अंधकार जब गहराता चला जाय, तो इसकी सघनतम स्थिति के अति समीप ही प्रभातकाल की ब्रह्मबेला भी जुड़ी रहती है। गर्मी की अतिशय तपन बढ़ चलने पर वर्षा की संभावना का अनुमान लगाया जा सकता है और वह सार्थक भी भी होता है। चारों ओर झुलस गयी धरती हरियाली के कवच से भर जाती है, मानो एक अप्रत्याशित चमत्कार-सा हुआ हो। दीपक जब बुझने को होता है, तो उसकी लौ जोर-जोर से चमकती है, लपलपाने लगती है। मरण की बेला अतिनिकट होने पर भी रोगी में हलकी-सी चेतना अवश्य लौट आती है और असामान्य रूप से लंबी-लम्बी साँसें लेने लगता है। सभी जानते है कि मृत्यु की बेला समीप आ गयी है। मरण के पूर्व कुछ ही पहले चींटी पर निकलने लगते है।
उपर्युक्त उदाहरण आज की युगसंधि की बेला एवं प्रज्ञावतार के आगमन के पुण्य-प्रयोजन की व्याख्या हेतु दिये गये है। इन दिनों असुरता जीवन-मरण का संघर्ष कर रही है। उसे समाप्त होना ही हैं, मात्र उसका अंतिम चरण ‘हताशा की स्थिति में एक उग्र रूप और-इस परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिए। अनीति की थोड़ी मात्रा नीतिवानों की के सामने चुनौती बनकर पहुँचती और उन्हें अनौचित्य से लड़ पड़ने की उत्तेजना एवं पौरुष प्रदान करती है। जन-जन को दुष्टता का पराभव देखने का अवसर मिलता है। जागरूकता, आदर्शवादिता और साहसिक का उभार होता ही तब है जब अनय के असुर की दुरभिसंधियाँ देवत्व में आक्रोश का आवेश भरती हैं। इस दृष्टि से अनय का अस्तित्व दुखदायी होते हुए भी अन्ततः उत्कृष्टता के प्रखर बने रहने की संभावनाएँ प्रशस्त बनाये रखता है।
किंतु यदा-कदा परिस्थितियाँ ऐसी ही आती है, जब संत सुधारक और शहीद अपने पराक्रम-पराभव का परिमाण भारी देखते हैं एवं विपन्नता से लड़ते-लड़ते भी सत्परिणाम की संभावना को धूमिल देखते हैं। ऐसे अवसरों पर अवतार का पराक्रम उभरता है। और ऐसी परिस्थितियाँ विनिर्मित करता है, जिससे पासा पलटने, परिस्थिति उलटने का असंभाव्य भी संभव न हो सके। विपत्ति की विषम वेला में सदा से यही होता रहा है। भविष्य में भी यही क्रम चलेगा। वर्तमान में इसके महातथ्य का प्रत्यक्ष स्पष्टीकरण सामने है। युगपरिवर्तन की इस पुण्यवेला में प्रज्ञावतार की प्रखर भूमिका संपादित होते हुए ज्ञानवानों की पैनी दृष्टि सरलतापूर्वक देख सकती है। -परमपूज्य गुरुदेव
अखण्ड ज्योति अगस्त, 1969
ठन दिनों युगसन्धि का शुभारम्भ है। अदृश्यदर्शियों से लेकर राजनेताओं और दार्शनिकों से लेकर अर्थशास्त्रियों तक इस तथ्य को समझते और स्वीकार करते है। तर्क और तथ्य दोनों ही किसी महान परिवर्तन की आवश्यकता ही नहीं सम्भावना भी देखते है। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। रात्रि का अन्त दिन में होता है और मरण कालान्तर में जीवन बनकर प्रकट होता है। पेड़ से टूटा फल कुछ ही समय बाद अंकुरित होता और स्वयं उस स्तर का बनता है जैसा कि पिछले समय उसे आश्रय के लिये मिला था। गतिचक्र की प्रक्रिया में यह भी सम्मिलित है कि संकटों से सताये जाने पर पौरुष उभरे और ऐसा कुछ कर गुजरे जैसा कि सामान्य जीवन में सम्भवतः बन ही नहीं पड़ता। लंघन के बाद तेजी से भूख बढ़ती और स्वास्थ्य सुधरता है। प्रसूतायें भारी क्षति उठाने के कारण उन दिनों अत्यन्त क्षीण दुर्बल दीखती हैं किन्तु प्रसव के उपरान्त उनका स्वास्थ्य इतनी तेजी से सुधरता है कि उस क्षति का पतन और उत्थान का भी यही क्रम है। प्रकृति का गतिचक्र इसी प्रकार घूमता है। न पतन स्थिर रहता है,न उत्थान। बचपन पाने के लिए परिवर्तन का नया रोल अपनाता प्रक्रिया के सहारे ही इस संसार की सारी व्यवस्था चल रही है।
प्राचीनकाल में इस धरती पर स्वर्ग बिखरा हुआ था मनुष्य में देवस्तर की उत्कृष्टता विद्यमान थी। संस्कृति का वह भव्य भवन जराजीर्ण होते होते खण्डहर वस्तुऐं दुर्गतिग्रस्त भी तो सही पर प्रतिक्रिया ने उन्हें पहले की अपेक्षा कहीं अधिक समुन्नत बना दिया।
मध्यकाल अन्धकार युग की तरह बीता है। उसमें हर स्तर की विकृतियाँ बढ़ी। अंधेरे की प्रकृति ही कुछ ऐसी है। निशा स्तर का हर प्राणी अपने अपने ढंग के कुचक्र रचता और अनाचार करता है। मध्यकाल में शासन में सामंतवाद घुसा। साथ ही पूँजीवादी बिखराव, दास और स्वामी छत अछूत जैसी विकृतियाँ अपने ढंग से बढ़ती चली गई। मत्स्य न्याय का बोलबाला हुआ। दुर्बल समर्पण करते चले गये। तूफान में विशाल वृक्ष भी टूटते उखड़ते देखे जाते है।
संसार की समग्र परिस्थिति पर विचार करने पर भी वैसा ही अंधेरा दिखाई पड़ता है। यों वायुप्रदूषण,रेडियो विकिरण जल की कमी,जनसंख्या वृद्धि ऊर्जासंकट उत्पादन स्रोतों का सूखना-प्रकृति-प्रकोप जैसी विभीषिकाएँ भी कम भयानक नहीं है, पर अणु आयुधों के माध्यम से लड़े जाने वाले भावी युद्ध की परिणति पर विचार करने मात्र से रोमांच खड़े होते है और लगता है-प्रलय का दिन अब दूर नहीं रहा। सामूहिक आत्महत्या के लिये मनुष्य का प्रवर्तन अब तब में आरम्भ होने ही वाला है। खुली आँखों से देखने पर लोग चलते फिरते कमाते-खाते,सो -जागते सामान्य जीवन जीते दिखाई पड़ते है और छुटपुट उपद्रवों के अतिरिक्त कोई बड़ा प्रत्यक्ष संकट दिखाई नहीं पड़ता। किन्तु जो अप्रत्यक्ष को देख और समझ सकते है, वे जानते है कि स्थिति कितनी भयावह है शहतीर में लगा घुन, रक्त में घुसा केन्सर चढ़ा हुआ ऋण, प्रत्यक्ष नहीं दीखते पर वे विपत्ति रहते हैं। प्रत्यक्ष न होने के कारण उनकी विभीषिका को हलका नहीं माना जा सकता। स्थिति को और भी अधिक अच्छी तरह समझने की आवश्यकता है ताकि उसका उपाय रहते कुछ सोचा ताकि और उपचार असंभव होने से पहले ही कुछ किया जा सके।
यह पृथ्वी ब्रह्माण्ड में उड़ने वाले असंख्य ग्रह-पिण्डों से असाधारण और अद्भुत है। लगता है उसे स्रष्टा ने अपने समस्त कलाकारिता संजोकर बनाया है और उस पर रहने वाले मनुष्य को कुछ ऐसा बनाया है कि वह उसकी इच्छा के अनुरूप धरती के वातावरण को सुरम्य बना सकने में समर्थ हो सके। इतने पर भी विकृतियाँ तो विकृतियाँ ही है। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति की तरह निकृष्टता भी मानवी चेतना को पतनोन्मुखी प्रेरणा देती रहती है। रोकथाम में ढील पड़ने पर पतनक्रम वैसा ही तेजी घूमने लगता है जैसा कि इन दिनों देखा जा सकता है। इन परिस्थितियों के बेकाबू होने से पूर्व ही स्रष्टा को साज संभाल करनी पड़ती है। असंतुलन को मनुष्य जब तक संभाल सके। तब तक ठीक, अन्यथा स्रष्टा अपनी विशिष्ट सत्ता को गतिशील करते और अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलते हैं। भगवान के अवतारों की श्रृंखला भूतकाल में भी यहीं करती रही है और इन दिनों भी यही करने जा रही है। ऐसे विशिष्ट अवसरों का युगसन्धि कहते है।
युगपरिवर्तन की इस सन्धिवेला में विनाश की विभीषिकाएँ अधिक भयावह होने जा रही है। दूसरा पक्ष सृजन का है, शुभारम्भ के दिनों की तत्परता देखते ही बनती है। शिशुजन्म,नया गृहस्थ शिलान्यास जैसे अवसरों पर लोग भावावेश में होते और भारी दौड़-धूप करते देखे जाते है। सृजन की शक्तियाँ भी इन दिनों उतनी ही सक्रिय है जितनी कि मरणासन्न विध्वंस की।
युगसन्धि की प्रसवपीड़ा से उपमा दी गई है। एक ओर असह्य व्यथा वेदना दूसरी ओर सुखद सम्भावना की गुदगुदी। ऐसे समय में डॉक्टर और नर्स पूरी सतर्कता बरतते हैं इन इन दिनों जाग्रत आत्माओं की भूमिका भी ऐसी ही होनी चाहिये जिससे विनाश से आत्मरक्षा और विकास का परिपोषण भली प्रकार सम्भव हो सके।
अशुभ से न तो डरना चाहिये और न शुभ के हर्षातिरेक में अकर्मण्य बनना चाहिये। विशेष अवसरों पर विशेष स्तर के धैर्य सन्तुलन साहस और पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। असन्तुलन में तो हानि ही हानि है। हड़बड़ाने से विपरीत बढ़ती है और सुखद सम्भावनाओं के अस्त व्यस्त होने का भय रहता है।
विशिष्ट अवसरों की आपत्तिकाल कहते है और उन दिनों आपत्ति धर्म निभाने की आवश्यकता पड़ती है। अग्निकाण्ड, दुर्घटना दुर्भिक्ष बाढ़ भूकम्प युद्ध महामारी जैसे अवसरों पर सामान्य कार्य छोड़कर भी सहायता के लिये दौड़ना पड़ता है। छप्पर उठाने धान रोपने शादी -खुशी में साथ रहने सत्प्रयोजनों का समर्थन करने के लिये भी निजी काम छोड़कर उन प्रयोजनों में हाथ बटाना आवश्यक होता है। युगसन्धि में जागरूकों को युगधर्म निभाना चाहिये व्यक्तिगत लोभ मोह को गौण रखकर विश्वसंकट की इन घड़ियों में उच्चस्तरीय कर्तव्यों के परिपालन को प्रमुख प्राथमिकता देनी चाहिये। यही परिवर्तन की इस प्रभातवेला में दिव्य प्रेरणा,जिसे अपनाने में ही हर दृष्टि से हर किसी का कल्याण है।
संसार के सभी विद्वान ज्योतिर्विद् और अतीन्द्रियद्रष्टा इस सम्बन्ध में एकमत है कि युगपरिवर्तन का समय आ पहुँचा। उनके अनुसार यह समय युगसंधि की वेला है ओर इन दिनों संसार में अधर्म, अशान्ति, अन्याय, अनीति तथा अराजकता का जो व्यापक बोलबाला दिखाई दे रहा है। उसके अनुसार परिस्थितियों की विषमता अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई है। ऐसे ही समय में धर्म की रक्षा और अधर्म का विध्वंस करने के लिये भगवान का अवतार लेने की शास्त्रीय मान्यता है। 'यदा यदा हि धर्मस्य' की प्रतिज्ञा के अनुसार ईश्वरीय सत्ता इस असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिये कटिबद्ध है और संतुलन साधने के लिये सूक्ष्मजगत में उसी की प्रेरणा से परिवर्तनकारी हलचलें चल रही है।
युगपरिवर्तन के समय ईश्वरीय शक्ति के प्राकट्य और अवतरण की प्रक्रिया सृष्टिक्रम में सम्मिलित है। असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिये अपनी प्रेरणा पुरुषार्थ प्रकट करने के लिये भगवान वचनबद्ध है। गीता में दिया गया उनका 'तदात्मानः सृजाम्यहम्' का आश्वासन ऐसे ही अवसरों पर प्रत्यक्षं
होता रहा है। आज की स्थितियाँ भी ऐसी है कि उनमें ईश्वरीय शक्ति के प्राकट्य की भगवान के अवतार की प्रतीक्षा की जा रही है। और सूक्ष्मदर्शी ईश्वरीय सत्ता की अवतरण प्रक्रिया को सम्पन्न होते देख रहे है।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार यह समय कलियुग के अंत तथा सतयुग के आरम्भ का है इसलिये भी इस समय को युगसंधि की वेला कहा है। यद्यपि कुछ रूढ़िवादी पंडितों का कथन है कि युग 4 लाख 32 हजार वर्ष का होता है। उनके अनुसार अभी एक चरण अर्थात् एक लाख आठ हजार वर्ष ही हुए है। इस हिसाब से तो अभी नया युग आने में 3 लाख 24 हजार वर्ष की देरी है। वस्तुतः यह प्रतिपादन भ्रामक है। शास्त्रों में कही भी ऐसा उल्लेख नहीं मिलता कि 4 लाख 32 हजार वर्ष का एक युग होता है सैकड़ों वर्षों तक धर्म शास्त्रों पर पंडितों और धर्मजीवियों का ही एकाधिकार रहने से इस सम्बन्ध में जनसाधारण भ्रान्त ही रहा और इतने लम्बे समय तक की युगगणना के कारण उसने न केवल मनोवैज्ञानिक दृष्टि से पतन की निराशा भरी, प्रेरणा दी वरन् श्रद्धालु भारतीय जनता को अच्छा हो या बुरा, भाग्यवाद से बंधे रहने के लिये विवश किया। इस मान्यता के कारण ही पुरुषार्थ और पराक्रम पर विश्वास करने वाले भारतीयों को अफीम की घूँट के समान इन अतिरंजित कल्पनाओं का भय दिखाकर अब तक बौद्धिक पराधीनता में जकड़े रखा गया। इस सम्बन्ध में ज्ञातव्य है कि जिन शास्त्रीय संदर्भों से युगगणना का यह अतिरंजित प्रतिपादन किया है वहाँ अर्थ को उलट पुलट कर तोड़ा मरोड़ा ही गया है। जिन सन्दर्भों को इस प्रतिपादन की पुष्टि के लिये प्रस्तुत किया गया है। वे वास्तव में ज्योतिष के ग्रन्थ है। वह प्रतिपादन गलत नहीं है। अन्यथा मूल शास्त्रीय वचन अपना विशिष्ट अर्थ रखते है। उनमें ग्रह नक्षत्रों की भिन्न भिन्न परिभ्रमण गति तथा ज्योतिषशास्त्र के अध्ययन में सुविधा की दृष्टि से ही यह युगगणना है।
जितने समय में सूर्य अपने ब्रह्माण्ड की एक परिक्रमा पूरी कर लेता है उसी अवधि को चार बड़े भागों में बाँटकर चार देवयुगों की मान्यता बनाई गई और 4 लाख 32 हजार वर्ष का एक देवयुग माना गया। प्रचलित युगगणना के साथ ताल मेल बिठाने के लिये छोटे युगों को अंतर्दशा की संज्ञा दे दी गई और उसी कारण वह भ्रम उत्पन्न हुआ, अन्यथा मनुस्मृति, लिंग पुराण प्रस्तुत की गई है वह सर्वथा भिन्न ही है। मनुस्मृति में कहा गया है-
ब््राह्मस्य तु क्षपाहस्य यत्प्रमाणं समासतः। एकैकषों युगानाँ तु क्रमषस्तत्रिबोधत॥
चत्वार्याहुः सहस्त्राणि वर्षाणाँ तत्कृतं युगम। तस्य तावच्छती संध्या संध्याँषष्च तथाविधः। इतरेशु ससंध्येशु च त्रिशु। एकापायेन वर्तन्ते सहस्त्राणि षतानि च-म्नु
अर्थात् -ब्रह्माजी के अहोरात्र में सृष्टि के पैदा होने और नाष होने में जो युग माने गये है वे इस प्रकार है चार हजार वर्ष और उतने ही शत अर्थात् चार सौ वर्ष की पूर्व संध्या और चार सौ वर्ष की उत्तर संध्या, इस प्रकार कुल 4800 वर्ष का सतयुग इसी प्रकार तीन हजार छह सौ वर्ष का त्रेता दो हजार चार सौ वर्ष का द्वापर और बारह सौ वर्ष का कलियुग।
हरिवंश पुराण के भविष्यपर्व में भी युगों का हिसाब इसी प्रकार बताया गया है, यथा
अहोरात्रं भजेत्सूर्यो मानवं लौकिकं परम्। तापुपदाय गणनाँ श्रृणु संख्याष्ष्च तथा नृप॥
त्रीणी वर्शसहस्त्राणि त्रेता स्यात्परिमाणतः। तस्याष्च त्रिषती संध्या सन्ध्याष्ष्च तथाविधः।
तथा वर्शसहस्त्रे द्वे द्वापरं परिर्कीितम्। तस्यापि द्विषती सन्ध्या सन्ध्याष्ष्च तथाविधः।
कलिर्वर्शसहस्त्रं च संख्यातोडत्र मनीशिभिः। तस्यापि षतिका सन्ध्या सन्ध्याँषष्चेव तद्विधः॥
अर्थात् हे अरिदंभ! मनुष्यलोक के दिन रात का जो विभाग बतलाया गया है उसके अनुसार युगों की गणना सुनिये चार हजार वर्षों का एक कृतयुग होता है और उसकी संध्या चार सौ वर्ष की तथा उतना ही संध्या भी तीन तीन सौ वर्ष का होता है द्वापर को दो हजार वर्ष कहा गया है। उसकी संध्या तथा संध्या दो दो सौ वर्ष के होते है। कलियुग को विद्वानों ने एक हजार वर्ष का बतलाया है और उसकी संध्या तथा संध्या भी सौ वर्ष के होते है। लिंग पुराण तथा श्रीमद्भागवत में भी इसी प्रकार की युगगणना मिलती है। भागवत् के तृतीय स्कन्ध में कहा गया है।
चत्वारि त्रीणि द्वे चैकं कृतादिशु यथाक्रमम्। संख्यातानि सहस्त्राणि द्विगुणानि षतानि च॥
अर्थात् चार तीन दो और एक ऐसे कृतादि युगों यथाक्रम द्विगुण सैकड़ों की संख्या बढ़ती है। आशय यही है कि कृतयुग के चार हजार वर्ष में आठ सौ वर्ष और जोड़कर 4800 वर्ष माने गये। इसी प्रकार शेष तीनों गुणों की कालावधि समझे जाय। कुछ स्थानों पर मनुष्यों के व्यवहार के लिये बारह वर्ष का एक युग भी माना गया है। जिसको एक हजार से गुणा कर देने पर देवयुग होता है जिसमें चारों महायुगों का समावेश हो जाता है। इस बारह वर्ष के देवयुग को फिर एक हजार के गुणा करने पर 1 करोड़ 20 लाख वर्ष का ब्रह्मा का एक दिन हो जाता है। जिसमें सृष्टि को उत्पत्ति और लय हो जाता है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में इसी युग की बात कहीं है।
सहस्त्रयुगपर्यन्तमहर्यदब्रहाणो विदुः। रात्रिं युगसहस्त्राँन्ताँ ते डहारात्राविदो जनाः॥ 8-17
अहोरात्र को तत्त्वतः जानने वाले पुरुष समझते है कि हजार महायुगों का समय ब्रह्मदेव का एक दिन होता है और ऐसे ही एक हजार युगों की उसकी रात्रि होती है। लोकमान्य तिलक ने इसका अर्थ स्पष्ट करते हुये लिखा है कि महाभारत, मनुस्मृति और यास्कनिरुक्त में इस युगगणना का स्पष्ट विवेचन आता है लोकमान्य तिलक के अनुसार “हमारा उत्तरायण देवताओं का दिन है और हमारा दक्षिणायन उनकी रात है। क्योंकि स्मृति ग्रन्थों और ज्योतिषशास्त्र की संहिताओं में भी उल्लेख मिलता है कि देवता मेरु पर्वत पर अर्थात् दो आयनों छह-छह मास का हमारा एक वर्ष देवताओं के एक दिन रात के बराबर और हमारे 360 देवताओं के 360 दिन रात अथवा एक वर्ष के बराबर होते है। कृत,त्रेता द्वापर और कलि ये चार युग माने गये है। युगों की कालगणना इस प्रकार है कि कृतयुग में चार हजार वर्ष, त्रेतायुग में तीन हजार द्वापर में दो हजार वर्ष और कलि में एक हजार वर्ष। परन्तु एक युग समाप्त होते ही दूसरा युग एकदम आरम्भ नहीं हो जाता बीच में दो युगों के संधिकाल में कुछ वर्ष बीत जाते है। इस प्रकार कृतयुग के आदि और अन्त में प्रत्येक ओर चार सौ वर्ष का त्रेतायुग के आगे और पीछे प्रत्येक ओर तीन सौ वर्ष का, द्वापर के पहले और बाद में प्रत्येक ओर दो सो वर्ष का तथा कलियुग के पूर्व और अनन्तर प्रत्येक ओर सौ वर्ष का सन्धिकाल होता है, सब मिलाकर चारों युगों का आदि अन्त सहित सन्धिकाल दो हजार वर्ष का होता है। ये दो हजार वर्ष और पहले बताये हुये सांख्य मतानुसार चारों युगों के दस हजार वर्ष मिलाकर कुल मिलाकर बारह हजार वर्ष होते है। गीता रहस्य भूमिका पृष्ठ 193
इन गणनाओं के अनुसार हिसाब फैलाने से पता चलता है कि वर्तमान समय संक्रमणकाल है। प्राचीन ग्रन्थों में हमारे इतिहास को पाँच कल्पों में बाँटा गया है। 1- महतकल्प 1 लाख 9 हजार 8 सौ वर्ष विक्रमीय पूर्व से आरम्भ होकर 85800 वर्ष तक। 2- हिरण्यगर्भकल्प 85800 विक्रमीय पूर्व से 61800 वर्ष तक। 3- ब्रह्मकल्प 60800 विक्रमीय पूर्व से 37800 वर्ष तक। 4- पाद्मकल्प 37800 विक्रम पूर्व से 13800 वर्ष पूर्व तक और 5- वाराहकल्प 13800 विक्रम पूर्व से आरम्भ होकर अब तक चल रहा है।
कलियुग संवत् की शोध के लिये राजा पुलकेशिन ने विद्वान ज्योतिषियों द्वारा गणना कराई थी। दक्षिण भारत के 'इहोल' नामक स्थान पर प्राप्त हुये एक शिलालेख में इसका उल्लेख मिलता है इससे यही सिद्ध होता है कि कल्कि का प्राकट्य इन्हीं दिनों होना चाहिये। पुरातन इतिहास शोध संस्थान मथुरा के शोधकर्ताओं ने भी इसी तथ्य की पुष्टि की और ज्योतिष के आधार पर यह सिद्ध किया कि इस समय ब्रह्मरात्रि का तमोमय सन्धिकाल है।”
इसी सन्धिकाल में असन्तुलन उत्पन्न होता है। दैवीशक्तियों पर आसुरी प्रवृत्तियों का संघात होता है तथा अनीतिमूलक अवांछनीयताएँ उत्पन्न होती है। नवनिर्माण की सृजन शक्तियाँ ऐसे ही अवसरों पर जन्म लिया करती है क्योंकि तप-साधना होने के कारण ऐसे समय विभिन्न अनयकारी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है। मनुष्यकृत संकटों ओर प्राकृतिक आपदाओं की वृद्धि जब चरम सीमा पर पहुँचने लगती है, तो उसी समय निर्माणकारी सत्ता अपने सहयोगियों के साथ अवतरित होती है और जहाँ एक ओर अधर्म अन्याय अनाचार बढ़ता है वहाँ ये शक्तियाँ धर्म संस्कृति सदाचार सद्गुण तथा सद्भावों को बढ़ाकर संसार में सुख शान्ति की स्थापना के लिये यत्नशील होती है।
संक्रमणवेला में किस प्रकार की परिस्थितियाँ बनती और कैसे घटनाक्रम घटित होते है, इसका उल्लेख महाभारत के वनपर्व में इस प्रकार आता है-
ततस्तुमुलसंधातेवर्तमानेयुगक्षये। द्विजातिपूर्वकोलोकः क्रमेणप्रभविश्यति।
ततः कालाँतरेडन्यस्मिन्पुनर्लोकविवृद्धये। भविश्यतिपुनदैवमनुकूलंयद्च्छया॥
यदासूर्यष्चंद्रश्रतथातिश्यबृहस्पती। एकराषौसमेश्यंतिप्रपत्स्यतितदाकृतम्।
क्लवर्शीचपर्यन्योनक्षत्राणि शुभनिच। प्रदाक्षिणाग्रहाष्चापिभविष्यं त्यनुलोमगाः। मंसुभिक्षमारोग्यंभविष्यतिनिरामयम्॥
अर्थात् जब एक युग समाप्त होकर दूसरे युग का प्रारम्भ होने को होता है, तब संसार में संघर्ष और तीव्र हलचल उत्पन्न हो जाती है जब चन्द्र, सूर्य बृहस्पति तथा पुष्पनक्षत्र एक राशि पर आयेंगे तब सतयुग का शुभारम्भ होगा।
इसके बाद शुभ नक्षत्रों की कृपा-वर्षा होती हैं। पदार्थों की वृद्धि से सुख-समृद्धि बढ़ती है। लोग स्वस्थ और प्रसन्न होने लगते है।
इस प्रकार का ग्रहयोग अभी कुछ वर्षों पहले ही आ चुका है। अन्यान्य गणनाओं के आधार पर भी यही सिद्ध होता है कि युगपरिवर्तन का ठीक यही समय है। ठीक इन्हीं दिनों युग बदलना चाहिये। अनय को निरस्त करने और सृजन को समुन्नत बनाने वाली दिव्यशक्तियों का प्रबल पुरुषार्थ इस सन्धि में प्रकट होगा जो सन् 1980 से 2000 तक के बीस वर्षों के बीच की उपलब्धि है।
दिनभर आपको धूप दी, आपके पुत्र पौत्रों को प्रकाश और गर्मी प्रदान की और आप है। कि मुझे थोड़ी ही देर में विदा कर रहे हैं। कुछ अधिक देर ठहरने देते तो आपका क्या बिगड़ जाता। ढलते हुये सूरज ने मुसकराते हुये क्षितिज के पास लिखित उलाहना भेजा।
गम्भीर स्याही लेकर उत्तर लिखने बैठे तो कुल एक पंक्ति से वह आगे नहीं बढ़ सके। प्रातः के प्रकाश में सूर्य ने उसे पढ़ा। लिखा था- इसलिये कि तुम हर बार एक नई चमक एक नई रोशनी लेकर आओ और पहले से भी अधिक फैलाओ। सूर्य का सिर श्रद्धा से झुक गया।
सृष्टिक्रम में सृजन और उत्थान के तत्व प्रधान है। कृषि कर्म में भूमि शोधन बीजवपन,हरीतिमा का विस्तार पुष्प की शोभा और फलों की सम्पदा का वैभव भी अधिक समय तक दृष्टिगोचर होता है। इतने पर भी वह स्थिति न तो निर्वाध गति से चलती है और न स्थिर रहती है। कृमि कीटक और पशु उस हरीतिमा को नष्ट करने में कमी नहीं रहने देते। ऋतुप्रभाव भी कई बार इस उत्पादन में अवरोध उत्पन्न करता है। अन्ततः एक समय ऐसा आता है। जब पकी फसल सूखती और अपनी जीवनलीला समाप्त करती हैं। उत्पादन का क्रम चक्र चलते रहने के लिये आवश्यक है कि उत्थान के बाद पतन और पतन के बाद उत्थान का क्रम जारी रहे। सूर्य का उदय अस्त प्राणियों का जन्म मरण इस सुनिश्चित साक्षी देते रहते है।
सृष्टि की सुव्यवस्था और सुन्दरता देखने ही योग्य है। प्रगतिक्रम का एक इतिहास है जिसमें नये अध्याय का अन्त नहीं। पतन और पराभव के तत्व अपना काम करते है और प्राणियों की सुरक्षा के लिये अधिक जागरूक रहने की प्रेरणा देते है। जीवनप्रवाह का एक सिरा है जन्म दूसरा मरण। गतिचक्र इसी प्रकार बनता है। विस्तार सीधा चलता रहे उतना स्थान इस ब्रह्माण्ड में नहीं है। इसलिये उसे चक्रगति से परिभ्रमण करने के लिये बाधित किया गया है। पहिये नीचे जाते और ऊपर उठते हैं। सृष्टिक्रम में भी यही होता है। शैशव, किशोरावस्था,यौवन पूर्ण होते होते जराजीर्णता का आना आरम्भ हो जाता है और अन्ततः मरण के अतिरिक्त और कोई समाधान रह नहीं जाता हैं यह मरण भी अन्तिम नहीं है। समापन के दिन से ही नव जीवन की भूमिका आरम्भ हो जाती है। मृतक को नवीन जन्म मिलता। असमर्थ वयोवृद्ध के सामने मरण की निराशा रहती तो है पर उससे अगला कदम अभिनव शैशव के रूप में दूरदर्शी ज्ञानचक्षुषः आसानी से देख सकते है। निराशा की सघन तमिस्रा को प्रत्यक्ष देखते हुये भी उषा द्वारा नवीन अरुणोदय का आश्वासन हर आस्थावान् को उपलब्ध हो सकता है।
मनुष्य को मनः स्थिति के समष्टि प्रवाह में ही उत्थान पतन के पन्ने पलटते रहते है। सृजन प्रधान है उत्कर्ष तथ्य हैं। शालीनता के साथ व्यवस्था जुड़ी विस्तृत है। यही सुनिश्चित है। इतने पर भी पतन और पराभव से छुटकारा नहीं। घुन छोटा होता है, चिनगारी छोटी होती है और विषाणुओं की सत्ता भी नगण्य है, फिर भी वे चुपके चुपके इतना कर गुजरते है कि मरण अथवा उसके समतुल्य संकट का सामना करना पड़ता है। विश्व के इतिहास में ऐसी संकट की घड़ियाँ अनेक बार आई है, जिनमें विनाश के घटाटोप बादल छाये ही नहीं, भयानक रूप से गरजे और सब कुछ डुबा देने की चुनौती लेकर मूसलाधार बरसे हैं। इसी आशंका ने जन जन को भयाक्रान्त किया है कि विपत्ति का प्रभाव सर्वनाश करके ही छोड़ेगा।
यह सब होते हुये भी स्रष्टा अपनी इस अद्भुत कलाकृति विश्व वसुधा को मानवीसत्ता को सुरम्यवाटिका को विनाश के गर्त में गिरने से पूर्व सजाता और अपनी सक्रियता का परिचय देता है और परिस्थितियों को उलटने का चमत्कार उत्पन्न करता है। यही अवतार है संकट के सामान्य स्तर से तो मनुष्य ही निपट लेते है। पर जब असामान्य स्तर की विपन्नता उत्पन्न हो जाती है तो स्रष्टा को स्वयं ही अपने आयुध संभालने पड़ते है। उत्थान के साधन जुटाना भी कठिन है, पर पतन के गर्त में द्रुतगति से गिरने वाले लोकमानस को उलट देना अति कठिन है। इस कठिन कार्य को स्रष्टा ने समय समय पर स्वयं ही सम्पन्न किया है।
शरीर में हरी घड़ी विषाक्तता उत्पन्न होती रहती है और उसकी सफाई का व्यवस्था-क्रम भी स्वसंचालित रीति से चलता रहता है। कोशिकाओं का मरण आहार का परिशोधन गतिक्रम में अवरोध बाह्य आघात जैसे अनेकों कारण कायसत्ता के अन्तः क्षेत्र में विकृतियाँ उत्पन्न करते हैं। प्रकृति ने इनकी परिशोधन पद्धति का भी काया के साथ साथ ही निर्माण किया है। मलमूत्र, स्वेद, कफ, श्वास आदि के माध्यम से अनुपयुक्त का निष्कासन होता रहता है। रक्त के श्वेतकण बाहर से आने वाले विषाणुओं से जूझने और उन्हें परास्त करने में निरन्तर अपना प्रयास सजग प्रहरी की तरह जारी रखते है। थकान की क्षतिपूर्ति विश्राम से होती रहती है।
यह विश्व भी विराट ब्रह्म का शरीर है। इसमें भी पिण्ड काया की जैसी व्यवस्था काम करती है। प्रकृति का सृजन और विगति का विसर्जन, निर्माण और ध्वंस की आँखमिचौनी खेलते रहते है।
इसी को अनवरत क्रम से चलने वाला देवासुर संग्राम कहते है। ईसाई मुसलिम धर्मों में इसी को शैतान भगवान की प्रतिद्वंद्विता कहा जाता है। मन का स्वभाव पानी की तरह नीचे की ओर चलना है। मनुष्य शरीर मिलने पर भी निम्न योनियों के संग्रहित कुसंस्कार अपनी जड़ जमाये बैठे रहते है। मानवी मर्यादाओं का धर्म अध्यात्म कानून,व्यवस्था सुप्रचलन आदि के द्वारा उद्बोधन उत्तेजन होता रहता है फिर भी कुसंस्कारिता अपनी करतूत करती ही रहती है। अनगढ़ व्यक्तियों के चिन्तन में भ्रष्टता ओर चरित्र में दुष्टता का बाहुल्य रहता ही है। सज्जन प्रकृति के लोग भी यदा कदा अवांछनीयता की कीचड़ में फिसलते देखे गये है। इस अनुपयुक्तता से जूझना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि सृजन के साधन जुटाना।
