प्रभु जब किसी को अपना मानते हैं, उसे गहराइयों से प्यार करते हैं, तो उसे अपना सबसे भरोसेमन्द सेवक प्रदान करते हैं और उससे कहते हैं कि तुम हर-हमेशा मेरे प्रिय के साथ रहो, उसका दामन कभी न छोड़ते । कहीं ऐसा न हो कि हमारा प्रिय भक्त अकेला रहकर संसार की चमक-दमक से भ्रमित हो जाये, ओछे आकर्षणों की भूल-भुलैयों में भटक जाये अथवा फिर सुख-भोगों की झाड़ियों में अटक जाये। प्रभु के इस विश्वस्त सेवक का नाम है-दुःख सचमुच वह ईश्वर भक्ति के साथ-साथ छाया की तरह चिपका रहता है।
निःसंदेह यह दुःख ही ईश्वरीय अपनत्व की कसौटी है। ज्यों ही इसका आगमन होता है हमारी चेतना ईश्वरोन्मुख होने लगती है। दुःख का हर पल दिल की गहराइयों में संसार की यथार्थता-उसकी असारता एवं निस्सारता की अनुभूति कराता है। इन्हीं क्षणों में इस सत्य की सघन अनुभूति होती है कि मेरे अपने कितने अधिक पराये हैं ? जिन सगे-सम्बन्धियों मित्रों-परिजनों कुटुम्बियों-रिश्तेदारों को अपना कहने और मानने में गर्व की अनुभूति होती थी, दुःख के सघन होते ही उनके परायेपन के रहस्य एक के बाद एक उजागर होने लगते हैं। इन्हीं पलों में ईश्वर की याद विकल करती है। ईश्वरीय प्रेम अंकुरित होता है। प्रभु के प्रति अपनत्व सघन होने लगता है।
प्रभु का विश्वस्त सेवक दुःख अपने साथ न रहे तो अन्तरात्मा पर कषाय-कल्मष की परतें चढ़ती जाती हैं। “अहं” का विषधर समूची चेतना को डस लेता है। आत्मा के प्रकाश के अभाव में प्रवृत्तियों एवं कृत्यों में पाप और अनाचार की बाढ़ आ जाती है। सत् और असत् का विवेक जाता रहता है। जीव सघन अँधेरे और घने कुहासे से घिर जाता है। घने अँधेरों की मूर्छना में वह संसार के छद्म जाल को अपना समझने लगता है और प्रभु के शाश्वत मृदुल प्रेम को पराया। और तब प्रभु अपने प्रिया को उबारने के लिए उसे अपनाने के लिए अपने सबसे भरोसेमन्द सेवक दुःख को उसके पास भेजते हैं।
जिनके लिए दुःख सहना कठिन है-उनके लिए भगवान को अपना बनाना भी कठिन है। ईश्वर के साथ सम्बन्ध जोड़ने का अर्थ है-जीवन को आदर्शों की जटिल परीक्षाओं में झोंक देना। प्रभु के प्रति अपनी श्रद्धा को हर दिन नई आग में तपाते हुए- उसकी आभा को नित नये ढंग से प्रदीप्त रखना पड़ता है। तभी तो भगवान को अपना बनाने वाले भक्त उनसे अनवरत दुःखों का वरदान माँगते हैं। कुन्ती, मीरा, राबिया, तुकाराम, नानक, ईसा, बुद्ध, एमर्सन, थोरो आदि दुनिया के हर कोने में रहने वाले परमात्मा के दीवानों ने अपने जीवन में आने वाले प्रचण्ड दुःखों को प्रभु के अपनत्व की कसौटी समझकर स्वीकारा और हँसते-हँसते सहा। प्रभु ने जिनको अपनाया, जिन्होंने प्रभु को अपनाया, उन सबके हृदयों से यही स्वर गूँजे है कि ईश्वर-भक्ति एवं आदर्शों के लिए कष्ट सहना यही दो हाथ है, जिन्हें जोड़कर भगवत्प्रार्थना का प्रयोजन सही अर्थों में पूरा हो पाता है ।
अपने दुर्भाग्य पर उसके आँसू छलक आए। ठीक वर्षा ऋतु के प्रारम्भ में उस बेचारे के दो बैलों में से एक मर गया। जोड़ी खण्डित हो गयी। एक तो गरीब था, दूसरे ठीक चौमासे के प्रारम्भ में ही बैल मर जाने से चारण रामदेव शोकाकुल हो गया। परन्तु अभी वर्षा हुई न थी, इसी बीच उसने कुछ स्नेही मित्रों और सेठों के पास जाकर पैसे की माँग की और कहा- “भाई ! मैं आपको आपका पैसा अगली फसल में ब्याज के साथ वापस दे दूँगा।” लेकिन उस किसान की दर्द भरी बातों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया और किसी ने उसको पैसे नहीं दिया। आखिरकार वह निराश होकर घर लौट आया। पति को घोर निराशा में पड़ देखकर पत्नी भी दुःखी हो गयी।
समय बीतते भला कितनी देर लगती है। गर्मी की तपन बीत गयी, चौमासे का प्रारम्भ था। बिजली की कड़क-तड़क के साथ बादलों के झुण्ड आकाश में उमड़-ने-घुमड़-ने लगें और किसानों के मुखमण्डल पर आनन्द का भाव झलकने लगा। वर्षा के आगमन से किसानों का हृदय नाच उठा। सारे किसान अपनी-अपनी खेती के साधन और बैलों को लेकर खेतों में जाने लगें। कोई जोतने लगा, तो कोई जमीन में बीज बोने लगा। इस किसान ने भी अपनी खेती के लिए साधन तैयार किये। पर फिर वही दुर्भाग्य, दूसरा बैल कहाँ ? दूसरा बैल तो मर चुका था।
उसकी पत्नी ने कहा, “स्वामी! हमारे पास भले ही दूसरा बैल न हो, इससे क्या होगा, दूसरे बैल की जगह मैं जुत जाऊँगी, किन्तु हमारी बोवनी का समय व्यर्थ नष्ट नहीं होने देना चाहिए।” पत्नी की बात सुनकर हताश चारण रामदेव के मन में भी कुछ हिम्मत आयी और वह एक बैल को और अपनी पत्नी को लेकर खेत में गया तथा एक ओर बैल को तथा दूसरी ओर पत्नी को जोतकर हल चलाने लगा। जैसे मनुष्य मनचाहा भोजन पाकर परितृप्त हो जाता है, उसी प्रकार काफी वर्षा होने के कारण धरती माता भी तृप्त हो गयीं थीं। ठीक मध्याह्न काल था, भगवान सूर्य नारायण भी आज पूर्णरूप से तप रहे थे।
किसान जल्दी-जल्दी बोवनी करने की उतावली में ताबड़-तोड़ हल चला रहा, जिससे उसकी पत्नी थक गयी थी। फिर भी वह थक गयी थी। फिर भी वह अपने काम में मशगूल था। उसी समय संयोगवश सौराष्ट्र नरेश देपाल दे उस किसान के खेत के पास होकर गुजरे। किसान के बैल के साथ दूसरी ओर बैल के बदले स्त्री को जुता हुआ देखकर उनका हृदय द्रवित हो उठा। राजा देपाल दे अपने साथ के सिपाहियों को दूर खड़ा कर, एक आदमी को साथ लेकर उस किसान के पास जाकर कहने लगे- “भाई यह तुम्हारा खेती करने का क्या ढंग है ? भलेमानस! बैल के साथ स्त्री से काम लेना क्या ठीक है ? भाई ! इसको छोड़ दो। क्या तुम्हारे हृदय में इतनी अधिक निर्दयता आ गयी है कि इस बेचारी भोली-भाली स्त्री को बैल के स्थान पर जोत रखा है। अरे ! कुछ तो दिल में दया रखो।”
ये बातें सुनकर रामदेव झल्ला गया, बोला- “बोवनी का समय है। दूसरा बैल भी था जो थोड़े दिन पहले मर गया। घर में पैसा भी नहीं और गाँव में भी कई जगह पैसे के लिए दौड़-धूप की, पर कहीं से छदाम भी न मिला। बिना पैसे के बैल कहाँ मिल सकता है ? तो क्या बैल के बिना हम अपनी बोवनी रोक दें ?
उसकी यह बात सुनकर राजा कहने लगें, “भाई तुमको सचमुच बैल की अत्यन्त आवश्यकता है। मैं तुमको अभी बैल मँगा कर देता हूँ।” इतना कहकर अपने साथ के आदमी को तुरन्त बैल आने को कहा। परन्तु रामदेव ने तनिक भी देखे या प्रतीक्षा किये बिना अपना काम यथावत् जारी रखा। यह देखकर राजा देपाल दे कहने लगा, “अरे भले आदमी ! अभी बैल आ जाएगा, क्या थोड़ी देर के लिए धीर नहीं रख सकते ? तुम्हें अपनी स्त्री पर दया नहीं आती, देखो तो बेचारी कितनी अधिक थक गयी है।”
“ओ हो ! इतने बड़ दयालु तो मैंने नहीं देखे। यदि इतनी ही दया उमड़ रही है तो जब तक बैल नहीं आ जाता, तब तक तुम स्वयं ही जुतकर इसे छुड़ा क्यों नहीं देते ?”
राजा देपाल ने बिना कुछ रुखाई प्रकट किये किसान की बात स्वीकार कर ली और किसान के बैल के साथ जुती स्त्री को छुड़ाकर उसकी जगह पर उन्हें जुए में जोत लिया। इस प्रकार शुरू-शुरू में जैसे ही एक-दो फेरा किया कि राजा के आदमी बैल लेकर आ पहुँचे और किसान को बैल दे दिया। पहले तो किसान ने समझा था कि बैल देने की बात कोरी बात ही है परन्तु अब जब थोड़े समय में बैल आ गया तो वह शर्मिन्दा हो गया और बैल को जुए में जोत कर राजा को मुक्त कर दिया। इस उपकार के बदले वह किसान आभार का एक शब्द भी न बोल सका। देपाल दे राजा भी, मानों कुछ न हुआ हो, इस प्रकार हँसते हुए अपने लोगों को साथ लेकर वहाँ से चला गया।
धीरे-धीरे दिन बीतते गये। खेतों में बोया गया ज्वार भली-भाँति उग गया। सारा खेत हरियाली से भर गया। पर एक आश्चर्य यह भी हुआ कि खूब सारे खेत में खूब सुव्यवस्थित रीति से ज्वार उग गया था, किन्तु जिस जगह राजा देपाल दे को जुए में जोता था, वहाँ एक भी पत्ती न होने के कारण किसान निराश हो गया और मन ही मन विचारने लगा कि लगता है- कोई अभागा आया था, वह जहाँ-जहाँ चला था, वहाँ-वहाँ कुछ नहीं उगा।
इस प्रकार विचारते हुए कारण जानने को उत्सुक किसान वहाँ की जमीन खोदकर देखने लगा, तो एकबारगी वह अचरज में पड़ गया, क्योंकि जहाँ-जहाँ राजा देपाल दे चले थे, वहाँ-वहाँ हराई में बोए ज्वार के बदले सच्चे मोती झिलमिला रहे हैं। इससे उसका आश्चर्य और बढ़ गया। उसने जमीन खोदकर सारे मोती इकट्ठे कर लिये और घर जाकर अपनी पत्नी को सारी बात कह सुनाई। फिर तो पता लगाने पर जान पड़ कि उनको बैल देने वाला और उनकी स्त्री के स्थान पर स्वयं जुए में जुत जाने वाला और कोई नहीं, स्वयं सौराष्ट्र नरेश राजा देपाल दे ही थे।
इससे किसान को भारी दुःख हुआ और वह अपनी स्त्री से कहने लगा, “देवी! मैं मूर्ख आदमी हूँ, मैंने कैसी भूल की है ? मुझ अभागे ने राजा को भी नहीं पहचाना और देवता जैसे सुकुमार राजा को जुए में जोत दिया। देवी ! ये सच्चे मोती अपने नहीं हैं। मैं कल ही राजा के दरबार में जाकर इसे राजा के सुपुर्द कर आऊँगा।”
दूसरे दिन प्रातःकाल होते ही किसान खेत में से प्राप्त मोतियों की पोटली बनाकर सीधे राजदरबार में जा पहुँचा। भरे दरबार में उसने सारी घटना विस्तार से कह सुनाई और मोतियों की पोटली राजा के चरणों में रख दी। घटना का ब्योरा जानकर मन्त्री, सभासद सभी आश्चर्यचकित थे। सबके आश्चर्य पर राजा देपाल दे मन्द-मन्द मुस्करा रहें थे। लेकिन उनकी यह मुस्कान हर किसी की जिज्ञासा को और अधिक तीव्र कर रही थी।
तभी अपनी वाणी में समाधान का अमृत घोलते हुए राजगुरु कहने लगें- “सभासदों, मंत्रीगण- इसमें आश्चर्य क्यों करते हो, मानवीय प्रेम में विगलित होकर जो श्रम किया जाता है, उस श्रम से झरे बिन्दुओं से कुछ भी चमत्कार सम्भव है। ये सच्चे मोती इसी का चमत्कार है।” सभी के मस्तक इस अद्भुत मानवीय प्रेम के सामने नत हो गये।
प्रार्थना अन्तःकरण की विकल पुकार है। शुद्ध और सच्चे हृदय से की गयी प्रार्थना परमात्मा की अनन्त सामर्थ्य से एकान्त कर देती है। तभी तो असम्भव कहे और समझे जाने वाले घटनाक्रम सम्भव हो जाते हैं। क्योंकि यह प्रकृति के नियमों को चीरती हुई सीधी अपने इष्ट एवं लक्ष्य तक जा पहुँचती है। इंसान और ईश्वर के बीच की यह कड़ी-स्वयं में एक चमत्कार है। इसे देखा कम परन्तु अनुभव अधिक किया जा सकता है। प्रार्थना रूपी तरंग के माध्यम से हर पल, हर क्षण अपने आराध्य के सामीप्य की अनुभूति हृदय में होती रहती है। न केवल इसका परिणाम आश्चर्यजनक एवं अद्भुत होता है, बल्कि इससे शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शान्ति एवं आत्मिक उन्नति का पथ प्रशस्त होता है। वैज्ञानिक भी इस सत्य स्वीकारने लगें है। रोजमर्रा के जीवन में घटने वाली अनेक घटनाएँ भी इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं।
कैलीफोर्निया में मिकी नाम की महिला को गुर्दे की खराबी थी। चिकित्सकों ने उसे सचेत किया कि उसका जीवन बचना तभी सम्भव है, जब वह किसी और की किडनी ट्रांसप्लांट करवाये। अनेक कोशिशों के बावजूद किडनी के न मिल पाने के कारण सभी चिन्तित एवं परेशान थे। अन्त में उसके भाई ने उसे ईश्वर से प्रार्थना करने की सलाह दी। प्रभु की कृपा पर भरोसा रखकर वह उन्हें पुकारने लगी। इसी दौरान एक अभूतपूर्व घटना घटी। एक वयोवृद्ध व्यक्ति मरणासन्न स्थिति में किन्तु स्वास्थ्य गुर्दों के साथ चिकित्सक के पास आया और बोला कि जीवन के इस अंतिम अध्याय में मैं अपनी किडनी दान करना चाहता हूँ। संयोग से दोनों की टीश्यू टाइपिंग भी हो गयी। सभी को हैरानी हो रही थी और स्वयं पर प्रभु-कृपा का अनुभव कर मिकी की आँखों में खुशी के आँसू छलक आये। प्रार्थना से उसे नया जीवन मिला।
सच्चे दिल से निष्ठा एवं श्रद्धा सहित की गयी प्रार्थना को ईश्वर अवश्य सुनता है। यही नहीं परिस्थितियों एवं समस्याओं के अनुरूप ईश्वरीय शक्ति के आश्चर्यजनक प्रभाव भी नजर आते हैं। विख्यात मनोचिकित्सक अपने अनुसंधान-प्रयोगों में प्रार्थना की प्रक्रिया को वैज्ञानिक मानने लगें हैं। उनके अनुसार इसके द्वारा मनुष्य अपनी भावशक्ति के द्वारा अनन्त ब्रह्माण्डीय प्राणऊर्जा के स्रोतों से जुड़ जाता है और यह विश्वव्यापी प्राणशक्ति उसमें प्रवाहित होने लगती है। जिससे उसके अन्दर धैर्य, मनोबल, साहस की असाधारण अभिवृद्धि हो जाती है। इसी के बलबूते असम्भव-सम्भव बन जाता है। केनेथ एल. वुडवर्ड ने अभी हाल ही में पिछले दिनों न्यूजवीक के 31 मार्च 1997 के अंक में अमेरिका में ईश्वर पर आस्था-विश्वास बनाए रखकर प्रार्थना करने वालों की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इसके अनुसार अधिकतर अमेरिकन प्रतिदिन प्रार्थना करते हैं।
इस सर्वेक्षण में उल्लेख किया गया है कि 54 प्रतिशत युवा नित्य प्रार्थना करते हैं। 20 फीसदी लोगों का कहना है कि वे दिन में एक से अधिक बार प्रार्थना करते हैं। 87 प्रतिशत व्यक्ति ऐसे हैं जो प्रार्थना के चमत्कारिक परिणाम पर विश्वास रखते हैं। इनका कहना है कि उनके जीवन में ऐसी कई घटनाएँ घट चुकी हैं, जिन्हें अद्भुत व आश्चर्यजनक कहा जा सकता है। वे इसे प्रार्थना की उपलब्धि मानते हैं। 24 प्रतिशत लोग दिन में एक बार तथा 82 प्रतिशत लोग परिणाम की चिन्ता किये बगैर प्रार्थना करते हैं। 84 प्रतिशत व्यक्ति अपने बच्चों व परिवारजनों के स्वास्थ्य-संवर्द्धन के लिए नित्य भगवत् भजन करते हैं। 75 फीसदी लोग अपनी वैयक्तिक दुर्बलता से मुक्ति पाने हेतु ईश्वर-आराधना करते हैं। 73 प्रतिशत लोगों की मान्यता है कि भगवान का ध्यान नौकरी व व्यवसाय जुटाने में सफल होता है।
गैरी हैबरसन प्रार्थना पर विश्वास रखने वाले परम आस्तिक व्यक्ति हैं। वह लिबर्टी युनिवर्सिटी के दर्शन विभाग के अध्यक्ष भी हैं। सन् 1980 में उन्होंने एक प्रयोग किया। इस क्रम में उन्होंने 100 व्यक्तियों की एक सूची तैयार की, जिनमें से दस से तो उनका कोई व्यक्तिगत परिचय भी नहीं था। वह प्रतिदिन कई घण्टे उन व्यक्तियों के स्वास्थ्य, परिवार एवं व्यवसाय आदि के लिए परमात्मा से प्रार्थना करते रहें। इस प्रयोग में उन्हें उल्लेखनीय सफलता मिली। जो अस्वस्थ थे, वे स्वस्थ हुए, अनेक को व्यवसाय मिला एवं कई परिवारों में सुख-शान्ति आयी। प्रार्थना के बल पर उन्होंने अपनी 87 वर्षीया रुग्ण माता को मृत्युशय्या से जीवित कर दिया था। सन् 1995 में उनकी 23 वर्षीया पत्नी डेवी को कैंसर होने का पता चला। डेवी इस असाध्य रोग से बच तो नहीं पायी, परन्तु स्वयं प्रार्थना करते हुए अन्त समय में शान्तिपूर्वक स्वर्ग सिधार गयी। मृत्यु से कुछ पूर्व डेवी ने हैबरसन से कहा कि तुम्हारी प्रार्थना के प्रभाव से मेरे मन में गहरी शान्ति है-शरीर भी पीड़ामुक्त है। मेरे मरने के बाद भी विश्वास रखना कि प्रार्थना ही मनुष्य जीवन का सार है। इस घटना ने हैबरसन को दुःख और विषाद के बदले उच्चस्तरीय प्रेम से सराबोर कर दिया।
विख्यात विज्ञान-पत्रिका अमेरिकन साइंटिस्ट के नवम्बर-दिसम्बर 96 के अंक में प्रार्थना के प्रभावों का बड़ विस्तार से वर्णन किया है। इसके अनुसार प्रार्थना न सिर्फ रोगों को दूर करती है-कम करती है, बल्कि मानसिक प्रसन्नता भी प्रदान करती है। इसमें वर्णित प्रयोग के दौरान 33 सप्ताह के बच्चों के समूह को तीन अस्पतालों में भर्ती किया गया। इन बच्चों के स्वास्थ्य हेतु 50 सदस्यीय तीन टीमों ने प्रार्थना की। प्रथम समूह ने सिर्फ प्रार्थना की, दूरी टीम ने नजरअंदाज कर दिया, जबकि तीसरे वर्ग ने सच्चे अन्तःकरण से इन नवजात शिशुओं के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। प्रार्थना-स्थल से अस्पताल की दूरी काफी अधिक थी। परीक्षण के पश्चात् इस रिपोर्ट का अध्ययन किया गया। इसके प्रायोगिक निष्कर्ष से सभी डाक्टरों ने किसी अदृश्य सत्ता के होने का खुला अनुमोदन किया। बहुत पहले सन् 1872 में इंग्लैण्ड के एक अस्पताल में हेनरी थामसन ने इसी तरह का एक प्रयोग किया था। उसने चार साल तक इस अस्पताल में लगातार प्रार्थना की। उसके इस प्रयास-पुरुषार्थ ने अन्य लोगों को भी उत्साहित किया एवं प्रार्थना के नियत समय पर हजारों की संख्या में लोग जुट जाते थे। इस अवधि में अस्पताल में मरने वाले रोगियों की संख्या एकाएक घट गयी। 85 फीसदी रोगी स्वास्थ्य-लाभ करते पाये गये।
वर्तमान अमेरिका की खुली उपभोक्ता संस्कृति ने वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक तथा नैतिक मानदण्डों को ताक में रख दिया है। फलस्वरूप समाज में ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा, हत्या आदि वारदातों में बेशुमार वृद्धि हुई है। अन्ततः चारों ओर से निराश-हताश व धक्का खाए हुए व्यक्ति शान्ति की तलाश में चर्च में प्रार्थना हेतु जाते पाए जाते हैं। रोमन कैथोलिक चर्च के डोर्थी रीस के अनुसार ज्यादातर व्यक्ति चर्च में अपनी ज्वलन्त समस्या के लिए ईश्वर से समाधान प्राप्त करने के लिए आते हैं। चर्च के विवरण के अनुसार हृदय रोग, यकृत पीड़ित, आमाशय कैंसर, नशाखोरी, बाँझपन तथा नौकरी की समस्या से परेशान व्यक्ति ही अधिक होते हैं। रीस का कहना है कि ऐसे लोगों की तादाद अधिक होती है, जो चारों ओर की परेशानियों से घबराए, जिन्दगी से हारे व असहाय होते हैं।
एक सर्वेक्षण के अनुसार अमेरिका के पेण्टीकोस्टल क्षेत्र के निवासियों में भगवान के प्रति अपार निष्ठा पायी जाती है। तुलसा ओखला के ओरल राबर्ट युनिवर्सिटी में विद्यार्थियों ने प्रार्थना की एक नई तकनीक निकाली। ये अपने सन्देश को पवित्र गिरिजाघरों तक पहुँचाने हेतु फोन-फैक्स तथा इंटरनेट की सहायता लेते हैं। इससे सुदूर क्षेत्रों के उन लोगों को लाभ मिलता है जो अपने पवित्र तीर्थ तक नहीं जा पाते हैं। फाउण्ड्री मेमोरियल युनाइटेड मेथोडिस्ट चर्च, वाशिंगटन में प्रति गुरुवार प्रार्थना हेतु लम्बी लाइन लगती है। अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भी इसके सदस्य हैं। उनका प्रार्थना पर अटूट विश्वास है। फाउण्ड्री मेमोरियल के फिलिप वागमेन की भगवत् भजन एवं ध्यान पर गम्भीर आस्था है। “मिरैकिल एण्ड मॉडर्न इमेजिनेशन” नामक पुस्तक के विख्यात लेखक तथा नार्थ कैरोलिना स्टेट युनिवर्सिटी के प्रोफेसर राबर्ट ब्रुशमुलीन के अनुसार प्रार्थना जीवन का महत्वपूर्ण अंग होना चाहिए। परमात्मा को सर्वशक्तिमान एवं सर्वज्ञ मानते हुए राबर्ट मुलीन का कहना है कि परमसत्ता ईश्वर को प्रार्थना के बल पर आकृष्ट किया जा सकता है। एक अदना-सा इंसान प्रेमपूर्ण भक्ति-भावना से सृष्टिकर्ता को दर्शन के लिए बाध्य कर देता है। यही सबसे बड़ चमत्कार है।
आज समूचा विश्व प्रार्थना की अनिवार्यता को स्वीकार कर रहा है। अनेक देशों में इस प्रकार की संस्थाएँ तथा स्कूल खोले जा रहे हैं, ताकि लोग ईश्वरीय श्रद्धा से सरलतापूर्वक जुड़ सकें। भारत तो अपनी सभ्यता के प्रारम्भ से ही प्रार्थना का देश रहा है। आध्यात्मिक संस्कृति के प्रणेता इस देश के मनुष्य के विकास के साथ ही सर्वहित एवं लोकहित के लिए प्रार्थनाएँ होती रहीं हैं। सर्वप्रसिद्ध गायत्री मंत्र में भी इसी की गूँज है। विश्वकल्याण के लिए की गयी इस अनोखी छन्द रचना के कारण ही इसके रचनाकार विश्वरथ से विश्वामित्र बन गये। विश्व में हर कहीं प्रत्येक श्रद्धालु को यह सत्य स्वीकार है कि परमात्मा प्रदर्शन प्रिय नहीं है। वह निस्वार्थ एवं अहंकार शून्य व्यक्ति को तलाशता है। एमौरी युनिवर्सिटी के कैण्डलर स्कूल ऑफ थियोलाॅजी की प्रोफेसर राबर्ट बोण्डी कहती हैं कि ईश्वर की उपासना सच्चे एवं पवित्र हृदय से करनी चाहिए। सच्चे आत्मिक सम्बन्ध से ही भगवत्कृपा का स्पर्श होता है। ऐसी पुकार कभी अनसुनी नहीं होती। बोण्डी की मान्यता है कि वैयक्तिक, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन को ऊँचा उठाने हेतु ईश्वर-प्रार्थना को अनिवार्य कर देना चाहिए।
“इनसाइक्लोपीडिया रिलीजन एण्ड एथिक्स” के अनुसार विश्व समुदाय में दो प्रकार की प्रार्थनाएँ प्रचलित हैं। पहले में प्रकृति की शक्तियों को प्रसन्न करने के लिए गीत गाये जाते हैं। दूसरी प्रकार की प्रार्थना में ईश्वर को पिता अथवा माँ माना जाता है। वही सारी सृष्टि का संचालक है। जे. मुनि का कहना है कि ईसाई देशों में प्रभु यीशु के इन उपदेशों का गहरा प्रभाव पड़ है, वे परमात्मा को पिता मानते हुए कहते हैं-” हे मनुष्यों ! तुम केवल अपने पिता को पुकारो, वह अवश्य जवाब देगा। केवल उसके पवित्र द्वार को खटखटाओ, वह निश्चय ही गले लगाएगा। तुम उसे खोजो और पाओगे।” जीवन के इस संक्रान्तिकाल में लाखों- करोड़ों लोग इन उपदेशों को हृदयंगम करके लाभान्वित हो रहें हैं।
प्रार्थना कैसी हो ? किस प्रकार ईश्वर पर आस्था की जाए ? इनका जवाब एक सर्वेक्षण में खोजा गया, जिसमें 80 प्रतिशत लोगों ने एकमत से स्वीकारा है कि ईश्वर स्वयं प्रमाणित हैं, उनके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। हाँ जरूरत इस बात की है कि आस्था और विश्वास कितना गहरा है ? अविश्वासी के लिए तो किसी भी प्रकार का प्रमाण अपर्याप्त है। एक प्रसिद्ध अमेरिकी वैज्ञानिक एक ऐसा ही व्यक्ति था, जो प्रार्थना आदि पर कभी विश्वास नहीं करता था। उसकी प्रसिद्ध कृति “द डेमन हंटेड वर्ल्डः साइन्स एज ए कैण्डल इन द डार्क” में इस बारे में विस्तृत वर्णन किया गया है। अभी हाल ही में उसकी मृत्यु हुई है। वैज्ञानिक सेगन का तीन बार मेरो ट्रांसप्लाण्टेशन हुआ। 1995 में जब उसे मेलोडीस्थलेशिया नामक बीमारी हुई तो उसके एक मित्र मोटार्न ने उसके स्वास्थ्य लाभ के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। उस समय उसे जीवन में पहली बार आभास हुआ कि शरीर का संचालन कहीं और से भी होता है। शरीर तो केवल यंत्र है, एकमात्र आत्मा ही सत्य है। अपने अन्तिम समय में उसने कहा कि अब मैं मरकर प्रार्थना का विश्लेषण करूँगा । प्रार्थना का प्रभाव चमत्कारी होता है। इस बात को भले ही लायल के भूगर्भ शास्त्र एवं डार्विन के विकासवाद से न समझाया जा सके, पर यह भी एक विज्ञान है। पर हाँ यह उच्चस्तरीय विज्ञान है। प्राचीन भारतीय ऋषियों ने इसका गहन अनुसन्धान-अन्वेषण किया है। आज का विज्ञान शायद इतना उन्नत नहीं हुआ है कि इसकी सही व्याख्या प्रस्तुत कर सके। हार्वर्ड स्कूल के प्रोफेसर गार्डन काफमेन ने कहा है- मात्र बुद्धि से ईश्वर की खोज असम्भव है। इसके साथ कोमल एवं पवित्र भावनाओं का होना अनिवार्य है। काफमेन विश्व को इकोलाॅजी सिस्टम मानते हुए परमात्मा को इसका अधिष्ठाता मानते हैं। प्रार्थना की महत्ता प्रतिपादित करते हुए इनका कथन है कि जो आत्म-निरीक्षण करा सके एवं विकास के पथ पर अग्रसर कर सके, वही सच्ची प्रार्थना है। काफमेन का मत है कि प्रार्थना से अन्दर की कमियों एवं बुराइयों का निराकरण करने हेतु चिन्तन का अवसर मिलता है। ऐसी ही प्रार्थना श्रेष्ठ, सर्वश्रेष्ठ है।
न्यूयार्क जनरल थियोलॉजिकल सेमिनार के प्रोफेसर जॉन पोकिंग हार्ने के मतानुसार बीसवीं सदी के विज्ञान ने विश्व-यांत्रिकों की मौत को देखा है। वे कहते हैं कि विज्ञान कण को खोजते-खोजते ऊर्जा तरंग को स्पर्श कर गया है, जहाँ अनन्त ऊर्जा की हलचल दिखाई देती है। द्रव्य इसी ऊर्जा का रूपान्तरण मात्र है। अनिश्चितता का सिद्धान्त तो इसे और भी स्पष्ट करता है। अतः किसी ऐसी नियामक सत्ता की खोज की जा रही है, जो सृष्टि के संचालक हों। पोकिंग हार्ने ने स्वीकार किया है कि विज्ञान ईश्वर मान्यता के नजदीक आता जा रहा है। ये विश्व को भगवान का खिलौना नहीं, वरन् एक सुव्यवस्थित तंत्र मानते हैं। इसका नियंता परमात्मा अनन्त भावमय है और मनुष्य तो इसका उत्तराधिकारी है। फिर क्यों न इसकी प्रार्थना सुनी जाएगी। आस्ट्रेलिया के एडीलेड युनिवर्सिटी के सृष्टि के नियमों में किंचित् मात्र परिवर्तन भी सर्वनाश खड़ा कर सकता है। डेविस सृष्टि-व्यवस्था के इस सुसंचालन को ही सबसे बड़ चमत्कार मानते हैं। इनकी मान्यता के अनुरूप भगवान का हर कार्य आश्चर्यजनक एवं रहस्यपूर्ण है। सामान्य-जन इसे ही प्रार्थना के रूप में उद्घाटित होते हुए देखते हैं।
प्रार्थना एवं ईश्वर सम्बन्धी सारी मान्यता श्रद्धा व निष्ठा की नींव पर टिकी है। बोस्टन कालेज के थियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष चार्ल्स हेकलिंग ने प्रार्थना से हीलिंग को अवश्यम्भावी बताया है। उनका कहना है कि प्रार्थना में अद्भुत रोग-निवारक क्षमता है। इसे एक सुविदित तथ्य के रूप में जाना जाना चाहिए। डाक्टर भी अंतिम साँसें गिनने वाले रोगी को प्रार्थना का सुझाव देते हैं। इस पर अनेक प्रयोग व परीक्षण हुए हैं। “आर्थाइटिस ट्रीटमेन्ट सेन्टर” क्लीयर वाटर (वर्जीनिया) के साठ रोगियों पर प्रार्थना द्वारा स्वास्थ्य लाभ हेतु परीक्षण किया गया। प्रयोगोपरान्त रोगियों की दर्दनाक पीड़ा व कष्ट में कमी देखी गयी । यह प्रयोग वाशिंगटन जार्ज टाउन युनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के सुविख्यात प्रोफेसर डा. जेल मैथ्यू के निरीक्षण में किया गया। डा. मैथ्यू ईश्वर पर अनन्त श्रद्धा रखते हैं तथा इस बल से अनेक रोगियों को स्वास्थ्य लाभ पहुँचा चुके हैं। वे इसे वैज्ञानिक प्रयोग मानते हैं।
डा. मैथ्यू ने अपने प्रयोग के दौरान हीलिंग प्रेयर में भाग लेने वाले रोगियों के दो समूह बनाए। दोनों टीमों को आरोग्य लाभ हेतु 6 महीनों तक प्रार्थना करायी गयी। फिर इन्हें एक-तीन-छह और बारह मास में अमेरिकन कालेज ऑफ रयुमेटालॉजी के डाक्टरों द्वारा परीक्षण कराया गया। प्रार्थना के चार सत्र के बाद मात्र आठ तक रह गया, जो कि आरम्भ प्रायः रोगियों का टेण्डर ज्वाइन्ट 49 था। 6 माह के बाद अनेक रोगी पूर्णतया स्वस्थ हो चुके थे। इसका निष्कर्ष यह निकला कि रोगी के स्वस्थ होने का अनुपात उसकी श्रद्धा-निष्ठा व ग्रहणशीलता पर आधारित होता है। अतएव विज्ञान प्रार्थना को प्रमाणित करता है।
भगवान हर प्रार्थना का प्रत्युत्तर देता है। पर श्रद्धा के अनुपात में ही इसके प्रभाव ग्रहण किये जा सकते हैं। एल्महर्स्ट कालेज इलीनायस के रोनाल्ड गोट्ज के मतानुसार ईश्वर अपनी सृष्टि के हर घटक के साथ तादात्म्य बनाए रखता है। जब एक बेजान और निर्जीव घटक भगवान से जुड़ रह सकता है, तो इंसान के अन्तर का तार क्यों नहीं इससे सम्बन्धित हो सकता है। रैबी हैरोल्ड कुशनर का कहना है कि व्यक्ति को हर परिस्थिति में ईश्वरीय नियमों पर विश्वास करना चाहिए। कभी-कभी अच्छे व्यक्तियों के जीवन में भी मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है। कुशनर का कहना है कि ऐसे समय में धैर्य और शान्तिपूर्वक ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए। प्रगाढ़ निष्ठा व अनन्त श्रद्धा से की गयी प्रार्थना आत्मा और परमात्मा के बीच की अहंकार की अभेद्य दीवार को तोड़ देती है और प्रभु की कृपा के प्रवाह से सभी मुश्किलें आसान हो जाती हैं।
सचमुच भगवान करुणा का सागर है। मानवी अन्तर से उठा करुण स्वर भगवान को भाव से ओत-प्रोत कर देता है। जैक माइल्स ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ “गाड ए बायोग्राफी” में परमात्मा को करुणा और संवेदना की सजल मूर्ति के रूप में उल्लेख किया है। प्रार्थना ही इसकी प्राप्ति का एकमात्र विकल्प है। सभी धर्मों में प्रार्थना का लक्ष्य एवं उद्देश्य एक ही है। इसकी पद्धतियों में भले ही थोड़ी-बहुत भिन्नता हो। ए. वर्नर के अनुसार अफ्रीका में न्यांगा और न्योगनी जाति के लोग वर्ष-समारोह का आयोजन करते हैं। जाति का प्रमुख, वरुण देवता की विशेष पूजा-अभ्यर्थना करता है। सभी लोग मिलकर उत्साहपूर्वक पानी बरसाने की प्रार्थना करते हैं।
ठन लोगों में प्रत्येक गाँव में एक प्रार्थना पेड़ होता है, जिसके नीचे बैठकर प्रार्थना की जाती है। ग्रीकवासी खड़ा होकर दोनों हाथ जोड़ते हुए अनन्त आकाश की ओर ताकते हुए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। महिलाएँ घुटने टेक कर प्रार्थना करती है। बोनियन जाति के लोग हाथ नीचे रखकर धरती माता की प्रार्थना करते हैं। ये अपने जीवन में सुख-समुन्नति तथा समृद्धि लाने के लिए धरती माता की उपासना करते हैं। यहाँ पर तेज आवाज के साथ भगवान को पुकारे जाने की परम्परा है। हर धर्म-सम्प्रदाय के लोग अपने-अपने ढंग से उस परमात्मा की प्रार्थना करते हैं। हिन्दू मन्दिर में, मुसलमान मस्जिद में, सिख गुरुद्वारे में तथा ईसाई गिरिजाघरों में प्रार्थना करते हैं। पर सभी का एक ही मत है कि सच्चे अंतःकरण से की गयी प्रार्थना ही सफल होती है। महात्मा ईसा ने अपने शिष्यों को नित्य भोजन के समान नित्य प्रार्थना का उपदेश दिया था।
भारतीय वेद-उपनिषद् सभी भगवान को निष्काम भाव से पुकारने का उपदेश देते हैं। प्रार्थना में अपरिमित शक्ति होती है। प्रार्थना वह आग है जो शुष्क हृदय को संवेदना और भावनाओं की ऊष्मा से भर देती हैं। प्रार्थना वह जल है जो अन्तःकरण को शान्त व शीतल कर देता है तथा प्रार्थना वह प्राणवायु है, जो प्रस्तर में नवचेतना और स्पन्दन डाल देती है। अरविन्द आश्रम की माँ कहा करती थीं कि प्रार्थना के द्वारा अन्तर में आनन्द की त्रिवेणी फूट पड़ती है और अन्तःकरण प्रेम से आप्लावित हो जाता है। उनके अनुसार प्रार्थना एक ऐसा आनन्द है-जिसका रसास्वादन किसी अन्य कामना की तृप्ति से नहीं हो सकता, एक ऐसी प्रेम-पिपासा है, जिसे कोई मानवीय सम्बन्ध तृप्त नहीं कर सकता। एक ऐसी शान्ति है, जो कहीं भी-यहाँ तक की मृत्यु में भी नहीं मिल सकती। एक ऐसी ज्योति है जो किसी विज्ञान के अन्दर नहीं पायी जाती। एक ऐसा ज्ञान है, जिसे कोई दर्शनशास्त्र, कोई विज्ञान नहीं दे सकता।
अधुनातन भारत के युगद्रष्टा ऋषि स्वामी विवेकानन्द का कथन है कि प्रार्थना से सोई हुई शक्ति आसानी से जाग उठती है और सच्चे दिल से की जाए तो सभी इच्छाएँ पूरी हो सकती हैं। परन्तु सच तो यही है कि स्वार्थपूर्ण एवं कामना-वासना से लिप्त प्रार्थना की अपेक्षा क्षण भर के लिए की गयी निष्काम भाव से प्रभु की प्रार्थना श्रेयस्कर है। स्वामी जी के अनुसार हृदय से की गयी प्रार्थना होठों से की गयी प्रार्थना की अपेक्षा ऊँची होती है और उससे त्राण भी अधिक होता है। महात्मा गाँधी के अनुसार, प्रार्थना प्रातःकाल का आरम्भ तथा सन्ध्या का अन्त है। कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैं-जीवन निकुँज में तुम्हारी रागिनी बजती रहे-सदा बजती रहे। हृदय कमल में तुम्हारा आसन विराजित हो-सदा विराजित हो।”
विश्वविख्यात कवि टेनिसन ने प्रार्थना को कुछ इस तरह रेखांकित किया है-मोर थिंक्स आर रॉट बाय प्रेयर देन दिस वर्ल्ड ड्रीम्स ऑफ”
निःसन्देह प्रार्थना समस्त कामनाओं की पूर्ति करती है। यही नहीं इससे शरीर, मन एवं हृदय परिष्कृत होता है। आत्म-चेतना परमात्म-चेतना से एकाकार एकात्म होती है। विश्वमानव के कल्याण के लिए धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठकर यदि सार्वभौमिक प्रार्थना के स्वरों की खोज करनी हो, तो फिर से विश्वामित्र के स्वरों में ही गाना होगा-ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् आज मानव-जाति को सबसे अधिक आवश्यकता है तो सद्बुद्धि की-प्रार्थना करने की। उसे सद्बुद्धि प्राप्त हुई, तो यह विश्व स्वयमेव आनन्द से परिपूर्ण हो जाएगा।
सौंदर्य एवं समृद्धि की प्रतीक ‘श्री’ अर्थात् लक्ष्मी पूजन अपने राष्ट्र की सर्वाधिक प्राचीन साँस्कृतिक परम्परा है। ज्योतिपर्व दीपावली तो इसी के लिए प्रसिद्ध है। वैदिक काल से लेकर वर्तमान काल तक लक्ष्मी का स्वरूप अत्यन्त व्यापक रहा है। ऋग्वेद की ऋचाओं में ‘श्री’ का वर्णन समृद्धि एवं सौंदर्य के रूपों में अनेकों बार हुआ है। धृतश्री, दर्शनश्री, श्री तथा श्रीनाम जैसे स्वरूपों में कहीं सौंदर्य तो कहीं समृद्धि की अभिव्यंजना हुई है। ऋग्वेदीय ऋषि जीवन में सौंदर्य एवं समृद्धि दोनों की महत्ता प्रतिपादित करते हैं। इसलिए प्रकृति के रूप या शक्तियाँ जहाँ भी मानवीकृत हुईं हैं, वहाँ सुन्दरता, प्रचुरता, ऐश्वर्य व समृद्धि की आभा बिखेरती हैं। प्रकृति की सभी देवशक्तियों में इसकी झलक नजर आती है। सूर्य स्वर्णिम आभा से अभिमण्डित है, तो उषा हिरण्यमयी है, समृद्धि प्रदात्री है। सन्ध्या की लालिमा सर्वत्र मनोहारी छटा छितराती है। अग्नि भी अपनी ओजस्विता और तेजस्विता से सबको प्रदीप्त करता है। प्रकारान्तर से सभी में ‘श्री’ का माहात्म्य जुड़ है।
शतपथ ब्राह्मण में ‘श्री’ की उत्पत्ति प्रजापति के अन्तस् से मानी गयी है। ऋग्वेद में ‘श्री’ और लक्ष्मी को एक ही अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। तैत्तिरीय उपनिषद् में ‘श्री’ को अन्न, जल, गोरस एवं वस्त्र जैसी चीजें प्रदान करने वाली आद्यशक्ति के रूप में प्रतिष्ठा मिली है। यजुर्वेद में ‘श्री’ और लक्ष्मी को विष्णु की दो पत्नियाँ कहा गया है-श्रीश्चते लक्ष्मीश्चते सपत्नयो।” श्रीसूक्त में श्रीश्च लक्ष्मीश्च कहा गया है। प्रकारान्तर से सर्वव्यापी भगवान की आद्यशक्ति को ही श्री अथवा लक्ष्मी की संज्ञा दी गयी है। यजुर्वेद में श्री को उत्तम माना गया है। इसके पूर्व तीन मन्त्रों में मेधा की चर्चा है। मेधा द्वारा विकारों का छेदन होने के पश्चात् ही साधक का जीवन श्री सम्पन्न होता है। ब्रह्म और छत्र दोनों ही ‘श्री’ के अवलम्बन से विकसित हुए हैं। ब्रह्म के द्वारा ज्ञान क्षत्र के द्वारा कर्म प्रतिपादित होते हैं। मानसिक एवं शारीरिक दोनों ही कर्म स्वास्थ्य एवं सुन्दर होने के उपरान्त ही ‘श्री’ की उपलब्धि होती है। डा. अभयदेव ने अपने ग्रन्थ “वेद सविता” में उल्लेख किया है कि ‘श्री’ आत्मा की सूक्ष्मशक्ति है, तो ‘लक्ष्मी’ चरितार्थ बल।
अथर्ववेद का ऋषि पृथ्वी सूक्त में ‘श्री’ की प्रार्थना करते हुए कहता है “श्रिया माँ धेहि” अर्थात् मुझे ‘श्री’ की संप्राप्ति हो। आरण्यकों में ‘श्री’ को सोम की प्रतिक्रिया अर्थात् आनन्दातिरेक कहा गया है। ब्राह्मण ग्रन्थों में इसकी विवेचना शोभा, सुन्दरता के रूप में हुई है। वाजसनेयी आरण्यक में ‘श्री’ एवं लक्ष्मी की उत्पत्ति तो अलग-अलग की गयी है, परन्तु बाद में दोनों के मिलकर एकात्म होने का कथानक है। पुराणों में ‘श्री’ का आविर्भाव समुद्रमन्थन से बताया गया है। सामगान में ‘श्री’ के पर्याय दीप्ति, ज्योति, कीर्ति जैसे शब्दों को प्रस्तुत किया गया है।
“प्रजापति वै प्रजाः सृजमानोऽतत्यात् तस्मात् श्रान्तात तापोच्छरी रुद्रकामत् सा। दीप्यमाना भ्राजभाता लोलायनयतिष्ठत्॥
अर्थात् प्रजापति के तप के पश्चात् ही श्री का आविर्भाव होता है। बिना परिश्रम के लक्ष्मी सिद्ध नहीं होती। व्यक्ति तभी श्रीमान का पद प्राप्त कर सकता है, बेवजह शारीरिक व मानसिक सौंदर्य को नैतिक एवं आत्मिक गुणों की वृद्धि से विकसित करता है। शास्त्रकारों के अनुसार जीवन में दोनों ही गुणों को उपलब्ध करना आवश्यक है। समृद्धि सम्पन्न होने पर ही राष्ट्र, राष्ट्र के समान प्रतीत होता है। इसी वजह से “श्री र्वै राष्ट्रम्” कहा गया है। इसके सम्बन्ध में स्थापना सोम से भी की गयी है, जिसका अर्थ है- आनन्द। श्री अर्थात् सौंदर्य एवं समृद्धि के संगम में ही मनुष्य को अपने चिर-अभिलाषित आनन्द की प्राप्ति होती है।
ऋग्वेद में ‘श्री’ का विचार एवं परिकल्पना विस्तार से हुई है। इसे लगभग पचास नामों से विभूषित किया गया है। साथ ही कई वर्गों में विभाजित किया गया है। इसके सौंदर्य बोधक नाम हैं- हिरण्यवर्णा, प्रभास, सोमिता, पद्मेस्थिता, पद्मवर्णा, पद्मनेभि, आदित्यवर्णा, पद्ममालिनी, पुष्करिणी तथा सुवर्णा। इसके वैभवबोधक नाम हैं- सुवर्णास्नक, रजतस्नक, अश्वमयी, हिरण्यप्रकाश, कीर्ति, ऋद्धि, गंधद्वारा, पशुनांरूपम्, यशसो, चन्द्र। मानवीय गुणबोधक नाम है - आर्द्रो, तृप्ता, तर्पयस्वी, उदारा, पुष्टि माता-व्येतीमाता वैश्विक रूप निदर्शक नामों में- ऋषि ने श्री को ‘का’ ( प्रजापति ‘क’ है तो उसकी शक्ति हुई ‘का’) मा (प्रलयकाल में सम्पूर्ण जगत इसी आद्या में परिमित हो जाता है।) ता, ईश्वरी, सुर्यो, साय, वाच, आकृति, मनस, काय, देवजुष्टा, लक्ष्मी। इसकी अन्य अभिव्यक्तियाँ हेममालिनी, खपिंगला, यवकारिणी, निष्पपुष्टा, करोषिणी, दुराधर्ष, ज्वलन्ति, अनुपगामिनी नामों से हुई है।
श्री सूक्त में ‘श्री’ का आवाहन जातवेदस् के साथ हुआ है। जातवेदो म आवह जातवेदस् के कई निर्वाचन द्रव्यपरक भी हैं, जैसे जातवित आदि। जातवेदस् इसलिए स्वाभाविक रूप से श्री से जुड़ हुए हैं। अग्नि की तेजस्विता में भी साम्य है। आदित्यवर्णा श्री को तेजस्विनी सिद्ध करता है। श्री सूक्त में वर्णित सभी नाम लक्ष्मी तंत्र नामक ग्रन्थ में दिये गये हैं। लक्ष्मी अर्थात् सभी शुभ लक्षणों से सुशोभित। लक्ष्मी को स्वर्ण से जोड़ गया है। लक्ष्मी तंत्र में सुवर्ण का अर्थ शोभनवर्णों की सृष्टि करने वाली के रूप में हुआ है। श्री की सौंदर्य संज्ञाओं में पद्मपुष्कर का बार-बार उल्लेख हुआ है। पद्म या कमल शोभा या सौंदर्य का प्रतिमान रहा है। इसी वजह से पुराणों में लक्ष्मी या श्री कमला, कमलासन, कमलाकर आदि हैं।
विष्णु पुराण में स्पष्ट हुआ है- देवता, मनुष्य तथा पशु-पक्षी आदि योनियों में जो कुछ पुरुषवाची है, वह सब भगवान श्री हरि हैं और जो कुछ स्त्रीवाची है वह सब श्री लक्ष्मी हैं। लक्ष्मी की अभिव्यक्ति दो रूपों में देखी जाती है-श्री रूप, लक्ष्मी रूप,। दोनों के स्वरूपों में भिन्नता है। दोनों ही रूपों में ये भगवान विष्णु की पत्नियाँ हैं। श्री देवी को कहीं-कहीं भूदेवी भी कहते हैं। इसी तरह लक्ष्मी के दो स्वरूप हैं- सच्चिदानन्दमयी लक्ष्मी श्री नारायण के वक्षस्थल में वास करती हैं। दूसरा रूप है-भौतिक या प्रकृति सम्पत्ति की अधिष्ठात्री देवी का। यही श्रीदेवी या भूदेवी हैं। सब सम्पत्तियों की अधिष्ठात्री श्रीदेवी शुद्ध सत्वमयी हैं। इनके पास लोभ, मोह, काम, क्रोध और अहंकार आदि दोषों का प्रवेश नहीं है। ये स्वर्ग में स्वर्गलक्ष्मी, राजाओं के पास राजलक्ष्मी, मनुष्य के गृह में गृहलक्ष्मी व्यापारियों के पास वाणिज्य लक्ष्मी तथा युद्ध विजेताओं के पास विजय लक्ष्मी के रूप में रहती हैं।
शास्त्रकारों ने लक्ष्मी के आठ स्वरूपों का वर्णन किया है। ये सभी स्वरूप आद्यालक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी, सौभाग्यलक्ष्मी, अमृतलक्ष्मी, कामलक्ष्मी, सत्यलक्ष्मी, भोगलक्ष्मी, व योगलक्ष्मी के नाम से प्रसिद्ध हैं। पतिप्राणा चिन्मयीलक्ष्मी, समस्त पवित्रताओं की शिरोमणि हैं। भृगुपुत्री के रूप में अवतार लेने के कारण इन्हें भार्गवी कहते हैं। समुद्रमन्थन के समय में ये ही क्षीरसागर से प्रगट हुई थीं, इसीलिए इनका नाम क्षीरोदतनया हुआ। ये पद्मिनी विद्या की अधिष्ठात्री देवी हैं। तंत्रोक्त नील सरस्वती की पीठशक्तियों में इनका भी उल्लेख हुआ है।
वैदिक वांग्मय में ऋग्वेद के ऋषि ने भौतिक समृद्धि के साथ कीर्ति-यश की कामना की है। अतः इसे भी श्री कहा जाता है। मानवीय गुणों से गुँथा हुआ है श्री का चरित्र। भक्तों को द्रवित करने से वे चन्द्रा हैं। आर्द्रा हैं क्योंकि आर्द्र अंतःकरण से भक्तों की आर्तपुकार सुनकर उनके कष्ट दूर करती हैं। भोग बिना स्वयं तृप्त हैं, इसलिए वे तृप्ता है, उन्हें माता के सदृश्य देखा जाता है। अपने वैश्विक रूप में आद्यशक्ति सृजन कर्म से जुड़ी हैं, सत्य स्वरूपा हैं। देवजुष्टा देवों द्वारा सेवित हैं। अतएव शंकर श्रीकण्ठ हैं तथा विष्णु हैं श्रीपति। अन्य नामों में ज्वलन्ती तथा दुराधर्ष महत्वपूर्ण हैं। ज्वलन्ती का तात्पर्य है- प्रज्ज्वलित होना। यह दुःख-दरिद्र को जलाकर सुख का उज्ज्वल प्रकाश बाँटती है। दुराधर्ष का अर्थ है जिसे सरलता से पाया न जा सके, जिसे पाने के लिए उद्यम करना पड़ता हो। लक्ष्मी को पाने के लिए साहस तथा तप चाहिए, तभी लौकिक साहित्य में “साहसे श्रीपति वसति” जैसी उक्तियाँ मिलती हैं। प्राचीन समय से ही लक्ष्मी का स्वरूप अत्यन्त व्यापक रहा है। श्री के आह्वान का फल सभी के सुख-सम्पन्नता को पाना है। श्री सूक्त के जप से क्रोध, मात्सर्य, अशुभमति, सब तिरोहित होने की बात कही जाती है। “न क्रोधो, न च मात्सर्य, न लोभो शुभा मतिभीति कृतापुण्यानां भक्तनां श्रीसूक्तं जपेत्।”
श्री हीन होना दरिद्र होना है। वैदिक ऋषि सभी को सुखी और समृद्ध देखना चाहते थे। सम्भवतः इसीलिए यह चिरपुरातन वैदिक ‘श्री’ शब्द वर्तमान समय तक प्रचलित है और भविष्य में बने रहने की सम्भावना है। श्री के इस नन्हें से मंत्र में मानव-व्यक्तित्व को समुन्नत, सुविकसित तथा कान्तिवान् बनाने का सम्पूर्ण तत्त्वज्ञान अन्तर्निहित है। प्रत्येक पुरुष व महिला के नाम के साथ श्रीमान-श्रीमती व कुमारिकाओं के लिए सुश्री शब्द का प्रयोग हमारी प्राचीन परम्पराओं की ओर संकेत करता है। यह मंगलसूचक शब्द है। मनुष्य के नाम के पहले श्री को जोड़ने का भाव हमारी शुभकामनाओं तथा सद्भावनाओं को अभिव्यक्त करता है। ऋषि का उद्घोष है कि सब श्रीमान या श्रीयुक्त बनें तथा सर्वतोमुखी प्रगति की दिशा में निरन्तर बढ़ते रहें।
मानव-जीवन में सत्यम्-शिवम् एवं सुंदरम् की आराधना व उपासना होती है। ‘श्री’ में इन तीनों भावों का अपूर्व समायोजन मिलता है। “श्रिंसर्वेयाम्” से निष्पन्न यह शब्द आश्रय-स्वभाव को समेटे हुए है। यह सुख-शान्ति और आनन्द का स्रोत बहा देता है। व्यक्तित्व के नैतिक भाव, मांगलिक भाव एवं सौंदर्य को उजागर करने का नाम ही श्री की उपासना है। यह मात्र समृद्धि का सूचक ही नहीं वरन् इसमें बाह्य एवं आन्तरिक सौंदर्य का भाव भी अभिव्यंजित होता है। बाह्य सौंदर्य शारीरिक स्वस्थता का परिचायक है, तो आन्तरिक सौंदर्य ओजस्-तेजस् और वर्चस् से परिपूर्ण रहता है। श्री सम्पन्न व्यक्तित्व के चारों ओर एक विशिष्ट प्रभामण्डल दृष्टिगोचर होता है। ऐसे व्यक्ति सदा भौतिक सम्पन्नता व आन्तरिक शान्ति से ओत-प्रोत रहते हैं। मानव-जीवन के अस्तित्व की सार्थकता श्री के प्रति आस्था-विश्वास-उद्यम एवं प्रयत्नशील रहने में है। श्री का स्वरूप साहस और कर्मठता से झलकता है। श्री के बाह्य रूप में जहाँ ललित कलाएँ, काव्य, चित्रकला आदि समाहित है, तो आन्तरिक सौंदर्य में यही चरित्रनिष्ठा, श्रद्धा बनकर उभरती है। इन दोनों के सन्तुलित समन्वय से ही मानव-व्यक्तित्व का विकास उत्तुंग शिखर तक पहुँचने में समर्थ होता है।
