स्थायी मिलन का रहस्य

प्यार के अंकुरित होते ही पिया मिलन की हूक उठती है। छटपटाता दिल अपने प्रिय से मिलने के लिए तड़पता है। भावाकूल हृदय मिलते भी है पर हर मिलन उनमें एक अतृप्ति पैदा करता है। प्यास को बुझाने की बजाय उसे गहरा करता है। प्रत्येक मिलन के बाद उनकी छटपटाहट , बेचैनी और बढ़ती जाती हैं ऐसा इसलिए क्योंकि वे स्थायी मिलन के रहस्य से अनजान है।

प्यार इबादत है, आराधना है, उपासना है। इसके रहस्य को जान लिया जाय तो यह स्वयं परमेश्वर है। जो प्रेमी को पवित्रता, सजलता, शान्ति, एकात्मता और अनन्तता का वरदान देने से नहीं चूकता। प्रेम के रहस्य जानने वाला प्रेमी ‘रसो वै सः’ के तत्व को समझ कर स्वयं रसमय-परमेश्वरमय हो जाता है।

प्यार के अनेकों किस्से दुनिया में प्रचलित है। शीरी-फरहाद, लैला-मजनू, हीर-राँझा, रोमियो-जूलियट की अमर कथाएँ बड़े चाव से कही-सुनी जाती है पर प्रेम की रहस्यमयी महिमा को जानने वालों का मालूम है कि यह तो प्रेम-साधना का सिर्फ पहला चरण है, जिसे इन अमर विभूतियों ने अनुभव किया। परस्पर हित के लिए उत्सर्ग, स्वार्थ नहीं बलिदान इनका मूलमंत्र था, जिसे अपनाकर वे मानवीय प्रेम के चरम बिन्दु तक पहुँच सके।

प्रेमवादिनी मीरा का प्यार प्रेमसाधना का सर्वोच्च प्रकार था। उनके प्रियतम प्रभु श्री कृष्ण का उनके समय कोई स्थूल अस्तित्व न था। चर्मचक्षुओं से उन्हें न देख पाने पर भी भाव-साधना निरन्तर गहराती गयी। दैवी प्रेम से की गयी शुरुआत ईश्वरीय प्रेम के सर्वोच्च बिन्दु तक जा पहुँची। उन्होंने अपनी भावनाओं में यो माँ पश्यति सर्वत्र , सर्व च मयि पश्यति में निहित सत्य का अनुभव किया। चिरवियोग-चिरमिलन में बदल गया।

वह एक सत्य दे गयीं-प्यार में देह की क्या दरकार। प्यार तो भावनाओं में ही अंकुरित, प्रस्फुटित एवं विकसित होता है। यदि प्रिय को अपनी भावनाओं में पाने का यत्न किया जाय तो भावों की ऊष्मा अन्तः करण में हूक, छटपटाहट, हृदय के फट पड़ने की-सी अनुभूति देती है। बाह्य मिलन का हठ न करके यदि इसे धैर्यपूर्वक सह लिया जाय तो इस ताप में सारी वासनाएँ, जन्म-जन्मान्तर के सिंचित कुसंस्कार भस्म हो जाते हैं। पवित्र हुई मानवीय भावनाएँ का रूप ले लेती है और ईश्वरीय प्रेम के सर्वोच्च बिन्दु तक जा पहुँचती है।

अपने प्रिय आराध्य परमपूज्य गुरुदेव मीरा के कृष्ण की ही भाँति स्थूल में नहीं है, परन्तु भावुक भक्तों के भावजगत में हर पल उपस्थित है। प्रेमी साधक अपनी प्रेमसाधना में भावमय गुरुमूर्ति एवं भावमय परमेश्वर की अनन्तता में जब स्वयं को विलीन होते हुए अनुभव करता है, तब कबीर के स्वरों में गा उठता है, मन मगन भया फिर क्यों बोले।


सफलता की कुँजी ऐसे मिली

लगातार की असफलताओं ने महाराज सूर्यभानुसिंह को विचलित, परेशान कर दिया था। उनके पूर्वजों द्वारा अर्जित गौरव की आभा इन दिनों धुँधली पड़ गयी थी। उन्होंने अपने पिता द्वारा संचालित-शासित मिथिला राज्य की प्रतिष्ठा को देखा था। पूरे भारत में इसकी ख्याति थी। प्रजा भी उनके पिता महाराज का यशोगान करते नहीं थकती थी। लेकिन अब दिन बदल चुके थे। उनके शासन सँभालते ही जैसे सब कुछ बदल गया था। अतीत के गौरव की कहानी के अक्षर अब मिटने लगे थे। अब नगर में जहाँ-जहाँ लूट-पाट और हत्याएँ हो जाती थी।

वह प्रतापी थे, साहसी योद्धा थे। उन्हें न्याय और निर्भीकता प्रिय थी। विद्वानों, कलाकारों, गुणीजनों का सम्मान करना उन्हें आता था। परन्तु अपने सारे सद्गुणों के बावजूद वह प्रजा को अच्छा शासन नहीं दे पा रहे थे। उनके मन में सतत् ये सवाल गूँजता रहता -”आखिर ऐसा क्यों ?” किस कार्य को कब करूं ? कौन व्यक्ति सबसे महत्व का हो सकता है और कौन कार्य सबसे अहम् है?”

इन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर में कुशल व्यवस्था का रहस्य छुपा है। यह सत्य बार-बार उनके अन्तः करण में बिजली की तरह कौंध उठता था। यदि इन तीनों बिन्दुओं को ध्यान में रखकर प्रबन्ध कार्य किया जाए तो असफलता-सफलता में बदल सकती है। ऐसा उन्हें बार-बार लग रहा था।

परन्तु इन तीनों प्रश्नों को हल करेगा कौन ? यह एक प्रश्न था। उन्होंने अपने मंत्री एवं सेवक-सामंतों से विचार-विमर्श किया, लेकिन कोई निदान नहीं निकला। तब उन्होंने एक दूसरी तरकीब निकाली और समूचे राज्य में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो भी व्यक्ति मेरे तीनों सवालों का सन्तोषजनक उत्तर देगा, उसे मुँह माँगा पुरस्कार दिया जाएगा।

मुँह माँगे पुरस्कार को पाने की लालसा अनेकों को हुईं मिथिला नरेश सूर्यभानुसिंह के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए अर्थशास्त्री भी आए और वैज्ञानिक भी। सैन्य व्यवस्था के विशेषज्ञ भी इस क्रम में पधारे। किसी ने सैनिक गतिविधियों को ओर अधिक चुस्त-दुरुस्त करने की सलाह दी, तो किसी ने आर्थिक नीति में फेर-बदल करने का सुझाव दिया। लेकिन इन सबकी बातों में महाराज को अपनी समस्याओं का समाधान नहीं मिल पा रहा था।

तभी एक तयोतिषी पधारे। उन्होंने घड़ी -पल, मास-दिवस की गणना का जाल फैलाया। अपनी गणना करके उन्होंने मिथिला नरेश को सुझाव देना शुरू किया-अमुक कार्य को करने के लिए आपको अमुक मास, अमुक तिथि और अमुक योग की प्रतीक्षा करनी चाहिए। घड़ी-नक्षत्रों के चक्रव्यूह में महाराज को अपना दम घुटता जान पड़ा। उन्हें ज्योतिष से भारी निराशा हुई।

इन्हीं दिनों राजा को किसी ने बताया कि गौतम ताल के उस पार एक घना जंगल फैला हैं वहाँ एक महान अध्यात्मवेत्ता संन्यासी रहते हैं। जो हर किसी की समस्या का समाधान चुटकी बजाते कर देते हैं। निराशा के घने अँधेरे में उनके मन में एक आशा कि किरण झिलमिलाया। वे एक सैनिक टुकड़ी सजाकर वन प्रदेश की ओर चल पड़े। संन्यासी की कुटिया के मार्ग में सघन झाड़ी फैली थी। राजा को अपनी सवारी रोकनी पड़ी। वे पैदल ही कुटिया की ओर बढ़े। संन्यासी कुदाल थामे मिट्टी काट रहे थे। वृद्ध शरीर , पसीने से लथपथ और थकान के कारण हाँफ रहे थे।

सूर्यभानुसिंह इस दृश्य को देखकर हतप्रभ रह गए। रूढ़ियों और मूढ़ताओं से भरी इस दुनिया में यह व्यक्ति उन्हें अद्भुत लगा। उसके व्यक्तित्व से परिभाषित होता था-ईश्वर परायण श्रमशील जीवन में सच्ची आध्यात्मिकता है। उन्होंने कुछ पलों की चुप्पी के बाद अपने तीनों प्रश्न उनसे चुप रहे ।

इसी बीच एक विलक्षण घटना घटीं एक युवक बचाओ-बचाओ चिल्लाता हुआ कुटिया के भीतर घुसा। युवक की बाँह में ताजा जख्म था, जिससे खून टपक रहा था। राजा भागकर उसकी सहायता के लिए दौड़े। युवक बेहोश हो गया था। मिथिला नरेश उस घायल के उपचार में लग गए, अपनी चादर फाड़कर पट्टी बांधी , फिर मुख पर पानी के छींटे मारकर होश में आते ही युवक फफक पड़ा। बोला-”महाराज मैं तो आपका शत्रु था और आपकी हत्या के इरादे से झाड़ी में छुपा था, किन्तु आपके अंगरक्षकों ने देख लिया और ऐसी दुर्गति कर डाली।”

“तुम मेरी हत्या किसलिए करना चाहते थे बन्धु? “ राजा ने पूछा। युवक कहने लगा-”आपने रामसिंह को पिछले साल फाँसी चढ़वाई और उसकी सम्पत्ति जब्त की थी। यह अन्याय था। वे मेरे बड़े भाई थे।” अब राजा के समक्ष युवक के रोष का कारण स्पष्ट हो गया। रामसिंह को फाँसी बढ़ाने में सचमुच जल्दबाजी की गयी थी राजा ने अपना सकूर मान लिया और युवक को सान्त्वना

देते हुए बोले-’मैं और युवक को सान्त्वना देते हुए बोले-” मैं तुम्हारे भाई को जीवित तो नहीं कर सकता, मगर उनकी जब्त सम्पत्ति को वापस करता हूँ। तुम भी अब हमारे दरबार में रहोगे।”

मिथिला नरेश की विनम्रता और न्याय से युवक खुश हो गया। वह राजा का अनन्य सेवक बन गया। संन्यासी मुस्कुरा पड़े। राजा ने अपने प्रश्नों को पुनः दुहराया तो संन्यासी बोले-”राजनफ! आपके तीनों सवालों के जवाब तो तत्काल घटी हुई इसी घटना में निहित है। जब आप मेरे पास आए वही सबसे उत्तम समय था। यह भी समझिए कि उस वक्त सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति मैं था, क्योंकि यदि आप मेरे पास नहीं रुकते और यहाँ से चल देते तो वह युवक जरूर आपकी जाने ले लेता और सत्कार्य ही सबसे अहम् है, क्योंकि घायल की रक्षा और सहायता करके आपने पुराने शत्रु को मित्र बनाया है। “

संन्यासी के उत्तर से महाराज सूर्यभानुसिंह पुलकित हो उठे। उन्होंने उन महापुरुष के चरणस्पर्श करते हुए वापस लौटने की आज्ञा माँगी, तो उन्होंने सहर्ष अनुमति देते हुए कहा,”महाराज, हमेशा याद रखिएगा, सबने उपयुक्त समय वर्तमान होता है और सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति वही होता है, जो आपके समक्ष खड़ा होता है एवं सबसे अहम् कार्य वह सत्कार्य जो आरम्भ होकर चल रहा है।”


हमशक्लों के निर्माण की यह भेड़चाल क्या रुक पाएगी ?

(समापन किश्त)

पौराणिक उपाख्यानों में रघुवंश के युवनाश्व नामक एक राजा का प्रसंग आरण्यकों में ऋषिगण यज्ञ-प्रक्रिया के द्वारा विविध प्रकार के वैज्ञानिक प्रयोगों में निरत थे।एक ऐसा ही प्रयोग, वे विभिन्न रसायनों के सम्मिश्रण से यज्ञ द्वारा उन्हें पकाकर तथा अभिमंत्रित कर उस मिश्रण में प्राणतत्व पैदा करने के प्रयास के रूप में कर रहे थे। एक प्रकार से उसे अमैथुनी सृष्टि की दिशा में प्रयोगशाला में जीवन-तत्व के निर्माण की दिशा में किया जा रहा शोधकार्य कहा जा सकता है। ऐसे ही प्रयोगों के दौरान आखेट करते हुए राजा भटकते हुए ऋषियों के आश्रम में पहुँचे। विविध रसायनों से भरा एक घड़ा यज्ञ वेदी पर रखा था। प्रयोग अभी अधूरा था। रात्रि में ऋषिगण प्रयोग के बीच विश्राम करने हेतु वहीं सो गए। थके हुए युवनाश्व भी यज्ञमण्डप में वहीं जाकर सो गये। रात्रि में उन्हें प्यास लगी। नजदीक कहीं पानी ढूँढ़ने निकले तो उन्हें यज्ञ कुण्ड के समीप रखा घड़ा दिखाई पड़ा। प्यास रोकने की स्थिति में न होने व संकोचवश ऋषिगणों को न जगाने का विचार मन में रख उनने वही जल पी लिया। जल तो अभिमंत्रित रसायन था। उनकी सुप्तावस्था में वह उनके उदर में एक गाँठ के रूप में बढ़ता रहा। प्रातः उठते ही सबने युवनाश्व को देखा, घड़े के जल को कम पाया एवं युवनाश्व को पेट के दर्द से पीड़ित । वे समझ गए कि क्या हुआ।

ऋषिगणों ने युवनाश्व को प्रयोग की गहनता समझाई एवं उस गाँठ को जो निरन्तर बढ़ती जा रही थी ‘गर्भ’ बताया जो उनके उदर में पल रहा था। बाकाया रसायनों तथा जड़ी-बूटियों द्वारा चिकित्सा करते हुए वे उनकी देखभाल करते रहे। अन्त में पूर्ण विकास होने पर युवनाश्व की दाहिनी कोख की शल्य क्रिया कर एक बालक जीवित स्थिति में निकाला गया। यह बालक ही कालांतर में ‘मान्धाता’के नाम से प्रख्यात हुआ। इस कथा की प्रामाणिकता कितनी है, यह न देखकर यदि इसे आज के वैज्ञानिक प्रयोगों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो समझा जा सकता है कि हमारे ऋषिगणों ने अपनी अन्तर्प्रज्ञा के आधार पर वह ज्ञान प्राप्तकर लिया था, जिससे वे ‘पार्थिनोजेनेसीज’ प्रक्रिया द्वारा बिना निषेचन के भी संतति उत्पन्न कर सकते थे।

यह चर्चा विगत अंक में प्रकाशित ‘क्लोनिंग’ हमशक्ल निमार्ण की प्रक्रिया के संदर्भ में चल रही है, जिसमें ‘डॉली’ नामक एक भेड़ की चर्चा की गयी थी, जो वैज्ञानिकों ने एक वयस्क भेड़ की कोशिका से विनिर्मित करके दिखाई है। सामान्य स्थिति में जब प्रजनन की चर्चा होती है तो पुरुष की शुक्राणु कोशिका के 23 एवं स्त्री की डिम्ब कोशिका के 23 क्रोमोसोम के सेट्स के सम्मिश्रण से बने भ्रूण की चर्चा की जाती है, जिसमें 46 क्रोमोसोम होते हैं। यह भ्रूण जब गर्भाशय में स्थापित होता है तो स्त्री की डिंब कोशिका में विद्यमान स्वचालित व्यवस्थानुसार 46 क्रोमोसोम्स का जुगाड़ होते ही एक कोशिकीय भ्रूण कई कोशिकाओं में ‘माइटोसिस मीओसिस‘ प्रक्रिया द्वारा बहुगुणित होने लगता है। एक कोशिकीय भ्रूण की स्थिति से लेकर अपनी परिपक्वावस्था तक पहुँचने तक जीवन के हर काल में शरीर की शुक्र कोशिकाओं और डिम्ब कोशिकाओं के केन्द्रक (न्यूक्लियस) में 46 गुणसूत्र ही बने रहते हैं।पर प्रकृति की व्यवस्था इतनी विलक्षण है कि इन 46 गुणसूत्रों में मौजूद जीवन की समस्त क्रियाओं के लिए उत्तरदायी कोई एक लाख जीन्स में से बहुत से निष्क्रिय हो जाते हैं। यही वजह है कि लीवर कोशिका जब विभाजित होती है तो सिर्फ लीवर की कोशिकाओं का निर्माण कर लीवर रूपी अंग का ही निर्माण करती है। यह न्यूरान्स या स्नायु कोशिका नहीं बना सकती। न्यूरान कोशिका प्रगुणित होती है तो वह त्वचा नहीं बना सकती, यह एक अनिवार्यता है, जिसे भलीभाँति समझा जाना चाहिए। प्राकृतिक व्यवस्था ही कुछ समस्त कार्यों का निर्देश देने जीन्स मौजूद होते हैं। उन जीन्स की चाब कब किसे खोल दें, कब कौन-सा , क्या निर्माण आरम्भ कर दें, यही रहस्य पी. पी. एल. स्काटलैण्ड के वैज्ञानिक ने 75 लाख डालर (लगभग 30 करोड़ रुपये) खर्च कर तथा 278 भेड़ों के थन की एक कोशिका से दूसरी भेड़ ‘डॉली’ पैदा कर सके और इसके लिए शुक्राणु की आवश्यकता नहीं पड़ी।

बाये टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में ‘क्लोनिंग’-जिरॉक्स निर्माण की प्रक्रिया पर शोध कार्य तो बहुत दिनों से चल रहा था पर अभी-अभी मिली सफलता जो मनुष्य के समीपवर्ती कहे जाने वाले बन्दरों के क्लोन्स के निर्माण तक जा पहुँची है-कई प्रश्न-चिन्ह खड़े कर रही है। वैज्ञानिक अब इस नतीजे पर पहुँच चुके है कि मानव ऐसी स्थिति में आ गया है कि विज्ञान की विकसित टेक्नोलॉजी के प्रयोगों द्वारा हो सकता है वह मानव की कोशिकाओं से उसी के हमशक्ल -क्लोन पैदा कर लेगा। कब कितने दिन में यह हो सकेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता, परन्तु जिस तेजी से 1950 में ब्रिग्स एवं क्रिग्स 1960 में जॉन वी. गार्डन, 1970 में लिमेन्से, 1984 में मैकग्रा एवं साल्टर 1993 में हाँल एवं स्टिलमैन, मार्च 1996 में राँसलिन इंस्टीट्यूट फरवरी 1997 में इंस्टीट्यूट तथा मार्च 1997 में आरेगाँन (ह्रक्रश्वत्रहृ) के डाँन वुल्फ को सफलता मिली है, यह कहा जा सकता है कि यदि रोक नहीं लगायी गयी तो पहला क्लोन 1999 में तैयार किया जा सकेगा। क्या यह नैतिक दृष्टि से सही है। उस पर बड़ी गरमागरम बहस जारी है। अमेरिकी राष्ट्रपति बिलक्लिण्टन इस विषय पर 18 सदस्यों की समिति बना दिए जाने एवं उनके निष्कर्षों के विविध रूपों में आने के बाद जैव प्रौद्योगिकी की विधा के विशेषज्ञों पर सबका ध्यान केन्द्रित है।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी मेडिकल स्कूल के विकास जैविकीविद् डॉ. स्टुअर्ट आँरकिन का मत है कि ‘एनीमल क्लोनिंग’ सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं मितव्ययिता, पर आधारित शोधकार्य है, जिसे रोका नहीं जाना चाहिए। यदि ऐसा प्रयास किया गया तो जेनेटिक्स , वंशों की सुधार तकनीकों, मानवी अंग प्रत्यारोपण आदि विधाओं में विकास का पहिया जाम हो जाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिण्टन ने ऐसे शोधकार्यों पर जब से सरकारी धन दिए जाने पर रोक लगाने का प्रस्ताव रखा है अनेकानेक यूरोप के देशों व ब्रिटेन के वैज्ञानिकों पर यह प्रतिबन्ध पूर्व से लगा दिया गया है। आँरिकन के साथ-साथ टोरेण्टों यूनिवर्सिटी के मॉलीक्यूलर मेडिकल जेनेटिक्स के प्रोफेसर जेनेट रोजाँ कर कहना है कि मात्र इस भय से कि कोई इनसान का हमशक्ल न तैयार कर दें, ये प्रयोग जानवरों के स्तर पर भी रोक दिए जाने चाहिए , नहीं तो विज्ञान का विकास जो मानव सहित सारी जैविकी के हित में है, रुक जाएगा। इससे पूर्व वेटीकन सिटी से कर निर्मित चर्चा से विरोध के स्वर पहले ही मुखरित हो चुके है एवं धार्मिक आधारों पर भी इस प्रक्रिया पर ‘बैन’ लगाने की बात की जा चुकी है। किन्तु निजी स्तर पर किये जा चुकी है किन्तु निजी स्तर पर किये जा रहे शोध कार्यों कैसे रोक सकेगा, जैसी कि सम्भावना ‘बायज फ्राम ब्राजील ‘ नामक एक काल्पनिक फिल्म में आज से प्रायः चौदह वर्ष पूर्व व्यक्त की गयी थी, यह सबकी चिंता का कारण बना हुआ है।

‘डॉली’ भेड़ से सम्बन्धित रहस्योद्घाटन इतना सनसनीखेज होगा यह किसी ने कल्पना भी नहीं की थी, क्योंकि ऐसे प्रयोग काफी वर्षों से चल ही रहे थे, किन्तु अब जैसे-जैसे और नतीजे सामने आ रहे है, सचमुच दिमाग चकराने लगा है। ताइवान के वैज्ञानिक डॉली की खबर के तुरन्त बाद घोषणा कर ही चुके है कि वहाँ के वैज्ञानिकों ने सुअर की एक लुप्त हो रही श्रेष्ठ प्रजाति को क्लोनिंग की कलम लगाने की तकनीक के जरिए बचाने में सफलता पा ली है। अमेरिका के बेवरटन स्थित-रीजनल प्राइवेट रिसर्च सेण्टर आरेगाँन की बन्दरों पर की गयी खोज से उत्साहित होकर सेनडियागो स्थित ‘न्यूरो साइंसेज इंस्टीट्यूट ‘ के डॉ. ईवान बालवान ने वेटर की स्नायु कोशिकाओं का हस्तान्तरण भ्रूणावस्था में करने के बाद उन्हें यह सफलता मिली है। आशय यह कि सभी तरह के प्रयोग जारी है एवं ह्यूमन जेनेटिक्स के वैज्ञानिक इससे काफी आशान्वित है कि सम्भवतः इस प्रक्रिया से हम चिकित्सा विज्ञान को कुछ उपयोगी उपलब्धियाँ दे सकते हैं, साथ ही ईश्वरवादी , समाजशास्त्री, मनोवैज्ञानिक भयभीत है कि इससे बड़े पैमाने पर प्राकृतिक असंतुलन पैदा हो सकता है एवं इस तकनीक का दुरुपयोग होने पर लालची लोगों के हाथों में जाने पर विनाश की विभीषिका भी सामने आ सकती है । उनका यह कहना है कि तानाशाही वैज्ञानिक द्वारा नियंत्रित कार्बन काँपी की तरह तैयार मनुष्य फिर ‘एनीमल फार्म’ का एक पशु मात्र बनकर रह जाएगा। स्वाभाविक है हिटलर एवं स्टालिन जैसे व्यक्तियों का मुकाबला कर चुका विश्व अब सतर्कता से इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करना चाहता है । एक और बात सामने आती है कि डॉली नामक मेमना जिस प्रकार बिना किसी नर की आवश्यकता के मात्र एक भेड़ के थन से निकाली गयी कोशिकाओं को अन्य भेड़ के अण्डाणु में प्रत्यारोपित कर तीसरी भेड़ के गर्भाशय में डाल कर पैदा कर दिया गया, अगले दिनों बिना किसी पुरुष की मदद लिए मात्र नारी गर्भाशय में अथवा प्रयोगशाला में भी जीन्स के प्रयोगों द्वारा मानव उत्पादन होने लगे, फिर स?परिवार संस्था अप्रासंगिक हो जाएगी एवं वर्चस्व मात्र विज्ञान या टेक्नोलॉजी का ही रहेगा। गनीमत है कि आदमी का हमशक्ल अभी गैर प्रजनन कोशिकाओं से विकसित करना मात्र सैद्धान्तिक रूप में ही सम्भव माना जा रहा है, व्यावहारिक दृष्टिकोण से अभी यह असम्भव माना जा रहा है।

जब सोनोग्राफी नामक आविष्कार के बाद, एनिक्नओं सेण्टेसिस की जानकारी के बाद बच्चों के लिंग निर्धारित करने का नतीजा दुनिया भर में स्त्री भ्रूणों की हत्या होने और नारी-नर अनुपात गड़बड़ाने के रूप में सामने आ रहा है, तो यह भी सम्भव है कि कल ‘जीरो फटभ्लिटी’ से पीड़ित पश्चिमी समुदाय अपनी ही नस्ल पैदा करने के चक्कर में ‘मानव क्लोन‘ कार्बन कापियाँ तैयार करने लगें, ऐसे सैनिक तैयार करने पर जुट जाएँ तो मात्र मरना-मारना जानते हो जिनके पास ताकत तो हाथी या चाल पर चलना सिखाता हो, जो राष्ट्रभक्ति-आदर्शवाद से प्रेरित न हो मात्र मर्सेनरी -भाड़े के सैनिक बनकर अपने तानाशाह की तरफ से लड़ना जाने।

खतरा तो है, पर जब यह प्रयोग सफल हो बंदर के हाथ तलवार लगने की तरह किसी शैतान के पास आ जाय। सम्भावना यही है कि सम्भवतः ऐसा नहीं होगा। किन्तु क्या इन आशंकाओं के चलते प्रयोगों की शृंखला बन्द कर दी जानी चाहिए। विवेक कहता है-नहीं । यदि दूरदर्शितापूर्वक विज्ञान की कलम में पैदा करने वाली इस विधा के मूल मर्म का अणु जैविकी का सदुपयोग किया जा सके, तो कई सम्भावनाएँ सामने दिखाई देती है। 10 मार्च , 1997 की ‘न्यूजवीक- साप्ताहिक पत्रिका ने इस सम्बन्ध में विस्तार से विवेचन कर कुछ निष्कर्ष दिए है। जेफ्री क्लुगर एक उदाहरण देकर लिखते हैं -कल्पना कीजिए कि एक छल साल की लड़की, जो ल्यूकोमिया (ब्लड कैन्सर) से पीड़ित है एवे बोनमेरों ट्राँसप्लाण्ट की प्रतीक्षा कर हरी है ताकि वह स्वस्थ स्थिति में जी सके, इस स्थिति में प्रतीक्षा करते-करते मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी क्योंकि उसके ऊतकों की टाइपिंग करने पर संगति वाली मेरो मुश्किल से मिल पाती है। उसके पिता-माता प्रतीक्षारत है- ‘क्लोन’ बनाने वाले एक वैज्ञानिक की प्रयोगशाला में जो उसकी कोशिका से समरूप जुड़वा उसके लिए तैयार कर सके। उसकी बोनमेरी से पूरी संगति खाने वाली उसकी यह जुड़वा बहिन अपनी बीमार पैदा कर दी जाती है, तो न केवल यह जीवित रह सकती है, कभी आगे संकट आने पर वह सदा उनके पास बनी रह सकती। ऐसे में इस दंपत्ति को दो बच्चियों को जिनमें एक स्वाभाविक पैदा बालिका की कार्बन कापी है पालना पड़ेगा ताकि पहली जीवित रहे।

जेनेटिक पहली के पीछे नैतिकता से जुड़े कई सवाल उठ सकते हैं, किंतु यह एक सम्भावना आज वैज्ञानिकों द्वारा व्यक्त की जा रही है। एक और उदाहरण जो श्रही क्लुगर देते हैं, देखें। एक सुप्रसिद्ध भौतिकीविद् मृत्यु शैया पर है। उनकी मृत्यु के साथ उनके मस्तिष्क ने जो भी कुछ वैविध्यपूर्ण चिंतन भौतिकी अणु विज्ञान के क्षेत्र में किया था, समाप्त होने की आशा है। अन्य उनके खेमे के वैज्ञानिक चाहते हैं कि उनके प्रयोगों की शृंखला बन्द न हो एवं वे क्लोनिंग द्वारा एक नया वैज्ञानिक उनके ही जैसा है तैयार करके रख लेना चाहते हैं ताकि वह शोधकार्य को आगे बढ़ा सके। यह मात्र संभावना है , किन्तु क्या यह सही है। कहीं घातक चिंतन वाला, अणु विभीषिका से सारे संसार को नष्ट करने वाला मस्तिष्क जीवित रह गया तो ? फिर इसका तो कोई अंत नहीं।

हाँ! जेनेटिक इंजीनियरिंग से जीन्स में परिशोधन कर आने वाली संततियों में इन बॉर्न एरर्स ऑफ मेटाबोलिज्म’ से जुड़ी अनेकानेक बीमारियाँ, कैंसर घातक कोलेस्टरोल (एल. डी. एल.) पैदा करने के लिए उत्तरदायी कारकों को समाप्त किया जा सके तो यह शोध जो क्लोनिंग की दशा में की जा रही थी, हितकारी भी सिद्ध हो सकती है। किसी व्यक्ति को आनुवंशिक रोग मात्र जीन मशीनरी की गड़बड़ी के कारण चले आ रहे हों, तो इस विधा का प्रयोग उसे ठीक कर आगे इस प्रक्रिया को सही बनाए रखने के लिए किया जाता है, तो यह एक सकारात्मक पक्ष है । बागी बन जाने वाली कोशिकाओं को प्रयोग शाला में पृथक् कर उनकी जीन्स संरचना में परिवर्तन कर उनसे लड़ने हेतु उन्हें पुनः प्रत्यारोपित कर कैंसर जैसे घातक रोगों का उपचार खोजा जाय तो कुछ बात है। आज अनेकानेक व्याधियाँ समाज में नयी-नयी औषधियों की खोज के बावजूद विद्यमान है। उनका उपचार यदि ‘क्लोनिंग ‘ के लिए आरम्भ हुई जैव प्रौद्योगिकी की इस शोध से होता है तो किसे इनकार हो सकता है।

किंतु यदि मात्र अंग प्रत्यारोपण हेतु यदि एक जुड़वा तैयार कर उससे जीवनभर गुर्दे, हृदय , लीवर आदि लेते रह उसे अपंग बनाकर रख देना ही प्रयोगों का लक्ष्य है, तो फिर समाज में एक नैतिक संकट खड़ा हो जाएगा। मनुष्य तो कसाई से भी बदतर होता चला जाएगा एवं यदि प्राइवेट लैबोरेटरी इन कामों को करने लगीं तो पैसे वालों की बन निकलेगी व न जाने कितने विकलाँग जापान की हिरोशिमा विभीषिका की तरह कहीं कोठरियों के अंधेरों में सिसक रहे होंगे।

10 मार्च की ही ‘टाइम’पत्रिका में एक लेख और छपा है-”केन सोल्स बि जिराक्स्ड “ (क्या आत्माओं की फोटोकॉपी हो सकती है।) रॉबर्ट राइट इस लेख में लिखते हैं कि क्लोनिंग की इस सफलता की कहानी ने एक बड़ा ही हैरतअंगेज चित्र सामने लाकर खड़ा कर दिया है। वे लिखते हैं कि व्यवहार, मनोभाव, संवेदना, आकाँक्षाओं की दृष्टि से जरूरी नहीं कि जो कार्बनकॉपी की जा रही है, वह आपकी ही हो, उनका कहना है कि इवॉल्युशनरी साइकोलॉजी एवं विहेवियल जेनेटिक्स के सिद्धान्तों के अनुसार जीन्स हमारे व्यक्तित्व की संरचना का नियंत्रण कर पारिवारिक वातावरण में हमारी स्थिति तय करते हैं। इसी से मानव के आध्यात्मिक विकास संस्कारगत नैतिक मूल्यों के समावेश का क्रम चलता है। यही प्रक्रिया यदि अस्वाभाविक ‘क्लोन’ के रूप में देखी गयी तो पूरे सामाजिक ढाँचे को गड़बड़ा देगी।

वैज्ञानिक प्रयोगों का यदि लक्ष्य सही है तो कुछ भी बुरा नहीं है। गुणसूत्रों में हेरफेर करके यदि सशक्त समर्थ, नीरोग पीढ़ियों उत्पन्न करने की दिशा में प्रयास किया जा रहा है, तो वह किसी सीमा तक उचित है। किन्तु यह सदा याद रखा जाना चाहिए कि मानवी रसायनशास्त्र से हस्तक्षेप एक सीमा तक ही किया जा सकता है। दूसरों मनुष्य मात्र रसायनों का समुच्चय ही नहीं, इससे भी कुछ ऊपर उठकर है। अब तक जितने भी यंत्र-उपकरण संसार में है, उन सबकी तुलना में स्रष्टा की अनुपम संरचना मानवी काया-मस्तिष्क हर दृष्टि से अत्यधिक अद्भुत एवं आश्चर्यजनक है। इसी यंत्र को आध्यात्मिक उपायों द्वारा साध लिया जाय तो इसी के माध्यम से असम्भव कार्य उत्पन्न किये जा सकते हैं। जड़ व चेतन के सम्मिश्रण से भी मानवी काया को अपने अंतिम लक्ष्य ‘ततवमसि’ ‘जीवों ब्रह्योव नापरः’ तक ले जाने वाला अध्यात्म विज्ञान आज की ‘क्लोनिंग कला’ के आविष्कारकर्ताओं से एक ही बात कहता है। कि मनुष्य को मात्र गाजर, मूली या भेड़ न समझा जाय। उसे जड़ पिण्ड तक सीमित न रख उसे सर्वांगीण स्वरूप की प्रगति का पथ प्रशस्त करने वाले अध्यात्म विज्ञान को भी साथ लेकर चला जाय, तो जिन नैतिक प्रतिबन्धों की बात आज कानून द्वारा की जाने की चर्चा हो रही है, वे स्वतः आते चले जायेंगे एवं विज्ञान की इस विधा का सृजनात्मक नियोजन ही होगा। आशा तो यही की जानी चाहिए, कि ‘डॉली- नामक मेमने से आरम्भ हुई यह प्रक्रिया भेड़चाल की तरह चलकर विनाश की ओर न जाकर मानवजाति के समग्र विकास की ओर ही मुड़ेगी। इसी आशावाद पर मानवजाति का भविष्य टिका हुआ है।


‘विकृति संवत्सर’ और महाकाल के बदलते तेवर

जैसे-जैसे संधिवेला की घड़ियाँ आगे बढ़ती चली जा रही है, परिवर्तन का समय समीप आ रहा है, महाकाल के तेवर बदले नजर आ रहे है। हैली-बाप्प धूमकेतु के आगमन-प्राकट्य के साथ-साथ सौर ज्वालाओं की प्रखरता बढ़ती देखी जा सकती है एवं सारी धरती पर उसके परिणाम विभिन्न रूपों में देखे जा सकते हैं। पिछले दिनों 13-14 अप्रैल को नासा के सोहो स्पेस क्राफ्ट ने सौर लपटों की तीव्रता को देखा जो 24 लाख किलोमीटर प्रतिघण्टे की चाल से धरती की और सूर्यदेवता द्वारा फेंकी गयी। पिछली बार ये 1989 में देखी गयी थीं, अब इनके कारण कयूबेक कनाडा का एक पूरा पॉवरग्रिड प्रायः चौबीस घण्टों के लिए ठप्प पड़ा रहा। वैज्ञानिकों का कहना है। कि इनसे पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र सहित मानवी चुम्बकत्व पर भी गहरा प्रभाव पड़ने की, अनेकानेक दैवी विपत्तियाँ आने की आशंका है, क्योंकि इनकी संख्या आने वालों दिनों में बढ़नी ही है, घटने वाली नहीं। वे कहते हैं न केवल सौर-ज्वालाओं, सौर कलंकों की संख्या बढ़ेगी, इनके बीच की अवधि भी क्रमशः कम होती चली जाएगी एवं मनुष्य मात्र को इनसे उत्पन्न चुम्बकीय आँधियों से प्रभावित होना पड़ सकता है।

क्या कारण है कि व्यापक स्तर पर राजनैतिक उथल-पुथल से लेकर अराजकता, हिंसा पिछले दिनों एकदम तेजी से बढ़ती देखी जा रहीं है। ज्योतिर्विज्ञानियों ने अपने ढंग से इसका विश्लेषण कर कहा है कि जैसे-जैसे वह परिवर्तन वेला समीप आ रही है, पूरी मानवजाति को ग्रहों की युति के कारण प्रलयंकर कष्ट झेलने पड़ सकते हैं। वि. संवत् 2054 से अभी-अभी माह की 8 अप्रैल , 1997 से आरम्भ हुआ है एवं 28 मार्च 1998 तक चलेगा, विकृति संवत्सर’ कहा गया है। यह केवल संकटों की शुरुआत मात्र है। अभी आने वाले तीन से लेकर पाँच वर्ष तक हम सभी को बहुत कुछ सहन करने के लिए स्वयं को तैयार कर लेना चाहिए।

इस विकृति संवत्सर का राजा मंगल एवं मंत्री सूर्य बताया गया है। ऐसी युति होने पा सभी पदार्थ विकृति को प्राप्त होते हैं एवं प्रकृति की मार भिन्न-भिन्न प्रकार के रोगों के रूप में मनुष्य को खानी पड़ सकती है, ऐसा ज्योतिर्विदों का मत है। अनेकानेक स्थानों पर भयंकर अग्निकाण्ड, विस्फोटों द्वारा प्राणियों की राजसत्ता के लिए परस्पर कलह, पूरे राष्ट्र ही नहीं, विश्व के कोने-कोने में विग्रह इस वर्ष का प्रतिफल बताया गया है। सूर्य एवं मंगल की विशिष्ट भूमिका के साथ-साथ शनिग्रह भी इन कुछ वर्षों में बड़ी-वक्री स्थिति भी कुछ ऐसी है कि आने वाले दिनों में सम्मिलित प्रभाव प्रायः समग्र जनसमुदाय के लिए अशुभ ही है।

सम्भव है कि महाकाल के बदलते तेवर जो मानवी चिंतन में घुसी विकृतियों व न सुधरने की स्थिति में और भी उग्र होते चले जा रहे है, इस वर्ष कुछ विशिष्ट दण्ड ही समूची धरित्री को देने में मुख्य भूमिका निभाएँ। प्रकृति को स्वाभाविक अवस्था विकृति संवत्सर में बढ़ते पापाचार के साथ-साथ स्वतः बिगड़ने लगती है। ऐसे में वर्षा कम होने एवं अकाल की परिस्थितियोँ बनने तक की सम्भावनाएँ प्रबल होने लगती है। पर्याप्त उत्पादन व अन्न संग्रह के बावजूद महंगाई बढ़ते चले जाने ऐसे दिनों में पूरे विश्व में देखा जा सकता है। बड़े-बड़े राजनेताओं में परस्पर ईर्ष्या-द्वेषगत लड़ाइयाँ, सभी विभागों की कार्य कुशलता में कमी आना, विदेशी कर्जे बढ़ते चले जाना, घोटालों की संख्या में और भी वृद्धि होते चले जाना एवं विश्व में कहीं भी कभी भी अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के बिगड़ते चले जाने के कारण विश्वयुद्ध जैसी स्थिति का ऐसे उत्पातों का खतरा अब और बढ़ गया है।

सारे भारत व सारे विश्व में आँधियों -बवंडरों, ओलावृष्टि, असमय का हिमपात आने वाले कुछ माहों में देखा जा सकता है। सूर्य के आगे शुक्रग्रह का सायंकाल पश्चिम में दिखाई देना भी आने वाले एक डेढ़ माह में अनेकानेक विपत्तियों का सूचक है। कहीं मात्र धूलभरी आँधियों और वर्षा का न होना ओर कहीं अत्यधिक वर्षा व तूफान से बाढ़ का आना, भूकम्प, चक्रवातों की संख्या में वृद्धि भी अगले दिनों ही विकृति संवत्सर में देखी जा सकती है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर रूस, चीन, जापान, अमेरिका, तुर्की, लेबनान, श्रीलंका, सउदी अरब, इजराइल, पाकिस्तान आदि देशों में आँतरिक कलह, कहीं विभाजन तो कहीं हिंसक सत्ता परिवर्तन के योग देखे जा सकते हैं।

यह कुछ भयभीत करने एवं सभी को अकर्मण्य बनाने के लिए नहीं लिखा जा रहा। ग्रह-नक्षत्रों की युतियाँ समय विशेष के अनुसार बनती है एवं यह भारतीय ज्योतिर्विज्ञान की ही विशेषता है कि क्या-क्या प्रतिफल सम्भावित है एवं कैसे इनसे बचा जा सकता है, ये सब सावधानियाँ हमारे ग्रन्थों में, महापुरुष की, वाणियों में वर्णित है। ‘विकृति संवत्सर’ उनके लिए जो खराब है जिनका चिंतन विकृति एवं आचरण भ्रष्ट है, किंतु उन सभी के लिए लिए शुभ है जो आध्यात्मिक पुरुषार्थ में, सामूहिक साधनाएँ समूह मन के जागरण हेतु किये जा रहे पुरुषार्थों में एवं सविता-देवता बृहस्पति की उपासना में तन्मय बने रह, अपने लौकिक पुरुषार्थ में कोई कमी नहीं आने देते । यह समस्त विक्रमी संवत्सर हमें प्रेरित करने आया है कि यदि हम अशुभ से बचना चाहते हैं, तो गायत्री उपासना करने वालों की संख्या में न केवल वृद्धि करें, युगसंधि महापुरश्चरण में भागीदारी कर देवत्व को संगठित करने का भी प्रयास करें। श्रुति कहती है कि दैव-दैव कहना मात्र आलसी-प्रमादियों को शोभा देता है जो ब्रह्ममुहूर्त में जागकर औरों को भी सारे राष्ट्र को विश्व समुदाय को जाग्रत बनाए रखने का पुरुषार्थ करते हैं, इनके लिए ‘विकृति संवत्सर‘ के प्रतिफल शुभ भी बन सकते हैं।

जिस तेजी से अनाचार, पापाचार बढ़ रहा है, भगवान महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया अपनी तीव्रता का दौर बढ़ाती ही चली जा रही है। समझदारों को इस स्थिति को देखना एवं औरों में भी विवेक जाग्रत करते रहने की समझदारी पैदा करने का युग धर्म निभाना चाहिए। निश्चित ही परिवर्तन की वेला आ पहुँची है। संहार तो होना ही है, किंतु सृजन सुनिश्चित है। क्षुद्र नास्तिकों को भी अब आस्तिकता का सही अर्थों में अवलम्बन लेना ही पड़ेगा, इस वर्ष महाकाल यह सुनिश्चित करा रहा है।


विलक्षण सम्मोहक सामर्थ्य निहित है संगीत में

संगीत की स्वर लहरियाँ वातावरण में सम्मोहक उल्लास का सृजन करती है ।जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे इसकी लय-ताल पर जिन्दगी अपने आप थिरकने लगती है। सदियों सहस्राब्दियों से इनसानी सभ्यता इसके जादुई प्रभाव से परिचित -प्रभावित है। सामगान से लेकर दीपक राग, मेध मल्हार तक भाँति-भाँति के सुरीले स्पन्दन मानव प्राणों को स्फूर्ति -उल्लास देते रहे है। विज्ञान के इस युग में शोध, अनुसंधान की कसौटियों पर कसे जाने से इसकी आभा में और अधिक निखार आया है। न्यूरोलॉजिस्टों के अनुसार इसके द्वारा शारीरिक संरचना में भी परिवर्तन सम्भव है। मैकगील यूनिवर्सिटी माण्ट्रियल के न्यूरोलॉजिस्ट राबर्ट जटारे का कहना है कि नवजात शिशुओं में संगीत के प्रति कुछ अधिक ही जागरुकता होती है।

यूँ तो भाषा और संगीत दोनों ही भाव-संचार का माध्यम है, लेकिन संगीत ध्वनि स्पन्दनों की विशिष्ट लय-ताल से समन्वित कर प्रसारित करता है। इसकी झंकृति से हर हृदय झंकृत हो जाता है। परन्तु भाषा शब्दों की संरचना है, जो अन्य भाषा-भाषी लोगों के सर्वथा प्रभावहीन है। संगीत के स्वर सांस्कृतिक सृजन के प्रतीक भी है और तनाव से मुक्ति का साधन भी। इन दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध के बारे में टोरोंटो यूनिवर्सिटी को डेवलपमेंट साइकोलॉजिस्ट सेण्ड्र ट्रेहब का कहना है कि संस्कृति के बगैर संगीत की सम्भावना न्यून होती है। अपने देश में इसी सांस्कृतिक समृद्धि के बलबूते ही संगीत का इतना विकास हो पाया है।

पश्चिमी देशों में संगीत का इतिहास छठवीं शताब्दी से शुरू होता है। इस सदी में ग्रीक दार्शनिक पाइथागोरस ने संगीत स्वरों को पहली बार गझातीय ने संगीत स्वरों को पहली बार गणितीय पद्धति से विश्लेषित किया। आज सारी दुनिया में ‘ओक्टेव इक्चीवैलेन्स’ (ह्रष्ह्लड्डक्द्ग श्वह्नह्वद्बड्ढड्डठ्ठड्डठ्ठष्द्ग) पद्धति से संगीत का प्रचलन है। पश्चिमी दुनिया का पाप साँक राक-रैप तथा अन्य संगीत मुख्यतया पहले चौथे एवं पाँचवें स्केल पर आधारित है। उसे ष्टस्नत्र (सी एफ जी) के नाम से जाना जाता है। सन् 1974 में 3400 वर्ष प्राचीन संगीत का पता चला। इसे सुमूरियन मानते हैं। जिसमें भारतीय पद्धति के अनुसार सात स्वर है। अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों का मत है कि सुमेरियन संगीत का विकास भारतीय संगीत से ही हुआ होगा।

संगीत के सुरीले प्रभाव का अध्ययन करने वाली ट्रेहब तथा उनक सहयोगियों का कहना है कि गीत का चौथा और पाँचवाँ माध्यम स्वर बालक के हाव-भाव में परिवर्तन ला देता है। यह स्वर जब जटिल हो जाता है, तो वयस्कों के लिए कर्णकटु साबित होता है। यह जैविक कारक जो जन्म से लेकर अन्तिम साँसों तक अपना परिचय बखूबी देता रहता है। गीतों के मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययप काफी अर्सें से चल रहा है। न्यूरोलॉजी के विशेषज्ञों के अनुसार मस्तिष्क का बायाँ हेमीस्फियर भाषा सम्बन्धी क्रियाओं के लिए तथा दया, संवेदना , भावना आदि को संचालित करता है। बायें हेमीस्फियर भाषा सम्बन्धी क्रियाओं के लिए तथा दया, संवेदना, भावना आदि को संचालित करता है। बायें हेमीस्फियर का ‘ब्रोकाएरिया’ क्षतिग्रस्त को जाने से बोलने की क्षमता समाप्त हो जाने से बोलने की क्षमता समाप्त हो जाती है। इसी क्षेत्र का यदि वरनिक एरिया ठीक हो तो बालपे की सामर्थ्य वापस आ सकती है। संगीत के लिए वैसे मस्तिष्क विशेषज्ञ दायें भाग को ज्यादा उत्तरदायी मानते हैं। परन्तु आधुनिक अन्वेषणों से पता चला है कि संगीत की गूँज समस्त मस्तिष्क को प्रभावित करती है।

भाषा एवं संगीत के लिए मस्तिष्क के दो अलग-अलग हेमीस्फियर के न्यूरोसर्किट काम करते हैं। इस बात की पुष्टि रूस के विसारिओन शेवलीन ने की थी। उन्होंने कई ऐसे लोगों के ऊपर अपने प्रयोग किए जो बोल नहीं सकते थे। लेकिन इन्होंने भी गीतों के द्वारा अभूतपूर्व शान्ति एवं उल्लास हासिल किया। विश्वविख्यात संगीतकार मौरिस रैवेल का मस्तिष्कीय ज्ञान शून्य थौ वे बोल भी नहीं पाते थे। संगीत साधना ने उन्हें न केवल सुनने-समझने की ताकत दी वरन् उन्हें संगीत साम्राज्य का सिरमौर बना दिया। इससे स्पष्ट होता है कि संगीत का जादू भाषा से ऊपर उठकर बोलता है। ऐसे अनगिनत लोग है, जो शिक्षा के क्षेत्र में नौसिखिया होते हुए भी सुप्रसिद्ध संगीतकार सिद्ध हुए है ईशावेल पेरेट्रज के अनुसार संगीत एक ही समय में सृजनात्मक, संवेदनात्मक एवं विचारात्मक कार्यों को सम्पादित करता है। इस विधा की समुचित जानकारी रोगोपचार से लेकर भावना के उच्चस्तरीय आयामों तक पहुँचा सकती है। भारतीय शास्त्रीय संगीत की पद्धति में वह सारा गुण परिलक्षित होता है। वैज्ञानिकों का एक बड़ा वर्ग इस सत्य को स्वीकारने लगा है।

संगीत का असर मस्तिष्क के लिए भाग पर कैसा होता है-पेरेट्रज तथा उनके सहयोगियों ने इस पर काफी खोज की है। उन्होंने अपने प्रयोग के दौरान दो तरह के मस्तिष्क रोगियों पर संगीत के प्रभाव को परखा। सुनाए गए गीतों के राग एवं लय के परिवर्तनों के परीक्षण के लिए बायें तथा दायें मस्तिष्क रोगियों से पूछताछ की गयी। बायें मस्तिष्क के रोगी राग परिवर्तन की सामान्य जानकारी दे पाए, जबकि दायें मस्तिष्क के रोगी अच्छे ढंग से जानकारी देने में सक्षम हुए। इस प्रयोग के परिणाम से पेरेट्रज ने निष्कर्ष निकाला कि लय एवं राग अविच्छिन्न रूप से जुड़े होने पर भी मस्तिष्क उसे भिन्न-भिन्न अनुभव करता है।

‘राग’ मोनोलिथिक तत्व नहीं है। यह दो भागों में बँटा होता है, नोट्स एवं रूपरेखा राग के उतार-चढ़ाव का अन्तर सामान्य होता है। सेण्ट्रा का कहना है कि बच्चे राग के परिवर्तन को समझते हैं लेकिन उसकी रूपरेखा पर कोई क्रिया जाहिर नहीं करते।

संगीत से मस्तिष्क का सम्पूर्ण भाग झंकृत हो उठता है। इसका प्रयोग मैकगील विश्वविद्यालय के राबर्ट ने किया। इन्होंने स्वरों को चालू कर ‘पैट स्कैन’ द्वारा मस्तिष्क के विभिन्न भागों पर होने वाले परिवर्तनों को रिकार्ड किया। मस्तिष्क के दायें टेम्पोरल लोब को सुपीरियर टेम्पोरल गाडरस कहते हैं। यह क्षेत्र स्वर के प्रति अति संवेदनशील होता है। स्वर तन्त्र के बजने से इसमें एक हल्की हलचल हुई और मस्तिष्क का सारा भाग इस धुन से सक्रिय हो गया। वैज्ञानिकों ने यह भी पाया है कि संगीत आनुवाँशिक गुणों का वाहक भी होता है। सात-आठ साल के बच्चों में दक्ष संगीतकार का गुण पाया जाना इसका द्योतक है।

इधर हाल में विज्ञानवेत्ताओं ने संगीतकारों की मस्तिष्कीय संरचना में विकास की कुछ विशेष सम्भावनाएँ जताई है। हेनरीक हेन यूनिवर्सिटी के न्यूरोलॉजिस्ट गटफ्राइड श्लगल के अनुसार इसका कार्पस कैलासम अपेक्षाकृत बड़ा होता है। शारीरिक नियन्त्रण करने वाला मोटर फंक्शन कार्पस कैलोसम के आगे के आधे भाग से संचालित होता है श्लेगल के मतानुसार इसी वजह से संगीतकार के वाद्ययन्त्रों एवं हाथों के बीच अद्भुत नियन्त्रण देखा जा सकता है। इस भाग के संवाहक स्नायु अति संवेदनशील एवं मजबूत होते हैं। जो दोनों हेमीस्फियर के मध्य सन्तुलन बनाए रखते हैं। श्लेगल की टीम ने एक और संरचना की कार्यपद्धति का अन्वेषण किया। सामान्यतया टेम्पोरल लोब का प्लेनम टेम्पोरल दायें भाग की अपेक्षा बायें भाग में बड़ा होता है ।यह कार्टेक्स भाषागत विषयों के लिए ही जिम्मेदार होता है, जबकि संगीत से सम्बन्धित लोगों में यह भाषा एवं संगीतों के लिए कार्य करता है।

अब सवाल यह उठता है कि भाषा से संगीत उत्पन्न हुआ या फिर संगीत से भाषा। इसका जवाब चार्ल्स डार्विन ने देने की कोशिश की है डार्विन का विश्वास है कि संगीत का जन्म प्रोटोह्यूमैन पुरुषों एवं महिलाओं के बीच आकर्षण से हुआ। ये राग एवं लय से आनन्दित होते थे। वैदिक काल की ओर झाँकने से पता चलता है कि संगीत भाषा का विकास हुआ। चारों वेद महाकाव्य है। सामवेद तो तमाम गीतों का संगीत बद्ध संकलन है। काव्य में तमाम बातों को एक साथ कहने की सुविधा होती है। इसलिए सम्भवतः विकास की प्रक्रिया में संगीत से भाषा की उत्पत्ति हुई हैं कई विकासवादी भी इस तथ्य से सहमत है। इस बात को और अधिक जानने के लिए डर्टमाउथ के वैज्ञानिकों ने एक कम्प्यूटर मॉडल बनाया है। इनके विश्लेषण के अनुसार आदिमानव में भाषा स्पृहणीय भले रही है, परन्तु संगीत का अपना विशिष्ट स्थान रहा है। इन्होंने बताया कि शास्त्रीय संगीत साँस्कृतिक सृजन का प्रतीक है, जो कई न्यूरॉन्स पद्धतियों को दर्शाता है।

इस विषय में विशद् अध्ययन करने वाले भारुच का मानना है कि गीत मूलतः समूहों में अधिक प्रयोग किया गया। हालाँकि सासा मार्च या मूलगीत धुन इससे सम्बन्धित नहीं है। फिर भी निर्विवाद तथ्य है कि संगीत एक समय एक समाज और पूरे क्षेत्र में भावनाओं के संचार का माध्यम था । यह भावनाओं के संचार का माध्यम था। यह भावनाओं के संकेतों का प्रतीक था, जबकि भाषा विचारों का स्पष्टीकरण भावना विचारो से पूर्व आती है। शायद इसी बात को लेकर भारुच ने संगीत को महत्वपूर्ण माना है।

