प्रभु ! तुम्हारा विश्वास शक्ति बने, याचना नहीं

हे प्रभु !मेरी केवल यही कामना है कि मैं संकटों से घबराकर भागूँ नहीं, उनका सामना करूँ । इसलिए मेरी यह प्रार्थना नहीं है कि संकट के समय तुम मेरी रक्षा करो, बल्कि मैं तो इतना ही चाहता हूँ कि तुम उनसे जूझने का बल दो । मैं यह भी नहीं चाहता कि जब दुःख-सन्ताप से मेरा चित व्यथित हो जाये, तब तुम सान्त्वना दो मैं अपनी अञ्जलि के भाव-सुमन तुम्हारे चरणों में अर्पित करते हुए इतना ही माँगता हूँ कि तुम मुझे अपने दुःखों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति दो ।

जब किसी कष्टदायक संकट की घड़ी में मुझे कहीं से कोई सहायता न मिले तो मैं हिम्मत न हारूँ । किसी और स्त्रोत से सहायता की याचना न करूँ, उन घड़ियों में भी संकटों और समस्याओं के सामने भी दृढ़ रह सकूँ और तुम्हें हर पल अपने साथ देखते हुए मुसीबतों, परेशानियों को हँसी-खेल समझकर अपने चित को हलका रखूँ, मैं बस यही चाहता हूँ ।

मेरे आराध्य ! तुम्हारा विश्वास हमेशा मेरे हृदय-मन्दिर में दीपशिखा की तरह अखण्ड अविराम प्रज्वलित रहे । मेरे प्रारब्ध के प्रबल झंझावात, परिस्थितियों की भयावह स्वयं मेरी अपनी मनोग्रंथियाँ इस ज्योति को बुझा तो क्या कँपा भी न सकें, विश्वास की यह ज्योति हर पल मेरे अस्तित्व में आत्मबल की ऊर्जा एवं तात्कालिक सूझ का प्रकाश उड़ेलती रहे, यह विश्वास मेरे लिए शक्ति बने याचना नहीं, सम्बल बने क्षीणता नहीं । कहीं ऐसा न हो कि स्वयं के तमोगुण से घिरकर तुम्हारे विश्वास का झूठा आडम्बर रचकर कर्म से विमुख हो जा जाऊँ, कर्तव्य से मुख मोड़ लूँ । चाहे जैसी ही प्रतिकूलताएँ हों व्यवहार में मुझे कितनी ही हानि क्यों न उठानी पड़े इसकी मुझे जरा भी परवाह नहीं है, लेकिन प्रभु मुझे इतना कमजोर मत होने देना कि मैं आसन्न संकटों को देखकर हिम्मत हार बैठूँ और यह रोने बैठ जाऊँ कि अब क्या करूँ मेरा सर्वस्व छिन गया ।

मैं न अहंकारी बनूँ और न ही अकर्मण्य । स्वयं को तुम्हारे चरणों में समर्पित हुए मेरी इतनी ही चाहत है कि जीवन संग्राम में रणबांकुरों योद्धा की तरह जुझारू बनूँ । तुम्हारे विश्वास की शक्ति से भयावह संकटों के चक्रव्यूहों का बेधन करूँ उन्हें छिन्न-भिन्न करूँ।

प्रभु तुम्हारा और केवल तुम्हारा विश्वास ग्रहण कर लोगों ने अकिंचन अवस्था में रहते हुए भी इतिहास-पुरुष बनने का गौरव हासिल किया है, जीव और संसार की श्रेष्ठतम उपलब्धियाँ अर्जित की है । मेरी बस यही कामना है कि तुम्हारा विश्वास मेरे लिए वीरता का पर्याय बनें आलस्य नहीं, धीरता का सम्बल बनें आतुरता की अकुलाहट नहीं, बस इतनी ही कृपा करना ।


जिसने जीवन-लक्ष्य को बेधा

राजगढ़ के महाराजा भद्रसेन एक कुशल योद्धा, न्यायप्रिय एवं दयालु शासक थे। वे वह अपनी प्रजा को जितना प्यार करते थे प्रजा भी उन्हें उतना ही प्यार करती थी। समीपवर्ती राज्यों के राजा उनकी ख्याति से जलते थे। राजगढ़ के दरबार में विद्वानों, योद्धाओं तथा विभिन्न कला के विशेषज्ञों को विशिष्ट स्थान प्राप्त था ।

इन्हीं में से एक भा------------------ अचूक निशानेबाज अप्रतिम समरेन्द्र रणबाँकुरा योद्धा होने के साथ वह एक उदार हृदय तथा स्वाभिमानी युवक था। उसकी निशानेबाजी आस -पास के सभी राज्यों में प्रसिद्ध थी, जिसे सुनकर दूर-दूर के निशानेबाज समरेन्द्र से मुकाबला करने के लिए आते थे लेकिन सभी को निराशा ही हाथ लगती क्योंकि समरेन्द्र का निशाना अचूक होता था ।

एक दिन दरबार में एक आदमी आया और बोला - “महाराज ! मैं समरेन्द्र के साथ निशानेबाजी का मुकाबला करना चाहता हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि मैं उसे पराजित करने में सफल हो जाऊँगा।” राजगढ़ नरेश भद्रसेन ने विस्मय से उसे देखा । साथ ही दरबार के सभी सदस्य उसे अचरज भरी नजरों से देखने लगे। उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा कि आखिर इस दुबले-पतले शरीर वाले युवक को क्या हो गया है जो यह समरेन्द्र जैसे अचूक निशानेबाज से मुकाबले की बात कह रहा है।

“क्या तुम्हें पता नहीं है कि पास-पड़ोस के सभी राज्यों के बेहतरीन निशानेबाज भी समरेन्द्र के साथ मुकाबला करने से कतराते हैं।” महाराजा भद्रसेन गम्भीर होते हुए बोले।

मुझे पता है कि महाराज ! लेकिन मैं उन निशानेबाज में से नहीं हूँ, जो दूसरे की शोहरत सुनकर डर जाते हैं। मुझे एक बार मौका दीजिए मुझे पूरा यकीन है कि समरेन्द्र मेरे सामने टिक नहीं पाएगा।

“ठीक है, लेकिन अगर तुम हार गए तुम्हें कड़ी सजा मिलेगी।” राजा ने कहा ।

“हाँ महाराज, मंजूर है ।”- युवक के स्वर में पर्याप्त दृढ़ता थी।

एक निश्चित तिथि पर दोनों को उपस्थित होना था।

प्रतियोगिता के लिए समरेन्द्र ने भी जमकर अभ्यास किया, प्रतियोगिता का प्रचार - प्रसार भी पड़ोसी देशों के राजा भी आए । लाखों की संख्या में भीड़ इकट्ठी हो गयी । ठीक समय पर दोनों निशानेबाज मैदान में उतरे । समरेन्द्र ने झुककर महाराज को--------------- भद्रसेन ने घोषणा की- “ जो भी उस धागे से लटके फल को लगातार दो बार गिरा देगा वही विजेता होगा।”

सभी को विश्वास था कि समरेन्द्र ही बाजी मारेगा । साधने की बारी उस युवक की आयी उसने निशाना साधा, बाण छोड़ा बाण ठीक उस धागे में लगा जिसमें फल बँधा हुआ था और फल नीचे गिर पड़ा ।पहला निशाना कामयाब देखकर सभी तालियाँ बजाने लगे। खुद राजगढ़ नरेश भी निशाने को देखकर विस्मित हो गए थे । लेकिन युवक का दूसरा निशाना खाली गया । तीसरी बार प्रयास करने पर भी वह विफल रहा । इस तरह युवक का निशाना एक ही बार कामयाब रहा।

अब बारी समरेन्द्र की थी। लोगों को पूर्ण विश्वास था कि बाजी अब उसी की झोली में चली जाएगी । उसने धनुष-बाण उठाकर निशाना साधते हुए बाण छोड़ा, लेकिन उसका पहला निशाना बेकार गया पहली बार समरेन्द्र का निशाना खाली जाते देख सभी लोग हैरत में पड़ गए। खुद राजा को भी विश्वास नहीं हो रहा था । इधर समरेन्द्र ने अपने धनुष पर दूसरी बार तीर चढ़ाया । अबकी बार उसने काफी साधकर बाण छोड़ा लेकिन उसका यह वार भी खाली गया । समरेन्द्र का जीवन में पहली बार ऐसा प्रदर्शन था। लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था कि यह वही समरेन्द्र, है जो अपनी आँखों में पट्टी बाँधकर अचूक लक्ष्य बेध करता है। लेकिन समरेन्द्र के चेहरे पर दुःख की कोई रेखा न थी । उसने तीसरी बार कोशिश की लेकिन यह भी बेकार गयी

तीनों बार में वह एक बार भी सही निशानेबाजी न कर सका । इसके बावजूद उसके चेहरे पर आश्चर्यजनक सन्तुष्टि के भाव थे ।

महाराजा भद्रसेन को समरेन्द्र के हारने का दुःख था किसी तरह पुरस्कार बाँटकर वह भारी मन से महल में लौटा आए । उन्हें अब भी विश्वास नहीं हो रहा था कि अचूक निशानेबाज समरेन्द्र हार गया है । काफी विचार करने पर भी जब वे कुछ समझ नहीं पाए तो उन्होंने उसे बुलाने का आदेश दिया कुछ ही पल में वह उनके सामने था ।

“ये सब कैसे हो गया समरेन्द्र ? तुम एक साधारण व्यक्ति से कैसे हार गए।” महाराज का गला रुंधा हुआ था।

“महाराज ! वास्तव में वह एक निपुण निशानेबाज था। मैंने पहले कभी वैसा निशानेबाज अपनी जिन्दगी में नहीं देखा ।” समरेन्द्र थोड़ा अटकते हुए बोला।

“ समरेन्द्र सब कुछ साफ- साफ बताओ वरना...”

भद्रसेन क्रोधित होते हुए बोले ।

“तो सुनिए महाराज ! मैं एक दिन नगर भ्रमण कर रहा था, तभी वह मुझसे मिला और अपने घर की दयनीय स्थिति बताते हुए अपने घर चलने का आग्रह करने लगा। उसकी बीमार माँ दवा के बिना बिछावन पर पड़ी कराह रही थी । बच्चे भूख के मारे रो रहे थे। तब मैंने ही वहाँ बैठकर इस प्रतियोगिता की योजना बनायी । क्योंकि वह यदि बहुत अच्छा नहीं तो काफी अच्छा निशानेबाज तो है ही और इसके बाद की सारी बातें आपने अपनी आँखों से देखी है।

पूरी घटना सुनकर महाराज की आँखें सजल हो गयीं वे उसे गले लगाते हुए बोले - “धन्य हो तुम किसी की कराहती हुई माँ और रोते हुए बच्चों को देखकर तुम्हारे मन में इतनी दया उमड़ आयी कि तुम जानबूझकर हार गये - अपनी चिर अर्जित ख्याति को पल भर में मिट्टी में मिला दिया।”

नाम-यश के झूठे मोह से मानवीय संवेदना का मोल कही अधिक है महाराज ! मानवीय जीवन का लक्ष्य आत्मीय संवेदना का विस्तार है । पीड़ितों की सेवा में स्वयं का उत्सर्ग है मैंने वही करने की कोशिश की है।” समरेन्द्र की वाणी भावोद्रेक में काँप रही थी।

“सचमुच तुमने जीवन लक्ष्य का बेध किया है।” महाराज की भी आँखें भर आयी।


सुव्यवस्थित विचारों से रंगे अपने मन का कैनवास

बात मन की चल पड़े तो उसकी चंचलता के किस्से आएँगे ही । बालक, वृद्ध, विद्यार्थी, व्यापारी सभी अपने मन के हाथों परेशान रहते हैं । जिन्हें अपनी ताकत का भारी दम्भ रहता है, ऐसे समर्थ युवाओं को भी उनका मन छकाता रहता है। साधनारत योगी भी इससे कम हैरान नहीं होते । तभी तो गीतोपदेश के समय योगचर्चा के दौरान अर्जुन ने घबराकर भगवान श्रीकृष्ण से पूछ लिया, आखिर यह सब होगा कैसे प्रभु? क्योंकि - चन्चलहि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवदद्वम । यानि कि हे कृष्ण! यह मन तो बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला और बड़ा मजबूत है। सभी का यही मानना है कि इसे एक ही दिशा में देर तक बनाए रखना ही एकाग्रता है। लेकिन यह एकाग्रता आसान नहीं, बड़े प्रयत्नों के बाद ही थोड़ी-बहुत देर के लिए सम्भव हो पाती है ।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मन एक बार में एक ही काम कर सकता है । अगर इस बात को ठीक तरह से ध्यान में समझ में आ जाएगा कि तमाम निरर्थक और निरुपयोगी बातों में उलझे रहने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होंगे । छोटी बातों में जिनका जीवन में उपयोग नहीं, बेकार उलझे रहने से हानि ही है, अच्छा तो यही है कि इन सबसे मुँह मोड़कर मन को निश्चित लक्ष्य एवं प्रयोजन में लगाया जाये ।

मानव-मन के मर्मज्ञ जे. एटकिन्सन ने अपने ग्रन्थ ‘माइण्ड एण्ड इट्स पावर्स में इस विषय की विस्तार से चर्चा की है । उनका कहना है कि एकाग्रता सिद्धि का सबसे बढ़िया उपाय यही है कि मन को बेकार की उलझनों, समस्याओं से दूर रखा जाये । जिनसे अपने लक्ष्य का सीधा सम्बन्ध हो ऐसी ही बातों और विचारों तक सीमित रहा जाये । ज्यादातर लोग अपने को घर-परिवार मुहल्ले, समाज,

देश-दुनिया की तमाम छोटी-छोटी बातों में व्यस्त बनाए रखते हैं। इन फिजूल की बातों का न तो खुद से कोई सम्बन्ध होता है और न ही घर-परिवार मुहल्ले-समाज राष्ट्र की ही व्यवस्था-प्रगति में ही कोई योगदान । उलझने की वृति निरर्थक उत्सुकता की वृति ही है । यह वृति अपनी विचारधाराओं को संकीर्ण एवं विश्रृंखल बनाती है। उसमें उलझनें से मन अस्त-व्यस्त छिन्न-भिन्न और चंचल ही बना रहता है तथा उसकी एकाग्रता-शक्ति विकसित नहीं हो पाती। वाचाल और गप्पी लोगों की इधर-उधर की बातें सुन-सुनकर उन्हीं में उलझे रहना मनः शक्ति का अपव्यय ही है। ऐसे लोगों का संग करने से धीरे-धीरे स्वयं का विचार स्तर भी वैसी ही बनने लगता है ।

‘कन्सेप्ट ऑफ माइण्ड’ में लियोनिद सखारोव कहते हैं कि विचारधारा की प्रकृति एवं स्तर, संगति तथा साहित्य के अनुरूप ही बनता है। जैसे लोगों के साथ व्यक्ति रहता है और जिस तरह का साहित्य वह पढ़ता है, वैसी ही उसकी विचारधारा बनती रहती है अखबारों में से ढूँढ़-ढूँढ़कर सनसनीखेज बातें चित्र-विचित्र समाचार, जासूसी कहानियाँ, हलके दर्जे के उपन्यास और कामोत्तेजक साहित्य पढ़ने से मन की चंचलता ज्यादा ही बढ़ जाती है । एकाग्रता का मन के वैचारिक स्तर से नजदीकी रिश्ता है। गम्भीर, शालीन, विचारवान लोगों का साथ और श्रेष्ठ साहित्य के अध्ययन से वैचारिक

स्तर में क्रमशः निखार आता है । उसी क्रम से मन की एकाग्रता का अभ्यास भी बढ़ जाता है ।

सही पूछो तो एकाग्रता का मतलब गहराई में प्रवेश करने की प्रवृत्ति है। मनोविद एम.जैकब अपनी रचना ‘माइण्ड इट्स हेल्युसिनेशन एण्ड एल्यमिनेशन‘ में बताते हैं कि------------------------- एकाग्रता के इस असली मतलब को सही समझकर उसे एक जगह बाँधने में जुट जाते हैं । वैसे इस एकाग्रता से लाभ हैं। यह भी उपयोगी है, लेकिन यह शुरुआत की नहीं बाद की सीढ़ी है और इस विशेष एकाग्रता की रोजमर्रा के उपयोग में जरूरत भी नहीं पड़ती । कतिपय विशेष योग-साधनाओं में ही वैसी एकाग्रता अपेक्षित होती है । यदि प्राथमिक अभ्यास कर लिया जाये तो वैसी एकाग्र साधना भी कुछ खास कठिन नहीं रह जाती । पर होता है कि वैसी एकाग्रता के कुछ

ऊल-जलूल चमत्कारों को पढ़-सुनकर हम मन के साथ कुश्ती में उपलब्ध तो कुछ करते नहीं है विफलता, निराशा और तनाव से उपजी अस्त-व्यस्तता ही गले पड़ती है ।

जिस एकाग्रता की रोजमर्रा के जीवन में जरूरत है, वह लेखकों कवियों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों, गणितज्ञों, कलाकारों की एकाग्रता ही है । इसका अपने जीवन में यदि उचित समावेश किया जा सके तो जिन्दगी अपने आप ही सफलता की ओर भागने लगती है । एक ही निश्चित विषय क्षेत्र में पूरी गहराई तक तीव्रता से विचारशील बने रहना ही वह एकाग्रता शक्ति है, जो हमारे लिए रोज़ नयी उपलब्धियाँ जुटाती है । इसी के द्वारा वैज्ञानिक जटिल, गूढ़ वैज्ञानिक गुत्थियाँ सुलझाते हैं और नई-नई खोजें करते हैं। कवि काव्य सृजन करते हैं, लेखकों में एक ही विषय पर नए-नए लेख एवं वृहदाकार ग्रन्थ लिखने की सोच पैदा होती है, यही शक्ति कलाकारों में एक ही भावदशा का व्यापक चित्रण एवं प्रस्तुतीकरण कराती है। संगीतज्ञ इसी शक्ति की स्फुरणा से राग की गहराई को छू पाते हैं, दार्शनिक इसी एकाग्रता शक्ति का सहारा लेकर गम्भीर ऊहापोह कर निष्कर्ष निकालते हैं । डॉक्टर लोग शल्य क्रिया या निदान एवं चिकित्सा में निपुण बनते हैं मन की एकाग्रता का अर्थ विचारों की यह एक तानता एवं दिशाधारा ही है ।

ध्यान रहे कि गन्दे एवं निरुपयोगी विचार मन-मस्तिष्क में उमड़-घुमड़ कर ही नहीं अन्त होंगे वे हमसे वैसे ही गन्दे एवं निरुपयोगी काम भी करा डालेंगे भले ही इससे बाद में हमें शर्मिन्दगी उठानी पड़े ।

उन विचारों को रोकने और निकाल फेंकने में शुरुआती कठिनाई तो जरूर है । लेकिन थोड़े से ही प्रयास से यह काम सरल लगने लगता है । सावधान रहने और सक्रिय रहने का थोड़े दिनों तक लगातार अभ्यास करते रहने पर यह स्वभाव में आ जाता है । हमारा मन इस अभ्यास में कुछ ऐसा रम जाता है कि अनावश्यक विचारों की घुसपैठ नहीं हो पाती । सतर्कता एवं क्रियाशीलता, निरुपयोगिता और अस्त-व्यस्तता की विरोधी स्थितियाँ है । मन दोनों स्थितियाँ में एक साथ नहीं रह सकता -------------विचारों को बुलाते और भगाते हैं-------- यहाँ यह बात ध्यान रखने लायक है कि हमारे मन में जैसे विचार तरंगित होंगे वैसे ही विचार आएँगे ।

सतर्क एवं क्रियाशील मनःस्थिति में घटिया, गन्दे एवं निरुपयोगी विचार आने से सहमते एवं कतराते हैं । इसके विपरीत यदि सस्ती संगति में रहा गया, अस्त-व्यस्त मनोदशा को तहज़ीब दी गयी और उथले दर्जे का साहित्य पढ़ा

गया तो मन में प्रमाद देह में आलस्य तथा जीवन में पतनोन्मुखता की बढ़ोत्तरी होगी । इससे सतर्कता एवं क्रियाशीलता में कमी आएगी । ऐसी दशा में मन में उपजे घटिया एवं हलके विचारों के स्पन्दन इसी स्तर के विचारों को चुम्बक की तरह आकर्षित करेंगे, गन्दे विचारों का रेला हमारे मन में घुसता चला जाएगा ।

चंचलताएँ मन को अस्त-व्यस्त बनाती हैं और इससे उसकी स्फूर्ति खत्म हो जाती है, स्फूर्ति नाम है शक्ति के व्यवस्थित------ एवं स्फूर्ति नाम है शक्ति के हो जाती है स्फूर्ति नाम है-------- । शक्ति यदि बिखरती रहे तो उसकी कितनी भी मात्रा क्यों न लगा दी जाये---------- एक छोटा सा अंश भी लगाने पर अनेकों कार्य एक साथ कर लिए जाते हैं -----------इस बेकार के बिखराव से ढीलापन आता है यही स्फूर्तिहीनता की स्थिति है । जब मानसिक ऊर्जा को किसी खास दिशा एवं खास प्रयोजन के लिए केन्द्रित करते हैं तो परिणाम भी आशाजनक एवं उत्साहवर्द्धक होते स्थिति मन के उल्लास एवं स्फूर्ति को और ज्यादा बढ़ाती है । फिर तो जैसे मन शक्ति -समुद्र हो जाता है ।

इससे मनुष्य के अन्दर सोई हुई शक्तियाँ जाग उठती हैं और वह असम्भव कर दिखाता है, बिखरे मन ---------की कहे जाने वाले कामों को भी सम्भव कर दिखाता है बिखरे मन और विश्रृंखल शक्ति से संसार का कोई भी काम पूरा नहीं हो पाता इसलिए काम सिद्ध करने की एक ही सर्वमान्य विधि है मन की एकाग्रता । मन की एकाग्रता ही विचारशक्ति को सुव्यवस्थित करती है और इस सुव्यवस्था से मनचाहे काम होते चले जाते हैं ।

इस बात को ऐसे भी समझ सकते हैं कि यदि चित्रपटल पर अलग-अलग रंगों को बेतरतीब से पोत दिया जाये तो उनका वैसा प्रभाव न होगा, यदि इन्हीं रंगों को को एक विशेष अन्दाज में व्यवस्थित कर सजा दिया जाये तो सौंदर्य खिल उठता है यह सुव्यवस्था ही चित्रकला है । कैनवास पर बिखरे रंगों को चित्रकला का नाम देने में हर किसी को हिचकिचाहट होगी । यही रंग जब एक व्यवस्थित क्रम में किस निश्चित प्रयोजन के लिए सजा दिये जाएँ सभी कह उठेंगे वाह क्या कला है, चित्राकृति की चारों ओर प्रशंसा गूँज उठेगी।

इसी तरह कोई आदमी भले ही संगीत जानता हो लेकिन यदि वह सरगम के अलग-अलग स्वरों को यों ही आलाप करता रहे तो उस पर किसी का ध्यान नहीं जाएगा, ध्यान गया भी तो लोग उपहास से हँस पड़ेंगे । इन्हीं स्वरों को यदि सुव्यवस्थित रीति से निश्चित लय-ताल में बाँध दिया जाये तो राग सम्वेदनाओं की अनुभूतियों से श्रोता झूम उठेंगे एवं गायक भी इसमें विभोर हो जाएगा।

मन में उठने वाली विचार तरंगों की दशा भी स्वर-लहरियों एवं रंगों की तरह है । कार्ल रोर्ट अपनी पुस्तक 'मिस्टीरियस वेज आफ माइण्ड' में कहते हैं कि, मन को यदि निश्चित कर्म में सुव्यवस्थित कर दिया जाये तो उसकी रहस्यमय शक्तियों में उफान आ जाता है, यही सफलता, सुख एवं सन्तोष का आधार है । इनके अव्यवस्थित रहने की दशा में तो असफलता, उपहास एवं उपेक्षा ही मिलती है । रंगों एवं स्वर लहरियों के बिखराव से मन का बिखराव कही अधिक नुकसानदेह है । चित्र खराब हुआ और संगीत बेसुरा हुआ तो श्रोता ही नाराज होगे । लेकिन यदि मन बिखरा और कुराह पर चल पड़ा तो जिन्दगी के पतन-गर्त में समाते देर नहीं लगती । यह ऐसी पीड़ा है जो सारे जीवन को सिसकियों से भर देती है ।

बिखरी मनोभूमि में ही प्रमाद एवं पाप उपजते एवं पनपते हैं । इस रूप में मनोभूमि इतनी उपजाऊ होती है कोई न कोई गहरा असर शरीर एवं व्यक्तित्व पर पड़ता ही है । यही नहीं अनियन्त्रित मन के बिखराव में अनेकों शेखचिल्ली सरीखी उमंगें रहती है । नेता बनेंगे, तुरत-फुरत धनवान् बन जाने, पहलवान कहलाने की तरह-तरह की तरंगें ऐसी मनः स्थिति में बनती बिगड़ती रहती हैं । ये कल्पनाएँ आकांक्षाएँ यदि योजनाबद्ध एवं स्थिर हो तो कुछ बात बने भी । दूसरों की जिन्दगी की देखा-देखी कुछ वैसा ही करने की यह ललक प्रायः ------------------------------अस्थिर एवं अव्यवस्थित हो उसमें कुछ गम्भीरता से सोचने का सलीका हो बँटे -बिखरे एवं अस्थिर मन में ऐसी समस्त आकांक्षाएँ लालच भरे सपने बनकर रह जाते हैं ।

वाँछित प्रगति के लिए जरूरी है हमारी सारी आकांक्षाओं के तन्तु एक दूसरे से सलीके से बुने हों । इच्छाएँ जिन्दगी की किन्हीं-किन्हीं परिस्थितियों से जुड़ी होती हैं, इनके परस्पर पूरक बनने की स्थिति में ही एक शक्ति का आधार तैयार होता है । परस्पर विरोधी इच्छाएँ हमको कहीं का नहीं रहने देतीं । आवश्यक है अपने विचारों में लयबद्धता, एक संगीतमय स्थिति, इसीलिए नीतिकार प्रसिद्ध कवि रहीम ने कहा है - 'एकहि साधे सब सधे', तो मन को साधने से ही सब सिद्ध होगा । सधा हुआ मन बढ़ती रुचि और रसमयता के साथ लक्ष्य पूर्ति में लगा है रास्ते की कठिनाइयाँ अपने आप हल होती रहती है मार्ग प्रशस्त होता है और हमारे पाँव तेजी से सफलता की मंजिल तक अपने आप पहुँच जाते हैं ।


चलता-फिरता बिजलीघर है मनुष्य

ऊर्जा के अनगिनत रूप है। लेकिन जिस ऊर्जा-शक्ति से हम सबसे अधिक परिचित प्रभावित हैं, वह है बिजली यानि कि विद्युत-शक्ति । हमारी अपनी शारीरिक प्रक्रियाएँ जिस भी एक प्रकार की विशिष्ट विद्युत ही है । विज्ञानवेत्ताओं ने शरीर में व्याप्त इस ऊर्जा को जैव-विद्युत या बायोइलेक्ट्रिसिटी नाम दिया है । शरीर संचार की समस्त गतिविधियाँ व मस्तिष्कीय प्रक्रियाएँ शरीर में प्रवाहित होने वाली इसी विद्युत-शक्ति द्वारा ही नियंत्रित होती हैं । ,

मानव शरीर के आन्तरिक भागों में विद्युत के खजाने छुपे है । जब शरीर की माँसपेशियाँ फैलती एवं सिकुड़ती है तो यह बिजली पैदा होती है । न्यूरोलॉजिस्ट के अनुसार मस्तिष्क से असंख्य तंत्रिका कोशिकाएँ (न्यूरॉन्स) निकलकर सारे शरीर में फैले होते हैं । प्रत्येक न्यूरॉन अपने आप में एक छोटा सा डायनेमो है । यही न्यूरॉन्स शरीर में जैवविद्युत के मुख्य उत्पादक हैं । न्यूरॉन्स का केन्द्र मस्तिष्क अकेले वॉट शक्ति की विद्युत उत्पन्न कर सकता है ।

वैज्ञानिक अब यह पूरी तरह से मानने लगे है कि मानव शरीर एक जीता जागता उच्च स्तरीय बिजलीघर है जिससे कम या अधिक मात्रा में हमेशा विद्युत तरंगों का निष्कासन होता रहता है । वैसे तो प्रत्येक जीवधारी अपने स्तर के अनुरूप कम या अधिक वोल्टेज की बिजली पैदा करता है । पर मनुष्य में यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत कछु अधिक ही विकसित है । तंत्रिका विशेषज्ञों के अनुसार पुरुषों की तुलना में महिलाओं में इस विद्युत की मात्रा ज्यादा पायी गयी है।

परामनोवैज्ञानिकों का कहना है कि सामान्य व्यक्ति से निकलने वाली विद्युत तरंगें उसके शरीर से छह इंच बाहर तक फैली रहती हैं किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में तो ये तरंगें उनके शरीर से तीन फट दूर तक भी रहती है । परामनोवैज्ञानिक इसे मानवी तेजोवलय की संज्ञा देते हैं ।मानवीय तेजोवलय शरीर में एकत्रित जैव-विद्युत की विशिष्ट मात्रा का सपरिचायक है ।

वैज्ञानिकों की मान्यता है कि व्यक्ति जिस स्थान पर रहता है उसके शरीर से निष्कासित प्राण-विद्युत का अदृश्य कम्पन उस वातावरण में स्थित जड़ पदार्थों के परमाणुओं में तीव्र प्रकम्पन पैदा कर देता है। ये कम्पन उस वातावरण के सभी प्राणियों को प्रभावित व आकर्षित करते हैं। स्वाभाविक है जिनमें जैव-विद्युत की मात्रा अधिक होगी उनका आकर्षण प्रभाव भी व्यापक होगा। सामान्य क्रम में तंत्रिका कोशिकाएँ एक निश्चित मात्रा में ही जैव विद्युत का उत्पादन कर पाती है। लेकिन ध्यान के द्वारा मन-मस्तिष्क को इस शान्त एवं प्रसन्नावस्था में लाकर जैव-विद्युत की इस उत्पादन मात्रा को कई गुना बढ़ाया जा सकता है । प्राणायाम के प्रयोगों से भी वातावरण में संतप्त प्राणशक्ति काफी ज्यादा मात्रा में बटोरी जा सकती है जो अपने जीवन में इन प्रयोगों में निरत है, उनमें जैव-विद्युत का भारी परिमाण होना सहज है। इसी भारी परिमाण के अनुरूप ही उनका आकर्षण प्रभाव भी व्यापक होता है। प्राचीन काल से ऋषि-तपस्वियों के सान्निध्य में दुःखी-पीड़ित मन के एकाएक उत्साह से भर जाने के पीछे यही वैज्ञानिक आधार है । 'चम्पकलाल की वाणी' नामक पुस्तक में श्री अरविन्द के प्रिय शिष्य एवं अनन्य साधक चम्पकलाल बताते हैं कि वे अपनी किशोरावस्था में एक बार गाँव के पास एक पेड़ के नीचे जा बैठे, वहाँ बैठते ही उनका मन गम्भीर ध्यान में डूब गया । इस पर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ । आस-पास के लोगों से पूछने पर पता चला कि वहाँ एक साधु ने वर्षों तक अपनी तप-साधना सम्पन्न की थी । अलीपुर जेल में जहाँ श्री अरविन्द स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय में कैद किए गए थे, उनके छूट जाने के बाद जब भी वहाँ किसी को ले जाया जाता तो उसका मन किन्हीं विशेष विद्युत तरंगों से झनझना उठता । आखिर हार-थक कर जेल अधिकारियों ने वहाँ किसी को ले जाना बन्द कर दिया और उस कोठरी में ताला लगा दिया । हालाँकि बाद में उस स्थान को स्मारक में तब्दील कर दिया गया ।

कभी-कभार ऐसी घटनाएँ प्राकृतिक संयोग से भी हुई हैं, जिनमें व्यक्तियों को चलते-फिरते बिजलीघर के रूप में देखा गया है। डॉ. डिन्वल लिखते हैं, एक सीमित मात्रा में जैव-विद्युत प्रत्येक प्राणी के शरीर में होती है और तंत्रिका-संस्थान के माध्यम से समस्त शरीर में बहती रहती है । इसकी स्वाभाविक मात्रा में कमी आने पर व्यक्ति दुर्बल, निस्तेज व अवसादग्रस्त रहने लगता है । इसकी मात्रा असाधारण रूप से बढ़ने और अनियन्त्रित हो जाने पर व्यक्ति क्रोधी, चिड़चिड़ा, आक्रामक एवं अस्थिर प्रकृति का हो जाता है। सामान्य डॉक्टरी जाँच-पड़ताल में इसे कोई बीमारी न मानकर व्यक्तिगत स्वभाव मान लिया जाता है । लेकिन वास्तव में ऐसा शरीर में जैव-विद्युत की मात्रा के घटने-बढ़ने के कारण होता है।

इस जैव-विद्युत के प्रवाह में यदा कदा कुछ ऐसी गड़बड़ी आ जाती है कि यह बिजली उसे और उसके साथियों के लिए बड़ी हैरानी-परेशानी का कारण बन जाती है । इस तरह की एक घटना अमेरिकन लड़की लूलू हर्स्ट की है। 14 साल की इस बालिका में अचानक ही जैव-विद्युत का लीकेज होने लगने से स्वयं और उसके परिवार के सदस्य परेशान हो गए यह लड़की जिसको भी छू लेती, उसे बिजली का तीव्र झटका लगता । धातु से बनी वस्तुएँ उसके छूने से हिलने-डुलने लगतीं । इस विचित्र घटना की चर्चा चारों ओर फैल गयी और अन्त में यह मामला शरीर-क्रिया वैज्ञानिकों के सामने आया । अनेक प्रयोग-परीक्षणों के बाद पता चला कि लूलू के शरीर से काफी ज्यादा मात्रा में विद्युत तरंगों निकल रही हैं । तकरीबन दो सालों तक उसमें ये विचित्र लक्षण बने रहे । बाद में वह सामान्य जीवन जीने लगी ।

शरीर में विद्युत उत्पादन की ऐसी ही दूसरी घटना जनवरी 1946 में फ्राँस के लावेर शहर में घटित हुई । एगलिन कोटिन नाम की इस लड़की के शरीर से अकस्मात् बिजली का असाधारण प्रवाह फूटने लगा । छूने पर झटका लगना, वस्तुओं का गिर पड़ना आदि बातें लोगों की जिज्ञासा का कारण बन गयीं । काफी समय तक यह अचरज लोगों की चर्चा का विषय बना रहा । बाद में अपने ही आप विद्युत प्रवाह नियंत्रित हो जाने से एगलिन कोटिन सामान्य जीवन बिताने लगी।

यूक्रेन का शषा नामक किशोर छात्र जिस कसी वस्तु को छू देता है, वह जलने लगती है । इस विलक्षण क्षमता की वजह से उसके घर की प्रायः सारी वस्तुएँ जल चुकी हैं । अनायास ही प्राप्त इस विचित्र क्षमता के कारण उसे सामान्य जीवन जीने में गम्भीर संकट का सामना करना पड़ रहा है । शषा की इस अद्भुत क्षमता का अध्ययन वहाँ के चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. ब्लादीमिर कोर चिन्कोव ने किया तो पता चला कि शषा का पूरा शरीर जनरेटर या डायनेमो की भाँति प्रचण्ड विद्युत आवेश से भरा हुआ हुआ है । जब इस विद्युत ऊर्जा में उफान आता है तो सम्पर्क में आने वाली चीजों में आग लग जाती है। इटली के एक पर्यटन केन्द्र फार्मिया में रहने वाला बेने दत्तों सुपीनो नामक 18 वर्षीय बालक अपनी इसी विद्युतीय क्षमता के कारण इन दिनों में चर्चा का विषय बना हुआ है । उसके हम उम्र बच्चे उसके सामने आने से डरते हैं । क्योंकि सुपीनों जिस किसी चीज को ध्यान से देखता है, उसमें आग लग जाती हैं इस तरह की घटनाओं की शुरुआत उस समय हुई, जब एक दिन सुपीनों के दाँत में दर्द हुआ वह क्लीनिक में भीड़ की वजह से प्रतीक्षा में बेंच पर बैठकर कॉमिक पढ़ने लगा। देखते-देखते किताब जलने लगी । डॉक्टर समेत वहाँ मौजूद लोग आश्चर्य से उसे देखते रह गए । सुपीनों ने डाक्टर से कहा कि कॉमिक में आग कैसे लग गई, उसे कुछ मालूम नहीं ।

फिर एक रात ऐसी ही रहस्यमय घटना घटी। वह अपने बिस्तर की चादर ठीक कर रहा था । जैसे ही उसने चादर पर अपनी नजरें टिकायीं वैसे ही चादर में आग लग गयी । इसी तरह एक दिन सुपीनो अपने पिता के साथ कारखाने गया । कारखाने में उसके दाखिल होते ही मशीनों ने काम करना बन्द कर दिया । उनकी मरम्मत में लगभग 3,000 ---------------चिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों से परामर्श करने पर उन्होंने जैव-विद्युत के प्रचण्ड विद्युत चुम्बकीय आवेश की बात बताई । पर निदान ढूँढ़ने में वे अभी तक असफल हैं।

इसी प्रकार मेनचेस्टर की महिला पालिन शा का शरीर चलते-फिरते इलेक्ट्रिक पावर हाउस की तरह है । जिस वस्तु को वह स्पर्श कर देती है, धमाके की आवाज के साथ शॉर्टसर्किट की तरह उसमें आग लग जाती है । जिस व्यक्ति से भी उसका स्पर्श हो जाता है, वह तीव्र झटका खाकर गिर पड़ता है। पालिन शा की जाँच करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि उसके शरीर में 2000 वोल्ट की विद्युत शक्ति पैदा होती है, जो कि एक अजूबा ही कही जा सकती है । पालिन शा को अपने बायें पैर में हमेशा एक अर्थ वायर बाँधे रहना पड़ता है, ताकि उसके शरीर की अतिरिक्त विद्युत तरंगें जमीन में चली जाएँ।

बिजली सिर्फ शरीर के अन्दर ही नहीं बनती, वातावरण से भी हमारा शरीर लगातार विद्युत ग्रहण करता रहता है । वातावरण की यह विद्युत दो प्रकार के आयन से बनी होती है । ये आयन धनात्मक तथा ऋणात्मक होते हैं । यह विद्युत रक्त के माध्यम से शरीर के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचकर उनके क्रियाकलापों का नियंत्रण करते हैं । वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों से यह साबित कर दिया है कि वातावरण की विद्युत के आयन मनुष्य व अन्य जीवधारियों के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं । विद्युत के आयनों की अधिकता भी सजीव जगत पर बुरा असर डालती है । इनकी अधिकता अवसाद, चिन्ता, तनाव, सिरदर्द, उदासी पैदा करती है । एक तथ्य यह भी है कि शरीर में वातावरण से आती यह विद्युत यदि लगातार इकट्ठी होती रहे तो एक सीमा के बाद यह शरीर को जला डालेगी, लेकिन ऐसा नहीं होता । शरीर की कोशिकाओं, ऊतकों से होती हुई यह विद्युत पृथ्वी में धीरे-धीरे समाती रहती है ।

आधुनिक चिकित्सा पद्धति में जैव-विद्युत चमत्कारी प्रमाणित हुई है । प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्ष साबित करते हैं कि शरीर में व्याप्त जीव-विद्युत नष्ट अथवा क्षतिग्रस्त अंगों को दुबारा विकसित या पैदा करने की क्षमता रखती हैं छिपकली, हाइड्राॅ, स्टार फिश जैसे जन्तुओं में यह क्षमता पायी जाती है । लेकिन विज्ञान वेत्ताओं का अनुमान है कि विकास की एक अवस्था में मनुष्यों में भी टूटे या नष्ट हुए अंग दुबारा विकसित हो जाते थे।

डॉ. बेसेसंट ने औषधि एवं यन्त्रों के सहयोग से शरीर में पुनर्निर्माण की क्षमता पैदा करने की सफल कोशिश की हैं एक प्रयोग के दौरान उन्होंने टूटी हड्डी के सिरे को विद्युत धारा के सूक्ष्म प्रवाह से जोड़ दिया, तो अप्रत्याशित रूप से हड्डी जुड़ने लगी । एक अन्य प्रयोग में उन्होंने एक सफेद चूहे का पूरा पैर काट दिया तथा टूटे स्थान को एक इलेक्ट्रिक कॉयल से जोड़ दिया । उन्हें आश्चर्य तो तब हुआ जब टूटा हुआ पैर दुबारा उगने लगा और वह कोहनी तक उग आया । डॉ. बेसेसंट के इन प्रयोगों ने यह सिद्ध कर दिया कि शरीर की कोशिकाएँ कृत्रिम उपकरणों से उत्पन्न विद्युत को भी उतनी ही सहजता से ग्रहण कर सकती हैं और नया अंग पैदा करने की क्षमता रखती हैं । साथ ही विशेषज्ञों का अनुमान है कि भविष्य में मनुष्य में भी नष्ट या क्षतिग्रस्त हाथ, पाँव एवं दूसरे अंग भी दुबारा विकसित किए जा सकेंगे ।

अब तो ऐसे उपकरण भी बना लिए गये हैं, जो शरीर में फैली विद्युत-शक्ति व उसके उत्सर्जन का पता लगा सकते हैं । किर्लियन फोटोग्राफी व आर्गन एनर्जी मापन इस संदर्भ में महत्वपूर्ण उपकरण साबित हुए हैं । फिलहाल तो वैज्ञानिक इस ऊर्जा के चमत्कारों से चमत्कृत हैं । साथ ही वे ध्यान व प्राणायाम की वैज्ञानिकता का इस संदर्भ में पता लगाने में सक्रिय हैं क्योंकि उनका मानना है कि इन्हीं प्रयोगों से मनुष्य अपनी जैव-विद्युत का उचित उत्पादन एवं नियंत्रण कर सकता है । ये ही प्रक्रियाएँ उसे जैव-विद्युत के उपयोग की सही दिशा दे सकती हैं । वैज्ञानिक समुदाय का मत है कि यदि मानवी-काया में विद्यमान इस शक्ति के बारे में विस्तार से जाना जा सके तो रहस्यों की पिटारी इनसानी काया के अनेक अज्ञात रहस्यों को जानने में सफलता मिल सकती है।


प्रतिभा मात्र इसी जन्म की देन नहीं

आद्यशंकराचार्य के बारे में विख्यात है कि 6 वर्ष की छोटी उम्र से ही वे महामानवों जैसी दृष्टि अपना उसकी पूर्ति में जुट गये और उस तादात्म्य ने उन्हें महामानवों की सर्वोच्च श्रेणी प्राप्त करने का अवसर प्रदान किया । बचपन से ही वे प्रखर प्रतिभा के धनी थे। यों तो प्रतिभा पराक्रम, मनोयोग एवं साहस के सम्मिश्रण से बनती है । क्रिया-कुशल पुरुषार्थ परायण, संलग्नशील एवं महत्त्वाकाँक्षी जैसे व्यक्तित्व का मूल्य समझने वाले लोग अपनी आदतों को तद्नुरूप ढालकर प्रतिभाशाली बन भी जाते हैं । किन्तु सबसे अधिक रहस्यमय तथा चौंकाने वाली वे घटनाएँ होती हैं जिनमें बिना शिक्षण प्राप्त किये विशिष्ट स्तर की प्रतिभा किन्हीं-किन्हीं बालकों में अनायास ही प्रकट हो जाती है । जन्मजात प्रतिभा की इस विलक्षणता का कुछ सुनिश्चित कारण अनुसंधानकर्ता, मनःशास्त्री एवं न्यूरोलॉजिस्ट नहीं बता पाते । आनुवांशिकी से जोड़े जाने वाले तीर-तुक्कों की भी अब कोई सटीक संगति नहीं बैठती, अन्यथा जीनियस कहे जाने वालों के यहाँ मूर्ख और मूर्खों के यहाँ जीनियस न पैदा होते । निश्चित ही इन घटनाओं का कारण पूर्व संचित संस्कारों की सम्पदा को ही माना जा सकता है ।

इस संदर्भ में वैज्ञानिकों ने अनेक तरह की शोधें की हैं और उन्हें मनोविज्ञान अनुसंधान समिति द्वारा ‘द ह्युमन पर्सनालिटी एण्ड इट्स सरवाइवल आफ्टर बॉडिली डेथ’ नामक शोध ग्रंथ में विस्तार पूर्वक प्रकाशित भी किया है । वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रायः देखा गया है कि चिरप्रयत्न के बाद भी जो विशिष्टता-प्रतिभा प्रौढ़ों में विकसित नहीं हो पाती, वही विशिष्टता किन्हीं-किन्हीं में वह अनायास प्रस्फुटित हो जाती है । आये दिन ऐसी कितनी ही घटनाएँ प्रकाश में आती रहती हैं । उदाहरण के लिए दार्शनिक जे. बेन्थम जब चार वर्ष के थे, तभी लैटिन और ग्रीक भाषाएँ ठीक तरह बोल लेते थे । पिछले दिनों आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने एक चार वर्षीय बालिका बेबल थेम्पसन के गणित अध्ययन के लिए अतिरिक्त प्रबन्ध किया । यह बालिका इतनी छोटी आयु में ही अंकगणित, त्रिकोणमिति और भौतिकी में असाधारण गति रखती है । इस उम्र के बच्चे, जिनने प्रारम्भिक पढ़ाई क्रमबद्ध रीति से नहीं पढ़ी हो, उन्हें आगे कैसे पढ़ाया जाये? इसका निर्धारण करने के लिए तब शिक्षा-शास्त्रियों की एक विशेष समिति गठित की गयी थी ।

इसी प्रकार मद्रास अकादमी न्यास की ओर से रविकिरण नामक ढाई वर्ष के बालक को उसकी अद्भुत संगीत प्रतिभा के लिए छात्रवृत्ति देने की घोषणा की गयी थी । यह बालक न केवल वाद्ययन्त्रों को ठीक से बजाना जानता था, वरन् दूसरों द्वारा गलत बजाने पर उस गलती को भी बताता था । इन उदाहरणों के अतिरिक्त उक्त पुस्तक में प्रतिभा सम्पन्न कम आयु के बच्चों के ऐसे अनेक उदाहरण दिये गये हैं जो गणित, संगीत, ज्यामिती, चित्रकला आदि में इतने पारंगत थे कि उस विषय के विशेषज्ञ, प्राध्यापक भी इतने निष्णात नहीं होते ।

कहा जा चुका है कि आद्य शंकराचार्य ने भी अपने गुरु को ऐसी ही विलक्षण प्रतिभा से अचंभित कर दिया था । केवल पाँच-छह वर्ष जितनी छोटी आयु में ही इस प्रकार का असाधारण ज्ञान होना केवल एक ही आधार पर संभव हो सकता है कि किसी आत्मा को अपने पूर्वजन्म की संचित ज्ञान सम्पदा उपलब्ध हो । पूर्वजन्म के संग्रहित सुसंस्कारों का बाल्यावस्था में उदय आत्मा के स्वतंत्र अस्तित्व का प्रत्यक्ष प्रमाण है । उदाहरण स्वरूप पूर्वजन्मों के संस्कारों के आधार पर ही केवल 6 वर्ष और ग्यारह माह की स्वल्प आयु में चल बसने वाले कोचीन के एक बालक ने बीस हजार से अधिक चित्र एवं पेन्टिग्स् का आलेख किया था ।

एक बार कोचीन के एक पार्क में बच्चों की चित्र प्रतियोगिता रखी गयी थी, जिसमें ईसाई परिवार में जन्में क्लिन्ट ने प्रथम बार ही भाग लिया था । बच्चे जब चित्रों का आलेखन करने लगे, तब उसके पिता जोसेफ थेमस, जो क्लिन्ट को छोड़ने आये थे, पार्क में चहलकदमी करने लगे । तभी एक व्यक्ति ने उन्हें सूचना दी - “ देखो चित्र प्रतियोगिता में आये एक बालक को चित्र बनाते देखने के लिए भारी भीड़ एकत्रित हुई है । केवल पाँच वर्ष का छोटा बालक मूर्धन्य चित्रकारों जैसा चित्र देखते-देखते बना लेता है उसकी चित्रकला को देखकर लोग हैरान रह जाते हैं ।” सन् 1983 के ग्रीष्म ऋतु में चल बसने से पूर्व केवल एक ही वर्ष वह स्कूल में रहा । इस दौरान तेरह प्रतियोगिताओं में से उसे बारह प्रतियोगिताओं में स्वर्ण पदक सहित कितने ही इनाम मिले थे, जिसमें कोजीकोड में सम्पन्न हुई अट्ठारह वर्षीय बच्चों की प्रतियोगिता भी सम्मिलित थी । इसमें भी इस बालक ने प्रथम परितोषिक पाया था । इस प्रतियोगिता में दस हजार से अधिक बच्चों ने भाग लिया था ।

प्रायः जिस आयु में बच्चे उछल-कूद करते रहते हैं, उस उम्र में नन्हा क्लिन्ट एक प्रतिभाशाली चित्रकार बन चुका था । मात्र पाँच साल की आयु से ही वह अच्छे चित्र बनाने लगा था । प्रशिक्षक ने तो मात्र तूलिका चलाने और रंग मिलाने जैसी मोटी रूपरेखा ही बतायी थी, पर चित्रकला की हर बारीकी उसने आप सीखी थी । माता-पिता उसे डेविड, गणपति, अभिमन्यु जैसे महामानवों की जो कहानियाँ सुनाया करते थे, क्लिन्ट की छोटी-छोटी अंगुलियाँ उन्हें आनन-फानन में रेखांकित कर डालतीं । रंग-बिरंगे उड़ते फुदकते परिंदों के जो रेखाचित्र उसने अंकित किये, उन्हें देखकर हर कोई आश्चर्य चकित हुए बिना नहीं रहता । दायें हाथ से जब चित्र बनाते- बनाते वह थक जाता तब बायें हाथ में तूलिका पकड़ लेता और उसी द्रुतगति से रेखांकन करने लगता । ‘दि सेन्ट्रल इन्स्टीट्यूट ऑफ फिशरीज टेक्नालॉजी कोचीन’ में कार्यरत उसके पिता जब कागज नहीं जुटा पाये तब वहाँ उक्त विभाग में पड़े रद्दी कागजों पर ही अपनी कला को निखारने लगा और बीस हजार से अधिक चित्र बनकर तैयार हो गये । यद्यपि तीन वर्ष की आयु से ही वह गुर्दे की बीमारी से त्रस्त था, फिर भी चाहे वह घर में रहा हो या अस्पताल में, रेखाचित्र बनाने का कार्य अविराम गति से चलता ही रहा ।

पूर्व जन्मों से संचित संस्कारों के बिना यह कैसे संभव हो सकता है? मृत्यु से दो दिन पूर्व ही उसने अपनी मृत्यु की भविष्यवाणी कर दी थी । हुआ यों कि एक दिन वह बेहोश होकर गिर पड़ा । चिकित्सक बुलाने की तैयारी हुई ही थी कि वह उठ बैठा और हँसते हुए अपने पिता से बोला - कैसा चकमा दिया । दूसरे दिन फिर से उस प्रसंग को याद करते हुए बताया कि कल की तरह आज भी मैं सो जाऊँगा, लेकिन फिर नहीं जागूँगा, माँ मुझे बुलाना नहीं । मानों वह पूर्वाभास कर रहा हो । एक घण्टे बाद ही उसकी मूर्च्छा ‘कोमा’ में बदल गयी और वह सदा के लिये सो गया ।

अमेरिका के सुप्रसिद्ध भौतिकशास्त्री डॉ. स्टीवेन्सन ने 600 से अधिक ऐसी घटनाएँ एकत्रित की हैं जिनमें विशेषकर 14 वर्ष की आयु से कम के बच्चों द्वारा बताये गये अनेक पूर्व जन्म के अनुभव जाँच-पड़ताल करने पर प्रामाणिक सिद्ध हुए हैं । 170 प्रमाण अकेले भारत के हैं । ऐसी ही एक घटना पूर्व जर्मनी के विलक्षण प्रतिभासम्पन्न तीन वर्षीय बालक हामेन केन की है। वह मस्तिष्क विद्या-विशारदों न्यूरोलॉजिस्टों के शोध का केन्द्र बना रहा । इतनी अल्प आयु में ही यह बालक न केवल उच्च जर्मन साहित्य पढ़ लेता था, वरन् उनका विश्लेषण भी कर लेता था । इसी प्रकार जेरा कालबर्न नामक आठ वर्षीय बालक ने दिमागी आधार पर कठिन से कठिन प्रश्नों के उत्तर की जो क्षमता दिखाई थी, उससे बड़े-बड़े गणितज्ञ ही काफी समय लगाकर कागज पर हिसाब बिठाकर हल कर सकते थे, उन्हें यह बालक बिना क्रमबद्ध अध्ययन के, बिना हिचके आनन-फानन में कैसे हल कर लेता था, अनुसंधानकर्ता इस रहस्य को अभी तक नहीं जान पाये ।