लक्ष्मी पुराण में श्री के निवास का उल्लेख हुआ है। लक्ष्मी कहती हैं- जो मनुष्य मितभाषी, कार्यकुशल, क्रोधहीन, शान्त, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय और उदार है उनके यहाँ मेरा निवास है। सवारी, कन्या, आभूषण, यज्ञ, जल से पूर्ण मेघ, फूले हुए कमल, शरद ऋतु के नक्षत्र, हाथी, गायों के रहने के स्थान, राजा, सिंहासन, सज्जन पुरुष, विद्वान, ब्राह्मण, क्षत्रिय, सेवापरायण किसान के यहाँ लक्ष्मी विराजती हैं।
अकर्मण्य, नास्तिक, कृतघ्न, आचारभ्रष्ट, नृशंस, चोर, उद्धत, कपटी, बुद्धिवीर्यहीन पुरुष इसके दुश्मन माने जाते हैं। आज श्यामा श्री अर्थात् काले धन की उपासना की जा रही है। सारी दुनिया इसी श्यामा श्री के पीछे भागती नजर आ रही है। इसे प्राप्त करने के लिए मानव, मानवीयता की हर सीमा का अतिक्रमण कर चुका है। लोग तिकड़मबाज़ी, चोरबाजारी, शोषण व असत्य के सर्वव्यापी रूपों में ऐश्वर्य की कामना करते हैं। इसकी स्थापना मिथ्या भाषण, वासना, दीनता, विश्वासघात, कृतघ्नता, सुरापान, लोभ व अश्लीलता के साम्राज्य में की गयी है। परन्तु यह क्षणिक चमक पैदा करके तिरोहित हो जाती है।
दस महाविद्याओं में पहली तीन अर्थात् काली, तारा, षोडशी ही सर्वप्रधान क्रियाएँ मानी जाती हैं। इन तीनों से ही नौ विद्याएँ और एक पूरक विद्या मिलाकर दस महाविद्याएँ होती हैं। मूल एक से तीन होती है। सर्वमूलभूत एक विद्या ही श्री विद्या है। श्रीविद्या ही ललिता, राजराजेश्वरी, महात्रिपुरसुन्दरी, बाला, पंचदशी और षोडशी इत्यादि नामों से विख्यात है।
श्रीविद्या शब्द से श्रीत्रिपुरसुन्दरी का मन्त्र तथा उसकी अधिष्ठात्री शक्ति दोनों का बोध होता है। सामान्यतया श्री शब्द से लक्ष्मी तत्व का अर्थ स्पष्ट होता है। परन्तु हरितायन संहिता ब्रह्मपुराणोत्तर खण्ड आदि पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुरूप ही श्री शब्द महात्रिपुरसुन्दरी को स्पष्ट करता है। श्री महालक्ष्मी ने महात्रिपुरसुन्दरी की चिरकाल तक आराधना कर अनेकानेक वरदान प्राप्त किये । उनमें से श्री भी एक है। इसके उपरान्त ही श्री शब्द को महालक्ष्मी से
जोड़ जाने लगा। यह अर्थ गौड़ है। महात्रिपुरसुन्दरी की प्रतिपादिका विद्यामन्त्र ही श्रीविद्या है। इस मन्त्र का अधिष्ठाता देवता भी श्रीविद्या है। प्रचलित मान्यतानुसार श्री शब्द श्रेष्ठता का बोधक है। सर्वकारणभूता त्रिपुरेश्वरी सर्वज्ञान सम्पन्न ब्रह्मस्वरूपिणी होने के कारण केवल श्री शब्द से व्यवहृत होती हैं। “सा हि श्रीरमृतासताम्” इत्यादि श्रुति इसी पर ब्रह्म-स्वरूपिणी विद्या की स्तुति करती है।
श्री विद्या के उपासकों को लौकिक तथा पारलौकिक दोनों फलों का लाभ मिलता है। हरितायन संहिता त्रिपुरारहस्य माहात्म्य खण्ड के चतुर्थ अध्याय में महामुनि संवर्तन परशुराम को उपदेश देते हुए कहते हैं कि श्रीविद्या ही आत्मशक्ति है। स्वतंत्र तंत्र में उल्लिखित है कि स्वात्मा ही विश्वात्मा ललिता देवी है। उनका विमर्श ही उनका रक्तवर्ण है और इस प्रकार की भावना ही उनकी उपासना है। श्रीविद्या राजराजेश्वरी पंचदेवासन पर विराजमान् हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव ये पंच महादेव हैं। श्रीविद्या का ही नामान्तर त्रिपुरा है। वही आत्मशक्तिरूपिणी श्रीविद्या जब लीला से शरीर धारण करती हैं जब वेद शास्त्र उनका निरूपण करने लगते हैं। अखिल प्रमाणों की प्रदात्री वही शक्ति चित्तशक्ति के नाम से व्यवहृत होती है। उनके लीला-विग्रहों का महात्म्य भी अनन्त है। श्री शंकर भगवत्पादाचार्य ने अपने सौंदर्य लहरी स्त्रोत में इसे इस प्रकार निरूपित किया है- त्वदन्यः पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगणस्त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया। भयात्त्रातुं दातुं फलमपि च वाच्छांसमधिकं शरण्ये लोकानां तव ही चरणावेव निपुणौ॥
प्राचीन शास्त्रों में श्रीविद्या के बारह उपासकों का नाम आता है- मनु, चन्द्र, कुबेर, लोपामुद्रा, कामदेव, अगस्त्य, अग्नि, सूर्य, इन्द्र, स्कन्ध (कार्तिकेय) शिव और क्रोधभट्टारक (दुर्वासा)।
ऋग्वेद के नासदीय सुक्त में वर्णित है कि संसार के आविर्भाव से पूर्व गहन अंधकार था एवं इसी अंधकार के गर्भ से जगत के संवर्तन के समय प्रथम ऊषा का उद्भव हुआ। ऊषा का यह उद्भव ही श्री कहलाया। छान्दस् भाषा में इसका अर्थ है शोभा, अर्थात् जो सुन्दर, रूपमय एवं आह्लादकारी है। पौराणिक मतानुसार श्री का यही रहस्य ज्ञान श्रीविद्या है। यह विद्या यंत्र एवं मंत्र के रूप सूत्रबद्ध हैं। यंत्रों को देवता का शरीर और मंत्रों को देवता की आत्मा कहते हैं। इसी सृष्टिबीज रूपी मूल विद्या को पुराणकाल में लक्ष्मी के रूप में प्रतिपादित किया गया है। लक्ष्मी या श्री जल सम्भवा हैं। सृष्टि का आरम्भ जल से हुआ, जिससे जीव व वनस्पति जगत का प्रादुर्भाव हुआ। कमल और लक्ष्मी को इसी का प्रतिनिधि माना गया है।
इस सृजन की कथा को श्रीयंत्र के ज्यामितीय प्रतीक रेखाचित्रों के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। किसी भी रचना का विस्तार बिंदु से प्रारम्भ होता है। बिन्दु ही बीजशक्ति है। इससे आकार और स्वरूप का निर्धारण होता है। पंचमहाभूतों में से बिन्दु आकाश तत्व का संकेत करता है। बिन्दु का सर्वप्रथम विस्तार त्रिभुज के रूप में हुआ। यही सत-रज-तम के रूप में त्रिगुणात्मक सत्ता को प्रदर्शित करता है। तंत्रशास्त्र में इस त्रिकोण के तीन बिन्दु महासरस्वती, महालक्ष्मी, व महाकाली को अभिव्यक्त करते हैं। इस तंत्र के सबसे अन्दर वृत के केन्द्रस्थ बिन्दु के चारों ओर नौ त्रिकोण हैं। इनमें से पाँच त्रिकोण ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण देवी के द्योतक हैं तथा शिवयुवती कहे जाते हैं। अधोमुखी त्रिकोण को शिव और श्रीकण्ठ के नाम से जाना जाता है। पाँच शक्ति त्रिकोण ब्रह्माण्ड के विषय में पंचमहाभूतों, पंच-तन्मात्रा पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, पंच कामेन्द्रियाँ व पंचप्राणों के द्योतक हैं। चारों शिव त्रिकोण चित्त, बुद्धि, अहंकार तथा मन के रूप में स्थित हैं।
सुविख्यात श्री यंत्र त्रिपुरसुन्दरी का यंत्र है। इसे यंत्रराज अथवा सर्वश्रेष्ठ यंत्र भी कहते हैं। इससे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति व विकास का संकेत मिलता है। आदि गुरु शंकराचार्य ने सृष्टिक्रम के रूप में इस यंत्र का उल्लेख किया है। उन्होंने तिरूपति बालाजी में श्रीयंत्र की स्थापना की थी। अपनी आनन्द लहरी में इसके स्वरूप को स्पष्ट करते हुए लिखा है-
चतुर्भिः श्रीकण्ठैःशिवयुतिभिः पंचभिरपि प्रभिन्नाभिः शम्भोर्नवभिरपि मूलप्रकृतिभिः। त्रयश्चत्वारिंशद्वसुदलकलाश्रत्रिवलय त्रिरेखाभिः सार्थं नव शरण (भवन) कोणाः परिणताः॥
रुद्रयामल तंत्र में श्रीयंत्र के नौ चक्रों को इस क्रम से क्रमबद्ध किया गया है, बिन्दु, त्रिकोण, आठ त्रिकोण का समूह, दस त्रिकोणों का समूह-1, दस त्रिकोणों का समूह-2, चौदह त्रिकोणों का समूह, अष्टदल कमल, सोलहदल कमल और भूपुर। इन नौ चक्रों का नाम यथाक्रम है- (1) सर्वानन्दमय (2) सर्वसिद्धिप्रद (3) सर्वरक्षाकर (4) सर्वरोगहर (5) सर्वार्थसाधक (6) सर्वसौभाग्यदायक (7) सर्वसंक्षोभण (8) सर्वशायरिपूरक (9) त्रैलोक्य मोहन।
श्री यंत्र का सरल अर्थ है गृह। गृह ही सब वस्तुओं का नियंत्रण व नियमन करता है। आदि गुरु शंकराचार्य ने भी श्रीयंत्र का उदाहरण देते हुए नव शरण कोणाः परिणताः द्वारा यंत्र के अर्थ में गृहवाचक शरण पद का ही प्रयोग किया है। सम्भवतः इसी वजह से उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत में स्थित श्रीनगर नामक स्थान के की भी सार्थकता सिद्ध होती है। इन नगरों में श्रीविद्या के उपासक अधिक संख्या में थे। श्री का तत्त्वज्ञान रखने वालों का तो यह मत है कि यह सकल विश्व ही श्रीविद्या का गृह है। श्रयते या सा श्रीः अर्थात् श्रेयस् ही श्री है। परमात्मा से उसकी शक्ति श्री भी सर्वथा अभिन्न है। तभी तो आगम ग्रन्थ में कहा गया है- न शिवेन बिना देवी न देव्या च बिना शिवः। नानयोरन्तरं किंचिद्धचन्द्रिकयोरिव॥
श्री के कारण ही ब्रह्म को अनन्त शक्ति अथवा सृष्टि, स्थिति और पालन करने वाला कहते हैं। श्रीयंत्र ब्रह्माण्ड, पिण्ड दोनों का ही रहस्यबोध कराता है। यह विषय अपने आप में अतीव गहन एवं अनन्त विस्तार समेटे है। संक्षेप में इतना ही कहा जा सकता है बस इस श्रीयंत्र में निराकार ईश्वर की साकार लीला रेखांकित की गयी है। इसमें सृष्टि तथा जीवन का विकासक्रम एवं शैव-शक्त तत्वों का सुन्दर स्पष्टीकरण मिलता है। त्रिपुरतापिनी उपनिषद्, त्रिपुरापनिषद्, ललितासहस्रनाम, तंत्रराज, कामकला विकास में इसका विस्तृत विवरण हुआ है।
‘श्री’ शक्तिस्वरूपा है। प्रकारान्तर से यही श्रीविद्या एवं श्रीयंत्र का आधार है। इसकी आराधना, उपासना से लौकिक और पारलौकिक सुख, ऐश्वर्य व आनन्द प्राप्त होता है। यों तो इसकी नित्य अर्चना शुभ फलदायी है। पर ज्योतिपर्व दीपावली तो जैसे इसका महोत्सव है। यह इसके तत्त्वज्ञान को समझने एवं रहस्यमय उपलब्धियों को पाने का पर्व है। इस अवसर पर श्रद्धा, निष्ठा एवं विश्वासपूर्वक की गयी श्री उपासना जीवन में सुख, समृद्धि एवं सौंदर्य की निरन्तर अभिवृद्धि करने वाली हो।
जड़ पदार्थ जीवनहीन हैं-यह कहना मोटे तौर पर सही भी है और तथ्ययुक्त भी, कारण कि स्थूलरूप से उनमें उन सब लक्षणों का अभाव होता है, जिसके कारण सजीव प्राणियों और निर्जीव पदार्थों में अंतर किया जाता है। जब सजीवता का कोई चिन्ह न दीखे तो उसको निर्जीव कहना गलत भी नहीं। मोटी दृष्टि इसी आधार पर दोनों में फर्क करती है। तत्त्वदृष्टि की बात और है, जो जड़ में भी चेतना की उपस्थित का अहसास कराती एवं उसे उतना ही सत्य स्वीकारती है, जितना की सूर्य का पूरब से निकलना।
यह संसार जड़ और चेतन के समन्वय से बना है। यहाँ यदि केवल जड़ ही जड़ होता, तो उससे भी काम चलने वाला नहीं और यदि मात्र चेतना होती, तो उतने से ही सुंदर, सुखद सृष्टि की संरचना संभव नहीं थी। जीवधारियों को यदि प्राण चेतना दी, तो पदार्थों को स्वतंत्र सूक्ष्म सत्ताएँ । दोनों में ही चेतना दूध पानी की तरह घुली-मिली है। प्राणियों की सक्रियता और क्रियाशीलता से हमें इसका आभास मिलता है। पदार्थ निष्क्रिय है, उनमें किसी प्रकार की कोई हलचल नहीं, इतने पर भी यह कहना गलत होगा कि वह चेतना हीन है।
ऐसी ही एक घटना का उल्लेख अरविंद आश्रम की श्री माँ ने किया है। प्रसंग विख्यात गुह्यविद्याविद् मादाम तेओं से सम्बद्ध है। अव अल्जीरिया के तेमसेम नामक स्थान में निवास करती थीं। तेमसेम सहारा मरुभूमि के बहुत निकट है। इसीलिए वहाँ की जलवायु भी रेगिस्तानी हैं । वहाँ केवल एक ही स्थान ऐसा था, जो बहुत उपजाऊ था। यह एक घाटी थी , जिसमें कभी भी नहीं सूखने वाली एक नदी बहती थी। इसके अतिरिक्त वहाँ के पहाड़ बिलकुल बंजर और गंजे थे। पहाड़ के एक छोटे से हिस्से में कुछ पैदावार हो जाती थी। वह भी कृषि विशेषज्ञों के अथक परिश्रम से। उस घाटी में एक ऐसा उद्यान था जिसे देखते हुए यह तनिक भी आभास नहीं मिलता कि वहाँ की आबोहवा रेगिस्तानी है अथवा मरुस्थल के बहुत करीब।
एक बार कृषि वैज्ञानिकों के मन में यह शंका पैदा हुई कि इन बंजर पहाड़ों के कारण नदी कभी भी सूख सकती हैं, इसलिए उनमें कुछ पेड़-पौधे लगाये जाये। उक्त मन्तव्य से वहाँ के प्रशासन को अवगत कराया गया। प्रशासन ने इससे सहमत होकर आदेश जारी कर दिया। कृषि वैज्ञानिकों ने चीड़ के पेड़ों की अनुशंसा की थी। कारण की समुद्री चीड़ अल्जीरिया में आसानी से लग जाते हैं, पर भूलवश आदेश देवदारु के वृक्षों का चला गया। देवदारु हिमप्रदेश के पेड़ है। रेगिस्तानी जलवायु में वे नहीं उगते । फिर भी सावधानी के साथ इन पौधों को सम्पूर्ण पहाड़ में लगाये गये और उनकी उचित देख−भाल की जाने लगी। एक-दो वर्ष उपरांत इनकी लंबाई चार फुट के आस-पास हो गयी। तभी एक रात तेओं के साथ अद्भुत घटना घटी। वह सोने की तैयारी कर रही थी। बत्ती बुझाकर अभी लेटी ही थीं कि एक मंद स्वर ने उन्हें जगा दिया। आँखें खोली तो देखा कि कमरे में चाँदनी सा स्निग्ध प्रकाश फैला हुआ है और कोठरी के कोने में एक वामन खड़ा मुस्करा रहा है। सिर पर नुकीली टोपी, लंबी श्वेत दाढ़ी और पावों में नुकीले जूते-इस लिबास में उसका हुलिया वहाँ की परीकथाओं के बौनों से बिलकुल मिलता-जुलता था। उसका सम्पूर्ण शरीर बर्फ से ढका था।
तेओं ने पूछा-तुम कौन हो? यहाँ क्या कर रहे हो? उसने एक मदं मुसकान के साथ उत्तर दिया-मैं बर्फीले प्रदेश की आत्मा हूँ और यह बताने आया हूँ कि यह प्रदेश जल्द ही हिम-मण्डित होने जा रहा है। तेओं ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि हम तो सहारा मरुस्थल के एक दम समीप है फिर यहाँ बर्फ कैसे जम सकती हैं। उसने देवदारु वृक्षों की तरफ इशारा करते हुए कहा-आप ने इन लोगों को लगाकर आमंत्रित किया है। अतः हम उसे भेज रहे है। यह कहकर वह अन्तर्धान हो गये। दूसरे दिन वह सो कर उठी तो पहाड़ की चोटियाँ बर्फ से ढकी थी। ?
ऐसी ही एक महान योगी गंभीर नाथ के साथ घटी। प्रसंग उन दिनों का है, जब वे गया के कपिलधारा पर्वत पर साधना कर रहे थे। एक दिन जब वे गंभीर ध्यान की स्थिति में थे तो अचानक उन्हें कुछ असुविधा महसूस होने लगी। आँखें खोली, तो सामने एक तेजस्वी बालक दिखायी पड़ा। गंभीर नाथ ने पूछा-तुम कौन हो और क्या चाहते हो? बालक ने कहा-मैं कपिलधारा हूँ। मेरा स्थूल कलेवर वह है जिसमें आप बैठे तप कर रहे हैं और जिसको आप अपने सम्मुख देख रहे हैं वह उसकी सूक्ष्मसत्ता है। एक संदेश देने के निमित्त मुझे यहाँ उपस्थित होना पड़ा। आप जैसे योगीजन तो यदा-कदा ही आते हैं। आप यहाँ आए और आपके दर्शन-स्पर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इससे मैं धन्य अनुभव कर रहा हूँ। पर आपके शिष्य से मुझे अपार कष्ट हो रहा है। वह न जाने क्यों मेरे वक्षस्थल पर जगह-जगह गड्ढे खोदता फिरता है। आपकी जगह कोई और होता तो शायद मैं नहीं आता एवं तकलीफ चुपचाप सह लेता। पर आपके दर्शन के आकर्षण के कारण मुझे यह रूप धारण करने के लिए विवश किया। मुझको इस वेदना से मुक्ति दिलाइये। योगीराज से आश्वासन पाकर बालक अदृश्य हो गया।
गंभीर नाथ के साथ उन दिनों उनके दो शिष्य निवास करते थे। एक सदा उनके निकट बना रहता और दूसरे काम जंगल से लकड़ियाँ लाना था। उसका शरीर कुछ दुर्बल था। उसने कहीं सुन रखा था कि शतावर के सेवन से कमजोरी समाप्त हो जाती है। जंगल जब जाता, तो लकड़ी के साथ-साथ वह इसके भी तलाश में रहता। जहाँ उसका पौधा दिखायी पड़ता उसके कंद को खोद निकालता और नियमित उसका सेवन करता। गंभीर नाथ उसके इस कार्य से अनभिज्ञ थे। बालक की शिकायत पर जब उन्होंने उसे बुलाकर पूछा, तब उन्हें यह ज्ञात हो सका कि वह इस प्रकार जहाँ-तहाँ गड्ढे क्यों खोदा करता है। उन्होंने उसे ऐसा करने से मना कर दिया और कमजोरी दूर करने की एक विशेष यौगिक क्रिया बता दी।
रामकृष्ण परमहंस के जीवन संबंधित भी एक इसी प्रकार का उल्लेख आता है। कहते हैं कि एक बार वे दक्षिणेश्वर में गंगातट पर बैठे थे कि उनके मन में गंगा के प्रति एक संशय पैदा हो गया। वे सोचने लगे कि गंगा का आर्ष ग्रंथों में बढ़-चढ़कर बखान किया गया है। उसे देवी की मान्यता मिली है। उसकी पूजा अर्चना की जाती है। वह यदि सचेतन है तो उसकी चैतन्यता दीखती क्यों नहीं। इतना सोचना था कि मध्य गंगा से दो मानवी हाथ ऊपर उठते दिखलाई पड़ें, कुछ ही क्षणों में एक अपूर्व नारी मूर्ति जल से बाहर आई और रामकृष्ण के सामने से होकर निकल गयी।
संत रैदास के बारे में भी एक ऐसी ही जनश्रुति है। कहा जाता है कि एक बार उनका एक मित्र गंगा स्नान के लिए जा रहा था। उसने रैदास से भी स्नान के लिए साथ चलने को कहा, तो फुरसत न होने की बात कहकर उन्होंने जाने से इनकार कर दिया। मित्र चलने लगा तो उन्होंने चमड़े का एक पैसा देते हुए कहा कहा कि इसे मेरे नाम से गंगा में समर्पित कर देना। मित्र ने वैसा ही किया। स्नानादि के उपरांत पहले अपने नाम का पैसा गंगा की भेंट चढ़ाया, फिर रैदास का चमड़े का पैसा उनका नाम लेते हुए बीच प्रवाह में फेंक दिया। उसके आश्चर्य का का ठिकाना न रहा, जब देखा कि जल के भीतर से एक नारी का हाथ निकला और उसे ग्रहण कर लिया।
यहाँ तंत्रमर्मज्ञ सर्वानंद का उल्लेख न किया जाय, तो वर्णन अधूरा माना जायेगा। वे अपने जमाने के मूर्धन्य तांत्रिक थे। इस मार्ग को अपनाने से पूर्व उनकी पहचान एक बुद्धिहीन युवक के रूप में थी। उनके बड़े भाई एक छोटी रियासत में मंत्री पद पर आसीन थे। एक बार किन्हीं कारणों से उनका दरबार में उपस्थित होना संभव न हो सका। इसकी अग्रिम सूचना राजा के पास भिजवानी थी। परिवार में और कोई था नहीं। ले-देकर एक सर्वानंद ही थे। उन्हें भेजने में खतरा महसूस कर रहे थे। पर इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था। अतः क्या कहना है-यह उन्हें भली-भाँति समझाया और इस बात की कड़ी हिदायत दी कि इसके अतिरिक्त और किसी से कुछ न कहना तथा तुरंत लौट आना।
राजा और दरबारियों को सर्वानंद के बौद्धिक स्तर का पहले से ज्ञान था। वह आवश्यक सूचना देने के पश्चात् लौट ही रहे थे कि उपस्थिति लोगों ने विनोदवश छेड़खानी शुरू कर दी। उनसे तरह-तरह के प्रश्न करने लगे। वे भी भाई को चेतावनी भूलकर उनसे उलझ गये। प्रश्नों का जो जवाब उनके दिमाग में आता, अपने हिसाब से देते जाते। इसी बीच किसी ने तिथि पूछ ली। वह पहले से ही घबराये हुए थे, इसी घबराहट में उन्होंने अमावस्या की जगह पूर्णिमा कह दी। दरबार में एक जगह पूर्णिमा कह दी। दरबार में एक जोरदार ठहाका लगा। राजा ने उन्हें बहुत बुरा-भला कहा और दरबार से निकलवा दिया।
अपमानित होकर जब घर पहुँचे, तो भाई ने भी खूब फटकार लगायी। पत्नी से भी उपेक्षा ही मिली। हर ओर से तिरस्कृत सर्वानंद ने आज पहली बार जीवन की वास्तविक अनुभूति हुई। जब यह जीवन उन्हें बेकार और भारभूत प्रतीत होने लगा। इसी प्रतीति के साथ उन्होंने उसे समाप्त कर डालने का निर्णय ले लिया। वे चुपचाप घर से निकल पड़े। समीप ही एक नदी बहती थी। आत्मघात के उद्देश्य से जैसे ही वे तट के नजदीक पहुँचे, उन्हें एक नारी स्वर सुनाई पड़ा-आत्महत्या पाप है। तुम पढ़ लिखकर विद्वान बनो। तुम्हें अपने अपमान का बदला लेना है। एक क्षण को वे ठिठके, इधर-उधर कोई दिखायी नहीं पड़ा तो मन का भ्रम मानते हुए नदी जल के भीतर से एक नारी उभरी और सर्वानंद के पानी में गिरते ही उसे अपने हाथों से उठा लिया तथा नदी तट पर लाकर रख दिया। सर्वानंद उठकर खड़े हो गये, पूछा-आपने मुझे बचाया क्यों। नारी ने उत्तर दिया-अभी तुम्हारा जीवन काफी शेष है। तुम्हें विद्वान और ज्ञानवान बनना है। अनेक लोगों का तुमसे कल्याण होने वाला है। तुम्हारी रक्षा की प्रेरणा भगवान ने मुझे दी है।
पहाड़, पर्वत, नदी, भूखंड यों निर्जीव जैसे दीखते और निष्प्राण माने जाते हैं, पर बात ऐसी है नहीं। तत्त्ववेत्ताओं का कहना है कि इनमें से प्रत्येक की अपनी-अपनी सूक्ष्म सत्ताएँ हैं, जो समयानुसार प्रकट और प्रत्यक्ष हो सकती है। जिसकी सत्ता जितनी समर्थ होगी, वह उतनी ही सशक्त भूमिका निभाएगी। इसी आधार पर तत्त्वज्ञानी ऋषियों ने भारत के कुण्डलिनी जाग्रत की बात कही। यह अवधारणा वस्तुतः कोई नवीन, वरन् उस प्राचीन मान्यता का ही अभिनव संस्करण है, जिसमें कहा गया है कि जप-तप पूजा-पाठ शिष्ट आचरण को स्थान देवता, ग्राम देवता, राष्ट्र देवता तुष्ट और प्रसन्न होते हैं एवं विपरीत आचरण से कुपित।
अंदर का जागरण बाहर के आचरण द्वारा प्रकट हो जाता है। कुण्डलिनी जागरण का सीधा सा तत्त्वदर्शन यह है कि हमने स्वयं का कितना और किस स्तर तक साधा,, सुधारा और शोधा है। परिमार्जन जितना प्रखर होगा, जागरण की प्रक्रिया उतनी ही दिव्य व शीघ्र होगी। यह बात व्यक्ति और राष्ट्र दोनों पर समान रूप से लागू होती है। इन दिनों जिस प्रकार की उथल-पुथल अस्थिरता और अराजकता सम्पूर्ण देश व विश्वभर में व्याप्त है एवं भ्रष्टाचार बलात्कार, हत्या, अपहरण, उग्रवाद, चोरी, डकैती का विषाक्त वातावरण बना हुआ है उसे देखते हुए यही कहना पड़ेगा कि राष्ट्र की अन्तःसत्ता की गति अधोमुखी हो चली है। उसे ऊर्ध्वमुखी बनाना वहाँ के नागरिकों का दायित्व है। यदि जल्द ही इसे सम्पन्न नहीं किया गया, तो शक्ति की पतनोन्मुखी प्रक्रिया ऐसा व्रजपात करेगी जिसे देखकर लोग दाँतों तले उँगली दबाएंगे ।
इसके लिए क्या करना होगा? इसका एक ही उपाय है-प्रवृत्तियाँ का परिमार्जन और आदतों में सुधार। अन्तश्चेतना को प्रभावित करने के लिए बाह्य उपचार का ही सहारा लेना पड़ता है। राष्ट्र का मस्तिष्क नागरिक है। वह यदि विकृति हो जाय तो शक्ति का सुनियोजन और विकास का न बन पड़ेगा। अतएव राष्ट्र देवता को जगाने का मतलब उसके मस्तिष्क को-वहाँ के जनमानस को विकृति से उबार कर सृजन की सुनिश्चित राह पर चलाना है।
जड़ में जीवन है-इसका इतना ही अर्थ है कि उसमें परमचेतना का समावेश है। इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं निकाला जाना चाहिए कि रक्त माँस के प्राणियों की तरह वे भी चलने-फिरने एवं उन जैसी अन्य क्रियाएँ करने में सक्षम होंगे। ऐसा सोचना बाल-बुद्धि है। भला एक पत्थर किस भाँति चल सकेगा। हाँ यदि उसकी अन्तःसत्ता तो फिर भी जड़ ही बनी रहेगी। इसी संदर्भ में यहाँ जड़ को चेतन कहा गया है-इसे भली-भाँति समझ लेना चाहिए।
एक राजा था। उसकी नेक नीयती की सर्वत्र धूम मची थी। वह जब गद्दी पर बैठा, तो लोगों ने खूब खुशियाँ मनायी । सबने सोचा-इस बार प्रजा का पग-पग पर न्याय मिलेगा और अन्यायी दण्ड के भागी बनेंगे। सब उसकी बढ़-चढ़कर प्रशंसा करने लगे।
दुर्भाग्यवश सत्ता संभालते ही राज्य में चोरियों की बाढ़ आ गयी। राजा के पास लगातार शिकायतें आने लगी। वह उत्तेजित होकर बोलता कि जिस भी अपराधी को पकड़ा जायेगा उसकी सजा मृत्युदण्ड होगी, ताकि फिर कोई ऐसा दुस्साहस न कर सके। संयोग से एक बार दो चोर पकड़े गये । दरबार में उन्हें पेश किया गया। राजा ने दोनों को मृत्युदण्ड सुनाया। कुछ दिन बाद पुनः वे ही चोर, चोरी करते पकड़े गये। लोग भारी असमंजस में थे कि जब उन्हें फाँसी हो गयी, तो फिर जीवित कैसे हैं? पुनः उनको उनको राजसभा में प्रस्तुत किया गया और राजा से फाँसी की बात बतायी गयी।
राजा ने गंभीर होते हुए कहा कि उनके शरीरों की अन्त्येष्टि तो उसके ही समक्ष कर दी गयी। अतः उनके जिंदा रहने का सवाल नहीं। निश्चय ही यह उनकी मृतात्मा है। चोरी की उनकी आदत प्रेतयोनि में भी नहीं छूट सकी है। उन्हें कारावास में डाल दिया गया। पर अगले दिन वे फिर वे घूमते-फिरते नजर आये। अगली बार दूसरे चोर पकड़े गये। राजाज्ञा के अनुसार उन्हें भी फाँसी हुई। कुछ दिन पश्चात् वे भी घूमते देखे गये। शिकायत राजा के पास पहुँची। राजा ने बनावटी गंभीरता के साथ फिर पुरानी बात दुहरा दी।
मंत्री राजा की चाल समझता था। उसे भली-भाँति ज्ञात था कि धूर्त राजा घूस लेकर प्रजा को लुटवा रहा है और प्रजा त्राहि-त्राहि कर रही है। उससे इससे मुक्ति का उपाय सोचा। राजा से कहा कि उसकी हत्या का षड्यंत्र रचा जा रहा है। अतः कुछ दिन दरबार में न आये। राजा ने उनकी बात मान ली। इसी बीच मंत्री ने उसकी मृत्यु की घोषणा करवा दी। एक सप्ताह बाद जब राजा राजसभा में पधारें, तो मंत्री ने सभासदों को सूचित किया कि प्रतिनिधि के रूप में राजसिंहासन पर जो राजा की मृतात्मा ही बैठेगी। पर संचालन कार्य अब मैं संभालूंगा । भरे दरबार में उसने क्षमा-याचना की ओर आगे से प्रजा के प्रति ईमानदार रहने का वचन दिया। जैसे को तैसा की नीति ही उचित है।
सोते-सोते वह अचकचा कर उठ बैठे। अभी तक उसके दिमाग में स्वप्न का दृश्य छाया था। स्वप्न भी तो अद्भुत था, जिसके प्रभाव से उन्हें अभी तक रोमांच हो रहा था। उन्हें ऐसा लगा-जैसे सोते हुए उनकी आत्मा भगवान के दिव्य धाम का दृश्य। सब कुछ स्वयंप्रकाशित सर्वेश्वर का ज्योतिर्मय तेज ही, हर कहीं प्रदीप्त हो रहा था। अपने पार्षदों, देवों और ऋषियों से घिरे भगवान मंद-मंद मुस्करा रहे थे। उन्हें ऐसा लगा मानो वेद-उपनिषद् शास्त्र सब कुछ एक साथ उनके सामने साकार हो गये हैं। हृदय में भक्ति का ज्वार उमड़ा, भावनाएँ आँसू बनकर छलक उठी। वह भगवान के चरणों में झुक गये।
वात्सल्य भरी मुस्कान के साथ उन्हें उठाते हुए भगवान कहने लगे-देवाशीष मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ। इतने दिनों तुमने धरती पर रहकर त्याग और तप का जीवन जिया, जनजीवन में पवित्रता और भगवद्भक्ति का संचार किया। अब तुम्हारा कर्तव्य पूरा हुआ। शीघ्र ही तुमको हमारे दिव्यधाम में वापस आना है। परंतु तुम्हारे द्वारा प्रारंभ किया गया कार्य अनवरत जारी रहे। इसलिए अब तुम अपने स्थान पर किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करो जो सच्चा मनुष्य हो।
असम के हरे-भरे पहाड़ी इलाके में वह प्रधान पुजारी थे। मंदिर के आस-पास का क्षेत्र बेहद रमणीय और सुरम्य था। उनके तपोनिष्ठ जीवन एवं भक्तिपरायणता ने इसके कण-कण में पवित्रता की सुगंध भर दी थी। हजारों श्रद्धालु रोज मंदिर में आते थे। मंदिर की ओर से पास के ग्राम में पाठशाला एवं चिकित्सालय का संचालन होता है। मंदिर के पास ही उन्होंने यात्रियों की सुविधा के लिए धर्मशाला बनवायी थी। जहाँ यात्रियों के लिए निःशुल्क भोजन की व्यवस्था थी। आस-पास के गाँवों के सभी भोले-भाले ग्रामवासी पुजारी को धर्मपिता का सम्मान देते थे। सभी के हृदयों में उनके प्रति प्यार और सम्मान की निश्छल भावनाएँ थी। परंतु परंपरावादी धर्म के ठेकेदार उनसे प्रसन्न न थे। क्योंकि पुजारी जी ने जो सभी के मन में विवेक का दिया जलाया था। उसके प्रकाश में इनके रूढ़िवाद का अंधेरा किसी भी तरह नहीं टिक पा रहा था।
आज जब उन्होंने घोषणा की कि जो व्यक्ति कल सबेरे पहले-पहल आकर मंदिर में पूजा संबंधी जाँच में ठीक सिद्ध होगा, उसे ही प्रधान पुजारी बनाया जायेगा। उसकी नियुक्ति के साथ ही वे अवकाश ले लेंगे। इस घोषणा के साथ ही अनेकों नजरें मंदिर की आमदनी पर आ टिकी। बहुत से ब्राह्मण सबेरे मंदिर पहुँचने के लिए चल पड़े। मंदिर पहाड़ी पर था। पहुँचने का एक ही रास्ता था। उस पर भी काँटे और कंकड़ पत्थर थे। सभी ब्राह्मण पहुँच गये। पुजारी जी ने सभी को आदरपूर्वक बैठाया और सबको भगवान का प्रसाद दिया। सबसे अलग-अलग प्रश्न और मंत्र पूछे गये। जब दोपहर हो गयी तो एक नौजवान ब्राह्मण वहाँ आया। उसके कपड़े फटे थे। वह पसीने से भीग गया था और बहुत गरीब जान पड़ता था। पुजारी जी ने उससे सवाल किया-तुम बहुत देर से आये।
वह नवयुवक बोला-मैं जानता हूँ। मैं केवल भगवान का दर्शन करके लौट जाऊँगा। पुजारी जी उसकी दशा देखकर दयालु हो रहे थे। बोले-तुम जल्दी क्यों नहीं आये?
उसने उत्तर दिया-घर में बहुत जल्दी चला था, मंदिर के मार्ग में बहुत काँटे थे और पत्थर भी। बेचारे यात्रियों को उससे बहुत कष्ट होता होगा। यही सोचकर रास्ते से काँटे बीनने लगा और पत्थर हटाने में जुट गया। इसी सब में काम में काफी देर हो गयी।
पुजारी जी ने उसे सिर से पाँव तक देखते हुए पूछा-अच्छा तुम्हें पूजा करना आता है। वह कहने लगा-भगवान को स्नान कराके चंदन फूल देना, धूप दीप जला देना तथा भोग सामने रखकर पर्दा गिरा देना और शंख बजाना तो जानता हूँ। पुजारी जी ने अगला सवाल किया और मंत्र?
वह उदास होकर बोला-भगवान से नहाने-खाने को कहने के लिए मंत्र भी होता है, यह मैं नहीं जानता। वहाँ बैठे हुए सब पंडित यह सुनकर हंसने लगे कि यह मूर्ख भी पुजारी बनने आया है। सभी के चेहरों पर उसके प्रति उपेक्षा, अवहेलना व अवमानना के भाव सघन हो उठे। जब कि पुजारी जी के चेहरे पर एक संतोष छलक उठा। उन्होंने एक क्षण सोचा और कहा-अब मंत्र सीख लेना, मैं सिखा दूँगा। मुझे भगवान ने स्वप्न ने कहा है कि मुझे मनुष्य चाहिए।
क्या हम लोग मनुष्य नहीं हैं? दूसरे पण्डितों ने पूछा। वे लोग पुजारी जी पर नाराज होने लगे। रौब भरे स्वर में उनमें से अनेक बोल पड़े -इतने पढ़े-लिखे विद्वानों के रहते आप एक ऐसे व्यक्ति को अपना स्थान दे रहे हैं, जो मंत्र भी न जानता हो, यह पंडितों का अपमान है।
पुजारी जी ने पण्डितों की ओर बड़ी करुणा भरी नजरों से देखा और कहा-अपने स्वार्थ की बात तो पशु भी जानते हैं। बहुत से पशुओं में चतुराई भी होती है। लेकिन सचमुच मनुष्य वहीं है जो दूसरों को सुख पहुँचाने के लिए जुटा रहता है। यहीं नहीं औरों को सुख पहुँचाने के लिए अपने स्वार्थ और सुख को छोड़ देता है। पुजारी जी की बात सुनकर पण्डितों का सिर लज्जा से झुक गया। उन्हें अपने स्वार्थ पर शर्म हो आयी। मनुष्य होना जीवन की सबसे पहली और अनिवार्य जरूरत है-यह उन्हें आज और अभी समझ में आया। वे धीरे-धीरे उठे और मंदिर के भगवान, पुजारी जी एवं नव नियुक्त पुजारी को नमस्कार करके उस पहाड़ी से नीचे उतरने लगे।
स्रष्टा को अपनी संतानें समान रूप से प्यारी हैं। उसने अपनी सभी संतानों को कोई न कोई ऐसा विशिष्ट अनुदान दिया है, जिसके कारण क्षुद्र से क्षुद्र प्राणी भी अपनी जीवन -यात्रा बेखटके पूर्ण कर लेता है। उसने किसी को कोई खिलाने-खेलने के साधन दिये हैं, तो किसी को कोई । इस सृष्टि से न तो कोई सर्वथा साधन विहीन है और न सर्वसम्पन्न। हर प्राणी को अपनी आवश्यकता के अनुरूप इतने और ऐसे साधन प्रचुर परिणाम में उपलब्ध हैं जिनसे वह अपनी जीवनचर्या संतोष और प्रसन्नता के साथ चला सके। किसी भी प्राणी पर नजर डाली जाय तो स्पष्ट हो जाता है कि वे सभी सृजेता के कृपापात्र हैं और अपनी आवश्यकता के अनुरूप इतने साधन सम्पन्न हैं कि किन्हीं उपलब्धियों में मनुष्य से छोटे और पिछड़े हुए सिद्ध नहीं किये जा सकते। इस तथ्य को थोड़ा अधिक गहराई से विचार करने पर सहज ही जाना जा सकता है और उसके अनेक प्रमाण पाये जा सकते हैं।
उदाहरण के लिए, आत्मरक्षा के साधनों को ही लिया जा सकता है, जो प्रत्येक प्राणी की एक महती आवश्यकता है। जीवों में जागरूकता और पराक्रमवृत्ति को जीवंत बनाये रखने के लिए प्रकृति ने शत्रुपक्ष का निर्माण किया है। यदि सभी जीवों को शाँतिपूर्वक और सुरक्षित रहने की सुविधा मिली होती तो फिर वे आलसी और प्रमादी होते चले जाते । उनमें जो स्फूर्ति और कुशलता पायी जाती है, वह या तो विकसित ही न होती या फिर जल्दी ही समाप्त हो जाती। प्राणियों की आवश्यकताएँ तथा इच्छाएँ ही उनकी शारीरिक, मानसिक एवं भौतिक परिस्थितियों का सृजन करती हैं।
सिंह, व्याघ्र, सुअर, हाथी, मगर आदि विशालकाय प्राणियों को ही लें, तो वे अपने पैने दाँतों से आत्मरक्षा करते हुए देखे जाते हैं और उनकी सहायता से आहार भी प्राप्त करते हैं। साँप, बिच्छू, बर्रे, ततैया, मधुमक्खी आदि अपने डंक चुभोकर शत्रु को परास्त करते हैं। सीपी, घोंघा, केंचुआ आदि के शरीर से जो द्रव पदार्थ या दुर्गन्ध निकलती हैं, उससे शत्रुओं को नाक बंद करके भागना पड़ता है। गैंडा, कछुआ, सीपी, घोंघा, शंख, आर्मेडिलो आदि की त्वचा पर जो कठोर कवच चढ़ा होता है, उससे उनकी रक्षा होती है। टिड्डे का रंग घास जैसा, तितली का फूलों जैसा, चीते का पेड़-पौधों की छाया जैसा चितकबरापन और गिरगिट मौसमी परिवर्तन के अनुरूप अपना रंग बदलता है।
शिकारी जानवरों को अधिक परिश्रम करना पड़ता है। इस दृष्टि से उन्हें दाँत, नाखून, पंजे ही साधारण रूप से मजबूत नहीं मिले, वरन् उन्हें अनुदान रूप में मिली पूँछ तक की अपनी विशेषता है। अनुसंधानकर्ता प्राणि विज्ञानियों का कहना है कि जीवजगत में बहुत कम प्राणी ऐसे हैं, विशेषकर रीढ़धारी, जो बिना पूँछ वाला प्राणी है। भ्रूणीय अवस्था में यह अधिक स्पष्ट रहती है और बाद में मात्र अवशेष के रूप में रह जाती है। प्राणिशास्त्री लैमार्क के अनुसार प्रकृति का एक नियम है कि जीवधारियों में जिस अंग का उपयोग अधिक होता है वे अधिक सक्षम और सक्रिय बने रहते हैं और जिनका उपयोग नहीं होता वे धीरे-धीरे लुप्तप्राय हो जाते हैं या अवशेष मात्र रह जाते हैं। जैसे मनुष्य की पूँछ, आँखों की निक्टेटिंग मेम्ब्रेन एवं बाहकर्णपिन्ना आदि।
दक्षिण एशिया एवं दक्षिण अफ्रीका के जंगलों में निवास करने वाला एक जानवर है-पैंगोलिन इसके शरीर के चारों ओर प्रकृति ने ऐसा सुरक्षात्मक कवच बनाया है जो अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित सेना की भाँति उसकी रक्षा करते हैं और इसके कारण उसकी सुंदरता भी बढ़ जाती है। इसका मुख्य भोजन चींटियाँ और दीमक है। पेड़ों पर चढ़ने वाली पैंगोलिन विशाल वृक्षों से लेकर छोटी-मोटी शाखाओं पर अपनी इस विशेषता के कारण सहज रूप से चढ़ जाती है और पंजों से चींटियों और दीमकों को खोदकर अपना प्रिय भोजन करती है।
जीवशास्त्रियों के अनुसार पूँछ न केवल शरीर के संतुलन को बनाये रखने का कार्य करता है वरन् कितने ही प्राणी इसके कारण शत्रुओं से अपनी आत्मरक्षा भी करते हैं। छिपकली अपनी पूँछ के समान अस्त्र और किसी प्राणी के पास नहीं है। शत्रु के सामने मोड़-मरोड़ कर वह अपनी पूँछ को शरीर से अलग करके फेंक देती है, जो कुछ समय तक जीवित प्राणी की तरह उछलती-फुदकती रहती है। दुश्मन उसे अपना शिकार समझ कर उस पर झपट पड़ता है और इस तरह उसकी प्राणरक्षा हो जाती है। रंग बदलने वाली गिरगिट आत्मसुरक्षा के लिए इसे विशिष्ट यंत्र के रूप में प्रयुक्त करते हैं। सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप रंग बदल लेने पर इनके शत्रुओं को घास का भ्रम हो जाता है।
यहीं विशेषताएँ प्रायः स्तनपायी जीवों में भी कुछ अंशों में पायी जाती हैं। जमीन में, बिल में रहने वाला चूहा अपने पूँछ के अंतिम सिरे को आवश्यकता पड़ने पर उसी तरह शेष भाग से अलग कर देता है जिस प्रकार नाखून बढ़ने पर मनुष्य उसे काटकर अलग कर देता है। अनुसंधानकर्ता जंतुविज्ञानियों का कहना है कि पचास प्रतिशत चूहे शत्रु से घिर जाने पर अपनी पूँछ दुश्मन के मुँह में दे देते हैं और अंतिम समय सिरे को शरीर से अलग करके अपनी रक्षा कर लेते हैं। अफ्रीका में पाये जाने वाला डोर माउस नामक जीव तो बड़ी आसानी से अपनी जान बचा लेता है। उसकी पूँछ में आठ मिलीमीटर दूरी पर बड़े-बड़े धब्बे पाये जाते हैं, जो सतत् अपना स्थान बदलते रहते हैं। शत्रु को यह पता ही नहीं चल पाता कि आखिर सही धब्बा कौन सा हैं जिससे यह पहचाना जा सके कि यह अमुक जंतु है।
पक्षी विशेषज्ञों का कहना है कि प्रणय प्रस्ताव के लिए नर पक्षी अपनी कुशलता व सद्भावना प्रकट करने के लिए मादा की मनुहार करते हैं। इसके लिए वे विभिन्न मुद्राएँ बनाते, उपहार देते व नृत्य करते हैं। मोर का नृत्य देखते ही बनता है। इसमें उसकी पूँछ ही कलात्मकता का प्रमुख स्रोत होती है। अधिकाँश पक्षियों के लिए उनकी पूँछ ही उनके स्वेटर और कंबल का काम करती है। ठण्ड के दिनों में पक्षी अपने आपको इनसे ढक लेते हैं और गरम कपड़े की भाँति इसे प्रयुक्त कर अपनी रक्षा कर लेते हैं। दीमक खाने वाले जंतु अपने पूँछ का प्रयोग स्थायी, नरम व सुविधा जनक बिस्तर के रूप में करते हैं। जब भी सोने की इच्छा होती है पूँछ को नीचे बिछा लेते हैं और गहरी नींद का आनंद लेते हैं। बिच्छू और साँप की कुछ प्रजातियाँ अपनी पूँछ का प्रयोग एक सबल हथियार के रूप में करते हैं। आक्रमण होने पर वे सुरक्षा के लिए इसी का प्रयोग करके आक्रान्ता को परास्त करते हैं।
कुछ जानवर अपनी पूँछ का उपयोग भोजन-संग्राही के रूप में करते हैं। मेडागास्कर में पाया जाने वाला चूहा अनुकूल समय वर्षाकाल में अपनी पूँछ में मोटी चर्बी एकत्र कर लेता है, जिससे इसका आकार काफी मोटा हो जाता है। गर्मी के दिनों में जब खाद्य पदार्थों की कमी पड़ जाती है, तब यह अपने आपको गेंद के रूप में गोल-मटोल बनाकर बाँबियों में या घास-फूस से बनाये घोंसले में सोया पड़ा रहता है। इन दिनों पूँछ में संग्रहित चर्बी से ही काम चलाता है। जिसके कारण मोटापा कम होने लगता है।
किसी भी प्राणी पर दृष्टिपात करें, सभी को प्रकृति का प्यार, संरक्षण और अनुदान मिला हुआ है। ऐसा प्रत्यक्ष दीखता है। उदाहरण स्वरूप वृक्षों पर रहने वाला आस्ट्रेलिया का टेडीवियर नामक प्राणी अपनी पीठ पर आधे दर्जन तक बच्चे लादे हुए फिरता है। इसी तरह अमेरिका के ओपोसम चूहों के आठ-दस बच्चे अपनी माँ की पीठ पर लदे फिरते हैं। ये बच्चे इतने चतुर होते हैं कि अपनी पूँछ माता की पूँछ में लपेट कर जंजीर सी बना लेते हैं।
पूँछ का सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं मनोरंजक उपयोगिता है-संचार व्यवस्था। कुत्ते अपनी प्रसन्नता और कृतज्ञता अपनी दुम हिलाकर व्यक्त करते हैं। जब मालिक या परिवार का कोई सदस्य घर आता है तो उस समय कुत्ता विशेष प्रकार की आवाज निकालते हुए पूँछ को तेजी से हिलाता है। इन क्रियाकलापों से वह अपनी प्रसन्नता अभिव्यक्त करता है। इसी तरह भेड़िये की मानसिकता को उसकी पूँछ प्रदर्शित करती है। नर एवं मादा भेड़ियों का समूह अपनी पूँछ की हरकतों के आधार पर संचार समन्वय स्थापित करता है।
पूँछ से संचार भेजने के संबंध में अमेरिका के वैज्ञानिकों ने कैलीफोर्निया में पाये जाने वाले चूहा वर्गीय पाकेट नामक जंतु के बारे में गहन अनुसंधान किया है। इन प्राणियों के सबसे बड़े शत्रु हैं-साँप और इनमें भी धामन् साँप। यह इन्हीं चूहों को खाकर अपना जीवन निर्वाह करती है। जब से आक्रान्ता इस क्षेत्र में प्रवेश करते हैं जिनमें इस वर्ग विशेष के चूहे रहते हैं, तब वे भागते नहीं। वे कभी भी व्यक्तिगत सुरक्षा को महत्व नहीं देते। यदि वैयक्तिक बलिदान से सामूहिक सुरक्षा हो जाय तो बलिदान देने में पाकेट चूहे कोताही नहीं बरतते। तत्काल वहीं स्थिर रहकर अपने साथी-सहचरों को पूँछ रूपी दूरसंचार केन्द्र से संदेश भेजता है। सामान्य संकट आने पर वह अपनी पूँछ को तीन बार जमीन पर जोर-जोर से पटकता है। खतरे की संभावना होने पर दो बार और अनुभव न होने पर एक बार। पूँछ की इन हरकतों एवं क्रिया-प्रतिक्रियाओं के आधार पर खतरे की तीव्रता को उनके सहचर पहचान बना लेते हैं। धामिन साँप, जो इनका सबसे बड़ा दुश्मन हैं, उसे देखकर ये तेजी से पूँछ को जमीन पर पटकते हैं।
सामान्यतया हिरण झुण्ड में रहकर जंगलों में शाँतिपूर्वक घास-पात चरते रहते हैं। पर जैसे ही उनमें से किसी एक साथी का कान खड़ा हुआ , सभी सतर्क हो जाते हैं, मानो कोई दुश्मन आ गया हो। ब्राजील के जंगलों में पाये जाने वाले बूली बंदर पर भेड़ जैसी ऊन होती है। मकड़ी की तरह हाथ-पैर और पूँछ के सहारे यह एक डाली से दूसरे डाली पर उल्टी-सीधी चाल से उतरता और उछलता रहता है। इसलिए इस बानर का नाम स्पाइडर मंकी पड़ा। यह बंदर शायद ही कभी-कभी जमीन पर पैर रखता है। एक डाली से दूसरी डाली या एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलाँग लगाने में इसकी पूँछ ही मदद करती है। इसके सहारे यह डालियों पर देर तक लटका रहता है और हाथ पैर से खाने की चीजें तोड़ सकता है। बच्चे अपनी माँ पर सवारी करते समय पूँछ के सहारे ही उसे पकड़े रखते हैं। यह सभी उदाहरण इस बात के प्रमाण हैं कि भगवान मनुष्य के लिए ही नहीं, अपने सभी पुत्रों के प्रति समान रूप में उदार है। इसकी न्यायनिष्ठा में कहीं कोई व्यतिरेक नहीं।
उस दिन मेलबोर्न-आस्ट्रेलिया में तापमान बढ़कर 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया था। उस साल की गर्मियों का सबसे गरम दिन। विद्यालय की छुट्टी लगभग खत्म हो चुकी थीं। ज्वायसलीन हापकिंस अपने दोनों बेटों व बेटी के मित्र से बड़ी देर से गरमी की शिकायत सुन रही थी। 13 वर्षीय लीह और 12 वर्षीय डेनियल उसके अपने बेटे थे। 12 वर्षीय कार्ल पावेल इनका दोस्त था। तीसरा पहर बीत गया था, पर गर्मी कम होने का नाम नहीं ले रही थी। टी.वी. पर छह बजे के समाचारों में दर्जनों बच्चों को नगर के चौक वाले फव्वारे के जलकुण्ड में पानी के छींटे उड़ाते दिखाया गया, तो मिसेज़ हापकिंस ने भी गरमी से बेहाल बच्चों को वहीं ले जाने की सोची। और सात बजते-बजते वे तीनों लड़कों को साथ लेकर वहाँ पहुँच गयी।
उस स्थान पर तीन जलाशय आकर्षण के केन्द्र थे। एक तो समकोणीय चौकोर तालाब था, दूसरा था एक विशाल फव्वारा, जिसके एक ओर आस्ट्रेलियाई पर्वतारोहियों की काँसे की प्रतिमा थी और तीसरा आकर्षण का केन्द्र साढ़े चार मीटर ऊँची पानी की वह धारा थी, जो नीचे सीढ़ियों और बड़े-बड़े शिलाखण्डों पर गिरती थी। उत्साह और उमंग से भरे बच्चे यहीं पानी में छपकोरियाँ खेल रहे थे और खुशी से चिल्ला रहे थे। लीह और डेनियल उन चट्टानों का चक्कर काट कर एक नीची दीवार की ओर बढ़ गये, जहाँ से आसानी के साथ उतरा जा सकता था। लेकिन टीशर्ट और हाफ पैंट पहले दुबले-पतले कार्ल ने छोटी राह अपनाई और चट्टानों पर से उछलता-फलाँगता प्रतिमा के पास कमर भर गहरे पानी में जा पहुँचा।
