अन्तःकरण के मौन में गुरुदेव की परावाणी गूँजती है-अहो । मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ । तुम चाहे जहाँ जाओ, वहाँ मैं उपस्थित हूँ ही । मैं तुम्हारे लिए ही जीता हूँ । अपनी अनुभूति के फल मैं तुम्हें देता हूँ । तुम मेरे हृदय-धन हो । मेरी आँखों के तारे हो । प्रभू में हम एक हैं । मैं सदा-सर्वदा तुमसे एकता की अनुभूति करता हूँ । तुम्हें कठिन संघर्षों की धधकती-ज्वालाओं में झोंक देने में मुझे भय नहीं होता, यह इसलिए क्योंकि मैं तुम्हारी शक्ति की मात्रा को जानता हूँ । मैं तुम्हें अनुभवों के बाद अनुभवों में भेजता हूँ, किन्तु तुम्हारे इस भ्रमण में मेरी दृष्टि सदैव तुम्हारा पीछा करती रहती है । तुम जो भी करते हो, वह सब मेरी उपस्थिति में करते हो ।
मेरे विचारों में, मेरे साहित्य में मेरी इच्छाओं को ढूँढ़ो । उन शिक्षाओं का अनुसरण करो, जो मेरे गुरु ने मुझे दी थीं और जिसे मैंने तुम्हें दिया है । जो एक है, उसी का दर्शन करो, तब तुम मेरे सहस्रों शरीरों के साथ रहकर जितनी एकता का अनुभव करते उससे कहीं अधिक एकता का अनुभव करोगे । मेरी इच्छा और विचारों के प्रति जागरूकता, अस्मिता और भक्ति में ही शिष्यत्व है । हम दोनों बीच असीम प्रेम है । गुरु और शिष्य का सम्बन्ध वज्र से भी अधिक दृढ़ होता है । वह मृत्यु से भी अधिक सशक्त होता है ।
इस सत्य को अनुभव करते हुए यह ध्यान रखो वत्स !इन्द्रियाँ सदैव आत्मा के विरुद्ध संघर्ष करती हैं । अतः सतत् सावधान रहो । इन्द्रियों पर विश्वास न करो । ये सुख तथा दुःख के द्वारा विचलित होती रहती हैं । उनके ऊपर उठ जाओ । तुम आत्मा हो, मेरे अविनाशी अंश । शरीर का किसी भी क्षण नाश हो सकता है । सचमुच कौन उस क्षण को जानता है ! इसलिए सदैव अपनी दृष्टि लक्ष्य पर सुस्थिर रखो । अपने मन को मेरे विचारों से परिपूर्ण कर लो । मृत्यु के क्षणों में नहीं, किन्तु जीवन के इन्हीं क्षणों में अपने मन को मुक्त और पवित्र रखो । तब यदि मृत्यु अकस्मात् तुम्हें ग्रास बना ले तो भी तुम प्रस्तुत हो । इस प्रकार जीवन जियो मानो इसी क्षण तुम्हारी मृत्यु होने वाली है । तभी तुम सच्चा जीवन जी सकोगे । समय भाग रहा है । यदि तुम शाश्वत तथा अमर विचारों में डूबे रहो, तभी भागते समय को शाश्वत बना सकोगे ।
हर किसी को अपने आदर्श के लिए अनेकों तरह के कष्ट सहने पड़ते हैं । तुम भी सभी प्रकार की कसौटियों को सहो, विपत्तियों का सामना करो । आदर्श का जीवन जियो तथा ईश्वर के नाम पर निर्भीक बनो । भगवान पर सच्ची निर्भरता सभी भयों को भगा देती है । तुम मेरे सन्तान हो । जीवन में या मृत्यु में, सुख या दुःख में, भले या बुरे में जहाँ भी तुम जाओ, जहाँ भी तुम रहो, मैं तुम्हारे साथ हूँ । मैं तुम्हारी रक्षा करता हूँ । मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ, क्योंकि मैं तुमसे बँधा हूँ । ईश्वर के प्रति मेरा प्रेम मुझे तुम्हारे साथ एक कर देता है । मैं तुम्हारी आत्मा हूँ । वत्स ! तुम्हारा हृदय मेरा निवास स्थान है । फिर चिन्ता किस बात की-निश्चिन्त रहो, निर्भीक बनो ।
जीवन क्या है ? इसी उधेड़-बुन में आँखें झपक गयीं । स्वप्न में एक सन्त दिखे । उस स्वप्निल सन्त ने सिर छिपाने के लिए ऐसी अद्भुत कुटिया में रहने का निश्चय किया, जो जोहड़ की मिट्टी से बनी थी । छत उसकी इतनी कमजोर थी कि न जाने कब वह गिर जाए । जगह-जगह दीवालों में छिद्र हो गए थे । बरखा ऋतु में उसका टप-टप कर चूरा होता था । पानी एवं दुर्गन्धमय मिट्टी के संयोग से उसमें छोटे-छोटे कीड़ों ने जन्म ले लिया था । गली-सड़ी तरु शाखाओं से उसे बाँधा गया था, अतएव मजबूती न थी । उस कुटिया के बीचों-बीच एक बड़ा नाला बहता था, जिसमें से स्वच्छ जल आता था, किन्तु कुटिया के दूषित माहौल से वह भी दुर्गन्धमय हो जाता था । कुटिया के बाहर मच्छर, बर्र और ततैये थे । सन्त जब भी बाहर निकलते, सबके सब चारों ओर से चिपटकर उन्हें काट लेते और सन्त का शरीर लहूलुहान हो जाता । इस प्रकार उन सन्त का जीवन बहुत कष्ट में गुजर रहा था ।
इस असह्य कष्ट से छुटकारा पाने लिए वे शान्ति की खोज में चल पड़े । उन सन्त की मुलाकात एक देवर्षि से हो गयी । देवर्षि के समक्ष उन्होंने अपनी व्यथा-कथा कह डाली । देवर्षि ने मुसकराते हुए उनको आश्वस्त किया । सन्त को लेकर वह स्वयं चल दिए । काफी दूर निकल आए । अब की बार वे दोनों गहन अरण्य में जा पहुँचे । पहुँचते- पहुँचते अन्धकार हो गया, मार्ग भी आगे दिखाई न दिया, तभी ऐसे में देवर्षि भी अन्तर्ध्यान हो गए सन्त विचारने लगे कि अब क्या करूं ? खाने को कुछ भी नहीं, कैसे होगा, अब आगे शून्य ही शून्य दिखाई देता है । आज तो बुरे फँसे । रात गहरा रही थी, अँधेरा घना हो चुका था कि लुटेरे आ गए । उन्होंने सन्त को खूब मारा-पीटा । वे विकल हो रोने लगे । जैसे-तैसे भाग कर अपने प्राण बचाए । शरीर थककर चूर हो गया था । इतने में उन्होंने एक तपस्वी साधक को देखा । वह कुछ आश्वस्त हुए । उस महातपस्वी ने सन्त को सन्मार्ग सुझाया । थोड़ी देर सुस्ताकर सन्त तपस्वी के साथ चल दिए । अबकी बार वे उत्तर दिशा की ओर बढ़े ।
कुछ ही दूर यात्रा हुई थी कि सन्त को एक महल दिखाई दिया । वह उत्सुकतावश महल के निकट पहुँचे । उन्होंने देखा महल अति सुन्दर और भव्य है । यहाँ के निवासी घनिष्ठ मित्र से लगते हैं, भोजन के लिए नाना पकवान हैं । यहाँ रहकर सुख मिलेगा । यह सोचकर उन्होंने महल में ही रहने का निश्चय किया । महल में उनके रहने की व्यवस्था एक ऐसे कमरे में हुई, जिसमें दरवाजे ही दरवाजे थे । उस कमरे में एक सुन्दर आसन भी था, उस पर वह विराज गए । ठंडी- ठंडी बयार बह रही थी । तभी उनको भूख लग आयी । पलक झपकते ही भोजन-व्यवस्था हो गयी । भोजन के उपरान्त उनको निद्रा देवी ने आ घेरा । यह देखकर महातपस्वी उनसे बोले-बन्धु ! सोओ मत, जागो । सन्त ने आलस्यवश उनकी अनसुनी कर दी और वे सो गए । इतने में वहाँ वंचक आ गए और उनसे कहने लगे-चल उठ कहाँ सो रहा है, जाग ? बड़ा आया-यहाँ सोया है आराम से, तेरे बाप की नगरी है । मालूम है यह वंचकपुरी है । ऐसा कहकर उन्हें शिला पर पटक कर दे मारा और उनका सब कुछ छीन लिया । सन्त बहुत दुखी हुए और मन ही मन पश्चात्ताप करने लगे कि यदि मैं तपस्वी साधक की बात मान लेता तो यह दुर्दशा न होती ।
तपस्वी ने उनको इस दशा में देखा तो उनका हृदय करुणा से ओत-प्रोत हो गया । वे बोले-भाई मेरे ! मैंने पहले ही कहा था कि यहाँ सो मत जाग, लेकिन तुमने मेरा कहा माना ही नहीं । खैर घबराओ नहीं, अब फिर हिम्मत कर मेरे पीछे-पीछे आओ ।
तपस्वी की वाणी सुनकर उनमें फिर से साहस आ गया और उन्होंने अपने आप को सँभाला । चलते-चलते वे बहुत दूर निकल आए । सन्त ने बहुत ध्यान से देखा, परन्तु तपस्वी नजर नहीं आए । इतने में सुगन्धित पवन का झोंका आया । ऐसी गन्ध सन्त ने पहले कभी न सूँघी थी । उन्हें उसका स्पर्श भी बहुत मधुर लगा । निश्चय ही यहीं-कहीं रमणीय स्थल होगा, यह विचार कर वे कुछ आगे बढ़े, जिस ओर से गंध आ रही थी । न जाने किस प्रेरणा से उस ओर वे आगे बढ़ते रहे । आखिर में वे ब्रह्मपुरी आ पहुँचे । यहाँ पहुँचकर उनको भय नहीं लगा ।
इस ब्रह्मपुरी का राजा ब्रह्मदेव एक अलौकिक मंदिर में रहकर शासन करता था । सन्त की इच्छा इस अद्भुत मन्दिर को देखने की हुई । कुछ पग ही धरे थे कि मन्दिर भी उन्हें दिखाई दे गया । सन्त मन्दिर में प्रविष्ट हुए । सामने सिंहासन पर ब्रह्मदेव के शरीर से प्रकाश की अनोखी किरणें निःसृत हो रही थीं । इन दिव्य किरणों से सारा दरबार प्रकाशमान था । मन्दिर को इस निराली छटा से वह मुग्ध होकर बोले-मेरी यात्रा सफल हो गयी । मैं कृतकृत्य हो गया । मेरे समस्त दुःख पलायन कर गए । अब तो मैं यहीं रहूँगा । कितना वैभव है यहाँ के राज्य का । इनके एक ओर तो विवेक नामधारी मंत्री खड़े हैं, तो दूसरी ओर विश्वास नाम का सेवक । समता नामक अनुचर पंखा झल रहा है । एक-एक करके क्षमा-आर्जव आदि नौकर-चाकर सेवा हेतु तैनात हैं।
सन्त ने राजा के चरण-वन्दन की अभिलाषा व्यक्त की । सन्त की अभिलाषा को राजा ने जाना और उनको अपने कर-कमलों द्वारा उठाकर अपनी गोद में कुछ इस तरह बिठाया, जैसे पुत्र को पिता बिठाता है । ब्रह्मदेव की गोद में बैठते ही सन्त जगत को भूल गए ।
उधर सन्त परमानन्द सागर में अवगाहन में अवगाहन करने लगे, इधर आचार्य श्रीधर हड़बड़ाकर जाग गए। उनका स्वप्न टूट चुका था । नींद फिर आयी न थी । बस फिर क्या था ? इस विचित्र स्वप्न के अर्थ उनके मन में कुछ इस तरह स्पष्ट होने लगे-अरे यही स्वप्न तो जीवन-कथा है । दुर्गन्धयुक्त कुटिया देह रूप है । मुँह से मलद्वार तक नाला है, जिसमें स्वच्छ पदार्थ भी प्रवेश पाकर विष्ठा रूप में परिणत हो जाते हैं । मच्छर, बर्र और ततैये स्वार्थी-सम्बन्धी-जन हैं, जो दिन-रात काटते रहते हैं । सन्त रूपी प्राणी सुख-शान्ति के लिए अज्ञानतावश परिधि में भ्रमण करता रहता है, किन्तु उसके हाथ मात्र निराशा ही लगती है । देवर्षि और तपस्वी गुरु रूप हैं, जो पथ का पाथेय देते हैं, तब कहीं जाकर सन्तात्मा परमात्मा बन पाती है । स्वप्न में निहित सत्य के बोध ने उनके विवेक-चक्षु खोल दिए और श्रीधर ब्रह्मवेत्ता श्रीमत् श्रीधराचार्य के रूप में लोक-विख्यात हो गए ।
मानवी काया युगों- युगों से जन-जन के लिए एक रहस्य की पहेली बनी हुई है । अनन्त संभावनाएँ अपने अन्दर समेटे काया के इस भाण्डागार में इतना कुछ विलक्षण है कि इसके विषय में प्रायः हर ग्रन्थ में ऐसा कुछ वर्णन पाया जाता है जिसे गुह्य-विज्ञान की परिधि में माना जा सकता है । जहाँ गीता में योगीराज श्रीकृष्ण इसे शरीर क्षेत्र कहते हुए “देहेअस्मिन्पुरुषः परः” के माध्यम से यह कह जाते हैं कि “इस देह में स्थित यह आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है,” वहाँ योग वसिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ कहते हैं कि यह शरीर जो दृश्य रूप में रासायनिक संरचनाओं का समुच्चय नजर आता है, मन की अपने संकल्पों द्वारा की गयी रचना है । “करोति देहं संकल्पात्कुँभकारो घटं यथा” (4/11/19) के अनुसार उनका प्रतिपादन है कि मन, शरीर को उसी प्रकार अपने संकल्पों से विनिर्मित करता है जैसे कि कुम्भकार घड़े को । यह हड्डी और माँस का, पंचभूतों का पुतला शरीर नहीं, मात्र मन की काल्पनिक रचना है, यह सोच-सोचकर लगता है कि हमारे ऋषिगणों ने कितनी सूक्ष्म पैनी दृष्टि से इस देह व इसके अंदर के रहस्यों का विश्लेषण कर वह सब लिखा होगा, कहा होगा जिसे श्रुति के अनुसार “आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम्” के रूप में हम पाते हैं ।
स्थूल दृष्टि से ही देखें तो इस देह में कितना कुछ अजूबा भरा पड़ा है । यह अकारण तो नहीं हो सकता । इतना कुछ विलक्षण परमसत्ता का यह घटक लेकर जन्मा है एवं यदि इस मात्र पेट-प्रजनन का जीवन इसे किसी तरह भार की तरह ढोकर समाप्त कर देना है, तो फिर इससे बढ़कर विडम्बना और क्या हो सकती है । साठ-खरब जीव-कोशिकाओं से बनी यह काया प्रति मिनट लगभग तीस करोड़ जीव कोशिकाओं को समाप्त कर उनसे मुक्त हो लेती है, किंतु अगले ही क्षण इतने नये प्राप्त कर अपनी संख्या वही बनाए रखती है । क्या ऐसा नहीं लगता कि प्रकृति में संव्याप्त परमात्मसत्ता प्रतिपल-प्रतिक्षण मानवी काया का पुनर्निर्माण करती रहती है एवं उसे वह शक्ति देती है जिससे वह अपने अंदर की आत्मसत्ता के जगाने हेतु समुचित साधना-पुरुषार्थ कर सके । संभवतः है ऐसा ही, किंतु भगवान के उस कुम्भकार के बनाए हुए घट हम मनुष्य इस अनुदान की कीमत को जान नहीं पाते ।हमारे प्राणमय कोश में प्रतिक्षण इजाफा करने वाले ये जीवकोष नूतन प्राणशक्ति का स्पन्दन लेकर आते हैं, किंतु हम कृत्रिम साधनों से-बनावटी स्वयं के आमंत्रित प्रदूषणों से भरा जीवन जीकर उस प्राणशक्ति को सतत गँवाकर सहज ही अशक्ति के शिकार होते रहते हैं, अल्पायु में ही मृत्यु को प्राप्त होने लगते हैं अथवा रोगग्रस्त बने रह स्वयं को औरों को कष्ट देते रहते हैं ।
प्रत्येक जीव कोश जिसने इस शरीर को बनाया है, प्रतिक्षण-प्रतिपल गतिशील रहता है, हृदय की तरह स्पन्दित होता रहता है एवं क्रमशः विभाजित होता हुआ अनेकानेक संगी-साथी बनाता चलता है । विश्राम एवं दीर्घसूत्रता तो इसके जीवनकाल में कभी देखी ही नहीं जा सकती । इसके लिए आराम हराम है । गतिशीलता ही जीवन है एवं यही संदेश हर जीवकोष अपने धारणकर्ता को सतत् देता रहता है । एक और विलक्षण बात है । जो धड़कने अथवा ‘पल्सेशन्स’ हम जीवकोषों में देखते हैं- वे समष्टिगत इस पृथ्वी के अंतरंग हिस्सों में, सर्वव्यापी चेतना समुच्चय में हो रहे कम्पनों का ही एक अंग होती हैं । इसी कारण हर जीवकोष बड़ा संवेदनशील होता है एवं बड़ी शीघ्रता से उन स्पन्दनों से प्रभावित होता रहता है । विकृति ही इस पारम्परिक सम्बन्ध को तोड़ती है, नहीं तो यह सम्बन्ध जीवन भर स्थापित रहता है ।
जीवकोषों को अपने घेरे में आबद्ध किये हुए विद्यमान त्वचा को देखें, तो और भी विलक्षण तथ्य हमारी जानकारी में आते हैं । एक औसत व्यक्ति में प्रायः 4 किलो वजन वाली यह त्वचा लगभग 18 वर्ग फुट का स्थान घेरती है । तुलनात्मक दृष्टि से मस्तिष्क से यह तीन गुना आकार है । वाटरप्रूफ यह सतह अंदर के अंगों की रक्षा को संकल्पित रहती है । त्वचा तापमान में परिवर्तन, दर्द पैदा करने वाले स्नायु-संवेदन एवं स्पर्श जैसी अनुकृति का तुरन्त कुछ ही मिली सेकेण्ड नहीं, नैनों सेकेण्डों में प्रत्युत्तर देती है । इतनी कोमल एवं सूक्ष्मतम स्तर पर इसकी कार्यविधि चलती है । उँगलियों के पोरों में जितनी तीव्र संवेदनशीलता पायी जाती है, उतनी और कहीं नहीं । मालूम नहीं उस परमसत्ता ने पोरों को ही इतना कोमल क्यों बनाया ? सम्भवतः यहीं से प्राणशक्ति को ग्रहण करने, सम्प्रेषित करने की प्रक्रिया सम्पन्न होती है, एक अनुमान है, सही भी हो सकता है, गलत भी । सारे शरीर का तापमान एक जैसा बनाए रखना भी इसी त्वचा की सतह (डर्मिस) का ही काम है, जिसे वह बखूबी निभाती है । यह सब होता है पूरी त्वचा की ‘ डर्मिस’ सतह में विद्यमान 30 लाख स्वेद ग्रन्थियों (स्वेट ग्लैण्ड्स) के कारण, जो तापमान में परिवर्तन की प्रतिक्रिया स्वरूप सतत् सक्रिय बने रहते हैं।
मानवी काया की त्वचा अपना रंग बड़ी तेजी से बदलती है । भय से सफेद पड़ जाना, भावुक होते ही चेहरा लाल हो जाना, गलती पकड़े जाते ही स्याह हो जाना कोई अतिशयोक्तियाँ नहीं हैं वरन् वास्तविकताएँ हैं। इस मामले में मनुष्य को गिरगिट की उपमा तो नहीं दी जा सकती किंतु ‘इमोशनल स्ट्रेस" (भावनात्मक उद्वेग), सहने पर या अचानक बीमार पड़ने पर त्वचा का रंग अपने रंग दिखाने लगता है । मनोशारीरिक रोगों को पकड़ने के लिए त्वचा सबसे महत्वपूर्ण घटक है, जिससे प्रारंभिक स्थिति जानी जा सकती है ।
काले एवं सफेद रंग वाले (विभिन्न नस्लों के) व्यक्तियों में रंग पैदा करने वाली कोशिकाओं की संख्या एक समान होती है । इसमें कोई भेदभाव नहीं है । यह तो ‘जीन्स’ का कमाल है, जो यह निर्धारित करते हैं कि किसे काला या गेहुँआ रंग बनाना है, किसे नहीं । जीन्स यानी गुणसूत्रों के घटक-जो जन्म-जन्मान्तरों की यात्रा माता-पिता से प्राप्त अमीनों अम्लयुक्त अति सूक्ष्म तत्वों के माध्यम से करते रहते हैं । अब यदि कोई अश्वेत है या कोई श्वेत है, तो इसके लिए उसके पिगमेण्ट सेल्स-उन्हें बनाने वाले जीन्स जिम्मेदार हैं, न कि वह मनुष्य । ऐसे में रंगों के आधार पर पारस्परिक विद्वेष व लड़ाई क्यों होती है, इस पर परमसत्ता को भी आश्चर्य होता होगा व दुख भी । त्वचा वैसे कभी झूठ बोलती नहीं है । ‘लाई डिटेक्टर’ इसी सिद्धान्त पर काम करते हुए आदमी से सब कुछ उगलवा लेते हैं-पाँलीग्राफ-गैल्वेनिक स्किन रेजीस्टेन्स (जी . एस . आर .) के माध्यम से यह पता चल जाता है कि कब आदमी झूठ बोल रहा है, कब बिलकुल सत्य वचन कह रहा है । है न सब कुछ विलक्षण ।
त्वचा जिस हाड़-माँस के पुतले को ढके हुए है, उसे जरा देखें तो पाते हैं कि बच्चों में तो प्रायः छोटी-बड़ी तीन सौ पचास हड्डियाँ होती हैं, किंतु बड़ी में इनकी संख्या घटकर दो सौ छह रह जाती है । यह कभी टूट जाने या उनके अन्तर्ध्यान हो जाने के कारण नहीं, अपितु पारस्परिक जुड़ाव के कारण होती है, जो कि परिपक्व होने की स्थिति में होती है । भारतीय दर्शन में जीवन की प्रथम पच्चीस वर्ष की आयु बड़ी महत्वपूर्ण मानी जाती है । ब्रह्मचर्याश्रम वाली इस अवस्था में कोई चाहे तो अपना शरीर वज्र-सा बना सकता है-अपना स्वास्थ्य अक्षुण्ण बनाए रख परिपक्व हड्डियों का ढाँचा बनाए रख सकता है । किंतु इसके बाद यह संभव नहीं, क्योंकि 25 वर्ष की आयु तक वैज्ञानिक दृष्टि से ढाँचा पूर्ण मजबूती प्राप्त कर लेता है । इससे पूर्व वह परिपक्व प्राप्त कर रहा होता है । एक स्वस्थ पूर्णावस्था को प्राप्त व्यक्ति की एक हड्डी में कितने बल होता है, उसका नमूना जंघा की हड्डी ‘फीयर’ से लिया जा सकता है, जो 1200 पौंड प्रति वर्ग इंच दबाव ग्रहण करते हुए चलने की प्रक्रिया को संभव बनाती है ।
अस्थियों के इस कवच के साथ-साथ माँसपेशियों का एक कवच भी होता है, जिसमें 600 माँसपेशियों की भागीदारी होती है । लाखों सूक्ष्म तन्तुओं से बने ये मसल्स कुल 80 प्रतिशत जल तत्व एवं बीस प्रतिशत प्रोटीन के बने होते हैं । इस पूरे संस्थान को शरीर के सूक्ष्म अंगों को ढँकने के अतिरिक्त एक भूमिका निभानी होती है, वह है 75' से अधिक क्षमता तक काम करके ऊर्जा का उत्पादन करना, तब जब शरीर की पूरी सामर्थ्य किसी बलपूर्वक किये जाने वाले कार्य में लग जाती है । यह ऊर्जा गर्मी के रूप में इसी संस्थान द्वारा ही पैदा की जाती है ।
अंदर काम कर रहे हर संस्थान का अपना महत्व है, किंतु इस लेख में रक्तवाहिनी व हृदय- संस्थान तथा श्वास संस्थान दो का ही वर्णन कर रहे हैं । इसी क्रम में जारी लेखमाला में पाचन संस्थान, लीवर, हारमोन्स, गुर्दे एवं स्नायु संस्थान-मस्तिष्क के बारे में अगले अंकों में । हृदय वास्तव में पूरे काय संस्थान की धुरी है-केन्द्रीय नाभिक है, वह पम्प है जहाँ से पूरी काया को पोषण मिलता है, किंतु बड़ी हृदयहीनता से इसी के विषय में ज्यादा विचार नहीं किया जाता । समझदारी से लिया गया सात्विक मित आहार एवं नियमित व्यायाम इस हृदय को काफी ठीक रख सकता है । किंतु यहीं प्रमाद हो जाने से अधिकाँश रोगी हृदयावरोध-हाई ब्लडप्रेशर आदि के कारण आज मरते देखे जाते हैं । हृदय बिलकुल मध्य में ‘रिबकेज’ (वह पिंजड़ा जो पसलियों से बना है) से ढँका स्थित है । सबसे बड़ा कार्य जो हृदय करता है, वह है बिना तनिक भी विश्राम किए सतत् आक्सीजन युक्त रक्त सारे शरीर में प्रवाहित करते रहना । दो काम एक साथ करना-अशुद्ध रक्त को शुद्धिकरण हेतु फेफड़ों में भेजना, उन्हें आक्सीजन युक्त बनाना एवं पूरे शरीर में शुद्ध रक्त से अभिप्रेरित कर देना यह ऐसी विशेषताएँ हैं, जो कोई भी हृदय से सीख सकता है । हृदय एवं रक्त-परिवहन से जुड़े तंत्र सम्बन्धित कुछ तथ्य ऐसे हैं जो चौंका भी देते हैं एवं कुछ हमारी अनभिज्ञता को उजागर करते हैं कि इतनी विलक्षणता से भरे संस्थान को हम जानते तक नहीं ।
70 से 80 बार प्रति मिनट धड़कने वाले हृदय के कारण सारा रक्त मात्र इतनी अवधि में एक बार पूरे शरीर का एक चक्कर लगा लेता है । यह तो विश्रान्ति की स्थिति में, किंतु यदि सक्रिय रूप से उसे काम करना पड़ गया यथा व्यायाम, दौड़, अनिवार्य कार्यों हेतु तेजी से सम्पन्न करने हेतु आयी सक्रियता तो यह समस्त रक्त मात्र 10 सेकेण्ड में एक परिक्रमा पूरे शरीर की लगा लेता है ।
एक दिन में हृदय से जो रक्त गुजर जाता है उसकी माप 8 टन के बराबर है ।
बीस करोड़ प्रतिदिन की संख्या में विनिर्मित होने वाली लाल रक्त कोशिकाएँ, जो कि आक्सीजन ले जाने का कार्य करती है , एक सौ बीस दिन तक का वीसा लेकर आती है, फिर समाप्त हो जाती है । इन एक सौ बीस दिनों में ये कोशिकाएँ प्रति माह शरीर की 5 लाख बार परिक्रमा कर लेती है ।
हृदय रूपी पम्प कितना शक्तिशाली है, यह जानना चाहते हो, तो इस तथ्य पर गौर करें । यदि हृदय से जुड़ी मुख्य धमनी ‘एओर्टा’ काट दी जाए, तो इससे 5 फीट ऊँची रक्त धार का फव्वारा निकलने लगेगा ।
हृदय से जुड़ी रक्तवाहिनी नलिकाओं का जाल इतना बड़ा है कि यदि इसे मीलों में नापा जाए, तो यह प्रायः साठ हजार मील के लगभग बैठेगा । यह दूरी पृथ्वी की दो बार परिक्रमा करने के बराबर है ।
35 प्रतिशत रक्त यदि शरीर का निकल भी जाए, तो शरीर का काम किसी तरह चल जाता है व शीघ्र ही यह पूरा कर देता है, किंतु यदि 50 प्रतिशत रक्त आयतन यदि शरीर का कम हो जाए, तो यह अत्यधिक खतरनाक हो सकता है ।
हृदय की अपने आपको पोषण देने की भी रक्त परिवहन व्यवस्था है जिन्हें कोटोनरी आर्ट्रीज कहते हैं एवं इसके कुछ विशिष्ट ऊतक (टिश्यूज) विद्युत् ऊर्जा से अनुप्राणित हो-इसे एक सशक्त बिजलीघर के रूप में स्थापित भी करते हैं । इसी विद्युत को इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम, मैग्नेटोकार्डियोग्राम, हाँर्ण्टस टेस्ट आदि से मापा जाता है ।
हृदय का अपना एक स्वतंत्र विवेकशील चिन्तन तंत्र भी है , जो यह निर्धारित करता है कि अनिवार्य कारणों-वश रक्त की कहाँ सर्वाधिक आवश्यकता है ताकि इसे वहीं पम्प कर पहुँचाया जा सके । पाचन के समय पाचन संस्थान के तथा व्यायाम आदि के समय माँसपेशियों व हृदय स्वयं को सर्वाधिक रक्त संचार की आवश्यकता पड़ती है । यह सप्लाई कहाँ से काटकर कहाँ जोड़ी जाए, यह विवेक हृदय को रहता है । इसीलिए हृदय स्वयं की एवं मस्तिष्क की रक्त- संचार प्रक्रिया को कभी प्रभावित नहीं होने देता-इसमें कोई भी स्थिति आने पर रक्त प्रवाहित होता ही रहता है ।
आज सारे विश्व में जीवन-शैली गड़बड़ा जाने से हृदय रोगों का दौर है । सारी काया के केन्द्र में होने के कारण इसका सर्वाधिक ध्यान तो रखा ही जाना चाहिए, यह उपरोक्त विवरण से भी स्पष्ट हो जाता है, जिसमें इस संस्थान से जुड़ी वैविध्यपूर्ण संरचना को वािण्त किया गया है । यदि व्यक्ति अपनी आदतों-आहार व चिन्तन की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित बना ले, तो कोई कारण नहीं कि यह संस्थान उसका जीवन भर साथ न दे।
बिना श्वास जीवन नहीं है । प्रश्न आक्सीजन का नहीं है । यदि व्यक्ति श्वास न ले, जिसमें मात्र बीस प्रतिशत ही आक्सीजन होती है तो वह घुटकर मर जाएगा । इसी से श्वास संस्थान, फेफड़ों व उनसे जुड़ी ब्रोंकाई रूपी नलिकाओं का महत्व समझा जा सकता है । नाक से वायु कोशों तक जो झिल्लियाँ बनी हुई हैं, इतनी प्रभावशाली हैं कि जब तक जीरो डिग्री से भी नीचे की ठण्डी हवा नाक से प्रवेश कर फेफड़ों के द्वार तक पहुँचती है, शरीर के तापमान के समकक्ष गर्म हो जाती है । यह इस रक्तवाहिनी नलिकाओं के जाल के कारण है, जिनसे झिल्लियाँ विनिर्मित हैं । मस्तिष्क के संवेदनशील तन्तु व फेफड़े ऐसे सूक्ष्म स्तर पर परस्पर जुड़े हुए हैं कि वातावरण में 0.3 प्रतिशत की कार्बनडाइ आक्साइड की वृद्धि मात्र कुछ ही सेकेण्ड में श्वसन की दर बढ़ाकर आक्सीजन एक्सचेंज की गति को यथावत कर देती है । हम सभी प्रायः पाँच सौ घन फीट हवा प्रतिदिन अपने अंदर स्वतः स्फूर्त प्रक्रिया के अंतर्गत खींचते व छोड़ते रहते हैं । वायु कोष्ठक (एल्वीओलाई) जहाँ आक्सीजन-कार्बनडाइ आक्साइड परस्पर एक-दूसरे से आदान-प्रदान करते हैं, इतने सूक्ष्म तंतु जाल के रूप में विनिर्मित व फैले हुए हैं कि यदि इन्हें फैलाया जाए, तो यह क्षेत्र प्रायः एक एकड़ खेत के समकक्ष होगा । इसी एयर सैक या वायु कोष्ठक तंत्र के गड़बड़ाने से दमा, एम्फीजिया व हार्ट फैल्योर जैसी व्याधियाँ होती हैं एवं विभिन्न प्रकार के प्राणायामों से इनसे मुक्ति पायी जा सकती है ।
क्या यह एक आश्चर्य नहीं कि मनुष्य स्वयं अपने आप के बारे में बहुत कुछ नहीं जानता जबकि ज्ञानी होने का दर्प रखते हुए स्वयं भी हैरान होता रहता है, औरों को भी परेशान करता रहता है । मानवी काया एक देवालय है जिसमें तैंतीस कोटि देवताओं का निवास बताया गया है । मालूम नहीं यह कितना सत्य है, पर कबीर की बात तो समझ में आती है, जिसमें वे कहते हैं- “अड़सठ तीरथ हैं घट भीतर, वाही में मनमल धोओ जी” । जब आज के यंत्र तब की दुनिया में नहीं थे, तो कोई कैसे जान पाया कि हमारे शरीर में फलानी जगह चक्र हैं, फलानी जगह उपत्यिकाएँ हैं एवं उन्हें जगाकर आत्मविद्या का धनी बना जा सकता है-समर्थ ऋद्धि-सिद्धि सम्पन्न बना जा सकता है । (अगले अंक में जारी)
हिटलर युवावस्था में साहसी, धीर और वीर प्रकृति का व्यक्ति था, किन्तु अपनी महत्त्वाकाँक्षाओं से प्रेरित होकर जब उसने हिंसा बरतनी शुरू की, हजारों निरीह व्यक्तियों को मौत के घाट उतार दिया, तो दूसरों का जितना अनर्थ हुआ, इससे अधिक उसने अपना पतन कर लिया । 1945 में जबकि उसे आत्मरक्षार्थ एक बंकर में भूमिगत होना पड़ा, तब उसकी स्थिति यह थी कि वह अपने बड़े से बड़े विश्वासपात्र को भी सन्देह से देखता । वह इतना भयभीत रहता था कि ताजी हवा लेने के लिए बंकर से ऊपर भी नहीं आता था । मार्शल गोरिंग को उसने जर्मन सेना का प्रधान सेनापति अपना वफादार जानकर नियुक्त किया था, उसने विद्रोह किया भी नहीं था, पर उसने ग्रीस से उसके देशद्रोही होने की बात कही । ग्रीस सारी स्थिति जानता था, पर भयवश खुद भी सच्ची बात नहीं कह सकता था । हिटलर का मानसिक सन्ताप इतना अधिक बढ़ गया था कि उसके पैर में लकवा मार गया । दो दिन पूर्व तक उसके बाल काले थे, पर एक दिन में ही उसके बाल सफेद कैसे पड़ गये ? इस बात पर स्वयं उसकी प्रेमिका इवा और गोबेल की पत्नी भी चकित हो उठी थीं । अन्ततः अपनी मानसिक स्थिति नियन्त्रण से बाहर पाई, तो हिटलर को आत्म-हत्या ही उससे बचने का एकमात्र उपाय सूझा और उसने आत्महत्या कर ली ।
मन की कुसंस्कारों को छुपाना पाप का भी पाप है । इसलिए भारतीय आचार्यों ने निष्कासन तप का सिद्धान्त बनाया था । लोगों को चांद्रायण कराते समय उनसे सारे पाप कबूल कराये जाते थे । देखने में प्रायश्चित्त कर्ता को अपना स्वाभिमान-सा नष्ट होता दीखता है, उससे औरों की हँसी का डर भी रहता है, किन्तु भूलें स्वीकार कर लेने से मन में जो गाठें पड़ सकती थीं, पड़ने से बच जाती हैं और मनुष्य एक व्यवस्थित जीवन के लिए, शुद्ध, संस्कारी जीवन के लिए तैयार हो जाता है ।
-प्रसुप्ति से जाग्रति की ओर (वाङ्मय क्र. 7)
यौवन को चिरकाल तक अक्षुण्ण बनाये रख सकना संभव है क्या ? वैज्ञानिक इन दिनों इसी संभावना पर विचार कर रहे हैं और यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि शरीर की वृद्धता का कारण क्या है ? इस दिशा में यदि उन्हें सफलता मिली, तो फिर दीर्घजीवन की संभाव्यता को साकार करने की उनकी चिरप्रतीक्षित अभिलाषा पूरी हो सकेगी, ऐसा उनका विश्वास है ।
ज्ञातव्य है कि यौवन और दीर्घजीवन का परस्पर गहरा संबंध है । वार्द्धक्य के लक्षण प्रकट होते ही यह मान लिया जाता है कि जीवन का अन्तिम अध्याय अब आरम्भ हो गया । यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि बुढ़ापा आखिर है क्या ? क्या बालों का श्वेत हो जाना अथवा झुर्रियाँ पड़ना ही चौथेपन की निशानी है ? विशेषज्ञ बताते हैं कि नहीं, वास्तविक बुढ़ापा शारीरिक न होकर मानसिक होता है । मन यदि वृद्ध हो गया, तो फिर उसके काया में प्रकट होने में भी देर नहीं लगती । वैसे भी इन दिनों अधिकाँश बीमारियों का मूल कारण मनोकायिक माना जाता और कहा जाता है कि आजकल की बीमारियाँ सर्वप्रथम मन में अपना डेरा डालती हैं। कालान्तर में यही काया में अभिव्यक्त होती हैं । इसे दूसरे प्रकार से कहें, तो यह कहा जा सकता है कि हमारे चिन्तन का शरीर पर गहन असर पड़ता है । बुढ़ापे का मूलभूत कारण यहीं निहित है, अतः इसे दूर भी यहीं से करना पड़ेगा । जानने योग्य तथ्य यह है कि सम्पूर्ण अध्यात्म विज्ञान में मन को, चिन्तन को एक अति सामर्थ्यवान तत्व के रूप में स्वीकार किया गया और कहा गया है कि जिस दिशा में जैसी उसकी गति होगी, वैसा ही वह शरीर को, उसके अधु-अणु को, परिस्थितियों को एवं मनुष्य को बनाता-ढालता चलता है । इस आधार पर भी इस उपर्युक्त सत्य की ही पुष्टि होती है कि शरीर का आधार मन है । मन यदि स्वस्थ, उत्फुल्ल और उदात्त स्तर का बना रहा, तो शरीर में भी उसकी परिणति स्वस्थता, प्रसन्नता, स्फूर्ति और ऊर्जस्विता के रूप में दृष्टिगोचर होगी । यौवन की यही पहचान है । चेहरे में चमक, आँखों में तेज और रोम-रोम से अभिव्यक्त होता उत्साह-यह स्थिति जवानी को और अधिक सुदीर्घ बनाती है ।
विज्ञान काया की वृद्धता को आधार मानकर चल रहा है और उसी को घटाने-मिटाने का प्रयास कर रहा है । उसके अनुसार कोशिका के शीघ्र हास को यदि रोका जा सके, तो चिरयौवन और दीर्घजीवन प्राप्त कर सकना संभव है । वैज्ञानिक विधियों द्वारा ऐसा यदि कर पाना शक्य हो भी गया, तो वह अस्थायी ही होगा एवं उसे सर्वसुलभ और सर्वजनीन बना सकना सरल नहीं होगा । ऐसे में उसकी क्या और कितनी महत्ता और उपयोगिता रह जाएगी-इसे समझा जा सकता है । अतएव इन सभी प्रकार के प्रयत्नों को प्रयोगशाला में चलने वाले शोध-अनुसंधानों तक ही सीमित मानकर चलना पड़ेगा ।
इस प्रकार के प्रयोग विश्व की कई प्रयोगशालाओं में चल रहे हैं । मैकगिल यूनिवर्सिटी माँण्ट्रियल के वैज्ञानिक भी सम्प्रति ऐसे ही प्रयोगों में निरत हैं । उन्होंने गोलकृमि नामक अत्यन्त छोटे जीव पर प्रयोग किये और उनकी जीवन अवधि को पाँच गुना बढ़ाने में सफलता पायी है । आमतौर पर ये प्राणी बाह्य वातावरण में दस दिन तक जीवित रहते हैं, जबकि प्रयोगशाला में विज्ञानवेत्ता इनकी आयु को पचास दिनों तक बढ़ाने में सफल हुए हैं । इतना ही नहीं, ये कृमि सामान्य गोलकृमि की तुलना में अधिक समर्थ और सशक्त भी हैं ।
ऐसा ही एक प्रयोग जर्मनी के बर्लिन यूनिवर्सिटी के प्राणिशास्त्रियों ने किया है । उन्होंने ‘फ्रुट फ्लाई’ नामक मक्खी पर जीन संबंधी कुछ ऐसी फेर-बदल की है कि साधारणतया 60 दिन तक जीवित रहने वाली मक्खियों का जीवनकाल बढ़कर लगभग दुगुना हो गया है । अब वे 110 दिन तक जिन्दा रहती हैं ।
विज्ञान के यह प्रयोग निश्चय ही सराहनीय हैं पर सवाल यह है कि मानवेत्तर प्राणियों में मिली यह सफलता मनुष्य के संदर्भ में कितनी संगत और उपादेय होगी ? यह विचारणीय है । यह ठीक है कि छोटे जीवधारियों से लेकर आदमी तक में वार्द्धक्य संबंधी प्रक्रिया लगभग एक जैसी है और एक को समझकर दूसरे के बारे में काफी कुछ अनुमान लगाया जा सकना सम्भव है, इतने पर भी सम्पूर्ण सफलता के लिए कितने लोग होंगे, जो
प्रयोगशाला में ‘गिनी पिग‘ बनने को तैयार होंगे ? अपने को कठिनाई में डालकर विज्ञानवेत्ताओं के परीक्षण की वस्तु बनने के लिए कोई क्योंकर राजी होगा ? कुछ क्षण के लिए यदि यह मान भी लिया जाए कि इन बाधाओं को पार कर सफलता हस्तगत कर ली गई, तो भी यह कठिनाई अपने स्थान पर यथावत बनी ही रहेगी कि हर कोई प्रयोगशाला में जाकर अपने बुढ़ापे का उपचार कैसे कराये ? इसे व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता, न ही मनुष्य के जीवन में ऐसे प्रयोगों से कोई फर्क पड़ने वाला है । विज्ञान के उत्कर्ष का यशगान करने के अलावा इन्हें और क्या कहा जाए ?