घर में भोजनालय की तरह ही शौचालय की व्यवस्था करनी पड़ती है और रसोईदारिन की तरह ही महतरानी की भी आवश्यकता रहती है। उपार्जन के साथ साथ ही सुरक्षा की योजना बनानी पड़ती है। भण्डारी की तरह चौकी दार का भी दर्जा है। अगरबत्ती जलाकर सुगंध बिखेरने की ही तरह नाली में फिनायल छिड़कने की भी आवश्यकता रहती है। किसान बीज बोने के बाद पानी की व्यवस्था जुटाने की तरह ही वन्यपशुओं और कृमि कीटकों से फसल को बचाने का भी प्रबन्ध करता हैं माली के श्रम की सार्थकता फलों को पक्षियों से बचाने का प्रबंध किये बिना हो नहीं सकती। सरकारें शिक्षा, चिकित्सा परिवहन सिंचाई बिजली उद्योग आदि के अभिवर्द्धन में जितना ध्यान देती है लगभग उतना ही व्यय उन्हें पुलिस जेल कचहरी, सेना, शस्त्रनिर्माण आदि पर करना पड़ता है। मात्र सृजन ही अभीष्ट नहीं, ध्वंस का अवरोध भी एक तथ्य है। जिसकी ओर से आँख मींच सकना न कायसत्ता के लिये न विश्व व्यवस्था के लिये न व्यक्त के लिये और न समाज के लिये संभव होता है। उपार्जन एवं सृजन की कितनी ही महत्ता क्यों न हो, उसकी अपूर्णता तब तक बनी ही रहेगी जब तक विनाश के विघातक तत्वों से निपटने का प्रबंध ने किया जाय। मानवी और दैवी व्यवस्था-क्रम में दोनों का ही समुचित समावेश पाया जाता है इस क्रम जब भी असंतुलन पड़ता है तभी विषम परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है और विडम्बनाओं का सामना करना होता हैं
उपयोगी का अभिवर्द्धन करने के लिये सृजन के तत्व गतिशील रहते है। उन्हीं के पुरुषार्थ से भौतिक और आत्मिक जगत् में समृद्धि और संस्कृति की सुषमा हरीतिमा इस विश्व वसुधा पर दृष्टिगोचर होती है। साथ ही निकृष्टता की विनाशलीला को निरस्त करने के लिये प्रखर पराक्रम भी अपना जहर दिखाता रहता है। शौर्य और साहस इसी का नाम है। श्रेष्ठता के संवर्द्धन और निकृष्टता के उन्मूलन में नियोजित मानवी प्रखरता को ही त्याग बलिदान कहते है। इतिहास में ऐसे ही वीर पुरुषों का यशगान है। धर्मग्रन्थों के ऋषि प्रायः सृजनकृत्य में संलग्न रहे हैं, उन्होंने सर्वतोमुखी प्रगति के महत्वपूर्ण आधार खड़े किये हैं। साधु और ब्राह्मण की परम्परा इन्हीं पुण्य प्रयोजनों में गतिशील रही है। वीर बलिदानियों का वर्ग क्षत्रिय है। क्षात्रधर्म भी ब्रह्म के समकक्ष ही माना गया है और उसकी शक्ति भी समतुल्य ही आँकी जाती रही हैं। ब्रह्म क्षात्र का समन्वय ही श्रेष्ठता के संवर्द्धन और संरक्षण में समर्थ इकाई बनकर प्रकट होता हैं। एक ही केन्द्र से दोनों प्रवृत्तियाँ चलें या दो उद्गमों से निकलकर एक लक्ष्य तक पहुँचें यह परिस्थितियों पर आधारित है किन्तु पूर्णता समग्रता बनती तभी है जब सृजन का अभिवर्द्धन और ध्वंस का उन्मूलन सन्तुलित गति से अपना आधार सुदृढ़ बनाये रख सके।
शास्त्र और शस्त्र का समन्वय करने वाले तत्वों और व्यक्तित्वों ने ही सृष्टि के प्रगतिक्रम को आगे बढ़ाया है। उन्हीं ने ध्वंस की चुनौती से वसुधा की सौंदर्य सुषमा को सुरक्षित रखा है। ऋषि परम्परा में द्रोणाचार्य,परशुराम भीष्म, विश्वामित्र आदि के अनेकानेक उदाहरण ऐसे है जो उभयपक्षीय भूमिका निभाते रहते है। शास्त्र का समान उपयोग करते रहते हैं। होता ऐसा भी रहा है कि दोनों उद्गम स्वतन्त्र इकाई बनकर रहें और आवश्यकतानुसार उपयुक्त मात्रा से तालमेल बिठाकर काम करें। धर्मतन्त्र और राजतन्त्र की दो ध्वजाओं के नीचे दो आधार पृथक् पृथक् भी एकत्रित होते रहे है और पारस्परिक सहयोग से समृद्धि और प्रगति की सुख शान्ति का ढाँचा खड़ा करते रहे हैं।
कायसत्ता की तरह विश्वसत्ता में भी औचित्य का संवर्द्धन और अनौचित्य का उन्मूलनक्रम रथ के दो पहियों की तरह सहयोगपूर्वक चलता है। यह सुव्यवस्था जब तक सही रूप में बनी रहती है तब तक प्रगतिक्रम सुनियोजित गति से चलता और सुख शान्ति का वातावरण बनता रहता है। किन्तु जब असन्तुलन उत्पन्न होता है अथवा सामंजस्य लड़खड़ाता है, तो संकट की घटाएँ घुमड़ने लगती हैं। जन जीवन में सृजन की चेतना उच्चस्तरीय रहनी आवश्यक है। धर्म और अध्यात्म का तत्त्वदर्शन इसी की भावनात्मक पृष्ठभूमि खड़ी करता है। सन्त और सृजेता अपनी प्रवृत्तियाँ इस प्रयोजन में नियोजित रखते हैं, साथ ही प्रखरता का पराक्रम निकृष्टता को निरस्त करने में अपने शौर्य साहस का परिचय देता है। शान्ति और सुव्यवस्था की गारण्टी इन दोनों की समर्थता और सहकारिता पर ही निर्भर रहती है।
यह हुआ सृष्टि की सुव्यवस्था का सन्तुलित प्रगतिक्रम साथ ही असन्तुलन की अव्यवस्था भी दृष्टव्य हैं। जब सृजन के तत्व दुर्बल पड़ जाते है, तो आत्मिक क्षेत्र में अज्ञान और भौतिक क्षेत्र में दारिद्रय की विभीषिकाएँ सिर उठाने लगती है। इसी प्रकार पतन से जूझने वाली प्रखरता अपनी वरिष्ठता भूलकर ललक लिप्सा के गर्त में गिरने लगती है तो निकृष्टता को अपनी विनाशलीला रचने के लिये खुला क्षेत्र मिल जाता है। सृजन कर शिथिलता और विनाश की स्वच्छन्दता का असन्तुलन ही व्यक्ति और समाज के सम्मुख अनेकानेक विपत्तियाँ खड़ी करता है। समस्यायें और कठिनाइयाँ इसी स्थिति में आँधी तूफान की तरह उठाती है। सर्वनाशी विभीषिकाओं का आधारभूत कारण यह असन्तुलन ही है जिससे देवपक्ष दुर्बल पड़ता है और दैत्य को स्वच्छन्द रहने का अवसर मिलता है।
काया में दुर्बलता रुग्णता और अकालमृत्यु जैसे संकट तभी खड़े होते जब पोषण घटता और मालिन्य बढ़ता है। मानसिक तेजस्विता का व्यक्तित्व की उत्कृष्टता का हास भी इसी आधार पर होता है कि चिन्तन और चरित्र में से आदर्शवादिता घटती और दुर्बुद्धिजन्य दुश्चरित्रता बढ़ती जाती हैं। व्यक्ति के पतन -पराभव का एकमात्र कारण यही है। समाज का उत्थान पतन भी इसी तथ्य पर आधारित है। सृष्टि का चिरपुरातन इतिहास साक्षी है कि संकट असाधारण रूप से जब कभी जहाँ कहाँ उभरे है वहाँ सृजन की दुर्बलता और कहाँ उभरे है वहाँ सृजन की दुर्बलता और ध्वंस की बलिष्ठता को भी नाना आकार प्रकार के संकटों को बनाते उभारते देखा जा सकता है।
सृजन की सत्प्रवृत्तियाँ सनातन हैं। वे अपना काम करती ही रहती है। परिस्थितिवश दुर्बल तो पड़ती है पर पूर्णतया नष्ट नहीं होती। लंका में असुरों का बाहुल्य था फिर भी विभीषण और मन्दोदरी न केवल अपनी वरिष्ठता बनाये रहे वरन् अनीति के प्रतिरोध अधिक सम्भव न होने पर भी असहयोग और विरोध तो करते ही रहे। सन्त सुधारक और शहीद तथा श्रेष्ठता के समर्थन और निकृष्टता के उन्मूलन में भी अपनी क्षमता और परिस्थितियों की विषमता के साथ तालमेल बिठाकर कुछ योजना बनाते और प्रयास करते है। यह सामान्यक्रम हलके भारी रूप में चलता ही रहता है किन्तु कभी कभी स्थिति बहुत विषम हो जाती हैं सामान्य प्रयासों से न सृजन की बढ़ी चढ़ी आवश्यकता पूरी होती है और न ध्वंस की विनाशलीला पर नियन्त्रण बन पड़ता है। आतंक को तमिस्रा घनी होती जाती है। ओर निराशा भरी परिस्थितियाँ मानवी पुरुषार्थ को हतप्रभ बना देती है। लगता है परिस्थितियाँ बेकाबू हो गई है। और पतन और उत्थान में बदल सकने वाली प्रखरता मनुष्य के हाथ से छिन गयी। यह असमंजस यदि देर तक ऐसा ही बना रहे। तो ध्वंस ही जीतेगा। विनाश हो नग्ननृत्य करेगा।
ऐसे ही अवसरों पर स्रष्टा का वह आश्वासन अवतरित होता है, जिसमें उसने अपने सुरम्य उद्यान को विनाश के गर्त में गिरने से पूर्व ही बचाते रहने का सुनिश्चित विश्वास दिलाया है। यदा यदा हि धर्मस्य ...........वाली प्रतिज्ञा गीताकार ने अर्जुन के सम्मुख ही प्रकट नहीं की है वरन् इस आश्वासन का शास्त्रों और आप्तवचनों में अनादिकाल से अनवरत उल्लेख होता रहा है। न केवल उल्लेख वरन् उसके प्रकटीकरण का प्रमाण भी समय समय पर उपलब्ध होता रहा है। दिव्यसत्ता का अवतरण ऐसे ही अवसरों पर होता है। अवतार ऐसी ही विषम परिस्थितियों प्रकट होते है। मनुष्य का पौरुष जहाँ लड़खड़ाता है वहाँ गिरने से पूर्व ही सृजेता के लम्बे हाथ असन्तुलन को सन्तुलन में बदलने के लिये अपना चमत्कार प्रस्तुत करते दिखाई पड़ते है। यहीं है स्रष्टा का लीला अवतरण प्रकटीकरण।
सृष्टि के आदि से लेकर अब तक अनेक बार अनेक क्षेत्रों में अनेक विषमताओं को निरस्त करने के लिये ऐसे अवतरण होते रहे है। भूतकाल में विश्व बिखरा हुआ था। यातायात के साधनों में न्यूनता रहने से एक दुनिया छोटी छोटी अनेक दुनियाओं में बंटी हुई थी। इसलिये विषमताएँ भी क्षेत्रविशेष की स्थानीय परिस्थितियों की होती थी। विश्वव्यापी कोई संकट प्रायः नहीं ही होता था, इसलिये अवतार भी क्षेत्रीय अवतार भी क्षेत्रीय ही होते थे और उनके सामने लक्ष्य भी उतना ही रहता था जितना कि उन दिनों संकट उत्पन्न करने के लिये उत्तरदायी था भारतवर्ष में हिन्दू धर्म के अंतर्गत 24 अवतार गिनाये जाते है। जैन धर्म के 24 तीर्थंकर इनके अतिरिक्त है। सिक्खों के दस गुरु भी उसी श्रेणी के गिने जाते है। अन्याय सम्प्रदायों में भी अपने प्रवर्तकों एवं ऋषि देवताओं का पृथक् पृथक् उल्लेख है। हिन्दू धर्म की शाखा प्रशाखाओं के अंतर्गत जिन्हें अवतार स्तर की मान्यता मिली है उसकी गणना हजारों हो जाती है फिर भारत से बाहर अन्य देशों एवं धर्मों की गाथाओं में अपने अपने अवतारों का अलग से वर्णन है। ईसाई मुसलिम पारसी यहूदी आदि धर्मावलम्बी भी अपने अवतारों की गणना अलग से करते हैं। वे हिन्दू धर्मानुयायियों की गणना से भिन्न हैं।
मात्र धार्मिकता का क्षेत्र ही एक मानवी आवश्यकताओं एवं समस्याओं का क्षेत्र नहीं है। उसके बाहर भी बहुत कुछ है। उन क्षेत्रों में भी समस्याओं का समाधान करने वाली शक्तियाँ भी अनेक महामानवों के रूप प्रकट होती रही हैं। दर्शन विज्ञान शिक्षा चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में छाये हुये अन्धकार को प्रकाश में बदलने वाले व्यक्तित्वों को उनसे लाभान्वित होने वाले एवं श्रद्धालु लोग अवतार ही मानते है। दर्शन एवं विज्ञान की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्रस्तुत करने वाले महानुभावों को वैसा ही मसीहा माना जाता है जैसा कि धर्मक्षेत्र के लोग पौराणिक अवतारों को श्रद्धास्पद एवं अभिनन्दनीय मानते है।
व्यक्तियों को अवतार मानना होना मात्र धर्मक्षेत्र की विभूतियों को ही नहीं सन्तुलन में सहायक महान को उसी श्रेणी में गिनने पड़ेगा। ऐसी दशा में उनकी संख्या सीमा का निर्धारण सम्भव न रहेगा। साथ ही एक कठिनाई और बनी रहेगी कि उनके स्तर के अनुरूप कनिष्ठ वरिष्ठ का वर्गीकरण भी आवश्यक हो जायेगा। अवतारों का क्षमता और विशिष्टता का मूल्याँकन उनकी कलाओं के मापदण्ड में आँका जाता है। परशुराम जी तीन कला के और रामचन्द्र जी बारह कला के अवतार थे। दोनों एक ही समय में हुये और एक दूसरे के संबंध में यथार्थता से अपरिचित ही बने रहे। मच्छ, कच्छ वाराह आदि की कलाएँ कम थी और क्रमिक विकास के अनुसार बढ़ती चली आई। राम बारह कला के और कृष्ण सोलह कला के अवतार थे। बुद्ध बीस के पूर्ण कला चौसठ मानी जाती है। इस प्रकार अब तक के अवतारों को सामयिक परिस्थितियों के अनुसार जैसा भी पुरुषार्थ करना पड़ता है उसके स्तर और विस्तार को देखते हुये उनका महत्व स्तर और पराक्रम भी बढ़ता रहा हैं।
अपने युग में भगवान की सत्ता प्रज्ञावतार के रूप में प्रकट हो रही है। इसकी कलाएँ चौबीस है। गायत्री के चौबीस अक्षरों में से प्रत्येक को एक कला किरण माना जा सकता है। इन दिव्य धाराओं में बीज रूप से वह सब कुछ विद्यमान है जो मानवी गरिमा को स्थिर एवं समुन्नत बनाने के लिये आवश्यक है। सूर्य के सप्त अश्व, सप्तमुख, सप्तायुध प्रसिद्ध है। सविता की प्राणसत्ता गायत्री की शक्तिधाराएँ इससे अधिक है। गायत्री के चौबीस अक्षरों में साधनपरक सिद्धियाँ और व्यक्तित्वपरक ऋद्धियाँ अनेकानेक है उनका वर्गीकरण चौबीस विभागों में करने से विस्तार का समझने में सुविधा होती हैं। चेतना क्षेत्र में अंतर्गत का परिष्कार और साधन-सुविधाओं का विस्तार यह दोनों ही तथ्य मिलने पर मनुष्य में देवत्व के उदय और समाज में स्वर्णिम परिस्थितियों के विस्तारण की सम्भावना बनती है। प्रज्ञावतार का कार्यक्षेत्र यही है। वह व्यक्ति के रूप में नहीं शक्ति के रूप में प्रकट होगी। जिस व्यक्ति में इस प्रज्ञातत्व की मात्रा जितनी अधिक प्रकट होगी वह युगसृजेताओं की गणना में आ सकेगा और अपने पुरुषार्थ के आधार पर श्रेय प्राप्त कर सकेगा, इतने पर भी परिवर्तन के लिये अवतरित मूलसत्ता निराकार ही रहेगी। चेतना सदा निराकार ही रहती है। व्यक्तियों में घटनाओं के माध्यम से उसके प्रवाह का अनुभव भर किया जा सकता है। पंखा बल्ब मोटर हीटर आदि बिजली से चलते तो है पर वे उपकरण बिजली नहीं है। विद्युत धारक मूलभूत स्वरूप को प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता उसकी प्रतिक्रिया भर अनुभव की जा सकती है। प्रज्ञावतार का दर्शन भी इसी आधार पर कर सकना सम्भव होगा। उसे किसी व्यक्ति की आकृति में देखा जा सकेगा? हाँ विशिष्ट व्यक्तियों में उसकी ज्योति न्यूनाधिक मात्रा में जलती देखी जा सकेगी। यह ज्योतिपुञ्ज अपनी विशिष्टता का परिचय देते हुये यह प्रमाणित करेगा कि युगपरिवर्तन की ईश्वरीय इच्छा को पूरा करने में वे कितने समर्थ एवं श्रेयाधिकारी बन सके।
अवतार का प्रयोजन डगमगाते सन्तुलन को स्थिर करने के लिये सूक्ष्मजगत में ऐसा भावनात्मक प्रवाह उत्पन्न करता है। जो अपनी प्रेरणा से असंख्य प्राणवानों में नवसृजन के लिये अभीष्ट आवेश उत्पन्न कर सके। धर्म की ग्लानि को ओर दुष्कृतों को उलटकर धर्म की स्थापना एवं साधुता की सुरक्षा का महान प्रयोजन इसी प्रकार सम्पन्न होता रहा है। अपने युग में वह प्रक्रिया इसी क्रम से सम्पन्न होने जा रही है।
भगवान के अवतार समय की आवश्यकता के अनुसार अपने स्वरूप ओर कार्यक्षेत्र को विनिर्मित करते रहे है। जब जिस प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हुई तब उसी असंतुलन को सही करने के लिये सूक्ष्मजगत में एक दिव्यचेतना प्रादुर्भूत हुई है। अपने कौशल एवं पराक्रम से डगमगाती नाव को संभालने ओर भंवरों वाले प्रवाह से उसे बचा ले जाने का लीला उपक्रम ही अवतारों का चरित्र रहा है। सृष्टि के आदि में जब इस भूमि पर जल ही जल था और प्राणिजगत में जलचर ही प्रधान थे तब उस क्षेत्र की अव्यवस्था को मत्स्यावतार ने संभाला था जल ओर थल पर जब छोटे प्राणियों की हलचलें बढ़ी तो तदनुरूप क्षमता वाली कच्छप काया उस समय का संतुलन बना सकी। समुद्र मंथन का पुरुषार्थ प्रकृति दोहन की प्रक्रिया उन्हीं के नेतृत्व में आरम्भ हुई। हिरण्याक्ष द्वारा जल में समुद्र में छिपी सम्पदा के ढूँढ़ निकालने तथा तस्कर का दमन करने को वाराह रूप ही समर्थ हो सकता था, वही धारण भी किया गया।
उद्धत उच्छृंखलता का दमन प्रत्याक्रमण से ही हो सकता है इसके लिये ऐसे अवसरों पर शालीनता से काम नहीं चलता। तब नृसिंहों की आवश्यकता पड़ती है और उन्हीं का पराक्रम अग्रणी रहता है। भगवान ने उन दिनों की आदिम परिस्थितियों में नर और व्याघ्र का समन्वय आवश्यक समझा और दुष्टता के दमन तथा सज्जनता के संरक्षण का अपना आश्वासन पूर्ण किया।
संकीर्ण स्वार्थपरता और उससे प्रेरित संचय एवं उपभोग की पशु प्रवृत्ति को तब उदार बनाने की आवश्यकता पड़ी जब मनुष्य अपनी आवश्यकता से अधिक कमा सकने में समर्थ हो गया।
वामन भगवान के नेतृत्व में छोटे बौने पिछड़े लोगों की आवाज बुलन्द हुई ओर बलि जैसे सम्पन्न लोगों के उदार वितरण के लिये स्वेच्छा से सहमत किया गया। यही वामन अवतार है।
इसके बाद परशुराम राम कृष्ण बुद्ध के अवतार आते है। इन सबके अवतरण का लक्ष्य एक ही था। बढ़ते हुये अनाचार का प्रतिरोध और सदाचार का समर्थन पोषण। सामन्तवादी आधिपत्य को परशुराम ने शस्त्रबल से निरस्त किया लोहे से लोहा काटा। राम ने मर्यादाओं के परिपालन पर जोर दिया। कृष्ण ने छद्म से घिरी हुई परिस्थितियों का शमन करने में विषस्य विषमौषधम् का उपाय अपनाया। उनकी लीलाओं में कूटनीतिक दूरदर्शिता की प्रधानता है। तत्कालीन परिस्थितियों में सीधी उंगली से घी नहीं निकलता होगा तो काँटे से काटा निकालने के लिये टेढ़ी चाल से लक्ष्य तक पहुँचा गया होगा।
धर्मतत्त्व के श्रेयाधिकारी होते हुये भी उसमें विकृतियों भर जाने से साबुन का स्वरूप गन्दगी फैलाना जैसा बन गया था। मद्य माँस च मीनं च मुद्र मैथुनमेव च का अनाचार धर्म की आड़ लेकर लोक व्यवस्था को अस्त व्यस्त कर रहा था। उन दिनों बुद्ध ने धर्मव्यवस्था का सज्जनों के संगठन का और विवेक को सर्वोपरि मानने का प्रवाह बहाया था। धम्मं शरणं गच्छामि बुद्धं का लीला संदोह है। इस कार्य के लिये उनके आवाहन पर लाखों धर्म प्रचारक प्रव्रज्या पर निकले थे। और विचार क्रान्ति का आलोक संसार के कोने कोने तक पहुँचाया था।
बदलती परिस्थितियों में बदलते आधार भगवान को भी अपनाने पड़े है। विश्व विकास की क्रम व्यवस्था के अनुरूप अवतार का स्तर एवं कर्मक्षेत्र भी विस्तृत होता चला गया है। मनुष्य जब तक साधन प्रधान और कार्य प्रधान था तब तक शास्त्र और साधनों के सहारे काम चल गया। आज की परिस्थितियों में बुद्धि तत्व की प्रधानता है म नहीं सर्वत्र छाया हुआ है। महत्त्वाकाँक्षाओं के क्षेत्र में अनात्मतत्व की भरमार होने से सम्पन्नता और समर्थता का दुरुपयोग ही बन पड़ रहा है। महामारी सीमित क्षेत्र तक नहीं रही उसने अपने प्रभावक्षेत्र में समूची जाति को जकड़ लिया है विज्ञान ने दुनिया को बहुत छोटी कर दिया है और गतिशीलता को अत्यधिक द्रुतगामी। ऐसी दशा में भगवान का अवतार युगान्तरीय चेतना के रूप में ही हो सकता है। बुद्ध के बुद्धिवाद का स्वरूप विचार क्रान्ति था। पूर्वार्ध में धर्मचक्र का प्रवर्तन हुआ था। धर्म धारणा सम्पन्न लाखों व्यक्तियों ने उसमें भावभरा योगदान दिया था। आनन्द जैसे मनीषी हर्षवर्धन जैसे श्रीमन्त आम्बपाली जैसे कलाकार अंगुलिमाल जैसे प्रतिभाशाली बड़ी संख्या में इस अभियान के अंग बने थे। इससे पिछले अवतारों का कार्यक्षेत्र सीमित रहा था क्योंकि समस्याएँ छोटी और स्थानीय थी। बुद्धकाल तक समाज का विस्तार बड़े क्षेत्र में हो गया था। इसलिये बुद्ध का अभियान भी भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा और उन दिनों जितना व्यापक प्रयास संभव था उतना अपनाया गया। धर्मचक्र प्रवर्तन भारत से एशिया भर में फैला और उससे भी आगे बढ़कर उसने अन्य महाद्वीपों तक अपना आलोक बाँटा।
प्रज्ञावतार बुद्धावतार का उत्तरार्द्ध है। बुद्धिप्रधान युग की समस्याएँ भी चिंतन प्रधान होती है। मान्यताएँ विचारणाएँ इच्छाएँ ही प्रेरणाकेन्द्र होती है और उन्हीं के प्रवाह में सारा समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार का स्वरूप भी तदनुरूप हो सकता है लोकमानस को अवांछनीयता अनैतिकता एवं मूढ़मान्यता से विरत करने वाली विचारक्रान्ति ही अपने समय की समस्याओं का समाधान कर सकती है।
हर क्रान्ति का प्रतीक ध्वज रहा है प्रवाह के स्वरूप और निर्माण का परिचय देने के ले कोई सिम्बल चिन्ह रखे जाते रहे है। धार्मिक क्षेत्र में मन्त्र देवता तिलक ग्रन्थ आदि को आगे रखा गया है राजनैतिक क्षेत्र में झण्डों का उपयोग होता रहा है अपने युग में जो महाभारत लड़ा जाएगा। वह विशुद्ध चेतना क्षेत्र का होगा। उसमें विचारणाएँ मान्यताएँ आस्थाएँ आकांक्षाएँ ही उखाड़ी और जमाई जाएँगी। उसका प्रारूप क्या हो? उसका निर्धारण क्या हो चुका है? गायत्री महामन्त्र के अक्षरों में उन सभी तथ्यों का समावेश है जो सद्भाव सम्पन्न आस्थाओं के निर्माण एवं अभिवर्द्धन का प्रयोजन पूरा कर सकें। व्यक्ति का चरित्र चिंतन और समाज का विधान प्रचलन क्या होना चाहिये इसकी ऐसी सुनिश्चित निर्धारण इस महामन्त्र के अंतराल में विद्यमान है जिसे सार्वभौम सर्वजनीन सर्वोपयोगी माना जा सके।
यह नया प्रयोग नहीं है चिरकाल तक परखा गया परीक्षण है उसी पुरातन का नवीन संस्करण प्रस्तुत होने जा रहा है। अस्तु देव संस्कृति की जन्मदात्री देवमाता अगले दिनों अपना विशाल विस्तार वेदमाता के रूप में करेगी! वेदमाता के रूप में करेंगी! वेदमाता अर्थात् सद्ज्ञान की अधिष्ठात्री सुसंस्कृत और समुन्नत विश्व का निर्माण उन्हीं के द्वारा होने जा रहा है। अतएव गायत्री की विश्वमाता भूमिका भी उज्ज्वल भविष्य के अनुरूप ही होगी।
सामान्य बुद्धि इसी निश्चय पर पहुँचती है कि सुविधा साधन बढ़ने से मनुष्य को सुख शान्ति मिलनी चाहिये और अधिक प्रसन्नता तथा प्रगति का अवसर मिलना चाहिये। इसी आधार पर अधिक समृद्धि उपलब्ध करने के लिये नानाप्रकार के उचित अनुचित प्रयत्न करने में लगे रहते हैं। इन दिनों मान्यता एवं चेष्टा और अधिक बढ़ गई है। साम्यवादी प्रतिपादनों ने पिछले दिनों यह घोषणा बहुत जोरों से की है कि संसार की समस्त कठिनाइयों का प्रधान कारण धन की कमी है। धन बढ़ेगा तो समस्त कठिनाइयाँ स्वयं ही समाप्त हो जाएँगी। इसके लिये अधिक उत्पादन पर जितना ध्यान दिया जाना चाहिये था उतना नहीं दिया गया वरन् धनिकों को गरीबी का कारण ठहराकर वर्गसंघर्ष खड़ा कर दिया जो भी हो लक्ष्य धन की अभिवृद्धि ही रहा। पूँजीवादी क्षेत्रों में भी अर्थ संवर्द्धन के लिये कम प्रयत्न नहीं किये गये। हर देश में अपने अपने ढंग से समृद्धि संवर्द्धन के प्रयत्न चल रहे है। विज्ञान ने इस निमित्त अनेकानेक आविष्कार किये है और सफल संवर्द्धन ही नहीं अर्थ उपार्जन के लिये भी अनेकानेक उपकरण आधार विनिर्मित किये है। शिल्पी व्यवसायी अर्थशास्त्री अपनी आमदनी का अधिकाँश भाग धन उपार्जन के निमित्त ही लगाते रहे है। इसमें सफलता भी कम नहीं मिलती पूर्वजों की तुलना में अपनी पीढ़ी कहीं अधिक समृद्ध है। सुविधा साधनों की दृष्टि से इस पीढ़ी के लोग इतने सौभाग्यशाली है जितने सृष्टि के आरम्भ से लेकर अपनी शताब्दी के मध्यकाल में कभी नहीं रहे। गरीबी दूर नहीं हुई। कारण यह नहीं है कि 400 करोड़ मनुष्य की उचित आवश्यकता सुविधा साधन उपलब्ध नहीं है वरन् यह है कि उनके संचय की ललक और उपभोग की लिप्सा ने सम्पत्ति का सदुपयोग सम्भव नहीं रहने दिया। साधनों की वृद्धि तेजी से जारी है।
सम्पन्नता बढ़ रही है। इतने पर भी यह आशा नहीं बंधती कि प्रस्तुत कठिनाइयों का कोई हल निकलेगा। अमेरिका जैसे धनकुबेर इस बात के साक्षी है कि बहुत वैभव होने पर भी मनुष्य शारीरिक और मानसिक दृष्टि से किस तेजी के साथ दुर्बल एवं रुग्ण होते चले जा रहे है। पारिवारिक और सामाजिक जीवन में उन्हें कितनी भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। बढ़ते हुये मनोरोग और अपराध यह बताते है कि बढ़ा हुआ वैभव भी व्यक्ति को सुखी एवं समुन्नत बनाने में कुछ अधिक कारगर सिद्ध नहीं हो रहा है।
यहाँ वैभव वृद्धि की अनुपयोगिता नहीं ठहराई जा रही है और उन प्रयत्नों के विरुद्ध कुछ नहीं कहा जा रहा है सम्पत्ति बढ़ना तो मनुष्य के कौशल एवं पुरुषार्थ का ही प्रतिफल है। अस्तु उसे सराहनीय ही कहा जाएगा। चर्चाएं हो रही हैं कि पिछली पीढ़ी के लोग आज की तुलना में कहीं अधिक अभावग्रस्त थे उनमें से कुछ जीवित रहे होते तो आज बढ़ी चढ़ी सुविधाओं को देखते और अपने समय की परिस्थितियों के साथ तुलना करते तो उन्हें यह समय चमत्कारी समृद्धि ऋद्धि सिद्धियों से भरापूरा प्रतीत होता। रेल तार डाक जहाज मोटर सड़क शिक्षा चिकित्सा शिल्प कला व्यवस्था आदि की जो बढ़ोत्तरी हुई है उसे देखते हुये पिछली पीढ़ी वाले यही कल्पना कर सकते है कि इन दिनों के लोग देवोपम जीवन जी रहे हैं और स्वर्गीय परिस्थितियों का आनन्द ले रहे होंगे।
स्थिति बिलकुल उलटी है। व्यक्ति दिन दिन शारीरिक मानसिक और आन्तरिक सभी क्षेत्रों में दुर्बल पड़ता जा रहा है। रुग्णता और दुर्बलता एक फैशन एवं प्रचलन है, यद्यपि पौष्टिक खाद्य पदार्थों और चिकित्सा साधनों की कोई कमी नहीं है। उसी प्रकार मस्तिष्कीय विकास के लिये पाठशालाओं से लेकर पुस्तकों तक के अगणित साधन उपलब्ध है। रेडियो अख़बार प्रदर्शनी यात्रा सभा सम्मेलन आदि की सुविधा से जानकारी का क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है।
अशिक्षा के विरुद्ध युद्धस्तरीय प्रयत्न चल रहे है ओर विज्ञ एवं कुशल लोगों की संख्या तूफानी गति से बढ़ रही है। इतने पर भी मनोरोग हेय चिन्तन दुर्भाव अनुपयुक्त महत्त्वाकाँक्षा जैसे अनेकों ऐसे आधार खड़े हो गये है। जिनके कारण जनमानस में असंतुलन उद्वेग एवं आक्रोश उत्पन्न करने वाले तत्वों की ही भरमार है। अधिकाँश जनमानस संतोष ओर शान्ति से वंचित है। प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता के लक्षण अपवाद रूप से भी दृष्टिगोचर नहीं होते है। हर व्यक्ति खिन्न चिन्तित उदास दृष्टिगोचर होता है। न उमंगें है न आशा आशंकाओं और समस्याओं के भार से हर मनुष्य का मस्तिष्क तनावग्रस्त दीखता है। असुरक्षा और एकाकीपन का भार इतना लद रहा है कि जिन्दगी भारी लाश की तरह ढोनी पड़ रही है। बढ़ी हुई विपन्नता में हताशों आत्महत्याओं का दौर बढ़ रहा है। अर्द्धहत्या अर्द्धआत्महत्या की घटनाएँ तो पग पग पर देखी जा सकती हैं। विक्षिप्त और अर्धविक्षिप्त सनकी और वहमी लोगों की संख्या इस तेजी से बढ़ रही है कि स्वस्थ और संतुलित मनःस्थिति वाले व्यक्ति खोज निकालना कठिन दीखता है। बाहर से चतुर और बुद्धिमान सुशिक्षित और सम्पन्न दीखने वाले व्यक्ति भी भीतर ही भीतर इतने खोखले और उथले पाये जाते है कि कई बार तो उनके सुशिक्षित होने में भी संदेह होने लगता हैं।