सैण्ड्राट्रैहब ने माँ एवं बच्चे के बीच नैसर्गिक धुन की व्याख्या की है, शिशु माँ की धड़कनों से उत्पन्न लय ताल से आनन्दित रहता है। यह माँ की भावना एवं सूक्ष्म ब्रह्मांडीय तरंगों को डिकोड करता है कुछ वैज्ञानिकों का मानना है, कि नवजात शिशु में संगीत का बीज प्रसुप्त रूप से रहता है। कुछ भी हो इसका जुड़ाव व्यक्ति की संवेदना से शाश्वत है। तभी तो इसको सुनते ही हृदय के तार अपने आप ही झंकृत हो जाते हैं।

इसके चमत्कार को जानने के लिए मनोविज्ञानी जान श्लोबोडा ने इंग्लैण्ड के 83 रेताओं पर प्रयोग परीक्षण किया। ये श्रोता मनोरोगी थे। जो भय, दर्द, संदेह पीड़ा आदि व्यथाओं से पीड़ित थे। उन्हें लगातार अच्छे परिवर्तन पाए गए। इनकी हिंसक वृत्ति में कमी आयी एवं शालीनता-विनम्रता भाव जागने लगा था। वाडलिंग सीन स्टेट यूनिवर्सिटी ओयों बायो साइकोलॉजिस्ट जैक पैक शैप के अनुसार संगीत में मनुष्य की दिव्य क्षमताओं को जाग्रत करने की शक्ति निहित हैं

उनके अनुसार गीतों में एक निश्चित आवृत्ति होती है संसार में हर पदार्थ एक निश्चित आवृत्ति से बना हैं अगर किसी स्वर द्वारा इससे तारतम्य बिठाया जा सके तो जड़ से चेतन तक में लिचलें उत्पन्न हो सकना सम्भव है, शास्त्रीय संगीत में दीपक राग से दीपों का जलना, मेघ मल्हार से वर्षा होना प्रसिद्ध हैं इसके लिए समय, प्रहर का विशेष ध्यान देना पड़ता है। संगीत रूपी इस सूक्ष्म विज्ञान को अनावृत कर प्रकृति से बहुत कुछ लाभ लिया जा सकता है

संगीत से मानसिक कुशलता में होने वाली अभिवृद्धि को भी विज्ञान-विदों ने अपने प्रयोगों में स्वीकारा है सन् 1992 में कैलीफोर्निया युनिवर्सिटी के मनोविज्ञानी फ्राँस रसर, गार्डनशा और कैथराइन ने इस पर अनेकों प्रयोग किये। उन्होंने मोजार्ट इफेक्ट द्वारा कॉलेज के 36 छात्रों का आई. क्यू. परीक्षण से पूर्व वाद्य यन्त्रों की धुन सुनायी गयी। 15 मिनट तक इस धुन सुनायी गयी। 15 मिनट तक इस धुन में तल्लीन होने के बाद अच्छा रहा। एक अन्य प्रयोग में तीन साल के बच्चों को 9 महीने तक पियानो से गीत एवं धुन सुनायी गयी। इसके प्रयोग के परिणाम बहुत अच्छे रहे। इनकी मस्तिष्कीय क्षमताओं में 35 प्रतिशत की अभिवृद्धि पायी गयी। बायो फिजिसिस्ट मार्टिन गार्डनर इन निष्कर्षों को सही बताते हुए कहते हैं। कि संगीत आंतरिक न्यूरान्स की साँकेतिक भाषा हैं जो मस्तिष्क के समस्त कार्टेस में फैले है। संगीत न केवल इनके क्रिया-कलापों को सुचारु करते हैं बल्कि उनमें बढ़ोत्तरी करते हैं।

वैज्ञानिक समुदाय इस बारे में काफी आशान्वित है कि आज के अशांत, उद्विग्न एवं कलह ग्रस्त समाज में संगीत का शीतल स्वर नूतन चेतना का संचार कर सकता है व्यक्ति के विचारों एवं भावनाओं को सृजन की ओर मोड़कर कई रचनात्मक कार्य करा सकता है। लेकिन यह तभी सम्भव है जब अश्लील एवं फूहड़ गीतों का छोड़कर सुमधुर शास्त्रीय पद्धति पर आधारित सद्भावपरक गीतों एवं धुनों को प्राथमिकता दी जाए।


काल का रहस्यबोध खोल रहा है-जादुई संसार

‘काल’ की महिमा न्यारी है। सृष्टि के सभी घटनाचक्र इसी के इशारे पर नाचते हैं इसके एक इंगित सं जीवन मृत्यु में बदल जाता है और मृत्यु नव जन्म का सरंजाम जुटाने लगती है। सिंहासनाधीश दर-दर की ठोकरें खाने लगते हैं ओर गरीब-दलित कहा जाने वाला विशाल साम्राज्य का स्वामी बनता है। काल की इसी रहस्यमयता को जानने के लिए सभ्यता के प्रारम्भिक दौर से अध्यात्मवेत्ता गहन साधनाएँ एवं कड़ी तपश्चर्याएँ करते रहे है। अब इस क्रम में विज्ञानवेत्ता भी प्रयत्नशील है काल का रहस्यबोध पाने के लिए वे सतत् शोध-अनुसंधान कर रहे है। इस क्रम में प्राप्त उनके निष्कर्ष हमें अचरज में डाल देते हैं।

क्वाँटम भौतिकी के विशेषज्ञों ने प्रतिपदार्थ के समान ही प्रति समय की खोज की है। और साइबरनेटिक सिद्धान्तानुसार समय को तरंग के समान प्रतिपादित कर इसे ऊर्जा का अक्षय स्रोत माना गया हैं यानि कि अब वैज्ञानिकों के मतानुसार ‘काल’ ही समस्त शक्तियों का शाश्वत स्रोत है। मूरीहोप ‘टाइम द अल्टीमेट एनर्जी’ में समय को क्रोनोलाती के नए आयाम से जोड़ती है। उनके अनुसार समय सापेक्ष है । ब्रह्मांड से लेकर सूक्ष्मतम कण तक दुनिया का प्रत्येक घटक परिवर्तनशील है, जो एक निश्चित प्रक्रिया के तहत संचालित होता है। यह परिवर्तन जैविक,सामाजिक एवं साँस्कृतिक स्तर पर भी होता है एल्ल्विच टाफ्लर ने अपनी सुप्रसिद्ध कृति ‘फ्यूचरशँक’ में इसे स्पष्ट किया है। उनके अनुसार , सृष्टि की समस्त प्रक्रियाओं का महत्वपूर्ण कारक है-समय या काल। समय के बिना परिवर्तन सम्भव नहीं।

क्वाँटम भौतिकी तथा अंतरिक्ष विज्ञान के शोध प्रयासों से प्रकृति और समय के कार्य को समझने में नयी दिशा मिली हैं । विख्यात वैज्ञानिक मूरी होप समय को दो भागो में बाँटती हैं-आन्तरिक समय एवं बाह्य समय। ग्रहों -उपग्रहों, तारकों की गति से उत्पन्न समय को आन्तरिक समय कहते हैं। बाह्य समय की परिकल्पना वैज्ञानिकों ने उस समय के लिए की है, जो भौतिक अवस्था से बाहर हैं यह हमारी इच्छा, की ओर उन्मुख हैं विज्ञान के नवीनतम अध्ययन स्पष्ट करते हैं कि जिस तरह इलेक्ट्रॉन बाँण्ड को तोड़ने से अनन्त ऊर्जा मिलती है, उसी प्रकार यदि ‘टाइम कोड‘ को विखण्डित किया जा सके तो अपरिमित शक्ति स्रोत को पाया जा सकता है । प्राप्त इस ऊर्जा में सम्पूर्ण ब्रह्मांड को परिचालित, नियंत्रित करने की क्षमता है। प्राचीन अध्यात्मवेत्ताओं को इस रहस्य का ज्ञान था, ऐसा आज का वैज्ञानिक समुदाय मानने लगा है। ध्यान की गहराइयों में काल के इसी रहस्यमय आयाम में प्रवेश कर वे अपनी चेतना में उन्नत शक्ति को हासिल करते थे।

काल की गणना सूर्य की परिक्रमा के अनुसार करने का प्रचलन है। सौरदिन मध्य रात्रि से प्रारम्भ होता है। नक्षत्रीय समय मध्य मकर रेखा के प्रथम बिन्दु को पार करते समय मापन को कहते हैं। यह क्षितिज से आकाशीय पिंडों के सम्बन्धित स्थान को संकेत करता है डिस्कवरी ऑफ फिजिक्स के अनुसार सौरवर्ष , सौर माह , सौरदिन तथा नक्षत्रीय वर्ष, माह व दिन से ही कैलेण्डर का प्रचलन हुआ। अंतर्ग्रही समय के मापन हेतु परमाणविक घड़ी का प्रयोग किया जाता है

कहावत है कि समय तीर की तरह भागता है और गुजरा हुआ समय वापस नहीं आता। वैज्ञानिकों ने इस लोक-प्रचलित कहावत का मद्देनजर रखते हुए अनेकों रहस्यों को उजागर किया। सन् 1927 में ब्रिटिश अंतरिक्षवेत्ता सर आर्थर एडिंगटन ने सापेक्षतावाद के तहत ‘एरो ऑफ टाइम’ यानि समय के तीर का अन्वेषण किया। क्वाँटम सिद्धान्त के जन्मदाता ववारनर हाइजेनबर्ग, विख्यात वैज्ञानिक थ्रोडिंगर तथा अपने युग के महान् विज्ञानवेत्ता आइन्स्टाइन ने समय के बारे में एक नयी बात बतायी। । उनके अनुसार काल गति को वर्तमान से भविष्य की ओर के दायरे में नहीं बाँध सकते। ऐसा भी हो सकता है कि समय वर्तमान से भूत की ओर चलने लगे। उनके इस प्रतिपादन से विज्ञान जगत में हलचल मच गयी, परंतु उनके तर्क तथ्य एवं प्रमाण सम्मत विवेचन को सभी को स्वीकार करना पड़ा।

विज्ञान मनीषी सटीफेन हाकिंग ने अपनी विश्वविख्यात रचना ‘द ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम ‘ में समय की सापेक्षिता पर काफी मूल्यवान विचार व्यक्त किये है। उन्होंने समय को एकीकृत गुरुत्वबल से जोड़कर -काल्पनिक समय’ की एक नई परिकल्पना दी है। इसके अनुसार इस स्थिति में दिशाओं का अस्तित्व विलीन हो जाता है, जबकि वास्तविक समय में दिशा का महत्वपूर्ण स्थान है इस क्रम में काल के तीन रूप प्रकाश में आए-

1- थर्मोडायनिमिक एरो ऑफ टाइम,

2- साइकोलॉजिकल एरो ऑफ टाइम,

3-कास्मोलाजिकल एरो ऑफ टाइम,

इसमें थर्मोडासनिमिक तथा कास्मोलाजिकल समय की दिशा भूत से भविष्य की ओर होती है, जबकि साइकोलॉजिकल समय भविष्य से भूत की ओर गमन करता है। इसी के आधार पर ही हम अपने मन में स्वयं के अतीत कोचलचित्र की भाँति देखते हैं।

अंतरिक्ष विज्ञान का विशद् अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक रोजर पेनरोज ने ‘द एम्परर्स न्यू माइण्ड में समय की एक नयी अभिव्यक्ति दी है। ये कहते हैं कि वर्तमान द्रव्य की अवस्था प्रकृति की सूक्ष्म चेतना की स्थूल परिणति है। इस वजह से सूक्ष्म प्राकृतिक हलचलों से पदार्थ में परिवर्तन आना अवश्यम्भावी है। इसमें हमें समय की प्रचलित परिभाषा से हटकर एक नया परिचय मिलता है समय का यही परिचय समष्टि स्तर पर ब्रह्मांडीय काल के रूप में जाना जाता है समय के इस रहस्यमय आयाम में पहुँचकर हमें स्थूल से सूक्ष्म होने और सूक्ष्म से स्थूल रूप प्राप्त करने के घटनाओं की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि वैज्ञानिक अभी इस बारे में कुछ अधिक नहीं जान पाए है, परन्तु उनका विश्वास है कि इसे जान लेने पर मृत्यु से परे जीवन का अस्तित्व और लोक-लोकान्तर के घटनाक्रम अधिक स्पष्ट हो सकेंगे।

डॉ. रुपर्ट होल्ड्रेक ने समष्टि चेतना में समय की अवधारणा ‘मार्फिक रेजोनेन्स’ के आधार पर की है। इनका कहना है कि कोई भी क्षेत्र भ्रूण की अन्तिम अवस्था के बाद ही विकास की प्रक्रिया में आगे बढ़ता है। इस तरह निर्माण होने के बाद से अन्त तक विकास सीधी रेखा में चलता है। प्रोफेसर फ्रेड ब्रह्मांड को चैतन्य माना है। इस क्रम में उनका ग्रन्थ ‘द इंटेलीजेन्ट यूनीवर्स बहुत महत्वपूर्ण है। इस ग्रन्थ के विवरण के अनुसार न केवल ब्रह्मांड का स्रष्टा चेतन है, बल्कि उसकी सृष्टि भी चेतन का नया रहस्य खोलते हैं। फ्रेड हायल के मुताबिक ‘परम चैतन्य काल’ ही इस सृष्टि का स्रष्टा है। इसके विभिन्न आयाम वस्तुतः काल के ही आयाम है। विकास के इस क्रम में वापस मुड़कर यदि मूल उद्गम तक पहुँचा जा सके तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।

विलियम ब्लैक ने ‘बियाण्ड द टाइम बैरियर’ में साइकोलॉजिकल एरो ऑफ टाइम का कुछ अधिक ही खुलासा किया है। इस क्रम में उन्होंने बतलाया कि इसके रहस्य को जानकर हम सब अपने निर्माण के इतिहास को भेदकर परिभ्रमण कर सकते हैं। प्राचीन भारतीय वाड्.मय में इस तरह की अनेकों कथाएँ मिलती है। योगवासिष्ठ में जिन्होंने लीलोपाख्यान पढ़ा है, वे इस ‘काल रहस्य’ को आसानी से समझ सकते हैं। इस बारे में फ्रेंच मनीषी सत्प्रेम ने ‘द डिवाइन मैटोरियलिज्म’ में श्री अरविन्द आश्रम की अधिष्ठात्री श्री माँ के जीवन की एक घटना का रोचक उल्लेख किया है। जब वह एक बार पेरिस में वहाँ के ‘गीमट’ संग्रहालय को देखने गयीं, तो वहाँ पर स्थित ममी ने सामने सजीव हो उठे। वह उनके पिछले कई जन्मों के घटनाक्रमों को कुछ इस तरह देखती रहीं, मानो वह उनके साथ वर्तमान में ही रह हो। काल का यह अद्भुत रहस्यबोध निःसन्देह हमारे सामने अलौकिक एवं आश्चर्यजनक संसार का खुलासा करता है।

वैज्ञानिक इस बारे में कहते हैं कि विगत समय का अवश्य ही कोई ऐसा अदृश्य सूत्र हमारे पास है। , जिसे ढंग से समझ लेने पर हम रहस्यमय सृष्टि के अनेकों अविज्ञात लोकों को जान सकते हैं वर्तमान मनोवैज्ञानिकों के प्रयास भी इन दिनों कुछ इसी ओर है। पाश्चात्य जगत में ‘अवचेतन’ के नाम पर तहलका मचाने वाले सी. जी. युँग ‘मेमोरीज ड्रीम्स एण्ड रिपलेक्शन’ में खुशी जाहिर करते हुए लिखते हैं कि मनोविज्ञान अवश्य ही उन्नत विज्ञान है, जिससे काल के रहस्य को जाना जा सकता है। इस क्रम में किए गए अनुसंधान इनसान को उसके भूत और भविष्य की झाँकी दिखा सकते हैं। तब त्रिकालदर्शी होना उसके लिए कोई अनूठी बात न होगी।

मानवीय चेतना के उच्चतर आयामों में देश-काल का बोध क्रमशः विलीन होता जाता है। ब्लैक होल में भी समय नहीं रह जाता । मानवीय अचेतन में डूबी विगत स्मृति को वर्तमान में सजीव करने का सुझाव मूरीहोप देती है। इस स्थिति में समय की दिशा ीत की ओर मुड़ जाती है। ये कहती है, स्मृति मस्तिष्क के बायें हेमीस्फियर में अचेतन रूप में अंकित रहती है। मनोवैज्ञानिक अपनी कुशल तकनीकों से इसे जाग्रत कर सकते हैं। खोज-बीन के इस क्रम में उनका मानना है कि यदि समष्टि के अचेतन यानि कि’ कलेक्टिव अनकाँशस’ को भविष्य में जाना जा सका तो सृष्टि के उद्भव विकास में काल की लीला को कम्प्यूटर में उतारा जा सकता है। तब हमें रामायण-महाभारत भी अपने वास्तविक रूपों में ऐसे किसी सुपर कम्प्यूटर प्रणाली द्वारा अपने टी. वी. सैटों पर देखने को मिल सकेंगे। नासा ने इस बारे में एक योजना भी बना ली है, ‘आर्मचेयर एडवेन्चर’ जिसके अंतर्गत चार अरब वर्ष पूर्व के इतिहास में यात्रा करने की कोशिशें जारी हैं ।

विज्ञानवेत्ता पाल डेविस ने मस्तिष्क के दो स्तरों की विशद विवेचना की है। उनके अनुसार इसके निम्नतम स्तर में न्यूरान्स के अंतर्संबंधों के बीच जैविक हलचल होती रहती है। उच्चतर अवस्था में न्यूरान्स का जटिल नेटवर्क होता है। न्यूरान्स की इन सूक्ष्म संरचनाओं में उन्नत आयामों की दिव्य अनुभूतियाँ भरी पड़ी है। बस जरूरी है तो इसका जागरण । ऐसा किया जा सका तो फिर विगत के इतिहास को दूरदर्शन के पर्दे पर विभिन्न कार्यक्रमों के समान देख सकते एवं स्वयं वहाँ यात्रा करने कल्पना महज कपोल-कल्पना बनकर न रहेगी।

अपने इस अध्ययन में पाल डेविस ने समय का अति सूक्ष्म विश्लेषण किया है। समय, परिस्थिति के अनुरूप सापेक्ष है । क्वाँटम थ्योरी के अनुसार तो समय भी ऊर्जा से भरी तरंग है जिसका अति सूक्ष्म माइक्रो सेकेण्ड न्यूरान की गतिविधियों से जाना जाता है।समस्त सृष्टि में एक समान आवृत्ति में समय लगभग बराबर होता है। अध्यात्मविज्ञान में मर्मज्ञ अपनी मंत्र-साधना के द्वारा चेतना की गहराइयों में मंत्र बीज के स्फोट द्वारा ‘टाइम कोड’ को विखण्डित करके अनन्त ऊर्जा को प्राप्त करते हैं। इस रहस्यमय विज्ञान को अब आधुनिक विज्ञानवेत्ता भी स्वीकार करने लगे है।

मूरीहोप ने अपने अध्ययन में वैयारिक तरंगों में सन्निहित ऊर्जा का भी विस्तार से उल्लेख किया है। यह समय की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदलने के लिए जरूरी बल प्रदान करती हैं उनके अनुसार क्वाँटम संसार यानि कि तरंगमय संसार में यदि विचार तरंगों की ऊर्जा को संघनित किया जा सके तो टेलीपैथी के रूप में न केवल संवाद का संचार सहज होगा, बल्कि विचारों के सूक्ष्म आयामों से संपर्क करके आगत, सनागत को जानना भी सरल एवं सहज हो जाएगा। क्वाँटम विश्व में विचार भी मन की एक तरंग है। इसकी तरंग दैर्ध्य में बढ़ोत्तरी करके अनन्त दूरी की अकल्पनीय यात्रा कुछ पालों में पूरी की जा सकती है।

आइन्स्टाइन के सूत्र बताते हैं कि समय को आगे-पीछे ऊपर -नीचे सभी दिशाओं में लाना सम्भव है। यानि कि व्यक्ति वर्तमान से शुरू कर भविष्य की ओर तथा भविष्य से शुरू कर भूत की ओर भ्रमण कर सकता है। प्रख्यात भविष्य द्रष्टा एडगर केसीस इसी रहस्य को जानकर भूत एवं भविष्य के पारखी बने थे। जीन डिक्सन , नोस्ट्राउमस, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि रमण, योगीराज अरविन्द ने काल के इसी रहस्य को जाना था। इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य का उद्घोष करने वाले परम पूज्य कुरुदेव के संपर्क में जो भी आए है, उन्हें पता है कि काल के रहस्य-ज्ञान के वह अद्भुत मर्मज्ञ थे। हेंस आइजेक कैम्ब्रिज के विख्यात परामनोविज्ञानी डॉ. कार्ल सार्जेन्ट ने ‘एक्सप्लेनिंग द अनएक्सप्लेण्ड’ नामक शोधग्रन्थ में वर्तमान में ही आगत-अनागत की प्रायोगिक सत्यता को अच्छे ढंग से निरूपित किया है।

मनोवैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों में पाया है कि सम्मोहित अवस्था में व्यक्ति अपने बीते हुए जीवन की समस्त घटनाओं का साक्षात्कार कर सकता है, इस सम्बन्ध में जे. ग्रीवन का ‘टाइमबर्थ’ ग्रन्थ उल्लेखनीय है। उनका कहना है कि सम्मोहन की स्थिति में व्यक्ति की चेतना पार्थिव समय को लाँघकर काल के किसी उच्चतर आयाम में प्रवेश कर जाती है। जहाँ भूत एवं भविष्यत् घटनाओं से सम्बन्धित सभी तथ्यों तथा प्रत्येक जानकारियों से संपर्क स्थापित किया जा सकता है। किस तरह वर्तमान के बन्धन को शिथ्ज्ञिल कर उन्नत आयामों से संपर्क स्थापित किया जा सकता है ? इसके जवाब में डब्लू. एच. डन ने अपने ग्रन्थ ‘एक्सपेरीमेण्ट विथ टाइम’ में कहा है कि जब हम सामान्य चेतनावस्था को शिथिल कर गहरी सुषुप्ति की स्थिति में पहुंचते हैं तो भूत और भविष्य उसी तरह आमतौर से वर्तमान अनुभव में आता है। इसका प्रायोगिक स्वरूप ध्यान ही है।

काल यात्रा की यान्त्रिक परिकल्पना पहली बार 1987-88 में ‘चार्ल्स पेलीग्रीनों यूनिवर्सिटी - न्यूयार्क के नाभिकीय वैज्ञानिक जेम्स पावेल ने की। उन्होंने इसे अनतरतारकीय उड़ान से सम्भव बताया । उनके अनुसार यह एण्टीमैटर राकेट से सम्भव हैं इसके पश्चात् नासा के राबर्ट जैस्ट्रो, जीलटार्टर, राबर्ट फारवर्ड और जान रेदर ने इस ओर गहन अनुसंधान किया। 1987 में पाल सीमन्स ने यह परिकल्पना करते हुए कहा कि आगामी शताब्दी के नाम से जानी जाएगी। इस दौरान काल यात्रा का यह पुरुषार्थी अभियान साकार हो सकेगा। वैज्ञानिकों ने इस काल यात्रा पर जाने के लिए विलक्षण -अन्तरताकीय यान की परिकल्पना की है। उनके अनुसार यह यानतारक पथ पर द्रव्य एवं प्रति द्रव्य की अभूतपूर्व ऊर्जा से संचालित होगा। चुम्बकीय पट्टी पर एण्टीप्रोटज्ञन धनात्मक की बजाय ऋणात्मक चार्ज होता है। जब यह एण्टी प्रोटान सामान्य अवस्था में आता है तो पूरा द्रव्य ऊर्जा में बदल जाता है इस तरह सीमन्स का मान्यता है कि द्रव्य को ऊर्जा में रूपांतरित करके हाइड्रोजन बम से सैकड़ों गुनी ज्यादा ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है, फिर काल यात्री तो समय की ऊर्जा का भी प्रयोग करेंगे, जिसके द्वारा वे एक आकाशगंगा से दूसरी आकाशगंगा तक इस तरह घूमें-फिरेंगे जैसे हम लोग न्यूयार्क से दिल्ली आते-जाते हैं।

‘बियाँण्ड द टाइम बैरियर’ में ए. टज्ञमस का प्रकाशित तथ्य बताता है कि वह समय दूर नहीं , जब समय के धरातल पर आगे या पीछे यात्रा करना वास्तविक एवं यथार्थ विषय होगा। ‘टाइम मशीन ‘ में एच.जी. वेल्स की अवधारणा भी इसी तरह प्रतिपादित है। मनीषी जान व्हीलर ने ब्रह्मांड में कुछ ऐसे ‘वार्महोल’ के बारे में प्रकाश डाला है, जिसमें से होकर समय की यात्रा अतीव सरल हो जाएगी। ब्लैक होल में भी समय का सारा मापदण्ड निष्क्रिय तथा समाप्त हो जाता है। उड़नतश्तरियों की रोमाँचक तथा वास्तविक अन्तर्ग्रहीय यात्रा पथ शायद यही ब्लैक होल, हृइट होल तथा वार्म होल होंगे।

अलबर्ट आइन्स्टाइन, बोरिस पोडस्कीतथा नाथन रोजेन का ई. पी. आर. प्रयोग कणों के लोकल और नानलोकल निष्कर्ष का ब्योरा देता है। लोकलिटीं में देश में देश और काल के प्रभाव का नियंत्रण होता है, जबकि यह प्रतिबद्धता क्वाँटम याँत्रिकी के तहत आइन्स्टाइन ने सिद्ध किया है कि दो कणों का सम्बन्ध आपस में अन्योन्याश्रित होता है। इसका एक कण यदि वाशिंगटन वाले कण को छेड़ने पर बम्बई का कण स्वतः प्रभावित हो जाएगा।

इस घटना को पाल डेविस ने अपने शोधग्रन्थ ‘द कास्मिक ब्लून्रिन्ट’ में दूरत्व का अलौकिक कार्य कहा है। सूक्ष्म कण सदा देशकाल से पूरे संचारित होने की क्षमता रखते हैं विचार भी ठीक इसी प्रकार तरंगों से तरंगित होता है। विचार की ऊर्जा तरंग मस्तिष्कीय न्यूरान को एक सुनिश्चित प्रक्रिया से उत्तेजित करती है। इस प्रकार ब्रेन कार्टेक्स में सूक्ष्म तरंग प्रवाहित होने लगती है। इसकी तीव्रता 70 मिलीवाट के बराबर होती है। ऊर्जा का यह प्रसार एक न्यूरान से होकर समस्त न्यूरान में फैल जाता है। विचार रूपी इस ऊर्जा करे इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंग के तहत प्रक्षेपित किया जाय तो काल यात्रा को एक नयी दिशा मिल सकती है। विज्ञानवेत्ता आई. वैटेव ‘स्टाकिंग द वाइल्ड पेण्डुलम’ में इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। यूनिफिकेशन थ्योरी के अनुसार , ध्वनि तरंग, प्रकाश , इलेक्ट्रो डाइनैमिक तथा नाभिकीय विकिरण न केवल पदार्थ में है, बल्कि मानवीय चेतना में भी मौजूद है।

मानवीय मन-मस्तिष्क की अद्भुत क्षमता का परिचय वैज्ञानिकों ने स्पष्ट रूप से स्वीकारा है। अध्यात्मवेत्ता व्यष्टि से समष्टि यात्रा भी मन को ही यान बनाकर करते रहे है। वैज्ञानिकों को तो काल यात्रा के यान्त्रिक सरंजाम जुटाने में अभी लगेगी। सारे साधन जुट जाने पर नहीं मालूम यह प्रक्रिया कितनी खर्चीली साबित हो। पता नहीं सबके लिए उपलब्ध भी हो अथवा नहीं, परन्तु हमें, हम सबको परमेश्वर ने शरीर एवं मन का बहुमूल्य उपहार बिना मूल्य सौंपा है। इसकी असीम सामर्थ्य जगाकर हम काल के विभिन्न आयामों को यात्रा बिना किसी अवरोध के कर सकते हैं। काल का यह रहस्यबोध न केवल हमारे सामने एक नया जादुई संसार खोलेगा, बल्कि हमारे व्यक्तित्व में अनेकों आश्चर्यजनक शक्तियों का भण्डार भी भरेगा।


आशा का दीपक जलाये रखें

सर्वथा अनजान इस दुनिया में मानव पूरी तरह से साधनहीन होकर आता है। जन्म के समय न तो उसके पास सबल शरीर होता है और न प्रखर बुद्धि । बस अपने छोटे-से बाल हृदय में आशा एवं आत्म-विश्वास की एक टिमटिमाती ज्योति को लेकर इस संसार में प्रवेश करता है। इसी के प्रकाश में वह जीवन की राहें खोजना शुरू करता है। आशा के आलोक में अपने प्रयास करते हुए दुनिया के बड़ी से बड़ी श्रेष्ठताओं और विभूतियों का मालिक बन जाता है। जनम के समय कुछ न लेकर आया शिशु बड़ा होकर जीवन में आने वाले बीहड़ जंगलों, कठिन राहों, अटपटी भूल-भुलैयों एवं कुटिल चक्रव्यूहों के बीच अपना मार्ग खोज लेता है। उसके हृदय में दिपदपाती आशा की लौ उसका पथ प्रदर्शन करती रहती है। उसके श्रेष्ठ कर्मों का चमत्कार देखकर लोग दाँतों तले अँगुली दबा लेते हैं।

आशा की शीतल किरण ही बधिर एवं अशान्त व्यक्तियों के चित्त को सांत्वना देती है। उसके जीवन में छाए अन्धकार को दूर करके उसे नवविश्वास एवं संभावनाएं प्रदान किया करती है। आशा की अलौकिक ज्योति में संजीवनी तत्व विद्यमान रहते हैं। मनुष्य के मन में उत्पन्न हुई आशा की एक किरण उसके अन्तःकरण में छाए हुए अन्धकार के जंजाल को छिन्न-भिन्न कर देती है और उसमें साहस, उल्लास एवं नवस्फूर्ति पैदा करती है। आशा ब्रह्मशक्ति है, जो व्यक्ति को संघर्षों में भी आगे बढ़ जाने की प्रेरणाएँ एवं सामर्थ्य प्रदान करती है। आशा मानव जीवन का वरदान है और निराशा अभिशाप । इस सत्य को ध्यान में रखते हुए विवेकवान व्यक्ति आशा को अपने जीवन की सहचरी बनाते हैं।, जो प्रतिक्षण उन्हें कुतुबनुमा की तरह आगे बढ़ने की दिशा बताती रहती है। यही कारण है कि आशावादी

व्यक्ति ही जीवन का सही सदुपयोग कर पाते हैं। बहुतेरे लोग, प्रतिकूल परिस्थितियों में घबराकर, चिन्तित, परेशान होकर आशा का सम्बल छोड़ देते हैं और निराशा के घने अँधेरे में फँसकर अपने जीवन को चौपट कर लेते हैं। किंतु मनस्वी, बुद्धिमान एवं विवेकशील व्यक्ति ऐसी विषम परिस्थितियों में भी हार मानने के बजाय, जीत को लक्ष्य करके अधिक सक्रिय साहस के साथ आगे बढ़ जाते हैं। यह निराशा पर आशा की विजय है। आशावान् व्यक्ति निराशा को कभी पास फटकने नहीं देते। वे कभी भी जीवन से हार नहीं मानते और संघर्षों से मुकाबला करने के लिए हर पल तैयार रहते हैं।

जब व्यक्ति निराशा से आक्रांत होता है, निष्क्रियता उस पर आक्रमण करती है । उसका मन विषाक्त होता है और जीवनी क्षीण होती है। ण्से में जल मनुष्य की चित्तवृत्ति दूषित हो जाती है, तो वह अपने आदर्शों। , श्रेष्ठ निश्चयों एवं सत्कर्मों। के संकल्प को भी नष्ट कर डालती है। जिन श्रेष्ठ विचारणाओं का किला मनुष्य अपने प्रयत्न-अनगिनत कोशिशों के बाद खड़ा करता है, निराशा का एक ही ध्वंसात्मक विचार उसे अस्त-व्यस्त करके भूमिसात् कर देता है।

यह सभी जानते हैं। कि किसी चीज का निर्माण करना बड़ा मुश्किल है, लेकिन उसका विनाश-विध्वंस काफी सरलता से हो जाता है। ठीक इसी तरह विश्वास और आशा को बनाए रखना कठिन है। और निराश होना आसान है। यदि लोग यह जान पाते कि दूषित भाव और बुरे विचार उनके जीवन के लिए हानिकारक हैं, इन शत्रुओं को मन में खतरनाक है। तो शायद मनुष्य इस प्रकार उद्विग्न और असफल न होता। मनुष्य शक्ति का भण्डार है। उसे महान-ऊँचे तथा प्रशंसनीय काम करने चाहिए, न कि तुच्छ-नीच एवं निन्दनीय। इस मानवीय सामर्थ्य एवं गरिमा का अहसास की झिलमिलाती ज्योति में ही होता है।

निराशा का अहसास किसी भी स्थिति में खतरनाक है रोगी को जब निराशा आकर घेर लेती है तो वह ऐसा विश्वास करने लगता है कि उसकी स्थिति दिन पर दिन गिरती जा रही है। क्योंकि निराशा का कीटाणु उसे अन्दर ही अन्दर समाप्त करता जाता है। परिणामतः वह अपनी मौत की ओर धीरे-धीरे सरकने लगता है।

चट्टान की तरह सख्त इनसान को भी निराशा का भाव पलभर में चकनाचूर कर देता है। इससे बचे रहना तभी सम्भव है, जब हमारी आशा की ज्योति विषमताओं की आँधियों में भी जलती रहे। जीवन को उन्नतिशील बनाए रखने के लिए सदैव सुखद कल्पनाओं से अपने मन को आच्छादित रखना चाहिए।

पतझड़ के बाद बसन्त दुःख के बाद सुख और रात्रि के बाद दिन यह तो सृष्टि का नियम हैं इस आशा और विश्वास को लेकर आगे बढ़ना चाहिए। परिस्थितियों पर विचार किए बिना निराश होने

को मूर्खता ही कहा जाएगा, क्योंकि संसार में आपत्तियों का आना स्वाभाविक है, लेकिन सफलता उसी को मिलती है, जो आपत्तियों से न तो घबराता है, न निराश होता है और न ही आत्म-विश्वास को खोता है। संसार सफलता-असफलता दोनों के ताने-बाने से बुना है। यदि हम असफलताओं से हिम्मत हारकर, निराश होकर बैठ गए तो संसार की सारी सक्रियता नष्ट हो जाएगी।

हमारा जीवन रूपी पुष्प हमेशा खिला हुआ रहे, कभी मुरझाने न पाए, इसके लिए निराशा एवं निरुत्साह को पास नहीं फटकने देना चाहिए। ये तो तुषारापात की तरह है। , जिनसे न केवल जीवन पुष्प मुरझाता है, बल्कि समूची जीवन-ऊर्जा ही ठण्डी पड़ जाती है । सौंदर्य एवं उल्लास की अक्षुण्य बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हमारे हृदय में आशा का दीपक सदा-सर्वदा पूरी प्रखरता के साथ जलता रहे, लेकिन यह तभी सम्भव है, जब हम अपने अंतःकरण में श्रेष्ठ, उच्च एवं दिव्य विचारों का घृत अनवरत डालते रहे।


भवितव्यता के संदेशवाहक होते हैं- धूमकेतु

इनसान अपने चिरअतीत से अनंत आकाश में तारों, नक्षत्रों, ग्रह-पिण्डों से अपने संबंध -सूत्र की खोज करता रहा है। अन्तरिक्षीय हलचलों को उसने बड़ी गहराई से अपने जीवन के परिवर्तनों में महसूस किया है। उसी अनुभूति ने बाद में ज्योतिर्विज्ञान का रूप लिया और ग्रह-नक्षत्रों, निहारिकाओं की आधिक बारीकी से छान-बीन होने लगी। धूमकेतु को कुछ अधिक ही अनोखा एवं अद्भुत पाया गया। प्राचीन भारतीय ज्योतिषशास्त्र से लेकर आधुनिक खगोल-विज्ञानी तक सभी इसके प्रति कुछ विशेष ही आकर्षित हुए है। शायद इसका कारण ही इसकी अजीबोगरीब संरचना रही है। इन धूमकेतुओं में सबसे निराला एवं आज का बहुचर्चित हूल बाप्प है। 1995 से ही इसकी झलक सबको चमत्कृत किए है।

इसकी खोज 22 व 23 जुलाई, 1995 में न्यू मैक्सिको अमेरिका के दो अंतरिक्ष विज्ञानियों एलन हेल तथा थामस बाप्प ने की थी। इन्होंने इसे अपनी शक्तिशाली दूरबीनों से सबसे पहले देखा। इन्हीं दोनों खोजी वैज्ञानिकों के नाम पर इस धूमकेतु का नामकरण हुआ-हेल बाप्प। इनके नाम धूमकेतु की वर्तमान पहचान बने, इसका मतलब यह नहीं कि इसके बारे में इससे पहले किसी को कुछ मालूम ही न था। भारतीय ज्योतिष विद्या के वाराणसी स्थित एक संस्थान ‘ब्रह्मगुप्त ज्योतिष विश्लेषण वेधशाला’ के निदेशक गोपाल शास्त्री कारखाँडेकर का दावा है कि ‘वृहद संहिता’ में आचार्य वारामिहिर ने इस धूमकेतु के बारे में विस्तृत जानकारी दी है। हाँ इतना जरूर है कि आज से 1529 वर्ष पूर्व उन्होंने इसे ‘श्वेतकेतु’ के नाम से सम्बोधित किया था। वृहद संहिता के तुचार अध्याय के एक श्लोक में कश्यप श्वेतकेतु के डेढ़ हजार वर्ष पश्चात् देखे जाने की बात स्पष्ट है। इस श्लोक में आगे वर्णन मिलता है कि यह धूमकेतु 1500 साल बाद आकाश के प्रथम चौथाई हिस्से में उदित होगा और दक्षिण की तरफ वामावर्त दिशा में बढ़ेगा। आचार्य वारामिहिर ने एक अन्य श्लोक में इस धूमकेतु की व्याख्या करते हुए कहा है कि इसकी गति ध्रुवतारा और सप्तर्षि मण्डल की तरफ जाते हुए दिखेंगी। यह लगेगा कि यह आकाश को मध्य से काटते हुए दक्षिण की तरफ जा रहा है।

हेल बाप्प की प्रकृति एवं स्थिति का अध्ययन सूर्यग्रहण के दिन किया गया। अध्ययन करने वाले इस दल में भारतीय ज्योतिष विद्या की प्रवीण सुश्री इस्सर भी शामिल है। इनके अनुसार निकट भविष्य में धूमकेतु की कक्षा में विचलन सम्भव है। यह अचरज भरा तथ्य है कि आज से डेढ़ हजार साल पहले, जबकि आधुनिक खगोलशास्त्र का जन्म ही नहीं हुआ था, तब आचार्य वारामिहिर ने धूमकेतु का स्पष्ट वर्णन कर दिया था। इन्होंने 1000 धूमकेतुओं का उल्लेख किया है।

वारामिहिर ने इस धूमकेतु कश्यप श्वेतकेतु के अलावा उद्दालक श्वेतकेतु का भी वर्णन किया है। ये एक हजार साल पश्चात् दिखाई देते हैं। पैतामच्छल केतु 1500 वर्ष बाद एवं सनवर्त श्वेतकेतु 7800 वर्ष बाद नजर आता है। उन्होंने अपने ग्रन्थ वृहद संहिता में न केवल धूमकेतु कि पहचान बतायी है, बल्कि इसकी उत्पत्ति एवं विकास का विस्तृत वर्णन भी किया है। उनके अनुसार उल्कापिण्ड ही धूमकेतु में परिवर्तित हो जाते हैं।

वर्तमान में अन्वेषक वैज्ञानिकों के नाम पर धूमकेतु का नामकरण किए जाने का प्रचलन है। 30 जनवरी, 1996 को एक जापानी खगोलविद् यू. जी. हयाकुताफे के द्वारा देखे गए धूमकेतु का नाम उसके नाम पर हयाकुताफे रखा गया। बहुचर्चित होली धूमकेतु का नाम इसके खोजकर्ता एडमण्ड हेली के कारण हुआ। इस बारे में यह भी मान्यता है कि इसे सबसे पहले चीन में ईसा से 240 वर्ष पूर्व खोजा गया था। अपने समय के महान वैज्ञानिक आइजक न्यूटन के मित्र एडमण्ड हेली ने 1705 में इस धूमकेतु की कक्षाओं की गणना की थी। हेल बाप्प के बारे में भी कहा जाता है कि 4200 वर्ष पूर्व जब सिन्धु घाटी को सभ्यता चरमोत्कर्ष पर थी, तब इसे पहले पहल पहचाना गया था, परन्तु इस बारे में कोई प्रामाणिक विवरण उपलब्ध नहीं है।

धूमकेतु को लोक प्रचलन में पुच्छल तारा भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी पूँछ कुछ ज्यादा ही बड़ी है। डॉ. निरुपमा राघवन के अनुसार जब कोई धूमकेतु सूर्य के पास से गुजरता है तब सूर्य की भीषण गर्मी धूमकेतु के ऊपरी भाग को वाष्पित कर देती है। यह वाष्प सूर्य से दूर होने पर जम जाता है एवं पूँछ का आकार ले लेता है। यह पूँछ हमेशा सूर्य से विपरीत दिशा में दिखाई देती है।

हेल बाप्प 25 मीटर चौड़ाई में एक लाख मीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से बढ़ता चला आ रहा है। हेली धूमकेतु की अपेक्षा इसका आकार करीब सौ गुना बड़ा है। इसको देखने के लिए तीन सौ इंच व्यास की दूरबीन का प्रयोग किया गया, जबकि हेली 200 इंच व्यास की तथा हयाकुताफे सिर्फ 40 इंच की दूरबीन से ही साफ नजर आ गए थे। बड़ी दूरबीन की शक्ति धूमकेतु की दूरी एवं उसके आकार का संकेत करती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हेल बाप्प पृथ्वी से सात खगोलीय इकाई की दूरी स्थित है। एक खगोलीय इकाई की दूरी पर स्थित हैं एक खगोलीय इकाई 14 करोड़ 16 लाख तीन हजार पाँच सौ किलोमीटर के बराबर होती है। 22 मार्च , 1997 को यह पृथ्वी से साढ़े उन्नीस करोड़ किलोमीटर की दूरी था। अतः नजदीक होने के कारण बहुत चमकीला दिखाई दे रहा था। अभी भी इसे चैत्र नवरात्रि की मध्य वेला तक संध्याकाल में पश्चिमी आकाश में स्पष्ट देखा गया।

धूमकेतु चट्टान, धूल और गैसों से मिलकर बने होते हैं। ये बर्फ के गोले के समान होते हैं। इन्हें भी सौर मण्डल के सदस्य कहा जा सकता है। क्योंकि ये भी अपनी निश्चित कक्षाओं में सूर्य की परिक्रमा करते हैं। जहाँ तक हेल बाप्प का सवाल है-वैज्ञानिकों के असार इसकी पैदाइश 4.5 अरब साल पहले हुई होगी। जो बाद में सौरमण्डल से दूर निकल गए। अमेरिका में ‘नासा ‘ के धूमकेतु विशेषज्ञ माइकेल मुम्मा ने बर्फ का होने की वजह से इसे आसमानी झोल का नाम दिया है। नवीनतम अध्ययन यह सूचित करते हैं कि हेल बाप्प सूर्य की परिक्रमा 4000 वर्ष वाले कक्ष में रहकर करता है। नेहरू प्लेनेटोरियम बम्बई के निदेशक हृी. एस. वेंकट ने इस पर काफी गहन अध्ययन किया है। उनके अनुसार, यह प्लूटो की कक्षा से 10 गुना दूरी पर अवस्थित है। शोध-अनुसंधान के इन प्रयासों में हेल बाप्प में कतिपय जीवन-तत्वों जैसे अल्कोहल तथा कार्बनिक यौगिकों को रेखाँकित किया गया है। क्वीन्स विश्व विद्यालय बेलफास्ट के अन्तरिक्षवेतता एलेन फिटसजमैन ने स्वीकारा है कि हेल बाप्प की समुचित जानकारी अनेक अविज्ञात तथ्यों को स्पष्ट कर सकती है। जर्मन उपग्रह रौजेट (क्रह्रस््नञ्ज) ने तो हयाकुताफे से एकसकिरण के उत्सर्जित होने की जानकारी दी थी।

हेल बाप्प के चमकीलेपन का कारण एलन हेल और थामस बाप्प ने खोजा है।इनके अनुसार यह 11 दीप्ति वाला धूमकेतु है। खगोलविज्ञान में किसी भी खगोलीय पिण्ड को नापने के लिए ‘दीप्ति ‘ को आधार माना जाता है। 6 दीप्ति से ऊपर वाले खगोलीय पिण्ड नंगी आँखों से देखे जा सकते हैं हेल बाप्प की दीप्ति का मान 11 होने के कारण इसका चमकदार होना स्वाभाविक है।

धूमकेतुओं के कई प्रकार होते हैं। इसके अनुरूप इनका परिक्रमा पथ भी भिन्न-भिन्न होता है। केवल अण्डाकार भ्रमण पथ वाले धूमकेतु ही सौरमण्डल में प्रवेश कर मेहमान की तरह आते-जाते रहते हैं। इनके आने-जाने के समय में भी अन्तर होता है। कुछ धूमकेतुओं के वापस लौटने का समय 200 साल के अन्दर होता है। हैली हर 76 साल में सूर्य का एक चक्कर लगा जाता है। हैली का दर्शन सबसे पहले मई 1910 में हुआ था। यह दुबारा जनवरी 1986 में दिखाई दिया तथा अगली बार 2062 में पुनः दिखेगा।

कुछ पुच्छल तारे ऐसे भी है तो एक बार अपनी झलक-झाँकी देकर जल्दी लौट आते हैं, तो कुछ लौटने का नाम ही नहीं लेते। 1811 का महाधूमकेतु तीन हजार वष्र बाद ही दुबारा लौटेगा। 1844 में दिखाई पड़ने वाला पुच्छल तारा तो एक लाख वर्ष तक रहने की इच्छा लेकर आया है। 1864 के धूमकेतु की वापसी यात्रा तो पूरे अट्ठाइस लाख साल बाद होने की सम्भावना है एक वैज्ञानिक आकलन के अनुसार 87 ईसा पूर्व से अब तक 611 धूमकेतुओं को पहचानने का प्रमाण उपलब्ध है। इनमें से 513 देरी सौरमण्डल की यात्रा में निकलते हैं। शेष 18 धूमकेतु 200 साल के अन्दर ही दुबारा दर्शन दे जाते हैं। 1786 से अब तक 65 बार देखा जा चुका हैं ये तो खास -खास पुच्छल तारे है। वैसे छोटे-बड़े पुच्छल तारों की संख्या अपने सौरमंडल के आस-पास लाखों में है लेकिन इनमें अधिकाँश अपने अंधकारपूर्ण शीत गृहों में पड़े रहते हैं। थोड़े ही अन्तरतारकीय अन्तरिक्ष यात्रा पर निकलते हैं।

धूमकेतुओं के बारे में अभी तक कोई सुनिश्चित तथ्य तथा जानकारी नहीं मिल पायी है। फिर भी वैज्ञानिकों ने सूर्य के स पहुँचने पर इनमें होने वाले प्रभावों को रोचक वर्णन किया है। धूमकेतु जब सूर्य के बहुत करीब पहुँच जाते हैं तो दो प्रकार की प्रक्रिया होती है। कुछ तो सूर्य के शक्तिशाली ज्वारीय बल से अप्रभावित होकर वहीं जमे रहते हैं। कुछ इस बल से टूटकर कई खण्डों में विखण्डित हो जाते हैं। इस अन्तरिक्षीय घटना का सबसे ज्वलन्त उदाहरण है धूमकेतु-वेस्ट। सूर्य के पास से गुजरते समय यह चार टुकड़ों में बंट गया था। इस प्रकार की घटनाओं से धूमकेतुओं की उम्र कम हो जाता है सूर्य की वाष्पीकरण ऊष्मा के कारण उनकी बहुत-सी नाभिकीय सतह फट जाती हैं और बेनकाब हो जाता है। धूमकेतु के ये विखण्डित टुकड़े अलग-अलग कक्षाओं को ग्रहण करते हैं

इसी तरह की घटना शूमेर लेवी-9 के साथ घटी। 1992 में यह धूमकेतु दिखाई दिया था। शूमकेर लेवी-9 बृहस्पति के पास से गुजरा ओर फिर बृहस्पति के असीम गुरुत्व बल के कारण इसका नाभिक 21 खण्डों में आ गया। ये सभी 21 खण्डों लघु धूमकेतुओं के रूप में एक सीधी कतार में दिखाई दिए। बृहस्पति की भूमध्य रेखा से 16 जुलाई, 1994 से शुरू होकर 7 दिनों की अवधि में एक-एक करके क्रमिक रूप से टकराए ओर अन्ततः अन्तरिक्षीय हलचल मचाकर सदा के लिए शान्त पड़ गए।

हेल बाप्प का आकर्षण इन सबसे अधिक है, क्योंकि यह खुली आँखों से दिखाई पड़ता है। 1 अप्रैल से इसकी यात्रा सूर्य की तरफ शुरू हो गयी थी। 1 अप्रैल , 1997 को शुरू किए सौर भ्रमण के समय इसकी दीप्ति में पर्याप्त आभा थी। यह दिसम्बर 1995 को एक जाज्वल्यमान तारे की तरह दिखाई दिया था, तब इसकी दीप्ति का मान 10 था। अभी की गणना के अनुसार हेल बाप्प सूर्य और पृथ्वी की दिशा में गतिमान है तथा क्रमशः इसकी चमक जा रही हैं जून 17 से सम्भवतः यह तेजी से सूर्य और पृथ्वी की कक्षाओं से पीछे हटने लगेगा।

नेहरू तारामण्डल की निदेशक डॉ. राघवन के अनुसार भारत में इसे पूर्वोत्तर दिशा में 10 डिग्री की ऊँचाई पर देखा गया। इस सदी के सबसे चमकीले धूमकेतु को भारत सहित पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध के किसी भी स्थान से देखा जा सकता है। इसे उत्तरी गोलार्द्ध में 8 अप्रैल तक एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में बाद तक भी देखा जा सकेगा। यह आकाशीय मेहमान आजकल अनन्त आकाश में मनोहारी दृश्य उपस्थित किए हुए है। इसी दौरान तीन खगोलीय चमत्कार हुए, जिन्हें स्पष्ट रूप से देखा गया। सूर्य, पृथ्वी और मंगल ग्रह तीनों एक सीध में थे और मंगल ग्रह सूर्यास्त के समय पूर्व दिशा में उदय हुआ तथा इसकी चमक सामान्य से अधिक थी। पश्चिम में अस्त होने से पूर्व इसने सूर्य की परिक्रमा की।

ये अन्तरिक्षीय हलचलों सिर्फ कहने-सुनने भर के लिए रोचक एवं रोमाँचक नहीं है, इनके प्रभाव भी उतने ही रहस्यमय एवं रोमाँचकारी है। समय-समय पर इसे पृथ्वीवासी अनुभव भी करते रहे है।युग परिवर्तन की इस संक्रान्ति की वेला में इन्हें भविष्यता का सन्देशवाहक भी कहा जा सकता है। ऐसे में जरूरत हमारे उस विवेक की है, जो विधाता के इन संदेशों को समझे और स्वयं को भावी परिवर्तन के लिए तैयार करें।


खोने का मंगलमय आनन्द

राजपुरोहित कश्यप के तप, त्याग एवं विद्वता की सुरभि से सारी कौशाम्बी महकती थी। सामान्य नागरिकों से लेकर महाराज जितशत्रु तक सभी उनका हृदय से सम्मान करते थे। कश्यप का सामाजिक जीवन जितना सम्मानित था, पारिवारिक जीवन उतना ही सुखी था। उनकी धर्मपत्नी यशा परिपरायण एवं परम-साध्वी थी। नवजात शिशु कपिल ने उनके दाम्पत्य जीवन की जयोत्सना को शत-सहस्रगुणित कर दिया था। दोनों बड़े प्यार’-दुलार से पुत्र का पालन-पोषण करते हुए फूले न समाते। उनका अधिकतर समय अपने पुत्र को लाड़ लड़ाने में व्यतीत होता था। आखिर उनकी सारी आशाएँ उसी पर टिकी जो थी।

बालक कपिल के बड़े होते ही राजपुरोहित को उसके अध्ययन की चिन्ता होने लगी, परन्तु मातृस्नेह अभी उस पर पढ़ाई का बोझ डालने के लिए तैयार न था। यशा हमेशा हर बार यही कह देती, “ अभी तो इसकी उम्र ही क्या है? यह कितना छोटा है। आखिर अभी से आप इसकी पढ़ाई के लिए इतने परेशान क्यों हो रहे है। ?”

इन सवालों का कोई उत्तर कश्यप के पास भले न रहा हो, परन्तु काल के प्रवाह को जानने वाले मनीषी सदा से यही कहते रहे है-”शुभस्य शीघ्रं” यानि शुभ कार्य में देरी नहीं करनी चाहिए। परिस्थितियाँ पता नहीं कब बदल जाये, सुयोग न जाने कब दुर्योग में परिवर्तित हो जाए ? इसलिए काल करे। सो आज कर की नीति का स्वीकारने, अपनाने में ही भलाई है।

कपिल के बाल्य जीवन का सुख भी स्थायी न रह सका। काल के प्रचण्ड झोंके में उसके पिता कश्यप का अवसान हो गया। माता और पुत्र दोनों ही भाग्य के थपेड़े खाने के लिए मजबूर हो गए। सुख और वैभव भरा जीवन दुःख और दारिद्रय में डूब गया। यह सब इतना अचानक हुआ कि यशा यह भी न सोच सकी कि किस तरह ओर कैसे अपने और बालक के जीवन के सार-सँभाल करें ?

