क्रान्ति के बीज किसी एक महान विचारक के दिमाग में जमते हैं। वहाँ से फूल-फलकर क्रान्तिधर्मी साहित्य के रूप में बाहर आते हैं और संक्रामक रोग की तरह अन्य दिमागों में उपज कर बढ़ते हैं सिलसिला जारी रहता है। क्रान्ति की उमंगों की बाएं आती है। सब ओर क्रान्ति का पर्व मनने लगता है। चिनगारी से आग और आग से दावानल बन जाता है। बुरे-भले सब तरह के लोग उसके प्रभाव में आते हैं। कीचड़ और दलदल में भी आग लग जाती है।
ऐसे में नियति का नियन्त्रण करने वाली अदृश्य सत्ता परिवर्तन के क्रान्तिकारी आवेग से भरी प्रतीत होती है। वेदमाता, आद्यशक्ति समूचे विश्व को अपने हाथों में लेकर उसे नया रूप देने का संकल्प लेती है। तोपों की गरज, फौजों के कदमों के धमाके, बड़े बड़े सत्ताधीशों के अधःपतनों और समूचे विश्व में व्यापक उथल-पुथल के शोरगुल से भरे ये क्रान्ति के समारोह हर ओर तीव्र विनाश और सशक्त सृजन की बाढ़ ला देते हैं क्रान्ति के इस पर्व में दुनिया को गलाने वाली कढ़ाई में डाल दिया जाता है और वह नया रूप, नया आकार लेकर निकल आती है। महाक्रान्ति के इस पर्व में ऐसा बहुत कुछ घटित होता है। जिसे देखकर बुद्धिमानों की बुद्धिमत्ता चकरा जाती है और प्राज्ञों की प्रज्ञा हास्यास्पद बन जाती है।
वर्तमान युग में विचार-क्रान्ति के बीजों को परमपूज्य गुरुदेव ने अपने क्रान्तिधर्मा साहित्य के माध्यम से जनमानस की उर्वर भूमि में बड़े यत्न से बोया है। वन्दनीया माता जी के साथ सतत् तप करके इन्हें अपने प्राणों से सींचा है। इसके चमत्कारी प्रभावों से क्रान्ति की केसरिया फसल लहलहा उठी है। परिवर्तन की ज्वालाएँ धधकने लगी हैं। क्रान्ति के महापर्व की उमंगों की थिरकन चहुँओर फेल रही है। ये वही महान क्षण है।, जब भारतमाता अपनी ही सन्तानों के असंख्य आघातों को सहते हुए असह्य वेदना और आँखों में आँसू लिए अपना नवल सृजन करने को है।
अपने समय की इस महाक्रान्ति के लिए समर्पित युगसैनिक अपना धैर्य न खोएँ और न ही निराशा से अपनी आत्माओं को अभिभूत और हतोत्साहित होने दें। देवत्व और असुरता के इस महासंग्राम में जो हमारा नेतृत्व कर रहा है, वह स्वयं सर्वशक्तिमान महाकाल है। कालपुरुष, युगात्मा स्वयं इस क्रान्ति महोत्सव को सम्पन्न करने के लिए उठ खड़ा हुआ है। उसके प्रभाव, शक्तिमत्ता और अप्रतिरोध्यता को कौन रोक सकता है ? वह तो केवल उस तिमिर का नाश कर रहा है, जो मानवता को अनेक रूपों से आक्रान्त किए हुए है। जो होने जा रहा है, उस उज्ज्वल भविष्य का तो वह सृजन कर रहा है।
गुरुपूर्णिमा से प्रारम्भ होकर आगामी वसन्त पर्व तक प्रत्येक मास की पूर्णिमा को शान्तिकुँज में आयोजित महाक्रान्ति के सप्त विशिष्ट संवर्ग समारोह युग सेनानियों की चेतना में महाकाल के दिव्यप्रकाश के अवतरण के लिए हैं। उन्हें यह चेताने के लिए हैं कि इस क्रान्ति के पर्व में हृदय मूर्छित न होने पाए और न ही उदासी छाए तथा कोई अदूरदर्शी उत्तेजना भी न हो। हमारी भयंकर परीक्षा का समय है। मार्ग सरल नहीं होने का, मुकुट सस्ते में नहीं मिल जाएगा। भारत मौत के साए की घाटी से, अंधकार और यंत्रणा के घोर संत्रास से गुजर कर ही इक्कीसवीं सदी में विश्वगुरु बनने का गौरव प्राप्त करेगा। क्रान्ति के इस पर्व पर पहली अपेक्षा साहस की है, ऐसे साहस की जो पीछे हटना बिल्कुल न जानता हो। क्रान्ति के इन संवर्ग समारोहों में शामिल होने वाले ऐसे साहसी व्यक्ति ही क्रान्तिवीरों का गौरव प्राप्त कर करेंगे।
श्रद्धा क्रान्ति का मूल तत्व है। यह उस आस्था का नाम है जो उत्कृष्ट आदर्शवादिता को अत्यधिक प्यार करे और उस स्तर के चिन्तन तथा कर्तृत्व के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने में आनन्द अनुभव करें श्रद्धा अन्तःकरण की श्रेष्ठतम उपलब्धि है। इसका जहाँ जितना अंश स्फुरित होता है, उतना ही महानता दृष्टिगोचर होती है। उतने ही अंशों में आदर्शवादी चिन्तन की तरंगें उमगने लगती हैं, उत्कृष्ट क्रिया-कलाप स्वयमेव पनपने लगते हैं। इसी उपलब्धि के सहारे सामान्य परिस्थितियों में जन्में पले व्यक्ति भी ऐतिहासिक महामानवों की भूमिका निभाते और विश्वनिर्माण में असाधारण योगदान देते हैं।
क्रान्ति के प्रेरक एवं प्रवर्तक जन-जन के अन्तःकरण में इसी श्रद्धातत्व को जाग्रत करके आदर्शवादी चिन्तन एवं क्रिया-कलापों का तूफान खड़ा करते हैं। प्रज्ञावतार से उत्पन्न युगान्तरीय चेतना की विशेषता यही है कि अनायास ही जन-जीवन के अंतःकरण में मुरझाए और सूखे पड़े श्रम के बीज अंकुरित हो। श्रद्धा का समुद्र हिलोरें लेने लगे, ताकि उनकी अन्तःप्रेरणा वह कार्य कर सके जो सामान्य व्यक्ति के लिए सामान्य परिस्थितियों में सम्भव नहीं होता। असम्भव को सम्भव बना देने वाला अवतार प्रक्रिया का यह चमत्कार श्रद्धा के बलबूते ही बन पड़ता है।
रावण का आतंक दसों दिशाओं में संव्याप्त था। उसके विरोध-प्रतिरोध की बात कोई सोचता तक न था। उसके विरोध-प्रतिरोध की बात कोई सोचता तक न था। इतने दुर्दान्त दानव परिवार की शक्ति-सामर्थ्य का अनुमान लगाने वाले बेतरह निराशा और भयभीत हो जाते थे। अनीति सहते-सहते मरते तो असंख्य थे, पर लड़ते हुए मरने का साहस किसी में भी जगता न था। सीता अपहरण जैसी हृदयद्रावक घटना हो गयी, पर उन दिनारें के महाबली कहे जाने वाले आदर्शपरायण श्रद्धा के अभाव में चुप खड़े रहे । ऐसे आतंक को चीरते हुए अशिक्षित और अनगढ़ समझे जाने वाले रीछ-वानरों की भावनाएँ उमड़ी और वे प्रत्यक्ष मरण के लिए प्राण हथेली पर लेकर चल दिए। जन-श्रद्धा ने जनक्रांति का रूप ले लिया । अन्य प्राणियों पर भी प्रभाव पड़ा। गिद्ध ने श्रद्धा अतिरेक में प्रत्यक्ष काल से लड़ने में सम्भावित मरण का उल्लासपूर्वक वरण किया। गिलहरी उस धर्मयुद्ध में सहायता करने के लिए बालों में भर-भर कर बालू लाई। घटनाएँ अत्यधिक महत्व की भले ही न हों, पर एक तथ्य स्पष्ट होता है कि आतंक को चीरते हुए जब जन-श्रद्धा समग्र क्रान्ति का बिगुल बजा दे तो समझना चाहिए कि कोई दैवीचेतना कार्य कर रही है और परिवर्तन अब दूर नहीं है।
कृष्णकाल में इन्द्र के आतंक से वज्र जलमग्न हुआ जा रहा था। सामान्य बुद्धि भाग खड़े होने के अतिरिक्त और कोई उपाय सोच ही नहीं सकती थी। असम्भव को सम्भव बनाने वाली श्रद्धा का ज्वार उभरा। ग्वाल-बाल शिला-खण्ड को दूर-दूर से समेट कर हाथ और लाठियों के सहारे लाने लगे। विशालकाय बाँध बना। बाढ़ और वर्षा से होने वाली हानि टली। इन्द्र हारा, मनुष्य जीता। असम्भव लगने वाला कार्य सम्भव हुआ। सामान्य क्षुद्रबुद्धि इस प्रकार के दुस्साहसों में अनर्थ होने का ही निष्कर्ष निकलती है और ऐसे झंझट में उलझने से दूर रहने का ही परामर्श देती है। इसके विपरीत महान उद्देश्य के लिए, जोखिम भरे दुस्साहस के लिए, कटिबद्ध हो जाना असाधारण आदर्शवादिता का ही काम है। ऐसी प्रेरणा श्रद्धा के अतिरिक्त और कोई नहीं दे सकता।
दुर्योधन के पास राजशक्ति और साधनशक्ति असीम थी। पाण्डव अज्ञातवास में जान बचाते फिर रहे थे। कोई सहायक न था। सहायता करने में किसी को अपनी खैर नहीं दिखती थी। पाण्डव अपने बूते न सेना खड़ी कर सकते थे, न शस्त्र जुटा सकते थे। ऐसी दशा में निरीह पाण्डवों का कौरवों की अनीति से लड़ना सम्भव न था। फिर भी असम्भव सम्भव हुआ। न्यायपक्ष के समर्थन में महाभारत रचा गया और उसमें पराजय की सम्भावना को समझते हुए भी असंख्यों आदर्शवादी धर्मयुद्ध लड़ने के लिए जा पहुँचे। जनश्रद्धा एवं जन-भावनाओं के बल पर पाण्डवों ने साधनहीन होते हुए भी साधनों की विपुलता को पछाड़ा। इससे श्रद्धावानों की साहसिकता देखते ही बनती है। यह चमत्कार मात्र युगावतार के द्वारा लाए गए जनश्रद्धा के उफान से ही सम्भव है।
बुद्धकाल के दुर्दिन में जन-मानस को कुत्साओं और कुण्ठाओं ने बेतरह पाप-पंक में डुबो रखा था। पुरोहित वर्ग इस अनाचार का मूर्धन्य मार्गदर्शन कर रहा था। ऐसी दशा में विचार-क्रांति का शंख-नाद दुहरे संकट से भरा था। वातावरण की प्रतिकूलता में समर्थकों और सहयोगियों की सम्भावना क्षीण थी। विपक्षियों का निहित स्वार्थों में आँच आने से क्रुद्ध होना और घातक आक्रमण करना स्वभाविक था। ऐसे घोर निराशा भरे वातावरण में परिस्थितियों को उलट देने वाला उभार जनश्रुति से ही उमड़ा। एक अप्रत्याशित जन-क्रांति का सूत्रपात हुआ। श्रद्धावानों ने बुद्ध के अभियान में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने का संकल्प किया। लाखोँ लोग सुख-सम्पदा को लात मारकर चीवर धारी परिव्राजक बने। सम्पन्नों से लेकर निर्धनों तक में श्रद्धा का ज्वार उमड़ पड़ा। हर किसी ने स्थिति के अनुसार उनका सहयोग किया। न जनशक्ति की कमी रही न धनशक्ति की। श्रद्धा प्रेरित आदर्शवादी पराक्रम आँधी-तूफान की तरह उफनता चला गया और प्रतिकूलताएं इस प्रकार अनुकूल होती चली गयीं, मानों मनुष्य को निमित्त बनाकर भगवान ने सारा विधान पहले से ही रचकर तैयार रखा हो।
गाँधी युग में भी श्रद्धा का ऐसा ही चमत्कार हुआ अँग्रेजों की समर्थता और कुशलता पहाड़ जितनी ऊँची थी। उनके राज्य में सूर्य अस्त नहीं होता था। युद्ध-कौशल में वे अपना सानी नहीं रखते थे। निहत्थे मुट्ठी भर सत्याग्रहियों की टोली उनका कुछ बिगाड़ सकेगी, इसकी आशा-अपेक्षा किसी को भी न थी। हजार वर्ष की गुलामी से अस्त-व्यस्त जन-समुदाय में ऐसा साहस भी न था कि इतने सशक्त विपक्ष के साथ लड़ मरने के लिए अभीष्ट त्याग-बलिदान का परिचय दे सके। ऐसी निराशाजनक परिस्थितियों में जन-श्रद्धा का एक अप्रत्याशित उभार उमड़ा है। स्वतंत्रता संग्राम ठना और अन्ततः विजयी होकर रहा। राष्ट्रीय भावनाओं से भरे हुए जन-साधारण ने उस संदर्भ में जिस पराक्रम का परिचय दिया, वह अवर्णनीय है।
नवयुग के अवतरण में भी उसी परम्परा का निर्वाह होने जा रहा है । श्रद्धा इन दिनों युगशक्ति बनकर प्रकट हो रही है। जनभावनाएँ महाकाल के इंगित पर आदर्शवादी दुस्साहस को अपनाने के लिए उतारू है। युगावतार परमपूज्य गुरुदेव ने इस महाक्रान्ति को स्पष्ट करते हुए कहा था- बलिष्ठता शरीर की, बुद्धिमत्ता मस्तिष्क ओर श्रद्धा अन्तरात्मा की शक्ति है। यही चेतना क्षेत्र की सर्वोपरि क्षमता है। श्रद्धा ही मनुष्य को अनन्त सामर्थ्य प्रदान करती है। उत्कृष्टता को व्यवहार में उतारने वाला दुस्साहस उसी उद्गम से प्रस्फुटित होता है। जिन्हें श्रद्धा की जितनी मात्रा मिल सकी, उन्होंने उतने ही उच्चस्तरीय, उतने ही सुविस्तृत महान कार्य सम्पन्न किए हैं। अपने युग की यह महाक्रान्ति भी श्रद्धावानों के बलबूते ही सम्पन्न होगी।
युग परिवर्तन बड़ा काम है। लोक-मानस को अवाँछनीयता से विरत करके उत्कृष्टता से प्रति भाव-विभोर हो उठने की स्थिति को समष्टि व्यक्तित्व का कायाकल्प ही कहा जा सकता है। यह बड़ा काम है, इसके लिए बड़ी शक्ति चाहिए। चेतना को प्रभावित करने वाली शक्ति एकमात्र श्रद्धा ही हैं इसी को गँवा बैठने से अपने समय में दुर्दशाग्रस्त होना पड़ा है। श्रद्धा का संवर्द्धन ही प्रकारान्तर से नवयुग का अवतरण है। जनसमुदाय में श्रद्धा का अतिरेक ही आदर्शवादी परंपराओं को स्थापित करने वाला जन-क्रान्ति का विस्तार करेगा और इक्कीसवीं सदी इस क्रान्ति के प्रेरक-प्रवर्तक एवं अनुगामियों को उज्ज्वल भविष्य का वरदान देने वाली सिद्ध होगी।
हम जिस युग में जी रहे हैं, परम पूज्य गुरुदेव इसे अनास्था-युग कहते थे। अनास्था का सीधा अर्थ आध्यात्मिक, धार्मिक एवं नैतिक मान्यताओं पर श्रद्धा न रखना-एक प्रकार की नास्तिकता। परम पूज्य गुरुदेव ने अनास्था की परिभाषा को बहुत व्यापक बनाया और आज की परिस्थितियों के अनुरूप तर्क, तथ्य एवं प्रमाण देकर इस मान्यता को व्यक्ति एवं समाज की सबसे बड़ी हानि बताया। व्यक्तिगत जीवन में अनास्था का अर्थ शरीर को जड़प्रकृति परमाणुओं का खेल मानना और इन्द्रियों को अधिकतम सुखोपभोग की छूट देना है। इसी प्रकार संसार को भी बादलों की तरह बनने वाले चित्र-विचित्र दृश्य मानना ओर जो जितना शक्तिशाली है, उसे उतना ही खुलकर शोषण की छूट देना । इस मान्यता में न तो कहीं ईश्वर के लिए स्थान बचता है, न ही मानवीय संवेदना और कर्मफल के लिए। यह स्थिति अब तक यथावत् हैं।
परमपूज्य गुरुदेव ने बताया-एक साधारण-सी मशीन भी जब किसी न किसी उद्देश्य के लिए बनती है, तो ऐसी मशीन जो 600 खरब कोशिकाओं से बनी हो, इन कोशिकाओं के दृव्य को खींचकर समूचे ब्रह्माण्ड को नाप लेने जितना लम्बा किया जा सकता हो, जिसके मस्तिष्क में 14 अरब पाँच लाख ज्ञानतंतु हों ओर 20 अरब पृष्ठों का ज्ञान अपने भीतर समाहित रख सकते हों, जिसकी मोटर लगातार बिना रुके एक सौ वर्ष तक चलते रहने की क्षमता रखती हो तथा जिसके मस्तिष्क में, वैज्ञानिक आर्डिस व्हिटमैन के लेख ‘व्हाट इज दि लिमिट ऑफ योर माइन्ड’ के अनुसार-केवल 3 पिंट (1 पिंट = 1 1/2 पाव वजन) भाग में अब तक पृथ्वी में उपलब्ध भी और प्रस्तावित भी सम्पूर्ण विद्युतशक्ति विद्यमान हो, उस मशीन-शरीर का कुछ तो बड़ा उद्देश्य होना चाहिए।
इसी तरह वैज्ञानिकों के हवाले से उन्होंने विराट् ब्रह्माण्ड के अविज्ञात रहस्यों और नैतिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन करके विश्वव्यापी संकल्प-सत्ता परमात्मा का प्रतिपादन किया। परमपूज्य गुरुदेव ने इस तरह के दृष्टान्तों से व्यक्तिगत अनास्था को श्रद्धा में, अनुशासन में और विश्व-व्यवस्था को ईश्वरीय विश्वास में बदला। दुनिया में युगनिर्माण मिशन अकेला आन्दोलन है जिसने अशिक्षितों से लेकर उच्च शिक्षित बुद्धिवादियों तक को अध्यात्म से जोड़ दिया, इस श्रद्धा और विश्वास को आत्मबोध से जोड़ने के लिए उन्होंने लोगों को सद् चिन्तन की आधारभूत और परमात्मा की अभिव्यक्त सत्ता गायत्री और सत्कर्म के मूर्तिमान स्वरूप यज्ञ से जोड़ दिया। नास्तिक संसार को आस्तिक संसार में बदलने का सृष्टि के आविर्भाव से लेकर अब तक यह सब बड़ा उपक्रम है, विराटतम, महानतम आँदोलन है।
कोई भी मान्यता जब तक अभ्यास में नहीं परिवर्तित होती, तब तक उसमें स्थायित्व नहीं रहता। फिर श्रद्धा और विश्वास तो एकाँगी होते हैं। ऐसे लोग आत्म-कल्याण तक सीमित रह जाते हैं। अंतःकरण का एकान्त उन्हें व्यवहार में भी एकान्तवादी बनाता है। वह नीव कन्दराओं, जंगलों की ओर भागता है। इससे न तो संसार चलता है ओर न सांस्कृतिक सौंदर्य निखरता है। इसलिए परमपूज्य गुरुदेव की चतुराई देखिए कि उन्होंने श्रद्धा को समर्पण से जोड़ा, भले ही वह समाज की सेवा के लिए एक घंटा समय और दस पैसे प्रतिदिन अंशदान जितना छोटा ही क्यों न रहा हो।
विराट गायत्री परिवार और उसका विश्वव्यापी किया क्षेत्र इस समर्पण साधना का ही चमत्कार है। इसकी विधिवत् शुरुआत परमपूज्य गुरुदेव ने पहली बार 1954 के नरमेध से की थी। उन्होंने उस समय के अधिकतम एक हजार रहे अखण्ड-ज्योति के पाठकों से विश्व के लिए आत्मनिर्माण हेतु नरमेध अर्थात् समाज-सेवा के लिए नचिकेता और शतमन्यु की तरह सम्पूर्ण समर्पण का आग्रह किया था। यह परमेध या उस समय का एक अद्भुत कौतुक था, पुरातन मान्यता के अनुसार इसे मनुष्यों की बलि माना गया था और उसे देखने के लिए सारी मथुरा उमड़ पड़ती थी। तब टूटे-टाटे कुल 27 व्यक्ति मिले थे। परम पूज्य गुरुदेव ने उन्हीं से तात्कालिक प्रशिक्षण और व्यवस्था कार्यों का संचालन किया था। आज की तुलना में कह नहीं सकते यह उपलब्धि कितनी नगण्य रही होगी, पर लाखों फल देने वाला आम का वृक्ष भी तो प्रारम्भ में चार अंगुल का ही होता है ? इसलिए उसे नगण्य कहना भूल होगी।
दिसम्बर 1954 में परमपूज्य गुरुदेव ने वेद पारायण यज्ञ, रुद्र यज्ञ, विष्णु यज्ञ, शतचंडी यज्ञ, नवग्रह यज्ञ, महामृत्युँजय यज्ञ, गणपति यज्ञ, सरस्वती यज्ञ, अग्निष्टोम, ज्योतिष्टोम आदि दस यज्ञों की घोषणा की और उनकी व्यवस्था और संचालन के लिए पुनः समयदान माँगा तब उन्हें कुल 14 व्यक्ति मिले। अप्रैल 56 में साँस्कृतिक सेवा-शृंखला के लिए पूज्य गुरुदेव ने पुनः आत्मदान की अपील की तब 20 लोग मिले। फरवरी 1957 में उनके नाम भी प्रकाशित हुए थे। यह बात अलग है कि इनमें से अधिकाँश लोगों की निष्ठा निर्बल थी, अतः लोग आते-जाते रहे, पर परमपूज्य गुरुदेव व वंदनीया माताजी द्वारा एकाकी खींचे जा रहे रथ-चक्र को धीरे-धीरे आगे धकेलने में सहायक बने रहे।
आयोजन छोटे रहे हों, बड़े या मध्यम, अखण्ड-ज्योति के लेख रहे हों या बौद्धिक प्रवचन, पूज्य गुरुदेव ने अपनी याचना कभी बंद नहीं की। फलतः 1958 के हजार कुँडी या में नैष्ठिक स्तर के चार समर्पित आत्मदानी परमपूज्य गुरुदेव को मिले, जिन्हें गुरुदेव ने पुत्रवत् स्नेह दिया, प्रशिक्षण दिया। अधिकार दिए और उन्हें अपने समान कार्यक्षेत्र में उतारा। यह वह समय था जब एक साथ चार-चार पत्रिकाएँ प्रकाशित हुई। गायत्री परिवार की 2400 शाखाएँ स्थापित हुई न केवल सारे देश भर में यज्ञों की ऐसी व्यापक शृंखला चलाई गई, अपितु अंधविश्वास पशुबलि व दहेजप्रथा आदि के विरुद्ध तीव्र संघर्षात्मक मोर्चे खोले गये और उनमें गायत्री परिवार को अभूतपूर्व सफलता मिली। मिशन की साख निरंतर बढ़ती गई। यहाँ यह न बताना भूल होगी कि समर्पण की श्रेणी में आने वाले वह समयदानी अब तक हजारों की संख्या में बढ़ रहे थे, जो अपने घर-परिवार और क्षेत्र में रहकर गायत्री का प्रचार-प्रसार करते थे, यज्ञ कराते थे, पत्रिकाएँ बाँटते थे, ज्ञान मंदिरों के माध्यम से परमपूज्य गुरुदेव की तब की लिखी छोटी-छोटी पुस्तकें उसी भक्तिभाव से लोगों को पढ़ाते थे, जिस तरह किसी जमाने में भारतवर्ष जैसे सर्वथा अशिक्षित और अँग्रेजी बिलकुल न समझने वालों को टूटी-फूटी हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के सहारे अच्छे-अच्छे पदाधिकारी ईसाई अंग्रेज हिन्दी में अनूदित ईसा संदेश, लूका, यूनान मसीह और मरकुस घर-घर जाकर पढ़ाते थे। यदि उनकी इस तप-साधना से भारतवर्ष का एक बड़ा भाग ईसाई धर्म में दीक्षित हो सकता है तो अपने ही देश के लोगों में अपनी ही भाषा में अपने ही लोगों द्वारा फैलाया गया मिशन किसी तरह मजबूत जड़ें जमा पाया, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है।
परमपूज्य गुरुदेव ने समयदान की इस परम्परा को अनेक विधि-प्रशिक्षणों से जोड़कर और आगे बढ़ाया। जुलाई 64 में एक माह का गीता प्रशिक्षण रखा गया। उसमें भाग लेने वालों ने गीता कथा के माध्यम से युगनिर्माण मिशन का विस्तार किया। अक्टूबर 64 में मथुरा गायत्री तपोभूमि में बने हॉल का निर्माण भी समयदानियों के श्रमदान से हुआ। अगले ही वर्ष 1, 3 अथवा 5 सदस्यों द्वारा युगनिर्माण योजना प्रतिनिधि समितियों का संगठन हुआ। 1965 में लेखक और धर्मप्रचारक प्रशिक्षण शिविर सम्पन्न हुए, इससे एक नया मोर्चा खुला। इसी वर्ष जून में पहली बार पूज्य गुरुदेव ने लोगों से प्रतिदिन एक घंटा समय और एक आना (तब इकन्नी, दुअन्नी आदि सिक्कों का प्रचलन था।) अंशदान की अपील की, जो अद्यतन एक घंटा समय और 20 पैसे अंशदान के रूप में चल रही है और उसे ‘ज्योमेट्रिकल प्रागेशन’ की तरह एक से दो, दो से पाँच, पाँच से पच्चीस के रूप में बीजगणित की विशेष प्रक्रिया की तरह मिशन का विस्तार हो रहा है।
1965 में युगनिर्माण विद्यालय की पूज्य गुरुदेव ने स्थापना की, उसका कक्ष राजा महेन्द्र प्रतापसिंह द्वारा स्थापित प्रेम महाविद्यालय की तरह था, जिसमें लोगों को दरियाँ, गलीचे बुनना सिखाया जाता था, पर भीतर-भीतर वह स्वाधीनता सैनिक प्रशिक्षित करने का अड्डा था, आशा की गई थी कि इस विद्यालय से निकले बालक जहाँ भी रहेंगे ध्रुव तारों की तरह मिशनरी आदर्शों, सिद्धान्तों और कार्यक्रमों का प्रचार करेंगे। 1966 में वानप्रस्थियों और प्रबुद्धजनों के प्रशिक्षण शिविर सम्पन्न किए गये, लक्ष्य एक ही था। परमपूज्य गुरुदेव ने 1966 में ही 5 वर्ष बाद के परिवर्तन की घोषणा कर दी थी, भले ही उन्होंने स्पष्ट न किया हो, परन्तु शांतिकुंज का विचार बीज उसी समय का है जिसमें परमपूज्य गुरुदेव ने औरों के साथ-साथ अपनी मथुरा से विदाई के साथ अपना भी सम्पूर्ण समर्पण आत्मदान कर दिया। उसके बाद तो सारा संसार ही उनका परिवार बन गया। इस 5 वर्ष की अवधि में भी गायत्री तपोभूमि, मथुरा में लोगों के आने का क्रम जारी रहा। उन्होंने जब तपोभूमि छोड़ी तो उसे सँभालने वाले प्रायः पचास आत्मदानी वहाँ आकर व्यवस्थित रूप से बस गए थे।
समयदान और आत्मदान का व्यवस्थित स्वरूप परमपूज्य गुरुदेव ने शांतिकुंज में निखारा। तीन किश्तों में अब तक शान्तिकुँज के ब्राह्मणोचित आजीविका और लार्जर फेमिली के सिद्धान्तों पर कार्य करने वालों की संख्या प्रायः तीन सौ हो गयी और तीन माह से लेकर 5 वर्ष तक का समयदान करने वाले स्वयंसेवकों की संख्या प्रायः 4 सौ है। अपने आप में यह अनोखी टाउनशिप है। जिसे समाज व्यवस्था का एक अनुपम आदर्श माना जाता है।
शान्तिकुँज से जुड़े तंत्र की क्षमता का अनुमान करना हो तो शान्तिकुँज की 25 वर्षों की गतिविधियों और इस अवधि में यहाँ आये प्रत्येक व्यक्ति से कराये गये समयदान संकल्प से किया जा सकता है ? यों 1971 में स्थापनाकाल में यहाँ आकर 3640 लोगों ने विधिवत समय व श्रमदान किया 1972 में अनुदान सत्र में 4218 परिजन आये। शिविरों की विधिवत् शृंखला प्राण-प्रत्यावर्तन सत्रों के रूप में 1973 से प्रारम्भ हुई, जिसमें 3416 ने भाग लिया। 1982, 85 के अनुदान सत्रों में क्रमशः 4088 तथा 3519 श्रद्धालु आये। इन दो वर्षों को छोड़कर 1976 से लेकर 1976 की अवधि में क्रमशः 3110, 2242, 1137, 1814, 5530, 6695, 8010, 12052, 23355, 24483, 14417, 14820, 23096, 18078, 18299 तथा 37111 श्रद्धालुओं ने 9 दिवसीय साधना सत्र सम्पन्न किए और समयदान, अंशदान के संकल्प पत्र भरे। 1978, 79 में संपन्न एकमासीय चान्द्रायण सत्रों में 1500 व 1380 लोगों भाग लिया। 1971, 1980 तथा 1991 के जातीय सम्मेलनों में क्रमशः 10310, 6220 तथा 9454 लोग आये। 1983 के कल्पसाधना सत्र में 2118 तथा 1990 के श्रद्धाँजलि समारोह में आगंतुकों की संख्या 488237 ओर 1971 से 1996 तक अतिथियों के रूप में आए परिजनों की कुल संख्या 912128 है। स्पष्ट मान लें कि यहाँ अतिथियों का केवल भोजन-आवास से सत्कार भर करने की परम्परा नहीं है, उन्हें राष्ट्र और समाज के निर्माण में कुछ न कुछ हाथ बँटाने के लिए अनिवार्य रूप से संकल्पित होना पड़ता है।
जिन्होंने युगनिर्माण मिशन को समर्पित सेवाएँ ही देने की प्रतिज्ञा की और वर्ग शिविरों में भाग लिया, यह संख्या इनके अतिरिक्त है। इनमें प्रथम वह परिव्राजक हैं, जिन्होंने 10 दिन का प्रशिक्षण लिया और क्षेत्रों का काम सँभाला। 1974, 75, 76 तथा 79 में इनकी संख्या 2988,3820, 2630 तथा 800 थी। 1975 में रामायण प्रशिक्षण लेकर 2700 लोगों ने श्रीराम कथा के माध्यम से मिशन की सेवा का व्रत लिया। 1971 में 2000 लोग प्रशिक्षित होकर शक्तिपीठों में गये और इस मिशन द्वारा स्थापित 4000 शक्तिपीठों के संचालन में योगदान दे रहे हैं। शक्तिपीठों की अपनी व्यक्तिगत व्यवस्था के अंतर्गत काम करने वाले इससे अलग है। औसत 5 ट्रस्टियों की संख्या मानें तो अकेले सेवाएँ देने वाले ट्रस्टीगण ही 20 हजार हैं, जो शक्तिपीठों के माध्यम से युगनिर्माण कार्यों में जुटे हैं दस-दस की संख्या के चालीस हजार प्रज्ञामंडल इससे अलग हैं। 1980, 81 में ऐसे ही 1100 तथा 610 परिव्राजक निकले। परमपूज्य गुरुदेव के लिखे चार प्रज्ञापुराणों का 800 लोगों ने प्रशिक्षण लिया। 1983 वर्ष को छोड़कर शेष 1982 से लेकर 1996 तक केवल समयदान के उद्देश्य से ही 26906 लोगों ने प्रशिक्षण लिया और अब युगनिर्माण की अलख जगाने में लगे है। इसी सम्पूर्ण अवधि में शांतिकुंज से क्षेत्रों में छोटे-बड़े आयोजनों से लेकर बड़े कार्यक्रमों तक व्यवस्थित रूप से 46720 लोग प्रशिक्षित किए और कार्यक्षेत्र में उतारे गये। संगीत शिक्षा के माध्यम 1994 तथा 1917 में क्रमशः 175, 199 युवकों ने सेवाएँ दी। 1976, 77, 78, 79 में प्रतिमाह 140 महिलाएँ और इन्हीं प्रथम तीन वर्षों में 3 माह का प्रशिक्षण लेकर क्रमश 400, 550 तथा 480 महिलाएँ कार्यक्षेत्र में उतरीं और महिला जागरण अभियान को गतिशील किया। नियमित रूप से अखण्ड-ज्योति, युगनिर्माण योजना, युगशक्ति गायत्री सभी भाषाओं की पत्रिकाएँ थोक में मंगाकर ज्ञानदान देने वालों की संख्या भी प्रायः 25 हजार से अधिक है। ज्ञातव्य है कि इस पत्रिका को बाहर लाख से अधिक संख्या में ‘नो प्रोफिट नो लॉस’ की स्थिति में छाया जाता है। यह उपलब्धियाँ अपने आपमें एक सशक्त-समर्थ संगठन का पर्याय है। कल्पना की जाए यह सामर्थ्य युग बदलने में कितनी भूमिका निभा सकती है ?
भारत सरकार के पास निवृत्त होकर पेंशन भोगने वालों की संख्या इससे लाखों गुना अधिक है। परमपूज्य गुरुदेव ने हम लोकसेवियों को कभी कुछ नहीं दिया, मात्र उन्हें युगनिर्माण के इंजीनियर्स, युगशिल्पी, सृजन सैनिक, क्रान्तिदूत, युगनिर्माण सम्बोधनों से सम्मानित भर किया, पर सरकार चाहे तो अपने पेंशन भोगियों की राष्ट्र के पुनर्निर्माण कार्यक्रमों में लगाकर सारे देश का कायाकल्प कर सकती है। शायद कभी उसकी भी यह इच्छाशक्ति जाग्रत हो। एक काँग्रेसी स्वयंसेवक ने इतनी बड़ी जनक्रान्ति श्रद्धा-समर्पण के सहारे कर दी तो इतना बड़ा राजतंत्र कोई बड़ी क्रान्ति क्यों नहीं कर सकता ?
इस वर्ष हम स्वतंत्रता की पचासवीं सालगिरह मना हरे हैं। अकेले हम भारत में रहने वाले ही नहीं, सारे विश्व में एक अनूठे उत्साह के साथ इस वृहत गणतंत्र की यह पचासवीं वर्षगाँठ मनायी जा रही है। समस्त निराशाजनक परिणामों के बावजूद जो उपलब्धियाँ इस राष्ट्र की इस बीच रही हैं, उस पर सभी गणमान्य लेखकों ने टाइम, न्यूजवीक, द टाइम्स इंटरनेशनल, हेराल्ड, ट्रीब्यून, गार्जियन, इन्डिपेण्डेण्ट जैसी अन्तर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में तथा इण्डिया टुडे, फ्रंट-लाइन, पाँचजन्य जैसी भारत स्तर की पत्रिकाओं में बहुत कुछ आशाजनक भारत के बारे में लिखा है। संव्याप्त भ्रष्टाचार के बावजूद इस देश की माटी में सभी ने ऐसा कुछ पाया है कि वे इस देश को इक्कीसवीं सदी में सिरमौर की स्थिति में उभरता पाते हैं। निर्णायक दौर से गुजर रहे इस राष्ट्र में कोई तो ऐसी बात होगी जो सभी मूर्धन्यों को उज्ज्वल भविष्य का संकेत दे रही है। स्वयं राष्ट्र कवि श्री मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है-
सौ सौ निराशाएँ रहे, विश्वास यह दृढ़ मूल है। इस आत्म लीला भूमि को, वह विभु न सकता भूल है।
अनुकूल अवसर पर दयामय,फिर दया दिखलाएँगे। वे दिन यहाँ फिर आएँगे, फिर आएँगे, फिर आएंगे।
इस अथाह विश्वास के मूल में जहाँ मानस भवन में आर्यजनों से भद्रभावोद्भाविनी-उस भारती की आरती उतारने-नवयुग का स्वागत आयोजन करने के पीछे जन-चेतना जगाने का भाव है, वहाँ उस परमसत्ता पर अडिग विश्वास भी कि यह देश जो विश्वसंस्कृति का केंद्रबिंदु रहा है, आगामी ढाई-तीन वर्षों में निश्चित ही अपनी समस्याओं से उबर कर सबको मार्गदर्शन देने योग्य बन सकेगा। यह विश्वास स्वामी विवेकानन्द, श्री अरविन्द, सुभाषचन्द्र बोस के बाद हमें परमपूज्य गुरुदेव ने दिखलाया एवं कहा कि विभाजन से बँटे इस देश का दूसरा स्वातंत्र्य समर अभी लड़ा जाना है। चेतन के स्तर पर लड़ जाने वाले इस युद्ध में जाग्रत लोकशक्ति ही प्रमुख भूमिका निभाएगी। चैतन्य शक्तियों में सबसे बड़ी संघशक्ति है एवं आड़े समय में यही देवशक्तियों का समन्वय काम आता है एवं नगण्य से, असमर्थ से प्रतीत होने वाले व्यक्तियों से वह पुरुषार्थ करा लेता है, जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की जाती थी।
1990 में लिखे गए अपने अंतिम अमृत संदेशों में परमपूज्य गुरुदेव का चिन्तन आमूलचूल आशावादी मिलता है। यह वह समय था जब राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सभी स्तरों पर अराजकता का भयानक दौर था। किंतु पूज्यवर ने लिखा है कि - “हमारी युग-परिवर्तन की भविष्यवाणी के मूल में एकमात्र महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि यह है कि भावनाशील मनुष्यों का अधिकाँश समय पेट-प्रजनन की सीमित स्वार्थपरता में न खपेगा। उसका एक बड़ा अंश उस प्रगति के निमित्त लगेगा, जिसे आत्मिक आदर्शवादिता और भौतिक सुख-शान्ति के निमित्त बन पड़ने वाली सहकारिता कहा जा सकता है। इसे कठिन समझा जा सकता है, पर वस्तुतः वह ऐसा है नहीं। निर्वाह के निमित्त कुछ घण्टे लगा देना पूर्णतः पर्याप्त हो सकता है। इसके बाद जो कुछ बचता है, उसे दैवी–प्रयोजन के लिए लगाए जा सकने में क्यों किसी को अड़चन अनुभव होनी चाहिए। अभी तक प्रतिभावों ने अपना व्यक्तित्व पतन-पराभव के लिए लगाया है, उसका प्रतिफल सामने है-यदि यही प्रवाह उलट जाए और सदाशयता के निमित्त प्रयास सज्जनों की ओर से चल पड़े, तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य का सोया हुआ देवत्व फिर से न उभर पड़े।........ उलटे को उलट देने पर बात सीधी हो जाती है। ................ समय ईश्वरप्रदत्त ऐसी शक्ति है, जिसे जिस भी प्रयोजन के लिए लगाए जाए, वह उसी में सफलताओं के अम्बार लगा सकती है।” (वाङ्मय खण्ड 29/3.42)
इक्कीसवीं सदी की युग परिवर्तन योजना परमपूज्य गुरुदेव ने काफी पहले 1967 में आरम्भ कर दी थी। उसी का सघन तीव्रतम रूप 1988-89 में आया, जब बारह वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण की घोषणा की गयी। एक सुदृढ़ विश्वास के रूप में उन्होंने कहा कि-”इक्कीसवीं सदी की युग परिवर्तन योजना के अंतर्गत धर्मतंत्रों से लोक-शिक्षण की प्रक्रिया को ही प्रमुखता दी गयी है। परिष्कृत-प्रभावी संगठित धर्मतंत्र ही शासनतंत्र की गड़बड़ियों को संतुलित कर सकता है। अब यह घोषणा देश-विश्व के कोने-कोने में की गयी है कि सन् 1990 से 2000 के बीच दस वर्षों में जन-जाग्रति का, लोकमानस के परिमार्जन का लक्ष्य पूरा कर लिया जाएगा।”
जिस शाँतिकुँज की रजत जयंती हम ना रहे हैं, उसकी उपलब्धियों पर सभी को आश्चर्य होता है, किंतु इसके मूल में एक ऋषिसत्ता का संकल्प ही है जो उपर्युक्त पंक्तियों में अपने प्रखरतम 3 रूप में सामने दिखाई पड़ता है। स्वतंत्रता संग्राम के निमित्त अपना सब कुछ लगा देने वाले एक छोटे-से स्वयंसेवक के रूप में कार्यरत श्रीराम ‘मत्त; (आचार्य श्रीराम शर्मा-हमारे आराध्य गुरुदेव) ने अपने अंतः करण में अवतरित युगनिर्माण की स्फुरणा को आकुलता में बदला एक सुनिश्चित दिशाधारा बनायी एवं उसी क्राँतिकारी तूफान का प्रथम दिग्दर्शन सर्वविदित, बहुचर्चित युगनिर्माण सत्संकल्प में कराया। यही गायत्री परिवार रूपी विराट मिशन का, अभियान का प्रथम प्रीत दर्शन है- नवयुग का मैनिफेस्टो है- संविधान है। इस अभियान के उसके बाद की अब तक की 35 वर्षों की यात्रा सत्संकल्प की विकास-विस्तार यात्रा है। विचारपूर्ण निश्चय, दृढ़ता के साथ जब कर्मनिष्ठा के साथ जुड़ते हैं तो उनकी गतिशीलता आँधी-तूफान की तरह होती है-यह पूज्यवर की, मिशन की अब तक की प्रगति के विषय में अभिव्यक्ति है।
1990 में घोषित लक्ष्य की पूर्ति का प्रथम चरण श्रद्धाँजलि समारोह में पूरा हुआ। जब लाखों व्यक्तियों ने अपने इस आराध्य के संकल्पों को पूरा करने के लिए अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित किए। अक्टूबर 1990 में सम्पन्न इस आयोजन के बाद स्थान-स्थान पर गायत्री महामंत्र के अखण्ड जप कार्यक्रम सम्पन्न हुए एवं पुनः जून 1992 में हरिद्वार सप्तसरोवर की पुण्यस्थली में एक विलक्षण ‘शपथ समारोह’ संपन्न हुआ, जिसमें परमपूज्य गुरुदेव की जन्मभूमि की पावन माटी हाथ में लेकर एक लाख से अधिक कार्यकर्त्ताओं ने अपने न्यूनतम 1 माह व अधिकतम 3 माह से एक वर्ष के समयदान की घोषणा की। परमवंदनीया माताजी के द्वारा इसी के साथ-साथ देव संस्कृति दिग्विजय के निमित्त भारत व विदेश में सत्ताईस आश्वमेधिक पुरुषार्थ सम्पन्न करने के संकेत दिए गए। नवम्बर 1992 का ‘अखण्ड-ज्योति’ विशेषांक इसी निमित्त प्रकाशित हुआ था। इसके अतिरिक्त जून, जुलाई, अगस्त 1992 के ‘अखण्ड-ज्योति’ के विशेषाँक भी भारतीय संस्कृति, देव-संस्कृति, विश्व-संस्कृति के विभिन्न आयामों पर केन्द्रित हो प्रकाशित हुए । नवम्बर 1992 में जयपुर (राजस्थान) से आरम्भ हुआ आश्वमेधिक यज्ञ अभियान ग्रामतीर्थ स्थापना, ग्राम प्रदक्षिणा, जल-रजवंदन जैसे त्रिसूत्री अभियान के बाद विराट 1008 कुण्डी यज्ञायोजनों के रूप में आरम्भ हुआ, जिसमें प्रत्येक में न्यूनतम पचास हजार से एक लाख व्यक्तियों की समयदान व अंशदान की आहुतियाँ पड़ी-इससे प्रायः दस से पंद्रह गुना अधिक व्यक्तियों ने भावपूर्वक इनमें भागीदारी की। इस अभियान का प्रथम विराम 28 वें कार्यक्रम के रूप में युगसंधि महापुरश्चरण की प्रथम पूर्णाहुति के रूप में 3, 4, 5, 6, 7 नवम्बर 1995 की तारीखों में आँवलखेड़ा (आगरा) गुरु ग्राम में सम्पन्न विराट आयोजन के रूप में हुआ, जिसमें पचास लाख से अधिक परिजनों की भागीदारी रही। गुरुसत्ता के दिए गये निर्देश के अनुसार ही यह छह वर्ष में पहली पूर्णाहुति आयोजित की गयी थी, दूसरी अब 2000 से 2001 की अवधि में आयोजित है। इसी बीच 18 कार्यक्रम पूरे होने के बाद परमपूज्य गुरुदेव के साथ मिशन की बागडोर सँभालने वाली माता भगवती देवी, जिनके अजस्र स्नेह ने ही इस विराट अभियान को सींचा था, स्वयं को सूक्ष्म में विलीन कर अपनी आराध्य सत्ता के साथ एकाकार कर दिया (19 सितम्बर महालय श्राद्धारम्भ भाद्रपद पूर्णिमा 1994)। दोनों सत्ताएँ स्थूल में अलग होते हुए भी एक ही शाश्वत सत्ता का रूप थीं-हैं व रहेंगी। उनके महाप्रयाण के बाद सात अश्वमेध यज्ञ भारत में व दो विदेशों में (शिकागो-1995 तथा माँट्रियल 1996) पूर्णाहुति के बाद सम्पन्न हुए, एवं प्रत्येक में समय-साधन-प्रभाव-पुरुषार्थ बढ़-चढ़ कर युगदेवता के चरणों में अर्पित हुआ।
1995-96 में अनुयाज-पुनर्गठन वर्ष के अंतर्गत ‘ग्रामे ग्रामे यज्ञ, गृहे-गृहे उपासना’ अभियान व संगठन को सशक्त बनाने की प्रक्रिया जोरों से चली एवं तत्पश्चात् विराट संस्कार महोत्सवों की शृंखला अक्टूबर 1996 से अल्मोड़ा से आरम्भ कर दी गयी, जिसके प्रथम सोपान की समाप्ति 25 कार्यक्रम के बाद अभी लंदन में में सम्पन्न हुए (9, 10 अगस्त 1997) विराट संस्कार महोत्सव-मल्टी प्रदर्शन के साथ हुई । अब अगला सोपान आरम्भ हो रहा है-अक्टूबर में एक साथ चार स्थानों पर सम्पन्न हो रहे विराट संस्कार महोत्सवों के रूप में, जो सतत् मई-जून 1998 तक चलते रहेंगे एवं सम्भावना है कि ऐसे 150 आयोजन छोटे-बड़े रूपों में तब तक सम्पन्न हो जाएँगे।
अब तक की प्रगति का अद्यावधि वर्णन इसीलिए किया गया है ताकि सभी गुरुसत्ता के 1990 में दिए गए ‘इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य’ के उद्घोष के प्रति आश्वस्त हो सके। अब इस अंक के लिखे जाने के साथ आजादी की इस पचासवीं वर्षगाँठ के बाद कुल 28 माह शेष रह गए हैं-सन् 2000 की बसंत पंचमी के पूर्व। इस सवा दो से ढाई वर्ष की अवधि में क्या कुछ होना है, कैसे करोड़ों व्यक्तियों को समय व साधनों को युगदेवता महाकाल के चरणों में अर्पित होना। इस प्रतिक्रिया को जानना-समझना बहुत जरूरी है ताकि कमर कसकर, समय तनिक भी न गँवाकर हम सभी इस पुनीत कार्य में जुट सकें।
कोई अपना समय-साधन किसी कार्य के लिए तभी देता है जब उसको उस कार्य की सिद्धि पर, संकल्पकर्त्ता की प्रमाणिकता पर सघन विश्वास-प्रगाढ़ श्रद्धा होती हैं मिशन की यह जड़ है। इसे समझे बिना इतने अधिक प्राणवान कर्मठों का सुनियोजित समयदान जो कि उनके रुटीन के कार्य के अतिरिक्त है, किसी की भी समझ में नहीं आ सकता। लोगों ने अपना समूचा जीवन दे दिया और उनकी शरण में अपना सब कुछ छोड़कर आ गए बिना किसी भविष्य की चिन्ता में, यह समीकरण लौकिक दृष्टि से विचार करने वालों की समझ में नहीं आएगा। अब सभी इस तथ्य को समझने लगे हैं कि यदि कभी कायाकल्प धरती का हुआ है, तो वह कभी भी संपदा-कौशल-समर्थता से नहीं, भाव-संवेदना का नाम ही विवेक युक्त श्रद्धा है। इसी श्रद्धा को केंद्रीय धुरी मानकर परमपूज्य गुरुदेव और विराट गायत्री परिवार खड़ा किया । एक लाख स्वयंसेवक, एक लाख ब्राह्मण, एक लाख लोक-सेवी समाज से माँगे । एक छोटे-से गाँव में जन्मे आजादी के लड़ाकू सिपाही में अवतार-चेतना का अंश है एवं वह हमें परमार्थ की ओर प्रवृत्त कर हमारा ही कल्याण कर पथ प्रशस्त कर रहा है, यह समझ में आने के बाद ही अगणित व्यक्तियों ने अपना जीवन उनके चरणों में अर्पित कर दिया। उनके सूक्ष्म में विलीन होने के बाद भी करते चले जा रहे है।
अगले कुछ दिन व्यापक परिवर्तन व हलचलों से भरे पड़े हैं। अब आस्तिकता को किसी भी स्थिति में समाजीकृत रूप में सामने आना पड़ेगा। व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए बहुत पूजा-पाठ, भजन-ध्यान हो चुका। समष्टि के कल्याण में ही व्यक्ति का भी कल्याण है, यह भाव मन में रखकर कुरीति, पिछड़ेपन, उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन में सभी को जुटना होगा। प्रतिभाशाली वर्ग अब प्रसुप्त पड़े रहकर चैन की नींद नहीं सो सकेगा। युगपरिवर्तन किसी व्यक्ति विशेष की योजना नहीं है। उसके पीछे महाकाल का संकल्प और निर्धारण है। इस अगले 28 महीनों का एक-एक दिन ऐसी हलचलों से भरा होगा कि परिवर्तन प्रक्रिया की प्रचण्डता को देखकर सब आश्चर्यचकित होकर रह जाएँगे । लोक-मानस को बदला जाना सम्भव है, सूक्ष्म चेतना के स्तर पर इस क्रिया को किस तीव्रगति से किया जा सकता है, यह सब देखकर किसी का भी स्तब्ध रह जाना स्वाभाविक हैं प्रस्तुत अवधि में समयदान दो कार्यों में नियोजित होना चाहिए एवं होगा। प्रथम आत्म-परिष्कार एवं द्वितीय लोकमंगल। ये दोनों ही कार्य साथ साथ चल सकेंगे। विद्या विस्तार मूर्च्छितों तक प्राण चेतना के रूप में परमपूज्य गुरुदेव के विचार जिस तेजी से पहुँचाए जाएँगे उतना ही लक्ष्य समीप आता चला जाएगा।
आर्यों की सभ्यता की तरह आयुर्वेद की परम्परा भी चिरपुरातन है। वैदिक वाङ्मय में इसकी उत्पत्ति ब्रह्म से मानी गयी है। इस विवरण के अनुसार प्रजापति ने ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेद का मन्थन करके आयुर्वेद बनाया। यह पाँचवाँ वेद उन्होंने भास्कर ने स्वतन्त्र संहिता बनाकर इसे अपने शिष्यों को पढ़ाया। ये सभी शिष्य वेद-वेदाँग को जानने वाले और रोगों का नाश करने में निपुण थे। इन सबने अपने-अपने तंत्र बनाए। इन सब में धन्वंतरि ने चिकित्सा तत्व विज्ञान, दिवोदास ने चिकित्सा दर्शन, काशिराज ने चिकित्सा कौमुदी, अश्विनौ ने चिकित्सा सार तंत्र एवं भ्रमग्न को विकसित किया। इसी तरह नकुल ने वैद्यक सर्वस्व, सहदेव ने व्याधि सिन्धु विमर्दन, यम ने नार्णव, च्यवन ने जीवनदान, जनक ने वैद्यक सन्देह भंजन, चन्द्रमा के पुत्र बुध ने सर्वसार, जाबाल ने तंत्रसार, जाजलि ने वेदाँग सार, पैल ने निदान, करथ ने सर्वधनर, अगस्त्य ने द्वेघ निर्णयतंत्र का प्रतिपादन किया। ये सोलह तंत्र ही चिकित्साविज्ञान को प्रकाशित करने वाले एवं सभी बीज रोगों नष्ट करने वाले और बल देने वाले है। इसका विस्तृत विवेचन ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड में मिलता है।