मानवी शरीर की कोशिकाओं के अध्ययन के आधार पर अनुसंधानकर्त्ताओं ने बढ़ती आयु के साथ घटते यौवन के जो कारण बताये हैं, उनमें तीन प्रकार के मत सर्वप्रमुख हैं । प्रथम मान्यता के अनुसार, कोशिकाओं द्वारा उत्पन्न अवशिष्ट पदार्थ ही उनके समय से पूर्व क्षय का कारण है । इस धारणा का समर्थन करने वालों का कहना है कि यदि किसी प्रकार कोशिका-अवशिष्ट की समस्या का कोई उपर्युक्त समाधान निकाला जा सके, तो लम्बे काल तक बुढ़ापे से छुटकारा पाकर दीर्घजीवन का रसास्वादन किया जा सकता है । दूसरे दल के शोधकर्ताओं के अनुसार क्रोमोज़ोम के ऊपरी भाग में आने वाला परिवर्तन ही इसका निमित्त कारण है । उल्लेखनीय है कि समय के साथ वह वह हिस्सा संकीर्ण नलिकावत हो जाता है । उनका अनुमान है कि संभवतः इस परिवर्तन के रुकने से वृद्धता पर भी शायद अंकुश लग जाए । शरीर शास्त्रियों का तीसरा वर्ग ऐसा है, जो इस क्षेत्र में जीन को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानता है । उनका विश्वास है कि निश्चित रूप से काया में एक या एक से अधिक जीन ऐसे हो सकते हैं, जो वृद्धावस्था के लिए जिम्मेदार हों । अब इस के प्रमाण भी मिलने लगे हैं ।
वेटेरन्स अफेयर्स मेडिकल सेण्टर, सीटल के प्राणिशास्त्री जी. शेलेनबर्ग ने शोध के दौरान एक ऐसे मानवजीन की खोज की है, जो बीस वर्ष के होते-होते व्यक्ति को वयोवृद्ध बनाने लगता है । यों तो बुढ़ापे के लिए उत्तरदायी यह सामान्य प्रकार का जीन नहीं है वरन ‘वार्नर सिण्ड्रोम’ नामक एक ऐसे रोग से सम्बद्ध है, जो यौवन में ही शरीर कोशिकाओं को अशक्त और निष्क्रिय बना देता है, फिर भी इसकी खोज से वैज्ञानिकों का यह दावा तो सच साबित हो ही जाता है कि जीन भी इस कार्य के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं । उक्त जीन के कारण व्यक्ति में वृद्धता संबंधी अनेकानेक लक्षण प्रकट होने लगते हैं, यथा-दिल से सम्बन्धित बीमारियाँ, साँस, अस्थि, पेट, नेत्र एवं अस्थि-संधि से जुड़े विकार । इन समस्त व्याधियों के फलस्वरूप 35-40 वर्ष के भीतर ही व्यक्ति की जीवनलीला समाप्त हो जाती है ।
अपने इस अन्वेषण से शैलेनबर्ग अत्यन्त उत्साहित हैं और अब चूहों पर अनुसंधान कर रहे हैं । वे यह जानने का प्रयत्न कर रहे हैं कि चूहों में यदि वार्नर जीन को प्रवेश कराया जाय, तो उसकी प्रतिक्रिया किस रूप में सामने आएगी ? क्या चूहे यौवन में ही आदमी की तरह बूढ़े होने लगेंगे ? चूहों पर प्रयोग करने का मुख्य उद्देश्य इस बात की जानकारी प्राप्त करना है कि उस जीन को हटाये बिना मनुष्य को उसके अवांछनीय असर से कैसे बचाया जा सकता है ।
वार्द्धक्य से सम्बन्धित एक अन्य व्याधि ‘प्रोजोरिया’ भी है । यह भी जीन विकृत के कारण ही होती है, पर वार्नर रोग की तुलना में यह अधिक गंभीर है । इसमें वृद्ध होने की गति ज्यादा तीव्र होती है । ‘न्यूयार्क स्टेट इंस्टीट्यूट फॉर बेसिक रिसर्च’ के जेनेटिक प्रभाग के अध्यक्ष डब्ल्यू. टेड ब्राउन एवं उनके सहयोगियों ने उक्त रोग पर शोध के दौरान पाया है कि उपरोक्त बीमारी के मूल में किसी एक ही जीन का हाथ है, किन्तु वह इतना समर्थ-सशक्त होता है कि अपनी उपस्थिति मात्र से ही अन्य अनेकों को प्रभावित, विकृत एवं उत्तेजित करने की क्षमता रखता है, जिसका संयुक्त परिणाम बुढ़ापे के रूप में सामने आता है । वे भी अनेक प्रकार के परीक्षणों के माध्यम से इस बात की जानकारी प्राप्त करने में संलग्न हैं कि जीन की कटाई-छँटाई के बिना ही क्या किसी रासायनिक प्रक्रिया के द्वारा उसकी क्रियाशीलता घटाई जा सकती है या नहीं ? अभी तक के परिणाम इसी बात के संकेत दे रहे हैं कि ऐसा संभव है । आगे क्या होगा ? यह तो समय ही बतायेगा ।
‘अल्जीमर डिसीज’ भी बुढ़ापे के लिए जिम्मेदार बीमारी है । आम बोलचाल की भाषा में इसे ‘सठियाना कहते हैं । शोध से ज्ञात हुआ है कि इसमें मस्तिष्क के कुछ हिस्सों में संकुचन आ जाता है, जिससे स्मृति से लेकर सामान्य बुद्धि तक प्रभावित होती है । शोधकर्ता इस संदर्भ में अब यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि यह भी किसी जीन विकृति की फलश्रुति तो नहीं ? अनुसंधान जारी है ।
जीन जवानी को प्रभावित करते और असमय बुढ़ापा लाते हैं-इतना स्पष्ट होने के उपरान्त विज्ञानी अब उनके द्वारा वृद्ध बनने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं, पर इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा उनके समक्ष यह है कि इतनी बड़ी संख्या में मौजूद जीनों को सुधारा कैसे जाए ? वाशिंगटन विश्वविद्यालय के जीन विज्ञानी जार्ज मार्टिन कहते हैं कि यदि यह मानकर भी चला जाए कि वृद्धावस्था के लिए जिम्मेदार ये बीज कोश सीमित संख्या में हैं, तो भी इस कार्य में कम-से-कम सात हजार जीन सम्मिलित होंगे । एक बीज कोश की मरम्मत भी एक दुरूह कार्य है, तो इतनी बड़ी संख्या में जीनों का सुधार-संशोधन तो एकदम असंभव ही माना जाना चाहिए ।
ऐसे में चिकित्साशास्त्रियों में दीर्घ-जीवन और वार्द्धक्य-नियंत्रण के संदर्भ में जो दावे-प्रति दावे किये हैं, उन्हें अध्ययन-अध्यापन से सम्बन्धित बुद्धि-विलास के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता । यों कुछ विशेषज्ञ इसके लिए एक-एक बीजकोश को दुरुस्त करने की तुलना में उनके सामूहिक नियंत्रण की बात करते और कहते हैं कि रसायनों को काया में प्रवेश कराकर ऐसा संभव है । कैलीफोर्निया के जीरान फार्मास्युटिकल ने हाल ही में एक शोध पत्र प्रकाशित किया है, जिसमें कहा है कि टेलोमेरेस कोशिकाएँ कोशिका-विकृति को रोकने में समर्थ हो सकती हैं, पर यह भी सिर्फ एक अनुमान है । इसकी परिपुष्टि के लिए अभी इसे परीक्षणों के दौर से गुजरना है, दावे के साथ तभी कुछ कहा जा सकेगा । इस प्रकार जीन-विज्ञान की असमर्थता सुस्पष्ट है । शेष दो अनुमानों में से कोशिका अवशिष्ट सम्बन्धी समस्या और प्रत्येक गुणसूत्र के ऊपरी हिस्से को सुधार पाना-यह कोई इतने सरल कार्य नहीं, जिन्हें आसानी से सम्पन्न किया जा सके । ऐसे में समस्या ज्यों-की-त्यों बनी रहती है ।
पिछले लगभग सौ वर्षों के स्वास्थ्य-इतिहास का विहंगावलोकन करने से यह ज्ञात होता है कि विज्ञान ने मनुष्य की औसत आयु बढ़ाने में कुछ सीमा तक सहायता तो की है, पर वैसे नहीं, जैसे बढ़-चढ़कर दावे इन दिनों किये जा रहे हैं । चिकित्साशास्त्र संबंधी आँकड़े बताते हैं कि सन् 1900 के आस-पास जन्मे अमेरिकियों की
औसत उम्र मात्र 47 वर्ष थी । पचास के दशक में इसमें कुछ सुधार हुआ और उत्तम स्वास्थ्य- सेवाओं एवं अनुसंधानों के फलस्वरूप यह सीमा बढ़कर 50 वर्ष हो गई । अगले एक शताब्दी में उसमें और सुधार हुआ एवं आयु-सीमा 55 वर्ष तक पहुँच गई । अगले 45 वर्षों तक यह क्रम इसी प्रकार चलता रहा । इसी का नतीजा है कि आज उनकी औसत आयु-सीमा 76 वर्ष है । अपने देश के लोगों की भी आयु-सीमा में वैज्ञानिक प्रगति और स्वास्थ्य सुविधाओं की उत्तम व्यवस्था के कारण वृद्धि हुई है । सन् 1985 में एक औसत भारतीय की आयु 52 वर्ष हुआ करती थी, आज की तिथि में यह 60 वर्ष है । जापान में यह सुधार दर सर्वाधिक है । 40 के दशक में वहाँ स्त्रियों की औसत आयु 42.6 वर्ष थी, जबकि पुरुषों की 36.5 वर्ष । वर्तमान में वहाँ महिलाओं की औसत वय 83 वर्ष है, जबकि पुरुषों की 75 वर्ष ।
औसत आयु में बढ़ोत्तरी संबंधी यह आँकड़े इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि पौष्टिक भोजन, उत्तम स्वास्थ्य सेवाएँ और चिकित्सीय खोजों के लाभ यदि हर एक को उपलब्ध हों, तो इनसे आयु-सीमा में व्यापक फेर-बदल संभव है । इन सबके बावजूद इन दिनों वृद्धता के लक्षणों में बढ़ोत्तरी ही हुई है । जिस गति से हृदय, फेफड़े, वृक्क, अस्थि सन्धि, प्लीहा जैसे अवयवों की जटिलता आज सामने आ रही है, उसे अभूतपूर्व ही कहना पड़ेगा । इसे देखते हुए आज के युवाओं को युवा कहने में संकोच होता है । विशेषज्ञों के मतानुसार इसका कारण वर्तमान जीवनशैली में निहित है । उसे परिवर्तित करके ही वे स्वस्थता, चिरयौवन और दीर्घायुष्य
का आनन्द-लाभ ले सकते हैं ।
आज का मानवी मनोविज्ञान जितना भौंड़ा और विकृत हुआ है, उतना शायद ही पहले कभी देखा गया हो । चिन्तन का विकार सम्पूर्ण शरीर तंत्र को प्रभावित करता है । मन की कुढ़न एवं चिन्तन के प्रदूषण सिर्फ उन्हीं क्षेत्रों तक सीमित होकर नहीं रहते वरन् अपना व्यापक विस्तार शरीर-परिधि तक करते हैं, फलस्वरूप ऐसी अगणित असमानताएँ और शारीरिक कठिनाइयाँ उद्भिजों की तरह प्रकट होने लगती हैं, जिनके बारे में पहले न कभी सुना गया था, न जाना । इसे चिन्तन और मन की अद्भुत सामर्थ्य ही कहनी चाहिए कि जब वे उलटा सोचते और उलटा करते हैं, तब उसका उलटा असर सर्वप्रथम उसी को प्रभावित करता है, जहाँ से इसका प्रादुर्भाव हुआ । आग जहाँ जलती है, सबसे पहले उसी को गर्म करती है । शारीरिक व्याधियों के संदर्भ में यह एक उल्लेखनीय तथ्य है । इन्हें मनोकायिक रोग कहते हैं । यह चिन्तन-क्षेत्र की गड़बड़ी के कारण पैदा होते हैं । इसके विपरीत जब हमारी भावनाएँ किसी श्रेष्ठतम की तरह उदात्त तथा उत्कृष्ट होती हैं, तो उसकी परिणति न सिर्फ सामाजिक क्षेत्र में सफलता के रूप में सामने आती है, अपितु शारीरिक, मानसिक क्षेत्र में प्रसन्नता, स्वस्थता, शान्ति, सौंदर्य और चिरयौवन के रूप में प्रकट प्रत्यक्ष होती है । इसकी शान्ति इतनी महान और क्षमतावान् है कि इससे हम स्वस्थता तथा सौंदर्य की उपलब्धि भी कर सकते हैं और शरीर की एनाटॉमी (आन्तरिक संरचना) और फिजियोलॉजी (शरीर की क्रिया प्रणाली) को परिवर्तित-प्रभावित भी ।
रामकृष्ण परमहंस के जीवन से इस बात की पुष्टि हो जाती है । कहते हैं कि जब वे अपने साधनात्मक जीवन में विभिन्न धर्मों और इष्टों से संबंधित साधना कर रहे थे, तो भावनाओं में परिवर्तन के साथ-साथ उनकी शरीर- संरचना और क्रिया प्रणाली में भी तद्नुरूप परिवर्तन स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते थे । एक बार जब वे रामभक्त श्री हनुमान् की साधना कर रहे थे, तो उनकी बाह्य प्रकृति और प्रवृत्ति न सिर्फ हनुमान् जैसी हो गई थी, अपितु उनकी पूँछ भी निकलने लगी थी । साधना की समाप्ति के साथ धीरे-धीरे वह तिरोहित हो गई । एक अन्य समय में वे राधा-भाव से रह रहे थे, तब न केवल उनके हाव-भाव और परिधान ही स्त्रियोचित हो गये थे, वरन् स्तन भी नारी सुलभ विकसित होने लगे थे ।
यह सब मन, चिन्तन और भावना की शक्ति को प्रकट करते हैं । आज की समस्या इन्हीं से जुड़ी हुई है । वे शारीरिक कम , मानसिक अधिक है । विज्ञान इनका स्थूल उपचार करने की कोशिश कर रहा है, जबकि होना चाहिए इनका सूक्ष्म इलाज । इन दिनों के मानवीय चिन्तन एवं भावना को यदि सही दिशा दी जा सके एवं उन्हें सही ढंग से सोचने व उच्चस्तरीय संवेदना पैदा करने का तरीका बताया तथा प्रशिक्षण दिया जा सके, तो कोई कारण नहीं कि हम स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन न जी सकें ।
‘लाइकेन’ जीवशास्त्रं का ऐसा शब्द है जो प्रकृति में सहजीवन को स्पष्ट करता है । देखने में तो लगता है कि कुकुरमुत्ता जिस पेड़ पर उगा है, वही उसका शरणदाता है, पर तथ्य इसके विपरीत ही है । इसके कोमल तने के अन्दर जल शैवाल नाम का कोश समुदाय निवास करता है । वह कुकुरमुत्ते के भीतर न केवल सुरक्षित रहता है, अपितु क्लोरोफिलयिहीन कुकुरमुत्ते को इस उपकार के बदले प्रकृति से जीवन तत्व खींचकर देता है, जिससे उसका भी विकास होता रहता है । ऐसा ही सम्बन्ध कर्कट ( ष्टह्ड्डड्ढ ) और सी-एनीमेन में पाया जाता है । कर्कट इन्हें पीठ पर लादे घूमता है । बदले में यह कर्कट की जीवनरक्षा में सहायक होता है । कर्कट जीव इससे बहुत दूर रहते हैं । यह परस्पर सहकार का चमत्कार है ।
यह सहयोग एवं सहकार का सद्भाव ही है, जिसके कारण परमात्म चेतना का विश्व-उद्यान हरा-भरा दीखता है। मनुष्य जैसे भावनाशील प्राणी के लिए यही उचित है कि वह अपनी संकीर्ण मनोवृत्तियों से ऊपर उठकर सबके प्रति दया, करुणा और आत्मीयतापूर्ण सम्वेदना से ओत-प्रोत हो, परमपुरुष के उद्यान को पुष्पित-पल्लवित करने में उसका हाथ बँटाए ।-दृश्य जगत की अदृश्य पहेलियाँ ( वाङ्मय क्र. 55 )
ध्यान जीवन का उच्चतम विज्ञान है । इसी वजह से महर्षि वेदव्यास ने ध्यान को ज्ञान से भी श्रेष्ठ निरूपित किया है । यही वह प्रक्रिया व विज्ञान है, जिससे सतत् परमात्मा का अनुभव-बोध किया जा सकता है । ध्यान, आध्यात्मिक जीवन के साथ-साथ भौतिक जीवन को भी शान्ति-शीतलता तथा अनिर्वचनीय आनन्द से ओत- प्रोत कर देता है । आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी इस पर गहन अन्वेषण-अनुसन्धान किया है । इसी के परिणाम स्वरूप चिकित्सा के क्षेत्र में ध्यान चिकित्सा एक नवीन उपलब्धि साबित हुई है । विश्व के ख्याति प्राप्त मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मनःसंताप के वर्तमान युग में शारीरिक एवं मानसिक अरोग्य तथा तनाव-मुक्ति को सर्वश्रेष्ठ पद्धति ध्यान ही हो सकता है ।
छान्दोग्य उपनिषद् में ‘ध्यानं वाव चित्ताद भूयः’ अर्थात् ध्यान ही चित्त से बढ़कर है । नारद पुराण में ध्यान तत्त्व का कुछ इस प्रकार से वर्णन है-
ध्यानात्पापानि नश्यन्ति ध्यानान्मोक्षं च विन्दति । ध्यानात्प्रसीदति हरिद्धर्धानात्सर्वासाधनाम् ॥
ध्यान से पाप नष्ट होते हैं । ध्यान से मोक्ष मिलता है । ध्यान से भगवान प्रसन्न होते हैं । ध्यान से सब मनोरथों की सिद्धि होती है । युग नायक स्वामी विवेकानन्द ध्यान को आध्यात्मिक जगत की विभूतियों एवं उपलब्धियों हेतु सबसे बड़ा सहायक साधन मानते थे । उनके अनुसार, ध्यान के द्वारा हम भौतिक भावनाओं से अपने आपको स्वतन्त्र कर लेते हैं और अपने ईश्वरीय स्वरूप का अनुभव करने लगते हैं ।
महर्षि अरविन्द कहते हैं कि भारतीय शब्द ध्यान की भावना को अभिव्यक्त करने के लिए अंग्रेजी में दो शब्दों का व्यवहार किया जाता है- Meditation (ध्यान) तथा ( Con-templation ) (निदिध्यासन) । जब मनुष्य अपने मन को किसी एक ही विषय को स्पष्ट करने वाली, किसी एक ही विचारधारा पर एकाग्र करता है, तो उसे ही वास्तव में ध्यान कहते हैं । परन्तु जब मनुष्य किसी एक विषय, मूर्ति या भावना आदि पर मन दृष्टि लगा देता है, जिससे एकाग्रता की शक्ति की सहायता से उसके मन में स्वभावतः इनका ज्ञान उदित हो जाता है, तो वही कहलाता है Con-tem plation ) (निदिध्यासन) । ये दोनों ही चीजें ध्यान के रूप में हैं, क्योंकि ध्यान का मूल स्वरूप ही है मानसिक एकाग्रता । फिर वह एकाग्रता चाहे विचार पर की जाए या किसी दृश्य पर या फिर ज्ञान पर ।
ध्यान के अनेकों रूप हैं, यह कई प्रकार का होता है । अरविन्द आश्रम की अधिष्ठाता शक्ति श्रीमाँ ने ध्यान का दो भागों में वर्णन किया है-सक्रिय ध्यान एवं अक्रिय ध्यान । सक्रिय ध्यान में एक विचार को लेकर उसके विशेष परिणाम पर पहुँचने के लिए उसका अनुसरण किया जाता है । इससे यथार्थ रूप में निश्चल-नीरव प्रशान्ति होती है । सक्रिय ध्यान अति दुष्कर एवं कठिन होता है । इसमें सभी विचारों को बन्द करने का प्रयास नहीं किया जाता । क्योंकि कुछ विचार तो ऐसे होते हैं, जो पूरी तरह से मशीनी होते हैं और उनको हटा पाना भी समय साध्य होता है । इसमें जैसे-जैसे एकाग्रता बढ़ती है, परिपक्व होती है, अभीप्सा तीव्रतर होती है, वैसे-वैसे आनन्द का झरना फूटने लगता है ।
ध्यान की सूक्ष्मता को विश्लेषित करते हुए श्रीमाँ आगे कहती हैं कि तुम दिव्य शक्ति की ओर उद्घाटित होने के लिए ध्यान कर सकते हो, तुम अपनी सत्ता और अस्तित्व की गहराइयों में बैठने हेतु भी ध्यान कर सकते हो। तुम यह जानने के लिए भी ध्यान कर सकते हो कि तुम स्वयं को सर्वांगीण रूप से कैसे विकसित कर सकते हो अथवा भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के प्रति तुम्हारा सम्पूर्ण-समर्पण विसर्जन-विलय किस प्रकार सम्भव है । तुम सभी प्रकार की चीजों के लिए ध्यान कर सकते हो । तुम शान्ति, स्स्रिता, नीरवता, निश्चल स्थिरता में प्रवेश के लिए ध्यान लगा सकते हो । अधिक सफलता पाए बिना लोग साधारणतया यही करते हैं । परन्तु तुम रूपान्तरित साधित करने की शक्ति पाने हेतु, जिन स्थलों-बिन्दुओं को रूपान्तरित करने की आवश्यकता है , उनका पता लगाने के लिए प्रगति की धारा को प्राप्त करने के लिए भी ध्यान कर सकते हो और फिर तुम व्यवहारिक कारणों से भी ध्यान कर सकते हो । जब कोई कठिनाई दूर करनी हो, कोई समाधान पाना हो, जब तुम किसी न किसी कार्य में सहायता चाहते हो, तुम इस सबके लिए भी ध्यान कर सकते हो । अन्त में श्रीमाँ का यह कहना है-ध्यान जीवन की भौतिक, आध्यात्मिक सभी परिस्थितियों में अंकुरित होने वाली हर समस्या के समाधान के लिए कारगर उपाय है ।”
व्यक्तिगत ध्यान के अलावा सामूहिक ध्यान भी किया जाता है । मानव इतिहास के प्रारम्भ से लोगों के कुछ समुदाय अपनी अन्तरात्मिक स्थितियों को सम्मिलित रूप से अभिव्यक्त करने के लिए एक जगह इकट्ठा हुआ करते थे । सामूहिक ध्यान का अभ्यास सभी कालों में किया जाता रहा है । इसका कारण, तरीका और प्रयोजन भले भिन्न रहे हों । कुछ लोक-विख्यात उदाहरणों से इसकी महत्ता एवं चमत्कारिक प्रभावों को स्पष्ट किया जा सकता है । घटना हजारवी ईसवी की है, जब कुछ भविष्यवक्ताओं ने यह घोषित किया था कि अब संसार का अन्त सन्निकट है । तब सभी स्थानों पर लोगों ने एकत्रित होकर सामूहिक ध्यान का सहारा लिया था । इसी प्रकार इंग्लैण्ड का राजा जार्ज निमोनिया की अन्तिम अवस्था में आखिरी साँसें गिन रहा था । लोग न केवल चर्चा में, बल्कि राजमहल के सामने, सड़कों पर एकत्रित हुए थे । सभी सामूहिक ध्यान में निमग्न होकर पुकार रहे थे कि उनका राजा जार्ज स्वस्थ हो जाए । उन दिनों के विशेषज्ञों ने इसे चमत्कार ही कहा कि जार्ज अच्छा हो गया ।
सामूहिक ध्यान के इस तरह के चमत्कारी परिणामों की गिनती हजारों में है । हालाँकि यह सब सामूहिक ध्यान का एकदम बाहरी स्वरूप है । सामूहिक ध्यान में अपरिमित शक्ति का संचार होने लगता है । इसके लिए एकत्रित सदस्य एकमत, सामंजस्य और सहयोग के साथ एक समूह या एकमात्र इकाई जैसे होना चाहिए । वर्तमान युगसन्धि महापुरश्चरण की वेला में ब्रह्म मुहूर्त में करोड़ों गायत्री साधकों के सामूहिक ध्यान से हो रही हलचलों को दिव्य-दृष्टि से सम्पन्न बड़ी आसानी से अनुभव कर सकते हैं ।
ध्यान का मुख्य उद्देश्य ईश्वर-प्राप्ति है । परमात्म-चेतना सृष्टि के हर घटक में समाहित है । ध्यान द्वारा इसी सत्ता से एकात्म उत्पन्न करना होता है । ‘द आर्ट आफ मेडीटेशन में जोएल गोल्डस्मिथ ने ध्यान-प्रक्रिया का बड़ा रोचक एवं सुन्दर विश्लेषण किया है । इनके अनुसार, ध्यान न तो स्वास्थ्य और सम्पत्ति के लिए करना चाहिए और न कामना-वासना की पूर्ति हेतु । ध्यान तो विशुद्धतः भगवत्प्राप्ति के लिए ही करना श्रेयस्कर है । ध्यान की प्रक्रिया मनुष्य के जीव भेद को समाप्त कर परमात्मा से तदाकार कर देती है । अन्त में शेष रह जाता है, केवल शान्ति, स्स्रिता, आनन्द एवं परमानन्द । अहंकार ही वह विभेदीकरण है, जो आत्मा और परमात्मा को विभाजित कर देती है । अहंकार से द्वैत भाव का जन्म होता है, मैं और मेरेपन का । ध्यान इस अहंकार को गलाकर निर्विकल्प समाधि में एकाकार कर देता है । मनुष्य के रग-रग में, कण-कण में परमात्मा की सुगन्ध बिखरने लगती है । सतत् प्रभुमय चिन्तन की तरंग उठने लगती हैं । यह ध्यान का आध्यात्मिक गुण है, जो एक नगण्य मानव को देव और दिव्य भाव में परिवर्तित कर परमात्मीय कर देता है । विश्वविख्यात स्वामी विवेकानन्द नित्य दो घण्टे ध्यान की अनन्त गहराई में विचरण करते थे । अध्यात्म जगत में भगवान बुद्ध को सबसे प्रखर ध्यानी माना जाता है ।
आधुनिक विज्ञानवेत्ताओं का कहना है कि ध्यान से शारीरिक एवं मानसिक विश्रान्ति मिलती है । इस प्रक्रिया के परिणाम में व्यक्ति गहरे विश्राम का अनुभव करता है । इस समय साधक के शरीर में आक्सीजन की कुल खपत में जो कमी आती है, वह व्यक्ति को मिलने वाली शान्ति प्राप्त करने में सहायक होती है । प्राकृतिक रूप से कोशिकाओं में ऑक्सीजन की आवश्यकता घट जाती है । ऑक्सीजन की खपत की माप लेकर मेटाबालिक दर निकालते हैं । ध्यान के लिए यह गति बहुत अधिक घट जाती है । वैज्ञानिक शोध से स्पष्ट हुआ है कि औसत 20 प्रतिशत की गिरावट ध्यान के पहले 10 मिनट में ही आ जाती है । गहन निद्रा की तुलना में ध्यान के दौरान चयापचीय क्रिया में जो कमी आती है, उससे शरीर स्वस्थ एवं मन तनाव मुक्त रहता है ।
ध्यान के विषय में विश्व के 27 देशों में 200 स्वतंत्र विश्वविद्यालय और शोध संस्थाओं में पिछले 36 साल के दौरान 500 से अधिक वैज्ञानिक शोध हुए हैं । इसमें 30 हजार से भी अधिक शिक्षक हविश्व के विभिन्न देशों में कार्यरत हैं । एक अध्ययन के नवीनतम आँकड़े से पता चलता है कि संसार के 50 लाख व्यक्ति ध्यान करके अनेक शारीरिक एवं मानसिक रोगों से मुक्ति पा चुके हैं । बीमारियों से बचाव के लिए आजकल ध्यान चिकित्सा पद्धति जोरों से प्रचलित है । इसके नूतन स्वरूप प्रदान करने विश्व भर में ख्याति प्राप्त डॉ0 दीपक चोपड़ा ने ध्यान चिकित्सा को प्राइमोडियल साउण्ड मेडिटेशन (पी. एस. एम.) द्वारा प्रारम्भ किया है । यह विश्व के 113 देशों में प्रचलित है । भारत में मूलचन्द अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ0 के. के अग्रवाल ने भी इसकी शुरुआत की है ।
ध्यान- चिकित्सा में व्यक्ति के मूल स्वभाव के अनुसार एक सार्वभौम मंत्र का निर्धारण किया जाता है । ध्यान से पूर्व तीन प्राणायाम का अभ्यास कराया जाता है । यह प्राणायाम तीन प्रकार का कार्य करता है । दिमाग के नकारात्मक सोच को दूर कर उसका निषेध करता है तथा सकारात्मक विचारों को जन्म देता है । पी. एस. एम. में प्राकृतिक स्वरलहरियों का इस्तेमाल किया जाता है । डॉ0 अग्रवाल के अनुसार, इस चिकित्सा में साधक के जन्म के समय की ब्रह्माण्डीय स्थिति की जानकारी ली जाती है, ताकि उसकी मूल वृत्ति को प्रभावित किया जा सके । इसमें मनुष्य की मूल वृत्ति को झकझोर कर उसे नूतन दिशा प्रदान की जाती है ।
इसे 20 मिनट तक कराया जाता है । ध्यान- चिकित्सा के लिए किसी विशेष आसन की आवश्यकता नहीं पड़ती है, परन्तु भोजनोपरान्त इसे नहीं किया जाता है । चिकित्सकों के मतानुसार ध्यान में आदमी तीन प्रकार की स्थिति में पहुँचता है । पहले तो उसे नींद आ जाती है ऐसी स्थिति में शरीर को आराम दिया जाता है । मन का कम्पन बड़ा तीव्रतर होता है , जिससे किसी निश्चित विचार का आना सम्भव नहीं होता । नियन्त्रित ध्यान में मन में उठती इन अनियन्त्रित तरंगों को शान्त करने में सहायता मिलती है । ध्यानयोगियों का मन है कि दो विचारों के बीच की अवधि शून्य होती है । इसी क्षणिक शून्य में ही अनिर्वचनीय आनन्द की प्राप्ति होती है । समाधि में यही शून्यता व्याप्त रहती है । ध्यान-चिकित्सक इसी शून्यता को बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं । जाहिर है आदमी सैकड़ों सोच से घिरा रहता है , उसका दिमाग कभी खाली नहीं रहता है । योगी अचेतन को ही इसका मुख्य कारण मानते हैं ।
डॉ0 अग्रवाल के अनुसार, ध्यान-चिकित्सा में मानसिक सफाई एवं परिष्कार की अनिवार्यता होती है । ध्यान से शारीरिक-बल मानसिक-क्षमता एवं हृदयगत भावना में अभिवृद्धि होती है । रोग-प्रतिरोधक क्षमता के बढ़ जाने से शरीर नीरोग एवं सबल बना रहता है । हृदय तथा साँस की गति कम हो जाती है । शरीर के तापमान में कमी आती है । इससे शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा का ह्रास रुक जाता है, जिसका उपयोग आत्मविकास में होता है । चिकित्सकों के अनुसार बीस मिनट का पूर्ण ध्यान सात घण्टे की गहरी नींद के बराबर होता है । ध्यान करने वाले साधकों की औसत आयु बढ़ जाती है । ये अपनी उम्र से दस-पन्द्रह साल कम आयु के लगते हैं ।
ध्यानयोगियों ने व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को तीन भागों में बाँटा है । स्थूलशरीर में ऊर्जा का संचरण, सूक्ष्म शरीर में मन और बुद्धि तथा कारण शरीर को भावना और संवेदना का शरीर माना जाता है । ध्यान का प्रभाव स्थूल शरीर से आरम्भ होकर सीधे कारण शरीर तक पहुँच जाता है । यही नहीं इसी प्रभाव के बलबूते अहंकार की अभेद्य दीवार धराशायी हो जाती है । मन पर आत्मा की किरणों पड़ती हैं तथा आत्मा अपने मूल स्वरूप में ज्योतिर्मय हो उठती है । ध्यान से व्यक्ति अपने आत्म-तत्त्व में आनन्दित रहता है । ध्यान के इस आनन्द का सूफी सन्त जामी ने फारसी में कुछ इस तरह जिक्र किया है-
गर दिल तो गुल गुजाद गुल बशी । बर बुल-बुले बेकरार बुलबुल बशी ॥
यदि तो अपने दिल में फूल का विचार करेगा तो फूल हो जाएगा और यदि उसी के प्रेमी बुलबुल में ध्यान लगाए तो बुलबुल हो जाएगा । ध्यान जिसका किया जाता है, उसी में चेतना तादात्म्य हो जाती है । आनन्द के अनन्त महासागर परमात्मा में ध्यान लगाने से स्वयं की चेतना का रोग-शोक से मुक्ति पाकर आनन्दमय हो जाना स्वाभाविक ही है ।
भेड़ें चर कर वापस अपने आप पानी पीने बावड़ी पर लौट आतीं। वह तो जंगल में भेड़ों की रेवड़ को चरने के लिए छोड़ देता था और खुद एक बावड़ी के पास बने चबूतरे पर बैठ जाता। वहाँ बैठे हुए रेवड़ के चर कर लौटने का इंतजार करता। भेड़ों को इस तरह अपने आप लौटता देखकर वह अपने आपसे कह उठता “किसको सूझी है, मूर्ख की तुलना भेड़ से करने की, भेड़े तो बड़ी अक्लमंद होती हैं। रेवड़ में उनकी संख्या चार-पाँच सौ होती है, पर बावड़ी के पास रखी खेली में से केवल बीस या तीस भेड़े ही एक साथ पानी पी सकती हैं, इससे ज्यादा नहीं। पर अगली भेड़ों के पानी पीने तक पीछे की भेड़ें खड़ी इंतजार करती रहती हैं। फिर पानी पी चुकने वाली भेड़ें एक ओर हटकर इंतजार करती रहती हैं। वे साथ पानी पीने आती हैं और सबके साथ ही आराम करने जाती हैं।”
अपनी इस बात को सोचते हुए बड़े दार्शनिक अंदाज में सिर हिलाया। उसके होठों पर थिरक आयी मुसकान को देखकर कुछ ऐसा लगता था, जैसे उसने कोई गूढ़ रहस्य खोज निकाला हो अथवा कोई महत्वपूर्ण अनोखे सूत्र का आविष्कार कर लिया हो। वह था तो सामान्य चरवाहा, पर उसके सोचने का अंदाज बड़ा विचित्र था। उसका काम तो सिर्फ अपनी भेड़े चराना था, पर वह इसी बीच में वह कुछ चित्र-विचित्र सोचा करता। आज का चिंतन भी उसकी इसी सोच की एक नयी कड़ी थी। उसकी पत्नी कभी-कभी अपने पति की अजीबो-गरीब सोच से हैरान हो जाती। वे दोनों अपने गाँव के छोटे से कच्चे घर में रहते थे।
उस दिन भी वह मुसकराते हुए अनोखे अंदाज में बैठा, अपनी भेड़ों के रेवड़ के लौट आने का इंतजार कर रहा था। न जाने क्यों भेड़े देर कर रही थीं। जब-जब उसका रेवड़ यों देर से आता वो समझ जाता कि भेड़ों के साथ जरूर कोई दुर्घटना घटी है। आखिर काफी देर बाद दूर से आता भेड़ों का झुण्ड नजर आया। पास आने पर उसने अपनी भेड़े गिनी । एक-दो तीन-चार एक सौ इकतालीस। उसकी आशंका एकदम सही हो गयी। अरे! शेष भेड़ें कहाँ गयीं? ये तो एक सौ बावन थी। उसने निश्चय किया कि वह पता लगायेगा कि कभी-कभी उनकी भेड़ों की संख्या यों अचानक कम क्यों हो जाती हैं?
अपने इसी निश्चय को पूरा करने के लिए वह खोज-बीन में जुट गया। एक दिन वो दूर एक पेड़ पर चढ़कर छुपा बैठा था। उसने देखा जंगल में से एक भेड़िया आता है और उसकी भेड़ों के किसी झुण्ड के साथ मिलकर उन्हें एक अलग ऊँचे रास्ते पर ले जाता है। मगर भेड़ें हैं कि गर्दन झुकाए चरती-चरती आगे बढ़ जाती हैं और चट्टान की उस ऊँचाई की दूसरी ओर स्थित खाई में गिरकर या तो मर जाती हैं या फिर भेड़ियों के साथी जंगली हिंसक जानवरों का शिकार हो जाती है। चालाक भेड़िया पंजों के बल पर उछलता साफ बच जाता है। भेड़िये की इस चालाकी की वजह की वजह से बेचारे चरवाहे को निरंतर घाटा उठाना पड़ता।
इस वस्तुस्थिति को देख समझ कर वह किसी गहरे सोच-विचार में डूब गया। अपनी इस उधेड़ बुन में अचानक उसे कुछ सूझ गया। इस नये अनोखे विचार की छुअन से उसकी आँखों में प्रसन्नता छलक उठी। घर पहुँचकर उसने अपनी पत्नी को बुलाया और कहने लगा-अपनी ये भेड़े खुद की अज्ञानता की वजह से अपनी जान गँवाती है। क्यों न हम अपनी भेड़ों को पढ़ाना शुरू करें। उन्हें सिखा दें कि ऐसे दुर्गम एवं जानलेवा रास्ते पर हरगिज नहीं जाना है और उस दुष्ट भेड़िये का कहना तो किसी भी कीमत में नहीं मानना है।”
चरवाहे को अपनी इस सोच पर भारी प्रसन्नता हो रही थी। उसे लगने लगा कि अब समस्या का समाधान होने में देर नहीं। उसकी पत्नी उसके पति के सोचने के ढंग से परिचित थी। उसे भेड़ों की पढ़ाई का विचार कुछ विचित्र तो लगा, पर उसने स्वीकृत दे दी। अब चरवाहा जब अपनी रेवड़ चराने जाता, तो स्वयं दिन भर बावड़ी के पास वाले चबूतरे पर नहीं बैठा रहता, बल्कि अपनी भेड़ों को पढ़ाता। उनसे बातें करता। उन्हें सबक रटाता। वह बड़े प्यार से भेड़ों को बुलाता। पहले-पहल तो किसी भेड़ ने नहीं सुना। वे बड़े आनंद से घास और दूब चरती रहीं। पर चरवाहा भी कब मानने वाला था। उसने जोर-जोर से कहा-भेड़ों भेड़ों!!
भेड़ तो सिवाय-में-में की मिमियाहट के सिवाय कुछ भी न जानती थीं। क्योंकि अपनी रेवड़ में वे केवल वहीं आवाज में-में सुना करती थीं। इसलिए वे चरवाहे की आवाज सुन तो लेतीं, पर वापस बोल नहीं पाती थीं। लेकिन चरवाहे को भी अपने काम से कम लगाव न था। वह जुटा तो जुटा ही रहा। एक दिन, दो दिन करते-करते महीनों गुजर गये। अंत में एक दिन उसकी मेहनत रंग लायी। एक दिन भेड़ बोल उठी-भेड़ों भेड़ों!!
जब एक भेड़ ने कहा-भेड़ों भेड़ों!! तो बाकी भेड़ें उसका मुँह देखने लगीं और कुछ तो देखा-देखी और कुछ प्रयत्न करते-करते वह हो गया जो आज तक नहीं हुआ था। एक-एक करके सारी भेड़ें बोलने लगीं-भेड़ों ! भेड़ों!! उस जंगल में भेड़ों! भेड़ों!! की आवाज गूँजने लगी। चरवाहे की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। घर जाकर उसने अपनी आज की सफलता की खुशी में लगभग झूमते हुए उसने पत्नी को कहा-तुम हमेशा मेरी सोच को अजीबो-गरीब विचित्र जैसे नाम देती रहती हो। हमेशा यही कहती रहती हो, भला जो कभी नहीं हुआ, वह अब कैसे होगा? लेकिन आज हो गया, हमारी भेड़ों ने पढ़ने की शुरुआत कर दी। मेरा तो हमेशा से विश्वास रहा है, आदमी को सदा कुछ नया करना और नया सोचना चाहिए। अब देखना एक दिन हमारी भेड़ें अपनी समस्या का समाधान स्वयं करने लगेंगी। उत्तर में पत्नी मुस्करा दी। उसे समझ में नहीं आया कि इस मुसकान में क्या छिपा है प्रशंसा अथवा प्रोत्साहन अथवा फिर निराशा। पर इस सबके बारे में उसे सोचने की फुरसत कहाँ थी। उसे तो अपनी भेड़ों को एक नया सबक सिखाना था।
जंगल जाकर उसने आगे सिखाया, भेड़िया आएगा। अबकी बार जल्दी ही भेड़ें उसकी नकल में बोल उठी-भेड़िया आयेगा।” रोज-रोज एक पंक्ति करते-करते चरवाहे ने भेड़ों को पूरा सबक सिखा दिया। भेड़ें इधर-उधर चरती और एक स्वर में रटती रहतीं-भेड़ों भेड़ों!! भेड़िया आयेगा। चट्टान पर ले जायेगा। उसके पीछे मत जाना। सावधान रहना। अपनी जान बचाना। भेड़ों के मुख से अपनी पढ़ाई गयी बातों को सुनकर चरवाहा बहुत प्रसन्न हुआ। वह सोचने लगा कि मैंने ऐसा काम कर दिया है कि अब एक भी भेड़, भेड़िये के चंगुल में नहीं फँसेंगी और न उसे बिना बात का घाटा होगा। उसे लगा उसकी सोच कामयाब हो गयी। क्योंकि इतने दिनों एक भी भेड़ कम नहीं हो रही थी। वह सोच रहा था कि यह सब मेरी पढ़ाई का कमाल है, जबकि बात कुछ और ही थी। असल में भेड़िया भेड़ों की फिराक में रोज ही इधर आता था, परंतु हर बार चरवाहे की रेवड़ के साथ तैनात देखकर उसकी दाल नहीं गलती थी। वह दूसरे शिकार की तलाश में निकल जाता था।
इधर कुछ दिन सजग रहने के बाद चरवाहे ने अपनी इस नयी कामयाबी की खबर पत्नी को उल्लास के साथ कह सुनायी। देखो! तुमको भेड़ों की पढ़ाई पर कतई विश्वास न था। पर मैंने कर दिया न एक नया काम। एक ऐसा काम जो अब तक कोई भी न कर सका। अब हमारी सारी भेड़ों ने हमारी पढ़ाई सारी बातों को रट लिया है। तुम भी चाहों तो सुन सकती हो। अब भेड़िये की क्या मजाल जो उन्हें गुमराह कर सके। पत्नी उसकी बातों को रट लिया है। तुम भी चाहों तो सुन सकती हो। अब भेड़िये की क्या मजाल जो उन्हें गुमराह कर सके। पत्नी उसकी बातों पर फिर एक बार मुस्करा दी। वह फिर से नहीं समझ पाया कि उसकी इस मुसकराहट का रहस्य और अर्थ क्या है? अथवा यों कहो कि वह अपनी सफलता की खुशी में इस कदर मग्न था कि कुछ और समझना ही नहीं चाहता था। अब तो उसने अपनी पहले वाली दिनचर्या अपनाने की भी ठान ली थी। वह पहले की ही भाँति भेड़ों के रेवड़ को जंगल में छोड़ देता और स्वयं बावड़ी के पास वाले चबूतरे पर बैठकर मीठे-मीठे सपने देखता।
भेड़िये को फिर से मौका मिल गया। वह अभ्यस्त शिकारी की भाँति फिर रेवड़ में घुसा। रेवड़ की सारी भेड़े सिर झुकाए घास चरती जाती और वहीं पाठ दुहराती जाती थीं जो उन्हें चरवाहे ने सिखाया था। भेड़ों के मुँह से ये अटपटी बातें सुनकर भेड़िया तो चकरा गया। उसने सोचा-अरे ये तो सारी की सारी भेड़ें अक्लमंद हो गयी हैं। भला अब मेरे पीछे-पीछे क्यों आएँगी?