अरे लीह! कार्ल ने अपने दोस्त को आवाज लगायी। लीह ने पलट कर कार्ल को हाथ हिलाते देखा और फिर मंत्रकीलित सा देखता रह गया। कार्ल पलक झपकते गायब हो गया। उसने तत्काल अपने दोस्त के पीछे डुबकी लगा दी। पानी की धार गिरने के कारण वहाँ दिखायी तो कुछ नहीं दे रहा था, पर लीह फव्वारे की तली के साथ टटोलता चला गया। आखिर तली में उसे कोई एक मीटर चौड़ा गड्ढा मिला। उसने जान की परवाह किये बिना वह उसमें सिर के बल धंस कर पानी से भरी सुरंग में जा निकला। उस नाले में पलटियाँ खाते-खाते उसका हाथ सहसा किसी का चेहरा लगा। वह कार्ल ही था। लीह ने एकबारगी उसके बालों को दबोच लिया। लेकिन फव्वारे की तलहटी में बनी उस प्रणाली में चक्कर खाते पानी का बहाव इतना तेज था कि कार्ल फिर से उसके हाथ से छूट कर बह गया।
लीह ने फव्वारे की कंक्रीट वाली तली पर जोर से लात मारी। वहाँ पड़े काँच और कचरे से उसके पाँव जख्मी तो हुए , लेकिन वह झटके से बाहर निकल आने में सफल हो गया। रास्ते में उसका चेहरा नाले में लगे पाइपों से टकरा गया। एक पल को उसे लगा कि वह फँस गया, पर उसने कलाबाजी खाकर पाइपों के बीच से अपने को निकाल लिया और तेजी से उछलकर पानी के बाहर आ गया। कार्ल के बालों का एक गुच्छा अभी तक उसकी मुट्ठी में था।
उधर नीचे पानी की तेज धारा कार्ल को पलटियाँ दे-देकर इस तरह झंझोड़ रही थी जैसे कपड़े धोने वाली मशीन कपड़ों को उलटती-पलटती हुई खँगालती है। दिशाओं की सुध-बुध खो बैठने के कारण कार्ल को इतना भी अहसास नहीं रहा था कि वह एक दूसरी सुरंग की ओर बहा चला जा रहा है, जो उस तली वाली उस सुरंग के साथ-साथ सीधी खड़ी बनी थी। उसी में वह धंस गया था। शायद मैं सीवर में पहुँच गया हूँ और अब बहता हुआ नदी में पहुँच जाऊँगा। तो मैं अब मरने ही वाला हूँ। मौत के इस अहसास के साथ कार्ल को सारे साँसारिक संबंध छूटते-टूटते से लगे।
ऊपर शाम की मलगजी रोशनी में लीह खड़ा काँप रहा था। फिर वह फव्वारे का चक्कर काट कर भागा-भाग माँ के पास पहुँचा और रोते-रोते उसने कहा-कार्ल डूब गया है। उसका चेहरा देखते ही ज्वायसलीन भाँप गयी कि कोई अनहोनी हो गयी। वह चिल्ला पड़ी पुलिस! फायरब्रिगेड जल्दी करो। लीह चौक की भीड़ चीरता, दौड़ा-दौड़ा टाउन हाल के पास ड्यूटी पर तैनात कांस्टेबल के पास पहुँचा और घबराये स्वर में बोला-मेरा साथी फव्वारे में फँस गया है। उसकी जान बनाइये । प्लीज जल्दी कुछ कीजिए।
सिपाही ने तत्काल अपनी वाकी-टाकी उपकरण का स्विच दबाया। चौक से कोई डेढ़ कि.मी. दूर पूर्वी मेलबोर्न में स्थित महानगरीय फायरब्रिगेड के मुख्यालय में आग बुझाने वाले गेरी क्रोनिन और जान रोड्डा ने 7 बजकर 33 मिनट पर खतरे की घंटी सुनी और केवल चार मिनट में ही वे दोनों व अग्निशामक दल के छह अन्य जवान नगर चौक पर जा पहुँचे। वहाँ अब तक भारी भीड़ इकट्ठी हो गयी थी।
क्रोनिन और रोड्डा कमर तक नंगे बदन हो गये। लीह के बताये स्थान पर उन्होंने पाँवों से वह गड्ढा ढूँढ़ निकाला जिसमें कार्ल धंस गया था, फिर उन्होंने एक दूसरे की ओर ताका। लड़का गड्ढे के अंदर धंस गया है, तो उसके बचने की आशा कम ही थी। क्या उन्हें पानी से भरी इस सुरंग में बैठकर अपनी जान खतरे में डालनी चाहिए। उस लड़के को खोजने के लिए , जो शायद अब तक मर भी चुका हो ? हाँ ‘, उन्होंने किसी अज्ञात प्रेरणा से यह खतरनाक फैसला किया। यह खतरा उन्हें उठाना ही चाहिए। उनका फैसला था। गोताखोरी का विशेष श्वास यंत्र प्राप्त करने का तो समय था नहीं। इसलिए क्रोनिन और रोड्डा ने अपनी - अपनी पीठ पर हवा के सिलेंडर कसे और चेहरों पर वे मुखौटे चढ़ा लिए जो आग बुझाते समय धुएँ से भरी बिल्डिंगों में घुसने के लिए पहने जाते हैं। ये उपकरण पानी के अन्दर गोता लगाने के लिए नहीं थे, लेकिन उन्होंने जल्दी से जलकुण्ड में इधर - उधर डुबकी लगाकर देखा लिया कि उनके सहारे वे साँस ले सकते हैं।
इस बीच पुलिस ने चौक की देख - रेख वाले कक्ष में एक ऐसे कर्मचारी को खोज निकाला था, जो फव्वारे की चक्कर काटती पानी की तेज धारा वाली प्रणाली को बन्द करने में सफल हो गया। पानी शाँत हो गया। 30 मीटर लम्बे रस्से से अपने को बाँधकर, जिसे उसके साथियों ने थाम रखा था, पहले क्रोनिन ने उस अँधेरे गर्त में पाँव डाले। उसने गड्ढे की तली छूने की कोशिश की लेकिन पीठ पर बंधे हवा के सिलेंडरों ने उसको उछाल दिया। उसका सिर जोर से उन दोनों पाइपों से जा टकराया, जो नाले के अन्दर से गुजरते थे, इससे उसका एक दाँत टूट गया और ठुड्डी कट गयी।
क्रोनिन नीचे ठहर सके, इसके लिए रोड्डा नाले के अन्दर क्रोनिन के कंधों के ऊपर ,खड़ा हो गया। क्रोनिन दीवारों के साथ - साथ टटोल - टटोल कर उस सुरंग की प्रणाली को समझने का प्रयास करने लगा। उसने उस सीधी सुरंग का मुहाना ढूँढ़ निकाला। लेकिन घुप्प अंधियारे में अकेले घुसना उसे खतरनाक लगा। वह तैरकर ऊपर निकल आया।
और कुछ ही क्षणों बाद उन दोनों ने दोबारा गोता लगाया। इस बार वे अपने साथ कोई दो मीटर लंबा एक बाँस भी ले गये थे, जिसके एक सिरे पर हुक लगा था। उन्होंने यह बाँस उस खड़ी सुरंग के अन्दर डाल दिया और उस समय तक टटोलते रहे, जब तक उसमें कुछ फँस नहीं गया उसे खींचने के लिए उन दोनों को बहुत जोर लगाना पड़ा। दोनों के दिल धड़क रहे थे - होनी हो चुकी है। पर उनके हाथ लगा था कचरे से भरा एक बड़ा - सा प्लास्टिक का थैला। आग बुझाने वाले दोनों जवान पानी के ऊपर आए तो पुलिस ने उन्हें अब खोज कर देने की सलाह दी। कार्ल को गायब हुए एक घण्टा हो चुका था और यह निश्चित - सा लगता था कि लड़का मर चुका है। चौक से भीड़ भी धीरे - धीरे खिसक चली थी।
लेकिन कार्ल अभी मरा नहीं था। सारे भरोसे टूट जाने और सारे सहारे छिन जाने बाद भगवान के प्रति विश्वास बाकी था। उसे यह उम्मीद बरकरार थी कि सर्वसमर्थ एवं परम दयालु परमेश्वर मुझ असहाय बालक की जरूर सुनेंगे। वह बड़ी आन्तरिकता और व्याकुलता के साथ पुकार रहा था - प्रभु ! मैं तुम्हारी शरण में हूँ। मुझे बचा लो, शरणागत वत्सल। शायद अपने भगवत् - विश्वास के कारण ही उसमें अभी मनोबल बाकी था। वह जब बहकर सुरंग में पहुँच गया था और तेजी से चक्कर काटती धारा के साथ बुरी तरह पटका और झंझोड़ा जा रहा था और उसके फेफड़े फटने - फटने को हो रहे थे, तभी भगवान को पुकारने के साथ ही उसकी उँगलियाँ किसी दीवार से खरोंच - सी खा गयीं पर दीवार बेहद चिकनी थी, फिर वह जा टकराया किसी गोल - सी चीज से, जो पाइप - सा लगता था। इस टक्कर से कार्ल की गति धीमी पड़ गयी और उसने चलकर जैसे - तैसे पाइप को पकड़ लिया और उछलकर पानी के ऊपर निकलने का प्रयास किया। वह सोच रहा था कि वह इसके सहारे पानी के ऊपर हवा में पहुँच जाए, पर तभी उसका सिर किसी सख्त चीज से टकरा गया। वह छत थी, तो कोई निकलने का रास्ता नहीं।
अग कार्ल किसी भी तरह साँस नहीं रोके रह सकता था। उसे जैसे - जैसे साँस लेनी ही थी। विकल मन से भगवान की याद करते हुए उसने अपना मुँह खोला। कितना अविश्वसनीय लगता है कि उस गुफा की एक दरार में उसे हवा की एक खोह मिल गयी थी। लंबी साँस उसने अपने फेफड़े भर लिए। जब उसने अपना चेहरा झुकाया तो वह पानी से जा लगा। यह पता करने के लिए कि साँस लेने की जगह उसके पास कितनी है कार्ल पाइप के आस - पास घुमा। बस कोई 30 सेंटीमीटर जगह थी। उसके सिर से बस थोड़ी -सी ज्यादा। उसे इस छोटे से खण्ड में ही रहना होगा। जब तक कोई सहायता न आ जाए। पर सहायता तो तभी आएगी, जब परम दयालु भगवान कृपा करें।
फिर अचानक ही उसे आस - पास उफनता पानी शाँत होता जान पड़ा। कार्ल को अचरज - सा हुआ - तो क्या परमात्मा सचमुच मुझे बचाने के लिए किसी को भेज रहे हैं ? इस समय उसका मन बड़ी विकलता से प्रभु की याद करने में तल्लीन था। हालाँकि अब उस छोटी - सी खोह में भरी हवा उसे साँस लेने से क्षीण हो रही थी।
उसे न कुछ सुझाई दे रहा था, न कुछ सुनाई पड़ रहा था, कोई आता क्यों नहीं ? वह जोर से चिल्लाया। अपनी ही आवाज सुनकर उसे थोड़ी ढाँढस बंधी और फिर वह प्रतिदिन विद्यालय में दुहराई जाने वाली प्रार्थना गुनगुनाने लगा। पर अब तक वह थक चुका था। दिमाग के तन्तु ढीले पड़ने से वह जल्दी ही ऊँघने लगा। उसका मन हो रहा था कि आँखें मूँदकर वह थोड़ी देर सो ले। नीचे फँसे उसे एक घण्टा दस मिनट हो चुके थे। लेकिन उसे अपनी ही सोच पर हंसी आ गयी। सोएगा और यहाँ ? वह वह कर भी क्या सकता था। उसने स्वयं को पूरी तरह भगवान के हवाले करके आँखें मूँद लीं।
ऊपर चौक में एक एंबुलेंस कर्मचारी कार्ल की माँ कैथलीन पावेल के साथ खड़ा उन्हें बुरी से बुरी स्थिति के लिए तैयार करने की चेष्टा कर रहा था। वह साढ़े 6 किलोमीटर दूर स्थित अपने घर से भागी - भागी घबराई हुई यहाँ पहुँची थी। पुलिस उन्हें पास के स्टोर में ले गयी। कोई भी यह नहीं चाहता था कि वे उसे स्ट्रेचर और कम्बल को देखें, जो उनके बेटे की लाश के लिए यहाँ लाया गया था। कैथलीन पावेल को लोग घटनास्थल से जितना दूर रखने की कोशिश कर रहे थे, उतनी उनकी बेचैनी और घबराहट बढ़ती जा रही थी। तभी किसी ने उनके कहा कि आप अपने बेटे के लिए भगवान से प्रार्थना करो, हालाँकि कहने वाले की मुखमुद्रा बता रही थी कि स्वयं उसे भी अपने कथन पर विश्वास नहीं है।
लेकिन ‘प्रार्थना’ इस शब्द ने उनमें नवीन चेतना का संचार किया। उनमें विश्वास की तीव्र लहर उमगी, प्रभु चाहे तो क्या नहीं हो सकता ? एक और व्यक्ति इसी विश्वास के सहारे प्रयत्नशील था। उसका विश्वास था कि कार्ल के जिन्दा होने की सम्भावना है। कई लोगों के प्रतिवाद करने के बावजूद उसने अपना कथन दुहराया, जब तक लाश नहीं मिल जाती तब तक आशा बाकी है। रोड्डा ने अपने सहयोगियों से कहा। वह अब क्रोनिन के पास खड़ा फव्वारे के कुण्ड में पानी कम होता देख रहा था, जो फायरब्रिगेड के मुख्यालय से मंगाए गये 20 टन के विशाल एक सप्ताह पूर्व बिगड़ गया था ओर संयोग से आज ही साढ़े चार बजे ठीक होकर आया था।
पानी का स्तर शीघ्रता से गिरता जा रहा था। लेकिन रोड्डा का विचार था कि उन्हें खड़ी सुरंग के एकदम खाली होने तक रुके नहीं रहना चाहिए। वह क्रोनिन के साथ नाले में लगायी गयी एक सीढ़ी से नीचे उतर गया और तली में पहुँचकर प्रतीक्षा करने लगा। पानी अभी खड़े नाले के आधे तक था। वह सोच रहा था कि जैसे ही धरती की सतह के समानांतर बनी सुरंग की छत चार - पाँच सेंटीमीटर तक पानी उतर जाएगा और उसमें हवा का प्रवेश हो जाएगा, तभी वह पीठ के बल तैरता हुआ उसमें उतर जाएगा।
फिर जैसे ही हवा की एक सँकरी - सो जगह चौड़ी होने लगी, रोड्डा को लगा उसे कुछ सुनाई पड़ा है, क्या वह किसी की चीख थी ? उसने क्रोनिन को जल्दी से सीढ़ी चढ़कर ऊपर सब लोगों को चुप कराने के लिए कहा, तभी उसके कानों में दुबारा एक आवाज सुनायी पड़ी - मुझे बचा लो भगवान ! धन्य हो।
प्रभु ! रोड्डा चीखा, लड़का जिन्दा है।
रोड्डा की पुकार सुनते ही क्रोनिन झपट कर सीढ़ी से नीचे उतर आया। तेज रोशनी वाले दो लैम्प पकड़कर वे दोनों उलटे तैरते ऊपर की खाली जगह में भरी हवा के सहारे सुरंग में घुस गए। नीचे जगह इतनी सँकरी थी कि चित्त तैरते रोड्डा की नाक सुरंग की छत से रगड़ खाकर छिल गयी। क्रोनिन के आगे - आगे तैरता रोड्डा कोई तीन मिनट आगे जाने के बाद एक छोटे - से कक्ष में जा निकला। जरा - सा मुड़ते ही उसकी आँखें कार्ल के सफेद फक पड़े चेहरे पर अटक गयीं।
गंदी हवा में साँस लेते रहने के कारण के चेहरे पर जब रोशनी पड़ी तो वहाँ आतंक -सा छा गया। वह बुरी तरह ठंड से काँप रहा था, मुझे निकालो यहाँ से ! वह चिल्लाया, माँ के पास ले चलो मुझे। लेकिन इतने पर भी उसने पाइप नहीं छोड़ा। जिस किसी तरह वह पाइप से चिपटा था। रोड्डा और क्रोनिन ने उसे बड़े प्यार से दिलासा दी और बड़ी मुश्किल से किसी तरह खींचा - तानी करके वे उसकी उँगलियों को पाइप से अलग कर पाए और उसे तैराकर सीढ़ी तक ले आए।
और जब आग बुझाने वाले दस्ते के जवानों ने कार्ल को सीढ़ी पर चढ़ाया, तो वहाँ उपस्थित सभी लोग चीख पड़े , अरे यह तो जिन्दा है। किसी को भी अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हो रहा था। हर कोई हतप्रभ था। इन सबकी चीख- पुकार कार्ल की माँ के कानों में पड़ी, वह भावों के अतिरेक में बेहोश होने को आयी। उपस्थित लोगों ने उसे जैसे - तैसे सहारा दिया। वह एकबारगी चिल्ला पड़ी-प्रभु ने मेरे बेटे को बचा लिया।
कार्ल के काले बालों के कारण उसका चेहरा और सफेद फक दिख रहा था। जल्दी से कम्बलों में लपेट कर स्ट्रेचर पर लिटा दिया गया। आँखों में आँसू जब उसकी माँ उस पर झुकी तो वह बहुत ही धीमे स्वर में बोला, मैं ठीक हूँ माँ , भगवान ने मुझे बचा लिया। उन्होंने मेरी प्रार्थना सुन ली ! हाँ - बेटे ! कैथलीन पावेल का स्वर भी भाव विगलित था - प्रभु कृपा से असम्भव भी सम्भव हो जाता है। इस समय रात के 1.30 बज रहे थे। यानि कि कार्ल उस नाले में साढ़े पाँच घण्टे से भी ज्यादा देर रहा था।
एक एंबुलेंस कार्ल और उसकी माँ को क्वीन विक्टोरिया मेडिकल सेण्टर ले गयी, जहाँ उसके हाथ - पाँव लगी खरोंचों का इलाज किया गया। साथ वाले कमरे में कार्ल के बहादुर दोस्त लीह के कटे हुए तलबों की चिकित्सा हो रही थी। लीह ने जब कार्ल को बातें करते सुना तो वह भागा - भागा उसे मिलने आ पहुँचा। उससे मिलकर कार्ल बोला, भगवान सचमुच हैं , उसकी बात को बीच में रोककर लीह कहने लगा, तभी तो हमारी प्रार्थना सुनते हैं। थोड़ी देर रुककर दोनों लगभग एक साथ ही बोले - सच्चे हृदय से कोई भगवान से प्रार्थना करे और वह न सुनें, ऐसा हो ही नहीं सकता। पास में खड़ी लीह की माँ ज्वायसलीन और कैथलीन इन दोनों बच्चों की बातें सुन रही थीं। वे एक - दूसरे ओर देखते हुए बोलीं - प्रभु तो हमसे बस विश्वास की माँग करते हैं , उन पर विश्वास हो तो असम्भव भी सम्भव हो जाता है। इन चारों ने एक - दूसरे की ओर देखा और उनके चेहरों पर प्रसन्नता थिरक उठी।
अगले ही दिन जान रोड्डा दोबारा चौक पर पहुँचा। खाली नाले में उतरकर उस सुरंग में गया। जहाँ - जहाँ कार्ल ने हाथ - पाँव मार कर बदहवासी में किसी भी चीज को पकड़ने की कोशिश की थी,, वहाँ - वहाँ दीवारों पर जमी काई पर रोड्डा को खरोंचों पड़ी नजर आयीं। उस कोई लगे पाइप पर भी कार्ल की उँगलियों के निशान नजर आए थे, जिनके सहारे बड़ी देर तक चिपटा रहा था। इस बुरी तरह जमी काई की फिसलन को देखकर उसे हैरानी हुई कि आखिर कार्ल यहाँ ठहरा भी कैसे ?
उस दुर्घटना वाली रात को चौक में इकट्ठी भीड़ की ही तरह रोड्डा को भी आश्चर्य हो रहा था कि इस नाले में पाँच घण्टे फँसकर भी वह लड़का किस तरह जिन्दा बच गया। इस घटना को वहाँ के समाचार - पत्रों ने सुर्खियों में छापा - जिसने भी इस विवरण को पढ़ा - सुना, उसके मुँह से यही निकला - कार्ल पावेल का जिन्दा बच निकलना किसी चमत्कार से कम नहीं। पर प्रार्थना से तो हर चमत्कार सम्भव है।
विकास एक मानवी आवश्यकता है। यदि वह सम्पन्न न हुआ, तो मनुष्य पशु स्तर का ही बना रहेगा। जब वह भौतिक क्षेत्र में सम्पादित होता है, तो व्यक्ति को धनवान्, विद्वान और प्रतिभावान बनाता है। इसके अध्यात्म क्षेत्र से सम्पन्न होने से आदमी ज्ञानवान और विभूतिवान् बनते हैं। सभ्यता और संस्कृति इसी की देन हैं।
यह सच है कि प्रगति के लिए प्रयास अनिवार्य है पर मिथ्या यह भी नहीं कि इसके लिए अवस्था - बोध का होना नितान्त आवश्यक है। इससे कम में उत्कर्ष की कल्पना शक्य नहीं। मूर्धन्य मनीषी पी.डी. आस्पेन्स्की अपनी पुस्तक ‘ दि साइकोलॉजी ऑफ मैन्स पोसिबल इवाल्यूशन ‘ में लिखते हैं कि जिस पल व्यक्ति को यह आभास होता है कि वह सुषुप्तावस्था में पड़ा है, उसी क्षण उसके जागरण की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। सुषुप्ति का अनुभव किये बिना जाग्रति संभव नहीं। इसकी आशय का मन्तव्य प्रकट करते हुए ई. एल. मिलार्ड ने अपनी रचना ‘ दि प्रोग्रेसिव इवोल्यूशन ‘ में लिखा है कि आदमी यदि गरीबी में ही आनन्द की अनुभूति करने लगे, तो शायद उसकी भौतिकी प्रगति कभी भी न हो, कारण कि उत्कर्ष के लिए अभाव एवं असंतोष की प्रतीत जरूरी है।
मनुष्य और पशु में मूलभूत अन्तर यह है कि पशु हर परिस्थिति को झेलने के लिए बाध्य होता है। कोल्हू का बैल कोल्हू में चलने से इनकार नहीं कर सकता, पर मनुष्य के अन्दर भला - बुरा , सुख - दुख अभाव - सम्पन्नता अनुभव करने वाली एक सुविकसित चेतना है। उसके सहारे वह अपनी स्थिति - परिस्थिति में इच्छानुकूल परिवर्तन ला सकता है। वह चाहे तो पतन से दिशा उत्थान की ओर मोड़ ले और चाहे तो जन्म - जन्मान्तरों तक उसी अवस्था में पड़ा रहे। यह सब कुछ उसकी निजी इच्छा - आकांक्षा पर निर्भर है और इस बात पर अवलम्बित कि उक्त दशा का उसे भान है या नहीं। बीमार को अपनी बीमारी का अहसास ही न हो, तो भला उसका क्या उपचार हो सकता है ! पतन - निवारण के लिए पतनोन्मुख अवस्था का आभास होना चाहिए। शत्रु पक्ष के बदलते तेवर भाँपकर ही सुरक्षा - तंत्र मजबूत करना और चौकसी बढ़ानी पड़ती हैं इससे कम कीमत पर राष्ट्र - रक्षा सम्भव नहीं। सफलता के लिये असफलता के प्रति अन्यमनस्कता अनिवार्य है। विज्ञान अपनी वर्तमान प्रति कसे संतुष्ट हो जाए, तो फिर उसका भावी विकास ठप्प हो जाएगा। कलाकार की पूर्णता उसकी अपूर्णता की अनुभूति में निहित है। तात्पर्य यह है कि आज की स्थिति को ही यदि सर्वश्रेष्ठ और सर्वोपरि मान लिया गया, तो कल की दशा में सुधार की गुँजाइश ही समाप्त हो जाएगी।
विख्यात विचारक जे ब्रोनोवस्की अपनी पुस्तक ‘ दि इवोल्यूशन ऑफ मैन्स कैपेसिटी फॉर कल्चर ‘ में लिखते हैं कि विकास और कुछ नहीं, एक विशिष्ट मनोदशा का नाम है, जिसमें लक्ष्य के प्रति समर्पण और उसकी प्राप्ति के लिए प्रयास एवं परिश्रम अविच्छिन्न रूप से उसके साथ जुड़े हुए हों। यह सत्य है कि उन्नयन के लिए पुरुषार्थ अभीष्ट है, पर उसका उदय तब तक संभव नहीं जब तक प्राप्तव्य के प्रति गहरी निष्ठा न हो। लगन के अभाव में प्रयत्न उथले बन पड़ते हैं। ऐसे प्रयत्नों द्वारा महान लक्ष्य प्राप्त नहीं किये जा सकते। उसके लिए गंभीर उपक्रम चाहिए। यदि ऐसी बात नहीं रही होती, तो पूजा-पाठ करने वाला हर एक व्यक्ति चरमलक्ष्य को प्राप्त कर लिया होता, पर जीवन का महत्वपूर्ण भाग लंबे अन्तराल इस दिशा में नियोजित करने के उपरांत भी उनकी जीवन और चिन्तनशैली में राई - रत्ती भी अन्तर नहीं दिखाई पड़ता। इसका एक ही कारण समझ में आता है, वह यह कि उसे बाह्य उपचार को तो अपना लिया, किन्तु उसके साथ जुड़े रहने वाले आन्तरिक अनुशासन और तत्त्वज्ञान को आत्मसात् न किया। आत्मिक प्रगति न तो जप से संभव है, न ध्यान से। वे तो मात्र एक तत्त्वदर्शन हैं , जो इस बात की प्रेरणा देते हैं कि हमें परम-सत्ता से घनिष्ठता स्थापित करनी चाहिए। यह घनिष्ठता ईश्वरीय अनुशासन को कठोरतापूर्वक अपनाकर ही सम्पन्न की जा सकती है, इससे कम में नहीं। पूजा - पाठ, जप - ध्यान इसी की स्मृति और प्रतीत कराते हैं। आत्मिक प्रगति में इनका इतना ही योगदान हैं यह केवल कहने भर की बात है कि आध्यात्मिक कर्मकाण्ड पर करते रहने भर से व्यक्ति आध्यात्मिक बन जाता है और यह भी अत्युक्तिपूर्ण है कि धार्मिक वातावरण में रहने मात्र से आदमी बिलकुल सात्विक बन जाएगा। वास्तव में श्रेष्ठ और सात्विक बनने की प्रक्रिया तब तक अधूरी मानी जाएगी, जब तक उसे प्रति वास्तविक हूक न उठे, अन्यथा जीवनभर गंगाजल का पान और स्नान करने वाले भी अपने कलुषित मन को कहाँ धो पाते हैं ? गंगा जल सेवन और उसमें निमज्जन आज औपचारिकता मात्र बनकर रह गई है। इस दिशा में यदि हमारा संकल्प प्रबल और श्रद्धा हो, तो उसके पूरा होने में विलम्ब भी नहीं लगता, पर विडम्बना यह है कि निर्विकार बनने की हमारी कामना ही सच्ची नहीं है। यदि इसमें हम तनिक भी ईमानदार होते, तो हमारे कर्तृत्व में विरोधाभास नहीं दिखलाई पड़ता। तब एक और हम महानता का प्रदर्शन करते हुए क्षुद्रता का वरण नहीं करते। यह इस बात की परिचायक है कि हम उदात्त दीखना भर चाहते हैं, बनना नहीं। आत्मविकास इस ओछी मानसिकता द्वारा संभव नहीं।
जहाँ तक भौतिक विकास की बात है, तो इसमें दो मत नहीं कि वहाँ भी इच्छाशक्ति चाहिए। केवल प्रगति की बात सोचते और कहते रहने से ही यदि यह संभव होती, तो फिर दरिद्रता नाम की कोई चीज इस दुनिया में नहीं होती। इस जगत का यह विधान है कि यहाँ कुछ भी बिना किये होता नहीं हमें चलना है तो उठकर खड़ा होना पड़ेगा और पग बढ़ाने पड़ेंगे । बातचीत करनी है, तो जीभ हिलानी ही पड़ेगी। अस्तु यह कहना ठीक ही है कि सम्पत्तिवान बनने के लिए प्रयास से पूर्व उसकी इच्छा जाग्रत होनी चाहिए। इच्छा और क्रिया के समन्वय से वह पुरुषार्थ बन पड़ता है, जिससे व्यक्ति ही नहीं, समाज और राष्ट्र भी समृद्धिशाली बनते हैं। इन दिनों समृद्धि अर्जन का एक सरल उपाय भ्रष्टाचार माना जाता है। इससे पैसा तो कमाया जा सकता है, पर वह पुरुषार्थहीन अनीति की कमाई होने से उसके साथ असंतोष जुड़ा होता है। ऐसी सम्पदा अशान्ति और विपत्ति ही पैदा करती है, अतः उससे परहेज करना चाहिए।
प्रति की आकांक्षा करना अच्छी बात है। मनुष्य मात्र की यह नियति है उसके लिए तद्नुरूप प्रयास और पुरुषार्थ होने चाहिए, तभी वह साकार हो सकती है, अन्यथा शेखचिल्ली के सपने से बढ़कर वह ज्यादा कुछ और साबित न हो सकेगी।
परब्रह्म को जहाँ सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, निर्विकार और निर्लिप्त कहा जाता है, वहीं उसे निष्क्रिय भी माना गया है। निष्क्रिय अर्थात् गुमसुम बैठा रहने वाला - जिसकी न कोई इच्छा है और न कोई आकाँक्षा। ऐसा ब्रह्म विश्व के सृजन और पालन का उत्तरदायित्व भला कैसे पूरा कर सकता था, इसलिए उसे जाग्रत करने की आवश्यकता पड़ी। उस आवश्यकता की पूर्ति उसकी शक्ति ने की। यह शक्ति या शिवत्व ही ब्रह्म को क्रियाशील बनाती हैं सौंदर्य लहरी - 01 में आद्यशंकराचार्य ने लिखा है -
“ शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभावित न चेदेवं देवो नः खलु कुशलः स्पन्दितुमपि। “
अर्थात् शक्ति के साथ जुड़ जाने से ही शिव का कर्तृत्व है, उनकी सक्रियता है। अन्यथा वे हिल भी नहीं सकते। बिना शक्ति की सहायता के वे शव की तरह निष्क्रिय पड़े रहते हैं। वस्तुतः शक्ति से ही सक्रियता उत्पन्न होती है और उसी आधार पर सफलता मिलती है।
शिव की भाँति - परब्रह्म की भाँति उसका अंश आत्मा भी सर्वशक्तिमान, निर्विकार और निर्लिप्त होने के साथ - साथ निष्क्रिय भी है। सामान्य अवस्था में वह प्रसुप्त ही रहती है, तो साधारण दिखाई देने वाला मनुष्य भी असाधारण और असामान्य क्षमता सम्पन्न दिखाई पड़ने लगता है। आत्मा को प्रसुप्तावस्था से जाग्रत कर व्यक्ति को असाधारण शक्ति सम्पन्न बना देने वाली शक्ति का नाम कुण्डलिनी है। इसका स्थान काय-कलेवर में मेरुदंड के अंतिम भाग में स्थित मूलाधार चक्र माना जाता है। इस संस्थान को आँखों या वैज्ञानिक यंत्र - उपकरणों से नहीं देखा जा सकता। वहाँ तक पहुँचने और उस स्थान को उद्दीप्त कर जाग्रत करने में केवल भारतीय योग विद्या ही समर्थ है। त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद के 64वें श्लोक में उल्लेख है -
“ योगकालेन मरुता साग्निना बोधिता सती। स्फुरिता हृदयाकाशे नागरूपामहोज्चला॥ “
अर्थात् योग - साधना से प्राण प्रयोग द्वारा प्रज्वलित अग्नि के समान इस कुण्डलिनी महाशक्ति को जाग्रत किया जाता है। वह हृदयाकाश में सर्प की गति से बिजली जैसी चमकती है।
शास्त्रकारों ने कुण्डलिनी को प्रसुप्त सर्पिणी के रूप में साढ़े तीन लपेट लगाये नीचे मुख किये विष उगलते हुए दुर्दशायुक्त स्वरूप का वर्णन किया है, साथ ही उसके जाग्रत होने पर उपलब्ध सत्परिणामों की जानकारी दी है। घेरण्ड संहिता में उल्लेख है -
“ मूलाधारे आत्मशक्तिः’कुण्डली परदेवता। शपिता भुजगाकारा सार्ध त्रिवलयान्विताः॥ “
अर्थात्! मूलाधार में आत्मा की प्रचण्ड शक्ति रूप परमादेवी कुण्डलिनी साढ़े तीन वलय वाली सर्पिणी के समान कुण्डल मारकर सोयी है।
शिव संहिता के तेइसवें श्लोक में भी उल्लेख है कि उसी स्थान पर परमशक्ति देवी कुण्डलिनी साढ़े तीन आकृति लिए सुषुम्ना मार्ग पर अवस्थित है। योगवासिष्ठ में भी कहा गया है कि सर्पिणी की तरह कुण्डली मारकर बैठी हुई यह कुण्डलिनी प्राणियों की परमशक्ति हैं वह सब शक्तियों को जाग्रत करने वाली हैं जैसे क्रोध में भरी सर्पिणी फुसकारती रहती है। इसी से सारे शरीर में स्पन्दन होता है।
मलमूत्र छिद्रों के मध्य मूलाधार में सोई हुई कुण्डलिनी महाशक्ति इड़ा, पिंगला, और सुषुम्ना नामक तीन सूक्ष्म नाड़ियों में होकर ऊपर को उठती है और षट्चक्रों का बेधन करते हुए मस्तिष्क मध्य में स्थित सहस्रार में जा पहुँचती है ओर वहाँ प्रसुप्त पड़ी ब्राह्मीचेतना को झकझोरती है। कुण्डलिनी यदि जाग्रत नहीं है तो इड़ा और पिंगला अपने सामान्य परिवेश में ही काम करती हैं और मस्तिष्क भी उसी प्रकार सामान्य रीति से ढीले - पोले काम करता रहता है , पर जाग्रत कुण्डलिनी के आवेश को संभालना तो मस्तिष्क के लिए भी कठिन हो जाता है। फिर वह पहले की भाँति बैठा नहीं रह सकता। कुछ न कुछ उछल - कूद तोड़ - फोड़ बनाव - शृंगार उसे करना ही पड़ता है जिस व्यक्ति की कुण्डलिनी जाग जाती है, वह जाग्रत अवस्था की तरह गम्भीर निद्रावस्था में भी उतना ही सचेतन रहता है। उसकी स्वप्न ओर जाग्रत अवस्था में कोई अन्तर नहीं आता। जिस तरह वह जाग्रत अवस्था में किसी से बातचीत करता, सुनता, सोचता, विचारता, प्रेरणा देता, सहायता, सहयोग देता रहता है, उसी प्रकार स्वप्नावस्था में भी उसकी गतिविधियाँ चला करती हैं। उस अवस्था में वह किसी का भला भी कर सकता है और नयी - नयी जानकारियों के लिए अन्य ब्रह्माण्डों अर्थात् ग्रह - नक्षत्रों में सैर के लिए भी जा सकता है। जनसामान्य के लिए आश्चर्य करने वाली बात उसके लिए बिलकुल साधारण और सामान्य होती है। साधना में लीन व्यक्तियों को कभी - कभी रात में ऐसे कुछ स्वप्न भी आते हैं जिसमें उन्हें किसी भविष्य की घटना का पूर्वाभास मिल जाता है या किसी गोपनीय रहस्य का पता चल जाता है। वह कुण्डलिनी की ही शक्ति होती है।
यह पृथ्वी जिस पर हम निवास करते हैं , गोलाकार है। उसके केन्द्र में अत्यन्त प्रचण्ड गर्मी है, जिससे वहाँ की सारी वस्तुएँ और धातुएँ गली हुई तरल स्थिति में होती हैं। मूलाधार की वह गाँठ , जहाँ वर्टिब्रल कॉलम - मेरुदण्ड समाप्त होता है ओर जिसे अनेक नाड़ी गुच्छकों ने बाँध रखा है, का भेदन किया जाए तो वहाँ अत्यन्त तेजस्वी और उष्ण शक्ति मिलती है, यह कुण्डलिनी है।
जब कुण्डलिनी जाग्रत हो जाती है तो इड़ा और पिंगला समान गति से ऊर्ध्वमुखी हो जाती हैं और एक तीसरी धारा सुषुम्ना का आविर्भाव होता है। इसके जागरण से ऊर्ध्वमुखी लोकों की अनुभूति और गमन का सुख मिलता है। यह पार्थिव जगत के स्त्री - मिलन के सुख से भिन्न है। स्त्री - गमन का सुख तो क्षणिक होता है, परन्तु कुण्डलिनी जागरण का ऊर्ध्वमुखी सुख ऐसा आध्यात्मिक सुख है, जिसका रसास्वादन निरन्तर किया जा सकता है। पहला सुख जहाँ बन्धन एवं पतन का कारण बनता है वहाँ दूसरा परमानन्द एवं मोक्ष प्रदान करने वाला होता है। योगशास्त्रों एवं साधना - ग्रंथों में इसे ब्रह्म - मैथुन कहा गया है। कुण्डलिनी साधना की जब प्राप्ति होती है तो इस स्तर का आनन्द साधक को सहज ही मिलने लगता है। योगिनी तंत्र में कहा गया है -
सहस्त्रारोपरिबिन्दौ कुण्डल्या मेलनं शिवं मैथुनं शयनं दिव्यं यातीनां परिकीर्तितम्॥
अर्थात् हे पार्वती, सहस्रार कमल में जो कुल और कुण्डलिनी , महासर्प और महासर्पिणी का मिलन है, उसी को यातियों - योगियों ने परम मैथुन कहा है।
तंत्रसार में उल्लेख है -
इड़ा पिंगलयोः प्राणान् सुषुम्नायां प्रवर्तयेत् । सुषुम्नाशक्ति सुदृष्टा जीवोऽयं तु पर5 शिवः। तयोस्तु संगमे देवैः सुरतं नाम कीर्तितम्॥
अर्थात् इड़ा, पिंगला से प्राण जब सुषुम्ना में प्रवेश करता है और सुषुम्ना शक्ति तथा ब्रह्मरंध्र स्थित शिव का मिलन समागम होता है तो उसे मैथुन कहते हैं। शंकराचार्य कृत सौंदर्यलहरी में भी कुण्डलिनी शक्ति का रूपवती युवती के रूप में चित्रित किया गया है और उसके ब्रह्ममिलन को काम - कल्लोल, मैथुन सम्भोग की आलंकारिक भाषा में वर्णन किया गया है। कामधेनु तंत्र, भैरवतंत्र, त्रिपुरापनिषद् आदि ग्रंथों में भी सुषुम्ना नाड़ी को रूपवती परमसुन्दरी युवती के रूप में चित्रित किया गया और उस महाशक्ति की साधना से उत्पन्न अनुभूतियों, विभूतियों का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया गया है। पर इन भौतिक सिद्धियों एवं आत्मिक ऋद्धियों को प्राप्त करने के लिए कुण्डलिनी शक्ति जगाने का अर्थ है - अपने सूक्ष्म शरीर स्थित षट्चक्रों, पंचकोशों एवं उपत्यिकाओं को सक्रिय करना। गुण, कर्म, स्वभाव एवं चिंतन, चरित्र, व्यवहार की पवित्रता के बिना, इन्हें उच्चस्तरीय बनाये बिना यह कार्य सम्पन्न नहीं हो सकता। इसलिए कुण्डलिनी जागरण की विद्या को बहुत गुप्त रखा गया है। कुण्डलिनी के दो उत्पत्ति स्थान माने गये हैं। एक सूर्य के केन्द्र में निवास करने वाली पुरुषरूपी और दूसरी स्त्री रूप में पृथ्वी केन्द्र में। पृथ्वी केन्द्र में कुण्डलिनी को प्राणधारियों की जीवन-सत्ता का केन्द्र कह सकते हैं। वास्तव में यह सूर्य कुण्डलिनी का ही बीज है। कहा जाता है किस संसार में जो कुछ भी प्रकट - अप्रकट है वह बीज रूप से मानवी काया में विद्यमान है॥ सूर्य भी कुण्डलिनी के रूप में शरीर में बैठा हुआ है और शरीर मूलाधार ग्रंथि का विकास होता है तो उसमें सूर्य का प्राण प्रतिष्ठित हो जाता है और साधना द्वारा उसकी जाग्रत अवस्था सूर्य जैसी हो जाती है। अर्थात् उसमें मनुष्य की शक्ति सूर्य जैसी प्रचण्ड शक्ति वाली, सर्वव्यापी एवं सर्वसमर्थ हो जाती है। फिर उस शक्ति का नियंत्रण करना कठिन हो जाता है। कमजोर मन और शरीर वाले उस शक्ति को धारण नहीं कर सकते।
गायत्री का देवता ‘ सविता ‘ है। ओर कुण्डलिनी की प्रतिनिधि शक्ति भी सूर्य सविता ही है। इसलिए गायत्री उपासना का सीधा प्रभाव मेरुदण्ड से होकर मलमूत्र छिद्रों के मध्य स्थित मूलाधार चक्र तक विशेष रूप से होता है। अनन्त अन्तरिक्ष से उतरने वाला सविता का प्राण - प्रवाह मस्तिष्क मध्य स्थित ब्रह्मरंध्र से होकर पहले यहीं पहुँचता है और चक्रों एवं उपत्यिकाओं के माध्यम से सारे शरीर में संचित होता रहता है। जितना अधिक साधना द्वारा विकास होता है उतना ही अधिक प्राणशक्ति का अभिवर्द्धन और उसी अनुपात से कुण्डलिनी का जागरण होता है। यह प्रकाश धीरे - धीरे नेत्र , वाणी, मुख और ललाट आदि सम्पूर्ण शरीर में ओजस्-तेजस् के रूप में चमकने लगता है। त्वचा में यही कोमलता और बुद्धि में सात्विकता एवं पवित्रता की अभिवृद्धि करता है यह क्रिया धीरे - धीरे होती है, इसलिए हानि की भी आशंका नहीं रहती। उपासक अपने आत्म-कल्याण भर के संकेत प्राप्त करता हुआ जो वास्तविक लक्ष्य है, वह जीवन - मुक्ति भी प्राप्त कर लेता है। अणिमादिक अष्ट सिद्धियों, अतीन्द्रिय क्षमताओं के प्रलोभन उसे अपने गन्तव्य मार्ग से विचलित नहीं कर पाते।
सवितालोक से आने वाले प्राण-कण यद्यपि अत्यन्त सूक्ष्म होते हैं, किन्तु इतने प्रकाशमय होते हैं कि बिना दिव्य दृष्टि के भी उन्हें देखा जा सकता है। आसमान की ओर देखने पर वायु में छोटे - छोटे प्रकाश के कण अतिशीघ्रता से चारों ओर उछलते हुए दीख पड़ते हैं। ये प्राण - कण ही हैं। यह कण सात प्रकार के ईथर कणों से विनिर्मित होता है। यह प्राणकण सफेद होता है, पर ईथर के सातों अणु सात रंग होते हैं। नाभि चक्र-जिसे सोलर प्लेक्सस’ या एबडॉमिनल ब्रेन भी कहते हैं, उसमें प्रवेश करने पर यह सप्तवर्णी प्रकाश अलग - अलग रंगों वाली प्रकाश किरणों में विभक्त होकर अपने क्रिया - क्षेत्र में बँट जाता है। नीला और लाल रंग मिली हुई हलकी बैंगनी और नीली किरणें कंठ में चली जाती है। इनमें से हलकी नीली किरणें कंठ चक्र - विशुद्धि चक्र में प्रतिष्ठित हो जाती हैं। यह दोनों गले को शुद्ध रखती हैं और वाणी को मधुर बनाती हैं। कासनी और गहरी नीली मस्तिष्क में चली जाती हैं। उससे विचार, भक्ति और वैराग्य के गुणों का आविर्भाव होता है। गहरा नीला प्रकाश मगज के निचले और मध्यभाग तथा नीला रंग सहस्रार चक्र का पोषण करता है।
पीली किरणें हृदय - क्षेत्र में प्रवेश करती हैं। उससे रक्तकणों की शक्ति और स्निग्धता बढ़ती है। शरीर सुन्दर बनता है। यही किरणें बाद में मस्तिष्क को चली जाती है, जिससे विचार और भावनाओं का समन्वय होता है।
हरी किरणें पेट की अंतड़ियों में कार्य करती हैं। इससे पाचन - क्रिया सशक्त बनती है। गुलाबी किरणें ज्ञान - तन्तुओं के साथ सारे शरीर में फैलती हैं। आरोग्य की दृष्टि से इन किरणों का बहुत बड़ा महत्व है। इनकी बहुतायत वाला व्यक्ति किसी को भी हाथ रखकर अपने स्पर्श से स्वस्थ कर सकता है। बरगद, पीपल, देवदारु और यूक्लिप्टस के वृक्षों में इन किरणों की बहुतायत होती है, जिससे उनकी छाया भी बहुत आरोग्यवर्द्धक होती है। नारंगी, लाल किरणें जननेन्द्रियों तक पहुँचकर गुदा वाले रोग ठीक कर देती हैं। और शरीर की गर्मी में संतुलन रखती हैं। हलकी बैंगनी किरणें भी यहाँ आकर इस क्रिया में हाथ बँटाती हैं। यदि कामवासना पर नियंत्रण रखा जा कसे तो इन किरणों को ही मस्तिष्क में भेजकर भूत, भविष्य एवं वर्तमान का ज्ञान प्राप्त किया और दूर - श्रवण , दूरदर्शन जैसी अतीन्द्रिय क्षमताएँ जाग्रत की जा सकती है।
इस प्रकार कुण्डलिनी जागरण से व्यक्तित्व में आमूलचूल परिवर्तन आ जाता है। विकसित व्यक्तित्व ही नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम की विकास प्रक्रिया को पूर्ण बनाता है। शरीरस्थ कुण्डलिनी को इस प्रकार सूर्य कुण्डलिनी से जोड़कर हर कोई सहजता से जीवनोत्कर्ष का लाभ उठा सकता है।
गेहूँ हमारे आहार का प्रमुख घटक है। इसका प्रमुख कारण यह है कि इसमें पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा होती है। अपने देश के प्रायः सभी क्षेत्रों में गेहूँ की खेती होती है। अन्य अनाजों की अपेक्षा गेहूँ के दोनों के अतिरिक्त इसके छोटे - छोटे हरे ताजे - पौधे भी पोषण एवं रोगनाशक की दृष्टि से बहुत ही गुणकारी होते हैं। अनुसंधानकर्ता चिकित्सा विज्ञानियों ने इस संदर्भ में महत्वपूर्ण खोजें की हैं।
अपनी कृति ‘ हृाई सफर ‘ में अमेरिका की सुप्रसिद्ध चिकित्सक डाक्टर एन. विग्मोर ने गेहूँ की पोषक शक्ति एवं उसके औषधीय गुणों का स्वं पर किये गये अनुसंधानों एवं प्रयोगों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। उनके अनुसार संसार का कोई ऐसा रोग नहीं जो गेहूँ के जवारे रस के सेवन से ठीक न हो सके। कैंसर जैसे घातक रोग भी अपनी प्रारम्भिक अवस्था में इसके प्रभाव से अच्छे होते पाये गये हैं। कमजोरी, रक्ताल्पता, दमा, खाँसी, पीलिया, ज्वर , मधुमेह, वात व्याधि , बवासीर जैसे रोगों में भी गेहूँ के छोटे पौधों का रस लाभकारी सिद्ध होता है। फोड़े - फुंसियों एवं घावों पर इसकी पुलटिस बनाकर बाँधने से वह एण्टीसेप्टिक तथा एण्टी इन्फ्लैमेटरी औषधियों की तरह काम करता है। इसके माध्यम डा. विग्मोर ने कितने ही कष्टसाध्य रोगियों का सफलतापूर्वक उपचार किया और उन्हें स्वस्थ किया है।
पोषक तत्वों की अधिकता के कारण ही गेहूँ को खाद्यान्नों में सर्वोपरि माना गया है। इसमें वे सभी पौष्टिक तत्व विद्यमान होते हैं जो शरीर को स्वस्थ व तन्दुरुस्त बनाये रखने के लिए आवश्यक हैं, यथा - प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट, मिनिरल आदि। विश्लेषणकर्ताओं के अनुसार प्रति 100 ग्राम गेहूँ के आटे में नमी - 12.2 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट- 694 ग्राम, कैलोरी प्रोटीन - 12.1 ग्राम, वसा - 1.7 ग्राम, मिनरल्स - 2.7 ग्राम, रेशा - 1.09 ग्राम, कैल्शियम- 48 मि.ग्रा. फास्फोरस - 355 मि.ग्रा. , लोहा, 4.09 मि.ग्रा., कैरोटीन - 29 , थियामिन - 0.49 रिबोफ्लेविन - 0.17 मि.ग्रा. नियासिन 4.3 मि.ग्रा. और फोलिक एसिड - 0.12.1 मि.ग्रा. मात्रा में पाया जाता है।
वृद्धावस्था की कमजोरी दूर करने में गेहूँ के जवारे का रस किसी भी उत्तम टानिक से कम नहीं, वरन् अधिक ही उत्तम सिद्ध हुआ है। यह एक ऐसा प्राकृतिक टानिक है जिसे हर आयुवर्ग के नर - नारी जब तक चाहें प्रयोग कर सकते हैं। अंग्रेजी दवाओं - टानिकों का अधिक दिनों तक सेवन नहीं किया जा सकता, अन्यथा वे लाभ के स्थान पर नुकसान ज्यादा पहुँचाते हैं। परन्तु इस रस के साथ ऐसी कोई बात नहीं। पोषकता, गुणवत्ता एवं हरे रंग के कारण गेहूँ के पौधे के रस को ‘ग्रीन ब्लड’ की संज्ञा दी गयी है। गेहूँ के ताजे जवारे के साथ यदि थोड़ी - सी हरी दूब - दूर्बाघास एवं 2 - 4 दाने कालीमिर्च को पीसकर रस निकाला और उसका सेवा किया जाए तो पुराने से पुराना एलर्जिक रोग भी जड़ - मूल से नष्ट हो जाता है और शरीर में रोग प्रतिरोधी क्षमता विकसित होकर युवाओं जैसी स्फूर्ति आ जाती है। यहाँ ध्यान रखने योग्य विशेष बात यह है कि दूर्बाघास सदैव साफ-स्वच्छ स्थानों जैसे खेत, बाग, बगीचों, की ही प्रयुक्त की जानी चाहिए। इसे भी छोटे गमलों, क्यारियों, में गेहूँ की भाँति ही उगाया जा सकता है।
गेहूँ के जवारे उगाने का सबसे सरल तरीका यह है कि छोटे - छोटे सात मिट्टी के गमले लिये जाएँ और उन्हें मिट्टी से भर दिया जाए। मिट्टी भुरभुरी और रासायनिक खाद से रहित होनी चाहिए। अब इन गमलों में क्रम से पहले दिन एक गमले एक मट्टी गेहूँ बो दिया जाए तो दूसरे दिन दूसरे गमले में। दिन में 1 - 2 बार सिंचाई कर दी जाए। इस प्रकार गेहूँ अंकुरित होकर 6 - 7 दिन में जब जवारे थोड़े बड़े हो जाएँ तो आवश्यकतानुसार आधे गमले के कोमल जवारों को जड़ सहित उखाड़ लिया जाए। जवारे 7 -8 इंच के रहें तभी उन्हें उखाड़ लेना चाहिए, अन्यथा ज्यादा दिनों तक पड़े रहने से उनसे वह लाभ कम मिलता है, जिसकी अपेक्षा की जाती है। जवारों का रस सुबह खाली पेट लेना अधिक उपयोगी सिद्ध होता है। रस पीने के एक घंटे बाद ही कुछ और चीज खायी-पीयी जाए। जवारे छाया में ही उगाये जाए। उन्हें केवल आधा घंटे के लिए हलकी धूप में रखा जा सकता है।
जवारों से रस निकालने का सरल तरीका यह है कि कोमल पौधे उखाड़ कर उनका जड़ वाला हिस्सा काटकर अलग कर दिया जाए ओर डंठल तथा पत्ते वाले हिस्से को पानी में दो - तीन बार अच्छी तरह धोकर साफ कर लिया जाए। इसे सिल पर रखकर पानी के हलके छींटे मारते हुए बारीक लुग्दी की तरह पीस कर कपड़े से किसी बर्तन में छानकर सारा रस निकाल लिया जाए। इस रस को पीने से एक महीने के अंदर ही रक्त में रक्त - कणों की विशेषकर होमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ जाती है। यह शोध ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में की जा चुकी है और शरीर की कमजोरी दूर होने लगती है। नियमित सेवन से कुछ महीनों के भीतर ही रुग्णता दूर होकर दुबला - पतला शरीर हृष्ट-पुष्ट बन जाता है और खोया हुआ स्वास्थ्य फिर से प्राप्त हो जाता है। दूब - घास के सम्बन्ध में आरोग्य शास्त्रों में कहा गया है - “
देर्वेहि अमृत सम्पन्ने शतमूले शंताकूरे। शतपातक संहर्वि शतमायुष्य वर्धिनी॥
अर्थात् दूर्वाघास में अमृतरस भरा है। इसके नित्य सेवन से सौ वर्ष तक निरोग रहकर जिया जा सकता है। प्राचीन ऋषियों ने इस सूत्र में दूब की रोग- निवारक व स्वास्थ्य - संरक्षक शक्ति का ही संकेत किया है।
गेहूँ के जवारे के रस के साथ - साथ यदि गेहूँ और मेथी दाने को चार - एक के अनुपात में, चार चम्मच गेहूँ व एक चम्मच मेथी दाना स्वच्छ पानी से धोकर एक गिलास में भिगो दिया जाए और 24 घंटे बाद उसका पानी छान कर पी लिया जाए तो वृद्धावस्था को कोसों दूर भगाया जा सकता है। इस जल में आधा नीबू का रस, एक चुटकी सोंठ चूर्ण व दो चम्मच शहद मिला देने से वृद्धावस्था दूर करने वाले विटामिन ई, विटामिन सी और कोलीन नामक तीनों तत्वों के साथ ही एन्जाइम्स, लाइसिन, आइसोल्यूसिन, मेथोनाइन जैसे महत्वपूर्ण स्वास्थ्यवर्द्धक पौष्टिक तत्व भी शरीर को प्राप्त होते रहते हैं। यह पेय पाचक एवं शक्तिवर्धक होने से संजीवनी रसायन की तरह काम करता है। इसी के साथ यदि उक्त छने हुए गेहूँ व मेथी दोने को को कपड़े में बाँधकर अंकुरित कर लिया जाए और दूसरे दिन सुबह खाली पेट नाश्ते के स्थान पर खूब चबा - चबाकर सेवन किया जाए तो इससे न केवल पाचन सम्बन्धी विकार दूर होते हैं, वरन् शरीर भी हृष्ट-पुष्ट व बलिष्ठ बनता है। नीबू, कालीमिर्च व सेंधा नमक मिलाकर इसे स्वादिष्ट बनाया जा सकता है।
भामाशाह मेवाड़ के महाराणा प्रताप के दीवान थे। वे जितने दानवीर थे, उतने ही कुशल योद्धा। उनके सद्गुणों की सुगन्ध सारे राजपूताने में संव्याप्त थी। हर काई उनके नजदीक आ जाना चाहता था। उनके साथ रहने के लिए आकुल- आतुर था। परन्तु भामाशाह का हार्दिक स्नेह ‘बिरमाजी’ के प्रति था। यों कहने को बिरमाजी उनके सामान्य अंगरक्षक थे, परन्तु दीवानजी जितना अपनत्व उनसे रखते थे, उतना शायद उनके कुटुम्बी, परिजनों को भी नसीब नहीं था। इसी कारण अन्य सेवक, अंगरक्षक, मित्र कुटुम्बी सभी मन ही मन ईर्ष्या करते थे। उन सबको आश्चर्य होता था कि बिरमाजी में ऐसा कौन सा गुण है, जो किसी में नहीं और फिर, बिरमाजी तो सुन्दर भी नहीं थे, बदसूरत थे। एकदम काले - कलूटे बैंगन जैसे चेहरे पर दाग, चपटी नाक, टेड़ा - मेड़ा सिर। आखिर क्यों अन्नदाता ने इन्हें अपने मुँह लगा रखा है ?