यों तो प्रतिभा या विशेषज्ञता साधनात्मक प्रयत्नों द्वारा बढ़ाई जाती है, किन्तु पूर्व जर्मनी में दो सौ वर्ष पूर्व जन्में हानिरस हान्केन नामक तीन वर्षीय बालक के बारे में क्या कहा जाये, जिसने इतनी कम उम्र में हजारों लैटिन मुहावरे कंठस्थ कर रखे थे । कठिन से कठिन जोड़, बाकी, गुणा, भाग वह बड़ी आसानी से कर लेता था । इसी उम्र में उसने फ्रेंच एवं अन्य कई भाषाएँ सीखनी आरम्भ कर दी थीं । प्रख्यात कवि गैटे 9 वर्ष की आयु में कविता लिखने लगे थे । विकासवाद के जन्मदाता डार्विन भी ऐसी ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे । ऐसे कितने ही उदाहरण हैं जो यह दर्शाते हैं कि यह दक्षताएँ जिन्हें भी उपलब्ध होती हैं वह जन्मजात रूप में पूर्व संचित सम्पदा के रूप में ही उपलब्ध होती हैं । ट्रिनिटी कॉलेज का एक विद्यार्थी अपने अध्ययन काल में ही एक दूसरे कॉलेज में प्रकृति विज्ञान का प्राध्यापक नियुक्त हो गया । अध्ययन और अध्यापन दोनों कार्य साथ-साथ करता रहा । नियुक्ति के समय उस पर यह शर्त लगायी गयी थी कि दो वर्ष के भीतर वह कुछ आवश्यक डिग्रियाँ प्राप्त कर ले, वह शर्त उसने समय से पूर्व ही पूरी कर दी, साथ ही अपनी पढ़ाई भी यथावत् जारी रखी । इसी प्रकार लेबनान के केण्टुकी नगर का मार्टिन जे. स्पैडिडंग 14 वर्ष की आयु में गणित का प्रोफेसर बना । वह उन दिनों सेन्ट मैरीज कॉलेज में पढ़ रहा था । तभी उसकी प्रतिभा को देखकर इस पद पर नियुक्ति कर दी गयी । बाद में वह वाल्टीमोर के आर्कविशप पद पर आसीन हुआ ।

बारह वर्ष से भी कम उम्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त करना अपने आप में एक विश्व रिकार्ड है । कैलीफोर्निया अमेरिका के एडरगल ईस्टवुड दीयलों ने सन् 1988 में मात्र 11 वर्ष 8 माह की आयु में गणित में स्नातक की डिग्री प्राप्त की । इसी तरह भारतीय मूल के बाल मुरली अंबारी ने एक-एक वर्ष में दो-दो कक्षाएँ पास करते हुए 11 वर्ष में हाई स्कूल अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर लिया और अमेरिका के माउण्ट सिनाई स्कूल ऑफ मेडिसिन में मात्र 17 वर्ष की आयु में चिकित्सक बनकर निकला । इतना ही नहीं, उसने सबसे कम उम्र में चिकित्सक बनने का न केवल विश्व कीर्तिमान बनाया, वरन् एड्स जैसी खतरनाक बीमारी पर एक अनुसंधान पूर्ण ग्रंथ की रचना भी कर डाली, जिसे अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा पुरस्कृत किया गया ।

प्रायः मनुष्य अपने जीवन में किसी न किसी क्षेत्र विशेष में विशेषज्ञता हासिल करने का भरपूर प्रयत्न करता है, अधिकांश उसे सफलता भी मिलती है और वह उस विषय का मर्मज्ञ भी बन जाता है । पर कई बार ऐसा भी होता है कि मेहनत एवं आशा के अनुरूप वह योग्यता विकसित नहीं हो पाती । ऐसी स्थिति में यह कदापि नहीं समझना चाहिए कि उसके इस जीवन का प्रयास सर्वथा निरर्थक गया । वस्तुतः ऐसे ही पुरुषार्थ अगले जन्म में प्रतिभा बनकर प्रकट होते और लोगों को आश्चर्य चकित करते हैं ।


सीखने-नया जानने की जिज्ञासा (Kahani)

कलकत्ता से पूना जाते हुए रेल में महादेव गोविन्द रानाडे ने बँगला अख़बार खरीदा । इस पर उनकी पत्नी ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा - आप तो बँगला जानते ही नहीं, फिर यह अख़बार क्यों खरीदा? रानाडे ने कहा दो दिन के सफर में उसे आसानी से सीख लिया जायेगा । पूरे मनोयोग पूर्वक उन्होंने बँगला लिपि और उसके शब्द गठन पर ध्यान दिया और पूना पहुँच कर उनने अपनी परीक्षा देते हुए पत्नी को पूरा अख़बार पढ़कर सुना दिया । ऐसी थी इस 60 वर्षीय युवा की मनोयोग साधना । आयु से क्या होता है, मुख्य तो है सीखने-नया जानने की जिज्ञासा-आयु के अन्तिम क्षण तक ।


भ्यो औषधिषु, यो वनस्पतिषु-तस्मै देवाय नमो नमः

जीव जन्तुओं में ही नहीं, वृक्ष वनस्पतियों में भी प्राण चेतना विद्यमान है । तुच्छ समझे जाने वाले पेड़-पौधे भी मनुष्य की तरह दुख सुख का अनुभव करते और स्नेह सद्भाव का प्रत्युत्तर अपनी भाषा में उसी प्रकार देते हैं जैसे जीवनधारी परस्पर अभिव्यक्ति करते हैं । हिंसक क्रूर स्वभाव वाले प्राणियों को वे दूर से ही पहचान लेते हैं और डरे सहमे हुए जीवन रक्षा की मूक भाषा में सृष्टिकर्ता से प्रार्थना करते हैं । यह अलग बात है कि बुद्धि कौशल एवं शक्ति सामर्थ्य के मद में मदान्वित होकर मनुष्य उनकी सूक्ष्म हलचलों को न पहचान पाता है और न उनकी संवेदना को समझ पाता है । प्राचीन काल में ऋषि मनीषी इस तथ्य से भली भाँति परिचित थे । उनका सारा जीवन उन्हीं के मध्य बीतता था । वे जीवित प्राणियों की तरह उससे व्यवहार करते और हरीतिमा संवर्द्धन को प्रमुखता देते थे। आर्ष साहित्य में पीपल जैसे वृक्षों की गणना देवताओं में इस लिए की गयी है।

विज्ञानवेत्ताओं का भी ध्यान जब इस ओर आकृष्ट हुआ तो विविध अध्ययन अनुसंधानों द्वारा उनने सिद्ध कर दिया कि पेड़-पौधों में भी प्राण होते हैं । इस संदर्भ में अपने देश के प्रख्यात वैज्ञानिक गाडवेस्की ने वनस्पतियों में प्राणशक्ति सिद्धांत को प्रतिपादित किया । इन वैज्ञानिक प्रतिपादनों में हजारों वर्ष पूर्व भारतीय मेधा के प्रतीक महर्षि कृष्ण द्वेपायन व्यास ने वनस्पति चैतन्य को बड़ी निर्भीकता एवं विश्वासपूर्वक बताया था ।

एक बार जगदीशचंद्र बसु फरीदपुर के मेले में सम्मिलित हुए । उन्हें वहाँ प्रार्थना में लीन रहने वाले एक वृक्ष की जानकारी मिली । सायंकालीन जब मंदिरों की घण्टियाँ लोगों को प्रार्थना में सम्मिलित होने का आमंत्रण देती थीं, तो वह वृक्ष भी घण्टनाद के साथ ही धरती पर साष्टांग दण्डवत करता दिखाई देता और प्रातः फिर तन कर खड़ा हो जाता । श्रद्धालु लोग इसे विशिष्ट वृक्ष मानकर मनौती चढ़ाते और पूजा अर्चना करते । आचार्य बसु के समाधान हेतु स्वनिर्मित यंत्र द्वारा जब उस वृक्ष का तापक्रम मापा तो ज्ञात हुआ कि तापक्रम गिरने व चढ़ने के साथ वृक्ष के रूप रंग में भी परिवर्तन होता है । गहन जाँच पड़ताल के पश्चात् उनने निष्कर्ष प्रस्तुत किया की यह तथ्य प्रत्येक पौधे पर लागू होता है । उन्होंने यह भी प्रमाणित किया कि जीवधारियों की तरह ही स्थावर वनस्पतियों में भी प्राण है तथा उन्हें भी सुख दुख रुग्णता तथा जन्म मरण का शिकार होना पड़ता है ।

महाभारत के शाँति पर्व में यह प्रश्न उठाया गया है कि वृक्षों के शरीर में प्राण चेतना है अथवा नहीं ? इसके उत्तर में कहा गया है कि वृक्षों के शरीर में पाँच इन्द्रियाँ एवं चेतना का अस्तित्व होता है । वृक्ष भी देखते हैं, सुनते हैं, अनुभव करते हैं और खाते-पीते हैं । प्राण चेतना के कारण वे पंच तत्वों से प्रभावित भी होते हैं । अनेक कोशों में जीवनीशक्ति का स्पन्दन भी होता है । ऋग्वेद में भी इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख है कि जब मरुत नार्यागणों के साथ आकाश में विचरण करते हुए गुजरते हैं तो वन के वृक्ष भय से काँप जाते हैं और छोटी-छोटी झाड़ियाँ इधर-उधर हो जाती हैं । लतायें अपने आधार के साथ लिपटकर अपने जीवन की रक्षा करती हुई सी प्रतीत होती हैं । ग्रीष्म और शीत ऋतु में भी इन्हें भय लगता है । जिस तरह मानवी काया में त्वचा, माँस, अस्थियाँ, मज्जा एवं स्नायु तंत्र के समूह होते हैं और उनसे समूचा कार्यकीय संचालन होता है, उस तरह इनमें भी उन सबके समूह रूप में तेज जठराग्नि, क्रोध, चक्षु और ऊष्मा होती है । श्रोत्र, प्राण, मुख, हृदय, कोष्ठ भी होता है। श्लेष्मा, कफ, पित्त, स्वेद, वसा, शोणित और जल ये वृक्षों के शरीर में भी काम करते हैं ।

आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी अपने गहन अध्ययन एवं अनुसंधान के आधार पर ऋग्वेद के उक्त कथन की पुष्टि कर दी है। इन वैज्ञानिकों में दाल्हमन, सारेन्सन, राइस, हाटकिन्स एवं रॉयल सोसाइटी के अध्यक्ष विलियम क्रूक्स जैसे प्रख्यात वैज्ञानिक सम्मिलित थे । इन सभी ने एक मत से स्वीकारा है कि वृक्ष वनस्पतियों में प्राण तत्व का सिद्धांत वैदिक काल से ही प्रचलित था । पिछले दिनों अज्ञान, अंधविश्वास एवं अहमन्यता के कारण इसकी अवहेलना होती रही है । इससे भी एक कदम आगे बढ़कर विलियम क्रूक्स ने कहा है कि सूक्ष्म प्राण एक शक्ति है जिसे जीवन का आधार कहा जा सकता है । इसी शक्ति से शरीर के समस्त भीतरी और बाहरी व्यापार संपन्न होते रहते हैं । वनस्पति शास्त्रियों ने इस शक्ति के लिए अनेक परिभाषित शब्दों का प्रयोग किया, जैसे मैग्नेटिज्म-चुम्बकत्व वाइटिलिटी-प्राणशक्ति वाइटलफोर्स -प्राण, आदि । प्राण, अपान, उदान, व्यान, समान ये पाँच प्राण वनस्पतियों के शरीर में भी काम करते हैं । उसमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध की अनुभूति होती है । ऊष्मा से न केवल कोमल पुष्प और फल मुरझा जाते हैं वरन् पत्ते और शाखाएँ भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहती। इसी तरह इन पर शीत का भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, अतः वे शब्द ग्रहण करते हैं और उस पर संगीत एवं भावनाओं का भी व्यापक प्रभाव पड़ता है । लतायें वृक्ष को आवेष्टित करते हुए आगे बढ़ती हैं ।---------------------, अतः इसमें दृष्टि भी है।

महाभारत के अनेक ऋषि-मनीषी स्थावर जंगम में प्राण तत्व और चेतना का विकास समान रूप से मानते थे । महर्षि व्यास इष्ट, अनिष्ट, मधुर, कटु, स्निग्ध, रुक्ष, निर्हारिया, बाहर निकालने वाला, संहर भीतर रहने वाला, विशद् स्पष्ट या उत्कट ये नौ प्रकार की सुगंध वृक्षों में मानते हैं । उसी प्रकार वे उनमें मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय, तिक्त आदि इन रसों का भी अस्तित्व मानते हैं । व्यास के अनुसार जिन विविध ज्योतियों का अनुभव वृक्षों को होता है, वे इस प्रकार है शुक्ल, कृष्ण, रक्त, नील, पीत, अरुण, हस्य, दीर्घ, स्थूल, चौरस, अणुवृतवान । इसी प्रकार वृक्षों को कठोर, चिकना, विलक्षण, पिच्छल, मृदु, दारुण, उष्ण, शीत, सुख, दुख और विशद् इन 12 गुणों का भी अनुभव होता है । आचार्य बसु एवं अन्यान्य वैज्ञानिक मैग्नेटिक रिकार्डर, डाइमेट्रिक, कान्ट्रक्शन, आर्स आदि जैसे यंत्रों के माध्यम से उक्त गुणों को सिद्ध कर दिखाने में सफल हुए हैं । देखा गया है कि पशु एवं वनस्पति में सूक्ष्म जाल तन्तु समान रूप से होते हैं । वनस्पतियों में भी प्राण प्रवाहित होता है । जिस प्रकार जीवधारियों की मृत्यु होती है, उसी प्रकार प्राण शक्ति क्षीण हो जाने के बाद पौधे भी मर जाते हैं ।

केनोपनिषद् के चतुर्थ खण्ड में वन संज्ञक ब्रह्म की उपासना का फल बताते हुए कहा गया है कि यह ब्रह्म ही वन है, उसकी वन नाम से उपासना करनी चाहिए । जो उसे इस प्रकार जानता है, उसे सभी भूत अच्छी तरह चाहने लगते हैं । वन की उपासना करने का अर्थ है कि पृथ्वी को हरा भरा रखना । इसके लिए हरीतिमा संवर्द्धन किया जाये और वृक्ष वनस्पतियों के विनाश को रोका जाये । इसी को सस्य संवर्द्धन रूपी महापुण्य कहा गया है ।

वैशेषिक दर्शन के अनुसार पेड़-पौधों को पंचतन्त्राओं से युक्त माना गया है । जड़ समझे जाने वाले वृक्षों को इन व्यापारों को अनुप्रेरित करने वाले प्राण चेतना के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता । यह क्रिया पत्तियों में होने वाले सूक्ष्म मुख होते हैं, जिन्हें वनस्पति विज्ञान की भाषा में ‘स्टोमेटा’ कहते हैं । गैसों का यह आदान-प्रदान श्वसन के लिए होता है । प्रकाश की उपस्थित में स्टोमेटा द्वारा प्रविष्ट हुई कार्बनडाइआक्साइड फोटोसिन्थेसिस प्रक्रिया द्वारा पौधों का खाद्य पदार्थ निर्मित करती है । महाभारत में वनस्पतियों में प्राण तत्व की अवस्थिति को सिद्ध करने के लिए जो तर्क दिये गये हैं, वे आधुनिक वनस्पति शास्त्रियों को भी मान्य हुए हैं । वनस्पति शास्त्रियों ने प्रोटोप्लाज्म को जीवन का भौतिक आधार माना है । वृक्षों में जीवों की तरह प्रोटोप्लाज्म होता है । जो उनकी प्राण चेतना को सम्पन्न करने का सबसे बड़ा प्रमाण है । वैशेषिक दार्शनिकों की तरह आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी प्रोटोप्लाज्म द्वारा सम्पादित श्वसन, चयापचय, पोषण, वृद्धि, गति और प्रजनन आदि को जीवधारियों के लक्षण माना है।

विख्यात विकास वादी वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन के अनुसार समूचे जन्तु जगत एवं वनस्पति जगत बहुत सरल एवं निम्न श्रेणी के जीवधारियों एवं वनस्पतियों का विकास होते होते विकास की इस अवस्था में पहुँचा है । इस प्रकार जब हम विकास मार्ग को खोजते हुए पीछे जाते हैं, तो हम पौधे तथा जानवरों के आदिम रूप में पहुँचते हैं । डार्विन का मानना है किस स्तर तक पौधे और जन्तुओं में कोई अन्तर नहीं था और तब दोनों का मूल एक था । कालान्तर में किन्हीं कारणों से इन मूल प्राणियों का विकास दो दिशाओं में हुआ, जिससे वनस्पति जगत और जन्तु जगत का प्रादुर्भाव हुआ । तात्पर्य यह है कि डार्विन ने भी अपने विकासवादी सिद्धांत को प्रक्रिया में वनस्पतियों को प्राणयुक्त माना है।

आचार्य बसु से लेकर विलियम क्रूक्स प्रभूत विज्ञानी अपने रहस्यवादी अध्यात्मवादी थे, बाद में वैज्ञानिक । अतः वेद, उपनिषद्, महाभारत जैसे प्राच्य ग्रंथों में प्रतिपादित वनस्पतियों की प्राणचेतना से अवगत रहे हो और वर्षों तक प्रकृति के इन रहस्यों का अवलोकन करने के बाद इन्हें वैज्ञानिक धरातल पर प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए दृढ़ संकल्पित हुए हो ।

वृक्ष-वनस्पति प्राणतत्त्व सम्पन्न है, चेतना उनके अन्दर भी है । अतः उनकी सुरक्षा एवं पोषण समस्त चर-अचर जीव जन्तुओं की सुरक्षा एवं पोषण करने के समान है । हरितक्राँति करने का अर्थ है कि जीवों को प्राणदान देने जैसा पुण्य । एक पेड़ लगाने और उसे बड़ा करने का तात्पर्य है कि एक बच्चे को पाल पोष कर बड़ा करना । इस तथ्य से यदि हृदयंगम किया जा सके तो जंगलों को, वनों को उजाड़ने का क्रम रुकेगा और अपनी ही प्राणचेतना को विकसित करने के लिए वृक्षारोपण का क्रम चल पड़ेगा । सचमुच “आत्मवत् सर्वभूतेषु” वचन तभी सार्थक होंगे ।


मृतात्मा ने दुश्मनों से बचाया

रात का गहरा सन्नाटा सब ओर व्याप्त था । घने अंधेरे की काली चादर ने सबको अपने में ढ़क लिया था । पेड़-पौधे-पशु-पक्षी राह-पगडण्डियाँ सब अपने को इसी आवरण में छिपाये थे । वे सभी पशोपेश में थे, उन्हें समझ में नहीं आ रहा था किस ओर कदम बढ़ायें । वे सब अंधेरे में एक दूसरे की चमकती आँखों में यदा कदा ताक लेते और फिर सोच में पड़ जाते । इस अंधकार ने उनमें से किसी को अपनी सारी कोशिशों के बावजूद रास्ता सूझ नहीं पड़ रहा था ।

ये सभी सैनिक थे भारतीय सैनिक । संख्या में 25-30 रहें होंगे । उनकी टुकड़ी के नायक के पास उस क्षेत्र का एक नक्शा जरूर था । मगर इस समय उससे किसी तरह की कोई सहायता नहीं मिल पा रही थी । उन्हें अपना हर कदम भली-भाँति सोच समझकर आगे बढ़ाना था । कोई भी गलत कदम जानलेवा साबित हो सकता था । यह युद्ध का समय था । पाकिस्तानी सेनाएँ जान-बूझकर भारतीय क्षेत्र में अशाँति फैलाने की कोशिश काफी अर्से से करने लगी थीं और अब तो उन्होंने बाकायदा लड़ाई भी छेड़ दी थी । हमारी सीमाओं के रणबांकुरा प्रहरी उनका मुँह तोड़ जवाब दे रहे थे ।

स्ना की इस टुकड़ी की नियुक्ति जम्मू-कश्मीर में थी । आज इसे 15-20 मील दूर चौकी पर पहुँचना था और वह भी रातों-रात ताकि दुश्मन को उसकी योजना और अभियान का पता न चल सके । अपने वायरलैस सेट पर कमाण्डर पोस्ट से उनका सम्पर्क लगातार बना था । टुकड़ी के चालक ने वरिष्ठ अधिकारियों को अपनी समस्याओं से अवगत करा दिया था । वरिष्ठ अधिकारी भी ऐसे में क्या करते ? घनी अंधेरी सन्नाटे भरी रात ऊपर से पिछली रात हुआ हिमपात । कहीं कुछ नहीं सूझ पड़ रहा था । उधर कड़ाके की ठंड अपने तेवर दिखा रही थी । तेज बर्फीली हवा रात के भयावह सन्नाटे को चीरती हुई उन सब की पसलियों को भेद रही थी । जिस किसी तरह उन सबने सावधानी पूर्वक एक ओर कदम बढ़ाये । लेकिन कुछ ही देर जाने पर वह रास्ता भी बन्द हो गया ।

तब तो इस कड़ाके की सर्दी में भी सबके चेहरे पसीने से भीग गये । वे अपनी पिछली चौकी काफी पीछे छोड़ चुके थे और आगे चारों ओर बर्फ ही बर्फ दिखाई दे रही थी । टुकड़ी के नायक ने अपनी घड़ी पर नजर डाली । तीन बज रहे थे, सुबह के तीन यानि कुछ ही घण्टों के बाद सुबह हो जायेगी और वे इस समय पूरी तरह खुले में थे । हर तरह से असुरक्षित सुबह के उजाले में रास्ता मिलने की संभावना कम और दुश्मन के हमले की संभावना ज्यादा थी । सुबह का प्रकाश उनके लिए रक्तपात का संदेश ला सकता था ।

वो सैनिक थे जाँबाज सैनिक ! उनमें से किसी को अपने मरने का खौफ नहीं था । अफसोस था, तो इस बात का कि यदि दुश्मन की गश्त देती टुकड़ी आस पास हुई तो उनसे मुठभेड़ निश्चित थी और इस मुठभेड़ का मतलब था कि सारी योजना धूल में मिल जायेगी । सारे किये धरे पर पानी फिर जायेगा । किसी भी कीमत पर उन्हें रात के अंधेरे में ही अगली चौकी तक पहुँचना था । पर कैसे ? समस्या यही थी ।

टुकड़ी के नायक के माथे पर चिंता की रेखायें गहरी और घनी होने लगी । साथी सैनिक भी परेशान हो उठे थे । भयावह अंधेरे में, बर्फीली हवाओं के थपेड़ों को सहते हुए एक स्थान से दूसरे स्थान पर गहरे सोच में डूबे हुए 25-30 निर्भीक सैनिक ।

तभी वायरलैस सेट ने अपना संकेत देना शुरू किया । टुकड़ी के चालक ने रिसीवर अपने कान में लगाया । उधर कमाण्डर पोस्ट से पूछा जा रहा था, “तुम लोग कब तक चौकी पहुँचोगे ? जल्दी करो अब सुबह होने में ज्यादा देर नहीं ।”

टुकड़ी के नायक ने अपनी परिस्थितियों के बारे में बताया । उधर से चेतावनी भरा संदेश आया, परिस्थितियाँ कुछ भी हों पर तुम लोग ध्यान रखो, “सोल्जर्स् नेवर क्विट टिल डेथ”, यानि की सैनिक मरने तक अपने कदम पीछे नहीं हटाते । तुम सब रास्ता ढूँढ़ो और आगे बढ़ो । अपने कमाण्डर का संदेश सुनकर टुकड़ी नायक ने एक फौजी के से विश्वास भरे लहजे में कहा - सर सुबह से पहले हम जरूर चौकी पहुँच जायेंगे ।

कहने को तो उसने कह दिया, पर असलियत तो कुछ और ही होने जा रही थी । तभी सारे सिपाही, टुकड़ी का नायक, साँस थाम चौकन्ने हो गये । उस निर्जन इलाके में कोई फौजी आ रहा था अकेला । सैनिक ने कदमों की आहट से उसे पहचान लिया कि जरूर वह कोई फौजी ही है ।

लेकिन इस तरह वह अकेला क्यों ?

क्या पता, हो सकता है कि दुश्मन का कोई भटका हुआ सिपाही हो ? ऐसे अनगिनत सवाल एक साथ ही एक ही पल कौंध रहे थे ।

सभी सावधान हो गये । हरेक ने अपने अपने हथियार सँभाल लिये । कदमों की आहट लगातार तेज होती जा रही थी । आने वाले का कदम उन्हीं की ओर बढ़ रहा था । अब तक यह साफ हो चुका था कि आने वाला जो कोई भी है उन्हीं की ओर आ रहा है ।

अब तो साँस लेना भी मुसीबत को बुलावा भेजना था । वे सब किसी तरह अपनी उपस्थिति का आभास नहीं होने देना चाहते थे । लेकिन करें भी तो क्या ? आने वाला उनके पास तक पहुँच चुका था । अब वह आकृति उनके समीप आ चुकी थी ।

वह अकेला था उसके साथ और कोई नहीं था ।

दूसरे शब्दों में उससे कोई तत्कालिक भय की बात नहीं थी ।

वह एक और वे पच्चीस थे । तभी टुकड़ी के नायक ने अपनी टार्च की तेज रोशनी उस पर फेंकी । अब तो टुकड़ी के चालक ने ही नहीं, सभी ने उसे देखा, उसके सामने अपनी ही सेना का एक कैप्टन खड़ा है । आकर्षक चेहरा, सुगठित शरीर । उसके खड़े होने के अन्दाज में एक अदम्य आत्मविश्वास एवं गहरी सौम्यता झलक रही थी ।

अभी टुकड़ी का नायक कुछ बोल पाता, कि वह आगन्तुक कैप्टन कहने लगा, आगे का रास्ता बेहद खतरनाक है और हिमपात की वजह से सब छिप गया है । आप लोग मेरे साथ आइये, मैं आपको रास्ता दिखा दूँगा अगली चौकी तक ही तो जाना है आपको ।

टुकड़ी के नायक ने थोड़ा आश्वस्त होते हुए जवाब दिया कि हम सब इन कश्मीर की पहाड़ियों में लगभग खो से गये हैं सुबह होने से पहले हम सबको हर हाल में अपनी चौकी तक पहुँचना है । लेकिन करें क्या ? कोई रास्ता ही नहीं सूझ पड़ता । चारों तरफ बर्फ और भयानक अंधेरा है । नायक की बात समाप्त होने के पहले ही आगन्तुक कैप्टन ने कहा, हाँ मुझे मालूम है कि कल एक्शन हुआ था, लेकिन दुश्मन को तो जबरदस्त क्षति हुई । अपनी सारी ओछी चालों के बावजूद वह कामयाब न हो सका । फिर भी उस चौकी को सैनिकों की बेहद जरूरत थी । बड़ा अच्छा हुआ, आप लोग आ गये । उस कैप्टन ने खुश होते हुए कहा । फिर पल भर रुक कर बोला, आप लोग मेरे पीछे पीछे आइये । इधर कई रोज से मैं इधर की पोस्टिंग पर था । इसलिए इस इलाके का चप्पा-चप्पा मेरा छाना हुआ है ।

वह आगे बढ़ने लगा । उसके पीछे नायक के कदम पड़ रहे थे । सैनिक अपने नायक का अनुगमन कर रहे थे ।

कैप्टन उससे बातें करने लगा । उसने बताना शुरू किया कि कल दुश्मन ने किस तरह भीषण गोलाबारी की । कई लोग मारे गये । दोनों ओर हेवी कैज्युल्टी हुई । खुशी की बात इतनी ही रही कि वे तमाम कोशिशों के बाद भी अपनी चौकी छीनने में कामयाब नहीं रहे । फिर उसने नायक से सवाल किया, क्या आपने कभी कोई मृतात्मा देखी है ?

नायक का दिमाग उस समय तरह-तरह के ख्यालों में उलझा था । उसे समय पर चौकी पहुँचने की फिक्र लगी थी । कल की योजनाएँ बनानी थीं । पता नहीं सुबह से क्या होने लगे । हो सकता है सूरज उगते ही गोलाबारी शुरू हो जाये । वह अपनी इन्हीं चिंताओं में डूब उतर रहा था । कभी-कभी उसे अपने आगे चल रहे युवा कैप्टन का ख्याल भी घेर लेता, आखिर कौन है यह ? पता नहीं किस यूनिट का इंचार्ज है, अभी तक इसने अपना नाम तक नहीं बताया ? यहाँ बीहड़ में अकेला भटकने क्यों आया है ? वह उससे सारे सवाल पूछने वाला ही था कि कैप्टन ने फिर से अपना वही सवाल दोहराया क्या आपने कभी किसी मृतात्मा को देखा है ?

कैप्टन कहने लगा, मृतात्माएँ होती हैं और हर मृतात्मा बुरी नहीं होती । अनेक मृतात्माएँ तो संकट में पड़े आपत्तिग्रस्त लोगों की सहायता भी करती हैं ।

एक पल के लिए नायक चौंक उठा, आपत्तिग्रस्त लोगों की मृतात्माओं द्वारा सहायता ।

एक सवाल मन में कौंध रहा था । कही यह भी कोई मरा हुआ आदमी तो नहीं ? फिर उसे अपने इस अनजाने व्यक्ति के बारे में ऐसे विचार पर ग्लानि होती है । उसने अपने बातचीत का विषय बदलने की कोशिश की तथा उसके नाम और यूनिट के बारे में पूछा ।

कैप्टन जवाब टाल गया । कहने लगा कि अब तो आपकी चौकी भी पास आ गयी है । पौ फटने में ज्यादा देर नहीं । चौकी पहुँचने पर आपको सब पता चल जायेगा ।

और सचमुच कुछ ही कदमों के बाद चौकी आ गयी थी । सुबह की झुटपुटे की अभ्यस्त निगाहें उन्हें देख पा रही थीं । एक भारी वजन उनके सिर से उतर गया । तभी कैप्टन ने चौकी की तरफ इशारा करते हुए कहा, लो आप लोग सही सलामत समय पर पहुँच गये, बड़ी खुशी हुई, जाइये ।

लेकिन आप भी तो हम लोगों के साथ चलेंगे, टुकड़ी के नायक ने कहा । नहीं, माफ कीजिए । थोड़ा जरूरी काम है अभी चौकी पर नहीं पहुँच सकूँगा । नायक कुछ ओर कह पाता कि कैप्टन मुड़कर एक ओर जाने लगा । नायक समेत उसे सारे सिपाही लौटते देख निहारने लगे । कई सवाल उन सब के मन में थे, तभी अचानक उन सब की नजर कैप्टन की पीठ पर पड़ी, अब तक सुबह के प्रकाश में सब कुछ साफ साफ झलक रहा था । उन्होंने देखा कि ठण्ड से बचाव के लिए पहनी गयी जरसी में एक बड़ा सा छेद था मानो गोली लगी हो । छेद के आस पास का हिस्सा काला सा पड़ गया था । संभवतः जलने या गोली के घाव के कारण बहे खून के जमने से ।

टुकड़ी का नायक यह सब देखकर अवाक् था । उसके बाकी साथी भी भौचक्के थे । तभी अचानक नायक को कुछ देर पहले कही गयी कैप्टन की बात याद आई कि सभी मृतात्माएँ बुरी नहीं होतीं, वे आपत्तिग्रस्त लोगों की मदद करती हैं । तो क्या! ये कैप्टन भी ..............। आगे वह कुछ सोच न सका ।

थोड़ी देर उसी जगह खड़े होने के बाद वे सब चौकी के अन्दर चले गये । जहाँ कमाण्डर उनका इन्तजार कर रहा था । जब इन लोगों ने रात का सारा घटनाक्रम सुनाया तो वह चौंक पड़ा । नहीं, ऐसा नहीं हो सकता । फिर उसने कैप्टन के विषय में परिचय देते हुए संक्षेप में बताया कि अभी कल के एक्शन में उसे पीठ पर गोली लगी थी । उसे बचाया न जा सका । कल शाम को हम लोगों ने उसकी अन्त्येष्टि सम्पन्न की है ।

यह सुनकर नायक की आवाज रुंध गयी, गला भर्रा आया । बोला सर सर उसने मुझसे कहा भी था कि चौकी पर पहुँचने के बाद पता चल जायेगा । ठीक वही हुआ ।

थोड़ी देर रुक कर उसने पूछा - सर यह संभव है क्या ? मेरी तो अभी कुछ समझ में नहीं आ रहा है । क्या मृतात्माएँ भी हमारी सहायता करती हैं । पहले तो मैं भी विश्वास नहीं करता था, कमाण्डर बोला, लेकिन पिछली रात जो हुआ उसे बाद शक की कोई गुँजाइश नहीं रही । निश्चित पुण्यात्माएँ मरने के बाद भी अपनी सेवा सहायता की वृति नहीं छोड़तीं । देश के लिए अपना बलिदान देने वाला कैप्टन निश्चय ही पुण्यात्मा था । कमाण्डर के इस कथन के साथ ही सभी के सिर उसके सम्मान में झुक गये ।


इच्छाशक्ति से गुणसूत्र भी बदले जा सकते हैं

आनुवंशिक विज्ञान के अंतर्गत पिछले दिनों यह सिद्ध किया जाता रहा है कि प्राणी अपने पूर्वजों के प्रतिकृति होते हैं। माता पिता के डिम्ब कीट और शुक्र कीट मिलकर भ्रूण कलन में परिणित होते हैं और अपना शरीर बनना आरम्भ हो जाता है । उस शरीर में जो मनःचेतना रहती है उसका स्तर भी पूर्वजों की मनः स्थिति के अनुसार मिलता है। शरीर की संरचना और शारीरिक मानसिक बनावट के लिए वह हद तक पूर्वजों के उन जीवाणुओं को ही जिम्मेदार ठहराया गया है, जो परम्परा के रूप में वंशधरों में उतरते चले जाते हैं ।

इस प्रतिपादन से यह निष्कर्ष निकलता है कि व्यक्ति अपने आप में कुछ बहुत अधिक महत्वपूर्ण नहीं है पूर्वजों के ढाँचे में ढला हुआ एक खिलौना मात्र है । यदि संतान को सुयोग्य सुविकसित बनाना हो तो वह कार्य पीढ़ियों पहले आरम्भ किया जाना चाहिए, अन्यथा साँचे में ढाले हुए इस खिलौने में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो सकेंगे ।

आनुवांशिकी का यह प्रतिपादन जहाँ तक मानव प्राणी का संबंध है, बहुत ही अपूर्ण और अवास्तविक है । पशु -पक्षियों में एक हद तक यह बात सही भी हो सकती है पर मनुष्यों के लिए कहना अनुचित है कि वह पूर्वजों के साँचे में ढला हुआ एक उपकरण मात्र है । यह मानवी इच्छाशक्ति, विवेक-बुद्धि स्वतंत्र चेतना और आत्म निर्भरता को झुठलाना है । समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री और मनोविज्ञानवेत्ता वातावरण एवं परिस्थितियों के उत्थान पतन का कारण बताते रहे हैं । आत्मवेत्ताओं ने एक स्वर से सदा यही ही कहा है - मनुष्य की अंतःचेतना स्वनिर्मित है । यह वंश परम्परा से नहीं, संचित संस्कारों और प्रस्तुत प्रयत्नों के आधार पर विकसित होती है । इच्छा शक्ति और संकल्प शक्ति के आधार पर अपने मानसिक ढाँचे में कोई चाहे तो आमूल चूल परिवर्तन कर सकता है ।

आनुवांशिकी की मान्यता एक हद तक ही सही ठहराई जा सकती है । चमड़ी का रंग, चेहरा, आकृति, अवयव आदि पूर्वजों की बनावट के अनुरूप हो सकते हैं पर गुण, कर्म, स्वभाव भी पूर्वजों जैसे हों यह आवश्यक नहीं । यदि ऐसा नहीं होता तो किसी कुल में सभी अच्छे और किसी कुल में सभी बुरे होते । रुग्णता, सज्जनता, स्वास्थ्यता, बुद्धिमत्ता, मूर्खता, दुष्टता, कुशलता भी परम्परागत होती तो प्रगतिशील परिवार के सभी व्यक्ति सुविकसित होते और पिछड़े लोग सदा के लिए गये गुजरे ही बने रहते । तब उत्थान पतन के लिए किये गये प्रयत्नों की भी कुछ सार्थकता न होती, वातावरण का भी कोई प्रभाव न पड़ता । पर ऐसी स्थिति नहीं है, पूर्वजों की स्थिति से सर्वदा भिन्न स्तर की संतानों के अगणित उदाहरण पग-पग पर सर्वत्र बिखरे हुए देखे जा सकते हैं । इससे मनुष्य की स्वतंत्र चेतना और इच्छा शक्ति की प्रबलता का लक्ष्य ही स्पष्ट रूप से समाने आता है ।

मद्यप् मनुष्यों की संतान क्या स्वजन्मजात रूप से उस लत से ग्रसित होती है ? इस खोजबीन में पाया गया है कि ऐसी कोई बात नहीं हैं, वरन् उलटा यह हुआ कि बच्चों के बाप को मद्यपान के कारण अपनी बरबादी करते देखा तो वे उसके विरुद्ध हो गये और उन्होंने न केवल मद्यपान से अपने को अछूता रखा वरन् दूसरों को भी उसे अपनाने से रोका ।

मनुष्य के गुण सूत्रों के हेर-फेर से जो परिणाम सामने आये उनसे स्पष्ट है कि बिगाड़ने में अधिक और बनाने में कम सफलता मिली है । विकलांग और पैतृक रोगों से ग्रसित संतान उत्पन्न करने में आशाजनक सफलता मिली है क्योंकि विषाक्त मारकता से भरे रसायन सदा अपना त्वरित परिणाम दिखाते हैं यह गति विकासोन्मुख प्रयत्नों की नहीं होती । नीलाथोथा खाने से उल्टी तुरन्त हो सकती है पर पाचन शक्ति सुधार देने के प्रयोग उतने सफल नहीं होते हैं । देव से असुर की शक्ति को अधिक मानने का यही आधार है । मनुष्यों में मनचाही संतान उत्पन्न करने का प्रयोग सिर्फ उतनी मात्रा में कुछ अधिक सफल हुआ है कि रंग-रूप और गठन की दृष्टि से जनक-जानकी का सादृश्य दृष्टिगोचर हो सके । काया की आँतरिक दृढ़ता, बौद्धिक तीक्ष्णता एवं भावनात्मक उत्कृष्टता उत्पन्न करने में वैज्ञानिक प्रयोगों का उत्साह वर्धक परिणाम नहीं निकलता है ।

गुण सूत्रों को बदलने में इन दिनों विद्युत ऊर्जा एवं रासायनिक हेर-फेर के साधन जुटाये जा रहे हैं । पर वे यह भूल जाते हैं कि यह बाहरी थोप-थाप स्थिर न रह सकेगी, उसमें क्षणिक चमत्कार भले ही देखा जा सकें । शरीर के प्रत्येक अवयव को मस्तिष्क प्रभावित करता है और मस्तिष्क का सूत्र संचालन इच्छा शक्ति के हाथ में रहता है । अस्तु शारीरिक, मानसिक समस्त परिवर्तनों का तात्त्विक आधार इस इच्छा शक्ति को ही मानना पड़ेगा ।

अभीष्ट स्तर की पीढ़ियाँ क्या रासायनिक हेर-फेर अथवा वुतीय प्रयोग उपकरणों द्वारा प्रयोगशाला में विनिर्मित हो सकती है ? यह एक जटिल प्रश्न है । यदि ऐसा हो सकता तो यह मानना पड़ेगा कि मनुष्य इच्छा शक्ति का धनी नहीं, वरन् रासायनिक अभिक्रियाओं का परावलम्बी प्रतिक्रिया मात्र है । यदि यह सिद्ध हो चुका हो तो इसे मनोबल और आत्मबल की गरिमा समाप्त कर देने वाली दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ही कहा जायेगा, पर ऐसा हो सकना संभव दिखाई नहीं पड़ता भले ही इसके लिए एड़ी चोटी के प्रयत्न कितने ही किये जाते रहें ।

शरीर के विभिन्न अंगों पर दबाव डाले जाते रहे हैं, पर प्राणी की मूल इच्छा ने उस दबाव को आवश्यक नहीं समझा तो उस तरह के परिवर्तन ही नहीं हो सके । चीन में शताब्दियों तक स्त्रियो के पैर छोटे होना, सौन्दर्य का चिन्ह माना गया है इसके लिए उन्हें कड़े जूते पहनाये जाते थे । उससे पैर छोटे बनाने में सफलता मिलती पर वंश परम्परा कि दृष्टि से वैसा कुछ भी नहीं हुआ । हर नई लड़की के पैर पूरे अनुपात में ही होते थे । प्राणियों के क्रमिक विकास में इच्छा शक्ति का ही प्रधान स्थान है । मनुष्य तो मनोबल का धनी है, उसकी बात जाने भी दें और अन्य प्राणधारियों पर दृष्टिपात करें तो प्रतीत होगा कि उनकी वंश परम्परा में बहुमुखी परिवर्तन होता है । इसका कारण सामयिक परिस्थितियों का चेतना पर पड़ने वाला दबाव ही प्रभाव कारण रहा है । असुविधाओं को हटाने और सुविधाएँ बढ़ाने की आँतरिक आकांक्षा ने प्राणियों की शारीरिक स्थिति और आकृति में नहीं, प्रकृति में भी भारी हेर फेर प्रस्तुत किया है । जीव विज्ञानी इस तथ्य से भली भाँति परिचित हैं ।

यदि पूर्वजों का गुण लेकर ही संतानें उत्पन्न होने वाली बात को सही माना जया तो जीवों की आकृति प्रकृति में अन्तर कैसे संभव हुआ ? उस स्थिति में तो पीढ़ियों का सत्र एक ही प्रकार से चलता रहना चाहिए ।

लोमार्क ने प्राणियों का स्तर बदलने में वातावरण को, परिस्थितियों को श्रेय दिया है । वे कहते हैं इच्छा शक्तिओं-दबावों नहीं रहता ।-------------------कवके कारण उभरती है । सुविधा संपन्न परिस्थितियों के प्राणियों के ऊपर किसी प्रकार का दबाव नहीं रहता अतएव उनका शरीर ही-------- बुद्धि कौशल भी ठप्प पड़ता है । अमीरी के वैभव में पाले हुए लोग अक्सर छुईमुई बने रह जाते हैं और उनका चरखा बखेर देने के लिए एक छोटा सा आघात ही पर्याप्त है ।

जीवों का विकास इतिहास के पन्ने पन्ने पर यह प्रमाण भरे पड़े हैं कि प्राणियों का अंग प्रत्येक निष्क्रियता के आधार पर कुण्ठित हुए है और सक्रियता ने उन्हें विकसित किया है । प्रवृत्ति, प्रयोजन और चेष्टाओं की मूल इच्छा शक्ति है । असल में यह इच्छा शक्ति ही प्राणिसत्ता में विकास, अवसाद उत्पन्न करती है । रासायनिक पदार्थों के गुण सूत्रों की वंश परम्परा विज्ञान में कायिक क्षमता को एक अंश तक प्रभावित करने वाला आधार भर माना जाना चाहिए । आधुनिक विज्ञान वेत्ता मौलिक भूल यह कर रहे है कि मानवी सत्ता को उन्होंने रासायनिक प्रतिक्रिया मात्र समझा है और उसका विकास करने के लिए जनक जननी को, उनके जनन रसों को अत्याधिक महत्व दे रहे हैं । इस एकाकी आधार को लेकर मनचाही आकृति प्रकृति पीढ़ियाँ वे कदाचित् ही पैदा हो सके ।

वैज्ञानिक वेजमेन ने चूहों और चुहियों को लगातार बीस पीढ़ियों तक पूँछ काटी और देखा कि क्या इसके फलस्वरूप बिना पूँछ वाले चूहे पैदा किये जा सकते हैं ? उन्हें अपने प्रयोग में सर्वथा असफल होना पड़ा । बिना पूँछ के माँ-बाप भी पूँछ वाले बच्चे ही जनते चले गये । इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि कि मात्र शारीरिक हेर फेर से वंशानुक्रम नहीं बदला जा सकता है । इसके लिए प्राणी को अपनी रुचि एवं इच्छा का समावेश करना नितान्त आवश्यक है ।

हर्बर्ट स्पेन्सर ने खोजों में ऐसे कितने ही प्राणियों के उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, जिन्होंने शरीर के किसी अवयव को निष्क्रिय किया है कि वह क्षीण होता चला गया । इसके विपरीत ऐसे उदाहरण भी कम नहीं हैं जिसमें “आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है” वाले सिद्धांत को सिद्ध करते हुए अपने शरीर में किसी तरह के नये पुर्जे विकसित किये और पुरानों को आश्चर्यजनक स्तर पर परिष्कृत किया ।

समुद्रतल की गहराई में रहने वाली मछलियों को प्रकाश से वंचित रहना पड़ता है अतएव उनकी आँखों के चिन्ह रहते हुए भी उनमें रोशनी नहीं रहती है । आँखों वाले अन्धों में उनकी गणना की जा सकती है । अंधेरी गुफाओं में जन्मने और पलने वाले थलचरों का भी यही हाल होता है । उनकी आँखें ऐसी होती हैं कि जो अंधेरे में ही कुछ काम करती हैं प्रकाश में तो बेहतर ही चौंधा जाते हैं ।

समर्थ का चुनाव मात्र शारीरिक बलिष्ठता पर निर्भर नहीं है वरन् सच पूछा जाये तो उनकी मनो स्थिति ही परख की कसौटी होती है । पशुवर्ग और सरीसृप वर्ग के विशालकाय प्राणी आदिम काल में थे । उनकी शरीर गत क्षमता अद्भुत थी । फिर वे भी मन्द बुद्धि अदूरदर्शिता, आलस्य जैसी कमियों के कारण दुर्बल संज्ञा वाले ही सिद्ध हुए और अपना अस्तित्व ही खो बैठे । जबकि उसी समय के छोटी काया वाले अपने मनोबल के कारण अपनी सत्ता सँभालने रहे वरन् क्रमशः विकासोन्मुख भी होते चले गये । जीवों के विकास का क्रम एक ही महत्वपूर्ण आधार यह है कि उन्हें परिस्थिति यों से जूझना पड़ा अवरोध के सामने टिके रहने के लिए अपने शरीर व स्वभाव में अंतर करना पड़ा । यह परिवर्तन किसी रासायनिक हेर फेर के कारण नहीं, विशुद्ध रूप से इच्छा शक्ति की प्रवाह धारा बदल जाने से ही संभव है । जीवन संग्राम में जूझने की पुरुषार्थ परायणता का उपहार ही अल्प प्राण जीवों को महाप्राण स्तर में बदले सकने का रूप मिलता है जिन्होंने विपत्ति में लड़ने की हिम्मत छोड़ दी थी और हताश होकर पैर पसार बैठे । उन्हें प्रकृति ने कूड़े कचरे की तरह बुहार कर घूरे में पटक दिया । किसान और माली भी तो अपने खेत बाग में अनुपयोगी खर पतवार को ऐसी उखाड़ पछाड़ करते रहते हैं ।

विकास की उपलब्धि पूर्णता संग्राम में विजय प्राप्त करने के फलस्वरूप ही मिलती है और इस संघर्षशीलता का पूरा आधार साहसी एवं पुरुषार्थी मनोबल के साथ जुड़ता रहता है ।

आनुवांशिक विज्ञान की अनन्य शोधें कितनी ही महत्वपूर्ण क्यों न हों पर वह प्रतिपादित स्वीकार नहीं हो सकता कि प्राणियों का विशेषतया मनुष्यों का स्तर पूर्वजों की परम्परा गुणसूत्रों पर निर्भर है । इच्छा शक्ति की प्रचण्ड सार्थकता के आधार पर शारीरिक, मानसिक और सामाजिक परिवर्तनों की संभावना की मान्यता देने के उपरान्त ही वंशगत विशेषताओं की चर्चा की जाये यही उचित है ।


अब्राहम लिंकन (Kahani)

अब्राहम लिंकन के एक मित्र ने समाचार पत्र देखते हुए कहा कि “देखिये, लोग आपकी कितनी आलोचना करते हैं, आप इसका प्रतिवाद क्यों नहीं करते ?” लिंकन ने बड़े धैर्य से संक्षिप्त में उत्तर दिया, “ मित्र वाद-प्रतिवाद के चक्कर में पड़ा रहा तो राष्ट्र सेवा कब करूँगा ? यदि मेरे कार्यों से जनता का भला होता है तो आलोचकों के मुँह स्वयं ही बन्द हो जायेंगे यदि मैं जानता कि सुविधाओं का ध्यान नहीं रखूँगा तो मुझे इस आलोचना से कोई नहीं बचा सकता ।”


गायत्री साधना के आरंभिक सोपान

गायत्री उपासना के पाँच चरण है । सर्वजनीन, सार्वभौम उपासना में इन्हें ही प्रस्तुत किया जाता है । गायत्री उपासना के यह पाँच चरण है - (1) आत्म शोधन, (2) देवपूजन (3) जप (4) ध्यान (5) सूर्यार्घदान आदि एक मुखी उपासना के समय काम आने वाले यही वे सूत्र हैं जिनके रहस्य एवं मर्मों को यदि समझते हुए क्रियाकृत्य किये जाये तो सुनिश्चित रूप से यह सत्परिणाम सामने आयेगा जिसका उल्लेख वेद, शास्त्रों, पुराणों में किया गया है ।

सार्वभौम साधना क्षेत्र में गायत्री एकमुखी है । एकमुखी का तात्पर्य है अंतःकरण का परिष्करण के लक्ष्य पर अर्जुन के मत्स्यवेध जैसी गुरुवरण की अखण्ड निष्ठा । लक्ष्य प्राप्ति का एकमात्र यही उपाय है । इसके अवलम्बन की प्रेरणा देन वाली एकमुखी गायत्री है । इसमें जीवन लक्ष्य और उसके धारा प्रवाह की दिशा निर्धारित है ।

उच्चस्तरीय गायत्री साधना में गायत्री पंचमुखी है । कुक्षा के अनुरूप इस साधना को भी पाँच चरणों में विभाजित किया गया है । इस साधना उपक्रम में पाँच कोशों का अनावरण किया जाता है । सूक्ष्म शरीर में पाँच ऐसे रत्नकोश हैं जिसमें विभूतियों और सम्पत्तियों के विपुल भाण्डागार भरे पड़े हैं । इन पाँचों को अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश कहते हैं । यह पाँचों कोश सामान्यतया प्रसुप्त स्थिति में पड़े

रहते हैं, किन्तु इन्हें जब प्रयत्नपूर्वक जगाया जाता है तो वे कुम्भकरण की तरह अपने प्रबल पराक्रम का परिचय देते हैं । जाग्रत स्थिती में पाँच देवों के अनुग्रह से से मिलने वाली सिद्धि वर्षों------------ की तरह साधक को सामान्य से असामान्य, तुच्छ मानव से देवमानव बना देती है । कुण्डलिनी जागरण भी उच्चस्तरीय गायत्री साधना का ही एक विशिष्ट पक्ष है । इसमें भी पाँच साधना तपश्चर्याएँ की जाती हैं । कठोपनिषद् के यम नचिकेता संवाद में इसी साधना विज्ञान का पंचाग्नि विद्या का नाम से वर्णन है । इस प्रयोग को किस प्रकार क्रियान्वित किया जाता है इसकी चर्चा यहाँ न करके इन पंक्तियों में केवल सर्वजनीन सर्वसुलभ एक मुखी गायत्री साधना उपासना की चर्चा ही अभीष्ट है ।

इन पाँच उपचारों के सहारे सामान्य और प्राथमिक उपासना को आरम्भ किया जाता है। इसमें प्रथम है- आत्मशोधन । आत्मशोधन के लिए पाँच कृत्य किये जाते है-(1) पवित्रीकरण (2) आचमन (3) प्राणायाम (4) न्यास (5) शिखाबंधन ।

पवित्रीकरण में बायें हाथ की हथेली पर जल रखकर उसे दाहिने हाथ से ढकते और पाठ करते हैं । इसके उपरान्त जल को समस्त शरीर पर छिड़क लिया जाता है । इसमें भावना की जाती है कि इस मंत्रपूत जल के साथ विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त पवित्रता की हमारे ऊपर वर्षा हो रही है । फव्वारे या झरने के नीचे स्नान करने की तरह उस अमृत वर्षा का आनन्द लिया जा रहा है । पवित्रता शरीर के भीतर प्रविष्ट होकर चेतना के समस्त घटकों पवित्र बना रही है ।

आचमन में मंत्रपूर्वक तीन बार तीन चमची जल मुख में डाला जाता है ।इसका तात्पर्य है क्रियाशक्ति, विचारशक्ति और भावना शक्ति का परिमार्जन । इन तीनों चेतना केन्द्रों में शाँति शीतलता और सात्विकता एवं पवित्रता का समावेश है । विशेषतया जिह्वा की पवित्रता इन आचमनों द्वारा विशेष रूप से आवश्यक बताई गयी है । आहार और आचरण के संबंध में सतर्क रहने से जिह्वा में वह शक्ति उत्पन्न होती है कि पवित्र वाणी से किया गया जप ही सफल होता है । यह सिद्धांत इस आचमन प्रक्रिया के अंतर्गत समझाया गया है ।