फिर भी उसने एक प्रयत्न करते हुए अपने आप से कहा-एक बार आजमाकर देख लेने में क्या हर्ज है? उसने देखा भेड़ों का एक छोटा झुण्ड एक ओर घास चर रहा था, वह उसी ओर बढ़ा। उन्हीं की भाँति गर्दन नीची किए एक-एक कदम उस ऊँची ढलान, गहरी की खाई की ओर बढ़ने लगा। उसकी देखा-देखी भेड़ों का वह झुण्ड भी उधर ही बढ़ने लगा। मगर वे सभी वही पाठ दुहराती जाती थीं, जो चरवाहे ने उन्हें सिखाया था। बस फिर क्या था! भेड़िये ने चट्टान का शिखर पर पहुँचकर खाई की ओर छलाँग लगा दी। देखा-देखी भेड़ें भी एक-एक करके खाई में गिरने लगीं। इस बार अंतर बस इतना ही था कि पहले जहाँ भेड़ें में-में करती हुई गिरती थीं, जबकि इस बार वे सब की सब एक साथ सिखाया गया पाठ दुहराते हुए गिरती थीं।
उधर चरवाहे की पत्नी एक खास समाचार लेकर जंगल में पहुँची। उसने देखा कि उसका पति बावड़ी के पास वाले चबूतरे पर आराम से पैर फैलाए लेटा हुआ सो रहा है। उसने उसे झिंझोड़ कर उठाया और रेवड़ का हाल पूछा। चरवाहा अकड़ के साथ अपनी मेहनत का बखान करता पहुँचा। जब वे पति-पत्नी रेवड़ से थोड़ी दूर थे, पत्नी ने चरवाहे को ऊँची चट्टान की ओर उँगली उठाकर इशारा किया। चरवाहे ने देखा कि एक-एक करके उसके उस झुण्ड की बारह भेड़ें खाई में गिरने जा रही थी। वह अपनी भेड़ों को बचाने दौड़ा। वो वहाँ तक पहुँचता, तब तक उसका सिखाया पाठ दुहराती बारहवीं भेड़ खायी में गिर चुकी थी, आवाजों की गूँज अभी भी जंगल में तैर रही थी।
‘भेड़ों ! भेड़ों !! भेड़िया आयेगा। चट्टान पर ले जायेगा। उसके पीछे मत जाना। सावधान रहना। अपनी जान बचाना। इस गूँज को सुनकर चरवाहा सिर पीटकर रोने लगा। उसने अपनी पत्नी से कहा-मैंने इतनी मेहनत और लगन से इन भेड़ों को पढ़ाया, ये मेरी पढ़ाई बेकार कैसे गई। ? पत्नी ने उसे धीरज देते हुए कहा-” पत्नी ने उसे धीरज देते हुए कहा-पहले घर चलो गुरुजी आए है। सारी बातें उन्हीं पूछेंगे।” पत्नी के साथ चरवाहे को भी गुरुजी पर बहुत विश्वास था। वे उसके माता-पिता के भी गुरु थे। उनके ज्ञान की गरिमा एवं सिद्धियों की सामर्थ्य से अकेले उसका ही गाँव नहीं आस-पास का समूचा क्षेत्र परिचित एवं प्रभावित था। गुरुजी के आगमन की बात सुनकर लगा, अब तो समाधान मिल ही जायेगा।
घर पहुँचने पर उसने गुरुजी को सारी बात विस्तार से कह सुनायी। पूरी कहानी सुनकर वह रहस्यपूर्ण ढंग से मुसकराते हुए कहने लगे-तुमने भेड़ों को सिखाया, वह भेड़ों ने रट लिया, पर उन्हें समझ लेती। यदि ऐसा होता तो उन्हें ये दिन देखना न पड़ता। फिर थोड़ा रुककर वे उसे समझाते हुए बोले-बेटे ऊँची-ऊँची बातों को रट लेने भर से काम नहीं चलता। ज्ञान वही सार्थक है जो आचरण एवं अनुभूति का विषय बन जाय। जो लोग भारी-भरकम शास्त्र-वचन महापुरुषों के उद्धरण रट तो लेते हैं, पर आचरण में उतार नहीं पाते। उनकी भी दशा तुम्हारी भेड़ों की तरह होती है। दुष्प्रवृत्तियों का भेड़िया आता है और वे उसके पीछे-पीछे लम्बे-चौड़े सिद्धांत रटते हुए चल देते हैं, अन्ततः पतन के गर्त में समा जाते हैं।”
चरवाहे को गुरुजी की बात समझ में आ रही थी, जबकि गुरुजी उससे कह रहे थे, तुम्हें हमेशा कुछ नया करने का शौक है, तो इस बार नया यह करो कि कर्मठ बनो और ज्ञान को आचरण में उतारो।” उसने हामी भरते हुए अपनी बगल में देखा, पत्नी पास में खड़ी मुस्करा रही थी।
मूर्धन्य विज्ञानवेत्ता जॉन बैरो ने एक पुस्तक लिखी है, नाम है-दि आर्टिफीशियल इण्टेलिजेंस एंड दि कमिंग सेंचुरी।’ जानकारी की दृष्टि से यह अत्यंत साधारण है, पर इसमें जिस प्रकार की संभावना का उल्लेख किया गया है, उसे देखते हुए उसको असाधारण ही कहना पड़ेगा और मानना पड़ेगा कि आगामी समय कदाचित विज्ञान द्वारा निर्मित कृत्रिम प्राणियों का होगा।
कल का अनुमान यदि आज लगाना हो तो उसके दो तरीके हैं-एक वह, जिसमें अतीन्द्रिय सामर्थ्य के आधार पर अध्यात्मवेत्ता आने वाले समय की भविष्यवाणी करते हैं, जब कि दूसरा उपाय अनुमान और आकलन पर आधारित है। वर्तमान परिस्थितियों के सहारे उसमें भविष्य की रूपरेखा तैयार करनी पड़ती है और यह देखना पड़ता है कि आगामी समय का रुख क्या होगा। अनागत को जानने का सर्वसामान्य तरीका यही हैं। इसी के आधार पर साधारण किसान से लेकर विज्ञ विज्ञानवेत्ता तक अपनी अटकलें लगाते और निष्कर्ष निकालते हैं। बैरो ने इसी का आश्रय लेते हुए वर्तमान वैज्ञानिक प्रगति का विश्लेषण किया है एवं इस बात की संभावना प्रकट की है कि भविष्य में लगभग हर एक विकसित प्राणी की एक यांत्रिक अनुकृति होगी। वह अनुकृति कृत्रिम भले ही हो, पर उसकी आकृति और आचरण लगभग वास्तविक जैसे ही होंगे।
जलचरों और नभचरों के आधार पर वर्षों पूर्व वैज्ञानिकों ने जलयानों और वायुयानों का निर्माण किया। तब वे पूर्णतः मानवचालित थे। यों अब भी उनका परिचालन मनुष्य ही करते हैं, पर वर्तमान में धीरे-धीरे उनका स्वरूप स्वचालित होने लगा है। परिवहन और यात्री विमानों के अतिरिक्त मौसम की जानकारी पाने और जासूसी करने के उद्देश्य से जो छोटे आकार के यान विकसित हो रहे हैं, वे पूर्णतया कम्प्यूटरीकृत और पायलट रहित होते हैं। इसके अलावा ग्रहों-उपग्रहों के अध्ययन-अन्वेषण के लिए जिन यानों का उपयोग किया जाता है, वे भी मानव रहित होते हैं। मंगल ग्रह और चंद्रमा के अध्ययन के लिए आरंभ में रूस और अमेरिका ने स्वचालित या नहीं भेजे थे। उनका सम्पूर्ण नियंत्रण रोबोट के हाथ था। रोबोट को दिशा-निर्देश धरती के नियंत्रण कक्ष से मिलता था।
ऐसे यानों के लाभ भी है और हानियाँ भी। लाभ यह है कि जहाँ मनुष्य नहीं पहुँच सकते अथवा जहाँ जीवन संबंधी खतरे हैं, वहाँ पहुँचकर ये अपने कार्य कुशलतापूर्वक सम्पन्न करते हैं। आज यदि ऐसे यान नहीं होते, तो ग्रह उपग्रह संबंधी इतनी विस्तृत और सूक्ष्म जानकारियाँ उपलब्ध नहीं होती । पिछले तीन दशकों में चंद्रमा, मंगल और बृहस्पति ग्रह के बारे में जो ठोस सूचनाएँ मिली हैं, वह सब इन्हीं यानों के कारण संभव हो सकी हैं। इनकी कमियाँ यह है कि ये कृत्रिम बुद्धि सम्पन्न हैं, अतः विपरीत परिस्थितियों में क्या करना चाहिए? कौन-कौन से कदम उठाने चाहिए? इसका निर्णय वे स्वयं नहीं कर सकते, इसके अतिरिक्त सीमित ज्ञान होने के कारण ये कई बार भटक भी जाते हैं। पिछले दिनों अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययन के लिए भेजा गया एक अमेरिकी अंतरिक्ष यान इसी प्रकार भटक गया और अनंत अंतरिक्ष में कहाँ खो गया, इसका कुछ भी पता नहीं।
प्रवासी पक्षियों में दिशा संबंधी कम से कम इतना ज्ञान तो होता है कि प्रवास पूरा करके वे जहाँ से आये थे, वहाँ सकुशल पहुँच सके। इस क्रम में न तो वे अपना प्रवास-स्थान ढूँढ़ने में गड़बड़ाते हैं, न लौटने में ही रास्ता भटकते हैं। जीव और यंत्र में यही सबसे बड़ा अंतर है। इसके अतिरिक्त प्राणी प्रकृति प्रेरणा से भी अपना कार्य पूरा करते हैं। यंत्रों में इसका अभाव है। उसे प्रेरणा, दिशा, मार्गदर्शन धरती से मनुष्य के मिलते हैं, फिर भी अनेक बार वे उनका अक्षरशः पालन करने में विफल होते हैं। पक्षियों के साथ यह व्यतिक्रम नहीं होता। उनके साथ जुड़ी इन कुछ एक सुविधाओं और सफलताओं को छोड़ दिया जाय, तो यही कहना पड़ेगा कि मानव निर्मित यान नभचर के समतुल्य हैं।
पक्षियों की कुछ प्रजातियाँ उभयचर होती हैं। वे जल में भी तैर सकती है और आकाश में भी उड़ती भी है। इन्हें देखकर ऐसे हवाईजहाज बना लिये गये, जो आसमान में उड़ते भी हैं और आवश्यकता पड़ने पर जल-तल पर उतरकर उसमें तैर भी सकें। वीटाँल प्रकृति के इन वायुयानों की यह विशेषता है कि वे पक्षियों की तरह ही सीधे ऊपर उड़ जाते हैं। सामान्य हवाई जहाजों को उड़ने से पूर्व बहुत दूर तक रन वे पर दौड़ना पड़ता है। इसके बाद वे धीरे-धीरे ऊपर उठते हैं। इन्हें यह दौड़ नहीं लगानी पड़ती।
वैज्ञानिकों ने पनडुब्बी के रूप में जलचर की भी अनुकृति विकसित कर ली है। वह जल के अंदर ही अंदर लक्ष्य तक पहुँचने की क्षमता रखती है। इस दृष्टि से उन्हें जल-जीवों के समान ही कहना चाहिए। पानी के भीतर शत्रु की टोह लेने और लक्ष्य बेधने में भी वे अद्वितीय हैं। यह सामर्थ्य जलीय प्राणियों जैसी ही कही जा सकती है। इसके बाद विज्ञान ने मनुष्य के हमशक्ल रोबोट बनाये। यह रोबोट कई अर्थों में महत्वपूर्ण साबित हुए। इनकी पहली विशेषता तो यह है कि ये बिना विश्राम के अनवरत और अथक परिश्रम कर सकते हैं। श्रम में ईमानदारी बरतना, गुणवत्ता को बनाये रखना, तीव्रगति से काम करना आदि इनकी कितनी ही विशिष्टताएँ हैं। बिना पारिश्रमिक के श्रम करना, सर्दी-गर्मी जैसी प्रतिकूलताओं से अप्रभावित रहते हुए गति और गुणवत्ता को यथावत बनाये रखना, यह इन्हीं के द्वारा संभव है। मनुष्य चूँकि सचेतन प्राणी है, अतः उसकी क्षमता, वातावरण, मौसम, आहार, स्वास्थ्य आदि से प्रभावित होती है। जड़ पदार्थ बाह्य परिस्थितियों से कम से कम प्रभावित होते हैं, अस्तु जब इनके द्वारा यांत्रिक बुद्धि सम्पन्न यंत्रमानव बनाये गये, तो वे उपरोक्त विपरीतताओं से बेअसर रहकर अपनी पूरी सामर्थ्य और योग्यता के साथ कार्य करने लगे। इस दृष्टि से इसे चेतना के ऊपर जड़ की विजय कहा जा सकता है। इससे प्रोत्साहित होकर कई क्षेत्रों में यंत्र-मानवों की मदद ली जाने लगी। उद्योग से लेकर अंतरिक्ष तक में इनका समर्थ सहयोग मिलने लगा। यह सहयोग आगे रुकने वाला नहीं। जिन-जिन क्षेत्रों में अभी इसका आगमन नहीं हुआ है, वे सारे क्षेत्र अगले ही दिनों इसकी व्यापक परिधि में आयेंगे। तब न तो चिकित्सा क्षेत्र इससे अछूता रह सकेगा, न अनुसंधान, न चिंतन, न मानवी क्रियाशीलता-ऐसा विशेषज्ञों का अनुमान है। प्रतिरक्षा प्रणाली से लेकर युद्ध शैली तक में इसका स्पष्ट असर दिखलायी पड़ेगा।
उक्त संभावना पर अपना मत प्रकट करते हुए प्रसिद्ध फ्राँसीसी रक्षा विशेषज्ञ जे. बी. शुकमा ने अपनी पुस्तक ‘दि सोरसरर्स चैलेंज में लिखा है कि विश्व स्तर पर युद्ध के संदर्भ में इतनी जनचेतना जाग्रत हो चुकी है और युद्ध की विभीषिका से समाज इस कदर त्रस्त है कि आने वाले समय में कोई विश्वयुद्ध होगा, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता, फिर भी किसी तरह परिस्थितियाँ यदि वैसी बनती हैं, तो वह आदमी-आदमी के बीच न होकर रोबोट-रोबोट के मध्य होगा। सन 1991 में लड़ गये खाड़ी युद्ध का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि वास्तव में उसे पूरी तरह मानवी लड़ाई कहना उचित न होगा। वह एक प्रकार से अर्द्धरोबोटिक-अर्द्धमानवी युद्ध था, जिसमें एक ओर ईराकी सैनिक थे, तो दूसरी ओर यंत्रमानवों द्वारा प्राप्त गुप्त सूचनाओं के आधार पर रणनीति बनाने और आक्रमण करने वाली बहुराष्ट्रीय सेना। यह यंत्रमानव पायोनियर नामक विमान में सवार थे और रणक्षेत्र वाले आकाश में उतुँग ऊँचाई पर चक्कर लगा रहे थे। बाद में ईराकी सैनिकों ने इसी रोबोट के आगे आत्मसमर्पण कर दिया था। उक्त घटना पर टिप्पणी करते हुए अमेरिकी नौसेना के वाइस एडमिरल स्टेनल आर्थर ने कहा था कि युद्ध के इतिहास में यह पहला अवसर है, जब मनुष्य ने किसी यंत्रमानव के सम्मुख आत्मसमर्पण किया हो।
यों तो खाड़ी युद्ध में अमेरिका बहुराष्ट्रीय सेना में सम्मिलित था और बाद में उसकी विजय भी हुई, पर ऐसी बात नहीं कि शत्रु पक्ष के आक्रमण से वह एकदम अछूता रहा हो। युद्ध में उसके अनेक सैनिक हताहत हुए, कितने ही बंदी बना लिये गये और अगणित विषैले रेगिस्तानी साँपों के शिकार हुए। अमेरिकी जनता इसे बर्दाश्त नहीं कर सकी और उनका कोपभाजन तत्कालीन सरकार को बनना पड़ा। तब से अमेरिकी सरकार अपनी मानव सेना बाहर भेजने से कतराने लगी और उसी समय से इसका कोई यांत्रिक विकल्प ढूँढ़ने का प्रयास करती रही, जिसका परिणाम अब सामने आया है। वहाँ के नेशनल आर्म एण्ड एम्यूनिशन रिसर्च लैबोरेटरी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा रोबोट सैनिक विकसित किया है, जो युद्ध के मैदान में यह पता लगाने में पारंगत है कि बंदूक की गोली, तोप के गोले, राकेट आदि छोड़े गये? ठिकाने का सही-सही पता लगाकर वह उन्हें क्षण मात्र में विस्मार करने में अद्भुत क्षमतावान् है।
इसके अतिरिक्त अमेरिकी नौ सेना और थल-सेना ने मिलकर एक ऐसी योजना बनायी है, जिसके अंतर्गत सैनिक चौकियों के आस-पास गश्त लगाने का कार्य अब यंत्रमानव करेंगे। मोबाइल डिक्टेशन एसेसमेण्ट रिस्पोंस सिस्टम के नाम से जानी जाने वाली यह प्रणाली चौकसी बरतने में इस बात में मानवी-रक्षकों से श्रेष्ठ होगी कि वह बिना निद्रा, विश्राम और आहार के आठों याम एक जैसी क्षमता के साथ अपनी ड्यूटी पूरी करती रह सकेगी। यों तो मानव सृष्टि से वह सर्वोत्तम ही होगा। एक यंत्र के रूप में उसका आकार बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता। इसके कई कारण विज्ञानवेत्ताओं ने गिनाए हैं। उनका कहना है कि दो पैरों वाला होने के कारण आदमी किसी दीवार पर कीट की तरह आसानी से चल फिर नहीं सकता। दूसरे उसके चलने की खड़ी मुद्रा, जो कि धरती में समकोण बनाती हुई होती है, इसमें विशेष बाधक है। इसकी तुलना में सतह के समानान्तर मुद्रा अधिक सुविधाजनक और सरल होती है। छिपकली, कीड़े अपनी इसी विशेषता के कारण दीवारों, खम्भों पर आसानी से चढ़ और दौड़ लेते हैं, साथ ही सतह से चिपकने वाले उनके ऐसे पैर और पंजे होते हैं, जो उन्हें गिरने नहीं देते। मनुष्य में इनका अभाव होता है।
ऊर्ध्व मुद्रा युक्त होने के कारण आदमी के साथ एक बड़ी अड़चन यह जुड़ी होती है कि उसका गुरुत्व केन्द्र काफी ऊँचाई पर शरीर के मध्य भाग में नाभि के आस-पास स्थित होता है। इससे उसकी संतुलन क्षमता प्रभावित होती और स्थिरता घटती है। इसी कारण से किसी को हल्का सा धक्का दे देने पर वह लड़खड़ा जाता है। गुरुत्व केन्द्र धरती के जितना निकट होगा, स्थायित्व उतना ही मजबूत होता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर नृत्य प्रशिक्षक लम्बे और नाटे शिष्यों में से सदा ठिगनों को चयन करना पसंद करते हैं, कारण कि लंबे और नाटे शिष्यों में से सदा ठिगनों को चयन करना पसंद करते हैं, कारण कि लंबे व्यक्ति की तुलना में उनका गुरुत्व केन्द्र जमीन के अधिक समीप होने के कारण नृत्य की कठिन मुद्राओं में भी वह अपना संतुलन कायम रखते हैं। इसके अलावा अधिक संख्या में टाँगों का होना भी संतुलन को स्थिरता प्रदान करता है। इसे किसी मानव शिशु और पशु शावक को देखकर भली-भाँति जाना-समझा जा सकता है।
इन्हीं सब कठिनाइयों को देखते हुए वैज्ञानिकों ने सम्प्रति यंत्रमानवों के स्थान पर यंत्रकीट बनाने का निर्णय लिया है। कीड़ों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे बिलकुल जमीन से सटकर चलते हैं और टाँगे भी दो से अधिक होने के कारण उनका संतुलन बहुत चुस्त-दुरुस्त बना रहता है। इसके अतिरिक्त जमीन के समानांतर वाली उनकी शारीरिक संरचना छोटे कार्यों के लिए अत्यंत अनुकूल है। मानवाकार शक्ल इसमें विघ्न उत्पन्न करती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी पाइप के अंदर स्थित मशीन के किसी पुर्जे की गड़बड़ी का पता लगाना हो, तो वहाँ रेंगने वाली रोबोटिक संरचना ही उस कार्य को करने में सफल हो सकती है। मानवाकृति शक्ल का तो उस छोटे व्यास वाले पाइप में प्रवेश कर सकना संभव ही न होगा। इसलिए आवश्यकता और उपयोगिता को देखते हुए यंत्रमानव को अब यंत्रकीट का आकार दिया जा रहा है। अभी पिछले ही दिनों एक अमेरिकी कम्पनी ने ऐसा ही एक रोबोट बनाया है। न्यू वर्म के नाम से जाना जाने वाला यह यांत्रिक कीट 30 सेंटीमीटर लंबा है एवं दस मीटर प्रति मिनट की चाल से चलता है। इसे किसी भी पाइपनुमा संरचना के भीतर भेजा जा सकता है। अंदर पहुँचकर यह कृत्रिम अपने छोटे से कैमरे से बिगड़े पुर्जे की तस्वीर खींच लाता है, जिसके आधार पर खराबी को पहचानकर बाद में उसकी मरम्मत कर दी जाती है।
यंत्रकीट की सफलता से उत्साहित होकर अमेरिकी सेना ऐसे कीटनुमा यांत्रिक जासूस तैयार करने की सोच रही है, जो युद्ध के मैदान में अपने अत्यंत छोटे आकार के कारण दुश्मनों की आँखों से अदृश्य रहते हुए उनके टैंकों, बख्तरबंद गाड़ियों एवं दूसरे शस्त्रास्त्रों की संख्या तथा उनका ठीक-ठीक स्थान बता सके। इन्हें ही नहीं, उपकरणों के अंदर घुसकर उन्हें नष्ट करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। वे शत्रुओं की युद्ध संबंधी रणनीति की भी भविष्यवाणी करने में भी सफल होंगे।
इस योजना का कार्य शुरू हो गया है। बोस्टन यूनीवर्सिटी के इलेक्ट्रानिक्स प्रभाग के वैज्ञानिक, जोहानिस स्मिथ अपने सहयोगियों के साथ मिलकर इसे साकार करने में जुटे हुए हैं। यह तो समय ही बतायेगा कि इसमें वे कहाँ तक सफल हुए। जापान रोबोट टेक्नालाँजी में सबसे आगे है। वहाँ के इंस्टीट्यूट फॉर इण्डस्टियल आटोमेशन एण्ड द रोबोटिक डिवाइसेज नामक एक संस्थान ने डिस्क रोलर नाम का एक ऐसा रोबोट विकसित किया है, जो चुम्बकीय पहियों के सहारे खिसककर मशीन के वाँछित पुर्जे के नजदीक पहुँचता है और नाखून के बराबर अपने वीडियो कैमरे में उसका चित्र उतार लेता है। जापान में इसका उपयोग समुद्री जहाजों के हिस्से-पुर्जों की खराबी परखने में किया जाता है। बड़े आकार के जीव-जंतुओं को ठीक ढंग से शिक्षित-प्रशिक्षित करके उन्हें वशवर्ती बनाया और आज्ञानुवर्ती जैसा कार्य लिया जा सकता है, पर अत्यंत छोटे आकार वाले कीटकों के साथ ऐसा शक्य नहीं, जबकि जरूरत इसकी भी अनुभव की जा रही है। अस्तु, टोकियो यूनिवर्सिटी के रोबोटिक विभाग के अध्यक्ष हिंरोफ्युमी मियुरा एक ऐसे यंत्रकीट को विकसित करने में संलग्न है, जो न सिर्फ रेंग सकेगा, वरन् कीड़ों की तरह उड़ेगा भी और मालिक का कहना मानने में अग्रणी रहेगा। इसकी उपयोगिता की जानकारी देते हुए वे कहते हैं कि इसका मुख्य उद्देश्य एक फूल से दूसरे में जाकर परागण की क्रिया सम्पन्न करना और वैसे कीटकों को समाप्त करना होगा, जो फसलों को नुकसान पहुँचाते हैं। ब्रिटेन के पोर्टसमाउथ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक भी इस दिशा में जापानियों से पीछे नहीं है। उन्होंने एक ऐसी नकली मकड़ी बनायी है, जिसके पैरों में दीवार में चिपकने वाले न्यूमैटिक कप्स लगे हुए है। इनकी मदद से वह फुर्ती से दीवार पर चढ़ने लगती है। निर्माताओं ने इसका नाम रोबग-थ्री रखा है।
यंत्रकीटों के विकास में सबसे अधिक लाभ चिकित्सा विज्ञान को हुआ है। अब शरीर शास्त्री शरीर के अंदर की खराबी को आसानी से जान सकेंगे और यह सुनिश्चित कर सकेंगे कि गड़बड़ी कहाँ, किस स्तर की, कितनी गंभीर है। पिछले दिनों इस प्रकार के कई प्रयोग परीक्षण स्तर पर किये गये, जिसमें रोबोट कीट अपनी जिम्मेदारी भली-भाँति निबाहते देखे गये। ऐसे ही एक प्रयोग के दौरान कैलीफोर्निया इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालॉजी के वैज्ञानिक ने एक यांत्रिक कीड़े को सुअर की आहार नाल में प्रवेश कराया और आदेश दिया कि उसकी आँत में जो सूजन और छाले हैं वे किस अवस्था में एवं कितने गंभीर है तथा उनका ठीक-ठीक स्थान क्या है, इसका पता लगाये। रोबोट ने आज्ञाकारी सेवक की तरह इसका पालन किया और सुअर की चार मीटर लंबी आत की यात्रा करके चिकित्सकों को इसकी विस्तृत जानकारी दी। इस उत्साहवर्द्धक सफलता के बाद अब वैज्ञानिक रक्तवाहनियों में जमने वाले रक्त के थक्कों और कोलेस्टरोल की रुकावटों को दूर करने के लिए ऐसे ही मिनी यंत्र जीवों की सहायता लेने की सोच रहे हैं। इसमें वे कितने सफल होंगे यह बता पाना अभी मुश्किल है।
इलियान यूनिवर्सिटी अमेरिका के रोबोटविदों ने कीट शक्ल से अलग हटकर रेशम के कीड़े के लार्वा के आकार का एक यंत्र लार्वा बनाने में सफलता प्राप्त की है। यह पचास सेंटीमीटर लंबा जीव छह पैरों वाला हैं तथा उसकी चाल एकदम वास्तविक लार्वा जैसी है। शरीरविज्ञानी इन दिनों दो पृथक् प्राणियों को मिलाकर संकर जीव पैदा करने में संलग्न है। घोड़े और गधे की परिणति खच्चर के रूप में सामने आई। लायन और टाइगर के संयोग से लायगर बनाया गया। अभी इसी वर्ष मनुष्य और चिम्पैंजी का परस्पर संपर्क कराया गया। इससे उत्पन्न जीव अर्धमनुष्य अर्द्धम्पाँजी जैसा था, तो शरीर मनुष्य का। इस प्रकार की दो घटनाएँ इस वर्ष हुई। इस साल के प्रारंभ में जापानी बेण्डाई कंपनी के एक इंजीनियर आकी होरो योकोई ने टामागोची नामक एक रोबोटिक अण्डा बना डाला। सोनी कंपनी ने उस अण्डे को से एक कर रोबोडाँग पैदा कर लिया। यह यांत्रिक कुत्ता घूमता -फिरता है, पूँछ हिलाता है और पालतू एवं प्रशिक्षित कुत्ते की तरह हाथ मिलाता है। शक्ल भी लगभग कुत्ते जैसी है।
ब्रह्मा की चेतन सृष्टि से पृथक् कृत्रिम जड़ सृष्टि रचने का विज्ञान का यह अपने ढंग का प्रयास है। देखना यह है कि इस दिशा में वह कितना और कहाँ तक सफल होता है।
इतने बड़े संसार में उसका था ही कौन? माता-पिता ही नहीं, भाई नहीं और न कोई दूसरी बहिन ही थी। कहीं प्यार पाने के लिए जब वह चारों ओर नजर दौड़ाती तो उसे लगता कि जैसे वह विशाल महासागर के बीचों-बीच में डूब-उतरा रही है। अब कहीं-कोई भी संबल उसके लिए शेष नहीं बचा है।
उसके पिता देवगिरि राज्य के प्रधान सेनापति थे, जब तक वे जीवित थे, वे अक्सर कहा करते थे, मेरी बिटिया बड़ी होनहार है, मेरे लिए तो यह पुत्र से बढ़कर है। इसका मुख देखकर मुझे लगता ही नहीं कि मुझे पुत्र का अभाव है। और आज वे पिता भी नहीं थे, जिनके वात्सल्य की छाँव में उसे माता-पिता दोनों का ही ममत्व और प्रेम मिलता आया था, अन्यथा उसकी माँ तो जन्म के कुछ ही सालों बाद संसार छोड़ गयी थी, लेकिन पिता ने उसे माँ का अभाव कभी खटकने नहीं दिया। यदा-कदा उसे अपने यशस्वी पिता के कुछ इने-गिने शब्द याद आते तब-तब वह अपने हृदय में न जाने कैसा अनुभव करने लगती। विचित्र और अपरिचित अनुभूतियों से उसका मानस भर जाता और उस समय वह सुनसान घर में अकेले बैठे-बैठे न जाने क्या-क्या सोचने लगती।
मरते समय पिता उसे बोध दे गये थे-बेटी मैं अपने समूचे जीवन में एकमात्र इस अढ़ाई सेर लोहे से ही प्रेम कर पाया हूँ। बाद में एक दिन तू भी जन्मी और तब मुझे लगा कि तू उस जाति के जीवों में है, जिनकी रचना स्नेह-ममत्व दया और करुणा की पवित्र परतों के बीच होती है और इस लोहे से बहुत दूर तेरा निवास है, पर मेरी बिटिया....।
बोलते-बोलते उनका गला रुँध गया, आवाज भरभरा गयी और आँखों में पानी छलक आया। उस समय यद्यपि वह आयु में छोटी थी, फिर भी अपने मरणासन्न पिता की अंतिम काल की उन बातों को समझने का भरसक प्रयास किया था। अभी भी उसे याद है कि उन क्षणों में पिता के सिरहाने और पलंग के आस-पास राज्य के सभी प्रमुख व्यक्ति श्रद्धा और दुःख से परिपूर्ण पुतलियों को स्थिर किये खड़े थे। स्वयं देवगिरि के महाराज हाथ बाँधें रुंधे कंठ से पिता से बार-बार न जाने क्या कह रहे थे। हाँ तो पिता ने अपने भर्राए गले को खंखार कर कहा कि-यह लोहा भले ही कई बार मनुष्य की रक्त से नहाया हो, सैकड़ों के रक्त में डूबा हो, सैकड़ों का प्राण लेने का साधन रहा हो, पर यह बड़ा पवित्र और पूज्य है। इसी के बल पर मैंने अगणित कुल बंधुओं की लाज बचाई है। न जाने कितने अबोध जानों को अनाथ होने से बचाया है। मेरे कोई पुत्र नहीं , जिसकी कमर में इसे चलते-चलते बाँधकर संतोष प्राप्त करूं । तू इसे अपने पिता की धरोहर समझ। मेरे लिए हमेशा से तू सब कुछ रही है। जब तक जीना देश भक्ति” वह सुनती रही-देखती रही, सिसकियाँ भरती हुई उसी प्रकार और इन्हीं शब्दों के साथ एक हिचकी ने उनका माया-ममता में अटका अंतिम तार भी तोड़ दिया। उसके हाथों में पिता की दी हुई वह तलवार रखी रह गयी। वह रोते-रोते समझ नहीं पा रही थी कि क्या सोचकर और किसलिए वे उसे यह सौंप गये है? और फिर एक दिन देवगिरि नरेश की लाडली कन्या गौरी आयी और उसके गले झूलते हुए कहा बैठी-मेरी बहिन तुझे मेरे साथ ही रहना होगा...तू रहेगी न ?
इसके दो दिन बाद ही राजा राम देव का भी बुलावा आ गया और उसने सुना कि वे कह रहे है-तेरा एक पिता अभी जीवित है, बेटी तू न नहीं कर सकेगी यहाँ रहने के लिए गौरी तो प्राण ही छोड़ देगी बिना तेरे पास रहे। इन शब्दों की झंकृति में उसने अनुभव किया कि सचमुच महाराज के स्वर में पिता का ही प्यार बोल रहा है और गौरी से भी बचपन से उसका स्नेह संबंध जुड़ा था, वह भी एक कारण बन गया, उसके राजमहल में आ बसने के लिए। दिन जाते देर नहीं लगती। समय के साथ ही महाराज रामदेव की परम लाडली छोटी सी गुड़िया पीरु भी वीरमति नाम से बढ़ी और युवती बन गयी। उसके अप्रतिम सौंदर्य की आभा से समूचा राजमहल जगमगा उठा।
“इसकी हथेलियां पीली होनी चाहिए।” महारानी ने स्नेह से उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा।
और बस खोजबीन प्रारंभ हो गयी। ढूँढ़-खोज के इस सिलसिले में महाराज रामदेव की नजर एक सुंदर गठीले नवयुवक कृष्णराय पर एक विशेष अभिप्राय से जा टिकी। वार्ता चलाई गयी और संबंध पक्का हो गया। कृष्णराय देवगिरि दरबार में ही राजकर्मचारी थे। वह सुंदर, सुशील और स्वस्थ नवयुवक था। सभी उसकी कार्यकुशलता की मुक्त मन से सराहना करते थे। उसे जब पता चला कि महाराजधिराज की लाडली वीरमति उसकी पत्नी होगी, तो उसका दिल बल्लियों उछलने लगा। कृष्णराय ने कई बार राजमहल में आते-जाते हुए वीरमति को देखा था। वीरमति अत्यधिक सुंदरी होने के साथ-साथ परम विदुषी थी। घुड़सवारी और तलवारबाजी में जनसाधारण उसे मुक्त मन से अपने दिवंगत सेनापति पिता की सच्ची उत्तराधिकारिणी स्वीकार करता था। उसमें एक विचित्र सा आकर्षण था।
कृष्णराय यद्यपि एक साधारण दरबारी था, फिर भी उसकी प्रतिभा की सभी सराहना करते थे। उसमें एक होनहार युवक के प्रायः सभी गुण मौजूद थे। इसी सब कारण से महाराज ने उसे वीरमति के योग्य वर के रूप में चुना था। पर आदमी सोचता कुछ है, होता कुछ और है। मोहक चंद्रमा भी न जाने क्यों कलंकित हो जाता है। संध्या समय एक दिन वीरमति जब तुलसी के निकट दीप जलाने बैठी तो उसकी एक परमप्रिय सहेली ने आकर उसे ऐसा समाचार दिया कि वह सन्न रह गयी। उसका हृदय दीप की ज्योति के साथ ही काँप उठा।
क्या तुम सच कहती हो बहिन? बुझे स्वर में लगभग हकलाते हुए पूछा उसने।
“माता गंगा साक्षी हैं-अधिक क्या कहूँ। मेरी पालकी थोड़ी ही दूर थी कि टीले से उतरते देखा मैंने उन्हें, साथ में एक मुगल जैसा था कोई, जो उनका हाथ पकड़े कान में धीरे-धीरे कुछ फुसफुसा रहा था।
“हूँ....” उसके मुँह से जैसे शब्द ही नहीं निकल पा रहे थे। उस रास्ते कोई नहीं जाता, बहुत दूर है देवगिरि से, पर मेरे श्वसुर इस राज्य से बैर मानते हैं। इसलिए इसकी सीमा से अलग-अलग चलकर देवर मुझे यहाँ छोड़ गये। उसकी यह अभिन्न सखी बताये जा रही थी, कि किस प्रकार उसने उसके भावी पति कृष्णराय को एक मुगल जैसे लगते किसी आदमी से धीरे-धीरे कान में बात करते देवगिरि राज से दूर टीले के नीचे देखा है।
“मुझ पर भारी कलंक लगेगा....तू यह बात किसी से कहना मत बहिन। मैं तुझे विश्वास दिलाती हूँ कि देवगिरि पर आँच आये-इससे पहले ही मैं उन्हें समझा दूँगी-पूछूँगी उनसे कि क्या बात है-शायद तुझे भ्रम ही हुआ हो वे ऐसे कभी नहीं हो सकते....।”
खैर तू जाने और तेरे वे देवता, जो बात थी, जिसे मेरी आँखों ने देखा, मैंने जैसा का तैसा तुझे सुना दिया...। यह कहते हैं कि सहेली वहाँ से निकल गयी। इस बीच तुलसी के बिरवे पर जलाया हुआ दीप काँप कर बुझ गया था। उसे अपने चारों ओर देखकर लगा कि जैसे संध्या का अंधकार उसे निगले बिना नहीं रहेगा। अज्ञात अमंगल की आशंका से उसके हाथ काँप रहे थे। इन्हीं काँपते हाथों से उसने तुलसी की जड़ के निकट घृतदीप जलाया और आरती की। चलकर पलंग पर कटे पेड़ सी जा पड़ी। यह वह समय था जब वह दक्षिण भारत के हिंदू राज्य अलाउद्दीन खिलजी के बर्बर आक्रमणों से आक्रान्त थे। इतिहास के पन्नों पर लिखी हुई इबादत अभी भी साक्षी है कि सन 1302 से 1311 तक खिलजी की सेनाएँ इन राज्यों को रौंदती रहीं। वारंगल के काकात्य, मैसूर के होयसाल और देवगिरि के यादव राज्य अलाउद्दीन की सेनाओं के घोड़ों की टापों की धूल से अनेकों बार ढँक गये, पर देवगिरि राज्य ने उनकी प्रथम चढ़ाई को ही विफल कर दिया कि छिन्न-विच्छिन्न और हासोन्मुख भारत का लोहा अभी ऐसा कुण्ठित नहीं हो गया है, कि चाहे जो उसे मोड़ दे, यद्यपि देश का दुर्भाग्य किसी दूसरे भविष्य का निर्माण कर रहा था।
आमने-सामने की लड़ाई में जब अलाउद्दीन ने अपनी खिचड़ी पकते न देखी तो सोते शत्रु पर प्रहार करने की चालें सोचने लगा और सोचते-सोचते उसकी नजर अचानक होनहार कृष्णराय पर आ अटकी। लड़ाई के मैदान में कई बार उसके हाथों की सफाई और साहसिकता का प्रमाण उसे मिला, पर न जाने कैसे उसे उस मराठा युवक के चेहरे पर महत्त्वाकाँक्षी रेखाओं का आभास मिल गया कि उसने उसी को कूटनीतिक चालों का मोहरा बनाने का निश्चय किया। और एक दिन उसके आदमी द्वारा बहुत कुछ प्रलोभन दिखाये जाने पर सीधा-सादा अनुभवहीन युवक अपने अभी तक के अर्जित किये हुए यश पर कालिमा पोत बैठा। वह बड़ी ही अशुभ घड़ी थी जब उसके कानों में ये शब्द पड़े थे-बेफिक्र रहो। बहादुर सिपाही हम तुम्हें देवगिरि की सूबेदारी तो देंगे ही, पर साथ में दूसरी खिल्अत भी तुम्हें बख्शी जायेगी, उन्हें पाकर तुम निहाल हो जाओगे। कृष्णराय। यह हिंदू राजा तुम्हारी कीमत क्या जाने....?