आयुर्वेद को परिभाषित करते समय चरक ने अपने सूत्रों में आयु को चेतनानुवाद एवं जीवानुबंध का पर्याय माना है। यह आयु, शरीर, इन्द्रिय, मन, और आत्मा इन चारों का संयोग है। इन चारों का सम्यक् ज्ञान आयुर्वेद है। सुश्रुत ने इसे इस प्रकार कहा है- “आयुरनिमन विद्यतेऽनेन वायुऽऽयुर्विन्दतीत्यायुर्वेदः।” शरीर आत्मा का भोगायतन, पंच महाभूत विकारात्मक है, इन्द्रियाँ भोग का साधन हैं, मन अन्तः- कारण है, आत्मा मोक्ष या ज्ञान प्राप्त करने वाला है। इन चारों का अदृष्ट कर्मवश जो संयोग होता है, वही आयु है। इसके लिए हित-अहित, सुख-दुःख का ज्ञान तथा आयु का मान जहाँ कहीं हो उसे आयुर्वेद कहते हैं।
कश्यप के अनुसार “ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेदाथर्ववेदेभ्यः पंचमोऽयभायुर्वेदः।” वेदों में अन्यान्य देवताओं के साथ अश्विनौ भी देवता है। चरक की मान्यता है कि अश्विनौ मुख्यतः देवताओं के चिकित्सक थे। आयुर्वेद परम्परा में अश्विनौ ने प्रजापति से आयुर्वेद सीखा और अश्विनौ से इन्द्र ने सीखा। इन्द्र से यह तीन शाखाओं में विभक्त माना जाता है। सुश्रुत, चरक तथा काश्यप् ने फिर तीन संहिताओं का निर्माण किया। सुश्रुत संहिता के अनुसार धन्वंतरि तथा इनसे सुश्रुत, औपधनु, करवीर्य, वैतरण, औरभ्र, पीपकलावर्त, गोपरक्षित ओर भोज हुए। इन्होंने शल्य चिकित्सा तंत्र का विस्तार किया। चरक संहिता की मान्यता है कि भारद्वाज से आत्रेय, पुनर्वसु, अग्निवेश, जातुकर्ण, पराशर, सारपाणि, हारीत आदि नरे काय चिकित्सा को आगे बढ़ाया। काश्यप् संहिता में काश्यप्, वशिष्ठ, अत्रि, भृगु तथा इनके पुत्रों और शिष्यों द्वारा कौमार भृत्य के प्रचलन का वर्णन है।
चिकित्सा का सम्बन्ध यद्यपि आयुर्वेद से अधिक है, लेकिन अन्य वेदों में भी इस विषय के मंत्र मिलते हैं। ऋग्वेद में आपः जल औषधियों आदि का उल्लेख मिलता है। औषधियों में वनस्पतियों का पृथक्-पृथक रूप में वर्णन हुआ है। इसमें वनस्पतियों का मिश्रण नहीं मिलता, जबकि आयुर्वेद संहिताओँ में औषधियों का उपयोग मिश्रण के रूप में अधिक मिलता है। अतः कहा जा सकता है कि आयुर्वेद का प्रारंभिक ज्ञान ऋग्वेद में ऋजास्व को अश्विनौ का आँख प्रदान करना, च्यवन ऋषि का पुनः युवा होना आदि कथनों के साथ वैद्य के लक्षणों की भी विस्तृत चर्चा है।
यजुर्वेद में भी औषधियों के लिए बहुतेरे मंत्र मिलते हैं। इन मंत्रों की व्याख्या से स्पष्ट होता है कि औषधियों का उपयोग यज्ञ, कर्म तथा स्वास्थ्य के लिए विशेषतौर पर होता था। यही नहीं इसमें औषधियों से अनेक प्रकार प्रार्थनाओं का भी उल्लेख आता है यजुर्वेद के ऋषि ने औषधियों को माता की प्रतिकृति कहने के साथ ही ‘सर्वेषाँ रुग्णानाँ निष्कर्षों’ यदि कि सब रोगों को निकालने वाली कहकर प्रार्थना की है। यजुर्वेद में औषधियों के स्वरूप को बताते हुए उल्लेख है आपतन्तीरवद-न्दिवऽओषंधयस्परि। यं जीवमश्नवामहहै न स रिष्याति पूरुषः यानि कि औषधियाँ कहती हैं कि आकाश, द्युलोक से आती हुई जिस व्यक्ति के पास पहुँच जाती है, उसे किसी तरह का कष्ट नहीं होता है।
अथर्ववेद हमें आयुर्वेद का विषय विशेष विस्तार से विवेचित किया गया है। सच तो यह है कि अथर्ववेद का सम्बन्ध ही आयुर्वेद उपाँग से है। इसमें वनस्पतियों का स्पष्ट नामोल्लेख, कृमि सम्बन्धी जानकारी, शल्य चिकित्सा एवं प्रसूति विज्ञान आदि विषय मिलते हैं। अथर्ववेद का सम्बन्ध मनुष्य जीवन के साथ क्रियात्मक रूप से होने से आयुर्वेद का सम्बन्ध इसी से विशेष है। इसमें वनस्पतियों का उपयोग अलग-अलग स्वतंत्र रूप में ही मिलता है। उन दिनों इनको मिश्रित रूप में नहीं बरता जाता था। यही नहीं भिन्न-भिन्न अंगों में होने वाले रोगों के नाम भी स्पष्ट रूप में मिलते हैं। इसमें एक स्थान पर कहा गया है, ‘अथर्वणीरंगिरसी दैवीर्मनुष्यता उत। औषधयः प्रजायन्ते यदा त्वं प्राणं जिनवसी।
अर्थात् हे प्राण ! जब तक तू प्रेरणा देता है, तब तक आथर्वणी, आँगिरसी, दैवी और मानुषी औषधियाँ फल देती हैं।
वैदिक उल्लेख के अनुसार औषधियाँ प्राण सृष्टि से पहले उत्पन्न हुई। “या औषधीःपूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा।” ऐतरेय, शतपथ ब्राह्मणों में भी आयुर्वेद परम्परा का विशिष्ट वर्णन मिलता है। उपनिषदों में भी आयुर्वेद के विचारों की छाया दिखती है। चरक की परिपाटी में साफ तौर पर उपनिषदों का प्रभाव है। चरक संहिता में रोग ओर पुरुष की उत्पत्ति का निर्णय करने में जितने मत या वाद बताए गए हैं वे सब उपनिषदों में मिलते हैं। इन सभी का प्रचलन बुद्ध के समय तक भी रहा। वे वाद (सम्प्रदाय) लगभग 62 थे। जैन ग्रन्थों में इनकी संख्या 363 है। वैद्यक शास्त्र में स्वभाव, ईश्वर, काल, इच्छ, नियति और परिणाम इनको स्थूल रूप में कारण मानते हैं। यही वाद चरक संहिता में स्पष्ट रूप से भिन्न-भिन्न ऋषियों के मुख से सुनने में आता है। इन्हीं सब वादारें का समावेश श्वेताश्वेतर उपनिषदों में किया गया है।
रामायण में भी आयुर्वेद सम्बन्धी उद्धरण मिलते हैं। बाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड में हनुमान जी द्वारा औषधि पर्वत लाने का उल्लेख है। इस लायी गयी ‘औषधि’ को सुषेण वैद्य ने लक्ष्मण एवं वानरों को दी थी। ‘वैद्य’ शब्द सम्भवतः रामायण में सबसे पहले आया है। इस समय शल्य चिकित्सा एवं औषधि चिकित्सा पर्याप्त उन्नति पर थी। आयुर्वेद उन दिनों आठ अंगों में विभक्त था। ये आठ अंग शल्य, शाकल्य, विषगर विरोधिक, कौमारभृत्य, भूतिवद्या, रसायन, बाजीकरण एवं काय चिकित्सा के रूप में प्रचलित थे। महाभारत के लोकपाल समाधान प्रकरण में नारद युधिष्ठिर संवाद से स्पष्ट पता चलता है कि उस समय तक ये आठों अंग पूर्णतया विकसित हो चुके थे। गीता के विभूतियोग में भगवान श्रीकृष्ण ने गंधर्वों में अपने को चित्ररथ का उल्लेख वैभ्राज शब्द आता है। इसी चित्ररथ वन का उल्लेख चरक संहिता में अत्रिपुत्र ने किया है, जहाँ पर ऋषियों ने एक साथ बैठकर रस विनिश्चय किया था।
पाणिनि व्याकरण में भी आयुर्वेद साहित्य का परिचय मिलता है। गोल्ड स्टूकर के अनुसार पाणिनि निघण्टु से पूर्ण परिचित थे। जातक में उल्लेख मिलता है कि अनेक चरणों में घूम-घूम कर ज्ञान प्राप्त करने वाला छात्र चरक कहलाता था। शिष्य तीन प्रकार के होते थे-माणव, अन्तेवासी और चरक। पाणिनि ने माणव और चरक का एक साथ भी उल्लेख किया है। (माणवचरकाम्याँखञ-5/1।11) वैशम्पायन का एक नाम चरक भी था। सम्भवतः एक से दूसरे स्थान पर जाकर ज्ञान प्राप्त करने या ज्ञान प्रचार करने के कारण उनकी यह संज्ञा थी।
बौद्धकाल में आयुर्वेद विज्ञान अपना पूर्ण विकास कर चुका था। बौद्ध धर्म के ग्रन्थों में स्थान-स्थान पर इसका विस्तृत परिचय मिलता है। ‘नावनीतकम्’ ग्रन्थ तो पूर्ण आयुर्वेद की ही रचना है। सर्द्धम पुण्डरीक के सत्ताइसवें अध्याय में औषधि परिवर्तन का सम्बन्ध आयुर्वेद से है। तीसरा मुख्य ग्रन्थ ‘विनय पिटक’ है। इसमें भिक्षुओं के आचरण संबंधी नियम हैं इसका सम्बन्ध भी मुख्यतः आयुर्वेद साहित्य से ही है। इसी के आधार पर चरक संहिता के कुछ शब्द एवं उस समय की चिकित्सा का सही परिचय मिलता है। इससे पता चलता है कि उस समय आयुर्वेद के आठों अंग पूरी तरह से अपने पूर्ण यौवन में थे। चौथा ग्रन्थ ‘मिलिन्द प्रश्न’ आयुर्वेद का परिचय कराता है। इसमें जीवक ने आयुर्वेद के उत्कर्ष का वर्ण किया है। वह उस समय का कुशल वैद्य था।
वेद, उपनिषदों एवं बौद्ध धार्मिक ग्रन्थों की तरह स्मृतियों में भी आयुर्वेद की गौरवपूर्ण परम्परा का उल्लेख मिलता है। मनुस्मृति में उद्भिजों का भेद, औषधि, वनस्पति, वृक्ष एवं वल्लीद के रूप में किया गया है। मनुस्मृति में गृहस्थाश्रम के लिए आचार वर्णित है, वही तथा उससे मिलता-जुलता वर्णन आयुर्वेद की वृहत्रयी संहिता में आता है। विष्णु स्मृति के अध्याय 60, 61, 63 और 64 में दी हुई स्वास्थ्य सम्बन्धी सूचनाएँ ‘अष्टाँग संग्रह’ में दिए गए विवरण से मेल खाती है। याज्ञवल्क्य स्मृति में आयुर्वेद विषय तथा चरक संहिता में से बतायी गयी अस्थि गणना का उल्लेख है। चरक संहिता में अस्थि गणना तीन सौ साठ ही कही गयी है।नारदीय स्मृति में भी शल्य चिकित्सा का उदाहरण सन्निहित है। बोधायन स्मृति जो काफी बाद की मानी जाती है, इसमें चक्रचर का एक अन्य भेद भी बताया है, जो कि उपनिषद् के ‘चरक’ संज्ञा वाले ऋषियों की ओर संकेत करता है।
ये स्मृतियाँ कालक्रम की दृष्टि से प्रागैतिहासिक काल एवं ऐतिहासिक काल के मध्य से ही हैं। आयुर्वेद की वैदिक परम्परा इन्हीं से गुजरकर मौर्यकाल में प्रवेश करती हैं मौर्यकाल 363-211 ई॰ पूर्व माना जाता है । उस समय उत्तरी भारत में मगध और कलिंग दो राज्य थे। इन दोनों राज्यों में आयुर्वेद प्रचलित था। मैगस्थनीज ने अपनी पुस्तक ‘इण्डिका’ में चंद्रगुप्त के राज्यकाल के आयुर्वेद व भारतीय चिकित्सकों की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि वे अपने आयुर्वेद ज्ञान के बल पर निःसन्तानों को संतान उत्पन्न करा सकते थे तथा दवाइयों द्वारा इच्छानुसार नर या मादा बच्चे पैदा करा सकते थे।
इस काल के एक महत्वपूर्ण ग्रंथ चाणक्यकृत ‘अर्थशास्त्र’ की भाषा और शैली चरक से मिलती है। इसके अतिरिक्त जिस प्रकार से चरक संहिता में भिन्न-भिन्न आचार्यों के मत दिखाकर अन्त में आत्रेय ने अपना मत प्रस्थापित किया है, उसी प्रकार इसमें भी है। यही नहीं सुश्रुत संहिता और कौटिल्य की तंत्र युक्तियाँ समान है। इसके निशान्त प्रविधि तथा आत्मरक्षा का प्रकरण आयुर्वेद में बहुत अधिक मिलते हैं। चन्द्रगुप्त के पश्चात् मौर्यवंश का दूसरा प्रतापी राजा अशोक था। इसने भी आयुर्वेद पर विशेष कार्य किया। जहाँ पर औषधियों के पौधे नहीं थे, वहाँ पर दूसरे स्थानों से पौधे मँगवाकर लगवाए। शिलालेख के अनुसार अशोक ने मनुष्य और पशुओं दोनों की चिकित्सा का प्रबन्ध सारे देश में किया। इसी प्रकार उसने दक्षिण के पड़ोसी राज्यों चोलों, पाँड्य, शालिपुत्रों, केलपुत्रों और ताम्रपर्णी तथा यवन राज्यों में भी आयुर्वेद का ज्ञान फैलाया।
मौर्यकाल के बाद कृष्णकाल 290 ई॰ पूर्व से 176 ई॰ तक रहा। कनिष्क इस काल का सबसे प्रतापी राजा था। चरक परम्परा के ही एक महामनस्वी के इनके राजवैद्य होने का उल्लेख मिलता है। इन्होंने ही सिंधु जनपद, सौवीर, सौराष्ट्र, वाहलीक आदि राज्यों में चरक संहिता का प्रचलन किया। इस काल में प्रचलित चरक संहिता के दार्शनिक सिद्धान्तों पर श्री सुरेन्द्रनाथ दास गुप्त ने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ इण्डियन फिलॉसफी’ के भाग 1 व 2 में प्रकाश डाला है। उनके अनुसार चरक का दर्शन किसी एक दर्शन के ऊपर नहीं हैं साँख्य, योग, न्याय और वैशेषिक इन सबका स्थान-स्थान पर उल्लेख मिलता है।
चरक मौलिक साँख्यों के चौबीस तत्वों को मानते हैं। बौद्ध दर्शन के अनात्मवाद, दक्षिण विचार तथा निर्हेतुक विनाश इसमें परिलक्षित होते हैं। वैशेषिक दर्शन में आत्मा का लक्षण चरक संहिता में वर्णित आत्मा के लक्षणों का पूर्णतः अनुकरण ही हैं मन का लक्षण तथा उसका अस्तित्व न्यायदर्शन में चरक के अनुसार ही है। न्यायदर्शन की भाँति ईश्वर की पृथक् सत्ता चरक में नहीं है।
176 से 340 ईसवी के नागवंश में सुश्रुत संहिता में उपदेष्टा काशिराज धन्वन्तरि हैं श्रोता रूप में सुश्रुत औपधेनव वैतरणी, औरभ्र, पौपकलावत, करवीर्य, गोपुरक्षित आदि है। इसमें शल्य विषय ही प्रधान है। धन्वन्तरि एक सम्प्रदाय है, जो शल्य शास्त्र को इंगित करता है। इस सुश्रुत के प्रतिसंस्कर्ता, डल्हण के अनुसार नागार्जुन है। नागार्जुन कई हुए है। अंतिम नागार्जुन राजा सातवाहन के मित्र थे। चरक संहिता का भौगोलिक क्षेत्र मुख्यतः भारत का पश्चिमोत्तर प्रान्त है। सुश्रुत का परिचय लगभग सार भारत से है। इसका सम्बन्ध पूर्व में कलिंग देश, उत्तर में काश्मीर नाम उत्तर कुय से हैं इसमें हिमालय पहाड़ की चोटी, सहृद्रि, महेन्द्र पर्वत, मलयाचल, श्रीपर्वत, देवगिरि, सिन्धु नदी का नाम विशेष रूप से वर्णित है। सुश्रुत के समय तक उत्तर भारत का सम्बन्ध दक्षिण से अच्छी प्रकार हो गया था। लोगों का परस्पर आवागमन व्यापार था। इसलिए इसमें देश की हर जगह की औषधि का उल्लेख प्रमाण सहित स्पष्ट रूप से मिलता है।
कश्यप संहिता में भी चरक, सुश्रुत के समान परम्परा हैं जिस प्रकार चरक संहिता के मूल उपदेशक पुनर्वसु आत्रेय हैं, उसी प्रकार कश्यप संहिता के उपदेष्टा मारीच काश्यप है। ऋचीक के पुत्र जीवक ने काश्यप के बनाए तंत्र का संक्षेप किया है। बाद में यह तंत्र नष्ट हो गया था। जीवक के वंशज वात्स्य ने इसका प्रतिसंस्कार किया। आयुर्वेद की यह काश्यप परम्परा कुरुक्षेत्र, कुरु, नैमिषारण्य, पाँचोल, माणीचर, कौशल, हाराोतपाद, चर, शूरसेन, मत्स्य, दशार्ण, शिशिराद्रि, सारस्वत, सिन्धु, सौवीर, विपाद, काश्मीर, अपरचीन, खश, बाहीक, दासेरक, रामण आदि राज्यों में प्रचलित थी।
समुद्रगुप्त और चन्द्रगुप्त द्वितीय का काल स्वर्णयुग के नाम से भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध है। यह समय केवल शासन एवं समृद्धि की दृष्टि से ही स्वर्णयुगीन नहीं था, बल्कि आयुर्वेद की उन्नति भी इस काल में पराकाष्ठा पर थी। इसी समय प्रसिद्ध आयुर्वेद शास्त्र ‘अष्टाँग संग्रह’ की रचना वागभट्ट ने की थी। चरक एवं सुश्रुत के बाद यही प्रामाणिक संहिता है। अष्टाँग हृदय इसी का संक्षिप्त रूप है। गुप्तकाल का आयुर्वेद ग्रंथ ‘नावनीतकम्’ भी प्रसिद्ध है। इसकी रचना चतुर्थ शती के लगभग मानी जाती है। इसमें आत्रेय, सारपाणि, जतुकर्ण, पराशर, भेल, हारीत तथा सुश्रुत का उल्लेख है। योग संग्रह सम्बन्धी ग्रंथों का यही से आरम्भ होता है। वात्स्यायन कृत कामशास्त्र तथा अन्य ग्रंथ अनंगरोग, पंचसायक, कुचमारतन्त्र में भी आयुर्वेद का वर्णन मिलता है। इसी काल में प्रतिपादित वराहमिहिर की वृहत संहिता यद्यपि ज्योतिष शास्त्र का ग्रन्थ है। इसके बावजूद इसमें आयुर्वेद सम्बन्धी कई विषय जैसे वज्रलेप, पटराग आदि का उल्लेख है।
उत्तरगुप्त साम्राज्य का समय 455-696 ई॰ हैं इस काल में बाणभट्ट ने अपने ग्रन्थ हर्षचरित में हर्ष का और अपना वर्णन करने के साथ आयुर्वेद सम्बन्धी कुछ प्रसंग दिए हैं। यही नहीं बाणभट्ट ने कादम्बरी में पारे से सोना बनाने, पारे के सेवन, असुर विवर प्रदेश और श्री पर्वत का वर्णन किया है। प्रभाकर वर्धन की चिकित्सा पौनर्वसु में, रसायन नामक अठारह वर्ष के वैद्य आयुर्वेद के आठों अंगों में निपुण थे। इन्होंने आयुर्वेद की परम्परा का अच्छा प्रसार किया था। आयुर्वेद साहित्य पर प्रकाश डालते हुए गौरीशंकर रीराचन्द्र जी ओझा ने लिखा है कि इसी समय इन्दुकर के पुत्र माधवकर ने रुगविनिश्चय या माधवनिदान नामक एक उत्कृष्ट ग्रंथ लिखा। इसमें रोगों के निदान आदि पर बहुत विस्तार से विचार किया गया। चक्रपाणि दत्त के चिकित्सा संग्रह, शंकरधर की शंकरधर संहिता में आयुर्वेद परम्परा की विस्तृत विवेचना हुई है। अरबी के लेखों में बहला, मनका, बाजीगर, फलवर फल, सिन्दबाद आदि का उद्धरण मिलता है। ये सभी आयुर्वेदाचार्य थे। इनको याहिया बिन खालिद बरमकी ने भारत से बगदाद बुलाया था।
पाल और सेनवंशी राजाओं के समय में भी बंगाल में वैद्यक शास्त्र के नए-नए ग्रन्थ बने। चक्रपाणि दत्त, मदनपाल, बंगसेन आदि प्रसिद्ध ग्रन्थकार इन्हीं वंशों के शासनकाल में हुए और राज्यशासन के सहयोग से आयुर्वेद साहित्य व परम्परा की श्रीवृद्धि कर सके। इनमें सबसे प्रथम चक्रपाणि दत्त हुए हैं, जो वैद्य कोष, आयुर्वेद दीपिका नामक चरक की टीका, भानुमती नामक सुश्रुत टीका, त्यग्दरिद्रशुभंकरणाम्, चिकित्सा संग्रह, द्रव्यगुण संग्रह, सार संग्रह आदि वैद्यक शास्त्र की रचना की। चरक की प्रांजल विशद व टीका के कारण इनको चरक चतुरानन कहा जाता है।
इन ग्रंथों के प्रकाश में आने तक भारत में मुगलकाल की स्थापना हो चुकी थी। इस दौरान आयुर्वेद का प्रचार काफी मन्द पड़ गया। हालाँकि इस समय निघण्टु और रसशास्त्र का विकास भली प्रकार हुआ। इन दोनों विषयों पर स्वतन्त्र रूप से ग्रन्थ रचनाएँ भी हुई। नाड़ी विज्ञान का प्रारम्भ भी इसी समय की विशेषता है। मुगलकाल में रसौषधियों तथा बाजीकरण की परम्परा चल पड़ी थी। शासकों, बादशाहों की विलासप्रियता उन दिनों बाजीकरण एवं पौरुष वृद्धि करने वाले रसायनों तक सिमट कर रह गयी थी। यद्यपि अकबर ने आयुर्वेद के अन्य अंगों के विकास में काफी रुचि दर्शायी थी। उसने कासिम खाँ को थल सेनापति इसीलिए बनाया कि फूल-पत्तों, जड़ी-बूटियों की उन्नति हो सके। इस काल की आयुर्वेद चिकित्सा का उल्लेख लेखक व चिकित्सक निकोलियों मैन्यूसी ने अपनी पुस्तक ‘मुगल इण्डिया’ में विस्तार से किया हैं सत्रहवीं शताब्दी के कोलिम्ब राजवैद्य तथा अठारहवीं शती के प्रसिद्ध ग्रंथ योगरत्नाकर इसका और अधिक खुलासा करते हैं।
आयुर्वेद के प्रचलन एवं परम्पराओं की जानकारी 13 वीं शती में डलहणचार्य, शंकरधर, 14 वीं शताब्दी के वाग्भट्ट चतुर्थ, वाचस्पति वैद्य, विश्वनाथ कविराज, नरहरी पण्डित, जयदेव कविराज, 15 वीं शताब्दी के माधवाचार्य, रुद्रधर भट्ट, चिन्तामणि शास्त्री, 16 वीं शताब्दी के भावमिश्र, टोडरमल, रामचन्द्र दास गुह, 17 वीं शताब्दी में विमल भट्ट, रामाणिक्य सेन, 18 वीं शताब्दी में विद्यापति, राजवल्लभ, देवदत्त, 11वीं शताब्दी में गंगाधर कविराज, धनपति तथा नारायणदास वैद्य ने विस्तार से दी है। यही नहीं इन सबने अपने-अपने समय में आयुर्वेद की परम्परा को प्रचलन में लाने, गौरवशाली बनाने में अपना सर्वस्व होम दिया। साथ ही अनेक ग्रन्थों की रचना की।
दक्षिण भारत में संस्कृति का विस्तार करने वाले अगस्त्य ऋषि माने जाते हैं। वही हिमालय की दुर्लभ आयुर्वेद परम्परा को वहाँ ले गए। उन्होंने चुलस्त्य को और उसने तेरायर को आयुर्वेद का ज्ञान दिया। बाद में उससे अठारह या बाईस सिद्धों को वैद्यक विद्या प्राप्त हुई। इस परम्परा में अगस्त्य के उपदेशक धन्वन्तरि हैं, जो कि उत्तर भारत की परम्परा से मेल खाती है। दुर्गाशंकर केवलराम शास्त्री के आयुर्वेद साहित्य के अनुसार केरल में अष्टवैद्य नाम से प्रसिद्ध आठ वैद्य कुटुम्ब हैं। इनके मूलपुरुष परशुरामजी से अष्टाँग आयुर्वेद के एक-एक अंग में पारंगत हुए थे। इसके पश्चात् भदन्त नागार्जुन द्वारा लिखित रस वैशेषिक सूत्र तथा नरसिंह कृत भाष्य केरल में प्रसिद्ध हुआ। कर्नाटक में आयुर्वेद के प्रणेता थे-जैन आचार्य पूज्यपाद। केरल में आयुर्वेद की स्थिति 400 ई॰ में उत्कर्ष में थी। आन्ध्रप्रदेश के वैद्य, चिन्तामणि और वसवराजीयम नाम के दो संस्कृत ग्रन्थों का मुख्यतः उपयोग करते हैं। इनकी चिकित्सा में चूर्ण, गुटिका, अवलेह आदि के साथ रसयोग भी है। दक्षिण भारत की आर्युद परम्परा का उल्लेख पं0 डी0 गोपालाचार्लु ने अपने आयुर्वेद सूत्र में विशेष रूप से किया है।
आयुर्वेद में रसशास्त्र के आद्यकर्ता नागार्जुन चौरासी महासिद्धों में से एक थे। 11 वीं शताब्दी में भारत आए अलबरूनी ने इसका उल्लेख खासतौर पर किया है। इस विद्या के पारंगत थे- नाथ सम्प्रदाय के मत्स्येनद्रानि एवं गोरखनाथ। अनेक नाथ पंथियों के लिए रस ग्रंथ आज भी वैद्यों में प्रचलित है। सिद्ध नागार्जुन का नागार्जुन तंत्र,
नित्यानाथ का रस रत्नाकर, रसरत्नमाला आदि का इस संदर्भ में विशेष महत्व है। गोरखनाथ को रसायन विद्या का आविष्कारक कहा जाता है। रसतंत्र का विकास आठवीं सदी से प्रारम्भ हुआ और 11-12 वीं सदी में अपनी पूर्णता को प्राप्त हुआ।
आयुर्वेद में द्रव्य, रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव पर ही समस्त चिकित्सा प्रणाली टिकी हुई है। ये तत्व ही भारतीय चिकित्सा शास्त्र की रीढ़ है। इसका वर्णन चरक एवं सुश्रुत दोनों ने किया है। आहार विधि को आयुर्वेद के ग्रन्थों ने बहुत महत्व दिया है। इसकी उपमा पवित्र होमविधि से की है। अलग-अलग क्षेत्रों व देशों के जलवायु के अनुकूल ही यह नियमावली मिलती है।
आयुर्वेद की यह पुरातन परम्परा ब्रह्मा से इन्द्र तक तथा बाद में चरक, सुश्रुत व काश्यप् में एक समान है।इन्द्र से इसकी पृथक् शाखाएँ निकलती है। धन्वन्तरि ने इंद्र से सम्पूर्ण आयुर्वेद सीखा, परन्तु उपदेश केवल शल्य अंग का किया है। धन्वंतरि ने अपना उपदेश सुश्रुत को सम्बोधन करके दिया हैं इसी से इसका नाम सुरुत संहिता हो गया। दिवोदास उपदेष्टा और सुश्रुत श्रोता यही दो व्यक्ति इस ग्रंथ की पृष्ठभूमि हैं। इन्द्र से काश्यप्, वशिष्ठ, अत्रि और भृगु ने आयुर्वेद सीखा। इस संहिता के कर्ता काश्यप् है। यह ग्रन्थ जब कालप्रवाह में लुप्त हो गया तब जीवक के संशात्पन्न वात्स्य ने अनायास ही यह संहिता प्राप्त की थी। एक अन्य शाखा में चरक संहिता विनिर्मित हुई ।
ऋषिप्रणीत आयुर्वेद को शाश्वत व नित्य कहा जाता है। यह अनादि होने से, स्वभाव से, सिद्ध लक्षणों के कारण और पदार्थों के स्वभाव के नित्य होने से आयुर्वेद भी नित्य है। इस दृष्टि से यह ज्ञान भारत में विकसित हुआ और देश-देशान्तरों में प्रचलित-प्रचलित हुआ। ग्रीक के वैद्य हिप्पोक्रेट्स भारतीय आयुर्वेद के प्रशंसक थे। इसी तरह मिश्र, ईरान, बेबीलोनिया, तिब्बत, चीन तथा वर्मा में आयुर्वेद की परम्पराएँ अपनी झलक दिखाती हैं।
अँग्रेजों के शासनकाल में आधुनिक चिकित्साशास्त्र के ज्ञान के लिए 1835 ई॰ में बंगाल में मेडिकल कॉलेज खोला गया। आयुर्वेद के अध्यापन के साथ आधुनिक विज्ञान का संसर्ग तथा आयुर्वेद ग्रन्थों का प्रथम प्रकाश इसी समय हुआ। इस काल में आधुनिक अँग्रेजी शिक्षा का समावेश हुआ। यह बात मेघदूत की मल्लिका नाथ की टीका तथा प्रोफेसर काले की टीका से स्पष्ट होती है प्राचीन चिकित्सा की व्याख्याएँ या टीकाएँ पूर्णतया शास्त्रीय होती थीं। इसके विपरीत आधुनिक आयुर्वेद की व्याख्या सरल तथा प्रकरण से सम्बन्धित होती थी। इस काल में आधुनिक चिकित्सा शास्त्र के बावजूद आयुर्वेद प्रसिद्ध एवं प्रचलित रहा। इसका प्रमाण है-श्री यादव जी की, त्रिकम जी की ‘सिद्धयोग संग्रह’ का प्रसिद्ध होना। योग नुस्खा, रसतंत्रसार की भी अधिक खपत हुई । आधुनिक काल में माधव उपाध्याय, योगानन्दनाथ, जयराम, श्रीनाथ, शंभुनाथ, आनन्दराय माखी, वेंकट कृष्णराव, मोरेश्वर भट्ट आदि आयुर्वेद ग्रन्थों के रचनाकार एवं वैद्यों ने काफी प्रचार-प्रसार किया।
बंगाल के कविराज गंगाधर ने आयुर्वेद का गहन अनुसंधान किया। इनकी शिष्य परम्परा बहुत लम्बी है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सम्बद्ध आयुर्वेद कॉलेज के प्राध्यापकों ने अपनी स्थापना के बाद से आयुर्वेद के क्षेत्र में काफी काम किया है। इसी क्रम में 1902 में हरिद्वार में गुरुकुल काँगड़ी की स्थापना हुई थी। देश को स्वाधीनता मिलने के साथ आयुर्वेद कॉलेजों की स्थापना होने लगी। परन्तु अँग्रेजियत के प्रभाव के कारण उसकी गरिमा का वांछित विस्तार न हो सका। यद्यपि आज भारत में लगभग 97 आयुर्वेद कालेज, 76 फार्मेसियाँ तथा 624 के आस-पास इसकी लघु इकाइयाँ है। आयुर्वेद फार्मेसी की अपनी 500 शाखाएं हैं।
स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् पं0 नेहरू जी के समय भारत सरकार ने आयुर्वेद की स्थिति जाँचने के लिए 29 जुलाई, 1959 में एक कमेटी डॉक्टर के0 एन॰ उडूप्पा की अध्यक्षता में बनाई थी। इस कमेटी ने सम्पूर्ण भारत का परिभ्रमण करके आयुर्वेद संस्थाओं, फार्मेसियों और राज्यों में आयुर्वेद की स्थिति का निरीक्षण कर अपनी रिपोर्ट भारत सरकार को दी थी। इसके पहले भी समय-समय पर अन्य कमेटियाँ बैठाई गयी थी। सबसे प्रथम 1945 ई॰ में भारे कमेटी, 1946 ई॰ चोपड़ा कमेटी, पण्डित कमेटी, 1955 में दवे कमेटी का गठन किया गया था।
विभिन्न कमेटियों द्वारा अपनी रिपोर्ट जरूर प्रस्तुत की गयीं, परन्तु उनके वाँछित फलितार्थ नहीं प्राप्त हो सके। अभी कुछ ही समय पहले स्वाधीन भारत देश ने अपनी स्वाधीनता की स्वर्ण-जयन्ती मनायी है। जो इस बात की घोषणा है कि हमने स्वाधीनता के पचास वर्ष पूरे कर लिए। परन्तु हम अभी भी विदेशी चिकित्साप्रणाली के पराधीन हैं। इन पचास सालों के अन्तराल में अपने पूर्व पुरुषों से वसीयत के रूप में मिली आयुर्वेद को परम्परा को गौरवपूर्ण ढंग से नहीं विकसित कर सके। यह असफलता सिर्फ चिकित्सीय असफलता होने तक सीमित नहीं है। इसे राष्ट्रीय व साँस्कृतिक असफलता के रूप में भी आँकना होगा।
शान्तिकुँज के संचालकों ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया है और स्वाधीनता के स्वर्णजयंती पर्व के तीन दिनों बाद 18 अगस्त, 1917 श्रावणी पर्व पर आयुर्वेद संरक्षण एवं पर्यावरण संवर्द्धन के रूप में विशिष्ट सम्मेलन आयोजित किया। जिसमें आए युगनिर्माण मिशन के कर्मठ परिजनों ने समवेत स्वरों में संकल्प किया कि आयुर्वेद की चिरपुरातन गरिमा को पुनः प्रतिष्ठित करेंगे। स्थान-स्थान पर जड़ी-बूटी उद्यान लगाने, घरेलू उपचार पद्धति को पुनर्जीवित करने के साथ ही आयुर्वेद को प्रचारित करने का निश्चय किया गया है। शान्तिकुँज का केन्द्रीय तन्त्र इस क्रम में अपने यहाँ आयोजित एकमासीय शिविरों में जड़ी-बूटियों के विशेष प्रशिक्षण के साथ ही आयुर्वेद की पुरातन परम्परा से परिचित कराएगा। इस पुरातन परम्परा का संवर्द्धन न केवल अपने राष्ट्र के नागरिकों एवं विश्व-परिवार के स्वजनों का स्वास्थ्य-संवर्द्धन करेगा, बल्कि उनमें साँस्कृतिक गौरव का भी बोध कराएगा।
आज के इस आधुनिक युग में लोगों की मान्यता यह है कि जैसे आवागमन के तीव्रगामी साधन उपलब्ध हो गए हैं, संचार क्राँति से मनुष्य एक ‘ग्लोबल अम्ब्रेला’ के नीचे आ गया है, ठीक उसी तरह तुरत-फुरत कोई भी अस्वस्थता का आक्रमण होते ही ऐसी औषधि मिल जानी चाहिए, जो रोग को मिटाए न मिटाए, कष्ट जरूरी मिटा दे। आज की भोगवादी सभ्यता का दर्शन ही है, जिसमें ‘एलोपैथी’ के रूप में पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति के माध्यम से ढेरों अच्छाइयों के साथ एक सबसे बड़ा अभिशाप दिया है - वह है दोषपूर्ण-अनियमित जीवन-शैली का समाज में प्रचलन।
वस्तुतः मानवी काया प्रकृति की एक ऐसी रचना है जिस पर न्यौछावर हुआ जा सकता है। स्रष्टा ने इसमें कूट-कूटकर ऐसी विशेषताएँ भरी है कि देखकर आश्चर्यचकित होकर स्तब्ध हो जाना पड़ता है।ऐसा सर्वसमर्थ जीवनी-शक्ति सम्पन्न स्वयं अपने भीतर से ‘हीलिंग’ की सामर्थ्य पैदा करने वाला कोई यंत्र आज तक कोई भी वैज्ञानिक नहीं बना पाया । यदि अनावश्यक छेड़-छाड़ न की जाए, आहार-विहार के सभी नियमों की ठीक तरह से पालन किया जाता रहे, तो इतने मात्र से शरीर को जीवनपर्यन्त स्वस्थ व नीरोग रख ‘जीवेम शरदः शतम्’ की उक्ति सार्थक की जा सकती है। डॉ. एलेक्सिस कैरेल ने ‘मैन द अननोन’ तथा डॉ0 नारमन कजिन्स ने ‘एनाटॉमी ऑफ इलनेस’ पुस्तकों में मानवी काया की विलक्षणताओं-असीम सम्भावनाओं का वर्णन करते हुए यह लिखा है कि बीमार पड़ने पर भी स्वस्थ बनाने के सभी रहस्य इसी काया के गर्भ में छिपे पड़े हैं। काश हम इसके महत्व को समझ पाएँ तो हमारा जीवन जो आज अशक्ति का निवास स्थान बन गया, काफी कुछ ठीक चलाया जा सकता है।
आयुर्वेद एवं एलोपैथी में परस्पर द्वन्द्व या विवाद हम इस लेख में नहीं खड़ा कर रहे। कहने का आशय मात्र यह है कि आयुर्वेद में जीवनी-शक्ति को अक्षुण्ण बनाए रख शरीर को नैसर्गिक जीवन-पद्धति से पर्यावरण के साथ तालमेल बिठाकर जीवन जीना सिखाया जाता है तो एलोपैथी में मारक-घातक औषधियों के द्वारा सूक्ष्म मर्मस्थलों को चोट पहुँचाकर कभी-कभी चिरस्थायी नुकसान पहुँचा दिया जाता है, भले ही तुरन्त राहत मिल गयी हो। यहाँ’ऐलोपैथी’ -पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति के उस पक्ष की अवमानना नहीं की जा रही, जिसमें कि पेट में या छाती में, सिर में या दाँतों में दर्द होने पर दर्दनाशक दवाओं द्वारा तुरंत राहत पहुँचा दी जाती है अथवा चीर-फाड़ के द्वारा पास से भरे स्थान को खाली या ट्यूमर-ग्लैण्ड्स को निकाल कर मरीज को राहत पहुँचा दी जाती है अथवा चीर-फाड़ के द्वारा पस से भरे स्थान को खाली ट्यूमर-ग्लैण्ड्स को निकाल कर मरीज को राहत पहुँचा दी जाती है, कहा मात्र यह जा रहा है कि एलोपैथी एवं आयुर्वेद परस्पर विरोधी न बनकर एक-दूसरे की पूरक बनकर चलें, तो चिरस्थायी आराम ही नहीं, हीलिंग की प्रक्रिया को और भी सशक्त बनाया जा सकता है। ‘थैलिडोमाइड ट्रेजेडी’ जो 1961-62 में सारे विश्व में एक नींद, तनाव की दवा थैलिडोमाइड के घातक प्रभाव विकलाँग बच्चों के जन्म के रूप में विश्वविख्यात हुई थी, ने सभी समझदार व्यक्तियों के कान, घातक तीव्र औषधियों के विषय में खड़े कर आज से 35 वर्ष पूर्व ही चेता दिया था। आज जब पश्चिम हमारे आयुर्वेद की ओर मुड़ रहा है, वहाँ तेजी से आयुर्वेदीय औषधियों के दैनन्दिन जीवन में प्रयोगों को बढ़ावा मिल रहा है, न जाने क्यों हम पूरी तरह स्वयं को पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति के बंधनों में जकड़ा पाने पर भी स्वयं को सुधारने का, अपनी चिरपुरातन साँस्कृतिक गरिमा को समझने का पुरुषार्थ नहीं कर रहे हैं। हमारे शाँतिकुँज के प्रयास इसी दिशा में है कि इस संबंध में जनजाग्रति लेकर आयुर्वेद की गरिमा स्थापित की जाए।
आज की स्थिति बड़ी विडम्बना से भरी है। रुग्ण मानव समुदाय बहुतायत में है। चिकित्सा की जो पद्धति प्रचलित है-सर्वसुलभ है-वह महँगी ही नहीं-अत्यंत घातक भी है। दूसरी ओर आयुर्वेद मृतप्राय स्थिति में नजर आता है। आयुर्वेद ऐसी स्थिति में क्यों पहुँचा व कौन इसके निमित्त कारण के रूप में माने जाएँ, इसके विस्तार में जाने से पूर्व यह तो मानना ही पड़ेगा कि मानवी काया व मन के स्वास्थ्य की दृष्टि से विगत तीन-चार दशकों में अवनति ही अवनति हाथ लगी है, चाहे मनुष्य की जीवित रहने की आयु में वृद्धि हो गयी हो। जन-साधारण का, तुरन्त आराम देने वाली एलोपैथी चिकित्सा पद्धति की ओर उन्मुख होना इस कारण भी हो सकता है कि वे अब तुरंत लाभ चाहते हैं, उनमें इतना धैर्य नहीं रहा कि वे निराश करने वाले प्रयोगों को करें। जीवनी-शक्ति छूँछ होकर रह जाने का एक प्रमुख कारण यह है कि आज के औद्योगीकरण व प्रदूषण से भरे युग में मनुष्य की जीवनशैली इतनी अप्राकृतिक हो गयी है कि उस पर अब तेज दवाएँ ही असर कर पाती हैं, हलके उपचारों का कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता। मानसिक तनाव में वृद्धि विगत का एक दशक में तो इस तेजी से हई है कि ऐसा लगता है यह महामारी की तरह सारे विश्व में फेल गया हैं तनावजन्य मधुमेह, हृदयावरोध, दमा, सिर, पीठ के दर्द, एसीडिटी व पेप्टिक अल्सर तथा पाचन संबंधी अन्य बीमारियाँ एवं कई मनोरोग जिनमें डिप्रेशन एवं एक्वजाइटीन्यूरोसिस-सिजोफ्रेनिया जैसे रोग प्रधान हैं-पिछले एक दशक में तेजी से बढ़े हैं उसी अनुपात में एलोपैथी की दवाओं का प्रचलन भी बढ़ा है, किन्तु आराम फिर भी कहीं किसी को भी नहीं है।न मरीज को न डॉक्टर को। मलेरिया एवं राजयक्ष्मा (टी0बी0) जैसे रोग पुनः उभर कर नयी शक्ल लेकर आ गए हैं। कैंसर, एड्स व अन्य सेक्सुअली ट्राँसमिटेड डिसीजेज (STDs) तथा हृदयावरोध (इस्चीमिक हार्ट डिसीज) आज भी मृत्यु के तीन प्रमुख कारणों में से है। यदि समस्त विज्ञान की उपलब्धियाँ देखी जाएँ तो आज जब हम इक्कीसवीं सदी से मात्र ढाई वर्ष की दूरी पर हैं, यह समझ में नहीं आता कि हम अभी तक इनका समाधान क्यों नहीं खोज पाए। संभवतः परिष्कृत, पुनर्जीवित आयुर्वेद ही इसका समुचित उत्तर दे सकता है।
अथर्ववेद के एक उपाँग के रूप में प्रतिष्ठित आयुर्वेद प्राणशक्ति को जीवन्त बनाए रखकर अंदर से वह सामर्थ्य उत्पन्न करता है कि व्यक्ति कभी रोगी हो ही नहीं। कभी रोग का आक्रमण हो भी जाए तो सामान्यतः उपलब्ध वनौषधियों से ही उनका उपचार किया जा सके। आयुर्वेद का नाम तो आज मौजूद है पर विशुद्धतः आयुर्वेद के आधार पर चिकित्सा करने वालों के नाम पर मात्र एक प्रतिशत चिकित्सक समुदाय दिखाई पड़ता है। शेष सभी समन्वित चिकित्सा पद्धति और उसमें भी घातक-मारक मात्र तृतीय विश्व में प्रयुक्त होने वाली औषधियों का प्रयोग करते देखे जाते हैं, जबकि शिक्षा उन्होंने आयुर्वेद की ली है। यहाँ तक कि वैद्य कहलाने में उन्हें लाज आती है अतः डॉक्टर लिखकर, इंजेक्शन देकर वे स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं एवं मरीज भी मनोवैज्ञानिक रूप से उन्हीं से प्रभावित होते देखे जाते हैं। ‘काँर्टीसोन’ के रूप में अंतिम औषधि के रूप में उपलब्ध एलोपैथी की औषधि को चूर्णों में मिलाकर न जाने कितने आयुर्वेदिक काय-चिकित्सक देते देखे गए हैं। आयुर्वेद के रस चिकित्सक भस्मों के प्रयोग आदि पक्ष की तो हम बात नहीं कर रहें, क्योंकि उनमें तो कच्ची स्थिति में प्रयोग और भी अधिक घातक है। परंतु वनौषधियों को ही हमारे ऋषिगण रसायन के रूप में प्रतिष्ठित कर गए हैं यदि इन्हें ही शुद्ध रूप में लिया जा सके तो आज भी इनमें इतनी शक्ति विद्यमान है कि ये किसी भी व्यक्ति का कायाकल्प करने में समर्थ हैं। अश्वगंधा, मुलहठी, शतावरी, सारिवाँ, बहेड़ा, हरीतकी, आमलकी आदि रसायन ऐसे प्रभावशाली हैं कि नियमित प्रयोग करने पर नीरोग, दीर्घायु वाला जीवन जिया जा सकता है।
पिछले दिनों लोगों में जागरुकता आयी है एवं तेजी से इनके प्रयोगों का प्रचलन बढ़ा है, किन्तु अभी भी इस विषय में एक भ्रान्ति है कि जो चीज जितनी पुरानी, उतनी ही मूल्यवान हो जाती है। यह बात प्राकृतिक रूप में उगने वाली वनौषधियों पर लागू नहीं होती। वे परिपक्व स्थिति में तोड़ी जाने पर अपनी वीर्य कालावधि सुरक्षित रहने तक के समय तक ही लाभ पहुँचा सकती हैं। इनकी भी ‘एक्सपाईरी डेट’ होती है, यह तथ्य अक्सर भुला दिया जाता है । पंसारियों को ही हमारे यहाँ केमिस्ट, फार्मेसिस्ट, ड्रगिस्ट माना जाता है। वर्षों पुरानी, घुन लगी, वीर्यपाक रहित औषधि गुणकारी कैसे होगी- हो सकता है ओर नुकसान पहुँचा दे। औषधि को जब तक एक्सट्रैक्ट बनाकर आसव, अरिष्ट, अवलेह के रूप में सुरक्षित नहीं किया जाता-एक-समय विशेष में उसकी प्रभाव क्षमता नष्ट हो जाती है, यह तथ्य विशुद्धतः समझ लिया जाना चाहिए। एक दूसरी बात यह कि औषधि के किस अंग का उपयोग किस रोग में होता है, उसे कब तोड़ा जाना चाहिए, यह जानकारी भी अमूमन सभी को होनी चाहिए। अब कई वनौषधियाँ अनुपयुक्त रूप से तोड़े जाने के कारण पर्यावरण से मिटती चली जा रही है। फलोरा क्रमशः नष्ट होता चला जा रहा है। जगह-जगह इन्हें जिन्दा बनाए रखने के लिए औषधि उद्यानों, स्मृति उपवनों की अत्यधिक आवश्यकता है। कहाँ किस जलवायु में कौन-सी औषधि लाभकारी घटक अधिकाधिक मात्रा में अपने अंदर समाए पैदा होती है, यह जानकारी भी जन-जन को दी जानी अत्यधिक जरूरी है।
आज के समय की माँग को, मानव मात्र की वेदना को युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव ने देखा एवं आयुर्वेद की गरिमा को स्थापित करने के लिए उन्होंने गायत्रीतीर्थ एवं ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में इनके पुनर्जीवन हेतु समर्थ प्रयास आज से बीस वर्ष पूर्व 1976-77 से ही आरम्भ कर दिए थे। स्थान-स्थान पर वैज्ञानिक स्वयंसेवी कार्यकर्त्ताओं को भेजकर उन्होंने तथ्यों का संकलन कराया, हिमालय से लेकर समुद्री क्षेत्रों में होने वाली वनौषधियाँ मँगवाकर यहाँ उन्हें वैसी ही जलवायु-मिट्टी देकर उगाया एवं स्थान-स्थान से सूखी रूप में उपलब्ध उन औषधियों का संग्रह कर उन्हें चूर्ण रूप में मानवमात्र के लिए उपलब्ध कराया। आज से पंद्रह वर्ष पूर्व प्रकाशित तीन पुस्तिकाएँ ‘वनौषधि से स्वास्थ्य संरक्षण’ ‘वनौषधि संदर्शिका’ तथा ‘मसाला वाटिका से घरेलू उपचार’ इसी अध्ययन पर आधारित थीं। बाद में वाङ्मय के इकतालीसवें (41) खण्ड जीवेम शरदः शतम् में इन्हें समग्र रूप दे दिया गया। प्रत्येक परिजन को न केवल यह जानकारी इससे मिली है कि शुद्ध वनौषधि हमें किस रूप में कहाँ से उपलब्ध हो सकती है, अपितु उनकी पहचान, गुणधर्म, शुद्धाशुद्ध परीक्षा, प्रयोग-अनुपान संबंधी समस्त विवरण उन्हें इन पुस्तिकाओं के माध्यम से बड़ी सुलभ भाषा में मिल गया। इसे आयुर्वेद की सबसे बड़ी सेवा मानी जानी चाहिए कि आज समाज के एक बहुत बड़े तबके में स्वास्थ्य इस इस विद्या के विषय में जागरुकता शाँतिकुँज के प्रयासों से ही आयी है।
परमपूज्य गुरुदेव ने न केवल शाँतिकुँज फार्मेसी की स्थापना की, ताजी स्थिति में फाण्ट, क्वाथ या कल्क के रूप में उन्हें कैसे दिया जा सकता है, यह ज्ञान सबको उपलब्ध कराया, चूर्ण के रूप में उन्हें कैसे दिया जा सकता है, यह ज्ञान सबको उपलब्ध कराया, चूर्णों के रूप में उन्हें राष्ट्र ही नहीं विश्व के कोने-कोने में पहुँचा दिया। प्रत्येक चूर्ण के पैकेट पर औषधि को किस अनुपात में किस अनुपान भेद के साथ (शहद, दुग्ध, उष्ण या ठण्डा जल) लिया जाए, उसकी एक्सपाईरी डेट भी दी गयी, ताकि लोग वास्तविक लाभ उठा सकें- अनावश्यक रूप से उन पर लाभ न होने की स्थिति में उपालम्भ न लगा सकें। यही नहीं ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में, जहाँ अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय के विभिन्न प्रयोग-परीक्षण चलते हैं, एक सुव्यवस्थित प्रयोगशाला बनाई, जहाँ इन औषधियों की शुद्धाशुद्ध परीक्षा की जा सके तथा चूर्ण रूप में -उबालकर क्वाथ रूप में, ताजी स्थिति में कल्क रूप में अथवा यज्ञ में धूमीकृत स्थिति में ग्रहण करने से क्या लाभ होता है, किन रोगों का निवारण होता है, यह जानने में भी बड़ी मदद मिली है। सबसे बड़ी क्राँतिकारी खोज ‘प्रज्ञापेय’ के रूप में उपलब्ध औषधि संग्रह को माना जा सकता है, जो 12 औषधियों के भिन्न-भिन्न अनुपात में प्रयोग-परीक्षण के बाद चाय व कॉफी के विकल्प के रूप में चुस्ती लाने वाले एक टॉनिक के रूप में विश्व भर में ख्याति प्राप्त कर चुका है। ब्राह्मी, शंखपुष्पी, नागरमोथा, दालचीनी, सौंफ, मुलहठी (मधुयष्टि), लाल चंदन, अर्जुन, आज्ञा घास, तुलसी, तेजपात्र तथा शरपुँखा का सम्मिश्रण यह प्रज्ञापेय न जाने कितने चाय के शौकीनों के खोये स्वास्थ्य को पुनः लौटा सकने में समर्थ हुआ है एवं तनाव शासक, बुद्धिवर्द्धक, बलवर्द्धक पेय के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुका है।