सभी परेशान थे। आखिर एक दिन उनसे न रहा गया तो सब सलाह - मशविरा कर दीवान जी के पास पहुँचे। इनमें से कुछ वृद्ध भी थे तो कुछ प्रौढ़ और नये भी थे। एक वृद्ध सेवक ने साहस कर कहा-
“ अन्नदाता! आज्ञा हो तो हम सब आपसे कुछ निवेदन करना चाहते हैं।
भामाशाह बोले- “ हाँ - हाँ निडर होकर कहो। “
“ बात यह हे कि बिरमाजी में ऐसी क्या विशेष योग्यता है जिसके कारण अन्नदाता ने उसे अपने निकट रहने का सुअवसर दे रखा है। इसका कारण हमारी समझ में नहीं आया इसलिए हम आपकी सेवा में आए हैं। कृपाकर हमारी जिज्ञासा शाँत करें।
यह सुनकर भामाशाह पहले तो मुस्कराए, फिर बोले - “ वह प्रामाणिक है। लेकिन यह प्रामाणिक होता क्या है, प्रामाणिकता कैसे पायी जाती है ? यह बात पास खड़े लोगों में से किसी की समझ में नहीं आयी। दीवान जी उनके चेहरे के भावों को समझ गये और मन्द स्वर में बोले - “ समय आने पर मैं तुम लोगों की जिज्ञासा शाँत करूँगा अभी तो मुझे महाराणा की सेवा में पहुँचना है। “
सभी अपने - अपने काम में लग गए। बिरमाजी अपना काम करते रहे। अपने स्वामी की सेवा में वे इतना मगन रहते कि न उन्हें भूख लगती, न प्यास, न उन्हें आराम की आवश्यकता महसूस होती, न काम करते - करते उकताहट होती । हर समय उन्हें बस अपने स्वामी के संकेत की प्रतीक्षा रहती, ताकि उनकी सेवा कर अपने सेवक -धर्म का निर्वाह कर सकें। भामाशाह का संकेत पाकर वह दौड़ - दौड़े आते और पलक झपकते ही काम पूर्ण कर लौट जाते। इसी तरह समय गुजर रहा था।
एक बार एक युद्ध की समाप्ति के बाद , मेवाड़ के दीवान भामाशाह अपनी साँड़िनी पर सवार होकर लौट रहे थे। साँड़िनी पर कई बोरे स्वर्ण - मुद्राओं से ठसाठस लदे हुए थे। उनके पीछे - पीछे बिरमाजी, सेवक, अंगरक्षक और सैनिक भी पैदल चले आ रहे थे। सभी सतर्क थे कि कहीं झाड़ी से दुश्मन न निकल आए और आक्रमण न कर दे।
शाम होने को आयी थी। मंजिल कुछ ही दूर थी। अचानक भामाशाह ने अपनी साँड़िनी रोकर पीछे मुड़कर अपने सेवकों और सैनिकों को सम्बोधन किया-
“ साथियों ! न जाने कैसे स्वर्ण - मुद्राओं से भरे एक बोरे में छेद हो गया है। न जाने कितनी देर से इस बोरे में से स्वर्ण - मुद्राएँ पीछे गिरती आ रही हैं। लगभग तीन चौथाई स्वर्ण - मुद्राएँ गिर चुकी हैं। तुम लोग चाहो तो वे स्वर्ण-मुद्राएँ एकत्र कर सकते हो। जिसे जितनी मुद्राएँ मिलेंगी वही उसका मालिक होगा। मुद्राएँ किसी से भी वापस नहीं ली जाएँगी।
यह कहकर भामाशाह ने अपनी साँड़िनी को हाँक दिया। सभी सैनिक ओर सेवक स्वर्ण -मुद्राएँ एकत्र करने में लग गए। न जाने कब से मुद्रा गिर रही थीं - यही सोचते - सोचते सभी मुद्राएँ ढूँढ़ते - ढूँढ़ते पीछे की ओर बढ़ते रहे।
कुछ देर बाद भामाशाह ने पीछे पलटकर देखा तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि बिरमाजी को छोड़कर और कोई भी सेवक या सैनिक नहीं है। दूर - दूर तक उन्हें कोई नजर नहीं आया । हाँ बिरमाजी अवश्य पसीने से लथपथ हाथ में नंगी तलवार लिए दौड़ते - हाँफते चले आ रहे हैं। यह देखकर भामाशाह मुसकराये।
भामाशाह ने बिरमाजी से पूछा,
“ सभी तो मुद्राएँ एकत्र करने चले गए, तुम क्यों पीछे आ रहे हो ? क्या तुम्हें मुद्राएँ नहीं चाहिए ?
बिरमाजी हाथ जोड़ते हुए कहने लगे, अन्नदाता! मैं तो एक मामूली सेवक हूँ और मेरा कम हर पल आपके साथ रहना है। यह खतरनाक इलाका है, दुश्मन का भरोसा नहीं। क्या पता कब घात लगाए बैठा दुश्मन आक्रमण कर दे ? या क्या पता आपको कब प्यास लग जाए ? तब ऐसे में कौन आपके लिए जल लेकर आएगा ? और आपके होते हुए मुझे स्वर्ण - मुद्राओं की क्या आवश्यकता ? मेरे लिए तो आपका आशीर्वाद ही बहुत है। “
अगले दिन ही सभी भामाशाह के महल में एकत्र हुए। सभी प्रसन्न थे। सबको ही पर्याप्त स्वर्ण - मुद्राएँ मिली थीं। तभी भामाशाह आए और बोले - “ एक बार तुम लोगों ने मुझसे पूछा था कि बिरमाजी में ऐसा क्या है, जिसके कारण मैं बिरमाजी को अपने निकट रखता हूँ। इसका उत्तर तुम्हें मिल गया होगा !
भामाशाह की बात सुनकर सभी चकित रह गए। उनकी समझ में कुछ नहीं आया तब भामाशाह नु पुनः कहा - “ कल जब हम सब युद्ध से लौट रहे थे, तब मैंने जान-बूझकर एक बोरे में छेद कर दिया था। फिर मैंने तुम सबकी परीक्षा लेने के लिए कहा था कि जो जितनी मुद्राएँ एकत्र कर सकता है कर ले। ... तुम सबके सब मुद्राएँ एकत्र करने में रह गए। तुम सब मेरे सेवक, अंगरक्षक ओर सैनिक हो। मुद्राओं के लोभ में तुम अपना कर्तव्य भूल गए। तुम यह भी भूल गए कि दुश्मन कभी भी कही से भी आक्रमण कर सकता है। लेकिन बिरमाजी अपना कर्तव्य नहीं भूले। मेरे पीछे - पीछे दौड़ते रहे।
अब आया आप लोगों की समझ में कि प्रामाणिकता क्या है ? प्रामाणिकता है लोभ और भय के सामने सर्वथा अविचलित होकर कर्तव्य पर दृढ़ रहना। बिरमाजी कर्तव्यनिष्ठ हैं, इसलिए प्रामाणिक हैं। अब तो आप लोग समझ गए होंगे कि मैं बिरमाजी को अपने निकट क्यों रखता हूँ ? यह सच है मैं बिरमाजी को बहुत प्यार करता हूँ। “ भामाशाह की बातें सुनकर सभी भौचक्के रहे गए काटो तो खून नहीं। सभी मन ही मन शरमिन्दा हुए। मन आत्मग्लानि से भर गया। तब एक वृद्ध सेवक ने हाथ जोड़कर कहा-
“ अन्नदाता ! हम सब न सिर्फ आपके अपराधी हैं, बल्कि बिरमाजी के भी अपराधी हैं। हम उनके ईर्ष्या करते थे, लेकिन आज हमारी आँखें खुल गयीं। अब हम लोग भी स्वयं को प्रामाणिक बनाने की प्राणपण से चेष्टा करेंगे। वृद्ध के इस कथन के साथ ही समूचे वातावरण में प्रामाणिकता की सुवास बिखरे लगी।
भारतीय संस्कृति में जिन देवताओं की व्याख्या की गयी है, उनमें प्रमुख हैं- ब्रह्म, विष्णु और शिव। त्रिदेवों की इस पूरक व्यवस्था के अंतर्गत ही समूची सृष्टि , का, विश्व-ब्रह्माण्ड का क्रियाकलाप गतिशील है। इसमें सृजन के देवता ब्रह्मा, पोषण के अधिष्ठाता विष्णु एवं संहार के व्यवस्थापक महाकाल भगवान शंकर हैं। आर्ष वांग्मय में इनकी आराधना - उपासना व इनकी कृपा से मिलने वाली अनेकानेक सिद्धि- सम्पदाओं का सविस्तार वर्णन है। इनके कथा - उपाख्यानों के बड़े - बड़े रोचक प्रसंग पुराणों में भरे पड़े हैं। इतने पर भी वस्तुस्थिति को न जान सकने के कारण उपासक उन विभूतियों से वंचित रह जाते हैं, जा इष्ट- आराध्य में सन्निहित हैं। ऐसा क्यों होता है ? इसका उत्तर पाने के लिए हमें उस मूल भावना को समझना होगा, जिसमें देवताओं की विचित्र कल्पनाएँ की गयी हैं। उनकी मुखाकृति, वेष - विन्यास वाहन, अस्त्र - शस्त्र आदि के ऐसे विचित्र कथानक जोड़कर तैयार किये गये हैं कि उन्हें पढ़कर यह अनुमान करना भी कठिन हो जात है कि वस्तुतः कोई ऐसे देवी - देवता है भी अथवा नहीं ? इनमें चार मुख के ब्रह्माजी, शंख - चक्र - गदा- पह्मधारी विष्णुजी, पंचमुखी शंकरजी, षट्मुख कार्तिकेय, हाथी की सूँड़ वाले गणेशजी, पूँछ वाले हनुमान् जी आदि यह सब विचित्र - सी कल्पनाएँ लगती हैं, जिन पर मनुष्य की सीधी पहुँच नहीं हो पाती। ऐसी स्थिति में उसे या तो श्रद्धावश देवताओं को सिर झुकाकर चुप रह जाना पड़ता है या तर्क - बुद्धि से ऐसी विचित्रताओं का खण्डन कर यही मान लेना पड़ता है कि ऐसे देवताओं का वस्तुतः कहीं कोई अस्तित्व नहीं है।
पौराणिक देवी - देवताओं के जो वर्णन मिलते हैं, उन पर गंभीरतापूर्वक विचार करें तो पता चलता है कि इन विचित्रताओं के पीछे बड़ा समुन्नत आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है। मानव जीवन के किन्हीं आदर्शों और स्थितियों का इस तरह बड़ा ही कलापूर्ण दिग्दर्शन किया है, जिसका अवगाहन करने मात्र से मनुष्य दुस्तर साधनाओं का फल प्राप्त कर मनुष्य जीवन को सार्थक बना सकता है।
इस प्रकार के आदर्श आदिकाल से ही मनुष्य को आकर्षित करते रहें हैं। मनुष्य उनकी उपासना करता रहा है। इन्हें एक प्रकार से व्यावहारिक जीवन की मूर्तिमान् उपलब्धियाँ कहना चाहिए। उसे जीवनक्रम में इतना सरल और सुबोधगम्य बना देने में भारतीय ऋषि- मुनियों अध्यात्मवेत्ताओं की सूक्ष्म बुद्धि का उपकार ही मानना चाहिए, जिन्होंने बहुत थोड़े में सत्य और जीवन - लक्ष्य की उन्मुक्त अवस्थाओं का ज्ञान उपलब्ध करा दिया है।
शैव और वैष्णव - यह दो आदर्श भी उन्हीं में से हैं। भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों ही आध्यात्मिक जीवन के किन्हीं उच्च आदर्शों के प्रतीक हैं। इन दोनों में मौलिक अन्तर इतना ही है कि शिव अध्यात्मिक जीवन को प्रमुख मानते हैं। उनकी दृष्टि में लौकिक सम्पत्ति का मूल्य नहीं है, वैराग्य ही सब कुछ है, जबकि विष्णु जीवन के लौकिक आनन्द का भी परित्याग नहीं करते। यद्यपि यहाँ तुलनात्मक वर्णन करके किसी देवता की श्रेष्ठता ढूँढ़ना नहीं है, वरन् उन अध्यात्मिक रहस्यों, उच्च आदर्शों, प्रेरणाओं का ज्ञान कराना ही अभीष्ट है जो इन देवविग्रहों के पीछे विद्यमान है।
भगवान शिव को ही ले तो उनके स्वरूप, अलंकार और जीवन सम्बन्धी घटनाओं का विशद वर्णन वेद - पुराणों से लेकर अन्यान्य अध्यात्म शास्त्रों में मिलता है। ऐसे प्रत्येक प्रसंग में या तो किसी दार्शनिक तत्व का विवेचन सन्निहित है। अथवा व्यवहारिक आचरण की शिक्षा दी गई है।
भगवान शिव के अनन्त रूप हैं। अनेक रूपों के अनेक अवतारों का वर्णन मिलता है। आर्ष ग्रंथों में साकार और निराकार दो रूप शिव के निर्धारित किये गये हैं। सर्वव्यापी ब्रह्मरूप होने के कारण वे निष्फल - निराकार हैं और रूपवान् होने से सकल - साकार भी हैं। शिवलिंग उनके ज्योतिर्मय निराकार स्वरूप का प्रतीक है ता त्रिशुलयुक्त सर्पों की माला पहने हुए डमरुधर विग्रह उनका साकार रूप है। विश्व-ब्रह्माण्ड का प्रतीक - प्रतिनिधि मानकर लिंग रूप में उनकी सर्वत्र पूजा - उपासना की जाती है। भारतवर्ष के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित बारह शिवलिंग ‘द्वादश ज्योतिर्लिंग ‘ के नाम से विख्यात हैं।
देवसंस्कृति में निराकार रूप में शिव का आकार लिंग माना जाता है। यह सृष्टि की सर्वव्यापकता एवं महत्ता का प्रतीक है। वेद - पुराणों में सृष्टि को अण्डाकार माना गया है। शिवलिंग का आकार भी ऐसा ही है जो इस तथ्य की पुष्टि करता है। स्कन्दपुराण में इस संदर्भ में उल्लेख है -
“ आकाश लिंगमित्याहु, पृथ्वी तस्य पीठिका ।
आलयः सर्वदेवानां लयनालिंगमुच्येते “
अर्थात् आकाश लिंग है, पृथ्वी उसकी पीठिका है। समस्त देवताओं का वही आलय है। इसकी में सब लय होते हैं, अतः इसे लिंग कहा जाता है।
वैज्ञानिक अनुसंधानों से भी अब इस तथ्य की पुष्टि हो गई है कि विश्व - ब्रह्माण्ड अण्डाकार है। विश्वविख्यात भौतिक विज्ञानी एवं गणितज्ञ आइन्स्टीन ने भी अपने अनुसंधान में अनन्त आकाश को वक्राकार बताया है और भारतीय मान्यता की पुष्टि की है। देश , काल तथा पदार्थ से निर्मित विश्वब्रह्माण्ड तत्त्वतः लिंगवत् वक्राकार है। शिवलिंग उसका प्रतीक-प्रतिनिधि है जो समस्त सृष्टि को अपने में आत्मसात् किये हुए है।
निराकार निर्गुण परब्रह्म का प्रतीक शिवलिंग का अर्थ यह भी है कि यह सृष्टि साकार होते हुए भी उसका आधार आत्मा है। ज्ञान की दृष्टि से उसके भौतिक सौंदर्य का कोई बड़ा महत्व नहीं है। मनुष्य को आत्मा की उपासना करनी चाहिए, उसकी का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। साँसारिक रूप , सौंदर्य और विविधता में घसीटकर उस मौलिक सौंदर्य को तिरोहित नहीं करना चाहिए।
साकार रूप में भगवान शिव का निवास स्थान श्मशान है। वे गले में मुण्डमाला धारण करते हैं। मृत्यु के कालपाश - महासर्प उनके गले में- यज्ञोपवीत में लिपटे हुए हैं। तीक्ष्ण त्रिशूल उनका शस्त्र है। जब वे तीसरा नेत्र खोलते हैं तब चारों ओर आग बरसती है। कुपित होकर जब वे तीसरे नेत्र से जिसे भी देखते हैं वह जलकर भस्म हो जाता है। जब प्रलय की आवश्यकता अनिवार्य हो जाती है। तब वे ताण्डव नृत्य करने खड़े होते हैं। उनके चरणों की थिरकन जैसे - जैसे गतिशील होती जाती है वैसे ही जरा - जीर्ण कूड़ा- करकट प्रभूत दावानल में जल - जल कर अन्तरिक्ष में विलय होता चला जाता है। इसी तरह भगवान शिव के स्वरूप में कितनी ही विचित्रताएँ देखने को मिलती हैं।
वस्तुतः भगवान शंकर के स्वरूप में जो विचित्रताएँ है, वह किसी मनुष्य की देह में सम्भव नहीं, इसलिए उनकी सत्यता संदिग्ध मानी जाती है। पर हमें यह जानना चाहिए कि यह चित्रण सामान्य नहीं, अलंकार है, जो मनुष्यों में उच्चस्तरीय योग-साधनाओं एवं तपश्चर्या के आधार पर जाग्रत् होते हैं।
उपहारस्वरूप शिव के माथे पर चन्द्रमा है। चन्द्रमा मन की मुदितावस्था का प्रतीक है अर्थात् योगी का मन सदैव चन्द्रमा की भाँति शीतल , उत्फुल्ल, खिला और निःशंक होता है। चन्द्रमा पूर्ण ज्ञान का प्रतीक भी है, अर्थात् उसे जीवन की गहन परिस्थितियों में रहते हुए भी किसी प्रकार का विभ्रम अथवा ऊहापोह नहीं होता।
वह प्रत्येक अवस्था में प्रमुदित रहता है, विषमताओं का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
भगवान शिव का कंठ नीला है, अतः उन्हें नीलकंठ भी कहा जाता है इस संदर्भ में पुराणों में ऐसी कथा आती है कि देवों और दानवों को सर्वनाश से बचाने के लिए भगवान शंकर विष को पी लिया था। तब से उनका कंठ नीला है अर्थात् उन्होंने विष कंठ में धारण किया हुआ है। इस कथानक का भी सीधा - सादा सम्बन्ध योग की सिद्धि से ही है। योगी पुरुष अपने सूक्ष्मशरीर पर अधिकार पा लेता है, जिससे उसके स्थूलशरीर पर बड़े तीक्ष्ण विषों का भी प्रभाव नहीं होता। उन्हें भी वह सामान्य आहार मानकर ही पचा लेता है। यह बात इस तरह भी है कि संसार के मान - अपमान, कटुता, क्लेश आदि दुःख कष्टों का उस पर कोई प्रभाव नहीं होता। उन्हें भी वह साधारण घटनाएँ मानकर आत्मसात् कर लेता है और संसार का कल्याण करने की अपनी आत्मिक वृत्ति में निश्चल भाव से लगा रहता है। दूसरे व्यक्तियों की तरह लोकोपकार करते समय उसे स्वार्थ आदि का कोई ध्यान नहीं होता वह निर्विकार भाव से भलाई के कार्य में जुटा रहता है। खुद विष पीता है, पर औरों के लिए अमृत लुटाता रहता है।
भगवान शिव ने अपने सारे शरीर पर भस्म रमा रखी है। योगी पूर्णता पर संयम - सिद्धि होती है। योगी अपने वीर्य को शरीर में रमा लेते हैं, जिससे उनका सौंदर्य फूट पड़ता है। इस सौंदर्य को भस्म के द्वारा अपने आप रमा लेता है। उसे बाह्य अलंकारों द्वारा सौंदर्य बढ़ाने की आवश्यकता नहीं रहती। अक्षुण्ण संयम ही उसका अलंकार बन गया है, जिससे उसका स्वास्थ्य और शरीर सब कांतियुक्त हो गये हैं।
भगवान शंकर त्रिनेत्रधारी हैं। योग की भाषा में इसे नेत्रोन्मीलन या आज्ञाचक्र का जागरण भी कहते हैं। उसका सम्बन्ध गहन अध्यात्मिक जीवन से हैं घटना प्रसंग है शिवजी ने एक बार तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भी जला दिया था। योगी का यह तीसरा नेत्र यथार्थ ही बड़ा महत्व रखता है। सामान्य परिस्थितियों में वह विवेक के रूप में जाग्रत रहता है, पर वह अपने आप में इतना सशक्त और पूर्ण होता है कि कामवासना जैसे गहन प्रकोप भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाते। उन्हें भी जला डालने की क्षमता उसके विवेक में बनी रहती है। इसे वैज्ञानिक बुद्धि का प्रतिनिधि कहा जा सकता है। पर सबका तात्पर्य यही कि साधक का तृतीय नेत्र उन्मीलित होना, उसे साधारण क्षमता से उठाकर विशिष्ट श्रेणी में पहुँचा देना है।
शिव का वाहन वृषभ है। वृषभ सौम्यता और कर्मठता का प्रतीक माना जाता है। तात्पर्य यह है कि शिव का साहचर्य उन्हें मिलता है जो स्वभाव से सरल और सौम्य होते हैं, जिनमें छल - छिद्र आदि विकार नहीं होते। साथ ही जिनमें आलस्य न होकर निरन्तर कर्म करने की दृढ़ता होती है। श्मशान में उनका निवास है अर्थात् वे मृत्यु को कभी भूलते नहीं। भगवान की शक्ति और नियमों को मृत्यु की तरह अकाट्य मानकर चलने में मनुष्य की आध्यात्मिक वृत्तियाँ जाग्रत रहती हैं, जिससे वह लौकिक कर्तव्यों का पालन करते हुए भी अपने जीवनलक्ष्य की ओर निष्काम भाव से चलता रहा सकता है। मृत्यु को लोग भूले रहते हैं, इसलिए दुष्कर्म करते हैं। इस महातत्त्व की उपासना का अर्थ अपने आपको बुरे कर्मों से बचाये रखने के लिए प्रकाश बनाये रखना होता है। इस तरह की जीवन -व्यवस्था व्यक्ति को असाधारण बनाती है। वह शक्ति शिव में पायी जाती है, अतः शिव के उपासकों में भी वह वृत्तियाँ घुली होनी चाहिए।
यह प्रसंग भगवान शिव की आध्यात्मिक शक्तियों पर प्रकाश डालते हैं। इनके साथ कथानक और घटनाएँ भी जुड़ी हुई हैं जो जीवन के आदर्शों की व्याख्या करती हैं। इनमें से गंगावतरण की कथा मुख्य है। गंगाजी विष्णुलोक से आती हैं। यह अवतरण महान अध्यात्मिक शक्ति के रूप से होता है। उसे संभालने का प्रश्न बड़ा विकट था। शिवजी को इसके उपयुक्त समझा गया ओर भगवती गंगा को उनकी जटाओं में प्रश्रय मिला। गंगाजी यहाँ ज्ञान की प्रचण्ड आध्यात्मिक शक्ति के रूप में अवतरित होती हैं। लोक - कल्याण के लिए उसे धरती पर प्रवाहित करने की बात है ताकि अज्ञान से मरे हुए लोगों को जीवन-दान मिल सके। पर उस ज्ञान को धारण करना भी तो कठिन बात थी, जिसे शिव जैसा संकल्प -शक्ति वाला महापुरुष ही धारण सकता है। अर्थात् महान क्रान्तियों का सृजन भी कोई ऐसा व्यक्ति ही कर सकता है, जिसके जीवन में भगवान शिव के आदर्श समाये हुए हों, वही ब्रह्मज्ञान का धारण कर उस लोकहितार्थ प्रवाहित कर सकता है।
शिव का एक स्वरूप अर्द्धनारीश्वर है। जो प्रकृति में नर -नारी की सक्रिय भागीदारी के साथ - साथ बराबरी की दर्जा प्रदान करने की सक्रिय प्रेरणा प्रदान करता है। शिव और शक्ति एक - दूसरे के पूरक हैं। गृहस्थ होकर भी पूर्ण योगी होना शिवजी की महत्वपूर्ण विशेषता है। साँसारिक व्यवस्था को चलाकर भी वे योगी रहते हैं, पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। वे अपनी धर्मपत्नी को भी मातृशक्ति के रूप में देखते हैं। यह उनकी महानता का अद्वितीय आदर्श है। यहाँ उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि गृहस्थ रहकर भी आत्म-कल्याण की साधना असम्भव नहीं । जीवन में पवित्रता रखकर उसे हँसते-खेलते पूरा किया जा सकता है।
यह सभी आदर्श इस बात की शिक्षा देते हैं कि मनुष्य शिव की तरह पदार्थों और समाज में प्रचलित परंपराओं का आध्यात्मिक मूल्याँकन करना सीख ले तो निस्संदेह उसका जीवन अधिकाधिक निरापद होता चला जाएगा शिव का अर्थ है - शुभ, कल्याणकारी, आनन्द , मोक्ष। संक्षेप में कहा जा सकता है कि शिव मानव जीवन की उन सभी आध्यात्मिक विशेषताओं के प्रतीक हैं जिनके बिना मनुष्य जीवन पाने का अर्थ हल नहीं होता शिवोपासना की प्रेरणा यही है कि हम भी निर्विकार, लोकोपकारी, विवेकशील एवं सत्यान्वेषी बनें। प्रतीकोपासना के पीछे छिपे आध्यात्मिक रहस्यों की ओर से हमें उपेक्षा रखी चाहिए।
योगवासिष्ठ - 3/44/24 महर्षि वशिष्ठ भगवान राम से कहते हैं-
ये च मध्यमधर्माणो मृतिमोहादनन्तरम् । ते व्योमवायुवलिताः प्रयान्त्योषधिपल्लवम् ।।
अर्थात्-हे राम! ऐसे जीव जिनके पुण्य मध्यम श्रेणी के होते हैं, वायु द्वारा उड़कर औषधि, फल-फूल आदि वृक्षों की योनियों में जन्म लेते हैं। अपने-अपने कर्मों का फल भोगकर वे पुनः पुण्यार्जन के लिए मनुष्य शरीर में आते हैं।
योगवासिष्ठ का यह सूत्र स्पष्ट करता है कि प्राण चेतना वृक्षों ओर वनस्पतियों में भी है, इसलिए उनके साथ भी प्राणियों जैसा अध्यात्मवादी दृष्टिकोण अपनाकर व्यवहार करना चाहिए। शास्त्रों में वृक्षों का लगाने उनका पोषण करने को एक पुण्यकर्म माना गया है वृक्ष हमें प्राण-वायु जीवन-तत्व हरीतिमा, छाया, लकड़ी, पुष्प, फूल आदि बहुत कुछ देते हैं, ऐसे उपकारी प्राणियों से, वृक्षों से हमें बहुत कुछ सीखना चाहिए और उनके जैसा परोपकारी बनना चाहिए।
उक्त उपकार किसी जड़ पदार्थ के नहीं हो सकते, यह तथ्य हमें यह सोचने को विवश करता है कि वृक्ष-वनस्पति जड़ नहीं, वरन् प्राणियों की तरह उनमें भी चेतन संवेदनशीलता है, इसलिए उनके साथ जड़ जैसा बरताव करना पाप या अनुचित कर्म है। इस सम्बन्ध में वैदिक मान्यताएँ स्पष्ट ही इस पक्ष में हैं कि पेड़-पौधों में जीवन हैं। अथर्ववेद के प्रथम काण्ड, अनुवाक 5,सुक्त 32 की प्रथम ऋचा में “प्राणन्ति वीरुधः” ऐसा प्रयुक्त हुआ है। उसका अर्थ ही है-जिसमें बेले जीवन धारण करती हैं।’ इसके अतिरिक्त अथर्ववेद
8/2/6 मंत्र में भी औषधियों (वनस्पतियाँ) में जीवन होता है, प्रमाणित किया गया है। यथा- जीवलां नयारिवाँ जीवन्ती-मीषधीमहम्
छान्दोग्योपनिषद्- 6/19/9 में भी उल्लेख है-अस्य सोम्य महती वृक्षस्य यो मूलेभ्याहन्याज्जीवन् स्त्रवेद्यो मध्ये भ्याहन्याज्जीवन्स्त्रवेद्यो ग्रे भ्याहन्या-ज्जीवन्स्त्रवेत्स एष जीवेनात्मानानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति” अर्थात्-हे सौम्य! यदि इस बड़े वृक्ष को मूल से काटे तो मनुष्य के रक्त की तरह जीता हुआ स्त्रवण करता है। मध्य (तना) और अग्रभाग टहनी-आदि ) काटने से भी वैसा ही जीवनरस टपकता है। इससे प्रतीत होता है कि वृक्ष जीवात्मा से, आत्मचेतना से अधिष्ठित हुआ हैं। एक स्थान से जीवन रस या रक्त निकल जाने से रोगी अंग की तरह वृक्षों की भी अनेक टहनियाँ सूखती रहती हैं। जब वृक्ष से जीवात्मा का प्राणचेतना का अन्त हो जाता है तो वह सूख जाता है और उसमें से किसी प्रकार का प्राण-स्पन्दन नहीं रह जाता।
मनुस्मृति, 46 में भी जीव-योनियों का वर्णन करते हुए मनु भगवान् कहते हैं-
“उदिज्ीज्जाः स्थावराः सर्वे बीजकाण्उप्ररोहिणः। आषध्यः फलापाकान्ता बहुपुष्पुलोपगाः ॥”
अर्थात् कर्मानुसार जीव उद्भिज और स्थावर योनियों-औषधि फल-फूल वाले वृक्षों में भी जन्म ग्रहण करता है। अनेक मंत्रों से यह भी बताता गया है कि उन्हें भी मनुष्य की तरह सुख-दुःख की अनुभूति होती है। वृक्ष वनस्पतियाँ पत्तियों द्वारा (स्टोमेटा द्वारा) साँस लेते हैं और जड़ों द्वारा आहार भी ग्रहण करते हैं। बस चल फिर नहीं सकते हैं, इसी तरह से उन्हें स्थावर कहा गया है।
इस संदर्भ में किये गये आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों द्वारा भी यह सिद्ध करना अब संभव हो गया है कि वृक्षों में भी जीवन हैं। मनुष्यों की तरह आहार पर जीवित रहने, साँस लेने, सूर्य-रश्मियों से जीवन-प्राण ग्रहण करने, काम-क्रीड़ाएं करने, संतति वृद्धि करने जैसी विभिन्न क्रियाएँ वृक्ष- वनस्पति भी करते हैं। मनुष्यों की तरह उनमें भी भाव-संवेदनाएँ होती हैं। हरें-भरे होना वृक्षों का जीवन है तो उनका सूख जाना ही उनकी मृत्यु है। यह सभी लक्षण दर्शाते हैं कि पेड़-पौधे भी उसी दिव्यचेतना के प्रकाश-पुँज हैं, जिसके कि मनुष्य और मनुष्येत्तर प्राणी। जो शक्तियाँ मनुष्य तथा अन्य प्राणियों में दिव्य-विलक्षणताएँ उत्पन्न करती हैं, वही वृक्ष -वनस्पतियों को भी प्रभावित करती हैं। जहाँ पहले विज्ञान यह मानता रहा था कि पेड़-पौधे भी जड़ पदार्थों की तरह निष्प्राण है, वहीं अब यह मान्यता बदली है ओर कुछ वर्षों से ही यह माना जाने लगा है वृक्ष -वनस्पतियों में भी प्राण-चेतना विद्यमान है। अपने देश के प्रख्यात विज्ञानवेत्ता सर जगदीश चन्द्र बसु का तो सारा जीवन ही इसी बात को प्रमाणित करने में लग गया था।
एक छोटी सी घटना से प्रेरित होकर उन्होंने यह सिद्ध किया कि पेड़-पौधों में भी जान है। वे भी अनुभव करते हैं। वे भी मनुष्यों और जानवरों की तरह सुख में सुख तथा दुःख में दुख अनुभव करते हैं। बसु ने ‘आप्टिकल लीवर’ नामक एक विशेष उपकरण बनाया था, जिसके माध्यम से वृक्ष वनस्पतियों की गति, स्पन्दन और संवेदनाओं का अध्ययन किया जाता था। पेड़ की पत्ती तोड़ने पर उसे जो पीड़ा होती है, उसे इस यंत्र से पकड़ा और बताया। इसी तरह ही कितनी ही गतिविधियाँ और प्रतिक्रियाएँ आप्टिकल लीवर से देखी समझी जा सकी। इसके माध्यम से उन्होंने वृक्षों की संवेदनशीलता के अनेक प्रयोग किये थे। साँस और स्पन्दन की गति की नाप और जहरीले पदार्थों का उपयोग करके उन्होंने जहाँ तक सिद्ध कर दिखाया था कि जिस तरह मनुष्य और प्राणियों के शरीर में विष का प्रभाव होता है वृक्ष-वनस्पतियों में भी वैसा ही प्रभाव पड़ता है।
कलकत्ता यूनिवर्सिटी के उत्तर में आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र रोड पर चार एकड़ भूमि में फैला मुगलकाल से पूर्व का एक उद्यान है। इसे इण्डियन टैम्पल ऑफ साइंस’ के नाम से जाना जाता है। इसके प्रवेश द्वार पर एक ग्लास केस में कुछ यंत्र सुशोभित हैं। वे वही यंत्र उपकरण हैं जिन्हें पचास वर्ष पूर्व सर जगदीश चन्द्र बसु ने पेड़-पौधों के विकास और आचरण को प्रदर्शित करने हेतु अध्ययन-अनुसंधान में प्रयुक्त किये थे। ये यंत्र दस करोड़ गुना बढ़ाकर पेड़-पौधों की सूक्ष्मतम स्थिति का, संवेदनशीलता का अध्ययन करने की क्षमता रखते हैं।
भारतीय धर्मशास्त्रों में पेड़ पौधों और वनस्पतियों से मनुष्य द्वारा स्थापित किये गये सजीव संपर्क की अनेक घटनाओं का उल्लेख मिलता है। आयुर्वेद शास्त्र के पितामह महर्षि के सम्बन्ध में विख्यात है कि उन्होंने अपने छोटे से जीवन में हजारों जड़ी बूटियों के गुण-धर्म मालूम किये तथा कौन सी जड़ी-बूटी किस रूप में कैसे प्रयोग की जानी चाहिए, इसका विस्तृत विधि विधान खोजा। आयुर्वेद की रचना करते समय वे जंगल में एक-एक वृक्ष, वनस्पति, झाड़ी के पास जाते और उससे उसकी विशेषताएँ पूछते। वनस्पतियाँ स्वयं अपनी विशेषताएँ बता देती। इस आधार पर हजारों वर्षों या हजारों वैज्ञानिकों का कार्य एक अकेले व्यक्ति द्वारा सम्पन्न किया जा सका। तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग में पहली बात को पिछले दिनों जहाँ संदिग्ध समझा जाता रहा है। परन्तु अब जबकि वनस्पति जगत में हुई अधुनातन खोजों के आधार पर वैज्ञानिक यह कहने लगे हैं कि पेड़-पौधों से न केवल संवाद सम्भव है, वरन् इनसे इच्छित कार्य भी कराया जा सकता है, तो उक्त भारतीय मान्यता की पुष्टि होने में किसी अविश्वास या शंका की गुँजाइश नहीं रह जाती।
इस संदर्भ में ‘द सीक्रेट लाइफ ऑफ प्लाण्ट्स’ नामक अपनी अनुसंधान पूर्ण कृति में मूर्धन्य लेखक वैज्ञानिकद्वय पीटर टॉम्पकिन्स और क्रिस्टोफर बर्ड ने लिखा है कि मनुष्य अपनी पाँच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से जितना देख सुन व समझ नहीं सकता, उससे कई गुना क्षमता पौधों में होती है। बिना नेत्रों के इनकी देखने व अनुभव करने की शक्ति बड़ी विलक्षण है। अपने ऊपर आने वाले संकटों की सूचना देने में वे मनुष्य से कहीं आगे हैं। अमेरिकी वनस्पति विज्ञानी पियरे पाल साविन का तो यहाँ तक कहना है कि पौधों की इन विशेषताओं का उपयोग भविष्य में चोरों से घर की सुरक्षा के लिए किया जा सकेगा। उसके लिए किसी भी पौधे का सम्बन्ध दरवाजे के साथ जोड़ दिया जायेगा और मकान मालिक जब उस पौधे के पास जाकर खड़ा हो जायेगा तो पौधा अपने मालिक को पहचान कर दरवाजा खुलने देगा। उन्होंने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि पेड़-पौधे न केवल मालिकों पर शोक व्यक्त करते हैं, वरन् उन्हें मानव कोशिका की मृत्यु तक का बोध होता है और उस पर वे अपनी भाव संवेदना भी व्यक्त करते हैं।
इसके लिए पियरे ने एक बड़ा ही विलक्षण प्रयोग किया। इस प्रयोग के लिए जिस पौधे का चुना गया, वह उनके घर से 80 मील दूर एक अनुसंधान केंद्र में स्थित था, जिसका परीक्षण वैज्ञानिकों द्वारा किया जा रहा था। पौधे की संवेदनशीलता परखने के लिए उन्होंने अपने शरीर को बिजली के झटके दिये। 80 मील दूर स्थित पौधे पर इसकी प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया नोट की गयी, जबकि दोनों के मध्य कोई सीधा संबन्ध नहीं था, सिवाय इसके कि जब पियरे के शरीर को बिजली के झटके दिये जा रहे थे तो उस पौधे का ध्यान कर रहे थे। इस घटना के पश्चात् जब उन्हें विश्वास नहीं हुआ तो यही प्रक्रिया तीन पौधों के साथ अलग-अलग गमलों में अलग-अलग कमरों में रख कर दुहराई गयी। हर कमरे का वातावरण दूसरे के वातावरण से बिलकुल भिन्न था तथा तीनों पौधे एक ही विद्युत पथ से जुड़े हुए थे। उधर 80 मील की दूरी पर स्थित पियरे ने दुबारा अपना प्रयोग आरम्भ किया। दोनों के मध्य कोई संपर्क सूत्र नहीं था। केवल विचार शक्ति एवं भावनाओं का उपयोग करना था। जैसे ही प्रयोग आरम्भ हुआ, तीनों ही पौधों पर समान प्रतिक्रिया हुई। अब संदेह की कहीं कोई गुँजाइश नहीं रह गयी थी कि पौधे 80 मील दूर बैठे अपने पालक की अनुभूतियों, संवेदनाओं को ग्रहण कर कृतज्ञता स्वरूप प्रतिक्रियाएँ व्यक्त कर रहे थे।
वृक्ष- वनस्पतियाँ न केवल अपने पालन पोषणकर्ताओं की आज्ञा मानने को तत्पर रहते हैं और सुख-दुःख में अपनी संवेदनाएँ व्यक्त करते हैं, वरन् उनमें भी भावनाओं का आवेश उमड़ता है। इस सम्बन्ध में ‘इलेक्ट्रानिक रिसर्च सेंटर, टोकियो यूनिवर्सिटी जापान’ के वरिष्ठ वैज्ञानिक डाक्टर केन होशीमोतो ने गहन अनुसंधान किया है। उन्होंने पौधों की भाव-संवेदनाओं को अनुभव करने के लिए इलेक्ट्रिक सिगनल का प्रयोग किया है, जिसे आज के भौतिक सिद्धान्तों के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा सकता। ‘द मिस्ट्री ऑफ दि फोर्थ डाइमेंसनल वर्ल्ड’ नामक पुस्तक में इसका विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है। डा0 होशीमोतो की धर्मपत्नी का पादप प्रेम ‘ग्रीन थम्ब’ के नाम से विश्व विख्यात है। उनके बगीचे में लगे कैक्टस के पौधे उनसे वार्तालाप करते हैं। डा होशीमोतो ने इन पौधों की प्रतिक्रियाओं संवेदनाओं को मानने के लिए लाइडिटेक्टर मशीन के साथ कुछ इलेक्ट्रानिक मशीन जोड़कर उन पर इतने प्रयोग किये हैं कि कैक्टस के पौधे अब गिनती गिनना सीख गये और बाकायदा प्रश्नों के उत्तर तक देने लगे हैं। वे अपनी प्रतिक्रियाएँ या उत्तर कम्पनों के माध्यम से प्रदर्शित करते हैं जिसे इलेक्ट्रानिक यंत्र ध्वनि तरंगों में बदल देते हैं। इन्हें हेडफोन लगाकर कोई भी स्पष्ट रूप से सुन और समझ सकता है। वैज्ञानिकों ने उनके वार्तालाप को सुनकर साइकोकीनेसिस नामक विज्ञान की एक नयी शाखा विकसित की है, जिससे पौधों की अन्तः स्थिति को समझने में सफलता मिली है।
इसी तरह अमेरिका की नेवल और्डीनेंस लैबोरेटरी के अनुसंधानकर्ता ऐल्डन ब्रिड ने भी पेड़-पौधों के साथ भावनात्मक आदान पर विशेष शोधकार्य किया है। ‘साइकोलाजिकल स्टस इवैल्यूएटर’ नामक एक वैज्ञानिक विधि से श्रव्य और श्रवणातीत ध्वनियों को सुगमतापूर्वक सुना जा सकता है। तनावमुक्त शान्त मन से यंत्र के माध्यम से पौधों की आन्तरिक संवेदनाओं को आसानी से सुना समझा जा सकता है। पीटर टौम्पकिन्स एवं क्रिस्टोफर बर्ड के शब्दों में पेड़-पौधे की मनः स्थिति और परिस्थिति को समझने के लिए व्यक्ति की अति सूक्ष्म दृष्टि को विकसित होना चाहिए, तभी वह उनकी संवेदनाएँ समझने में समर्थ हो सकता है।
उक्त खोजें यह संकेत करती हैं कि एक ही चेतन आत्मा सब में विद्यमान है, यह अनुभव करते हुए हमें विराट ब्रह्म की असीम चेतना अपने चारों ओर फैली देखनी चाहिए और जीव-जन्तुओं के साथ ही नहीं, वृक्ष-वनस्पतियों के साथ भी सहृदयतापूर्ण व्यवहार करते हुए वृक्ष सम्पदा को बढ़ाना चाहिए। प्राचीनकाल चेतन से प्रभावित करने और आत्म-चेतना से अदृश्य गुह्य रहस्य उद्घाटित करने के जो प्रयोग हुए तथा उनमें जो सफलताएँ मिली थीं वह आज भी घटित हो सकती हैं, बशर्ते उक्त रहस्य को समझ सकें।
कौन ईश्वर को प्रिय है और किन की वे सहायता करते हैं ? इसे यदि जानना हो, तो इस बात पर विचार करना पड़ेगा कि उनकी गतिविधियाँ क्या हैं और वे सोचते कैसे हैं ? कारण कि कर्ममय दुनिया में उसे पाने का सरल साधन श्रेष्ठ चिन्तन और सेवा - वृत्ति है। जो इन्हें जितने अंशों में अपनाते और और व्यवहार में उतारते हैं , समझना चाहिए भगवान के वे उतने ही निकट और स्नेह पात्र हैं। कर्मयोगियों के जीवन में घटने वाली घटनाएँ इसकी पुष्टि करती हैं।
प्रसंग उन दिनों का है, जब अपने देश में राजतंत्र था एवं बंगाल में सम्राट कीर्तिचन्द्र की शासन - सत्ता थी। इन्हीं दिनों हुगली जिले में नारायणदास नामक एक समाज - सेवी हुआ करते थे। अपनी सेवावृत्ति के कारण पूरे राज्य प्रसिद्ध थे। वे इतने सरल और शुद्ध हृ थे कि किसी कष्ट उनसे सहा नहीं जाता, तत्काल उसकी सहायता के लिए दौड़ पड़ते तथा जितनी और जैसी मदद बन पड़ती , उसे करने में कोई कसर उठा न रखते। उन दिनों बंगाल के हर गाँव में तालाब हुआ करता था। नारायणदास जिस गाँव में रहते थे, उसके आस- पास के प्रायः गाँवों में उन्हीं के खुदवाये तालाब थे। वे धनवान् थे ओर विद्वान भी , पर धन की जैसी लिप्सा सर्वसामान्य में देखी जाती है उसका उनमें पूर्णतः अभाव था। विपत्तिग्रस्त व्यक्ति जब ओर जितनी की आर्थिक सहायता माँगने आते उसे पूरा करने में वे हर समय सन्नद्ध रहते।
उनकी पत्नी मालती भी उनके कार्यों में भरपूर सहयोग करती। अभावग्रस्तों के प्रति उनके मन में अपार करुणा थी। वे मुक्तहस्त से लोगों की मदद करने में पीछे नहीं रहतीं। वह यदा - कदा एकान्त में अपने इष्ट के समक्ष भाव - विभोर होकर उद्गार व्यक्त करतीं कि भगवन् ! मैं । इस जीवन के बाद जब और जहाँ कहीं भी पैदा होऊँ , मुझे इस स्थिति में अवश्य बनाये रखना किस इसी प्रकार समाज की सेवा - सहायता कर सकूँ । इस कार्य में मुझे आत्म संतुष्टि एवं निकटता की अनुभूति होती है , वैसे अन्य काम में नहीं।
दोनों का जीवनक्रम इसी प्रकार चल रहा था। इस क्रम में आयु कब ढल गई, पता न चला। जब ज्ञात हुआ , तो तीर्थयात्रा की योजना बनायी। विचार यह था कुछ दिनों तीर्थसेवन करने के उपरांत पुनः सेवा कार्य प्रारंभ किया जाय , अतएव आवश्यक सामान बैलगाड़ी में लादकर पति - पत्नी एक दिन अयोध्या के लिए निकल पड़े। मार्ग में मिलने वाले तीर्थों का आनन्द - लाभ लेते हुए वे चित्रकूट पहुँचे। यहाँ कुछ दिन ठहरकर फिर अयोध्या की ओर चल पड़े। रास्ता सघन वन से होकर जाता था। मार्ग का भली - भाँति ज्ञान न होने से वे इधर - उधर भटकते हुए आगे बढ़ रहे थे। वहाँ कोई बताने वाला भी नहीं था कि कौन सा रास्ता किधर जाता है। जब कुछ अनुमान से हो रहा था। चलते - चलते थक जाते , तो वृक्षों के नीचे विश्राम कर लेते और रात्रि होने पर वही ही वृक्ष उनके आश्रय - स्थल बनते। इस प्रकार चलते हुए कई दिनों के उपरांत वे एक गाँव के निकट पहुँचे। यह लुटेरे भीलों का गाँव था। उन्होंने अन्दाज लगाया कि इनके पास धन है बस उनके पीछे धन है। उन्होंने पूछा कि वे लोग गहन वन में कैसे आ गए ? नारायणदास ने सरलतापूर्वक बता दिया कि वे अयोध्या जा रहे हैं। सम्भवतः मार्ग भटक गये और यहाँ आ पहुँचे। डाकुओं ने कहा अच्छा हुआ भेंट हो गई। हम लोग भी उधर ही जा रहे हैं। चिन्ता न करो, अब हम राह बताते चलेंगे। सरल नारायणदास का उन पर सहज ही विश्वास हो गया। वे उनके साथ - साथ चलने लगे। लुटेरे उन्हें घनघोर जंगल में ले आए। वहाँ पहुँचकर भीलों ने ने उन्हें पकड़ लिया और उनकी खूब पिटाई की। इसके बाद उनके हाथ - पैर बाँध कर एक खाई में डाल दिया, उनकी पत्नी के पास गये।
मालती अपने पति की दुर्दशा को बर्दाश्त न कर सकी और मूर्च्छित हो गई। लुटेरे उसे भी घसीटकर ले जाने लगे। इतने में उसे होश आ गया। उसने अपने आराध्य का स्मरण किया और इस संकट की घड़ी में प्राण - रक्षा के लिए विनती करने लगी।
अभी कुछ ही पल बीते थे कि घोड़े के टापों के शब्द सुनाई पड़ने लगे। ध्वनि से ऐसा ज्ञात होता था कि कोई सवार इसी ओर तेजी चला आ रहा है। लुटेरे असमंजस में थे कि अब क्या किया जाए। अभी वे कुछ निर्णय ले पाते उससे पूर्व ही सामने से श्वेत घोड़े पर गठीले बदन का एक दीर्घाकार नवयुवक आत दिखलाई पड़ा। उसके वस्त्राभूषण से ऐसा प्रतीत हो रहा था , जैसे वह कोई राजकुमार हो। कानों में रत्न - कुण्डल, गले में मोतियों का आकर्षक माला, शरीर पर मूल्यवान वस्त्र, बगल में लटकती सुदीर्घ तलवार, पीर पर बाणयुक्त तरकस और कंधे झूलता धनुष। इस राजसी वेश - भूषा में शस्त्रों से सुसज्जित क्षत्रिय कुमार को देखकर लुटेरे घबरा गए। उन्हें ऐसा लगने लगा , मानो साक्षात् शक्ति का स्वरूप ही आ गया हो। जान संकट में पड़ी अनुभव कर वे इधर - उधर भागने लगे।
ईश्वर के उद्यान की रखवाली करने वालों का ईश्वर सदा ध्यान रखते हैं। जब सामान्य मनुष्य साधारण उपकार के प्रति कृतज्ञ बना रहता है और ऐसे किसी अवसर की तलाश में रहता है , जब वह उससे उऋण हो सके, तो परमात्मा भला इतने कृतघ्न कैसे हो सकते हैं कि उनके कार्यों के प्रति समर्पित अपने युवराज को संरक्षण तक प्रदान नहीं कर सकें। इस दुनिया में सर्वत्र आदान - प्रदान का नियम है। यहाँ बिना कुछ दिये किसी से कुछ प्राप्त कर सकना संभव नहीं। पाने के लिए देना ही पड़ेगा - यही सृष्टि का विधान है। यह विधान जीव - जन्तु , वृक्ष - वनस्पति और मनुष्य से लेकर सामान्य रूप में लागू होता है। अतः जो लोग भगवद् कार्य में संलग्न होते हैं , वे कभी खाली हाथ नहीं रहते। भगवान की कृपा और सहायता उन्हें बार - बार मिलती रहती है।
नारायण दम्पत्ति के साथ ऐसा ही घटित हुआ। दुरावस्था की घड़ी में उन्हें तत्क्षण भगवत् सहायता उपलब्ध हुई और वह युवक उनकी रक्षार्थ आ पहुँचा। आते ही उसने पूछा - माते ! तुम कौन हो ? इस गहन वन में अकेली कैसे हो ? तुम्हारे साथ क्या कोई पुरुष नहीं ? ये कौन तुम्हें घेरे हुए थे ? हमें देखते ही वह भाग क्यों गये ? यह बैलगाड़ी कैसी है, शायद कहीं दूर गन्तव्य के लिए निकली थी ?
प्राणों में अमृत घोलते हुए ये शब्द कानों में पड़े तो मालती ने आँखें खो दीं, देखा सामने एक क्षत्रिय कुमार खड़ा है। वह ऊपर से लेकर नीचे तक उसके शस्त्रों और आभूषणों को निहारती रह गयी , तभी युवक का स्वर पुनः उभरा। उसमें फिर वही प्रश्न थे। मालती अब तक उठ बैठी थी। उसने संक्षेप में अपनी कहानी कह सुनाई और आग्रह किया कि मेरी कुछ सहायता करो। तुम कौन हो ? इसे तो मैं नहीं जानती, पर मेरे त्राता बनकर आए इसलिए यह प्रार्थना कर रही हूँ। मेरे पति को इन दुष्टों ने बहुत मारा हैं वे कहाँ हैं ? जीवित हैं या मृत ? इसकी खोज करने में मेरा सहयोग करो।
युवक न कहा - देवि ! आप चिंता न करे। हम उन्हें जल्द ही ढूँढ़ लेंगे। वे यहीं कही आस - पास ही होंगे। इतना कहकर दोनों एक ओर चल पड़े।
ईश्वर की लीला भी बड़ी / विचित्र है। कहीं वे मनुष्य शरीर के माध्यम से सहयोग कतरे हैं, तो कहीं जीव - जंतुओं को इसका आधार बनाते हैं। आखिर /चेतना और प्रेरणा तो दोनों में उन्हीं का कार्य करती हैं। ऐसे में किसी भी प्राणी से कोई भी कार्य सम्पन्न करवा लेने में उनको क्योंकर मुश्किल होना चाहिए।
नारायणदास के हाथ -पाँव बाँधकर लुटेरे जब खाई में डाल गए, तो थोड़े समय पश्चात् दो बड़े - बड़े चूहों ने आकर उनके समस्त बन्धन काट डाले। तब वह अचेत थे। कुछ देर उन्हें होश आ गया। वे उठ बैठे। खड़ा होने कोशिश करने लगे तो ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उनके शरीर में प्राण हैं ही नहीं । अंग - अवयव शक्तिहीन ओर शिथिल पड़ गए थे। अब वह क्या करें ? अभी ऐसा विचार कर ही थे कि सामने से एक भील आता दिखाई पड़ा। उसे देखकर वह वह भयभीत हो उठे और किसी प्रकार भागने का प्रयत्न करने लगे। दो - तीन बार के प्रयास में भी वे सफल न हो सके। भील यह सब देख रहा था। दूर से ही चिल्लाकर उसने आश्वस्त किया कि डरने की आवश्यकता नहीं। वह कोई लुटेरा नहीं, उसका शुभचिन्तक और उसके लिए औषधि ला रहा है। अब नारायणदास का डर कुछ कम हुआ। आगन्तुक के हाथ में उन्होंने एक पात्र देखा, तो विश्वास हो गया कि उसमें वह कुछ ला रहा है। वहाँ पहुँचकर उसने वह पात्र नारायणदास को पकड़ा दिया और उसमें रखी औषधि को पी जाने को कहा। वे असमंजस में पड़ गये, सोचने लगे - इसे वह पीयें या नहीं ? कहीं ठगी का यह कोई दूसरा तरीका तो नहीं। क्या पता इसमें कोई प्राणघातक चीज हो ?