महाराज जितशत्रु जो सम्मान कश्यप को देते थे, वह अब बन्द होना ही था। माँ के अतिशय लाड़-प्यार में कपिल अध्ययन नहीं कर सका। अशिक्षित रह गया, अन्यथा अपने पिता को ही तरह उसका भी राजदरबार में मान-सम्मान होता। उसकी माता यशा अपनी दुर्दशा एवं दीनता पर चुपके-चुपके कोने में बैठकर आँसू बहाया करती। वह पुत्र को कुछ कहना नहीं चाहती थी। फिर अब कहने का अर्थ भी क्या था।

एक दिन जब किशोर कपिल बाहर से धमा-चौकड़ी करके, हुड़दंग मचाकर घर वापस लौटा तो देखा उसकी माँ सुबक-सुबक कर रो रही है। माँ को रोते देखकर वह उद्विग्न हो गया। वह जैसा भी था, अपनी माँ को बहुत प्यार करता था, अपनी माँ को गहरा आघात-सा लगा। उसने माता से पूछा-” माँ तू क्यों रोती हैं ? तुझे क्या कष्ट है? “

इतना सुनते ही यशा बिलख कर रोने लगी। तनिक सांत्वना मिलने पर वह बोली, “ रोऊँ नहीं तो क्या करूं, बेटा! तेरे पिता के न रहने पर घर में कुछ भी तो नहीं रहा। कल तो सम्मान से सिर झुकाते थे, आज वही व्यंग्य करते हैं। तेरे अध्ययन में मैंने रुचि नहीं जली। तेरे पिता की चिन्ता कितनी वाजिब थी, परन्तु अपने मोहवश उसे ठीक से समझ न सकी। आज उसी के कारण ये दुर्दिन देखने पड़ रहे है।”

माँ की वेदना से मर्माहत कपिल की आत्म इस शुभ क्षण में जाग उठी। वह भावुक स्वर में बोला , “माँ तू रो मत। मैं पढूँगा। तू फिक्र छोड़ दे। ज्ञान की गरिमा को मैं समझ गया हूँ। मैं एक सच्चा ब्राह्मण बनूँगा। तू मुझे आशीष दे कि मैं अपना बनूँगा। तू मुझे आशीष दे कि पूँजी कमा सकूँ परन्तु मुझे विद्या देगा कौन ?”

“बेटा! इसका रास्ता है।“ यशा पुत्र में आश्चर्यजनक बदलाव को देखकर हतप्रभ थी। वह आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता के साथ कहने लगी,” अपने संकल्प को दृढ़ करके तू श्रावस्ती चला ता। वहाँ पर तुम्हारे पिता के परमस्नेही मित्र इन्द्रदत्त रहते हैं। आचार्य इन्द्रदत्त तुम्हारे पिता के मित्र ही नहीं प्रकाण्ड विद्वान और प्रख्यात मनीषी भी है। वे तुम्हें जरूर अध्ययन कराएंगे।”

माँ का आशीष लेकर कपिल अध्ययन के लिए चल पड़ा। वह श्रावस्ती में आचार्य इन्द्रदत्त के यहाँ पहुँचा। वह उनके गुरुकुल के वित्रमान वातावरण को देखकर अभिभूत हो गया। वहाँ हजारों विद्यार्थी अपनी ज्ञान पिपासा को तृप्त करने के लिए आते थे। जिधर नजर डाली उधर ही तप एवं ज्ञान की आंधी दमक रही थी। कपिल ने अपना परिचय देकर आचार्य इन्द्रदत्त से निवेदन किया, “मुझे आप अध्ययन की दीक्षा दें, मैं आपकी शरण में हूँ।”

आचार्य अपने प्रिय मित्र के पुत्र को देखकर विभोर हो उठे।उन्होंने सका हाथ पकड़कर अपने पास बिठाया और कहा, ‘पुत्र ! मैं तुम्हें अवश्य विद्याध्ययन कराऊँगा।”

आचार्य ब्राह्मण थे, सर्वथा अपरिग्रही ब्राह्मण । एक क्षण के लिए उनके मन में उसके भोजन के सम्बन्ध में विचार आया। कुछ पल सोच-विचार के बाद उसे वे वहाँ के नगरश्रेष्ठ शीलनिधि के पास ले गए और उन्हें निवेदन किया, “रेश्ठिवर ! यह मेरे परममित्र का पुत्र है। यहाँ अध्ययन की भावना से मेरे पास आया है, परन्तु मैं इसके भोजन प्रबन्ध के लिए चिन्तित हूँ।”

श्रेष्ठी शीलनिधि को आचार्य की प्रामाणिकता पर पूर्ण विश्वास था। उन्हें यह यकीन था कि आचार्य का आग्रह हमेशा लोकहित की कामना से होता है। वे कहने लगे-”इसमें चिंता कैसी? आपका आग्रह तो मेरे लिए आदेश है।” कपिल के कन्धे पर हाथ रखकर बोले- पुत्र कपिल आज से तुम प्रतिदिन मेरे यहाँ भोजन करना और मन लगाकर पढ़ना।”

अध्ययन प्रारम्भ हो गया। दिन-प्रतिदिन कपिल की प्रतिभा निखरती गयी। व्याकरण, साहित्य, दर्शन के मर्म को वह आत्मसात् करता गया। ज्ञान को तेज उसके हरे पर उभर आया। साथ ही यौवन की आभा भी दीप्त हो उठी। वह प्रतिभाशाली था, सुन्दर था और गुणवान भी। शीलनिधि की कन्या चन्द्रकला उसकी कंचन-सी काया और स्वप्निल नेत्रों पर मुग्ध हो गयी। उसके नेत्र बाणों से कपिल भी आहत हो गया। शनैः-शनैः वे दोनों एक दूसरे के मोहपाश में बँध गए।

अवसर पाकर जब-तब वे दोनों उद्यान में चले जाते और परस्पर कल्पनाओं के यान में बैठकर मनोमय लोक में विहार करते रहते । हर दिन मनोमय लोक की आभा भी हर दिन उनकी कल्पनाओं का यान नया होता। मनोमय लोक की आभा भी हर दिन अपेक्षाकृत अधिक लुभावनी होती। चन्द्रकला कपिल की साहित्यिक शब्दावली एवं भाँति-भाँति की उपमाओं से रससिक्त प्रशंसा से हर्षविभोर हो जाती। कपिल भी चन्द्रकला के मादक यौवन को अपने ऊपर न्यौछावर होते देख फूला न समाता।

चन्द्रकला कपिल के प्रेम में भले ही आबद्ध हो गयी हो, परन्तु पिता से पाए व्यावसायिक संस्कार उसमें पर्याप्त थे, एक दिन एकान्त में उसने कपिल को समझाते हुए कहा-”सुनो अब आन अध्ययन को त्याग कर उपार्जन करो।”

“पर आखिर क्यों? “ कपिल सर्वथा अनजान था।

“आप तो निरे बुद्धू हो, समझते क्यों नहीं ? अभी तक तुम अकेले थे। अब हम दो होंगे। विवाह के बाद, तुम्हें मेरे पिता के घर इस तरह भोजन करते हुए अच्छा लगेगा।”

“क्यों नहीं अच्छा लगेगा!” कपिल ने इधर-उधर ताकते हुए कहा। “आखिर वे हमसे इतना स्नेह करते हैं,”

“स्नेह की बात और है, मेरे स्वामी ? पर स्वाभिमान भी कुछ होता है ?’

“ओह !” उसे चन्द्रकला की बातें कुछ-कुछ समझ में आयीं। वह थोड़ा चिन्तित-सा हो गया। “ तब तो अर्थ उपार्जन करना ही पड़ेगा, परन्तु मैं अर्थ उपार्जन करना जानता कहाँ हूँ ?”

“आपको अर्थ उपार्जन करना नहीं आता, यह तो मैं जानती हूँ।” चन्द्रकला उसके भोलेपन पर मुस्कुरा रही थी, “ परन्तु आपको श्लोक रचना करती तो आती है न ?”

“हाँ ! “ कपिल ने स्वीकारा।

“तब सुनो ! श्रावस्ती के महाराजा प्रसेनजित विद्याप्रेमी है। वे सरस्वती की उपासना करते हैं। उनका नियम है कि प्रातःकाल यदि कोई मनुष्य नया एवं सुन्दर श्लोक सुनाए तो उसे वे दस स्वर्ण मुद्राएँ भेंट करते हैं। हाँ इतना जरूर है कि प्रातःकाल शीघ्र वहाँ जाना पड़ता है। बोलो कल जाओगे ?” चन्द्रकला ने कपिल से पूछा।

“हाँ! अवश्य जाऊँगा ।”

चन्द्रकला ने एक रहस्यमय मुसकान के साथ अपनी बात जारी रखी।” इसमें एक रहस्य भरी बात और है, इसे तुम चूर्नाती कह सकते हो और परीक्षा भी।”

“वह क्या ? “ कपिल इस बार थोड़ा चकित हुआ और हैरान भी। चन्द्रकला कहने लगी, “ कल गुरुवार है, विद्या के उपासकों का विशेष दिन। महाराज प्रसेनजित को अपने राजदरबार के लिए राजकवि की तलाश है। उन्होंने सोच रखा है कि कल के दिन जो भी उन्हें सर्वप्रथम श्लोक सुनाएगा, वह यदि उनके मन को भा गया तो उसे राजकवि बना दिया जाएगा।”

यह सुनकर तो कपिल की नींद गायब हो गयी। उसने सोचा कि यदि वह सुबह सर्वप्रथम न पहुँच पाया तो ? इसलिए रात्रि में ही राजमहल के पास खड़े रहना ठीक है। अपनी सोच के अनुरूप वह राजमहल के द्वार के समीप खड़ा हो गया। जब आँखों में नींद आए, तो वह वहाँ घूमने लगता। कहीं कोई दूसरा व्यक्ति श्लोक लेकर उसके पहले न आ जाए। साथ ही उसे इस बात की चिन्ता थी कि कौन-सा श्लोक सुनाया जाय, कि महाराज प्रसन्न हो जाएँ।

उसे व्यग्र चित्त घूमते हुए सन्तरी ने देख लिया। उसने सोचा जरूर यह कोई चोर है। सन्तरी ने उसे पकड़ कर कमरे में बन्द कर दिया। उसके लिए वह रात्रि कालरात्रि बन गयी। श्लोक की चिन्ता छोड़कर वह सोचने लगा कि कल जब नगर में ज्ञात होगा कि कपिल रात्रि में कारागार में था, तब आचार्य तथा शीलनिधि का हृदय कितना दुःखी होगा? अब मेरा क्या होगा ?

सुबह राजदरबार में महाराजा प्रसेनजित के सामने जब उसे खड़ा किया गया, तब उसने सब कुछ सच-सच बता दिया।

महाराजा उसके सत्य वचनों से प्रसन्न हो गए ओर बोले, “कपिल ! तुम्हारी सच्चाई से मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हें जो चाहिए, वह तुम मुझसे माँग सकते हो।” वह तो अचंभे में पड़ गया। उसने तो सोचा था कि उसे दण्ड मिलेगा, पर यहाँ तो कुछ और ही। वह बोला-” मैं क्या माँगू, यह मैं नहीं सोच पा रहा हूँ। मुझे आप सोचने के लिए थोड़ा समय दें।”

प्रसेनजित ने उसका निवेदन स्वीकार कर लिया। वह राजोद्यान में बैठकर सोचने लगा, महाराज से क्या माँगू ? विचार आया कि एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ माँग लूँ । फिर मन में आया कि इतने से क्या होगा, आधा राज्य ही क्यों न माँग लूँ ? लेकिन आधा राज्य माँगने से इससे तो अच्छा होगा मैं उनका पूरा राज्य ही माँग लूँ।

यह विचार आते ही वह काँप उठा। अरे रे ! मैं यह क्या सोच रहा हूँ ? जो मुझे देने बैठा है उसको लूट डालने की मैं योजनाएँ बना रहा हूँ? उसकी आँखों में आँसू छलछला आए। उसकी अन्तरात्मा उसे धिक्कारने लगी । जाग्रत आत्मा उसे सचेत करने लगी, अभी तो इन्द्रिय भोगों, विषयों की कल्पना करने से तू इतना उद्विग्न है। लिप्सा के भंवर में फँसकर रात्रि तू कारागार में रहा। जब विषयों के बीच रहेगा, तब तेरा क्या हाल होगा? इन्द्रिय भोगों से कौन तृप्त हुआ हैं। जीवन का वास्तविक गौरव तो कुछ भी नहीं माँगने में है। बस फिर क्या था, बचपन से लेकर युवावस्था तक के सारे दृश्य उसके नेत्रों के सामने एक-एक कर तैर गए। उसे संसार से विरक्ति हो गयी।

उसने राजदरबार में पहुँचकर कहा-”राजन! मुझे क्षमा करें, मैं अब कुछ भी नहीं माँगना चाहता। मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। मैं आज से सम्पूर्ण त्यागी बनकर संयम में महा मंगलमय मार्ग पर जा रहा हूँ। आपका कल्याण हो।” और वह ब्राह्मणत्व के उस सत्य मार्ग पर चल पड़ा, जहाँ अपरिग्रह उसका आदर्श था, संयम उसका सम्बल। तप और विद्या ही उसकी संपत्ति थी, जिसके बल पर उसने अपने साथ अन्यों के जीवन को भी आलोकित कर दिया।


अलादीन के चमत्कारों से भरा है हमारा अपना मन

भानुमती का पिटारा और अलादीन का चिराग अपने करिश्मों के लिए प्रसिद्ध है। परंतु इन दोनों के चमत्कारों के योगफल से भी शायद वह मुमकिन नहीं, जो अपना मन कर दिखाता है। इसकी जादुई क्षमताएँ अलौकिक एवं अनोखी है। साथ ही इसके रंग भी इतने है कि कभी-कभी तो खुद को भी पहचानना मुश्किल हो जाता है, क्या यह हम ही है ? अथवा क्या यह अपना ही मन है ? उसकी विद्युत चुम्बकीय तरंगों की घट-बढ़ इसकी क्षमताओं को आश्चर्यजनक ढंग से बदल देती है। कभी इसमें पड़ी दरार एक ही अस्तित्व में दो अलग-अलग व्यक्तियों के अनुसार विशिष्ट चुम्बकीय तरंगों का प्रयोग कर इन दोनों व्यक्तियों को समान रूप से विकसित भी किया जा सकता है।

कुछ ऐसा ही संयोग एक महिला की मनोभूमि में प्राकृतिक यप से घट गया और यह एक ही महिला, अर्लीनग्राण्ट तथा कैण्डों जोन्स नामक दो अलग हीमिकाओं में काम करती रही। एक बार अर्लीनग्राण्ट सेनफ्रांसिस्को से ताइवान गई। वहाँ अच्छे होटल में ठहरी, घूमने का आनन्द लिया। ताइपेई नामक सुन्दर जगह की सैर की तथा वापस सेनफ्रांसिस्को आयी। यह प्रवास एक सप्ताह का था। मॉडलिंग एजेन्सी में काम करने के कारण उसके कार्यालय वालों ने उससे पूछताछ की कि वह कहाँ गई हुई थी। सभी को बहुत आश्चर्य हुआ, जब उसने कहा कि उसे कुछ पता नहीं है, जबकि प्रवास का पूरा प्रमाण उपलब्ध था। वह सब कुछ आश्चर्यजनक एंग से भूल गयी थी।

यह क्रम एक-दो बार और एक-दो दिन नहीं, पूरे बारह साल तक अनेकों बार चलता रहा। परन्तु हर बार आने के पश्चात् वह बीता हुआ सब भूल जाती थी। ग्राण्ट इतनी सुन्दर , बुद्धिमान और अपने काम में इतनी दक्ष थी कि कोई उसके दुहरे व्यक्तित्व की कल्पना नहीं कर सकता था। ग्राण्ट के रूप में वह अमेरिका में 40 वें से 50 वें दशक में अनगिनत पत्रिकाओं के मुखपृष्ठ पर स्वयं को सुशोभित कर चुकी थी, जबकि कैण्डी जोन्स के व्यक्तित्व में वह यायावर थी और इस रूप में उसने पैसिफिक युद्ध क्षेत्र में दो साल की कठोर यातनाएँ सहन की। इस बात की पुष्टि आकलैण्ड के डाक्टर एवं सी. आई. ए. के सदस्य एरील जेन्सन ने अपने दस्तावेजों में की है।

हिप्नोटिज्म के विशेषज्ञ डा. जार्ज इस्टरब्रुक्स ने इस विषय पर काफी अनुसंधान किया है। उन्होंने इस पर अनेकों प्रयोग किए कि किस तरह बहु व्यक्तित्व के प्रत्येक आयामों को अलग−अलग किया जाय। प्रयोग के दौरान उन्होंने उन्हीं व्यक्तियों को चुना तो कई रूपों में जीते थे। इन्हें उन स्थानों पर भेजा गया जिनसे वे सम्बन्धित हों, परन्तु उन्हें इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं हासिल हो सकी। एक विशेष सम्मोहन संकेत से ही इनसे कुछ पता लगा पाना सम्भव हो पाया। कोलगेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर इस्टाब्रुक्स ने पाया कि इन्हें भय या डर दिखाकर रहस्यों को अनावृत नहीं किया जा सकता। क्योंकि ऊपरी नहीं किया जा सकता। क्योंकि ऊपरी तौर पर ये स्वयं अपने मन के रहस्यों से अनजान है।

कैण्डी जोन्स अपने इस रूप में राजनीति, सैन्य-गतिविधियों से सम्बन्धित थी, जबकि अर्लीनग्राण्ट रिसेप्सनिस्ट केसाथ मॉडलिंग का काम करती थी। एक दशक बाद अर्लीन ने न्यूयार्क आकाशवाणी के प्रसिद्ध उद्घोष लाँग जॉन नेबल से शादी की। शादी के कुछ समय बाद उसे दौरा पड़ा और युद्ध कैदी का सारा रहस्य गलने लगी। नेबल को हैरानी हुई कि ऐ सामान्य रिसेप्सनिस्ट का जासूसी जैसे कामों से क्या वास्ता। काफी दिनों के बाद वह सामान्य हो सकी और अपने पुराने व्यक्तित्व में वापस लौट आयी। विख्यात लेखक डोनाल्ड बेन्स ने ‘द कण्ट्रोल ऑफ कैण्डी जोन्स’ में उसके दुहरे व्यक्तित्व का रोचक वर्णन प्रकाशित किया है।

बहुव्यक्तित्व का अध्ययन करने वाले पत्रकार जेम्स. एल. मूरी ने इसे दो प्रकार का बताया है। पहला है, रेडियो हिप्नोटिक इन्द्रा सीरिब्रल कन्ट्रोल तथा दूसरा है इलेक्ट्रॉनिक डिसेसिएशन ऑफ मेमोरी। मूरी के अनुसार इस तरह के बहुव्यक्तित्व एक खास ध्वनि से पहचाने जाते हैं। ऐसे लोगों के मस्तिष्क से एक विशेष प्रकार की तरंग निकलती है, जो व्यवहारों में अचानक परिवर्तन ला देती है और व्यक्ति अनायास ही दूसरी तरह के काम करने लग जाता है ई. डी. ओ, एम. में एसिटोकोलीन नामक हार्मोन की मुख्य भूमिका रहती है। यह हार्मोन विद्युत आवेश को इन्द्रियों से मस्तिष्क तक पहुँचाता है। स्मृति केन्द्र इसे रिकार्ड कर लेता है। एसिटोकोलीन स्नायु में एक तरह की वायरिंग का काम करता है। जब यह सक्रिय हो जाता है तो व्यक्ति अतीत में किए गए सारे कामों को भूल जाता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि दोहरे व्यक्तित्व में सम्भवतः यही प्रक्रिया होती होगी।

मन की विद्युत चुम्बकीय तरंगों में जब दरार पड़ती है , तो बहुव्यक्तित्व या दोहरे व्यक्तित्व का जन्म होता है और जब इनमें बढ़ोत्तरी होती है तो व्यक्ति की स्मृति क्षमता अत्यधिक बढ़ जाती है। अपनी इसी क्षमता के कारण इजराइल के मास्टर जासूस एलीकोहेन सुपर मेमोरी के रूप में विख्यात थे। उन्हें एक बार देखी हुई चीज याद रखने की अद्भुत क्षमता थी। इनका दिमाग एक फोटो सेल के रूप में काम करता था। उसने 1967 में अजराइली युद्ध में अपनी इस सुपर मेमोरी का प्रयोग किया था। वह शत्रु की असंख्य सेना को देखते ही उसकी सभी प्रकार की सेना, रणनीति, संख्या आदि का पूरा विवरण दे देता था। सारा देखा आ दृश्य वीडियो कैमरे की तरह अंकित कर लेता था।अनगिनत कैदियों एवं अन्यान्य लोगों को पारिवारिक, साँस्कृतिक, व्यावसायिक आदि असंख्य बातों की एवं उनकी पीढ़ी दर पीढ़ी की विभिन्न जानकारियाँ याद कर लेना उसके लिए आम बात थी। जरूरत पड़ने पर कम्प्यूटर की तरह समय-समय पर उससे ये जानकारियां ले ली जाती थी।

डब्लू. एच. बोवार्ट ने अपनी पुस्तक ‘आप्रेशन माअण्ड कन्ट्रोल’ में मानव मन के ऐसे अनेकों चमत्कारों का वर्णन किया है। उनके अनुसार शरीर में बायोइलेक्ट्रिक, बायेमैग्नेटिक एवं बायोप्लाज्मिक कई तरह की ऊर्जाएँ क्रियाशील रहती है। मन का जादू ही इन्हें नियन्त्रित एवं सक्रिय करता है। मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं। कि ध्यान की मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि ध्यान की प्रक्रिया इसे अपेक्षाकृत अधिक जाग्रत करती है। इससे न केवल स्मृति, बल्कि व्यवहार भी प्रभावित होता है। सन् 1983 में लोमा लीडा व्ही. ए. हास्पिटल के डॉ. एस. एडी ने अपनी मनःशक्ति से मशीन के प्रभाव को समाप्त कर दिया था। वह अपनी चेतना के उच्चतर आयामों में पहुंचकर वहाँ के दृश्यों एवं घटनाओं का यथावत् वर्णन कर देते थे। इसके पास भी गजब की स्मरण शक्ति थी।

डॉ. एस. एडी का कहना है कि मस्तिष्क के आगे से पीछे की ओर यदि लो वोल्टेज करेंट प्रवाहित किया जाय तो जाग्रत चेतना की निरस्त किया जा सकता है। सिराकुज व्ही. ए. अस्पताल के डॉ. राबर्ट बेकर ने भी इस बात कर समर्थन किया है कि मजबूत चुम्बकीय प्रवाह भी स्मृति का नाश कर सकता है। बोवार्ट के मतानुसार माइकोवेव्य की निश्चित आवृत्ति से मस्तिष्कीय तरंगों में परिवर्तन हो जाता है तथा भ्रमात्मक स्थिति पैदा हो जाती है। वैज्ञानिक सर्वेक्षणों से पता चला है। कि सन् 1960 सू 80 के दशक में नाभिकीय आयुधों की तरंगों से लोगों के मन, विचार व व्यवहार बुरी तरह गड़बड़ा है।

सही माने में मन एक तरह की तरंग ही तो है, जो अपनी समान आवृत्ति की तरंगों से प्रभावित होता रहता है। सन् 1975 में रूस ने जबर्दस्त रेडियो संकेतों को प्रक्षेपित किया था। इसे वुडपेकर ट्राँसमिशन के रूप में जाना जाता है। यह ट्राँसमिशन 3,26 ओर 17.54 मेगाहटर्ज का था, जिसने मुख्यतः 6 से 11 हर्जज की मस्तिष्कीय तरंगों पर प्रभाव डाला। वुडपेकर के अनुसार इ. एल. एफ. पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक प्रदूषण फैलाता है, जिससे मौसम परिवर्तित होने के ही साथ मानसिक हलचलें भी तेज होती है। पेन्सेकोला लैबोरेटरी के शोध अध्ययन में कहा गया है कि एयर फोर्स तथा रासायनिक आयुधों के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक राडार वाले क्षेत्र के पास रहने वाले व्यक्तियों को अप्रत्याशित मानसिक परेशानियाँ झेलनी पड़ती है।

मन की दोहरी अथवा बहुआयामी कार्यप्रणाली के बारे इंग्लैण्ड के फ्रेडरिक डब्लू.एच. मेयर्स. फ्राँस के अल्फ्रेड विनेट और पियरी जेनेट तथा अमेरिका के विलियम जेम्स ने काफी खोज-बीन की है। इन्होंने अपने अध्ययन में मन एवं स्मृति के अनेक तथ्यों को स्पष्ट किया है। विलियम जेम्स के अनुसार मन की तरंगों को नियन्त्रित , अभिवर्द्धित करके कोई भी अद्भुत क्षमताएँ अर्जित कर सकता है। स्मरण शक्ति के मामले में उन्होंने एक अँग्रेज आर्थर भौतिकी, रसायन, मेडिसिन तथा भाषा विज्ञान के प्राध्यापक है इन्हें अरबी का भी अच्छा ज्ञान हैं।

उनके अनुसार इससे आगे का स्तर अतीन्द्रिय क्षमता का हैं। वैसे इसका अनुभव कम ही लोग प्राप्त कर पाते हैं। क्योंकि वे अपने मन की तरंगों को वातावरण की हलचलों के प्रभाव से बचाकर उच्चस्तरीय आयाम तक ले जाने में प्रायः असफल रहते हैं। हालाँकि प्रकृति ने हर छठवें प्रकृति ने हर छठवें बच्चे में इसके बीज सँजो रखे है। कैनोलिया विल्बर के अनुसार जो इसे विकसित कर लेते हैं उनका आई. कयू. दो सौ से अधिक पहुँच जाता है। साथ ही इनमें दूरश्रवण ,

दूरदर्शन आदि की क्षमताएँ क्रमशः प्रकट होने लगती है। डॉ. डेविड कौल ने एक ऐसे व्यक्ति का उल्लेख किया है जो एक सेकेंड के हजारवें से कम समय में हजारों में हजारों प्रकार की सुगंध को पहचान लेता है।

मन की आश्चर्यजनक क्षमताओं के परिप्रेक्ष्य में डेनयल कीस ने बिलोंमिलोगन नामक महिला से साक्षात्कार किया तथा उन्होंने इसे ‘द माइण्ड ऑफ बिली मिलीगन ‘के नाम से प्रकाशित किया। बिली में गजब की स्मरण शक्ति थी। साक्षात्कार के दौरान उन्होंने बताया कि जब वह एक माह की नवजात शिशु थीं तब उनका ऐक्सीडेंट हो गया था। उनका अस्पताल में किस तरह आप्रेशन किया गया, उसका पूरा विवरण वे इस तरह से सुना गयी, मानों अभी यह कल की घटना हो।

‘नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ’ के डा. फ्रैक फुटनाम का तर्क है कि असाधारण मानसिक क्षमता वाले व्यक्तियों की मानसिक तरंगें कुछ अलग तरह की होती हैं ‘लायल यूनिवर्सिटी’ के डा. राबर्ट डीबरों की मान्यता है कि ऐसे व्यक्तियों में घाव जल्दी भरने लगते हैं। इनके शरीर की कोशिकाओं की जीवन-शक्ति भी अपेक्षाकृत अधिक रहती है, जिससे ये जल्दी स्वस्थ हो जाती है। डा. अब्रेजल रोग को अचेतन की याददाश्त मानते हैं। उनके अनुसार अपने मन की तरंगों को नियन्त्रित करने वाला अचेतन को परिवर्तित कर सकता है। जिससे सभी तरह के रोगों का निवारण सम्भव है।

रूस के स्टानीस्लेवेस्की का दावा है कि उन्होंने राजयोग के द्वारा अपने मन पर नियंत्रण कर लिया था। इस प्रक्रिया में उन्होंने आश्चर्यजनक मानसिक शक्तियाँ अर्जित कीं। उनका मानना है कि यदि मन को विद्युत चुम्बकीय तरंगों को यदि यौगिक रीति से बाँटा जा सके तो दुर्योग-सा लगने वाला विभाजित व्यक्तित्व सचमुच दो अलग-अलग समर्थ एवं सशक्त व्यक्तियों में बदल सकता है।

डा. जेनीफर अपनी पुस्तक ‘माइण्ड एण्ड मिस्ट्री ‘

में कहते हैं कि ध्यान एवं योगाभ्यास आज के प्रदूषित युग में अपरिहार्य एवं अनिवार्य है। इससे हम तनावमुक्त रह सकते हैं। इस प्रक्रिया से मन की तरंगेँ इतनी समर्थता अर्जित कर लेती है कि वे अनेक दुष्प्रभावों से अपने आप बची रहती है। यही नहीं यदि इस अभ्यास को जारी रखा, जा सके तो असामान्य स्मरण शक्ति, अतीन्द्रिय क्षमताएँ एवं अलौकिक सामर्थ्य प्राप्त होती है। अपने व्यक्तित्व को अनेक हिस्सों में बाँट कर उनसे अलग-अलग काम लेना इस साधना का उच्चस्तरीय आयाम है। इस साधना के अनुभवी ही जानते हैं कि भानुमती के पिटारे के अजूबे एवं अलादीन के चिराग के चमत्कार और कहीं नहीं अपने मन में ही है।


प्रेतयोनि होती है, अब तो विश्वास करेंगे न

हिमालय के इस अंचल ने उनका मन मोह लिया था। कालका-शिमला मार्ग पर स्थित धर्मपुर से पाँच किलोमीटर दूर बसी यह जगह पर्वतीय सौंदर्य से घिरी थी। चीड़-देवारु के वृक्ष, हरियाली की मनोहारी सुषमा को वे अपलक देखते ही रह गए। कुछ पल ठहरने के बाद उनके पाँव छावनी की ओर बढ़ चले। बहुत थोड़ी-सी आबादी वाला यह गाँव उन दिनों पटियाला रियासत में आता था। अभी कुछ ही समय पहले पटियाला महाराज ने इसे अंग्रेजों को उपहार में दिया था। यह अनोखा उपहार देते समय उन्होंने इसका नाम रखा-दाग ए शाही।

इस स्थान की हैरतअंगेज सुंदरता पर मुग्ध होकर अँग्रेज हुक्मरानों ने यहाँ पर फौजी छावनी बनने से गाँव की आबादी में अच्छा-खासी बढ़ोत्तरी हुई, साथ ही गाँव को खूबसूरती के साथ साफ-सुथरा रूप दिया गया। पहाड़ी इलाका होने के कारण ठण्डी हवाओं की ताजगी यहाँ पहले से मौजूद थी। तिस पर सेना की सिलसिलेवार बैरकें, ऑफिसर्स बंगले और काँटेज बन जाने की वजह से जंगल में मंगल होने की उक्ति चरितार्थ हो गयी। यहाँ का पुराना किला अँग्रेजी सेना के अधिकारियों ने जेल में तब्दील कर दिया। यहाँ वे उन लोगों को बन्दी बनाकर रखते थे, जिन्हें राजनैतिक कारणों से या जासूसी करने के सन्देह में गिरफ्तार किया जाता था।

अँग्रेज सैनिक, सेनाधिकारी एवं अँग्रेजी शासन के आला हुकमरानों में इस स्थान की चर्चा सर्वाधिक थी। हर कोई अपना तबादला कर कुद दिनों के लिए यहा रहना चाहता था। दाग ए शाही अंग्रेजी संगति में डाग ए शाही ..................डाग शाही होता हुआ डगशाही और बाद में उगशाई होता गया। मि. वैस्टन भी सेना में उच्च अधिकारी। अभी हाल में ही उनका ट्रान्सफर हुआ था ओर आज ही वे अपनी पत्नी मिसेज रैलेका वैस्टन के साथ यहाँ ज्वाइन करने आए हुए थे। उनकी पत्नी रैलेका अद्भुत रुपसी थी। रूप की इस देवी में मानों सौंदर्य की देवी वीनस का सौंदर्य साकार हो उठा था। डगशाही का सौंदर्य उन्हें पाकर सहस्रगुणित हो गया और वे शाही की सुरम्यता को देखकर अभिभूत हो गयीं।

उन्होंने अपने पति को बाँह को हल्के से दबाते हुए कहा-”यहाँ आकर मुझे तो जैसे मनमाँगें मुराद मिल गयी। अब हम लोग यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य का आनन्द उठाएँगें।” मि. वैस्टन को पत्नी की इस सहज स्वीकारोक्ति पर भारी प्रसन्नता हुई। वे अपने कार्यालय को रवाना हो गए और इस तबादले को वरदान की तरह स्वीकार कर लिया।

दरअसल उन्हें यह ट्राँसफर तो पहले से ही स्वीकार था, परन्तु वे अपनी पत्नी से इस कदर प्यार करते थे कि उसकी इच्छा के बगैर एक कदम भी नहीं चलना चाहते थे। “रैलेका ‘ थी भी इसी लायक। रूप और सौंदर्य की ऐसी आकर्षक मूर्ति, कि जो भी देखे उसे देखता, उसकी सुन्दरता का बखान यशोगान करने लगता और आज जब रूप का सूर्य अपनी सूची आभा के साथ डगश्ज्ञज्ञही की पहाड़ियों पर निकला तो पूरे छावनी क्षेत्र में जैसे उसकी सौंदर्य की सुहानी धूप ही फैल गयी। हर हृदय उजास से भर गया। मि. वैस्टन जब किसी और के मुख से रैलेका के सौंदर्य की प्रशंसा सुनते तो उन्हें जरा भी ईर्ष्या न होती। क्योंकि उन्हें उस पर पूरा यकीन था।

आज यहाँ आकर उन दोनों की अपनी पहली मुलाकात याद आ गयी। जब वे लन्दन के एक रेस्तराँ में पहली बार मिले थे, उस दिन रैलेका अकेली बैठी हुई अपने ही ख्यालों में खोयी थी। उन्होंने बड़ी विनम्रतापूर्ण सादगी से उससे पूछा था, “मैं यहाँ बैठ सकता हूँ ?”

“अवश्य !” सामने पड़ी एक दूसरी कुर्सी की ओर इशारा करते हुए रैलेका ने कहा था। फिर कुछ ही देर में दोनों ने एक कुछ ही देर में दोनों ने एक दूसरे का परिचय प्राप्त कर लिया। यह परिचय फिर अनेकों मुलाकातों का स्रोत बन गया। वे एक दूसरे के नजदीक आते गए ओर एक दिन उन्होंने बड़ी ही सादगी पूर्ण भावुकता के साथ रैलेका से कहा-” मैं आपसे शादी करना चाहता हूँ।” उत्तर में रैलेका ने मुसकराकर अपनी मौन स्वीकृति दे दी। उसे भी मि. वैस्टन का भावुक एवं आकर्षक व्यक्तित्व पसन्द था। इस पारम्परिक स्वीकृति के बाद दोनों में वे दोनों विवाह सूत्र में बँध गए। उनके सपनों की दुनिया साकार हो गयी।

आज उनको शादी हुए दो साल से अधिक बीत गए थे। मगर मि. वैस्टन के प्यार में कहीं-कोई किसी तरह की राई-रत्ती कमी न आयी थी। उनका हृदय आज भी उतना ही तरोताजा उन्मादित और उमड़ता हुआ था, जितना पहले दिन अपनी प्रेयसी को देखकर रहा होगा। हिमालय की इस प्राकृतिक सुरम्यता ने तो उन प्रेमी युगल को गोया अपने आँचल की छाया में ले लिया था।

ठण्डा मौसम , चाँदनी रातें और वे दोनों । अँग्रेजी सेना के वरिष्ठ अधिकारी होने की वजह से उनकी आय भी भरपूर थी। सुख-सुविधाओं की कोई कमी न थी। तिस पर एक को चाँद-सी पत्नी हासिल थी, तो दूसरे को बेहद प्यार करने वाला पति। शादी के इतने समय बाद उनका प्यार ज्यों का त्यों बरकरार था। परस्पर आकर्षण में जरा भी कमी न आयी थी। यदा-कदा मि. वैस्टन को यह आशंका जरूर घेर लेती थी कही उनकी सुन्दर पत्नी को किसी की नजर न लग जाए। कहीं कोई उसे नुकसान न पहुँचा दे। यह ख्याल आते ही उनका हाथ स्वयमेव अपनी रिवाल्वर पर चला जाता, लेकिन भला किसकी मौत आयी थी जो अँग्रेजों के शासनकाल में किसी अँग्रेज अधिकारी की पत्नी पर बुरी नजर डालता।

लेकिन एक दिन तो गजब ही हो गया। रैलेका ने सुबी की चाय के वक्त मि. वैस्टन को बताया, “ कोई रात के वक्त बेडरुम की खिड़की से भीतर झाँक रहा था। जब मेरी नजर खिड़की पर पड़ी तो वह एकदम गायब हो गया।”

“असम्भव ! “तुम्हें जरूर धोखा हुआ होगा। बंगले में हर वक्त चार संतरी रहते हैं। इतने सख्त पहले में भला यह कैसे मुमकिन है कि लाँन में दाखिल होकर बेडरुम की खिड़की तक पहुँच जाए ?” मि. वैस्टन ने शान्त स्वर में कहा।

और रैलेका चुप रह गयी। मि. वैस्टन भी कहने को तो इतनी बातें कह गए, लेकिन वे सोच में पड़ गए, आखिर यह हिमाकत करने वाला कौन हो सकता है ?

“चुप क्यों हो गए ? “ रैलेका ने टोका-’कुछ नहीं, बस यूँ ही। तुम अपना ख्याल रखा करो। मैं ऑफिस जाते समय संतरियों को खबरदार करता जाऊँगा।” यह कहते हुए वे उठे और चुपचाप धीमे कदमों से बंगले के बाहर निकल गए।

दो-तीन दिन यूँ ही गुजर गए। हालाँकि श्रीमती वैस्टन यह सोचती रही कि आखिर वह कौन हो सकता है ? हो सकता है उन्हें भ्रम ही हुआ हो।

उस दिन मि. वैस्टन बोले, “मुझे एक-दो दिन के लिए दिल्ली जाना पड़ेगा, हेडक्वार्टर से आदेश आया है। तुम इस बीच अपना ठीक तरह से ख्याल रखना। तुम बिलकुल चिंता नहीं करना। मैं सन्तरियों को खबरदार करता जाऊँगा।”

श्रीमती वैस्टन ने मूक भाव से उनकी ओर देखा। उनके बेहद सुन्दर नेत्र आज उदासी से धूमिल थे। वे कर भी क्या सकती थीं। सेना की नौकरी और फिर मुख्यालय का आदेश । लेकिन अन्दर ही अन्दर किसी अज्ञात भय से वह आशंकित हो उठी। फिर भी घर से दूर जाते हुए पति को किसी भी प्रकार की उधेड़-बुन या चिन्ता में डालना उचित न लगा। उन्होंने हलकी-सी मुसकान के साथ पति को विदा कर दिया।

उसी रात, रैलेका अपने बिस्तर में लेटी कोई पुस्तक पढ़ रही थी। उन्हें झपकी-सी आने लगी। उन्होंने उठकर कमरे की खिड़की भीतर से बन्द कर ली और बत्ती बुझाकर बिस्तर पर आ लेटी। तभी उन्हें लगा, जैसे कोई बेहद प्यार से उनकी ओर देख रहा है। अँधेरे में वह सिहर उठी। भय को अधिकता से वह चीख भी न सकी। कुछ ही क्षण बीते होंगे। उन्हें लगा कि उनसे कोई कह रहा है ,”मैं हूँ तुम्हारा पूर्व जन्म का पति फिलिप। एक बार मैं तुम्हें पूर्व जनम में यहाँ लेकर आया था। यहाँ हुई एक वाहन दुर्घटना मेरी -तुम्हारी मृत्यु हो गयी थी। मैं तभी से यहाँ भटक रहा हूँ, जबकि तुम्हारी आत्मा ने एक अर्से बाद ब्रिटेन में पुनर्जन्म ले लिया है जब से तुम यहाँ आयी हो मुझे तुम्हारा आभास तभी से बराबर मिल रहा था।”

इन बातों से वह सोच में पड़ गयी। इसी बीच कमरे में एक विचित्र-सी सुगन्ध फैलने लगी। जिसका नशा उसके मन-मस्तिष्क पर छाता जा रहा था। उसका लग रहा था, मानों वह विवश होती जा रही है। फिर भी हिम्मत करके वह बिस्तर से उठ बैठी और लगभग दौड़कर उसने कमरे की बत्ती जला दी ताकि देख सके कि यहाँ आने की हिमाकत करने वाला कौन व्यक्ति हो सकता है ?

लेकिन वहाँ तो कोई भी न था। दरवाजे की चिटकनी अन्दर से पूर्ववत् बन्द थी। खिड़की भी ज्यों की त्यों बन्द दिखाई दी। तब फिर ? क्या वह सचमुच कोई प्रेतात्मा थी ? यह विचार आते ही वह एक बार भय से काँप उठी। फिर बिस्तर पर लेकर सोचने लगी, पति की वापसी में तो अभी एक-दो रोज का समय है, तब तक वह अज्ञात व्यक्ति इसी तरह परेशान करता रहेगा। क्या यह बात किसी से बतानी चाहिए ? लेकिन सुनने वाले तो हमारी ही हँसी उड़ाएँगे। इसी सोच-विचार में डूबी वह न जाने कब सो गयी।

रोज की तरह वह इस सुबह भी अपने समय से उठ गयी। हालाँकि उस अनजाने व्यक्ति का ख्याल उन्हें रह-रह कर विस्मय के दरिया में डुबा देता था। इस बीच नौकरानी भी काम पर आ गयी थी। अपनी मालकिन को सोच में डूबी हुई देखकर उसकी कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई। चाय की ट्रे सामने रखकर उसने एक प्याला चाय रैलेका के हाथों में थमाते हुए बस इतना ही कहा, “मेम साहब चाय।”

मिसेज वैस्टन चाय का प्याला थामकर चुस्कियाँ लेने लगी। रात के अनुभव से जहाँ वह थकी व टूटी थी, वह एक अजीब-सा आनन्द भी अनुभव हो रहा था। नौकरानी के चले जाने के बाद वह दुबारा अपने बिस्तर पर आ लेटी। बिस्तर पर लेटने से पूर्व उन्होंने ध्यान से दरवाजे की चिटकनी लगा दी। लेटते समय रात के अज्ञात व्यक्ति की याद आते ही उन्होंने मन ही मन सोचा, यदि इस बार ऐसा हुआ तो वह निश्चय ही शोर मचाकर उसे पकड़वा देगी।

“लेकिन तुम ऐसा नहीं कर सकती।” किसी ने उनके कानों के पास फुसफुसाते हुए कहा,” मैं एक सूक्ष्म प्राणी हूँ। तुम चाहो तो मुझे प्रेतात्मा कह सकती हो। मुझे पकड़वाने का दण्ड देने के लिए तुम शरीरधारियों के पास कोई साधन नहीं है और फिर मैंने तो तुम्हें को नुकसान भी नहीं पहुँचाया। मैं तो तुम्हारा सान्निध्य पाने के लिए लालायित हूँ।”

इस बार वह तनिक हिम्मत करके झटके के साथ अपने बिस्तर पर बैठ गयी। परन्तु थोड़ी भयभीत भी थी। हाँ फिर वहीं पहली वाली सुगन्ध उनके मस्तिष्क पर हावी होती चली जा रही थी। उन्हें लगा , कोई छाया-सी सिरहाने खड़ी उनसे कुछ कह रही है। वह सोचने लगी, शायद यही प्रेतात्मा हो, तभी तो इसे मेरे मन की बात पता चल गयी। खैर यह चाहें जो भी हो, लेकिन इसका सामीप्य न जाने क्यों उन्हें अजीब से आनन्द से भर देता है। धीर-धीरे उनका भय कम होता चला गया।

अभी भी वह छाया उनसे कह रही थीं, “आखिर मैं तुम्हारे ही मोह के कारण तो प्रेतयोनि में हूँ। फिर यह मोह कुछ गलत भी तो नहीं, मैं तुम्हारे पूर्वजन्म का पति जो हूँ।” अब वह छाया को अपने काफी नजदीक महसूस कर हरी थी। एक आनन्ददायी सुगंध उनके चारों ओर सघन प्रभाव से वह बेसुध हो गयी। जब उनकी चेतना लौटी तो उन्हें लगा, जैसे उनके कोई कर हरा हो “ मैं रात में फिर आऊँगा। इसकी चर्चा किसी से मत करना। तुम्हें कोई नुकसान न होगा और न किसी को पता चलेगा। अच्छा, गुडबाई।” कहकर छाया धीरे-धीर चलते हुए दरवाजे खोले बगैर ही कमरे से बाहर निकल गयी। वह अचरज से उसे देखती रहीं।

इसके बाद तो जैसे यह नियमित का क्रम बन गया। उन्हें उस अज्ञात छाया पुरुष के सान्निध्य की अनुभूति अक्सर होने लगी। जब कभी मि. वैस्टन बाहर होते,यह छाया उपस्थित हो जाती। समय बीतता गया। उन्होंने यह बात किसी को भी नहीं बतायी कि कोई पारलौकिक आत्मा उनसे प्रेम करती है। मि. वैस्टन भी इन दिनों सेना के कार्यों में कुछ अधिक ही मसरूफ रहने लगा। यदा-कदा इस अतिव्यस्तता के कारण उन्हें कुछ अपराधबोध -सा होता। इसी वजह से वह रैलेका से बीच-बीच में कहते रहते, “देखो, इन दिनों जरा अधिक काम रहता है, मैं कोशिश करूंगा कि जल्दी ही इन कामों से छुटकारा पा सकूँ।”

जवाब में रैलेका मुस्कुरा-कर चुप रह जाती। उसने मि. वैस्टन से अभी तक की किसी घटना का जिक्र नहीं किया था। हाँ वह अक्सर अपने जीवन के कई अनजाने पहलुओं पर सोचती जरूर रहती थी। उसे अब यह पता चला गया था कि ‘डगशाही‘ का यह इलाका क्यों पहली नजर में पहचाना-पहचाना सा लगा। उसे अपने पूर्वजन्म की यादें भी ताजा होने लगी थीं। फिलिप के साथ भारत आना, मोटर की दुर्घटना और फिर सब कुछ एक कुहासे में खो जाना।

और अब यह तो क्या पूर्वजन्म प्रेतयोनि, यह सब सच है ? यह सच तो अब उनका रोजमर्रा का अनुभव बन गया था। जिसे वह किसी भी तरह झुठला नहीं सकती थी। पूर्वजन्म की यादें ताजा होते ही वे भी फिलिप की प्रेतात्मा के प्रेम में खोने लगी थीं।

इसी दौरान श्रीमती वैस्टन गर्भवती हो गयी। इस बात का पता चलते ही मि. वैस्टन तो जैसे खुशी से पागल हो गए। वह स्वयं भी माँ बनने की खुशी को जल्द से जल्द हासिल कर लेना चाहती थी। मि. वैस्टन को भी पिता बनने का बेसब्री से इन्तजार था। इसी बीच उन्हें किसी सरकारी काम से ब्रिटेन जाने का हुक्म मिला। आखिर फौज की नौकरी थी, जिसमें आदेश को मानना ही होता है। न चाहते हुए उन्हें इंग्लैण्ड के लिए कूच करना पड़ा।

प्रेतात्मा उनकी अनुपस्थिति में कुछ ज्यादा ही आती थी। इन दिनों हर रात रैलेका के सान्निध्य में रहती और सुबह होने से पूर्व ही चल जाती। रैलेका को भी उसका इंतजार रहने लगा था। अब उसे अपनी नींद पूरी करने के लिए प्रायः दिन में भी सोना पड़ता था। एक रात फिलिप को प्रेतात्मा ने उनसे कहा, “ अब मैं तुम्हारे बगैर ज्यादा दिन नहीं रह सकता। इसलिए मैं तुमको हमेशा-हमेशा के लिए अपने साथ अपने लोक में ले जाना चाहता हूँ।”

“नहीं, अभी नहीं ।” रैलेका ने प्रतिवाद किया, “ जब तक मैं अपने बच्चे को जन्म नहीं दे देती। मैं कहीं भी नहीं जाना चाहूँगी। “ प्रेतात्मा चुप होकर हमेशा की भाँति चली गयी और रैलेका अपने गर्भस्थ शिशु के ख्यालों में खो गयी। लेकिन तभी उसे इस आशंका ने घेर लिया कि यदि फिलिप की प्रेतात्मा ने जबरदस्ती की तो फिर..........मेरा बच्चा। इस ख्याल में डरकर वह मि. वैस्टन को पत्र लिखने बैठ गयी।

“डियर वैस्टन ! मैं बेचैनी से तुम्हारा इन्तजार कर रही हूँ। जल्दी वापस आ जाओ। जब तुम वापस आओगे, हमारा घर किलकारियों से गूँज रहा होगा। इधर मेरे सपनों में अकसर एक अज्ञात आत्मा आती है और मैं काफी अर्से से उससे मिलती रही हूँ। बहुत सम्भव है अपने घर के नए मेहमान का चेहरा उसी अलौकिक आत्मा से मिलता-जुलता हो।”

अपने पत्र में आखिर रैलेका ने अपने पति पर प्रेतात्मा के बारे में संकेत कर ही दिया। हालाँकि मि. वैस्टन इसका असली मतलब नहीं समझ पाए। उन्होंने केवल इतना ही समझा कि रैलेका को शायद गर्भावस्था में अजीबो-गरीब सपने आते हैं।

इधर चिट्ठी लिखकर जब वह पोस्ट ऑफिस भिजवा कर अपने बिस्तर पर लेटी। तो कुछ ही देर में फिलिप की प्रेतात्मा उनके कमरे में फिर से हाजिर हो गयी और एंठे स्वर में कहने लगी-”यह तुमने अच्छा नहीं किया। अब तो तुम्हें तुरन्त मेरे साथ चलना ही होगा। इस बार तुम्हारी कोई बहानेबाजी नहीं चलेगी।”

रैलेका ने पीछे मुड़कर देखा, वहाँ कोई न था। वह घबराहट में पसीने से भीग गयी। थोड़ी ही देर में उनकी तबियत बिगड़ने लगी। पहले उन्हें लगा, जैसे सिर चकरा हरा है। फिर उन्हें साँस लेने में परेशानी होने लगी। उन्होंने बड़ी मुश्किल के साथ जैसे-जैसे कमरे का दरवाजा खोलकर नौकरानी को बुलाया । नौकरानी उनकी आवाज सुनकर जब वहाँ पहुँची , श्रीमती वैस्टन अपने बिस्तर पर लेटी थी। उनकी हालत काफी खराब थी। लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया न जा सका। सेना के डाक्टर ने भी काफी कोशिशें कीं पर सफल न हो सका।

मि. वैस्टन को अपनी पत्नी की मृत्यु का समाचार जब मिला , तो वह स्तब्ध रह गए। उनके हृदय में पिता बनने की आशा का अंकुर विकसित हो पाने के पहले ही मुरझा गया। इंग्लैण्ड से वापस आने पर उन्हें रैलेका के बक्से में उसकी गोपनीय डायरी मिली। जिससे उन्हें सारी बातों का पता चला। सारी बातें जानकर वह अचरज से भर गए। उन्होंने रैलेका की स्मृति में एक आदमकद मूर्ति बनवायी। इसी के साथ उन्होंने एक चित्र अपने अजन्मे बच्चे का भी बनवाया और रैलेका की कब्र के पास डगशाई के कब्रिस्तान में स्थापित कर दिया। अपनी भवाँजलि अर्पित करते हुए उन्होंने रैलेका की कब्र पर लिखवाया श्रीमती रैलेका वैस्टन एवं अजन्मे पुत्र की स्मृति में जो 10 सितम्बर, 1901 को स्वर्गवासी हुए।

इसे देखने के लिए उगशाई में आज भी दूर-दूर से पर्यटक आते हैं और इस अद्भुत मूर्ति को देखकर सोचते रहते हैं कि अतृप्त कामनाओं को लेकर किस तरह मनुष्य प्रेतयोनि में भटकता रहता है। वासनाहीन हुए बिना न तो शान्ति है, न सद्गति और न ही मुक्ति ।


Quotation

स्वार्थी पाता कम और खोता बहुत है। वासना किसी की तृप्त नहीं हुई। तृष्णा कोई पूरी न कर सका जिसे लालच ही दिखता है उसकी प्रगति के द्वार बन्द हैं ।

दुनिया में और सब चीजें भरी पड़ी है, पर चरित्रवान, दृढ़, निश्चयी और आदर्शवादी व्यक्तियों की कमी है। वे ढल सकें तो समझना चाहिए सारे अभाव दूर हो गये।


क्या-क्या गुल खिलाते हैं, ये बाल

सिर पर बालों की क्या उपयोगिता है ? इस सम्बन्ध में यों शरीरशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र के भिन्न-भिन्न उत्तर है, पर यदि इस बात की तलाश करनी हो कि दोनों में से किससे इनका निकट का रिश्ता है, तो यही कहना पड़ेगा कि सामान्य जिन्दगी में ये मनुष्य के लिए सौंदर्य का महत्वपूर्ण आधार हैं ।

स्त्री हो या पुरुष, सौंदर्य की चर्चा जब कभी होती है, तो उसमें बालों का उल्लेख हुए बिना वह अधूरी मानी जाती है। यह ठीक है कि सौंदर्य में चेहरे की बनावट, त्वचा की स्निग्धता, शरीर सौष्ठव, कद-सब कुछ सम्मिलित है, पर बालों का इनमें प्रमुख स्थान है। यही कारण है कि इन दिनों जबकि बालों की बीमारियाँ बढ़ी है, उनका झड़ना ओर समय पूर्व सफेद होने जैसी शिकायतें उत्पन्न हुई हैं, तो लोग उनके प्रति अधिक सचेष्ट होते देखे गये है। महिलाओं में तो चेहरे की संरचना के अनुरूप केश-सज्जा का प्रचलन है, ऐसा इसलिए , ताकि वह स्वयं को अधिक आकर्षक बना सके। यह मानसिकता अब पुरुषों में भी विकसित हुई है। यही कारण है कि पिछले दिनों बड़े-बड़े शहरों में पुरुष ‘ब्यूटी पार्लर‘ भी खुले है। यहाँ सुन्दरता की कायम रखने सम्बन्धी क्रिया-प्रक्रिया के अतिरिक्त इस बात की भी सलाह दी जाती है कि किस प्रकार के चेहरे पर कैसी केश-सज्जा उपयुक्त रहेगी ?