शाँतिकुँज द्वारा प्रचारित औषधियों में बीस को प्रारंभिक स्तर पर प्रमुखता दी गयी एवं इनके प्रभावों के आँकड़े एकत्रित किये गए। ये हैं- 1 आमाशय एवं ऊपरी पाचन संस्थान हेतु मधुयष्टि (मुलहठी) तथा आँवला 2 निचले पाचन संस्थान हेतु हरीतकी (हरड़) एवं बिल्व 3 हृदय एवं रक्तवाही संस्थान हेतु अर्जुन तथा पुनर्नवा 4 श्वास संस्थान के लिए वासा एवं भारंगी 5 केन्द्रीय स्नायु संस्थान के लिए ब्राह्मी एवं शंखपुष्पी 6 वात-नाड़ी संस्थान हेतु सुण्ठी (सौंठ-सूखी अदरक) एवं निर्गुण्डी 7 रक्तशोधन हेतु नीम एवं सारिवाँ 8 ज्वर आदि प्रकोपों हेतु एवं प्रति संक्रामक के नाते गिलोय व चिरायता 9 प्रजनन मूत्रवाही संस्थान हेतु अशोक एवं गोक्षर तथा 10 स्वास्थ्यवर्द्धक बल्व रसायन के रूप में अश्वगंधा एवं शतावर। इसके अतिरिक्त सभी रोगों में विभिन्न अनुपान भेद से तुलसी का प्रयोग व बाह्योपचार के लिए नीम, घृतकुमारी, आपामार्ग, हरिद्रा एवं लहसुन के प्रयोग को प्रचारित किया गया। प्रारम्भ में तो महत्व इन्हीं औषधियों को मिल गया था, किंतु कालान्तर में युगऋषि ने उचित समझा कि और भी औषधियाँ विकल्प रूप में उपलब्ध करायी जाएँ ताकि उनकी गुणवत्ता बनाए रख, उनके निर्माण-उत्पादन व खोती पर सभा बराबर ध्यान देते रहें। ये औषधियाँ इस प्रकार हैं- हरड़, बहेड़ा, आँवला के सम्मिश्रण त्रिफला के रूप में, शतपुष्पा (सौंफ), कालमेध, कुटज, दाडिम, अमलतास, शंखपुष्पी, सर्पगन्धा, लालचंदन, कण्टकारी, पिप्पली, भुई आँवला, जटामाँसी, वच, नागरमोथा, रास्ना, बला, बहेड़ा, ज्योतिष्मती, वरुण, लोध, अपामार्ग इत्यादि। इन सबके एकौषधि प्रयोग के अंतर्गत एकाकी एवं सम्मिश्रण के क्वाथ बनाकर उनके प्रयोग शाँतिकुँज के आयुर्वेद प्रकोष्ठ में किए गए तथा परिणामों का विश्लेषण ब्रह्मवर्चस में किया गया।
प्रतिदिन आयुर्वेदिक उपचार हेतु चेकअप कराने वालों की संख्या 1981 से इस प्रकार है:- 8015 वर्ष 1981 में, 8634 वर्ष 1990 में, 7656 वर्ष 19991 में , 8516 वर्ष 1992 में, 11217 वर्ष 1993 में, 7200 वर्ष 1994 में, 7830 वर्ष 1995 में, 10350 वर्ष 1996 में तथा अभी तक 1917 में 6720। प्रतिमाह सत्र में शिविरार्थियों की आयुर्वेदिक दृष्टि से चेकअप कराके लाभान्वित होने वालों की संख्या प्रतिवर्ष अनुसार 1984 से क्रमशः 2118, 1220, 1814, 3745, 1255, 1518, 1172, 83332, 2049, 2080, 2445, 3015, 2482 तथा इस वर्ष 2185 है। जो नौ दिवसीय सत्रों में आते हैं, उनकी संख्या सन् 1984 में क्रमशः 1814, 5530, 3819, 6615, 8010, 12052, 22535, 20151, 14417, 14820, 2396, 2412, 23510 तथा इस वर्ष अब तक 13450 है। यह ध्यान देने योग्य है कि शिविरार्थी जो 1 माह या 9 दिन के लिए आते हैं, की संख्या प्रतिदिन चेकअप कराके परामर्श लेने वालों के अतिरिक्त है।
नानकपुरा नई दिल्ली में श्री ए. के0 खोसला जिन्हें सिरोसिस ऑफ लीवर प्रमाणित कर दिया था, गले में कैंसर संपीड़ित श्री मधुसूदन पटेल (जि0 बड़ौदा), जीभ के कैंसर से ग्रस्त श्री मथुरालाल (जि0 रतलाम), हृदयरोगी श्री राज शर्मा (देहरादून) तथा नेफ्रोटिक सिण्ड्रोम से किडनी फैल्योर की स्थिति में गए श्री मनु अग्रवाल ऐसे रोगियों के नाम हैं जिन्हें विशुद्धतः आयुर्वेदिक औषधियों से ही रोग मुक्त किया गया। ये तो मात्र कुछ उदाहरण मात्र है। औरों की बायपास सर्जरी करने व करने की सलाह देने वाले शल्न्य चिकित्सक जो दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता में कार्य कर रहे हैं, यहाँ की औषधियाँ नियमित रूप से ले रहे हैं ताकि स्वयं को बायपास से बचाया जा सके। इससे ज्यादा इन औषधियों की प्रशंसा में और कहा भी क्या जा सकता है। मधुमेह, दमा, आर्थ्राइटिस, पेष्टिक अल्सर के अनेकों रोगी यहाँ से परामर्श लेकर स्वास्थ्य लाभ को प्राप्त हुए है। यहाँ यह बताना जरूरी है कि शाँतिकुँज कोई दवाखाना नहीं है, यह तो एक तीर्थ है, आरण्यक है- जीवनशैली के शिक्षण की अकेडमी हैं। यहाँ रोगी आकर निष्णात वैद्यों का परामर्श ले सकते हैं, पत्राचार भी कर सकते हैं, किंतु चिकित्सा हेतु ठहर नहीं सकते। स्थान की लब्धि पर हो सकता है अगले दिनों ऐसा केन्द्र कहीं समीप ही बनाया जाए, जहाँ कुछ दिन रहने की भी सुविधा हो, किंतु अभी तो मात्र कुछ घण्टों के लिए ही आया जा सकता है। चिकित्सा परामर्श नितांत निःशुल्क है एवं औषधियाँ बिना लाभ-बिना नुकसान की स्थिति में उपलब्ध हैं। हाँ कोई श्रद्धापूर्वक परामर्श के बदले कोई श्रद्धानिधि देना चाहता है तो वह सहर्ष देकर लेखाविभाग से रसीद प्राप्त कर सकता है।
जहाँ तक उत्पादन क्षमता का प्रश्न है, अभी चार स्वयंसेवक 8 घण्टे मशीन पर सिंगल पिसाई कर हवन सामग्री व प्रज्ञापेय का निर्माण करते हैं, जो प्रतिदिन 700 किग्रा0 के लगभग बैठती है। 4 आदमी आठ घण्टे डबल पिसाई कर कपड़छन पाउडर रूप में जड़ी-बूटियों का चूर्ण तैयार करते हैं, जो कि 350 किग्रा0 प्रतिदिन बैठता है। आठ स्वयंसेवक आठ घण्टे 100 ग्राम के पैकेट्स की पैकिंग कर 3500 पैकेट्स तैयार करते हैं। सारा कार्य पारमार्थिक सेवाभाव से होता है। भावी संभावनाएँ और भी अधिक हैं एवं विकेन्द्रीकृत होने पर कई स्थानों पर निर्माण संभव है।
औषधि संग्रह उत्तर प्रदेश में हरिद्वार, देहरादून, टनकपुर, रामनगर, नेपालगंज, रक्सौल, लखनऊ, कानपुर व ललितपुर से तथा मध्यप्रदेश में मन्दासौर, कटनी, शिवपुरी, रायपुर, धमतरी, नीमच एवं रायगढ़ से किया जाता है। इसके अतिरिक्त हिमालय प्रदेश, दिल्ली, कलकत्ता व मुम्बई से भी औषधि संग्रह कर लायी जाती है। यह सारा वर्णन कार्य की विशालता-विराटता का सबको आभास कराने के लिए दिया गया है।
यह अब ज्योतिर्विज्ञान के आधार पर भी प्रमाणित हो गया है कि विभिन्न वनौषधियाँ, विभिन्न ग्रहों का प्रभाव लेकर धरती पर उपजती हैं एवं अन्तर्ग्रही किरणों के प्रीवों से मनुष्य को भी लाभान्वित करती है। विज्ञान की सभी विधाओं के आधार पर आँकड़ों की दृष्टि से प्रमाणित आयुर्विज्ञान, जो चरक एवं सुश्रुत जैसे महान ऋषियों की हम सबकी देन है, शाँतिकुँज के अधिष्ठाता युगऋषि पूज्य पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा इस युग में हम सबकी समर्थता हेतु पुनर्जीवित किया गया, यह मानव जाति का सौभाग्य है - सबके लिए वरदान है। इसे अधिकाधिक व्यक्तियों तक पहुँचाने का पुण्य अर्जित करना ही सबसे बड़ी समझदारी है।
मधु वाता ऽ ऋतायते सन्त्वोषधीः ॥ मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव रजः । मधु द्यौरस्तु नः पिता॥ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँपर अस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावो भवन्तु नः ॥
“वे जो नैतिक मर्यादाओं को स्वीकार करने की इच्छा रखते हों, यह वायु उनके लिए सुखकर हो जाएँ । यहाँ तक कि ये वनस्पतियाँ नीतिपरायण जीवनयापन करने वाले हम सबके लिए सुखकर हो जाएँ। रात हमारे लिए सुखकर हो जाए एवं यह भोर हमारे लिए सुखकर हो। हे सृष्टिकर्ता। हमारे लिए पृथ्वी और स्वर्ग सुखकर हों, सूर्य हमारे लिए सुखकर हो जाएँ और धेनु हमारे लिए सुखकारी हों।
यजुर्वेद (13, 27-29) की उपर्युक्त ऋचा इस तथ्य को स्पष्टतया उद्घाटित करती है कि हमारे पूर्व पुरुष-मनीषी, ऋषि-मुनि प्रकृति व पर्यावरण को कितना महत्व देते थे। प्रकृति जीवन का स्त्रोत है। पर्यावरण के समृद्ध होता है, यह बात वे बखूबी जानते थे। यही नहीं वे प्रकृति को ‘परमेश्वरी’ कहकर उसकी देवशक्ति के रूप में अर्चना-उपासना करते थे। यही कारण है कि ऋषिप्रणीत हमारी संस्कृति अरण्य संस्कृति के रूप में विख्यात हुई और अपने देश की परम्पराओं में इस तत्व को गहराई से आत्मसात किया गया यही नहीं बाद के दिनों में ये परम्पराएँ जहाँ जिस ओर-जिस किसी देश में गईं वहीं उन्होंने अपने अमिट चिन्ह छोड़े।
प्राचीन यूनानी भाषा के दो शब्दों ह्रढ्ढष्टह्रस् घर और रुह्रत्रह्रस् अध्ययन से मिलकर बने शब्द ‘इकॉलाजी में इसी की गूँज है। इसका अर्थ है जीवित तत्वों के प्राकृतिक निवास या परिस्थिति का अध्ययन। इसके अंतर्गत दो निश्चित प्रवृत्तियाँ है, ऑटो इकॉलाजी और सिनेकोलॉजी। आटोइकोलॉजी में अलग-अलग पौधों और प्राणियों की जातियों के बीच तथा उनकी अपनी संख्या और उनके पर्यावरण का अध्ययन किया जाता है, जबकि सिनेकोलॉजी में पौधों व प्राणियों का उनके प्राकृतिक समूहों में अर्थात् परिस्थितिकी प्रणालियों और पर्यावरण के साथ उनके सम्पर्कों का विवेचन किया जाता है। आधुनिक विज्ञान में जैसे-जैसे अध्ययन की गहराइयाँ बढ़ी हैं, उसी क्रम में ऋषियों की प्राचीन परम्पराओं का मूल्य एवं महत्व उजागर हुआ है।
विख्यात वैज्ञानिक फ्रिटजोफ काप्रा ने अभी कुछ ही दिनों पहले प्रकाशित अपने ग्रन्थ ‘द वेब ऑफ लाइफ’ में ‘डीप इकॉलाजी’ को मानव समाज व प्रकृति के अंतर्संबंधों के क्रियात्मक पहलू के रूप में निरूपित किया है। काप्रा ने इसे धार्मिक व आध्यात्मिक तथ्यों से जोड़ने का प्रयास किया है। इनके अनुसार ‘डीप इकॉलाजी’ आध्यात्मिकता की ओर अनुगमन करती है। क्योंकि मानवीय चेतना ब्रह्माण्डीय चेतना से तादात्म्य स्थापित करके ही अपना उत्कर्ष प्राप्त करती है। काप्रा के इस कथन की पुष्टि भारतीय धर्मग्रन्थ, वेद, उपनिषद्, ईसा का रहस्यवाद, बुद्ध दर्शन, ज्योतिषशास्त्र आदि सभी करते हैं।
नार्वे के दार्शनिक अर्नेनीस ने पर्यावरण का सम्बन्ध समस्त संसार व इनसान के बीच घनिष्ठता से जोड़ा है। उनके अनुसार, विश्वप्रसिद्ध दार्शनिक ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता में इस बात और अधिक ढंग से समझाया गया है। इसमें प्रकृति के आठ अंग बताए गए हैं। इन्हें ‘अष्टधा प्रकृति’ कहा गया है। पहले पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश पाँच बाहरी एवं मन, बुद्धि , अहंकार तीन आन्तरिक ये बाहरी और आन्तरिक घटक आपस में खूब गहराई से जुड़े है। बाहरी प्रकृति की हलचलें इनसान की आन्तरिक प्रकृति को हिलाए-डुलाए बिना नहीं रहतीं।
इस सत्य को अर्नेनीस ने अपने तत्वचिन्तन में पूरी तरह स्वीकारा है। उनका मानना है कि इनसानी जिन्दगी के प्रायः सभी क्रियाकलाप किसी न किसी तरह से पर्यावरण से सम्बद्ध हैं। आधुनिक भौतिकी, वैज्ञानिक अनुसंधान एवं औद्योगिक क्रियाकलापों को पर्यावरण से अलग करके नहीं देखा जा सकता। इन्होंने इकॉलाजी के दो भागों में बाँटा है-शैलो इकॉलाजी एवं डीप इकॉलाजी। शैलो इकॉलाजी मनुष्य के प्राकृतिक मूल्यों के सम्बन्धों तथा उपयोग को दर्शाती है, जबकि डीप इकॉलाजी में मानवीय अन्तः- कारण की पर्यावरण से अभिन्नता की व्याख्या है।
‘द डेथ ऑफ नेचर’ नामक विख्यात ग्रन्थ में सुविख्यात मनीषी कैरोलीन मर्चेण्ट ने इसका दो तरह से उल्लेख किया है-सोशल इकॉलाजी तथा इकोफेमीनिज्म। ‘सोशल इकॉलाजी’ के अनुसार मानव के सामाजिक सम्बन्धों की सीमा उसके रिश्तेदारों-कुटुम्बियों-पत्नी-पुत्रों तक सिमटी हुई नहीं है। यथार्थ में वह ब्रह्माण्डीय परिवार का एक वरिष्ठ सदस्य है, जिसके हर घटक के प्रति उसकी वरिष्ठता के अनुरूप ही विशिष्ट दायित्व है। सोशल इकॉलाजी इन्हीं दायित्वों को निभाने के तौर-तरीकों को विशद् व्याख्या है।
प्राचीन वैदिक ऋषियों की ही भाँति आधुनिक विज्ञानवेत्ता भी यह मानने लगे हैं कि इनसान के प्रकृत से सम्बन्ध बहुत घनिष्ठ और गहरे ही नहीं, भावुक एवं मार्मिक भी हैं। ‘प्रकृति हमारी माता है’-इस वैदिक सत्य का चार्लीन स्प्रीट नेक ने अपने शोध प्रबन्ध ‘एन इन्ट्रोडक्शन टू इकोफेमीनिज्म’ में विस्तार से विवेचन किया है। उनका कहना है कि नारी व प्रकृति अन्योन्याश्रित हैं। यानि कि नारी प्रकृति का स्वरूप और प्रकृति नारी का। पुरुष प्रधान मानव समाज में प्रकृति का दोहन व नारी का शोषण एक साथ हुआ है स्प्रीट नेक के अनुसार नारी प्रकृति की पीड़ा को अपेक्षाकृत अधिक गहराई से समझ सकती है। उसकी संवेदनशील प्रवृत्ति ही प्रकृति के भावी सम्वर्द्धन का आधार बनेगी।
गुजरे जमाने में यह समझा जाता था कि ‘प्रकृति’ मानव के लिए है। समस्त प्राकृतिक सम्पदा पर एकमात्र मनुष्य का आधिपत्य है। वह जैसे चाहे वैसे उसका उपभोग करें। इसी भोगवादी प्रवृत्ति के चलते हमने उसका इस हद तक शोषण कर डाला कि अब हमारा खुद का अस्तित्व ही संकटग्रस्त लगने लगा है। प्रकृति का विनाश कर इस आधुनिक भोगवादी सभ्यता की जिस अट्टालिका को हमने खड़ा किया है, अब हम उसी के तले दबने लगे हैं और तो और प्रकृति व पर्यावरण का जिस विज्ञान एवं वैज्ञानिकता ने सबसे ज्यादा विनाश किया, आज वही विज्ञान हमें चेतावनी देने लगा है कि प्रकृति, पर्यावरण और पारिस्थितिकी की रक्षा करो, अन्यथा तुम भी बच नहीं सकोगे।
पिछले कुछ ही समय पहले विकसित हुई विज्ञान की आधुनिकतम शाखा ‘डीप इकॉलाजी’ प्राचीन वैदिक ऋषियों के कथनों को ही दुहराती हे, साथ ही नैतिकता एवं मर्यादा की सीमा रेखा खींचते हुए ऐसा जीवन जीने का आग्रह करती है, जिसे सृष्टि के किसी जीवन का शोषण व संहार न हो सके और प्राकृतिक सन्तुलन बना रहे। वर्तमान समय में मानवी बुद्धिमत्ता ही मानवीय मूर्खता का पर्याय बनी हुई है। मनुष्य अब तक अपनी जिन बौद्धिक उपलब्धियों पर इतराता फिरता था, आज वही बौद्धिक उपलब्धियाँ पर्यावरण के आँचल को तार-तार कर रही है। परिस्थितियों की विषमता को देखते हुए विज्ञान की सभी शाखाओं के वैज्ञानिक मिलकर विज्ञान के ‘इकोएथिकल’ आयाम का विकास किया है। इसका मतलब सिर्फ इतना ही है, विज्ञान की किसी भी शाखा में होने वाला वर्तमान एवं भावी अनुसंधान अब केवल बुद्धि पर आधारित न होकर नैतिकता पर भी अवलम्बित होगा।
इस नैतिकता का भावार्थ इतना ही है कि प्रकृति-पर्यावरण एवं मानवीय जीवन के पारस्परिक एवं मानवीय जीवन के पारस्परिक सम्बन्ध बड़े भावपूर्ण एवं गहरे है। भारतीय ज्ञान विज्ञान की प्राचीन सम्पदा में इसका उल्लेख बड़ी काव्यात्मक रीति से होता आया है। प्रातः जागरण बेला में ही पुराण कालीन ऋषिगण प्रार्थना करते थे-
पृथ्वी सगन्धा सरसास्तथापः र्स्पशश्च वायुर्ज्वलनः सतेजाः। नभः सशब्दं महता सहैव यच्छन्तु सवे मम सुप्रभातम्॥
लेकिन बुद्धिवाद के दम्भ में हम यह सत्य पूरी तरह भुला बैठे कि हमारे इनसानी जीवन का सुप्रभात पर्यावरण के अनुग्रह पर ही निर्भर है। आज ‘डीप इकॉलाजी’ पर किए जा रहे अनुसंधान हमें पुनः वैदिक, पौराणिक अवधारणाओं की ओर मुड़ चलने के लिए विवश कर रहे हैं। हाल ही में प्रकाशित ‘डीप इकॉलाजी’ नामक पुस्तक में बारबीक फाल्स ने उल्लेख किया है कि प्रकृति संरक्षण की अवधारणा व्यावहारिक तथ्यों के साथ सम्पूर्ण मन एवं भावना से करनी चाहिए। फाल्स ने अपने इस सूत्र की व्याख्या। ‘ट्राँस पर्सनल इकॉलाजी’ के अंतर्गत की है। डीप इकॉलाजी की यह आधुनिकतम मान्यता हमारे प्राचीन ग्रन्थों में बिखरी पड़ी है।
सच तो यह है कि समय, समाज एवं सभ्यता के परिवर्तन के बावजूद पर्यावरण एवं मानव जीवन के सम्बन्ध शाश्वत हैं। इन सम्बन्धों की महत्ता भी अक्षुण्ण हैं। रामकथा के सबसे अधिक लोकप्रिय ग्रन्थ ‘रामचरितमानस’ में तुलसीदास ने इसे इन शब्दों में उकेरा है- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा, यही पंच तत्व है। प्रकारान्तर में इसे ही इकॉलाजी के रूप में जाना गया है। डच मूल के भारतीय विद्वान फादर कामिल बुल्के के शोध ग्रन्थ ‘रामकथा, उद्भव और विकास’ में भी इसे उजागर किया गया है। बाल्मीकि रामायण तो जैसे पर्यावरण की महागाथा है।
वैदिक काल तो जैसे अरण्य संस्कृति का स्वर्ण काल था। उन दिनों वनदेवी अरण्यानी की आराधना अनिवार्य थी। ये वनदेवी प्रकृति माता का पर्याय ही थी। यही जीवों-वनस्पतियों के जीवन, पोषण, संरक्षण व विकास का आधार थी। जंगल को देवता तुल्य माना जाता था और यह आकर्षण का केन्द्र था। सभ्यता का शुभारम्भ यहीं से हुआ। भारतीय आर्य परम्परा में अरण्य, तपोवन और कुँज ज्ञानस्थली, तपस्थली और कर्मस्थली रहे हैं। वृक्षों की पूजा उन दिनों गौरव की बात थी। स्कन्दपुराण और कठोपनिषद् के अनुसार पीपल के पेड़ की जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु एवं टहनियों में शिव का वास माना गया है। ऋग्वेद में सोमवृक्ष और अथर्ववेद में पलाश वृक्ष की पूजा का वर्णन मिलता है। माँ शीतला को पलाश वृक्ष की देवी माना जाता है।
हमारे ऋषियों ने पेड़ों की पूजा का विधान बनाकर पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्द्धन का पथ प्रशस्त किया था। अनेक संस्कृत ग्रन्थों में कई स्थानों पर प्रकृति एवं पर्यावरण के साथ मानवीय जीवन के भाव भरे सम्बन्धों का उल्लेख मिलता है। ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ में वर्णन मिलता है कि शकुन्तला पेड़ों को जल दिए बिना भोजन नहीं ग्रहण करती थी। वह पेड़ों से इतना प्रेम करती थी कि अपने शृंगार के लिए फूलों एवं पत्तों को नहीं तोड़ती थी, बल्कि पेड़ों के नीचे गिरे फूलों तथा पत्तों से अपना शृंगार करती थी।
प्राचीनकाल की ये भावनाएँ अपने देश के विभिन्न भागों में अभी भी अलग-अलग परम्पराओं का रूप लेकर प्रचलित हैं। कहीं मनोकामना पूर्ति के लिए, तो कहीं देवता का स्वरूप मानकर इनकी पूजा-अभ्यर्थना की जाती है। बिहार प्रान्त के कई इलाकों में आज भी जब वर-वधु गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते हैं, तो वे एक पेड़ जितना हरा-भरा रहता है, उनका दाम्पत्य जीवन उतना ही सुखी, स्वस्थ एवं सम्पन्न होता है। वटवृक्ष की पूजा सुहाग प्रदान करने एवं उसकी रक्षा करने के लिए करने का प्रचलन है। देश के अनेक अंचलों में ज्येष्ठ मास की अमावस्या को उपवास रखकर वटवृक्ष की पूजा की जाती है। कुछ क्षेत्रों में पुत्र प्राप्ति के लिए पीपल की उपासना करने का विधान है।
प्रकृति और आदिवासी तो एक-दूसरे के पर्याय हैं। बहुत से आदिवासियों में यह प्रथा है कि विवाह के समय वधू महुए के पेड़ पर सिन्दूर लगा कर उससे सुहागिन होने का वरदान माँगती है। वर आम के पेड़ को नमन कर अपने वैवाहिक जीवन की सफलता की कामना करता है। कुछ प्रान्तों में हलषष्ठी के दिन महिलाएँ झरबेरी और बाँस के पेड़ों की पूजा करके अपने पुत्रों के दीर्घजीवन का कामना करती हैं। दशहरे पर शमी वृक्ष की पूजा का विधान आज भी देश के अनेक भागों में प्रचलित है। शिवरात्रि के अवसर पर बेलपत्रों से शिव की उपासना फलदायी मानी जाती है। तुलसी को शुद्धि की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, अतः कोई भी भोग तुलसी के बिना पूरा नहीं माना जाता। आम, जामुन, असन, लोध्र, शाल, कटहल, अंकोल, सुन्दर, तिनिश, बेल,तेंदू, बाँस, काशमरी, वरण, महुआ, तिलक, बेर, आँवला, कदम्ब, बेंत, अनार आदि फूलों-फलों और छायादार वृक्षों की महत्ता को दर्शाने वाली अनेकों परम्पराएँ अपने देश के विभिन्न भागों में प्रचलित हैं।
अपने देश एवं समाज में इन परम्पराओं का प्रचलन यह सिद्ध करता है कि हमारे पूर्वज पर्यावरण के प्रति कितने जागरुक थे। उनकी यह जागरुकता प्राचीन ग्रन्थों में भी विविध रूपों में प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए, धर्मशास्त्रों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि जो हरे वृक्ष को काटता है, वह सन्तान से वंचित हो जाता है। यही नहीं पेड़ को पुत्र के समान बताया गया है। शास्त्रों में केवल सूखे पेड़ काटे जाने को उचित माना गया है हरे पेड़ों को काटने से प्राकृतिक सन्तुलन बिगड़ता है, इसलिए इस पर निषेधाज्ञा लागू की गयी थी। यज्ञ-हवन आदि धार्मिक कृत्यों के लिए भी सूखे पेड़ तलाशने की परम्परा थी।
प्राचीन समय में पर्यावरण संरक्षण को हर जन अपना पुण्य-कर्तव्य मानकर चलता था। आज इसी बात का उद्घोष विश्व के शिखर वैज्ञानिक ‘इकोएथिकल’ अवधारणा द्वारा कर रहे हैं। पुरातनकाल में कृषि सभ्यता और वन सभ्यता के सामंजस्य से जीवन सुख और समृद्धि से भरा-पूरा रहता था। मनुष्य जाति का इतिहास प्रकृति के इतिहास का एक सिलसिला है। अतएव मनुष्य जाति के भविष्य को प्रकृति के साथ समाज की अन्तर्क्रिया जैविक और सामाजिक क्रियाओं के परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए।
विज्ञानवेत्ता भी अपने सतत् अनुसन्धान द्वारा इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मानवीय एक-दूसरे से घनिष्ठतापूर्वक जुड़ें है। एक की गड़बड़ी से दूसरा प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। व्यवहार विज्ञानियों ने इन दिनों एक नये आयाम की खोज की है। उनके अनुसार समूचे संसार में फैले मानव समाज की व्यवहार सम्बन्धी गड़बड़ियों का एक महत्वपूर्ण कारण पर्यावरण असन्तुलन है। इनका मानना है कि अच्छे समाज, अच्छे आदमी के लिए जरूरी है कि प्रकृति सम्पन्न और समृद्ध हो।
बात भी सही है। प्रकृति एवं मानव समाज की पारस्परिक अन्तर्क्रिया इतनी व्यापक है कि उससे समूची मानवजाति प्रभावित हो रही है। वर्तमान में दिखाई दे रहे पर्यावरणीय बिगाड़ का कारण बेतहाशा औद्योगीकरण, अन्धाधुन्ध शहरीकरण, ऊर्जा और कच्चे माल के पारम्परिक, साधनों की घटोत्तरी, प्राकृतिक सन्तुलनों के विघटन, विभिन्न जानवरों एवं पेड़-पौधों का भारी विनाश ही है। स्वच्छन्द वैज्ञानिक प्रगति तथा तकनीकी सामर्थ्य ने मनुष्य को काफी ताकत दे दी है। हम पर्वतों को हटा सकते हैं, नदियों का मार्ग बदल सकते हैं। नए सागरों का निर्माण कर सकते हैं। मतलब यह कि हम प्राकृतिक जगत में काफी फेर-बदल कर सकते हैं। परन्तु कौन-सी फेर-बदल उचित है, कौन-सी अनुचित ? क्या करने से सत्परिणाम सामने आएँगे, क्या करने से दुष्परिणाम सामने आएँगे, क्या करने से सत्परिणाम सामने आएँगे, क्या करने से दुष्परिणाम। इसे बिना सोचे-विचारे कुछ भी करने लगा जाए तो इसे मूर्खता के सिवा और क्या कहा जाएगा ?
अमेरिकन विद्वान जे0 एम॰ हाफ ‘बिहेवियर इकॉलाजी’ में कहते हैं कि आज यह जगजाहिर हो गया है कि प्राकृतिक जगत पर अपने अन्तहीन आक्रमण तथा बगैर सोचे-विचारे उसमें बड़े फेरबदल करके इस अधिकार का अविवेकपूर्ण उपयोग नहीं कर सकते और हमें करना भी नहीं चाहिए, क्योंकि इसके परिणाम हानिकारक ही होंगे। आधुनिक अनुसंधानों से यह साबित हो चुका है कि जैवमण्डल पर मनुष्य के अनवरत एकतरफा और काफी हद तक अनियमित प्रभाव से हमारी सभ्यता एक ऐसी सभ्यता में तब्दील हो सकती है, जो मरुभूमियों को मरुद्यानों को रेगिस्तानों में बदल देगी।
इसी सबको मद्देनजर रखते हुए ए व्हाइट का ‘दिह्ममनाइजेशन ऑफ मैन’ में कहना है कि प्रकृति पर अपनी मानवीय विजयों के कारण हमें आत्मप्रशंसा में विभोर नहीं हो जाना चाहिए। क्योंकि ऐसी हर विजय हमें अमानव बनाने वालाी होती है। यह सही है कि हरेक विजय से पहले वे ही परिणाम मिलते हैं, जिनका हमने भरोसा किया था। पर दूसरी और तीसरी बार में उसके बिलकुल भिन्न तथा अप्रत्याशित परिणाम होते हैं, जिनसे अक्सर पहले वाले परिणाम का असर जाता रहता है। पिछली सदी तथा मौजूदा सदी के पूर्वार्द्ध में मनुष्य का लालच इतना बढ़ा-चढ़ा नहीं था, जो सारी मानव जाति के अस्तित्व की आवश्यक शर्त के रूप में सोचने को विवश करता । यह तकाजा करता कि समाज और उत्पादन के सिलसिले में प्रकृति पर हमारे हस्तक्षेप के दूरगामी परिणामों पर विचार किया जाए। लेकिन अब यह निहायत जरूरी हो गया है।
इनसान द्वारा भौतिक चीजों के लिए प्रकृति के शोषण की शैली ने पर्यावरण को ही नहीं मनुष्य के जीवन जीने के रंग-ढंग को भी बरबाद कर दिया है। हमारा जीवन सरल, सौम्य और मृदुल बन इसके लिए जरूरी है कि हम पृथ्वी पर जीवन प्रणाली के विभिन्न तत्वों पर अपने प्रभाव को सावधानीपूर्वक देखें, समझें और सुधारें। पर्यावरण को मनुष्य को आवश्यकताओं के अनुरूप रूपांतरित करना एक सीमा तक तो ठीक है। विनाशक प्राकृतिक शक्तियों जैसे भूकम्पों, चक्रवातों, बाढ़, सूखा, चुम्बकीय और सौर औषधियों से भी संघर्ष करना पड़ेगा। परन्तु यह केवल उन नियमों के अनुसार ही किया जा सकता है, जिनके द्वारा जैवमण्डल एक अखण्ड व स्व-नियामक प्रणाली के रूप में काम करता व विकसित होता है। आज का पर्यावरणीय सवाल महज प्रदूषण तथा मनुष्य के आर्थिक क्रियाकलापों के दूसरे नकारात्मक परिणामों तक सीमित नहीं है। यह हमारी जीवनशैली को गढ़ने से भी सम्बन्धित है।
इसे हल करना तभी सम्भव है, जब हम सब समवेत भावनाओं से प्रकृति को वैदिक ऋषियों की भाँति ‘माता’ के रूप में स्वीकारे, समादृत करें। अन्तःकरण में इन भावनाओं के उपजते ही उस नीति में अपने आप बदलाव आने लगेगा, जिसके अंतर्गत प्रकृति पर विजय प्राप्त करने, उसके विभिन्न साधन स्रोतों से मनचाही लूट-खसोट करने को ही मानवीय पुरुषार्थ का प्रतीक और सामाजिक लक्ष्य मान लिया गया था।
हम हँसी-खुशी की जिन्दगी जी सकें, इसके लिए सन्तुलित रीति हर हाल में अख़्तियार करनी होगी। इसके प्रयोग के तौर-तरीके, स्थान-परिवेश और उसकी अवस्थाओं, आवश्यकताओं के अनुरूप अवश्य भिन्न हो सकते हैं सहयोग, संरक्षण सद्भाव का यह प्रवाह हमारे व्यवहारिक विकारों को धीरे-धीरे दूर कर निर्मल करता जाएगा। इसके लगातार बने रहने के लिए जरूरी है, हम सभी का एकजुट प्रयास, जो एक-दूसरे में निरन्तर इसके लिए प्रेरणा भरता रहे। शान्तिकुँज में आयोजित पर्यावरण संवर्ग समारोह में इसी तत्वदर्शन को अभियान का रूप दे दिया गया है।
पर्यावरण प्रदूषण के जलते सवाल की आँच से आज हर कोई बुरी तरह झुलस रहा है। जब इस सर्वनाशी समस्या ने इनसानी अस्तित्व पर ही सँवालिया निशान लगा दिया हो, तब भला कौन इससे स्वयं को अलग रख सकता है। साँस लेने की हवा, पीने का पानी, स्वयं का आवास, आस-पास का वातावरण पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है। कभी का सुखी, शान्त व समृद्ध समाज इसके दुष्प्रभावों से, रोग-शोक से जर्जरित है। सब ओर प्रदूषण रूपी भयावह पिशाचिनी ताण्डव नर्तन करती नजर आ रही हैं ध्वनि प्रदूषण ने तो हर किसी की रातों की नींद हराम कर दी है। प्रदूषित परिस्थितियों के भयावह घटाटोप में भविष्य का उजाला कहीं से नजर नहीं आ रहा। दुनिया को वर्तमान तबाही से बचाना तभी सम्भव है जब प्रदूषण के विरोध में जबरदस्त मुहिम छेड़ी जाए और यह मात्र नारों, स्टीकरों एवं सम्मेलनों तक सीमित न रहे बल्कि यह पुकार हर जन के अन्तःकरण से निकले और नैष्ठिक कर्मठता बनकर दिखाई पड़े।
आज हर आदमी साफ हवा में साँस लेने के लिए तरस रहा है। वायुमण्डल में कार्बन डायऑक्साइड की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। एक बिजलीघर से 50 टन सल्फर डायऑक्साइड और उससे भी अधिक कालिख वातावरण में फैल जाती है। अपने पूरे देश में ऐसे 75 से भी ज्यादा ताप बिजलीघर हैं। इसी तरह रासायनिक खाद के बड़े-बड़े कारखानों से अत्यधिक प्रदूषित तत्व उत्सर्जित होते हैं, जिनमें अमोनिया, हाइड्रोकार्बन आदि प्रमुख है। वाहनों से निकलने वाले धुएँ में कार्बन मोनो ऑक्साइड नाइट्रोजन व लेड के ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन, अल्डीहाइड आदि होते हैं। जो वायुमण्डल को प्रदूषित करते हैं। दुनिया भर में इन दिनों 50 करोड़ वाहनों का उपयोग किया जाता है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक पर्यावरण नियन्त्रण के सभी नियमों के बावजूद विकसित देशों में 150 लाख टन कार्बन मोनो ऑक्साइड, 15 लाख टन हाइड्रोकार्बन, 10 लाख टन नाइट्रोजन ऑक्साइड प्रतिवर्ष वायुमण्डल में पहुँचते हैं। इसके अलावा ईंधन के जलने से कार्बन मोनो ऑक्साइड की जो मात्रा वायुमण्डल में आती है, वह अरबों टन प्रतिवर्ष है। इस क्रम में संसार में 70 फीसदी प्रदूषण विकसित देशों में हो रहा है।
प्रदूषण के इस दौर में अपना देश भी कुछ पीछे नहीं है। एक अध्ययन के अनुसार विश्व के 41 प्रदूषित शहरों में दिल्ली का स्थान चौथा हैं केन्द्रीय सड़क-अनुसंधान संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में वाहनों की संख्या गत बीस वर्षों में दस गुने से भी ज्यादा बढ़ गयी है। वर्तमान समय में यहाँ 25 लाख वाहन हैं। दिल्ली में मोटर वाहनों, कारखानों और अन्य स्रोतों से रोजाना लगभग 2500 टन प्रदूषित पदार्थ निकलते हैं। यहाँ पर कार्बन मोनो ऑक्साइड का गाढ़ापन 35 पी0पी0एम॰ है, जबकि विषाक्तता के लिए 25 पी0पी0एम॰ ही काफी है और स्वीकृत सीमा तो सिर्फ 9 पी0पी0एम॰ की ही है। यहाँ रहने वाला एक व्यक्ति हर दिन साँस लेने के दौरान लगभग एक पैकेट सिगरेट पीने के बराबर प्रदूषित वायु का सेवन कर चुका होता है। मुम्बई, अहमदाबाद, नागपुर जैसे शहरों में वार्षिक प्रदूषण की दर तीन गुना ज्यादा है। जबकि दिल्ली, कलकत्ता और कानपुर में प्रदूषण की वार्षिक औसत दर अंतर्राष्ट्रीय मानक की तुलना में पाँच गुना अधिक है।
‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ के अनुसार वायु प्रदूषण इसी प्रकार जारी रहा तो इक्कीसवीं सदी के आने तक विश्व में कम से कम 9,75,000 व्यक्तियों के लिए आपातकालीन कक्ष की जरूरत पड़ सकती है। 8.5 करोड़ लोगों की दैनिक गतिविधियाँ पूरी तरह ध्वस्त हो जाएँगी। 7.2 करोड़ लोगों में श्वसन संबंधी बीमारियों के लक्षण प्रकट होंगे, लगभग 30 लाख बच्चे श्वसन रोग से पीड़ित नजर आएँगे, 90 लाख लोग अस्वस्थ और 2.4 करोड़ लोग फेफड़े सम्बन्धी रोगों से ग्रस्त हो सकते हैं। अभी ही यह स्थिति है कि दिल्ली में प्रदूषण के कारण हर तीसरे परिवार के एक सदस्य के सामने कैंसर का आसन्न संकट मँडरा रहा है। यहाँ का हर छठा आदमी टी0बी0 अथवा दमे का रोगी होने की स्थिति में है।
नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फर डायऑक्साइड गैसों के कारण संसार के अनेक भागों में तेजाब वर्षा हो रही है। ये आपस में मिलकर हाइड्रोकार्बनों के साथ धूप में ओजोन पर्त को हानि पहुँचाते हैं। यह ओजोन मंडल पृथ्वी के धरातल से तकरीबन 10.15 किलोमीटर ऊँचे आकाश में मौजूद है और इसका काम सूर्य से आने वाली खतरनाक पराबैगनी विकिरणों को पृथ्वी की सतह तक आने से रोकना है। इस ओजोन मण्डल को सबसे अधिक नुकसान औद्योगिक क्षेत्र से उत्पन्न होने वाली क्लोरीन गैस के कारण होता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि प्रदूषण की दर इसी प्रकार बनी रही तो अगले दो सालों में अपनी धरती में सूर्य की पराबैगनी विकिरण का दुष्प्रभाव 8 से 15 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। ह्रास की यह दर उत्तरी ओर दक्षिणी मध्य अक्षांश में लगभग पाँच प्रतिशत है। इससे पृथ्वी के तापमान में बढ़ोत्तरी होती है।
इन्हीं दुष्प्रभावों की वजह से गतवर्ष 1996 में पृथ्वी शीतयुग के बाद सबसे अधिक गर्म रही। पिछले दस हजार साल में पृथ्वी का ताप 50 डिग्री से लेकर 90 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। इसी वजह से इस दौरान समुद्र का जल 100 मीटर ऊँचा हो गया है। इन परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए वैज्ञानिकों ने नीदरलैण्ड और बंगलादेश के एक बड़े हिस्से के निकट भविष्य में समुद्र में समा जाने की भविष्यवाणी की है। नासा के गोडार्ड इन्स्टीट्यूट ऑफ स्पेस स्टडीज तथा ब्रिटेन के हैडले सेण्टर फॉर क्लाइमेटिक रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार पिछले साल औसतन ताप 15.33 डिग्री सेल्सियस था। अनुमान है कि इसमें अगले सौ सालों में 30 डिग्री से 50 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है। भारतीय भू-भाग का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। वैज्ञानिकों की राय में 20 डिग्री सेल्सियस की तापवृद्धि भी अनेक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक प्रणालियों को तबाह कर देने के लिए पर्याप्त हैं इससे सारे जीव बैक्टीरिया से लेकर इनसान तक प्रभावित होते हैं वर्ल्ड वाच संस्थान के अध्यक्ष लेस्टर ब्राउन के अनुसार धरती के तापमान में हो रही बढ़ोत्तरी के कारण यूरोप, अमेरिका, रूस और उक्रेन में फसलों को नुकसान पहुँचाने वाली ताप लहर चलने लगी है, जिसके कारण खाद्यान्न उपज में काफी गिरावट आयी है।
पहाड़ी पर बिगड़ते पर्यावरण सन्तुलन ने वायुमण्डल पर और भी बुरा असर डाला है। हाल ही में पहाड़ी वातावरण में कार्बन डायऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि हुई है। पेड़ कट जाने से वर्षा कम होने लगी है तथा जलवायु भी अनिश्चित व अनियंत्रित हो गयी है। प्राचीनकाल से औषधीय जड़ी-बूटियों की खान रहे हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र में 200 से ज्यादा महत्वपूर्ण पादप प्रजातियाँ लुप्त होने के कगार पर हैं। इनमें से अधिकाँश प्रजातियाँ ऐसी हैं, जो दुनिया भर में केवल यहीं पायी जाती हैं। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण विभाग कलकत्ता की रेड डाटाबुक के अनुसार हिमालय क्षेत्र में 214 महत्वपूर्ण प्रजातियाँ संकटग्रस्त है। इन संकटग्रस्त प्रजातियों के रूप में चिह्नित पादप प्रजातियों के रूप में चिह्नित पादप प्रजातियों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। पंचमढ़ी वन-क्षेत्र में करीब 800 दुर्लभ पौधों की प्रजाति विलुप्ति के कगार पर हैं। इसी तरह पौधों की 49 प्रजातियाँ मध्य प्रदेश के बस्तर जिले के वनों से समाप्त हो गयी हैं। वनों की कटाई के कारण जमीन के अन्दर का जलस्तर तेजी से घट रहा है। इसके परिणामस्वरूप उत्तर पश्चिम भारत में लगभग 2,50,000 हेक्टेयर भूमि में जल की समस्याएँ उत्पन्न हो गयी है और अगले 30 से 50 वर्षों में 3 लाख हेक्टेयर भूमि, पानी के अभाव में ऊसर हो जाने की समस्या है। एक अध्ययन के अनुसार अपने देश में वर्ष भर में वर्षा से लगभग 40 करोड़ हेक्टेयर मीटर जल प्राप्त होता है। इसकी भूमिगत जलसम्पदा अनुमानतः 300 मीटर की गहराई में 370 करोड़ हेक्टेयर है, जो यहाँ की सालाना बारिश से लगभग 10 गुना अधिक है। भूगर्भवेत्ता जी0सी0 चौधरी के सर्वेक्षण के मुताबिक पता चला है कि प्रदूषण की वजह से उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, बिहार के भोजपुर आदि क्षेत्र में भूमिगत जल में नाइट्रोजन, फास्फेट पोटेशियम के अलावा सीसा, मैंगनीज, जस्ता, निकिल जैसे रेडियो-धर्मी पदार्थ व जहरीले तत्व निर्धारित मान्य स्तर से काफी ज्यादा मौजूद है। यह स्थिति अत्यन्त विस्फोटक एवं खतरनाक है।
पुरातनकाल में पर्यावरण की दृष्टि से अपने देश में ही नहीं विदेशों में भी बड़े-बड़े नगरों को नदियों के किनारे बसाया गया था। आधुनिक समय में औद्योगिक संस्थाओं, कारखानों, मिलों द्वारा बहाए जाने वाले रसायनों, कूड़ा तथा प्रदूषण निकासी वाले पानी से नदियों का पानी इस कदर प्रदूषित हो चुका है कि नदियाँ पर्यावरण को स्वच्छ करने के बजाय भयंकर बीमारियों को जन्म दे रही है। यही नहीं कूड़े की अधिकता की वजह से ये नालों में बदलती जा रही हैं। देश के लगभग 3119 शहर और कस्बों में से आठ में पूरे और 201 में आँशिक मल-जल उपचार संयंत्र हैं। इन सभी शहरों में अनुपचारित मल-जल जिसकी मात्रा प्रतिदिन तकरीबन 1200 करोड़ लीटर से भी ज्यादा होती है, नदियों के जल को प्रदूषित कर रहे हैं उत्तर प्रदेश में लगभग 190 औद्योगिक इकाइयाँ अपना करोड़ों टन कचरा हर रोज नदियों में गिरा रही हैं। पूरे देश की स्थिति तो और भी चिन्ताजनक है। गंगा सहित देश की प्रमुख 17 जीवनदायिनी नदियों का जल औद्योगिक कचरे व गन्दे जल के विसर्जन से इस कदर प्रदूषित हो चुका है कि इनका पानी नहाने के काबिल भी नहीं रह गया है।
देवनदी गंगा गंगोत्री से समुद्र तक अपनी 2500 कि0मी0 की यात्रा में कुल अस्सी छोटे-बड़े शहरों को अपने आँचल में समेटे हुए है तथा लगभग 25 करोड़ व्यक्तियों के जीवन और स्वास्थ्य को यह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। इस पवित्र नदी में हर साल दस हजार मृत मनुष्यों के शव0, साठ हजार मृत जानवरों के शरीर प्रवाहित कर दिए जाते हैं। अस्सी शहरों का करीब 500 करोड़ लीटर प्रदूषित मल-जल प्रतिदिन पवित्र गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है। गंगा की सहायक नदी गोमती का हाल तो और भी खराब है। इस नदी में सिर्फ लखनऊ से हर रोज 1800 टन घरेलू कचरा तथा 33 करोड़ लीटर प्रदूषित जल प्रवाहित हो रहा है। इसी तरह यमुना नदी में दिल्ली से 190 करोड़ लीटर प्रदूषित जल हर रोज प्रवाहित किया जाता है। यही हाल बिहार की दामोदर नदी का है, जो अब तक प्रदूषण के खतरनाक स्तर को पार कर चुकी है। गुजरात की प्रसिद्ध नदी साबरमती अहमदाबाद के 74 करोड़ लीटर प्रदूषित जल का भार ढोए जा रही है।
जल प्रदूषण की विषाक्तता की वजह से अपने देश को दो सौ अरब रुपए का नुकसान हर साल झेलना पड़ता है। इसी की वजह से पेचिश, यकृत सम्बन्धी रोग एवं हैजा आदि के कारण अगणित आदमी अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। सन् 1987 में जितनी भी मौतें हुई हैं, उनमें से 60 प्रतिशत का कारण जल प्रदूषण रहा है। प्रदूषण के कारण भूमिगत जल में मौजूद नाइट्रेट के इन-नाइट्रोसो कम्पाउण्ड के रूप में बदलने की आशंका उत्पन्न हो गयी है। इससे पेट का कैंसर होने की सम्भावना रहती है।
प्रदूषण की महामारी को बढ़ाने में कीटनाशकों का भी भारी योगदान है। वर्तमान समय में हमारे देश में 64 कारखाने कृषि रसायनों का उत्पादन करते हैं। 9 वीं पंचवर्षीय योजना में 85 हजार टन कृषि रसायनों की खपत का अनुमान है। हाल ही में किए गए एक अनुसंधान से ज्ञात हुआ है कि प्रतिवर्ष विश्वभर में कीटनाशकों के दुष्प्रभाव के कारण कम से कम 20,000 व्यक्ति असमय ही मौत का ग्रास बनते हैं तथा 20 लाख व्यक्ति हर साल जानलेवा रोगों का शिकार होते हैं। कीटनाशकों के चिरकालीन विषाक्तता के कारण असमय गर्भपात होना, बच्चों में शारीरिक अपंगता, असमय जन्म, मानसिक विकास, स्मरण शक्ति का ह्रास, प्रतिरोधक क्षमता में कमी, गुर्दे तथा यकृत की बीमारियाँ, चर्म रोग तथा कैंसर जैसी बीमारियाँ, उत्पन्न हो रही हैं। इसकी वजह से खेतिहर मजदूरों में आँखों का विकार, थकावट तथा नपुँसकता आदि रोग बढ़ रहे हैं।
मौजूदा औद्योगिक क्रान्ति और आबादी की बढ़ोत्तरी ने अगणित बीमारियों के जनक ‘शोर’ को उपजाया हैं 75 डेसीबल से अधिक का शोर हानिकारक माना जाता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि 85 डेसीबल से अधिक की ध्वनि लगातार सुनने से बहरापन भी आ सकता है।वही 90 डेसीबल शोर के कारण एकाग्रता व मानसिक कुशलता में कमी आ जाती है। 120 डेसीबल से ऊपर का शोर गर्भवती स्त्रियों और पशुओं के भ्रूण को नुकसान पहुँचा सकता है। 155 डेसीबल से अधिक शोर से मानव त्वचा जलने लगती और 180 पर मृत्यु तक हो सकती है। शोर से रक्त में कोलेस्टरोल और कर्टिसीन की स्तर बढ़ जाता है, जिससे हाइपरटेंशन होता है। यह आगे चलकर हृदय रोग व मस्तिष्क रोग सरीखी घातक बीमारियों को जन्म देता है। आस्ट्रिया के डॉ0 ग्रिफिथ का दावा है कि शोर से दिमाग के तन्तु कमजोर हो जाते हैं और आदमी असमय ही बूढ़ा हो जाता है।
शोर के कारण श्वसन गति, रक्तचाप, नाड़ी गति में उतार-चढ़ाव, पाचन तन्त्र की गतिशीलता में कमी आदि दुष्प्रभाव भी देखे गए हैं। एक अनुसन्धान के अनुसार ध्वनि प्रदूषण के कारण मुर्गियों ने अण्डे देना बन्द कर दिया और मवेशियों के दूध में कमी आ गयी। अनिद्रा और कुण्ठा जैसे विकारों का कारण भी शोर ही है। इससे पाचन विकार, सिर दर्द, झुँझलाहट आदि होना सामान्य बात हैं इसी कारण विज्ञानवेत्ताओं ने ध्वनि प्रदूषण को मानवता के लिए स्लोप्वायजन (धीमा जहर) की संज्ञा दी है।