भील उनकी मनः स्थिति समझ रहा था, उसने पात्र अपने हाथ में लिया और उसमें रखे जलीय पदार्थ का कुछ भाग अपने मुँह में उड़ेल लिया, फिर उसको लौटाते हुए उसे पी जाने को कहा। अब निर्भय होकर नारायणदास उसे भी पी गए। पीते ही उन्हें बड़ी अद्भुत अनुभूति हुई। ऐसा लगा मानो सारी ताकत शरीर में वापस लौट आई हो। पीड़ा के मारे अंग - अंग टूट रहे थे, वह तत्काल ठीक हो गया। वे खाई से बाहर निकले और मालती का पता लगाने के लिए चल पड़े। साथ में वह वनवासी भी था। थोड़ी दूर बढ़ने पर ही मालती दीख गई। वह उधर ही आर रही थी। उसके साथ क्षत्रिय युवक भी था। दोनों ने एक दूसरे की कुशलता पूछी और आश्वस्त हुए। मालती ने युवक का परिचय दिया और नारायणदास ने आदिवासी का। दोनों त्राता आमने - सामने खड़े थे। उन्होंने एक दूसरे का अभिवादन किया। दोनों असामान्य पुरुष थे। दोनों का स्पर्श असाधारण था।
नारायणदास अब आगे बढ़ने का कार्यक्रम बनाने लगे। युवक ने उन्हें रास्ता बतलाते हुए उस पर निर्भय चले जाने को कहा। मार्ग सम्बन्धी आवश्यक जानकारी देने के पश्चात् वे दोनों भी दो दिशाओं प्रस्थान कर गये। पति - पत्नी उन्हें विदाई देते हुए सहायता के लिए आभार प्रकट किया। बाद में बैलगाड़ी में सवार हो कर वे भी चल पड़ें सामने ही युवक घोड़े पर सवार होकर चला जा रहा था। पति - पत्नी की दृष्टि उसी पर टिकी थी, तभी अचानक न जाने वह कहाँ गायब हो गया। दूसरी ओर पलट कर देखा, तो भील भी अन्तर्धान हो चुका था। अब उनकी समझ में आया कि वास्तव में वे कौन थे दस दम्पत्ति अपने भाग्य को सराहते हुए अयोध्या पहुँचे और फिर सरयू किनारे एक कुटिया बनाकर स्थायी रूप से वही रहने लगे। उनका सारा जीवन लोक - मंगल में व्यतीत हुआ।
संसार ईश्वर की संरचना है। इसका लौकिक नियन्ता मनुष्य को माना जा सकता है वह चाहे तो अपने उत्कृष्ट चिन्तन और उदात्त गतिविधियों के द्वारा इसे स्वर्ग जैसा सुन्दर , सुखद और श्रेष्ठ बना दे तथा चाहे तो नरक की निकृष्टता में धकेल दे। यह पूर्णतया आदमी की अपनी इच्छा पर निर्भर है। बुरे कार्यों के लिए दण्ड और प्रताड़ना की सर्वत्र व्यवस्था है एवं अच्छे कार्यों के लिए पुरस्कार दिये जाते हैं। पुत्र कुमार्गगामी बने और घर बर्बाद करे - यह किस पिता को पसन्द होगा, इसके विपरीत उसके उत्तम कार्यों की प्रशंसा भी होती है और पारितोषिक भी मिलते हैं। परमपिता के कार्यों में सहभागी बनकर इन दिनों हम ऐसे ही इनाम - इकराम के रूप में उनके दिव्य अनुदान और वरदान प्राप्त कर सकते हैं। यह हमारी अपनी मर्जी है कि इस अवसर का लाभ उठाकर हम स्मृति - आकाश में देदीप्यमान नक्षत्र की तरह चमकते रहें अथवा विस्मृति के महातिमिर में विलीन हो जाएँ।
श्रवण कुमारों का आह्वान
पूज्यवर शरीर नहीं, विचार थे। वे कहते थे। वे कहते थे - जैसे श्रवण कुमार ले अपने माता - पिता को सभी तीर्थों की यात्रा कराई, वैसे ही आप भी हमें भारत के तीर्थ प्रत्येक गाँव, प्रत्येक घर में ले चलें। हमारे ये विचार क्रान्ति के बीज हैं, जो अगले दिनों धमाका करेंगे। “ अन्य कई अवसरों पर उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि तुम हमारा काम करो, हम तुम्हारा कम करेंगे।
क्या आप श्रवण कुमार की भूमिका सम्पादित करने के लिए महाकाल का आह्वान स्वीकार करते हैं ? प्रचार वाहन में उनके मूर्तिमान् स्वरूप वाह्य को लेकर देश में जगह - जगह जाकर इनकी स्थापना कराने हेतु संकल्प भाव से कार्य करेंगे ? इसके लिए यदि आप एक बार में तीन माह का समय निकाल सकते हैं, तो कृपया अपना नाम - पता, फोन नं0 , समयदान की अवधि (जनवरी - मार्च, अप्रैल- जून तथा अक्टूबर - दिसम्बर), आयु, स्वास्थ्य की स्थिति, योग्यता, प्रचार - प्रसार का अनुभव (मिशन में या अन्य कहीं), वांग्मय स्थापना का विवरण, परिवार में कौन - कौन आप पर आश्रित हैं - आदि का उल्लेख करते हुए हमें शीघ्र लिखें।
स्थूल जगत में चल रही ध्वनि धाराओं के लाभ - हानि से विज्ञान के विद्यार्थी परिचित है कि अवांछनीय कोलाहल से अन्तरिक्ष कितना विक्षुब्ध होता है और उसका भयानक प्रभाव प्राणियों और पदार्थों पर किस प्रकार विपत्ति बरसाता है ? बड़े शहरों और कारखानों से उत्पन्न कोलाहल के दुष्परिणामों को अब भली प्रकार समझा जाने लगा है और उसकी रोकथाम के लिए गंभीर विचार हो रहा है। दूसरी ओर उपयोगी ध्वनियों का लाभ उठाने के लिए भी एक से एक बढ़े - चढ़े आविष्कारों की शृंखला सामने आ रही है। रेडियो जैसे उपकरणों से संवाद - प्रेरणा आदि के कार्य के लिये जा रहे हैं। इस प्रकार ध्वनियों को समझने, पकड़ने रोकने एवं प्रेषण के लिए भी भरपूर प्रयत्न हो रहे हैं। लाउडस्पीकर, टेपरिकार्डर, सीडी प्लेयर, सुपर सोनिक यंत्रों की भरमार होती चली जा रही है। संगीत के प्रभाव से मनुष्यों की शारीरिक, मानसिक विकृतियों के उपचार होते हैं। उनके सुखद संवेदनाएँ उभारने का काम लिया जाता है। इतना ही नहीं दुधारू पशुओं का दूध बढ़ाने बागवानी एवं कृषि कार्य के क्षेत्र में अधिक अच्छी सफलताएँ पाने के लिए लय और तालबद्ध ध्वनि - प्रवाहों का उत्साहवर्द्धक उपयोग हो रहा है। ध्वनि की शक्ति बारूद, भाप , बिजली, अणुशक्ति से अधिक ही आँकी गई है। प्रयत्नपूर्वक ऊर्जा उत्पन्न करना महँगा भी है और कष्टसाध्य भी। प्राकृतिक ऊर्जा जो ध्वनि - प्रवाह के रूप में सर्वत्र संव्याप्त है, उसको पकड़ने और उपयोग में लाने की आशा विज्ञान क्षेत्र में पुलकन उत्पन्न कर रही है। समझा जा रहा है कि इस क्षेत्र में जिस दिन विज्ञान को कुछ कहने लायक सफलता मिल सकेगा उस दिन वह अबकी अपेक्षा असंख्य गुणी शक्ति का अधिपति बना जाएगा।
यह तो हुई स्थूल जगत में चलने वाले ध्वनि - प्रवाह की क्षमता एवं उपयोगिता की तनिक - सी झाँकी इसके ऊपर सूक्ष्म जगत है। उसमें चलने वाले ध्वनि - प्रवाह और भी अधिक महत्वपूर्ण हैं। यद्यपि वे मशीनों की पकड़ में नहीं आते तो भी उनके अस्तित्व को चेतनात्मक उपकरणों की सहायता से समझा जा सकता है। समझा ही नहीं उपयोग में भी लाया जा सकता है। यंत्रों से तो अब तक परमाणु का स्वरूप तक नहीं देख जा सका। उसकी प्रतिक्रियाओं को देखते हुए उसका स्वरूप कल्पित किया गया है। कल्पना की यथार्थता इसलिए मान्य की गई कि परमाणु से शक्ति - उत्पादन की सफलता ने उनके समर्थन में साक्षी प्रस्तुत कर दी। सूक्ष्म जगत की ध्वनियों का विज्ञान भौतिक क्षेत्र की शब्द विद्या से कम नहीं अधिक ही महत्वपूर्ण है। शरीर से प्राण की क्षमता अधिक होने का तथ्य सर्व- स्वीकृत है। स्थूल जगत की तुलना में सूक्ष्म जगत की गरिमा को भी ऐसी ही वरिष्ठता देनी होगी। ध्वनि - प्रवाह के सम्बन्ध में भी यही बात है। श्रवणातीत ध्वनियाँ विज्ञान जगत में अपनी गरिमा का प्रभाव समझा चुकी है। मनुष्य उनसे संपर्क जोड़ने के लिए बेतरह लालायित भी हो रहा है। सूक्ष्म जगत की ध्वनि संवेदनाओं का महत्व श्रवणातीत ध्वनियों से उच्चस्तरीय है। भौतिक जगत की ध्वनियों से मात्र भौतिक प्रयोजन ही सिद्ध हो सकते हैं। सूक्ष्म जगत के ध्वनि - प्रवाह यदि मनुष्य की समझ एवं पकड़ की सीमा में आ सके तो उसके चेतनात्मक लाभ प्रचुर मात्रा में उठाये जा सकते हैं।
तत्त्वज्ञानी, महामनीषियों को मात्र धर्मोपदेशक नहीं मानना चाहिए। वे सूक्ष्म जगत के स्वरूप को समझने और उसके साथ सम्बन्ध जोड़कर अतीन्द्रिय ज्ञान विकसित करने के प्रयास में संलग्न रहे हैं। इस प्रकार उनकी योग - साधना एवं तपश्चर्या को आत्म-कल्याण और सूक्ष्म विज्ञान के अधिकरण का दुहरा प्रयास कहा जा सकता है। हमारे ऋषि ज्ञानी भी थे और विज्ञानी भी। उनकी साधनाएँ आत्म-साक्षात्कार के लिए भी थीं और सूक्ष्म जगत में प्रवेश एवं अधिकार पाने के लिए भी। योग - साधना के साथ स्वर्ग - मुक्ति की भावनात्मक और ऋद्धि - सिद्धि की शक्तिपरक सफलताएँ जुड़ी हुई हैं।
योग साधनाओं से सूक्ष्म ध्वनि क्षेत्र से संपर्क बनाने और लाभ उठाने के दो प्रयोग होते रहे हैं। शब्द विद्या की दो धाराएँ मानी गई हैं, एक तो पकड़ने समझने और उनके सहारे अविज्ञात सम्भावनाओं से परिचित रहने की है, जिसे नादयोग कहा गया है। नादानुसंधान की महिमा योगशास्त्र में विस्तारपूर्वक बताई गई है। उनके सहारे सूक्ष्म जगत की हलचलों की जानकारी प्राप्त करने का लाभ बताया गया है। यह कहने - सुनने में छोटी किन्तु व्यवहार में बहुत बड़ी बात है। स्थूल जगत की वस्तुस्थिति से जो जितना परिचित है, उसे उतना ही बड़ा ज्ञानवान कहा जाता है। इस जानकारी के आधार पर ही लोग विभिन्न क्षेत्रों में आशातीत सफलताएँ पाते हैं। जिसकी जानकारियाँ जितनी सीमित हैं वे उतने ही पिछड़े समझे जाते और घाटे में रहते हैं। सूक्ष्म जगत की अद्भुत जानकारियों से परिचित रहने वाले नादयोगी अति महत्वपूर्ण वस्तुस्थिति समझ लेते हैं और उनके सहारे खतरों से बचने एवं अवसरों से लाभ उठाने का प्रयत्न करते हैं। यह लाभ वे अपने लिए भी लेते हैं और दूसरों का भी हित - साधन करते हैं। नादयोग के सहारे देवतत्त्वों से - परब्रह्म से जो सीधा सम्बन्ध बनता है उसका अन्तः क्षेत्र के परिष्कार में कितना बड़ा योगदान मिलता है, यह अनुभव का विषय है। नादानुसंधान के प्रवीण अभ्यासी इस क्षेत्र में प्रवेश पाने में मिली सफलताओं से चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करते देख गये हैं।
नादयोग की - सूक्ष्म जगत की दिव्य - ध्वनियों के साथ संपर्क बनाने की विद्या का महत्व बहुत ही है। इस विज्ञान का लाभ, स्वरूप एवं प्रयोग समझाते हुए ऋषियों ने बहुत कुछ कहा है।
नाबिन्दुपनिषद में वर्णन है -
ब्रह्मप्रणवसन्धानं नादो ज्योतिर्मयः शिवः। स्वयमावर्भविदात्मा मेघापायेंऽशुभनिव ॥
यत्र कुत्रापि वा नादे लगति प्रथमं मनः। तत्र त स्थिरीभूत्वा तेन सार्धं विलीयते।
सर्वचिन्ताँ समुत्सृज्य सर्वचेष्टाविवर्जितः। नादमेवानुसन्दध्यान्नादे चित्तं विलीयते॥
नियामनसमर्थोऽयं निनादो निशिताँकुशः । नादोऽन्तरंगसारंगबन्धने वायुरायते॥
अर्थात् - नादयोग ज्योतिर्मय शिव हैं वेदात्मा है। अशुभों का निवृत्तिकर्ता है। जब नाद के आधार पर मन स्थिर हो जात है तो वह परमात्मा में विलीन हो जाता है। इसलिए समस्त चिन्ताओं और हलचलों से छुटकारा पाकर शान्तचित्त से नादानुसंधान करना चाहिए। इस प्रयास के फलस्वरूप जो दिव्य शब्द श्रवण की अनुभूतियाँ होती हैं उससे अन्तःक्षेत्र की दुर्बलताओं और विकृतियों की निवृत्ति होती है। दिव्य क्षमता जगती है।
वायवीय संहिता में नाद को शक्ति का उद्भवकर्ता बताते हुए कहा गया है -
“ नादाच्छक्ति समुद्भवः । “
अन्तःकरण को निर्विषय बना लेने से उसकी दिव्य - क्षमताएँ उभरती हैं। मन को निर्विषय बनाने के लिए नादयोग का अभ्यास अतीव श्रेयस्कर सिद्ध होता है। कहा गया है-
मकरन्दं पिबन्भृंगो गन्धं नापेक्षते यथा। नादासक्तं तथा चित्तं विषयाँ हिं काँक्षते॥ - हठयोग
अर्थ - जिस प्रकार पुष्पों के मकरन्द को पान करने वाला भ्रमर दूसरे गन्ध को नहीं चाहता, उसी प्रकार नाद में आसक्त हुआ अन्तःकरण अन्य विषयों की अभिलाषा नहीं करता है।
शब्द की, नाद की अनुभूति यदि ठीक तरह होने लगे तो उसके सत्परिणाम भौतिक और आत्मिक दोनों ही क्षेत्र के मनोरथों को पूरा करते हैं -
एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः सुष्दु प्रयुक्तः स्वर्गे लोके च काम धुग भवति। - श्रुति
एक ही शब्द की तात्त्विक अनुभूति हो जाने से समस्त मनोरथों की पूर्ति हो जाती है। यह नादानुसंधान श्रवण पक्ष हुआ। शब्द विद्या का दूसरा पक्ष है - ध्वनि का अभीष्ट उद्देश्य के अनुरूप उत्पादन एवं प्रयोग। इसे मंत्रयोग से प्रेषण की क्षमता उत्पन्न होती है। दोनों को मिला देने से ही एक ऐसा स्वर - विज्ञान बनता है जो सूक्ष्म जगत की ध्वनि परिस्थितियों का उभय - पक्षीय उपयोग कर सके। घरों में रहने वाले रेडियो मात्र ध्वनि को पकड़ते हैं। इससे एकांगी प्रयोजन पूरा होता है। टेलीफोन की तरह ग्रहण - प्रेषण की उभय - पक्षीय व्यवस्था जहाँ होती है वही पूर्णता मानी जा सकती है। नादयोग और मंत्रयोग की दोनों ही धाराएँ मिलकर शब्दब्रह्म की समग्र क्षमता प्रस्तुत करती हैं। सुने जाने वाले प्रवाह को शब्दब्रह्म और कहे जाने वाले का परब्रह्म की संज्ञा दी गई है -
आगमोक्तं विवेकाच्य द्विि ज्ञान तथोच्यते। शब्दब्रह्मा ऽऽगमय परं ब्रह्म विवेकजम्॥ - अग्निपुराण
एक शब्द - ब्रह्म है दूसरा परब्रह्म। शास्त्र और प्रवचन से शब्दब्रह्म ओर विवेक, मनन, चिंतन से परब्रह्म की प्राप्ति होती है।
शब्दब्रह्म, परब्रह्म भार्गेभ्याँ शाश्वती - भागवत
शब्दब्रह्म और परब्रह्म यह दोनों ही भगवान के नित्य और चिन्मय शरीर है।
कुण्डलिनी जागरण में मन्त्राराधन एवं नादानुसंधान के रूप में इस शब्द - शक्ति का ही प्रयोग करना पड़ता है। इन दोनों ही धाराओं का उपयोग करने से अन्तः ऊर्जा का प्रखरीकरण - कुण्डलिनी जागरण सम्भव होता है।
चेतन्यं सर्वभूतानाँ शबद ब्रह्नोति में मतिः । तत्प्राप्य कुण्डली रूपं प्राणिनाँ देह मध्यगम् ॥ - योग वासिष्ठ
समस्त प्राणियों में यह शब्दब्रह्म चेतना बनकर विद्यमान है। उसे कुण्डलिनी जागरण द्वारा पाया जाता है।
मंत्र शक्ति का माहात्म्य असीम बताया गया है। उसके उपयोग से आत्मोत्कर्ष और लोक - कल्याण के उभयपक्षीय प्रयोजन पूरे होते हैं। अनुभवी साधना - विज्ञानियों ने , प्रामाणिक शास्त्र साक्षियों ने मंत्र की गरिमा समान रूप से प्रतिपादित की है। इससे उच्चस्तरीय शब्द विज्ञान द्वारा उत्पन्न ध्वनि की महत्ता पर प्रकाश पड़ता है -
अश्मानं चिद्ये बिभिदुर्वचोभिः । ऋग्वेद 4/16/6
उन शक्तिसम्पन्न पत्थरों को भी फोड़ डाला।
तामेताँ वाचं यथा धेनुँ वत्सनोपसृज्य प्रत्ताँ । दुहीतैवमेव देवा वाचं सर्वान् कामान् अनुह्नन ॥ - जैमिनीयोपनिषद् ब्राह्मण
जिस प्रकार बछड़ा गाय का दूध पीता है उसी प्रकार देवपुरुष दिव्य - वाणी का आश्रय लेकर समस्त कामनाएँ पूर्ण करते हैं।
जिह्ना ज्या भवति कुल्मलं वाड्.नाडीका दन्तास्तपसाभिदिग्धाः । तेभिर्ब्रह्मा विध्यति देवपीयून् हृद्बलैर्धनुर्भिर्देवजूतैः ॥ - अथर्व
आत्मबल रूपी धनुष , तप रूपी तीक्ष्ण बाण लेकर तप और मन्यु के सहारे प्रहार करते हैं तो अनात्म तत्वों को दूर से ही वेध कर रख देते हैं।
कौषीतकि उपनिषद् में कहा गया है -
न वाचं विजिज्ञासीत्। वक्तारं विद्यात् ।
वाणी के उच्चारण को मत देखो। उच्चारणकर्ता के व्यक्तित्व को समझो।
कृतघ्न व्यक्ति उस साँप की तरह है जिस यह याद नहीं कि किसी के दूध पिलाने से वह मोटा हुआ है।
शब्दविद्या के दो आधार, दो साधन नादयोग और मंत्रयोग के नाम से प्रसिद्ध हैं। दोनों विधि - विधान और अभ्यास में अति सरल हैं। किन्तु उन्हें बहिरंग आवरण ही समझा जाना चाहिए। इनमें प्राण -संचार जीवन - साधना द्वारा उपार्जित की गई उत्कृष्ट अन्तः स्थिति से ही संभव होता है। मस्तिष्क में दुर्बुद्धि, अचिन्त्य, विकृत विचार - प्रवाह का निराकरण करने से उत्पन्न हुई चित्त स्थिरता से नादानुसंधान में सफलता मिलती है। व्यावहारिक जीवन से सत्कर्म परायणता, सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन एवं आदर्शवादी चरित्रनिष्ठा से उस वाक् शक्ति का उदय होता है जो मंत्रों को लक्ष्यवेधी बाण की तरह सामर्थ्यवान बनाती है। साधना विधियाँ सरल हैं, कठिन तो वह प्रक्रिया है जिसमें क्रिया, विचारणा और भावना को परिष्कृत-परिमार्जित करने के लिए निरन्तर आत्म-संघर्ष करना पड़ता है। शब्द विद्या का लाभ उठाने के लिए उसके लिए उपयुक्त यंत्र - उपकरण अपना परिष्कृत व्यक्तित्व ही होता है। शब्द को शब्द - ब्रह्म बना सकना ऐसे ही व्यक्तित्वसम्पन्न साधकों के लिए संभव होता है।
योगशास्त्रों में सिद्धियाँ प्राप्त करने के उनके उपाय - उपचारों का वर्णन है। उनमें से एक उल्लेख औषधि का भी है। यहाँ औषधि से तात्पर्य वनौषधियों से है। क्योंकि वे अविकसित प्राणधारी वर्ग में सम्मिलित की जा सकती हैं। वे संवेदनशील भी होती हैं और संवेदनाओं अभिमंत्रित किया जा सकता है और इस योग्य बनाया जा सकता है कि किसी महाप्राण के प्राण - चेतना को अपने में संचारण कर सके। किसी दूसरे सत्पात्र तक पहुँचा सके, जिन्हें अध्यात्म - बल की विशिष्ट उपलब्धि कहा जा सके।
यज्ञ इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। अग्निहोत्र या हवन में मात्र औषधियों से बनी हवन सामग्री को या वनौषधियों को जलाकर उसकी ऊर्जा मात्र से ही चमत्कारी परिणाम नहीं होते, वरन् हविष्य को दिव्य मंत्रों से अभिमंत्रित करके उसके एक ऐसा पदार्थ बनाया जाता है, जिसमें प्राण - चेतना का गहरा संपुट लगा हुआ पाया जा सके।
मंत्रशक्ति मात्र कुछ शब्दों का उच्चारण ही नहीं होता, वरन् उसके साथ प्रयोक्ता की विशेष साधना द्वारा विशेष शक्ति उत्पन्न करके शब्दों के साथ संपुटित करना होता है। अभिमंत्रित किया गया पदार्थ ही ‘ भविष्य कहलाता है। उसके यज्ञाग्नि में यजन करके सशक्त ऊर्जा के रूप में परिणत किया जाता है। इस ऊर्जा का व्यक्ति पर, वातावरण पर, लक्ष्य पर प्रहार किया जाता है। यज्ञाग्नि भी चूल्हे में जलने वाली अग्नि से भिन्न होती है। उसे भी नियत कर्म - काण्डों के साथ अभिमंत्रित किया जाता है। इस प्रयोजन में काष्ठ (लकड़ी) होमी जाती है, उसके ‘ समिधा’ कहते हैं। यह रूप तब बनता है जब निर्धारित वृक्षों से नियत विधि से उसे उपलब्ध किया जाए और मंत्रों द्वारा विशिष्ट प्रकार के प्राण से, विशेष प्रकार की क्षमता से उसे सम्पन्न किया जाए। वातावरण शुद्धि के लिए अथवा लोक - चेतना जगाने वाले वृहद् यज्ञों में भी और व्यक्तिगत प्रयोजनों के लिए किये गये छोटे यज्ञों में भी इस विधा को अपने - अपने ढंग से अपने अपने स्तर पर प्रयोग किया जाता है। अग्निहोत्र में प्रयुक्त होने वाला समूचा सरंजाम मंत्रशक्ति की अवधारणा से अपने को सचेतन स्तर पर विकसित करता है, तभी उसके समुचित लाभ मिलते हैं। यदि भट्टी में या तसले में आग जलाकर वनौषधि मात्र को, हवन सामग्री को सामान्य रीति से जला दिया जाए तो उसकी धूम्र ऊर्जा यत्किंचित् ही प्रभाव उत्पन्न करेगी। इससे वह वाँछित लाभ न मिल सकेगा, जो यज्ञ प्रक्रिया का होना चाहिए।
रोग निवारण के लिए, वातावरण संशोधन के लिए, विचारणा और भावना के परिशोधन के लिए प्राणपर्जन्य की अभिवृद्धि के लिए , आत्मबल बढ़ाने के लिए , चमत्कारी सिद्धियाँ उत्पन्न करने के लिए यज्ञों की विशेष महिमा बखानी गयी है और कहा गया है-
“ यज्ञोऽयं सर्व कामधुक “ अर्थात् यह यज्ञ सब कामनाएँ पूर्ण करने वाला है, पर यह सब यथार्थ रूप में तभी देखा, पाया जा सकता है , जब उसमें किसी प्राणवान प्रवीण पारंगत द्वारा शाकल्य को अभिमंत्रित किया गया हो , उसमें विशेष प्राण भरा गया हो। इस आवश्यकता उपेक्षा करके अभीष्ट लाभ प्राप्त करना सम्भव नहीं होता।
कायाकल्प जैसे प्रयोगों में अन्य उपचारों का यत्किंचित् ही योगदान होता है। वस्तुतः उस समूची प्रक्रिया का हर पक्ष मंत्रशक्ति से अनुप्राणित किया जाता है , तभी उसकी वह परिणति होती है, जो शास्त्रों में माहात्म्य रूप से विस्तार करे साथ बतायी गयी है। सामान्य भोजन और भगवान के प्रसाद में मौलिक अन्तर यही है कि खाद्य को प्रसाद बनाते समय उसमें भावनाओं का, प्राणशक्ति का, मंत्रविद्या का समुचित एवं मंत्र विद्या विधिवत् प्रयोग किया जाता है।
शारीरिक रोगों में आयुर्वेद के अनुसार वनौषधियों का प्रयोग होता है। आधि - व्याधि निवारण एवं शक्ति - संवर्द्धन के लिए उनके शामक एवं संवर्धक गुणों का उपयोग विभिन्न अवसरों पर विभिन्न प्रकार से होता है। शारीरिक एवं मानसिक रुग्णता से बुरी तरह त्रस्त मानव समाज को आज यदि समग्र रूप से स्वस्थ बनाने की क्षमता यदि किसी उपचार पद्धति में है तो वह मात्र जड़ी - बूटियों पर आधारित आयुर्वेद में ही है। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि समय परिवर्तन के साथ ही लोग इस क्षेत्र में अपनी विशेषता खाते चले गये, अन्यथा अपने समय में यही एकमात्र पद्धति लोगों को हर दृष्टि में स्वस्थ एवं समर्थ रखे रहती थी। रोगों से ही नहीं, वरन् बुढ़ापे की जीर्णावस्था से भी मुक्ति दिलाने में यह एक समर्थ विधा है। कई तो ऐसी जड़ी - बूटियों का भी परिचय शास्त्रों में मिलता है जो लोगों को मृत्यु तक से छुटकारा दिलाती थीं।
ऐसी दिव्य व दुर्लभ जड़ी - बूटियाँ प्रायः हिमालय के दुर्गम पर्वत श्रृंखलाओं में पायी जाती हैं। उन्हीं में से एक को ‘संजीवनी’ के नाम से जाना जाता है। नाम के अनुरूप इसके कार्य भी मृतकों को जिन्दा कर देना है। रामायण में जब मेघनाद के शक्तिबाण से लक्ष्मण जी मूर्च्छित हो जाते हैं, तो सुषैण वैद्य द्वारा संजीवनी लाने को कहा जाता है। इसकी जानकारी देते हुए उन्होंने इस रात के घने अंधकार में भी चमकने वाली तथा हिमालय क्षेत्र के सुमेरु पर्वत पर उपलब्ध दिव्य बूटी बताया। हनुमानजी इस औषधि को पहचान तो नहीं पाये थे, परन्तु पूरे पर्वत को ही उखाड़ कर लाये थे और उसमें से संजीवनी को प्राप्त करके लक्ष्मण को बचा लिया गया था।
आयुर्वेद शास्त्रों में इस संजीवनी का ‘सोम ‘ औषधि के रूप में में भी उल्लेख मिलता है। इस सम्बन्ध में उल्लेख है कि आरम्भ में इसका एक पौधा होता है जिसमें शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को एक पत्ते का उद्भव होता है। क्रमानुसार दौज के दो, तृतीय को तीन तथा पूर्णिमा तक पन्द्रह पत्ते निकल आते हैं यथा कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से क्रमशः एक - एक पत्ता नित्य झड़ने लगता है। अमावस्या तक यह पौधा सूखी लकड़ी सदृश रह जाता है, परन्तु इस स्थिति में इसकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है। यह पौधा घने अन्धकार में रेडियम की तरह चमकता है तथा अत्यन्त गुणकारी हो जाता है। शास्त्र इसके गुणों को इस प्रकार प्रतिपादित करता -
“अणिमा गरिमा लघिमा प्राप्तिः प्रकाम्यं महिमा तथा। ईशित्वं व वशित्वं च तथा कामावसमिता॥ “
अर्थात् - अणिमा, गरिमा, लघिमा प्राप्त, प्रकाम्य, महिमा, ईशित्व एवं वशित्व - इन आठ ऐश्वर्य युक्त सिद्धियों को संजीवनी उपलब्ध कराती है। इनको पाकर व्यक्ति देवतुल्य बन जाता है।
शारीरिक स्तर पर संजीवनी अग्नि, जल, विष, शस्त्र आदि का प्रभाव नहीं पड़ने देती है। इसके सेवन से सुदृढ़ माँसपेशी, तेजस्वी दृष्टि, तथा नवजीवन की प्राप्ति होती है। व्यक्तित्व में तेजस्विता तथा प्रतिभा का समन्वय होता है तथा व्यक्ति में वह सामर्थ्य आ जाती है जिससे वह आकाश गमन की क्षमता अर्जित कर लेता है। सामान्य स्तर पर क्षय रोग, बाल रोग, शिरोशूल, मानसिक रोग, भूत - प्रेत बाधा, बुखार, दृष्टि दोष, सर्पदंश आदि से उत्पन्न रुग्णता को दूर करने में इसकी सक्षमता का भी उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। इस तरह की कितनी वनौषधियाँ हैं, जिनका वर्णन दिव्य जड़ी - बूटियों के रूप में किया गया है। इनमें से अधिकाँश खोज - बीन के अभाव में अब अप्राप्य है। यद्यपित उचित स्थानों पर खोजने से इन्हें अभी भी प्राप्त कर लाभ उठाया जा सकता है। उदाहरण के लिए गौमुख से लेकर सुमेरु पर्वत पर 11,000 हजार से 17000 हजार फीट ऊँचाई तक पायी जाने वाली ‘ रुदन्दी ‘ नामक बूटी प्राचीनकाल में दिव्य रसायन के रूप में विख्यात थी। तब इससे ताँबा , राँगा आदि के संयोग से सोना तक बनाया जाता था। आज उस प्रक्रिया का पूर्ण ज्ञान उपलब्ध नहीं है, परन्तु सामान्य रूप से सेवन करने पर यह बूटी शरीर को आश्चर्यजनक रूप से शक्ति प्रदान करती है। इसके सेवन से जरा - जीर्णता एवं सभी प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं। यह आयुवर्द्धक तथा मरणासन्न व्यक्ति को नवजीवन प्रदान करने वाली है। आयुर्वेद ग्रंथों में इसे भी संजीवनी के रूप में घोषित किया गया है। संक्षेप में वनौषधियों में अद्भुत सामर्थ्य प्रदान करने की क्षमता है। यदि सही वस्तुओं का सही रीति से प्रयोग किया जाए तो उसका लाभ वैसा ही मिलता है, जैसा कि शास्त्रकारों ने बताया है। इस प्रयोजन में भी यदि उपचार सामग्री अभिमंत्रित की गयी हो तो उसका लाभ और अधिक मिलता है।
यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि जब अभिमंत्रित वनौषधियों को यज्ञ के माध्यम से वायुभूत बनाकर प्रयुक्त किया जाता है तो वे और अधिक व्यापक - प्रभावशाली सिद्ध होती हैं। यह सभी जानते हैं कि ठोस से अधिक प्रभावशाली द्रव पदार्थ व द्रव से अधिक प्रभावी वाष्प होता है। चूर्ण की अपेक्षा बटी - गोलियाँ , टेबलेट्स, रस - भस्म आदि अधिक सामर्थ्यशाली और शीघ्र राहत पहुँचाने वाले होते हैं, किन्तु इनसे भी अधिक तीव्र फाण्ट, क्वाथ, आसव, आरिष्ट इंजेक्शन प्रभावशाली माने गये हैं। वाष्पीकृत नस्य पदार्थ ठोस और तरल औषधियों की अपेक्षा अतिशीघ्र अपना प्रभाव दिखाते हैं। अग्निहोत्र या यज्ञ - विधा के साथ ऐसे ही अनेक वैज्ञानिक कारण जुड़े हुए हैं, जिनके कारण उसके प्राचीनकाल में उच्चकोटि की प्रतिष्ठा प्राप्त थी। महाभारत के कच - देवयानी आख्यान में उल्लेख है कि दैत्यगुरु शुक्राचार्य को संजीवनी विद्या प्राप्त थी, जिसके माध्यम से वे मृतकों को भी पुनर्जीवित कर देते। संजीवनी मंत्र द्वारा आहुति देने पर वह प्राण ऊर्जा प्रवाहित होने लगती थी, जो निर्जीव पड़े प्राणी में भी गतिशीलता पैदा कर देती थी। तंत्र शास्त्रों में संजीवनी विद्या एवं दिव्य वनौषधियों का विस्तृत उल्लेख मिलता है।
श्वासतंत्र के सहारे बलवर्धक , रोग निवारक एवं प्राण - संवर्धक औषधियों को काया के कण - कण तक पहुँचाने का कार्य जितनी अच्छी तरह अग्निहोत्र द्वारा सम्पन्न हो सकता है , उतना और किसी प्रकार नहीं । वनौषधियाँ वाष्पीकृत स्थिति में फेफड़ों से होती हुई मस्तिष्क आदि अवयवों में होकर शरीर की कोशिकाओं तक पहुँचाती व अपनी इस सीधी पहुँच के कारण ही प्रभाव दिखा पाने में सक्षम हो पाती हैं। चिकित्साविज्ञानियों के अनुसार फेफड़ों में विद्यमान वायु कोष्ठकों का औसत क्षेत्रफल लगभग सौ वर्गमीटर का तथा दस माइक्रमीटर पतला होता है। एक बार में साधारण श्वास द्वारा वायु का 500 मिलीलीटर एवं गहरी साँस द्वारा 900 से 950 मि.ली. आयतन अंदर प्रवेश कर इसके बदले में कार्बनडाइआक्साइड को बाहर निकाल देता है। ऐसी श्वास - प्रश्वास प्रक्रिया एक मिनट में 15 से 18 बार होती है। इस प्रकार एक मिनट में हृदय जब तक 70 - 80 बार धड़क चुका होता है, श्वास मार्ग द्वारा 7550 मि. ली. वायु का एक्सचेंज अर्थात् आदान - प्रदान हो चुका होता है। अन्य आँकड़ों से एक अनुमान इस सशक्त माध्यम का लगाया जा सकता है , जिससे वनौषधियजन प्रक्रिया द्वारा वाष्पीभूत धूम्र ऊर्जा समूचे काय - कलेवर में प्रविष्ट करायी जाती है।
यह जन प्रक्रिया के द्वारा अनेकानेक आध्यात्मिक लाभों के अतिरिक्त उसका प्रभाव शरीर और मन के सभी महत्वपूर्ण अवयव तक पहुँचाने का है। अग्निहोत्र उपचार की यही विशेषता है कि शारीरिक एवं मानसिक क्षेत्रों में जिन रसायनों की, जिन तत्वों की कमी पड़ती है, वह मंत्रपूरित वनौषधियों की सूक्ष्मीकृत यज्ञ वाष्प में से खींच लिए जाते हैं और आवश्यकता की पूर्ति हो जाती है। साथ ही प्रश्वास द्वारा भीतर घुसी अवांछनीयता को बाहर धकेल कर सफाई का आवश्यक प्रयोजन भी पूरा कर लिया जाता है। यह बहुमुखी संतुलन बिठाने का माध्यम हर प्रकार की विकृतियों का निराकरण करने में असंदिग्ध रूप से सफल होता है। अग्निहोत्र उपचार एक प्रकार की समुह चिकित्सा का प्रयोजन भी पूरा करता है और त्वरित लाभ प्रदान करता है । जब वाष्पीभूत होने वाले औषधि तत्वों को साँस के साथ घोल दिया जाता है , तो रक्तवाहिनी संस्थान के माध्यम से ही नहीं, कण - कण तक पहुँचाने वाले वायु संचार करे रूप में भी वहाँ जा पहुँचता है, जहाँ उसकी आवश्यकता है। इस तरह वनौषधियों का हवन अर्थात् यज्ञ चिकित्सा में वे सभी आधार मौजूद हैं, जिनसे शारीरिक व्याधियों एवं बीमारियों तथा मानसिक व्याधियों एवं विकृतियों का उपचार पूर्ण रूप से संभव है।
वह लंकाशायर में एक लोहार के घर पैदा हुई थी। अपने व्यवसाय की दृष्टि से उसके पिता साम की गणना गुणी और सफल व्यक्तियों में की जाती थी। पेशे से लोहार होते हुए भी नफासत उनके स्वभाव का हिस्सा थी। वह एक संवेदनशील इनसान और शायद स्वाभाविक रूप से मनोवैज्ञानिक थे। पिता के यही गुण उसने अपेक्षाकृत अधिक विकसित रूप में पाए थे। वह अभी बच्ची थी कि साम पर उस अवस्था का एक रहस्योद्घाटन हुआ कि उसकी बेटी एक खास मनोवैज्ञानिक विशेषता की मालिक है। हुआ यों कि एक रात उनकी बराबर वाली गली में आग लग गयी। आग के बारे में जैसे ही साम और उसकी पत्नी को पता चला, वे तत्काल उस ओर दौड़ पड़े। जिस गली में आग लगी थी उसमें साम का एक प्रिय मित्र सपरिवार रहता था।
आग का खबर उसे भी मिल चुकी थी। हालाँकि वह अभी सोने के लिए बिस्तर पर लेटी ही थी, लेकिन इसके बावजूद यह सुनकर उससे रहा न गया। वह जल्दी से कपड़े पहनकर अपने माता - पिता की तलाश में निकल पड़ी। जब वह उस गली में दाखिल हुई, जिसमें आग लगी थी तो उसने देखा कि गली में जगह - जगह लाग जमा हैं। वहीं पास में एक बुरी तरह जले हुए व्यक्ति को स्ट्रेचर पर डालकर उस मकान से बाहर लाया जा रहा है, जिसमें उसके पिता के मित्र रहते थे। तनिक आगे बढ़कर उसने देखा तो पहचान गयी, अरे यह तो मिस्टर टॉम हैं। वह घबराहट, भय ओर दिलचस्पी के साथ उस दृश्य को देखती रही। अकस्मात् उसे अहसास हुआ कि मिस्टर टॉम का एक शरीर तो झुलसी हुई अवस्था में स्ट्रेचर के बराबर चल रहा था।
उसे यह पहेली बड़ी अजीब लगी। उसे कुछ ठीक से समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह सब क्या है ? अभी उसका बाल मन इस गुत्थी को सुलझाने में जूझ रही कि तभी उसके पिता साम निकट आए और उसे डांटने लगे कि वह आधी रात को घर से निकलकर यहाँ क्यों आयी है, कहीं अगर उसे कुछ हो ? अभी वह कुछ कहने के लिए मुँह खोलती की पिता ने उसके कान मरोड़ें और उसे जबरदस्ती घर वापस भेज दिया। कुछ देर टॉम जब घर आये, तो यह देख कर विस्मित रहे गये कि उनकी लड़की भय ओर घबराहट से पत्ते की तरह काँप रही है। साम ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और उसे सान्त्वना देते हुए उसकी घबराहट का कारण पूछा, तो उसने उसे एक जले हुए और एक ठीक टॉम की कहानी सुनायी। पिता ने यह सुनकर उसे प्यार से समझाने की कोशिश की, मेरी प्यारी बेटी ! ऐसा नहीं सोचा करते लगता है तुम्हें वहम हो गया है। लेकिन उसे उसी रात अंदाजा हो गया है कि उसकी बेटी ‘डोर्स स्ट्रोक्स’ भविष्य में एक असाधारण इंसान बनाने वाली है। क्योंकि साम को इस बात का भली−भाँति एहसास था कि डोर्स ने टॉम के साथ उसकी आत्मा को देखा था।
डोर्स का घराना धनी तो नहीं था किन्तु खाता पीता अवश्य था। इसी वजह से उसका बचपन बहुत आराम से बीता। पर वह अभी संसार और जीवन को ढंग से समझ भी नहीं पायी थी कि सहसा उसके पिता के जीवन की अन्तिम घड़ियाँ आ पहुँची। बेटी को प्राणों से प्रिय रखने वाले पिता ने विदा होते हुए उसका हाथ थाम लिया और कहा- ‘डोर्स तुम एक असाधारण इंसान हो। अब जो कुछ भी करना है, तुम्हें स्वयं ही करना है। मैं इस संसार में मौजूद नहीं होऊँगा। इसके बावजूद मेरा वादा है कि तुम्हारा हाथ थामने के लिए सदा मौजूद रहूँगा। बेटी से यह बात कहकर पिता विदा हो गये और डोर्स को भी इस सत्य का तीव्रता से अनुभव होने लगा कि यदि उसने अपने आपको नहीं संभाला तो उसकी जिन्दगी बरबाद हो जाएगी।
आग वाली दुर्घटना के बाद से पिता-पुत्री एक दूसरे के बहुत ही नजदीक आ गए थे। इस गहरी भावनात्मक समीपता के साथ ही साम ने डोर्स को तीव्रता से इस बात का एहसास दिलाना शुरू कर दिया था कि प्रकृति ने उसे क्या विशेषताएँ प्रदान की हैं और उनसे उसे क्या काम लेना चाहिए। इस सिलसिले में साम ने उसे बहुत कुछ सिखाया था, बहुत सी पुस्तकें पढ़ने को दी थीं और बहुत सी घटनाएँ सुनायी थीं। यानि की साधारण लड़कियों से भिन्न जिन्दगी बिताने के लिए काफी हद तक उसे तैयार कर दिया था।
अभी साम की मौत को थोड़े ही दिन बीते थे कि महायुद्ध शुरू हो गया। वह उन दिनों सिर्फ बीस वर्ष की थी। उसने तत्काल ही ‘वीमेन्स रायल एयर फोर्स’ में नौकरी कर ली। नौकरी के दौरान उसे अनेक लड़कियों से मित्रता करने का अवसर मिला। वह उनके साथ शाम को मनोरंजक स्थानों पर जाती, नृत्य करती हंसी खुशी की जिन्दगी बिताती इस सबके बावजूद अक्सर उस पर उदासी के तीव्र दौरे पड़ते। इन दौरों के असल कारण यह था कि वह उन युवा विमान-चालाकों को, जिनके साथ वह समय बिताती, प्रायः यों देखती कि वे अपने विमान उड़ा भी रहें हैं और उनसे बाहर भी तैरते हुए या उड़ते हुए नजर आ रहें हैं।
ऐसे नजारे जब उसकी दृष्टि पथ पर खिंच जाते, तो उसकी अन्तरात्मा गहराई से उदास हो जाती। क्योंकि वह अच्छी तरह जानती थी कि वह जिन युवकों को इस तरह अपने ख्याल में देख लेती है, वे फिर कभी वापस नहीं आते हैं। शुरू शुरू में तो वह इन मामलों को महज एक संयोग समझती रही, पर धीरे धीरे उसे अन्दाज हुआ कि इस प्रकार के जो दृश्य नजर आते हैं, वे शत-प्रतिशत सही साबित होते हैं और यह केवल संयोग नहीं हो सकता।
उन्हीं दिनों रायल एयर फोर्स से सम्बन्ध रखने वाले नवयुवकों का एक समूह एक रात स्थानीय गिरजाघर में आयोजित होने वाले एक आध्यात्मिक समारोह में चला गया। डोर्स भी उस समूह में थी। उस समारोह में जिस व्यक्ति को अपनी कला का प्रदर्शन करना था, जब वह मंच पर आया तो कुछ ही मिनट बाद उसने डोर्स की ओर इशारा किया। डोर्स इसका इशारा देखकर किसी सूत्रधार की तरह उठ खड़ी हुई। वह बोला लड़की याद रखो ! एक दिन वह भी आएगा जब तुम इस प्रकार के प्रदर्शन करोगी और हजारों लोग तुम्हें देखने आएँगे।
ये बातें सुनकर उसके सभी साथी हँसने लगे और उन्होंने उसका हाथ पकड़कर बैठा लिया उस रात जब वे लोग गिरजाघर से वापस हुए तो सभी उसका मजाक उड़ा रहे थे। कुछ दिनों उसके निकटवर्ती मित्रों के बीच यह मजाक इसी तरह चलता रहा और फिर बात आयी गयी हो गयी। इस भविष्यवाणी के कुछ महीनों के बाद ही उसने एक अमेरिकी पायलट जान फिशर से शादी कर लीं जान बहुत कुशल विमान चालक माना जाता था। शादी के कुछ ही दिनों बाद वह हर रोज की तरह उड़ान पर गया और फिर वापस नहीं आया। डोर्स ने अपनी सभी अलौकिक शक्तियाँ लगाकर जान फिशर के बारे में कुछ जानना चाहा, लेकिन हर बार उसके मस्तिष्क के सामने एक काली चादर सी तन जाती।
डोर्स को अपने पति से प्रेम था। वह उसके बच्चों की माँ बनने वाली थी। ऐसे में उसके लिए जान से अलग हो जाना एक असह्य घटना थी। अपने गहरे भावनात्मक आघात से उबरने के लिए वह एक गुह्य-विज्ञानी से जाकर मिली। उस गुह्यविद्याविद् तांत्रिक ने बताया कि जान मारा जा चुका है। और वह उसकी प्रतीक्षा करना छोड़ दे। लेकिन उसका अंतर्मन इस सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार न था। हालाँकि इसके बावजूद इस हकीकत को माने बिना अन्य कोई उपाय भी तो न था। अतः वह सदमे निढाल कर वापस आयी।
घर पहुँचते ही वह अपने बिस्तर पर जा गिरी तभी अचानक कमरे का दरवाजा बहुत जोरदार आवाज से खुला वह समझी की उसकी माँ आयी है, पर जब उसने गर्दन घुमाकर देखा तो अचरज का ठिकाना न रहा, वहाँ तो उसके पिता साम खड़े थे वे बिलकुल वैसे ही लग रहे थे जैसा की अपनी मौत से पहले थे। पहले तो डोर्स को इस दृश्य पर यकीन नहीं हुआ, फिर उसने अपना यकीन करने के लिए उन्हें होठों ही होठों में आवाज दी।
हाँ बेटी! मैं ही हूँ। तुम्हें मालूम है न, कि मैंने तुमसे कभी झूठ नहीं बोला ? वह उसी अन्दाज में बोल रहे थे, जैसे अपने जीवनकाल में बोला करते थे। हाँ, पिताजी ! मुझे आप पर पूरा विश्वास है। वह भावावेश में बोल पड़ी। तब बेटी ! यकीन रखो, मैं अब भी तुमसे झूठ नहीं बोल रहा। तुम बिलकुल परेशान न होओ। जान मरा नहीं है। क्रिसमस के दिन तुम्हें एक पक्का सबूत भी मिल जायेगा। अपने इसी कथन के साथ साम का अस्तित्व हवा में विलीन हो गया।
इस घटना के ठीक तीन महीने बाद वार ऑफिस की ओर से डोर्स को सरकारी तौर पर सूचित किया गया कि जान फिशर युद्ध क्षेत्र में वीरता दिखाते हुए शहीद हो गया है। लेकिन पड़ोसियों-कुटुम्बियों-मित्रों के लिए यह बात विस्मयकारी थी कि वह डोर्स जो कुछ दिनों पहले तक सदमे से निढाल थी बहुत शान्तिपूर्ण और आश्वस्त लग रही है। वार आफिस से जान के निधन का समाचार मिलने के बाद इसके बजाय कि वह जान के मारे जाने का शोक मनाती, उसने इस समाचार की सत्यता से ही इनकार कर दिया।
पहले तो उसकी माँ और उसके मित्रों ने उसे बहुत समझाया, लेकिन जब उन्हें अनुमान हुआ कि वह इसके बारे में कुछ सुनने -समझने के लिए तैयार ही नहीं, तो उन्होंने यह समझकर उसे हाल पर छोड़ दिया कि सदमे ने मस्तिष्क को प्रभावित किया है, अतः इस सतत् को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं कि वह विधवा हो चुकी है।
सब लोग इस बात की समीक्षा करने लगे कि कब वह सत्य का सामना करने में समर्थ हो पाती है। लेकिन तभी क्रिसमस के दिन उसके पिता की भविष्यवाणी के अनुसार यह समाचार आ गया कि जान फिशर का पता चल गया है और वह बेहद जख्मी हालत में जिन्दा बच गया है। उसके सकुशल घर आने के बाद उसे गहराई से विश्वास हो गया कि शरीर से परे जीवन है और सूक्ष्मशरीर सूक्ष्मशरीर -धारी लोग समय-समय पर सहायता भी पहुँचाते हैं।
उसे स्वयं भी सूक्ष्मशरीरधारी लोगों की आवाजें यदा-कदा सुनायी पड़ने लगी थीं। इसी समय उनका पाँच माह का बेटा मर गया। बेटे की दुःखद मृत्यु ने उसे शरीर से परे जीवन के प्रति और अधिक सचेतन किया। हालाँकि दुर्भाग्यवश उसके एक के बाद तीन बच्चों की मृत्यु ने उसकी चेतना को अन्दर तक झकझोर दिया था। अन्त में उसने एक बच्चों टेरी को गोद लिया, लेकिन लगातार की इन मौतों ने उसे सूक्ष्म जगत से अधिक जोड़ दिया।
यह बताना बड़ा मुश्किल है कि उसकी प्रसिद्धि घर - घर कैसे पहुँची ? 1978 में उसने अमेरिकी टेलीविजन पर लगातार कई ऐसे प्रोग्राम किये जिनमें उसने अपनी अध्यात्मिक विशेषताओं को प्रदर्शित किया था। उसके ये प्रोग्राम इतने सफल हुए कि वह हर खास व आम लोगों में बेहद लोकप्रिय हो गयी। उसकी पुस्तक ‘वायसेज इन माई ईयर्ज’ को सबसे अधिक बिकने वाली पुस्तक का नाम दे दिया गया। वह जिस जगह जाती, लोग वहाँ जमा हो जाते और उससे यह इच्छा प्रकट करते कि दूसरे संसार को सिधार जाने वाले उनके प्रियजनों से उनका करा दें। उससे निजी- तौर पर सूक्ष्म शरीरी लोगों का संपर्क चाहने वालों की सूची हजारों तक जा पहुँची। उसने कई देशों के तूफानी दौरे किए, जिनमें उसे क्षण - भर की मोहलत नहीं मिलती थी और जब वह आस्ट्रेलिया के दौरे पर सिडनी पहुँची , तो आस्ट्रेलिया के लोग उसके प्रोग्राम के टिक खरीदने के लिए घण्टों कतार में खड़े रहने में गर्व का अनुभव करते थे।
विज्ञानवेत्ता सूक्ष्मजगत से उसके गहरे संपर्क को देखकर विस्मित होते हैं। जो अनुभव पा चुके हैं, उन्हें डोर्स का यह सूक्ष्म - सार इतना वास्तविक लगता है, जितना कि हमारा वास्तविक संसार। डोर्स और उसके संपर्क में आने वालों को न केवल मौत के पश्चात् जिन्दगी पर विश्वास है, बल्कि वह अपने हर प्रोग्राम को इस विश्वास के और दृढ़ होने का प्रमाण घोषित करती है। डोर्स स्ट्रोक्स का कहना है कि उसकी हकीकत एक टेलीफोन एक्सचेंज की जैसी है, जो आत्माओं से उनके प्रियजनों का संपर्क कायम कर देता है। वह लोगों को उनके प्रियजनों के चेहरे तो नहीं दिखा सकती, किन्तु उसकी आवाज अवश्य सुना सकती है। कभी - कभी वह अपने बच्चों की आत्माओं को भी देखा करती थी और इसका कारण उनसे उनका गहरा भावनात्मक जुड़ाव था।
वह अपने संपर्क में आने वाली आत्माओं से कुछ इस तरह बातें करना शुरू करती, मानो वे उसके सामने बैठी हों और उनसे सुखदायक मूड में हलके - फुलके विषयों पर विषयों पर वार्तालाप हो रही हो। सूक्ष्म - जगत में उसी पहुँच कुछ इस तरह जाती, जैसे लोग गाड़ी या बस की यात्रा में अजनबी व्यक्तियों से बातचीत शुरू कर देते हैं। इस बातचीत में उसे अनेक अनुभव हुए। विभिन्न तरह की आत्माओं की अलग - अलग स्थिति एवं प्रकृति का पता चला।
डोर्स का कहना है कि कुछ आत्माएँ कम हिम्मत वाली होती हैं। ऐसी आत्माओं के साथ बातचीत करते हुए वह उत्साह बढ़ाती है और प्रायः निःसंकोच होकर रहती है, डियर जरा जोर से बोलो, तुम्हारी आवाज साफ नहीं आ रही है। इन शर्मीली आत्माओं के अतिरिक्त कुछ आत्माएँ ऐसी भी होती है। जो जीवित व्यक्तियों से संपर्क करने के लिए का जरिया है, अतः वे उससे बातें करने के लिए जब व्यग्रता प्रकट करती हैं। तो वह उनसे शिष्टता से अपनी बारी की प्रतीक्षा करने का अनुरोध करती है। सूक्ष्म - संसार से संपर्क के इसी स्वाभाविक और निःसंकोच अन्दाज ने उसे असाधारण नारी बना दिया है।
एक बार वह स्टॉक ऑफ टेण्डर में 4 मई , 1974 को एक बड़े जनसमूह के सामने विशिष्ट प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही थी कि सहसा उसे एक ऐसी जानी - पहचानी आवाज सुनायी दी, जो उसकी सूचनाओं के अनुसार अभी जीवित थी। उसने घबराई - सी आवाज में कहा, नहीं डायना, यह तुम नहीं हो सकतीं। फिर उस आवाज से उसका संपर्क टूट गया ओर उसने अपने कोनों का धोखा समझा लेकिन उसी शाम स्थानीय आकाशवाणी पर जब यह घोषणा हुई कि आज अपराह्न अभिनेत्री डायना जो कैंसर से पीड़ित थीं, अकस्मात् स्वर्ग - सिधार गयीं। तब डोर्स को अनुमान हुआ कि उसके कानों ने धोखा नहीं खाया था। उसकी मित्र ने इस संसार से विदा होते समय उसे आवाज दी थी और फिर वह ऊपरी संसार की ओर उड़ गयी थी।
इसी प्रकार की एक विचित्र घटना उसे टोमी कूपर के साथ पेश आयी । टोमी कूपर उन दिनों का एक विख्यात हास्य अभिनेता था। एक दिन टोमी टी.वी पर अपनी कला का प्रदर्शन कर रहा था कि सहसा वह लड़खड़ाया। उसने संभलने का काफी प्रयत्न किये, परन्तु जिन्दगी मोहलत समाप्त हो चुकी थी। कुछ क्षणों के अन्दर टोमी कूपर समाप्त हो गया। डोर्स इस प्रोग्राम में मौजूद थी। उसने देखा कि जैसे ही टोमी कूपर गिरा, उसके अस्तित्व में से एक इंसानी आकृति ऊँची उठी और फिर हवा में घुल−मिल - सी गयी।
इस घटना के थोड़े ही समय बाद डोर्स को लेस्टर की एक जगह पर एक ऐसे होटल में रात बिताने का अवसर मिला, जिसमें कूपर अपनी मृत्यु से पूर्व ठहर चुका था। डोर्स ने देखा कि उस कमरे में एक लम्बा - चौड़ा बिस्तर बिछा हुआ है। उसने कमरे में प्रवेश किया और इसी के साथ अपना कोट उतार कर कुर्सी की पुश्त पर डाला। पर्स मेज़ पर रखा और बिस्तर की ओर बढ़ी। उसी समय उसके कानों में टोमी कूपर की आवाज़ आयी, इस बिस्तर की मुझे आवश्यकता है। डोर्स ठिठक कर रुक गयी। फिर कमरे में धीरे - धीरे टोमी की हँसी गूँजने लगी और बढ़ते - बढ़ते यह आवाज जोरदार ठहाकों में बदल गयी। वह टोमी के इन ठहाकों को नजरअंदाज करते हुए बिस्तर पर जा लेटी। कोई और होता तो कमरा छोड़ कर भाग जाता। पर वह तो आत्माओं के साथ इतनी बातें कर चुकी थी कि उसे इस सबसे कतई डर नहीं लगा। फिर यह हुआ कि आधी रात को उसे चाय की जरूरत महसूस हुई। अभी उसने बिस्तर से उठकर फोन तक जाने का इरादा किया था, ताकि रूप सर्विस को फोन करके चाय मंगवा सके, तभी टोमी की मसखरी आवाज सुनायी पड़ी, छोड़ो भी चाय का चक्कर, ठाठ से बिस्तर पर लेटकर सो जाओ। ‘
ऐसी एक नहीं अनेकों घटनाएँ डोर्स के जीवन के साथ अभिन्नता से जुड़ी हैं। हजारों लोग उसकी इन विशेषताओं को स्वीकार भी चुके हैं। जबकि उसका कहना है कि यह विशेषता और कुछ नहीं, मानवीय संवेदनशीलता और चेतना का विकास हैं कोई भी उच्चतर संसार से संपर्क कर सकता है। ठीक वैसा ही संपर्क जैसा कि हमारे अपने संसार से है। इसमें अचरज की कोई बात नहीं। पर हम हैं कि जीवन को बस वर्तमान परिधि तक सीमित मान बैठे हैं। जबकि जीवन का विस्तार अनन्त है, वह शरीर तक सिमटा नहीं है।
अपनी बातों का प्रायोगिक औचित्य सिद्ध करने वाली डोर्स आत्माओं के जो संदेश, उनके सगे - सम्बन्धियों को देती है, उसे सुनकर वे सभी अचरज में पड़ जाते हैं। क्योंकि इसमें ऐसी अनेक बातें होती हैं जो उनके और उनका प्रिय परिजन की आत्मा के सेवा और किसी को नहीं मालूम। वे लोग जो उसकी इस सारी क्रिया को संदेह की दृष्टि से देखते हैं, कम से कम यह मानने पर तो मजबूर हो ही जाते हैं कि वह असाधारण संवेदनशील चेतना (एक्स्ट्रा सेन्सरी परसेप्शन) का प्रदर्शन कर रही है।
जबकि इस प्रक्रिया के दौरान डोर्स का यह मानना है कि वह जिन आत्माओं से संपर्क करती है उनके सिरों पर वह झिलमिलाता हुआ नीला प्रकाश देख सकती है। उसका यह भी कहना है कि किसी व्यक्ति की मौत को जितना ज्यादा समय बीत जाता है, उसकी आवाज उतनी ही साफ सुनायी देती है और कुछ दिनों पहले समाप्त होने वाले व्यक्तियों की आवाजें बहुत मद्धिम होती हैं और कई बार तो सुनायी ही नहीं देतीं। डोर्स ने अपनी पुस्तक ‘ एक होस्ट ऑफ वायसेज ‘ में कतिपय बहुत प्रसिद्ध व्यक्तियों की आत्माओं से अपनी मुलाकात का हाल लिखा है। इसी पुस्तकों में है कि 1974 नामक प्रसिद्ध उपन्यास के लेखक जार्ज आरवेल से उसकी बातें हुई। जॉन लेनिन और मार्क बोलन से भी उसकी दिलचस्प मुलाकातें हुई। ये दोनों पॉप संगीत के उज्ज्वल सितारों की हैसियत रखते थे। उसकी बात चीत नवयुवक अभिनेता रिचर्ड बेकन से हुई, जो 32 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से मर गया था। इनके अलावा ऐसी आत्माओं से भी उसकी मुलाकातें हुई हैं, जो बहुत ही दिव्य हैं और उच्चतर लोकों में निवास करती हैं।
इन आत्माओं से हुई रहस्यमय मुलाकातों के बारे में डोर्स का कहना है कि इन सभी में मानवता के प्रति अद्भुत प्रेम हैं ये मानव - कल्याण के लिए सतत् सूक्ष्म रूप से प्रयास करती हैं। इन सभी का मानना है कि समूचा विश्व इन दिनों एक भयावह संक्रमण से गुजर रहा है। बीसवीं सदी समाप्त होते ही इसका भी अन्त मानव की उज्ज्वल भवितव्यता के रूप में होगा। ये सभी दिव्य आत्माएँ इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य का पर्याय और मानव की अनिवार्य नियति मानती हैं। डोर्स स्ट्रोक्स का कहना है कि उनकी ही तरह हर व्यक्ति ऐसी रहस्यमय अनुभूतियों को अर्जित कर सकता है बशर्ते उसकी अभिरुचि भौतिक प्रगति के साथ अपनी आत्मिक एवं चेतनात्मक प्रगति की आरे भी हो।
क्या उन्हें पानी से भरी इस सुरंग में बैठकर अपनी जान खतरे में डालनी चाहिए। उस लड़के को खोजने के लिए , जो शायद अब तक मर भी चुका हो ? हाँ ‘, उन्होंने किसी अज्ञात प्रेरणा से यह खतरनाक फैसला किया। यह खतरा उन्हें उठाना ही चाहिए। उनका फैसला था। गोताखोरी का विशेष श्वास यंत्र प्राप्त करने का तो समय था नहीं। इसलिए क्रोनिन और रोड्डा ने अपनी - अपनी पीठ पर हवा के सिलेंडर कसे और चेहरों पर वे मुखौटे चढ़ा लिए जो आग बुझाते समय धुएँ से भरी बिल्डिंगों में घूसने के लिए पहने जाते हैं। ये उपकरण पानी के अन्दर गोता लगाने के लिए नहीं थे, लेकिन उन्होंने जल्दी से जलकुण्ड में इधर - उधर डुबकी लगाकर देखा लिया कि उनके सहारे वे साँस ले सकते हैं।
इस बीच पुलिस ने चौक की देख - रेख वाले कक्ष में एक ऐसे कर्मचारी को खोज निकाला था, जो फव्वारे की चक्कर काटती पानी की तेजधारा वाली प्रणाली को बन्द करने में सफल हो गया। पानी शाँत हो गया। 30 मीटर लम्बे रस्से से अपने को बाँधकर, जिसे उसके साथियों ने थाम रखा था, पहले क्रोनिन ने उस अँधेरे गर्त में पाँव डाले। उसने गड्ढे की तली छूने की कोशिश की लेकिन पीठ पर बंधे हवा के सिलेंडरों ने उसको उछाल दिया। उसका सिर जोर से उन दोनों पाइपों से जा टकराया, जो नाले के अन्दर से गुजरते थे, इससे उसका एक दाँत टूट गया और ठुड्डी कट गयी।
क्रोनिन नीचे ठहर सके, इसके लिए रोड्डा नाले के अन्दर क्रोनिन के कंधों के ऊपर ,खड़ा हो गया। क्रोनिन दीवारों के साथ - साथ टटोल - टटोल कर उस सुरंग की प्रणाली को समझने का प्रयास करने लगा। उसने उस सीधी सुरंग का मुहाना ढूँढ़ निकाला। लेकिन घुप्प अंधियारे में अकेले घुसना उसे खतरनाक लगा। वह तैरकर ऊपर निकल आया।
और कुछ ही क्षणों बाद उन दोनों ने दोबारा गोता लगाया। इस बार वे अपने साथ कोई दो मीटर लंबा एक बाँस भी ले गये थे, जिसके एक सिरे पर हुक लगा था। उन्होंने यह बाँस उस खड़ी सुरंग के अन्दर डाल दिया और उस समय तक टटोलते रहे, जब तक उसमें कुछ फँस नहीं गया उसे खींचने के लिए उन दोनों को बहुत जोर लगाना पड़ा। दोनों के दिल धड़क रहे थे - होनी हो चुकी है। पर उनके हाथ लगा था कचरे से भरा एक बड़ा - सा प्लास्टिक का थैला। आग बुझाने वाले दोनों जवान पानी के ऊपर आए तो पुलिस ने उन्हें अब खोज कर देने की सलाह दी। कार्ल को गायब हुए एक घण्टा हो चुका था और यह निश्चित - सा लगता था कि लड़का मर चुका है। चौक से भीड़ भी धीरे - धीरे खिसक चली थी।