प्राणायाम में श्वास को भीतर खीचना, भीतर रोकना, बाहर निकालना और बाहर ही रोकना यह चार क्रिया मंत्र पूर्वक की जाती है । इन चार क्रियाओं को पूरक, अंतःकुंभक, रेचक, बाह्य कुंभक कहते हैं । श्वास खींचते समय भावना की जाती है कि निखिल अंतरिक्ष में संव्याप्त वायु तत्व के साथ चेतन प्राणतत्त्व भीतर प्रवेश करता है और दिव्य शक्ति को काया के कण-कण में भर देता है । साँस रोकते समय भावना करनी चाहिए कि उस खींची हुई दिव्य प्राण शक्ति को शरीर के अवयवों, रक्तकणों और चेतन संस्थानों द्वारा सीखा और सर्वदा के लिए भीतर धारण किया जाये । साँस निकालते समय भावना रखनी चाहिए कि बहिष्कृत विकारों को बाहर न लौटने देने के लिए प्रवेश द्वार बन्द कर दिया जाये और तीन बार इस प्रकार के तीन प्राणायाम किये जाते हैं और उनमें तीनों बार उन्हीं भावनाओं की पुनरावृत्ति की जाती है ।

न्यास में बायें हाथ की हथेली पर जल रखा जाता है और दाहिने हाथ की पाँचों अंगुलियों को इकट्ठी करके उन्हें जल में डुबाते हैं और मंत्रपूर्वक जल क्रमशः नासिका, नेत्र, भुजाओं और जंघों से लगाते हैं, शेष जल समस्त शरीर पर छिड़काव कर देते हैं । जिन इन्द्रियों पर जल स्पर्श किया जाता है उसमें पवित्रता और सतर्कता भरे जाने की भावना परिपक्व होती है ।

शिखाबंधन में शिखा स्थान का जल से स्पर्श किया जाता है । यह सद्भावना उत्कृष्टता एवं ऋतम्भरा प्रज्ञा की गायत्री माता के शरीर के सर्वोच्च शिखर पर प्राण प्रतिष्ठापना है । इसे --------किनले में लगे झण्डे का अभिवादन करना चाहिए । इसे विवेक बुद्धि का भावभरा अभिवादन भी कहा जा सकता है ।

दूसरा चरण है देवपूजन । गायत्री माता की छवि को देवत्व के प्रतीक प्रतिनिधि के रूप में पूजावेदी पर स्थापित करते हैं । देवता के प्रति श्रद्धांजलि प्रस्तुत की जाती है । उन्हें कुछ देते हैं, इसी अनुदान के प्रतिदान में देव-अनुग्रह प्राप्त होता है । देवता देते हैं । उन्हें वे भी प्रिय होते हैं जो देने की गरिमा स्वीकार करते हैं और उसका शुभारम्भ अपने आप से करते हैं । बीज गलने को तैयार होता है तो धरती माता उसे पोषण देकर विशालकाय वृक्ष बनने का वरदान एवं अनुदान प्रदान करती हैं । यही नीति देवताओं की भी है । वृक्ष अपने फल दूसरों को देते हैं । भेड़ भी अपनी ऊन दूसरों को देती है । नदियाँ अपना जल दूसरों को देती हैं । इसी देव प्रकृति को अपनाये जाने पर प्रसन्न होकर देवता उन्हें अधिकाधिक अनुग्रह देते चले जाते हैं । कृपणता बरतने वाले अनुदार, स्वार्थपरायणों के प्रति देवता भी निष्ठुर ही बने रहते हैं । इस तथ्य को ठीक तरह हृदयंगम करने के लिए पूजा की चौकी पर स्थापित गायत्री प्रतिमा के सम्मुख साधक को पंचोपचार के रूप में पाँच प्रतिवेदन प्रस्तुत करने होते हैं । उससे यह आत्मशिक्षण मिलता है कि समर्थ देवताओं का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए क्या रीति-नीति अपनानी होगी ? जीवनचर्या निर्धारण में किस स्तर की गतिविधियों का समावेश करना होगा ? पंचोपचार में पाँच वस्तुएँ प्रयुक्त होती हैं - (1) जल-शीतलता शान्ति, नम्रता एवं सज्जनता का प्रतीक है । सत्प्रयोजनों के लिए समय लगाने, श्रम बिन्दु समर्पित करने की तैयारी करनी चाहिए । पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान के निमित्त देवता को जो चार बार में चार चम्मच जल चढ़ाया जाता है, उसका तात्पर्य है - श्रम समय, मनोयोग एवं धन-साधना की चारों उपलब्धियों को यथासम्भव अधिकाधिक मात्रा में ईश्वरीय प्रयोजन के लिए समर्पित करना ।

चावल-उपार्जित अत्र, धन, वैभव का प्रतीक है । उपार्जन को शरीर, परिवार के उपयोग भर में सीमित नहीं किया जाना चाहिए वरन् उसमें देश-धर्म समाज-संस्कृति की भी भागीदारी स्वीकार करनी चाहिए । इनके लिए अपने-अपने साधनों का अंशदान नियमित रूप से किया जाना आवश्यक है । यह प्रेरणा देवता के सम्मुख अछत अर्पण करने की विधि के साथ जुड़ी हुई है ।

पुष्प अर्थात् खिलने-खिलाने हँसने-हँसाने की हल्की फुल्की जिन्दगी और सद्भावना सम्पन्न सज्जनता की सत्प्रवृत्ति । भीतर और बाहर से सर्वांग सुन्दर बने । विश्व उद्यान को शोभायमान बनाने वाला जीवन जियें । देवत्व की शोभा बढ़ाने के लिए अपनी गर्दन नुचवाने और मर्मभेदी सुई से छेदा जाना भी स्वीकार करें । प्रभु के गले का हार बनने की आकांक्षा रखें । पुष्प समर्पण के साथ इसी नीति को अपनाने की आत्मशिक्षण सन्निहित है ।

दीपक अर्थात् स्नेह से चिकनाई से भरा पूरा स्वयं जल कर दूसरों को प्रकाश देने वाला जीवन । दीपक की लौ की भाँति अंधकार अज्ञान के विरुद्ध अंतिम साँस रहने तक संघर्ष । प्रकाश अभिवर्द्धन के लिए समग्र आत्म समर्पण । स्वयं प्रकाशवान रहना और दूसरों को प्रकाश देना यही है दीप धर्म इसे अपनाकर ही कोई साधक भगवान के मंदिर में करने का, उनकी समीपता का श्रेय पाने का सौभाग्य प्राप्त हो सकता है । इस तथ्य को साधक ठीक तरह से समझ सके इसी निमित्त देव प्रतिमा के समीप दीपक जलाया जाता है । अगरबत्ती, धूपबत्ती और स्थापना भी प्रकारान्तर में दीपक का ही प्रयोजन पूरा करते हैं ।

चन्दन यह वृक्ष जिसका कण कण सुगंधित है और जो समीपवर्ती झाड़ झंखाड़ों को भी सुगंधित करता है । अपनी शीतलता और साँप बिच्छू जैसे विष दंश वालो तक को शाँति प्रदान करता है । चन्दन की लकड़ी काटने वाले सुगंध भरी शीतलता प्राप्त करते हैं । चन्दन की लकड़ी काटने वाले, बेचने वाले, पत्थर पर घिस घिस कर नष्ट कर देने वाले तक प्रतिशोध नहीं उपकार ही पाते हैं । नष्ट होते-होते भी चन्दन अपनी लकड़ी से भजन कराने वालों की माला, हवन सामग्री, चन्दन चूरा आदि उपयोगी सामग्री दे जाता है । हमारी शक्ति एवं सामर्थ्य का उपयोग भी इसी प्रकार होना चाहिए । यही है चन्दन समर्पण के पीछे सन्निहित प्रेरणा, जिसे अपनाकर कोई भी सच्चा ईश्वर भक्त बना रह सकता है और भक्तों को मिलने वाले अनुदानों का अधिकारी बन जाता है ।

आत्मशोधन में व्यक्तित्व पवित्र परिष्कृत बनाने का भाव है और देवपूजा के सदुद्देश्यों के लिए अधिकाधिक अनुदान देने का उत्साह उत्पन्न करने का निर्देश है । इन्हें प्रकारान्तर की चरित्र निष्ठा और समाज निष्ठा कह सकते हैं । ईश्वर भक्ति योगसाधना के यह दोनों ही आरंभिक चरण हैं । इसे साधना की पृष्ठभूमि कह सकते हैं । इसके उपरान्त मंत्र ध्यान आरंभ होता है । मंत्र साधना के दो भाग है - (1) जप (2) ध्यान । इन दोनों के साथ-साथ समन्वय करके चलना पड़ता है ।

जप प्रक्रिया में गायत्री महामंत्र की बार बार पुनरावृत्ति की प्रक्रिया करनी पड़ती है । जिस तथ्य पर मन को सघन करना होता है तो उसकी उच्चारण क्रिया अथवा ध्यान के माध्यम से बार बार दोहराने की आवश्यकता पड़ती है । इसी उपाय से उन तथ्यों को मन की पृष्ठभूमि पर सघन होने का अवसर मिलता है । बच्चों को प्राथमिक कक्षा में प्रायः इसी आधार पर पढ़ाई आरंभ करनी होती है । वे वर्णमाला अथवा गिनती-पहाड़े बार बार दोहराते रहते हैं । तभी उनके स्मृति पटल पर ये बातें स्थान जमा पाती हैं । संगीत शिक्षा के आरंभ से अंत तक दोहराने की प्रक्रिया चलती है । सैनिकों को भी निरन्तर अभ्यास करना पड़ता है । इष्ट के साथ एकाकार होने के लिए उस महान गरिमा के अंतःकरण पर दृढ़ता पूर्वक जमने के लिए उसका नामोच्चार बार बार करना पड़ता है । खोये हुए को भी पुकारने के लिए बार बार नाम लेना पड़ता है । भगवान राम वनवास में सीता को खोजते हुए उनका नाम जोर जोर से लेकर पुकारते थे । मनुष्यों में भी उनका लक्ष्य इष्ट स्वरूप छूट, बिछुड़ गया है । इसके बिना वह मणि हीन साँप की तरह बिलखता है । ग्रास के चंगुल में फँसे हुए गजराज को भगवान ने अनेक नाम लेकर पुकारा और बुलाया था । जप में बार बार भगवान की रट लगाई जाती है और प्यासे पपीहे की तरह प्यास प्यास पुकारा जाता है । उसी प्रकार भगवान को, इष्ट को दूरी समीप करके निकट बुलाने का आवाहन किया जाता है । चेतना पर संस्कार डालना कठिन है । कठिन और कठोर कार्यों को धीरे धीरे घिसकर, रगड़ रगड़कर ही पूरा किया जाता है । स्नान हाथ, मुँह धोना, बर्तन साफ करना, झाड़ू लगाना, कपड़े धोने जैसे काम बार बार रगड़ने से ही होते हैं । पालिश किसी भी प्रकार की हो उसमें घिसाई आवश्यक है । आरी काटने में भी घिसना पड़ता है । रस्सी को पत्थर पर बार बार रगड़ने से उस पर निशान बन जाता है । मंत्र जप में यही प्रयोजन पूरा होता है । गायत्री महामंत्र में शब्द विज्ञान के अत्यंत सूक्ष्म रहस्यों का समन्वय है । इसका गुँथन इस प्रकार किया गया है कि नियत क्रम, नियत लय, ताल के अनुसार यदि कोई पुनरावृत्ति की जाती रही तो उससे एक अदृश्य शब्द चक्र बनता है जो अभीष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ब्रह्मास्त्र का कार्य करता है । बार बार मंत्रोच्चार करने से शरीर के स्थूल और सूक्ष्म अवयवों में, चक्र उपत्यिकाओं में विशिष्ट हलचलें उत्पन्न होती हैं और उससे कई महत्वपूर्ण शक्तियाँ, क्षमताएँ जागृत होने लगती हैं । जप विज्ञान के पीछे ऐसे अनेक कारण हैं जिससे उस प्रयोजन में लगे हुए साधक का श्रम अन्य कार्यों में लगने की अपेक्षा प्रत्यक्ष और परोक्ष परिणामों की दृष्टि कही अधिक सफल रहती है ।

जप के साथ-साथ ध्यान भी आवश्यक है क्योंकि जिस उद्देश्य के लिए जप किया जा रहा है उसमें जीभ ही नहीं, मन की एकाग्रता भी नियोजित होती है। जिस भी काम में जीभ और मन दोनों का समन्वय होता है, उसमें सफलता की संभावना अधिक बढ़ जाती है। मात्र जप करते रहा जाये और मन खाली रहे तो वह इधर उधर भागता रहता है। फलतः उपासना साधना में न तो रस मिलेगा और न सफलता का सुयोग बनेगा। सामान्यता मन का चिंतन बहुमुखी है और भौतिकता का ही तान बान बुनता रहता है। अंतःक्षेत्र की दिव्य विभूतियों को समझना और उन्हें प्राप्त करने का उपाय खोजना ध्यान साधना से ही संभव हो सकता है।

मनःशक्ति प्रचण्ड है । बिखराव में वह नष्ट होती रहती है । यदि ध्यान द्वारा उसे एक केन्द्र पर इकट्ठा कर लिया जाये तो उसका प्रभाव परिणाम चमत्कारी होता है । जिस प्रकार सूर्य किरणों उत्तल लेंस पर फोकस कर लिया जाता है तो उससे आग लगने लगती है । भाप को एक केन्द्र पर केन्द्रित कर लिया जाता है तो रेल इंजन हजारों टन माल लेकर द्रुतगति से दौड़ने लगता है । बारूद को बन्दूक में भर कर चलाते हैं तो वह निशाने को भेदता हुआ चला जाता है । ठीक उसी प्रकार मन की शक्ति को ध्यान द्वारा एकाग्र करके भौतिक अथवा आध्यात्मिक प्रयोजनों में लगाने से आशाजनक सफलताओं के नये नये आधार बन जाते हैं । सर्वजनीन सार्वभौमिक गायत्री उपासना का अंतिम चरण है - सूर्यार्घदान । इस प्रक्रिया में पूजा के समय जल पात्र के प्रतिष्ठित छोटे से पवित्र जल कलश को सूर्य भगवान के सम्मुख अथवा उनकी दिशा में अर्घ्य किया जाता है । यह जप रूपी यज्ञ की पूर्णाहुति है इसे श्रद्धांजलि, जलांजलि कह सकते हैं । जल चढ़ाते समय यह भाव रहना चाहिए कि सूर्य परब्रह्म परमात्मा की प्रतिमा है और कलश अपने अस्तित्व का प्रतिनिधि है । कलश में भरा हुआ जल जीवन सम्पदा माना जाये तो सविता देवता के विराट ब्रह्म के चरणों में समर्पित किया जाये । समर्पित करते समय यह भावना उभरनी चाहिए कि हमें अपना अस्तित्व वैभव विशाल विश्व के लिए, लोक कल्याण के लिए अर्पण करके सच्चे अर्थों में सार्थक बनना है । समर्पित जल ऊष्मा की सविता भाप बनकर आकाश में बिखर जाता है और वातावरण में शीतलता उत्पन्न करके सीमित से असीम बनता है । यही आत्म शिक्षण सूर्यार्घदान प्रक्रिया के साथ जुड़ा हुआ है गायत्री उपासना की इस प्रारम्भिक कक्षा को भली भाँति हृदयंगम करने के उपरान्त ही उच्चस्तरीय साधना बन पाती है ।


अष्टावक्र (Kahani)

राजा जनक ने एक विशाल सम्मेलन का आयोजन किया था, जिसमें जाने माने विद्वान भाग ले रहे थे । सम्मेलन में एक ऐसा भी व्यक्ति आया जिसका शरीर 8 जगहों तक मुड़ा हुआ था और पूरे शरीर पर कूबड़ निकले हुए थे । इन अष्टावक्र ने कहा, “महाराज मैं जानता हूँ -----------------।” महाराज के कारण पूछने पर उसने कहा - “मैं तो समझा था कि यहाँ विद्वान लोग पधारे होंगे पर यहाँ तो सभी चर्मकार एकत्र हुए हैं ।” राजा ने पूछा कैसे ? अष्टावक्र ने कहा, - “जो लोग हाड़ चाम की जाँच परख करते हो और वे क्या हो सकते हैं ? यदि वे लोग विद्वान होते तो मेरे अन्दर के ज्ञान सरोवर में झाँकने का प्रयास करते ।” राजा ने अष्टावक्र को अपनी सभा में रखा और शेष सभी विद्वानों को भगा दिया ।


विचारों की दौलत

रियासत काफी छोटी थी। लेकिन वहाँ के खलीफा महमूद की कर्तव्य-परायणता ने उसे धन-धान्य से समृद्ध कर रखा था। एक रात वह सोने चला तो उसने अलमारी के पीछे छिपे व्यक्ति को देखा।

महमूद ने उस व्यक्ति को पकड़ कर बाहर खींचा । वह कोई चोर था । पकड़े जाने के कारण थर-थर काँप रहा था । महमूद ने उसे अपने पास बैठाया और कहा - “तुम घबराओ मत । मेरे रहते कोई तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता । जो मैं पूछता हूँ उसका सही-सही जवाब दो। तुम यहाँ चोरी करने आए थे?”

“जी हाँ हुजूर मैं इसी बदनियत से यहाँ आया था ।” चोर ने कहा ।

“कुछ हाथ लगा?” महमूद ने पूछा ।

“जी नहीं मैं अभी-अभी यहाँ आया हूँ।” चोर ने जबाब दिया ।

महमूद ने चोर को गौर से देखा । वह किसी अच्छे घराने का शरीफ युवक लगता था। महमूद ने सवाल किया, “तुम किसी अच्छे घराने के लगते हो, इस गंदे काम को कब से करना शुरू किया ?” खलीफा के इस हमदर्दी पूर्ण व्यवहार से चोर रो पड़ा । रोते हुए उसने जो दास्तान सुनायी, वह बेहद दर्दनाक थी । उसके अनुसार उसका पिता बगदाद का व्यापारी था, उनके पास ढेरों सम्पत्ति थी। किन्तु उनके मरने के बाद उनके दोस्तों ने उनकी सम्पत्ति हड़प ली और उसे तथा उसकी माँ को बेघर कर दिया। अपनी बीमार माँ के लिये वह पैसों का बन्दोबस्त चाहता था। जिसके लिए मजबूरन उसे चोरी का रास्ता अख़्तियार करना पड़ा और पहली बार में ही पकड़ा गया। चोर की बताई सभी बातें सच थी। खलीफा चोर के पिता को निजी तौर पर जानता था सारी कहानी सुनकर उसका दिल भर आया। उसने चोरी करने आए नौजवान की पीठ सहलाते हुए कहा - बेटे मालिक अपने बन्दों को कभी

- कभी मुसीबत में डालकर इम्तहान लेता है। हमें मुसीबतों में भी

नेक नियति से काम लेना चाहिए। अल्लाह बड़ा कारसाज है, उसके रहम नर भरोसा रखो और मेहनत करते हुए ईमान के रास्ते पर चलो । इतना कहकर उसने अपनी तिजोरी से तीन सौ दीनारें निकालकर उस नौजवान को दे दिए । तीन सौ दीनारें उसके लिए काफी थीं । कम में ही माँ का इलाज हो गया । बाकी रकम लेकर वह महमूद के पास वापस करने लिए आया । महमूद ने बाकी रकम रकम लेने से मना कर दिया और----------- अपनी माँ का पेट भरना ।”

नौजवान को महमूद का यह विचार अच्छा । उसने बतायी गयी जगह पर फलों की दुकान खोल ली । धीरे-धीरे दुकान चल निकली । कुछ दिनों बाद उसने फलों की धन्धा बन्द करके सूखे मेवे का व्यापार शुरू किया । इसी बीच उसकी माँ मर गयी । लेकिन तब तक कारोबार में काफी तरक्की हो जाने के कारण वह पास की एक बड़ी रियासत में रहने लगा ।

इस घटना को चौदह वर्ष बीत गये । खलीफा महमूद बूढ़ा हो चला था उसके लड़के थे नहीं जो काम सँभालते । काम न सँभल पाने कारण रियासत उसके हाथ से निकल गयी थी । हवेली और कुछ जमा पूँजी के सिवाय उसके पास कुछ नहीं बचा । उधर कभी चोरी करने आया व्यापारी वह नौजवान मुल्क का बहुत बड़ा व्यापारी बन गया था । उसका व्यापार पास के कई मुल्कों तक फैल चुका था लोग उसे सेठ हासीम अली के नाम से जानने लगे थे ।

खलीफा जो अपने बुढ़ापे के कारण ठीक तरह से चल भी नहीं पा रहा था । उसकी एकमात्र बेटी फातिमा विवाह के योग्य हो चुकी थी । महमूद का अब वह मान-सम्मान नहीं रह गया था अतः बेटी के विवाह के लिए धन जुटाने के लिए उसे कठिनाई हो रही थी । बड़ी मुश्किल से उसने बीस हजार दीनारें इकट्ठा की थीं लेकिन इतने में विवाह नहीं हो पा रहा था । अपनी चिन्ता का कोई हल न देखकर अन्ततः बूढ़े महमूद ने अपना खानदानी हीरा बेचने का फैसला किया और लाठी टेकता हुआ जौहरी के घर की ओर चल पड़ा ।

अभी उसने हवेली के मुख्य दरवाजे पर कदम रखा ही था कि चौक पड़ा । करीब 35-40 साल का एक आकर्षक व्यक्ति चमचमाते कपड़ों में उसके सामने खड़ा था । उसके पीछे सैकड़ों हाथियों का जत्था जुलूस की शक्ल में था । महमूद ने आँखें मिचमिचाते हुए पूछा - “कौन हो मियाँ ? मेरे ख्याल में यहाँ के हाकिम से मिलना चाहते हो । भाई उसकी हवेली तो उस रास्ते पर है ।”

“मैं आपसे मिलने आया हूँ चचा जान । आपने मुझे पहचाना नहीं । मैं हाशिम हूँ आपका हाशिम ।”

“अरे हाशिम तुम यहाँ । कैसे आना हुआ बेटे ? तुम तो बड़े आदमी हो गये हो ।” कहते हुए महमूद की आँखें छलक आईं ।

चचा मुझे मालूम हुआ कि आप फातिमा बहन की शादी करने जा रहे हैं । उसी के लिए कुछ उपहार लाया हूँ।” इतना कहकर हाशिम ने अपने नौकरों को घोड़ों और हाथियों पर लदे सामान को हवेली के आँगन में रखने का हुक्म दिया ।

महमूद जो खुशी के आँसू रोक नहीं पा रहा था बोला - “अरे! बेटे यह सब इतना ?” यह सब आपके द्वारा दिये गये अच्छे विचार का फल है । आपकी सलाह मानकर मैं मेहनत और ईमानदारी की राह पर चला और आज इस मुकाम पर हूँ । यह मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि अच्छे विचारों को अपनाने और उस पर चलने का सबब और कुछ नहीं । मैंने तो सिर्फ एक अच्छे विचार को अपनाया । जो अपनी जिन्दगी में कई अच्छे विचारों को अमल में लाते होंगे, वे तो पीर फकीर तक बन जाते होंगे ।”

“ ठीक कहते हो बेटे, अच्छे विचारों से बढ़कर इस दुनिया में कुछ नहीं । जो इन पर अमल करते हैं, उनको दुनियावी दौलत से लेकर रूहानी सुकून तक सब कुछ हासिल हो जाता है । अल्लाह के नूर का नजारा भी उनके लिए मुश्किल नहीं ।” यही बात पूरी करते हुए महमूद ने उसे गले से लगा लिया ।


अग्नि और सोम के परस्पर प्रत्यावर्तन का अनूठा प्रयोग

शरीरशास्त्री और मनोविज्ञानवेत्ता यह बताते हैं कि नर-नर का सान्निध्य, नारी-नारी का सान्निध्य मानवी प्रसुप्त शक्तियों के विकास की दृष्टि से इतना उपयोगी नहीं, जितना भिन्न वर्ग का सान्निध्य है । विवाहों के पीछे सहचरत्व की भावना ही प्रधान रूप से उपयोगी है । सच्चे सखा-सहचर की दृष्टि से परस्पर हँसते खेलते जीवन बिताते पति पत्नी यदि आजीवन काम सेवा न करें तो भी एक दूसरे के मानसिक एवं आत्मिक अपूर्णता को बहुत हद तक पूरा कर सकते हैं । मनुष्यों में न जाने क्यों ऐसी रहस्यमय अपूर्णता है कि वह भिन्न वर्ग के सहचरत्व से अकारण ही अपनी तृप्ति एवं शाँति अनुभव करता है । अविवाहित जीवन में सब प्रकार की सुविधाएँ होते हुए भी एक उद्विग्नता, अतृप्ति और अशाँति बनी रहती है । विवाह के बाद एक निश्चिन्तता सी अनुभव होती है । साथी की प्रगाढ़ मैत्री का विश्वास करके व्यक्ति अपनी समर्थता दूनी ही नहीं दस गुनी अनुभव करता है । एकाकी जीवन में जो शून्यता थी उसकी पूर्ति तब होती है जब यह विश्वास बन जाता है कि हम अकेले नहीं दूसरे साथी को लेकर चल रहे हैं जो हर मुसीबत में सहायता करेगा और प्रगति के हर स्वप्न को रंग भरेगा । यह विश्वास मन में उतारते ही मनोबल चौगुना बढ़ जाता है और उत्साह भरी कर्मठता और आशा भरी चमक से जीवन क्रम का एक अभिनव उल्लास दृष्टिगोचर होता है । विवाह का मूल लाभ भिन्न वर्ग के सान्निध्य से होने वाले उभयपक्षीय सूक्ष्म शक्ति प्रक्रिया का अति महत्वपूर्ण प्रत्यावर्तन तो है ही, एक मनोवैज्ञानिक लाभ अंतरंग का एकाकीपन दूर करना और समर्थता द्विगुणित हुई अनुभव करना भी उज्ज्वल भविष्य की संभावना का आशापूर्ण भविष्य की दृष्टि में बहुत उपयोगी है ।

काम सेवन विवाह जीवन में आवश्यकता अनुसार मर्यादाओं के अंतर्गत उपयुक्त होता रहे तो उसमें कोई बड़ा अनर्थ नहीं है पर उसे आवश्यक या अनिवार्य न माना जाये । मोटे तौर पर पति पत्नी की परस्पर मनःस्थिति वैसी होनी चाहिए जैसे दो पुरुषों और दो नारियों की सघन मित्रता होने पर होती है । सखा, साथी, मित्र, स्नेही का रिश्ता पर्याप्त है । कामुक और कामिनी की दृष्टि में रखकर किये गये विवाह घृणित हैं । रूप, रंग, शोभा, सौंदर्य के आधार पर उत्पन्न हुआ आकर्षण एक आवेश मात्र है । उस आधार पर जो जोड़े बनेंगे, सफल हो सकेंगे? रूप, यौवन की चमक को एक छोटा सा रोग बात की बात में नष्ट करके रख सकता है । रूपवान् में दोष, दुर्गुण भरे पड़े हों तो भी निर्वाह देर तक नहीं हो सकेगा । शारीरिक आकर्षण की खोज आज की विवाह सफलता का महत्वपूर्ण अंग बनती जा रही है । रूपवान् लड़के लड़कियों की ही माँग है । कुरूपों की बाज़ार दर दिन दिन गिरती जा रही है । यह प्रवृत्ति बहुत ही विघातक है । चमड़ी की चमक ही जब अच्छे साथी की कसौटी बन जायेगी तो फिर आँतरिक सत्र की उत्कृष्टता का क्या मूल्य रह जायेगा ? फिर भावनाओं की, सद्गुणों की, स्नेह-सौजन्य की कीमत कौन आँकेगा ?

चमड़ी का रंग नख-शिख की बनावट की शोभा-सौंदर्य की दृष्टि से सराहा जा सकता है । नृत्य अभिनव में उसको प्रमुखता मिल सकती है । नयनाभिराम मनमोहक आकर्षक भी उसमें देखा जा सकता है । ईश्वर की कृति के इस विभूति से प्रसन्न हुआ जा सकता है । दाम्पत्य जीवन में उसकी कोई बहुत उपयोगिता नहीं है । मिलन चमड़ी का, आँख, नाक का नहीं वरन् अंतरंग का होता है और उसकी उत्कृष्टता-निष्कृष्टता चेहरे या अवयवों की बनावट से तनिक भी संबंध नहीं रखती । हो सकता है कोई काला कुरूप व्यक्ति योगी अष्टावक्र, नीतिज्ञ चाणक्य, अपनी पांचाली द्रौपदी की तरह उच्च मनःस्थिति धारण किये हो । रूपवती नर्तकियाँ, अभिनेत्रियाँ, नट नायक कोई उच्च भावनाशील ही थोड़े होते हैं । बन्दीगृह में क्रूर कर्म करने के दण्ड में नर नारी आते रहते हैं । उनके कुकर्मों का विवरण सुनकर रोमांच खड़े हो जाते हैं । रूप-रंग के आवरण में उनके भीतर प्रेत पिशाच का वीभत्स नृत्य देखकर दिल दहल जाता है । विवाह का वास्तविक आनन्द और लाभ जिन्हें लेना हो उन्हें साथी का चुनाव करने में रूप रंग की बात उठाकर ताक पर रख देनी चाहिए । केवल सद्भावना, निष्ठा, सौंदर्य, व्यवस्था, उदारता, दूरदर्शिता, उत्साही और हँसमुख प्रकृति जैसे सद्गुणों पर ही ध्यान देना चाहिए । सज्जनों के बीच ही चिर स्थायी मैत्री का निर्वाह होता है । दुर्जन तो क्षण भर में बनते हैं और पल भर में शत्रु बनते देर नहीं लगती । अभी बहकावे की मीठी-मीठी बातें कर रहे थे और चापलूसी की अति कर रहे थे, अभी तनिक सी बात पर खून के प्यासे बन सकते हैं । प्रेम के जाल में ऐसे ही बहुत से लोग दूसरों को फँसाते फिरते बहुत देखे जाते हैं इसीलिए विवाह की सोचने से पहले साथी के चुनाव की कसौटी निश्चित करनी चाहिए और वह यह होनी चाहिए कि रंग-रूप कैसा ही क्यों न हो, साथी की आँतरिक स्थिति में स्नेह सौजन्य का समुचित पुट होना चाहिए । जिन्हें ऐसा साथी मिल जाये समझना चाहिए कि उसका विवाह करना सार्थक हो गया ।

काम सेवन के संबंध में उपेक्षा वृति बरतनी पड़ती है । कम ही लोग ऐसे होते हैं जिनके पास शारीरिक मानसिक आवश्यकता की पूर्ति के अतिरिक्त इतना ओजस संचित रहे जिसे क्रीडा कल्लोल में व्यय कर सके । आमतौर पर वर्तमान परिस्थितियों में लोग इतनी ही शक्ति उपार्जित कर पाते हैं जिसके आधार पर किसी प्रकार काम चलता रहें और गाड़ी लुढ़कती रहे । इस स्वल्प उत्पादन में से यौन सम्पर्क में अपव्यय किया जायेगा तो उसका सीधा प्रभाव समग्र स्वास्थ्य और जीवन यात्रा पर पड़ेगा । विषयी मनुष्य अपनी श्रमशीलता, तेजस्विता, स्फूर्ति, नीरोगता, प्रतिभा, स्मरण शक्ति, साहसिकता, स्थिरता व संतुलन आदि सभी शारीरिक, मानसिक विशेषताएँ खोते चले जाते हैं । यह अपव्यय जितना बढ़ता है उतना ही खोखलापन बढ़ता चला जाता है । अशक्ति का शिकंजा अपने गले में कसा जाना हर कामुक व्यक्ति निरन्तर अनुभव करता रहा है । यह एक प्रकार से स्वेच्छा पूर्वक हँसते खेलते मंदगति से की जाने वाली आत्महत्या ही है ।

प्रजनन जब उचित और आवश्यक हो तो उचित मर्यादाओं के अंतर्गत काम सेवन की ढील छोड़ी जा सकती है । यदि अपनी या साथी की तन्दुरुस्ती या मनःस्थिति ठीक न हो तो इस प्रकार की छेड़ छाड़ का कोई तुक नहीं रह जाता । पति-पत्नी के बीच इस प्रकार का धैर्य, संतुलन रहना चाहिए कि जब तक अति आवश्यक न हो तब तक प्रसंग को उपेक्षित ही किया जाये । साथी की अनिच्छा रहने पर उसे विवश करना एक प्रकार से बलात्कार जैसा ही अपराध है, भले ही वह वैवाहिक साथी के साथ किया गया हो । कानून भले ही उसे दण्डनीय न माने पर नैतिक दृष्टि से उसे निर्लज्ज बलात्कार ही कहा जायेगा । ऐसा प्रसंग जिससे साथी का मन रोष या क्षोभ भर जाये निश्चित रूप से कामुक पक्ष के लिए हर दृष्टि से हानिकारक सिद्ध होगा । क्षणिक उद्वेग शाँत करके जितनी प्रसन्नता पायी गयी थी, कालान्तर में उसकी प्रक्रिया अनेक गुनी अप्रसन्नता की परिस्थितियाँ लेकर सामने आवेगी । अस्तु हर समझदार पति-पत्नी की आदि से अंत तक ऐसी मनःस्थिति विनिर्मित करनी चाहिए कि कोई किसी को कठिनाई, क्षति या असमंजस में न डाले । दाम्पत्य जीवन के बीच ब्रह्मचर्य की निष्ठा का जितना प्रभाव होगा उतना ही पारस्परिक सद्भाव प्रगाढ़ होता जायेगा और वह लाभ मिलेगा जिसे प्राप्त करना विवाह का मूल प्रयोजन है ।

ज्ञानेन्द्रियों का उभयर्वादित उपयोग यौन रोग उत्पन्न करता है । विशेषतया नारी को तो इससे अत्याधिक हानि उठानी पड़ती है । औसत नारी महीने में एकाध बार से अधिक काम क्रीड़ा का दबाव सहन नहीं कर सकती । प्रजनन की दृष्टि से हर बच्चे के बीच कम से कम पाँच वर्ष का अंतर होना चाहिए । जल्दी-जल्दी बच्चे उत्पन्न करने और काम क्रीड़ा का अधिक दबाव पड़ने पर नारी अपना शारीरिक ही नहीं मानसिक स्वास्थ्य भी खो बैठती है । दैनिक काम क्रीड़ा का स्वरूप हँसी, विनोद, मनोरंजन, चुहल, छेड़छाड़ तक सीमित रहे तभी ठीक है । हर्षोल्लास बढ़ाने वाले, छुटपुट क्रिया कलाप चलते रहें तो चित्त प्रसन्न रहता है । परम घनिष्ठता बढ़ती है और सान्निध्य का मनोवैज्ञानिक ही नहीं काम प्रयोजन भी पूरा हो जाता है । यौन सम्पर्क को यदा कदा के लिए ही सीमित रखना चाहिए । आये दिन की इस विडम्बना में फँसकर मनुष्य अपना स्वास्थ्य ही नष्ट नहीं करता, प्रतिक्रिया के आनन्द से भी वंचित हो जाता है । कामुक व्यक्ति घटिया और उथला ही आनन्द ले पाते हैं । उसमें जो ऊँचे स्तर का उल्लास है, उसे प्राप्त करने के लिए देर तक की संग्रहित शक्ति होनी चाहिए । जिन्हें यौन रोगों से बचना हो उन्हें इस प्रकार की सतर्कता बरतनी चाहिए ।

इस सन्दर्भ में यह समझ लिया जाये कि जननेन्द्रियों का सीधा संबंध मस्तिष्क से होता है । वहाँ जो गड़बड़ होगी उसका सीधा प्रभाव मस्तिष्क पड़ेगा । मनोविज्ञानवेत्ताओं के अनुसार उचित समय पर उचित काम सेवन को अवसर न मिलने पर जहाँ अपस्मार मूर्छा, भूत-प्रेत अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, स्मरण शक्ति की कमी, सिरदर्द, हृदय रोग आदि रोग उत्पन्न होते हैं । वहाँ अति काम सेवन भी ऐसे ही उद्वेग उत्पन्न करता है । लम्पटों का शरीर जितना क्षीण होता है, मन उससे भी अधिक विक्षिप्त असंतुलित रहने लगता है । अनेकों मानसिक रोगों से ग्रस्त उन्हें पाया जायेगा जिन्होंने काम सेवन की दिशा में अति बरती । इस प्रकार का दुरुपयोग यों तो दोनों के लिए हानिकारक है पर नारी को काम क्रीड़ा के उच्छृंखल उपयोग को खुली छूट नहीं मान लेनी चाहिए और उस संदर्भ में वैसी ही सतर्कता, उपेक्षा बरतनी चाहिए जैसी कि अविवाहित-जीवन में बरती जाती है । इस शक्ति संग्रह का सर्वतोमुखी प्रतिभा और व्यक्तित्व विकास पर सीधा असर पड़ता है । सुहागिन की अपेक्षा विधवाएँ अथवा कुमारियाँ अधिक तेज शरीर और स्फूर्तिवान् पाई जाती हैं । इसका कारण उसकी अंतःशक्ति का अनावश्यक क्षरण न होना ही प्रधान कारण है । इस लाभ से विवाहितों को भी वंचित नहीं होना चाहिए ।

काम सेवन का वैज्ञानिक स्वरूप यह है कि शरीरों की विद्युत शक्ति का इस प्रयोग द्वारा अति द्रुत गति से प्रत्यावर्तन होता है । मानवीय विद्युत की मात्रा शरीर में पाई जाती है पर उनका भण्डार चेतन संस्थान में ही देखा पाया जाता है । यौन संस्थान की नाव में बिजली आकृति मात्रा में भरी रहती है । जैसे ही जननेन्द्रियाँ निकट आती हैं वैसे ही प्रसुप्त शक्ति का विनिमय होने लग जाता है । ऋण विद्युत धारा धन की ओर दौड़ने लगती है । इस सम्मिलित एवं प्रत्यावर्तन का ही वह परिणाम है कि जो काम सेवन के आनन्द के रूप में उस क्षण का अनुभव किया जाता है । यह विशुद्ध रूप से प्राण और रवि शक्ति के अग्नि और सोम में परस्पर प्रत्यानुवर्तन की अनुभूति है । यह प्रयोग अति महत्वपूर्ण है कि उसमें जहाँ व्यक्तियों का विश्वास हो सकता है, पर जिसके शरीर में क्षीण प्राण है वह साथी को क्षति नहीं पहुँचा सकता है कि दोनों शारीरिक दृष्टि से न सही प्राण शक्ति की दृष्टि से समान स्तर आ जायें ।

वेश्या शरीर का क्षरण करते रहने पर भी अपना रूप सौंदर्य बनाये रखती है इसका कारण शरीर शास्त्री नहीं बता सकते । इसका उत्तर प्राण विद्या के ज्ञाताओं के पास है । वे मनस्वी कामुक की शक्ति चूसती रहती हैं और जिस स्थिति में सामान्य गृहस्थ नारी मृत्यु के मुख में जा सकती थी, उस स्थिति में भी अपने चेहरे पर चमक और शरीर में स्फूर्ति बनाये रहती हैं । यदि उसके प्रेमी घटिया स्तर के या रोगी या मूर्ख स्तर के हों तो फिर उनका स्वास्थ्य कभी भी फिर स्थिर न रहेगा । यों शरीर की दृष्टि से युवाकाल में नर नारियों में बिजली अधिक रहती है इसी, से उनका आकर्षण युवा वर्ग के साथ काम सेवन की लालसा सँजोये रहता है । शरीर में विद्युत शक्ति है तो पर थोथी और घटिया स्तर की पाई जाती है । स्वस्थ और सुन्दर व्यक्ति भी यदि मनोबल की दृष्टि से घटिया है तो उसे इस संदर्भ में अशक्त माना जायेगा । कुरूप और ढलती आयु का व्यक्ति भी उसके आँतरिक स्तर पर अनुरूप प्रबल प्राण रख सकता है । असलियत यह है कि शरीर की स्थिति में प्राण क्षमता का संबंध बहुत कम है । किसी भी आयु की मनःस्थिति के अनुरूप प्राण की प्रबलता या न्यूनता हो सकती है और उसका लाभ हानि साथी को भोगना पड़ सकता है ।

यों ब्रह्मचर्य सभी के लिए उचित है, पर प्राण सम्पन्न उच्च व्यक्तियों के लिए तो बहुत ही आवश्यक है । वे इस प्रकार का व्यक्तिक्रम करके अपनी प्रगति को ही रोक देंगे । साथी को उतना लाभ न मिलेगा जितनी स्वयं को क्षति उठानी पड़ेगी । इसीलिए ब्रह्मचर्य की महत्ता असंदिग्ध है । प्राण को संचित करते रहा जाये और यदा-कदा उनका उपयोग काम क्रीड़ा में कर लिया जाये तो साथी की सहायता की दृष्टि से भी समर्थ पक्ष की भी यही बुद्धिमत्ता होगी । कामुक व्यक्ति बाहर से ही चमक दमक के भले दिखें, भीतर से खोखले होते हैं और वे जिससे भी सम्पर्क बनाते हैं उसी की शक्ति चूसने लगते हैं । लम्पट व्यक्ति के साथ दाम्पत्य जीवन बनाकर उसका साथी शारीरिक और मानसिक क्षति ही उठा सकता है । क्षीण प्राण वाला व्यक्ति समर्थ पक्ष की कुछ सहायता नहीं कर सकता । ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी ही अपनी विशेष विद्युत धाराओं से एक दूसरे को लाभान्वित कर सकते हैं, जिससे प्रबल शक्ति प्रवाह का लाभ दोनों ही पक्ष अपनी अपनी आवश्यकता की पूर्ति और अतृप्ति निवारण के लिए कर सकें ।

संतान उत्पादन के सत्परिणाम संयम शीलता पर निर्भर हैं । कामुकता की दिशा में अति करने वाले दाम्पत्य कुछ ही दिनों में अपनी जननेन्द्रियों की मूल सत्ता खो बैठते हैं । ऐसे पुरुष को नपुंसक और नारी को बंध्या होते देखा जाता है । गर्भ रहे तो गर्भपात होने, दुर्गुणी, रोगी, अविकसित संतान उत्पन्न कर सकते हैं । समर्थ संतान के लिए जिस परिपक्व शुक्र की आवश्यकता है, उसका निर्माण ब्रह्मचारी जीवन से ही संभव है । पुष्ट शरीर वाले युवक युवती मिलकर पुष्ट शरीर वाले बालक को जन्म दे सकते हैं । पर उनकी मनःशक्ति, बुद्धिमत्ता एवं तेजस्विता अपूर्ण ही रह जायेगी । आँतरिक समस्त विशेषताएँ और विभूतियाँ प्राण शक्ति से संबंधित है । प्राण का परिपाक ब्रह्मचर्य हो सकता है । इसलिए जिन्हें आँतरिक दृष्टि से मेधावी, प्रतिभावान और दूरदर्शी संतान अपेक्षित हो उन्हें अपनी अंतः सविता की सुरक्षा एवं परिपुष्ट का ध्यान रखना चाहिए । यह उपलब्धि अधिक संयम से ही प्राप्त कर सकना संभव है । इसीलिए गृहस्थ रहते हुए भी ब्रह्मचारी की स्थिति बनाये रहकर अपना, अपने साथी और भावी संतान का भविष्य उज्ज्वल बनाने की बात सोचनी चाहिए । काम सेवन क्षुद्र मनोरंजन के लिए, इन्द्रिय तृप्ति के लिए नहीं करनी चाहिए । उसका सदुपयोग उसे प्राण प्रत्यावर्तन द्वारा एक दूसरे के अभावों को पूर्ण करने में या जाना चाहिए । यह प्रयोजन केवल प्राणवान और प्रबुद्ध पति-पत्नी ही मिलकर कर सकते हैं । अपने देश, समाज और वंश का मुख उज्ज्वल कर सकने वाली संतान उत्पन्न कर सकना हर किसी के वश की बात नहीं है । इसके लिए इन्द्रिय संयम की साधना करनी पड़ सकती है और प्राण को परिपुष्ट करने वाली सत्प्रवृत्तियों से भरा पूरा व्यक्तित्व बनाना पड़ता है । वस्तुतः सुयोग्य संतानोत्पादन भी एक साधना है जिसके लिए संयमी ही नहीं मनस्वी भी बनना पड़ता है । दो वस्तुएँ बनने से तीसरी मिलने की प्रक्रिया रसायन कहलाती है । केमिस्ट्री इस विज्ञान का नाम है । रज और वीर्य मिलने से भ्रूण की उत्पत्ति होती है

और नौ महीने की अवधि पूरी करके वही भ्रूण बालक के रूप में प्रसव होता है ।------------------- स्थूल गर्भधारण या प्रजनन हुआ । इसके अतिरिक्त भी एक प्राण प्रत्यावर्तन होता है जिसे अनेकों अवसरों पर अनेक रूपों में देखा जा सकता है । शिष्य के प्राण में गुरु अपना प्राण प्रतिष्ठित करके उसको प्रतिभा, मेधा और विद्या में प्रखर बनाता है । यह कार्य स्कूली मास्टर नहीं कर सकते, वे बेचारे मात्र जानकारी दे सकने वाले पाठ भर पढ़ा सकते हैं । वह शिक्षा जो शिष्य को गुरु के समान प्रखर बना दे, केवल तपस्वी गुरुओं द्वारा ही संभव हो सकती है । योगी अपने साधकों को शक्तिपात करते हैं, वे अपनी तपशक्ति शिष्य को देकर बात की बात में उच्च भूमिका तक पहुँचा देते हैं । मरणासन्न रोगी को रक्तदान देकर पुनर्जीवन प्रदान किया जा सकता है इसी प्रकार दुर्बल प्राण को सबल प्राण बना सकने का कार्य शक्ति प्रत्यावर्तन जैसी प्रक्रिया ही सम्पन्न करती है । काम सेवा का ऊँचा स्तर यही है । यह बच्चे पैदा करने के लिए नहीं, दो प्राणों के समन्वय से एक नवीन प्रतिभा विकसित करने के लिए किया जा सकता है । सतोगुणी और सौम्य दम्पत्ति एक प्राण साधना के रूप में काम सेवन करते भी हैं तो इसका प्रयोजन एक अद्भुत प्रतिभा को जन्म देना होगा जो आवश्यकता अनुसार एक या दो शरीरों में पैदा की जा सकती है । यह उच्च स्तरीय शिशु जन्म है । एक काम सेवन अभिशाप या वरदान हो सकता है । विष को भी यदि संशोधन करके भेषज बना लिया जाये तो वितायक न रह कर संजीवनी मूरि बन सकता है । काम प्रक्रिया को विष बनाकर अपने मरण का साज न सँजोयें, बल्कि उसे अमृत बनाकर दो व्यक्तियों के असाधारण उत्कर्ष एवं विश्व कल्याण में कर सकने में समर्थ एवं प्राण प्रयोजन सिद्ध करें । यह पूर्णतः अपने वश की बात है और अपनी बुद्धिमत्ता व दूरदर्शिता पर निर्भर है।


Quotation

झूठा कायर है क्योंकि सच बोलते हुए मनुष्यों से डरता है। झूठा नास्तिक है क्योंकि उसे ईश्वर का न तो विश्वास है, न भय।


शाश्वत काल है, परमात्मा

गीता के ‘विभूति’ योग में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - अहमेवाक्षयः कालो यानि कि मैं शाश्वत समय हूँ। समय की शाश्वत धारा में सभी कुछ क्षीण होता है। परिवर्तित होता रहता है, सिवाय परिवर्तन के। बदलाव के अलावा सब कुछ बदल जाता है, जो कुछ इस पल है, वही अगले पल नहीं रहता। तभी तो यूनानी दार्शनिक हेराक्लाइट्स ने कहा था कि एक नदी में दो बार उतरना संभव नहीं। भला कैसे उतरेंगे नदी में दो बार ? क्योंकि जब हम दूसरी बार नदी में उतरने जायेंगे नदी बह चुकी होगी। नदी के जिस जल का हमने पहली बार स्पर्श किया था, अब दूसरी बार उसका स्पर्श किसी भी तरह मुमकिन नहीं है। नदी बह रही है और बहने का नाम ही नदी है। बहाव सतत् है, प्रवाह शाश्वत है, किन्तु जल परिवर्तनशील है।

जीवन की नदी वैसी ही सतत् है। उसमें भी कुछ उसी तरह का बहाव है। जिन्दगी है। जिन्दगी में भी दुबारा उसी जगह पर खड़ा हो पाना असंभव है। पहली देखी गयी चीज को दोबारा देखना संभव नहीं। लेकिन हमें भ्रम होता है, हम सोचते हैं रोज सुबह वही सूरज निकलता है। उसी तरह सूरज में जलती आग की लपटें भी प्रतिपल बदलती रहती हैं। शाम को जब हम एक दिया जलाते हैं तो सुबह बुझाते हुए सोचते हैं कि उसी साँझ वाले दिये को बुझा रहे हैं। परन्तु यह तो हमारी भ्रान्ति है। साँझ को दिया जलाया था, वह तो हर क्षण बुझता रहा है। उसकी लौ तो हर पल आकाश की अनन्तता में विलीन होती रही है। पुरानी लौ के स्थान पर नयी लौ प्रतिष्ठित होती गयी, मगर सब इतनी जल्दी हुआ कि हम इसे समझ न सके।

श्राँत को सोते समय हम आप नहीं थे, जागने पर वहाँ नहीं है। शायद ही हमने कभी विचार किया हो कि माँ के पेट में हमारी जो तस्वीर थी, अगर आज उसे हमारे सामने रख दिया जाये तो हम उसे संभवतः देखकर आँखें घुमा लेंगे और फिर एक दिन हमारे शरीर को जलकर नष्ट भी होना है। श्मशान में एक छोटे से राख के ढेर में बदलना है। यदि वही राख का ढेर आज हमारे सामने रख दिया जाए, तो भी हम शायद मानने को तैयार न होंगे कि हमारा ही भविष्य है। भला भरोसा कैसे हो सकता है ? हम तो यही सोचेंगे, कहाँ मुझ जैसा विद्वान धनी या गुणी अथवा फिर ख्याति प्राप्त सुप्रसिद्ध व्यक्तित्व और कहाँ यह राख की ढेरी ?

