उदार जीवन की गरिमा

संग्रह का मतलब है-स्वयं पर अविश्वास, ईश्वर पर अश्रद्धा और भविष्य की आज्ञा है। जब पिछले दिनों हम अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं का अर्जन करते रहे तो कल नहीं कर सकेंगे, इसका कोई कारण नहीं। यदि जीवन सत्य है तो यह भी सत्य है कि जीवनोपयोगी पदार्थ ईश्वरीय कृपा से अन्तिम साँस तक मिलते रहेंगे। नियति ने उसकी समुचित व्यवस्था पहले से ही कर रखी है। तृष्णा तो ऐसी बुद्धिहीनता है, जो निर्वाह के लिए आवश्यक साधन उपलब्ध रहने पर भी निरन्तर अतृप्तिजन्य उद्विग्नता में जलाती रहती है।

जिन्हें ईश्वर की उदारता पर विश्वास है, वे उदार बनकर जीते हैं। धरती अन्न उपजाती है-अन्न और वनस्पति उगाकर वह समस्त प्राणियों का पेट भरती है, पर यह नहीं सोचती कि मेरा भण्डार खाली हो जाएगा। उसकी यह उदारता सृष्टिक्रम के अनुसार लौटकर उसी के पास वापिस आ जाती है, प्राणी पृथ्वी के अनुदान का उपभोग तो करते हैं पर प्रकारान्तर से उसकी निधि उसी को वापिस कर देते हैं। मल-मूत्र, खाद, कूड़ा, मृत शरीर यह सब लौट कर धरती के पास आते हैं और उसकी उर्वरता को सौ गुना बढ़ा देते हैं।

बादलों का कोष कभी नहीं चुका, वे बार-बार खाली होते रहते हैं, पर फिर भर जाते हैं। नदिया उदारतापूर्वक देती हैं और यह विश्वास करती है कि उसका प्रवाह चलता रहेगा। अक्षय जल स्रोत उसकी पूर्ति करते रहेंगे। वृक्ष प्रसन्नतापूर्वक देते हैं और सोचते हैं कि वे ठूँठ नहीं होंगे। नियति का चक्र उन्हें हरा-भरा रखने की व्यवस्था करता ही रहेगा। कृपणता, संकीर्ण चिन्तन का ही नाम है। ऐसे व्यक्ति कुछ संग्रह तो कर सकते हैं पर साथ ही बढ़ती हुई तृष्णा के कारण उस सुख से वंचित ही रहते हैं जो उदार रहने पर उन्हें अनवरत रूप से मिलता रह सकता था।

पर्वत के उच्च शिखर पर निवास करने वाली चट्टान किसी को कुछ देती नहीं। वह अपनी सम्पदा अपने पास ही समेटे बैठी रहती है। अपनी विभूतियाँ किसी को क्यों दे, यह सोचकर रेतीली मिट्टी की अपेक्षा कहीं अधिक सुदृढ़, समर्थ चट्टान निष्ठुरता बरतती है और कृपण बनी रहती है, लेकिन जब वर्षा होती है, विपुल जलधार बरसती है तो रेतीली मिट्टी आर्द्र हो उठती है। उसकी तृषा तृप्त हो जाती है, पर चट्टान को उस लाभ से वंचित ही रहना पड़ता है। भीतर तो एक बूँद घुसती ही नहीं, बाहर जो नमी आती है उसे भी पवन एक झोंके में सुखा देता है, जबकि खेत की मिट्टी बाहर भी देर से सूखती है। भीतर तो सरसता का सुखद आनन्द चिरकाल तक लेती रहती है। मिट्टी ने कुछ खोया नहीं, चट्टान ने कुछ पाया नहीं। उदारता अपनाकर मिट्टी वरुण देव के स्नेह से अनायास ही सिक्त हो गयी और चट्टान को सूर्य का कोप सदा ही संतप्त करता रहा।

खिलते हुए पुष्प हमेशा ही हवा की झोली में अपना सौरभ भरते रहते हैं। अपने पराग से कीट, पतंगों, मधुमक्खियों की सतत् उदरपूर्ति करते हैं। ईश्वरीय व्यवस्था उन्हें कभी सौरभ और पराग की कमी नहीं होने देती। बहता हुआ पानी स्वच्छ रहता है, उसे लोग पीते और नहाते हैं। गड्ढे में रुका हुआ पानी सड़ जाता है, पीने योग्य नहीं रहता। कृपणता रुके हुए गड्ढे की तरह है, उसका संचय सड़कर दुर्गन्ध ही उत्पन्न करता है। गड्ढे की संकीर्णता में बँधकर जल देवता की भी दुर्गति होती है। ऐसी दुर्गति से बचें एवं उदार जीवन की गरिमा समझें। देते रहने का आनन्द पाएँ।


प्रशंसा योग्य मात्र भगवान

‘ईश्वर!’ इस शब्द के उच्चारण के साथ ही सम्राट विजयसेन ठठाकर हँस पड़े। उनकी हँसी में ईश्वरीय शक्ति एवं ईश्वर भक्तों के प्रति उपेक्षा, अवहेलना, अवमानना के साथ स्वयं के दम्भ की भारी गूँज थी। हँसी के थमते ही वे कहने लगे-”भगवान कायरों, आलसियों और शक्तिहीनों का आश्रय है। मैं उसे नहीं मानता। मेरी शक्ति सर्वोच्च है। मेरी सत्ता सर्वत्र हैं।” उनके इस कथन पर चाटुकारों ने हाँ में हाँ मिलायी। सभासद, मंत्रीगण, दरबारी सभी मुक्त कण्ठ से उनकी बढ़-चढ़कर प्रशंसा करने लगे।

दरबार में रहते हुए भी राजकवि सौमित्र इस चाटुकारी-चापलूसी से दूर ही रहते। सौमित्र महाकवि थे। उनकी काव्य साधना नीति, सदाचार एवं ईश्वर भक्ति के लिए समर्पित थीं। कई सभासद उनसे ईर्ष्या करते थे, लेकिन उनके सादे, सच्चरित्र एवं सहज सन्तुष्ट जीवन में ऐसा कुछ न था जिसके आधार पर उन्हें नीचा दिखाया जा सके। आज भी जब दरबार में चापलूसों का बड़बोलापन गूँज रहा था, तब भी वे मौन बने रहे।

उन्हें इस तरह मौन देखकर महाराज ने पूछा,”लगता है राजकवि को हमारी विजय की प्रसन्नता नहीं हुई?”

“ऐसा कैसे हो सकता है, महाराज!” राजकवि ने हाथ जोड़कर कहा। “तो फिर हमारी प्रशंसा में कविता क्यों नहीं सुना रहे?” राजा ने तनिक तीखे स्वर में कहा।

“क्षमा करें महाराज! मैं केवल ईश्वर की शक्ति की प्रशंसा करता हूँ। उन्हीं की शक्ति से आप विजयी हुए है।” महाकवि सौमित्र की वाणी में नम्रता थी। यह सुनकर राजा की भृकुटि तन गयी। उसने क्रोध से कहा-”सुना नहीं तुमने अभी मैंने ईश्वर के बारे में क्या कहा। ईश्वर कुछ नहीं हमारी इच्छा से नियुक्त हुए हो। या तो एक सप्ताह के अन्दर-अन्दर हमारी प्रशंसा में काव्य रचना करो, अन्यथा एक सप्ताह के बाद तुम्हें मृत्युदण्ड दिया जाएगा।”

सौमित्र उस समय चुप रहे। कुछ भी कहना राजा के गुस्से की बढ़ाना था। राजदरबार का समय समाप्त होने पर वे सीधे अपने गुरु महर्षि कृष्णापाद के यहाँ गए। कृष्णपाद महान ज्ञानी थे और भावुक हृदय ईश्वरभक्त। साथ ही वे योगविद्या में पारंगत थे। देश-देशान्तर में उनकी ऋद्धियों-सिद्धियों के बारे में अनेकों किंवदंतियां प्रचलित थीं। महर्षि का आश्रय नगर से दूर जंगल में था। आश्रम की ओर जाते समय सैमित्र मन ही मन सोच रहे थे कि मैं अपनी आत्मा की हत्या कर कुछ भी न लिखूँगा। में कवि हूँ। ईश्वर की स्तुति करता हूँ। ओछी चाटुकारिता करके माँ सरस्वती का अपमान नहीं करूंगा।

इसी चिन्तन में डूबे वे महर्षि कृष्णपाद के पास जा पहुँचे। महर्षि के चरणों में प्रणाम करते हुए उन्होंने संक्षेप में राजदरबार की घटना कह सुनायी। सब कुछ सुनकर महर्षि ने मुसकराते हुए कहा-”परेशान क्यों हो वत्स! जिस ईश्वर की स्तुति करते हो, उसी पर विश्वास रखो।”

दैवयोग की बात इस घटना के तीन दिन बाद ही राजमहल में हाहाकार मच गया। सौंप के काटने से राजा का इकलौता पुत्र मरणासन्न था। झाड़-फूँक, टोने-टोटके, हकीम-वैद्य सब बेकार साबित हो रहे थे। राजा बिलख रहा था, उसकी शक्ति और सत्ता सभी व्यर्थ सिद्ध हो रही थी, तभी पता चला सभासद एवं मंत्री भारी षड्यन्त्र करके उसे सत्ता से हटाने जा रहे हैं। दो चार दिन पहले दम्भ में चूर सम्राट विजयसेन आज असहाय था।

राजकवि ने जैसे ही इन घटनाओं के बारे में सुना, वे विकल हो उठे। वे भागे-भागे अपने गुरुदेव महर्षि कृष्णपाद के आश्रम में जा पहुँचे। उन्हें विश्वास था अनगिनत योग विभूतियों के स्वामी महर्षि कृष्णपाद अवश्य कुछ चमत्कार कर दिखाएँगे। महर्षि सारी बातों को सुनकर एक बार पुनः मुस्कराए और शान्त मन से महाकवि सौमित्र के साथ राजमहल की ओर चल पड़े।

राजकवि को देखते ही राजा विलुख पड़े-”राजकवि! ईश्वर ने मेरी आंखें खोल दीं। उसी की इच्छा से सब कुछ होता है। अब तक मैं व्यर्थ ही घमंड में डूबा था। इसी का दण्ड मुझे मिला है।”

“राजन्! ईश्वर केवल दण्डित ही नहीं करता, वह अनन्त करुणामय भी है।” राजकवि के पीछे खड़े महर्षि को विजयसेन ने अब तक देखा ही न था। उन्हें देखते ही वह प्रणाम करने झुके। उन्हें आशीष देते हुए महर्षि राजकुमार के पास आकर सिरहाने बैठ गए। युवराज के सिर पर हाथ रखे हुए वे गम्भीर ध्यान में डूब गए। घड़ी, पल गुजरते हुए लगभग एक घण्टा बीत गया। सभी स्तब्ध थे, तभी युवराज ने धीरे-धीरे आंखें खोल दीं। महर्षि ने अपने साथ लाए हुए किसी औषधि अर्क की कुछ बूँदें उसके मुख में टपकायीं। उसके अन्दर किसी नयी चेतना का संचार होने लगा। महर्षि धीरे से उठे-राजकवि के कान में कुछ कहते हुए वे धीरे से बाहर निकल गए।

राजा हतप्रभ था। इधर राजकुमार स्वस्थ हुआ, उधर राजकवि की सहायता से षड्यन्त्र का पर्दाफाश हो गया। अबकी बार राजा के हैरान होने की बारी थी। क्योंकि षड्यन्त्रकारियों में ज्यादातर वही लोग थे जो उसकी प्रशंसा और चाटुकारी में बड़ी-बड़ी बातें किया करते थे।

युवराज के पूर्ण स्वस्थ हो जाने पर तथा राजकार्य को ठीक ढँग से व्यवस्थित करके सम्राट विजयसेन राजकवि सौमित्र के साथ महर्षि के आश्रम में पहुंचे। महर्षि ने उनका स्वागत-सत्कार करते हुए उनकी मानसिक जिज्ञासाओं का समाधान करना शुरू किया-”राजन्। सर्वसमर्थ और शक्ति सम्पन्न सिर्फ परमात्मा ही है। सृष्टि के सभी प्राणी उसी की शक्ति का एक छोटा सा अंश पाकर शक्तिवान बनते हैं। प्रशंसा योग्य भगवान ही हैं, अन्य कोई नहीं। जो लोग किसी की अतिशय प्रशंसा करते हैं, वे निश्चित ही स्वार्थ प्रेरित होते हैं। ऐसे लोगों से सावधान रहने में ही भलाई है।” महर्षि के इन वचनों से सम्राट के विवेक चक्षु खुल गए। वे उन्हें प्रणाम करते हुए राजकवि सौमित्र के साथ नगर की ओर चल पड़े।


महाकाल के कालदण्ड के रूप में उदित ये अंतरिक्षीय हलचलें

अन्तरिक्ष की जो हलचलें मानव को उसके चिरअतीत से प्रभावित करती रही हैं, उनमें धूमकेतुओं का महत्व सर्वोपरि है। पिछले मई अंक में इसकी परिचयात्मक चर्चा की गयी थीं। हेल बाप्प की परिचर्चा हर किसी ने न केवल इन दिनों सुनी है, बल्कि अनन्त आकाश में उसके सौंदर्य के नजारे भी देखे हैं। धूमकेतुओं का यह इतिहास भी बड़ा ही अजीबोगरीब है। इनका उदय अनेक देशों में, अनेक रूपों में लिया जाता है। सभी मान्यताओं को भली-भाँति जाँचने-परखने पर यह स्पष्ट होता है कि यह प्राकृतिक उथल-पुथल का संकेत चिह्न है। उनके दिखाई देने की अवधि में अगणित शासकों का पतन हुआ और सभ्यता ने कष्टकारी वेदना झेली। अनेकों अनुभवों से जनमानस में यह मान्यता ही बन गयी कि धूमकेतुओं का उदय भूकम्प, बाढ़, अनावृष्टि, हिंसा, मार-काट का भूचाल लेकर आता है। सीजर की हत्या, चार्ल्स मैग्ने की मौत का सम्बन्ध इन्हीं से जोड़ा जाता है। लास ऐंजेलिस के साइकिक आई के रूप में विख्यात मैरीकाश का कहना है कि धूमकेतु का प्रभाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी पर अवश्य पड़ता है।

विभिन्न देशों में अनेकों किम्वदंतियों एवं अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखे जाने वाले धूमकेतु का इतिहास बड़ा ही रहस्यमय एवं विचित्र है। इसके बारे में ‘मेसाचुशेट्स इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ के अन्तरिक्षविद तथा विश्वविख्यात उपन्यासकार एलेन लाइटमेन ने कहा है कि , इस दूरस्थ आकाशीय पिण्ड का सम्बन्ध हमारे अतीत से जुड़ा हुआ है। आज का यह चमकता परिदृश्य आने वाले कल के लिए अतीत बन जाएगा और अपने साथ अनेकों रहस्यमय घटनाओं को समेटे रहेगा। अन्तरिक्ष वेत्ताओं के अनुसार हेल-बाप्प का प्रथम दर्शन आज से 2213 बी.सी. वर्ष हुआ था।पुरातत्ववेत्ता हेनरिक स्कलीमेन ने हेल बाप्प के साथ ग्रीक शासकों के पतन-पराभव लम्बा-चौड़ा आँकड़ा पेश किया है। 1594 ई. में डोमेनीको कोन्टाना पर भी इस धूमकेतु का कष्टकारी प्रभाव पड़ा, ऐसा इतिहास विशेषज्ञ मानते हैं। उल्लेखनीय यह है कि विश्व घटनाचक्र का विश्लेषण करने वालों के अनुसार धूमकेतु का प्रभाव सिर्फ अपशकुनात्मक ही नहीं होता, महत्वपूर्ण घटनाएँ भी इसी अवधि में घटती हैं। ये विशेषज्ञ लोग इस काल में हेल बाप्प की सबसे बड़ी उपलब्धि गीजा के पिरामिड को मानते हैं। क्योंकि इसी दौरान ही इस पिरामिड का निर्माण सम्भव हुआ था।

हेल बाप्प धूमकेतु का उदय धर्म, राजनीति, समाज तथा विज्ञान के क्षेत्र में विभिन्न परिवर्तनों को लेकर हुआ। इससे समस्त पृथ्वी में हलचल मच गयी। कहीं परिवर्तन अच्छे हुए तो कहीं विनाश के बाद सृजन का स्वरूप बन पड़ा। 2213 बी.सी. में जब इसे पहले-पहल देखा गया था, तब इसके कुछ ही समय के पश्चात् रोम तथा एथेंस के साम्राज्यों की नींव पड़ी। इनके प्रतीक के रूप में मेयान. एनकान और एजटेक सभ्यता का अस्तित्व अभी तक देखा जा सकता है। उसी समय सम्पूर्ण यूरोप में कृषि का प्रचलन हुआ। इलिपियास घाटी का विकास, अलास्का की सभ्यता, सिन्धु घाटी की सभ्यता तथा इजिप्ट व चीन तो इसे बेहद प्रभावित हुए।

2293 ईसा पूर्व राजनैतिक, आर्थिक व तकनीकी विभिन्नताओं का दौर था। जब भी धूमकेतुओं का उदय हुआ, उसी के आस-पास प्रकृति में भारी परिवर्तन दृष्टिगोचर हुए हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के मानवविज्ञानी सी. सी. लैम्बर्ग कार्लोवस्की ने भी धूमकेतु को प्राकृतिक घटनाक्रमों में भारी उथल-पुथल का संकेत माना है। कार्लोवस्की के अनुसार जब भी इनसान धर्म के पथ का परित्याग करके अधर्म और अनर्थ का ताण्डव-नर्तन करने लगता है, तभी प्रकृति उन्हें सचेत करने के लिए धूमकेतुओं द्वारा संकेत देती है। कार्लोवस्की इसी वजह से इन धूमकेतुओं को प्रकृति एवं परमेश्वर के क्रोध का परिचायक भी मानते हैं। ये धूमकेतु युग-प्रत्यावर्तन करने, भगवान महाकाल के कालदण्ड बनकर उदित होते हैं।

सुविख्यात पुरातत्ववेत्ताओं का समुदाय 2213 ईसा पूर्व, यानि कि आज से लगभग 4230 वर्ष पहले हेल बाप्प के उदय होने के समय प्रकृति हेल बाप्प के उदय होने के समय प्रकृति में भीषणतम हलचलों की रेखाँकित करते हैं। ये शान्ति का स्वप्न इसके बाद देखते हैं। 2213 बी. सी. में चीन, इजिप्ट,/ मेसोपोटामिया उत्तरीपेरु, सिन्धु घाटी आदि की सभ्यताएँ अपने यौवन पर थीं। इसके बावजूद इनमें अपनी सभ्यताओं के गर्व की मदान्धता भी आ गयी थी। इसी के साथ इनके अवसान और पतन की शुरुआत हुई। इसे हेल बाप्प के आगमन के साथ इतिहासवेत्ता एवं पुरातत्वविद् जोड़ते हैं। उस समय के कुछ उच्च प्रतिष्ठित ज्ञानी लोग तो राजा या शासक के भाग्य को धूमकेतुओं पर लिखा हुआ मानते हैं। हालाँकि उस युग में भी इस विषय पर काफी मतभेद और मत-मतान्तर प्रचलित थे।

सभ्यता के विकास के साथ धूमकेतु का प्रभाव परिलक्षित होने को प्रायः सभी इतिहासवेत्ता एवं नृतत्वविज्ञानी एक स्वर से स्वीकार करते हैं। उन दिनों हेल बाप्प के दर्शन के समय इजिप्ट के छठवें साम्राज्य का पतन हुआ। उन दिनों इजिप्ट की राजधानी कैरो के पास मेम्फीस में स्थित थी। इसी अवधि में 2575 ईसा पूर्व के आस-पास खुफु ने गीजा के महान पिरामिड का निर्माण कराया था, जो अब भी तपते रेगिस्तान के बीच सैकड़ों सालों से सीधा खड़ा है। राजा एवं राज्यपरिवार के मृतक सदस्यों के गीजा, स्क्वैराह, मेडम, दसूर एवं अवुसीर में कब्रगाह बनाए गए। 14 साल राज्य शासन कर लेने के पश्चात् येदी द्वितीय ने अपने स्थान पर छह साल के राजकुमार को पदासीन किया। इसी के साथ 1252 ईसा पूर्व में भीषण भूकम्प ने तबाही मचा दी थी।

2213 ईसा पूर्व में जबकि हेल बाप्प का स्पष्ट प्रभाव था, कतिपय विशिष्ट ख्यातिलब्ध इतिहासकारों एवं पुरातत्ववेत्ताओं ने विज्ञान, धर्म, राजनीति, समाज व आर्थिक स्थिति के तीव्र एवं व्यापक परिवर्तनों को चित्रित किया है। उन दिनों अल्काड सभ्यता में धतुविज्ञान, कृषि आदि का विकास हो चुका था। केन्द्रीय प्रशासन अनेक छोटे-छोटे राज्यों का नियंत्रण करता था। नगर देवता कृषिदेव आदि के रूप में बहुदेववाद तथा हेपौटोस्क्रोपी का प्रचलन था। व्यापार भी विकासशील अवस्था में पहुँच चुका था। चीन में वैज्ञानिक टेक्नोलॉजी, सिंचाई, धातुकर्मी, संगीत तथा ज्योतिर्विज्ञान की उन्नति इसी काल में हुई। शासन व्यवस्था का सुचारु रूप इन सभ्यताओं में इसी समय विकसित किया। शासन कृषकों पर विशेष रूप से ध्यान देने लगा था। ईश्वर में आस्था एवं विश्वास पैदा करने वाली दार्शनिक प्रणाली इन सभ्यताओं में इसी समय विकसित और प्रचलित हुई।

इसी काल में व्यापारिक प्रणाली एवं धनाढ्य कृषक वहाँ की विशेषता बन गए। इजिप्ट की शासन व्यवस्था उन दिनों धार्मिक लोगों पर आश्रित-अवलम्बित थी। फरोह को शक्तिशाली देवता तथा पैथिअथस को शासन व्यवस्था के देवता के रूप में पूजा जाता था। कृषक नौकरशाही को नियंत्रित करते थे और व्यापार राज्य के अन्दर ही होता था। सिन्धु घाटी की सभ्यता उस समय उच्चस्तरीय थी। मोहन जोदड़ो उन्हीं दिनों अपनी बहुमंजिली इमारत के लिए प्रसिद्ध हुआ। समुद्री यात्रा का प्रचलन उस काल की विशेषता मानी जा सकती है। म्यूनिसिपल प्रशासन खाद्य संग्रह, श्रम विभाजन तथा सार्वजनिक कार्यों का परिचालन करती थी। शिव जैसे देवताओं तथा अन्यान्य दैवी शक्तियों की उपासना के प्रचलन ने अपना विश्वव्यापी आधार बनाया।

इन तथा का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञों का मत है कि धूमकेतुओं का उदय महाकाल की संक्रमण लीला का द्योतक है। इस अवधि में विध्वंस एवं सृजन की घटनाएँ एक साथ घटित होती हैं। एक तरफ खंडहर ढहाए जाते हैं तो दूसरी तरफ विशालकाय गगनचुम्बी अट्टालिकाओं के लिए नींव भरी जाती है। भीषणतम विनाश के साथ नव-निर्माण के सरंजाम जुटाए जाना इस समय की विशेषता होती है, जिसका संकेत देने के लिए धूमकेतु अन्तरिक्ष में उदय होते हैं। इस अवधि में प्राचीनता में पड़ती दरारें उभरती दरकनें किसी नवयुग के अभ्युदय की पूर्व सूचना देती है। जिसके संकेत बनकर ये धूमकेतु उभरते हैं।

‘न्यूयार्क मेट्रोपोलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट’ के इजिप्टोलाँजिस्ट जेम्स एलेन ने 2600 ईसा पूर्व पिरामिड में उल्लेख किए गए तथ्यों को स्पष्ट किया है। इनके अनुसार उस समय जब धूमकेतु का उदय हुआ तो एक राजा की मृत्यु हो गयी। एलेन ने इसका वर्णन कुछ इस प्रकार किया है कि राजा जब अपने अधिकार एवं शक्ति का दुरुपयोग करता है, तो उसके देवता धूमकेतु के रूप में चेतावनी देते हैं। धूमकेतु का प्रभाव यहाँ इसी तरह हुआ माना जाता है।

इस अवधि में किसानों को अधिकतम दरों का भुगतान करना पड़ता था। उन दिनों नील नदी में भीषण बाढ़ आयी थी, फिर भी पिरामिड के लिए विशालकाय प्रस्तर खण्डों को बाहर से लाना पड़ता था। किसानों एवं मजदूरों की स्थिति एकदम चिन्ताजनक थी। इन तमाम तथ्यों का उल्लेख पिरामिड में अंकित मिलता है। जिसमें धूमकेतु के प्रभाव का भी जिक्र है। इसके पश्चात् पेपी के राज्यावधि में अफ्रीका का अन्य देशों से व्यापारिक समझौता हुआ और स्थिति परिवर्तित हुई।

ऐतिहासिक उल्लेख के अनुसार चीन में 2205 ईसा पूर्व झीया साम्राज्य के पतन के पीछे धूमकेतु को कारण माना जाता है। इसी दौरान चीन नीओलिथिक काल-प्रस्तर युग तथा प्रारम्भिक काँस्य युग के बीच झूल रहा था। छोटे-छोटे राज्य आपस में खूनी लड़ाई लड़ रहे थे। समाज हत्या और लूटपाट से त्रस्त था। चीन के लिए यह बड़ा कठिन व कष्टप्रद समय था। धूमकेतु के नाम पर चीन में अनेकों मान्यताएँ प्रचलित हैं। यहाँ के साठ वर्षीय कैलेण्डर साइकिल 2600 ईसा पूर्व धूमकेतुओं की गणना पर आधारित हैं। हार्वर्ड के पुरातत्ववेत्ता राबर्ट मुरोवचीक के मतानुसार धूमकेतु के उदय काल के आस-पास काँस्य युग में कई शासकों व साम्राज्य में तीव्र परिवर्तन हुए। धूमकेतु की ही भाँति ग्रहण को भी चीन में परिवर्तन एवं फेर-बदल का सूचक मानते हैं।

लेडीग विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डेवडि फेंकनीयर का कहना है कि ग्रहण के समय चीनी धरती के अन्दर संग्रहित सम्पदा की खोज में लग जाते हैं। वहाँ के जनमानस में धूमकेतु को काफी भयातुर ढंग से देखा जाता है। राजनैतिक परिदृश्य के परिवर्तन की आशंका तीव्रतम हो जाती है।

धूमकेतु के इस काल में वहाँ नगरीकरण की क्रान्ति सम्पन्न हुई। येल विश्वविद्यालय के विज्ञानी बेंजामिन फास्टर ने मेसोपोटामिया के अक्केडत्री की परंपराओं को प्रकाशित किया है। आजकल यह क्षेत्र दक्षिणी ईराक को माना जाता है। फास्टर के मुताबिक धूमकेतु जब उदय होता है तो भावी जीवन के बारे में जानने की लालसा लोगों में बढ़ जाती है। इस लालसा का कारण परिस्थितियों में व्यापक अस्थिरता का होना ही है। फास्टर ने इस क्रम में मेसोपोटामिया के लोगों का आगे वर्णन करते हुए लिखा है कि वहाँ के प्रशासक राजा नरम सूएन ने धूमकेतु सम्बन्धी परम्परा का उल्लंघन करने का अपूर्व साहस दिखाया। लेकिन जन विद्रोह के सामने उसे मुँह की खानी पड़ी और अपनी राजसत्ता से हाथ धोना पड़ा।

इतिहास विशेषज्ञों का कहना है कि हेल बाप्प के उदय के समय ही मेसोपोटामिया के अक्कड़ नगर का विकास हुआ। यह विश्व का सर्वप्रथम नगर था जहाँ धातु विज्ञान, पीतल के आभूषण, ताम्बे का उत्खनन व युद्ध सामग्रियों का अच्छा विकास हुआ था। एक सुमेरियन ने जब उस नगर का भ्रमण किया तो वहाँ के विकास से हतप्रभ रह गया। अक्कड़ के प्रशासक सेर-कली-शेरी ने जहाँ एक ओर बुचानेनाइट के साथ स्वतन्त्र व्यापार तथा केरेवान मार्ग पर डाकुओं के आतंक को समाप्त किया वहीं स्वयं भी कालचक्र के हाथों अपने को गँवा बैठा। उस समय का इतिहास इसे धूमकेतु का प्रकोप मानता है।

इन्हीं दिनों इण्डस वैली की हड़प्पा सभ्यता में भी नगरीय क्रान्ति हुई। वहाम् का प्रमुख शहर मोहनजोदड़ो था। इस नगर का बाढ़ के कारण नौ बार पुनर्निर्माण किया गया। इसकी विशेषता थी-इसे बहुमंजिला एवं योजनाबद्ध रीति-नीति से बसाया जाना। जहाँ पर सुरक्षा एवं साधन के तमाम सरंजाम मौजूद थे। बाजार उस समय की अत्याधुनिक सामग्रियों से भरा रहता था। वेतनभोगी सरकारी कर्मचारी नियुक्त किए जाते थे। मोहनजोदड़ो में धूमकेतु का दिखना दैवी प्रकोप माना जाता था। जहाँ की सभ्यता में धार्मिक भाव प्रवलतर था। मन्दिर नहीं थे परन्तु घर-घर उपासना की पद्धति अपनायी जाती थी। यहाँ के लोग भगवान शिव की आराध्य देवता के रूप में पूजा करते थे। धूमकेतु के अनिष्टकारी प्रभावों से बचने के लिए इस उपासना को सर्वमान्य स्वीकृति थी। इस समय यहाँ 40 हजार आवास अवस्थित थे। धूमकेतु के उदय के समय से मोहनजोदड़ो को अपनी विकास की चरमसीमा प्राप्त करने के लिए तकरीबन सौ सालों का सफर तय करना पड़ा।

अतः इतिहासकारों एवं पुरातत्व वेत्ताओं के निष्कर्षों से स्पष्ट होता है कि हेल बाप्प ने इजिप्ट के शासन, एण्डस घाटी की स्थिति एवं चीन आदि देशों को बुरी तरह से झकझोर दिया था। मोहनजोदड़ो एवं मेसोपोटामिया का विकास भी इसी दौर में हुआ। इसका तात्पर्य यह है कि संक्रमण लीला के संदेशवाहक हेल बाप्प के उदय के साथ ही विनाश एवं सृजन की लीलाएँ चलती रहीं। एम. आई. टी. के लाइटमेन के अनुसार, हेल बाप्प एक आकाशीय पेण्डुलम के समान है जो सेकेंड-मिनट और घण्टों में नहीं वरन् मानवीय सभ्यता के उत्थान-पतन के टिक-टिक के साथ चलता है। उत्तरी कैलीफोर्निया के तकनीकी विशेषज्ञ पाल सैफोने सम्भवतः इसी वजह से इस धूमकेतु को एक चमत्कारिक पिण्ड के रूप में वर्णित किया है।

धूमकेतु के धरती पर पड़ने वाले प्रभावों का हार्वर्ड स्थिसोनियन सेण्टर के एस्ट्रोफिजिक्स विभाग ने हेल बाप्प की वर्तमान उपस्थिति पर गहन अनुसंधान किया है। उनके अनुसार इस बार भी 25 मील चौड़ा और लगभग 200 मील लम्बा यह हेल बाप्प मानवीय सभ्यता पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाएगा। इसका अतीत एवं इतिहास बड़ा ही भयंकर व विप्लवी है। 650 लाख वर्ष पूर्व ऐसे किसी पाँच मील चौड़े धूमकेतु ने युकाटान पेरीनसुला में गिरकर समस्त डायनोसौर जाति को समूल नष्ट कर डाला। सन् 1908 में 200 फुट की चट्टान साइबेरिया के तुगंस्कर में गिरने से हजारों मील का जंगल ध्वस्त हो गया। अन्तरिक्ष शास्त्रियों के अनुसार, आधा मील चौड़े एक उल्कापिण्ड ने सूर्य पर सतत् उत्पात मचाया, जिसकी वजह से सौरमण्डल में वर्षों प्रकाश की दर्शन नहीं हो सका। ऐसी घटना एक लाख साल बाद होती है। इसके दुबारा 2000 के आस-पास घटित होने की सम्भावना है। इस प्रकार स्वच्छन्द विचरण करने वाले आकाशीय पिण्डों से यदा-कदा तो धरती के अस्तित्व का ही प्रश्न उठ खड़ा होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी के पास में मंडराने वाले तथा तकरीबन आधे मील चौड़े उत्पाती पिण्डों की संख्या लगभग 300 आँकी गयी है। इसमें एक भी तबाही के लिए पर्याप्त हो सकता है।

अमेरिका में धूमकेतु एवं आकाशीय पिण्डों पर सतत् नजर रखने के लिए (एन.ई.ए.टी.) कार्यक्रम चलाया है। नासा के डेविड मौरिसन अन्तरिक्ष के दस फीसदी भाग का गहन अनुसंधान कर लेता है। इसके लिए दोनों गोलार्द्ध में तीन-तीन उच्चस्तरीय एवं बेहद संवेदनशील टेलिस्कोप तैनात किये गए है। इसमें एक दूरबीन पर प्रतिवर्ष 100 लाख डालर का खर्च आता है। लाल ऐलयानस नेशनल लैबोरेटरी के ग्रेन केनाबाइन ने कहा है कि उल्का पिण्ड खतरनाक होते है। इन्हें धरती से सुरक्षा हेतु बचाने के लिए कई प्रकार के कार्यक्रम चलाए जाते हैं। काइनेटिक प्लाण्ट द्वारा इन्हें पृथ्वी से दूर खदेड़ा जा सकता है। प्राकृतिक कारणों से भी ये अपना कुछ परिवर्तन कर डालते हैं। सौर तूफान भी इसकी दिशा को परिवर्तित कर देता है। पृथ्वी और चन्द्रमा का संयुक्त बल भी इन्हें हट जाने के लिए बाध्य करता है। इन्हें नाभिकीय विखण्डन द्वारा भी नष्ट किया जा सकता है। जो भी हो उल्कापिण्ड एवं धूमकेतु पृथ्वी के लिए हर-हमेशा भारी उथल-पुथल का संकेत लेकर आते हैं।

हेल बाप्प की उपस्थिति भी कुछ ऐसा ही संकेत कर रही है। इतिहास वेत्ताओं एवं पुरातत्त्वविदों एवं दार्शनिकों द्वारा प्रदत्त इन अन्वेषणों को एकदम झुठलाया नहीं जा सकता। यह ठीक है कि वैज्ञानिकों भी इसके बारे में अपनी परिकल्पना में व्यस्त है। उन्होंने भी इसके बारे में काफी कुछ आँकड़े इकट्ठे कर लिए हैं। उनके अनुसार हेल बाप्प में उपस्थित रासायनिक तत्व ग्रहों की उत्पत्ति का रहस्योद्घाटन कर सकते हैं। विज्ञानविदों ने इसे सौरमण्डल का नटखट बालक कहा है, क्योंकि यह सदा बालकों के समान भ्रमण करता रहता है। कुछ वैज्ञानिक हेल बाप्प की उपस्थिति सौर मण्डल से भी 4.6 अरब वर्ष पूर्व

मानते हैं। ग्रह विशेषज्ञों ने इसमें उपस्थित कुछ विशिष्ट अणुओं के कारण इसके वेवलेन्थ को विश्लेषित किया है। प्रयोगोपरान्त स्पष्ट हुआ है कि हेल बाप्प की यह विशिष्टता किसी अन्य धूमकेतु से काफी भिन्नता रखती है। इस निष्कर्ष से इस बात की भी खुलासा होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि हेल बाप्प कभी पृथ्वी से टकराया था। सम्भव है इसी अवधि में इसमें समुद्र के जलकण एवं कार्बनिक तत्व अवशेष के रूप में दिखाई दे रहे हैं।

वैसे अभी इस सम्बन्ध में किए गए वैज्ञानिकों के अन्वेषण-अनुसंधान कार्य की शुरुआत भर है। फिर भी ये सभी विज्ञानवेत्ता भी अपने इस क्रम में किसी विशेष रहस्योद्घाटन की आशा लगाए है। इतिहासकार एवं पुरातत्व विज्ञानी इस बारे में हेल बाप्प के अतीत से कुछ सीखने की प्रेरणा देते दिखते हैं। इस सम्बन्ध में दिव्यदर्शियों का स्पष्ट मत है कि हेल बाप्प की उपस्थिति प्राकृतिक एवं सामाजिक घटनाक्रमों में व्यापक उथल-पुथल के संकेत दे रही है। जीवन को सभी स्तरों में विनाश एवं सृजन का दौर साथ-साथ चलेगा। हेल बाप्प के उदय के समय से लेकर अब तक यदि राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में यदि राजनैतिक, सामाजिक, साँस्कृतिक उलटफेर का आकलन-विश्लेषण किया जाय तो कथन की प्रामाणिकता अपने आप ही समझ में आने लगेगी। ध्यान रहे क्रान्तियाँ माल-गाड़ी के डिब्बों की तरह एक के बाद एक आने वाली हैं। पुराने के टूटने-दरकने नष्ट होने के साथ ही नवयुग के अभ्युदय, अरुणोदय का संदेशवाहक बनकर हेल बाप्प अन्रिक्ष में आ टिका हुआ है। उसके संकेत को समय रहते हुए समझकर भवितव्यता के अनुरूप स्वयं को ढालने में ही समझदारी है।


माटी खुदी करें दी यार

अरब देश की छोटी-सी रियासत गुलबाद, वहाँ के बादशाह के कारनामों की वजह से बहुत मशहूर थी। बादशाह की आदतें भी अजीबो-गरीब थीं। अपने शयनकक्ष के पलँग में ताजे सुगन्धित पुष्प बिछवाकर सोना उसका प्रिय शौक था। यह कार्य फातिमा नाम की एक दासी करती थी।

एक शाम फातिमा बादशाह के पलँग को सजा रही थी। तभी उसके दिमाग में विचार आया कि इस पलँग पर सोने का कैसा आनन्द आता है? यह सोचकर वह उस पलँग पर लेट गई। दिन भर के परिश्रम से थकी होने के कारण फातिमा को पलँग पर लेटते ही निद्रा ने घेर लिया। वह काफी देर तक गहरी नींद में सोती रही।

अकस्मात बादशाह ने शयनकक्ष में प्रवेश किया तो दासी फातिमा को पुष्पों से सज्जित अपने पलँग पर खर्राटे भरते देखा। अदना-सी दासी की ये जुर्रत कि बादशाह की शान में गुस्ताखी करें। वह आग-बबूला हो गया और हंटर उठाकर फातिमा पर कोड़े बरसाने लगा। दासी कोड़ों की मार से क्षमा-याचना करती हुई रुदन करने लगी। लेकिन बादशाह रुकने का नाम नहीं ले रहा था। वह गिड़गिड़ाते हुए लगातार प्राणों की भीख माँग रही थीं, लेकिन उसकी निष्ठुरता राई-रत्ती भी न पिघली।

पर आश्चर्य, कोड़ों की मार खाती हुई दासी ने थोड़ी देर बाद रोना छोड़कर हँसना शुरू कर दिया। बादशाह ज्यों-ज्यों कोड़े मारता दासी खिलखिलाकर हँसती। दासी के इस अचानक हँसने पर बादशाह आश्चर्यचकित हो गया। उसने कोड़े मारना छोड़ा और पूछा-”दासी अभी तो तू कोड़ों की मार से चीख रही थी और अब ठठाकर हँस रही है। इसकी क्या वजह है।?”

फातिमा ने कहा-”हुजूर जब मैं आपके पलँग को फूलों से सजा रही थी तो मेरे दिल में इस पलँग पर कुछ देर लेटकर आनन्द अनुभव करने का विचार आया। मैं आपके फूलों से सजे पलँग पर लेट गयी तो मुझे मालूम नहीं कि कब नींद की गिरफ्त में आ गयी। कोड़े की मार से हड़बड़ाकर मेरी नींद खुली। आप कोड़े बरसाते रहे, मैं चीख-चीखकर विलाप करती रही। फिर अचानक मेरे मन में विचार आया कि, अरी बाबरी, तू तो इस पलँग पर थोड़ी ही देर लेटी है। इसके परिणाम में तुझे अनगिनत कोड़े पड़ रहे हैं, परन्तु जो बादशाह सारी जिन्दगी इस पलँग पर सोता रहा। उसका खुदा क्या हाल करेगा। उसको तो कयामत तक अनगिनत कोड़ों की सजा भुगतनी पड़ेगी। बस हुजूर इसी ख्याल से मैं जोर-जोर से हँसे जा रही हूँ।”

फातिमा के इस कथन से बादशाह चौंक गया। वह निष्ठुर और सनकी भले ही था, लेकिन न्यायप्रिय भी था। दासी की बातों में उसे सच्चाई नजर आयी। विलासिता के साजो-सामान ऐशो-आराम के पीछे छुपी हुई ईश्वरीय दण्ड-व्यवस्था की झलक उसे मिल गयी। निःसन्देह वैभव-विलास तो हजारों-लाखों गरीबों को सताकर ही तो इकठ्ठा किया जाता है। इसके दण्ड का भागीदार कौन होगा?

उसने ठण्डे दिमाग से सोचा कि दासी सच बात कह रही है। मैंने जीवन को फूलों की सेज पर ही रखा है, काँटों पर रखकर नहीं देखा। मैं फूलों की सेज त्याग दूँगा। फातिमा की सीख ने मेरी आँखें खोल दी हैं। उसने अपनी सोच से उबरते हुए दासी से क्षमा माँगी। अब उसे फकीरी रास आ चुकी थी। वह राज-पाट छोड़ कर गुरु की खोज में रवाना हो गया।

इस खोज में उसके पाँव हिन्द की ओर मुड़े। लाहौर के पास एक घने वन में उसे एक कुटिया दिखाई दी। उसे तीव्र प्यास लग रही थी। पानी पीने की आशा से वह कुटिया पर पहुँच गया। वहाँ एक फकीर ध्यानमग्न बैठे थे। बादशाह ने उनसे पानी पिलाने की विनती की। पास खड़े फकीर के शागिर्द ने उसे पानी पिलाया और खाने को कुछ फल दिए। बादशाह ने सोचा कि इतने घने वन में ये फकीर पतस्यारत है। मैं इन्हें ही अपना गुरु बनाऊँगा। वह वहीं पर बैठकर फकीर बाबा के उठने की प्रतीक्षा करने लगा।

लम्बी प्रतीक्षा के बाद मुनि ध्यान से उठे तो उन्होंने वहाँ बैठे बादशाह से कारण पूछा कि तुम यहाँ क्यों बैठे हो? बादशाह बोला, “फकीर बाबा मैं आपको गुरु बनाना चाहता हूँ। मैं गुलबाद का बादशाह हूँ। मुझे वैराग्य हो गया है।”

फकीर तो त्रिकालदर्शी थे, उन्हें सारी घटना की जानकारी हो गयी। वे मुस्कराए और कहा कि हम तुम्हें अपनी सेवा में रख लेते हैं। अगर तुम योग्य हुए तो हम तुम्हें अवश्य ही अपना शिष्य बनाएँगे। फकीर की इस वाणी को सुनकर वह तन-मन से फकीर की सेवा में लग गया।

सेवा करते हुए उसे काफी दिन बीत गए। एक दिन फकीर ने बादशाह की परीक्षा लेने की सोची। फकीर ने अपने एक शागिर्द से बादशाह के सिर पर कूड़ा-करकट डालने को कहा। उस शागिर्द ने बादशाह के सिर पर सुबह ही बहुत-सा कूड़ा-करकट डाल दिया। सिर पर कूड़ा पड़ते ही उसका राजसी अहंकार जाग्रत हो गया। गुस्से में भरकर उसने कूड़ा डालने वाले से कहा, “अगर मेरा राज्य होता तो ऐसा करने वाले के हाथ कटवा देता।”

फकीर यह सब नजारा देख रहे थे। वे बोले-”अभी तुम शिष्य बनने और ज्ञान प्राप्ति के

लायक नहीं हो। तुममें अभी इतना राजसी अहंकार है कि तुम इतनी गलती पर हाथ कटवा सकते हो। तुम इस थोड़ी-सी मिट्टी से इतनी घृणा करते हो, मृत्यु के बाद तो तुम्हारा ये सुन्दर शरीर भी एक मिट्टी का ढेर हो जाएगा।”

बादशाह फिर से फकीर की सेवा में तत्पर हो गए। फकीर के बताए हर छोटे-बड़े काम को वे भक्तिपूर्वक करने लगे। अगली बार जब फकीर बाबा के संकेत से उन पर पहले की भाँति मिट्टी-कूड़ा डाला गया तो वह बोला-”हे, भाई! आपने मिट्टी डालने का इतना कष्ट बेकार उठाया। आप आज्ञा देते तो इस मिट्टी के टोकरे को मैं स्वयं ही अपने सिर पर डाल लेता। आपके हाथों को बहुत पीड़ा हुई होगी।” बादशाह से यह सुनकर फकीर बाबा अति प्रसन्न हुए और बोले-”बेटे अब तुम शिष्य एवं ज्ञान प्राप्ति के योग्य हो। एक परम ज्ञानी के लिए अहंकारी कदापि नहीं होना चाहिए।” फकीर से वे दीक्षा पाकर सन्त बुल्लेशाह कहलाए। अपने अनुभव का ज्ञान करते हुए उन्होंने कहा-

माटी खुदी करें दी यार। माटी जोड़ा, माटी घोड़ा, माटी दा असवार॥

माटी माटी नूँ मारण लागी, माटी दे हथियार। जिस माटी पर बहुती माटी, तिस माटी अहंकार॥

माटी बाग, बगीचा, माटी दी गुलजार। माटी-माटी नूँ देखण आई, है माटी दी बहार॥

हंस खेल फिर माटी होई, पौड़ी पावे पसार। बुल्लेशाह बुझारत बुझी, लाह सिरों मा मार॥

दासी की सीख एवं गुरु की सेवा से अब उनके अन्दर ज्ञान ज्योति जगमगाने लगी थी।


आत्मतत्व को वैज्ञानिक भी अब स्वीकार करने लगे हैं।

चेतना के स्वरूप को जानने की जिज्ञासा दार्शनिकों को ही नहीं वैज्ञानिकों को भी है। वर्तमान शताब्दी के इस अन्तिम दौर में इस जिज्ञासा और इससे सम्बन्धित परिचर्चाओं ने कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ा है। इनमें से ज्यादातर लोगों की मान्यताएँ हैं कि हमारी विचारशक्ति, भाषा सामर्थ्य, सामाजिक व्यवस्था, संस्थाएँ मस्तिष्क के स्थूल स्वरूप एवं बनावट पर निर्भर करती हैं, लेकिन इसके साथ ये लोग यह भी मानते हैं कि मस्तिष्क की कार्यप्रणाली न्यूटन के याँत्रिक सिद्धान्तों पर आधारित है तथा वह मात्र पर्सनल कम्प्यूटर की भाँति काम करता है।

किसी वस्तु को पहचानना, प्रसन्नता तथा दर्द की अनुभूति, ऐच्छिक एवं स्वसंचालित क्रियाएं सामान्य मानवीय सामर्थ्य में आती हैं। इस अनुभूतियों के लिए हमारा मस्तिष्क पशुओं के मस्तिष्क के समान कार्य करता है, किन्तु इनसान में अन्य विशेषताएँ भी हैं-जैसे तर्कबुद्धि (प्रज्ञा), कल्पनाशक्ति, किसी बात को गहराई से समझने की सामर्थ्य, प्रेम करना आदि। इसके अतिरिक्त सौन्दर्यात्मक, भावात्मक, आध्यात्मिक विषयों पर विचार करने की शक्ति सिर्फ मनुष्य को ही मिली है। आत्मानुभूति शारीरिक नश्वरता का ज्ञान आदि अनेकों उच्चस्तरीय अनुभव यह दर्शाते हैं कि मानवीय चेतना का स्त्रोत जितना स्थूल कलेवर में है, उससे बढ़कर कुछ और भी है।

अनुभवों का यह वैचित्र्य केवल बुद्धि के दायरे में सिमटा-बँधा नहीं है, बल्कि कहीं और भी है। वैज्ञानिकों का समुदाय-इस कहीं और को चेतना मानने के लिए विवश है। आज तक न तो किसी मशीन, न ही किसी ऐसे कम्प्यूटर का निर्माण हुआ है, जिसके पास चेतना हो। मशीनें चेतना द्वारा अनुभूत कुछ अनुभवों पर आधारित क्रियाओं की नकल कुछ हद तक ही कर सकती हैं, किन्तु उनके पास स्वयं अनुभवों को प्राप्त करना कल्पनातीत हैं। हम यह कल्पना नहीं कर सकते कि किसी मशीन के दर्द हो रहा है। अथवा वह प्रसन्न है या किसी से मित्रता कर रही है।

चेतना को जानने के लिए जिज्ञासु तो सभी हैं, लेकिन उसके स्वरूप को लेकर लोगों के मत अलग-अलग हैं। नोबल लारेट, जॉन एक्लस और दार्शनिक कार्ल पोवर का दृढ़तापूर्वक मानना है कि चेतना का स्त्रोत स्थूल मस्तिष्क नहीं हो सकता। इसका अस्तित्व मस्तिष्क के अन्दर सूक्ष्म रूप में हैं। प्लेटो, देकार्ते एवं ईसाई गिरजाघरों से जुड़ा दर्शन इस बात पर जोर नहीं देता कि आत्मा की ही भाँति बुद्धि का भी कोई विशेष आयाम है। उनके अनुसार बुद्धि अति सूक्ष्म तत्व अवश्य है एवं उसका कोई स्थूल आधार नहीं है। हालाँकि ऐसे विचार बुद्धि तथा स्थूल जगत की दूरी बढ़ाते हैं। कतिपय विचारों का यह भी मानना है कि चेतना को सही ढंग से न समझे जाने के कारण ही प्रकृति और संस्कृति के सम्बन्धों को नकारा जा रहा है, जो आज ज्यादातर पर्यावरण संकटों का महत्वपूर्ण कारण है। सामाजिक विग्रह का भी यह एक कारण है।

दूसरे प्रकार के लोगों का मत है कि बुद्धि का मस्तिष्क में कोई स्थूल आधार अवश्य है, लेकिन ऐसा दावा करने वाले चेतना के विभिन्न अनुभवों का स्थूल स्त्रोत नहीं बता पाते। अपनी खोज-बीन में असफल रहने पर वे अपनी असफलता तथा वैज्ञानिक कार्यप्रणाली की सीमाओं को स्वीकार करने के बदले यह कहने लगते हैं कि चेतना मात्र भ्रम है अथवा यह सिर्फ आन्तरिक मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं को पूरा करने वाला एक निमित्त कारण है, जो मानवीय विकासक्रम में शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उत्तरदायी है।

इन सभी भिन्न मत वालों तथा आर्टिफीशियल इन्टेलीजेन्स (ए॰ आई0) की वकालत करने वालों के अनुसार चेतना ऐसे गुणों का समुच्चय है, जो मात्र याँत्रिक ढाँचे से उत्पन्न हुई है। इस कथन के पीछे शायद कहने वालों की यह समझ है कि चेतना मात्र बौद्धिक कार्यकुशलता तक सीमित है। वे इसे स्ट्र्ग ए॰ आई॰ का नाम भी देते हैं। दूसरी है वीक ए॰ आई॰ यानि कि वे गुण जिनकी नकल मशीनें कर सकती हैं। हालाँकि यह कथन कुछ उसी प्रकार है जैसे यह कहना कि हम आरकेस्ट्र् के उस सम्पूर्ण संगीत आनन्द उठा सकते हैं, जो काम्पैक्ट डिस्क में है। यद्यपि इस संगीत में वादक वृन्द की मौलिक सूझ-बूझ, आवश्यकतानुरूप फेर-बदल का सदा अभाव बना रहेगा।

सम्भवतः इसी वजह से स्ट्रग ए॰ आई॰ जिसके अनुसार बौद्धिक चेतना मात्र एक कम्प्यूटर प्रोग्राम है का जॉन शर्ले जैसे दार्शनिकों द्वारा तीव्र विरोध किया गया। वीक ए॰ आई॰ के ह्मूबर्ट ड्र्कस तथा रोजर पेनरोज जैसे आलोचक हैं। जिनके अनुसार बुद्धि के अन्य मशीन नहीं कर सकती। इन विचारकों के अनुसार बौद्धिक चेतना को यन्त्र मानने वाली विचारधारा ने एक ऐसे समाज का निर्माण किया है, जिसमें कठोर तथा निश्चित नियमों के अंतर्गत कार्य करने को प्रोत्साहन मिला एवं बौद्धिक चेतना की वास्तविक क्षमताओं का उपयोग बहुत ही कम हुआ।

‘द क्वाँटम सोसाइटी’ पुस्तक की लेखिका दाना जोहर के अनुसार चेतना का सम्पूर्ण क्षेत्र यथार्थ भी है और अति महत्वपूर्ण भी। मनुष्य स्वेच्छानुसार कार्य कर सकता है। स्वयं द्वारा सम्पन्न कार्यों की जिम्मेदारी का उसे अहसास होता है। ऐसी स्वेच्छा, स्वतन्त्रता, जिम्मेदारी का अहसास यान्त्रिक नियमों पर आधारित मस्तिष्क में मिलना सम्भव नहीं।

समग्रता या ‘होलिज्म’ चेतना का एक विशेष गुण है। अलग-अलग इन्द्रियों-आँख, नाक, कान, मुँह त्वचा आदि से भिन्न-भिन्न जानकारी उपलब्ध होती है। चेतना उन सबको समग्रता एवं एक्यता देकर अर्थपूर्ण स्वरूप प्रदान करती है। देकार्ते के अनुसार शरीर और समग्र चेतना के बीच बहुत अन्तर हैं-शरीर विभाजित है, जबकि चेतना सर्वथा अविभाजित। चेतना की यही विशेषता वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय है। यह माना गया कि हमारे समस्त मानसिक क्रिया-कलाप-न्यूरान्स (मस्तिष्क की कोशिकाएँ) में विभिन्न संदेशों की आवाजाही से होती है। वैज्ञानिकों के लिए यह आज तक आश्चर्य का विषय हैं कि अनेक अलग न्यूरान्स में विभक्त कोई व्यवस्था किस प्रकार एक्यता देकर हमें अपने अस्तित्व की समग्र अनुभूति करा देती हैं? यहाँ निश्चित रूप से उस शक्ति की ओर ध्यान जाता है जो कि इस व्यवस्था की प्रेरक एवं नियन्ता है। इसे आत्मचेतना कहें या कुछ और? पिछले कई सालों से बौद्धिक चेतना के ‘होलोग्राफिक मॉडल’ पर विशद् चर्चा होती रही है। इस मॉडल को डेविड बोम तथा कैलीफोर्निया के न्यूरोसर्जन कार्ल प्रिब्राम के सुझावों के आधार पर बनाया गया। इसके अनुसार मस्तिष्कीय छवियों की एकात्मता तथा होलोग्राम की एक्यता में बहुत समानता है। होलोग्राम को कई हिस्सों में बाँटने पर भी प्रत्येक हिस्से में सम्पूर्ण छवि सूक्ष्म रूप में मिलेगी, इसी प्रकार मानव शरीर की प्रत्येक कोशिका में सम्पूर्ण शरीर का आनुवंशिक गुण (जैनेटिक कोड) होता है। इस आधार पर लघु में विभु तथा विभु में लघु होने की बात स्पष्ट हो जाती है। इन्हीं प्रयोगों के आधार पर वैज्ञानिक ‘अयमात्माब्रह्म’ के सूत्र की सार्थकता स्वीकार करने लगे हैं। अब उन्हें स्पष्ट होने लगा है। कि किस प्रकार परमात्म-चेतना की व्यापक अनन्तता व्यक्ति की आत्म-चेतना में समग्र रूप में प्रतिबिंबित होती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार होलोग्राम की यह विशेषता लेकर किरणों के कारण हैं। इंग्लैण्ड की लीवर पूल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हर्बर्ट फ्रोलिक के अनुसार कुछ ऐसे ही गुण ईस्ट बैक्टीरिया तथा डी0 एन॰ ए॰ अणुओं में मिलते हैं। जर्मनी के भौतिकशास्त्री फ्रिट्ज पॉप ने खोज की है कि जैव ऊतकों से उचित शक्ति द्वारा उत्तेजित किए जाने पर एक धीमे प्रकाश का स्फुरण होता है। प्रत्येक कोशिका की दीवारें असंख्य प्रोटीन तथा वसा के अणुओं से निर्मित होती है। प्रत्येक अणु में एक विद्युत चार्ज होने की सम्भावना हैं विश्राम की अवस्था में वे उत्तेजित रहते हैं, किन्तु भोजन के पाचन से प्राप्त शक्ति से व्यवस्थित होकर दोलित या कम्पित होने लगते हैं। तब प्रत्येक अणु रेडियो ट्रांसमीटर की तरह ऐ सूक्ष्म सन्देश प्रसारित करता है।