इस पर भी वह चुप रहा तो कहा गया कि आधा देवगिरि तुम्हारा, और आधे का इंतजाम हम खुद करेंगे। बस थोड़ी सी मदद चाहिए हमें....बिना इसके हम देवगिरि पर फतह नहीं पा सकते....। और तब जैसे उसकी महत्त्वाकाँक्षा ने उसे अंधा बना दिया और भूमि पर अचेतन पिण्ड के पतित होने की सी खोखली आवाज में उसने हामी भर दी। तय हुआ कि आज के ठीक पाँचवें दिन कैसे, क्या तुम्हें करना होगा, यह जानने के लिए यहीं के पड़ोस वाले जंगल में तुम आओ और हम भी आयेंगे...और उसके बाद फिर देवगिरि का राजा तुम स्वयं को ही समझना।
उसकी भावी पत्नी अद्वितीय सुंदरी थी, जिसमें उसे अपने प्राणों का आलोक दिखायी दे जाता था-वह आलोक न देख पाने पर , उसे अपने समीप का अनुभव कर पाने पर वह कैसे जीवित रहेगा, कभी-कभी वह इसकी सोच में खो जाता। दोषी चेतना संशयाकुल हो जाती है। अपनी इसी रौ में वह बहुत कुछ सोचता चला गया। काश! उसके सामने अपने देश की स्पष्ट कल्पना होती? अधिक से अधिक जो सोच सकता था वह यही कि देवगिरि नरेश का वह नमक खाता था और देवगिरि राज्य के प्रति उसे नमक के कर्तव्य के रूप में निभाना चाहिए-अदा करना चाहिए। जरूरत आन पड़े तो इसके लिए त्याग और बलिदान भी करने चाहिए। किंतु उसकी चिंतन परिधि ने उसे विश्वास करा दिया कि सभी स्वार्थी है। उसके हृदय के किसी संस्कारित कोने ने एकाध बार उसे चेताया कि वह मनुष्य से राक्षस न बने। अलाउद्दीन आततायी है। देवगिरि का शत्रु है। धर्म शत्रु है। वीरमति संभवतः इसे पसंद न करे और उससे नफरत करने लगे...!!
किंतु यह भाव जुगनू की भाँति आया-चमका और क्षण भर में उसे लगा कि वह भी प्रकाश है और उसके कल्पित प्रकाशपुँज से भिन्न, यह शायद पवित्र है, स्निग्ध है। अपनी ओर अपने प्राणों को हृदय को आकर्षित करता है। लेकिन देर तक ये भाव न रहे।
वीरमति के संपर्क में आने का अभी उसे ठीक से अवसर नहीं मिला था कि वह उसे समझा पाता। वह तो बस यही सोचता था कि स्त्री को गहने चाहिए, ऊँची सी अट्टालिका चाहिए जिसकी वह रानी बन सके और यही वह करने जा रहा था। जब वह देवगिरि नरेश को धोखा दे सकता है, उनके साथ विश्वासघात कर सकता है, तो खिलजी की ऐसी की तैसी। है ही वह किस खेत की मूली? उसे चकमा देने में कितनी देर लगेगी। कोई अपना तो है नहीं वह, यदि अवसर अनुकूल रहा तो सोते में सिर ही काट लेगा। इन दिवा कल्पनाओं के बीच पाँचवाँ दिन भी आ गया, जिसकी प्रतीक्षा में ये स्वार्थ के धागे बुने जा रहे थे। दिवस के गुजरते ही निरभ्र आकाश में असंख्य तारक जगमगा उठे। किंतु देवगिरि में जो आनंद हिलोरें ले रहा था, वह तारों के उदय काल के साथ ही कहीं विलीन हो गया। खिलजी की फौज मैदान से भाग खड़ी हुई थी और लगता था कि अब कभी अलाउद्दीन इधर की राह नहीं तकेगा।
नगर में अँधेरा घना होता जा रहा था। ऊपर से तारे खिले हुए थे और नगरवासी गंभीरता धारण किये कहीं-कहीं धीमे स्वरों में बातें करते दिख रहे थे। उसी समय देवगिरि की सीमा से कई मील दूर एक सघन वन में काले लबादों से अपने को ढके दो मनुष्य छायाएँ एक दूसरे के कान में बार-बार कुछ कहती हुई दिख रही थी।
“अच्छा तब यही ठीक है तुम सुरंग का दरवाजा खोले रखना और पहरेदार का कत्ल कर देना...। एक ने इस प्रकार कहा कि दूसरे के बजाय कोई तीसरा भी यह शब्द सुन नहीं सकता था। पर परामर्श करने वाले शायद बेफिक्र थे कि इस भयानक जंगल में इस समय कौन बैठा है।
“ मैं अपना वादा पूरा करूँगा, पर हमला ठीक मौके पर ही होना चाहिए और मुझे दिये हुए वचनों में यदि कुछ हेर-फेर किया गया तो याद रहे देवगिरि से निकलना भी दुश्वार हो जायेगा। जाने वाले घुड़सवारों के घोड़े की टापों का स्वर धीरे-धीरे सुनायी पड़ना बंद हो गया, फिर भी दूसरे आदमी का टहलना जारी था। कुछ क्षण और बीते की सहसा पीछे से किसी ने उस टहलने वाले व्यक्ति पर खड्ग प्रहार किया और एक ही हाथ में वह भूमि पर तड़पने लगा। देश को विदेशियों-विधर्मियों के हाथ बेचने वाले अभागे, तेरी करनी का फल आगे क्या होगा, यह तू नहीं जानता। नहीं तो यह सौदा कभी नहीं पटाता।
“कौन...? वीर...मती..मेरी...प्रि..य...”तलवार सीधे उसके कंधे पर पड़ी थी, किंतु दम तोड़ते भी अपने प्राणहन्ता को पहचान गया था। “हाँ, वीरमति-क्या तुझे यह ध्यान कभी नहीं आया, नारी सिर्फ वैभव और विकास की प्रतीक नहीं, वह त्याग और बलिदान की मूर्ति भी है। उसके स्वर में अभी भी कठोरता और आवेश था। वीरमति...तुम...देवी हो, मुझे माफ...कर देना।” इन अटकते हुए शब्दों के साथ उसके प्राण पखेरू हो गये। इसी के साथ आस-पास का अँधेरा और भी गाढ़ा हो गया। उसने अनुभव किया कि यह अँधेरा उसके हृदय में अनगिनत सुइयाँ चुभो रहा है। वह सोचने लगी, कल जब लोगों को पता चलेगा कि उसका होने वाला पति ऐसा था तो क्या कहेंगे वह सब? देश के प्रति कर्तव्य चुक गया...लेकिन पति के बिना...
तब? उसके हृदय ने हाहाकार करते हुए उससे पूछा...तब? चारों दिशायें मानो उससे यही सवाल करने लगी ओ भारतीय नारी ,तब ...? उसके चारों ओर व्याप्त प्रगाढ़ अंधकार ने उससे लिपट कर पूछा...तब?
उसने उठकर एक बार वृक्षों के बीच से झलकते तारों को देखा और फिर उसकी शून्य दृष्टि अपने पिता द्वारा दी गयी रक्त भरी तलवार से जा टकरायी और तब उसे जग-जग में व्याप्त तब का हल मिल गया। लपक कर उसने खड्ग उठाई और दूसरे ही क्षणं एक तरुणी का ताजा रक्त धरती पर नारी की देशभक्ति और सर्वस्व बलिदान की गाथा लिखने लगा।
पिछले दिनों बुद्धिमान सवं विज्ञान का जो विकास हुआ है, उसने भौतिक सुविधाओं को भले ही बढ़ाया हो, आध्यात्मिक आस्था को दुर्बल बनाया है। विज्ञान ने जब मनुष्य को एक पेड़-पौधा मात्र बनाकर रख दिया और उसके भीतर किसी आत्मा को मानने से इनकार कर दिया, ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकृत किया। इस सृष्टि को सब कुछ अणुओं की स्वाभाविक गतिविधि के आधार पर स्वसंचालित बताया तो स्वभावतः विज्ञान को प्रत्यक्ष प्रमाणों के आधार पर अति प्रामाणिक मानने वाली बुद्धिवादी नयी पीढ़ी उसी मान्यता को शिरोधार्य क्यों न करेंगी? प्रत्यक्ष है कि विचारशील वर्ग अनास्थावान् होता चला जा रहा है और यह एक भयानक परिस्थिति है, क्योंकि एक बुद्धिजीवी वर्ग के पीछे जनता के अन्य वर्गों के चलने के लिए विवश होना पड़ता है। आज के थोड़े से अनास्थावान् बुद्धिजीवी कल-परसों अपनी मान्यताओं से समस्त जन-समाज को आच्छादित किये हुए होंगे।
आध्यात्मिक मान्यताएँ सदाचार, सहयोग, सद्भाव, सेवा, सद्भावना, पुण्य, संयम एवं त्याग बलिदान जैसी सत्प्रवृत्तियों की रीढ़ हैं। आत्म कल्याण, ईश्वरीय प्रसन्नता, पुण्य परमार्थ, स्वर्ग-नरक कर्मफल आदि मान्यताओं के आधार पर ही मनुष्य अपनी चिरसंचित पशुता-पाशविकता पर नियंत्रण करने और लोक कल्याण के लिए नितांत आवश्यक सत्प्रवृत्तियों को चरितार्थ करने में समर्थ होता है। यदि वह आधार ही नष्ट हो गया-यदि उन आधार पर नष्ट हो गया-यदि उन मान्यताओं को कपोल-कल्पित मान लिया गया, तो फिर न किसी को संयमी बनने की आवश्यकता अनुभव होगी, न सदाचारी होने की। न पुण्य अभीष्ट होगा, न पुरुषार्थ। न त्याग की कोई बात करेगा, न बलिदान की। फिर मनुष्य खाओ-पीओ मौज उड़ाओ के आदर्श को अपनाकर हर अनैतिक कार्य करने के लिए तैयार हो जायेगा ताकि वह अधिक मौज-मजा उड़ाने का अधिक अवसर प्राप्त कर सके। कानूनी पकड़ एवं दण्ड से बचने का रास्ता अब अति सरल है। कानून बहुत ही ढीले-पोले है। फिर जिन पर कानून पालने के लिए विवश करने की, दण्ड देने-दिलाने की जिम्मेदारी है, वे राज्य कर्मचारी ही कहाँ दूध के धुले है? अपराधी से साठ-गाँठ रखने की कला उन्हें भी आ गई है और उस दुर्बलता से हर भ्रष्टाचारी, हर सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाला पूरा-पूरा लाभ उठाता है, उठा सकता है। केवल कानून के द्वारा अपराध रोक सकने की बात सोचना उपहासास्पद है। मनुष्य केवल अपनी अंतरात्मा की पुकार और ईश्वरीय सत्ता के रोक-अनुग्रह का विचार स्मरण रखकर ही कुमार्ग से बचता और सन्मार्ग अपनाता है। यदि आत्मा और ईश्वर कोई है ही नहीं, कर्मफल देने की कोई अज्ञान व्यवस्था है ही नहीं, तो फिर पाप प्रवृत्तियों को अपनाकर शौक-मौज के साधन जुटाने को कोई चूके क्यों? आज यही विचार बुद्धिजीवी पीढ़ी के मस्तिष्क में घूम रहे है और उनका नैतिक स्तर दिन-दिन दुर्बल होता चला जा रहा है।
यह विभीषिका इतनी भयानक है कि इसकी भावी सम्भावनाओं का स्मरण करने मात्र से आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है। शुतुरमुर्ग की तरह बालू में मुँह ढँक कर खतरा टल गया, ऐसा सोचना मूर्खता है। सब कुछ अपने आप ठीक हो जायेगा ऐसी मान्यता वास्तविकता से दूर है। जहाँ धर्म-अध्यात्म का प्रकाश नहीं पहुँचा है, ऐसे अफ्रीका आदि प्रदेशों के जंगली लोग अभी भी नरमाँस खाते और एक से एक बढ़ कर घृणित एवं नृशंस रीति-रिवाज अपनाये बैठे है। अपने आप सब कुछ ठीक होने वाला होता, तो सृष्टि के आरंभ से लेकर अब तक लाखों वर्षों में वे अपने आपको सभ्यता के उच्च स्तर तक ले आने में समर्थ हो गये होते। अपने आप कुछ नहीं होता-सब कुछ करने से होता है। ऋषियों ने लाखों वर्ष तक तप, त्याग, मनन चिंतन करके अध्यात्म और धर्म का अति महत्वपूर्ण कलेवर खड़ा किया है। उसे जन मानस में प्रविष्टि कराने के लिए अगणित साधु ब्राह्मणों ने तिल-तिल करके अपना जीवन जलाया है। अगणित धर्मग्रंथ लिखे गये हैं और उन्हें पढ़ने, सुनने, समझने तथा हृदयंगम करने की स्थिति उत्पन्न करने के लिए अगणित मानवतावादी परम्पराओं या रीति-रिवाजों प्रक्रियाओं, पूजा-पद्धतियों एवं कर्मकाण्डों का प्रचलन किया है। लगातार उस विचारधारा से सम्पर्क बनाये रखने के लिए उन्होंने धर्म एवं अध्यात्म का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया है।
यदि ऋषियों द्वारा प्रादुर्भूत धर्म संस्कृति का आविर्भाव न हुआ होता तो अन्य प्रदेशों की उद्धत जंगली जातियों की तरह समस्त जन-समाज पशु-प्रवृत्तियों अपनाये होता और उसकी बौद्धिक विशेषता पतनोन्मुख होकर इस संसार में पैशाचिक कुकर्मों की आग जला रही होती। ईश्वर अपने आप सब कुछ कर लेगा, यह सोचना ठीक नहीं। गत 80 वर्षों में संसार का 80 फीसदी भाग बौद्धिक एवं राजनैतिक स्तर पर साम्यवादी शासन के अंतर्गत आ गया। जिस तीव्रगति से अब वह चक्र घूम रहा है, उसे देखते हुए अगले 20 वर्ष में शेष 20 प्रतिशत भाग भी उसी मान्यता के क्षेत्र में चला जा सकता है।
बुद्धिवाद और विज्ञान के द्वारा प्रतिपादित उन मान्यताओं के संबंध में हमें सतर्क होना होगा , जो मनुष्य को अनास्थावान् एवं अनैतिक बनाती है। विचारों को विचारों से, मान्यताओं को मान्यताओं से, प्रतिपादनों को काटा जाना चाहिए। समय-समय पर यही हुआ है। वाममार्गी विचारधारा को बौद्धों ने हटाया और बौद्ध धर्म के शून्यवाद का समाधान जगद्गुरु शंकराचार्य के प्रबल प्रयत्नों द्वारा हुआ।
उत्कृष्ट आदर्शों के प्रति अनास्था उत्पन्न करने वाली आज की बुद्धिवादी और विज्ञानवादी मान्यता तेजी से अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाती चली जा रही है। उसकी भयंकरता की दुर्धर्ष संभावना का मूल्याँकन कम नहीं किया जाना चाहिए। उसका प्रतिरोध करने के लिए तत्परतापूर्वक खड़ा होना चाहिए। युग के प्रबुद्ध व्यक्तियों की यह महती जिम्मेदारी है। इसकी न तो उपेक्षा की जानी चाहिए और न अवज्ञा। हमें एक ऐसा विचार मोर्चा खड़ा करना चाहिए जो भौतिक वादी अनास्था से पूरी तरह लोहा ले सके। यदि यह कार्य सम्पन्न किया जा सका तो समझना चाहिए कि मानव जाति के मस्तिष्क को, धर्म-संस्कृति और अध्यात्म की, अंधकार के गर्त में गिरने से बचा लिया गया।
समय रहते चेतने में ही बुद्धिमानी है। बुद्धिमत्ता की भूमिका प्रस्तुत करनी चाहिए। वही शुभारम्भ किया भी जा रहा है। बुद्धि सम्पन्न एवं विज्ञान सम्मत अध्यात्म के प्रतिपादन की चर्चा इसी दृष्टि से की जा रही है। यह कहना सही नहीं कि धर्म, अध्यात्म, ईश्वर, आत्मा आदि का प्रतिपादन बुद्धि का नहीं, श्रद्धा का विषय है। अंध-श्रद्धा नहीं विवेक सम्पन्न श्रद्धा ही स्थिर और समर्थ हो सकती है। प्राचीनकाल के ऋषियों ने भी बुद्धि की शक्ति से ही अध्यात्म का सारा कलेवर खड़ा किया था। कार्य कठिन है। अति विस्तृत और अति श्रमसाध्य है। उसके लिए भारी मनोयोग, अध्यात्म और प्रत्युत्पन्नमति की आवश्यकता है। पर इस संसार में अभाव तो किसी वस्तु का नहीं। आखिर कठिन काम भी तो मनुष्यों ने ही किये है। यदि हम अध्यात्मवादी मान्यताओं का आज विज्ञान, तर्क और प्रमाणों के आधार पर प्रतिपादन कर सकते हों तो निःसंदेह जन समाज को उसे स्वीकार करने में कोई आपत्ति न होगी और यह भी निश्चित है कि जो बात अन्तःकरण की गहराई में स्वीकार की जाती है। वह आचरण में भी अवश्य उतरती है। आज अध्यात्म का प्रतिपादन जिन आदर्शों पर, जिस ढंग से किया जाता है, वे जनमानस में गहराई तक प्रवेश नहीं करते। कथा पुराणों, धर्मशास्त्रों, किम्वदन्तियों एवं परम्पराओं की प्रामाणिकता पर अब लोगों के मन में संदेह उत्पन्न हो गया है। वे उन्हें किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों की ऐसी कल्पनायें मानते हैं जिनकी उपयोगिता एवं वास्तविकता प्रमाणित नहीं होती। आज हर व्यक्ति तर्क, प्रमाण और विज्ञान को आधार मानता है। इस युग में कोई भी मान्यता केवल इस तीन आधारों पर ही प्रामाणिक एवं ग्राह्य बन सकती है।
इस युग के मनीषियों का पवित्र कर्तव्य है कि अपने समय की आवश्यकता को समझें और उसको एक व्यवस्थित विचार पद्धति विनिर्मित करने में संलग्न हों। युग निर्माण के महान प्रयोजन की पूर्ति के लिए यह नितांत आवश्यक है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए जीवन जीने की कला का व्यवहारिक अध्यात्म का प्रतिपादन शिक्षण किया भी जा रहा है। अखण्ड ज्योति पत्रिका इसी प्रयोजन की पूर्ति में संलग्न है। विज्ञान और अध्यात्म का क्षेत्र सर्वथा पृथक् एक दूसरे से सर्वथा असंबद्ध है। पर अब ऐसी स्थिति नहीं रही। सर्वसाधारण की जानकारी प्रायः पिछड़ी हुई बनी रहती है। प्रगति के नवीन चरण में उसमें प्रायः अविज्ञात ही बने रहते हैं। डार्विन का विकासवादी सिद्धांत अब नयी खोजों के आधार पर उपहासास्पद बनता चला जा रहा है। नवीन शोधों ने विकासवाद और मनोविज्ञान को अध्यात्म की दिशा में काफी आगे तक बढ़ा दिया है और लगता है उनके बढ़ते जाते कदम अध्यात्म के समर्थन की दिशा में ही बढ़ रहे है। अणु विज्ञान के आचार्य आइंस्टीन की नवीन खोजों के अणु सत्ता की पीठ पर एक सचेतन उत्कृष्ट सत्ता का अस्तित्व को स्वीकार किया है और भी इस दिशा में बहुत कुछ काम हुआ है। पर वह उतने ऊँचे स्तर के क्षेत्र में है कि सर्वसाधारण तक उसकी जानकारी मुद्दतों बाद पहुँचेगी और तब तक अनास्थावादी मान्यताएँ इतनी प्रखर हो जायेंगी कि उन्हें हटाना, मिटाना संभव न रहेगा।
दर्शन और तत्त्वज्ञान के उद्गम से ही कोई विचार-पद्धति एवं आचार प्रक्रिया प्रादुर्भूत होती है। अध्यात्म का दर्शन और तत्त्वज्ञान प्रतिपादन करने के लिए ही वेद, उपनिषद्, दर्शन, ब्राह्मण आरण्यक आदि का आविर्भाव हुआ। ईश्वर जीव प्रकृति के विभिन्न भेद-उपभेदों की चर्चा रही। दर्शन ही विचार और आचरण का मूल आधार है, इसलिए ईश्वर आत्मा, धर्म, स्वभाव कर्मफल आदि के दार्शनिक सिद्धांतों को सही ढंग से प्रतिपादित करना होगा। संसार की दिशा मोड़ने वाले दार्शनिकों ने मानवीय आस्थाओं का मूलभूत विश्लेषण अपने ढंग से किया है और यदि वह लोगों को ग्राह्य हुआ, तो निस्संदेह जनसमूह की गतिविधि भी उसी दिशा में सोचने, करने और बढ़ने के लिए प्रेरित प्रभावित होगी। अब भी यही किया जाना है। हम अध्यात्म के दार्शनिक सिद्धांतों का विज्ञान तर्क और प्रमाणों के आधार पर प्रतिपादन कर सके, तो निस्संदेह जन-मानस को पुनः उसी प्रकार सोचने और करने को तत्पर किया जा सकता है। जिस पर कि भारतीय जनता लाखों वर्षों तक आरुढ रहकर समस्त विश्व का प्रकाशपूर्ण मार्गदर्शन करती रही है।
मनुष्य-जीवन का सर्वोपरि लाभ आध्यात्मिक लाभ है। साँसारिक लाभों के नितान्त अभाव की स्थिति में भी आध्यात्मिक लाभ मनुष्य को सर्वसुखी बनाने में सर्वदा समर्थ है, जबकि इसके अभाव में विश्व की समग्र उपलब्धियाँ भी मनुष्य को सुखी एवं सन्तुष्ट नहीं बना सकतीं। बल्कि उलटे वे जीवन के लिए भारभूत ही सिद्ध होती हैं और पतन-पराभव का कारण बनती है। अध्यात्म ही है, जो मनुष्य को तुच्छ से महान, नर से नारायण बनाने में समर्थ है। इसके अतिरिक्त संसार की कोई भी भौतिक उपलब्धियाँ मनुष्य को शूद्रता से विराट की ओर नहीं ले जा सकतीं।
कितनी ही धन-सम्पदा कमा ली जाए, कितनी ही विद्या प्राप्त कर ली जाए, कितनी ही शक्ति-संचय कर ली जाए-तब भी न तो संसार के दुखों से सर्वथा मुक्ति पायी जा सकती है और न ही महानता अर्जित की जा सकती है। धन अभावों एवं आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है। विद्या बौद्धिक विकास कर सकती है और शक्ति से किन्हीं दूसरों को वश में किया जा सकता है, किन्तु इस प्रकार की कोई भी सफलता दुखों से मुक्ति नहीं दिला सकती। धनवानों को दुख होता है। विद्वान शोक मनाते देखे जाते हैं और शक्तिमानों-बलशालियों को पराजित होते देखा गया है।
धन हो और विद्या न हो तो जड़ता से मिलकर धन विनाश का हेतु बन जाता है। विद्या हो, स्वास्थ्य न हो तो विद्या का कोई समुचित उपयोग सम्भव नहीं। दिन-रात स्वास्थ्य की चिन्ता लगी रहेगी, थोड़ा काम किया नहीं कि कभी सिरदर्द है तो कभी पीठ दर्द। कभी पेट गड़बड़ है तो कभी ज्वर घेरे है। इस प्रकार न जाने कितनी बाधाएँ और व्यथाएँ लगी रहती है। केवल विद्या के बल पर उनसे छुटकारा नहीं मिल पाता। इसी प्रकार शक्ति तो हो, पर धन और विद्या न हो तब भी पग-पग पर संकट खड़े रहते हैं। धन के अभाव में शक्ति निष्क्रिय रह जाती है और इसके बल पर यदि सम्पदा संचित भी कर ली जाए तो विद्या के अभाव में उसका कोई समुचित सदुपयोग नहीं किया जा सकता, विद्या रहित शक्ति भयानक होती है। वह मनुष्य को आततायी, अन्यायी और अत्याचारी बना देती है। ऐसी अवस्था में संकटों का पारापार नहीं रहता। धन, विद्या और शक्ति तीनों वस्तुएँ विश्व में एक साथ किसी को कदाचित ही मिलती हैं।
यदि एक बार यह तीनों वस्तुएँ किसी को मिल भी जाएँ तो हानि-लाभ वियोग-विछोह ईर्ष्या-द्वेष आदि के न जाने कितने कारण मनुष्य को दुखी और उद्विग्न करते रहते हैं। ऐसा नहीं हो पाता कि धन, विद्या और शक्ति को पाकर भी मनुष्य सदा सुखी, सन्तुष्ट एवं शाँत बना रहे। अध्यात्म के अतिरिक्त संसार की कोई भी ऐसी उपलब्धि नहीं, जिसके मिल जाने से व्यक्ति दुख-क्लेशों की ओर से सर्वथा निश्चित हो जाए।
सुप्रसिद्ध अमेरिकी उद्योगपति एडिंग्टन ने अपना संपूर्ण जीवन धन-संपत्ति की विशाल मात्रा अर्जित करने, भोग-ऐश्वर्य और इन्द्रिय-सुखों की तृप्ति करने में बिताया। वृद्धावस्था में भी उनके पास धन-सम्पत्ति के अम्बार लगे थे, पर वह शक्तियाँ, जो मनुष्य को आत्म-संतोष प्रदान करती हैं, एडिंगटन के पास से कब की विदा हो चुकी थीं, मृत्यु की घड़ियाँ समीप आई देखकर उनका ध्यान भौतिकता से हटकर दार्शनिक सत्यों और आध्यात्मिक तथ्यों की ओर आया। वह अनुभव करने लगे कि पार्थिव जीवन की हलचलें और भौतिक सुखोपभोग प्राप्त करना ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य नहीं, लोकोत्तर जीवन- तत्वों का शोध एक अनिवार्य कर्तव्य था- उसे भुला दिया गया और धन-सम्पदा विलास-वैभव जुटाने में ही जीवन- सम्पदा लुटा दी गयी। वे पश्चाताप की अग्नि में जलने लगे। गंभीरतापूर्वक विचार करने के पश्चात् उन्होंने निष्कर्ष निकाला- “ भौतिकता में क्षणिक सुख है और निरन्तर विकसित होने का विनाशकारी गुण। इनके निष्कर्ष तो इतने खराब होते हैं कि जिनके बारे में कोई कल्पना ही नहीं की जा सकती। विक्षोभ और दुर्वासनाओं की भट्टी में जलता हुआ प्राणी मृत्यु के आने पर जल विहीन मछली और मणि-विहीन सर्प की तरह तड़पता है, पर तब सब परिस्थितियाँ हाथ से निकल चुकी होती हैं, केवल पश्चाताप ही शेष रहता है। “
जीवन के इस महत्वपूर्ण साराँश से वर्तमान और आगत पीढ़ी को अवगत कराने के लिए एडिंगटन ने एक महान साहस किया। उन्होंने एक संस्था बनायी और अपनी सारी सम्पत्ति उसे इसलिए दान कर दी कि यह संस्था मानव जीवन के आध्यात्मिक सत्य और तथ्यों की जानकारी अर्जित करे और उन निष्कर्षों से सर्वसाधारण को परिचित कराये, जिससे आगे मरने वालों को इस तरह पश्चाताप की ज्वाला में झुलसते हुए न विदा होना पड़े। यह संस्था अमेरिका में खोली गयी, जिसकी शाखा न्यूयार्क में है। वहाँ प्रतिवर्ष धर्म और विज्ञान के सम्बन्ध पर उत्कृष्ट कोटि के भाषण कराये जाते हैं।
जीवन में अध्यात्म का समावेश करने की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए मूर्धन्य मनीषी रसेल ब्रेन ने अपनी कृति ‘साइन्स, फिलॉसफी एण्ड रिलीजन’ में कहा है कि इसके अभाव में जीवन का कोई महत्व नहीं है। भौतिक पदार्थों की विपुलता कितनी ही क्यों न हो, वह आध्यात्मिक सुख-शान्ति की एक किरण की भी बराबरी नहीं कर सकती। उनके अनुसार “ विज्ञान हमें पदार्थ की भौतिक जानकारी दे सकता है, किन्तु पदार्थ क्यों बना ? कैसे बना ? इसका कोई उत्तर उसके पास नहीं है। जिन सत्य निर्णयों को विज्ञान नहीं दे सकता, उन्हें केवल दर्शन और धर्म के द्वारा ही खोजा जा सकता है। उसी का नाम अध्यात्म है।”
अज्ञात वस्तु की खोज मजेदार हो सकती है, पर जब तक उस वस्तु के सम्पूर्ण कारण को न जान लिया जाए, उस वस्तु को जीवन का अंग बनाना घातक ही होगा। मान लीजिए एक ऐसा व्यक्ति है, जिसे यह पता नहीं है कि अल्कोहल के गुण क्या हैं और हाइड्रोक्लोरिक एसिड के गुण क्या है ? सल्फर, अमोनिया, क्लोरीन, फास्फेट की कितनी-कितनी मात्रा में मिलकर कौन-सी चीज बनेगी ? पर वह जो भी भरी हुई शीशी मिलती जाती है, उनसे दवाएँ तैयार करता जाता है। तो क्या वे दवाएँ किसी मरीज को लाभ पहुँच सकती हैं ? लाभ पहुँचाना तो दूर वह मरीज की जान ही ले सकती हैं। नियन्त्रण रहित विज्ञान ऐसी ही दुकान है, जहाँ सीमित ज्ञान के आधार पर औषधियाँ बनती हैं और उनसे एक रोग ठीक होता है, पर वे दो नये रोग और पैदा कर देती है।
सुदूर अनन्त अन्तरिक्ष में ग्रह-नक्षत्र अपने-अपने परिक्रमा-पथ में सुव्यवस्थित रीति से चक्कर लगाते हैं। अब यह पता है कि कौन ग्रह पृथ्वी से कितनी दूर है ? किस ग्रह को सूर्य की परिक्रमा करने में कितनी यात्रा करनी पड़ती है। कितने ग्रह-गोलकों की सतह पर अन्तरिक्ष यान भी उतर चुके हैं और स्वसंचालित मशीनों की सहायता से उनकी आन्तरिक रचना के बारे में भी जानकारियाँ जुटा रहे हैं। पर यह गह नक्षत्र क्यों चक्कर काट रहे हैं ? उन्हें संचालित-नियंत्रित कौन कर रहा है ? यह विज्ञान नहीं बता सकता। उसके लिए हमें आध्यात्मिक चेतना की ही शरण लेनी पड़ती है। अध्यात्म में ही वह शक्ति है, जो मनुष्य के आन्तरिक रहस्यों का उद्घाटन कर सकती है। विज्ञान उस सीमा तक पहुँचने में समर्थ नहीं है।
अध्यात्म एक स्वयं-सिद्ध शक्ति है, उसका वैज्ञानिक आधार पर विश्लेषण नहीं किया जा सकता। मानवी मन-मस्तिष्क के गुणों के बारे में भौतिक विज्ञान चुप है। हमें नयी-नयी बातों के जानने की उत्सुकता क्यों होती है ? हम आजीवन कर्तव्यों से क्यों बँधे रहते हैं। निर्दयी कसाई भी अपने बच्चों से प्रेम और ममत्व रखते हैं, हिंसक एवं क्रूर डकैत भी स्वयं कष्ट सहते और दूसरों को त्रास देते, उन्हें मौत के घाट तक उतार देते हैं, पर अपनी पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण और शिक्षा का प्रबन्ध करते हैं। चोर, अपहरणकर्ता और उठाईगीरों को भी अपने साथियों और मित्रों के साथ सहयोग करना पड़ता है। अपनत्व, सेवा, सहानुभूति और सच्चाई-यह आत्म के स्वयंसिद्ध गुण हैं। मानवीय जीवन में उनकी विद्यमानता के बारे में कोई सन्देह नहीं है। यह अलग बात है कि किसी में इन गुणों की मात्रा कम है। किसी में कुछ अधिक होती है।
सौंदर्य की अदम्य पिपासा, कलात्मक और नैतिक चेतना को भौतिक नियमों के द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। इन्हें जिस शक्ति के द्वारा व्यक्त और अनुभव किया जा सकता है, वह अध्यात्म है। हमारा निन्यानवे प्रतिशत जीवन इन्हीं से घिरा हुआ रहता है। एक प्रतिशत आवश्यकताएँ भौतिक हैं, किन्तु सर्वाधिक दुखद पहलू यह है कि इस एक प्रतिशत के लिए ही जीवन के शत-प्रतिशत अंश को न्यौछावर कर दिया जाता है। 99 प्रतिशत भाग अन्ततोगत्वा उपेक्षित ही बना रहता है। इससे बढ़कर मनुष्य का और क्या दुर्भाग्य हो सकता है। अशान्ति, असंतोष उसी के परिणाम हैं।
‘द विल टु बिलीव’ नामक पुस्तक के सुप्रसिद्ध लेखक वैज्ञानिक विलियम जेम्स और हैण्डरसन ने जब महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन के ‘ थ्योरी आफ रिलेटिविटी’ अर्थात्-सापेक्ष सिद्धान्त को पढ़ा और टाइम, स्पेस, मोशन एण्ड काजेशन (समय, ब्रताण्ड, गति और सृष्टि के मूलतत्वों ) के साथ व्यक्तिगत अहंता (सेल्फ) का तुलनात्मक अध्ययन किया तो, उन्हें भी यही कहना पड़ा कि भौतिक जगत संभवतः सम्पूर्ण नहीं है। हमारा सम्पूर्ण भौतिक जीवन आध्यात्मिक वातावरण में पल रहा है। उस परम पालक आध्यात्मिक शक्ति को ही लक्ष्य कह सकते हैं। ऐसी शक्ति को अमान्य नहीं किया जा सकता।
उन्होंने आगे बताया कि वह तत्व जो विश्व के यथार्थ का निर्देश करते हैं भौतिक शास्त्र के द्वारा विश्लेषित नहीं किये जा सकते। उसके लिए एक अलग आध्यात्मिक स्केच-नक्शा तैयार करना पड़ेगा और सचेतन इकाइयों द्वारा ही उनका अध्ययन करना पड़ेगा। यह सचेतन इकाइयाँ हमारे विचार, श्रद्धा, आस्था, अनुभूतियाँ, तर्क और भावनाएँ हैं। उन्हीं के द्वारा अध्यात्म को स्पष्ट किया जा सकता है। उन्हीं के विकास द्वारा मनुष्य जीवन में अभीष्ट सुख-शाँति की प्राप्ति की जा सकती है। भावनाओं की तृप्ति भावनाएँ ही कर सकती हैं। भौतिक पदार्थ या धन-सम्पदा नहीं। इसलिए भाव-विज्ञान अर्थात् अध्यात्म की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
संसार में रहकर भौतिक उपलब्धियाँ प्राप्त करने, धन-सम्पदा अर्जित करने का प्रयत्न करना बुरा नहीं। बुरा है उनके लोभ में उस महान लाभ को त्याग कर देना, जो स्थिर एवं शाश्वत सुख का हेतु है। ऐसा सुख, जिसमें न ते विक्षेप होता है और न परिवर्तन। उपलब्धियों के बीच से गुजरते हुए मानव-जीवन के सारपूर्ण लाभ प्राप्त करने का प्रयत्न करना ही सच्चा पुरुषार्थ है, मनुष्य को जिसे करना ही चाहिए।
आध्यात्मिक जीवन आत्मिक सुख का निश्चित हेतु है, जिस पर हमारी आन्तरिक तथा बाह्य - दोनों प्रकार की उन्नतियाँ तथा समृद्धियाँ प्राप्त करने के लिए भी जिन परिश्रम, पुरुषार्थ, सहयोग, सहकारिता आदि गुणों की आवश्यकता होती है वे सब आध्यात्मिक जीवन के ही अंश हैं। हमारा आन्तरिक विकास तो अध्यात्म के बिना हो ही नहीं सकता।
अध्यात्मवाद जीवन का सच्चा ज्ञान है। इसको जाने बिना संसार की समस्त भौतिक उपलब्धियाँ, सम्पदाएँ एवं सारे ज्ञान अपूर्ण हैं, लेकिन इसको जान लेने के बाद फिर कुछ भी जानने और पाने को शेष नहीं रह जाता। यह वह तत्त्वज्ञान एवं महाविज्ञान है, जिसकी जानकारी होते ही मानव जीवन अमरता पूर्ण आनन्द से ओत-प्रोत हो जाता है। आध्यात्मिक ज्ञान से पाये हुए आनन्द की तुलना संसार के किसी आनन्द से नहीं किया जा सकती, क्योंकि इस आत्मानन्द के लिए किसी आधार की आवश्यकता नहीं होती। वस्तुजन्य सुख नश्वर होता है, परिवर्तनशील तथा अन्त में दुख देने वाला होता है। वस्तुजन्य मिथ्या आनन्द वस्तु के साथ ही समाप्त हो जाता है, जबकि आध्यात्मिकता से उत्पन्न आत्मिक-सुख जीवन भर साथ तो रहता ही है, अन्त में भी मनुष्य के साथ जाया करता है, एक बार प्राप्त हो जाने पर फिर कभी नष्ट नहीं होता। शरीर की अवधि तक तो रहता ही है, शरीर छूटने पर भी अविनाशी आत्मा के साथ संयुक्त रहा करता है।
अष्टावक्र के हृदय में ब्रह्मविद्या की अभीप्सा प्रबल हो उठी थी। ‘अयमात्मा ब्रता’ का रहस्य जानने के लिए उनका अन्तःकरण व्याकुल था। अपनी इस व्याकुलता को समेटे हुए वह सुविख्यात ब्रतावेत्त महर्षि वदान्य के आश्रम में जा पहुँचे। अपने सामने ब्रह्मविद्या के यथार्थ जिज्ञासु को पाकर महर्षि की आँखों में एक अनोखी दीप्ति उभर आयी। उनकी कोमल भावनाएँ मुखमण्डल पर उभरें, इसके पहले ही उन्होंने इन सब भावों को अन्तःकरण में ही दबाते हुए कहा-पुत्र ! मैं तुम्हारी अभीप्सा से परिचित हूँ। परन्तु मैं तुम्हारी जिज्ञासा को शान्त करूं, तुम्हें समर्थ ब्रह्मवेत्ता बनाऊँ, इसके पहले तुम्हें मेरी एक आज्ञा माननी होगी।”
अष्टावक्र ने शिष्योचित विनम्रता से पूछा, “ वह क्या महर्षि ?”