लेकिन कार्ल अभी मरा नहीं था। सारे भरोसे टूट जाने और सारे सहारे छिन जाने बाद भगवान के प्रति विश्वास बाकी था। उसे यह उम्मीद बरकरार थी कि सर्वसमर्थ एवं परम दयालु परमेश्वर मुझ असहाय बालक की जरूर सुनेंगे। वह बड़ी आन्तरिकता और व्याकुलता के साथ पुकार रहा था - प्रभु ! मैं तुम्हारी शरण में हूँ। मुझे बचा लो, शरणागत वत्सल। शायद अपने भगवत् - विश्वास के कारण ही उसमें अभी मनोबल बाकी था। वह जब बहकर सुरंग में पहुँच गया था और तेजी से चक्कर काटती धारा के साथ बुरी तरह पटका और झंझोड़ा जा रहा था और उसके फेफड़े फटने - फटने को हो रहे थे, तभी भगवान को पुकारने के साथ ही उसकी उँगलियाँ किसी दीवार से खरोंच - सी खा गयीं पर दीवार बेहद चिकनी थी, फिर वह जा टकराया किसी गोल - सी चीज से, जो पाइप - सा लगता था। इस टक्कर से कार्ल की गति धीमी पड़ गयी और उसने चलकर जैसे - तैसे पाइप को पकड़ लिया और उछलकर पानी के ऊपर निकलने का प्रयास किया। वह सोच रहा था कि वह इसके सहारे पानी के ऊपर हवा में पहुँच जाए, पर तभी उसका सिर किसी सख्त चीज से टकरा गया। वह छत थी, तो कोई निकलने का रास्ता नहीं।
अग कार्ल किसी भी तरह साँस नहीं रोके रह सकता था। उसे जैसे - जैसे साँस लेनी ही थी। विकल मन से भगवान की याद करते हुए उसने अपना मुँह खोला। कितना अविश्वसनीय लगता है कि उस गुफा की एक दरार में उसे हवा की एक खोह मिल गयी थी। लंबी साँस उसने अपने फेफड़े भर लिए। जब उसने अपना चेहरा झुकाया तो वह पानी से जा लगा। यह पता करने के लिए कि साँस लेने की जगह उसके पास कितनी है कार्ल पाइप के आस - पास घुमा। बस कोई 30 सेंटीमीटर जगह थी। उसके सिर से बस थोड़ी -सी ज्यादा। उसे इस छोटे से खण्ड में ही रहना होगा। जब तक कोई सहायता न आ जाए। पर सहायता तो तभी आएगी, जब परम् दयालु भगवान कृपा करें।
फिर अचानक ही उसे आस - पास उफनता पानी शाँत होता जान पड़ा। कार्ल को अचरज - सा हुआ - तो क्या परमात्मा सचमुच मुझे बचाने के लिए किसी को भेज रहे हैं ? इस समय उसका मन बड़ी विकलता से प्रभु की याद करने में तल्लीन था। हालाँकि अब उस छोटी - सी खोह में भरी हवा उसे साँस लेने से क्षीण हो रही थी।
उसे न कुछ सुझाई दे रहा था, न कुछ सुनाई पड़ रहा था, कोई आता क्यों नहीं ? वह जोर से चिल्लाया। अपनी ही आवाज सुनकर उसे थोड़ी ढाँढस बंधी और फिर वह प्रतिदिन विद्यालय में दुहराई जाने वाली प्रार्थना गुनगुनाने लगा। पर अब तक वह थक चुका था। दिमाग के तन्तु ढीले पड़ने से वह जल्दी ही ऊँघने लगा। उसका मन हो रहा था कि आँखें मूँदकर वह थोड़ी देर सो ले। नीचे फँसे उसे एक घण्टा दस मिनट हो चुके थे। लेकिन उसे अपनी ही सोच पर हंसी आ गयी। सोएगा और यहाँ ? वह वह कर भी क्या सकता था। उसने स्वयं को पूरी तरह भगवान के हवाले करके आँखें मूँद लीं।
ऊपर चौक में एक एंबुलेंस कर्मचारी कार्ल की माँ कैथलीन पावेल के साथ खड़ा उन्हें बुरी से बुरी स्थिति के लिए तैयार करने की चेष्टा कर रहा था। वह साढ़े 6 किलोमीटर दूर स्थित अपने घर से भागी - भागी घबराई हुई यहाँ पहुँची थी। पुलिस उन्हें पास के स्टोर में ले गयी। कोई भी यह नहीं चाहता था कि वे उसे स्ट्रेचर और कम्बल को देखें, जो उनके बेटे की लाश के लिए यहाँ लाया गया था। कैथलीन पावेल को लोग घटनास्थल से जितना दूर रखने की कोशिश कर रहे थे, उतनी
आश्विन नवरात्रि के ठीक पूर्व प्रकृति का सर्वाधिक विलक्षण एवं विविधताओं वाला मौसम वर्षा ऋतु होता है। यह ऋतु अपने साथ हर्ष, उमंग और वर्षा की अनेक सुखद संभावनाएँ तो लाती ही है, पर साथ ही विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ तथा जन धन हानि जैसी परेशानियाँ भी साथ लाती है। अतिवृष्टि से जल-जंगल एक हो जाते हैं और चहुँ ओर जल प्रलय की-सी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इससे जन-धान्य के हानि के साथ ही जनहानि भी बहुत होती है। यों तो अपने देश के कुछ भाग को छोड़कर गर्मी के मौसम में ही वर्षा आरम्भ हो जाती है और सितम्बर - अक्टूबर तक चलती है। बरसात के दिनों में घर भी सीलन भरे रहते हैं। फलस्वरूप वायु दूषित हो जाती है। वातावरण की अनियमितता के कारण गीलेपन, उमस और सीलन भरी हवा के कारण शरीर की जठराग्नि मन्द हो जाती है और पाचन संस्थान गड़बड़ा जाता है। सर्दी, जुकाम, खाँसी, मलेरिया, डेंगू फीवर एवं वात व्याधि जैसी बीमारियों का सर्वाधिक प्रकोप इन्हीं दिनों होता है। ऐसी स्थिति में रहन सहन और खान-पान में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
अपना देश विविधताओं का देश है। वर्ष भर में यहाँ जितनी ऋतुएँ होती हैं, विश्व के अन्य द्वीपों में उतनी नहीं होती। संवत्सर काल-विभाजन के अनुसार यहाँ छह ऋतुएँ होती हैं यथा- “ते शिशिरवसन्तग्रीष्मवर्षाशरद्धेमंताः”- अर्थात् शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा शरत, हेमन्त यही छह ऋतुएँ हैं। सुश्रुत संहिता सूत्र में उल्लेख है- इहु तु वर्षाशरद्धेमन्तवसंतग्रीष्मप्रावृषः षडृतवो भवन्ति दोषोपचयप्रकोपा्रपशमनिमित्ताम्। अर्थात् दोषों के संचय , प्रकोप और शमन के निमित्त से वर्षा, शरद, हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म ओर प्रावृट ये 6 ऋतुएँ होती हैं। “भाद्रपदाश्विनौ वर्षा” सूत्र के अनुसार भाद्रपद और आश्विन ये दो महीने वर्षा ऋतु के तथा “आषाढ़श्रावणौ प्रावृडिति” के अनुसार आषाढ़ और श्रावण-ये दो मास प्रावृट ऋतु के होते हैं। आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थ चरक-संहिता के अनुसार वर्षा का समय दो भागों में विभक्त किया गया है- (1) आदाएनकाल और (2) विसर्गकाल। आदानकाल में तीन ऋतुएँ आती हैं- शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म तथा विसर्ग काल के अंतर्गत वर्षा, शरद और हेमन्त ऋतुएँ। ग्रीष्म ऋतु आदानकाल की चरम सीमा होती है और इसके तुरन्त पश्चात् वर्षा ऋतु आरम्भ हो जाती है। यह विसर्गकाल की पहली ऋतु होती है। इस काल में सूर्य पृथ्वी से दूर जाने लगता है और चन्द्रमा की शक्ति में अभिवृद्धि होने लगती है। यथा- “सोमश्चव्याहबलः शिशिराभिभीरापूरयञजगदाष्याययति शश्वत अतो विसर्गः सौम्यः।” अर्थात् विसर्गकाल में चन्द्रमा पूर्ण बली रहता है। इसलिए विसर्गकाल को सौम्य कहा जाता है। इस काल की प्रथम ऋतु है- वर्षाकाल।
आयुर्वेद ग्रन्थों में आहार-विहार एवं चिकित्सकीय उपचार की दृष्टि से वर्षाकाल को दो भागों में बाँटा गया है- “प्रावृडिति प्रथमः प्रवृश्टः कालः तस्यानुबन्धो हि वर्शाः।” अर्थात् वर्षा के आरम्भिक काक को ‘प्रावृट’ और उत्तरार्द्ध कहा कहते हैं। यह अन्तर गुण दोष की दृष्टि से किये गये हैं। वर्षाकाल में जठराग्नि कमजोर पड़ जाती है और वात का वायु का प्रकोप बढ़ जाता है, यथा “वर्षास्वग्नि बले क्षीणे कुप्यन्ति पवनादयः” इसके कारण आदमी को गर्मी ज्यादा सताती है और पित्त बढ़ जाने के कारण घबराहट होने लगती है। अतः इस ऋतु में हल्के सुपाच्य भोजन के अतिरिक्त शीतल, ठण्डे एवं अम्लीय द्रव्यों का सेवन करना चाहिए तथा आहार-विहार के सभी नियमों का पालन करते हुए स्वास्थ्य की रक्षा करनी चाहिए।
वर्षा के उत्तरार्द्ध काल में अर्थात् भाद्रपद व आश्विन में वातावरण बहुत बदला हुआ रहता है। इन दिनों सर्वत्र नदी, नालों, गढ्ढों में पानी एकत्र रहता और सड़ता रहता है, जिससे मच्छर एवं अन्य अनेक प्रजाति के रोगवाहक कीड़े-मकोड़े बहुतायत में पनपते पैदा होते हैं। वर्षाकाल में संचित हुआ पित्त शरद ऋतु में कुपित होता है, जिससे कई तरह की शारीरिक व्याधियाँ पैदा होने की सम्भावना रहती है। अतः इन दिनों ऐसा आहार नहीं लेना चाहिए जो पित्त को कुपित करता हो, जैसे अधिक खट्टे पदार्थ, लाल मिर्च, गरम मसाले, बासी गरिष्ठ भोजन आदि। आहार के साथ विहार रहन-सहन का भी विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए अन्यथा मक्खी-मच्छरों के कारण हैजा, मलेरिया जैसी बीमारियाँ होने की संभावना अधिक रहती है। इस काल में धूप भी अधिक तीव्र रहती है, अतः इससे भी बचा जाना चाहिए।
वर्षाकाल में जिन व्याधियों का सर्वाधिक प्रकोप होता है, वे हैं- सर्दी, जुकाम, खाँसी, मलेरिया, डेंगू फीवर। इसके अतिरिक्त वायु प्रकोप, उदर, विकार, संधिवात, जोड़ों का दर्द, त्वचारोग, फोड़ा-फुंसी खाज-खुजली आदि रोग भी इसी संधिकाल में ज्यादा सताते हैं। इनमें से कुछ के कारण और सरल उपचार इस प्रकार हैं-
सर्दी जुकाम जब मनुष्य को हो तो वह एक प्रकार की पूर्व सूचना होती है कि शरीर में कुछ न कुछ गड़बड़ी अवश्य है और शरीर में कुछ न कुछ विजातीय द्रव्य एकत्र हो गये हैं। इस सम्बन्ध में यदि हमको इस बात का ज्ञान हो जाये कि शरीर में यह विजातीय द्रव्य कैसे एकत्र होते हैं तो सर्दी, जुकाम या किसी प्रकार की शिकायत का कारण तुरन्त समझ जाएँगे। सर्दी, जुकाम के यों तो अनेक कारण हैं परन्तु इनमें से कुछ प्रमुख हैं- अनावश्यक रूप से अधिक भोजन करना, यकायक गर्म स्थान से निकलकर ठण्डे स्थान पर जा पहुँचना, पसीने से लथपथ की स्थिति में नहाना या ठण्डी हवा लग जाना, शुद्ध वायु का न मिलना व दीर्घ साँस न लेना, ठंडी हवाओं के थपेड़े अधिक लगना आदि। इस स्थितियों में श्वास नलिका के प्रारम्भिक भग के ऊपरी हिस्से में विषाणुओं का आक्रमण शीघ्रता से होता है और वे छूत की बीमारी की तरह शरीर में घुसकर नाक और गले की म्यूकस मेम्ब्रेन श्लेष्मा झिल्ली से घिरी कमजोर कोशिका का सफाया कर देती हैं और जुकाम से पीड़ित व्यक्ति की नाक बहने लगती है। आँखें लाल पड़ जाती हैं, छींके आने लगती हैं ओर प्रायः हलका बुखार रहने लगता है। यह स्थिति प्रायः सात-आठ दिन तक बनी रहती है।
सर्दी जुकाम से बचने के लिए यह आवश्यक है कि दिनचर्या और आहार विहार संयमित रहे। इससे पहली बार तो यह बीमारी पास नहीं आएगी और आएगी तो तुरन्त ठीक हो जाएगी। इसके बावजूद भी अगर घर-परिवार में किसी को सर्दी जुकाम हो जाये तो निम्नलिखित औषधियों का क्वाथ बनाकर एक सप्ताह तक सुबह शाम सेवन कराते रहने पर वह व्यक्ति पूर्णतया स्वस्थ हो जाता है। इन्हें तीन रूपों में प्रयुक्त किया जा सकता है-
(1) वासा (अडूसा), कंटकारी भटकटैया) एवं त्रिकटु चूर्ण (सोंठ, पीपल और काली मिर्च तीनों की बराबर मात्रा लेकर कूट-पीस लेने का त्रिकटु चूर्ण बन जाता है)।
(2) हल्दी, तुलसी, भई आँवला और त्रिकटु।
(3) प्रज्ञापेय और त्रिकटु।
उक्त तीनों में से किसी एक मिश्रण का प्रयोग क्वाथ बनाने में किया जाता है। क्वाथ बनाने का सरल तरीका यह है कि सम्बन्धित पदार्थों का एक एक चम्मच मात्रा में लेकर आधा लीटर पानी में डालकर मंद आँच पर उबाला जाए और जब चौथाई पानी शेष रहे तब उसे ठण्डा करके छान लिया जाए। मीठा बनाने के लिए इसमें दो चम्मच शक्कर मिलाई जा सकती है। इस क्वाथ का सुबह, दोपहर, शाम सेवन करने पर न केवल सर्दी, जुकाम से छुटकारा मिल जाता है, वरन् पाचन शक्ति भी सुधरने लगती है। और शरीर में एकत्र विजातीय पदार्थ बाहर निकल जाते हैं। ध्यान देने योग्य विशेष बात यह है कि इस दौरान खट्टे पदार्थ जैसे नीबू, टमाटर, संतरे, आचार, दही आदि एवं ठण्डे पेय पदार्थों का सेवन बिलकुल न किया जाए।
प्रायः सर्दी-जुकाम बुखार में सिर-दर्द बना रहता है। ऋतु प्रभाव, काम का दबाव, तनाव, अपच आदि के कारण भी लोगों को सिर-दर्द की शिकायत रहती है। सिर-दर्द वस्तुतः कोई स्वतंत्र बीमारी नहीं है, वरन् ज्ञान तन्तुओं और मस्तिष्क के बीच चल रहे सामान्य आदान-प्रदान में जब वहाँ अवरोध उत्पन्न होता है तब वहाँ दर्द अनुभव होने लगता है। चूँकि सिर समस्त नाड़ी संस्थानों का विद्युत-संवाहक केन्द्र है, अतः शरीर भर की गड़बड़ियों की शिकायतें वहाँ जमा होने लगती हैं और उस जहाँ तहाँ से एकत्र विषाक्तता का कष्ट सिर को भुगतना पड़ता है और हम सिर दर्द की शिकायत करने लगते हैं। ऐसी स्थिति में दर्द-नाशक दवाएँ एवं विक्स, बाम आदि मरहम आमतौर से प्रयोग में लाए जाते हैं। इनमें सिर-दर्द व सर्दी-जुकाम नाशक मरहम सरलतापूर्वक कोई भी अपने घर पर तैयार कर सकता है। प्रथम है- बाम के समान सिर-दर्द जुकाम नाशक मरहम और दूसरा है विक्स के समान सर्दी-जुकाम नाशक मरहम। इन्हें बनाने में प्रयुक्त होने वाली सामग्री व निर्माण-विधि क्रमशः इस प्रकार हैं-
(1) सिरदर्द-जुकाम नाशक बाम सामग्री- (1) पैराफीन-100 ग्राम (2) पीपरमेण्ट-21 ग्राम (3) कपूर भीमसेनी-1 ग्राम (4) अजवायन फूल, (थाइमोल) 250 मि.ग्रा. (5) मिथाइल सेलीसिलेट 13 मि.ली., (6) तारपीन तेल आधा मि.ली.।
(2) सर्दी-जुकाम नाशक (विक्स के समान)
सामग्री- (1) पैराफीन- 100 ग्रा., (2) पीपरमेण्ट-3 ग्राम, (3) कपूर भीमसेनी-6 ग्राम, (4) अजवायन फूल-100 मि. ग्राम, (5) तारपीन का तेल-6 मि.ली (6) नीलगिरी का तेल (यूक्लिप्टस ऑयल)-2 मि.ली., (7) जायफल का तेल या लौंग का तेल- आधा मि.ली.।
उपरोक्त चीजें घर भी बनायी जा सकती हैं, शान्तिकुञ्ज में भी मार्गदर्शन लिया जा सकता है। इन्हें खरीदते समय यह अवश्य देख लेना चाहिए कि मेडिकल उपयोग वाली व उत्तम क्वालिटी की हो। मेथिल सेलिसिलेट, यूक्लिप्टस आइल (नीलगिरी तेल) आदि तेल लैबोरेटरी, केमिकल बेचने के वालों के यहाँ से प्राप्त किये जा सकते हैं। पैराफीन, तारपीन का तेल, नीलगिरी तेल ऐसा न ले जिसमें मिट्टी तेल या पेट्रोल की गंध आ रही हो। शुद्ध तेलों में तेल की तरह ही चिकनाहट रहता है।
दोनों प्रकार के मरहम बनाने की विधि एक ही है। सर्वप्रथम उपरोक्त दर्शाए अनुपात से उत्तम क्वालिटी का सफेद पैराफीन या मधुमक्खी के छत्ते का मोम लेकर किसी भी स्टील के बर्तन या कार्निंग फ्लास्क में गरम करें। तत्पश्चात् जो मरहम बनाना हो, उसकी आवश्यक चीजें नाप-तोल कर अलग रख लें। कणदार (रवेदार) चीजों को बारीक पीस लें। मेथिल सेलिसिलेट (विन्टरग्रीन), नीलगिरी तेल आदि द्रव पदार्थों की आवश्यक मात्रा काँच या प्लास्टिक की सीरींज से अलग निकाल लें। अब पिघले हुए पैराफीन में सीरींज द्वारा नाप कर रखे हुए द्रव पदार्थ तथा बारीक पीसी हुई अन्य आवश्यक चीजें मिला दें तथा उसके जमने तक चम्मच या काँच की छड़ से हिलाते रहें। जब पैराफीन जमने लगे तो बर्तन को प्राकृतिक ढंग से ठण्डा होने दें। इसे ठण्डा करने के लिए काँच के बर्तन को पानी में कदापि न रखें। जम जाने पर शीशी में भरकर रखे लें।
यह बात ध्यान रहे कि 2 से 6-7 नम्बर तक की चीजें पहले आपस में मिला लें, तत्पश्चात् उसे पिघले हुए पैराफीन में डालें। यदि अधिक मात्रा में बनाना हो तो 100 फ् 3=300 ग्राम पैराफीन और उसी अनुपात से तीन गुना अन्य सामग्री लें। यह विधि किसी भी मरहम बनाने में प्रयोग कर सकते हैं, जैसे-आयोडेक्स के समान गुण वाला दर्द-मोच कर मरहम’ मूव के समान दर्द-नाशक मरहम’, दाद-खुजली का मरहम’ या ‘ व्हाइट फील्ड’ आदि। इन तीनों में प्रयुक्त होने वाली चीजें इस प्रकार हैं-
(1) दर्द-मोच हर मरहम (आयोडेक्स के समान)
सामग्री- (1) पैराफीन- 100 ग्राम, (2) आयोडीन- साढ़े तीन ग्राम, (3) मेथिल सेलिसिलेट- जिसे विंटरग्रीन भी कहते हैं- 6 मि.ली.। पहले आयोडीन मेथिल सेलिसिलेट में घोल लें, फिर पैराफीन में मिलाए ।
(2) दर्द-नाशक मरहम (मूव के समान)
सामग्री- (1) पैराफीन- 100 ग्राम, (2) पिपरमिंट-6 ग्राम (3) विन्टरग्रीन- 19 मि. ली., (4) तारपीन का तेल- 3 मि.ली., (5) नीलगिरी का तेल- 2 मि. ली.। यदि दर्दनाशक मरहम को अधिक स्ट्रांग बनाना हो तो मिथाइल सेलीसिलेट की मात्रा बढ़ाकर 20 मि. ली. एवं पिपरमिंट की मात्रा 10 ग्राम तक कर सकते हैं।
(2) दाद-खुजली का मरहम या व्हाइट फील्ड
सामग्री- (1) एसिटल सेलिसिलिक एसिड-3 ग्राम, (2) बेन्जोइक एसिड-6 ग्राम, (3) पैराफीन- 100 ग्राम ।
इसे यदि और भी अच्छा और प्रभावी बनाना हो तो, निम्न चीजें और मिला सकते हैं- एक ग्राम पैराफीन में एक गोली वेटनीसॉल या वेटनीलॉन अर्थात् 100 ग्राम पैराफीन में 100 गोली। इसके साथ ही क्रेनडिडया (क्लीट्रीमी जोल) गोली-1 ग्राम पैराफीन में 10 मि. ग्राम अर्थात् 100 ग्राम पैराफीन में 100 मि. ग्रा. वाली 100 गोलियाँ। पहले इसे बारीक पीस लिया जाता है, तत्पश्चात् पिघले हुए पैराफीन में मिलाया जाता है।
वर्षा ऋतु में सर्दी-जुकाम के बाद जिस बीमारी से बहुसंख्यक लोग त्रस्त देखे जाते हैं वह है मलेरिया। यह प्लाज्मोडियम वाईवेक्स, प्लाज्मोडियम मेलेरी, प्लाज्मोडियम फेलसीपेरम नामक परोपजीवी जीवाणुओं द्वारा होता है, जिसके वाहक होते हैं क्यूलेक्स एनिफिलीज मादा मच्छर। मच्छर और मलेरिया ने विश्व में मानवजाति के इतिहास में आज तक जितनी जानें ली हैं शायद उतनी मौतें युद्ध और प्राकृतिक विभीषिकाओं से भी नहीं हुई होंगी। मच्छरों को कीटनाशक दवाओं द्वारा मारने के जितने भी प्रयोग और प्रयत्न किये जाते हैं, उनकी प्रजातियाँ उतनी ही अधिक इन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बनती जाती हैं। इसी तरह उनके द्वारा फैलने वाली बीमारियों के जीवाणु-विषाणु भी विभिन्न प्रकार की एलोपैथिक औषधियों एवं एण्टीबायोटिक्स के प्रति प्रतिरोधी क्षमता विकसित करते हुए देखे जाते हैं, ऐसा अनुसंधानरत-चिकित्साविज्ञानियों का निष्कर्ष है। यही कारण है कि मच्छरों द्वारा फैलने वाले मलेरिया के अतिरिक्त डेंगू, फीवर, येलोफीवर, (पीतज्वर), ऐसेफेलाइटिस (दिमागी बुखार), फाइलेरिया जैसी घातक बीमारियाँ तीव्रगति से फैलती जा रहीं हैं। चूँकि ये रोग मच्छरों के काटने से फैलते हैं अतः पहला उपचार मच्छरों से बचाने का करना चाहिए।
मच्छर काटने पर जो ज्वर होता है, आयुर्वेद-शास्त्रों में उसे ‘विषम ज्वर’ (मलेरिया) कहा जाता है। इस संदर्भ में आयुर्वेद ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। भावप्रकाश के शुभारम्भ में ही ग्रन्थकार ने मलेरिया-विषम ज्वर को सब बीमारियाँ का ‘राजा’ बताते हुए कहा है-
‘यतः समस्तरोगाणाँज्वरो राजेति विश्रुतः।”
अर्थात् सम्पूर्ण रोगों में ज्वर को सभी आयुर्विज्ञ ऋषियों ने राजा बताया है। इन ग्रन्थों में मलेरिया के पाँच प्रकार बताये गये हैं, जो लगातार कई-कई दिनों तक भी रहते हैं ओर एक-दो-तीन दिनों के अंतर में भी आते हैं। एलोपैथी चिकित्सा में परीक्षणोपरान्त इनके उपचार के लिए क्लोरोक्विन, प्राइमाक्विन, क्वीनाइन, मफ्लोक्विन और हैलाफेंट्रइन जैसी औषधियाँ प्रयुक्त की जाती है। इनमें से तो कई बहुत महँगी हैं और कुछ एक अपने देश में उपलब्ध भी नहीं हैं। ऐसी स्थिति में आयुर्वेदिक औषधियों का जड़ी-बूटियों का सेवन हानि-रहित भी है, सस्ता और सरल भी। सहज उपलब्धता के कारण वे सब जगी मिल जाती हैं, विशेषकर देहातों और पर्वतीय क्षेत्रों में, जहाँ इनकी भरमार है। इनके सेवन से सभी प्रकार के विषम ज्वरों से छुटकारा पाया और स्वास्थ्य-रक्षा की जा सकती है। कुछ परीक्षित एवं सफल प्रयोग इस प्रकार हैं-
(1) ठण्ड लगकर सर्दी-जुकाम सहित बुखार हो तो निम्न वनौषधियों का क्वाथ बनाकर रोग-पीड़ित व्यक्ति को सुबह-शाम देते रहने पर बुखार उतर जाता है-
वसा (अडूसा), कंटकारी (भटकटैया), त्रिकटु ( सोंठ, पीपल, कालीमिर्च समान मात्रा में पीसकर), गिलोय, शरपुंखा, कालमेघ, सप्तपर्णी तुलसी और हल्दी।
(2) मलेरिया बुखार विशेषकर जब लम्बे समय तक बुखार रहने के कारण लीवर यकृत और स्प्लीन (तिल्ली) बढ़े हो तो निम्नलिखित जड़ी-बूटियों का काढ़ा (क्वाथ) बनाकर रोगी को सुबह-शाम पिलाये ।
चिरायता, कालमेघ, गिलोय, आर्टीमीसिया एनुआ, कुटकी, भुई आँवला, सप्तपर्णी, शरपुंखा सभी की एक-एक चम्मच मात्रा में लेकर क्वाथ बनाकर प्रयुक्त करें।
(3) डेंगू फीवर में- चिरायता, कालमेघ, गिलोय, आर्टीमीसिया एनुआ, कटु, पटोल पत्र कुटकी, सप्तपर्णी, कसौंदी, खदिर, सारिवा, शतावर, अश्वगंधा, कंटकारी इन सभी 15 औषधियों का जौकुट चूर्ण सम मात्रा में लेकर क्वाथ बनाकर पीने से डेंगू ज्वर से पीड़ित व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। इसका सेवन कम से कम 10-15 दिन तक सुबह-शाम अवश्य किया जाये। यह उपचार हानि रहित भी है और सर्वसुलभ व लाभदायक भी।
उपरोक्त सभी वनौषधियाँ पंसारियों की दुकानों, आयुर्वेदिक फार्मेसियों, गायत्री शक्तिपीठों तथा शान्तिकुञ्ज से प्राप्त की जा सकती है। क्वाथ बनाने की सरल विधि यह है कि सम्बन्धित जड़ी-बूटियों का जौकुट चूर्ण समान मात्रा में ( एक-एक चम्मच ) लेकर उसे एक लीटर पानी में किसी स्टील के भगोने या बर्तन में शाम को भिगो दिया जाए। सुबह उसे मन्द आँच पर उबलने दे और पानी चौथाई रह जाये तब उसे उतार कर ठण्डा कर लें और कपड़े से छान लें। इस क्वाथ की दो मात्रा बनाकर एक सुबह और दूसरी शाम को रोगी को कम से कम एक सप्ताह तक पिलानी चाहिए। इससे मलेरिया और डेंगू ज्वर तथा उनसे विषाक्तता समाप्त हो जाती है और पीड़ित व्यक्ति धीरे धीरे पूर्णतया स्वस्थ हो जाता है।
ऊपर की पंक्तियों में वर्षा वर्षा ऋतु और शीत की संधिवेला में उपजने वाली कुछ बीमारियों का सरलतम किन्तु प्रामाणिक व परीक्षित उपचार बताया गया है ताकि नवरात्रि साधना ठीक से की जा सके। अगले अंकों में क्रमशः इसी तरह से ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान-शान्तिकुञ्ज में चल रहे वनौषधि अनुसंधानों से परिजनों को परिचित कराते रहने का प्रयत्न जारी रहेगा।
दुनिया में हर वस्तु की, चेतन पदार्थों व चेतन के घटकों की अपनी-अपनी सीमाएँ हैं। उन्हीं के अंतर्गत वे जाने, समझें और अपनाए जाते हैं। स्थूल बुद्धि इस मामले में विशिष्ट है कि वह सर्वोपरि मानवी सम्पदा है। उसी के निर्णय निष्कर्ष को यहाँ विचारणा, अवधारणा, मान्यता, तर्क, तथ्य के रूप में अपनाना पड़ता है, पर सीमा-बन्धन से वह भी मुक्त नहीं। इस घटनाक्रम के भौतिक कारणों तक ही उसकी गति है। यदि परोक्ष जगत के गुह्य−विज्ञान को समझना हो, तो उसके लिए साधारण बुद्धि और लौकिक ज्ञान से ऊपर उठना पड़ेगा, तभी उसके वास्तविक निमित्त को समझ पाना सम्भव है अन्यथा नहीं। अध्यात्म जगत के घटनाक्रम इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं।
घटना कुलदानन्द ब्रह्मचारी से सम्बन्धित है। बात उन दिनों की है, जिन दिनों वे गया ( बिहार ) के ब्रह्मयोनि पर्वत पर साधना कर रहे थे। छह महीने बीत चुके थे। अचानक एक दिन समाचार मिला कि उनकी माँ गम्भीर रूप से बीमार है। आते समय उन्होंने माँ को वचन दिया कि वे कहीं भी रहें उनके पास पहुँच जाएँगे। इसलिए वचनबद्ध थे। घर छोड़ते समय परिवार वालो को उन्होंने ने यह नहीं बताया था कि कहाँ रहेंगे। ऐसा इसलिए कि हर छोटी-मोटी पारिवारिक परेशानी में उन्हें तंग न किया जाए और उनकी साधना में व्यवधान न पहुँचे, पर प्रस्थान करते वक्त एक पड़ोसी मित्र को सारी बात समझा दी थी और यह भी बता दिया था कि वे कहाँ जा रहे हैं। आज वही मित्र सूचना लेकर आए थे।
वे तत्काल घर के लिए निकल पड़े। समय की कमी को भली−भाँति समझ रहे थे, पर क्या कर सकते थे। सफर पैदल ही तय करना था, कारण की उन दिनों रेल-यातायात की सुविधा न थी। बसें भी यदा-कदा संयोग से ही मिलती थीं। अतएव लगभग एक महीने बाद जब वे घर पहुँचेंगे, तो क्या माँ से मुलाकात हो सकेगी ? यदि नहीं हुई, तो उसका दिल टूटेगा ? क्या वह यह नहीं समझेगी कि बेटे ने धोखा दिया ? ऐसे में क्या उसकी आत्मा को शान्ति मिल सकेगी ? वह यही सोच-सोचकर परेशान हो रहे थे और अपनी धुन में चले जा रहे थे। माँ के एक-एक शब्द उनके कानों में प्रतिध्वनित हो रहे थे। विदाई के समय का दृश्य उनके मन को मथ रहा था। किस प्रकार माँ रो-रोकर उन्हें जाने से रोक रही थी और वह बार-बार आश्वासन दे रहे थे कि यह बिछोह अस्थायी है। वह आएँगे, बीच-बीच उससे मिलते रहेंगे।
इन्हीं विचारों में वे खाये हुए थे मन अपना काम कर रहा था और पैर अपने। वे तेजी से गंतव्य की ओर बढ़े चले जा रहे थे, तभी उनके वस्त्र बगल की कँटीली झाड़ी से उलझ गये। विचार-प्रवाह रुका और छुड़ाने लगे। सहसा सामने की ओर दृष्टि गई। वे चौंके यह तो अपना गाँव प्रतीत हो रहा है ? गाँव का जीर्ण सूर्य मन्दिर ओर उसकी ड्योढ़ी में खड़ी शेर की दो भग्न प्रतिमाएँ। इधर-उधर देखा। सारे दृष्टि उसी की पुष्टि कर रहे थे, पर उनकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि गया से चले अभी एक दिन भी नहीं हुआ, इतनी जल्दी सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय कर ढाका कैसे पहुँच गये। आश्वस्त होने के लिए उससे पूछा तो ज्ञात हुआ कि यह उन्हीं का गाँव ‘पश्चिमपाड़ा’ है। वे विस्मय-विमूढ़ हो गये। उनकी बुद्धि तनिक भी काम नहीं कर रही थी। वे बिलकुल ही समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसा कैसे हो गया?
उनका घर अभी दो किलोमीटर दूर था। माँ का स्मरण आते ही कदम जल्दी बढ़ने लगे। घर पहुँचे, तो देखा माँ अन्तिम साँसें गिन रही है। बेटे को सम्मुख देख उनके नेत्र चमके और आँसू की कुछ बूँदें उनसे ढुलक पड़ी, फिर सदा के लिए आँखें बन्द हो गयी।
इस घटना की चर्चा करते हुए कुलदानन्द कहा करते थे कि हर वस्तु और घटना के दो पहलू हैं- सामान्य और गुह्य। सामान्य पक्ष को साधारण बुद्धि सरलतापूर्वक समझ लेती है, पर दूसरा अत्यन्त गूढ़ और दुरूह होने के कारण समझ से परे होता है। उपरोक्त प्रसंग का विश्लेषण करते हुए वे कहते हैं कि इसमें चलना एक सामान्य सी क्रिया थी। साधारण मेधा उसे भली−भाँति समझती थी कि यह जाने का कार्य किसी विशेष उद्देश्य और स्थान के लिए हो रहा है, पर चलते-चलते अनायास सैंकड़ों किलोमीटर की दूरी पल भर में छलाँग जाना-यह उसका गुह्य विज्ञान है, जिसे साधारण बुद्धि नहीं समझ सकती। इसके लिए ऋतम्भरा-प्रज्ञा स्तर की बुद्धि चाहिए। यह बिना आत्म-परिष्कार के सम्भव नहीं।”
एक अन्य मिलती जुलती घटना बंगाल के प्रसिद्ध साधक किरणचन्द्र दरवेश के साधनात्मक जीवन के सम्बन्ध में है। किरणचन्द्र तब वृन्दावन में अपने गुरु विजयकृष्ण के साथ ‘तीर्थमणि कुँज’ में निवास कर रहे थे। गुरु ने उनकी साधना के लिए एक पृथक् कोठरी की व्यवस्था कर दी थी। उसी में वे प्रतिदिन प्रायः चार घण्टे साधना किया करते। उन दिनों ‘लता साधना’ नामक उनकी एक विशिष्ट साधना चल रही थी। तंत्र शास्त्र में इसका विस्तार पूर्वक उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि इस प्रक्रिया द्वारा काम-शक्ति पर विजय प्राप्त कर सकना सम्भव है।
जिन दिनों का यह प्रसंग है कहते हैं कि उन दिनों संसर्ग दोष के कारण किरणचन्द्र काम-भावना प्रबल हो उठी थी, अस्तु गुरु ने अपने पास बुलाकर उक्त साधना का निर्देश किया। किरणचन्द्र भी काम की प्रबलता से परेशान थे और इससे मुक्ति का उपाय खोज रहे थे। जब उन्हें उपचार बता दिया, तो उसे वे निष्ठापूर्वक नियमित रूप से करने लगे।
एक दिन नित्य की भाँति उन्होंने साधना की। उसके उपरान्त आधे घण्टे का ध्यान का नियम था। उन्होंने आँखें बन्द की और ध्यान करने लगे। अभी वे ध्यान की गहराई में उतर ही रहे थे कि कुछ घुटन अनुभव हुई। तनिक सजग हुए, तो ज्ञात हुआ कि कमरे में जलने वाली धूपबत्ती की सुगन्ध भी गायब है। अनायास आँखें खुल गयी। वे आश्चर्यचकित रह गये। जिस कोठरी में बैठे ध्यान कर रहे थे, उसकी जगह अब कोई गुफा थी। उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। कई बार नेत्र मले, पर वह वास्तव में गुफा ही थी, नेत्रों का कोई भ्रम नहीं। दीवार स्पर्श करके भी इसकी पुष्टि कर ली।
वे आसन से उठ गये और व्याग्रतापूर्वक टहलने लगे। किरणचन्द्र गम्भीर सोच में पड़ गये थे। उनकी बुद्धि यह सोच सोचकर चकरा रही थी कि वे यहाँ किस प्रकार पहुँच गए। चिंता बढ़ती जा रही थी। एक समय तो वे इतने घबरा गये कि स्वयं किरणचन्द्र ही हैं, इस पर भी भरोसा नहीं रहा। तभी उन्हें होश आया कि गुफा के बाहर चलकर देखा जाए। बाहर निकलने पर मालूम हुआ कि वह एक पहाड़ी गुफा है। पहाड़ से नीचे उतरकर मैदानी भाग में आये। पास एक व्यक्ति दिखाई पड़ गया। पूछने पर विदित हुआ कि चह विजयवाड़ा (महाराष्ट्र) है। अब वे और परेशान हुए। हजारों किलोमीटर की दूरी कैसे तय करेंगे ? पैसा पास में है नहीं। पैदल यात्रा के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं। इसके लिए मनोभूमि तैयार करने लगे। लगभग आधे घण्टे पश्चात् जब ते चलने को तैयार हुए, तभी मन में विचार आया कि प्रस्थान करने से पूर्व थोड़ा ध्यान कर लेना चाहिए। वे पुनः गुफा के अंदर बिछे आसन पर पहुँचे और ध्यान करने लगे। इस बार मन बड़ी तेजी से गहराई में उतरता चला गया। थोड़ी ही देर में श्वास प्रवाह की गति एवं आवाज एकदम क्षीण पड़ गयी। यह इस बात की पहचान थी कि साधक ध्यान की गहरी भूमिका में प्रवेश कर गया।
करीब दो घण्टे बाद ध्यान टूटा। नेत्र खुले, तो दृष्टि सामने की ओर उठ गई। एक बार वे फिर चौके कोठरी का दरवाजा है। चारों ओर देखा और आश्वस्त हुए। यह उनका ही कमरा था। चेहरे पर प्रसन्नता और व्यग्रता के मिश्रित भाव थे। प्रसन्न इसलिए थे कि अपनी कोठरी में फिर से वापस आ गये। व्यग्रता का कारण यह था कि आखिर एक अनजाने स्थान में अकस्मात् कैसे पहुँच गए ? जो कुछ इस बीच अनुभव किया, वह वास्तविकता थी या भ्रम? वे तेजी से उठे और विजयकृष्ण गोस्वामी के पास जा पहुँचे। उन्होंने समाधान प्रस्तुत करते हुए कहा कि न तो यह सब भ्रम था, न वह कोई अपरिचित स्थान। वह तुम्हारी पूर्व परिचित भूमि थी- तुम्हारे पिछले जन्म की साधना स्थली। कई बार पुनर्जन्म के स्थानों से गहरा लगाव होने के कारण इस प्रकार की घटनाएँ घट जाती हैं और अनेक बार इसके पीछे ईश्वरीय लीला होती है। तुम्हारे संदर्भ में कारण आकर्षण ही है। समाधान से किरणचन्द्र संतुष्ट हो गये और गुरु को प्रणाम कर चले गए।
विख्यात साधक हरनाथ ठाकुर के बारे में कहा जाता है कि जिन दिनों उनकी साधना उग्र चल रही थी, उन दिनों उनके साथ कई विचित्र घटनाक्रम होने लगे थे। इनका उल्लेख सुरेशचन्द्र चक्रवर्ती ने अपनी पुस्तक ‘पागल की कथा’ में विस्तारपूर्वक किया है। एक प्रसंग की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा है कि एक दिन मध्य रात्रि को जब वे ध्यान कर रहे थे तो अचानक एक अस्फुट सी आवाज सुनाई पड़ी। उन्होंने ध्यान नहीं दिया, किन्तु जब बार-बार सुनाई पड़ने लगी तो आँखें खोली। देखा सामने एक दिव्य पुरुष खड़े हैं। उनका सम्पूर्ण शरीर ज्योतिर्मान था। आँखों से इतना तेज निकल रहा था कि वे उनसे नेत्र न मिला सके। उन्होंने कहा कि इस प्रकार रास्ते में बैठकर ध्यान क्यों कर रहे हो ? आने जाने वालों को इससे असुविधा होती है। तनिक परे हटकर बैठ जाओ। इससे उन्हें भी कठिनाई न होगी और तुम्हारी साधना में भी विक्षेप नहीं आयेगा। इतना कहकर वे आगे बढ़ गये। हरनाथ ठाकुर जैसे सोते से जागे। देखा सचमुच वे एक पगडंडी के मध्य आसन जमाए हुए हैं। उन्हें स्मरण आया कि वे तो कमरे में बैठे हुए थे, फिर यहाँ कैसे आ गए ? यह कौन सा स्थान है ? महापुरुष जा चुके थे, इसलिए उनके प्रश्न अनुत्तरित रह गये। इधर-उधर देखा थोड़ी दूर पर पीछे की ओर एक भव्य मन्दिर था जो स्निग्ध चाँदनी में अत्यन्त मनोहारी लग रहा था। उन्होंने महसूस किया कि यहाँ काफी दूर की चीजें भी एकदम स्पष्ट अपने वास्तविक आकार में दिखती हैं। उससे उन्हें आश्चर्य हुआ, तभी अकस्मात् याद आया कि उन देवपुरुष से जो कुछ भी बात हुई, बैखरी में नहीं वाराणसी में सम्पन्न हुई। शब्दों के उच्चारण की आवश्यकता नहीं पड़ी। चेहरा देखकर ही उनके सारे भाव समझ में आ जाते थे। इस पर भी उन्हें विस्मय हुआ। वे सोचने लगे कि ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था। मन की बात जानने की सामर्थ्य तो उनमें थी नहीं, फिर अचानक यहाँ उसका विकास कैसे हो गया ? अभी यह विचार ही रहे थे कि पक्षियों का एक झुण्ड वहाँ आकर बैठ गया। उन्होंने अनुभव किया कि उनके भाव और विचार भी उनके लिए बोधगम्य थे। अब उनकी समझ में कुछ-कुछ आने लगा कि पृथ्वी से परे कोई अलौकिक स्थान है। वे आसन से उठकर मन्दिर की ओर चल पड़े। वहाँ पहुँचने पर विदित हुआ कि वास्तव में वह जितना समीप दिख रहा था उतना था नहीं। इससे एक ओर तथ्य उजागर हुआ कि वहाँ दूरी सम्बन्धी ज्ञान सामान्य मनुष्य के लिए निर्भ्रान्त नहीं था। सीढ़ियाँ चढ़ कर वह मन्दिर के द्वार तक पहुँचें। स्वर्ण कपाट बन्द थे। वहीं सीढ़ियों पर बैठकर उनके खुलने का इंतजार करने लगे। सीढ़ियाँ श्वेत संगमरमर की बनी थी और उनमें स्थान स्थान पर रत्न जड़े हुए थे। काफी देर तक प्रतीक्षा करने के उपरान्त भी जब द्वार नहीं खुला, तो वे आगे बढ़ गए। थोड़ी दूर पर एक सरोवर था। उसमें अद्भुत लावण्यमयी अप्सराएँ स्नान कर रहीं थी। सामने एक अजनबी को खड़ा देख वे सब चौंक पड़ी, फिर देखते-देखते न जाने कहाँ अदृश्य हो गयी। सम्पूर्ण में कमल खिले हुए थे। वे सब सामान्य आकार-प्रकार के थे, किन्तु सरोवर के मध्य का कमल आकार में असाधारण था, इतना बड़ा जितना सामान्य मन्दिर का गुम्बज होता है। उसकी खुशबू मदोन्मत्त करने वाली थी। हरनाथ नयनाभिराम दृश्यों का रसास्वादन कर रहे थे, तभी आकाश-वाणी हुई- “काफी देर हो चुकी, अब तुम्हें अपना आसन ग्रहण करना चाहिए।” वे मुड़ चले। आसन पर बैठते ही स्वतः आँखें बन्द हो गयी। धीरे-धीरे बाह्य लुप्त होने लगा। जब नेत्र खुले तो स्वयं को कमरे में पाया। आज उनकी कोठरी कमल पुष्प की खुशबू से ओत प्रोत थी, इसे दूसरे लोग भी अनुभव कर रहे थे।
अक्षर ज्ञान प्राप्त करे रहे बालक के लिए पुस्तक पढ़ना कठिन है, समझना तो असम्भव ही होता है। बुद्धि जिस स्तर की होती है, उससे उसी स्तर का काम लेना पड़ता है। भौतिक मेधा अभौतिक कारणों का समाधान नहीं ढूँढ़ सकती। इसके लिए उसका आगे का विकास अनिवार्य है।
अगणित विशेषताओं वाले कम्प्यूटर की तरह ही मनुष्य का मस्तिष्क है। दोनों में सूचनाओं के वृहद् भण्डार हैं। मस्तिष्क अपनी विशिष्ट संरचना के आधार पर संदेशों को ग्रहण-धारण करता है, जबकि कम्प्यूटर आदमी के गुलाम होते और उनकी इच्छानुवर्ती होकर कार्य करते हैं। दोनों में एक मौलिक अन्तर है। कम्प्यूटर की क्षमता सीमित है, जबकि परिष्कृत मस्तिष्क अनन्त सामर्थ्यवान होता है।
इन दिनों मानवी मस्तिष्क के स्थानापन्न के रूप में कम्प्यूटर को स्थान मिला है। इतने पर भी यह नहीं समझा जाना चाहिए कि बुद्धि के संदर्भ में मस्तिष्क की उपयोगिता समाप्त हो गई। सच तो यह है कि ईश्वर निर्मित अंगों की जगह मानव रहित यंत्र नहीं ले सकते। यह ठीक है कि कई मामलों में दोनों का कार्य एक समान होते हैं, तो भी उपकरण को मनुष्य का, उसके अवयवों का ठीक-ठीक विकल्प मानना अनुचित होगा, कारण कि मानव अंग केवल मशीन मात्र नहीं उससे भी अधिक और कुछ है। मनुष्य में भावनाओं और संवेदनाओं की जो सम्पत्ति है, उसके कारण ही उसे सृष्टि का सर्वोपरि प्राणी माना गया है। इन्हें यदि पृथक् कर दिया जाये, तो मनुष्य भी एक चलता-फिरता कठपुतली से अधिक कुछ नहीं रह जाएगा। एक सुविकसित प्राणी होने के कारण ही उसके रोम-रोम और कण-कण में यह विशिष्टता घुली हुई है। विज्ञानवेत्ता इसे कहाँ से लाएँगे ? अपने यंत्रों में उसे किस भाँति विकसित करेंगे ? यदि ऐसा नहीं हो सकता, तो यह दावा रखना गलत है कि यंत्र अंगों के विकल्प बन सकते हैं। वास्तव में इन्हें विकल्प नहीं, सहायक कहना चाहिए। वैज्ञानिकों ने हृदय को संचालित करने वाला यंत्र पेसमेकर मेकर’ बनाया, वृक्क की असफलता को दुरुस्त करने वाला डायलिसिस उपकरण की रचना की, कृत्रिम रक्त पर सम्पूर्ण मनुष्य की नकल यंत्र मानव का विकास किया। यों कहने को तो आदमी ने अपनी प्रतिकृति और बुद्धि की अनुकृति मानव यंत्र कम्प्यूटर के रूप में विकसित कर ली है, पर फिर भी मानव विज्ञान और विराट् सत्ता की कृतियों में तो अन्तर बना ही रहेगा। जड़ बुद्धि भला चेतनवान् मेधा का मुकाबला कैसे कर सकती है। मानवी बुद्धि कोई भी कार्य करने से पूर्व यह बार-बार सोचती है कि उसके कृत्य के परिणाम स्वयं पर, समाज और समय पर क्या होंगे ? यदि वे हानिकारक हुए तो वह उस पर अंकुश लगाती है और लाभकारी होने पर दुगुने तिगुने उत्साह के साथ सम्पन्न करती है। यांत्रिक बुद्धि में यह योग्यता नहीं। उससे स्वतंत्र चिन्तन का अभाव है। वह नीति-अनीति भला-बुरा लाभ-हानि उत्कृष्ट-निकृष्ट का निर्णय कर सकने में असमर्थ है। मानवी बुद्धि में यह समर्थता भाव-संवेदना की फलश्रुति मानी जानी चाहिए। इसलिए मस्तिष्क का कम्प्यूटर से और मानव का यंत्रमानव से तुलना करना गलत होगा। यंत्र सिर्फ निर्देशों का पालन करते हैं, वे भले हैं या बुरे, नैतिक हैं या अनैतिक, इससे उनका कोई सरोकार नहीं है। पिछले दिनों लन्दन में घटी एक घटना से यह बात एकदम स्पष्ट हो जाती है।
हुआ यों कि एक संस्थान में कुछ लड़के लड़कियाँ टाइपराइटिंग कर कर रहे थे। इसी कार्य में एक रोबोट भी नियुक्त था। सभी अपने अपने काम में तल्लीन थे कि अचानक रोबोट अपना काम छोड़कर एक सहकर्मी लड़की की ओर बढ़ने लगा। यह देखकर वह सहम गई और कमरे से बाहर भागी। वह भी उसका पीछा करते हुए बाहर निकला। लड़की उससे बचने के लिए इधर-उधर दौड़ रही थी। रोबोट भी बराबर उसका पीछा कर रहा था। बाद में बड़ी मुश्किल से उसको नियन्त्रित किया गया। कहते हैं कि किसी ने जानबूझ कर उसे गलत सिगनल दिया था। उन दिनों यह घटना चर्चित हुई थी।
ऐसे ही जापान की होण्डा मोटर्स कम्पनी ने एक बार एक ऐसा रोबोट बनाया, जो गाड़ी के पुर्जे बनाने में मनुष्य की सहायता करता था। उसका सहयोगी उसके साथ मिलकर एक दिन पुर्जा बना रहा था कि एक दिन उसे संदेश देने में अचानक एक गलती हो गयी। गलत बटन दबते ही रोबोट की बाँहें तत्काल उठीं और अपने नियन्ता व्यक्ति को एक जोर दार थप्पड़ मारा। यंत्रमानव की फौलादी भुजाओं की मार वह बर्दाश्त नहीं कर सका और थोड़ी ही देर में उसकी मौत हो गयी।
इन घटनाओं के उपरान्त बौद्धिक जगत में यह सवाल उठाए जाने लगे कि क्या सचमुच यांत्रिक बुद्धि को मानव मेधा स्तर का आँका जा सकता है ? क्या केवल क्रियात्मक समानता जैसे किसी एक गुण के आधार पर कोई वस्तु किसी दूसरे के समकक्ष कहलाने का अधिकार प्राप्त कर लेती है ? इन बिन्दुओं पर गम्भीर चिन्तन के पश्चात् इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि समानता का आधार एक पक्षीय नहीं हो सकता। यदि ऐसा होने लगे तो फिर विवेकपूर्ण निर्णय कर पाना असंभव होगा और संसार में नीति, धर्म, गुण, सदाचार की धज्जियाँ उड़ जाएँगी। उदाहरण के लिए आदमी और वनमानुष को लिया जा सकता है। दोनों के आकार-प्रकार लगभग एक जैसे हैं। दोनों को ही ‘बाइपेडल लोकोमोशन’ ( दो पैरों से चलने की क्षमता ) मिला हुआ है। इतने पर भी वनमानुष को मनुष्य नहीं कहा जा सकता है। दोनों में जमीन आसमान का अन्तर है। इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति को उसके बाह्य लिबास, देश-विन्यास और धार्मिक बातों के आधार पर ही आध्यात्मिक मान लिया गया तथा उसके निजी व्यक्तित्व की परख नहीं की गयी तो फिर ऐसे लोग समाज को जिस धार्मिक प्रपंच में धकेलेंगे, वहाँ प्रपंचना और छलना के अतिरिक्त शेष कुछ होगा ही नहीं । ऐसे में धर्म और समाज को जो क्षति पहुँचेगी, वह साधारण नहीं, असाधारण होगी। प्लास्टिक के सजीव से दीखने वाले पौधे कितने ही जीवन्त क्यों न लगे, रहेंगे वे रसहीन और निर्जीव ही। पवित्र गंगाजल और नाले के पानी को सिर्फ जल होने के कारण ही स्तर का नहीं माना जा सकता। गंगाजल का लोग श्रद्धापूर्वक आचमन करते हैं, जबकि नाले के पानी में पैर भी धोना पसन्द नहीं किया जाता । पत्थर गोल है, मात्र इसलिए उसकी शिवलिंग जैसी पूजा होनी चाहिए- यह तर्क निरर्थक है।
यहाँ चर्चा कृत्रिम और नैसर्गिक मानवी बुद्धि के संदर्भ में हो रही है और कहा यह जा रहा है कि समतुल्यता की निशानी आकार अथवा क्रिया की एकरूपता नहीं है, उसमें तद्नुरूप अनुशासन और गरिमा का समुचित समावेश भी अभीष्ट है, तभी यह कहा जा सकेगा कि दोनों वस्तु एक स्तर की एक समान है, अन्यथा नहीं। समान दीखना और समान कहलाना एक बात है और उस जैसा होना सर्वथा दूसरी। कम्प्यूटर और मस्तिष्क के मध्य यही सबसे बड़ा फर्क है। दोनों की क्रिया-प्रणाली एक जैसी हो सकती है, पर कम्प्यूटर कभी मस्तिष्क नहीं बन सकता। मानवी मस्तिष्क का एक प्रमुख गुण समायोजन (एडजस्टमेण्ट) है। उसमें इसकी अद्भुत क्षमता है। कम्प्यूटर इस विशिष्टता से वंचित है। यह सत्य है कि निर्धारित प्रोग्राम के अंतर्गत वह दक्षतापूर्वक काम करता है, पर उससे ऊपर उठकर कुछ विशेष सोच और कर सकना उसके वश की बात नहीं। यही इन दिनों उद्योग जगत के लिए सबसे बड़ी चिन्ता की बात है। जिस पैमाने पर वर्तमान में औद्योगिक प्रतिष्ठान कम्प्यूटरीकृत हुए हैं, उसे देखते हुए क कम्प्यूटर की असमर्थता से उत्पन्न चिन्ता को समझा जा सकता है। कहते हैं कि सन् 2000 की शुरुआत के साथ ही कम्प्यूटर अपनी तारीख पहचान सकने की क्षमता खो बैठेंगे। सब वे बीसवीं सदी और इक्कीसवीं सदी के मध्य भेद नहीं कर सकेंगे । इसका सबसे प्रमुख कारण यह है कि वर्तमान में अधिकाँश कम्प्यूटर प्रणालियों में तारीख क्षेत्र (डेट फील्ड) दो अंकों का है,? जो 19 पर पूर्व निर्धारित है। 31 दिसम्बर सन् 1999 की मध्य रात्रि के पश्चात् यह तारीख क्षेत्र सन् 2000 और 1999 में अन्तर नहीं कर पायेगा। उद्योग क्षेत्र में इसके परिणाम काफी गम्भीर होंगे। विशेषकर वे कम्पनियाँ जो आयात निर्यात में संलग्न हैं अथवा जहाँ कर्मचारियों सम्बन्धी भविष्य निधि, पेंशन जैसे कार्यों का लेखा जोखा रखा जा रहा हो, उन्हें इन कार्यों में मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है और किस प्रकार की दिक्कतें सामने आएँगी इसकी ठीक-ठीक भविष्यवाणी कर सकना तो अभी सम्भव नहीं, पर अनुमान है कि उससे उक्त प्रणाली आँशिक रूप से या पूर्णरूपेण असफल हो जाएगी। इसके अतिरिक्त एक सम्भावना यह भी व्यक्त की जा रही है कि 31 दिसम्बर 1999 की अर्धरात्रि के बाद से कम्प्यूटर आँकड़े ग्रहण करना बन्द कर देंगे। यह तो मात्र अटकलें हैं। वास्तविक स्थिति क्या होगी यह तो समय ही बताएगा।
इसका हल क्या है ? विशेषज्ञों का कहना है कि इसका एकमात्र समाधान यही हो सकता है कि दो अंकों वाले डेट फील्ड को चार अंकों के क्षेत्र में परिवर्तित कर दिया जाए। इस सलाह के साथ वे यह भी कहते हैं कि यह एक जटिल प्रक्रिया है, अतः इसे सरलतापूर्वक सम्पन्न कर सकना कठिन होगा। वे कहते हैं कि यदि प्रोग्रामिंग करते समय अगली सदी का भी ध्यान रखा गया होता तो शायद यह समस्या सामने नहीं आती। अब जैसे ही वैज्ञानिकों को इस समस्या की जानकारी हुई, वैसे ही उन्होंने अपनी भूल का परिमार्जन करना शुरू कर दिया है। अब जो कम्प्यूटर प्रणालियाँ विकसित की जा रहीं हैं, उनमें शताब्दी परिवर्तन के कारण आने वाली तारीख सम्बन्धी अड़चन का पूरा पुरा ध्यान रखा जा रहा है। और इस बात की चेष्टा की जा रही है कि ऐसा कोई सॉफ्टवेयर लगाया जाए जो शताब्दी परिवर्तन से सर्वथा अप्रभावित रहते हुए 1999 की आधी रात्रि के बाद इस महत्वपूर्ण परिवर्तन को पहचान ले और स्वतः ही स्वयं को उसके अनुरूप ढाल ले। यह तो आगे विकसित होने वाली प्रणाली की बात हुई। इससे वर्तमान अवरोध का समाधान थोड़े ही हो जायेगा। वह फिर भी ज्यों का त्यों बना रहेगा, कारण कि इन दिनों विश्वभर में कम्प्यूटर की जितनी प्रणालियाँ अस्तित्व में हैं, उनमें से अधिकाँश का प्रोग्राम इसी शताब्दी को ध्यान में रखकर बनाया गया है, अतः विश्वभर में पुरानी पड़ चुकी इस प्रणाली को बदला जाना ही इसका कारगर उपाय हो सकता है। जल्द ही यदि इसे सम्पादित नहीं किया गया, तो कम्प्यूटरीकृत अधिकाँश कारोबार ठप हो जाएँगे, दुनिया भर में हवाई यातायात अवरुद्ध हो जायेगा और नई सूचना टेक्नोलॉजी की परियोजना को विवश होकर बड़े पैमाने पर निरस्त करना पड़ेगा ।
इससे निपटने के लिए ब्रिटेन ने ‘ईयर 2000 टास्क फोर्स’ बनाया है। इसका मुख्य उद्देश्य सम्पूर्ण विश्व में उक्त संकट के प्रति चेतना उभारना है। जानकारों के अनुसार अभी भी एशिया में 19 प्रतिशत कम्पनियाँ इस गम्भीर समस्या के प्रति लापरवाह बनी हुई हैं। यूरोपीय देशों में 15 प्रतिशत, ब्रिटेन में 92 प्रतिशत तथा अमेरिका में 70 प्रतिशत प्रतिष्ठान आज भी इस दिशा में उपेक्षा बरत रहे हैं, जबकि विपत्ति सिर पर है। इस आकलन के अनुसार इस विश्वस्तरीय परियोजना पर कुल 600 अरब डालर से भी अधिक खर्च होने का अनुमान है। कई मूर्धन्य तो यहाँ तक आशंका व्यक्त करने लगे हैं कि सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के लिए जो राष्ट्रीय बजट है, उसका 30 से लेकर 55 प्रतिशत तक का भाग इस निमित्त खर्च हो जायेगा। जो भी हो इतना सुनिश्चित है कि अब इससे बचा नहीं जा सकता। कम्प्यूटर प्रणाली में परिवर्तन अब अवश्यम्भावी हो गया है।
मस्तिष्क इस मामले में इससे भिन्न है। वह किसी भी बदलाव को तत्काल पहचानता और उसके अनुरूप स्वयं को ढाल लेता है। जड़ कम्प्यूटर और चेतन मस्तिष्क में यही सबसे बड़ा अन्तर है। यह ठीक है कि सामान्य स्थिति में दिमाग वैसी क्षमता का प्रदर्शन नहीं कर पाता किन्तु इतने मात्र से ही यंत्र मस्तिष्क की बराबरी नहीं कर सकते। परिष्कृत स्थिति में यह इतना अद्भुत और असाधारण क्षमतावान् बन जाता है, जिसे किसी भी प्रकार कल्पवृत से कम नहीं आँका जा सकता। जो कल्पतरु हो, उसकी तुलना कृत्रिम बौद्धिकता से करना उसके गौरव को घटाने जैसा है। अतः उचित यही है कि जड़ की तुलना चेतन से न की जाए। जड़ को जड़ की तरह स्वीकार किया जाए और चेतन की महत्ता को उसके अनुरूप गरिमा प्रदान की जाए, तभी हम ब्रेन और बुद्धि को संवेदना शून्य बनने से रोक सकेंगे, इससे कम में नहीं।
अर्थप्रधान इस युग में भौतिक सभ्यता का अन्धानुकरण जिस द्रुतगति से हो रहा है, लोगों का नैतिक पतन भी उसी गति से हो रहा है। भौतिकता की यह भयानक लिप्साएँ चरित्रनिष्ठा, समाज-निष्ठा एवं ईश्वरीय निष्ठा को इस सीमा तक नष्ट भ्रष्ट कर देती हैं कि मनुष्य अनजाने में ही पूरा नास्तिक बन जाता है। अर्थ को प्रधानता देने के कारण ही आज व्यक्ति बहुत अधिक मात्रा में भौतिक साधनों का संचय करने लगा है और ईमानदारी नीति, न्याय तथा धर्म की सीमा छोड़कर अनुचित और असत्य की रेखा में चला जा रहा है। साधन संचय में तीव्र गति से बढ़ते हुए ऐसा व्यक्ति आत्मा परमात्मा से इतनी दूर चला जाता है कि जहाँ पर न तो उसकी आवाज सुनाई देती है और न ही झलक दिखाई देती है। साथ ही ईर्ष्या, छल, कपट, असत्य, एवं अनीति के लोह आवरण उस ज्योति का मार्ग स्वयं ही अवरुद्ध कर देते हैं। पूर्णतया भोगवादी जीवन के परिणाम दुःखदायी ही होते हैं। आध्यात्मिक और भौतिक समृद्धि के सम्मिश्रित मार्ग को अपनाकर ही मानव जीवन का सच्चा आनन्द प्राप्त किया जा सकता है। यही हमारी आर्षपरम्परा रही है और अब इसी राह पर चलने के लिए हमें समुद्यत होना है।
प्रायः यही समझा जाता है कि अर्थ का, भौतिक समृद्धि का अभाव ही व्यक्ति अथवा समाज के पतन का तथा सम्पन्नता- विकास का एकमात्र कारण है। पिछले लम्बे समय से यह परम्परा रही है। मनुष्य जीवन की असंख्य समस्याओं को अर्थ की भाषा में परिभाषित करने एवं समझने के प्रयत्न हुए हैं। विश्व के अधिकाँश मूर्धन्य अर्थशास्त्रियों, विचारकों ने, पूँजीवादियों से लेकर साम्यवादियों तक ने समस्याओं के हल समृद्धि में खोजने का प्रयत्न किया है। अर्थ को अतिरंजित महत्व देने का प्रतिफल यह हुआ कि मानवीय मूल्य एवं उसके आदर्श गौण होते गये और अर्थ-भौतिकता ही सर्वोपरि बनकर रह गया।
अर्थप्रधान एकांगी दृष्टि ने मानवी मूल्यों को किस प्रकार गिराया है, यह तथ्य किसी से आज भी छुपा नहीं है। इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध विचारक वाल्टर रोश्चेनकिश ने अपनी कृति- 'क्रिशिचयानिटी' एण्ड द सोशल साइन्सेज’ में भौतिकवादी दृष्टिकोण की समीक्षा विभिन्न आधारों पर की है। मानवी मूल्यों का ह्रास अर्थ को प्रधानता देने के कारा किस प्रकार हुआ है, इसका उल्लेख उन्होंने इस पुस्तक में विगत शताब्दियों के मृतात्माओं के परस्पर संवाद के रूप में किया है, जो इस प्रकार है-
उन्नीसवीं सदी की मृतात्मा विगत शताब्दियों की मृतात्माओं के पास पहुँची। स्वागत करते हुए उन्होंने उन्नीसवीं सदी की मृतात्मा से कहा- मित्र अब तुम अपनी कहानी कहो। गर्वपूर्वक उन्नीसवीं सदी की आत्मा ने अपनी सफलताओं की कहानी आरम्भ की । उसने कहा- मैंने मनुष्यों प्रकृति पर विजयी बना दिया, उसे पृथ्वी का शासक बना दिया। मैंने मनुष्य के विचारों को उन्मुक्त एवं स्वतंत्र कर दिया है। उसे बुद्धि एवं प्रकृति की असीम शक्ति दे दी, सम्पन्न बना दिया।
विगत शताब्दियों की मृतात्माओं ने उसकी सारी बातें शान्तिपूर्वक सुनी । पूरी कहानी सुनने के बाद मृतात्माओं ने उन्नीसवीं सदी के मृतात्मा से पूछा कि “बताओ, क्या अब भूलोक पर कोई व्यक्ति क्षुधा से पीड़ित नहीं रहा है? क्या समाज में वर्गभेद नहीं रहा? अमीर गरीब के बीच खाई नहीं रही? क्या मनुष्य ने महत्त्वाकाँक्षाओं की पूर्ति हेतु मनुष्यों का शोषण करना बन्द कर दिया? क्या प्रत्येक व्यक्ति संतुष्ट हो रहा है? क्या मनुष्य अपने जीवन लक्ष्य की दिशा में आवश्यक प्रगति कर रहा है?”