पारिवारिक स्नेह सौजन्य सहयोग सौहार्द घटते घटते समाप्ति के बिन्दु तक जा पहुँचा है। माता पिता और संतान के बीच भाई बहिनों में भावज ननद में जैसी आत्मीयता होती है, उसका दर्शन दुर्लभ हो रहा है। एक बाड़े में रहने वाली भेड़ों की तरह कुटुंबों में कई व्यक्ति रहते तो है पर एक दूसरे पर प्यार और सहयोग बिखेरने के स्थान पर अपनी अपनी गोटी बिठाने में लगे रहते है। परिवार संस्था से अधिकाधिक लाभ किस प्रकार उठाया जा सकता है घर का हर सदस्य इतना ही सोचता है अधिकार की माँग है और कर्तव्य की उपेक्षा। फलतः नीरस निरानन्द हो चले है। दुकान दफ्तर से लौटने पर घर में जो स्वर्गीय आनन्द मिल सकता है उससे अधिकाँश लोग वंचित है। थकान मिटाने के नाम पर नशा सिनेमा यारवासी जैसे घटिया आधार ढूँढ़ने के लिये लोग प्रायः बचे हुये समय को भी बाहर ही बताते है।
पति पत्नी का रिश्ता एक प्राण दो देह का माना जाता है। जीवनरथ को अग्रगामी बनाने में दोनों को दो पहियों की भूमिका निभानी चाहिये। नाव खेने में दो हाथ काम देते है इसी प्रकार गृहस्थ की सुव्यवस्था में पति पत्नी का योगदान होता है। दोनों को एक मन होकर समन्वित जीवन जीना पड़ता है किन्तु लगता है वे आदर्श समाप्तप्राय हो गये। यौनलिप्सा ही वह आधार रह गया है जिसमें दोनों एक दूसरे के साथ जुड़ें रहते है। इसी प्रसंग में बच्चे आ सकते है और उनके प्रति जो प्रकृतिप्रदत्त माया मोह होता है उस सूत्र से भी पति पत्नी किसी प्रकार बंधे रहते है। यदि यौन आकर्षण ओर बालकों का मोह हटा लिया जाये तो सहज सौजन्य से प्रेरित भावभरा दाम्पत्य जीवन कदाचित ही कहीं दृष्टिगोचर होगा। समृद्ध देशों में स्वच्छन्दता के कारण ही पिछड़े देशों में विवशता के कारण ही पति पत्नी के बीच काना कुबड़ा स्नेह संबंध जीवित रह रहा है। परिवार टूटते जा रहे है। वयस्क होते ही हर किसी को अलग रहने की बात सूझती है। मजबूरी से जो साथ रहते है उन्हें भी सोचना यही पड़ता है कि सम्मिलित कुटुम्ब के सदस्य न रहते तो अच्छा होता। पढ़ी लिखी लड़कियाँ और उनके अभिभावक विवाह संबंध जोड़ने के साथ ही यह सोचते है कि बड़े कुटुम्ब का सदस्य बनकर न रहना पड़े। विलगाव के इस प्रयत्न में पारिवारिक जीवन जिसे घरौंदों में बसने वाला स्वर्ग कहा जाता था एक प्रकार से छिन्न भिन्न अस्त व्यस्त और नष्ट भ्रष्ट ही होता चला जा रहा है इस सौभाग्य से वंचित रहने पर लोग सराय में दिन बिताने वाले आवारागर्द लोगों की तरह दिन गुजारते हैं। गृहस्थ जीवन का भावात्मक आनन्द कितना उच्चस्तरीय होता है इसकी अनुभूति ही नहीं कल्पना भी लोगों के हाथ से छिनती जा रही है।
आर्थिक दृष्टि से प्रायः सभी लोग दरिद्री है। अभावग्रस्त लोग स्वतंत्र आजीविका के कारण जितने खिन्न पाये जाते है उससे अधिक उद्विग्न वे है जिनके पास साधनों का बाहुल्य हैं। धन कमाना एक बात है और उसका सदुपयोग करना बिलकुल दूसरी। एक पक्ष तो बढ़ रहा है पर दूसरे की दुर्दशा ने सारा संतुलन ही बिगाड़ दिया। विलासिता आलस्य बनावट शान शौकत की मदें इतनी खर्चीली हो रही है कि भोजन वस्त्र जैसे आवश्यक व्यय तो उनकी तुलना में नगण्य जितने ही लगते हैं। अहंकार और बड़प्पन सहोदर जैसे बनते जा रहे हैं। सम्पन्नता की धारा दुर्व्यसनों के गर्त में गिराती है और उसकी प्रतिक्रिया से अनेकानेक दुराचरण एवं विग्रह उत्पन्न होते हैं। आजीविका सीमित है और लिप्सा असीम तो फिर ऋणी बनने या कुकर्म करके उपार्जन करने के अतिरिक्त और कोई उपाय ही नहीं रह जाता। सामाजिक कुरीतियों की लाश ढोने में भी अर्थ व्यवस्था की कमर टूटती है। उचित से काम नहीं चलता तो अनुचित किया जाता है और अपराधी स्तर को कमाई का एक बड़ा साधन बनाया जाता है इतने पर भी कितने लोग है जो आर्थिक दृष्टि से अपने को सुखी संतुष्ट कह सके। धनी निर्धन सभी को अर्थसंकट से गुजरने की शिकायत है।
समाज व्यवस्था का ढाँचा ऊपर से तो किसी प्रकार कागज से बने विशालकाय पुतले की तरह खड़ा है पर उसके भीतर खोखलेपन के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं। भिन्नता की आड़ में जितना छल छल चलता है उतनी घात दुश्मन भी नहीं लगा पाते। सम्बन्धियों के बीच किस प्रकार बुनने उधेड़ने की दुरभिसंधियाँ चलती है उसे विवाह शादियों में होने वाले लेन देन को देखकर भली प्रकार समझा जा सकता हैं। ग्राहक और विक्रेता के मध्य अफसर और प्रजाजन के मध्य जिस प्रकार का सदाशयतायुक्त आदान प्रदान होना चाहिये उसके दर्शन दुर्लभ हो रहे हैं। मूल्य तौल स्तर के सम्बन्ध में ग्राहक को सदा छल की आशंका ही बनी रहती है। अधिकारी और प्रजाजनों के मध्य उचित सहयोग का आधार रिश्वत पर केन्द्रित होता जा रहा है। पड़ो से हर घड़ी चौकन्ना रहना होता है। परदेश में अपरिचितों के बीच वहीं जिन्दा रह सकता है जो किसी के साथ कुछ समय रहने पर समुचित सतर्क रह सके। विश्वास करने वाले और निश्चिन्त रहने वाले पग पग पर जोखिम उठाते है। सेवक स्वामी के बीच का रिश्ता अब समाप्त हुआ ही समझना चाहिये। दोनों के मध्य सद्भावना सूत्र टूट चुके। मालिक को सर्प पालने की तरह सतर्क रहना होता है नौकर को हर घड़ी शोषक के साथ रहने जैसा अप्रिय लगता है। पारिवारिक सहयोग से समृद्धि और व्यवस्था बढ़ सकती है। पर उसकी सम्भावना निरन्तर घटती जा रही है। श्रम संकट आज के समाज की इतनी विकट समस्या है कि उसकी उलझन ने समृद्धि की सम्भावना को वे तरह धूमिल कर दिया है।
समाज के प्रथा प्रचलनों को देखते हुये लगता है इस प्रमाद में बहने वाले जनसमाज को विपत्तियों के गर्त में ही गिरा रहना पड़ेगा। नशेबाजी फैशन परस्ती विलासिता धूर्तता उच्छृंखलता जैसे प्रचलन सभ्यता के अंग बन चले है। यों कहने को तो अपने समय को तर्क और बुद्धि का युग कहा जाता है पर अन्धविश्वासों और कुरीतियों का प्रभाव जितने उत्साह के साथ इन दिनों बढ़ रहा है उतना कदापि पिछले दिनों के उस समय में भी न रहा हो जिसे अनगढ़ आदिमकाल कहते हैं।
बुद्धिमत्ता और पूर्णता का यह विचित्र समन्वय देखते ही बनता है ज्योतिषी तान्त्रिक भविष्यवक्ता जादूगरों ने जिस प्रकार धर्म और अध्यात्म को ग्रस लिया है उसे देखते हुये लगता है विवेक का अरुणोदय अभी भी बहुत दूर है। भ्रान्तियों से छुटकारा पाने की शुभ घड़ी आने में अभी बहुत दिन प्रतीक्षा करनी पड़ेगी ऐसा लगता है जाति लिंग की असमानता आर्थिक विषमता क्षेत्रीय संकीर्णता मतवादियों की कट्टरता आहार विहार की शैली विनोद की व्यवस्था चिन्तन की धारा आदि की स्थिति को देखते हुये लगता है जिस मध्यकालीन अंधकार युग को कोसा जाता है उसमें वह अभी भी यथावत विद्यमान है। उसने मात्र अपना पुराना चोला उतारा और नया जामा पहना है। समाज प्रवाह के आधार पर सामान जनमानस ढलता है और लोक प्रवृत्तियाँ पनपती है। यदि उसमें अमानवीय तत्व ही भरे रहे तो फिर यह आशा करना व्यर्थ है कि शालीनता को लोग अपने जीवन व्यवहार में स्थान दे सकेंगे। समाज का स्तर जिस क्रम से नीचे गिरता जा रहा है। उसे देखते हुये लगता है आदर्शवादी सिद्धान्त लिखने पढ़ने और सुनने तक ही सीमित बनकर रह जाता है शासन व्यवस्था प्रकारान्तर से समाज व्यवस्था का ही दूसरा नाम है। निम्न समाज को श्रेष्ठ शासन मिलने की आशा नहीं ही करनी चाहिये।
ऊपर की पंक्तियों में व्यक्ति के सामने प्रस्तुत कठिनाइयों और विपत्तियों का चित्रण किया गया है। अधिकाँश को इन्हीं समस्याओं ओर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। जन जीवन में शान्ति और व्यवस्था की प्रगति और प्रसन्नता की संभावनाएं घटती जा रही है।
सामूहिक जीवन में शासनतंत्र की प्रधानता है। सरकार अपने संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति के लिये दूसरे देशों के प्रति जो रवैया अपनाती है उससे शोषण आधिपत्य विग्रह और युद्ध का कुचक्र,ही गतिशील होता है। शीतयुद्ध तो कूटनीति का ध्वज ही ठहरा। गृहयुद्ध की आशंका बढ़ रही है। अणु आयुध विषाक्त दाहक किरणें रासायनिक युद्ध जैसे उत्पादनों का चरम सीमा तक जा पहुँचना यह बताता है कि कोई भी एक पागल अनन्त काल की श्रम साधना से संचित मानवों का अंत चुटकी बजाने जितने समय में कर सकता हैं। तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या ने यह संकट सामने खड़ा कर दिया है कि एक शताब्दी में ही जीवनयापन के लिये आवश्यक अन्न, जल,वस्त्र, निवास जैसे साधन मिलना कठिन हो जायेगा। जनसंख्या जिस तेजी से बढ़ रही है उस अभिवृद्धि का भार उठा सकने की क्षमता अपनी धरती शताब्दी पूरी होते होते गंवा बैठेगी। कारखाने जिस अनुपात से प्रदूषण और विकिरण उत्पन्न करते है, उसका प्रभाव मनुष्यों का शारीरिक एवं मानसिक सन्तुलन स्थिर नहीं रख सकता। शरीर और मन की बढ़ती हुई दुर्बलता प्रकृति का दबाव और विकृत प्रचलनों का दबाव कहाँ तक सहन कर सकेगी, इसमें भारी संदेह है। विनाश की ऐसी अगणित विभीषिकाएँ है जिन्हें काल्पनिक नहीं वास्तविक ही माना जाएगा।
प्रगति और शान्ति के लिये कुछ नहीं किया जा रहा या उस स्तर के प्रयासों की कोई उपलब्धि नहीं है, यह कहा जा रहा है। लक्ष्य इतना ही प्रस्तुत किया जा रहा है कि सृजन से ध्वंस की गति तीव्र होने के कारण दिवालिया होने और ऐसी विपत्ति में फंस जाने की ही सम्भावना अधिक है जिससे निकल सकने के लिये नई सृष्टि की शुभ घड़ी आने के लिये लम्बी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
विपत्तियाँ भौतिक क्षेत्र में बढ़ रही है और विकृतियाँ से आत्मिक क्षेत्र उद्विग्न होता जा रहा हैं। सुधार और बचाव के प्रयास अपेक्षाकृत बहुत धीमे है लगता है मनुष्य द्वारा अन्यमनस्क भाव से किया गया आधा अधूरा प्रयास वर्तमान की समस्याओं को सुलझाने तथा भविष्य की विभीषिकाओं को परास्त करने में सफल नहीं हो सकेगा एक गाज जोड़ने के साथ साथ दस गज टूटने का क्रम चल रहा है। ऐसी दशा में विश्व को महाविनाश के गर्त में जा गिरने की ही आशंका है। अवतार ऐसे ही समय में प्रकट होते है। मनुष्य का बाहुबल थक जाता है और विनाश की आशंका बलवती हो जाती है तो प्रवाह को उलटने का पुरुषात् महाकाल ही करता है। स्रष्टा को अपनी उस सुरम्य विश्ववाटिका का दर्द भरा अवसान सहन नहीं हो सकता। वे धर्म की ग्लानि और अधर्म की अभिवृद्धि को एक सीमा तक ही सहन कर सकते है। मानवी पुरुषार्थ जब संतुलन बनाये रहने में असफल होता है तो व्यवस्था को भगवान स्वयं संभालते हैं। राष्ट्रपति शासन तभी लागू होता है जब राज्य की सामान्य व्यवस्था लड़खड़ा जाती है। इन दिनों ऐसा ही होने जा रहा है। महाकाल की चेतना सूक्ष्मजगत में ऐसी महान हलचलें विनिर्मित कर रही है। जिसके प्रभाव परिणाम को देखते हुये उसे अप्रत्याशित और चमत्कारी ही माना जाएगा। अवतार सदा ऐसे ही कुसमय में होते रहे है जैसा कि आज है। अवतारों ने लोकचेतना में ऐसी प्रबल प्रेरणा भरी है जिससे अनुपयुक्त को उपयुक्त में बदल देने की उत्साह लगने वाली संभावना सरल हो सके। दिव्य चक्षुओं की युगान्तरीय चेतना को गंगावतरण की तरह धरती पर उतरते देखा जा सकता है। चर्मचक्षुओं को भी कुछ दिनों में अवतार के लीलासंदोह का परिचय प्रत्यक्ष एवं सुनिश्चित रूप से देखने को मिलेगा।
पूर्व दिशा में उषा की लालिमा दिखाई देने लगी। अन्धकार के विदा होने का समय निकट आ गया। भगवान भास्कर भी अपने रथ पर सवार होकर गगन पथ पर आगे बढ़ने लगे। दीपक की लौ ने अपना मस्तक उठाकर सूर्य को प्रणाम किया।
सूर्य को यह देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि मेरी अनुपस्थिति में दीपक ने अपने कर्तव्य को अच्छी तरह निभाया है। वे दीपक को वरदान देने के लिये तैयार हो गये।
दीपक की आत्मा सहज भाव से बोल पड़ी सूर्यदेव संसार में अपने कर्तव्यपालन से बढ़कर कोई अन्य पुरस्कार हो सकता है मैं नहीं जानता। मैन तो आपके द्वारा दिये गये उत्तरदायित्व का निर्वाह किया है। इसमें प्रशंसा की बात ही क्या है। सूर्य ने सन्तुष्ट होकर अपने रथ को आगे बढ़ने का आदेश दिया।
सहजभाव से निभाया कर्तव्य मानवता का प्रतीक है।
युगसंधि की अवधि में कितनी ही उथल पुथल होने की सम्भावना है। इस संदर्भ में प्रख्यात ज्योतिषियों ने कुछ महत्वपूर्ण अभिमत व्यक्त किये है। इनमें से कई समयानुसार सही सिद्ध हो चुके। कुछ ऐसे है जिनका सम्बन्ध भविष्य से है। कुछ अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों से सम्बन्ध रखते है कुछ भारत से। समय आने पर ही विदित होगा कि भूतकाल की तरह उनके भविष्य कथन भी सही सिद्ध होते है या नहीं।
इन कथनों में से जिनका भारत से सीधा सम्बन्ध है उन्हें देखते हुये इस नतीजे पर पहुँचना पड़ता है कि अगले दिन भारी कठिनाइयों के है। इन से भारत को भी बहुत कुछ सहना पड़ेगा। साथ ही एक तथ्य यह भी उभर कर आता है कि समस्त विश्व को नया प्रकाश देने और सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने में भारत की भूमिका असाधारण रहेगी। भूतकाल में भी विश्व शान्ति के लिए मानवी प्रगति एवं समृद्धि के लिये भारत ने बहुत कुछ किया है। अब फिर उसी की पुनरावृत्ति होने जा रही है। यहाँ की ऋषिकल्प आत्माएँ प्राचीनकाल की तरह लोक कल्याण के लिये बहुत कुछ करने की तैयारी में जुटी हुई हैं समय बताएगा कि इन प्रयासों के फलस्वरूप सृजन को कितना बल मिला और संकटों
को टालने में इस तत्परता ने कितना चमत्कार उत्पन्न किया। इस सन्दर्भ में प्रख्यात ज्योतिर्विदों के कुछ कथन नीचे प्रस्तुत किये जा रहे है।
सितम्बर 72 में दुनिया के प्रमुख ज्योतिषियों का एक सम्मेलन हुआ। कोरिया के स्यूल नगर में सम्पन्न हुये इस सम्मेलन 104 भविष्यवक्ता सम्मिलित हुये थे, सबने सहमति से अपने ज्योतिष ज्ञान के अनुसार जो भविष्य कथन कहे उनमें से कुछ इस प्रकार है।
सन् 1984 के आसपास अमेरिका और रूस में युद्ध संभावना होगी, किन्तु सन् 1984 के पूर्व उनमें आपसी चर्चा द्वारा ऐसा वातावरण निर्मित होगा जिसके आधार पर विश्वास दृढ़ हो सकेगा कि इन बात की संभावना नहीं है।
आज जो राष्ट्र महाशक्तियों द्वारा विभक्त कर दिये गये है जैसे जर्मनी कोरिया और
वियतनाम वह भविष्य में पुनः संयुक्त हो जायेंगे उनकी सरकारें दो न होकर एक होंगी, राष्ट्रवादी ओर बाह्य शक्तियों के दबाव में आये बिना काम करने वाली होगी।
व्यापार धन धान्य कृषि गौ विद्या विज्ञान तकनीकी क्षेत्र का एशियाई प्रभुत्व भारतवर्ष में आ सकता है।
चीन काफी समय तक जोड़ तोड़ की राजनीति में कामयाब रहेगा और प्रबल शत्रुओं को भी धोखा देने तथा मित्रता का नाटक रचने में वह सफल होगा किन्तु उसकी पोले जल्दी ही खुलेंगी। अपने आन्तरिक विग्रह के कारण ही वह विनाश के गर्त में जा सकता है। विश्व के कई राजनेताओं की हत्याओं के योग है।
इन भविष्यवाणियों में अधिकाँश का समय 1980 के बाद का बताया गया है। इस सम्मेलन के अध्यक्ष जा स्वयं भी कोरिया के विश्व प्रसिद्ध देवज्ञ है श्री हर्सारोंअसानों ने उस सम्मिलित विज्ञप्ति को प्रसारित करते हुये लिखा है कि इसमें केवल उन्हीं भविष्यवक्ताओं को सम्मिलित किया गया है जिनकी भविष्यवाणियाँ 80 प्रतिशत से भी अधिक सत्य हुई हैं। इस सम्मेलन के समाचार और ये भविष्यवाणियाँ दुनिया के प्रायः सभी अखबारों में विवरण सहित प्रकाशित हुई। भारत में भी यह विवरण इण्डियन एक्सप्रेस दैनिक के 12 सितम्बर 72 में साररूप में छपा था। इसमें उपरोक्त घटनाक्रमों की चर्चा के अतिरिक्त विश्वव्यापी बौद्धिक परिवर्तनों का भी संकेत है। घोषणा में कहा गया है कि अगले दिनों एशिया में भारी उथल पुथल होगी। यह उथल पुथल एक और विचारक्रान्ति के रूप में परिलक्षित होगी तो दूसरी तरफ एक बार भयंकर अकाल पड़ेगा। तीन भयंकर भूकम्प आयेंगे।
विचारक्रान्ति का असर सारी दुनिया पर पड़ेगा। सन् 2000 से पूर्व ही बौद्धिक क्रान्ति की यह लहर न केवल दक्षिण पंथी वरन् कम्यूनिस्ट देशों में भी फैल जाएगी। क्रान्ति का स्वरूप आध्यात्मिक धार्मिक विचार होगा। मतमतान्तरों के वर्ण सम्प्रदाय के भाषा भेष के भेद मिट जाएँगे और लोगों में धार्मिक समभाव तथा भाईचारे की भावना का व्यापक विस्तार होगा।
परिवर्तन जब एक सुनिश्चित विधान के अनुसार होगा तो उसका सूत्रपात और सूत्र संचालन कौन करेगा इस बात पर भी विश्व के भविष्यवक्ताओं में विचार विमर्श हुआ। द्रष्टा इस मामले में एक मत थे कि एशिया के किसी देश में जन्मा एक महान संत विश्व में भारी परिवर्तन लाने के लिए कार्यरत है। इस शताब्दी के अंत तक इस सन्त का प्रयास इतना सफल होगा कि उसकी गरिमा का मूल्याँकन करने के लिये उपयुक्त कल्पना नहीं की जा सकती।
प्रसिद्ध भविष्यवक्ता कीरो जो ज्योतिष शास्त्र के आधार पर भविष्यवाणियाँ करते थे ने वर्तमान परिस्थितियों के बारे में कहा था यूरोप की ईसाई जातियाँ एक बार फिर से यहूदियों को पैलेस्टाइन में बसाएँगीं जिसके कारण अरब राष्ट्र और उनके इस्लामी मित्र भड़क उठेंगे द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी आदि देशों से खदेड़े गये यहूदियों को पैलेस्टाइन में बसाया गया और एक नया राष्ट्र इजराइल अस्तित्व में आया। वे बार बार इंग्लैण्ड अमेरिका आदि के विरुद्ध उत्तेजक नारे बुलन्द करेंगे। यहूदियों से उनकी टक्कर भी होगी। इन सबके बावजूद यहूदियों की शक्ति बढ़ेगी। कम संख्या में होते हुये भी यहूदी अरबों को पीटेंगे और उनका बहुत-सा प्रदेश अपने कब्जे में कर लेंगे। 1980 के बाद कभी भी एक बार बहुत ही भयानक टक्कर होगी, जिसमें अरब राष्ट्र बुरी तरह तहस नहस होंगे। यह विनाश पूर्ण होने के बाद एक नई सनातन सभ्यता का अभ्युदय होगा और सारे विश्व में उसका प्रसार होगा।
कीरो ने यह पंक्तियाँ सन् 1927 में लिखी थी तब किसी को इजराइल की कल्पना भी नहीं थी। करीब बीस वर्षों में ही दुनिया भर के यहूदी पैलेस्टाइन में आये सचमुच ईसाइयों ने उन्हें मदद दी और इस तरह एक छोटा-सा किन्तु बाघ और बाज़ की तरह इजराइल एक सशक्त राष्ट्र के रूप में उठ खड़ा हुआ और एक ही धमाके में उसने जोर्डन की कमर तोड़ दी तथा वहाँ मिश्र का सारा सिनाई प्रान्त ही हड़प लिया।
प्रो. कीरो कीरो ने कहा था अरबों की नील नदी यहूदियों का आदाब बजाएगी। सो भी सच हुआ और अब उस भविष्यवाणी के उत्तरार्द्ध की प्रतीक्षा की जा रही है। प्रो. कीरो की भविष्यवाणियों की सत्यता का अनुमान किसी को करना हो तो वह सन् 1943 की अखण्ड ज्योति का जनवरी अंक उठाकर देखे जिसमें पृष्ठ 23 पर छपा है इंग्लैण्ड भारत को स्वतन्त्र कर देगा पर मजहबी फिसाद के कारण भारत तबाह हो जायेगा। यहाँ तक कि हिन्दू बौद्ध और मुसलमानों में बराबर बराबर विभक्त हो जायेगा।
जिन दिनों यह भविष्यवाणी प्रकाशित हुई थी उन दिनों ब्रिटिश दमन चक्र अपने पूरे जोर पर था। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। कि भारत स्वतन्त्र होगा पर प्रो. कीरो का कथन था भारत वर्ष का सूर्य ग्रह बलवान है और कुम्भ राशि पर है परन्तु उसका अभ्युदय संसार की कोई ताकत नहीं रोक सकती। यह कथन सच ही होकर रहा पर दूसरी भविष्यवाणी जिसमें इस देश के बंट जाने की बात थी उस पर तो किसी का कतई विश्वास नहीं था फिर भी सारी दुनिया ने देखा कि भारत के ही बहुत से मतावलम्बी अंग अलग हो गये पाकिस्तान बना और आज तक वह भारत के लिये सिरदर्द पैदा कर रहा हैं।
बरार के विद्वान ज्योतिषी श्री गोपीनाथ शास्त्री चुलैट ने एक रात स्वप्न देखा कि नये युग का आविर्भाव सन्निकट है। उठकर उन्होंने उस स्वप्न समय की कुण्डली बनाई।
इस लग्न कुण्डली को बनने और अध्ययन के बाद इन निष्कर्ष पर पहुँचने बाद इन निष्कर्ष के बाद शास्त्री जी ने युगपरिवर्तन नामक एक पुस्तक लिखी जो अकोला महाराष्ट्र से प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में उन्होंने ज्योतिष गणना के आधार पर बताया है कि इन्हीं दिनों युगपरिवर्तन प्रारम्भ हो जाता है और इस समय युगसंधि चल रही है जिसमें पिछले अज्ञानान्धकार का अन्त और नवयुग की अरुणिमा निरन्तर बढ़ती ही जायेगी। यह समय एक ओर जहाँ भारतवर्ष के लिये तीव्र हलचलों उथल पुथल और परिवर्तनों का है वही सारे विश्व के लिये भी कम कष्टप्रद नहीं है। शास्त्री जी द्वारा समय समय पर की गई भविष्यवाणियाँ सही सिद्ध होती रही है। इस आधार पर उनका युगपरिवर्तन कथन भी विश्वसनीय ही माना जा सकता है।
सन् 1945 और 1950 के मध्य भारतवर्ष के स्वतंत्र होने की जो भविष्यवाणी की थी वह सच हुई। उन्होंने सन् 1938 में ही महात्मागाँधी की मृत्यु का ठीक ठीक समय बता दिया था, यह भी सही सिद्ध हुआ शास्त्री ने भविष्यवाणी की थी कि सन् 1970 के आस पास अमेरिका का कोई मनुष्य चन्द्रमा की परिक्रमा करेगा। कलिवर्ज्य प्रकरण में पृथ्वी की प्रदक्षिणा नहीं करनी चाहिये, इसका खण्डन करते हुये शास्त्री जी ने लिखा था कि भारतीय विमान आदिकाल से ही पृथ्वी और अन्य ग्रहों की प्रदक्षिणा करते हुये उड़ते तथा वहाँ की यात्रा करते रहे है। निकट भविष्य में यह स्थिति भी देखने में आएगी जब सन् 1970 तक अमेरिका निवासी चन्द्रमा पर उतर जायेगी। इसलिए हम भारतीयों को भी प्रदक्षिणा अंतरिक्ष विज्ञान की शोध करनी चाहिये। शास्त्री जी की अनेक भविष्यवाणियों में उत्तरी सीमान्त से आक्रमण चीन के हमले आदि की भविष्यवाणी भी सही सिद्ध हो चुकी है ऐसी दशा में उनका युगपरिवर्तन सम्बन्धी वक्तव्य विश्वस्त समझा जा सकता है।
हरियाणा के प्रसिद्ध सन्त बांगड़ ने स्पष्ट शब्दों में कहा है-
संवत् बीसा द्वौ बीघा कूं। अस जोग अनोखा आवै सै।
नौ ग्रह मिलसी एक राशि पर। गुरु दशा विचलावें सै।
फाल्गुणमासै सूर्यग्रहण दृश्य दिखावे से। राजा प्रजा को घणा दुःखनू सौ, कोहराम मचावै सै।
पड़सी विकट अकाल बाद सूँ। अनावृष्टि दिखलावै है। धरती फटै, आकाश टूटि के, महाणास समहावै है।
असा वखत नो ज्योति प्रगट्या, सबको राह यह दिखावै है। कह बांगड़ की बात झूंठ ना, कतै कणै है पावै है।
लड़सी दयाख्या गोरा तुरकां, राज राजसा धणी धणी। तुरक तबारा मिटसी देखी, अमरीसा घेर छणी।
उसै जंगड़ी जंग चबारा, धरणी कोय देखावेणी। दुःख पर दुःख पावसी दुणियाँ धुन्ध कोण ली छावैसी।
अकबर के समकालीन इस महान संत का उल्लेख ‘फरमान ए रशीदी’ पुस्तक में भी मिलता है। उपर्युक्त छन्द में जो स्थितियाँ बताई गई हैं, उनकी संगति वर्तमान परिस्थितियों से बहुत मिलती-जुलती है। लोकश्रुति के रूप में प्रचलित यह पंक्तियाँ कई पुराने लोगों को कंठाग्र है और ‘फरमान ए रशीदी’ में भी संत बांगड़ की इसी तरह की भविष्यवाणियाँ मिलती है। मनुष्यकृत उत्पातों और प्राकृतिक विपदाओं के कारण कई देशों के तहस-नहस हो जाने तथा जन जीवन के बुरी तरह अस्त व्यस्त होने की बात उपरोक्त पंक्तियों में स्पष्ट कही गई है। संत के अनुसार यह शुरुआत ही है, किन्तु बीस वर्षों में परिवर्तन तेजी से होगा।
पटना की ‘खुदाबख्त औरियण्टल लाइब्रेरी में फारसी कसीदों (कविता) की पुस्तक है, जो बुखारा के सुप्रसिद्ध सन्त शाहनिया मतुल्ला वल्ली साहब की लिखी हुई है। इस पुस्तक में उन्होंने लिखा है, जापान और रूस में युद्ध होगा (1904 में रूस और जापान में युद्ध हुआ भी)। इस तरह उनकी एक भी भविष्यवाणी अभी तक गलत नहीं हुई है।
भारत के प्रसंग में वल्ली साहब ने लिखा है, मुसलमानों के हाथ से यह मुल्क विदेशियों के हाथ चला जाएगा, फिर हिन्दू-मुसलमान मिलकर उनके खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे। विदेशी यहाँ से चले तो जाएँगे, पर हिन्दुस्तान को दो टुकड़ों में बाँट जाएँगे। तृतीय विश्वयुद्ध के सम्बन्ध में वल्ली साहब ने लिखा है, यह युद्ध बड़ा भयंकर होगा। श्वेत जातियाँ बहुत कमजोर पड़ जाएँगी। भारत का अभ्युदय जिससे संसार में सीधे सच्चे लोगों की प्रतिष्ठा बढ़ेगी और अमन चैन फैलता चला जाएगा।
मिश्र की एक बहुत प्राचीन मीनार पर यह भविष्यवाणी अंकित है, जिसमें कहा गया है कि चौदहवाँ सदी बीत जाने पर (हिजरी सन् के अनुसार चौदहवीं सदी अब बीत चुकी है) कयामत आएगी अर्थात् भीषण विनाश और संघर्ष उत्पन्न होगा। इसी मीनार पर जल्द ही नया जमाना आने की बात भी लिखी है, इस नये युग का आरम्भ थोड़े से लोगों क द्वारा किए जाने की भविष्यवाणी भी उस मीनार पर अंकित है।
महाभारत लिखने के लिये व्यास जी ने गणेशजी का सहयोग लिया। गणेशजी लिखते गये। महाभारत पूरा हुआ तो व्यास जी ने गणेशजी से कहा महाभाव! मैंने 24 लाख शब्द बोलकर लिखाये आश्चर्य है कि इस बीच आप एक शब्द भी न बोले सर्वथा मौन बने रहे।
गणेशजी ने उत्तर दिया- बादरायण बड़े काम सम्पन्न करने के लिये शक्ति चाहिये और शक्ति का आधार संयम है। संयम ही समस्त सिद्धियों का प्रदाता है। वाणी का संयम न रख सका होता तो आपका ग्रन्थ कैसे तैयार होता?
राजा बालीक ने अपने प्रधान सचिव विश्वदर्शन को पदच्युत कर राज्य से निकाल दिया। विश्वदर्शन एक गाँव में रहते थे। पदच्युत होने के बाद वही आकर बड़े परिश्रम का जीवन बिताने लगे।
एक दिन बालीक को यह देखने की इच्छा हुई कि विश्वदर्शन की कैसी स्थिति है? वह वेश बदलकर उसी गाँव की ओर चल पड़ा। गाँव पहुँचकर उसने देखा कि विश्वदर्शन के मकान के सामने पच्चीसों व्यक्ति बैठे बात चीत कर रहे हैं और प्रसन्न है। विश्वदर्शन स्वयं बड़े प्रसन्नचित्त दिखाई दे रहे थे।
छन्द वेशधारी बालीक ने विश्वदर्शन से पूछा - “महानुभाव! आपको तो राजा ने पदच्युत कर दिया है, फिर भी आप इतने प्रसन्न हैं, इसका रहस्य क्या है?