महर्षि वदान्य ने कहा, “ तुम्हें उत्तर दिशा में जाना होगा। अलकापुरी और हिमालय पर्वत के आगे जाने पर तुम्हें कैलाश पर्वत मिलेगा। वहाँ महादेव जी अनेक सिद्ध, चरण, भूत, पिशाचगणों के साथ विचरण करते हैं। उस स्थान के पूर्व और उत्तर की ओर छहों ऋतुएँ, काल, रात्रि-दिवस देवता और मनुष्य आदि भूतभावन महेश्वर की उपासना करते रहते हैं। इस स्थान को लाँघने के बाद तुम्हें मेघ के समान एक नीला वन मिलेगा। उस स्थान पर एक वृद्धा तपस्विनी रहती है। तुम उसके दर्शन करके लौट आना। मैं उसी क्षण तुम्हें अयमात्मा ब्रता का तत्त्वबोध कराऊँगा।” अष्टावक्र सच्चे अभीप्सु थे। जिज्ञासा की प्रचण्ड वुि उनके अन्तः-करण को जलाए दे रही थी। महर्षि वदानय की बातें महयाचल की शीतल बयार और वर्षा की ठण्डी फुहारों की भाँति लगीं। उन्होंने बड़ी प्रसन्नता और श्रद्धा के साथ सिर नवाकर उनकी बात स्वीकार कर ली एवं यात्रा के लिए चल पड़े। पहले तो वे हिमालय पर्वत पर पहुँचे और वहाँ धर्म दायिनी बहुदा नदी के पवित्र जल में स्नान और देवताओं का तर्पण करके उसी पवित्र स्थान पर कुशासन बिछाकर विश्राम करने लगे। वहीं रात भर सुखपूर्वक सोये। वहीं प्रातःकाल अग्नि प्रज्वलित करके उन्होंने यज्ञ किया। वहीं पास में सरोवर था, जहाँ शिव-पार्वती की मूर्ति थी। उन्होंने मूर्ति के दर्शन किए और फिर अपनी यात्रा पर चल दिए।
वे कैलाश, मन्दिर और सुमेरु आदि अनेक पर्वतों को लाँघकर किरात रूपी महादेव के स्थान की प्रदक्षिणा करके उत्तर दिशा की ओर चल पड़े। कुछ ही आगे जाने पर एक सुन्दर वन उन्हें दिखाई दिया। उस वन में एक दिव्य आश्रम था। उस आश्रम के पास अनेक रत्नों से विभूषित पर्वत, सुन्दर तालाब और तरह-तरह के सुन्दर पदार्थ थे। देखने में वह कुबेर की नगरी से भी अधिक शोभायमान दिखाई दे रहा था। वहीं अनेक प्रकार के सोने और मणियों के पर्वत दिखाई देते थे। जिन पर सोने के विमान रखे हुए थे। मन्दार के फूलों से अलंकृत मन्दाकिनी कल-कल निनाद करती हुई बह रही थी। चारों ओर मणियों की जगमगाहट से उस दिव्य वन की कल्पना श्री से ऊँची उठ जाती थी, लेकिन उसकी समता कहीं भी मस्तिष्क खोज नहीं पाता था।
अष्टावक्र यह देखकर आश्चर्यचकित से खड़े रहे। वे सोच रहे थे कि यहीं ठहरकर कुछ देर आनन्द से विचरण करना चाहिए। इससे अधिक सुखकर और रमणीय स्थान और कहाँ मिल सकता है ? अब वे अपने लिए एक उपयुक्त स्थान ढूँढ़ने लगे। आगे बढ़ने पर उन्होंने पाया कि यह तो एक पूरा नगर है। इस नगर के द्वार पर जाकर उन्होंने पुकार कर कहा, “मैं अतिथि हूँ। इस नगर के निवासी मेरा उचित स्वागत करें। “
उसी समय द्वार से सात परम सुन्दरी कन्याएँ अतिथि के स्वागत के लिए निकल आयीं। वे कन्याएँ इतनी अधिक सुन्दर थीं कि उन्हें देखकर ऋषि अष्टावक्र ठगे से खड़े हो गए। वह जिसकी तरफ आँख उठाकर देखते, उसे ही देखते रह जाते। इस तरह कुछ देर तक उनके अन्तर में भारी कोलाहल-सा मचा रहा। तभी उन्हें ब्रह्मविद्या प्राप्त करने की जिज्ञासा याद आयी और उन्होंने संयमपूर्ण अपने मन को स्थिर किया।
उन सुन्दरियों ने कहा- “आइए भगवान ! पधारिये। हम आपका स्वागत करती हैं। “
महर्षि एक भव्य प्रासाद के अन्दर चले गए। वहाँ उन्हें सामने ही एक वृद्धा बैठी मिली। वह स्वच्छ वस्त्र पहने थी और उसके शरीर पर अनेक तरह के आभूषण थे। महर्षि को देखते ही वह वृद्धा उठकर खड़ी हो गयी और उनका समुचित स्वागत करके बैठ गयी। महर्षि भी वहीं पास में बैठ गए। उन्होंने उन सुन्दरी कन्याओं की तरफ बढ़कर कहा- “हे कन्याओं ! तुममें से जो बुद्धिमती और धैर्यवती हो वही यहाँ रहे, बाकी सब यहाँ से चली जाएँ।
एक को छोड़कर सभी कन्याएँ वहाँ से चली गयीं। वृद्धा वहीं बैठी रही। रात होने पर महर्षि के लिए वहीं पर एक शय्या की व्यवस्था कर दी गयी। जब महर्षि सोने लगे, तो उन्होंने उस वृद्धा से भी जाकर अपनी शय्या पर सोने के लिए कहा। उनके कहने पर वृद्धा अपनी शय्या पर लेट गयी।
रात्रि का एक ही प्रहर बीता होगा कि वृद्धा जाड़े का बहाना करती हुई काँपती-सी महर्षि अष्टावक्र की शय्या पर आ लेटी। महर्षि अष्टावक्र ने आदर के साथ उसे लेट जाने दिया। थोड़ी देर बाद ही उन्हें उस वृद्धा की चेष्टाएँ चौंकाने लगीं। फिर भी महर्षि काष्ठ के समान कठोर और निर्विकार पड़े रहे।
वृद्धा उनसे कहने लगी, “ हे ऋषि मैं जीवन भर आपकी कृतज्ञ रहूँगी। यही आपकी तपस्या का अभीष्ट फल है। मेरी यह सारी सम्पत्ति आपकी ही है। आप यहीं मेरे पास रहिए। देखिए, हम यहाँ लौकिक और अलौकिक अनेक प्रकार के सुख भोगते रहेंगे।”
वृद्धा की प्रार्थनाएँ सुनकर अष्टावक्र बोले-हे देवी ! मैं एक तपस्वी हूँ और बचपन से अभी तक मैं पूर्ण ब्रह्मचारी रहा हूँ। इन्द्रिय-भोगों में प्रवृत्ति आत्मतेज को नष्ट करने वाली होती है। विवेकवान वही है जो इन्द्रियों पर संयम रखकर आत्मज्ञान की, ब्रह्मविद्या की अभीप्सा रखते हैं। मैं भी आत्मविद्या का जिज्ञासु हूँ। अपने गुरुदेव महर्षि वदान्य के आदेश से आपके दर्शन हेतु आया हूँ। आप मुझे आशीष दें, ताकि मैं अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकूँ।”
यह सुनकर वृद्धा ने कहा-
“ऋषिवर ! आप जिस ब्रह्मविद्या की बात करते हैं, वह तो निरा भ्रम है। लोक प्रत्यक्ष है उसके भोग भी स्पष्ट हैं। इन भोगों का स्वाद संसार के प्रत्येक प्राणी के मन को लालायित करता रहता है। इन्द्रियों के विभिन्न भोगों के आस्वादन के लिए संसार के समस्त जीवधारी लगातार श्रम करते हैं। शास्त्रों ने भी तप का लक्ष्य स्वर्ग को बताया है। इन्द्रिय-भोगों की सघनता और निरन्तरता ही तो स्वर्ग है। आप मेरे साथ जीवनयापन करिए, यहीं पर स्वर्गीय सुख साकार होने लगेंगे।”
महर्षि को उस वृद्धा की बातें अद्भुत लगीं। वह सोचने लगे-गुरुदेव महर्षि वदान्य ने मुझे क्यों इसके पास भेजा ? तभी उनके हृदय में संशय जागा कि हो सकता है कि यह कुछ समय पूर्व इस प्रासाद की अधिष्ठात्री देवी कोई युवती हो और किसी शाप के कारण इस तरह वृद्धा हो गयी हो। यह संशय पैदा होते ही उन्होंने उसकी वृद्धावस्था का कारण पूछना चाहा, लेकिन सीधे ही वृद्धा से प्रश्न करने की उनकी हिम्मत नहीं पड़ी।
एक दिन बीत गया। संध्या होने पर वृद्धा ने आकर कहा- “हे महर्षि ! वह देखिए, सूर्य अस्त हो रहा है। अब आपकी क्या आज्ञा है ?”
वृद्धा जाकर जल ले आयी और उसके साथ सुगन्धित तेल और वस्त्र भी लेती आयी। महर्षि से आज्ञा लेकर वह उसके शरीर पर तेल-मर्दन करने लगी और फिर अपने हाथों से ही उनके शरीर को मल कर उनको स्नान कराने लगी। महर्षि बड़े आनन्द से स्नान करते रहे। स्नान करते-करते सारी रात बीत गयी। प्रातःकाल जब सूर्य की किरणें स्नानागार में आने लगीं, तो ये चौंक पड़े और इसे कोई माया समझकर वृद्धा से कहने लगे- “शुभे ! क्या भोर हो गयी ? या यह भी किसी तरह का छल है ?”
वृद्धा ने कहा, “ भगवन् ! वास्तव में भोर हो गयी। देखिए सूर्य भगवान प्राची में निकल आये हैं।”
महर्षि स्नान कर चुके थे। इसके बाद वृद्धा ने पूछा, “हे भगवन् ! अब मैं क्या करूं?
अष्टावक्र कुछ भी उत्तर नहीं दे पाए और चिन्तामग्न होकर पिछले दिन से हो रही इस विचित्र लीला के बारे में सोचने लगे। इसी बीच उत्तर की प्रतीक्षा न करती हुई वृद्धा उठी और अन्दर से एक थाल में सजाकर स्वादिष्ट भोजन ले आयी। महर्षि भोजन करने लगे। फिर भोजन करते-करते उन्हें पूरा दिन बीत गया। रात्रि आयी। वृद्धा ने अलग-अलग पलंग बिछा दिए। महर्षि जाकर अपने पलंग पर लेट गए और कुछ देर बाद उनको नींद आ गयी, आधी रात्रि के समय वृद्धा फिर बहाना करती हुई उनके पलंग पर आ गयी।
महर्षि सहसा जागकर कहने लगे, “हे देवी ! तुम व्यर्थ प्रयत्न न करो। शास्त्रकारों ने परस्त्रीगमन को महापाप माना है। यह कार्य मुझे धर्माविरुद्धः लगता है। इसलिए इसे त्याज्य समझकर मैं इसमें कदापि प्रवृत्त नहीं होऊँगा।”
अब तो वृद्धा को गहरा धक्का लगा, लेकिन फिर भी उसने धैर्य नहीं छोड़ा, फिर वह आशा लेकर अष्टावक्र से बोली, “हे महर्षि ! यदि आप मुझे परस्त्री समझते हैं तो मुझे अपनी स्त्री बना लीजिए। मैं इसके लिए सहर्ष तैयार हूँ। आप विश्वास कीजिए, मैं अभी तक कुँवारी हूँ।”
अब तो अष्टावक्र एक अजीब पशोपेश में पड़ गए। तत्काल उन्हें कोई उत्तर नहीं सूझ पड़ा। चिन्ता के भार से उन्होंने अपना सिर नीचे झुका लिया। कुछ ही क्षणों बाद जब उन्होंने कुछ कहने को अपना मुँह ऊपर उठाया और उनकी दृष्टि उस स्त्री पर पड़ी तो महान आश्चर्य के कारण वे सहसा हिल उठे। वह वृद्धा अब एक सोलह वर्ष की परम रूपसी कन्या का रुपं धारण करके सामने बैठी मुस्करा रही थी।
अष्टावक्र ने अधीर होकर पूछा- “हे देवी ! यह तुम्हारा कैसा रूप ? मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है कि तुम कौन हो ? पर तुम जो भी हो, मैं अभी भी अपने पूर्व कथन पर अडिग हूँ। मैं ब्रह्मविद्या का अभीप्सु हूँ, साँसारिक भोग मुझे नहीं चाहिए। देवि ! मैं मनुष्य हूँ और मनुष्य की परिभाषा यही है- जिसने मन पर विजय पा ली हो, वहीं सच्चा मनुष्य है। लेकिन तुम्हारा परिचय प्राप्त करने के लिए अवश्य लालायित हूँ। बताओ कल्याणी ! तुम कौन हो ?”
उस कन्या ने मुसकराते हुए ही कहा- “ हे महर्षि अष्टावक्र ! स्वर्ग-मृत्यु आदि सभी लोकों के स्त्री-पुरुषों में विषय-वासना पायी जाती है। मैं आपके मन को विचलित करके आपकी परीक्षा ले रही थी, लेकिन अपने कठोर संयम के कारण आपने धर्म-मर्यादा को नहीं छोड़ा। इसलिए मेरा विश्वास है कि जीवन में आप कभी किसी प्रकार का कष्ट नहीं भोगेंगे।
“मैं उत्तर दिशा हूँ। मैंने यह वृद्धा का रूप आपको यह बताने के लिए रखा था कि आप जान लीजिए कि इस संसार में वृद्धावस्था को प्राप्त स्त्री-पुरुषों को भी काम सताता है। इसीलिए विवेकवान वही है, जो संयम के लिए वृद्ध होने की प्रतीक्षा नहीं करता, बल्कि बचपन से ही ब्रह्मचर्य का पालन करता है। ब्रह्मचर्य में ही ब्रह्मविद्या का रहस्य निहित है। मुझे प्रसन्नता है कि आपने ब्रह्मचर्य व्रत को नहीं छोड़ा, इसलिए ब्रह्म और इन्द्र आदि देवता आप पर अत्यन्त प्रसन्न हैं। जिस काम के लिए महात्मा वदान्य ने आपको यहाँ भेजा था वह अवश्य पूरा होगा।”
अष्टावक्र यह सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उस देवी से चलने की आज्ञा माँगने लगे। उत्तर दिशा ने आदर के साथ अष्टावक्र को विदा कर दिया। जब वे लौटकर महर्षि वदान्य के पास आए तो महर्षि ने बड़ी प्रसन्नता से उन्हें आशीष दिया। क्योंकि वे अपनी दिव्यदृष्टि से अपने शिष्य के साथ घटी सारी घटनाओं को जान चुके थे। गुरु की कृपा से शिष्य ने ब्रह्मविद्या के रहस्य को जाना और श्रेष्ठतम ब्रह्मवेत्ताओं के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त की।
देवी-भागवत् पुराण में भगवती गायत्री महाशक्ति की महत्ता का विस्तारपूर्वक वर्णन है। उसे समस्त देवताओं का उपास्य और समस्त मन्त्रों का शिरोमणि बताया गया है। अनादि काल से सर्वत्र उसी की महिमा गायी जाती है और उपासना को प्रधानता दी जाती है। शास्त्र-इतिहास में ऐसा ही विवरण मिलता है और देवताओं, अवतारी देवदूतों द्वारा अपनी उपासना का रहस्योद्घाटन करते हुए इसी महाशक्ति को अपना इष्टदेव प्रतिपादित किया जाता रहा है। शक्तियों का केन्द्र वस्तुतः यही महामंत्र है। इसकी महत्ता का प्रतिपादन करते हुए शास्त्र कहते हैं-
न गायत्र्याः परो धर्मा न गायत्र्याः परन्तपः। न गायत्र्याः समो देवो न गायत्र्याः पाते मनुः॥ गातरं त्रायते यस्माद् गायत्री तेन सोच्चते।
अर्थात्-गायत्री से परे कोई नहीं है, गायत्री से परम अन्य कोई भी तपश्चर्या नहीं है। गायत्री के समान अन्य कोई देवता नहीं है। गायत्री का मंत्र सब मंत्रों में श्रेष्ठ है। जो कोई इस गायत्री का गायन अर्थात् जप किया करता है, उसकी यह गायत्री त्राण-रक्षा किया करती है। इसीलिए इसका गायत्री-यह नाम कहा जाता है। इसी की उपासना से मनुष्यों से लेकर त्रिदेवों तथा अन्य देवताओं तक का कल्याण होना सिद्ध होता रहा है। प्रज्ञातत्व की अधिष्ठात्री गायत्री ही है।
आध्यात्मिक साधनाओं द्वारा आत्मिक प्रगति के लिए जिस शक्ति की आवश्यकता पड़ती है, वह प्रज्ञातत्व ही है। प्रज्ञा की अभीष्ट मात्रा यदि अपने पास विद्यमान हो तो फिर आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रगति करने के लिए कोई बाधा नहीं रह जाती है। वह सुविधा और परिस्थितियाँ आसानी से बन जाती हैं, जिनके आधार पर मनुष्य नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम और आत्मा से परमात्मा बन जाता है। इसके लिए कोई विशेष श्रम या मनोयोग लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में उतना ही श्रम और मनोयोग लगाना पर्याप्त रहता है जितना कि भौतिक आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए जरूरी होता है। लोभ और मोह की पूर्ति में जितना पुरुषार्थ करना और जितना जोखिम उठाना पड़ता है, आत्मिक प्रगति के लिए उससे कम में ही काम चल जाता है। महामानवों को उससे अधिक कष्ट नहीं सहने पड़ते जितने कि साधारण लोगों को सामान्य जीवन में नित्यप्रति उठाने पड़ते हैं। फिर कठिनाई क्या है ? ऋषि-मुनियों ने अध्यात्मवेत्ताओं एक ही कठिनाई बताई है और वह है-प्रज्ञा प्रखरता की। यदि प्रज्ञा को प्रखर बनाया जा सके, वह प्राप्त हो सके, तो समझना चाहिए कि जीवन को सच्चे अर्थों में सार्थक बनाने वाली ऋद्धि-सिद्धियों की उपलब्धियों से भर देने वाली संभावनाएँ हस्तगत हो गयी हैं।
वस्तुतः इस प्रज्ञातत्व का ही दूसरा नाम गायत्री है। गायत्री महाशक्ति को तत्वज्ञानियों ने इसीलिए सर्वोपरि दिव्य क्षमता सम्पन्न बताया है और इसीलिए इसका इतना अधिक माहात्म्य बताया है कि इसका आश्रय लेकर कोई भी व्यक्ति सहज ही आत्मिक प्रगति की उच्च कक्षा में पहुँच सकता है। प्रज्ञातत्व को अथवा गायत्री को दूरदर्शी विवेकशीलता एवं आत्मोत्कर्ष के लिए अभीष्ट बल प्रदान करने वाली साहसिकता भी कह सकते हैं। गायत्री उपासना से यह दूरदर्शी विवेकशीलता और आत्मिक प्रगति के लिए अभीष्ट साहसिकता पर्याप्त मात्रा में उत्पन्न होती है। इसलिए मनीषियों ने आत्मिक प्रगति के लिए की जाने वाली समस्त साधना-उपासनाओं में गायत्री को सर्वश्रेष्ठ माना है।
गायत्री महाशक्ति की उपासना का प्रतिफल प्रज्ञा के रूप में-दूरदर्शी विवेकशीलता और आत्मबल के रूप में प्राप्त होता है और उसके बल पर साधक अपने को आत्मिक दृष्टि से सुविकसित एवं सुसम्पन्न बनाता है। परिणामस्वरूप उसके आत्मिक जीवन का स्तर ऊँचा उठता है और वह व्यक्ति सामान्य न रहकर देवात्मा, महात्मा तथा परमात्मा के स्तर तक जा पहुँचता है। इस संदर्भ में मनुस्मृति 2/87 में उल्लेख है- “गायत्री उपासना समस्त सिद्धियों का आधारभूत है। गायत्री उपासक अन्य कोई अनुष्ठान या साधना न करे, तो भी सबसे मित्रवत आचरण करता हुआ वह ब्रह्मं को प्राप्त करता है, क्योंकि इस महामंत्र के जप से उसका चित ब्राह्मीचेतना की तरह शुद्ध व पवित्र हो जाता है।” निश्चय ही जहाँ इस स्तर की आन्तरिक सम्पन्नता होगी, वहाँ कहने की आवश्यकता नहीं कि आत्मिक सम्पन्नता की अनुचरी भौतिक सम्पन्नता भी अनिवार्य रूप से होगी ही। आत्मिक दृष्टि से सुसम्पन्न और सुविकसित व्यक्ति इन भौतिक विभूतियों का उद्धत प्रदर्शन नहीं करते, उन्हें श्रेष्ठ सत्कार्यों में ही लगाते हैं। इसलिए वे साँसारिक दृष्टि से अन्य मनुष्यों की अपेक्षा साधारण स्तर के ही दिखाई देते हैं। कइयों को उनकी यह सादगी देखकर उनके दरिद्र होने का भ्रम भी हो जाता है। दूसरे उन्हें क्या समझते हैं, इसकी परवाह न कर वे आत्मिक पूँजी के धनी अपने आप में ही संतुष्ट रहते हैं और सच्चे अर्थों में सुसम्पन्न बनते हैं।
जिस प्रज्ञा को दूरदर्शी विवेकशीलता, निर्मल प्रखर बुद्धि और आत्मबल के रूप में जाना जाता है, उसे आकर्षित करने का अनुभूत और सर्वोपरि सर्वसुलभ उपाय है- गायत्री महाशक्ति की उपासना। इस तत्व को आकर्षित कर साधक परब्रह्म की विशिष्ट अनुकम्पा, दूरदर्शी विवेकशीलता और सन्मार्ग अपना सकने वाली प्रखरता प्राप्त करता है। यह अनुदान प्राप्त कर वह तो स्वयं धन्य बन ही जाता है, अपने आस-पास के समूचे वातावरण में भी वैसी ही विशेषताएँ उत्पन्न करता ह है। उसके ऊर्जा सम्पन्न व्यक्तित्व से आस-पास का, उसके सम्पर्क क्षेत्र का समूचा वातावरण प्रभावित होता रहता है और सुखद सम्भावनाओं का क्रम चल पड़ता है। इस सम्बन्ध में मानवी महाशक्ति का, उसकी उपलब्धियों का, उसकी उपासना का परिचय देते हुए तत्त्वदर्शियों ने बहुत कुछ कहा है। शास्त्रवचनों में इस तथ्य का उल्लेख स्थान-स्थान पर हुआ है।
गायत्री महाशक्ति का साधक किस प्रकार कायाकल्प करता है ? इस संदर्भ में शास्त्रकारों का कथन है कि यह शक्ति मनुष्य में सत्-असत् का निरूपण करने वाली, नीर-क्षीर विवेक का भाव जगाने वाली बुद्धि का विकास और परिष्कार करती है। इसके प्राप्त होने का प्रथम चमत्कार तो यह होता है कि साधक वासना-तृष्णा की पशु-प्रवृत्तियों से ऊँचा उठकर मनुष्योचित कर्म-धर्म को समझने और तदनुसार उत्कृष्टतावादी नीति अपनाने के लिए अन्तः प्रेरणाएँ प्राप्त करता है तथा साहसपूर्वक आदर्शवादी जीवन जीने की दिशा में चल पड़ता है। ऐसे व्यक्ति स्वभावतः दुष्कर्मों से ही नहीं, दुर्भावनाओं से भी विरत हो जाते हैं और उनके क्रिया-कलापों में से, अंतःक्षेत्र में से अवांछनीयताएँ पूरी तरह चली जाती-निकल जाती हैं। शास्त्रकार ने इस परिवर्तन को धर्म-स्थापना और अधर्म-निवारण के रूप में प्रतिपादित करते हुए प्रार्थना की है-
“धर्मोन्नतियधर्मस्य नाशनं जनहृदछुँचिम्। माँगल्ये जगतो माता गायत्री कुसनात्सदा॥”
अर्थात् धर्म की उन्नति, अधर्म का नाश, भक्तों के हृदय की पवित्रता तथा संसार का कल्याण गायत्री माता करे।
महाभारत- भीष्म पर्व 1/4/16 में भी उल्लेख है-
“यएताँवेदगायत्रीपुण्याँसर्वगुणन्विताम्। तत्वेनभरतश्रेष्ठसलोकेनप्रणश्यति॥
अर्थात्-हे राजन् ! जो इस सर्वगुण सम्पन्न परम पुनीत गायत्री तत्त्वज्ञान को समझकर उपासना करता है, उसका संसार में कभी पतन नहीं होता।
गायत्री महामंत्र में जिस प्रज्ञा को “धियः’ शब्द से सम्बोधित किया गया है और उसे अन्तःचेतना के कण-कण में ओत-प्रोत करने की घोषणा की है, उसी को शास्त्रकारों ने अन्यत्र ऋतम्भरा प्रज्ञा, भूमा आदि नामों से चर्चा की है। यह शब्द सामान्य व्यवहार में काम आने वाली बुद्धि के लिए नहीं आया है। इस सामान्य व्यवहार में काम आने वाली बुद्धि के लिए नहीं आया है। इस सामान्य व्यवहार में काम आने वाली बुद्धि का विकास तो सामान्य उपायों से भी सम्भव है। चतुरता, कुशलता एवं जानकारी बढ़ाने का काम शिक्षा के द्वारा स्कूलों के माध्यम से भी पूरा हो जाता है। प्रज्ञा इससे सर्वथा भिन्न तत्व है। जिस विद्या के द्वारा साधक को आत्मबोध होता है। वह जीवन का महत्व, स्वरूप एवं लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त करता है, सत-असत का उचित
अनुचित का, क्षीर-नीर का विवेचन करना है, उस विवेचक अंतःवृत्ति का नाम ही प्रज्ञा है और उसी को गायत्री कहा जाता है।
गायत्री उपासना के द्वारा साधक में प्रज्ञा शक्ति का अभिवर्द्धन होने के साथ वे विशिष्ट क्षमताएँ सिद्धियाँ भी प्राप्त होती है। जिनका वर्णन विद्या के अवगहन तथा योग, तप आदि के के साधन विधान के साथ जुड़ा हुआ है। गायत्री उपासक की आत्मिक पूँजी निरंतर बढ़ती चली जाती है और यदि वह धैर्य तथा साहसपूर्वक आत्मपरिष्कार करता हुआ अपने मार्ग पर, साधनापथ पर बढ़ता चलता है, तो वह एक दिन नर से नारायण के स्तर तक पहुँचकर सिद्ध पुरुषों की-सी स्थिति में जा पहुँचता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में इसी तथ्य को उद्घाटित करते हुए कहा गया है-
“ हे आद्यशक्ति ! आप योगनिद्रा रूप योगरुपा, योगदात्री हैं, जो कि योगियों को योग प्रदान किया करती हैं। आप सिद्धों को सिद्धियाँ देने वाली हैं। आप सिद्धि-सिद्धियों की योगिनी हैं। आप विद्वानों की विद्या और बुद्धिमान सत्पुरुषों की बुद्धि हैं। जो प्रतिभा वाले पुरुष हैं, उनकी आप मेधा, स्मृति और प्रतिभा के स्वरूप वाली हैं। आप ब्रह्मा आदि समस्त देवताओं द्वारा पूजित हैं। ब्राह्मणों में ब्राह्मणत्व और तपस्वियों में तप आप ही हैं।”
बृहदारण्यक उपनिषद् में गायत्री को ब्रह्मविद्या का, देव विद्या का, परब्रह्म शक्ति का स्वरूप बताया गया है और कहा गया है कि इस महाशक्ति का आश्रय लेकर साधक ब्रह्मतेज का अधिकारी बनता है तथा वह सबकुछ प्राप्त कर लेता है, जो इस संसार में पाने योग्य है। यथा -
तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतमसि धामनामासि। प्रियं देवानामनाधृष्टं देवयजनमसि॥ गाययस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि नहि पद्यसे। नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेसावदो मा प्रापत्। - बृहदा0 5/14/7
अर्थात्-हे गायत्री! तुम तेज रूप हो, निर्मल प्रकाश रूप हो, अमृत एवं मोक्ष रूप हो, चित्तवृत्तियों का निरोध करने वाली हो, देवों की प्रिय आराध्य हो, देवपूजन का सर्वोत्तम साधन हो। हे गायत्री! तुम इस विश्व-ब्रह्माण्ड की स्वामिनी होने से, एक पदी वेद विद्या की आधारशिला होने से द्विपदी, समस्त प्राणशक्ति का संचार करने से त्रिपदा और सूर्यमण्डल के अंतर्गत परम तेजस्वी पुरुषों की आत्मा होने से चतुष्पदी हो। रज से परे हो भगवती! श्रद्धालु साधक सदा तुम्हारी उपासना करते हैं।
गायत्री मंजरी में कहा गया है-
भूलेकस्यास्य गायत्री कामधेनुर्मताबुधैः। लोक आश्रायणे नामुँ सर्वमेधाधिगच्छति॥
अर्थात्-देव वर्णित सारी सिद्धियाँ गायत्री उपासना से मिल सकती है।
गरुड़ पुराण में उल्लेख हैं-
“ जिस-जिसका हाथ स्पर्श करता है और जो-जो नेत्र से देखता है, वह समीपूत हो जाता है। गायत्री से परे अन्य कुछ भी नहीं है। यह गायत्री सर्वोपरि शिरोमणि मंत्र है।”
सन्ध्या भाष्य में गायत्री को
“ सर्वात्म प्रतिपादकोऽय गायत्री मन्त्र।”
अर्थात्-गायत्री को सर्वत्र आत्मा को प्रखर करने वाला मंत्र कहा गया है। आध्यात्मिक प्रगति के लिए आत्मबल को प्रखर बनाने के लिए गायत्री महाशक्ति किस प्रकार काम करती है। यह प्रज्ञातत्व के महत्व से समझा जा सकता है। प्रज्ञा शक्ति को संक्षेप में वह आलोक कहा जा सकता है, जो साधक के पथ को निरंतर प्रकाशित और उसके बल का अहर्निश प्रदीप्त रखता है। इस शक्ति को आकर्षित करने में गायत्री महामंत्र के समतुल्य और उपासना नहीं है। इसलिए गायत्री को सर्वोपरि साक्षात् सर्व देवता स्वरूप, सर्व शक्तिमान, सबको प्रकाश देने वाला और परमात्मा के सर्वात्मा-स्वरूप का ज्ञान कराने वाला है। आत्मोत्कर्ष के लिए हमें इसका आश्रय लेना ही चाहिए।
मंत्र विद्या में दो तत्त्वों का समावेश है- (1) शब्दशक्ति का सूक्ष्म चेतना विज्ञान के आधार पर उपयोग, (2) व्यक्ति की आन्तरिक पवित्रता एवं भावोल्लास से उत्पन्न दिव्य क्षमता का समन्वय। इन दोनों के मिलन से एक तीसरी ऐसी अद्भुत शक्ति उत्पन्न होती है, जो कितने ही बड़े भौतिक साधनों से उपलब्ध नहीं हो सकती।
मन्त्रों में अक्षरों के क्रम में तथा उनके उच्चारण की विशेष विधि-व्यवस्था का ही अधिक महत्व है। कण्ठ, तालु, दाँत, होंठ, मूर्धा आदि जिन स्थानों से शब्दोच्चारण होता है, उनका सीधा सम्बन्ध मानव-शरीर के सूक्ष्म स्थानों से है। षट्चक्र, उपात्मक एवं दिव्य वादियों, ग्रन्थियों का सूक्ष्म शरीर संस्थान अपने आप में अद्भुत है। इन दिव्य वादियों, ग्रन्थियों का सूक्ष्म शरीर संस्थान अपने आप में अद्भुत है। इन दिव्य अंगों के साथ हमारे मुख यन्त्र के तार जुड़े हुए हैं। जिस प्रकार टाइपराइटर की चाबियाँ दबते चलने से ऊपर अक्षर टाइप होते चलते हैं, ठीक इसी प्रकार मुख से उच्चारण किये हुए विशेष वैज्ञानिक प्रक्रिया के साथ विनिर्मित मन्त्रगुम्फन का सीधा प्रवाह उपर्युक्त संस्थानों पर पड़ता है और वहाँ तत्काल एक अतिरिक्त शक्ति तरंगों का प्रवाह चल पड़ता है। यह प्रवाह मन्त्रविज्ञानी को स्वयं लाभान्वित करता है। उसकी प्रसुप्त क्षमताओं को जगाता है। भीतर गूँजते हुए वे मन्त्र कम्पन यही काम करते हैं और जब वे बाहर निकलते हैं, तो वातावरण को प्रभावित करते हैं। सूक्ष्म जगत में अभीष्ट परिस्थितियों की सम्भावनाओं का सृजन करते हैं और यदि किसी व्यक्ति विशेष को प्रभावित करना है तो उस पर भी असर डालते हैं। मन्त्र विद्या इन तीनों प्रयोजनों को पूरा करती है।
राडार हमारे शरीर में भी विद्यमान है और वह भी यन्त्रों द्वारा बने हुए राडार की तरह काम करता है। उसे जाग्रत, सशक्त और सक्रिय बनाने के लिए मंत्र विद्या का उपयोग किया जाता है। शब्द विद्या के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मंत्रों के अक्षरों का चयन होता है। मन्त्र रचना कविता या शिक्षा नहीं है। शिक्षा भी उनमें हो सकती है पर वह गौण है। कविता की दृष्टि से भी मंत्रों का महत्व गौण है। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र में 23 ही अक्षर हैं, जबकि छंद शास्त्र के अनुसार उसमें 24 होने चाहिए। इस दृष्टि से उसे साहित्य की कसौटी पर दोषयुक्त भी ठहराया जा सकता है, पर शक्तितत्त्व का जहाँ तक सम्बन्ध है, वह सौ टंच-खरा है। उसकी सामर्थ्य का कोई पारावार नहीं। साधारणतया ध्वनि चारों दिशाओं में फैलती है पर मंत्रों में शब्द इस प्रकार गुँजित होते हैं कि उसकी ध्वनि तरंगें विशेष प्रकार की हो जाती है। गायत्री मंत्र की ध्वनि तरंगें तार के
छल्ले जैसी ऊपर उठती है और यह सूक्ष्म अंतराल के प्रमाणियों के माध्यम से सूर्य तक पहुँचती है और जब यही ध्वनि सूर्य के अंतराल में प्रतिध्वनित होकर लौटती है तो अपने साथ प्रकाश अणुओं की (गर्मी, प्रकाश व विद्युत सहित) फौज जब करने वाले के शरीर में उतारती चली जाती है। साधक उन अणुओं से शरीर ही नहीं, मन और आत्मा की शक्तियों का विकास करता चला जाता है और कई बार वह लाभ प्राप्त करता है, जो साँसारिक प्रयत्नों द्वारा कभी भी संभव न हो सके।
शब्द की शक्ति पर जितना गहरा चिंतन किया जाये, उतना ही उसकी गरिमा और विलक्षणता स्पष्ट होती चली जाती है। बादलों की गरज से ऊँची इमारतें फट जाती हैं। आज की यांत्रिक सभ्यता जितना शोर उत्पन्न कर रही है, उसके दुष्परिणामों से मानव जाति को पूरी न हो सकने वाली क्षति उठानी पड़ेगी। इस तथ्य से समस्त संसार चिंतित है। अतिस्वन और जेट विमान आकाश में जितनी आवाज करते हैं उससे उत्पन्न होने वाली हानिकारक प्रतिक्रिया को सर्वत्र समझा जा रहा है और इन विशालकाय द्रुतगामी वायुयानों को कोलाहल रहित बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है।
शब्द की सामर्थ्य सभी भौतिक शक्तियों से बढ़कर सूक्ष्म और विभेदन क्षमता वाली है। इस बात की निश्चित जानकारी होने के बाद ही मंत्र विद्या का विकास भारतीय तत्त्वदर्शियों ने किया है। यों हम जो कुछ बोलते हैं, उसका प्रभाव व्यक्तिगत और समष्टिगत रूप से सारे ब्रह्माण्ड पर पड़ता है, तालाब के जल में फेंके गये कंपन की लहरें भी दूर तक जाती हैं, उसी प्रकार हमारे मुख से निकला हुआ प्रत्येक शब्द आकाश के सूक्ष्म परमाणुओं में कम्पन उत्पन्न करता है, उस कम्पन से लोगों में अदृश्य प्रेरणाएँ जाग्रत होती हैं, हमारे मस्तिष्क में विचार न जाने कहाँ से आते हैं, हम समझ नहीं पाते, पर मन्त्रविद जानते हैं कि मस्तिष्क में विचारों की उपज कोई आकस्मिक घटना नहीं, वरन् शक्ति के परतों में आदिकाल से एकत्रित सूक्ष्म कम्पन हैं, जो मस्तिष्क के ज्ञानकोषों से टकराकर विचार के रूप में प्रकट हो उठते हैं। तथापि अपने मस्तिष्क में एक तरह के विचारों की लगातार धारा को पकड़ने या प्रवाहित करने की क्षमता है।
एक ही धारा में मनोगति के द्वारा एक-सी विचारधारा निरन्तर प्रवाहित करके सारे ब्रह्माण्ड के विचार-जगत में क्रान्ति उत्पन्न की जा सकती है, उसके लिए यह आवश्यक नहीं कि उन विचारों को वाणी या सम्भाषण के द्वारा व्यक्त ही किया जाए।
‘उच्चारण’ और ‘स्वर’ में यही अन्तर है कि उच्चारण कण्ठ, होंठ, जीभ, तालु, दाँतों की संचालन प्रक्रिया से निकलता है और वह विचारों का आदान-प्रदान कर सकने भर में समर्थ होता है पर स्वर अन्तःकरण से निकलता है। उसमें व्यक्तित्व, दृष्टिकोण और भाव समुच्चय भी ओत-प्रोत रहता है। इसलिये मन्त्र को स्वर कहा गया है। वेद पाठ में उदात्त-अनुदात्त स्वरित की उच्चारण प्रक्रिया का शुद्ध होना ही इसी ओर संकेत करता है। साधना क्षेत्र में स्वर का अर्थ वाक् शक्ति के माध्यम से किये जाने वाले सशक्त जप-अनुष्ठान से ही है।
मन्त्र की जो कुछ महिमा है उसका आधार वाणी को ‘वाक्’ के रूप में परिणत कर देना है। इसके लिए मन, वचन और कर्म में ऐसी उत्कृष्टता का समन्वय करना पड़ता है कि वाणी को दग्ध करने वाला कोई कारण शेष न रहे
जाए। इतना करने के उपरान्त उसके द्वारा जपा हुआ मन्त्र सहज ही सिद्ध होता है और उच्चारण किया हुआ शब्द असंदिग्ध रूप से सफल होता है। यदि वाणी दूषित, कलुषित, दग्ध स्थिति में पड़ी रहे तो उसके द्वारा जप किये हुए मन्त्र भी जल जाएँगे और बहुत संख्या में, बहुत समय तक जप, स्तवन, पाठ आदि करते रहने पर भी अभीष्ट फल न मिलेगा।
परिष्कृत जिह्वा में वह शक्ति रहती है जिसके बल पर किसी भी भाषा का-कोई भी मन्त्र प्रचण्ड और प्रभावशाली हो उठता है। उसके द्वारा उच्चारित शब्द मनुष्यों के अन्तस्तल को असीम अन्तरिक्ष को प्रभावित किये बिना नहीं रहता। ऐसी परिष्कृत वाणी-वाक् को अध्यात्म का प्राण कह सकते हैं। उसे साधक की कामधेनु एवं तपस्वी का ब्रह्मास्त्र कहने में तनिक भी अत्युक्ति नहीं है। इसी की परिमार्जित जिह्वा को ‘सरस्वती’ कहते हैं। साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले व्यक्ति को उस मन्त्र शक्ति की, दीक्षा की महत्ता समझनी चाहिए। मन्त्र की माता उसे ही मानना चाहिए, सिद्धियों का उद्गम स्थल, भगवान को द्रवित एवं प्रभावित कर सकने का माध्यम उसे ही मानना चाहिए।
मन्त्र सिद्धि में चार तथ्य सम्मिश्रित रूप से कम करते हैं- (1)ध्वनि विज्ञान के आधार पर विनिर्मित शब्द-शृंखला का चयन और उसका विधिवत् उच्चारण, (2) साधक की संगम द्वारा निग्रहित प्राण-शक्ति और मानसिक एकाग्रता का संयुक्त समावेश, (3) उपासना प्रयोग में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ उपकरणों की भौतिक किन्तु सूक्ष्म शक्ति, (4) भावना-प्रवाह श्रद्धा, विश्वास एवं उच्चस्तरीय लक्ष्य, दृष्टिकोण। इन चारों का जहाँ जितने अंश में समावेश होगा वहाँ उतने ही अनुपात से मन्त्र शक्ति का प्रतिफल एवं चमत्कार दिखाई पड़ेगा। इन तथ्यों की जहाँ उपेक्षा की जा रही होगी और ऐसे ही अन्धाधुन्ध गाड़ी धकेली ही जा रही होगी, जल्दी-जल्दी वरदान पाने की धक लग रही होगी, वहाँ निराशा एवं असफलता ही हाथ लगेगी।
ईथर तत्त्व के परमाणु अत्यन्त सूक्ष्म और अति संवेदनशील हैं। वे एक सेकेण्ड में 34 अरब तक कम्पन उत्पन्न कर सकते हैं। जब यह कम्पन चरम सीमा पर पहुँचते हैं, तो उनसे एक अखण्ड प्रकाश की किरणें निकलने लगती हैं। वैज्ञानिक प्रयोग बताते हैं कि इन किरणों में अद्भुत गतिशीलता होती है, वे एक सेकेण्ड में प्रायः एक करोड़ मील चल लेती हैं। वायु के कम्पन नष्ट हो जाते हैं, पर ईथर के कम्पनों का कभी नाश नहीं होता। वे सदा अमर रहते हैं। जैसे-जैसे वे पुराने होते जाते हैं, वैसे-वैसे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की सतह पर जाकर स्थिर हो जाते हैं। जहाँ वे बलिष्ठ होने पर अपने समानधर्मी अन्य कम्पनों को अपनी और खींचते हैं अथवा दुर्बल होने पर दूसरों की ओर खींच जाते हैं। इस प्रकार जीर्ण होने पर भी एक नई चेतना को संघ शक्ति के आधार पर जन्म देते हैं और ऐसे चुम्बकत्व का सृजन करते हैं जो उन शब्दों के साथ जुड़ी हुई चेतनाओं से मनुष्यों को प्रभावित कर सकें। यहाँ भी सहधर्मिता का नियम लागू होता है। जिन मनुष्यों के मस्तिष्क की स्थिति उन प्राचीन किन्तु संगठित शब्द कम्पन शक्ति से मिलती-जुलती होगी। असमानता की स्थिति में काई विचार या शब्द प्रभाव किसी को प्रभावित नहीं कर सकता केवल अपनी उपस्थिति का परिचय दे सकता है।
यों शरीर भी एक छोटा किन्तु पूरा विश्व है। इसमें सभी तीर्थों के बीज-पीठ विद्यमान हैं। इनमें से कोई एक अथवा एक साथ अनेक पीठों को जाग्रत एवं प्रखर बनाया जा सकता है। कोई-कोई व्यक्तित्व मूर्तिमान् शक्तिपीठ होते हैं। यही सिद्ध पुरुष मानवी चेतना में घुसा हुआ विजातीय तत्त्व है, उसे निकालने, हटाने में थोड़ा-सा ही प्रबल प्रयत्न सफल हो सकता है। साधना इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए है। साधना समर में यदि आत्म-तत्त्व बाजी ले गया तो फिर पौराणिक समुद्र मंथन में प्राप्त 14 रत्नों से भी अधिक मूल्य की अगणित दैवी सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं। उन्हें पाकर मनुष्य आप्तकाम हो जाता है फिर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। साधनाकाल दैवी-आसुरी संघर्षों की, तुमुल युद्ध की अवधि है। इसमें पूरे कौशल, चातुर्य एवं साहस का प्रयोग करना पड़ता है। यह युद्ध उपेक्षापूर्वक, ज्यों-त्यों करके, ढीले-पोले मन से बेगार भुगतने की तरह नहीं लड़ा जा सकता है। उसमें पूरे। मनोयोग एवं प्रबल पराक्रम की आवश्यकता पड़ती है।
साधना जब साधक का सर्वप्रिय विषय बन जाए-उसमें निरत रहने को स्वयमेव मन चले-उन क्षणों को घटाने की नहीं, बढ़ाने की ललक रहे-उपासना से उठने पर शरीर में स्फूर्ति और मन में सरसता लगे तो समझना चाहिए कि परिपक्वता आ गई और इसका श्रेयस्कर सत्परिणाम अत्यन्त सन्निकट है।
आत्मा का परमात्मसत्ता के साथ घनिष्ठ एकाकार-तादात्म्य-तन्मय होने की स्थिति को साधना की प्रखरता कहते हैं। जब दोनों का सघन मिलन होता है तो आत्म-विभोर स्थिति को समाधि कहा जाता है। आवश्यक नहीं कि उस स्थिति में योगनिद्रा अथवा मूर्छा ही आवे। ज्ञान-साधना में स्थितप्रज्ञ की-कर्म-साधना में अनासक्त कर्तव्य-परायण की, भक्ति साधना में व्यापक स्नेह सौजन्य की स्थिति प्राप्त होती है। इससे मूर्छा तो नहीं आती, पर आत्म-ज्ञान का आलोक एवं सन्तोष, समाधान का अनवरत अनुभव होता है। साधक अपने को भगवान में और भगवान को अपने में एकाकार देखता है। दोनों की इच्छाएँ एवं क्रियाएँ एक ही स्तर की होती हैं।
इन्द्रिय-संयम और मानसिक एकाग्रता की दोनों धाराएँ मिलकर मानवी विद्युत शक्ति का निमार्ण करती हैं। बिजली ठण्डे और गरम दो तारों के द्वारा प्रवाहित होती है। इसी प्रकार शरीर और मन की शक्तियों को वासना और तृष्णा में बिखरने न देने से वह सामर्थ्य जमा होती है, जिसे प्राण-शक्ति अथवा ओजस कहा जाता है। योगशास्त्र में साधना क्षेत्र के छात्रों को यह नियम बरतने का शारीरिक और मानसिक संयम बरतने की प्राथमिक तैयारी करने के लिए कहा गया है। यदि इन दोनों बड़े छेदों में होकर मानवी विद्युत नष्ट होती रहे, तो फिर मंत्र रूपी इंजन को चलाने के लिए तेल, कोयला, ईंधन कहाँ से आयेगा। मात्र शब्दोच्चारण का नाम हो तो मन्त्र साधना नहीं है।
उपार्जन काल में सात्विक आहार-विहार ब्रह्मचर्य, मौन, एकान्त सेवन, परिमार्जित दिनचर्या, मनन-चिंतन द्वारा साधना को सींचा जाता है। उसके उपरान्त उसे सस्ती प्रशंसा लूटने के लिए दिखाये जाने वाले चमत्कारों से बचाया जाता है। सिद्धियों को लोभ-मोह के उथले प्रयोजन पूरे करने में भी खर्च किया जा सकता है अपने को तथा दूसरों को आत्म-कल्याण की दिशा में प्रेरित करने के लिए भी उसका उपयोग हो सकता है। स्वल्प श्रम में अधिक भौतिक सफलताएँ पाना कर्म विज्ञान के विपरीत है। उसके लिए यदि मन्त्र शक्ति का प्रयोग किया जाएगा तो वह देर तक टिक न सकेगी और उसी खिलवाड़ में नष्ट हो जाएगी। हाँ, यदि आत्म-कल्याण के लिए उसका प्रयोग होगा तो उससे उसमें और भी तीव्रता आयेगी जैसे कि चाकू को पत्थर पर रगड़ने से उसकी धार तेज होती है और जंग छूटकर चमक आती है।
मन्त्र सिद्धि के लिए साधक के शरीर को पोषण देने वाली, उसका रक्त और ओजस बनाने वाली वस्तुओं का विशेष महत्व है। आहार से शरीर और विहार से मन परिपुष्ट होती है। पदार्थों में परिसंचालन शक्ति है जिसे स्वसंचालित शक्ति के सहारे गतिशील किया जा सकता है। कोयला, तेल और पानी में भाप बनाने की शक्ति है, पर वह आग एवं प्रयोक्ता की स्वसंचालित शक्ति के सहारे ही प्रकट हो सकती है। पदार्थों की शक्ति को भी साधनाकाल में प्रयोग किया जाता है। अनेक विधि-निषेध एवं वस्तु-प्रयोग इसी दृष्टि से बने हैं। किस मंत्र की सिद्धि के लिए किन पदार्थों से हवन किया जाए। आहार में क्या वस्तुएँ प्रयुक्त की जाएँ। पूजा के उपकरणों में किस स्तर को प्रधानता दी जाए-आदि की विधियाँ परिसंचालन शक्ति को स्वसंचालित शक्ति का साथ देने के लिए उभारने के लिए है। इंजन में भाप बनाने और उसे पहिये घुमाने में लगाने की प्रक्रिया इसी प्रकार सम्पन्न होती है।
हृदय को शिव और जिहृ को शक्ति कहते हैं। हृदय प्राण और जिहृ रयि है। हृदय को अग्नि, जिहृ को सोम कहते हैं। दोनों का समन्वय धन और ऋण विद्युत धाराओं के मिलने से जो शक्ति-प्रवाह उत्पन्न करता है, वही मन्त्र के चमत्कार रूप में देखा जा सकता है।
वाणी से उपासना करना पर्याप्त नहीं, उसे ‘वाक्’ बनाकर ही इस योग्य बनाया जा सकता है कि अध्यात्म पथ पर बढ़ते हुए साधक को कुछ कहने लायक सफलता मिल सके। आयुर्वेद में सोना, चाँदी, ताँबा, राँगा, अभ्रक, पारद आदि की भस्म बनाकर उनके सेवन का विधान है। विषों का भी बड़ा लाभ बताया गया है, पर वह सम्भव तभी होता है, जब उन विषों को विधानपूर्वक शुद्ध किया जाए। वाणी एक मूल पदार्थ है। शोधित होने पर वह अमृत बन जाति ह और विकृत होने पर विष का काम करती है। शोधित वाणी को ही ‘वाक्’ कहा गया है।
मन्त्र की शक्ति का विकास जप से होता है। जितनी अधिक घिसाई-पिसाई की जाती है उतनी ही पदार्थ की शक्ति उभरती है। ठेले को तोड़ते-तोड़ते उसे अणु की स्थिति में ले जाया जाए तो वह अणु ठेले की तुलना में अत्यधिक सामर्थ्यवान होगा। घोंटने और पीसने की प्रक्रिया बहुत समय तक चलते रहने पर ही आयुर्वेदिक दवाएँ गुणकारी होती है। बार-बार घिरने से गर्मी पैदा होती है। बार-बार रगड़ने से चमक उत्पन्न होती है। इस तथ्य को हर कोई जानता है। मन्त्र की शक्ति उसके क्रमबद्ध रूप से बहुत समय तक जप करने से उभरती है। अनुष्ठान एवं पुरश्चरण विज्ञान का यही रहस्य है।
मन्त्र की शक्ति का विकास जप से होता है। जितनी अधिक घिसाई-पिसाई की जाती है उतनी ही पदार्थ की शक्ति उभरती है। ठेले को तोड़ते-तोड़ते उसे अणु की स्थिति में ले जाया जाए तो वह अणु ठेले की तुलना में अत्यधिक सामर्थ्यवान होगा। घोंटने और पीसने की प्रक्रिया बहुत समय तक चलते रहने पर ही आयुर्वेदिक दवाएँ गुणकारी होती है। बार-बार घिसने से गर्मी पैदा होती है। बार-बार रगड़ने से चमक उत्पन्न होती है। इस तथ्य को हर कोई जानता है। मन्त्र की शक्ति उसके क्रमबद्ध रूप से बहुत समय तक जप करने से उभरती है। अनुष्ठान एवं पुरश्चरण विज्ञान का यही रहस्य है।
इन्द्र देवता की सहायता के लिए दशरथ जी अपना रथ लेकर गये थे। पहिया गड़बड़ाने लगा तो कैकेयी ने अपनी अंगुली लगाकर विपत्ति का समाधान किया था। ठीक इसी प्रकार एक और वर्णन यह मिलता है कि अर्जुन इन्द्र की सहायता करने गये थे, प्रसन्न होकर इन्द्र ने अर्जुन को उर्वशी का उपहार दिया था, जिसे उसने अस्वीकार कर दिया था। जहाँ मनुष्यों का आवागमन सम्भव हो सके, ऐसा स्वर्ग धरती पर ही हो सकता है। इन्द्र और चन्द्र देवताओं का गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या से छल करना धरती पर ही सम्भव है। दधीचि ने अपनी अस्थियाँ याचक देवताओं को प्रदान की थीं, आदि-आदि अगणित उपाख्यान ऐसे हैं जिसमें देवताओं और मनुष्यों के पारस्परिक घनिष्ठ सहयोग की चर्चा है। इन पर विवेचनात्मक दृष्टि से विचार करें तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि स्वर्ग कहीं भूमि पर होना चाहिए। यह क्षेत्र उत्तराखण्ड देवात्मा हिमालय का हृदय-क्षेत्र ही है।
सन् 1800 ई0! मारेन्गो युद्ध युद्ध !! की तलवार नेपोलियन के सिर पर झूल रही थी। वह हेलना में मृत्युशय्या पर पड़ा अपने अन्तिम क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था। उसकी महत्त्वाकाँक्षा अभी भी पहले की तरह पर्वत शिखरों की ऊँचाइयों को छू रही थी। स्टींगल उसके विश्वासपात्र सेनापतियों में से मुख्य था। वह धीर-वीर बलिष्ठ और रणनीति में कुशल तो था ही, साथ ही सूझा-बूझ का भी धनी था। नेपोलियन उसको अपने दाहिने हाथ के समान मानता था। उसने मारेन्गो के युद्ध की जिम्मेदारी सौंपते हुए उससे कहा-स्टींगल जल्दी करो आगे बढ़ो!” स्टींगल भी अपने स्वामी नेपोलियन की वीरता से प्रभावित था और उसका हृदय से सम्मान करता था। जब वह रणभूमि में जाने को उद्यत हुआ तो उसने श्रद्धा से नेपोलियन के हाथ चूमे और विनीत होकर बोला
“मेरी एक प्रार्थना है, स्वामिन्?”
“स्टींगल! हम तुम्हारी एक प्रार्थना तो क्या हजारों प्रार्थनाएँ सुनने को तैयार हैं, पर..... ।” “पर! ..... क्या स्वामी?”
“यही कि पहले तम हमारी ओर से युद्ध में विजयी बनकर लौट आओ।”
“युद्ध में निश्चित रूप से विजयी आपकी ही होगी। इस सत्य को तो कोई बदल नहीं सकता, मगर।”
“मगर क्या स्टींगल! साफ-साफ कहो, तुम आखिर क्या कहना चाहते हो ? “
“यही कि मैं युद्ध में तो विजयी रहूँगा, मगर वापस न लौट पाऊँ गा। आज आपसे यही आखिरी मुलाकात है।”
“नहीं, स्टींगल कदापि, नहीं। हम इसे कैसे मान लें ? तुमने तो हर बार मृत्यु पर विजयी पायी है।”
“आप ठीक कहते हैं श्रीमान।”
“फिर! आज तुम आखिर इतने निराश-हताश क्यों हो ?”
“स्वामी! बात सह है कि रात को मैंने स्वप्न देखा था कि मैं शत्रु के सैनिकों को खदेड़ता हुआ बढ़ रहा हूँ । मैं जैसे ही एक विशेष शत्रु, सेनाधिकारी का काम-तमाम करना चाहता था कि एक सैनिक, जो शरीर पर कवच और चेहरे पर नकाब धारण किए हुए था, सहसा मेरे सामने आ खड़ा हुआ। मैं जैसे ही उसे अपने भाले से छलनी करना चाहता था कि उसके शरीर से कवच और नकाब खुलकर धरती पर जा पड़े। वह हाथ में तलवार लिए मुझे साक्षात् अपनी मौत लगा। उसने एक व्यंगपूर्ण और भयंकर अट्टहास किया और निमिष भर में मेरा सिर धड़ से अलग कर दिया।”
स्टींगल जब अपनी बात कह चुका तो नेपोलियन मुसकराते हुए दासे क्षण उसे देखता रह, फिर बोला -”स्टींगल! स्वप्न भी कभी सच हुआ है ? उन स्वप्नों का न कोई सिर होता है न पैर! आदमी को स्वप्नों की बेहूदगी में नहीं बहना चाहिए। अपने मन से भय का भूत तुरन्त भगा दो और देखे गए स्वप्न को भी फौरन भूल जाओ। मत याद रखो कि तुमने स्वप्न में क्या देखा था और क्या नहीं।”
“श्रीमन्! आप तो जानते ही हैं कि मैं घोर से संकट पड़ने पर भी भयभीत नहीं होता पर इस स्वप्न को मैं जितना-जितना भुलाने का प्रयत्न करता हूँ, यह मुझे उतना ही यासद आ-आकर व्यथित करने लगता है इसे स्वप्न के माध्यम से मेरे अंतर्मन ने पूर्वाभास का अहसास पाया है।”
“स्टींगल! अब व्यर्थ की बातें छोड़ो और युद्धभूमि में जाकर कर्तव्य निभाओ । तुम अवश्य विजयी होगे। जाओ, हमारी हार्दिक शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं। ये पूर्वाभास आदि की बातें अन्धविश्वास के सिवाय कुछ भी नहीं।”
नेपोलियन की इस बात के उत्तर में स्टींगल ने उसे अदब से प्रणाम किया और उससे विदा लेकर घोड़े पर सवार रणभूमि में आ डटा। वह प्राण-पण से शत्रुओं से लोहा लेता रहा। उन्हें छठी का दूध याद दिलाता रहा। शत्रु दल उसकी वीरता को देखकर स्तब्ध था।
युद्ध जोरों से चल रहा था। भालों, किरचों, ढ़ालों और तलवारों की कर्णभेदी ध्वनियाँ आकाश तक गूँज रही थीं। खून की नदियाँ बहने लगी थीं। घायल ओर मरते हुए सैनिकों की चीखें तथा घोड़ों की हिनहिनाहटों ने वातावरण को और भी वीभत्स बना दिया था। चारों तरफ त्राहि-त्राहि का शोर मचा हुआ था।
संध्या होने पर नेपोलियन को जब स्टींगल की मृत्यु का शोकपूर्ण समाचार मिला, तो एक बार तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ। उसने तुरन्त स्टींगल के साथ लड़ रहे सैनिकों को बुलाया और पूछा-क्या तुम बता सकते हो कि स्टींगल की मृत्यु किन परिस्थितियों में, किस प्रकार हुई ?”
उसके इस प्रश्न के उत्तर में पास खड़े उन सैनिकों में से एक सैनिक बड़े अदब से आगे बढ़ आया और बताने लगा-स्वामी सेनापति स्टींगल की वीरता से भला कौन इनकार कर सकता था। उनकी वीरता के सामने वे सबके सब घुटने टेकते जा रहे थे। मारे भय के उन सबके रक्तिम मुखमण्डल देखते ही देखते पीले पड़ते चले गए थे। जब वे शत्रुओं से दृढ़तापूर्वक जूझ रहे थे, तो सहसा एक सैनिक शरीर पर कवच और चेहरे पर नकाब धारण किए उनके सामने न जाने कहाँ से आकर खड़ा हो गया। उसके खड़े होते ही हमारे सेनापति ठगे से रह गए ओर जोर से चीखकर कह उठे-यह वही है, ठीक वही! इसी बीच उस सैनिक का कवच तो शरीर से और नकाब चेहरे पर से अलग होकर नीचे धूल में गिर पड़े। सेनापति ने अपने भाले से उस सैनिक को छेदना चाहा, पर वे सफल न हो सके। उस सैनिक ने अपनी हार से बौखलाकर घात लगाकर सेनापति की गर्दन पर अवनी तलवार से एक भरपूर प्रहार किया, जिससे उनका सिर धड़ से अलग होकर रक्त से लथ-पथ हो धरती पर जा पड़।” “क्या यह सब कुछ तुमने अपनी आँखों से देखा था सैनिक ?” नेपोलियन ने पूछा।
“जी हाँ, स्वामिन्! वह दृश्य मैं कभी भी भूल नहीं सकता। अभी भी सेनापति स्टींगल ओर उस सैनिक का परस्पर द्वन्द्व-युद्ध मेरी आँखों के सामने चल-चित्र की तरह घूम रहा है।”
“उफ! यह सब कुछ कैसे हो गया ? “नेपोलियन के मुँह से हताशा भरा स्वर निकल पड़ा। स्टींगल के द्वारा बतायी स्वप्न की एक-एक बात अक्षरशः ठीक थी।
इस घटना से पूर्व नेपोलियन अतीन्द्रिय क्षमताओं, भविष्यवाणियों-पूर्वाभासों को बकवास बताकर उनकी खिल्ली उड़ाया करता था। परन्तु अब उसके अपने सेनापति स्टींगल की मृत्यु ने उसके अपने इन पूर्वाग्रहों को एक ही झटके में किसी कच्चे धागे के समान तोड़कर रख दिया। अब वह सोच रहा था, स्वप्नों में मिले पूर्वाभास सच भी हो सकते हैं।
यह संसार जड़ और चेतन के, सत और असत के सम्मिश्रण से बना है । देव ओर दानव दोनों यहाँ रहते हैं । देवत्व और असुरता के बीच सदा सत्त संघर्ष चलता रहता है। भगवान का प्रतिद्वन्द्वी शैतान भी अनादिकाल से अपना अस्तित्व बनाये हुये है। परस्पर विरोधी रात और दिन का, अन्धकार और प्रकाश का जोड़ा न जाने कब से जुड़ा चला आ रहा है। कपड़ा ताने और बाने से मिलकर बना है। यद्यपि दोनों की दिशा परस्पर विरोधी है। यहाँ जलाने वाली गर्मी भी बहुत है। शीतलता देने वाली बर्फ से भी पूरे ध्रुव प्रदेश और पर्वत शिखर लदे पड़े हैं। यहाँ न दुष्ट दुर्जनों की । पतन के गर्त में गिराने वाले तत्व अपनी पूरी साज सज्जा बनाये बैठे और अपने आकर्षण जाल में सारे संसार को जकड़ने के प्रयास में संलग्न है। दूसरी ओर उत्थान की प्रेरणा देने वाली उत्कृष्टता भी मर नहीं गई है। उसकी प्रकाश किरणों का आलोक भी सदा ही दीप्तिमान रहता है और असंख्यों को श्रेष्ठता की दिशा में चलने के लिये बलिष्ठ सहयोग प्रदान करता है। परस्पर विरोधी सत असत तत्वों का मिश्रण ही यह संसार है। भाप में जल की शीतलता और अग्नि की ऊष्मा का विचित्र संयोग हुआ है। यह संसार भाप से बने बादलों की तरह अपनी सत्ता बनाये बैठा है।
इस हाट में से क्या खरीदा जाय क्या नहीं यह निर्णय करना हर मनुष्य का अपना काम है। पतन या उत्थान में से किस मार्ग पर चलना है। यह फैसला करना पूरी तरह अपनी इच्छा ने मनुष्य पर विश्वास किया है। और इतनी स्वतन्त्रता दी है कि वह अपनी इच्छाशक्ति ज्ञान शक्ति और क्रियाशक्ति किसी भी दिशा में , किसी भी प्रयोजन के लिये उपयोग करें। इसमें किसी दूसरे का यहाँ तक कि परमेश्वर तक का कोई हस्तक्षेप नहीं है।
कर्म करने में मनुष्य पूर्ण स्वतन्त्र है पर परिणाम भुगतने के लिये वह नियोजक सत्ता के पराधीन है। हम विष पीने में पूर्ण स्वतन्त्र है। पर मृत्यु का परिणाम भुगतने से बचा जाना अपने हाथ में नहीं है। पढ़ना न पढ़ना विद्यार्थी के अपने हाथ में है। पर उत्तीर्ण होने न होने में उसे परीक्षकों के निर्णय पर आश्रित रहना पड़ता है । कर्मफल की पराधीनता न रही होती तो फिर कोई सत्कर्म करने के झंझट में पड़ना स्वीकार ही न करता दुष्कर्मों के दण्ड से बचना भी अपने हाथ में होता तो फिर कुकर्मों में निरत रहकर अधिकाधिक लाभ लूटने से कोई भी अपना हाथ न रोकता।
अदूरदर्शी इसी भूल भुलैयों में भटकते देखे जाते हैं। वे तत्काल का लाभ देखते हैं और दूरगामी परिणाम की ओर से आँख बन्द किये रहते हैं। आटे के लोभ में गला फँसाने वाली मछली और दाने के लालच में जाल पर टूट पड़ने वाले पक्षी अपनी आरम्भिक जल्दबाजी पर प्राण गँवाते समय तक पश्चाताप करते हैं। आलसी किसान और आवारा विद्यार्थी आरम्भ में मौज करते हैं पर जब असफलताजन्य कष्ट भुगतना पड़ता है तो पता चलता है कि वह अदूरदर्शिता कितनी महँगी पड़ी। व्यसन व्याभिचार में ग्रस्त मनुष्य भविष्य के दुष्परिणाम को नहीं देखते । अपव्यय आरम्भ में सुखद और अन्त में कष्टप्रद होता है। यह समझ यदि समय रहते उपज पड़े तो फिर अपने समय धन आदि को बर्बाद करने में किसी को उत्साह न हो। दुष्कर्म करने वाले अनाचारी लोग भविष्य में सामने आने वाले दुष्परिणामों की कल्पना ठीक तरह नहीं कर पाते और कुमार्ग पर चलते रहते हैं सिर धुनकर तब पछताना पड़ता है जब दण्ड व्यवस्था सिर पर बेहिसाब बरसती और नस नस को तोड़कर रखती है।
वस्तुस्थिति का सही मूल्याँकन कर सकना कर्म के प्रतिफल का गम्भीरतापूर्वक निष्कर्ष निकालना उचित अनुचित के सम्मिश्रण में से जो श्रेयस्कर है उसी को अपनाना यह विवेक बुद्धि का काम है। मोटी अकल इन प्रसंगों में बेतरह असफल होती है। अवांछनीयता में रहने वाला आकर्षण सामान्य चिन्तन को ऐसे व्यामोह में डाल देता है कि उसे तात्कालिक लाभ को छोड़ने का साहस ही नहीं होता, भले ही पीछे प्रतिफल कुछ भी क्यों न भुगतना पड़े । इसी व्यामोह में ग्रस्त होकर अधिकतर लोग आलस्य प्रमाद से लेकर व्यसन व्यभिचार तक और क्रूर कुकर्मों की परिधि तक बढ़त चल जाते है। इन्द्रिय लिप्सा में ग्रस्त होकर लोग अपना स्वास्थ्य चौपट करते हैं । वासना तृष्णा के गुलाम किस प्रकार बहुमूल्य जीवन की निरर्थक गतिविधियों में जीवन गँवाते हैं यह प्रत्यक्ष है। आन्तरिक दोष दुर्गुणों, शट्रिपुओं को अपनाए रहकर व्यक्ति किस प्रकार खोखला होता चला जाता है इसका प्रमाण आत्म समीक्षा करके हम स्वयं ही पा सकते हैं।
अनर्थमूलक भ्रम जंजाल से निकालकर श्रेयस्कर दिशा देने की क्षमता केवल विवेक में ही होती है। वह जिसके पास मौजूद है समझना चाहिये कि उसी के लिये औचित्य अपनाना सम्भव होगा और वहीं कुछ महत्वपूर्ण कार्य कर सकने में समर्थ होगा। विवेकशीलता की कमी अन्य किसी गुण से पूरी नहीं हो सकती । अन्य गुण कितनी ही बड़ी मात्रा में क्यों न हो पर यदि विवेक का अभाव है तो वह सही दिशा का चुनाव न कर सकेगा। दिग्भ्रान्त मनुष्य कितना ही श्रम क्यों न करे अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सकना उसके लिये सम्भव ही न होगा।
विवेकशीलता को ही सत्य की प्राप्ति का एकमात्र साधन कहा जा सकता है। सत्य को नारायण कहा गया है। भगवान का सर्वाधिक सारगर्भित नाम सत्यनारायण है। यथार्थता के हम जितने अधिक निकट पहुँचते है भगवान के सान्निध्य का उनके दर्शन का उतना ही लाभ लेते हैं। हीरा पेड़ों पर फूल की तरह लटका नहीं मिलता। वह कोयले की गहरी खदानें खोदकर निकालना पड़ता है। सत्य किसी को अनायास ही नहीं मिल जाता है । उसे विवेक की कुदालों से खोदकर निकालना पड़ता है। दूध और पानी के अलग कर देने की आदत हंस में बताई जाती है। इस कथन में तो अलंकार मात्र है पर यह सत्य है कि विवेक रूपी हंसवृत्ति उचित और अनुचित के चालू सम्मिश्रण में से यथार्थता को ढूँढ़ निकालती है और उस पर चढ़े हुये कलेवर को उतार फेंकती है।
शरीर की आन्तरिक स्थिति का सामान्यतः कुछ भी पता नहीं चलता पर रक्त एक्सरे मल मूत्र आदि के परीक्षण से उसे जाना जाता है । सत्य और असत्य का विश्लेषण करने के लिये विवेक ही एक मात्र परीक्षा का आधार है मात्र मान्यताओं, परम्पराओं, शास्त्रीय आप्त वचनों से वस्तुस्थिति को जान सकना अशक्य हैं। धर्मक्षेत्र का पर्यवेक्षण किया जाय तो पता चलता है कि संसार में हजारों धर्म सम्प्रदाय मत मतान्तर प्रचलित है। उनकी मान्यताएँ एवं परम्परायें एक दूसरे के सर्वथा विपरीत है। नैतिकता रूप से वे जरूर सहमत होते हैं, बाकी सृष्टि के इतिहास से लेकर ईश्वर की आकृति प्रकृति अन्तः उपासना तक के सभी प्रतिपादनों में घोर मतभेद है। प्रथा परम्पराओं के सम्बन्ध में कोई तालमेल नहीं। ऐसी दशा में किस शास्त्र को किस अवतार को सही माना जाय यह निर्णय नहीं हो सकता।
प्रत्येक सम्प्रदाय के अनुयायी अपने मार्गदर्शक के प्रतिपादनों पर इतना कट्टर विश्वास करते हैं कि उनमें से किसी को झुठलाना उनके अनुयायियों को मर्मान्तक पीड़ा पहुँचाने के बराबर है। सभी मत वादी अपनी मान्यताओं का अपने अपने ढंग से ऐसा प्रतिपादन करते हैं कि मानों उनका विश्वास ही एक मात्र सत्य है । इसका अर्थ हुआ कि अन्य मतावलम्बी झूठे है। जिस एक को सत्य माना जाय, वह भी अन्यों की दृष्टि में झूठा है। फिर परस्पर घोर विपरीतता लिये हुये प्रतिपादनों में से किसी को भी सत्य ठहराते नहीं बनता। वह कहानी उपहासास्पद है जिसमें अन्धों ने हाथी के कई अंगों को पकड़कर उसका वर्णन अपने अनुभवों के आधार पर किया था। इस कहानी में यह बात नहीं है कि एक ही कान को पकड़कर हर अन्धे ने उसे अलग अलग प्रकार का बताया था। यहाँ तो यही होता देखा जा सकता है पशुबलि को ही ले एक सम्प्रदाय का तो उसके बिना धर्म कर्म सम्पन्न ही नहीं होता दूसरा जीव हिंसा को धर्म के घोर विपरीत मानता है। दोनों ही अपनी अपनी मान्यताओं पर कट्टर है एक वर्ग ईश्वर को साकार बताता है दूसरा निराकार। अपने अपने पक्ष की कट्टरता के कारण अब तक असंख्यों बार रक्त की नदियाँ बहती रही है और विपक्षी को धर्मद्रोही बताकर सिर काटने में ईश्वर की प्रसन्नता मानी जाती रही है।
समाधान जब कभी निकलेगा तब विवेक की कसौटी का सहारा लेने पर ही निकलेगा। अन्य सभी क्षेत्रों की तरह धर्मक्षेत्र में भी असली नकली का समन्वय बेतरह भरा हैं किस धर्म की मान्यताओं में कितना अंश बुद्धि संगत है यह देखते हुये यदि खिले हुये फूल चुन लिये जाये तो एक सुन्दर गुलदस्ता बन सकता है। बिना दुराग्रह के यदि सार संग्रह की दृष्टि लेकर चला जाये और प्राचीन नवीन का भेद न किया जाय तो आज की स्थिति में जो उपयुक्त है उसे सर्वसाधारण के लिये प्रस्तुत किया जा सकेगा। वही सामयिक एवं सर्वोपयोगी धर्म हो सकेगा। ऐसे सार संग्रह में विवेक को तर्क तथ्य को ही प्रामाणिक मानकर चलना पड़ेगा ।
देश काल पात्र के अनुसार विधानों में परिवर्तन होता रहता है। भारत जैसे अन्य बहुत से देशों में शाकाहार ही मान्य है पर उत्तरी ध्रुव के निवासी एस्किमो अन्न कहाँ पायें? उन्हें तो माँसाहार पर ही जीवित रहना है। सर्दी और गर्मी में एक जैसे वस्त्र नहीं पहने जा सकते। पहलवान ओर मरीज की खुराक एक जैसी नहीं हो सकती । देश काल पात्र की भिन्नता से बदलती हुई परिस्थितियाँ विधि व्यवस्था बदलती रहती है। स्मृतियाँ इसी कारण समय समय पर नये ऋषियों द्वारा नई बदलती रही है। इनमें परस्पर भारी मतभेद है। यह मतभेद सत्य की दिशा में बढ़ते हुये कदमों ने उत्पन्न किये है आज जो सत्य समझ जाता है वही भविष्य में भी समझा जायेगा, ऐसा मानकर नहीं चलना चाहिये क्रमिक विकास की दिशा में बढ़ते हुये हमारे कदम अनेकों प्राचीन मान्यताओं को झुठला चुके है। सत्यान्वेषी दृष्टि बिना किसी संकोच और दुराग्रह के सत्य को स्वीकार करने के लिये तैयार रही है। यदि ऐसा न होता तो विज्ञान के क्षेत्र में प्रचलित मान्यताओं को समर्थन न मिला होता। प्राचीनकाल के वैज्ञानिकों की मान्यताओं और आज की मान्यताओं में जमीन आसमान जितना अन्तर है। फिर भी भूतकाल के मनीषियों की कोई अवज्ञा नहीं करता।
मान्यताओं प्रथाओं का प्रचलन समय के अनुरूप निर्धारित किया और बदला जाता रहा है। जब कृषि योग्य भूमि बहुत और जनसंख्या कम थी, हिंस्र पशुओं और जन्तुओं का जोर था तब अधिक उत्पादन और अधिक सुरक्षा की दृष्टि से बहु पत्नी प्रथा प्रचलित हुई थी और बहुत बच्चे उत्पन्न होना सौभाग्य का चिन्ह था।
आज उत्पादन की कमी, जनसंख्या की वृद्धि को देखते हुये सन्तानोत्पादन को समाज द्रोह जैसा अपराध गिना जाता है तो ठीक ही है प्राचीनकाल की मान्यताओं की इस समय दुहाई देना प्रतिगामी नीति अपनाने की तरह है। कभी धनुष बाण ही सबसे बड़ा अस्त्र था। मशीनगनें विषैली गैस और भयानक बमों की तुलना में धनुष बाण संभालने से क्या बनेगा। सुन्दर स्त्रियों का अपहरण करने के लिये लालायित फिरने वाले यवन शासकों से लड़कियों की शील रक्षा के लिये पर्दा प्रथा और बाल विवाह का प्रचलन किया गया था आज वैसी कठिनाई नहीं रही तो उन प्रथाओं की लकीर पीटने में धर्म का डंका क्यों बजाया जाय। जो अपरिवर्तनशील, शाश्वत,सनातन एवं सुस्थिर है वह इस संसार में एक ही है विवेक। विवेक के आधार पर और सब कुछ तो बदला जा सकता है पर वह स्वयं सदा सर्वदा एकरस यथा स्थान बना रहता है। इसलिये उसे सत्य का प्राण एवं भगवान का प्रतीक प्रतिनिधि कहा गया है।
शास्त्रों में उल्लेख आता है कि एक बार देवताओं ने प्रजापति ब्रह्मा के पास जाकर प्रश्न किया कि पितामह! टाप कहते हैं कि गायत्री उपासना करने वालों के सब साँसारिक कष्ट दूर हो जाते हैं तथा उसे लोक परलोक में सुख शान्ति तथा सद्गति मुक्ति प्राप्त होती है पर आपने यह नहीं बताया कि इस प्रकार की महान सामर्थ्य वाली सत्ता कौन है?