लेकिन असलियत यही है। हम समय की शाश्वत धारा में प्रतिपल वह वह रहें हैं। इस बहाव का प्रत्येक क्षण एक घटना है, वस्तु नहीं। घटना का मतलब है प्रक्रिया। इस संसार में प्रक्रिया है। सब कुछ घटित हो रहा है। प्रवाह है। इस प्रवाह के बीच यदि कोई चीज शाश्वत है तो वह काल। जगत की इस प्रक्रिया में आज कोई चीज अपरिवर्तित है तो वह है स्वयं परिवर्तन। सुनने से बड़ी उलट बाँसी लगती है लेकिन जीवन के सभी गहरे सत्य उल्टे ही हैं। तभी तो जिन्दगी की सच्चाइयों का महात्मा कबीर ने अपनी उलटबाँसियों में बखान किया है। अब इसी को लें, यदि कोई चीज कभी नहीं मरती तो वह स्वयं मृत्यु है। एक मात्र चीज जिसका क्षय नहीं होता, वह समय है। शायद इसी कारण मौत ‘काल’ कहलाती है और अनहोनी ‘अकाल’।

सब बदलता है समय की वजह से। हालाँकि कहते यही हैं कि समय बदलने वाला है पर वस्तुतः बदलती परिस्थितियाँ है इसी लिए कृष्ण के समय में अक्षय और शाश्वत कहा है। महावीर ने तो आत्मा का नाम ही समय रख दिया। भारतीय मनीषी ने मृत्यु और काल को एक इसलिए माना कि दोनों शाश्वत हैं। जरा ध्यान से विचार करें तो समझ आयेगा मृत्यु भर है। यथार्थ में हम समय के द्वारा निरन्तर कटते रहते हैं। हालाँकि कहते यही हैं कि हम समय को काट देते हैं जबकि पूरी तरह समय हम सबको काट देता है तो इस घटना को हम मृत्यु कहते हैं। इसके अलावा मृत्यु और कुछ नहीं है। काल के बहाव में हम रोज कण-कण बह रहे हैं। जिस रोज पूरे बह जाते हैं, उसी दिन कहते हैं कि मौत हो गयी। समय हम में से हर किसी को हर क्षण बहाए लिये जा रहा है। हम बहते हैं यह सोचकर हम हर क्षण आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन आगे बढ़े या नहीं इसकी कसौटी भली समय है। समय ही जीवन मूल्यों का निर्माण करता है। इन्हीं मूल्यों को पोषित करने के लिए समाज में परम्पराएँ, रीति-रिवाज रखे जाते हैं। कार्ल मैनहोम जैसे विचारक भी यह मानते हैं कि श्रेष्ठ समाज वही है जिसकी परम्पराएँ समय के अनुरूप हैं।

समय की वेग धारा को रोकने का कोई उपाय नहीं है। यह अनिवार्य नियत है। जो काल प्रवाह से लड़ने की कोशिश करेगा। वह और जल्दी नष्ट होगा। तो फिर क्या करें ? समय की शाश्वत धारा के साथ एकता साधें। शाश्वत काल के साथ एकता का मतलब है स्वयं परमात्मा से एकता। क्योंकि परमात्मा ही शाश्वत काल है - अहमेवाक्षयः कालो।

इस एकता का व्यवहारिक मतलब है कि युग की चुनौती स्वीकार करना। बिना अपने पूर्वाग्रह-दुराग्रह के, युग की माँग के लिए जुट पड़ना। इस बात को अच्छी तरह से दिलों दिमाग में बिठा लेना कि समय की पुकार स्वयं भगवान की पुकार है। समय तो परिवर्तन ला रहा है, उसके अनुरूप स्वयं को तैयार करना, औरों को तैयार होने में मदद करना। साथ ही इस बात का ध्यान रखना है कि एक बार में हमें केवल एक ही क्षण मिलता है। बीता क्षण लौट कर वापस नहीं आता है। हममें से कोई भी समय को धोखा दे सकने समर्थ नहीं, फिर वह चाहे कितना बड़ा धनी वैज्ञानिक तपस्वी यों योगी क्यों न हो।

जो समय साधना कर सका, यानि समय की शाश्वत धारा से स्वयं को एक कर सका व उसे अपना शाश्वत स्वरूप प्रदान करता है, वह जगत के घटना क्रमों में अपनी उचित एवं उपयुक्त भूमिका का निर्वाह करता हुआ शाश्वत आनन्द में निमग्न हो जाता है। संसार में जितने भी श्रेष्ठतम व्यक्ति हुए हैं, उन्होंने निष्ठा पूर्वक समय की साधना करके ही उपलब्धियाँ, विभूतियाँ अर्जित की हैं, परमानन्द ब्रह्मानन्द पाया है।


मरण की स्मृति ही वास्तविक अनुभूति है।

अवन्तिका के इस राजमहल की ख्याति सुदूर देश तक फैली रहती थी। हो भी क्यों न, दूर-दूर के विख्यात वास्तु विशारद, शिल्पी और चित्रकारों ने इसके निर्माण में अपनी श्रेष्ठतम प्रतिभा का दान किया था। महल की सर्वोत्तम अटारी पर चारों ओर स्फटिक जाली वाले रेलिंग और वातायन थे। बीचो-बीच स्फटिक का ही शयन कक्ष था। उसे देख कर लगता था कि जैसे छोर तरंगों पर चन्द्रमा उतर आया हो। फर्श के चारों ओर मरकत और इन्द्रनील मणि की शालायें जड़ी थीं। कक्ष के द्वार पर, खिड़कियों पर नीलम और मोतियों के तोटक लटक रहे थे, जिनकी मणि घण्टिकायें हवा में हिल-हिलकर शीतल शब्द कह रही थीं। उनके ऊपर सौरभ की लहरों से रेशमी परदे हिल रहे थे।

कक्ष के एक ओर गवाक्ष के पास ही पद्यरागमणि का पलंग बिछा था। उस पर तुहिन सी तरल मसहरी झूल रही थी। उसके पट आज उठा दिये गये थे। अन्दर फेनों पर उभार वाली शय्या बिछी थी। मनोखंचित छतों में मणिदीपों की झूमरें झूल रही थीं। एक ओर आकाश के टुकड़े सा विशाल बिल्लौरी सिंहासन था। उस पर कास के फूलों से बुनी सुख स्पर्श मृसण गद्दिया और तकिये लगे थे। उसके आस पास संगमरमर के उज्ज्वल हंस-हंसनियाँ खड़े थे जिनके पंखों में छोटे-छोटे कृत्रिम सरोवर चित्रित किये गये थे। इन कृत्रिम सरोवरों में तैरते नीले-नीले कमल, देखने वालो को आश्चर्य में डाल देते। कक्ष के बीचो-बीच काफी बड़े आकार का कल्प वृक्ष बनाया गया था। जिसमें लगी ----------------कल घुमा देने पर अनेक सुगंधित जलों की------------------ रंगबिरंगा बिखरने लगते थे। मणिदीपों की प्रभा में ये सीकर इन्द्रधनुष की लहरें बनकर शोभा की आलौकिकता का नृत्य रच रहे थे। कक्ष के दोनों कोनों में सुन्दर जालियाँ कटे दीपधार थे, जिनमें सुगंधित तेलों के दीप प्रज्वलित थे।

ऐश्वर्य के चकाचौंध से भरे-पूरे इस कक्ष में महाराज भोज अपने पलंग पर विश्राम कर रहे थे। उनके कवि हृदय में कभी कल्पना की एक तरंग उठती तो कभी दूसरी और कभी सारी तरंगें आपस में समा जातीं। कवि की भावुकता जब उमड़ पड़ती तो वह यदा-कदा क्षणिक सौंदर्य को ही शाश्वत मान लेता है और उसी प्रवाह में बहने लगता है। अवन्तिका के महाराजाधिराज इस समय इसी मनःस्थिति में थे।

उन क्षणों में उन्हें अपने जीवन की प्रचुर उपलब्धियों पर गर्व हो रहा था। लोकहित के लिए उन्होंने अनेकों उपयोगी कार्य किये थे। जनहित के लिए अनेकों लाभकारी योजनाओं का क्रियान्वयन किया था। उनकी प्रजा भी उन्हें ईश्वर की विभूति के रूप में पूजती थी। वह उज्जयिनी ही नहीं जन-जन के हृदय सम्राट थे। अपने विपुल ऐश्वर्य तथा जनता द्वारा मिलती हुई महती प्रशंसा पर उन्हें अभिमान था। दुर्भाग्य से वह अहंकार लोक कल्याण की भावना की जगह दम्भ की वासना द्वारा वंचित किया गया था।

रोज की तरह उस रात भी महाराज भोज अपने सर्वाधिक आरामदायक एवं मणियों से जड़े उस बेशकीमती पलंग पर लेटे आनन्द के सागर में डुबकियाँ लगा रहे थे। आज उन्हें सबके द्वारा प्रशंसित अपने भाग्य पर अभिमान हो रहा था। उन्हें पूरी तरह से लग रहा था कि मेरे समान इस संसार में अन्य कोई दूसरा ऐश्वर्य सम्पन्न एवं सुखी नहीं है। वे प्रजा के मुँह से अपने प्रति सुने गुणगान को ही वास्तविक बड़प्पन की निशानी मान बैठे थे। सही भी है जो दूसरा ठकुरसुहाती कहे तो प्रखर प्रज्ञा के अभाव में मनुष्य उसी को सच मान लेता है। मनुष्य को चाहे जितनी भी प्रशंसा क्यों न मिले, उसे कभी भी तृप्ति नहीं होती बल्कि और अधिक की चाहत उसे ईर्ष्याग्नि में जलाती रहती है।

महाराज भोज विद्वानों का बहुत आदर करते थे। उन्होंने विद्या को मनुष्य की सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि माना था। उनके दरबार में निरन्तर विद्वानों का बड़ा सम्मान-सत्कार होता था। उन्हें भरपूर पुरस्कृत किया जाता था। वे स्वयं विद्वानों के विचार सुनते और उन्हें पुरस्कृत करते। वे स्वयं भी उत्कृष्ट कवि थे। काव्य प्रेम और सहज मानवता सेवा उनके चरित्र के गौरव में सदैव बुद्धि करते रहते थे। वे प्रायः कहते भी रहते-

विद्वत्वं च नृपत्वं चनैव तुल्यं कदाचन्। स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते॥

यानि विद्वान और राजा किसी भी तरह परस्पर बराबर नहीं हैं क्योंकि राजा अपने राज्य में ही पूजा जाता है लेकिन विद्वान अपने देश में ही नहीं सर्वत्र पूजा जाता है। सर्वत्र सम्मान पाता है। अतः विद्वान सब तरह से सबके द्वारा पूज्य है।

लेकिन जिस सरोवर में स्वच्छ जल काई से घिर जाता है, प्रज्वलित अग्नि धुएँ में आच्छादित हो जाती है, उसी तरह विद्याभ्यासी महाकवि उज्जयिनी नरेश का मन अपनी ही अहं वृत्ति में आच्छादित था। वह सोच रहे थे, मनुष्य जीवन ऐश्वर्य भोग एवं दुखी जनों पर दया करने के लिए मिला है। मैं कितना सौभाग्यशाली हूँ कि मेरी प्रजा दयालुता का सम्मान करती है। मुझे विष्णु के समान पूजती है और में भी इन्द्र की तरह ऐश्वर्य का भोग कर रहा हूँ।

संयोग से उसी क्षण पलंग पर लेटे कविता की कुछ पंक्तियाँ उनके भाव जगत में स्पंदित होने लगती हैं। इन स्पन्दनों ने मन में शब्द का आकार लिया और अधरों में स्फुटित हो उठे।

च्तोहरा युवतयः सुहृदोनूकुलाः।

वह गुनगुनाने लगे आह! मुझे, चित्त को मयूर की भाँति नृत्य से लुभाने वाली सुन्दर कामिनी युवतियों का प्यार और स्वभावानुकूल स्नेही मित्रों के सत्संग का सुख मिला है। मैं आज कितना सौभाग्यशाली हूँ। उन्होंने अति विह्वलता के साथ इसे कड़े स्वर में कई बार दोहराया। इस पंक्ति के पीछे उनका भोगविलास में निमग्न मन बोल रहा था। वे इतने प्रसन्न थे मानो दूसरे सर्वश्रेष्ठ इन्द्र हों। उस पंक्ति को बार-बार कहकर वे आत्म गौरव का अनुभव कर रहे थे। अपने सौभाग्य पर इतराते हुए वे मिथ्याभिमान में सब कुछ भूले हुए थे। लोक प्रचलन भी है कि इन्द्रिय सुख में मनुष्य मिथ्या गर्व से भर जाता है। प्रशंसा जनित अहं तुष्टि उसे विवेकहीन बना देती है। आज महाराज भोज की यही दशा थी। वह सोच रहे थे कि किसी राजा को वह विभूति नहीं मिली, जो आज मुझे प्राप्त है। मेरे भाग्य में कितना आनन्द समाया हुआ है। मन की इसी इतराहट में एक और पंक्ति स्फुटित हुई -

सद्बान्धवाः प्रणतिगर्भश्चः भृत्याः।

यानि की अपने निजी स्नेही बन्धुओं का साहचर्य और अनुरागी सेवकों की अविचल सेवा वृति मुझे प्राप्त हुई है। अहो ! मुझ सा भाग्यशाली भला दूसरा कौन है ?

फिर से अपनी हथेली और दूसरी पंक्ति बार-बार दर्प में गुनगुनाने लगे। अब अपनी कल्पनाओं के जगत में उनकी आत्मचेतना डूबने लगी। कवि का हृदय तो कल्पनाओं का सागर है। इसी कल्पनाओं के महासागर से काव्य के मोतियों की एक नयी लहर छिटक कर बाहर आयी -

गर्जन्ति दन्तिनिवहास्तरलास्तुरड्ढा।

अर्थात् मेरे दरवाजे पर गर्व और शक्ति सम्पन्न चंचल घोड़े हिनहिनाते तथा मदमस्त बड़े बड़े दाँतों वाले हाथी चिंघाड़ते हैं। अहा! मेरी शक्ति का पारावार नहीं है। मुझसे शक्ति सम्पन्न भला और कौन है ? मेरे ऊपर भगवान की असीम कृपा है। मुझे अपने अप्रतिम भाग्य पर गर्व है। सचमुच मैं अनन्त भाग्यशाली हूँ।

अब तो वे तीनों शक्तियों को एक साथ जोड़कर बार-बार हर्षित मन से उच्च स्वर में गाने लगे। काफी देर तक वे छन्द की चौथी पंक्ति जोड़ने की कोशिश करते रहे, किन्तु सफलता न मिल पायी। वे निर्णय नहीं कर पा रहे थे कि चतुर्थ पंक्ति क्या हो, जो उनके अहंकार की तुष्टि करे ? भावनाएँ उद्वेलित हो रही थीं।

अहंवृत्ति की दुर्बलता मनुष्य की आत्मा को क्षीण करती है। उसकी चेतना में कलुष घोलती है। मनुष्य को भोग और विनाश के मार्ग पर ले जाती है। उसका हर काम काज अपने अंतर के स्वार्थ से प्रेरित होता है। स्वार्थ और अहं से बँध कर वह और अत्याचार करने की कोशिश में लग जाता है। वह झूठे और अंधकारमय जगत में जीने लगता है।

कुछ इसी प्रकार की अवस्था इस समय महाराज भोज की थी। वह अपने को हर प्रकार से धन्य समझकर मिथ्या गर्व में चूर थे, लेकिन छन्द की चौथी पंक्ति की रचना नहीं हो पा रही थी।

तभी ठहाके की गूँज के साथ छन्द की एक और पंक्ति वातावरण में स्फुटित हो उठी -

सम्मीलने नयननोर्नहि किंचिदस्ति।

यानि की मृत्यु बेला में जैसे ही आँखें बन्द होती हैं, यह सब कुछ भी नहीं रहता। कहने वाले के स्वर में कुछ ऐसा तेज, कुछ ऐसी प्रखरता थी कि ऐश्वर्य और वैभव का समूचा साम्राज्य थर्रा उठा था। काँप तो गये स्वयं महाराज भी। उन्होंने नजरें उठाकर देखा तो पाया भगवान महाकालेश्वर के अनन्य आराधक अवधूत विक्रांत भैरव खड़े हैं। महान सिद्धियाँ, आलौकिक शक्तियों और दैवीय विभूतियों से सम्पन्न इस महान व्यक्ति के चरणों में भारतवर्ष के सभी राज्यों के राजमुकुट स्वयं झुकते थे। उज्जयिनी निवासी तो उन्हें स्वयं महाकाल का रूप मानते थे। वे कब कहाँ और किस तरह पहुँच जायेंगे, वह जानना किसी के लिए संभव न था। लेकिन यह सुनिश्चित था कि वे जब भी जहाँ जाते हैं किसी न किसी पर आलौकिक कृपा करने जाते हैं।

महाराज उन्हें अपने कक्ष में देखकर हड़बड़ा से गए। उन्होंने तुरन्त उठकर अवधूत विक्रान्त भैरव को प्रणाम किया। धारानगरी के अधीश्वर को अपनी बाँहों में उठाये हुए वे अपनी कही नयी पंक्ति का अर्थ समझाने लगे। हे राजन् ! यह ठीक है कि आपको अपने पुण्य और सत्कर्मों से ये सब लौकिक शारीरिक सम्पदायें और वैभव प्राप्त हो गये हैं। आज आपके पास साँसारिक भोग-सुख के समस्त साधन उपलब्ध हैं। किन्तु मनुष्य के अंतिम समय जब मृत्यु की छाया में उसके नेत्र बन्द होने लगते हैं उस समय उसके पास कुछ नहीं रहता है। यह सब साँसारिक सुख-वैभव क्षणिक और अस्थिर हैं। इन सब सम्पदाओं में से स्थायी रूप से तुम्हारे साथ तो कुछ भी नहीं है। यह सब भ्रम मात्र है। याद रखो, केवल आत्मतत्त्व ही स्थायी है।

मुझे यहाँ देखकर चौंकिये मत अवन्तिकेश्वर। मैं आपको अहंकार के क्षुद्र काल्पनिक जगत से बाहर निकाल ठोस वास्तविकता की ओर ध्यान दिलाने आया हूँ। इसी वार से मैंने आपका छन्द पूरा करने के लिए चौथी कड़ी जोड़ी है। अब छन्द पूरा हो गया -

च्ोतोहरा युवतयःसुहृदोऽनुकूलाः । सद्बान्धवाःप्रणतिगर्भश्च भृत्याः॥ गर्जन्ति दन्तिनिवहास्तरलास्तुरड्ढा। सम्मीलने नयननोर्नहि किंचिदस्ति॥

चित्त को लुभाने वाली कमनीय युवतियाँ, स्वभावानुकूल मित्रजन, स्नेही बन्धुओं का साहचर्य, अनुरागी सेवकों की अटूट सेवावृत्ति, द्वार पर चिंघाड़ते मदमस्त हाथियों एवं हिनहिनाते हुए शक्ति सम्पन्न चंचल घोड़ों का वैभव, मृत्यु की छाया में आँख बन्द करते ही कुछ भी नहीं रह जाता है।

छन्द की अंतिम पंक्ति मनीषी अवंतिका नरेश के अंतर्मन में शूल की तरह चुभ जाती हैं। उन्होंने अवधूत विक्रान्त भैरव से क्षमा माँगी। अब वे मोह निद्रा से जाग उठे थे। न जाने कब किस रूप में मृत्यु आ जायेे। अतः जो समय बचा है, उसे तप साधना एवं लोक सेवा में लगाना चाहिए। मोह निशा के समाप्त होते ही त्याग और वैराग्य का भाव तरंगित होने लगा। उन्हें ऐसा लग रहा था कि जैसे इसी क्षण उनकी जिन्दगी का नवप्रभात हुआ है। उनके भावजगत में काव्य का नया छन्द आकार लेने लगा था -

अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः। नित्यं सनिहितो मृत्युः कर्तव्यों धर्मसंग्रह॥

अर्थात् - यह शरीर अनित्य और क्षणिक है। साँसारिक वैभव भी हमेशा सदा साथ रहने वाला नहीं है। मृत्यु सदैव निकट रहती है। इसलिए सदा धर्म को ही महत्व देना चाहिए। संग्रह वृति हर तरह से त्यागने योग्य है।

महाराज भोज के होठों से यह छन्द अभी प्रस्फुटित हो रहा था कि तभी अवधूत विक्रान्त भैरव अंतर्ध्यान हो गये। शायद उन्हें किसी और को मोहान्धकार से बाहर निकालना होगा।


संस्कृति चिंतन

मनुष्य की बुद्धि और विचार के जन्म के साथ ही संस्कृति की पैदाइश हुई। इसकी रचना में जीवन के प्रायः सभी तत्वों का समावेश है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि संस्कृति इंसानी सभ्यता, काल, एवं इतिहास का ऐसा निचोड़ है जिसकी रासायनिकता बता पाना संभव नहीं, इसे तो सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। इसके दृश्य रूप के साथ अदृश्य रूप भी है। जीवनशैली में जहाँ व्यक्ति और समाज की संस्कृति दिखाई देती है वहाँ चिंतन शैली के विचारों में स्पन्दन अदृश्य होने पर भी संस्कृति का प्रभावी परिचय देते हैं।

इस तरह यह स्थूल है और सूक्ष्म भी, साथ ही दृश्य होने के साथ अदृश्य भी है। इसका संबंध समाज के सभी वर्गों यानि की धनी, निर्धन, विद्वान, अशिक्षित हर किसी से होता है। इस लिए यह स्वाभाविक है कि इसके कतिपय रूप हों। बाहरी तौर पर उनमें कुछ अंतर हो सकता है लेकिन एक ही इंसानी समाज की उत्पादकता से जुड़े होने के कारण उनमें कुछ खास आँतरिक भिन्नता नहीं होती। केवल ग्रहणशीलता सूक्ष्म होने के कारण ही वर्ग विशेष में उच्चस्तरीय होने का सतही आभास होता है। इसीलिए संस्कृति को सही मायने में समझने के लिए सतह को भेदना जरूरी है। सतह के अन्दर ही मिलती है सहजता, प्रवाह, एवं जीवन सत्व और वही है किसी भी संस्कृति का मूलमंत्र।

मानव जाति के इतिहास से अभिन्न रूप से जुड़ी संस्कृति की नैसर्गिक धारा बहती चली आ रही है। प्रागैतिहासिक काल के अणु युग तक इसका विकास इसी में परिलक्षित होता है। संस्कृति स्वयं ऊर्जा पर चलने वाली शक्ति है। सभ्यता की कहानी और इतनी सरल नहीं है। जहाँ एक तरह सृजनात्मक भाग है तो दूसरी और विघटनात्मक एवं विनाशकारी तत्व उपस्थित हैं। संस्कृति से सौम्यता है, सृजनात्मक शक्ति है साथ ही इसमें सुरक्षा एवं संघर्ष के तत्व भी हैं। जैसे-जैसे मूल्यों का विकास हुआ, उन पर आधारित संस्थाओं का विकास हुआ। सांस्कृतिक मूल्यों पर आघात तभी हुए। संस्कृति अपने आप में प्रेरणाओं का अभेद सुरक्षा कवच बन गयी। इसकी सुरक्षा के लिए उपजे संघर्ष में अनगिनत बलिदान हुए, नुकसान भी हुआ लेकिन आखिर बर्बरता को हर बार हार माननी पड़ी, इसे किसी भी तरह विनष्ट नहीं किया जा सकता है। लोकविश्रुत स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में संस्कृति के बढ़ते महत्व का आकलन इसी से किया जा सकता है कि किसी भी सभ्यता का उत्थान और पतन उस समय की संस्कृति की स्थिति पर निर्भर रहा है इसीलिए सभ्यता के मूल्याँकन के लिए संस्कृति को एक प्रमुख तत्व माना गया है। सही बात तो यह है कि संस्कृति का समाज से अटूट संबंध है। तभी तो किसी भी समाज किसी भी देश की सभ्यता स्वयं को असंस्कृति-कुसंस्कृति अथवा संस्कृतिविहीन कहलाना नहीं पसन्द करती है।

संस्कृति का स्थूल भाग कला, परम्परा, रहन-सहन और रीति-रिवाजों के रूप में होता है। इसी कारण इतिहास के भिन्न-भिन्न चरणों में संस्कृति को संरक्षण एवं प्रोत्साहन विभिन्न वर्गों से मिलता रहा है। इसका सूक्ष्म भाग आध्यात्मिक, सामाजिक मूल्यों एवं चिंतन पद्धतियों आदि के सोच के तौर-तरीकों का होता है। इसे जीवन के प्रति नजरिया भी कह सकते हैं। यह साहित्य के बतौर सामने आता है। मानव सभ्यता के प्राचीनतम इतिहास में ऐसे भी जीवन्त उदाहरण हैं जब इन सूक्ष्म मूल्यों का रक्षण साहित्य व पुस्तकों द्वारा संभव नहीं होता तो ऐसी दशा में उन्हें मौखिक रूप से सहेजा गया और पीढ़ी दर पीढ़ी पहुँचाया गया।

श्रुत और ऋचाओं के रूप में वैदिक वाङ्मय की धरोहर इसी का प्रमाण है। यही वजह है कि संस्कृति की धारा अक्षुण्ण ढंग से बहती चली आ रही है। इसके प्रति हमेशा से जागरूकता रही है। इसकी उपेक्षा के अति गम्भीर परिणाम अवश्यम्भावी हैं।

आज की सांस्कृतिक विपन्नता का कारण है - तथ्यपूर्ण तार्किकता की कमी और भावनात्मक आवेश की अधिकता। इसी वजह से काफी कुछ विसंगतियाँ उपजी हैं। वर्तमान समय में आधुनिकीकरण के व्याख्याकारों ने पारस्परिक संस्कृति को प्रगमित अवरोधक माना और निरंतर सांस्थानिक और मूल्यात्मक परिवर्तन का राग अलापते रहे। संस्कृति की सृजनात्मक ऊर्जा की ओर से मुँह मोड़ लिया गया। उनको भी यह अहसास नहीं रहा कि संस्कृति की तीव्र प्रतिरोधात्मक प्रक्रिया से आधुनिकीकरण का महत्व धराशायी हो जायेगा।

एक ओर जहाँ पूर्वाग्रही संस्कृति की गत्यात्मकता को समझे बिना किसी सुदूर अतीत और उसके मूल्यों से चिपके रहे------------------। ये नये समाज का स्वप्न-------------- क्राँतिकारी दृष्टिकोण एवं परम्पराओं को नष्ट करके उसमें मिलती जुलती परम्परावादिता का अनुदान वर्तमान भविष्य की हर समस्या का हल पुरातन परम्पराओं में खोजने के लिए प्रयत्नशील है। दोनों ही संस्कृति की गति-प्रगति एवं मौलिक चिंतन के अवरोधक हैं। दूरदृष्टि के अभाव में इसमें से किसी ने परम्परा एवं प्रगति के बीच की दूरी और संबंध सूत्रों को खोजने की सही कोशिश नहीं की। इसके बिना उज्ज्वल भविष्य की संकल्पना साकार नहीं हो सकती।

एकदम आधुनिक एवं पूरी तरह से पारम्परिक, संस्कृति के ये दोनों रूप भ्रामक हैं। इनमें निर्दिष्ट लक्ष्य की ओर गति नहीं एक अबूझ भटकाव है। कुछ ऐसी ही बातें अभिजात्य संस्कृति और लोक संस्कृति के बीच है। ये भी दो भिन्न धरातल हैं। उनमें संपर्क सूत्र तो है, पर स्तर भेद के कारण उनके परिप्रेक्ष्य में काफी भेद है। समस्या तब और जटिल हो जाती है जब अनेक सांस्कृतिक कारकों के कारण उनमें लोकव्यापी जन संस्कृति और लोकरुचि की संस्कृति का उदय होता है। संस्कृति की इन चार शैली वृत्तों में परिभाषित व्याख्यायें अलग-अलग होती हैं। उनमें संवाद एवं आदान-प्रदान भी बना रहता है। लेकिन उनकी परिधि प्रायः अलग ही रहती है।

लोक संस्कृति में कुछ मोहक तत्व भी होते हैं। जिनका परिष्कृत रूप अभिजात्य संस्कृति में झलकता है। शिक्षा एवं आधुनिक संचार माध्यम द्वारा अभिजात संस्कृति का कुछ रोचक रूप लोक संस्कृति में प्रवेश पाता है। लोकरुचि निरन्तर परिवर्तनशील होने के कारण अभिजात एवं लोक संस्कृति पर इसका प्रभाव साफ परिलक्षित होता है। व्यापक जन संस्कृति के निर्माण में पारम्परिक संस्कृति के रूपों एवं लोकरुचि संस्कृति के तत्वों का मिश्रण होता है। कालान्तर में स्थिर स्वरूप को धारण कर लोकव्यापी जन संस्कृति में परिवर्तित हो जाती है।

तरह-तरह की समस्याओं से घिरे देश में संस्कृति की सक्रिय सोच अंकुरित होती देखी जा सकती है। अपनी अभिरुचि और संवेदनाओं के अनुरूप एक विशिष्ट दायरे में संस्कृति के तत्वों का मूल्याँकन और उनका सत्र निर्धारित होता है। मुख्यतः ये कला रूपों के उच्च उपलब्धियों से आकर्षित होते हैं। संगीत, साहित्य और उत्कृष्ट कलाओं---------------------- को उनके मूल्याँकन में ऊँचा स्थान मिलता है। इन तत्वों के महत्वपूर्ण होने के बावजूद संस्कृति की परिभाषा का परिसर विस्तृत है। खेल-कूद संस्कृति के अंग हैं, मनोरंजन भी। युद्ध और शाँति संस्कृति के दायरे में आबद्ध है। श्रम भी संस्कृति है और विचार भी। राजनीति की अपनी संस्कृति होती है और धर्म की अपनी। व्यक्ति और समूह की प्रवृत्तियाँ संस्कृति द्वारा बदलती हैं। यह संस्कृति के आधार और केन्द्रीय मूल्यों को प्रभावित करता है। इस तरह संस्कृति का सर्वांगीण आकलन व्यापक और समुचित दृष्टिकोण द्वारा ही संभव है।

अपने को संस्कृति का हिमायती कहने वालो के नजरिये में एक दोष आ जाता है। वे इसे जाति आदर्श पूर्ण ढंग से अपनाने के लिए मजबूर करते हैं अथवा फिर बहिष्कृत कर देने में विश्वास करते हैं। जबकि बात तो यह है कि संस्कृति के पहिये की धुरी स्थित एवं अपरिवर्तित होती है लेकिन परिधि में सामयिक परिवर्तन भी होते हैं। परन्तु इसके अभाव में कई विकृतियाँ अमरबेल की तरह फैल जाती हैं। अन्याय, शोषण और उत्पीड़न को चाहे धर्म का परिधान पहनाया जाये पर छिपाया या मिटाया नहीं जा सकता। प्रतिक्रिया स्वरूप सामाजिक असंतोष का भाव पनपता है और संस्कृति रूढ़ियों, मूढ-मान्यताओं परम्पराओं की बेड़ियों को झटक कर तोड़ फेंकती है।

अपने नये रूप में यह संस्कृति विकृतियों का विरोध, अन्याय का उन्मूलन, सुधार के मार्ग प्रशस्त करती है। जब भी ऐसी स्थिति आई उसे असंख्य विघ्न बाधाओं का सामना करना पड़ा। संस्कृति क्राँति के प्रणेता गौतमबुद्ध और उनके श्रमणों का मजाक उड़ाया गया। महावीर को अनगिनत यातनाएँ दी गयी तथा ईसा को सूली पर चढ़ना पड़ा। इसका इतिहास दर्दनाक एवं लम्बा होने के बावजूद क्राँति के अग्नि स्नान से पुरातन मूढ़ताओं को धोकर पुनः ऊर्जावान हुई संस्कृति की अनोखी दास्तान है। इसके प्रणेता भी अपने इस अनुदान के कारण युगपुरुष बनकर प्रतिष्ठित हुए। सही मायने में संस्कृति है ही युगानुरूप सत्य की अन्वेषक। संतों, मनीषियों ने भावनाएँ ही नहीं सिखायी बल्कि उसमें से अनेक युग शोध और परिवर्तन परिवर्तक भी थे। यदा-कदा इस प्रयास में विसंगतियाँ भी आ जाती हैं पर उनकी सृजनात्मक भूमिका की उपेक्षा नहीं की जा सकती।

अप संस्कृति हर युग में विषपायी देन है। इसमें कुछ का निराकरण संभव होता है, कुछ को समाज में किसी कारणवश विशेषाधिकार मिल जाने से उसका आश्चर्यजनक विस्तार होता चला जाता है। इसी का नतीजा है कि आज समाज अनियंत्रित आर्थिक लाभ व उच्छृंखल कामुकता की ज्वाला से जल रहा है। सफलता के लिए मानवीय मूल्यों व आदर्शों की तिलाञ्जलि देने में कोई हिचक नहीं है। आधुनिकता और स्वतंत्रता के नाम पर अंकुशहीन भोगवाद पनप रहा है। सामाजिक और पारिवारिक सौहार्द्रता चटककर व्यक्ति के स्वार्थ केंद्र में सिमट आई है। साहित्य एवं जन संचार माध्यम इसी अप संस्कृति का विश्व व्यापी प्रचार कर रहे हैं। वैज्ञानिक तकनीकों का भरपूर लाभ अप संस्कृति उठा रही है। मानवीय मूल्य बाज़ार में बिकने के समान हो गया है। स्वार्थ रूपी व्यवसायिकता की जड़े गहरी हुई हैं। सांस्कृतिक मूल्य दम तोड़ते मालूम पड़ते हैं और विघातक सांस्कृतिक प्रवृत्तियों को प्रश्रय देकर इंसानी पाँव किस सर्वनाश की ओर मुड़ चले हैं शायद उसे स्वयं नहीं मालूम।

इस विकराल विप्लवी समस्या के समाधान के लिए जरूरी है - सांस्कृतिक क्राँति में सक्रिय भागीदारी। युगऋषि ने जिस विचारक्रांति की रचना की है, उसमें युगानुकूल राष्ट्रीय चरित्र निर्माण के सभी तत्व जरूरी हैं। वह सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी मानसिकता को हर स्तर पर निर्माण का अभियान है। अपने देश में जो वर्तमान मानसिकता है, उसे शब्द चित अल्डुअस हक्सले ने बखूबी खींचा है, उनका कहना है कि भारतीय लोगों को राजनीति और राजनीतिक चर्चा करने की लाइलाज बीमारी लग गयी है। यहाँ यह नहीं कहा जा रहा है कि राजनीतिक नितान्त घटिया चीज है लेकिन आज कुटिलता भ्रष्टाचार इसकी मजबूरी बनी हुई है जबकि संस्कृति मानवीय दिलों के दायरे को जोड़कर अखण्ड समाज की रचना में समर्थ है। शायद उसकी उपेक्षा ही वह कारण है कि बड़े-बड़े बाँध, इमारतें, कारखाने बन जाने के बावजूद लोगों के मन बाँधने का यानि की राष्ट्रीय चरित्र निर्माण का स्वप्न पूरा नहीं हो सका है। राष्ट्र, राष्ट्रीयता, एकता और लोकतंत्र की संकल्पना को हमने स्वतंत्रता के पश्चात् नये सिरे से स्वीकार तो कर लिया पर इसे असरकारक ढंग से अमल में लाने के लिए संस्कृति की, युग क्राँति की उपेक्षा कर रहे हैं।

संस्कृति दो मंजिलें मकान की तरह है। इसकी पहली मंजिल में एकदम मूलभूत मगर जीवन के चिरन्तर तत्व होते हैं, वे मूल्य कायातीत हैं, शाश्वत हैं। यही इंसान के सामाजिक जीवन की नींव की ईंट हैं। पहली मंजिल पर दूसरी मंजिल का निर्माण ऐतिहासिक परम्परा, आर्थिक लेन-देन सामाजिक संबंध और परिस्थितिजन्य अन्य मूल्यों द्वारा निर्मित होता है। यह व्यवस्था मूलतः संरक्षणात्मक होने की वजह से तरह-तरह के प्रतीक, परम्पराओं, मान्यताओं का बड़ा सा पिंजड़ा बनाती है। इसे देखकर पहली मंजिल पर दूसरी मंजिल की आश्रित मूल अवस्था को श्रेष्ठता का भ्रम होने लगता है। इस भ्रम से कई तरह की विकृतियाँ पैदा हो जाती हैं। ज्ञान-विज्ञान के विकास से होने वाला बदलाव यानि की सामाजिक परिवर्तन इस विकृति से संघर्ष करने लगता है। दुनिया के सभी देशों के साथ अपना देश भी आज इसी संकट के दौर से गुजर रहा है।

समाज में मृत और जीवित संस्कृति भी होती है। मृत संस्कृति का पहला प्रमाण है कि वहाँ जीवन रस सूख चुका होता है। इसमें न हलचलें होती है और न नवसृजन के स्पन्दन। दूर से यहाँ सब कुछ शान्त-शान्त लगता है। पर वह शांति मरघट की शांति की तरह होती है जहाँ जीवन की राख के अलावा कुछ नहीं। जीवित संस्कृति में विचारों के अंतर्विरोध होते हैं। अतीत और भविष्य के संबंधों की खोज में वर्तमान तनावपूर्ण भी होता है। उज्ज्वल भविष्य के निर्माण के लिए यहाँ वर्तमान में संघर्ष की टंकारें रह-रहकर गूँजती हैं। भारतीय संस्कृति ऐसी असंख्य अनुभूतियों को अपने में समेटे आज उज्ज्वल भविष्य के लिए कार्यरत है।

डॉ. राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति की इस प्रवृत्ति के बारे में कहा करते थे - साहित्य एक है पर उसे कई भाषाएँ रचती हैं। विचारों में विविधता हो सकती है इसीलिए मानदण्ड होना चाहिए। तनाव से हो, टकराव से हो, भारतीय संस्कृति में गहरा चिंतन खोजने की प्रवृत्ति हमेशा से रही है। इसके जीवंत होने का सबसे बड़ा प्रमाण है धर्म, अर्थ, काम ओर मोक्ष सभी की एक साथ स्वीकारोक्ति क्योंकि जीवन अलग-अलग हिस्सों में बैठा है। किसी को काटने-हटाने छोड़ने का मतलब है - संस्कृति का अधूरापन। इसकी पूर्णतया के जीवन्त प्रवाह को हर जगह पहुँचाने की जिम्मेदारी प्रतिभाओं की है। परन्तु भटकाव के इस दौर में याद आते हैं ए. गिलवर्ट के शब्द - “मैंने अपनी पीढ़ी की योग्यतम प्रतिभाओं को पतनावस्था में देखा है। उनका रोना मैंने सुना है, जैसे बगीचे में कोई बूढ़ा या बच्चा रोता है।”

इन पंक्तियों में उन योग्यतम प्रतिभाओं को दुरावस्था के भँवर से उबारने और संस्कृति क्राँति में भागीदार होने के लिए आह्वान है, अनुरोध है और हृदय की गहराइयों से पुकार है। क्योंकि व्यक्ति समाज और राष्ट्र-विश्व की सभी समस्याओं का समाधान इसी संस्कृति के निर्णायक विकास में है। अतः इसमें अधिकतम जीवन ऊर्जा के निवेश की जरूरत है। इस भारी जरूरत की पूर्ति स्वार्थ की बेड़ियों को तोड़कर फेंकने वाली प्रतिभाएँ ही कर सकती हैं।

सांस्कृतिक प्रयासों को अब अंतर्राष्ट्रीय आवश्यकता भी मान लिया गया है। यूनेस्को की अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक विकास दशाब्दी समिती की रिपोर्ट में इसे स्पष्ट रूप से बताया गया है। उनके अनुसार यह आवश्यक है कि विकास शब्द को दर्शन और विचार के संदर्भ में समझा जाये। किसी खास और प्रमुख ढाँचे के आधुनिकीकरण को ही प्रायः विकास समझा जाता रहा है। जबकि वास्तव में आवश्यकता यह है कि इसमें सांस्कृतिक एकाधिक विचारधाराओं, विभिन्न जीवन पद्धतियों, अलग-अलग आस्थाओं, तथा जीवन मूल्यों का समायोजन हो ताकि समूची मानव जाति अपने चरम लक्ष्य को पा सके। आधुनिकीकरण का मतलब किसी विशिष्ट जीवन पद्धति की मशीनी नकल नहीं है वरन् विकास पद्धति को संस्कृति के संबंध में पुनर्जीवित करना है। विकास के तत्वों की सांस्कृतिक अंतर्वस्तुओं को भी महत्व देना होगा जिसमें स्थानीय व भौगोलिक प्रासंगिकता पर्यावरणीय तत्व, ऐतिहासिक परम्पराएँ, परम्परागत ज्ञान और कौशल शामिल हैं।

इसी कारण एक नयी अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृति नीति की आवश्यकता है जिससे समूचा मानव समाज अपनी आत्माभिव्यक्ति दें सके। इस नीति से विश्व भर के विचारों, दृष्टिकोणों में मानवी विकास हेतु उचित सामंजस्य बिठाया जा सकेगा। साथ ही दूर होगी विभिन्न देशों के निवासियों की वह संवेदनहीनता जिसकी वजह से समस्त कतिपय लोग अपना स्वार्थ सुधारने के लिए अपने भोले-भाले देशवासियों में दूसरे देश के लोगों के प्रति नफरत के बीज बोते हैं। किसी भी देश के मनुष्य मानवीय भावनाओं से वंचित नहीं होते हैं। सभी में कोमल संवेदनाएँ होती हैं। हाँ इन संवेदनाओं की वजह से उनमें यदि अपनी मातृभूमि के प्रति प्यार है तो गलत क्या है। लेकिन यदि उन्हें बताया जा सके, सिखाया जा सके कि मातःभूमिः पूत्रोऽहम् प्रथिव्याँ कि यानि धरती हमारी माता है हम पृथ्वी के पुत्र हैं

और एक माँ की संतानों को जिस तरह से रहना चाहिए हम उसी तरह से रहें। इस तत्व को हृदयंगम कर पाना संस्कृति शिक्षण से ही संभव है। भारतीय संस्कृति में सबसे अधिक सामंजस्य एवं समन्वय की क्षमता रही है। इस संदर्भ में उनके अनुभव भी बहुत हैं। आज भी यह विश्व के विभिन्न भू-भागों में प्रचलित जीवन मूल्यों, आवश्यक तत्वों को अपने में आत्मसात् कर सकती है। यह पारस्परिक सांस्कृतिक संवाद ही सभी समस्याओं का सार्थक हल है।

क्योंकि अभी देशों का पारस्परिक परिचय वहाँ के राजनेताओं के बीच होता है, जन जीवन तो आपस में अपरिचित ही रहता है। जब सांस्कृतिक क्रिया-कलापों से जनजीवन आपस में परिचित होगा, तो जनभावनाएँ भी उमंगेंगीं। जनभावनाओं के इस उफनते ज्वर में संकीर्णता की दीवारें, कतिपय स्वार्थी लोगों की कुटिल चालें रेत के महल के मानिद बह जायेगी, फिर अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव पनपेगा, समस्यायें नहीं। इस कार्य की शुरुआत हमें ही करनी है यानि की हम भारतवासियों को, क्योंकि हमारे यहाँ की मानवता के इतिहास में पहली बार वसुधैव कुटुम्बकम् की गूँज उठी है।

परिस्थितियाँ विपरीत हुई तो क्या, विश्व संस्कृति के निर्माण की जिम्मेदारी हम भारत वासियों को पूरी करनी है। मानवता के सामने यह सबसे बड़ा कार्य है। अप संस्कृति का जहर भी इसी से शान्त होगा। संस्कृति की अवहेलना से उत्पन्न दोष को इसी प्रयास से भरा जा सकता है। संस्कृति ही समस्त मानवीय विकास का आधार है। सांस्कृतिक क्राँति के अग्रदूतों की जिम्मेदारी है कि इसके तत्वों को सुदूर विश्व के कोने कोने तक पहुँचाये।


पेड़-पौधों की विचित्र दुनिया

प्रकृति रहस्यों से भरी पूरी है। उसने अपने मातृ-सुलभ स्नेह से अपनी संतानों को विलक्षणता के आलौकिक अनुदान दिये हैं। अकेले मनुष्य ही इसका दुलार पाया हो ऐसा नहीं है। वह भले ही अपनी क्षमताओं से गर्वोन्नत, मदान्ध हो उठे लेकिन यह उसकी अहंवृत्ति है। यदि वह अपनी इस अंधता की पट्टी को उतार कर फेंक दे और चारों ओर नज़र डाले तो जानेगा कि साँस भी जड़ कहे जाने वाले पौधों का अनुदान है। जिन्हें हम जड़ कहते हैं, उपेक्षित समझते हैं, उनकी भी क्षमताएँ कम रहस्यमय और कम विलक्षण नहीं हैं। कभी तो वे हमें प्यार से भर कर अपना सब कुछ लुटा देते हैं और कभी हमारी कृतघ्नता का दण्ड देने के लिए हमारा शिकार तक कर लेते हैं।

हिमालय के तिब्बत, लद्दाख वनेपाल के उच्च बर्फीले क्षेत्र में ट्यूर नामक एक विशेष प्रजाति का वृक्ष पाया जाता है, जो आहार में घी शक्कर सरीखा स्वादिष्ट पदार्थ प्रस्तुत करता है। इसके वृक्ष लम्बे और हरे होते हैं। इसके रंगीन व सुगंध युक्त पराग से यहाँ के लोग गुड़, शक्कर बनाते हैं। इसमें लगने वाला फल मीठा और स्वादिष्ट होता है। इसके अन्दर की गुठली पीसने पर घी सरीखा गाढ़ा चिकना व सफेद तेल निकलता है, इससे पकवान बनाये जाते हैं। उत्तरीय महासागरीय द्वीपों में ‘ब्रेड ट्री’ नाम से जाने जाने वाले वृक्ष की एक विशेष जाति होती है जिसमें बड़ी गेंद की तरह कोमल व आकर्षक फल लगते हैं। जिसके भीतर कोमल स्वादिष्ट, पौष्टिक गुच्छा होता है। वहाँ के लोग रोटी कर तरह इसे मक्खन लगाकर खाते हैं। इसमें काफी खनिज लवण व पौष्टिक तत्व पाये जाते हैं।

उत्तरी अमेरिका में मक्खन देने वाले पेड़ पाये जाते हैं। इनमें अख़रोट की तरह का कड़े आवरण वाला फल लगता है। इसे सुखाकर तोड़ने पर अन्दर मक्खन जैसे रंग, स्वाद एवं गंध वाला सफेद चिकना पदार्थ निकलता है, यह अत्यंत पौष्टिक एवं स्वादिष्ट होता है। इसे दो सालों तक बिना खराब हुए सुरक्षित रखा जा सकता है। यूरोप के मेडागास्कर में वृक्षों की ऐसी प्रजाति पायी जाती है जो प्यासे राहगीरों की प्यास बुझाती है। इसके पत्तों की बनावट प्यालों की तरह होती है, इनमें वर्षा का पानी इकट्ठा हो जाता है। यह पानी कई सप्ताह तक भरा रहता है।

एक ऐसा वृक्ष भी होता है, जिसमें चीरा लगाने पर मीठे पानी का फव्वारा फूट पड़ता है। इससे राहगीर गर्मी में अपने पानी की आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। चीरा लगाने के थोड़ी देर बाद पानी निकलना अपने आप बन्द हो जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस वृक्ष में काफी पानी होता है जो शिराओं के माध्यम से दौड़ता रहता है। इसी तरह अण्डमान निकोबार में ‘कुवार्व’ या केलेमान अण्डमानिकस नामक पौधे की प्रजाति पायी जाती है जिसके पर्ण वृत में पानी पाया जाता है। क्षेत्रीय आदिवासी पानी न मिलने पर इसी से अपनी प्यास बुझाते हैं। एक ऐसा आरोही पौधा भी पाया जाता है जिसकी पत्तियों व तने के रस को पानी में मिला देने पर पानी बर्फ की तरह जम जाता है अपनी इस विशेषता के कारण इसे जल जमनी या वाटर फ्रीज़र कहा जाता है।

वृक्ष हमारे लिए खाद्य पदार्थ या पानी ही नहीं जुटाते बल्कि अपनी विलक्षणताओं से हमें आश्चर्यचकित भी करते हैं। छोटानागपुर में ‘काला कौरैया’ नामक एक ऐसा वृक्ष पाया जाता है जिसकी छाया के नीचे उसकी घास जल जाती है और मिट्टी का रंग काला हो जाता है। इसी तरह हिमालय क्षेत्र में कुछ ऐसे पौधे पाये जाते हैं जो रात के अंधेरे में रेडियम व हीरे की तरह चमकते हैं। ‘सोल औषधि’ नामक एक पौधे की प्रतिपदा की चाँदनी से पूर्णिमा की रात तक 15 पत्तियाँ लगती हैं व अमावस्या की रात में सभी झड़ जाती हैं और पौधा सूख कर लकड़ी के समान दिखने लगता है व रात को चमकता है।

कुछ ऐसे भी पौधे पाये जाते हैं जिनके तने से निकलने वाला विशेष प्रकार का रस अंधेरे में चमकता है। कवकों में कुकुरमुत्तों की कुछ जातियाँ रात में कई रंगों का सुनहरा प्रकाश उत्पन्न करती हैं।

पौधों में कुछ ऐसे भी हैं जो पूरी तरह सूखने पर भी पानी में डालने पर हरे भरे हो जाते हैं। संजीवनी बूटी के नाम से प्रख्यात ऐसा ही सदाबहार पौध है। कुछ पौधे मनुष्य की भाँति शर्माते भी देखे जा सकते हैं। लाजवंती (छुई-मुई) ऐसा ही शर्मीला पौधा है। स्पर्श करते ही यह लजा जाता है। जीव-जन्तु व मनुष्यों की भाँति पौधे रोते भी हैं। ‘फेनरीद्वीप’ में पाया जाने वाला लाउरेल नामक वृक्ष ऐसा ही है, इसे आँसू बहाते देखा जा सकता है। मेडूँक वृक्ष की आकृति मनुष्य से काफी मिलती जुलती हैं इसे काटने या उखाड़ने पर यह बच्चे की तरह रोने लगता है। मनुष्य व जीव जन्तुओं में तो माँसाहारी पाये जाते हैं, लेकिन वनस्पति जगत में भी कुछ ऐसे सदस्य हैं जो मास भक्षण करते हैं। ज्यादातर यह दलदली भूमि में पाये जाते हैं जहाँ नाइट्रोजन की कमी रहती है। अपवाद स्वरूप पुर्तगाल में पाया जाने वाला यूरोपियन फ्लाई क्रेचर सूखी व चट्टानी जमीन में उगता है। एशिया के कुछ ऐसे देशों में पाया जाने वाला पिपरप्लाण्ट (घटपर्णी) माँसाहारी पौधे का एक सुपरिचित नाम है। इसमें पत्ती एक छोटे घड़े की आकार की होती हैं, कीड़े फिसल कर इसके अन्दर चले जाते हैं व इसका शिकार बन जाते हैं। ’सनड्यू’ एक ऐसा पौधा है जिसकी पत्तियों के किनारों पर अनेक चिपचिपी व रस कुण्डलिनी के समान रचनाएँ निकलती हैं जो संपर्क में आये कीट पतंगों को निगल जाती हैं।

यूट्रोकुलेरिया जिसे व्लैडर वर्ट भी कहते हैं, अधिक दलदली जगहों पर उगता है और जल कीटों को अपना प्रमुख आहार बनाता है। उत्तरी अमेरिका में ‘वेनस फ्लाइट्रप’ नामक माँसभक्षी पौधे की प्रजाति मिलती है। इसके किनारे काँटेदार पत्ते खुल या अन्दर हो सकते हैं। सामान्यता अन्य माँसभक्षी पौधे धीरे-धीरे पानी के तालाब में डूबते हैं या चिपकाऊ पत्तों या बालों में कीड़ों को उलझा देते हैं लेकिन ‘वेनस फ्लाइट्रेप’ शिकार के पत्तों पर बैठते ही तीव्र आक्रामकता के साथ झपट पड़ता है और अपने पाचक रसों द्वारा शिकार को गलाकर पोषक तत्व ग्रहण करता है।

दक्षिण अमेरिका में अर्जेन्टीना के जंगलों में ‘क्लोरोफार्म ट्री’ नामक प्रजाति पायी जाती है। ऐसे ही पौधे नरभक्षी जावा व सुमात्रा के समुद्रतटीय जंगलों में पाये जाते हैं, इन्हें ‘मैन ईटर ट्री’ कहते हैं। जब कोई जीव-जन्तु इन पौधों के नीचे आता है तो पेड़ की टहनियाँ चारों ओर से उसे अपने शिकंजे में कस लेती हैं, दम घुटते ही जब जीव मर जाता है तो वापस उठ जाती हैं।

कुछ पौधे इनसान की तरह घुमक्कड़ प्रकृति के होते हैं। अमेरिका में पाया जाने वाला मेनगोव ऐसा ही पौधा है, यह तटीय क्षेत्रों में पाया जाता है। अपना घूमने का शौक पूरा करने के लिए हजारों कि.मी. की दूरी तय कर लेता है। सड़ी लकड़ियों के बीच उगने वाला ‘स्लामर वाँल्ड ‘ भी एक ऐसा ही पौधा है। यह बैक्टीरिया पर जीवित रहता है। अपने कुछ ही घण्टों के जीवन काल में यह 12 इंच की दूरी तय कर लेता है। यह प्रकाश की ओर चलकर अपनी अगली पीढ़ी के लिए उपयुक्त घर को सुनिश्चित करता है।

कई पौधे जमीन में पौष्टिक तत्वों के न मिलने पर हवा व वर्षा में अपना पोषण ग्रहण करते हैं। अमेरिका के वर्षा वनों में पाये जाने वाले रेड एल्डेन और मेपल की कुछ प्रजातियाँ इसी तरह की हैं। अधिक बरसात के कारण इन पेड़ों के नीचे के खनिज व पोषक तत्व बह जाते हैं, अतः ये अपनी खुराक हवा व वर्षा में लेते हैं।

खिलने वाले फूलों में दक्षिण पूर्वी एशिया का रैफलेटिया नामक फूल सबसे बड़ा होता है। यह परजीवी पौधा है। इसके फूल का व्यास एक मीटर व भार 7 किलो तक होता है। इसी तरह से सबसे छोटा फूल इकवीड़ के नाम से जाना जाता है। पानी में तैरने वाला यह फूल इंच का 30वाँ भाग होता है।

वृक्षों के विशेषताओं की कोई सीमा नहीं है। अब सिकोया जाइगैथ्ष्टया की बात करें तो उसकी ऊँचाई 360 फीट तक होती है। उम्र भी 1000 साल से कुछ ऊपर ही होती है। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि यह पेड़-पौधों के खानदान में सबसे लम्बा एवं दीर्घायु सदस्य है। कहने को बाँस की लम्बाई सबसे ज्यादा मानी जाती है लेकिन बड़े से बड़ा बाँस भी अधिकतम 121 फीट का ही होता है। घास सामान्यता जमीन पर रेंगने वाली प्रजाति है लेकिन फफैली घास जब अपना सिर उठाकर खड़ी होती है तो इसकी लम्बाई 18 फुट तक जा पहुँचती है। कभी-कभी पौधों की कुछ प्रजातियाँ अपना कुछ अधिक ही विकास कर लेती हैं। मेक्सिको में मक्का की एक किस्म 20 फीट तक ऊँची पायी गयी है। इसी तरह बाँस एक दिन में तीन फीट तक बढ़ता है और कभी-कभी ही यह फूलता है। जापानी बाँस की एक किस्म 120 वर्ष में एक ही बार फूलती है। पौधा फूलने के बाद प्रायः मर जाता है।

जड़े गहरी होना एक मुहावरा है, लेकिन किसी की जड़े 100 मीटर तक गहरी होंगी, ऐसा कम ही होता होगा। यह बात अफ्रीका में पाये जाने वाले ‘ऐड्रसोनिया डिजीटोटा’ नामक पौधे के बारे में सच है। इसके विशाल उदर में पानी भर कर रखा जाता है। जिसे रेगिस्तानी यात्रियों को बेचा जाता है। एक प्रौढ़ वृक्ष के खोखले तने में शव को दफनाते हैं जो सैकड़ों सालों तक सुरक्षित रहते हैं। आस्ट्रेलिया के एक शहर में तो इस वृक्ष के तनों को जेलखाने के रूप में उपयोग किया जाता है। अचरज की बात यह है कि इसमें पानी का टैंक बनाने, शव दफनाने और बन्दी गृह में उपयोग करने के बावजूद भी यह वृक्ष सूखता नहीं, बल्कि बढ़ता ही रहता है।

साधारण तौर पर वृक्ष से हमारा मतलब लम्बा तना, फैली हुई शाखाओं पत्तों से होता है। लेकिन कई वृक्ष इस ढाँचे से हटकर अपनी विचित्रता प्रदर्शित करते हैं। अफ्रीका का वाओवस व आस्ट्रेलिया के वॉटल ट्री इसी तरह के विचित्र वृक्ष हैं। स्थानीय किंवदन्तियों के अनुसार हयेना नामक दुष्ट भूत ने पहले वाओ वृक्ष को उल्टा आरोपित कर दिया था, जिसके कारण यह एक उलटे वृक्ष की तरह दिखता है। इसके मोटे तने को पानी का भण्डारगृह माना जाता है। पुराने वृक्ष प्रायः खोखले होते हैं, कभी कभी इन्हें घर के रूप में भी उपयोग में लाया जाता है। एक प्रसिद्ध वृक्ष तो बस स्टॉप के रूप में उपयोग किया जा रहा है जिसमें एक समय तीन यात्री शरण ले सकते हैं।

मलाया के जंगलों में यदि कोई राही मार्ग भटक जाये तो जंगल में लगा कैडलोना नामक पेड़ मार्ग बोध कराता है, इसकी शाखा हमेशा दक्षिण की ओर झुकी रहती है। वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसा पेड़ के चुम्बकत्व गुण के कारण है। इस तरह के पेड़ भटके लोगों के लिए दिशा सूचक का काम करता है।

वृक्ष वनस्पतियों के इस विचित्र संसार में अनेकों आश्चर्य भरे पड़े हैं। कहीं तो ये हमारे लिए स्वादिष्ट खाद्य जुटाते हैं, कहीं मधुर पेय, तो कहीं अपने अनोखेपन से चकाचौंध कर देते हैं। कभी इनका क्रोध डराने वाला भी होता है। अपने हर रूप में ये मानव जाति को एक ही संदेश देते हैं, ‘कबिरा गरव न कीजिए’, यानि कि गर्व न करो, तुम्हारा गर्व बेकार है। हमारी क्षमताएँ किसी तरह से कम नहीं। सृष्टि की मूल वृत्ति सहयोग सहकार है। तुम हमें पुष्पित करो, हम तुम्हें समृद्ध करेंगे। तो क्यों न मिलजुल कर प्रकृति के अनुदानों का उपयोग करें और परमेश्वर की बहुरंगी सृष्टि में सौंदर्य भरें।


Quotation

यदि तुम्हारे पास ज्ञान है तो तो उस ज्योति से बुझे दीपक को जलाने में लाभ मिलने दो, ताकि तुम्हारे ज्ञान का प्रकाश अधिकाधिक व्यापक और विस्तीर्ण होता चला जाये।

यदि अपने ज्ञान को सिर्फ अपने ही पास बने रहने दोगे तो उसकी दशा भी तालाब के बन्द पानी जैसी होकर रह जायेगी। उसमें संकीर्णता की कीचड़ एवं स्वार्थ की काई ही पनपेगी।

ज्ञान के दीपक की गरिमा इसी में है कि वह अपने इर्द-गिर्द अँधेरे को मिटाता रहे।


जीवन मूल्यों का यक्ष प्रश्न और उसका हल

जीवन मूल्यों के बेतहाशा पतन ने मानवी मेधा को चुनौती दे रखी है। इस यक्ष प्रश्न का हल ढूँढ़ने के लिए सभी परेशान हैं। विभिन्न देशों की सरकारें, मानवाधिकार संगठन आये दिन इस संकट पर अपनी चिंता प्रकट करते रहते हैं, यू.एन.ओ. की विभिन्न गतिविधियों का तो ये जैसे आधार ही बन गया हो। साहित्यकारों ने भी इस पर कम पृष्ठ नहीं रंगे। वही अकेले क्यों, बुद्धिजीवियों के विभिन्न वर्ग इस पर आये दिन गोष्ठी, सेमिनारों का आयोजन करते रहते हैं। इतने सारे हड़कम्प के बावजूद जन साधारण अनजान है, कि आखिर जीवन मूल्य है क्या?