इस तरह एक निश्चित ऊर्जा प्राप्ति के पश्चात् सभी अणुओं द्वारा प्रस्फुटित ऊर्जा में लेकर किरणों की तरह ऐक्यता (होलिज्म ) गुण होते हैं।

कार्ल प्रिब्राम के अनुसार मस्तिष्क एक ऐसा ब्लैकबोर्ड है, जिस पर हमारे अनुभव लिखे जा सकते हैं। यह एक तालाब की तरह हैं, जिसमें चेतना के अंग, विचार, छवियाँ, भावनाएँ, स्मृतियाँ आदि लहरों की तरह उमड़ती रहती हैं। ध्यानावस्था में अन्तःकरण पवित्र होने पर मस्तिष्क में कोई लहर या उत्तेजना नहीं होती। इन लहरों के उत्पन्न होने की वजह वे विद्युत रासायनिक प्रक्रियाएँ हैं, जो न्यूरान्स में होती रहती हैं। बाह्य जगत से प्रेरित ये प्रक्रियाएँ मनुष्य के आनुवंशिक गुणों, अनुभवों, भावनाओं, रुचियों स्मृतियों तथा अन्य शारीरिक आवश्यकताओं का मूल कारण है। इन्हीं सबको मिलाकर हमारा मस्तिष्क हमें स्वयं का तथा ब्रह्माण्ड का ज्ञान कराता है।

विख्यात न्यूरोलॉजिस्ट हैरी वाल्टर के ग्रन्थ ‘ब्रेन एण्ड इट्स रिलेशन विथ कान्शसनेस’ के अनुसार मस्तिष्क में तनी प्रकार की प्रक्रियाएँ चलती हैं। शृंखलाबद्ध, समानान्तर तथा क्वाँटम। निश्चित सिद्धान्तों के आधार पर भाषा समझना शृंखलाबद्ध प्रक्रिया द्वारा होता है। समानांतर प्रक्रिया से जटिल आदतें बनती हैं। कुछ पहचानना या सीखना इसी से होता है। यह प्रक्रिया छोटे जानवरों में भी मिल जाती है, किंतु क्वाँटम प्रक्रिया के द्वारा सृजनात्मकता आती है। कला, नैतिकता, परस्पर सम्बन्धों आदि के विषय में ज्ञान होता है। इसे ही मानवीय चेतना की विशिष्टता कहा जा सकता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार मस्तिष्क के किसी हिस्से की क्षति से उन गुणों का ह्रास होता है जो उस हिस्से से सम्बन्ध रखते हैं। आँप्टिक कारटेक्स की क्षति से अंधापन, मोटर कारटेक्स की क्षति से लकवा, ब्रोंकाज एरिया की क्षति से गूँगापन आदि हो जाता है, किन्तु मस्तिष्क में, गम्भीर चोटें आने पर भी बहुधा व्यक्ति पूर्णतया चैतन्य रहता है। यह छोटे जानवरों तथा शिशुओं में भी देखा गया है। जहाँ अति अल्प या अविकसित मस्तिष्कीय क्रिया-कलाप होते हैं। सामान्य क्रम में किसी दूरभाष तंत्र के शृंखलाबद्ध तारों को एक स्थान से भी क्षतिग्रस्त कर दिया जाय, तो सम्पूर्ण व्यवस्था निष्क्रिय हो जाती है, किन्तु मस्तिष्क में किसी एक स्थान की क्षति होने पर भी चैतन्यता बनी रहती है। अतः मस्तिष्क में न्यूरान्स के तन्त्र के द्वारा ही संदेशों का आवागमन होता है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। यदि संदेश सम्पूर्ण मस्तिष्क के विशाल क्षेत्र में समान रूप से फैले हों, तभी ऐसा सम्भव हो सकता है।

ज्ञात हो कि सामान्यतया निद्रावस्था के दौरान मस्तिष्क का अधिकाँश भाग क्षतिग्रस्त होने पर मस्तिष्क को तीव्र झटका लगने पर अथवा बेहोशी की अवस्था में चैतन्यता नहीं रहती। सीजोफ्रेनिया नामक रोग में मस्तिष्क की चिकनी सतह प्रभावित होने से न्यूरान्स के चारों ओर बनी क्वाँटम फील्ड की ऐक्यता ‘कोहेरेन्स’ प्रभावित होती है। फलतः अनुभूतियों की ऐक्यता पर प्रभाव पड़ता है। हालाँकि इससे रोगियों की विचारशक्ति में कोई कमी नहीं होती, परन्तु उनका चेतना जगत विभक्त होता है। इसी प्रकार का विभाजन स्वप्नों के दौरान होता है। स्वप्न में हम व्यक्ति के अलग-अलग अंगों को मिलाकर सम्पूर्ण नाटक देख लेते हैं ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि चेतना की ऐक्यता प्रदान करने की शक्ति मन्द पड़ जाती हैं।

अपने विभिन्न प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों के विश्लेषण से कार्ल पिब्राम एवं उनके सहयोगी वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि शरीर से उन्नत स्तर की इन्द्रियों का चेतनात्मक स्तर है। इससे उन्नत स्तर है-मन-मस्तिष्क का। इससे उन्नत स्तर बौद्धिक चेतना का तत्व है और बौद्धिक चेतना से परे आत्म-चेतना है, जो इन सभी का मूल स्त्रोत है। श्रीमद्भगवद्गीता भी तो यही कहती हैं-

“इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः, मनसस्तु परा बुद्धियों बुद्धेः परतस्तु सः”

यही है आत्मतत्व जिसका स्वरूप भले ही विज्ञान और वैज्ञानिक अभी ठीक तरह से न समझ पाए हो, पर उसे स्पष्ट तौर पर स्वीकार तो करने ही लगे हैं।


परकाया-प्रवेश एक कपोल कल्पना नहीं, सत्य

चिकित्सा-विज्ञान के प्रोफेसर फ्रेडरिक वॉन श्लेगल विज्ञान के कई अन्य विषयों में पारंगत थे। अपने साथी वैज्ञानिकों के विपरीत उनका भारतीय दर्शन एवं अध्यात्म के प्रति गहरा रुझान था। इसी रुचि के चलते वे भारत भी आए थे। उन्होंने अपने भारत-भ्रमण के दौरान कई योगियों, संतों एवं अध्यात्मवेत्ताओं से मुलाकात की। यहाँ की आध्यात्मिकता से प्रभावित होकर उन्होंने संस्कृत सीखनी शुरू की, ताकि भारतीय ऋषियों की अनुभूतियों को गहराई से समझ सकें। अपने अनवरत अध्ययन एवं अभ्यास से उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि ऋषियों द्वारा अन्वेषित अध्यात्म-विद्या पूरी तरह वैज्ञानिक है। यदि इस पर ठीक ढंग से काम किया जाय तो एक स्वतन्त्र एवं समग्र विज्ञान का विकास सम्भव है।

अपनी सोच में डूबे रहने वाले प्रोफेसर श्लेगल दुबले, पतले और लम्बे थे। उनकी भूरी आँखों में अजीब-सी चमक थी, जो दूसरों के चेहरे ही नहीं विचारों को भी पढ़ लेने की क्षमता रखती है। प्रोफेसर साहब छात्रों में बेहद लोकप्रिय थे। लेक्चर के बाद छात्र उन्हें घेर लेते और उनके विचित्र सिद्धान्तों को उत्सुकतापूर्वक सुनते थें। उन्हें अपने प्रोफेसर की अतीन्द्रिय ज्ञान की बातें, आध्यात्मिक अनुभव बेहद रोचक एवं रोमाँचक लगते।

प्रायः वह कुछ छात्रों को अपने प्रयोगों के लिए नियुक्त कर लेते थे। इसलिए शायद ही कोई ऐसा छात्र रहा हो, जिसे उन्होंने ध्यान की शिक्षा न दी हो। उनके इस वैज्ञानिक अध्यात्म के प्रति समर्पित छात्रों में सबसे अधिक उत्साही श्वेरिन था। वह प्रोफेसर के विभिन्न प्रयोगों में हमेशा उनका सहायक बन रहता। शायद इसी वजह से प्रोफेसर उसे चाहते भी बहुत थे। प्रोफेसर की युवा बेटी कार्सिका भी उसे बेहद पसन्द करती थी। श्वेरिन भी उसे मन ही मन चाहता था, लेकिन अभी तक वह अपने गुरु के सामने अपने हृदय की बात जाहिर नहीं कर सका था।

श्वेरिन स्वस्थ और सुन्दर युवक था। पैतृक सम्पत्ति के रूप में उसकी काफी जमीन-जायदाद थी। मेधावी छात्र तो वह था ही। कार्सिका के लिए वह सुयोग्य वर हो सकता था। मगर कार्सिका की माँ को वह पसंद नहीं था, इस नापसंदगी का कारण उसकी कोई खराब आदत नहीं थी। अपनी आदतों से तो श्वेरिन बेहद साफ-सुथरा एवं चरित्रवान नवयुवक था। लेकिन उसकी एक बात जो कार्सिका की माँ को रह-रह कर खटकती थी, वह थी उसकी वैराग्य भावना। वह यदा-कदा अपना सम्पूर्ण जीवन आध्यात्मिक साधनाओं में लगाने की बात करता रहता था। उसकी यही बातें प्रोफेसर वाँन श्लेगल की पत्नी को नागवार गुजरती थीं। वह सोचती कहीं ऐसा न हो कि श्वेरिन के साथ बँधकर उसकी इकलौती संतान कार्सिका की जिन्दगी भी जीवन के सारे सुखों से मरहूम हो जाए।

इधर जब से फ्रेड्रिक वाँन श्लेगल भारत से आए थे, उनके सारे चिन्तन पर एक ही सवाल हावी था। उनके सभी प्रयोग और सिद्धान्त सिर्फ इस बिन्दु पर केन्द्रित हो गए थे कि मनुष्य की आत्मा को कुछ समय के लिए शरीर से अलग करके उसे पुनः शरीर में लौटाया जा सकता है। पहली बार विचार आने पर उनके वैज्ञानिक दिमाग ने इसे फौरन अस्वीकृत कर दिया था। मगर धीरे-धीरे रिसर्च करते हुए उन्होंने इसे सम्भव मान लिया कि आत्मा या प्राणतत्व पदार्थ से अलग अस्तित्व रख सकता है अब उन्हें अपने भारत-प्रवास के दौरान सुनी गई आचार्य शंकर की कहानी में कुछ सार नजर आने लगा था। जिसके अनुसार जगद्गुरु शंकराचार्य अपने शरीर को शिष्यों के हवाले करके अपनी आत्मा से निहित कार्य करने के बाद पुनः अपने शरीर में लौट आए थे। उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि इस आध्यात्मिक कथानक की सच्चाई को जानने के लिए एक साहस भरा मौलिक प्रयोग करके इस गूढ़ प्रश्न को हल कर लिया जाए।

प्रोफेसर ने अपने एक विशिष्ट लेख में यह घोषणा करके समूचे वैज्ञानिक जगत को आश्चर्यचकित कर दिया, “यह स्पष्ट है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में आत्मा स्वयं को शरीर से अलग कर लेती हैं। सम्मोहित व्यक्ति के मामले में शरीर बेहोशी की हालत में पड़ा रहता है, लेकिन सम्मोहन के चरम बिन्दु पर पहुंचकर आत्मा उसे छोड़ देती है। एक संवेदनशील व्यक्ति को सम्मोहन के जरिए माध्यम बनाकर मैं स्वयं यह सही-सही जान लेता हूँ कि दूसरे कमरे या दूसरे घर में क्या हो रहा है? यह तभी सम्भव होता है जब आत्मा या चेतना शरीर को छोड़ कर बाहर भ्रमण करे। आत्मा अपनी प्रकृति में अदृश्य है, इसलिए उसका जाना और आना हम देख नहीं पाते हैं। लेकिन व्यक्ति के शरीर पर उसके आवागमन का प्रभाव हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं। जैसे शरीर का कड़ा पड़ना-निश्चल हो जाना और अपने प्रभावों को व्यक्त करने के लिए संघर्ष करना और फिर सामान्य हो जाना।”

“इसीलिए मेरा इरादा है कि मैं अपने एक शिष्य को सम्मोहन के साथ ध्यान की गहराइयों में ले जाऊँ। ध्यान की इन विशेष प्रक्रियाओं के माध्यम से मेरी और मेरे शिष्य की आत्मा हमारे शरीरों से अलग होकर शून्य में एक-दूसरे से संपर्क स्थापित करेंगी। थोड़ी देर बाद वे हमारे शरीरों में वापस लौट आएँगी। इस दिलचस्प प्रयोग के निष्कर्ष मैं विश्व के वैज्ञानिकों एवं विचारशीलों के समक्ष प्रस्तुत करूंगा।”

इस विशिष्ट लेख के साथ, जब प्रोफेसर ने अपने विचित्र प्रयोग के बारे में पूरी जानकारी दी तो हलचल मच गई। उनका मजाक उड़ाया गया, गुस्सा जाहिर किया गया। कइयों ने तो धमकियाँ तक दीं। लेकिन प्रोफेसर फ्रेड्रिक वाँन श्लेगल अपने निश्चय पर पूरी तरह अडिग रहे।

उनके इस निश्चय पर छात्रों में उत्तेजना फैल गई। कई छात्रों का यह कहना था कि यह तो आत्मघाती कदम है। मान लो आत्मा शरीर से बाहर निकल गई लेकिन वापस न आयी तो? प्रोफेसर खुद तो अपनी तरह-तरह की सनकों में मशगूल रहते हैं, परन्तु बेचारे श्वेरिन की जान क्यों लेना चाहते हैं। जितने मुँह उतनी बातें। चर्चाओं का बाजार गर्म था और कॉलेज में होने वाली इन दिनों की सारी चर्चाएँ इसी अजीबो-गरीब प्रयोग पर ही केन्द्रित थीं।

एक दिन प्रयोगशाला में व्यस्त रहने के बाद जब प्रोफेसर साहब विचारमग्न अवस्था में घर लौट रहे थे, तो पुस्तकालय से बाहर निकल रहे छात्रों ने उन्हें घेर लिया। हरेक ने उन्हें समझाने की कोशिश की। वह चुपचाप सुनते रहे। आखिर खीझकर एक छात्र ने उनसे जानना खीझकर एक छात्र ने उनसे जानना चाहा, “आखिर आपके इस प्रयोग में आपका साथ कौन देगा?” “यह भी कोई पूछने की बात है।” प्रोफेसर ने मुसकराते हुए कहा-”श्वेरिन।”

श्वेरिन की सहमति के बाद प्रोफेसर ने इस प्रयोग के लिए अगले महीने की पन्द्रह तारीख का चुनाव किया। निर्धारित तिथि पर प्रोफेसर के साथी वैज्ञानिक एक विशेष हॉल में उपस्थित हुए। अध्यात्म तथा अलौकिक शक्तियों की लौकिक गतिविधियों के गहन अध्येता भी इस विलक्षण अवसर पर उपस्थित थे। इन सबके साथ कतिपय अन्य विचारणीय व्यक्ति भी उपस्थित थे। ये सभी हॉल के उस मंच पर टकटकी लगाए देख रहे थे, जिस पर सिर्फ दो कुर्सियाँ रखी थीं। एक पर प्रोफेसर साहब विराजमान थे और दूसरी पर उनके प्रिय शिष्य श्वेरिन।

एक बूढ़ा और दूसरा नवजवान दिल साथ-साथ मिलकर स्पन्दित हो रहे थे। उपस्थित दर्शकों के दिलों में भी ऊहापोह मची थी कि देखें आखिर क्या होता है तमाशा। सबको सम्बोधित करते हुए प्रोफेसर ने चुने हुए शब्दों में कहा, “मैं कहता हूँ, जब व्यक्ति सम्मोहन के सघन प्रभाव में होता है, उसकी आत्मा कुछ समय के लिए उसके शरीर से मुक्त हो जाती है। भारतवर्ष में प्रणीत योग विद्या में आत्मा को शरीर से अलग करने, शरीर से बाहर भ्रमण करने और पुनः शरीर में आने की कई तकनीकें विकसित की गई हैं। मैंने वहीं अपने प्रवास के दौरान महान दार्शनिक एवं योगी आचार्य शंकर के बारे में प्रचलित कहानी को सुना था। आप सब भी इसे जानते होंगे। मैं स्वयं भी योगविद्या का अभ्यास करता हूँ। मेरे शिष्य श्वेरिन की भी योग में गम्भीर रुचि हैं।

मैं उम्मीद करता हूँ कि अपने शिष्य को सम्मोहित करने के बाद स्वयं भी गम्भीर ध्यान में चला जाऊँगा। हमारी आत्माएँ घुल-मिलकर बातें करेंगी, जबकि हमारे शरीर निश्चल होकर जीवित रहेंगे। थोड़ी देर के बाद हम दोनों की आत्माएँ अपने-अपने शरीरों में लौट आएँगी और सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा। आप सबकी विनम्र अनुमति से अब मैं अपने प्रयोग की कोशिश शुरू करता हूँ।”

प्रोफेसर के इस संक्षिप्त भाषण पर खूब तालियाँ बजीं। फिर सब लोग देखें क्या होता है, ऐसी खामोशी में डूब गए।

कुछ तेज कोशिशों के बाद प्रोफेसर वाँन श्लेगल ने अपने शिष्य की सम्मोहित किया और धीरे-धीरे उसका शरीर निढाल होकर कुर्सी से चिपक गया। ठीक तभी प्रोफेसर ने अपनी आँखें बन्द कीं। और वे भी अपने शिष्य की अवस्था में पहुँच गए। उन दोनों के शरीर पीले और सख्त पड़ गए थे।

यह बड़ा अजीब और असरदार मंजर था। गुरु और शिष्य दोनों समान मूर्छा की दशा में थे, तो उनकी आत्माएँ कहाँ भाग गयी थीं? यह सवाल वहाँ उपस्थित सभी लोगों के दिमाग में हलचल मचा रहा था। सब चुप थे, इस तरह जैसे वहाँ कोई था ही नहीं।

पाँच मिनट बीत गए-दस बीत गए, पन्द्रह और गुजर गए। इस बीच प्रोफेसर के साथ उनका शिष्य ज्यों का त्यों रहा। प्रोफेसर के साथी चिकित्सा वैज्ञानिकों ने उन दोनों के शरीर की जाँच-पड़ताल की। उन्हें यही समझ में आ रहा था कि ये दोनों गहरी मूर्छा में हैं इससे अधिक वे कुछ नहीं समझ पा रहे थे।

लगभग एक घण्टा बीत गया। फिर उपस्थित लोगों की बेचैनी को विराम मिला। पहले प्रोफेसर के चेहरे पर एक ताजगी आयी। अचानक उन्होंने अपनी लम्बी, पतली बांहें फैलायीं, जैसे नींद से जागे हों। पलकें झपकाते हुए वह उठ खड़े हुए। मगर आश्चर्य, अब प्रोफेसर के हाव-भाव में गम्भीरता और शालीनता नहीं थी।

तभी श्वेरिन भी सचेत हो गया। वह अपनी कुर्सी से उठकर मंच पर आया और गंभीर स्वर में कहने लगा, “आप लोगों ने देखा हमारा प्रयोग सफल रहा। इस एक घण्टे में हमारी आत्माओं ने शून्य में जाकर संपर्क किया। लेकिन वहाँ क्या बातें हुईं, यह हमें इस समय याद नहीं है। भविष्य में हम ऐसा प्रयोग करेंगे जिसमें आत्माओं की सारी गतिविधियाँ। हमें याद रहेंगी और हम आपको बता सकेंगे।”

नौजवान श्वेरिन के मुँह से ये प्रोफेसराना बातें सुनकर लोग चौंक पड़े कि यह क्या तमाशा है।?

प्रयोग सफल रहा, इसमें कोई दो राय नहीं, मगर एक अजीबो-गरीब मसला पैदा हो गया था। आत्माएँ निकलीं और फिर शरीरों में लौट आयीं, लेकिन हुआ यह कि प्रोफेसर की आत्मा वापसी में नौजवान छात्र श्वेरिन के शरीर में प्रवेश कर गयी थी और श्वेरिन की आत्मा वृद्ध प्रोफेसर के शरीर में। इसीलिए दोनों के विचारों एवं व्यवहार में भी फर्क आ गया था। बहरहाल लोग थोड़ा चौंके तो जरूर, मगर विशेष ध्यान न देकर चले गए।

इधर प्रोफेसर के शरीर के पाँव विश्वविद्यालय के पुस्तकालय की ओर मुड़े। यहाँ यह बताना जरूरी है कि प्रोफेसर साहब श्वेरिन की आत्मा पाकर उसी के जैसा व्यवहार करने लगे थे और श्वेरिन प्रोफेसर साहब जैसा। इस तरह बड़ा अजीबो-गरीब तमाशा शुरू हो गया था।

प्रोफेसर (भीतर से श्वेरिन) ने लाइब्रेरी में पहुँचकर सभी से उल्लास में कहा-”भाई मेरा प्रयोग सफल रहा। अब मैं तुम सबके साथ मस्ती करना चाहता हूँ।”

मस्ती और प्रोफेसर, वहाँ सभी छात्र घोर आश्चर्य में पड़ गए। क्या हो गया है, आज प्रोफेसर साहब को। थोड़ी देर तक वे उन्हें सिर से पैर तक घूरते ही रह गए, खामोश रहकर।

“इस तरह मुझे घूर क्या रहे हो, अब मैं बहुत जल्द शादी करने वाला हूँ।” शादी! एक छात्र ने प्रोफेसर के इस कथन पर हतप्रभ होते हुए कहा-”क्या मैडम मर गयी?”

“मैडम......कौन मैडम?”

“मैडम इवा श्लेगल।”

“हा....हा....हा..” प्रोफेसर ने

ठहाका लगाते हुए कहा-” तो तुम लोग मेरी पहले की परेशानियों से परिचित हो। नहीं, वह मरी नहीं है, लेकिन वह अब मेरी शादी का विरोध नहीं करेगी। हम सब एक साथ रहेंगे।”

“वाह! कितना खुशहाल परिवार होगा।” छात्रों के इस व्यंग्य को प्रोफेसर समझ नहीं सके।

इधर एक तरफ बातों का शोरगुल था, तो दूसरी तरफ एक नया ही तमाशा होने लगा था। प्रयोग के कार्यक्रम के बाद नवयुवक श्वेरिन प्रयोगशाला के कर्मचारियों को जरूरी हिदायतें देकर चिन्तन की मुद्रा में प्रोफेसर के घर की ओर चल पड़ा।

रास्ते में दो छात्र मिल गए। उन्होंने दौड़ कर श्वेरिन का कन्धा थपथपाते हुए बधाई दी और बांहें थामते हुए उससे गले मिलने की कोशिश की, लेकिन श्वेरिन ने इसे अपनी बेइज्जती समझा और अपनी बांहें झटक कर बोला-”मैं तुम दोनों को विश्वविद्यालय से निकलवा दूँगा।”

“अच्छा जाओ यार, पता नहीं क्यों आज तुम्हारा मूड खराब हैं।” दोनों छात्र श्वेरिन को छोड़कर अपनी राह चलते बने। श्वेरिन झुँझलाता हुआ प्रोफेसर के घर की ओर चल पड़ा।

इधर मैडम इवा श्लेगल को अपने पति का डिनर के लिए इन्तजार था। तभी उनकी निगाह बड़े इत्मीनान से आते हुए श्वेरिन पर पड़ी। जो गेट से दाखिल हो रहा था, उसके आने का अन्दाज कुछ ऐसा था, जैसे वही घर का मालिक हो। मैडम इवा को अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हुआ। कार्सिका ने भी ऊपर की खिड़की से उसे देख लिया था। आज उसे अपने श्वेरिन पर गर्व महसूस हो रहा था।

मैडम इवा खुले दरवाजे पर खड़ी थीं। श्वेरिन ने मुस्कराकर उनकी ओर देखा और कहा, “आज का दिन बहुत अच्छा है इवा। खड़ी क्यों हो जल्दी से डिनर लगाओ, बहुत भूख लगी हैं।”

इवा! डिनर! मैडम श्लेगल उनके बेटे की उम्र के श्वेरिन के मुख से यह सब सुनकर बौखला गई।

“हाँ, डिनर, इवा.. डिनर” श्वेरिन ने थोड़ा जोर से कहा-”मैं डाइनिंग रूप में चल रहा हूँ। जो भी तैयार हो, ले आओ। अरे तुम अब भी खड़ी हो?”

मैडम इवा से यह सब बर्दाश्त नहीं हुआ। वह श्वेरिन को शिष्ट-शालीन लड़का समझती थी। उसकी इस तरह की बातें सुनकर वह तेजी से पलटी और अपने कमरे में चली गयी। इधर श्वेरिन ड्राईंग रूम जाकर सोफे पर पसर गया और जोर से चिल्लाया, “कार्सिका, ओ लड़की, इधर आ।”

इस तरह बुआई जाने पर कार्सिका घबरा-सी गयी और सीढ़ियों से उतर कर अपने प्रेमी के पास आ खड़ी हुई। फिर उसके गले में बाँहें डालकर बोली-”प्रियतम मुझे मालूम है, तुमने यह जोखिम मेरे लिए उठायी थीं।”

श्वेरिन के लिए यह दूसरा अजूबा हमला था। उसने गुस्से में भरकर कार्सिका को परे धकेल दिया और लगभग चीख पड़ा, “ऐसा दिन मेरी जिन्दगी में कभी नहीं आया। लगता है मेरा प्रयोग असफल हो गया। रास्ते में दो छात्रों ने मेरे साथ बदतमीज़ी की। घर में डिनर माँगा तो बीबी भाग खड़ी हुई और बेटी पागलों की तरह व्यवहार कर रही है।”

“लगता है तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है डियर”, कार्सिका उसे समझाते हुए बोली, “तुम्हारा मन अभी कहीं और भटक रहा है, तभी ऐसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो।”

“मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है तुम क्या कह रही हो।” श्वेरिन के इस कथन के उत्तर में कार्सिका उसके एकदम पास आ गयी। उसके इस अप्रत्याशित आलिंगन से घबराकर श्वेरिन पीछे रखे सोफे से भिड़ गया। सोफा पुराना था, वह टूट गया और श्वेरिन पानी से लबालब भरे उस टैंक से बाहर किया। इस खींच-तान में वह तर-बतर हो गया था। क्रोधित होकर वह उसी तरह घर से बाहर निकल गया। वह किसी होटल में जाकर पहले कुछ खाना चाहता था।

श्वेरिन के शरीर में कैद प्रोफेसर फ्रेड्रिक वाँन श्लेगल की आत्मा गुस्से में भरी हुई सड़क पर चली जा रही थी। अचानक उसने बूढ़े प्रोफेसर को सामने आते देखा। प्रोफेसर आज मस्ती में झूमते चले आ रहे थे। वह आनन्दमग्न होकर छात्रों में बेहद लोकप्रिय एक गीत गुनगुना रहे थे। पहले तो श्वेरिन को यह नजारा बड़ा मजेदार लगा, लेकिन थोड़ा पास आने पर उसे लगा कि इसे तो पहले कहीं देखा है।

वृद्ध प्रोफेसर ने भी श्वेरिन को पहचानने की कोशिश की और पास जाने पर बोले, “अच्छा बेटे बताओ तो मैंने तुम्हें कहाँ देखा है? मैं अपनी तरह तुम्हें भी जानता हूँ। लेकिन असमंजस में पड़ गया हूँ।”

“ मैं प्रोफेसर फ्रेड्रिक वाँन श्लेगल हूँ”, श्वेरिन ने बताया। “आप कौन हैं?”

“तुम्हें झूठ नहीं बोलना चाहिए, युवक। तुम प्रोफेसर नहीं हो, क्योंकि प्रोफेसर तो लम्बा, दुबला, पतला वृद्ध व्यक्ति है और तुम खूबसूरत नौजवान हो। जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं श्वेरिन हूँ।”

“तुम किसी भी तरह श्वेरिन नहीं हो सकते। तुम तो उसकी पिता की उम्र के हो।” बातें करते-करते वे दोनों पास के होटल में पहुँच गए। वहाँ लगे शीशे के पास के होटल में पहुँच गए। वहाँ लगे शीशे के सामने आते ही सत्य स्पष्ट हो गया। क्षण भर में असलियत उनके दिमाग में कौंध गयी। वे दोनों एक साथ चिल्ला उठे, “बात समझ में आ गयी। हमारी आत्माएँ गलत शरीरों में प्रवेश कर गयी हैं। मैं तुम हूँ और तुम मैं” भारतीय अध्यात्म विद्या के आत्मा एवं शरीर के अलग अस्तित्व एवं परकाया-प्रवेश दोनों ही सिद्धान्तों की सत्यता एक साथ प्रमाणित हो गयी। लेकिन किस कीमत पर?

काफी देर विचार करने पर उन दोनों ने ही निश्चित किया कि हमें अपने उसी प्रयोग को दुहराना चाहिए। पास एक एकान्त स्थान को तलाश कर श्वेरिन के शरीर में कैद प्रोफेसर की आत्मा ने फौरन प्रयोग का यह क्रम दो घण्टे चलता रहा। तभी कुछ और लोग भी इकट्ठे हो गए थे। कुछ लोग आपस में यह भी सोचने लगे थे कि इन दोनों को अस्पताल पहुँचाया जाय।

तभी गुरु-शिष्य के शरीर में हरकत शुरू हो गयी। उनके चेहरों पर सहजता लौट आयी। अबकी बार की खुशी दुगुनी थी। क्योंकि इन दोनों ने ही अपने शरीर पा लिए थे और भारतीय दर्शन एवं अध्यात्म के सिद्धान्तों की वैज्ञानिकता को शत-प्रतिशत प्रमाणित अनुभव कर लिया था।


अन्यान्य ग्रहों के हमारे परिजन हमसे मिलने को बेताज हैं।

पिछली कई शताब्दियों से लोक-लोकान्तर के निवासियों द्वारा पृथ्वी के निवासियों से संपर्क स्थापित करने की बात प्रकाश में आ रही है। इसके लिए विशिष्ट यान जिसे उड़नतश्तरी कहा जाता है-को देखने के रूप में कई घटना-क्रम प्रकाश में आए। लाखों लोगों ने आकाश में उड़ने वाली ऐसी वस्तुओं को देखा जिन्हें वे पहचान नहीं सके कि वह क्या है? अनेकों ने इसके बारे में विस्तार से लिखा है कि वह उल्कापात, ग्रह, तारा-समूह, मौसमी गुब्बारा, गैस का गोला या पर्यावरण असंतुलन से उत्पन्न चिह्न के रूप में अनुभव किया गया। इसके अतिरिक्त जिन्होंने इसे विशिष्ट रूप में अनुभव किया वह सत्यतः अवर्णनीय है। इसी कारण वैज्ञानिकों ने इसे यू. एफ. ओ. ‘अन आइडेन्टिफाइड फ्लाइंग आब्जेक्ट’ (अनजानी अड़ने वाली वस्तुएँ या तश्तरियाँ) की संज्ञा दी। यह सत्य है कि उड़नतश्तरी या सिगार आकार के इन अजूबों को अनेकों नर-नारियों ने न केवल देखा, अपितु उसे अनुभव भी किया है। कई वैज्ञानिकों ने रडार द्वारा उसका परीक्षण भी किया। इसके श्वेत-श्याम फोटो एवं वीडियो भी लिए गये। कभी यह यान नीचे उतर रहा था तथा ऊपर चढ़ रहा था, इस कारण से चंद मिनटों में मनुष्य की यंत्रीय पकड़ की गति से भी तेज उड़ गया। इस कारण से चंद मिनटों में मनुष्य की यंत्रीय पकड़ की गत से भी तेज उड़ गया। इसने कभी भी किसी का नुकसान नहीं पहुँचाया, किन्तु अपनी अलौकिकता एवं पहुँचाया, किन्तु अपनी अलौकिकता एवं विशिष्टता के कारण वैज्ञानिकों के सामने सृष्टि एवं भौतिकी के नियमों को चुनौती दी है और सोचने के लिए बाध्य कर दिया है कि जितना हम देखते हैं, अनुभव करते हैं, यंत्रीय खोज के ढिंढोरे पीट रहे हैं वह पूर्णता की खोज नहीं है अपितु लोक-लोकान्तरों में इससे भी अधिक प्रगतिशील वैज्ञानिक जगत के अस्तित्व का स्वरूप उभर कर आ रहा है।

पिछले दिनों विश्वभर के वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, दार्शनिकों, मनोवैज्ञानिकों ने यू. एफ. ओ. की अलग-अलग व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं। 1977 में अमेरिका एयर फोर्स द्वारा ‘यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोरेडो- एवं ‘अमेरिकन एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ साइंस’ के प्रमुख एवं भौतिक विज्ञानी डॉ एडवर्ड कोडोन के नेतृत्व में एक दल का गठन किया गया। विशिष्ट शोध के लिए उन्होंने 59 घटनाओं में से 23 प्रमुख घटनाओं को लिया। 1969 की अंतिम रिपोर्ट में उनने 21 वर्ष की घटनाओं के बारे में वैज्ञानिक टिप्पणी प्रस्तुत करते हुए कहा, “इसका वैज्ञानिक परिणाम भले ही भविष्य में निकले, किन्तु अभी तक के परिणाम यही बताते हैं कि अन्य ग्रहों में जीवन है, जो भ्रमण के दौरान अपनी उपस्थिति का आभास समय-समय पर देते हैं। इन घटनाओं को प्राकृतिक घटनाक्रम, भूत-प्रेत, कल्पना आदि कहकर अभी तक तो टाला जा रहा है, किन्तु भविष्य में यह स्वीकार करना ही होगा कि लोक-लोकान्तरों में भी जीवन है, वैज्ञानिक प्रगति है, भले ही हम पृथ्वीवासियों को उसकी जानकारी हो।” कोडोन की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अमेरिका की एयर फोर्स अथवा किसी भी देश के सुरक्षा-तंत्र को अपनी सुरक्षा के लिए इन घटनाचक्रों के बारे में चिंतित नहीं होना चाहिए। 1973 में सेंटर फॉर यू. एफ. ओ. स्टडीज’ नामक अंतर्राष्ट्रीय संस्था की स्थापना की गई। 1982 की रिपोर्ट में संस्थान ने सत्तर हजार घटनाओं का उल्लेख किया है। इनमें से 80 प्रतिशत के बारे में कोई विशेष तथ्य नहीं मिल पाया, किन्तु 20 प्रतिशत के बारे में अभी तक शोध कार्य चल रहा है। इसी तरह फ्राँस, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड के वैज्ञानिक भी शोध कार्य में जुटे हुए हैं।

कम्प्यूटर विज्ञानी एवं यू. एफ. ओ लाजी के छात्र जैकीस वैली ने अपनी पुस्तक ‘पासपोर्ट टू मैग्नोनिया’ में यू. एफ. ओ. के बारे में प्राचीन परम्परा एवं आधुनिक घटनाचक्रों का समन्वय करके व्याख्या प्रस्तुत की है। उनके अनुसार, ये घटनाचक्र प्राकृतिक असामान्य के ही कारण हैं। इसमें विशिष्ट अनुभूतियाँ अवश्य होती हैं। किन्तु कोई प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता। वैली के अनुसार मनुष्य का जीवन कल्पना और प्राचीन थोपी गयी मान्यताओं के आधार पर संचालित होता है, इन्हीं कारणों से विश्व-ब्रह्माण्ड एवं उसके स्वयं के बीच सम्बन्ध स्थापित होता है। इसी कारण कुछ अलौकिकताएँ भी उत्पन्न होती है। मानवीय मनोविज्ञान पर कार्य करने वाले सुप्रसिद्ध मनोविज्ञान पर कार्य करने वाले सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानी कार्ल जुँग ने भी यू. एफ. ओ. के बारे में एक बड़ी विशिष्ट व्याख्या प्रस्तुत की है। उन्होंने 1958 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘फ्लाइंग साँसर’ में लिखा है-”सामूहिक अति विशिष्ट प्राकृतिक घटनाचक्र को देखने की प्रक्रिया सामूहिक अचेतन मन का प्रभाव है। यह किसी चिह्न, कल्पना के आधार पर दृष्टिगोचर होता है एवं किसी विशेष स्थान और समय विशेष पर घटित होता है। गोलाकार, चौकोर, तश्तरी आकार, सिगार आकार वस्तुतः मनुष्य के मन में सूक्ष्मलोकों के प्रति आशा और डर का आरोपण की ही है।”

वैली और कार्लजुँग के विचार लगभग मिलते-जुलते हैं, किन्तु फरवरी 1974 को एक मनोवैज्ञानिक पत्रिका ‘अपर फेट’ में लिख लेख में उन्होंने सुझाव दिया है कि यह समूह मन द्वारा कल्पित विचारों का विद्युतीय चुम्बकीय प्रभाव है जो बाहरी जगत में अनेकों को अनुभव होता है। इन मनोविज्ञानियों की व्याख्या से अनेकानेक वैज्ञानिक सहमत नहीं होते प्रतीत हुए। एक-दो-पच्चीस लोगों तक तो यह मनोवैज्ञानिक प्रभाव कहा जा सकता है, किन्तु हजारों लोगों द्वारा लम्बे समय तक किसी विशिष्ट यान को देखा जाना वस्तुस्थिति को प्रकट करता है और मनोवैज्ञानिक व्याख्या को झुठलाता है।

सर्वप्रथम यू. एफ. ओ. का उल्लेख यूनान प्रान्त के एक आइलैण्ड के ग्रेनाइट पहाड़ में विशिष्ट यान के दिखाई देने के रूप में मिलता है। इजोप्ट के पैपीरस के राजा थरमोस ढ्ढढ्ढढ्ढ (1504-1450 बी. सी.) ने इसके बारे में सर्वप्रथम लिखा है-” 22वें वर्ष तीसरे माह में सर्दी की ऋतु में एक अग्नि का गोला आकाश से आता दिखाई दिया। उस विचित्र यंत्र का सिर नहीं था, बल्कि उसमें पूँछ थी। उसका आकार चौड़ाई एवं लम्बाई में था। उससे कोई आवाज नहीं आ रही थी। कुछ दिनों तक यह आकाश में दिखाई देता रहा। उसका तेज सूर्य से भी ज्यादा था। बाद में वह आकाशीय गोले के रूप में परिवर्तित हो गया। जिसमें असाधारण तेज था। इसके बाद वह आकाशीय गोला दक्षिण दिशा की ओर बढ़ गया और विलुप्त हो गया।” संत एंजिकेल को छेबर नदी-छेलेडिया (ईराक) में 512 बी. सी. में बेबिलोन के राजा ने बुछाडनजर के राज्य में विचित्र यान के दर्शन हुए। वे अपना अनुभव लिखते हैं-”मुझे उत्तरी दिशा में तेज आँधी के साथ बादलों का एक टुकड़ा दिखाई पड़ा, जो ऐसे प्रकाशपुँज के रूप में बदला जो धीरे-धीरे चार जीवित मनुष्यों के रूप में बदलता चला गया। इन सभी के चार मुँह थे और चार पंख। उस यान में चार चक्के भी थे। जिसके चारों ओर आँखें बनी हुई थीं। विचित्र प्राणियों के विलुप्त होते ही चक्के भी गायब हो गये और ऊपर उठ गये। वे कुछ बोल रहे थे किन्तु मैं समझ नहीं पा रहा था। जब वह यान अन्तरिक्ष की ओर प्रस्थान कर रहा था तो भूकम्प जैसी जोरों की आवाज हुई। बाद में जब लोगों को नदी के तट पर लाया गया तो विचित्र चक्कों के निशान पाये गये। जिसमें बड़े विराट आकार के गड्ढे हो गये थे।”

रोमन लेखक जूलियस आब सेक्वेन्सन ने चौथी शताब्दी (ए. डी. ) की विचित्र यान सम्बन्धी घटनाओं को ‘प्रोडिगोरियमर्ल लिबर’ नामक ग्रन्थ में इकट्ठा किया है। उनके अनुसार 217 बी. सी. में जहाज के आकार का एक यान इटली के ऊपर दिखाई दिया। यह रोम से 180 मील पूर्व अपूलिया में एक गोल यान के आकार में गुजरा। उन्हीं दिनों कापुआ के आकाश में अग्नि की लौ जैसे जहाज को लाखों लोगों ने देखा। 11 बी. सी. में जब सीमोरिस और वेलेरियम टार्कानिया में थे तब दोनों ने विभिन्न स्थानों पर ज्वाला उगलती तश्तरियों को अपनी स्थूल आँखों से देखा व लिखा कि ये आकाश से अचानक आयी थीं। सूर्यास्त की वेला में पश्चिम से ग्लोब की तरह एक वस्तु चक्कर। लगाती हुई पश्चिम से पूर्व की ओर जा रही थी। 10 बी. सी. में रोम से 65 मील उत्तर दिशा की ओर आम्ब्रिया के स्पोल्टीयस स्थान में एक आग का गोला, स्वर्णिम रंगयुक्त धरती पर अनुभव किया गया, जिसका आकार धीरे-धीरे बढ़ता गया। वह पहले धरती से उठा और तश्तरी के रूप में बदल कर सूर्य की तरह आकार लेकर शून्य में विलीन हो गया। 1567 में कोनार्ड वोल्फहार्ट द्वारा रचित पुस्तक ‘प्रोडिगिरस एण्ड ओस्टेटोरियम कोनिकन’ में लिखा है- 313 एक. डी. में थियोडोसियस राज्य में एक आश्चर्यजनक प्रकाशपुँज दिखाई पड़ा। यह वीनस के निकट चक्र की तरह दिखाई पड़ा। शुक्र ग्रह की अपेक्षा उसका तेज कम था। धीरे-धीरे उसके दो भाग हो गये, जो विशिष्ट आकार लेते चले गए, फिर एक ही क्षण में दोनों भाग एक होकर गायब हो गए। फ्राँस वर्डन के म्यूजियस में रखी पुस्तक ‘लिवर क्रोनिकोरियम’ में हर्टमेन स्केंडल ने विभिन्न यू. एफ. ओ. के आकारों को घटनाओं के साथ प्रकाशित किया है। 1034 की घटना का उल्लेख करते हुए लेखक हैं-दक्षिण से पश्चिम की ओर सूर्यास्त के समय सिगार आकार की लौ नीले आकाश में हरे रंग का आँरा (आभामण्डल) बनाती हुई गुजरी। सभी लोगों ने इसे एक साथ देखा।

यू. एफ. ओ. के बारे में वैज्ञानिक दृष्टि से प्रामाणिक खोज सर्वप्रथम जापान में 1235 में की गयी। 24 सितम्बर की रात्रि को जब जनरल योरित्सम एवं उनके सिपाही कैम्प में थे, तब उन्होंने एक विचित्र प्रकाशवलय को आकाश में देखा। दक्षिण पश्चिम दिशा में घूमते, चक्कर लगाते, ऊपर-नीचे होते वलय को कई घंटों तक सभी सिपाहियों ने अनुभव किया। जनरल ने आदेश दिया कि इसका पूर्णतः वैज्ञानिक परीक्षण किया जाय। रिपोर्ट में यही बताया गया कि कोई चमत्कारी वस्तु है, जिसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। मध्यकाल में जापान के इतिहास में ऐसी अनेकों घटनाओं का उल्लेख मिलता है। 21 सितम्बर, 1271 की तत्सूनोकुचो कामाकुटा के सुप्रसिद्ध धर्मगुरु ने आकाश में चंद्रमा के समान तेज लिए एक वस्तु को देखा। 1361 में 20 फीट ड्रम के आकार वाले प्रकाशवलय को पश्चिमी जापान के समुद्र में उड़ते हुए देखा गया है। 8 मार्च, 1468 को माउण्टकासुगा में मध्यरात्रि को काली वस्तु वाले यान को विशिष्ट आवाज करते आकाश मार्ग पर जाते हुए देखा गया।

यूरोप में सम्भवत-यू. एफ. ओ. चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में पहली बार कइयों को अनेकों बार दिखाई दी। सन् 1322 की 4 नवम्बर रात्रि के प्रथम प्रहर में आक्सब्रिज इंग्लैण्ड में अग्निमय ज्वाला पुँज को नाव की आकार में विभिन्न रंग बिखेरते आकाश मार्ग पर उड़ते देखा गया। यह दक्षिण से उठा और पहले धीमी गति से उत्तर की ओर गया। धीरे-धीरे उसकी गति बढ़ती गई और वह लाल रंग का पूँछ छोड़ता गया। जो एक प्रकाश रेखा के रूप में बदल गया। 1387 के नवम्बर-दिसम्बर माह में इंग्लैंड के लिस्टरशायर एवं नार्थम्पटन-शायर के आकाश में जलते चक्के के समान अपने चारों ओर आग निकालते, घूमते एक चक्र को देखा गया। 1461 के नवम्बर माह की पहली तारीख को फ्राँस के ऐरम शहर में चाँद के आकार के सप्तरंगी गोले को एक घंटे तक देखा गया। धीरे-धीरे उसका आकार जहाज जैसा हो गया, फिर चंद्रमा की तरह गोल होकर वह गायब हो गया। 1733 की 8 दिसम्बर के दिन डोरसेट (इंग्लैण्ड) शहर के श्री क्रेकर उड़नतश्तरी के बारे में बताते हुए कहते हैं-”मैं घाटी में खड़ा था, मौसम कुछ गरम था, सूर्य स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था, उसी समय आकाश से एक तारा टूटते दिखाई पड़ा। लेकिन उसका रंग चाँदी चमक रहा था। दूसरे तारों की अपेक्षा उसकी पूँछ बहुत लम्बी थी। दूसरे दिन जब मैंने श्री एडगोकोम्ब से यह बात कही तो इसी घटना को उन्होंने भी दुहराया, जबकि हम दोनों में 15 मीन का अंतर था।” वह पूर्व से उत्तर दिशा की ओर जा रहा था। इसी प्रकार की घटना का उल्लेख 16 दिसम्बर, 1742 को रायल सोसायटी लंदन के आक्रीब्स में सेंट जेम्स पार्क में घटी घटना के रूप में किया गया है। 1 अगस्त, 1762 को स्विट्जरलैण्ड के लसाना शहर में वहाँ के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री मान्सीयर डी. रोस्टन व उनके साथियों ने अपने दूरदर्शी यंत्र से पूँछ वाले चमकते तारे को सूर्य के पास चक्कर लगाते हुए एक माह तक देखा। उन्होंने कैमरे के द्वारा उसका आकार बनाने का प्रयास किया, जो रायल एकेडमी साइंसपेरिस को भेजा गया। उन्हीं दिनों उनके एक मित्र ने भी इसी प्रकार के विशिष्ट प्रकाश को देखा।

19 सितम्बर, 1799 को इंग्लैण्ड के ‘जेन्टलमैन’ पत्रिका में एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें लिखा हुआ था-”आज 8.30 रात्रि को गेंद के आकार वाले बडत्रे तारे को उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर जाते सभी इंग्लैण्ड वासियों ने देखा। इसमें से लाल रंग की लपटें निकल रही थीं। 12 नवम्बर को उसी प्रकार लाल रंग का खम्भा आकार का प्रकाशपुँज उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर जाते देखा गया।” 19वीं सदी के प्रारम्भ में यू. एफ. ओ. के बारे में अनेकों वैज्ञानिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। लंदन के वैज्ञानिक जाँनस्टीवली ने अपने ‘साइंस एण्ड आर्ट’ ग्रन्थ में इसका विस्तार से वर्णन किया है। 7 सितम्बर, 1820 में फ्राँस के एम्ब्रम शहर में 27 मार्च, 1470 को नार्थ वेस्ट अफ्रीका में इसी तरह की एक घटना का उल्लेख है, जो दैनिक हैराल्ड में प्रकाशित किया गया। पास्सीमन खाड़ी में वेल्चर जहाज के कर्मचारियों ने 15 मई, 1879 को 180 फीट आकार के एक चक्र को समुद्र में समाते हुए देखा। उनहीं दिनों इसी प्रकार की घटना भारत के पटना शहर में घटित हुई, जो ‘दैनिक हैराल्ड’ में विस्तार से उन्हीं दिनों प्रकाशित हुई थी। इसे ईस्ट इंडिया कम्पनी के सिपाहियों द्वारा देखा भी गया। डीस्क जैसे आकार के चारों ओर चमकता प्रकाशवलय छाया हुआ था। 10 अप्रैल, 1909 को ठीक 8-30 बजे सायं एड्र्याटिक समुद्र में एस. एस. सिल्वर नामक जहाज द्वारा ऐसा ही चक्र देखा गया, ठीक वही घटना 1906 में ब्रिटिश स्टीमर गल्फ ओमान में घटित हुई। एक प्रकाशपुँज घूमता रहा एवं कुछ देर बाद दूसरा चक्का आया, दोनों मिले और गायब हो गये।

जिप्सी मोथ हवाई जहाज के पायलट सर फ्राँसिस चिचेस्टर जब न्यूजीलैण्ड-आस्ट्रेलिया के बीच तस्मान समुद्र के ऊपर 10 जून, 1939 को जा रहे थे, उस समय की घटना का उल्लेख करते हुए लिखते हैं, “मेरे जहाज में 30 डिग्री पर कुछ विशेष चमक के साथ विशाल यंत्रनुमा कोई जहाज अपने निकट आता देखा। मुझे टकराता अनुभव हुआ। मैंने आँखें बंद कर लीं। किन्तु कुछ न होने पर आँखें खोलते ही देखा। वह दूर होता चला गया-मुझे विश्वास नहीं हुआ-लेकिन काफी देर तक उसे जाते हुए देखता रहा।” 28 फरवरी, 1946 को उत्तरी क्षेत्र में एक विचित्र संरचना आकाश में दिखाई पड़ी, जिसका नाम दिया गया ‘घोस्ट राकेट’। हैलसिन्की रेडियो द्वारा इसकी घोषणा भी हुई। ऐसी ही आकृति जुलाई 1946 को स्वीडन में भी दिखाई पड़ी। उन्हीं दिनों आकाश में वैसी ही संरचना टेन्जीर, इटली, ग्रीस, भारत में भी दिखाई दी। स्वीडन तो किसी देश का षड्यंत्र मानकर अपनी वायुसेना को तैयार भी कर चुका था। 10 अक्टूबर, 1946 को स्वीडिश सरकार की ओर से अंततः घोषणा की गई कि यह न पहचान पाने योग्य उड़नतश्तरी है जो अनन्त में चली गयी। 1948 में लंदन टाइम्स में प्रकाशित किया गया कि घोस्ट राकेट स्केन्डिनोवियन देशों में घूम रहा है एवं कई बार कई व्यक्तियों द्वारा देखा जा चुका है।

उड़नतश्तरी के बारे में सबसे रोचक घटना 24 जून, 1947 को घटी, जब अमेरिकन एयर फोर्स के पायलट आनाँल्ड वाशिंगटन एयरपोर्ट से उड़े, वे आगे लिखते हैं-”उस समय सुनहरी धूप खिली हुई थी और मैं माउण्ट रैनर के ऊपर से गुजर रहा था, तभी आकाश में कुछ चमका लेकिन दिखाई नहीं दिया, फिर कुछ ही क्षणों में और चमका और ऐसा लगा कि मैं तश्तरी (पाई आकार) नुमा आकार के 8 जहाजों से घिरा हूँ और वे भी मेरी ही गति से उड़ रहे थे। तीन मिनट साथ उड़ने के बाद पता नहीं वे कहाँ गायब हो गये। उसके बाद अदृश्य ही हो गये।” उसके कथन की पुष्टि भी हो गई जब एयर ट्रैफिक कंट्रोल ने कहा कि आठों जहाज को राडार में देखा गया।

संवैधानिक रूप से यू. एफ. ओ. के बारे में विधिवत् अध्ययन 1948 में अमेरिका एयर फोर्स द्वारा प्रारम्भ हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य यू. एफ. ओ. के बारे में सही जानकारी हस्तगत करना था। इस अभियान को ‘ब्लू बुक प्रोजेक्ट’ कहा गया। इसके अनुसार तब से 1990 तक 12600 घटनाएं प्रकाश में आईं। इन्हें प्रकृति की अलौकिकता मात्र कहा गया, किन्तु 701 घटनाएँ ऐसी थीं, जिन्हें सही अर्थों में यू. एफ. ओ. मान्यता दी गयी। 1948 में ही अमेरिकन एयर फोर्स में काम करने वाले खगोलशास्त्री एलेन हाइक ने यू. एफ. ओ. को तीन भागों में बाँटा। पहले यू स्तर के घटनाचक्र में 500 फीट की दूरी से देखे गये यंत्र को रखा गया। इसमें उन्होंने तीन भाग किये-संधिकाल में, रात्रि में और हलके प्रकाश और पूर्ण प्रकाश में देखे गये तश्तरी को। इसे राडार में भी देखा गया। दूसरे भाग में उन्होंने 500 फीट से भी कम दूरी में देखी गयी घटनाओं को रखा। इसको भी उन्होंने तीन भागों में बाँटा। पहला जिसे देखने या अनुभव करने वालों को कोई प्रभाव नहीं पड़ा। दूसरे प्रकार में ऐसी घटनाएँ जिसमें वहाँ के जीव-जन्तु, पशु-पक्षी तथा वहाँ का भूगोल प्रभावित हुआ। तीसरे प्रकार में ऐसी घटनाएँ जिनमें दूसरे ग्रहों से आने अथवा प्रभाव देखने की, घटनाओं का स्पष्ट स्वरूप देखने को मिलता है। वैज्ञानिकों की परिकल्पना को बाद में 80 के दशक में ‘ई. टी. ‘ नाम की एक फिल्म के द्वारा हालीवुड ने भी प्रदर्शित करने का प्रयास किया। यह फिल्म लगातार डेढ़ वर्ष तक छबिगृहों में चली व सबके कौतूहल का केन्द्र बनी।

यू. एफ. ओ. के बारे में वैज्ञानिक अपने तरह की विशिष्ट विवेचना कर रहे हैं, उनके अनुसार यह घटनाचक्र अलौकिक नहीं है अपितु विद्युतीय प्रभाव, प्रकाशवलय का चकाचौंध, मौसमी प्रभाव से उत्पन्न विशिष्टता आदि है। प्राचीनकाल से लेकर अब तक के सभी घटनाचक्रों को समूह मन का मनोवैज्ञानिक प्रभाव मानें अथवा सामूहिक मन की भ्रान्ति मानें, वैज्ञानिक इस दुविधा में हैं, किन्तु यह स्पष्ट है कि ये सारे तथ्य दूसरे ग्रह में मानवीय जीवन, वैज्ञानिक प्रगति एवं संचार व्यवस्था को स्पष्ट प्रतिपादित करते हैं। इन तथ्यों को झुठलाया भी नहीं जा सकता। इस पर और विशेष शोध कार्य किये जाने की आवश्यकता है कि हम इन अतिथियों के ज्ञान का लाभ भी उठा सकें व योग्य तैयारी भी अपनी कर सकें।


डाकू ने देखी मुरली-मनोहर की झाँकी

वैशाख का महीना, शुक्लपक्ष की रात्रि का समय। श्रीमद्भागवत की कथा सरिता अपनी शीतलता-पवित्रता के साथ पूरी उमंग से प्रवाहित हो रही थी। कथावाचक पण्डितजी विद्वान तो थे ही, अच्छे गायक भी थे। वे बीच-बीच में भगवद्भक्ति के भावपूर्ण पदों का मधुर कण्ठ से गान भी करते। पहले उन्होंने संक्षेप में भगवान के जन्म की कथा सुनायी। फिर नन्दोत्सव का वर्णन करते-करते एक मधुर पद गाया।

कथा का प्रसंग आगे चला। श्रोतागण व्यवहार की चिन्ता और शरीर की सुधि भूलकर भगवदानन्द में मस्त हो गए। बहुतों के शरीर में रोमाँच हो आया। कितनों की ही आँखों में आँसू छलक आए। सभी तन्मय हो रहे थे।

उसी समय डाकू दुर्जनसिंह आस-पास के घरों में सूनापन देखकर डकैती के इरादे से एक घर में घुसा। लेकिन बहुत प्रयास करने पर भी उसे कुछ भी न मिला। वह जिस समय कुछ न कुछ हाथ लगाने के लिए इधर-उधर ढूंढ़ रहा था, उसी समय उसका ध्यान यकायक कथा की ओर चला गया। कथावाचक पण्डितजी महाराज ऊँचे स्वर में कह रहे थे, “प्रातःकाल हुआ। पूर्व दिशा ऊषा की मनोरम ज्योति और अरुण की लालिमा से रंग गई। उस समय व्रज की झाँकी अलौकिक हो रही थी। गौएँ और बछड़े सिर उठा-उठा कर नन्दबाबा के महल की ओर सतृष्ण दृष्टि से देख रहे थे कि अब हमारे प्यारे श्रीकृष्ण हमें आनन्दित करने के लिए आ ही रहे होंगे। उसी समय भगवान श्रीकृष्ण के प्यारे सखा श्रीदामा व सुदामा, मधुमंगल, मनसुखा आदि ग्वाल−बालों ने आकर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम को बड़े प्रेम से पुकारा ” हमारे प्यारे कन्हैया आओ न। अब तक तुम से ही रहे हो? देखो, गौएँ तुम्हें देखे बिना रँभा रही हैं। हम कभी से खड़े हैं।” इस प्रकार ग्वाल-बालों की पुकार और जल्दी देखकर नन्दरानी ने अपने प्यार पुत्रों को बड़े ही मधुर स्वर से पुकार-पुकार कर जगाया।