इसके उत्तर में प्रजापति कहते हैं -हे देवताओं ! यह जो अनेक प्रकार के अनुदान वरदान देने वाली गायत्री महाशक्ति है उसे तत सावित्री अर्थात् सविता देवता से उद्भासित होने वाला ज्ञान जानों। संक्षेप में वहाँ सृष्टि विज्ञान की भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही प्रक्रियाओं का स्पष्ट संकेत किया गया है। और भी शास्त्रों में कई स्थानों पर ऐसा उल्लेख आता है कि गायत्री प्रकाश तेज अग्नि और शक्ति रूप है । तीनों काल उसी की शक्ति से गतिशील है। इस महाशक्ति के सम्बन्ध में कहा गया है।
स्विता सर्वभूतानाँ सर्वभावाष्च सूयत। सर्वनात्प्रेरणाच्चैव सविता तेन चोत्यते॥
अर्थात् समस्त तत्वों सभी प्राणियों और समस्त भावनाओं की प्रेरणा देने के कारण ही उस शक्ति को सविता कहा गया है। प्रतीक रूप में सविता देवता की प्रतिमा को सूर्य माना गया है। यह सविता देवता का स्थूल प्रतीक है। सविता उससे भी सूक्ष्म है। उसकी शक्ति सामर्थ्य और विशेषताओं को समझने के लिये सूर्य के सम्बन्ध में जान समझ लेना आवश्यक होगा। सर्वविदित है कि सूर्य ही तत्व रूप से सम्पूर्ण भौतिक और जागतिक पदार्थों की गति तथा सक्रियता का कारण है। उस प्रतीक में सविता देवता के भावना रूप और प्राण रूप होने की भावना भी स्थापित की गयी है और बताया गया है कि वहीं सम्पूर्ण प्राणियों एवं मनुष्यों को शक्ति प्राण और प्रकाश देकर भावनात्मक विकास में सहायक होती है। इस सम्बन्ध में कुछ अधिक जानने विश्लेषण करने का प्रयत्न नहीं किया गया अन्यथा प्रतीत होता कि ऋषियों और तत्वदर्शियों की यह गवेषणाएं पूर्ण वैज्ञानिक एवं सत्य है। जा बातें उन्होंने लाखों वर्श लिख दी थी, विज्ञान भी आज उनकी सत्यता की साक्षी देने लगा है।
सविता देवता के स्थूल भाग का बहुत थोड़ा भाग ही वैज्ञानिक अभी जान पाये है पर जो कुछ जाना जा सका है। वह भी भारतीय मान्यताओं के प्रतिपादन की दृष्टि से कम नहीं है। स्थूल दृष्टि से सूर्य आग का एक विराट तप्त गोला दिखाई देता है। अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों के अनुसार नदी के तेज प्रवाह में जिस प्रकार भंवर पड़ते हैं उसी प्रकार सूर्य के गरम द्रव्य में भी तेज भंवर पड़ते हैं ओर उससे हजारों मील लम्बी आग की लपटें सोलर फ्लेयर्स उठती है सूर्य के उसी प्रकाश पुँज से पृथ्वी में जीवित प्राणियों व वनस्पतियों को जीवित रहने के लिये आवश्यक ऊर्जा प्राप्त होती है तथा पृथ्वी के अतिरिक्त अन्य ग्रह गोलकों का वातावरण व परिस्थितियाँ विनिर्मित होती है।
धरती ही नहीं पूरे सौरमण्डल में जिस किसी भी ग्रह नक्षत्र पर जीवन का अस्तित्व है सूर्य ही उसका आधार है। सभी प्राणी सूर्य से ही शक्ति ग्रहण करते हैं और उससे प्राप्त उस ऊष्मा के बल पर ही जीवन जीते हैं। जिस ताप क्रम पर मनुष्य तथा अन्य जीव जन्तु रहते हैं वह सूर्य के कारण ही स्थिर और सन्तुलित रहता है। प्राचीन ऋषियों ने इसलिये सूर्य को जीवन दाता और सृष्टि का प्राण कहा है वैदिक ऋषि का स्पष्ट उद्घोषक है सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुशष्च अर्थात् सूर्य समस्त संसार की जड़ चेतन वस्तुओं की आत्मा है। इस सम्बन्ध में छान्दोग्योपनिषद् 3-19-3 का कथन है आदित्यो ब्रहोत्यादेषस्स्यों पव्याख्यानम सदेवेदमग्र आसीत अर्थात् भू से द्यु तीनों लोकों को अपनी रश्मियों से जीवन देने वाले सूर्य सबकी आत्मा है। जीवनदाता और सृष्टि का प्राण सूर्य वैज्ञानिकों के अनुसार आकाश में दिखाई देने वाले असंख्य तारों में से एक है।
यों आकाश में असंख्य ग्रह नक्षत्र है और वे सभी अपनी न्यूक्लियर एनर्जी नाभिकीय ऊर्जा का सृजन अपने आप करते हैं पर मूल रूप में वे सब अपने अपने सूर्य की ऊर्जा पर जीवित है। अपने सौरमण्डल का सूर्य प्रति सेकेण्ड चार सो ट्रिलियन ऊर्जा गर्मी प्रकाश और विद्युत फेंकता रहता है। इसके भीतरी भाग का ताप दो करोड़ डिग्री सेंटीग्रेड है। सूर्य के मध्यभाग में केवल नाभिक कण होते हैं और उनमें इतनी तीव्र हलचल मची रहती है कि उसकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती। स्वरूप समझने के लिये कहा जा सकता है कि बाढ़ आने पर जब तेज बहते नदी के पानी में जिस प्रकार भंवर पड़ते हैं और वहाँ के पानी में जैसा मंथन होता रहता है कुछ उसी प्रकार का मंथन सूर्य के इस भाग में केवल नाभिक कण ही होते हैं ,इन पर किसी प्रकार का आवरण नहीं होता । न्यूट्रान इलेक्ट्रानों को भगाते रहते है और स्वयं प्रोट्रान अथवा धन विद्युत के आवेश में बदलते रहते हैं। इसी से द्रव्य का रूपान्तर होता है अर्थात् हाइड्रोजन हीलियम में बदलता रहता है और उससे ऊर्जा सृष्टि का संचालन करती रहती है।
इस शक्ति का हजारवाँ भाग ही पृथ्वी के प्राणियों की जीवनी शक्ति सुदृढ़ बनाने तथा पोषण करते रहने के काम आता है शेष भाग से पृथ्वी की विभिन्न गतिविधियों तथा मौसम नदियों का प्रवाह पहाड़ों की स्थिरता समुद्र और वर्षा आदि का नियंत्रण होता है। पृथ्वी पर सूर्य की किरणें एक समान नहीं पड़ती, इसलिये मौसम भी पृथ्वी के भिन्न भिन्न भागों पर भिन्न भिन्न तरह का होता है। यथा जून के महीने में उत्तरी ध्रुव सूर्य की ओर झुका होता है। उस समय उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्म ऋतु होती है। उत्तरी ध्रुव सूर्य की ओर झुका रहता है। इसलिये दिन रात की तुलना में अधिक लम्बे होते हैं। उत्तरी ध्रुव के निकट तो उन दिनों दिन चौबीस घण्टे तक का होता है। इसके विपरीत इन्हीं दिनों दक्षिणी ध्रुव में सदियों का मौसम होता है क्योंकि वह उत्तरी ध्रुव से एकदम विपरीत दिशा में होता है। दक्षिणी ध्रुव सूर्य से परे होने के कारण वहाँ के दिन रात की तुलना में काफी छोटे होते हैं और कई बार तो रातें चौबीस घण्टे लम्बी होती है। इस अवधि में सूर्य की किरणें उत्तरी गोलार्द्ध की सतह पर सीधी पड़ती है विशेषकर कर्क रेखा पर लम्बवत रूप में पड़ती हैं। मकर रेखा पर उन दिनों सूर्य की किरणें सीधे न पड़कर कोण बनाती हुई पड़ती है इससे वहाँ पर उनका ताप कम मात्रा में पहुँचती है 22 दिसम्बर को उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मियाँ होती है इन दिनों उत्तरी ध्रुव सूर्य से हटा होता है और इस कारण उत्तरी गोलार्द्ध के दिन छोटे होते हैं तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बड़े । इन दिनों दक्षिण गोलार्द्ध में मकर रेखा पर सूर्य की किरणें लम्बवत रूप में पड़ती है और उत्तर में कर्क रेखा पर कोण बनाती है। मार्च के महीने में उत्तरी गोलार्द्ध पर वसन्त ऋतु होती है। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव दोनों ही सूर्य की ओर रात हर स्थान पर प्रायः बराबर होते हैं। इसी प्रकार पृथ्वी के झुकाव और गति के कारण जब जहाँ जिस स्थान पर सूर्य की किरणें जिस रूप में पहुँचती है उसी के अनुसार मौसम बदलता रहता है।
मौसम ही नहीं पृथ्वी पर पायी और उपयोग में लाई जाने वाली विभिन्न शक्तियों का स्त्रोत भी सूर्य ही धरती पर धूप कोयला, लकड़ी या ईंधन पेट्रोलियम पदार्थ, पानी, वायु, विद्युत आदि ऊर्जा के जितने भी रूपान्तर है उन सभी का स्त्रोत सूर्य ही है । इस संदर्भ में पूर्व सोवियत रूस के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. जी. ए. उषाकोव ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में कुछ नये तथ्य प्रतिपादित किये है। उनका कहना है कि जीवन का आधार माने जाने वाली आक्सीजन वायु तक पृथ्वी की अपनी उपज अथवा संपत्ति नहीं है। यह सूर्य से प्राण रूप में प्रवाहित होती हुई चली आती है और धरती के वातावरण में यहाँ की तात्त्विक प्रक्रिया के साथ सम्मिश्रित होकर प्रस्तुत आक्सीजन बन जाती है यदि सूर्य अपने उस प्राण प्रवाह में कटौती कर दे अथवा पृथ्वी ही किसी कारण उसे ठीक तरह ग्रहण न कर सके तो आक्सीजन की न्यूनता के कारण धरती का जीवन संकट में पड़ जायेगा। पृथ्वी से 62 मील ऊँचाई प्राण का आक्सीजन रूप में परिवर्तन आरम्भ होता है यह आक्सीजन बादलों की तरह चाहे जहाँ नहीं बरसता रहता वरन् वह भी सीधे उत्तरी ध्रुव पर आता है और फिर दक्षिणी ध्रुव पर आता है और फिर दक्षिणी ध्रुव के माध्यम से समस्त विश्व में वितरित होता है। ध्रुव प्रभा में रंग बिरंगी झिलमिल का दीखना विद्युत मण्डल के साथ आक्सीजन की उपस्थिति का प्रमाण है।
खगोल विद्या की नवीनतम शोधों से भी अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि सूर्य से ध्रुव प्रदेशों पर बरसने वाले गति प्रवाह अत्यन्त प्रभावशाली व सामर्थ्य वान होते हैं और उनमें प्राणियों तथा पदार्थों को प्रभावित करने की प्रचण्ड क्षमता होती है। यह तथ्य उस ऋषि वाक् की पुष्टि करते हैं जिसमें कहा गया है कि सविता वै प्रसवानामीषे अर्थात् सबको उत्पन्न करने वाला परमेश्वर सविता देवता सूर्य ही है। सूर्य से उत्सर्जित होने वाली प्रचण्ड शक्ति अपने प्रभाव समेत पदार्थों में भी समासीन हो जाती है। यही कारण है कि स्वास्थ्य संरक्षण के लिये सूर्य प्रकाश के सान्निध्य में अधिकाधिक रहना आवश्यक माना गया है। विभिन्न शोध अनुसंधानों से अब यह प्रमाणित हो गया है कि स्वस्थ रहने के लिये सूर्य का प्रकाश भोजन और जल से भी अधिक आवश्यक है । शरीर को पर्याप्त धूप मिलने से रक्त में लाल कणों की मात्रा आवश्यक रूप से संरक्षित रहने लगती है। यदि ऐसा न हो सूर्य का प्रकाश न मिले तो यह मात्रा घटने लगती है और उनमें जलतव बढ़ने लगता है। फलस्वरूप रक्ताल्पता तथा रक्त सम्बन्धी अन्यान्य विकार पैदा होने लगते हैं। जीवधारियों का जीवन सूर्य प्रकाश से कितने घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध रहता है, इसका एक उदाहरण पेड़ पौधे भी हो सकते हैं। यदि किसी पौधे को सूर्य के प्रकाश से वंचित कर दिया जाय तो प्रकाश संश्लेषण के अभाव में उसकी जैविक क्रिया मंद पड़ जाती है और वह क्षीण तथा म्लान होने लगता है। इस सम्बन्ध में किये गये अध्ययन अनुसंधानों के अनुसार घिचपिच रूप से बसे शहर की सघन गलियों और संकरे प्रकाश रहित स्थानों में खुले स्थानों की अपेक्षा अधिक लोग बीमार पड़ते हैं तथा अल्पायु में ही काल कवलित हो जाते हैं।
ठस संदर्भ में अमेरिका क मूर्धन्य वैज्ञानिक डा. नील बर्नहाट ने वर्शा गहन शोध के बाद निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुये बताया है कि सूर्य के प्रकाश से मनुष्य शरीर का विद्युतीकरण होता रहता है । उनके अनुसार सूर्य की शक्तिवर्धक किरणों के संपर्क में आकर मनुष्य के शरीर में एक विद्युतमय चुम्बकीय प्रवाह बहने लगते हैं। पृथ्वी तो स्वयं एक महाचुम्बकत्व है ही।
शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले सूर्य शक्ति के प्रभाव के अतिरिक्त मनुष्य के व्यक्तित्व पर भी उसका असाधारण प्रभाव पड़ता है। कहा जा चुका है कि सूर्यलोक से जो शक्ति अपनी जिस प्रचण्डता के साथ पृथ्वी पर आती है उसी प्रचण्ड प्रभाव के साथ प्राणियों में समाहित हो जाती है मन में भी वही शक्ति होने के कारण मनुष्य प्रत्येक पदार्थ के अंतरंग से संपर्क स्थापित कर सकने और सूक्ष्म रूप में किसी भी पदार्थ की शक्ति को प्रवाहित कर लेने में सक्षम है । इस विज्ञान को पहुँचे हुये योगों जानते और उसका उपयोग करते हैं । इसी कारण उनके कितने ही क्रिया कलाप चमत्कार जैसे लगते हैं। अब जबकि पदार्थ में शक्ति की प्रचण्डता और अस्तित्व को विज्ञान ने भी स्वीकार कर लिया है तो यह सिद्धियाँ यांत्रिक रूप से भी ग्रहण की जा सकती है पर उनके मनोगत चमत्कार तो योग और साधना उपासना पद्धति से ही प्राप्त हो सकते हैं।
योगीजन साधना उपासना द्वारा सविता देवता से सूर्य की सूक्ष्म शक्ति से मानसिक सम्बन्ध स्थापित करते हैं और वे ऋद्धि सिद्धियाँ प्राप्त करते हैं जा लोगों को चमत्कार जैसी प्रतीत होती है लेकिन उनका आधार वैज्ञानिक ही होता है । जिस तरह अब दैनिक सौर ऊर्जा का दोहन फोटो वोल्टिक यंत्र उपकरणों के माध्यम से ऊर्जा आपूर्ति में करने लगे है ठीक उसी तरह गायत्री उपासक व योगीजन सविता देवता की शक्ति का अवशोषण व उपयोग आत्मोत्कर्ष एवं जनकल्याण में करते हैं यद्यपि यह प्रक्रिया से भिन्न है। इसे कुण्डलिनी जागरण कहा जाता है। गायत्री उपासना द्वारा सविता शक्ति का काया में अवगाहन धारण और विकास कर यह प्रयोजन पूरा किया जाता है इससे आरोग्य ओजस तेजस का और बुद्धि का विकास तो होता ही है उन अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास भी होता है जिन्हें लोग आश्चर्य अथवा ईश्वरीय अनुकम्पा मानते हैं गायत्री उपासना में गायत्री महामंत्र के जप व ध्यान द्वारा मन का सम्बन्ध सविता लोक से स्थापित किया जाता है तथा उसकी चमत्कारी क्षमताओं क्षमताओं का लाभ उठाया जाता है ध्यान की अवस्था में जब सविता के प्राण-प्रवाह से अपने मस्तिष्क मध्य स्थित ब्रह्मरंध्र का सम्बन्ध जुड़ जाता है तो उसकी शक्ति शरीर के कण कण में प्रविष्ट होती हुई चली जाती है और अपना प्राण शरीर विकसित होता हुआ सूर्य प्रकाश के समान हल्का दिव्य तेजस्वी होता चला जाता है यदि इस तथ्य को समझा और अपनाया जा सके तो हर कोई दिव्य क्षमताओं का स्वामी बन सकता है।
तक्षशिला से कुछ मील दूर एक विशाल शिलाखंड पर कुछ दिगम्बर साधु साधना में तल्लीन थे । ज्येष्ठ मास की तीव्र उष्णता से सारा पृथ्वी मण्डल लावा बना हुआ था। सूर्य की प्रखरता में प्रत्येक पदार्थ झुलस तथा मुरझाया प्रतीत होता था । फिर भी तवे सी तपती उस शिला पर वे नग्न दिगम्बर साधु निर्विकार भाव से बैठे आत्मचिंतन में लीन थे । तभी तक्षशिला के शासक आँभी तथा अरस्तू के प्रमुख शिष्य ओनेसिक्राइट्स जो सिकन्दर के भारत आक्रमण के समय उसके साथ पधारे थे, इन मुनियों के साथ भारतीय दर्शन की गहराइयों की चर्चा करना चाहते थे । साधू जनों को नंगे बदन बैठा देखकर उसने साथ खड़े दुभाषिये से पुछवाया क्या इस प्रकार जंगल में बैठकर कष्ट क्यों सा उत्तम कोटि का वस्त्र इन्हें दे सकते हैं। दुभाषिये ने प्रश्न का उत्तर यूनानी में अनूदित करते हुये कहा इस देश में किसी भी वस्तु की कमी नहीं है त्याग से ही मुक्ति है भोग से तो संसार बँधता है।
यूनानी दार्शनिक को यह सिद्धान्त न रुचा । उसने पाश्चात्य दर्शन एवं अरस्तू के भौतिक सिद्धान्तों की जो खोलकर विवेचना की और उन्हें प्रलोभन दिया कि विश्वविजेता सिकन्दर तुम्हारे ऊपर विशेष कृपालु है इसका लाभ उठाये ।
तुम्हें यूनान ले चलेंगे। जहाँ तुम्हारे ज्ञान विज्ञान की वृद्धि होगी। पर वीतरागी दिगम्बर मुनि प्रलोभन से परे थे। इसी माया जाल से बचने के लिये ही तो उन्होंने यह वेष धारण किया था वे मौन हो गये। यूनानी दार्शनिक जैसे ही सदल बल वापस होने लगा। आनन्द नाम एक मुनि ने उच्च स्वर में कहा ठहरो में चलूँगा तुम्हारे साथ! ओनेसिक्राइट्स की अपनी विजय बाछें खिल उठी पर आनन्द मुनि का एक प्रधान साधु ने इतने दिनों की साधना एवं तपस्या नष्ट भ्रष्ट कर म्लेच्छों के साथ जाने का विरोध किया। किन्तु आनन्द मुनि में लोककल्याण की प्रवृत्ति प्रबल थी । उन्होंने विनम्रतापूर्वक उन वृद्ध संन्यासी से निवेदन किया कि जब तक विभिन्न दर्शनों का तुलनात्मक अध्ययन न होगा, सच्चा ज्ञान प्राप्त करना दुर्लभ है अतः आज्ञा प्रदान करें । वृद्ध संन्यासी उत्तर में मौन हो गये।
आनन्द मुनि जिसे कैलानोस नाम से यूनान में जाना जाने लगा था। कैलानोस के यूनान जाने से यूनानी दर्शन पर भारतीय चिन्तन का प्रभाव स्पष्ट झलकने लगा।भारतीय चिन्तन की दार्शनिक प्रवृत्तियाँ यूनानी जन जीवन पर सर करने लगी। आनन्द मुनि के शिक्षण का तरीका बहुत मोहक था । वे अत्यन्त सरल तरीके से गूढ़तम रहस्यों का बोध करा देते। एक दिन वह भारी भीड़ के सामने प्रवचन कर रहे थे। तभी भीड़ के सामने प्रवचन कर रहे थे। तभी उन्होंने सुना कि सिकन्दर ने पाँच बेगुनाह लोगों को राजद्रोह के अपराध में प्राणदण्ड की आज्ञा दी है तो वह बिलबिला उठे। उनकी आत्मा उन पाँचों प्राणियों को बचाने के लिये छटपटाने लगे जीव दया से उनका हृदय हो उठा।
उन्होंने अपने मित्र ओनेसिक्राइट्स से अपनी हार्दिक वेदना कह सुनायी । ओनेसिक्राइट्स सिकन्दर की बर्बरता एवं कठोरता को अच्छी तरह समझता था। वह जानता था कि सिकन्दर की आज्ञा के विरुद्ध कुछ कर पाना सूर्य को पूर्व से पश्चिम में उगवाना है । फिर भी वह करना चाहता था। अतः उसने सिकन्दर से निवेदन की सलाह दी। तभी सहसा बिगुल बज उठा और लोग राजदरबार में इकट्ठे होने लगे। दोनों दार्शनिक भी वहाँ पहुँच। वहाँ खम्भों से बंधे उन पाँचों आदमियों को देखकर आनन्द मुनि का अंतःकरण छटपटा उठा।
महामंत्री सेल्यूकस अपराधों के विशय में सिकन्दर से कुछ कह रहे थे। क ही पड़ा तुम अनूठे दिमाग वाले ही और शरीर में दिमाग की तरह ही मेरी दृष्टि में तुम्हारा मूल्य है। दया द्रवित कैलानोस ने पूछा क्या इन पाँचों आदमियों सम्मिलित मूल्य से मेरा मूल्य अधिक है? सम्राट सिकन्दर इस प्रश्न को सुनकर एकबारगी छटपटा गया पर शीघ्र ही सावधान हो उत्तेजनापूर्ण बोला इनका मूल्य ता समाप्त हो चुका है पर आप तो अत्यधिक स्मरणीय एवं मूल्यवान है।
आप इन पाँचों के बदले मेरे प्राण लें ले और इन गरीबों छोड़ दें खम्भों से बंधे निरीह और सहमे हुये पाँचों व्यक्तियों की ओर संकेत करते हुये कैलानोस बोले।
सिकन्दर बड़े असमंजस में फँस गया। वह अरस्तू का शिष्य था। उसने अपने ज्ञान विज्ञान के तर्क वितर्क एवं प्रबल युक्तियों द्वारा कैलानोस को परास्त कर उनको प्रण से डिगाना चाहा पर कैलानोस उसकी सभी युक्तियों का तर्क सम्मत उत्तर देते हुये अपनी बात पर दृढ़तापूर्वक डटे रहे। जब सम्राट को कोई और उपाय न सूझा तो सैनिकों को आँख का संकेत किया । सम्राट का संकेत पाते ही यूनानी सिपाहियों ने उन्हें वहाँ से हटा दिया। बेचारे दार्शनिक कैलानोस आँसू बहाते हुये चले गये। बिगुल बजाकर वे पाँचों प्राण विहीन कर दिये गये। कैलानोस इस घटना से बड़े चिन्तित हुए । सिकन्दर की बर्बरता और दुष्टता से उनका मन काँप उठा। उनका चित्त अस्थिर हो गया। बार बार उन्हें वृद्ध संन्यासी का मुखर मौन याद आ रहा था। कहाँ तो संतों का संग और कहाँ यहाँ का बर्बरता का स्वरूप ।
वे फिर से वापस अपनी संन्यासी मण्डली में जान की सोचने लगे। पर अब घनिष्ठ मित्र बन चुके ओनेसिक्राइट्स की विनय और बार बारी किये जा रहे आग्रह अनुरोध उन्हें उसके साथ चलने के लिये विवश करने लगे और जब सिकन्दर सदल बल भारत से लौटा तो कैलानोस भी ओनेसिक्राइट्स के साथ विवश एवं बेचैन मन से यूनान की सीमा से राजमहल की और चल पड़े।
लौटते हुये मार्ग में युद्ध की विभीषिका से संत्रस्त एवं छटपटाती हुई मानवता दरिद्रता दीनता एवं भुखमरी आदि मर्मस्पर्शी दशाओं को देखकर कैलानोस बेचैन हो उठे और अपने मित्र से ही पूछ बैठे क्या तुम्हारी संस्कृति एवं दर्शन तुम्हें यही सिखाते हैं ? क्या तुम्हारे यहाँ मानवता का कोई मूल्य नहीं है ? ओनेसिक्राइट्स एक क्षण मौन रहा, किन्तु तत्क्षण ही अट्टहास कर पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान की युक्तियों से उस महामानव को बहलाने के लिए सत्प्रयत्न करने लगा, पर उससे उनके भावनाओं से भरे अन्तःकरण को सन्तोष न हुआ। तभी वे राजप्रसाद की ओर मुड़ पड़े कि सहसा उन्हें नारी कण्ठ का करुणापूर्ण आर्त क्रन्दन सुनायी पड़ा।
दीर्घ निश्वास खींचकर करुणा विगलित स्वर में कैलानोस ने अपने मित्र से पूछा- “यह करुण क्रंदन किसका है? उसे क्या कष्ट? जो इस तरह बिलख-बिलखकर रो रही है।” यूनानी दार्शनिक ओनेसिक्राइट्स अपेक्षा भाव से बोला- “ मालूम होता है, यह स्वर हमारी दासी एथेना का है।” जैसे ही वे दोनों ड्योढ़ी लाँघकर एक विशाल प्रांगण में पहुँचने की ठिठक कर रह गये। ओनेसिक्राइट्स की पत्नी हेलना अपनी दासी एथेना पर कोड़े बरसा रही थी। पूछने पर पता चला कि दासी ने ईरानी गुलाम से विवाह किया है, इसलिए उसे सजा दी जा रही है।
हेलना की निष्ठुरता देख कैलानोस थर-थर काँप उठे, अपने मित्र से बोले “क्या तुम्हारे दर्शन में प्यार करना भी अपराध है? यह तो मानव प्रवृत्ति है? ओनेसिक्राइट्स हँस पड़ा और बोला- मित्र छोड़ो इन बातों को व्यर्थ में चिंतित न होओ। कैलानोस लगभग जड़वत् घिसटते हुए राज प्रसाद में पहुँचे। हेलना ने वहाँ उनका स्वागत किया और भोजन में कुछ यूनानी मेवे व फल तथा सुमधुर पेय प्रस्तुत किए। कैलानोस ने बड़ी अरुचि से थोड़े से रूखे मेवे खाकर कोरा जलपान किया।
तभी हेलना ने ताली बजाकर एथेना को बुलाने का आदेश दिया। परिचारिका ने सिर झुकाकर निवेदन किया, “एथेना राजमहल में नहीं है, शायद उसी गुलाम के साथ भाग गयी हो।” यूनानी दार्शनिक की पत्नी का स्वर क्रोध से तीव्र हो उठा, वह होंठ चबाते हुई बोली- “ इसी समय सैनिकों को उसे पकड़ने को भेजो और जरूरत हो, तो महा सेनापति परदीक्ष से भी सैनिक सहायता ली जा सकती है।” अपनी पत्नी की बात सुनकर ओनेसिक्राइट्स ने अपने भारतीय मित्र को संकेत किया और वे दोनों ही बाहर आ गए।
बाहर आकर उसने कैलानोस से कहा- “शीघ्रता करो, किसी तरह मामला आपस में निबटा लें, नहीं तो एथेना को सिकन्दर प्राणदण्ड देगा।” वे दोनों सैनिकों की दिशा में दौड़ गए। एक स्थान पर हजारों संत्रस्त सत्रप् खड़े थे और उनकी हेलना के सैनिकों से झड़प हो रही थीं। तभी सिकन्दर के दो हजार सैनिक भी आ पहुँचे। अब तो सामूहिक नर हत्या होने में कोई शंका नहीं रह गयी थी। कैलानोस विचलित हो उठे। उनका मन-पक्षी छटपटाने लगा। वे सत्रपों के झुण्ड में कूदें और जोर-जोर से चिल्लाकर उन्हें समझाने की व्यर्थ चेष्टा करने लगे। पर उनकी भाषा को वहाँ कौन समझता था और न वे सत्रपों की भाषा समझते थे। बड़ा संक्रान्ति काल था।
इतने में एक वृद्ध कैलानोस की बातें ध्यानपूर्वक सुनने लगा। वह टूटी-फूटी संस्कृत जानता था। हिंसा न करने की बात सुनकर घोषणा के स्वर में वह बोला- “हमारे धर्म गुरु के पौत्र ने इस यूनानी दासी को अपने धर्म में दीक्षित कर विवाह कर लिया है। अब हम उसे मरने को वापस नहीं कर सकते, कैलानोस को स्थिति की विषमता समझते देर नहीं लगी, पर दासी को लौटाए बिना इतना बड़ा नरसंहार रुकना मुमकिन न था। वे उस वृद्ध के पास पहुँचे और हाथ जोड़कर विनीत स्वर में बोले- “आप दासी को लौटा दें, उसे कोई दण्ड न मिलेगा। यदि दासी को दण्ड मिलेगा, तो उससे पूर्व वही दण्ड मैं भोगूँगा।” उन दिनों भारतीय साधु प्रामाणिकता के चरम मानदण्ड थे। उनकी बात पर शंका-सन्देह की कोई गुँजाइश न थी। दासी एथेना सिकन्दर के सैनिकों को सौंप दी गयी।
यूनानी के सम्राट सिकन्दर ने जब एथेना के भागने की घटना सुनी, तो उसने एथेना को जीवित जला देने का प्राणदण्ड देने की आज्ञा सुना दी, तो एक बार फिर से वे एथेना के अपराध की क्षमा प्राप्ति के लिए सिकन्दर के पास पहुँचे और दृढ़ निश्चय से निवेदन किया। सिकन्दर अपने भौतिक बल के आगे मनोबल को कुछ समझता ही न था। उसने एक बार फिर उन भारतीय दार्शनिक की प्रार्थना अस्वीकार कर दी। वह भारतीय दार्शनिक भी अपने आत्मबल के चमत्कार पर पूर्णतया दृढ़ था।
सिकन्दर के आदेश से दो चिताएँ तैयारी की गयीं। एक कैलानोस और दूसरी एथेना के लिए। सिकन्दर ने भारतीय दार्शनिक को एक बार फिर समझाया, पर उन्होंने अस्वीकार करते हुए दृढ़ शब्दों में कहा- “भारतीय दर्शन पाश्चात्य दर्शन की भाँति मात्र तर्क एवं विचार नहीं, बल्कि आचरण एवं अनुभूति है।” जैसे ही कैलानोस चिता पर चढ़ने लगा कि सहसा सामने से ओनेसिक्राइट्स दौड़ता हुआ आया और अपने मित्र के गले से लिपटकर रुंधे स्वर में बोला-मित्र घर वापस चलो। पर कैलानोस अपने वचन पर दृढ़ था।
सिकन्दर अब भी कठोर ही बना रहा, उसने कैलानोस की चिता में एक साथ आग लगाने का आदेश दे दिया। वह महान भारतीय दार्शनिक पद्मासन लगाकर ध्यानमग्न हो गया। चिता धधक उठी और उस महा मानव की अखण्ड मूर्ति उन लाल-पीली ज्वालाओं में मोम की भाँति लगने लगी। उपस्थित जन समुदाय की कुछ आँखों में श्रद्धा थी तो कुछ आँखों में करुणा तथा कुछ में क्षोभ और विद्रोह की ज्वाला धधक रही थी। सिकन्दर भी कुछ विक्षिप्त हो उठा था।
आत्मबलिदान और उत्सर्ग के इस महान आदर्श से उस बर्बर शासक का हृदय भी दया द्रवित हो उठा। यह पहला अवसर था, जब उसकी आँखें बर्बरता और कठोरता को पिघलाकर करुणा के अश्रु कण बहा रही थीं। तभी एथेना को चिता की ओर लाया गया। उसमें भी वीराँगना की भाँति चिता की ओर कदम बढ़ाए, तभी सिकन्दर ने सिंह गर्जना करते हुए आदेश दिया- “हम एथेना को क्षमा करते हैं”। चारों ओर तालियाँ गड़गड़ा उठीं। भारतीय दार्शनिक के आत्मबलिदान और उत्सर्ग के कारण होने वाले सिकन्दर के इस हृदय परिवर्तन से जनसमुदाय में उल्लास एवं प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी। उन सभी को सम्बोधित करते हुए यूनान सम्राट ने श्रद्धा विगलित स्वर में कहा- हमें अपने भारत अभिमान में अखण्डित, राजनीतिक, विजय भले ही मिली हो, पर भारतीय दर्शन एवं संस्कृति के सम्मुख आज हम पूरी तरह पराजित हुए। भारत महादेश के सम्मुख हम नतमस्तक हैं और यह नतमस्तक होना हम सबके लिए सौभाग्य की बात है।” सम्राट की इस वक्तृता की समाप्ति के साथ संन्यासी कैलानोस एवं भारतीय दर्शन की जय-जयकार से सारा वातावरण गुँजायमान हो उठा।"
श्रीमद्भागवत् गीता के तीसरे अध्याय के 10-12 वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ। इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञीविताः॥
अर्थात्-प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजा को उत्पन्न करके उससे कहा- इस यज्ञ द्वारा तुम लोग वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों की इच्छित कामनाओं को देने वाला हो। तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं को बढ़ाओ, वे देवता लोग तुम्हारी उन्नति करें। इस प्रकार आपस में कर्तव्य समझकर उन्नति करते हुए परम कल्याण को प्राप्त होंगे। यज्ञ द्वारा बढ़ाए हुए देवता तुम्हारे लिए बिना माँगे ही अभीष्ट भोगों को प्रदान करेंगे।
यहाँ गीताकार ने यज्ञों का महत्व बताते हुए इसे देवताओं और मनुष्यों में संपर्क, सम्बन्ध व सहयोग के सघन-सूत्र स्थापित करने वाला अमोघ उपाय बताया है। कारण किसी भी कार्य में सफलता की प्राप्ति के लिए मात्र मानवीय पुरुषार्थ ही पर्याप्त नहीं है और न केवल दैवी शक्तियाँ ही सब कुछ कर सकने में समर्थ होती हैं। कल्याणकारी प्रयोजनों की पूर्ति दोनों के सहयोग से ही होता है। इस रहस्य को और अधिक स्पष्ट करते हुए इस मंत्र में मनुष्यों को यह आदेश किया गया है कि वे अपना सर्वस्व यज्ञ के लिए लगा दें-
आयुर्योन कल्पताम प्राणोयज्ञेन कल्पताम् चक्षुर्योन कल्पताम् वाग्यज्ञेन कल्पताम् मनो यज्ञेन कल्पताम् आत्मा यज्ञेन कल्पताम् स्वाहा।
अर्थात्-अपनी आयु, प्राण, इन्द्रियाँ, मन, आत्मा आदि सर्वस्व को यज्ञ के समर्पण करो।
इतना ही नहीं, यज्ञ के द्वारा देवों से सम्बन्ध स्थापित करने का पूरी तत्परता से प्रयत्न करने के लिए मनुष्यों के जैसी प्रेरणा देवताओं को भी दी गयी है-
देवा यहमानश्च सीदत।
अर्थात्- हे देवताओं! यजमान और तुम पास बैठो और इकट्ठे यज्ञ करो। कहने का तात्पर्य यह कि यज्ञ की महिमा अनिर्वचनीय है। इससे किसी एक का ही नहीं, वरन् समूचे जगत का कल्याण होता है। यज्ञ के माध्यम से मनुष्य देवताओं से सम्बन्ध स्थापित करके उन्हें सहयोग देने के लिए बाध्य करता है और इससे संतुष्ट और परिपुष्ट हुए देवता मनुष्य को अनेक सुख-साधन एवं सुअवसर प्रदान करते हैं।
अब यहाँ प्रश्न उत्पन्न होता है कि यह देवता कौन है? कहाँ रहते हैं? इनसे हमारा क्या सम्बन्ध है और यज्ञ द्वारा वह क्यों संतुष्ट होते हैं? यज्ञ द्वारा उनका पोषण किस प्रकार होता है? उनका सहयोग मनुष्य को किस प्रकार प्राप्त होता है और उनमें ऐसी कौन सी सामर्थ्य है जिसके द्वारा संसार को वे लाभ पहुँचा सके। बिना यज्ञ के संसार को लाभ पहुँचाने में उन्हें क्या अड़चन होती है? इन सब प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक है, ताकि उपरोक्त अभिवचनों का तात्पर्य ठीक प्रकार समझ में आ जावे।
देव शब्द का सलिल अर्थ-देने वाला, सत्पुरुष, ज्ञानी, विद्वान आदि श्रेष्ठ व्यक्ति है। ऐसे सत्पुरुषों को सहयोग देना, उनकी शक्तियों एवं कर्म-पद्धतियों को आगे बढ़ाने के लिए निस्वार्थ भाव से सहायता करना यज्ञ है। इस यज्ञ से दोनों ही पक्षों को अपरिमित लाभ होता है और दोनों की सम्मिलित शक्ति दूनी नहीं वरन् एक और एक मिलकर दो के स्थान पर ग्यारह गुनी हो जाती है। यह स्थूल की साँसारिक देवपूजा हुई।
दूसरे देवता वे हैं जो अदृश्य हैं। यह देवता ईश्वर की विविध प्रकार की सूक्ष्म शक्तियाँ हैं। वैसे तो ईश्वर एक ही हैं, उसकी शक्तियाँ अलग-अलग है, उसके गुण और कार्य भिन्न-भिन्न हैं। इन्हें देव कहते हैं। इसी प्रकार प्रकृति के अंतराल में काम करने वाली सृष्टि में रचना, विकास, पोषण और संहार करने वाली अनेक शक्तियाँ हैं, यह भी देव कहलाती हैं। अनेक ग्रह-मण्डलों से जो प्रभाव किरणें (कॉस्मिक रेंज) हम तक आती हैं, उन्हें भी देव कहते हैं। सूर्य की किरणों में जो सप्तवर्णी एवं विविध गुणों वाली शक्तिधाराएँ काम करती हैं, यह भी देव हैं। देव-पुराणों में 33 कोटि देवताओं का वर्णन हैं। 33 प्रकार के परिचय इस प्रकार हैं- वसु 8, रुद्र 11, आदित्य 12, अश्विनी कुमार 1, पूषा 1-यह देवशक्तियाँ इस विश्व ब्रह्माण्ड के वातावरण में नाना प्रकार के परिवर्तन, उपद्रव एवं उत्कर्ष उत्पन्न करती रहती हैं।
देवता 33 प्रकार के, पितर 9 प्रकार के, असुर 99 प्रकार के, गंधर्व 27 प्रकार के, पवन 49 प्रकार के बताये गये हैं। शास्त्रोक्त यह बातें आश्चर्य, कौतूहल एवं अविश्वास करने योग्य नहीं हैं। यह भारतीय सूक्ष्म विज्ञान के चिरकालीन प्रयत्नों एवं अन्वेषण के साथ की हुई खोज है। किसी समय इन शक्तियों की भारतीय ऋषि-मनीषियों को भली प्रकार जानकारी थी और वे उनसे लाभ उठाकर प्रकृति के स्वामी बने हुए थे। इन अदृश्य शक्तियों की खोज करके उनका उपयोग, नियंत्रण, संचालन, आवाहन और विसर्जन उन्होंने भली प्रकार जान लिया था। अन्य लोकों तथा ग्रह-नक्षत्रों में उनका आना-जाना था। अष्ट-सिद्धियों एवं नवनिधियों के वे स्वामी थे। अणिमा, महिमा, लघिमा, ईशित्व, वाशित्व जैसी सिद्धियाँ उन्हें करतलगत होती थीं। यह सब कार्य सूक्ष्म प्रकृति की उन शक्तियों द्वारा सम्पन्न होते थे, जिन्हें देव नाम से पुकारते हैं। प्रत्येक सूक्ष्म शक्ति को अध्यात्म विज्ञान के अनुसार एक देव माना गया है। पंचतत्त्वों में जल को वरुण देव, गर्मी को अग्नि, पवन को वायु देव, धरती को गौरी, आकाश को इन्द्रदेव माना गया है। इसी प्रकार सृष्टि के अंतराल में जो शक्तियाँ काम कर रही हैं, उनको भी देव संज्ञा दी गयी है।
अदृश्य शक्तियों के दो भाग हैं- एक चेतना, दूसरा क्रिया। क्रिया प्रकृति से सम्बन्धित है और चेतना ब्रह्म का अंश है। जैसे सूर्य का सलिल रुपं अग्नि पिण्ड मात्र है, जिस भौतिक विज्ञानी इसी रूप में जानते हैं, पर अध्यात्म विज्ञान के अनुसार सलिल रूप के अतिरिक्त सूर्य में एक चैतन्य प्राण भी है, जो ब्रह्म से प्रेरणा प्राप्त करता है, ब्रह्मरूप है। इसी प्रकार जल, वायु, अग्नि आदि देवों के जो स्थूल रूप हैं, उनके अतिरिक्त उनमें एक चैतन्य आत्मा भी है, जो ब्रह्म से सम्बन्धित है। जैसे मनुष्य का शरीर भीतर की प्राण-चेतना के अनुसार कार्य करता है, वैसे ही इन देवों की अन्तः चेतना ही उनकी दृश्य क्रिया का संचालन करती है। उस देव आत्मा से जब सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, तो उसके अनुसार इन जल, वायु आदि के चलाने और रोकने का कार्य होने लगता है। इन्द्र की चैतन्य सत्ता को उपासना द्वारा प्रसन्न कर लिया जाए तो मनुष्य मनचाही वर्षा कराने में सफल हो सकता है। गंगा की देवी आत्मा को प्रसन्न करके भगीरथ पृथ्वी पर गंगा नदी को लाये और उसी जलधारा को इच्छित मार्ग से समुद्र तक ले गये। प्राचीनकाल में हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि इसी प्रकार आत्म साधना, उपासना, तपश्चर्या, मंत्र, योगाभ्यास, यज्ञ आदि क्रियाओं से देव तत्वों की सूक्ष्म आत्मा से अपना सम्बन्ध स्थापित करके उनकी महान शक्तियों का भरपूर लाभ उठाते थे।
यज्ञ में मंत्रोच्चार की प्रमुख भूमिका होती है। वेदमंत्रों का गठन ही ऐसे विलक्षण एवं विज्ञानसम्मत ढंग से हुआ है कि उनका विधिपूर्वक शुद्ध उच्चारण करने से अनन्त अन्तरिक्ष में एक विशेष प्रकार के कम्पन उत्पन्न होते हैं। विशेष मंत्रों का उच्चारण करने से एक ऐसी ध्वनि लहरी उत्पन्न होती है, जो अपने शरीर के कुछ देव केन्द्रों को झंकृत करती है और आकाशस्थ देवशक्तियों को प्रभावित करती है। जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में सभी देवशक्तियाँ व्याप्त है, उसी प्रकार पिण्ड (काया) में भी उनका कोई न कोई विशिष्ट स्थान निर्धारित है। मंत्र को शब्दब्रह्म कहा गया है, मंत्र की शक्ति को वज्र या ब्रह्मास्त्र भी कहते हैं। इस शक्ति का उद्भव मंत्रोच्चारण से होता है और देहगत तथा ब्रह्माण्डगत वह देवशक्ति आपस में सम्बन्ध स्थापित करती है, परस्पर आलिंगन करती हैं और दोनों में सान्निध्य एवं सामीप्य स्थापित होता है। यजमान और देव में सम्बन्ध स्थापित करने की महान शक्ति यज्ञ में मौजूद है। स्थूल रूप से मंत्रों में विशेषकर गायत्री मंत्र में ईश्वर की प्रार्थना है, किन्तु यह कार्य तो गद्य प्रार्थना तथा पद्य कविता आदि से भी हो सकता है। जैसे सूर्य स्थूल रूप से अग्नि पिण्ड और सूक्ष्म रूप से प्रसवित सविता है, उसी प्रकार मंत्र स्थूल रूप से शिक्षा प्रद प्रार्थना’ और सूक्ष्म रूप से सृष्टि की अत्यन्त ही महत्वपूर्ण एवं प्रचण्ड शक्तिशाली देवशक्तियों से जीवन का सान्निध्य कराने वाले रहस्यपूर्ण माध्यम है। मंत्र की शक्ति महान है, तभी तो मानसकार ने इसे - “मंत्र परम लघु जासु बस, विधि हरि रि सुर सर्व” कहा है।
मंत्र शब्दब्रह्म है। शब्द की महान शक्ति से हमारे ऋषि परिचित थे। आधुनिक विज्ञान ने शब्दशक्ति की जानकारी प्राप्त करके बेतार के तार एवं राडार जैसे यंत्र उपकरणों का विकास किया है। मंत्र का राडार इससे कहीं अधिक शक्तिशाली है जो लोक-लोकान्तरों तक आसानी से पहुँच जाता है। उसकी पहुँच देवों तक, देवलोकों तक, देवशक्तियों तक भली प्रकार हो जाती है।
तंत्र विज्ञान में मारण, मोहन उच्चाटन वशीकरण स्तंभक जैसे शब्दों का प्रयोग होता है। मारण किसी व्यक्ति को जान से मार डालना मोहन किसी की बुद्धि को मोहित कर लेना, उच्चाटन किसी व्यक्ति का मन जमे हुए काम, स्थान या विचार पर से उचाट देना वशीकरण हिप्नोटिज्म की भाँति किसी व्यक्ति को आज्ञानुवर्ती बना देना। शास्त्र और यंत्रों का संचालन मंत्रों द्वारा करने की विद्या तो हमारे देश में किसी समय बहुत साधारण हो गयी थी। आज वह विद्या लुप्तप्राय भले ही हो गयी हो, पर किसी मय वह उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर थी और ऐसी आशा करनी चाहिए कि उसका पुनः उत्कर्ष होगा।
शब्द की शक्ति महान है, फिर वेदों में जिस वैज्ञानिक ढंग से शब्दों का गुँथन हुआ है, उसकी महत्ता तो अनिर्वचनीय ही है। इन शब्दों का मर्म एवं रहस्य कोई ठीक प्रकार समझ ले, इन शब्दों में छिपी हुई प्रेरणाओं शिक्षाओं विद्याओं एवं शक्तियों से अवगत हो जाए, तो उनके लिए यह मंत्र कामधेनु के समान सब कुछ दे सकने वाले बन जाते हैं। महर्षि पतंजलि का ऐसा ही अभिमत है - एकः शब्दः सम्यक् ज्ञात सुप्रयुक्त, र्स्वगलोके कामधुग्भवति। अर्थात् श्रफति का एक अब्द भी ठीक प्रकार जानकर उसको भली प्रकार काम में ले आवे, तो वह एक शब्द ही कामधेनु तथा स्वर्गीय सुख का दाता होता है।
देवशक्तियों एवं मंत्र की महत्ता पर संक्षिप्त प्रकाश यहाँ इसलिए डाला गया है कि इन दिनों संस्कार महोत्सवों के क्रम से जो यज्ञ शृंखला चल रही है, उसमें होने वाले मंत्रोच्चारण का महत्व समझने में सुगमता हो। विभिन्न प्रकार के यज्ञों में अलग-अलग प्रकार की सामग्री काम में आती हैं, क्योंकि उनके प्रयोजन, मंत्र विधान एवं देव भिन्न होते हैं।
एक उपचार योग मनोविकार प्रेतबाधा
भूतबाधा के नाम से प्रचलित एक प्रकार के आवेश का लक्षण एवं प्रभाव ऐसा होता है, जिसे देखते हुए उसे बहानेबाज़ी या सनक भी नहीं कहा जा सकता। उसके प्रभाव प्रत्यक्ष दीखते हैं। उन कारणों से रोगी का जीवनक्रम ही अस्त व्यस्त नहीं हो जाता, कई बार तो जान पर बन आती है और बुरी तरह बर्बादी उठानी पड़नी है। ऐसी दशा में उसे झुठलाया कैसे जाए। इसमें प्रेतबाधा का खेल भी शामिल हो सकता है, पर हर परिस्थिति में यह बात सही नहीं होती। कई बार कई लोग इस संकट में बुरी तरह फँसे पाये जाते हैं।
फिर ऐसे उपद्रव या आक्रमण प्रेत ही करते हों, आवेश या उन्माद खड़े करते हो यह बात प्रेत-विज्ञान से प्राप्त जानकारियों से सर्वथा भिन्न है। मृतात्माओं का अस्तित्व होना उनका व्यक्ति विशेष के साथ संबंध जुड़ना एक बात है। समझदार लोगों में वैसा कुछ क्यों नहीं होगा ?