इतना सुनते ही उन्नीसवीं सदी की आत्मा का मस्तक लज्जा से झुक गया। इस पर मृतात्माओं ने गम्भीर वाणी में कहा “तब तुम्हारी उद्घोषित सफलता के आने में निश्चय ही अभी विलम्ब है बहुत विलम्ब है।”
अपनी इस पुस्तक में वाल्टर लिखते हैं कि कोई भी समाज अर्थ को, भौतिकवाद को अपना आदर्श बनाकर सभ्य, सुसंस्कृत एवं समुन्नत नहीं बन सकता। उसके समग्र विकास के लिए मानवोचित गुणों को आदर्श के रूप में प्रतिष्ठापित करना होगा और यह कार्य अध्यात्मजीवन आदर्श अपनाने पर ही सम्भव है।
यह एक तथ्य है कि सम्बन्धित कुछ कठिनाइयों के हल में अर्थदृष्टि एवं उसकी उपलब्धियों से यत्किंचित् योगदान भले ही मिला हो पर यह नहीं कहा जा सकता कि जिन देशों ने अपनी आर्थिक गुत्थियाँ सुलझा ली हैं अथवा समृद्ध हो गए हैं, वे समस्याओं से अछूते हैं। पर्यवेक्षण करने पर यह पता चलता है कि उन देशों में, जिन्होंने समृद्धि को सम्पन्नता को ही आदर्श के रूप में अपनाया और अपने प्रयासों के फलस्वरूप उत्साहवर्द्धक सफलता पायी, वे पिछड़े, अविकसित एवं निर्धन समझे जाने वाले राष्ट्रों की तुलना में कहीं अधिक संकटों से ग्रस्त हैं। वे संकट भौतिक साधनों के अभाव में भले ही न हों किन्तु तुलना में कहीं अधिक भयावह हैं। समृद्धि से खुशहाली बढ़नी चाहिए थी किन्तु हुआ उल्टा ही। अधिकाँश समृद्धि देशों में शारीरिक, मानसिक बीमारियाँ से लेकर अपराधों, अनाचारों में असामान्य गति से वृद्धि हुई है। सभी जानते हैं कि सम्पन्न देशों में जिस गति से भौतिक उन्नति हुई है, उसकी तुलना में वहाँ आत्महत्या, भ्रष्टाचार, व्यभिचार जैसी सामाजिक बुराइयाँ भी अधिक पनपी हैं। टूटता हुआ जन-जीवन बढ़ता हुआ पारिवारिक कलह एवं परस्पर एक दूसरे के प्रति अविश्वास, द्वेष, ईर्ष्या, आदि ने गरीबी से उत्पन्न होने वाले संकटों को तुलना में कहीं अधिक समस्याएँ उत्पन्न की हैं। जीवन दर्शन के अभाव में यह एकांगी भौतिक दृष्टि का ही दुष्परिणाम है।
आज विश्व अमेरिका सम्पन्नता, भोगवाद एवं भौतिक साधनों का सर्वोच्च निदर्शन बना हुआ है। उस देश में प्रचुर धन-सम्पत्ति है। अगणित उद्योग विशालकाय कल-कारखाने तथा वैभव की असीम चकाचौंध है। आदमी का सब काम रोबोट जैसा यंत्र करते हैं और हर द्वार पर एक महँगी गाड़ी खड़ी मिलती है। होटल, रेस्तराँ, सिनेमा, पार्क, नाचघर, जुआघर, नाटकशाला तथा प्रमोद स्थलों की भरमार है। हर व्यक्ति की आय, व्यय कहीं अधिक है। ऐसा लगता है कि संसार के सारे साधन, सारी सामग्री और सारी लक्ष्मी अमेरिका में ही सिमट कर आ गयी है। किन्तु इस सम्पन्नता की स्थिति में वहाँ का जन-जीवन कितना अतृप्त, कितना अशाँत, कितना व्यग्र, कितना व्यस्त और कितना बोझिल है, इसका अनुमान वहाँ प्रतिवर्ष होने वाले अपराधों और आत्महत्याओं की रोमांचकारी संख्या से लगाया जा सकता है। मात्र आर्थिक सम्पन्नता एवं भौतिकवाद मनुष्य जीवन के लिए कितना बड़ा अभिशाप है, समृद्धि राष्ट्र इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है।
अर्थ- अर्थात् भौतिक सम्पन्नता आवश्यक है और उपयोगी भी शरीर-निर्वाह एवं उसके सुसंचालन में उसकी महानता से इंकार नहीं किया जा सकता। अतः उसकी प्राप्ति के लिए प्रयास चलते हैं और चलने भी चाहिए। परन्तु इन्हें साधन की सीमा में ही रहने देना चाहिए था। साध्य के रूप में मानवीय आदर्श के स्थान पर प्रतिष्ठापित कर देने से वह अनेक प्रकार के संकट खड़े कर रहा है। इतिहास की आधिभौतिक व्याख्या का अर्थ यह नहीं है कि समग्र जीवन को ही अर्थ में रखा जाए, वरन् यह है कि अर्थ को जीवन का आवश्यक अंग मानकर उसकी विवेचना की जाए।
साम्यवाद के जन्मदाता कार्लमार्क्स के अर्थदर्शन को समझने में यही भूल हुई और वर्तमान में भी हो रही है। उन्होंने अपने सिद्धान्तों में मात्र अर्थ के पहलू एवं उससे उत्पन्न होने वाली अव्यवस्थाओं की विवेचना की है, न कि समग्र जीवन की। अतएव सम्पूर्ण मनुष्य जीवन एवं सम्बन्धित कठिनाईयाँ को अर्थ की भाषा में परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए। मार्क्स ने समाज अथवा शासन व्यवस्था के स्वरूप को निश्चित करने के लिए जीव एवं ईश्वर के प्रश्न से अपने को अलग रखा तथा उन पक्षों की विवेचना की जो अर्थ से सीधे सम्बन्धित थे। भूल यह हुई कि धन-सम्पदा को ही सब कुछ मान लिया गया और उसे जीवन-दर्शन के रूप में अपना लिया गया।
इस संदर्भ में ख्यातिप्राप्त विचारक सेलिमेन ने अपनी पुस्तक ‘इकोनामिक इन्टरप्रिटेशन ऑफ हिस्ट्री” में लिखा है कि इतिहास की आर्थिक व्याख्या का अर्थ यह है कि इतिहास की आर्थिक व्याख्या का अर्थ यह नहीं है कि समस्त इतिहास को ही अर्थशास्त्र की परिभाषा में व्यक्त किया जाए, अपितु मात्र इतना है कि समाज में भौतिक परिवर्तन हुआ करते हैं और उनमें अर्थ की भी प्रधान भूमिका होती है।
निश्चय ही मनुष्य जीवन की व्याख्या अन्य सब बातों की अपेक्षा करके अर्थ के शब्द में करना एकांगी एवं अविवेकपूर्ण दृष्टि का परिचायक है। मनुष्य जड़ नहीं चेतना है। यदि उसके स्वरूप क्रियाकलाप, विचारणा का एवं भावना की महानता पर विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि अर्थ के अतिरिक्त भी उनके पक्ष हैं जो कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। चेतना अधिक धन से नहीं, उदात्त विचारणा तथा भावसंवेदनाओं से तुष्ट एवं पुष्ट होती है। इसके स्वरूप पर ध्यान जाते ही यह पता लगता है कि अर्थ रूपी आदर्श पर खड़ी मानव जाति एवं भौंड़े साँचे में ढली सभ्यता का स्वरूप त्रुटिपूर्ण है।
मूर्धन्य विचारकों का कहना है कि जहाँ आज की तुलना में पूर्व काल में भौतिक साधनों का इतना बाहुल्य नहीं था वहाँ तब इस संसार में इतने दुःखों, दोषों, द्वन्द्वों तथा द्वेषों के साथ रोग-शोक एवं कष्ट संतापों का बाहुल्य नहीं था। आज जैसे अभाव, असंतोष, अल्पता, असहिष्णुता, अहंकार, अबोधता, असत्य, अनाचार, शोषण, छल-कपट छीना-झपटी स्वार्थ एवं संकीर्णता का बोलबाला पूर्वकाल में रहा है’- इसके प्रमाण भी उपलब्ध नहीं होते। भौतिक साधनों एवं धन का प्रचुरता के बीच भी मनुष्य का जीवन आज जितना अशाँत एवं अभावग्रस्त है उतना पहले कभी नहीं रहा साधनों की न्यूनता एवं अल्पता में भी लोग आज की अपेक्षा कहीं अधिक प्रसन्न पुष्ट एवं सुखी थे।
इस विपर्यय या विरोधाभास का क्या कारण हो सकता है? इसका कारण यही है कि मनुष्य ज्यों ज्यों अर्थ को, भौतिकता को प्रमुखता देकर बाह्य साधनों की दासता स्वीकार करता गया, त्यों त्यों उसका चारित्रिक, नैतिक एवं मानसिक पतन होता चला गया। वह सहज मानवीय गुणों से रिक्त होकर मशीन बनाता चला गया। वह उदारता, प्रेम, सहृदयता जैसा मानवीय सद्गुणों के प्रति निरन्तर संकीर्ण एवं स्वार्थी लोभी और लोलुप बन गया है। इस प्रकार की दूषित मनःस्थिति में सुख-संतोष तथा हंसी-खुशी की सम्भावना हो भी किस प्रकार सकती है। आज जहाँ ओर राजनैतिक, सामरिक, शैक्षणिक, सामाजिक तथा औद्योगिक प्रगति की ओर शक्तियों तथा साधनों को केन्द्रित किया जा रहा हैं, वहाँ मानसिक तथा भावनात्मक क्षेत्र की सर्वथा अपेक्षा की जा रही है। आन्तरिक विकास, मनोन्नति अथवा अन्तःकरण की पवित्रता की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। भौतिक तथा औद्योगिक अथवा आर्थिक योजनाओं को जितना महत्व दिया जा रहा है। यदि उसका कुछ अंश मनोविकास तथा आत्मोन्नति की ओर दिया जाने लगे तो कोई कारण नहीं कि मानव समाज के ऊपर मंडरा रही आज अगणित समस्याओं का समाधान न हो सके।
आर्षपरम्परा में जीवन के चार प्रयोजन बताए गए हैं- जिनमें एक अर्थ भी है। उसे उतना ही महत्व दिया गया जितना की शरीर निर्वाह के लिए आवश्यक है। ईशोपनिषद के ऋषि निर्देश करते हैं- “तेन त्यक्तेन भुञजीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्।” अर्थात् धन कमाओ, यह शाश्वत सहचर नहीं, अतः निर्लिप्त रहो।
जीवन के अनन्य तीन प्रयोजन माने गये हैं जो अर्थ की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। धर्म, काम और मोक्ष। ‘धर्म’ अंतः विकास का साधन था। काम चेतना की कलात्मक वृत्ति थी। जड़ चेतन में क्रीड़ा कल्लोल कर रही चेतना के दिग्दर्शन से आनन्दित होने की प्रवृत्ति को ‘काम माना जाता है ‘मोक्ष’ को परम लक्ष्य कहा गया है। वहाँ तक पहुँचने के लिए मनुष्य को अन्य तीनों को साथ लेकर चलना होता है। संतुलन इसी से बनता है। इस समग्र जीवन-दर्शन को अपनाने की ही परिणति थी, अतीत की स्वर्गीय परिस्थितियाँ एवं देवतुल्य मानव की गौरवास्पद उपलब्धियाँ।
उन परिस्थितियों के नव निर्माण के लिए अर्थ एवं भौतिकता को ही नहीं, अंतरंग को विकसित करने वाले अध्यात्मिक पक्ष को भी उतना महत्व देना होगा अन्यथा एकांगी अर्थदृष्टि एवं तद्नुरूप भौतिक प्रगति मानवीय विकास की सम्भावनाओं को अवरुद्ध ही करेंगे और समग्र जीवन दृष्टि के अभाव में अनेकों प्रकार की समस्याएँ ही खड़ी होंगी। भौतिक आवश्यकताओं के साथ आध्यात्मिक आस्था ही जीवन को सुखी समुन्नत एवं शान्त बना सकती है।
(सितम्बर, 1973 में शान्तिकुञ्ज परिसर में दिए गये उद्बोधन का अविरल अंश) - (पूर्वार्द्ध)
गायत्री महामंत्र हमारे साथ साथ
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियों, भाइयों । ईश पूजन की आवश्यकता के बारे में मैं आपको हमेशा से कहता और बताता चला आ रहा हूँ । पूजा की आवश्यकता हमेशा पड़ेगी ओर पग-पग पर पड़ती रहेगी। पूजा के खिलाफ मुसलमान सबसे ज्यादा हैं। मुसलमान सर्वप्रथम जब हिन्दुस्तान में आये और हिन्दुस्तान में आकर उन्होंने मन्दिरों को तहस नहस कर डाला। सोमनाथ के मन्दिर को तोड़-फोड़ कर उन्होंने फेंक दिया। श्री रामचन्द्रजी का मन्दिर अयोध्या में बना हुआ था, उसे भी तोड़-फोड़ कर फेंक दिया। कृष्ण भगवान का मन्दिर मथुरा में बना हुआ था, तोड़-फोड़ कर फेंक दिया। उनका ख्याल था कि व्यक्ति को मूर्ति पूजा नहीं करनी चाहिए। उनका ये ख्याल था कि पृथ्वी को हम मन्दिर विहीन कर देंगे। अंत तक मूर्ति-पूजा न करने की बात पर वे कायम रहे। मक्काशरीफ में आप जाइए, वहाँ एक ‘संगे अवसद’ नाम का पत्थर रखा हुआ है। वह काले रंग का है। जो कोई भी मुसलमान काबा में जाता है, मक्का मदीना में जाता है, हज करने के लिए, तो उसको पत्थर के सामने इजरा करना होता है और बोसा लेना पड़ता है, चुम्बन लेना पड़ता है। अगर चुम्बन नहीं लिया, बोसा नहीं लिया, उस काले रंग के पत्थर का तो, उनकी हज यात्रा निरर्थक हो जायेगी। वह जो उनकी इबादत है ओर हज है वह खत्म हो जाएगी। यह क्या बात हो गयी ? हमने भी अपने गोल मटोल शंकर जी बनाये थे और शालिग्राम जी बनाए थे, उन्होंने चौड़ा वाला पत्थर बना दिया। मूर्ति पूजा से पिण्ड कहाँ छूटा? किसी का भी नहीं छूट सकता। मूर्ति-पूजा की खिलाफत आर्य समाज वाले भी करते हैं। आर्य समाज वाले मूर्ति-पूजा को नहीं मानते, लेकिन उनके यहाँ भी स्वामी दयानन्द की मूर्ति लगी हुई है। स्वामी दयानन्द की मूर्ति को उतार कर हम यदि उसका अपमान करने लगे तो क्या किसी आर्य समाज को यह अच्छा लगेगा ? जबान से भले ही न कहे, लेकिन बाद में बहुत गालियाँ देगा और लड़ने आयेगा और कहेगा कि आपने हमारे स्वामी जी का क्यों अपमान किया ? उनकी फोटोग्राफ या तस्वीर अगर हम ले आये और उनका अपमान करने लगे तो क्या कोई आर्य समाजी बर्दाश्त करेगा ? नहीं करेगा, उसको बहुत बुरा लगेगा। उसके चेहरे से आप देख सकते हैं।
यह क्या हो गया ? यह प्रतीक पूजा हो गयी- कम्यूनिस्ट पार्टी वाले इस बात को नहीं मानते कि कोई भगवान है और कोई पूजा है और कोई मन्दिर होना चाहिए। वे भगवान की बात पर यकीन नहीं करते और मूर्ति-पूजा को नहीं मानते, लेकिन उनका लाल झण्डा क्या है ? लाल झण्डे को अगर हम उनके सामने जलाएँ तो वह कम्यूनिस्ट हमसे लड़ने आएँगे ओर यह कहेंगे कि आपने हमारा लाल झण्डा क्यों जला दिया ? भाई वह तुम्हारा कौन था, हमने अपने पैसे देकर खरीदा था। हमने इसे वहाँ लगाया था। हमने दियासलाई लगा दी। हमने इसका अपमान कर दिया, फिर तुम्हें इससे क्या शिकायत ? तुम्हें इससे क्या लेना देना ? वाह! लेना-देना क्यों नहीं ? यह अन्तर्राष्ट्रीय कम्यूनिस्ट पार्टी का झंडा है, आपने इसे जला दिया और खाक कर दिया। कम्यूनिस्ट हमसे लड़े बिना नहीं रहेंगे। और राष्ट्रीय विचार धारा के लोग काँग्रेस के लोग जिन्होंने झण्डे के लिए कितनी ज्यादा कुर्बानियाँ दी, बलिदान दिया। उन दिनों पटना के हाईकोर्ट के ऊपर विद्यार्थी झण्डा लगाने के लिए जा रहे थे। और गवर्नमेंट ने मना किया और कर्फ्यू लगाया और कहा आपको नहीं जाना चाहिए। विद्यार्थी नहीं माने उन्होंने कहा-हमारे देश का झण्डा हाईकोर्ट पर अवश्य फहराया जायेगा। विद्यार्थी चले जा रहे थे। सिपाहियों ने कहा अच्छा आप जायेंगे, तो हम गोलियों से भून देंगे। उन्होंने कहा आप गोलियों से भून दीजिए। वे सात विद्यार्थी थे, पटना में मारे गये और जिनका अभी भी स्मारक बना हुआ है झण्डे के लिए। झण्डे से क्या फायदा ? झण्डा तो एक रुपये का था, बारह आने का था और जान कितनी कीमती थी ? झण्डे के लिए उसने क्यों खर्च कर डाला ? झण्डे के लिए क्यों आपने नुकसान उठाया, कष्ट उठाया ? झण्डे की बात नहीं है। उसके पीछे जो भावनाएँ जुड़ी हुई हैं, जो हमारे प्रतीक जुड़े हुए हैं, वे बड़े कीमती हैं।
हमारी मूर्तियाँ जो हमारे मन्दिरों में स्थापित है, गीता की पुस्तक और भागवत् की पुस्तक जिनको हम सिर पर रखकर जुलूस निकालते हैं और गुरु ग्रन्थ साहब, जिसके सामने हम मत्था टेकते हैं, वेद की पुस्तक जिनका हम जुलूस निकालते हैं- ये सब हमारे प्रतीक पूजन हैं और प्रतीक पूजन बड़ा आवश्यक है। मैं तो प्रतीक-पूजन की हिमायत करता रहा हूँ। प्रतीकों की स्थापना मैंने जिन्दगी भर की है। गायत्री तपोभूमि पर भी की। गायत्री माता वहाँ विद्यमान् हैं और यहाँ पर गायत्री स्थापित हैं। अखण्ड ज्योति कार्यालय में जहाँ हम रहते थे, वहाँ भी दीपक के रूप में गायत्री माता की फोटोग्राफ और तस्वीर के रूप में हमारा प्रतीक स्थापित है, पर मैं कई बार इन चीजों के बारे में आपको बुरा भला कहता हूँ। यह क्यों कहता हूँ ? प्रतीकों का कई बार मजाक उड़ाता हूँ क्यों ? प्रतीकों का मजाक मैं इसलिए उड़ता हूँ कि प्रतीकों के बारे में मैं बार-बार गरम बात इसलिए कहने लगता हूँ कि आपने प्रतीक को सबकुछ मान लिया है। प्रतीक ही सबकुछ नहीं है। वे रेलवे लाइन पर खड़े हुए सिगनल की तरीके से है जो हमको यह बताते हैं कि हमको कहाँ चलना चाहिए और कहाँ जाना चाहिए। मूर्ति को आप मानकर चलेंगे कि ये सब सामर्थ्यवान हैं और ये सर्वसमर्थ हैं तो हम नाराज होंगे। तब हम आपसे कहेंगे कि यह गीता की पुस्तक की तरीके से हैं। श्रीकृष्ण भगवान का ज्ञान जो उन्होंने अर्जुन को दिया था, उस सारे के सारे ज्ञान को हमने कैद कर रखा है- पकड़ करके रखा है, ढाई आने वाली किताब में, जिसे गीता की किताब कहते हैं। गीता की पुस्तक में तो ज्ञान भरा हुआ है परन्तु अगर आप ये कहेंगे कि नहीं साहब, हमको ज्ञान से क्या लेना देना है। हम तो इसी पुस्तक की आरती उतारेंगे, इसी को हम जय बोलेंगे, इसी की हम कल्पना करेंगे, इसी को हम दीपक दिखायेंगे। वह जो श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को ज्ञान बताया था उससे हम कोई ताल्लुक नहीं रखेंगे, तो मैं आपसे नाराज होऊँगा ओर यह कहूँगा कि आपने अपनी गीता का मूल्य नहीं समझा, महत्व नहीं समझा। आप तो खिलौने के पत्थर न जाने किन-किन बातों को लेने लगे। मैं हमेशा यह चाहता रहा हूँ कि मेरे समझाने का मतलब आपकी समझ में आना चाहिए। जब आप यह कहेंगे कि हम इसको सब कुछ मानते हैं कि बद्रीनारायण वाले श्रीकृष्ण भगवान बड़े जबरदस्त हैं। उन्हीं को लेकर हम बैकुण्ठ को चले जायेंगे ओर वहाँ जो वृन्दावन में रहते हैं, वह निकम्मे है, बेकार हैं, उनमें कोई ताकत नहीं है। बद्रीनारायण वाले भगवान में बड़ी ताकत है तो मैं नाराज होऊँगा और कहूँगा आप मूर्ति पूजा का महत्व नहीं जानते, रहस्य नहीं जानते। जहाँ कहीं भी बद्रीनारायण, जहाँ कहीं भी श्रीकृष्ण भगवान हैं चाहे वह आपके मकान पर रखें हुए हों, चाहे बद्रीनाथ, चाहे वृन्दावन में रखे हुए हो, कहीं भी रखे हुए हों, आप ये मत कहिए कि वृन्दावन वाला जबरदस्त है श्रीकृष्ण भगवान और मथुरा वाला कमजोर है। ये बात आप कहेंगे तो मैं नाराज होऊँगा। मूर्तियाँ सारी की सारी जहाँ कहीं भी रखी हैं वे भगवान के रूप की- श्रीकृष्ण की याद दिलाती हैं, बस काम खत्म हो जाता है।
मूर्तियों में आप ताकत बताने तो क्या हो जायेगा। तब ये बुत-परस्ती हो जाएगी। मोहम्मद साहब ने बुतपरस्ती के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था। पूजा को तो कोई भी मना नहीं कर सकता। मोहम्मद साहब तो क्या कोई भी मना नहीं कर सकता। लेकिन बुतपरस्ती मो सभी मना करते हैं।
बुतपरस्ती क्या थी ? पहले एक गाँव का एक बुत होता था और बद्दू लोग, डाकू लोग जहाँ कहीं भी चले जाते थे और छाया मारते थे, पुराने जमाने में सोना-चाँदी तो था नहीं, नोट थे नहीं। अनाज था, जानवर था, भेड़ बकरियाँ थीं और मोटे हट्टे कट्टे जवान आदमी थे और स्त्रियाँ थी। इन्हीं को ये लोग लेकर भाग जाते थे उस जमाने में यही दौलत थी। किसी की जवान छोकरी देखी, औरत देखी बस उसको लेकर डाकू चल दिये। जो कोई मोटा आदमी देखा, मजबूत आदमी देखा उसको लेकर चल दिए और बोले हमारा यह काम करो वह काम करो। गुलाम बना लेते थे उन लोगों को। पुराने जमाने का रिवाज यही था। पुराने जमाने के बद्दू लोग, जहाँ पर मोहम्मद साहब पैदा हुए थे, बहुत सी औरत को ले आते थे किसी के पास सव औरतें भी थीं, किसी के पास 250 औरतें थी, उनके बच्चे पैदा होते थे। बच्चों का क्या होगा ? औरतों का तो यह भी है कि कुछ खेती-बाड़ी में काम आ सकती हैं, कुछ मेहनत-मशक्कत कर सकती हैं। बच्चों तो खामख्वाह तंग करेंगे। उनका क्या होगा ? बच्चों के लिए मकान कहाँ से आएगा ? बच्चों के लिए दूध कहाँ से आएगा ? तब ऐसा हुआ करता था कि साल भर में एक दिन ऐसा आता था कि जिसके पास जितने बच्चों होते जरूरी वाले दो-चार बच्चों रख लिए जाते थे और बाकी बच्चों मूर्ति के समान उसे समर्पित कर दिये जाते थे जितने ज्यादा बच्चों दिये जाएँगे, उतना ज्यादा बुत प्रसन्न रहेगा और आशीर्वाद देगा और सब काम कर देगा। जितने कम बच्चों बुत को दिये जायेंगे, उतना ही उस गाँव का बुत नाखुश हो जाएगा, उतनी ही बीमारी फैला देगा और नुकसान कर देगा। इसलिए गाँव में एक कम्पटीशन होता था और हर गाँव का बुत अलग-अलग होता था। इस गाँव का अलग, उस गाँव का अलग। हर गाँव का अलग ‘बुत’ होता था। उन बुतों में लड़ाई होती थी। एक गाँव वाले अपने बुत से कहते थे कि तू उस गाँव वालों से लड़ाई लड़, तो दूसरे गाँव वाले इसी तरह अपने बुत से कहते थे। इस तरह गाँव-गाँव में बुत भरे हुए थे।
मोहम्मद साहब जब पैदा हुए तब उन्होंने कहा कि यह बड़ी वाहियात बात है। तुम लोग अलग-अलग बुत मानते हो पर खुदा तो एक है। इतने सारे खुदा कैसे हो सकते हैं? गाँव- गाँव का खुदा भी कहीं हो सकता है। यह आपने क्या वहम पाल रखा है। बच्चों को ‘जिबह’ (जो बाधित किया गया हो ) नहीं करना चाहिए। वाह! बच्चों का जिबह नहीं करेंगे तो हमारा बुत खायेगा क्या? अच्छा तो एक काम करो बकरी को मार डालो। ऊँट को ‘जिबह’ कर लो। गाय को जिबह कर लो। कई बच्चों को मारो मत। ठीक बात है। मोहम्मद साहब ने अपने ढंग से स्वयं काम कर दिया था। उस जमाने में मोहम्मद साहब बुतपरस्ती के खिलाफ थे। वह और किसी तरह की बुतपरस्ती थी। हमारे आपके जैसा नहीं। वह की कैसे खिलाफत कर सकते थे मूर्ति-पूजा का कोई खण्डन नहीं कर सकता। मूर्ति-पूजा दुनिया में रही है और रहेगी। लेकिन मूर्ति-पूजा के हम खिलाफ होंगे, मूर्ति-पूजा से हम इनकार करेंगे और मूर्ति-पूजा के लिए आपके वहम को हटाएँगे, दुनिया से वहम हटाएँगे और आपकी श्रद्धा को हिलाएँगे। कब ? जब आप यह ख्याल करने लगेंगे कि जो पत्थर अमुक जगह पर रखा हुआ है वह बड़ा ताकतवर है। उसके ऊपर आप कपड़ा पहना देंगे और उस पर छत्र चढ़ा देंगे तो वह आपका अमुक काम बना देगा, तमुक काम बना देगा। ये वाहियात बातें आप करेंगे तो मैं नाखुश होऊँगा। यह कहिए कि ये बातें आपके समझ में नहीं आती। इसके पीछे जो किस्सा है, वजह है, वह है कि ये सारी की सारी चीजें यह याद दिलाने के लिए हैं कि सर्वशक्तिमान् ईश्वर सबके भीतर समाया हुआ है। श्रीकृष्ण भगवान के मन्दिर में जरूर जायेंगे और वहाँ सिर झुकायेंगे और सिजदा करेंगे, प्रणाम करेंगे। लेकिन वह हमारा प्रणाम उस पत्थर के लिए नहीं है। हमारा प्रणाम उनके लिए हैं जो आज से 5000 वर्ष पूर्व भगवान जी आये थे, जो दुनिया में नयी धारा और नये विचार मनुष्य को देकर चले गये थे। हम उस मूर्ति का ध्यान करते हैं, सिजदा करते हैं। हमारा ईमान और हमारी निष्ठा वहाँ रहती है। उन्हीं कृष्ण के ऊपर जो सारे विश्व में समाये हैं और सब जगह समाये हुए है। मूर्ति पूजा के बारे में, प्रतीक-पूजा के बारे में बार-बार आपके मन को कच्चा कर देता हूँ। बार-बार आपकी निष्ठा को डिगा देता हूँ। मेरी बात को समझिए, मेरी बात को समझने की कोशिश कीजिए कि क्या कहता हूँ। मैं यह कहता रहूँगा कि प्रतिमा को आप पूरा मान देंगे तो बात बनेगी नहीं। राष्ट्रीय झण्डा हमारे घर में लगा हुआ। तिरंगा झण्डा हमारे घर में लगा हुआ है, तो इस बात का द्योतक है कि हम सबसे बड़े देशभक्त हैं। आप देशभक्त हैं- तो हिन्दुस्तान में छाई मुसीबतों और असुविधाओं से आपको पीड़ा होती है क्या ? नहीं साहब, हमको क्या पीड़ा होगी। आप अपने घर में अपनी खुशहाली में हिस्सा बंटाते हैं ? नहीं साहब हम क्यों हिस्सा बंटाएंगे। हम तो देशभक्त हैं। देशभक्त क्यों हैं ? देखिए हमारे घर में तिरंगा झण्डा लगा हुआ है। तिरंगा झण्डा इस बात का प्रतीक था कि हमारे मन में देशभक्ति का जागरण होना चाहिए। मित्रों, मूर्तियाँ इस बात की प्रतीक हैं कि हम उन भावनाओं को, जिनको हम बार-बार भूल जाते हैं और जो बातें हमारी दिमाग में से निकल जाती है, हमारे ख्यालों में से निकल जाती है, उन्हें हम अपने ख्यालों में जगाइए । जो बातें श्रीकृष्ण भगवान जी के साथ जुड़ी हुई हैं, जो बातें भगवान श्री रामचन्द्र जी के साथ जुड़ी हुई हैं, जो बातें गणेश जी के साथ जुड़ी हुई हैं, जो देवी के साथ में जुड़ी हुई हैं, वह खयालात, वह विचार धारा, वह प्रेरणा और वह प्रकाश, वह सारी की सारी चीजें इन मूर्तियों को देखकर हमारे मन में उठेंगी। अगर वह मूर्तियाँ और वह प्रतीक हमारे मन में भावना को उठाएँगे तो हम उनका स्वागत करेंगे। उनके आगे प्रणाम करेंगे। उनकी उपयोगिता को स्वीकार करेंगे और गाँव-गाँव उनके मन्दिर बनाएँगे । उनकी जय बोलेंगे। लेकिन अगर लोग इस वहम में घुसते चले जाएँगे कि जो कुछ भी है ये मूर्ति का, पत्थर का टुकड़ा ही सब कुछ है। लेकिन इस शर्म से जब आपको कुछ भी नहीं मिलेगा तो आप ये कहने लगेंगे ये सब बेकार हैं, तब हम आपको अज्ञानी बताएँगे और फिर हम आपसे नाराज होंगे और आपके अज्ञान को उखाड़ने की कोशिश करेंगे और आपसे कहेंगे कि आप ये क्या करते हैं गड़बड़। जो चीज जिस काम के लिए बनायी गयी है, उस उद्देश्य पर आप ध्यान दीजिए, उस काम की महत्ता को समझिए।
मित्रों, प्रतीक हमारे माध्यम हैं और माध्यम केवल इसलिए है कि उनके साथ में जो मूल प्रेरणा और मूल प्रकृति जुड़ी हुई है उसके सम्बन्ध में हम जानकार हैं और उसको अपने हृदय में स्थान देने की कोशिश करें। न केवल हृदय में स्थान देने की कोशिश करें, बल्कि अपने जीवन का एक हिस्सा बना लें। ये है प्रतीक पूजा का आदर्श और प्रतीक-पूजा का उद्देश्य। हमने आपसे यही कहा था। अब हम गायत्री माँ का प्रतीक घर-घर में स्थापित करना चाहतें हैं और हम आदमी के दिमाग में इस बात की प्रेरणा स्थापित करना चाहते हैं कि हमको मनुष्यता का अनुयायी होना चाहिए और हमको नारी जाति के प्रति निष्ठावान् और श्रद्धावान होना चाहिए। मानवता के प्रति निष्ठावान् और श्रद्धावान होना चाहिए। ये सारे के सारे “सिम्बोल” हमारे इस गायत्री माता के साथ जुड़े हुए हैं। हमको विवेकशील होना चाहिए और विवेकशीलता की इज्जत करनी चाहिए। ये सारे के सारे सिद्धान्त गायत्री माता के साथ जुड़े हुए हैं। इन सारे सिद्धान्तों को लेकर के जो गायत्री माता का पूजन करेंगे तो उनका प्रतीक-पूजन सही होगा, सार्थक होगा और उससे दुनिया का फायदा होगा। मनुष्य जाति उद्धार हो जाएगा। यही प्रतीक-पूजन का उद्देश्य है।
प्रतीकों के सम्बन्ध में विडम्बना की शुरुआत वहाँ से आरम्भ होती है जहाँ हमने यह मानना शुरू कर दिया कि ये मूर्ति जो बैठी हुई है, बड़ी ताकतवर है। उसको हम मिठाई खिला देंगे, उसकी हम आरती उतारेंगे तो वह हमारा उद्धार कर देगी और हमें मालामाल कर देगी। ये खयालात आप करने लगेंगे तो हम नाराज होंगे। वास्तविकता को आप समझते क्यों नहीं ? वास्तविकता को आप समझिए। वास्तविकता को समझने की कोशिश कीजिए कि मूर्ति-पूजा क्यों बनाई गयी थी और किसके लिए बनाई गयी थी ? एक दिन हमने आपसे एक बात कही थी कि गायत्री माँ, जो हमारी भारतीय संस्कृति की जीवात्मा हैं, जो हमारा प्राण हैं, जो चारों वेदों की जननी हैं। उसका एक “सिम्बोल” को लेकर के हम सारे हिन्दू समाज को एक स्थान पर इकट्ठा कर सकते हैं। जो हमारे अनेक देवताओं के माध्यम से, सम्प्रदायों के माध्यम से, मंत्रों के माध्यम से, पैगम्बरों के माध्यम से, हजारों और लाखों टुकड़ों में हिन्दू धर्म फैल गया और बिखर गया है, अब हम इसको फिर से इकट्ठा करना चाहते हैं। हम उसका बिखराव बर्दाश्त नहीं करेंगे।
अब हम यह करेंगे कि हिन्दू समाज का कोई न कोई तो प्रतीक होना चाहिए। कोई न कोई तो एक ‘सिम्बोल’ होना चाहिए। कहीं तो एक जगह इकट्ठे होना चाहिए।
राष्ट्रीय झण्डे के प्रति हमारे सारे हिन्दुस्तानी नतमस्तक होते हैं। इसमें हिन्दू भी शामिल हैं, मुसलमान भी शामिल हैं, ईसाई भी शामिल हैं,। इस माध्यम से जब सारे के सारे लोग इकट्ठे किये जा सकते हैं तो क्या हम हिन्दू-संस्कृति को इकट्ठा करने के लिए माध्यम तलाश नहीं कर सकते। हाँ, माध्यम हमारा था और वही रहना चाहिए और वही रहेगा। कौन है वह माध्यम ? वह है गायत्री मंत्र। हमारा माध्यम है और वही रह सकता है, दूसरा कोई बन ही नहीं सकता। हमारे पुराण, हमारे कुरान वे हैं जिनको हम वेद कहते हैं। वेद कैसे हैं और वेदों का मूल हमारा कलमा, हिन्दू का कलमा क्या है ? हिन्दू का कलमा एक है और वह है गायत्री मंत्र। हम दूसरों को भी इज्जत देते हैं। आप जिस देवता की पूजा करते हैं, आपको मुबारक, हमें क्या झगड़ना आपसे। आप श्रीकृष्ण भगवान की पूजा करते हैं तो खुशी खुशी करें और आप ‘श्री कृष्णाय नमो नमः’ का जप करें हमें कोई ऐतराज आपसे। लेकिन जब आप यह कहेंगे कि हिन्दू धर्म का मूल है- ‘श्री कृष्णाय नमो नमः’ तो हम यह पूछेंगे कि जब 5000 हजार वर्ष भगवान श्रीकृष्ण जी का जन्म हुआ था तब आप किसकी पूजा करते थे। श्रीकृष्ण भगवान किसकी पूजा करते थे। श्रीकृष्ण भगवान क्या यह जाप करते थे- ‘श्री कृष्णाय नमो नमः।’ नहीं, ये जप नहीं करते थे। 5000 वर्ष पूर्व क्या उपासना थी ? बताइए न आप।
मित्रो, तब एक ही उपासना रही है हमारी। ब्रह्माजी को आकाशवाणी के रूप में वह मिली थी। वह था- ‘गायत्री मंत्र’ और जिसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश ही नहीं राम और कृष्ण जो हमारे हिन्दू धर्म के सूर्य और चन्द्रमा माने जाते हैं, उन्होंने भी इस उपासना को अपनाया था। आप भागवत् में पढ़ लीजिए, आप बाल्मीकि रामायण में पढ़ लीजिए। दोनों को जो दीक्षाएँ दी गयी थी, वह गायत्री मंत्र की दीक्षा दी थी और जब तक दोनों जिन्दा रहें तब तक वे गायत्री मंत्र की उपासना करते रहें। शिव की उपासना का मंत्र यही है। सूर्यवंशी राजा और चन्द्रवंशी राजा जितने भी हुए सबकी उपासना का मंत्र यही एक है और हमारी नमाज वही एक है। हमारी संध्या गायत्री के बिना सम्भव नहीं है। सम गायत्री के बिना संध्या कैसे कर सकते हैं ? ये हमारा प्रतीक है और हम इस प्रतीक का-सिम्बोल को हर जगह जमाएँगे और इसलिए जमाएँगे कि सारे हिन्दू समाज को यह मालूम हो जाये कि हमारी मूल जड़ कहाँ है और उद्गम कहाँ है ? ताकि हम सारे समाज को एक सूत्र में पिरो सकें और सारे समाज को हम विवेकशीलता का अनुयायी बना सकें। हम विवेकशील लोग हैं। हम विचारशील लोग हैं। हम अंध परम्पराओं के अनुयायी नहीं हैं। हम हर चीज को विवेक की कसौटी पर कसते हैं, क्योंकि हमारा मंत्र- हमारी उपासना गायत्री मंत्र है- “ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्।” हम बुद्धि के उपासक हैं, हम विवेक के उपासक हैं, हम विचारों के उपासक हैं, हम तर्क के उपासक हैं। हम दलील के उपासक हैं, हम सच्चाई के उपासक हैं। हम किसी ‘फालोवर’ नहीं हैं- हम केवल सच्चाई के फालोवर हैं। ये सारी की सारी प्रेरणा कहाँ से मिल सकती है ? ये सारी प्रेरणाएँ गायत्री मंत्र से मिल सकती हैं। इसलिए हम कमर कसकर खड़े हो गये हैं कि गायत्री मंत्र की पूजा करने के लिए हर आदमी को मजबूर करेंगे और गायत्री मंत्र की महत्ता को अंगीकार करने और हृदयंगम करने की सलाह देंगे और परामर्श देंगे।
एक दिन हमने आपको ये भी कहा था कि उपासना को सस्ती बनाएँगे और हर बच्चों-बच्चों को उपासना करने के लिए कहेंगे। हम यह कहेंगे कि गायत्री मंत्र का एक फोटो अपनी घर में पूजा स्थली पर रखिए। यदि आप निराकार को मानने वाले हैं तो गायत्री मंत्र टाँग लीजिए। हमें कोई ऐतराज नहीं है। साकार उपासना को मानने वाले हैं तो आप गायत्री माता की तस्वीर रख लीजिए और सुबह शाम संध्या वंदन का क्रम आरम्भ कीजिए। कोई भी व्यक्ति या स्कूल जाने वाले बच्चों सबसे पहले अपनी चप्पल उतार दे, अपनी टोपी उतार दे और अपने सिर को नीचा झुकाए। हाथ जोड़ करके प्रणाम करे, भारतीय परम्पराओं की अनुभूति करे और पाँच बार गायत्री मंत्र मन ही मन बोले और नमस्कार करके स्कूल चला जाए पढ़ने के लिए। स्त्रियाँ खाना पकाने से पहने स्नान कर लिया है तो ठीक, नहीं भी कर लिया है तो भी ठीक है, वे सिर को उघाड़ करके और पैरों से चप्पल उतार करके खड़ी हो जाये और पाँच बार मन ही मन गायत्री मंत्र का जप करें और उसके बाद में खाना पकाने के लिए चली जाएँ । दुकानदार अपनी दुकान को चला जाए। गायत्री माता का चित्र दुकान में लगा हुआ है, उसके आगे मस्तक झुकाए, सिर झुकाए और पाँच बार मन ही मन गायत्री मंत्र जप ले। खड़े-खड़े होकर के यह उपासना करले और अपनी दुकानदारी को चलाए। अध्यापक या बच्चों स्कूल को चले जाएँ । इससे सस्ती उपासना तो और कोई नहीं हो सकती। मित्रों! इसमें तो शिकायत की बात भी नहीं है कि हमको समय नहीं मिलता और देखिए स्नान नहीं हुआ और ये नहीं हुआ और जनेऊ तो था ही नहीं। फिर कैसे करेंगे गायत्री जप। जनेऊ पहनना हो तो जरूर पहनना, हमें कोई शिकायत नहीं है और आपको स्नान करना हो तो जरूर करना। हम किसे मना करते हैं लेकिन यदि आप बीमार हो गये हैं और आप नहीं नहा सकते हैं तो आपको यह कहने की आवश्यकता नहीं होगी कि चूँकि हम नहाए नहीं थे, इसलिए हम गायत्री मंत्र की उपासना नहीं कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में भी आपको जरूर करनी चाहिए उपासना।
गायत्री मंत्र के बारे में हम हर हिन्दू से कहेंगे, हर घर में जायेंगे हर आदमी को समझाएँगे और ये कहेंगे कि आपने अपने संस्कृति के माता ओर पिता को भूला दिया था। अब अपने माता पिता के नाम याद रखिए। आपकी माता का नाम क्या है और पिता का नाम क्या है ? हमको नहीं मालूम साहब। आपका पिता कौन है ? हमको नहीं मालूम। अरे भाई ये क्या वाहियात बात बकते हो। आपकी माँ कौन थी ? हमें नहीं मालूम कि हमारी माँ कौन थी ? ये कोई जवाब है। जब कोई यह कहेगा कि हमको हमारी माँ का नाम नहीं मालूम है तो हम उसको वर्णसंकर कहेंगे । आपको अपने पिता का और माता का नाम मालूम होना चाहिए और हर घर में उनकी स्थापना होनी चाहिए। भारतीय धर्म के माता पिता कौन हैं ? आपको उनका नाम मालूम होना चाहिए और आपको उनकी इज्जत करनी चाहिए, जैसे कि ऋषियों ने, देवताओं ने अनादिकाल से की और होती रहेगी। हमारे माता-पिता बदले नहीं जा सकते। आपको बुतपरस्त वालों ने और मजहब वालों ने बहका दिया है। इससे हमारी वैदिक संस्कृति को झुठलाया नहीं जा सकता। उनकी बात को टाला नहीं जा सकता। आज तो हरेक चालाक बाबाजी ने अपने अपने नाम का मजहब खड़ा कर दिया है। और अपने-अपने पैगम्बर बनकर बैठे हैं और अपना अपना मंत्र बना दिया है। और अपनी-अपनी पुराण बना दी है। हम ये नहीं चलने देंगे। हम ये कहेंगे कि हिन्दू धर्म एक ही था और एक ही रहेगा। ठीक है मजहब- परस्तों को अपने चेले और चेलियों की हजामत बनाने के लिए तरह-तरह के सम्प्रदाय बनाने पड़े, पर इसकी क्या कीमत हो सकती है और इसकी क्या वकत हो सकती है, इसे हर विवेक शील को जानना और समझना चाहिए। जब सूरज निकलना शुरू होगा तो ये चमगादड़ और ये उल्लू अपनी जगह से भाग खड़े होंगे ओर इनकी कलई खुल जायेगी। इन्होंने हिन्दू धर्म के टुकड़े काट काट कर के फेंक दिए और अपने-अपने नाम के मजहब नहीं चलेंगे। मजहब हमारा एक था और एक ही रहेगा और हमारे माता-पिता एक ही थे ओर एक ही रहेंगे। हमारी माँ गायत्री माँ हैं और हमारे पिता यज्ञ हैं। इन दोनों को हम जिन्दा रखेंगे और इन्हीं की पूजा करेंगे। हर एक आदमी जो इनको भूल गया है और अपनी वास्तविकता को भी, हम अब ये सिखाने की कोशिश करेंगे कि हमारी माँ कौन थी और हमारे पिता कौन थे ? माँ और बाप की इज्जत करनी चाहिए- “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव” माता-पिता हमारे देव हैं, हमें इनकी पूजा करनी चाहिए।
मित्रों, अब हमको घरों में गायत्री माँ की स्थापना करनी चाहिए। गायत्री माता के ‘सिम्बोल’ प्रतीक और उनकी चौकियाँ अपने घरों में स्थापित करनी चाहिए। जहाँ पर थोड़ी देर बैठ करके घण्टे आधा घण्टे बैठकर के भजन कर लिया करें और गायत्री मंत्र का अनुष्ठान कर लिया करें। हमको जहाँ कहीं भी मौका मिले, इस तरह की स्थापना करनी चाहिए, जिस तरह हम यहाँ गायत्री माता की स्थापना कर रहे हैं और हमने गायत्री तपोभूमि में स्थापना की है। इस बात की जरूरत समझी जाए और जहाँ भी मौका मिले, जहाँ आवश्यकता हो वहाँ गायत्री माँ की स्थापना करनी चाहिए। हमने लोगों से यह भी कहा है कि आप चाहें तो मूर्तियाँ स्थापित करने की अपेक्षा एक चित्र स्थापित करने लें। इसमें एक फायदा आपको यह हो जायेगा कि आपके ऊपर वे जिम्मेदारियाँ नहीं आयेंगी जो हमारे ऊपर जिम्मेदारियाँ आती हैं। मूर्ति स्थापित करने से हमको भोग लगाना पड़ेगा, प्रसाद बाँटना पड़ेगा, सबेरे उनकी पूजा करनी पड़ेगी। हमें आरती करनी पड़ेगी। हमें ये करना पड़ेगा, वो करना पड़ेगा। अतः जहाँ जैसी जिम्मेदारियाँ उठाना सम्भव हो सके वहाँ वैसी ही उठायी जाये। जहाँ पर सम्भव नहीं, वहाँ पर तस्वीर स्थापित कर ली जाए और वहाँ पर सबके सब लोग इकट्ठे हों, गायत्री परिवार वाले इकट्ठे हों, गाँव वाले इकट्ठे हों, महिलाएँ इकट्ठी हों, बच्चों इकट्ठे हों और सब इकट्ठे होकर सायंकाल को केवल आरती उतार लिया करें। आरती के समय शंख बजा दिये जाए, घड़ियाल बजा दिया जाए। अगर आपके पास प्रसाद बाँटने के लिए न हो, तो पंचामृत वाला प्रसाद प्रस्तुत कर सकते हैं। पानी में थोड़ी सी शक्कर, थोड़ा सा गंगाजल, तुलसी के पत्ते। बस उसी का हम पंचामृत बनायेंगे और उसी को सबको देंगे। अगर प्रसाद हमारे पास नहीं है, पैसे हमारे पास नहीं हैं तो हमारी पंचामृत वाली पद्धति है जिसमें चन्दन घुला रहता है, उसका ही हम प्रसाद बाट सकते हैं। उसमें कोई हर्ज की बात नहीं है।
गाँव-गाँव में, घर-घर में, मौहल्ले-मौहल्ले में इस तरह के मन्दिर स्थापित करने पड़ेंगे ताकि वहाँ पर स्त्रियाँ, बच्चों, बुजुर्ग और बूढ़े और बालक सब इकट्ठे हो सकें और प्रार्थना में शामिल हो सकें। आप लोग आरती कीजिए और लोगों को अपने माता-पिता की अर्थात् गायत्री और यज्ञ की जानकारी कराइए। हम प्रतीकों को जिन्दा रखेंगे। हम प्रतीकों को नष्ट करने वाले नहीं हैं। हम प्रतीकों का मजाक उड़ाने वाले नहीं हैं। प्रतीकों के प्रति हम अनास्था उत्पन्न करने वाले नहीं हैं। हम तो अनास्था वहाँ उत्पन्न करते हैं और बार-बार आपसे झगड़ने के लिए इसलिए खड़े हो जाते हैं कि आप प्रतीक को सब कुछ मान बैठते हैं और प्रतीक जिस काम के लिए बनाया गया था, उस पर आप ध्यान देना नहीं चाहते। जब आप कलम या पेन जेब में लगाते हैं तब हमें क्या ऐतराज हो सकता है। लेकिन जब आप यह कहते हैं कि हम फाउन्टेन पेन लगा करके एम॰ ए॰ हो गये हैं, तब हम आपसे लड़ाई करते हैं और कहते हैं फाउन्टेन पेन रखिए, लेकिन पढ़ना भी सीखिये, लिखना सीखिये, गणित सीखिये, ज्योमिट्री सीखिये, किताब पढ़ना सीखिये और फाउन्टेन पेन का इस्तेमाल कीजिए। अगर आप यह कहें कि नहीं साहब, फाउन्टेन पेन का क्या इस्तेमाल करना, हमारा पेन तो परब्रह्म परमात्मा है। हमारी जेब में वह लगा हुआ है, अतः हम तो एम॰.ए॰ हैं देखिए हम पेन खरीद कर लाए हैं। तो हम आपसे लड़ाई करेंगे और कहेंगे कि आप पेन को क्यों एम॰ ए॰ बताते हैं। पेन के सहारे तो एम॰ ए॰ पास किया जाता है, बस इससे आगे बढ़िए मत।
मूर्तियों के माध्यम से, प्रतीकों के माध्यम से, तस्वीरों के माध्यम से हमको अपने हृदय के कपाट खोलने पड़ते हैं। और अपने मस्तिष्क का परिष्कार करना पड़ता है। हमको अपने जीवन का उद्धार करना पड़ता है। साथ ही हमको यह बात मालूम करनी पड़ती है कि हमको जाना कहाँ है? चलना कहाँ है ? यदि आपकी मंशा में यही उद्देश्य निहित है तो हम आपकी पूजा की बराबर प्रशंसा करेंगे और सराहना करेंगे। हमको लड़ता तब पड़ता है, हमको गुस्सा तब आता है और हमको झकझोरते तब हैं, जब आप मूर्ति को ही सब कुछ मान बैठते हैं और कहते हैं कि यही हमारी मनोकामना पूर्ण करेगी। यही हमको बेटा देगी। यह मूर्ति हमारा यह करेगी हमारा वह करेगी। जब आप ऐसा कहना शुरू कर देते हैं तब हम आपसे नाराज होते हैं कि असलियत को क्यों नहीं समझते ? असलियत को समझिए। असलियत को जब आप समझेंगे नहीं तो आप मूर्ति-पूजक नहीं रहेंगे, फिर आप बुत-परस्त हो जायेंगे । मूर्ति-पूजन और बुत-परस्ती में जमीन- आसमान का फर्क है। मूर्ति-पूजक वे हैं जो मूर्ति का इस्तेमाल गीता की पुस्तक की तरीके से किया करते हैं और ज्ञान को जहाँ से वह ज्ञान आता है, भगवान जहाँ रहते हैं वहाँ अपने मन को भगाकर ले जाते हैं और ज्ञान को पकड़ कर लाते हैं। वह आदमी की मूर्ति-पूजक है, बुत-परस्त नहीं। बुत-परस्त कौन थे ? वो लोग थे बुत-परस्त जिन्हें बद्दू कहा जाता था। आप लोग बद्दू लोगों की नकल करना शुरू कर देंगे तो हम आप पर झल्लाएँगे और कहेंगे कि आप तो बुत-परस्त बद्दू हो जाते हैं। बद्दू आप होइए मत और किसी भी मूर्ति को ये मान कर जाइए मत कि वह सामर्थ्यवान है। उसमें चमत्कार है और वह देवी तो ऐसा कर देती है, वैसा कर देती है। वह चमत्कारी देवी है। वो चमत्कारी देवी नहीं है। चमत्कारी केवल भगवान है जो सारे विश्व में समाया हुआ है। उसी की शक्ति हमारे विचारों से सम्बन्ध रखती है, हमारे आचरण से सम्बन्ध रखती है। आचरण और विचारों से सम्बन्ध रखने वाली देवी को अगर आप उस मूर्ति के माध्यम से पकड़ते हैं तो हम आपको ठीक कहेंगे और हम आपको मुबारकवाद देंगे और कहेंगे कि आप जानकार लोगों में से हैं, आप सही आदमी हैं।
मित्रों, क्या हम प्रतीकों की उपेक्षा कर सकते हैं ? नहीं, हम प्रतीकों की उपेक्षा नहीं कर सकते हैं। प्रतीकों के माध्यम से हम उस ज्ञान को जो हमारी भारतीय संस्कृति का मूल है, हर आदमी के गले में उतारने की हम कोशिश करेंगे। इंजेक्शन की सिरींज के बिना हम किसी तरीके से दवा आपके खून में प्रवेश नहीं करा सकते हैं। दवा हमारे पास बहुत बढ़िया वाली रखी है। उसको इंजेक्शन से लगाने के लिए सुई तो हमको चाहिए ही। सुई क्या है ? सुई मित्रों, जिसको हम प्रतीक पूजा कहते हैं। इसके अन्दर जो दवा भरी जाती ह�
परमपूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य ने जीवन भर जो अपने लेखनी से लिखा, औरों को प्रेरित कर उनसे सृजनात्मक लेखन करवाया, पुस्तकों- पत्रिकाओं में जो प्रकाशित हुआ, समय-समय पर उनने अमृत वाणी के माध्यम से जो विचारों की अभिव्यक्ति की, विचार सार व सूक्तियाँ जो वे लिखे गये या अनायास कभी कह गये तथा पत्रों के माध्यम से जो अंतरंग स्पर्श जन-जन को दिया, वह समग्र इस वांग्मय के खण्डों में है। कुल 108 खण्डों में युगऋषि का यद्यपि समग्र लेखन, वक्तृत्व एवं कर्तृत्व समाता नहीं है तथापि, अपनी ओर से सभी महत्वपूर्ण अंशों में इसमें लेने का प्रयास किया गया है। अब तक प्रकाशित 70 खण्डों के नाम इस प्रकार है-
युगद्रष्टा का जीवन-दर्शन (समग्र वांग्मय का परिचय)
जीवन देवता की साधना-आराधना
उपासना-समर्पण योग
साधना पद्धतियों का ज्ञान और विज्ञान
साधना से सिद्धि-1
साधना से सिद्धि-2
प्रसुप्ति से जाग्रति की ओर
ईश्वर कौन है ? कहाँ है ? कैसा है ?