एक अध्ययन के अनुसार भारी ट्रेफिक में 90 डी0बी0, रेलगाड़ी से 10 कार के हार्न से 100 से 110, हवाई जहाज से 140 से 170 तथा मोटर साइकिल से 90 डी0बी0 की ध्वनि तरंगें पैदा होती हैं। सुपर सोनिक जेट और कंकार्ड विमानों से उत्पन्न 150 डी0बी0 से अधिक शोर के कारण ओजोन पट्टी को सर्वाधिक क्षति पहुँचती है। कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ0 हरेला जान्सन का दावा है कि इन विमानों के कारण कुछ ही सालों तक यदि यही पट्टी नष्ट हो जाएगी। इससे मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के बुरी तरह प्रभावित होने की सम्भावना है।
पर्यावरण का हमारे स्वास्थ्य से सीधा सम्बन्ध है। यहाँ तक कि प्रदूषण से अजन्मा बच्चा तक प्रभावित होता है। गर्भस्थ शिशु बाह्य पर्यावरण के प्रति संवेदनशील होता है। कीटनाशकों, घातक रसायनों व अन्य विषैले पदार्थों के मिश्रणों में गर्भस्थ शिशुओं के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को तहस-नहस करने की पूर्ण क्षमता है। संयुक्त राष्ट्र के एक सर्वेक्षणानुसार वर्तमान में कोई गर्भ सुरक्षित नहीं है। आधुनिक जीवनशैली व औद्योगिक क्रियाकलापों के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले दूषित तत्व माँ के गर्भ में पल रहे भ्रूण पर कहर बरपा रहे हैं। माँ के गर्भ में सांसें ले रहा गर्भस्थ शिशु प्रदूषित पर्यावरण के कारण खतरों के बीच पल रहा है।
नई दिल्ली के अपोलो अस्पताल की एक स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ0 मधुराय के अनुसार कुछ प्रदूषित तत्वों का भार व रासायनिक संरचना गर्भस्थ शिशुओं के आहार से मिलती-जुलती है। परिणाम स्वरूप ये तत्व प्लेसेण्टा के द्वारा गर्भ में पहुँच जाते हैं। इनमें टेराटोजेन्स नामक रसायन भ्रूण की संरचना ही चौपट कर सकता है। जिसके प्रभाव से बच्चा मरा हुआ पैदा हो सकता है या जन्म के पश्चात् तुरन्त मर जाता है । विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्ययन के अनुसार स्पान्टेनियस एबार्शन की दर 14 से 30 प्रतिशत तक है। सन् 1975-77 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा किए गए अध्ययनों के मुताबिक यह स्थिति प्रमुख रूप से पर्यावरणीय कारणों से उत्पन्न जीन संबंधी गड़बड़ी से होता है। नई दिल्ली के गुय तेगबहादुर अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ0 एम0ए॰ फरीदी के मतानुसार तीव्र औद्योगीकरण, असुरक्षित वातावरण, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों के कारण पर्यावरणीय प्रदूषण बढ़ा है तथा घर की चहारदीवारी के अन्दर वायु की गुणवत्ता घटी है। इन सबसे गर्भस्थ शिशु बुरी तरह प्रभावित होता है। विकासशील एवं अविकसित राष्ट्रों की इस सम्बन्ध में स्थिति कुछ ज्यादा ही खराब है।
‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ की रिपोर्ट बताती है प्रदूषित वातावरण में उपस्थित रहने वाले तत्व लेड व कैडमियम क्रमशः पुरुषों की प्रजनन क्षमता एवं प्लेसेण्टा पर बुरा असर डालते हैं 1956 में जापान में मिथाइल मरकरी प्रदूषण ने महामारी का रूप धारण कर लिया था, जिसकी वजह से 10 वर्षों तक इस क्षेत्र में 6 प्रतिशत बच्चे सेरीब्रल पाल्सी के शिकार होते रहे । इसी तरह की घटना 1956 व 60 के बीच ईराक में हुई। आर्गेनोक्लोरीन पेस्टीसाइड छठवें दशक में पश्चिम में प्रतिबन्धित कर दिए गए थे लेकिन दक्षिण राष्ट्रों में इनका प्रचलन अभी भी है। डी0डी0टी0डी0बी0सी0पी0 लिण्डेन, डाइएल्ड्रिन व हेक्साक्लोरो प्रभावित टेरानोजोन्स हैं। पी0सी0बी0(पाली क्लोरीनेटेड बाइफेनिल) एक ऐसा रसायन है जो भ्रूण के विकास को अत्यन्त प्रभावित करता है। गर्भस्थ महिलाओं पर कार्बन मोनोऑक्साइड एवं बेन्जोपायरिन का प्रभाव अधिक देखा गया है। जो महिलाएँ ऐसे वातावरण में रहती हैं वे 100 से अधिक सिगरेट से उत्पन्न धुएँ की मात्रा प्रतिदिन साँस के द्वारा अन्दर लेती हैं।
कार्बन मोनोऑक्साइड भ्रूण को प्राणदायी ऑक्सीजन से वंचित करने का कार्य करता है। शुद्ध वायु में इसकी मात्रा 0.1 से 0.5 पी0पी0एम॰ होती है। लेकिन शहरों एवं औद्योगिक क्षेत्रों में यह मात्रा 50 पी0पी0एम॰ तक हो सकती है। लेकिन शहरों एवं औद्योगिक क्षेत्रों में यह मात्रा 50 पी0पी0एम॰ तक हो सकती है। यह कार्बन मोनोऑक्साइड प्लेसेण्टा में फैलकर भ्रूण के रक्तसंचार से जुड़ जाता है। रक्त में उपस्थित होमोग्लोबिन में इसके बेधने की दर ऑक्सीजन से 200 गुना अधिक होती है। अगर भ्रूण में कार्बोक्सी होमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ती है तो मस्तिष्क व हृदय बुरी तरह प्रभावित होते हैं। इसे मीकोनयम कहते हैं। मीकोनियम भ्रूण के मुँह या फेफड़ों में पहुँचकर बच्चे को मौत के मुँह में सुला देता है। सीसा एवं मैग्नीज धातु भी कम हानि नहीं पहुँचाते।
थियोकोलर्बोन द्वारा रचित ग्रन्थ ‘अवर स्टोलेन फ्यूचर’ में प्रदूषण से उत्पन्न होने वाली समस्याओं की विशद् विवेचना की हैं उनका कहना है कि प्रदूषण की वजह से शुक्राणुओं की संख्या 2.1 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से कम हो रही है तथा इसकी गुणवत्ता का ह्रास हो रहा है। टेस्टीक्यूलर कैंसर की दर अप्रत्याशित रूप से बढ़ रही है। इण्डोक्रइन व्यतिक्रम के कारण पुरुषों का स्त्रीकरण एवं स्त्रियों का पुरुषीकरण हो रहा है। इन्हें जेण्डर वेर्ण्डस के नाम से जाना जाता है। ये रसायन मानव सेक्स हार्मोन की नकल करते तथा इन्हें प्रभावित करते हैं। नार्थ कैरोलिना विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मार्सिया के मतानुसार लड़कियाँ समय से पूर्व यौवनावस्था को प्राप्त कर रही है। इसके लिए ओस्ट्रेन नामक हार्मोन जिम्मेदार माना जाता है। चिकित्सा वैज्ञानिकों के अनुसार आज का ज्वलन्त विषय पर्यावरण प्रदूषण से होने वाले ओस्ट्रेजन हार्मोन के व्यक्तिक्रम को रोकना है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् जो सैकड़ों रसायनों की खोज और इस्तेमाल हुआ है, उन्होंने जीवन को ही बुरी तरह प्रदूषित कर दिया है। इनमें से सैकड़ों रसायन ओस्ट्रेजन की तरह है। पी0सी0बी0 जैसे रसायनों की संरचना इससे काफी हद तक मिलती है। ये रसायनों की संरचना इससे काफी हद तक मिलती है। ये रसायन वर्तमान में हमारी जीवनशैली के अभिन्न अंग बन चुके हैं। साबुन, सौंदर्य प्रसाधन सामग्री, रंग-रोगन, प्लास्टिक, कीटनाशक व अन्य प्रयोग में आने वाले रसायनों में यह विद्यमान रहता है। दुनिया में डी0डी0टी0 की सर्वाधिक मात्रा दिल्ली निवासियों की वसा में पायी जाती है। यही नहीं माँ के दूध में पेस्टीसाइड्स की मात्रा भी सर्वाधिक भारत में ही पायी जाती है। ये प्रदूषणकारी तत्व जेनेटिक संरचना को भी परिवर्तित करने में समर्थ हैं।
प्रदूषण की इस विनाशकारी समस्या से जूझने एवं बचने के लिए विश्वभर में पर्यावरण संरक्षण व संवर्द्धन के अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यू0एन0ई0पी0) ने 5 जून 1997 के दिन को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया। इसे ‘पृथ्वी सम्मेलन धन पाँच’ के रूप में जाना जाता है। सन् 1992 में आयोजित रियो डी जेनेरो के पृथ्वी सम्मेलन की यह पांचवीं वर्षगाँठ थी। इस पृथ्वी सम्मेलन में 160 से भी अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्षों व शासनाध्यक्षों के साथ महान पर्यावरणविद् उपस्थित हुए थे। सभी ने वर्तमान प्रदूषण पर चिन्ता व्यक्त करते हुए इसके विकास और संवर्द्धन को अपने युग के महत्वपूर्ण कार्य की संज्ञा दी। सम्मेलन में मनुष्य के विनाशकारी व्यवहार को ठीक करने तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए सैकड़ों अरब डालर आवंटित करने की एक कार्ययोजना पारित की । यू0एन0ई0पी0 के निदेशक एलिजाबेथ डाइसबेल ने अपने सन्देश में विश्वसमुदाय का आह्वान करते हुए कहा-”पर्यावरण की सुरक्षा विश्व की सुरक्षा है। अतः विश्व के हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह इस ओर कटिबद्ध हो। विकासशील दुनिया के प्रमुख राजनीतिज्ञ एवं राष्ट्रकुल के पूर्व महासचिव श्री दत्त रामफल ने वर्तमान पर्यावरण संकट को अति गम्भीर बताते हुए स्पष्ट किया है कि पर्यावरण संरक्षण हो आज का युगधर्म है।
पृथ्वी सम्मेलन धन पाँच में अमेरिकी उपराष्ट्रपति अलगोरे ने संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में कहा है कि जलवायु में परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए अपने संकल्प में एकजुट रहना चाहिए। ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर तथा नीदरलैण्ड के प्रधानमंत्री विमकाफ ने पर्यावरण संरक्षण को प्रथम मानवीय कर्त्तव्य का नाम दिया और अनेक योजनाएँ सुझायीं । अमेरिका में कोलोराडो की एक संस्था ‘ग्लोबल रिस्पाँस’ के अलग अहोशी ने कहा है कि पृथ्वी को बचाने के लिए हमें तीव्र तथा अनुरूप बदलाव करना चाहिए। ‘ग्लोबल रिस्पाँस’ ने विकसित औद्योगिक देशों के संगठन ग्रुप सात और रूस के शिखर बैठक के समय डेनवर में ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के क्रियाकलापों पर सुनवाई के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय पंचायत का आयोजन किया था। इसमें एशिया, अफ्रीका, दक्षिण और उत्तरी अमेरिका के संगठनों ने यूरोप, अमेरिका और जापान की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को कड़ी चेतावनी दी, साथ ही पर्यावरण संरक्षण हेतु अनेक कार्य योजनाएँ बनायीं, जिन पर क्रियान्वयन भी हो रहा है।
यूरोपीय संघ के देश विश्व भर में ऐसे उपाय करने के पक्ष में हैं जिससे कार्बन डायऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस प्रभाव पैदा करने वाली गैसों के उत्सर्जन में 2010 तक 1990 के स्तर के मुकाबले 15 प्रतिशत की कमी आ जाए। ये गैसें वायुमण्डल के तापमान को बढ़ाती हैं। रियो सम्मेलन में सन् 2000 तक रियो कार्ययोजना यानि ‘एजेण्डा 21’ को लागू करने पर सहमति जतायी गयी। इसके लिए 600 अरब डालर का प्रस्ताव था। दुनिया में पर्यावरण सुरक्षा के लिए धन का मूल स्त्रोत वैश्वीय पर्यावरण व्यवस्था में करीब 2.8 अरब डालर की धनराशि 6 साल के लिए जमा की गयी थी, जो जलवायु परिवर्तन, जैवविधिता और जल के संरक्षण जैसे वैश्विक मुद्दों सम्बन्धी योजनाओं पर खर्च किया जाता है। 25 करोड़ डालर का एक दूसरा फण्ड ओजोन परत पर हुए माण्ट्रियल समझौते के लिए रखा गया है। पर्यावरण संरक्षण की समीक्षा और आकलन के लिए 23 से 26 जून तक न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा का विशेष अधिवेशन आयोजित किया गया था। वायुमण्डल में गर्मी बढ़ने से रोकने के उपायों के बारे में सन्धि हेतु क्योटो (जापान) सम्मेलन निकट भविष्य में तय है। इसके पूर्व स्वीडन में संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में मानव और पर्यावरण रक्षा पर जून 1972 में एक सम्मेलन हुआ था, जिसमें स्पष्ट चेतावनी दी गयी थी कि पर्यावरण के विनाश से मानवजाति का विनाश अवश्यम्भावी है।
इतने सारे सम्मेलनों, चेतावनियों एवं पर्यावरण सुरक्षा का विशालकाय तन्त्र खड़ा करने के बावजूद प्रश्न यथावत् है, समस्या की विकरालता घटने के स्थान पर बढ़ी है। क्योंकि जन भावनाएं) जाग्रत नहीं की गयी। प्रकृति के साथ मनुष्य के भाव भरे सम्बन्धों का मर्म नहीं समझाया गया। इसकी सारगर्भित व्याख्या नहीं की गयी। आज की वर्तमान पीढ़ी इस बात से अनजान है कि प्रकृति से उसके कुछ वैसे ही भावनात्मक रिश्ते हैं, जैसे कि उसके अपने परिजनोँ एवं सगे सम्बन्धियों से। इस भावनात्मक सत्य का मर्मोद्घाटन विज्ञान के दायरे के बाहर की चीज है। सम्भवतः इसीलिए अपनी सारी तार्किकता एवं मेधा नियोजित करने के बावजूद उसे वैज्ञानिक हल नहीं कर पाए। मानव एवं प्रकृति के बीच उलझी यह गुत्थी वैज्ञानिक होने की बजाय साँस्कृतिक अधिक है। इसका सुलझाव और समाधान भी साँस्कृतिक प्रयत्नों से ही सम्भव है।
भारत मानवीय भावनाओं का उद्गम बिन्दु, मानवीय संस्कृति का जन्मदाता एवं मानव-प्रकृति एवं परमेश्वर के पारस्परिक भाव भरे सम्बन्धों का चिरकाल से दार्शनिक व्याख्याता रहा हैं यहीं के महर्षियों के मुख से कभी ओजस्वी गूँज उठी थी-
गिरयस्ते पर्वता हिमवन्तोऽरण्यं ते पृथिवि स्योनमस्तु। बभ्रुँ कृष्णाँ रोहिणीं विश्वरुपाँ ध्रुवाँ भूमिं पृथिवीमिन्द्रगुप्ताम्। अजीतोऽहतो अक्षतोऽध्यष्यठाँ पृथिवीमहम्। -अर्थव 12, 1-11
आज जबकि पर्यावरण संकट के कारण धरती पर अक्षत खड़ा रहना मुश्किल हो गया है, ऐसे क्षणों में साँस्कृतिक क्रान्ति के जन्मदाता वेदमूर्ति तपोनिष्ठ परमपूज्य गुरुदेव की पराप्रेरणा से संचालित शान्तिकुँज ने पर्यावरण की साँस्कृतिक गुत्थी को सुलझाने का संकल्प लिया हैं। इस संकल्प में पुरातन ऋषिगणों की वाणी ध्वनित होते अनुभव की जा सकती है। श्रावणी महापर्व पर शान्तिकुँज में सम्पन्न हुए पर्यावरण संवर्ग समारोह में यह निश्चित किया गया कि पर्यावरण संरक्षण पाँच स्तरों पर सम्भव होगा-
1- मानव-प्रकृति एवं परमेश्वर के सम्बन्ध, 2- मानव और अन्य जीव-जन्तुओं का सम्बन्ध, 3-मानव और प्रकृति के विविध रूपों का सम्बन्ध 4- मनुष्यों के आपसी सम्बन्ध, 5- वर्तमान पीढ़ी का भविष्य की पीढ़ी के सम्बन्ध। जीव-जन्तुओं पर एक समग्र सोच न बनने से छोटे-छोटे निरीह एवं मूक प्राणी उपेक्षित रह जाते हैं और संरक्षण एकाँगी रहता है। पर यह तभी संभव है जब हम स्वयं में एवं प्रकृति के समस्त घटकों में परमेश्वर की पराचेतना अनुभव करें। तभी सभी जन्तुओं एवं वनस्पतियों के प्रति संवेदना का भावविकास सम्भव हो सकेगा। प्रकृति के विविध रूपों के प्रति मनुष्य का सम्बन्ध इसी समझ पर आधारित होना चाहिए कि इनसे हमें केवल अपने उपयोग की वस्तुएँ ही नहीं लेनी है बल्कि इसके संरक्षण कीर जिम्मेदारी भी हमारी है। जमीन, जंगल, नदी और भूजल के प्रति आक्रामक रवैया छोड़कर हमें इनके सहज विकास पर ध्यान देना होगा।
कृत्रिम वृक्षारोपण के साथ प्राकृतिक वन संरक्षण भी जरूरी है, क्योंकि जलवायु सन्तुलन, जल एवं भू-संरक्षण तथा जैव विविधता की वास्तविक सुरक्षा प्राकृतिक वनों में ही सम्भव है। यह भी ध्यान दिया जाना जरूरी है कि मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण से प्रकृति भी प्रभावित होती है। शोषक अपनी विलासिता के लिए आदतन प्रकृति को विनष्ट करता है। मनुष्यों में पारस्परिक सौहार्द एवं मर्यादा पर्यावरण संरक्षण के लिए अतीव आवश्यक है। शोषण एवं विषमता जितनी कम होगी पर्यावरण उतरा ही समृद्ध होगा। पर्यावरण की समृद्धि ही संसार की समृद्धि है अपनी भावी पीढ़ी को जीवन की सम्पन्नता तभी सौंपी जा सकती है, जब वर्तमान पीढ़ी पर्यावरण संरक्षण के लिए पूर्ण जागरुक एवं कटिबद्ध हो। युगनिर्माण मिशन के प्रत्येक कार्यकर्त्ता को न केवल स्वयं जानना चाहिए बल्कि द्वार-द्वार जाकर घर-घर पहुँच कर जन-जन को यह चेताना चाहिए कि पर्यावरण संरक्षण केवल वृक्षारोपण नहीं है, अपितु वह प्राकृतिक आधार है, जिस पर मानव जीवन व जीव-जन्तु जीवित रहते हैं । इसी पर कृषि एवं औद्योगिक क्रान्ति भी निर्भर है। पर्यावरण ही सृष्टि का आधारभूत जीवन तत्व है। इसका संरक्षण-संवर्द्धन हमारे, हम सबके जीवित रहने की अनिवार्य शर्त है।
इन्द्र के रथ पर चढ़कर भगवान श्रीराम युद्ध क्षेत्र में ठीक रावण के सम्मुख जा खड़े हुए। उन्होंने सर्वप्रथम विप्र अर्थात् ज्ञानमूर्ति रावण को प्रणाम किया। आशीर्वाद तो दूर उलटे उसने अपशब्द भी कहे और अपनी वीरता का आप ही बखान किया। भगवान् श्रीराम ने कहा:-
जनि जल्पना करि सुयश नाशहि नीति सुन शठ करु क्षमा। संसारमहँ पुरुष त्रिविध पाटल रसाल पनस समा।
इक सुमन प्रद इक सुमन फल इक फलै केवल लागहीं। इक कहहिं, करहिं न करहिं कहि एक करहिं कहहिं न गवहीं॥
ऐ रावण! अपनी प्रशंसा आप नहीं करनी चाहिए इससे यश क्षीण होता है, नीति कहती है आत्मप्रशंसक क्षमा के पात्र होते हैं। हे रावण! इस संसार में तीन प्रकार के लोग होते हैं- एक पलाश वृक्ष की तरह जो केवल फूल देते हैं फल नहीं, दूसरे आम की तरह फूलते भी फलते भी हैं, तीसरे कटहल की तरह अर्थात् फूलते नहीं केवल फल देते हैं अर्थात् कुछ लोग कहते तो बहुत हैं पर करते कुछ नहीं, दूसरे कहते भी है करते भी हैं। तीसरे कहने से पुण्य क्षय हुआ मानकर कहते नहीं केवल करते हैं।
यह बात तो निकृष्ट और श्रेष्ठ मनुष्यों की पहचान के बारे में कही गई हैं पर्यावरण की रक्षा के क्षेत्र में किए गये कार्यों की पहचान की दृष्टि से भगवान् श्रीराम के कथानुसार युगनिर्माण योजना, गायत्री परिवार शान्तिकुँज की स्थिति तीसरे अर्थात् श्रेष्ठ व्यक्ति की है। शान्तिकुँज ने कभी बखान नहीं किया, पर उसके प्रयत्नों और उपलब्धियों पर पूरी तरह प्रकाश डाला जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि जितना कार्य अकेले इस मिशन ने किया है शायद शेष संसार ने भी इतना कार्य मिल कर नहीं किया होगा।
पिछले 25 वर्षों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करें तो उसके लिए अखण्ड-ज्योति का एक सम्पूर्ण विशेषाँक ही बनाना पड़ेगा। इसलिए यहाँ मात्र 19991 से अब तक के कर्तृत्व एवं उपलब्धियों का उल्लेख किया जा रहा है। गत 25 वर्षों के न तो संकल्पों का उल्लेख है न व्यक्तिगत प्रयत्नों का।
भारतवर्ष में श्रावणी पर्व मात्र रक्षा बन्धन के लिए मनाया जाता है, सामान्य जन इतना भर जानते हैं। पर सत्य यह है कि यह पर्व अनादिकाल से जब संसार का इस ओर ध्यान तक नहीं था, तभी से वृक्षारोपण दिवस के रूप में मनाया जाता रहा है। शान्तिकुँज ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया। यह पर्व प्रायः अगस्त में पड़ता है। अगस्त से लेकर अक्टूबर तक का समय वृक्षारोपण के लिए अत्यन्त उपयुक्त काल होता है। अतएव पाक्षिक तथा मिशन से निकलने वाली मासिक पत्रिकाओं के जुलाई अंक में प्रतिवर्ष नियमित रूप से सघन वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाने के सम्पादकीय प्रकाशित किए जाते हैं और इस अवधि में सम्पूर्ण अखिल विश्व गायत्री परिवार इस कार्य में लग पड़ता है। अब तक करोड़ों की संख्या में पौधे लगाए गए हैं उसके कुछ उदाहरण इस प्रकार है -
गायत्री परिवार ट्रस्ट खरगोन ने 1991 अक्टूबर में ग्राम इच्छापुर में अपना अष्टम वृक्षारोपण सप्ताह सम्पन्न किया। इन समारोहों में समूचे जिले के गायत्री परिवार परिजन किसी एक गाँव या क्षेत्र में सघन वृक्षारोपण कार्यक्रम सम्पन्न करते हैं। पहले या बाद में विधिवत् समारोह मनाया जाता है, जिसमें जिले के अधिकाँश सभी प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी भाग लेते हैं, फिर रंग-बिरंगे परिधानों और गाजे-बाजे के साथ यह कार्यक्रम प्रारम्भ होता है। इस वर्ष इस जिले की बीस गायत्री परिवार शाखाओं ने ‘गंगा वृक्ष रैलियों’ का आयोजन कर 374 गाँवों, में 18000 वृक्ष वितरण किए गए तथा आदिवासी प्रधान 27 गाँवों में हरे वृक्ष न काटने देने के लिए हरित सेनाएँ गठित की गईं। इस 189 गाँवों में 27000 घरों में तुलसी के पौधे भी लगाए गए। स्मरणीय है कि वायुमण्डल को शुद्ध रखने में तुलसी का सर्वाधिक महत्व माना गया है।
समारोह में स्थानीय जिलाध्यक्ष, प्रवर पुलिस अधीक्षक, वरिष्ठ पत्रकारों ने भाग लिया और देखा कि पिछले वर्षों में लगाए गए 30250 वृक्षों में से 95 प्रतिशत वृक्ष जीवित हैं, बढ़ रहे हैं। वनीकरण कार्यों के लिए जिला प्रशासन ने वर्ष 1990 का जिलास्तरीय प्रथम पुरस्कार गायत्री परिवार ट्रस्ट खरगोन को दिया। अक्टूबर 92 में सात एकड़ शासकीय भूमि पर 5500 पौधे लगाए गए। आदिवासियों ने खेतों की मेड़ों पर एक हजार वृक्ष लगाए। उन्हें ‘वृक्ष मित्र’ प्रशस्ति पत्र दिए गए।
1993 में 108 गाँवों में वन चेतना रैली निकाली गई। 138 आदिवासियों ने मेड़ों पर 10-10 वृक्ष लगाए। इसके अतिरिक्त 5000 अन्य वृक्ष लगाए गए। “पेड़ लगे हर घर उद्यान, वृक्षारोपण यज्ञ महान्” यह वाक्य इस क्षेत्र के हर घर की दीवार पर लिखा मिलेगा।
जुलाई 94 में यहाँ की वानिकी कार्यक्रम देखने के लिए विश्व बैंक ने वाशिंगटन अमेरिका के इयान हिल्स, ब्रिटेन के डिमोर्ट शिल्ड, रोम की सुश्री डि लिग्नो तथा दिल्ली के प्रवीर गुहाया कुल को भेजा। कलेक्टर खरगोन श्री राजकिशोर स्वेन ने गायत्री परिवार खरगोन को ‘इन्दिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र पुरस्कार’ देने के लिए राष्ट्रीय वनीकरण और पारिस्थितिकी विकास बोर्ड दिल्ली को संस्तुति पत्र भेजा। यहाँ 58.3 हेक्टेयर भूमि पर 50700 से अधिक वृक्ष लगाए गए हैं। इसके अतिरिक्त गायत्री परिवार मेहराजा द्वारा 33 एकड़ भूमि में पाँच हजार पौधे लगाए गए। जैन तीर्थस्थल की 6 हजार एकड़ भूमि में 2000 नीम के वृक्ष लगाए गए। इससे उस क्षेत्र की जलवायु आमूलचूल बदल गयी है।
सितम्बर 1994 में गायत्री परिवार तलेगाँव मोहना (अमरावती) ने जिले भर में पाँच हजार वृक्ष लगाए। इसमें सर्वाधिक परिश्रम के लिए गायत्री परिवार परिजन, भास्कर मोहोड़ को महाराष्ट्र सरकार का ‘वनराई पुरस्कार’ प्रदान किया गया। इसी अवधि में सीधी (म0प्र0) के एक बालक ने अकेले ही 60 वृक्ष यूकेलिप्टस, 30 वृक्ष नीम, 30 आम के लगाए, ढुलना प्रज्ञामण्डल द्वारा 108 वृक्षों का आरोपण किया गया। कासगंज (उ0प्र0) में 1008 घरों में तुलसी के पौधे घर-घर जाकर लगवाए गए। जिन घरों में पौधे लगाए गए, उन्हें प्रति परिवार पाँच नये घरों को पौध वितरण के संकल्प भी साथ ही कराए गए। गायत्री शक्ति-पीठ सक्ती (बिलासपुर) म0प्र0 के कर्मठ कार्यकर्त्ताओं ने समूचे सक्ती ब्लाक में 1100 वृक्ष लगाए।
गायत्री परिवार राउरकेला उड़ीसा ने राउरकेला प्रखण्ड में परमपूज्य गुरुदेव, वंदनीय माताजी की स्मृति में 24 स्मृति वाटिकाएँ स्थापित कर दी गई। प्रत्येक स्मृति वाटिका में न्यूनतम 132 छायादार वृक्ष लगाए गए। इन आयोजनों में यहाँ के सरकारी पदाधिकारी भी बड़ी संख्या में सम्मिलित हुए। फतेहपुर (उ0प्र0) के जेल अधीक्षक श्री आर0के0 त्रिपाठी (वर्तमान में सीतापुर) गायत्री परिवार के कार्यक्रमों में भावनापूर्वक भाग लेते हैं। वर्ष 1994 में उन्होंने एक हजार वृक्षारोपण का लक्ष्य रखा था जिसमें से 266 वृक्ष जेल परिसर व समीपवर्ती क्षेत्र में लगाए गए।
सितम्बर 1995 में बुलन्दशहर (उ0प्र0) अश्वमेध के अनुयाज कार्यक्रमों के अंतर्गत जी0टी0 रोड के किनारे-किनारे 59 किलोमीटर तक वृक्षारोपण किया गया, जिसमें गायत्री परिवार परिजनों का वहाँ के प्रशासनिक अधिकारियों, आयकर आयुक्त, न्यायाधीशों तथा डी0ए0ओ॰ आदि ने उत्साह संवर्द्धन और सम्मानित किया। 300 कॉलेज के बालकों ने भी इस कार्यक्रम में उत्साह पूर्वक भाग लिया।
राजस्थान के हल्दीघाटी अश्वमेध यज्ञ से प्रभावित वहाँ के तत्कालीन जिलाधीश तथा जिला प्रमुख अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक उपवन संरक्षक ने समूचे यज्ञ स्थल को स्मृति उपवन के रूप में परिवर्तित करने की घोषणा की। सभी सरकारी विभागों को पौधों के संरक्षण का भी दायित्व वितरित किया गया। गाजीपुर उत्तर प्रदेश के राजकीय होम्योपैथी चिकित्सालय परिसर में एक हजार एक वृक्ष लगाए गए। राहतपुर (इटावा) के गायत्री परिवार ने दस हजार तुलसी के पौधे लगाने का महायज्ञ पूर्ण किया।
फरवरी 1996 में गायत्री शक्तिपीठ आँवलखेड़ा में आँवला, जामुन तथा बेल के 200 वृक्ष लगाए गए। चडहरा (सीतापुर) में 2400 वृक्ष लगाने का कीर्तिमान 1996 में ही पूरा किया गया। कानपुर तथा जोधपुर में इस वर्ष सघन वृक्षारोपण किए, जयन्त सीधी में विशेष रूप से पेण्डुला अशोक लगाए गए। महोली सीतापुर में 2400 वृक्ष तथा हरदोई गायत्री परिवार ने 501 वृक्ष लगाए। विलासपुर (म0प्र0) में आम तथा नीबू के दो-दो सौ वृक्ष लगाए। शाही बाग अहमदाबाद गायत्री शक्तिपीठ कार्यकर्त्ताओं ने एक सघन अभियान के अंतर्गत पर्यावरण पखवारा मनाया, 1500 फलदार वृक्ष तथा 2400 पौधे तुलसी के लगाए गए। इस समूचे कार्यक्रम को अहमदाबाद दूरदर्शन द्वारा प्रसारित किया गया है।
यह तो कुछ स्फुट समाचार भर हैं, जिनसे अखिल भारतीय गायत्री परिवार द्वारा पर्यावरण क्षेत्र की जागरुक सेवाओं का अनुमान किया जा सकता है। परमपूज्य गुरुदेव इससे भी आगे बढ़कर यज्ञों को पर्यावरण सन्तुलन का सर्वोपरि आधार मानते थे। इसी कारण उन्होंने गायत्री उपासना के साथ सघन यज्ञायोजनों का आन्दोलन भी चलाया। गाँव-गाँव, गली-गली यज्ञ हुए इससे पर्यावरण में कितना सुधार हुआ होगा इसकी कल्पना दो वर्ष पूर्व सूरत में अचानक फैली प्लेग की तरह की महामारी से लगाया जा सकता है। उस समय सूरत में अकेला गायत्री परिवार था जिसने घूम-घूम कर मुहल्ले-मुहल्ले एक-एक दिन में बीस-बीस यज्ञ तक सम्पन्न कराए। इन यज्ञों में औषधि-युक्त हवन सामग्री प्रयुक्त की गई। समाचार पत्रों में यह खबरें विस्तार से छपीं तो दिल्ली में भी घर-घर लोगों ने अपने-अपने बचाव के लिए हवन किए।
ग्ना अश्वमेध यज्ञ में वहाँ के कृषि उपसंचालक ने विभिन्न आँकड़े एकत्रित कर यज्ञों को कृषि के लिए उपयोगी प्रतिपादित किया। गोरखपुर यज्ञ में वहाँ के वैज्ञानिकों ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से बड़े-बड़े उपकरण लेकर पर्यावरण का अध्ययन किया और चौंकाने वाले निष्कर्ष इस प्रकार निकाले:-
1- वैज्ञानिक जिन्होंने प्रयोग किए-डॉ0 मनोज गर्ग डायरेक्टर एनविरानमेण्टल एण्ड टेक्निकल कन्सल्टेन्ट्स।
2- स्थान-यज्ञशाला से 20 मीटर दूर पर पूर्व की ओर।
3- प्रयोग की विधि-हाई वैल्यूम सैम्पलर एनविरोटेक ए0पी0एम0-45।
4- हवा के निष्कर्ष प्रति 100 मिलीग्राम तथा पानी के प्रति 100 मिलीलीटर
सल्फर नाइट्रस
अवधि डायऑक्साइड ऑक्साइड
यज्ञ से पूर्व 3.36 1.16
यज्ञ की अवधि में 2.82 1.14
यज्ञ के पश्चात् 0.80 1.02
पानी में बैक्टीरिया
यज्ञ से पूर्व 4500
यज्ञ की अवधि में 2470
यज्ञ के पश्चात् 1250
इन आँकड़ों के आधार पर वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाले और अखबारों में प्रकाशित किए कि यज्ञ कैन्सर जैसी जानलेवा और प्रदूषणजन्य, कष्टप्रद बीमारियों को भी रोकने में समर्थ हो सकते हैं। इसी प्रमाण पत्र में जो हमें उपलब्ध कराया गया बताया है कि विभिन्न यज्ञ कुण्डों से प्राप्त यज्ञ भस्म (ASH) का लैब-विश्लेषण करने पर निम्न खनिज पाए गए-
1- फास्फोरस 4076 मि0ग्रा0/कि0ग्रा0
2- पोटैशियम 3407 मि0ग्रा0/कि0ग्रा0
3- कैल्शियम 7822 मि0ग्रा0/कि0ग्रा0
4- मैग्नेशियम 6424 मि0ग्रा0/कि0ग्रा0
6- क्वाइस्पार 2% W/W
इससे स्पष्ट है कि यज्ञों से पृथ्वी की उर्वरा शक्ति को भी बढ़ाया जा सकता है। उपसंचालक कृषि गुना (म0प्र0) ने गुना यज्ञ के पश्चात् इस आशय की एक रिपोर्ट पिछले और यज्ञ के समय की कृषि उपज आँकड़ों के साथ दी।
परमपूज्य गुरुदेव कहते थे पर्यावरण में भरते जा रहे प्रदूषण की दिन−रात सफाई की जाए, इसके स्थान पर उसे इतना शक्तिशाली बनाया जाना चाहिए कि प्रकृति में सफाई की स्वसंचालित प्रक्रिया अपने आप चलती रहे। इसके लिए परम पूज्य गुरुदेव कहते थे वनौषधियों जिसमें तुलसी, ज्योतिष्मती, निर्गुण्डी, पोदीना, पुनर्नवा अश्वगंधा, चिरायता तथा देववृक्ष पीपल, गूलर, बरगद, आँवला, आम आदि वृक्षों का व्यापक वृक्षारोपण अभियान चलाना चाहिए। सीता अशोक ध्वनि प्रदूषण रोकने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक वर्ष पूज्य गुरुदेव ने इसी का आन्दोलन चलाया। तुलसी जैसे पौधों से निकलने वाली गंध वातावरण को बहुत शक्ति देती है।
शतपथ ब्राह्मण में अश्वमेध यज्ञों की इष्टियों पर प्रकाश डालते हुए लिखा है-
एष वै दीर्घो नाम यज्ञः। यत्रैतेन यज्ञेन यजन्तऽआ दीर्घारण्य जायते॥ शतपथ 13/3/10
अर्थात्-इस यज्ञ का एक नाम ‘दीर्घ’ है। जहाँ इस यज्ञ का अनुष्ठान होता है वहाँ पुण्य वन सम्पदा (उपरोक्त औषधियों और देव-वृक्षों की बहुतायत सहित) की वृद्धि होती है।
शान्तिकुँज ऐसे 27 अश्वमेध सम्पन्न कर चुका है। पर्यावरण संतुलन में इसके योगदान का इतने सहज अनुमान किया जा सकता है।
आस्तिकता का अर्थ व स्वरूप गहराई से न समझ सकने वाले संसार के कतिपय लोगों ने उसे एक निरर्थक ईश्वरवाद भर मान लिया और उसे अपने से बहिष्कृत कर नये नैतिक स्वरूप का प्रवर्तन किया। उन्होंने आशा की कि इस प्रकार के नए प्रयोग से समाज में स्थायी सुख-शान्ति और सामान्य सदाचार को मूर्तिमान करने में सफल हो सकेंगे। किन्तु उनकी यह आशा पूरी होती नहीं दिखलाई दी।
इस प्रकार के नये प्रयोग को समाजवाद अथवा साम्यवाद के नाम से पुकारा गया और कहा गया कि यदि समाज के लोग अपनी निष्ठा को न दिखने वाले ईश्वर की ओर से हटाकर इन यथार्थवादों में लगाएँ तो समाज में स्थायी सुख-शान्ति की स्थापना हो सकती है। इस नई विचारधारा का परीक्षण एवं प्रयोग कई दशकों तक साम्यवादी कहे जाने वाले देशों में होता रहा, किन्तु उसका परिणाम देखते हुए यही मानने पर मजबूर होना पड़ता है कि यह प्रयोग सफलता से आभूषित न हो सका। उदाहरण के लिए, साम्यवाद की मूलभूमि रूस को ही लिया जाए और देखा जाए कि क्या उसका समाज साम्यवादी आस्थाओं के आधार पर अपने जनसमूह के लिए वाँछित सुख-शान्ति अर्जित करने में सफल हो सका ? तो इस प्रकार का उत्तर नकारात्मक ही मिलता है।
इसे नास्तिकवाद और नास्तिकता की पूर्ण असफलता ही कहेंगे कि रूस की जनता ने साम्यवादी व्यवस्था को जड़मूल से उखाड़ फेंका और पुनः वहाँ का जन-मानस अपनी आस्थाओं को नये ढंग से पुष्पित-पल्लवित करने के लिए चर्च और गिरजाघरों की ओर मुड़ने लगा। यद्यपि वहाँ की जनता को नास्तिकता का भरपूर शिक्षण एवं प्रशिक्षण दिया गया है। यदि सच पूछा जाए तो अनीश्वरवादी समाज व्यवस्था में अपराधों एवं अपराधियों की संख्या कुछ अधिक ही होती है, अपेक्षाकृत उन समाजों के जो आस्तिकता एवं ईश्वर में आस्था रखते हैं। भ्रष्टाचार मिटाने और सदाचार को लाने के लिए राजदण्ड को कठोर बनाने के बावजूद दुष्प्रवृत्तियों को रोकने की मन्तव्य सिद्धि होते नहीं दिखती।
ऊपर से देखने में तो ऐसा ही लगता है कि दमन, नियन्त्रण और प्रतिबन्धों ने जनता का हृदय परिवर्तित कर दिया है। कहने-सुनने के लिए लोग समाजवाद की दुहाई भी देते हैं, बाहरी तौर पर भ्रष्टाचार आदि अहितकर प्रवृत्तियों के प्रति घृणा भी दिखलाते हैं, किन्तु वास्तविकता यही होती है कि लोगों में खुलकर खेलने का साहस भले ही कम हो जाए, पर भीतर ही भीतर अनैतिकता की आग बराबर सुलगती रहती है, जो अवसर पाकर भय और आतंक को एक ओर ठेलकर जब-तब प्रकट होती रहती है। इसे तो सच्चा सुधार नहीं माना जा सकता।
दमन, दण्ड और आतंक के भय से यदि ऊपर से किन्हीं सदाचारों का प्रदर्शन करते रहा जाए और भीतर ही भीतर उसे मजबूरी अथवा अत्याचार समझा जाए तो उसे सच्ची सदाचार प्रवृत्ति नहीं माना जा सकता। सच्चा सदाचार तो तब माना जाएगा, जब ब्राह्म के साथ मनुष्य का हृदय भी उसे स्वीकार करे। अवसर आने पर और कोई भय अथवा प्रतिबन्ध न रहने पर भी लोग सहर्ष उसकी रक्षा करें। आतंक से प्रेरित मनुष्य का कोई भी गुण, गुण नहीं बल्कि एक याँत्रिक प्रक्रिया होती है। जिसका न कोई मूल्य है, न महत्व।
केवल राजदण्ड और राजनियमों के आधार पर समाज में स्थायी सुख-शान्ति की आशा कभी पूरी नहीं हो सकती। यदि ऐसा सम्भव होता तो संसार के सारे देशों में राजनियम लागू हैं और राजदण्ड की भी व्यवस्था है। तब भी संसार का एक भी ऐसा देश नहीं हैं, जिसमें पूर्ण शान्ति के लक्षण दिखाई दें। सभी देशों और समाजों में अपराध और पाप होते ही रहते हैं, जिसके कारण लोग अशान्त और दुःखी रहते हैं।
सही मायने में समाज में सुख-शान्ति तो तभी सम्भव है, जब जन-जन अपना उत्तरदायित्व समझे, पाप और अपराधों को बिना किसी दबाव के अस्वीकार कर दे और नैतिकता को जीवन मूल्य माने। यही नहीं स्वयं की आत्मप्रेरणा से दुष्कर्मों से विमुख रहे। सामाजिक एवं राजकीय नियम तथा प्रतिबन्ध एक अल्पसीमा तक ही जन-साधारण को कुमार्गगामी होने से रोक सकते हैं। उनकी क्षमता में केवल इतना ही होता है कि जिन्होंने कोई दुष्कर्म किया है उनकी निन्दा, भर्त्सना कर लें या दण्ड दिलवा दें। यह तो कुकर्म का परिणाम है, इससे उसकी प्रवृत्ति कहाँ रुकी, बहुत बार तो लोग इतने निर्लज्ज हो जाते हैं कि बार-बार दण्ड पाते हैं और बार-बार अपराध करते रहते हैं। उन्हें समाज में निन्दा अथवा लाँछना का भय नहीं रहता। इतना ही क्यों बहुत बार तो अपराधी अपनी चतुरता, साधनों अथवा परिस्थितियों का लाभ उठाकर दण्ड व्यवस्था से भी बच निकलते हैं और तब उनकी यह प्रवृत्ति और भी उत्साहित हो उठती है।
पाप प्रवृत्ति का दमन ब्राह्म प्रतिबन्धों अथवा भयों से नहीं हो सकता। उसका दमन तो मनुष्य की स्वयं की अंतःप्रेरणा से ही सम्भव है। इस अंतःप्रेरणा का आधार पूर्ण आस्तिकता ही हो सकती है। जब मनुष्य को यह निश्चय हो जाएगा कि ईश्वर सर्वव्यापक है, न्यायशील तथा सर्वशक्तिमान है। सबके प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष, अच्छे-बुरे कर्मों का साक्षी है, देखने और जानने वाला है तो वह चोरी से भी पाप कर्म करने से बचेगा। उसे विश्वास रहेगा कि वह जो कुछ करेगा, उसको ईश्वर अवश्य देखेगा और उसके अनुसार पूरा-पूरा दण्ड देगा। ईश्वर के अस्तित्व, उनकी सर्वव्यापक और न्यायशीलता में निश्चय हुए बिना मनुष्य के लिए सहज सम्भव नहीं कि वह अज्ञानवश सुन्दर, सुखकर तथा लाभकर दिखाई देने वाले पापों के आकर्षण से बचा रह सके, जो मनुष्य को हठात् अपनी ओर खींच ही लेते हैं। इसकी रक्षा का एकमात्र उपाय सच्ची और संपूर्ण आस्तिकता ही है।
पाप का बीज विचारों में रहता है और उसकी परिणति कर्मों में होती। अन्तः करण में कुविचार उठते ही मस्तिष्क भी उसके अनुसार योजना रचने लगता है, जिसे शरीर और इन्द्रियों की सहायता से अनायास ही कार्यान्वित कर डालता है। यद्यपि इस प्रक्रिया के बीच-बीच में राजदण्ड और समाज का भय भी काम करता रहता है, किंतु निर्बल नैतिकता के कारण वह कुछ अधिक उपयोगी सिद्ध नहीं हो पाता। कुविचार के सहायक दुस्साहस के बल पर लोग उस कल्याणकारी भय की उपेक्षा कर देते हैं। निष्पाप नैतिकता के विकास और उसकी प्रबलता के लिए विचारों का निर्विकार होना बहुत आवश्यक है।
ईश्वर की सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमत्ता और निष्पक्ष न्यायशीलता का निश्चय हुए बिना अनैतिक विचारों को रोका नहीं जा सकता। कुविचारों पर अंकुश रखना तभी सम्भव होगा, जब कर्मफल, स्वर्ग-नरक, लोक-परलोक, पुनर्जन्म और अधम योनियों में विश्वास हो। इन सत्यों का विश्वासी निश्चय ही कुमार्ग पर पैर रखते डरेगा। उसका यह विश्वास तुरन्त ही पाप की ओर बढ़ते हुए उसके पैरों में जंजीर डाल देगा। इस प्रकार का कल्याणकारी भय किसी आस्तिक के हृदय में ही उत्पन्न हो सकता है नास्तिक के हृदय में नहीं।
आज के घोर भौतिकवादी युग में अध्यात्मिक विचारधारा यदि पूरी तरह मिट नहीं गयी है, तो कम अवश्य हो गयी है। इसी कारण आज आस्तिकता के भाव भी ज्यादा दिखाई नहीं देते। ईश्वर के प्रति यथार्थ निष्ठा में कमी आ जाने का ही तो यह परिणाम है कि आज संसार में चारों ओर अशान्ति, भय और आशंका का वातावरण दिखलाई देता है। सम्पन्न से सम्पन्न और समुन्नत समाज व राष्ट्र सुख-शान्ति के लिए तरस रहे हैं। आस्तिकता की कमी के कारण कुकर्म बढ़ गए हैं और आज की सर्वव्यापी अशान्ति उन्हीं कुकर्मों का ही तो फल है। भौतिकवाद की प्रबलता के कारण जो आज परस्पर राग-द्वेष और छीना-झपटी की अनीतिपूर्ण प्रक्रिया चल रही है, वही आज कष्टों-क्लेशों और शोक-सन्तापों के रूप में फलीभूत होकर जनसमुदाय को चैन की साँस नहीं दे रही है। राग-द्वेष ही, स्वार्थ और संघर्ष का जन्मदाता माना गया है। लोगों में स्वयं के प्रति इतना स्वार्थ और राग भर गया है कि वह समाज के प्रति एक प्रकार से अन्धे हो गए हैं। सब कुछ अपने लिए चाहने वाले और दूसरे के हितों और अधिकारों के प्रति द्वेष रखने वाले समाज में अशान्ति एवं असुख की परिस्थितियों के लिए विशेष उत्तरदायी हैं। स्वार्थी को यदि सौ नास्तिकों का एक नास्तिक मान लिया जाए तो कुछ अनुचित न होगा।
संसार में व्यक्तिगत अथवा समष्टिगत जितने प्रकार के जो भी कष्ट-क्लेश दिखलाई देते हैं, वह सब तद्नुसार कुकर्मों का ही फल है। ऐसा नहीं कि कुकर्म करने वाले को ही केवल अपने किए का फल भोगना होता हो, उसे तो भोगना ही होता है, लेकिन उसका प्रभाव दूसरे लोगों के माध्यम से समाज पर भी पड़ता है। व्यक्ति के साथ समाज को भी दुःख का भाग भोगना पड़ता है। शरीर के अंगों की तरह व्यक्ति भी समाज के एक अंग होते हैं जिस प्रकार शरीर का कोई भी अंग यदि दूषित हो जाता है, तो उसका थोड़ा-बहुत प्रभाव सारे शरीर पर पड़ता है। उसी प्रकार व्यक्ति की बुराई से भी समाज सर्वथा बचा नहीं रह सकता। जिस समाज में जितने ही दूषित, बुरे और कुकर्मी लोग बढ़ते जाते हैं, उससे उसी अनुपात से दुःख और कष्टों की वृद्धि होती जाती है।
इसीलिए व्यक्ति की बुराई से समाज को बचाने के लिए पूर्वकाल में पापी के बहिष्कार अथवा सार्वजनिक निन्दा की एक प्रथा प्रचलित थी। राजदण्ड की तरह यह सामाजिक दण्ड भी अपरिहार्य माना जाता था। समाज द्वारा किया जाने वाला यह बहिष्कार व सार्वजनिक घृणा का दण्ड मृत्युदण्ड से भी अधिक भयानक होता था। इसके डर से लोग किसी हद तक बुराई से बचे रहने का प्रयत्न करते थे।
अब संसार के लगभग सभी समाजों से यह व्यवस्था उठ गयी है। जिन समाजों में इसका कुछ अवशेष दिखलाई देता है, वह भी हुक्का-पानी अथवा रोटी-बेटी तक ही सीमित है और उसका कारण भी कोई सामाजिक मान्यता अथवा रूढ़ि का उल्लंघन करना ही होता है। असत्य, बेईमानी, चोरी, जुआ, शोषण आदि कार्यों के लिए, जिनका कुप्रभाव सारे समाज की शान्ति और व्यवस्था पर पड़ता है, सामाजिक बहिष्कार की प्रथा अब कहीं भी दिखलाई नहीं देती।
बल्कि, आज तो इसका उलटा रूप दिखाई देता है। बहुधा ऐसे कुकर्मियों से लोग डरकर अथवा किसी प्रकार के लाभ के लोभ में उनका समर्थन तक करने लगते हैं। ऐसी विपरीत दशा में समाज की सुख-शान्ति को क्षति पहुँचना स्वाभाविक है। प्राचीनकाल में प्रथम तो नास्तिक कदाचित ही होते थे और यदि यदा-कदा किसी में उसके लक्षण दिखाई भी देते थे, तो उसका सामाजिक बहिष्कार होते देर नहीं गलती थी। लोग उससे बोलना , बात करना उसका संग करना अथवा किसी प्रकार का सम्बन्ध रखना पसन्द नहीं करते थे। नास्तिक व्यक्ति को बड़ा पानी माना जाता था। उसका कारण यही था कि नास्तिक को लोक-परलोक, स्वर्ग-नरक, पुनर्जन्म और कर्मफलों में अनास्थावान माना जाता था। प्रायः नास्तिक होते भी ऐसी ही विचारधारा के थे। जिन्हें कर्मफलों का भय ही नहीं, वह कोई भी कर्म-कुकर्म करते संकोच भी क्यों करेगा। केवल भोगवादी होने के कारण इन्द्रिय सुख में ही उसकी लिप्सा बनी रहने से उसका अनैतिक हो जाना कोई असम्भव बात नहीं होती। अनैतिक व्यक्ति का समाज के लिए दुःखदायी होना स्वाभाविक ही है। अतएव समाज नास्तिक में इन सब दोषों को मनोनीत मानता था और सार्वजनिक सुख-शान्ति के लिए शीघ्र ही उसका बहिष्कार करने का प्रयत्न करता था।