यह प्रश्न ऐसे है जो अपना निश्चित समाधान माँगते हैं। इस संदर्भ में विज्ञजनों ने लम्बी खोजों के बाद इस स्थिति को अचेतन मन की विलक्षण विकृति कहा है। ऐसी या इससे मिलती जुलती विकृतियाँ संसार भर में देखी गई है, जिन्हें कोई चाहे तो प्रेम बाधा भी कह सकता है।
शारीरिक रोगों की बढ़ोत्तरी के इस युग में मानसिक रोगों की भी चित्र विचित्र किस्में निकली है। उन्माद आमतौर से उसे कहा जाता है, जिसमें व्यक्ति सामान्य लोक व्यवहार और चिंतन की मर्यादाओं का व्यतिक्रम करके कुछ भी सोचने और कुछ भी करने लगे। इन्हें एक विशेष प्रकार की सनक कहा जा सकता है जो यदा कदा उभरती हैं और कुछ ऐसी भी होती हैं जो स्वभाव में अपने लिए स्थान बना लेती है।
उत्तरी ध्रुव पर निवास करने वाले एस्किमो लोगों में कभी कभी किसी किसी पर एक भयानक मानसिक रोग चढ़ दौड़ता है। इसमें वह आपे से बाहर हो जाता है और ऐसा लगता है कि कोई उससे यह सब बलपूर्वक करा रहा है।
आँखें लाल हो जाती है, माँसपेशियाँ जकड़ जाती है, पसीना छूटता है। आवेशग्रस्त मनः स्थिति में पत्नी तक रेडियम हिरन जैसी दीखती है और उस पर आक्रमण कर बैठने पर उतारू दीखता है। मुँह से जार टपकती है। भूख से तड़पता है और जो भी हाथ पड़े, खाने लगता है। स्थिति पूर्णतया उन्मादी जैसी होती है।
यह उस क्षेत्र का प्रख्यात रोग है। इसे उस क्षेत्र में काम करने वाले डॉक्टरों ने विन्डेगो ना दिया है। वहाँ के निवासी इसे हिममानव का आक्रमण है, जो भूखा होने पर किसी को भी क्षुधा निवृत्ति के लिए चुन सकता है, जिसे पकड़ता है, उसे फिर जीवित नहीं छोड़ता।
उन्माद जब अस्तिर पर होता है, तो रोगी किसी को भी मार डालने जैसे आक्रमण करता है। साथ ही यह भी कहता है कि यदि बचना है तो मुझे उन्हें अपना वफादार सहयोगी मानकर पुरस्कार भी देता है।
कनाडा के डाक्टरों ने इसे रोग के संबंध में गहरी छानबीन की है और उस व्यथा को विन्डिगो साइकोसिस नाम दिया है। पर उसकी रोकथाम के उपाय अपनाये गये हैं, तो स्थिति और घटनाक्रमों का अनुपात कम होता जा रहा है।
मानस रोगों के प्रत्यक्ष कारणों से व्यक्तिगत दुश्चिन्तनों अरुचिकर सामाजिक प्रचलनों अनपेक्षित दबावों को प्रमुख माना जाता है। जिनकी भौगोलिक एवं वातावरण संबंधी चुम्बकीय परिस्थिति किन्हीं पर अतिरिक्त प्रभाव डाले और उसे इस प्रकार उन्माद में जकड़ दें।
साइकोलाजिस्टों और एन्थ्रोपोली जिस्टो के एक वर्ग ने इसे हिस्टेरिया की तरह छूत स्तर का माना है। भूतोन्मादों के पीछे यही प्रक्रिया काम करती है। वे सर्वत्र नहीं होते। किसी विशेष क्षेत्र या समुदाय में ही उनकी धूम रहती है। यह व्यथा छूत की तरह एक से दूसरे को लगती है। दुखती आँखों को देखने भर से अच्छी आँखें भी दुखने लगती है। जुकाम वालों की समीपता से अन्य दुर्बल प्रकृति के लोग भी वैसी ही शिकायत करने लगते हैं बड़ों को भूत से आक्रान्त देखकर छोटों के मन पर भी वह कुहासा जमने लगता है, जो अनुकूल अवसर मिलने पर फूट निकलता है। जिनके परिवार मुहल्लों में भूत प्रेतों की घटनाएँ होती रहती है। कथानकों से प्रभावित ऐसे लोग भी इस व्यथा में फँस जाते हैं, जिनकी मानसिक संरचना में उन्माद प्रकट होने की आशंका नहीं की जाती थी।
मलेशिया की महिलाओं में ‘लता’ नामक भयाक्रान्त रोग होता है, यदि उनसे आग में हाथ डालने को कहा जाए तो रोगिणी आग में हाथ देगी। ऐसा ज्ञात होता है। कि यह रोग परम्परागत होता है, महिलाएँ पश्चिमी नकल को बाध्य की गयी थी। लता मात्र अन्धाधुन्ध नकल की मानसिक दासता का प्रतीक है।
मलेशिया का मानस रोग एमोक बड़ा भयानक है। युवा रोगी विक्षिप्त होकर छुरा भोकता फिरता है। उसका कारण नौकरी से निकाला जाना या परीक्षा की असफलता आदि होती है। अनेक मनुष्यों को घायल होते हो तो उस पर काबू पाया जाता है। जबकि देशभक्त स्वराज्य प्राप्त एमोक पर निकल पड़ते थे और देश के लिए मर मिटने को निकल पड़ते थे। धर्म परिवर्तन के समय वे मरने को अधिक पसन्द करते थे। एमोक से मृत व्यक्तियों का सम्मान 1850 तक था उसके बाद यह मानस रोग माना जाने लगा है। किन्तु रक्त के संस्कार तो बने ही रहते हैं।
विश्व के विभिन्न स्थानों में मानसिक रोग विभिन्न रूप लेते हैं। स्थान की संस्कृति जलवायु जलप्रपात तथा परम्परागत अन्धविश्वास मानस संस्थान पर छाये रहते हैं। यह बात मात्र पिछड़ी जातियों तक ही सीमित नहीं वरन् पढ़े लिखे आधुनिक सभ्यता में पले लोगों को भी होती है।
इंग्लैण्ड के एक परिवार में पीढ़ियों से यह मान्यता चली आयी है कि उसका हर नर सदस्य 50 वर्ष की आयु से पूर्व ही मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। पिछले दिनों एसोसिएट्स प्रेस के माध्यम से 26 अक्टूबर, 1983 सातवें स्टेटलमैन अख़बार में एक समाचार छपा कि सातवें अर्ल क्रेवन ने जो गत पाँच वर्षों से आसन मृत्यु से भयभीत था, 26 वर्श की आयु में ही स्वयं को गोली मारकर आत्म हत्या कर ली। थामस राबर्ट डगलस क्रेवन शाही परिवार की सातवीं पीढ़ी के एकमात्र पुरुष सदस्य थे।
कहा जात है कि इनके पिता 35 वर्श की आयु में व दादा मात्र 37 वर्ष की आयु में नाव में डूबने से अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए थे। यही इतिहास परिवार के हर सदस्य का है। कुछ लोग इसे एक भय की आत्म सम्मोहन की स्थिति कहते हैं, जिसमें हर व्यक्ति संभाव्य को सच मानकर ही जिया है व उसने मानो लोकोक्ति को ही सही सिद्ध करने के लिये आत्महत्या की है।
एन्थ्रोपोलोजिस्ट चार्ल्स लिन्हाम का कथन है कि पिछड़े क्षेत्रों में पाया जाने वाला उन्माद भूतोन्माद कहा जाता था जिसके प्रति उपेक्षा व्यंग्य उपहास का ही प्रयोग होता था। अब वह नये रूप से शिक्षित समुदाय में भी नई नई सनकों और उमंगों के रूप में दृष्टिगोचर होने लगा है। उसे भूतकाल की पुरातन पृष्ठभूमि पर नई परिस्थितियों के अनुसार उगा नये किस्म का किन्तु उसी प्रकृति का पौधा कहा जा सकता है।
प्रेत बाधा या भूतोन्माद का न उपहासास्पद ठहराया जाए और न उसकी उपेक्षा की जाए। यदि बहाने बाजी पाई जाए तो उसका पर्दाफाश किया जाए, किन्तु यदि वस्तुतः कोई इस व्यथा से आक्रान्त है, तो उसका एक मानसिक रोगी की तरह उपचार किया जाए। खोजने पर जैसे अन्य रोगों के समाधान मिल गये इस प्रकार इस विक्षेप के निराकरण का भी युक्तिसंगत मार्ग मिल सकता है।
सभ्यता और धर्म के समन्वय का नाम संस्कृति है। जिस तरह इड़ा और पिंगला के योग से सुशुम्ना का गंगा और यमुना के योग से त्रिवेणी का आविर्भाव होता है, उसी प्रकार संस्कृति धार्मिक परिप्रेक्ष्य में तो अन्तर्मुखी जीवन के विकास की प्रेरणा देती है, और सभ्यता के रूप में वाह्य जीवन को भी शुद्ध और ऐसा बनाती है, जिसमें एक मनुष्य किसी भी दूसरे प्राणी के हित का अतिक्रमण न करता हुआ, जीवन लक्ष्य की ओर बढ़ता रहे।
समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान (वाङ्मय खण्ड क्र. 35)
योगीराज श्रीकृष्ण की समग्र क्रान्ति अब इस रूप में स्वामी विवेकानन्द, योगी अरविन्द घोष जैसे द्रष्टाओं-महापुरुषों ने भारत को पुनः अपनी महानता प्राप्त करने की सुनिश्चित घोषणाएँ की हैं। भारत को पुनः विश्व का आध्यात्मिक मार्ग दर्शन करना है। इसके हेतु अपने को प्रभावशाली स्थिति में लाने के लिए उसे आर्थिक एवं सैन्य शक्ति के रूप में भी उभरना होगा, लेकिन उसकी वास्तविक भूमिका आध्यात्मिक ही है। आर्थिक प्रगति के लिए बड़े पैमाने पर मशीनीकरण से पर्यावरण को तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का वर्चस्व बढ़ने से भारत की आत्मनिर्भरता को खतरा होने लगा है। इस अर्थप्रधान युग में आर्थिक परावलम्बन का अर्थ परतन्त्रता जैसा ही कुछ होता है। प्रकृति को ‘माता’ कहने वाले भारत में पर्यावरण की शुद्धता तथा ‘पूर्ण बन्धन मुक्ति’ को जीवन-लक्ष्य मानने वालों के लिए आत्मावलम्बन दोनों ही अत्यधिक आवश्यक हैं। क्या किया जाए ? इस संदर्भ में ‘महान भारत’ की स्थापना के लिए ‘महाभारत’ रचाने वाले योगेश्वर श्री कृष्ण द्वारा प्रदर्शित कुछ सूत्र अत्यन्त उपयोगी हो सकते हैं।
कलेवर सँवारे, आत्मा को न भूले
स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ, श्री अरविन्द, महामना मालवीय, लोकमान्य तिलक, महात्मा गाँधी, संत विनोबा भावे, डॉ0 राधाकृष्णन, लोकनायक जयप्रकाश आदि न भारत के विकास के लिए पाश्चात्य औद्योगीकरण को भी एक सीमा तक अपनाने की सहमति दी है। इसमें कायकलेवर तथा बुद्धि-कौशल के साथ भाव-संवेदनाओं को संतुलित अनुपात में बनाए रखने पर भरपूर जोर दिया गया है।
आज भौतिक विज्ञान के युग में भौतिक संसाधनों के विकास को अप्रासंगिक नहीं कहा जा सकता, लेकिन उसे भौतिक कलेवर से अधिक महत्व भी नहीं दिया जाना चाहिए। इस भौतिक दौड़ में भारत की आत्मसत्ता की अवहेलना नहीं की जानी चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण योगीराज थे। उन्होंने अपने समय में भौतिक प्रगति के साथ भावनात्मक विकास का सुन्दर योग कर दिखाया था। उन्होंने भारत के सर्वांगीण विकास के लिए समग्र क्रान्ति की योजना बनायी थी। पू0 गुरुदेव ने बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति के जिन तीन अनिवार्य चरणों की बात की है, वे भगवान श्रीकृष्ण की समग्र क्रान्ति के भी अंग थे।
ज्ञान क्राँति के उद्घोषक के रूप में वे गीतकार हैं। उनके ज्ञान की प्रखर और प्रबल धारा का जोहा सारा संसार मानता है।
नैतिक क्राँति, भावनात्मक नवनिर्माण के लिए वे भक्तिरस के संचारक हैं। उनकी भक्तवत्सल, लोकहित के लिए समर्पित भाव को कोई नकार नहीं सकता।
सामाजिक क्राँति-नायक के रूप में उन्होंने वृज में गोरस सत्याग्रह से लेकर महाभारत तक का संचालन किया। इन सबके पीछे उनके दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन और सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन का, युगधर्म की स्थापना का सुदृढ़ संकल्प कार्य करता दिखाई देता है। सामयिक कार्यक्रमों के रूप में उन्होंने अनेक अभियान चलाए, लेकिन भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास के स्थाई सूत्र के रूप में उन्होंने किस ओर संकेत किया है, वह उन दोनों भाइयों द्वारा अपनाए गए सम्बन्धों में प्रकट होता है।
हलधर-गोपाल की जोड़ी श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम हलधर थे तथा वे स्वयं गोपाल कहलाए। इस संबोधनों को अपनाने के पीछे उनकी विशेष मंशा झलकती है। भारत कृषि प्रधान देश है। यहाँ भी उपजाऊ भूमि में अन्न, फल से लेकर औषधियों वनस्पतियों की अटूट सम्पदा उपजती रहती है। यही सम्पदा पर्यावरण संतुलन के लिए भी आवश्यक है। इस सम्पदा को विकसित करने की साधना का नाम कृषि और उक्त साधना में निष्ठापूर्वक लगे रहने वाले साधक का नाम कृषक । कृषक का ही प्रतीक चिन्ह है हलधर । श्रीकृष्ण अग्रज ने हलधर कहलाना पसन्द किया। वे कृषि संवर्द्धन के लिए समर्पित व्यक्ति रहे।
भारत को कृषि प्रधान देश मानकर कृषि के उत्कर्ष की बात सोचना योगीराज के सामाजिक उत्कर्ष के सूत्र का एक ही पक्ष हुआ। हम गोपाल के गूढ़ महत्व को भूल गये तथा पहले दूध व्यापार और फिर माँस व्यापार से संपन्न बनने के क्रूर प्रयास करने लगे। इस क्रम में हम पशु धन के प्रति तो क्रूर बने ही, पर्यावरण और मानवीय संवेदना के हनन में भी हमें संकोच नहीं रह गया है।
गोरस आन्दोलन
भगवान कृष्ण ने धन के लोभ में गोरस बेचे जाने के विरुद्ध वृज में सबसे पहले सत्याग्रह आन्दोलन छेड़ा था। धन के लोभ में बछड़ों और बालकों को गोरस से वंचित करके उसे राक्षसों को उपलब्ध कराने का उन्होंने कड़ा विरोध किया था। बछड़ों को दूध पीने के लिए चुपचाप छोड़ देने से लेकर छिपकर बालकों को गोरस बेचने जाने वालों की हाँड़ी तोड़ देना उनके इसी आन्दोलन का अंग था।
क्रूरता का स्रोत
धन के लोभ में गोरस बेचा जाता है, तो क्रूरता पनपती है। पहले बछड़ों और बच्चों का हक मारा जाता है। फिर अधिक दूध चोड़ने के लिए फूँका लगाने से लेकर हारमोन्स के इंजेक्शन देने जैसी अमानवीय हरकतें की जाती है। जब दूध कम मिलता है तो माँस से धन वसूलने की सीमा तक पहुँच जाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने इस क्रूरता के चक्र को तोड़ने के लिए ही आन्दोलन चलाया। उस समय के हिसाब से उन्होंने गो-पूजन जैसी भावभरी परिपाटियाँ चलायी थीं आज की परिस्थितियों में हमें उसी तथ्य को कुछ भिन्न प्रकार से समझना और समझाना होगा।
दूध एवं माँस बेचकर धन कमाने की अपेक्षा उसके बिना ही पशु धन गोधन की उपयोगिता सिद्ध करनी होगी।
पशु धन के पक्ष में
यदि हम मानवीय संवेदनाओं तथा पर्यावरण की रक्षा करना तथा अपना कर्तव्य समझते हैं, तो हमें अपनी सोच में कुछ आधारभूत परिवर्तन करने होंगे।
हमें अधिक धन कमाना है, इसके लिए पशुपालन करना है, यह विचार बदलना होगा। यह मानना होगा कि हमें मानवीय संवेदनाओं और पर्यावरण के लिए पशुओं के साथ सद्व्यवहार करना है। उनकी रक्षा हमारे लिए आर्थिक भार बने, इस स्तर तक अवश्य विचार करना होगा। इस दृष्टि से बहुत कुछ समझा और किया जा सकता है।
देश में ऊर्जा की बड़ी समस्या है। बिजली के रूप में ऊर्जा की बहुत कमी अनुभव होती है। डीज़ल, लकड़ी, कोयला आदि से ऊर्जा उत्पन्न करने की प्रतिक्रिया में वायु प्रदूषण बहुत बढ़ता दिखता है। इस दृष्टि से पशु धन से प्राप्त ऊर्जा सबसे अधिक सुरक्षित है।
घास-तृण भूसा आदि खाकर पशु पर्याप्त ऊर्जा दे सकते हैं। उक्त पदार्थों से किसी अन्य प्रकार इतनी ऊर्जा प्राप्त नहीं की जा सकती। सर्वेक्षण द्वारा लगाए गए एक अनुमान के अनुसार, आज की गिरी गुजरी स्थिति में भी बैलों के माध्यम से प्राप्त ऊर्जा लगभग 40000 मेगावाट के बराबर है।
म्ष््राीनों से ऊर्जा प्राप्त करने में ऊर्जा उत्पादन के साथ ही प्रदूषण भी बढ़ता है। पशु तृण खाकर ऊर्जा तो देते ही हैं, तृण आहार से पर्याप्त ऊर्जा देने के बाद उनके मल गोबर आदि भी उपयोगी में सक्षम होता है। यदि उसको भली प्रकार लिया जाए, तो उससे पर्यावरण बिगड़ने के स्थान पर पर्यावरण संवर्द्धन का लाभ उठाया जा सकता है।
गोबर गौमूत्र में खरपतवार को जैव खाद में बदल देने की असामान्य क्षमता होती है। वह अपने से 10 गुने खरपतवार को उपयोगी उर्वरक के रूप में बदल सकता है। रासायनिक खादों के स्थान पर जैव खाद का महत्त्व आजकल हर क्षेत्र में स्वीकार किया जा सकता है।
गोवंश विशेष
पशुपालन में गोवंश को विशेष महत्व यों ही नहीं दिया गया है। योगीराज कृष्ण ने अपने लिए गोपाल संबोधन अनायास ही नहीं स्वीकारा था गाय के दूध, दही, घृत से लेकर गोबर, गौमूत्र चर्म और हड्डियों तक में औषधीय गुण पाये जाते हैं। पर्यावरण आर्थिक स्वावलम्बन आरोग्य कृषि विकास तथा मानवीय संवेदनाओं के संरक्षण संवर्द्धन की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकते हैं।
ग्रामोत्थान, ग्रामोद्योग
देश विदेश के विभिन्न धाराओं के विशेषज्ञ अब इस भारत जैसे देश के विकास के लिए जीवन पद्धति ही अधिक लाभप्रद सिद्ध होगी। पर्यावरण संरक्षण, मानवीय संवेदनाओं के पोषण पिछड़े वर्गों की उन्नति आदि के लिए ग्रामोद्योग के विकास को ही प्रमुख आधार बनाना होगा।
उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाओं पर अपने विचार प्रकट करते हुये पूज्य गुरुदेव ने भी यह बात स्पष्ट की है कि सामाजिक संतुलन के लिए शहर दुबले होंगे तथा गाँवों को समृद्ध किया जाएगा। इसके लिए आवश्यक है कि ग्रामोद्योग की दिशा में प्रतिभाओं का नियोजन किया जाए। वहाँ वे धन कमा लेते हैं, पर व्यसनी भी हो जाते हैं। व्यसनों गंदगी और असंतुलित जीवन पद्धति की चपेट में वे स्वास्थ्य गँवा बैठते हैं। अपराधी प्रवृत्तियाँ में पड़कर समाज का भी परेशानी में डाल देते हैं।
ग्रामोद्योग कैसे हों
यह शहरोन्मुख होने के दोष हैं जीवन को ग्रामोद्योग बनाकर ही उक्त तमाम विडम्बनाओं से पीछा छुड़ाया जाना तथा पर्यावरण से लेकर मानवीय संवेदनाओं के पोषण में सफलता पाना संभव हो सकता है।
इन दिनों इस दिशा में प्रबुद्धजनों के प्रयास विभिन्न ढंग से चल रहे है। उनके ढेरों निष्कर्ष इसी दिशा में घूमते दिखने लगें हैं कि इस देश में गोपाल बढ़ने चाहिए। ग्रामोद्योग में गो पालन को केन्द्रीय धुरी के रूप में स्थापित किया जा सकता है। उसके साथ अनेक ग्रामोद्योग ही का ताना बाना भी सहज ही बुना जा सकता है।
ग्रामोत्थान से समग्र क्राँति
पूर्व केन्द्रीय सचिव, ऋचा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूज्य गुरुदेव के अनन्य अनुयायी श्री जगदीश चन्द्र पंत जी ने अपने शोध आलेख ग्रामोत्थान से सम्पूर्ण क्राँति में गोशाला केन्द्रित ग्रामोद्योग पर बहुत सारगर्भित योजना प्रस्तुत की है। इस सन्दर्भ में अधिक विस्तृत चर्चा अगले लेख में है। इस योजना के थोड़े से मुख्य सूत्र इस प्रकार है।
प्रत्येक 10-12 गाँवों के बीच एक ऐसी गोशाला हो, जहाँ गोवंश को दूध और मोस के व्यापार के बिना ही उपयोगी सिद्ध रखा जा सके। इस दिशा में कुछ सर्वोदयी संगठनों ने बहुत कुछ शोधकार्य कर भी लिया है।
गोशाला में जो दूध उत्पादित हो सके वह बेचा न जाए। गाँव की गर्भिणी महिलाओं गरीब बालकों तथा रोगियों को गोरस उपलब्ध कराया जाए। प्रत्येक गोशाला से जुड़े महिला मण्डल यह व्यवस्था बनाए।
गोशाला से जुड़े कार्यकर्ता तथा समयदानी गो सेवक, जल संरक्षण तथा वन सम्पदा संवर्द्धन की अनेक गतिविधियाँ ग्रामोद्योग के रूप में संचालित करे।
पिछले लेख में ग्राम विकास के संदर्भ में हलधर और गोपाल की जोड़ी को जीवन्त बनाने वाली बात कही जा चुकी है। सब मिलाकर ग्राम्य जीवन को इतना आकर्षक बनाने की आवश्यकता है कि लोग गाँवों से नगर की ओर न भागें बल्कि नगरों के प्रदूषण भरे वातावरण से निकलकर गाँवों में बसने के लिए गो संवर्द्धन से लेकर वन सम्पदा एवं सम्पदा के संयोग से पनपने वाले कुटीर उद्योगों के लिए ग्रामीणजनों को प्रशिक्षित करना आवश्यक है। इस संदर्भ में गायत्री परिवार, ऋचा और नाबार्ड के संयुक्त प्रयासों से सफल प्रशिक्षणों और प्रयोगों का क्रम चल पड़ा है। इस संदर्भ में कुछ जनोपयोगी विचार-बिन्दु यहाँ दिए जा रहे है।
गो संवर्द्धन ग्रामोत्थान के लिए व्यापार दूध का तो नहीं वरन् बैल, गोबर, गौमूत्र, बायोगैस, पशुओं की स्वाभाविक मृत्यु से उपलब्ध अहिंसक चमड़े और हड्डियों तथा उनसे बने उत्पादनों का होगा, गोचर हेतु अपनी थोड़ी थोड़ी जमीन भी देने को राजी हो जायेंगे।
गौशालाओं की प्रबन्ध व्यवस्था वैज्ञानिक और उच्चकोटि की बनानी होगी। तभी देश का अर्थतन्त्र पुनः सुदृढ़ और पर्यावरण स्वच्छ हो सकेगा। सिमटती हुई राज्याश्रित विकास प्रक्रिया का विकल्प अब केवल जीवन पद्धति ही हो सकता है जिसके व्यवस्थित प्रचार प्रसार से अधिक से अधिक परिवार इसे अपनी पवित्र परम्परा मानकर अपनाने लगेंगे और जब उनके पशु दूध देना बन्द करेंगे तब उन्हें वे समीपस्थ गोशाला को दान दे देंगे। औसतन दस गाँवों के समूह के बीच एक समर्थ गोशाला स्थापित हो, ग्रामोत्थान का यह नक्शा देखने में तो अच्छा लगता है लेकिन इसे क्रियान्वित करने के लिए गायत्री परिवार के परिजनों को कड़ी मेहनत करनी होगी।
लक्ष्य है कि हर ग्राम पंचायत यह सुनिश्चित करें कि प्रत्येक गर्भवती महिला और हर बच्चे को आवश्यकतानुसार निःशुल्क गोरस मिले, ताकि अगली पीढ़ी तन्दुरुस्त और संस्कारवान बनकर विकास कार्यों में लग सके। ग्राम महिला मण्डल इसके लिए विशेष रूप से प्रयासरत हो सकता है। इससे गाँवों का आकर्षण बढ़ जाएगा और तब होगा ग्रामोत्थान से सम्पूर्ण क्राँति का मार्ग प्रशस्त ।
दूध की डेरी और गोशाला में अन्तर समझना होगा। दूध की डेरी गाय के दूध का व्यापार करती हैं जब ये गायें दूध कम देने लगती हैं तो इन गायों को बेकार समझा जाने लगता है। इन्हीं परिस्थितियों में ये गायें बूचड़खाने पहुँचती है। जब तक गाय के दूध का व्यापार चलता रहेगा, तब तक गौहत्या, कानून बन जाने पर भी बन्द नहीं होगी। दूध का व्यापार आज भैंस केन्द्रित है। आज की बाज़ार संस्कृति को गौसेवा की श्रद्धा पर आधारित यह विकास प्रक्रिया ही मुँहतोड़ जवाब होगी।
ग्रामोत्थान को व्यापक अर्थ देने के लिए गाँव गाँव में जल और रज के संरक्षण का अभियान चलाया जाना है। सहकारिता और गो संवर्द्धन के लिए शोध प्रसार और प्रशिक्षण के कार्य में लगा हुआ है। शान्तिकुञ्ज के रचनात्मक प्रकोष्ठ माध्यम से उक्त शोध कार्यों का लाभ परिजनों तक पहुँचाया जाता रहेगा।
इसके लिए प्रशिक्षण की एक व्यापक योजना बनायी गयी है। प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत पीठों या समर्थ केन्द्रों को प्रशिक्षण केन्द्रों के रूप में विकसित किया जाना है। इसके लिए जिन केन्द्रों को चुना जाएगा, उनमें निम्नलिखित क्षमताएँ होनी चाहिए -
1. शक्तिपीठ के 3 पूर्ण समयदानी प्रशिक्षक एवं संगठन के रूप में केन्द्र से प्रशिक्षित कर दिए गये हों।
2. यह प्रशिक्षित प्रशिक्षक सम्बद्ध पीठों पर नियमित प्रशिक्षण कराकर क्षेत्र की आवश्यकता के अनुरूप कुटीर/ ग्रामोद्योगों के लिए कुशल शिल्पी (मास्टर क्राफ्टमैन) तैयार करेंगे और उनके माध्यम से लोगों को विभिन्न उद्योगों का प्रशिक्षण देंगे।
3. शक्तिपीठ में निरन्तर प्रशिक्षण चलाते रहने के लिए प्रशिक्षण कक्ष, प्रशिक्षणार्थियों की भोजन व्यवस्था एवं अन्य आवश्यकताएँ सुविधाजनक तरीके से अपने संसाधनों से संपन्न करने की क्षमता उन केंद्रों में होनी चाहिए।
4. प्रशिक्षण कार्य आरम्भ करने के लिए प्रशिक्षणों के विशय में एवं अन्य आवश्यक विवरण की सूचना केन्द्र को भेजकर यहाँ की अनुमति प्राप्त की जा सकेगी।
5. जड़ी-बूटियों का एक लघु उद्यान शक्तिपीठ पर तैयार कर लिया गया हो, जिससे वनौषधि उपचार एक स्वस्थ जीवनचर्या से स्वास्थ्य संबंधी प्रशिक्षण देन में सुविधा रहेगी।
6. स्थानीय बैंक शाखा व नाबार्ड के प्रबन्धक मण्डल से स्वयं सहायता बचत समूह के गठन तथा उसके उपरान्त बैंक से सम्बद्ध करने के लिए संबंध में विचार विमर्श कर लिया गया हो एवं सहमति प्राप्त कर ली गयी हो।
7. स्वयं सहायता बचत समूह अलग अलग गृह उद्योग एवं ग्रामोद्योग चलाने के लिए गठित किए ही जायेंगे । उत्पादित माल के लिए भी वयं सहायता बचत समूह को तैयार एवं प्रशिक्षित कर उनके माध्यम से समुचित बिक्री व्यवस्था के लिए भी क्षमता प्राप्त करनी होगी।
8. उन्हें केन्द्र द्वारा निर्धारित वित्तीय अनुशासनों का अनुपालन करना होगा।
9. शक्तिपीठ स्वयं व्यावसायिक कार्यों में प्रवृत्त नहीं होंगे। वे सही व्यक्तियों को खड़ा करके उन्हें सहयोगपूर्वक आगे बढ़ाने के लिए समर्थ, कुशल सहयोगी की भूमिका भर निभाएँगे ।
युगनिर्माण मिशन की 500 से अधिक समर्थ शक्तिपीठों को रचनात्मक केन्द्रों के फील्ड चैर्प्टस के रूप में विकसित किया जाना है, जहाँ से देश के कोने कोने से आने वाले परिजनों को ग्रामोत्थान के लिए प्रशिक्षित किया जा सकेगा। लक्ष्य यह है कि देश के 6.5 लाख गाँवों को शीघ्र जीवन की जरूरी आवश्यकताओं के लिए आत्मनिर्भर बना दिया जाए।
इस अभियान के अंतर्गत महानगरों के उपनगरों यानि गंदी बस्तियों के उपनगरों, यानि गंदी ग्रामवासियों के जीवन में आशा का संचार करने के लिए एक नारा दिया है - अब गाँव वापस चलें। इसको संभव बनाने के लिए एक प्रश्न कौंधता है। गाँव को आकर्षक कैसे बनाए? जिसके अंतर्गत अगले कुछ वर्षों में 5,00,000 उपनगरीय युवाओं को देहात लौटने के लिए राजी किया जा सकेगा और उन्हें इस आशय से प्रशिक्षित भी किया जाएगा, ताकि वे वहाँ लौटकर अपने पाँवों पर खड़े हो सके। मिशन के सम्पूर्ण क्राँति के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अब गाँव वापस चले का नारा बुलन्द करना है।
देश के अभिजात्य वर्ग को अब आगे बढ़कर सहयोग देना है कि ग्रामोद्योग की सामग्री को देशवासियों को सरलता से उपलब्ध कराने के लिए एक व्यापक बाज़ार तंत्र शीघ्र से शीघ्र खड़ा हो जाए। उसके बिना गाँव प्रधान कृषि प्रधान देश भारत में खुशहाली नहीं लाई जा सकती है। हमारे प्रयास सफल हो जाएँगे तो, यह भी हो सकता है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों जो अपना सामान भारत में उसकी गरीबी के कारण गोरस बेचने में सफल न हो पाएँगी, जिस तक हम ऋषि सत्ता के संरक्षण में अवश्य पहुँच सकते हैं। ऐसा दृढ़ विश्वास हमें रखना ही चाहिए।
व्यासजी ने जनमेजय से कहा-एक बार पंद्रह वर्षों तक वर्षा नहीं हुई इस अनावृष्टि के कारण भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा। असंख्य प्राणी भूख से तड़प कर मर गये। उनकी लाशें घरों में सड़ने लगी।
तब सज्जनों ने इकट्ठे होकर विचार किया कि गायत्री के परम उपासक तपोनिष्ठ गौतम ऋषि के पास चलना चाहिए, वे इस विपत्ति को दूर सकेंगे। वे तब सब मिलाकर गौतम ऋषि के पास गये और कष्ट सुनाया।
आगन्तुकों को सम्मानपूर्वक आश्वासन देकर गौतम ऋषि ने सर्व शक्तिमान गायत्री से उस संकट के निवारण के लिए प्रार्थना की।
जगन्माता गायत्री ने प्रसन्न होकर गौतम ऋषि को समस्त प्राणियों का पोषण कर सकने में समर्थ एक पूर्ण पात्र दिया और कहा-इससे तुम्हारी समस्त अभीष्ट कामनाएँ पूर्ण हो जाया करेंगी। यह कहकर वेदमाता अन्तर्ज्ञान हो गयी और उस पात्र की कृपा से अन्न के पर्वतों जैसे ढेर लगे गये।
गायत्री साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार
(वाङ्मय क्र. 11)
भगवान कृष्ण की चर्चा करते हुए गोपालन एवं उसके साथ जुड़ी ग्रामोद्योग की चर्चा विगत दो लेखों में की जा चुकी है। आज हलधरों (श्री बलराम) एवं गोपालों (श्री कृष्ण व उसके साथी बाल-ग्वाल को या तो भुला दिया गया है या विकृत स्थिति को प्राप्त हो गए हैं कि उन्हें पहचानना मुश्किल हो गया है। हलधर के साथ ऊर्जा का संकट जुड़ा हुआ है।
ऊर्जा का अकाल - हलधर बगैर बैल की ऊर्जा पूर्णतः निष्प्रभावी होती है और आज बैल के महत्व को दिन प्रतिदिन गिराये जाने के प्रयास चल रहे है। यद्यपि कृषि और उद्योग में लगने वाली कुल ऊर्जा का पचास प्रतिशत से अधिक ऊर्जा बैल से ही आज प्राप्त हो रही है। गोपाल हो तो गोवंश पनपे, गोवंश पनपेगा ता बैल की ऊर्जा उपलब्ध होगी, गोबर गौमूत्र से गाँव की भूमि उर्वरा होगी, गाय का दूध सबको उपलब्ध होगा, गोशाला केन्द्रित ग्रामोद्योग सबको रोजगार देंगे और गोचर केन्द्रित कृषि व्यवस्था सबको भरपेट पौष्टिक भोजन देगी।
आधुनिक कृषि की विडम्बना-आधुनिक कृषि का केवल एक ही अभिशाप देखने को नहीं मिल रहा है। रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं से देश की उर्वरा भूमि निस्तेज होती चली गई है। कुछ बड़े बड़े काश्तकार देहात के अर्थतन्त्र पर काबिज हो गये है। गोचर की भूमि आसपास के किसानों की जोत के भाग बन गये है। विकेन्द्रित अर्थतन्त्र के स्थान पर पूरी व्यवस्था का केन्द्रीकरण होता चला गया है, जिससे गरीब पर जीवित भर रहने का भार बढ़ता गया है। देहात के गरीबों को महानगरों की ओर के सिवा कोई और चारा नजर नहीं आया।
महानगरीय उपनगरों की गन्दी बस्तियाँ-देहात के बिखरते हुए अर्थतन्त्र की मार वहाँ के सबसे गरीब, बेसहारा भूमिहीन कृषक मजदूरों पर पड़ी है, जिसके कारण उन्हें आजीविका की तलाश में महानगरों की चमचमाती रोशनी ने आकर्षित किया और वे यहाँ आकर एक के बाद एक गन्दी बस्ती और उपनगरों को बसाते चले गये। कुछ लोग नई नई बनने वाली अट्टालिकाओं के निर्माण में मजदूर बन गये तो कुछ नये नये पनपते अवैध धन्धों में खपते चले गये।
धरती पर स्वर्ग उतारने के सपने तो युगनिर्माण मिशन ने अपने परिजनों को प्रेरित करने के लिए रचे, लेकिन धरती पर नरक कैसा दिखता है, यह इन गन्दी बस्तियों में रहने वाले अभागों ने आरम्भ से ही जाना। यहाँ रहने वाले दुख दर्द, बीमारी बदहाली में जीवन बसर करने वाले सीधे सादे देहाती आज न उस देहात के हैं जहाँ उन्होंने जन्म लिया था और न उस शहर के जहाँ गन्दी बस्तियों में उन्होंने शरण ली है। यह विरोधाभास कब तक चलने वाला है ? यदि प्रेम और निर्माण की धारा इन उपनगरों में नहीं बहाई गई, तो लहू और लोहे की क्राँति अब होना चाहती है।
प्रेम और निर्माण की धारा को इन महानगरों में किस प्रकार पहुँचाया जाए ? उसका सीधा दायित्व आता है महानगरों में निवास कर रहे गायत्री परिवार के परिजनों पर, जिनके घरों में इन झुग्गी-झोपड़ियों के लोग सेवा का काम करते हैं। दूसरा प्रयास महानगरों के समीप के देहाती क्षेत्रों में निवास कर रहे परिजनों द्वारा भी किया जा सकता है। वे अपने रोजमर्रा के कामों के लिए सीपम के महानगर तो आते जाते ही रहते हैं। साप्ताहिक छुट्टी के दिन वे समीपस्थ उपनगर की गन्दी बस्ती में जन्मदिन, पुँसवन, नामकरण, अन्नप्राशन आदि संस्कार तो करा ही सकते हैं। इस प्रकार के व्यापक प्रयासों से कुछ समय बाद इन उपनगरों में से ही युवा परिजन उभरने लगेंगे, जो प्रेम और निर्माण की धारा को प्रगाढ़ करते चलने के लिए सक्रिय हो जाएँगे ।
स्वावलम्बन का प्रशिक्षण
संस्कारों के उपलक्ष्य में आयोजित गायत्री यज्ञों की व्यवस्थित शृंखला चलने से उपनगरों के कई परिवार समूहों को धीरे-धीरे संस्कारित तो किया ही जा सकेगा, उनके प्रयास की प्रक्रिया से इन गन्दी बस्तियों में सफाई का माहौल बनना आरम्भ हो जाएगा और यज्ञीय धूम्र से गन्दगी से शमन भी होना आरम्भ हो जाएगा। इस प्रकार सतत् रूप से प्रयासरत रहने से इन उपनगरों में परिजनों का एक प्रभावी वर्ग उभरने लगेगा, जो हिंसा और घृणा के स्थान पर संस्कार-पद्धति से लोकशिक्षण के दायित्वों को संभालकर पतन-निवारण की दिशा में क्रियाशील हो चलेगा। इन्हीं परिजनों में से प्रत्येक उपनगर से सौ कर्मठ युवा परिजन ढूँढ़ निकालने हैं, जो समीप के किसी न किसी शक्तिपीठ पर स्वावलम्बन का प्रशिक्षण प्राप्त कर अपने मूल देहात की ओर प्रस्थान करने का संकल्प लेंगे। इसके पूर्व उस देहात के क्षेत्र में भी उनके स्वागत की तैयारी की जानी होगी। उनके देहात लौटने पर वे किस प्रकार का व्यवसाय करेंगे, इसकी योजना भी पहले से होगी। उसका विशिष्ट प्रशिक्षण यदि आवश्यक हुआ तो उन्हें समय से दिया जाना होगा। स्वयंसेवी बचत समूह गठन की प्रक्रिया में भी उन्हें सिद्धहस्त बनाना होगा। यह सब आयोजन शान्तिकुञ्ज से प्रशिक्षित उस चयनित शक्तिपीठ को तीन पूर्णकालिक समयदानियों द्वारा सम्पन्न होना है।
आज का स्वतन्त्रता संग्राम - “गाँव स्वावलम्बी बनें” - इन सौ व्यक्तियों को दस - दस के दस समूहों से संगठित करने की कार्यवाही भी देहात वापस लौटने के संकल्प से पहले सम्पन्न करनी होगी, ताकि प्रत्येक समूह अपने समकक्ष दस व्यक्तियों को क्षमतावान् बनाकर उसी देहाती क्षेत्र से संयोजित करें और इस प्रकार 20-20 सदस्यों वाले बचत समूह गठित हो चलें। 20 व्यक्तियों अथवा परिवारों का एक समूह, जिसमें दस उपनगरवासी होंगे और दस देहात के, मिलकर उपयुक्त एवं सुविधाजनक ग्रामोद्योग को चलाना आरम्भ कर, अपने पैरों पर खड़े होने का पुरुषार्थ करने लग जाएँगे । इस प्रकार के संगठन और आयोजन की प्रकारान्तर में गाँव को स्वावलम्बी बना सकेंगे, जिसके लिए शान्तिकुञ्ज में प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई है। “अब गाँव वापस चलें” की योजना का स्पष्ट स्वरूप यही है और इसी के माध्यम से आज का स्वतंत्रता संग्राम लड़ा जाना है, जो हर गाँव के वर्ग के परिवार द्वारा लड़ा जाएगा। शान्तिकुञ्ज में जो छह दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम हाथ में लिया गया है, उसके अंतर्गत प्रयास वह है कि देश की कम से कम 500 सौ शक्तिपीठों को स्वावलम्बन के प्रशिक्षण के लिए तैयार किया जाए। इसी उद्देश्य से शक्तिपीठों को प्रेरणा दी गई है कि वे कम से कम तीन पूर्णकालिक सुयोग्य एवं कर्मठ परिजनों को शान्तिकुञ्ज में छह दिवसीय प्रशिक्षण प्राप्त कराएँ।
महानगरों एवं उनके उपनगरों में निवास करने वाले सभी लोग कितने ही दुर्गुणों को बढ़ाने वाले क्यों न हों, लेकिन भारतीय समाज के एक बड़े दुर्गुण जातिवाद के दुराग्रहों से वे पूर्णरूप में मुक्त हो चुके हैं। उनके इस सद्गुण का लाभ उठाने का समय भी अब आ गया है। जाति-पाँति के भेदभाव वाले भारतीय समाज से इस विष को अब जड़-मूल से निकालना है और उसके लिए उपयुक्त व्यवस्था भी बन रही है। शहरी उपनगरों के जो परिजन देहात लौटकर गाँवों को स्वावलम्बी बनाने का संकल्प लेंगे व शहरों के जाति-पाँति दुराग्रह मुक्त संस्कारों को भी देहात अपने साथ ले जाएँगे । उनके माध्यम से देहात में व्यास इन दुराग्रहों से मोर्चा लेने का भी आयोजन परिजनों, को करना होगा। “अब गाँव वापस चलें” अभियान का यह भी एक मकसद है कि अपने देहात को जाति-पाँति के दुराग्रहों से मुक्त कराया जाए।
गौ सेवा केन्द्रित जीवन - पद्धति ही चलेगी - विगत पचास वर्षों की राज्याश्रित विकास प्रक्रिया अब अपनी अंतिम साँसें गिन रही है। अब समाज को अपनी समस्याओं के समाधान तथा सामुदायिक विकास का एक नया आयाम तलाशना है, जो अधिक विश्वसनीय और कारगर हो। इसी परिप्रेक्ष्य में गौ सेवा - केन्द्रित जीवन-पद्धति जो इस देश की साँस्कृतिक धरोहर है, को पुनर्जीवित करने का अभियान छेड़ा गया है। गौ सेवा केन्द्रित जीवन पद्धति को सर्वसामान्य के लिए सुविधाजनक बनाने के लिए गौशालाओं का एक देशव्यापी जाल खड़ा करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। तब गौ-संवर्द्धन आम लोगों के लिए सुविधाजनक तो ही हो जाएगा, गौ हत्या से भी गौ वंश को बचाया जा सकेगा। गौ हत्या को रोकने के विषय में घड़ियाली आँसू पिछले पचास वर्षों से बहाये जा रहे हैं । लेकिन गौ संवर्द्धन की व्यवस्था न होने से गौ-हत्या बेरोक - टोक चल रही है। इसी ही गौ सेवा की श्रद्धा पर आधारित विकास प्रक्रिया की संज्ञा दी गई है, जो निश्चय ही अधिक कारगर और विश्वसनीय होगी। यह विकास-प्रक्रिया विकेन्द्रित तो होगी ही, उसके माध्यम से व्यवस्था के और अधिक केन्द्रीकरण को जो आज की अर्थ-व्यवस्था का अभिशाप है, निरुत्साहित भी किया जा सकेगा। व्यवस्था के केन्द्रीकरण का कहर सबसे अधिक समाज के गरीबों को झेलना पड़ता है और उसका जनसामान्य द्वारा मुकाबला गौ सेवा केन्द्रित जीवन-पद्धति से ओत-प्रोत विकास - प्रक्रिया द्वारा किया जा सकता है। संवेदनाशून्य होता जा रहा हमारा समाज पुनः संवेदनशील हो चलेगा।
सिमटती हुई राज्याश्रित विकास प्रक्रिया के खाली स्थान को भरने के लिए एक और होड़ मची हुई है। जो सात समुद्र पार से प्रेरित है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को माध्यम से देश के अर्थतन्त्र का भूमण्डलीकरण अथवा अर्थव्यवस्था के उदारीकरण जैसे सम्बोधन परोक्ष में भारत की अर्थव्यवस्था पर उनके द्वारा कब्जा कर लिये जाने का उनके लिए सुनहरा अवसर प्रस्तुत करते हैं इसी परिप्रेक्ष्य में यह याद करना देश के हित में होगा कि पचास वर्षों पूर्व प्राप्त राजनैतिक आजादी आर्थिक आजादी को खो देने से स्वतः हाथ से जाती रहेगी। आज जब वह भागवत् मुहूर्त आ पहुँचा है, जब देश का आत्मगौरव जाग रहा है तथा निष्कलंक प्रज्ञावतार का अवतरण हो रहा है, गौ सेवा केन्द्रित जीवन-पद्धति के प्रचार-प्रसार के अभियान, जो गौ शालाओं के देशव्यापी जाल के स्थापित होने से ही सफल हो सकता है, को प्रभावी बनाने के लिए थोड़े - से ही प्रयास के महा फल देखने को मिल सकता है। यहीं आज देश की अर्थ-व्यवस्था को स्वतन्त्रता संग्राम का स्वरूप है, जो हर गाँव, हर खेत और हर घर से लड़ा जाना है। यह स्वतंत्रता संग्राम लहू और लोहे से नहीं वरन् प्रेम और निमार्ण की धारा बनाकर लड़ा जाना है। इसी से गौ चर केन्द्रित कृषि - व्यवस्था का प्रादुर्भाव होगा, जो देश को अन्न और जल से भरपूर कर देगा और इसी से विकसित होगी गौशाला केन्द्रित ग्रामोद्योग व्यवस्था, जो हर हाथ को रोजगार देगी। “अब गाँव वापस चलें” बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को केन्द्रीकृत विकास प्रक्रिया का मुकाबला करने के लिए देशवासियों को दिया गया युगनिर्माण मिशन का मन्त्र है जो एक बार फिर देश के सभी गाँवों को स्वायत्तता प्रदान करेगा। यह होगी वास्तव में “निष्कलंक सम्पूर्ण क्रान्ति" जो भारत से आरम्भ होकर फिर पूरे विश्व को अपना शीतल और सुखद स्पर्श प्रदान करेगी। भविष्य में पुनः जगद्गुरु का पद प्राप्त करने वाले भारत देश की आज की पीढ़ी पर यह दायित्व आ पड़ा है कि इस भागवत् मुहूर्त पर वे सोते ही न रह जाएँ। युगनिर्माण करने के पुण्य से वंचित न हो जाएँ। उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्यवरान्निबोधत।
सितम्बर 1973 (गतांक से आगे)
मित्रों, गायत्री मंत्र की, गायत्री माता की - भगवान की मूर्तियाँ हमारे घरों में होनी चाहिए। लेकिन इससे भी ज्यादा शानदार, इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि हर इनसान के, हर व्यक्ति के और हिन्दू के हृदय में इनकी स्थापना की जाए। गायत्री मंत्र केवल हिन्दुओं के लिए ही नहीं है, वरन् वह प्रत्येक धर्मावलम्बी व मजहब के सामने वालों के लिए है। हमें उन्नति करनी है, तो इन प्रतीकों को फिर अपनाना पड़ेगा, जिसको हम गायत्री कहते हैं। जिसकी स्थापना शरीरों की गयी थी। स्थापना मंदिरों में नहीं, पूजा - घरों में ही नहीं, बल्कि प्रत्येक हिन्दू के शरीर के ऊपर इसकी स्थापना हुई। कैसे स्थापना हुई ? शिखा सूत्र के रूप में हुई। शिखा क्या है ? शिखा - एक विवेकशीलता को देवी, ज्ञान की देवी हमारे मस्तिष्क के ऊपर हावी है। मस्तिष्क के ऊपर हावी है और झण्डे के रूप में फहराती है। शिखा क्या है ? शिखा गायत्री है। जिस प्रकार से शंकर भगवान का सिम्बल, शंकर भगवान का चित्र हम गोल-मटोल बना देते हैं। और मंगलमय हो लेते हैं, उसी तरह से गायत्री माता की मूर्ति के रूप में हमारी शिखा के ऊपर रखा गया है। हम शिखा की स्थापना कराएँगे और हम आदमी से कहेंगे कि आपको शिखा जरूर रखनी चाहिए, क्योंकि ये गायत्री माता की प्रतीक है, गायत्री माता की मूर्ति है। हम हर आदमी से कहेंगे कि आपको अपने कंधों पर ऊपर सामाजिक कर्तव्य, नैतिक कर्तव्य की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। वे कर्तव्य क्या हैं ? कर्म क्या हैं ? उसको हम यज्ञोपवीत कहते हैं, जो हमारे कंधे पर रखा हुआ है। कर्म करने की जिम्मेदारी हमारे कंधे पर रखी हुई है। कर्म करने की जिम्मेदारी हमारे हृदय पर टँगी रहनी चाहिए। कर्म करने की जिम्मेदारी हमारे कलेजे से चिपकी रहनी चाहिए। कर्म हमारे आगे भी रहना चाहिए, कर्म हमारी पीठ के ऊपर भी रहना चाहिए। ये क्या है ? ये है यज्ञोपवीत। यज्ञोपवीत हमारे कंधे पर रखा हुआ है, हमारे कलेजे पर रखा हुआ है, हमारे हृदय पर रखा हुआ है हमारी पीठ पर रखा हुआ है। हमने चारों ओर से अपने आपको खींचकर बाँध दिया है, जिससे कि यह सतत ख्याल बना रहे कि सामाजिक कर्तव्य, नैतिक कर्तव्य और पारिवारिक कर्तव्य से हम जुड़े हुए हैं और बंधे हुए है।
जानवर के गले में रस्सा बाँध देते हैं और फिर उसे खूँटे से बाँध देते हैं, ताकि दायरे में रहा करें, कानून में रहा करे। हमारे ऋषियों ने भी हमको एक रस्से से बाँध दिया है, जो हमारे कंधे से बँधा हुआ है, हमारे हृदय से बँधा हुआ है हमारे कलेजे से बँधा हुआ है, हमारी पीठ से बँध हुआ है। चारों ओर से हमें जकड़कर बाँध दिया है और हमारे विवेक को, हमारी अक्ल को बाँध दिया है। यह क्या है ? यह है - यज्ञोपवीत और शिखा। शिखा और यज्ञोपवीत क्या है ? बताइए। ये हैं हमारे गायत्री मंत्र और यज्ञ। ये दोनों के दोनों प्रतीक हैं। यज्ञ से उपवीत किया हुआ, यज्ञ से प्राण प्रतिष्ठा किया हुआ धागा। इसका नाम क्या है ? यज्ञोपवीत, जो हमारे कंधे पर स्थापित है और शिक्षा ? ये गायत्री मंत्र की व्याख्या है, जो हमारे अपने मस्तिष्क रूपी किले के पर छाई रहती है और हमारे झण्डे के रूप में फहराती रहती है।
यह शरीर ही हमारा किला है। यह हमारा लाल किला है। स्वतंत्रता दिवस के समय हमने लाल किले के ऊपर झण्डा फहरा लिया था। कब फहरा लिया था ? आज से छब्बीस - सत्ताईस वर्ष पहले जिस दिन अंग्रेज यहाँ से विदा हुए थे, उस दिन हमने अपने दिल्ली वाले लाल किले के ऊपर तिरंगा झण्डा फहराया था। इसी तरह भारतीय संस्कृति का, मानवी मूल्यों का सद्गुणों का झण्डा हमारे मस्तिष्क के ऊपर फहराता है। यह शरीर हमारा किला है। यह हमारे व्यक्तिगत जीवन का किला है। इसके ऊपर हम झण्डे की स्थापना करते हैं और व्यक्तिगत शिखा की स्थापना करते हैं। अब हम शिखा को प्यार करना और मुहब्बत करना सिखाएंगे। किले को प्यार करना और किले को मुहब्बत करना अब हम सिखाएंगे लोगों को। हम घर-घर जाएँगे इसे सिखाने, क्योंकि हिन्दू धर्म महान है, हिन्दू धर्म विश्व का धर्म है, ये मनुष्यों का धर्म है। हिन्दू धर्म कोई मजहब नहीं है। अभी-अभी हमने एक किताब लिखकर तैयार की है, शायद एक-दो महीने के छपकर तैयार हो जाए। हिन्दू धर्म के जो सारे सिद्धान्त हैं, वे मात्र हिन्दू लोगों के लिए ही नहीं है, बल्कि ये यूनीवर्सल हैं। ये विश्वव्यापी हैं, मानवमात्र के लिए हैं। हर देश के निवासी के लिए हैं। चाहे वह हिन्दू धर्म को मानता हो, चाहे न मानता हो। ये सारे के सारे सिद्धान्त मानवमात्र के सिद्धान्त हैं, विश्वव्यापी सिद्धान्त हैं, सार्वभौम सिद्धान्त हैं। सारे के सारे धर्मों का निचोड़ हमारे हिन्दू धर्म में है।
हिन्दू धर्म का मूल क्या है ? हिन्दू धर्म का मूल वह है - जिसको हम शिक्षा कहते हैं। जिसको हम यज्ञोपवीत कहते हैं अब हम इस झण्डे को नष्ट नहीं होने देंगे और हर हिन्दू को कहेंगे कि आप इसको प्यार करना सीखिये । आप भी अपनी संस्कृति को प्यार करना सीखिये, आप अपनी माँ को प्यार करना सीखिये और आप अपने बाप को प्यार करना सीखिये,। ये हमारा महत्वपूर्ण क्रिया-कलाप है और इस क्रिया - कलाप का हम विस्तार करेंगे और आपके मनों में और जनता के मनों में स्थापित करेंगे। जब मुसलमान भारत आये थे, तब उन्होंने कहा था कि सुनो हम तुम्हारी चोटी काटना चाहते हैं। अब तुम्हारी चोटी को उतार देंगे। लोग बोले ठीक है, ताकत आपके हाथ में है और फौज आपके साथ में है और बन्दूक आपके हाथ में है। हम क्या कर सकते हैं ? हथियार हमारे पास नहीं है। आप जरूर हमारी चोटी काट सकते हैं, लेकिन एक मेहरबानी कीजिए। क्या मेहरबानी करें ? आप इस चोटी को यहाँ से न काट कर गर्दन से काट दीजिए। कारण, चोटी की जड़ यहाँ तक आई है। यदि आप इसे यहाँ से काट डालेंगे तो हमको संतोष बना रहेगा और कोई हमको दुःख का एहसास नहीं होगा और शान्तिपूर्वक दुनिया से चोटी भी चली जाएगी और हम भी चले जाएँगे । अतः आप हमारा सिर काट डालिए। लाखों व्यक्तियों के सिर को मुसलमानों ने कलम करा दिया था।