“मनुष्यता। विश्वदर्शन ने मुस्कुराते हुए और राजा को पहचानते हुए कहा-महाराज पहले तो मुझसे लोग डरते भी थे, पर अब वह डर नहीं है, इसलिए लोगों से खुलकर बात करने और सेवा, सहानुभूति व्यक्त करने में बड़ा आनन्द आता है।
महाराज बालीक ने अनुभव किया, सचमुच पद से लोग डर सकते हैं, सम्मान तो मनुष्यता के अच्छे गुणों का ही होता है। लौटते समय नरेश विश्वदर्शन को पुनः साथ लेते आये और उन्हें उनका पद फिर लौटा दिया।
विश्व के मूर्धन्य विचारकों ने अपनी सहज प्रज्ञा के आधार पर प्रस्तुत परिस्थितियों की सूक्ष्म विवेचना करते हुए यह अभिमत व्यक्त किया है कि युगपरिवर्तन का समय सन्निकट है। वे इस प्रयोजन में ध्वंस और सूजन की दुहरी प्रक्रिया को पूर्ण प्रखरता के साथ अपना-अपना रोल पूरा करने की सम्भावना व्यक्त करते है। साथ ही यह भी कहते है कि अन्ततः जीतेगा सृजन ही। उज्ज्वल भविष्य का समय आने से पूर्व मानवी दुष्कृत्यों और प्रकृति-प्रकोपों की काली घटाएँ बरसेंगी और उनसे लड़ने के लिये स्वभावतः मानवी पुरुषार्थ प्रबल और प्रचण्ड बनेगा।
सन 1963 में अमेरिका की प्रसिद्ध जीवशास्त्री महिला प्रो. राशेल क्रार्सन ने अपनी पुस्तक ‘ साइलेंट स्प्रिंग ‘ में लिखा है कि पंद्रह-बीस वर्ष बाद दुनिया के अधिकाँश महानगरों की स्थिति ऐसी हो जायेगी कि वहाँ के सभी निवासियों पर अकाल मृत्यु की सम्भावना हर घड़ी छाई रहेगी। न केवल नगर निवासी वरन् उस क्षेत्र में रहने वाले प्राणियों को भी कभी भी मरना पड़ सकता है। इस तरह की सामूहिक मौतों का कल्पना के आधार पर चित्रण भी किया है। उस समय तो लोगों ने इन प्रतिपादनों का मखौल उड़ाया, पर अभी कुछ वर्षों पहले अमेरिका के डेटायट शहर में इटली के जोर्निया तथा जापान के मिनिमाता कस्बे में ‘साइलेंट स्प्रिंग’ पुस्तक में दी गई स्थिति हूबहू देखने में आई।
डेटायट की हवा में कारखानों की चिमनियों से निकले धुएँ के कारण इतनी सल्फर डाई आक्साइड जमा हो गई कि वह बादलों के साथ मिलकर दहकते तेजाब के रूप में बरस पड़ी। इटली के जोर्निया शहर में एक कारखाने से इतनी अधिक कार्बन डाई आक्साइड छोड़ी गई कि मुर्गियाँ मरने लगी, पेड़ सूखने लगे और बूढ़े खाँसते-खाँसते परेशान हो गये। जापान के मिनिमाता कस्बे में भी यही स्थिति उत्पन्न हो गई थी।
इस तरह की घटनाओं को देख- जानकर अब काफी लोग यह मानने लगे हैं कि व्यक्ति और हर प्राणी सिर पर मौत नाच रही है। वह कभी भी सैकड़ों क्या, हजारों लोगों को अपने पंजे में जकड़ सकती है।
सन 1975 में अमेरिका में सम्पन्न हुए खगोलशास्त्रियों के सम्मेलन में प्रो. कार्ल साइमन ने बताया कि कुछ वर्षों बाद पृथ्वी का वातावरण अचानक शुक्र अपने सौर परिवार का सबसे गर्म वातावरण वाला सदस्य है। वहाँ प्रायः 380 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान रहता है, जबकि हमारी पृथ्वी का औसत तापमान 40 से 52 डिग्री सेंटीग्रेट के बीच है। इसका कारण बताते हुए प्रो. कार्ल साइमन ने कहा कि शुक्र पृथ्वी और बुध के बीच में सूर्य के सबसे समीप पड़ने वाला ग्रह है। वहाँ सूर्य की अधिक रोशनी पहुँचता है और सूर्य की गर्मी के कारण पानी की भाप तथा कार्बनडाइआक्साइड का एक घना आवरण बन गया है, जो गर्मी को बाहर नहीं जाने। इसी कारण शुक्र पर भयानक गर्मी पड़ती है।
इन दिनों पृथ्वी पर जिस तेजी से औद्योगीकरण बढ़ता जा रहा है और वायुमण्डल में कार्बनडाइआक्साइड की जितनी मात्रा घुलती जा रही है, उससे पृथ्वी के आयनमंडल पर धीरे-धीरे एक आवरण बनता जा रहा है। धीरे-धीरे स्थिति यह बनती जा रही कि उस घने आवरण में ही पृथ्वी द्वारा फेंकी जाने वाली अतिरिक्त गर्मी कैद होती जा रही है। कोई आश्चर्य नहीं कि कुछ वर्षों बाद ही पृथ्वी पर असह्य गर्मी पड़ने लगे और अनेक स्तर के संकट खड़े करे।
सुप्रसिद्ध पश्चिमी दार्शनिक ओस्वाल्ट स्पेंगुलर ने अपनी पुस्तक ‘दि डिक्लाइन ऑफ द वेस्ट’ में लिखा है कि “वर्तमान सभ्यता अब बुढ़ापे के दौर से गुजर रही है। उसने संसार में कूटनीति और युद्ध का जो रंग-मंच तैयार कर दिया है वह वास्तव में विनाश नदी की एक ऐसी कगार है, जो अब और एक बाढ़ बर्दाश्त नहीं कर पाएगी, तृतीय विश्वयुद्ध अवश्य होगा और उसके बाद वर्तमान भौतिकतावादी सभ्यता का सदा के लिए अन्त हो जाएगा।”
स्पेंगुलर ने जो तर्क प्रस्तुत किए है। वे जीवाणुओं की विस्तृत गवेषणा पर आधारित हैं और ये तर्क तथा तथ्यों पर आधारित हैं कि प्रत्येक विचारक उन्हें मानने के लिए अपने को लगभग बाध्य-सा अनुभव करता है।
प्रसिद्ध विचारक और दिव्यदर्शी रोम्यां रोला ने लिखा है” मुझे विश्वास है कि श्वेत सभ्यता का एक बड़ा भाग अपने गुणों-अवगुणों सहित नष्ट हो जाएगा, फिर एक नई सभ्यता को भारतीय सभ्यता माना है और कहा कि आगे भारतीय संस्कृति और दर्शन ही विश्वधर्म, विश्वसंस्कृति के रूप में प्रतिष्ठित होंगे तथा एक नये समाज की रचना होगी। मुझे जीवन का अन्त होने की चिन्ता नहीं, पश्चिम ही नहीं, पश्चिमी देश आत्मा की अमरता पर विश्वास नहीं करते, पर मैं करता हूँ। जो लोग इस समय पश्चिमी दुनिया में जन्म ले रहे हैं, उन्हें भीषण विपत्तियों का सामना करना पड़ेगा।”
स्पेन से प्रकाशित होने वाली एक पत्रिका’ साइन्स वेस्ट मिरर ‘ में सन 1926 के एक अंक में जी वेजीलेटीन नामक भविष्यवक्ता का लेख छपा था, जिसमें बताया गया था कि 56 वर्ष बाद (अर्थात् 1982 में) वायुमण्डल की जीवनदायी गैसें विषाक्त हो जाएँगी, तब प्रकृति का उग्रता सन 1980 के बाद क्रमशः बढ़ती हो जाएगी।प्रकृति का इतना भयंकर प्रकोप मनुष्य ने पहले कभी नहीं देखा होगा। उसमें अतिवृष्टि और अनावृष्टि से लेकर उल्कापात तथा ज्वालामुखी के विस्फोट से लेकर चुम्बकीय तूफानों तक विनाश के अनेक कारण उत्पन्न होंगे। समुद्र में कई नये टापू निकलेंगे। मित्र जैसे लगने वाले अनेक देशों में परस्पर युद्ध होगा। उसके बाद एक नई सभ्यता और संस्कृति का उदय होगा, जो पूर्व के देश (भारतवर्ष) की होगी। उससे ही वायुमण्डल शुद्ध होगा, बीमारियाँ दूर होंगी, आपसी कलह शान्त होंगे और संसार में फिर से अमन-चैन कायम होगा। लोग भाई-भाई की तरह प्रेमपूर्वक रहने लगेंगे। देश-जाति की सीमाएँ टूटकर भ्रातृभावना का ही विस्तार होगा।
अन्तर्ग्रही प्रवाहों का प्रभाव धरती के वातावरण पर, उसके पदार्थों और प्राणियों पर असंदिग्ध रूप से पड़ता हैं। सौरमण्डल से जो अदृश्य विकिरण प्रवाहित होते हैं, उन्हें अत्यधिक संवेदनशील होने के कारण नवजात शिशु असाधारण रूप से ग्रहण करता हैं, फलतः उसके व्यक्तित्व में उस स्थापना का प्रभाव एक स्थायी तथ्य बनकर जमा रहता हैं। यों प्रबल पुरुषार्थ से उसे मिटाया या घटाया भी जा सकता हैं।
अन्तरिक्ष विद्या के दो स्वरूप हैं- एक ग्रह-नक्षत्रों की गतिविधि का निर्धारण और उसके प्रत्यक्ष प्रभावों का आकलन। मौसम, तूफान, ज्वार–भाटा, चुम्बकीय विकिरण जैसे आकलन इसी प्रत्यक्ष विद्या के अंग हैं। परोक्ष खगोल विद्या वह है जिसमें ग्रह-नक्षत्रों के विकिरण का, मनुष्यों के व्यक्तियों और भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव का पता चलाया जाता हैं ग्रहों का गतिचक्र के वातावरण पर प्रभाव पड़ता हैं और प्राणियों की मनोदशा तथा गतिविधियों पर उसका दबाव अनुभव किया जाता हैं। अन्तरिक्ष के प्रत्यक्ष निर्धारण को एस्ट्रोनॉमी और परोक्ष आकलन को एस्ट्रोलॉजी कहते हैं।
इन दोनों प्रसंगों पर बहुत समय से ऊहापोह होता रहा हैं और प्रतिपादन तथा मतभेद का क्रम चलता रहा हैं, फिर भी दोनों का अपना-अपना पक्ष हैं। कटु आलोचना और विरोध-भर्त्सना का प्रसंग वहाँ खड़ा होता हैं जहाँ तीरतुक्का मिलाने वो ज्योतिषी अनजान होते हुए भी उस विज्ञान का आवरण ओढ़कर लोगों को डराते और पूजा-पाठ के नाम पर जेब काटते हैं। अन्धविश्वास, भाग्यवाद और निहित स्वार्थों का दबाव यदि हटाया जा सकें, तो ज्योतिर्विज्ञान अपने आप में एक उच्चस्तरीय विज्ञान है। उसकी गणना अनादिकाल से एक मान्यता प्राप्त शास्त्र के रूप में होती रही है।
आधुनिक शोधकर्ता और विज्ञान-वेत्ता जैसे-जैसे तथ्यों की गहराई में उतरते जाते हैं, वैसे-वैसे उन्हें यह स्वीकारना पड़ रहा हैं कि ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव प्राणियों की मनःस्थिति एवं परिस्थिति पर पड़ता हैं, साथ ही उसके दबाव से पृथ्वी के वातावरण तथा पदार्थों के स्तर में अनपेक्षित परिवर्तन आते हैं।
जान एण्टनी वेस्ट और जान गेरहार्ड टुण्डा नामक दो पत्रकारों ने फलित ज्योतिष की वैज्ञानिकता प्रमाणित करने का एक अभिनव प्रयास किया हैं उनकी पुस्तक ‘द केस फाॅर एस्ट्रोलॉजी' में यही प्रतिपादन है। उनके अनुसार, तर्क और वैज्ञानिकता के उदयकाल से लेकर वर्तमान तक ज्योतिर्विज्ञान के विरोध एवं पक्ष में लगभग एक-सी बातें कही जाती रहीं हैं।
लेखकों के अनुसार, एक ही जगह, एक ही समय में जन्मे लोगों में बहुत कुछ साम्य होता हैं। यहाँ तक कि थोड़े-से अन्तर से पैदा हुए जुड़वा बच्चों का भी। सैमुअल हेंमिग और जॉर्ज तृतीय दोनों एक ही दिन जन्मे (4 जून, 1738)। एक ही दिन उन्हें विरासत में राज मिला (सैमुअल को लुहारी दुकान, जॉर्ज को इंग्लैण्ड की गद्दी) दोनों देखने में और स्वभाव में एक से थे। दोनों का विवाह एक दिन हुआ एवं दोनों की सन्तानों की संख्या भी एक-सी थी। दोनों एक ही समय बीमार पड़ते रहे और दोनों एक ही दिन (21 जनवरी, 1820) मरें।
हाल ही के वर्षों में एक ही दिन, एक ही समय, एक ही जगह जन्मे वैज्ञानिक आइंस्टीन और ओटोहान, लेखक जेन्स स्टीफेन्स और जेम्स जायस जैसी कई जोड़ियों के जीवन में अद्भुत साम्य देखा-दिखाया गया हैं। आमतौर से एक ही समय जन्मने वाले अनेकों बालकों की मनः स्थिति एवं परिस्थिति में कोई साम्य नहीं होता। लेखकों के अनुसार, व्यक्ति का एकाकी भाग्य पूर्णतया स्वतन्त्र नहीं हैं, वह समूह के भाग्य के साथ भी जुड़ा हैं। ऐसे कई वैज्ञानिक अनुसन्धानों की चर्चा लेखक करते हैं, जिनसे सिद्ध होता हैं कि प्रकृति के अनेकानेक क्रिया−कलाप कुछ सधे-बँधे समय चक्रों में होते हैं।
वैज्ञानिकता के इस दौर में फलित ज्योतिष जैसी विद्या के सम्बन्ध में यह प्रश्न स्वाभाविक उठता है कि क्या इस पुरातन विद्या में कोई वैज्ञानिक तत्व हैं? कोपरनिकस, कैपलर तथा गैलीलियो जैसे खगोलविदों ने सूर्य को सौरमण्डल का स्थिर केन्द्र सिद्ध करके प्राचीन ज्योतिष को ध्वस्त तो किया, पर साथ ही वे स्वयं फलित ज्योतिष के परम भक्त भी रहें। स्वयं न्यूटन, जिन्होंने आधुनिक भौतिकशास्त्र की रचना में भारी योगदान दिया हैं, फलितज्योतिष के आधार पर कितने ही निर्धारण किया करते थे। एक वैज्ञानिक प्रयोग के फ्रेंक ब्राउन ने यह सिद्ध किया हैं कि मटर के दाने हों या आलू के टुकड़े हो या सीपियाँ, सभी की भीतरी घड़ियाँ (बायोलॉजिकल क्लॉक) सूर्य और चन्द्रमा की स्थिति से प्रभावित होती हैं। इस प्रभाव का रोशनी से कोई सम्बन्ध नहीं। यदि इन्हें अँधेरे में बन्द कर दिया जाए, तो भी इनका क्रम सूर्य-चन्द्र की स्थिति के अनुसार चलता रहता हैं। पड़वा के चाँद में शिथिल और पूर्णिमा के चाँद में सक्रिय गतिविधियाँ रहती हैं। सीपियाँ ज्वार-भाटे से कोई सम्बन्ध रख चन्द्रमा की कलाओं के अनुसार खुलती, बन्द होती हैं। यह भी परीक्षणों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका हैं।
वैज्ञानिक जान नेलसन के अनुसार, आयनमंडल में तूफानों का, जो रेडियो प्रसारणों में बाधा डालते हैं, सूर्य के सन्दर्भ में ग्रहों की स्थिति से सीधा सम्बन्ध हैं जब भी दो या दो से अधिक ग्रह, सूर्य की राशि में होते हैं या उससे 180 डिग्री अथवा 90 डिग्री दूर राशि में, तब भी ऐसे ही तूफान आते हैं। जब भी बहुत से ग्रह सूर्य की राशि से 60 डिग्री या 120 डिग्री की दूरी पर होते हैं, आयनमंडल शान्त रहता हैं। इस संदर्भ में याद रखने योग्य है कि पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार 90 डिग्री और 180 डिग्री का सम्बन्ध कठोर और 60 डिग्री या 120 डिग्री का सम्बन्ध कोमल माना जाता रहा हैं।
प्रस्तुत अन्तर्ग्रही परिस्थितियों पर दृष्टिपात करने वाले इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि युगसन्धि के अवसर पर जैसी उथल-पुथल होती हैं वैसी सम्भावना इन दिनों भी उभरने के लक्षण प्रतीत हो रहे हैं। इनमें विनाशकारी घटनाक्रमों की प्रखरता तो उनके कष्टकारक होने के कारण मानी ही जाएगी, किन्तु साथ ही उसके पीछे उज्ज्वल भविष्य का आश्वासन भी सुनिश्चित रूप से विद्यमान हैं।
समाजशास्त्रियों और इतिहासकारों के अनुसार, ईसा के समय विश्व की कुल जनसंख्या 30 करोड़ थी। अब तो अकेले भारत की ही आबादी इतनी हैं कि यह ईसा के समय की विश्व की आबादी से तिगुनी से अधिक हो जाती हैं ईसा के 1750 वर्ष बाद जनसंख्या लगभग ढाई गुनी अर्थात् 75 करोड़ हुई। इसके बाद से अब तक चक्रवृद्धि गणित के क्रम से जनसंख्या निरन्तर बढ़ती जा रही हैं। सन् 1850 में आबादी 110 करोड़ हुई, 1900 में 160 करोड़, 1920 में 181 करोड़ 91 लाख, 1940 में 224 करोड़, 1960 में 306 करोड़ और 1980 में 412 करोड़। इस प्रकार जनसंख्या की वृद्धि निरन्तर तीव्र से तीव्रतर ही होती जा रही हैं।
कहा जा चुका हैं कि पृथ्वी के पास सीमित प्राणियों के लिए ही स्थान और साधन उपलब्ध हैं। अन्य प्राणियों की तरह यह नियम मनुष्यों पर भी लागू होता हैं। मनुष्येत्तर प्राणियों के सम्बन्ध में देखा गया है। कि जब उनकी संख्या बढ़ने लगती हैं और सीमारेखा को लाँघ जाता हैं, तो प्रकृति उनका सफाया करने लगती हैं। यह स्वाभाविक भी हैं। प्रकृति द्वारा उपलब्ध कराये जाने वाले सुविधा-साधन अधिक संख्या में प्राणियों के लिए कम पड़ने लगते हैं। कम साधन और अधिक उपभोक्ताओं के कारण निश्चित ही संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं। शक्तिशाली दुर्बल को दबाता है और उसके हिस्से को भाग छीनता है॥ इस प्रकार के संघर्ष में जो सशक्त होते हैं, वही बचते हैं और दुर्बल मारे जाते हैं, संघर्ष की यह स्थिति अन्ततः पूरे वर्ग की ही नष्ट करके रख देती हैं। नृतत्वशास्त्रियों को प्राचीनकाल में विद्यमान रहे ऐसे कई प्राणियों के अवशेष मिले हैं, जो उन दिनों काफी शक्तिशाली और विशालकाय थे, किन्तु उनकी संख्या इतनी बढ़ गई कि प्रकृति के पास उपलब्ध साधन-स्रोत कम पड़ने लगे, संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हुई और फलतः वह पूरा का पूरा प्राणि-वर्ग ही अपना अस्तित्व नष्ट करा बैठा।
क्या मनुष्य के लिए भी प्रकृति यही न्यायनीति बरतने वाली हैं? उसके विधान में किसी से भी पक्षपात करने या किसी को भी छूट देने की गुँजाइश नहीं हैं, सो इसमें जरा भी संदेह नहीं हैं कि मनुष्य के लिए भी संघर्ष और अन्ततः विनाश का चक्र घूमने को तैयार बैठा हैं। इस आधार पर संसार भर के विचारशील और बुद्धिजीवी व्यक्ति लोगों को तरह-तरह से सीमित सन्तानोत्पादन के लिए समझाते, बड़े परिवारों की हानियाँ और जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणामों की विवेचना करते रहे है। इन बातों का कोई प्रभावशाली परिणाम उत्पन्न हुआ हो ऐसा देखने में नहीं आता, आखिर प्रकृति को ही अपना कुल्हाड़ा तेज करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा हैं।
इन दिनों संसार में हिंसा की आग बड़ी तेजी से फैल रही हैं। हत्या, मारपीट, उपद्रव, दंगे, लूटमार और अपराधों में बड़ी तेजी से बाढ़ आ रही हैं। मनोवैज्ञानिकों और प्रकृति विज्ञानियों की दृष्टि में इसका एक बड़ा कारण जनसंख्या का बहुत अधिक बढ़ जाना हैं, पिछले दिनों ब्रिटेन के दो प्रसिद्ध समाजशास्त्री क्लेअर रसेल और डब्ल्यू. एस. रसेल ने कई मामलों का अध्ययन करने के बाद जो निष्कर्ष प्राप्त किये, उनसे यही सिद्ध होता हैं कि इस तरह की घटनाओं के मूल में वस्तुतः प्रकृति प्रेरणा ही काम कर रही हैं। इन दिनों छुट-पट कारणों से उत्पन्न हुए मनमुटाव भी भयंकर हिंसावृत्ति के रूप में उभरते हैं और उनकी चपेट में प्रतिद्वंद्वियों के निरीह बाल-बच्चे भी आ जाते हैं। धन के लालच में चोरी-ठगी की अपेक्षा सफाया करके निश्चिन्ततापूर्वक लाभान्वित होने की आपराधिक प्रवृत्तियाँ पिछले दिनों तेजी से बढ़ी हैं। क्यों हिंसावृत्ति इतनी उग्र होती जा रही हैं? इस पर विभिन्न दृष्टियों से विचार और कई परीक्षण करने के बाद यही सिद्ध हुआ कि जनसंख्या का दबाव मनुष्य को उथला, असहिष्णु और असंतुलित बना देता हैं। इसी कारण लोग जल्दी उत्तेजित हो जाते हैं अथवा हत्या और हिंसा करने में जरा भी नहीं झिझकते।
संख्या के दबाव का मनोवैज्ञानिक प्रभाव जाँचने के लिए किए गए प्रयोगों में देखा गया कि छोटे-छोटे जानवर जब छिरछिरे, खुले और शाँत वातावरण में रहते थे, तब उनकी प्रकृति बहुत शान्त थी, किन्तु जब उन्हें भीड़-भाड़ में रखा गया, तो वे उत्तेजित और थके-माँदे रहने लगे तथा उनमें एक-दूसरे पर आक्रमण करने की प्रवृत्ति भी पनपती देखी गई। सर्वविदित हैं कि भीड़-भाड़ के कारण मल-मूत्र पसीना तथा रद्दी चीजों की गंदगी भी बढ़ती हैं और शरीर से निकालने वाली ऊष्मा अपने निकटवर्ती वातावरण को प्रभावित करती हैं, मनः शास्त्रियों के अनुसार यह विकृतियाँ ही प्राणियों तथा मनुष्यों को उत्तेजित करती एवं उन्हें अशान्त बनाती हैं। यही कारण है कि छोटे गाँवों की अपेक्षा कस्बों में तथा कस्बों की अपेक्षा शहरों में अधिक अपराध करते हैं हत्याओं और आत्महत्याओं का अनुपात भी इन्हीं कारणों से सघन आबादी वाले क्षेत्रों में अधिक पाया गया हैं।
सामाजिक और पारिवारिक वातावरण यदि संतोषजनक समाधान कारण बना रहें, तो उसमें रहने वाले व्यक्ति भी शान्त-प्रकृति के हो सकते हैं, किन्तु जब तो उसमें परिवार का वातावरण शाँत, संतुलित बना रहना प्रायः कठिन ही होता हैं फलस्वरूप कलह पैदा होता हैं और इस कलह के कारण परिवार के प्रत्येक सदस्य को खिन्न, दुःखी एवं अशान्त होना पड़ता हैं। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक ही रोष उत्पन्न होता है और यही रोष हिंसावृत्ति में बदल जाता हैं इन दिनों जितने भी उपद्रव हो रहे हैं, उनके मूल इस तरह की पारिवारिक परिस्थितियाँ एक बड़ी सीमा तक उत्तरदायी हैं।
शहरों में आबादी बढ़ रही हैं और परिवारों में संतान की संख्या। कुल मिलाकर जनसंख्या तेजी से बढ़ती जा रही हैं और जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ एक दूसरा खतरा भी मनुष्यजाति के सिर पर मँडरा रहा हैं- वह है औद्योगीकरण के कारण स्वच्छ जल और शुद्ध वायु का दिनोंदिन दुर्लभ होते जाना। इन दिनों नये-नये उद्योग-धन्धे नये कलकारखाने खुलते जा रहे हैं। इन कल-कारखानों और फैक्ट्रियों के लिए बड़ी मात्रा में पानी भी चाहिए और वह पानी उपलब्ध जलस्रोतों से ही प्राप्त किया जाता हैं। बात यही तक सीमित रहती तो भी गनीमत थी, समस्या तो तब और विकराल रूप धारण कर जाती हैं जब कल-कारखानों से निकलने वाला कूड़ा- कबाड़ा जलस्रोतों में फेंक दिया जाता हैं और फेंकी गई उन गंदगियों के कारण जलस्रोत दूषित हो जाते हैं। यों पृथ्वी पर पानी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, पर अधिकाँश जलस्रोत इतने दूषित हो गए हैं कि पीने योग्य पानी का एक तरह से अकाल ही पड़ता जा रहा हैं। अपनी पृथ्वी का 97 प्रतिशत हिस्सा समुद्र से ढँका हुआ है। समुद्र का वह पानी न तो पीने योग्य होता है और न ही कल-कारखानों या कृषि-उद्योगों के लिए ही उपयुक्त हैं। दो प्रतिशत जल बर्फ के रूप में उत्तरी-दक्षिणी ध्रुवों तथा ऊँचे पर्वतों की चोटियों पर जमा रहता हैं। एक प्रतिशत जल ही ऐसा होता हैं, जो खेती, जंगल, उद्योग-धन्धों तथा पीने के काम में लाया जा सकता हैं उसमें भी काफी पानी बेकार चला जाता हैं, जितना पानी बचता हैं, उसका सातवाँ भाग नदियाँ समुद्रों में फेंक देती हैं। अब जो पानी बचता हैं उसी में कल-कारखानों खेती-बागवानी और पीने-पकाने की आवश्यकता पूरी करनी पड़ती हैं। कल-कारखानों और फैक्ट्रियों की बाढ़ पेयजल का एक बहुत बड़ा भाग झपट लेती हैं। इतना ही नहीं उत्सर्जित गंदगी से आस-पास के जलस्रोतों को भी दूषित कर देती हैं। कल-कारखानों के कारण मनुष्य को अपने भाग में से कितनी कटौती करनी पड़ती हैं-इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता हैं कि महानगरों में रहने वाले लोगों को अपनी आवश्यकता का केवल 40 प्रतिशत ही स्वच्छ जल मिल पाता हैं इसी में उन्हें खींच-तानकर काम चलाना पड़ता हैं।
स्वच्छ जल का कितना बड़ा भाग कारखाने और फैक्ट्रियाँ झटक लेते हैं? यह कल्पना करने के लिए इन तथ्यों से अनुमान लगाना चाहिए कि एक लीटर पैट्रोल बनाने के लिए 10 लीटर पानी फूँकना पड़ता हैं। 1 किलो सब्जी पर 40 लीटर, 1 किलो कागज के लिए 100 लीटर तथा 1 टन सीमेंट के लिए 3500 लीटर पानी जलाना पड़ता हैं। इतना होने के बाद कारखाने जो जहर फेंकते हैं वह भी उपलब्ध पानी का एक बहुत बड़ा हिस्सा नष्ट कर डालता हैं, क्योंकि उसे भी नदी-तालाबों में ही फेंका जाता हैं। इसके कारण उन नदी-तालाबों का पानी किसी काम का नहीं रह जाता, वह इतना विषाक्त हो जाता हैं किन केवल झील-तालाबों की सुन्दरता नष्ट हो जाती हैं वरन् उनमें रहने वाले जीव-जन्तु और उनका प्रयोग करने वाले सभी अपनी सम्पदा नष्ट करने के लिए विवश हो जाते हैं। इन दिनों अमेरिका के कई झील-झरने जो कभी अपनी सुन्दरता के कारण प्रकृतिप्रेमियों का जी ललचाते थे और लोग उनके किनारे बैठकर अपना थोड़ा-बहुत समय शाँति से बिताया करते थे, अपना आकर्षण खो बैठे हैं। प्रशासन ने अब कई झील-झरनों और नदी-जलाशयों के किनारों पर बड़े-बड़े सूचनापट लगा दिए हैं, जिन पर लिखा हैं ‘डेन्जर! पोल्यूटेड वाटर, नो स्वीमिंग', (खबरदार! पानी जहरीला हैं, तैरिये मत)। वहाँ के औद्योगिक नगरों के निकटवर्ती सरोवर अब एक प्रकार से मृतक जलाशय बन चुके हैं। नदियाँ अब गंदगी बहाने वाली गटरें मात्र रह गई।
यह कैसे हुआ? मात्र एक ही कारण है कि कारखानों में जो कुछ वेस्टेज, कूड़ा-कबाड़ा निकलता हैं, वह इन नदी-तालाबों निकलता हैं, वह इन नदी-तालाबों में फेंक दिया जाता हैं। विशेषज्ञों का कथन है कि इस प्रकार जो प्रदूषण फैल रहा हैं, उसके कारण अगले दिनों पेयजल का गम्भीर संकट उत्पन्न होगा। प्रसिद्ध रसायन विशेषज्ञ नाटवल्ड डैफिमराइट ने नार्वे की सेट फ्लेयर झील से पकड़ी गई मछलियों का रासायनिक विश्लेषण किया तो पाया कि उनमें पारे की खतरनाक मात्रा मौजूद हैं। मछलियों में पारे का अंश कहाँ से आया? अधिक बारीकी से पता लगाया गया तो मालूम हुआ कि उस झील के किनारे से लगे हुए कारखाने से, जो औद्योगिक रसायन फेंका जाता था, उसमें पारे की भी एक बड़ी मात्रा होती हैं और वह गंदगी के रूप में बहती हुई झीलों में पहुँचती हैं। सोचा यह था कि यह पारा भारी होने कारण जल की तली में बैठ जाएगा। कुछ मछलियाँ यदि पारी से मर भी गई तो कुछ विशेष हानि नहीं होगी। पर यह अनुमान गलत निकला और मछलियाँ पारे कि प्रतिक्रिया से प्रभावित हुई तथा वह प्रभाव उनके शरीर में एक इकाई बनकर जम गया। उल्लेखनीय हैं कि इन मछलियों का भोजन के रूप में उपयोग करने के कारण कई मनुष्य अन्धे और पागल हो गए तथा सैकड़ों की तो मृत्यु हो गई।
इस तरह की सैकड़ों घटनाएँ सैकड़ों जाँचें हो चुकी हैं, जिनमें किसी क्षेत्रविशेष में कोई बीमारी अचानक फैली और उस बीमारी के कारणों की गम्भीरता से खोज-बीन की गई तो पता चला कि यह विपत्ति निकटवर्ती दूषित उन जलस्रोतों का पानी प्रयोग करने से आई हैं, जिनमें कारखानों द्वारा गंदगी छोड़ी जाती हैं। औद्योगीकरण के कारण केवल जलस्रोत ही दूषित हो रहे हैं, ऐसा भी नहीं हैं, बल्कि कल-कारखानों और रेल-मोटरों से जो धुँआ हवा में घोला जाता हैं वह भी बड़ी भारी विपत्ति बनकर निकट भविष्य में ही बरसने वाला हैं।
फिलहाल तो ब्रिटेन, जर्मनी, फ्राँस, बेल्जियम, अमेरिका जैसे उन्नत देशों में ही स्थिति विषम से विषमतर होती जा रही हैं, किन्तु शीघ्र ही धुएँ के जहरीले प्रभाव से सारा संसार संकट में पड़ने वाला हैं। रोम की राष्ट्रीय अनुसंधान समिति के निर्देशक रावर्टों पैसिनों ने वायुप्रदूषण के कारण उत्पन्न होने वाले खतरों की और संकेत करते हुए कहा है कि इससे व्यापक-जीवन की समस्या निकट भविष्य में ही खड़ी होने जा रही हैं। भले अभी कुछेक उन्नत देश ही इससे प्रभावित होते दिखाई दे रहे हों, किन्तु शीघ्र ही संसार भर के देश कम-ज्यादा रूप में घुलते जा रहे विषों के प्रभाव से यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि संभवतः इन विषैले तत्त्वों के कारण सारी पृथ्वी ही भयंकर रूप से गर्म होकर जल जाए अथवा उस पर रहने वाले प्राणी धुएँ के कारण घुट-घुट कर मरने लगें।
इस दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण संभावना का वैज्ञानिक आधार बताते हुए वैज्ञानिक कहते हैं कि कारखानों की भट्ठियों और रेल-मोटरों से निकलने वाला धुँआ आकाश में छाने लगता है तथा अवसर पाते ही धरती की और झरने लगता है। यह झुकाव कभी भी इतना घना हो सकता है कि कभी भी कहीं भी, कोई भी दुर्घटना घट सकती हैं और हजारों लोगों को अपनी चपेट में लेकर मृत्यु की गोदी में फेंक सकती हैं। थर्मल इर्न्वशन (ताप व्यतिक्रमण) की प्रक्रिया शुरू होते ही धुँआ धुँध के रूप में बरसने लगता है। जब तक वायु गर्मी से प्रभावित रहती हैं, तब तक तो धुँआ-धुंध हवा के साथ ऊपर उठता रहता हैं, लेकिन जब शीतलता के कारण वायु नम हो जाती है तो धूलि का उठाव रुक जाता है और वह वायु दूषण नीचे की और गिरने लगता है। हवा का बहाव बन्द हो जाने पर तो यह विपत्ति और भी बढ़ती सकती है। पिछले दिनों कई देशों में पाँच-सात दिन तक इस तरह के विषैले धुएँ की धुँध छाई रही और इस धुँध के दौरान ही सैकड़ों लोगों की घुट-घुटकर बुरी तरह खाँसते अपने प्राण गँवाने पड़े। इस तरह की घटनाएँ अगले दिनों यत्र-तत्र घटेगी।
हजारों लोगों को एक साथ मार डालने वाली घटनाओं का ताँता न भी लगे, तो भी कल-कारखाने और रेल-मोटरें जिस तेजी से वायुमण्डल को विषाक्त करते जा रहे हैं, उनके कारण नये-नये रोगों के उत्पन्न होने की सम्भावना निश्चित ही समझनी चाहिए। वायुप्रदूषण के भयंकर खतरों की और वैज्ञानिक समय-समय पर ध्यान आकर्षित करते रहे हैं। कुछ समय पूर्व ब्रिटेन की पर्यावरण प्रदूषण शोध संस्था के वैज्ञानिक ने यह वक्तव्य प्रसारित किया कि “पिछले दिनों धुएँ के रूप में जितना विष वायुमण्डल में छोड़ा गया हैं और अब भी छोड़ा जा रहा हैं, यदि शीघ्र ही कोई नियन्त्रण नहीं किया गया तो बहुत जल्द ही ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाने वाली है, जिसमें विश्व के अधिकाँश जीवों का, जिसमें मनुष्यों के अतिरिक्त अन्य प्राणी भी आते हैं, सबको दम घोटकर चट कर जाएगा।” स्मरण रह यह चेतावनी आज से 18 वर्ष पूर्व की है।
भावी युद्ध हेतु अणु-आयुधों का निर्माण भारी मात्रा में हो रहा हैं। उनके परीक्षण विस्फोटों से जितना विकिरण अन्तरिक्ष में भर चुका, उसके फलस्वरूप अप्रत्यक्ष रूप से करोड़ों का शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा हैं और इससे नई पीढ़ियों को विकलांग, विक्षिप्त एवं अविकसित स्तर का जीवन-यापन करना पड़ेगा। यह विस्फोटों का सिलसिला अभी चल ही रहा है और उससे सर्वनाश का खतरा दिन-दिन बढ़ रहा हैं। अणुयुद्ध हुआ तब तो समझना चाहिए कि महाप्रलय जैसी स्थिति ही उत्पन्न होगी और इस धरती का वातावरण मनुष्य ही नहीं किसी अन्य प्राणी के जीवित रहने योग्य न रहेगा।
बढ़ता हुआ कोलाहल, नशों का अन्धाधुन्ध प्रयोग, रासायनिक खाद, कीटमारक छिड़काव आदि के फलस्वरूप मनुष्य की जीवन-शक्ति दिन-दिन घटने तथा विषाक्तता बढ़ने का दौर घटता नहीं, बढ़ता ही जा रहा हैं। ऐसी दशा में न शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा हो सकेगी और न मानसिक सन्तुलन की।
कुछ विपत्तियाँ ऐसी होती हैं जो शस्त्र प्रहार की तरह तत्काल प्राणसंकट उत्पन्न करती हैं, कुछ क्षय रोग की तरह अविज्ञात रहती और धीरे-धीरे गलाती, घुलाती, मरण के मुख में धकेलती हैं। जनसंख्या वृद्धि, वायु प्रदूषण, अणु-विकिरण कोलाहल, रासायनिक विषाक्तता, नशे जैसे संकट होते हैं, जो गलाकर समस्त मानव समाज को विनाश के गर्त में धकेलते जा रहे हैं
युगसन्धि की इस वेला में परिस्थितियाँ तो यही बताती हैं कि संकट बढ़ते चले जा रहे हैं। इनसे जूझना या मरण के सम्मुख सिर झुकाना यही दो मार्ग सामने है। अच्छा यही है कि विनाश के साथ मुठभेड़ करने की तैयारी की जाए। इसी में अपना बचाव हैं और इसी समस्त मानव समाज का संरक्षण।
महाराज भोज एक दिन लेटे-लेटे सोचने लगे कि लक्ष्मी जब चंचला हैं, तब जो ऐश्वर्य के अधिकारी हैं, उन्हें अपने वैभव का सदुपयोग करना आवश्यक हैं। अतः दूसरे दिन उठते ही जरूरतमन्दों को बुलाकर उन्होंने अनुदान देना शुरू कर दिया, ताकि वे स्वावलम्बी बन सकें। प्रजा अपने महाराज की इस उदारता पर फूली न समायी।
महामंत्री तनिक संकुचित एवं संकीर्ण मनोवृत्ति के थे। वे सोच में पड़ गए, भला ऐसे अनुदान देते रहने से राजलक्ष्मी कितने दिन रहेगी? उन्होंने दानशाला की दीवार पर जहाँ महाराज की नजर अवश्य पड़े, लिख दिया- आपातकाल के लिए धन की सुरक्षा करना कर्तव्य हैं।”
दूसरे दिन महाराज ने पूछा-यह किसने लिखा हैं? पर जब किसी ने उत्तर नहीं दिया, तो उसके नीचे उन्होंने लिख दिया-भाग्यशाली को आपत्ति कहाँ?” महामंत्री ने जब पढ़ा तो उसी के नीचे और लिख दिया-भाग्य यदि कुपित हो जाए तो?”