गायत्री महाविद्या का तत्त्वदर्शन
गायत्री साधना का गुह्य विवेचन
गायत्री साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार
गायत्री की दैनिक एवं विशिष्ट अनुष्ठान-परक साधनाएँ
गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उपलब्धियाँ
गायत्री साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि
सावित्री, कुण्डलिनी एवं तंत्र
मरणोत्तर जीवन : तथ्य एवं सत्य
प्राण शक्तिः एक दिव्य विभूति
चमत्कारी विशेषताओं से भरा मानवीय मस्तिष्क
शब्द ब्रह्म-नाद ब्रह्म
व्यक्ति विकास हेतु उच्च स्तरीय साधनाएँ
परिमित संभावनाओं का आगार मानवी व्यक्तित्व
चेतन, अचेतन एवं सुपर चेतन मन
विज्ञान और आध्यात्म परस्पर पूरक
भविष्य का धर्मः वैज्ञानिक धर्म
यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान
यज्ञः एक समग्र उपचार प्रक्रिया
युग-परिवर्तन कैसे और कब ?
सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण-1
सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण-2
(सतयुग की वापसी)
मर्यादा पुरुषोत्तम राम
संस्कृति-संजीवनी श्रीमद् भागवत् एवं गीता
रामायण की प्रगतिशील प्रेरणाएँ
षोडश संस्कार विवेचन
भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व
समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान
धर्मचक्र प्रवर्तन एवं लोकमानस का शिक्षण
तीर्थ सेवन : क्यों और कैसे ?
प्रज्ञोपनिषद
निरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र
चिकित्सा उपचार के विविध आयाम
जीवेम शरदः शतं
चिरयौवन एवं शाश्वत सौंदर्य
हमारी संस्कृतिः इतिहास की कीर्ति स्तम्भ
मरकर भी अमर हो गये जो
साँस्कृतिक चेतना के उन्नायक सेवाधर्म के उपासक
भव्य समाज का अभिनव निर्माण
यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता
समाज का मेरुदण्ड सशक्त परिवार तंत्र
शिक्षा एवं विद्या
महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग-1
महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग-2
विश्व वसुधा जिनकी सदा ऋणी रहेगी
धर्मतत्त्व का दर्शन व मर्म
मनुष्य में देवत्व का उदय
दृश्य जगत की अदृश्य पहेलियाँ
ईश्वर-विश्वास और उसकी फलश्रुतियाँ
मनस्विता, प्रखरता और तेजस्विता
आत्मोत्कर्ष का आधार-ज्ञान
प्रतिगामिता का कुचक्र ऐसे टूटेगा
विवाहोन्माद समस्या और समाधान
गृहस्थ एक तपोवन
इक्कीसवीं सदी नारी सदी
हमारी भावी पीढ़ी और उसका नवनिर्माण
राष्ट्र समर्थ और सशक्त कैसे बने ?
सामाजिक, नैतिक एवं बौद्धिक क्रान्ति कैसे ?
युग-निर्माण योजना-दर्शन स्वरूप व कार्यक्रम
प्रेरणाप्रद दृष्टांत
पूज्यवर की अमृतवाणी-1
विचारसार एवं सूक्तियाँ-1
विचारसार एवं सूक्तियाँ-2
प्रत्येक खण्ड का मूल्य रु. 125/.. 70 खण्ड के सेट का मूल्य रु. 7000/.. शेष 38 खण्ड 1 वर्ष में प्रकाश्य।
अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा- 281003
( सप्तक्रान्तियों के संदर्भ में )
विश्व का कल्याण करने, तप-तितीक्षा कर रहीं हम। पर्वतों, निर्जन वनों में, शैलजा-सा तप रही हम॥
लक्ष्य केवल ‘शिव’ हमारा, विश्व का कल्याण करने। रोग, शोक, ग्रसित जगत के, प्राणियों की पीर हरने॥ लुटाने सर्वस्व अपना, चिरप्रतीक्षा कर रहीं हम॥ पर्वतों...........
शीत, वर्षा, ताप, सारे मौसमों की मार सहकर। लवण, खनिज, रसायनों के निर्झरों का नीर पीकर। स्वयं की क्षमता बढ़ाने, हर परीक्षा कर रही हम॥ पर्वतों...........
किया आयुर्वेद के मर्मज्ञ ऋषियों ने परीक्षित। थीं उन्हीं की शोध से, हम लोकमंगल को समर्पित। शोधग्रंथों में कथित क्षमता, समीक्षा कर रहीं है हम॥ पर्वतों...........
रक्त, मज्जा, माँस, अस्थि, चर्म सबके काम आतीं। शोधतीं, करतीं शमन व जोड़ देती अरु गलातीं। जड़, तने, छाले सुपल्लव, फूल, फल सब झड़ रहीं हम॥ पर्वतों...........
हम ‘वनौषधि’ हैं, हमारे नाम व गुण हैं अनेकों । पूर्वजों से आज तक जो भी किये उपकार देखो। किन्तु आज विदेश के षड्यन्त्र से, सिर धुन रहीं हम॥ पर्वतों...........
देशवासी ‘दमन’ वली औषधि ही खा रहे हैं। रुग्ण को रोगाणुओं के साथ क्षति पहुँचा रहे हैं। देखकर यह दुर्दशा, बस पीर अनुभव कर रही हम॥ पर्वतों...........
रोग का करतीं ‘शमन’ हम संतुलन से काम लेकर। और जीवन-तत्व को देतीं सुरक्षा, प्राण देकर। हमारे रहते पिएँ विष, यही चिन्ता कर रहीं हम॥ पर्वतों...........
तनिक हम शुभचिंतकों की, वेदना अनुमानिए तो, हमारी ‘संजीवनी की शक्ति’ को पहचानिए तो, अब हमें स्वीकारिए ! संवेदना से भर रहीं हम॥ पर्वतों...........
-मंगल विजय ‘विजयवर्गीय’
[ सहस्रकुंडी यज्ञ (नवम्बर 1958) के तुरन्त बाद का एक महत्वपूर्ण लेख एक महात्मा की लेखनी से (उसी शीर्षक से )]
प्रस्तुत लेख अखण्ड ज्योति पत्रिका में आज से चालीस वर्ष पूर्व छपा था। उसे पुनः प्रकाशित कर नये पाठकों को इस मिशन की आधारभूत स्थापना के बहुआयामी पक्ष से परिचित कराने का एक विनम्र प्रयास है।
एक मूर्धन्य कवि का कथन है- “महापुरुषों की जीवनियाँ हमें स्मरण कराती हैं कि हम भी अपने जीवन महान बना सकते हैं।” कवि का कथन सत्य से परिपूर्ण है। गाँधीजी जैसी महान आत्माओं के जीवन-चरित्र का अध्ययन करने से प्रतीत होता है कि उनको महानता के पथ पर अग्रसर करने में महापुरुषों की जीवनियों का कितना महत्वपूर्ण हाथ रहा है। जिन महापुरुषों के विचार और कार्य हमारे अनुकूल होते हैं जिनका हम हृदय से सम्मान करते हैं, उनकी जीवन घटनाओं की छाप हमारे मस्तिष्क पर पड़ती है। परम पूज्य आचार्यजी गायत्री तपोभूमि के संस्थापक और अखिल भारतीय गायत्री परिवार के कुलपति हैं। साधना क्षेत्र में उन्हें कहना ही क्या कि कितना आगे बढ़ चुके हैं। चौबीस-चौबीस लक्ष्य के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण उन्होंने किये हैं। पूर्वकाल में सवा करोड़ गायत्री जप करने वाले को वशिष्ठ की पदवी प्रदान की जाती थी। उनका इतना सम्मान किया जाता था कि वशिष्ठ ही अयोध्यापुरी के राजाओं के राजगुरु हुआ करते थे जिनकी आज्ञा के बिना राज्य में पत्ता भी नहीं हिलता था, उनके पथ-प्रदर्शन में ही सब कार्य हुआ करते थे। इसका अर्थ यह है कि सवा करोड़ गायत्री जाप के तप के द्वारा आत्मा इतनी महान बन जाती है कि वह व्यक्ति राष्ट्र के नेतृत्व के योग्य बन जाता है। पूज्य आचार्यजी की साधना वर्षा पहले से छह करोड़ के लगभग हो चुकी है। उनकी महानता की नाप वशिष्ठ के आत्म विकास से हो सकती है। इस महान तप के कारण ही उन्हें इस युग का विश्वामित्र कहा जाता है। विश्वामित्र के द्वारा नवीन सृष्टि की रचना हुई मानी जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि उन्होंने अपने क्रान्तिकारी विचारों द्वारा एक नये समाज का निर्माण किया था। महर्षि वशिष्ठ गायत्री साधना को केवल ब्राह्मणो तक ही सीमित रखना चाहते थे, परन्तु विश्वामित्र ने जो कि समस्त विश्व के मित्र, स्नेही और हितैषी थे और प्राणी मात्र में परमात्म-तत्व का अनुभव करते थे, इस सीमित अधिकार की दीवारों को तोड़−फोड़ दिया था और महर्षि वशिष्ठ के विचारों के विरुद्ध एक आंदोलन खड़ा कर दिया था। परम पूज्य आचार्यजी ने भी एक नयी सृष्टि की रचना की है, एक नये समाज का निर्माण किया है। समाज को एक नयी मोड़ दी है उसके लिए वह सदैव स्मरणीय रहेंगे। सैकड़ों वर्षा से जिस जाति का इतना पतन हो चुका हो कि उसने उन्हें भजन-पूजन के अधिकारों से वंचित कर रखा हो। ऐसी-ऐसी कपोल कल्पित घोषणाएँ कर दी हों कि कोई स्त्री यदि वेदमंत्र सुन या पढ़ लेगी या गायत्री जाप कर लेगी तो उसके परिवार में महान अनिष्ट होगा । एक से समय में स्त्रियों को जप हवन में भाग लेने का अधिकार देना एक नयी सृष्टि की रचना ही है, क्योंकि पुराने विश्वासों के अंधानुकरण करने वाले पण्डितों के विरुद्ध इस आवाज को उठाना जिन पर हिन्दू जनता गम्भीर आस्था और श्रद्धा रखती है, अद्भुत साहस का काम है। भारतवर्ष में होने वाले हजारों यज्ञों में जो रुकावटें उन लोगों ने डाली है, जनता को इन पवित्र धार्मिक कृत्यों के विरुद्ध उत्तेजित किया, उन्हें हर प्रकार से डराया, धमकाया, शास्त्रों की दुहाई दी, परन्तु सत्य के पुजारी के सामने उनकी कुछ न चली। सैकड़ों वर्षा से जहाँ वेद मंत्र की आहुतियाँ मन में उच्चारण करते हुए दी जाती थीं, वहाँ अब उच्च ध्वनि सुनाई दे रहा है। क्या यह आश्चर्य नहीं है। ?
गायत्री परिवार के कार्यकर्तागण कोई सेठ-साहूकार या बड़े आदमी नहीं हैं, परन्तु उनके माध्यम से देश में एक अद्भुत धार्मिक क्रान्ति हो चुकी है। जितने बड़े और सफल आयोजन पिछले कुछ वर्षा में गायत्री परिवार द्वारा हुए हैं, उतने और किसी भी धार्मिक संस्था द्वारा सम्पन्न नहीं हुए हैं। गुरु गोविन्द ने एक स्थान पर कहा है कि मैं चिड़ियों से बाज़ मरवाऊँगा अर्थात् छोटे दिखने वाले व्यक्तियों से बड़े-बड़े कार्य करवाऊँगा। पूज्य आचार्यजी के सम्बन्ध में भी यही बात सिद्ध होती है, यज्ञायोजन बड़े-बड़े महात्माओं के द्वारा ही सम्पन्न हो सकते हैं, वह कम पढ़े लिखे कम बुद्धि और सामर्थ्य रखने वाले व्यक्तियों से उन्होंने करवाये हैं। क्या यह कम गौरव की बात है ?
आजकल अधार्मिकता, नास्तिकता का विशेष प्रभाव नवयुवकों पर पड़ा है। उनके सामने परमात्मा का कोई अस्तित्व नहीं है और धर्म केवल ढोंग है और धार्मिक कर्मकाण्डों में अपना समय और शान्ति को व्यर्थ खोना है। गायत्री परिवार के प्रतिज्ञाबद्ध चार लाख से अधिक सदस्यों के नाम व आयु देखने से प्रतीत होता है कि वे अधिकाँश नवयुवक हैं। नवयुवकों को धर्म-मार्ग की ओर अग्रसर करना क्या नयी सृष्टि की रचना नहीं है ?
धर्म-प्रचार का उत्तरदायित्व ब्राह्मणों और साधु-महात्माओं पर रहा है। आज ब्राह्मणा ने अपने कर्तव्यों को तिलाञ्जलि दे दी है। 15 लाख साधु समाज पर बोझ बन रहें हैं। गृहस्थों का कार्य इनकी आज्ञाओं व उपदेशों का अनुकरण कर अपने जीवन का निर्माण करना था। परन्तु पूज्य आचार्यजी ने उन्हें वह शक्ति और सामर्थ्य दे दी है कि वह साधारण गृहस्थ होते हुए छोटा सा व्यापार व नौकरी करते हुए सन्त-महात्माओं और ब्राह्मणों जैसे कार्य योग्यतापूर्वक सम्पन्न कर रहें हैं। साधारण बुद्धि से वह आयोजन की इतनी उत्तम व्यवस्था कर लेते हैं कि देखने पर आश्चर्य होता है। आवश्यकता पड़ने पर वह अच्छे प्रवचन दे लेते हैं। कर्मकाण्डी पंडितों से अच्छे यज्ञ करवा लेते हैं। आजकल नवयुवकों को इस ओर लाना ही कठिन है। उनको साधक बनाकर, प्रचारक व उपदेशक बनाना है तो असम्भव-सा ही दीखता है। वे अपने घर, नौकरी व व्यापार कार्यों से समय बचाकर मौहल्ले-मौहल्ले और ग्राम-ग्राम घूमते हैं, कड़ी धूप में पैदल चलते हैं, भूख-प्यास सहन करते हैं। अपना धन व्यय करके साहित्य वितरण करते हैं, शाखा स्थापित कराने, यज्ञ कराने, व्यसन छुड़वाने, नये गायत्री उपासक आदि की प्रतिज्ञाएँ लेकर घी, शक्कर, नमक, एक समय का भोजन आदि त्याग कर, ब्रह्मचर्य पालन, भूमिशयन, बाल न कटवाना आदि के व्रत लेकर समाज कल्याण आदि लिए अपने आपको अर्पित करते हैं। क्या यह नई सृष्टि की रचना नहीं है ?
पूज्य आचार्यजी का जीवन आश्चर्यों से भरा हुआ है। उन्होंने स्वयं एक पुस्तक में लिखा है कि वेदमाता की कृपा से उन्हें थोड़े समय में इतना ज्ञान प्राप्त हुआ है कि जितना एक साधारण व्यक्ति को 100 वर्षों में प्राप्त होना सम्भव नहीं था। गायत्री तत्त्वावधान के सम्बन्ध में जितनी खोज उन्होंने की है, उतनी आज तक किसी ने नहीं की होगी। गायत्री सम्बन्धी रहस्यों का उद्घाटन जितना उन्होंने किया है, उतना अभी किसी ने नहीं किया। उनके समान गायत्री साधना और तप करने वाला भी कोई दिखाई नहीं देता। अध्यात्म ज्ञान सम्बन्धी अगणित पुस्तकें उन्होंने लिखी हैं। 1956 में दस हजार साधकों से 24-24 गायत्री जाप के अनुष्ठान करवा कर 108 कुण्डीय यज्ञ करवाया था। पाँच वर्ष के थोड़े से समय में देश के कोने कोने में गायत्री यज्ञ भारतीय संस्कृति का प्रसार किया है। 4000 गायत्री परिवार की शाखाएँ स्थापित कराकर उन क्षेत्रों में धार्मिक जागृति की गंगा बहा दी। कलियुग के समय में जब लोग धर्म से चिढ़ते हैं सवा लक्ष साधकों से सवा लाख के गायत्री अनुष्ठान करवाना 52 उपवास करवाना, वर्ष भर तक ब्रह्मचर्य का पालन कराना और उसके पश्चात् उनके अनुष्ठान की पूर्णाहुति के रूप में एक हजार कुण्डों का गायत्री महायज्ञ सम्पन्न करना क्या कम चमत्कार की बात है, जिसमें जनता से एक पैसा भी न माँगा गया हो। सभी लोग दाँतों तले उंगली दबाकर रह गये। कंस ने जब पूजा पर अत्याचार आरम्भ किया था एक ग्वाले से सब दूध लेना शुरू कर दिया था कि प्रजा का कोई व्यक्ति दूध न पिये-भगवान कृष्ण ने उसके विरोध में
विगत माह सितम्बर 97 का अखण्ड-ज्योति का अंक ‘क्रान्ति विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ है। यह मातृसत्ता को समर्पित एक विशेषांक है। शान्तिकुञ्ज द्वारा घोषित रजत जयन्ती वर्ष संसर्ग समारोहों का विस्तार वे विवेचन इस अंक में तथ्यों, आँकड़ों एवं प्रतिपादनों के माध्यम से हुआ है। नवयुग का आगमन इन्हीं सूत्रों के आधार पर होगा। जितने अधिक व्यक्तियों तक अंक पहुँचाया जा सके, इस दिशा में जितना अधिक पुरुषार्थ सम्भव है, वह अपने सभी परिजनों द्वारा गुरुसत्ता के प्रति सुमनांजलि के रूप में किया जाना चाहिए। जितनी प्रतियाँ अतिरिक्त मँगानी हों, उसके लिए ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ घीयामण्डी मथुरा से पत्र व्यवहार करें।
आंदोलन खड़ा किया था और ग्वालों का संगठन कर उन्हें कहा था कि तुम केवल अपनी अपनी उँगली लगा दो, यह गोवर्धन उठ जाएगा अर्थात् तुम्हारी थोड़ी-थोड़ी सहायता से यह आंदोलन सफल हो जायेगा और हुआ भी ऐसे ही। पूज्य आचार्य जी ने इतना बड़ा साहस गायत्री परिवार के छोटी सामर्थ्य वाले साधकों पर किया था कि बड़े आयोजन करने के लिए राजा, महाराजा, सेठों और अमीरों के सहयोग की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह सिद्ध करके दिखा दिया कि जिस प्रकार ने भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पहाड़ उठाने जैसा बड़ा कार्य ग्वालों की सीमित शक्तियों से कर लिया, उसी प्रकार यह गायत्री सशस्त्र कुण्डीय यज्ञ, जिसको सभी ने आश्चर्य की दृष्टि से देखा, गायत्री परिवार के मतवालों की संगठन शक्ति का फल है। सशस्त्र कुण्डीय यज्ञ के पश्चात् अब तक 24 हजार कुण्डों के यज्ञों को सम्पन्न कराके घर-घर में यज्ञ भगवान के प्रति आस्था व श्रद्धा उत्पन्न करना, उनके महान तप का ही परिणाम है। चारों वेदों का प्रकाशन भी कम गौरव की बात नहीं है। अभी तक किसी संस्था प्राचीन भाष्यों के आधार पर वेद प्रकाशित नहीं किये हैं।
परम पूज्य आचार्यजी हमारे हृदयों के सम्राट हैं। आध्यात्मिक उन्नति के लिए उन्होंने हमारे लिए उत्तम मार्ग प्रशस्त किया है। लुप्तप्राय गायत्री व यज्ञ विद्या का उन्होंने पुनरुत्थान किया है। गायत्री विद्या एक वर्ग विशेष तक सीमित थी। आज सभी लोग उससे लाभ उठा रहे हैं। उनके पथ-प्रदर्शन और सहयोग से लाखों व्यक्तियों ने भौतिक आध्यात्मिक शुभ परिणाम प्राप्त किये ओर कर रहे हैं। युग-निर्माण के क्रान्तिकारी प्रहरी तप और त्याग की साक्षात् मूर्ति हैं। नम्रता और सरलता उनके स्वभाव में कूट-कूट कर भरी हुई है। अहंकार उनके पास तक फटक नहीं सकता। संयम महान आदर्श हैं, जिनकी नस-नस से परमार्थ और सेवा की भावनाओं का महासमुद्र हिलोरें मारता है। आचार्यजी का वरद्हस्त सदैव हमारे ऊपर बना रहे है, माता से यही कामना है।
शान्तिकुञ्ज के रजतजयंती वर्ष के समारोहों के क्रम में तीन पूर्णिमाओं में तीन समारोह सम्पन्न हो चुके। प्रत्येक की अपनी विशिष्ट उपलब्धियाँ रही हैं। श्रद्धा-संवर्द्धन हेतु सम्पन्न गुरुपूर्णिमा पर्व, पर्यावरण संरक्षण स्वास्थ्य संवर्द्धन हेतु सम्पन्न श्रावणीपर्व के समारोहों का विस्तृत विवरण पहले ही परिजन पढ़ चुके हैं। इन पंक्तियों के आप तक पहुँचने तक अक्टूबर का सद्ज्ञान सदशिक्षा वर्ग का समारोह भी सम्पन्न हो चुकेगा। जो कि शरद पूर्णिमा पर आयोजित है। विगत माह साधना वर्ग के अंतर्गत परमवंदनीय माताजी की पुण्यतिथि पर जो आयोजन सम्पन्न हुआ, वह स्वयं में अति महत्वपूर्ण रहा है, अनेकानेक संकल्पों के साथ उसका समापन हुआ एवं ऐसा लगा कि साधना पक्ष का प्राधान्य इस मिशन की जड़ों में रहा है, उसके माहात्म्य व क्रियापक्ष को लोगों ने भली−भाँति समझा है, आत्मसात् किया है।
वस्तुतः देखा जाए तो परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीय माताजी का सम्पूर्ण जीवन आस्तिकता के मूल्यों को जन-जन के जीवन में समाविष्ट करने हेतु ही नियोजित हुआ है। इस मिशन की धुरी ही वह रही है। उसके विना किसी भी क्रान्ति की सफलता की आशा नहीं की जानी चाहिए। इतिहास बताएगा किस तरह परमपूज्य गुरुदेव एवं शक्तिस्वरूपा माताजी ने अपने आपको एक साधक के रूप में गलाया, अपनी तप की पूँजी से यह मिशन खड़ा हुआ एवं हर व्यक्ति की प्राणचेतना में भाव-संवेदना भरकर उन्हें स्वयं का निर्माण करने के साथ राष्ट्रदेवता, मातृभूमि के प्रति समर्पित करने हेतु एकजुट कर विराट परिवार का रूप इसे दे दिया। बिना साधना, समर्पण एवं पारस्परिक आत्मीयता के सूत्रों का जीवन में उतारे कोई आध्यात्मिक संगठन नहीं चला सकता। यही अन्यान्य संगठनों से कुछ अलग हमारा गायत्री परिवार दिखाई देता है, जहाँ औरों के हित जीने की तमन्ना लिए हर धर्म-सम्प्रदाय वर्ग के व्यक्ति सूक्ष्म चैतन्य प्रवाह से जुड़ते ही चले जा रहे हैं। आस्तिकवाद जीवनचर्या में व्यावहारिक रूप में कैसे उतरना चाहिए, सभी समस्याओं का हम अध्यात्म कैसे हो सकता है, उज्ज्वल भविष्य एक भवितव्यता है, कैसे समूह मन के विकास से-एक साथ सम्पन्न की गयी साधना से आ सकता है, अध्यात्म के ध्यान-प्रयोगों से मानसोपचार कैसे सम्भव है, ये कुछ ऐसे महत्वपूर्ण पक्ष हैं जिन्हें गायत्री परिवार ने आज बड़ी सरलता से जन-जन के मन में बिठा दिया है। वैज्ञानिक आध्यात्मवाद के प्रवक्ता इसे ठोस तर्क, तथ्य व प्रमाणों के माध्यम से प्रमाणित कर जन-जन तक पहुँचाने वाले परमपूज्य गुरुदेव के साहित्य की यही विलक्षणता है कि व्यक्ति जो स्वयं को बुद्धिजीवी मानता है, सहज ही इस विराट विचार सागर में डुबकी लगाकर आस्तिकता को सही मायने में उतारता देखा जाता है। गाँव में रहने वाले सीधे साधे किसान वर्ग के, श्रमिक वर्ग के व्यक्ति ने तो परम्परा के रूप में वे संस्कार पाए हैं कि वह अध्यात्म उसके रोम-रोम में समाया हुआ है। उसे मात्र स्वावलम्बन-आर्थिक उपार्जन-पारमार्थिक सुनियोजन-स्वच्छता सभ्यता के प्रारम्भिक पाठ की आवश्यकता थी, वह भी गुरुसत्ता ने पूरी कर दी। जीवन साधना के इस पक्ष को ऋषियुग्म की सत्ता ने बड़ी सहजता ने निरक्षर अथवा कम शिक्षित जनता के दिलों को पहुँचाकर संस्कारों के समावेश की जीवन में अनिवार्यता बताकर उन्हें भी आत्मनिर्माण से राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में जोड़ दिया है। युगशक्ति का जागरण इतने बड़े समुदाय को जोड़े बिना हो भी कैसे सकता था। अब शिक्षित समुदाय की, तथा कथित प्रबुद्ध वर्ग की समस्या सामने है, जिसने बुद्धि विलास के साधन तो अनेकानेक जुटाएँ हैं, किन्तु उस मृगमरीचिका में वह स्वयं को ऐसा उलझा चुका है कि साधना तो दूर उसका जीवन एक ऐसी नैया की तरह दिखाई देता है, जो गतिशील तो है पर गंतव्यहीन होकर बेचैनी से बढ़ती चली जा रही है। कब लहरों के थपेड़े, तनाव के झोंके उसे उलट दें, पता नहीं। इसी वर्ग के लिए परमपूज्य गुरुदेव ने प्रतिपादन दिये, प्रत्यक्षीकरण हेतु ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना की एवं जीवन साधना द्वारा रोजमर्रा की जीवन चर्या में उतारने हेतु संजीवनी साधना सत्रों की शृंखला शान्तिकुञ्ज में चलाई। आज संस्कार महोत्सव जो स्थान-स्थान पर सम्पन्न हो रहे हैं, एक ही विशेष लक्ष्य के साथ हो रहे हैं कि यह वैज्ञानिक अध्यात्मवाद उन सभी तक पहुँचे, जो कर्मकाण्ड प्रधान धर्म को परम्परागत मानते हुए उसे नकारते हैं, ताल ठोंककर स्वयं को नास्तिक कहते हैं, जबकि व्यक्तिगत जीवन में हर क्षण हर कष्ट में भगवान को याद करते हैं। अखण्ड ज्योति के विज्ञानसम्मत प्रतिपादन भी इसी उद्देश्य के साथ प्रतिमास निरन्तर 58 वर्षों से प्रकाशित हो रहे हैं एवं यह ज्योति निरंतर प्रज्वलित ही रहेगी।
अब इस साधना वर्ग की एक विशिष्ट उपलब्धि के रूप में दो कार्यक्रम विशेष रूप से दिये जा रहे हैं।
(1) प्रतिदिन के लिए विशिष्ट शक्ति प्राप्त करने हेतु युगतीर्थ-ज्ञानगंगोत्री शान्तिकुञ्ज से शक्ति का संचार होने व उसे प्राप्त करने की साधना। इसमें अवधि 10 से 15 मिनट रखी गयी है। नये साधकों के लिए एक सरल उपक्रम बनाया गया है एवं पुराने शान्तिकुञ्ज आ चुके व्यक्तियों-परिजनों के लिए शान्तिकुञ्ज का ध्यान निर्धारित किया गया है। विस्तार से इस ध्यान-साधना का विवरण आगामी पृष्ठ में पढ़ लें।
(2) सभी धर्म सम्प्रदायों के व्यक्तियों-अनुयाइयों से अनुरोध किया जा रहा है कि वे हो प्रतिमास दो बार अमावस्या और पूर्णिमा के अवसर पर एक साथ संध्या 7 से 7.30 तक अपनी-अपनी उपासना पद्धति से उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करें। आधे घण्टे की इस प्रक्रिया में वे द्वीप प्रज्वलित कर सकते हैं, मोमबत्ती जला सकते हैं अथवा लोबान जला सकते हैं। अपने-अपने घरों में एक साथ, एक दिन जब इतने अधिक व्यक्ति यह साधना उपक्रम मौन साधना-’ भविष्य उज्ज्वल बने विभीषिकाएँ मिटे' ऐसी प्रार्थना तथा दीपयज्ञ संक्षिप्त उपक्रम करेंगे तो इससे एक समष्टिगत मन-कास्मिक माइण्ड’ का निर्माण होगा, जिसका प्रभाव निश्चित ही चारों ओर वातावरण पर, सूक्ष्म जगत पर पड़ेगा। आशा की जानी चाहिए कि उत्साहपूर्वक यह उपक्रम सभी स्थानों पर चल पड़ेगा व सन् 2000 के आने तक गति पकड़ लेगा। अब यही तो एक मात्र आशा की केन्द्र रह गया है।
पूज्य गुरुदेव बराबर कहते रहें हैं कि ‘आत्मशक्ति’ का जागरण किया जाना है। इसके अंतर्गत मनुष्य मात्र के लिए सद्बुद्धि और उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना अनिवार्य है। सर्वप्रथम सभी नैष्ठिक साधक तथा नये संपर्क में आये परिजन, युगसंधि पुरश्चरण में भाग लें और अधिक साधक बनाने का क्रम जारी रहे।
नैष्ठिकों से कहा गया है कि वे जप का दैनिक अस्वाद व्रत और ब्रह्मचर्य का साप्ताहिक तथा अनुष्ठानों का छमाही (नवरात्रियों में या सुविधानुसार ) क्रम चलाते रहें। नये साधकों को नित्य दस मिनट गायत्री मंत्र जप या एक चालीसा पाठ या चौबीस मंत्रलेखन की साधना से जोड़कर क्रमशः उन्हें आगे बढ़ाते रहें। यदि कभी चूक हो जाये, तो उसकी पूर्ति अगले दिन कर लें।
अनुदान ध्यान-साधना :- साधकों के अपने साधना पुरुषार्थ के साथ युगशक्ति के दिव्य-अनुदान प्राप्त करने के लिए यह साधना-प्रयोग ऋषिसत्ता की अनुकम्पा से उपलब्ध कराया जा सकता है। साधकों का इस अनुदान-साधना से आत्मनिर्माण और लोककल्याण के व्रतों को फलित करने योग्य, अग्रदूतों की भूमिका निभाने योग्य ऊर्जा प्राप्त होगी। अशुभ को निरस्त करने और सृजन बनाने के लिए आत्मशक्ति की इन दिनों विशेष आवश्यकता है। उसे उपलब्ध करने के लिए ध्यान का यह अभिनव उपक्रम आरम्भ किया गया हैं, जिसे प्रज्ञा परिवार के समस्त परिजनों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। उनके संपर्क में जो भी श्रद्धा सम्पन्न व्यक्ति आयें, उन्हें भी अपनाने के लिए कहा जाना चाहिए।
अपने नियमित उपासना क्रम के अतिरिक्त प्रातःकाल के लिए यह शक्ति-संचार साधना है। यह सूर्योदय से एक घण्टा पूर्व से लेकर सूर्योदय तक की अवधि में किसी भी समय 15 मिनट तक की जा सकती है। प्रक्रिया इस प्रकार है :-
उपासना कक्ष या कोलाहल रहित स्थान में ध्यानमुद्रा में बैठें। ध्यानमुद्रा अर्थात् स्थिर शरीर, शान्तचित्त, सुखासन (पालथी मारकर )कमर सीधी, हाथ गोदी में, आँखें बन्द।
ध्यान करें कि देवात्मा हिमालय के केन्द्र से प्रेरित विशिष्ट प्राण प्रभाव हमारे चारों ओर छा गया है। वह हमारे श्वास-प्रश्वास के साथ शरीर, मन, अन्तःकरण के कण-कण में संचरित हो रहा है।
श्वास खींचने (पूरक क्रिया ) के साथ प्राण अनुदान को धारण करने, श्वास रोकने के साथ आत्मसत्ता के जाग्रत को होने का भाव करें, कि हमारी जाग्रत आत्मशक्ति ब्रह्माण्ड में फैलकर युगशक्ति के नवसृजन संकल्प के साथ जुड़ रही है। इससे विभीषिकाएँ निरस्त होकर अनुकूलताएँ बढ़ रही हैं, यह क्रम 15 मिनट चलाएँ। बाद में नमस्कार करके उठें और सूर्यार्घ देकर समापन करें। नये साधकों के लिए इतना ही पर्याप्त है। प्रौढ़ साधक इसके साथ कुण्डलिनी शक्ति जागरण, उन्नयन का प्रयोग जोड़ सकते हैं। इस प्रयोग में भावना इस प्रकार करे :-
श्वास खींचने के साथ भावना करें कि यह प्राण प्रभाव युक्त श्वास, मल-मूत्र छिद्रों के मध्य अवस्थित मूलाधार चक्र तक पहुँचकर उससे टकराता है।
प्राणवायु के टकराने से मूलाधार में सोयी पड़ी सर्पिणी के सदृश कुण्डलिनी शक्ति में हलचल उत्पन्न होती है।
श्वास रोकने के साथ कुण्डलिनी, श्वास में घुले प्राण−प्रवाह को पीकर जाग्रत और परिपुष्ट होती है। उस जागरण से स्थूल, सूक्ष्म व कारण शरीरों को बल मिलता है।
श्वास छोड़ते समय यह भावना की जाये कि प्राणवायु मेरुदण्ड मार्ग से ऊपर उठती हुई मस्तिष्क के मध्य केन्द्र तक पहुँचती है और वहाँ से वह नासिका द्वारा अनन्त अंतरिक्ष में बिखर जाती है।
यह एक प्राणायाम हुआ। इसमें पूरक, कुम्भक और रेचक तीन ध्यान हैं। तीनों के उद्देश्य हैं- धारण, जागरण एवं संचार। इससे आत्मसत्ता की प्रखरता बढ़ती है और वातावरण के अनुकूलन में सहायता मिलती है।
यह साधना देखने में सामान्य किन्तु परिणाम में असामान्य है। इसमें विशेष महत्व शक्ति-संचार-साधना का है। इसे हिमालय पर अवस्थित अध्यात्म ध्रुव केन्द्र का, महाकाल का अनुदान समझा जाए। (सन् 2000 तक यह विशिष्ट प्राण-प्रवाह सूर्योदय तक निरन्तर चलता रहेगा
प्रज्ञा परिजनों के लिए यह अतिरिक्त अनुदान है )
इस साधना की न्यूनतम अवधि 15 मिनट रखी गयी है। दुर्बल व्यक्ति 10 मिनट ही करें। जो आत्मिक दृष्टि से प्रौढ़ और परिपक्व हैं, वे प्रति सप्ताह एक-एक मिनट बढ़ाते हुए आधा घण्टा तक पहुँचा सकते हैं। अधिक भोजन से उत्पन्न होने वाली हानियों की तरह इस प्राण-संचार-साधना को उपयुक्त सीमा तक सीमित रखने को ही कहा गया है।
विशेष- जनसामान्य के लिए देवात्मा हिमालय से ही प्राण संचार का ध्यान उपयुक्त है। वे साधक जिनकी आस्था पूज्य गुरुदेव के प्रति स्थिर हो चुकी है, वे बड़ी सहजता से युगशक्ति की गंगोत्री शान्तिकुञ्ज से शक्ति-संचार का ध्यान कर सकते हैं। भावनात्मक रूप से हरिद्वार पहुँचने, गंगा स्नान कर, सजल श्रद्धा, प्रखर प्रज्ञा पर नमन, अखण्ड दीप दर्शन, वन्दनीया माताजी से भक्ति और पूज्य गुरुदेव से शक्ति अनुदान पाने का भाव करते हुए सामान्य जप और शक्ति-संचार का ध्यान सम्पन्न कर सकते हैं। सूक्ष्मीकरण के क्रम में पूज्य गुरुदेव ने ही नैष्ठिक साधकों के लिए इस ध्यान का विधान दिया था।
विराट संस्कार-महोत्सवों की शृंखला पुनः वर्षा के बाद अब 1 अक्टूबर, 1997 से आरम्भ हो रही है। यों इस विराट स्वर के कार्यक्रम इससे पूर्व भारत भर में 24 एवं दो भारत से बाहर यू. क्रे. (इंग्लैण्ड) लंदन में वेम्बले में तथा यू.एस.ए. (अमेरिका) की धरती पर न्यूयार्क नगर में मई 97 के बाद अगस्त-सितम्बर में सम्पन्न हुए हैं। अब जो शृंखला आरम्भ हुई है, यह सतत् जून 98 तक चलती रहेगी एवं पूरे देश को मथती रहेगी। यह ने केवल वहाँ की भूमि के, वहाँ रहने वाले लोगों के प्रसुप्त संस्कारों को जगाएगी, अपितु षोडश संस्कारों के माध्यम से जन -जन में नयी चेतना का समावेश करेगी। संस्कार अधिक से अधिक रुचि के साथ अधिकाधिक व्यक्तियों की भागीदारी के साथ सम्पन्न हो, यह लक्ष्य रखा गया है एवं यही शृंखला आगे भी न्यूजर्सी (यू.एस.ए.) में होने वाले विराट संस्कार महोत्सव-वाजपेयी स्तर के ज्ञान यज्ञ मल्टीमीडिया एक्जीविषन (23, 24, 25, 26 जुलाई, 1998 ) के बाद 97-99 में भी चलती रहेगी। जब तक की सारा देश विश्व संस्कारों से अनुप्राणित नहीं हो जाता।
हिन्दी भाषा, उड़िया, गुजराती भाषी ऐसे क्षेत्र जहाँ मिशन पहले से ही बहुत विराट परिमाण में जन-जन तक पहुँच चुका है, प्रचारात्मक के बाद अब रचनात्मक-सुधारात्मक कार्यक्रम भी चालू हो चुकें है, वहाँ अब इन कार्यक्रमों के स्थान पर संगठनात्मक स्तर के एवं भावी पूर्णाहुति की तैयारी के निमित्त कार्यक्रम होने चाहिए थे, फिर भी जन उत्साह को देखते हुए एवं जो अश्वमेधों में अपने स्थान का प्रतिनिधित्व तो कर सकें, किन्तु अपने यहाँ आयोजन नहीं कर सके, उनकी इस इच्छा को नैष्ठिक साधकों के निर्माण व संस्कारों का सम्पन्न कराने देने की भावना के साथ स्वीकृति दे दी
गई। अब ये सभी स्थान व इनके कार्यकर्ता प्रौढ़ता की सीमा पार कर चुके हैं। उन्हें कौतुक प्रदर्शन भरे कार्यक्रम से ऊँचा उठाकर कुछ अतिसामान्य कर दिखाने हेतु सुनियोजित कार्य पद्धति से जोड़ने का मन था, सो उस अब वसंत पर्व 1998 तक के लिए आगे बढ़ा दिया है। यह सभी उन कार्यकर्ताओं के लिए जहाँ कार्यक्रम हो चुके, अनुयाज प्रक्रिया होगी। इन्हीं स्थानों पर भविष्य में संगठनात्मक कार्यक्रम सम्पन्न होंगे, जिनमें मिशन की संचालन मण्डली के 15 सदस्यों में से वरिष्ठ कार्यकर्ता भागीदारी करेंगे।
जहाँ तक नवलपरासी, नेपालगंज, बीरगंज (नेपाल), रानीखेत (कुमायूँ) नैमिषारण्य, शिरपुर (धुले), चंडीगढ़ भिवण्डी (ठाणे), धर्मशाला काँगड़ा-हिमाचल बाड़मेर (राजस्थान), मदुराई (तमिलनाडु), विशाखापट्टनम (आँध्र), मद्रास (चेन्नई), गंगटोक (सिक्किम) जैसे स्थानों का प्रसंग है वहाँ यह तो समझ में आता है कि चूँकि यहाँ अभी तक इस विराट स्तर के आयोजन पूर्व में नहीं हुए, अतः इन्हें महत्व दिया जाना चाहिए। किन्तु शेष सभी कार्यक्रम जहाँ हो रहे हैं, वहाँ जन उत्साह ही प्रधान रहा है, जिस कारण वहाँ संस्कार महोत्सवों के लिए अनुमति देनी पड़ी है। अब कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु सभी परिजनों पाठकों हेतु यहाँ दिये जा रहे हैं ताकि वे वर्तमान में चल रही शृंखला एवं भावी कार्यक्रमों के विषय में भी अपनी सोच को उस स्तर तक लाकर विकसित कर सकें। यह हो सका तो ही पूज्यवर को वैचारिक क्रान्ति-ज्ञानयज्ञ की प्रक्रिया जन-जन तक पहुँच सकेगी। कुछ बिन्दु इस प्रकार हैं :-
सभी परिजन यह मानकर चलते हैं कि हमारा कार्यक्रम विराटतम एवं अद्वितीय होने जा रहा है। इसमें शान्तिकुञ्ज के वरिष्ठ से वरिष्ठ कार्यकर्ता का आना अत्यधिक अनिवार्य है। यह मानकर नाम छाप देते हैं व प्रचार यही करते हैं कि अमुक-अमुक सज्जन आ रहे हैं। एक साथ चार टोलियाँ हम एक अक्टूबर को रवाना कर रहे हैं। एक साथ चार कार्यक्रम भिन्न भिन्न स्थानों पर भौगोलिक दृष्टि से बड़ी दूरियों पर सम्पन्न होने जा रहे हैं। यह तो मात्र नवम्बर तक उसके बाद छह टोलियाँ हो जायेंगी एवं छय कार्यक्रम एक साथ मई जून माह तक चलते रहेंगे ऐसे में यह आग्रह करना कि अमुक भाई साहब या बहिनजी को हमारे यहाँ आना चाहिए, न केवल अनौचित्यपूर्ण है, अपनी अपरिपक्वता का परिचायक भी है। ऐसे में फोन फैक्स, पत्र, परिजनों की भीड़ लेकर शान्तिकुञ्ज पर चढ़ाई करने की बजाय अपना ध्यान अपने आस पास के क्षेत्र में सक्रियता बढ़ाने की ओर अधिकाधिक लगाना चाहिए।
जिस चौदह सदस्यीय दल को यहाँ से भेजा जा रहा है, वह परमपूज्य गुरुदेव, वंदनीया माताजी की शक्ति को लेकर आ रहा है। सभी वरिष्ठ स्तर के साधक स्तर के कार्यकर्ता है। किसी को भी किसी से कम न माने, अपने कार्यक्रम को विशिष्ट मानते हुए किसी भी वी.आई.पी. स्तर के कार्यकर्ता की माँग न करें तो अच्छा है। बार बार आग्रह करने पर नीतिगत निर्णय के अंतर्गत शान्तिकुञ्ज से प्रार्थना अमान्य होने पर सभी अकारण दुखी होंगे।
अब नये संस्कार-महोत्सवों को 1998 की अक्टूबर से वसंत पंचमी 1999 तक की अवधि में किया जा रहा है। प्रस्तुत वर्ष की शृंखला में भी स्थान खाली नहीं है। जितनी टोलियाँ जा रहीं हैं, इनसे अधिक बड़ा पाना शान्तिकुञ्ज का संचालन मण्डल आवश्यक मानता है। कोई भी अतिरिक्त विशेष टोली का आग्रह न करें। दो वाहन के साथ आ रही टोलियों के सभी सदस्य पूर्णता प्रशिक्षित एवं स्वयंसेवक स्तर के हैं। इन्हीं को मंच से प्रवचन देते भी देखा जा सकेगा। संस्कृतनिष्ठ कर्मकाण्ड सम्पन्न कराते भी तथा प्रदर्शनी खड़ी करने जैसा पुरुषार्थ करते भी देखा जा सकता है। आप सभी उनका यथा-सम्भव सहयोग करें, उनके माध्यम से गुरुसत्ता की ऊर्जा को ग्रहण करने का प्रयास करें।
मंच की गरिमा बनाए रखना सभी का दायित्व है। गायत्री परिवार के कार्यक्रम अध्यात्मिक कार्यक्रम हैं, राजनैतिक सभाएँ नहीं, जहाँ मंच पर ठूँस ठूँस के व्यक्तियों को बैठा दिया जाता हो। कृपया गरिमा को बनाये रखने में भेजे गये दल के सदस्यों का सहयोग करें।
जहाँ तक सम्भव हो, कार्यकर्ता गोष्ठी हर स्थान पर कार्यक्रम के पूर्व या टोली रवाना होने के पूर्व अवश्य रखी जाए ताकि भविष्य का अनुयाज-प्रक्रिया को गतिशील किया जा सके।
विस्तार से व्यवस्था-निर्देश हेतु 1 अक्टूबर के पाक्षिक (प्रज्ञा अभियान) के पृष्ठ दो को पढ़े प्रत्येक आयोजक मण्डल को इस आशय के पत्र भी अलग से भेजे गये हैं। सभी को यह पत्र, यह लेख एवं पाक्षिक के संपादकीय पढ़ कर सुनाएँ एवं तदनुसार ही अपनी रीति-नीति बनाएँ। सभी को दीपावली के उजासपर्व की भावभरी मंगल कामनाएँ।
*समाप्त*