आज कोई ऐसा भय रह नहीं गया है। इसलिए लोग वास्तविक आस्तिकता से विमुख होते संकोच नहीं करते। यही नहीं आज के जमाने में बहुत से लोग आस्तिकता को ढकोसला तक कहने लगे हैं। ईश्वर को मनुष्य की कल्पना और धर्म अथवा नैतिकता को अप्राकृतिक प्रतिबन्ध तक मानने लगे हैं। ऐसी ही निरंकुश मनोवृत्ति वाले लोग अपने स्वार्थ के लिए सामाजिक हितों पर ध्यान नहीं देते और मनमाने ढंग से जीवन चलाते हुए दुःख और अशांत की परिस्थितियाँ पैदा करते हैं।
आज समाज बहिष्कार की प्रथा है नहीं और राजदण्ड अनैतिकता एवं अपराधों को रोक सकने में पूर्णतया सफल नहीं हो पा रहा है। सफल हो तो किस प्रकार ? पुलिस और गुप्तचरों की इतनी पर्याप्त संख्या हो सकना सम्भव नहीं कि वह इतने विशाल जनसमूह पर पहरा दे सकें अथवा हर जगह गुप्त-प्रकट स्थानों पर जाकर अपराधों एवं अनैतिकताओं का पता लगा सके॥ जो अपराधी पकड़े जाते हैं, उन पर आरोप सिद्ध करने के लिए गवाही, शहादत और सबूत पर्याप्त मात्रा में जुट सकना कठिन होता है। फिर बहुत से अपराधी इन सब व्यवस्थाओं के बावजूद भी छूट जाते हैं। साधन-सम्पन्न और धन व्यय कर सकने वालों को तो ऊँचे से ऊँचे वकीलों की योग्यताओं के आधार पर बच जाने की और भी सुविधा रहती है। ऐसी दशा में केवल एक ही सफल उपाय रह जाता है और वह है मनुष्यों की मनोभूमि का सुधार, जिसमें कि उसमें न तो कोई कुविचार ही आए और न अनैतिक भावना का जन्म हो, साथ ही मनुष्य की अन्तः प्रेरणा सत्कर्मों की ओर अग्रसर हो।
इस पावन स्थिति को चरितार्थ करने के लिए आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्यों में अधिक से अधिक आस्तिकता का विकास किया जाए। उसकी शिथिल होती आस्थाओं को बल प्रदान किया जाए। जिस दिन इनसान में सही मायने में आस्तिकता का विकास हो जाएगा, उसकी अंतःप्रेरणा सदोन्मुखी हो जाएगी, ज्यों-ज्यों इस दिशा में प्रगति होती जाएगी, त्यों-त्यों समाज में अशान्ति एवं कष्ट की परिस्थितियाँ कम होती जाएँगी। जिस प्रकार नास्तिकता सारे अनैतिक कर्मों की जड़ है उसी प्रकार आस्तिकता संवर्द्धन को व्यापक आन्दोलन का रूप देने का निश्चय किया है। घर-घर देव स्थापनाएं एवं गायत्री महामंत्र के जप तथा यज्ञ कर्म के प्रचार प्रसार से ही परमात्मभाव की व्यापक आस्था जन-जन में उत्पन्न होगी। यही वह मार्ग है जिससे समाज और संसार में शान्ति की स्थापना हो सकती है।
साधन की दृष्टि से मानवीसत्ता का विश्लेषण का जाए तो उसे तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। पहला-हड्डी-माँस का, पंचतत्वों का बना पिण्ड जिसे स्थल ।शरीर कहते हैं। ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के द्वारा इसके माध्यम से विविध-विधि क्रियाएँ सम्पन्न की जाती है। दूसरा-मन, बुद्धि, चित्त अहंकार द्वारा बना, शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श की तन्मात्राओं से विनिर्मित अनुभूतियों, इच्छाओं और प्रेरणाओं का आधार सूक्ष्म शरीर, जिसे माइण्ड या ज्ञान संस्थान भी कहते हैं। तीसरे-आस्थाओं, मान्यताओं, आकांक्षाओं का उद्गम। जीवन की दिशाओं का निर्धारण करने वाला कारण शरीर, जिसे अंतरात्मा अथवा अंतःकरण भी कहते हैं। भाव-सम्वेदनाएँ, उच्चस्तरीय आवेग यही जन्म लेते है। संक्षेप में इन तीनों को क्रमशः क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति और इच्छाशक्ति का उद्गम केन्द्र कह सकते हैं। इन तीनों का समन्वित रूप ही मानवी-जीवन है।
इन तीनों में से किसी एक में अथवा तीनों में आयी विकृति से हमारा जीवन लड़खड़ाने लगता है। स्थूल शरीर में आयी विकृति रोग-व्याधियों के रूप में उभरती है और हमें अपंग-अपाहिज एवं असहाय जैसी स्थिति में ला पटकती है। सूक्ष्म शरीर की विकृति कुण्ठाओं-ग्रन्थियों के रूप में सामने आती है। इन विकृतियों की ही वजह से व्यक्ति-पागल एवं अपराधी के रूप में स्वयं के एवं औरों के जीवन को तबाह और तहस-नहस करने में जुट जाता है। कारण शरीर की विकृतियाँ मनुष्य से उसकी मनुष्यता छीन लेती हैं। समस्त उच्चस्तरीय सम्भावनाएँ उसके जीवन से जाती रहती है। विकृतियों के निदान एवं कारगर उपचार की दृष्टि से इन तीनों की विवेचना आवश्यक है। जब तक संरचना का ज्ञान न होगा- प्रतिक्रियाओं व परिणति की जानकारी कैसे होगी ? इसी कारण साधना विधान के विस्तार में जाने वाले साधकों को पहले ‘स्प्रिचुअल एनाटॉमी’ की जानकारी करायी जाती है। साधनाक्रमों का चयन इस प्रारम्भिक शिक्षण के बाद ही किया जाना उचित है।
यों तो तीनों शरीरों की महत्ता और सामर्थ्य अपने आप में अद्भुत है। फिर भी स्थूल शरीर द्वारा सम्भव श्रम का मूल्य स्वल्प है। वह तो पशु और मशीनों द्वारा भी कराया जा सकता है। महत्वपूर्ण तो है, पंचतत्वों द्वारा विनिर्मित यह कलेवर, जिसके माध्यम से अन्य दो सूक्ष्म गहराई में विराजमान परतें अपनी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त करती हैं। सूक्ष्म शरीर वह संस्थान है जिसको परिमार्जित-प्रखर बनाकर हम वैज्ञानिक, कलाकार, विद्वान बनते हैं। बौद्धिक क्षमता के उपार्जन से धन-यश, सम्मान प्राप्त करते हैं। वासना-तृष्णा का उद्भव इसी से होता है। तरह-तरह की महत्वाकाँक्षाओं को पूर्ण करने वाला ताना-बाना यहीं बुना जाता है। ‘माइण्ड’ रूप में विद्यमान इसी चेतन प्रकृति को विकसित कर बुद्धिमान, दूरदर्शी, कला-कौशल सम्पन्न बन जाता है।
इन दोनों से ऊँची परत है कारण शरीर की। यह सबसे शक्तिशाली स्तर है। यहाँ आस्थाएँ, मान्यताएँ, विश्वासों की गहरी परतें जमा होती है। सम्वेदनाएँ यहीं जन्म लेती है। शौर्य, साहस एवं आदर्शवादी प्रेरणाओं का उभार इसी क्षेत्र में होता है। अपने आत्मस्वरूप का निर्धारण, आध्यात्मिक जीवन की रीति-नीति, अभिरुचियों का नियोजन यहीं होता है। व्यक्तित्व का निर्धारण और निखार यही से सम्भव होता है। इसी केन्द्र के उत्थान या पतन पर व्यक्तित्व का समुन्नत बनना या गिरना सम्भव हो पाता है। यही जीवचेतना का केन्द्र है। आस्थाओं की परत यहीं चढ़ी होती है।, उसी प्रकार की गतिविधियों का संचालन मन व शरीर द्वारा सम्भव हो पाता है।
आमतौर पर ध्यान शरीर पर दिया जाता है। खाने-पीने, सोने से लेकर तरह-तरह के इन्द्रिय उपभोगों से इसी पिण्ड को सुखी-सन्तुष्ट करने का प्रयास किया जाता है। रुग्ण व स्वस्थ यही होता है। बहिरंग में सुन्दर व कुरूप यही नजर आता है। अतः स्थूल दृष्टि इसे सुन्दर-स्वच्छ-समुन्नत बनाने में नियोजित होती है। निम्नवर्ग के व्यक्ति अपनी गतिविधियों को इसी शरीर तक केन्द्रित रखते हैं। ‘यावज्जीवत् सुखं जीवेत्’ का सिद्धान्त ही उनके लिए अनुकरणीय होता है।
जिनका चेतनास्तर मध्यवर्ती विकास स्तर तक पहुँच चुका होता है। उनको मस्तिष्कीय विकास का महत्व समझ में आता है। वे विद्यार्जन, बुद्धि-कौशल, उपार्जन व ज्ञान-सम्पादन में रुचि लेते हैं। कालेज शिक्षा से लेकर सामान्य जीवन व्यवहार का ज्ञान अर्जित कर वे सम्मान-नेतृत्व पाते हैं। यशस्वी बनते है। उनकी महत्वकाँक्षाएँ इसी उद्देश्य की पूर्ति तक सीमित रहती है। इसी कारण मस्तिष्क विकास के जितने भी विनोदात्मक, संवर्द्धनात्मक, उपभोगात्म तरीके उपलब्ध हो सकते हैं, उसे वे जुटाते रहते हैं। जीवन का अधिकाँश समय उनका इसी पुरुषार्थ में निकल जाता है। यह सामान्य से कुछ ऊँचे स्तर की स्थिति हुई।
तीसरी स्तर, जो सर्वोच्च व शक्तिशाली है-कारण शरीर का है। इसके स्वरूप को समझा एवं परिष्कृत करने का प्रयत्न करना मात्र उच्च भूमिका में विकसित व्यक्तियों के लिए ही सम्भव हो पाता है। इस स्तर की उपयोगिता-महत्ता सामान्य बुद्धि के व्यक्तियों को समझ में नहीं आती, न ही उन्हें प्रत्यक्ष रूप में इसका कोई प्रतिफल ही नजर आता है। भाव संवेदनाएँ, आस्थाएं ही समग्र मानवी व्यक्तित्व को दिशा देती है। उसका स्वरूप निखारती हैं, उच्चस्तरीय चिन्तन में निमग्न होने की प्रेरणा देती हैं। यह समझना, अनुभव करना व उस स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास करना हर किसी से नहीं बन पाता । इसी कारण यह अछूता पड़ा रह जाता है। स्वभाव बदलता नहीं, आदतें सुधरती नहीं, पशुवृत्तियों से मोर्चा लेते बनता नहीं व जीवन-शकट जैसे-तैसे खिंचता रहता है।
ऐसे व्यक्ति भौंड़े असभ्य कहलाते हैं व अस्त-व्यस्त असफल जीवन जीकर बहुसंख्य जीवों की तरह मृत्यु की शरण लेते हैं। अतीन्द्रिय दैवीक्षमताओं की, सिद्धियों की, व्यक्तित्वोत्थान की चर्चाएँ जो भी सुनी जाती है, वे इसी कारण शरीर के विकासोन्मुख उभार है। पाश्चात्यविज्ञान के ज्ञाताओं ने थोड़ा-थोड़ा स्पर्शमात्र इस विषय का किया है, पर वहाँ भी वे आँकल्ट का जिक्र कर चुप हो गए हैं। ‘मिस्टीसिज्म’ नाम से जाना जाने वाला यह विषय उतना ही स्पष्ट एवं खुला हुआ है जितने भौतिकी के अन्य अध्याय। पर स्वरूप की सही जानकारी के अभाव में उथले प्रयत्नों को ही समग्र मान उनकी परिणति हुई समझ ली जाती है।
अगले दिनों जब भी साधना विज्ञान का सही स्वरूप लोगों की समझ में आएगा, तो वे जानेंगे कि मानवीसत्ता के इस मूल आधार को विकसित करने पर शारीरिक कायाकल्प-मानसिक प्रत्यावर्तन एवं अति सूक्ष्म स्वर्ग एवं मुक्ति जैसे दिव्य वरदानों से लाभान्वित हुआ जा सकता है। व्यक्ति स्वयं को लघु से महान् नर से नारायण एवं आत्मा से परमात्मा बना सकता है। सारे महामानव अपने इसी आस्था संस्थान को परिष्कृत-समुन्नत बना कर ऊँची स्थिति पर पहुँच पाए है।
साधना-विज्ञान भारतीय संस्कृति की अमूल्य सम्पदा व विश्व को एक बहुमूल्य देन है। साधना प्रक्रिया का जो स्वरूप पहले प्रचलित था, उसके अनुसार हठयोग द्वारा स्थूल शरीर का-राजयोग से सूक्ष्म शरीर का एवं ब्रह्मयोग द्वारा अन्तः करण का परिमार्जन-परिशोधन किया जाता था। इन्हीं का व्यवहारिक स्वरूप था कर्म-ज्ञान एवं भक्तियोग। साधनात्मक उपक्रमों की विविधताओं का विभाजन इन्हीं तीन समूहों में करके व्यक्ति विशेष की स्थिति के अनुसार उसे मार्गदर्शन दिया जाता था। यह पुरुषार्थ साधारण स्तर का नहीं-तप अर्जित मनोबल की शक्ति से सुपात्र बनने वाले साधक को ही प्राप्त होता था।
आज तो अति सुगम बनाने के चक्कर में इस पूरे विज्ञान-विधान को एक मात्र स्थूल तक ही सीमित कर दिया गया। यह एक शाश्वत-सनातन सत्य है कि अन्तरात्मा का गहन स्तर ही व्यक्तित्व को दिशा देता एवं समर्थ बनाता है। अतिमहत्वपूर्ण-अतिमानव देवपुरुष, अग्रगामी, महापुरुष कहे जाने वाले व्यक्ति अपने इसी स्तर को दिशा-विशेष में परिपुष्ट कर आगे आए हैं। जिसका यह अन्तस्-अंतःकरण खोखला होगा-वह बहिरंग में सम्पन्न होते हुए भी व्यक्तित्व की दृष्टि से ओछा, बौना एवं गया-गुजरा ही बना रहेगा। ऐसे व्यक्ति का वैभव उसके लिए तो अभिशाप सिद्ध होगा ही, समाज में अन्य सभी के लिए भी विपत्ति का कारण बनेगा।
सारे साधना उपचारों का लक्ष्य एक ही रहता है। इस मर्मस्थल-अन्तः-करण की गहन पर्तों को स्पर्श कर वहाँ छाए अन्धकार को मिटाना तथा उस स्थान को श्रेष्ठ-समुन्नत बनाना। साधना विधानों का स्तर बहिरंग से अन्तरंग गत परत-दर-परत छूने के लिए अलग-अलग होने के कारण उनके प्रकार भी भिन्न-भिन्न हैं। पर मोटा विभाजन यही है कि स्थूल शरीर की साधना व उसे उच्चस्तरीय साधना उपक्रमों के योग्य समर्थ बनाने के लिए क्रियायोग तथा कारण शरीर की साधना हेतु चिन्तन-भाव संवेदनापरक ध्यानयोग। इन्हीं दो में सारे साधना विज्ञान का ढाँचा विभाजित हो जाता है।
अध्यात्म विद्या को भी तत्त्ववेत्ताओं ने इसी प्रकार चिन्तन और क्रिया के दो भागों में विभक्त किया है। चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश करने वाले प्रतिपादन को ब्रह्मविद्या कहते हैं। इसमें ईश्वरीय निर्देशों एवं ऋषि अनुभवों को इसी प्रकार गूँथा गया है कि मानवी अन्तःकरण उसे स्वीकार कर ले। शास्त्र-वचनों का स्वाध्याय चिन्तन-मनन एवं शास्त्रों का सत्संग इसी निमित्त किया जाता है। यह अध्यात्म विद्या का तत्त्वदर्शन वाला पक्ष हुआ, जिसमें मान्यताओं की श्रद्धा-तर्क के आधार पर मान्यताओं से काट की जाती है।
दूसरा पक्ष साधना का है। स्वयं की विकृतियों का निराकरण करके-सूक्ष्म जगत से, दैवीशक्तियों से संपर्क का आदान-प्रदान का द्वार खोलने वाला यह प्रयास उपासना-साधना के रूप में जाना जाता है। जिसमें व्यक्ति स्वयं को अनगढ़ से सुगढ़ व ईश्वर का सामीप्य पाने योग्य बनाता है।
चिन्तापरक ब्रह्मविद्या तथा साधनापरक तपश्चर्या दोनों ही तथ्यपूर्ण व महत्त्वपूर्ण हैं। एक ज्ञानपक्ष है तो दूसरा विज्ञानपक्ष। एक को ब्रह्मवर्चस का ब्रह्मपक्ष व दूसरे को वर्चसपक्ष कहते हैं। दोनों मिलकर ही सम्पूर्ण-समग्र बनते हैं। ब्रह्मवर्चस् विज्ञान की इन दोनों ही विद्याओं का सारे साधना उपक्रमों में समावेश रहता है। ज्ञान व विज्ञान दोनों का समन्वय क्रियायोग व ध्यानयोग में है। बिना चिन्तन में भाव सम्वेदनाओं की उत्कृष्टता उभारे, तप-साधना के प्रयास अधूरे व एकाँगी ही बने रहते हैं। इस मूल तथ्य को सबसे पहले समझा जाना चाहिए कि उच्चस्तरीय आस्थाओं की वरीयता स्वीकार करके ही साधना पथ पर आगे बढ़ा जा सकता है।
स्थूल शरीर, सूक्ष्मशरीर व कारण शरीर, क्रियायोग व ध्यानयोग ब्रह्मविद्या एवं तपश्चर्या के इन विभाजनों एवं उनके विवेचन को स्पष्ट करने का उद्देश्य यह है कि इस सत्य को भली प्रकार समझा जाना चाहिए कि साधना समग्र व्यक्तित्व की उपचार प्रक्रिया है। समस्त जीवन की विकृतियों का निदान करने एवं उसकी विभूतियों को उभारने, उकेरने का अनोखा-अनूठा प्रयास है। इसके प्रत्येक चरण का, प्रत्येक उपक्रम का लक्ष्य एक ही है-अन्त करण मर्मस्थल को स्पर्श करने वाली आस्थाओं का उन्नयन, मान्यताओं का परिष्कार, परिमार्जन, प्रसुप्त पड़ी क्षमताओं का जागरण तथा देवपुरुष, ऋषि-महामानव बनने की दिशा में चिन्तन एवं क्रिया का सुनियोजन
इस लक्ष्य की पूर्ति में आप्तवचनों के अतिरिक्त सुनियोजित मार्गदर्शन की समय-समय पर आवश्यकता पड़ती है, इसीलिए तत्वदर्शन व चिन्तन के रूप में आत्मतत्व रूपी सद्गुरु अथवा आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति काया में विद्यमान प्रत्यक्ष गुरु की सहायता ली जाती है। गुरु उस सद्गुरु से दिशा-निर्देश प्राप्ति में सहायता करता है। व पात्रता के अनुरूप अपनी शक्ति का एक अंश भी साधक को देता है, परन्तु वास्तविक सहायता उसी आत्मतत्व से मिलती है। जिसे अपने अन्तःकरण में जगाया जाता है। यदि आत्मतत्व परिष्कृत, जागा हुआ न हो तो गुरुकृपा भी सूखी चट्टान पर बरसे वर्षा जल की तरह निरर्थक चली जाती है।
अपने आपे को परिष्कृत करने जगाने की जो साधना की जाती है, उसमें ध्यान-धारणा का महत्वपूर्ण स्थान है। अपने चिंतन को इधर-उधर भटकने से रोक कर उत्कृष्ट प्रवाह के साथ जोड़ देना उसी प्रकार है जैसे अपने अन्दर के क्रिस्टल को ईश्वर में संव्याप्त तरंगों को ग्रहण करने योग्य बना लेना व आदान प्रदान का क्रम आरम्भ कर देना सद्भाव संवर्द्धन श्रद्धा-अभिवर्द्धन से श्रेष्ठ कोई साधना नहीं । सोऽहं की हंसयोग साधना नादयोग, त्राटक, ज्योति अवतरण एवं चक्र भेदन इत्यादि साधनाएँ मूलतः ध्यानपरक हैं। इनसे अखण्ड-ज्योति के मनस्वी पाठक परिचित भी हैं। समयानुसार अपनी दिनचर्या में उन्होंने इनको यथोचित स्थान भी दे रखा है।
लेकिन युगसन्धि के इन महत्वपूर्ण अन्तिम वर्षों में इसे अभियान आन्दोलन का रूप दिया जाना है। परम वन्दनीया माता जी की तृतमीय पुण्य तिथि महालय पूर्णिमा, 16 सितम्बर को इस अभियान का शुभारम्भ तीन दिवसीय साधना-संवर्ग में होना सुनिश्चित हुआ है। इस अभियान का उद्देश्य अपने राष्ट्र एवं विश्वमानवता को श्रेष्ठ एवं समुन्नत महामानव प्रदान करना है। इस साधना-संवर्ग में सम्मिलित होने वाले एवं इसमें बताई गयी साधना की विशिष्ट विधियों को अपनाने वाले व्यक्ति ही इक्कीसवीं सदी में संचालित होने वाले सृजन-उपक्रमों का नेतृत्व करेंगे। परम वन्दनीया माताजी एवं परमपूज्य गुरुदेव को इस अपूर्व ऊर्जा अनुदान को साधना-संवर्ग में सम्मिलित होने वाले परिजन अनुभव किए बिना न रहेंगे। यह अनुदान उनके समस्त जीवन को अनेकानेक विभूतियों का उपहार देने वाला सिद्ध होगा।
किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए, भले ही व्यक्तिगत हो या फिर सामूहिक, केवल चिन्तन भी एकाँगी है और केवल कर्म भी अपूर्ण। उसके लिए चिन्तन और कर्म दोनों का ही समन्वित स्वरूप ही पूर्ण होता है बिजली के दोनों तार अलग-अलग हों तो विद्युतधारा का प्रवाह उत्पन्न नहीं होता है। दोनों के जुड़ने पर ही विद्युत धारा प्रवाहित होना सम्भव है। इसी के साथ यह सत्य भी स्मरणीय है कि लक्ष्य जब व्यापक हो तो सद् चिन्तन एवं सत्कर्म के युग्म का भी व्यापक समायोजन करना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हो जाता है।
युग-परिवर्तन ऐसा ही व्यापक एवं उच्चस्तरीय लक्ष्य है। यह प्रयोजन सामूहिक सहयोग से ही पूरा हो सकता है। संसार में जब भी कोई बड़े परिवर्तन होने अभीष्ट होते हैं तो उसमें ईश्वरीय शक्तियाँ मानवी चेतना के रूप में ही सक्रिय भाग लेती हैं। अकेले राम ने लंकाविजय, आसुरी आतंक की समाप्ति और दिव्य सत्प्रवृत्तियों की स्थापना नहीं की थी, उसके लिए रीछ-वानरों का सहयोग संगठित किया। कंस के संहार एवं कौरव अनीति के उन्मूलन में भी अकेले कृष्ण ने ही भाग नहीं लिया था, बल्कि उसके लिए ग्वाल-बालों को संगठित किया था। वर्तमान परिस्थितियों में भी परिवर्तन अभीष्ट है, यह स्पष्ट है कि परमात्मा की दिव्यचेतना भी युगशक्ति के रूप में क्रियाशील है- यह भी अनुभव किया सकता है। उसके लिए रीछ-वानरों की तरह, ग्वाल-बालों की तरह सामान्य व्यक्तियों को गायत्री साधना के द्वारा चिन्तन परिष्कार और यज्ञ अभियान के द्वारा कर्मशोधन प्रक्रिया को जन-जन तक पहुँचाना चाहिए।
युगशक्ति के रूप में जिस गायत्री चेतना के अवतरण की बात कही जाती रही है, उसके दो रूप है, पहला है परोक्ष-जिसे चिन्तनपरक कहा जा सकता है तथा दूसरा है प्रत्यक्ष, जिसे कर्मपरक कहा जाना चाहिए। परोक्ष स्वरूप में जप, ध्यान-धारणा, लय तथा तत्त्वज्ञान, योगाभ्यास का समावेश किया गया है तथा कर्मपरक प्रत्यक्ष अभियान में या आन्दोलन का। इस तरह के प्रयास व्यक्तिगत रूप से तो लम्बे समय से किए जाते रहे हैं-परन्तु अब इसमें सामूहिकता का समावेश किया गया है, जिसे अपने युग की नवीनता और विशेषता कहा जा सकता है। गायत्री और यज्ञ का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे के पूरक है। बिजली के दोनों तारों की तरह दोनों का सम्मिलित, समन्वित स्वरूप ही अभीष्ट युगचेतना उत्पन्न करने में समर्थ हो सकेगा। गायत्री और रु को भारतीय संस्कृति का माता-पिता कहा गया है। इसका भी यही अर्थ है कि ये दोनों सद् चिन्तन और सत्कर्म का मूल आधार है, और परस्पर एक-दूसरे के पूरक है।
अभी से नहीं अनादिकाल से ही यह सम्बन्ध चला आ रहा है। शास्त्रों में व्यक्ति के लिए सन्ध्यावन्दन के साथ नित्य यज्ञ का भी निर्देश दिया गया है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह सम्भव नहीं रहा, तो बलि वैश्वदेव का विधान किया गया। नित्यकर्मों में गायी और या को इस रूप में सम्मिलित करने के अतिरिक्त शक्ति अर्जन के लिए किए जाने वाले अनुष्ठानों की पूर्णाहुति में या अनिवार्य है। भारतीय धर्मानुयायी के जीवन की कोई भी महत्वपूर्ण घटना गायत्री ओर यज्ञ के बिना आयोजित नहीं की जाती। बालक का विद्यारम्भ संस्कार कराते समय यज्ञ भगवान की साक्षी में गुरुमंत्र के रूप में गायत्री मंत्र दिया जाता है। सिर पर शिखा-स्थापन के समय ऋतम्भरा-प्रज्ञा की ही प्रतिष्ठापना की जाती है और सत्कर्मों की प्रतिभा धारण करने के रूप में यज्ञोपवीत संस्कार कराया जाता है। इन संस्कारों में भी गायत्री यज्ञ किए जाते हैं तथा गायत्री और यज्ञ को प्रतीक रूप में अपने शरीर पर धारण किया जाता है। उन्हें जीवनक्रम में सम्मिलित करने का संकल्प लिया जाता है।
षोडश-संस्कारों में कोई भी संस्कार सम्पन्न किया जाता है, तो उसमें किसी न किसी रूप में गायत्री और यज्ञ की अनिवार्यता जुड़ी रहती है। गर्भाधान, पुँसवन, सीमान्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, उपनयन, वेदारम्भ, विवाह, समावर्तन, वानप्रस्थ, संन्यास और अंत्येष्टि में से एक भी संस्कार गायत्री और यज्ञ के बिना पूरे नहीं होते। इस तथ्य में यही सत्य समाविष्ट है कि सद् चिन्तन एवं सत्कर्म को पूरी ही निष्ठा से पालन करने का संकल्प ही जीवन को ऊर्जा एवं प्रकाश से भरता है।
लेकिन इस रूप में यह प्रक्रिया व्यक्तिगत जीवन तक सीमित थी। जब जब प्रश्न समूचे वायुमण्डल एवं वातावरण को परिशोधित करने का उठ खड़ा हुआ है तो इसकी व्यापकता का आह्वान करना उचित है। युग समस्याएँ बाहरी कारणों से उत्पन्न हुई लगती भर हैं, वस्तुतः उनकी जड़ें बहुत गहरी हैं, बड़े पेड़ों की जड़ें जमीन में गहराई तक धँसी होती हैं तभी उनके विशालकाय तने और पल्लव-परिकर को आवश्यक खुराक मिलती है। लदे हुए फल-फूल बाहर टँगे होते हैं और मोटी बुद्धि से प्रतीत यह होता है कि यह कहीं बाहर से ही आए या ऊपर से खतरे हैं। पर सच्चाई यह है कि वृक्ष का अस्तित्व विस्तार और वैभव बनाए रखने के लिए जड़ें ही प्रमुख भूमिका निभाती हैं। वे चर्म चक्षुओं से दिखाई न पड़ें, यह बात दूसरी है।
आज की समस्याओं के विशाल काय परिकर एवं कलेवर की जड़ों में सद् चिन्तन एवं सत्कर्म का अभाव ही प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है। समस्या पर्यावरण अथवा स्वास्थ्य से सम्बन्धित हो अथवा फिर भ्रष्टाचार या किसी सामाजिक कुरीति की, वहाँ उस क्षेत्र में सद् चिन्तन एवं सत्कर्म की उपेक्षा-अवहेलना स्पष्ट देखी जा सकती है। इसी उपेक्षा-अवहेलना ने वातावरण एवं वायुमण्डल को विषाक्त कर रखा है। यह वातावरण और वायुमण्डल ही सृष्टि वृक्ष की यह जड़ है-जिसे गीतकार ने ‘उर्ध्वमूलं अधः शाखं’ कहकर सम्बोधित किया है।
इसमें से वातावरण चेतनात्मक है और वायुमण्डल प्रकृतिपरक। वातावरण से मनुष्य की आस्था, आकाँक्षा और विचारणा से मनुष्य की आस्था, आकाँक्षा और विचारणा प्रभावित होती है। वायुमण्डल से वस्तुओं की मात्रा एवं स्तरीय स्थिति का सीधा सम्बन्ध है। मनुष्य एक सीमा तक स्वतन्त्र भी है। उसकी अपनी पुरुषार्थपरायणता का भी महत्व है, किन्तु वातावरण का दबाव तो आँधी-तूफान की तरह है, जिसके आवेग में जनमानस अमुक दिशा में उड़ता-दौड़ता दिखाई पड़ता है। अन्धड़ के साथ-साथ तिनके और पत्ते दौड़ते हैं। पानी की प्रचण्ड धारा में न जाने क्या-क्या हलका-भारी बहता चला जाता है। इसी प्रकार अन्तरिक्ष में संव्याप्त चेतनात्मक वातावरण, जनमानस को किसी दिशा विशेष में धकेलता-घसीटता चला जाता है। अबोध, असमर्थ जनमानस का बहुत बड़ा समूह स्वेच्छा से नहीं वातावरण के दबाव से अपने चिन्तन और प्रयास का निर्धारण करता है। ‘दैवेच्छा बलीयसी’ की उक्ति में इसी कटु सत्य की ओर संकेत किया गया है।
वायुमण्डल के उतार-चढ़ाव का विश्व की सम्पत्ति और परिस्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता है-उसे आए दिन देखा जा सकता है। अतिवृष्टि, अनावृष्टि वायुमण्डल की असन्तुलित हलचलें हैं, जिससे समस्त प्राणि-परिकर बुरी तरह प्रभावित होता है। मौसम प्रतिकूल हो जाने पर स्वास्थ्य को बुरी तरह क्षति पहुँचाती है। दुर्बलता और रुग्णता का, महामारियोँ का कभी-कभी ऐसा दौर आता है जो सँभाले नहीं सँभलता। मस्तिष्क ज्वर, लू लगने और निमोनिया होने जैसी बीमारियों में मनुष्य का दोष कम और मौसम का अधिक होता है।
वायुमण्डल की अनुकूलता ही प्रकृति की सहायता है। सतयुग में प्रकृति अनुकूल रहती थी और मानवी आवश्यकता के अनुरूप वस्तुओं की कमी नहीं पड़ती थी। मौसम सन्तुलित रहने पर पदार्थ प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होते हैं, खाद्य पदार्थों में पोषक तत्वों का परिमाण बढ़ा-चढ़ा रहता था। ऐसी-ऐसी अनेकानेक अनुकूलताएँ रहने के कारण प्राणी स्वस्थ, परिपुष्ट, प्रखर और दीर्घजीवी रहते थे। समर्थता काय-कलेवर तक ही सीमित नहीं रहती थी, वरन् उसके अन्तराल में रहने वाले मनःतत्व को भी प्रभावित करती थी। स्वस्थ मनुष्य सन्तुलित एवं सुखी भी रहते हैं।
सतयुग में वायुमण्डल एवं वातावरण परिशोधित एवं विकृति मुक्त था। तभी तो पुरातनकाल में मानवी-चिन्तन का स्तर उच्चस्तरीय था। उनकी कामनाएँ, रुचियाँ, महत्वकाँक्षाएँ उच्चस्तरीय थी। लोग ऊँचा चाहते और ऊँचा सोचते थे। फलतः इनके क्रिया-कलापों में आदर्शों का पुट पग-पग पर परिलक्षित होता था। ऐसे व्यक्तियों के स्वभाव में शालीनता, चरित्र में सज्जनता, व्यवहार में उदारता घुला रहना स्वाभाविक है। इसी स्तर के लोग धरती के देवता कहे जाते थे।
मनुष्यों को देवता बनाने और समष्टिगत वातावरण के परिशोधित व उन्नत रहने की ऊर्जा का उद्गम गायत्री एवं यज्ञ की सतत् प्रवाहमान प्रक्रिया थी। इसी के प्रवाह से समष्टिगत वातावरण ही कुछ ऐसा था जिसके प्रवाह में जन-समुदाय को ऊँचा सोचने, ऊँचा करने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं था। प्रवाह चीर कर उलटा चलना कठिन होता है। आज निकृष्टता के प्रवाह में व्यक्ति विशेष को अपने मनोबल के सहारे उत्कृष्टता अपनाना और उसे अन्त तक मजबूती के साथ पकड़े रहना अति कठिन होता है। कोई अपवाद ही ऐसा पौरुष दिखा पाते हैं। ठीक इसी प्रकार प्राचीन युग में भ्रष्ट चिन्तन एवं दुष्ट आचरण के लिए असाधारण दुस्साहस ही करना होता होगा अन्यथा वातावरण के दबाव में सहज ही वैसा कुछ कर सकना सरल नहीं, अतीव दुष्कर था। आज आकाँक्षाएँ एवं विचारणाएँ मानवीय आदर्शों को विपरीत दिशा में उद्दण्ड अन्धड़ की तरह बह रही हैं, उससे अनगढ़ ही नहीं सुशिक्षित और सभ्य कहे जाने वाले लोग भी बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।
कर्म स्थूल है और चिन्तन सूक्ष्म। वायुमण्डल स्थूल है-वातावरण सूक्ष्म। दुष्कर्मों से वायुमण्डल विकृत होता है, प्रकृति रूठती है और परिस्थितियाँ दुःखदायी बनती हैं। आवश्यक वस्तुओं का अभाव घटनाक्रम की प्रतिकूलता और कष्ट-संकटों का, विरोध-विग्रह का अभिवर्द्धन यह वायुमण्डल की विषाक्तता का परिमाण हैं वातावरण चेतन हैं मान्यताओं, आस्थाओं और विचारणाओं के समन्वय से उत्पन्न चिन्तन-प्रवाह में निकृष्टता भर जाने से वातावरण विकृत होता है। उससे प्रभावित जनमानस में कुकल्पनाएँ, दुर्भावनाएँ और अनीतिमूलक उच्छृंखलताएँ ज्वार-भाटों की तरह उठती है।
अचिन्त्य-चिन्तन का परिणाम अन्तःकरण में उद्विग्नता और कुटिलताओं के रूप में प्रकट होता है। फलतः संकीर्ण स्वार्थपरता, निरंकुश उच्छृंखलता एवं आक्रमण, दुष्टता पर उतारू होने की प्रवृत्ति पनपती है और मनोमालिन्य, विलगाव असहयोग, विरोध एवं विग्रह के रूप में प्रतिद्वन्द्विताएँ खड़ी होती हैं और अनेकानेक समस्याएँ उत्पन्न कर देती है। प्रभावित लोग स्वयं उद्विग्न रहते हैं और दूसरों का अप्रसन्न करते हैं। गर्हित दृष्टिकोण ही है जिसे अपनाने वाले स्वयं दुःख पाते हैं दूसरों को दुःख देते हैं। सहयोग के अभाव में प्रगति के द्वार रुक जाते हैं। मनोविकार ही शारीरिक और मानसिक रोगों को जन्म देते हैं। अनुदारता और दुष्टता अपनाने वाले दूसरों को सद्भावना गँवा देते हैं।
वायुमण्डल दूषित होने के कारणों में वैज्ञानिक अनाचार से उत्पन्न कूड़े-कचरे की अभिवृद्धि भी है। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, कोलाहल, विकिरण आदि बढ़ने से अन्तरिक्ष में बढ़ती विषाक्तता और उससे उत्पन्न विभीषिका की चर्चा सर्वत्र होती रहती है। इसके अतिरिक्त मनुष्यों के अनाचरण भी प्रकृति सन्तुलन को विक्षुब्ध करते हैं। फलतः मौसम, बाढ़, वर्षा, भूकम्प, तूफान, युद्ध, महामारी, कृमिकीटक, दुर्भिक्ष आदि की विपत्तियाँ आती हैं। वनस्पति हीनवर्या होती है। उसके पोषक तत्व घट जाते हैं और हवा में जीवन तत्वों की कमी पड़ने से मनुष्य ही नहीं अन्य जीवधारियों की भी शारीरिक स्थिति इस प्रकार बिगड़ती है कि उनकी मनः स्थिति सामान्य और सुखद परम्परा अपनाए रहने योग्य नहीं रह जाती है। यह प्रकृति विषयक हर दृष्टि से, हर किसी के लिए हानिकारक ही सिद्ध होती है। वातावरण की विषाक्तता लोकमानस में निकृष्टता की मात्रा बढ़ाती है, जिसकी वजह से स्नेह सहयोग के स्थान पर द्वेष, दुर्भाव और विग्रह-अनाचार की घटनाएँ घुमड़ने लगती है।
भौतिक क्षेत्र में सुख-सुविधा और शान्ति-व्यवस्था के साधन बढ़ाने के लिए भरपूर प्रयत्न होने चाहिए। कठिनाइयों को हल करने के लिए जो भी पराक्रम सम्भव हो उसे तत्परतापूर्वक किया जाना चाहिए, किन्तु ध्यान यह भी रखा जाए कि यह सब सद् चिन्तन एवं सत्कर्म के मूल आधारों को अपनाए बगैर पूरी तरह से सम्भव नहीं इसके अलावा वायुमण्डल और वातावरण का परिशोधन उन अध्यात्म प्रयत्नों पर निर्भर है, जिन्हें व्यक्तिगत धर्मधारणा एवं सामूहिक सह-साधना के आधार पर सम्पन्न किया जाता है। वायुमण्डल की परिशुद्धि के लिए यज्ञोपचार से बढ़कर और कोई शक्तिशाली माध्यम अब तक ढूँढ़ा नहीं जा सका। इसी तरह वातावरण के परिशोधन के लिए गायत्री की व्यक्तिगत एवं सामूहिक साधनाएँ अत्यधिक कारगर सिद्ध होती हैं।
गायत्री एवं यज्ञ के व्यापक प्रसार का अर्थ है- सद् चिन्तन एवं सत्कर्म के मूल आधारों का व्यापक विस्तार। इन्हीं भावनाओं को अपनाए जाने एवं न-जन तक विस्तार होने से समस्याओं एवं विकृतियों को जड़ से उखाड़ा जा सकेगा। गायत्री एवं यज्ञ का युग्म किसी धर्मविशेष की मान्यता अथवा किन्हीं प्रचलित कर्मकाण्डों की उठा-पटक तक सीमित नहीं है। इसके तत्वज्ञान में मनुष्यता का जीवनदर्शन निहित है। ऐसा जीवनदर्शन जो जाति-धर्म, क्षेत्र एवं राष्ट्र की सीमाओं से परे है। जिसमें सर्वजन हिताय एवं सर्वजन सुखाय की मधुर भावनाएँ सँजोई हैं। इसका विज्ञानपक्ष इससे भी कहीं अधिक मूल्यवान है। युगनिर्माण मिशन द्वारा अपनी स्थापना के समय से ही इसके विभिन्न प्रयोगों की शृंखला सम्पन्न की जाती रही है। इसके परिणाम भी आशातीत एवं कल्पनातीत रहे है। अब तक के अनुभवों के आधार पर ही कहा जा सकता है कि उज्ज्वल भविष्य की संरचना में जिस प्रकार का वातावरण अभीष्ट है उसे बनाने में गायत्री एवं यज्ञ से अधिक कारगर प्रयोग दूसरा कोई नहीं, इसमें युगक्रान्ति के स्थूल और सूक्ष्म स्तर के उन सभी तत्वों का समावेश है, जो जनमानस को, व्यापक वातावरण को परिष्कृत करके इक्कीसवीं सदी को सुनिश्चित रूप से उज्ज्वल भविष्य का स्वरूप प्रदान कर सकते हैं।
मनुष्य की सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है विचार। इसकी प्रचण्डता देखते ही बनती है। जिस प्रकार जलती हुई आग अपने समीपवर्ती क्षेत्र को गर्म करती है उसी प्रकार विचारों की ऊष्मा संपर्क में आने वाले व्यक्तियों के व्यक्तित्व में भारी उथल-पुथल मचा देती है। रत्नाकर का महर्षि बाल्मीकि में परिवर्तन, डाकू, अंगुलिमाल का सहृदय भिक्षु में बदलाव, देवर्षि नारद एवं महात्मा बुद्ध के विचारों की ऊष्मा का ही परिमाण था। दो समान परिस्थितियों और समान साधनों के व्यक्तियों की मनःस्थिति का विश्लेषण किया जाए तो उनमें भारी अन्तर मिलेगा। कई बार तो उनमें जमीन-आसमान जितना फर्क मिलता है। जिन परिस्थितियों में एक व्यक्ति दुःखी, उदास-खिन्न और असन्तुष्ट बना खीजता रहता है, उन्हीं में दूसरा सन्तोष की साँस लेता है और कई बार तो अपने को सुसम्पन्न सौभाग्यशाली भी अनुभव करता है। इस अन्तर का कारण क्या हो सकता है, इस पर विचार करने से एक ही निष्कर्ष उभर कर आता है- “विचारों के स्तर एवं प्रवाह का अन्तर।” विचारों के स्तर एवं प्रवाह का अन्तर।” वस्तुतः मानवजीवन के दुःख-सुख एवं उत्थान-पतन का केन्द्रबिन्दु यही है।
विचारों के निर्झर प्रतीत होने वाले मस्तिष्क को निश्चित रूप से जादू का पिटारा कह सकते हैं। इन दिनों कम्प्यूटरों के कारण कठिन बौद्धिक कार्यों को जिस सरलता से सम्पादित किया जाता है, उसके कारण उनकी बहुत चर्चा-प्रशंसा है, किन्तु यदि मस्तिष्कीय क्रियाकलाप को देखा जाए तो उस पर अब तक के बने सम्पूर्ण कम्प्यूटरों के आविष्कार न्यौछावर करने पड़ेंगे। यह एक ऐसा अद्भुत यन्त्र है, जिसकी तुलना का दूसरा उपकरण खड़ा कर सकना मनुष्य की बुद्धि, कल्पना से बाहर की चीज है। मस्तिष्क द्वारा शारीरिक क्रियाकलापों का अनवरत और सुव्यवस्थित संचालन किस खूबसूरती के साथ होता है, यदि इसका विवरण तैयार किया जा सके तो प्रतीत होगा कि उसकी क्षमता अद्भुत है कि मनुष्यकृत आज तक के सभी आविष्कार उसके सामने फीके पड़ जाते हैं।
क्योंकि मस्तिष्क केवल जीवन-यापन सम्बन्धी क्रियाकलापों या सोच-विचारों में लगा रहता हो और उतनी ही सीमा में उसकी शक्ति सीमित रहती हो, सो बात नहीं है। सूर्य जिस प्रकार निरन्तर अपना प्रकाश और ताप चारों ओर बखेरता रहता है, ठीक उसी प्रकार मानव मस्तिष्क से एक विशेष प्रकार की ऊर्जा निःसृत होती रहती है। इसे विचार, संकल्प, भावना, इच्छा आदि किसी भी नाम से अथवा उनके संयुक्त सम्मिश्रण के रूप में कह या पहचान सकते हैं इस विकिरण के द्वारा एक व्यक्ति अपने समीपवर्ती लोगों को असामान्य रूप से अनजाने ही प्रभावित करता है।
अनन्त आकाश की पोल में ‘ईथर’ तत्व भरा पड़ा है। ढेला फेंकने पर तालाब में जिस तरह लहरें उठने लगती हैं, उसी तरह विश्वव्यापी ‘ईथर’ महासागर में हमारे विचार अपने स्तर पर प्रहार करते हैं और उनसे प्रकाश या ध्वनि से भी अधिक ऊँची एवं सूक्ष्म स्तर की किन्तु लगभग उसी प्रकार की तरंगें उठती है, वे कुछ दूर तक जाकर ही समाप्त नहीं हो जातीं, बल्कि अनन्त आकाश में भ्रमण करने निकल जाती हैं। स्पष्ट है किसी गोलक पर सीधी यात्रा आरम्भ करने पर उसका अन्त आरम्भ किए जाने वाले स्थान पर ही होगा। इसी प्रकार किसी व्यक्ति के मस्तिष्क से निकलने वाली विचार तरंगें अपनी सुदूर यात्रा करती हुई अन्ततः अपने उद्गम स्त्रोत पर-विचार के मस्तिष्क पर वापस लौट आती हैं। इस क्रिया-प्रक्रिया का दुहरा प्रभाव होता है। एक तो उसी स्तर की विचार-बुद्धि वाले उन कम्पनों से बल तथा प्रोत्साहन पाते हैं दूसरे जब से वापस लौटते हैं तो अपने इस उत्पादन को नए आहार के रूप में पाकर सृजेता मस्तिष्क को भी लाभ मिलता है।
किसान अपनी फसल का लाभ स्वयं भी उठाता और उससे अन्य अनेकों को आहार मिलता है। विचारोत्पादन भी इसी प्रकार का कृषि कर्म है। पशु अपनी शरीर यात्रा सम्बन्धी सोच-विचारों में ही लगे रहते हैं, इसलिए उनका चिन्तन थोड़ा और विचार प्रवाह अत्यन्त क्षीण होता है। किन्तु मनुष्य में भावना, इच्छा, संकल्प, आदर्श आदि की बड़ी शक्तिशाली प्रेरणाएँ चिन्तन क्षेत्र को घेरे रहती हैं। अस्तु, उनसे विचार-तरंगें भी बहुत शक्तिशाली उत्पन्न होती हैं। यों जिनका चिन्तन शरीर-यात्रा की परिधि में ही एक ढर्रे का घूमता रहता है, उनकी विचार तरंगें भी बहुत दुर्बल होती हैं। प्रखरता तब आती है, जब उनमें किन्हीं विशेष भावनाओं की उभार सम्मिलित रह रहा हो।
स्पष्ट है आदर्शवादी उच्चस्तर का चिन्तन करने वाले चरित्रवान एवं सेवाभावी लोग अपनी विचार-तरंगों के माध्यम से समस्त विश्व को अपनी प्रखर प्रेरणाओं से लाभान्वित करते हैं, भले ही उनका वह अनुदान दूसरों को प्रत्यक्ष दिखाई न पड़ता हो। यह बात दुष्ट-दुरात्माओं पर भी लागू होती है। वे मन ही मन दुरभिसन्धियों के कुचक्र रचते हैं और इस प्रकार की भयानक तरंगें छोड़ते हैं, जिनके कारण अगणित दुर्बल मनोभूमि के लोग उसी प्रकार का चिन्तन प्रारम्भ कर दें और कुमार्गगामिता के कदम बढ़ाएँ।
समान विचारों के लोगों को अपने स्तर के नए विचार आकाश से मिलते रहें तो उनका बल बढ़ेगा। सजातीयता का आकर्षण प्रकृति का सर्वविदित नियम है। धातुओं के कण धूल में बिखरे रहते हैं, पर जिधर इन धातुओं की खान होती है, उधर वे धीरे-धीरे सहज ही खिसकते जाते हैं। समुद्र की दिशा में ही समस्त नदियाँ बहती हैं। नदियों की तरह नाले दौड़ते हैं। विचार भी अपने सजातियों की तरफ तेजी से बढ़ते हैं और वहाँ अपना रंग जमाते हैं। चोर, लवार जुआरी, व्यभिचारी अपनी जमात जोड़ लेते हैं। सन्त-सज्जनों के सत्संग भी जमे रहते हैं। यह समान स्वभाव का आकर्षण है।
विचारों के क्षेत्र में भी यही होता है, जहाँ जिस स्तर के विचार उठ रहे होंगे वहाँ उसकी अन्य लोगों द्वारा छोड़ी गयी विचार-तरंगें भी उड़ती हुई आवेंगी और अपना अड्डा जमा लेंगी। यही कारण है कि हर भले-बुरे विचारकर्ता को नई-नई सूझ-बूझें सहज ही मिलती चला जाती हैं, इसे अन्य सजातीय लोगों द्वारा छोड़े गए सजातीय विचारों का अनुग्रह-अनुदान भी कहा जा सकता है। प्रोत्साहनकारी और मार्गदर्शक विचारों की इस दुनिया में कमी नहीं। जिसे जो कुछ पसन्द हो इस विचार-बाजार में मनचाही परन्तु मनमानी मात्रा में बिना मूल्य एवं बिना रोक-टोक के खरीद सकता है।
हमारा रेडियो उन्हीं प्रसारणों को पकड़ता है, जिन पर उसकी सुई अड़ी होती है। उसी समय अन्य रेडियो स्टेशनों से अन्य प्रसारण भी होते रहते हैं, पर हम केवल अपनी रुचि का स्टेशन और प्रोग्राम ही सुनते हैं। अन्य प्रसारण अपनी राह चले जाते हैं, हमसे संपर्क उन्हीं का होता है, जिन्हें अपना रेडियो पकड़ना है। विचार-तरंगों को भी रेडियो का सहधर्मी-सहकर्मी माना जा सकता है। वे उठती हैं, उमड़ती हैं और स्पर्श भी सभी को करती हैं। अत्यन्त सूक्ष्म प्रभाव वे सभी पर छोड़ती हैं, पर विशेष प्रभाव सजातियों पर ही डालती हैं। सज्जनों का मस्तिष्कीय चुम्बकत्व प्रायः उन्हीं को आकर्षित करता है, जिनमें सज्जनता के अंकुर पहले से ही मौजूद हैं। यह बात दुर्जनों के सम्बन्ध में भी लागू होती है।
तथ्य सज्जनों-दुर्जनों तक ही सीमित नहीं है, दर्शन, कला और विज्ञान जैसे विषयों में भी इस सत्य का चमत्कार देखा जा सकता है। ठीक एक ही समय में एक ही वैज्ञानिक शोध पर-कई लोग एक ही स्तर की खोज-बीन करते हैं। वे अपने प्रयोगों की पूर्णता प्राप्त न होने तक छिपाते हैं, पर देखा गया है कि उनमें एक ही स्तर का चिन्तन, एक ही क्रम से, ऐसे ढंग से चला मानो एक-दूसरे की नकलची परीक्षार्थियों की तरह नकलटीप या चोरी की हो। वस्तुतः यह विशेष मनोयोगपूर्वक निःसृत विचारधारा का ही चमत्कार होता है। जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक दौड़ जाने से रोका नहीं जा सकता।
शारीरिक पुण्य-पापों की तरह मानसिक पुण्य-पापों की चर्चा भी धर्म-पुस्तकों में मिलती है और इसके अनेक भले-बुरे परिणाम भुगतने पड़ते हैं ऐसा कहा गया है। इस प्रतिपादन में ठोस तथ्य है। हमारा चिंतन समस्त विश्व को प्रभावित करता है, ऐसी दशा में हमारी क्रिया द्वारा न सही, विचारों द्वारा ही सही कुछ क्षति जरूर पहुँचाई गई अथवा सेवा-सहायता की गयी है तो उसका भला-बुरा परिणाम हमें मिलना ही चाहिए। शारीरिक पुण्य-पापों का अपना महत्व है, पर मानसिक पुण्य-पापों को भी काल्पनिक, नगण्य, निरर्थक या विनोद कहकर झुठलाया नहीं जा सकता। जब उनका प्रवाह होता है तो परिणाम क्या नहीं मिलेगा ?