राजा ने इसके उत्तर में लिखा-पुरुषार्थी अपने भाग्य का कोप शान्त करने में समर्थ होते हैं। यही नहीं, वे अपने प्रचण्ड-पुरुषार्थ से नए भाग्यविधान की रचना करते हैं।”
इस पर निरुत्तर होकर महामंत्री ने आत्मसमर्पण कर दिया और महाराज के अनुदान से युवा स्वरोजगार योजना अबोध गति से चलती रही।
यों प्रकृति के उतार-चढ़ाव भी प्राणियों को प्रभावित करते हैं और उन कारणों से भी उन्हें कई प्रकार की सुविधा-असुविधाओं का सहन करना होता हैं किन्तु यह तथ्य सामान्य प्राणियों पर ही अधिकतर लागू होता हैं मनुष्य की विलक्षण बुद्धि उसे प्रकृति के प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में सहायता करती रहती हैं। मनुष्य प्रकृति पर पूर्णतया आधिपत्य तो स्थापित नहीं कर सकेगा, पर इतना अवश्य है कि अनुकूलन में बहुत बड़ी सफलता प्राप्त कर ली हैं। इसी सफलता का स्तर और अनुपात अगले दिनों घटेगा नहीं, बढ़ता ही जाएगा।
इस तथ्य की चर्चा यहाँ इसलिए की जा रही है कि इन दिनों मनुष्य के सामने प्रस्तुत वैयक्तिक और सामूहिक कठिनाइयों का कारण खोजते समय कहीं प्रकृति की प्रतिकूलता को दोषी न ठहराया जान लगे। बहुत भाग्यवादी लोग ऐसा ही कुछ कहते सुने जाते हैं कि ग्रह-नक्षत्रों ने, विधि-विधान ने, प्रकृति परिस्थितियों ने मनुष्य के सामने कठिनाइयाँ उत्पन्न की और वह उनके प्रभाव से विपत्तियों में फँस गया। सुविधा-संवर्द्धन के अवसरों पर भी इसी प्रकार श्रेय आकस्मिक परिस्थितियों को दिया जाने लगता हैं। ऐसा कभी-कभी अपवाद जितना भले ही होता हो, आमतौर से मानवी -चिन्तन और प्रयास ही भली-बुरी परिस्थितियों के लिए उत्तरदायी होता हैं। प्रकृति की प्रतिकूलता भी कभी किसी सीमा तक कारण होती हैं, पर मनुष्य को परिस्थितियों से जूझने का इतना अनुभव प्राप्त है कि वह उनसे सुरक्षा के उपाय किसी न किसी प्रकार खोज ही लेता हैं प्रकृति-संघर्ष के लम्बे इतिहास में सृष्टि के आरम्भ से लेकर अब तक का घटनाक्रम साक्षी है कि मनुष्य हारा नहीं। जीता भले ही न हो पर तालमेल बिठा लेने में, उसे आशाजनक सफलता दिलाने में बुद्धि-कौशल ने सदा-सर्वदा अपना चमत्कार दिखाया हैं।
जमाना बुरा हैं, कलियुग का दौर हैं, परिस्थितियाँ कुछ ऐसी ही बन गई, भाग्यचक्र प्रतिकूल रहा- जैसे कारण बताकर मन तो हलका किया जा सकता है, पर उससे समाधान कुछ नहीं निकलता। मूर्धन्य राजनेताओं, दार्शनिकों, सेनापतियों, धर्माचार्यों, धनिकों को भी प्रतिकूलताओं के लिए दोषी तो ठहराया जा सकता है, पर यह नहीं कहा जा सकता कि जन-मानस सर्वथा निर्दोष हैं। तथ्य यह है कि मूर्धन्य व्यक्ति भी आकाश से नहीं टपकते, जन-समाज में से ही निकलते हैं। लोकमानस का स्तर ही प्रतिभाएँ उत्पन्न करता और उन्हें दिशा प्रदान करता हैं। व्यक्ति अपने आप में पूर्ण हैं उसकी अन्तः चेतना में अनन्त संभावनाएँ बीज रूप में विद्यमान हैं। वे उभरती हैं तो व्यक्तित्व का स्तर बनता है और उस आधार पर विनिर्मित हुई प्रतिभा अपना चमत्कार दिखाती हैं। मूर्धन्यों के उभरने और पुरुषार्थ की दिशा अपनाने का यही तत्त्वज्ञान है। परिस्थितियों को दोष या श्रेय देने को तो किसी को भी दिया जा सकता हैं, पर मूल कारण ढूँढ़ना और तथ्य तक पहुँचाना हो तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि व्यक्ति का अन्तराल ही प्रगति एवं अवगति के लिए उत्तरदायी हैं आज की विषम परिस्थिति को बदलने की जा आवश्यकता समझते हैं, उन्हें कारण की तह तक पहुँचना होगा, अन्यथा सूखते, मुरझाते पेड़ को हरा बनाने के लिए जड़ की उपेक्षा करके पत्ते सींचने जैसी विडंबना चलती रहेगी और थकान के अतिरिक्त और कुछ भी पल्ले न पड़ेगा।
आमतौर से मनुष्य की कृतियों को परिस्थितियों के लिए उत्तरदायी माना जाता हैं प्रत्यक्षवादी को इतना ही दीखता हैं किन्तु जो गहराई तक उतर सकते हैं, उन्हें प्रतीत होगा कि शरीर जड़ पदार्थों का बना हैं, वह उपकरण मात्र हैं उसमें क्रियाशीलता तो हैं, पर यह विवेक नहीं कि क्या करें, क्या न करें। यह निर्धारण मन को करना होता हैं। शरीर मन का आज्ञानुवर्ती सेवक हैं मन इशारे पर ही उसके समस्त क्रिया-कलाप चलते हैं। भली-बुरी आदतें यों देखने में तो शरीर के अभ्यास में जुड़ी प्रतीत होती है।, पर वास्तविकता यह है कि गुण, कर्म, स्वभाव का सारा ढाँचा मनःक्षेत्र में खड़ा रहता हैं, शरीर को तो उस बाजीगर के इशारे पर कठपुतली की तरह हरकत भर करनी होती हैं। शरीर से की गई हर क्रिया के लिए मानसिक स्तर को ही कारण मानना होगा।
इससे भी अगली परत एक और है जहाँ पहुँचने पर व्यक्तित्व के आधारभूत मर्मस्थल का जाना जा सकता है। यह है आस्था केन्द्र-अन्तःकरण यहीं भाव-सम्वेदनाएँ उठती हैं। रुचि और इच्छा का निर्माण यहीं होता हैं। साधारण बुद्धि तो शरीर द्वारा किए गए कर्मों का ही परिस्थिति उत्पन्न करने वाला कारण मानती है। सूक्ष्म दृष्टि की खोज आगे तक जाती हैं और वह मानसिक स्तर को, विचार-विन्यास का महत्व देती हैं। इससे आगे तथ्यान्वेषी प्रज्ञा का विवेचन प्रतिपादन आरम्भ होता हैं। वह व्यापक परिस्थितियों के लिए लोगों की कृतियाँ और विचारणाओं को एक सीमा तक उत्तरदायी मानती हैं। उसका अन्तिम निर्णय यही होता है कि अन्तःकरण का स्तर ही विचार-समुच्चय में से अपने अनुकूलों को अपनाता हैं। व्यक्ति जो कुछ सोचता या करता है वस्तुतः वह सब कुछ आस्था एवं आकांक्षा के उद्गम केन्द्र- अन्तःकरण का ही निर्देश होता हैं।
सामान्य परिस्थितियाँ सभी के लिए एक जैसी होती हैं साधन-सुविधा के अवसर किसी-किसी को तो पैतृक उत्तराधिकार में या आकस्मिक कारणों से भी मिल जाते हैं, पर आमतौर से सारा उपार्जन मनुष्य की आन्रिक अभिरुचि के अनुरूप होता हैं। यही हैं चुम्बकत्व का वह उद्गम केन्द्र, जो अपने स्तर के विचारों, साधनों, व्यक्तियों को आकर्षित-आमन्त्रित करता हैं। यही है व्यक्तित्व पूँजी या कुँजी। कहने को तो यही कहा जाता है कि जो जैसा सोचता है वह वैसा बनता हैं, पर वास्तविकता यह है कि जिसकी आकांक्षा जिस स्तर की होती हैं, उसे उसी स्तर के विचार जम जम जाते हैं वे ही शरीर को अपनी मनमर्जी पर शिल्पी के उपकरणों की तरह हिलाते-घुमाते रहते हैं।
गीताकार ने इस आत्यंतिक सत्य का रहस्योद्घाटन करते हुए हैं- श्रद्धामयोऽयं पुरुषों यो यच्छद्धः स एवं सः।”
व्यक्तित्व श्रद्धा का ही प्रतिफल हैं। जिसकी जैसी श्रद्धा है उसका स्तर ठीक तदनुरूप ही होता हैं।
मनुष्यों की आकृति और नित्यकर्म प्रक्रिया प्रायः एक जैसी होती हैं। सभी के शरीर आहार-विहार की पद्धति लगभग एक जैसी ही अपनाते हैं नहाने, खाने, सोने, जागने जैसे हरकतें और अनुकूल सुविधा-साधन पाने के लिए सभी समान रूप से इच्छुक रहते हैं। ऋतुप्रभाव से लेकर समय का प्रभा भी सभी को समान रूप से प्रभावित करता हैं। थोड़ा-बहुत अन्तर भले ही हो, प्रगति के लिए अवसर हर मनस्वी को उपलब्ध रहते हैं। ऐसी दशा में किसी का पिछड़ेपन से घिरा रहना, किसी का दिन गुजारना, किसी का प्रगतिशील, होना, किसी को महामानवों जैसी मूर्धन्य स्थिति प्राप्त करना आश्चर्यजनक लगता है इस आकाश-पाताल जैसे अन्तर का एकमात्र कारण अन्तराल में अवस्थित आस्था एवं आकांक्षाएँ ही होती हैं वे ही जीवन -क्रम की दिशाधारा निर्धारित करती है।
एक ही प्रसंग में असंख्य प्रकार की विचारधाराओं का प्रचलन हैं। उनमें से किन्हें चुना जाए, इसका फैसला अन्तराल अपनी आस्थाओं एवं आकांक्षाओं के अनुरूप करता हैं क्या साधन ढूँढ़ जाएँ? किन व्यक्तियों से संपर्क साधा जाए, कि परिस्थितियों में रहा जाए, किस प्रकार का वातावरण अपनाया जाए, इसका अन्तिम निर्णय बाहरी व्यक्ति नहीं करते हैं। यह परामर्श या संगति वातावरण के कारण होती भर दीखती हैं। वास्तविकता यह हैं कि मनुष्य का ‘स्व’ उसके अन्तराल में प्रतिष्ठित रहता है। निर्णय-निर्धारण यहीं से होते हैं। मन और शरीर स्वामिभक्त सेवक की तरह अन्तःकरण की आकांक्षा को पूरा करने के लिए तत्परता और ईमानदारी के साथ लगें रहते हैं। एक ही परिस्थितियों में जन्मे और पले व्यक्तियों के सामने एक जैसे अवसर रहने पर भी उनकी दिशाधारा भिन्न दिशाओं में चलती हैं और ऐसे परिणामों पर पहुँचती हैं, जिन्हें उन साथियों के मध्य आकाश-पाताल जैसे अन्तर के रूप में देखा जा सकता है। इस गूढ़ पहेली का समाधान एक ही हैं कि व्यक्तियों की आस्था ही उन्हें सोचने करने के लिए विवश करती है। और धकेलते-धकेलते भली या बुरी परिस्थितियों के दरबार में जा खड़ा करती हैं। तत्त्वदर्शियों का यह निष्कर्ष अक्षरशः सही हैं कि अन्तःकरण ही व्यक्तित्व है। आस्था ही चिन्तन और चरित्र की दिशाधारा निर्धारित करती है। कौन किस प्रकार जिया और किन परिस्थितियों में रहा, इसका निमित्त कारण उनके अन्तःकरण का स्तर ही होता हैं। यहीं उत्थान-पतन का भाग्यविधान लिखा जाता हैं कदाचित विधाता इसी मर्मकेन्द्र को कहते है। भाग्य और भविष्य यदि वस्तुतः लिख जाता होगा तो उसकी विधिपाठ अन्तराल के मर्मस्थल में ही प्रतिष्ठित होती होगी।
कई बार परिस्थितियाँ भी किसी को कुछ से कुछ बना देती हैं, पर उन्हें अपवाद के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। इतनी बड़ी विश्ववसुधा में बेतुके प्रसंगों का जब-तब घटित होते रहना अप्रत्याशित नहीं हैं। अनुपयुक्तों को भी कई बार उच्चस्तरीय परिस्थितियाँ मिल सकती हैं। इस प्रकार उपयुक्त व्यक्ति कुछ समय तक हेय परिस्थितियों में भी तथ्य सुनिश्चित हैं कि व्यक्ति के स्तर और परिस्थिति के बीच यदि विसंगति बन भी गई होगी तो वह अधिक सम ठहरेगी नहीं। न तो कुपात्र, श्रेष्ठता को स्थिर-सुरक्षित रख सकते हैं और न श्रेष्ठ व्यक्तियों को देर तक हेय परिस्थितियों में घिरे रहना पड़ता हैं।
प्राचीनकाल और अर्वाचीनकाल में जो तुलनात्मक विसंगतियाँ पाई जाती हैं उनका कारण परिस्थिति नहीं मनः-स्थिति हैं। परिस्थिति की दृष्टि से आज सुविधा-साधनों का बाहुल्य हैं। सम्पत्ति, शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प, कला, व्यवसाय, विज्ञान आदि क्षेत्रों में हम अपने पूर्वजों की तुलना में कहीं अधिक समृद्ध, सौभाग्यशाली हैं किन्तु स्वास्थ्य सन्तुलन, स्नेह, सहयोग जैसे जीवन के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में श्मशान जैसी वीभत्स भयंकरता छाई हुई हैं। जबकि होना उल्टा यह चाहिए कि लोग अधिक समृद्ध, सुसंस्कृत दिखाई पड़ते, प्रसन्न रहते और प्रसन्न रखते। उठते और उठाते। जो क्षमताएँ सृजन और सहयोग में नियोजित रहने पर संसार में स्वर्गीय वातावरण बना सकती थीं-वे ही एक दूसरे को काटने गिराने में लगी हुई हैं। यह दुरुपयोग कैसे बन पड़ा? सृजन की धारा ध्वंस में कैसे जुट गई? इस विडम्बना का कारण एक ही हैं, आदर्शवादी आस्थाओं का पलायन। अन्तःकरण के स्तर का अवमूल्यन। इसी विपर्यय की प्रतिक्रिया व्यक्ति और समाज के सम्मुख खड़ी हुई अनेकानेक समस्याओं, विपत्तियों और विभीषिकाओं के रूप में दृष्टिगोचर हो रही हैं।
प्राचीनकाल में लोग स्वल्प-साधनों से गुजारा कर लेते थे। आज की तुलना में उस समय की भारी अभावग्रस्तता भी उन्हें अखरती नहीं थी। कारण इतना ही था कि तब यह सोचा जाता था कि जीवन उच्चस्तरीय प्रयोजनों के लिए हैं। शरीर-निर्वाह के लिए न्यूनतम साधन जुटाने में सन्तोष करने के उपरान्त क्षमताओं का समुच्चय सदुद्देश्यों में नियोजित रहना चाहिए। आदर्शवादी परम्पराओं को अपनाने में गर्व-गौरव अनुभव करना चाहिए। प्रसन्नता का आधार परमार्थ रहना चाहिए। यही वे मान्यताएँ हैं जिनके कारण हमारे महान पूर्वज अपने क्षेत्र में स्वर्गीय परिस्थितियाँ बनाये रहने के उपरान्त समस्त विश्व को अजस्र अनुदानों से लाभान्वित करते हुए लोकश्रद्धा अर्जित करने की दृष्टि से देवमानव कहलाने का सौभाग्य पा सके।
आज आस्थाओं का स्तर गिर गया। संकीर्ण स्वार्थपरता का विलासी परिपोषण जीवन का लक्ष्य बन गया हैं। वैभव के सम्पादन और उसका उद्धत-उच्छृंखल दुरुपयोग ही जन-जन को अभीष्ट हैं। आदर्शवादी कहने -सुनने भर का एक बुद्धि-विलास बनकर रह गया हैं। समृद्धि बढ़ रही हैं और चातुर्य की मात्रा भी। न प्रतिभाओं की कमी हैं, न कर्म-कौशल को चरितार्थ कर सकने के अवसरों की। फिर भी श्रेष्ठता का संवर्द्धन और निकृष्टता का उन्मूलन बन कठिनाई है कि लोकमानस पर पशु-प्रवृत्तियों का ही आधिपत्य हैं। आदर्शों के प्रति न आस्था हैं, न आकांक्षा। उस स्तर कीं उमंगें उठती ही नहीं। उत्कृष्टता अपनाने में गर्व गौरव की अनुभूति कर सकने वाली भाव-सम्वेदना को ढूँढ़ निकालना अति कठिन हो रहा हैं। ऐसी दशा में आधे-अधूरे मन से श्रेष्ठता का लँगड़ा लूला समर्थन और उन्हें क्रियान्वित करने के अनुत्साह कोई ऐसे आधार खड़े नहीं कर सकते, जिनके सहारे ध्वंस को निरस्त और सृजन को अग्रसर कर सकना सम्भव हो सके।
हम आस्था-संकट के दुर्दिनों में रह रहे हैं। दुर्भिक्ष मात्र आस्थाओं का है। अन्य सभी वस्तुएँ महँगे-सस्ते दाम पर विपुल परिमाण में खरीदी जा सकती है। समस्याओं का स्थूल उत्पत्ति क्षेत्र आर्थिक, राजनैतिक या सामाजिक प्रतीत होता हैं। अतएव इन्हीं को सुधारने के लिए आन्दोलन और संघर्ष खड़े किये जाते रहते हैं। स्वास्थ्य की गिरावट का कारण असंयम नहीं, विषाणुओं का आक्रमण माना जाता हैं मनोरोगों का कारण उत्कृष्ट-चिन्तन का अभाव नहीं, स्वेच्छाचार का नियंत्रण बताया जाता हैं। अर्थसमस्या का समाधान श्रमशीलता और मितव्ययिता का अभाव नहीं, पूँजी का वितरण माना जाता हैं। अपराधों को रोकने के लिए आस्तिकता का, आध्यात्मिकता का तत्त्व-दर्शन हृदयंगम कराने की उपेक्षा की जाती हैं और पुलिस-कचहरी में समाधान खोजा जाता हैं। राजसत्ता को सुधार की जादुई छड़ी मानकर उस पर आधिपत्य करने के लिए हर महत्त्वाकाँक्षी लालायित हैं। धर्मतन्त्र को परिष्कृत करने और उसके सहारे आस्थाओं से झंझट खत्म करने का मार्ग किसी को सूझता तक नहीं हैं। यह उथले प्रयत्न हैं। रक्त की विषाक्तता की उपेक्षा करके फुंसियों पर पट्टी बाँधते रहने का रास्ता बहुत लम्बा है। और अभीष्ट परिणाम की दृष्टि से नितान्त संदिग्ध। फिर भी घुड़दौड़ इन्हीं उथले प्रयत्नों के बवंडर खड़े करने में लगी हुई है। जड़ को खोजे बिना उथले प्रयत्न कितने दिनों में किस सीमा तक सफल हो सकेंगे, यह नितान्त अनिश्चित है।
यह हजार बार समझना और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि अपने युग की अनेकानेक समस्याओं, विपत्तियों और विभीषिकाओं का एकमात्र कारण मानवी अन्तःकरण में सन्निहित रहने वाली उच्चस्तरीय आस्थाओं का अवमूल्यन है। सड़ी कीचड़ में से मक्खी-मच्छर कृमि-कीटक विषाणु और दुर्गन्ध के उभार उठते है। इनका आत्यंतिक निराकरण नाली में जमी हुई सड़न को धो डालना ही हो सकता हैं। आस्थाओं में जड़ जमाये बैठी हुई निकृष्टता का न हटाया जा सका, अन्तःकरण में उत्कृष्टता का स्तर न बढ़ाया जा सका, तो समझना चाहिए बालू से तेल निकालने की तरह सुधार- परिवर्तन के समस्त प्रयास निष्फल ही होते रहेंगे। उज्ज्वल भविष्य दिवास्वप्न की तरह कल्पना का विषय ही बना रहेगा।
बाह्योपचारों के लिए कोई मनाही नहीं। वे होते हैं और होते रहने चाहिए। किन्तु महत्व अन्तःउपचार का भी समझा जाना चाहिए। युगपरिवर्तन का वास्तविक तात्पर्य हैं अन्तःकरण में जमी हुई आस्थाओं का उत्कृष्टतावादी पुनर्निर्धारण। समस्त समस्याओं का समाधान, इस एक ही उपाय पर केन्द्रित हैं, क्योंकि गुत्थियों का निर्माण इसी क्षेत्र में विकृतियाँ उत्पन्न होने के कारण हुआ-खाद्य-संकट ईंधन-संकट स्वास्थ्य संकट, सुरक्षा-संकट की तरह आत्मा संकट के व्यापक क्षेत्र और प्रभाव को भी समझा जाना चाहिए। युग की समस्याओं के समाधान में इससे कम में कम चलेगा नहीं और इससे अधिक और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। यों लोगों को आश्वासन देने की दृष्टि से सुधार और संवर्द्धन के बहिर्मुखी प्रयास भी चलते रहने चाहिए, किन्तु ठोस बात तभी बनेगी। जब समष्टि के अन्तःकरण में उत्कृष्टता की आस्थाओं का आरोपण और अभिवर्द्धन युद्धस्तरीय आवेश के साथ किया जाएगा। एक ही समस्या हैं और एक ही समाधान। मनुष्य इसे भले ही समझ न पाये, पर महाकाल को यथार्थता की जानकारी हैं। वह लोकमानस में आस्थाओं को पुनर्जीवन प्रदान करने के लिए प्रज्ञावतार को भेज रहा है।उसका प्रधान उद्देश्य अनास्था को आस्था में बदल देना ही होगा।
साधु स्वामिनाथन की कुटिया गाँव के पास ही थी। प्रायः प्रतिदिन सायंकाल ग्रामीण लोग उनके पास जाते और धर्म-चर्चा का लाभ प्राप्त करते।
जब संध्याभजन का समय आता, गाँव के दो नटखट लड़के आ धमकते और कहते-महात्मन् आप से ज्ञान प्राप्त करने आये हैं।” फिर शुरू करते गप्पें बीच-बीच में साधु को चिढ़ाने, गुस्सा दिलाने वाली बातें भी करते जाते। उनका तो मनोरंजन होता, पर स्वामिनाथन का भजन-पूजन का समय निकल जाता। यह क्रम महीनों चलता रहा, पर साधु एक दिन भी गुस्सा नहीं हुए। बालकों के साथ बात करते हुए आप भी हँसते रहते।
बहुत दिन बाद भी जब वे नटखट लड़के उन्हें क्रुद्ध न कर सकें, तो उन्हें अपने आप पर क्षोभ हुआ। उन्होंने क्षमा माँगते हुए पूछा- महात्मन् हमने जान-बूझकर आपको चिढ़ाने का प्रयत्न किया, फिर भी आप न कभी खीझ, न क्रुद्ध हुए।”
स्वामिनाथन ने हँसते हुए कहा- वत्स यदि मैं ही क्रुद्ध हो जाता, तो आप सबको सिखा क्या पाता?”
स्वयं आवेश में आकर असन्तुलित हो जाने वाले दूसरों का सुधार नहीं कर सकते।
इन दिनों विज्ञान ने जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रगति की है। जो जानकारियाँ एवं सुविधाएँ पूर्वजों को उपलब्ध थीं, उनकी तुलना में अपनी उपलब्धियाँ कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी हैं। इन उपलब्धियों को ही प्रगति कहा जाए, तो यह मानने में कोई हर्ज नहीं हैं कि मानवी सभ्यता ने प्रगति की है किस दिशा में हुई? उत्थान की दिशा में अथवा पतन की दिशा में, तो स्थिति निस्सन्देह शोचनीय हो जाती हैं। क्योंकि प्रगति उत्थान की दिशा में भी हो सकती हैं और पतन की दिशा में भी। प्रगति का अर्थ बढ़ना हैं, तो बढ़ना आगे भी हो सकता है, और पीछे बढ़ी, यह विश्लेषण किया जाए तो प्रतीत होगा कि इन दिनों सुविधा-साधनों के साथ-साथ विनाश, विग्रह और पतन के साधन भी उतनी ही तेजी से, कहा जाए कि उससे भी अधिक तीव्रता के साथ विकसित किए गए हैं, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वर्तमान प्रगति किस दिशा में हुई हैं, उससे मनुष्य ने क्या पाया हैं? शान्ति, सुरक्षा, सुव्यवस्था और प्रगति की दृष्टि से विज्ञान ने मनुष्य को जितने सुविधा-साधनों से लैस किया हैं, उससे भी अधिक मनुष्य के पास विनाशकारी और संहारक अस्त्र-शस्त्रों का भण्डार एकत्रित हो गया हैं पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रकाशित आँकड़ों के अनुसार, इस समय विश्व के शक्तिशाली राष्ट्रों के पास इतनी अधिक मात्रा में गोला-बारूद जमा है। कि उससे पृथ्वी का एक बार नहीं, सात-सात बार जलाकर राख किया जा सकता हैं।
प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में जो विनाश और नरसंहार हुआ, वह सर्वविदित हैं। इसके बाद तीसरे विश्वयुद्ध में होने वाले विनाश की सम्भावनाओं की कल्पना भी नहीं की जा सकती। प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन से किसी ने एक बार तीसरे विश्वयुद्ध के सम्बन्ध में पूछा तो उन्होंने उत्तर दिया कि तीसरे विश्वयुद्ध के बारे में तो कुछ नहीं कहा जा सकता, पर चौथे विश्वयुद्ध के सम्बन्ध में जरूर कुछ-कुछ कल्पना की जा सकती हैं।
इस कल्पना को स्पष्ट करते हुए आइंस्टीन ने कहा था कि तीसरे विश्वयुद्ध के बाद यदि कोई लड़ाई लड़ी गई, यदि इसके बाद थोड़े-बहुत मनुष्य बचे और उनमें कोई युद्ध हुआ तो वह युद्ध ईंट-पत्थरों से लड़ा जाएगा। अर्थात् तीसरे विश्वयुद्ध में इतना प्रलयकारी विनाश होगा कि मनुष्य जाति का अस्तित्व किसी प्रकार बचा रहा तो भी यह निश्चित है कि सभ्यता और संस्कृति का तो अन्त हो ही जाएगा। यह सच है कि इन दिनों सुरक्षा और शान्ति के साधन बढ़ाने के नाम पर, जो साधन-सरंजाम जुटाए जा रहे हैं, उन साधनों के रूप में मृत्यु को अति सरल और अतिनिकट बना देने वाले साधनों का ही विकास तेजी से हो रहा हैं।
लाठी, फरसे से होने वाली मारकाट की तुलना में यह स्थिति निश्चय ही प्रगति कही जा सकती हैं, यदि व्यापक विनाश को सस्ता और सरल बना देना ही प्रगति कहा जाए, तो कोई एक व्यक्ति, जो इस तरह के साधनों का संचालन, नियन्त्रण और प्रबन्ध का उत्तरदायित्व सम्हालता हैं, यदि थोड़ी देर के लिए बहक जाए, तो इस सुन्दर संसार को भस्मीभूत करके रख सकता हैं।
आइये, थोड़ा इन विनाश साधनों का विवरण जानें। इन दिनों अमेरिका ने एक नये किस्म का प्रक्षेपक विमान बनाया है। इस विमान में अणुबमों से लैस मिसाइलें फिट कर दी जाती हैं और उन्हें आकाश से ही चलाकर लक्ष्य पर छोड़ा जा सकता है। अब तक ऐसी मिसाइलें केवल जमीन पर से ही छोड़ी जा सकती थीं। शत्रुपक्ष गुप्तचरों द्वारा यह जानकारी रख सकता था। कि प्रतिपक्ष के पास इस तरह के अणुबम प्रक्षेपण करने वाले अड्डे कहाँ-कहाँ हैं। इस जानकारी के आधार पर उन्हें नष्ट करने की व्यवस्था बनाई जा सकती थी। अणु अस्त्र फेंकने और शत्रुपक्ष की मार से बचने के लिए इसी आधार पर अब तक युद्ध नीति निर्धारित की जाती थी, किन्तु अब बी-वन नामक विमानों ने नई समस्याएँ पैदा कर दी है। मिसाइलें उस पर लदी होंगी, और आकाश से ही निशाने पर बम दाग दिए जाएँगे। ये बमवर्षक इतने ऊपर उड़ रहे होंगे कि वहाँ तक तोपों के गोले नहीं पहुँचे सकेंगे। उन्हें राकेटों से तोड़ने की बात सोची जाए, तो वह भी कठिन होगा, क्योंकि उस बमवर्षक यान के चालक उसे सीधी दिशा में एक गति से नहीं उड़ा रहे होंगे। आकाश में वे कभी दायें, कभी बायें, कभी दायें, कभी पीछे, कभी ऊपर, कभी नीचे इस तरह उलटी-पुलटी दिशाओं में, ऊँचाई-नीचाई पर उड़ेंगे और उन्हें जमीन से राकेट दाग कर नष्ट करना प्रायः असम्भव ही रहेगा। इस प्रकार ये बमवर्षक विमान बिना जोखिम उठाये अपना काम कर सकेंगे।
कैलीफोर्निया के रासवेल इण्टर नेशनल प्लांट ने जब इस बी-बन बम-वर्षक विमान को पहली बार उड़ाया तो उसके समय जेट 2400 किलोमीटर प्रति घण्टे की चाल से उड़ रहा था। इसकी मार करीब इस हजार किलोमीटर पहुँचती थी। उसका भार 1 लाख 15 हजार पौंड तथा मूल्य करीब 50 करोड़ डॉलर हैं लम्बाई 144 फीट, ऊँचाई 34 फीट और इसके पंख 137 फीट के हैं। इसमें अभी और विकास किया जाना है। आकाश से अणुबम दागने की तकनीक तक ही बात सीमित होती, इन दिनों तो युद्ध में शत्रुपक्ष को मारने के लिए नए-नए तरीके विकसित किये जा रहे हैं।
स्मरणीय हैं युद्ध का उद्देश्य सदैव यही रहता है कि शत्रुराष्ट्र के जन-धन को अधिक से अधिक हानि पहुँचाई जाए।
अभी तक की लड़ाइयाँ में यह स्पष्ट रहता था कि युद्ध किन देशों के बीच चल रहा हैं, किन्तु अब इस तरह के प्रयास चल रहे हैं, जिसमें कोई देश किसी के सामने न आए, यह स्पष्ट न हो कि लड़ाई किन देशों के बीच चल रही है और व्यापक स्तर पर प्रतिपक्षी को हानि पहुँचाई जा सके। इस सावधानी के लिए युद्ध के नये-से-नये तरीके खोजे जा रहे हैं। अब तक खोजे गये तरीकों में से नवीनतम दो तरीकों में जीवाणुयुद्ध तथा भूगर्भीययुद्ध हैं।
जीवाणु-युद्धों के सम्बन्ध में प्रायः चर्चाएँ होती रहती हैं और इनके कारण होने वाले भयंकर विनाश के बारे में पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हैं। प्रतिपक्षी देश को इस युद्ध के द्वारा हानि पहुँचाने की प्रक्रिया में न ऐसा लगता है कि कोई देश हमला कर रहा है और न ही ऐसा लगता है कि कहीं किन्हीं शत्रुओं का उपयोग हो रहा हैं युद्ध का उपक्रम चुपचाप बिना किसी हल्ले के चलता रहता है, ऊपर से देखने में बेहद शान्त स्थिति लगती हैं, पर विनाश अपना ताण्डव नृत्य नेपथ्य में रचता रहता हैं, जिसकी प्रतिक्रिया असाधारण रूप से देखने में आती है। इस प्रक्रिया में विषाक्त जीवाणुओं को चुपचाप दूसरे देश में पहुँचा दिया जाता है यह विषाणु इतने सूक्ष्म होते हैं कि आमतौर पर शक्तिशाली माइक्रोस्कोप यन्त्रों के द्वारा भी नहीं देखे जा सकते हैं। सुई की नोक के बराबर स्थान में यह जीवाणु लाखों की संख्या में बड़ी आसानी से आ जाते हैं और उन्हें किसी व्यक्ति के नाखून पर लगाकर भी दूसरे देशों में बड़ी सरलतापूर्वक पहुँचाया जा सकता हैं।
उन देशों में पहुँचने के बाद ये जीवाणु जब सक्रिय होते हैं, तो असाध्य बीमारियाँ महामारी के रूप में फैलती हैं। उनका कोई कारण भी समझ में नहीं आता, लेकिन वे इतनी तेजी से फैलती हैं कि लाखों लोग अपनी जान गँवा बैठते हैं। अब तक के युद्धों में तो ऐसा होता है कि सेनाएँ एक-दूसरे पर आक्रमण करती हैं, गोला-बारूद और आग्नेयास्त्रों के प्रयोग द्वारा इस प्रकार के युद्धों में केवल सैनिक ही मारे जाते हैं, परन्तु अगले दिनों जो युद्ध लड़े जाएँगे, उनमें निरीह लाखों की भी हत्या होगी।
जीवाणु-युद्धों के अतिरिक्त दूसरे प्रकार के युद्धों में भू-भौतिकीय अथवा भूगर्भीय-युद्ध भी कम विनाशकारी नहीं हैं। इन युद्धों में पृथ्वी की ऊर्जा का उपयोग करके भूकम्प लाने, जलवायु बदलने तथा पृथ्वी के वायुमण्डल में परिवर्तन कर दूसरे देशों को हानि पहुँचाने का उपक्रम रचा जाएगा। इस प्रकार के युद्धों में कुछ क्रियाओं का तत्काल असर पड़ेगा और कुछ धीरे-धीरे सामान्य जीवन को प्रभावित करेंगी। प्रभाव चाहे तत्काल हो या धीरे-धीरे वे होंगे अत्यन्त घातक ही।
इस प्रकार के युद्धों में सौर ऊर्जा के प्रयोग की भी सम्भावना हैं। स्मरणीय हैं सूर्य सात लाख मेगावाट अणुबमों की शक्ति के बराबर ऊर्जा प्रतिदिन पृथ्वी पर फेंकता है। इस असाधारण ऊर्जा का एक बहुत बड़ा अंश प्रकृति पर विभिन्न रूपों में समा जाता हैं। समुद्र और वायुमण्डल इस ऊर्जा का एक बहुत बड़ा भाग सोख लेते हैं और इस ऊर्जा से ही पृथ्वी पर मौसमों का चक्र बनता हैं। समुद्र और वायुमण्डल इस ऊर्जा का एक समान नहीं सोखते। कहीं-कहीं यह ऊर्जा बहुत अधिक मात्रा में केन्द्रित हो जाती है। इस केन्द्रित ऊर्जा के कारण समुद्र में तूफान, चक्रवात आदि आते रहते हैं। एक समुद्री तूफान के कारण जलप्रलय से ठीक वैसा ही विनाश उत्पन्न होता हैं, जितना कि पाँच हजार टन बारूद या विस्फोट के बराबर होते हैं। इस तरह के तूफान प्रायः समुद्र में उड़ते रहते हैं। युद्धविज्ञानी इस बात के लिए प्रयास कर रहें हैं कि इन तूफानों की दिशा व गति बदलकर मनचाही दिशा में मोड़ी व घटाई-बढ़ाई जा सकें। इस तरह के कई प्रयोग सफल भी हुए हैं। अब अनुमान लगाया जा सकता हैं कि युद्ध के रूप में इस तकनीक का उपयोग किया गया, तो इसके कितने घातक परिणाम हो सकते हैं।
आकाश में घूमती हुई अगणित उल्काएँ पृथ्वी के वायुमण्डल में प्रवेश करती हैं। इनमें से अधिकाँश उल्काएँ तो वायुमण्डल के ताप और घर्षण से ही जलकर नष्ट हो जाती हैं, किन्तु जो उल्काएँ पृथ्वी पर आ गिरती हैं, उनका प्रभाव निश्चित होता हैं। इन उल्काओं का रास्ता बदलकर दूसरे क्षेत्रों में गिराने के वैज्ञानिक प्रयास भी चल रहे हैं और उनसे ठीक वैसा ही विनाश प्रस्तुत किया जा सकेगा, जैसा कि बड़ी उल्काओं के पृथ्वी पर गिरने से होता हैं। ये उल्काएँ तो कहीं भी जंगल में या आबादी में गिर सकती हैं और आमतौर पर उल्काओं का युद्ध के लिए प्रयोग किया जाएगा, तो निश्चित ही उन्हें आबादी वाले क्षेत्रों में गिराया जाएगा। बड़ी उल्काओं के गिरने से पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक स्थानों पर हुए विनाश के चिह्न अभी भी मौजूद हैं। अफ्रीका में कुछ वर्षों पूर्व हुए एक उल्कापात के परिणामस्वरूप ‘ऐरीजोना क्रेटर’ नाम का विशाल गड्ढा इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं। इसका व्यास एक मील का हैं तथा साथ ही मीलों दूर तक उल्का के धातुकण छितरे पाये गए हैं। यदि इस प्रकार उल्काओं की दिशा मोड़कर उन्हें आबादी वाले क्षेत्रों में गिराया गया, तो कहा नहीं जा सकता कि कितना और कैसा विनाश ताण्डव खड़ा हो जाएगा?