फिर मैया ने स्नेह से उन्हें माखन मिश्री का तथा भाँति-भाँति के पकवानों का कलेऊ करवाकर बड़े चाव से खूब सजाया। लाखों-करोड़ों रुपये के गहने, हीरे-जवाहरात और मोतियों से जड़े स्वर्णालंकार अपने बच्चों को पहनाए। मुकुट में, बाजूबन्द में, हार में जो मणियाँ जगमगा रही थीं, उनके प्रकाश के सामने प्रातःकाल का उजाला फीका पड़ गया। इस प्रकार भली-भाँति सजाकर यशोदा मैया ने अपने लाड़ले पुत्रों के सिर सूँघे और फिर बड़े प्रेम से गौ चराने के लिए उन्हें विदा किया।”

इतनी बातें डाकू ने भी सुनीं और तो उसने कुछ सुना था नहीं। अब वह सोचने लगा कि अरे! यह तो बड़ा अनुपम सुयोग है। मैं छोटी-मोटी चीजों के लिए इधर-उधर मारा-मारा फिरता हूँ, यह तो अपार सम्पत्ति हाथ लगने का अवसर है। केवल दो बालक ही तो हैं। उसके दोनों गालों पर दो-दो चपत जड़े नहीं कि वे स्वयं अपने गहने निकाल कर मुझे सौंप देंगे। यह सोचकर वह कथा स्थल से थोड़ी दूर रुककर कथा के समाप्त होने की बाट देखने लगा।

बहुत रात बीतने पर कथा समाप्त हुई। भगवान के नाम और जयकार के नारों से आकाश गूँज उठा। प्रसाद बँटने लगा। उधर यह सब हो रहा था, परन्तु डाकू के मन में इन सब बातों की ओर कोई ध्यान नहीं था। वह तो रह-रह कर कथावाचक की ओर देख रहा था। उसकी आँखें कथावाचक की गतिविधि पर जीम हुई थीं। कुछ समय के बाद प्रसाद पाकर कथावाचक जी अपने डेरे की ओर चले। डाकू भी उनके पीछे-पीछे हो लिया। जब पण्डितजी कुछ खुले मैदान में पहुँचे, तब उसने पीछे से कुछ कड़े स्वर में पुकार कर कहा-”ओ पण्डितजी खड़े रहो।” पण्डितजी के पास दक्षिण के रुपये-पैसे भी थे। वे कुछ डरकर और तेज चाल से चलने लगे। डाकू ने दौड़ते हुए कहा-”पण्डितजी खड़े हो जाओ। यों भागने से नहीं बच सकोगे।” पण्डितजी ने देखा कि अब छुटकारा नहीं है। वे लाचार होकर ठहर गए। डाकू ने उनके पास पहुँचकर कहा-”देखिए पंडितजी! आप जिन कृष्ण-बलराम की बात कर रहे थे, उनके लाखों-करोड़ों के गहनों का वर्णन कर रहे थे, उनका घर कहाँ है? वे दोनों गौएँ चराने के लिए कहाँ जाते है? आप सारी बातें ठीक-ठाक बता दीजिए। यदि जरा भी टाल-मटोल की तो बस देखिए मेरे हाथ में कितना मोटा झण्डा है, यह तुरन्त आपके सिर के टुकड़े-टुकड़े कर देगा।”

पण्डितजी ने देखा, उसका लम्बा-चौड़ा दैत्य-सा शरीर बड़ा ही बलिष्ठ है। मजबूत हाथों में मोटी लाठी है, आँखों से कठोरता टपक रही है। उन्होंने सोचा हो न हो, यह कोई डाकू है। फिर साहस बटोर कर कहा, “तुम्हारा उनसे क्या काम है?” डाकू ने तनिक जोर देकर कहा-”जरूरत है।” पण्डितजी बोले-”जरूरत बताने में कुछ अड़चन है क्या?” डाकू ने कहा-”पण्डितजी मैं डाकू हूँ। मैं उनके गहने लूटना चाहता हूँ। गहने मेरे हाथ लग गए तो आपको भी अवश्य कुछ दूँगा। देखिए टालमटोल मत कीजिए, ठीक-ठीक बताइए।” पण्डितजी ने समझ लिया कि यह वज्रमूर्ख है। अब उन्होंने कुछ हिम्मत करके कहा-’तब इसमें डर किस बात काक है? मैं तुम्हें सब कुछ बतला दूँगा। लेकिन यहाँ रास्ते में मेरे पास पुस्तक देखकर सब ठीक-ठीक बतला दूँगा।” वह उनके साथ-साथ चलने लगा।

डेरे पर पहुँचकर पंडितजी ने किसी से कुछ कहा नहीं। पुस्तक बाहर निकाली और वे डाकू को भगवान की रूपमाधुरी सुनाने लगे। उन्होंने कहा-”श्री कृष्ण और बलराम दोनों के ही चरण कमलों में सोने के सुन्दर नूपुर हैं, जो अपनी रुनझुन ध्वनि से सबका मन मोह लेते हैं। दोनों की कमर में बहुमूल्य मोतियों से जड़ी सोने की करधनी शोभित है। हृदय पर कौस्तुभमणि झलमला रही है। ऐसी मणि जगत में और कोई है ही नहीं। कलाई में सोने के कंगन कानों में मणि कुण्डल, सिर पर मनोहर मोहन चूड़ा। उनकी अंगकान्ति के सामने करोड़ों सूर्यों की कोई गिनती नहीं। यमुना के तट पर वृन्दावन में कदम्ब वृक्ष के नीचे प्रायः उनके दर्शन मिलते हैं। वनमाली श्रीकृष्ण और हलधारी बलराम।”

सारा विवरण सुनकर उसने लाठी उठाकर कन्धे पर रखी और उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा। वह उत्तर भी उसकी अपनी धुन का ही था। दूसरों के देखने में शायद वह दक्षिण ही जा रहा था। उसको इस बात का भी पता नहीं था कि उसके पाँव हरी दूब पर पड़ रहे हैं या काँटों पर।

चलते-चलते एक स्थान पर सुबह का धुँधलका होने को आया। उसने देखा, बड़ा सुन्दर हरा-भरा वन हैं एक नदी भी कल-कल करती बह रही है। उसने सोचा निश्चय किया, यही है, यही है! परन्तु वह कदम्ब का पेड़ कहाँ है? डाकू बड़ी सावधानी के साथ एक-एक वृक्ष के पास जाकर कदम्ब को पहचानने की चेष्टा करने लगा। अंत में वहाँ उसे एक कदम्ब मिल ही गया। अब उसके आनन्द की सीमा न रही। उसने सन्तोष की साँस ली और आस-पास आँखें दौड़ाई। एक छोटा-सा पर्वत, घना जंगल और गाओं के चरने का मैदान भी दिख गया। हरी-हरी दूब रात्रि के तीसरे प्रहर के स्वाभाविक अँधेरे में घुल-मिल गयी थी। फिर भी उसके मन के सामने गौओं के चरने और चराने वालों की एक छटा छिटक ही गयी। अब उसके मन में एक ही विचार था-कब सवेरा हो, कब अपना काम बने। वह एक-एक क्षण सावधानी से देखता और सोचता कि आज सवेरा होने में कितनी देर हो रही है। ज्यों-ज्यों चौथे प्रहर का धुँधलका घटता, त्यों-त्यों चौथे प्रहर का धुँधलका घटता, त्यों-त्यों उसकी चिन्ता, उद्वेग, उत्तेजना, आग्रह और आकुलता बढ़ती जाती। वह कदम्ब पर चढ़ गया और देखने लगा कि किसी ओर उजाला तो नहीं है। कहीं से वंशी की आवाज तो नहीं आ रही है? उसने अपने मन को समझाया- अभी सवेरा होने में देर है। मैं ज्यों-ही वंशी की धुन सुनूँगा, त्यों ही टूट पडूँगा। उसने पण्डितजी से सुन रखा था कि श्रीकृष्ण की प्रिय आदत में वंशी बजाना शामिल है। वे वंशी बजाए बिना रह नहीं सकते। इस प्रकार सोचता हुआ बड़ी ही उत्कंठा के साथ वह सवेरा होने की बाट जोहने लगा।

देखते ही देखते किसी ने प्राची दिशा का मुख रोली के रंग से रँग दिया। उसके हृदय की आकुलता और बढ़ गयी। वह पेड़ से कूदकर जमीन पर आया। परन्तु वंशी की आवाज सुनायी न पड़ने के कारण फिर उठकर कदम्ब पर चढ़ गया। वहाँ भी किसी प्रकार की आवाज सुनायी नहीं पड़ी। उसका हृदय मानो क्षण-क्षण फटता जा रहा था। अभी-अभी उसका हृदय विहर उठता, परन्तु यह क्या, उसकी आशा पूर्ण हो गयी। दूर-बहुत दूर वंशी की सुरीली स्वर लहरी लहरा रही है। वह वृक्ष से कूद पड़ा। हाँ ठीक है, ठीक है बाँसुरी ही तो है। अच्छा यह स्वर तो और समीप होता जा रहा है। दुर्जनसिंह आनन्द के आवेश में अपनी सुध-बुध खो बैठा और मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़ा। कुछ ही क्षणों में उसकी बेहोशी दूर हुई। आँखें खुलीं वह उठकर खड़ा हो गया। देखा तो पास ही जंगल में एक दिव्य शीतल प्रकाश चारों ओर फैल रहा है। उस मनोहर प्रकाश में दो भुवन मोहन बालक अपने अंग की अलौकिक छटा बिखेर रहे हैं। गौएं और ग्वाल-बाल उनके आगे-आगे कुछ दूर निकल गए हैं।

भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के पास पहुँचकर उनका स्वरूप देखते ही दुर्जनसिंह की चेतना लुप्त हो गयी। पैर लड़खड़ाए और वह गिर पड़ा। फिर उठा। कुछ देर तक टकटकी लगाए देखता रहा, आँखें आँसुओं से भर आयीं। फिर न मालूम क्या सोचा, हाथ में लाठी लेकर उनके सामने गया और बोला-”खड़े हो जाओ। सारे गहने निकाल कर मुझे दे दो।”

सम्मोहर मुसकान के साथ श्री कृष्ण बोले-”हम अपने गहने तुम्हें क्यों दें? दोगे कैसे नहीं? देखते हो मेरी इस लाठी की ओर।” चाहकर भी दुर्जनसिंह अपनी आवाज में कठोरता नहीं ला पाया।

“लाठी से क्या होगा?” प्रभु श्रीकृष्ण ने हँसी की छटा बिखेरी।

“अच्छा क्या होगा? गहना न देने पर तुम्हारा सिर तोड़ डालूँगा और क्या होगा?” दुर्जनसिंह के शब्दों में उसकी बेबसी साफ-साफ झलक रही थी। “कुछ भी करो, लेकिन हम लोग अपने गहने नहीं देंगे।” श्रीकृष्ण जैसे उसे चिढ़ाने पर तुले थे।

“ज्यादा जिद करोगे, तो कान पकड़ कर ऐंठूँगा और सारे गहने छीन-छान कर तुम्हें नदी में फेंक दूँगा।” डाकू दूर्जनसिंह ने अपनी आवाज में तेजी लाते हुए कहा।

प्रभु श्रीकृष्ण का अभिनय नाट्य भी जारी था। वे जोर से चिल्लाए “बाबा ओ बाबा।”

डाकू से झपटकर अपने हाथ से श्री कृष्ण के मुँह पर हाथ रखना चाहा, परन्तु स्पर्श करते ही उसके सारे शरीर में बिजली दौड़ गयी। वह अचेत होकर धड़ाम से धरती पर गिर पड़ा। कुछ क्षणों के बाद जब उसे चेत हुआ तब वह श्रीकृष्ण से बोला-”अरे तुम दोनों कौन हो? मैं ज्यों-ज्यों तुम दोनों को देखता हूँ त्यों ही त्यों तुम मुझे और सुन्दर, और मधुर, और मनोहर क्यों दिख रहे हो? मेरी आँखों की पलकें झपकना बन्द हो गयी हैं। न जाने क्यों, मुझे रोना आ रहा है, देखो तो मेरे शरीर के सब रोएँ क्यों खड़े हो गए हैं। जान गया, तुम दोनों देवता हो, मनुष्य नहीं हो।”

सृष्टि सम्मोहक मुसकान बिखेरते हुए श्रीकृष्ण कहने लगे-”अरे नहीं, नहीं हम भी मनुष्य हैं। हम ग्वाल-बाल हैं। हम व्रज के राजा नन्दबाबा के लड़के हैं।”

दुर्जनसिंह मुग्ध होते हुए बोला-”आहा! कैसी

मुसकान है! जाओ-जाओ तुम लोग गौएँ। चराओ। मैं अब गहने नहीं चाहता। मेरी आशा, दुराशा, मेरी चाह-आह सब मिट गयी। हाँ मैं चाहता हूँ कि तुम दोनों के सुअंग-अंग में अपने हाथों से और भी गहने पहनाऊँ। जाओ-जाओ। हाँ, एक बार अपने दोनों लाल-लाल चरणों को मेरे मस्तक पर रख दो। जरा हाथ इधर तो करा! मैं एक बार तुम्हारी स्निग्ध हथेलियों का चुम्बन करके अपने प्राणों को तृप्त कर लूँ। ओह, तुम्हारा स्पर्श कितना शीतल, कितना मधुर है। धन्य! धन्य!! तुम्हारे मधुर स्पर्श से हृदय की ज्वाला शान्त हो रही है। आशा-अभिलाषा मिट गयी। तुम लोगों को जहाँ भी जाना हो, अब तुम जाओ। मेरी भूख-प्यास मिट गयी। अब कहीं जाने की इच्छा नहीं होती। मैं यहीं रहूँगा। तुम दोनों रोज इसी रास्ते से आओगे न? एक बार केवल एक क्षण के लिए प्रतिदिन मुझे दर्शन देते रहना।

किसी दिन नहीं आओगे। दर्शन नहीं दोगे तो याद रखो मेरे प्राण छटपटाकर छूट जाएँगे।”

“अब तुम हम लोगों को मारोगे तो नहीं? गहने तो नहीं छीनोगे? हाँ, ऐसी प्रतिज्ञा करो तो हम लोग प्रतिदिन आ सकते हैं।” श्रीकृष्ण ने मुस्कराकर कहा। बलराम ने हामी भरी।

“प्रतिज्ञा? सौ बार प्रतिज्ञा! अरे भगवान की शपथ! तुम लोगों को मैं कभी नहीं मारूंगा। तुम्हें मार सकता हो, ऐसा कोई है जगत में? तुम्हें तो देखते ही सारी निष्ठुरता गायब हो जाती है। मन ही हाथ से निकल जाता है। फिर कौन मारे और कैसे मारे।” दुर्जनसिंह ने विह्वल होते हुए कहा।

“यदि तुम्हें हम लोग गहना दें तो लोगे?” भक्तवत्सल प्रभु ने कहा।

“गहना, गहना? अब गहने क्या अब तो कुछ भी लेने की इच्छा नहीं है।” दुर्जनसिंह की चाहत मिट चुकी थी।

“क्यों नहीं? ले लो। हम तुम्हें दे रहे हैं।” भक्तवत्सल प्रभु बोले।

“लेकिन मैं इनका करूंगा क्या? पर तुम्हारी बात टाली भी तो नहीं जा सकती। तुम जो भी आज्ञा दोगे करूंगा।” दुर्जनसिंह में समर्पण के स्वर जग रहे थे।

“तब ठीक है, तुम इन्हें ले जाओ।” श्रीकृष्ण ने कहा।

दुर्जनसिंह ने उनके हाथों से गहनों की पोटली लेते हुए कहा-”मैं फिर आऊँगा, लेकिन गहनों के लिए नहीं, तुम्हारा दर्शन पाने के लिए।”

अवश्य! प्रभु का यह शब्द सुनते ही आनन्द के समुद्र में डूबता-उतराता घर की ओर लौट पड़ा। दूसरी रोज रात के समय कथावाचक पण्डितजी के पास जाकर सब वृत्तान्त कहा और गहनों की पोटली उनके सामने रख दी। बोला-” देखिए देखिए पण्डितजी। कितने गहने लाया हूँ। आपकी जितनी इच्छा हो ले लीजिए। मुझे तो मारना-पीटना भी नहीं पड़ा। उन्होंने अपने आप ही से दे दिया। फिर उन्हें मैं मारने की सोचता भी कैसे? कितने प्यारे हैं जो वे।”

पण्डितजी तो यह सब देखकर-सुनकर चकित रह गये। उन्होंने बड़े विस्मय के साथ कहा-”मैंने जिनकी कथा कही थी, उनके गहने ले आया।”

दुर्जनसिंह कहने लगा-”तब क्या देखिए न, यह सोने की वंशी, यह सिर का मोहन चूड़ामणि।” पण्डितजी हक्के बक्के रह गये। बहुत सोचा, बहुत विचारा परन्तु वे किसी निश्चय पर नहीं पहुँच सकें। जो अनादि, अनन्त, पुरुषोत्तम हैं। बड़े-बड़े योगी सारे जगत को तिनके समान त्याग कर भूख, प्यास, नींद की उपेक्षा करके जीवन भर जिनके ध्यान की चेष्टा करते हैं, परन्तु दर्शन से वंचित रह जाते हैं। उन्हें यह डाकू देख आया। कुछ समझ में नहीं आता।

क्षण भर ठहर कर पण्डितजी ने कहा-”क्यों भाई! तुम मुझे उनके दर्शन करा सकते हों?” दुर्जनसिंह ने कहा-”क्यों नहीं, कल ही साथ चलिए न।” पण्डितजी पूरे अविश्वास के साथ केवल उस घटना का पता लगाने के लिए उसके साथ चल पड़े और दूसरे दिन नियत स्थान पर पहुँच गए। पण्डितजी ने देखा एक सुन्दर-सा वन है। छोटी-सी नदी बह रही है। बड़ा-सा मैदान और कदम्ब का वृक्ष भी है। यह ब्रज नहीं, यमुना नहीं है, पर है कुछ वैसा ही। रात बीत गयी, सवेरा होने के पहले ही दुर्जनसिंह ने कहा-”देखिए पण्डितजी! आप नए आदमी हैं। आप किसी पेड़ की आड़ में छिप जाइये। वह कहीं आपको देखकर न आए तो। अब प्रातःकाल होने में विलम्ब नहीं है। अभी आएंगे।” वह पण्डितजी से बात कर ही रहा था कि मुरली की मोहक ध्वनि उसके कान में पड़ी। वह बोल उठा”सुनिए-सुनिए पण्डितजी! बाँसुरी बज रही है। कितनी मधुर! कितनी मोहक! सुन रहे हैं न?” पण्डित जी अचकचाकर बोले-”कहाँ मैं तो कुछ नहीं सुन रहा हूँ।” “क्या तुम पागल हो गए हो,” दुर्जनसिंह ने चौंककर उन्हें देखा और कहा, “जरा ठहरिए, अभी आप उन्हें देखेंगे। रुकिए, मैं पेड़ पर चढ़कर देखता हूँ कि वह अभी कितनी दूर हैं।”

उसने पेड़ चढ़कर देखा और कहा-”पण्डितजी! पण्डितजी!!” पण्डितजी!!! अब वह बहुत दूर नहीं हैं।” उतरकर उसने देखा कि थोड़ी दूर पर वैसा ही विलक्षण प्रकाश फैल रहा है। वह आनन्द के मारे पुकार उठा-”पण्डितजी देखिए। वे रहे-वे रहे।”

“लेकिन मुझे तो कुछ नहीं दिखाई पड़ता।” अब तो उसे भारी आश्चर्य हुआ-” आप जंगल, नदी सब कुछ देख रहे हैं और उन्हीं को नहीं देख पाते, जिनकी आप कथा सुनाते हैं। तो क्या अब तक वे सारी बातें आप बिना देखे ही कहते थे।”

अब तक भगवान श्रीकृष्ण और बलराम डाकू दुर्जनसिंह के पास आकर खड़े हो गए थे। वह उनसे कहने लगा-”भाई मैं गहने लेने नहीं आया, जो तुमने दिए थे, वे भी तुम्हें लौटाने आया हूँ। तुम अपना सब ले लो। लेकिन भैया, ये पण्डितजी मेरी बात का विश्वास नहीं कर रहे हैं। यदि तुम इन्हें दिखाई नहीं दोगे, तो ये मेरी बात पर विश्वास कैसे करेंगे?” प्रभु श्रीकृष्ण उसे समझाते हुए कहने लगे-”मैं भावैक्यगम्य हूँ। सरल हृदय, निष्कपट विश्वास ही मुझे देखने की शर्त है। तुम परिस्थितिवश डाकू बने हो परन्तु तुम्हारा अंतर्मन निश्छल है, जबकि पण्डितजी नियमित मेरी कथा करते हैं, परन्तु उनके ध्यान में मैं नहीं अधिक से अधिक धन कमाना और सम्मान पाना रहता है। वह मुझे नहीं धनीमानी लोगों को रिझाने की कोशिश करते हैं। विश्वास न हो रहा हो तो उनसे पूछकर देखो।”

दुर्जनसिंह ने पण्डितजी से सारी बातें पूछीं, जिसे उन्होंने रोते हुए सत्य स्वीकार किया। उन्हें आज मालुम हो रहा था, ईश्वर-दर्शन की पात्रता चतुर बुद्धि नहीं सरल हृदय है। उन्होंने पश्चाताप के स्वरों में कहा-”भाई तुम किसी तरह भगवान की एक झाँकी हमें दिखा दो।” दुर्जनसिंह के भगवान से निवेदन करने पर उन्होंने हँसकर कहा-”अच्छी बात है, तुम मुझे पण्डितजी को एक साथ स्पर्श करो।” उसके ऐसा करते ही मानो पण्डितजी के कर्मों का प्रायश्चित हो गया। उन्होंने मुरली-मनोहर की दिव्य झलक प्राप्त कर ली। इस घटना के बाद दुर्जनसिंह-जगन्नाथ दास गोस्वामी बनकर प्रभु और उनके भक्तों की सेवा में तल्लीन हो गया। पण्डितजी भी स्थान-स्थान पर भगवत् कथा का मर्म समझाते हुए जनमानस को यह बताने लगे कि निश्छल विश्वास, सरल हृदय, निष्कपट भावना डाकू को भी सन्त बना देती है।


गायत्री उपासना को सफल बनाने वाली पाँच तप-साधनाएँ

गायत्री उपासना में सफलता प्राप्त करने के लिए आत्मशोधन की प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। इसके बिना धन की सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी। जिस तरह भौतिक प्रगति में सफलता के लिए अभीष्ट श्रम, साहस, प्रयत्न-पुरुषार्थ करना पड़ता है, उसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए तपश्चर्या का पुरुषार्थ करना पड़ता है। अध्यात्म क्षेत्र की प्रगति पूरी तरह इस तथ्य पर निर्भर है कि साधक में तपश्चर्या की साहसिकता किस मात्रा एक प्रचण्ड हो सकी। उपासना और साधना का तात्विक पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि अध्यात्म विज्ञान का सारा ढाँचा ही यह प्रेरणा देता है कि प्रगति के लिए आवश्यक ऊर्जा उत्पन्न की जाय। ऊपर उठने के लिए, आगे बढ़ने के लिए सर्वत्र ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। वायुयान को या राकेट को आकाश में फेंकना हो या पानी को नीचे से ऊपर की ओर खींचना हो तो साधन और सामर्थ्य दोनों को ही जुटाना पड़ता है। जीवन को ऊँचा उठाना हो, आगे बढ़ाना हो तो भी समर्थता उत्पन्न करनी होगी और यह ऊर्जा तपश्चर्या के बिना उत्पन्न नहीं हो सकती। तपश्चर्या के बिना उत्पन्न नहीं हो सकती। तपश्चर्या के आधार पर ही वह क्षमता विकसित होती है जो अंतर्जगत की क्षमताओं को जगाकर किसी को विभूतिवान बना सकी। दैवी अनुग्रह इसी आधार पर आकर्षित किये जाते हैं।

आद्यशक्ति की साधना से अभीष्ट सफलताएँ प्राप्त करने वालों का इतिहास आदि से अन्त तक एक ही तथ्य प्रमाणित करता है कि उन्होंने आवश्यक तपश्चर्या करके अपनी पात्रता विकसित की, फलतः उन्हें विभूतियों, सिद्धियों से लाभान्वित होने का अवसर मिला। महामानवों से लेकर ऋषि-महर्षियों तक की सफलताएँ पूर्णतया उनकी तप-साधना पर निर्भर रही हैं। मंत्राराधन जादूगरी नहीं है। उसके पीछे प्रचण्ड तपश्चर्या की शक्ति ही चमत्कार प्रस्तुत करती है। साधक की पात्रता का विकास जिस अनुपात से होता है, उसी क्रम में उसका वर्चस्व बढ़ता जाता है और दैवी अनुदान-वरदानों से वह निहाल होता जाता है।

उच्चस्तरीय गायत्री महाशक्ति की साधना पंचमुखी है। उसके प्राण रूपी प्रकरण पाँच-पाँच सोपानों बँटे हुए हैं। तप−साधना वाला प्रकरण भी पाँच भागों में विभक्त है। पाँच तत्वों से बना हुआ काय-कलेवर, पाँच प्राणों से बने हुए चेतना-संस्थान पाँच प्राणों से बने हुए चेतना-संस्थान भी पाँच प्रकार की तपश्चर्याओं से परिष्कृत, परिमार्जित होते हैं। गायत्री उपासना को सफल बनाने वाली पाँच तपश्चर्याएँ-(1) उपवास, (2) ब्रह्मचर्य, (3) मौन, (4) तितीक्षा और (5) अनुदान-इन पाँच नामों से प्रसिद्ध हैं। साधना के साथ-साथ इनका समन्वय जितना हो सकेगा, उसी अनुपात से उसकी कार्य-क्षमता बढ़ती चली जाएगी।

उपवास का प्रयोजन है- आहार की संयमशीलता और सात्विकता। पापों के प्रायश्चित के लिए तो चान्द्रायण, संतापन आदि कितने ही विशिष्ट व्रत हैं। अमावस्या, पूर्णिमा, एकादशी एवं साप्ताहिक उपवासों का क्रम कितने ही लोग चलाते हैं। श्रावण, कार्तिक, माघ, वैशाख महीने के पूरे व्रत-साधनों का विस्तृत माहात्म्य है। रमजान में रोजे तो मुसलमान भी रखते हैं। जन्माष्टमी, रामनवमी, शिवरात्रि, गंगा दशमी, नवरात्रि आदि के पर्वों पर उपवासों की परम्परा है। आहार न करने से पेट को विश्राम मिलता है और उसका नयी शक्ति, नयी स्फूर्ति अर्जित करना स्वास्थ्य की दृष्टि से तो हितकर है ही, उसका प्रभाव मन पर भी पड़ता है। शारीरिक आवश्यकता भूख के रूप में प्रकट होती है ओर आहार माँगती है। धर्मश्रद्धा के साथ जुड़ा हुई संकल्प-शक्ति उस माँग को पूरा करने से इनकार करती है। संस्कार और संकल्प के बीच विग्रह खड़ा होता है। समझाकर या बलपूर्वक कुसंस्कारों का दमन किया जाता है और धर्मबुद्धि के सहारे शरीर को संतोष-समाधान कराया जाता है। इस अनुशासन स्थापना को तपश्चर्या कहा गया है। इस अभ्यास में अन्यान्य प्रकार की वासनाओं का दमन एवं समाधान हो सकता है।

इन्द्रियनिग्रह और मनोनिग्रह से इस सफलता से क्रमशः उत्साह एवं साहस बढ़ता है। मन को जीतना सबसे बड़ी सफलता है, विजय है। जो पूरी तरह इस क्षेत्र में सफल हो सका, उसे जीवनमुक्त ही कहा जाएगा। उपवास की तपश्चर्या के सहारे आत्मानुशासन स्थापित करने का महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध होता है।

उपवास किसे, किस प्रकार, कितना करना चाहिए, यह साधक की मनः स्थिति और परिस्थिति पर निर्भर है। पूर्ण उपवास तो वही है जो मात्र जल पर रहा जाय। आँशिक उपवास के कितने ही प्रकार हैं-दूध, छाछ, फलों का रस, शाकों का रस, खिचड़ी, दलिया आदि। उपवास की इन प्रक्रियाओं में से जो जितना कठिन या सरल चुनाव कर सके, उसे करना चाहिए। इसके साथ ही अस्वाद व्रत की प्रक्रिया भी जुड़ी हुई है। नमक, शक्कर, मसाले छोड़कर बिना स्वाद का भोजन करना इन्द्रियनिग्रह का एक बड़ा कदम है। स्वास्थ्य की दृष्टि से इसमें तनिक भी हानि नहीं, वरन् इससे मन की चंचलता को रोकने और सात्विकता की अभिवृद्धि में सहायता मिलती है।

अस्वाद व्रत जिह्वा इन्द्रिय का संयम है। जीभ को चटोरेपन के दुर्गुण से छुड़ा लेने में साहसिकता का समावेश है। इसे जीत लेने पर अन्य सभी इन्द्रियों पर अनुशासन स्थापित कर सकना सरल हो जाता है। इसमें भी आत्म-निग्रह का, आत्मानुशासन का संकल्प प्रखर होता है और इससे बढ़ा हुआ साहस अन्य कुसंस्कारी दुष्प्रवृत्तियों पर विजय पा सकने में सफल हो जाता है। स्वाद छूटने पर जो कुछ खाया जाएगा, प्रायः वह सीमित और सात्विक ही रहता है और उससे आत्मिक प्रगति में बड़ी सहायता मिलती है। इसलिए उपवास और उसकी एक महत्वपूर्ण शाखा अस्वाद व्रत का पालन तपश्चर्या में ही सम्मिलित है। उसका लगातार कितने समय तक पालन किया जाय, यह साधक की इच्छा पर निर्भर है। न्यूनतम सप्ताह में एक बार इस तप के पालन का अभ्यास तो करना ही चाहिए।

जप, स्तवन, कीर्तन, पठन आदि जिह्वा से किये जाते हैं, अतः इस उपकरण की शुद्धि नितान्त आवश्यक हैं। जिस जीभ रूपी बन्दूक से मंत्र रूपी कारतूस चलाया जाता है उसकी सफाई पहले ही कर लेनी चाहिए। नली में कूड़ा-करकट भरा हो, दबाने को घोड़ा तथा दूसरे पुर्जे अस्त-व्यस्त हों तो अच्छे कारतूस होने पर भी निशाना लगाना कठिन है। वंशी बजाने वाले यह देख लेते हैं कि उसके छेद साफ हैं या नहीं। मैले बर्तन में दूध दुहने या उबालने से उसके फटने की आशंका रहेगी। यही बात अशुद्ध जिह्वा के सम्बन्ध में भी है, उसके द्वारा किये गये पूजा-उपचार एवं मंत्र-साधन सफल नहीं होते। अस्तु, उपासना को सार्थक बनाने के लिए जिह्वा शुद्धि की प्रक्रिया पर पूरा ध्यान देना चाहिए। जिह्वा शुद्धि आहार से भी जुड़ी है एवं वाणी से भी।

शास्त्रों में कहा गया है कि अभक्ष्य आहार से जिह्वा की पवित्रता और आध्यात्मिक क्षमता नष्ट होती है। इसलिए भोजन की सात्विकता पर पूरा-पूरा ध्यान देने की आवश्यकता है। स्वाद को जीतना अति आवश्यक है, इसके बिना आहार को सात्विक नहीं रखा जा सकेगा। जीभ का चटोरापन न केवल पेट को, स्वास्थ्य को बिगाड़ता है, वरन् मानसिक चंचलता और तामसिकता का भी निमित्त होता है। भोजन पवित्र हाथों का बनाया हो। पकाने और परोसने वाले के संस्कार आहार में रहते हैं। इसलिए साधक को अपने हाथ का अथवा सुसंस्कारी हाथों का पकाया, परोसा आहार लेने की व्यवस्था करनी चाहिए और हर हालत में भूख से कम ही खाना चाहिए। बेईमानी से कमाया हुआ, युद्ध में पाया हुआ धन भी बुद्धि भ्रष्ट करने का बड़ा कारण है। ऐसे धन से खरीदे गये खाद्य पदार्थ, वस्त्र तथा दूसरे उपकरण, आध्यात्मिक प्रगति में घोर बाधा पहुँचाते हैं। इन सब बातों का ध्यान रखा जाय तो उपासना की सफलता सुनिश्चित होती है।

जिह्वा का एक कार्य है-आहार ग्रहण, दूसरा है-उच्चारण। उच्चारण का तात्पर्य है साधक के सम्भाषण में पवित्रता का समावेश। असत्य भाषण, छल, शेखी खोरी, अवाँछनीय परामर्श, अपमान, तिरस्कार, कटुवचन, चुगली, हिम्मत गिराना जैसे अनेक वाणी दोष है। इनके रहते भी वाणी की पवित्रता नहीं बन पाती। साधक को नपा-तुला बोलना चाहिए। व्यर्थ की बक-झक करते रहने की आदत पड़ गयी हो तो वह दूर करनी चाहिए। अपने वाणी दोषों को सुधारने के लिए पूरा-पूरा ध्यान देना चाहिए। इस संदर्भ में वाणी का विश्राम, निरीक्षण, संशोधन करने के लिए मौन का अभ्यास करना चाहिए। मौन को वाणी का तप कहा गया हैं।

निःस्वार्थ सेवा से अहंकार, घृणा, ईर्ष्या जैसे दोषों से मुक्ति पायी जा सकती है। इससे भेदभाव, ऊँच-नीच का भाव मिटता है। पवित्रता पनपती है। जीवन के प्रति दृष्टिकोण विशाल होता चला जाता है। सब में एक और एक में सबकी अनुभूति होने लगती है। फिर सेवा ही पूजा में बदल जाती है।

सुविधानुसार हर दिन जाग्रत स्थिति में एक-दो घण्टे मौन रहने का अभ्यास करने का प्रयत्न करना चाहिए। भोजन के समय, मल-मूत्र विसर्जन में, उपासना के समय तो मौन रहने की परम्परा भी है। इसके लिए जिस समय कम जन-संपर्क रहता है उस समय एक दो घण्टे का मौन रखने का नियम बनाना चाहिए। सप्ताह में यह महीने में एक दिन पूरा मौन रखना भी जिह्वा की अवाँछनीय गतिविधियों पर रोक लगाने, पुरानी आदतें भुलाने का एक अच्छा उपाय है।

शक्ति-संचय की दृष्टि से कम बोलना उपयोगी है। जब मनुष्य अधिक दुर्बल हो जाता है तो उसकी वाणी बन्द हो जाती है या लड़खड़ाने लगती है। यद्यपि होश-हवाश बने रहते हैं। बोलने में अन्तःशक्तियों पर बहुत जोर पड़ता है।

अनेकों अवयवों की संयुक्त शक्ति के अतिरिक्त उसमें शरीर विद्युतशक्ति का भी एक बहुत बड़ा भाग खर्च होता है। दुर्बलता की स्थिति तक उतनी सामर्थ्य न रहने से ही बोलने में कठिनाई होती है।

‘वाइस ऑफ साइलेन्स’ ग्रन्थ में थियोसॉफी के जन्मदाताओं ने यह बताया है कि मौन रहने की स्थिति में दैवी-वाणी को सुनने में दोनों क्रियाएँ साथ-साथ चलाने में कितनी कठिनाई होती है, यह सभी जानते हैं। ईश्वर की वाणी सुनने, अदृश्य लोक के दिव्य संदेशों को पकड़ने के लिए मौन धारण का अभ्यास करना उचित ही है। गायत्री उपासकों के लिए उपवास अस्वाद एवं मौन का अभ्यास करने के साथ में जिह्वा के माध्यम से की जाने वाली दोनों ही तपश्चर्याएँ आवश्यक हैं। आहार की तामसिकता और अनर्गल वार्ता का संयम करने से जिह्वा में वह शक्ति उत्पन्न होती है जिसके द्वारा किया गया जप-आराधन सफल हो सके।

तीसरा तप- ब्रह्मचर्य। ब्रह्मचर्य का मोटा अर्थ है-वीर्य रक्षा। स्वास्थ्य सुरक्षा की दृष्टि से यह भी आवश्यक है। इस बहुमूल्य धातु का सूक्ष्म रूप ओजस् है। नेत्रों में ज्योति, वाणी में प्रभाव, मस्तिष्क में स्मृति, व्यक्तित्व में प्रतिभा, शरीर में स्फूर्ति, चेहरे पर तेजस्विता, मन में साहसिकता के रूप में यह ओजस् ही काम करता है। जीवन-ज्योति में आलोक जिस तेल के आधार पर प्रकाशवान रहता है, वह वीर्यरक्षा से ही संचित होता है। आत्मिक प्रगति के लिए प्रचण्ड संकल्प शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। भौतिक आकर्षणों से लेकर कुसंस्कारों के अवरोधों से पग-पग पर जूझना होता है। इसके लिए योद्धाओं जैसे शौर्य, साहस की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए अभीष्ट शक्ति-संचय की दृष्टि से ब्रह्मचर्य का पालने आवश्यक है। दाम्पत्य जीवन का अर्थ आत्मघात नहीं है। पति-पत्नी भी सीमित ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए दो मित्रों की तरह और सहेलियों की तरह मित्रता और प्रसन्नता भरा जीवन सरलता और सफलतापूर्वक जी सकते हैं।

ब्रह्मचर्य का सूक्ष्म ओर महत्वपूर्ण भाग वह है जिसमें नर, नारी को और नारी, नर को कामुकता की दृष्टि से न देखकर सामान्य प्राणी की तरह देखते हैं। अश्लील विचारों की वासनात्मक कुदृष्टि का समन्वय नहीं होने देते। यदि स्नेहपूर्वक एक-दूसरे को देखना आवश्यक हो तो पुत्री, भगिनी या माता की, पुत्र, भाई या पिता की पवित्र दृष्टि रखते हुए घनिष्ठता एवं मित्रता का भी निर्वाह हो सकता है। हम जिस आद्यशक्ति की माता के रूप में उपासना करते हैं। उसका चित्र युवा नारी का है। उसमें पवित्रता भरी मातृ-बुद्धि की श्रद्धा जमाने का एक उद्देश्य यह भी है कि नारी यौवन पर दृष्टि जाते ही उत्कृष्ट चिन्तन उभरने का अभ्यास होता रहे। सरस्वती, लक्ष्मी, काली आदि अन्य देवियों की प्रतिमाओं में भी यौवन के साथ भावभरी श्रद्धा संजोये रहने की मान्यता है इसी प्रकार देवताओं को रूप-यौवन संपन्न बनाकर नारी को यह अभ्यास करने का अवसर नारी को यह अभ्यास करने का अवसर दिया गया है कि वे पर यौवन से कामुक उत्तेजना ग्रहण न करें, वरन् ईश्वर तुल्य पवित्र मान्यताओं का अभ्यास करें। मीरा आदि की आराधना इसी स्तर की थी। यौवन विकारों को पवित्र चिन्तन में परिणत करने की साधना ही वास्तविक ब्रह्मचर्य है। इसका अभ्यास देव प्रतिमाओं सहारे किया जा सकता है। सामान्य जीवन-क्रम में इस सम्बन्ध में अधिक अनुशासन बरतने की मर्यादाएँ बनानी और पालन करनी चाहिए।

इस क्रम में चौथी प्रक्रिया है- तितीक्षा। तितीक्षा का अर्थ है-सुविधाओं का स्वेच्छापूर्वक परित्याग और कष्टसाध्य जीवनक्रम का अभ्यास। यह कई कारणों से आवश्यक है। मितव्ययी ब्राह्मणोचित जीवन निर्वाह की स्थिति अपनाने पर ही परमार्थ प्रयोजनों की पूर्ति होती है और विलासिता से पिंड छूटता है। अल्पव्यय में निर्वाह करने वाले को कई प्रकार की असुविधाएँ सहन करनी पड़ती हैं। इसका पूर्वाभ्यास तितीक्षा से ही करना पड़ता है। अल्पव्यय में निर्वाह करने वाले को कई प्रकार की असुविधाएँ सहन करनी पड़ती हैं। इसका पूर्वाभ्यास तितीक्षा से ही करना पड़ता है। तितीक्षा के कई रूप हैं जिसे हर साधक को करते रहना अनिवार्य है।

सर्दी, गर्मी, भूख, प्यास सहने का अभ्यास तितीक्षा है। भूमिशयन, बिना जमते के चलना, कम वस्त्रों का उपयोग भी इसी श्रेणी में आता है। बिना दूसरों की सहायता का स्वावलंबी जीवन, अपनी शरीर यात्रा के कार्य अपने हाथों करने का अभ्यास भी इसी प्रयोजन के लिए है। कपड़े धोना, हजामत, बनाना, जैसे दैनिक आवश्यकता के काम बिना दूसरों की सहायता लिए करने के नियम इसी तप-तितीक्षा के अंतर्गत आते हैं। अपनी स्थिति के अनुरूप इनमें से जिनसे जो जितनी मात्रा में बन पड़े, उतना कुछ करते रहने का प्रयत्न करना चाहिए।

पाँचवाँ तप है- अनुदान। अपने सुविधा-साधनों में कमी करके उस बचत को सत्प्रयोजनों में लगाते रहना अनुदान अथवा अंशदान है। समय-दान, श्रमदान, धनदान आदि इसी वर्ग में आते हैं। अपने धर्म-कृत्यों में से प्रत्येक के साथ किसी न किसी रूप में दान देने का विधान जुड़ा हुआ है। विविध प्रकार के दान, पुण्य-परमार्थ एवं धर्मकृत्य माने गये हैं। ब्रह्मभोज, प्रसाद वितरण आदि की पूर्णाहुति मानी जाती है। यह लोकमंगल के लिए अंशदान की ही एक प्रक्रिया है। अंशदान का अर्थ है-अपना उपार्जन तो अधिकाधिक बढ़ाना, पर उसका एक न्यूनतम अंश ही अपने निर्वाह में खर्च करना और शेष बचता हो तो परमार्थ प्रयोजनों में लगा देना। यह उसमें अपनी वासना-तृष्णा पर, लोभ-मोह पर अंकुश रखना पड़ता है। कार्यों या व्यक्तियों के लिए न्यौछावर करना पड़ता है। इतनी उदार साहसिकता को जो भी परमार्थ प्रयोजनों के लिए नियोजित कर सके, उसे तपस्वी ही कहा जाएगा। समय दान और धनदान का न्यूनतम अनुदान युग निर्माण परिवार के प्रज्ञ-परिजनों को ज्ञानयज्ञ के लिए प्रस्तुत करना पड़ता है। ज्ञानघटों की स्थापना से इसी तपश्चर्या का शुभारंभ होता है। अपने युग का सबसे बड़ा परमार्थ ज्ञानयज्ञ ही माना गया है। हमें प्राचीनकाल के ऋषियों, महामानवों और देवपुरुषों की तरह बढ़ा-चढ़ा अंशदान पीड़ा और पतन का समग्र निवारण कर सकने वाले ज्ञानदान के निमित्त करते रहना चाहिए। तपश्चर्या का यह पंचम चरण है। इन पाँचों को किसी न किसी रूप में कार्यान्वित करके गायत्री उपासना के वास्तविक सत्परिणाम देखने का अवसर प्राप्त करना चाहिए, यह मानकर चलना चाहिए कि तप के बाद ही योग परमात्मा का मिलन-संयोग, श्रेष्ठ तपस्वी ही समर्पित योगी बन सकता है। हम जीवन-शैली में पर्याप्त संतुलन, समत्व स्थापित कर योगी बनना सीखें व अनुदानों के अधिकारी बनें।


एक प्याली शराब (Kahani)

एक शराबी अपने दोस्तों से कहने लगा कि उसने कभी एक प्याली से अधिक शराब नहीं पी। मित्र उसे अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने कहा-सरासर झूठ। तुम तो प्यालियों पर प्यालियाँ उड़ेलते चले जाते हो। हम सबने अपनी आँखों से देखा है। लेकिन शराबी अपनी जिद पर अडिग था। वह बार-बार कसमें खाकर विश्वास दिलाता, परन्तु प्रत्यक्षदर्शी मानें भी तो कैसे? वे सब बोले-थोड़ा ठहरो, आज शाम को ही बता देंगे।

शाम आयी। शराबी लगा बैठकर पीने। एक के बाद दूसरी-दूसरी के बाद तीसरी-क्रम चलता जा रहा था। एक मित्र ने उसका हाथ पकड़ कर कहा-बोलते थे न झूठ। उसने कहा-मैं अब भी झूठ नहीं बोल रहा। तुम्हें ही दिखाई नहीं पड़ रहा। मित्रों को उसकी इस बेढंगी बात पर आश्चर्य के साथ गुस्सा भी आ गया।

इस पर उन्हें समझाते हुए शराबी कहने लगा-मैंने एक ही प्याली पी है। बाद में तो पहली प्याली ने दूसरी को पिया, दूसरी ने तीसरी को, इसी तरह तीसरी प्याली चौथी को पी रही है और धीरे-धीरे शराब शराबी को ही पी जाती है और वह स्वयं इस रहस्य से अनजान बना रहता है।


अंतर्जगत के झरोखों को खोलता है ध्यान

ध्यान आत्मलोक का प्रवेश द्वार है। स्वयं की अन्तर्निहित क्षमताओं को जाग्रत करने का वैज्ञानिक प्रयोग है। लेकिन इस प्रयोग में तल्लीनता और आत्मलोक में प्रवेश तभी सम्भव है, जब शरीर व मन शान्त स्थिति में हों। शारीरिक और मानसिक उत्तेजनाएँ आत्मिक साधनाओं में बाधक होती हैं। उनके कारण महत्वपूर्ण साधना-विधानों के लिए किया गया भारी पुरुषार्थ भी निरर्थक चला जाता है इसीलिए तत्वदर्शी आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने के लिए अभ्यासरत साधकों को यही शिक्षा देते रहे हैं कि शरीर को तनावरहित और मस्तिष्क को उत्तेजनारहित रखा जाय, ताकि उस दिव्यचेतना का अवतरण निर्बाध गति से होता हर सके।

क्रिया-कलापों की भगदड़ से माँस-पेशियों में, नाड़ी-संस्थान में तनाव रहता है। बाहर से स्थिर होते हुए भी यदि शरीर के भीतर आवेश छाया रहा, तो उस उफान के कारण मन की स्थिति एवं एकाग्र रह सकना किसी भी तरह सम्भव न होगा। हठयोग में शरीर को जटिल स्थिति में डाले रहने की आवश्यकता होती है। पर ध्यानयोग की दृष्टि से वह सर्वथा अवाँछनीय है। बद्ध पद्मासन, शीर्षासन, एक पैर से खड़ा होना, जल में बैठना, धूप में तपना, शीत में काँपना, ठण्ड के दिनों में ठण्डे जल से नहाना, गर्मियों में धूनी तपना जैसे शरीर में दबाव डालने वाले साधनाक्रम हठयोग एवं तान्त्रिक साधनाओं के लिए उपयुक्त हो सकते हैं, पर यदि कोई चाहे कि इस स्थिति में प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि जैसे लययोगपरक अभ्यास कर सके तो उसे असफलता ही मिलेगी। इस संदर्भ में बहुधा खेचरी मुद्रा, नासिकाग्र पर दृष्टि जमाना, उड्डयन बन्ध, जालन्धर बन्ध, यहाँ तक कि मंत्रोच्चारण के साथ किया गया माला जप भी व्यतिरेक उत्पन्न करता है। इन विधि-विधानों के साथ ध्यान नहीं हो सकता। क्योंकि चित्तवृत्तियों इन शरीरगत हलचलों में ही लगी रहती हैं। ऐसी दशा में एकाग्रता, स्थिरता हो तो कैसे हो?

आरम्भिक साधना-प्रयास में केवल आदत डालने, नियमितता अपनाने एवं रुचि उत्पन्न करने जितना ही लक्ष्य रहता है। इसलिए उपासना में चंचल-चित्त को एक नियत विधि-व्यवस्था में लगाए रहने वाली मनोरंजन विधियाँ उपयुक्त रहती हैं। शंकरजी पर विल्वपत्र चढ़ाना, अभिषेक करना, परिक्रमा करना, धूप-दीप से गायत्री माता की मूर्ति अथवा चित्र का पंचोपचार, षोडशोपचार पूजन करना आदि क्रियाएँ इसी स्तर की हैं। विभिन्न धर्मग्रन्थों-बाइबिल, रामायण, गीता का पाठ, देवी-देवताओं के स्तवन, मंत्रजप आदि शारीरिक हलचलों के साथ की जाने वाली साधनाएँ इसी स्तर की होती है। उनमें रुचि उत्पन्न करने, स्वभाव का रुझान ढालने का लक्ष्य जुड़ा रहता है। आरम्भ में इस लाभ का भी अपना महत्व है, किन्तु जब ध्यानयोग की उच्च भूमिका में प्रवेश करना होता है, तो शरीरगत हलचलें बन्द करके निःचेष्ट होने की आवश्यकता पड़ती है। माँसपेशियों और नाड़ी संस्थान को जितना अधिक तनाव-रहित, शान्त रखा जा सके उतना ही लाभ मिलना है।

मन-मस्तिष्क के बारे में भी यही बात है। उसमें हलचलें चल रही होंगी, तरह-तरह के विचार उठ रहे होंगे तो जल में उठती हुई हिलोरों की तरह अस्थिरता ही बनी रहेगी। स्थिर जल राशि में चन्द्र, सूर्य, तारे आदि का प्रतिबिम्ब ठीक प्रकार दृष्टिगोचर होता है, पर हिलते हुए पानी में कोई छबि नहीं देखी जा सकती। विचारों की हड़कम्प यदि मस्तिष्क में उठती रहे, तरह-तरह की कल्पनाएँ घुड़-दौड़ मचाती रहें तो फिर ब्रह्म सम्बन्ध की प्रगाढ़ता में निश्चित रूप में अड़चन पड़ेगी। मस्तिष्क जितना अधिक विचार रहित-खाली होगा उतनी ही तन्मयता उत्पन्न होगी और आत्मा-परमात्मा का मिलन-संयोग अधिक प्रगाढ़ एवं प्रभावशाली बनता चला जाएगा।

आकाश में जब बिजली कड़क रही हो या आँधी-तूफान का मौसम चल रहा हो तो हमारे रेडियो की आवाज साफ नहीं आती। कड़कड़ जैसे व्यवधान उठते रहते हैं और प्रोग्राम ठीक से सुनायी नहीं पड़ते। अन्तरिक्ष से भौतिक शक्तियों एवं आत्मिक चेतनाओं का सुदूर क्षेत्र से मनुष्य पर अवतरण होता रहता है। ब्राह्मी चेतना एक प्रकार ब्रोडकास्ट केन्द्र है, जहाँ से मात्र संकेत, निर्देश, सूचनाएँ ही नहीं, वरन् विविध प्रकार सामर्थ्यं भी प्रेरित-प्रेषित की जाती रहती हैं। सूक्ष्म जगत में यह क्रम निरन्तर चलता रहता है। जहाँ सही रेडियो यन्त्र लगा है, जहां व्यक्ति ने अपने आपको सही अन्तःस्थिति में बना लिया है, वहाँ। यह सुविधा रहेगी कि ब्रह्म चेतना की विविध सूचनाओं को ग्रहण करके अपनी ज्ञानचेतना को बढ़ा सके। इतना ही नहीं प्रेरित दिव्य शक्तियों को ग्रहण करने और धारण करने का लाभ उठाकर अपने को असाधारण आत्म-बल सम्पन्न बना सके।

परंतु यह सम्भव तभी है, जब मनुष्य अपने मस्तिष्क को तनावरहित, शान्त स्थिति में रखे। आँधी-तूफान, कड़क और गड़गड़ाहट की उथल-पुथल रेडियो को ठीक से काम नहीं करने देती। मनुष्य का शरीर और मन उत्तेजित तनाव की स्थिति में रहे तो फिर यह कठिन ही होगा कि वह ब्रह्मचेतना के साथ अपना सम्बन्ध ठीक से जोड़ सके और उस सम्मिलन की उपलब्धियों का लाभ उठा सके।

ध्यान भूमिका की साधना में शरीर को ढीला और मन को खाली रखना चाहिए। इसके लिए शिथिलीकरण मुद्रा तथा उनमनी मुद्रा का अभ्यास करना पड़ता है। शिथिलीकरण मुद्रा तथा उन्मनी मुद्रा का अभ्यास करना पड़ता है। शिथिलीकरण का स्वरूप यह है कि देह को मृतक, निष्प्राण, मूर्छित, निद्रित, निःचेष्ट स्थिति में किसी आरामकुर्सी या किसी अन्य सहारे की वस्तु से टिका दिया जाय और ऐसा अनुभव किया जाय मानी शरीर प्रसुप्त स्थिति में पड़ा हुआ है। उसमें कोई हरकत या हलचल नहीं हो रही है। यह मुद्रा शरीर को असाधारण विश्राम देती है और तनाव दूर करती है। ध्यानयोग के लिए यही स्थिति सफलता का पथ प्रशस्त करती है।

मन-मस्तिष्क को ढीला करने वाली उन्मनी मुद्रा यह है कि इस समस्त विश्व को पूर्णतया शून्य-रिक्त अनुभव किया जाय। प्रलय के समय ऊपर नील आकाश, नीचे नील जल का अपने चिन्तन की तन्मयता में अनुभव करते स्वयं को कमलपत्र पर पड़े हुए अबोध बालक की तरह तैरते हुए ध्यान करना चाहिए। ध्यान की इस भावभूमि में अनुभव करें कि बालक पैर का अँगूठा अपने मुख से चूस रहा है। इस प्रकार का प्रलयकालीन दृश्य चित्र के रूप में बाजार में भी बिकता है। चित्र में वर्णित यह अनुभूति मन को शान्त करने की दृष्टि से बहुत उपयुक्त है। इस भावभूमि की प्रगाढ़ता में स्पष्ट अनुभव होता है कि संसार में कोई व्यक्ति, वस्तु, हलचल, समस्या, आवश्यकता है ही नहीं सर्वत्र पूर्ण नीरवता ही भरी पड़ी है।

यह मान्यता दृढ़ होने पर मन को लिए भोगने, सोचने, चाहने का कोई पदार्थ या कारण रह ही नहीं जाता।अबोध बालक के मन में कल्पनाओं की घुड़-दौड़ की कोई गुँजाइश नहीं रहती। अपने पैर के अँगूठे में से निःसृत अमृत का जब आप ही परमानन्द उपलब्ध हो रहा है तो बाहर कुछ ढूँढ़ने-खोजने की आवश्यकता ही क्या रही? इस उन्मनी मुद्रा में आस्था पूर्वक यदि मन जमाया जाय तो उसके खाली एवं शान्त होने की कोई कठिनाई नहीं रहती। कहना न होगा कि कठिनाई नहीं रहती। कहना न होगा कि शरीर को ढीला और मन को खाली करना ध्यानयोग के लिए नितान्त आवश्यक है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि ध्यानयोग का चुंबकत्व ही आत्मा और परमात्मा की प्रगाढ़ घनिष्ठता को विकसित करके द्वैत को अद्वैत बनाने में सफल होता है। आत्मा ओर परमात्मा का मिलन-संयोग जितना गहरा होगा, उतना ही परस्पर लय होने की सम्भावना बढ़ेगी। इस एकता के आधार पर ही बिन्दु को सिन्धु बनने का अवसर मिलता है। जीव का ब्रह्म बनने का अवसर ऐसे ही लय-समर्पण पर, एकात्मभाव पर निर्भर रहता है।

जटिल संरचना वालो कोमल तारों एवं पुर्जों से बने यन्त्रों का उपयोग बहुत साज-सँभाल के साथ किया जाता है। उन्हें झटके-धक्के लगते रहें तो कुछ ही समय में गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है। ट्रांजिस्टर, रेडियो, टेपरिकार्डर, घड़ी आदि संवेदनशील यन्त्र भारी उठा-पटक बर्दाश्त नहीं कर सकते। इलेक्ट्रानिक उपकरणों, कम्प्यूटर आदि के साथ भी यही बात है। उन्हें ठीक रखना हो तो सावधानी के साथ उठाने, रखने, बरतने का क्रम चलाना चाहिए। यही सत्य शरीर और मस्तिष्क के बारे में है। यदि उन्हें स्वस्थ स्थिति में रखना हो तो तनावों और आवेशों से उनकी समस्वरता को नष्ट होने से बचाना ही चाहिए।