सामान्य जीवन में बालों का इससे अधिक महत्व नहीं। शरीरशास्त्रियों ने इसके दूसरे पहलू पर विचार करना आरम्भ किया है। वे इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रहे है कि इनके द्वारा व्यक्ति के स्वभाव की जानकारी प्राप्त करना सम्भव है क्या ? अब तक के शोध - अनुसंधान इसी बात संकेत देते हैं कि ऐसा कर पाना शक्य है। इस दिशा में प्रथम प्रयास शिकागो के वैज्ञानिकों ने किया। ओरैगन नेशनल लैबोरेटरी के दो शोधकर्त्ताओं-विलियम वाल्स तथा डॉ. रोनाल्ड ने लगभग सौ अपराधियों के बालों के नमूने इकट्ठे किये और फिर इतने ही सामान्य व्यक्तियों के बालों के नमूने लिये। फिर उनका तुलनात्मक अध्ययन प्रारम्भ किया। अनेक वर्षों के अनुसंधान के उपरान्त वैज्ञानिक द्वय ने इस सम्बन्ध में अपना निष्कर्ष देते हुए कहा कि अपराधी प्रकृति के व्यक्तियों के बालों में जस्ता, ताँबा, कोबाल्ट, मैंगनीज जैसे कितने ही तत्व सामान्य से अधिक परिमाण में पाये जाते हैं। इनका शरीर की जैविक गतिविधियों को तीव्र करने में बड़ा हाथ होता है। शरीर -क्रियाओं में गड़बड़ी और शरीर में रासायनिक असंतुलन को अध्ययन का विज्ञानवेत्ता इन तत्वों की गतिविधियों का अध्ययन करने का प्रयास कर रहे है।

अब प्रश्न है कि इस अध्ययन के लिए बाल का ही चयन क्यों किया गया? इसका उत्तर देते हुए शोधकर्त्ता कहते हैं कि बालों में कैरोटीन नामक एक विशेष प्रकार का प्रोटीन पाया जाता है। यह अत्यन्त टिकाऊ होता है। इसमें कुछ ऐसे रसायन पाये जाते हैं, जो दूसरे तत्वों और धातुओं को अपने में आसानी से अवशोषित कर लेते हैं। इससे एक निश्चित अवधि में, शरीर में इनकी घटती-बढ़ती मात्रा का सरलतापूर्वक पता लगाया जा सकता है और यह जाना जा सकता है कि शरीर के भीतर किस प्रकार के रासायनिक परिवर्तन हो रहे है। यह विशेषता दूसरे अंगों में नहीं होती, इसलिए वैज्ञानिक इस अध्ययन के लिए सबसे उपयुक्त अवयव इसे ही मान रहे है।

इस प्रकार के अध्ययन इंग्लैण्ड में भी चल रहे है। लंदन के सेण्ट थामस अस्पताल के शरीरशास्त्री सेण्ट ब्राइठ्स चर्च में रखे लगभग दो दशक पुराने ताबूतों से प्राप्त बालों का विश्लेषण कर सम्बद्ध कंकालों का स्वभाव और व्यक्तित्व की जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे है।

इस दिशा में विज्ञानवेत्ताओं को कितनी सफलता मिली-यह तो आने वाला समय ही बताएगा, पर यदि ऐसा हो सका, तो यह विज्ञान की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी और इससे अपराधी और निरपराधी प्रकृति के व्यक्तियों को पृथक् पहचानने सहायता मिलेगी। अपराध विज्ञान के लिए यह एक उपयोगी सूत्र साबित होगा एवं इससे स्वभावों और आदतों की आक्रामकता को नियंत्रित और दूर करने में काफी मदद मिलेगी।

अगले चरण में शरीरशास्त्री कदाचित् यह जानने का प्रयत्न करें कि उग्र स्वभाव के कारण बालों में तत्वों का असामान्य जमाव होता है या विशिष्ट केश-संरचना के कारण प्रकृति आपराधिक बन जाती है। दोनों ही स्थितियों में अध्यात्म विज्ञान एक उपचार सुझाता है-इच्छाओं, आकाँक्षाओं आदतों, मान्यताओं , विचारणाओं भावनाओं का परिष्कार। कारण कि मानवी सत्ता में आस्था ही वह तत्व है, जो जिस दिशा में चल पड़ती है, उसी के अनुरूप व्यक्तित्व को गढ़ती-बनाती चलती है। इसके द्वारा शरीर -संरचना को भी प्रभावित कर सकना सम्भव है और उसकी क्रिया-पद्धति को भी। शर्त एक ही है-वह गहरी स्तर की चिरस्थायी हो।

बाल, मनुष्य स्वभाव को पोल खोलते हैं, पर यह भी सच है कि वह उसे सुन्दर भी बनाते हैं। अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक बंगाल में विधाओं के सिरे मूँड़ दिये जाते थे, ताकि वे अपना आकर्षण खो दें और समाज में अपने शील को अक्षुण्ण रख सके। हिन्दू धर्म में कई ऐसे पथ-पन्थ है, जिनमें संन्यासियों के सिर मुँड़ाये रखने की परम्परा आज भी प्रचलित है।

सौंदर्यशास्त्र की दृष्टि से बाल महत्वपूर्ण अवयव हैं। अब यह शरीरशास्त्र के आधार पर भी उपयोगी साबित हुए है। निसर्ग ने धूप-ताप से रक्षा के लिए सिर पर ये उगाये है। तीनों ही दृष्टियों से इनके अपने-अपने मूल्य और महत्व है। हम इनके द्वारा सुन्दरता वृद्धि तो करें, पर साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि वह सौंदर्य केवल बाह्य स्तर पर ही सीमाबद्ध होकर न रह जाए, वरन् अन्तस् को भी प्रभावित करे। ऐसा तभी सम्भव है , जब उच्चस्तरीय आस्थाओं को हम अपने गहन अंतराल में विकसित करें। समग्र व्यक्तित्व को आकर्षक तभी बनाया जा सकता है और इसी में बाह्य सौंदर्य की सार्थकता है। इससे कम में नहीं।


दुर्भाग्य ! कि हम अपने ही ज्ञान के भण्डार को पहचान न पाए

धर्मपाद की पुस्तक ‘बोधि राजकुमार वृत्थु’ में एक आख्यायिका आती है। बोधि राजकुमार ने एक कारीगर से महल बनवाया। इस महल की डिजाइन और बनावट इतनी आकर्षक और सुदृढ़ थी कि उस समय के सारे राजा बोधि राजकुमार से ईर्ष्या करने लगे। स्थापत्य और वास्तुकला की दृष्टि से गत शताब्दी तक भारतीय परम्पराएँ बेजोड़ रही है। उस जमाने का तो कहना ही क्या

वह हमारी कला प्रगति का चरम-विकास युग था। पाश्चात्य सभ्यता की आँधी को इस देश में घुसने न दिया जाता, तो आज भी हम कला के क्षेत्र में विश्व -शिरोमणि रहे होते। दुनिया हमारे पाँव पूजती, जबकि आज हमारे देश का शिक्षित नेतृत्व खुद ही अपना गौरव भुलाकर विदेशियों की ओर ताकता है।

बोधिक राजकुमार ने सोचा कहीं ऐसा न हो कि यह कारीगर कहीं और जाकर इससे भी अच्छा महल तैयार कर दें, इसलिये उन्होंने उसे वहाँ बन्दी बनाकर जेल में डाल दिया और निश्चय किया कि उसके हाथ कटवा दिये जायें। यह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं ही इस राष्ट्र के लिये घातक बनी, यदि उसे रोका गया होता तो सम्भवतः इस राष्ट्र को पराधीनता का मुँह देखना न पड़ता। दुःख है कि राजनीति की जिन भूलों के कारण यह देश पहले गुलाम बना था वह महत्वाकांक्षा आज भी शासन-तन्त्र को गुमराह कर रही है। उसे रोकने का साहस हमारी स्वाभिमानी प्रजा को करना ही पड़ेगा।

कारीगर ने अपने एक मित्र के द्वारा अपनी स्त्री के पास खबर भेजी कि वह अपनी सारी सम्पत्ति बेचकर पुत्रों सहित मिलने के लिए राजा से विनय करे। इस बीच उसने स्वयं बन्दी होकर भी राजा से प्रार्थना की कि यदि उसे यन्त्र दिये जाये तो वह हाथ कटाने से पूर्व राजा को एक अद्भुत वस्तु भेंट कर सकता है। राजा ने बात मान ली। इस बीच उसने एक सुन्दर गरुड़ यन्त्र (हैलिकाप्टर) तैयार किया। उधर उसकी पत्नी ने पति की आज्ञानुसार स्थायी सम्पत्ति बेच दी और अपने पुत्रों को लेकर राजा के पास गई और अपने पति से बन्दीगृह में ही भेंट करने की प्रार्थना की। राजा ने स्वीकृति दे दी। इसके बाद ‘बोधि राजकुमार वत्थु के अनुसार-

“पुत्र दारुमरुस सकुनस्य कुच्छियं निसीदयित्व बातपातेन निवसनित्वा पलायि”

अर्थात् कारीगर ने अपनी धर्म-पत्नी और बच्चों को उस गरुड़ यन्त्र में बैठाया और बन्दीगृह से पलायन कर गया। राजा के सिपाही देखते ही रह गये, वह जाकर नेपाल में रहने लगा।सम्भवतः हमारे यहाँ से प्रतिभा-पलायन इसी तरह होता रहा होगा।

भारद्वाज ऋषि कृत, ‘अंशु-बोधिनी’ पुस्तक के 28वें प्रकरण ‘वैमानिकी पगकरण’ में विमान विद्या से सम्बन्धित अनेक सूक्ष्म और प्रामाणिक तथ्यों का उल्लेख है। यदि प्राचीन संस्कृत वाङ्मय पर शोध की जाये और इन सूत्रों के आधार पर विज्ञान को एक नई दिशा दी जाए तो हमारे देश के वैज्ञानिक आज जो विदेशियों के ज्ञान के आधार पर अपनी जानकारियाँ बढ़ाते हैं, वह कुछ ही समय में विज्ञान के आश्चर्यजनक रहस्यों की खोज करके भारत को महान् , वैज्ञानिक प्रतिष्ठा प्रदान कर सकते हैं। इस पुस्तक के यहाँ उद्धृत किये जा रहे अंशों उसी का प्रमाण है-

“शक्त्युग्मों भूतवाहो धूमयानिश्शखेदगमः अंशुवाहस्तारामुखों मणिवाही मरुत्सखः इत्पष्टकाधिकरणे वर्गाष्युक्तानि शास्त्रतः।

आठ प्रकार से चलने वाले विमान आकाश में चलते थे (1) शक्त्युदफगमौ अर्थात् विद्युत से चलने वाले। (2) भूतवाह अर्थात् जो अग्नि, वायु, जल आदि ईंधनों से चलते थे। (3) धूमयान अर्थात् भाप से चलने वाले। (4) शिखोद्गम अर्थात् पंचशिखी तेल से चलने वाले। (5) अंशुवाह अर्थात् तारामुखी या जो विभिन्न ताराओं में जाया करते थे, वह सूर्य की ऊर्जा से संचालित होते थे। (6) उल्कारस अर्थात् चुम्बक शक्ति। (7) मणियों की शक्ति से चलने वाले मणिवाह तथा (8) जो केवल वायु को शक्ति से चलते थे ऐसे मस्त्सखा आठ प्रकार के विमान थे। इस प्रकरण में विमानों को ऊपर किस गति से ले जाना चाहिए, आकाश के अवरोध अर्थात् बादल, बिजली उल्का आदि से किस प्रकार किन यन्त्रों से रक्षा की जानी चाहिए, इन सब बातों के साथ-साथ यह भी बताया है कि किसी भी ग्रह में उतरने से पूर्व पहले उसकी परिक्रमा की जाये फिर उतरते समय अमुक सावधानी रखी जाये आदि-आदि। यह सब पढ़ने से यही लगता है कि आज जो जर्मनी, अमेरिका और रूस वैज्ञानिक उन्नति कर रहे है। उस सबका आधार हमारे यहाँ से चुराकर जर्मनी ले जाया गया अथर्ववेद ही है। हमारे सूत्र संस्कृत में होने के कारण अभी पाश्चात्य देशवासी सारे रहस्य जान नहीं पाते, इसीलिए उन्हें लम्बे परीक्षणों के दौर से गुजरना पड़ता है। हमारे ये तो वह सारा मसाला तैयार है, साधारण से साधारण यन्त्रों, उनकी बनावट आदि के विस्तृत उल्लेखों वाला साहित्य हमारे यहाँ अभी भी सुरक्षित है, आवश्यकता केवल उसको इकट्ठा करने और उस पर शोध करने की है। कुछ समय पूर्व अमृत बाजार पत्रिका ने इसी आशय का एक लेख छापकर बताया था कि हैदराबाद के पत्थर घाटी नामक ग्राम में डॉ. सैयद मुहम्मद कासिम जिनके पुरखे कभी बीजापुर के मौलवी रहे है, कि पास इस तरह के साहित्य का विशाल भण्डार सुरक्षित है । खोज की जाये तो सारे देश में ऐसी पाण्डुलिपियाँ आज भी सुरक्षित मिल सकती है।

विमान ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी भारत का विज्ञान उल्लेखनीय प्रगति पर था। ब्रह्मांड विकास की जानकारी के लेख हमारी पत्रिका में पहले भी छपते रहे है। प्रकाश की गति की जानकारी सर्वप्रथम 1625 में रोमर ने की थी। इसके बाद 1925 में ‘माइकल सन’ ने गणितीय सूत्रों के आधार पर प्रकाश की गति 186864 मील प्रति सेकेण्ड का सूत्र निकाला। यह जानकारियाँ बहुत हाल की है। भारतीय शास्त्र ग्रन्थों का अवलोकन करते हुए हम मुनि आन्नेय की भगवत् पढ़ते हैं तो उसमें प्रकाश की गति का मान निकालने वाली इकाइयाँ मिलती है। उनसे प्रकाश की गति 187670 मील प्रति सेकेण्ड निकलती है। इस मान में और आज के मान में कोई बड़ा अंतर नहीं है। सम्भव है आज के वैज्ञानिक कई ऐसी भूलें करते हों जो तब भी हमारे यहाँ के आचार्यों को ज्ञात रही हों और हमारे मानक ही सही हों जो भी हो इतना तो निश्चित ही है कि हमारी पहले की जानकारियाँ अत्याधुनिक थीं। इन सारी जानकारियाँ अत्याधुनिक थी। इन सारी जानकारियों के आधार पर ही हमारे यहाँ ‘आत्मा’ और ब्रह्म’ जैसे सूक्ष्म तत्वों का ज्ञान प्राप्त किया गया है, जबकि आज का विज्ञान इनका उपयोग इन्द्रिय सुख और भौतिक महत्वाकाँक्षाओं में नियोजित करके मानवी-चिंतन को दिग्भ्रमित करने में लगा हुआ है। विज्ञान का सर्वोत्तम उपयोग लौकिक सुखों की अभिवृद्धि नहीं, अपितु अमरत्व प्रदान करना और साँसारिक भयो से मुक्ति प्रदान करना है।

पार्के डेविस कम्पनी की पाँच पीढ़ियों ने केवल चिकित्साशास्त्र पर क्रमबद्ध अनुसन्धान किये है। उसने भारतीय चिकित्सा पद्धति को आधुनिकतम बताते हुए लिखा है कि यहाँ शल्य चिकित्सा (सर्जरी) तक का अच्छा ज्ञान था। सुश्रुत को इस देश का महान् सर्जन मानकर उनका एक कल्पना चित्र बनाकर इस कम्पनी ने प्रसारित भी किया। ऐसे चित्रों की एक शृंखला छापी गयी है। पार्के डेविस ने आचार्य सुश्रुत को न केवल एक महान् डाक्टर माना, वरन् यह भी स्वीकार किया है कि उनकी औषधियों और चिकित्सा पद्धति ने सारे विश्व को प्रभावित किया है।

यह सुश्रुत ही है जिन्होंने सर्वप्रथम शरीर के भीतरी अंगों की बनावट का वर्णन किया हैं सुश्रुत संहिता में उन्होंने बताया है-शरीर में 900 संधियाँ, 700 रक्त वाहनियाँ, 500 माँसपेशियाँ, 300 हड्डियाँ है। 300 लिम्फ ग्रन्थियाँ जो आधुनिक चिकित्सा जगत में पूर्ण रूप से खोजी भी नहीं जा सकी थी। उनका ज्ञान सुश्रुत को था। उन्होंने इनके लिए ‘रसकुल्पा’ अर्थात् ‘रस स्रवित करने वाली’ नाम दिया है। सुश्रुत संहिता में 101 अस्त्रों का भी उल्लेख है और उन औषधियों का भी वर्णन है जो किसी अंग को सुत्र करने और आपरेशन के बाद ‘एण्टीसेप्टिक’ के रूप में दी जाने में प्रयुक्त होती थी। ऐसी ही वृणों के उपचार हेतु वनौषधियों के पेस्ट का भी वर्णन पढ़ने को मिलता है।

एक बार एक आश्रम के किसी लड़के ने खेलते समय धातु का कोई टुकड़ा आँतों में जाकर अटक गया और कष्ट देने लगा। टुकड़े को आपरेशन करके निकालने में चुम्बक का प्रयोग करके उसे बाहर निकाला गया। यह घटना इस बात की प्रमाण है कि उस समय चिकित्सा पद्धति में चुम्बक का भी प्रयोग होता था जैसा कि आज मैग्नेटिक रेजोनेन्स या लिथोटिक्सी में प्रयुक्त होता है।

कर्नल अल्काट ने भारतीय ग्रन्थों का अवलोकन करने के बाद लिखा है कि आज जिन बातों की हमारे वैज्ञानिक कल्पना भी नहीं कर सकते, ऐसी अस्त्र विद्या भारतीयों के पास थी। उन्हें विभिन्न गैसों का ज्ञान था। हाइड्रोजन बमों का निर्माण भारतवर्ष में हुआ है। प्रोफेसर विल्सन ने तो यहाँ तक लिखा है-राकेट भारतीयों के पास थी। उन्हें विभिन्न गैसों का ज्ञान था। हाइड्रोजन बमों का निर्माण भारतवर्ष में हुआ है। प्रोफेसर विलसन ने तो यहाँ तक लिखा हैं आज उनकी केवल नकल हो रही है।”

शुक्रनीति में जिस बन्दूक और उसमें गोला भरकर दागने का उल्लेख है, वह आजकल की बन्दूकों से किसी भी स्थिति में खराब न रही होगी उसका प्रमाण-

“नालीके द्विविध ज्ञेयं वृहत्क्षृद्रविभेदतः। तिर्यगूर्ध्वयुतं छ्रिं नालं पंचवितस्तिकम्॥ मूलाग्रयों लक्ष्याभेदि तिल बिन्दु युतं सदा। यन्त्राघाताग्नि कृदग्राव चूर्णं धृर्क्कण मूलकम्॥ -शुक्रनीति

इन पंक्तियों में बन्दूक की सारी रचना व बारूद का वर्णन हैं कई बनावटें तो ऐसी मिलती-जुलती है जैसा कि ऊपर बन्दूक की ‘आईसाइट’ का वर्णन है यह आज की बन्दूक से हू-ब-हू मिलता है। इससे लगता है आज का विज्ञान हमारे यहाँ से ले जाये गये ग्रन्थों का ही परिणाम है। आज जबकि अपना सारा देश दूसरों के प्रयोगों की नकल करके आगे बढ़ना चाहता है। तब यह कहना भूल नहीं होगी कि यदि हम अपने ही उपलब्ध ज्ञान को एक नई दिशा दे सके होते तो अध्यात्म ही नहीं भौतिक विज्ञान की दृष्टि से उन्नति के पथ पर तेजी से अग्रसर हो गये होते। अब हमें आगे यही करना है। अपने देश की वैज्ञानिक प्रतिभाओं को शोध के लिये अपनी ही तरह का ज्ञान प्रस्तुत करना है, ताकि हम विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया के देशों को पछाड़ सकें और यह बता सके कि हम भारतीय मात्र पूजा-उपासना करना ही नहीं जानते, वरन् आर्थिक, औद्योगिक व वैज्ञानिक क्षेत्र में आगे बढ़कर सर्वशक्तिमत्ता की अभिव्यक्ति करना भी अच्छी तरह जानते हैं।


मनोयोग ओर परिश्रम (Kahani)

1940 में काली दैकास को हंगरी का सर्वश्रेष्ठ निशानेबाज घोषित किया गया और जापान में होने वाले ओलम्पिक खेलों में सम्मिलित होने के लिए उसका चयन भी हो गया, लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ जाने के कारण उसे युद्ध में जाना पड़ा, 1945 में युद्ध समाप्त हुआ और 1948 में होने वाले ओलम्पिक की तैयारियाँ शुरू हो गई, लेकिन एक मोटर दुर्घटना में टैकास अपना दाहिना हाथ गँवा बैठा। एक बार तो टैकास को अपनी सारी आशाएँ धूमिल होती लगीं, लेकिन उसने हिम्मत से काम लिया।

सन् 1948 में लंदन में ओलम्पिक खेलों का आयोजन हुआ, निशानेबाजी में प्रथम आए खिलाड़ी का दाहिनी हाथ नहीं था, दर्शक इस अद्भुत-खिलाड़ी को देखने के लिए उमड़ पड़े, बायें हाथ से निशानेबाजी की चैंपियनशिप जीतने वाला वह खिलाड़ी हंगरी निवासी काली टैकास ही था। मनोयोग ओर परिश्रम साथ रहे तो व्यक्ति कुछ भी कर गुजरने में सफल हो सकता है।


गौ सेवा से ग्रामोत्थान एवं सम्पूर्ण क्रान्ति

भारत एक ग्रामीण प्रधान देश है। यहाँ की बहुसंख्य जनता गाँवों, छोटे कस्बों में बसती आयी है एवं कृषि पर उनकी जीवन-व्यवस्था आधारित रही है। कृषि पूर्णतः पशुधन पर टिकी रही है। जब तक पशुधन, उपलब्ध उर्वर भूमि एवं उपयुक्त पर्यावरण का संतुलन बैठा रहा, तब तक भारत का औसत व्यक्ति ग्राम छोड़कर शहरों की ओर जाने की नहीं सोचता था, किंतु जब से यह असंतुलन बढ़ा है, गाँवों से पलायन भी तेजी से बढ़ा है। गाँवों बड़े कस्बों में एवं कस्बे बड़े शहरों में बदलते चले गए। नतीजा सामने है कि आज बहुसंख्य समस्वरता का, सरलता का जीवन बिताने वाले ग्रामवासी शहरों में बड़ी निम्नस्तरीय परिस्थितियों में जीते देखे जाते हैं। शहरी जनसंख्या विगत तीस वर्षों में तेजी से बढ़ी है, साथ ही साथ इनके कारण कोढ़ के दागों की तरह मलिन गंदी बस्तियों की संख्या में अभिवृद्धि हुई है। नवीन भारत का आजादी के पचास वर्षों बाद पुनर्निर्माण एक संपूर्ण क्रांति के रूप में ग्रामोत्थान के माध्यम से ही संभव है एवं वही कार्य आज की सर्वोपरि आवश्यकता माना जाना चाहिए, युगधर्म के रूप में समझा जाना चाहिए।

आज गाँवों में डीजल चालित ट्रेर्क्टस से खेती होने लगी है। देहाती क्षेत्रों में इन दिनों बैलों द्वारा उपलब्ध ऊर्जा अनुमानतः लगभग 40,000 मेगावाट के बराबर है। इस ऊर्जा का लाभ और अधिक लिया जा सकता था। यदि पशुओं की नस्ल सुधार की नीति चालू रहती एवं गोधन विकास पर चिन्तन किया जाता। केवल दुग्ध उत्पादन को ही बढ़ावा देने के कारण भैंस प्रजाति को ही बढ़ावा देने के कारण भैंस प्रजाति को ही प्रोत्साहन मिला है , क्योंकि ये दूध अधिक देती है और इनके दूध में वसा की मात्रा ज्यादा होती है। गाय का दूध गुणात्मक दृष्टि से अच्छा होने के बावजूद भैंस के दूध से कम खपने लगा, क्योंकि इसमें घी कम मात्रा में होता है।

ट्रैक्टरों के बढ़ते उपयोग एवं बैलों की उपेक्षा के कारण बचपन से ही नर-प्रजाति-गाय और भैंस दोनों में ही उपेक्षित होकर माँस के व्यापार को बढ़ावा मिला है। निर्यात अत्यधिक होने के कारण इस प्रक्रिया को और भी विशेष प्रोत्साहन मिलता चला गया है।

दूध अधिक से अधिक मिले, इसके लिए गाय और भैंस का दूध निकालने की प्रक्रिया भी बड़ी क्रूर और अमानवीय हो गयी है। परम्परागत विधि से पहले बच्चे को दूध पिलाया जाता था, उसके पश्चात् गाय अथवा भैंस का दूध दुहा जाता था ताकि ममता प्रेरित प्राकृतिक हारमोनों के स्राव के फलस्वरूप गाय और भैंस स्वाभाविक स्थिति में दूध दे सकें। अब याँत्रिक विधि से वैक्यूम पम्प जैसे यंत्रों द्वारा एवं इंजेक्शन (ऑक्सीटोसिन जैसे प्रसव वेदना पैदा करने वाले) देकर अधिक से अधिक दूध प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। गम्भीर पीड़ा का परिस्थिति में निकला दूध हमारी उपभोगवादी, बाजारी मानसिकता के फलस्वरूप आज सारे देश में जहाँ भी दिया जाता है- चिंतन में हिंसात्मक क्रूरता के संस्कार ही लाता है। हमारे शिशु - शावकों एवं पोषण के नाम पर दूध पीने वालों के जनमानस में ये संस्कार तेजी से घुलते चले जा रहे है। इसी कारण आज तनाव, वर्ग संघर्ष संक्षोभ-विक्षोभ तेजी से बढ़ते दिखाई देते हैं। हर कोई झल्लाता अथवा ऐसे कृत्य करता देखा जाता है, जो कि मानवीय गरिमा के अनुरूप नहीं है। दूसरी ओर नर-प्रजाति का माँस व्यापार तु हनन होते रहने से ग्रामीण ऊर्जा के स्रोत बड़ी तेजी से सूखते चले जा रहे है। डीजल के दाम बढ़ते चले जाने से जिसे कि हम विदेशी पूँजी की कीमत पर आयात करते हैं, याँत्रिक निर्भरता बढ़ती जा रही है-खर्च बढ़ रहा है-पैट्रोल पम्पों पर डीजल के लिए लम्बी लाइनें देखी जा सकती है और इस सबका परिणाम समग्र अर्थव्यवस्था का ढाँचा चरमराने के रूप में सामने आ रहा है सर्वनाश का एक खेल हम सबकी आँखों के सामने बड़े सुनियोजित ढंग से बहुत बड़े पैमाने पर एक सोची-समझी नीति के अनुसार होता प्रतीत हो रहा है।

भारतीय कृषि-व्यवस्था जो परम्परागत वेग से चली आ रही थी, इस देश की संस्कृति के अनुरूप गोवंश पर गाय और बैल पर केन्द्रित थी। गौवध निषेध के अनेकानेक आध्यात्मिक कारण है, इनके अतिरिक्त सामाजिक कारण होने से भी हमारे ऋषियों ने स्थान-स्थान पर गोवंश के संरक्षण की बात कहीं है। ग्रामीण ऊर्जा के स्रोत बैल जिन्दा रहें

उनका सतत् संवर्धन होता रहे ताकि उनकी ऊर्जा से कृषि का विस्तार सम्भव हो सके और कभी अकाल जैसी स्थितियाँ देश में उत्पन्न न हो पायें, यह निषेध ऋचाओं के माध्यम से ऋषि अपने संदेशों में दे गए है। प्राचीनकाल में गाय का दूध परिवार की आवश्यकता मात्र के लिए ही होता था बिक्री के लिए नहीं। इसी कारण महिलाएँ एवं बच्चे स्वास्थ्य बने रहते थे। गौ सेवा महिलाएँ तथा बच्चे किया करते थे, पुरुष कृषि कार्य के साथ चरागाहों में उन्हें चराने तथा उनके व्यापार में अपना समय लगाते थे, ताकि गोवंश का प्रसार हो। भगवान श्रीकृष्ण का बाल्यकाल गोप-गोपियों, ग्वाल-बालों के साथ व्रज में यों ही नहीं बीता था। यह उनकी गोवंश प्रसार की सुनिश्चित योजनानुसार था। भारत को महाभारत बनाने की उनकी योजना के अनुरूप था। प्राचीनकाल में गायों को चराने के लिए गाँवों में गोचर हुआ करते थे, जो स्थानीय भूमिहीन कृषक -मजदूरों की पीने का पानी, जलावन की लकड़ी पशुओं को चारा मुफ्त उपलब्ध कराते थे। परिवारों में पल रही गायें जब दूध देना बन्द कर देती थी, तब उन्हें गौ शाला को दान दे दिया जाता था। गौ शाला और गोचर क्रमशः ग्रामोद्योग और कृषि के केंद्रबिंदु थे।

आज गाय की अवज्ञा और भैंस के दूध के फलते-फूलते व्यापार ने गौ सेवा, गौ शाला और गोचरों की धज्जियाँ उड़ा दी है। परिणामस्वरूप भारत की टिकाऊ कृषि-व्यवस्था, खेती−बाड़ी आज खतरे में पड़ गयी है। टिकाऊ कृषि व्यवस्था के कारण ही हर गाँव के तालाब और कुएँ वर्ष भर आदमियों और पशुओं को पर्याप्त पीने का पानी उपलब्ध कराते थे। खेतों में उत्तम प्रकार की प्राकृतिक खाद, जो गोबर से बनती थी, प्रयुक्त होती थी, तथा भूमि एक औषधि माना जाता था। गोबर के उपले जलते रहने के कारण वातावरण सुवासित एवं बीमारी पैदा करने वाले मच्छरों से रहित होता था। दही, दूध, गौमूत्र, घी के साथ मधु मिलाकर पंचगव्य बनाया जाता था, जो कि आयुर्वेद के विद्वानों के अनुसार एक आध्यात्मिक उपचार हेतु प्रयुक्त द्रव्य ही नहीं, मानसोपचार एवं काया के रोगों के लिए एक समग्र औषधि माना जाता रहा है। इसका भी अब क्रमशः आज की पाश्चात्य अंधानुकरण वाले सभ्य-समाज में लोप होता जा रहा है, क्योंकि मूल घटकों की उपलब्धि ही नहीं हो पा रही है।

आज की टिकाऊ खेती रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाइयों के आधार पर सिंचाई हेतु पानी अत्यधिक माँगती है। साथ ही साथ खेतों की उर्वरा शक्ति भी गिरती देखी जा रही है। गाँवों के तालाब और कुएँ जो कभी भरे रहते थे, पानी की अत्यधिक खिंचाई के कारण सूख गए है। आदमी तो क्या पशु के लिए भी पीने का पानी आज देहातों में नहीं है। इस घटनाक्रम के लिए भैंस के दूध के व्यापार को दोष नहीं दिया जा रहा, वरन् उसके फलस्वरूप नासमझी में छोड़ी गयी तो गौ सेवा वाली मानसिकता को इसके लिए जिम्मेदार बताने का प्रयास यहाँ किया जा रहा है। इस नासमझी के दृष्टिकोण का एक उदाहरण पर्याप्त है-”जब बाजार में दूध मिल जाता है तो घर में गाय पालने की क्या जरूरत है। “ अब वह चाहें भैंस का हो, पाउडर दूध या सिन्थेटिक दूध, जो अपराधी समाज की हम सबको एक घातक भेंट है।

आधुनिक अर्थशास्त्रियों का यह तर्क कि देश की बढ़ती जनसंख्या को भरपेट भोजन देने के लिए पशुओं की संख्या कम कर माँस के निर्यात को बढ़ावा देना चाहिए, त्रुटिपूर्ण चिंतन का परिचायक है। भरपेट भोजन जिस अन्नाहार-शाकाहार पर निर्भर होना चाहिए, वह संतुलित पर्यावरण पर टिका हुआ है। गोचर क्षेत्र की सूखी घास, कृषि कार्य से उपजे वेस्ट प्रोडक्ट्स को खाकर यों पशु उपयोगी गोबर व गो-मूत्र किसानों को देते थे। उपले ही गाँवों में ऊर्जा के स्रोत थे। आज गोबर गैस तैयार करने के आधुनिक तरीके भी निकल आए है। अर्थात् गो-वंश के गोबर, गो-मूत्र के अतिरिक्त कोई और विश्वसनीय वैकल्पिक ऊर्जा का स्रोत आज देहात में नहीं है। वृक्षों को काटकर ईंधन की आपूर्ति लम्बे समय तक न तो सम्भव है और न ही सुझायी जानी चाहिए। आज देहातों में गोवंश की कमी के कारण वृक्ष अंधाधुन्ध कटे हैं। इससे पर्यावरण प्रदूषण का एकमात्र समाधान , वृक्षों द्वारा दी जा रही ऑक्सीजन में भारी कमी आयी है, वर्षा में कमी आयी है एवं अपराध तेजी से बढ़े है वृक्षारोपण के निमित्त सरकारी प्रयास कितने कागजी रहे, यह सभी जानते हैं।

गो-सेवा की उपेक्षा से देहात में गोचर निबट गए है एवं भूमिहीन कृषक मजदूर शहरों को पलायन हेतु विवश हो गए है। देहातों से शहरों में पलायन के कारण आज देश की लगभग 10 करोड़ जनसंख्या अनुमानतः पाँच हजार उपनगरों में नगरीय जीवन जीती देखी जा सकती है गाँव इनने छोड़ दिए है, शहर इन्हें रोज दुत्कारता है। ये कहीं के नहीं रह गए। धरती पर साक्षात नरक के रूप में गंदी बस्तियों में रहना इनकी नियति बन गयी है। महिलाओं और बच्चों की दशा इन उपनगरों में विशेष रूप से दयनीय है। शराब के नशे में धुत अपने पति से और बच्चों का पिता से पिटना इनका रोजमर्रा का अनुभव है। एड्स जैसी महामारी से लेकर अन्य छूत की बीमारियाँ फैलने के ये उपनगर केन्द्र बन गए है। मुम्बई की आधी से अधिक आबादी इसके उपनगरों में बसती है। इसी प्रकार दिल्ली की 40 प्रतिशत आबादी उपनगरों में रहती है। आर्थिक असमानताजन्य विद्वेष कब इन महानगरों में फूट पड़े, कहा नहीं जा सकता। उपचार एक ही है-ग्रामोत्थान एवं शहरों की बड़ी आबादी को वापस वहीं भेजना जहाँ से वे आए थे।

हमारे देश में प्रायः पन्द्रह ऐसे महानगर है। जिनकी आबादी आस-पास के गाँवों को लीलकर उपनगरों को बढ़ती जनसंख्या की कीमत पर बढ़ी है। उपनगरों में यदि बुराइयाँ है तो एक अच्छाई भी कि देहात से आए इन व्यक्तियों ने शहरी संस्कृति के उन्मुक्त जाति विहीन संस्कारों का अनुभव अपने रोजमर्रा के जीवन से लिया है। इसके विपरीत देहातों में आज जातिवाद के दुराग्रहों से सभी ग्रसित दिखाई देते हैं। यदि उपनगर वासी परिजनों को गाँवों के जातिवादी पूर्वाग्रहों से मोर्चा लेने के लिए तैयार किया जा सके, तो आज की घृणित राजनीतिक का केन्द्र बिन्दु बनी जातिवादी मानसिकता से जूझा जा सकता है। यदि पाँच हजार महानगरों से 100-100 युवक भी चयनित किए जा सकें, इनकी मनोभूमि ऐसी बनाई जा सके कि ये वापस गाँवों में जाकर उनके उत्थान का बीड़ा उठायेंगे तो इन पाँच लाख व्यक्तियों के द्वारा एक माहौल फूलते शहरों की सघनता कम करने, प्रदूषण मिटाने एवं जातिगत विद्वेष से लड़ने के अलावा ग्रामोत्थान के माध्यम के रूप में बन सकता है।

ग्रामों की ओर ये युवा या अन्य कोई तब ही लौट पायेंगे, जब वहाँ ग्रामोद्योगों को बढ़ावा देने के स्थान पर उनकी उपेक्षा ही हुई है। ग्रामोद्योग टिक नहीं पाए, अधिकतर उनकी ओर हम सबकी संवेदना सतही ही रही है। उनके लिए बाजारों की भी कोई व्यवस्था नहीं बन पाई, जहाँ उनकी खपत हो सके। ग्रामोत्थान-ग्रामोद्योग को ‘ग्रासरुट’ स्तर पर विकसित किए बिना सम्भव नहीं। ग्रामोद्योग टिकेगा तब जब उसके लिए गाँवों में कोई खूँटा हो। वह खूँटा बन सकता है गौ शाला , जहाँ परिवारों में पल रही वे गायें और भैंसें एकत्र की जा सकती हैं, जिनने दूध देना बन्द कर दिया है। उनके गोबर, गो-मूत्र से उत्तम प्रकार की आर्गेनिक खाद और कीटनाशक दवा के साथ-साथ रसोई गैस भी पैदा की जा सकती है, जो सीधे ग्रामवासी भाइयों के घरों में पाइपों द्वारा पहुँचायी जा सके। उससे प्रकाश की भी व्यवस्था हो सकती है, ईंधन की भी। इन पशुओं के कटने पर पूर्णायु प्राप्त करने पर उनके चमड़े, हड्डी आदि की सुव्यवस्था वे लोग कर सकते हैं जो आज केवल बूचड़खानों पर आश्रित है। इससे उन्हें रोजगार मिलेगा एवं पारस्परिक सद्भाव का प्रचार-प्रसार भी सम्भव हो सकेगा। इन गो-शालाओं द्वारा क्षेत्र के पशुओं की नस्ल सुधार का काम भी किसानों की आवश्यकतानुसार हाथ में लिया जा सकता है। तरह-तरह के ग्रामोद्योग इन गोशालाओं से कच्चे माल की उपलब्धि के आधार पर चलाए जा सकते हैं। गोसेवा के लौटने और गौदुग्ध की सर्वत्र उपलब्धि से महिलाओं और बच्चों का पोषण भी ठीक से हो सकेगा। इन दोनों के कुपोषण से ही जनसंख्या विस्फोट की समस्या सुलझेगी, क्योंकि माता का स्वास्थ्य ठीक न होने, जल्दी-जल्दी बच्चे होने और असमय बच्चों के मरते चले जाने के कारण दंपत्ति वंशवृद्धि-व्यवसाय-व्यापार आदि के लिए अधिक बच्चे पैदा करते हैं ताकि उनमें से दो तो जीवित रहें। इस चक्र को तोड़ा जा सकता है, यदि पोषण सही ढंग से गोपालन प्रक्रिया द्वारा उपलब्ध कराया जा सके। गाय और गौ सेवा के लौटने पर निश्चय ही महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार होगा, ऐसा विश्वास किया जा सकता है।

एक दुर्भाग्य इस देश का यह है कि आज गाय हमारे देश में सांप्रदायिक तनाव का एक मुद्दा बन गयी है। भारत में मात्र जम्मू एवं कश्मीर ही एक ऐसा राज्य है जहाँ सदियों से गौवध पूर्ण रूप से प्रतिबन्धित है। कभी भी इस राज्य में साँप्रदायिक तनाव की परम्परा नहीं रही। हमारी दूरदर्शिता के अभाव ने यदि पिछले कुछ वर्षों में कुछ प्रतिकूलताएँ पैदा की हों तो हम स्वयं उसके लिए जिम्मेदार है। गाय किसकी है ? इस सवाल ने गाय का सर्वाधिक नुकसान किया है। आज परिस्थितियाँ ऐसी बन गयी है। कि गाय जो हमारी माता कहीं जाती थी, किसी की नहीं रही। मुसलमान गौ हत्या की तोहमत से बचने के लिए इससे दूर रहते हैं और हिन्दू ने मात्र इसकी पूजा की है अथवा उपेक्षित करके आवारा पशु के रूप में कस्बों-शहरों में घूमने के लिए छोड़ दिया है। आधुनिकता की दौड़ ने गाय को,हमारी संस्कृति की महत्वपूर्ण प्रतीक को हम सबसे अलग-थलग कर दिया है। इसको मारने वाला न हिन्दू है, न मुसलमान आज की जीवन पद्धति ने इसे प्रायः मार ही दिया है। अतः पुनः गोसेवा केन्द्रित जीवन पद्धति को हमारे समाज में वापस लाना होगा। इससे न केवल बचपन से ही परिवारों में जीवनमात्र के प्रतिनिधि के रूप में गाय के प्रति संवेदना जागेगी, अपितु महिलाओं और बच्चों को पर्याप्त पोषण भी मिलेगा। घरों में गायें पुनः पलने लगेगी एवं जब ये दूध देना बन्द कर देंगी, तब उनकी देखभाल गाम की गोशाला कर लिया करेगी।

गौशाला की स्थापना के कार्य को गोसंवर्धन हेतु एक आन्दोलन के रूप में चलाने की आज अत्यधिक आवश्यकता है। ये गौशालाएँ ही ग्रामोद्योग का केन्द्र बनेंगी और देहात में गोचर व्यवस्था से लेकर पर्यावरण संतुलन स्थापित करने की दिशा में फिर सक्रिय होंगी। स्वैच्छिकसेवियों के बचत समूहों के माध्यम से यह कार्य सम्भव है एवं फिर आगे इसे शहर से वापस आने वाले युवक-युवतियाँ गति देने का कार्य करते रह सकते हैं। नाबार्ड (नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एण्ड रुरल डेव्हलपमेण्ट) जैसी संस्था ‘ऋचा’ जैसे बहुमुखी, बहुउद्देश्यीय जल व भूमि संरक्षण को समर्पित संगठन के साथ आज पूरे देश में कार्य कर स्वयंसेवी बचत समूहों के द्वारा राष्ट्र का खोया वैभव, सुसंस्कारिता वापस लौटाने का प्रयास कर रहे है। इस आँदोलन के साथ गोशाला आँदोलन जुड़ने पर आर्थिक आधार भी सशक्त बनेगा एवं फिर गोचर केन्द्रित कृषि व्यवस्था की पुनर्स्थापना सुनिश्चित रूप से हो सकेगी। यही व्यवस्था भारत की टिकाऊ खेती-बाड़ी का मेरुदण्ड रही है। तब ही सम्भव हो पाएगी गोसेवा से ग्रामोत्थान, ग्रामोत्थान से समानता-सद्भावना की सम्पूर्ण क्रान्ति।


बिल्ली और मुर्गी (Kahani)

पालतू बिल्ली किसान का दूध छिपकर पी जाती। मुर्गी उसे टोकती हुई कहती-तुम्हारी नीयत बहुत खराब है। मालिक तुम्हें समय पर भोजन देता है, किंतु तुम चोरी की आदत नहीं छोड़ती। बिल्ली ने उसकी बात अनसुनी कर दी। किसान रोज दूध की चोरी होते देख सोच में पड़ जाता आखिर बिल्ली और मुर्गी के अतिरिक्त और कोई तो यहाँ है नहीं। लेकिन मैं तो दोनों को ही भरपेट खिलाता हूँ, फिर यह दूध कौन पी जाता है। हमें छिपकर देखना चाहिए।

पर बिल्ली काफी चालाक थी। वह हर बार ऐसे मौके की तलाश में रहती जब किसान और मुर्गी दोनों बाहर रहते। एक दिन मुर्गी ने बिल्ली को बाहर घूमने चलने के लिए कहा तो बिल्ली पेट-दर्द का बहाना बनाकर लेट गई। मुर्गी ने समझ लिया कि ये बहाना क्यों बनाया जा रहा है। जैसे ही मुर्गी ने घर से बाहर पैर रखा कि बिल्ली दूध पीने में लग गयी। मुर्गी ने वापस लौटकर सारा नजारा देखा और चिल्लाने लगी।

अब तो किसान ने बिल्ली को दूध पीते रँगे हाथों पकड़ लिया। बिल्ली गुस्से मेँ मुर्गी को खाने दौड़ी तो किसान ने बिल्ली को डण्डा मार-मार कर घर से निकाल दिया। तब से बिल्ली मुर्गी की जानी दुश्मन बनी हुई है। कपटी ठग और चोरों का भेद पर वे जान के दुश्मन बन जाते हैं।


पुष्पों की निर्मम बलि रोकिए

भारतीयों संस्कृति में पुष्पों का बड़ा महत्व बताया गया है। खिले हुए फूल उल्लास के प्रतीक रूप में अपनी आराध्यसत्ता को समर्पित किए जाते हैं। पुष्प या पुष्पदल के समर्पण के पीछे मूल भाव यहीं रहता है कि हम भी इन्हीं की तरह बने। हम भी सुगन्धि बाँटे, पराग कणों की विस्तृतीकरण प्रक्रिया द्वारा हमारी प्रतिभा-पुरुषार्थ बहुगुणित होकर अनेकों तक पहुँचे-अनेकों पुष्पों में बदल जाय। स्वागत-सत्कार की परम्परा में भी हमारे यहाँ अतिथिगणों को पुष्पमाला, पुष्प गुच्छक, बुके या गुलदस्ते द्वारा अपने स्नेह व सम्मान का प्रदर्शन किया जाता है। यही नहीं उल्लास के प्रतीक के अतिरिक्त शोक या अवसाद प्रकट करने के लिए भी बड़े-बड़े पुष्पों से सजे बुके जो अनेकानेक आकारों के रूप में होते हैं, मृत शरीर पर अथवा उनकी अन्त्येष्टि पर समर्पित किए जाते हैं।

पुष्पों का महत्व अपनी जगह है, रहेगा। उनकी बढ़ती माँग के कारण ही तो आज पुष्पोद्यान लगाना (फ्लोरीकल्चर) एक उद्योग के रूप में परिणत होता चला गया है एवं आजीविका का महत्वपूर्ण स्रोत बनता चला गया है। 1990-91 में जहाँ प्रायः साढ़े पाँच करोड़ रुपयों के पुष्पों का निर्यात होता था, वहीं अब 1996-97 में यह लक्ष्य बढ़ाकर 110 करोड़ रुपये कर दिया गया है। विश्व के विभिन्न राष्ट्रों में भारतीय पुष्पों की माँग तेजी से बढ़ती चली जा रही है।

यहाँ तक तो ठीक है कि हम पुष्पोद्यानों में उनकी भाँति-भाँति की प्रजातियाँ विकसित करें एवं निर्यात द्वारा अपनी विदेशी पूँजी के कोष को बढ़ाते चले। किंतु जब हम उनके सर्वनाश पर उतर आते हैं एवं उन्हें व्यर्थ नष्ट कर पर्यावरण एवं जैविक संतुलन से खिलवाड़ करने लगते हैं तो लगता है कि कहीं कोई गड़बड़ी अवश्य है, जिसे रोका जाना चाहिए। हमारे देश में सामाजिक, राजनैतिक एवं धार्मिक परिवेश जिस प्रकार है, पुष्पों का अनावश्यक दुरुपयोग होता देखा जाता है। यह प्रचलन पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। आज कोई भी छोटा या बड़ा गाँव, कस्बे या शहर का समारोह हजारों , पुष्पों की बलि लिए समाप्त नहीं होता। जिन अतिथि महोदय को आमंत्रित किया गया है, उन्हीं के सम्मान में माला पहनाने की होड़ लग जाती है एवं देखते-देखते कई पुष्प बलि चढ़ जाते हैं। यही स्थिति शादी-ब्याह एवं सार्वजनिक समारोहों में की जाने वाली सजावट के दौरान देखी जाती है, जब पैरों तले फूल कुचले देखे जाते हैं। धार्मिक उत्सव समारोहों में भी अनावश्यक रूप से उत्साह अतिरेक में आकर लोग ढेरों फूल नाली में, सरोवरों-सरिताओं में बहा देते हैं। कुछ आँकड़े बड़े चौंक देने वाले है।

भारत की प्रमुख नदियों में प्रति वर्ष लगभग छह हजार टन पुष्पों को प्रवाहित कर न केवल पर्यावरण संतुलन को अव्यवस्थित किया जा रहा हैं, नदियाँ भी प्रदूषित की जा रही हैं क्योंकि ये सभी बासी, सड़ी-गली स्थिति में बहा दिए जाते हैं। इनके अतिरिक्त चार हजार टन फूल प्रतिवर्ष राजनैतिक-सामाजिक कारणों से नष्ट होते चले आ रहे है। पुष्पों से जुड़ा एक समुदाय मधुमक्खियों का भी है, जो परागण द्वारा बहुमूल्य औषधि ‘मधा’ का निर्माण ही नहीं करती अपितु पुष्पों की प्रजातियाँ बढ़ाने, उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वर्तमान में भारतवर्ष में बीस हजार प्रजाति की मधुमक्खियाँ हैं, जो पुष्पों के अनैतिक स्तर पर किये जा रहे दोहन के कारण निरन्तर घटती जा रही है। एक मधुमक्खी एक ग्राम शहद बनाने के लिए लगभग पाँच हजार विभिन्न प्रकार के पुष्पों का रसास्वादन करती है। आज हो रही पुष्प बलि से प्रतिदिन 13000 किलोग्राम शहद की हानि हो रही है, जिसकी लागत लगभग 20 लाख रुपया प्रतिदिन कूती जाती है।

दो लाख हेक्टेयर भूमि में आज पुष्प मात्र ‘बल्क उत्पादन’ के लिए लगाए जा रहे है। अत्यधिक उपयोगी पोषक-हरी सब्जियाँ तथा अनाज पैदा करने वाला भू-क्षेत्र घटता जा रहा है। तुरन्त का लाभ चूंकि दिखाई देता है- अतः इस कीमत पर भी पुष्पों की खेती बढ़ती ही जा रही है। उन्हें असमय तोड़कर जैवविविधजा से तथा पर्यावरण संतुलन से छेड़खानी की जा रही है। यदि यह कार्य बंजर पड़ी भूमि (जो लगभग 40 लाख हेक्टेयर से भी ज्यादा है ) पर किया जाता तो शायद उस भूमि का भी उद्धार हो जाता । किन्तु यह उत्पादक उर्वर भूमि पर हो रहा है। क्या किया जाय, उसके लिए कैसे जन-जाग्रति पैदा की जाय, यह प्रश्न कुछ के मन-मस्तिष्क में एक आँदोलन के रूप में पिछले कुछ दिनों से जनम ले रहा है। उनमें से एक टेहरी गढ़वाल के नागानी शासकीय महाविद्यालय के बायोलॉजी लेक्चरर श्रीरायजादा है, जिनने इस पुष्प बलि अभियान के लिए भारत भर में अलख जगाने हेतु यात्रा की है। वे चाहते है कि ‘पुष्पमित्र’ अधिक से अधिक संख्या में बढ़े एवं पुष्प बलि के खिलाफ संघर्ष करें। एक राष्ट्रीय पुष्प नीति बने ताकि पर्यावरण संरक्षण भी सम्भव हो सके, पुष्पों की प्रजातियों-मधुमक्खियों का सर्वनाश भी रोका जा सके। ‘एक व्यक्ति को एक पुष्प’ वह भी गमले में अर्पित करके दिया जाय, ताकि स्वागत की परम्परा भी निभ जाय व उसका संरक्षण भी सम्भव हो । कटे हुए पुष्पों का प्रयोग कम से कम किया जाय एवं धार्मिक समारोहों में भी यथासम्भव कम से कम पुष्पों का प्रयोग हो।

आगामी 1 जून को विश्व पर्यावरण दिवस है। इस सम्बन्ध में जो भी कार्य एक व्यक्ति एक संस्था के रूप में कर रहा है। , उसके समर्थक तर्क बड़े सशक्त एवं हिला देने वाले है। पुष्प प्रजातियाँ भी हमारे विश्वराष्ट्र इकोसिसटम का एक अंग है। वे हमें वैसा ही उल्लास बाँटती रहें एवं हमारा वातावरण प्रदूषित होने से बचे, इस सम्बन्ध में समूह चेतना जगायी जानी चाहिए। ऐसे सत्प्रयासों के लिए जनसमर्थन भी मिले, , ऐसा गायत्री परिवार का भी मत है। पुष्प जिन्दा रहेंगे, अपने विशुद्ध स्वाभाविक रूप में मौजूद होंगे तो वे उल्लास भी बांटेंगे, मधु भी हमें मिलता रहेगा एवं हमारी नदियाँ तो प्रदूषित होने से बचेगी ही, प्रकृति के अंग-अवयव ये फूल प्रदूषण निवारण के साथ-साथ इस धारा का सौंदर्य और बढ़ाते रहेंगे। मात्र जनचेतना के जागने भर की आवश्यकता है।


जीवन-सम्पदा का सही सुनियोजन

इस विश्व-ब्रह्मांड की अजस्र शक्ति और सम्पदाओं में से जीवात्मा हिस्से में जो सर्वोपरि उपहार आता है। उस वैभव को मनुष्य जीवन कहा जा सकता है। दृष्टि पसार कर देखने पर प्राणी के लिए इससे बड़ी उपलब्धि और कुछ हो ही नहीं सकती। अन्य जीवधारियों को जा काय-कलेवर मिला है, उससे प्रकृति की इच्छा ही पूरी होती है। आत्मा या परमात्मा को कोई प्रसन्नता या सम्भावना की आशा नहीं रहती। क्योंकि उन शरीरों की क्षमता मात्र इतनी ही है कि निर्धारित आयुष्य को पूरा करने के लिए अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति भर करते रह सके।

शरीर के लिए आहार, आहार के लिए श्रम, श्रम की प्रेरणा भूख से। यह प्राणि-जगत की हलचलों का एक प्रयोजन है। दूसरा है-वंश रक्षा। प्रकृति चाहती है-धरती प्राणियों से रहित न रहे। इस कष्ट -साध्य कार्य का दबाव पड़ता है। इस व्यर्थ के कष्टकर झंझट को कोई क्यों वहन करें? इस उलझन को सुलझाने के लिए मनःक्षेत्र में एक ऐसी उमंग उत्पन्न की गई , जिससे प्रेरित होकर प्राणी यौन-कर्म की ओर आकर्षित हो और परिवार बढ़ाये। यही है दो प्रयोजन, जिनमें हर वर्ग और स्तर के प्राणी निरत पाये जाते हैं। इन्हीं दो उपक्रमों में उनकी जीवनचर्या घड़ी के पेण्डुलम की तरह झूले-झूलती रहती है। इन दोनों प्रयोजनों के लिए हर प्राणी में सामर्थ्य एवं कुशलता है। न इससे कम न अधिक।

मनुष्य जीवन इस सामान्य की तुलना में कहीं अधिक असामान्य है। उसे ऐसी काय-संरचना तथा बुद्धि सम्पदा उपलब्ध है, जिसके सहारे वह आगे की सोच सकता है और ऊँचा उठ सकता है काया-संरचना भी ऐसी है जिसे न केवल असामान्य प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किया जा सके वरन् कला-कौशल के ऐसे भाव-सम्वेदना भी हस्तगत कर सके, जिसमें अन्तः करण प्रफुल्लता से भर सके। अपना बहुमुखी हित-साधना हो सके और उपलब्धियों का लाभ असंख्यों को वितरण करके कृत-कृत्य हो सकें।

मनुष्य ही है जिसने भाव-सम्वेदना, वारणा एवं निर्धारण की क्षमता को सुसंस्कृत-सुनियोजित बनाकर अपनी आंतरिक गरिमा को उच्चस्तरीय बनाया है। महामानव से लेकर नी-नारायण बन सकने जैसी विभूतियों को करतल किया है। प्रसुप्त क्षमताओँ को जाना, उभारा और लाभ उठाया है। शरीर की इन्द्रिय-तृप्ति सर्वविदित है, किन्तु मनुष्य ही है जिसने भाव-सम्वेदना को परिष्कृत करके संतोष , आनन्द, उत्साह, उमंग जैसी अदृश्य भाव-सम्वेदनाओं से अपने आपको देवोपम बनाया है। स्वर्ग और मुक्ति उसकी अपनी उपलब्धियाँ हैं तृप्ति, पुष्टि और शान्ति का आनन्द वही लेता है। श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा के कारण भाव-विभोर रहने और गर्व-गौरव अनुभव करने का अवसर उसी को मिला है, जबकि अन्यान्य प्राणी मात्र पेट प्रजनन के निमित्त कुछ करने और कुछ पाने का ही उथला-सा आनन्द ले सके।