अपनी शिखा और जनेऊ को हम कितना प्यार करते थे। आपको तो नहीं मालूम, पर हमें मालूम हैं। आपको तो साढ़े चौहत्तर का आशय भी नहीं मालूम कि किसे कहते हैं साढ़े चौहत्तर ? पहले जमाने में पुराने जमाने में लोग लिफाफे पर साढ़े चौहत्तर नम्बर डालते थे। आपको मालूम है क्यों डालते थे ? जो कोई उस लिफाफे को खोल लेगा, उसको साढ़े चौहत्तर मन जनेऊ, जो अगणित हिन्दुओं ने पहन रखे थे और काट डालें गये थे मुसलमानों के द्वारा, उसकी जो हत्या उन्हें पड़ी होगी, पाप पड़ा होगा, उस आदमी को भी पाप पड़ेगा, जो हमारी चिट्ठी को बिना बताए हुए खोल लेगा और चुपचाप पढ़ लेगा और फिर चिपका देगा। बंद कर देगा। उतना ही उसे पाप पड़ेगा। पता नहीं पाप पड़ता था कि नहीं और वह साढ़े चौहत्तर मन जनेऊ थे कि नहीं। मैं इस बहस में नहीं जाऊँगा। लेकिन भावना ये थी कि हम लोगों ने साढ़े चौहत्तर मन जनेऊ और शिक्षाएँ कटवा दी थीं और उसके लिए आप अंदाज लगा लीजिए, साढ़े चौहत्तर मन जनेऊ जिस तराजू पर तौले गए होंगे उसके लिए कितना खून बहाया गया होगा ? कितनी गर्दन कटाई होंगी ? हमने बहुत गर्दन कटाई हैं। हमने अपना बहुत खून बहाया हैं। क्योंकि हम अपनी शिखा को प्यार करते हैं। जनेऊ को हम प्यारे करते हैं। अपनी चोटी से प्यार करते हैं हम। शिवाजी न होते तो चोटी भी न होती सबकी। चोटी की रक्षा करने के लिए राणाप्रताप, शिवाजी और गुरुगोविन्द सिंह ने अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। और किसका-किसका नाम बताएँगे आपको कि चोटी के लिए कितनों ने अपनी जान न्यौछावर कर डाली, कुर्बानी कर डाली। अब यह चोटी हमारे हाथ से चली गई, नीचे आ गई। अब यह खिसक रही है। कौन काट रहा है इसको मुसलमान काट रहे हैं इसको ? नहीं, ईसाई भी नहीं काट रहे हैं इसको ? तो फिर कौन काटता है ? इसको वो काटता है, जिसको हम इस युग की अनास्था कहते हैं। यही अनास्था चोटी को काटती चली जाती है। आप पता लगा लें कि किन-किन बच्चों के सार पर चोटी है ? आपको एक भी बच्चे के सिर पर चोटी दिखाई नहीं पड़ेगी, यही हाल जनेऊ का है।
अगर हम जनेऊ का पता लगाने के लिए चलें और किसी कालेज, किसी विश्वविद्यालय में जाएँ और बच्चों को नंगा कर के देखें और पूछे कि बच्चे तुम्हारे पास जनेऊ है क्या, जरा हमको दिखाना। उत्तर मिलेगा - जी नहीं। अब जनेऊ खत्म हो गया। हमारे - आपके जैसे दकियानूसी कहलाने वाले लोगों के ऊपर शायद जनेऊ रखा भी हो, लेकिन वहाँ भी दकियानूसी शब्द लगा हुआ है। जनेऊ हमें जँचता नहीं है। उल्टे कहा जाता है कि जो कोई जनेऊ पहनेगा, उसके घर से मौत हो जाएगी। हमारे यहाँ तो सात पीढ़ी से जनेऊ नहीं पहना गया। बेटे को हम जनेऊ नहीं पहना गया। बेटे को हम जनेऊ पहनाएँगे तो हमारी अम्मा नाराज हो जाएगी और यह कहेगी कि हमारे तो बाप - दादाओं ने भी नहीं पहना। इसे कहाँ से ले आया हमारे घर में, कोई और अनिष्ट हो जाएगा। और अशुभ हो जाएगा। जनेऊ को तू उतार दे। हमारे घर में जँचता नहीं है। जनेऊ हम कैसे पहनेंगे ? हमारे तो पिता जी जिन्दा है। क्या हम मार डालें पिता की ? नहीं आप मार न डालें पिता को। तो, तो क्या करेंगे। जब तक हमारे पिता जिन्दा हैं। तब तक हम जनेऊ कैसे पहन सकते हैं? बाप जनेऊ पहनेगा। बाप जब मर जाएगा तो बेटा जनेऊ पहनेगा । अजीब किस्सा है कि अगर बाप के सामने बेटा पहनेगा तो बाप मर जाएगा। अरे बाबा, ये क्या कहता है तुम कि जनेऊ हमारे वंश में और हमारे खानदान में किसी ने नहीं पहना।
दुनिया में कौन-कौन से रिवाज चले हुए हैं कि जनेऊ कौन पहनेगा ? मर्द पहनेगा, औरत नहीं पहनेगी। लड़कियों को हम धन्यवाद देते हैं। क्योंकि शिखा की लाज, शिखा की इज्जत इन लोगों ने रखी ली हैं। मर्द से कहते हैं कि अरे बाबा छह इंच की न सही तीन इंच की चोटी रख ले, पर इनको 3 इंच की रखने में भी परेशानी मालूम पड़ती है। इन छोकरियों में से किसी की एक फुट लम्बी है, तो किसी की डेढ़ फुट लम्बी है। किसी की 2 फुट लम्बी है तो किसी की ढाई फुट लम्बी है। ये भी नहीं है कि कोई चोटी हो, वरन् लड़कियों की मोटी-मोटी चोटियाँ है। जब वे अपने खाविंद को देखती है कि वह एक ऐसा सफाचट है कि उसने चोटी काट ली है, तो वह दो भी रख लेती हैं। एक अपनी चोटी रख लेती है और दूसरी अपने खाविंद के लिए। जनेऊ भी तो हम दो पहनते हैं - एक अपना पहनते हैं । इसी तरह लड़की कहती है कि एक चोटी अपने खाँविद के बदले की रखाएँगी और एक अपने बदले की। यही तो बात है कि जो धर्म बचा हुआ है, वह इन लड़कियों की वजह से बचा हुआ है। ये लड़कियाँ न होती तो इस चोटी का पता लगाना मुश्किल पड़ जाता। किसे कहते हैं चोटी और कैसे धारण की जाती है ? चोटी कहाँ से आती है ? चोटी की कौन रखवाली करता है ? चोटी की हम रक्षा करेंगे और जनेऊ की हम रक्षा करेंगे।
मित्रों ! हमारा यह उद्देश्य होना चाहिए, हमारा यह शिक्षण होना चाहिए, प्रयास होना चाहिए कि जहाँ कहीं भी हम यज्ञ कराने जाएँ वहाँ युवकों से हमें यह पूछें कि आप हिन्दू धर्म को, मजहब को मानने वाले हैं। हाँ ! तो फिर ये बताइये, कि पुलिस या सिपाही अपना सिम्बल पहने रहता है, उसके कमर में एक पेटी बँधी रहती है और उसके ऊपर लगा रहा है एक पील का बिल्ला। पीतल के बिल्ले पर क्या लिखा रहता है ? ‘यूपीपी’ लिखा रहता है। पहले अँगरेजी में लिखा रहता था और जब हिन्दी में लिखा रहता है - उत्तर प्रदेश पुलिस - उ0प्र0प0’ लिखा रहता है। पीतल का बिल्ला न हो किसी के पास तो समझ लीजिए कि वह सिपाही नहीं है और कमर में पेटी बाँधी हुई न हो तो समझ लीजिए वह पुलिस का सिपाही नहीं है। सिपाही की कमर में पेटी बाँधनी चाहिए।
जब कभी किसी का फौज में कोर्ट-मार्शल होता है, तो सबसे पहले यह काम किया जाता है कि उसकी पेटी उतार जी जाती है, उसका बिल्ला उतार लिया जाता है और उसको ‘क्रिमिनल’ मान लिया जाता है तथा उसको लाइन में खड़ा किया जाता है फिर उसका कोर्ट-मार्शल किया जाता है। और यह कहा जाता है कि तुम हमारी इज्जत मत खराब करो। पेटी की इज्जत - राष्ट्र की इज्जत है। तुमने ऐसे खराब काम किए हैं, इसलिए सबसे पहले तुमको समाज दी जाएगी कि तुम्हारी पेटी और तुम्हारा बिल्ला हम जब्त कर लेते हैं। पुलिस में भी यही होता है और फौज में भी यही नहीं किया, हम पुलिस के सिपाही हैं कि नहीं, हम फौज के सिपाही है, कि नहीं, हम हिन्दू धर्म के सिपाही हैं कि नहीं, हम हिन्दू धर्म के दीक्षित हैं कि नहीं, इसकी पहचान आपके शिखा और सूत्र से होती है। अगर आप हिन्दू धर्म में दीक्षित हैं तो लाओ वह निशान, आपके कंधे पर ‘यू0पी0पी0’ लिखा हुआ है कि नहीं और कमर में पेटी बाँधी हुई है कि नहीं और अगर आपकी पेट छीन ली किसी ने तो आपको यह कहना पड़ेगा कि पुलिस में से हमें बर्खास्त कर दिया गया - फौज में से बर्खास्त कर दिया गया और हमारा कोर्ट-मार्शल किया गया। अगर आपका बिल्ला छीन लिया गया, पेटी छीन ली गई, जनेऊ छीन लिया गया और आपकी शिखा उतार ली गई तो फिर इसका मतलब यह होगा कि आपको हिन्दू धर्म में से बर्खास्त कर दिया गया। हिन्दू धर्म से कोई और धर्म होगा आपका।
हमारी यही तो निशानियाँ थीं। अब हम पहले निशानियों को जिन्दा करेंगे। निशानियों को जिन्दा करने के बाद उसकी जो शिक्षायें हैं, जो कोई भी दिशाएँ हैं, उसकी जो भी प्रेरणाएँ हैं, जो भी निष्ठाएँ हैं, उन्हें हम लोगों के हृदय में प्रवेश कराएँगे, इसके लिए पहले हम सिम्बल स्थापित करेंगे। इसके बाद हम यह करेंगे कि जहाँ कहीं भी मित्रों, हमारे यह होंगे, वहाँ पर ध्यान देना पड़ेगा, जिस तरह से छोटे बच्चों को मुण्डन-संस्कार किया जाता था, अब हमको बड़ी उम्र वालों का मुण्डन - संस्कार कराना पड़ेगा। छोटे बच्चों का मुण्डन-संस्कार क्या है ? मुण्डन - संस्कार हरेक के यहाँ पर होता है और हिन्दू यह चाहता है कि हमारे बच्चों का मुण्डन हो और वह भी गंगाजी पर हो, जमुनाजी पर हो। देवी के सामने हो। ये मुण्डन क्या है ? मुण्डन कोई संस्कार नहीं है। यह शिखा स्थापना का संस्कार है। चोटी हम रखा लेते हैं, बाकी बालों को काट देते हैं। बाकी बालों को नहीं काटेंगे तो आप शिखा रखाएँगें कैसे ? इसलिए शिखा को रखाने के लिए हमको बाकी बाल कम कर देने पड़ते थे। इसका नाम क्या था मुण्डन-संस्कार मुण्डन-संस्कार मित्रों कन्या का भी करना पड़ता है और बच्चों का भी कराना पड़ता है। जब तक मुण्डन - संस्कार नहीं होगा, शिखा नहीं रखाएँगें, तब तक हिन्दू कैसे कहलायेंगे ? हिन्दू होने की निशानी ही मुण्डन-संस्कार है। लेकिन आज हमारी शिखाएँ गायब हो गई है, अतः इस संस्कार को हम फिर से शुरू करेंगे। हम यज्ञ के लिए जो स्थान तलाश करेंगे। वहाँ सबसे पहले यह पूछना शुरू करेंगे कि आपके सिर पर शिक्षा है कि नहीं और जो कहेगा कि शिक्षा नहीं, है तो उससे यह प्रार्थना करेंगे आपका मुण्डन-संस्कार होना आवश्यक है। मुण्डन - संस्कार के लिए शायद वह तैयार न हो तो यह कहना पड़ेगा कि आप इतनी कृपा कीजिए कि आपके तीन-तीन इंच के जो बाल हैं, उन्हें एक-एक इंच कम करा दीजिए। एक इंच बाल कम करा देंगे तो जहाँ कहीं भी शिखा आपके स्थान पर बनी रहती है, वहाँ एक इंच बाल बड़े हो जाएँगे । आपको छह महीने या साल भर बाद फिर से यदि अपने बाल कम कराने पड़े तो फिर एक इंच बढ़ा देना। इस तरह आपकी शिखा दो-तीन इंच बड़ी हो जाएगी और इस तरह आपकी शिखा की स्थापना हो जाएगी। आप शुरुआत अभी से कीजिए। जाइए नाई से हजामत बनवाकर आइए और मुण्डन-संस्कार कराकर आइए।
मित्रों, मुण्डन-संस्कार हमारे हिन्दू धर्म का मूल है। लोग गंगाजी जाते हैं, जमुनाजी जाते हैं, हरिद्वार आते हैं, सब जगह मुण्डन होते हैं। आप मध्यप्रदेश जाइए और बिहार जाइये, सब जगह गंगा या नर्मदा किनारे मुण्डन होता हुआ चला जा रहा है। जो लोग दक्षिण भारत में जाते हैं, वे वहाँ देखते हैं कि जो विधवाएँ होती है वे सब अपने सिर के पूरे बाल कटा कर के आती हैं। वहाँ पर बाल काटने का और कटे हुए बालों का ठेका होता है लाखों रुपए का। सारे के सारे कटे हुए बालों को इकट्ठा कर लेते हैं और फिर उनको विलायत भेजते हैं। लाखों रुपये का सौदा होता है इनका। जो सुहागिन हैं उनको नहीं कटाना पड़ता, पर जो सुहागिन नहीं है, या जो विधवा हो जाती है, उनको बाल कटाने पड़ते हैं, मुण्डन कराना पड़ता है। साथियों, मुण्डन के बारे में हमें लोगों को शिक्षा देनी पड़ेगी और यज्ञोपवीत के बारे में यह ये फिजा पैछा करनी पड़ेगी। जनेऊ के बारे में यह बहम हमें निकालना पड़ेगा कि ये पंडित के हिस्से का है और ये बनिये के हिस्से का है या क्षत्रिय के हिस्से का है। जनेऊ पहनने का अधिकार किसी एक वर्ग विशेष के हिस्से का नहीं होता। ये अटूट है, मजबूत है, शानदार है और हर आस्तिक के लिए है।
यज्ञोपवीत धारण करने के कुछ नियम हैं, कुछ मर्यादाएँ हैं, जिन्हें जानना आवश्यक है। यज्ञोपवीत को छह महीने में बदलना चाहिए, क्योंकि पसीने से छह महीने में वह मैली पड़ जाती है। और धागे कमजोर हो जाते हैं। अतः हर छह महीने बाद यज्ञोपवीत के धागे को बदल देने चाहिए। सूर्यग्रहण पर भी बदल देते हैं, चंद्रग्रहण पर बदल देते हैं, कई बार बदलते हैं यदि ऐसा नहीं हो पाता तो कम से कम छह महीने में तो बदल देने चाहिए। छह महीने के लिए हमने इसलिए कहा है कि छह महीने में जनेऊ पुरानी पड़ जाती है। महिलाएँ प्रायः हर महीने अपना जनेऊ बदल लेती हैं और नया धारण कर लेती है। इसी तरह कई लोग महीने में एक बार बदलते हैं। पैसे, दो पैसे, पाँच पैसे का जनेऊ आता है। वैसे तो लोग अन्य मदों में ढेरों पैसा खर्च कर देते हैं, तो महीने भर में एक जनेऊ पर खर्च क्यों नहीं कर सकते हैं ? उससे क्या आफत आ जाएगी ? अतः हमको यज्ञोपवीत की स्थापना करनी पड़ेगी और हम उसे व्यापक आन्दोलन के रूप में चलाएँगे। जहाँ कहीं भी हमारे यज्ञ होगा, जो कोई भी व्यक्ति हमारे यज्ञ में शामिल होने का इच्छुक होगा, उनसे हम ये कहेंगे कि यज्ञोपवीत करा लीजिए और जनेऊ पहनेंगे तो हमारी अम्मा नाराज हो जाएगी। अम्मा नाराज हो जाएगी, तो आप ऐसा कीजिए कि यदि यज्ञ में शामिल होना चाहते हैं तो आपको जनेऊ हम पहना देते हैं, आप पहन लीजिए। इसे आप चौबीस घण्टे पहन लीजिए। चौबीस घण्टे के बाद आप इसे विसर्जित कर देना। यदि आप हवन में शामिल होना चाहते हैं तो जनेऊ जरूरी है। जनेऊ हमारे हिन्दू धर्म का अक्षुण्ण अंग है। इसलिए इसे अपनाना शुरू कीजिए, अभ्यास करना शुरू कीजिए। अब हम हवन को व्यापक बनाने की सोच रहे हैं तो यज्ञोपवीत को भी व्यापक बनाना पड़ेगा। हवन-यज्ञ और यज्ञोपवीत वास्तव में एक ही चीज है।
यज्ञ से ही मनुष्य को मुक्ति हासिल नहीं होती। इसके लिए अपने अंतराल में छिपी दिव्य-ज्योति को जाग्रत करना पड़ता है। यज्ञ की अग्नि तो हवन-कुण्ड में समाप्त हो जाती है, पर अखण्ड-ज्योति तो कई-कई दिन रखी जाती है। अखण्ड-ज्योति समष्टि के अनंत प्रकाश की प्रतीक है। कितने ही मंदिर ऐसे होते हैं जहाँ अखण्ड-ज्योति की रक्षा की जाती थी। अब वे कहाँ रहे जहाँ अखण्ड दीपों की रक्षा की जाती हो। अखण्ड नियम और अखण्ड दीपक की रक्षा एक ही बात है। ये तो किन्हीं-किन्हीं ऋषियों के यहाँ और किन्हीं-किन्हीं महत्वपूर्ण व्यक्तियों के यहाँ पाई जाती है। हमने भी अखण्ड-ज्योति जलाई है, ताकि आप अखण्ड-ज्योति को और गायत्री माता को अपने कंधों पर, अपने हृदय पर रखे, साथ ही साथ और लोगों के कंधों पर, अपने हृदय पर रखें, साथ ही साथ और लोगों के कंधों पर भी उन्हें स्थापित करें। यह काम आपको करना ही पड़ेगा । इसका यह नियम है कि स्वयं प्रकाशित हों और अन्यों को भी प्रकाशित करें, प्रेरित करें। यह एक नियम है, एक कायदा है। ये निष्ठाएँ हमको फिर से अपने हिन्दू धर्म में पैदा करनी चाहिए और विश्व में सारे के सारे लोगों में पैदा करनी चाहिए। इससे रीति और रस्म बदलकर रहेंगी। लेकिन अगर हमने यह मानकर रखा कि केवल यज्ञोपवीत करा लेने, जनेऊ पहन लेने और शिखा रखा लेने भर से हमारी तरक्की हो जाएगी, तो ऐसा नहीं समझना चाहिए।
अभी मैं आपको मूर्ति-पूजा और बुत-परस्ती के बारे में कह रहा था। ठीक इसी तरह अगर आपने शिखा रखी और यज्ञोपवीत पहना, लेकिन शिखा रखने के बाद और यज्ञोपवीत पहनने के बाद में आपने उसका मूल्य समझा नहीं, उत्तरदायित्व समझा नहीं, शिक्षा को समझा नहीं, प्रेरणा को समझा नहीं, हकीकत को समझा नहीं तो आपको उससे उपेक्षा पैदा होती चली जाएगी और हमारे बच्चे जनेऊ पहनने से इनकार करेंगे हमारे बच्चे चोटी रखने से इनकार करेंगे।
आज हमारे हिन्दुओं के बच्चों ने इनसे क्योंकि उन्हें किसी ने भी ये बताया नहीं कि आखिर ये क्या है ? हम लोगों ने इसे यज्ञोपवीत क्यों पहनाई जाती है और ये क्या याद दिलाती है ? जनेऊ पहना तो दिया आपने, जनेऊ पहनाने की दक्षिणा भी दे दी पंडित जी को और हवन भी करा दिया और ब्रह्मभोज भी करा दिया-दो हजार रुपए भी खर्च कर दिए, लेकिन यज्ञोपवीत पहनने के बाद जब बच्चे ने पूछा-पिताजी ये क्या है ? इसे क्यों पहनते हैं ? हमें क्यों जनेऊ पहनाया गया है ? तब आपका जवाब होता है- चुप बे, ज्यादा बोलता है। हमारे बाप-दादा पहनते थे, इसलिए हम भी पहनते हैं। हम ब्राह्मण है। तुझे शर्म नहीं आती-पूछता है क्यों पहनते हैं ? सभी ब्राह्मण जनेऊ पहनते हैं। लेकिन पंडित जी ब्राह्मण तो सब पहनते हैं, पर क्यों पहनते हैं ? आखिर ये क्या चीज हैं ? चुप रह! क्यों पहनते हैं ? पंडित जी-पंडित जी, हर वक्त धर्म के बारे में पूछताछ का जवाब देने में यदि आप समर्थ न हो पाए तो मित्रो, आपकी निष्ठा कमजोर होती चली जाएगी और हमारी साँस्कृतिक परम्पराएँ-संस्कार परम्पराएँ विलुप्त होती चली जाएँगी। अतः संस्कार परम्परा के बारे में आपको बताना पड़ेगा, शिखा के बारे में बताना और समझाना पड़ेगा । अगर आपने इस संबंध में बताना और समझाना पड़ेगा, जनेऊ के बारे में बताना और समझाना पड़ेगा । अगर आपने इस संबंध में बताना और समझाना शुरू कर दिया तो एक भी हिन्दू का बच्चा यह नहीं कह पाएगा कि हमने यज्ञोपवीत तो करा कह पाएगा कि हमने यज्ञोपवीत तो करा लिया, पर हम जनेऊ नहीं पहनेंगे।
आप पूरे यूरोप में जाइये, वहाँ तो हमसे अधिक पढ़े-लिखे लोग हैं। हमारे बच्चों को तो अंग्रेजी आती भी नहीं है, मैट्रिक पास हैं। लेकिन कोई जनेऊ नहीं पहनता और साहब बना फिरता है। जबकि सारे के सारे यूरोप में आपको सब के सब शिक्षित आदमी मिलेंगे। कोई आदमी ग्रेजुएट से कम नहीं मिलेगा। जो आदमी दिन में नहीं पढ़ सकते, वे रात में पढ़ते हैं और ग्रेजुएट हो जाते हैं। लेकिन आपको मालूम होना चाहिए कि कोई भी आदमी, कोई भी ईसाई कहीं भी निकलता है तो अपनी प्रॉपर ड्रेस में निकलता है। जिसमें ‘टाई’ भी शामिल है। टाई क्या है ? टाई ईसाइयों का यज्ञोपवीत है। ‘क्रूस’ जिसमें ईसा-मसीहा को फाँसी लगाई गई थी। टाई उस फाँसी का प्रतीक है। प्रत्येक ईसाई, जिसमें कि बड़े से बड़ा आदमी शामिल है और छोटे से छोटा भी शामिल है या जो भी ईसा-मसीह में विश्वास करता है, यकीन करता है वह गले में फाँसी का फंदा, टाई के रूप में लगाकर सड़कों पर निकलता है और कहता है कि ये हमारी शान है और हमारी इज्जत है और हम पहनकर निकलते हैं। अरब देशों में मुसलमान तिरछी टोपी पहनकर निकलते हैं। हमारे हिन्दुस्तान में भी वे तिरछी टोपी पहनकर निकलते हैं और कुछ लोग बालों वाली टोपी पहनकर निकलते हैं और चूड़ीदार पायजामा तथा अचकन पहनकर निकलते हैं। आप जाइए वहाँ। कहाँ ? जामिया-मिलिया इस्लामिया कालेज में और दूसरे कालेजों में भी मुसलमानों के लड़कों को देखिए ना। अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में जाइए ना, वहीं आपको आगे वाली मूँछें कटाए हुए और पायजामा एवं चप्पल पहने हुए आपको मुसलमानी लिबास में उसी लहजे में, उसी तर्ज में काम करते हुए मिलेंगे, दिखाई पड़ेंगे । आप जामिया मिलिया कालेज में जाइए, अन्य स्कूल, कालेजों में जाइए आपको प्रत्येक जगह वे सारे के सारे मुसलमानी लिबास में मिलेंगे। क्या वो पढ़े-लिखे नहीं हैं ? क्या हिन्दुओं के लड़के पढ़े-लिखे हैं ? क्या हिन्दुओं के लड़कों के दिमाग सातवें आसमान पर नहीं हैं ? क्या हिन्दुओं के लड़कों को बहस करना आ गया ? मुसलमान के लड़कों को बहस करना नहीं आया ? उनको भी आता है।
आप सिक्खों के कालेजों में जाइये। वहाँ के सारे के सारे स्टूडेण्ट आपको साफा पहने हुए मिलेंगे। अपने सिर पर कलंगी लगाये हुए दीखेंगे और अपने हाथ में कृपाण लिए हुए या बगल में डाले हुए दिखाई देंगे। क्या वो पढ़े-लिखे हुए नहीं हैं ? क्या सारी अक्ल आपके ही हिस्से में आ गई है। क्या वे पढ़े-लिखे नहीं है ? विद्या उनको नहीं आती। नहीं साहब, वह तो शिक्षा ने ऐसा बना दिया हमें। तो शिक्षा ने हमें ही बना दिया, डहनें नहीं बनाया ? शिक्षा उन्होंने भी तो पढ़ी है। एम0ए॰ पास हैं और मुसलमान भी तो एम0ए॰ पास हैं। फिर हमारे यहाँ ये क्या हो रहा है ? मित्रों इसकी जिम्मेदारी हमारी और आपकी है। धर्म के बारे में, यज्ञोपवीत के बारे में बताने और समझाने की कोशिश हमने नहीं की। ये शिक्षा क्या है ? ये यज्ञोपवीत क्या है ? इसका हमने कभी समाधान कर दिया होता, उनको समझा दिया होता तो निश्चित हमारे बच्चे में ये गुण आ गये होते। तब हमारे घर के प्रत्येक के बच्चे के कंधे पर जनेऊ तो रखा होता और सिर पर शिखा स्थापित होती। वे उनमें छिपी प्रेरणाओं का अनुसरण कर रहे होते। अभी भी समय है संभल जाने के लिए कि जब भी हमारे बच्चे हम से बहस करने आयेंगे और प्रश्न करेंगे कि बताइए शिखा क्या हैं ? तो हमको उन्हें एक घण्टा समय देना पड़ेगा और बराबर बताना पड़ेगा कि शिखा का मतलब क्या है? मकसद क्या है? उद्देश्य क्या है ?
एक दिन हमने आपको गायत्री मंत्र के बारे में, ज्ञान की देवी के बारे में बताया था। गायत्री मंत्र की वह सारी की सारी व्याख्या अपने बच्चे को समझानी पड़ेगी, जो कि शिखा के बारे में जानकारी पड़ेगी, जो कि शिखा के बारे में जानकारी प्राप्त करने आया है और चोटी के बारे में जानने आया है कि यह क्या है ? चोटी गायत्री माता की प्रतीक है, यह बात आपको बतानी पड़ेगी। फिर वह पूछेगा कि गायत्री मंत्र क्या होता है ? ये भी मैंने आपको एक दिन बताया था। इसके लिए मैंने आपको तीन घण्टे का समय दिया था, आपको याद होना चाहिए। इस तरह जो आदमी शिखा के बारे में जानना चाहता हो उसे उसकी सारी की सारी फिलॉसफी के बारे में समझना चाहिए कि शिखा क्या होती है। गायत्री क्या है और गायत्री की मूर्ति क्या है ? इस तरह आपका बच्चा गम्भीर हो जाएगा और तब जनेऊ को समझने, शिखा को समझने से इनकार नहीं कर सकेगा। यज्ञोपवीत के बारे में भी यही करना पड़ेगा आपको। जो बच्चा यह पूछने के लिए आपके पास आया है कि गुरुजी, ये क्या चीज है। जिसे आप पहनाते हैं। यह तो मैला-कुचैला हो जाता है। आप धोकर ही बार-बार हमारे गले में बाँध देते हैं। आप इसे क्या बाँध देते हैं, बताइये न। तो आपको यज्ञोपवीत पहनाने के साथ ही उसे यज्ञोपवीत धर्म की शिक्षा देनी पड़ेगी। यज्ञोपवीत की वह शिक्षा जो मैंने एक दिन सबेरे भी आपको समझाई थी और शाम को भी समझाई थी।
यज्ञ फिलॉसफी के बारे में भी लोगों को बताना पड़ेगा कि यज्ञ हिन्दू धर्म का अक्षुण्ण अंग क्यों है ? हमारी संस्कृति का अक्षुण्ण अंग क्यों है ? इसकी प्रेरणाएँ क्या हैं, इसका प्रकाश क्या है ? इसकी शिक्षाएँ क्या है ? इस संबंध में हम प्रत्येक के बारे में किताब में छपवा रहे हैं। इसमें शिखा और सूत्र के बारे में बता भी रहे हैं शिखा और सूत्र के बारे में एक हमारी पुस्तक भी है। पहले एक मोटी किताब भी थी, एक बड़ी किताब तो रही भी थी। पर अब बड़ी किताब तो रही नहीं, अतः एक अन्य छोटी किताब प्रकाशित कर रहे हैं। इस तरह से शिखा और यज्ञोपवीत के बारे में बहुत जानकारी हमको देनी है और हम जरूर देंगे, क्योंकि हमारे हिन्दू धर्म का मूल स्थापना-स्तंभ यज्ञोपवीत है। पर आपने यज्ञोपवीत केवल उसी तरीके से पहनाना शुरू कर दिया जिस तरह से आप मूर्तियों के बारे में कहते चले आ रह है। संध्या तो करते हैं, पर यह नहीं मालूम कि संध्या का उद्देश्य क्या है, संध्या क्यों की जाती है ? लोग साधु - संन्यासी तो बन जाते हैं, पर इसके उद्देश्यों का ज्ञान उन्हें नहीं होता है। साधु और संन्यासी वे होते हैं। जिसने कि संकल्प लिया था कि हम समाज के लिए काम करेंगे, देश के लिए काम करेंगे ,देश के लिए काम करेंगे, संस्कृति के लिए काम करेंगे। पर आज सर्वत्र उलटा ही दिखाई देता है। लोगों को मालूम भी नहीं कि साधु-संत कैसे होते थे ? आज तो जहाँ देखो वहीं लाल-पीले कपड़े पहनने वाले, चिमटा बजाने वाले और बाबाजी कहलाने वाले-संन्यासी कहलाने वालों की भीड़ नजर आती है। इससे तो संन्यास की महत्ता कम हो जाएगी और लोग बाबाजी की पूजा करने से इनकार कर देंगे, सम्मान करने से इनकार कर देंगे, आपने देखा नहीं । आप लोग देखिये, कुंभ के मेले में देखकर आइए। इससे यह मालूम हो जाता है कि विवेकशीलता का समाधान हमारे पास नहीं है।
लोग बार-बार हमारे पास आते हैं और पूछते हैं कि गुरुजी कितनी महँगाई है। इसका प्रभाव कुम्भ जैसे मेलों पर भी पड़ा है। अभी भी आप देखेंगे कि हरिद्वार का, ऋषिकेश का हर की पौड़ी का क्या हाल होता है। लाखों आदमी आते हैं। पिछले साल भी आए थे, तब भी महँगाई थी। इस साल भी आने वाले हैं। आगे और भी ज्यादा आने वाले हैं इसकी क्या वजह है कि इतने कम लोग आते हैं ? कुम्भ में आने वालों का सफाया कैसे हो गया ? जब पहले पचासों हजार आदमी आते थे अब पच्चीस हजार भी नहीं है। कितने स्नान कम हो चुके। वसंत पंचमी का स्नान खत्म हो गया। शिवरात्रि का स्नान खत्म हो गया और कौन-कौन से दो खत्म हो गए। चार तो स्नान खत्म हो गए। पच्चीस हजार आदमी भी नहीं आये। इस व्यवस्था में ढेरों रुपया गवर्नमेंट का खर्च हो गया। अब देखिए क्या होता है। अब एक ही स्नान रह गया है, जो पहली तारीख को पड़ने वाला है। उसमें भी आप देख लेना बहुत थोड़ी-सी भीड़ दस हजार की होगी। बहुत थोड़े - से आदमी आएँगे और वह भी उस दिन आएँगे, जिस दिन तेरह तारीख को कुम्भ का मेला है। उसमें आपको कुछ भीड़-ताड़ दिखाई पड़ेगी। बस उसके बाद सफाया हो जाएगा। ऐसा क्यों हुआ ? किसी जमाने में कुंभ मेले का यह होता था कि इन मेलों में हिन्दुस्तान के सारे के सारे संत और सारे के सारे ऋषि और सारे के सारे ब्राह्मण, एक बड़ा - सा व्यापक सम्मेलन किया करते थे, जिसमें सभा, गोष्ठी और अधिवेशन होते थे। इन अधिवेशन का ध्येय आध्यात्मिक होता था। वे कोई छोटे-मोटे नहीं होते थे, बल्कि बड़े और अच्छे अधिवेशन होते थे, जिसमें प्रत्येक संत और प्रत्येक ऋषि और प्रत्येक ब्राह्मण, प्रत्येक धर्मगुरु और प्रत्येक महन्त इकट्ठा होते थे और विचार-विनिमय करते थे कि इस मानव समाज में आध्यात्मिकता में जो न्यूनता आ गई है, धार्मिकता की निष्ठाएँ जो कमजोर पड़ गई है - उसका समाधान क्या है और हम लोग उसके लिए क्या काम करेंगे ? बड़े-बड़े महत्वपूर्ण फैसले हुआ करते थे। लोग इन अवसरों पर मिलते थे ओर बड़ा भारी काम किया करते थे। ये
वाहनचालक
वाङ्मय प्रसार - प्रचार हेतु वाहनचालक चाहिए, जिन पर हैवी ड्राइविंग लाइसेन्स हो तथा पाँच वर्ष का अनुभव हो। समर्पित भाव वाले श्रमशील परिजन पूर्ण विवरण (नाम, पता, आयु, व्यवसाय, अनुभव, पारिवारिक उत्तरदायित्व) एवं निर्वाह राशि का उल्लेख करें। व्यवस्थापक अखण्ड - ज्योति संस्थान मथुरा
उसकी कारीगरी दूर-देर तक प्रसिद्ध थी। जो भी उसके बनाए जूते पहनता, हमेशा-हमेशा के लिए उसका ग्राहक बन जाता। सामान्यजन ही नहीं स्वयं महाराज भी उसके काम पर मोहित थे। सचमुच चमड़े का काम करने में कोई भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता था। दूसरे राज्य के राजा तथा धनवान् लोग भी अपने जूते उसी से बनवाया करते थे। वह था तो अपने काम में बेहद होशियार, पर उसमें एक बुरी आदत थी। वह बहुत आलसी तथा भुलक्कड़ था। जैसे उसे समय की और कीमत की पहचान ही न थी। अपनी इसी आदत के कारण वह अपना कार्य समय पर कभी भी पूरा नहीं कर पाता था। उसकी इस आदम से सभी लोग उससे तंग थे। परन्तु सभी की मजबूरी थी, आखिर उससे अच्छा और कोई कारीगर भी तो न था। इसलिए कोई कुछ भी बोला पाने में समक्ष न था।
एक दिन स्वयं महाराज को नए जूते पहनने की इच्छा हुई। उन्होंने उसको बुलवाया और कहा, “कारीगर तुम मुझे अतिशीघ्र बढ़िया जूते बनाकर दे सकते हो ?” उसने राजा से पूछा, “महाराज कब तक बनाकर दे दूँ। “ राजा उसकी आदत के बारे में सुन चुका था। तभी वह मुसकराते हुए बोले “ तुम्हीं बताओ कारीगर, तुम कब तक बनाकर दे सकते हो?” कारीगर बोला, “महाराज! आज से एक दिन छोड़कर आपके लिए जूते बनाकर दे दूँगा। “ राजा ने फिर चेताया, “कारीगर सोच लो, फिर से एक बार, अपने कहे के अनुसार बना पाओगे ?” वह कहने लगा-महाराज मेरे बारे में लोगों ने अनेक तरह का भ्रम फैला रखा है, पर मैं वैसा हूँ नहीं । फिर यह तो मेरे लिए बहुत मामूली काम है। आपको अवश्य ही समय पर जूते तैयार मिलेंगे।” उसकी इस बात पर राजा हँस दिया और बोला, “जाओ कारीगर और समय पर आना।”
वह घर पर आया और सोचने लगा, अभी तो पूरे दो दिन हैं। मैं कल से ही काम पर लग जाऊँगा। यह सोचकर वह सो गया। दूसरे दिन उसने एक जूता तैयार कर लिया। जब एक जूता बन गया तो सोचने लगा, एक जूता तो बन ही गया है, दूसरा कल आराम से बना लूँगा। अपनी इसी सोच को लेकर वह आराम करने लगा। दूसरे दिन भी वह देर से उठा और राजा के जूते बनाने की बात भूलकर, बाज़ार घूमने निकल गया। वह शाम को वापस घर आया, तो उसकी पत्नी ने उसे राजा के लिए जूते बनाने की याद दिलाई। पत्नी की बातें सुनते ही वह घबरा गया। उसी समय जल्दी-जल्दी उसने अपना काम शुरू किया। जैसे-तैसे उसे आज जूते बनाकर देने ही थे। लेकिन काम पूरा होते-होते आधी रात हो आयी। काम समाप्त करके भागता-भागता वह राजा के महल में पहुँचा।
महल के सैनिकों ने उसे सुबह तक प्रतीक्षा करने को कहा। मरता-क्या न करता, वहीं बाहर बैठकर सारी रात गुजारनी पड़ी। सुबह होते ही राजा को खबर दी गयी। राजा आया, उसने जूते पहनकर देखे और कारीगर से कहा - जूते तो बहुत सुन्दर बनाए हैं, लेकिन तुमने समय पर तैयार नहीं किए। उसने डरते-डरते कहा, “क्या करें महाराज। हमसे भूल हो गयी।” राजा को समझ में आ गया कि यह सीधे तरह से अपनी आदत नहीं छोड़ सकता। वह सोचने लगे, इतना हुनरमन्द इनसान, अनेकों सद्गुणों के होते हुए अपने इसी दुर्गुण के कारण स्वयं भी परेशानी भुगतता है और औरों को भी परेशान करता है। वह विचार कर रहे थे, कैसे इसे समय की कीमत समझायी जाए ? कैसे इसको समय का मोल बताया जा ?
पर उन्होंने प्रकट रूप से कुछ नहीं कहा, बल्कि हँसते हुए बोले, “कोई बात नहीं, हम तुमसे बहुत खुश हैं। अपना पारिश्रमिक शाम को आकर ले जाना।” कारीगर को अपनी जान छूटती हुई लगी। उसने राजा को अभिवादन किया और घर जाकर फिर सो गया। जब उसकी नींद खुली तो देखा रात हो गयी थी। झटपट उठते हुए उसने अपनी पत्नी से कहा - “मैं राजमहल जा रहा हूँ।” राजा को खबर दी गयी कि कारीगर अपना पारिश्रमिक लेने आ गया है। राजा आया, उसने कारीगर की ओर एक हल्की-सी मुसकान के साथ निहारा और कहा “आ गए, कारीगर ! तुमने फिर देर कर दी आन में।” कारीगर ने फिर से क्षमा माँगी । राजा ने कहा - “कोई बात नहीं। आओ आज हम तुम्हें अपना शाही बाग दिखाते हैं। जिसमें कुछ फूल रात को भी चमकते हैं।” राजा और कारीगर बाग में घूमने लगे। अचानक राजा ने कारीगर से कहा, “कारीगर, तुम बाग में घूमो हम अभी एक जरूरी काम निबटाकर आते हैं।” यह कहकर राजा महल में चले गए।
बहुत देर हो गयी। महाराज का तो पता-ठिकाना ही न था। कारीगर ने घबराकर जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया। असलियत तो यह थी कि महाराज तो जान-बूझकर उसे अकेला छोड़ गए थे। उसकी चीख - पुकार सुनकर राजा ने अपने सैनिकों से कुछ कहा।
सैनिकों से कारीगर की जब इधर-उधर घूमते देखा तो उसे पकड़ ला और कहने लगे” चोर है इसे कारागार में डाल दो।” कुछ सैनिकों ने कहा “पहले इसकी पिटाई की जानी चाहिए।” कारीगर बुरी तरह घबरा गया। वह जोर-जोर से चिल्लाकर महाराज को पुकारने लगा। उसकी आवाज सुनकर महाराज यशोवर्मन पधारे और अनजान बनते हुए उन्होंने सैनिकों को रोका और उसकी ओर देखते हुए बोले - “अरे कारीगर तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”
कारीगर रो पड़ा “महाराज आप तो थोड़े समय बाद आने की बात कहकर भूल ही गए। देखिए न आपकी भूल से मेरा क्या हाल हो गया है।” महाराज अभी भी उसकी ओर देखते हुए हल्के से मुस्कराए और कहने लगे, “कारीगर ! जब तुम समय की याद नहीं रखते और अपने काम को भूलकर लोगों को परेशान करते हो, अपना काम नियत समय पर नहीं करते तो दूूसरों को कितना परेशानी होती होगी ? इसी का अहसास दिलाने के लिए हमने जान-बूझकर यह नाटक रचा था।”
महाराज के इस कथन के साथ ही कारीगर को अपनी भूल का अहसास हो रहा था। उधर महाराज उसे समझाते हुए अभी भी कह रहे थे, “मत भूलों कारीगर ! समय नियन्ता का अनुशासन है। सभी को उसका परिपालन करना पड़ता है, जो समय के इस अनुशासन को नहीं मानते, वे जीवन की बहुमूल्य उपलब्धियों विभूतियों से वंचित रह जाते हैं।”
रामकृष्ण परमहंस के महाप्रयाण के पश्चात् की बात है। सभी शिष्य आत्मबोध हेतु बिखर गए थे। कुछ ही थे, जो कलकत्ता में रह रहे थे। नरेन्द्रनाथ जिनने स्वामी विवेकानन्द बनने के पूर्व कई नाम बदले थे, ऐसी ही भ्रमण यात्रा पर हिमालय क्षेत्र में थे। गुरु के स्थल सान्निध्य का अभाव उन्हें भी कसमसाता था। अन्दर से गहन प्यास थी कि परमचेतना का वह सान्निध्य क्या पुनः नहीं मिल सकता। तड़पन बढ़ती जाती थी, व्याकुलता चरमसीमा पर थी। ऐसी ही मनःस्थिति में उन्हें लगा, काश कोई ऐसा गुरु मिल जाता, जो मुझे स्थूल रूप में मार्गदर्शन देता व वैसा ही वात्सल्य भी, जो कोई ठाकुर से मिला था। एक बाबाजी के दर्शन के बाद उनमें उन्हें कुछ ऐसा दिखाई पड़ा कि सम्भवतः उनसे भावी जीवन सम्बन्धी, आत्मिक - प्रगति सम्बन्धी मार्गदर्शन मिले। परमहंस तत्काल उनके मन में यह भाव प्रकट होने के कुछ क्षणों बाद सूक्ष्म रूप में सामने आए और बोले कि “नरेन ! क्या तू भी औरों की तरह नादान है। क्या तू भी यही समझता है कि मैं शरीर के अग्निभूत होने के साथ समाप्त हो गया ? क्या अशरीरधारी सूक्ष्म - कारणजगत में सक्रिय मेरी सत्ता तेरी आध्यात्मिक प्यास नहीं बुझा सकती, जो तू दूसरे गुरु को खोजता है ?” इस अनुभूति ने नरेन्द्रनाथ को अन्दर से बाहर तक मथ डाला एवं एक नये संन्यासी का जन्म हुआ, जिसने जीवन के अंतकाल तक मात्र ठाकुर का ही नाम लिया, सारा श्रेय उन्हीं को दिया, कभी भी गुरु के इतर कुछ और सोचने की बात मन में नहीं आयी।
हम सभी के लिए परमपूज्य गुरुदेव की स्थूलसत्ता के महाप्रयाण के मान वर्ष एवं परमवंदनीया माताजी के शरीर को पंचतत्वों में विलीन हुए प्रायः साव तीन वर्ष बाद, यह परीक्षा की घड़ी है। यदि हमें गुरुसत्ता की सूक्ष्म चेतना पर अटूट विश्वास है। तो निश्चित ही वह हमें किसी न किसी रूप में मार्गदर्शन देती रहेगी, यह संकल्प हमारा प्रतिपल दृढ़ होता चले जाना चाहिए। गुरु से वास्तविक प्रेम करने वालो के लिए समय व चेतना की दूरी कोई मायने नहीं रखनी चाहिए। यदि मायने रखती है। तो इसका मतलब कहीं कोई अहंभाव पल रहा है, पोषण पा रहा है एवं हर क्षण हमें गुरुतत्त्व से दूर ले जा रहा है। एक ओर गुरु की गरिमा का गान करना, किन्तु उसके बताए मार्ग पर न चलना कहीं और ताक-झाँक कर अपनी महत्त्वाकाँक्षा को प्रधानता देते हुए उस मार्ग से भटक जाना, जो गुरु ने बताया था, एक ऐसी विडम्बना है जो किसी भी शिष्य के साथ जुड़े, उसके पतन का ही कारण बनती है। एक और बात देखने में आती है कई व्यक्ति अपनी चिन्तन-क्षेत्र से उपजी मान्यता को गुरुसत्ता की प्रेरणा का नाम देकर अनुभूति-अन्तः स्फूर्त प्रेरणा बताते हुए स्वयं को भी भरमाते हैं, अपने पीछे चलने वाले समुदाय को भी दिग्भ्रमित करते हैं। यह प्रश्न मात्र आत्मावलोकन-आत्मविवेचन की दृष्टि से अपने आप से किया जात रहा है एवं सभी अपनों से करने का निवेदन किया जा रहा है कि कहीं आत्मप्रवंचना की इस मृगतृष्णा में हममें से कोई उलझ तो नहीं गया। यदि उत्तर ‘नहीं’ में है तो यह सकारात्मक चिन्ह है एवं हमें प्रेरक बल प्रदान करते हुए शक्ति देता है, भविष्य के उज्ज्वल होने का संकेत भी देता है।
फरवरी 1973 की ‘अपनों से अपनी बात’ इस संदर्भ में पढ़ने योग्य है। किस शिष्य को सद्गुरु के अनुदान मिलते हैं - उसके लिए पात्रता किस स्तर की होनी चाहिए, इस सम्बन्ध में परम प्राण-प्रत्यावर्तन की भूमिका के साथ प्रकाशित हुआ था। इसमें उन्होंने लिख है कि “गुरुदेव इन दिनों यही देख रहे हैं कि वे कौन हैं, जो आत्मबल का अनुदान उसी प्रयोजन के लिए चाहते हैं, जिसके लिए कि वह अनादिकाल से मिलता रहा है ........ स्वर्ग में गंगा का अवतरण शिवाजी की जटाओं में हुआ था, हमारी अन्तः-स्थिति शिवजी की जटाओं जैसी पवित्र और निर्मल होनी चाहिए।” उदाहरण देते हुए वंदनीया माताजी लिखती हैं - “गुरुदेव ने भौतिक कामनाएँ छोड़ी और महानता पर अपने को उत्सर्ग किया। यही वह प्रथम चरण था, जिससे मुग्ध होकर उनके मार्गदर्शक दौड़ते हुए चले आए और अपना आन्तरिक रस-तत्व उन्हें भी वत्स की तरह निचोड़ कर पिला दिया। यही राजमार्ग उन लोगों के लिए भी खुला पड़ा है, जो कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ चाहते हैं। “ ............... “परमार्थ परायण, श्रेयानुगामी अपनी तप-साधना त्याग एवं बलिदान से आरम्भ करते हैं किन्तु पाते इतना अधिक हैं कि स्वयं धन्य बनते हैं और अपने युग के इतिहास को चिरस्मरणीय - अभिनन्दनीय बनाते हैं।”
परमपूज्य गुरुदेव ने प्राण−प्रत्यावर्तन की, प्राण-अनुदान-वितरण की प्रक्रिया इसी प्रयोजन से आरम्भ की। प्रारम्भ भले ही वह कुछ साधकों से, कुछ सत्रों से हुई हो, किन्तु यह क्रम बराबर विभिन्न सत्रों में आदान-प्रदान के रूप में इसीलिए जारी रहा कि जिन्हें वे तैयार कर रहे हैं, जिन्हें शक्ति से ओत-प्रोत करते चले जा रहें है, वे उनके महाप्रयाण के बद भी युगपरिवर्तन की प्रक्रिया को अग्रगामी बनाते चलें, आत्मबल सम्पन्न सद्गुरु का दिव्य अनुदान सत्प्रयोजनों के निमित्त नियोजित हो सके। अनुदान वितरण की इस प्रक्रिया को समय की आवश्यकता बताते हुए परमवंदनीया माताजी ने इसी संपादकीय में लिखा था “युग परिवर्तन के इस पर्व बेला में अभीष्ट प्रयोजनों की मूर्ति के लिए ऐसी आत्मबल सम्पन्न विभूतियों की आवश्यकता पड़ेगी जो भौतिक साधनों से नहीं, अपने आत्मबल से जन मानस के विपन्न प्रवाह को उलट सकने का साहस कर सके। इसके लिए ऐसे अग्रगामी लोकनायकों की आवश्यकता पड़ेगी जो मनस्वी और तपस्वी बनने में अपना गौरव गर्व अनुभव करें। जिनकी महत्त्वाकाँक्षाएँ भौतिक बड़प्पन से बढ़कर आत्मिक महत्ता पर केन्द्रीभूत हो सके। “ ....”मनुष्य में देवत्व के उदय एवं धरती पर स्वर्ग के अवतरण की पुण्य बेला में महामानवों की महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ेगी। इतिहास के आकाश में ऐसे ही महामानव उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह अनंत काल तक चमकते हैं। इन्हीं का निर्माण इन दिनों अभीष्ट है। महाकाल ने उन्हीं का आह्वान किया है। युग की आत्मा ने उन्हीं को पुकारा है।
प्रत्येक पंक्ति और उसका झलकता भाव बताता है कि कितना स्पष्ट चिंतन उनका तब रहा होगा, जब वे एक नये आत्मबल सम्पन्न साधक परिवार को खड़ा कर रहे थे, जिसे भावी गायत्री तीर्थ से अगणित योजनाओं को क्रियान्वित कर भारत के नवनिर्माण की प्रक्रिया को गतिशील करना था। परमपूज्य गुरुदेव ने पुनः 1989 व 1990 में दोहराया जब उन्होंने “ ज्योति कभी बुझेगी नहीं। उद्बोधन के साथ सभी परिजनों को उनके महाप्राण से इक्कीसवीं सदी आरंभ होने तक व उसके सौ वर्ष बाद तक सतत् ध्यान रखने की बात कही।
स्वरूप सामने है। सम्भावनायें अनंत है। पथ है तो कठिन किंतु लक्ष्य संभव नहीं है। अपना मनोबल कभी गिरने न पाये। पूज्यवर की विभूतियों की खोज इस सदी के प्रारंभ से चल रही थी। किंतु महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया के शुभारंभ के साथ 1966 में उन्होंने इस और गति दी। 1972-73 के बीच और वेग से बढ़ाया। उनके हाथों से लिखी कुछ पँक्तियाँ जो अखण्ड ज्योति में प्रकाशित हुई थी इस दृष्टि से पठनीय है।
पूज्यवर लिखते है-अभी इन दिनों युग परिवर्तन के प्रचण्ड अभियान का शिलान्यास-शुभारंभ हुआ है। ज्ञान यज्ञ की हुताशन वेदी पर बौद्धिक, नैतिक व सामाजिक क्राँति की ज्वाला प्रज्ज्वलित करने वाली आज्याहुतियाँ दी जा रही है। जन्मेजय की नाग यज्ञ की तरह फुफकारते हुए विषधर तक्षकों को ब्रह्मतेजस् स्वाहाकार द्वारा घसीटा ही जायेगा, तो उस रोमांचकारी दृश्य को देखकर दर्शकों के होश उड़ने लगे। वह दिन दूर नहीं जब आज की अरणि मंथन से उत्पन्न स्फुल्लिंग शृंखला कुछ ही समय उपरांत दावानल बनकर कोटि-कोटि जिह्वाएँ लपलपाती हुई वीभत्स जंजालों से भरे अरण्य को भस्मसात् करती दिखायी देगी। “
अगले दिनों कोटि-कोटि के घटकों से विभिन्न स्तर से ऐसे ज्योति पुँज फूटते दिखायी पड़ेंगे जिनकी अकूत शक्ति द्वारा सम्पन्न होने वाला कार्य अनुपम ही और अद्भुत समझे जायेंगे। वहीं समयानुसार अपनी आज की मंगलाचरण थिरकन को क्रमशः तीव्र से तीव्रतर और तीव्रतम करता चला जायेगा। तांडव नृत्य से गगनचुम्बी जाज्वल्यमान आग्नेय लपटों द्वारा पुरातन को नूतन में परिवर्तित करने की भूमिका किस प्रकार , किस रूप में अगले दिनों सम्पन्न होने जा रही है। आज उस सब को सोच सकना कल्पना परिधि में ला सकना सामान्य बुद्धि के लिए प्रायः असंभव ही है। फिर भी जो भवितव्यता है वह होकर रहेगी। युग को बदलना ही है। आज की निर्विणनिशा का कल के प्रभातकालीन अरुणोदय में परिवर्तन होना ही है। (पृष्ठ 59, 60 अप्रैल, 73 अखण्ड ज्योति)
कितना दृढ़ एवं स्पष्ट कथन है कि ये मात्र ऐसी सत्ता लिख या कह सकती है जो द्रष्टा स्तर की हो। ये सभी के सामने है। पुरातन को नूतन में बदलने की प्रक्रिया ही युग निर्माण है। एवं ये होकर ही रहना है वो भी आगामी कुछ वर्षों में। ये स्पष्ट चिंतन उभरकर सामने आता है।
आज जनमानस में छायी असुरता जिस स्तर की है उसके लिए ज्ञान यज्ञ की पतन निवारण हेतु श्रेष्ठ विचारों के विस्तार की सर्वाधिक आवश्यकता है। शान्तिकुञ्ज में चल रही वर्तमान प्रक्रिया जिसके अंतर्गत विभूतियों को नवसृजन की गतिविधियों में नियोजित करने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। जिसके अधीन विगत दिनों श्रद्धा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, साधना, सद्ज्ञान सम्वर्द्धन वर्ग के चार महोत्सव आयोजित किये जा चुके है। छावनी के रूप में, टकसाल के रूप में विनिर्मित इस केन्द्र शाँति कुँज गायत्री तीर्थ में सभी साधक स्तर के विभूतिवान् कार्यशालाओं , गोष्ठियों के माध्यम से वैचारिक आदान-प्रदान कर उन शस्त्रों का निर्माण करें जिससे विचार क्राँति होनी है। ये कार्य पूर्णतया संभव है असंभव नहीं। मात्र प्रतिभाओं के सुनियोजन की आवश्यकता भर है।
गायत्री यज्ञ साधना अनुष्ठान संस्कार महोत्सवों के माध्यम से जो युग निर्माण प्रक्रिया का अलख सारे देश में गूँजा है। विदेश तक जिसकी आवाज सुनी व बड़े व्यापक स्तर पर पहचान ली गयी है। 1999 के अंत तक सारे विश्व में वासन्ती बयार चलने लगी। इसके संकेत नजर आ रहे है। ये तो प्रचारात्मक पक्ष हुआ। जन संवेदनाओं को उभार कर सुसंस्कारिता की दिशा में मोड़ने की प्रक्रिया हुई । इसके आगे नवनिर्माण का महती पुरुषार्थ सामने खड़ा है। प्रत्येक को पेट भरने को अन्न मिले, साक्षरता के माध्यम से वो ज्ञान की महत्ता को जाने तथा प्रस्तुत संधि बेला के समझते हुए उसे भी श्रेय अर्जित करने का अवसर दिया जाय।
ये कार्य आगामी ढाई वर्षों में महापूर्णाहुति की बेला आने तक किस द्रुत गति से होगा ये महाकाल पर छोड़कर स्वयं को प्रतिकूलताओं की भँवरों के बीच से निकालते हुए पार पहुँचने की स्थिति में तैयार करना ही इस समय का सबसे बड़ा गुण धर्म है। यदि हम गुरुसत्ता पर विश्वास करते हैं -उनकी प्रत्यक्ष अनुपस्थिति में यह भाव रखते हैं कि उनका वरद हस्त हमारी पीठ पर है तो हम अपने आत्मबल को निरंतर बढ़ाते हुए सक्रियता के अनुपात में और वृद्धि करेंगे एवं संकल्पित होकर लाखों वर्षों में पहली बार एक ऐसे अवसर का लाभ उठाने के लिए तत्पर हो जायेंगे जो सारे विश्व सुधा का भाग्य नये सिरे से लिखने हेतु सहज ही भागवत् मुहूर्त ही सामने खड़ा हुआ है।
प्रसिद्ध अणु वैज्ञानिक नील्स बोहर ने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि वे अपने बौद्धिक सामर्थ्य का उपयोग केवल मानव जाति के कल्याण के लिए ही करेंगे। उल्लेखनीय है कि नील्स बोहर ने ही सर्वप्रथम अणु की संरचना पर प्रकाश डाला और उसकी व्याख्या की थी।
द्वितीय विश्वयुद्ध के समय हिटलर के नाजी सैनिक उन्हें पकड़ ले गये और अणु बम बनाने के लिए दबाव डालने लगे। बोहर अणु की विनाशकारी क्षमता से परिचित थे। वे जानते थे कि यदि अणु बम बना लिया गया तो उसके द्वारा भयंकर विनाश ही होगा। इसलिए उन्होंने नाजी अधिकारियों के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। पहले तो उन्हें कई प्रलोभन दिये गये। पर मनुष्य कल्याण के लिए समर्पित यह मनीषी इन प्रलोभनों के आगे क्या झुक सकता था? प्रलोभनों को ठुकरा दिये जाने के बाद उन्हें तोड़ने के लिए उन्हें यंत्रणाएँ दी गयी। इससे भी वे विचलित नहीं हुए। एक उनकी जान ही नहीं ली और तो सबकुछ कर लिया गया। अनेकों बार उन्हें मृत्यु के द्वार पर ले जाया गया और वापस खींच लिया गया। ताकि वे डर कर तैयार हो जाये। दृढ़व्रती नील्स बोहर न तो डरे और न अपनी प्रतिज्ञा से डिगे। किसी प्रकार वे भागकर अमेरिका जा पहुँचे। जहाँ आजीवन मानवता की सेवा करते रहे। अहिंसा सही अर्थों में साहस का पर्याय है। शूरवीरों का भूषण है। आतंक एवं दमन का प्रतिकार भी अहिंसा में आता है। इस शब्द का दुरुपयोग न हो, न उसकी ओट में अपनी कायरता छुपायें इस आध्यात्मिक गुण की व्याख्या का आज की परिस्थितियों में सही रूप में प्रस्तुतीकरण किया जाना जरूरी है। -अपरिमित सम्भावनाओं का आधार मानवी व्यक्तित्व (वाङ्मय खण्ड क्रं. 29)
*समाप्त*