शरीर को मृत समान निर्जीव अनुभव करने, काया से प्राण को अलग मानने-अर्द्धनिद्रित स्थिति में माँस-पेशियों को ढीला करके आरामकुर्सी जैसे किसी सुविधा-साधन के सहारे पड़े रहने को शिथिलीकरण मुद्रा कहते हैं। ध्यानयोग के लिए यही सर्वोत्तम आसन है। शरीर को इस प्रकार ढीला करने के अतिरिक्त मन को भी करने के अतिरिक्त मन को भी खाली करने की आवश्यकता पड़ती है। ऊपर नील आकाश-नीचे अनन्त नील जल-अन्य कोई पदार्थ, कोई जीव, कोई परिस्थिति कहीं नहीं, ऐसी भावना के साथ यदि अपने को निर्मल, निश्चिन्त मन वाले बालक की स्थिति में एकाग्र होने की मान्यता मन में जमायी जाय, तो मन सहज ही ढीला हो जाता है। इन दो प्रारम्भिक प्रयासों में सफलता मिल सके तो ही समझना चाहिए कि ध्यानयोग में आगे बढ़ने का पथ प्रशस्त हो गया।

संसारव्यापी शून्य नीलिमा की तरह ध्यान योग में अपने हृदयाकाश को भी रिक्त करना पड़ता है। कामनाएँ-वासनाएँ, ऐषणाएं, आकाँक्षाएँ, प्रवृत्तियाँ भावावेशपरक उद्विग्नताएँ मन में जितनी उभर-उफन रही होंगी, उतना ही अन्तः-क्षेत्र अशान्त रहेगा और एकाग्रता का तन्मयता का, लय स्थिति का आधार अपनाकर हो सकने वाला प्रयोजन पूरा न हो सकेगा।

मस्तिष्क पर क्रोध, शोक, भय, हानि, असफलता, आतंक आदि के कारणवश आवेश आते हैं, पर वे स्थायी नहीं होते। कारण समाप्त होने अथवा बात पुरानी होने पर शिथिल एवं विस्मृत हो जाते हैं। उनका प्रभाव चला जाता है, पर कामनाओं की उत्तेजना ऐसी है जो निरन्तर बनी रहती है और दर्द की तरह मनः संस्थान में आवेश की स्थिति बनाए रखती है। घृणा, द्वेष, प्रतिशोध, आशंका जैसे निषेधात्मक और लोभ, मोह, अहंता, वैभव, सत्ता, पद, यश-भोग प्रदर्शन जैसी बौद्धिक महत्वाकाँक्षाओं की विधेयात्मक कामनाएँ यदि उग्र हों तो दिन-रात, सोते-जागते कभी चैन नहीं मिल सकता और अपना अन्तःकरण निरन्तर उद्विग्न बना रहता है। यह स्थिति ध्यान-साधना के लिए, ब्रह्म सम्बन्ध के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है।

शरीर, मन और भाव-संस्थान को जितना अधिक शिथिल, शान्त, रिक्त किया जा सके, उतनी ही आत्मसाधना के उपयुक्त मनोभूमि का निर्माण होता है। कहना न होगा कि शिथिलीकरण एवं उन्मनी मुद्रा यह प्रयोजन बड़ी आसानी से पूरी करती है। इनके द्वारा जिस पृष्ठभूमि का निर्माण होता है, उसमें ध्यानयोग के उच्चस्तरीय स्वरूप को आसानी से अपनाया जा सकता है।

ध्यान के इस उच्चस्तरीय स्वरूप में स्वयं को सूर्य की स्थिति में ऊपर आकाश में अवस्थित देखते हुए अनुभव करना होता है कि मैं समस्त भूमंडल पर अपनी प्रकाश किरणें फेंक रहा हूँ। संसार मेरा कर्मक्षेत्र और लीला-भूमि है। भूतल की वस्तुओं और शक्तियों को में इच्छित प्रयोजनों के लिए काम में लाता हूँ, पर वे मेरे ऊपर प्रभाव नहीं डाल सकतीं। पंचभूतों की गतिविधि के कारण जो हल-चलें संसार में हर घड़ी होती हैं वे मेरे लिए एक विनोद और मनोरंजन दृश्य मात्र हैं। मैं किसी भी साँसारिक हानि, लाभ से प्रभावित नहीं होता। मैं शुद्ध, चैतन्य, सत्यस्वरूप, पवित्र, निर्लेप, अविनाशी आत्मा हूँ। महान परमात्मा का विशुद्ध स्फुल्लिंग हूँ।

ध्यान का यह स्वरूप जब अभ्यास के कारण पूर्ण रूप से पुष्ट हो जाय और हर घड़ी यह भावना रोम-रोम में प्रतिभासित होने लगे तो समझना चाहिए कि आत्मलोक का प्रवेश द्वारा खुल गया। इसी के साथ स्वयं की अनन्त क्षमताएँ भी जीवन के व्यापक परिदृश्य में अपने प्रकाश एवं प्रभाव का सहज ही परिचय देने लगती हैं। योगीगण इसी को जाग्रत समाधि या जीवनमुक्त अवस्था भी कहते हैं। इसके आनन्द अवस्था भी कहते हैं। इसके आनन्द को अनुभव करने वाला सहज ही गुनगुना उठता है-ज्यों गूँगा मीठे फल का रस अंतर्गत ही भाये।


हँसना-हंसाना सीखें, ताकि नीरोग रह सकें

खिलखिलाहटों की खनकती गूँज इन दिनों कहीं खो-सी गयी है। कृत्रिम सभ्यता की भागदौड़ व चकाचौंध भरे जीवन ने मनुष्य की नींद व चैन हराम करके रख दिया है। अपनी अस्तव्यस्तता में उसे किसी चीज के लिए फुरसत नहीं है। अगर फुरसत मिलती भी है तो सिर्फ तनाव, चिन्ता एवं उद्विग्नता के लिए। इसकी परिणति यह है कि शरीर भाँति-भाँति के रोगों से ग्रसित और मन तरह-तरह के विकारों से व्यथित है। इनसान शारीरिक आरोग्य, मानसिक सन्तुलन व जीवन में सुख-शान्ति के लिए तरह-तरह के उपचार जुटा रहा हैं। इस सबके लिए पर्याप्त समय, श्रम एवं धन लुटा रहा है, लेकिन राहत के नाम पर उसे असफलताजन्य असन्तोष ही पल्ले पड़ता है।

मानव प्रकृति के मर्मज्ञों का मानना है कि समस्या का शाश्वत निदान तभी सम्भव है, जबकि मनुष्य तनावमुक्त हो सके और यह किसी औषधि से नहीं हँसी की गूँज से सम्भव है। ठहाकों भरी हँसी-खिलखिलाहटों की मधुर गूँज और आनन्द बिखेरती मुसकान, इन सभी समस्याओं की अचूक औषधि है। इसके बहुआयामी प्रभावों व उपयोगिताओं पर वैज्ञानिकों ने भी पर्याप्त शोध की है। उनका भी पर्याप्त शोध की हैं उनका भी यही निष्कर्ष है कि इससे बढ़िया और प्रभावी दवा दूसरी कोई नहीं।

यही वजह है कि प्रायः हँसमुख व्यक्ति अधिक स्वस्थ व नीरोग रहते हैं। उनके चेहरे पर एक विशेष चमक व आकर्षण होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार हँसने से उत्पन्न उत्तेजना से हारमोन ग्रन्थियों पर विशेष प्रभाव पड़ता है। इनसे निकलने वाले जैव रसायन जहाँ एक ओर शरीर की रोग-प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाते हैं, वहीं दूसरी ओर जीवन को अधिक स्वस्थ व नीरोगी बनाते हैं।

स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयार्क के ‘साइकोन्यूरल इम्यूनोलाजी’ विभाग के प्राध्यापक आर्थर स्टोन ने 72 लोगों पर हँसी के प्रभाव को 12 सप्ताह तक देखा। परीक्षण के दौरान इन लोगों में ‘इम्यूनाग्लोब्यूलिन ए’ नामक प्रतिरोधक की मात्रा में वृद्धि देखी गयी। यह बैक्टीरिया व वायरस को सफेद कणिकाओं पर आक्रमण से रोकने में सहायक है। इसके कारण ये लोग सर्दी व संक्रमण के विरुद्ध अधिक प्रतिरोधी पाए गए। ‘रायल कालेज ऑफ जनरल प्रैक्टिशनर्स’ में हुए अनुसंधान के अनुसार हँसने से हृदय गति कम हो जाती है, भूख बढ़ती हैं। इसके प्रभाव से इडोर्फिन नामक दर्दनिवारक रसायन का स्राव होता है। जो माँसपेशियों की जकड़न को कम कर देता है। इससे मानसिक तनाव से होने वाले सिरदर्द से भी राहत मिलती है।

लम्बे समय तक हँसने के प्रभाव पर शोध करने वाले फ्रेंच डॉक्टर पियरे वायर का कहना है कि हँसी के दौरान रक्तवाहिकाओं का विस्तार हो जाता है। इससे रक्तप्रवाह शरीर के सुदूर कोनों तक तीव्र हो जाता है। अतः जिन व्यक्तियों के हाथ व पैर ठण्डा पड़ने की शिकायत है उनको डाक्टर पार्चर का सुझाव है कि वे जुराव या ग्लब्ज (दस्ताने) पहनने के साथ खुलकर हँसने का प्रयोग भी आजमा सकते हैं।

स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के मेडिकल विभाग के प्रमुख डॉ0 विलियम्स के अनुसार हँसमुख व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। उनकी एण्डोक्राइन प्रक्रिया अधिक सक्रिय व सतेज रहती है। अपने अनुसंधान में डॉ0 विलियम्स एवं उनके सहयोगियों ने यह भी पाया कि हँसते समय मस्तिष्क में एक खास तरह का उत्तेजना होता है, जिससे एपीनेफ्रीन, नोरपाइनक्रीन व डापोमाइन जैसे दर्दनिवारक हारमोन के स्राव में प्रत्याशित बढ़ोत्तरी होती है। इससे गठिया, वात रोग व एलर्जी जैसे रोगों में भी राहत मिलती हैं।

हँसने के इन्हीं प्रभावों की वजह से आज इसे चिकित्सा-पद्धति के रूप में उपयोग किया जा रहा हैं। कई असाध्य रोगों में इससे उपचार का दावा किया जा रहा है। ‘पोलालिण्डा यूनिवर्सिटी कैलीफोर्निया’ के इम्यूनोलॉजी विभाग के प्रो. एल. एम. वर्क का मानना है कि हास्य प्रक्रिया शरीर की प्रतिरोधी प्रणाली को इतना अधिक सशक्त करती है कि इससे कैंसर प्रतिरोधक खत्म हो जाता है। उनके अनुसार कैंसर का कारण डब्ल्यू. बी. सी. का निर्धारित मात्रा में अधिक बनना है। हँसी से उत्पन्न होने वाली प्रतिरोधक शक्ति कैंसर कोशिकाओं की बढ़ोत्तरी को कम करती है।

हँसी की गूँज श्रेष्ठतम निदान ही नहीं, श्रेष्ठतम विश्राम भी है। फ्रेंच न्यूरोलॉजिस्ट हेनरी रुपेनस्टैन ने अपनी शोध के आधार पर हँसने को सर्वश्रेष्ठ विश्रामदाता घोषित किया हैं। उनके अनुसार एक मिनट की उन्मुक्त हँसी 45 मिनट के चिकित्सकीय विश्राम जितनी फलदायी होती है। इसी तरह अमेरिकी हृदय विशेषज्ञ डॉ0 विलियम फरहे के अनुसार एक मिनट का हँसना 40 मिनट के विश्राम जितना लाभ देता है। यदि यह हँसी सौ बार हो तो- इससे इस मिनट के योगाभ्यास के परिणाम साकार हो उठते हैं। अपनी पुस्तक ‘मेक एम आफ’ में डॉ0 विलियम्स का कहना है कि हँसने से दर्द से छुटकारा मिलता है, दबाव कम होता है व रक्त-नलिकाएँ साफ हो जाती है।

खिलखिलाहटों भरा उन्मुक्त हास्य रोगों के मूल कारण पर ही प्रहार करता है। चिकित्साविज्ञानियों का मानना है कि अनिद्रा से उत्पन्न तनाव अनेकों रोगों को जन्म देता है, जबकि उन्मुक्त हँसी से अच्छी गहरी नींद आती है। ‘एनाटॉमी ऑफ इलनैस’ के विज्ञ लेखक काजिन्स कहते हैं कि 20 मिनट का उन्मुक्त हास्य उन्होंने बिना किसी पार्श्व प्रभाव के दो घण्टे की नींद देता है। नींद में खर्राटे लेने की समस्या को भी हँसने से ठीक किया जा सकता है। खर्राटों ने कई व्यक्तियों के वैवाहिक जीवन को नष्ट किया है। इनका भी समाधान खुलकर हँसना है। खर्राटे का कारण ढीला व मुलायम ‘पैलेट’ होता है। हँसने से प्रभावकारी माँसपेशियों पर दबाव पड़ता है, जो इन्हें शक्तिशाली बनाता है शक्तिशाली माँसपेशियों को ‘पैलेट’ प्रभावित नहीं कर सकता है। जिससे खर्राटे समाप्त हो जाते हैं।

हास्य की प्रभावशीलता को आज के वैज्ञानिक ही नहीं प्राचीन युगीन ऋषिगण भी स्वीकारते रहे हैं। आयुर्वेद के प्रणेता महर्षियों ने हँसने को विशेष रूप से लाभकारी बताया है। उनके अनुसार, इससे रक्तवाहिनी धमनियों का विस्तार होता है, जिससे रक्तप्रवाह में तेजी आती है। इस क्रम में श्वासोच्छवास क्रिया से ताजगी भरती है, फेफड़े फैलते हैं, इसके प्रभाव से आँखों में चमक आती है। चेहरे की कान्ति बढ़ती है व शरीर सन्तुलन ठीक होता है, साथ ही पित्त का शमन होता है, जो कि एसिअडटी का प्रमुख कारण है। इस तरह ठहाकों भरी हँसी से अम्ल रोग का स्वयमेव खात्मा हो जाता है।

वर्जीनिया विश्वविद्यालय के डॉ0 एम. ए. मूडी ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘द हीलिंग पावर्स ऑफ हृमर’ में हास्य चिकित्सा के अपने एक अद्भुत अनुभव का उल्लेख किया है। एक मानसिक रोग से पीड़ित एक 12 वर्षीय बालिका को प्रयोग के रूप में जोकरों का एक खेल दिखाया गया। खेल देखने पर वह जोर-जोर से हँसने लगी। खुशी की एक लहर उसके पूरे शरीर-मन में व्याप्त हो गयी। साथ ही उसे जीवन का एक नया संदेश दे गयी। उसने जीवन नये सिरे से जीना शुरू किया व आश्चर्यजनक रूप से स्वस्थ हो गयी। इसी तरह एक कैंसर का रोगी हास्य चिकित्सा द्वारा पूरी तरह ठीक किया गया। मूडी के अनुसार खुलकर हँसना स्वस्थ व्यक्तित्व का प्रतीक है। जो खुलकर हँस नहीं सकते, वह जरूर कहीं न कहीं, किसी न किसी विकार से पीड़ित हैं।

ऐसे लोगों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम देखी गयी है, जो लोग अधिक तनावग्रसित रहते हैं। देखा गया है कि हँसने से सतर्कता उत्पादक हार्मोन्स के कोरेलामिन्स स्रवित होता है जो आगे चलकर मस्तिष्क से एण्डोर्फिन के स्राव को प्रेरित करता है। जिसके प्रभाव से दर्द निवारण के साथ ही शिथिलता का अभाव भी मिलता है। इस तरह हँसती-हँसाती जिन्दगी तनाव रोगों की अचूक व सहज दवा है। आज 60 प्रतिशत रोगों का कारण तनाव है। उच्च रक्तचाप, सिरदर्द, पेष्टिक अल्सर, हृदय रोग आदि तनाव से जुड़े हुए रोग हैं। यही बात माइग्रेन के संदर्भ में भी है। इसका कारण मानसिक तनाव व पित्त का आधिक्य बताया जाता है, जबकि हँसने से तनाव अपने आप दूर होता है, पेट पर पड़ने वाला दबाव कम हो जाता है व पित्त से राहत मिलती हैं।

‘कैलीफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी’ की नर्सिंग विभाग की दीरा राबिन्सन पिछले 20 वर्षों से हास्य चिकित्सा पर कार्यरत हैं। उन्होंने अपने अध्ययन-अनुसन्धान में यही पाया है कि मुक्त हँसी से तनाव, घबराहट, क्रोध, संकोच, अवसाद अपने आप भाग जाते हैं। जीवन जीने की एक नयी दृष्टि मिलती है। यहाँ तक कि आप्रेशन को लिए जाते हुए रोगियों के कष्ट में भी कमी आती हैं हँसने के इन्हीं लाभों को देखते हुए बेंगलोर स्थित राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तन्त्रिका विज्ञानी संस्थान ने भी हँसने को एक मनोवैज्ञानिक चिकित्सा के रूप में लिया है।

हँसी की मस्ती और उससे होने वाले शरीर व मन के प्रभावों का विशेष अध्ययन डॉ0 बोबिन ने किया हैं डॉ0 राबर्ट मेरीलैण्ड बाल्टीमोर विश्वविद्यालय के न्यूरो बायोलॉजी एवं मनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष हैं एवं वे स्वयं को हास्य विशेषज्ञ कहलाने में गर्व अनुभव करते हैं। उनका कहना है कि हास्य चिकित्सा द्वारा रक्तचाप, हृदय रोग, ब्रान्काटिस, ब्राँकियल अस्थमा, मानसिक उत्तेजना, अनिद्रा, डिप्रेशन और हीन भावना जैसी बीमारियों को ठीक किया जाता है।

हास्य शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की चिकित्सा ही नहीं, दीर्घायु का सशक्त आधार भी है। मनोवैज्ञानिक थोरटन के अनुसार यदि चेहरे की झुर्रियाँ दूर करनी हैं व लम्बी आयु जीनी है तो हँसने को अपने दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बना लो। न्यूयार्क बेबी हास्पिटल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ0 स्टीव के अनुसार, रोगी की मृत्यु को नहीं टाल सकते, किन्तु हँसाते रहकर कुछ दिन बढ़ा सकते हैं। डॉ0 स्टीव जोकर बनकर बच्चों को खूब हँसाते हैं।

न्यूयार्क के डॉ0 वार्डेन ‘हंसता हुआ डॉक्टर’ के नाम से प्रसिद्ध थे। वे रोगी से हँसते हुए मिलते थे व उसे खूब हँसाते थे। वे दवा कम देते थे पर हँसाते अधिक थे। उनके अधिकाँश रोगी दवा से कम उनकी हँसी से ज्यादा ठीक होते थे।

डॉ0 वोकुल का कहना था कि यदि अस्पतालों में डाक्टर व नर्स के चेहरे खिलते रहें तो रोगियों के ठीक होने की तादाद में भारी वृद्धि होगी। अमेरिका के कई अस्पतालों में लाफिंग रूप खुले हैं। जहाँ चुटकुला की किताबें, हँसी वाली फिल्मों के वीडियो एवं दूसरी हँसाने वाली सामग्री रखी जाती है। हँसने को सार्वजनिक स्तर पर प्रचारित करने के लिए मुम्बई का ‘लाफर क्लब इंटरनेशनल’ अपनी तरह का पहला क्लब है। इसके सदस्यों की संख्या हजारों में है व निरन्तर तेजी से बढ़ती जा रही हैं।

प्रत्यक्ष रूप से नहीं पर हँसना स्वयं को जानने के लिए भी लाभदायक है। तनावमुक्त व्यक्ति ही अपने अस्तित्व की गहराइयों में झाँक सकता है। तभी तो प्राचीन रोम में एक कहावत प्रचलित थी, कि ‘यदि अपने बारे में अधिक जानना चाहते हो तो हँसी को अपना लो।’ इस तरह मुस्कराना, हँसना, खिल-खिलाकर ठहाके लगाना, शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य एवं दीर्घायु जीवन का स्वर्णिम सूत्र है। हँसने का एक महत्वपूर्ण पक्ष है इसकी संक्रामकता। यदि हम हँसते हैं। तो सारा जग अपने साथ हँसने लगता है। एक साथ हँसने से सम्बन्धों की मलिनताएँ, दुर्भावनाएँ आदि घुल जाती हैं व आपसी सम्बन्ध अधिक सरस, विश्वसनीय व सुदृढ़ बनते हैं। जो कि सामाजिक जीवन में सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है। हँसने के लाभ अनेक हैं, अनगिनत हैं, लेकिन इनका यथार्थ परिचय तभी मिल सकता है, जब अपने जीवन का यही एक सूत्र हो-खूब हंसे औरों को भी हँसायेंगे। देखते-देखते तनाव कम होता दीख पड़ने लगेगा एवं दुनिया और रंगीन जीने योग्य नजर आएगी।


पर्यावरण से खिलवाड़ करेंगे तो दण्ड भुगतना ही होगा

13 मई मंगलवार, रात्रि दूरदर्शन के समाचार को सुनकर श्रोताओं में यकायक सिहरन-सी दौड़ गई। इस समाचार में बताया गया था कि उसी दिन 8 बजे सायं उत्तर भारत में भूकम्प के झटके महसूस किये गये। इन झटकों से भले ही कहीं कोई विशेष नुकसान न पहुँचा हो, परन्तु 10 मई, 1997 को ईरान में आए भूकम्प का विनाशकारी परिदृश्य जरूर साकार हो उठा। पर्यावरण काक असंतुलन, मानव की प्रकृति से अनावश्यक छेड़छाड़-प्रकृति को किस कदर कुषित कर सकती है, यह ईरान में भूकम्प के दौरान स्पष्ट अनुभव किया गया। इस जबर्दस्त भूकम्प में 2400 लोग मारे गए तथा 5000 लोग घायल हुए। तकरीबन 200 गाँव पूरी तरह तहस-नहस हो गए। इससे अफगानिस्तान में भी काफी तबाही हुई। इस भूकम्प की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 6.1 थी। पिछले तीन महीनों में यह ईरान में तीसरा भूकंप है और 1990 के बाद सबसे भयानक। 1990 में आए थे। इस 28 फरवरी को उत्तरी पश्चिमी ईरान के आर्दाबील इलाके में भूकम्प आया था। इसमें करीब 1900 लोग मरे थे। इसकी तीव्रता 5.5 रिक्टर आँकी गयी थी।

भूकम्प प्रकृति दुसह्य कोप हैं, जो अनगिनत आपदाओं-विपदाओं की असहनीय यन्त्रणा दे जाता है। कोई अन्य प्राकृतिक विपदा इतने कम समय में इतनी अधिक तबाही नहीं लाती। कुछ सेकेंड से लेकर कुछ मिनटों तक की अवधि में भूकम्प पृथ्वी के एक विशाल भू-भाग में उथल-पुथल मचा देता है। पूरी पृथ्वी के साथ ही भारत का इतिहास भी अनेक विनाशकारी भूकम्पों की भयावह घटनाओं से भरा पड़ा है। खास कर हिमालय की स्थिति को बड़े ही नाजुक दृष्टिकोण से देखा जा रहा है।

विज्ञानवेत्ताओं के अनुसार, भूपटन के शैलों में

भ्रंशन होता है। भ्रंशन के फलस्वरूप शैल टूटते-खिसकते हैं। और ऊपर-नीचे चढ़ जाते हैं। इससे धरातल में कम्पन उत्पन्न होता है, जो भूकम्प का रूप धारण कर लेता है। भारत की भू-पट्टिकाएँ पिछले करोड़ों सालों से अपने स्थान से सरक रही हैं। आज भी ये 5.5 सेण्टीमीटर प्रतिवर्ष की रफ्तार से हिमालय की ओर बढ़ रही हैं। जिन स्पर्श-बिन्दुओं पर नवागत भारत की भू पट्टिकाएँ एशिया की भौतिक भू-पट्टिका के सामने-आमने टक्कर खाती हैं या रगड़ खाती है, वहाँ धनुष की कमान की तरह खिंचवा पैदा हो जाता है। हिमालय की पर्वत शृंखलाएं इसी कसावट के परिणामस्वरूप उभर कर अस्तित्व के परिणामस्वरूप उभर कर अस्तित्व में आयी थीं। भारत की प्लेट और एशिया की प्लेट के आपस में निरंतर दबाव डालने से भूकम्प की स्थिति उत्पन्न होती है। भूकम्प विशेषज्ञ डॉ. के गौड ने आशंका व्यक्त की है कि भारत की 2600 किलोमीटर लम्बी प्लेट में विनाशकारी भूकम्प आने की सम्भावना है।

एक अन्य सर्वेक्षण में भू-गर्भ शास्त्री कहते हैं कि गतिमान प्लेटों की परस्पर रगड़ से भूकम्प होता है। विशेषज्ञों के अनुसार पर्यावरण में व्यापक असन्तुलन से इन दिनों इसकी सम्भावना काफी बढ़ गयी है। भू-गर्भ शास्त्रियों ने भूकम्प की दृष्टि से भारत को पाँच क्षेत्रों में बाँटा हैं। इस वर्गीकरण के अनुसार हिमालय की पर्वत शृंखलाएं सर्वाधिक संवेदनशील हैं, परन्तु 1967 में कोएना तथा 1993 में आए लातूर के भूकम्प ने स्थिति को और भी गम्भीर कर दिया है। इसके पूर्व यह मान्यता थी कि दक्षिणी पठार भूकम्प के खतरे से मुक्त हैं, परन्तु यह धारणा बदल गयी है। पहले कभी यह भी कहा गया था कि भारत में रिक्टर पैमाने की चार डिग्री से अधिक बलशाली भूकम्प नहीं आ सकते, लेकिन यह सही नहीं साबित हुआ।

हिमालय पर्वत अत्यन्त संवेदनशील पट्टी पर स्थित है। इस पट्टी के अंतर्गत जापान, दक्षिण, चीन, पाकिस्तान, ईरान-ईराक तथा जिव्राल्टर आते हैं। यह पट्टी बेहद संवेदनशील है तथा इसके अन्दर चट्टानों में टूटन तथा घर्षण के कारण ऊर्जा पैदा होती है। इस पट्टी के ईरान के आर्दाबील क्षेत्र और पाकिस्तान को ब्लूचिस्तान प्रान्त में आए भीषणतम भूकम्प ने इस पट्टी में गम्भीर तनाव पैदा कर दिया है। इस पट्टी पर स्थित हिमालय पर्वत विश्व की सुप्रसिद्ध पर्वत-शृंखला है तथा उसमें भूगर्भीय प्रक्रियाएँ, अभिक्रियाएँ सक्रिय हैं रुड़की इंजीनियरिंग विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. के. एम. वैद्य ने पिछले कुछ सालों से बेतरह नष्ट हो रहे पर्यावरण सन्तुलन की वजह से इस क्षेत्र में भूकम्प आने इतिहास के अध्येता और अमेरिका को रैकेर यूनिवर्सिटी के भूकम्प विशेषज्ञ रोजर विल्हेम ने बहुत पहले ही इस बात की पुष्टि की थी।

हिमालय की प्रकृति से छेड़छाड़ तथा यहाँ पर विकास के नाम पर हुए अन्धाधुन्ध विनाश के कारण उत्पन्न स्थितियाँ लगातार भूकम्प को आमन्त्रण देती रहती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन दिनों हिमालय की हिमरेखा नीचे खिसक रही है। ग्लेशियर बुरी तरह खिसक रहे हैं जिससे जमीन पर दबाव पड़ रहा है। इसी दबाव के कारण भूगर्भीय प्लेट सरकती चली जा रही हैं। इस सबके चलते हिमालय में भूगर्भीय हलचलों की समस्याएँ तीव्रतर हो गयी हैं। परिणामस्वरूप हिमालय क्षेत्र में असीम ऊर्जा संग्रह होती चली जा रही है, जो निश्चित रूप से भूकम्प को रूप में फट सकती है। हिमालय में आने वाले भूकम्पों की संख्या भारतीय क्षेत्र में ऊपर की ओर खिसकने के कारण हिमालय में जमा हो रही ऊर्जा की दर पर निर्भर करती है। वर्तमान में ऊर्जा का जमाव तो निरन्तर हो रहा है, लेकिन उसका निस्तारण नहीं हो पाया है। भूगर्भ-वेत्ताओं के अनुसार सन् 2000 तक इस ऊर्जा का निस्तारण होने की सम्भावना है। यह कम से कम 8 रिक्टर की क्षमता वाले भूकम्प से हो पाएगा। इससे 270 किलोमीटर लम्बी दरार पैदा हो सकती है। चूँकि हिमालय में अभी भी भूगर्भीय रिक्तता 800 किलोमीटर के विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई हैं। इसलिए इस रिक्तता को भरने के लिए 8 क्षमता वाले भूकम्प की सम्भावना का वैज्ञानिक आकलन कर रहे हैं।

नवादा यूनिवर्सिटी अमेरिका के भूकम्प विज्ञानशाला के निदेशक प्रो. जेम्स ब्रूने ने तो समस्त हिमालय को अत्यन्त दिलचस्प जगह बताया है। इनके अनुसार पूरे संसार में यही एकमात्र स्थान है, जहँ दो प्लेट भारतीय और यूरोसियस एक दूसरे में पाँच सेण्टीमीटर प्रतिवर्ष की दर से घुस रही हैं। इससे संग्रहित ऊर्जा भूकम्प के रूप में निकलती है। परन्तु सन् 1803 व 1833 में यहाँ आए भूकम्पों के कारण दरारें उत्पन्न नहीं हो पायी थीं। यही संग्रहित ऊर्जा सम्भवतः 200 साल बाद सनफ 1991 में उत्तरकाशी में आए भूकम्प के रूप में उभर कर आयी और उसके जरिए ऊर्जा निस्तारण का प्रयास हुआ। इस विनाशलीला का दृश्य अभी तक सब को याद है।

हिमालय क्षेत्र में 1817, 1905, 1934 एवं 1950 में बड़े भूकम्प आए। 1897 में आए भूकम्प के दौरान उत्तरी पूर्वी हिमालय क्षेत्र में भूटान एवं असम हिमालय में 500 किलोमीटर लम्बी दरारें उत्पन्न हुईं। इसी तरह 1905 में काँगड़ा भूकम्प के कारण कुमाऊँ एवं पंजाब के हिमालय क्षेत्र में 300 किमी लम्बी तथा 1950 में असम हिमालय में भी 300 किलोमीटर लम्बी दरार पैदा हो गयी थी। इस प्रकार इन चार प्रमुख भूकम्पों के कारण हिमालय क्षेत्र में आयी दरार की कुल लम्बाई 1400 किलोमीटर हैं।

राजकीय स्नातकोत्तर महा-विद्यालय पिथौरागढ़ में भूगर्भ विज्ञान अध्यक्ष प्रो. संजय तिवारी ने हिमालय क्षेत्र में भूकम्प की स्थिति पर एक विश्लेषणात्मक शोध-आलेख तैयार किया है। उनका कहना है कि उत्तरी पूर्वी भारत में पिछले 200 वर्षों में जितने भी भूकम्प आए उसमें सबसे ज्यादा उत्तराखण्ड प्रभावित हुआ है। अध्ययन के आधार पर यह भी चेतावनी दी गयी है कि उत्तराखण्ड में इक्कीसवीं सदी के आगमन को साथ ही रिक्टर पैमाने में 8 से भी अधिक तीव्रता वाले भूकम्प का आगमन सम्भावित है।

प्रोफेसर तिवारी ने बताया है कि पिछले 200 वर्षों में हिमालय में सात से अधिक क्षमता वाला भूकम्प नहीं आया है। उन्होंने दो प्रसिद्ध भूवैज्ञानिकों नहीं आया हैं। उन्होंने दो प्रसिद्ध भूवैज्ञानिकों गुप्ता एवं सिंह के शोध-प्रबन्ध के आधार पर बताया कि 21 डिग्री से 25 डिग्री उत्तरी अक्षांश एवं 13 डिग्री से 16 डिग्री पूर्वी देशान्तर क्षेत्र में किसी भी समय 8 क्षमता वाला भूकम्प आने का खतरा है।

इस बीच कतिपय अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भूवेत्ताओं ने भी काठमाण्डू से देहरादून के मध्य जबरदस्त आन्तरिक हलचलों की समस्याओं को रेखाँकित किया है। प्रसिद्ध भूगर्भशास्त्री डॉ. के. एस. वालिया के अनुसार हिमालय वलित पर्वत श्रेणी में आता है। इस कारण उसमें भूगर्भीय हलचलों का बोल-बाला सर्वाधिक है। हिमालय के धास्मूला मन्यासी, अल्मोड़ा, मराडी, चमोली तथा उत्तरकाशी अत्यन्त संवेदनशील क्षेत्र में आते हैं। नेपाल भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

पिछले 20 वर्षों के दौरान हिमालय क्षेत्र में कई भूकम्प आए। 19 जनवरी, 1975 को किन्नौर में रिक्टर स्केल पर 7 क्षमता वाला भूकम्प आया। इसमें 42 लोग मारे गए। 278 मकान पूर्ण नष्ट हुए और तकरीबन 2 हजार मकानों को आँशिक रूप से क्षति पहुँची। 14 जून, 1976 को धर्मशाला में रिक्टर 5 भूकम्प आया। 22 जुलाई, 1980 में धारस्मूला में 6.1 तीव्रता का भूकम्प आया। 24 अगस्त, 1980 को जम्मू में 5.5 रिक्टर क्षमता का तथा 26 अप्रैल, 1986 को 5.6 क्षमता का भूकम्प आया। परन्तु सबसे ज्यादा तबाही मचाने वाला भूकम्प 20 अक्टूबर, 1991 को उत्तरकाशी में 6.5 रिक्टर पैमाने का आया। इसमें डेढ़ हजार लोग मारे गए। इसके अलावा बिहार राज्य में सन् 1954 में भूकम्प से बड़ी क्षति हुई थी। सन् 1967 में महाराष्ट्र का कोएना नगर भूकम्प से बर्बाद हो गया था। 31 दिसम्बर, 1974 में पाकिस्तान के पाटन में और उसके कुछ साल बाद हिमालय प्रदेश में भूकम्प आने से अपार धन-जन की हानि हुई थी। सन् 1913 में लातूर और उसमानाबाद में आए भूकम्प की त्रासदी से सभी वाकिफ हैं। इसका केन्द्र वहाँ से 200 कि.मी. दक्षिण में स्थित था।

विश्व में भूकम्प के सम्भावित और संवेदनशील क्षेत्र हैं-हिमालय, उत्तर पश्चिम चीन, पाकिस्तान में सिंधु घाटी और भारत में गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान है। भूकम्प से प्राचीन मीनोअन सभ्यता तथा सीदाम और गोमोराह जैसे नगर कुछ ही क्षणों में समाप्त हो गए थे। मेनलोनार्थ कैलीफोर्निया के भूकम्प विशेषज्ञ रास स्टीव के अनुसार, भूकम्प मैदानी क्षेत्र की अपेक्षा दलदली भूमि में तीव्रता के साथ आता है एवं अत्यधिक क्षति पहुँचाता है। सनफ 1989 में कोव जापान तथा सेन फ्राँसिस्को के मेरीना में आया भूकम्प नमी वाली जमीन पर था। इससे अपार धन-जन की हानि हुई।

अमेरिका के एक अन्य भूकम्प वेत्ता वेयन थेचर ने एक भूगर्भीय सर्वेक्षण प्रस्तुत किया है। इसके अनुसार दो भीषणतम भूकम्पों के बीच की अवधि एक हजार से पाँच वर्ष की होती हैं, जबकि इससे कम शक्तिशाली वाला भूकम्प शताब्दी के अन्दर ही आ जाता है। यह कभी भी, किसी भी समय अपनी तबाही प्रस्तुत कर सकता है। कोव का भूकम्प पृथ्वी की सतह पर उठा था, जबकि अमेरिका के नारर्पीज क्षेत्र में पृथ्वी की गहराई से आया था। भूकम्प से उत्पन्न ऊर्जा का सही मापन सम्भव नहीं है, इसका तो मात्र अनुमान लगाया जाता है। शहर के बीच उठे भूकम्प का हलका झटका भी एक हजार लोगों की मौत के लिए पर्याप्त हैं।

जापान भूकम्प का देश कहलाता है। यह देश भूकम्प की प्राकृतिक आपदा से त्रस्त है। सन् 1995 में कोव में 7.2 क्षमता वाला भूकम्प आने से लगभग 5000 लोग मारे गए। 25000 घायल हुए तथा 46440 इमारतें नष्ट हो गयीं। लाखों लोग बेघर हो गए। चालीस हजार घरों में घरेलू गैस कनेक्शन टूट गया। कोव जापान का टोयो के बाद दूसरा बड़ा बन्दरगाह है। इसकी जनसंख्या करीब डेढ़ करोड़ हैं।

भूकम्प की तीव्रता बढ़ने के साथ ही प्राकृतिक पीड़ा और अधिक होती चली जाती है। सन् 1985 में मैक्सिकोसिटी में 7.9 क्षमता वाला विप्लवी भूकम्प आया, जिसमें 1500 लोग परलोक सिधार गये। 8.2 रिक्टर के भूकम्प ने विश्व इतिहास का सबसे भयानक और वीभत्स दृश्य उपस्थित किया था। यह सन् 1923 में टोक्यों में आया। इससे 14 3000 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। इसी तीव्रता वाला भूकम्प 1976 में चीन के ताँगसेन क्षेत्र में आया। इसके प्रभाव से ढाई लाख लोग मारे गए। इससे कुछ आगे की तीव्रता 8.3 रिक्टर का भूकम्प सन् 1906 में सेनफ्रांसिस्को में आया जिससे सिर्फ 700 लोग मारे गए। इतनी कम जनहानि का कारण यह था क्योंकि यह क्षेत्र ऐसे स्थान में अवस्थित है जिसमें तीव्र झटके सहने की सामर्थ्य है। सन् 1960 में चीन में आए भूकम्प के कारण पृथ्वी एक घण्टे तक हिलती रही। इससे 100 किलोमीटर लम्बी और दस मीटर गहरी दरार पड़ गयी। शोन एण्ड्र्यू की 1000 किलोमीटर लम्बी पट्टी बड़ी संवेदनशील मानी जाती हैं।

भूकम्प इतना आकस्मिक होता है कि इसके बारे में सटीक भविष्यवाणी कर पाना सम्भव नहीं हो पाता। जापान ने इसको जानने के लिए अर्थक्वेक ऐससमेण्ट कमेटी (ई. ए. सी. ) गठित की है। इसमें विश्वप्रसिद्ध भूकम्पवेत्ता पिछले सत्तरह सालों से भूकम्प का अध्ययन कर रहे हैं, परन्तु सुनिश्चित तथ्य की जानकारी नहीं मिल पायी हैं। 30 जनवरी, 1995 की टाइम पत्रिका के अनुसार जापान की अर्थक्वेक एसेसमेण्ट कमेटी हर साल इस काम के लिए एक हजार लाख डालर खर्च करती है।

ऐसे भूकम्प को जानने के लिए कई विधियों का प्रयोग किया जाता है। इसमें प्रमुख तीन हैं डायलेशन डीफ्यूजन कैकएवालची तथा लेजर विधि। पहली विधि में रेडान गैस को मापा जाता है, जो भूतल के नीचे से निकल कर पानी में घुलती रहती है। दूसरी विधि में भूतल पड़ने वाली दरारों के मापन से पता लगाया जाता है। लेजर किरणें पृथ्वी के भूकम्प से सम्बन्धित पट्टियों के असामान्य व्यवहार का पता लगाती हैं। भूमिगत पानी और गैसों के दबाव आदि के अध्ययन से भी भूकम्पों को नजर रखने में सहायता मिलती है।

भूकम्प की अभी तक यन्त्रों के माध्यम से सही-सही जानकारी नहीं पायी जा सकी है। विज्ञानवेत्ताओं के अनुसार यह प्राकृतिक घटना होने के कारण प्रकृति के संवेदनशील जीव-जन्तु इसे आसानी से पहचान लेते हैं। उनके असामान्य व्यवहार को देखकर मनुष्य भी इस प्राकृतिक आपदा के आगमन को भाँप सकता है। भूकम्प की कम तीव्रता वाली तरंगें 7 से 14 साइकिल प्रति जन्तु सेकेंड निकलती हैं। सम्भवतः जीव-जन्तु इन सूक्ष्म तरंगों को पहचान लेते हैं। भूकम्प के एक घण्टा पूर्व खरगोश और हिरन भूकम्प केन्द्र से दूर बेतरतीब भागने लगते हैं। अचानक कुत्ते भौंकने लगते हैं जापान में पायी जाने वाली गोल्डफिश तो इसके पूर्व विचित्र एवं उत्तेजित ढंग से तैरकर इसके पूर्व संकेत करती है। जापानी लोग इसीलिए गोल्डफिश को सदैव अपने पास रखते हैं, ताकि समय रहते इस भीषण आपदा से अपना बचाव कर सकें। प्रसिद्ध मनीषी लायल वाटसन ने अपने सुविख्यात ग्रन्थ ‘सुपरनेचर’ में उल्लेख किया है कि महिलाएँ एवं बच्चे भूकम्प की इन तरंगों के प्रति अति संवेदनशील होते हैं। ‘द प्लेनेट अर्थ’ में एफ किंगडन वार्ड ने सन् 1951 में आसाम में आए हुए भयावह भूकम्प का चित्रण किया हैं, यह भी उपरोक्त बातों की पुष्टि करते हैं।

कहा जाता है कि फरवरी 1975 में आए हिचाँग भूकम्प की भविष्यवाणी चीनी वैज्ञानिकों ने पशुओं के असामान्य व्यवहारों को देखकर की थी। चीन और जापान में भूकम्प की पूर्व संध्या पर चूहे इधर-उधर पलायन करने लगते हैं। भारत में भी लातूर और उस्मानाबाद के भूकम्पों से पहले चूहों के उन क्षेत्रों से भागे जाने की बात सामने आयी है। कुछ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यहीं से भागे हुए चूहों के उन क्षेत्रों से भागे जाने की बात सामने आयी है। कुछ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यहीं से भागे हुए चूहों ने सूरत आदि शहरों में पहुँच कर प्लैग फैलाया। इस पर अध्ययन करने वाले अमेरिकी वैज्ञानिकों का कहना है कि भूकम्प की तरंगें आने से पूर्व व्यक्तियों के अन्दर अजीब-सी दहशत, तनाव, उत्तेजना भर जाती है। सन् 1956 में अटलाटीस में आये भूकम्प ने आने के पूर्व ही बहुत सारे लोगों को उत्तेजित कर डाला था। सन् 1966 में ताशकंद में आया भूकम्प तो अभूतपूर्व कहानी कहता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि पानी में अक्रिय गैस आर्गन की मात्रा यकायक बढ़ गयी थी। 25 अप्रैल को यह मात्रा सामान्य से चार गुना अधिक हो गयी थी तथा 26 अप्रैल को भूकम्प आया। वैज्ञानिक अभी तक इसके वास्तविक कारणों का पता नहीं लगा पाए हैं।

इन भूकम्पों के आने से अपार धन-जन की हानि सर्वविदित है। इससे धरती का स्वरूप भी बदल जाता है। नयी भू-आकृतियों की रचना होती है। तटों के धँसने से खाड़ियाँ बनती हैं। तटों के धँसने से खाड़ियाँ बनती हैं। कही झील बन जाती है, कहीं सोते निकल आते हैं। भूकम्पों के निरन्तर आने से अवसादी शैलों के क्षेत्र में वलित पर्वतों का निर्माण होता रहता है। जो भूकम्प के लिए अति संवेदनशील होता रहता है। भूकम्प की इस भीषण हानि को मद्देनजर रखते हुए आजकल इमारतों के ढाँचों में परिवर्तन किया जा रहा है। दिल्ली, मुम्बई और कलकत्ता की इमारतें रिक्टर पैमाने पर छह डिग्री से अधिक शक्तिशाली भूकम्प के झटके को सहन नहीं कर सकतीं। दोषयुक्त भू-पट्टिकाओं वाले सोन एण्ड्र्यू प्रदेश में स्थित सेन फ्रांसिस्को की इमारतों को मजबूती की बजाय लचीला बनाया जाता है ताकि वे भूकम्प के झटकों को सहन कर सकें। जापान की कुछ इमारतों में ऐसे यन्त्र लगाए जाते हैं जो भूकम्प की तरंगों को तुरन्त भांप लेते हैं और इमारत की आवश्यक वस्तुओं को, व्यक्तियों को सुरक्षित स्थानों में स्थानान्तरित कर दिया जाता है।

भूकम्प रूपी प्राकृतिक आपदा से पूरी तरह बचने के लिए विज्ञानवेत्ता अभी तक कोई सार्थक उपाय नहीं खोज पाए हैं। हालाँकि इसकी पूर्व सूचना पृथ्वी अपनी सूक्ष्म तरंगों के माध्यम से प्रक्षेपित करती हैं। विशेषज्ञों का इस बारे में यही सुझाव है कि मनुष्य को पर्यावरण के सन्तुलन को किसी भी कीमत पर बिगाड़ना नहीं चाहिए। जंगल, वृक्ष, वन सम्पदा, प्राकृतिक वैभव समूची मनुष्यता की सुरक्षा कवच है। इसे सुरक्षित रखकर ही हम भूकम्प जैसी आपदाओं से स्वयं को धूलिसात होने से बचा सकते हैं। पर्यावरण का प्राकृतिक वैभव ही हमारे उज्ज्वल भविष्य की सुनिश्चित सम्भावना को साकार करने में समर्थ है।


बुद्धि संवेदना की अनन्तता में प्रतिष्ठित हुई

तेजोदीप्त वदन। लम्बे श्वेत केश-घुटनों तक प्रलम्ब बाहु। एक हाथ में कमण्डल। पैरों में खड़ाऊँ। ललाट पर प्रचण्ड तिलक। रोम-रोम सफेद हो चला था। आयु का हिसाब न तो इनके पास और न देवों को ही ज्ञात है। भूत-भविष्य, वर्तमान, पृथ्वी, पाताल और अन्तरिक्ष ऐसा कोई काल और लोक नहीं, जहाँ इस तपस्वी की गति न हो।

वर्षों के बाद उनकी समाधि आज टूटी थी। एक रहस्यमयी मुसकान के साथ आज वह हिमालय के आँगन से बाहर निकले थे। कहाँ? किस ओर? इसका अनुमान कोई लगा पाता इसके पहले वह कपिलवस्तु के राजमहल के द्वार तक पहुँच चुके थे। उनके खड़ाऊँ की खाद-खट् सुन दास-परिचायक चौंके। देखते-देखते राजमहल में खबर पहुँच गई कि हिमालय से कोई महायोगी द्वार पर पधारे हैं।

महाराज शुद्धोधन ने मन्त्रियों के साथ स्वयं द्वार पर आकर उन्हें प्रणाम किया। प्रणाम में त्रिकालदर्शी ऋषि ने एक रहस्यमयी मुसकान के साथ महाराज से कहा-”पुत्र जन्म पर बधाई राजन्।”

“अन्दर चलकर शिशु को अपना मंगल आशीर्वाद दें प्रभु।” “ चलो!” इस शब्द के साथ महर्षि कालदेवल रनिवास की ओर चल पड़े, जहाँ महारानी माया देवी अपनी गोद में देवोपम शिशु को लिए बैठी थी। महर्षि के आसन ग्रहण करने के बाद राजा ने शिशु को महारानी की गोद से लेकर ऋषि को दिया। ऋषि की दृष्टि बालक के भोले मुखमण्डल पर टिक गयी। लगा कि समय जैसे थम गया। क्या नहीं था महर्षि की उस दृष्टि में, काल की सीमाओं को भेदती वह दृष्टि कुछ अद्भुत और अलौकिक को प्रत्यक्ष कर रही थी।

कुछ पलों के अनन्तर महर्षि के मुख से कुछ अस्पष्ट स्वर निकले-”तुम धन्य हो राजन्। धन्य है वह माँ, उसकी कोख से इसने जन्म लिया, धन्य है वह धरती जहाँ इसकी बाल-क्रीड़ाएँ होंगी। धन्य होंगे वे लोग जो इसके आश्चर्यमय जीवन के साथी होंगे।” “ऐसा क्या है इस बालक में ऋषिवर!” प्रश्नकर्त्ता के मुख पर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता के भाव थे।

“क्या नहीं है, इसमें? यह बालक असाधारण है। भविष्य में यह बोधिवृक्ष की छाया में बुद्धत्व प्राप्त करेगा और संसार को समस्त प्राणियों को सत्य, अहिंसा, क्षमा, शान्ति, मैत्री, करुणा का सन्देश देगा। यह प्रथम बार मनुष्य के स्वभाव की बदलकर हिंसा से अहिंसा की ओर ले जाएगा। इसके प्रत्येक पद से भूलोक में क्रान्तियाँ जन्मेगी और परिवर्तन के भूचाल आएँगे। इसकी दृष्टि से करुणामृत का वर्णन होगा और इसके प्रत्येक संकेत से शान्ति का स्त्रोत बहेगा। यह धर्म राज्य का चक्रवर्ती होगा महाराज।”

“तो क्या यह संन्यासी बनेगा, ऋषिवर?”

“सामान्य संन्यासी नहीं, सम्यक् सम्बुद्ध। क्षत्रियों के दिग्विजय के स्थान पर धर्म विजय करेगा। कल्प-कल्पान्तों तक इसके धर्म की शरण में व्यक्ति और समाज, शान्ति और सुरक्षा ग्रहण कर अभय होंगे।” ऋषि बोलते जा रहे थे, परन्तु महाराज शुद्धोधन ने जैसे कुछ सुना ही न हो, उनका मन ‘संन्यासी’ शब्द में अटक कर रह गया। महर्षि उनको सोचता छोड़कर किसी अज्ञात दिशा की ओर चल दिए।

‘संन्यासी’ तो क्या घर-बार छोड़कर..... कल्पना को इस उफान को उनके अन्तःकरण की दृढ़ इच्छाशक्ति ने टुकड़े-टुकड़े कर दिया। नहीं वह ऐसा नहीं होने देंगे। शिशु का पालन इतनी सुविधाओं में होगा कि उसे कभी वैराग्य न हो। वैभव और विलास की अर्गलाओं से वह उसे जकड़ देंगे।

क्षण, पल, घड़ी, दिवस, मास, वर्ष के साथ उनका संकल्प मूर्त होने लगा। कुमार सिद्धार्थ के लिए साधन-सुविधाओं के अम्बार लगा दिए गए। युवावस्था होते-होते उसका विवाह अप्रतिम सुन्दरी से हो गया।

रूप, यौवन एवं विलास कुमार सिद्धार्थ इन सबसे चारों ओर घिरा था। सारा दिन नृत्य-गीत में व्यतीत हो जाता। वीणा की एक झंकार ऊषा की पलकें खोलती और दूसरी झंकार रात की पलकें मूँद लेतीं। संगीत की स्वर-लहरियों के साथ यौवन और विलास उसके रोम-रोम को बींध रहा था। इन सारे विलास-सुखों से घिरे कुमार सिद्धार्थ न जाने रह-रहकर विह्वल हो उठते थे। एक अनचाही घुटन उन्हें तड़पाए जा रही थी। बिजली की कड़क और चमक की तरह एक सवाल उनके मन में कौंध उठता, आखिर क्या हैं, जीवन? क्या यही अथवा कुछ और?

इस घुटन से उबरने के लिए एक दिन उसने वन भ्रमण का निश्चय किया। आज पहली बार वह राजमर्यादाओं के आडम्बर को परे हटाकर भ्रमण हेतु निकले थे। साथ में था सारथी-जिसके मुख से सवाल उभरा-किधर चलूँ देव। इस प्रश्न ने उनकी विचार-मग्नता को भंग किया। चौंक कर बोले-वन की ओर चलो।

शब्दों के साथ रथ भाग चला। साथ ही कुछ पल ठहरी विचार-शृंखला भी। तो क्या जीवन निरुद्देश्य है। यदि उद्देश्य है तो फिर क्या? प्रश्न उसके मन को मथ रहे थे। वह सब कुछ तो था उसके पास, जिस अधिकतम की संसार में कामना की जाती है, फिर भी कुछ अभाव खटक रहा था।

अचानक वह अचकचा गया। सामने एक जर्जर व्यक्ति पथ को मध्य सामने एक जर्जर व्यक्ति पथ के मध्य खड़ा था। पोपला, झुर्रीदार चेहरा, सिर पर श्वेत केश, जो झड़कर दोहरा हुआ जा रहा शरीर, धँसी आँखें। हाथ से पकड़ी लकड़ी के सहारे काँपते हुए स्वयं को सँभालने की कोशिश कर रहा था। निर्बलता के कारण हटना चाहकर नहीं हट सका था।

“सौम्य। इसे क्या हो गया?” उसने सारथी से पूछा।

“प्रभु! इसे बुढ़ापा हो गया है।”

“क्या यह भी दरिद्रता की कोई यातना है?”

“नहीं आर्य।” छन्दक ने मुस्कराकर महाकुमार की ओर देखते हुए कहा-”इसके सामने धनी और निर्धन दोनों समान है। वैभव का अतिरेक विलासिता की बाढ़ इसे रोकने की बजाय कहीं अधिक शीघ्र इसे आकर्षित कर लेती है।”

“तो क्या धनी भी एक दिन वृद्ध बन जाने पर यही कष्ट भोगते हैं।”

“हाँ आर्य, जन्म लेने वाले इस दशा को भी प्राप्त होते हैं।”

हठात् सिद्धार्थ ने कहा “छंदक।”

“आर्य।”

“रथ लौटा लें।”

“कहाँ चलूँ देव?”

“प्रसाद।”

मानो राजमहल उस वास्तविकता की भयानकता के विरुद्ध एक पलायन था। वहाँ तो ऐसा कुछ नहीं था। छंदक ने लगाम खींची, घोड़ों को मोड़ा और रथ राजमहल की ओर लौट चला।

जिस समय सिद्धार्थ रथ से उतरा उसका मुँह उतरा हुआ था। राजा शुद्धोधन ने देखा तो कहा-”तात्।”

सिद्धार्थ ने अवाक् दृष्टि से देखा। “क्या हुआ वत्स। तू कहाँ गया था और क्यों लौट आया?”

सिद्धार्थ ने उँगली उठाकर शुद्धोधन की ओर न देखकर सुदूर से आने वाले स्वर में कहा-”आर्य! आप भी, पितृव्य अमृतोदन भी और अन्त में मैं भी...........।”

“क्या हुआ वत्स?” राजा चौंक उठा।

“पिता ।” सिद्धार्थ ने कहा और फिर बड़बड़ाया “और फिर एक दिन यशोधरा भी....”

शुद्धोधन की हड्डियाँ काँप गयीं। बोले “पुत्र क्या

हुआ?” “कुछ नहीं आर्य!” सिद्धार्थ ने कहा “आपको चिन्ता नहीं होती?” “किसकी?”

“बुढ़ापे की। जो आने वाला हैं?” इतना कहकर वह किसी चिन्ता में डूब गए।

एक पल को चुप रहकर शुद्धोधन बोले-”पुत्र! यह सब चिन्ता न कर जीवन में जो मिला है उसे भोग। तू मेरा सबसे प्रिय है।”

सिद्धार्थ भीतर चला आया था और जब विशाल प्रकोष्ठ में पहुँचा तो उसे लगा कि वह शिथिल था। भद्रा कापिलायिनी शाक्य कुलनारियों के साथ थी।

रात्रि के मंगल वाद्य बजे थे। रूप और यौवन की मोहक किरणें कुमार को लुभाने लगीं। लेकिन आज वह अन्यमनस्क था। भोर होते ही वह फिर वन की ओर चल पड़ा। फिर तुरंग भाग रहे थे, छन्दक रथ हाँक रहा था। अचानक कोलाहल मचा-”मर गया, मर गया।”

सिद्धार्थ चौंका। छन्दक ने घोड़ों की लगाम को पूरे बल से खींच लिया। रथ डाँवाडोल हो गया।

देखा, एक क्षीणकाय व्यक्ति असह्य यातना में तड़प रहा था। भय से पथ पर गिर गया था। वह काला था। चमड़ा हाथ पर सड़ा-सा लगता था।

सिद्धार्थ ने देखा कि पथ के रक्षक ने चिल्लाकर कहा-”देखता नहीं। महाकुमार का रथ जा रहा है और तू..।”

“ठहर जाओ!” सिद्धार्थ ने रथ से उतर कर कहा।

सबने अभिवादन किया। रक्षक पीछे हट गया। उस व्यक्ति के रूप को देखकर सिद्धार्थ को लगा वह मनुष्य नहीं था पशु था। वह हाथ उठाकर कुछ घिघियाया, लगा जैसे मर्मान्तक वेदना से वह कराह रहा था।

सिद्धार्थ रथ पर लौट गया। उसकी आँखों में दया, घृणा, भय, जुगुप्सा क्या-क्या नहीं थे।

“देव! चलूँ?” छन्दक ने पूछा।

“हाँ।” सिद्धार्थ ने कहा-”छात्र”

“महाप्रभु!”