मनुष्य ही है जिसने प्रकृति को मथ डाला और उसके अंतराल में गहरी डुबकी लगाकर रहस्यमयी रत्न-राशि पर कब्जा जमाया। प्रकृति ने हर प्राणी को उसके निर्वाह भर के अनुदान दिये है। शेष को किन्हीं अविज्ञात प्रयोजनों के लिए अपनी रहस्य भरी तिजोरी में सात तालों के भीतर छिपा रखा है। मनुष्य ने चाबी ढूँढ़ी और रहस्य भरे वैभव का भारी मात्रा में माल-असबाब अपने कब्जे में कर लिया। अभी भी उसका प्रयास यह है कि प्रकृति को नंगी करके छोड़े और उसकी समूची सम्पदा हस्तगत करके स्रष्टा न सही अधिष्ठाता अधिकारी कहाने का श्रेय तो प्राप्त कर ही ले। पौराणिक युग के रावण, वृत्तासुर , हिरण्यकश्यपु, भस्मासुर, मारीच, सहस्रार्जुन आदि आज के मनुष्य की तुलना में बहुत पीछे रह गये है।

यह हैं मानवी उपलब्धियाँ । आत्मिक क्षेत्र का उसे बृहस्पति और भौतिक क्षेत्र का शुक्राचार्य दोनों का समन्वय कहा जाय तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी। यह उस विश्वमानव का समष्टि मानव का स्वरूप है, जिसकी उपलब्धियों की मुक्त कण्ठ से सराहना करनी पड़ेगी। यों उसका एक विनाशकारी पक्ष भी है, जिसमें उपलब्धियों के दुरुपयोग की दुःखद दुर्घटना भी सम्मिलित है। ऐसी दुर्घटना जिसके कारण वह स्वयं पिछड़ी , पतित और कष्टकर स्थिति में फँसा और समूचा वातावरण विषाक्त बनाकर रख दिया। अवाँछनीय आकाँक्षा और आदतों को अपनाकर जिस दुर्गति का वरण किया है। उसे देखते हुए कई बार आश्चर्य होता है कि क्या यहीं मनुष्य है जिसने आत्मिक विभूतियों और भौतिक सिद्धियों का आश्चर्यजनक वैभव अर्जित करने में सफलता पाई।

ऊपर की पंक्तियों में जो कुछ भी ऊहापोह किया जा रहा वह मनुष्य जीवन की समर्थता एवं सम्भावना की एक उथली-सी झाँकी है। मनुष्य जन्म सचमुच ही इतना बड़ा दैवी उपहार है, जिसकी तुलना में अधिक मूल्यवान इस समूचे संसार में और कुछ मिल सकना कठिन है। मानवी सत्ता की वरिष्ठता को खोजने में यदि बढ़ते ही चला जाय तो वहाँ पहुँचना पड़ेगा जहाँ उसने ईश्वर की, देवताओं की तत्वदर्शन की कला-कौशल की, धर्म-शासन की, भौतिक आत्मिक की, शिक्षा, चिकित्सा की तथा और न जाने किस-किस की सृष्टि की है। ब्रह्मांड का स्रष्टा तो परमात्मा ही है, पर इस सृष्टि में जो कुछ भी शोभा-सज्जा, प्रगति एवं प्रसन्नता दिखाई पड़ती है, उसे प्रकारांतर से मनुष्य का ही अर्जन, उपार्जन कहना चाहिए। इस सबका श्रेय मनुष्य के सर्व-समर्थ जीवन को है। उसकी अनंत सम्भावनाओं में से अभी कुछ ही चरितार्थ हुई है, जिनका प्रकटीकरण शेष है उनकी तो कल्पना करने भर से रोमाँच हो उठता है।

असमंजस इस बात का है कि इतना समर्थ , इतना विशिष्ट होते हुए भी मनुष्य को इन दिनों ऐसी दुर्गति का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें उसका शरीर दुर्बलता-रुग्णता से ग्रसित होकर आमतौर से अकाल मृत्यु का वरण करता है। मानसिक दृष्टि से तनाव, असंतोष खीज, भय, आशंका, चिन्ता, आक्रोश जैसी उद्विग्नताओं के कढ़ाव में उबलता रहता है। जिस उद्भूत मनः संस्थान से हर घड़ी प्रसन्नता -प्रफुल्लता झरती रहनी चाहिए, उस पर श्मशान जैसी वीभत्स जुगुप्सा छाई रहे तो उसे दुर्भाग्य-दुर्विपाक ही कहना चाहिए। अन्य प्राणियों की तुलना में निर्वाह स्वल्प एवं सरल, उपार्जन की क्षमता अत्यधिक -इस स्थिति में उसे साधनों के सम्बन्ध में हर घड़ी प्रसन्न-सन्तुष्ट रहना चाहिए। इतने पर भी यदि आर्थिक तंगी छा रहे, दरिद्रता और कंगाली का अभिशाप लदा रहे तो समझना चाहिए, कि कहीं न कहीं भयानक गलती हो रही है। पारिवारिक जीवन को धरती का स्वर्ग और भाव-सम्वेदनाओं से भरा-पूरा नन्दन वन कहा गया है। उसमें रहने वाले हर व्यक्ति को हर घड़ी मनोमालिन्य, असन्तोष, असहयोग का सामना करना पड़े, विरोध-विग्रह बना रहे और भटियारों की सराय जैसा-कैदखाने जैसा वातावरण बना रहे तो समझना चाहिए कि परिवार तन्त्र की गरिमा, उपयोगिता, व्यवस्था एवं आचार-संहिता समझी समझायी ही नहीं गई, अन्यथा हर घर-घरौंदे में स्नेह-सहयोग का वातावरण होता और गरीबी में भी अमीरी से बढ़कर प्रसन्नता का रसास्वादन उस समुदाय का हर सदस्य करता रहता।

कहाँ तो मनुष्य की विशिष्टता, वरिष्ठता और कहाँ पशु-पक्षियों से भी गई-बीती हेय-हीनता। आखिर यह आकाश-पाताल जैसा अभ्यन्तर बना कैसे ? आया कहाँ से ? लद पड़ा क्यों कर ? इन अनबूझ पहेलियों को सुलझाते-सुलझाते ओर-छोर ढूंढ़ते -ढूँढ़ते वहाँ पहुँचना पड़ता है, जहाँ विडम्बना के उद्गम केन्द्र को जाना-पहचाना जा सके। असमंजसों की जन्मदात्री है- मानवी की गरिमा के प्रति छाई हुई अनभिज्ञता। इस विभूति का सही मूल्यांकन न कर सकने और उसके सदुपयोग से अपरिचित होने की मूढ़ता।

समर्थता से-सम्पन्नता से लाभान्वित होने की बात तभी बनती है जब उसकी उपयोगिता समझी जा सके। साथ ही विभूतियों का सदुपयोग करा सकने वाली दूरदर्शिता उभरे, अन्यथा सामर्थ्य दुधारी तलवार हैं वह वहाँ सुरक्षा का उद्देश्य पूरा करती है, आततायी आक्रमणों को रोकती है, वह वहाँ उलटकर आत्मघात का भी निमित्त कारण बनती है। ईश्वरप्रदत्त सर्वोपरि अनुकम्पा की प्रतीक जीवन -सम्पदा है। इससे बढ़कर जीव को देने योग्य ईश्वर के खजाने में और कोई रत्न-राशि है नहीं साथ ही यह भी निश्चित है कि प्राणी के समस्त अभावों को पूर्ण कर सकने में सर्वसमर्थ उपान प्राप्त करने के उपरान्त और कोई आवश्यकता रह भी नहीं जाती।

प्रश्न सदुपयोग कर सकने की क्षमता का है वह न बन पड़े तो हर महत्वपूर्ण व्यक्ति पर उलट कर उतनी ही घातक भी सिद्ध होती है। आग, बिजली, बारूद, औषधि , अस्त्र की तरह ही वैभव की भी गरिमा है, किंतु सर्वविदित है कि यदि इनका दुरुपयोग होने लगे तो कोई व्यक्ति देखते-देखते अपना और अपने परिवार का सर्वनाश कर सकता है। विभूतियाँ जितनी महत्वपूर्ण हैं, उनसे भी अधिक उस विवेक -बुद्धि की गरिमा है, जो उनके सदुपयोग की पृष्ठभूमि बनाती, व्यवस्था जुटाती और अग्रगमन की साहसिक मनोभूमि उत्पन्न करती है। वह न हो तो समझना चाहिए, उपलब्धियाँ उलटकर विपत्ति ही बनेगी।

परिस्थितियों और सुविधाओं की न्यूनता-प्रतिकूलता को आमतौर से प्रगतिपथ का व्यवधान कहा जाता है, किन्तु वस्तुतः वैसा कुछ है नहीं। इतिहास साक्षी है कि अभावग्रस्त, गई-गुजरी परिस्थितियों में जन्मे-पले व्यक्ति अभीष्ट प्रयोजनों की दिशा में बढ़े और व्यवधानों को चीरते हुए सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचे है। मोटी बुद्धि कुछ भी समझती रहे, दुनिया कुछ भी कहती रहे पर यह तथ्य अपने स्थान पर चट्टान की तरह अडिग है कि मनः स्थिति ही परिस्थितियों को बनाती, सुधारती है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता इसी कारण है कि वह अपने दृष्टिकोण-स्वभाव एवं पराक्रम को उपयोगी बनाकर व्यक्तित्व की प्रचण्ड सृजनात्मक शक्ति का प्रमाण परिचय दे सकता ।

मनुष्य की उपलब्धियाँ महान है, पर भ्रांतियां, अवांछनीयताएं भी इतनी है जिन्हें किसी अभिशाप जैसी कहा जाना चाहिए। अभिशापों में सबसे दुरूह, सबसे दुस्तर-सबसे कष्टकारक है जीवन को गरिमा न समझ पाना और उसका स्तर उभरने के सम्बन्ध में अन्यमनस्क रहना। इस एक गलती को सुधारा जा सके और किसी प्रकार यह हृदयंगम कराया जा सके कि -”लोक-प्रचलन एवं अभ्यस्त ढर्रा जीवन-सम्पदा के सदुपयोग में सहायक नहीं है। उसका नये सिरे से पर्यवेक्षण एवं निर्धारण की आवश्यकता समझी जानी चाहिए।” तो समझना चाहिए कि व्यक्ति और समाज को संत्रस्त करने वाली समस्याओं में से आधी को अनायास ही सुलझाने का सूत्र हस्तगत हो गया। जीवन के प्रति सही दृष्टिकोण एवं सदुपयोग की सही विधा की जानकारी यदि हो तो समझना चाहिए कि हँसती-हँसाती, खिलती-खिलाती जिन्दगी जीने का एक महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लग गया। यही सफलता की कुँजी भी है।


ईश्वर पर विश्वास (Kahani)

स्वामी रामतीर्थ से किसी जिज्ञासु ने प्रश्न किया कि आपको ईश्वर पर विश्वास है ? स्वामी रामतीर्थ बोले-एकदम नहीं। इतना सुनते ही जिज्ञासु हैरान होकर उनका मुँह ताकता रह गया। क्योंकि जो व्यक्ति केवल ईश्वर की महिमा का ही गुणगान करता है, उसे ही ईश्वर पर विश्वास नहीं। यह कैसी विडम्बना ?

स्वामी जी जिज्ञासु के मन की बात भाँप गए और बोले-देखो भाई विश्वास तो उसके ऊपर किया जाता है, जहाँ दूसरे का भाव हो या अजनबीपन की भावना हो। जिसे मैं स्वयं जानता हूँ, जिसके प्रेम में मैं आबद्ध हूँ, जिसके साथ मेरी एकात्मता है, उसके साथ विश्वास-विश्वास का प्रश्न कैसा ? मैं तो उसे करता हूँ। सचमुच प्रेम, विश्वास से बहुत ऊँचे दर्जे का तत्व है। इसमें विश्वास अपने आप ही समा जाता है।


इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर ला चुकी है, सूचना क्रान्ति हम सबको

आज सारा संसार एक छाते के नीचे आ गया है, जिसे ‘ग्लोबल अम्ब्रेला’ नाम दिया गया है। वैज्ञानिक आविष्कारों ने सवा सौ वर्ष से भी कम समय में ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि मीलों की दूरी नहीं रहीं। ‘इन्फार्मेशन टेक्नोलॉजी‘ सूचना तकनीक के क्षेत्र में हुई क्रान्ति ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ का वह स्वरूप सामने लाकर खड़ा कर दिया है, जिसकी किसी को कोई कल्पना भी नहीं थी। विश्व के सात समुद्रों को दूरी अब कोई दूरी नहीं रही। अब आप चाहे जिससे, जब चाहे न केवल बात कर सकते हैं, अपने कम्प्यूटर पर उसे पत्र भेजकर तुरन्त उससे जवाब भी माँग सकते हैं। विज्ञान कितना शक्तिशाली है, कितनी सामर्थ्य उसमें है, यह उसका नमूना मात्र है। आज की स्थिति में हम किस प्रकार पहुँचे, सका एक समयावधि क्रम से विवरण जान लेना ठीक रहेगा, ताकि हम भविष्य में जब इक्कीसवीं सदी में प्रवेश योजना बना सकें।

टेलीग्राफ कोड एवं टेलीग्राफ यंत्र का आविष्कार क्रमशः सैमुअल मोर्स द्वारा 1837 में तथा एम. लैमण्ड (फ्राँस) द्वारा 1787 में हुआ। लेमण्ड ने अपना वकिंग मॉडल जिसके माध्यम से संदेश एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजे जा सकें, 1787 में ही पेरिस की एक प्रदर्शन में सबको पहली बार दिखाए थे। बाद में अमेरिका के बी. पी. मोर्स द्वारा 1837 में टेलीग्राफ कोड, जिसे आज ‘मोर्स की‘ द्वारा प्रेषित किया जाता है, आविष्कार के रूप में अपने सहयोगी अलफ्रेड बेल के साथ प्रस्तुत किया। टेलीफोन सैद्धान्तिक यप से 1849 में पहली बार संदेश बातचीत के माध्यम से संप्रेषण के रूप में एण्टीनियोक्यूरी (इटली) द्वारा प्रस्तुत किया गया, परन्तु इसका व्यावहारिक स्वरूप एलेक्जेण्डर ग्राहमबेल द्वारा यंत्र के रूप में बातचीत प्रत्यक्ष करवाकर 1876 में बोस्टन में सबके रखा गया। विश्व का पहला टेलीफोन एक्सचेंज बोस्टन (मैसाचुसेट्स) अमेरिका में 1878 में विनिर्मित किया गया। 1889 में आटोमेटिक टेलीफोन एक्सचेंज अलफ्रेड स्ट्रोगर द्वारा विनिर्मित कर सबके समक्ष रखा गया है। ‘टेलीफोन’ एक ग्रीक शब्द है। इसका अर्थ है दूर-ध्वनि जिसे बाद में संशोधित रूप में ‘दूरभाष’ के नाम से प्रस्तुत किया गया।

साथ ही साथ रेडियो, टेलीविजन एवं वीडियो के क्षेत्र में भी एक क्रान्ति चल रही थी, जिसने विश्व की दूरी को और निकटता में बदल दिया। गुगलीएमो मारकोनी ने 1901 में मोर्स कोड के माध्यम से रेडियो संदेश अटलाण्टिक महासागर के पार भेजकर (कार्नवेल से न्यूफाउण्डलैण्ड) रेडियो तरंगों के सम्प्रेषणों के विज्ञान को व्यवहार में प्रमाणित कर एक क्रान्तिकारी शुरुआत की। 922 में ब्रिटिश ब्रोडकास्टिंग कारपोरेशन (बी. बी. सी.) ने अपनी प्रसारण की शुरुआत की जो समुद्र पार जाने लगी। 1925 में एक स्काँटिश वैज्ञानिक लोगी बायर्ड ने पहली बार किसी व्यक्ति चेहरा रेडियो तरंगों द्वारा सम्प्रेषित कर टेलीविजन की आधारशिला रखी। 1945 में आर्थर सी. क्लर्क के लिखे उपन्यास ‘वायरलैस वर्ल्ड’ में सम्भावना व्यक्त की गयी कि कैसे धरती पर स्थिर उपग्रह से रेडियो व टी.वी. सिगनल्स भेजे जा सकते हैं, जो बाद में 1964 में एक हकीकत में बदल गया। बाद में यही अंतरिक्षीय उपग्रहों द्वारा संचालित होने लगा। यह तब हुआ जब नासा ने इन्टेलसेट-1 उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा। इससे पूर्व 1958 में सर्वप्रथम वीडियो रिकार्डिंग प्रक्रिया विकसित हो चुकी थी। 190 में वीडियो होत सिस्टम ने सचमुच एक विलक्षण क्रान्ति पैदा कर दी एवं 1974 में ‘सीफैक्स’ सेवा के द्वारा जब घर बैठे लोगों तक वर्गीकृत सूचनाएँ पहुँचाने लगीं, विज्ञान की प्रभाव क्षमता पर सभी हतप्रभ थे।

1970 से 1980 की दशाब्दी को वीडियो टेलीफोन सेवाओं की दिशा में क्रांतिकारी माना जाता है चौबीस सौ अक्षर प्रति सेकेण्ड भेजने की क्षमता इस सेवा में विकसित की गयी थी। 1980 में अब तक के बीच कम्प्यूटर क्षेत्र में हुई इलेक्ट्रानिक क्रान्ति, फैक्स सेवाओं का तथा सेल्युलर फोन सेवाओं का विकास इस तेजी से हुआ है कि सारी धरित्री लगता है एक ‘साइबर इन्फार्मेशन हाइवे’ पर सफर कर रही है।

मूलतः आणविक विस्फोटों के विश्लेषण, मिसाइल्स के निर्माण हेतु आवश्यक गणनाओं एवं वैज्ञानिक शोधों के लिए विकसित किये गये कम्प्यूटर नामक यंत्र से सूचना, शिक्षा, प्रसारण एवं प्रेस प्रकाशन के क्षेत्र में इतनी तेजी से गति आएगी, यह किसी ने भी तब नहीं सोचा था, जब 1943 में प्रोग्रामबेल इलेक्ट्रानिक के रूप में प्रो. मैक्सन्यूमैन न इनकी खाज की थी। आश्चर्य की बात है कि कम्प्यूटर की भाषा का आधार 1666 ई. में विल्हेम लिबनीज द्वारा आविष्कृत बाइनरी डिजिटल भाषा बनी। तब किसी ने कम्प्यूटर के बारे में सोचा भी नहीं था। कंप्यूटर के बारे में सोचा भी नहीं था। कम्प्यूटर के इलेक्ट्रानिक सर्किट 1952 में बनाए तेजी से विकास होते-होते इनका छोटा स्वरूप माइक्रो कम्प्यूटर के रूप सामने आया । इससे पूर्व के कम्प्यूटर बड़े भारी-भरकम एक फैक्टरी की मशीनों के रूप में देखते थे।

1989 में आई.बी.एम. पीसी / एक्स टी के साथ ही कंप्यूटर का विकास आरम्भ हुआ एवं विण्डोज के 1984-1985 में आगमन के साथ ही एक ऐसी यात्रा आरम्भ हो गयी जो विण्डोज 15, मोडम एवं इलेक्ट्रॉनिक मेल (डाक) तक आ पहुँची है। कंप्यूटर अब थिंक पैड के रूप में एक छोटे रजिस्टर के रूप में, मात्र 3-4 पौण्ड वजन के यात्रा में ले जाए जाने लगे है एवं जहाँ चाहे जैसा इनका उपयोग किया जा सकता है, अब नेटवर्किंग उपग्रहों के माध्यम से हो जाने के बाद एक ऐसा सुपरततीकी राजमार्ग तैयार हो गया है।, जिस पर आप जब चाहें जैसे चाहें सूचनाएँ भिजवा सकते है-मँगवा सकते हैं। इन्टरनेट ने वस्तुतः एक विलक्षण क्रांति पैदा कर दी है। सारे आँकड़े पूरी पाठ्यपुस्तक, संगीत की पूरी गीतमाला से लेकर विभिन्न भाषाओं की वर्णमालाएँ अब तक ‘फ्लापी’ या सी डी , (कॉम्पेक्ट डिस्क) में कैद कर कभी भी, कहीं भी भू-उपग्रहों के माध्यम से मात्र कुछ मिनटों में उधर से उधर भेजी जा सकती है।

लगभग सात वर्ष पहले जहाँ इसका प्रयोग मात्र 500 व्यक्ति सारे विश्व में कर रहे थे, वहाँ अब प्रायः 6 से 7 करोड़ व्यक्ति इसका नित्य उपयोग अपने-अपने पर्सनल कम्प्यूटर्स के माध्यम से कर पारस्परिक सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रहे है। इससे किसी भी व्यक्ति की डाक नियमित रूप से तत्क्षण भेजी जा सकती है एवं नित्य प्रतिपल विश्व में क्या घट रहा है , यह भी जाना जा सकता है आश्चर्य की बात है कि इतने विशाल नेटवर्क जिसे ‘वर्ल्ड वाइड वेब’ (W.W.W) कहते हैं, का कोई भी स्वामी ,संचालक या नियंत्रणकर्ता नहीं हैं विश्वभर में फैले हजारों कम्प्यूटर नेटवर्क एक दूसरे से जुड़कर इसका संगठित स्वरूप बनाते हैं। अपने संसाधनों द्वारा या किसी भी माध्यम से टेलीफोन की एस.टी.डी. लाइन नेटवर्क के द्वारा जुड़ने के लिए हर कोई स्वतन्त्र है। वैसे नेशनल साइंस फाउण्डेशन का उस पर काफी कुछ नियन्त्रण है। तथ्यतः यही संस्था इंटरनेट को स्थापित करने हेतु मूलरूप से उत्तरदायी है। अन्य संस्थाओं में एडवाँस नेटवर्क एण्ड सर्विसेज एवं आई.बी.एम. आदि ने इसके आधारभूत ढाँचे का खड़ा करने तथा तकनीकी रूप से विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भारत में यह विदेश संचार निगम लिमिटेड द्वारा महानगर टेलीफोन निगम अथवा टेली-कम्यूनीकेशन विभागों के माध्यम से संचालित किया जा रहा है। पूरे विश्वभर के स्तर पर इण्टरनेट पर कार्य करने में मात्र उतना ही शुल्क लिया जाता है, जितना कि एस.टी.डी. की पल्सरेट्स की दरें होती है। कोई चाहे तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की मदद से अपनी ‘वेबसाइट’ भारत में अपने कम्प्यूटर पर अथवा विदेश के किसी परिचित नोडल केन्द्र पर स्थापित करवा सकता है। कई कंपनियाँ नाममात्र के शुल्क पर डाक के आदान-प्रदान की प्रक्रिया प्रतिदिन कम्प्यूटर पर नियमित रूप से करती रहती है। अब भारत में कई निजी कम्पनियाँ सक्रिय हो गयी है क्योंकि जन-जाग्रति विगत एक वर्ष में बड़ी तेजी से आयी है।

इंटरनेट की कार्यप्रणाली के बारे में इतना विस्तार से विज्ञान के प्रारम्भिक आविष्कारों से लेकर अब तक के इतिहास सहित इसलिए लिखा जा रहा है ताकि सब कोई विज्ञान की उस विधा से परिचित हो सकें, जिसने सूचना क्षेत्र में जबर्दस्त क्रान्ति पैदा कर आज मानव-मानव में दूरी को कितना घटा दिया है। इस विधा को समझना हो तो वस्तुतः यह जटिल न होकर बड़ी सरल, उपयोगी एवं बड़ी द्रुतगति से कार्य करने वाली सेवा है। हर व्यक्ति के अपने रजिस्टर्ड सर्वर्स (सूचना संकलन-संप्रेषण केन्द्र) होते हैं, जिनमें आवश्यक जानकारियाँ एकत्रित होती रहती है। उपभोक्ता अपने कम्प्यूटरों को टेलीफोन लाइनों के साथ जोड़ देते हैं एवं समूचा डाटा कम्प्यूटर में स्वतः आता रहता है। मोडम ही वह यंत्र है जो कम्प्यूटर में लगा होता है एवं आँकड़ों को टेलीफोन लाइन से लेकर पढ़ने योग्य, सुनने योग्य आँकड़ों या सूचना में बदल देता है जो उपभोक्ता चाहे अपने कम्प्यूटर में जो वाँछित है, उन आँकड़ों या डाक को या भेजी सूचनाओं को संग्रहित कर सकता है, उनको प्रिण्टर पर छाप सकता है, अथवा उनका रिकार्ड अपने पास काम्पेक्ट डिस्क (सी. डी.) या फ्लॉपी में सुरक्षित रख सकता है।

कोई भी व्यक्ति भारत में बैठे-बैठे अमेरिका, जापान या न्यूजीलैण्ड-आस्ट्रेलिया के किसी भी स्थान पर उपलब्ध यातायात, होटल सुविधाएँ मौसम की जानकारी, रेल व वायुयान में आरक्षण की सुविधा से लेकर बैंकों से लेन-देन, राजनैतिक व खेलकूद जगत में कौन आगे है-पीछे है की स्थिति , विश्व के किस पुस्तकालय में क्या-क्या पुस्तकें किन-किन विषयों पर है- यह जान सकता है। विभिन्न समाचार पत्र, टाइम-न्यूजवीक जैसी पत्रिकाएँ अब घर बैठे अपने कम्प्यूटर पर देखी जा सकती है व तुरन्त उन्हें कोई संदेश भेजना हो तो भेजना हो तो भेजा जा सकता है।

शाँतिकुँज-गायत्री परिवार भी इंटरनेट द्वारा वर्ल्ड वाइड वेब से जुड़ गया है। इससे विचार-क्रान्ति की प्रक्रिया को विश्वव्यापी बनाया जा सकेगा। अब अमेरिका, कनाडा, इंग्लैण्ड साऊथ अफ्रीका, सिंगापुर , आस्ट्रेलिया के कई परिजन इस सेवा से सीधे जुड़े हुए हैं। शाँतिकुँज में नियमित रूप से समाचार अब ई-मेल से आने लगे हैं। अब प्रयास यह कि ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के प्रयोगों के निष्कर्ष व्यक्तित्व परिष्कार सम्बन्धी आध्यात्मिक प्रतिपादनों सम्बन्धी आध्यात्मिक प्रतिपादनों पूज्यवर की अमृतवाणी से लेकर विभिन्न सूचनाएँ जो गायत्री, यज्ञ , ध्यान पुरश्चरण साधना महापूर्णाहुति से सम्बन्धित होंगी इससे भेजी जाती रहेंगी, वेदमंत्रों से लेकर उपनिषद् तथा भारतीय संस्कृति सम्बन्धी सारी जानकारियाँ सारे विश्व के करोड़ों व्यक्तियों को यदि इस माध्यम से आकर्षित कर इस अभियान से जो युग-निर्माण के निमित्त ऋषिचेतना ने खड़ा किया है, जोड़ दें तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यही विज्ञान व अध्यात्म के समन्वय की इक्कीसवीं सदी कही वैचारिक क्रान्ति का आधार बनेगा, इसमें कोई सन्देह किसी को नहीं होना चाहिए।


VigyapanSuchana

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शाँतिकुँज के कम्प्यूटर वर्ल्ड वाइड वेब से जुड़ गए हैं । वेब पृष्ठ का पता है- http://www. cs2ksolutions.com/skunj/

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अरण्य संस्कृति की विविधता जिन्दा रहे

सहयोग -सहकार सृष्टि का मौलिक सूत्र है इसी धागे में हम सब पिरोये है। मानव की अहंवृत्ति से उपजा एकाकीपन और आत्मनिर्भरता का दम्भ विशालकाय दीखने पर भी खोखला और झूठा है। जिन्दगी का हर कदम इस सत्य का अहसास करा देता है कि पारस्परिक निर्भरता के बिना अपने अस्तित्व को बरकरार नहीं रखा जा सकता। मानव समुदाय ही नहीं, सृष्टि सृजन के हर घटक को विधाता ने अपनी आत्मीय भावना के सूत्र में बाँधा है विविधता ने अपनी विविधता का अर्थ अलगाव नहीं, सृजेता के कलात्मक सौंदर्य की अनेक रूपों में अभिव्यक्ति है।

जैविक सर्वेक्षण के अनुसार दुनिया में तीन लाख जातियों की वनस्पतियाँ पायी जाती है। अकेले अपने देश में में लगभग 75,000 तरह की जीव प्रजातियाँ, 45,000 किस्म के पेड़-पौधे ज्ञात है। इस देश की भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी है कि सभी प्रकार के प्राणी वनस्पति यहाँ मिल-जुलकर रह सकते हैं। उत्तर में विशालकाय हिमालय उसके तराई वाले- ऊँचे-ऊँचे स्थान है और दक्षिण में नम व दलदली भूमि में पाए जाने वाले वन है। वन प्रदेशों और मरुस्थल से आच्छादित यह देश संसार की समस्त जैव जातियों में से 40 प्रतिशत से भरा हुआ है। यह विविधता पूरी धरती में अफ्रीका के बाद यहीं पर है।

आदिकाल से धरती पर जितनी जीव प्रजातियाँ यहाँ पायी जाती थीं, आज मुश्किल से उसका सौवाँ भाग ही शेष रह गयी है। जितनी वनस्पतियाँ उपलब्ध हैं, जितनी वनस्पतियाँ उपलब्ध हैं, उसमें से 50 हजार खाने योग्य है। हालाँकि 150 से 200 जातियों को ही भोजन के रूप में उपयोग किया जाता है। मनुष्य की हिंस्रवृत्ति एवं एकाधिकार की भावना ने पर्यावरण को बेहद खतरा पहुँचाया है। आज स्थिति काफी असन्तुलित है। एफ.ए.ओ. के काफी असन्तुलित है। एफ.ए.ओ. के मुताबिक पिछले सौ सालों में कृषक फसलों की 75 प्रतिशत जातियाँ और उसमें निहित आनुवंशिक विविधता सदा के लिए नष्ट हो गयी है। असन्तुलित पर्यावरण की वजह से लगभग 100 प्रजातियाँ हर रोज कृषि कार्यों, शहरों और औद्योगिक विकास वैविध्य बाँधों के निर्माण, प्रदूषण और भूमि कटाव के कारण विनष्ट हो जाती है। 100 करोड़ हेक्टेयर में फैले जैव वैविध्य वाले क्षेत्र ज्यादातर ऊष्ण कटिबंधीय गरीब देशों में है। हार्वर्ड के जीवविज्ञानी ठ. ओ. विल्सन के मतानुसार वनों की कटाई से प्रतिवर्ष करीब 50,000 यानि कि लगभग 140 अकशेरुकी जीवों की प्रजातियाँ लुप्त हो रही है।

जीवों को इतनी ज्यादा प्रजातियाँ भले ही प्रत्यक्ष रूप से हमसे सम्बन्धित न दिखाई दें, लेकिन पर्यावरण से इनका काफी गहरा सम्बन्ध है। प्रकृति की विनाशलीला या वन कटाव इसे खासतौर पर प्रभावित करता है। सन् 1980 से 900 के बीच ऊष्ण कटिबन्धीय देशों में हर साल 154 लाख हेक्टेयर की र से जंगल काटे गए। एशिया और प्रशान्त क्षेत्र में प्रतिवर्ष 20 लाख हेक्टेयर वनों की कटाई होती है। एक अनुमान के अनुसार हर साल 2 करोड़ हेक्टेयर वन काटे जाते हैं। उनमें 80 फीसदी वन-भूमि को खेती योग्य भूमि में परिवर्तन किया जाता है। चौंकाने वाली रिर्पोट है। कि पति सेकेण्ड एक एकड़ ऊष्ण कटिबन्धीय वनों को नष्ट कर दिया जाता है। वनों की कटाई यदि इसी रफ्तार से होती रही तो बीसवीं सदी समाप्त होते-होते 2250 लाख हेक्टेयर वन समाप्त हो जायेंगे।

इसकी परिणति होगी 10 से 20 प्रतिशत वनस्पतियों एवं जंतुओं की हमेशा-हमेशा के लिए समाप्ति । वैसे भी बीसवीं सदी की शुरुआत से अभी तक फसलों की 75 प्रतिशत आनुवाँशिक विविधता नष्ट हो चुकी है। कतिपय दुर्लभ जातियों के वंश का अब नाम ही याद रह गया है। यह संकट जीव जंतुओं पर भी मँडरा रहा है। विकासशील देशों में पालतू पशुओं की तकरीबन 20 फीसदी नस्लें नष्ट हो गयी हैं। यही विनाशलीला मत्स्य उद्योग , पशुपालन तथा अन्य जीव-जगत पर भी अपना कहर बरपाए है। इनसान यदि इस आनुवंशिक विविधता की महिमा न समझ सका तो उसे क्षति उठानी पड़ेगी। इन्हें पुनः प्राप्त कर सकना असम्भव कार्य होगा। फसलों के लिए इससे अनगिनत समस्याएँ उठ खड़ी होगी।

विज्ञजनों का अनुमान है कि खेती की प्रक्रिया ईसा से कोई दस हजार साल पहले प्रारम्भ हो चुकी थी। उस समय भारत के कतिपय क्षेत्रों में जौ ओर गेहूँ की खेती प्रारम्भ हुई। बाद में 6000 वर्ष पूर्व ईराक एवं चीन में भी धान एवं मोटे अनाज की पैदावार शुरू हुई । आज के अत्याधुनिक तकनीकी विकास के अभाव में भी उस समय की खेती उन्नत एवं विकसित थी। मौजूदा दुनिया की खाद्य सुरक्षा पौधों की केवल 15 प्रमुख जातियों पर ही निर्भर है, जबकि उत्तर अमेरिकी इंडियनों ने अपनी खाद्य सुरक्षा के लिए 120 कुलों तथा 444 वेशों यानि कि 1112 प्रजातियों को विकसित किया था।

जैव विविधताओं को संरक्षित करने का मतलब है- अपने सृष्टि कुटुम्ब का विस्तार-प्रसार और आपस में हेल-मेल । विज्ञानवेत्ताओं ने इसके लिए तीन बातें सुझाई हैं इको सिस्टम या परितंत्र के अंतर्गत पर्वतीय परितन्त्र, मरुस्थलीय और तटीय परितन्त्र आता है। अभी तक जैविक विदों को 15 लाख प्रजातियों की ही पहचान हो पायी है। सारे संसार में पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं की लगभग 500 से 800 लाख प्रजातियाँ होने की सम्भावना हैं सूक्ष्म जीव और अकशेरुकी प्राणियों के स्तर पर अभी भी असंख्य किस्मों की खोज किया जाना बाकी है। अतएव पूरे परिस्थितिकी तंत्र का अनुमान लगाना कठिन कार्य है। इस तंत्र में सूक्ष्म कीट-पतंग, अकशेरुकी से लेकर पादप वृक्ष और प्राणियों में से प्रत्येक का बड़ा ही महत्वपूर्ण योगदान हैं

जैव विविधता की एक और खासियत है। इसे प्रजाति के भीतर ही पहचाना जाता है फिलीपीन्स के अंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान के जीन बैंक में धान के लगभग 90 हजार विभेद संग्रहित है। इनका प्रयोग विश्वभर में किया जाता है। किसी भी प्रजाति का अध्ययन उसके मूल उद्गम स्थल पर किया जाता है। अतः इसकी वृद्धि के लिए परिवेश वातावरण तथा उस प्रजाति के विशिष्ट गुणों को जानना जरूरी है। इसका अगर समुचित अध्ययन हो सका तो उत्पादन में भारी वृद्धि की जा सकती है।

रूस के प्रसिद्ध वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. पाविलोव ने सबसे पहले संसार भर में भ्रमण करके पौधे के मूल स्थानों का पता लगाया। इनके इस सर्वेक्षण के निष्कर्ष बताते हैं कि जौ, नरम व कठिया गेहूँ, राई, मसूर, अलसी गाजर आदि फसलों का मूल उद्गम उत्तर पश्च्मि भरत व दक्षिण पूर्व अफगानिस्तान है। डॉ. पाविलोव का यह प्रयास, पुरुषार्थ अनेकों वनस्पति वेत्ताओं का प्रेरणा स्रोत बना है। जैव विविधता के अध्ययन अन्वेषण के लिए अब तो काफी प्रयास जा रहा है। इसी को आधार मान कर सन् 1964 में अंतर्राष्ट्रीय जैविकी कार्यक्रम की शुरुआत हुई।

इसी क्रम में एक नयी तकनीक बायेटेक्नोलाँजी विकसित हुई। इसके लिए संकल्पित ‘सेण्टर फार इलिट ट्रीज ‘ ने इस दिशा में काफी नाम कमाया है। इनकी कोशिश है कि सूखे मरुस्थल एवं बंजर धरती को हरियाली से भर दिया जाय। वातावरण की प्रतिकूलता के बावजूद भिन्न-भिन्न स्थानों पर सी. ई. टी. ने काजू , नीम, इमली, आम की विभिन्न प्रजातियों को विकसित कर लेने में सफलता पायी हैं। इसी सिलसिले में ‘सेण्टर फार प्रोसेस्ड फूड’ अर्थात् सी. पी. एफ. ने भी कई वृक्ष-वनस्पतियों का अन्वेषण किया है।

आज के औद्योगिक समाज में जैव विविधता का अर्थ उसके उत्पादन एवं उत्पाद तक सीमित है। अन्न भोजन के रूप में प्रयुक्त होता है, इसे उत्पादन माना जाता है। यदि इसी उत्पादन को बतौर तीज के सुरक्षित रख लिया जाय तो उत्पादन की श्रेणी में गिना जाता है। यानि कि बीज उत्पादन है एवं अन्न उत्पादन। बायो टेक्नोलॉजी के जरिए विकासशील देशों ने विभिन्न वनस्पतियों की अनेकों किस्मों की खोज की है। लेकिन इनके प्रसार में मानव की अहंवृत्ति फिर आड़े आ गयी । एकाधिकार की भूख की वजह से कतिपय देश इन्हें विश्वभर में फैलाने के लिए राजी नहीं है। इस विषय में माइकेल डी. लेमोनिक का टाइम पत्रिका के 25 सितम्बर , 1995 के अंक में एक लेख प्रकाशित हुआ था। इसके अनुसार यह मानवता एवं समाज के लिए आत्मघाती कदम है।

विज्ञानवेत्ताओं के नवीनतम अनुसंधान से पता चला है कि प्रकृति चाहती है कि सभी संतानें उसी गोद में सुख पाएँ। यही वजह है कि मोनो कल्चर यानि कि एक ही फसल बार-बार उसी जमीन पर उगाते रहना ठीक नहीं माना जाता। ऐसा करने से कृमि एवं रोग के बढ़ने की सम्भावना ज्यादा हो जाती है। 1970-71 में अमेरिका में कार्न ब्राइट महामारी से पूरे देश की लगभग 15 फीसदी फसल चौपट हो गयी। 1970 में एक ही प्रकार के 80 फीसदी संकल मक्के की पैदावार की गयी। फसल तो लहलहायी, परन्तु इसमें उपस्थित टी. साइटोप्लाज्म ने एच. मेउम नाम के फंगस का ऐसा बढ़ावा दिया कि सारी फसल महामारी से तबाह हो गयी।

मोनो कल्चर कृषि में ही नहीं वरन् वृक्षारोपण , मत्स्य उद्योग पशुपालन में काफी घातक साबित हुई है। आज हम अपने देश में फसलों की मात्र दह जातियों, उपजातियों पर निर्भर होते चले जा रहे है। इसी वजह से समय-समय पर काफी हानि उठानी पड़ती है। और अकाल की विनाशकारी चपेट में हम घिर जाते हैं।

इसी तथ्य को ध्यान में रखकर फिलीपीन्सवासी शकरकन्द की 280 किस्में उगाने लगे है। अमेजन में कसावा की 100 किस्में उगाने लगे है। जैव विविधता का महत्व सिर्फ उत्पादन एवं उपज तक सीमित नहीं है। पर्यावरण एवं जीवन के अस्तित्व के लिए इसका मूल्य कहीं अधिक है। इसी बात को समझाने के लिए एफ. ए. ओ’ 1993 में प्राकृतिक विविधता वर्ष मनाया तथा इसके प्रसार के लिए विश्वव्यापी अभियान छेड़ा। इसकी अनिवार्यता न केवल पेड़-पौधों , वृक्ष-वनस्पतियों के लिए है। बल्कि पशुओं जीव-जन्तुओं पर भी यही सत्य लागू होता है। इसे बताते हुए ‘फ्राम कैबेज टू किंग ‘ में पैट मुनी ने स्पष्ट किया है कि प्रकृति एवं पर्यावरण पर व्यापारिक दृष्टिकोण से देखना उचित नहीं है।

जंगलों का पर्यावरण एवं जैव-विविधता के पोषण का संरक्षण व विकास में महत्वपूर्ण स्थान है। किसी भी जाति के मूल लेग यहीं उपजे एवं बाद में समस्त संसार में फैल गए। भारतीय संस्कृति भी अरण्यववासिनी रही हैं जंगल अर्थात् आरण्यक की गरिमा यहाँ किसी तीर्थ से कम नहीं आँकी गयी है। बर्गन यूनिवर्सिटी के मतानुसार संसार में 500 प्रकार की विभिन्न सांस्कृतिक विभिन्नता मध्य दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया व न्यू गुएना के जंगली क्षेत्रों में अधिक है। भारत तो साँस्कृतिक विविधता का जनक है ही।

प्रजातियाँ चाहे मनुष्य की हो या फिर जीव-जन्तुओं या वृक्ष-वनस्पतियों की, इनमें से प्रत्येक की अपनी मौलिकता है सभी का अपने-अपने स्थान पर महत्व है। किसी को हटा देना या फिर समूल नष्ट कर देना परिस्थितिकी पर विपरीत असर डालता है। ऐसे में हम यदि किसी प्रजाति को पूरी तरह से बुरा समझते हैं, तो इसका मतलब यही है कि हम सिर्फ उसके दोषों से वाकिफ है, गुणों से नहीं। पूरी तरह से सद्गुण सम्पन्न तो सृष्टि का मुकुटमणि कहा जाने वाला इनसान भी नहीं है, फिर पेड़-पौधों जीव-जन्तु कैसे होने लगें ?

हाँ, इनकी गुणवत्ता से परिचित होने की आवश्यकता जरूर है। विभिन्न प्रजातियों की गुणवत्ता से संवाद स्थापित करके हम उनकी प्राकृतिक विभूतियों से लाभान्वित होते रह सकते हैं, पर ऐसा तभी सम्भव है जब हम जैव-विविधता के प्रति जागरुक हों। उसकी जरूरत समण्। इस सत्य से परिचित हों कि हम सब एक दूसरे पर निर्भर है। पारस्परिक हों कि हम सब एक दूसरे पर निर्भर है। पारस्परिक निर्भरता से ही सहयोग-सहकार एवं सद्भाव-सदाशयता पनपती हैं यदि हम अपने सहयोगियों का ही विनाश करने में जुट गए तो न केवल हम निराश्रित हो जाएंगे, बल्कि अस्तित्वहीन भी होना पड़ सकता है। अच्छा है-समय रहने चेतें, स्वयं समृद्ध हों तथा प्रकृति की सभी संतानों को समृद्ध करें। ऐसा करके हम पर्यावरण के बारे में कहे गए वैदिक सत्य को अनुभव कर सकेंगे-

“मधुवाताः ऋतामते मधुरन्ति सिंधवाः”


क्यों ले रहा है आज मनुष्य ही मनुष्य की जान

सुबह के समाचार पत्र का पन्ना हमसे-हम सबसे एक ही सवाल अनेक तरह से पूछता है, क्या हम वाकई इनसान है ? यदि हम इनसान है तो पशु से भी अधिक बर्बर और हिंस्र कैसे हो जाते हैं ? किस तरह से हमारे कारनामों की खबरें छपती है ? आत अमुक गाँव अमुक शहर , अमुक प्रान्त, अमुक देश में इतने लोगों की हत्याएँ सामूहिक नरसंहार। हत्याएँ जिसने कीं वे भी इनसान थे, हत्याएँ जिसकी हुई वे भी इनसान थे। सभी प्राणियों में मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जो अपनी ही जाति के प्राणियों की हत्याएँ इतने व्यापक पैमाने पर करता है। इस बारे में तरह-तरह की तरकीबें सोचता है। भाँति-भाँति की योजनाएँ गढ़ता और सरंजाम जुटाता है।

अतीत का इतिहास हो या आज का वर्तमान, सिलसिला कुछ इसी तरह चल रहा है। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान टर्की सेना के 8 लाख से अधिक आरमेनियनों को क्रूरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया था। द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर के नेतृत्व में नाजी जर्मनी ने 60 लाख से अधिक यहूदियों को निर्ममतापूर्वक यातनाएँ देते हुए तड़पा-तड़पा कर मारा। इसी तरह 1975 से 79 के बीच हुए गृहयुद्ध में कम्बोडिया के साम्यवादी खमेर रोंज ने 20 लाख से अधिक नागरिकों को तरह-तरह की यातनाएँ देकर मार दिया।

आज की दुनिया एवं समाज हिंसा के बढ़ते दौर से गुजर रहा है। भौतिक दृष्टि से सर्वाधिक समर्थ एवं सशक्त देश संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े हिंसक राष्ट्र में गिना जा सकता है दुर्घटनाओं के अलावा होमीसाइड -आज अमेरिका के 15 से 24 वर्ष के किशोर युवाओं में मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। 20 लाख से अधिक व्यक्ति प्रतिवर्ष पिटाई, छुरा घौपने या दूसरे हमलों के शिकार होते हैं, जिनमें तेईस हजार दम तोड़ देते हैं, स्काटलैण्ड दूसरे नम्बर पर आता है, लेकिन यहाँ पर इस तरह की वारदातें अमेरिका को एक चौथाई ही होती है।

हिंसा की घटनाएँ मनुष्य की विक्षिप्त मानसिकता की द्योतक है। शान्त एवं प्रसन्न व्यक्ति किसी को मारने उत्पीड़ित करने में विश्वास नहीं करता। ऐसी मनोदशा में इस तरह की बर्बर सोच अंकुरित ही नहीं हो सकती। मानव इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो यही पाएंगे कि कोई भी राष्ट्र, समाज अथवा समाज की इकाई के रूप में स्वयं व्यक्ति सर्वाधिक सृजनशीलता का परिचय तभी सका है, जब वह बर्बरता एवं हिंसा से मुक्त स्थिति में हों सुजन वृत्तियाँ , कला-कौशल , साहित्य, दर्शन, विज्ञान आदि की सोच शान्ति के क्षणों में ही उपजती है। मानवीय गरिमा अपनी चरमावस्था की अभिव्यक्ति ऐसे ही समय में कर पाती है। हिंसा एवं बर्बरता के पल तो शताब्दियों में पूरे किए गए सुजन की एक क्षण में ध्वंस में बदल देते हैं।

मानव की ध्वंयसृत्ति उसकी मनुष्यता पर अमिट दाग है। एक ऐसा प्रश्न चिन्ह है, जिससे उसकी समूची मानवीय भावनाएँ ही सन्देह के घेरे में आ जाती है। इस सवालिया निशान का समाधान किए बगैर मानवीय विकास एवं प्रगति के सारे प्रयास आँशिक एवं अधूरे है। उचित समाधान की खोज के लिए हमें इनसानी प्रकृति की गहराई में जाना होगा। ध्वंस एवं हिंसा की वृत्तियों के मूल में जाकर छान-बीन करनी होगी। यह कार्य स्वयं को मानव प्रकृति का मर्मज्ञ कहलाने वालों के समक्ष चुनौती है। चाहे वे मनोवैज्ञानिक हों या फिर अध्यात्मवेत्ता, इस पहेली को हल करना उनकी सामयिक जिम्मेदारी है।

इन्होंने इसकी महतवपूर्ण गुत्थियों को सुलझाने की समय-समय पर चेष्टा भी की है। मनोवैज्ञानिकों का एक वर्ग , ध्वंस का मूल कारण जैविक वृत्ति को बतलाते हैं। ‘आन एग्रेशन’ नामक ग्रन्थ में काँरेड लारेन्ज , अफ्रीकन जेनेसिस एवं द टेरीटोरियल इम्पेरेटिव नामक शोध अध्ययन में राबर्ट आर्डर तथा ‘द नेकेड एप’ डेस्मंड मोरिस एवं आन लव एण्ड हेट में आई. ईब्ल एवं स्फेल्ड युद्ध हिंसा, अपराध एवं लड़ाई झगड़ों तथा सभी तरह के ध्वंसात्मक कृत्यों के मूल कारण को जैविक वृत्ति या सहजात वृत्ति से जोड़ते हैं। यह वृत्ति अपनी अभिव्यक्ति चाहती है जो समय आने पर प्रकट हो जाती है। फ्रायड ने मानव की ध्वंसात्मक वृत्ति को ‘डेथ इंसटिंक्ट’ या मृत्यु वृत्ति का नाम दिया है। उनके अनुसार यह जीवन की मौलिक जरूरत भी है।

मनोवैज्ञानिक अपने इस अध्ययन में हिंसा के कारणों को खोजने का दावा भले करें, परन्तु वे इसे मूल वृत्ति या जीवन की मौलिक आवश्यकता कहकर इनसान को उसके इनसानी सद्गुणों सत्प्रवृत्तियों से अलग कर देते हैं। उनकी नजर में इनसान दो पैरों पर चलने वाला जानवर भर है।, जो थोड़ा-बहुत सोचता-विचारता भी है। चिकित्सा वैज्ञानिकों ने इसकी खोज-बीन अपने ढंग से की है। उन्होंने साइजोफ्रोनिया तथा सैनिक अवसाद जैसी व्यावहारिक गड़बड़ियों में जीन्स की भूमिका को महत्वपूर्ण पाया है। यूनिवर्सिटी ऑफ कोलेरिडों इन्स्टीट्यूट फॉर बिहेविअरल जेनेटिक्स के प्रोफेसर ग्रेगरी केरी का कहना है कि प्रत्येक व्यवहार में हम जीन्स की भूमिका देख सकते हैं, जिसके करण प्रत्येक व्यक्ति का व्यवहार विविधता लिए हुए होता है। इस तरह जीन्स हिंसक गतिविधियों में भी अपनी भूमिका निभा सकते हैं।

लेकिन इस शोध पर उस समय स्वयं प्रश्न-चिन्ह लग गया जब एक अध्ययन के दौरान एक ही तरह के कई जुड़वा बच्चों को अलग-अलग पाला गया। लेकिन पाया यह गया कि एक में हिंसक वृत्ति थी, जबकि दूसरा इस दुर्गुण से पूरी तरह से मुक्त था। एक दूसरी शोध के अनुसार जिन शिशुओं के माता−पिता हिंसक अपराध से जुड़े हुए थे, वे सामान्य नागरिकों के शिशुओं की अपेक्षा हिंसक अपराध की ओर अधिक उन्मुख हुए, परन्तु उन्हीं शिशुओं को जब अधिक अच्छे वातावरण में रखा गया, पालन-पोषण एवं शिक्षण का समुचित प्रबन्ध किया गया तो उनकी हिंस्र वृत्तियां कोमल भावनाओं में बदलने लगी।

वैज्ञानिकों को स्वयं हिंस्रवृत्तियों के जेनेटिक होने पर सन्देह हैं, क्योंकि अभी तक स्वयं वे ऐसा कोई हिंसक जीन नहीं खोज पाए है। जो लोगों को हत्या के लिए बाधित करता हो। हाँ, इतना जरूर है कि जीन व्यवहार का नियमन करने वाले रसायनों के उत्पादन के निग्रह एवं नियन्त्रण में सहायता करते हैं।

इस बारे में विज्ञानवेत्ताओं को मस्तिष्क द्वारा स्रवित सिरोटिन रसायन पर शंका है। वोमेन ग्रे स्कूल ऑफ मेडिसिन , नार्थ केरोलिना में हुए प्रयोगों से मालूम हुआ है कि अत्यधिक हिंसक बन्दरों में सिरोटिन का स्तर अधिक शान्त बन्दरों की अपेक्षा कम होता है। वे प्रायः अधिक असामाजिक भी होते हैं। ऐसे ही रासायनिक परिवर्तनों को मनुष्य में भी खोजा गया है। ‘यू. एस. नेशलन इंस्टीट्यूट आन अल्कोहल एब्यूज एण्ड एल्कोहलिज्म ‘ में किए गए इस तरह के अध्ययन में देखा गया है कि हत्यारों में सिरोटोनिन की मात्रा कम होती है। महिलाओं के चिड़चिड़े व क्रुद्ध व्यवहार पर भी कुछ शोधकर्त्ताओं को मानना है कि मासिक धर्म से पूर्व सिरोटोनिन के स्तर में कमी का एक कारण हो सकता है। यदि किसी तकनीक से सिरोटिन के स्तर को बढ़ाया जा सके तो मनुष्य को कम हिंसक बनाया जा सकता है। विशेषज्ञों के एक दूसरे वर्ग का कहना है कि मनुष्य के हिंसक व्यवहार का उसकी जैविकी से कोई सम्बन्ध नहीं है। इसका सम्बन्ध वे व्यक्ति के परिवेश एवं वातावरण से जोड़ते हैं। वेथेस्टा के मेरीलैण्ड के सेण्टर फॉर स्टडी ऑफ साइकियाट्री के डॉ. पीटर वेग्रीन के अनुसार मनुष्य से जुड़ी मूल समस्याएँ उसके शरीर या मस्तिष्क के कारण नहीं है, वे परिवेश के कारण है। उनके अनोर सामाजिक समस्याओं को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में पुनः परिभाषित करना नाजी जर्मनी द्वारा किए गए प्रयास जैसा होगा।

मानवी हिंसा के लिए पूर्णतया जैविक कारण बताना या परिवेश द्वारा इन्हें उत्पन्न मानना , दोनों मान्यताएँ एकाँगी है। आनुवांशिकी प्रभाव को समर्थक भी वातावरण के प्रभाव को नहीं नकारते। वास्तव में ये दोनों गहराई में कहीं परस्पर सम्बद्ध है। जैविक व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। किन्तु व्यवहार एवं अनुभव जैविकी को भी प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, बन्दरों पर हुए प्रयोग के अनुसार सिरोटिन का स्तर न केवल जीन द्वारा नियन्त्रित है, बल्कि नियमित शराब पीने वालों में भी इसके स्तर में कमी आ जाती है। इसी तरह एक निर्भीक बालक को एक हिंसक एवं अस्त−व्यस्त परिवार में पालकर उसे हिंसक एवं अपराधी बनाया जा सकता है। एव्र स्वस्थ स्थिर पोषण द्वारा एक बहादुर योद्धा भी बनाया जा सकता है।