बैठे-ठाले जब चाहे जैसी कल्पनाएँ करते रहने में हम स्वतन्त्र तो हैं, पर यह नहीं समझ बैठना चाहिए कि यह कोई निरर्थक मनोविनोद मात्र था। विचारों की शक्ति आग या बिजली की तरह है, उसके साथ मखौलबाजी करना खतरनाक है। दुष्टता और दुराचार की कल्पना भर करते रहें, योजना भर बनाते रहे, तो भी उसी स्तर के सजातीय विचार चारों ओर दौड़ पड़ेंगे और मस्तिष्क पर हावी हो जाएँगे। इसका परिणाम यह होगा कि हमारे प्रादुर्भूत विचार अनेक गुनी शक्ति-सामर्थ्य से भरे जाएँगे और अनेक भले-बुरे परिणाम सामने आ उपस्थित होंगे। यदि हम बुरे विचारों में निमग्न हैं तो स्वभावतः उस बुराई की अगणित प्रेरणाएँ, योजनाएँ सामने आती चली जाएँगी और क्रमशः इसी दुर्गुण के लिए अपना मन प्रशिक्षित हो जाएगा। विनोद मात्र के लिए निरर्थक कल्पना समझ कर जिन उड़ानों में हम उड़ रहे थे, वे ही मारे गले का फन्दा बन जाएँगी और एक दिन हमें उसी जाल-जंजाल में बेतरह डुबोकर रख देंगी। यदि कल्पना करनी हो तो केवल शुभ कल्पनाएँ करनी चाहिए, ताकि उस मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहन और बल मिलता चला जाए और समयानुसार हम उसी प्रकार की क्षमताएँ विकसित करते हुए उत्साहवर्धक प्रगति कर सकें।
विचार-शक्ति को विद्युत-शक्ति जैसी अणुशक्ति जैसी प्रचण्ड सामर्थ्य का माना जाना चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति को इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए कि उसका सही सदुपयोग क्या हो सकता है। धन-सम्पत्ति अपने पास हो तो उसे ऐसे ही बरबाद नहीं किया जाता है। धन की बरबादी करने से लोग क्षतिग्रस्त होते और उपहासास्पद बनते हैं। यही तथ्य विचारों की सम्पदा पर भी लागू होता है।
फालतू समय में कुछ भी किसी भी प्रकार के विचार प्रवेश करते रहें तो मोटे तौर पर उससे कुछ प्रत्यक्ष हानि होती दिखाई नहीं पड़ती, पर यदि गम्भीरता पूर्वक देखा जाए तो प्रतीत होगा कि मस्तिष्क में उमड़ने-घुमड़ने वाले विचार मस्तिष्क को उसी अपने ही स्तर का विनिर्मित एवं प्रशिक्षित करते हैं। कुछ समय रुचिपूर्वक जिन विचारों को मस्तिष्क में स्थान दिया जाएगा वे फिर वहाँ अपना अड्डा जमा लेंगे और उसी स्तर की अभ्यस्त विचारधारा चिन्तन के क्षेत्र में बिना बुलाए ही उमड़ने लगेगी। यह सब उमड़-घुमड़ ऐसे ही समाप्त नहीं हो जाती वरन् रुचि, रुझान और प्रवृत्तियों का निर्माण करती है। यह तथ्य है कि देर तक जिन विचारों को अपनाया गया है, वे प्रेरणाप्रद बनते हैं और अन्ततः अपनी ही दिशा में करने के लिए क्रियाशक्ति को सहम तत्पर कर लेते हैं।
अवाँछनीय विचारों को मस्तिष्क में स्थान देने और उन्हें वहाँ जड़ जमाने का अवसर देने का अर्थ है, भविष्य में उसी स्तर के जीवन की तैयारी कर रहे हैं। भले ही यह अनपेक्षित या अनायास ढंग से हो रहा है, पर उसका परिणाम तो होगा ही। उचित यही है कि हम उपयुक्त एवं रचनात्मक विचारों को ही मस्तिष्क में प्रवेश करने दें। उपयोगी एवं विधेयात्मक विचारों का आह्वान करने के लिए ही अपने देश में सत्संग एवं स्वाध्याय की परम्परा को व्यापक महत्व दिया गया था। देवालयों की उपयोगिता का भी यही कारण था। भक्तिभावना सम्पन्न लोग ही वहाँ आते हैं और एक ही स्तर की गतिविधियाँ लगातार चलती रहती हैं। इसका प्रभाव वहाँ के वातावरण पर ही नहीं इमारत पर भी पड़ता है। तीर्थों का निर्माण भी इसी आधार पर किया गया था। सत्संग भवनों की महिमा इसी प्रयोजन को पूरा करते-करते बढ़ जाती है। मनस्वी महामानवों के निवास स्थान इसी दृष्टि से प्रेरणाप्रद बन जाते हैं। उन्हें दिव्यस्मारकों के रूप में सुरक्षित रखने का यही प्रयोजन है।
सामूहिक सद्सम्मेलनों एवं धर्मानुष्ठानों के पीछे एक बड़ा प्रयोजन सामूहिक सद्विचार-प्रवाह के मिलने से एक सम्मिलित शक्ति का उद्भव करना भी होता है सामूहिक प्रार्थना, पर्व-त्योहारों के सम्मिलित आयोजन इसी प्रयोजन की पूर्ति करते हैं। इकट्ठे होकर यज्ञायोजन पूरे करने में छुटपुटे अलग-अलग प्रयत्न करने की अपेक्षा कहीं अधिक लाभ होता है। युगनिर्माण मिशन के जनम का आधार एवं उद्देश्य ही यही है कि सद्विचारों का प्रसार कर प्रचण्ड वातावरण विनिर्मित किया जाए। प्राचीनकाल में आश्रम, बौद्ध विहार, चैत्य आदि को बनाए जाने के पीछे भी यही उद्देश्य निहित था। विचारों की शक्ति एवं सम्पदा का यदि महत्व समझा जा सके और उनके सद्प्रयोग का मार्ग अपनाया जा सके तो निःसन्देह सफल और समुन्नत जीवन की मंगल उपलब्धियाँ प्रचुर परिणाम में प्राप्त कर सकते हैं। पर यह सब होगा तभी जब हम अपने अन्तःकरण में यह गहराई से अनुभव कर लें-’न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते’ अर्थात् सद्ज्ञान यानि सद्विचार-सद् चिन्तन से पवित्र एवं श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं।
चिरपुरातन काल से विद्या-विस्तार का राष्ट्रीय एवं सामाजिक महत्व रहा है। जीवन जीने एवं सामाजिक महत्व है। जीवन जीने की कला, जिसे अध्यात्म की भाषा में संजीवन विद्या कहा जाता है, मनुष्य की प्रथम चेतनात्मक आवश्यकता है। अर्थोपार्जन करके सुविधा-सम्पादन एक के अनेकानेक प्रयास जानकारी बढ़ाने, मस्तिष्क को सुविकसित करने के लिए किए जाते हैं। आहार-विहार होती है। इस तरह भौतिक जीवन की आवश्यकताएँ शरीर-मस्तिष्क और थप्र-साधनों को सुव्यवस्थित रखने से पूरी हो जाती है। परम चेतनात्मक प्रखरता उस विद्या से आती है, जो दृष्टिकोण को परिष्कृत करती है। और चिन्तन एवं कर्तव्य को सही दिशा में चलने के लिए नियन्त्रित-प्रशिक्षित करती है। जीवन-विद्या का जिसे सफल-सार्थक जीवन-विद्या का जिसे जितना ज्ञान अभ्यास है, वह उतना ही सफल- सार्थक जीवन है, वह उतना ही सफल- सार्थक जीवन जिएगा। अंतरंग क्षेत्र में उसे महानता का आनन्द और बहिरंग में बड़प्पन का श्रेय-सम्मान मिलेगा।
कोई भी कला-कौशल मात्र सुनने, समझने से ही उपलब्ध नहीं हो जाता। उसके से ही उपलब्ध नहीं हो जाता। उसके लिए अनुभव, अभ्यास भी जुटाना पड़ता है। जीवन-विज्ञान को बौद्धिक रूप से जाना-समझा जाए सो ठीक है।, पर साथ ही यह भी जानना आवश्यक है कि उसे अभ्यास में लाने में लाने की, अनुभव में उतारने की प्रबल चेष्टा की जाए, तभी वे जानकारियाँ व्यावहारिक जीवन में उतरेंगी और आदतों का रूप धारण करेंगी। ज्ञान को व्यवहार में परिणत करने का अनवरत प्रयास साधना कहलाता है। यों सामान्य क्रम में योग और तप के क्रियाकलापों को ‘साधना’ कहते हैं। पर वस्तुतः वह शब्द इतना सीमित नहीं है। चेतना को किसी भी प्रकार के अभ्यास में ढालने के हर प्रयास को साधना कहा जा सकता है। कला, शिल्प, व्यायाम, अध्ययन, परमार्थ आदि किसी में भली प्रकार प्रवीण-अभ्यस्त कर लेना साधना ही कही जाएगी। जिन्दगी को परिष्कृत स्तर के जीने की जानकारी को जीवन-विज्ञान और उसे स्वभाव का अंग बना लेना, अभ्यास और आदतों को अनुसार ढाल लेना जीवन-विज्ञान और उसे स्वभाव का अंग बना लेना, अभ्यास और आदतों को तदनुसार ढाल लेना जीवन साधन कही जाएगी। वस्तुतः ये दोनों ही एक दूसरे की पूरक है। दोनों के समन्वय को ही सर्वांगपूर्ण विद्या कहते हैं।
प्राचीन साहित्य में इसके राष्ट्रीय एवं सामाजिक महत्व का विवेचन विस्तारपूर्वक दिया गया है। यह कोई कल्पना विहार या जादुई क्रियाकलाप नहीं कल्पना बिहार या जादुई क्रियाकलाप नहीं है। दृष्टिकोण के चिन्तनक्षेत्र को उच्चस्तरीय पृष्ठभूमि पर अवस्थित करने की आस्था निर्धारण करने का विधि विधान है। अध्यात्म का विवेचनात्मक और साधनात्मक विशालकाय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। ईश्वर-जीव-प्रकृति के स्वरूप का प्रतिपादन, जीवन-लक्ष्य का निर्धारण-गति विधियों का नियमन, नियमन, नियन्त्रण और वस्तुओं का उपयोग एवं व्यक्तियों से व्यवहार की जो नीति-मर्यादा निरूपित होती उस मान्यता और आकांक्षा का एक उत्कृष्ट आधार बनता है। यही है संजीवनी-विद्या का लक्ष्य। इसी को पाकर मनुष्य का व्यक्तित्व ऊँचा उठता है, देव भूमि में विकसित होता है।
इस संजीवनी-विद्या को उत्कृष्ट जीवनयापन सम्बन्धी मान्यताओं एवं रीति-नीतियों का समन्वय कह सकते हैं। हमें क्या सोचना चाहिए और क्या करना चाहिए, इसी का विस्तार से विवेचन विश्लेषण इसमें किया गया है। इसी का अपनाकर भारतभूमि स्वर्गादपि गरीयसी बनी थी। यहाँ के निवासियों ने देवता होने का गौरव पाया था। इस देश को जगद्गुरु एवं चक्रवर्ती की उपाधियाँ इसी कारण मिली थीं। यहाँ के उपाधियाँ इसी कारण मिली थीं। यह संजीवनी विद्या का ही विस्तार- प्रसार था कि यहाँ के निवासियों की चरित्रनिष्ठा, ईमानदारी की गाथाएँ यहाँ आने वाले विदेशी यात्री करते नहीं अघाते थे। मैगस्थनीज फाहृन, हृनसाँग की रचनाएँ भारत देश की महानता एवं भारतीयों के उज्ज्वल चरित्र के गौरवगान से भूरी-पूरी हैं।
बदलते युग में विद्या-विस्तार की प्रक्रिया एवं परम्परा नष्ट हो गयी। इसी का प्रक्रिया एवं परम्परा नष्ट हो गयी। इसी का परिणाम हमारे सामने है। स्वतंत्रता की पचासवीं वर्षगाँठ मनाते हुए हम भ्रष्टाचार के दल-दल में धँसे खड़े हैं। राष्ट्रीय स्वाधीनता के पचास वर्ष पूरे होने पर संसद का जो छह दिवसीय विशेष सत्र आयोजित किया गया, उसमें भ्रष्टाचार एवं अपराध की ही चर्चा होती रही। जन-प्रतिनिधि से लेकर नौकरशाहों तक सभी इस पाप पंक में फँसे है। यह बात हर ओर से मुक्त कण्ठ से स्वीकारी जा रही है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? इससे छुटकारा कैसे मिले? इन प्रश्नों के उत्तर में समाधान के स्वर मौन है। बुद्धिजीवी, राजनीतिज्ञ, समाजशास्त्री सभी असमंजस में है। वे सोच नहीं पर रहे हैं कि इस राष्ट्रीय समस्या का निदान कैसे हो?
इसके उत्तर में कहना इतना ही है कि इस राष्ट्रीय समस्या के निदान एवं समाधान के लिए विद्या-विस्तार का राष्ट्रीय एवं सामाजिक महत्व फिर से पहचानना पड़ेगा। हाँ इसके लिए प्राचीन विधियाँ को युग के अनुरूप सरल सुबोध बनाना पड़ेगा और आज की स्थिति के अनुरूप समझाने और व्यवहार में लाने की शैलो का विकास करना होगा।
प्राचीनकाल में शास्त्री निर्देश और आप्तवचन प्रमाणभूत थे। श्रद्धा ही उन दिनों का आधार थी। पर अब वैसी स्थिति नहीं है विज्ञान के समानान्तर बुद्धिवाद बढ़ा है। विज्ञान ने युग को नई दिशा दी है कि जो कुछ माना जाए, वह प्रत्यक्ष प्रमाणभूत एवं तर्कसंगत होना चाहिए। इन नयी कसौटी पर शास्त्र निर्देश आप्तवचन परम्परा प्रचलन तीनों की अमान्य ठहरते हैं। आधार उलट गया। अब किसी को तर्क और प्रमाणरहित, आप्तवचन स्वीकार नहीं। विज्ञान को पीछे नहीं धकेला जा सकता और बुद्धिवाद से पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता। अतएव विद्या संजीवन विद्या नहीं छुड़ाया जा सकता। अतएव संजीवन व़ा के तत्वज्ञान को अब बुद्धिवादी, युग के अनुरूप शैली में प्रतिपादित करना होगा। यही बात नीति-सदाचार के सम्बन्ध में है। प्राचीनकाल में व्यक्ति को जिन परिस्थितियों में रहना पड़ता था, समाज का ढाँचा जिस स्तर का था उसके अनुरूप क्रियाकलापों का निर्धारण, तत्कालीन नीति-सदाचार के रूप में हुआ था।
अब परिस्थितियों में धारी अन्तर आ गया है। व्यक्ति जिस वातावरण से प्रभावित होता है और समाज ने अपना जो रूप बना लिया है, उससे प्राचीनकाल के प्रचलनों जितना अन्तर दिखाई पड़ता है। ऐसी स्थिति में धर्माचरण का, नीति सदाचार का, आस्था-निरूपण का पुराना स्वरूप यथावत् नहीं रखा जा सकता । शाश्वत मूल्यों को यथावत् रखते हुए भी उनके प्रतिपादन एवं व्यवहार में समयानुकूल अन्तर आवश्यक है ऐसे हेर-फेर अनादिकाल से आज तक होते रहे है। अनेक अवतारों को देवदूतों को सामयिक परिवर्तन की प्रक्रिया सम्पन्न करने के लिए ही बार-बार आना पड़ता है। वे अपने पूर्ववर्ती का आदर्श तो स्थिर रखते हैं, पर व्यवहार में समय की विकृतियों को संस्कृति में बदलने के लिए अपने प्रतिपादनों एवं क्रियाकलापों का ऐसा निर्धारण करते हैं, जो नवीन लगता है, समय की आवश्यकता को पूरा करता है। दैवी मार्गदर्शन का, सृष्टि-सन्तुलन का यह प्रयास प्रतिभाओं द्वारा समय-समय पर होता रहा है और आगे भी होता रहेगा।
जो समस्याएँ प्राचीनकाल में थीं वे अब नहीं हैं । जो अब है वे प्राचीनकाल में नहीं थीं। जो अब है वे प्राचीनकाल में नहीं थीं। ऐसी दशा में प्राचीनकाल की संजीवनी-विद्या की आत्मा को यथावत् रखते हुए भी उसे समझाने और करने की पृष्ठभूमि दूसरी ही बनानी पड़ेगी। यह प्राचीन एवं नवीन का समन्वय होगा। इसकी तुलना सर्प की केंचुली उतरने अथवा जराजीर्ण स्थिति को नवयौवन में बदलने वाले कायाकल्प से की जा सकती है।
प्राचीनकाल में समस्त शिक्षा सघन वनों के एकान्त उद्योगों में बने गुरुकुलों में होती थी। अभिभावक अपने बच्चों को पाँच वर्ष की आयु से लेकर पच्चीस वर्ष होने तक निष्णात आचार्यों को सौंप देते थे। अब वैसी शिक्षा प्रक्रिया का चल सकना कठिन है। कितने ही उत्साही गुरुकुलों कठिन है। कितने ही उत्साही गुरुकुलों ने वैसा ही कुछ सोचा और आरम्भ किया, पर वह प्रयास सर्वथा आरम्भ किया, पर वह प्रयास सर्वथा असफल हो गए। अब प्रायः समस्त गुरुकुल सरकारी मान्यता प्राप्त कॉलेजों के रूप में हैं। कोई अपवाद हो तो दूसरी बात है। इसमें दोष किसी का नहीं परिस्थितियों का है। अब परिष्कृत शिक्षा पद्धति चलेगी तो उसमें युग की आवश्यकता का समावेश करना होगा आरण्यक की वानप्रस्थ परम्परा भी अब लुप्तप्राय है। साधु-ब्राह्मण परम्परा के भी अब कहीं दर्शन नहीं होते हैं। प्राचीनकाल में ये परम्पराएँ संजीवनी विद्या को द्वार-द्वार तक जन-जन तक ले जाती थीं। यही नहीं व्यक्ति अपने अवकाश के समय तीर्थस्थानों में निर्धारित पर्वों पर होने वाले धर्मानुष्ठानों में, सत्र सम्मेलनों में सम्मिलित होते थे और प्रस्तुत समस्याओं को सुलझाने एवं भावी प्रगति का सामाजिक प्रकाश प्राप्त करने के लिए वहाँ पहुँचते थे। तीर्थों के निष्णात तत्वदर्शियों द्वारा आवश्यक मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन प्राप्त करते थे । अब तीर्थों का, धर्मायोजनों का रूप कैसा विकृत हो गया है इसे कोई भी आँखें खोलकर देख सकता है। कुम्भ जैसे मेले कितना धन, श्रम, समय बरबाद करते हैं। और जितना पाखण्ड, अंधविश्वास फैलाते हैं, उसे सहज ही देखा-जाना जा सकता है। यातायात और परिवहन की सुविधा, व्यवसायी व्यवसायी दृष्टिकोण और प्रचार प्रपंच ने मिलकर इन मेलों का जो स्वरूप बन दया है, उससे अब प्राचीन स्थिति के शिक्षण सत्रों की स्थिति में लौट पाना असम्भव हो गया हैं अब उस आवश्यकता की पूर्ति तभी सम्भव है, अब युग चुनौती को स्वीकार करके नयी परिस्थितियों के अनुरूप, नए साधन सरंजाम जुटाए जाएँ।
शान्तिकुँज की स्थापना ही इसी उद्देश्य को लेकर की गयी है। परमपूज्य गुरुदेव के विचार-क्रान्ति अभियान के प्रवर्तन का उद्देश्य विद्या विस्तार के प्राचीन-तन्त्र का पुनर्जीवन एवं नवीनीकरण ही था। यहाँ प्राचीनकाल की सभी परम्पराओं की नयी परिस्थितियों के अनुरूप जाग्रत एवं प्राणसम्पन्न देखा जा सकता है। गायत्री विद्यापीठ के रूप में गुरुकुल परम्परा बच्चों में दैवी संस्कारों का रोपण करने के लिए सक्रिय है। यहाँ के तपोनिष्ठ आचार्यगण एवं गार्गी- मैयेयी की भाँति साधना-संपन्न ब्रह्मवादिनी महिलाएँ बच्चों में महामानवों के संस्कार देने में निरत हैं।
आरण्यक परम्परा की शुरुआत यहाँ प्राण प्रत्यावर्तन सत्र से 1973 में आरम्भ हुई थी। इसके पश्चात् वरिष्ठ वानप्रस्थ श्विर, कनिष्ठ वानप्रस्थ शिविर, रामायण शिविर, लेखन शिविर, जीवन साधना शिविर, चान्द्रायण सत्र ब्रह्मवर्चस् लेखन एवं शोध सत्र कल्पसाधना सत्र, युगशिल्पी सत्र आदि के माध्यम से आरण्यक परम्परा के प्रवाह ने विस्तार पाया । जो अभी भी अपने पूरे वेग से गतिमान है। तीर्थ परम्परा का पुनर्जीवन यहाँ से शक्तिपीठों-प्रज्ञापीठों की शृंखला के निर्माण से पूरा हुआ। आज के समय तक लगभग 4000 की संख्या से अधिक शक्तिपीठ एवं प्रज्ञापीठ ज्ञान एवं संस्कार देने की अपनी प्राचीन तीर्थ परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं इसी के साथ देश के विभिन्न प्रान्तों एवं विश्व के अनेक देशों में 26ए 427 प्रज्ञामण्डल एवं 11,190 मला अनी महती भूमिका का निर्वाह तत्परता एवं तल्लीनता से कर रहे हैं।
संजीवनी-विद्या के तत्वज्ञान को युगानुरूप वैज्ञानिक प्रतिपादन करने वाली मासिक पत्रिका अखण्ड-ज्योति 5 लाख प्रतिमास छपती है। इसी तरह युग-प्रवाह को जन-जीवन तक पहुँचाने वाली 50,000 है। गुजराती भाषा में युगशक्ति की प्रकाशन संख्या 125,000 है। इसी क्रम में अखण्ड-ज्योति के तेलगू,मराठी, बंगाली, एवं उड़िया संस्करण भी प्रकाशित होते हैं। जो जन-जन को संजीवनी-विद्या को सुगम बोध कराने में सक्षम एवं समर्थ भूमिका अतिरिक्त युगसाहित्य के रूप में लगभग अब तक 3,000 से भी अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। इनमें से कइयों के गुजराती, मराठी, बंगाली एवं उड़िया व तेलगू संस्करण उपलब्ध है। अंग्रेजी भाषा में युगसाहित्य के प्रचार-विस्तार ने अपनी तीव्र गति पकड़ ली है। पूज्यवर द्वारा रचित सभी पुस्तकों, पत्रिकाओं, प्रवचनों आदि विचार सामग्री को एक स्थान पर लाकर वाङ्मय के रूप में प्रकाशित किया गया है।, इसके 70 खण्ड तैयार हैं तथा 39 खण्ड लगभग 1-2 वर्ष में तैयार होंगे। गुजराती तथा अँग्रेजी में इनके अनुवाद कराने की प्रक्रिया प्रारम्भ की गई है।
यही नहीं युगनिर्माण मिशन के कर्मठ परिजनों ने प्राचीनकाल की साधु ब्राह्मण परम्परा को युगानुरूप क्रत तके पुनर्जीवित कर दिया है। अपने मिशन के एक लाख से भी अधिक भाई-बहिन झोला पुस्तकालय के माध्यम से द्वार-द्वार पहुँच कर जन-जन को सद्ज्ञान का वितरण करते हैं। इसी क्रम में 6000 से अधिक ज्ञानरथ भारत एवं विश्व भारत एवं श्वि में सक्रिय तन्ख् द्वारा संचालित यज्ञायोजनों के केन्द्रीय तन्त्र द्वारा संचलित यज्ञायोजनों, धर्म सम्मेलनों, के विश्व भूमिका को परिस्थितियों के अनुरूप प्रस्तुत करने का अभियान चला रखा है। इसे चिरप्राचीन और चिर नवीन का संगम समन्वय कहा जा सकता है।
शान्तिकुँज ने इस पद्धति को संजीवनी-विद्या के विस्तार का नाम दिया है। मृतक को जो जीवित बना दे, वह संजीवनी जीवन के रहस्यों का उद्घाटन करने के साथ-साथ जो उसे परिष्कृत बनाए वह संजीवनी इस विद्या-विस्तार बनाए वह संजीवनी। इस विद्या-विस्तार का शुभारम्भ इस युग की एक महत्वपूर्ण घटना है। इसका श्रीगणेश कितना ही छोटा क्यों न हो, परन्तु यह सुनिश्चित है कि यह चिनगारी इक्कीसवीं सदी में प्रचण्ड दावानल का रूप धारण करेगी और युग की विकृतियों को भस्मसात् करके छोड़ेगी। इस विद्या-विस्तार को नवयुग की एक क्षीण, किन्तु सूर्योदय की सुनिश्चित सम्भावना की घोषणा कहा जा जा सकता है। समय बताएगा कि यह सुखद कल्पना नहीं,वरन् सुनिश्चित सम्भावना का उद्घोष है। शरद पूर्णिमा 16 अक्टूबर, 1997 के तीन दिवसीय सद्ज्ञान सद्शिक्षा संवर्ग समारोह में भाग लेने वाले परिजन इस सत्य को अनुभव किए बिना न रहेंगे।
छेव-संस्कृति की गौरव-गरिमा के कारण ढूँढ़ने हों तो उसमें ऐसी अगणित अच्छाइयाँ मिल सकती हैं, जो समूची मानवता के लिए कल्याणकारी और प्रेरणाप्रद सिद्ध हो सकें। ऐसी विशेषताओं में अत्यधिक महत्व की है-वैचारिक सहिष्णुता। भारत में अनेक विचार और मतमतांतर पनपे और बढ़े है। किसी ने किसी को रोका या काटा नहीं है। औचित्य किस प्रतिपादन में कितना है, इसका निर्णय जन विवेक पर छोड़ दिया गया है। इसमें आस्तिक से लेकर नास्तिक तक, जीव-हिंसा को पाप मानने वालों से लेकर पशु-बलि चढ़ाने वालों तक को अपनी बात कहने की छूट दी गयी है। बौद्ध धर्म भारत में पैदा हुआ और देश निकाल लेकर अन्यत्र चला गया, यह स्वस्थ प्रतिद्वन्द्विता के कारण हुआ। इसके लिए उसे बाधित नहीं किया गया।
इस वैचारिक स्वतन्त्रता से जहाँ यत्किंचित् भ्रम फैलाने की गुँजाइश है, वहाँ बहुत बड़ा लाभ यह है कि देव संस्कृति के अनुपात विचार-सागर में अपने उपयोग का सर्वोत्तम रत्न तलाश करने के लिए विवेक-बुद्धि जाग्रत तलाश करने के लिए विवेक-बुद्धि जाग्रत रहती है। यह विकसित रही तो देर-सबेर में अधिकतम उत्कृष्ट का चुनाव सम्भव हो ही जाएगा। यदि मान्यताओं के बन्धनों से बुद्धि सामर्थ्य को जकड़ दिया गया होता तो कट्टरता भले ही बनी रहती, परन्तु औचित्य को परखने वाला तत्व तो कुँठित ही होता चला जाता। ‘बाबा वाक्यं प्रमाणम्’ के अन्धानुकरण में कई अच्छाइयों पर दृढ़ बने रहने का जितना लाभ है, उसकी तुलना में यह हानि भारी है कि तर्क और तथ्य का उपयोग होना ही बन्द हो जाएगा। तर्क, तथ्य एवं प्रमाण के आधार पर सत्य को स्वीकारने की भारतीय संस्कृति की यह विशेषता ऐसी है, जो कट्टरतावादियों को एक अच्छी दिशा की ओर संकेत करती है। हम अनेक प्रस्तुतीकरणों में से जहाँ जितने उपयोगी अंश मिल सकें, वहाँ से उतना चुन लेने की नीति अपनाकर अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमत्ता का ही परिचय देते हैं।
यही नहीं, देव-संस्कृति में व्यक्ति को ऐसी इकाई माना गया है, जो अपने आप में पूर्णता सम्भावना रखते हुए भी समाज के लिए अति उपयोगी बना रह सकता है। आत्मबोध,आत्मकल्याण, आत्मोत्कर्ष जैसे शब्दों को भारतीय दर्शन में प्रमुखता मिलने से लगता है कि यह व्यक्तिवादी मान्यता है और स्वार्थी बनने के लिए कहा जा रहा है। इसे स्वार्थान्धता को प्रोत्साहन मिलेगा और सामाजिकता क्षीण होगी। लेकिन यह आशंका तभी सही सिद्ध हो सकती थी, जब व्यक्ति विकास को विश्वात्मा के लिए समर्पित करने के स्थान पर निजी सुख-सुविधा के लिए आत्मकेन्द्रित किया गया होता। पर यहाँ तो यह मान्यता है कि विश्वात्मा के, परमात्मा के चरणों पर उत्कृष्टतम पूजा शाकल्य के रूप में परिष्कृत आत्मसत्ता को समर्पित किया जाए। इस प्रकार यह व्यक्तिवादी स्वार्थान्धता का, एकाकीपन का आक्षेप नहीं आता।
अरस्तू ने राज्य को सर्वोपरि माना है और व्यक्ति को उसके हित में कुछ भी करने के लिए कहा है। हीगल ने इस मान्यता को और भी आगे बढ़ाकर सर्वहारा किया है। मार्क्स ने उसे और भी अधिक तर्क और तथ्यपूर्ण ढंग से समाज की सर्वोच्च सत्ता के पक्ष में अपने मत को प्रस्तुत किया है और व्यक्ति की निजी स्वतन्त्रता को अमान्य ठहराया है। व्यक्ति के अधिकार बने रहने पर स्वतन्त्र आत्मोत्कर्ष की, अन्तरात्मा का अनुसरण करने की गुँजाइश रहती है। किन्तु जब वह समाज के संचालकों की वशवर्ती कठपुतली मात्र रह गया हो तो फिर स्वतन्त्र चिन्तन की गुँजाइश कहाँ रही?
माना कि इसमें दुष्टता बरतने की गुँजाइश है, पर साथ ही ऐसा भी तो है कि चेतना की साधनात्मक गतिविधियाँ अपनाकर व्यक्ति उस स्थान पर पहुँच जाए, जहाँ अवतारी महामानव पहुँचते हैं। समाज नियन्त्रण को सर्वोपरि मान लेने पर वैचारिक महानता का विकसित कर सकने वाली आत्मसाधना के लिए अवसर ही नहीं रहता। इस प्रकार प्रचलित विचारधारा को अन्तिम मानने से, मानवीय प्रगति के इतिहासक्रम में भागी बाधा उत्पन्न होगी। सच तो यह है कि प्रचलित विचारक भारतीय संस्कृति की प्रतिपादित एवं समर्थित वैयक्तिक स्वतन्त्रता के कितने ही दोष क्यों न गिनाए, पर एक गुण तो उसमें बना ही रहेगा कि इसको मानने से व्यक्ति की अन्तरात्मा जीवित रहेगी और अपने ढंग से, अपने निर्णय लेने और उत्कृष्ट गतिविधियाँ अपनाने में स्वतन्त्र रह सकेगी। इस विशेषता के रहते आत्मनिर्माण की, आत्माभिव्यक्ति की जो सुविधा मनुष्य के हाथ रह जाती है वह असंख्य व्यवधानों के रहते हुए भी अधिक मूल्यवान है।
देव-संस्कृति में संवेदना, कल्पना, आचरण, भावसंयम, नैतिक विवेक, उदार आत्मीयता, के जो तत्व अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए है, उनका आंशिक पालन बन पड़ने पर भी व्यक्ति सौम्य एवं सज्जन ही बनता है। इस दृष्टि से औसत भारतीय नागरिक तथाकथित प्रगतिवान एवं सुसम्पन्न समझे जाने वाले देशों की तुलना में कहीं अधिक आगे है।
कर्मफल के सिद्धांत की मान्यता, पुनर्जन्म के प्रति आस्था भारतीय संस्कृति की ऐसी विशेषता है, जिसके आधार पर नीति और सदाचार की रक्षा होती है। यह एक अच्छी दार्शनिक ढाल है, जिसके कारण अनैतिक बनने के लिए उभरने वाले उत्साह पर नियन्त्रण लगाता है। अपने देश में ईमानदारी, अतिथि सत्कार, दाम्पत्य मर्यादाओं की कठोरता, पुण्य-परोपकार, पाप के प्रति घृणा, जीव-दया जैसे तत्व दरिद्रता और सामाजिक अव्यवस्था के रहते हुए भी जीवित हैं। संसार में अन्य? ऐसी स्थिति नहीं है। जिन दिनों इस कर्मफल सिद्धांत पर वास्तविक आस्था थी, उन दिन यहाँ की चरित्रनिष्ठा और समाजनिष्ठा देखते ही बनती थी। प्राचीनकाल का भारतीय गौरव वस्तुतः उसकी महान संस्कृति का ही एक अनुदान रहा है।
मातृशक्ति को देवी रूप में परम प्रतिष्ठा एवं भोजन-स्नान आदि के साथ जुड़ी हुई स्वच्छता ऐसे आधार योगदान रह सकता है। वर्ण-व्यवस्था आज जन्मजाति के साथ जुड़कर विकृत हो जाने के कारण बदनाम है, पर उसके पीछे हो जाने के कारण बदनाम है, पर उसके पीछे अपने व्यवसाय तथा अन्य विशेषताओं को परम्परागत रूप से बनाए रहने की भारी सुविधा है। आज से बनाए रहने की भारी सुविधा है। आज छोटे-छोटे कामों के लिए नए सिरे से ट्रेनिंग देनी पड़ती है, जबकि प्राचीनकाल में वह प्रशिक्षण वंश-परम्परा के आधार पर बचपन से आरम्भ हो जाता था। और अपने विषय की प्रवीणता सिद्ध करता था। आश्रम धर्म में ब्रह्मचर्य ओर गृहस्थ में बीतने वाली आधी आयु भौतिक प्रगति के लिए ओर आधी आयु आत्मिक प्रगति के लिए ओर आधी आयु आत्मिक विभूतियों के संवर्द्धन के लिए है। वानप्रस्थ और संन्यास में आत्मिक श्रेष्ठता के संवर्द्धन में तथा लोकमंगल में योगदान देने के लिए सारा समय निश्चित है। इससे व्यक्ति ओर समाज दोनों की श्रेष्ठता समुन्नत होती रहती है।
तीर्थयात्रा में जहाँ स्वास्थ्य संवर्द्धन अनुभव वृद्धि, स्वस्थ मनोरंजन, व्यवसाय वृद्धि घर बैठे आदर्शवादी लोक शिक्षण की भी प्रचुर सम्भावना है। देवदर्शन के बहाने तीर्थयात्री गाँव-गाँव गली-मुहल्लों में जाकर धार्मिक जीवन की प्रेरणा देते थे। पैदल तीर्थयात्रा का नियम रहने से धर्मात्मा व्यक्ति का नियम रहने से धर्मात्मा व्यक्ति, अपने मार्ग के अनेकों व्यक्तियों तक श्रेष्ठ जीवन के सदुपयोग का मार्गदर्शन करते थे। साधु-ब्राह्मणों के अतिथि-सत्कार एवं दान-दक्षिण के पीछे यही भावना भरी हुई है कि लोकसेवा के लिए स्वेच्छा से समर्पित कार्यकर्त्ताओं को किसी प्रकार की आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े।
व्रत-उपवासों से जहाँ उदर रोगों की कारगर चिकित्सा की पृष्ठभूमि बनती है, वहाँ मनःशुद्धि की प्रेरणा एवं व्यवस्था का भी क्रियान्वयन होता है, साथ ही होती है। प्रत्येक शुभकर्म के साथ अग्निहोत्र जुड़ा रहने के पीछे दूरदर्शी तत्त्ववेत्ताओं की इच्छा यही रही है कि लोगों का यज्ञीय जीवन जीने की प्रेरणा मिले। यज्ञीय प्रेरणाओं से जन-जीवन में त्याग-परमार्थ की पुनीत सत्प्रवृत्तियों का अधिकाधिक समावेश होता रहे। पर्वों एवं जयन्तियों की विशेषता भारतीय संस्कृति की ऐसी विशेषता है, जिसके सहारे सत्परम्पराओं को अपनाए रहने और प्रेरणाओं के हृदयंगम किए रहने के लिए पूरे समाज को प्रकाश मिलता है।
भारतीय संस्कृति की परम्पराओं में न केवल मनुष्यों बल्कि वृक्ष-वनस्पतियों एवं पशु-पक्षियों के प्रति आत्मभाव बरतने की महानता है। यहाँ आने वाले पाश्चात्य पर्यटक इस बात पर भारी अचम्भा करते हैं कि इस बात पर भारी अचम्भा करते हैं कि इस देश में पक्षी अचम्भा करते हैं कि इस देश में पक्षी इतनी बहुलता के साथ जीवित है और वह इतनी निर्भीकता के साथ जीवित है और वह इतनी निर्भीकता के साथ विचरण करते हैं। पश्चिमी देशों में ऐसा नहीं होता। वहाँ ढेरों किशोर, तरुण छोटी बन्दूकें लिए दिन भर पक्षियों के शिकार के लिए दिन भर पक्षियों के शिकार के लिए लुक-छिप कर घात लगाए रहते हैं। लुक-छिप कर घात लगाए रहते हैं फलतः वहाँ उनका एक प्रकार से वंशनाश होता चला जा रहा है।
उन देशों में जहाँ जक हुआ है पक्षी संरक्षण क्षेत्र बनाए जा रहे है। और वहाँ शिकार खेलने का निषेध किया है। भारत में पक्षियों का स्वर्ग देखकर इस सहअस्तित्व पर सभ्यताभिमानी लोग आश्चर्य करते हैं और जब देखते हैं कि यहाँ पक्षियों को दाना डालने जैसी पुण्य-परम्पराएँ है, तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहती है। यही नहीं यहाँ तो कतिपय पक्षियों के दर्शन तक को शुभ और कल्याणकारक माना जाता है।
सच तो यह है कि सभ्यता एक बात है-संस्कृति दूसरी। सभ्यता दूसरी । सभ्यता क्षेत्रीय होती है उस पर स्थानीय परिस्थितियों का ओर समय के उतार-चढ़ावों का प्रभाव रहता है, किन्तु संस्कृति आत्मा की मौलिक विशेषता होने के कारण सनातन और शाश्वत है। समय के साथ वह घटती बढ़ती अवय है, पर उसके मौलिक सिद्धांतों में कोई अन्तर नहीं आता। मानवता के साथ कुछ आदर्श अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए है। वह देश-काल-पात्र से प्रभावित नहीं होते। समर्थन या विरोध की परवाह न करते हुए वह अपने स्थान पर चट्टान की तरह अडिग बन रहते हैं। बहुमत या अल्पमत से भी उन्हें कुछ लेना-देना नहीं पड़ता। देव-संस्कृति ऐसी ही आदर्श शृंखला है, जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता। यहाँ तक कि व्यवहार में उन सिद्धांतों के प्रतिकूल चलने वाला भी खुले रूप में उसका विरोध कर सकता।
उदाहरण के लिए, चोर भी अपने यहाँ किसी दूसरे चोर को नौकर नहीं रखना चाहता। व्यभिचारी अपनी कन्या का विवाह व्यभिचारी अपनी कन्या का विवाह व्यभिचारी के साथ नहीं करता और न अपनी पत्नी को किसी ऐसे व्यक्ति के साथ घनिष्ठता बढ़ाने देता है। यही नहीं अपने सम्बन्ध में परिचय देते हुए हर व्यक्ति अपने को नीतिवान के रूप में ही प्रकट करता है। इन तथ्य पर विचार करने से प्रकट होता है कि मनुष्य की अन्तरात्मा एक ऐसी दिव्य परंपराओं के साथ गुँथी हुई है, जिसे झुठलाना किसी के लिए, यहाँ तक कि पूर्ण कुसंस्कारी के लिए भी सम्भव नहीं हो सकता। वह अपने दुराचरण के बारे में अनेक विवशताएं बताकर अपने को निर्दोष सिद्ध करने का प्रयत्न तो कर सकता है, पर अनीति को नीति कहने का साहस नहीं कर सकता। यही सत्य देव-संस्कृति की गरिमामय आत्मा को और अधिक प्रदीप्त करता है।
आज की भोगवादी प्रवृत्तियों एवं परिस्थितियों में इसके प्रकाश को ग्रहण भले लग गया हो, पर अगले ही दिनों भौतिकवादी उच्छृंखल भोगवाद की टक्कर में आदर्शवादी तत्वज्ञान की सेनाएँ देव-संस्कृति की आधारभूत मान्यताओं के सहारे खड़ी होगी अगले ही दिनों एक प्रचण्ड तूफान ऐसा आन्दोलन के रूप में खड़ा होगा, जिसे पुराने धार्मिक या आध्यात्म के नाम से न सही, पुराने धार्मिक के अन्य किसी नाम से पुकारा जाए, किन्तु आवश्यकता उसी प्रयोजन को पूरा करने की करेगा। इसी आंदोलन का बीजारोपण आने वाली कार्तिक पूर्णिमा यानि कि 14 नवम्बर के संस्कृति के अनिवार्य सत्यों की स्थापना, विश्व-संस्कृति या मानव संस्कृति के किसी नाम से ही, पर होगी अवश्य और इसी से प्रस्तुत विषाक्तता का निराकरण हो सकेगा। इस बिखरे हुए निराकरण हो सकेगा। इस बिखरे हुए कालकूट को समेटकर अपने गले में भर लेने वाला शिव अभियान इसी संस्कृति संवर्ग से अपना जन्म लेगा।
अन्धकार कहीं से भी क्यों न फैलाया गया हो, प्रकाश की किरणें सदा पूर्व दिशा से ही उदय हुई हैं। भारत एक देश नहीं मानवी संस्कृति का सेतु है। जिससे टकराकर प्रत्येक तूफान को पीछे लौटना पड़ता है। अगले दिनों मानवी गरिमा को विनाश के गर्त में उबारने के लिए देव-संस्कृति का सेतु है। जिससे टकराकर प्रत्येक तूफान की पीछे लौटना पड़ा है। अगले दिनों मानवी गरिमा को विनाश के गर्त में उबारने के लिए देव-संस्कृति की गरिमा ही अपनी महती ओर देशकाल की समस्त सीमाओं को लांघती हुई विश्वव्यापी तपोवन को शान्त करने वाली अमृतवर्षा सम्पन्न करेगी।
यह सपना नहीं सत्य है कि अगले दिनों भारतीय संस्कृति की खोई हुई आभा पुनः अपने प्रचण्ड प्रकाश के साथ विश्व-गगन पर प्रकट होगी। इस पृथ्वी पर ऋषियों ओर देवताओं द्वारा प्रेरित-प्रवर्तित संस्कृति वाला नया युग पुनः अवतरित होगा। भारतीय संस्कृति के तत्वज्ञान का युगांतरीय आविष्कार पुनः होगा। यही आशा लगाए मानवता आज भी सजल नेत्रों से प्रतीक्षा कर रही है। आज भले ही यह विश्वास कर रही है। आज भले ही यह विश्वास न होता हो प्राप्त हो सकेगा। परन्तु महाकाल के स्वर स्पष्ट रूप से यह आश्वासन देते प्रतीत होते हैं कि नव-जागरण के प्रभाव होने में अब देर नहीं। वर्तमान अन्धकार के पैर अब ज्यादा समय तक जमे न रहेंगे। देव-संस्कृति की गौरव-गरिमा के ज्योतिर्मय आलोक से संसार का लाभान्वित होने का अवसर अब आ गया है।
‘जेल भरो’ आन्दोलन के दिनों में स्वयंसेवकों की कमी न पड़ने दी जाए इसलिए उस समय के देशभक्त पूँजीपति वर्ग ने एक कोष स्थापित किया था, जिससे जेल जाने वालों को जेल में रहने तक परिवार के लिए भरण-पोषण दिया जाता था भारत के प्रथम सूचना प्रसारण मंत्री श्री बालकृष्ण केसकर आगरा क्षेत्र के कोषाध्यक्ष थे। परमपूज्य गुरुदेव तब स्वयंसेवक के रूप में उनके सहायक बने थे। उसी की स्मृति स्वरूप श्री केसकर जी एक बार गायत्री तपोभूमि मथुरा आए और परमपूज्य गुरुदेव की गतिविधियों की बहुत सराहना कीं।
श्री केसकर जी ने परमपूज्य गुरुदेव से अपने कार्यक्रमों में- (1) चित्र प्रदर्शनी (2) संगीत (3) नाटक मंडली (अभिनय) जोड़ने का आग्रह किया। परमपूज्य गुरुदेव बताते थे-तब तो उन्हें यह सुझाव हास्यास्पद सा लगा, पर पीछे वे जितना अधिक चिन्तन की गहराई में उतरने गये, उन्होंने अनुभव किया कि व्यक्ति और समाज से इन कलाओं का कितना गहरा सम्बन्ध है? इन्हीं कलाओं के समन्वय को आज के समय में ‘इलेक्ट्रानिक मीडिया’ कहा जाता है और इस वैज्ञानिक युग में उसका कितना द्रुत तथा आकर्षक विकास हुआ है, यह किसी से छिपा नहीं है।
मनुष्य समाज के वर्तमान पतन के कारणों में सबसे बड़ा हाथ इस आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का है। संस्कृत साहित्य में संगीत की महत्ता का उल्लेख है और जहाँ भी संगीत और उससे जुड़ी लोक कलाएं प्रदर्शित हों, उन्हें लोकरंजन भर का साधन न बनाकर अनिवार्य रूप से लोकमंगल का तथा जोड़ने का अनुशासन स्थापित किया गया है। आज के सिनेमा और कला संसार ने इस अनुशासन को बुरी तरह से छिन्न-भिन्न कर दिया है। कला क्षेत्र की इस प्रतिगामिता ने व्यक्तिगत चिन्तन और आचरण, पारिवारिक मर्यादाओं और सामाजिक परम्पराओं मर्यादाओं और सामाजिक परम्पराओं को सिक हद तक उच्छृंखल ओर क्रूर बना दिया है, उसकी घटनाएँ आए दिन समाचार पत्रों में छपती रहती हैं।
लंदन में एक महिला 5 वर्षीय बालक को लेकर खरीददारी के लिए बाजार गई। दुकान में प्रविष्ट होते ही मां का ध्यान बच्चे की सुरक्षा से हटकर खरीददारी में चला गया। जब उसने अपना काम पूरा कर लिया तो पाया बच्चा वहाँ नहीं है। चारों ओर भागदौड़ हुई तो समीप की गली में ही जख्मी हालत में बच्चा पड़ा हुआ मिला। उसे मारने वाला 9 वर्षीय बालक वहीं खड़ा था। पुलिस ने उससे पूछताछ की तो उसने बताया उसने टी.वी. की एक फिल्म में ऐसा दृश्य देखा था, उसी से उसे प्रेरणा मिली। जब तक महिला का ध्यान बँटता, बच्चा शायद खेलने की उत्कंठा से इस बच्चे के साथ आ गया और यह दुर्घटना घट गई।
कुछ महीने पूर्व दिल्ली में एक आठ वर्ष के बालक ने 6 वर्षीया बालिका के साथ दुराचार किया। पूछने पर उसने भी फिल्म देखकर यह प्रेरणा मिलने की बात स्वीकार कीं। लड़कियों को आवारा लड़कों के साथ भागने, जीवन गँवाने, परिवारों में वीभत्स घटनाएँ की बात तो अब आम हो गई है। बिनोवा के शब्दों में - “फ्री और कम्पलसरी एजुकेशन के रूप में नई पीढ़ी में यह बीमारी बुरी तरह फैलती जा रही है। कला क्षेत्र के इस विष का यदि समय रहते उपचार न हुआ, व्यक्तिगत आदर्श और सामाजिक मर्यादाएँ विलुप्त जीवों की श्रेणी में आ जावें तो इसे आश्चर्य न माना जाए।”
परमपूज्य गुरुदेव ने इस तथ्य को मथुरा से ही ताड़ लिया था, इसलिए उन्होंने श्री केसकर जी के सुझाव को प्रारम्भ में संगीत के माध्यम से अपने कार्यक्रमों में जोड़ा। यह बताने वाली बात नहीं है। कि स्वस्थ विचार, रचनात्मक प्रेरणाएँ, आदर्श भावों की गहराई में उतारने वाले गीत वे न केवल स्वयं लिखते, प्रोत्साहित करने के लिए अपने प्रियजनों के नाम से छपाते अपितु अपने समय के परिचित गीतकारों से वे सुन्दर गीत लिखाते और अपनी पत्र- पत्रिकाओं में उन्हें नियमित प्रकाशित भी करते थे। सर्वश्री नाथ व्रजबाल, रामस्वरूप खर, खरे, शिवशंकर मिश्र, विद्यावती मिश्र, झलकरन लाल छैल, रजेश जी, राम कुमार भारतीय आदि गीतकार प्रमुख हुआ करते थे। पीछे तो उन्होंने मिशन के ही समर्पित गीतकार मायावर्मा, मंगलविजय, बलरामसिंह परिहार, शचीन्द्र भटनागर आदि विकसित किए। यही नहीं माया वर्मा को प्ररिक कर भागीरथ, शिवशंकर आदि संगीत नाटिकाएं लिखवाई वे इनका मंचन भी कराना चाहते थे, पर वैसा सुयोग बन नहीं पाया।
मदर इंडिया, दोस्ती, गान्धी मेकिंग ऑफ महात्मा, नानक नाम जहाज जैसी फिल्मों ने न केवल भारी सफलता अर्जित की, अपितु मनोरंजन के साथ-साथ स्वस्थ सामाजिक परम्पराओं की स्थापना में बहुत उपयोगी माना गया। रामायण, महाभारत, चाणक्य तथा तेरह पन्ने जैसे धारावाहिकों ने भी न केवल जनमानस को आकर्षित और प्रभावित किया वरन् लोगों को भरपूर स्वस्थ मनोरंजन भी प्रदान किया इन तथ्यों से परिचित परमपूज्य गुरुदेव ने 1971 में विधिवत एक पुस्तिका प्रकाशित की और श्री-सम्पत्रों से साफ सुथरी युग-निर्माण फिल्में बनाने का आग्रह किया।
इसका प्रभाव भी पड़ा, न केवल अपने व्यवसायी पूज्य गुरुदेव से मिले अपितु फिल्मों के विज्ञापन का काम करने वाली संस्था मीरा आर्ट्स के डाइरेक्टर श्री बाबूभाई सथवारा ने पूज्य गुरुदेव के पास आकर फिल्म स्क्रिप्ट देने का आग्रह भी किया परमपूज्य गुरुदेव ने तब एक स्क्रिप्ट बनाई थी जिसकी कहानी एक ऐसे आदर्शवादी पति-पत्नी अथवा भाई-बहिन से प्रारम्भ होती थी, जिसके मन में समाज के वर्तमान पतन के प्रति बड़ी पीड़ा था। वे प्रव्रज्या में निकले-एक गाँव में एक लड़की का शव लोग श्मशान की ओर ले जा रहे थे। उन्हें पता चला कि यह दहेज हत्या है। (पूरी घटना का प्रदर्शन) वे इसके विरुद्ध नवयुवकों को आदर्श विवाहों द्वारा इस कुप्रथा को रोकने की प्रतिज्ञाएँ कराते हैं। उस गाँव में यह परम्परा चल पड़ती है जो वे अगले गाँव में जाकर अशिक्षा, उससे आगे अन्ध-विश्वास, बेरोजगारी आदि दूर करते चले जाते हैं। इस कहानी पर आधारित गीत भी पूज्य गुरुदेव ने तैयार कराये थे, पर श्री सथवारा के साथ के व्यक्तियों को ऐसा लगा कि इसमें प्रेम का कहीं स्थान न होने से शायद फिल्म न चलें, अतएव फाठनेर्न्स ने हिम्मत नहीं की। यह अलग बात है कि इस कहानी का आधार लेकर उनकी ही मण्डली के एक मित्र ने इसी तरह की पारिवारिक फिल्म बनाई जो बहुत सफल हुई, पर तब पूज्य गुरुदेव के पास जो भी आए उन्होंने आजकल की तरह अभिव्यक्त प्यार के अभाव को व्यावसायिक बाधा माना और किसी ने इस क्षेत्र में प्रवेश का साहस नहीं किया।
परमपूज्य गुरुदेव इससे रत्ती भर हतोत्साहित नहीं हुए । शान्तिकुँज में अन्य प्रकोष्ठों की तरह उन्होंने विधिवत ‘ई एम.डी.’ प्रकोष्ठ की स्थापना की, योग्य इंजीनियर्स रखे ओर भले ही छोटा प्रयास हो किंतु आडियो संगीत से जुड़ी नृत्य-नाटिकाओं की वीडियोग्राफी से यह कार्य प्रारम्भ कर दिया। प्रारम्भ में उन्होंने कलकत्ते से एच.एम.वी. पर 14 गीतों के सात रिकार्ड वीणापणि के स्वर में तैयार कराये, जिसकी एक हजार प्रतियाँ हाथों-हाथ बिक गई। यद्यपि उनमें आज के व्यावसायिक स्वर, कलाकारों जैसा सौंदर्य और आर्केस्ट्रा नहीं था तो भी इनकी सर्वत्र चर्चा हुई और बहुत सराहा गया।
ऑडियोग्राफी और वर्तमान टेप रिकार्डर टेक्नोलॉजी के विकास को परमपूज्य गुरुदेव ने सबसे पहले हाथ में लेकर अपने ही गीतकारों, गायकों ओर शान्तिकुँज के ही आर्केस्ट्रा से गीतों के कैसेट्स बनवाए, वह कितने लोकप्रिय हुए, इसका अनुमान उनके तीव्र विस्तार से लगाया जा सकता है। प्रारंभ में प्रायः सत्रह प्रकार के ऑडियो कैसेट्स बनाए गए, दो भाग वंदना प्रधान गीतों के, चार मानवीय आदर्शों पर आधारित गीतों के, व्यक्ति, परिवार, नारी समाज और राष्ट्रीय उत्कर्ष की भावनाएँ भरने वाले गीतों के पाँच कैसेट्स, गायत्री महिमा ओर श्रद्धांजलि गीतमाला के क्रमशः तीन ओर चार भाग, दस भाग-वंदनीया माताजी के गाये गीतों के, शेष ग्यारह प्रकार आरती, प्रार्थना, ध्यानमंत्र व संगीत धुनें तथा प्रवचनों रिकार्ड कराकर ले जाते रहे हैं। इनकी लोकप्रियता का अनुमान इनके विस्तार से लगाया जा सकता है, जिसके आँकड़े नीचे दिए जा रहे हैं-