“यह कौन था, छन्न? यह कौन था? क्या यह भी मनुष्य था?” सिद्धार्थ का स्वर कंपित था।

छन्दक ने कहा था, “स्वामी। आपका हृदय बहुत कोमल है। यह तो एक रोगी है।”

“रोग।” सिद्धार्थ ने कहा था। “क्या यह भी दारिद्रय का प्रसाद है?” “नहीं देव। रोग धनी-दरिद्र नहीं देखता, जो भी इसकी चपेट में आ जाता है, यह उसे दबोच लेता है। बड़े से बड़े सौंदर्य भी इसकी एक ठोकर में ढीले हो जाते हैं, जीवनपर्यंत कराहते हैं। उनके लिए दुःख-सुख नहीं केवल यातना होती है।”

“ऐसा क्यों होता है छन्दक?”

“देव! कर्मफल है यह?”

“लौट ले छन्दक! लौट चल।”

लौटकर सिद्धार्थ ने शय्या में मुँह छिपा लिया। आज रंगशाला में नर्तकियों की खिलखिलाहट उसे लुभा नहीं सकी। यशोधरा के विविध हाव-भावों के बीच वह घुटन महसूस करने लगा था। वह व्याकुलता से सोच रहा था धनी भी, दरिद्र भी और इस विषम संसार में जातियों के अहंकार और घृणा में वह कौन-सा रास्ता है जहाँ। मनुष्य-मनुष्य समान है। यह सब नष्ट कहाँ होगा? मनुष्य सुखी कैसे हो सकेगा? इस सोच-विचार में कब भोर हो गयी, पता ही न चाल। भोर होते ही वह फिर निकल पड़ा। महार्ध उत्तम अलंकारों से शोभित रथ को सैंधव तुरंग अपने श्वेत शरीर को फड़काते हुए बढ़ा चले।

अचानक उसके कानों में रुदन के स्वर पड़े और उसे लगा कि आकाश फट जाएगा? अतलंत गहन में से वेदना के ज्वालामुखी फूटे पड़ रहे थे।

“सारथी।” उसने पुकारा।

“प्रभु।”

“यह क्या है? वे पुरुष कन्धों पर क्या उठाए लिए जा रहे हैं?” “देव! वह मुर्दा है।”

“मृत्यु का नाम तो सुना था, परन्तु देखा नहीं था छन्दक। लेकिन मौत तो इसे ले गयी, लेकिन ये क्यों रो रहे हैं।” “कुमार! स्नेह की अर्गलाओं के तड़कने से किसका हृदय व्याकुल नहीं हो उठता। मनुष्य अपने स्वार्थ से दूसरे के जीवन और मृत्यु का

मोल करता है।”

“वैसे नहीं?”

“नहीं प्रभु। ऐसे यदि हर मरते के लिए आदमी रोने लगे तो जिए कब। सब मरते हैं।” “हाँ प्रभु। रथ बढ़ाऊँ?”

“नहीं, ठहर छन्न! तूने मुझसे पहले क्यों न कहा?”

“देव!” छन्न सकपकाया। कहा-” आर्य राजा से न कहें स्वामी!”

“क्यों?”

“वे कहेंगे पुत्र को तूने दुखी क्यों किया?”

“मैंने पढ़ा है छन्न। मैंने पहले सुना है।”

“सुनना और बात है, देखना और बात है।”

“छन्न! संसार में जो आते हैं, वे जाते भी हैं। आकर जाने वाले डरते क्यों नहीं।?”

छन्दक ने कहा “प्रभु मैं क्या जानूँ? परन्तु इतना अवश्य है कि श्मशान में जाने पर सभी को लगता है, यह संसार व्यर्थ हैं।”

“छन्दक, श्मशान कैसा होता है?”

“प्रभु। बड़ा दारुण होता है वहाँ का दृश्य है।”

“कैसा होता है?”

“लाशें जलती हैं।”

“कौन जलाता है?”

“वह जलाता है प्रभु, जो उसका सम्बन्धी और प्रेमी होता है।” “वह इतना कठोर कैसे हो जाता है, छात्र? जिससे प्रेम करता है, बात करता है, उसे वह इतना हृदयहीन होकर जला कैसे देता है?”

“देव! वह उसे नहीं जलाता। जिसे जलाता है, वह तो मुर्दा होता है, वह तो मिट्टी के समान हो जाता है।”

“कितनी भीषण है यह उलझन। इसमें अधिकार, धन, यश कुछ भी नहीं कर सकता?”

“नहीं कुमार! असमानता के इस संसार में इस मृत्यु ने ही सबको समान करके दिखा दिया है।”

“लौट चल, छन्दक।” सिद्धार्थ ने पुकार कर कहा-”लौट चल।”

रथ राजमहल की ओर मुड़ चला। राजमहल पहुँचने पर मंगल वाद्यों से उसका स्वागत हुआ। आज वहाँ सभी प्रसन्न थे। चारों ओर राग-रंग की धूम थीं। दास-दासियों से लेकर राजकर्मचारियों तक ने उसे पुत्र जन्म की बधाई दी।

ओह! तो यह सब उसके पुत्र जन्म के उपलक्ष में था। अन्तःपुर में प्रवेश करने पर यशोधरा उसे मिली। उसके मुखमण्डल पर प्रसन्नता थिरक रही थी।

दिन भर का थका वह पलंग पर सो गया। आधी रात होने के पहले ही अचानक वह जाग उठा।

क्या वह सो रहा था? वह क्या था। उसका स्वप्न था।

वृद्ध, रोगी सिद्धार्थ घूम रहा था। यशोधरा मृत पड़ी थी। प्रासाद में हाहाकार मच रहा था।

कितना भयानक था वह स्वप्न।

आज आनन्द की अखण्ड वेला में वह भीषण यातना का स्वप्न। सिद्धार्थ का मन धड़क उठा। उसने आस-पास देखा। कक्ष में अनेकों सुन्दरियाँ एक दूसरे से गुँथी-बँधी सो रही थीं। वह सोचने लगा बाँधने के लिए कितनी अर्गलाएँ हैं यह और मनुष्य इन्हीं कड़ियों से प्यार करता है। आखिर क्यों?

यह रूप नहीं रहेगा, बुढ़ापा इस सौंदर्य को ऐसा ढीला कर देगा कि इन्हें देखकर घृणा होने लगेगी। रोग, काले कुरूप रोग आकर इन सुन्दरियों को डस लेंगे और तब यह साँप के विष जैसी यन्त्रणा में छटपटाने लगेगी और फिर मृत्यु इनका रक्त चूसने लगेगी। मृत्यु सर्वग्रहिणी, सर्वनाशिनी, सर्वव्यापिनी मृत्यु आएगी और इन सबको अपने जबड़ों में चबा-चबा कर फेंकेगी।

तब क्या यही जीवन है, वासना, विलास, ऐश्वर्य, मरण और नाश। सोच-सोचकर उसका सिर फटने लगा।

उसने द्वार के पास आकर कहा “यहाँ कौन है?”

कोई नहीं बोला।

सब सो रहे हैं। उसने सोचा। प्रासाद नितान्त नीरव था। उसने फिर पुकारा-”कोई है?”

छन्दक जागकर बोला “आर्यपुत्र मैं छन्दक हूँ।”

“मेरे लिए एक अश्व तैयार कर।” स्वर अजीब था।

“इस समय देव।”

“अभी।”

छन्दक डरा परन्तु प्रश्न का साहस नहीं हुआ। कहा-”जो आज्ञा देव, अभी लाता हूँ।”

सिद्धार्थ का हृदय धक-धक कर रहा था। कुछ ही देर में जब छन्दक अश्व कंथक को सजाकर लाया तो देखा सिद्धार्थ नहीं है। फिर देखा आर्य पुत्र धीरे-धीरे आ रहे हैं। वह आगे आ गया। कहा “देव। अश्व आ गया है।” सिद्धार्थ गम्भीर था। अब वह घबराया हुआ-सा नहीं लग रहा था। राहुल और यशोधरा के पास से लौटा हुआ वह एक नया व्यक्ति था।

एक ऐसा व्यक्ति जो जीवन को नया अर्थ देने के लिए संकल्पित था। आषाढ़ की पूर्णिमा को उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में आज की घड़ी अमूल्य थी। आज उसने महाभिनिष्क्रमण करना था। आत्म-कल्याण, लोककल्याण के लिए सर्वत्याग।

प्रियजन-परिजन, राजमहल, नगर सब कुछ छूटने लगे। धीरे-धीरे शाक्य, कोलिय और रामग्राम के राज्य पार हो गए।

कंथक और छन्दक को वापस लौटा दिया। लेकिन कंथक अपने स्वामी का वियोग न सह सका और उसी समय सदा के लिए पृथ्वी पर गिर गया। छन्दक भरे मन से आँसू भरी आँखों को लिए अपने कदम कपिलवस्तु की ओर बढ़ाए।

फिर सिद्धार्थ का जीवन एक यात्रा बन गया।

कठोर तपस्या में छह वर्ष बीत गए। आज वह

रिर्रजना नदी के किनारे एक विशाल बरगद की छाया में बैठे थे। उसी समय उरुवेला के सेनानी नामक कस्बे से सुजाता खीर लेकर आयी।

उन्होंने उन्वास कौर बनाकर वह खीर खाई और थाल को निरंजना के जल में फेंक दिया। अब वह संकल्पित थे कि बुद्ध होकर ही यहाँ से हटेंगे।

वटवृक्ष की छाया, पद्मासन पर बैठे हुए क्षण बीतने लगे। ध्यान दिनों-दिन गम्भीर होता जा रहा था और बैशाख पूर्णिमा की रात्रि में जब सारा संसार निद्रा की गोद में पड़ा आनन्द ले रहा था। सिद्धार्थ की इन्द्रियाँ, उनका मन, उनकी सम्पूर्ण चेतना अहंभाव से ऊपर उठकर अनन्त के विस्तार में फैल गयी। वे अब बुद्धि की संकीर्ण परिधि से निकलकर संवेदना की अनन्तता की अनुभूति कर रहे थे। समाधि के इस आनन्द में स्वयं का अस्तित्व निर्मल, स्वच्छ, धुला हुआ, शान्त-सन्तुष्ट लग रहा था। भेद की दीवारें ढह चुकी थीं। कण-कण उनका अपना हो चुका था। समाधि निमग्न बुद्ध ने आँखें खोलीं। उनके नेत्रों में असीम करुणा जाग उठी। एक दिव्य रागिणी के समान आकाश में ऊषा उदित हुई। उस दिन नए आलोक ने नया ही जीवन देखा।

बुद्ध उठ खड़े हुए-मानवता को बुद्धि के चक्रव्यूह से निकाल कर संवेदना की अनन्तता में प्रतिष्ठित करने। वह धीरे-धीरे चल पड़े। उनके पाँव धीरे गम्भीर गति से उठने लगे। नंगे पाँव मानो धरती की धूलि में क्षणिक जीवन की पर्तों पर करुणा की अमरता का जीवित संदेश लिखने के लिए बढ़ चलें।


आत्मिक प्रगति हेतु ब्रह्मवर्चस की पंचाग्नि साधना

ब्रह्मवर्चस की पंचाग्नि साधना जिसमें शिशु स्तर का चान्द्रायण भी कराया जाता है, सवालक्ष गायत्री महापुरश्चरण (जप के साथ तल्लीनतापूर्वक ध्यान) के अतिरिक्त पाँच योगों के समावेश से पूरी होती है। ये साधनाएँ सरल भी हैं एवं हर परिजन इन्हें सम्पन्न कर सकता है। इनमें कोई भूल होने पर हानि की भी कोई सम्भावना नहीं है। गायत्री को पंचमुखी कहा गया है। पंचमुखी गायत्री की पंचकोशी आवरण साधना में (1) बिन्दुयोग-त्राटक (2) प्राणयोग-सूर्यवेधन प्राणायाम (3) कुण्डलिनी योग-शक्ति चालिनी मुद्रा व साधना (4) लययोग-खेचरी मुद्रा (5) हंसयोग, सोऽहम् साधना का विस्तार से विवेचन परमपूज्य गुरुदेव ने अपने साधना सम्बन्धी मार्गदर्शन में किया है। इस समन्वय को उनने यम द्वारा नचिकेता को सिखाई गयी कठोपनिषद् वर्णित पंचाग्नि विद्या नाम भी दिया है। इस लेख में प्रारम्भिक दो साधनाओं का वर्णन हैं।

(1) बिन्दुयोग (अन्तः एवं बहिर्त्राटक)- भगवान शिव और भगवती दुर्गा के भ्रूमध्य भाग में तीसरा नेत्र चित्रित किया जाता है। यह तीसरा नेत्र है। दिव्य दृष्टि इसी में रहती है। दिव्य दृष्टि सामान्यतया दूरदर्शिता और विवेकशीलता को कहते हैं। उच्चस्तरीय स्थिति में उसे दूरदर्शन जैसी अतीन्द्रिय क्षमता माना जाता है। वेधक दृष्टि भी वही है। इस केन्द्र से प्रचण्ड विद्युत निकलती है और उसके द्वारा दूसरों को कई प्रकार के अनुदान देना सम्भव हो जाता है। भगवान शिव ने इसी तीसरे नेत्र से निकलने वाली प्रचण्ड विद्युत शक्ति के सहारे आक्रमणकारी कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया था। संजय इसी केन्द्र का उपयोग टेलीविजन की तरह करते थे उन्होंने धृतराष्ट्र के पास बैठकर ही सुविस्तृत क्षेत्र में फैले हुए महाभारत का समाचार सुनाते रहने का काम अपने जिम्मे लिया था। मैस्मरेजम हिप्नोटिज्म जैसे चमत्कारी प्रयोगों के लिए इन दिनों त्राटक साधना का ही अभ्यास किया जाता है।

मस्तिष्क विद्या के ज्ञाता जाते हैं कि भ्रू-मध्य भाग की तनिक-सी गहराई में पीनियल और पिट्यूटरी नामक दो ग्रन्थियाँ हैं। इन दोनों की क्षमता एक दूसरे को प्रभावित करती और एक संयुक्त प्रभावचक्र बनाती है। इस चक्र की कार्य-पद्धति से मस्तिष्क के विभिन्न भाग प्रभावित होते हैं। मेरुदण्ड से सम्बन्धित नाड़ी गुच्छकों तथा हारमोन ग्रन्थियों से भरी हुई विशिष्ट क्षमता को इसी चक्र से प्रेरणा, एक दिशा मिलती है। चेतन और अचेतन मन को-गतिविधियों को दिशा देने का काम इसी चक्र का है। इसलिए उसे अध्यात्म विवेचन में आज्ञाचक्र कहा जाता है। आज्ञाचक्र अर्थात् काया के स्थूल और सूक्ष्म संस्थानों की विभिन्न गतिविधियाँ अपनाने के लिए आज्ञा देने वाला दिव्य संस्थान पड़ी है, पर वह किसी उच्च उद्देश्य में प्रयुक्त न किये जाने के कारण अँधेरे में भटकती है। कुसंस्कारों से आच्छादित रहती और मूर्छित पड़ी रहती है। इसे जाग्रत करने की साधना का नाम त्राटक है। इसके लिए प्रकाश का अवलम्बन लेना पड़ता है।

त्राटक साधना में घृत-दीप जलाकर सामने रखते हैं। उसे एक बार आँख खोलकर देखते हैं। फिर आँखें बन्द कर लेते हैं। भ्रू-मध्य भाग में ध्यान करते हैं कि प्रकाश ज्योति भीतर जल रही है और अंतःक्षेत्र में विद्यमान तृतीय नेत्र को ज्योर्तिमय बनाती हुई, दिव्य दृष्टि उत्पन्न कर रही है। इस ध्यान में दीप ज्योति से सहायता मिलती है। संकल्प बल द्वारा आज्ञाचक्र में उसकी प्रतिष्ठापना होती है और अभ्यास से उसे इतना परिपक्व बनाया जाता है कि चर्मचक्षुओं की तरह से उसे विश्व-व्यापी दिव्यता का भान होने लगे। जड़ के आवरण में छिपी हुई आत्मा की झाँकी मिलने लगे। पदार्थों में परमेश्वर परिलक्षित होने लगे। इसे विवेक का जागरण भी कह सकते हैं। सामान्य बुद्धि जहाँ अवाँछनीयता से समझौता कर लेती है और मोह-जंगल में भ्रमित होकर कुछ का कुछ निर्णय करने लगती हैं। त्राटक साधना से जो दूरदर्शी, तत्वदर्शी विवेक जाग्रत होता है उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। गायत्री मन्त्र का धियः तत्व वही है। इस जागरण को आत्मजागरण की संज्ञा दी जाती है। इसे भौतिक और आत्मिक जीवन की महान उपलब्धि ही कह सकते हैं।

(2) प्राणयोग (सूर्यवेधन प्राणायाम)-इस निखिल ब्रह्माण्ड में वायु, ईथर, ऊर्जा आदि की तरह ही एक ऐसा दिव्यतत्व भी भरा पड़ा है, जिसे जड़-चेतना की समन्वित शक्ति प्राण कहते हैं। आरोग्यशास्त्री उसे जीवन शक्ति कहते हैं और बताते हैं, उसकी न्यूनाधिक मात्रा के कारण ही मनुष्य दुर्बल और समर्थ बनते हैं। मनःशास्त्री उमंग, स्फूर्ति, उत्साह, साहस के रूप में उसकी व्याख्या करते हैं और जीवट एवं प्रतीक्षा कहते हैं। अध्यात्मशास्त्री इसी प्राण को संकल्प, विश्वास, आदर्श की परिपक्वता, प्रखरता कहते हैं। सम्वेदना क्षेत्र में इसी को सद्भावना, श्रद्धा, कला, सरसता आदि के रूप में प्रतिपादित करते हैं और महानता नाम देते हैं। व्यक्तित्व के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवेश करके वह प्राण ही ओजस्, तेजस्, वर्चस् के रूप में प्रकट होता है। मनस्वी, तेजस्वी, तपस्वी, यशस्वी व्यक्तियों में इसी प्रखरता का बाहुल्य पाया जाता है। चेहरे का छाये हुए तेजोवलय के रूप में इसी का दर्शन होता है। वह प्राण ही शरीर विद्युत के रूप में संपर्क क्षेत्र में अपना चुम्बकीय प्रभाव छोड़ता है। आकर्षण, अनुदान, प्रहार जैसे कितने ही प्रभावशाली तत्व उसमें घुले रहते हैं। प्राण की काया में जो सामर्थ्य का स्त्रोत है वह प्राण ही है। इसीलिए उसे प्राणी अर्थात् प्राण द्वारा संचालित कहा जाता है। इसके निकल जाने पर मृत्यु हो जाती है और घट जाने पर जीवित रहते हुए भी मुर्दनी, सुस्ती, उदासी छाई रहती है। पिछड़ेपन से ग्रसित, दीन-दरिद्र, अस्त-व्यस्त, अनिश्चित स्तर के लोगों की प्रधान है। जिस प्राणी में जितना प्राणतत्व अधिक होगा वह उतना ही पराक्रमी पाया जाएगा। ऋषियों के आश्रमों में उन महामानवों का परिष्कृत प्राण ही उच्चस्तरीय वातावरण बनाये रहता था। उसी के प्रभाव से वहाँ पहुँचने पर सिंह, गाय एक घाट पर पानी पीते थे। सत्संग और कुसंग में इस प्राण चुम्बक का ही भला-बुरा प्रभाव काम करता है। विचारों प्रवचनों से समझने-समझाने भर से सहायता मिलती है। एक-दूसरे के मध्य जो प्रभाव या आदान-प्रदान होता है, उसमें प्राणविद्युत ही काम कर रही होती है। दूसरों को प्रभावित करने का काम प्रायः प्रखरता के सहारे सम्पन्न होता है।

पदार्थ जगत में ऊर्जा और गति के रूप में प्राणशक्ति ही विभिन्न प्रकार की मन्द एवं तीव्र गतिविधियाँ उत्पन्न करती हैं। परमाणु के अंतर्गत काम करने वाले छोटे घटक इसी चुम्बकत्व से परस्पर बँधे रहते हैं। द्रुतगति से अपनी कक्षा पर अनवरत गतिशील रहने की सामर्थ्य इसी दिव्य विद्युत से प्राप्त होती है। पृथ्वी की आकर्षण शक्ति में-सूर्य की ऊष्मा में यह पिण्डों को परस्पर जकड़ कर रखे हुए सूत्र शृंखला में महाप्राण ही काम करता है। लेसर, एक्सरेज, अल्ट्रावायलेट आदि विशिष्ट किरणें इसी महाशक्ति की चिनगारियाँ हैं। परमाणुओं और जीवाणुओं के मध्य केन्द्र नाभिक, न्यूक्लियस, पदार्थ समुच्चय का प्राण कहा जा सकता है।

यह प्राण ही चेतना की सर्वोपरि सामर्थ्य है। उसी के सहारे किसी भी क्षेत्र में प्रगति कर सकना सम्भव होता है। यह महातत्व अग्नि आकाश में प्राणतत्व आक्सीजन की ही तरह प्रचुर परिमाण में सर्वत्र भरा पड़ा है। इसकी अभीष्ट मात्रा को खींचना मात्रा को खींचना और आत्मसत्ता में धारण कर सकना प्रयत्नपूर्वक सम्भव हो सकता है। इस प्राण-विनियोग की प्रक्रिया को प्राणायाम कहते हैं। इसमें विशिष्ट क्रिया-प्रक्रिया के साथ श्वास-प्रश्वास क्रियाएँ करना पड़ती हैं। साथ ही प्रचण्ड संकल्प-बल का वैयक्तिक चुम्बकत्व समुचित मात्रा में समन्वित किये रहना होता है। इसी साधना को प्राणयोग कहते हैं। सामान्यतः इसे प्राणायाम कहते हैं। ‘लय’ और ‘ताल’ की महान शक्ति का ज्ञान सर्वसाधारण को तो नहीं होता, पर विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि सर्वविदित होने पर भी यह सामर्थ्य कितनी प्रचण्ड है।

सूर्यवेधन प्राणायाम में लय और ताल का विशेष समन्वय है। इड़ा और पिंगला शरीरगत दो विद्युत प्रवाह हैं, जो मेरुदण्ड के अन्तराल में काम करते रहे हैं। इनका मिलन केन्द्र सुषुम्ना कहलाता है। इड़ा, पिंगला में सम्बन्धित श्वास प्रवाह को उलट-पुलटकर चलाने की प्रक्रिया विशिष्ट महत्वपूर्ण है। पेण्डुलम क्रम में उसी के तनिक से स्पर्श का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है और घड़ी चलती रहती है। हृदय की धड़कन भी इसी उलट-पुलट का काम रक्त-संचार के सहारे जीवन धारण किये रहने का महान कार्य सम्पादन करती है।

इसी लोम-विलोम क्रम से किया जाने वाला प्राणयोग सूर्यवेधन प्राणायाम कहलाता है। ब्रह्मवर्चस् साधना में इसी का अभ्यास कराया जाता है। साधक अपने भीतर प्राणतत्व की अभिवृद्धि का अनुभव करता है। इस प्रक्रिया के द्वारा उपार्जित प्राणसम्पदा साधक की बहुमूल्य सम्पत्ति होती है। इस पूँजी को आवश्यकतानुसार विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। इसे बहिरंग और अन्तरंग क्षेत्र का सामर्थ्य उत्पादक प्रयोग कह सकते हैं। कुण्डलिनी जागरण के लिए तो इसी क्षमता की विशेष रूप से आवश्यकता पड़ती है। विद्युत उत्पादन में जो कार्य जनरेटर करते हैं, लगभग व्यक्तित्व में अनेक प्रयोजनों में काम आने वाली प्राणऊर्जा का संचय सूर्यवेधन प्राणायाम की साधना द्वारा किया जाता है।

प्राणायाम के साथ बन्धों का भी प्रयोग किया जाता है। मुख्य बन्ध तीन प्रयोग किया जाता है। मुख्य बन्ध तीन है।-(1) मूलबन्ध (2) उद्बिन्ध (3) जालन्धरबन्ध। प्राण प्रवाह को नियन्त्रित करने में इन्हें बाँध या वाल्व के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। प्राण ऊर्जा अवाँछनीय दिशा में प्रवाहित न होने देने तथा वाँछित दिशा में नियोजित करने के महत्व को समझते हुए उसके लिए इन योग क्रियाओं में मायाग्रस्त जकड़नों में कसे रहने वाली ग्रन्थियों से छुटकारा जीवनमुक्त स्थिति तक पहुँचाना बन्ध साधना का उद्देश्य है। ब्रह्म ग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि और रुद्र ग्रन्थि का वर्णन हठयोग की विवेचना में किया जाता है। ब्रह्मवर्चस् की बन्ध साधना में इन्हीं तीनों को खोलने का विधान है। मूलबन्ध, जालन्धर बन्ध और उड्डियन बन्धों की साधनाएँ अधिकारी भेद से घटा-बढ़ाकर अथवा समन्वय करके कराई जाती हैं। इसीलिए प्राणायाम बन्ध सहित करने की प्रक्रिया अपनायी जाती है।


VigyapanSuchana

ज्ञातव्य

कई परिजन भावुकता के अतिरेक में आकर बिना केन्द्र की आज्ञा के शक्तिपीठ-प्रज्ञा संस्थान निर्माण इन दिनों करने लगे हैं। पूज्यवर का संकल्प जनजाग्रति के केन्द्र बनाने का था, मठ-मन्दिर नहीं। अब नये संकल्प न लिये जाएँ, न ही कोई भूमि आदि क्रय करने का विचार मन में लाया जाय।

अपवाद रूप में नये अनछुए स्थानों पर आवश्यकता हो तो पहले शान्तिकुँज आकर विचार-विमर्श करें तो ही कोई कदम उठायें।


युगसन्धि महापुरश्चरण और वातावरण का संशोधन

युग-समस्याएँ बाहरी कारणों से उत्पन्न हुई लगती भर हैं, वस्तुतः उनकी जड़ें बहुत गहरी है। बड़े पौधों की जड़ें जमीन विशालकाय तने और परिकर को आवश्यक खुराक मिलती है। लदे हुए फल-फूल बाहर टँगे होते हैं। और मोटी बुद्धि से प्रतीत यह होता है कि यह कहीं बाहर से आये या ऊपर से उतरे हैं, पर सच्चाई यह है कि वृक्ष का अस्तित्व, विस्तार और वैभव बनाये रहने के लिए जड़ें ही प्रमुख भूमिका निभाती हैं। वे चर्मचक्षुओं को दीख न पड़ें यह बात दूसरी हैं।

गीता में इस जगत को ‘ऊर्ध्व मूल अधःशाखा’ वाला ‘अश्वत्थ’ कहा गया है। जड़ें ऊपर और पेड़ नीचे होने की उक्ति पहेली जैसी लगती है, पर सूक्ष्मदर्शी पर्यवेक्षण से इस यथार्थता में किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं रह जाता। बादल ऊपर से बरसते हैं और धरातल में नमी और शीतलता बनाये रहते हैं। प्रतीत यह होता है कि जल धरती की सम्पदा है, पर वस्तुतः वह आकाश का अनुदान है। सृष्टि के आरम्भ में धरती गरम गोला थी। आच्छादित गैसें मिलकर पानी बनीं और बरसीं, उसी से समुद्र बने और भाप से बादल बनने का सिलसिला चला। धरती पर पाया जाने वाला जल ही प्रकारान्तर से प्राणियों का जीवनाधार हैं, फिर भी वस्तुस्थिति यह है कि वह सृष्टि के आरम्भ से लेकर अन्त तक आकाश का ही वैभव था और बना रहेगा।

धरती पर जीवन का विकास सन्तुलित तापमान से हुआ है। यह गर्मी ऊपर सूरज से उतरती है। छूने से धरती ही गरम लगती है और उसी की सतह चमकती है। इसलिए सामान्य बुद्धि धरातल पर फैली हुई गर्मी और रोशनी को पृथ्वी की सम्पदा कह सकती है, पर वास्तविकता यह है कि ऊष्मा और ऊर्जा का स्त्रोत सूर्य है। जमीन से वनस्पति के रूप में उगता और प्राणियों के रूप में चलता-फिरता जीवन वस्तुतः सूर्य का ही अनुदान है। उसकी किरणें असंतुलित हो उठें तो यह धरती अग्नि पिण्ड या शीत पिण्ड बनकर सर्वथा निर्जीव स्थिति में जा पहुँचेगी।

पृथ्वी पर पाये जाने वाली अगणित सम्पदाएँ, क्षमताएँ एवं विशेषताएँ उसकी अपनी श्री-समृद्धि प्रतीत होती हैं, किन्तु विशेषज्ञों का प्रतिपादन है कि यह सारा वैभव अन्तर्ग्रही अनुदान है, जिसे ध्रुवों के चुम्बकत्व से कुशलतापूर्वक खींचा और संग्रह किया है। अंतर्ग्रही अनुदानों का विशेष सौभाग्य यदि धरती को न मिला होता तो वह अन्य निर्जीव ग्रहों की तरह इस सारे वैभव से रहित निस्तब्ध में पड़ी होती।

खाद्य पदार्थों का उत्पादन और उपयोग करने का अवसर धरती के सहारे उपलब्ध हुआ प्रतीत होता है, पर सच्चाई दूसरी ही है। प्राणियों का प्रमुख आहार अन्न-जल नहीं, वायु है। खाद्यों के अभाव में कुछ समय जीवित रहा जा सकता है, पर वायु के बिना एक क्षण का भी निर्वाह नहीं। पोषण जितना खुराक के सहारे मिलता है उससे हजार गुना हवा से ग्रहण करके प्राणिजगत जीवित रहता है। आँखें भोजन को देखें और हवा की गरिमा को देखने, समझने में असमर्थ रहें तो भी स्थिति ज्यों की त्यों ही बनी रहेगी।

ब्रह्माण्ड का छोटा रूप पिण्ड है। सौर-मण्डल की छोटी झाँकी परमाणु के अन्तःक्षेत्र में काम करने वाले घटकों की गतिविधियाँ देखने से मिल जाती है। ब्रह्माण्ड में भरी चेतना परब्रह्म है। उसी का छोटा घटक जीव है। जीव और ब्रह्म का पारस्परिक आदान-प्रदान जितना निर्बाध रहता है उसी अनुपात से जीवधारी समर्थ, सम्पन्न एवं प्रसन्न पाया जाता है। उसका प्रगतिक्रम इसी सम्बन्ध शृंखला पर अवलम्बित है। ईश्वर को अश्वत्थ मूल और जीव को उसका पुष्प-पल्लव कहा गया है। इसी स्थिति को ऊर्ध्व मूल अधःशाखा कहा गया है।

धरती पर पदार्थ और ऊर्जा यही दो घटक प्रधान हैं। इसी प्रकार अन्तरिक्ष की दो सम्पदाएँ हैं।

(1) ‘वातावरण’ और (2) ‘वायुमण्डल’ इन दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है। वातावरण चेतनात्मक है और वायुमण्डल प्रकृतिपरक। वातावरण से मनुष्य की आस्था, आकाँक्षा और विचारणा प्रभावित होती है। वायु-मण्डल में वस्तुओं की मात्रा एवं स्तरीय स्थिति का सीधा सम्बन्ध है। मनुष्य एक सीमा तक स्वतन्त्र भी है। उसकी अपनी पुरुषार्थपरायणता का भी महत्व है, किन्तु वातावरण का दबाव तो तूफान की तरह है जिसके आवेग में जन-मानस अमुक दिशा में उड़ता, दौड़ता दिखाई पड़ता है। अन्धड़ के साथ-साथ तिनके और पत्ते दौड़ते हैं। पानी की प्रचण्ड धारा में न जाने क्या-क्या हलका-भारी बहता चला जाता है। इसी प्रकार अन्तरिक्ष में संव्याप्त चेतनात्मक वातावरण जनमानस को किसी दिशा विशेष में अनायास ही धकेलता-घसीटता चला जाता है। अबोध-असमर्थ जनमानस का बहुत बड़ा भाग स्वेच्छा से नहीं वातावरण के दबाव से अपने चिन्तन और प्रयास का निर्धारण करता है। “दैवेच्छा वलीयसी” की उक्ति में इसी सत्य की ओर संकेत किया गया है।

वायुमण्डल के उतार-चढ़ाव का विश्व की सम्पत्ति और परिस्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता है, उसे आये दिन देखा जा सकता है। अतिवृष्टि, अनावृष्टि वायु-मण्डल की असन्तुलित हलचलें हैं, जिनसे समस्त प्राणिपरिकर बुरी तरह प्रभावित होता है। मौसम प्रतिकूल हो जाने पर स्वास्थ्य को बुरी तरह क्षति पहुँचती है। दुर्बलता और रुग्णता का-महामारियों का कभी-कभी ऐसा दौर आता है जो सँभाले नहीं सँभलता। मस्तिष्क ज्वर, लू लगने और निमोनिया होने जैसी बीमारियों में मनुष्य का दोष कम और मौसम का अधिक होता है।

वायुमण्डल की अनुकूलता ही प्रकृति की सहायता है। सतयुग में प्रकृति अनुकूल रहती थी और मानवी आवश्यकता के अनुरूप वस्तुओं की कमी नहीं पड़ती थी। मौसम सन्तुलित रहने पर पदार्थ प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होते थे। खाद्य पदार्थों में पोषक तत्वों का परिमाण बढ़ा-चढ़ा रहता था। ऐसी-ऐसी अनेकानेक अनुकूलताओं के कारण प्राणी स्वस्थ, परिपुष्ट, प्रखर और दीर्घ रहते थे। समर्थता, काय-कलेवर तक ही सीमित नहीं रहती थी वरन् उसके अन्तराल में रहने वाले मनःतत्व को भी प्रभावित करती थी। स्वस्थ मनुष्य सन्तुलित एवं सुखी भी रहती हैं।

सतयुग में मनुष्यों तथा मनुष्येत्तर प्राणियों के शरीर विशालकाय भी थे और बलिष्ठ भी। पीछे उनमें गिरावट आती चली गई। इसका क्या कारण हुआ? परिवर्तन के दिनों प्राणियों ने क्या अच्छाई अपनाई, क्या बुराई? इसका ऊहापोह करने पर लगता है उनने भला-बुरा उगाया नहीं प्रकृतित उन पर शाप, वरदान अनायास ही लदते रहे हैं।

पुरातनकाल में मानवी चिन्तन का स्तर उच्चस्तरीय था। उनकी कामनाएँ, रुचियाँ, महत्वाकाँक्षा उच्चस्तरीय थीं। ऊँचा चाहते और ऊँचा सोचते थे। फलतः इनके क्रिया-कलापों में आदर्शों का पुट पग-पग पर परिलक्षित होता था। ऐसे व्यक्तियों के स्वभाव में शालीनता, चरित्र में सज्जनता, व्यवहार में उदारता घुला रहना स्वाभाविक है। इसी स्तर के लोग धरती के देवता कहे जाते थे।

उन दिनों समष्टिगत वातावरण ही कुछ ऐसा था जिसके प्रवाह में जनसमुदाय को ऊँचा सोचने, ऊँचा करने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं था। प्रवाह चीर कर उलटा चलना कठिन होता है। आज निकृष्टता के प्रवाह में व्यक्ति विशेष को अपने निजी मनोबल के सहारे, उत्कृष्टता अपनाना और उसे अन्त तक मजबूती के साथ पकड़े रहना अति कठिन पड़ता है। कोई अपवाद ही ऐसा पौरुष दिखा पाते हैं। ठीक इसी प्रकार प्राचीन युग में भ्रष्ट चिन्तन एवं दुष्ट आचरण के लिए असाधारण दुस्साहस ही करना होता होगा अन्यथा वातावरण के दबाव में सहज ही वैसा कुछ कर सकना सहज ही वैसा कुछ कर सकना सहज नहीं अतीव दुस्तर था। आज आकाँक्षाएँ और विचारणाएँ मानवी आदर्शों से विपरीत दिशा में उद्दण्ड अंधड़ की तरह बह रही हैं। उससे अनगढ़ ही नहीं सुनिश्चित और सभ्य कहे जाने वाले लोग भी बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।

कार्य स्थूल है और चिन्तन सूक्ष्म। वायुमण्डल स्थूल है और वातावरण सूक्ष्म। दुष्कर्मों से वायुमण्डल विकृत होता है, प्रकृति रूठती है और परिस्थितियाँ दुःखदायी बनती हैं। आवश्यक वस्तुओं का अभाव घटनाक्रम की प्रतिकूलता और कष्ट-संकटों का विरोध-विग्रह का अभिवर्द्धन यह वायुमण्डल की विषाक्तता का परिणाम है। वातावरण चेतन है। मान्यताओं, आस्थाओं और विचारणाओं के समन्वय से उत्पन्न चिंतन प्रवाह में निकृष्टता भर जाने से वातावरण विकृत होता है। उससे प्रभावित जनमानस में कुकल्पनाएँ दुर्भावनाएँ और अनीतिमूलक उच्छृंखलताएं ज्वार-भाटों की तरह उठती हैं। अचिन्त्य चिन्तन का परिणाम अन्तःकरण में उद्विग्नता और कुटिलताओं के रूप में प्रकट होता है। फलतः संकीर्ण स्वार्थपरता, निरंकुश उच्छृंखलता एवं आक्रामक दुष्टता अपनाने पर उतारू होता है। कुविचारों की परिणति दुर्व्यवहार से होती है। फलतः मनोमालिन्य, विलगाव, असहयोग, विरोध एवं विग्रह के रूप में प्रतिद्वन्द्विता खड़ी होती है और अनेकानेक समस्याएँ उत्पन्न कर देती है। प्रभावित लोग स्वयं उद्विग्न रहते और दूसरों को अप्रसन्न करते हैं। गर्हित दृष्टिकोण ही है जिसे अपनाने वाले स्वयं दुख पाते और दूसरों को दुःख देते हैं। सहयोग के अभाव में प्रगति के द्वार रुक जाते हैं। मनोविकार ही शारीरिक और मानसिक रोगों को जन्म देते हैं। अनुदारता और दुष्टता अपनाने वाले दूसरों की सद्भावना गँवा देते हैं।

वायुमण्डल दूषित होने के कारणों से वैज्ञानिक अनाचार से उत्पन्न कूड़े-कचरे की अभिवृद्धि भी है। वायु प्रदूषण, जनप्रदूषण, कोलाहल, विकरण आदि बढ़ने से अन्तरिक्ष में बढ़ती विषाक्तता और उनसे उत्पन्न विभीषिका की चर्चा सर्वत्र होती रहती है। इसके अतिरिक्त मनुष्यों के अनाचरण भी प्रकृति सन्तुलन को विक्षुब्ध करते हैं, फलतः मौसम, बाढ़, वर्षा, भूकंप, तूफान, युद्ध, महामारी, टिड्डी, मूषक, कृमि-कीटक, दुर्भिक्ष आदि की विपत्तियाँ आती हैं। वनस्पति हीनवीर्य होती है। उसके पोषक तत्व घट जाते हैं और हवा में आक्सीजन और जीवन तत्वों की कमी पड़ने से मनुष्य ही नहीं अन्य जीवधारियों की भी शारीरिक स्थिति इस प्रकार बिगड़ती है कि उनकी मनःस्थिति सामान्य और सुखद परम्परा अपनाये रहने योग्य नहीं रह जाती है। यह प्रकृति विपर्यय हर दृष्टि से हर किसी के लिए हानिकारक ही सिद्ध होती है। वातावरण की विषाक्तता लोकमानस में निकृष्टता की मात्रा बढ़ाती है फलतः स्नेह-सहयोग के स्थान पर द्वेष-दुर्भाव और विग्रह, अनाचार की घटाएँ घुमड़ने लगती हैं।

भौतिक क्षेत्र में सुख-सुविधा और शान्ति-व्यवस्था के साधन बढ़ाने के लिए भरपूर प्रयत्न होने चाहिए। कठिनाइयों को हल करने के लिए जो भी पराक्रम सम्भव हो उसे तत्परतापूर्वक किया जाना चाहिए, किन्तु ध्यान यह भी रखा जाय कि इतना ही सब कुछ नहीं है। इसमें आगे भी बहुत कुछ करना शेष है। वायु-मण्डल और वातावरण का परिशोधन उन अध्यात्म-प्रयत्नों पर निर्भर है, जिन्हें व्यक्तिगत धर्मधारणा एवं सामूहिक सहसाधना के आधार पर सम्पन्न किया जाता है। वायुमण्डल की परिशुद्धि के लिए यज्ञोपचार से बढ़कर और कोई अधिक शक्तिशाली माध्यम अब तक नहीं ढूँढ़ा जा सका। थोड़े से पदार्थों को जलाने की हानि को ही देखा जाय और उसके द्वारा होने वाले लाभों को दृष्टि से ओझल कर दिया जाय तो यह बुद्धिमत्ता की बात न होगी। स्वर्णभस्म, मोती भस्म आदि में उन पदार्थों को जला देने से मोटी दृष्टि से हानि और मूर्खता का ही निष्कर्ष निकलता है, पर जो उन रसायनों का महत्व समझते हैं, उन्हें उसमें लाभ और समझदारी ही का परिचय मिलता है।

वातावरण के परिशोधन से सामूहिक साधनाएँ अत्यधिक कारगर सिद्ध होती हैं। युगसंधि महापुरश्चरण की वर्तमान शृंखला जो सन् 2001 तक चलेगी, में इन दिनों प्रायः एक से दो करोड़ साधक एक समय, एक मन, एक विधान और एक उद्देश्य को लेकर जो धर्मानुष्ठान कर रहे हैं उसका प्रतिफल अदृश्य वातावरण के संशोधन में अपना असाधारण योगदान देगा और इसे आज दूरदर्शिता के सहारे जाना जा सकता है कल उसके प्रत्यक्ष परिणाम भी सुखद परिस्थितियों के रूप में सामने होंगे।


नात्मानमवसादयेत्

इतनी अधिक निराशा और अवसाद आखिर किसलिए? यह प्रश्न चिह्न आज के आम इनसान की कहानी बन गयी है। बढ़ते औद्योगीकरण एवं शहरीकरण के फलस्वरूप मेण्टल डिप्रेशन यानि कि मानसिक अवसाद एक व्यापक मानसिक रोग के रूप में उभर रहा है। एक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार प्रति हजार व्यक्तियों में से 16 लोग इस व्याधि से पीड़ित हैं। 8 से 20 प्रतिशत लोग जीवन के विभिन्न मोड़ पर इससे प्रभावित रहते हैं। वैज्ञानिकों को अनुमान है कि 20 से 30 वर्ष की वयस्क आयु में इसे सर्वाधिक देखा जाता है। इसके बाद प्रायः 40 से 50 वर्ष की आयु में इसके प्रभाव में बढ़ोत्तरी दिखाई देती है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ इससे अधिक प्रभावित देखी गयी हैं। एक अध्ययन के अनुसार डाक्टर के पास आने वाले हर तीसरा-चौथा रोगी अवसाद का शिकार होता है। विदेशों में विशेषकर विकसित देशों में यह स्थिति और भी गम्भीर हैं अमेरिका में लगभग दो करोड़ व्यक्ति इसे प्रभावित हैं।

वस्तुतः अवसाद एक तरह की मनोवस्था को व्यक्त करता है। भग्न आशाएँ, उदास, निराश मनःस्थिति इसके प्रमुख लक्षण हैं। जीवन में दुःख, कष्ट, निराशा, असफलता भरी प्रतिकूल एवं विषम परिस्थितियों के दबाव में मन का उदास होना स्वाभाविक है। कभी अपने प्रियजन के निधन पर, तो कभी सम्बन्धी जन से मनमुटाव, कभी परीक्षा में असफलता, तो कभी व्यवसाय में घाटा, कभी प्रेम में निराशा, तो कभी दाम्पत्य सम्बन्धों की उलझनें, कभी पद की-धन की हानि तो कभी लम्बी बीमारी, ऐसी परिस्थितियाँ जीवन को निराश व खिन्नता से भर देती हैं। किन्तु यह अवसाद की स्थिति कुछ समय के लिए ही रहती है। समय के साथ यह अपने आप ठीक हो जाती है। ऐसी परिस्थितियों के अतिरिक्त जीवन में कुछ ऐसे दौर भी आते हैं, जो विषाद को बढ़ावा देते हैं। उदाहरण के लिए, जब व्यक्ति बचपन से किशोरावस्था में प्रवेश करता है या फिर युवावस्था से प्रौढ़ावस्था में आता है अथवा जब व्यक्ति सेवानिवृत्त हो जाता है। इसी तरह महिलाओं में मासिक धर्म से पूर्व तनाव की स्थिति या शिशु जन्म के तुरन्त बाद की स्थिति खिन्नता का कारण बन सकती है। इस तरह की अवस्थाओं पर भी व्यक्ति अन्ततः काबू पा लेता है अथवा ये समय के साथ ठीक हो जाती हैं।

लेकिन जब यह उदासी बिना किसी कारण के मन की गहराइयों में उतर आती है तथा जीवन पर इस कदर छा जाती है कि कुछ अच्छा नहीं लगता, रह जाती। चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा दिखाई देता है। जीवन बोझिल लगता है व जीने की इच्छा नहीं रहती, तब अवसाद रोग के रूप में गम्भीर समस्या बन जाता है। इसका दुष्प्रभाव मन के साथ शरीर पर भी पड़ने लगता है। इसके शारीरिक लक्षणों में भूख न लगना, थकान, नींद न आना, नींद आए तो बुरे स्वप्न दिखना, दुर्बलता, कब्ज, बदहजमी, वजन में लगातार कमी बात चीत न करने का मन, बातचीत में व्यथा का पुट, भीड़ में घबराहट, दिमाग में कंपकंपी व झुनझुनाहट प्रमुख हैं। ऐसा मनोरोगी हमेशा दुःखी रहता है। उसे अकारण घबराहट लगती है, बिना कारण रोने की इच्छा होती है व हर जगह असहज अनुभव करता है। उसमें आत्मविश्वास की नितान्त कमी रहती है। मानसिक लक्षणों में व्यक्ति में नकारात्मक सोच की प्रधानता रहती है। जो धीरे-धीरे व्यक्ति को आत्महत्या की ओर प्रेरित करती है। उचित चिकित्सा के अभाव में आज विश्व में 15 प्रतिशत रोगी आत्महत्या कर लेते हैं।

सामान्य परिस्थितियों में भी मन पर छाए रहने वाले अवसाद को मनोरोग विशेषज्ञ एण्डोजिनस डिप्रेशन अर्थात् आन्तरिक अवसाद की संज्ञा देते हैं। इसका कारण वे मस्तिष्क के सन्देशवाहक रसायन, न्यूरो ट्रांसमीटर्स नाँर एपीनेफरिन या सिरोटोनिन की कमी से यूनीपोलर डिप्रेशन होता है। नशीले पदार्थ व मदिरा का सेवन भी अवसाद का कारण बन सकते हैं। मनः- चिकित्सा विज्ञान के अनुसार नशा भी एक प्रकार का डिप्रेशन का ही रूप हो सकता है। डिप्रेशन के दौरान नशा करने वाले लोगों को अधिक मात्रा में धूम्रपान करते व शराब पीते देखा गया हैं।

कुछ शारीरिक बीमारियाँ भी अवसाद का कारण बन सकती है। जैसे वायरल, छूत के रोग, कैंसर, यकृत शोथ, मस्तिष्क के कुछ रोग, हारमोनल विकार थाइराइड ग्रन्थि का ठीक तरह से न काम कर पाना, लम्बी असाध्य बीमारियों में भी अनायास व्यक्ति गहरे अवसाद से घिर जाता है। कुछ दवाइयाँ भी अवसाद की स्थिति उत्पन्न कर सकती हैं। जैसे रक्तचाप कम करने वाली दवाइयाँ रेसर्पिन और मिथाइल डोपा स्टोराँयड औषधियाँ, गर्भनिरोधक गोलियाँ बार्बीच्यूरेट्स आदि का सेवन शरीर में न्यूरोट्र्न्समीटर की कमी लाकर अवसाद की स्थिति पैदा करता है।

उपचार के तौर पर चिकित्सा विशेषज्ञ एण्डोजिनस डिप्रेशन में उन दवाइयों का सहारा लेते हैं, जो न्यूरोट्र्न्समीटर के सनतुलन को ठीक कर सकें। हालाँकि इस सर्न्दभ में विशेषज्ञ चिकित्सक ही औषधीय परामर्श दे सकते हैं। सामान्यतया ट्र्इसायक्लिक एण्टीडिप्रेसेण्ट दवाइयाँ दी जाती हैं, जो तीन-चार सप्ताह में अपना प्रभाव दिखाती है। इनके अपने साइडइफैक्टस भी हैं, जैसे-आलस्य छा जाना, मुँह सूखना, नींद में, पेशाब में परेशानी, कब्ज, नजर में धुँधलाहट, चक्कर आना आदि। बिना किसी साइडइफैक्ट्स के दवा की खोज करनी हो तो मनश्चिकित्सा विशेषज्ञ भी ध्यान और विधेयात्मक चिन्तन की ही सलाह देते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यदि अवसाद अत्यन्त तीव्र हो और रोगी की प्रवृत्ति आत्महत्या की ओर अधिक हो तो फिर रोगी को अविलम्ब अस्पताल में भरती करना चाहिए। ऐसे में यदि औषधियाँ सन्तोषजनक लाभ नहीं देतीं तो चिकित्सक विद्युत चिकित्सा की सहायता लेते हैं यद्यपि यह उपाय भी सामयिक है। वास्तविक उपाय तो मन की गहराइयों में जाकर अवसाद के कारणों के निकाल फेंकना है।

कतिपय व्यावहारिक उपाय ऐसे हैं जिनसे अवसाद का नियमन आसानी से हो जाता है। उदाहरण के लिए, मन ही मन घुटने की बजाय अच्छा है कि अपनी परेशानियों को व्यक्त किया जाय। इस कार्य के लिए किसी विश्वस्त व समर्थ व्यक्ति का सहारा आवश्यक है, जो उचित परामर्श के साथ सहानुभूति के दो शब्द सुनाकर राहत दे सके। यदि ऐसा व्यक्ति न मिले तो हाथ में कलम या केनवास पर उतार दें। इससे भी मन का गुबार हलका होता है। मानसिक शान्ति मिलती है। मनोवैज्ञानिक भी इस ‘आर्ट थैरेपी’ का अधिकाधिक उपयोग कर रहे हैं।

मध्यम दर्जे के अवसाद में वाताक्षेपी व्यायाम-उदाहरण के तौर पर, तेज साइकिल चलाना, रास्ता कूदना, जागिंग, तेजी से टहलकदमी करना, जीना चढ़ना बहुत सहायक माना गया है। एक ओर इससे जहाँ न्यूरोट्र्समीटर की कमी पूरी होती है, वहीं दूसरी ओर यह मस्तिष्क द्वारा तैयार कुछ रसस्रावों की वृद्धि करता है एक अध्ययन के अनुसार जो महिलाएँ वजन घटाने या उच्च रक्तचाप के नियमन के लिए हलका-फुलका व्यायाम करती रहती हैं उनमें अवसादक लक्षणों का खतरा पचास प्रतिशत घटते देखा गया हैं।

अपने परिवेश के परिवर्तन से भी अवसाद निवारण में सहायता मिल सकती है। ऐसी परिस्थितियों से दूर रहा जाय जो अवसाद को बढ़ावा देती हैं। जीवनशैली में आवश्यक परिवर्तन डिप्रेशन का एक सार्थक ठोस निदान हो सकता है। समय पर सोना, समय पर उठना, विश्राम देना आदि सामान्य उपचार अवसाद के निदान में काफी सहायक सिद्ध हो सकते हैं। अवसादों के विभिन्न स्वरूपों के प्रयास विभिन्न स्तरों पर इसके उपचार के प्रयास अभीष्ट हैं। अवसाद की वजह परिस्थितिजन्य हो या आन्तरिक या कोई अन्य, मूलतः इसका कारण त्रुटिपूर्ण विचार पद्धति है। अपने विचारों के प्रति जागरुकता अपनाकर दृष्टिकोण में अभीष्ट परिवर्तन लाकर हम अवसाद को जड़ से ही मिटा सकते हैं।

डा. डेविड बर्न्स अपनी पुस्तक ‘फीलिंग गुड’ में इसी तथ्य का प्रतिपादन करते हैं कि अवसाद प्रायः दोषपूर्ण विचारों की उपज होता है। वे यह भी बताते हैं कि उदासी अवसाद की अंधकार भरी दुनिया में उलझने वाले विचारों पर नियंत्रण भी सम्भव है। उनके अनुसार नशीली दवाओं की अपेक्षा विचार संयम अवसाद को काबू करने का ठोस एवं प्रभावशाली तरीका है।

डॉक्टर बर्न्स ने संज्ञात्मक चिकित्सा के तीन सिद्धान्त पेश किए हैं-पहला हमारी समूची मनःस्थिति हमारे विचारों या संज्ञा की रचना है। अभी जो हम अनुभव कर रहे हैं उसके पीछे हमारे विचारों का वर्तमान क्रम ही है। दूसरा, अवसाद हम तभी अनुभव करते हैं जब हमारे विचारों में उग्र नकारात्मक सोच हावी होती है। उस क्षण हर वस्तु विवाद में लिपटी नजर आती है और इससे भी बदतर स्थिति वह होती है जब हम कल्पनाजनित विषम परिस्थितियों को भी यथार्थ मान बैठते हैं। तीसरा प्रत्येक अवसादग्रस्त मनोभूमि में नकारात्मक विचार विकृत एवं अतिरंजनापूर्ण होते हैं। अतः हमारी सोच ही हमारे दुःखों का एकमात्र कारण होती हैं।

संज्ञात्मक चिकित्सा में, रोगी को नकारात्मक विचारों को सुनने व उन पर ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। रोगी को पूरा प्रशिक्षण दिया जाता है कि वह विध्वंसात्मक विचार कम उठने की पहचान कर उस पर काबू पाने के लिए क्या कुछ करे? इस तरह गाड़ी तत्काल पटरी पर आने लगती है। इस क्रम से ज्यादातर लोग कुछ सप्ताह में ही अवसाद को जन्म देने वाले विचारों से उबरना शुरू हो जाते हैं।

डॉ. बर्न्स अवसादपूर्ण खिन्नता से राहत के लिए तीन महत्वपूर्ण कदम सुझाते हैं-पहला अपने नकारात्मक भ्रामक विचारों को लिख डालो। नकारात्मक विचारों को कभी भी अपने मन पर हावी मत होने दीजिए। दूसरा उपयुक्त स्वलिखित संज्ञात्मक विकृतियों की सूची पढ़ते रहिए। तीसरा महत्वपूर्ण कदम है-ज्यादा से ज्यादा विधेयात्मक, उद्देश्यपूर्ण एवं वास्तविक विचारों को अधिकाधिक मन में स्थान दिया जाय ताकि वे अवसाद पैदा करने वालो कुविचारों को झुठला सकें। नकारात्मक विचारों के स्थान पर अपना स्थान जमाने योग्य सकारात्मक व उत्प्रेरक विचारों के कुछ उदाहरण।

इस प्रकार से हो सकते है-”आपके भाव यथार्थ नहीं हैं। आपके भावों-मनोभावों का कोई महत्व नहीं है सिवा इसके कि वे आपके विचारों को प्रतिबिम्बित करते हैं। अगर आपके विचार निरर्थक होंगे। आप निराश व हीनता से उत्पन्न अवसाद का मुकाबला कर सकते हैं उन्मूलन किया जाय तो वास्तविक समस्या से निपटने का काम इतना दुःसाध्य नहीं होगा। अपनी उपलब्धियों के आधार पर अपनी कोई मान्यता न बनाएँ। उपलब्धियों पर आधारित आत्म मूल्याँकन भ्रांत व मायावी होता है न कि यथार्थ। आपके व्यक्तित्व का मूल्याँकन धन-प्रतिभा, योग्यता आदि के आधार पर नहीं किया जा सकता। आप अवसादग्रस्त होंगे या मुक्त यह इस बात पर निर्भर है कि आपका अपनी दृष्टि में क्या महत्व है।”

अवसाद की समग्र चिकित्सा का आधारभूत सूत्र है, “स्वयं से प्यार।” आप अपने को पसन्द करना शुरू कर दें तो अवसाद का उपचार शुरू कर दें तो अवसाद का उपचार शुरू हो जाएगा। मानसिक स्थिति बेहतर होने लगेगी। स्वयं से प्यार को इस संकल्प के रूप में लिया जाय कि हमारा जीवन सर्वसमर्थ, अनन्त दयामय प्रभु की देन है। वह हमें बेहद प्यार करता है। परम कारुणिक परमात्मा के प्यार को पाकर बाकी कुछ बचता भी क्या है, जिसके लिए हम स्वयं को अवसादों में डालें। जरा स्वयं से यह पूछ कर देखिए कि यदि कोई विशिष्ट व्यक्ति आपसे मिलने आए, तो क्या आप उसकी कमियों कमियों को उघाड़ेंगे, उन पर चोट करेंगे? निश्चित रूप से बिलकुल नहीं, बल्कि आप उसके लिए सुख-सुविधा का हर सम्भव प्रयत्न करेंगे। उसे भरपूर सम्मान देंगे। तब आप ऐसा स्वयं के लिए क्यों नहीं करते। सर्वसमर्थ भगवान के परमप्रिय आप से अधिक दूसरा विशिष्ट कौन हो सकता है। आप ज्यों ही स्वयं के प्रति प्यार एवं सम्मान का भाव अपनाएँगे, अवसाद का नामोनिशान भी न बचेगा। ध्यान रहे गीता का सूत्र-नात्मानमवसादयेत्। स्वयं को अवसाद में मत डालो।