एरिक फ्राँम के अनुसार मनुष्य को ऐसे नर-वानर के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो विकास के उस बिन्दु तक पहुँच चुका है, जहाँ जैविक निर्धारण न्यूनतम होता है एवं मस्तिष्कीय विकास अधिकतम। जैविक रूप से वह दूसरे पशुओं से सुकुमार एवं असहाय है। लेकिन विकसित मस्तिष्क द्वारा न केवल वह इस कमी को पूरा कर लेता है, बल्कि स्वयं में ऐसी क्षमताएँ विकसित कर लेता है, जिससे अन्य प्राणियों को नियन्त्रित कर सके।

मनुष्य ही एक मात्र प्राणी है, जिसके पास स्व-जागरुकता, तर्क एवं कल्पना-शक्ति है। जिसके सहारे वह दूसरे प्राणियों से भिन्न अपने स्वतन्त्र अस्तित्व के बारे में सचेत है। वह अपनी दुर्बलताओं व ब्रह्मांड में अपनी विलक्षणताओं से परिचित है। वही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो प्रकृति के साथ समस्वरता से नहीं रह सकता, जो अपने को स्वर्ग से निष्कासित अनुभव करता है , जिसकी दैवी प्रवृत्तियाँ रह-रह कर विकसित होने के लिए जोर मारती है। वही एकमात्र ऐसा प्राणी है, जिसका अस्तित्व उसके लिए एक ‘समस्या है, जिसे उसे स्वयं ही हल करना है।

मनोवैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि मानव का अस्तित्वजन्य विरोधाभास एक सतत् सन्तुलन में परिणत होता है। यह असंतुलन ही अन्य पशुओं से उसे अलग करता है, जो प्रकृति से एक तारतम्य बिठाकर रहते हैं। संस्कृति सभ्यता के माध्यम से वह इस असन्तुलन का सामयिक उपचार कर लेता है। एरिक फ्राँम का अपने ग्रन्थ ‘एनाटॉमी ऑफ हामन डिस्ट्रिक्टिवनेस’ में मानना है कि मनुष्य को प्रेम, घृणा, तर्क, बुद्धि, अच्छाई, बुराई जैसे गुणों के आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता। इसे मानवीय अस्तित्व में विद्यमान मूलभूत विरोधाभास के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। जो उसके विलुप्त संस्कार व जाग्रत सचेतनता के बीच जैविक विभाजन के कारण उत्पन्न होता है। मनुष्य का यह अस्तित्वजन्य द्वंद्व कुछ विशेष मानसिक आवश्यकताओं को जन्म देता है।

इन आवश्यकताओं की पूर्ति इनसान के स्वस्थ-चित्त रहने के लिए उतना ही जरूरी है , जितना कि उसे जीवित रहने के लिए भोजन, पानी और हवा। पारस्परिक प्यार एवं सद्भाव का आदान-प्रदान, उच्च कल्पनाशीलता, प्रेरणाएँ, अनन्तता से एकता आदि का उल्लेख एरिक फ्राम ने इन आवश्यकताओं के रूप में किया है। इनकी संतुष्टि के विविध तरीके , विविध मनोभावों के रूप में प्रकट होता है। जैसे भक्ति के आदर्श की आवश्यकता को मनुष्य भगवान सत्य या प्रेम के द्वारा अपने आदर्श की उपासना से पूरा करता है।

संबद्धता की आवश्यकता की पूर्ति प्रेम और दया से पूरी की जाती है। मानव प्रकृति के विशेषज्ञोँ का मत है कि यदि आवश्यकता की पूर्ति के तरीके जैविक संस्कारों के अंतर्द्वंद्व से विकृत हो जाए तो परावलम्बन, परपीड़न एवं विध्वंस द्वारा भी व्यक्त हो सकते हैं, इसी तरह एकता और मूलबद्धता की आवश्यकता पूर्ति एकात्म का, भाईचारा प्रेम, आध्यात्मिक अनुभूति द्वारा होनी चाहिए। परन्तु विकृत अवस्था में नशा-व्यसन, निर्व्यक्तीकरण द्वारा होती है। इसी भाँति उत्तेजना और रोमाँच की आवश्यकता पूर्ति प्रकृति के शोधन के अभाव में ऐंद्रियक सुखों की लोभजन्य वृत्ति द्वारा पूरी होती है।

एरिक फ्राँम ने अपने शोध अध्ययन में एक बात तो मानव मनीषा के सामने स्पष्ट कर दी कि मानव स्वभाव से पशु नहीं है, जैसा कि वे अब तक सोचते आ रहे है। हाँ उसमें पाशविक संस्कार अवश्य रह गए है, जो परिशोधन के अभाव में इतने तीव्र हो उठते हैं कि हमें उनकी स्वाभाविकता का भ्रम होने लगता है। यदि इन वृत्तियों को परिशोधित , परिमार्जित किया जा सके तो मानव का दैवी स्वभाव अपनी समग्र आभा से देदीप्यमान हो उठेगा।

एरिक फ्राँम ने अपने द्वारा बताए गए मनोभावों के समूह का चरित्र का नाम दिया है, जो जैविक आवेगों से सर्वथा भिन्न है । इसे इनसान की द्वितीय प्रकृति कह सकते हैं। इसी के माध्यम से मनुष्य स्वयं को अन्य मनुष्यों, प्राणियों एवं प्रकृति से जोड़ता है। चरित्रजनित मनोभावों को उन्होंने जीवन-संपोषक एवं जीवन-विनाशक इन दो समूहों में विभाजित किया है।

ये मनोभावों ही इनसानी जिन्दगी में उत्साह ,उमंग एवं उत्सुकता के आधार होते हैं। इनसे न केवल उसके स्वप्न जन्म लेते हैं, बल्कि जीवन को सार्थक बनाने वाले धर्म-मिथक भी इसी से उपजते हैं। ये मनोभाव मनुष्य को उसकी समस्त अपूर्णताओं के बीच जीवन में एक अर्थ की खोज के लिए प्रेरित करते हैं। इसी वजह से वह अपना निर्माता स्वयं बनना चाहता है। एक लक्ष्य पाना चाहता है, ताकि जीवन में इन मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति उच्चतर स्तर पर नहीं कर पाता, तो वह अपने लिए ध्वंस का मार्ग चुन लेता है और ऐसी दशा में यही जीवन-संपोषक भाव विध्वंसक भावों का रूप ले लेते हैं।

मनोवैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार व्यक्तित्व में परिवर्तन तभी सम्भव है, जब मनुष्य जीवन को प्रोत्साहित करने वाले मनोभावों को उच्चतर दिशा मिले, जो जीवन को पहले से अधिक जीवन्तता और समग्रता प्रदान कर सके। जब तक यह न किया जायेगा, तब तक मनुष्य का सभ्य तो बनाया जा सकता है, लेकिन उसे सुसंस्कृत नहीं बनाया जा सकता।

एरिक फ्राम के अनुसार , हालाँकि जीवन को प्रोत्साहन देने वाले मनोभाव अधिक शक्ति , आनन्द संघटन और जीवन्तता में ध्वंसात्मक आवेगों की अपेक्षा अधिक सहायक है। फिर भी ये मनुष्य-अस्तित्व की समस्या को उतने ही सार्थक रूप से उजागर करते हैं। सर्वाधिक परपीड़क एवं हिंसक व्यक्ति भी उतना ही मनुष्य है जितना कि संत। उसे एक रुग्ण या विकृत मानव कह सकते है-जो मनुष्य के रूप में जनम लेते हुए जीवन की चुनौतियों का बेहतर सामना न कर सके।

हिमलर, हिटलर, मुसोलनी जैसे ऐतिहासिक, चरित्र ऐसे ही भटके हुए मनुष्यों के उदाहरण है। हिमलर यूरोप में ‘खूनी भेड़िये’ के रूप में कुख्यात रहा। अपने सारे जीवन भर वह निर्मम रूप से परपीड़क और कायर था, जो एक दयालु वफादार एवं साहसी व्यक्ति का मुखौटा ओढ़े रहा। अपने को जर्मनी का त्राण कर्त्ता कहने वाला हिटलर अपने देश को प्राणों से अधिक प्रेम करता रहा। लेकिन वह न केवल अपने दुश्मनों का बल्कि स्वयं जर्मनी के लिए एक निरंकुश, ध्वंसक साबित हुआ। अपने देश के दयालु पिता -स्टालिन’ ने रूस को लगीग तबाह कर दिया और नैतिक रूप से विषाक्त कर दिया था। इसी तरह पाखण्ड का एक अद्वितीय उदाहरण था मुसोलिनी , जिसने आक्रामक एवं साहसी पुरुष का अभिनय किया ओर जिसने अपना जीवन-मात्र साहस के साथ जीना घोषित किया, लेकिन वैयक्तिक जीवन में वह असाधारण कायर था।

मनुष्य द्वारा जीवन के अर्थ की खोज में जीवन का ही विनाश एक ऐसा विरोधाभास है, जिसकी समझ जरूरी है। जिसके बिना इसका उपचार नहीं हो सकता। मनोवैनिक कार्ल गुस्ताव युँग अपने ग्रन्थ ‘मार्डन मैनइन सर्च ऑफ सोल ‘ इस उपचार के लिए भारतीय तत्वज्ञान को पूरी तरह से समर्थ एवं समक्ष मानते हैं। उनके अनुसार इससे मानव प्रकृति का जितना समग्र विवेचन है, उतना अन्यत्र कहीं प्राप्य नहीं।

एरिक फ्राँम इस सम्बन्ध में समूचे समाज को नए सिरे से संस्कारित करने पर बल देते हैं। उनके अनुसार रुग्ण मनुष्य अपनी सही पहचान के अभाव में उलटी-सीधी हरकतें करता रहता है। आज की दशा कुछ ऐसी ही है। हिंसा और ध्वंस की बढ़ती वारदातें इसी रुग्ण मानसिकता का परिणाम है। प्राचीन भारतीय ऋषि न केवल कुशल मनोवैज्ञानिक थे, बल्कि सामाजिक, साँस्कृतिक क्रान्ति के प्रणेता भी थे। उनका संस्कार-विज्ञान एवं आध्यात्मिक तकनीकें इसी सामाजिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए है। इसी के द्वारा ऐसी परिस्थितियों का निर्माण सम्भव है, जिसमें मानव अपनी रुग्ण प्रकृति को स्वस्थ कर सके। इस रुग्ण प्रकृति को स्वास्थ्य में बदलकर ही मानव समाज सच्ची स्वतन्त्रता को उपलब्ध कर सकता है। इस स्वतन्त्रता में इनसानियत अपनी सम्पूर्ण गरिमा में विकसित हो सकेगी। साथ ही उन हिंसक एवं ध्वंस वृत्तियों का अवसान होगा, जिनकी वजह से हम अपने मनुष्य होने की पहचान तक खोते चले जा रहे है।


वीर शिवाजी (Kahani)

एकबार शिवाजी का सेनापति मुगलों पर विजय प्राप्त करके लोटे। वह शिवाजी के पास गए और बोले-  महाराज, मैं आपके लिए अनुपम भेंट लाया हूँ।  यह कहकर उन्होने एक पालकी मँगवा कर उनके सामने रखवा दी। पालकी का दरवाजा हटाया गया तो शिवाजी ने देखा कि उसमें एक सौंदर्य की जीती-जागती प्रतिमा बैठी है। वह मुगल सेनापति की बेगम थी। शिवाजी को माजरा समझते देन न लगी।

शिवाजी ने बेगम से हाथ जोड़कर कहा, “आपके दर्शन से मैं धन्य हो गया,” माँ तुम कितनी सुन्दर हो।” इतना कहकर उन्होंने सेनापति को आज्ञा दी , “ बेगम को इज्जत से मुगल सेनापति तक पहुँचादो, शत्रु को नारी भी पूजनीय तथा माता के समान होती है। उसका अपमान वीर नहीं, कायर करते हैं, सच्चा वीर नारी में माता के दर्शन करता है।”


सेवा से मिलती है खुदा की जागीर

“या खुदा, अब तो आगे का रास्ता भी नहीं है।” सवार घोड़े से कूद पड़ा। प्यास के मारे गला सूख रहा था। गौर मुख भी अरुण हो गया था। पसीने की बूँदें नहीं थीं, प्रवाह था। उसके जरी के रेशमी वस्त्र गीले हो गए थे। ज्येष्ठ की प्रचण्ड दोपहरी में जरी एवं आभूषणों की चमक आँखों में चकाचौंध उत्पन्न कर रही थी। वे ऊष्ण हो गए थे और कष्ट दे रही थी। वे ऊष्ण हो गए थे और कष्ट दे रहे थे। भाला उसने पेड़ से टिकाया, तरकश एवं म्यान खोल दी। कवच जलने लगा था और उसे उतार देना जरूरी हो गया। केवल कुर्ता रहने दिया उसने शरीर परं मुकुट भी काफी तप चुका था।

“पानी कहाँ मिलेगा ? “ व्याकुल होकर वह इधर-उधर देखने लगा। वन सघन हो गया था। घोड़े पर चढ़कर आगे जाने का मार्ग था नहीं। कहीं भी पानी के लक्षण दिखाई नहीं पड़ हो थे। यहाँ बैठने को तो ठिकाने की छाया भी नहीं। वह खैर के वन में भटक चुका था। काँटों से भरी डालियाँ भूमि तक झुकी हुई थी। सूखकर गिरी टहनियों ने जमीन को बैठने योग्य भी नहीं रखा था। वहाँ फल या जल की चर्चा ही बेकार थी।

“एक पेड़ तो दिखाई पड़ा।”‘ कुछ दूरी पर अर्जुन के विशाल वृक्ष को देखकर उसने लम्बी साँस खींची। किसी प्रकार तलवार से टहनियाँ काटता वह उसकी ओर बढ़ चला। जिधर से आया था, लौट सकता था। पर अब यह सम्भव नहीं था। एक हिरन के पीछे वह बेतहाशा भागा आया था। पगडण्डी भी उसे भूल चुकी थी। सही रास्ते लौट सकना अब मुश्किल था। फिर काफी दूर भी निकल आया था। अब उतनी दूर लौटने की कोई सम्भावना नहीं नजर आ रहीं बड़ी तेजी से प्यास लग रही थी। घोड़ा भी पसीने -पसीने हो गया है। जोर से हाँफ रहा है और मुँह से फेन निकाल रहा है। जहाँ तक याद पड़ता है, मार्ग में कोई बस्ती भी तो नहीं पड़ी। न एक झोपड़ी और न नन्हा गड्ढा ही।

वृक्ष के समीप पहुँच कर बड़ा निराश हुआ। कँटीली झाड़ियों ने तने तक उसे घेर रखा था। पता नहीं कौन सा अपराध किया है कि बैठने की छाया तक नसीब नहीं । मार्ग की झाड़ियों को छाँटने में छाले पड़ गये थे हाथ में। उसका सुकुमार शरीर सूचित कर रहा था कि उसे कभी कोई परिश्रम नहीं करना पड़ा।

अब क्या हो द्य निराश हो गया वह जीवन से ही। हो सकता है, आस-पास कोई तालाब या झरना हो। उसने वृक्ष की ओर देखा। कवच, धनुष , भाला, ढाल, तरकश, मुकुट तथा आभूषण वह पहले ही छोड़ आया था । तलवार भूमि पर रख दी। जरी के कामदार जूत उतार दिए और पेड़ पर चढ़ने लगा। दूर जहाँ तक चढ़ना सम्भव था, चढ़ गया वह।

कही कोई झरना नहीं। चारों ओर बड़े गौर से देख रहा था वह । हो भी तो इन कंटीली झाड़ियों के भीतर कहीं छिपा होगा। पानी का कहीं नामोनिशान नहीं मिल रहा था। हार-परेशान कर बड़ा-दुःख हो गया।

‘वहाँ क्या है ‘ थोड़ी दूर पर अधिक सघन कुछ ऊँचा हरा झुरमुट दिखाई पड़ा। उसे एक आशा से वह उसी ओर देखने लगा। वह खैर का कुँज नहीं हो सकता। नीम, आम, शीशम या ऐसा ही कुछ । कई पेड़ है और वह बीच में सूखा-सूखा क्या झलक रहा है ? किसी झोपड़ी का छप्पर तो नहीं ?

कुछ भी निश्चय न कर सका। दूरी के कारण कुछ स्पष्ट नहीं हो रहा था। पेड़ वहाँ सघन थे। अन्ततः उतर आया वह-यदि झोपड़ी हुई तो मनुष्य होगा। मनुष्य हुआ तो जल भी होगा ही। कुछ न हुआ तो ? मर तो रहा ही हूँ पानी बिना। यहाँ न सही वहाँ। उतर आया वह वृक्ष से नीचे। जूते पैर में डाले, तलवार उठाई, घोड़े की बाग पकड़ी और झाड़ियों छाँटकर मार्ग बनाने में लग गया। धीरे-धीरे ही सही, वह एक-एक कदम उस ओर आगे बढ़ने लगा। यदा-कदा झाड़ियों के काँटे उसके कुर्ते में फँस जाते , जिन्हें हटाते हुए वह सोचने लगा वह अपनी इस शिकार की योजना के बारे में , सब लोग आज अलग-अलग शिकार करेंगे, वह अपने पूरे दल-बल के साथ बघेलखण्ड की सीमा पर डेरा डाले हुए था। बंगाल के विद्रोह का दमन करके लौटते समय प्रयाग से वे सब जंगल की ओर मुड़ गए थे। शिकार का बड़ा शौक जो था उनको। शाही खेमे के चारों ओर फौजी खेमे खड़े हो गए। हाथी और घोड़ों की कतारें लग गयी। तंदूर जलने लगे। उस दिन सबेरे शिकार के लिए निकलने पर घोड़े पर बैठे शाहजादे ने अपने साथी सेनापतियों को आदेश दिया।

यहाँ चीते और तेंदुओं की भरमार है। सेनापति बहराम खाँ ने बताया, “बड़े भयंकर रीछ और बाघ भी है। शाहजादे न होगा। “

“मैं डरपोक नहीं हूँ। “ उसने सेनापति की बातों से अपना अपमान अनुभव किया। उसकी त्योरियाँ चढ़ आयी-”मैं दिखा दूँगा कि मैं किसी से भी अच्छा शिकारी हूँ।” घोड़े को थाप दी उसने । सधा जानवर खुशी से हिनहिना उठा।

“ मेरा मतलब ऐसा हरगिज नहीं था।” बहराम क्षाँ ने सिर झुकाकर गुजारिश की, “ मैं शाहजादे की बहादुरी में यकीन करता है और उनकी शान के खिलाफ एक लफ़्ज़ भी जबान से निकालने की हिम्मत नहीं कर सकता। मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि इधर का जंगल बीहड़ है। दोनों तरकशों के तीरों से ज्यादा तीर भी जरूरी हो सकते हैं और हुजूर जंगल के रास्तों से वाकिफ भी नहीं है। महज खादिम को साथ रहने की इजाजत........।” कोई जरूरत नहीं। शाहजादा तो शाहजादा ही ठहरा। प्रधान सेनापति से यों भी चिढ़ता था वह बार-बार उसका मुँह लगना वह गवारा नहीं कर सकता। “ मेरे पास खूब बजनी भाला है और तलवार भी। मैं महज तीरों पर मुनसहर नहीं करता। कोई बच्चा नहीं हूँ कि रास्ता भूल जाऊँगा। अगर भूल भी गया, तो ढूंढ़ लूँगा। इतना बड़ा खेमा कोई सुई तो नहीं खो जाएगा।”

बहराम खाँ आखिरकार सिपहसालार थे। शाहाजादे के द्वारा उनका यह पहला अपमान था। चुपचाप सह लिया। उन्हें उसकी मूर्खता पर क्रोध के बदले तरस आया,’ फिर भी उन्होंने अधिक आग्रह करने में कोई लाभ नहीं देखा।

दोपहर में जानवर पानी पीने जरूर निकलते हैं। शाहजादा अपना ज्ञान प्रकट करना चाहता था। जो पानी किनारे रहेंगे, वे ज्यादा फायदे में रहेंगे। मैं तो आज उन्हें ढूँढ़ कर उनके घर में ही शिकार करूंगा। उसकी चिढ़ उसे आवश्यकता से अधिक उत्तेजित कर चुकी थी।

“तब मैं शाम को यहीं आपसे मिलूँगा। “ बहराम खाँ इस झल्लाहट से छुटकारा पाना चाहते थे। उन्होंने घोड़े की लगाम उठाई और आदेश की प्रतीक्षा करने लगे।

“शाम को नहीं अधिक से अधिक तीसरे पहर ते।” शाहजादा आज जैसे सेनापति की प्रत्येक बात का प्रतिकार करने में तुल गया था।”सबको तीसरे पहर तक लौट आना चाहिए। शिकार मिले या न मिले। यदि कोई जंगल में भटक जाय तो उसे ढूंढ़ने का अवकाश रहना चाहिए। यदि आप तब तक न लौटे तो मैं आपको ढूँढ़ने निकल पडूँगा। “ व्यंग्य किया उसने।

यदि वह अन्तिम व्यंग्य न करता तो अवश्य सेनापति उनकी बुद्धिमत्ता की प्रशंसा करते।” आपको कष्ट न करना पड़ेगा।” सेनापति ने अबकी बार घोड़ा बढ़ा दिया और अधिक अपमान सहना उनके वश में न था।

“अच्छा। हम लोग भी अलग-अलग रास्ता ले।” शाहजादे ने सबको आदेश दे दिया और किसी को सलाम का उत्तर देने की उसने कोई चेष्टा नहीं की। उसका घोड़ा तीर की भाँति छूटा और और एक ओर दूर जंगल में विलीन हो गया। भटकते-भटकते अब वह इस हाल में था। अपने थके पाँवों से चलता हुआ, वह नीम के पेड़ के नीचे बनी इस झोपड़ी तक आ पहुँचा।

यह झोपड़ी एक भील की थी। वह एकाकी थी। कन्द-मूल, फल तथा वच्य पशु उसके आहार थे। मृग-चर्म, लकड़ी वनौषधि या चार जैसे जंगली फल लेकर वह सप्ताह में एक नि पास के दस मील-दूर वाले कस्बे में बाजार लगने पर जाता था और वहाँ से नमक मसाला, तेल या कपड़ा खरीद लाता। उस कस्बे के अतिरिक्त उसने कोई बाजार या नगर नहीं देखा था। उसे जरूरत भी नहीं थी। बड़े जोर की गर्मी थी। लू चलने लगी थी, वह अपनी झोपड़ी का दरवाजा बन्द ही करने उठा था टटिया लगाकर । तभी सामने नीम के नीचे हाथ में घोड़े की लगाम थामे एक घुड़सवार उसे खड़ा दिखा। वह शेर और चीतों से खेलने वाला जंगली भील काँप उठा। पता नहीं कौन-सी विपत्ति आने वाली है। रेशमी वस्त्र, कानों में झिलमिलाते मणिकुण्डल, हाथ में नंगी तलवार। उसने सवार को बाँधव नरेश का कोई बड़ा अधिकारी समझा ।

भाग जाता वह, यदि उसे तनिक भी अवकाश मिलता। बीहड़ जंगल में उसे कोई ढूंढ़ न पाता । कुटिया में छिपे रहने का भी अवकाश न था। सवार ने उसे देख लिया था। कमर को पूरी झुकाकर माथे को लगभग भूमि के समीप तक पहुँचाकर दोनों हाथों से काँपते-काँपते जुहार की उसने। इतना गोरा तेजस्वी वेशधारी पुरुष उसने पहले कभी नहीं देखा था। पता नहीं बान्धव पति का मन्त्री है या सेनापति? युवराज तो लगता नहीं, क्योंकि मुकुट नहीं लगाए है। वह सोच रहा था।

“पानी मिलेगा भाई।” सवार को झोपड़ी देखकर अपार हर्ष हुआ था। भील उसे जीवनदाता के समान ही दिखाई पड़ रहा था। गला सूख गया था। शब्द निकल नहीं रहे थे स्पष्ट। “ बहुत प्यासा हूँ।”

“हुजूर विराज जावें।” भील झोपड़ी में गया। अन्दर से एक बड़ा-सा झोपड़ी में गया। अन्दर से एक बड़ा-सा बाघाम्बर उसने नीम बूतरे पर शीतल छाया में बिछा दिया। घोड़े की रास पकड़ ली स्वयं उसने। बहुत चलकर आए दिखते हैं। पसीने से शरीर डूब रहा है। तनिक सुस्ता लें। अभी पीने से पानी लग जाएगा। इसे चूसें, प्यास की तेजी मर जाएगी। कई उजली-उजली जड़ उसने एक चौड़े सागौन के हरे पत्ते पर रख दीं।

श्रानत-क्लान्त सवार उसी चर्म पर धम्म से बैठ गया। बैठते ही लेट गया। तलवार से टुकड़ा बनाकर एक टुकड़ा जड़ लेटे-लेटे ही मुख में जाते ही उसने मुँह को पानी से भर दिया। सवार को ऐसा लगा कि जीवन में ऐसा स्वादिष्ट पदार्थ उसने कभी नहीं खाया है।

“आप तनिक विश्राम कर लें।” भील कोई बात कहने से पूर्व झुककर सलाम करता था-”मैं झरने से ठण्डा पानी लाता हूँ। पास ही है। इसे भी पानी पिलाकर नहला दूँगा।” यह कहते हुए झोंपड़ी में से घड़ा ले आया। घोड़े की जीन खोलकर सवार के समीप चबूतरे पर रख दी और घोड़े को लेकर चल पड़ा।

“पता नहीं उसका झरना कितनी दूर है।” सवार की प्यास जड़ी ने कुछ कम अवश्य की दी थी, किन्तु उसे असह्य प्रतीत हुई। उठकर झरना ढूँढ़ने जाने का उसमें साहस नहीं रहा था। बहुत थका था। वायु ने अब तक पसीना सुखा दिया था।

कन्धे पर बायें हाथ से उसने घड़ा पकड़ रखा था और दाहिने में घोड़े की लगाम थी। घोड़ा हिनहिनाता हुआ आ रहा था। पानी पीकर उसने प्यास बुझा ली थी ओर भील ने उसे स्नान करा दिया था। ताजा हो गया था। आते ही उसने घोड़े को छोड़ दिया। वह हरी-हरी घास चरने में लग गया।

“भागकर जाएगा भी कहाँ ?” नीम के चबूतरे पर घड़ा रखते हुए उसने कहा-” भागा भी तो मैं पकड़ लाऊँगा।” कुटिया में से एक भद्दा -सा लोटा पीतल का और एक किसी फल की कड़ी खाली खोखली । लोटे को खूब रगड़ कर माँज दिया था उसने। पानी भरकर सवार के समीप रख दिया । आप हाथ पैर धोवें यह कहना नहीं पड़ा। सवार लोटा भरने से पहिले ही बैठ गया। उसने कुल्ला किया, मुख धोया और भली प्रकार हाथ-पैर भी। पायजामे को यथासम्भव ऊपर सरका दिया था उसने। आज उसने पहली बार अनुभव किया था कि शीतल जल से हाथ-पैर धोने में कितना आनन्द होता है।

“गरीब आदमी हुजूर की क्या सेवा करेगा ?” एक बड़े पत्ते पर कुछ कन्द-फल और कई मोटे-मोटे उज्ज्वल दल वाले फूल रखे थे। भील ने झोपड़ी में से लाकर सवार के सम्मुख उन्हें रख दिया। पत्ता खूब बड़ा था और सवार ने देखा कि उसमें उसके दैनिक भोजन से चौगुना सामान भरा है। पानी पी लिया था उसने जीभर है। पानी पी लिया था उसने जीभर कर। अब उसे बड़े जोर की भूख लगी थी। भूख तो पहले भी लगी होगी, किन्तु प्यास की तीव्रता ने उसे दबा दिया था। प्यास का कष्ट मिटते ही पता लगा कि पेट में चूहे छलाँग भर रहे है। चुपचाप पत्ता सामने खिसका लिया उसने।

एक से एक स्वादिष्ट कोई खूब मीठा, कोई खटमिट्ठा , कोई मन्द एवं सुश्रचिपूर्ण मधुर। कन्द-फूल और फलों में से एक को भी नहीं पहचानता था वह। केवल कमल के हरे बीज भर उसकी पहचान के थे। आगरे में भला क्यों तो ‘चार’ मिली होगी और क्यों कभी तुन्दू खाया होगा उसने। भील उसे प्रत्येक फल या कन्द खाने की विधि बतलाता जाता था। खाने के बाद वहीं एक ओर वह आराम से सो गया। शाम की ठण्डी ब्यार ने उसकी सारी थकान मिटा दी थी।

इधर खेमे पर दोपहर होते-होते सबसे पहले सेनापति लौट आए थे। इनके घोड़े की पीठ पर एक पूरा छह फीट का बाघ लदा था। आते ही उन्होंने अपने निजी सेवकों को जंगल का पता -ठिकाना बताकर भेज दिया। पूरे आधे दर्जन पशु मारे थे इन्होंने । बाघ तो भाले से मारा गया था और उसे वे खुद ले आए थे। एक चीता, एक तेंदुआ, एक रीछ और दो चीतल ये भी उनके तीरों के शिकार बने थे। सेवकों ने खच्चर खोले और वे सब जानवर भोज्य पदार्थ बनने अन्दर आ गए।

अब तक कई शिकारी लौट चुके थे। प्रायः सबको कुछ न कुछ मिला था। कुछ आलसियों ने खरगोश या मयूर पाकर ही सन्तोष कर लिया था। चीते, तेंदुए और रीछ भी कई थे। सबसे अधिक संख्या थी चीतल और हिरणों की। बाघ तो सारे किसी को मिल नहीं सका था।

दोपहर बीतते-बीतते तक सभी आ गए थे। एक बुड्ढे मियाँ जी को कुछ नहीं मिला तो वे दो वनमुर्गियाँ ही कहीं से मार लाए थे। सेनापति ने अपने राजपूत सहायक रामसिंह के काले चीते की प्रशंसा की”बड़ा धूर्त पशु होता है।” उन्होंने बताया।

किन्तु अब तक शाहजादे का कोई अता-पता न था। सब लोग आस-पास के जंगलों में उन्हें ढूँढ़ आए थे। अब तक तीसरा पहर भी बीत चुका था। सिपहसालार बहराम खाँ काफी परेशान थे। उनकी परेशानी जायज थी। उन्हें सूझ नहीं रहा था कि शहंशाह अकबर को क्या जवाब देंगे। शाहजादे ही नहीं हिन्दुस्तान की मुगलिया सल्तनत के वली अहद भी है।

चारों ओर ढूँढ़ -खोज हो रही थी, परन्तु कोई नतीजा नहीं निकल रहा था। तभी सेनापति के राजपूत सहायक रामसिंह ने खबर दी-पास के जंगल में एक पहुँचे हुए फकीर रहते हैं। कहते हैं इनके पास रूहानी ताकतें है। भूत, भविष्य वर्तमान का हाल बता देना इनके लिए कोई मुश्किल नहीं।

मरता क्या न करता। बहराम खाँ ने उसकी बात मान ली। कुछ घुड़सवारों के साथ वह रामसिंह के बताए हुए रास्ते पर चल दिए। पास के जंगल में पीपल के पेड़ के नीचे एक झोपड़ी दिखाई दी। झोपड़ी के बाहर चबूतरे पर एक बुजुर्गवार बैठे दिखाई दिए। उनके बारे में यह मशहूर था कि वह स्वयं हिन्दू, मुसलमान कहने के बजाय खुदा का बन्दा ईश्वर का सेवक कहने में ज्यादा यकीन रखते हैं। मुसलमान उनको पीरबाबा कहते हैं, तो हिन्दू लोग स्वामीजी कहकर पुकारते हैं। बस यही उनका सामान्य-सा परिचय है।

बहराम खाँ के घोड़े उतरते हुए वह मुस्कुराकर कहने लगे-”तो तुम लोग-”तो तुम लोग शाहजादे को ढूँढ़ते हुए यहाँ आए हो। घबराओ नहीं वह आराम से है। मिल जाएगा।”

एक ही साँस में उनके मुँह से इतनी सारी बातें सुनकर सिपहसालार की जान में जान आयी। उसे अचरज था कि फकीर ने उनके मन की बात बिना बताए कैसे जान ली। इस चमत्कार से प्रभावित होकर उसने ओर उसके साथियों ने भक्तिपूर्वक प्रणाम किया।

शाम हो रही थी। इधर के जंगलों के रास्ते से सभी अनजान थे। बहराम खाँ ने हिचकिचाते हुए बुजुर्ग फकीर से कहा-”पीरबाबा, लेकिन हम उन्हें ढूँढ़ेंगे कैसे ?” “चिन्ता न करो, अभी हम उन्हें इधर ही बुला देते हैं।” फकीर ने बड़े आश्वस्त भाव से कहा।

और सचमुच उन्हें थोड़ी ही देर में जंगल के झुरमुट से घोड़े की टापों की क्षीण-सी आवाज और एक मशाल की-सी मद्धिम रोशनी दिखाई दी। बढ़ते पलों के साथ आवाज एवं रोशनी दोनों ही तेज होने लगी। कुछ ही समय में घुड़सवार एवं उसका साथी पास आ गए।

“ओह ! बहराम खाँ ।” आने वाले सवार ने अपने सिपहसालार को पहचान लिया था। “शाहजादा हुजूर आप।” बुजुर्ग फकीर के पास बैठे अन्य घुड़सवारों ने अपने अहद को झुककर सलाम किया। सेनापति ने अपने शिकार की कहानी और उन्हें ढूँढ़ने के प्रयास एवं इन बुजुर्ग फकीर की चमत्कारी सामर्थ्य के बारे में संक्षेप में कह सुनाया।

साथ में आने वाला भील तो पहले से ही स्वामीजी की दैवी शक्तियों से परिचित था। उसके लिए तो वे साक्षात् भगवान थे। अब उसे समझ में आया कि किस अदृश्य आकर्षक शक्ति की बदौलत वह खेमे की ओर जाने के बजाय इस ओर चला आया। इस बीच शाहजादे ने भी अपनी राम कहानी कह सुनायी।

परस्पर की बात-चीत से उबरते हुए शाहजादे ने सेनापति से माँग कर एक टुकड़ा भोजपत्र लिया और एक रंगीन शलाका। कुछ लिखने लगा। बहराम खाँ ने देख लिया कि वह बान्ध्णव पति के नाम युवराज का पत्र है। इस भील को आस-पास का पूरा जंगल जागीर में दे देने का आदेश है उसमें । पत्र सेनापति को थमाते हुए शाहजादे ने बुजुर्ग फकीर की ओर श्रद्धा से देखते हुए पूछा -”मुआफी के साथ जानना चाहता हूँ, आपको ये रूहानी ताकते कैसे हासिल हुई ?”

बुजुर्ग फकीर ने हँसते हुए कहा- सेवा से। जिस तरह आपने इस गँवार भील की थोड़ी-सी सेवा से खुश होकर इइतनी बड़ी जागीर बख्श दी,उसी तरह इस नचीजा बन्दे की सेवा से खुश होकर खुदा ने अपनी रूहानी मिलकियत की छोटी-सी जागीर हमें भी बख्शी है।”

“सेवा का बड़ा महत्व है वली-अहद जिसकी भी सेवा की जाती है, वह अपनी हैसियत के मुताबिक दिए बिना नहीं रहता। यही सोचकर विवेकवान लोग दोनों जहाँ के मालिक और उसके बन्दों की निष्काम सेवा दिल लगा कर करते हैं। “


‘स्टेटस सिम्बल’ की अंधी भेड़चाल क्या जरूरी है ?

सतयुग के आगमन का मतलब है-जीवन के मूल्याँकन और मानदण्डों में सात्विक बदलाव। कोई समय अपने आप में अच्छा या बुरा नहीं होता। प्रचलित मानक ही उसे भला या बुरा रूप देते हैं। हर आदमी की चाहत समाज में अपनी पहचान बनाने की होती है। दर्जे पर पड़े रहना कतई पसन्द नहीं। सामाजिक प्रतिष्ठा पाने के लिए वह जमाने के प्रचलित मानदंडों पर जल्दी से जल्दी खरा उतरना चाहता है। अब इस जल्दबाजी को उसका दोष मान लिया जाय, तो और बात है। लेकिन छान-बीन जरा गहराई से करें तो यही पाएंगे कि उसके व्यक्तित्व के ढाँचे को बुरा या भला बनाने वाले साँचे सामाजिक मानक ही है।

अतीत का भारत जग सतयुगी परिस्थितियों से सम्पन्न था, तो उसके मूल में मानव की सात्विक प्रवृत्तियाँ ही कारण थीं। व्यक्ति की योग्यता एवं प्रतिष्ठा का आकलन उसके निष्कलंक चरित्र, उत्कृष्ट चिंतन, शालीन आचरण एवं विनम्र व्यवहार से किया जाता था। त्याग एवं बलिदान के आभूषणों से अलंकृत नररत्न ही प्रतिष्ठा के योग्य माने जाते थे। कालान्तर में सोच व नजरिया बदला। इन मानवीय मूल्यों के स्थान पर आर्थिक सम्पन्नता का आधार खड़ा किया गया। जिसकी कमजोर नींव पर टिकी प्रतिष्ठा की मंजिल चन्द क्षणों की चकाचौंध दिखाकर धराशायी हो जाती है। आज का इनसान अपनी सात्विकता को पूरी तरह से खोकर रासिक एवं तामसिक प्रवृत्तियों के सहारे कुटिलता, बर्बरता एवं छद्म के चक्रव्यूह रचाकर जैसे-तैसे सफल करने , सत्ता हासिल करने, समृद्ध बनने की जुगत भिड़ाने में लगा है।

इस प्रक्रिया से जीवन व्यवस्था बुरी तरह चकनाचूर हो चुकी है। क्योंकि राजसिक एवं तामसिक प्रवृत्तियाँ आर्थिक सम्पन्नता को पाकर ही चुप नहीं बैठती, उनके साथ विलासिता अनिवार्य रूप से जुड़ी है। असंयमित एवं अनियन्त्रित विलासिता का यह दौर समूचे जीवन को रोग-शोक एवं पाप-पतन का जमावड़ा बना देता है। इस सत्य को हम अपने इर्द-गिर्द जाँच-परख सकते हैं। भारत में हाल में हुए आर्थिक उदारीकरण के पश्चात् बहुतायत में अर्थोपार्जन बढ़ा है। फलस्वरूप एक नए वर्ग की फसल उपजी है, जिसे नवधनाढ्य वर्ग कहते हैं। इसने अपनी आर्थिक सुदृढ़ता के साथ प्रतिष्ठा के नए-नए मानदण्ड खोजे है, जो इन दिनों स्टेटस सिम्बल के रूप में प्रचलित-प्रचारित है।

सिर्फ अपने ही देश में ही नहीं, बल्कि समूची दुनिया आज इन्हीं मानदण्डों से अपना मूल्याँकन करती है। समाज के इस वर्ग की नजर में पैसा होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इससे विलासिता के संसाधनों की खरीद एवं एकत्रीकरण भी जरूरी है। कीमती वस्त्र , आभूषण, तरह-तरह की विदेशी वस्तुएँ, गाड़ी बंगला जो पहली नजर में ही अपनी विशिष्टता व मूल्यवान होने का परिचय दे दें। स्टेटस सिम्बल को ऊँचा करने के दौर में विदेशी कम्पनियों के महँगे टेलीविजन, वीडियो सेट, सेल्युलर फोन, पेजर तथा नए ढंग की बिल्डिंग पाने की होड़ लगी है। आज समाज में वहीं प्रतिष्ठित व्यक्ति माना जाता है, जिसके घर में चमचमाता डायनिंग रूम खूबसूरत नारीटैक बात चाइना की प्लेट तथा हाथ में बेहद कीमती कार्टिआर या कार्न्कड घड़ियाँ सुशोभित हो रही हों।

वर्तमान प्रतिष्ठा के इन मानदण्डों ने जीवन-पद्धतियों का विदेशीकरण कर दिया है। हरेक जीवन की मुख्य कल्पना विदेशी चीजों को पाने में सिमटी रहती है। इन चीजों को हासिल करके इनका प्रदर्शन और आडंबर करना ही एकमात्र मकसद बनकर रह गया है। लगता है कि आज अपने देश एवं समाज का विकास इसी लक्ष्य को पाने के लिए तड़प रहा है। गुजरती शताब्दी के इस अन्तिम दशक के अन्तिम दौर में विलासिता की वस्तुओं के विदेशी उत्पादों को पाने की अदम्य इच्छा सब ओर देखी जा सकती है। इसे देखकर अचरज होता है, क्या जीवन जीने का मकसद यही सब है ?

हाल के सालों यह दिखावटी एवं आडम्बरपूर्ण सामान अपने देश के बाजारों में कुछ ज्यादा ही अट गया है। अभी कल तक जिनका नाम सुना जाता था, उनको जल्दी से जल्दी खरीदकर अपना घर सजाने के लिए लोग रोजमर्रा की जरूरी चीजों को भी तिलाँजलि दे रहे है। पचास साल पहले जिस देश के लोग जहाँ स्वदेशी अपनाने के लिए अपनी आत्माहुति देने से भी नहीं हिचकता थे, उसी देश के वासी आज इन झूठे ‘स्टेटस सिम्बसल्स’ को पाने के लिए चोरी, स्मर्लिंग को भी बुरा नहीं समझते। इनके लिए पानी की तरह धन बहाना एवं थोथे प्रदर्शन को उजागर कर अभावग्रस्त लोगों में हीनता एवं ईर्ष्या भाव जगाना इनके लिए आनंददायक कार्य बन गया है। लोगों की भोगवादी प्रवृत्ति कहें या कम्पनियों का लुभावना आकर्षण जाल, हर कोई इसमें फँसने व जकड़े जाने के लिए आकुल-व्याकुल है। विदेशी कम्पनियाँ अपनी दिखावे भरी सामग्री को छोटे-छोटे बाजारों में मुहैया करा रही है और हम प्रतिष्ठित बनने के नाम पर अपना सर्वस्व दाँव पर लगाकर भी इन्हें खरीद रहे है।

इन सामग्रियों को बनाने-वाले अर्थशास्त्र के एक सिद्धान्त को उद्धृत करते हैं, ‘माँग पूर्ति का सृजन‘ करती है और इसे ही मद्देनजर रखकर ऐसी वस्तुओं को उपलब्ध कराना उनका यानि कि कम्पनी मालिकों का कर्त्तव्य है। फिर चाहे इसकी कीमत कुछ भी क्यों न हो और इन्हें खरीदने वालों को भले ही कुछ क्यों न करना पड़े। अनेकों अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनियाँ इस दौड़ में शामिल है। इनमें से एक है-’हीरों का व्यापार करने वाली ब्यूटीफुल डायमण्ड कम्पनी’। करोड़ों रुपए का कारोबार करने वाली इस कम्पनी ने हाल में ही भारत में विलासितापूर्ण सामग्रियों का अतिशय विस्तार किया है। एक सर्वेक्षण से पता चला कि है कुछ साल पहले टिफैनीज गोल्ड मास्टर, कार्न्कड, नारीटेक जैसे नाम केवल कुछ गिने-चुने पवारों में जाने जाते थे, लेकिन आज की दशा में ये उत्पाद उच्च से उच्च मध्यम वर्ग तक पहुँचते हुए मध्यवर्गीय परिवारों के स्टेटस सिम्बल बनते जा रहे है। विदेशी उत्पाद होने के कारण इनको विदेशों से लाने में पहले काफी दिक्कत उठानी पड़ती थी, परंतु अब तो विदेशी कम्पनियों ने भारतीय बाजारों को इनसे पाट दिया है।

भारतीय बाजारों में ऐसी कीमती चीजों के मिलने का सिलसिला सन् 1996 से कुछ ज्यादा ही शुरू हुआ है। टिफैनी व गोल्डमास्टर के 24 कैरेट के चमकते सोने के आभूषण, कार्न्कड की जगमगाती घड़ियाँ, चश्मे हो या क्रिस्टल वाले काँच के सामान व नारीटेक के चीनी, मिट्टी के बर्तन या मुख्यतः अमेरिका, यूरोन , थाईलैंड और जापान के विश्व प्रसिद्ध उत्पाद है। विकसित देशों की चकाचौंध का अनुकरण करना विकासशील देशों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। अतः आर्थिक समृद्धि के सर्वोच्च मानदण्ड आज अपने देश के काफी कुछ आवास गृहों को सुशोभित करने लगे है। इनकी शुरुआत बंबई जैसे महानगरों से हुई थी। बाद में दिल्ली, मद्रास, कलकत्ता एवं अन्य महानगरों में इनके पाँव काफी हद तक फैल चुके है। प्रतिष्ठा बटोरने के लिए लालायित लोग बड़े शान से इनका संग्रह करने में लगे हैं। प्रतिष्ठा की इस अंध-मानसिकता ने समाज को दो भागों में विभक्त कर दिया है- एक तो वह वर्ग है ता अपनी झूठी शान की चकाचौंध में स्वयं ही अन्धा हो रहा है, दूसरा वह वर्ग है जो अपनी गरीबी , भुखमरी अशिक्षा की मार से छटपटा रहा है।

‘स्टेटस सिम्बल’ बेचने वाले इन केन्द्रों की विक्रय नीति बड़ी ही लुभावने तरीकों से इनसान की ओछी वृत्तियों को बढ़ावा देती है। ग्राहकों से सम्बन्ध एवं अपनी चीजों का प्रस्तुतिकरण सुपर मॉडलों द्वारा किए जाते हैं। नारी की असीमता एवं अस्तित्व को मॉडल बनाकर, बाजारू रूप देकर धन कमाने का एक नया ही तरीका ईजाद कर लिया गया है। यह आकर्षण जाल इतना लुभावना है कि कमजोर मानसिकता के लोग सहज ही इसमें फँस जाते हैं और एक संक्रामक बीमारी की तरह स्टेटस सिम्बल का रोग उनको अपनी चपेट में ले लेता है।

भारतीय महानगरों में अभी तो केवल ‘सलोन’ कम्पनी की ही वस्तुएँ ही आयी है। अभी तो कार्टियर, पाटेक, फिलिप, हैरीविस्टन, वाटरफोर्ड, टायरान, बेलोक, रायलडाल्टन, पेजबुड, स्वारोवस्की एवं स्टूबेन जैसे अति कीमती कम्पनियों के सामानों का प्रवेश होना बाकी है। स्टेटस सिम्बल बटोरने के लोभी जब इतनी सारी कम्पनियों के सामानों को देखेंगे तो उनका क्या होगा। प्रतिष्ठित होने की यह अंधी चाह में हम अपना विकास कर रहे है अथवा अपने एवं अपने परिवार के लिए तनाव एवं अलगाव की दरारें पैदा कर रहे हैं यह ठहरकर सोचें तो हमें अपने ऊपरी चकाचौंध की क्षणिक आभा के तले सब कुछ अँधेरे में घिरा नजर आएगा। शायद इसीलिए महाकवि कालिदास अपनी अमर कृति अभिज्ञान शाकुन्तलम् में की गए है-

औत्सुक्य मात्र भवसाय यति प्रतिष्ठज्ञ क्लिश्नति लब्ध परिपालनवृत्तिरवे॥

यानि कि ऐसी प्रतिष्ठा की प्राप्ति केवल उत्सुकता को समाप्त कर देती है, किन्तु बटोरे गए इस साजो-सामान की रक्षा करना निहायत कष्टकारी होता है।

इसीलिए भारतीय मनीषियों ने प्रतिष्ठा का यथार्थ मानदण्ड मनुष्य की सात्त्विक वृत्तियों के उत्कर्ष को माना हैं जो अपनी परिणति में जीवन शान्ति और सन्तोष से भर देती है, लेकिन इसे अपना दुर्भाग्य ही कहेंगे कि हम अपना जीवन-स्तर उठाने के लिए वैचारिक एवं भावनात्मक उत्कर्ष का कोई प्रयास न करके आभूषण , फर्नीचर, घरेलू सजावट के समान, सौंदर्य प्रसाधन बटोरने में लगे हैं । बदले में इनकी परिणति हमें तनाव जन्य मानसिक व्याधियों की बढ़ोत्तरी करके हम अशान्त-परेशान होते चले जा रहे है।

गीताकार ने जीवन-सूत्रों को समझाते हुए कहा है। ’अशान्तस्य कुतो सुखम्’ यानि कि अशान्त व्यक्ति को सुख कैसा ? शान्ति आह्लाद एवं प्रसन्नता तो सात्विक मनोभूमि में उपजती एवं पनपती है। शताब्दी के इस अंतिम दौर में हमें अपनी प्रतिष्ठा के मूल्याँकन एवं मानदण्डों पर फिर विचार करना होगा। हमारा व्यक्तिगत ही नहीं सामाजिक, साँस्कृतिक और अन्तर्राष्ट्रीय जीवन गहरे संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। सब ओर भयानक उथल-पुथल छिड़ी है। हर तरफ बदलाव के स्वर है।

ऐसे में क्या हमारी प्रतिष्ठा के ये वर्तमान मानदण्ड भविष्य में अपना अस्तित्व बचाए रख पाएँगे ? प्राकृतिक नियमों एवं जीवन व्यवस्था के जानकर लोगों का जवाब इस बारे में स्पष्टतया नकारात्मक है। बदली हुई परिस्थिति एवं परिवेश में पुरानी चीजें बेकार पड़ जाती है। वसन्त आने पर पुराने पत्तों को झड़ना ही पड़ता है। गर्मी का मौसम आते ही जाड़ों के कपड़े अपनी उपयोगिता गँवा देते हैं।

इक्कीसवीं सदी मानव प्रजाति के लिए सर्वथा नयी परिस्थितियाँ लेकर आ रही है। यह नया युग-मानव की सात्विक प्रवृत्तियों का उत्कर्ष ही ‘स्टेटस सिम्बल’ के रूप में स्वीकार्य होगा। प्रतिष्ठा के नए मानक सद्गुण सत्कर्म एवं सत् चिंतन प्रधान होंगे। अंतर्राष्ट्रीयता भावनात्मक एवं वैचारिक उत्कर्ष के लिए माध्यम बनेगी। श्रेष्ठ विचार एवं रेष्ठ जीवन-पद्धति कहीं की भी हो उसे अपनाना गौरव की बात समझी जाएगी। साधन’-सुविधाओं का आदान-प्रदान स्टेटस सिम्बल को ऊँचा करने के लिए नहीं, जीवन निर्वाह के साधनों को दुनिया के अन्तिम छोर में बैठे इनसान को सुखी बनाने के लिए किया जायगा।

मानव की इस अनिवार्य भवितव्यता को समझते हुए हमारे लिए श्रेयस्कर यहीं है कि प्रतिष्ठा के नए मानदण्डों का अपनाना शुरू कर दें। अभी से किया गया अभ्यास ही भविष्य में अपना स्वभाव बन पाएगा। कहीं ऐसा न हो कि आज के ‘स्टेटस सिम्बल’ बटोरने का लोभ हमें घटिया एवं गो दर्जे का आदमी प्रमाणिक कर दे। सत्य को समझना, तथ्य को अपनाना ही समझदारी है। अपनी सात्विक प्रवृत्तियों का उत्कर्ष करके ही हम भविष्य में अपनी प्रतिष्ठा बचाए रख सकेंगे।


प्रतिभाओं पर चढ़ा है राष्ट्र-भूमि का ऋण

अतीत का जगद्गुरु भरत-भविष्य में विश्वगुरु कैसे बनेगा ? यह सवाल हमें एकबारगी चौका देता है । यह नहीं हमें कल्पनाओं के सौंदर्य लोक से यथार्थ की मरुभूमि में ला खड़ा करता है। हमारा अतीत कुछ भी क्यों न रहा हो, वर्तमान में हम विज्ञान और तकनीकी न की छोटी-छोटी जानकारियों के लिए चतुर देशों के सामने याचक है। यहाँ उन्हें इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि उन्होंने बड़ी चालाकी से हमारे देश का ज्ञान ही नहीं, ज्ञानियों को भी हासिल कर लिया। उनके बिछाए जाल में अपने देश की प्रतिभाएँ फँसती चली गयीं और हम प्रतिभाहीन होते गए।

ज्ञान की अनन्त जलधारा प्रतिभा की नदी में ही प्रवाहित होती है। बुद्धि तो सिर्फ छान-बीन करती है, आविष्कार-अनुसंधान का श्रेय तो प्रतिभा को जाता है। किसी भी राष्ट्र के वैभव-विकास एवं समृद्धि का शाश्वत आधार है। अपनी भारतमाता सभ्यता की शुरुआत से ही प्रतिभाओं को जनम देने में अग्रणी रही है। आज भी उसकी कोख बाँझ नहीं हुई। दुनिया के आँकड़े यह सिद्ध करते हैं। कि विश्व की सर्वाधिक प्रतिभाएँ भारत में जन्म लेती है, पर हम उन्हें न उचित साधन दे पाते हैं और न सम्मान। इसके अभाव में वे पलायन कर जाती है और अपनी भारतमाता अपने प्रतिभावान सपूतों से वंचित होती जाती है ।

नवीनतम सर्वेक्षण से स्पष्ट है कि 50,000 से एक लाख भारतीय प्रतिवर्ष पश्चिमी देशों में जाकर बस जाते हैं। उपयुक्त कार्यक्षेत्र अत्याधुनिक सुविधा-साधन इन्हें वहाँ की ओर आकर्षित करता है आर्थिक आकर्षण एवं भारी सम्मान के कारण ही उच्च प्रतिभाएँ विदेशों में जाकर बस जाती हैं इनमें वैज्ञानिक इंजीनियर, डाक्टर व मेधावी छात्र शामिल है। इस तरह हर साल भारत से 5560 से 7554 की संख्या में उच्चस्तरीय प्रतिभाएँ विदेशों में अपना आश्रय खोज लेती है। सन् 1990 के कुल 40,000 के आँकड़े के मुकाबले अब यह संख्या 596000 तक जा पहुँची है, जिसमें तकरीबन 24094 इंजीनियर शामिल है। वैज्ञानिकों में लगभग 23 % पश्चिमी एशिया , 30 % अमेरिका तथा 11% पश्चिमी यूरोपीय देशों में है।