जीवन से सभी परिचित हैं लेकिन उसके मूल्याँकन की चेष्टा कम ही लोग करते हैं। जीवन अकेले शरीर का पर्याप्त नहीं और न ही अकेली प्राण ऊर्जा का। अकेली मानसिक शक्ति भी जीवन की परिभाषा नहीं बन सकती। परन्तु इनमें से किसी को छोड़ दें तो भी जिन्दगी आधी-अधूरी और अपंग-अपाहिज हो जायेगी। जिस आत्मसत्ता का गौरव-गान करते हुए विभिन्न धर्मों के प्रवर्तक एवं धार्मिक, आध्यात्मिक ग्रन्थों के प्रणेता ऋषि-मनीषीगण नहीं अघाते, वह भी अपनी विभूतियों को प्रकट करने के लिए जीवन को तलाशती रहती है। आत्मा की सबसे सफल अभिव्यक्ति इनसानी शरीर में ही सम्भव है इसीलिए इनसानी जीवन का महत्व सबसे अधिक है और सम्भवतः इसी कारण जीवन-मूल्य मानवीय मूल्य का पर्याय बन गए।

इंसानी जिन्दगी में ही हम मूल्यों की तलाश करते हैं। जानवरों की जिन्दगी में भी मूल्यों की तलाश में ऐसा कुछ कर गुजरते हैं, जिसके सामने इंसान बौना लगने लगता है कि शायद ये विचारहीन जानवर भी हमें बहुत कुछ सिखा सकते हैं। फिर भी इंसान-इंसान है और जानवर-जानवर इंसानी क्षमताएँ जानवरों से बहुत बढ़ी-चढ़ी हैं, यदि इन्हें मूल्यवान बनाया जा सके तो केवल मानव समाज ही नहीं बल्कि उसका सान्निध्य पाने वाले पशु-पक्षी भी स्वतः मूल्यवान हो जाएँगे।

अब सवाल यह उठता है कि मनुष्य की जिन्दगी में आखिर सबसे अधिक मूल्य किसका है ? क्या शरीर का ? तो इसके जवाब में कहना इतना ही कि यह सच है कि मानव शरीर विधाता की अनुपम रचना है। शरीर शास्त्री आज भी इसके जोड़ो, संधियों, नस-नाड़ियों शिराओं, धमनियों, दिल, गुर्दे की संरचना को देखकर हतप्रभ होते रहते हैं। लेकिन जहाँ इनमें अनेक विशेषताएँ है वहीं बहुतेरी कमियाँ भी हैं। न तो वह मछली की तरह तैर सकता है और न ही यह मेंढक की तरह पानी और जमीन पर रह सकता है। चिड़ियाँ की तरह न उड़ने की सामर्थ्य है और न गिद्ध और उल्लू की तरह देखने की। हिरन की तरह कुलाचें भरना भी इसके बूते नहीं। हाथी जैसा बल और शेर जैसा फुर्तीलापन भी मनुष्य के अन्दर नहीं है। इतनी सारी कमियों के बावजूद इंसान को शरीर के बल पर मूल्यवान कहना उचित नहीं है।

आदमी की श्रेष्ठता का आधार उसकी प्राणऊर्जा भी नहीं हो सकती। यह ठीक है कि हम प्राणों के सहारे जिन्दा हैं अन्यथा प्राणों के बिना शरीर को निष्प्राण होते कितनी देर लगेगी। इसकी अधिकता ही दीर्घायु होने का राज है। प्राणों की पूँजी खत्म हुई कि जीवन लीला समाप्त हुई। लेकिन इस प्राण सम्पदा के मामले में इनसान कइयों से पीछे है, सिकोया जाइगैष्टिया जैसे पौधे 1000 सालों तक जी लेते हैं। बरगद की उम्र भी आदमी से काफी ज्यादा होती है। जानवरों में हाथी भी आदमी से कम उम्र नहीं पाता और गोल-मटोल कछुआ भी 300 साल से भी ज्यादा जी लेता है। ऐसी दशा में प्राण सम्पदा मानवीय मूल्य नहीं बन सकता है।

रही बात मानवीय बुद्धि की, तो हाँ इसके चर्चे चारों ओर हैं और काफी जोर शोर से हैं। बुद्धि के मामले में इसकी कहीं कोई बराबरी नहीं है, न जानवर ही मुकाबला कर सकते हैं और न पेड़ पौधे। साहित्य-दर्शन-विज्ञान इसी के कौशल हैं। मोहक काव्य रचना, दार्शनिकता के वैचारिक अनुसंधान और विज्ञान की अनुभूतियाँ किसे आकर्षित नहीं करतीं। इसमें भी इनसानी शक्ल ने विज्ञान के क्षेत्र में कुछ ज्यादा ही लाभ कमाया है। यह बात बिजली और कल कारखानों, हवाई जहाजों तक सीमित नहीं रही, इलेक्ट्रानिक्स के नये युग ने तो हर और जैसे चमत्कार कर दिया है। कम्प्यूटर की कारीगरी ने एक नयी दुनिया ही सामने लाकर रख दी है।

लेकिन बौद्धिकता की इसी अनोखी सामर्थ्य ने जिन्दगी को पतन और विनाश के गर्त में धकेलने वाले सरंजाम भी कम नहीं जुटाये। साहित्य की बात ही लें ले, अश्लीलता और कामुकता से भरी छन्द रचना, रोचक, रोमांटिक उपन्यासों की कमी नहीं। सिनेमा और टी.वी. सीरियल का आधार भी तो बुद्धि ही है। इन्हें देखने वाले जानते हैं कि किस तरह ये माध्यम जन जीवन में कुत्सित भावनाओं का जहर घोल रहे हैं। दार्शनिक जो अपनी बुद्धि के संसार पर शिखर पुरुष होने का दम्भ करते हैं उन्होंने इनसानी बुद्धि को भ्रमित करने वाले चक्रव्यूह ही ज्यादा रचे हैं। मनुष्य की कोमल भावनाओं को नष्ट करने, उसके पैरों के नीचे की आस्था व विश्वास की जमीन को खिसका देने में जितना योगदान दार्शनिक का है, उतना किसी का नहीं। विज्ञान की बात ही निराली है, उसने तो सम्मोहन में प्रवीण कुशल इंद्रजाल की तरह मनुष्य को कुछ न कुछ दिखाकर उसकी इंसानियत तक छीन ली।

आणविक अस्त्र वैज्ञानिकों की बुद्धि का ही चमत्कार है। इसी चमत्कार से उपजे पर्यावरण प्रदूषण ने मानवीय प्रजाति के सम्मुख अस्तित्व का ही संकट खड़ा रखा है। वैज्ञानिकों की सतह और सहायता से हम भले ही अंतरिक्ष में उड़ना सीख गये हों लेकिन धरती पर जीना अवश्य भूल गये हैं। विज्ञान और वैज्ञानिकता ने सुविधा और सहूलियत के साथ मानवता की छाती पर इतने गहरे जख्म दिये हैं, जिसके दर्द की कसक से वह रह-रहकर तड़पती और सिसकती रहती है। ऐसे में मानवीय बुद्धि की लाख विशेषताओं के बावजूद मानवीय मूल्यों या जीवन मूल्यों का प्रतिमान प्रमाण मानना किसी भी तरह उचित नहीं। सच तो यह है कि जीवन मूल्यों का बेतहाशा पतन हुआ ही मानवीय बुद्धि के कारण है।

तब क्या जीवन का कोई मूल्य नहीं ? उसके मूल्याँकन की बात बेमानी है और इस तरह के प्रयासों का स्वयं ही कोई मूल्य नहीं ? इन सवालों के उत्तर इतना ही कहना है कि, मानव जीवन के अमूल्य और बहुमूल्य है, वह तो मूल्यों के आगार और भण्डार है। लेकिन इसके सारे मूल्य जीवन के केन्द्र से गुजरते हैं। यह केन्द्र ही जीवन का सार है। जीवन में इस सार तत्व को संवेदना कह सकते हैं। यह शाश्वत जीवन मूल्य है। इसी का सहारा पाकर जीवन मूल्य अंकुरित होते हैं, इसी का रस पाकर पुष्पित पल्लवित एवं अभिवर्धित होते हैं।

संवेदना का मतलब है - समान वेदना। किसी की पीड़ा को देखकर हम तड़प उठे। हमारा चिंतन उसके दुख के निवारण के लिए सक्रिय हो उठे। हमारे हाथों-पाँवों में उसकी सेवा के लिए अकुलाहट भर जाये यही संवेदना है। संवेदना जब सक्रिय होती है तो अस्तित्व की सारी शक्तियों को एक सूत्र में पिरोकर इच्छित दिशा में अग्रसर कर देती है। कर्म और चिंतन अपने आप भावनाओं के बड़प्पन में बँध जाते हैं। यदा-कदा पशुओं में भी इसकी झलक मिल जाती है। समय-समय पर समाचार पत्रों में ऐसे समाचार छपते रहते हैं, कुत्ते ने बन्दर की रक्षा की और गाय ने कुतिया के बच्चे को दूध पिलाया। कुत्ते की वफादारी और घोड़े की स्वामी भक्ति भी इसी रूप में है। परन्तु इन प्राणियों में कल्पना एवं विचारशीलता के अभाव में यह संवेदना व्यक्त नहीं हो पाती। ऐसी दशा में इससे जीवन मूल्यों की बहुरंगी फसल सही ढंग से विकसित हो पाती।

संवेदना सहज है और सरस है, लेकिन स्वार्थ और अहं की वृत्तियां इसकी सारी सहजता समाप्त कर देती हैं और सरसता सोख लेती हैं। मजे की बात है कि इन वृत्तियों को पोषण बुद्धि से मिलता है। यही स्वार्थ के पक्ष में तर्क जुटाती है और अहं की प्रतिष्ठा के लिए साधन का इन्तजाम करती है। स्वार्थ और अहं हमारे भाव सरोवर की निर्मलता और उर्वरता को काई की तरह ढके रहते हैं। ऐसे में जीवन मूल्यों के कमल खिलें तो किस तरह। समाधान एक ही है यानि स्वार्थ एवं अहं की वृत्तियों से छुटकारा और इसकी जगह पर उदारता और सहिष्णुता की भाव वृति का विकास।

उदारता और सहिष्णुता के अंकुरित होते ही स्वार्थ और अहं की वृत्तियां अपने आप ही निष्प्राण और निस्तेज होने लगती हैं। इन दोनों को संवेदना का शाश्वत जीवन मूल्य से उपजा प्रारंभिक जीवन मूल्य कह सकते हैं क्योंकि इनके अभाव में स्वार्थ एवं अहं की समाप्ति असंभव है। विचार गम्भीरता से करें तो हम पायेंगे की स्वार्थ का विस्तार आर्थिक उच्छृंखलता, निरंकुश भाव योग का कारण बना हुआ है। अहं के गगनचुम्बी बनने की ललक की वजह से नित नये कुचक्र रचे जाते हैं। अचरज तो तब होता है जब सारे सुख साधनों के बावजूद दूसरों की स्वतंत्रता एवं मर्यादा के हरण के लिए तरह-तरह के मकड़जाल रचे जाते हैं। पर अहं की वृति ही कुछ ऐसी है कि उसे तब तक चैन नहीं मिलता जब तक औरों को नीचा न दिखा ले, दूसरों को अपने आधीन करके दम्भ को पूरा न कर ले।

हिटलर की बर्बरता, मुसोलिनी की तानाशाही एवं नैपोलियन के अभिमान की प्रेरक उनकी अहं वृति ही थी। सिकन्दर का विश्व विजेता बनने का सपना इसी वृति से प्रेरित था। अहं के इस दानव की ही भाँति स्वार्थ की सुरसा का मुँह कम बड़ा नहीं है। भोग जैसे जैसे बढ़ते जाते हैं स्वार्थ की सुरसा का मुँह भी बढ़ता जाता है इसका कोई अंत नहीं। ये दोनों ही विनाश वृत्तियां जीवन मूल्यों की विरोधी हैं। जिस व्यक्ति में, जिस समाज में अथवा जिस किसी राष्ट्र में इनका प्रसार जितना अधिक है वही जीवन मूल्यों के उतने ही अंशों में उतनी कमी आना स्वाभाविक है।

इसी कारण जीवन और समाज को कोई भी व्यवस्था चाहे वह आस्तिक हो अथवा नास्तिक, जीवन मूल्यों को नकार नहीं सकती। धर्म को अफीम की गोली कहने वाला मार्क्स भी जीवन मूल्यों को नकार नहीं सका बल्कि उसने शाश्वत मूल्य संवेदना से प्रेरित होकर ही सर्वहारा वर्ग के लिए ऐसी समाज रचना की कल्पना की, जिससे सबको बराबर का सुख मिल सके। ‘ऋण कृत्वा घृतं पिबेत ’ का सूत्र देने वाले चार्वाक यही बता सके कि जब धरती का भोग पदार्थ सीमित है तो बिना बँटवारा किये खाने वाला सुख पूर्वक कैसे रह सकता है और बाँटना तो संवेदना को अपनाकर ही संभव है। कतिपय विचारहीन लोगों को छोड़ दें तो सुखी और समृद्ध समाज की कल्पना करने वाले हर किसी ने संवेदनशीलता की सराहना की है। ऐसे विचारकों ने जब-जब धर्म की आलोचना की है तो उनका मतलब उन धार्मिक कुरीतियों से रहा है, जो समाज के स्वार्थ और अहं का पर्याय बनी हुई थी। अपने देश के ऋषि कहे जाने वाले विचारकों ने धर्म को शाश्वत जीवन मूल्य कहा है क्योंकि यह संवेदना का ही पर्याय था। राजा रतिदेव की धार्मिक भावनाएँ, भगवतकार शब्दों में कुछ इस तरह से झलकती है

न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्ग नापुनर्भवम्। कामये दुःखतप्तानाँ प्राणिनामात्तिंनाशम्।

अर्थात् हे सर्वेश्वर! मैं स्वर्ग की सद्गति, स्वर्ग, मोक्ष, इस लोक का सुख-वैभव राज्य आदि कुछ नहीं चाहता, चाहता हूँ तो सिर्फ दुखों की आग में जलते हुए प्राणियों के ताप के निवारण की शक्ति।

गोस्वामी तुलसीदास जी अपनी अमरकृति रामचरित्र मानस में कहते हैं - ‘परहित सरिस धरम नहि भाई’। यानि की दूसरों की सेवा भावना से बड़ा कोई धर्म नहीं है। महर्षि व्यास की समस्त रचनाओं का सारभूत अंश बताते हुए एक ऋषि का कथन है, अष्टादश पूराणेषु व्यासस्य वचनं द्वयम्। परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नम्॥ अठारह पुराणों में व्यास की मूल बातें दी हुई है।, परोपकार सबसे बड़ा पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना सबसे बड़ा पाप।

विचारक चाहे पूर्व के हों या पश्चिम के, अतीत के हों या वर्तमान के, सभी का एक ही मत है, जीवन मूल्यों के विकास का अर्थ है शाश्वत जीवन मूल्य।

संवेदना के जीवन के सभी क्षेत्रों में अधिकाधिक अभिव्यक्ति है। चिंतन कर्म और भावना से सभी क्षेत्रों में ज्यादा से ज्यादा संवेदना बिखरे और निखरे। अपने-अपने परिवेश और समाज के अनुरूप नीति बनती है। लेकिन इन नीति नियमों का उद्देश्य यही रहा है मानव को अधिक से अधिक उदार एवं सहिष्णु बनाना। उसमें उन तत्वों को विकसित करना, जिनके द्वारा वह समाज के व्यापक दायरे में सामंजस्य बैठा सके। समाज की सौम्यता व सौजन्यता विकसित कर सके।

हालाँकि नीति नियम की तरह ये बाहरी अनुशासन हैं, जिसे समाज व्यवस्थापक ढंग का भय दिखाकर डरा धमका कर पालन करवाते हैं। यह नियम तोड़ोगे तो ऐसी सजा मिलेगी। शोषण, भ्रष्टाचार, अनीति, अन्याय सभी के खिलाफ कानून है, सजाएँ हैं पर सिलसिला है कि रुकता नहीं है। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि कि नीति नियम, संविधानों का अम्बार मानव की स्वार्थ अहं की वृत्तियों का सामयिक दमन तो करता है पर स्वार्थ और भोग की प्रतिष्ठा की चाह, चोरी छिपे उन कामों को करवाती ही रहती है जो नियमों के खिलाफ है। कभी-कभी तो कुछ लोग खुल्लमखुल्ला इन नियमों को तोड़ने का साहस कर बैठते हैं। ऐसी दशा में न

तिकमता के बंधन जीवन मूल्यों के तात्कालिक एवं सामयिक संरक्षण ही हो सकता है, शाश्वत और सर्वकालिक नहीं ।

उसके लिए तो मानव प्रकृति के मर्मज्ञ अध्यात्म की तकनीकों की सलाह देते हैं। उनके अनुसार अध्यात्म मानवीय अस्तित्व की सी टेक्नालॉजी है, जिसके बलबूते वृत्तियाँ परिशोधित की जा सकती हैं। अंतःप्रकृति का रूपान्तरण हो सकता है। इसके साथ ही उन तकनीकों का सहारा लेकर मानव अपने अस्तित्व के केन्द्र तक जा पहुँचता है, जहाँ इसे सृष्टि विस्तार के सारे सूत्र अपने आँतरिक संवेदना से जुड़े दिखते हैं। ऐसी स्थिति में सब ओर उसे अपना ही विस्तार लगता है। सबके स्वार्थ में अपना स्वार्थ और सबकी प्रतिष्ठा में अपनी प्रतिष्ठा समझ में आने लगती है। जब स्वार्थ और अहं की क्षुद्र वृत्तियां ही नष्ट हो गयी हो तो फिर उसका हर कार्य एवं चिंतन जीवन मूल्यों का विकास एवं विस्तार ही करता है।

जिन्होंने भी इस सत्य को जाना एवं पाया वे ही जीवन मूल्यों के संसार में शीर्ष पुरुष बनें। बुद्ध ने इसी बोध को पाकर बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की ध्वनि गुँजित की। स्वामी विवेकानन्द को इसी कारण अमेरिका का सुखमय जीवन रास नहीं आया। सुख ऐश्वर्य से भरे पूरे घर में भी वे नंगे फर्श पर पड़े देशवासियों की दयनीय दशा के लिए तड़पते रहे। महात्मा ईसा के द्वारा सूली को स्वीकार किये जाने के पीछे यही रहस्य था। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी इसी भाव से भावित होकर दरिद्र को नारायण के रूप में पूजने लगे थे। दरिद्र नारायण की सेवा ही उनके जीवन का व्रत बन पड़ा है।

इन सभी शीर्ष पुरुषों ने जीवन मूल्यों को किसी विवशता एवं बाध्यता की वजह से से नहीं अपनाया बल्कि उनकी अंतरात्मा से इसकी बहुरंगी छटा झलकने लगी थी। उनका स्वभाव ही कुछ ऐसा हो गया कि उनके अलावा वे कुछ सोच अथवा कह नहीं सकते थे। यदि उन्होंने अपने प्रारम्भिक जीवन में नैतिक अनुशासन और मान्यताओं को अपनाया तो वह कानून या संविधान के डर से नहीं बल्कि इसलिए कि उसमें उनकी आस्था थी। उन्हें इस बात पर विश्वास था कि इन अनुशासनों के दायरे रहकर ही अपनी प्रकृति परिवर्तित एवं रूपान्तरित कर सकते हैं और उन्होंने ऐसा ही किया।

आज यदि जीवन मूल्यों में गिरावट आई है तो इसका मतलब इतनी ही है कि जीवन के प्रति आस्था टूटी है। जीवन लक्ष्य हीन हुआ है। जीवन के अतीत और भविष्य खो गये हैं। ऐसी दशा में वर्तमान में भटकना स्वाभाविक है। अब यदि इस भटकाव को दूर करना है तो बात, बातों से नहीं बनेगी। पाँच सितारा होटलों में होने वाली वक्तृताओं, वातानुकूलित कमरों में चलने वाले बौद्धिक वितण्डावाद से कब किसका कल्याण हुआ है। इनसे तो विलासिता बढ़ती है। सच कहा जाये तो ऐसे लोग स्वयं जीवन मूल्यों से पतित होते हैं।

जीवन मूल्यों का विकास, भाव विकास है, मानवीय संवेदनशीलता का बहुआयामी विकास है। इस विकास का चरम बिन्दु है मोक्ष। एक तरह से यह सर्वोच्च जीवन मूल्य है क्योंकि यहीं इस बिन्दु पर स्वार्थ एवं अहं की वृत्तियों से पूरी तरह से छुटकारा मिलता है। इसके साधन हैं - सहानुभूति, सेवा, सहायता, त्याग, बलिदान, कर्तव्यपरायणता। यथार्थ में इन्हें कितने ही नाम एवं रूप क्यों न दें पर वे उदारता ओर सहिष्णुता के ही अलग-अलग रूप हैं। उदारता ही भामाशाह, जमनालाल बजाज का सृजन करती है। बहुजन हिताय में अपना सर्वस्व दे सकने का साहस इन्हीं से उमगता है। सहिष्णुता के सहारे तप और त्याग के अंतिम छोर को छू पाने में समर्थ हो पाते हैं। राष्ट्र और समाज के लिए बड़े से बड़ा त्याग बलिदान, उदार और सहिष्णु व्यक्ति ही कर पाते हैं।

इस भाव विकास के लिए चाहिए विचार और आदर्श। खोखले विचारों, वक्तृता एवं पुस्तकीय रचना से काम चलने वाला नहीं है। आदर्श व्यक्तित्व के चिंतन से प्रवाहित विचार गंगा ही मानव वृत्तियों का कलुष धो सकने में समर्थ है। त्याग चिरअतीत से हमारे समाज व संस्कृति का मानदण्ड रहा है। इस मानदण्ड पर खरे उतरने वाले मोक्ष परायण व्यक्तियों के जीवन मूल्यों का शिक्षण संभव है। महावीर और महर्षि रमण बिना बोले ही सब कुछ सिखा देते थे जबकि वक्तृताओं की बौद्धिक रचना से प्रायः बोलने वालों की कुटिल अहंवृत्ति को ही पोषण मिलता है। यथार्थ में जिन्हें जीवन मूल्यों में गिरावट की पीड़ा है, कसक है, वे आगे आयें, तोड़ फेंके स्वार्थ और अहं की बेड़ियों को, चाहे वे लोहे की हो या सोने की और प्रामाणित कर दें अपने जीवन से कि वास्तविक जीवन मूल्य क्या है। उनका ही समर्थ संरक्षण एवं सशक्त शिक्षण होगा। यदि ऐसे एक हजार व्यक्तित्व भी आगे आ सके तो अपने देश में जीवन मूल्यों की कोई समस्या न होगी। क्या 10 करोड़ पुत्र पुत्रियों पाली संतानों को पा सकेंगी ? यदि ऐसे त्यागी बलिदानी युवक-युवतियाँ आगे आ सकें तो हम 21वीं सदी में समूचे विश्व में जीवन मूल्यों का शिक्षण एवं संरक्षण कर सकेंगे।


एक व्यक्ति, एक साथ, एक ही समय दो स्थानों पर

जिसने सुना उसी ने दाँतों तले उँगली दबा ली। हरेक की जबान पर एक ही सवाल था, आखिर ऐसा किस तरह ? एक ही समय एक ही व्यक्ति दो स्थानों पर उपस्थित और वह भी एक स्थान से सैकड़ों मील दूर दूसरे स्थान पर।

शुरुआत में ज्यादातर लोगों को इस बात पर हँसी आई। लेकिन जब किसी और के कथन उसकी अनुभूतियों को बदलने लगे, तो शक की गुँजाइश न रही। धीरे-धीरे पत्रकार और बुद्धिजीवी आकृष्ट होने लगे। उन्होंने अपने तरह से सच्चाई को परखने की कोशिश की और उसे खरा पाया। अब तो उसके अपने देश और बाहर के देशों के वैज्ञानिकों के हतप्रभ होने की बारी थी। विज्ञान की दुनिया के लिए ऐसा होना किसी तरह से संभव न था। अब तक के अन्वेषण अनुसंधान की परम्पराएँ ऐसा कुछ भी नहीं खोज सकी थी जिसके आधार पर इस घटना की व्याख्या की जा सके।

परीक्षण आवश्यक माना जाने लगा। सभी ने यह जिम्मेदारी औण्टेरियो इन्स्टीट्यूट के निर्देशक डॉ. मार्टिन स्पेन्सर को सौंपी। यह वर्ष 1937 का समय था। इस समय डॉ. स्पेन्सर की ख्याति एक प्रख्यात मनोवेत्ता के रूप में विश्वव्यापी हो चुकी थी। शुरुआत में उन्होंने किसी भी दावे को मानने से इनकार करते हुए कहा, ऐसा दावा करने वाला जरूर कोई ठग है। वह अपने बारे में इस तरह की बातें प्रचारित करके मुफ्त की ख्याति पाना चाहता है, हो सकता है उसका इरादा कुछ धनी-मानी अंध विश्वासी लोगों को ठगने का हो।

लेकिन जब इस जमाने के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों ने उन्हें अपने अनुभव बतायें और लुईस राजर्स के दावे से अपनी सहमति जाहिर की तो वह वैज्ञानिक जाँच पड़ताल के लिए तैयार हो गये। लुईस राजर्स का जन्म इंग्लैण्ड में हुआ था। तीन साल की उम्र में वह कनाडा चला आया। सन 1931 में वह टोरोण्टो में जाकर बस गया। वहाँ वह कतिपय ऐसे लोगों के साथ काम करने लगा जो मृत आत्माओं के सूक्ष्म शरीरों से संबंध स्थापित करते थे। धीरे-धीरे उसे इस बात में आनन्द आने लगा। स्वयं भी वह मृत आत्माओं का आह्वान करने लगा और सूक्ष्म दुनिया लोक लोकान्तर की जानकारी हासिल करता। लोग उसके पास मृत संबंधियों से भेंट करने के लिए आने लगे। ज्यादातर समय वह इन्हीं लोगों के लिए काम करता। बाकी समय में उसकी अपनी साधना चलती रहती। हालाँकि इस समय तक उसके बारे में लोगों को कुछ खास जानकारी नहीं थी।

लेकिन इतने दिनों की साधना के दौरान उसे अपने अस्तित्व में कुछ विशेष होने का आभास होने लगा था। उसे लगने लगा था कि वह स्वयं को दो रूपों में प्रकट कर सकता है। सूक्ष्म आत्माओं को बताये गये निर्देश के अनुसार उसने साधना करके यह विद्या सीख ली थी जिसके द्वारा वह सामान्य भौतिक शरीर के साथ एक अन्य संकल्प शरीर में भी प्रकट हो सकता था। ये दोनों शरीर दो अलग-अलग स्थानों पर दो अलग-अलग ढंग से सक्रिय रह सकते थे। देखने में दोनों में कोई भेद मालूम नहीं पड़ता। दोनों ही शरीरों में उसकी सूक्ष्म चेतना सक्रिय रहती और परस्पर आँतरिक संवाद बनाये रखती।

उसका भेद तब खुला जब उसकी दो परिचित स्त्रियों की टोरोण्टो में भेंट हुई। एक दिन जब ये दोनों बाज़ार में मिलीं, तो उनमें लुईस राजर्स के बारे में बात छिड़ गयी। एक महिला ने कहा मुझे पता ही नहीं था कि मि. लुईस राजर्स आज कल माँटियल गये हुए हैं। मेरी बहन ने उन्हें मंगलवार को वहाँ देखा था और उनसे काफी देर बातें कीं, साथ बैठकर काफी पी।

यह सुनते ही दूसरी औरत चौंक पड़ी। आश्चर्यचकित होकर उसने कहा, यह असंभव है, ऐसा हो ही नहीं सकता। क्यों ? पहली औरत ने जिज्ञासावश पूछा।

क्योंकि पिछले मंगलवार तो मि. लुईस राजर्स मेरे घर पर थे। वह पूरे दिन मेरे परिवार के साथ रहे। दूसरी महिला ने हैरतअंगेज बयान दिया।

इस बात पर दोनों औरतें काफी समय तक बहस करती रहीं और इसके बाद लुईस राजर्स के बारे में काफी अफवाहें फेल रही थीं, कुछ झूठी और कुछ सच्ची। लुईस राजर्स के एक साहसी परिचित ने उससे इन अफवाहों के बारे में एवं उसके दूसरे व्यक्तित्व के बारे में पूछ लिया। जबाब में लुईस राजर्स ने मुस्कुराते हुए कहा, यदि तुम चाहो तो मुझे दोहरे व्यक्तित्व का स्वामी मान सकते हो।

अब तो लुईस राजर्स के बारे में सूचनाएँ एकत्रित की जाने लगी। प्राप्त सूचनाओं का विश्लेषण करने पर पता चला कि यदि एक जगह लुईस राजर्स वाक् पटु, कुशल, चुस्त और सक्रिय होता था तो दूसरी ओर वह खामोश और सुषुप्त सा होता। अपने एक अंतरंग मित्र को इसका भेद बताते हुए उसने एक बार कहा, दरअसल उसकी साधना अभी पक्की नहीं हो पाई है दूसरे शरीर को सक्रिय, सतेज एवं प्रखर बनाये रखने के लिए जितनी प्राण ऊर्जा चाहिए अभी वह उतनी नहीं जुटा पाया है। यदि तप प्रखर हो सका तो आगे ऐसी परेशानी नहीं होगी।

सन 1937 होते होते उसके बारे में कहानियाँ इतनी चर्चित हो गयी कि वैज्ञानिक एवं प्रतिष्ठित बुद्धि जीवी तक हतप्रभ होने लगे। इसी क्रम में डॉ. मार्टिन स्पेन्सर अपने वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए आगे आए। उनके साथ लुईस राजर्स के निवास पर पहुँचे साथी वैज्ञानिकों ने लुईस राजर्स से पूछा कि वह उनके प्रश्नों के उत्तर देगा, तो उसने स्पष्ट मना कर दिया। इससे इन्स्टीट्यूट के निर्देशक डॉ. स्पेन्सर असामंजस्य में पड़ गये। थोड़ी देर बाद कुछ सोचते हुए उन्होंने उससे जानना चाहा कि उसके प्रश्नों के उत्तर देने में आखिर उसे किस बात का डर है ?

प्रत्युत्तर में लुईस राजर्स ने कहा कि वह नहीं चाहता कि उसके काम और उसके परिचितों के विश्वास के आधार पर वैज्ञानिक सिद्धांत गढ़े जाएँ। डॉ. स्पेन्सर ने उन्हें बताया कि ऐसा नहीं होगा, वह अपने साथियों के साथ पक्षपात रहित प्रयोग सम्पन्न करेंगे। यह कार्य पूरी तरह से तटस्थता, भेदभाव रहित एवं वैज्ञानिक प्रयोग के अनुरूप पूर्ण ईमानदारी से सम्पन्न होगा। डॉ. स्पेन्सर के इस कथन के बाद उनके परीक्षण में भाग लेने के लिए वह तैयार हो गया।

इस समय तक और लोग भी लुईस राजर्स के बारे में फैल रही अफवाहों को गम्भीर रूप लेने लगे थे। पुलिस भी छान बीन में लग गयी थी। लुईस राजर्स के नाम से एक फाइल भी तैयार कर ली गयी थी।

डॉ. स्पेन्सर का परीक्षण शुरू हो गया। उनके प्रयोग में एक शर्त यह थी कि राजर्स अगले तीन हफ्तों तक टोरोण्टो के बाहर नहीं जायेगा। स्पेन्सर ने अपने साथी वैज्ञानिक से कहा कि वे राजर्स के घर की पहरेदारी करे। जब कभी भी वह घर से बाहर निकले तो उसके साथ कोई जरूर जाये। प्रयोग शुरू होने के तीसरे दिन 7 अप्रैल 1937 को मांट्रियल से एक व्यक्ति ने सूचना दी कि जो अपने को राजर्स बताता है, मांट्रियल के एक होटल में देखा गया है।

जाँच दल के सदस्य तुरन्त मांट्रियल पहुँचे। वहाँ उनकी भेंट राजर्स के हूबहू से हुई। वह व्यक्ति बोला मैं लुईस राजर्स हूँ। उसने वैज्ञानिकों को अपने ऊपर किये जाने वाले प्रयोग की गोपनीय बातों का ब्यौरा बताया। अब तो जाँच दल तो दुविधा में पड़ गये। उन्होंने तुरन्त फोन कर डॉ. स्पेन्सर को बताया, वे सकते में आ गये और लगभग चीखते हुए बोले नहीं, ऐसा किसी तरह नहीं हो सकता। मैं इस समय यहाँ राजर्स के साथ दोपहर का खाना खा रहा हूँ।

वह राजर्स के दो स्थानों पर एक ही व्यक्तित्व के अस्तित्व का बेहद सनसनीखेज प्रमाण था। लेकिन इतना होने पर भी डॉ. स्पेन्सर को विश्वास नहीं हुआ कि वह सचमुच दो व्यक्तियों का स्वामी हैं अभी उन्हें विश्वास था कि वह जालसाजी से काम ले रहा है।

लोगों की उलटी सीधी बातें व डॉ. स्पेन्सर एवं उनके साथी वैज्ञानिक के तरह-तरह के तर्कों से तंग आकर राजर्स ने कहा - मैं अब इन सब से काफी थक गया हूँ। थोड़ा धीरज रखो।

12 अप्रैल को यह हमेशा के लिए सिद्ध कर दूँगा कि मेरे अन्दर असाधारण शक्ति है। तब शायद आप विश्वास कर सकेंगे, अब मुझे अपनी एकान्त साधना के लिए छोड़ दें।

डॉ. स्पेन्सर इस महत्वपूर्ण परीक्षण के लिए सहमत हो गये। 12 अप्रैल 1937 को लुईस राजर्स को डॉ स्पेन्सर की प्रयोगशाला में ले जाया गया। उसे और डॉ. स्पेन्सर को प्रयोगशाला के अन्दर बैठाकर बाहर का ताला बन्द कर दिया गया। जाँच दल के अन्य तीन सदस्य बाहर इन्तजार करने लगे। अन्दर लुईस ने डॉ. स्पेन्सर से कहा - आपके दिमाग में जो भी पहली चीज आती है वह बोल दें। डॉ. स्पेन्सर ने कहा गुलाब।

बस अब ठीक है राजर्स ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा। राजर्स को अपनी प्रयोगशाला में छोड़ कर डॉ. स्पेन्सर अपने साथियों के पास बाहर आ गये। वे लोग लगभग एक घण्टे बैठे रहे। इतने में उनके पास रखे फोन की घण्टी बज उठी। फोन टोरोण्टो रिसर्च इन्स्टीट्यूट के एक खास प्रतिनिधि का था उसने फोन पर सूजना दी कि उसने अभी लुईस राजर्स को शहर में घूमते देखा है। प्रतिनिधि की यह बात सुनकर सुविख्यात मनोविज्ञानी डॉ. स्पेन्सर और उनके साथी दंग रह गये, क्योंकि वे खिड़कियों से लुईस को साफ-साफ बैठा देख रहे थे। जब यह हमारे सामने बैठा है और कमरे के दरवाजे चारों तरफ से बन्द हैं व हर दरवाजे पर मजबूत ताले लगे हैं, तो फिर वह शहर में कैसे बोल रहा है ? यहाँ पर बैठे वैज्ञानिकों के दल में एक स्तब्धता छा गयी।

मनोवैज्ञानिक डॉ. स्पेन्सर अपने सोच-विचार में उलझे थे तभी फिर से फोन की घंटी बजी। उन्होंने झपटकर फोन उठाया। उधर से राजर्स की स्पष्ट आवाज सुनाई दी, डॉ. स्पेन्सर मैं लुईस राजर्स बोल रहा हूँ। हमारा सांकेतिक शब्द गुलाब है जिसे मेरे और आपके सिवा कोई नहीं जानता। यह सुनकर डॉ. स्पेन्सर के आश्चर्य के की सीमा न रही। विचित्र तथ्य यह था कि वे राजर्स के मुस्कुराते हुए चेहरे को दरवाजे के शीशे से साफ-साफ देख रहे थे। प्रयोगशाला से फोन उन्होंने जान-बूझ कर हटा दिया था। इसका मतलब यह था कि जरूर राजर्स का दूसरा रूप उन्हें फोन कर रहा था।

इस घटना ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया और काफी सोच विचार के बाद अन्ततः वे लुईस राजर्स के चमत्कारिक व्यक्तित्व के कायल हो गये। उन्होंने उसके दो रूपों को स्वीकार कर लिया। जब उन्होंने स्वयं राजर्स से उसके रहस्य के बारे में पूछा, तो वह हँसते हुए कहने लगा - मित्र मार्टिन, आपका मनोविज्ञान, मन के बारे में जितना जानता है, यथार्थ में इनसानी मन उससे हजारों लाखों गुना व्यापक है। इसकी सामर्थ्य और रहस्यों की भी कोई सीमा नहीं। यदि कोई लगातार के साधनात्मक प्रयासों से अपने मन सहित समूची चेतना को नियंत्रित कर सके, तो वह स्वयं कई रूप प्रकट कर सकता है।

लेकिन सूक्ष्म चेतनाओं का स्थूल प्रकटीकरण ? मनोवैज्ञानिक डॉ. स्पेन्सर ने अपनी शंका व्यक्त की।

वह कोई विशेष बात नहीं। समर्थ सूक्ष्म चेतना अपनी संकल्पशक्ति से वातावरण में व्याप्त अणु-परमाणुओं से अपने स्थूल शरीर का निर्माण कर लेती है जिसका स्थायित्व व्यक्ति की सूक्ष्म चेतना की संकल्पशक्ति के अनुरूप ही होता है। लुईस राजर्स के इस कथन की मनोवैज्ञानिक मार्टिन आश्चर्य से सुन रहे थे। राजर्स कह रहा था, हमारी सामर्थ्य तो अभी उतनी ही है, हाँ भारत के प्रधान योगी लोग स्वयं को 5-10 या उससे भी अधिक रूपों में प्रकट करने की क्षमता रखते हैं।

डॉ. स्पेन्सर को अनुभव हो रहा था कि मानव कितना रहस्यमय है। वास्तविक विज्ञान तो वही है जो इन रहस्यों को प्रकट करने में समर्थ हो। इस घटना के लगभग 5 वर्ष बाद लुईस का जीवन समाप्त हो गया लेकिन मनुष्यों को यह संदेश देने के बाद कि तुम स्वयं रहस्यों, आश्चर्यों, विभूतियों के भण्डार हो, साधनात्मक प्रयासों से इन्हें प्रकट करो। ईश्वर के राजकुमार होने की सार्थक अनुभूति करो।


महत्वाकाँक्षाओं को आदर्शवाद के साथ जोड़ दें

मनुष्य के विषय में यदि उसकी आकृति, योग्यता और सम्पदा को आगे बढ़कर देखना, खोजना हो तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि जो जैसा सोचता है वह वैसा ही बन जाता है। गीता में इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहा है - “यो यच्छ्द्धः स एव सः”, जिसकी जैसी श्रद्धा है वह वैसा ही बन जाता है। श्रद्धा अर्थात् आकांक्षा और मान्यता का समुच्चय। मस्तिष्क सोचने में स्वतंत्र नहीं है और न शरीर अपनी मर्जी से कुछ करता है। अंतराल की उमंगें ही उसे इधर-उधर लिये फिरती हैं। उसी प्रेरणा के अनुरूप मस्तिष्क को सोचना और शरीर को करना पड़ता है। अस्तु व्यक्ति का वर्तमान और भविष्य वस्तुतः उसकी इच्छा, आकांक्षा पर पूरी तरह अवलंबित समझा जा सकता है।

महत्व साधना सम्पदा का भी है। और परिस्थितियाँ भी मनुष्य को प्रभावित करती है। इतने पर भी यह मानकर चलना होगा कि उनका महत्व सीमित है। साधनों के सहारे की गयी प्रगति उनके हटते ही सादा के लिए समाप्त हो जाता है। परिस्थितियाँ बदलती, उलटती रहती हैं, आज अनुकूलता कल प्रतिकूलता। यदि उन्हीं पर प्रगति निर्भर हो तो मनुष्य को सर्वथा पराधीन ही मानना होगा।

व्यक्ति की निजी सम्पदा उसके अन्तराल में छिपी रहती है जो आकांक्षा बनकर उभरती, उछलती है। वही अपने प्रचण्ड चुम्बकत्व से ज्ञान सम्पदा, शारीरिक क्षमता, कुशलता, अन्यान्यों की सहायता, परिस्थितियों की अनुकूलता जैसे अनेक साधन अनायास ही इकट्ठे कर लेता है और मनुष्य वहाँ जा पहुँचता है जहाँ उसकी आरम्भिक क्षमता और परिस्थिति को देखते हुए यह कल्पना भी कर सकना कठिन था कि इतनी दूरी तक वह बढ़ा और इतनी ऊँचाई तक उठा जा सकता है।

समझा यह जाता है कि आकांक्षाएँ अनायास ही उठती हैं पर वास्तविकता वैसी नहीं। संचित पशु-प्रवृत्तियों के संस्कार मनुष्य पर रहते अवश्य हैं और गुरुत्वाकर्षण की तरह नीचे की दिशा में गिरते भी हैं। इतने पर भी यदि अन्यान्य उपलब्धियों की तरह आकांक्षा क्षेत्र को परिष्कृत करने का प्रयत्न भावनापूर्वक किया जाये तो दृष्टिकोण एवं रुझान--------------------- अधोगामी अभ्यासों से छुटकारा उत्कृष्टता के साथ नियोजित कर सकना भी संभव हो सकता है। आकांक्षा ही व्यक्ति को बनाती है, उठाने और गिराने का बहुत कुछ उत्तरदायित्व उसी पर रहता है।

इच्छाओं को पूर्ण करने और अभीष्ट साथ जुटाने में मन की कल्पना और बुद्धि की निर्धारणा संयुक्त रूप से महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करती है। किन्तु रुझान, चिंतन और प्रयास को दिशा देने में अंतःकरण का मार्गदर्शन होता है। अंतः कारण को कई भागो में बाँटा जाता रहा है पर उसे संक्षिप्त में अचेतन की वह परत कह सकते हैं जिसे स्वभाव एवं अभ्यास कहा जा सकता है। यह आदतें इतनी प्रबल होती हैं कि इसके सामने न बुद्धि के निर्णय ठहरते हैं और न परिस्थितियों के दबाव। इसलिए मानवी सत्ता का सबसे प्रबल पक्ष यह अचेतन या अंतःकरण ही माना जाता है।

मनोवैज्ञानिक अचेतन की उसी परत का विवेचन विश्लेषण करते हैं जो बहुसंख्यक पिछड़े वर्ग साथ जुड़ी होती है। मूल प्रवृत्तियों के नाम से उनने उसी ढेर का विश्लेषण किया है जो पशु स्तर से मिलते जुलते पिछड़ेपन से ग्रसित क्षुद्र जनों में पाया जाता है। यह प्रायः स्वकेंद्रित ही होता है और क्षुद्र प्रयोजन में उलझा उन्हीं के ताने-बाने बुनता रहता है।

अचेतन की उच्चस्तरीय परत वह है जिसे समष्टिगत कह सकते हैं, इसे सामाजिकता, नीतिमत्ता, देशभक्ति, उदारता एवं संस्कृति के नाम से जाना जाता है। यह सचेतन निखिल ब्रह्माण्ड में विश्व चेतना की तरह संव्याप्त है। उसे ‘ईथर’ तत्व के समतुल्य समझा जा सकता है। इसकी प्रेरणा--------------------- की व्यक्तिगत अचेतन को सचेतन का सहयोग एवं अनुचर बनकर रहना चाहिए और उस विराट की विपुल संपदा से लाभान्वित होना चाहिए।

अदूरदर्शी अचेतन कुछ और तरह सोचता है। उसकी इच्छा एवं हठवादिता यह है कि समष्टि की उसको ‘स्व’ का वर्चस्व मानना चाहिए और अपने नियम निर्धारण छोड़कर उसी की इच्छापूर्ति से सारा प्रवाह एवं ढाँचा बदल देना चाहिए। विग्रह इसी बात का है कि अंतर्द्वन्द्वों का समाधान इसी विग्रह के कारण होता है और उस कलह में चेतना तंत्र को किंकर्तव्य विमूढ ही नहीं विक्षिप्तों की तरह इसे ऐसे मार्ग अपनाने पड़ते हैं जिस पर अवरोध व अधःपतन के काँटे ही काँटे बिछे पड़े हैं।

विकास क्रम पर चलते हुए अचेतन की क्षुद्रता सचेतन की महानता को स्वीकार शिरोधार्य करने लगती है। अनपढ़ बचपन ही बच्चे को स्वेच्छाचारी बनाये रहता है। वे जैसे-जैसे बड़े होते हैं अनुशासन और सामाजिक अनुसंधान के परिपालन में स्वेच्छापूर्वक श्रद्धा बढ़ाते चलते हैं। तब स्वार्थ और परमार्थ में अन्तर नहीं रहता और सदुद्देश्यों के परिपालन में भी उतना ही रस मिलता है जितना कि स्वार्थ साधन में। निजी सफलताओं और सुविधाओं के लिए जितनी आतुरता अविकसित स्थिति में पाई जाती है, चेतना का विकास विस्तार होते-होते उतना ही संतोष एवं आनन्द समष्टि सेवा की गतिविधियाँ अपनाने पर भी मिलता है और क्रमशः बढ़ता चला जाता है। यही है क्षुद्रता से महानता की ओर बढ़ चलने का प्रगतिक्रम।

शरीरगत इच्छाओं और आत्मिक आकांक्षाओं का अंतर समझा जाना चाहिए। इच्छाएँ कठिनाइयों के निराकरण एवं सुविधा संवर्द्धन को लक्ष्य कर उठती हैं। उसमें वैभव और वर्चस्व ही प्रधान रहता है किन्तु आकांक्षाओं की उमंगें अपने स्तर के अनुरूप ही सोचतीं और सफलता का मूल्याँकन करती हैं। उसकी तुष्टि एवं प्रसन्नता इतने उथले लाभ पर आधारित नहीं हो सकती है। छोटे बच्चों के लिए खिलौने ही सब कुछ हो सकते हैं पर बड़ों का समाधान इन छोटी उपलब्धियों से संभव नहीं। ललक और लिप्सा ऐसे स्तर के लोगों के लिए----------------------- महत्वपूर्ण लिप्साएँ एक स्तर के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। पर इस संसार में ऐसे भी लोग है जो उससे कुछ ऊँची वस्तु खोजते हैं।

संपन्नता कुछ लोगों के लिए सब कुछ हो सकती है। बड़प्पन और वैभव जिन लोगों को आकर्षित किये रहता है, उतने इस संसार में नहीं रहते। जो प्रदर्शन से दूसरों को प्रभावित करने पर विश्वास करते हैं ऐसे लोग हैं तो बहुत पर इन्हीं का आधिपत्य समूचे विचार क्षेत्र में प्रचलन पर नहीं है। जो लोग महानता को महत्व देते हैं और उसकी उपलब्धि में गौरव अनुभव करते हैं ऐसे लोग संख्या में भले ही कम हों पर अभ्युदय को सुविस्तृत एवं सुनिश्चित बनाने में उन्हीं का प्रमुख हाथ रहता है।

वैभव भी आकर्षण का केन्द्र और इच्छाओं के प्रवाहित होने का एक सर्वविदित और बहुप्रचलित मार्ग है। इतने पर भी सब लोग उतने से संतुष्ट नहीं हो सकते हैं, महानता उपलब्ध कर वे ‘मैन‘ नरहका सुपर मैन बनना चाहते हैं। परिपुष्ट व्यक्तित्व की आवश्यकता एवं आकांक्षा यही रहती है कि वे सम्पन्नता में नहीं, शालीनता में अन्य असंख्यों से ऊँचे उठेंगे और अपने पराक्रम का इस रूप में परिचय देंगे कि लोक प्रयोजन में ऊँचे उठकर उनने आदर्शों का मार्ग चुना और अवरोधों, व्यंग, उपहासों एवं अभावों को सहन करते हुए भी उस संकल्प को निष्ठापूर्वक निभाया।

इच्छाएँ मनुष्य को भटकाती रहती हैं, आतुर हो उठे तो गिरा भी सकती हैं। किन्तु आकांक्षाएँ सदा उच्चस्तरीय ताने बाने बुनती हैं और असफल रहने पर भी ऐसे गर्व गौरव का अनुभव कराती हैं कि टूट गये किन्तु अनौचित्य के सामने झुके नहीं।

आदर्शवादिता अपनाने के लिए प्राथमिक तैयारी यह करनी होती है कि बड़प्पन की महत्त्वाकाँक्षाएँ घटाएँ और सादगी की निर्वाह पद्धति अपनायें। जिनकी आवश्यकताएँ बढ़ी चढ़ी हैं, उन्हें उसके लिए साधन जुटाने में अत्यधिक व्यस्त रहना पड़ता है। इच्छाओं की तीव्रता कई बार आतुरता के स्तर तक जा पहुँचती है और कम समय में अधिक पाने की पगडंडी खोजते-खोजते अनीति के झाड़-झंखाड़ों में जा फँसती है। ऐसा न हो तो भी अभिलाषाएँ चिंतन क्षेत्र को इतना खाली नहीं छोड़ती कि वहाँ आदर्शवादी जीवन पद्धति पर विचार कर सकना और वैसा वातावरण बनाने के लिए ठोस कदम उठा सकना संभव हो सके।

श्रेष्ठ जीवन का निर्माण भी किसी बड़े कृषि फार्म व्यवसाय, शासन संचालन, एवं सैन्य शिक्षण की तरह समूचे मनोयोग की अपेक्षा करता है। चुटकी बजाते संग्रहित आदतों से छुटकारा पाना और देव संस्कृति के ढाँचे में अपने को ढालना भी श्रमसाध्य और समय साध्य है। इसके लिए चिंतन तंत्र को गम्भीरता पूर्वक सोचने और प्रयास परिश्रम की दृष्टि से भी बहुत कुछ करना होता है। इसकी सुविधा उन्हें ही मिल सकती है जिनने अपनी बड़प्पन परक आकांक्षाओं को संचित करके निर्वाह को आवश्यकताएँ पूरा करते रहना ही पर्याप्त माना है। अमीरी और गरीबी को एक साथ प्राप्त कर सकना कदाचित ही कभी किसी के लिए संभव हुआ है।

मनुष्य की सामर्थ्य सीमित है, वह एक निश्चित दिशा में अवतरित गति से चल सकती है। दो विपरीत मार्गों पर एक साथ चल सकना भला किस प्रकार संभव हो सकता है ? महत्त्वाकाँक्षाएँ यदि किसी समृद्ध संसाधन के लिए गगनचुम्बी बनी हुई है तो मनःतंत्र का महत्वपूर्ण अंश उसी का ताना बाना बुनेगा। फिर आदर्शवादी निर्धारणों में न उसे उतनी रुचि रहेगी न तत्परता, जितनी की महानता का साधन जुटाने के लिए आवश्यक है। उथले प्रयासों के परिणाम भी उथले होते हैं। शौकिया स्तर की महानता सदा दिवास्वप्न ही बनी रहती है। साधन न जुटे तो सफलता कैसी ? मनोयोग की प्रखरता उत्पन्न हुए बिना साधन और सहयोग का अभीष्ट परिमाण में मिल सकना किस प्रकार संभव हो सकता है ?