सफल दाम्पत्य जीवन के कुछ व्यावहारिक सत्य

किसी के पास विश्वविद्यालय की बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ हों, प्रतिभा हो, योग्यता हो तो वह ज्ञान दाम्पत्य जीवन की सफलता में कोई विशेष योगदान देगा, यह आशा करना व्यर्थ है। कई ऐसे व्यक्ति भी अपने दाम्पत्य जीवन में असफल होते देखे जाते हैं। यद्यपि वे ज्ञान, शिक्षा की दिशा में प्रगति के चरम सोपानों पर पहुँच चुके होते हैं। वस्तुतः व्यावहारिक का अभाव ही वह कारण है, जो इस कटु परिणति के रूप में निकलता है।

पति-पत्नी के बीच जो अपनेपन का भाव होता है, वह प्रायः पारस्परिक शिष्टाचार व औपचारिकता को विस्मृत कर देता है। यह कुछ दंपत्तियों के लिए जिनके बीच गहरी समझ और रुचि, स्वभाव का साम्य उत्पन्न हो गया हो के लिए तो ठीक हो भी सकता है, किन्तु इससे पूर्व की स्थिति में शिष्टाचार व औपचारिकता का यथासाध्य निर्वाह अच्छा रहता है। सभी इसका पालन करें तो लाभ भी लाभ होगा, हानि होने की सम्भावना नहीं है। कभी-कभी शिष्टाचार व औपचारिकता का अभाव दूसरे लोगों के सामने पति-पत्नी के अपमानित-सा होने की अशोभन स्थिति उत्पन्न कर देता है। एक पक्ष अपने को आहत-अपमानित समझने लगता है जबकि संभव है, दूसरे ने यह सब बिना सोचे कहा हो। जैसे मित्रों के सामने पत्नी के मैके वालों के सम्बन्ध में कोई ऐसी बात कह देने पर उसे वैसा ही अनुभव होता है। इसलिए अपनत्व का भाव तो रहे पर उसके साथ जो अधिकार व अद्वैत का भाव आ जाता है उसकी अति न हो जाय, इसके लिए शिष्टाचार व औपचारिकता का पालन ठीक ही रहता है।

कई व्यक्ति अपने मित्रों के साथ वार्तालाप करते समय भी कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग करते देखे जाते हैं, जो शिष्टता की सीमा में नहीं आते। वैसा ही कुछ पत्नी के साथ भी कुछ व्यक्ति व्यवहार करते हैं वे समझते हैं कि यह उनकी अभिन्नता की अभिव्यक्ति है। हमारे बीच कोई परायापन नहीं, यह सोचकर उस औचित्य को स्वीकारते हैं, पर कभी-कभी यह अनुचित भी हो जाता है। घर में, अकेले में, पत्नी को प्यार से कुछ ऐसे सम्बोधन से पुकारा जाना या बातों में वैसा कह देना तो उसे अखरेगा नहीं, पर स्वभाववश बाजार में या कई अपरिचितों के सामने वैसी बात मुँह से निकल जाने पर स्वयं पति को भी लज्जित होना पड़ता है और पत्नी को भी। पत्नी की ओर से भी ऐसी ही भूलें हो सकती हैं। समय व स्थिति को देखे बिना पति पर हुकुम चलाना प्रायः बुरा लग जाता है। यदि ऐसी आदत ही न डाली जाय तो ऐसी स्थिति से बचा जा सकता है, जो पति-पत्नी के सम्बन्धों के बीच लकीरें खींचती हैं।

कटुभाषण और गाली-गलौच, कलह आदि से दम्पत्तियों को बचना आवश्यक है। यह बात सही है कि जहाँ दो बर्तन होंगे तो वे भी एक दूसरे से टकराकर आवाज पैदा करेंगे तो पति-पत्नी के बीच भी वैसे प्रसंग आ सकते हैं। जहाँ एक दूसरे की भूलों को, अनुचित व्यवहार को उसे बताना जरूरी हो जाता है किन्तु उनका ढंग सदा शिष्ट और सौजन्यपूर्ण होगा। घर की यह बात बाहर नहीं जाये इसका ध्यान रखना ही चाहिए। मार-पीट जैसी महामूर्खतापूर्ण बात तो होनी ही नहीं चाहिए। किसी पक्ष को दूसरे से नाराजगी है तो उसे बोल-चाल बंद करके, खाना छोड़कर या अन्य तरीकों से भी अभिव्यक्त किया जा सकता है।

कोई ऐसा जोड़ा हो जिसमें पति किसी बात पर आवेशग्रस्त होकर पत्नी पर हाथ उठा बैठे, तो उसमें पति तो महादोषी है ही। विवाह के बंधन कुछ ऐसे अटूट होते हैं कि उनसे मुक्ति सम्भव नहीं हो सकती, फिर ऊपर से बच्चे-बच्चियाँ भी आ जाते हैं, ऐसी स्थिति में पत्नी को मन मार कर साथ रहना और अपमान के कड़वे घूंट पीकर चुप रह जाना पड़ता है। किन्तु पत्नी यह सोचने का प्रयास करे कि पति ऐसा क्रूर क्यों हो जाता हैं? क्या उन कारणों को वह दूर कर सकती है? यदि इन प्रश्नों का उत्तर हाँ में मिलता है तो उसे उदास या जिन्दगी से बेजान होने की अपेक्षा उन कारणों को दूर करना ही चाहिए। कोई भी व्यक्ति भीतर से वैसा क्रूर नहीं होता, अतः पत्नी के ये प्रयास धैर्यपूर्वक चलते रहे तो उसकी खोयी खुशियाँ पुनः देर-सबेर मिल ही जाएँगी। यह मार्ग अपनाने की बजाय यदि उसका ढिंढोरा पीटना आरम्भ कर दें तो परिणाम प्रायः अच्छा नहीं निकलता।

पति द्वारा हाथ चला देना हर स्थिति में निन्दनीय है, पर इसका समाधान खोजा जाना चाहिए, न कि इसका प्रचार कर गृहस्थ संस्था का अपमान। यदा-कदा एक दूसरे से संतुष्ट दंपत्तियों के बीच भी किसी बात को लेकर अप्रिय प्रसंग आ जाते हैं। उन्हें टालना तो ठीक रहता है पर वे क्यों उत्पन्न हुए और भविष्य में ऐसे प्रसंग न आयें। उसका कोई स्थायी हल अपने विचार, स्वभाव, व्यवहार में सुधार करके लाया जाना अच्छा रहता है। उसे यों ही टाल दिया जाय तो फिर वैसा ही प्रसंग आ सकता है। बार-बार वैसे प्रसंग आने पर सम्बन्धों में दरार भी उत्पन्न हो सकती है।

स्त्रियाँ ममता, सेवा, त्याग, सहनशीलता और समर्पण की देवियाँ होती हैं और पुरुष, दृढ़ता, रुक्षता व बुद्धि प्रधान होता है। यह सामान्य वर्गीकरण स्त्री वर्ग और पुरुष वर्ग पर तो लागू होता है, किन्तु यदि कोई पति अपनी पत्नी से स्त्री वर्ग में पाये जाने वाले इन सामान्य तत्वों की अपेक्षा करे या पत्नी अपने पति का वैसा ही स्वरूप समझे जो सामान्य पुरुष वर्ग का होता है, तो उनके जीवन में असंतोष का उत्पन्न हो जाना अधिक सम्भव होता है, क्योंकि सभी पुरुष एक से नहीं होते, सभी स्त्रियाँ एक सी नहीं होतीं। इसकी अपेक्षा सहधर्मी जैसा भी है उसे समझ कर स्वीकार करना ही संतोष का हेतु बनता है।

पति-पत्नी के प्रेम रूपी वृक्ष की जड़ें विश्वास की उर्वर और गहरी भूमि में जिस प्रकार बढ़ती हैं, उसी प्रकार उसका कलेवर भी बढ़ता जाता है। पति-पत्नी को परस्पर विश्वासी होना चाहिए। किसी भी शंका पर, दूसरों की कही-सुनी बातों पर विश्वास करने की अपेक्षा सीधे-सीधे एक-दूसरे से पूछ लेना चाहिए। पति-पत्नी दोनों ही एक दूसरे के उस विश्वास की रक्षा अवश्य करें। वकील की तरह किसी बात पर एक-दूसरे से जिरह करने की अपेक्षा संयत रहना कहीं ज्यादा अच्छा होता है ईर्ष्या दाम्पत्य रूपी वृक्ष की जड़ों के नीचे आ जाने वाली चट्टान का काम करती है। उससे बचने का सबसे बड़ा उपाय विश्वास ही है। ईर्ष्या मनोमालिन्य उपजाती हैं और विश्वास उसे दूर करता है।

रुपये-पैसे के मामले में पति-पत्नी के बीच कोई दुराव-छिपाव रहना ठीक नहीं होता। जो पति अपनी आय और उसके स्त्रोत से पत्नियों को अनभिज्ञ रखते हैं वे भूल करते हैं। जो यह मानते हैं कि यह उनका निजी मामला है वे गलती करते हैं। यह ठीक है कि घर की भीतरी व्यवस्था का दायित्व सामान्य रूप से पत्नी के हाथ होता है और उपार्जन आदि बाहरी कामों का सूत्र-संचालन पति करता है। दोनों अपने क्षेत्र में पूरी तरह स्वतंत्र हैं, पर एक दूसरे को इस बात का ज्ञान होना ही चाहिए कि परिवार की आय का स्त्रोत क्या है और कितना है। वह किस प्रकार खर्च होता हैं?

पति द्वारा अपनी आय का पूरा ब्यौरा दे देने से पत्नी के लिये तद्नुरूप ही गृह-संचालन करने की सुविधा करने की सुविधा उत्पन्न हो जाती है। यह बात दूसरी है कि पत्नी अपनी दूरदर्शिता से आड़े वक्त के लिए कुछ पैसे बचाकर जोड़ती रहती है। अच्छा यह रहता है कि पति-पत्नी ही नहीं परिवार के सब सदस्य मिलकर परिवार का बजट बनाएँ। उससे एक तो यह लाभ होगा कि सभी को पता लगेगा कि “हमें अपनी सौर जितने ही पाँव पसारने हैं।” दूसरे उन्हें अपने महत्व का भी अपनी भूमिका पूरी तरह समझ लेंगे।

जहाँ पति-पत्नी दोनों कमाते हों, वहाँ भी यह बात लागू होती रहे तो अच्छा है। अनुभवियों का कहना है कि जहाँ पति भी कमाता है और पत्नी भी कमाती है, वहाँ व्यय को लेकर अधिक मतभेद खड़े होते हैं। अतः इस सम्बन्ध में सावधानी बरतना ही ठीक रहता है। आय-व्यय का बजट सावधानी व सूझबूझ से बनाना चाहिए।

अमेरिकन मदर्स कमेटी की अध्यक्षा श्रीमती लिलियन डी पोलिंग का अपना मत हैं- मैं मानती हूँ हर परिवार को अपनी आय का दसवाँ हिस्सा परोपकार व समाजसेवी कार्यों में व्यय करना चाहिए। अधिकाँश दम्पत्ति यह कहेंगे कि वे इतने सम्पन्न नहीं हैं। लेकिन जब आप अपनी आय का कुछ हिस्सा इस तरह परोपकार के लिए अलग रखने लगेंगे तो आप देखेंगे कि वास्तव में आपके हाथ उतने तंग नहीं हैं जितना कि आप अब तक समझते थे। अजीब-सा लगे, किन्तु इसकी सच्चाई को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। मन की गरीबी आदमी को गरीब ही बनाये रखती है। जब अपनी आय का एक निश्चित अंश ऐसे कामों के लिए निकाला जाएगा तो पति-पत्नी एक अनूठे आनन्द, अनुपम आत्मसंतोष से आप्लावित हो उठेंगे।

ऐसी ही एक व्यावहारिक अनुभव सिद्ध राय उन्होंने महिलाओं को दी हैं- वास्तविक में विवाह साझेदारी है। इसमें लेना भी होता है और देना भी। सच मानिये तीन-चौथाई देना पत्नी के ही हिस्से में पड़ता है। मैं यह नहीं कहती कि पत्नी को पति के सही-गलत सब निर्णय चुपचाप स्वीकार कर लेने चाहिए। लेकिन झुकने में कोई नुकसान नहीं होता, बल्कि झुकना एक बहुत अच्छी कसरत है। इससे शरीर लचीला बना रहता है और नैतिक और आत्मिक शक्ति बढ़ती है।

अमेरिका जैसे देश जहाँ। ‘विमेन लिब’ जैसे आँदोलन भी हुए है, की एक मातृ संस्था की अध्यक्षा और अनुभवी महिला का यह सुझाव कहाँ तक युक्तिसंगत है। यह सब दंपत्तियों के लिये व्यावहारिक हो, यह तो कहा नहीं जा सकता। फिर भी पत्नी को ही तीन-चौथाई देना पड़ता है। उनका सुझाव भी उपयोगी है यह तो मानना ही पड़ेगा।

अपने वैवाहिक जीवन पर असंतोष और अपने जीवन-सहचर की अन्यों से तुलना, तत्संबंधी अपनी निराशा एक-दूसरे के सम्मुख प्रदर्शित करना उस असंतोष को और भी गहरा और निराशा को तीव्र बना देता है।

यह अच्छा दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता। दुनिया में एक से एक अच्छे, सुन्दर, योग्य, सम्पन्न तथा व्यवहार कुशल स्त्री-पुरुष हैं। यदि उनमें से किसी एक के साथ मेरा सम्बन्ध जुड़ा होता तो मेरा जीवन कितना सुन्दर, सुखद और सफल होता यह सोचना मनुष्य को तोड़कर रख देता है। मैं किसके पल्ले पड़ गयी या मेरे गले कैसी रस्सी पड़ गयी। यह रोना कुछ अर्थ नहीं रखता। उस स्थिति से उबरने का एक ही मार्ग है और वह है स्वयं सतत् प्रयत्नशीलता और आशावादी बने रहना।

पति-पत्नी के बीच शारीरिक, मानसिक आकर्षण का बना रहना दाम्पत्य की सफलता का एक आवश्यक आधार है। आकर्षण का मूल सौंदर्य है। सौंदर्य सभी स्त्री-पुरुषों को मिला होता है यह कहना जितना गलत है उतना ही सही भी है। सच बात तो यह है कि प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक बनावट में कहीं न कहीं, कुछ न कुछ सौंदर्य होता ही है। सुन्दर कहे जाने वालों में भी कही न कहीं असुन्दरता दिखाई पड़ ही जाती है और असुन्दर माने जाने वालों में भी कहीं न कहीं सौंदर्य होता है। पारस्परिक आकर्षण बंधन के लिए शारीरिक सौंदर्य का वह उजला पक्ष ही सही ढंग से दिखाया जाय जो आँतरिक सौंदर्य के रूप में है, तो वही आकर्षण जन्म ले लेता है। महत्वपूर्ण होता है प्रस्तुतीकरण का ढंग और देखने वाले का पारखीपन। पति-पत्नी यदि उस दृष्टि को उपजा सके तो वे दुनिया की निगाह में भले ही अनाकर्षक हों उनकी अपनी ओर एक दूसरे की निगाहों में तो आकर्षक बन ही जाते हैं। बाहरी आकर्षण की उपयोगिता यही तक है।

शरीर की तरह मन का भी वैसा ही आकर्षण उत्पन्न किया जा सकता है। यह मानसिक आकर्षण शारीरिक आकर्षण से कई गुना महत्वपूर्ण और प्रभावी होता है। शृंगार, आभूषण, मेकअप, भड़कीले वस्त्र आदि बनावटी चमक तो उत्पन्न कर सकते हैं, किन्तु स्थायी आकर्षण सादगी, सुरुचि-सम्पन्नता, उत्तम स्वास्थ्य व स्वच्छता में ही निवास करता है। प्रसन्नता, मदुर व्यवहार, उल्लास, विनोदप्रियता आदि ऐसे गुण हैं जो मानसिक आकर्षण को उपजाते हैं और स्थायी बनाते हैं।

प्रयास यह किया जाय कि पति-पत्नी शरीर व मन से एक दूसरे में आकर्षण के बिन्दु ढूँढ़ें एवं एक संतुलित जीवन जीने की नीति अपनाये तो हर घर एक स्वर्ग एवं गृहस्थ एक तपोवन जैसा बन सकता है थोड़ी-सी गुणों की साधना भी टूटते दाम्पत्य को जोड़ सकती हैं। यह साधना दोनोँ ही पक्षों को करनी चाहिए।


अतिथि, कृपया इन मर्यादाओं को समझें

इन दिनों छुट्टियाँ हैं, अतिथि अक्सर ऐसे ही दिनों बाहर निकलते हैं। कुछ व्यावहारिक सूत्र यहाँ जीवन-साधना के ऐसे विषय पर दिये जा रहे हैं जो प्रायः उपेक्षित रहता है।

अतिथि-सत्कार पारिवारिक जीवन का एक महत्वपूर्ण व्यवहार है। हमारे देश में इसको बहुत अधिक गरिमा दी गई हैं। परिवर्तित वातावरण में इसका प्राचीन स्वरूप यथावत् तो रह नहीं सकता, तो भी परिवारों में अतिथि के आने या स्वयं कहीं अतिथि बनकर जाने के प्रसंग आते ही रहते हैं। इसलिए दोनों पक्षों को कुछ मर्यादाओं को ध्यान में रखना तथा उन्हें निभाना आवश्यकता है। आतिथेय की भूमिका अतिथि के आने पर ही प्रारम्भ होती है। अतः सर्वप्रथम अतिथि के व्यवहार पर ही विचार आवश्यक है।

बिना आमन्त्रण के कहीं भी अतिथि बनकर जा पहुँचना उचित नहीं, भले ही रिश्तेदार का घर हो या मित्र का। कभी किसी आवश्यक कार्यवश कहीं जाना पड़े तो इसका विचार अवश्य कर लेना चाहिए कि जहाँ। जिस काम से जा रहे हैं, क्या वह अन्यत्र ठहरकर भली-भाँति किया सकता हैं? बहुत से लोग आजीविका सम्बन्धी कार्य से उस शहर-कस्बे में जाने पर भी मित्रों-रिश्तेदारों के घर टिकना और भत्ता बचाना चतुरता मान बैठते हैं, तो कुछ अन्य लोग मौज-मनोरंजन का अपना कार्यक्रम स्वतः ही बनाकर अतिथेय से परामर्श-स्वीकृति सब अनुचित है। ऐसी स्थितियों में पत्र द्वारा ठहरने आदि की अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है।

दूसरा विचार इस बात का करना चाहिए कि जहाँ अतिथि बनकर ठहरने का विचार कर रहे हैं, वहाँ अपने कार्य एवं विचार कर रहे हैं, वहाँ अपने कार्य एवं अपनी मनः स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला कोई वातावरण तो नहीं हो सकता? यदि वहाँ पहुँचने पर समय पर तैयार ही न सके, मन प्रसन्न ही न रह सका, तो कार्य पर इनका प्रभाव पड़ेगा। अतिथेय के यहाँ पानी का अभाव, शौचालय की अव्यवस्था जैसे कई कारण हो सकते हैं, जिससे आप अपने स्वभाव एवं कार्य के अनुकूल समय पर तैयारी न कर पाएँ। अतिथि को सुबह उठने की आदत है और ठहरा दिया गया है एक कोने में स्थित कमरे में। आतिथेय का परिवार देर तक सोने का अभ्यस्त है और इस आश्वासन के बाद भी कि उनमें से अमुक सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि को जाने वाले रास्ते के किवाड़ आदि खोल देगा, आदत से लाचार दिन चढ़े तक सो ही रहा है, तब क्या स्थिति होगी? खीझ, झुंझलाहट या परेशानी ही तो मिलेगी। क्या यह अधिक अच्छा न होता कि कहीं होटल-सराय-धर्मशाला में ठहरकर समय पर तैयार हो जाते, अपना काम करते। फिर समय मिलने पर वहाँ भी हो आते, जिनके यहाँ रिश्ते या मैत्री के कारण अतिथि बनकर जाने की योजना बनाई जाती है।

कोशिश यही की जानी चाहिए कि अपने कार्यवश कहीं जाना पड़े तो परिचित या रिश्तेदार के घर न रुककर स्वयं के ठहरने की व्यवस्था अन्यत्र करें। अनचाहे मेहमान बनकर कहीं भी न जा धमके। चाहे कितना भी निकट का रिश्ता हो या घनिष्ठ मैत्री हो। देवी सती की कथा इस संदर्भ में स्मरण कर लेनी चाहिए। वे अपने पिता दक्ष प्रजापति के यहाँ अनचाहे अतिथि के रूप में जा पहुँची थीं। इस कारण वहाँ के उपेक्षा भरे वातावरण की कचोट से उन्हें पश्चाताप की अग्नि में जलना पड़ा।

जहाँ अतिथि बनकर रहे हैं, उनसे घनिष्ठता-सद्भावना होना ही पर्याप्त नहीं। यह आर्थिक संकट का युग है। ऐसा भी हो सकता है कि निश्छल सद्भाव होने पर भी आतिथेय आर्थिक विवशता के कारण आतिथ्य सत्कार में असमर्थ हो। अतः इन सब बातों का विचार करने के बाद ही किसी के यहाँ अतिथि बनकर जाने की तैयारी करनी चाहिए।

यदि स्थिति अनुकूल हो और बहुत घनिष्ठता हो तो अपने पहुँचने की सूचना पत्र द्वारा देते हुए वहाँ पहुँचने की सूचना पत्र द्वारा देते हुए वहाँ पहुँचने का, गाड़ी आदि का समय भी लिखा देना चाहिए, ताकि आतिथेय स्वागत के लिये पहुँच सकें।

बिना पूर्व सूचना के सदल-बल, पत्नी, बच्चों समेत किसी के घर जा धमकना हर प्रकार से अनुचित है। यह आतिथेय के साथ अन्याय है। वह सदाशयी होते हुए भी यदि इस आकस्मिक स्थिति में समुचित व्यवस्था न जुटा पाया तो व्यर्थ ही परेशान होगा, झुँझलाएगा अथवा लज्जित होगा। इससे सम्बन्धों में तनाव आयेगा।

आतिथेय की भी इस संदर्भ में समान जिम्मेदारी है। जब अपना मित्र या परिजन आने-ठहरने के लिए पत्राचार द्वारा पूछता है, उस समय अपनी स्थिति विनम्र किन्तु स्पष्ट शब्दों में लिख देनी चाहिए। यदि घर में स्थान नहीं हैं, इच्छा नहीं है या वातावरण नहीं है, तो अतिथि टिकने के बाद तंग होगा, परेशान होगा इससे अधिक अच्छा है कि पहले ही अतिथि को घर पर न टिकाकर होटल आदि में टिकाने का बन्दोबस्त कर लिया जाय। यदि अपनी आर्थिक स्थिति उस समय अनुकूल नहीं है, तो पत्र में ही वैसा स्पष्ट कर देना चाहिए। अतिथि जब घर आकर ठहरेंगे, तब तो उन्हें घर की स्थिति का आभास ही हो जाएगा। अतः शुरू में ही अनावश्यक संकोच न किया जाय।

जब अतिथि आएँ उस समय, यदि हो सके और सूचना हो, तो आतिथेय को स्टेशन, बस स्टेण्ड पहुँचना चाहिए। इससे आतिथेय की प्रसन्नता और उत्साह प्रकट होगा तथा अतिथि अपने आने की अनुकूल प्रतिक्रिया देखकर आनन्दित होगा।

स्वागत-सत्कार में आडम्बर-प्रदर्शन हर प्रकार से हानिकर है। जैसी अपनी स्थिति है, वैसा ही सत्कार करना चाहिए। स्वादिष्ट व्यंजनों और महँगे मनोरंजनों द्वारा सत्कार की प्रवृत्ति अनुचित है। इनसे कोई अच्छा परिणाम भी नहीं निकलता। यदि अतिथि अपना सच्चा हितैषी है, तो वह स्पष्टतः ऐसे अनाप-शनाप खर्चा का सच्चे मन से विरोध करेगा। न मानने पर उसे मानसिक कष्ट होगा। यदि अतिथि कोई ऐसे रिश्तेदार हैं, जो अपने ताम−झाम भरे स्वागत के, सेवा के इच्छुक हैं, तब तो फिजूलखर्ची और भी न करनी चाहिए। क्योंकि ऐसे लोगों को अपने स्वागत की भूख मिटती नहीं, चाहे मेजबान कर्ज लेकर भी उनकी बढ़िया आवभगत करे। उन्हें तो अन्ततः टीका-टिप्पणी करनी है। दूसरी जगह हुए अपने किसी वास्तविक या काल्पनिक सत्कार से इस स्वागत की तुलना कर मेजबान को नीचा दिखाना ही है। ऐसे लोगों पर अनावश्यक बोझ सहकर खर्च करना बेकार है।

मेहमानों की संख्या एवं प्रकृति अनुरूप उनकी व्यवस्था करनी चाहिए। उनमें आतिथेय को पूरी रुचि लेनी चाहिए। उनके लिए व्यर्थ की भागदौड़ तो अनावश्यक है, किन्तु सहज-शाँति एवं सजग भाग से उनकी सुख-सुविधाओं का पूरा-पूरा ध्यान रखना आवश्यक है, ताकि उन्हें यहाँ भी घर जैसा अपनत्व अनुभव में आए। प्रसन्न रहें। उनके समुचित मनोरंजन की व्यवस्था भी करनी चाहिए। इसी क्रम में आतिथेय के परिवार का मनोरंजन भी हो जाएगा और स्वागत भी कहलाया जाएगा। दूसरी ओर अतिथि का कर्त्तव्य यह है कि उन्हें इस बात का ध्यान रहे कि उनके कारण आतिथेय का दैनिक कार्यक्रम अस्त-व्यस्त न हो। वे अपना दैनन्दिन काम सुचारु रूप से करने के बाद शेष समय ही अतिथि के साथ-साथ बिताएँ, इसका अतिथि को स्वयं ही ध्यान रखना चाहिए तथा आग्रह करना चाहिए। आतिथेय के कार्यक्रमों में अव्यवस्था पैदा करने वाला अतिथि भार जैसा प्रतीत हो सकता है।

अपने लिए किसी अतिथि या विशेष व्यवस्था का स्वयं तो कदापि आग्रह नहीं ही करना चाहिए। पूछने पर भी, जो आवश्यक हो, वही व्यवस्था बनाएँ। यही शालीनता का आग्रह है।

बच्चे, बूढ़े और बीमार लोगों को साथ लेकर कहीं मेहमान नहीं बनना चाहिए। बीमार को साथ ले जाएँ तो अन्य, रुकने की व्यवस्था करें। बच्चे अधिक हों या बहुत ज्यादा बूढ़े हो चुके बुजुर्ग हों तब भी ऐसा ही करें।

छोटा बच्चा साथ ले जाएँ, तब उसकी आवश्यक वस्तुएँ स्वयं ही साथ ले जाएँ। आतिथेय के यहाँ यदि छोटे बच्चे न मिलेगी। ऐसे सामान स्वयं के ही साथ रखना चाहिए। तौलिया, कंघी जैसी आवश्यक वस्तुएँ और विस्तार अतिथि को अपने साथ लेकर ही चलना चाहिए। आतिथेय के यहाँ टूथब्रश आदि माँगते फिरना अच्छा नहीं लगता है। फिर वे नया ब्रुश खरीद कर लाएँ, तब तो बात बने। अतिथि द्वारा ऋतु अनुकूल बिस्तर साथ न रखने पर भी आतिथेय को भारी असुविधा हो सकती है।

रुकने पर अपनी दिनचर्या ऐसी बनानी चाहिए कि जिससे आतिथेय की झंझटें न बढ़े। छोटे बच्चों को बिना मोमजामा और चादर बिछाए आतिथेय के बिस्तर पर न लिटा दें अन्यथा मलमूत्र से वह बिस्तर गन्दा हो जाएगा और झेंप की स्थिति आ जाएगी। अपने बच्चे आतिथेय के घर तोड़-फोड़ न करें, इसका ध्यान रखना भी अतिथि का ही कर्त्तव्य है अन्यथा बच्चे स्वाभाविक उत्सुकतावश चीजों को उलट-पुलट, अस्त-व्यस्त कर देंगे। कुछ वयस्क अतिथि भी आतिथेय की वे वस्तुएँ जिनसे सम्बन्ध नहीं, छूने, उलटने-पलटने में या कागजात आदि उठाने-देखने में नहीं झिझकते। यह अभद्रता है। आतिथेय के घर पर आप जासूसी करने नहीं गये हैं। वहाँ शीलयुक्त संकोच आवश्यक है। मुक्त व्यवहार से आशय आत्मीयता से है। आतिथेय यह कहेगा ही कि यह तो आपका ही घर है, पर सचमुच उसे पूरी तरह अपना मानकर ताक-झाँक, हटाना-खोजना शुरू न कर दें, अन्यथा स्नेह सम्बन्ध विकृत ही होंगे। हाँ आतिथेय के घरेलू कार्यों में सोत्साह पूरा हाथ बँटाना चाहिए। यदि अतिथि महिला है तो उन्हें रसोई-चौके, साफ-सफाई में पूरा सहयोग देना चाहिए। पुरुष बाहर के कार्यों में यथासम्भव सहयोग दें। आवश्यकता से अधिक कभी नहीं ठहरना चाहिए। अतिथि जितने कम समय रहेगा ओर जितना उत्तम व्यवहार करेगा, परस्पर आकर्षण उतना ही बना रहेगा और बढ़ेगा।

उभयपक्ष के व्यवहार में मृदुता, शिष्टता, खुलापन तो हो, लेकिन अपने घर का दुःखड़ा लेकर नहीं बैठ जाना चाहिए। जिनके बीच अति प्रगाढ़ सम्बन्ध हैं, उनमें ही ऐसी चर्चाएँ ठीक होती हैं। अन्यथा अधिक निजी व्यथा कथा दूसरे पक्ष को उकता देती है। साथ ही बाद में कभी उपहास का भी आधार बन सकती हैं। “रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोप।” इस दोहे को सदा स्मरण रखना चाहिए।

निजी चर्चा के दौरान सामयिक, सामाजिक-राजनैतिक प्रश्न भी अनायास आ जाते हैं। उस समय अपनी राय संयमित ढंग से ही दें तथा अपना मत लादने-थोपने का प्रयास कदापि न करें अन्यथा “सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठमलट्ठ” वाली स्थिति उपस्थित हो जाती है और आकाश ही सम्बन्धों में तिक्तता आ जाती है। जाते समय आतिथेय के प्रति आभार एवं कृतज्ञता की अभिव्यक्ति अतिथि का कर्त्तव्य हैं इससे परस्पर मधुरता तथा सद्भाव में वृद्धि होती है।


पाखण्ड (Kahani)

मरणासन्न डार्विन को जब थोड़ा होश आया तो उसने अपनी बेटी से कहा-बेटी! मैं नहीं जानता कि परलोक होता भी है या नहीं, लेकिन यदि परलोक कहीं होता होगा तो मैं उसके द्वार पर खड़ा रहूँगा और इन पाखण्डियों को स्वर्ग में प्रवेश करने से रोकूँगा, अन्यथा ये लोग इस लोक की तरह परलोक में भी पाखण्ड फैलाए बिना न रहेंगे।


विधि का विधान अटल है रे भाई

क्या है विधि का विधान? सायंकालीन भ्रमण के समय महाराज जयवर्धन अपने महामात्य से अचानक पूछ बैठे। शाम की शीतल बयार उनके मन की तरंगों को हौले-से गति दे रही थी। एक आम्रकुंज बालादित्य को सम्बोधित करते हुए कहने लगे, “मंत्रिवर, क्या विधि के विधान में कोई तर्क है, जो यह बता सके कि मैं राजा क्यों हूँ और आप मंत्री क्यों हैं?”

“महाराज, स्रष्टा की विधि-व्यवस्था उद्देश्यपूर्ण है। सृष्टि में कहीं कोई संयोग नहीं है। सभी कुछ यहाँ कर्मफल के सुनिश्चित विधान से अनुशासित हैं।” बालादित्य ने उत्तर दिया।” इसलिए कोई राजा क्यों बना और कोई मंत्री क्यों इसका कोई न कोई कारण अवश्य होगा।”

“वही तो मैं जानना चाहता हूँ।” राजा के स्वर में आतुरता की अकुलाहट थी।

“महाराज, आपके सवालों का उत्तर तो कोई भूत-भविष्य को जानने वाला, वर्तमान के सत्य से परिचित कोई त्रिकालदर्शी ही बता सकता है।” महामात्य ने सुझाव दिया।

“ऐसा त्रिकालदर्शी सिद्ध पुरुष कौन हैं?”

“महायोगी सरपहा।”

“आमात्यवर, हम उनके दर्शन करके अपनी जिज्ञासा शान्त करना चाहते हैं।” जयवर्धन उतावले स्वर में बोले।

“उनके दर्शनों के लिए हमें साल वन की यात्रा करनी पड़ेगी। महासिद्ध वहाँ एक कुटिया में रहते हैं।”

“बहुत अच्छा, हम कल वहाँ चलेंगे।” महाराज जयवर्धन अपनी जिज्ञासा का समाधान अतिशीघ्र ढूँढ़ लेना चाहते थे।

दूसरे दिन सुबह महाराज और महामात्य दोनों अपने-अपने घोड़े पर सवार होकर वन की ओर चल पड़े और दोपहर के समय बीहड़ जंगल में स्थित योगीराज की कुटिया पर पहुँच गए। महायोगी के तेजस्वी मुख को देख राजा जयवर्धन ने श्रद्धावनत हो उन्हें प्रणाम किया।

योगीराज ने अपनी मधुर वाणी में उन्हें आशीर्वाद दिया आसन ग्रहण करने का संकेत दिया। जंगल के मीठे फलों से उनकी आव-भगत करते हुए उन्होंने राजा से वहाँ आने का कारण पूछा।

“प्रभु! मेरे मन में विधि के विधान के रहस्य को जानने की उत्सुकता है। बार-बार मेरे मन में यह सवाल गूँजता है, मैं राजा क्यों बना?” महाराज जयवर्धन ने अपने मन की बात निवेदित कर दी।

“ठीक है राजन्, आप इतने उत्सुक हैं तो मैं बताता हूँ-आप यहाँ से दक्षिण दिशा में बीस कोस की यात्रा करें। आपको वहाँ एक आदमी मिलेगा, जो कंकड़-पत्थर खा रहा होगा। वह आपके प्रश्न का उत्तर देगा।” योगीराज ने राजा को समझाते हुए कहा। उनकी यह बात सुनकर महाराज जयवर्धन अचरज में पड़ गए। कंकड़-पत्थर खाने वाले आदमी के बारे में सोचते हुए उन्होंने रात्रि में वहीं पर विश्राम किया और दूसरे दिन मंत्री को साथ लेकर दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े। बीस कोस की यात्रा के पश्चात् उन्हें सामने बंजर धरती दिखाई दी। जब वे पास पहुँचे तो उन्होंने देखा कि उस बंजर जमीन के किनारे एक आदमी बैठा हुआ है और कंकड़-पत्थर खाए जा रहा है। उस आदमी का शरीर हड्डियों का पिंजर मात्र था। परन्तु वह कंकड़-पत्थरों को चबाए जा रहा था और चुभने के कारण मुंह से खून बह रहा था।

राजा विस्मित होकर कुछ पल तक उसे देखते रहे। फिर उन्होंने उस आदमी से पूछा-”तुम कंकड़-पत्थर क्यों खा रहे हों?”

“महाराज, मैं आपके प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकता।” मुँह से बहते खून को पोछते हुए वह आदमी बोला,”यहाँ से बीस कोस दक्षिण में एक आदमी रहता है, जो मिट्टी खाता है, वह आपके सवालों के उत्तर देने में सक्षम है।” इतना कहकर वह चुप हो गया और मुँह फेरकर फिर से कंकड़-पत्थर खाने लगा।

राजा ने वह रात पास के एक गाँव में गुजारी और दूसरे दिन मंत्री को साथ लेकर अपनी यात्रा करने के पश्चात् उन्हें जंगल में एक जगह मिट्टी का ढेर दिखाई दिया। जब राजा और मंत्री उस मिट्टी के ढेर के पास पहुँचे तो यह देखकर उनके आश्चर्य की सीमा न रही कि एक आदमी मिट्टी खाकर अपनी भूख मिटाने का प्रयास कर रहा है। लगातार मिट्टी खाकर जीने से उसका शरीर सूखकर काँटा हो गया था, बड़ा’-सा पेट निकल आया था। उसका चेहरा एकदम जर्द पीला पड़ गया था।

“तुम यह मिट्टी क्यों खा रहे हो? क्या तुम्हारे पास खाने को कुछ नहीं है।” राजा ने उसकी असहनीय पीड़ा पर दया दिखाते हुए बड़े ही कोमल स्वर में पूछा।

“राजन्! आपके प्रश्नों के उत्तर मैं नहीं दे सकता।” वह आदमी आँसू पोछते हुए बोला, अगर आप अपने प्रश्नों के उत्तर जानने के इच्छुक हैं तो बीस कोस दक्षिण दिशा में जाएँ। आपको वहाँ एक ऐसा आदमी मिलेगा जो भूख की पीड़ा से बेहाल है। वह बार-बार खाना खाने की कोशिश करता है, परन्तु हर बार पेट में खाना पहुँचते ही उल्टी हो जाती है। उसने काफी इलाज भी करवाए, अनेकों दवाओं का सहारा भी लिया, परन्तु सब कुछ नाकाम रहा। अब तो जैसे भूख की पीड़ा से गुजारना ही उसकी नियति है। वही आपको आपके सवालों का सही जवाब दे सकता है। यह कहते हुए उसने मिट्टी का एक ढेला उठाया और खाने लगा। मिट्टी खाते हुए उसके चेहरे पर बड़ी बेबसी के भाव थे।

राजा को उसकी बात सुनकर बड़ा अजीब-सा लगा। वह लगातार इतनी अजीबो-गरीब यात्राएँ करते हुए थक गए थे। अब तो उन्हें अपने ऊपर गुस्सा आने लगा था। वह सोचने लगे कि आखिर उन्हें भी क्या सूझी जो इस विधि के विधान के रहस्य को जानने के लिए चल पड़ें। एक के बाद एक आश्चर्यों से पाला पड़ रहा है, और गुत्थी है कि सुलझने की बजाय उलझती जा रही है। इस उधेड़बुन में वह काफी थक-से गए थे। विवश होकर मुँह फेरकर वह कुछ देर चुप खड़े रहे। फिर महामात्य से बोले-”आमात्यवर, यह क्या चक्कर है? ये बीस कोस की और कितनी यात्राएँ करनी पड़ेंगी?”

“महाराज मुझे ये आदमी पहचाने से लगते हैं। मेरा अनुमान है कि शायद यह बीस कोस की अन्तिम यात्रा होगी।”

महामात्य ने कुछ सोचते हुए कहा। महामात्य की बात सुनकर राजा की निराशा कुछ कम हुई। रात को वहाँ विश्राम कर दूसरे दिन सुबह वे फिर अपनी यात्रा पर निकल पड़े। सचमुच बीस कोस की यात्रा के बाद एक गाँव में उन्हें एक आदमी मिला, जो भूख की पीड़ा से बेहाल था। तरह-तरह का भोजन उसके पास रखा था। वह उसे खाने का प्रयत्न भी करता, लेकिन हर बार उल्टी हो जाती। गाँव वालों ने महाराज जयवर्धन एवं उनके महामात्य को बतलाया कि हम सबने इसके इलाज और उपचार की काफी कोशिशें कीं, परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। राजा जयवर्धन काफी देर तक उसकी बेबसी को देखते रहे, फिर बोले, “हे महानुभाव! आपकी यह क्या गति है? किसी ने बना दी है या फिर विधाता ने रची हैं।”

“राजन् अपनी इस गति का कारण मैं स्वयं हूँ। आप बैठ जाएँ। और विश्राम कर लें, फिर मैं आपको अपनी कहानी सुनाता हूँ। मेरी कहानी में ही आपको अपने प्रश्नों के उत्तर मिल जाएँगे।” उस आदमी ने अटक-अटक कर अपनी बात पूरी की।

जब राजा ने विश्राम कर लिया तो वह आदमी अपनी कहानी सुनने बैठा। “राजन् कभी किसी समय हम पाँच मित्र व्यापार के लिए यात्रा कर रहे थे। मात्रा के बीच में एक दिन तालाब के किनारे हम सब दोपहर का भोजन करने के लिए रुकें। सभी के पास दो-दो रोटियाँ थीं। सभी मित्रों ने सलाह बनायी कि चटनी पीसी जाय और उसके साथ रोटी खायी जाए। एक साथी को भूख कुछ ज्यादा ही लगी थी, सो उसने बिना चटनी के ही रोटी खा ली, बाकी साथी जब चटनी पीस कर रोटी खाने के लिए बैठे तो एक साधु वहाँ पहुँचा और बोला-मुझे दो रोटियाँ दे दो, बड़ी भूख लगी है। इसके उत्तर में पाँच साथियों के पाँच उत्तर मिले।

पहले ने कहा-अच्छा, तुम्हें भूख लगी है और मुझे क्या लगी है। दो ही तो रोटियाँ हैं, अगर ये भी तुम्हें दे दूँ तो मैं क्या कंकड़-पत्थर खाऊँ। इससे तो अच्छा है कि तुम्हीं कंकड़-पत्थर चबाओ। दूसरे ने कहा-जा भाग यहाँ से इतनी मेहनत से चटनी पीसी है, अगर ये रोटी चटनी तुम्हें दे दूँ तो मैं क्या मिट्टी खाऊँ। अच्छा हो कि तुम्हें मिट्टी खाकर पेट भर लो।

तुम्हारी भूख मिटाकर मुझे क्या मिलेगा? रोटी के सहारे तो पेट भरता है। उन्हें तुम्हें देकर मैं क्या भूखा तड़पूँ। भूख की पीड़ा से छटपटाना है, तो तुम्हीं छटपटाओ। जाओ भागों यहाँ से।

चौथा कहने लगा, साधु महाराज मैं विवश हूँ। तुम्हें रोटी नहीं दे सकता क्योंकि आपके यहाँ आने से पहले ही मैं अपनी रोटियाँ खा चुका हूँ। अगर होती तो मैं जरूर दे देता। मुझे दुःख है कि आपकी भूख मिटाने में असमर्थ हूँ।

हम सब की बातें सुनकर पाँचवें ने बड़े ही विनम्र स्वर में कहा-साधु महाराज, आप मेरे साथियों की बातों पर ध्यान न दें। ये दो रोटियाँ मेरे पास हैं। आप इन्हें खाकर अपनी भूख मिटा लें।

यह कहते हुए हमारे पाँचवें साथी ने अपनी दोनों रोटियाँ हाथ में पकड़ ली और बारी-बारी से हम सबकी ओर देखकर बोला-जैसी तुम्हारी भावना है, वैसा ही तुम्हें फल मिलेगा। तुम लोग विधि के विधान को शायद नहीं जानते। इस संसार में भावनाएँ, विचार और कर्म अपने अनुरूप परिणाम प्रस्तुत किये बिना नहीं रहते। इसमें देर-सबेर भले ही हो जाए, पर क्रिया की प्रतिक्रिया हुए बिना नहीं रहती।

जिसने मुण् कंकड़-पत्थर से पेट भरने की सलाह दी है, उसे अगले जन्म में कंकड़-पत्थर खाकर ही रहना पड़ेगा। मुझे मिट्टी खाने की बात कहने वाले को मिट्टी खाकर ही गुजारा करना होगा और जो कहता है मैं कही भी जाकर भूख से तड़पूँ, उसे अपनी भावनाओं के अनुसार भूख से तड़पना होगा। फिर रोटियाँ देने वाला साथी की ओर मुँह फेरकर साधु बोला-तुम्हारा मन परोपकार की भावना से भरा है, इसलिए तुम अगले जन्म में राजा बनोगे। फिर अगले साथी की ओर देखते हुए साधु कहने लगा-तुम्हारी भावना अच्छी है, परंतु तुम दान करने से पहले ही अपना भाग खा चुके थे अतः तुम राजा के मंत्री बनोगे।

राजन् इस तरह हम पाँचों मित्र इस जीवन में विधि का विधान भोग रहे हैं।”

“आप सबने साधु से इस कष्ट से निवारण का उपाय क्यों नहीं पूछा? फिर आपको पिछले जन्म की बातें याद कैसे हैं?” राजा ने जानना चाहा।

“हम तो उसकी बातें सुनते ही अवाक् रह गए थे। हमसे कुछ बोलते ही नहीं बन पड़ा हमारे कुछ बोलते ही नहीं बन पड़ा। हमो उद्धार के लिए प्रार्थना आपने ही की थी और महामात्य ने भी हाथ जोड़कर आपका साथ दिया था। तब साधु ने कहा था कि ठीक है अगले जन्म में तुम्हें मुक्ति भी इसी राजा के द्वारा मिलेगी, जब तुम्हारी सजा पूरी हो जाएगी तो यह तुम सबकी सुधि लेगा। तुम्हें मेरे पास लाएगा और तुम सब अपने विगत कर्म से उबर सकोगे। तुम्हारा प्रायश्चित शीघ्र पूरा हो, इसलिए मेरे आशीर्वाद से तुम्हें अपने इस जन्म की बातें याद रहेंगी, ताकि तुम सब शीघ्रातिशीघ्र अपनी भावनाओं को निर्मल कर सको।”

राजा ने वापस लौटते हुए उन सबको अपने साथ लिया और सभी के साथ महासिद्ध सरपहा के पास आ पहुँचे। योगीराज सरपहा महाराज जयवर्धन की ओर देखकर मुस्कराए और बोले-”राजन्! तुम्हारी परोपकार की भावना अमिट है। तुम्हारे मित्रों ने अपनी करनी की सजा भुगत ली है और सच्चे मन से प्रायश्चित कर रहे हैं। अतः अब ये अपने कष्टों से मुक्त हो जाएँगे। इसी के साथ तुम्हें विधि के विधान का रहस्य भी ज्ञात हो चुका होगा।”

“अभी एक शंका है।” राजा जयवर्धन के स्वर में तनिक संकोच था।

“निश्चित होकर कहो राजन्।” महायोगी राजा के संकोच को भाँप चुके थे।

जयवर्धन ने थोड़ा धीमे स्वर में कहा, “मनुष्य के भावना, विचार एवं कर्म समयानुसार अपने अनुरूप तीव्र, मध्यम या मन्द प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। विधि के इस विधान को हमने अपने एवं अपने

मित्रों के जीवन से समझा। लेकिन हमारे मित्रों के बुरे बर्ताव से आपके मन में जो हलका आवेश उत्पन्न हुआ था, उसकी प्रतिक्रिया?”

हँसते हुए योगीराज बोले,”विधि के विधान से कोई ऊपर नहीं, फिर चाहे वह कितना भी श्रेष्ठ या वरिष्ठ ही क्यों न हो। मैं भी अपने क्षणिक आवेश के कारण तुम लोगों से बँध गया था। अपने उसी आवेश का प्रायश्चित करते हुए मैं तब से तुम लोगों की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, ताकि तुम्हें अपने श्राप से मुक्त कर सकूँ।

पाँचों मित्रों ने महासिद्ध को प्रणाम किया और राजा जयवर्धन के साथ उसकी राजधानी की ओर चल पड़े।


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी- - आद्यशक्ति गायत्री की युगान्तरीय चेतना

इस गायत्री जयन्ती (15 जून 1997 ) की पावन वेला में गुरुसत्ता की अमृतवाणी उनके 1980 की गायत्री जयंती के पावन दिन शांतिकुंज हरिद्वार की पुण्यभूमि में दिए गए उद्बोधन के रूप में प्रस्तुत हैं।

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियों, भाइयों!!

आज गायत्री जयंती का पुण्य पर्व है तथा गंगा दशहरा भी आज है। गायत्री को आत्मा कहते हैं तथा गंगा को काया कहते हैं। आत्मा एवं काया का जन्म एक ही दिन हुआ था। आज गायत्री जयंती का पर्व मनाने के लिए हम एकत्रित हुए हैं। आज के दिन हम इतिहास पर नजर डालते हैं तो यह पाते हैं कि आज के दिन ही गंगा का भी अवतरण हुआ था। आज के दिन गंगा इस धरती पर आई थीं। मित्रो! हमारा ख्याल है कि गंगा सर्वप्रथम भगीरथ के अंतरात्मा में कैसे आयी होंगी? सामान्य मनुष्य बड़ा तेज एवं चालाक होता है। उसे अपने अलावा किसी की बात समझ में नहीं आती है। उसे तो केवल स्वार्थ ही दिखाई पड़ता है। ऐसे मनुष्य को कर्त्तव्य, समाज की सेवा, परमार्थ तथा भगवान समझ में नहीं आते हैं। उसके मन में हमेशा शैतान हावी रहता है। उसे पेट के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता है परन्तु भगवान जब एक इनसान के मन में आये होगे, जिसका नाम था भगीरथ, तो उसने यह सोचा होगा कि एक मनुष्य की सुख-सुविधा से ज्यादा महत्व का है-समाज की-संस्कृति की सेवा। उसने यही सोचा और क्या कर डाला? उसने गंगा से भक्ति का नाता जोड़ डाला। यह भक्ति का प्रतीक है।

यह भक्ति अंतरात्मा में से उमँगती है। भगीरथ एक राजकुमार था। उसके राज-पाट थे, परंतु उसने आदमी की खुशहाली के लिए अपना स्वार्थ, लोभ त्याग दिया। भगवान की भक्ति आती है तो करुणा के रूप में आती है, दया के रूप में आती है। गायत्री को हम माता कहते हैं, गंगा को भी माता कहते हैं। माता कोई देवी या औरत का नाम नहीं है। माता एक आदर्श का नाम है, सिद्धान्त का नाम है। गायत्री माता इसलिए कहलाती हैं कि उनके भीतर करुणा एवं दया है। माता का अर्थ करुणा एवं दया है। माता प्यार के लिये गलने का नाम है। आज तो लोग संतोषी माता की पूजा करते हैं, पता नहीं ये कहाँ के लोगों ने गढ़ा हैं। कितनी रोचक कहानियाँ बनायी हैं। एक औरत थी। उसकी सास उसे तंग करती थी। संतोषी माता आयीं और उसने सास की पिटाई की। उसके बाद उसका पति तंग करता था। संतोषी माता आयीं एवं पति की पिटाई कर दी। यह मक्कार लोगों की कथा है। माता जब आती है तो एक मस्ती के रूप में, आदर्श के रूप में इनसान के पास आती है।

भगीरथ के हृदय में भी माता का उदय हुआ था। उसके सीने में, कलेजे में करुणा बही होगी। यह भावना की गंगा थी जो विशाल होती चली गयी। हिमालय में से निकली विशाल गंगा बन गई। भगीरथ ने गंगा को मजबूर कर दिया कि आप स्वर्ग में बैठी हैं तथा धरती के लोग एक-एक बूँद पानी के लिए मजबूर हो रहे हैं, आपको शर्म आनी चाहिए। भगीरथ ने गंगा को मजबूर कर दिया। स्वर्ग की गंगा जो महलों में रहती थीं, आराम का जीवन जीतीं थीं, वह भगीरथ के करुणा, त्याग एवं परमार्थ की भावना को देखकर मजबूर हो गई इस धरती पर आने के लिए। आज का यह ऐतिहासिक दिन महत्वपूर्ण है। गंगा कितनी विशाल है? क्या आपने कभी सोचा? वह हिमालय से भगीरथ की आवाज पर इस धरती पर आईं तथा इस धरती के लोग जो त्राहि-त्राहि कर रहे थे उन्हें राहत दी, उन्हें नया जीवन दिया। यह भगीरथ की त्याग-तपस्या का फल था जिसके फलस्वरूप गंगा के अवतरण के साथ धरती धन्य हुईं। आज का दिन गंगा अवतरण का महत्वपूर्ण दिन हैं। गंगा अगर स्वर्ग में रहती तो आज जो लोग गंगा के तट पर व्रत करते हैं, आरती करते हैं, वह कौन करता? गंगा ने सारे समाज को धन्य कर दिया। हम किसी औरत की जयंती मनाने नहीं आये हैं, हम आज आदर्शों की, सिद्धान्तों की जयंती मनाने आये हैं। उदारता की, इनसानियत की जयंती मनाने आये हैं। आप चाहें तो इसे गायत्री माता कह सकते हैं। आज गायत्री के अवतरण का भी दिन हैं।

शेर खौफनाक होते हैं। उन्हें एक बार शिकार मिल जाये तो लम्बा पैर करके सोते रहते हैं। आप को ऐसा नहीं होना चाहिए। हमारा विचार है कि शेर से भी ज्यादा खौफनाक इक्कड़ व्यक्ति होता है जो केवल अपने पेट, अपने बच्चे आदि को ही देखता है। अकेला हाथी इतना खतरनाक होता है कि उसका क्या कहना? उसी प्रकार इक्कड़ आदमी होता है। ऐसे आदमी ही आज समाज को तहस-नहस कर रहे हैं। जो आदमी यह सोचते हैं कि मेरा पैसा बढ़ना चाहिए, मेरी तरक्की होनी चाहिए। मेरे परिवार का विकास होना चाहिए। उन्हें हम इनसान नहीं, शैतान कहते हैं। ऐसे खतरनाक आदमी सारे समाज को बर्बाद कर देते हैं। संत भी हैं, परंतु वह भी इक्कड़ हैं। इनको भी निरन्तर यही ध्यान रहता है कि मेरी सिद्धि होनी चाहिए, मेरा ही विकास होना चाहिए। ऐसा व्यक्ति भी इक्कड़ होता है।

आज गायत्री जयंती का दिन है जिसे विश्वमित्र ने सिद्ध किया था। अपनी तपश्चर्या का लाभ उन्होंने सारे समाज को दिया। एक दिन उन्होंने अपने शिष्य हरिश्चन्द्र से पूछा, कि क्या हम आपको मार डालें, आपको तबाह कर दें? तो उन्होंने कहा कि आपने जब इसके द्वारा ही महानता प्राप्त की है तो हम भी जलने के लिये तैयार हैं, आप सहर्ष इस कार्य को करें एवं हमारी आध्यात्मिक परीक्षा लें। गुरुवर! हम भी इस मस्ती का लाभ उठायेंगे। राजा हरिश्चन्द्र अपनी परीक्षा में सफल हो गये और इस धरती पर धन्य हो गये। राजा हरिचन्द्र का ड्रामा देखकर महात्मा गाँधी रो पड़े थे और उन्होंने यह निश्चय किया कि हम भी इसी प्रकार का जीवन जिएँगे। मित्रों! मुसीबतों का जीवन कुछ बिगाड़ नहीं सकता है। आदमी की जिन्दगी में से मुसीबतें निकल जाएँ तो, उसका जीवन दो कौड़ी का होता है। आदमी की जिन्दगी में इसके कारण ही निखार आता है, उसका विकास होता है। महापुरुष-संत इसी कारण से महान बने हैं और बढ़े हैं अगर इनसान अपने लिए मुसीबत न उठायेगा तो दूसरों के लिए वह क्या कर सकता है? हमने भी ऐसी मुसीबतें उठायी हैं। मित्रो! ऐसी मुसीबत का ही नाम तप है, जो हर इनसान के विकास के लिए आवश्यक है। आप इसके लिए घबराएं नहीं, उसे बुलाये। इसके द्वारा आदमी में पैनापन आता है, आदमी में निखार आता है। यह आदमी को सोने का बनाती हैं आदमी को प्रामाणिक बनाती है। विश्वमित्र से गला-तपाकर महान बना दिया।

हम आपको प्राचीनकाल की बात न करके आज की बात करना चाहते हैं। आज गायत्री जयंती का दिन एक ऐतिहासिक दिन है। यह भगवान का दिन है। आपको दिखलाई नहीं पड़ता है। रामचन्द्रजी जब पालने में झूल रहे थे तो कब आपको भगवान दिखलाई पड़े? आपको तो तब भगवान दिखलाई पड़े, जब वे रावण को मारकर आये और रामराज्य स्थापित कर दिया था। परन्तु कुछ ऐसे आदमी भी होते हैं जिन्हें भगवान पहले दिखाई पड़ जाते हैं। उसी प्रकार आज भी भगवान का अवतार हो गया है। यह प्रज्ञा अवतार समय की आवश्यकता है। जब कभी भी पृथ्वी पर अनीति, अत्याचार बढ़ता है, भगवान का अवतार होता है। आज की ऐसी ही स्थिति है तथा इस कारण से ‘प्रज्ञा अवतार’ हो गया है। इसे भी कुछ लोगों ने राम की तरह पहचान लिया है तथा वे प्राणपण से उनके कार्यों में लगे हैं।

आज का दिन महत्वपूर्ण है। आज गायत्री जयंती का दिन हैं अगले दिनों आज के दिन से ही इनसान को अंदर एक दिव्य हलचल होगी। कुरीतियाँ मिटेंगी, अनीति समाप्त होगी। सभी धर्म एवं संस्कृतियाँ एक हो जाएँगी। धरती पर स्वर्ग का अवतरण होगा। जमाना एक हो जाएगा। भगवान एक हो जाएँगे। आज तरह-तरह की वेश-भूषा पहने, विभिन्न भाषाओं को बोलते हुए लोग दिखाई पड़ते हैं। अगले दिनों ऐसा मालूम पड़ता है कि ये सब चीजें समाप्त होने वाली है। आचार, संस्कृति, भाषा सब एक हो जाएँगे। सारे के सारे धर्म, राष्ट्र, संस्कृति एक होने वाली हैं। अगले दिनों विशाल परिवर्तन होने वाला हैं। “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना पनपने वाली हैं, कमाने वाला अकेला नहीं खा सकता है, उसे समाज, परिवार, राष्ट्र को देखकर चलना होगा। हम कमाते तो जरूर हैं, लेकिन हमारे इस पैसे पर केवल हमारा ही हक नहीं है। हमारी बूढ़ी माता कमाती नहीं है, उसके व्यवस्था बनानी होगी। आप कमा तो सकते हैं, परन्तु खाने पर आपके ऊपर अंकुश लगा है। आप केवल अकेले खा नहीं सकते हैं। आप समाज को, परिवार को, नौकर को खिलाकर खायें। आने वाला दिन आपको दिखलाई पड़ता है कि नहीं, यह पता नहीं, परन्तु हमें दिखलाई पड़ता है कि ऐसा ही होना वाला है।

आज गायत्री माता का जन्मदिन है। यह बहुत ही शानदार दिन है। गायत्री माता किसी समय वेदमाता बनी थीं जिन्होंने सारे वेदों को जन्म दिया था। सारी संस्कृति एवं सभ्यता को जन्म दिया था। उस समय यह गायत्री माता वेदमाता बनी थीं। हिन्दुस्तान के निवासी देवता थे। वे स्वयं तो खाते कम थे, पर खिलाते अधिक थे। उन्होंने खाया कम, खिलाया ज्यादा। ब्राह्मणों ने खाया कम खिलाया ज्यादा। ऋषियों ने खाया कम, खिलाया ज्यादा। यहाँ के नागरिकों ने खाया कम, खिलाया ज्यादा। यहाँ के नागरिकों ने सारी दुनिया में अपनी सम्पदा को बाँट दिया। वे विदेशों में चले गये, इण्डोनेशिया, अमेरिका आदि सारी दुनिया में चले गये और अपनी प्रतिभा को बिखेरते चले गये। वे देवमानव थे, उन्हें अकेले खाते समय मन में अप्रसन्नता होती थी तथा खिलाते समय वे प्रसन्न होते थे। अकेले खाने के समय वे शर्मिन्दा होते थे। एक बार हमें भी शर्मिंदा होना पड़ा। माताजी ने किसी के कहने पर हमें एक गिलास मौसमी का रस दे दिया था। हम काम में व्यस्त थे, माताजी ने दिया तो हम उसे पी गये, परन्तु थोड़ी देर के बाद पेट में ऐसा लगा कि किसी ने हमें तेजाब पिला दिया। हमें मालूम पड़ा कि ये तो मौसमी का रस था। हमने अपने मुँह में अँगुलियाँ डालकर उल्टी कर दी तथा उस समय तक चैन नहीं आया जब तक कि मौसमी का रस पेट से न निकल गया। माताजी ने पूछा कि क्या मक्खी आ गई? हमने कहा कि नहीं, हम इसे कैसे पी सकते हैं? हमारे बच्चे जो गायत्री तपोभूमि में हमारे कहने से, हमारी आवाज पर आ गये हैं, उनको न दूध मिलता है, न घी। उनके बच्चे बिना दूध के रहते हैं। तब हम मौसमी का रस कैसे पी सकते हैं?