बर्फ को पिघलाकर भूभागों को जलमग्न कर देने, अतिवृष्टि, अनावृष्टि करने तथा भीषण गर्मी या भयंकर शीत का मौसम बदल देने जैसे प्राकृतिक परिवर्तन प्रस्तुत करने के अनेकों सफल प्रयोग किए जा रहे हैं। युद्ध की यह नई पद्धतियों पिछली सभी पद्धतियों की अपेक्षा अधिक विध्वंसक हैं। इन सब स्थितियों को देखते हुए लगता है कि मनुष्य ने जो प्रगति की हैं वह विकास की अपेक्षा विनाश की ओर, सामूहिक आत्मघात की ओर ही अधिक कदम उठाए हैं। ये तथ्य यह भी सिद्ध करते हैं। कि बुद्धि और साधन क्षेत्र में मनुष्य कितना ही विकास क्यों न कर ले, चेतना और अन्तःस्थिति का परिष्कार किए बिना वह प्रगति अधूरी, एकांगी और घातक ही हैं।
ऐसी स्थिति में मानवीय अस्तित्व की रक्षा के लिए कदम उठाना अनिवार्य हैं। उथल-पुथल उलट-फेर भय और संकटों से तो नहीं बचा जा सकता, किन्तु प्रकृति उसके लिए सन्नद्ध और सचेष्ट दीखती हैं, सूक्ष्मदर्शी इस बात के लिए एकमत है कि अगले दिनों व्यापक क्रान्ति के मध्य नये युग का सूत्रपात सुनिश्चित हैं।
शक्ति और साधनों की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। सुविधा-संवर्द्धन की दृष्टि से उनका बाहुल्य निश्चित रूप से अभीष्ट हैं। इसलिए इन दोनों का व्यर्थ बताने या उपेक्षा करने का प्रश्न ही नहीं उठता। पराक्रम के लिए सामर्थ्य चाहिए और उपलब्धियों के लिए उपकरण। अस्तु, इन दोनों का संचय-संवर्द्धन मनुष्य आदिमकाल से ही करता रहा हैं और जब तक धरती पर उसका अस्तित्व हैं, तब तक करता भी होगा। यह स्वाभाविक भी हैं, उचित भी और अभीष्ट भी।
किन्तु ध्यान रखने योग्य तथ्य यह है कि शक्ति एवं साधनों का उपयोग करने वाली चेतना का स्तर ऊँचा रहना चाहिए, तभी समर्थता और सम्पदा का सहयोग बन पड़ेगा। इसके अभाव में बन्दर के हाथ में तलवार पड़ने की तरह मात्र अनर्थ की ही सम्भावना हैं। दुर्बुद्धियुक्त कुकर्मी का सशक्त होना उसे विनाश के गर्त में और भी तेजी के साथ धकेलता हैं। आग में ईंधन पड़ने से वह भड़कती ही हैं। अन्तरंग की निकृष्टता, अभावग्रस्त स्थिति में तो दबी भी पड़ी रहती हैं, पर साधन मिलने पर तो उसे खुल खेलने का अवसर मिलता हैं। ऐसी दशा में कुकर्मी का वैभव उसके स्वयं के लिए, सम्बन्धित व्यक्तियों के लिए और समस्त समाज के लिए अभिशाप ही सिद्ध होता हैं। दुर्बलता बुरी होती हैं, पर दुष्टता तो भयानक ही कही जाएगी। अभावजन्य दुर्बलता को कोई पसन्द नहीं करता, पर समर्थताजन्य दुष्टता द्वारा कुछ घटित होता हैं, उसे देखकर तो रोमांच ही हो आता हैं। सम्पन्नता और समर्थता बढ़ने का लाभ तभी हैं, जब उस पर नियन्त्रण करने वाली शालीनता को अक्षुण्ण और प्रखर रखा जा सकें।
पिछले दिनों प्रगति के नाम पर बहुत कुछ हुआ हैं। उससे अनेकों में कुशलता और तत्परता का बड़े परिमाण में नियोजन हुआ हैं। अन्यमनस्कता और अकर्मण्यता की हेय स्थिति की तुलना में इस पुरुषार्थ की मुक्तकण्ठ से सराहना ही की जाएगी। जिन पुरुषार्थियों ने बुद्धि-कौशल से विज्ञान-उद्योग आदि क्षेत्रों में प्रयत्न करके सुविधा-साधन बढ़ाये हैं, उनके पराक्रम को तिरस्कृत नहीं किया जा सकता। इतने पर भी यह अभाव खटकता ही रहेगा कि दूरदर्शिता, विवेकशीलता, उदारता, शालीनता जैसी सत्प्रवृत्तियों का उत्पादन, अभिवर्द्धन उपेक्षित ही पड़ा रहा। उसकी उपयोगिता वैसी नहीं समझी गई, जैसी समझी जानी चाहिए थी। एकांगी चिन्तन यह बताता रहा कि भौतिक प्रगति ही सब कुछ हैं। साधनों के बढ़ने पर मनुष्य के समान उपस्थित होने वाली सभी कठिनाइयों का समाधान हो जाएगा।
मनुष्य जितना बुद्धिमान हैं, उतना ही अदूरदर्शी भी। सम्पदा को सब कुछ मान बैठने और चेतना की उत्कृष्टता को उपेक्षित रखने की भूल निश्चित रूप से अदूरदर्शिता हैं। इतिहास साक्षी हैं कि निकृष्ट स्तर के व्यक्तित्व समर्थता प्राप्त करने के उपरान्त अपने कुकर्मों से सारे वातावरण का ही विक्षुब्ध करते रहे हैं। उनका वैभव असंख्यों के लिए अभिशाप बना हैं। आज भी इस तथ्य को पग-पग पर चरितार्थ होते देखा जा सकता हैं। सम्पन्न देशों के नागरिक उपलब्ध सुविधाओं का उपयोग किस प्रयोजन के लिए कर रहें हैं, उसके क्या-क्या परिणाम भुगत रहे हैं, उसका प्रमाण अमेरिका जैसे सम्पन्न देशों की वास्तविक स्थिति को, ऊपर से चमकीला आवरण उखाड़कर भली-भाँति देखा जा सकता हैं। सम्पन्नता से सुविधाएँ तो बढ़ती हैं, पर उससे व्यक्ति के अन्तरंग को ऊँचा उठाने में तनिक भी सहायता नहीं मिलती। फलतः मात्र भौतिक सफलता के सहारे जिस स्थिति में जा पहुँचते हैं उससे भारी निराशा होती हैं। क्या व्यक्ति, क्या समाज और क्या राष्ट्र सभी पर यह तथ्य समान रूप से लागू होता है कि आदर्शवादिता बढ़े बिना, बढ़े हुए वैभव संकटों और विग्रहों की ही बाढ़ आती हैं।
आदर्शवादिता का नियंत्रण हट जाने पर बलिष्ठता की परिणति उद्दण्ड उच्छृंखलता में होती हैं, सुन्दरता, कामुकता और अहमन्यता का पथ प्रशस्त करती हैं। बढ़ा हुआ बुद्धि-कौशल छद्म रचने के कमा आता हैं। वैभव के बढ़ते ही दुर्व्यसन चढ़ दौड़ते हैं। अधिकारों का उपयोग स्वार्थ के लिए, अशक्तों के शोषण-उत्पीड़न में होता हैं। कला का सौष्ठव पशु-प्रवृत्तियों को भड़काने में नियोजित होता हैं। धनी अधिक धनी बनना चाहता हैं, समर्थ अधिक सामर्थ्यवान, किन्तु वे यह नहीं सोच पाते कि इस अभिवृद्धि का सदुपयोग क्या हो सकता हैं? दूरदर्शी विवेक के अभाव में तृष्णा ओर अहंता की पूर्ति ही वह आधार रह जाती हैं, जिसके लिए बाहुल्य को लगाया जा सकें। यह होता है, यही हो रहा हैं। प्रतिक्रिया सामने हैं- वैभव बढ़ रहा हैं, साथ ही विक्षोभ भी। साधन बढ़ रहे हैं, साथ ही दुर्व्यसन भी। शिक्षा, साधन और कुशलता-संवर्द्धन के अनेकानेक आधार बढ़ रहे हैं। और मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक चतुर, अधिक सतर्क बनता जा रहा हैं। इतने पर भी यह बढ़ी हुई बुद्धिमत्ता दूरभिसंधियाँ गढ़ने में ही काम आती हैं।
शान्तचित्त से स्थिति की विवेचना करने पर एक बार तो ऐसा लगता हैं कि प्रगति की दिशा में दौड़ते हुए हम अवगति के गर्त में गिरने को तेजी से बढ़ रहे हैं तब क्या प्रगति निरर्थक हैं? समर्थता और सम्पन्नता बढ़ाने के लिए, जो प्रयत्न चल रहे हैं क्या वह अनावश्यक हैं? इस प्रकार सोचने की आवश्यकता नहीं हैं। सम्पन्नता अचेतन है और समर्थता, अन्धी। इनमें से न किसी को भला कहा जा सकता है, न बुरा। पदार्थ, पदार्थ हैं और बल, बल हैं। इनमें क्षमता भर है। इतनी योग्यता नहीं कि अपना उपयोग किसी भले या बुरे प्रयोजन के लिए कर सकें। आग में ताप तो हैं, पर उससे यह निर्णय करते नहीं बनता कि वह भोजन पकाने में लगे या अग्निकाण्ड उत्पन्न करने में। यह कार्य किसी सचेतन का हैं पदार्थ प्रकृति की प्रेरणा भर अंगीकार करते हैं। उचित-अनुचित का निर्णय करना या परिणाम की कल्पना करना उनके वश से बाहर की बात है। इसलिए बारूद, आग, बिजली जैसी समर्थताओं से भी उचित-अनुचित का निर्णय करते नहीं बन पड़ता।
चेतन ही उन्हें विकास या विनाश के लिए नियोजन करता है। रेल, मोटर, जहाज की गतिशीलता सर्वविदित है, किन्तु वे कुशल ड्राइवर के संरक्षण में ही अपनी उपयोगिता का परिचय दे सकते हैं, अन्यथा वे अनियमित गतिशीलता अपनाकर स्वयं नष्ट होने एवं दूसरों को नष्ट करने जैसी दुर्घटनाएँ ही उपस्थित कर सकते है।
एकांगी प्रगति असंतुलन उत्पन्न करती है। एक पहिए की गाड़ी और अर्द्धांग पक्षाघात से पीड़ित काया कितनी ही मूल्यवान क्यों न हो अन्ततः भारभूत ही सिद्ध होती है। एक पैर मोटा, एक पतला होना सुन्दरता और गतिशीलता में बाधक ही होता है। फूला हुआ पेट, घेंघें का गला, सूजा हुआ चेहरा, रसौली या फोड़ा होने पर वे अंग अपेक्षाकृत उठे, उभरे दिखाई पड़ते हैं, तो भी उस असन्तुलन को न शुभ माना जाता है, न सुविधाजनक। जीवन एकांगी नहीं है। उसके दो पक्ष है, एक शरीर अर्थात् भौतिक, दूसरा प्राण अर्थात् चेतन, दोनों का सम्मिलित ढाँचा जब तक सुसंतुलित बना रहता है तभी तक जीवनचर्या चलती है। एक के विलग हो जाने पर दूसरा अपंग, असमर्थ ही नहीं, परिहार्य ही हो जाता है। प्राणरहित शरीर तो तेजी से सड़ता है, शरीररहित प्राण भूत-पलीत जैसी विचित्र स्थिति में जा पहुँचता है। भौतिक प्रगति को लक्ष्मी कहा गया है, पर नारायण के आदर्श के साथ रहने में ही उसकी शोभा है। ऋद्धि-सिद्धि के युग्म में भौतिक और आत्मिक प्रगति का सहसंतुलन ही प्रतिपादित किया गया है-उमा-महेश शची- पुरंदर, सीता-राम राधेश्याम आदि युग्मों में प्रगति की उभयपक्षीय आवश्यकता का ही प्रतिपादन है। साधन रहित सद्भावना और सद्भावरहित साधन की स्थिति अवांछनीय ही मानी जाती है।
पिछले दिनों बुद्धिवाद और प्रत्यक्षवाद ने जीवन के भौतिकपक्ष को ही तत्त्वदर्शन के आधार पर प्रतिपादित हो सकने वाली उत्कृष्टता को काल्पनिक कहकर अमान्य ठहरा दिया है। फलतः आदर्शवादिता का नियंत्रण लोकमानस पर से उठ गया। अनियंत्रित पशु- प्रवृत्तियाँ समर्थ होने की स्थिति में कितनी उच्छृंखल एवं घातक होती हैं, इसका अनुमान मदोन्मत्त हाथी, नरभक्षी, व्याघ्र, श्मशान के पिशाच, जलाशय के मगर द्वारा किए जाने वाले विनाश को देखकर सहज ही लगाया जा सकता है। छुट्टल पशु हरी-भरी फसल को चरकर समाप्त कर देते है। अराजकता दुष्परिणाम का जो अनुमान लगा सकते है, उन्हें यह भी जानना चाहिए कि चेतना पर से आदर्शवादिता का अंकुश हट जाने पर जो परिस्थिति उत्पन्न होती है, उसे सर्वनाशी दावानल से कम विघातक नहीं माना जा सकता। शत्रुदेश के आक्रमण, गृहयुद्ध, दुर्भिक्ष, महामारी आदि विपत्तियों से जूझने के लिए अवसर आने पर अथवा उससे पहले ही जो सतर्क सक्रियता अपनानी होती है, उससे कम नहीं अधिक ही सावधानी चिन्तनक्षेत्र पर आधिपत्य जमाने वाले स्वेच्छाचार के प्रति बरती जानी चाहिए।
पिछली पीढ़ी प्रत्यक्षवादी अदूरदर्शिता के आतुर आवेश में मात्र भौतिक प्रगति पर ही अपनी सक्रियता नियोजित किए रही है, जबकि उससे भी अधिक प्रयास चेतना को सुसंस्कृत बनाने के लिए किया जाना चाहिए था। शरीर से प्राण का मूल्य और महत्व अधिक है। उसी प्रकार समृद्धि से संस्कृति की गरिमा अपेक्षाकृत अधिक समझी जानी चाहिए। इस संदर्भ में जो असंतुलन बरता गया, एकांगी दृष्टिकोण को अपनाया गया, उसी की प्रतिक्रिया आज अनेकानेक संकटों और विग्रहों के रूप में सामने प्रस्तुत है। जिस तत्परता से समृद्धि-संवर्द्धन का प्रयास किया गया, उसी तन्मयता से सद्भाव उन्नयन के लिए प्रबल प्रयास होने चाहिए थे। शरीर से आत्मा का महत्व अधिक है। इसलिए समृद्धि की तुलना में संस्कृति को प्रमुखता मिलनी चाहिए थी और उसी अनुपात से लोकमानस को उत्कृष्टता से भरा-पूरा रखने वाले प्रयास चलने चाहिए थे। वर्षा का पानी नाला न मिलने पर भयंकर बाढ़ के रूप में विनाशलीला उत्पन्न करता है। इसी का दृश्य हम सब अपनी आँखों से प्रत्यक्ष देखते हैं।
भूल के परिमार्जन का ठीक यही समय है। मानवी दूरदर्शिता से शान्तचित्त से विचार करना चाहिए कि क्या पिछली भूल का परिमार्जन करने के लिए अब कुछ नहीं हो सकता? मानवी प्रखरता को समझने वाले यह भली प्रकार जानते है कि जिस भी दिशा में आकांक्षा और तत्परता का विनियोग होता है, उसी दिशा में तूफानी प्रगति होने लगती है। आज के साधन जहाँ विनाश का पथ प्रशस्त करते हैं वहाँ उनमें यह क्षमता भी विद्यमान है कि विकास के साँस्कृतिक पुनरुत्थान की दिशा में भी चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत कर सकें। प्रेस, लाउडस्पीकर, चलचित्र जैसे कितने ही उपयोगी यन्त्र ऐसे निकल पड़े हैं, जिनकी सहायता से चिंतन को परिष्कृत करने की दिशा में कई प्रचारात्मक कार्य आसानी से सम्पन्न हो सकते हैं। युगसाहित्य का निर्माण और प्रसारण एक कार्य है और ज्ञान-गोष्ठियों के माध्यम से मनीषियों द्वारा शिक्षण दूसरा। रचनात्मक और सुधारात्मक गतिविधियों की सुगठित रूपरेखा बनाकर उनमें असंख्यों सद्भाव सम्पन्नों की श्रम-साधना नियोजन की जा सकती है। समृद्धि-संवर्द्धन के लिए जिस प्रकार सोचा जाता रहा है, जिस प्रकार उसमें साधन, श्रम तथा मनोयोग का नियोजन होता रहा है, उसी तन्मयता तथा तत्परता से यह भावनात्मक उत्कृष्टता बढ़ाने के लिए सक्रियता अपनाई जाएगी, तो कोई कारण नहीं कि प्रयत्न असफल चले जाएँ। असफलता का एक ही प्रमुख कारण है, उपयुक्त तन्मयता तथा अभिरुचि एवं प्रयत्नशीलता का अभाव। इसे यदि दूर किया जा सके, तो प्रगति किसी भी क्षेत्र में हो सकती है, भले ही वह उत्कृष्टता-संवर्द्धन के लिए ही नियोजन क्यों न की गई हो?
यहाँ स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि जिस क्षेत्र में दृष्टिकोण की उत्कृष्टता उत्पन्न होती है वह न तो शरीर है और न मस्तिष्क। शरीर को सैनिकों, नर्तकों, श्रमिकों, बालचारों की तरह कुछ अभ्यास करा दिए जाए तो उससे काया भर सधेगी। मस्तिष्क को प्रशिक्षित करने के लिए कितनी ही तरह के पाठ्यक्रम चलते हैं। दृश्य दिखाए, अनुभव कराए और प्रसंग सुनाए जाते हैं। साहित्य पढ़ने और प्रवचन सुनने का भी क्रम चलता रहता है, उससे जानकारी भर बढ़ती है। आस्थाओं के परिष्कार में कोई खास सहायता नहीं मिलती। नीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, नागरिकशास्त्र आदि पढ़ाने वाले अध्यापकों तक का निजी जीवन जब उच्चस्तरीय न बन सका, आदर्शवादिता पर आये दिन लिखते रहने वाले लेखकों तक का स्तर जब सामान्य लोगों से अधिक ऊँचा न उठ सका,कथा - प्रवचनों में संलग्न रहने वाले पुरोहितों तक को जब प्रतिपादन के अनुरूप आचरण करते न पाया जा सका,तो यही मानना पड़ेगा कि मस्तिष्कीय शिक्षा मात्र जानकारी बढ़ाती है। उसका सीधा प्रभाव उस मर्मस्थल तक नहीं पहुँच पाता,जहाँ उच्चस्तरीय आस्थाओं का उत्पादन और उत्थान होता है। यदि व्यक्तियों के मूल आधार - दृष्टिकोण को परिष्कृत - परिमार्जित करना हो तो फिर निश्चय ही पुनर्निर्माण का कार्यक्षेत्र अन्तः करण को मानकर चलना होगा। तब उन आधारों को अपनाना होगा,जो उच्चस्तरीय आस्थाएँ उत्पन्न करने में काम आते और सफल होते रहे है।
आस्थाओं के क्षेत्र को स्पर्श करने वाला एक ही माध्यम है, अध्यात्म - अध्यात्म के चिन्तन को तत्त्वदर्शन और व्यवहार को धर्म कहते हैं। दोनों को मिलाने से ही समग्र अध्यात्म बनाता है। तत्त्वदर्शन को हृदयंगम करने की पद्धति को योग और व्यवहार में उच्चस्तर का समावेश करने का नाम तप कहा जाता है। तप को साधना और योग को ब्रह्मविद्या कहते हैं। आस्तिकता-आध्यात्मिकता और धार्मिकता की त्रिवेणी मिलने से वह त्रिवेणी बनती है, जिसमें स्नान करने पर रामायण में प्रतिपादित ‘काक होहि पिक-बकहु मराला’ का भावनात्मक कायाकल्प सम्भव होता है।
यों चिन्तन के माध्यम से ही आस्थाएँ जगाई जाती है, पर वह उथला नहीं गहरा होता है। तर्क का समावेश तो रहता है, पर साथ में श्रद्धा भी जुड़ी रहती है। शुष्क तर्क बुद्धि -विलास है। बहस के लिए ही बहस करने वाले, मस्तिष्क से चतुर वकीलों की तरह वह प्रतिपादन करते चले जाते है, जिन पर उनकी आस्था तनिक भी नहीं है। सच्चे को फँसाने और झूठे को छुड़ाने के लिए वे वकील भी प्रभावी बहस करते देखे गये है, जो वस्तु -स्थिति को ठीक तरह समझते है। इसलिए मस्तिष्क को माध्यम को माध्यम मानते हुए उन आस्थाओं को उच्चस्तरीय बनाने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता। इसके लिए एक ही अवलम्बन है- अध्यात्म।अध्यात्म का प्राण है ऋतम्भरा -प्रज्ञा में विवेक और श्रद्धा इन दो तत्त्वों का समन्वय होता है। विवेक अर्थात् दूरदर्शिता,श्रद्धा अर्थात् उच्चस्तरीय आस्थाओं में उल्लास भरी सघन अभिरुचि। यह भाव - संवेदनाएँ जिन चिन्तन और जिस अभ्यास से उभारी जाती है उसे ऋतम्भरा -प्रज्ञा कहते है। संक्षेप में इसी को प्रज्ञा कहा गया है। गायत्री मंत्र की अन्तरात्मा को प्रज्ञा की प्रेरणा माना गया है। प्रज्ञा जीवन्त तभी होती है जब उसमें प्रेरणा देने प्रवाह उत्पन्न करने की क्षमता हो। गायत्री महामंत्र में यही सब कुछ है। उसके चौबीस बीजाक्षरों में मान्यताओं, संवेदनाओं और प्रेरणाओं का सुनियोजित तारतम्य विद्यमान है। युगपरिवर्तन के लिए लोकमानस को उच्चस्तरीय बनाने के लिए इस एक महामंत्र के अतिरिक्त और कोई ऐसा कारगर उपाय नहीं खोजा जा सका, जो मनुष्यों में देवोपम आस्थाएँ जगाने-प्रेरणाएँ उभारने और सक्रियता अपनाने के लिए अभीष्ट लक्ष्य तक खींचता-घसीटता चला जाए।
सामयिक विकृतियों से निपटने और उज्ज्वल भविष्य का सृजन करने के उभयपक्षीय प्रयोजन जिस एक ही युगान्तरीय चेतना से सम्भव होने जा रहे है उसी के उदय-उद्भव का नाम है, प्रज्ञावतरण। इन दिनों इसी का उषाकाल है। अरुणोदय सन्निकट है। नवप्रभात की संभावनाएँ प्रकट ओर प्रत्यक्ष होती जा रही है। विकृतियों की तमिस्रा का निराकरण और गतिशीलता उत्पन्न करने की ऊर्जा का संवर्द्धन जिस युगप्रभात में होने जा रहा है उसी को अपने समय का अवतार कहना चाहिए। सामान्य मानवी-प्रयास इतने बड़े अभियान में कम न पड़ जाएँ इसलिए महाकाल की युग-चेतना का सूक्ष्मजगत में विशिष्ट प्रादुर्भाव हो रहा है। प्रज्ञावतार का विशिष्ट प्रादुर्भाव हो रहा है। प्रज्ञावतार का आलोक युग-समस्याओं के समाधान की महती भूमिका सम्पादित कर सकेगा इस पर विश्वास कर के ठोस कारण सामने ही विद्यमान है।
स्वतन्त्रता संग्राम में जूझते हुए राणाप्रताप वनपर्वतों में अपने छोटे परिवार सहित मारे-मारे फिर रहे थे। एक दिन ऐसा अवसर आया कि खाने के लिए कुछ भी नहीं रहा। अनाज को पीसकर उनकी धर्मपत्नी ने जो रोटी बनाई थी उसे भी वनबिलाव उठा ले गया। छोटी बच्ची भूख से व्याकुल होकर रोने लगी।
, राणाप्रताप का साहस टूटने लगा। वे इस प्रकार बच्चों को भूख से तड़पकर मरते देखकर विचलित होने लगे। एक बार मन में आया, शत्रु से संधि कर ली जाए और आराम का जीवन जिया जाए। उनकी मुखमुद्रा गम्भीर विचारधारा में डूबी हुई दिखाई दे रही थी।
रानी को अपने पतिदेव की चिन्ता समझने में देर न लगी। उसने प्रोत्साहन भरे शब्दों में कहा ”नाथ कर्तव्यपालन मानव-जीवन की सर्वोपरि सम्पदा है इसे किसी भी मूल्य पर गँवाया नहीं जा सकता सारे आघातों से उन्हें तो कर्तव्य का ही ध्यान रहता है। आप दूसरी बात क्यों सोचने लगें|
प्रताप का उतरा हुआ चेहरा फिर चमकने लगा। उन्होंने कहा-प्रिय तुम ठीक ही कहती हो। सुविधा का जीवन तुच्छ जीव भी बिता सकते है पर कर्तव्य की कसौटी पर तो मनुष्य ही कसे जाते है। परीक्षा की इस घड़ी में हमें खोटा नहीं सिद्ध होना चाहिए।”
राणा वन में से दूसरा आहार ढूँढ़कर लाये और उन्होंने दूने उत्साह से स्वतंत्रता संग्राम जारी रखने की गतिविधियाँ आरम्भ कर दी।
ऋतम्भरा-प्रज्ञा का संक्षिप्त उच्चारण ‘प्रज्ञा’ के रूप में होता है। ऋतम्भरा वह है जिसमें विवेक और श्रद्धा का समुचित समावेश हों विवेक उस को कहते है जिसमें तर्क तथ्य और दूरदर्शिता का समुचित समावेश हो। श्रद्धा उस-आस्था का नाम है जो उत्कृष्टता आदर्शवादिता को अत्यधिक प्यार कर और उस स्तर के चिंतन तथा कर्तृत्व से भावभरे रसास्वादन का आनन्द प्रदान करे। विवेक को बुद्धि का उत्कृष्टतम स्तर माना गया है। श्रद्धा अन्तःकरण की श्रेष्ठतम उपलब्धि है। दोनों का जहाँ जितना सम्मिश्रण होता है वहाँ उतनी ही महानता दृष्टिगोचर होती हैं उसी उपलब्धि के सहारे सामान्य परिस्थितियों में जन्मे पले व्यक्ति भी ऐतिहासिक महामानवों की भूमिका निभाते और विश्वनिर्माण में असाधारण योगदान करते है।
अगले दिनों मनुष्य की सबसे बड़ी सम्पदा एवं उपलब्धि ऋतम्भरा-प्रज्ञा मानी जाएगी। यों कथा-प्रसंगों में और धर्म-प्रवचनों में प्रज्ञा की महिमा बहुत गायी जाती है और ब्रह्मविद्या का सुविस्तृत है किन्तु उसे व्यवहार में कार्यान्वित करने का अवसर किन्हीं विरलों को ही मिलता है। सामान्य जीवनक्रम में उसका समावेश नहीं के बराबर होता है। जो बात व्यवहार में नहीं आती वह कठिन या असम्भव मानी जाती है प्रेरणा प्रदान करने में अनुकरण की परिस्थितियाँ ही कुछ अपनाने और कुछ करने की मानवीय दुर्बलता ही सर्वत्र संव्याप्त है। मौलिक चिंतन की प्रखरता और मौलिक निर्णय की साहसिकता इन्हीं विरलों में ही होती है। बिना दूसरों का प्रभाव ग्रहण किए उच्चस्तरीय नीति अपनाने और उस पर अन्त तक दृढ़ बने रहने का आत्मबल तो दृष्टिगोचर होता है। प्रज्ञा के माहात्म्य की चर्चा करते रहना सरल है पर उसे अपनाना कठिन है। कठिन इसलिए नहीं कि व्यवहार में जटिल है असम्भव है। कारण मात्र इतना भर है कि अनगढ़ प्रचलनों से आच्छादित वातावरण में अनुकरण के उदाहरण न मिलने से सामान्य व्यक्ति उस दिशा में पग बढ़ाते हुए डरता है।यह डर ही वह बाधा है जो प्रज्ञा को अपनाकर मंगलमय जीवनयापन करने के आनन्द से मनुष्य को वंचित किए रहती है।
प्रज्ञावतार से उत्पन्न युगांतरीय चेतना की विशेषता यह होगी कि अनायास ही जन-जन के मन में ऐसा उल्लास उत्पन्न करेगी, जिसमें अन्तःप्रेरणा ही वह कार्य कर सके तो सामान्य व्यक्ति के लिए सामान्य परिस्थितियों में सम्भव नहीं होता। असम्भव को सम्भव बना देना यही अवतार-प्रक्रिया का प्रधान चमत्कार है।
रावण का आतंक दसों दिशाओं में संव्याप्त था। उसके विरोध-प्रतिरोध की बात कोई सोचता तक न था। इतने दुर्दान्त दानव परिवार की शक्ति-सामर्थ्य का अनुमान लगाने वाले बेतरह निराश और भयभीत हो जाते थे। अनीति-सहते-सहते मरते तो असंख्यों थे पर लड़ते हुए मरने का शौर्य किसी में भी जगता न था। सीता अपहरण जैसी हृदयविदारक घटना हुई पर न अयोध्या से प्रतिरोध-प्रतिरोध का प्रयास हुआ और न मिथिला से। रघुवंशी भी चुप थे और राजा जनक के स्वजन-परिजन भी। ऐसे आतंक की चीरते हुए अशिक्षित और अनगढ़ समझे जाने वाले रीछ-वानरों का शौर्य उभरा और वे प्रत्यक्ष मरण से लड़ने में सम्भावित मरण का उल्लासपूर्वक वरण किया। गिलहरी उस धर्मयुद्ध में सहायता करने के लिए बालों में भर-भरकर बालू लाई। घटनाएँ अत्यधिक महत्व की भले ही न हों, पर तथ्य स्पष्ट होता है कि आतंक को चीरते हुए जब सत्साहस अप्रत्याशित रूप से उभरे तो समझना चाहिए कि कोई दैवी चेतना काम कर रही है और बुद्धि लगाये जाने वाले गणित को निरस्त करके असाधारण का परिचय दे रही है। अवतार की प्रक्रिया यही है। प्रेरक राम थे या हनुमान बहस इस बात की नहीं तथ्य यह है कि अन्तरालों ने आदर्शवाद अपनाया और घाटे का सौदा स्वीकार करने वाले दुस्साहस का परिचय दिया।
कृष्णकाल में इन्द्र के आतंक से ब्रज जलमग्न हुआ जा रहा था। सामान्य बुद्धि भाग खड़े होने के अतिरिक्त और कोई उपाय सोच ही नहीं सकती थी। असम्भव को सम्भव बनाने वाला साहस उभरा। ग्वाल-बाल शिलाखंड को दूर-दूर से लगे। विशालकाय बाँध बना। बाढ़ और वर्षा से होने वाली हानि टली। इन्द्र हारा मनुष्य जीता। असम्भव लगने वाला कार्य सम्भव हुआ। गोवर्द्धन उठ गया। सृजन से श्रमशक्ति के नियोजन का सत्परिणाम प्रत्यक्ष हुआ। सामान्यतया ऐसे बड़े कार्य किसी सुसम्पन्न शासनतंत्र से ही बन पड़ते है। निहत्थे और निर्भय श्रमिक किशोरों में न इतना ज्ञान होता है न अनुभव। सामान्य वणिक बुद्धि इस प्रकार के दुस्साहसों अनर्थ होने का ही निष्कर्ष निकालती है। और ऐसे झंझट में उलझने से दूर रहने का ही परामर्श देती है। इसके विपरीत महान उद्देश्य के लिए जोखिम भरे दुस्साहस के लिए कटिबद्ध हो जाना असाधारण आदर्शवादिता का ही काम है। ऐसी प्रेरणा प्रज्ञा के अतिरिक्त और कोई दे नहीं सकता।
दुर्योधन के पास जन-शक्ति और साधन-शक्ति असीम थी। पाण्डव अज्ञातवास में जान बचाते फिर रहे थे। कोई सहायक न था। सहायता करने में किसी को अपनी खैर नहीं दीखती थी। पाण्डव अपने बलबूते न सेना खड़ी कर सकते थे न शस्त्र जुटा सकते थे। ऐसी दशा में निरीह पाण्डवों का कौरवों की अनीति से लड़ना सम्भव न था। फिर भी असम्भव सम्भव हुआ। न्याय पक्ष के समर्थन में महाभारत रचा गया और उसमें पराजय की सम्भावना को समझते हुए भी असंख्यों आदर्शवादी धर्मयुद्ध लड़ने के लिए पहुँचे। साधनहीनता ने साधनों की विपुलता को पछाड़ा। इससे असमर्थों की साहसिकता देखते ही बनती है। यह चमत्कार मात्र अवतार ही कर सकता है। आदर्शों के लिए घाटा स्वीकार करते हुए लड़ मरने की साहसिकता का अनुदान अवतार के अतिरिक्त और किसी के पास होता ही नहीं।
बुद्धकाल के दुर्दिनों में जन-मानस को कुत्साओं और कुण्ठाओं ने बेतरह पाप-पंक में डुबा रखा था। पुरोहित वर्ग इस अनाचार का मूर्धन्य मार्गदर्शन कर रहा था। ऐसी दशा में विचारक्रान्ति का शंखनाद दुहरे संकट से भरा था। वातावरण की प्रतिकूलता में समर्थकों और सहयोगियों की सम्भावना अत्यन्त क्षीण थी।
विपक्षियों को निहित स्वार्थों में आँच आने से कुद्ध होना और घातक आक्रमण करना स्वाभाविक था। अंगुलिमाल ने प्राणहरण की बीड़ा उठाया और आम्रपाली ने चरित्र हनन का। ऐसे घोर निराशा भरे वातावरण में परिस्थितियों को उलट देने वाला उभार उमड़ पड़ना निश्चय ही अप्रत्याशित था। बुद्ध के अभियान को भरपूर सहायता मिली। लाखों व्यक्ति सुख-सम्पदा को लात मारकर चीवरधारी परिव्राजक बने सम्पन्नों से लेकर निर्धनों तक ने उसका सहयोग किया। न जन-शक्ति की कमी रही न धनशक्ति की। आदर्शवादी पराक्रम आँधी-तूफान की तरह उफनता चला गया। और प्रतिकूलताएँ इस प्रकार अनुकूल होती चली गई मानों मनुष्य को निमित्त बनाकर भगवान ने सारा विधान पहले से रचपचकर तैयार रखा हो। बुद्ध की क्षमता और परिस्थितियों की विषमताओं का असन्तुलन रहते हुए भी जो परिणाम उत्पन्न हुए इन्हें अवतारलीला के अतिरिक्त और क्या कहा जाए? आदर्शवादी कथनीय कथन तो बहुत होते रहते है पर ऐसे दुस्साहस कदाचित ही कभी फूटते है। जब लोग आदर्शों के परिपालन में अपना सर्वस्य समर्पण करने की सोचे ही नहीं वरन् हजार प्रतिकूलताओं के रहते हुए भी उसे कर ही गुजरे। आदर्शवादी दुस्साहस ही अवतार है। वह एक भावनात्मक प्रवाह के रूप में उत्पन्न होता है और असंख्यों का अनुप्राणित करता है। श्रेय किस व्यक्ति मिला प्रमुख किसे माना जाए यह बात नितान्त गौण है। झण्डा लेकर आगे चलने वाले की ही छवि फोटो में आती है। यद्यपि उस सैन्यदल में अनेकों का शौर्य पुरुषार्थ झण्डाधारी की तुलना में कम नहीं अधिक ही होता है।
गाँधी युग में भी ऐसा ही चमत्कार उत्पन्न हुआ। अँगरेजों की समर्थता और कुशलता पहाड़ जितनी ऊँची थी। उनके राज्य में सूर्य अस्त नहीं होता था। युद्ध कौशल में वे अपना सानी नहीं रखते थे। निहत्थे मुट्ठीभर सत्याग्रहियों की टोली उनका कुछ बिगाड़ सकेगी इसकी आशा-अपेक्षा किसी को भी नहीं थी। हजार वर्ष की गुलामी से अस्त-व्यस्त जनसमुदाय में ऐसा साहस भी नहीं थी कि इतने सशक्त विपक्ष के साथ लड़ मरने लिए अभीष्ट त्याग-बलिदान का परिचय दे सके। ऐसी निराशाजनक परिस्थितियों में एक अप्रत्याशित उभार उमड़ा। स्वतन्त्रता संग्राम ठना और अन्ततः विजयी होकर रहा। जनसाधारण ने उस सन्दर्भ में जिस पराक्रम का परिचय दिया वह देखने ही योग्य है। असमर्थता की समर्थता और साधनहीनों के साधन असहायों की सहायता करने के लिए वे अनुकूलताएँ न जाने कहाँ से आ उपस्थित हुई। असम्भव लगने वाला लक्ष्य पूरा होकर रहा। यही है सूक्ष्मजगत में बहने वाली प्रचण्ड शक्तिधाराओं का प्रवाह जो ऊपर ही से शान्त और सामान्य दीखते हुए भी भीतर से ज्वालामुखी जैसी विस्फोट की क्षमता छिपाये बैठा रहता है। जब फूटता है तो सब कुछ उलट देता है इसी बुद्धि के लिए अगम्य विलक्षणता को अवतार कहते है। अवतार का दार्शनिक विश्लेषण उस ऋतम्भरा-प्रज्ञा की उमंग भरी हलचल के रूप में किया जाता है जो मात्र अन्तःकरणों में अनायास ही उभरती है और आदर्शवादी दुस्साहस कर गुजरने के लिए विवश करती है। यह अवतरण एक पर नहीं अनेकों पर होता है। जो इस ऊर्जा के वाहन बनते है उनके पराक्रम असामान्य होते है। उनकी परिस्थिति और मनःस्थिति में कोई तालमेल नहीं रहता। असाधारण सोचना और असाधारण कर गुजरना सामान्य लोगों का काम नहीं। लोग तो संकीर्ण स्वार्थपरता से आगे की बात सोच ही नहीं पाते। उन्हें निकट का ही दीखता है दूर का नहीं अस्तु न लोभ छोड़ते बनता है और न शौर्य अपनाते। अवतार इस प्रचलन से विपरीत सोचने और बिना समर्थन पाए एकाकी चल पड़ने की सामर्थ्य प्रदान करता है। इस आवेश में कितने ही व्यक्ति बहकर गुजरते है। जिसे देव-पराक्रम के रूप में माना जाता है। इस प्रकार की चेष्टाएँ अपने कर्ता को धन्य बनाती है। वह असंख्यों के लिए उत्कृष्ट पराक्रम कर गुजरने का साहस अपने अनुकरणीय आदर्श द्वारा प्रदान करता रहता है। ऐसे व्यक्ति देवदूत कहलाते है। सामान्य भाषा में इन्हें महामानव कहा जाता हैं अवतार का प्रधानकार्य आने लीलाकाल में देवदूतों में अदृश्य वातावरण की उच्चस्तरीय उमंगें भर देना भर होता है। शेष कार्य तो वे युगसृजेता स्वयं ही करते रहते हैं। सफलता सहज ही उन्हें भी नहीं मिल जाती। प्रतिकूलताओं से लड़ने का पराक्रम और अपने अनुदानों से लोकश्रद्धा उभारने वाला वरदान प्रस्तुत करते रहना ऐसे लोगों के लिए तनिक भी कष्टसाध्य नहीं होता। सामान्य लोग जिसे मुसीबत मोल लेना कहते है मनीषियों के लिए वही कष्ट सहना युगसाधना के रूप में सम्मानित होता है। तत्त्वदर्शी इन्हीं अदृश्य हलचलों को जाग्रत आत्माओं के अन्तःकरणों में उछलती देखते हैं तो कहते है अवतार का आवेश असन्तुलन को सन्तुलन में बदलकर ही रहेगा।
अवतार क्या करता है? उसके लीलाप्रसंग क्या होते है? इसका स्थिर निश्चय नहीं हो सकता। परिस्थिति के अनुरूप हर अवतार ने अपने क्रिया−कलाप निर्धारित किए और आवश्यकतानुसार बदले है। लीलाओं का महत्व नहीं। उनमें पाई जाने वाली विलक्षणताओं एवं विसंगतियों का भी कोई महत्व नहीं सारभूत का तथ्य इतना ही है कि उस अदृश्य प्रेरणा से हर सुसंस्कृत अन्तरात्मा में कुछ ऐसा कर गुजरने का दुस्साहस उमड़ता है जिसको चरितार्थ होते देखकर आदर्शवादिता असंभव नहीं लगती वरन् व्यवहार साध्य प्रतीत होती है। प्रवाह की उत्पन्न करने में भगीरथों को अग्रणी भर होना पड़ता है आगे तो उसी धारा में असंख्य सामान्यों को अनायास ही बहते देखा जाता है।
प्रज्ञा अवतरण में उसी परम्परा का निर्वाह होने जा रहा है। श्रद्धा और विवेक का संगम युगशक्ति के रूप में प्रकट हो रहा है। श्रद्धा अपनाने में पूर्ण तथ्यों को खोजने और यथार्थता अपनाने के लिए विवेक का अवलम्बन लेना पड़ता है, अन्यथा अविवेक के रहते अन्धश्रद्धा ही पनपती है और उससे लाभ के स्थान पर हानि होती है। बलिष्ठता शरीर की बुद्धिमत्ता मस्तिष्क की, श्रद्धा अन्तरात्मा की शक्ति है। यही चेतनाक्षेत्र की सर्वोपरि क्षमता है। श्रद्धा ही मनुष्य को अनन्त सामर्थ्य प्रदान करती हैं उत्कृष्टता को व्यवहार में उतारने वाला दुस्साहस उसी उद्गम से प्रस्फुटित होता है। जिन्हें श्रद्धा की जितनी मात्रा मिल सकी उन्होंने उतने ही उच्चस्तरीय और उतने ही सुविस्तृत महान कार्य सम्पन्न किये है। जिसकी अन्तःश्रद्धा जिस स्तर की है उसका जीवन स्वरूप ठीक उसी के अनुरूप बन जाती हैं ईश्वरीय प्रयोजन का पूरा करने में अपने प्रचण्ड पुरुषार्थ की श्रद्धांजलि लेकर युगदेवता के चरणों में उपस्थित होने वाले अवतार के सहधर्मी-सहकर्मी माने जाते है। अनन्त श्रेय के स्वामी ऐसे ही लोग बनते है युगशिल्पियों के स्तर का विस्तार होना इस तथ्य का प्रमाण है कि अवतार की तत्परता कितनी प्रखर हो रही है।
श्रद्धा से सामर्थ्य उत्पन्न होना सुनिश्चित तथ्य है। सामर्थ्य का आकर्षण साधनों और सहयोगियों का प्रचुर परिमाण में खींचकर बुला लेता है उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति सदा इसी प्रकार सम्भव होती रही है। साधनों में श्रद्धा उत्पन्न करने की सामर्थ्य नहीं हैं साधन सम्पन्न दृश्य खड़े करने और हलचलों का चलचित्रों जैसा प्रतिबिम्ब भर खड़ा कर सकते है। मात्र साधनों से विनिर्मित प्रयास लोगों को आकर्षित चमत्कृत तो करते है पर अनुकरण की प्रेरणा नहीं देते। यही कारण है कि धनिकों कलाकारों विद्वानों प्रचारकों द्वारा खड़े किये अभियान आन्दोलन अपनी उछल-कूद का परिचय तो देते हैं पर कोई ठोस कार्य कर सकने में सफल नहीं होते। जहाँ तक मनुष्यों को दिशाधारा देने का प्रश्न है उनकी अन्तःस्थिति में उत्कृष्टता,अभिवर्द्धन का प्रश्न है वहाँ तक एक ही उपाय कारागार होता हैं श्रद्धासिक्त व्यक्तियों का अनुकरणीय आचरण श्रद्धा के बिना और किसी प्रकार बन नहीं पड़ता। श्रद्धा साधनों के अभाव में भी अपना चमत्कार प्रस्तुत करती है जबकि साधनों को प्रशंसा तक ही सीमित रहना पड़ता है वे श्रद्धा का संचार कर सकने में सदा असफल ही बने रहते है। युगपरिवर्तन बड़ा काम है। लोक-मानस को अवांछनीयता से विरत करके उत्कृष्टता के प्रति भावविभोर हो उठने की स्थिति को समष्टि व्यक्तित्व का कायाकल्प ही कहा जा सकता है। यह बड़ा काम है इसके लिए बड़ी शक्ति चाहिए। चेतना को प्रभावित करने वाली शक्ति एकमात्र श्रद्धा ही है इसी को गँवा बैठने से अपने समय को दुर्दशाग्रस्त होना पड़ा है। इसी अभाव के कारण साधनों की बहुलता भी सुख-शान्ति को बनाए रहने तक में सफल नहीं हो पा रही है। समस्याओं और विपत्तियों का तथ्य मूल-कारण आस्था-संकट के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं श्रद्धा का संवर्द्धन ही प्रकारान्तर से नवयुग का सतयुग का अवतरण है। सूर्य की किरणें पहले पहाड़ की चोटी पर दिखाई देती है पीछे नीचे उतरकर समस्त भूतल को आलोक प्रदान करती है।
प्रज्ञावतार का प्रभाव सबसे पहले जाग्रत आत्माओं पर चमकेगा। तदुपरान्त जन-साधारण को उस दिव्य-अनुदान से लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा।
औषधियों की खोजबीन में महर्षि चरक जंगलों में घूम रहें थे। एकाएक उनकी दृष्टि एक खेत में उग एक सुन्दर पुष्प पर पड़ी। इससे पहले उन्होंने सहस्रों पुष्पों के गुण-दोषों का अध्ययन-अनुसंधान किया था परन्तु यह तो कोई नया ही फूल था।
उनका मन पुष्प लेने के लिए उत्सुक था, किन्तु पैर आगे नहीं बढ़ रहे थे। समीप खड़े उनके शिष्य ने सादर कहा-गुरुदेव फूल ले आऊँ?"