सदा उच्च विचार का सिद्धांत अक्षरशः सत्य है। महामानव को अपनी आवश्यकताएँ घटाने और और वैभव परक महत्त्वाकाँक्षाएँ दबानी पड़ती हैं। मनोयोग और पुरुषार्थ की इस प्रकार की गई बचत ही महानता खरीदने के काम आती है।

आदतें हठीली होती हैं पर वे कभी परिस्थितियाँ बदल जाने पर छूटतीं और नयी बदलती रहती हैं। ठीक उसी प्रकार आकांक्षाएँ भी शाश्वत नहीं हैं, वे समीपवर्ती लोगों पर प्रभाव तथा मन मस्तिष्क के चिंतन की सामग्री देने से बदलती रहती हैं। महत्वाकाँक्षाओं को आवश्यक उपयोगी एवं शक्तिशाली माना गया है पर यह बात तभी सच बैठती है जब उन्हें आदर्शवादिता के साथ नियोजित किया जाये, निकृष्टता के साथ जुड़ जाने पर वह पतन और पराभव का ही पथ प्रशस्त करती हैं।


जीवन नियमों और आदर्शों से बँधा हुआ (Kahani)

प्रसिद्ध क्राँतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल जिस दिन फाँसी होने वाली थी, उस दिन वह सुबह सुबह उठकर व्यायाम कर रहे थे। जेल वार्डन को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने बिस्मिल से पूछा - “आपको एक घण्टे में फाँसी लगने वाली है, फिर व्यायाम से क्या लाभ ?” बिस्मिल ने उत्तर दिया, “जीवन नियमों और आदर्शों से बँधा हुआ है। जब तक शरीर में साँस हो, नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए। मैं अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ, आप अपना फर्ज पूरा कीजिए।”

बनार्ड शॉ को फूलों से बहुत प्रेम था, एक दिन उनके एक मित्र उनके घर पधारे। उनके घर में कोई भी फूलदान न देखकर उन्होंने आश्चर्य से पूछा - “आप को फूलों से बड़ा प्रेम है, लेकिन आपके कमरे में तो एक भी फूल नहीं है ?” बनार्ड शॉ ने मुस्कुराते हुए कहा - “प्रेम तो मुझे अपने बच्चों से भी है, क्या मैं उनकी गरदन काटकर अपने कमरे में सजा लूँ ? मुझे फूलों से प्रेम है, इसीलिए वह मेरे बाग में हँसते खिलते हैं।”


अन्दर के कपाट खोलती है - स्वाध्याय प्रक्रिया

बहुत बार हममें से अनेक लोग किसी को धारा प्रवाह बोलते एवं भाषण देते देख कर मंत्र कीलित जैसे हो जाते हैं और वक्ता के ज्ञान और उसकी प्रतिभा की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगते हैं और कभी-कभी यह भी मान लेते हैं कि इस व्यक्ति पर माता सरस्वती की प्रत्यक्ष कृपा है। इसके अंतर्पट खुल गये हैं तभी तो ज्ञान का अविरल स्रोत इसके शब्दों में मुख के द्वारा बाहर बहता चल रहा है।

बात भी सही है, श्रोताओं का इस प्रकार आश्चर्य विभोर हो जाना अस्वाभाविक भी नहीं है। सफल वक्ता या सामर्थ्य प्राध्यापक जिस विषय को ले लेते हैं उस पर घण्टों एक धार बोलते चले जाते हैं और यह प्रमाणित कर देते हैं कि उनको इस विषय में सांगोपांग ज्ञान है और उनकी सारी विद्या जिह्वा के अग्रभाग में रखी हुई है यह बात लगती तो वास्तव में एक चमत्कार ही है, एक सिद्धि जैसी जबकि यह कोई मांत्रिक सिद्धि नहीं होती है। यह सारा चमत्कार उनके उस स्वाध्याय का सुफल होता है जिसे वे किसी दिन भी, किसी अवस्था में नहीं छोड़ते। उनके जीवन का कदाचित ही कोई ऐसा अभागा दिन जाता हो, जिसमें मनोयोग पूर्वक घण्टे दो घण्टे स्वाध्याय न करते हों। स्वाध्याय उनके जीवन का महत्वपूर्ण अंग है और प्रति दिन की अनिवार्य आवश्यकता बन जाता है। जिस दिन वे अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर पाते, उस दिन वे अपने तन-मन और आत्मा में एक भूख, एक रिक्तता का कष्ट अनुभव किया करते हैं। उस दिन को जीवन का एक मनहूस दिन मानते हैं और उस मनहूस दिन को अपने जीवन में कभी भी आने का अवसर नहीं देते।

यही तो अबाध तप है जिनका फल ज्ञान एवं मुखरता के रूप में वक्ताओं एवं विद्वानों की जिह्वा पर सरस्वती के वास का विश्वास उत्पन्न करा देता है। चौबीसों घण्टे सरस्वती की उपासना में लगे रहिए, जीवन भर ब्रह्ममंत्र एवं ब्राह्मी बूटी का सेवन करते रहिए लेकिन स्वाध्याय किसी दिन भी न करिये और देखिये कि सरस्वती की सिद्धि तो दूर पास की पढ़ी हुई विद्या भी विलुप्त हो जायेगी। सरस्वती स्वाध्याय का अनुगमन करती है, इस सत्य का सम्मान करता हुआ जो साधक उनकी उपासना किया करता है वह अवश्य उनकी कृपा का भागी बन जाता है।

नित्य ही न्यायालयों में देखा जा सकता है कि कोई एक वकील तो धारावाहिक रूप में बोलता और नियमों की व्याख्या करता जाता है, और कोई टटोलकर, भूलता, याद करता हुआ सा कुछ थोड़ा बहुत बोल पाता है। दोनों वकीलों ने एक समान ही वकालत परीक्षा पास की, उनके अध्ययन का समय भी बराबर रहा, पैसा और परिश्रम परीक्षा पास करने के लिए एक सा लगाया गया और न्यायालय के पक्ष प्रतिपादन का अधिकार भी समान रूप से मिला है - तब यह ध्यानाकर्षण अंतर क्यों ?

इस अंतर का और कोई कारण नहीं, एक ही अंतर है और वह है - स्वाध्याय। जो वकील धारावाहिक रूप में बोल कर न्यायालय का वायुमण्डल प्रभावित कर अपने पक्ष का समर्थन जीत लेते हैं, वह निश्चय ही घंटों स्वाध्याय का व्रती होगा। इसके विपरीत जो वकील अविश्वास पूर्वक विश्रृंखलता प्रतिपादन करता हुआ दिखलाई दे, विश्वास कर लेना चाहिए कि वह स्वाध्यायशील नहीं है।

धार्मिक अथवा अध्यात्मिक क्षेत्र ले लीजिए, कोई अमुक नित्य चार-चार बार पूजा करता है, तीन-तीन घंटे आसन लगाता है, जाप करता अथवा कीर्तन करता है, व्रत-उपवास रखता, दान-दक्षिणा देता है किन्तु शास्त्रों अथवा सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय, उनके विचारों का चिंतन-मनन नहीं करता है और सोच लेता है कि जब मैं इतना क्रियाकाण्ड करता हूँ तो इसके बाद अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती, आत्म ज्ञान अथवा परमात्मा विभूति करा देने के लिए इतना ही पर्याप्त है तो निश्चय ही भ्रम में है। आत्मा का क्षेत्र वैचारिक क्षेत्र है, सूक्ष्म भावनाओं और मनन चिंतन का क्षेत्र है।

अध्ययन के अभाव में इस आत्मा जगत में गति कठिन है। आत्मा के स्वरूप का ज्ञान अथवा परमात्मा के अस्तित्व का परिचय प्राप्त करते हुए बिना उनसे सम्पर्क किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है ? इस अविगत का ज्ञान तो उन महान मनीषियों का अनुभव अध्ययन करने से ही प्राप्त कर सकना संभव है जो अवतार के रूप में संसार को वेदों का ज्ञान देने के लिए परमात्मा का प्रतिनिधित्व करते रहते हैं। आसन, ध्यान, पूजा-पाठ से तो प्रधान रूप से बुद्धि को परिष्कृत और आचरण को उज्ज्वल बनाने के लिए इस हेतु करना आवश्यक है कि अध्यात्म के वैदिक तत्व को समझने और ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त हो सके। इसके विपरीत यदि एक बार पूजा-पाठ को स्थगित भी रखा जाये और एकाग्रता एवं आस्थापूर्वक स्वाध्याय और उसका चिंतन-मनन भी किया जाये तो बहुत कुछ उस दिशा में बढ़ा जा सकता है। स्वाध्याय स्वयं ही एक तप, आसन और निर्दिष्टयासन के समान है। इसका नियम निर्वाह करने से आप ही आप अनेक नियम, संयमों का अभ्यास हो जाता है।

स्वाध्याय में मनुष्य का अंतःकरण निर्मल कर देने और उसके अंतर्पट खोलने की सहज क्षमता विमान है। आंतरिक उद्घाटन हो जाने से मनुष्य स्वयं ही आत्मा और परमात्मा के प्रति जिज्ञासु हो उठता है। उसकी चेतना ऊर्ध्वमुखी होकर उसी ओर उड़ने के लिए पर तोलने लगती है। उच्च अध्यात्मिक अनुभूतियों का प्रस्फुटन स्वाध्याय के द्वारा ही हुआ करता है। स्वाध्याय निःसंदेह एक ऐसा ही अमृत है जो मानस में प्रवेश कर मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को नष्ट करता है।

चारित्रिक उज्ज्वलता स्वाध्याय का एक साधारण और मनोवैज्ञानिक फल है। सद्ग्रन्थों में सन्निहित साधु वाणियों का निरन्तर अध्ययन और मनन करते रहने से मन पर शिव संस्कारों की स्थापना होती है, जिससे चित्त अपने आप दुष्कृत्यों की ओर से फिर जाता है। स्वाध्यायी व्यक्ति पर कुसंग का प्रभाव नहीं पड़ने पाता इसका भी एक वैज्ञानिक कारण है। जिसकी स्वाध्याय में रुचि है और जो उसको जीवन का एक ध्येय मानता है वह आवश्यकताओं से निवृत्त होकर अपना सारा समय तो स्वाध्याय में ही तो लगाता है। इसलिए उनके पास को फालतू समय ही नहीं रहता, जिसमें वह जाकर इधर-उधर यायावरी करेगा तथा दूषित वातावरण अवांछनीय तत्व ग्रहण कर लायेगा।

उसी प्रकार ‘यरुचि साध्य संपर्क’ के सिद्धांत के अनुसार भी यदि उसके पास कोई आयेगा तो प्रायः उसी रुचि का होगा और उन दोनों को एक सामयिक सत्संग का लाभ होगा। रुचि वैषम्य रखने वाला स्वाध्यायशील के पास जाने का कोई प्रयोजन या साहस ही नहीं रखेगा और यदि संयोगवश ऐसे कोई व्यक्ति पास आ भी जाते हैं तो उनके पास का वातावरण अपने अनुकूल न पाकर देर तक ठहर न पायेंगे। निदान संगत जन्य आचरण दोनों का स्वाध्यायशील के पास कोई प्रश्न ही नहीं उठता।

आत्मोन्नति के संबंध में विपरीत वृत्तियां, आलस्य, प्रमाद अथवा असंयम आदि स्वाध्यायशील व्यक्ति के निकट नहीं जा पाते। इसका भी एक वैज्ञानिक हेतु ही है, कोई सुरक्षा कवच का प्रभाव नहीं है। जिसे पढ़ना और नित्य नियम से जीवन का ध्येय समझ कर पढ़ना है, वह तो हर अवस्था में अपने उस व्रत का पालन करेगा ही। अवस्था अथवा अनियमितता, वह जानता है कि उसके इस रुचिपूर्ण व्रत में बाधक होगी अस्तु वह जीवन की एक सुनिश्चित दिनचर्या बनाकर चलता है। उसका सोना, जागना, खाना-पीना टहलना-घूमना और कारोबार करने के साथ-साथ पढ़ने लिखने का कार्यक्रम एक व्यवस्थित रूप से बड़े अच्छे ढंग से चलता रहता है। जिसने जीवन के क्षणों को इस प्रकार उपयोगिता पूर्वक नियमबद्ध कर दिया है, उसका तो एक-एक क्षण ही तपस्या का समय ही माना जायेगा। जिसने जीवन की व्यवस्था एवं नियमबद्धता का अभ्यास कर लिया उसने मानो अपने आत्मलक्ष्य के एक सुन्दर नसेनी तैयार कर ली है, जिसके द्वारा वह सहज ही ध्येय तक पहुँचेगा।

अनुभव सिद्ध विद्वानों ने स्वाध्याय को मनुष्य का पथ प्रदर्शक नेता और मित्र जैसा हितैषी बताया है। उनका कहना है कि जो व्यक्ति सत्पथ प्रदर्शक अपने सच्चे सखा स्वाध्याय का परित्याग कर देता है, उसका नाड़ी आदि इन्द्रियों पर अधिकार नहीं रहता। उसका मन चंचल, विवेक मन्द और बुद्धि कुंठित रहती है। इन सब दोषों के कारण उसे दुखों का भागी बनना पड़ता है। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति वही है, जो अपने सच्चे मित्र स्वाध्याय को कभी नहीं छोड़ेगा। इसलिए तो गुरुकुल से अध्ययन पूरा करने के बाद विद्या लेते समय गुरु, शिष्य का अंतिम उपदेश दिया करता था -

‘ स्वाध्यायात् मा प्रमद।’

अर्थात् हे प्यारे शिष्य ! अपने भावी जीवन में स्वाध्याय द्वारा योग्यता बढ़ाने में प्रमाद मत करना। स्वाध्याय से जहाँ संचित ज्ञान सुरक्षित तो रहता है, साथ ही उसके ज्ञानकोष में नवीनता और वृद्धि भी होती रहती है। वहाँ स्वाध्याय से विरत हो जाने वाला नयी पूँजी पाना तो क्या गाँठ की विद्या भी खो देता है।

स्वाध्याय जीवन विकास के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है, जिसे हर व्यक्ति को पूरा करना चाहिए। अनेक लोग परिस्थितिवश अथवा प्रारम्भिक प्रमाद वश पढ़ लिख नहीं पाते और जब आगे चलकर उन्हें शिक्षा और स्वाध्याय के महत्व का ज्ञान होता है, तब हाथ मल-मलकर पछताते रहते हैं।

किन्तु इसमें पछताने की बात होते हुए भी अधिक चिंता की बात नहीं है। ऐसे लोग जो स्वयं पढ़-लिख सकते हैं, उन्हें विद्वानों का सत्संग करके और दूसरों द्वारा सद्ग्रन्थों को पढ़वाकर सुनने अथवा उसके प्रवचन का लाभ उठाकर अपनी इस कमी की पूर्ति करते रहना चाहिए। जिनके घर पढ़े-लिखे बेटे-बेटी अथवा नाती-पोते हों उन्हें चाहिए कि वे उनको संध्या समय अपने पास बिठाकर सद्ग्रन्थों का पाठ कराये।

इस प्रकार उसका स्वयं तो लाभ होगा ही, बच्चों को सद्ग्रन्थों का अध्ययन करने का अभ्यास हो जायेगा। जहाँ चाह, वहाँ राह - के सिद्धांत के अनुसार यदि स्वाध्याय की रुचि है और उसके महत्व को हृदयंगम कर लिया गया है, तो शिक्षा अथवा अशिक्षा को कोई व्यवधान नहीं आता, स्वाध्याय के ध्येय को अनेक तरह पूरा किया जा ही सकता है।


Quotation

बचपन और युवावस्था पार किये बिना कोई वृद्ध नहीं हो सकता। ठीक उसी तरह कोई व्यक्ति कर्तव्यनिष्ठ एवं समाजनिष्ठ हुए बिना ईश्वरनिष्ठ नहीं हो सकता। मन बहलाव वाली भक्ति की बात दूसरी है। पर यदि हम वस्तुतः ईश्वर तत्व तक पहुँचना चाहते हैं तो पवित्र जीवन और सेवा धर्म की टाँगों की सहायता से ही इस महान यात्रा को पूरा किया जा सकता है।


अवसर चित्र (Kahani)

चित्रकार ने काफी मेहनत करके एक चित्र बनाया। चेहरा बालों से ढका था और पाँव में पंख लगे थे। देखने वालों ने चित्र के कई अर्थ लगाये, लेकिन फिर भी अर्थ की तह तक नहीं पहुँच पाये। एक जिज्ञासु ने चित्रकार से चित्र का अर्थ पूछा। चित्रकार ने कहा, “ यह अवसर चित्र है।” किसी ने पूछा,“ आप ने इसका चेहरा क्यों ढँक दिया ?” चित्रकार बोला - “जब अवसर मनुष्य के पास आता है तो वह उसे पहचान नहीं पाता और जब उसे कोई पकड़ नहीं पाता तो वह अपने पाँवों में पंख लगाकर उड़ जाता है।” सभी ने चित्रकार की बुद्धि की सराहना की।


हँसता-हँसता मस्ती भरा जीवन जियो

किसी की आत्मा पर अनावश्यक भर लदा है या नहीं, उसकी नाप-तौल इस आधार पर की जा सकती है कि यह कितना खिन्न और असंतुष्ट रहता है अथवा हँसता मुस्कुराता दिखाई पड़ता है। खीझ, असंतोष, रोष, उद्वेग से जलते भुनते व्यक्ति को देखकर सहज ही कहा जा सकता है कि यह विकृत चिंतन का शिकार है। इसके जीवन का नाव दृष्टि दोष के भँवर में फँस कर डूबने की तैयारी कर रही है। पटरी से उतरा हुआ इंजन जमीन में धँस जाता है तब उसके लिए न आगे बढ़ना संभव होता है और न पीछे हटना, कलपुर्जों की दृष्टि से बढ़ी-चढ़ी सामर्थ्यता तब निरर्थक सिद्ध होती है और वह अपने उद्धार के लिए क्रेन या जैक की सहायता चाहता है। रेलगाड़ी कीमती होती है, जैक की अपेक्षा इंजन अधिक शक्तिशाली होता है और अधिक मूल्यवान भी पर वह बड़प्पन पटरी से उतर जाने की दशा में व्यर्थ है। चिंतन की विकृति मनुष्य के चेहरे पर छाई खीझ और मस्तिष्क में भरी उद्विग्नता के अनुपात से नापी, आँकी जा सकती है।

कठिनाइयों से रहित मनोवाँछित परिस्थितियों और परिजनों से घिरा जीवन आज तक किसी का नहीं हुआ है। भविष्य में कोई सर्वांगपूर्ण सुविधा सम्पन्न मनुष्य इस संसार में जन्म ले सकेगा ऐसी आशा नहीं की जा सकती है। भगवान के अवतार कहे जाने वाले राम, कृष्ण तक की जो दुर्दशा हुई वह सामान्य मनुष्य से अच्छी नहीं, वरन् बुरी ही रही। दूसरे अवतार ऋषि, महापुरुष, ज्ञानी-विज्ञानी भी कठिनाइयों से घिरे और विपत्तियाँ सहन करते रहते हैं। महापुरुषों की महानता इसी आधार पर परखी जाती रही है कि उनने आदर्श और सुविधा में से किसे चुना और अपनी चरित्र निष्ठा को कितनी कठिन कसौटियों पर कसे जाने के लिए कितनी प्रसन्नता से प्रस्तुत किया।

धनी और दरिद्र, विद्वान और मूर्ख, पुण्यात्मा और पापी परिस्थितिवश अनुकूलता प्रतिकूलता के झूले पर प्रकृति व क्रम के अनुसार आगे-पीछे झूलते रहते हैं। प्रारब्ध-भोग विधि-विधान कर्मफल, समय चक्र आदि नाम कुछ भी दिया जाये लाभ-हानि सुख-दुख और यश-अपयश के अवसर हर किसी के जीवन में रात और दिन की तरह आते-जाते रहते हैं, न उससे ज्ञानी बचते हैं और न अज्ञानी। अनाचारों और दुष्कर्मों के फलस्वरूप दण्ड भुगतते हैं और सदाचारी पुण्य परमार्थ के लिए त्याग बलिदान करते हुए सादगी, संयम और तपश्चर्याजन्य कठिन परिस्थितियों से होकर गुजरते हैं। सुविधा-असुविधा की बहिरंग कसौटी पर कसने से कोई भी व्यक्ति अपने को सुखी नहीं कह सकता। पर दूसरी दृष्टि से देखने पर सुख सौभाग्य का उपभोग करने वाले इस संसार में कम नहीं हैं। इन सुखी लोगों में से प्रत्येक को विवेक दृष्टि प्राप्त होती है। वे अपने परिष्कृत दृष्टिकोण को हल्के-फुलके हँसते-खेलते स्वभाव में परिणित करते हैं और खिलाड़ी की तरह प्रत्येक स्थिति में संतुलित रहने का प्रयत्न करते हैं।

ताश, शतरंज से लेकर हाकी, पोलो या दूसरे विश्व खेलों के खिलाड़ी घड़ी-घड़ी में हारते जीतते रहते हैं। कभी हार, कभी जीत की उलट-पुलट होते रहने से किंचित् मुसकान या किंचित् माथे पर पर सिकुड़न भर आती है पर उससे उसके उत्साह में कोई फर्क नहीं पड़ता है। हार में न वे रोते हैं और जीत में न वे उछलते हैं। नमक, शक्कर की तरह स्वाद बदलता रहता है, पर वह इतना हल्का होता है कि मानसिक स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं डालता है और विनोद का दुरंग क्रम यथावत जारी रहता है। यदि हर काम को, हर बात को इसी दृष्टिकोण से देखा समझा जाये, प्रतिकूलता और अनुकूलता को बड़ी गम्भीरता से लिया जाये तो उस असंतोष, उद्वेग से सहज ही बचा जा सकता है और प्रगति के पथ को प्रशस्त करने एवं प्रस्तुत कठिनाइयों से निपटने का रास्ता निकल सकता है।

जिस प्रकार कठिनाई को वस्तु स्थिति की अपेक्षा अधिक बढ़ी-चढ़ी सोचने से उसका दबाव बढ़ जाता है और अनावश्यक परेशानी से मानसिक स्तर गड़बड़ा जाता है, इसी तरह उसे वस्तु स्थिति की अपेक्षा कुछ हल्का गिना जाये तो जितनी चिन्ता होनी चाहिए उतनी न होगी। हल्की मनःस्थिति में एक तो चिंता के कारण होने वाली क्षति से बचाव हो जाता है और शांत चित से उपयोगी गतिविधि का निर्धारण करना सरल हो जाता है। निश्चिन्तता, निर्भयता जैसे गुणों की इस लिए प्रशंसा की गई है कि वास्तविक कठिनाई आने पर उसका सामना कर सकने योग्य साहस और विवेक सुरक्षित बना रहता है। यदि संकट सिर पर आ जाये और उसे भुगतना ही पड़े तो हलकी मनःस्थिति वाला व्यक्ति उसे धैर्य पूर्वक सहन कर लेता है। वह सोचता है कि जब अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन बहुत समय तक क्यों टिकेंगे। समय बदलेगा, अच्छी स्थिति आवेगी और फिर नये सिरे से प्रयत्न करके प्रस्तुत हानि की क्षतिपूर्ति कर लेंगे। अच्छे भविष्य की आशा करते हुए कठिन समय सरलता पूर्वक निकल जाता है, जबकि अच्छा समय भी बुरे भविष्य की निराशाजनक कल्पनाएँ करते रहने पर भार रूप में हो जाता है और सुखद वर्तमान का आनन्द लाभ ले सकना संभव नहीं रहता।

विपत्ति को टालने अथवा हलका करने का सबसे सस्ता और सबसे हलका नुस्खा यह है कि कठिनाई को हलकी माना जाये। सही और भरपूर प्रयत्न करना ऐसी ही मनःस्थिति में संभव हो सकता है। लड़खड़ाता हुआ चिंतन तो और भी अधिक गहरे दलदल में फँसा देता है। उज्ज्वल भविष्य की आशा छोड़ दी जाये तो फिर चारों ओर अंधकार ही अंधकार दिखाई देगा और हलकी सी कठिनाई को पार करना भी पहाड़ उठाने जैसा भारी पड़ेगा।

अनुकूल परिस्थितियाँ सामने आने पर ही प्रसन्नता अनुभव करने की आदत रही तो जीवन में आनन्ददायक कुछ क्षण भी कदाचित नहीं मिल सकेगा। कारण कि थोड़ा लाभ होते ही उससे बड़ी आकांक्षा जग पड़ेगी और जो उपलब्ध हो सका है वह अपेक्षाकृत अपर्याप्त एवं असंतोषजनक प्रतीत होगा। इच्छा की तुलना में उपलब्धि कम हो तो संतोष ही नहीं आनन्द भी मिलेगा। उपलब्धियाँ उतनी मिल जाये जितनी कि इच्छा है, यह कदाचित ही संभव होता है क्योंकि प्राप्तियाँ सीमित ही रहेंगी और इच्छाएँ क्षण भर बाद पहले की अपेक्षा बढ़कर कई गुना हो सकती हैं। अस्तु इच्छा और तृप्ति का संतुलन कभी बनेगा ही नहीं। ऐसी दशा में यह तरीका सरल है कि उपलब्धियों की तुलना में इच्छा की सीमा घटा ली जाये और जो मिल सका हो उस पर पूरा संतोष और आनन्द अनुभव किया जाये। दृष्टि पसारने पर ऐसे असंख्य व्यक्ति मिलेंगे जो अपनी तुलना में कही अधिक गई गुजरी स्थिति में रहते हुए जीवन जी रहे हैं। उन्हीं का अनुकरण करके हम भी अपनी प्रसन्नता को सदा सर्वदा हर स्थिति में अक्षुण्ण बनाये रह सकते हैं।

उन्नति के लिए उत्साहपूर्वक प्रयास करना एक बात है और अपने आप को दीन दरिद्र अनुभव करना दूसरी। खिलाड़ी जीतने के लिए, पहलवान कुश्ती पछाड़ने के लिए, छात्र ऊँचा वज़ीफ़ा पाने के लिए प्रतियोगिता में उतरते हैं, प्रयत्न करते और विजयी उपहार पाते हैं पर इनके न मिलने तक अपने आप को दीन दरिद्र नहीं मानते रहते हैं। उन्हें अपनी सामयिक स्थिति पर संतोष भी होता है और गर्व भी। फिर भी अधिक सफलता पाने, अधिक ऊँचे उठने के लिए प्रयत्न जारी रखते हैं। हमारे प्रयास प्रगति की दिशा में निरन्तर चलें, पर इसके लिए वर्तमान स्थिति को असंतोषजनक मानना और खिन्न रहना आवश्यक नहीं है।

हलकी फुलकी हर्षोल्लास एवं संतोष, आनन्द से जिन्दगी जीने की योजना बनानी चाहिए और इस मार्ग में जो जो अवरोध हों उसे चुन चुनकर मार्ग से हटाना चाहिए। विचार करने पर सबसे बड़ी-बड़ी अपने को अभावग्रस्त कठिनाइयों से घिरा हुआ, विरोधी दुर्जनों के बीच रहता, भविष्य में विपत्ति की संभावनाओं से जकड़ा अनुभव करेंगे तो जी सदा खिन्न, उद्विग्न रहेगा। चिंतन की इस निषेधात्मक धारा को विवेकपूर्ण पर्यवेक्षण से बहुत कुछ हलका किया जा सकता है। भविष्य में क्या होना है किसी को पता नहीं, यदि यह बात है तो विपत्ति की आशंका करने की अपेक्षा उज्ज्वल संभावनाओं की कल्पना क्यों न की जाये, साथियों के दोष ही दोष क्यों देखे जायें ? उनमें जो गुण हैं उन्हें क्यों न समझें ? उनके द्वारा जो क्षति हुई उसी पर विचार क्यों करते रहें ? जो सहयोग, सद्भाव वे देते हैं उन सुखद प्रसंगों का स्मरण क्यों न किया जाये ? स्वजनों के दोष दुर्गुणों को देखना, सुधारना उचित है, पर क्या वह कार्य डाक्टर या रोगी को वयस्क और बालक की भावना के साथ उदारता पूर्वक बिना खोजे भी किया जा सकता है।

जो ईश्वर ने दिया है वह कम नहीं है। पशु-पक्षियों और दुखी-दरिद्रों की, रुग्ण-अपंगों की तुलना में अभी भी अपनी स्थिति कहीं अच्छी है, इस पर मोद मनाया जा सकता है और अधिक प्राप्त करने के लिए उत्साह एवं आशा भरी मनःस्थिति में प्रयत्न रखा जा सकता है। हमारे अधिकाँश मानसिक बोझ अवास्तविक और निराधार होते हैं। चिंतनपरक विकृतियाँ ही हमें अशान्त बनाये रखती हैं। सन्तान न होने पर कितने ही व्यक्ति दुखी रहते हैं जबकि उत्तरदायित्वों का बोझ हलका होने पर उन्हें संतान का भार वहन करने में पिसते हुए लोगों की तुलना में अधिक प्रसन्न होना चाहिए था। इसी प्रकार अनेकों अनावश्यक महत्त्वाकाँक्षाएँ दुखी बनाये रखती हैं जिनके बिना जीवन क्रम का सामान्य निर्वाह क्रम रुकता नहीं है। ऐसी अनावश्यक महत्वाकाँक्षाओं की तृष्णाओं को बोझ आसानी से हलका किया जा सकता है और सादगी के सौम्य जीवन का आनन्द लिया जा सकता है। प्रस्तुत कठिनाइयों से लड़ा जूझा जाये, उन्हें हटाने के लिए पूरा कौशल प्रयुक्त किया जाये फिर भी यदि वे न हटें तो प्रारब्ध निपट जाने की बात सोची जा सकती है। अधिक सतर्कता बरतने, अधिक क्षमता जुटाने एवं अनुभव संपादित करने का अवसर भी उसे माना जा सकता है। दृढ़ता, साहसिकता, संतुलन आदि सद्गुणों की परीक्षा का अवसर भी उसे माना जा सकता है। कठिन समय में चिंतन का परिष्कृत स्तर मन का भार हलका करने में बहुत सहायक सिद्ध होता है। खोज करने पर प्रतीत होगा कि दुखी मनःस्थिति का बहुत बड़ा कारण सही ढंग से सोच सकने में त्रुटि रहना ही था। उसे सुधार लेने पर अधिकाँश समस्याओं का हल मिल जाता है। फिर भी जो रह जाये उसे हर किसी को कुछ न कुछ कमी, कठिनाई रहने के सामान्य क्रम को ऐसे ही हँसते-खेलते सहन किया जा सकता है।

इस प्रकार अन्य अप्रिय प्रसंग हर किसी के जीवन में कभी न कभी घटित हुए ही होते हैं। यदि उन्हें ढूँढ़ कर एकत्रित किया जाये और उन्हीं का स्मरण किया जाये तो लगेगा कि सारी जिन्दगी दुख कष्ट सहते सहते असफल बीत गई। इसके विपरीत यदि सुखद प्रसंगों को ढूँढ़ा जाये तो वे भी इतने अधिक दिखाई पड़ेंगे जिनके आधार पर सुखी जीवन को जी लेने का गर्व किया जा सके। एक स्मृति दुखी बनाती है और दूसरी के कारण होठों पर मुस्कान आती है। दोनों में से जिसका का भी चुनाव करना हो प्रसन्नता पूर्वक किया जा सकता है।

हँसी-खुशी का हलका-फुलका जीवन शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक एवं आर्थिक सभी पक्षों को प्रभावित करता है और सुखद भावनाएँ विनिर्मित करने में भारी योगदान देता है। यह कठिन नहीं अति सरल है। चिंतन का थोड़ा हेर-फेर करके हम खिन्न, उद्विग्न जीवन को हँसता-हँसाता बनाने में अभीष्ट सफलता प्राप्त कर सकते हैं।


Quotation

पति के लिए चरित्र, सन्तान हेतु ममता, समाज के लिए शील, विश्वजन्य दया और जीव मात्र के लिए करुणा सँजोने वाली महाकृति का नाम नारी है।


चमत्कारी उपलब्धियों वाली साधना - - कुछ तथ्य, कुछ अनुभूतियाँ

प्राचीन स्मृतिकारों, पुराणों के उपदेष्टाओं ने अपने विशाल वाङ्मय में गायत्री साधना के साथ चांद्रायण महाव्रत के प्रभावों का स्थान-स्थान पर वर्णन किया है। गायत्री महामंत्र की महिमा से भी अब कोई अपरिचित नहीं रहा। किन्तु इस दोनों के संयुक्त प्रयोग से अभी भी कम ही लोग परिचित हैं।

परम पूज्य गुरुदेव ने अपने मथुरा निवास काल में वर्ष 1963 एवं 64 में इस प्रयोग का पहली बार अपने कार्यकर्ताओं को परिचय कराया था। बाद में शान्तिकुञ्ज की स्थापना होने के बाद सन 1982 में चांद्रायण सत्र आयोजित किये गये। साधकों ने इन सूत्रों में उत्साहपूर्वक भाग लिया और लाभान्वित हुए। इन शिविरों में भागीदार होने वाले परिजन आज भी उन दिनों की स्मृतियों एवं विभूतियों से पुलकित होते रहते हैं।

सामान्य क्रम में चांद्रायण व्रत को प्रायश्चित के एक विशिष्ट विधान के रूप में स्वीकृत किया गया है। स्कन्दपुराण में चांद्रायण व्रत की चर्चा के संदर्भ में युधिष्ठिर और कृष्ण का संवाद मिलता है युधिष्ठिर पूछते हैं -

चक्रायुध नमस्तेऽतु देवेश गरुणध्वज। चांद्रायण विधि पुण्यमाख्याहि भगवान मम्॥

अर्थात् चक्रायुध और गरुणध्वज धारण करने वाले भगवान कृष्ण को नमस्कार करके युधिष्ठिर ने पवित्र चांद्रायण व्रत का वर्णन करने की प्रार्थना की। भगवान ने उस महाव्रत का महात्म्य बताते हुए कहा -

चन्द्रायाणेंन चीर्णेन यतु कृतं तेन दुष्कृतम। तत सर्व तत्क्षणादेव भस्मी भवति काष्ठवत्॥

चन्द्रायण व्रत करने से मनुष्य के किये हुए पाप उसी प्रकार दूर हो जाते हैं जैसे जलती हुई अग्नि से काष्ठ जल जाता है।

अनेक घोर पापानि उपपातकमेव च। चन्दा्रयाणेन नश्यन्ति वायुना पाँसवी यथा॥

अनेक घोर पाप तथा सामान्य पाप चांद्रायण व्रत से उसी प्रकार उड़ जाते हैं, जैसे आँधी चलने पर धूल के कण।

शास्त्रकारों के उद्देश्य के अनुरूप चांद्रायण में दो प्रकार के भेद बताये हैं। कृच्छ चांद्रायण एवं मृदु चांद्रायण। कृच्छ चांद्रायण में चार प्रकार के भेद माने गये हैं - (1) पिपीलिका मध्य चांद्रायण (2) यति चांद्रायण (3) शिशु चांद्रायण (4)-------------- । इन चारों में ही 240 ग्रास भोजन एक महीने में करना पड़ता है। पिपीलिका मध्य चांद्रायण वह है जिसमें पूर्णमासी को 15 ग्रास खाकर क्रमशः एक-एक ग्रास घटाते हैं। अमावस्या व प्रतिपदा को निराहार रहकर दूज से एक ग्रास बढ़ाते हैं और इस क्रम से पूर्णिमा को पुनः 15 ग्रासों तक जा पहुँचाते हैं।

यति चांद्रायण में मध्याह्न को प्रतिदिन आठ-आठ ग्रास खाया जाता है। इसमें न किसी दिन कम किया जा सकता है और न किसी दिन अधिक। यव मध्य चांद्रायण शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है। अमावस्या के दिन उपवास करके शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को एक ग्रास लेते हैं। इसके पश्चात् एक-एक ग्रास बढ़ते हुए पूर्णिमा को 15 ग्रास तक पहुँचते हैं। बाद में कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से एक-एक ग्रास घटते हुए अमावस्या को निराहार की स्थिति में जा पहुँचते हैं। शिशु चांद्रायण में प्रातः 4 ग्रास और सायं 4 ग्रास खाये जाते हैं यही क्रम नित्य चलता है।

इस प्रकार इन सभी कृच्छ चांद्रायणों में एक महीने में 240 ग्रास भोजन किया जाता है। ग्रास के दो अर्थ किये गये हैं। बोधायन का कहना है -

कुक्कुटाण्ड प्रमाणं यावद् वास्य मुखं विशेत्। एतं ग्रासं विजानीयुः शृद्धयर्थेकाय शोधनमः॥

अर्थात् मुर्गों के अण्डों के बराबर ग्रास माना जाये, अर्थात् जितना मुँह में समा सके उसे ग्रास कहा जाये।

शास्त्रकारों ने कृच्छ चांद्रायण के साथ कुछ और भी विधि विधानों का वर्णन किया है। उदाहरण के लिए सिर मुडाँना, साथ ही जप-हवन दान आदि का काफी विस्तार से वर्णन है। इन विधियों में जो विवरण प्राप्त होता है, वैसा कर पाना आज की स्थिति में असंभव प्रायः है। वैसे भी कृच्छ चांद्रायण का उद्देश्य भी किसी महापातक के प्रायश्चित के लिए किया गया अनुष्ठान है। इसमें शारीरिक कठोरता के साथ मानसिक तितीक्षा का पालन करके प्रायश्चित को पूर्ण किया जाता है। सामान्य परिस्थितियों में आध्यात्मिक साधना के रूप में उसकी इतनी कोई खास उपादेयता नहीं। इसके लिए मृदु चांद्रायण का महत्व कुछ विशेष है।

मृदु चांद्रायण या सामान्य चांद्रायण के साथ गायत्री महामंत्र का सवालक्ष अनुष्ठान अपने आप में साधना का अति विशिष्ट उपक्रम है। इससे होने वाले लाभ तो इतने हैं कि जिन्हें गिनाने के लिए एक लेख का कलेवर पर्याप्त न होगा। हर लाभ को स्पष्ट करने के लिए एक-एक लेख लिखना पड़ेगा। फिर भी इसके प्रभावों का अनुभव जिस रूप में स्पष्ट किया जा सकता है वे हैं, (1) बुरे प्रारब्ध या दुष्कर्मों के चक्रव्यूह का वेधन (2) पंचकोशों का शोधन एवं जागरण (3) व्यक्तित्व में सूर्य और चन्द्र या प्राण एवं रवि अथवा सोम एवं अग्नि की धाराओं का समुचित सामंजस्य। ये तीनों ही लाभ ऐसे है जो अल्प समय में मिलने वाले हैं, जिन्हें अध्यात्मवेत्ता चमत्कार से कम नहीं मानते।

सबसे पहला लाभ जिसे बुरे प्रारब्ध या दुष्कर्मों के चक्रव्यूह का वेधन कहते हैं। इस साधना में 10-15 दिन गुजरते ही अनुभव करने में आता है कि हर किसी के विगत जन्मों में जाने-अनजाने कुछ ऐसे कर्म बन पड़े होते हैं, जो वर्तमान जन्म में दुर्भाग्य बनकर सामने आते हैं। जब सच्चाई और ईमानदारी पूर्वक लाख प्रयत्न करने पर भी सफलता नहीं मिले तो यही समझना चाहिए कि कुछ दुर्योग आ गया। इस दुर्योग के समाधान के लिए समाज में ऐसे न जाने कितने टोने-टोटके जादू-मन्त्र प्रचलित हैं कि जिनसे प्रायः लाभ की जगह हानि देखी जाती है। इन तमाशों और चुटकुलों में समय गँवाने के साथ भारी धन भी गँवाना पड़ता है और मुश्किलें हैं कि जहाँ कि तहाँ खड़ी रहती हैं। चांद्रायण महाव्रत के साथ गायत्री अनुष्ठान करने वाले इस कर्म चक्र को अपने तप एवं मंत्र शक्ति से सूक्ष्म जगत में छिन्न-भिन्न कर देते हैं। इस क्रम में यदा-कदा ऐसा ही होता है कि जिस प्रारब्ध को अभी और तुरन्त भोगना है, वह यदि पूरी तरह से नष्ट नहीं भी हो पाता तो साधक के तप कवच के सामने निस्तेज अवश्य हो जाता है। लेकिन जो दुर्योग अथवा बुरा प्रारब्ध अभी सूक्ष्म में स्थूल में आने में दो तीन साल दूर है वह इस उग्र तप एवं गायत्री मंत्र की तरंगों के माध्यम से पूरी तरह नष्ट हो जाता है। साथ ही आध्यात्मिक चेतना के प्रभाव से इच्छाशक्ति के अनुरूप नये भाग्य का निर्माण होता है। सच कहा जाये तो मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है ऐसा ही तपस्वियों के जीवन के चरितार्थ होता है। जिन साधकों को तनिक सी भी अंतर्दृष्टि प्राप्त है, वे इस प्रक्रिया को स्पष्टतया प्रत्यक्ष रूप से घटित होते देख सकते हैं।

इस साधना का दूसरा प्रमुख लाभ पंचकोशों का परिशोधन एवं जागरण है। इस लाभ को प्रमुख एवं महत्वपूर्ण इसलिए बताया जा रहा है क्योंकि सच्चे साधक अपनी तप ऊर्जा को प्रारब्ध को नष्ट करने में नहीं लगाते हैं। वे तो समाधि में परमात्मा का सान्निध्य पाने के लिए अपने पंचकोशों को परिशोधित एवं जाग्रत करते रहते हैं। साधना की तनिक गहराई में प्रवेश पाने के बाद साधक बुरे प्रारब्ध को भी तप से रूपान्तरित कर लेते हैं। फिर तो असाध्य कष्ट ही तप की विभूतियाँ लुटा जाता है। पिछले दिनों विगत डेढ़ मास में मेरी अनुभूतियाँ शीर्षक के अंतर्गत इसी तत्व की चर्चा की गयी है।

पंचकोशों के जागरण एवं विकास के लिए चांद्रायण महाव्रत के साथ समन्वित की गयी गायत्री साधना जितनी प्रभावकारी एवं सुगम है उतनी कोई और विधि नहीं। इसमें वे सभी तत्व हैं जो पंचकोशों को विकसित करने के लिए आवश्यक हैं। उदाहरण के लिए अन्नमय कोश की शक्तियों के विकास के लिए चन्द्रमा की कलाओं के अनुसार घटते बढ़ते क्रम में मिर्च मसाले रहित एक समय के अस्वाद भोजन से उत्तम और कोई उपाय नहीं। यही बात प्राणमय कोश के संदर्भ में है। सहज सरल प्राणाकर्षण प्राणायाम मंत्र जाप के समय श्वास की क्रिया, लयबद्धता, साधना काल में निष्ठापूर्वक ब्रह्मचर्य एवं वाणी का दृढ़तापूर्वक संयम प्राणमय कोश की शक्तियों को विकसित एवं अभिवर्धित करने के कारगर उपाय हैं। अनुष्ठान काल में मानव प्रकृति के रहस्यों को खोजने वाली पुस्तक का स्वाध्याय, जप के समय मंत्रार्थ चिंतन, आज्ञाचक्र पर अंतःत्राटक, मनोयोग कोश की विभूतियों को तीव्र गति से जाग्रत करने में समर्थ है। जप काल में स्वर्णिम सविता का ध्यान आवश्यक है। ध्यान में साधक का सविता में समर्पण, विसर्जन, विलय की गहरी अनुभूति साधनारत व्यक्ति को बोध कराती है, ‘योऽसौसूर्यो सोऽह्मस्मि।’ यानि कि वही मैं हूँ। ध्यान की इसी गम्भीरता में रुद्र, विष्णु, ब्रह्मग्रंथियाँ भी खुलती हैं। यही विज्ञानमय कोश की विभूतियों का जागरण है। इसके बाद आनन्दमय कोश की विभूतियाँ बता सकना भले ही वाणी और शब्द से परे हों फिर भी उन्हें संकेत तो दिये जा सकते हैं जो यथार्थ में जिज्ञासु हैं। यहाँ पर इतना ही जान लेना पर्याप्त है कि यदि धैर्यपूर्वक लम्बे समय तक इस लेख में प्रतिपाद्य साधना को किया जाये तो आनन्दमय कोश की विभूतियाँ भी उपलब्ध की जा सकती हैं।

इस साधना से उपलब्ध होने वाला तीसरा तत्व जो भले ही उपलब्धि की श्रेणी में न गिना जा सके किन्तु इस प्रक्रिया का सारा विज्ञान इसी में निहित है, यह है सोम तथ्यों का ठीक-ठाक संतुलन सामंजस्य। गायत्री साधना के शुरुआती दौर से गुजरने वाले साधक और कभी-कभी तो लम्बे-लम्बे समय समय तक साधना करते रहने वाले व्यक्ति भी कई तरह की शिकायतें करते देखे गये हैं, उदाहरण के लिए जी मिचलाना, चक्कर आना, सिरदर्द होना। मूलतः ये और ऐसी अनेकों तकलीफें गायत्री मंत्र की अधिकता के कारण शरीर में अचानक बढ़ जाने वाले अग्नि तत्व के कारण होती हैं। हालाँकि गायत्री मंत्र सर्वथा निरापद मंत्र है। मंत्र विज्ञान के मर्मज्ञ इस बात को जानते भी हैं। इसमें सूर्य और गुरु दोनों शक्तियों का संतुलित सामंजस्य है। विशेषज्ञों को यह भी पता है कि इसका ऊर्जावतरण भी इड़ा और पिंगला दोनों ही नाड़ियों में समान रूप से होने से सूर्य एवं चन्द्र, सोम एवं अग्नि दोनों ही तत्वों का संयोग भी समुचित ही रहता है।

जबकि गायत्री के देवता सविता की शक्ति का संदोहन यदि योगशास्त्र में गुह्य कही जाने वाली हृदय नाड़ी या हृदय द्वार से किया जाये तो स्थिति निरापद नहीं रहती है। यद्यपि ऐसा करना सुलभ नहीं है क्योंकि इसके कुछ अलग ही साधना विधान है, जो अति उच्चस्तरीय होने के कारण सर्वसाधारण की पहुँच से बाहर हैं। फिर भी इतना तो है ही कि गायत्री मंत्र ज्यादा जपने से उष्णता पैदा होती है, स्नायु भी चंचल और ऊष्ण हो जाते हैं। यह उष्णता कुछ यद्यपि हवन से भी कम होती है फिर भी इसका वैज्ञानिक उपाय यही है कि जब अग्नि तत्व की बढ़ोत्तरी हो तो सोम को आकर्षित किया जाये। चांद्रायण व्रत से वातावरण से सोम तत्व का आकर्षण तीव्रता से होता है, इससे उत्तेजित स्नायु शान्त होते हैं। स्वाभाविकता ही प्रसन्नता और उल्लास भर जाता है। अग्नि एवं सोम दोनों तत्वों का सामंजस्य होने से साधना क्रम में आने वाले विक्षेप, व्यतिरेक स्वतः शान्त हो जाते हैं।

इन चमत्कारी उपलब्धियों वाली साधना की शुरुआत कैसे करें ? पाठकों की इस जिज्ञासा के उत्तर में कहना इतना ही है कि इसे किसी भी मास की पूर्णिमा से शुरू किया जा सकता है। पूर्णिमा को पूरा आहार लिया जाये। ध्यान रहे यहाँ पूरे अहार का मतलब दोनों समय भोजन नहीं है, किसी भी एक ही समय आहार ग्रहण करना है। सुविधा सहूलियत के हिसाब से सुबह या दोपहर का समय अधिक उपयुक्त है। प्राचीन काल में तो आहार में एक ही चीज लेने का विधान था। आज की स्थिति में यदि कोई चीज चाहे तो खिचड़ी या दलिया उपयुक्त है। अधिक से अधिक दाल रोटी या फिर सब्जी रोटी यानि की दो का उपयोग किया जा सकता है।

इसमें रजोगुण या तमोगुण के तत्वों का प्रवेश निषिद्ध है यानि की मिर्च मसाले एवं नमक शक्कर का प्रयोग वर्जित है। जिनका इनके बिना किसी तरह काम नहीं चलता हो तो वे मिर्च के स्थान पर काली मिर्च, अदरक या सोंठ ले सकते हैं। स्वाद के लिए मन न माने तो आँवला या नींबू की खटाई ली जा सकती है अन्य खटाई वर्जित है। हींग, लाल मिर्च, एवं गरम मसाले पूरी तरह से त्याज्य हैं। हल्दी, धनिया एवं जीरा की उचित मात्रा आवश्यकतानुरूप ली जा सकती है लेकिन इस बात का विचार अवश्य रखे कि अन्नमय कोश परिशोधित जाग्रत करने के लिए भोजन का अधिकतम सात्विक एवं सादा होना निहायत जरूरी है।

पूर्णिमा को पूरे आहार की शुरुआत के बाद प्रतिदिन तिथि के हिसाब से उसका चौदहवाँ अंश घटाते रहा जाये। किसी-किसी पक्ष में तिथियाँ घट या बढ़ जाती हैं उसी क्रम में आहर के अंशों को भी घटा बढ़ा लेना चाहिए। चन्द्रमा की कलाओं पर इस व्रत का आधार रहने से आहार के घटाने या बढ़ाने का क्रम भी उन्हीं के अनुसार बढ़ाना पड़ता है। उदाहरण के लिए जिसने पूर्णिमा को अपने पूरे आहार के रूप में 14 कौर खाये हैं और अगले दिन प्रतिपदा की हानि होने से दूज आ गयी जो आहार की तिथि को हानि होने से 13 के स्थान पर 12 कौर हो जायेंगे। यही बात तिथि की बढ़ोत्तरी में भी लागू होती है आहार के स्थान पर दो अंशों में बढ़ेगा। अमावस्या या प्रतिपदा को चन्द्रमा न दिखाई देने के कारण उन दिनों निराहार रहना पड़ता है। दूज से पुनः 1 अंश से शुरू होकर पूर्णिमा को आहार 14 अंशों में अपनी पूर्णता प्राप्त करता है। इस व्रत में एक समय आहार उसमें भी घटत बढ़त किसी नये साधक के लिए अति कठिन पड़ सकती है, ऐसी स्थिति में वे दूसरे समय दूध, छाछ अथवा फलों का रस ले सकते हैं। लेकिन इस बात का सख्ती से ध्यान रखें कि दूसरे समय कोई ठोस पदार्थ न लिया जाये, चाहे वह फल ही क्यों न हो। चांद्रायण व्रत में एक विशिष्ट वैज्ञानिक प्रयोग है, इसे जो जितना सावधानी एवं ईमानदारी से करेगा परिणाम उतने ही आश्चर्यजनक होंगे।