यह आंकड़े मात्र पिछले सात वर्षों के हैं। 1991 में अधिकाँश कैसेट्स गीतों के थे। 15000 रिकार्डिंग की गईं। अगले दो वर्ष में यह संख्या बढ़कर 55000 हो गई। 1993 में 87000 तथा 1994 में 76800 की संख्या में गीत व अन्य कैसेटों की रिकार्डिंग की गई। 1995 में आँवलखेड़ा में प्रथम पूर्णाहुति थी। उस वर्ष रिकार्ड 1,11000 कैसेट्स की रिकार्डिंग में परिवर्तन किया गया। उससे निर्माण में कुछ विलम्ब हुआ, पर उसके बाद इसमें तत्काल तीव्रता आई अर्थात् 1997 वर्ष में में जनवरी से जुलाई तक से सत समीनों में ही 661514 कैसेट्स की रिकार्डिंग हो चुकी हैं इनके और अधिक विस्तार में यदि कोई दिक्कत हो सकती है जो वह पर्याप्त पूँजी की रही है। इसलिए उनका इतना उत्पादन नहीं किया जा सका कि इन्हें क्षेत्रों में सम्पन्न होने वाले कार्यक्रमों में भी पर्याप्त मात्रा में भेजा जाना सम्भव होता। पूँजी ब्लाक होने के भय से क्षेत्रीय केन्द्रों को उधार न दे पाने की विवशता भी इसमें सम्मिलित है।
क्षेत्रों में सम्पन्न 24 अश्वमेध यज्ञों में सु गुना, जयपुर बड़ौदा, बुलंदशहर, आँवलखेड़ा में फिल्मायी गयी डॉक्यूमेण्ट्री वीडियोग्राफी सहित सात वीडियो कैसेट्स (60 मिनट), 4 विधियों कैसेट्स (120 मिनट) तथा श्रद्धांजलि समारोह का एक तीन घंटे का सम्मिलित है। इनमें छोटे-छोटे ड्रामा, नृत्य-नाटिकाएं, प्रवचन आदि सभी है। 1991 से लेकर 1996 तक यह क्रमशः 2000,1550,1270ए1000ए 2700तथा 2072 संख्या में रिकार्ड किए गए। इस वर्ष ई. एम.डी. की सारी उटिंग में निर्माण, फिल्माँकन ओर एडीटिंग में लगी होने के करण यद्यपि उपलब्धता नहीं हो पाई, तो भी जो बचे थे वह 421 वीडियो कैसेट्स भी रिकार्ड हुए। यह जहाँ भी सुने और देखे जाते हैं वहां 0161 एक नये सतयुगी वातावरण का विकास होता है। मिलने वाली प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट पता चलता है रोग की तुलना में उपचार हेतु दी गई गोली बहुत छोटी होती है, पर उससे रोग दूर होने का सिद्धांत आकटच है । यही उपचार युगनिर्माण मिशन के द्वारा सम्पन्न हो रहा है। अब पिछले दिनों इस विभाग द्वारा मल्टीमीडिया प्रोजेक्टर से दिखाई जाने वाली 5-5 मिनट की देव संस्कृत के विभिन्न पक्षों पर फिल्में बनायी गई हैं, जिन्हें बहुत बड़े स्क्रीन पर देखा जा सकता है।
बीमारी का असली उपचार फिल्में है। उस ओर कदम उठाने से पूर्व फिल्में हैं। उस ओर कदम उठाने से पूर्व पहले धारावाहिकों पर ध्यान दिया गया। धारावाहिकों पर ध्यान दिया गया। धारावाहिक ‘मंथन’ के 5 एपिसोड्स बने। राजतंत्र में फैले भ्रष्टाचार के कारण समाज सुधार का यह नन्हा फरिश्ता युगनिर्माण मिशन, अब तक उसे विभागीय स्वीकृति प्राप्त कराने में सफल नहीं हो पाया था, पर अब वह उस भवन में प्रवेश कर गया है और इस सीरियल की कड़ियाँ जल्दी ही दिखाई जाने की सम्भावना है। इसके निर्माण में जयपुर के भाई वीरेन्द्र अग्रवाल परिवार की सबसे बड़ी भूमिका है। पिछले दिनों जी.टी.वी पर केन्द्रीय प्रतिनिधि के रिकार्डेड प्रवचन तीन बार ‘जागरण के अंतर्गत लिए गए, जिन्हें देश-विदेश में दूर-दूर तक देखा गया।
एक कठिनाई अभी प्रोफेशनल अनुभव की कमी आ रही है। यदि यह कार्य वर्तमान फिल्म इन्डस्ट्री को दिया जाता है, जो आर्थिक रूप से पिट जाने की तो आशंका रहेगी ही, सबसे बड़ा डर इस बात का है कि कहीं अपने मिशनरी आदर्शों, सिद्धांतों की खिचड़ी न बन जाए। इसलिए अपने ही मिशन के स्क्रिप्ट लिखने वालों, गीतकारों, संगीतज्ञों ओर अभिनय में प्रवीण उन लोगों को भी आमंत्रित किया जा रहा है जो विशुद्ध सेवाभावना से अपना योगदान दे सकें। शूटिंग, एडीटिंग, डबिंग आदि सभी उच्च तकनीक की प्रयोगशाला शान्तिकुँज में ही विकसित की गई है। अब केवल इस क्षेत्र के निष्णात सहयोगियों के आने भर की देर है। युग-निर्माण मिशन इस लड़ाई में कूदने के लिए पूरी तरह तैयार है।
दिनाँक 13 से 15 नवंबर तक का संस्कृति वर्ग का समारोह इस क्षेत्र की प्रतिभाओं की परीक्षा, परामर्श ओर प्रयोग के लिए है। उन सभी को सादर आमंत्रित किया जा रहा है, जो मनोरंजन के इस क्षेत्र में प्रवेश कर चुके त्रिपुरासुर को मारने में देवसेना के सैनिक सहायक बन सकें। एक बार मैदान में कूदने भर में मिली। विजय की भाँति इस मोर्चे की फतह भी सुनिश्चित समझी जानी चाहिए।
‘नारी का सम्मान जहाँ है, संस्कृति का उत्थान वहाँ है’ के गगनभेदी उद्घोष के साथ आगामी कार्तिक पूर्णिमा को परमपूज्य गुरुदेव की तपस्थली शान्तिकुँज में संस्कृति संवर्ग समारोह आयोजित किया जाएगा। भारत की नारी भारतीय संस्कृति स्पष्ट उद्घोष करती है,”यत्र नार्यस्तु पूज्धन्ते रमानों तत्र देवताः । देवी और जननी के रूप में परिभाषित एवं प्रतिष्ठित नारी सृजन शक्ति का पर्याप्त है। तभी तो उसे ‘माँ’ की संबा मिली है। इसीलिए तो धरती को माता कहा गया। गंगा और गाय भी इसी पावन श्रेणी में गिनी जाती है। नारी का सर्वश्रेष्चमग बवउचनजमत अलंकार है-संवेदना, शील व चरित्र। परन्तु पाश्चात्य सभ्यता ने भारत एवं भारतीय पर, यहाँ की संस्कृति पर प्रहार करने शुरू किए। नारी के लज्जावन तार-तार होने लगे है। उसकी संवेदनशीलता का लाभ उठाकर यहाँ संस्कृति के मर्म बिन्दुओं पर निर्मम प्रहार किए जा रहे हैं।
इसी के परिणामस्वरूप अश्लीलता, कुत्सित मॉडलिंग एवं हेय अश्लीलता, कुत्सित मॉडलिंग एवं हेय विज्ञापनों की बाढ़-सी आई है। सर्वत्र असंस्कृति का नग्न स्वरूप नर्तन करता नजर आता है। ऐसे में-साँस्कृतिक जागरण तभी सम्भव है जबकि नारी जागरण हो। नारी की दुर्दशा के रहते संस्कृति हो। नारी की दुर्दशा के रहते संस्कृति की दुर्दशा नहीं रोकी जा सकती अश्लीलता नारी के स्थापित पक्ष का प्रदर्शन या उससे जुड़ी कुत्सित अभिव्यक्तियों तक सीमित नहीं है। यह तो हमारे चिंतन व व्यवहार के कई स्तरों पर समायी हुई विकृति के कई स्तरों पर समायी हुई विकृति का नाम है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 213-14 के अनुसार किसी भी ऐसी प्रकाशित सामग्री का अश्लील माना जाता है, जो पढ़ने, देखने या सुनने वाले के लिए कामुक, कामोत्तेजक या उसके चरित्र को भ्रष्ट करने वाली हैं यही कानून इंग्लैण्ड में 1727 में लागू हुआ है। यही कानून इंग्लैण्ड में 1727 में लागू हुआ था। न्यायाधीश कोल बोर्न के अनुसार, अश्लीलता की कसौटी यह है कि क्या अश्लील करार दी गयी सामग्री की प्रवृत्ति ऐसे लोगों को भ्रष्ट करने की है, जिनके हाथ वह सामग्री पड़ सकती है ओर जिनके दिमाग उसके अनैतिक प्रभाव का ग्रहण करने के लिए खुले हैं।
विकृत मानसिक कुण्ठाओं का विस्फोट भयावह होता है । यह विस्फोट देश में 90 के दशक से प्रारम्भ हुआ था जब वीडियो का आगमन तथा प्रचलन हुआ। इस दौरान अश्लील फिल्मों का प्रदर्शन प्रारम्भ हुआ। इसके पश्चात् 90 के दशक में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में क्रान्ति की शुरुआत हुई। आर्थिक उदारीकरण के तरह बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने तो इसमें बाढ़ ला दी। उन्हें भारत एक मण्डी के रूप में नजर आया। जहाँ किसी भी तरह का प्रोडक्ट्स प्रचार के माध्यम से बेचा जा सकता है नोम चोमस्की अनुसार, देह सभी शास्त्रों से जतीलवनन्त है, क्योंकि यह गणितीय तथ्यों की बाड़ तोड़कर मनोविज्ञान तक पहुँच जाता है इसीलिए पूँजी के बाजार में इसे पूँजी के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है।
समाज के दृष्टिकोण एवं उसकी नैतिकताओं के बदलने के साथ ही अश्लीलता को खुले मापदण्ड पर स्वीकार करने की मजबूरी-सी बन गयी है। सामाजिक, दृष्टिकोण, धार्मिकता, संस्कृति या नीति-मर्यादाओं को तोड़ मरोड़ कर पेश करने के कारण यह जहर उभर कर समाने आया है। इसकी शुरुआत सिनेमा जगत से प्रारंभ हुई। उथली मानसिकता के लोगों ने इसे पसन्द किया और प्रसार करने में बेशर्मी का परिचय दिया। यह वर्ग अभिजात्य वर्ग से सम्बन्धित था। अन्धानुकरण की परम्परा ने उसे सभ्यता और प्रतिष्ठा का मापदंड माना। फलस्वरूप इसे स्वीकारने के साथ ही सारी सीमाएँ ओर मर्यादाएँ टूटकर बिखरने लगीं, जिसका लाभ उठाया-विभिन्न लगीं, जिसका लाभ उठाया-विभिन्न टी.वी. जिसका लाभ उठाया-विभिन्न टी.वी. चैनलों, विज्ञापन एजेन्सियों एवं पत्र-पत्रिकाओं ने। आज तो अश्लीलता फैशन बन गयी है- मॉडलिंग, सौंदर्य प्रतियोगिताएँ सभ्यता की नयी दौड़ मानी जा रही है।
अश्लीलता जब साहित्य के रूप में वैचारिक-स्वरूप धारण कर लेती है। आजकल डेबोनियर, फेबुलस, न्यूजप्लस, इटर्निका जैसी अश्लील पत्रिकाएँ धड़ल्ले से बिकने लगी है। मॉडलों की तादाद बढ़ती जा रही है। कलात्मकता के नाम पर अश्लील चित्र छापे जाने लगे हैं। बुद्धिजीवियों की दिशाहीन मानसिकता इसे और भी विकृत करने की चेष्टा कर रही है। नारी को उपभोग की वस्तु बना दिया गया है। अश्लीलता अर्थोपार्जन का जरिया बनकर व्यवसाय में तब्दील हो चुकी है। इसे नये नये से परोसने में लोग पारंगत हो चुके हैं। निरंकुश सोच पाशविकता को प्रेरित कर रही है। रंग और आकृतियाँ मनोवैज्ञानिक पक्ष को सशक्त करते हैं, अतः इनका अश्लीलता के नग्न नकाब में सारा शील-संकोच मर्यादाएँ और सतर्कताएँ धरी की धरी रह जाती है।
भारतीय संस्कृति में धर्म और अर्थ के पश्चात् काम का स्थान आता है। इसकी दिव्य एवं स्तुत्य ढंग से स्तुति की जाती है। इसकी अपनी निश्चित सीमाएँ और मर्यादाएँ है। यह प्रदर्शन की वस्तु नहीं हैं दिव्य कलाओं में इसकी गणना की जाती है न कि छिछले और उथलेपन के रूप में। परन्तु अपसंस्कृति के प्रभाव से हम अपनी साँस्कृतिक विशिष्टता को भुलाते जा रहे हैं। इसकी देह को प्रदर्शन के विष में घोलकर कलुषित कर दिया गया है। सौंदर्य का मापदण्ड, आचरण, विचारणा, भावना से नहीं किया जा रहा है, बल्कि देह की कुत्सित चेष्टाएँ ही सौंदर्य की कसौटी बनी हुई है।
मॉडलिंग इसी की एक अभिव्यक्ति है। जिस देश के न्यायविद् के यह मेज मुखर शब्द हों कि “हमारा समाज नैतिकताओं के पाश्चात्य मानदण्डों को स्वीकार कर रहा है। इसी के प्रभाव से भारतीय लड़कियाँ मॉडलिंग के पश्चिमी मानदण्डों के साथ कदम मिलाना हमारे नैतिक पतन की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है? विकास एक लम्बी ऐतिहासिक व सामाजिक प्रक्रिया है। इसके लिए समय लगता है जिसके हमने प्रगति एवं विकास की संबा दी है। वह सर्वनाशी अपसंस्कृति का ज्वलन्त प्रमाण है। चूँकि यह आज अर्थोपार्जन का बहुत बड़ा साधन बन गया है, इसलिए लोग इसे बेझिझक स्वीकारते हैं। मॉडलिंग एवं विज्ञापन की इस दुनिया में सकल उत्पाद की छह प्रतिशत आय है।
भारत में सन् 1985 से 89 के बीच प्रतिवर्ष 30 से 50 प्रतिशत तक उपभोक्ता वस्तुओं की खपत दर बढ़ी है। ‘नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकॉनामिक रिसर्च ‘ के अनुसार इन वर्षों में विज्ञापन उद्योग भी 20 से 45 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ा है। एक अन्य सर्वेक्षण के अनुसार 1994-95 में देश की दस शीर्ष विज्ञापन एजेन्सियों विज्ञापन उद्योग की आय थी। इसमें भी 4400 करोड़ रुपये में शुद्ध रूप से विज्ञापन मॉडलिंग से हुई आय थी। यह मॉडलिंग और कुछ नहीं, बढ़ती अश्लीलता का प्रतिमान थी। आज यह व्यापार विश्व का सबसे अधिक कमाई वाला साधन बन चुका है।
आजकल एक मॉडल या विश्व सुन्दरी इतना आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकती हैं कि वह नेपाल जैसे छोटे देशों की कुल वार्षिक आय से भी ज्यादा ठहरेगा। वस्तुतः सौंदर्य को आर्थिक ताकत से जोड़कर उपभोक्तावाद पर आधारित पूँजीवाद टिका रहा है। सौंदर्य प्रतियोगिताओं को धन और ग्लैमर से मढ़कर पूँजीवाद टि रहा हैं सौंदर्य मढ़कर पूँजीवाद ने उन्हें सम्मानजनक बनाने की कोशिश की है ओर सुल् भी हुआ है। इसी आर्थिक और भौतिक आकर्षण के जाल में फँसकर महिलाएँ अपने शील और संकोच को उतार फेंकती हैं। सौंदर्य प्रतियोगिताएँ नारी के सार्वजनिक प्रतियोगिताएँ अपने शील और संकोच को उतार फेंकती है। सौंदर्य प्रतियोगिताएं नारी के सार्वजनिक अपमान की ही पोषक है। ग्लोबलाइजेशन अपमान की ही पोषक है ग्लोबलाइजेशन बढ़ने के साथ ही स्थिति और भी अधिक विस्फोटक हो गयी हैं।
पिछले तीन-चार सालों में इसमें भारी-भरकम बढ़ोत्तरी हुई है। मानों इससे पहले अपने देश में सुन्दरता थी ही नहीं इसके प्रचार-प्रसार से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है तो माध्यम वर्ग। पहले कभी मध्यमवर्गीय परिवारों में प्रतिष्ठा, धर्म एवं नैतिकता के नाम पर महिलाओं का शोषण होता रहा है। आज बदले परिवेश में यही शोषण बदले रहा है। सुसान ब्राउन मिलर ने अपनी प्रसिद्ध कृति ’अगेंस्ट अपर बिल’ में वर्तमान परिवेश में स्त्रियों की दशा का उल्लेख किया है। उनके अनुसार अश्लील साहित्य बलात्कार की तरह पुरुषों की खोज है। यह स्त्री को मात्र कामुक परिदृश्य में स्थापित करने के लिए है। शील व चरित्र जाति की सर्वोत्कृष्ट सम्पदा है। इसका प्रदर्शन ही अश्लीलता है। एवं सम्पूर्ण नारी जाति का अपमान है। सुसान इसे नारी विरोधी करती है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के माध्यम से यही कार्य हो रहा है। स्वतन्त्रता के नाम पर स्वच्छन्दता और मुक्ति के बदले शोषण का यह अन्तहीन सिलसिला नारी जाति के लिए एक अभिशाप है।
मीडिया, विज्ञापनों, सीरियलों, फिल्मों के भीतर नारी को मनमाने ढंग से नचाने वाले यह भूल जाते हैं। कि भारत की शोषित, दमित स्त्री की मुक्ति का लक्ष्य बाजार में साबुन, तेल व कॉस्मेटिक सामग्री बेचने वाली स्त्री नहीं हो सकती है अन्यथा मॉडल विज्ञापन के प्रदर्शन के अलावा नारी को और किन्हीं अन्य क्षेत्रों में क्यों इतना महत्व नहीं दिया जाता। एक आँकड़े से यह बात और भी साफ हो जाती है। मॉडल तथा विज्ञापनों में 90 से 10 प्रतिशत महिलाओं को चुना जाता है, जबकि दूरदर्शन के निदेशालय समेत सात निर्माण केन्द्रों में दूरदर्शन समेत सात निर्माण केन्द्रों में दूरदर्शन के कुल कर्मियों में 3783 पुरुषों के मुकाबले सिर्फ 378 महिलाकर्मी थी। और भी कई ऐसे आंकड़े में है जो इस बात का खुलासा करते हैं।
सौंदर्य विचारों में होता है, भावनाओं में होता है दैहिक सौंदर्य से वैचारिक एवं भावनात्मक सौंदर्य का मूल्य कहीं बढ़कर है। सबसे महत्वपूर्ण एवं मूल्यवान सौंदर्य महत्वपूर्ण एवं मूल्यवान सौंदर्य तो आध्यात्मिक सौंदर्य की प्रतीक थीं-सीता, सावित्री , गार्गी, मैत्रेयी आदि अनेक भारतीय महिलाएँ। वास्तव में यही नारी का आदर्श है, परन्तु प्रतिमान के बदलते ही नैतिकता का महत्व भरभरा कर का महत्व भरभरा कर गिर जाता है। आज ब्यूटीफुल का अर्थ है-देह को अधिक से अधिक आवरणहीन कर सकने की बेशर्म हिम्मत। इस प्रतिमान को बदले बगैर न नारी जागरण सम्भव है और न साँस्कृतिक उत्थान।
जिस देश की नारी, संस्कृति को प्रतीक और पर्याय रही हो, आज उसी देश में उसकी देह को अनावृत्त करने के अनेकों प्रपंचपूर्ण प्रयास चल रहे हैं यह सच है कि नारी का आकर्षण नैसर्गिक है, परन्तु इसका मर्यादाहीन प्रदर्शन निःसन्देह मन में विकृत भावों को उद्वेलित, उसके मातृत्व के अमृतत्व तो जीवमात्र और यह मातृत्व तो जीवमात्र के लिए सार्वभौमिक संवेग है।
इस सर्वनाशी और खतरनाक दौर से जूझने के लिए ही शान्तिकुँज में 13, 14 एवं 15 दिसम्बर की तिथियों में संस्कृति-संवर्ग का आयोजन किया गया है। युगनिर्माण मिशन एवं उसके संस्थापकों परमपूज्य गुरुदेव एवं वन्दनीया माताजी ने प्रारम्भ से ही नारी शक्ति के रूप में मान्यता एवं प्रतिष्ठा दी हैं महिला जाग्रति अभियान इस मिशन कस सबसे अग्रणी कार्यक्रम रहा है। विश्व का यही एकमात्र साँस्कृतिक अभियान है, जिसने नारी को राष्ट्र पुरोहित के रूप में पूजित एवं प्रतिष्ठित किया है आज जबकि स्वतन्त्रता की अर्द्धशताब्दी बीत जाने के बावजूद महिलाओं के रूप में राष्ट्र की आधी आबादी पीड़ा और प्रताड़ना से गुजर रही है तो कुछ विशेष ठोस कदम उठाने की जरूरत हैं
इसी के विचार-विमर्श एवं जुझारू नीतियों के निर्माण के लिए उत्साही महिला कार्यकर्त्ताओं एवं कर्मठ परिजनों को उपरोक्त तिथियों में आमंत्रित किया जा रहा है। जिनके हृदय में संवेदनाएँ हुलसती हों, वे भला अपनी साँस्कृतिक गरिमा को भला इस कदर दुर्दशाग्रस्त होते कैसे देख सकते हैं? नई पीढ़ी की कन्याएँ शालीनता, शिष्टता एवं मर्यादाओं के संकल्प लेकर इस अभियान में नया प्राण फूँकने की अपनी उत्साहवर्द्धक भागीदारी दिखा सकती है। छोटे-बड़ जपजसम मज हर किसी के संघबद्ध, समवेत प्रयास नारी-जागरण को संस्कृति जागरण का रूप देने में सहायक ही नहीं सक्षम और समर्थ सिद्ध होंगे, ऐसी आशा की गई है।
दुष्प्रवृत्तियों के चक्रव्यूह में फँसे देश के अभिमन्यु की दशा आज बहुत करुण है। अपने दम-खम से असम्भव को सम्भव बना देने वाले, साहस और उत्साह का पर्याय कहे जाने वाले युवाओं की स्थिति बहुत ही दुःख एवं चिंताजनक हो गयी है। दिशाहीन शिक्षापद्धति द्वारा भ्रमित, आदर्शहीन समाज में मार्गदर्शन के अभाव में युवा पीढ़ी दुष्प्रवृत्तियों के दलदल में धंसती जा रही है। वैचारिक शून्यता और दिशाभ्रम की इस स्थिति में पाश्चात्य अपसंस्कृति के भोगवादी हमले ने उसके भटकाव का शिकंजा और बुरी तरह कस दिया है। इस आत्मघाती चक्रव्यूह में फँसे इन युवाओं की तड़प हर संवेदनशील व्यक्ति अपने सीने में अनुभव कर सकता है।
आज अपने देश के सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अराजकता व गिरावट का माहौल व्याप्त है। देश के प्रायः अभी संस्थान,प्रतिष्ठान, दल, संगठन इसकी आग में झुलस रहे है। लगता है मूल्यों व आदर्शों के प्रति कहीं कोई निष्ठा शेष नहीं बची है। जीवन के प्रायः किसी भी शेष नहीं बची है। जीवन के प्रायः किसी भी क्षेत्र में सकारात्मक ढंग से कुछ हासिल करने की रचनात्मक तड़प नजर नहीं आती। युवाओं की निर्वाणस्थली विश्व विद्यालयों एवं शिक्षा संस्थानों की स्थिति तो और बदतर है। हमारे राष्ट्रीय एवं सामाजिक भविष्य को विनिर्मित करने वाले इन संस्थानों में अराजकता का माहौल संव्याप्त है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय, बिहार के विश्वविद्यालय हों या दिल्ली विश्वविद्यालय अथवा वहीं का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय हों या दिल्ली विश्वविद्यालय हों का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, सभी लगभग एक-सी स्थिति में जा पहुँचे है।
अपने देश में लगभग ढाई सौ विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय-नुमा उच्च शिक्षण की बहुत-सी अन्य शिक्षा संस्थाएँ व विश्वविद्यालय से जुड़े लगभग सात हजार कॉलेज है। इनमें पढ़ाने वालों की संख्या एकाध करोड़ है। इनमें से प्रत्येक वर्ष 40 प्रतिशत छात्र फेल हो जाते हैं, 30 प्रतिशत तीसरे दर्जे में पास होते हैं। फेल होने वाले और कम नंबरों में प्राप्त होने वाले ये छात्र-छात्राएँ प्रायः आत्म-हीनता एवं कुण्ठा का शिकार हो जाते हैं। इनकी यह दशा सामाजिक समस्या का भी रूप ले लेती है। लाखों पास-फेल युवा अपने-अपने पुश्तैनी काम-काज में लग जाते हैं, जिनमें इनकी विश्वविद्यालय शिक्षा की कोई आवश्यकता नहीं होती। बहुत सारे स्नातक शहरों में ऑटोरिक्शा चलाते या फिर किसी दफ्तर में चपरासी हो जाते हैं। बहुतों को तो यह भी नसीब नहीं होता। लाखों युवक युवतियाँ हर साल सिविल सर्विस की परीक्षाओं में अपना भाग्य आजमाते हैं, पर यहाँ भी हर साल कुल सात-आठ सौ ही चुने जाते हैं। अतः स्पष्ट स्पष्टतया उच्चशिक्षा का दृश्य कोई उत्साहवर्द्धक नहीं है।
भविष्य के प्रति असुरक्षा का भाव युवाओं में आक्रोश एवं निराशा का एक बड़ा कारण है। भयावह ढंग से बढ़ से रही बेरोजगारी ने युवक-युवतियों को शिक्षा की उपादेयता के प्रति सशंकित बना दिया है। एक सर्वेक्षण के अनुसार बेरोजगार स्नातकोँ की संख्या 1980-88 के दौरान 23त्न प्रतिवर्ष की दर से बढ़ी है, जबकि 1995-97 के दौरान यह प्रतिशत और बढ़ गया। डिग्रीधारी बेरोजगारों की संख्या सर्वाधिक पश्चिम बंगाल में पायी गयी, जो कुल बेरोजगारों का 27.21 प्रतिशत थी। इसी तरह कुल बेरोजगारों में डिग्रीधारी बेरोजगारों की संख्या बिहार, केरल, कर्नाटक, पंजाब, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र महाराष्ट्र, राजस्थान, नागालैण्ड में क्रमशः 24.85त्न 21.100त्न 18.21त्न 13.7त्न 12.16त्न 1.16त्न 1.23त्न 7.68त्न 6.54त्न व 4.42त्न पाई गई। इसी तरह पिछले सालों में अलग अलग शिक्षा वर्गों में बेरोजगारी के बढ़ने की दर को इसी प्रकार पाया गया । कला 26त्न प्रतिवर्ष बढ़ी। विज्ञान के बेरोजगार स्नातकों का प्रतिशत 12.9त्न से 33 प्रतिशत तक रहा। वाणिज्य, इंजीनियरिंग व मेडिकल में बेरोजगारों की संख्या वृद्धि दर क्रमशः 16.4 से 27.4त्न 4.6 से से 21त्न व 12.2त्न से 37त्न वार्षिक रही। इनमें पोस्ट ग्रेजुएट की स्थिति तो और भी बदतर देखी गयी। पांचवीं एवं छठी योजनाओं के दौरान दस से मात्र पाँच पोस्ट ग्रेजुएट ही रोजगार उपलब्ध कर पाए।
शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी अनेक समस्याओं की जन्मदात्री है। मनो वैज्ञानिकों के अनुसार कुँठित एवं हताश युवा मन का आक्रोश उग्रवाद एवं आतंकवाद को हवा देता है, जो राष्ट्र के लिख खतरा बन जाते हैं। अगस्त-सितम्बर 10 में मण्डल आयोग की स्वीकृति के बाद हुआ राष्ट्रव्यापी उग्र छात्र आन्दोलन युवाओं में बेरोजगारी से जुड़ी गहरी भावनात्मक समस्याओं को समेटे था। पंजाब के रोजगार निदेशालय जुड़ी गहरी भावनात्मक समस्याओं को समेटे था। पंजाब के रोजगार निदेशालय द्वारा गहरी भावनात्मक समस्याओं को समेटे था। पंजाब के रोजगार निदेशालय द्वारा बताए गए आंकड़ों के अनुसार 1984 दिसम्बर तक पंजाब के अमृतसर जिले में 51,360 शिक्षित युवा बेरोजगार थे। इसी तरह अन्य जिलों में बेरोजगार शिक्षित युवाओं की स्थिति व्यापक बेरोजगारी की एक झलक देती है, जो शोधकर्ताओं के अनुसार पंजाब में आतंकवाद के फलने-फूलने का एक अहम् कारण रही। काश्मीर में भी आतंकवाद के फलने-फूलने का एक अहम् कारण रही। काश्मीर में भी गुमराह युवा शक्ति ही सक्रिय है। विश्लेषकों के अनुसार पाकिस्तान में सैन्य प्रशिक्षण के लिए जाने वाले लोगों में अधिकतर 19-24 वर्ष के युवक ही थे।
सन् 1988 में देश के 236 शहरों के 2100 युवाओं पर हुए राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण के अनुसार युवाओं के भटकने, दुष्प्रवृत्तियों में फँसने की ज्यादातर कारण रोजगार के सीमित अवार है। इनमें से 62 प्रतिशत युवाओं का यही मानना था कि प्रतिशत युवाओं का यही माना था कि रोजगार की स्थिति बदतर हो गयी है। सर्वेक्षण में भागीदारी करने वाले ज्यादातर युवक युवतियाँ न केवल अपने भविष्य व आर्थिक असुरक्षा के प्रति निराश थे, बल्कि देश के आर्थिक भविष्य व सामाजिक विकास को लेकर चिंतित थे।
वर्तमान युवा पीढ़ी में कुछ रोजगार कारणों के चलते और कुछ सही दशा के अभाव में नशे के आदी हो रहे है। इन युवाओं में नशे की लत अलग-अलग शहरों में 17 से 25 प्रतिशत तक देखी गयी है। 1986 में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार अलग-अलग शिक्षा वर्ग में इसका प्रतिशत इस तरह था। वाणिज्य में 31 प्रतिशत, कला व समाज विज्ञान में 27.2 प्रतिशत मेडिकल 7.3 प्रतिशत इंजीनियरिंग 6 प्रतिशत व कानून के 4.7 प्रतिशत छात्र किसी न किसी नशे का शिकार थे। बढ़ते सालों में अध्ययनकर्ताओं के अनुसार इस प्रवृत्ति में भी बढ़ोत्तरी हुई है। अध्ययन में यह पाया गया हैं कि इनमें से 10 प्रतिशत युवक प्रारम्भिक प्रयोगात्मक दौर में चल रहें हैं अर्थात् सप्ताह में एक बार या इससे कम नशा लेते थे। 9 प्रतिशत सप्ताह में कई बार नियमित रूप से सेवन कर रहे थे। 1 प्रतिशत नशे के पूरी तरह शिकार हो गए थे जो बिना नशे के रह नहीं सकते हैं। इनमें से 75 प्रतिशत शराब व तम्बाकू के साथ अन्य नशों का भी सेवन करते थे जबकि 6 से 10 प्रतिशत शराब व तम्बाकू के शिकार थे।
मनोवैज्ञानिक के अनुसार आज की हताश-निराश युवा पीढ़ी में परिस्थितियों से जूझने की क्षमता चूकती जा रही ही। आत्महत्या के बढ़ते आँकड़े इस दुःखद स्थिति की गवाही दे रहे है। 1994 में राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो द्वारा तैयार किए गए आँकड़ों के अनुसार देशभर में प्रतिवर्ष 10,000 आत्महत्याएँ होती हैं आठ लाख लोग गम्भीर प्रयास करते हैं। जिसमें 25 प्रतिशत 30 वर्ष से कम आयु के युवक होते हैं। इनमें से भी 17 से 30 वर्ष के आयु वर्ग में 43.7 प्रतिशत होते हैं। गत तीन वर्षा में युवाओं में आत्महत्या की वृत्ति तेजी से बढ़ी हैं प्राप्त विश्लेषण के अनुसार युवतियों की अपेक्षा युवक अधिक आत्महत्याएँ करते हैं आत्महत्याओं के साथ ही बढ़ते अपराध में भी युवाओं का हाथ सबसे अधिक देखा गया है। इस क्रम में 17 से 30 वर्ष आयु वर्ग में सबसे अधिक 49 प्रतिशत अपराधी पकड़े गए। हैं शिक्षा संस्थानों में बढ़ता राजनैतिक हस्तक्षेप भी युवा पीढ़ी को दुर्भावनाओं दुष्प्रवृत्तियों के चक्रव्यूह में उलझाता जा रहा हैं राजनीति के दुष्चक्र में उलझी युवा पीढ़ी अपनी रचनात्मक शक्ति खोती जा रही हैं शिक्षा केन्द्र पूरी तरह से राजनैतिक द्वन्द्व का अखाड़ा बनते जा रहे हैं विश्वविद्यालय की व्यवस्था सम्बन्धी इकाइयाँ भी इससे अछूती नहीं हैं प्रायः कुलपतियों की नियुक्ति के पीछे कोई न कोई राजनैतिक पूर्वाग्रह काम कर रहे होते हैं इसी के साथ विभिन्न विभागों में प्राध्यापकों, विभागाध्यक्षों की नियुक्ति भी इन्हीं राजनैतिक आग्रहवश होती हैं राजनीति के कुचक्रों से घिरे ये द्रोणाचार्य मनचाहे अर्जुनों को पालते हैं और नैष्ठिक एकलव्यों का अँगूठा कटवाते चलते हैं सम्भवतः इसी कारण छात्रों एवं प्राध्यापकों के रिश्ते दिन प्रतिदिन बिगड़ते जा रहें हैं यही क्यों एक समय था जब विश्व विद्यालयों में पुलिस का प्रवेश एक अनहोनी घटना मानी जाती है। कुलपति व शिक्षकों का दबाव ही विश्वविद्यालय में अनुशासन के लिए पर्याप्त माना जाता था। किन्तु आज वहाँ पुलिस एक अनिवार्य उपस्थिति बन चुकी है। युवावस्था का प्रारम्भिक दौर शारीरिक व मानसिक परिवर्तन के कारण अत्यन्त उथल-पुथल भरा होता है जिसके दौरान पूर्वानुमानित प्रतिमान टूटते हैं और नये बनते है। इन दिनों युवक अपनी अस्मिता की खोज करता है अपनी ओर से नए प्रतिमान ढूँढ़ने की कोशिश करता है की तलाश में होता है। जिसके अनुरूप वह स्वयं को ढाल सके। अपने आदर्श की खोज की प्रेरणा वह पुस्तकों , फिल्मों , समाचार पत्रों व आस-पास के सामाजिक राजनैतिक माहौल की बीच करता है पहले ऐसे आदर्श कोई ऐतिहासिक कोई ऐतिहासिक महापुरुष, वीर, महात्मा एवं कोई सज्जन पुरुष हुआ करते थे लेकिन आज नई पीढ़ी के आदर्श एवं प्रतिमान बहुत कुछ बदल गए है। जो टूटती परम्पराओं , मान्यताओं एवं गिरते नैतिक मूल्यों का परिणाम हैं आज युवाओं के आदर्श टी0 वी0 एवं फिल्मों के सतरंगी पर्दा से अवतरित होते हैं, जो हिंसा, फैशनपरस्ती एवं फूहड़ता की प्रेरणा देते हैं । इन आदर्शों का अनुकरण करने वाली युवा पीढ़ी में मस्तिष्क में हिंसा, अश्लीलता की ऊल-जुलूल हरकतों , कुकल्पनाओं व दुर्भावनाओं के अतिरिक्त और क्या कल्पना की जा सकती हैं । आज नई पीढ़ी का अर्थ किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अनुशासन में उभारती पौध नहीं हैं बल्कि स्वच्छन्दता की पराकाष्ठा और कृत्रिम आदर्शों को अन्धी दौड़ में शामिल कॉलेज या विश्वविद्यालय की भीड़ हैं आकाश से अवतरित होने वाला अपसंस्कृति का आक्रमण स्थिति को और बद से बदतर बनाता जा रहा है। अगणित सेटेलाइट चैनलों ने हमारी लापेक संस्कृति की तोड़-मरोड़ और नंगा करके सरेआम खुली सड़क पर ला पटका है। खान, पान, वेश-भूषा आचार व्यवहार गीत संगीत सभी क्षेत्रों में युवाओं द्वारा किये जा रहे पाश्चात्य अंधानुकरण ने भारतीय समाज के समक्ष गम्भीर संकट खड़े कर दिए हैं आज की युवा पीढ़ी भारत की बहूमूल्य साँस्कृतिक धरोहर के प्रति पूर्णतया उदासीन हैं आज के युवक-युवतियों में वेद, उपनिषदों - पुराणों को पढ़ना, उन पर चर्चा करना यहां तक कि उनका नाम लेकर पिछड़ेपन, रूढ़िवादी होने का प्रमाण मान लिया जाता है देव-संस्कृति की उपेक्षा, भारतीय पहनावे का त्याग, रैप, डिस्कों का प्रचलन इसी का परिणाम है यही नहीं युवाओं में आदर्श व प्रेरक साहित्य के प्रति अभिरुचि में भारी कमी आयी हैं गत कुछ सालों से देखने में आया है कि युवक -युवतियों अश्लील साहित्य को बेहद चाव से पढ़ने लगे हैं छात्रावासों के प्रायः हर कमरे में डेबोनियर, फैंटसी, चेस्टिटी, पेंटहाउस जैसी ओछी और महँगी पत्रिकाएँ देखने को मिल जाएँगी। चाहे गल्से हास्टल हो या फिर ब्वायज होस्टल हर कही अश्लीलता का बखान करने वाले उपन्यास देखे जा सकते हैं एक समय था जब कालेज-विश्वविद्यालयों के परिसर में धर्मवीर भारती , वृन्दावन लाल वर्मा, रवीन्द्रनाथ टैगोर , मुल्कराज आनन्द आदि की साहित्यिक रचनाएँ रुचि के साथ पढ़ी जाती हैं युवकों को आज मालूम ही नहीं कि वे क्या पढ़े।
वैसे भी इन दिनों अपने देश में पत्रिकाओं के नाम पर अश्लीलता से भरी पूरी पत्रिकाओं की बाढ़-सी आ गयी है। एक मोटे अनुमान के अनुसार अकेले दिल्ली में लगभग एक दर्जन ऐसी पत्रिकाएँ प्रकाशित होती है। अपने नाम के अनुरूप इन पत्रिकाओं में ऐसी कोई पाठ्य सामग्री नहीं होती, जो युवा पीढ़ी को किसी दिशा में जागरुक करने में सक्षम हो या उनकी रचनात्मक क्षमताओं का विकास करें । इसके विपरीत ये तथाकथित जागरुक पत्रिकाएँ युवा पीढ़ी को नैतिक पतन के दलदल में धकेलती जा रही है।कहने को तो ये पत्रिकाएँ युवा पीढ़ी में यौन शिक्षा के सम्बन्ध में युवाओं को जागरुक होने का दावा करती हैं परन्तु वास्तविकता इसके ठीक विपरीत हैं इन पत्रिकाओं की कीमत आम पत्रिकाओं से दो से ढाई गुना अधिक होती हैं फिर भी ये धड़ल्ले से बिकती हैं इनमें से कइयों की प्रचार संख्या लाखों के आस पास हैं इनमें से अधिकाँश वार्षिकाँक भी निकालती हैं जिसका मूल्य कम से कम सौ रुपये होते हैं लेकिन इतना महँगा यह अंक भी बाजार में आते ही हाथो-हाथ बिक जाता है अति आधुनिक पश्चिमी संस्कृति में रँगी अपने को मॉडल कहने वाली युवतियां कालेज छात्राएँ भी बड़ी संख्या में ऐसी पत्रिकाएँ खरीद कर ले जाती हैं इतनी आसानी से उपलब्ध होने वाली इन पत्रिकाओं की युवा पीढ़ी में कितनी पैठ है, और उनका कितना प्रभाव पड़ रहा है। इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं हैं
ये पत्रिकाएँ अपने अलग-अलग अंकों में अवैध सम्बन्धों यौन कुण्ठाओं, यौन समस्याओं आदि पर सर्वेक्षणानुसार आलेख भी प्रकाशित सर्वेक्षणों को यदि सच मान लिया जाए तो बड़े ही अफसोस के साथ कहना पड़ेगा कि आज भारतीय समाज विशेषतौर पर युवा पीढ़ी ऐसी कुसंस्कृति अपनाने के लिए अग्रसर है जहाँ रिश्ते-नातों की पवित्रता और व्यक्तिगत जीवन में नैतिकता कोई अर्थ नहीं रखती हैं उसी संस्कृति स्त्री-पुरुष के बीच कामवासना के अतिरिक्त कोई दूसरा सम्बन्ध नहीं समझती । युवाओं में इस मानसिकता और प्रवृत्ति के विकास में ये अश्लील पत्रिकाएँ खास भूमिका निभा रही है पत्रिकाओं की अति कामोत्तेजक पाठ्य-सामग्री युवकों की यौन सम्बन्धी समस्याओं का न तो समाधान करती है और न ही यौन कुण्ठाओं को शान्त करती हैं इसके विपरीत उनकी यौनेच्छाओं को इस हद तक उभारती है कि वे अप्राकृतिक एवं अनुचित तरीकों से अपनी वासनाओं की पूर्ति के लिए बाधित होते हैं ऐसी स्थिति में युवा वर्ग घृणित अपराधों के चंगुल में भी फँस जाता है।
हाल ही के वर्षों में मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई है। इन अपराधों के अभियुक्तों में युवा सबसे अधिक हैं समाजशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों ने भी इन घटनाओं में वृद्धि के लिए युवाओं को भ्रमित करने वाले अश्लील साहित्य को ही जिम्मेदारी माना हैं अश्लीलता का प्रचार करने वाले इस साहित्य की मायाजाल इस कदर बढ़ा है कि युवतियों भी इसके नागपाश से बच नहीं पायी है गतवर्ष ऐसी ही एक पत्रिका के एक संपादक ने एक टी0 वी0 कार्यक्रम में बताया कि प्रतिमाह सैकड़ों पत्र ऐसी लड़कियों के आते हैं जो पत्रिका के लिए नग्न तस्वीर खिंचवाना चाहती है यदि उक्त सम्पादक की बात सच मानी जाए तो सभी पत्रिकाओं के पास आने वाले पत्रों की संख्या एक लाख के आस-पास होगी । इन आँकड़ों से यह बात स्पष्ट होती हैं कि इन पत्रिकाओं ने लड़कियों के एक खास वर्ग को उस पश्चिमी संस्कृति में पूरी तरह ढल जाने के लिए प्रेरित किया है, जहां अपने वस्त्र उतारकर पैसा कमाना आम बात है।
देश में एक ऐसी सामाजिक अपसंस्कृति का प्रसार हुआ है, जिससे युवक-युवतियाँ आत्मघाती दुष्चक्र में उलझते जा रहे है। मध्यम व उच्चवर्गीय परिवारों की लड़कियां अपनी ऊर्जा और प्रतिभा को किसी सार्थ कार्य में लगाने के बजाय फैशन शो, सौंदर्य प्रतियोगिता व फिल्मों के प्रलोभन में अपराधी एवं बुरे लोगों के जाल में फंसती जा रही हैं यह आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है कि भारतीय आभूषण उतार फेंककर जिस्म की नुमाइश की होड़ में शामिल हो गयी है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली के दो डाक्टरों ने हाल ही में दक्षिण दिल्ली के सात स्कूलों के 700 छात्र-छात्राओं को जो सर्वेक्षण किया, उससे हमारी शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक नैतिकता सम्बन्धी कई नाजुक सवाल खड़े हो गए है। सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 60 प्रतिशत छात्र अश्लील गतिविधियों में लिप्त पाए, गए। आश्चर्य की बात तो यह है कि लड़के अपने सहपाठियों -मित्रों के बीच इन सम्बन्धों की खुलकर चर्चा व शेखी बघारते हैं और जो इन कुकृत्यों से दूर रहते हैं, उन्हें बड़े ही हीन व बैकवार्ड समझा जाता है यह प्रतिशत केन्द्रीय विद्यालयों में 55 प्रतिशत था व पब्लिक स्कूलों में 60 प्रतिशत। सर्वेक्षण यदि सरकारी स्कूलों में किया गया होता तो यह प्रतिशत और कम होता। बड़े पब्लिक स्कूलों में वी0 आई॰ पी0 पारिवारिक -सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण यौन उच्छृंखलता को फैशन व आधुनिकता का प्रतीक बना लिया है कुछ परिवारों ने पिछले कुछ सालों से विदेशी टी0 वी0 चैनलों को जिस तरह अपनाया है उससे एक विकृत अभिरुचि पनपी हैं युवा इससे सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं हमारे परम्परागत व नैतिक मूल्य अपनाए जा रहे पश्चिमी मूल्यों ने युवा पीढ़ी को पतन के गर्त में धकेल दिया है। पाश्चात्य संस्कृति के जीवन मूल्य को अपनाती युवा पीढ़ी अपने देश की संस्कृति को हेय दृष्टि से देखने लगी हैं यह पीढ़ी अपनी कुण्ठाओं के हल महानगरों की सड़कों पर तलाशती है, चमक-दमक वाले रेस्त्रा, नाइट क्लबों में ढूंढ़ती है फैशन शो, सौंदर्य प्रतियोगिताओं में खोजती है। अपने आन्तरिक बिखराव के चलते नशा इस पीढ़ी का अभिन्न अंग बनता जा रहा हैं भोगवादी लालसाओं से रँगे सपनों को पाने के जुनून में यह पीढ़ी किसी भी सीमा तक गिरने के लिए तैयार हैं आज के युवाओं में प्रगतिशीलता के नाम पर भारतीयता का विरोध , नैतिकता के विरुद्ध उतरना, विवादास्पद हो जाना उपलब्धियों में गिना जाता है।
युवा पीढ़ी में स्वार्थपरायणता की भी बेहद वृद्धि हुई है युवक-युवतियाँ अपने सामाजिक दायित्व बोध से कट गए हैं। उनके जीवन का प्रयोजन संकुचित हो गया है उच्च आदर्शों एवं प्रेरणा स्त्रोत के अभाव में ये एक के बाद एक नए कुचक्रों में फँसे उलझते चले जा रहे है। अपनी वैचारिक शून्यता के कारण ये अभिमन्यु दुष्प्रवृत्तियों के चक्रव्यूह का बेधन कर पाने में स्वयं को असहाय पा रहे हैं
वैचारिक शून्यता व साँस्कृतिक संकट की इस विषम घड़ी में युवाओं की शक्ति को रचनात्मक दिशा में नियोजित करने के लिए युगनिर्माण मिशन कृतसंकल्प हैं अपनी रचनात्मक गतिविधियों के द्वारा यह मिशन युवाओं के दुष्प्रवृत्तियों से लोहा लेने व देवसंस्कृति के सामाजिक, उपयोगी एवं प्रगतिशील मूल्यों के प्रति जागरुक होने के लिए इन पंक्तियों के माध्यम से आमन्त्रित करता है। जिनमें कुछ भी चेतना बाकी हैं, जो अभी जीवन्त है वे इस आमन्त्रण को हृदय की गहराइयों में सुनेंगे और दुष्प्रवृत्तियों के चक्रव्यूह में फँसे देश के अभिमन्युजनों को नवयुग के प्रेरक एवं प्रवर्तक की नवीन भूमिका के लिए प्रस्तुत करने के सहायक सिद्ध होगे।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा 14 दिसंबर 1997 को शांतिकुंज के तपःपूत परिसर में आयोजित स्वावलम्बन संवर्ग समारोह-समग्र क्रान्ति के लिए युवाओं का आह्वान हैं। युवाशक्ति के राष्ट्रशक्ति बनाने के लिए छेड़े जाने वाला महाअभियान का शुभारंभ हैं विदेशी पराधीनता से मुक्त हुए हमें पचास वर्ष पूरे हो गए। इन पचास वर्षों की उपलब्धियों आगामी भविष्यत् पर इन दिनों जोरदार राष्ट्रीय चर्चा छिड़ी हुई हैं अपने देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में भी 26 अगस्त से चार दिवसीय विशेष सत्र की शुरुआत की गई है इस ऐतिहासिक सत्र में भी यही सवाल उठकर आए हैं कि अभी भी हम साँस्कृतिक एवं मानसिक परतन्त्रता के अदृश्य पाश में जकड़े हुए हैं शायद यही कारण है कि गत पचास वर्षों में हुए विकास के बावजूद राष्ट्र का जनसाधारण स्वर्णजयंती समारोहों के औचित्य तक को समझने में असमर्थ हैं वह अभी भी अशिक्षा, गरीबी, पिछड़ेपन एवं सामाजिक अन्याय से पीड़ित है जिसके चलते वह अपने देश में आी नागरिकीय गरिमा को समझने में असमर्थ है विश्व क्रान्ति एवं साँस्कृतिक सद्भाव का संवाहक देश आज आतंकवाद एवं उग्रवाद के विस्फोटों से ग्रस्त है। जातीय- सांप्रदायिक हिंसा देश की अस्मिता के लिए खतरा बनी हुई है। समूचा राष्ट्र भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबा है कभी सोने की चिड़िया के नाम से विश्वविख्यात देश आज विदेशियों के सामने भिक्षापात्र लेकर भटक रहा हैं पूरा समाज आज नेतृत्वविहीन है राजनीति भ्रष्टाचार एवं अपराध का पर्याय बन गयी है। लोकतन्त्र की व्यवस्था एक उपहास मात्र बनती जा रही है राष्ट्रनिर्माण का लक्ष्य एक अंधेरी गली में गुम हो गया है राष्ट्रव्यापी असन्तोष, अव्यवस्था आज देश की रुग्ण स्थिति को दर्शा रही हैं। ऐसी विषम स्थिति से जूझने की सामर्थ्य किसमें है? उलटे प्रवाह को उलट कर सीध करने का साहस कौन कर सकता है? इन सवालों के जवाब में समवेत स्वर ‘युवाशक्ति’ का आह्वान करते हैं हर किसी का इंगित उन्हीं की ओर उठता है। सभी इस बारे में एक मत है कि युवाओं के प्रचण्ड ऊर्जा है भले ही आज वह दिशाहीनता की वजह से बिखर रही है आगामी मार्गशीर्ष पूर्णिमा को आयोजित स्वावलंबन समारोह के माध्यम के शांतिकुंज ने युवाशक्ति को राष्ट्र शक्ति के रूप में गढ़ने और निखारने की प्रक्रिया की एक राष्ट्रव्यापी आन्दोलन एवं अभियान का रूप देने का संकल्प किया है। स्वावलम्बन समारोह रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि युवक-युवतियों को आर्थिक ही नहीं वैचारिक भावनात्मक एवं साँस्कृतिक रूप से स्वावलंबी बनाने का प्रयास है साथ ही उनकी अपनी वैयक्तिक एवं सामाजिक समस्याओं जैसे दहेज , दुष्प्रवृत्ति , उन्मूलन नशावारण आदि के खिलाफ खोले जा रहे एक जुझारू मोर्चे की शुरुआत है युग निर्माण मिश्रु के संचालकों का सुनिश्चित रूप से मानना है कि आज के राष्ट्रीय एवं सामाजिक परिवेश में युवा आंदोलन से ही यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह राष्ट्र को इस विकट स्थिति से उबारकर इसमें नई चेतना का संचार कर सके। हर हमेशा राष्ट्रीय गौरव की सुरक्षा के लिए युवाओं ने ही अपने कदम बढ़ाए हैं सेकट चाहे सीमाओं पर हो अथवा सामाजिक एवं राजनैतिक , इसके निवारण के लिए अपने देश के युवक एवं युवतियां ने अपना सर्वस्व न्यौछावर करने में कोई कौर-कसर नहीं छोड़ी हैं देश के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भी इसका सक्षी है। 1857 से 1947 तक के लंबे राष्ट्रभक्ति एवं क्रान्ति के भावों का आरोपण करने वालों में युवाओं की भूमिका सर्वोपरि रही हैं 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महा नायकों में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई , तांत्याटोपे और मंगल पाण्डे युवा थे। रानीलक्ष्मीबाई तब मात्र 26 वर्ष की थी। अंग्रेजों के दाँत खट्टे करने वाली लक्ष्मीबाई की सेना की एक जाँबाज झलकारी बाई एक युवती ही थी। उन्हीं की प्रेरणा से सुन्दर, मुन्दर, जुही, मोतीबाई जैसी नृत्यांगनाएं क्रान्ति की वीराँगनाएं बन गयी थी। जिनका जीवन घुंघरुओं की झंकार से शुरू होकर गोले-बारूद के धमाकों में खत्म हुआ। पश्चिम बंगाल में युवाओं को क्रान्ति के बलिदान मंच पर लाने वाले की अरविन्द तक एक 25-30 वर्षीय युवा ही तो थे। उस जमाने की सर्वोच्च आई॰ सी0 एस॰ परीक्षा को ठुकराकर राष्ट्र प्रेम से आप्लावित होकर वे राष्ट्रीय राष्ट्रीय जागरण के महायज्ञ में कूद पड़े थे कर्मयोगिन् एवं वन्देमातरम् से देश के युवकों में राष्ट्रीय स्वाभिमान एवं क्रान्ति की भावना को जगाकर राष्ट्रीय भक्ति से भर दिया था सैकड़ों युवक इस प्रेरणा से हंसते-हंसते फांसी के तख्ते पर चढ़ गए थे 1907 ई॰ स्वाधीनता यज्ञ की बलिवेदी पर शहीद होने वाले खुदीरामबोस मात्र 27 वर्षीय किशोर थे। फांसी के फंदे पर चढ़ने से पूर्व उसके उद्गार थे।
हाँसी -हाँसी चाड़बे फाँसी देखिले जगतवासी, एक बासर विदाय दे माँ, आमि धूरे आसी।