“फूल तो चाहिए, लेकिन खेत के मालिक की अनुमति के बिना फूल तोड़ लेना तो चोरी मानी जाएगी।”
“गुरुदेव। कोई वस्तु किसी के काम की हो, तो उसकी बिना अनुमति के ले लेना चोरी हो सकती है, परन्तु यह तो पुष्प है फिर इसे लेने में क्या हर्ज है? फिर......?" महर्षि चरक ने बीच में ही पूछा।
शिष्य ने कहा-गुरुदेव आपको तो राजाज्ञा है कि आप कही से कोई भी वन-सम्पत्ति इच्छानुसार बिना किसी अनुमति के ले सकते है।”
“सौम्य। राजाज्ञा और नैतिकता में अन्तर हैं।”
“शिष्य ने उत्सुकतावश जानना चाहा-कैसा अन्तर?”
सुना-महर्षि ने समझाया। “यदि हम अपने आश्रितों की सम्पत्ति को स्वच्छंदता से व्यवहार में लाएँगे तो फिर लोगों में आदर्श कैसे जाग्रत होगा? लोकादर्श की जाग्रति के लिए नैतिकता श्रेष्ठ होने के साथ अनिवार्य भी है।
शिष्य को मूल्यों की महत्ता बताते हुए महर्षि चरक तीन कोस पैदल चलकर उस कृषक के निवासस्थान पर गए। उसकी अनुमति लेकर उन्होंने उस पुष्प को तोड़ लिया और अनुसंधान में संलग्न हो गए।
व्यापक शक्तियाँ सूक्ष्म ओर निराकार होती है। उनका कार्यक्षेत्र अदृश्य जगत हैं। परब्रह्म की अवतार सत्ता युग सन्तुलन को सँभालने,सुधारने के लिए आती है। यह कार्य वह उनसे कराती है, जिनसे दैवी - तत्त्वों का चिरसंचित बाहुल्य पाया जाता हैं।
सूक्ष्म जगत में चलने वाले प्रवाहों की प्रतिक्रिया से सभी परिचित है। ग्रीष्म शीत और वर्षों ऋतुओं में भिन्न - भिन्न प्रकार का वातावरण रहता है और उसी आधार पर पदार्थों एवं प्राणियों की स्थिति बदलती रहती है। बसन्त ऋतु में कुछ विचित्र प्रवाह बहते है और प्राणियों से लेकर वनस्पतियों तक को उल्लास -उन्माद से भर देते है। महामारी से लेकर युद्धोन्माद तक की परिस्थितियों सूक्ष्मजगत में बनती और स्थूलजगत में अपने अस्तित्व का परिचय देती है। लोक प्रवाह में अवांछनीयता की विषाक्तता भर जाने से पतन और पराभव का संकट खड़ा होता है। उसका निराकरण भी सूक्ष्म जगत में ही उत्पन्न होता है। उसका तूफानी प्रभाव सारे वातावरण को झकझोरता है। जाग्रत आत्माएँ उस दैवेच्छा को पूरा करने में अग्रगामी भूमिका निभाती और महाकाल का हाथ बँटाती दीखती है, साथ ही लोकमानस पर भी उस उभार का प्रभाव पड़ता है। अवांछनीयता की जड़े खोखली होने लगती है। और औचित्य का समर्थन करने के लिए हर किसी का मन मचलता है। इस सहज परिवर्तन का प्रभाव नये सृजन के लिए उत्पन्न हुई अनेकानेक सत्प्रवृत्तियों के रूप में सर्वत्र दृष्टिगोचर होता हैं
मानवीकाया में जो अवतार का दर्शन करना चाहते है। वे उस समय के श्रेष्ठ सज्जनों का उदात्त चरित्र एवं उदात्त प्रयास के विकास-विस्तार में भली प्रकार देख सकते है। जब युगान्तरीय चेतना से प्रभावित आदर्शवादी व्यक्ति सृजन प्रयोजनों में अधिक तत्परतापूर्वक कार्य-संलग्न दिखाई पड़े तो उसे अवतार की प्रेरणा ही मानना चाहिए। सन्त सुधारक और शहीद लगें तो समझना चाहिए। इसका सूत्र-संचालन अवतारी सत्ता ही अदृश्य रूप में कर रही है।
सन्त, सुधारक और शहीद सामान्य जन-जीवन से ऊँचे स्तर के होने के कारण छोटे-बड़े अवतारों की गणना में आते है। सन्त अपनी सज्जनता से मानव-जीवन के सदुपयोगों का आदर्श प्रस्तुत करते हैं।
उनकी विचारणाएँ गतिविधियाँ और उपलब्धियाँ जन-जन के मन आदर्शवादिता के प्रति श्रद्धा और अनुकरण के लिए उमंग उत्पन्न करती है। सुसंस्कृत जीवनयापन किस प्रकार होना चाहिए इसका प्रत्यक्ष उदाहरण सन्त अपने उपदेशों से ही नहीं चरित्र एवं व्यक्तित्व के आधार पर भी प्रस्तुत करते है। हेय उदाहरण ही सर्वत्र दृष्टिगोचर होते हैं। इसलिए आमतौर से यही समझा जाता है। कि आदर्शवादिता कहने-सुनने भर की बात हैं उसका उपयोग कथा-प्रवचन में तो हो सकता हैं पर व्यवहार में उसे उतारना सम्भव नहीं। इस निराशा को सन्त अपने निजी उदाहरण से निरस्त को सन्त अपने निजी उदाहरण से निरस्त करते है। और यह साहस प्रदान करते है। कि मनःस्थिति ऊँची रहने पर विषम परिस्थितियों में भी मानवी गरिमा अक्षुण्ण रखी जा सकती इससे सर्वसाधारण को बल और प्रोत्साहन मिलता है। निराशा की अनास्था उलटने में सन्तों का जीवनक्रम प्रकाश-स्तम्भ जैसा प्राणवान उदाहरण प्रस्तुत करता हैं आदर्शों के परिपालन में आने वाली कठिनाई का सामना करते हुए उत्कृष्टता को दृढ़तापूर्वक अपनाये रहने वाले व्यक्ति सन्त वर्ग में गिने जाते है। भले ही वे वेश और व्यवसाय सामान्य स्तर का ही क्यों न अपनाये रहते हों। सन्तों को धरती के देवता कहते है। साधु और ब्राह्मणों को जो उच्चस्तरीय सम्मान मिलता हैं उससे अवतार के प्रति लोकश्रद्धा की झाँकी मिलती हैं।
जनजीवन में अवतार का इससे ऊँचा स्तर हैं -सुधारक। यह स्थिति ऊँची हैं इसमें सन्त होने के लिए आत्मनिर्माण की तपश्चर्या ही पर्याप्त नहीं होती। श्रेष्ठ जीवन जी लेने तक ही बात नहीं बनती वरन् एक और भी बड़ा कदम उठाने की आवश्यकता पड़ती हैं कि जन जीवन पर छाये हुए भ्रष्ट चिन्तन और दुष्टाचरण के साथ जूझने का प्रबल पराक्रम करना होता हैं आत्म-सुधार अपने हाथ की बात है इसलिए सन्त का कार्यक्षेत्र सीमित और सरल है किन्तु सुधारक को दूसरों को बदलना होता इसलिए अपेक्षाकृत अधिक प्राणशक्ति की आवश्यकता पड़ती हैं चरित्र अधिक ऊँचा साहस अधिक प्रखर और पुरुषार्थ अधिक प्रबल चाहिए तभी दूसरों को अभ्यस्त अनाचार से विरत करने और सदाशयता अपनाने के लिए सहमत एवं विवश करना सम्भव होता है। सुधारकर न केवल लोकप्रवाह में धुली हुई अवांछनीयता से जूझते हैं वरन् साथ ही अभीष्ट परिवर्तन को प्रचलन में जोड़ने और परम्परा बनाने का सृजन प्रयोजन भी पूरा करते है। उन्हें दो मोर्चे सँभालने पड़ते है। जबकि सन्त के लिए एक कार्य कभी पर्याप्त समझा जाता है। सन्त का ब्राह्मण होना पर्याप्त है किन्तु सुधारक को ’ब्रह्मक्षेत्र धर्म अपनाना होता है। उसके एक हाथ में शास्त्र और दूसरे में शस्त्र रहता है। प्रखरता से काम चल भी नहीं सकता। सुधारकों की गणना देवदूतों में होती रही हैं। अवतार का यह द्वितीय चरण है।
तीसरा चरण है-शहीद। शहीद का अर्थ है-स्व-का-पर-के लिए समग्र समर्पण। अध्यात्म भाषा में इसी को समर्पण शरणागति कहते हैं। स्वार्थ का परमार्थ में उत्सर्ग करने का तात्पर्य है लोभ और मोह के बन्धनों को काट फेंकना अपने दायरे को शरीर-परिवार तक सीमित न रखकर विश्व-नागरिक जैसा बना लेना वसुधैव-कुटुम्बकम् के दर्शन को चिन्तन और चरित्र का अविच्छिन्न अंग बना लेना। इस स्तर के व्यक्तित्व लोकप्रवाह से अलग थलग पड़ जाते हैं। लोगों की दृष्टि में लोग मूर्ख। यह एक प्रकार के लौकिक जीवन का मरण है। जीवित रहते हुए भी वे आस-पास की परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होते अथवा दृष्टिकोण और कार्यक्रम दूसरों के प्रभाव-परामर्श से नहीं अन्तःप्रेरणा से निर्धारित करते है तथाकथित स्वजन-सम्बन्धियों का मित्र परिचितों को अनुपयुक्त परामर्श उन्हें रत्तीभर भी प्रभावित नहीं करता। अपनी नीति स्वयं निर्धारित करते है।। ऐसे महामानवों को ही आत्मदानी-शहीद कहा जा सकता हैं।,
साधारणतया शहीद उन्हें कहते है। जो किसी महान प्रयोजन के लिए अपनी जान गँवा देते है। पर यह परिभाषा एकांगी हैं जिन्होंने परमार्थ के लिए प्राण त्यागे, उनके चरणों पर श्रद्धा के सुमन चढ़ने ही चाहिए। उनकी यशगाथा का गायन आदर्शों के प्रति आदर्शवादियों के प्रति लोकमानस के नतमस्तक होने और उच्चस्तरीय प्रेरणाओं से अनुप्राणित होने का अवसर प्रदान करता है। इस दृष्टि से बलिदानियों का जितना गुणगान किया जाए जितना सम्मान दिया जाए उतना ही कम है। इतने पर भी बात ध्यान में रखने की हैं कि हर आत्मदानी के लिए प्रभु समर्पित के लिए मरणकृत्य अपनाना अनिवार्य नहीं है। हर शहीद को फाँसी गोली तलाश ही करनी पड़े ऐसी बात नहीं है। संकीर्ण स्वार्थपरता का अन्त करके परमार्थ को ही अपनी महत्त्वाकाँक्षाओं का केन्द्र बना लेना उसी में रस लो उसी चिन्तन में तन्मय रहना वस्तुतः मानसिक शहादत है। यह जहाँ होगी वहाँ व्यवहार भी वैसा ही बनेगा। क्रिया–कलापों का निर्धारण और कार्यान्वयन वही होता हैं जो अन्तःकरण में बसा हो। समर्पण एक आस्था के भवबन्धन काटने पड़ते है और आदर्शों के लिए चिन्तन और चरित्र को पूरी तरह नियोजित रखना पड़ता है। अपने को इस ढाँचे में ढाल लेने वाले व्यक्ति अध्यात्म शब्दावली में ऋषि कहलाते हैं शहीद शब्द से यह अधिक उपयुक्त हैं शहीद होने में मरण की आवश्यकता जुड़ी रहती है जबकि ऋषि कहलाते हैं। शहीद होने में मरण की आवश्यकता जुड़ी रहती है जबकि ऋषि के लिए जीवन या मरण में कोई अन्तर नहीं रहता वह जीवित रहते हुए चतुर लोगों की दृष्टि में मृतक हैं। इतिहासकार उसके मर जाने पर भी जीवितों जैसी अभ्यर्थना करते हैं संत और सुधारक में अपना अहं शेष रहता हैं जबकि समर्पित को वासना, तृष्णा का लोभ-मोह का ही अन्त नहीं करना पड़ता वरन् अहन्ता का भी विसर्जन आवश्यक होता है। आमतौर से लोकसेवियों की लोकेषणा यश और सम्मान की कामना घटने के स्थान पर बढ़ती देखी जाती है जबकि वस्तुतः उसका पूर्णतया विसर्जन होना चाहिए। सार्वजनिक जीवन में यह लोकेषणा ही सबसे बड़ी बाधा है। लोकसेवी बहुत कुछ त्यागते पाये जाते है। पर अपनी यशलिप्सा-पदलिप्सा छोड़ नहीं पाते। यही कारण हैं कि संस्था-संगठनों के अंतःक्षेत्र में आये दिन भूकम्प आते और विस्फोट होते देखे जाते हैं जन-सहयोग के अभाव में सार्वजनिक सेवाकार्य में उतनी बाधा नहीं पड़ती जितनी तथाकथित लोकसेवियों की महत्त्वाकाँक्षा की चिनगारी उन उपयोगी प्रयासों को नष्ट-भ्रष्ट करके रख देती हैं। अवतारों में उच्चस्तरीय वे है जिन्होंने सन्त की पवित्रता-सुधाकर की प्रखरता के साथ-साथ ऋषि की तत्वदृष्टि अपनाई और अहंता का पूरी तरह विसर्जन कर दिया। अपने श्रम, समय, चिन्तन, प्रभाव का पूरी तरह परमार्थ के ब्रह्मानंद पर उत्सर्ग कर दिया। ऐसे लोगों की प्रतिभा एवं क्षमता सामान्य लोगों की तुलना में असंख्यों गुना अधिक होती हैं। स्व का परिपोषण मनुष्य की अधिकाँश शक्ति से निकल जाता है। यदि उससे बचा जा सके और सच्चे अर्थों में उत्कृष्टता के लिए समर्पण किया जा सके तो अहंता के परिपोषण में लगने वाली इच्छा विचारणा एवं क्रियाशीलता इतनी अधिक मात्रा में बच जाती हैं जिसके आधार पर सामान्य व्यक्ति भी असामान्य स्तर के काम कर सकता हैं ऐसी प्रतिभाएँ जब कभी जहाँ कही उपलब्ध होती है तब वही चमत्कार उत्पन्न होते चले जाते है।
ऋषियों के सभी कृत्य शहीदों जैसे दुस्साहस भरे होते हैं। अपने साधनों को परमार्थ के लिए विसर्जित करने में उन्हें वाजिस्रवा के सर्वमेध यज्ञ जैसे दृश्य दिखाई पड़ते हैं। लक्ष्य में इतनी तन्मयता रहती है कि अर्जुन के मत्स्यवेध का अनुकरण करने की घटना अहर्निश। घटित होते देखी जा सकती है। प्राण का मोह छोड़ना कठिन है पर अपने वैभव व्यामोह और अहन्ता का विसर्जन करने के उच्चस्तरीय प्रस्तुत कर सकते है। इसी स्तर के लोग प्रकाश स्तम्भ की तरह ज्योतिर्मय रहते और कर्तृत्व की गरिमा से असंख्यों को प्रभावित करते हैं उनके त्याग-बलिदान का परिचय पग-पग पर मिलता रहता हैं शहीद मरने के उपरान्त आक्रोश उत्पन्न करते है? किन्तु ऋषियों की सुषमा हर घड़ी स्वर्गीय श्रद्धा-सम्वेदना का संचार जन-जन में करती रहती है।
बिजली हर वस्तु में प्रवाहित नहीं होती। वह कुछ ही पदार्थों में प्रवेश कर पाती हैं लकड़ी चीनी रबड़ काँच जैसी वस्तुओं पर उसका तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता। अवतार के सहकर्मी, सहधर्मी तीन ही होते है सन्त, सुधारक और शहीद। सज्जन, सृजनशिल्पी ऋषि। जिन्हें अवतार के प्रत्यक्ष दर्शन करने होते है वे इन तीन वर्गों का विस्तार एवं स्तर उभरता देखकर यह सन्तोश कर लेते हैं कि अवतार की प्रखरता कितनी दीप्तिमान हो रही है। रामकाल के रीछ वानर कोल-भील-गीध-गिलहरी जिस आदर्शवादिता को अपना रहे थे उसे देखकर यह जाना जा सकता था कि सूक्ष्मजगत में अवतार की ऊर्जा किस आवेग के साथ काम कर रही है। कृष्ण काल के पाण्डव और ग्वाल-बाल इसी तथ्य का प्रमाण प्रस्तुत करते थे। बुद्धकाल के परिव्राजक और गाँधीकाल के सत्याग्रहियों की गतिविधियों से भी यही सिद्ध होता था कि अवतार का आवेश दिव्य-आत्माओं पर उतरता है और उनके शरीर से वही करा लेता है जो उसे अभीष्ट है।
प्रज्ञावतार का आवेश उसके प्रभाव से अनुप्राणित परिव्राजकों-समयदानियों की बढ़ती हुई संख्या और उठती हुई श्रद्धा को देखकर सहज ही आँका जा सकता है। इस वर्ग से सन्त सुधारक और शहीद के तीनों ही तत्त्व असाधारण मात्रा में बढ़ते-उभरते देखें जा सकते है। आदर्शवाद निष्ठावान् और पराक्रमी सृजनशिल्पियों का बाहुल्य उनकी गतिविधियों का अनुकरणीय सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन यह बताता हैं कि निराकार प्रज्ञावतार अपने अनुकूल और अनुरूप आत्माओं को नियत दिशाधारा में नियोजित करके अभीष्ट की पूर्ति का वातावरण बनाने में अपनी तत्परता दे रहा है।
अश्रद्धा अर्थात् आदर्शवादिता की अवमानना अन्धश्रद्धा अर्थात् व्यक्तियों क्रियाओं या देवभूतों की विलक्षण में आसक्ति। श्रद्धा अर्थात् उत्कृष्टता की सर्वोपरि उपलब्धि के रूप में अवधारणा। इस व्याख्या को समझ लेने पर अवधारण। इस व्याख्या को समझ लेने सकना भी सम्भव होता है। आदर्शों की अवमानना का अर्थ है-उस रिक्तता को पशुवृत्तियों से भरना। जो भला नहीं होगा, उसे बुरा होना चाहिए। जब दिन नहीं होता तब रात रहती है। अन्धकार और प्रकाश की मध्यवर्ती और कोई रेखा नहीं है। अश्रद्धा की प्रतिक्रिया चिन्तन की भ्रष्टता और आचरण की दुष्टता भयावह रूप धारण करती और श्मशान में होने वाले प्रेत–पिशाचों के नृत्य जैसा जीवनक्रम एवं वातावरण विनिर्मित करती है। धर्म-क्षेत्र में घुसी हुई विकृतियों तथा बुद्धिमान के नाम पर पनपी भ्रान्तियों ने इन दिनों अश्रद्धा की भावनात्मक अराजकता उत्पन्न की है। परिणाम सामने है। मनुष्य क्रमशः नरपशु, नरकीटक, नरपिशाच बनता और पतन के गर्त में गिरता चला जा रहा है।
अन्धश्रद्धा ने भ्रान्तियों के जंजाल में चिन्तन को उलझाया और कष्कारण भूल-भुलैया में भटकाया हैं। भोले -भावुक व्यक्तियों को चतुर लोग अन्धश्रद्धा के रस्से बाँधकर ही अनुपयुक्त मान्यताओं के गर्त में धकेलते हैं। निहित स्वार्थों का व्यवसाय अन्धश्रद्धा की अन्धेर नगरी में जिस सफलता के साथ चलता है, उतना अन्यत्र कहीं नहीं। भीरुता और बौद्धिक अपंगता मिलकर एक ऐसा दल-दल प्रस्तुत करती हैं, जिसमें, जादू-टोना देवभूत, ज्योतिष से लेकर सामाजिक कुरीतियों जैसी विकृतियाँ ही पल्ले पड़ती हैं। तथाकथित प्रगतिशीलता अश्रद्धा में और पिछड़ी मनःस्थिति अन्धश्रद्धा में भटकती है। आस्था-संकट इन्हीं दोनों के समन्वय का नाम है। चेतना की क्षमता को अनर्थ में धकेलने और निरर्थक बनाने की दुरभिसंधि इन दोनों ने ही मिलकर रची है। भटकी और बौराई मनुष्य जाति को इन्हीं दोनों के अभिशाप सहने पड़ रहे हैं। प्रज्ञायुग में श्रद्धा को मानवी अन्तरात्मा में प्रतिष्ठित होने का अवसर मिलेगा। इन उपलब्धियों से जो कितना सम्पन्न होगा उसे उसी अनुपात में अपने दृष्टिकोण एवं आचरण का स्तर ऊँचा उठाने का सुअवसर प्राप्त होगा। कहना न होगा कि इसी सौभाग्य के सहारे व्यक्तित्व में प्रखरता उत्पन्न होती है और भौतिक सफलताओं से लेकर आत्मिक विभूतियों की अनेकानेक सुसम्पन्नताएँ उपलब्ध होती है। आत्मकल्याण और लोक-कल्याण के दोनों ही जीवन-लाभ मात्र श्रद्धालु ही प्राप्त करते है।
श्रद्धालु अपने का आत्मा मानता है और उसके सन्तोश एवं कल्याण के लाभ को प्रमुखता देता हैं। शरीर उसे मात्र वाहन, उपकरण प्रतीत होता है। अतएव उसके भरण-पोषण का समुचित ध्यान रखते हुए भी शरीराध्याय की कीचड़ में कृमि-कीटकों की तरह आत्मसात् नहीं करता। इन्द्रियों की अनुभूत क्षमता से जीवनचर्या में सहयोग तो लेता है पर ऐसी स्थिति नहीं आने देता कि इन्द्रियाँ ही अधिपति बन बैठे और उन्हीं की वासनातृप्ति के लिए शारीरिक मानसिक सन्तुलन ही नहीं नीति-मर्यादा तक को गँवाना पड़े। श्रद्धालु मस्तिष्क की लगन काम में रहती है और उसे उच्छृंखल घोड़े जैसा आचरण नहीं करने देता। संग्रह की तृष्णा, बड़प्पन की अहंता, उपभोग की लिप्सा परिजनों में आवश्यक आसक्ति ईर्ष्या, द्वेश, मद, मत्सर जैसी व्याधियाँ दिशाहीन भटकन जैसी वितृष्णाएँ निरन्तर मानसिक सन्तुलन को अस्त-व्यस्त करती रहती है। उद्विग्नता की अनेकानेक परतें मनःक्षेत्र को विक्षुब्ध बनाये रहती हैं तनाव और खोज ही चमड़ी की सुन्दरता रहते हुए भी विद्रूप और कुरूप लगता रहता हैं यह स्थिति शारीरिक रुग्णताओं का पहाड़ टूट पड़ने से भी अधिक दुःखदायी होती है। इसका समग्र उपचार उन्मूलन निराकरण श्रद्धा की रामबाण औषधि ही कर सकती है। गुण ग्राहकता-सौंदर्य-दृष्टि-विधायक-चिन्तन उदार-आत्मीयता अभिनेता जैसी मनःस्थिति बन जाने पर परिस्थिति में जी हलका रखा जा सकता है। ऐसा हलका मन रहने पर ही गुत्थियों के समाधान और प्रगति के निर्धारण सही रूप में सम्भव हो सकते हैं। कहना न होगा कि सौजन्य और सौमनस्य श्रद्धा तत्त्व के ही दो प्रतिफल है। मनीषी प्रकारान्तर से श्रद्धालु को ही कहते हैं। विवेक मात्र उन्हीं के मस्तिष्क में रहता है। द्रष्टा एवं तत्त्वदर्शी उन्हीं को कहा जाता है।
श्रद्धा, संगम और अनुशासन द्वारा शरीर को स्वस्थ और दीर्घजीवन प्रदान करती है। श्रद्धा में सद्विचारणा और सद्भावना का अभ्यास होता है। फलतः सामान्य स्तर का मस्तिष्क भी ऋषिकल्प मेधा से भरा रहता है। वे चन्दन की तरह महकने और वातावरण को शीतल, सुव्यवस्थित बनाये रहते हैं। चिन्तन की क्रियाधारा उत्कृष्टता की ओर प्रवाहित होती है। इसका परिणाम उस स्तर की सफलता बनकर सामने आता है, जिसे सामान्यतया वरदान या चमत्कार की संज्ञा दी जाती है।
श्रद्धा की परिणति आत्मियता और सुव्यवस्था में होती है। परिवारों का आनन्द और उत्साह, सहयोग और सौजन्य इसी मनःस्थिति में सम्भव रहता है। ऐसा वातावरण जिन कुटुंबों में रहेगा उन्हीं में श्रेष्ठ नागरिक और नररत्न होते हैं। धन से विलासिता और वैभव के साधन बढ़ सकते हैं, पर उसमें उद्धत अहंकार का पोषण होने के अतिरिक्त और कुछ बनता नहीं, ऐसी सड़न में विकृत व्यक्तित्व ही जन्मते और पलते हैं। ऐसे कुटुम्ब बाहर से एक बाड़े में रहने की तरह इकट्ठे भले ही दीखें, पर पारस्परिक स्वभाव और उपयुक्त वातावरण के अभाव में दुरभिसंधियाँ ही पनपती हैं, ऐसे कुटुम्ब पालने की अपेक्षा एकाकी रहने वाले अपेक्षाकृत अधिक सुखी रह सकते हैं।
श्रद्धा ही वह तत्त्व है, जो छोटे कुटुंबों को आत्मीयता के सूत्र में बाँधता है और विवेक-उल्लास के साथ गरीबी में भी अमीरों से कहीं अधिक सन्तोश प्रदान करता है। पति-पत्नी के बीच, भाई-बहिन के बीच, अभिभावक-संरक्षकों के बीच जो आत्मीयता और उदार सेवा-साधना की भाव-सम्वेदनाएँ मचलती रहती हैं उन्हीं पर कुटुम्ब का आनन्द और उत्थान टिका हुआ है। श्रद्धातत्व हटा देने के बाद कुटुम्बियों के बीच आपाधापी, खींचतान, उठक-पटक रोष-प्रतिशोध घृणा-ईर्ष्या के अतिरिक्त और कुछ बचता ही नहीं। परिवार संस्था की गरिमा श्रद्धा-सद्भावना के अतिरिक्त किसी प्रकार न तो स्थिर रह सकती है और न बढ़ सकती है।
धन दुधारी तलवार है। उसका सदुपयोग बन पड़े तो व्यक्ति का भी कल्याण है और समाज का भी। दुरुपयोग होने लगे, तो बढ़ी हुई सम्पदा के कारण उससे हर प्रकार हानि ही हानि होती है। दुर्व्यसन बढ़ने, दुर्गुण पनपने और कुकृत्य बन पड़ने में दुर्जनों का आर्थिक सुविधा सम्पन्न होना भी एक बड़ा कारण है। धन एक शक्ति है। दुर्बुद्धि के हाथों उसका उपयोग अनाचरण एवं विनाश के लिए ही हो सकता है। श्रद्धातत्व अन्तःकरण में रहने पर धन के उपार्जन और उपयोग में पूरी-पूरी सावधानी बरतनी होती है। कठोर परिश्रम के द्वारा ईमानदार के साथ मात्र उपयोग कार्य करके ही आजीविका कमाई जाए, यह दृष्टि सर्वप्रधान है। इस प्रकार यदि स्वल्प-उपार्जन होता है, तो इतने में ही काम चलाने की तैयारी आरम्भ से ही कर ली जाती है। इसका एकमात्र उपाय है-ब्राह्मण जीवन,सादगी का निर्वाह,औसत भारतीय के स्तर पर गुजार करने में गर्व -गौरव की अनुभूति, मितव्ययिता,सादगी,श्रमशीलता और ईमानदारी इन चारों का समन्वय हैं। ऐसे श्रद्धालु व्यक्ति न तो ठाट-बाट बनाते है, न सन्तान की संख्या बढ़ाकर अनावश्यक भार वहन करने की मूर्खता बरतते है। योग्यता बढ़ाने,मनोयोगपूर्वक श्रम करने और मितव्ययिता बरतने की नीति अपना लेने पर किसी को भी आर्थिक तंगी नहीं भुगतनी पड़ती। ऋण लेने,याचना करने अथवा कुकृत्यों पर उतारू होने की उन्हें आवश्यकता ही नहीं पड़ती। ऐसे लोग सीमित आजीविका रहने पर भी यथा- सम्भव दूसरों की मदद कर सकते है। लोभ और मोह की मात्रा बढ़ जाने, संग्रह एवं उपभोग की महत्त्वाकाँक्षा अनियन्त्रित हो जाने पर ही अनीति - उपार्जन का सिलसिला चलता है। सौम्य -निर्वाह भर के साधनों में सन्तुष्ट रहने वाला न तो दरिद्र होता है, न दुर्व्यसनी,न कुकर्मी धन की मर्यादा का निर्वाह महत्वपूर्ण है,। संग्रह का परिमाण नहीं। उपार्जन उपयोग में ही न लगे वरन् उसमें पिछड़ेपन को दूर करने, असमर्थों को सहायता देने तथा सत्प्रवृत्तियों को सींचने का तथ्य भी सुनिश्चित रूप से जोड़ रखा जाए। खर्च की सामान्य मद में ही उदार दानशीलता को भी एक अनिवार्य आवश्यकता मानकर चला जाए। इन्हीं तथ्यों का समावेश अर्थक्षेत्र में प्रयुक्त होने वाली श्रद्धा का रहता है। प्रज्ञावतरण की प्रेरणा अन्याय क्षेत्रों की तरह अर्थक्षेत्रों में भी श्रद्धा का समन्वय करने की रहेगी।फलतः अनेक दुष्प्रवृत्तियों की जननी दरिद्रता ओर उद्धतता का कहीं कोई अस्तित्व ही न रह जाएगा।
सामाजिक क्षेत्र की बुराइयाँ कुरीतियाँ, अनैतिकताएँ,मूढ़ -मान्यताएँ प्रकारान्तर से व्यक्तियों में भरी हुई निजी निकृष्टताओं का सामूहिक प्रदर्शन मात्र है। समाज का अलग से कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं। मनुष्यों की सामूहिकता ही समाज है। श्रेष्ठ नागरिकों के बिना समुन्नत समाज बन ही नहीं सकता। प्राचीनकाल में पंचायतें समाज -व्यवस्था बनाती थी। आजकल सारी शक्ति सिमटकर शासन के हाथ में चली गई है। पंचायतें भी मुकदमा निपटाने अथवा सफाई जैसी छुट-पुट व्यवस्था बनाने में सीमित हो गई। शासन के कानून अपराधों को रोकने भर के लिए बने है। सत्परम्पराओं का प्रचलन करने की न तो उसमें आकांक्षा रह गई। और न सामर्थ्य। सुरक्षा,शिक्षा, चिकित्सा,उद्योग, परिवहन जैसे कार्यों की साज - सँभाल ही उसके काबू से बाहर होती जा रही है। सहकारिता को उद्योगों में समाविष्ट करने तथा नीति-शिक्षा को पुस्तकीय पाठ्यक्रम में जोड़ने, रेडियो-टेलीविजन आदि पर कुछ प्रचार कर देने जैसे बालप्रयास ही शासन के द्वारा वर्तमान स्थिति में बन सकते है। पंचायतें भी शासन का अंग भर रह गई हैं और भौतिक प्रयोजनों की ही यत्किंचित् देख-भाल कर पाती हैं। समाज-व्यवस्था लड़खड़ाने का कारण ऐसे तन्त्र का अभाव है, जो जन-समुदाय में आदर्शवादी आस्थाओं को उभार सके, जिसमें दुष्प्रवृत्तियों को सहन करने तथा समर्थन देने वालों को लोकमत का तिरस्कार भाजन बनना पड़े। न्याय और औचित्य एवं उच्छृंखलता का मानमर्दन करने की प्रखरता जन-जन में उत्पन्न होने पर ही स्वस्थ समाज की संरचना हो सकती है। श्रेष्ठ प्रचलनों की, सत्परम्पराओं की प्रतिष्ठा तभी सम्भव है जब व्यक्ति के निजी जीवन में आदर्शवादिता अपनाने की उत्कृष्ट श्रद्धा बनी रहे। इसके अभाव में वह अपने पापों पर पर्दा डालेगा। अवांछनीय तत्त्वों का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन करेगा तथा हेय परम्पराओं से जूझने के स्थान पर उनके समर्थन का ही उपक्रम करता रहेगा।
वस्तुस्थिति समझ लेने के उपरान्त समाज की एक ऐसी सम्भावना आवश्यक हो जाती है, जो सामाजिक प्रचलनों और वैयक्तिक आदर्शों को उत्कृष्टता की दिशा में उछाल सके। अनौचित्य के विरुद्ध असहयोग एवं विरोध का वातावरण बना सके ऐसा समाज अध्यात्म- दर्शन एवं धर्म - प्रचलन जैसे उच्चस्तरीय आदर्शों के लिए बने संगठनों द्वारा ही विनिर्मित हो सकता है। जो व्यक्ति के अन्तराल को स्पर्श करेगा, जो उस मर्मस्थल में सदाशयता का बीजारोपण कर सकेगा, उसी के लिए देव-समाज की कल्पना कर सकना और तदनुरूप ढाँचा खड़ा कर सकना सम्भव होगा। समाज में सत्परम्पराओं का प्रचलन सृजन पक्ष है और दुष्प्रवृत्तियॉं का उन्मूलन निषेध पक्ष, दोनों को मिलाने से ही समग्रता बनती है। धर्मतन्त्र का संगठन ऐसा होना चाहिए जो व्यक्ति और समाज के अन्तराल को झकझोरने में, उत्कृष्टता के ढाँचे में ढाल सकने में भावना और क्रिया को साथ लेकर चल सके।