व्रत काल में गायत्री उपासना की अनिवार्यता है, अन्यथा उपलब्धियाँ एवं अनुभूतियाँ भी अन्नमय कोश तक ही सिमट कर रह जायेंगी। 30 दिनों में सवालक्ष का अनुष्ठान पूरा करने के लिए प्रतिदिन बयालीस माला का जप करना होता है। जप साधना की शुरुआत का क्रम उसी तरह का है जिस तरह अपने परिजन नौ दिवसीय या चालीस दिवसीय अनुष्ठानों में करते थे। बस इतना ध्यान रखें कि इस क्रम में 42 माला का जप अनिवार्य है इसमें किसी भी छूट की कोई गुँजाइश नहीं है। षट्कर्म, गुरुदेव एवं गायत्री माता के चित्र का पंचोपचार पूजन के पश्चात् जप प्रारम्भ कर देना चाहिए। प्राणाकर्षण-प्राणायाम का अभ्यास षट्कर्म के समय भी किया जा सकता है और बाद में भी। 42 माला का पूरा जप करने में प्रायः चार घण्टे लगते हैं, प्रातः ढाई-तीन घंटे एवं सायंकाल डेढ़ घंटे लगाने से उपासना आसानी से पूर्ण हो जाती है।

ब्रह्मचर्य, भूमि या तख्ता पर सोना, अपने शरीर की सेवा स्वयं करना, हजामत, कपड़े धोना आदि कार्य स्वयं करने चाहिए। भोजन पकाने में अपना अभ्यास न हो तो माता या पत्नी की सहायता ली जा सकती है पर चाहे जिसका भी हाथ का बना भोजन उन दिनों नहीं करना चाहिए क्योंकि पकाने वाले व्यक्ति के संस्कार यदि ठीक न हुए तो अपनी मनोभूमि विकृत होगी। यहाँ एक बात बहुत ज्यादा ध्यान रखने लायक है कि साधना काल में व्यक्ति की चेतना कुछ अधिक ही संवेदनशील हो जाती है, इसलिए जहाँ अच्छे प्रभाव शीघ्र असर करते हैं वहाँ बुरे प्रभावों का भी बहुत जल्दी असर होता है, इसीलिए इन बुरे प्रभावों से जितना ज्यादा दूर रहा जा सके उतना ही अच्छा।

वैसे भी साधनाकाल में अपनी सेवा कराने की अपेक्षा सेवा करने की बात सोची जानी चाहिए। चमड़े का उपयोग भी इन दिनों वर्जित है क्योंकि आजकल 19 प्रतिशत चमड़ा हत्या करके ही उपलब्ध किया जाता है और उसका प्रयोग करने वाले के सिर पर भी आसुरी हत्या का प्रभाव पड़ता है। लकड़ी, रबड़ या कपड़े के जूते हों तो व्रत काल में प्रयोग करना चाहिए। अच्छा तो यह हो कि उन दिनों घर के वातावरण को अपनी आध्यात्मिक भावनाओं के अनुरूप बनाने की कोशिश की जाये। इतना न हो सके तो अपनी दिनचर्या में अधिक से अधिक मौन एवं स्वाध्याय को स्थान एवं महत्व देने की कोशिश करनी चाहिए।

साधनाकाल में क्रोध, क्षोभ, ईर्ष्या, घृणा आदि मनोविकारों का कोई स्थान नहीं है। ऐसा कुछ भी सोचा जाये तो चित्त की शाँति और समरसता को नष्ट करे। इन दिनों अपना दैनिक जीवन विशेष रूप से लोकहित के कार्यों में संलग्न रहना चाहिए। प्रत्येक दिन शुभ कर्मों के उपार्जन का माध्यम बने। इस साधना के प्रभाव विलक्षण एवं अद्भुत हैं। व्रत के दिनों में जल खूब लें। जल में नीबू, शहद, ग्लूकोस जैसी वस्तुएँ भी लेते रहना चाहिए। स्थिति के अनुसार पेट की सफाई के लिए एनीमा जरूर लेते रहना चाहिए ताकि उपवास के दिनों में पेट में गर्मी बढ़ने से मल सूखकर गाँठ न बन जाये। इस प्रक्रिया में अकेला शरीर ही नहीं समूचा अस्तित्व तप की आँच में पकता है। परिणाम भी उसी के अनुरूप होते हैं। शरीर को जीर्ण रोगों से छुटकारा, मानसिक विकृतियों, विक्षिप्तताओं से मुक्ति तो सामान्य बातें हैं, विशिष्टताएँ अनेकों हैं जिन्हें वही जान पायेंगे जो इस साधना को समुचित रूप से करेंगे। किसी भी महीने में एक चांद्रायण महाव्रत के साथ गायत्री साधना को समन्वित रूप से अपनाकर इससे होने वाली उपलब्धियों से परिचय पाया जा सकता है। विशिष्ट साधक अपनी स्थिति के मुताबिक़ इस क्रम को आगे भी बढ़ा सकते हैं। उचित परामर्श और मार्गदर्शन इस पत्रिका के माध्यम से गुरुकृपा से सभी को समयानुसार मिलता रहेगा।


निर्भीक कवि की बेबाक अभिव्यक्ति

सामंत सालमसिंह की सियासती चालें अपना रंग दिखा रही थी। युवराज गजसिंह उसके चक्रव्यूह में फँसकर अपना कर्तव्य भूल गये बैठे थे। विलासिता का राग-रंग और चाटुकारों की ओछी प्रशंसा बस यही उनकी दिनचर्या थी। महाराज मूलराज के निधन के समय वह सिर्फ चौदह वर्ष के थे। नाबालिग होने के कारण उस समय उनके हाथों में शासन का अधिकार नहीं था। सामन्त मण्डल में सालमसिंह को युवराज गजसिंह का रक्षक बना दिया।

युवराज गजसिंह को जब भी फुर्सत मिलती, वह लोकगायकों के गीत संगीत को सुनता। युवराज के साथ रियासत के जागीरदार, ठाकुर, मंत्री परिषद् के सदस्य और मित्र आदि होते थे। कभी-कभी उनकी इस महफ़िल में सालमसिंह भी दल-बल सहित शामिल होता था।

एक दिन ऐसी ही महफ़िल सजी हुई थी। उस महफ़िल में सामन्त सालमसिंह भी था। तभी एक लोक गायिका ने एक ऐसा गीत गाया, जिसमें सालमसिंह की क्रूरता, अन्याय और लालच का वर्णन किया था। इस गीत की हर पंक्ति गजसिंह की कायरता और दब्बूपन को उजागर कर रही थी। गीत सुनकर गजसिंह और सालमसिंह दोनों आग बबूला हो उठे।

गायिका तो बेचारी प्राणों की भीख माँगती वहाँ से भाग खड़ी हुई। लेकिन सामन्त सालमसिंह ने तुरन्त फरमान जारी किया कि ऐसा विद्रोह गीत लिखने वाले कवि को पकड़कर युवराज के समक्ष पेश किया जाये। राज्य के गुप्तचर सभी गाँवों, रास्तों, डाँडियों और सुनसान रेगिस्तान तक कवि की खोज में जा पहुँचे। जब किसी तरह से उस एक गीतकार का पता नहीं चला तो सालमसिंह के आदेश से रियासत के सभी कवियों और गायकों को पकड़ लिया गया।

अगले दिन युवराज और सामन्त के सामने सभी कवियों को एक कतार में लाकर खड़ा कर दिया। सालमसिंह उन सभी की ओर देखते हुए गरजा - “अब तुम में से हर एक बारी-बारी से हमें एक गीत सुनायेगा।”

सभी कवि बारी-बारी से कभी युवराज तो कभी सालमसिंह को समझदारी, उनके उदार हृदय, उनकी सुन्दरता, उनकी ताकत और अपनी बड़ाई की ख्याति के गीत गाने लगे। उन्होंने जो गाया उसका सार वही था कि इस धरती पर युवराज और सामन्त जैसा महान और बुद्धिमान तथा न्यायप्रिय शासक तो कोई पैदा ही नहीं हुआ है।

युवराज एक के बाद एक कवि को छोड़ने का आदेश देते गये। आखिर में चार कवि रह गये । उन चार कवियों ने गाने की बात तो दूर कुछ बोलने तक के लिए इंकार कर दिया। उनके उस व्यवहार से खीझकर युवराज ने उन चारों को जेल में बन्द करने का आदेश दिया। सभी ने सोचा कि युवराज उन चार व्यक्तियों के बारे में भूल गये हैं।

ठस युवराज गजसिंह पूर्णतया बालिग हो गये। इस समय तक शासन के सारे अधिकार सीधे तौर पर उनके हाथ में आ गये थे फिर भी सामन्त सालमसिंह का पहले वाला रुतबा और प्रभाव बरकरार था।

अचानक एक दिन महाराज गजसिंह ने उन चार कवियों को दरबार में तलब किया और आदेश दिया कि अब उन में से हर कोई मुझे एक एक गीत सुनाए। उन चारों में से दो फौरन गजसिंह और सालमसिंह की समझदारी, दरियादिली, सुन्दरता, उनकी बड़ाई और ख्याति के बारे में गाने लगे। उन दोनों कवियों को छोड़ दिया गया।

अब दो कवि बाकी बचे थे। वे दोनों कुछ भी गाने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्हें एक खुले मैदान में ले जाया गया। जहाँ एक पिंजरे में खूँखार और कई दिनों से भूखा एक बाघ बेचैन होकर डोल रहा था। दोनों कवियों को पिंजरे के सामने खड़ा देखकर बाघ बार-बार जोरदार दहाड़ के साथ झपटता। मगर पिंजरे की मजबूत सलाखें उसका रास्ता रोक रही थी। बाघ का दिल दहला देनी वाली दहाड़ को सुनकर अच्छे-अच्छों के हृदय काँप उठते थे।

“ अभी तुम दोनों को इस भूखे बाघ के पिंजरे में डाल दिया जायेगा।” सालमसिंह गरज कर बोला। “ महाराज आखिरी मौका देकर कहते हैं कि अपना कोई गीत सुनाओ ” सामन्त के स्वरों में अति चेतावनी थी।

सामन्त के इस चेतावनी भरे शब्द को सुनकर उन दोनों कवियों में से एक की हिम्मत टूट गयी और उसने गजसिंह और सालमसिंह की अक्लमंदी, उदारता, महानता का बखान करना शुरू कर दिया। उस कवि को भी छोड़ दिया गया। बस एक जिद्दी कवि बाकी रह गया था, जो कुछ भी नहीं गाना चाहता था।

उसे फिर गरजती आवाज में चेतावनी मिली। जिसे सुनकर वह कहने लगा - “ मैं साहित्यकार हूँ, माँ सरस्वती का सच्चा पुत्र। किसी लोभ अथवा भय से चाटुकारी करके मैं सरस्वती का अपमान नहीं कर सकता। साहित्य का धर्म सद्गुणों की प्रशंसा करके समाज को उन्हें अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है। दुर्गुणों, दुष्प्रवृत्तियों की निन्दा का मतलब सिर्फ इतना है कि व्यक्ति इनसे बाज़ आये। यदि तुम्हें मेरी कविता सुनने का इतना ही शौक है तो फिर सुनो।” इतना कहते हुए वह सालमसिंह की क्रूरता और अत्याचार तथा गजसिंह की कायरता और दब्बूपन के बारे में वही गीत गाने लगा, जिसे सुनकर यह मामला शुरू हुआ था।

गीत की पंक्तियों के साथ ही सालमसिंह भड़क उठा। उसने कवि को भूखे बाघ के पिंजरे में धकेलने का इशारा किया अभी पिंजरा खुलता कि इससे पहले सभा स्थल में महाराज का तेज स्वर गूँजा - “रुको इस सच्चे कवि को आजाद कर दो इसने मेरी आँखें खोल दीं। मेरे सोये हुए विवेक को जाग्रत कर दिया।” हरेक की नजर उस कवि पर थी, जिसने मौत की परवाह न करके साहित्यकार का धर्म निभाया था। उसकी कविता की पंक्ति में सत्य की खनक थी। हर शब्द में जन सामान्य का दुख-दर्द उजागर हो रहा था। साथ ही शासकों की अकर्मण्यता भी प्रतिबिम्बित हो रही थी। महाराज स्वयं खड़े होकर उसे गले लगाते हुए बोले - “ मित्र ! तुम्हारी स्पष्ट अभिव्यक्ति ने हमें दुर्गुणों और दुष्प्रवृत्तियों से उबार लिया।” क्या आज के साहित्यकार में, पत्रकार में वह मन्यु है जो प्रलोभन में डिगे बिना सत्य कहलवा सके ?


किसकी सलाह लें, कब लें ?

सलाह किसकी मानें ?बड़ा उलझन भरा सवाल है। अपने सगे संबंधियों, मित्र, परिचितों द्वारा प्रायः कई तरह के मशविरे दिये जाते रहते हैं उनमें से किसे स्वीकार करें, किन्हें अस्वीकार, इसका निर्णय करते नहीं बनता। ऐसी दशा में बड़ा असमंजस एवं धर्म संकट की स्थिति आ खड़ी होती है। और वे इतने घनिष्ठ होते हैं कि उनका मन रखने की बात ध्यान में रखनी पड़ती है। इन्हें अप्रसन्न, असंतुष्ट, रुष्ट कैसे करें ? भारी संकोच उस समय होता है जब बात गले नहीं उतरती, लेकिन आग्रह को टालते भी नहीं बनता।

प्रायः ऐसी कठिनाई तब पड़ती है, जब किसी आदर्शवादी प्रोत्साहन के लिए किसी सुदूर क्षेत्र से आवाज आती है। बात उचित है किन्तु कहने वाला दूर होने अथवा घनिष्ठता का नाता न रहने से प्रत्यक्ष प्रभाव डालने की स्थिति में नहीं होता। उसका आग्रह किताबों के पन्नों, सूक्ष्म मानसिक प्रेरणाओं अथवा हृदय में उठने वाले भावपूर्ण स्पन्दनों से अपने तक पहुँचता है, जिसका न कोई प्रत्यक्ष संबंध होता है और न सामाजिक रिश्ता। संबंधों के सगेपन की न तो यहाँ कोई दुहाई होती है और न इस तरह का दबाव प्रभाव। इस दशा में किस तरह की सलाह औचित्यपूर्ण लगते हुए भी उसे अपनाने स्वीकारने का साहस नहीं जुटता।

वैसे भी अनौचित्य को ठुकरा देना और औचित्य को अपना लेना हर तरह से हर किसी के लिए लाभदायक है। तुरत-फुरत का लाभ उसमें न हो, थोड़ी बहुत सामयिक हानि दिखती है तो उसे अंततः सत्परिणाम औचित्य को अपनाने में ही मिलते हैं। इतने पर भी सलाहकारों के व्यक्तिगत आग्रह को ध्यान में रखते हुए कई बार अनौचित्य को स्वीकार करने और औचित्य को छोड़ने का असामंजस्य सामने आ खड़ा होता है। ऐसे समय में हमें क्या करना चाहिए ? इसका कोई सुनिश्चित विधान निश्चित कर लिया जाये तो फिर उचित कदम उठाने का निर्णय सुविधाजनक हो सकता है।

इसके लिए अच्छा यही हो कि हम आदर्श और औचित्य को ही अपना सगा संबंधी, शुभचिंतक, मित्र, घनिष्ठ मानकर चलें। व्यक्तियों में हर किसी को उतने ही अंश का सगा मानना चाहिए जितने में वह औचित्य का पालन करता है। हर इंसान के भीतर देवत्व और असुरता थोड़े बहुत अंशों में मौजूद होते हैं। ज्वार-भाटे की तरह दोनों ही तत्व समय-समय पर सभी में उभरते रहते हैं। एक व्यक्ति एक समय में एक सीमा तक ही कार्य के लिए ठीक सलाह अथवा सहायता दें सकता है लेकिन यह जरूरी नहीं कि वही व्यक्ति दूसरे समय, दूसरे प्रयोजन के लिए उचित सलाह दे।

यह भी हो सकता है कि जिसने एक समय में मुसीबत में बचाना और ऊँचा उठाने में कारगर सहायता दी, वही दूसरे समय दूसरे क्षेत्र में कारगर साबित हो। यह उभयपक्षीय परस्पर विरोधी संभावनाएँ हर समय हो सकती हैं। प्रायः हर इंसान दोहरे व्यक्तित्व से जकड़ा रहता है इसलिए जान-बूझकर अथवा अनजाने में उसके आग्रह अनौचित्य और औचित्य से भरे हो सकते हैं। इसलिए महत्व परामर्श या आग्रह को नहीं उसमें छिपे तथ्यों को देना चाहिए और यह देखना चाहिए कि जो कहा जा रहा है वह किस सीमा तक उचित है और किस सीमा तक अनुचित है। हमारी स्वीकृति उचित अंश को ही मिलनी चाहिए। व्यक्तिगत घनिष्ठता, खून के रिश्ते अथवा प्रभावशाली पद का संबंध रहते हुए भी अनुचित को विनय पूर्वक अस्वीकार कर देना चाहिए।

अस्वीकार कर देने में यदि पर्याप्त विनम्रता बरती गयी है तो कोई जरूरी नहीं कि सामने वाला नाराज़ ही हो। नाराज़गी का अवसर तो तब आते हैं जब सलाह देने वाले के परामर्श को मूर्खतापूर्ण, अनैतिक, अनुपयुक्त कहकर उसके अहंकार को चोट पहुँचायी जाती है। इस सीधे टक्कर से बचा जा सके तो कटुता के अप्रिय प्रसंग नहीं बनेंगे। यदि किसी अन्य वजह से कटुता हुई तो बहुत थोड़ी होगी। जिसे अपना अंतःकरण और विवेक ठीक नहीं समझता है उसे मान लेने में क्या-क्या कठिनाई पड़ेगी, इस बात को आग्रहकर्ता को नम्र किन्तु स्पष्ट शब्दों में बता देना चाहिए।

हानियाँ कई तरह की होती है, शारीरिक, मानसिक, आत्मिक, आर्थिक, सामाजिक आदि। अनुचित आग्रह मानने पर किन-किन कठिनाइयों में फँसना पड़ सकता है इसके लिए तर्क और आधार पहले तो अपने मन में तैयार कर लिया जाये और और बाद में सामने वाले को बता दिया जाये। अनैतिक परामर्शों के बारे में धर्म, इंसान, भगवान एवं अंतरात्मा की असहमति की बात भी कही जा सकती है। इस संदर्भ में ज्यादा दबाव डालने पर अपने आपको कमजोर, कायर, दुर्बल भी अस्वीकार किया जा सकता है। सलाहकार के अहंकार को तुष्ट करते हुए यह भी कहा जा सकता है कि आप तो साहसी होने के नाते ऐसा कर और सोच सकते हैं। पर मेरे जैसे धर्मभीरु के लिए ऐसा करना मुश्किल होगा, मन को मारकर आँतरिक विद्रोह के साथ यदि आपकी सलाह मानी जाये तो उलझी हुई मनःस्थिति में वह स्वीकृति व्यक्त करते भी आपके लिए प्रसन्नता होगी।

इस तरह नम्रता के साथ अपनी कठिनाई व्यक्त करते हुए बात को समझाया जा सके तो परामर्शदाता के दबाव को आसानी से टाला जा सकता है, साथ ही सामने वाले को बिना नाराज किए स्वयं को अनौचित्य से बचाया जा सकता है।

ऐसी ढेरों मूढ़ताएँ, अंध परम्पराएँ हैं जो नैतिक, आर्थिक, सामाजिक दृष्टि से अहितकर होते हुए भी घर के बड़े बुजुर्गों या फिर सगे संबंधियों द्वारा पर थोपी जाती हैं, उन्हें अपनाने के लिए दबाव दिया जाता है तो कभी अपने अहसानों की दुहाई दी जाती है। ऐसे प्रसंगों में दर गुजर उनकी की जा सकती है जिनका मतलब किन्हीं चिन्ह पूजाओं से हो। यों लकीर पीटने में श्रम, समय एवं धन बरबाद करने की कोई आवश्यकता नहीं। फिर भी घर में बेकार कलह पैदा न होने देने के लाभ को ध्यान में रखते हुए उनमें शामिल हुआ जा सकता है। किन्तु जिनका प्रभाव महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया नहीं उत्पन्न करता उन्हें न मानने में ही भलाई है। मोहग्रस्त वृद्धजन बाल विवाह में कुछ ज्यादा ही रुचि रखते हैं। उन्हें अपने बेटे पोते की शादी देखने की आतुरता लगी रहती है। उनको यह भी मालूम नहीं रहता कि इस जल्दबाजी से इन बच्चों के शरीर, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं भविष्य पर क्या असर पड़ेगा ? ऐसे आग्रह को यदि बच्चे खुद ही न मानें तो उसमें कुछ खास बुराई नहीं है। बड़ों का सम्मान करना, उनकी सेवा सहायता करना पारिवारिक सद्व्यवहार है, उसका पालन किया जाना चाहिए। लेकिन उसके आधार पर मजबूरी नहीं उत्पन्न करनी चाहिए कि वे कुछ भी अनर्थकारी आदेश देंगे और उसका पालन होता रहेगा। दहेज जैसी कुरीति पारिवारिक एवं सामाजिक, आर्थिक व नैतिक संतुलन का सत्यानाश कर रही है परन्तु उसे ये परम्परावादी सलाहकार नहीं छोड़ने दे रहे हैं। कानूनी बंधन और सामाजिक असम्मान बढ़ जाने से उन कुरीतियों को अपनाये रहना कठिन रहता। लोग रिश्वतखोरों की तरह चोरी छुपे उस ढर्रे को चलाये जा रहे हैं। ऐसे प्रसंगों में घर के विकासशील लोग अथवा लड़की-लड़के स्वयं इन सलाहकारों की सलाह को ठुकरा देने का साहस जुटायें तो सब तरह से उचित होगा। देखने में हो सकता है यह बड़ों की अवज्ञा जैसी लगे पर अन्याय और व्यापक लोकहित को देखते हुए इसमें अनुचित जैसा कुछ नहीं है।

मित्रों में से कितने ही अपने साथ दुर्व्यसनों में शामिल होने की सलाह देते हैं। आधुनिकता के नाम पर नशेबाजी, महँगे होटलों में फूहड़ नाच-गानों की आवारागर्दी जैसी अनेकों बुराइयाँ प्रायः मित्र मण्डलों की सलाह के दबाव में आकर अपनायी जाती हैं, पीछे वही बुराइयाँ आदतें बनकर जीवन पतन के गर्त में डुबोती रहती हैं। यदि शुरुआत में इसी सलाह को कड़क स्वर में इंकार कर दिया होता तो ही अच्छा। एक दिन की इस रुखाई से आजीवन तरह-तरह की हानियाँ उठाते रहने की विपत्ति तो न खड़ी होगी। होना तो यह चाहिए कि दोस्तों को शुरुआती दौर में सबसे ज्यादा सावधानी इस बात की बरती जानी चाहिए कि दुर्गुणी, कपटी, धूर्त प्रकृति के व्यक्तियों से मित्रता न की जाये क्योंकि ऐसे लोग मित्रता के जाल में फँसा कर शत्रुओं से भी अधिक दुर्गति करते हैं।

इन दिनों यह खतरा कदम कदम पर खड़ा है। सज्जनों को भारी व्यस्तता रहने से उनके पास यार बाजी के लिए समय नहीं है। फालतू आवारा लोग ही मित्र फँसाने के जाल कन्धे पर लादे घूमते रहते हैं। इन लोगों की सलाहों के कुचक्र में फँस कर आये दिन उदीयमान व्यक्तित्व पतन के गर्त में समाते रहते हैं। अतः जहाँ आग्रह मानने में संकोच करने का सवाल है तो अच्छा यही है कि ऐसे अनुपयुक्त व्यक्तियों की मित्रता का हाथ न थामा जाये। इस संदर्भ में उपेक्षा बरतने में ही भलाई है। पहले ही यदि उपेक्षा बरती जा सकी तो बाद में संकोच का सामना न करना पड़ेगा।

अधिक घनिष्ठ संबंधी कहे जाने वालों की सलाह को आँख मूँदकर नहीं स्वीकार करना चाहिए। उनका परामर्श ही माना जाये तो औचित्य की सीमा के अंतर्गत हो भले ही उसमें उनके असंतुष्ट या रुष्ट हो जाने का खतरा ही क्यों न उठाना पड़े।

सलाह किसकी स्वीकार करें ? अपना सच्चा हितैषी कौन है ? इसका निर्णय करते हुए यही तथ्य ध्यान रखा जाना चाहिए कि औचित्य, न्याय एवं विवेक की कसौटी पर कौन से परामर्श खरे उतरते हैं लोकमत और लोकापवाद की चिन्ता भी औचित्य के आधार पर नहीं करनी चाहिए। यदि सही बात मानने के कारण, सही राह चलने के कारण उपहास सहना पड़ रहा है तो उस अवसर पर 'हाथी चलता है और कुत्ते भौंकते हैं' वाली नीति ही अपनायी जानी चाहिए किन्तु किसी दबाव में आकर अनीति नहीं अपनानी चाहिए।

सलाह यदि अपनत्व के आधार पर ही मानी जानी चाहिए तो अपने अपनत्व के आधार के दायरे को थोड़ा बढ़ाया जाना चाहिए। खून के रिश्तों से कहीं अधिक सगे-से-सगे व्यक्ति होते हैं जो स्वार्थ एवं अहं से रहित हैं। जिनकी वृत्तियों में शोषण का कलुष नहीं है। ऐसे विशिष्ट प्रज्ञावान पुरुष अपने सगे संबंधियों से भी अधिक अपने होते हैं। युद्ध विवेकानन्द जैसे ज्ञानीजनों ने अपने समय में अनेकों को अनूठी सलाह देकर तुच्छ से लोगों का भाव विकास कर उन्हें आसमान की बुलंदियों तक पहुँचा दिया। अपने समय में उठे विचार क्राँति का तूफान भी कुछ ऐसा ही है प्रज्ञावतार की सलाह एवं प्रेरणाएँ जिस किसी को भी महामानव बनाने में समर्थ हैं बशर्ते उन्हें पूर्ण हृदय से स्वीकारा जाये। महामानव भले स्थान की दृष्टि से दिवंगत हो चुके हों फिर भी आवश्यकता पड़ने पर उनकी भावभरी याद करते ही उनके उदात्त स्पन्दन अपने हृदय एवं मन में कोई भी कहीं भी महसूस कर सकता है। वह सूक्ष्म प्रवाह न केवल हमें संकट से उबारते हैं बल्कि जीवन को दिशा भी प्रदान करते हैं। रोजमर्रा के कामकाज में अनेकों से वास्ता पड़ता है। धोबी, नाई, डाक्टर, दुकानदारी, मजदूर आदि ऐसे ढेरों है जिनसे काम चलाऊ शिष्टाचार बनाये रखना ही ----------------अपने क्षेत्र में उचित सलाह का ही मूल्याँकन करना चाहिए। लेकिन जहाँ तक जिन्दगी की समस्याओं में उलझाने, सुलझाने वाले परामर्श का मामला है वहाँ पर यह काम सिर्फ प्रामाणिक व्यक्तियों के भरोसे पर ही करना चाहिए। प्रामाणिक वे हैं जिन्होंने अपनी वृत्तियों का परिमार्जन किया है। जिसका हमसे कोई स्वार्थ नहीं है। जिसका हृदय सहज ही हमारे प्रति प्रेम से भरा है। जिसके पास हमें देने के लिए जिन्दगी के अनुभव हैं, अमूल्य विचार हैं, भावभरी संवेदनाएँ हैं। ऐसे व्यक्तियों के परामर्श में जीवन की दिशाधारा को बदल देने की शक्ति होती है। इनकी सलाह हमारे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करती है।

इसलिए सलाह स्वीकार करने में सतर्कता बरतने में ही भलाई है। किसकी किस प्रकार की कितनी सलाह माननी चाहिए और कितनी उपेक्षा करनी चाहिए अथवा असहमति प्रकट करना चाहिए, निर्णय सूक्ष्म दृष्टि, विवेकशीलता और दूरदर्शिता के आधार पर करना चाहिए। जो भी संपर्क में आया उसकी उलटी सीधी सलाह को मानकर प्रभावित हो जाने में भारी खतरा है। ऐसा किया जाये तो समझना चाहिए कि अपनी उथली दुर्बल मनोभूमि के कारण हमें पथभ्रष्ट होने और कुमार्ग की कटीली झाड़ियों में भटकने का संकट सहन करना पड़ेगा


सम्मान वैभव को नहीं, गुणों को मिले

सच्चाई मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता है। इसके अभाव में हर मार्ग कंटकाकीर्ण हो जाता है। क्या वैयक्तिक, क्या सामाजिक और क्या राष्ट्रीय हर क्षेत्र में सच्चाई का बहुत अधिक महत्व है। व्यक्तिगत जीवन में मिथ्याचारी किसी प्रकार की आत्मिक उन्नति प्राप्त नहीं कर सकता, सामाजिक जीवन में अविश्वास एवं असम्मान का भागी है और राष्ट्रीय जीवन में तो वह एक आपत्ति ही माना जाता है।

व्यक्तिगत जीवन में आहार-विहार में मिथ्या करने से न जाने कितने प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोग पैदा हो जाते हैं, जिनसे संघर्ष करते ही बहुमूल्य मानव जीवन समाप्त हो जाता है। जिससे न तो वह वर्तमान में कोई सुख शाँति पा सकता है और न आगे उसकी कोई व्यवस्था कर पाता है।

मानव जीवन के परम लक्ष्य सुख शाँति को पाने के लिए जिस शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की आवश्यकता होती है, मिथ्याचारी के जीवन में उसका कभी आगमन नहीं होता है। मिथ्याचारी का अर्थ ही यह है कि वह सब कुछ न करना जिसको करना चाहिए और वही सब करना जिसको नहीं करना चाहिए।

यद्यपि इस प्रकार के अकरणीय कार्यों को अज्ञानवश करने से कोई परिणाम के कुफल से बच नहीं पाता, तथापि जो जानता हुआ अकरणीय कार्य किया करता है उसकी दुर्दशा की कल्पना कर सकना ही कठिन है। धूर्त और मक्कार लोग ऊपर से कितने ही खुशहाल क्यों न दिखाई पड़ते हों किन्तु अन्दर से बड़े ही व्यग्र, विकल और दरिद्र ही रहा करते हैं। उनके हृदय में हर समय एक जलन, एक पश्चाताप एवं आत्मग्लानि कसक करती है। और यही आँतरिक अशाँति मनुष्य के लोक-परलोक में आग लगाने का हेतु होती है।

मिथ्याचारी सामाजिक जीवन में अविश्वास और असम्मान के परिणाम उपस्थित करता है। ऐसे व्यक्ति बेईमान, मक्कार और धूर्त सिद्ध हो जाता है, लोग उससे व्यवहार करने से बचते हैं। अपना कोई काम न तो मिथ्याचारी को सौंपते हैं और न कोई काम करने को तैयार होते हैं। उसके किये कर्मों और कहे वचनों में विश्वास नहीं करते। एक बार यदि मिथ्याचारी किसी काम अथवा कथन में सत्यता का व्यवहार भी करता है, तब भी उस पर कोई विश्वास नहीं करता और उससे दूर रहने का प्रयत्न किया जाता है।

मिथ्याचारी से घृणा किया जाना तो एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लोग उसके मुँह पर उसे बेईमान, चोर, धूर्त तक कह देते हैं उसके एवज में वह क्यों न क्रोध करने लगे, क्यों न लड़ने को तैयार हो जाये ? किन्तु यह सब उसका ऊपरी दिखावा मात्र होगा, उसकी आत्मा इस सत्य को स्वीकार करती रहती है।

मिथ्या के दोष से मनुष्य में कायरता तथा दब्बूपन आ जाता है। वह खुलकर न तो समाज में बात कर पाता है और न विश्वासपूर्वक खुले तौर पर काम कर सकने का साहस कर पाता है। वह हर समय चोर की तरह डरा-डरा ओर दबा-दबा रहा करता है।

समाज में उसकी इज्जत दो कौड़ी की हो जाती है। वह अपने को बड़ा बुद्धिमान समझ कर प्रसन्न रहता है। किन्तु भेद खुलते ही, जो शीघ्र खुल ही जाता है और दयनीयता के पल्ले लग जाता है, फिर जीवन भर पछताने और दुखी होने के सिवाय कोई चारा नहीं रहता। राष्ट्रीय जीवन का मिथ्याचार सबसे भयानक होता है। राष्ट्रीय स्तर का मिथ्याचार ही पराधीनता, शोषण, अत्याचार का हेतु बना करता है। यही नहीं कभी-कभी तो राष्ट्रीय स्तर का मिथ्याचार राष्ट्रों को मिटा दिया करता है। आज खेद के साथ देखना पड़ रहा है और शोक के साथ कहना पड़ रहा है कि भारतवासियों के जीवन से ईमानदारी और सच्चाई दिन-दिन निकलती चली जा रही है। संसार में अपनी सच्चाई तथा नैतिकता के लिए प्रसिद्ध भारतीय राष्ट्र अपने मिथ्याचार एवं अनैतिकता के लिए बुरी तरह बदनाम हो रहा है।

यह वही भारतीय राष्ट्र है, जहाँ घरों में ताले नहीं डाले जाते थे, प्रहरी नहीं रखे जाते थे, एक दूसरे के रक्षक स्वयं ही बने रहते थे, धोखे से मिथ्याचार हो जाने से प्राण देकर प्रायश्चित किया करते थे, अनजान में किये गये पाप को भी प्रकाशित कर दिया करते थे और जब तक उसका परिमार्जन नहीं कर लेते थे अपने को सामाजिक जीवन के योग्य नहीं समझते थे।

आज के बढ़े हुए आर्थिक दुराचार, घोटालों आदि के मूल में धन की अपरिमित लिप्सा ही काम कर रही है। यह स्पष्ट है कि जीवन की वास्तविक आवश्यकताएँ किसी भी भ्रष्टाचार के लिए विवश नहीं कर रही हैं। क्योंकि मनुष्य की अनिवार्य आवश्यकताएँ इतनी कम होती हैं कि ईमानदारी की कमाई से भी यदि मितव्ययिता और सादगी का जीवन जिया जाये तो आवश्यकताएँ सहज ही पूरी हो सकती हैं। आज का सारा मिथ्याचार आवश्यकताओं और आडम्बर पूर्ण फिजूलखर्ची की आदतों के कारण ही फैला हुआ है। आज के लोग बड़े प्रदर्शनवादी और दुर्व्यसनी बन गये हैं। अनावश्यक अपव्ययता ने उनकी आवश्यकताएँ जमीन से आसमान तक बढ़ा दी हैं। हमारे जीवन में आदर्शवाद का स्थान भोगवाद ने ले लिया है। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का भाव भुलाकर ओछे विचार और दिखावे का जीवन पसन्द करने लगे हैं। कम से कम परिश्रम में अधिक से अधिक धन पैदा करने की प्रवृत्ति ने लोगों को भ्रष्टाचार के पाप की ओर अग्रसर कर दिया है। जहाँ इस पतन में मनुष्य की मानसिक दुर्बलता काम कर रही है वहाँ------------- और खर्चीले सामाजिक रीति रिवाज भी इसके उत्तरदायी हैं। ब्याह, शादी, दान-दहेज प्रीति भोज, मृत्यु भोज जैसी सामाजिक कुरीतियाँ भी ऐसी ही रीति-रिवाज हैं जो हमें किसी प्रकार भी अधिक पैसा कमाने को मजबूर कर रही हैं। इसके साथ ही समाज में पैसा ही आदर, सम्मान और बड़प्पन का मापदण्ड बनता चला जा रहा है। जिसके पास जितना पैसा है वह आदमी उतना ही अधिक बड़ा और आदर का पात्र माना जाने लगा है। पैसे को बड़प्पन का चिन्ह मानने वाले अथवा उससे प्रभावित होकर किसी को आदर-सम्मान देने वाले यह क्यों नहीं देखते कि इसने उतना पैसा कमाया किस मार्ग से है ? पाप से पैसा कमा कर भी जब आदर मिल सके तो कोई पसीने की कमाई में विश्वास क्यों करने लगे ?

यह बात सही है कि पैसा बड़प्पन का चिन्ह माना जाता रहा है। उसका कारण यही था कि आसानी से न मिल सकने के कारण लोगों को इसके लिए कठिन परिश्रम व पुरुषार्थ करना पड़ता था। इस प्रकार जिसके पास जितना पैसा होता था वह उतना ही परिश्रमी, सद्गुणी और पुरुषार्थी माना जाता था। इस कारण धन के कारण दिया जाने वाला बड़प्पन वास्तव में उस परिश्रम एवं पुरुषार्थ का ही सम्मान हुआ करता था, जो पैसा कमाने में लगाया था। किन्तु अब स्थिति बदल गयी है, लोग परिश्रम एवं पुरुषार्थ के बजाए धूर्तता, भ्रष्टाचार तथा बेईमानी से पैसा अधिक इकट्ठा करने लगे हैं। इसीलिए पैसे के कारण किसी को सम्मान देने का मतलब है कि भ्रष्टाचार एवं बेईमानी की प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देना।

यदि समाज में बेईमानी तथा भ्रष्टाचार की प्रवृत्तियों को कम करना है तो पैसों के बजाए मनुष्य को गुणों का आदर करना होगा। जीवन में यथासंभव उस वस्तुओं का बहिष्कार कर देना होगा, जिनमें लोगों को भ्रष्टाचार करने का अवसर मिलता है।


सामान्य लोकसेवी (Kahani)

एक धर्माचार्य को इस बात पर बड़ा घमण्ड था कि उनकी देश देशान्तरों में काफी ख्याति है, बहुत बड़ा समुदाय और अपार सम्पत्ति है, वैभव है, शास्त्र कंठस्थ हैं। उन्हें पूरा भरोसा था कि मरने के बाद देवता स्वर्ग में अगवानी करेंगे। स्वर्ग से परमात्मा उन्हें खुद ही लेने आयेंगे। एक दिन धर्माचार्य को नींद में एक सपना आया कि वह मरकर स्वर्ग के दरवाजे पर पहुँच गये हैं। किन्तु यह देखकर वह बड़े हैरान थे कि स्वर्ग के द्वार पर न कोई स्वागत के लिए पहुँचा है, न परमात्मा ही आये हैं। सब तरफ सन्नाटा देखकर वे सकते में आ गये।

सोचा कि एक बार फिर दरवाजा खटखटाया जाये। इस बार कोशिश करने पर एक खिड़की खुली, कोई झाँका। धर्माचार्य को ऐसा लगा कि जैसे सूरज उग आया हो। धर्माचार्य घबराकर आड़ में छिपकर कहने लगे परमपिता आप जरा पीछे हट जाइये मैं आपका प्रकाश सहन नहीं कर पा रहा हूँ।

इस पर उसे उत्तर मिला, क्षमा करें मैं तो यहाँ का द्वारपाल हूँ। परमेश्वर और मेरे बीच तो लाखों योजन का फासला है। मुझे तो दर्शनों का अभी तक अवसर नहीं मिला है। गुरुदेव यह सुनकर घबराये। फिर भी उन्होंने छिपे-छिपे ही कहा - आप परमेश्वर तक सूचना पहुँचा दे कि धरती से अमुक धर्मगुरु आया है। धरती पर मेरी बड़ी ख्याति थी। मेरा नाम उन्होंने जरूर सुना होगा।

द्वारपाल ने कहा - क्षमा करें, पहले तो आप यह बताइये कि आप किस धरती से आये हैं ? अब तो धर्मगुरु चौंके और बोले - क्या मतलब किस पृथ्वी से ? अरे, तुम इतना भी नहीं जानते वहाँ तो मेरे करोड़ों अनुयायी रहते हैं।

यह सुनकर द्वारपाल ने मुश्किल से अपनी हँसी रोकते हुए कहा - तब तो आपका ज्ञान बहुत अल्प है। ब्रह्माण्ड में अनेकों पृथ्वी हैं। आप अपनी पृथ्वी का नम्बर बताइये।

अब तो धर्मगुरु संकट में पड़ गये। वह तो सोच रहे थे कि वैभव और ख्याति की जानकारी निश्चित ही परमात्मा को होगी। तभी द्वारपाल ने पुनः कहा चलो पृथ्वी का सही नम्बर याद नहीं तो आकाशगंगा और अपने सौरमण्डल का ही नाम बता दो ताकि रिकार्ड देखकर पता लगाया जा सके कि आप कहाँ से आये हैं ?

यह सुनकर धर्माचार्य की विस्मय और परेशानी बढ़ती ही जा रही थी। वह सोचने लगा कि जीवन भर आपाधापी करने, प्रशंसा बटोरने, अनुयायियों की संख्या बढ़ाने में ही लगा रहा। अपनी तुच्छता को ही अपनी महानता समझता रहा। कभी परमात्मा के विराट स्वरूप की कल्पना तक नहीं की। इस सोच विचार में घबराहट से उसकी नींद खुल गयी। नींद खुलने पर लगा कि वह पहली बार जाग्रत हुआ है, क्योंकि उसने अब सामान्य लोकसेवी बनने की ठान ली थी।


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

( गायत्री तपोभूमि में अक्टूबर 1968 के साधना शिविर में दिया गया व्याख्यान )

गायत्री महामंत्र हमारे साथ साथ-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियों भाइयों,

यहाँ गायत्री तपोभूमि में गायत्री माता का मंदिर है। यहाँ गायत्री मंत्र की साधना होती है। मंत्र बड़े सार्थक और सामर्थ्यवान है। इसके द्वारा बड़े बड़े काम हो सकते हैं। साधारण मंत्र जो सपेरा जानता है, साँपों के जहर को मंत्र पढ़कर उतार देता है। भौतिक जगत में मंत्रों का बड़ा महत्व है। आज मंत्रों के द्वारा भारतवर्ष के अंतर्गत बड़े-बड़े कारखाने चलते हैं। यंत्रों का भी एक इतिहास है। इसकी शक्ति भी पैटर्न टैंक की तरह होती है। हमारे पूर्वज इस महत्व को जानते थे। इस कारण उन्होंने मंत्रों का उपयोग किया था तथा उसकी जानकारी लोगों को दी थी। मंत्रों का भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों तरह का महत्व है।

इस संबंध में राक्षसों और देवताओं दोनों में विवाद था। राक्षस यंत्र को बड़ा मानते थे अर्थात् उनकी दृष्टि में भौतिकता का अधिक महत्व था। देवता कहते थे कि मंत्र बड़ा है अर्थात् अध्यात्म बड़ा है। मंत्र मनुष्य को विचार देता है। मंत्र विद्या का वैज्ञानिक महत्व है। जीभ से भी शब्द निकलते हैं, उनका उच्चारण कंठ, तालु, ओष्ठ, दाँतों यानि मुख के विभिन्न अंगों द्वारा होता है। इस उच्चारण काल में मुख के जिन अंगों से ध्वनि निकलती है, उन अंगों से नाड़ी तन्तु शरीर के विभिन्न भागों तक फैलते हैं। वास्तव में मंत्र की दो दिशाएँ हैं - (1) यंत्र (2)मंत्र। इस दुनिया में जो चीजें वस्तु के द्वारा बनी हैं, वह नाशवान् हैं। हम लोग सभी यंत्र है। हमारे खान पान का ढंग एक यंत्र की प्रक्रिया है। वास्तव में हलचल पर दुनिया टिकी है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि हलचल से दुनिया बनी है।

इस धरती पर हर चीज प्रायः नाशवान् है। हम बच्चों के रूप में पृथ्वी पर आते हैं। वह बच्चा 15-18 साल तक नवयुवक की स्थिति में होता है तो अच्छा लगता और जब वही बच्चा 55-60 वें वर्ष में पहुँच जाता है तो वह सुन्दर नहीं लगता। वास्तव में यह चीज टिकाऊ नहीं है। जब तक आपका शरीर युवा है तक तक आपकी पत्नी आपको देवी अप्सरा मालूम पड़ती है । परन्तु जब आप बड़े हो जाते हैं तो यह पत्नी एक नौकरानी मात्र रह जाती है।

मनुष्य सोचता है कि हमारे पास पैसा होगा तो सुख शाँति मिलेगी, परन्तु ऐसा नहीं होता जब उसके पास पैसा आ जाता है तो चोर, डाकुओं का डर बना रहता है। मनुष्य जब बी.ए.एम.ए. पास कर लेता है तो उसे बड़ी नौकरी का ख्वाब रहता है। हमारा सुख केवल कल्पना के सागर में डूबा रहता है। जो शेखचिल्लियों की तरह कभी पूरा नहीं होता है। अगर हम देखें तो पायेंगे कि मनुष्य समस्या लेकर पैदा होता है और समस्या में जिन्दगी भर लगा रहता है तथा अंत में वह समस्या को लिये दुनिया से चला जाता है। मनुष्य कल्पनाओं के सागर में डूबा रहता है। यह यंत्र जो मनुष्य शरीर है, उसको थोड़ी सी शाँति मिलती है। अगर मनुष्य को शाँति मिलेगी तो मंत्र से मिलेगी अर्थात् अध्यात्म की ओर मुड़ने से मिलेगी।

मंत्र, जप करने की प्रवृत्ति को नहीं कहते हैं वरन् वह विचार की प्रवृत्ति है। मनुष्य इन मंत्रों को अपनाकर अपने दुखों को सुखों में बदल सकता है। मनुष्य अपनी दिशाधारा को बदल सकता है। अधिकाँश दुख मनुष्यों के मंत्रों की कमजोरी के कारण होता है और उसका जीवन कष्टों से घिर जाता है। मंत्र कहते ही दुखों को दूर करता है। इससे भौतिक आवश्यकता भी पूरी होती है। एक व्यक्ति को साँप काटता है, एक तांत्रिक सपेरा आता है और वह कुछ मंत्र पढ़ता है। साँप आकर विष वापस ले लेता है और वह आदमी स्वस्थ सानन्द हो जाता है। यह मंत्र का भौतिक प्रयोग कहा जा सकता है।

मंत्रों का सागर इससे कही अधिक अध्यात्म के लाभों के बारे में हमें इंगित करता है। अध्यात्म क्षेत्र बड़ा विशाल है। इस क्षेत्र के अंतर्गत गायत्री मंत्र की महत्ता सर्वोपरि है, जो मनुष्य के बुद्धि के स्रोत को खोल देता है। मंत्र की आराधना प्रारम्भ करने के बाद मनुष्य को महानता की ओर अग्रसर करते हुए उसे देवता बना देता है। गायत्री मंत्र के एक अक्षर में अनेक प्रकार के ज्ञान विज्ञान का तत्व भरा पड़ा है इसमें रहस्यमय तत्व छिपे पड़े हैं। इसका ही वेद उपनिषद्, दर्शन, स्मृतियों, रामायण आदि ग्रंथों में विवेचन है।

गायत्री को वेदमाता कहा गया है। चारों वेद गायत्री के पुत्र है शास्त्रों में कहा गया है कि ब्रह्माजी ने अपने एक एक मुख से गायत्री के एक एक चरण की व्याख्याएँ की है। इस प्रकार चार मुखों से चार वेदों का वर्णन किया गया है -

ॐ भूर्भुवः स्वः ऋग्वेद तत्सवितुर्वरेण्यं यजुर्वेद भर्गो देवस्य धीमहि सामवेद धियो यो नः प्रचोदयात् अथर्ववेद

बाद में उन वेदों के द्वारा दर्शन, आरण्यक, उपनिषद्, पुराण आदि का निर्माण हुआ। जिस प्रकार मनुष्य के एक बूँद भ्रूण-कलल में मनुष्य का पूरा पूरा स्वरूप होता है, उसी प्रकार गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षरों में समस्त संसार का ज्ञान विज्ञान भरा पड़ा है। इसमें सोना बनाने का भी विधान भरा पड़ा है।

गायत्री मंत्र की उपासना सर्वश्रेष्ठ है। इसमें बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करने के लिए प्रार्थना है। मनुष्य की सद्बुद्धि आ जाये तो उसे भौतिक एवं अध्यात्मिक दोनों लाभ प्राप्त होता है। उपासना का अर्थ होता है पास बैठना। अगर बछड़ा गाय के पास न बैठे तो उसे दूध कहाँ से मिलेगा? माँ की छाती से बच्चा न लिपटे तो उसे दूध कहाँ से मिलेगा? पारस को छुए बिना सोना लोहा कैसे बनेगा? उसी प्रकार ईश्वर के समीप गये बिना आत्मा की भूख कैसे मिटेगी यह उपासना की पद्धति है जो मनुष्य को तृप्त करती है। जिस प्रकार मनुष्य के शरीर में प्राण का महत्व है, उसी प्रकार आत्मा में तो ईश्वर है। परमात्मा से रहित आत्मा शरीर का आवरण ओढ़े पशु के समान है।

परमात्मा के नजदीक जब साधक पहुँच जाता है तो अपनी वेदनाओं को भक्तिभाव को उसके सामने रखता है उस समय भगवान भक्त की जो आवश्यक मनोकामनाएँ हैं उन्हें पूरा कर देता है। उनकी तृष्णा, वासना अहंता को समाप्त कर देता है। साधक को भौतिक लाभों के अंतर्गत चिरस्थायी संतोष, मनोविकारों का शमन, संकटों का निवारण, सुखी गृहस्थ जीवन, हँसता-हँसाता जीवन, लोकसम्मान जैसा लाभ प्राप्त होता है। इसके साथ उसके परिष्कृत स्वभाव, दैवी अनुग्रह, सेवा की भावना जैसे आध्यात्मिक लाभ साधक को मिलने लगते हैं, जिससे वह नर नारायण बन जाता है।

हमारे पास तपोभूमि में नित्य एक न एक लोग आते रहते हैं, जिनकी समस्यायें होती है। हमने गायत्री उपासना के माध्यम से उन्हें राहत पहुँचाने का कार्य किया है। एक म.प्र. की प्रधानाध्यापिका आती थीं। उन्हें नींद नहीं आती थी और हमेशा रोती रहती थीं। हमने उन्हें ठीक किया, अब उनको नींद आती है। एक बार हमारे पास एक सेठ जी आये, उनका इनकम टैक्स का घोटाला था। वे परेशान थे उनके पास कुल पूँजी 32 लाख रुपये थी। इनकम टैक्स का 10 लाख रुपये देना था। वे परेशान थे हमारे कहने पर उन्हें शाँति मिली। हमने कहा आपके 10 लाख चले जायेंगे तो भी आपके पास 22 बचेंगे। आप परेशान क्यों हैं? फिलहाल तो जायेगा नहीं, अगर चला भी जायेगा तो भी तेरी कमी पूरी हो जायगी। हमने उसे गायत्री मंत्र के जप के लिए कहा आगे उसकी बुद्धि में बदलाव आ गया।

बेटे, इस मंत्र शक्ति महान है। पहले जमाने के संत महात्माओं के पास गायत्री मंत्र का बल होता था, इसके कारण वे हर जगह विजयी होते थे। एक बार सिकन्दर हिमालय की ओर गया और एक महात्मा से कुछ माँगने को कहा। उसने कहा - आप शक्तिशाली हो तो धूप निकाल दो। सिकन्दर चुप खड़ा हो गया। अच्छा, तो तेरे में इतनी शक्ति नहीं तो दूर हट जा और पूरब दिशा से हमें धूप लेने दे। बेटे, यह साहस एवं आत्म बल गायत्री मंत्र का था जिसके बल पर उस महात्मा ने विश्व विजयी सिकन्दर को परास्त किया था।

गायत्री महामंत्र एक महान एवं महत्वपूर्ण मंत्र है। जब वह किसी के हृदय में प्रवेश कर जाता है तो अंतःकपाट खोल देता है और उसका कायाकल्प हो जाता है। आम्रपाली के अन्दर प्रवेश किया तो वह बुद्ध की महान शिष्या बना गयी। उसे अपना तन, मन, धन सब कुछ उनके चरणों में समर्पित कर दिया। एक बार वह बुद्ध के चरणों में गई तो उसने कहा कि प्रभु हम अशुद्ध है, आपकी शरण में आये हैं। क्या आप हमारा उद्धार कर सकेंगे। भगवान बुद्ध ने उसे कुछ मंत्र बताया और कहा कि आप इसका जप करें एवं अपने जीवन में इसे लायें। महिला जो अपने शरीर का व्यापार करती थी, उस दिन अपने जीवन को बदलने का प्रयत्न किया, वह महान बन गयी। बुद्ध की महान शिष्या बन गयी और “बुद्धं शरणं गच्छामि” “संघं शरणं गच्छामि” “धम्मं शरणं गच्छामि” का नारा लगाते हुए करोड़ों लोगों तक बुद्ध का संदेश पहुँचा दिया। बेटे, यह गायत्री मंत्र की शक्ति है, जिसके द्वारा विचारों में बदलाव आता है और उसे संतोष मिलता है।

वास्तव में गायत्री मंत्र भगवान की एक श्रेष्ठ प्रार्थना है जिसके अंतर्गत हम प्रार्थना करते हैं।