भारतीय तकनीकी संस्थानों से सर्वाधिक प्रतिभा-पलायन 68 % होता है। इसी तरह कम्प्यूटर इंजीनियरिंग की 69% एवं केमिकल इंजीनियरिंग की 53% प्रतीभाएँ पलायन कर जाती है। (इण्डियन स्पेस रिसर्च आर्गनाइजेशन) भी इन दिनोँ भारतीय अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों के पलायन से काफी चिन्तित है। इस संगठन ने स्वीकारा है कि कम से कम पिछले छह सालों में 600 वैज्ञानिक देश छोड़कर विदेश में जा बसे है। 1995-96 में 42% कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी के तथा कम्यूनिकेशन्स के जूनियर साइंटिस्ट विदेश गए है। इसरो के प्रबन्धन तन्त्र ने स्वीकार है कि प्राइवेट सेक्टर एवं बहुदेशीय कम्पनियों का आर्थिक एवं अन्य आकर्षण कुछ ज्यादा ही है पलायन की यह दशा आई. आई. टी. में कुछ ज्यादा ही गम्भीर है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान पवई (आय. आय. टी.) बम्बई की एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक उच्च प्रशिक्षण प्राप्त छह से 10 हजार भारतीय प्रतीएँ हर साल विदेशों में जा बसती हैं उनमें बी. टेक के 36.7 फीसदी , एम. टेक के 29.3 फीसदी एवं 13% पी. एच. डी. सकालर होते हैं। आई. आई. टी. बम्बई से 46% मद्रास से 43% तथा इलेक्ट्रानिक्स और कंप्यूटर विज्ञान के प्रशिक्षितों का एक बड़ा भाग विदेशों में नौकरी या व्यवसाय तलाशता है। भारत के कुल आई. आई. टी. स्नातकों का लगभग 70% हिस्सा विदेश गमन कर जाता है।

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की दशा भी काफी दयनीय हैं यहाँ 4250 लोगों की आबादी के पीछे एक डाक्टर है, लेकिन यहाँ से 25 से 30 हजार डाक्टर भागकर विदेशों में जा बसें है। शायद इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को चिकित्सा के क्षेत्र में मानव शक्ति का बड़ा दानी देश कहा है। इस सम्बन्ध में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली ने हाल ही में प्रकाशित अपनी एक सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा है कि 1956 से 1990 के बीच हर साल 8 % से 63.3 % तक डाक्टरों का पलायन हुआ है। इनमें से 88.9 % तो सिर्फ अमेरिका में बसे हुए है। देश के प्रतिभा-पलायन के बारे में प्रोफेसर सुखाले ने एक गम्भीर अध्ययन किया है। उनके निष्कर्ष के मुताबिक 90 % प्रतिभाएँ विदेश जाने के सपने सँजोती रहती है।

सन् 1992 में विभिन्न देशों की जनसंख्या के आधार पर प्रतिभाओं का प्रतिशत है-ताइवान 0.68, सिंगापुर 0.69, कोरिया 0.54, हांगकांग 0.49, मैक्सिको 0.35, ब्राजील 0.13 तथा भारत 0.06 है। प्रति दस लाख आबादी में संलग्न वैज्ञानिक एवं इंजीनियर हैं, जापान में 4569, ताइवान 1426, कोरिया 1283, सिंगापुर, 960, मैक्सिको 217, इण्डोनेशिया 152 थाईलैंड 150 एवं भारत 132। भारत में प्रतिभाओं की सर्वाधिक कमी का कारण उनका व्यापक पलायन है।

प्रतिभा-पलायन का यह इतिहास काफी पुराना है। 400 से 300 बी. सी. में एथेन्स आज के अमेरिकी वैभव व प्रतिभा के समान प्रबुद्ध वर्गों का केन्द्र था। एथेन्स में सुकरात के शिष्य प्लेटो ने एक अकादमी का गठन किया। इसी तरह अरस्तू एवं लीसियम ने 335 वी. सी. में एक अकादमी बनायी। यह अकादमी पूरे ग्रीस में आकर्षण का केन्द्र अकादमी पूरे ग्रीस में आकर्षण का केन्द्र बिन्दु बनी। 300 बी. सी. में ग्रीस के 60 प्रखर बुद्धिमानों में से 45 एथेन्स और अलेक्जेण्ड्रिया पलायन कर गए थे। 300 बी. सी. में सिकन्दर ने स्वीकार किया था कि देश की चहुँमुखी प्रगति के लिए विज्ञान के आविष्कारों की नितान्त आवश्यकता है। उसका भारत अभियान करने का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य यहाँ की प्रतिभाओं का अपहरण करना भी था।

अपहरण न कर पाने पर भी वह महर्षि दण्डायन को मनाने में सफल रहा। ये महर्षि दण्डायन ही वहाँ जाकर डायोजिनिस कहलाए। इन्होंने वहाँ पूरे देश की लाइब्रेरी एवं संग्रहालय के संचालन का दायित्व सँभाला। उनके द्वारा संचालित लाइब्रेरी उस समय विश्वविख्यात बनी। यहाँ पर ज्योतिष , वनस्पतिशास्त्र , जीवविज्ञान, रसायन एवं भौतिक आदि अनेक विषयों के प्रख्यात विद्वान एवं अन्वेषक उनके अधीन काम करते थे यहाँ सो जाने-माने विद्वान थे, जो वहाँ उनका सान्निध्य पाने के लोभ से पहुँच गए थे। इसी तरह ग्यारहवीं एवं बारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में इटली का सेलार्नो बोलाँगों तथा फ्राँस का पेरिस की पेरिस यूनिवर्सिटी भी कतिपय विशिष्ट प्रतिभाओं से धन्य हुई थी।

प्रतिभाओं के कारण ही कोई भी केन्द्र या संस्था महत्वपूर्ण होती है। इनके पलायन से ये उजड़ जाती है। 1204 में विसंजा यूनिवर्सिटी अपने प्रोफेसरों के कारण ख्यातिलब्ध थी। इसी तरह प्रतिभाओं के आने से 1215 में अरेजो यूनिवर्सिटी, 1222 में पाडुआ, 1228 में वर्सेली, 1246 में सिएना, 1343 में पीसा तथा 1339 में फ्लोरें स विश्वविद्यालय का निर्माण सम्भव हो सका। 1250 में इटली में 9 विश्वविद्यालय , फ्राँस में 5 स्पेन में चार तथा इंग्लैण्ड में 2 विश्वविद्यालयों का निर्माण हुआ। तकरीबन 1224 में बोलगा विश्वविद्यालय से प्रतिभा पलायन का सिलसिला शुरू हुआ, जिससे वहाँ अच्छी-खासी परेशानी हो गयी, इससे बचने के लिए वहाँ एक अधिनियम बनाया गया। 1228 में इसी वजह से पेरिस विश्वविद्यालय काफी परेशानी में फँस गया। अतः किंग हेनरी तृतीय ने 1229 में इसे रोकने के लिए अनेक प्रयास किये। 2400 सालों के पश्चिमी दुनिया के इतिहास को देखने पर हम वहाँ प्रतिभा-पलायन से उत्पन्न संकट एवं उससे निपटने के लिए बरती गई नीतियों का ब्योरा पढ़ सकते हैं।

परन्तु न जाने क्यों हमने अपने देश की प्रतिभाओँ को लगातार खोते चले जाने के बावजूद चुप्पी साध रखी हैं ब्राजील में आज भी भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की भरमार है। ब्राजील के अंतरिक्ष संगठन ने 70 के दशक में इस मौसम अनुसंधान केन्द्र खोला। अनुसंधान केन्द्र में नियुक्ति के लिए वहाँ वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों का अभाव था। भारत से गए वैज्ञानिकों एवं तकनीकी विशेषज्ञों का अभाव था। भारत से गए वैज्ञानिकों एवं तकनीकी विशेषज्ञों के कारण ही यह संगठन चल सका। इस बात की स्वीकारोक्ति इस केन्द्र के संस्थापक डॉ. फेन्डेन मेंडन ने स्वयं की है। सेण्ट जोन्स डेस कम्पोस में 20 से अधिक भारतीय वैज्ञानिक अपने परिवारों के साथ रह रहे है। जीन संश्लेषण के प्रणेता एवं नोबुल पुरस्कार विजेता डॉ. हरगोविन्द खुराना एवं विश्वप्रसिद्ध अन्तरिक्ष विज्ञानी सुब्रह्यण्यम चन्द्रशेखर भी मूल रूप से भारतीय ही है। विश्वविख्यात सिद्धान्त सापेक्षितावाद का मर्म विश्व में वैज्ञानिक एडिंगटन के बाद इन्हें ही मालूम था।

सन् 1960 के दशक तक विकसित और विकासशील दुनिया को हम जैसे लोगों की खूब जरूरत थी। उनके विकास में हमारे मजदूर, इंजीनियर, डाक्टर, वैज्ञानिक बहुत मददगार थे। इसी वजह से उन्हें लुभा-ललचाकर ले जाया गया। इससे पहले 19 वीं सदी में ब्रिटिश उपनिवेशों मारीशस सूरीनामा फिजी , दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में हमारे लोग जबरदस्ती ले जाए जाते थे। विश्वयुद्ध के दौरान लाखों व्यक्तियों का पलायन हुआ। पश्चिम जर्मनी में तब दस लाख लोग गए। अमेरिका, कनाडा, जर्मनी , बिअन अथवा ऐसे किसी अन्य देश में जाने और बसने की ललक आज भी भारत के एक बड़े वर्ग में है। एक नवीनतम अनुमान से पता चलता है कि 105 देशों में करीब ढाई करोड़ से अधिक भारतीय फैले हुए है। कइयों की कई पीढ़ियों वहीं जन्मी हैं।

इन दिनों अधिकतर भारतीय प्रतिभाएँ अमेरिका और कनाडा जाना पसन्द करती है। इन प्रवासियों में तीन महत्वपूर्ण परिवर्तन देखे जा सकते हैं। ये पहले इंग्लैंड जाकर बसते थे। सातवें दशक में इन्हें अमेरिका के चकाचौंध ने आकर्षित किया। आठवें दशक में इन्होंने कनाडा में पड़ाव डालना शुरू किया। पश्चिमी देश इन युवा प्रतिभाओं को लुभाने के लिए भाँति -भाँति के उपाय भी खोजते रहते हैं।

युवा प्रतिभाएँ किसी भी देश की जीवनी-शक्ति है। जब यही बाहर निकलने लगे तो राष्ट्रीय अस्तित्व का कमजोर होना स्वाभाविक हैं पहले कभी ये युवक इंग्लैण्ड के आक्सफोर्ड एवं कैम्ब्रिज विश्वविद्यालयों में अध्ययन हेतु जाते थे और वहाँ के होकर हर जाते थे। आज इनकी मंजिल अमेरिका हो गयी है। इस ओर भागने की गति इतनी तेज है कि आँकड़े बताते हैं कि दुनिया में किसी भी देश के मुकाबले भारत में प्रतिभा -पलायन सर्वाधिक है।

यहाँ की कुल प्रतिभा पलायन का 90 प्रतिशत अमेरिका में तथा शेष 90 % अन्य पश्चिमी देशे में होता है। हालाँकि अब कनाडा में रहने वाले प्रवासियों की संख्या बढ़ रही हैं अमेरिका में 1974 से 1988 के बीच प्रवासी वैज्ञानिकों की संख्या दुगुनी हो गयी है। पहले इनका %5.8 था, अब यह बढ़कर 105 हो गया हैं अमेरिका को यह प्रतिभाएँ जिन 5-6 देशों से मिलती है, उनमें भारत मुख्य है। न्यूयार्क में, कुवैत व सउदी अरब में केरल की नर्सो का जाल -सा बिछा हुआ है। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड के बड़े-बड़े संस्थानों में भरी संख्या में भारतीय वैज्ञानिक और इंजीनियर काम कर रहे है। विशेष रूप से कृषि व डेरी वैज्ञानिक।

अमेरिका में एक इंजीनियर को प्रशिक्षित करने में लगभग 403 लाख. रुपये लगते हैं और ऐसे संस्थानों को चलाने में 16,650 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। भारत की अपेक्षा अमेरिका में यह खर्च छह गुना अधिक है। इस तरह अमेरिका को मुफ्त में इंजीनियर मिल जाता है, जिसका वह भरपूर लाभ उठा लेता है। दीपक नैय्यर की प्रसिद्ध पुस्तक ‘माइग्रेशन रैमिटैसेज एण्ड कैपिटल ग्रोथ’ में प्रतिभा-पलायन से हुए भारत के नुकसान का हवाला दिया है। प्रतिभाओं की यह लागत तथा लाभ का समाजीकरण यदि भारत में हो सकता तो तो हम आज ही विश्व समुदाय का नेतृत्व करने की स्थिति में होते।

प्रतिभा-पलायन को रोकने के विरोध में अक्सर भूमण्डलीकरण का तर्क दिया जाता है। इस तर्क की गहराई से छान-बीन करें तो पता चलेगा, यह चतुर देशों का बेहद चतुराई भरा जाल है, जिसमें फँसकर वे मानव संसाधन को लगातार अपनी ओर खीचते जा रहे है। अपने देश का उच्चशिक्षित वर्ग खासतौर पर इसमें बुरी तरह जकड़ चुका है। उसे यह बात भूल चुकी है कि भूमंडलीकरण समूचे विश्व में एक से प्रतिभाओं एवं संसाधनों के प्रवाह का नाम है, न कि समूचे विश्व से किसी एक या कुछ खास देशों की ओर संसाधनों का खिंचते चले जाना।

यह स्थिति भारत सहित सभी विकासशील देशों के लिए गम्भीर समस्या बन चुकी है। ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने विकासशील देशों से प्रतिभा-पलायन की गम्भीर कठिनाई का अध्ययन करने के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारत ने अमेरिका को 1967 से 1985 के दौरान करीब 51 अरब डालर की मानव सम्पदा सौंपी। सिर्फ चिकित्सकों के विदेशों में बस जाने से तीस करोड़ डालर का नुकसान हुआ है। करीब 25 से 35 हजार डाक्टर विदेशों में अपना व्यवसाय अपनाए हुए है, जबकि एक डाक्टर को तैयार करने में पाँच से सात लाख रुपये तक खर्च होते हैं। विकासशील देश भी करोड़ों रुपये इनकी लाभ उठने से वंचित रह जाते हैं। अध्ययन के मुताबिक अमेरिका की समृद्धि में 28% से अधिक भारतीय बुद्धि का योगदान है।

प्रतिभा को खोते जाने की समस्या किसी भी देश के लिए शोचनीय है। इस समस्या का एक दयनीय पहलू और है-प्रतिभा संवर्द्धन की उपेक्षा। 1990 के दशक के आँकड़ों के अनुसार भारत में ही नहीं अन्य देशों में भी विज्ञान स्नातकोत्तर छात्रों की संख्या घटती जा रही है। मौलिकता के इस परिवेश में ज्ञान का मानदण्ड व्यावसायिक लाभ हो गया है। प्रतिभा दैवी वरदान अवश्य है। परन्तु जन्म के समय यह अंकुरित अवस्था में होती है। जीवन में इसे विकसित, संवर्धित करने पर ही इसके उपयुक्त लाभ लिए जा सकते हैं। इसकी ओर बरती जा रही उपेक्षा शुभ सूचक नहीं है।

प्रतिभा-पलायन की रोकथाम एवं इसका सतत् सम्वर्द्धन दो समस्याएँ नहीं है। वस्तुतः ये दोनों एक ही समस्या के दो पहलू है। लगातार इनके बढ़ते जाने का कारण अपने समाज में बढ़ती संकीर्ण स्वार्थपरता, भ्रष्टाचार एवं येन-केन प्रकारेण धन बटोरने की हविश है। ऐसी स्थिति में न तो हम प्रतिभाओं को समुचित सम्मान दे पाते हैं, स्थिति का विश्लेषण करते हुए अल्फ्रेड टेन ग्रिस वोल्ड ने ठीक ही कहा है जो राष्ट्र स्वयं पर विश्वास नहीं करता वह बुद्धिजीवियों का विश्वास कैसे हासिल कर सकता है प्रतिभाओं के रोकने का उपाय उन्हें सम्मान देना है। इसका एक उदाहरण भारत में टाटा कन्सल्टैन्सी समूह के रूप में देखा जा सकता है।

पलायन की इस विकरालता को रोकने के लिए कतिपय उपाय किए भी गए है। 1984 में वैज्ञानिकों को काफी सुविधाएँ मुहैया कराई गई। इस दिशा में संयुक्त राष्ट्र के ‘टोक्ने’ के कार्यक्रम तथा 1991 में यूनेस्को के ‘यूनिटिविन’ योजना भी मूल्यवान रही। इनके 21 नेटवर्क कार्यक्रमों के माध्यम से विभिन्न विश्वविद्यालयों के बीच संपर्क स्थापित करने के साथ ही छात्रों को उन्हीं के देश में उच्च शिक्षा हेतु आर्थिक सहयोग का प्रावधान है।

अपने देश में प्रतिभाओं को पल्लवित -पुष्पित करने के लिए मलेशिया-ब्राजील आदि देश भी कम्भीरता से कारगर उपाय खोज रहे हैं। उन्होंने अपने राष्ट्र की समृद्धि के लिए इनका समुचित सुनियोजन भी शुरू कर दिया है। चीन के अपनी सर्वोत्तम बुद्धि एवं ज्ञान के वाहक दिमागों को अमेरिका और यूरोप की ओर पलायन से रोकने के लिए व्यापक कार्यक्रम बनाए है। हाल ही में चीन के एक प्रमुख आर्थिक दैनिक ‘बिजनेस यूज ऑफ बीजिंग’ के अनुसार 1995 में अमेरिका , फ्राँस और ब्रिटेन में 13 त्न चीनी विद्वानों की वापसी हुई है।

प्रतिभा के सुनियोजन के लिए हमें अपनी सोच को औपनिवेशिकता के दायरे से बाहर निकलकर सोचना होगा। प्रशासनिक ही नहीं, सामाजिक स्तर पर, ऐसी सोच पैदा करनी होगी कि डाक्टरों, वैज्ञानिकों, प्रोफेसरों, लेखकों, विचारशीलों को नौकरशाहों की तुलना में अधिक सम्मानित समझा जाय, क्योंकि यही प्रगति के पहिए है, जिनके बल पर देश प्रगति की मंजिल प्राप्त करता है। प्रतिभा न केवल ज्ञान का पर्याय है, बल्कि सत्य, तप, त्याग एवं शान्ति का वाहक भी है। बट्रेण्ड रसेल ने सच्ची प्रतिभाओं की पहचान बताते हुए कहा है कि “सच्ची प्रतिभा किसी भी प्रलोभन और मानसिक आवेग के सामने नहीं झुकती। यह सदा शांत और पक्षपात रहित रहकर रचनात्मक सृजन में निरत रहती है।” जिस समाज एवं राष्ट्र में ऐसी प्रतिभाओं की बहुलता होगी, वह राष्ट्र उन्नति और प्रगति के शिखर तक अवश्य पहुँचेगा।

अपने देश में सदा से विद्या एवं विवेक की अभ्यर्थना होती आयी है। आज फिर से इसे सामाजिक प्रतिष्ठा का मानदण्ड बनाना होगा। इसके साथ प्रतिभाशालियों को भी सोचना होगा कि मातृभूमि के प्रति उनका भी कुछ कर्त्तव्य है। माँ का प्यार किसी प्रलोभन से अधिक मूल्यवान है। प्रतिभाएँ भारत माता की वरिष्ठ संतानें है। उन्हें अपनी योग्यता को राष्ट्र के नव-निर्माण के लिए सोचना चाहिए। यदि वे अपनी कायरता को छोड़कर ‘न दैन्यं न पलायनम् ‘ की नीति अपनाएँगी तो निश्चित ही उनके प्रयास भारत देश के नए भविष्य का सृजन करेंगे। ऐसा भविष्य जिसमें वह फिर से विश्व गुरु के आसन पर प्रतिष्ठित होगा।


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समाज से आंखें मूँदकर अपने स्वार्थ में ही लगे रहना सभी तरह से हेय, निषिद्ध और सामाजिक अपराध माना गया है।

गिरे हुओं को उठाना, पिछड़े हुओं को आगे बढ़ाना, भूले को राह बताना और जो अशांत है, उसे शान्ति दे देना, यही वस्तु ईश्वर की सच्ची सेवा है।


विकास की योजना समग्र ही बने

समाज में विषमताजन्य विसंगतियों का जब तक अस्तित्व रहेगा, तब तक विकसित होने का अस्तित्व रहेगा, एक प्रकार से विडम्बना ही कहलाएगी। शिक्षित-अशिक्षित, गरीब -अमीर की असमानताएँ ऐसी है, जिन्हें हटा-मिटा कर ही वास्तविक अर्थों में विकसित बना जा सकता है। उससे कम में नहीं।

आश्चर्य तब होता है, जब इन विद्रुपताओं में डूबे समाज और राष्ट्र भी स्वयं को उन्नत मानने लगते हैं और यह विश्वास करने लगते हैं कि उन्होंने प्रगति की अन्तिम सीमा का स्पर्श कर लिया। यदि प्रगति यही है, तो फिर यही कहना पड़ेगा कि इसकी परिभाषा ही गलत है। धनवान बनना-यह उत्कर्ष का एक पहलू हो सकता है, सम्पूर्ण और पूरी की जा सकती है, पर जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति नहीं। आज मान्यताएँ उलटी हो गई है और सर्वोपरि लक्ष्य भौतिक समृद्धि को ही मान लिया गया है एवं इसी के द्वारा विपन्नता को मिटाने का प्रयास किया जा रहा है। सच्चाई तो यह है कि इस प्रक्रिया द्वारा खाई को पाटने का जितना प्रयास किया जाता है, उतनी ही वह और चौड़ी होती जाती है।

उजाले से अंधेरे को मिटाने का सिद्धान्त सर्वत्र लागू नहीं होता। अर्थशास्त्रियों का यह कथन भी उपयुक्त नहीं कि वैभव की विपुलता द्वारा निर्धनता को मिटाया जा सकता है। वास्तविक समाधान तो तभी हो सकेगा, जब मानवी आस्थाओं और मान्यताओं में घुसी तत्सम्बन्धी विकृतियों का अन्यथा इसके अभाव में कोई भी प्रयास एकाँगी और अधूरा ही कहलाएगा। मान्यताएँ यदि दीन-हीन बनी रहीं और वैभव-विलास की लिप्सा उस पर सन्निपात की तरह सवार रही, तो सम्पदा जन्य विषमता को मिटाने की लाख कोशिश भी कोई परिणाम प्रस्तुत न कर सकेगी।

उदाहरण के लिए , अमेरिका को लिया जा सकता है। इसका न्यूयार्क शहर वहाँ का सबसे ऐश्वर्यवान शहर है, फिर भी वहाँ कंगालों की उपस्थिति लोगों को आश्चर्यचकित करती है। न्यूयार्क की कुल जनसंख्या 73 लाख है। इसका पाँचवाँ हिस्सा अत्यन्त ही दरिद्र जीवन बिता रहा है। इसी से इस आशंका को बल मिलता है कि धन निर्धनता को मिटाने का कोई कारगर उपाय किया नहीं गया, इससे सम्पत्ति के केन्द्रीकरण को बढ़ावा मिला है, जिसके फलस्वरूप धनपति-धनाध्यक्ष बनते चले गए और निर्धन कंगाल।

न्यूयार्क के इन कंगालों को ‘मोल पीपुल’ के नाम से पुकारा जाता है। घरविहीन ये दरिद्र, न्यूयार्क के चारों ओर फैली भूमिगत रेल मार्गों की अंधेरी सुरंगों में रहने के लिए विवश है। इसलिए इनका यह विशेष नामकरण किया गया है। ‘मोल पीपुल’ अर्थात् छछूँदर की तरह बिलों में रहने वाले। खाने के लिए बिलों में रहने वाले। खाने के लिए ये लोग समय-समय पर उसमें समा जाते हैं। होटलों और रेस्तराँओं से फेंकी गई जूठन से इनका उदर-पोषण होता है। इसके अतिरिक्त कुछ लोग खाली कनस्तरों को बेचकर किसी प्रकार अपनी जीवन-नौका खेते हैं।

विलासपूर्ण जीवन बिताने वाले शहर के निवासियों को भले ही इन तहखानों में रह रहें भाग्यहीन लोगों के बारे में पता न हो, पर इनकी विद्यमानता समृद्ध लोगों में हो रहे विकास का एक विकृत पहलू उजागर करती है।

न्यूयार्क के मेनहटन शहर में आय सम्बन्धी विषमताएँ तो पहले से ही मौजूद थीं, पर वर्तमान दशक में वह और भी उग्र हो गई है। आयगत विषमताओं की दृष्टि से अस्सी के दशक में जहाँ इसका स्थान ग्यारहवाँ था, वहीं नब्बे की दशाब्दी में वह पाँचवें स्थान पर आ गया है। इसी से अन्दाज लगाया जा सकता है कि तथाकथित विकास और समृद्धि के नाम पर शहरों की आर्थिक विसंगतियों कितना बढ़-चढ़ कर सामने आ रही है।

यों तो इन बेघर लोगों के पुनर्वास के लिए ‘कोएलिशन फॉर दि होमलेस’ नामक एक संगठन कार्य कर रहा है। पर इन्हें अन्यत्र बसाने और इनका जीवन स्तर सुधारने सम्बन्धी प्रयास में सफलता नगण्य जितनी ही मिली है। गोबर के कीड़े को स्वर्ग-सुख का आनन्द भला और कहाँ मिल सकता है। ऐसी ही स्थिति इन लोगों की है। इतने वर्षों से उस अंधेरी दुनिया में रहते हुए वे उस अंधेरी दुनिया में रहते हुए वे उसके इतने आदी और अभ्यस्त हो गये है कि वहाँ से अन्यत्र किसी खुले मकान में रहने के लिए अब तैयार नहीं। इसके लिए दोषी वे नहीं, वह समाज -व्यवस्था है, जिसने ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कीं।

भौतिक विकास बुरी बात नहीं है, पर इसके साथ-साथ हमारी आस्थाओं और मान्यताओं का परिमार्जन भी होना चाहिए। यदि ऐसा न हो सका, तो जीवन और समाज में संतुलन-समीकरण उत्पन्न करने वाले उस समग्र विकास से हम वंचित रह जाएंगे , जिसके न बन पड़ने पर कितनी ही विसंगतियाँ उठ खड़ी होती हैं? हमारी सोच में यदि आध्यात्मिकता आ सकती, तो इस एक ही अवलम्बन के सहारे हम अपनी भौतिक और आत्मिक दोनों ही प्रकार की प्रगति को साधते हुए उस विकास को उपलब्ध कर सकते हैं, जिसे सर्वोपरि कहा गया है। इससे कम में उस असमानता को दूर कर पाना सम्भव नहीं, जो शिक्षित-अशिक्षित , गरीब-अमीर जैसी कितनी ही विकृतियों के रूप में इन दिनों दिखाई पड़ रहीं है।


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नाग के आधा निगल लिये जाने पर भी मेढ़क मक्खियाँ खाने का लालच नहीं छोड़ता, यह कितना आश्चर्य है। ?


जाग्रत राष्ट्र का ब्रह्मक्षत्र बल

ब्रह्मचारी कौत्स के आगमन से अयोध्यावासियों में आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता छा गई। नगर की वीथियों, चतुष्पथ में नगर निवासी एक-दूसरे से पूछते दिखाई पड़ते-सुना है महर्षि वरतन्तु के शिष्य कौत्स पधारे हैं? उत्तर में हाँ सुनकर वे अचरज में डूब जाते। क्योंकि उनमें से सभी को मालूम था कि सर्वथा अपरिग्रही महर्षि वरतन्तु परम तपस्वी है। वे महान् अध्यात्मवेत्ता होने के साथ ही महान् वैज्ञानिक भी है। उनकी अनुसन्धानशाला के चमत्कारी अन्वेषणों से अयोध्या की जनता परिचित ही नहीं लाभान्वित भी थी।

किन्तु महर्षि वरतन्तु की एक विशेषता से अयोध्यावासी ही नहीं सम्पूर्ण भारतवासी परिचित थे, वह यह कि महर्षि अपने एकांत में कोई व्याधात नहीं पसन्द करते। उन्होंने अपने शिष्यों को भी यही सिखाया था कि अध्यात्मवेत्ता एवं वैज्ञानिकों को सर्वथा एकान्त में रहना चाहिए। तभी वे जनहित के लिए महत्वपूर्ण शोध कर सकते हैं। पिछले कई दशकों से किसी ने उन्हें अथवा उनके शिष्यों को नगर में भ्रमण करते अथवा इधर-उधर घूमते हुए नहीं देखा। परंतु आज महर्षि के प्रधान शिष्य उनकी अनुसंधानशाला के वरिष्ठ वैज्ञानिक कौत्स को राजमहल की ओर जाते हुए देख सभी चकित थे।

महाराज रघु ने उनके आगमन का समाचार जैसे ही सुना, स्वयं द्वार तक आकर उन्हें लेने आए। वह अपने अतिथि का योग्य स्वागत-सत्कार करने के उपरान्त कुशल-क्षेम पूछ रहे थे।

“कहिए भगवान्। ऋषियों में श्रेष्ठ मंत्र द्रष्टा, हम सबके पूज्य ब्रह्मर्षि वर-तनतु कुशल से तो है न ? उनकी तथा अन्य ऋषियों की शोध साधना निर्विघ्न रूप से चल रही है ? विद्या अभ्यासी ब्रह्मचारीगणों के अध्ययनादि में कोई व्याघात तो नहीं पड़ रहा ?”

“आश्रम एवं आम के वृक्षों को आँधी के वृक्षों को आँधी -पानी से कोई नुकसान तो नहीं पहुँचा और वे हरिणशावक तो कुशल से है न जिनकी नाभि का नाल ऋषियों की गोद में सूखकर गिरता है और जिन्हें ऋषिगण यज्ञ के लिए बटोरी गयी कुशा भी खाने से नहीं रोकते।”

“उन नदियों का जल तो ठीक है न, जिनके तट पर आप ऋषि-मनीषियों की शोधशालाएँ स्थित है और आश्रमों में संचित अन्न तथा कन्द , फल, मूलादि तो सुरक्षित है न, जिनके द्वारा आप लोग स्वयं की देह रक्षा करते हुए आगत ऋषि-मनीषियों , अतिथियों का सत्कार करते हैं।

मनीषी कौत्स महाराज की विनम्रता से अभिभूत थे। जितना हतप्रभ महाराज उन्हें देखकर हुए थे, उतना ही वे महाराज को देखकर हुए थे। अपने आश्रम में रहकर अभी तक वे महाराज की वीरता, प्रजापालन, विद्वत्ता के किस्से सुनते आए थे, लेकिन कोई शासक वह भी चक्रवर्ती ,भरतखण्ड का एकछत्र सम्राट् इतना अकिंचन, इतना अपरिग्रही हो सकता है, इसकी उन्हें कल्पना नहीं हो रही थी।

वह एकटक महाराज की और देखे जा रहे थे। महाराज का शरीर न केवल सुगठित और बलिष्ठ था, बल्कि तपस्या की अलौकिक आभा से दमक रहा था। उनके पाँवों में खड़ाऊं, कमर में एक सामान्य-सी धोती जिसका एक सिरा उत्तरीय की तरह उनके कंधों पर पड़ा हुआ। उनका आवास जो राजप्रसाद या राजमहल कहलाता था, कौत्स को आश्रम जैसा ही लगा।

अद्भुत है अपने प्रजावत्सल महाराज। उनका मस्तक राजर्षि के इस अनूठेपन पर श्रद्धा से झुक गया। अभी कुछ समय पहले उन्होंने महाराज द्वारा किए गए विश्वजित् यज्ञ की चर्चा सुनी थी। विलक्षण था इस महान् यज्ञ का आयोजन । इसमें जो ऋषिगण भागीदार हुए थे, उन्होंने इसकी चर्चा उनके गुरुवर्य ब्रह्मर्षि वरतन्तु से की थी।

इस यज्ञ में राजर्षि रघु का संकल्प था कि ऋषिगणों में जनहित के लिए कृषि, चिकित्सा, शिक्षा आदि विभिन्न क्षेत्रों में जो भी अनुसंधान किए हैं।, उन्हें वे जन-जन तक पहुंचाएंगे। साधनों की कमी से हमारे महर्षियों, ब्रह्मर्षियों के अथक श्रम से प्राप्त निष्कर्ष उनकी प्रयोगशालाओं में ही बन्दी रहें, ऐसा नहीं होगा।

बड़ा साहसपूर्ण था महाराज का संकल्प । स्थान-स्थान पर यज्ञ संसदों का आयोजन, ऋषियों एवं राजकर्मचारियों के सम्मिलित प्रयास से सामान्य नागरिकों तक महर्षियों के अनुसंधान के नवीनतम निष्कर्ष तक पहुँचने लगे। शीघ्र ही इसकी परिणति भी सामने आयी। कृषि की उपज चौगुनी हो गयी। तकनीकी ज्ञान की प्रचुरता के कारण भारतीय व्यवसाय विश्व के शीर्ष पर जा पहुँचा। कला-संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान की गतिविधियाँ इतनी बढ़ गयी कि भारत की धरती को विश्व के विभिन्न भू-भागों के निवासी स्वर्गलोक कहने लगे।

महाराज ने सचमुच अनोखी और अनूठी विश्व-विजय की थी। उनके इस कार्य से ऋषियों में और अधिक उत्साह जागा। उन सबने महर्षि वरतन्तु से निवेदन किया, कि अबकी बार कुछ ऐसे अनुसन्धान किए जाएँ जिससे प्राकृतिक आपदाओं पर पूरी तरह से रोक लगायी जा सके। पर्यावरण को कुछ इस तरह सन्तुलित एवं नियन्त्रित किया जाय कि प्रकृति कुपित ही न हो। योजना ब्रह्मर्षि वरतन्तु को पसन्द आयी। उन्होंने इसका प्रारूप भी तैयार कर डाला, परन्तु इसमें चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का व्यय अपेक्षित था। अपनी अनुसंधानशाला के वरिष्ठ वैज्ञानिक कोत्स को उन्होंने इसीलिए महाराज के पास भेजा था।

परंतु महाराज स्वयं पिछले विश्वजित् महायज्ञ को सफल बनाने में अपने सारे धन-साधन की आहुति दे चुके थे। चक्रवर्ती सम्राट फुस की साधारण झोपड़ी में रह रहा था। मृतिका पात्रों के अलावा और कुछ नहीं था।

सुखी-संतुष्ट प्रजा के सुख में राजा भी सुखी है, प्रसन्न है। आनन्द-उल्लास उसके तेजस्वी मुख पर लहरा रहा है, किंतु मेरी कार्य पूर्ति कैसे हो ? मुझे महाराज इतनी बड़ी धनराशि कैसे दे पाएँगे ? सोचते-विचारते कौत्स मुनि हृय से निराश होकर धीरे-धीरे बोले-

“राजन् ! यह देखकर कि आपकी प्रजा में दुःख’दैन्य की छाया मात्र खोजे भी नहीं मिलती, मुझे अत्यधिक प्रसन्नता हुई है। चक्रवर्ती होकर सम्पूर्ण धन-धान्य प्रजाहित में लगा देने के बाद आपका तेज और यश और भी बढ़ गया है।”

“आपका कल्याण हो राजन्! मैं ही नहीं गुरुदेव वरतन्तु सहित समस्त ऋषि शक्तियाँ आप पर प्रसन्न है।” आशीर्वाद का हाथ उठाते हुए मनीषी कौत्स चलने को उद्यत हुए ।

“अरे ऐसा क्यों ? आप कुछ आज्ञा भी तो करें.......भारत भूमि के सौभाग्य तिलक ब्रह्मर्षि वरतन्तु की आज्ञा को स्वीकार-शिरोधार्य करके मैं धन्य हो जाऊँगा। आप कुछ कहें भी तो मैं प्राणपण से प्रयत्न करूंगा।” राजा ने स्वभावानुसार अनुनयपूर्ण स्वर में अधिक जानने की जिज्ञासा की। ब्रह्मर्षि वरतन्तु का शिष्य उनके द्वार से निराश लौट जाए, इससे बढ़कर अमंगल और दुःख की बात और क्या हो सकती है ?

“क्या कहूँ राजन! पिछले समय किए गए आपके विश्वजित् यज्ञ से अनुसन्धानरत ऋषिगणों का उत्साह द्विगुणित हुआ है। आपने जिस तत्परता से पिछले शोध-निष्कर्षों को जनसामान्य तक पहुँचाया, उससे वे सभी अति उत्साहित है। इसी उत्साह में भरकर उन्होंने प्राकृतिक आपदाओं को रोकने के लिए एक महत्वाकाँक्षी शोध योजना बनायी है। इसमें चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का व्यय अपेक्षित है। इसी उद्देश्य से ऋषिगणों ने मुझे अपना प्रतिनिधि बनाकर आपके पास भेजा है।

“अच्छा...। “ अमित पराक्रमी राजा के सामने क्षण भर के लिए एक ऊँची अंधकारमयी दीवार-सी खड़ी हो गयी।

“नहीं ऋषिवर ! ऐसा कदापि सम्भव नहीं कि रघु की झोपड़ी से आप इस प्रकार निराश लौट जाएँ। रघु अपने शरीर के रक्त की एक-एक बूँद और प्राणों की एक-एक श्वास शेष रहते आपको विश्वास दिलाने का प्रयास करेगा कि ऋषि सत्ताओं की इच्छाओं को आज्ञा व कर्तव्य के रूप में पूरी करके ही राजपुत्र धरती पर जीवित रह सकता है। आप विश्राम करें दो चार दिवस...........।”

राजा के पुरुषार्थ ने उनकी आत्मा को ललकारा, जो समष्टि में समायी हुई थी। आज उसके सामने अद्भुत चुनौती थी। उसके पौरुष ने हार मानना नहीं सीखा था। उसके साहसिक अभियानों की कहानियाँ लोक विख्यात थीं, जनता उन्हें चाव से सुनती थी, क्योंकि राजा उनका नितान्त अपना था।

सैनिक अपने राजा के साहसिक अभियानों की बात बड़े उत्साह एवं उल्लास से लोगों को सुनाते थे। प्राग्ज्योतिषपुर (असम) नरेश ने किस तरह उनकी सेनाओं का आदर-सत्कार करते हुए अपने युद्धकला में निपुण विशालकाय हाथी उपहार में दिए थे। जब अन्य राजाओं की स्त्रियाँ विलाप करने लगीं तो कैसे उनके दयालु राजा रघु ने उनके पति राजाओं को मुक्त कर दिया।

हिमालय पर अपनी विजय पताका फहराने के निमित्त जब उसकी घाटियों और ऊँची-नीची चढ़ाई पर उनके अपने घोड़े दौड़ रहे थे, तो पर्वतीय खनिजों की लाल-लाल धूल टापों से उड़कर हिमालय की चोटियों तक किस भाँति छा गयी थी ? भोज पत्रों का मर्मर स्वर पहाड़ी बाँसों के छेदों में घुसकर कैसा विचित्र स्वर उत्पन्न करता था तथा देवदारु के तनों से बंधे हुए हाथियों के गले की साँकलें रात्रि में कैसे चमकती थीं, यह बताते समय वे सजीव चित्र-सा खींच देते।

भल्ल नामक बाणों से मधुमक्खियों से भरे छत्ते के समान दाढ़ियों वाले बर्बरे यवनो के सिर किस प्रकार कट-कट कर ढेर हो गए थे और काम्बोज की लड़ाई में अख़रोट ही अख़रोट आ झरते थे आदि बताते समय लगता मानो व फिर से काबुल के साहसिक अभियानों में पहुँच गए। सुनने वाले अपने महाराज के साहस पर चमत्कृत रह जाते।

आज वही साहसी महामानव एक कठिनाई में आ पड़ा हैं यह बात भी पहले इन्हीं सैनिकों को ज्ञात हुई। कौत्स का आगमन नागरिकों को जितना चौंकाने वाला था, उनका यकना उससे भी ज्यादा रहस्यमय था। इस रहस्य का भेद जैसे ही नागरिकों को पता चला, वे राजा के लिए कुछ करने के लिए उतावले हो उठे। वणिकों, जौहरियों , किसानों, राजगीरों , स्वर्णकारों , लौहकारों और कुम्भकारों आदि जिसने भी सुना अपने राजा की चिंता और कठिनाई शीघ्रातिशीघ्र दूर करने को आकुल हो पड़े।

रात्रि का द्वितीय प्रहर बीत रहा था कि राजपथ पर भाग-दौड़ मच गयी। पर केवल लोगों की पदचाप सुनायी पड़ती थी, मानो गूँगे चल-फिर रहे हो। हर आने वाला जैसे के भण्डार उड़ेल रहा था। हर एक के मुंह पर एक ही बात थी, हमारे देश के ऋषि हमारे देश का राजा चिरायु हो। ब्रह्मतेज और क्षात्रतेज सक्रिय रहेगा, तो देश सुख-समृद्धि से भरा रहेगा, तो देश सुख-समृद्धि से भरा रहेगा। स्वर्ण देने वालों में से प्रत्येक का सिर ब्रह्मर्षि वरतन्तु और राजर्षि रघु के प्रति श्रद्धावनत था।

ब्राह्मी वेला समाप्त होते-होते महाराज रघु स्नान संध्या से निवृत्त हो नागरिकों की कुशलक्षेम जानने के लिए बाहर निकले। यह उनका रोज का नियम था। कभी-कभी तो वे सूर्य निकलने से पूर्व अपने अश्व सहित 100-200 मील तक परिक्रमा कर डाला करते थे। आज जब महाराज अपने कटिबन्ध में कसी हुई दो तलवारों को चलाते हुए बाहर आए तो उनके अचरज की सीमा न रही।

राजद्वार के सामने स्वर्ण मुद्राओं का एक छोटा−मोटा पहाड़-सा खड़ा था। दोपहर होते-होते वहाँ पर नागरिकों का जमघट-सा लग गया। हर कोई स्वर्ण उड़ेल रहा था।

“मैं अपनी आवश्यकतानुसार केवल चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ ही लूँगा।” ब्रह्मचारी कौत्स नियम बँधे थे।

“पर यह धनराशि तो आपके निमित्त आयी है। इसे आपको ही लेना होगा।” महाराज का आग्रह था। ऋषि ने सहायतार्थ नागरिकों की ओर नजर उठाई।

“यह संकल्पित अर्थ है। हम नहीं लेंगे और फिर आपकी कृपा से हमारे पास क्या कमी है।” सभी

ने एक स्वर से मना कर दिया और मुँह फेर कर चल दिए। अन्त में महाराज को उसे राजकोष भिजवाना पड़ा, ताकि फिर से वह जनकल्याण के काम आ सके।

राजा रघु और ऋषि कौत्स, अब तक नेत्रों से जनसमूह को देखते हुए सोच रहे थे कि यदि देश का नेत्रों से जनसमूह को देखते हुए सोच रहे थे कि यदि देश का ब्रह्मतेज एवं क्षात्रतेज सक्रिय एवं कर्त्तव्य रहे तो समाज अपने आप ही उदार एवं दृढ़ चरित्र हो जाता है। धरती स्वयमेव स्वर्गादपि गरीमयी हो जाती है।


आत्मबल की साधना करें - परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

गायत्री तपोभूमि मथुरा के प्राँगण में 8-7-68 की वेला में परमपूज्य गुरुदेव का प्रवचन

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियों, भाइयों ! मानव जीवन भगवान द्वारा प्रदान की गयी एक बहुमूल्य निधि है। मनुष्य विश्व का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। यह एक ऐसा सत्य है जिसे तथ्यों के आधार पर भी स्वीकार करना ही पड़ता है साथ ही, हर व्यक्ति इस गौरवपूर्ण स्थिति को अनुभव भी करता है। परन्तु दूसरी ओर यह बात भी उतनी ही सत्य है कि अधिकाँश व्यक्ति क्षुब्ध , दीन-हीन एवं दुखी जीवन जीते रहते हैं। इस प्रकार अनन्त मनुष्यों की समस्याएँ भी अनेक है, जिसके कारण वे हमेशा दुखी रहते हैं, उदास रहते हैं। वास्तव में हमें इस मानव-जीवन को भौतिक दलदलों में फँसकर रोने-कलपने की अपेक्षा ऊपर उठाना चाहिए तथा परमेश्वर के द्वारा बनाये गये इस संसार में सुख -शान्ति का रसास्वादन करते हुए अपने आपको धन्य बनाने का प्रयास करना चाहिए। यह बात भी सत्य है कि भगवान ने वरिष्ठता के कारण मनुष्य को कुछ अधिक ही दिया है, परन्तु यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम अपनी इन विशिष्ठ क्षमताओं को न पहचान पाये, न विकसित कर पाये और न ही उनको सही दिशा दे पाये यही कारण है, कि भगवान का इतना श्रेष्ठ अनुदान पाकर भी हम दुखी है और रात-दिन कलपते रहते हैं।

प्राचीनकाल में भारतीय तत्ववेत्ता ऋषि-मुनि इस तथ्य को जानते थे तथा वे मनुष्य जाति को आगे बढ़ाने , प्रगति करने एवं सुखी-संपन्न बनाने के लिए सदा प्रयत्नशील रहते थे। बेटे, आज हम उसी परम्परा के अनुसार मनुष्य को सुखी बनाने हेतु युग-निर्माण योजना के माध्यम से प्रयत्नशील है। ताकि हम भी भगवान के श्रेष्ठ पुत्र को सुखी बना सकें।

वास्तव में आपको यह मालूम नहीं है कि हमें सुख कहाँ मिल सकता है तथा शान्ति कहाँ मिल सकती है? इस सुख-शान्ति की खोज में हम इधर-उधर मारे-मारे फिरते हैं, परन्तु हमें वह चीज प्राप्त नहीं होती है। हिरन जंगलों में पानी के लिए रात भर घूमता रहता है, परन्तु उसे पानी नहीं मिलता है। दिन में वह रेगिस्तान में चमकते बालू के ढेर को पानी समझकर उधर को जाता है, परन्तु वहाँ भी उसे निराशा ही हाथ लगती है। वही हालत आज मनुष्यों की हो रही है। अशान्त मनुष्य भी मृगतृष्णा की तरह इधर-उधर भटक रहा है। वह समझता है कि हमें शान्तिं उत्तम स्वास्थ्य से, धन से और पागल हो रहा है। उसे मालूम नहीं कि किसी भी क्षेत्र में मनुष्य को आगे बढ़ने के लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। उसे अपनी प्रत्येक गतिविधियों का सर्वेक्षण करना पड़ता है एवं उसके साथ कुछ नये नक्षत्र निर्धारित करने पड़ते हैं।

यह एक कटु सत्य है कि मनुष्य शरीर धारण करने का अवसर ही प्रगति का शुभ अवसर है। परन्तु यह बात ध्यान देन योग्य है कि प्रगति की आकाँक्षा मात्र से प्रगति सम्भव नहीं है। इसके लिए मनुष्य को प्रयास , पुरुषार्थ एवं साहस करना पड़ता है। सामान्य लौकिक पद प्रतिष्ठा के लिए भी जब पुरुषार्थ करना पड़ता है, तो आत्मिक प्रगति जैसे महान लक्ष्य के लिए इसकी उपेक्षा करना नितान्त भूल मानी जानी चाहिए। पहले हम स्वास्थ्य की बात को ही लें, तो आज के युग में मनुष्य अच्छी सेहत के लिए विटामिन-ए, बी, सी से लेकर न जाने क्या-क्या अभक्ष्य पदार्थ खाता रहता है, परन्तु ताकत मिलने की बजाय उसका पतन ही होता चला जाता है ।आज कृत्रिम रूप से ताकत बढ़ाने के विभिन्न प्रयोगों के कारण हर व्यक्ति 40-50 वर्ष की आयु में ही अपने को वृद्ध मानने लगता है। उसमें कुछ करने की हिम्मत , साहस प्रायः समाप्त होती दिखाई देती है। उनकी शक्तियाँ प्रायः समाप्त होती दिखाई देती है। उनकी शक्तियां प्रायः पंगु हो जाती है।

परन्तु अगर हम महापुरुषों की ओर ध्यान दें, तो पायेंगे कि इन लोगों ने अपने जीवन में 50-60 साल के बाद ही महान कार्य सम्पादित किये है। महात्मा गान्धी ने 53 वर्ष की आयु के बाद ही अनेक भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया था। युवावस्था में ही वृद्धावस्था आ घेरने को प्रमुख कारण यह है कि हमें इस बात की जानकारी नहीं है कि हमारे शरीर के संचालन के लिए प्रकृति ने भी कुछ व्यवस्था बना रखी है। अगर हम उस क्रम में कोई गतिरोध पैदा करते हैं, तो हमारे स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव आते हैं। हमारा शरीर कमजोर हो जाता है। उस समय मौसम एवं वातावरण के परिवर्तन का भी प्रभाव शरीर पर पड़ता है। हमारे शरीर पर विजातीय तत्वों का भी आक्रमण होता है।परन्तु आपको मालूम नहीं है कि हमारे शरीर के भीतर ऐसी प्रतिरोधक शक्ति भी भगवान ने दे रखी है, जो उन आक्रमणकारी तत्वों को नष्ट करती रहती है। यह सब मनुष्य के शरीर के अन्दर होता रहता है। वास्तव में यह एक परिशोधन प्रक्रिया है, जो प्रकृति द्वारा सम्पन्न होती है।

मनुष्य को अपने शरीर को ठीक रखने के लिए अपने आहार-विहार तथा संयम पर ध्यान रखना चाहिए। बीमारी के दिनों में हमें यह करना चाहिए । बीमारी के दिनों में हमें यह करना चाहिए कि अपने शरीर को अनावश्यक श्रम से बचायें और प्रकृति को अपना काम करने दें। प्राकृतिक चिकित्सा जैसे-जल, मिट्टी, धूप आदि की सहायता प्राप्त करें । घबराने की अपेक्षा, रोग निवृत्ति में थोड़ा समय लगे तो उसे धैर्यपूर्वक हमें सहन कर लेना चाहिए। इस प्रकार थोड़ी-सी सावधानी बरत लेने पर हम रोग से छुटकारा पा जायेंगे और स्वस्थ हो जायेंगे। वस्तुतः स्वास्थ्य के बारे हमें पूरी जानकारी होनी चाहिए, तभी हम स्वास्थ्य बल से लाभ उठा सकते हैं। अन्यथा हम अल्पायु में ही बूढ़े हो जाएँगे। स्वास्थ्य बल का लाभ लेने के लिए हमें संयम नियम, आहार, विहार, श्रम आदि तत्वों पर विशेष ध्यान देना होगा। हमने साल में दो बार गायत्री अनुष्ठान की प्रक्रिया इसीलिए चलायी है, ताकि आप लोग अपने स्वास्थ्य बल को ठीक रख सके।

स्वास्थ्य बल के बाद दूसरा बल विद्या बल माना गया है। लोग हमें कहते हैं। कि विद्या मनुष्य को शान्ति प्रदान करती है, मनुष्य को ऊँचा उठा देती है, इस संदर्भ में आप भी कुछ प्रकाश डालने-समझाने की कृपा करें।

मित्रो, यह सत्य है कि प्राणि जगत में सर्वोपरि गौरव पाने का अधिकार जो मनुष्य को मिला है, उसका मूल कारण उसकी विकसित बुद्धि एवं विवेक ही है। मनुष्य में यही एक ऐसी विशेषता है, जिसके कारण वह प्राणिजगत का स्वामी तथा गुरु बना हुआ है ।यद्यपि यह सत्य है कि शारीरिक रूप से पशुओं की तुलना में मनुष्य बहुत हीन निर्बल तथा अपूर्ण है, किन्तु परमात्मा से विशेष वरदान के रूप में मिली हुई बुद्धि ने उसे सर्वश्रेष्ठता प्रदान कर दी है। मनुष्य के बौद्धिक विकास के प्रमाण के रूप में हम आज के उन्नत ज्ञान , आश्चर्यजनक वैज्ञानिक प्रयोग , विशाल उद्योग, चिकित्सा विज्ञान आदि की ओर देखकर गर्व अनुभव करते हैं।यह सब वास्तव में मनुष्य की बुद्धि चमत्कार है।

विद्या के अभाव में उन्नति असम्भव है। यही वह पूँजी है जो सच्चे अर्थों में मनुष्य का उत्थान करती और यश , गौरव का अधिकारी बनाती है। ऐसा एक भी उदाहरण इस संसार में नहीं पाया जा सकता, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि बिना ज्ञान एवं विद्या के सभी प्रकार की उन्नति एवं प्रगति सम्भव मानी जा सकती है। वास्तव में उत्कर्ष का एक ही उपाय है और वह है-’ज्ञान’ - ‘विद्या’-इसके बिना मनुष्य की आध्यात्मिक या भौतिक प्रगति सम्भव नहीं है। मनुष्य के मानसिक, सामाजिक, आर्थिक एवं व्यक्तिगत हर प्रकार की उन्नति का मूल कारण विद्या ही है। आज संसार में विद्यावान् की ही पूजा होती है। अशिक्षित-अज्ञानी की कहीं पूछ नहीं होती है। जिस प्रकार नेत्रहीन के लिए सारा संसार अंधकार से पूर्ण रहता है सुन्दर दृश्यों तथा रंगों के आनन्द से वह वंचित रह जाते है उसी प्रकार ज्ञान के अभाव में मनुष्य इस संसार का मधुर रहस्य, ज्ञान-विज्ञान, साहित्य , कला आदि का रसास्वादन नहीं कर सकता है। इसके अभाव में मनुष्य इस स्वर्गीय संसार में पशु के तुल्य ही माना जा सकता है। ऐसा मनुष्य केवल पेट और प्रजनन में ही इस दुर्लभ मानव जीवन को नष्ट कर देता है।

इस संसार में आत्मा से लेकर जितने भी शारीरिक सुख हैं, वह विद्या के अभाव में हम प्राप्त नहीं कर सकते हैं। ज्ञान को -विद्या को ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति माना गया है। वास्तविक वस्तु वह है, जो सदैव रहने वाली हो, चिरस्थायी हो। संसार में हर वस्तु एक निश्चित काल पश्चात् नष्ट हो जाती है। धन नष्ट हो जाता है, तन जर्जर हो जाता है, साथी-सहयोग छूट जाते हैं, केवल ज्ञान ही एक ऐसा अक्षय तत्व है जो कहीं भी किसी भी अवस्था और किसी काल में मनुष्य का साथ नहीं छोड़ता है।

धनबल को भी एक शक्ति माना गया है, किंतु यह उसकी वास्तविक शक्ति नहीं है। इसका मूल स्रोत ज्ञान ही है। ज्ञान के आधार पर ही धन की उपलब्धि होती है और ज्ञान के बल पर ही समाज में लोगों को अपना सहायक तथा सहयोगी बनाया जाता है। अज्ञानी व्यक्ति के लिए संसार की कोई वस्तु सम्भव नहीं है अतः हम चाहते हैं कि आप भी ज्ञानवान बने। अपने घर में एक छोटा-सा पुस्तकालय रखें तथा हमारे साहित्य को पढ़े और दूसरों को भी पढ़ाने का प्रयास करें। यह साहित्य हमने अपने मार्गदर्शक के आदेशानुसार तैयार किया है इसमें हमने अपने प्राण का अंश लगाया है और अपनी भावनाओं को , संवेदनाओं को और अन्तः की पीड़ा को उड़ेल दिया है। आप इसे पढ़ेंगे तो पका विचार बदलता चला जायेगा तथा आप समाज में ऊँचा स्थान प्राप्त करते हुए चले जायेंगे।