मित्रो! अगले दिनों लोगों को खाने से ज्यादा मजा खिलाने में आयेगा। अकेले खाने वालों को अगले दिनों लोग यह कहेंगे कि आपको शर्म नहीं आती हैं, आप खाते चले जाते हैं, खाते चले जाते हैं। आपको शर्म आनी चाहिए। पड़ोसी तथा पीड़ित-पतित एवं भूखे लोग आपको दिखलाई नहीं पड़ते हैं, मक्कार कहीं का। केवल अपना पेट, अपनी बीबी, अपने बच्चे ही दिखलाई पड़ते हैं। आपके भीतर से जब गायत्री माता उदय होंगी तो आपको सारा परिवार, समाज, देश दिखलाई पड़ेगा। आप देवता बनते चले जाएँगे। गायत्री माता हंस पर बैठकर कमण्डल लेकर नहीं आती हैं, वह केवल करुणा के रूप में, दया के रूप में आके अंदर आएँगी। यही उनका स्वरूप हैं जो आपको देवता बनाकर जाएँगी। उस समय आपको देवता की तरह से जीना पड़ेगा। आप हैवान तथा शैतान की तरह से नहीं जी सकते हैं। आप मालदार एवं पूँजीपति की तरह से जी नहीं सकेंगे। आपके जीने एवं रहने का ढंग अजीब हो जाएगा। आप बाँटकर खाएँगे तथा दूसरों की मुसीबतों को बँटाने का काम करेंगे। आप अपनी खुशहाली को बाँट देंगे तब प्रसन्नता आपके अंदर से आ जाएगी।

आज करुणा की माता जन्म लेने वाली है। आज गायत्री माता जन्म लेने वाली है। आज प्रज्ञावतार जन्म लेने वाला हैं। अवतार कब जन्म लेते हैं जब-

यदा यदा हि धर्मस्व ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य, तदात्मानं सृजाभ्यहम्॥

परित्राणाय साधूनाँ विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥

अवतार लेने के बाद भगवान केवल तीन काम करते हैं। सज्जनों की रक्षा, दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन और धर्म की स्थापना करनी पड़ती है उनको। भगवान एक ही काम करता है चाहे वह बाहरी दुनिया की दुष्प्रवृत्तियाँ हों या मनुष्य के अंदर हों, उसे तोड़ता, उसे नाश करता हुआ चला जाता है। उसे हटाता चला जाता है। वह उसके साथ ही निर्माण यानी जिलाने का काम भी करता है। सज्जनों की रक्षा भी करता है। वह डबल रोल करता है। भगवान इनसान की बुरी परिस्थितियों को तोड़ता चला जाता है तथा दूसरा काम बनाता चला जाता है अर्थात् परिस्थितियाँ ठीक करता चला जाता है। यह भगवान का डबल रोल हैं-ध्वंस एवं सृजन का। इसी का नाम गलाई एवं ढलाई है। आप टाटानगर चले जाना, वहाँ देखना बड़ी-बड़ी चिमनियाँ बनी हुई हैं। उसमें लोहे के टुकड़े आदि डाल दिये जाते हैं। वहाँ पर उनकी गलाई होती है। उसमें सब गलकर एक हो जाते हैं। उसमें गलत चीजें भी गल जाती हैं। इसका क्या नाम हैं? गलाई। उसके बाद अच्छी चीजें बन जाती हैं, उसे ढलाई करके नया रूप दे दिया जाता है। इसी प्रकार भगवान का ध्वंस एवं सृजन काम भी चलता रहता है। भगवान अगर किसी को मुसीबत भी देता है तो किसी खरे मकसद के लिए देता है।

मैं क्या कह रहा था आज गायत्री जयंती के दिन-कि अगले दिनों जो समय आने वाला है उसमें भगवान गलाई-ढलाई करेगा। आप हमारी आँखों से, हमारे दिन तबाही आयेगी। बेटे तबाही आयेगी तो निर्माण के लिए आयेगी। तो क्या अगले दिन डरावने हैं? हाँ डरावने भी हो सकते हैं। इसके लिए हम क्या कह सकते हैं। बच्चे पैदा होते हैं तो मुसीबत भी आती है, परन्तु उसके बाद खुशियाँ भी मनायी जाती हैं। मिठाई भी बाँटी जाती है। अगले दिन हमको खुशहाल दिखाई पड़ रहा है। अगले दिनों में हमे खूबसूरत इनसान दिखलाई पड़ रहे हैं। खुशहाल दुनिया दिखलाई पड़ रही है।

अगले दिन हमको गायत्री माता का वह दिन दिखाई पड़ रहा है, जो आज का दिन है, जो लोगों को प्रभावित करने वाला है। इनसान के भीतर का देवता जो सो गया है, वह जगने वाला है। अगले दिनों इनसान के भीतर से देवता जगेगा। इसे मनुष्य में देवत्व का उदय कहा जा सकता है। हमने इसके साथ यह भी कहा है कि धरती पर स्वर्ग का अवतरण होगा। अगले दिन दुनिया में बहुत शानदार एवं अच्छी परिस्थितियाँ आयेंगी। जमाना बहुत सुँदर आएगा। धर्म, संस्कृति, भगवान सब एक हो जाएँगे, ताकि कोई आपस में न लड़ सकें। अगले दिनों भाषाएँ। भी एक हो जाएँगी। जो आपस में लड़ती-मरती हैं, वह एक हो जाएँगी। अगले दिनों आचार एवं संस्कृति एक हो जाएगी। पर्व जो आयेंगे, उसमें सबको छुट्टी मिलेगी। कोई एक व्यक्ति का पर्व नहीं होगा। संस्कृति, सभ्यता, इनसान, राष्ट्र एक होने वाले हैं। एक ही संस्कृति अगले दिनों चलने वाली है। सारी दुनिया एक कुटुम्ब की तरह रहेगी इसमें बूढ़ी माता तथा जो नहीं कमा रहे हैं, उनका भी हक होगा। सब मिल−बांट कर खाएँगे। आपस में प्रेम, आत्मीयता होगी। कमाने वाला ही केवल नहीं खा सकता है उस पर अंकुश लगा हुआ है।

अगले वाले दिन हमको बहुत शानदार दिखलाई पड़ रहे हैं, आपको दिखलाई पड़ रहा है या नहीं। हम नहीं कह सकते। इस बार गायत्री माता सभी को देवता बनाना चाहती है। वे सभी को महान बनाना चाहती हैं। इस समय आप लोगों को कुछ विशेष काम करने हैं। आप सब लोग लोभ-मोह की बेड़ियों को काट डालिए। अरे ये हथकड़ियाँ आपके हाथों में लगी हैं उसे काटिये। ढेरों की ढेरों अकल, समय हर आदमी के पास है। आपने अभी तक इसे बेकार में खर्च किया है तथा बर्बाद किया है। अब आप समझदार आदमी बन जाएँ तथा इसका उपयोग अब सही ढंग से करना सीखें। आप कम में गुजारा करना सीखिये। औसत भारतीय का जीवन जीना सीखिये, ताकि कुछ राष्ट्र एवं समाज के लिए भी खर्च कर सकें। आप अपने बच्चों को संस्कारवान बनाने का प्रयास करें, आपका बच्चा लुहार, बढ़ई हो जाये तो कोई हर्ज की बात नहीं है। अगर आप बड़े आदमी जैसे वकील, दरोगा, डॉक्टर, इंजीनियर न बनाकर उसे संस्कारवान बनायें तो बेहतर है। ये बड़े आदमी आपके लिए, अपने लिए, समाज के लिए समस्या बन जाएँगे तथा तबाही लाएँगे। आप उन्हें संस्कारवान बनायें। आप अपने विचारों में अगर परिवर्तन कर सकें तो बहुत मजा आयेगा। आज गायत्री का जन्मदिन है। अगर वह आपके जीवन में आ गयी तो वास्तव में आपको धन्य कर देगी।

अभी तो आपकी धन, शक्ति-सामर्थ्य, अकल सब बेकार काम में खर्च हो रही है। लेकिन जिस दिन गायत्री माता आपके जीवन में आएगी तो सारे के सारे जीवनक्रम में उलट-फेर हो जाएगा। हमारा गुरु जिस दिन हमारे पास आया आज से 55 वर्ष पूर्व, तो उसने हमारे लोभ, मोह की बेड़ियों को काट डाला। वह दिन सौभाग्य का दिन था। उस दिन मेरे गुरु के रूप में भगवान आये थे और उस दिन से हम अपनी सारी चीजें अपने गुरु को, भगवान को सौंपते चले गये। हम अपनी सारी चीजें अपने गुरु को, भगवान को सौंपते चले गये। हम अपनी अकल को, पैसा को, सब कुछ को भगवान को सौंपते चले गये और मालदार होते हुए चले गये। एक दिन एक व्यक्ति कह रहा था कि बच्चा जिस दिन जन्म ले, उसके नाम एक हजार जमा कर दीजिए तो वह 39 साल बाद एक लाख बत्तीस हजार हो जाता है। पहले हमें विश्वास नहीं हुआ, परन्तु उसने बतलाया कि हर पाँच साल के बाद जमा राशि डबल होती चली जाती हैं। पता नहीं यह कहाँ तक सत्य है, परन्तु हमने भगवान के बैंक से तो न जाने कितनी चीजें प्राप्त कर लीं तथा आज हम आप सबों से ज्यादा मालदार हैं। हमारे गुरु ने, भगवान ने अपने बैंक से इतना दिया कि कोई भी बैंक या ऑफिस इतना नहीं दे सकता।

अतः आज हम आप सबों से कहना की अपेक्षा, बेटे-पोतों को देने की अपेक्षा समाज को, राष्ट्र को खिलाना सीखें तो आपके भी मालदार होने की गुंजाइश होगी। आपसे प्रार्थना है कि आप स्वयं खाने की अपेक्षा खिलाना सीखें। आप कहते हैं कि हम खाएँगे तो पहलवान हो जाएँगे। हम कहते हैं कि आप खाने से पहलवान नहीं हो सकते हैं। आप खाने से पहलवान नहीं हो सकते हैं। आप अगर अकेले खाएँगे तो आप सबों के पेट दर्द होगा तथा ‘तो आप सबों के पेट में दर्द होगा तथा ‘डाइबिटीज- होगी। आप विटामिन ‘ए’ खाएँगे, अण्डा खाएँगे तो ही पहलवान नहीं हो जाएँगे। घास या पत्ते खाने से भी आदमी ताकतवर हो सकता है। हम जब हिमालय चले जाते हैं, उस समय हमें केवल वहाँ पर घास तथा पत्ते ही मिलते हैं। परन्तु क्या हम आपसे कम ताकतवर हैं? वहाँ कंद-मूल भी नहीं हैं। हम पत्ते को उबाल कर खा लेते हैं और आज हमारी सेहत 17 वर्ष के लड़के की तरह है। हम कितना काम करते हैं, आप जानते नहीं? हम आज 70 वर्ष के हो गये परन्तु 17 वर्ष के लगते हैं। आप वहीं खायें जो ब्राह्मण, सदाचारी, अपरिग्रही खाते रहे हैं तो आप देखेंगे कि आपकी सेहत कैसी रहती हैं?

आप आज गायत्री जयंती के दिन यहाँ आये हैं तथा यहाँ पर्व मना रहे हैं। आपसे प्रार्थना है कि आप समर्पित हों तो आपका यह पर्व मनाना सार्थक होगा। यह दे रहे हैं। यह नसीहत हमारे गुरु ने हमें दी थी। उसके पहले हमारी माताजी ने दी जो 12 वर्ष की होकर मरी थीं। वे एकादशी का व्रत करती थीं और उस दिन वे ‘सीधा’ निकाल कर देती थीं और कहती थीं कि हमने पेट काटकर बचाया है, इसे मंदिर में देकर आओ। “पेट काट कर बचाना और लोकहित में यानि कि भगवान को देना-इसी का नाम यज्ञ है।” आप हवन तो करते हैं, परन्तु कुर्बानी, परोपकार, सेवा के लिए कुछ करना नहीं चाहते हैं। मित्रों, इसी का नाम अग्निहोत्र है, इसी का नाम यज्ञ है। अगर आप भी इस यज्ञ की प्रवृत्ति, लोकहित का जीवन जीने की प्रवृत्ति लेकर चले जाएँ तो आपका जीवन धन्य हो जाएगा। हम मरते-मराते, जीवन के अंतिम क्षणों में आपको एक नसीहत देकर जाना चाहते हैं कि आप एक शानदार आदमी बनें। लोकहित का जीवन जीना सीखें।

आज गायत्री जयंती के दिन हम एक बात और कहना चाहते हैं कि अगर आप आज अपने गुरु की नसीहत के मुताबिक, गायत्री माता के नसीहत के मुताबिक जो करुणा और दया की प्रतीक हैं-लोकमंगल हेतु अपने अकल, धन, समय को लगा सकेंगे तो आपका जीवन धन्य हो जाएगा। अगले दिनों आप शानदार जीवन जिएँ, आप किफायतशारी जीवन जियें। आप अपने औलाद का, परिवार वालों का मोह न करें तो आपकी जिन्दगी तथा भविष्य शानदार बनता हुआ चला जाएगा। आपको हम जिम्मेदारी से विमुख होने को नहीं कहते हैं। हमें परिवार शब्द से बहुत प्रेम है तथा हमने अपनी संस्था का नाम गायत्री परिवार, प्रज्ञा परिवार रखा है। परन्तु हम एक बात कहना चाहते हैं कि आप उसमें लिप्त न हों, मोहग्रस्त न हों। हमने युग निर्माण परिवार, गायत्री परिवार इसी उद्देश्य से बनाया है। आपने परिवार तो बनाया है, परंतु आपने उसे बड़ा बना दिया है यानी कि मालदार बना दिया है। आप बड़ा मत बनाइये, आप केवल संस्कारवान बनाने का प्रयास करें। आप लोभ, मोह को कम करें तथा आप लोग कुछ समाज, देश तथा संस्कृति के लिए काम करें तो मजा आ जाएगा।

यह समय बीजारोपण का है। यह गायत्री का, प्रज्ञावतार का दिन है। यह सारे विश्व में फैलने वाली है, आप देख लेना। गायत्री महामंत्र जो विवेक, सद्विचार, सद्भावना, प्रेरणा, शालीनता, उज्ज्वल भविष्य, नये युग का मंत्र है। यह सारे विश्व में फैलने वाली है। यह मत्स्यावतार की तरह फैलने वाली है, यह हम आपको दिखा देंगे। ब्रह्माजी ने जिस मछली को कमण्डल, तालाब, नदी, समुद्र में डाला था वह बढ़ती चली गई। आने वाले दिनों में यह गायत्री माता भी इसी प्रकार बढ़ने वाली हैं, आप विश्वास रखें। इस प्रकार की कथा आपने सुनी है, परन्तु हमारे जैसा नाचीज आदमी यह कह रहा है, आप नोट कर लें। आगे गायत्री भी मत्स्यावतार की तरह सारे विश्व में फैलने वाली है। आज भी हमारे 24 लाख व्यक्ति हमारा कहना मानते हैं, हमें गुरुजी कहते हैं। वे हमसे दीक्षा प्राप्त किये हैं। वे हमसे जुड़े हैं। एक आवाज पर हर प्रकार की कुर्बानी के लिए तैयार रहते हैं। आप समझते नहीं हैं 24 लाख किसे कहते है? आपने कभी सोचा है 24 लाख आंखें, 24 लाख हाथ तथा 24 लाख घण्टे कितने होते हैं? इंसान आठ घण्टे काम करता है, परन्तु 24 लाख व्यक्तियों के एक घंटे श्रम का मतलब है 4 लाख आदमियों का श्रम। 6 घण्टे प्रतिदिन के हिसाब से उन्हें औसतन 20 रुपये भी प्राप्त हो जाते हैं तो जरा मूल्याँकन कर लेना कि हम कितने बड़े तथा सामर्थ्यवान् आदमी हैं। आप जरा मूल्यांकन करें कि एक दिन में, एक माह में और एक साल में यह कितना हो जाता है। यहाँ गायत्री माता भी मत्स्यावतार की तरह से हमारे कमण्डल में से बढ़ते-बढ़ते कहाँ तक पहुँच गयी है। हमने 24 गायत्री शक्तिपीठ बनाने का संकल्प लिया था, कसम खायी थी, परन्तु आज कितना बन गया, आपको पता नहीं है।

अब हम गायत्री माता के बारे में कहना चाहते हैं। यह विकसित होने जा रही है। इसका विकास होने जा रहे हैं। अगर किसी डूबते हुए को तिनके का सहारा मिल जाता है तो वह बढ़ता, फलता, फूलता चला जाता है। इसी गायत्री जयंती से हमने नया संकल्प लिया है। हिन्दुस्तान में सात लाख गाँव हैं। हिन्दुस्तान में हमने जन्म लिया, यहाँ की मिट्टी में हमने खेला है, यहाँ हमने पढ़ाई की है, जन्म हुआ है, हवा खायी है। इसी संस्कृति में हमने जीवन जीना सीखा है। इस संस्कृति का कर्ज हमारे ऊपर है। अतः विवेक की देवी, दया, करुण, उज्ज्वल भविष्य की देवी की एक लाख व्यक्तियों के द्वारा 240 करोड़ जप गाँवों में हमें कराना है। धर्मानुष्ठान की शृंखला में हम अभूतपूर्व कार्यक्रम प्रारम्भ करने जा रहे हैं, जो आज तक के इतिहास में एक अभूतपूर्व कार्य माना जा सकता है। पुराने जमाने में नैमिषारण्य में सारे ऋषि आते थे एवं उनका भावभरा संकल्प होता था। आज गायत्री जयंती के दिन विवेक की देवी के जन्मदिन पर आप सब जो बैठे हैं, वे सब हमारे पूर्व जन्म के ऋषि, मुनि हैं, जिनने कि प्रारम्भ में भी कार्य किये हैं तथा आगे भी काम करेंगे। आज का यह धर्मानुष्ठान इस युग का महत्वपूर्ण धर्मानुष्ठान है।

आज से एक लाख व्यक्तियों द्वारा 240 करोड़ जप नित्य का प्रारम्भ हो गया। आज का दिन बड़ा शानदार दिन है। धर्मानुष्ठान की शृंखला में, अनुष्ठान की शृंखला में आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। नैमिषारण्य में एक लाख व्यक्ति कभी इकट्ठे नहीं हुए हैं। आप बिना माइक के प्रवचन नहीं दे सकते हैं। मित्रो, एक लाख व्यक्ति मायने रखता है। यह गायत्री माता का विस्तार है। आज से एक लाख द्वारा नित्य 240 करोड़ का जप कार्य होगा। यह वातावरण का संशोधन, धरती पर स्वर्ग एवं मनुष्य में देवत्व लाने के लिये प्रारम्भ किया गया है। इससे सारे वातावरण में परिवर्तन हो जाएगा। एक लाख गाँव में हम गायत्री चरणपीठ बना देंगे। हमने इसकी अनुमानित लागत 250 रुपये रखी है। हम उसे उपस्थित करा देंगे। इस काम के लिए कोई भी व्यक्ति इतनी धनराशि दे देगा तथा हमारा यह काम पूरा हो जाएगा। मित्रो! यह हमारा सपना है जो पूरा होगा। हमने हमेशा सपना देखा है। यह भी हमारा एक सपना है। हमने बहुत शानदार सपना देखा है तथा उसे रंगीन बनाने की कोशिश की है। यह भी हमारा एक सपना है। क्या सपना है? 1 लाख व्यक्तियों में जनचेतना जगाना तथा 240 करोड़ जप करने की पद्धति प्रारम्भ करना। हर गाँव में नित्य हवन, चालीसा का पाठ, मंत्र लेखन, जप तथा जन्मदिन मनाया जाएगा। हम हर गाँव में 4 घण्टे काम करने वाला एक आदमी रख करके जाएँगे, जो उपर्युक्त सारे कामों को पूरा करेगा तथा गाँव के अंतर्गत चेतना जाग्रत करेगा। वह 50 रुपये में भी काम कर सकता है। आज हम घर में दो-दो आदमी बेकार बैठे रहते हैं। उन्हें आप कहें तो वह 4 घण्टे समय दे देगा, आप इसे 50 रुपये दे दें। इसके अलावा उस गाँव में एक-एक मुखिया (मैनेजर) मिल जाएगा जो कामों की देखभाल करेगा। इस प्रकार हर गाँव के दो आदमी के हिसाब से 2 लाख आदमी हमारे हो जाएँगे जो हमारे कामों को निष्ठा के साथ पूरा करेंगे।

हमने संकल्प लिया है कि देश के अंदर से निरक्षरता को हम मिटायेंगे तथा लोगों को साक्षर बनायेंगे। सरकार यह काम नहीं कर सकती है। वह तो प्राइमरी स्कूल की व्यवस्था ही नहीं देख पाती है। जैसे स्वामी केशवानन्द जी ने शेखावाटी के गाँवों में मुद्री फण्ड योजना के द्वारा प्राइमरी स्कूल खोला था। हम भी उस योजना को सफल करेंगे। इसके साथ ही हर आदमी की सेहत की जिम्मेदारी हम उठायेंगे जो असंयम, खानपान, रहन-सहन के कारण चौपट हो गई है। हम उसे लोगों को समझाकर परिवर्तन करेंगे। आज जो अनास्था संकट हावी हो गयी है उसे हम दूर करेंगे। हम बहुत से काम करेंगे। आज सामाजिक कुरीतियाँ जो बढ़ रही है उन्हें हम समाप्त करेंगे।

आज गायत्री जयंती के दिन से अपने चरणपीठ तथा 1 लाख परिजनों के सहयोग से हम बड़े से बड़े कदम उठाने वाले हैं। कौन-से कदम उठाने वाले हैं? दहेज प्रथा ओर फिजूलखर्ची को समाप्त कर देंगे जिसने इनसान को गरीब बना दिया है। समाज को बर्बाद करके रख दिया है। एक लाख आपने फिजूल-खर्ची में बर्बाद कर दिया। आपने सोचा नहीं कि एक लाख रुपये का मासिक ब्याज एक हजार आता है। आपने यह विचार नहीं किया। आपने अपने नाक कटने की वजह से आतिशबाजी, बाजा-गाजा तथा फैशन-परस्ती को बढ़ावा दिया। यह बेहूदापन बंद करें। अगर आपकी नाक इस कारण कटती है तो सूर्पणखा की तरह से आपकी नाक अवश्य कटनी चाहिए। हमने साहस के साथ कदम उठाया है। लानत भरे यह विवाह मुझे बिल्कुल नापसंद हैं। इसे दैत्य विवाह कहते हैं। यह सभ्यता के नाम पर डकैती है, जो शक्ति हमारे साथ है उसके माध्यम से हम यह काम अवश्य पूरा करेंगे।

आज गायत्री जयंती के दिन जो शादियाँ हो रही हैं। यह प्रतीक हैं, यह प्रारंभ है। हमने शादियों का धंधा नहीं लिया है। आज से हमने क्रान्ति का प्रारम्भ किया है। शादियों के अवसर पर हंस के मोटर पर बैठा हुआ आदमी हमें नरपिशाच-सा नजर आता है।

मित्रो, हम इसके विरोध में बगावत शुरू करेंगे। कहाँ से करेंगे? मित्रो, हम देहात से शुरू करेंगे। यह शहर तो बर्बाद हो गये हैं। न जाने कितनी पार्टियाँ, कितने नेता, कितने पेपर, यह सारा बर्बाद हो गया है। आज गायत्री जयंती के पुनीत पर्व पर हम देहातों में चलें। हिन्दुस्तान की आत्मा-आबादी देहातों में बसती है। उसके विकास के लिए, प्रगति के लिए हम उधर की ओर चलें। यह क्षेत्र खाली पड़ा है जहाँ न कोई सम्प्रदायवाद है, न कोई आडम्बर है। असली हिन्दुस्तान तो वहीं है जो खाली पड़ा हुआ है। हम उसका विकास करना चाहते हैं। गायत्री माता तथा हमारा गुरु हम पर हावी है और न जाने कैसी-कैसी बेचैनी पैदा करता है, हमें सोने भी नहीं देता है। आज गायत्री जयंती के दिन भगवान करें यह बेचैनी आपके अ दर भी आवे। आप भी हमारी तरह से समाज के लिए, राष्ट्र के लिए, पीड़ा-पतन के निवारण के लिए कुछ अपनी अकल, समय और धन दे सकें तो यह दुनिया सुँदर बन सकती है तथा धरती पर स्वर्ग एवं मनुष्य में देवत्व का उदय हो सकता है। जो वास्तव में हमारा सपना है। गायत्री माता, करुणा की माता अब अपना विस्तार चाहती है। आप उठिए तथा हमारे साथ चलने के लिए आगे आइये। मानव जीवन जो मिला है, उसे हमारी तरह धन्य बनाने का प्रयास कीजिए।

भगवान करे आपको भी सामर्थ्यवान देवी प्राप्त हो। आपको भी ऋद्धि-सिद्धि मिले। जो हमें ऋद्धि-सिद्धि का चमत्कार मिला है, वह आपको भी मिले, हमें लाखों आदमियों के आँसुओं को पोंछना अच्छा लगता है। आप भी गायत्री माता से माँगिए। आप तो केवल अपने लिये माँगते है। आप समाज के लिए, राष्ट्र के लिए, राष्ट्र! के लिए माँगिए तो इसके साथ आपको भी मिलेगा। हमें वर्तमान और भविष्यकाल दोनों ही शानदार दिखलाई पड़ रहें है। हम गायत्री माता से यही प्रार्थना करते हैं कि हे माता! हमें दया, करुणा, क्षमा, शालीनता और ममता दीजिए। मित्रो! आपको भी यही माँगना चाहिए। यही हमारी, गायत्री माता तथा महाकाल की प्रेरणा हैं अगर आप इसे समझ जाएँ तथा उस पर चलने, उतारने का प्रयास करेंगे तो आज गायत्री जयंती तथा आपका जीवन धन्य हो सकता है।

ॐ शान्ति!


कलंक और आक्रमण से निष्कलंक की सुरक्षा - परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

इन दिनों परिस्थितियाँ बड़ी विषम एवं प्रतिकूल हैं। सज्जनता पर आए दिन आक्रमण होते देखे जाते हैं। जिस समय विशेष से हम गुजर रहे हैं, यह बड़ा ही विकट एवं अत्यधिक उलट-फेरों से भरा हुआ है। महाकाल की युग-प्रत्यावर्तन प्रक्रिया जिसमें निष्कलंक प्रज्ञावतार का प्रकटीकरण होना हैं, आरम्भ हो चुकी है। गायत्री परिवार-युग-निर्माण मिशन के क्रियाकलापों से जुड़े व्यक्तियों को कभी-कभी आस-पास घटने वाली घटनाओं, भ्रष्ट चिंतन एवं दुष्ट आचरण में बढ़ोत्तरी देखकर निराशा आ घेरती है एवं वे अपना मनोबल खोने लगते हैं। उनका आत्म-विश्वास डगमगाने लगता है। ऐसी स्थिति में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा अगस्त 1979 की अखण्ड-ज्योति में लिखा यह लेख उनके लिए एक विशिष्ट संजीवनी का कार्य करेगा। न केवल वे बाह्य व आन्तरिक आक्रमणों की ओर से जागरुक रहेंगे, अपना मन्यु जगाकर परमसत्ता के विधान पर अटल विश्वास रख और सक्रिय हो सकेंगे। इसी आशय से यह लेख यहाँ गायत्री जयंती परमपूज्य गुरुदेव की महाप्रयाण तिथि की बेला में जन-साधारण के लिए पुनः प्रकाशित किया जा रहा है।

प्रगति के मार्ग में अवरोध का, विशेषतया श्रेष्ठ सम्भावनाओं में अड़चनें आने का अपना इतिहास है, जिसकी पुनरावृत्ति अनादिकाल से होती रही है। जिस प्रकार आसुरी संक्रमणों को निरस्त करने के लिए दैवी सन्तुलन की सृजन शक्तियों का अवतरण होता है, उसी प्रकार श्रेष्ठता की अभिवृद्धि को आसुरी तत्व सहन नहीं कर पाते। उसमें अपना पराभव देखते हैं और बुझते समय दीपक के अधिक तेजी के साथ जलने की तरह अपनी दुष्टता का परिचय देते हैं। मरते समय चींटी के पंख उगते हैं। पागल कुत्ता जब मरने को होता है तो तालाब में डूबने को दौड़ता है। पागल हाथी पर्वत पर आक्रमण करता है और उससे टकरा-टकराकर अपना सिर फोड़ लेता है। आसुरी तत्व भी जब अन्तिम साँस लेते हैं और एकबारगी मरणासन्न की तरह उच्छ्वास खींचकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। अवतारों की पुण्य-प्रक्रिया भी निर्बाध रीति से बिना किसी अड़चन के सम्पन्न नहीं हो जाती, उसमें पग-पग पर अवरोध और आक्रमण आड़े आते हैं।

भगवान कृष्ण पर जन्मकाल से ही एक के बाद एक आक्रमण हुए। वसुदेव जब उन्हें टोकरी में रखकर गोकुल ले जा रहे थे तो सिंह की गर्जन, घटाओं का वर्षण, सर्पों का आक्रमण जैसे व्यवधान उत्पन्न हुए। इसके बाद पूतना, वृत्तासुर, तृणावर्त, कालिया सर्प आदि द्वारा उनके प्राणहरण की दुरभिसन्धियाँ रची जाती रहीं। कंस, जरासन्ध जैसे अनेकों शत्रु बन गये। चाणूर, मुष्टिकासुर आदि ने उन पर अकारण आक्रमण किए। अन्ततः भीलों क्षरा गोपियों का हरण, व्याध द्वारा प्रहार करने जैसी घटनाएँ घटित हुईं।

कृष्ण की चरित्र-निष्ठा और न्याय-निष्ठा उच्चस्तरीय थी तो भी उन पर स्यमन्तर मणि चुराने का दोष लगाया गया। चरित्र-हनन की चोट भगवान राम को भी सहनी पड़ी। सीता जैसी सती को लोगों ने दुराचारिणी कहा और अग्निपरीक्षा देने के लिए विवश किया। जयन्त ने सीताजी पर अश्लील आक्रमण किया। सूर्पणखा राम के स्तर को गिराकर असुरों के समतुल्य ही बनाना चाहती थी। चाहना अस्वीकार करने पर उसने जो विपत्ति ढहाई वह सर्वविदित हैं। सत्यता और कर्त्तव्यों के प्रति राम के व्यवहार में कहीं कोई अनौचित्य नहीं था। फिर भी उसने वह षड्यन्त्र रचा जिससे उन्हें चौदह वर्ष के एकाकी वनवास में प्राण खो बैठने जैसा ही त्रास सहना पड़ा। रावण जैसे राक्षसों ने आक्रमण पर आक्रमण किये, इनमें से किसी से भी राम की ओर से पहल नहीं हुई थीं। वे तो मात्र आत्मरक्षा की ही लड़ाई लड़ते रहे।

ईसा को अपराधी ठहराया गया और शूली पर लटकाया गया। सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ा। दयानन्द को विष दिया गया। गाँधी को गोली से उड़ाया गया। व्याध ने कृष्ण के प्राणहरण किये। गुरु गोविन्द सिंह के अबोध बालकों को जल्लादों सिंह के अबोध बालकों को जल्लादों के सुपुर्द किया गया। मीरा निर्दोष होते हुए भी उत्पीड़न सहती रहीं। जहाँ तक अपराधों, आक्रमणों और प्रताड़नाओं का सम्बन्ध है, वहाँ तक जो जितना उच्चस्तरीय आत्मवेत्ता हुआ उसे उतना ही अधिक भार सहना करना पड़ा है। भगवान बुद्ध की जीवन-गाथा पढ़ने से पता चलता है कि पुरातन पंथी और ईर्ष्यालु उनके प्राणघाती शत्रु बने हुए थे। उन्होंने अंगुलिमाल को आक्रमण के लिए उकसाया था। चरित्र हनन के लिए लिए ढेरों दुरभिसंधियाँ रची थीं। समर्थकों में अश्रद्धा उत्पन्न करने के लिए जो षड्यन्त्र रचे जा सकते थे उसमें कुछ कसर नहीं छोड़ी गई थी। गाँधीजी का सतत् विरोध होता रहा। उन पर पैसा बटोरने और हड़पने का लाँछन लगाने वालों की संख्या आरम्भ में तो अत्यधिक थीं, अन्ततः उन्हें गोली से ही उड़ा दिया गया। मध्यकाल के संतों में सक प्रायः प्रत्येक को शत्रुओं की प्रताड़नाएं सहनी पड़ी हैं। आद्य शंकराचार्य, चैतन्य महाप्रभु, रामदास, एकनाथ, तुकाराम, ज्ञानेश्वर, रामदास, गुरु गोविन्द सिंह, बन्दा वैरागी आदि इसके जीते-जागते प्रमाण हैं।

संसार के सुधारकों में प्रत्येक को प्रायः ऐसे ही आक्रमण न्यूनाधिक मात्रा में सहने पड़े है। संगठित अभियानों को नष्ट करने के लिए कार्यकर्त्ताओं में फूट डालने, बदनाम करने, बल प्रयोग से आतंकित करने जैसे प्रयत्न सर्वत्र हुए हैं। ऐसा क्यों होता है यह विचारणीय है। सुधारक पक्ष को अवरोधों का सामना करने पर उनकी हिम्मत टूट जाने, साधनों के अभाव से प्रगतिक्रम शिथिल या समाप्त हो जाने जैसे प्रत्यक्ष खतरे तो हैं, किन्तु परोक्ष रूप से इसके लाभ भी बहुत हैं। व्यक्ति की श्रद्धा एवं निष्ठा कितनी सच्ची और कितनी ऊँची है, इसका पता इसी कसौटी पर कसने से लगता है कि आदर्शों का निर्वाह कितनी कठिनाई सहन करने तक किया जाता रहा। अग्नि तपाये जाने और कसौटी पर कसे जाने और कसौटी पर कसे जाने से कम में, सोने के खरे-खोटे होने का पता चलता ही नहीं। आदर्शों के लिए बलिदान से ही महामानवों की अन्तःश्रद्धा परखी जाती है और उसी अनुपात से उनकी प्रमाणिकता को लोकमान्यता मिलती है। जिसे कोई कठिनाई नहीं सहनी पड़ी ऐसे सस्ते नेता सदा सन्देह और आशंका का विषय बने रहते हैं। श्रद्धा और सहायता किसी पर तभी बरसती है, जब वह अपनी निष्ठा का प्रभाव प्रतिकूलताओं से टकराकर प्रस्तुत करता है।

दुरभिसंधियों के रचने वाले हर सफलता के बाद दुगुने साहस के साथ अपने दुष्कर्मों को निर्द्वन्द्व होकर बढ़ाते हैं। निष्ठावानों से टकराने पर उनके दाँत खट्टे होते हैं। आक्रमण महँगा पड़ता है और भविष्य के लिए उनकी हिम्मत टूट जाती है। लोक तिरस्कार के कारण वे मुँह दिखाने लायक नहीं रहते। यह उदाहरण दूसरे के सामने भी प्रस्तुत होता है और श्रेष्ठता से अकारण टकराने का प्रतिफल क्या होता है, इसका पता न केवल आततायियों को, वरन् उस वर्ग के अन्य लोगों का साहस तोड़ने के लिए भी पर्याप्त होता है। अपयश और तिरस्कार का दण्ड जेल-फाँसी से भी महँगा पड़ता है। ऐसी स्थिति श्रेष्ठ व्यक्तियों या आन्दोलनों से ही टकराने पर बनती है। सामान्य लोगों के बीच तो आक्रमण-प्रत्याक्रमण के क्रम आये दिन चलते ही रहते हैं।

अन्धश्रद्धाओं का समर्थन भी जोखिम भरा है। किसी के साथ अनगढ़, अधकचरे, अपरिपक्वों की मण्डली हो तो वह उसे जन-शक्ति समझने की भूल करता रहता है। किसकी श्रद्धा एवं आत्मीयता कितनी गहरी है, इसका पता चलाने का एक मापदण्ड यह भी है कि अफवाहों या किन्तु सदाशयता की पक्षधर अनेकानेक घटनाओं को क्षणभर में भुला न दिया जाय। जो अफवाहों की फूँक से उड़ सकते हैं वे वस्तुतः बहुत ही हलके और उथले होते हैं। ऐसे लोगों का साथ किसी बड़े प्रयोजन के लिए कभी कारगर सिद्ध नहीं हो सकता। उन्हें कभी भी, कोई भी, कुछ भी कहकर विचलित कर सकता है। ऐसे विवेकहीन लोगों की छँटनी कर देने के लिए कुचक्रियों द्वारा लगाये गये आरोप या आक्रमण बहुत ही उपयोगी सिद्ध होते हैं। योद्धाओं की मण्डली में शूरवीरों का स्तर ही काम आता है। शंकालु, अविश्वासी, कायर प्रकृति के सैनिकों की संख्या भी पराजय का एक बड़ा कारण होती है। ऐसे मूढ़मतियों को अनाज में से भूसा अलग कर देने की तरह यह आक्रमणकारिता बहुत ही सहायक सिद्ध होती है। दुरभिसन्धियों के प्रति जन-आक्रोश उभरने से सहयोगियों का समर्थन और भी अधिक बढ़ जाता है। उस उभार से सुधारात्मक आन्दोलनों का पक्ष सबल ही होता है। कुसमय पर ही अपने-पराये की परीक्षा होती है। इस कार्य को आततायी जितनी अच्छी तरह सम्पन्न करते हैं उतना कोई और नहीं। अस्थिर मति और उद्दण्ड साथियों से पीछा छूट जाना और विवेकवानों का समर्थन-सहयोग बढ़ना जिन प्रतिरोधों की उत्तेजना उत्पन्न हुए बिना सम्भव ही नहीं होता।

प्रज्ञावतार ही निष्कलंक अवतार है। उसके प्रतिपादनों और समर्थकों को लोकश्रद्धा कैसे मिले? इसके रचनात्मक आधार तो कितने ही हैं, पर एक निरोधात्मक आधार भी हैं-आसुरी आक्रमण। इसके पश्चात् ही किसी महान् व्यक्ति या आन्दोलन की प्रौढ़ता का पता चलता है। कलंक-कालिमा दौर और अवरोध-आक्रमणों का क्रम ही अगले दिनों वह स्थिति उत्पन्न करेगा, जिससे निष्कलंक भगवान की सर्वत्र जय-जयकार होने लगे।

यह क्रम अपने इस अभियान में भी निश्चित रूप से चलेगा। चलता भी रहा है। प्रतिगामी निहित स्वार्थों द्वारा तरह-तरह के आक्षेप लगाये जाते रहे हैं। बदनाम करने का कोई अवसर उन्होंने नहीं छोड़ा। अश्रद्धा उत्पन्न करने के लिए जो कुछ कहा जा सकता था- जो कुछ किया-कराया जा सकता था, उसमें कहीं कुछ कमी नहीं रहने दी गई है। यह सारा उत्पात उन आसुरी तत्वों का है जो अवाँछनीयताओं की सड़ी कीचड़ में ही डाँस, मच्छरों की तरह अपनी जिन्दगी देखते हैं। कुछ ईर्ष्यालु हैं, जिन्हें अपने अतिरिक्त किसी अन्य का यश-वर्चस्व सहन ही नहीं होता। इसके अतिरिक्त सड़े टमाटरों का भी एक वर्ग हैं जो पेट में रहने वाले कीड़ों की, चारपाई पर साथ सोने वाले खटमलों की, आस्तीन में पलने वाले साँपों की तरह जहाँ आश्रय पाते हैं, वहीं खोखला भी करते हैं। बिच्छू अपनी माँ के पेट का माँस खाकर ही बढ़ते और पलते हैं, माता का प्राणहरण करने के उपरान्त ही जन्म धारण करते हैं। कृतघ्नों और विश्वासघातियों का वर्ग इस युग में जिस तेजी से पनपा है उतना सम्भवतः इतिहास में भी इससे पहले कभी भी नहीं देखा गया।

अवाँछनीयता हर क्षेत्र में जड़ जमाये बैठी है। युग-परिवर्तन की प्रक्रिया भी उसे उखाड़ने की उसी क्रम अनुपात से चलेगी जितनी कि सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों को संवर्द्धन हेतु। ऐसी दिशा में दुष्प्रवृत्तियों के सामने जीवन-मरण का प्रश्न उपस्थित होगा। अभियान को जब तक दुर्बल समझा जाएगा, तब तक उसे उपहास-उपेक्षा का पात्र बने रहने दिया जाएगा। व्यंग्य, तिरस्कार बरसते रहेंगे। किन्तु जब उसकी समर्थता और सफलता का आभास होने लगेगा तो विरोध एवं आक्रमण का सिलसिला चल पड़ेगा। अन्ततः वह देवासुर संग्राम उतना ही प्रचण्ड हो जाएगा जितना कि सृजन प्रत्यावर्तन। इसके लिए प्रत्येक सृजनशिल्पी को पहले से ही तैयार रहना होगा। किसान का मुख्य काम अन्न उपजाना है, विभुक्षा का समाधान करना है। तो भी उसे इस कार्यक्षेत्र में आये दिन सर्प, बिच्छुओं, दीमकों, सुअर, भेड़ियों से मुठभेड़ के साधन सँजोकर रखने होते हैं। स्वयं श्रेष्ठ कर्म में निरत हैं, यह इस बात की गारंटी नहीं कि दुष्ट-दुरात्माओं के आक्रमण होंगे ही नहीं। सज्जनता सामने से ही अनाक्रम दीखती हैं, पर परोक्ष रूप से उसमें भी दुष्टता की विघातक सामर्थ्य परिमाण में भरी पड़ी है। असुर वस्तुस्थिति को समझता है, इसलिए देव पर कुछ प्रत्यक्ष कारण न रहने पर भी आक्रमण करने से चूकता नहीं। प्रकाश के उदय में अन्धकार की मृत्यु हैं। इसलिए सूर्योदय से पूर्व एक बार सघन तमिस्रा जमा होती है और प्रकाश से जूझने का उपक्रम करती है, भले ही उसे अन्ततः मुँह की ही क्यों न खानी पड़े।

शाँतिकुँज के युग-निर्माण अभियान की प्रज्ञावतार प्रक्रिया इन समस्त सम्भावनाओं से भरी हुई है। सहयोग उसे प्रचुर परिमाण में मिलना है, किन्तु ऐसी घटनाएँ भी कम नहीं होंगी जो प्रत्यक्ष आक्रमण में कठिनाई और परोक्ष दुरभि-सन्धि रचने में सरलता देखकर उसी मार्ग को अपनाये। अन्तः क्षेत्र से उभरने वाली और बाहरी क्षेत्र से आक्रमण करने वाली दोनों ही स्तर की दुरभिसन्धियों से अभियान की सुरक्षा का प्रबन्ध हम सभी को करना चाहिए। इस संदर्भ में बरती जाने वाली जागरुकता, साहसिकता एवं शूरवीरता उतनी ही आवश्यक है जितनी कि सृजन प्रयोजनों के लिए बरती जाने वाली उदार सेवा-साधना एवं भावभरी परमार्थ-परायणता।


स्वतन्त्रता स्वर्णजयन्ती लेखमाला-1 - स्वामी विवेकानन्द के सपनों का भारत

स्वाधीनता का पचासवाँ वर्ष पूरा होने को है। स्वर्णजयंती की स्वर्णिम आभा के लिए जिन महामानवों ने सपने सँजोये थे, उनमें स्वामी विवेकानन्द अद्वितीय और अनुपम हैं। स्वामीजी राष्ट्रीय नवजागरण के प्रथम मंत्रदृष्टा थे। राष्ट्रप्रेम उनके रोम-रोम में समाया था। उनके विचारों के आलोक में हम सब स्वतन्त्र भारत के नागरिक अपने राष्ट्रीय कर्त्तव्यों की समीक्षा कर सकते हैं। आखिर हम कहाँ चूक गये? क्यों आज राष्ट्रीय स्वाधीनता का स्वर्णजयंती वर्ष, देश के नागरिकों एवं कर्णधारों के त्याग-बलिदान, प्रतिभा एवं ज्ञान के गौरव से दीप्त होने की बजाय आपराधिक घोटालों, जालसाजी, अलगाव एवं आतंक की कालिमा से धुँधला हो रहा है। भारत-माता के चेहरे पर पीड़ा की लकीरें आज साफ नजर आ रही हैं। विश्ववन्द्य माँ भारती आज विदेशियों से नहीं अपनी ही सन्तानों से छली जा रही हैं।

आखिर कैसे हुआ यह सब? स्वामीजी के शब्दों में-”यह वहीं प्राचीन भूमि है, जहाँ। दूसरे देशों को जाने से पहले तत्वज्ञान ने आकर अपनी वासभूमि बनायी थी। यह वही भारत है जहाँ के आध्यात्मिक प्रवाह का स्थूल प्रतिरूप उसके समुद्राकार नद हैं। जहाँ चिरन्तन हिमालय श्रेणीबद्ध उठा हुआ अपने हिमशिखरों द्वारा मानो स्वर्ग राज्य के रहस्यों की ओर निहार रहा है। यह वही भारत है जिसकी भूमि पर संसार के सर्वश्रेष्ठ ऋषियों की चरणज पड़ चुकी है। यहीं सबसे पहले मनुष्य प्रकृति तथा अंतर्जगत के रहस्योद्घाटन की जिज्ञासाओं के अंकुर उगे थे। आत्मा का अमरत्व, अंतर्यामी ईश्वर एवं जगत्प्रपंच तथा मनुष्य के भीतर सर्वव्यापी परमात्मा विषयक मतवादों का पहले-पहल यहीं उद्भव हुआ था। बाढ़ की तरह ज्ञान एवं विज्ञान के तत्वों तथा व्यापारिक समृद्धि ने समस्त संसार को बार-बार आप्लावित किया है। यह वही भारत है जो शताब्दियों के आघात, विदेशियों के शत-शत आक्रमण और सैकड़ों आचार-व्यवहारों के विपर्यय सहकर भी अक्षय बना हुआ है। यह वही भारत है जो अपने अविनाशी वीर्य और जीवन के साथ अब तक पर्वत से भी अधिक दृढ़तर भाव से खड़ा है।”

“इस पर्वतीय दृढ़ता के पीछे अपने देश के नागरिकों की राष्ट्रीय भावनाओं के साथ सजग अभिन्नता रही है। किसी जाति-विशेष, किसी धर्म विशेष से हमसे से किसी का कोई खास लगाव हो सकता है, किन्तु इसमें भी सबसे पहले हम भारतमाता के पुत्र-पुत्रियाँ हैं। भारतीय हैं-राष्ट्रीय गौरव हमारी सर्वोपरि पहचान, सर्वश्रेष्ठ परिचय है। यह ठीक है कि अध्यात्म भारतीय जीवन का मूल मंत्र रहा है, लेकिन हम साम्प्रदायिक कभी नहीं रहे। यूरोप तथा अन्य देशों में राजनैतिक विचार ही राष्ट्रीय एकता का आधार अपनी आध्यात्मिक संस्कृति रही है, हमारी आध्यात्मिक भावनाएँ, हमारी साँस्कृतिक विरासत हमारे राष्ट्रीय जीवन की मूल मूर्ति हैं।”

“लेकिन यह आध्यात्मिक कट्टरता का पर्याय नहीं, पारस्परिक आत्म-भाव एवं सौहार्द का विशेषण है। भारत ने कभी भी किसी नए विचार का विरोध नहीं किया। उसे ग्रहण करने, उसका समन्वय करने की सतत् चेष्टा की है। भारत की सर्वमान्य विशेषता है- उसकी आध्यात्मिकता एवं शान्तिप्रियता। यही हमारा जीवनरक्त है। यही राजनीति, समाज, शिक्षा और बुद्धि को सबल और सतेज बना सकती है। भारत विविध सम्प्रदायों का आश्रय-स्थल है। यहाँ की आध्यात्मिक विचारधारा का सर्वमान्य सिद्धान्त रहा है-एकं सद्विप्राः बहुधा वदन्ति। फिर साम्प्रदायिक द्वेष क्यों? यह सही है कि भारत में एक के बाद एक न जाने कितने सम्प्रदायों का उदय हुआ। ये आपस में टकराए भी, किंतु धीरे-धीरे जब कोलाहल शान्त हुआ, ये यहाँ की राष्ट्रीय मूल भावना में समाहित होते चले गए या यूँ कहें कि यहाँ की मूल भावना ने सबको स्वयं में आत्मसात् कर लिया। वर्तमान साम्प्रदायिक द्वेष को साम्प्रदायिक सौमनस्य में बदलने को महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कर्त्तव्य के रूप में निभाया जाना चाहिए। यही नियति की भवितव्यता भी हैं।”

स्वामीजी स्पष्ट उद्घोष करते हैं-”मेरा दृढ़ विश्वास है कि शीघ्र ही भारतवर्ष किसी में भी जिस श्रेष्ठता का अधिकारी नहीं था। शीघ्र ही उस श्रेष्ठता का अधिकारी हो जाएगा। अपूर्व महिमामण्डित भावी भारत का निर्माण होगा। सुदीर्घ रजनी अब समाप्त होती हुई जान पड़ रही है। महा दुःख का प्रायः अन्त ही प्रतीत होता है। महानिद्रा में निमग्न शव माना जाग्रत हो रहा है। इतिहास की बात तो दूर रही, जिस सुदूर अतीत के घनाँधकार को मन्द करने में अनुश्रुतियाँ भी असमर्थ हैं, वहीं से एक आवाज हमारे पास आ रही है। हिमालय की हर एक चोटी से प्रतिध्वनित होकर यह आवाज मृदु दृढ़तर परन्तु अभ्रान्त स्वर में हमारे पास तक आ रही है। जितना समय बीतता है, उतनी ही वह और भी स्पष्ट तथा गम्भीर होती जाती है। इसके प्रभाव से निद्रित भारत अब जगने लगा है। मानो हिमालय के ध्रुव केन्द्र प्रवाहित प्रायः अस्थि-माँस तक में प्राण-संचार हो रहा है। जड़ता धीरे-धीरे दूर हो रही है। जो अंधे हैं वे ही देख नहीं सकते और जो विकृत बुद्धि हैं वे ही नहीं समझ सकते कि हमारी मातृभूमि अपनी गम्भीर निद्रा से अब जाग रही है। अब उसे कोई रोक नहीं सकता। अब यह फिर से सो भी नहीं सकती। कोई बाहरी ताकत इस समय इसे दबा नहीं सकती, क्योंकि असाधारण शक्ति का अपना देश अब जागकर खड़ा हो रहा है।”

“ऐसे में राष्ट्रवासियों के कर्त्तव्य और बढ़ जाते हैं। जीवन, समृद्धि, ज्ञान-विज्ञान की चेतना सब ओर पहुँचे इसके लिए खासतौर पर प्रयत्न करने का यही समय है। जो इसमें सहायक होंगे, वे प्रभु योजना में भागीदार बनेंगे श्रेय और सम्मान पाएँगे, विभूतियों के अधिकारी बनेंगे। इसके विपरीत जो साधन और विभूतियों को अपने तक सीमित रखने की चेष्टा करेंगे, वे उपहास के पात्र होंगे, हास्यास्पद बनेंगे। प्रवाह की प्रचण्डता किसी के रोके नहीं रुकती। जो इसके लिए मिथ्या प्रयास करते हैं, वे कुछ समय के लिए तो उत्साहित हो सकते हैं, लेकिन शीघ्र ही उन्हें पता चलेगा कि प्रवाह उनके रोके नहीं रुका। वह बनाए गए बाँधों को तोड़ता, स्वयं का विस्तार करता हुआ आगे बढ़ गया। इसे अपने तक समेटे रखने वालों के पल्ले बदनामी के सिवा और कुछ नहीं पड़ा।”

“अन्तरिक्ष से समड़ने वाला दैवी प्रवाह सृजन के लिए है। महाशक्ति की यह बाढ़ हर कहीं-हर और सृजन के लिए निमन्त्रण दे रही है। जो राष्ट्र, समाज एवं जाति का अर्थ हैं वर्ग या श्रेणी विशेष। जाति का मूल अर्थ प्रत्येक व्यक्ति के अनुरूप अपने विशेषत्व को प्रकाशित करने की स्वाधीनता। जाति सम्बन्धी इसी भाव के त्याग से अपना अधःपतन हुआ। मात्र जाति से कोई छोटा-बढ़ा ऊँचा-नीचा नहीं होता। उसके आन्तरिक सद्गुण, अर्जित की गयी विभूतियाँ ही उसे श्रेष्ठ या कनिष्ठ बनाती हैं। सड़क का भंगी भी उतना ही उच्च तथा श्रेष्ठ है, जितना कि एक कुलीन ब्राह्मण।”