“हे तेजस्वी महात्मा ! हम आपके प्रकाश को अपने में ग्रहण करते हैं। आप हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करें।”

ब्रह्माजी द्वारा दिये गये इस गायत्री मंत्र को जिस दिन से इस धरती पर विद्यमान लोगों ने अपने जीवन में अपनाया, उसे चैन, संतोष, प्रेम, नैतिकता एवं सहयोग मिलने लगा। आज भी इस मंत्र को ग्रहण करके कमजोर वर्ग के लोग भी महानता की ओर बढ़ रहे हैं। यह ठीक है कि इसका लाभ मिलने में कुछ समय लगता है। इस मंत्र के द्वारा हथेली पर पौधे उगाये जा सकते हैं। मनुष्य के कषाय-कल्मष जब धुल जाते हैं तथा उसकी पात्रता का विकास हो जाता है तो उसे लाभ मिलता है ऐसी अनेक कथाएँ आती हैं। गायत्री की साधना का चमत्कार अवर्णनीय है। एक समय अकबर ने महामंत्री मानसिंह को बुलाया और कहा कि हमारा प्रयाग का किला अठारह बार ढह गया है उसका कोई उपाय करो ताकि वह सुरक्षित रह सके। अकबर का आदेश पाकर मानसिंह निकले और गंगा तट पर भ्रमण करने लगे। उसने देखा इस वीरान स्थान पर एक महात्मा तप कर रहे है। वे उनके पास पहुँचे । इस समय वे ध्यानावस्था में थे। उन्होंने देखा कि अजगर उधर से आया और उन्हें निगलने का प्रयास करने लगा, परन्तु वह तपस्वी को निगल न सका। थोड़ी देर में तपस्वी का ध्यान टूटा और उसने अपने तपोबल से उस अजगर को अपने में मुक्त कर लिया। यह सब तमाशा देखने के बाद मानसिंह वहाँ पहुँचें। थोड़ी देर बाद महात्मा जी जिनका नाम देवमुरारी बाबा था, ने कुशल समाचार पूछा। उसने कहा मैं अकबर का महामंत्री मानसिंह हूँ और निकट समस्या के हल हेतु आपके के पास आया हूँ। उस महात्मा ने कहा कि आप निःसंकोच अपनी समस्या को बतलाये। हम उसके समाधान हेतु प्रयास करेंगे। मानसिंह ने बतलाया कि महात्मन् प्रयाग के किले का निर्माण महाराज ने 18 बार कराया पर पता नहीं की किस कारण से या देवी देवताओं के अभिशाप के कारण यह बन नहीं पा रहा है और बार-बार ढह जाता है। महात्मा जी थोड़ी देर मौन रहे और अपनी ध्यान अवस्था में चले गये। उसके बाद मानसिंह के हाथ पर कुछ रख दिया। उसने कहा इसे आप नींव में डाल देंगे ओर उसके बाद निर्माण करेंगे तो किले का कुछ नहीं होगा। उन्होंने वैसा ही किया और किला तैयार हो गया। वह वस्तु जो मानसिंह की हथेली पर महात्माजी ने रखी थी, वह तुलसी की मंजरी थी। देवमुरारी बाबा गायत्री के बहुत बड़े उपासक उस जमाने में रहे हैं तथा उनका चमत्कार सर्वविदित था। सभी लोग उनके पास आते थे और वे सिद्ध किये हुए मंजरी के गुच्छे सबको देते थे।

मंत्रों का सूक्ष्म प्रभाव बहुत ही महत्वपूर्ण है। उसमें गायत्री महामंत्र की महत्ता तो और भी विलक्षण है। इसके जप से उत्पन्न होने वाली शक्ति सारे वातावरण को कँपा देने में समर्थ है। इसी महाशक्ति का लाभ जिन्होंने प्राप्त कर लिया है, वे धन्य हो गये हैं। इस महान मंत्र में सद्बुद्धि ही वह तत्व है जिसके आधार पर व्यक्तित्व निखरता है तथा उभरता है। इस साधना के द्वारा लोग ऋषि, तपस्वी बन जाते हैं। उनके जीवन का कायाकल्प हो जाता है। इसीलिए हम आप लोगों को गायत्री तपोभूमि मथुरा बुलाते हैं जो गायत्री की एक सिद्ध पीठ है। जहाँ अखण्ड अग्नि एवं 400 तीर्थों के जल रज की स्थापना है। यहाँ हम गायत्री अनुष्ठान कराते हैं ताकि आपके पूर्वजन्म के संस्कार कम हों तथा इस जन्म में आप महानता की ओर बढ़ सकें। आपके अन्दर पूर्व जन्मों का काफी कषाय-कल्मष जमा है, जिसे हमें साफ करना है ताकि नये संस्कार आपके अन्दर भरे जा सकें। हम वहाँ पर बुलाकर आपका यज्ञोपवीत संस्कार कराते हैं। यज्ञोपवीत गायत्री की प्रतिमा है। इसके नौ धागे गायत्री मंत्र में नौ शब्दों के प्रतीक हैं। यज्ञोपवीत गायत्री की प्रतिमा है इसे ऋषियों ने रिसर्च करके बनाया है। अगर यह लोहे पत्थर का होता तो हम धारण नहीं कर पाते। इस धागे का वैज्ञानिक महत्व है। यह धागा हमारी आध्यात्मिक माँ के रूप में हमेशा हमारी छाती से लिपटा रहता है। यह हमारा मार्गदर्शन करता है।

आपको भी हमेशा गायत्री मंत्र का जप करना है तथा अपने इलाके, मोहल्ले, शहर के लोगों को प्रेरणा देकर उसके महत्व समझाकर इस मंत्र को जपने की प्रेरणा देना चाहिए। यह वह मंत्र है जिससे हमारी भौतिक तथा आध्यात्मिक समस्याओं का हल होता है।

तथा बड़ी-बड़ी समस्याओं का भी हल होता है। पुराणों में अनेक कथाएँ हमारे ऋषियों ने इस मंत्र के लाभ के बारे में लिखी हैं।

एक समय की बात है इस पृथ्वी पर अनावृष्टि के कारण बहुत बड़ा अकाल पड़ा। सारे सरोवर सूख गये, पशु पक्षी मरने लगे। लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हो गये। अनेकों लोग भूखों मरने लगे। उस स्थिति में लोग त्राहि-त्राहि करने लगे। वे गौतम ऋषि के पास समाधान के लिए पहुँचे । उस समय गौतम ऋषि बहुत पहुँचे हुए गायत्री साधक थे। लोग उनके आश्रम में पहुँचे तथा चरणों में प्रणाम करते हुए अपनी समस्याओं को सुनाया। गौतम ऋषि ने उन्हें अपने आश्रम का पात्र दिया जो उन्हें गायत्री माता से प्राप्त हुआ था। उन्होंने कहा - आप इसे ले जाएँ इससे आपका समाधान हो जायेगा।

लेकिन आप लोग यह न समझें कि हम गायत्री तपोभूमि में आये हैं, आचार्य के पास रहकर हमने अनुष्ठान, जप, तप हवन कर लिया और हमें गायत्री की सिद्धि हो गयी और हम जो चाहेंगे वह हमें प्राप्त हो जायेगा। आपका यह सोचना व्यर्थ है। इसके लिए हमें आपकी पात्रता का विकास करना परम आवश्यक है। इसके बिना आध्यात्मिक जगत में इसका विकास नहीं हो सकता। जितने भी प्रचलित ऋषि हुए हैं उन्होंने गायत्री साधना द्वारा आत्मशोधन, आत्मपरिमार्जन किया है। योग तप के माध्यम से अपने को गलाया है बीज जब गलता है तभी पेड़ का रूप लेता है। हम यह बताना चाहते हैं कि आपके अन्दर अभी जितनी कमियाँ हैं इसे निकाले बिना आपको हम कुछ नहीं दे सकते हैं। इसके परिमार्जन एवं परिशोधन के लिए हम आपको गायत्री तपोभूमि समय-समय पर बुलाते रहते हैं। आप जानते हैं कि ऊसर भूमि में कोई बीज न तो उगता है और कोई उपज होती है। उसी प्रकार भावना रहित उपासना करना निरर्थक है, बेकार है। इसमें कोई भी फायदा नहीं हो सकता है। मनुष्य के अन्दर राग द्वेष, अहंकार, कटुता आदि भरा हुआ है, इसके रहते गायत्री मंत्र का लाभ नहीं मिल सकता। यह निकालने का कार्य गुरु करता है। गुरु यानि प्रकाश। अर्थात् प्रकाश की स्थापना होने पर अंधकार स्वयं भाग जाता है। आप जानते हैं कि विरजानन्द जी ने दयानन्द का, रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द का, समर्थ रामदास ने छत्रपति शिवाजी का, हमारे गुरु ने हमार अंधकार दूर किया और आज गायत्री मंत्र का लाभ हमें कितना मिला यह आपके सामने है।

हम भी समर्थ हैं। हम भी आपका अंधकार समाप्त करना चाहते हैं, प्रकाश भरना चाहते हैं, आप अपने को खाली करें। यहाँ आये हैं तो आप यहाँ से कुछ लेकर जाएँगे। आज हम कुछ देकर आपको विदा कर रहे हैं। आप जायें और थोड़ा भगवान के लिया भी जीना सीखे। अपने पेट के लिए ही न जिये थोड़ा सामान्य स्तर से ऊपर उठकर भी कार्य करें। हमें आपके इस कार्य से प्रसन्नता होगी। आप विश्वास रखें कि आपने जो अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के बारे में हमें बतलाया था उसका हमें पूरा-पूरा ध्यान है। हम उसे दूर करते रहेंगे। आप निश्चिन्त हो जाइये।

आज की बात समाप्त। ॐ शाँति।


हैरियट स्टो (Kahani)

यों तो अमेरिका में दास प्रथा की जड़ उखाड़ने में अब्राहम लिंकन का नाम लिया जाता है, परन्तु सच पूछा जाये तो उस दास प्रथा की जड़ साफ करने में अहम् भूमिका ‘ टॉम काका की कुटिया ’ ग्रंथ लिखने वाली एक महिला हैरियट स्टो की थी। सबसे बड़ी विडम्बना तो यह थी कि हैरियट स्टो को परिवार का खर्च चलाने के लिए कठिन श्रम करना पड़ता था। गरीबी और कठिनाई के बीच घिर कर उन्होंने थोड़ा-थोड़ा समय निकाल कर पुस्तक पूरी की थी। अंतःप्रेरणा से अभिप्रेरित होकर लिखी गयी उनकी यह पुस्तक अमेरिका से गुलामी प्रथा के अंत के लिए वरदान साबित हुई।


महासंजीवनी है - चोकर

खाद्यान्नों को पिसवाकर प्रायः उन्हें छाना जाता है। छानने में गेहूँ, ज्वार मक्का आदि अनाज का ऊपरी छिलका चलनी में ही रह जाता है। गृहणियाँ इस छिलके को जिसे बोलचाल भाषा में चोकर कहती हैं, या तो फेंक देती हैं अथवा पशुओं को डाल देती हैं। यदि यह मालूम हो सके कि इस प्रकार अनाज का सबसे अधिक पौष्टिक भाग व्यर्थ चला जाता है, तो बहुत से लोग इस प्रकार की गलती नहीं करेंगे।

कई लोग तो ऐसे भी होते हैं जो चोकर के लाभकारी गुणों को जानते हुए भी उसे निकाल-छानकर फेंक देते हैं। इसे तो स्वाद-लिप्सा का दुर्गुण ही कहा जाएगा जिसकी किसी भी प्रकार अनुशंसा नहीं की जानी चाहिए। ऐसे लोगों को समझा सकना भी मुश्किल है। ब्रिटेन में काफी वर्षों पहले चोकर के गुणों जाँच की जा चुकी है। वैज्ञानिकगण प्रयोगों से इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस प्रकार खाद्य पदार्थों के सर्वाधिक पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। वहाँ तो इसका प्रयोग कई भयंकर बीमारियों के उपचार में पथ्य रूप में भी किया जाता है। तपेदिक, कब्ज, मन्दाग्नि तथा मधुमेह जैसे रोगों की कुछ विशेष अवस्थाओं में एक भाग चोकर और आठ भाग गेहूँ के आटे की रोटियाँ ही खाने को दी जाती हैं। स्नायु दुर्बलता एवं रक्ताल्पता के रोगियों को चोकर की चाय बनाकर पिलायी जाती है। साफ चोकर को उसके छह गुने पानी में मिलाकर आधा घण्टे तक उबालने से चोकर की चाय तैयार हो जाती है। सुस्वादु बनाने के लिए उसमें शहद, चीनी अथवा नींबू का रस भी मिलाया जा सकता है। इसका एक प्याला प्रातः-सायं पीने से स्वस्थ व्यक्तियों को भी काफी लाभ होता है। इसका उपयोग कई व्यक्ति बाज़ार में मिलने वाली चाय के स्थान पर करने लगे हैं। एक ओर जहाँ यह पेय बाल वृद्ध-युवा सभी के लिए स्फूर्तिदायक सिद्ध हुआ है वहीं यह पीने वालों को गले की खराश, सर्दी, जुकाम आदि से भी बचाता है।

गेहूँ के वजन का पाँचवां भाग चोकर होता है परन्तु इस पाँचवें भाग में गेहूँ के सभी पोषक तत्वों का तीन चौथाई हिस्सा समाया होता है। इसका रासायनिक विश्लेषण करने पर पता चला है कि मामूली चोकर में 3 प्रतिशत चिकनाई, बारह प्रतिशत प्रोटीन तथा एक तिहाई भाग स्टार्च होता है। चूने और अन्य खनिज लवणों की मात्रा भी उसमें काफी होती है। एक पौण्ड चोकर वाले आटे में चार ग्रेन चूना होता है, जो शरीर की आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त है। आटे का चोकर निकाल दिये जाने पर उसका चूना निकल जाता है। स्मरणीय है चूना शरीर के लिए अत्यावश्यक है। प्राकृतिक रूप से यह आवश्यकता पूरी न होने पर शरीर के कई अंगों को पोषण नहीं मिल पाता। दन्त क्षय का रोग चूने के अभाव में ही होता है। अपने भोजन में बारीक छने आटे अथवा मैदे का प्रयोग करने वालों के दाँत अन्य लोगों की अपेक्षा जल्दी गिरते हैं अथवा खोखले हो जाते हैं।

डा. एम. बुज ने शोध परिणामों द्वारा बताया है कि आटे से चोकर निकाल देने पर उसका आधा लौह तत्व समाप्त हो जाता है। मैदे में तो यह तत्व इससे भी कम रह जाता है। ऐसे आटे में से पोटैशियम का तीन-चौथाई भाग, फास्फोरस का अस्सी प्रतिशत भाग तथा कैल्शियम का आधा भाग निकल जाता है जो शरीर और स्वास्थ्य के लिये निश्चय ही अपोषणकारी है।

स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य सन्तुलन और विजातीय तत्वों में चोकर महत्वपूर्ण भाग अदा करता है। कोष्ठ शोधन में तो यह हरी सब्जियों तथा फलों की तुलना में भी ज्यादा अच्छा साबित हुआ है। कोष्ठ शुद्धि के लिए उपयोग में लाई जाने वाली ज्यादा अच्छा साबित हुआ है। कोष्ठ शुद्धि के लिए उपयोग में लाई जाने वाली दवाओं की तरह यह आँतों को उत्तेजित नहीं करता, बल्कि उन्हें बल और स्फूर्ति प्रदान कर सुचारु रूप से कार्य चलाने में मदद देता है। अतः यह ध्यान रखना चाहिए कि जो आटा हम काम में लाते हैं उसमें से चोकर निकाला नहीं गया हो।

एक और अद्भुत निष्कर्ष वैज्ञानिकों ने विषद अनुसंधान द्वारा निकाला है यह विज्ञान जगत को नयी दिशा देने वाला हो सकता है। हैदराबाद के पोषण अनुसंधान केन्द्र के अनुसार चोकर में कुछ ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो जीन्स की संरचना पर प्रभाव डालते हैं। कोलोन के अतिघातक कैंसर को रोकने में, मधुमेह जैसी महाव्याधि में व्यापक परिवर्तन लाने में तथा रक्त का कोलेस्टाॅल कम करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका देखी गयी है। पाया यह भी गया है कि यह शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाकर इम्यूनोग्लोबुलीन्स की मात्रा रक्त में बढ़ाता है। ऐसी स्थिति में दमा, एलर्जी एवं एड्स जैसे रोगों में भी इसकी उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता। चोकर को आटे का निस्सार भाग मानकर फेंकने के बजाये उसका यदि हम सदुपयोग करना जारी कर दें तो यह एक अमृतोपम औषधि की भूमिका निभा सकता है।


सच्चा संकल्प(Kahani)

एक लड़के ने निश्चय किया कि वह बी.ए. करते ही देश सेवा के कामों में लगेगा। पर जब उसके बहुत अच्छे नम्बर आये और विलायत जाने की छात्रवृत्ति मिली, तो घर वाले उसे संकल्प छोड़ने के लिए दबाने लगे। लड़के को अपने वचन का स्मरण रहा, उसने मॉर्डन रिव्यू अख़बार निकाला और रवीन्द्र बाबू का सारा साहित्य प्रकाशित करके देश की महत्वपूर्ण सेवा की। इस लड़के का नाम था रामानन्द चटर्जी। अपने परिवार के इस हीरे से प्रेरणा लेकर उनके पिता व बड़े भाई ने भी स्वयं को देश सेवा के लिए न्यौछावर कर दिया। यह सच है कि जलते दीपक से अनेक दीपक जल उठते हैं और अँधेरी अमावस को उजाले में बदल देते हैं।


अपना अपना चुनाव

दोनों की परिस्थितियाँ एक जैसी थी। दोनों एक ही गाँव के आस पास झोपड़ी बना कर रहते थे। माता पिता के देहान्त के बाद उन दोनों का गुजारा जंगल की लकड़ियाँ काट कर बेच लेने से हो जाता था। परिस्थितियों की इस समानता के बावजूद उन दोनों की रुचियों, प्रवृत्तियों, विचारों, आकांक्षाओं में पर्याप्त अंतर था।

एक शाम वे जंगल से लकड़ियाँ लेकर जा रहे थे, उनमें से एक ने कहा - काश ! हम भी कुछ पढ़े लिखे होते, शास्त्रों का अध्ययन चिंतन किया जाता तो जिन्दगी का स्वरूप कुछ और होता।

क्या बेकार की बात करते हो विवेक! पढ़ाई लिखाई तो अब हमें क्या करना। भगवान से प्रार्थना करो कि कही से गढ़ा हुआ धन मिल जाये जिससे बाकी जीवन आराम से बीत सके, वैभव हमेशा की तरह उसकी बात काट कर बोला।

अचानक किसी आदमी की तेज चीख सुनकर वे चौक पड़े, लगता है कोई मुसीबत में है, हमें उसकी सहायता करनी चाहिए विवेक बोला और वे लकड़ी के गट्ठे वही एक ओर रखकर अपनी कुल्हाड़ी लेकर चीख की दिशा में दौड़ पड़े। वहीं कुछ दूर जाकर उन्होंने एक भयानक दृश्य देखा। शिकारी के समान दिखने वाले एक व्यक्ति पर एक चीते ने आक्रमण कर दिया था। शिकारी बुरी तरह छटपटाते हुए चीख रहा था।

उन्होंने तुरन्त आगे बढ़कर चीते पर कुल्हाड़ी का वार किया। अचानक हुए इस वार से चीता घबरा गया और घायल हो कर जंगल की ओर भाग गया। अब दोनों घायल व्यक्ति को लेकर गाँव की ओर चल पड़े। उसी वक्त घायल व्यक्ति को ढूँढ़ते हुए कोई सिपाही जैसा व्यक्ति वहाँ पहुँच गया।

“ वे रहे महाराज! महाराज आप ठीक तो हैं।”

पास आते ही उनमें से एक ने पूछा।

“ हाँ अब हम ठीक ही है। यदि ये बहादुर युवक हमें न बचाते तो न जाने हमारा क्या हाल होता।”

शिकारी जैसे व्यक्ति ने कराहते हुए उत्तर दिया।

“शाबाश नौजवानों ! अपने राज्य के महाराज के प्राण बचाकर तुमने सारे राज्य पर ही उपकार किया है।” सिपाही बोला।

‘ महाराज !’ विवेक ओर वैभव दोनों ही चौक पड़े। “ हाँ हम शिकार का पीछा करते हुए अपने सिपाहियों से बिछुड़ गये थे, तभी चीते ने हम पर आक्रमण कर दिया। तुम्हारी शाबाशी केवल बहादुरी के योग्य नहीं बल्कि पुरस्कार देने योग्य भी है। कल सुबह हम तुम्हें राजमहल में आने का निमंत्रण देते हैं, वहाँ तुम्हें मुँह माँगा पुरस्कार देकर सम्मानित किया जायेगा।” शिकारी जैसे व्यक्ति ने कहा।

दूसरे दिन वे ठीक समय पर राजमहल पहुँच गये। महाराज ने सचमुच ही उनका भरपूर सम्मान किया और मुँह माँगा पुरस्कार देने के लिए कहा। “महाराज ! यदि आप प्रसन्न है तो मुझे दस हजार मुद्राएँ दे दीजिए, जिससे कि मुझे अपनी गरीबी से छुटकारा मिल सके।” वैभव ने हाथ जोड़कर कहा।

“महाराज ! मेरी अभिलाषा बचपन से सत्पुरुषों की संगति में ज्ञान प्राप्त करने की रही है। परन्तु आज तक ऐसा हो न सका। यदि आप मुझ पर प्रसन्न है तो मेरी यह इच्छा पूरी करा दें।” विवेक ने अपने मन की बात कह सुनायी।

महाराज ने वैभव को दस हजार मुद्राएँ दे दी और विवेक को राजगृह आचार्य देवल के आश्रम भेजने की व्यवस्था कर दी। विवेक से अलग होना वैभव को काफी खल रहा था, साथ ही उसे उसकी अक्ल पर तरस भी आ रहा था। चलते समय वह बोला, “अभी भी सोच ले विवेक यह तुमने क्या माँगा। अभी भी समय है महाराज से स्वर्ण मुद्राएँ माँग लो और मेरे साथ गाँव चलकर आराम से रहो।” वैभव ने अपनी सलाह प्रकट की।

“नहीं मित्र ! मैंने अपनी आवश्यकता के अनुसार ठीक ही माँगा है। ज्ञान प्राप्त के बाद मैं तुमसे मिलने गाँव जरूर आऊँगा, तब तक के लिए विदा दो।” यह कहकर विवेक ने महर्षि देवल के आश्रम की ओर प्रस्थान किया। समय, पल, क्षण, दिवस, मास, वर्ष की अपनी यात्रा पूरी करता गया। कब बारह वर्ष बीत गये पता ही नहीं चला। इस बीच विवेक ने महर्षि देवल के आश्रम में कठोर तप साधना के बाद अपना विद्याध्ययन पूरा कर लिया। तत्वदर्शी विद्वान के रूप में उसकी ख्याति चारों ओर फैलने लगी थी। जीवन के अनगिनत रहस्यों का उसने अनुभव कर लिया था।

साधना और अध्ययन पूरा कर लेने के बाद वह अपने मित्र से मिलने गाँव की ओर चल पड़ा। गाँव पहुँचकर उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वैभव अभी भी उसी टूटी फूटी कुटी में दिन बिता रहा था। “ यह क्या वैभव तुम ओर इस हालत में ?”

वैभव यकायक उसे पहचान न सका, बस हाथ जोड़कर उसके सामने खड़ा हो गया।

“ अरे ! मुझे नहीं पहचाना ? मैं विवेक हूँ तुम्हारा मित्र।”

“ विवेक तुम !” वैभव तुरन्त ही उसके गले से लिपट गया। साथ ही उसकी आँखों में आँसू आ गये।

“ क्या बात है वैभव ! तुम तो महाराज से पर्याप्त धन लेकर लौटे थे। फिर भी ऐसा ........क्या किसी ने रास्ते में स्वर्ण मुद्राएँ लूट ली थीं।” विवेक ने पूछा।

“ नहीं विवेक ! धन ने मुझे लूट लिया। समझदारी के अभाव में मैं धन का सही सदुपयोग नहीं कर सका। धन मिलने के साथ मेरे मन में कुसंस्कार मुझ पर हावी होने लगे। गलत संगति के कारण विलास प्रियता भी बढ़ी। देखते देखते सारा धन समाप्त हो गया। साथ ही चौपट हो गया स्वास्थ्य। अब तो केवल पछतावा ही बाकी बचा है।”

विवेक, वैभव की पीड़ा समझ रहा था। उसने उसे समझाते हुए कहा “ मित्र ! वास्तविक सम्पदा जीवन है। जो इसका उचित उपयोग करना सीख सका, वह संसार की उचित संपदाओं का उपयोग कर सकता है। पछतावा छोड़ो बचे हुए जीवन को सँवारने का प्रयत्न करो शेष अपने आप सँवर जायेगा।”

“ तुम ठीक कहते हो विवेक ! आज से समझ सका हूँ वैभव और विवेक की जोड़ी में विवेक का महत्व ही अधिक है और हमेशा रहेगा। तुम्हारा सान्निध्य पाकर मुझमें फिर से नव जीवन का संचार होने लगा है।


अपनों से अपनी बात- - संस्कार महोत्सव क्यों ? किसलिए ?

भारतवर्ष के बारे में उक्ति बारम्बार पढ़ने में आती है कि यहाँ विश्व वसुधा पर कभी तैंतीस कोटि देवता निवास करते थे। यदि तैंतीस कोटि देवताओं की गणना की जाये तो सभी शास्त्रों के, श्रुति-स्मृतियों के पन्ने पलटने के बाद एक हजार तक ही नाम मिल पाते हैं। तैंतीस कोटि देवताओं से संभवतः हमारी संस्कृति पुरुषों का आशय था कि परिष्कृत, सुसंस्कृत, मनोविज्ञान वाले, देवत्व को आचरण में उतारने वाले नरपुरुष इतनी बड़ी संख्या में इस पृथ्वी पर थे। नरपशु से पशु प्रवृत्तियों में निरत पेट-प्रजनन की सीमा में बद्ध स्वार्थान्धता से भरी मनःस्थिति से नर एवं देव मानव बनने की विकास यात्रा की चर्चा हमारे यहाँ की जाती रही है---------------------------- एवं सही अर्थों में यही मनुष्य की वास्तविक प्रगति या चेतनात्मक विकास की प्रक्रिया में सुसंस्कारिता का समावेश किस सीमा तक हो सका,------------------------------ यही संभवतः हमारी देव संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण शिक्षण विश्व मानवता के लिए रहा है एवं इसी धुरी पर मानवी वरिष्ठता का सारा ढाँचा हमारे ऋषिगणों ने खड़ा किया । संभवतः यही एक विलक्षण अनुदान के रूप में ‘संस्कार प्रक्रिया ‘ के नाम से पूरी विश्व वसुधा में मात्र हम लोगों के पास भारतीयों के लिए एक थाती की तरह है।

तत्त्ववेत्ता, दूरदर्शियों हमारे ऋषिगणों ने मानवी प्रवृत्ति को सही दिशा देने के लिए संस्कारों को जीवन में समावेश की प्रक्रिया को एक अपरिहार्य आवश्यकता के रूप में और उसे जीवन जीने के लिए एक विद्या के रूप में विकसित कर भारतीय जीवन पद्धति का एक अनिवार्य अंग बना दिया। यही कारण था कि भारत भूमि की आँख से देव मानवों का उत्पादन कभी बन्द नहीं हुआ। महामानवों के कल्पवृक्षों से तुलना की जाती रही है। वे स्वयं धन्य बनते और असंख्यों को कृतकृत्य बनाते हैं। ऐसे ही भूसुरों के कारण संस्कृति की महत्ता का गान गाया जाता रहा है तथा संस्कारों के माध्यम से उसका दूसरा जन्म ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुआ बताया गया है। क्या है ये ‘संस्कार’ एवं संस्कृति के महत्व के पक्ष में इतनी प्रधानता क्यों दी गयी है? मीमांसा दर्शन में महर्षि जैमिनी कहते हैं - ‘कर्मबीजं संस्कार’ अर्थात् संस्कार ही कर्म का बीज है एवं वही सृष्टि का आदि कारण है। जीवन सर्वथा संस्कारों का दास है, यह मान्यता हमारे वैदिक ऋषियों की थी। उनका कहना था कि मनुष्य का चित एक ऐसा गोदाम है, जिसमें अच्छे बुरे सभी प्रकार के संस्कारों का संग्रह रहता है। यदि श्रेष्ठ कर्म होगे, श्रेष्ठ की संगति होगी तो संस्कार भी श्रेष्ठ स्तर के संग्रहित होते चले जायेंगे। आज के समाज में सबसे बड़ी समस्या यही है कि समाज में संस्कार लुप्त होते चले गये हैं। सारा मानव समुदाय एक प्रकार का कुसंस्कारी बन गया है। व्यष्टि संस्कार पूरी समष्टि को, समाज व संसार को प्रभावित करते हैं। जैसे व्यक्ति के परिवार के संस्कार होंगे वैसा ही तत्कालीन समाज का स्वरूप होगा। यदि हमें आस्था संकट से लड़ना है तो समाज के ढाँचे को बदलना होगा, पूरे युग का नव निर्माण करना होगा, तो हमें संस्कार युक्त मानवों के निर्माण के तंत्र को गतिशील करना होगा।

परमपूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य एवं शक्तिस्वरूपा माता भगवती देवी शर्मा ने जीवन भर सुसंस्कृत व्यक्ति, परिवार एवं समाज के निर्माण के लिए कटिबद्ध होकर पुरुषार्थ किया। गायत्री परिवार उसी पुरुषार्थ की देन है। अनपढ़ को सुगढ़ बनाने के लिए रसायन के रूप में गायत्री महाशक्ति को जन जन तक पहुँचाने का संकल्प युग ऋषि पूज्यवर ने किया एवं गायत्री महाविद्या, जो लुप्त होती चली जा रही थी, को करोड़ों नर नारियों तक पहुँचा दिया। गायत्री प्राण विद्या है, मधुविद्या एवं सामूहिक मन को सुसंस्कृत बनाने हेतु एक विलक्षण रसायन है हमारी गुरुसत्ता ने अपने निज के तप पुरुषार्थ एवं व्यवहारिक प्रयोगों द्वारा यह प्रमाणित कर दिखाया कि गायत्री महाशक्ति के तत्त्वज्ञान एवं साधना प्रयोग विधानों में अध्यात्म का सार निहित है। उत्कृष्ट चिंतन की पृष्ठभूमि बनाने वाली गायत्री महाविद्या एक प्रकार से अमृत है। पारस भी और कल्पवृक्ष भी। साथ ही उनने यज्ञ का तत्वदर्शन एवं विज्ञान के रूप में धर्म की सारी शिक्षाएँ समुदाय के समक्ष रख दीं। परमार्थ के लिए किये गये सत्कर्म के रूप में यज्ञ विद्या को हमारी गुरुसत्ता ने ‘जाग्रत जीवान्त पुरोहितो’ के रूप में सक्रिय कार्यकर्ताओं के माध्यम से जन जन के लिए सुलभ बना दिया। स्वयं की अनूठी एवं विलक्षण प्रयोगशाला भी यज्ञ विज्ञान पर वैज्ञानिक अनुसंधान हेतु एवं यज्ञोपैथी चिकित्सा के रूप में ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान को विनिर्मित कर दिया। आज ‘ग्रामें ग्रामे यज्ञःगृह गृहे गायत्री उपासना’ की जो शृंखला चल पड़ी है, वह यही प्रमाणित करती है कि देवसंस्कृति -----------------------------------दो आधार स्तम्भों के अंतर्गत आता है। कोई भी संस्कार हमारे यहाँ बिना मंत्र शक्ति एवं यज्ञ ऊर्जा के समन्वित किये पूर्ण नहीं होता। देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत विगत पाँच वर्षों में अनगिनत संस्कार अब तक संपन्न हुए। 27 अश्वमेध महायज्ञों एवं युगसंधि महापुरश्चरण की पूर्णाहुति आँवलखेड़ा में संपन्न हुई। हमारी ऋषि संस्कृति की एक आध्यात्मिक विरासत संस्कार प्रक्रिया को पूज्यवर ने जिस प्रकार विज्ञान सम्मत एवं प्रामाणिक बनाकर रख दिया एवं जीवन के व्यवहारिक सूत्रों के साथ गूँथ दिया, यह इस युग में अपने आप में एक अभिनव प्रयोग है। अब उसी संस्कार प्रक्रिया देवसंस्कृति दिग्विजय के क्रम में एक वर्षीय अनुयाज पुनर्गठन प्रक्रिया के बाद संस्कार महोत्सव के रूप में सारे भारत में एवं विश्व में संपन्न किया जाना है। इसका एक उद्देश्य है कि हमारी मातृभूमि के प्रसुप्त संस्कारों को यज्ञ ऊर्जा में तपाकर प्राणवान नागरिकों के रूप में विनिर्मित करना। अब इन्हीं संस्कार महोत्सवों के माध्यम से 21वीं सदी का स्वागत किया जायेगा।

वस्तुतः संस्कार विहीन होकर मानवीय गरिमा के अनुरूप जीवन जीने का अधिकार जो खो दे, स्वयं को गिरा दे, उन्हें हमारे ऋषियों ने उपालभ्य के रूप में व्रात्य शब्द से संबोधित किया है। ‘संस्कार’ ही नरपशु को नरमानव को गरिमा पद प्रदान करके उसके विकास की प्रक्रिया बलवती बनाते हैं। पारिभाषिक शब्दावली के अनुसार व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं अध्यात्मिक परिष्कार के निमित्त जो आध्यात्मिक अनुष्ठान संपन्न किया जाता है, उसे संस्कार कहते हैं। गौतम धर्मसूत्रों के अनुसार संस्कार उन्हें कहते हैं, जिनसे दोष हटते हैं और गुणों का उत्कर्ष होता है। मानवी व्यक्तित्व के सर्वांगपूर्ण नव निर्माण के परिष्करण हेतु जन्म के पूर्व से अंत तक हमारी संस्कृति में संस्कारों का प्रावधान है। आत्मा की नश्वरता एवं पुनर्जन्म पर विश्वास रखने वाले पुरोधा ऋषि इस आत्मा के जन्म लेने से पूर्व से काया छोड़ने के बाद तक भी उसे कषाय-कल्मषों से मुक्त करते रहने हेतु संस्कारों की महत्ता प्रतिपादित करते आये हैं।

धातुएँ मिट्टी में छिपी रहती है। इस मिट्टी की विधान के अनुसार संस्कारों द्वारा शोध कर उससे लोहा, ताँबा, सोना, आदि बहुमूल्य धातुएँ प्राप्त कर लेता है। आयुर्वेदिक रसायन बनाने वाले औषधियों को कई प्रकार के रसों से मिश्रित कर उन्हें गजपुट, अग्निपुट विधियों द्वारा कई-कई बार तपाकर संस्कारित कर उसने मकरध्वज जैसी चमत्कारिक एवं अनन्य औषधियों का निर्माण करते हैं, ठीक उसी प्रकार मनुष्य के लिए समय-समय पर विभिन्न आध्यात्मिक उपचारों का विधान कर उसे सुसंस्कृत बनाने की, अनगढ़ से सुगढ़ बनाने की महत्वपूर्ण पद्धति तत्त्ववेत्ता ऋषियों ने विकास की थी, इसी को षोडश संस्कार कहा जाता है। ऋषिगण जानते थे कि सुसंस्कारित किये जाने से मनुष्य के संचित कुसंस्कार नष्ट होते हैं तथा इन सूक्ष्म संस्कारों द्वारा जीवन के मार्मिक महत्वपूर्ण अवसरों पर विशिष्टता का, देवत्व का अभिवर्द्धन किया जा सकना संभव है।

भारतीय संस्कृति में मानव जीवन को आत्मा की विराट यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना गया है इसलिए ऋषिगणों ने इस व्यवस्था--------- द्वारा मनुष्य के गर्भ में आते ही आत्मा पर छाये मलीनता के कषाय-कल्मषों को हटा दिया जाये------------------ और संस्कार प्रक्रिया को यदि इस प्रकार एक ऋषिप्रणीत आध्यात्मिक चिकित्सा पद्धति कहा जाये तो अत्युक्ति नहीं होगी।

परम्परागत ढंग से चले आ रहे सोलह संस्कारों में से मात्र दस को रख कर युगऋषि पूज्य गुरुदेव ने आज की दृष्टि से अनिवार्य एवं व्यवहारिक मानते हुए दो नये संस्कार जन्म दिवस और विवाह दिवस जोड़कर कुल 12 संस्कारों से धर्मतंत्र से लोकशिक्षण प्रक्रिया के अंतर्गत प्रचलित किया है। ये हैं - 1.पुंसवन 2.नामकरण 3.अन्नप्राशन 4.मुँडन 5.विद्यारंभ यज्ञोपवीत-उपनयन 7.विवाह 8.वानप्रस्थ 9.अन्त्येष्टि 10.मरणोत्तर 11.जन्मदिवस 12.विवाह दिवस। शिखा स्थापन तथा गुरुदीक्षा संस्कार भी इन्हीं के खण्ड उपखण्ड में हैं जो उनके साथ व्यापक स्तर पर प्रचलित किये गये। सभी संस्कारों का ज्ञान अनिवार्य है, साथ ही लोकशिक्षण भी ताकि उनके महात्म्य को समझ कर प्रेरणाओं को हृदयंगम किया जा सके। यहाँ केवल एक ही महत्व पर प्रकाश डाला जा रहा है। प्रत्येक संस्कार के मूल में ऐसा ही वैज्ञानिक प्रतिपादन है। पुंसवन संस्कार गर्भस्थ शिशु के समुचित विकास के लिए तब सम्पन्न किया जाता है जब शिशु के भौतिक शरीर का विकास प्रारम्भ हो जाता है। तीसरे माह में गर्भ में आकार और संस्कार जब दोनों अपना स्वरूप बनाने लगते हैं, सामान्यतः उसे सम्पन्न किया जाता है। आज मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य दोनों ही विषम स्थिति में पाये जाते हैं। प्रायः एक लाख में से एक हजार में से 10 से अधिक बच्चे एक वर्ष की आयु पहुँचने तक मर जाते हैं। इसका कारण मातृ एवं शिशु कल्याण की पर्याप्त व्यवस्था का न होना है। साथ ही उन संस्कारों का भी हास होते चले जाना तो विज्ञान सम्मत ढंग से सम्पन्न कराये जाते हैं। सुरक्षित सुसंस्कृत मातृत्व के लिए पुंसवन संस्कार अनिवार्य है। इस संस्कार में वटवृक्ष, गिलोय, पीपल जैसी वनौषधियों को सुँघाने के पीछे ऋषियों का आयुर्वेदिक अनुभव ही मूल है। गर्भपात न हो, श्रेष्ठ स्वस्थ बच्चा जन्में इसीलिए इस औषधि को आँतरिक -----------------गर्भपात के माध्यम से सभी परिवारजनों द्वारा गर्भस्थ शिशु तक एवं माता------------- की आश्वासनता दी जाती है। ---------------- सुसंस्कारित एक विशेष चरु पदार्थ क्षीर रूप में गर्भिणी को सेवन कराया जाता है। क्या स्वाध्याय किया जाये एवं साधनात्मक मनोभूमि विकसित कर आहार विहार का नियमन कर कैसे स्वस्थ, सुसंस्कृत संतति को जन्म दिया जाये, इसकी पूरी व्यवस्था उस संस्कार में है। गायत्री परिवार के द्वारा सुव्यवस्थित पौरोहित्य व्यवस्था के माध्यम से यह कर्मकाण्ड अब बड़े व्यापक रूप से सम्पन्न किया जाता है। 21वीं सदी में यदि मातृसत्ता को स्वस्थ देखना चाहते हैं, उसकी संख्या में तेजी से आ रही कमी को रोकना चाहते हैं एवं उनका उनके गर्भकाल में होने वाली आनुवंशिक व्याधियों में शिशुओं को रोगी होने से बचाना चाहते हैं तो यह संस्कार ही इस प्रक्रिया के लिए सम्पन्न कराया जाना अनिवार्य माना जाना चाहिए। भविष्य की -------------रोगमुक्त, संस्कार वान श्रेष्ठ महामानवों को ही,---------------- इसके लिए यह संस्कार जरूरी है।

पिछले दिनों वैज्ञानिक अनुसंधानों में विभिन्न असाध्य व्याधियों जिसमें कैंसर भी शामिल है तथा उच्च रक्तचाप से लेकर मानसिक अवसाद जैसे मनोविकार का मूल कारण, गुणसूत्रों के आये दोषों को ठहराया है। कैंसर के लिए एक जीन पी-53 की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। जिसमें यह बाल्यावस्था से ही स्वस्थ स्थिति में रहता है कैंसर रोग को जीवन में कभी-कभी ही आने देता है। यदि पुंसवन सहित अन्य संस्कार, यज्ञ प्रक्रिया के साथ विधिवत् सम्पन्न होते रहें तो सभी गुणसूत्र पुष्ट बने रहें। जिससे न केवल कैंसर बल्कि अनेकानेक व्याधियों से मनुष्य को बचा कर उसके शरीर व मन के विकास की प्रक्रिया को गतिशील बनाया जा सकता है। यह अनुसंधान हमारे ऋषिगण आज से सहस्रों वर्ष पूर्व कर चुके थे। आज पुनः यही सत्य स्थापित किया जा रहा है।

वस्तुतः देखा जाये तो प्रत्येक संस्कार के मूल में ऐसे वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक सूत्र हैं, जिन्हें दृष्टिगत रख कर इनकी उपयोगिता पर किसी प्रकार का संदेह किसी को रहना नहीं चाहिए। संस्कार समारोह महोत्सव जो आज 107 कुण्डीय यज्ञों के साथ स्थान-स्थान पर सम्पन्न हो रहे हैं इसी लक्ष्य को दृष्टिगत रखकर निर्धारित किये गये हैं। भारतवर्ष में कुल 400 जिले हैं। इनमें प्रायः अढ़ाई सौ तक गायत्री परिवार पहुँच गये हैं। गायत्री एवं यज्ञ के पर्याय के रूप में गायत्री परिवार को जाना जाता है। इन क्षेत्रों में अब भूमि वातावरण तथा नरमानवों में सुसंस्कारों को जगाने के लिए संस्कारों को सघन स्तर पर कार्यान्वित करना हम सबका महत्वपूर्ण कर्तव्य है। इससे भी अधिक दुःसाध्य एवं प्रचण्ड पुरुषार्थ वाला कार्य यह है कि शेष बचे 150 जिले जो पूर्वोत्तर भारत के सात प्रान्तों, दक्षिण के चार प्रान्तों, महाराष्ट्र का दक्षिण भाग आदि में यह कार्य सम्पन्न किया जाये। इस वर्ष यही बीड़ा हाथ में लिया गया है और ऐसे ही अछूते क्षेत्रों को गायत्री महाविद्या की शब्द ऊर्जा से यज्ञ की तप ऊर्जा से अनुप्राणित कर संस्कृति की भागीरथी में सबको स्नान करा दिया जाये। आश्वमेधिक दिग्विजय के उपक्रम में यह उपसंहार वाला पक्ष जो युग संधि महापुरश्चरण की पद्धति की द्वितीय पूर्णाहुति तक 2001 के वसंत तक अनवरत चलता रहेगा निश्चित ही देव भूमि को यह वैभव प्रदान करेगा जो उसे जगद्गुरु के रूप में प्राप्त था। यजुर्वेद का कथन - ‘सा प्रथमा संस्कृति विश्वधारा’ पुनः अपनी पुनरावृत्ति करने जा रहा है। संस्कारों के जागरण और संधिकाल की इस विषम बेला में आस्था संकट की विभीषिका हेतु अनिवार्य पाथेय प्रदान कर सकेगा। सूक्ष्म जगत जहाँ तेजी से प्रदूषित होता जा रहा है, साँस्कृतिक स्तर पर जन-जन के मन में जहाँ विकृति ही विकृति दिखाई देती है, समाधान मात्र देवसंस्कृति के उन उपचारों से मिल सकता है। गायत्री परिवार के प्रयास अपने दोनों ही आराध्य सत्ताओं के सूक्ष्म संरक्षण में इस दिशा में गतिशील हैं। सभी भविष्यवेत्ता यह बड़े दावे के साथ कह रहे हैं कि 21 वीं सदी के आने वाले दस वर्षों में साँस्कृतिक आध्यात्मिक चेतना ही सारे विश्व का नेतृत्व करेगी और यह प्रक्रिया भारत के माध्यम से सम्पन्न होगी। हम सभी को इस प्रक्रिया को बलवती बनाने के लिए अपने प्रयासों को अब तीव्र गति देना चाहिए एवं 21वीं सदी उज्ज्वल भविष्य की युगऋषि की घोषणा को स्वीकार करके दिखा देना चाहिए।


घमंडी कबूतर (Kahani)

कबूतर को घोंसला बनाना नहीं आता था। अतः जब भी कबूतरी अण्डे देती तो गिरकर टूट जाते। एक दिन कबूतरी ने कबूतर से कहा - क्यों न चिड़ियों से मिलकर घोंसले को बनाने की विधि जान ली जाये? थोड़े बहुत न-नुकुर के बाद कबूतर ने बात मान ली।

कबूतरी जब चिड़ियों के पास गयी तो उन्होंने खुशी-खुशी घोंसला बनाने की विधि सिखाने की स्वीकृति दे दी। अभी वहाँ पहुँचकर चिड़ियों ने घोंसला बनाना प्रारम्भ किया था कि कबूतर ने कहा ऐसा तो हमें भी बनाना आता है। ऐसा तो हम ही बना लेंगे। बेचारी चिड़ियाँ वापस चली गयी।

कबूतर ने कुछ कोशिश की पर घोंसला ठीक से नहीं बना। कबूतरी बेचारी पुनः चिड़ियों के पास गयी ओर बोली - कृपया फिर से मदद कर दें। हमसे घोंसला नहीं बना। खीझती हुई चिड़ियाँ फिर आकर सिखाने लगीं। अभी शुरुआत की थी कि कबूतर फिर बीच में आ धमका ओर बोला अरे यह तो हम भी जानते हैं ऐसा बनाने में भला क्या रखा है।

चिड़ियाँ फिर वापस लौट गयीं। कबूतर दिन भर लगा रहा किन्तु घोंसला न बन सका। अबकी बार कबूतरी फिर चिड़ियों के पास गयी और प्रार्थना करने लगी - बहिन मदद कर दीजिए इनसे घोंसला नहीं बनता।

लेकिन इस बार चिड़ियों ने जाने से साफ इनकार कर दिया और कहा - जो जानता भी कुछ नहीं और मानता भी किसी की नहीं, पर घमण्ड है कि मैं सब कुछ जानता हूँ, ऐसे अहंकारी मूर्ख को न कोई कुछ सिखा सकता है और न कभी वह कुछ सीख सकता है।


अपने अगले पड़ाव की तैयारी कर

राहगीर यहाँ ललचाई आँखों से मत देख। यह सराय है । तेरा घर तो बहुत दूर है। लम्बी मंजिल चलकर ही वहाँ तक पहुँचेगा।

यह सराय एक रात विश्राम के लिए है। सो यहाँ भले मानस की तरह प्रवेश कर, शालीनता के साथ रहकर सज्जनता के साथ अपना रास्ता पकड़।

भूल गया भुलक्कड़। ऐसी न जाने कितनी सराय में तू ठहर चुका। आगे लम्बी मंजिल पार करने के लिए कितनी ऐसी सराय में ठहरना पड़ेगा। ललचाने की आदत छोड़। मुसाफिर ठहरने की सुविधा को पर्याप्त न मानकर सराय पर अधिकार जताने लगे तो उसकी मूर्खता की चारों ओर निन्दा होगी।

सराय वाले को शुक्रिया अदा करें, जिसने रात ठहरने के लिए व्यवस्था की। सुविधापूर्वक रहा तो चैन की नींद सोएगा। इतना मिल गया बहुत है इसे अनुभव करके संतोष कर प्रसन्न हो कृतज्ञ बन और शाँति के साथ अगले पड़ाव की तैयारी कर।

गड़बड़ मत फैला। पलंग मेरा, कमरा मेरा, रसोईघर मेरा, बर्तन मेरे, कर्मचारी मेरे, सराय मेरी, मालिकी मेरी। मैं ही सबका मालिक, यह सारी सम्पत्ति मेरी है, इस पागल पन को छोड़? कोई सुनेगा तो क्या कहेगा? रात भर ठहरने वाला मूसाफिर सराय पर अपनी मालिकी जताता है। समझाने पर मानता नहीं। मेरी मेरी ही कहे चला जा रहा है। अरे भला यह सराय तेरा कैसे हो सकता है? यह बनाने वाले की है। यहाँ के कर्मचारी तेरी सम्पत्ति कैसे हो सकते हैं, इनका अपना अस्तित्व है । इन्हें खिलाने-सँभालने वाला कोई दूसरा है। मूर्ख बेकार की बकवास मत कर, सुनने वाले सुन लेंगे तो बुरी दुर्गति बनायेंगे।

बगीचा देख लिया सो ठीक, फूल सूँघ लिये तो ठीक, पर यह तेरे नहीं हैं। दूसरों की तरह तू भी देख ले, सूँघ लें और इतनी देर तक मोद मनाने के सौभाग्य का सराहता हुआ आगे बढ़ चल।

तेरा घर दूर है। उसकी मंजिल लम्बी है। अपनी मंजिल के मील गिन चलने को कमर कस। रास्ते में, जलपान का प्रबंध कर और हलका फुलका होकर चल। सराय की चीज उठाकर चलेगा तो बोझ से तेरी गर्दन टूट जायेगी, फिर कोई ले जाने भी क्यों देगा ?

नेक मुसाफिर यहाँ रहकर जब तक ठहरना है भलमनसाहत बरत, हँस और हँसा, प्यार दे और प्यार लें।

छोड़ सके तो ऐसी याद छोड़ जो जो सराहना के साथ पीछे वालों के मन में उठती रहे। ले जा सके तो यहाँ पवालारे की श्रद्धा और सद्भावना लेता जा। लेने और छोड़ने के लिए इतना ही काफी है। परदेशी मोह के जाल मत बुन। यहाँ न तो कोई तेरा है और न तु किसी का। रैन बसेरा में कितने आते हैं और रात ठहरते हैं, दूसरे दिन चले जाते हैं। रात भर हँस बोल लिए, मिल जुल कर रह लिया, यही क्या कम है। मैं उसका वह मेरा इस ममता से बँधेगा तो रोना और रुलाना ही पल्ले पड़ेगा। मत रो मत रुला, हँसते हुए रह और हँसता हुआ जा, इसी में तेरी गरिमा है।

मोह नहीं प्यार कर। मोह में बन्धन है, प्यार में मुक्ति। मोह अधिकार माँगता है, प्यार उत्सर्ग में संतुष्ट होता है। असंतोष छोड़ संतोष कर।

मनचले मचलना छोड़। जिस दुकान पर खिलौने दिखाई दिये वहाँ मचलने लगे, जिस दुकान पर मिठाई दिखाई पड़ी वहाँ अड़ गये, इस बचकाने पन से क्या करेगा ? यह मेला है, यहाँ सब कुछ अनोखा ही अनोखा है, देख और खुशी में उछलता-कूदता अपने घर की राह ले। यह जलपरी का बगीचा है, एक से बढ़कर एक फूल खिले हैं। देखने और खुश होने के लिए हैं, छूना और तोड़ना सख्त मना है। गलती करने वाले को सख्त सजा भुगतनी पड़ती है। मुसाफिर अपनी मंजिल को याद रख सफर के उद्देश्य को मत भूल। सरायों में ठहरता हुआ आगे बढ़ता चल। लालच किया और अधिकार जमाया तो बुरी तरह मारा जायेगा।

एक भूखा और बेहाल व्यक्ति पेरिस के प्रसिद्ध होटल दयोरोंतोंद में खाना खाने गया । काफी कुछ खा चुकने के बाद उसने वेटर से झिझकते हुए कहा - “मेरे पास पैसे नहीं हैं, मुझे राजनीतिक कारणों से निर्वासन भोगना पड़ रहा है। फ्राँस के अतिथि के तौर पर तुम मुझे बिल चुकाने लायक पैसे दे दो, मैं तुम्हें वापस लौटा दूँगा।” वेटर ने उसकी दुख भरी कहानी सुनकर उसे पैसे दे दिये।

यह अजनबी और कोई नहीं, अपितु महान रूसी क्राँतिकारी और बोल्शोविक दल के नेता लेनिन था। रूसी क्राँति और जारशाही के समाप्त हो जाने के बाद भी लेनिन को कर्ज की याद रही और उसने उस वेटर के पास रकम और ढेरों उपहार सधन्यवाद भिजवाये। लेकिन वेटर ने यह रकम हाथों-हाथ लौटा दी ओर कहा - “वह रकम मैंने एक भूखे तथा गरीब निर्वासित को उधार दी थी, न कि एक महान और शक्तिशाली राष्ट्र के शासक को।”

*समाप्त*