प्रायः धनबल के बारे में लोगों की मान्यता यह है कि यह धन जिसके पास अधिक होगा वह उतना ही प्रसन्नचित होगा तथा उसके अन्दर खुशियों का भण्डार होगा, परन्तु हमारा यह सोचना गलत है। आज जिसके पास जितना अधिक धन है, वह उतना ही अधिक अशान्त तथा सुख -चैन से वंचित है। शक्ति भी उसमें नहीं है। हमारे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि धन को बुरी चीज है, निःसंदेह धन एक शक्ति है और वर्तमान समय तो ऐसा हो गया है, कि बिना धन के मनुष्य का जीवन निर्वाह भी सम्भव नहीं रहा। परंतु यह बात भी सत्य है कि धन तभी तक शुभ और हितकारी है,जब तक उसे ईमानदारी के साथ कमाया जाय और उसका सदुपयोग किया जाय। इसके विपरीत यदि हम धन कमाने और चारों तरफ से उसे बटोर कर अपनी तिजोरी में बन्द करने को ही अपना लक्ष्य बना लेते हैं और इस समाप्ति का चाहे जैसा भी दुरुपयोग करने का निश्चय कर लेते हैं, तो यह हमारे लिए अभिशाप बन जाता है । ऐसे मनुष्य अपना पतन तो करते ही है, साथ ही दूसरे लोगों को उनके उचित अधिकार से वंचित करके विपत्ति का कारण बनते हैं।

आजकल समाज में, देश में यही हो रहा है। जिसमें अक्ल, चतुरता और शक्ति की तनिक भी अधिकता है, वह कोशिश करता है कि मैं संसार की अधिक से अधिक सुख-सामग्री अपने कब्जे में कर लूँ। अपनी इस हवस को पूरा करने के लिए वह अपने पड़ोसियों के अधिकारों के ऊपर हमला करता है और उनके हाथ की रोटी, मुख का ग्रास छीनकर खुद मालदार बनना चाहता है। वास्तव में एक आदमी का मालदार बनने का अर्थ है-अनेकों का शोषण, अनेकों की सुख-सुविधाओं का अपहरण। इस प्रकार समाज के अंतर्गत अधिक धन इकट्ठा होने से आपस में राग-द्वेष पनपता है। इस तरह हम देखते हैं कि धन की अधिकता समाज में मनुष्य-मनुष्य के बीच विरोध पैदा करता है, वैमनस्य को बढ़ाता है । वास्तव में हमने मिट्टी के ढेलों को धन मानकर रखा है। यह हमारी कमी है। इसके द्वारा कभी भी मनुष्य का कल्याण न तो हुआ है और न कभी सम्भव होगा।

मनुष्य धन इसलिए जमा करना चाहिए है कि उसे आगे सुख और संतोष मिल सके, किंतु जमा करने की यही आदत जब तृष्णा बन जाती है तो उस व्यक्ति को धर्म एवं अधर्म का ख्याल नहीं रहता और अज्ञानतावश वह ऐसा काम कर बैठता है, जिसके द्वारा उसका कल्याण होने की बजाय उसे जीवन भर दुःख भोगना पड़ता है। अतः हमें ऐसे धन से संचय होने पर हमारी आने वाली पीढ़ी का भी संस्कार दूषित हो जाता है। अतः हम इस धनबल के पीछे न पड़कर संस्कारवान बनने का प्रयास करे ही, अपने बच्चों को भी संस्कारवान बनायें।

वास्तव में हमारे ख्याल से स्वास्थ्य बल , विद्यालय एवं धनबल से ज्यादा महत्वपूर्ण एक और बल है, जिसका नाम-’आत्मबल’ है। आत्मबल के धनी ऋषि-मुनियों ने, हमारे पूर्वजों ने सब कुछ प्राप्त कर लिया था। यह एक तथ्य है कि भौतिक बलों से भौतिक आत्मिक प्रगति के साधन मनुष्य को मिलते हैं। महान पुरुष मनुष्य को मिलते हैं। महान पुरुष जिस स्वर्गीय परिस्थितियों में निवास करता है। तथा उसे जो भी विभूतियाँ जगत में प्राप्त होती है। अन्य तीन बलों की जो बाते हमने बतलायी हैं, उससे इन चीजों की प्राप्ति नहीं होती है। हर मनुष्य को आत्मिक प्रगति एवं सफलता के लिए यही सिद्धांत अपनाना पड़ता है। आत्मबल ही मनुष्य की वह पूँजी है, जिसके आधार पर मनुष्य दैवी अनुग्रह, भागवत् कृपा एवं ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है।

मनुष्य को शरीरबल प्राप्त करने के लिए योग्यता, श्रम, कार्यकुशलता तथा ज्ञान बल के लिए अध्ययन , लेखन, शिक्षक, गुरु, साहित्य आदि की आवश्यकता पड़ती है। ठीक उसी प्रकार आत्मबल के लिए मनुष्य को संकल्प, संयम, आदर्शों के प्रति श्रद्धा एवं विश्वास की नितान्त आवश्यकता है। फूटे हुए बर्तन में दूध दुहने से कोई फायदा नहीं मिलता है, उसी प्रकार मनुष्य के भीतर कषाय-कल्मष भरे हों तो ईश्वर-प्रदत्त चीजों अर्थात् आत्मबल नहीं मिल सकता है। उसे पहले अपने आपका सुधार करना आवश्यक है। इसके द्वारा ही मनुष्य का कल्याण हो सकता है। अतः इसे अपने अन्दर धारण करने का प्रयास करना चाहिए। इसका एक ही माध्यम है कि व्यक्ति अध्यात्मवादी दृष्टिकोण अपनाए एवं परिस्थितियों से प्रभावित न हो।

आज हर व्यक्ति समस्याओं के जाल में निरंतर उलझता जा रहा है। इसका प्रमुख कारण है व्यक्ति के अन्दर आध्यात्मिक दृष्टिकोण का अभाव। हमें हर प्रकार से यह समझ लेना चाहिए, कि मनुष्य के विकास के लिए उसके सामने दो ही रास्ते है-(1) भौतिकवादी रास्ता और (2) अध्यात्मिक रास्ता। चाहे तो आप इसे प्रेय एवं श्रेय मार्ग भी कह सकते हैं। मनुष्य में उत्कृष्ट चिंतन की पृष्ठभूमि बनाने का काम अध्यात्म करता है। आत्मा में विद्यमान परमात्मा को हम कैसे विकसित करें, परन्तु आत का मनुष्य तो पूजा-पाठ , कर्मकाण्ड, अनुष्ठान तथा हनुमानजी को प्रसाद चढ़ा देने की प्रतिमा को ही अध्यात्म क्या , सब कुछ मान बैठा है यह उसकी भूल है। वास्तव में अध्यात्म का मतलब है-आदमी के चिंतन, चरित्र, आदर्श एवं व्यवहार का ऊँचा उठाना जो इस तथ्य को जानता है, वही सच्चा अध्यात्मवादी है।

प्रायः लोग मनौती मानने और प्रसाद चढ़ा देने, धूपबत्ती , अगरबत्ती जला देने और पूजा-पाठ को ही अध्यात्म मान बैठते हैं। वे नहीं जानते कि देवता बहुत ही व्यस्त होते हैं। एक कम्पनी का सँभालने में मैनेजर का कचूमर निकल जाता है, फिर भगवान को तो सारी सृष्टि का नियन्त्रण करना पड़ता है। अतः उसके पास उतना समय कहाँ जो आपके प्रसाद के लिए दौड़ा चला आवे और आशीर्वाद, वरदान दे जायें भगवान मूर्ख नहीं है जो आपकी माला और पूजा से प्रसन्न हो जाये। आपको अपने चरित्र एवं व्यक्तित्व को ऊँचा उठाना होगा तभी परमात्मा की अनुकम्पा आपको मिल सकती है। इसके लिए ऋषियों ने चार साधनाएँ बतलायी है, जो मनुष्य को करनी चाहिए। वे है-’सादा जीवन उच्च विचार’ आत्मवत् सर्वभूतेषु’, लोष्ठवत् परद्रव्येषु’ एवं ‘मातृवत् परदारेषु’। इन सूत्रों को अपनाकर ही हम अध्यात्मवादी बन बल-’आत्मबल’ आ सकता है।

अगर हम अध्यात्मबल का व्यापार करें तो अधिक लाभ कमा सकते हैं। गुरुनानक का उदाहरण सामने है । नामक के पिताजी ने नानक को 20 रुपये दिये और उन्हें व्यापार करने को कहा। आत्मबल के धनी नानक ने ऐसा व्यापार किया कि आज वह करोड़ों के व्यापारी बन गये। आपने अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर देखा होगा, वह आत्मबल का व्यापार है। आत्मबल का व्यापार अध्यात्म का व्यापार कहलाता है, भगवान बुद्ध, जो अपने बचपन में एक बूढ़े , बीमार तथा एक मरे हुए आदमी को देखकर घबरा गये थे, उन्होंने जब आत्मबल का व्यापार किया तो विश्व के अनेक जगहों में उनके मन्दिर सोने के बने हुए हैं। द्रौपदी ने भी अध्यात्म का व्यापार किया था। चीरहरण के समय भगवान ने उसे सभी मिलों का कपड़ा अनुदान में दे दिया था। दुशासन उसे नंगा न कर सका, कपड़े से कपड़े निकलते चले गये। अध्यात्म का ऐसा व्यापार किया कि सारे कि देश में आज जितने अधिक मन्दिर उनके बने हुए है, उतने मन्दिर राम के नहीं है। यही सबसे महत्वपूर्ण बल है।

एकलव्य ने भी अध्यात्म का व्यापार किया था और मिट्टी के द्रोणाचार्य से इतना सीख लिया कि कुत्ते का मुँह तक सिल दिया था। अर्जुन जो पहले कायर बना हुआ था, परन्तु भगवान श्रीकृष्ण के समझाने पर जब उसने भी अपने अन्दर आत्मबल धारण किया तो वह फायदे में रहा। भगवान आगे-आगे थे तथा उसके सारथी बनकर चल रहे थे।

बेटे, आत्मबल एक सुन्दर तथा नफे का व्यापार है। हम भी इसके व्यापारी है। हमारा आपसे निवेदन है कि आप भी भगवान की इस लिमिटेड कम्पनी में अपना शेयर खरीद लीजिए और भागीदार बन जाइये। आप भी फायदे में रहेंगे। सुना है रुड़की में हरिद्वार के पास एक बड़ा पावर हाउस है। उसी तरह भगवान के पास भी एक बिजलीघर है। उसी से हम सभी को जिसने आत्मबल का व्यापार किया है, शक्ति मिलती रहती है और हमारा काम चलता रहता है। इस आत्मबल की प्राप्ति अध्यात्म मार्ग पर चलने से ही होती है।

अध्यात्म एक भावना का नाम है, श्रद्धा का नाम है। आप जिस श्रद्धा एवं भक्ति के साथ गायत्री माता के फोटो को देखते हैं, आपको उसी प्रकार का लाभ मिलता है। इसे हम अध्यात्म का लाभ कहते हैं। अनुष्ठान उसे कहते हैं, जो किसी खास विधान एवं खास उद्देश्य से किया जाता है। अनुष्ठान में गर्मी के कारण हमने अनुष्ठान में आपको छुट दे रखी हैं यह एक तथ्य है। कि भगवान को प्राप्त करने के लिए भावना पवित्र करने के लिए आहार को ठीक करना परम आवश्यक है। आपके आहार के अनुसार ही भावना होगी। आपने गलत ढंग से पैसा कमाया है और उस पैसे का अन्न ग्रहण किया है तो आपकी भावना भी दूषित होगी। आपका आहार तमोगुणी होगा तो भावना भी उसी प्रकार की होगी। अतः हर साधक को अपने भोजन के बारे में सही मात्रा , सही समय तथा संस्कार सम्बन्धी दोष एवं अवाँछनीयता का ध्यान रखना चाहिए।

संस्कारवान बनने के लिए अपने आहार का नियंत्रण करना आवश्यक है, तभी हमारी उपासना में सामर्थ्य एवं बल की प्राप्ति होगी। हमने चौबीस साल तक जौ की रोटी तथा छाछ खायी हैं अपने को परिष्कृत -परिमार्जन किया है। वास्तव में उपासना के लिए अपने को पवित्र बनाना परम आवश्यक है। इसी कारण से कबीर ने कहा है-

कबिरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर। पाछे-पाछे हरि फिरैं, कहत कबीर-कबीर।

हमने चौबीस वर्ष जो आहार-संयम किया था, उसके कारण आज भी हमारी पाचनशक्ति ठीक है। हम जो ग्रहण करते हैं, उसे पेट ठीक ढंग से पचा लेता है। पिप्पलाद ऋषि ने अपना सारा जीवन केवल पीपल के फल से ही काटा था। इससे उन्हें बहुत फायदा था।

आहार के द्वारा मनुष्य के विचार बनते हैं। शास्त्रों में कहा गया है-’जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन।’ आपमें से अधिकाँश होटलों में खाते हैं वहाँ आपको जूठन भी मिलता है। वहाँ काम करने वाले नौकर ठीक से बर्तनों की सफाई या मँजाई नहीं करते हैं। ड्रम में रखे थोड़े से पानी में बार-बार धो-पोंछकर पुनः आपको परोस कर दे देते हैं। इस प्रकार के आहार द्वारा आपका अन्नमय कोश कैसे ठीक होगा ? आपकी उपासना कैसे ठीक ढंग से संचालित होगी।

आपने ब्रह्मचर्य व्रत पालन भी नहीं किया है। आपकी पत्नी कितनी खूबसूरत, सुकोमल आयी थी, आपने उसे साथ भी संयम नहीं बरता और बच्चे पैदा करते चले गये। आपकी थोड़ी-सी शक्ति अर्जित होती थी, वह भी बार-बार निकल जाती रहीं अगर आपको कुछ बनना है , उपासना-साधना करनी है, तो आपको सीमित ब्रह्मचर्य का पालन कर संयमशील बनना चाहिए, तभी मन की चंचलता थमेगी और आपका मन उपवास में लगेगा।

आपने अपनी जीभ को भी नहीं साधा है। इसके द्वारा न जाने क्या-क्या खाते रहते हैं। दिनभर बकरी की तरह से आपका मुँह चलता रहता है, जबकि यह कहा गया है कि बिना कड़ी भूख लगे मनुष्य को कुछ भी नहीं खाना चाहिए। इससे लाभ की बजाय हानि हो होती है। आपने अगर अपनी जीभ को साध लिया, किसी की चुगली नहीं की, कभी अभक्ष्य पदार्थ नहीं खाया, किसी का दिन नहीं दुखाया तो आपकी यह जीभ भगवान बन जायेगी। आप जिस किसी को भी जो कुछ कहेंगे वह उसके लिए वरदान सिद्ध हो जाएगा। हमने अपनी जीभ को अपनी इन्द्रियों को साधा है, तब ही यह चमत्कार आपको यहाँ दिखायी पड़ रहा है।

अनुसूया ने ब्रह्मचर्य का पालन किया था। एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश उनके पास भिक्षा माँगने गये और कहा कि आप कपड़ा निकाल करे देंगी तो हम ग्रहण करेंगे। अनुसूया ने अपने ध्यान में देखा तो मालूम पड़ा कि ये त्रिमूर्ति है। अतः वह बाल पड़ी कि आप लोग बच्चे हो जाएँ तो हम आपके आदेश का पालन करेंगे। इस प्रकार कहते हैं कि वे बच्चे बन गये तथा अनुसूया ने उन लोगों को प्रेम से भोजन कराया था। यह है बेटे, साधना-उपासना का महत्व, जो दो-दो कौड़ी के आदमी को महान बना देता है।

मित्रो, ब्रह्मचर्य के साथ साथ-साथ मनः-संयम भी बरतना आवश्यक है। संयम शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार का होता है। स्त्री -पुरुष के बीच एक स्वाभाविक आकर्षण होता है। जब भी कोई जवान व्यक्ति एक -दूसरे को देखते हैं, तो उन्हें लगाव महसूस होता है। दोनों अगर अपनी भावनाओं में परिवर्तन कर लें तो दोनों ही महानता की ओर अग्रसर हो सकते हैं। ऐसी अनेक घटनाएँ है जो इस प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक संयम का प्रतिपादन करती है। शिवाजी ने जब मुगलों पर विजय पायी थी, तो उनके सेनापति ने एक सुन्दर युवती को लाकर उनके सामने खड़ा कर दिया था। शिवाजी में शारीरिक एवं मानसिक संयम विद्यमान था। उसे देखकर उनकी भावनाओं में परिवर्तन आया और वे बोल उठे-काश अगर हमारी माँ भी ऐसी सुन्दर होती तो हम भी सुन्दर होती तो हम भी सुन्दर होते। उन्होंने सेनापति को बुलाकर भला-बुरा कहा और उसे उसके निवास स्थान पर छोड़ आने का निर्देश दिया।

स्वामी विवेकानन्द जब विदेश गये थे, तो एक लड़की ने भी उनकी परीक्षा ली थी, परन्तु वे डे नहीं, अपनी वासना को जला दिया ओर उस लड़की को अपनी शिष्या बना लिया। एक साथ काम करने वाली आगे चलकर सिस्टर निवेदिता के नाम से प्रख्यात हुई। यह सब आप जानते ही है। यह सब संयम की बात है। अपनी भावनाओं के परिवर्तन की बात हैं साधक को इस प्रकार का होना आवश्यक है। आपको आत्मबल प्राप्त करने के लिए अध्यात्म के रास्ते पर चलना होगा और उसके लिए निम्नलिखित सिद्धान्तों को अपनाना होगा। पहला-माला के विधान को समझना होगा-यानी कि व्यक्तित्व को परिष्कार करना होगा। दूसरा -एक नये किस्म की आरती एवं दीपक का थाल सजाना होगा-अर्थात् अपने को भगवान के प्रति समर्पित करना होगा। तीसरा-आहार पर नियंत्रण करना होगा। चौथा-शारीरिक एवं मानसिक संयम साधना होगा और पाँचवाँ-स्वाध्यायशील बनना होगा। आप इस प्रकार कर सकेंगे तो मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आपका जीवन महान बन जायगा।

आज की बात समाप्त॥ ॥ ॐ॥


जिज्ञासाएँ आपकी-समाधान हमारे

प्रश्न:- आप लोग नारा देते हैं कि-”हम बदलेंगे-युग बदलेगा” किंतु आसपास की परिस्थितियों को, वातावरण को बदले बिना क्या हम बदल सकते हैं ? ऐसे युग बदलेगा किस तरह माना जाय ?

उत्तर- यह सत्य है कि परिस्थितियाँ प्रतिकूल है एवं वातावरण विषाक्त है। किन्तु परिस्थितियों को बदलकर व्यक्ति की मनःस्थिति को बदलने की दिशा में हुए अनेकानेक प्रयोग अब तक असफल ही सिद्ध हुए है। चाहें वह पूँजीवाद-प्रत्यक्षवादी भौतिकवाद द्वारा सुख-सुविधाओं के साधनों का समुच्चय एकत्र करना हो अथवा साम्यवाद द्वारा व्यक्ति को समान अधिकारों को दिये जाने का वादा। दोनों ही स्थितियों में व्यक्ति के मानस के परिवर्तनों, नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठापना की दिशा में कोई योगदान नहीं मिला है। साम्यवाद का किला ढह चुका है एवं भोगवाद मानसिकता तनाव से ग्रसित मानव समुदाय के समक्ष तनाव से ग्रसित मानस समुदाय के समक्ष अपनी अंतिम साँसें गिर रहा है। स्वयं से शुभारम्भ कर परिवार निर्माण-परिवार से समाज व समाज से राष्ट्र का नवनिर्माण तथा विश्व का निर्माण अथवा नवनिर्माण अथवा सतयुग का आगमन ही एक ऐसी प्रक्रिया है , जो अध्यात्मवाद के मूल्यों पर आधारित एक सुनिश्चित भवितव्यता है। मनः स्थिति से परिस्थिति का निर्माण ही अध्यात्म का मूल है, जबकि परिस्थिति से मनः स्थिति गढ़ने या बनाने की प्रक्रिया पूँजीवाद, प्रत्यक्षवाद या आधुनिक विज्ञान का दाता है। हमें वही नारा देना चाहिए, जो हमारे नियंत्रण में हों हम अपने आपको बदल ही सकते हैं। हर धर्मग्रन्थ इसी तथ्य का प्रतिपादन करते आए है। आज है। आज की संक्रान्ति वेला में जब हम इक्कीसवीं सदी के द्वार पर खड़े हैं, पूज्य गुरुदेव द्वारा दिया गया यह नारा निश्चित ही सबके लिए एक प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

प्रश्न:- यह माना कि गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्ठ है, किन्तु इस मंत्र के जाप से ही क्या हमारी सभी समस्याएँ हल हो जाएँगी? गायत्री मंत्र तो युगों से गायत्री परिवार बनाने का क्या औचित्य है ?

उत्तर:- गायत्री मंत्र सद्बुद्धि की प्रार्थना का मंत्र है। ऐसे अनेकानेक मंत्र न केवल हिन्दू धर्म के बल्कि अन्यान्य संप्रदाय के ग्रन्थों में भी देखे जा सकते हैं। किंतु इस मंत्र की छन्द रूप में जो संरचना है वह अति विशिष्ट है। एक समग्र धर्मशास्त्र इस छोटे से मंत्र में समाया हुआ है। इसका उच्चारण ऐसे कम्पन वातावरण में पैदा करता है जो समधर्मी श्रेष्ठ विचारों को एकत्र कर एक विचार-मण्डल उच्चारणकर्त्ता अथवा समूह के चारों ओर विनिर्मित कर देते हैं । शरीर में विद्यमान ग्रन्थियों, चक्र उपत्यिकाओं पर भी इसके विशिष्ट प्रीव पड़ते हैं एवं इससे अन्दर के प्रसुप्त पड़ते हैं एवं इससे अन्दर के प्रसुप्त केन्द्र जाग्रति की स्थिति में आ जाते हैं। इस मंत्र के मात्र जप से नहीं बल्कि भावविह्वल होकर अन्तर्भाव से की गयी सद्बुद्धि की प्रार्थना से वह प्राणशक्ति इसमें आ जाती है जो ‘गय’ अर्थात् प्राणों के ‘त्र’ अर्थात् त्राण-रक्षा करने के इसके अर्थ कामूल है। जप के साथ जब ध्यान किया जाता है, तो गायत्री मंत्र अत्यधिक शक्तिशाली मिसाइल बनकर सूक्ष्म जगत के परिशोधन की प्रक्रिया को सम्पन्न कर अनुकूलता पैदा करने की परिस्थितियां बना देता है। मंत्र जाप, उच्चारण , गायन से सूक्ष्म पर्यावरण के संशोधन एवं समूह मन के जागरण की प्रक्रिया जिस प्रकार सम्पन्न होती है, वही इसकी सभी समस्याओं को हल कर पाने, दुश्चिंतन को सद् चिंतन में बदल सकने के मूल में छिपा कारण माना जा सकता है।

गायत्री परिवार सद् चिन्तन को बढ़ावा देने वाले व्यक्तियों के समूह का नाम है, किसी संप्रदाय का नहीं। इसमें सभी मत, पंथ , जाति लिंग के व्यक्ति हैं एवं आज के कलियुग के चमत्कार में मात्र सज्जनों के संगतिकरण एकत्रीकरण के लिए इसकी स्थापना युगऋषि द्वारा अनिवार्य मानकर की गयी। यह परिवार नए सिरे से स्थापित नहीं है। पूर्वजन्मों की संचित सुसंस्कारों आत्माओं का संगठन मात्र है, जो नित-निरन्तर बढ़ता ही चला जा रहा हैं प्रश्न पूछने वाले सज्जन एवं वे सभी जो अभी मात्र पत्रिका के पाठक है-गायत्री परिवार के सदस्य बनने हेतु आमंत्रित है, जिसकी कोई शर्त व सौदा नहीं है। एक ही अनुबन्ध है-श्रेष्ठता से जुड़ने का, जो निश्चित ही घाटे का सौदा नहीं है।

प्रश्न:- आपके आंदोलन में ब्राह्मणवादी कर्मकाण्डों का बाहुल्य है। फिर अन्तर कहाँ हैं ?

उत्तर:- ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द बड़ा ही ‘मिसनाँमर ‘ है। यह कोई वाद नहीं अपितु जीवन जीने की पद्धति है। कर्मकाण्ड शिक्षण के निमित्त मात्र होते हैं, सब कुछ नहीं होते। कर्मकाण्ड ब्राह्मणवादी होते हैं, यह कहना मिथ्या है। ब्राह्मणत्व अर्जित करने हेतु योगी एवं तपस्वी दोनों ही बनना पड़ता है। ब्राह्मणत्व के जागरण का अर्थ है-करुणा-संवेदना का जागरण। अन्दर से औरों के प्रति सदाशयता जाग उठना यदि ऐसा हो जाय तो मानना चाहिए कि अन्दर का भटका देवता सही दिशा पा गया। कर्मकाण्ड जब होठों से उच्चारित मात्र किए जाते हैं, अंतः की संवेदना से अनुप्राणित नहीं होते, वे प्रीवोत्पादक भी नहीं बन पाते तथा न उच्चारणकर्त्ता के, न कर्मकाण्ड करने वाले के जीवन में कोई परिवर्तन ही ला पाते हैं। गायत्री परिवार ने धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की प्रक्रिया को अति सरल सूत्र पद्धति ,द्वारा जन-जन तक पहुँचाया मात्र नहीं अपितु, लाखों व्यक्तियों को बदल पाने में सफलता प्राप्त की है। यही इस आंदोलन की सफलता , लोकप्रियता की मूल मंत्र है। ब्राह्मणत्व एवं सार्थक कर्मकाण्ड के बीच समन्वय स्थापित कर धर्म में प्राण डाल कर जो कार्य इस संस्था द्वारा किया गया है, वहीं औरों की प्रक्रिया से इसकी भिन्नता स्थापित करता है।


अपनों से अपनी बात- - श्रद्धा-समर्पण को कसौटी पर कसने का समय है यह

बर्बर-आसुरी शक्तियां जब हारने लगती है ,तब उन्हें मायाचार सूझता है। ऋषियों एवं देवों के तप-तेज के सामने अपनी विध्वंसक प्रवृत्तियों को फीका पड़ते देखकर वे छल-छद्म, कपट, कुटिलता का सहारा लेती हैं जिस किसी तरह से नवनिर्माण की पक्षधर देवसेना में फूट पड़ जाए, दैवी शक्तियाँ भ्रमित होकर आपस में ही लड़ने-झगड़ने लग जाएँ ऐसे किसी भी हथकण्डों को अपनाने से ये बाज नहीं आती। भले ही उनकी ये चालें कितनी ही ओछी, शर्मनाक ओर घटिया क्यों न हों। इन कुटिल चालों में फँसकर अपने ही साथियों पर दोषारोपण करने वाले, अपनों से ही वैर भाव रखने वाले भूलवश या अनजानों में ही सही असुरता के पक्षधर बन जाते हैं वही असुरता जिसके खिलाफ उन्होंने संघर्ष करने का संकल्प किया था। जिसके समूल नाश के लिए उन्होंने अपने सर्वस्व की आहुति दे डालने का साहस जुटाया था। जब उन्हें अपनी भूल समझ में आती है, तब पता चलता है कि उन्होंने अपने ही नवसृजन अधीयान का कितना नुकसान कर डाला। अपने कृत्यों से उन्होंने अपने ही सेनानायक को अनगिनत घाव दे डाले।

असुरता का यह मायाचार नया नहीं है। जब-जब देवी व आसुरी शक्तियों में संघर्ष हुआ है, पलायन के क्षणों में असुर यही रीति-नीति अपनाते रहे है वैदिक एवं पौराणिक साहित्य इसके रोचक व रोमांचक विवरणों से भरा हुआ है। रामायण एवं महाभारत में इसके अनगिनत प्रसंग देखे और पढ़े जा सकते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में इन प्रसंगों को बहुत रुचिकर ढंग से सँजोया है। हारते हुए रावण की सोच को बताते हुए वह लिखते है-

रावन हृदय विचारा , भा निसिचर संहार। मैं अकल कपि भालु बहु, माया करौं अपार॥

अर्थात् -रावण ने हृदय में सोचा कि राक्षसी सेना का नाश हो गया है। मैं अकेला हूँ और वानर-भालू बहुत हैं, इसलिए मैं अब अपार माया रचूँ।

माया का अर्थ है-भ्रान्ति-भ्रम या भुलावा। यह मन में प्रकट होती है और उलटे-सीधे काम करवाकर व्यक्ति को लक्ष्य विमुख करती हैं माया के भुलावे में फँसा आदमी खुद के दिमागी फितूर के कारण अपना और अपनों का भारी नुकसान कर डालता है। माया के रंग अनेक है और रूप बहुत। कभी यह स्वार्थ की विभिन्न प्रवृत्तियों के रूप में प्रकट होती है, तो कभी महत्वाकांक्षा के अनेक रंगों की सम्मोहक छटा का जादू बिखेरती है। स्वयं को अध्यात्मवादी कहने और बतलाने वाले भी चित्र-विचित्र अनुभूतियों एवं कल्पित प्रेरणाओं के मायावी पास में बँधे बिना नहीं रहते। कौन किस रूप-जाल में फंसेगा ? इसे जानने में और उसी के अनुरूप भ्रम पैदा करने में असुरता बहुत प्रवीण है। यह असुरता नव-निमार्ण के पक्षधर सेनानियों को अपनी चतुर चालों में सा रही हैं

देव-परिवार के सदस्यों के लिए आत्मावलोकन , आत्म चिंतन एवं आत्म मंथन का समय हैं नवसृजन के ये जुझारू सैनिक चाहे वे गायत्री तपोभूमि , शांतिकुंज एवं ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के कार्यकर्त्ताओं के रूप में अग्रिम पंक्ति में खड़े हो। अथवा फिर अपने-अपने क्षेत्रों में नवनिर्माण के लिए जुड़ रहे कर्मठ सेनानी हों। अपने युग के इस अलौकिक महाभारत में सभी की भूमिका एक से बढ़कर एक है। कोई किसी से कम नहीं। मनुष्यता की इंच-इंच भूमि पर लड़े जा रहे इस युद्ध में यूँ तो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में सभी किसी न किसी तरह से फँसे हुए है। लेकिन अपने परिजनों को, गायत्री परिवार के सदस्यों को यह लड़ाई अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर लड़नी पड़ रही है। यही कारण है कि असुरता के कुचक्रों , कुटिल चालों, विनाशक आघातों का सबसे पलता निशाना वही बनते हैं।

यह सच है कि उन्हें स्वयं महेश्वर भगवान महाकाल का संरक्षण प्राप्त है। किंतु यह समर्थ शक्ति हमारे अन्दर सिर्फ श्रद्धा ओर समर्पण के द्वारों से प्रवेश करती है। जिनकी अंतर्चेतना श्रद्धा एवं समर्पण के भावों से ओत-प्रोत है वे ही महाकाल की प्रचण्ड ऊर्जा को धारण कर सकते हैं। जिन्हें यह सौभाग्य प्राप्त है, ऐसे अनुभवी परिजन जानते हैं कि किस तरह वे इन दिनों जीवन व्यवस्था की छिन्न-भिन्न करने वाले विध्वंसक आसुरी आघातों के समक्ष अछेद्य एवं अभेद्य बने रहते हैं। किसी भी परिस्थिति के सामने वे अडिग चट्टान की तरह खड़े रहते हैं। हर आसुरी आघात की भयंकरता उनसे टकराकर चकनाचूर हो जाती है। पर यह होता तभी है जब वे युग देवता के प्रति श्रद्धा एवं समर्पण के भावों का दिव्य कवच पहने हों।

असुरता कितनी ही भयंकर और खतरनाक क्यों न हो, लेकिन उसे अपनी सीमाएँ मालूम है। उसे पता है कि वह दिव्य कवच के सामने कितनी लाचार एवं असहाय है। इसीलिए वह ऐसे भ्रम रचती है, ऐसी भ्रांतियां पैदा करी है कि हम देवसेना के महानायक से विमुख हो जाएँ। विमुख न भी हों तो भी उनके प्रति श्रद्धा-विश्वास एवं समर्पण के भावों में कमी आ जाए। क्योंकि जितने अंशों में ये भावनाएँ हमारे अन्तःकरण में कम होंगी, उतने ही अंशों में आसुरी शक्तियाँ हमें नुकसान पहुँचा सकेंगी। इन भावों में कमी मायाचार फैलाते हैं।

माया का आकर्षण एवं सम्मोहन बहुत ज्यादा है। सारा सद्ज्ञान एवं विवेक धरा का धरा रह जाता है। कहते हैं, महाज्ञानी नारद भी इससे बच नहीं सकें, स्वयं भगवान के वाहन , उनके अति समीप रहने वाले पक्षिराज गरुड़ जी भी इसकी चपेट में आ गए थे। क्योंकि ज्ञानियों के लिए यह ज्ञान का दम्भ बनकर प्रकट होती है। “मुझे तो सब मालूम है।” यह भाव भी अन्तःकरण की विनम्रता, पवित्रता एवं पात्रता को नष्ट कर देता है अज्ञानियों में इसका प्रकटीकरण अहं की प्रतिष्ठा बनकर होता है मैं भला क्यों झुकूँ ? मैं सबसे श्रेष्ठ, सबसे अधिक वरिष्ठ , ये भाव हमारे और आराध्य के बीच विभाजन की दीवार बना देती है। हम उनकी शक्तियों से वंचित रह जाते हैं। प्रभु के सामीप्य का अभिमान भी हमें उनसे कोसों दूर ले जाता है तभी तो ईसामसीह ने कहा था-

ञ्जद्धशस्रह् ख्द्धश ड्डह्द्ग द्यड्डह्यह्ल द्यद्बठ्ठद्ग . ञ्जद्भद्गब् ख्द्बद्यद्य द्गठ्ठह्लद्गह् द्धद्बह्ह्यह्ल द्बठ्ठ द्मद्बठ्ठद्दस्रशद्व शद्ध त्रशस्र.

अर्थात् जो पंक्ति में सबसे पीछे खड़े है, वे प्रभु के राज्य में पहले प्रवेश पाएँगे।

माया के जादू से हमारा अभिमान कभी तो कुछ साधन एवं सम्मान बटोर कर शीर्ष पर जा पहुँचाता है और कभी आहत होकर क्रुद्ध नाग की तरह फुंसकार उठता है। गुस्से में उबलते हुए हम हने लगते हैं , आखिर क्या मिला हमारी दीर्घकालीन सेवाओं के बदले में? क्या पाया हमने अपने भारी-भरकम त्याग और बलिदान का पुरस्कार ? कहते हुए भूल जाते हैं कि सच्चा त्यागी ओर बलिदानी पुरस्कार की माँग से बहुत ऊपर उठ जाता है लेकिन अमुक को तो ढेर सारा सम्मान मिला और अनगिनत साधन-सुविधाएँ, मेरी योग्यता क्या किसी से कम है ? क्या मेरा समर्पण उनसे थोड़ा भी कम है। इन सवालों को उठाते हुए क्या हम अपने ही समर्पण का मजाक नहीं उड़ा देते ?

हम कुछ भी , कहीं भी और कोई भी क्यों न हो ? अपने चिन्तन और कृत्य पर एक नजर डालकर देखें-कहीं हम असुरता के पक्षधर तो नहीं हो गए ? कहीं हम अपनी हठधर्मी में अपने ही नव-सृजन अभियान को नुकसान तो नहीं पहुँचा रहे ? जिसे हम बरसों से अपने रक्त-प्रवाह , प्राण−प्रवाह से सींचते आए हैं संगठन अपने प्रभु का विराट शरीर है, पारस्परिक सहयोग एवं सहकार ही उनकी इस विराट मूर्ति की अर्चना-आराधना हैं तनिक आत्मावलोकन करके देखें कि कहीं हमीं अपने कृत्यों से अपने प्रभु के शरीर पर आघात तो नहीं कर रहे ।

ध्यान रहे मायावी अँधेरा चाहे कितना भी सघन क्यों न हो, परन्तु श्रद्धा एवं समर्पण के झरोखे से आने वाला ईश्वरीय प्रकाश उसे पलक झपकते मिटा देता है भक्त हमेशा मायाचार से मुक्त रहते हैं। तभी महात्मा तुलसी कहते है-

अस विचारि पंडित मोहि भजहीं। पायहुँ ज्ञान भगति नहीं तजहीं॥

यानि कि इस विचार को ध्यान में रखकर ज्ञानी जन भी प्रभु भक्ति का अवलम्बन लेते हैं ज्ञान प्राप्ति के बावजूद वे श्रद्धा-समर्पण के भावों को नहीं छोड़ते । इन दिनों जबकि आसुरी शक्तियों की कुचक्र रचना पूरे जोर-शोर से है, इनकी आवश्यकता और भी अधिक बढ़ जाती है।

हम श्रद्धावान है, नवसृजन अभियान के प्रति समर्पित है, इसकी कसौटी एक ही है कि हम मिशन के गतिशील अभियान के लिए कितने सक्रिय है ? हमारा पारस्परिक सहयोग-सहकार एवं सौहार्द कितना सघन हैं पूज्यवर की अपने शाखा-संगठनों से एक ही अपेक्षा थी कि वे आनंद और अशोक की भूमिका सम्पादित करने में लग जाएँ। गौतम बुद्ध को जिस बोधि वट-वृक्ष के नीचे आत्म-ज्ञान हुआ था, उसकी डालियाँ-शाखाएँ काटकर बुद्धि के शिष्य आनन्द और अशोक के नेतृत्व में एशिया के प्रायः समस्त देशों में ले गए थे और वहाँ उनका रोपण किया था। फलतः उन शाखाओं से उन देशों में भी विशाल बोधि वट-वृक्ष उग पड़े। जिनसे असंख्यों में श्रद्धा का संचार हुआ।

अपने देव परिवार की हर शाखा अपने को बोधि वट-वृक्ष की शाखा माने और यह सोचकर चले कि उसे स्वतन्त्र रूप से विशाल वटवृक्ष के रूप में परिणत होना है। स्थापना को शिथिल करके अपने को, अपने संस्थापक को उपहासास्पद नहीं बनाना है। मिशन में वे सभी तत्व मौजूद है, जिनके कारण मनुष्यों के प्रत्येक वर्ग में, समाज के प्रत्येक पक्ष में उसका स्वागत किया जाए। अपने मार्ग दर्शक द्वारा सौंपे गए आदर्शों एवं सिद्धान्तों के अस्त्र-शस्त्रों से असुरता की हर मुहिम को नाकाम करना कोई मुश्किल नहीं। बशर्ते हम उन्हें प्रयोग में लाएँ। समय की माँग पूरी करने, उलझी हुई समग्र समस्याओं को हल करने तथा मानव जाति का भविष्य उज्ज्वल बनाने की समस्त सम्भावनाएँ इस योजना में निहित है। यह सम्भव है कि कोई स्वल्प-साधनों से इतना बड़ा काम हो सकने में कठिनाई व्यक्त करे। लेकिन अपने नवसृजन अभियान के किसी पक्ष से असहमति या विरोध नहीं कर सकता है। इसे जिन दूरदर्शी युग चिंतन के आधार पर विनिर्मित किया गया हैं , उसे जो कोई गम्भीरतापूर्वक समझने की चेष्टा करेगा,उसे आसुरी तत्वों एवं शक्तियों की पराजय के साथ मानव जाति के सर्वांग सुन्दर एवं उज्ज्वल भविष्य कर झलक स्पष्ट दिखाई पड़ेंगीं।

प्रश्न यह नहीं है कि हम अपने उद्देश्य में सफल होंगे या नहीं-उसमें किसी तरह की कमी की, दैवी शक्तियों की विजय की भवितव्यता में किसी तरह की कोई आशंका नहीं। सन्देह का कारण केवल हम में आपसी तालमेल के अभाव से उपजी शिथिलता है। जिसके कारण हो सकता है, हम जुड़कर भी बिछुड़ जाएँ। हमारी अपनी शाखा का अंकुर प्यासा रहकर सूख जाए। गुरुदेव का संदेश शाखाओं के लिए यह था कि जहाँ भी शाखाओं की स्थापना हुई है, वहाँ उसे कार्यकर्ता अपने स्वेद बिन्दुओं से सींचते रहे। उसे मरने न दें। मरी हुई शाखा उन्हें उतनी कष्टकर होगी जितनी किसी पिता को अपनी प्यारी और छोटी संतान की मृत्यु कष्टकर हो सकती है। यदि अपने श्रम स्वेद एवं डलकते भाव बिंदु से इसे सींचते रहा जाए तो कोई शाखा कभी भी, किसी भी स्थिति में न तो मुरझाने पाएगी और न उनके ऊपर उदासी छाएगी।

जो लोग एक दूसरे की शिकायतें करते हैं, परस्पर दोषारोपण करते हैं, उनके बारे में यही कहना पड़ेगा कि वे शायद असुरता के मायाचार में फँस गए है अन्यथा जिसे अगले ही जीन कदमों बाद विजय वाली है, वह भला कहीं ऐसे उलझाता है, मनुष्य जिस कार्य को महत्व देता है, उसे सबसे पहले स्थान पर रखता है। अहं की प्रतिष्ठा- स्वार्थ का नजरिया इससे श्रद्धा एवं समर्पण से कोई वास्ता नहीं। नवनिर्माण अभियान को यदि निरर्थक नहीं समझा गया है। उसके प्रति सच्ची श्रद्धा है- तो फिर आपसी उलझनों के लिए यहाँ कोई स्थान नहीं। जिन्दगी की घोर कठिनाइयों के बीच भी अपनी शाखाओं, शक्तिपीठों को सींचते रहना शक्य होगा। शाखा सदस्य इस कसौटी पर खरे ही उतरेंगे ऐसी विश्वासपूर्वक आशा की गई हैं।

इस वर्ष कुछ अधिक ही काम किया जाना चाहिए गर्मी के दिनों में अध्यापक, किसान, विद्यार्थी प्रायः सभी अपेक्षाकृत कुछ फुरसत में रहते हैं। इस फुरसत को मिशन का कार्यक्षेत्र और प्रभावक्षेत्र बढ़ाने में लगाया जाना चाहिए पत्रिकाएँ जहाँ भी जाती है, उन्हें कम से कम दस व्यक्ति अवश्य पढ़े या सुनें तभी उसकी सार्थकता समझी जानी चाहिएं आन्दोलन का मार्गदर्शन , एवं प्रसार ‘प्रज्ञा-अभियान पाक्षिक’ पत्रिका के द्वारा होता है, उसे अधिक लोग मँगाएँ , पढ़े इस पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।

चल पुस्तकालय हर शाखा की सजीवता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। बड़े रूप में यह चलपुस्तकालय शाखाओं की समर्थता के अनुरूप मोटर गाड़ी में सुन्दर एवं सुसज्जित रूप ले सकता है, लेकिन जैसे भी हो हर शाखा को अपने यहाँ समर्थ या दुर्बल चल पुस्तकालय खड़े कर ही लेने चाहिए। दो कर्मठ कार्यकर्ता अपने अवकाश के समय उसे अपने गाँव नगर में घुमाने , जन-संपर्क बनाने, मिशन का प्रयोजन समझाने का क्रम चलाने लगे तो समझना चाहिए, अपने कार्यक्षेत्र में उज्ज्वल भविष्य का उजाला फैलने लगा।

जहाँ अपनी विचारधारा का विस्तार सम्मान तो बहुत हैं संगठन नहीं बना है, वहाँ यह प्रयत्न किया जाना चाहिए कि सम्बद्ध व्यक्ति शाखा सूत्र में आबद्ध हो संगठित हो जाएँ। कहना न होगा कि यह संगठन का युग है। इसमें संघ-शक्ति ही सबसे बड़ी शक्ति हैं युगपरिवर्तन के लिए इस चेतना को विकसित करना अनिवार्य रूप से आवश्यक है।

‘बोलती दीवारें’ आन्दोलन हर जगह बहुत प्रभावशाली सिद्ध हुआ है। उससे सहज ही अनेक व्यक्तियों को प्रेरणा व दिशा मिलती है। अवकाश के दिनों में प्रेरणाप्रद वाक्य दीवारों पर लिखने के लिए लग जाना चाहिए। इस संदर्भ में एक नया प्रयोग यह भी किया जा सकता है कि दुरंगे-तिरंगे-छोटे-पोस्टर छपवाकर दीवारों-खम्भों पर चिपकाए जा सकते हैं। यह उपक्रम दीवारों पर लिखने के समान ही आकर्षक एवं प्रभावशाली है।

शाखा सदस्यों को समयदान एवं अंशदान की शर्त अनिवार्य रूप में पालन करनी चाहिए। समयदान के क्रम में सुशिक्षित व्यक्ति आगामी ग्रीष्मावकाश में युग-निर्माण पाठशालाएँ चला सकते हैं। यदि ऐसी महिलाएँ भी परिवार में हो तो वे अपने समय को दोपहर में महिलाओं की पाठशाला चलाने में लगा सकती है। इन पाठशालाओं में क्रान्तिधर्मी सेट में सम्मिलित पुस्तकों में निहित विचारों के प्रकाश में आगंतुक जनों को वर्तमान समय के महत्व एवं उपयोगिता को समझाया जा सकता है। यह प्रशिक्षण क्रम प्रायः हर शाखा में चलाया जाना चाहिए।

पिछली बार वसन्तपर्व जिस श्रद्धा और तत्परता के साथ देश-विदेश में मनाया गया, उसे अपने परिवार के जीवनकाल में बहुत सफल प्रयोग कहा जा सकता है। इन आयोजनों में प्रायः दो करोड़ जनता ने मिशन की विचारधारा से निकट संपर्क बनाया और उसमें सहयोग देने की उत्सुकता प्रकट की। इन आयोजनों का क्रम आगे भी रखा जाना चाहिए। चुने हुए पर्वों को सामूहिक समारोह के रूप में उसी प्रकार प्रेरणाप्रद पद्धति से मनाया जाना चाहिए। यदि इन पर्वों को वसन्त पर्व जैसी तैयारी के साथ मनाया जाता रहे तो जन जागरण का महान प्रयोजन सहज ही सर्वत्र पूरा होने लगेगा। इससे अपने क्षेत्र में ही ऐसे वक्ता ओर गायक उत्पन्न किए जा सकेंगे, जो समय-समय पर युग परिवर्तन सम्बन्धी विचारधारा को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त कर सकें। भविष्य में सर्वतोमुखी परिवर्तन लाने के लिए व्यापक रूप से जन आन्दोलन खड़े करने पड़ेंगे। उनके लिए पर्व मनाने की प्रक्रिया एक पूर्व तैयारी और अनुभव एकत्रित करने की पाठशाला सिद्ध होगी।

अगला पर्व, गायत्री जयन्ती गंगा दशहरा का ज्येष्ठ सुदी तदनुसार 15 जून रविवार को आ रहा है। रविवार होने के कारण सार्वजनिक अवकाश भी है। उसे मनाने की अभी से तैयारी करनी चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव का महाप्रयाण इस तिथि में होने से इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। कुछ सप्ताह ही शेष है। इतने दिनों में यदि उत्साहपूर्वक तैयारी की जाय, तो उसे वसन्त पर्व से घट कर नहीं वरन् बढ़कर ही मनाया जा सकता है प्रभात फेरी , सामूहिक जप, हवन , कीर्तन, दीपयज्ञ की प्रक्रिया सामान्य हो। युगशक्ति माँ गायत्री के पूजन की प्रक्रिया से परिजन परिचित है। इसमें प्रयोग में लाए जाने वाले कर्मकाण्ड का अनुभव सभी को है।

बात केवल संगीत-प्रवचन की रह जाती है, सो उसके लिए भी स्थानीय क्षेत्र में इसको ढूंढ़-तलाश की जानी चाहिए। प्रवचनकर्त्ता युगसन्धि के इन महत्वपूर्ण क्षणों में निभाए जाने वाले दायित्वों का उपस्थित जनसमुदाय को बोध कराएँ। मंच-मंडप, फर्श , लाउडस्पीकर आदि की

व्यवस्था शाखाएँ आसानी से कर सकती है। टोली बनाकर घर-घर आमन्त्रण देने तथा बुलाने लिए कार्यकर्त्ता निकल पड़े तो उस आह्वान पर जनता की उपस्थिति भी आशाजनक हो सकती है। इस प्रकार जहाँ अभी से ध्यान दिया जाएगा और प्रयत्न किया जाएगा, वहाँ गायत्री जयन्ती पर्व भी बहुत शान से सम्पन्न होगा। आशा की जानी चाहिए कि वसन्त पर्व की अपेक्षा कहीं अधिक जनता उस आयोजन से लाभान्वित होगी।

गायत्री जयन्ती गंगा एवं गायत्री अर्थात् श्रद्धा एवं समर्पण के अवतरण का पर्व है। अपने अन्तः करण में इन तत्वों को धरण करके ही हम युगांतरीय चेतना के माध्यम बन सकते हैं। हमारे अन्तःकरण श्रद्धा एवं समर्पण के तत्वों से भरपूर हैं , इसकी कसौटी यही है कि हम अपनी संघबद्धता को और अधिक सशक्त करेंगे। आसुरी शक्तियों के मायावी जाल से बचेंगे। परस्पर दोषारोपण के स्थान पर पारस्परिक सहयोग-सौहार्द हमारी जीवन-नीति बनेगी। अहं की प्रतिष्ठा के स्थान पर अहं का विसर्जन-विलय हमारा जीवन-सिद्धान्त होगा। महत्वाकाँक्षा का स्थान समर्पित भावनाएँ लेंगी स्वार्थपरता सेवा-भावना में बदलेगी।

असुरता के किसी कुचक्र एवं छद्म नीति के समक्ष न स्वयं घुटने टेकेंगे और न ही दूसरों को ऐसा करने देंगे। परम पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मसत्ता ने गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य से, प्रत्येक शाखा संगठन से यही आशा रखी है। समस्त शाखा संगठन अपनी संघबद्ध प्रखरता बनाए रखेंगे और उत्साह में कार्यक्रमों में किसी प्रकार की शिथिलता न आने देंगे।


पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का जीवन दर्शन समग्र वाङ्मय

परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने जीवन भर जो अपनी लेखनी से लिखा , औरों को प्रेरित कर उनसे सृजनात्मक लेखन करवाया, पुस्तकों-पत्रिकाओं में जो प्रकाशित हुआ, समय-समय पर उनने अमृतवाणी के माध्यम से जो विचारों की अभिव्यक्ति की, विचार सूक्तियाँ जो वे लिख गये या अनायास कभी कह गये तथा पत्रों के माध्यम से जो अंतरंग स्पर्श जन-जन को दिया, वह समग्र इस वाङ्मय के खण्डों में है। कुल 108 खण्डों में युग ऋषि का यद्यपि समग्र लेखन, वक्तृत्व एवं कृतित्व समाता नहीं है तथापि , अपनी ओर से सभी महत्वपूर्ण अंशों का इसमें लेने का प्रयास किया गया है ? अब तक प्रकाशित 70 खण्डों के नाम इस प्रकार है-

परिचायात्मक खण्डसमग्र वाङ्मय का परिचय

जीवन देवता की साधना-आराधना

उपासना-समर्पण योग

साधना पद्धतियों का ज्ञान और विज्ञान

साधना से सिद्धि-1

साधना से सिद्धि -2

प्रसुप्ति से जागृति की ओर

ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?

गायत्री महाविद्या का तत्वदर्शन

गायत्री साधना का गुह्य विवेचन

गायत्री साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार

गायत्री की दैनिक एवं विशिष्ट अनुष्ठान-परक साधनाएँ

गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उपलब्धियां गायत्री साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि

सावित्री, कुण्डलिनी एवं तंत्र

मरणोत्तर जीवन : तथ्य एवं सत्य

प्राणशक्ति : एक दिव्य विभूति

चमत्कारी विशेषताओं से भरा मानवी मस्तिष्क

शब्द ब्रह्मनाद ब्रह्मा

व्यक्तित्व विकास हेतु उच्चस्तरीय साधनाएँ

अपरिमित संभावनाओं का आगार मानवी व्यक्तित्व

चेतन, अचेतन एवं सुपर चेतन मन

विज्ञान और अध्यात्म परस्पर पूरक

भविष्य का धर्मः वैज्ञानिक धर्म

यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान

यज्ञः एक समग्र उपचार प्रक्रिया

यज्ञः एक समग्र उपचार प्रक्रिया

युग-परिवर्तन कैसे और कब ?

सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण-1

सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण-2

मर्यादा पुरुषोत्तम राम

संस्कृति-संजीवनी श्रीमद्भागवत् एवं गीता

रामायण की प्रगतिशील प्रेरणाएँ

षोडश संस्कार विवेचन

भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व

समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान

धर्मचक्र प्रवर्तन एवं लोकमानस का शिक्षण

तीर्थ सेवन : क्यों और कैसे?

प्रज्ञोपनिषद्

नीरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र

चिकित्सा उपचार के विविध आयाम

जीवेम शरदः शतम्

चिरयौवन एवं शाश्वत सौंदर्य

हमारी संस्कृतिः इतिहास के कीर्ति स्तम्भ

मरकर भी अमर हो गये जो

सांस्कृतिक चेतना के उन्नायक : सेवाधर्म के उपासक

भव्य समाज का अभिनव निर्माण

यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता

समाज का मेरुदण्ड सशक्त परिवार तंत्र

शिक्षा एवं विद्या

महापुरुषों के अविस्मरणीय

जीवन-प्रसंग-1

महापुरुषों के अविस्मरणीय

जीवन-प्रसंग-2

विश्व वसुधा जिनकी सदा ऋणी रहेगी

धर्मतत्व का दर्शन व मर्म

मनुष्य में देवत्व का उदय

दृश्य जगत की अदृश्य पहेलियाँ

ईश्वर विश्वास और उसकी फलश्रुतियां

मनस्विता, प्रखरता और तेजस्विता

आत्मोत्कर्ष का आधार-ज्ञान

प्रतिगामिता का कुचक्र ऐसे टूटेगा

विवाहोन्माद : समस्या और समाधान

गृहस्थ : एक तपोवन

इक्कीसवीं सदी : नारी सदी

हमारी भावी पीढ़ी और उसका नवनिर्माण

राष्ट्र समर्थ और सशक्त कैसे बने ?

सामाजिक, नैतिक एवं बौद्धिक क्रान्ति कैसे ?

युग निर्माण योजना-दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम

पूज्यवर की अमृतवाणी-1

विचार सार एवं सूक्तियाँ-1

विचार सार एवं सूक्तियाँ-2

विचार सार एवं सूक्तियाँ-3

*समाप्त*