“नैतिकता और सदाचार राष्ट्रीय जीवन के आधार है। इन्हें राष्ट्रीय कर्तव्यों के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। लेकिन यह तभी सम्भव है जब हम अपनी साँस्कृतिक सीमा के प्रति जागरुक हों। यूरोप और अमेरिका का राष्ट्रीय आदर्श एवं मानक भिन्न है। हम उनकी नकल नहीं कर सकते। यह नकल पश्चिमी भावों का अन्धानुकरण हमारी अपनी प्रकृति के विपरीत होगा। जबरदस्ती ऐसा करने से हमारा राष्ट्रीय जीवन विचित्र विपर्यय से ग्रस्त हो जाएगा। हमें अपनी प्रकृति एवं राष्ट्रीय संस्कृति के अनुरूप राष्ट्रीय आदर्श एवं मानक खोजने होंगे। साथ ही इन्हें साकार स्वरूप देने के लिए नैतिकता एवं सदाचार को व्यक्तिगत जीवन, सामाजिक जीवन एवं राष्ट्रीय जीवन में सर्वोपरि स्थान देना होगा।”

“भारत में किसी भी प्रकार का समाज सुधार उधार की विचारधारा अथवा विदेशी अनुभवों के अनुकरण से सम्भव नहीं। हर देश का अपना अतीत होता है और उसी के अनुरूप उसकी मौलिक प्रकृति। इसका अपना इतिहास, अपनी परम्पराएँ, मूल्य एवं मानदण्ड होते हैं। इन्हें एकबारगी नकारा या झुठलाया नहीं जा सकता। राष्ट्रीय प्रकृति में जो भी सामयिक विकृति आ जाती है उसके निदान उसकी प्रकृति के अनुरूप ही खोजे जाने चाहिए। भारत को समाजवादी अथवा राजनैतिक विचारों से प्लावित करने के पहले आवश्यक है कि उसमें आध्यात्मिक विचारों की बाढ़ ला दी जाय। सर्वप्रथम हमारे उपनिषदों, पुराणों एवं अन्य सब शास्त्रों में जो अपूर्व सत्य छिपे हुए हैं, इन्हें इन सब ग्रन्थों के पन्नों से बाहर निकाल कर मठों की चहारदीवारियों को भेदकर वनों की शून्यता से दूर लाकर, कुछ सम्प्रदाय विशेषों के हाथों से छीनकर देश में सर्वत्र बिखेर देना होगा, ताकि ये सत्य दावानल के समान सारे देश को चारों ओर से लपेट लें उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक सब जगह फैल जाएँ। हिमालय से कन्याकुमारी और सिन्धु से ब्रह्मपुत्र तक सर्वत्र धधक उठें।”

“किसी भी राष्ट्र की प्रगति का सर्वोत्तम थर्मामीटर है वहाँ की महिलाओं की स्थिति। नारी राष्ट्रीय एवं सामाजिक जीवनवृत्त का केन्द्र हैं। भारतीय नारी में आध्यात्मिक एवं सामाजिक नेतृत्व की सारी सम्भावनाएँ मौजूद है। कदाचित् संसार की सभी स्त्रियों से अधिक। तभी तो स्वामीजी कहते हैं-”मेरे देश में नारी प्रार्थना के योग्य हैं, क्योंकि प्रार्थना से विश्व में एक नयी आत्मा का प्रादुर्भाव होता है। यही आत्मा ही किसी राष्ट्र की सार्थक सम्पत्ति है। मेरे देश में स्त्रियों में उतनी ही साहसिकता है जितनी कि पुरुषों में। सभी उन्नत राष्ट्रों ने स्त्रियों को समुचित सम्मान देकर ही अपने राष्ट्रीय गौरव को विकसित किया है। देश, जो राष्ट्र स्त्रियों का आदर नहीं करते, वे कभी बड़े नहीं हो पाए हैं और न भविष्य में कभी बड़े होंगे। हमारे देश के वर्तमान पतन का मुख्य कारण यह है कि हमने शक्ति की इन सजीव प्रतिमाओं के प्रति आदर-बुद्धि नहीं रखी। महिलाओं की विशेष रूप से सामाजिक सम्मान देना, उन्हें प्रगति व उन्नति के उचित अवसर उपलब्ध कराना भारतवासियों का अनिवार्य राष्ट्रीय कर्तव्य है। जहाँ की स्त्रियाँ उदासीन और दुःखी जीवन व्यतीत करती हैं, उस कुटुम्ब या देश की उन्नति की किसी भी स्थिति में आशा नहीं की जानी चाहिए।”

“हमें नारियों को ऐसी स्थिति में पहुँचा देना चाहिए, जहाँ वे अपनी समस्याओं को अपने ढंग से स्वयं सुलझा सकें। भारतमाता हमसे नारी शक्ति के उद्धारक बनने की नहीं, उनके सेवक और सहायक बनने की अपेक्षा करती हैं। भारतीय नारियाँ संसार की अन्य किन्हीं भी नारियों की भाँति अपनी समस्याओं को सुलझाने की क्षमता रखती हैं। आवश्यकता उन्हें उपयुक्त अवसर देने की हैं स्त्रियों की अवस्था सुधारे बिना भारतीय समाज की प्रगति की कोई आशा नहीं। पक्षी के लिए एक पंख से उड़ना सम्भव नहीं हैं।

भारत के स्वर्णिम वर्तमान एवं उज्ज्वल भविष्य के निर्माण के लिए जिस चीज की आवश्यकता है वह है लोहे की माँसपेशियाँ और फौलाद के स्नायु, दुर्दमनीय प्रचण्ड इच्छाशक्ति जो सृष्टि के गुप्त और रहस्यों को भेद सके और जिस उपाय से भी हो अपने उद्देश्य की पूर्ति करने में समर्थ हो, फिर चाहे उसके लिए समुद्र तल में ही क्यों न जाना पड़े। साक्षात् मृत्यु का ही सामना क्यों न करना पड़ें। हम मनुष्य बनाने वाला धर्म चाहते हैं। हम मनुष्य बनाने वाले सिद्धान्त ही चाहते हैं। हम सर्वत्र सभी क्षेत्रों में मनुष्य बनाने वाली शिक्षा ही चाहते हैं।”

“भारतमाता को अपनी समुन्नति के लिए अपनी कुछ विशुद्धात्मा सन्तानों की आवश्यकता है। उनके व्यक्तित्व के तेज से सहस्रों पुरुष स्फूर्ति प्राप्त करेंगे। मैं जो चाहता हूँ वह है लोहे की नसें और फौलाद के स्नायु, उनके भीतर ऐसा मन वास करता हो, जोकि वज्र के समान पदार्थ का बना हो। बल, पुरुषार्थ, वीर्य और ब्रह्मतेज सम्पन्न युवक-युवतियों की आवश्यकता है। भारत-माता अपने नव-निर्माण के लिए ऐसी कम से कम एक हजार सन्तानों को बलिदान चाहती है। मस्तिष्क वाली सन्तानों का, पशुओं का नहीं।”

“राष्ट्र निर्माण के लिए नाम-यश का मोह छोड़ो, काम में लगो। आलस्य का त्याग करो, इहलोक और परलोक के सुखभोग को दूर हटाओ। मेरे भीतर जो आग जल रही है, वही तुम्हारे भीतर जल उठे। तुम अत्यन्त निष्कपट बनो, राष्ट्र निर्माण के रणक्षेत्र में तुम्हें वीरगति प्राप्त हो। यही मेरी निरन्तर प्रार्थना है। पहले अपने आप पर विश्वास करो, सब शक्ति तुममें है। उसे जान लो और विकसित करो। केवल मात्र बातों से कुछ होने वाला नहीं है। जिसके मन में साहस और हृदय में प्यार है वही मेरे स्वप्नों के भारत का निर्माण कर सकता है। राष्ट्र-परायण बलिदानियों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। मुझे उज्ज्वल भविष्य स्पष्ट नजर आ रहा हैं। युगधर्म का यह महान् कार्य भारतीय युवाओं पर सम्पूर्ण रूप से निर्भर है। जगत की अनन्त शक्ति तुम्हारे भीतर है। जो कुसंस्कार तुम्हारे मन को ढके हुए हैं उन्हें भगा दो। साहसी बनो, सत्य को जानो और उसे जीवन में परिणत करो।”

राष्ट्र् निर्माता वही हो सकता है, जो विनीत, निरभिमानी और विश्वासपरायण है। ईश्वर के प्रति आस्था रखो, दुखियों का दर्द समझो और ईश्वर से सहायता की प्रार्थना करो। मैंने जीवन भर हृदय का रक्त बहाते हुए अपनी भूमिका निभा दी। अब राष्ट्र-निर्माण का दायित्व तुम पर, तुम सब भारत के युवकों एवं युवतियों पर है। मैं गरीबों, मूर्खों, दलितों और उत्पीड़ियों की भावभरों सेवा उनके कल्याण के लिए प्राणपण से यत्न थाती के तौर पर तुम्हें अर्पित करता हूँ। भगवान के प्रति एक महाबलि दो, अपने समस्त जीवन की बलि दो। प्रतिज्ञा करो कि अपना समस्त जीवन दीन−हीन, पतित लोगों के उद्धार कार्य में लगा दोगे। जो दिनों-दिन अवनति के गर्त में गिरते जा रहे हैं।

यह एक दिन का काम नहीं है और रास्ता भी अत्यन्त भयंकर कंटकों से आकीर्ण है। भगवान का नाम लेकर और उन पर अनन्त विश्वास रखकर भारत का युगों से संचित पर्वतकाय राशि में आग लगा दो। वह जलकर राख हो जाएगी। कार्य गुरुतर है और हम लोग साधनहीन हैं। तो भी हम अमृतपुत्र और ईश्वर की सन्तान हैं। हम अवश्य सफल होंगे। इस संग्राम में सैकड़ों खेत रहेंगे, पर सैकड़ों पुनः उनकी जगह खड़े हो जाएँगे। विश्वास, सहानुभूति, दृढ़ विश्वास और भावभरा प्यार चाहिए। जीवन तुच्छ है, मरण भी तुच्छ है, भूख भी तुच्छ है और जाड़ा भी तुच्छ है। पीछे मत देखो कौन गिरा, आगे बढ़ो। बढ़ते चला। विश्वास रखो एक गिरेगा तो दूसरा वहाँ डट जाएगा। इस प्रकार के निर्भीक युवक-युवतियों पर ही मेरे स्वप्नों के भारत का निर्माण टिका हुआ हैं।

“कर्मरत रहो अपने अहं को शून्य में विलीन हो जाने दो, फिर देखो मेरे स्वप्नों के भारत को अभ्युदय कैसे होता है? यह नया भारत निकलेगा हल पकड़े किसानों की कुटी भेदकर, माली, मोची, मेहतरों की झोंपड़ियों से। निकलेगा बनिये की दुकानों, भुजवा के भाड़ के पास से, कारखाने से, हाट से, बाजार से निकल पड़ेगा। झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से। इन लोगों ने सहस्र-सहस्र वर्षों तक नीरव अत्याचार सहन किया है, उससे पायी है अपूर्व सहिष्णुता। इन्होंने सनतन दुःख उठाया है, जिससे पायी है अटल जीवनी शक्ति ये लोग मुट्ठी भर सत्त खाकर दुनिया उलट देंगे। इन्हें आधी रोटी मिली तो तीनों लोकों में इतना तेज न अटकेगा ये रक्तबीज के प्राणों से युक्त हैं और पाया सदाचार बल, जो तीनों लोक में नहीं है। इतनी शान्ति, इतनी प्रीति, इतना प्यार, बेजबान रहकर दिन-रात खटना और काम के वक्त सिंह का विक्रम। यही है तुम्हारे सामने तुम्हारा उत्तराधिकारी भारत। अपनी रत्न पेटिकाएँ, अपनी मणि की अँगूठियाँ फेंक दो, इनके बीच, जितना शीघ्र फेंक सको फेंक दो। तुम हवा में विलीन हो जाओ, अदृश्य हो जाओ। तुम ज्यों ही ऐसा करोगे, उसी वक्त सुनोगे-त्रैलोक्यकम्पकारिणी भावी भारत की उद्बोधन ध्वनि।”

“ध्यान रहे हमारा राष्ट्र झोंपड़ियों में बसता है। वर्तमान समय में राष्ट्रपरायण लोगों का कर्तव्य है कि वे देश के एक भाग से दूसरे भाग तक जाएँ, गाँव-गाँव जाकर लोगों को समझाएँ कि अब आलसी बनकर बैठे रहने से काम नहीं चलेगा। उन्हें उनकी यथार्थ अवस्था का परिचय कराना होगा। उनसे कहना होगा, भाइयों! सब कोई उठो! जागो! अब और कितना सोओगो? जाओ और उन्हें अपनी अवस्था को सुधारने की सलाह दो, उनकी मदद करो और शास्त्रों की बातों को विराट रूप से सफलतापूर्वक समझाते हुए उदात्त सत्यों का ज्ञान कराओ। उनके मन में यह बात जगा दो कि ब्राह्मणों के समान उनका भी धर्म पर अधिकार है। सभी को चाण्डाल तक को भी इन्हीं जाज्वल्यमान मंत्रों का उपदेश दो। उन्हें सरल शब्दों में जीवन के लिए आवश्यक विषयों तथा वाणिज्य व्यापार तथा कृषि आदि की शिक्षा दो।”

“भारत की दुरावस्था का मुख्य कारण यह रहा कि मुट्ठी भर लोगों ने देश की सम्पूर्ण शिक्षा और बुद्धि पर एकाधिकार कर लिया। यदि हम पुनः राष्ट्रीय गौरव को दीप्त करना चाहते हैं, तो हम जन-समुदाय में शिक्षा का प्रसार करके वैसा कर सकते हैं। शिक्षा का अर्थ है पूर्णता की अभिव्यक्ति जो सब मनुष्यों में पहले से विद्यमान है। भारत जो झोपड़ियों में बसता है, अपना मनुष्यत्व विस्मृत कर चुका है। उन्हें शिक्षित करना है एवं उन्हें उनका खोया हुआ व्यक्तित्व वापस करना हैं। अनपढ़ शिक्षक के निकट नहीं आ सकते तो शिक्षक को उनके पास घर, खेत, कारखाने और हर जगह पहुँचना होगा। हमारे शास्त्र-ग्रन्थों में आध्यात्मिकता के रत्न विद्यमान हैं और जो अभी थोड़े ही मनुष्यों के अधिकार में मठों और अरण्यों में छिपे हुए हैं, सबसे पहले उन्हें निकालना होगा। मैं इन तत्वों को निकाल कर इन्हें सबकी, भारत के प्रत्येक मनुष्य की सार्वजनिक सम्पत्ति बना देना चाहता हूँ।”

“वेदान्त शिक्षा देता है कि अपनी आत्मा का आह्वान करो और अपने देवत्व को प्रदर्शित करो। अपने बच्चों को सिखाओ कि वे दिव्य हैं, बाकी सब अपने आप हो जाएगा। आवश्यकता है वीर्यवान, तेजस्वी, श्रद्धा सम्पन्न और दृढ़ निश्चयी व्यक्तियों की। ये संख्या में थोड़े भी हों तो भी राष्ट्र में जागरण का महोत्सव सम्पन्न होने लगेगा। इनके कृतसंकल्प होते हैं। भारत पुनः उठ खड़ा होगा। उसकी प्रसुप्त चेतना जाग उठेगी। हमारे कार्यों पर ही भारत का भविष्य निर्भर है। अब तो सतयुग की वापसी होने को है। अतः सब प्रकार के भेदों का अन्त होना ही है।”

“आचार्य शंकर की अपूर्व मेधा के साथ तथागत के हृदय की महानुभावना और अद्भुत लोकहितकारी शक्ति को मिलाकर ही भारत के उत्थान का सपना साकार हो सकता है। आदर्शोपलब्धि के लिए वास्तविक इच्छा यही हमारा पहला और बड़ा कदम है। इसके बाद अन्य सब कुछ सहज हो जाता है। जिनके भीतर ये भाव प्रखरता से उद्दीप्त हो उठे ऐसे व्यक्तियों का समुदाय ही राष्ट्रीय गौरव का निर्माण करता है। ये भाव हमारे मस्तिष्क तक सीमित न रहकर रक्त-मज्जा में घुल-मिल जाने चाहिए। संस्कृति ही युग के आघातों को सह्य कर सकती है, मात्र ज्ञान राशि नहीं। ज्ञान तो मात्र चमड़े की ऊपरी सतह तक ही सीमित है, एक खरोंच लगते ही वह पुरानी नृशंसता जग उठती हैं। अतः शिक्षा में, सेवा में संस्कृति का बोध हो। भारतवासियों में सुसंस्कारों का रोपण करके ही राष्ट्र की उज्ज्वल भवितव्यता साकार हो सकती है।”

“राष्ट्र के स्वर्णिम भविष्य के लिए हममें से प्रत्येक को अहर्निश उन करोड़ों पददलित भारतीयों को शिव समझ कर सेवा करनी होगी जो धनवानों, कुलीनों के छल और अत्याचारों का सदियों से शिकार बने हुए हैं। मैं उच्च और धनिकों की अपेक्षा उनके पास रहने, उनकी सेवा करने में विश्वास रखता हूँ। मैं दार्शनिक नहीं हूँ, तत्ववेत्ता नहीं हूँ और दलितों को प्यार करता हूँ। मेरे सपनों का भारत इन्हीं की झोंपड़ियों एवं इनके ही निश्छल-निर्मल हृदयों से उठकर आएगा।”

राष्ट्रीय नवजागरण का गगनभेदी उद्घोष करने वाले स्वामी विवेकानन्द के उपर्युक्त उद्गार न केवल राष्ट्र के नीति-निर्माताओं एवं कर्णधारों के लिए आत्मावलोकन की प्रेरणा देते हैं, बल्कि भारत के जन-गण-मन के लिए कर्त्तव्य का निर्धारण करते हैं। यह स्पष्ट सन्देश देते हैं कि तुम ही अपने भाग्य विधाता हो। उठो और अपने भाग्य का निर्माण करो। तुम्हारी निद्रा टूटते ही लुटेरे अपने आप पलायन कर जाएँगे। तुम्हारी भ्रान्तियाँ दूर होते ही अलगाव, आतंक का कोई स्थान न रहेगा। युगद्रष्टा स्वामीजी के स्वर स्वाधीनता की इस स्वर्णजयंती पर्व पर हम सबके संकल्प की सम्मिलित गूँज बन सकते हैं। फिर देर किस बात की है। उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्यवरत्रिबोधत्। उठो, जागों और रुको मत, जब तक लक्ष्य तक न पहुँच जाओ।


धारावाहिक स्तम्भ- - जिज्ञासाएँ आपकी-समाधान हमारे

महानगरों के व्यस्त जीवन के दौरान स्नान शुद्धि, समय-काल तथा भोजनादि का उतना नियमन नहीं हो सकता। क्या यह नियम शिथिल नियम हैं? अर्थात् बिना स्नान किए कभी भी दिन-रात्रि में गायत्री मंत्र दोहराया जा सकता है?

गायत्री महामंत्र एक ऐसा मंत्र है जिसे कभी भी, किसी भी समय, कहीं भी मानसिक जप को रूप में सम्पन्न किया जा सकता है। जिस वातावरण में जप किया जा रहा है, कम से कम उसकी शुद्धि और पवित्रता का ध्यान तो रखा ही जाना चाहिए। मानसिक जप कभी भी, किसी भी स्थिति में चल सकता है एवं जब भी ऐसा समय मिले यथा-बस में बैठे हुए, रेल यात्रा के दौरान अथवा प्रतीक्षारत कहीं बैठना पड़े तो मानसिक जप सतत् चलता रह सकता है। विधि-विधान के द्वारा जप-अनुष्ठान करना हो तो स्थान नियत कर षट्कर्म के बाद जप करना चाहिए। ब्रह्ममुहूर्त सहित तीनों संध्याओं में किए गए जप का निश्चित ही फल मिलता है। यदि वह भावार्थ पर ध्यान लगाकर किया हो, किन्तु यदि यह समय मर्यादा यदि संभव न हो तो इसे नित्य न्यूनतम करते रहने का नियम तोड़ना नहीं चाहिए, चाहे जब भी यह संभव हो। रात्रि की ड्यूटी होने, बीमारी की स्थिति, यात्रादि के कारण रुटीन की अस्तव्यस्तता होने पर जब समय मिले, थोड़ा मानसिक शुद्धि-पवित्रता का भाव मन में रख ध्यान को तल्लीनता की स्थिति में लाकर न्यूनतम एक माला का जप तो करना ही चाहिए। हो सके तो एक माला (छह मिनट) आत्म-कल्याण हेतु, एक लोककल्याण हेतु एवं एक संधिकाल की विषम परिस्थितियों के निवारणार्थ की जानी चाहिए। श्रद्धा-विश्वास, आचार-विचार, नियमितता इन चार नियमों का पालन करने से जप निश्चित ही फल देने लगता है। महानगरों, शहरों का व्यस्त कभी भी जप न कर पाने का या मानसिक जप न करने का कारण नहीं बनना चाहिए।

‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में योग प्रशिक्षण-योग थैरेपी-प्राकृतिक चिकित्सा आदि पर सामग्री कम देखने में आती है। इसे भी कुछ अंशों में देते रहने का प्रयास करें।

‘योग’ शब्द का जहाँ अर्थ दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में हैं, वहाँ अखण्ड ज्योति की पूरी विषयवस्तु उसी धुरी पर केन्द्रित हैं। योग चिकित्सा, प्राकृतिक चिकित्सा आदि पर नियमित स्तम्भ तो पत्रिका में नहीं है, पर अब अगले दिनों यह प्रयास रहेगा कि यह पक्ष भी किसी न किसी रूप में विषयवस्तु में समाविष्ट रहे। आहार-विहार, यम-नियम आदि पक्षों को तो समय-समय पर दिया जाता रहा है। वस्तुतः ‘अखण्ड ज्योति’ की विषय सामग्री जैसा परमपूज्य गुरुदेव निर्धारित कर गए हैं। उसी के अंतर्गत दी जाती रही है। प्राकृतिक चिकित्सा जैसा विषय पंचतत्वों के परिप्रेक्ष्य में कभी-कभी दिया जा सकता है, पर मूलतः यह शारीरिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित है, स्थूल विकारों की शुद्धि से इसका सम्बन्ध है। मनोविकारों से मुक्ति, उनकी चिकित्सा एवं आस्था-संकट निवारण द्वारा अध्यात्म के विभिन्न पक्षों का प्रतिपादन अखण्ड ज्योति की विषय परिधि के अंतर्गत आता है, किंतु अब चूँकि पाठकों ने माँग की है। योग के बहिरंग पक्ष को भी चिकित्साक्रम से जोड़ते हुए देते रहने का प्रयास करेंगे।

आप यदि विदेशी घटनाओं की चर्चा अपने लेख में करते हैं व उद्धरण देते हैं तो मैं नहीं सोचता कि यह आलोचना का विषय होना चाहिए। अच्छे प्रसंग जहाँ से मिलें, लेने चाहिए। देश-विदेश की सीमाएँ नहीं देखनी चाहिए। अतः अपना निर्णय पूर्ववत ही रखें। भारतीय संदर्भ भी जहाँ। अनिवार्य है, देते रहें।

उपर्युक्त टिप्पणी के विषय में हमें यही कहना है कि हमारा प्रयास पूरा रहता है कि उदाहरणों के माध्यम से व्यक्ति का चिंतन श्रेष्ठता की ओर बढ़े, चाहे वे विदेशी हों अथवा भारतीय। चूँकि विदेशी उदाहरण प्रचुर परिमाण में पूर्ण प्रामाणिकता के साथ मिल जाते हैं, अपने प्रतिपादनों की साक्षी में देने में कठिनाई नहीं होती। भारतीय उदाहरण मिलते कम हैं, उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध होती है एवं उनके क्रमबद्ध संकलन का अभी कोई भारत व्यापी तंत्र नहीं बन पाया हैं। अपना प्रयास यही है कि दोनों के बीच तालमेल बने। आपकी टिप्पणी से हमें बल मिला है एवं प्रयास रहेगा कि पाठकों को श्रेष्ठतम सामग्री द्वारा युग चिन्तन से अनुप्राणित कर सकें।

अखण्ड ज्योति के लेख-सामग्रियाँ निश्चित ही श्रेष्ठतम स्तर में हैं, किंतु पत्रिका ‘ओल्ड मॉडल’ (महावीर प्रसाद द्विवेदी युगीन) जैसी है। इसे युगानुरूप पत्रिका की शक्ल में विभिन्न स्तम्भों में

बाँटकर उनके उपशीर्षक ऊपर देकर लिखना चाहिए। सुझाव को अन्यथा न मानें, कई उपशीर्षक लिख रहा हूँ।

‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका साहित्य स्टाल पर बिकने वाली आम पत्रिकाओं से अलग है। इसी कारण इसके कुछ स्तंभ ही नियमित व उपशीर्षकों के साथ होते हैं। विविधता के साथ-साथ लोक-शिक्षण मूल उद्देश्य है। जीवन जीने की कला का शिक्षण चाहे एक कथानक के माध्यम से मिले अथवा वैज्ञानिक अध्यात्मवाद प्रधान एक लेख से, देने का प्रयास किया जाता है। आपने ढेरों उपशीर्षक दिए हैं। हम प्रयास करेंगे कि उन विषयों को भी इसी परिधि में ले लें, किंतु इसे आम पत्रिकाओं जैसा स्वरूप नहीं दे सकेंगे। यह हमारी विवशता नहीं, अपितु वह नीति है जिस पर हम चल रहे हैं एवं जो पाठकों द्वारा एक विशिष्टता के रूप में स्वीकार कर हृदयंगम की जाती रही है। आशा है आप भी इस तथ्य को भली-भाँति समझ रहे होंगे।


अपनों से अपनी बात- - गायत्री जयंती महापर्व से सपतसूत्री आँदोलन का शुभारम्भ

क्रियान्वयन हेतु सप्तर्षि क्षेत्र ‘शाँतिकुँज’ को ही छावनी के रूप में चुना गया है

युग-परिवर्तन के शब्द कहने और सुनने में सरल मालुम पड़ते हैं, पर विश्व की अगणित धाराओं के उलटी दिशा में बहने वाले प्रचण्ड प्रवाह को मोड़ने के लिए कितनी, किस स्तर की शक्ति चाहिए, इसका लेखा-जोखा तैयार करने पर विदित होता है कि बड़े काम के उपयुक्त ही बड़े साधन सँजोने पड़ेंगे। यह सरंजाम जुटाना न तो सरल है और न उसका स्वरूप स्वल्प है। दुनिया बड़ी है, उसकी समस्याएँ भी बड़ी हैं। इतने विशाल क्षेत्र की उलझनों को सुलझाने के लिए कितना कुछ करना पड़ेगा इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि पुराने खण्डहर को तोड़कर उसी की मिट्टी से नया भवन बनाने के लिए जो कुछ अभीष्ट है, वह सभी कुछ जुटाना पड़ेगा। इससे कम की तैयारी से मानवी कल्पना को हतप्रभ कर देने वाले लक्ष्य की पूर्ति नहीं हो सकती।

भगवान कृष्ण को महाभारत रचाना था। पाण्डव निमित्त बनाए गए थे, पर वे बेचारे करते क्या? अज्ञातवास वनवास की व्यथा भोगते-भोगते इतने साधनहीन हो गए थे कि कौरवों की दुर्धर्ष सत्ता को चुनौती दे सकने लायक सेना, शस्त्र, धन, साधन आदि कुछ भी उनके पास नहीं था। कृष्ण के बार-बार उकसाने पर भी पाण्डव लड़ने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे। अर्जुन तो ऐन वक्त तक कतराते रहे। इसका कारण स्पष्टतः तुलनात्मक दृष्टि से साधनों की न्यूनता होगी। संतुलन स्थापित करने के लिए भगवान कृष्ण ने गीता का उपदेश ही नहीं दिया था, रथ के घोड़े ही नहीं हाँके थे वरन् और भी बहुत कुछ किया था।

सर्वथा निर्धन और साधनहीन पाण्डवों का साथ देने, उनके पक्ष में लड़ने के लिए जो विशालकाय सेना खड़ी थी वह तमाशा देखने वाली भीड़ नहीं थी, उसे जुटाने, प्रशिक्षित एवं सुसज्जित करने से लेकर अर्थ-व्यवस्था और युद्ध योजना बनाने तक का सारा कार्य परोक्ष रूप से कृष्ण को ही करना पड़ा था तभी युद्ध में पाण्डव महाबली दुशासन और दुर्योधन की भुजा उखाड़ने और कमर तोड़ने का पराक्रम दिखा सके। इस महासमर में पाण्डव ही विजयी हुए सही, राजगद्दी पर वे ही बैठे सही-पर साथ ही यह भी सही है कि कंस, जरासन्ध, कौरव और शिशुपाल जैसे दैत्यों के माध्यम से नग्न नृत्य करने वाली असुरता को नीचा दिखाने की अद्भुत योजना का सूत्र-संचालन पर्दे के पीछे रहकर चक्रधारी के हाथों ही हो रहा था।

अभी इन दिनों युग-परिवर्तन के जिस प्रचण्ड अभियान से हम सब जुड़े हुए हैं, उसका भी सूत्र-संचालन किन्हीं अदृश्य हाथों से हो रहा हैं। हम सबके जीवन की बागडोर थामने वाले महासारथी का दृश्य भले ही 2 जून, 1990 की गायत्री जयन्ती के महापर्व पर ओझल हो गया हो, पर उनके गीता गान की परावाणी तनिक भी मन्द नहीं हुई हैं। अपनी अनन्त गुनी अलौकिक सामर्थ्य को हमें-हम सभी को सौंपने के लिए आतुर वे आज भी हमसे प्रत्येक से कह रहे हैं- “क्लैव्यं मा स्म गमः? ऐसे विषम समय में क्लीव मत बनो, कायरता मत दिखाओ। वे इन दिनों किस तह युग-निर्माण अभियान से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के अन्तःकरण को उद्वेलित, आन्दोलित करने में लगे हुए हैं, इसका अनुभव हम सभी को हैं।

लेकिन करें क्या? किस तरह से करें, ये प्रश्न हर किसी का मनोमन्थन कर रहे हैं। युग-परिवर्तन की भूमिका लगभग महाभारत जैसी ही है। इसे लंकाकाण्ड स्तर का भी कहा जा सकता है। स्थूल बुद्धि इतिहासकार इन्हें भारतवर्ष के अमुक क्षेत्र में घटने वाला घटनाक्रम भले ही कहते रहें पर तत्वदर्शी जानते हैं कि अपने-अपने समय में इन प्रकरणों का युगान्तकारी प्रभाव हुआ था। यह ठीक है कि अब परिस्थितियाँ भिन्न हैं। अब विश्व का स्वरूप भी दूसरा है। और फलस्वरूप परिवर्तन का उपक्रम भी दूसरा ही होना चाहिए। यह सुनिश्चित है कि वर्तमान युग-परिवर्तन प्रक्रिया का स्वरूप और माध्यम भूतकालीन घटनाक्रम से मेल नहीं खा सकेगा, किन्तु उसका मूलभूत आधार वही रहा जो कल्प-कल्पान्तरों से युग-परिवर्तन उपक्रमों के अवसर पर कार्यान्वित होता रहा हैं।

असुरता जिस स्तर की हो उसी के अनुरूप प्रतिरोध खड़ा करने के अतिरिक्त परिवर्तन की प्रक्रिया और किसी प्रकार सम्पन्न नहीं हो सकती। जनमानस की कुत्साओं-कुण्ठाओं ने जिस प्रकार जिस रास्ते मलिन, अवरुद्ध किया है, उसी रास्ते को उलटकर सृजन का उपक्रम खड़ा करना पड़ेगा। असुरता की व्यूह रचना के अनुरूप ही देव-शक्तियों को रणनीति बनानी पड़ती है। चक्रव्यूहों के कुचक्र को तहस-नहस करने के लिए तद्नुरूप ही सरंजाम जुटाने पड़ते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में तोप-तलवारों से नहीं, उन अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होना पड़ेगा, जिससे मानवी अन्तःकरण में गहराई तक घुस पड़े कषाय-कल्मषों का उन्मूलन किया जा सके।

समयानुसार पूज्य गुरुदेव इस तरह के अनेकों कार्यक्रम अपने कार्यकर्त्ताओं को देते रहे हैं, जिनको सम्पन्न करके असुरता को मुँहतोड़ जवाब दिया जा सके। उसके कुचक्र को तोड़ा जा सके। उनकी सतत् सक्रिय सूक्ष्म सत्ता आज भी शान्तिकुँज के संचालकों को मार्गदर्शन व निर्देश देती रहती हैं। यथार्थ में संचालन तन्त्र की डोर आज भी उन्हीं के हाथों में है। शेष हम सब कठपुतलियाँ हैं। जिनको वे अपनी इच्छानुसार नचाते और उनसे आश्चर्यजनक और अलौकिक कहे जाने वाले कार्यों को बड़ी आसानी से करवा लेते हैं। उनकी प्रेरणाएँ और निर्देश ही अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर शब्द समूह बनकर अवतरित होते रहते हैं।

इस बार भी उन्होंने शान्तिकुँज के संचालन तंत्र को सप्तसूत्री योजना को कार्यान्वित करने का निर्देश दिया है। यह निर्देश भले ही किसी एक को अपनी चेतना की गहराइयों में मिला हो, परन्तु उसकी अनुभूति सभी को हुई है। इस सप्त सूत्री योजना को सप्तसरोवर क्षेत्र में प्रवाहित कल्मषनाशिनी गंगा की सात धाराओं के रूप में भी समझा जा सकता है। इसे क्रियान्वित करने वाले कार्यकर्त्ता अपने लिए भक्त और भगवान के बीच प्रणय मिलन के मधुर बन्धन में बाँधने वाली सप्तपदी की भी संज्ञा दे सकते हैं। वाली सप्तपदी की भी संज्ञा दे सकते हैं। इन सातों सूत्रों का उद्गम स्थान-गोमुख की ही भाँति शान्तिकुँज ही है। भले ही उसे प्रवाह के रूप में कहीं भी क्यों न अनुभव किया जाय।

गायत्री जयन्ती गायत्री एवं गंगा के अवतरण की पुण्य तिथि है और साथ ही इन सातों महाधाराओं को व्यापक बनाने के लिए महासंकल्प की तिथि भी। ये सात सूत्र निम्न हैं-

आस्तिकता संवर्द्धन आन्दोलन,

नारी जागरण आन्दोलन,

विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन,

कुरीति उन्मूलन आन्दोलन,

सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन-दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन आन्दोलन,

व्यसन मुक्ति आन्दोलन,

स्वास्थ्य संवर्द्धन आन्दोलन।

इन संकल्पों से अपने परिजन किसी न किसी रूप से पहले भी परिचित रहे हैं, लेकिन अब इन कार्यक्रमों को उन्हें आन्दोलन का रूप देना है। आन्दोलन प्रारम्भ करने के लिए मात्र संकल्प पर्याप्त नहीं होता। उसके लिए विशिष्ट प्रशिक्षण एवं समुचित मार्गदर्शन की जरूरत पड़ती है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए शान्तिकुँज में गायत्री जयन्ती के महापर्व से पाँच दिवसीय विशेष सत्रों का आयोजन किया गया है। इन सत्रों में इन सभी आन्दोलनों के स्वरूप की विस्तृत जानकारी के साथ इन सबकी सूक्ष्म बारीकियों का ज्ञान कराया जाएगा। सप्त सूत्री आन्दोलनों को प्रभावशाली बनाने के लिए अपने-अपने क्षेत्र विशेष के अनुरूप हमारे कर्मठ कार्यकर्त्ताओं को कब-क्या और किस तरह से करना चाहिए, इसका व्यावहारिक मार्गदर्शन दिया जाएगा।

हर क्षेत्र की अपनी समस्याएँ होती हैं, परिस्थितिजन्य जटिलताएँ होती है, परिस्थितिजन्य जटिलताएँ होती हैं। उनका निराकरण शान्तिकुँज आए बिना, मिल-बैठकर चर्चा किए बगैर सम्भव नहीं। सप्तसूत्री आंदोलन की चर्चा सप्तऋषि क्षेत्र एवं गंगा की सप्तधाराओं के सान्निध्य में हो सके, इसे सुखद सौभाग्य ही माना जाएगा। पाँच दिवसीय विशेष प्रशिक्षण सत्रों के अतिरिक्त कार्यकर्त्ताओं को समयानुसार उचित मार्गदर्शन देते रहने के लिए इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण पत्राचार की योजना भी बनायी गयी है, जिसके द्वारा इन पाँच दिवसीय सत्रों में प्रशिक्षण लेने के बाद भी सामयिक समस्याओं का निदान-निराकरण सम्भव होता रहेगा।

निःसन्देह युग-परिवर्तन का प्रधान आधार भावनात्मक नव-निर्माण ही है। इसी के लिए उपर्युक्त सात मोर्चे खोले जा रहे हैं। जन-मानस में इन दिनों झूठी मान्यताओं की भरमार है। सोचने की सही पद्धति एक प्रकार से विस्मृत ही हो गयी है। स्थिति का सही मूल्याँकन कर सकने वाला दृष्टिकोण ही हाथ से चला गया है। उसके स्थान पर भ्रान्तियों की चमगादड़ विचार-भवन के गुम्बदों में उलटी लटकी पड़ी हैं। इस सारे कूड़ा-करकट को एक बार झाड़-बुहार कर साफ करना होगा और चिन्तन की तथा जीवन जीने की परिष्कृत प्रक्रिया को जनमानस में प्रतिष्ठापित करना पड़ेगा जो मानवीय गरिमा के अनुरूप है। इन सातों आन्दोलनों से वे सभी आधार प्रबल होंगे, जिनके चलते न अनैतिकताओं के लिए कोई स्थान रह जाएगा और न ही झूठी मान्यताओं के लिए। सप्त-आन्दोलनों के निर्मल प्रवाह द्वारा स्वच्छ और निष्पक्ष चिन्तन सुदूर कोनों तक पहुँचाया जा सकेगा। साथ ही इसके द्वारा किसी भी वर्ग के व्यक्ति उसी स्थान पर पहुँच सकेंगे, जिसके लिए भारतीय अध्यात्म अनादिकाल से अंगुलि-निर्देश करता रहा हैं।

शान्तिकुँज के सशक्त शक्ति उद्गम से सम्बन्ध बनाने वाले, संपर्क साधने वाले आन्दोलनकारी सृजन सेनानी अनुभव करेंगे कि उनके प्रयास की हलचलें जन-जन में दृष्टिगोचर होने लगी है। आशा की गयी है कि समुन्नत आत्माएँ निजी सुख-सुविधाओं को तिलांजलि देकर मानवता के भावनात्मक नवनिर्माण केक इस कदम को इस युग की सर्वोत्तम साधना, उपासना, तपश्चर्या एवं आवश्यकता समझते हुए इसी में सर्वतोभावेन संलग्न होंगी। साथ ही सामान्य स्तर के व्यक्तियों में इतना विवेक तो अनायास ही जाग्रत होगा कि वे अन्धकार और प्रकाश का अन्तर समझ सकें। अनुचित के लिए दुराग्रह छोड़कर इन आंदोलनों द्वारा प्रतिपादित न्याय और विवेक के उचित पक्ष को स्वीकार कर सके। इस प्रकार उभयपक्षीय सुयोग-संयोग उस प्रयोजन को अग्रगामी बनाता चला जाएगा, जो युगपरिवर्तन का मूलभूत आधार है।

युग-परिवर्तन के जिस अभियान का महाकाल ने प्रवर्तन-प्रत्यावर्तन किया है, वह वस्तुतः चेतनात्मक उत्कर्ष ही है। इसी हेतु महेश्वर महाकाल की प्रेरणा सप्तसूत्री कार्यक्रम बनकर शान्तिकुँज में अवतरित हुई। जिसका विस्तार युग-निर्माण आन्दोलन के विभिन्न केन्द्रों से होना और किया जाना है। यह चेतनात्मक उत्कर्ष की बात कहने से यह मतलब नहीं है कि भौतिक प्रगति व्यर्थ है। वह भी आवश्यक है, पर वह दूसरे लोगों का काम है। जिसे वे शक्ति भर सम्पन्न भी कर रहे हैं। सरकारें पंचवर्षीय योजनाएँ बनाती हैं। वैज्ञानिक शोध कार्य में जुटे हुए हैं। अर्थशास्त्री व्यवसाय का उत्पादन और वितरण का ताना-बाना बुन रहे हैं। सैन्य तन्त्र आयुधों के निर्माण और योद्धाओं के प्रशिक्षण में लगा है। शिक्षाशास्त्री बौद्धिक क्षमता के अभिवर्द्धन में लगे हैं। उपेक्षित तो समाज निर्माण का तन्त्र ही पड़ा है। उस नाम पर जो खड़ा है उसे तो विदूषकों जैसी विडम्बना ही कहा जा सकता है। धर्म के नाम पर जो कहा और किया जा रहा है उससे ऐसी आस्तिकता की अपेक्षा नास्तिकता भली प्रतीत होती है। कानून बनाने भर से न तो समाज की दुष्प्रवृत्तियों को मिटाया जा सकता है और न ही सत्प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिल सकता है। आज जब कानून बनाने वाला तंत्र ही शक के घेरे में आ खड़ा हुआ है, तो उनके बनाए कानूनों पर भला किसकी सच्ची श्रद्धा और आस्था टिकेगी?

इसे कर गुजरने की जिम्मेदारी तो अपने परिजनों, नव-निर्माण अभियान के कर्मठ सेनानियों पर आ पड़ी है। उन्हें ही इसे पूरा करना है। सप्त-सूत्री आन्दोलन की कार्य-योजना का अनुग्रह अवतरण इसीलिए चेतना की किसी उच्चस्तरीय कक्षा से हुआ है। इसमें भागीदार बनने के लिए शान्तिकुँज के पाँच दिवसीय प्रशिक्षण सत्रों में आने वाले परिजन अनुभव करेंगे कि उन पर समर्थ सत्ता का विशिष्ट अनुग्रह-अवतरण हो रहा है। उन्हें समर्थ बनाने वाली शक्ति का विशिष्ट अनुदान देने का संकल्प भी उसी का है। जिसने सप्तसूत्री आन्दोलनों की कार्ययोजना सुझायी है।

यहाँ आकर शक्ति-अनुदान पाने वाले अपने क्षेत्र में कार्य करते समय स्पष्ट देखेंगे कि अब तक व्यक्तिगत लाभ में संलग्न रहने की लिप्सा में फँसे हुए लोग भी लोकमंगल के लिए उत्सर्ग करने की उनकी आन्तरिक पुकार सुनेंगे। यह पुकार इतनी तीव्र होगी कि चाहने पर कि वे संकीर्ण स्वार्थपरता, व्यक्तिवादी जीवन जी ही न सकेंगे। उनके संपर्क में आने वालों की, लोग और मोह की जटिल जंजीरें वैसी ही टूटती दीखेगी, जैसे कृष्ण जन्म के समय बन्दीगृह के ताले अनायास ही खुल गए थे। यों माया-बद्ध नरकीटकों के लिए वासना और तृष्णा की परिधि तोड़कर परमार्थ के क्षेत्र में कदम बढ़ाना असम्भव जैसा लगता है। पेट और प्रजनन की विडम्बनाओं के अतिरिक्त वे क्या आगे की ओर कुछ बात सोच या कर सकेंगे? पर समय ही बतायेगा कि इसी जाल-जंजाल में जकड़े हुए वर्गों में से कितनी प्रबुद्ध आत्माएँ उछल कर आगे आती हैं और सामान्य स्थिति में रहते हुए कितने ऐसे अद्भुत क्रिया-कलाप सम्पन्न करती हैं, जिन्हें देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ेगा। जन्मजात रूप से तुच्छ स्थिति में जकड़े हुए व्यक्ति अगले दिनों जब महामानवों की भूमिका प्रस्तुत करते दिखाई पड़ें, तो समझना चाहिए कि युगपरिवर्तन का प्रकाश एवं चमत्कार सर्वसाधारण को प्रत्यक्ष हो चला। आज की स्थिति को देखते हुए यह कार्य बड़ा ही कठिन लगता है। धर्म विडम्बना के सस्ते प्रलोभनों को तिरस्कृत कर धर्मप्रेमी लोग कष्टसाध्य परमार्थ में प्रवेश करेंगे यह कठिन है। बुद्धिजीवी अपनी अच्छी-खासी सुविधाओं का परित्याग कर लोकमंगल के इन आन्दोलनों के लिए दर-दर ठोकरें खाएँगे, यह भी कठिन ही लगता है। पर युग-प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का प्रवर्तन करने वाले महेश्वर महाकाल का स्पष्ट आश्वासन है कि शान्तिकुँज के समर्थ शक्ति उद्गम से संपर्क साधने वालों को माध्यम बनाकर वे इस दुःसाध्य कार्य को भी अति सरलता से करवा लेंगे। सप्त-सूत्री आन्दोलनों की व्यापकता नियति की अवश्यम्भावी योजना हैं। इसमें भागी बनने वाले सुनिश्चित रूप से श्रेय के अधिकारी बनेंगे।

रीछ-वानर अपने प्राण हथेली पर लेकर मौत से लड़ने गए थे। बुद्ध के ढाई लाख अनुयायी यौवन की उमंगों को कुचलते हुए भिक्षु-भिक्षुणी बनने की जटिल प्रक्रिया स्वीकार करने को सहमत हुए थे। गाँधी की पुकार पर लाखों ने अपनी बर्बादी को स्वीकार किया था। इसी प्रकरण को यदि इतिहास फिर दोहराए तो इसे न कठिन मानना चाहिए और न असम्भव। जो भूतकाल में होता रहा है उसकी पुनरावृत्ति को कठिन या जटिल मानने का कोई कारण नहीं। समय की पुकार इस कष्टसाध्य प्रक्रिया को भी पूरी करके रहेगी। जीवन्त और जाग्रत आत्माओं का एक बड़ा वर्ग इन पंक्तियों को पढ़कर आगे आवेगा। ऐसा विश्वास किया गया है, उनकी सहायता से शान्तिकुँज द्वारा आन्दोलन की सभी सप्तधाराओं का ऐसा विशालकाय शस्त्रागार खड़ा किया जाएगा जिसकी सहायता से अनाचार की लंका को ध्वस्त किया जा सके।

आज का जनमानस मूढ़ता और दुष्टता की असुर प्रवृत्तियों में बेतरह चिपका दिखता है। वास्तविकता को उपहासास्पद मूर्खता माना जाता है। विवाहोन्माद एवं कुरीतियों का बोलबाला है। नारी उत्पीड़ित एवं प्रताड़ित स्थिति में जैसे-तैसे जीवन गुजार रही हैं। दुष्प्रवृत्तियों की इतनी बाढ़ आ गयी है कि कालेज की छात्र-छात्राएँ व्यसनों के जाल में उलझ गए है। असंयम एवं व्यसन ने जन-जीवन के स्वास्थ्य को चौपट करके रख दिया है। नीति और न्याय की, धर्म और ईश्वर की बातें तो बहुत कही-सुनी जाती हैं, पर व्यवहार में उतारना असम्भव कहा जाता है। सप्तसूत्री कार्य-योजना में भागीदार होने वाले देखेंगे कि आज की यह दुर्दशा कल बदलेगी कल बदलेगी और सर्वसाधारण को सही सोचने और सही अपनाने की ललक उठेगी। यह उभार लोकमानस में आने ही वाला है। दैवी चेतना इस कार्य में इतनी समर्थ भूमिका निभाएगी कि आन्दोलन की सप्तधाराओं का उपहास नहीं उड़ाया जाएगा वरन् उसका स्वागत-समर्थन आशातीत रूप में देखने को मिलेगा।

इसके प्रभाव से धर्म अपने वास्तविक रूप में प्रकट होगा। उसके प्रसार-प्रतिपादन का ठेका किसी वेश या वंश विशेष पर न रह जाएगा। सम्प्रदाय वादियों के डेरे उखड़ जाएँगे। उन्हें मुफ्त के गुलछर्रे उड़ाने की सुविधा छिनती दिखेगी तो कोई उपयोगी धंधा अपनाकर भले मानसों की तरह आजीविका उपार्जित करेंगे। तब उत्कृष्ट चरित्र, परिष्कृत ज्ञान एवं लोकमंगल के लिए प्रस्तुत किया गया अनुदान ही किसी को सम्मानित या श्रद्धास्पद बना सकेगा। पाखण्ड-पूजा के बल पर जीने वाले उलूक उस दिवा प्रकाश से भौंचक्के होकर देखेंगे और किसी कोटर में बैठे दिन गुजारा करेंगे। अज्ञानान्धकार में जो पौ बारह रहती थी, उन अतीत की स्मृतियों को वे ललचाई दृष्टि से सोचते भले ही रहें, पर फिर वह समय लौटकर कभी न आ सकेगा।

शान्तिकुँज के समर्थ शक्ति केन्द्र जहाँ परमपूज्य गुरुदेव की शक्ति समाहित है, के माध्यम से महाकाल इस महाक्रान्ति यज्ञ की हुताशन वेदी पर इन आन्दोलनों की सप्त आज्याहुतियों के लिए युग सेनानियों करे आमंत्रित कर रहा हैं। इसके द्वारा वह ऐसी प्रचण्ड-शक्ति का संचार करेगा कि अपूर्व दृश्य देखे जा सकेंगे। जनमेजय के नागयज्ञ की तरह फुफकारते हुए विषधर तक्षकों को जब ब्रह्मतेजस् स्वाहाकार द्वारा घसीटा ही जाएगा तो उस रोमाँचकारी दृश्य को देखकर दर्शकों के होश उड़ने लगेंगे। वह दिन दूर नहीं जब आज की अरणि-मन्थन से उत्पन्न स्फुल्लिंग शृंखला कुछ ही समय उपरान्त दावानल बनकर कोटि-कोटि जिह्वाएँ लपलपाती हुई वीभत्स जंजालों से भरे अरण्य को भस्मसात् करती हुई दिखाई देंगी।

इसी के साथ नवयुग का सूर्य अपना प्रकाश बिखेरने लगेगा। सभी जानते हैं कि सूर्योदय हमेशा पूर्व दिशा से होता है-ऊषाकाल की लालिमा उसकी पूर्व सूचना लेकर आती है। कुक्कुट उस पुण्य बेला की अग्रिम सूचना देने लगते हैं। तारों की चमक और निशा की कालिमा की सघनता कम हो जाती है। इन्हीं लक्षणों से जाना जाता है। इन्हीं लक्षणों से जाना जाता है कि प्रभातकाल समीप आ गया और अब सूर्योदय होने ही वाला है।

इन आन्दोलनों की सप्तसूत्री कार्य-योजना के प्रभाव-विस्तार से युग-परिवर्तन का सूर्योदय भी इसी क्रम से होगा। यूँ यह सार्वभौम प्रश्न है, विश्वमानव की समस्या है। एक देश या एक जाति की नहीं। फिर भी उदय का क्रम पूर्व से ही चलेगा। कुछ चिरन्तन विशेष परम्परा ऐसी चली आती है कि विश्वमानव ने जब भी करवट ली है, तब उसका सूत्र-संचालन सूर्योदय की ही भाँति पूर्व दिशा से हुआ हैं। यों पाश्चात्य देशवासी भारत को पूर्व मानते हैं, पर जहाँ तक आध्यात्मिक चेतना का प्रश्न हैं, निःसन्देह यह श्रेय-सौभाग्य इसी देश को मिला है कि वह विश्व की चेतनात्मक हलचलों का उत्तरदायित्व अग्रिम पंक्ति में खड़ा होकर वहन करे। इस बार भी ऐसा ही होने जा रहा है। सप्तसूत्री इन आन्दोलनों के माध्यम से महाकाल की चेतना युग-परिवर्तन का प्रकाश इसी पुण्यभूमि से आरम्भ करने जा रही है। जो कुछ ही समय में विश्वव्यापी बने बिना न रहेगा।

इन आन्दोलनों की सप्तसूत्री कार्य-योजना के प्रभाव-विस्तार से युग-परिवर्तन का सूर्योदय भी इसी क्रम से होगा। यूँ यह सार्वभौम प्रश्न है, विश्वमानव की समस्या है। एक देश या एक जाति की नहीं। फिर भी उदय का क्रम पूर्व से ही चलेगा। कुछ चिरन्तन विशेष परम्परा ऐसी चली आती है कि विश्वमानव ने जब भी करवट ली है, तब उसका सूत्र-संचालन सूर्योदय की ही भाँति पूर्व दिशा से हुआ हैं। यों पाश्चात्य देशवासी भारत को पूर्व मानते हैं, पर जहाँ तक आध्यात्मिक चेतना का प्रश्न हैं, निःसन्देह यह श्रेय-सौभाग्य इसी देश को मिला है कि वह विश्व की चेतनात्मक हलचलों का उत्तरदायित्व अग्रिम पंक्ति में खड़ा होकर वहन करे। इस बार भी ऐसा ही होने जा रहा है। सप्तसूत्री इन आन्दोलनों के माध्यम से महाकाल की चेतना युग-परिवर्तन का प्रकाश इसी पुण्यभूमि से आरम्भ करने जा रही है। जो कुछ ही समय में विश्वव्यापी बने बिना न रहेगा।

युग-परिवर्तन की घड़ियों में भगवान अपने विशेष पार्षदों को महत्वपूर्ण भूमिकाएँ सम्पादित करने के लिए आमंत्रित करता है। गायत्री परिवार, युग-निर्माण परिवार के सदस्य अपने को इसी स्तर का समझें और शान्तिकुँज के सतत् संपर्क में रहते हुए अनुभव करे कि युगान्तर के अति महत्वपूर्ण अवसर पर उन्हें हनुमान, अंगद जैसी विशेष भूमिका सम्पादित करने के लिए जन्म मिला है। हमें तथ्य को समझना चाहिए। अपने स्वरूप और लक्ष्य को पहचानना चाहिए और आलस्य-प्रमाद में बिना एक क्षण गँवाए अपने अवतरण का प्रयोजन पूरा करने के लिए अविलम्ब कटिबद्ध हो जाना चाहिए। अग्रगामी पंक्तियों में आने वालों को ही श्रेयभाजन बनने का अवसर मिलता है, महान् प्रयोजन को लिए भीड़ तो पीछे भी आती रहती हैं और अनुगामियों से कम नहीं कुछ अधिक ही काम करती हैं, पर तब श्रेय-सौभाग्य का अवसर बीत गया होता है। परमपूज्य गुरुदेव चाहते हैं कि युग-निर्माण परिवार की आत्मबल सम्पन्न आत्माएँ इन्हीं दिनों आगे आएँ और शान्तिकुँज में प्रशिक्षण प्राप्त करके अपने-अपने क्षेत्र में आंदोलन की सप्तधाराओं को प्रवाहित करें। उन्हें अग्रिम पंक्ति में खड़े होने वाले युग-निर्माताओं की ऐतिहासिक भूमिका निभाने में चूकना नहीं चाहिए। इन पंक्तियों का प्रत्येक अक्षर इसी संदर्भ से ओत-प्रोत समझा जाना चाहिए।


VigyapanSuchana

इस माह 15 जून को गायत्री जयंती पर्व पड़ रहा है। परमपूज्य गुरुदेव की यह महाप्रयाण तिथि भी है, हम सबके लिए एक पावन पुण्य पर्व भी। जो परिजन आ सकें वे युगतीर्थ आँवलखेड़ा, गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं शाँतिकुँज हरिद्वार पहुँचें। जो नहीं आ सकें या पिछले दिनों आकर ही गए हैं, वे इसे स्थानीय स्तर पर अखण्ड जप (न्यूनतम 12 से 18 घण्टे ) एवं दीपदान के माध्यम से इसे मनायें व युग-ऋषि के संकल्पों को पूरा करने की शपथ दुहरायें। सभी शाखाएँ - प्रज्ञामण्डल-प्रज्ञा-संस्थान इसे अपने यहाँ उत्साहपूर्वक मनाएँ।

अखण्ड-ज्योति के आगामी दा विशेषाँक अखण्ड-ज्योति पत्रिका परमपूज्य गुरुदेव के प्राण प्रवाह चेतनापुँज के रूप में प्रकाशित होती है। इसका जुलाई अंक ऋषियुग्म को गुरु पूर्णिमा की पावन वेला में समर्पित है। कुछ दुर्लभ संस्मरणों-पत्रों व चित्रों के साथ इस विशेषाँक को संग्रहणीय मानकर अधिक से अधिक परिजनों तक इसे पहुँचायें। मात्र बाँटने के लिए पढ़ाने, हृदयंगम करने के लिए पत्रिका का सितम्बर अंक विचार-क्रान्ति विशेषांक के नाम से प्रकाशित होगा। आगामी 30 माह में इस क्षेत्र में कैसे व क्या किया जाना है? इसका सम्पूर्ण मार्गदर्शन 2000 की वसंत पंचमी से आरम्भ होने वाली महापूर्णाहुति के प्रारूप के साथ इसमें होगा।

*समाप्त*