अर्थात् दुनिया देखेगी कि मैं हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे पर चढ़ जाऊंगा। हे भारत माता! मुझे विदा दो, मैं बार-बार तुम्हारी कोख में जन्म लू। काकोरी काण्ड स्वतन्त्रता इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना रही हैं 1924 र्ह0 में हुए इस काण्ड के सभी क्रान्तिकारी अभियुक्त युवा थे। अपने साहस एवं सहर्ष आत्मबलिदान के भाव से उन्होंने देशवासियों के हृदय में राष्ट्र -प्रेम की लौ। लगा दी थी। इनमें प्रमुख क्रान्तिकारी अभियुक्त पं0 रामप्रसाद विस्मिल ने फाँसी के फन्दे को चूमते हुए कहा था-
बन न कोई बलबूते है, और न अरमानों की भीड़, एक मिट जाने की हसरत, अब दिले विस्मिल में है।
अन्य क्रान्तिकारी अभियुक्त अमर शहीद अशफाक उल्ला खाँ , राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह आदि सभी युवा ही थे अपने अप्रतिम देशप्रेम एवं आत्मबलिदान द्वारा देश भर में क्रान्ति की नई लहर फैलाने वाले शहीद-ए-आजम भगतसिंह उस समय मात्र 23 वर्ष के थे। उनके क्रान्तिकारी साथी राजगुरु एवं सुखदेव भी युवा ही थे इसके अलावा अगणित गुमनाम युवाओं ने स्वतन्त्रता संग्राम महायज्ञ में अपनी आहुति दी थी। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के समय भी युवाशक्ति अपने चरम पर उभर कर आगे आयी थी वा राष्ट्र शक्ति का पर्याय बनी थी। भारत ही नहीं विश्वभर में जितने भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए है जितनी भी सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनैतिक क्रान्तियाँ हुई है, इनमें युवा भावनाएँ ही काम करती रही है। थोड़े से प्रबुद्ध युवाओं ने समय की मांग को समझा तो स्वार्थ एवं विलासिता को ठोकर मारकर कुछ हजार भिक्षु उठ खड़े हुए और देखते ही देखते बौद्ध धर्म का प्रसार सारे एशिया में हो गया। 2000 वर्षों में विश्व की एक तिहाई जनता को ईसाई धर्म में दीक्षित करने का श्रेय ईसा के कुछ प्रबुद्ध युवा शिष्यों को जाता है। मार्क्स जब मरा था तो उसे दफनाने के लिए सिर्फ 5-10 व्यक्ति हो गए थे। पर जब प्रबुद्ध युवाओं ने उसके विचारों का महत्व समझा तो विश्व का एक बहुत बड़ा भाग साम्यवादी हो गया।
सही तो यह है कि किसी भी देश का निर्माण वहां की युवाशक्ति के नियोजन पर ही हुआ है। अमेरिका आज विश्व का सबसे समृद्ध एवं सशक्त राष्ट्र माना जाता है। वहां के सामाजिक , आर्थिक , कानूनी , वैज्ञानिक एवं औद्योगिक क्षेत्र में जो तीव्र परिवर्तन हुए है उनका इतिहास बहुत पुराना नहीं है 1910 ई॰ में अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में कुल नौ व्यक्ति ‘सरकारी अनुसंधान संस्थान’ की रूपरेखा लेकर एकत्रित हुए थे। उन्होंने बुकिंग इन्स्टीट्यूट नामक संस्था की स्थापना की। इसका उद्देश्य अमेरिका के कानूनी, प्रशासन, शिक्षा एवं वान के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन को बुकिंग इन्स्टीट्यूट ने केवल व्यवस्थित ढाँचा देकर प्रकाशित किया, लेकिन इसे उभारा वहां के प्रबुद्ध युवाओं ने इस अभियान ने अमेरिका में बौबवुढ, जाँन गार्डनर, चालीडोर जैसे कर्मठ एवं प्रभावशाली व्यक्ति पैदा किए। इनके कार्यक्रमों से कोई व्यक्ति अछूता न रहा और ऐसी आँधी आयी कि कानूनी मामले ही नहीं, सामाजिक रहन-सहन और राष्ट्रीय में ठोस परिवर्तन हुए। अमेरिका की वर्तमान प्रगति का इतिहास वहां के प्रबुद्ध युवाओं के पसीने से लिखा हुआ है।
एक समय की विश्वशक्ति सोवियत रूस की प्रगति का इतिहास भी युवा शक्ति की असंदिग्ध भूमिका को स्पष्ट करता है विखण्डित सोवियत रूस की वर्तमान स्थिति जो भी हो, 1920 से 1960 तक के चार दशकों की अद्भुत प्रगति का इतिहास अपने में युवाशक्ति की मिसाल कायम किए हुए हैं इस शताब्दी के प्रारम्भ में वहां की तीन-चौथाई से भी अधिक जनता अशिक्षित व निर्धन थी। वैज्ञानिक क्षेत्र में देश बिलकुल पिछड़ा हुआ था एकाएक जो परिवर्तन की लहर आयी, वह युवाओं को सुव्यवस्थित क्रान्ति की परिणति थी। इसके पीछे युवाशक्ति के अथक श्रम, त्याग, लगन, का एक चमकता अध्याय जुड़ा हुआ है।
सन् 1920 से 1960 के चार दशकों में वहां अकेले शिक्षा के क्षेत्र में जो क्रान्ति हुई उसका लेखा जोखा प्रस्तुत करते हुए विद्वान रूसी लेखक ए॰ पुत्को ने एक स्थान पर बताया कि 1920 में 10 लाख लोगों में केवल 3000 व्यक्ति ऐसे थे जिन्होंने उच्चतर शिक्षा प्राप्त की थी। इसके बाद युवकों के माध्यम से सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का संगठन हुआ और देश में अकाल, विनाश की परिस्थितियों के बीच भी निरक्षरता उन्मूलन के कार्यक्रम गाँवों में कस्बों , निवासगृहों एवं औद्योगिक संस्थाओं में स्थापित किए गए। इस शिक्षा क्रान्ति का उद्देश्य राष्ट्र में वैज्ञानिकों लेखकों और कलाकारों की आवश्यकता पूर्ति करना भी था । इस आन्दोलन में लेनिन कोस्सतन्तिन त्सियोल्कीवस्कों एवं इवान पावलोव जैसे अगुआ थे। लेकिन इस शिक्षा क्रान्ति के प्रचार-प्रसार में अथक श्रम व त्याग करने वाली शक्ति युवाओं की ही थी। परिणामतः 1940 में 1,10,000 और 1960 में 3,34000 तक उच्चशिक्षितों की संख्या पहुंची उन्हें विशेषज्ञ स्नातक कहा गया। क्यूबा एक छोटा-सा देश है। उसकी शक्तियां भी उसी के अनुपात सीमित हैं लेकिन वहां के प्रबुद्ध युवाओं ने अद्भुत शिक्षा क्रान्ति करके स्वयं में एक नया इतिहास रच दिया। वहाँ जितने पढ़े -लिखे लोग थे, वे अशिक्षितों को ढूँढ़-ढूँढ़ कर पढ़ाने लगे। निरक्षरता को क्यूबा से निर्वासित करने का श्रेय जाता है वहां के युवाओं को। चीन व जापान में भी वही के राजनैतिक परिवर्तन एवं सामाजिक सुधार का श्रेय वहां की युवा पीढ़ी को जी जाता है समाज की कुंठाओं को काटने, उसे प्रतिगामिता से उबारने, उसका कायाकल्प कर उसे नया जीवन देने में यदि कोई समर्थ हो सकते हैं तो वे प्रबुद्ध एवं भावनाशील युवक-युवतियां ही हैं उन्हें छोड़कर या उनके बिना कोई भी सुधार या क्रान्तिकारी परिवर्तन लाना सम्भव नहीं। समय की आवश्यकता यही है कि व अपने हृदय में समाज -निर्माण की कसक उत्पन्न करें व अपनी बिखरी शक्तियों को एकत्रित कर समाज की विभिन्न समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न करें। देश की प्रगति में ही अपनी प्रगति और उन्नति सन्निहित हैं । इस उदात्त दृष्टिकोण के आधार पर हो युवाशक्ति , राष्ट्र शक्ति बनकर राष्ट्र को समृद्ध उन्नति व प्रगति के मार्ग पर ले जा सकती है। कितने ही देशों के उदाहरण है, जिन्होंने द्रुतगति से प्रगति की है जापान , कम्बोडिया, डेनमार्क, चीन, क्यूबा जैसे देश कल -परसों तक घोर विपन्नता में घिरे हुए थे, पर देश की प्रतिभाओं एवं युवा पीढ़ी ने थोड़े समय के लिए अपने स्वार्थ को त्याग कर देश के विकास का संकल्प लिया। उनका संकल्प सामूहिक पुरुषार्थ के रूप में फलीभूत हुआ और कुछ ही दशकों में ये राष्ट्रों की श्रेणी में पहुंच गए। यह चमत्कार युवाशक्ति एवं प्रतिभाशाली लोगों के मुक्तहस्त सहयोग से ही सम्भव हुआ।
ऐसी राष्ट्रीय भावना का अकाल देश की नई पीढ़ी में पड़ता जा रहा हैं हर सुशिक्षित युवा अपनी योग्यता की कीमत तत्काल पैसे के रूप में पाना चाहता है। उच्च शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य भी धनोपार्जन तक सिमट कर रह गया है। अधिकाँश युवकों-युवतियों की यह मान्यता बन गई हैं कि उन्हें अपनी योग्यता को पैसे के रूप में भूनाने का मनमाना अधिकार है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समाज एवं देश का भी ऋण उनके ऊपर चढ़ा है उसे भी चुकाने का प्रयत्न करना चाहिए, ऐसा विरले की सोचते हैं उल्लेखनीय है कि किसी देश का विकास, बहुसंख्यक भीड़ के सहारे नहीं बल्कि मूर्धन्य प्रतिभाओं के सहारे होता है इनके सहयोग की मात्रा जितनी अधिक होगी समाज देश में प्रगति भी उतनी ही तीव्रगति से होगी। आज बड़े दुःख की बात है कि अधिक धन एवं सुख-सुविधा के लोभ में देश की युवा प्रतिभाएं विदेशों में अपना रैन बसेरा के लिए आतुर है अबकी इन घड़ियों में शताब्दियों के विदेशी प्रभुत्व और निष्क्रियता के बाद देश एक नए पुनर्जागरण और नियति की ओर अग्रसर हो रहा है। यों तो किसी भी देश के नवनिर्माण में ज्ञान एवं युवाशक्ति का योगदान सदा ही रहा हैं ।किन्तु किसी भी काल में यह इतना महत्वपूर्ण नहीं रहा होगा, जितना कि आज के इस वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी के युग में और न ही यह इतना चुनौतीपूर्ण और अनिवार्य रहा होगा, जितना कि इन दिनों हमारे अपने देश में है। इन क्षणों में प्रत्येक युवा को जो महान पाठ सिखाना है वह है परिश्रम , त्याग और प्रत्येक व्यक्ति को सबके हित में कार्य करने का पाठ।
जीवन के आधारभूत मूल्य-सत्य की खोज भावनात्मक एकता, आदर्श आदि ऐतिहासिक स्मारकों के रूप में अथवा पाठ्यपुस्तकों में अंकित करके दीर्घकाल तक सुरक्षित नहीं रखें जा सकते हैं उच्च आदर्श और महान उद्देश्य तब तक अर्थहीन है, जब तक हम भावना में भरकर अनवरत रूप से उसके लिए प्रयत्न नहीं करते। राष्ट्रीय स्वाधीनता के पचास वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रत्येक युवा को परिश्रम, त्याग और समर्पण के द्वारा राष्ट्र के पुनर्निर्माण, पुनर्जीवन और नवीनीकरण का संकल्प करना होगा अन्यथा आदर्श और मूल्य निस्तेज और नष्ट हो जाएंगे एवं उद्देश्य धूमिल पड़ जाएगा।
राष्ट्रनायक पं0 जवाहर लाल नेहरू ने भारतमाता की प्रत्येक युवा सन्तान को सम्बोधित करते हुए कहा था-” यदि तुम वर्तमान परिस्थिति से असन्तुष्ट नहीं हो, यदि तुम इस ललक का अनुभव नहीं करते जो तुम्हें अधीर बना दे तथा कर्म के प्रति प्रेरित और बाध्य करें, तब तुम वृद्धजनों के उस समूह से भिन्न कहा हो जो वार्ता , वाद-विवाद और तर्क अधिक करते हैं और काम कम? जब यह दिखाई पड़ता है कि तुममें राष्ट्र की वर्तमान परिस्थिति के प्रति सच्चा भाव है, जिज्ञासा की उत्साहपूर्ण भावना है क्या करना है, कैसे करना है? को जानने की आकाँक्षा है, तब इस बात का विशेष महत्व है। राष्ट्र के प्रत्येक युवा का वर्तमान परिस्थितियों में यही कर्तव्य है कि वह अपनी पुरातन संस्कृति से ओत-प्रोत अपनी मातृभूमि के उत्थान के लिए कार्य करने वाली वीर सन्तान बने। उसकी भावनाएं अंतर्राष्ट्रीय हो जिनकी कोई सीमाएं नहीं हैं वृद्ध लोग सीमित समय के लिए कार्य करते हैं और युवा अनन्त समय कि लिए। ध्यान रहे सीधे लक्ष्य की ओर बढ़ना है, कमर सीधी कर दृढ़ता से पकड़कर ऊँचे आकाशवत आदर्शों को देखता है तभी राष्ट्र निर्माण के लिए सार्थक प्रयास हो सकेंगे।
यौवन इस बात पर निर्भर नहीं है कि हम कितने छोटे है, बल्कि इस पर कि हममें विकसित होने की क्षमता एवं प्रगति करने के योग्यता कितनी हैं विकसित होने का अर्थ है अपनी अन्तर्निहित शक्तियाँ, अपनी क्षमताएँ बढ़ाना। प्रगति करने का अर्थ है, जब तक अधिकृत योग्यताओं को बिना रुके निरन्तर पूर्णता की ओर ले जाना। बुढ़ापा आयु बड़ी हो जाने का नाम नहीं हैं बल्कि विकसित होने और प्रगति करने को अयोग्यता का पर्याय है। जो अपने आप को निष्कपट, साहसी, सहनशील, ईमानदार बना सकेगा, वही राष्ट्र की सर्वाधिक सेवा करने के योग्य हैं । उसे ही अद्वितीय एवं महान कहा जा सकता है
इन पंक्तियों के माध्यम से 13,14 एवं 15 दिसम्बर 97 शांतिकुंज में आयोजित होने वाले स्वावलम्बन समारोह में इन्हीं उपरोक्त भावनाओं को आमन्त्रित किया जा रहा हैं यह आमन्त्रण प्रत्येक उस छात्र-छात्रा , युवक - युवती को है जो न केवल स्वयं को , बल्कि समूचे राष्ट्र को स्वावलम्बी बनाना चाहते हैं जिनके हृदय में कसक है, अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों के प्रति विकलता का भाव है जिनका मन कुछ सार्थक करने के लिए व्याकुल बेचैन है, वे इन पंक्तियों को पढ़ते ही शान्तिकुँज से पत्र व्यवहार करें यहां से उनको शक्ति से ही राष्ट्रीय नव-निर्माण की चतुरंगिणी खड़ी की जाएगी, जो सृजन का सार्थक एवं सफल अभियान रचेगी। राष्ट्र की सभी युवा भावनाओं की सम्बोधित करते हुए चिरयुवा स्वामी विवेकानन्द के कहा था-” हम सभी को इस समय कठिन श्रम करना होगा। हमारे कार्यों पर ही भारत का भविष्य निर्भर है देखिए भारतमाता धीरे-धीरे आँख खोल रही है अब तुम्हारे निद्रामग्न रहने का समय नहीं है। उठिए और माँ भगवती को जगाइए ओर पूर्व की तरह उन्हें महा गौरव मण्डित करके, भक्तिभाव से उन्हें अपने महिमामय सिंहासन पर प्रतिष्ठित कीजिए। इसके लिए सर्वप्रथम प्रत्येक युवा को पहले स्वयं मनुष्य बनाना होगा। तब वे देखेंगे कि बाकी सब चीजें अपने आप ही स्वयं उनका अनुगमन करने लगेंगी। परस्पर के घृणित भाव को छोड़िए एक दूसरे से विवाद तथा कलह का परित्याग कर दीजिए और सदुद्देश्य , सदुपाय, सत्साहस एवं सद्वीर्य का आश्रय लीजिए। किन्तु भलीभांति स्मरण रखिए यदि आप अध्यात्म को छोड़कर पाश्चात्य जाति की भौतिकता प्रधान सभ्यता के पीछे दौड़ने लगेंगे तो फिर प्रगति के स्वप्न कभी भी पूरे न होंगे ।
एकमात्र भारत के पास ही ऐसा ज्ञानलोक विद्यमान है जिसकी कार्यशक्ति न तो इन्द्रजाल में है और न छल-छल में ही। वह तो सच्चे धर्म के मर्मस्थल उच्चतम आध्यात्मिक सत्य के अश्ज्ञेष महिमामंडित उपदेशों में प्रतिष्ठित है। तगत को इस तत्व की शिक्षा प्रदान करने के लिए ही प्रभु ने भारत एवं भारतीयता को विभिन्न दुःख कष्टों के भीतर भी आज तक जीवित रखा है अब उस वस्तु को प्रदान करने का समय आ गया है। हे वीर हृदय भारत मां की युवा सन्तानों । तुम यह विश्वास रखो कि अनेक महान कार्य करने के लिए ही तुम लोगों का जन्म हुआ है। किसी के भी धमकाने से न डरो, यहाँ तक कि आकाश से प्रबल वज्रपात हो तो भी न डरो। उठों। कमर कस कर खड़े होओ और कार्यरत हो जाओ। राष्ट्रीय युवाशक्ति के महानायक स्वामी विवेकानन्द की इन्हीं भावना को परमपूज्य गुरुदेव ने व्यावहारिक एवं व्यापक स्वरूप प्रदान किया है। युगनिर्माण मिशन अपने आप में युवा भावनाओं का समर्थ एवं सशक्त संगठन है। स्वावलम्बन समारोह के माध्यम से इन्हीं भावनाओं को राष्ट्रीय अभ्युदय में नियोजित होते हुए देखा जा सकेगा।
अपने स्वजन -सम्बन्धी कही बाहर जाकर रहने लगे तो भी उनके साथ जुड़ी हुई न तो आत्मीयता टूटती है और न रक्त का रिश्ता टूटता है जल्दी -जल्दी मिलना जुलना न हो सकने पर भी दूर निवासी आत्मीयजनों के प्रति ममता का अन्त नहीं हो सकता और न होना ही चाहिए। ये प्रवासीजन भी अपने मूल निवास को भूला नहीं पाते। मात् संस्कृति के प्रति श्रद्धा उमंगती रहती हैं परिस्थितिवश भारत-माता के लाखों करोड़ों सपूतों को विदेश जाना पड़ा और वे प्रवासी भारतीय बन गए। भूतकाल में इस देश से धर्मप्रचारक, समाज व्यवस्थापक, कुशल प्रशासक, शिल्पी, व्यवसायी, चिकित्सक, शिक्षाशास्त्री संसार के कोने-कोने में भेजे जाते रहे है। उन्होंने अपनी प्रतिभा से जो लाभ विदेशों को पहुंचाया उसके लिए समस्त विश्व उनके प्रति कृतज्ञ रहा हैं जगद्गुरु चक्रवर्ती प्रशासक के 3प में उन्हें व्यापक सम्मान प्राप्त हुआ। भगवान बुद्ध ने अपने हजारों शिष्य सुव्यवस्थिति योजना के अंतर्गत विदेशों में भेजे थे और उन्हें संसार के विविध भागों की विभिन्न प्रकार की सेवा साधना का निर्देश दिया था। तदनुसार एशिया भर में बौद्ध धर्म तेजी से फैला और प्रगति के विविध विधि प्रयास वहां हो पाए।
ये प्रवासी भारतीय और उनके वंशज एवं अनुयायी एशिया में बहुलता पूर्वक और संसार भर में न्यूनाधिक रूप में फैले हुए हैं दुर्भाग्य इतनी ही हुआ कि भारत के और उनके बीच का सम्बन्ध एक प्रकार से टूटता चला गया और एक महत्वपूर्ण कड़ी नष्ट हो गयी, अन्यथा हिन्दू धर्म-बौद्ध धर्म होता और उस संस्कृति की पताका विश्व भर में फहरा रही होती । आज तो बौद्ध धर्म अपने आपको हिन्दू तैयार नहीं। इसका प्रवासी भारती धर्मानुयायी और भारतभूमि के सम्बन्ध सुदृढ़ बनाए रखने के लिए बरती जाने वाली प्रक्रिया की उपेक्षा करने की भूल भी सबसे बड़ा दुःखदायी कारण रही हैं मध्यकाल में बहुत से भारतीय विदेशों में व्यापार के लिए गए और वही बस गए। अँग्रेजी शासनकाल के दिनों में गोरों ने संसार के विभिन्न भागों में अपने उपनिवेश कायम किए। उन्हें आबाद करने के लिए कुशल कर्मियों की जरूरत पड़ी। अँग्रेज भारतीयों को आकर्षक प्रलोभन देकर विदेशों में ले गए और उन्हें वही बस जाना पड़ा। उन दिनों वे श्रमिक कारीगर मात्र थे, पर जब वहाँ बस गए तो अपनी योग्यता, शिल्प कुशलता एवं पूँजी के बल पर सम्भ्रान्त नागरिकों जैसी सुखद परिस्थितियों में वे रहने लगे। नेपाल, भूटान, लंका, बर्मा किसी समय विशाल भारत के ही अंग थे, पर पीछे विभाजन एवं पृथक्करण के कारण वहाँ के भारतीय भी प्रवासी बन गए। अब तो पाकिस्तान में भी वही हुआ। है।
जो जहाँ निवास करे वहाँ की नागरिक वफादारी उसे राजनैतिक दृष्टि से निभानी ही चाहिए। पर धर्म उद्गम एवं संस्कृति माता के भावनात्मक स्नेह सम्बन्ध भी ऐसे हैं जिन्हें सहज ही नहीं तोड़ फेंका जाना चाहिए। मुसलमान कहीं भी रहें, मक्का की तरफ मुँह करके नमाज पढ़ते हैं। मक्का की तरफ मुँह करके नमाज पढ़ते हैं। येरुसलम के प्रति ईसाइयों की वैसी ही निष्ठा है। लोग बुद्ध भगवान से सम्बन्धित स्थानों का दर्शन करने किस भावना के साथ आते हैं। यह कहने की आवश्यकता नहीं है। इस सबको देखते हुए प्रवासी भारतीयों के मन में अपनी संस्कृति के प्रति ममत्व और अपनत्व की लहर आनी ही चाहिए,। वे जहाँ भी जिस देश में रहे हैं, वहाँ के अपने कर्तव्यों का कुछ इस कलात्मक रीति-नीति से निर्वाह करे, जिससे उनकी अपनी साँस्कृतिक गरिमा परिलक्षित हो। उन्हें स्वयं में इस बात का अहसास होना चाहिए कि वे देव-संस्कृति के अग्रदूत है।
सम्भवतः इसलिए क्योंकि प्रवासी भारतीयों के साथ स्नेह-सद्भाव का आदान-प्रदान करते रहने की महत्ता, उपयोगिता एवं आवश्यकता को हम एक प्रकार से भुला ही बैठे। विदेशों में बसे भारतीयों को यदि उनकी मातृभूमि से मार्गदर्शन, प्रकाश, सहयोग, समर्थन मिलता रहता तो वे लोग जिस प्रकार को भूलते जा रहे हैं, वह दुर्दिन देखने को न मिलता। आदान-प्रदान का सिलसिला चलता रहा होता तो न केवल प्रवासी भारतीय ही अपनी धर्म-संस्कृति के उद्गम केन्द्र के साथ जुड़े होते वरन् भारत की साँस्कृतिक गरिमा भी उन देशों में फैली होती। ईसाई ओर पर प्रवासी भारतीयों की संतानें ही हिन्दू रह सकी है, वहाँ के मूल निवासियों में कहीं भी हिन्दू धर्म नहीं फैल सका है। इसका एकमात्र कारण यही है कि मातृभूमि से उन्हें किसी प्रकार का कोई प्रोत्साहन नहीं मिला।
समय-समय पर भारत से इन प्रवासी भारतीयों के बीच साधु-बाबा, पण्डित, किसी न किसी बहाने उनका भावनात्मक शोषण करके मात्र पैसा बटोरना रहा है। गन्ध भी उसमें नहीं थी। यदि घनिष्ठता और प्रकाश उत्पन्न करने वाले भारतीय जाते रहते ता स्थिति उससे कहीं अधिक आशाजनक रहती जैसी कि आज है। प्रवासी भारतीयों में आज भी जो धर्मनिष्ठा अपनी मातृभूमि, धर्मभूमि के प्रति श्रद्धा का अभिवर्द्धन करने का कुछ दायित्व हमारा भी है, ऐसा नहीं सोचा गया।
अपने समय की इस चुनौती को युग-निर्माण मिशन ने स्वीकारा है। परम पूज्य गुरुदेव के हृदय में प्रवासी भारतीयों इसी प्रेम के वशीभूत होकर उन्होंने वर्ष रहने वाले भारतीयों के मन में देव संस्कृति के प्रति श्रद्धा के बीच बोए। इन बीजों को खाद-पानी देने का काम इस पत्रिका के सम्पादक के हाथों वर्ष 1999 से शुरू किया गया। इससे अपनी संस्कृति के प्रति श्रद्धा एवं निष्ठा की जो फसल सहज वात्सल्य प्राप्त हुआ। वे स्वयं सन् 1993 से 14 तक तीन बार विदेश गयीं। यह क्रम यह काम पहले किया गया होता तो भारत से बाहर रहने वाले करोड़ों हिन्दू धर्मानुयायी देव-संस्कृति के अग्रदूत का भूमिका निभा रहे होते।
होना तो यह भी चाहिए था कि बौद्ध धर्म को विशुद्ध रूप से हिन्दू धर्म का ही एक अंग समझा जाता और उस धर्म के अनुयायियों को बिछुड़े भाई समझ कर गले लगाया जाता। शिया-सुन्नी, कैथोलिक, प्रोटेस्टेण्ट दो सम्प्रदाय होते हुए भी अन्ततः एक हैं, तो कोई कारण नहीं कि हिन्दू और बौद्ध भी उसी प्रकार एक होकर न रहें, जैसे वैष्णव, शैव, शाक्त सनातनी, आर्यसमाजी, सम्प्रदाय भेद होते हुए भी एक है। सिख और जैन हिन्दू धर्मानुयायी हैं, तो फिर बौद्ध और हिन्दू धर्म में परस्पर घनिष्ठता और एकता बढ़ाने में क्यों कठिनाई होनी चाहिए। लेकिन यह सब होगा तभी जब प्रवासी भारतीय स्वयं भी इसके लिए आगे आएँ । वैसे अभी भी उनकी गतिविधियाँ कम सराहनीय नहीं हैं।
ग्रेट ब्रिटेन, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, कनाडा, फिजी, ट्रिनीडाड, सूरीनाम और सिंगापुर में भारतीय मूल के लोग, विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक संगठन सार्वजनिक सेवा कार्य सुचारु रूप से चलाते हैं अफगानिस्तान, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, हांगकांग आदि देशों में भारतीय मूल के लोगों की संख्या काफी है पर विधिवत संगठन और रचनात्मक गतिविधियाँ अपनाने का उत्साह अभी उतना नहीं उभरा है। अफगानिस्तान तो वैसे भी आतंकवाद से झुलस रहा है। हाँ सूरीनाम की सनातन धर्मसभा, गयाना का गाँधी संगठन, बैंकाक की हिन्दू धर्मसभा का कार्य काफी समय से चल रहा है। इंडोनेशिया की हिन्दू धर्म परिषद ने तो ‘हिन्दूधर्म’ नामक मासिक पत्र भी निकालना शुरू किया था।
कैरेबियन टापुओं में श्रमजीवी भारतीयों की संख्या काफी है, उन्होंने धार्मिक संस्कारों को अपेक्षाकृत अधिक अच्छी तरह पकड़े रखा है। ट्रिनीडाड में 45 प्रतिशत से अधिक आबादी हिन्दू है। यही नहीं, वहाँ के प्रधानमंत्री भी भारतीय मूल के ही हैं। हालैण्ड सरकार के उपनिवेश ‘सूरीनाम’ में लगभग आधी आबादी भारतीयों की है। गयाना में कोई 60 प्रतिशत हिन्दू होंगे। बार्बेडोज, ग्रेनेडा, सेन्टविंसेन्ट में काफी भारतीय हैं।
ब्रिटेन में भारतीयों की संख्या पहले से भी काफी थी, अब और भी अधिक बढ़ रही हैं पूर्वी अफ्रीका के केन्या, तस्मानिया आदि देशों की भी यही स्थिति है। गयाना, सूरीनाम और ट्रिनीडाड में प्रायः प्रत्येक गाँव में राम या कृष्ण के मन्दिर हैं। यहाँ पर भजन-कीर्तन एवं संस्कार पद्धतियों का भी प्रचलन है।
जोमेका में लगभग चालीस हजार से भी अधिक भारतीय हैं। फीजी में प्रायः आधी आबादी भारतीयों की हैं ये लोग अभी भी हिन्दी समझते और बोलते हैं। हाँगकाँग यों तो अब चीन का एक अंग है पर वहाँ भी भारतीयों की संख्या पर्याप्त है। इनमें से ज्यादातर सिन्धी है। श्रीलंका कल तक भारत का ही अंग था। उसके पृथक हो जाने पर भी भारतीय मूल के लाखों हिन्दू धर्मानुयायी वहाँ मौजूद हैं। नेपाल भूटान को हिन्दू प्रधान देश कह सकते हैं। वर्मा में कुछ समय पूर्व भारतीयों की बड़ी संख्या थी, अब उसमें काफी कमी हो गयी है, फिर भी काफी तादाद में लोग अभी भी मौजूद हैं। सिंगापुर से लेकर जापान तक हर देश में भारतीयों की हिन्दू धर्मानुयायियों की काफी संख्या मौजूद है। योरोप, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड में भी व महत्वपूर्ण स्थानों पर वे कई महत्वपूर्ण व्यवसाय में लगे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन व जर्मनी आदि में तो भारतीय छात्र भी पर्याप्त संख्या में रहते हैं।
फिजी, माँरीशस, दक्षिण अमरीका और अफ्रीका में रहने वाले भारतीय वहाँ के अग्रगामी वर्ग में गिने जा रहे हैं। यहाँ के अलावा भी भारतीयों की स्थिति सम्पन्न एवं बुद्धिजीवी प्रतिभासम्पन्न की मानी जाती है। यदि ये अपनी पुरातन साँस्कृतिक गरिमा को स्वयं के जीवन में समुचित स्थान देकर औरों को उसका बोध कराएँ तो भारतीय संस्कृति को विश्वसंस्कृति बनते देर नहीं लगेगी।
देव-संस्कृति की इस पुरातन गरिमा को अभी भी अनेकों प्रवासीजन एवं अन्य देशों के मूल नागरिक अनेकों तरह से अपनी भावनाओं में सँजोये हैं। कम्बोडिया, खमेर, वियतनाम, उत्तर मलाया, आइलैंड निवासी अपने को कौडिन्य ब्राह्मण के वंशज कहते हैं। उनकी पौराणिक गाथा है कि कौडिन्य भारत से आए। उन्होंने यहीं गृहस्थ बसाया ओर वे उन्हीं के वंशज हैं। पूर्वी अफ्रीका में गुजराती और माल्टा एवं जिब्राल्टर में सिन्धी लोगों ने उन देशों की समृद्धि बढ़ाने में भारी सहयोग दिया है।
पाँचवीं शताब्दी से लेकर दसवीं शताब्दी तक मलाया, जावा, सुमात्रा, ब्रूनी, बाली आदि द्वीपों का प्रगाढ़ सम्बन्ध भारत के साथ था। भारतीय वहाँ बसे और व्यवसाय, शिक्षा, धर्म, सुरक्षा, शासन आदि सभी क्षेत्रों में वहाँ के निवासियों के साथ मिल-जुलकर काम करते रहे। यमन के प्राचीन राजभवनों में भारत की बनी काष्ठ मूर्तियाँ मिली हैं। उनकी खुदाई में नीलगिरि पर्वत के पाषाण खण्ड मिले हैं। इतिहासकार पेरीप्लस का कथन है कि पूर्वी अफ्रीका, अरेबिया, पर्शिया और सोकान्ना में भारतीयों का निरन्तर आवागमन रहा है।
इतिहासकार प्लीनी ने लिखा है कि रोम साम्राज्य भर में भारत में बने वस्त्र आभूषणों की भरमार थी। इसके लिए वहाँ से लाखों स्वर्ण मुद्राएँ भारत आती थीं। व्यवसाय के लिए ही नहीं भारतवासी वहाँ लोकशिक्षण एवं चिकित्सा के लिए भी पहुँचते थे। टागोवैरा उन दिनों भारतीय धर्म-पुरोहितों का केन्द्र स्थान था। स्कैडेनेविया में उपलब्ध बौद्ध मूर्तियों भारत से बौद्ध धर्म का प्रभाव वहाँ तक पहुँचना प्रमाणित करती है। मध्य एशिया, वैक्टोरिवा, सोगाडियना, तारीमवेसिन से प्राप्त अवशेषों से विदित होता है कि वहाँ कभी बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार रहा है। ऐसे ही प्रमाण मसका एवं काराशर में भी मिलते हैं।
प्रागैतिहासिक काल के तथ्यों का विश्लेषण करें तो महात्मा तुलसी के इदसी कथन को प्रमाणित मानना पड़ता है कि ‘भूमि सप्त सागर मेखला, एक भूप रघुपति कोसला।’ अर्थात् सातों महाद्वीपों में भारतीय संस्कृति का अविच्छिन्न प्रवाह प्रवाहित था। हाँ आज यह स्थिति अवश्य है कि वहाँ अब इसके ध्वंसावशेष ही मिलते हैं। इस सम्बन्ध में भिक्षु चमन लाल के ग्रन्थ ‘हिन्दू अमेरिका’ ग्रन्थ में अनेकों सन्दर्भों को देखा जा सकता है।
जहाँ तक वर्तमान स्थिति का सम्बन्ध है सी0 कोण्डापै द्वारा लिखित ‘इण्डियन ओवरसीज 1938-1949 नामक ग्रन्थ में विदेशों में बसे हुए भारतीयोँ के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ उपलब्ध है। लेकिन 1949 के बाद से अब तक परिस्थितियों में भारी बदलाव हुआ है। ये जानकारियाँ भी जिनमें सम्मिलित हों, ऐसे नए ग्रन्थ लिखे जाने और प्रकाशित करने की आज बड़ी आवश्यकता है। ऐसे प्रयास से अपने प्रवासी परिजनों के बारे में अधिक और अधिक जानने-समझने एवं आत्मीय सम्बन्धों को अपनाने की सहूलियत रहेगी।
शान्तिकुँज के संचालकों ने न केवल प्रवासी परिजनों के बीच समन्वय की संस्थापना की है, बल्कि उनके बीच देवसंस्कृति की प्रेरणा एवं प्रकाश को व्यापक बनाया है। इसके माध्यम से युगनिर्माण मिशन के समर्पित कार्यकर्त्ता उन्हें साँस्कृतिक अग्रदूत के रूप में प्रशिक्षित करने का प्रयत्न कर रहे हैं। अपनी इस समर्थ भूमिका को सक्षमतापूर्वक अपनाकर वे अपनी मूल संस्कृति को विश्व-संस्कृति का गौरव प्रदान कर सकेंगे।
पिछले दिनों समाचार पत्रों में सुर्खी के साथ एक समाचार छपा-”प्रवासी भारतीयों के लिए अलग मंत्रालय की माँग।” आई0ए0एन0एस॰ द्वारा प्रसारित इस समाचार में प्रवासी भारतीयों की न्यूयार्क में स्थित एक विश्वव्यापी संस्था की ओर से माँग उठायी गयी थी कि भारत सरकार इस संस्था को, जिसके साथ पंजीकृत 1.8 करोड़ भारतीय मूल के नागरिक है व विश्व भर में फैले हैं, मान्यता दे तथा इनके हितों को अपनी मातृभूमि में रक्षा हेतु एक अलग मंत्रालय गठित करें। इस संस्था का नाम है ‘गोपियो’ (ग्लोबल आर्गनाइजेशन ऑफ पीपुल ऑफ इण्डियन ऑरिजिन)। इसने न्यूयार्क में अपना 1 दिन का अधिवेशन पिछले दिनों जुलाई 97 के अंत में भारत की आजादी की स्वतन्त्रता की पचासवीं वर्षगाँठ के संदर्भ में किया एवं चीन में ऐसी ही गठित संस्था व मंत्रालय का हवाला देते हुए बताया कि उसके माध्यम से चीन के सारे विश्व भर में रहने वाले प्रतिभाशाली व भावनाशील अपनी मातृभूमि से जुड़े हैं एवं यह प्रयोग किस प्रकार भारत में भी सफल हो सकता है। इस मंत्रालय के गठन से चीन में “एक खिड़की पर मंजूरी” की प्रक्रिया कसे लाल फीताशाही हटी है एवं पूँजी निवेश से चीन की समृद्धि बढ़ी है। गोपिओं के अध्यक्ष डॉ0 थॉमस एब्राहम बड़े आशान्वित हैं व इक्कीसवीं सदी की ओर अग्रणी भारत से उन्हें बड़ी अपेक्षाएँ हैं। सभी सदस्यों के मन में अपनी मातृभूमि के लिए कुछ करने की उमंग है, जोश है।
परमपूज्य गुरुदेव ने आज से पच्चीस वर्ष पूर्व जब पूर्वी अफ्रीका का दौरा किया था एवं लौटकर अपना शोध प्रबन्ध ‘समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान’ के रूप में लिखा तो उनकी वेदना भी यही थी कि अपनी जन्मभूमि-मातृभूमि से पुरुषार्थ कर सुदूर देशों में आकर बसे अपने स्वजनों की सुध हम क्यों नहीं ले रहे जबकि वे हमें देना ही चाहते हैं। हमसे तो उन्हें मात्र स्नेह आत्मीयता व सहकार की आवश्यकता है। परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा कि- “राजनैतिक या साम्प्रदायिक उप निवेशवाद के दिन अब लद गए। एक विश्व की बात सोचने के साथ ही एक संस्कृति को भी ध्यान में रखना होगा। प्रचलित अनेकानेक संस्कृतियों के उपयोगी एवं महत्वपूर्ण अंश यदि एक स्थान पर एकत्रित कर दिए जाएँ तो उसका स्वरूप एक देवसंस्कृति जैसा बन जाता है। उस दृष्टि से भारत की ओर से भी प्रयास चलना चाहिए एवं हमारे विदेश में बैठे प्रवासी परिजनों की ओर से भी।” इसके लिए परमपूज्य गुरुदेव ने संस्कृति साहित्य के विश्व की सभी भाषाओं में अनुवाद एवं प्रकाशन घर-घर उसे पढ़ाने तथा हर व्यक्ति का जन्मदिवस, विवाह दिवस मनाए जाने के दो कार्यक्रम प्रारम्भ में दिए थे। बाद में उन्होंने साधनात्मक पुरुषार्थ की दृष्टि से प्रदूषित वातावरण में रह रहे परिजनों से वातावरण पुष्टि के लिए व स्वयं की आत्मिक प्रगति के लिए सुनियोजित साधना गायत्री मंत्र का सुविधानुसार जप एवं न्यूनतम साप्ताहिक यज्ञ की बात भी साथ में जोड़ी थी।
इन दिनों एक सर्वेक्षण के अनुसार उच्चस्तरीय डिग्री प्राप्त चिकित्सक, इंजीनियर, कम्प्यूटर विद्, पेरामेडीकल वर्कर्स एवं व्यवसायी बड़ी संख्या में विदेश में कार्यरत हैं। इनमें अधिकतम अमेरिका, कनाडा, इंग्लैण्ड, जर्मनी, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, साउथ अफ्रीका में हैं। भारत में प्रति वर्ष 12,500 चिकित्सक एवं 3500 से अधिक तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त औद्योगिकी वर्ग के निष्णात व्यक्ति निकलते हैं जिनमें से प्रायः पंद्रह से बीस प्रतिशत तुरन्त बाहर नौकरी पर जाते हैं। यह क्रम 1960-61 से सतत् बढ़ता चला जा रहा है। ऐसा अनुमान है कि प्रायः बीस हजार चिकित्सक (एम0डी0, एम0एस॰ स्तर के), पंद्रह हजार चिकित्सक (एम0बी0बी0एस॰ स्तर के), लगभग पैंतीस से चालीस हजार तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त मास्टर ऑफ साइंस उपर्युक्त देशों में हैं। शिक्षितों का सघनतम अनुपात अभी ऊपर लिखे देशों में ही है एवं ऐसा अनुमान है कि साढ़े चार करोड़ प्रवासी भारतीयों में प्रायः दो करोड़ इन देशों में स्थायी में स्थायी नागरिक के रूप में रह रहे हैं। फिजी, सूरीनाम, मारीशस, मेडागास्कर, जापान, सिंगापुर, मलेशिया, चीन, रूस, फ्राँस पुर्तगाल, बेल्जियम, स्पेन, इटली, डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन, टर्की कुवैत, ईरान, सउदी अरब, तंजानिया, केन्या, युगाण्डा, जिंबाब्वे में भी भारतीय बड़ी संख्या में हैं। लैटिन अमेरिकन राष्ट्र ब्राजील, अर्जेन्टीना, ऊरुग्वे, पनामा, इक्वाडोर में इनकी संख्या कम है पर इनकी उपस्थिति वहाँ बड़ा महत्व रखती है। अमेरिका में नासा, जो अंतरिक्ष में वैज्ञानिकों को भेजती है।, अधिकाँश वैज्ञानिक भारत, तैवान, कोरिया या जापान के हैं। जर्मनी में बंगाल से गए ढेरों वैज्ञानिक उच्च पदों पर महत्वपूर्ण स्थिति में कार्य कर रहे है। इंग्लैण्ड में भारतीय साँसद के रूप में चुने गए हैं एवं उनका हाउस ऑफ कामन्स व हाउस ऑफ लार्डस् में अच्छा खासा दबदबा है। यही स्थिति कनाडा की है जहाँ पश्चिम में स्थित वैंकूवर से पूर्व में स्थिति टोरेण्टो मण्ट्रियल तक पंजाब व गुजरात से गए भारतीय बहुतायत में हैं-तीन तो मंत्री हैं एवं कुछ साँसद । अमेरिका भारत से क्षेत्रफल की दृष्टि से लगभग 4 गुना बड़ा प्राकृतिक संसाधनों से भरा देश है। यहाँ चप्पे-चप्पे में भारतीय-गुजरात, पंजाब, तेलगू, तमिल, बंगाल, उ0प्र0 मूल के बसे हुए हैं एवं भिन्न-भिन्न रूपों में उपार्जन कर देव-संस्कृति की गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखने के प्रयास में लगे हैं। जापान व चीन में पिछले दिनों उद्योग से जुड़े काफी भारतीय जाकर बसे हैं। हाँगकाँग चूँकि अब चीन में मिल गया है, वहाँ के सभी सिंध मूल के भारतीय प्रसन्नतापूर्वक तालमेल बिठाकर वहाँ कार्य कर रहे हैं। यही स्थिति जापान की है, जहाँ भारतीय उद्योग तंत्र में महत्वपूर्ण स्थानों पर हैं।
उपर्युक्त विश्लेषण इसलिए सामने रखा गया ताकि यहाँ बैठे हमारे भारतीय समुदाय को अपने एक विशिष्ट अंग की जानकारी हो सके जो बड़ी संख्या में भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व प्रायः सभी देशों में कर रहा है। जितनी बड़ी संख्या प्रवासी भारतीयों की है उससे कम जनसंख्या वाले देश विश्व में कुछ नहीं तो कम से कम पचास है। इससे हमें एक ताकत का अहसास हो सकता है जो हमारे पास है, हमारी ही जड़ों से जुड़ी नियमित संपर्क बनाए रखे हुए है। इनके पास जो पूँजी है उसके द्वारा भारत पर चढ़ा कर्ज हो मात्र नहीं उतारा जा सकता अपितु भारत अपनी संसाधनों की सम्पदा व उस पूँजी के बल पर पूरे विश्व का आर्थिक नेतृत्व कर सकता है, यह ‘फाँरचून’ पत्रिका का विश्लेषण है।
यहाँ से गए भारतीय, प्रारम्भ में तो वहाँ की चकाचौंध में लिप्त हो पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित हो उसी को अंगीकार कर बैठे थे। किन्तु जैसे-जैसे उनकी दूसरी व तीसरी पीढ़ियाँ निकलने लगीं, उन्हें अनुभव हुआ कि उन्हें साँस्कृतिक पोषण की, आध्यात्मिक खुराक की आवश्यकता है नहीं तो वे अपनी संततियों का खो देंगे। गुजराती परिवारों ने अपने घरों में बच्चों से गुजराती में , पंजाबी परिवारों ने हिन्दी या पंजाबी में बोलने का क्रम जारी रखा, इसी का परिणाम है कि वहाँ तीसरी पीढ़ी को सँभालने में अधिक समय नहीं लगा। भारत से जाने वाले धर्मतंत्र के अग्रदूतों ने उन्हें उनकी पहचान दी एवं क्रमशः 95-96 तक का समय आने तक यह स्थिति आने लगी कि ऐसा लगा कि भारतीय मूल से जुड़े हमारे परिजन एवं उनके बच्चे अब साँस्कृतिक दूत की भूमिका निभाकर वहाँ के मूल अँग्रेज अमेरिकन, एशियन, कैनेडियन, फ्रेंच, स्पेनिश व्यक्तियों को भी भारतीय परिवेश में रंग सकेंगे, उन्हें मानसिक शान्ति-ध्यान का संदेश दे सकेंगे तथा संभवतः आगामी दस वर्षों में विश्व संस्कृति के विराट परिकर में बाँध सकेंगे।
परमपूज्य गुरुदेव की 1972 की यात्रा के बाद एक छिटपुट प्रयास 1971-80 में केन्या-नैरोबी से विदेश प्रवास का आरम्भ हुआ जो 1984-85 तक ही चल पाया था। किन्हीं कारणों वश बड़ी शानदार शुरुआत वाले इस प्रयास के बदलते स्वरूप को देखकर पूज्य गुरुदेव द्वारा रोक लगायी गयी। किन्तु प्रवासी परिजनों का विभिन्न देशों से आने, उनसे पत्राचार का क्रम चलता रहा, बढ़ता रहा अनेकों शाखाएँ विभिन्न देशों में खुलीं एवं गायत्री साधना एवं यज्ञ को आधार मानकर भारत मूल के परिजनों ने अपनी सक्रियता एवं शाँतिकुँज-हरिद्वार, परमपूज्य गुरुदेव वंदनीया माताजी के प्रति श्रद्धा को अडिंग बनाए रख निरन्तर अपने गुरुद्वारे आने का क्रम जारी रखा। 1991 में परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण एवं श्रद्धाँजलि समारोह के बाद तत्कालीन उपराष्ट्रपति (बाद में राष्ट्रपति) डॉ0 शंकरदयाल शर्मा द्वारा तिलक लगाकर परमवंदनीया माताजी की उपस्थिति में प्रथम दल की 26 जून 1991 को इंग्लैण्ड के दौरे पर रवाना किया गया। जन चेतना को जगाने, उनके गौरव का आभास कर दिलों की दूरी मिटाने का प्रयास इस दल द्वारा किया गया। पूरे यू0के0 में स्थान-स्थान पर कार्यक्रम हुए जिनमें 108 कुण्डी यज्ञ 4 स्थानों पर, 51 कुण्डी यज्ञ प्रायः दस स्थानों पर एवं छिटपुट कार्यक्रम हुए । उसी दौरे पर कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पहली बार वहाँ के छात्रों के बीच इंग्लिश में व्याख्यान हुआ। विभिन्न सेमिनार में कई मेम्बर ऑफ पार्लियामेंट भी आए एवं प्रभावित होकर गए। बी0बी0सी0 वर्ल्ड ने भी वार्ता रिकार्ड कर दो बार रिले की। यह प्रारम्भिक प्रयास क्रम बाद में यू0के0 के साथ नार्वे, डेनमार्क, केन्या, तंजानिया, जिंबाब्वे तथा 1992 में आस्ट्रेलिया, फिजी, न्यूजीलैण्ड, साउथ अफ्रीका, यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका, कनाडा के विस्तृत दौरे में परिणत हो गया। मात्र दो वर्ष के अन्दर अनेकानेक शाखाएँ स्थापित हो गयीं, घर-घर में ज्ञान घट स्थापित हुए, देव स्थापनाएँ हुई, साथ ही कार्यकर्त्ता प्रशिक्षण भी चला। इससे स्थानीय स्तर पर कई कार्यकर्त्ता प्रशिक्षित हो आगामी वर्ष में होने वाले लेस्टर (यू0के0), टोरेण्टो (कनाडा), लॉसएँजेल्स (यू0एस0ए0) के अश्वमेध महायज्ञों के लिए तैयार होते चले गए। गायत्री मंत्र की धुन का संकीर्तन व दीपयज्ञों की धूम अमेरिका, कनाडा के चर्चों तक पहुँच गयी। इसी बीच एक विशिष्ट उपलब्धि ‘हाउस ऑफ काँमन्स’ में शान्तिकुँज प्रतिनिधि के उद्बोधन के रूप में मिली जिसमें कई साँसद भारतीय संस्कृति की प्राणचेतना से अनुप्राणित हुए। इस बीच विभिन्न कथा वाचकों, धर्मोपदेशकों के जाने व कार्यक्रम सम्पन्न करते रहने का क्रम सारे विश्व के विभिन्न राष्ट्रों में चलता रहा किन्तु गायत्री परिवार का एक ही उद्देश्य रहा कि किसी तरह अपनी युवा पीढ़ी को पाश्चात्यीकरण की आँधी दौड़ में शामिल होने से बचाया जाय। पूज्यवर द्वारा दिया गया वैज्ञानिक चिंतन इतना सटीक है कि उसने युवा वर्ग को विशेष रूप से प्रभावित कर मिशन का एक अंग बना दिया। प्रारम्भ में अब तक जुड़े नए परिजनों में युवक-युवतियों का प्रतिशत प्रायः 65 से 70 प्रतिशत के बीच है। उन्हें शान्तिकुँज से नियमित साहित्य मिलने लगा जिसने उन्हें जीवन जीना सिखाया। देव-स्थापना क्रम ने घर में शाँति ला दी, दुर्व्यसन मिटा दिए एवं आस्तिकता विस्तार की प्रक्रिया काफी बलवती हुई। यू0के0 में श्री वेदमाता गायत्री परिवार, तंजानिया केन्या में गायत्री परिवार युगनिर्माण अमेरिका व कनाडा में आलवर्ल्ड गायत्री परिवार न्यूजीलैण्ड, फिजी, आस्ट्रेलिया में श्री वेदमाता गायत्री परिवार के नाम से संगठन पंजीकृत व चेरिटी रजिस्ट्रेशन प्राप्त कर प्रायः तीन सौ से अधिक शाखाओं के रूप में वहाँ से शासन द्वारा मान्यता प्राप्त हैं व विधिवत् कार्य कर रहे हैं।
युवावर्ग को 5 मिनट आहार-व्यायाम हेतु, 5 मिनट मानसिक प्रखरता के विकास हेतु प्राणायाम के लिए तथा 5 मिनट मानसिक शाँति व दिव्य शक्तियों के जागरण हेतु सूर्य के ध्यान के लिए देने का जो आग्रह केन्द्रीय प्रतिनिधियों ने किया उसके परिणाम 1993-94 से ही देखे जाने लगे एवं यह प्रक्रिया और समय बढ़ाकर सभी ने आरम्भ भी की व वहाँ के मूल के छात्रों को भी इससे जोड़ा। सभी ने न्यूनतम तीन वर्ष में एक बार शान्तिकुँज, गायत्री तपोभूमि आने, पढ़ाई में मन लगाकर सतत् पढ़ने, आत्मनिर्भर होते ही एक कार्यकर्त्ता के रूप में समयदान-अंशदान करने का संकल्प लिया जो कि एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। साउथ अफ्रीका, अमेरिका व कनाडा, इंग्लैण्ड में मिली उपलब्धियों से एक बात समझ में आई कि सीधी सरल अँग्रेजी में साहित्य युवावर्ग को उपलब्ध कराना चाहिए। इसी बीच शान्तिकुँज प्रतिनिधि को सम्मान पूर्वक इंडिया हैरिटेज फाउण्डेशन की ओर से ‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ हिंदुइज्म’ का मानक संरक्षक व संपादन सलाहकार नियुक्त किया गया। पारस्परिक परामर्श से साउथ कैरोलीना यूनिवर्सिटी में हो रहे इस कार्य में डॉ0 शेषगिरि राव एवं मुनि चिदानन्द जी ने इन पंक्तियों के लेखक से भरपूर सहयोग चिंतन के स्तर पर माँगा। इससे भावी संभावनाएँ काफी प्रबल हो गयी हैं।
1993 में परमवंदनीया माताजी की उपस्थिति में तीन विराट् अश्वमेध महायज्ञ लेस्टरशायर (यू0के0), टोरेण्टो (ओण्टेरियो-कनाडा) एवं लॉसएंजेल्स (कैलोफोर्निया-यू0एस0ए0) में जुलाई अगस्त में भव्यता के साथ संपन्न हुए। प्रत्येक में प्रायः 1 लाख से डेढ़ लाख की उपस्थिति रही एवं देवसंस्कृति का विराट रूप पहली बार वहाँ के लोगों ने देखा। दर्शकों, भागीदारों, रुचि लेने वालों में वहाँ के मूल के लोगों का अनुपात तीस प्रतिशत था। इन अश्वमेधों की परिणति स्वरूप ही जो यहाँ नहीं आ सकते थे, मातृसत्ता के दर्शन उन्हें वहीं हो गए एवं परिजनों की संख्या बढ़ती ही चली गई। विजन 2000 (वाशिंगटन) एवं वर्ल्ड पार्लियामेण्ट ऑफ रिलीजन (शिकागो) में 1993 में ही आयोजित थी। इनमें मिशन की शीर्ष भागीदारी रही एवं वैज्ञानिक अध्यात्मवाद प्रधान चिन्तन को बड़ी उत्सुकता पूर्वक सभी के द्वारा सुना गया। लॉसएंजेल्स, सेक्रामेण्टो, सेनफाँसिस्कों, साँन होजे, शिकागो, अटलाण्टा, हास्टन, वाशिंगटन मियामी, न्यूजर्सी न्यूयार्क, बोस्टन, अलबामा
*समाप्त*