व्यक्ति और समाज में धर्मधारणा का बहुत बड़ा स्थान है। मनुष्य के आदिम प्रयत्नों से लेकर आधुनिकतम प्रतिपादनों में धर्मतत्त्व का समावेश सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप होता रहा है। यह आत्मा की आवश्यकता और अन्तः-करण की पुकार है। इसका दमन न तो बुद्धिवाद कर सकता है, न प्रत्यक्षवाद, न उपयोगितावाद। धर्म की, कर्तव्य की, उत्कृष्टता की आवश्यकता ईश्वरवादी-अनीश्वरवादी सभी को समान रूप से अनुभव होती है। अस्तु, नवयुग की साज-सज्जा में धर्मधारणा को प्रमुखता देने से ही काम चलेगा। देवसमाज की परिकल्पना को मूर्तिमान करने में धर्मतन्त्र की पवित्रता, प्रखरता और संगठनों के तीनों ही पक्ष उच्चस्तरीय बनाये जाने चाहिए। जिस दिन इस आवश्यकता को गम्भीरतापूर्वक समझा जाएगा और उसके लिए भावभरी तत्परता का उपयोग किया जाएगा, उसी दिन से उज्ज्वल भविष्य का सुनिश्चित आरम्भ हो जाएगा।
मोटी दृष्टि से अनेकों समस्याएँ और विपत्तियाँ व्यक्ति एवं समाज के सम्मुख खड़ी दीखती हैं। वे परिस्थिति-जन्य प्रतीत होती है। फलतः उनके उपाय भी उसी स्तर के होते रहते हैं। गरीबी, अशिक्षा, बीमारी, अपराध, विग्रह, आक्रमण जैसे बड़े कारण ही लोक-नेताओं के मस्तिष्क पर छाये रहते है। उनके निराकरण का उपाय साधनों की सहायता से खोज निकालने का प्रयत्न करते है। राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों की सारी शक्ति सरकारों के हाथ में केन्द्रित है। अस्तु उस मंच को हथियाने अथवा उसी आधार पर गुत्थियों को सुलझाने में मूर्धन्य वर्ग का सारा ध्यान और प्रयास केन्द्रीभूत बना रहता है। गुत्थियों को सुलझाने की वर्तमान पद्धति यही है। स्थूल दृष्टि उससे अधिक न तो कुछ सोच सकती है और न कुछ कर ही सकती है। जो हो रहा है, होता रहा है वह कम नहीं है, पर गुत्थियाँ सुलझने के स्थान पर उलझती ही जा रही है। एक छेद सीने का काम पूरा नहीं हो पाता कि दस नये सिरे से उभरते सामने आ खड़े होते है। यह क्रम चिरकाल से चला आ रहा हैं। बार-बार परखा-अपनाया जाता है, फिर भी निराशा के और व्यग्रता बढ़ने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।
उपाय आज खोजा जाए या हजार वर्ष बाद, प्रयत्न आज किया जाए या हजार वर्ष बाद, इससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। व्यक्ति और समाज के सम्मुख खड़ी हुई अनेकानेक समस्याओं, विपत्तियों और विभीषिकाओं का हल निकलेगा तभी, जब मानवी अन्तःकरण में उत्कृष्ट आस्थाओं के बीजारोपण तथा परिपोषण का प्रयास युद्धस्तरीय तत्परता के साथ आरम्भ होगा। इसके लिए न राजनीति से काम हो सकेगा। उसे मात्र धर्मतन्त्र ही कर सकता है। आज धर्म का कलेवर उपहासास्पद और विद्रूप हो गया है, यह ठीक है किन्तु यह भी ठीक है कि इसी को परिष्कृत, प्रखर एवं सुनियोजित बनाने पर भावनात्मक नवनिर्माण करने के अतिरिक्त और कोई उपाय है नहीं। सम्पदा को अर्थतन्त्र, शरीर को चिकित्सातन्त्र, मस्तिष्क को शिक्षातन्त्र प्रभावित कर सकता है, परन्तु अन्तःकरण को प्रभावित करने की क्षमता धर्मतन्त्र के अतिरिक्त और किसी में भी है नहीं। टूटे को सुधारा जाए या उसे नये सिरे से ढाला जाए, यह तकनीकी प्रश्न है। मूल तथ्य जहाँ का तहाँ रहता है कि विपत्तियों से छुटकारा पाने और उज्ज्वल भविष्य को मूर्तिमान् करने में धर्मतन्त्र की सहायता लिए बिना काम किसी भी प्रकार नहीं चल सकता। बहस शब्द की नहीं, विवेचना तथ्य की है। किसी को धर्म-अध्यात्म से चिढ़ हो तो उनको सन्तुष्ट करने वाले शब्द दूसरे शब्दकोश में ढूँढ़ निकाले जा सकते है। पर करना यह होगा कि व्यक्ति एवं समाज की अनेकानेक दिशाधाराओं को प्रभावित करने वाले अन्तःकरण को उत्कृष्टता की सम्पदा से सुसम्पन्न बनाया जाए, मानवी-संस्कृति के अवमूल्यन का अन्त किया जाए, श्रद्धा और विवेक के समन्वय को, दृष्टिकोण को आधारभूत तथ्य बनाया जाए।
प्रज्ञावतार का प्रयोजन यही है। उसका कार्यक्षेत्र जन-जन की आस्थाओं को अध्यात्म के आधार पर और आदतों को धर्म-धारणा के सहारे परिष्कृत करना है। उत्कृष्टता के प्रति श्रद्धा-संवर्द्धन उसका प्रधान कार्यक्रम है। यह गतिचक्र जितनी तेजी से परिभ्रमण करेगा, नवयुग के दिव्यदर्शन की पुण्यवेला उतनी ही समीप आती चली जाएगी।
जीवन के संघर्ष और आँधियों से दुःखी एक नाविक जहाज से उतरकर बाहर आया। समुद्र के मध्य अडिग और अविचलित चट्टान की स्वच्छता को देखकर उसके कुछ शान्ति मिली। उसने देखा समुद्र की उत्ताल तरंगें चारों ओर से उस चट्टान पर निरन्तर आघात कर रही है, तो भी चट्टान के मन में न रोष है और न विद्वेष। संकटपूर्ण जीवन पाकर भी उसे कोई ऊब और उत्तेजन नहीं है।
यह देखकर नाविक का हृदय श्रद्धा से भर गया। उसने चट्टान से पूछा-तुम पर चारों ओर से आघात हो रहे है, फिर भी तुम निराश नहीं हो।” तब चट्टान की आत्मा धीरे से बोली- ‘‘तात। निराश और दोनों एक ही वस्तु के उभयनिष्ठ हैं, हम निराश हो गए होते तो एक क्षण ही सही, दूर आये अतिथियों को विश्राम देने,उनका स्वागत करने से वंचित रह जाते।” नाविक का मन नई प्रेरणा से भर गया,जीवन में कितने संघर्ष आये, अब मैं चट्टान की तरह जिऊंगा,ताकि हमारी न सही,भावी पीढ़ी और मानवता के आदर्शों की रक्षा तो हो सके।
चीन के राजा क्वांग ने शुनशूआओ को तीन बार अपना प्रधानमन्त्री बनाया और तीन बार हटाया। इस पर न तो वे कभी प्रसन्न हुए न कभी खिन्न! विद्वान किनबू ने उनकी इस स्थिरता का कारण पूछा! शुनशूआओ बोले -” जब मुझे मन्त्री बनने को कहा गया तो मैंने सोचा अस्वीकार करना ठीक नहीं, जब निकाला गया तो सोचा मेरी उपयोगिता नहीं तो चिपका क्यों रहूँ? मन्त्री पद ने मुझे न कुछ दिया और न उसके छिनने पर मेरा कुछ गया और वह सम्मान जो मुझे मिला था वह पद का था तो मुझे उससे क्या लेना-देना यदि मेरा था तो पद के रहने, न रहने में न्यूनता या वृद्धि होने वाली नहीं थी।”
विवेकपूर्ण विचार द्वारा प्रत्येक परिस्थिति में सुखी और सन्तुष्ट रहा जा सकता है।
चेतना निराकार है और प्रकृति साकार। चेतना का परिचय प्रकृति पदार्थों की हलचलों में देखा जा सकता है, पर उसकी मूलसत्ता आकार रहित ही होती है। अवतार एक प्रकार की चेतना ऊर्जा है, जिसका प्रभाव सम्बद्ध पदार्थों के बढ़े हुए तापमान के रूप में देखा जा सकता है। गर्मी व्यापक होने के कारण उसका निजी स्वरूप इन्द्रियातीत ही रहता है। प्रज्ञावतार का प्रभाव न्यूनाधिक मात्रा में अनेकों दिव्य आत्माओं में उभरता हुआ देखा जा सकेगा, पर वह स्वयं प्राणियों या पदार्थों के रूप में आकारवान नहीं बन सकती। प्रज्ञावतार का रूप देखना हो तो वह युगान्तरीय चेतना के रूप में ही देखा जा सकेगा। किसी व्यक्तिविशेष के रूप में उसे सीमाबद्ध नहीं किया जा सकता। प्रज्ञा का जहाँ जितना उभार हो रहा हो, समझना चाहिए कि वहाँ उतनी ही मात्रा में युगदेव ने अपना परिचय एवं दर्शन देना आरम्भ कर दिया।
स्पष्ट है कि अपने युग का ‘असंतुलन’ आस्था-संकट ने उत्पन्न किया है। इसलिए निवारण का केन्द्रबिन्दु भी वही होना चाहिए। इन दिनों ऐसा भावनात्मक प्रवाह जन- मानस में उत्पन्न होना है, जिसके कारण यह प्रमाण - परिचय मिलने लगे कि श्रद्धातत्व की अभिवृद्धि का दौर चल पड़ा है। आदर्शवादिता का समावेश कर सकना किन्हीं सन्त - महन्तों का काम माना जाता था। इसके विपरीत प्रज्ञा का उभार उत्पन्न होगी जन-जन में यह चेतना उत्पन्न होगी कि उसे अपने जीवन क्रम में श्रेष्ठता का अवधारण अधिकाधिक मात्रा में करना चाहिए,इसके लिए वह इतना साहस संजोयेगा कि संकीर्ण स्वार्थपरता के लिए समर्पित इच्छा और चेष्टा नये सिरे से समीक्षा करे और उसमें भरी हुई क्षुद्रता को हटाकर उस स्थान पर महानता की स्थापना के लिए कुछ कहने योग्य कदम बढ़ाए। यह परिवर्तन किसी बाहरी दबाव से नहीं वरन् स्वतः प्रेरणा से होगा।
आमतौर से लोभ,मोह और अहंकार के दैत्य ही जनसाधारण को कठपुतली की तरह नचाते है। यही प्रभाव सर्वत्र चल रहा है। समर्थ-असमर्थ,धनी निर्धन, शिक्षित - अशिक्षित इन दिनों सभी अपने तुच्छ स्वार्थों की सिद्धि में बुरी तरह संलग्न है। लिप्सा और लालसा की कीचड़ में लोकचेतना गहराई तक धँसी हुई है। सामान्य प्रयत्नों से इसमें हेर-फेर होते दिखाई नहीं पड़ रहा है, किन्तु प्रज्ञावतार की प्रेरणा नये आयाम प्रस्तुत करेगी। अन्तः प्रेरणा का उद्गम ही बदलने लगेगा। लोग अपना स्तर उत्कृष्टता की ओर उठाने और आदर्शवादिता की ओर बढ़ाने का प्रयत्न करेंगे। यह परिवर्तन बाहर से थोपा हुआ नहीं,भीतर से उभरा हुआ होगा। कहने- सुनने को तो धर्म और अध्यात्म की,भक्ति और शान्ति की, सज्जनता और उदारता की चर्चा आये दिन कहने - सुनने को मिलती रहती है। कइयों का विनोद- विशय भी यही होता है। तथाकथित धर्मगुरु, लोकनेता, लेखक - वक्ता उत्कृष्टता की चर्चा आये दिन करते रहते हैं, किन्तु उन प्रतिपादनों को क्रियान्वित करते इनमें से कोई विरले ही देखे जाते हैं। फिर सर्वसाधारण के लिए तो उन्हें आचरण में उतारना और भी अधिक कठिन होता है। उदाहरण तो केवल समझाने के लिए प्रचार-प्रक्रिया अपनाने के रूप में ही हो सकता है। सो हो भी रहा है। लेखनी और वाणी से आदर्शवादिता का प्रतिपादन भी कम नहीं हो रहा है, किन्तु सफलता इसलिए नहीं मिलती कि लोकचेतना की अन्तःस्थिति उसे स्वीकारने और अपनाने को सहमत नहीं होती। कानों से सुनने या मस्तिष्क से समझने से काम बनता नहीं। व्यक्ति की स्थिति और कृति तो अन्तःप्रेरणा से ही बदलती है। इन दिनों उसी क्षेत्र के निष्फल होकर रह जाता है। प्रज्ञावतार इस कठिनाई का समाधान करेगा। भीतर से ‘हिय हुलसने, दिशा बदलने जैसी स्थिति उत्पन्न होगी। फलतः वह प्रयोजन सफलतापूर्वक पूरा होने लगेगा। जिसके आज प्रशिक्षण और दमन के सभी अस्त्र-शस्त्र निष्फल होते, निरर्थक जाते दीखते है।
अन्तःकरण मूर्च्छित रहे तो उच्चस्तरीय भाव- संवेदनाएँ उसमें से उठती ही नहीं। धर्मधारणा के बीजांकुर जमते ही नहीं। यही है वह अपरिहार्य कठिनाई, जिसके निराकरण का कोई मार्ग किसी को सूझता ही नहीं। मानवी प्रयास जहाँ असफल होते हैं वहाँ दैवी प्रयास बागडोर अपने हाथ में सँभालते है। प्रज्ञावतार की प्रेरणा से यही कठिनाई हल होगी। लोग अपने भीतर कुछ नई उमंग उठती अनुभव करेंगे और देखेंगे कि उनका मस्तिष्क उत्कृष्टता में रुचि लेने आरम्भ कर शरीर ने सत्कर्मों में रस लेना आरम्भ कर दिया। युगपरिवर्तन के बीजांकुर इसी रूप में फूटेंगे। शुभारम्भ का अग्रगमन का श्रेय
सदा सुसंस्कारी जाग्रत आत्माओं को मिलता है। सामान्यजन क्रमशः उनके अनुगमन एवं अनुकरण का ही साहस समयानुसार सँजोते रहते हैं।
विचारक्रान्ति अभियान हो प्रज्ञावतार की प्रमुख प्रक्रिया है। समस्त क्रिया−कलाप इसी क्षेत्र में नियोजित रहेंगे। आस्थाओं का कल्पवृक्ष उग पड़ने की उपरान्त उसके पत्र-पल्लव और फल-फूलों की सम्पदा इतनी बढ़ी-चढ़ी होगी कि उसके सहारे प्रस्तुत संकटों के निवारण में कोई अड़चन शेष न रहे।
युगपरिवर्तन का केन्द्र बिन्दू एक ही है-आस्थाओं का उन्नयन, चिन्तन का परिष्कार, सत्प्रवृत्तियों का प्रतिष्ठापन। यह दीखते तो तीन है, पर वस्तुतः एक ही तथ्य के तीन रूप है। सत्कर्म और सद्ज्ञान वस्तुतः सद्भावों का ही उत्पादन है। यही है जाग्रत आत्माओं के माध्यम से प्रज्ञावतार द्वारा कराया जाने वाला महाप्रयास। हर जाग्रत आत्मा को अगले दिनों अपनी समस्त तत्परता और तन्मयता जन-मानस का परिष्कार पर केन्द्रीभूत करनी होगी।
किसी ने एक बुद्धिमान मनुष्य से पूछा-भाग्यवान कौन है और अभागा कौन है?” उसने उत्तर दिया-भाग्यवान वह जिसने बोया और खाया और अभागा वह है, जो मर गया और छोड़ गया।”
अवतारों का भी क्रमिक विकास हुआ हैं। उनकी कलाएँ क्रमशः बढ़ती आई है, कच्छ-मच्छ एक-एक कला के अवतार थे। वाराह और वामन दो-दो के। नृसिंह और परशुराम तीन - तीन कला के माने जाते है। राम बारह के,कृष्ण सोलह के और बुद्ध बीस कला के माने गये है। निष्कलंक के बारे में कहा गया है कि वे चौबीस कला के होंगे। यह क्रमिक विकास है। सृष्टिक्रम में अवतारों की श्रृंखला अनवरत चलती रहती है और विश्वविकास के साथ -साथ उनकी कला- सामर्थ्य भी बढ़ती रहेगी।
भूतकाल के अवतारों में प्रारम्भिक का कार्यक्षेत्र भौतिक परिस्थितियों से जूझना भर था। उसके बाद वालों को अनाचारियों से लड़ना पड़ा। इसके बाद स्थापनाओं का क्रम चलता है। राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कृष्ण को पूर्णपुरुष और बुद्ध को विवेक का देवता कहा जाता है। इनके चरित्र और कर्तृत्व में उच्चस्तरीय स्थापनाओं का दौर है। अधर्म का नाश करने के लिए उनके जितने प्रयत्न हुए है, उनको अपेक्षा स्थापनाओं पर गतिविधियाँ अधिक केन्द्रित रही हैं कृष्ण का गीता प्रतिपादन और बुद्ध का बुद्धि की शरण में दिशा और लोक-मानस को प्रेरणा देने में अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में अधिक प्रयत्नशील रहे। प्रज्ञावतार का कार्य अपेक्षाकृत अधिक कठिन और अधिक व्यापक है। उसे सामयिक समस्याओं एवं व्यक्तिगत उद्दण्डताओं से ही नहीं जूझना है वरन् लोकमानस में ऐसे आदर्शों का बीजारोपण, अभिवर्द्धन, परिपोषण एवं क्रियान्वयन करना है, जो सतयुग जैसी भावना और रामराज्य जैसी व्यवस्था के लिए आवश्यक अन्तःप्रेरणा व्यापक क्षेत्र में उत्पन्न कर सकें। लक्ष्य और कार्य की गरिमा एवं व्यापकता को देखते हुए प्रज्ञावतार की कलाएँ चौबीस होना स्वाभाविक है।
समुद्र मन्थन से चौदह रत्न निकले थे। हृदय मंथन की वर्तमान भावचेतना से अनेकानेक नररत्नों का निकलना निश्चित है। समुद्र मंथन से निकले रत्नों ने सृष्टि की आदिम स्थिति में उत्कृष्ट साधनों का बाहुल्य उपस्थित किया था। लक्ष्मी(सम्पदा), सूर्य(ज्ञान), चन्द्रमा (सन्तुलन), अमृत (आत्मज्ञान), धन्वन्तरि ( शमन ), वज्र(अनुशासन), अश्व (उत्साह), ऐरावत (पराक्रम), रम्भा (कला) जैसी अनेकों दिव्य सम्पदाएँ आविर्भूत हुई तो समुद्रमन्थन ने तत्कालीन परिस्थितियों को कुछ से कुछ बना दिया था। इन दिनों भी ऐसा ही कुछ होने जा रहा है। अन्तः प्रेरणा से उत्पन्न हुआ आत्मज्ञान और भावावेश मनुष्यों को कुछ उच्चस्तरीय सोचने और करने के लिए विवश करेगा। अग्रगामी सदा अपने अनुयायी उत्पन्न करते और परम्पराओं को जन्म देते है। जाग्रत आत्माओं द्वारा अपनाई गई युग-साधना का प्रवाह जन-मानस को अनुकरण के लिए अनायास ही आकर्षित और प्रेरित करेगा। पिछले दिनों जहाँ आदर्शवादिता के दोनों आधार धर्म अध्यात्म चर्चा एवं उपचार की विडम्बनाओं में उलझकर रहते रहे है। इन दिनों उन्हें अपनी प्रखरता प्रकट करने का, प्रत्यक्ष कार्यरत होने का अवसर मिलेगा। इंजन चलता है, तो डिब्बे अनायास ही पीछे लुढ़कने लगते है। तूफान उठता है, तो पत्ते और तिनके साथ ही उड़ने लगते हैं। जलप्रवाह में जाने क्या-क्या साथ ही तैरता-डूबता बहता चला जाता है। जाग्रत आत्माओं के अपने उदात्त दृष्टिकोण और उदार आचरण से जब लोकश्रद्धा उभरेगी तो अनेकों व्यक्तियों एवं सत्प्रवृत्तियों को प्रगति के पथ पर द्रुतगति से अग्रसर होते देखा जा सकेगा।
इस तथ्य को हजार बार समझा और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि अपने युग की समस्याएँ परिस्थितिजन्य दीखती भर है वस्तुतः उनका उद्भव विकृत मनः-स्थिति से हुआ है। जड़ तक पहुँचने पर ही समाधान खोजा जा सकेगा। मनः स्थिति बदलने से ही परिस्थितियाँ बदलेगी। नाली साफ करने पर ही मक्खी-मच्छरों और दुर्गन्ध फैलाने वाले विषाणुओं से छुटकारा मिलता है। रक्त शुद्धि का चिरस्थायी उपचार किये बिना निरन्तर उठते रहने वाले फोड़े -फुंसियों से पिण्ड नहीं छूटता। समस्याएँ असंख्य है, उनके बाह्योपचार भी असंख्यों हों सकते है। यह प्रयत्न हो रहे है और होते भी रहे है। प्रतिफल और अनुभव भी सामने है। समाधान चाहे शासनतंत्र ने ढूँढ़ हो, चाहे अर्थतन्त्र ने। बात कुछ बनी नहीं है। एक हाथ जोड़ने के साथ ही दो हाथ टूटने का सिलसिला चलता रहे, तो गुत्थियों को सुलझना किस प्रकार सम्भव हो सकता है, बुद्धि और सम्पदा की, साधना और सामर्थ्य की दिनों कोई कमी नहीं। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक के इतिहास में मनुष्य कभी इतना समृद्ध और सशक्त नहीं हुआ जितना इन दिनों है साथ ही यह भी सच है कि वर्तमान में उस पर जितनी विपन्नता छाई है उतनी भूतकाल में कभी भी सहन नहीं करनी पड़ी।
समस्याएँ सुलझेगी तो एक-एक करके नहीं वरन् एक साथ ही उनका समाधान निकलेगा। क्योंकि उनका उद्गम एक है। अस्वस्थता दूर होनी होगी तो उस पर मात्र संयम से आहार-विहार सम्बन्धी अनुशासन के सहारे ही विजय प्राप्त की जा सकेगी। असंयम का दौर रहते आहार को बहुमूल्य बनाने एवं चिकित्सा-उपचार के पहाड़ जैसे साधन खड़े करने पर भी कोई हल न मिलेगा। नित नई औषधियों का आविष्कार होगा और नित नूतन अस्पताल खुलेंगे किन्तु दुर्बलता और रुग्णता पर विजय प्राप्त करने का स्वप्न दिन-दिन दूर ही हटता जाएगा।
मनुष्य की वितृष्णा आन्तरिक समाधान, सन्तुलन, सन्तोश जैसे चिन्तन से ही शान्त होगी, अन्यथा तनिक-तनिक-सी बातों पर उत्तेजना उद्विग्नता के ज्वालामुखी फूटते रहेंगे। वस्तुओं का बाहुल्य और व्यक्तियों का अनुकूलन एक स्वप्न है जिसकी पूर्ति व्यावहारिक जीवन में सम्भव नहीं। हर किसी को ताल-मेल बिठाकर चलना पड़ता है। अधिकार के साथ कर्तव्य को उपार्जन के साथ सन्तोश को, संघर्ष के साथ सहयोग को उपभोग के साथ संयम को मिलाकर चलने से ही मानसिक सन्तुलन बनता है। किसी को मानसिक तनावों से छुटकारा पाना है तो अनुकूल परिस्थितियाँ प्राप्त होने तक की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। चिन्तन में विधायक तत्त्वों को भर लेने दृष्टिकोण को ऊँचा उठा लेने से ही काम चला जाता हैं संव्याप्त विक्षोभ और असन्तोष का समाधान इसी प्रकार होगा। अनुकूल के लिए किया गया पुरुषार्थ तो दूसरा चरण है।
परिवार छोटे करने का प्रयोग पाश्चात्य देशों में व्यापक रूप से चला है। पति-पत्नी और न्यूनतम बच्चे यही है आधुनिक परिवार का स्वरूप। संयुक्त परिवार को तो आफत समझा गया और उसको विखण्डित किया गया पर इतने से भी समस्या कहाँ सुलझी। छोटे परिवार भी आपाधापी के केन्द्र है और स्नेह-सौजन्य की कमी का रोना उनमें भी रोया जाता हैं जबकि कितने ही बड़े कुटुम्ब स्नेहसिक्त सहकारी संस्था के रूप में अपनी सार्थकता और सफलता सिद्ध करते है। पारिवारिक समस्याओं की गणना असंख्य हैं किन्तु उनके मूल में भावनात्मक दरिद्रता ही प्रधान कारण रही होती है। परिवार का सुख, प्रचुर साधनों के रूप-यौवन के अथवा व्यवस्था-उपचार के सहारे उपलब्ध होने की आशा की जाती हैं किन्तु देखा यह गया है कि जहाँ इन सबकी प्रचुरता है वहाँ भी मनोमालिन्य कम नहीं है। तथ्य ढूँढ़ने पर भावनाओं की दरिद्रता ही कुटुंबों को विश्रृंखलित एवं विपन्न बनाती है। इसका निराकरण हो सके तो अभावग्रस्त घरौंदे में भी लोग देवोपम स्नेह-सौजन्य का आनन्द लेते हुए दिन बिता सकते है। समाज में अनेक कुप्रथाएँ प्रचलित है। इनमें परिपाटी उतनी घातक नहीं होती जितनी कि उनकी आड़ में नंगा नृत्य करने वाली दुष्टता। दहेज, समस्या नहीं हैं बेटी की विदाई में अभिभावक अपनी सम्पदा का एक अंश उपहार में देते हो तो उसमें कोई अनौचित्य नहीं हैं। दहेज का कन्याभक्षी पिशाच का रूप तो उसके पीछे काम करने वाली निष्ठुर अहंकारिता और स्वार्थपरता ने उत्पन्न किया है। यदि इन तत्त्वों को हटा दिया जाए तो नवपरिणिता को स्त्रीधन के रूप में कुछ उपहार मिल जाने से निश्चिन्तता और प्रसन्नता ही रहेगी। यही बात अनेकानेक प्रचलनों से सम्बद्ध हैं कुप्रथाएँ बदली जानी चाहिए, यह आवश्यक है किन्तु स्मरण रखा जाए कि दुष्टता के रहते सुधार के नाम पर किए गए परिवर्तन भी सन्तोषजनक परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकेंगे। बिना दहेज के तथाकथित आदर्श विवाहों की आजकल धूम है। इनमें भी पर्दे के पीछे लेन-देन पनप रहा हैं। उसे सुधारवाद का दुर्भाग्य ही कह सकते समाज-सुधार के बाह्य प्रयत्न कितने ही आवश्यक क्यों न हो उनकी सार्थकता सद्भावना के जीवन्त रहने पर ही हो सकती है। सद्भावना प्रथा-परम्परा नहीं है यह आध्यात्मिक उपलब्धि हैं समाज में प्रचलित अनेकों कुप्रथाओं का उन्मूलन तो होना ही चाहिए पर आत्यंतिक समाधान की तब तक प्रतीक्षा करनी चाहिए जब तक कि सद्भावनाओं की हरीतिमा अन्तःक्षेत्रों में लहलहाने न लगे।
शासन-सत्ता कि पार्टी के हाथ में रहती है प्रश्न यह नहीं वरन् यह है जो शासन को चलाते है वे किस स्तर के है। घोषणापत्रों और साइनबोर्डों के बदलने से व्यक्तियों की गोटें इधर से उधर बिठाने भर से स्वच्छ शासन की अपेक्षा नहीं की जा नीयतें बदलें तभी कुछ काम चलेगा।
उत्थान के लिए बनने वाली योजनाएँ उपयुक्त संचालकों के अभाव में किस प्रकार असफल होती हैं इसका प्रमाण पग-पग पर मिल सकता है। अपराधों के नियन्त्रण में पुलिस कचहरी जेल आदि का ढाँचा अति स्वल्प मात्रा में ही कारगर सिद्ध होता है। अपराधी मनोवृत्ति का शमन करने एवं नियंत्रणकर्ताओं के निर्लोभ एवं कर्तव्यपरायण होने से ही बात बनेगी। अन्यथा अपराध अपने ढंग से पनपते रहेंगे और नियन्त्रण का ढकोसला अपनी जगह खड़ा रहेगा। अनैतिकता के वैयक्तिक एवं सामाजिक रूप अनेकानेक है इन सभी पर अंकुश लगने का एक ही उपाय है व्यक्ति के अन्तःकरण में धर्मधारणा का घनीभूत होना।
नेतृत्व की हर क्षेत्र में माँग है पर उसे प्रतिभा और चतुरता के सहारे उपलब्ध करने का प्रयत्न किया जाता हैं कौतुक-कुतूहल दिखाकर समाप्त हो जाता हैं। स्थायित्व उस गरिमा में है जो चिन्तन और चरित्र के हर घटक में छाई रहती है जिसमें भ्रष्ट चिन्तन और दृष्ट आचरण की छय़ एवं स्वार्थ-साधन के लिए कही कोई गुँजाइश ही नहीं रह जाती है। ऐसे उच्चस्तरीय नेतृत्वों का उदय ही जब बन्द हो गया तो लोकचेतना कौन जगाए? पीढ़ी का मार्गदर्शन कौन करे? भटकने और भटकाने वाले लोग ही मिल-जुलकर नेता और अनुयायियों की मण्डलियाँ बना-बनाकर जन-कल्याण के नाम पर शालीनता का निर्माण करने में लगे हुए है। यह परिस्थिति और किसी तरह दूर नहीं हो सकती। प्रज्ञावतार की प्रेरणा से उत्पन्न उत्कृष्टता सम्पन्न मनः स्थिति ही नेतृत्व के अभाव को पूरा कर सकने में समर्थ हो सकती है।
अर्थसुविधा के लिए साधनों का बाहुल्य उतना आवश्यक नहीं जितना उपलब्धियाँ को मिल-जुलकर खाने और उन्हें मात्र औचित्य के लिए ही उपयोग करने की धारणा। श्रमशीलता ईमानदारी मितव्ययिता जैसे सद्गुणों की कमी पड़ने पर ही दरिद्रता की विपत्ति सहन करनी पड़ती है अन्यथा मनुष्य की आवश्यकताएँ ही कितनी है उन्हें सरलतापूर्वक स्वल्प साधनों से ही पूरा किया जा सकता है। और हर किसी को इतना समय-साधन मिल सकता हैं
जिसके सहारे आत्म-कल्याण एवं समाज-कल्याण के लिए बहुत कुछ कर सकना सम्भव हो सके।
दृष्टि पसार के वास्तविकता को ढूँढ़ने पर समस्त समस्याओं का एक ही कारण दीखता है आस्था-संकट-निकृष्ट चिन्तन। इसका निराकरण आज एक ही उपाय से हो सकता हैं अन्तःचेतना का ऊर्ध्वगमन, उन्नयन, अभ्युदय, प्रज्ञावतार की तूफानी गतिविधियाँ जन-जन के अन्तःकरण को झकझोरती और उसे क्रमशः उस दिशा में धकेलती-घसीटते ले चलेगी जहाँ उसे शालीनता और सदाशयता से बढ़कर और कुछ मूल्यवान प्रतीत ही न होता हो। मूर्धन्य देव-मानवों के माध्यम से प्रज्ञावतार आस्था-संकट के निवारण का प्रयत्न कर रहा हैं धर्मक्षेत्र की नर्सरी में ही महामानवों के कल्पवृक्ष उत्पन्न होते रहेंगे। इस समय भी उसी के प्रमाण में कल्पवृक्षों की नई पौधे उग रही है।
एक व्यक्ति सन्त सुकरात के पास गुरुदीक्षा लेने पहुँचा। सुकरात ने उसे देखकर कच्चे घड़े की ओर इशारा किया और कहा-इस बर्तन में कुएँ से पानी ला दो? ”उस आदमी ने कहा-महात्मन् आपको इतना भी पता नहीं कि इसमें पानी नहीं टिकेगा। ”सुकरात हँसते हुए बोले-यही तो मैं भी कहता हूँ कि मलिन विचारों वाले हृदय में ईश्वर भक्ति कैसे रहेंगी?”
प्रज्ञा का आरम्भिक उद्गम जाग्रत आत्माओं से आरम्भ होता है। इस ऊर्जा से अनुप्राणित व्यक्ति सर्वप्रथम अपने चिन्तन और चरित्र को बदलते हैं उनकी चेतना नरकीटकों जैसा क्षुद्र जीवन जीने से स्पष्ट इनकार करती हैं। पुरानी इच्छाएँ, रुचियों और आदतें बदलना आमतौर से सामान्य व्यक्तियों के लिए अति कठिन होता हैं। इसे समुद्र-तैरने और पर्वत-लाँघने जैसा दुर्गम बताया गया है। लोग श्रेष्ठता की दिशा में सोचते तो बहुत कुछ है पर संकल्पबल के अभाव में कर कुछ नहीं पाते। शेखचिल्ली जैसे सपने गढ़ते दिवास्वप्न देखते और कल्पना लोग में उड़ते-उड़ते ही जिन्दगी बीत जाती है और सड़ी कीचड़ से निकलने की बात बनती ही नहीं। किन्तु प्रज्ञापुरुष अन्तःप्रेरणा की प्रचण्डता से प्रेरित होकर असाधारण साहसिकता का परिचय देता है और पुराने ढर्रे को मकड़ी को तरह अपने बुने ताने-बाने को समेटकर अपने ही पेट में निगल लेते है। आत्मपरिवर्तन सामान्य लोगों के लिए निस्सन्देह अति कठिन है पर प्रज्ञापुरुष अपनी दैवी साहसिकता के सहारे उसे इतनी अच्छी तरह सम्पन्न कर लेते है कि साथियों को उसे दाँतों तले उँगली दबाकर आश्चर्यवत् पश्यति करिष्वदेन’ की पुनरावृत्ति खुली आँखों से देखनी पड़ती है।
दैवी-अनुग्रह का प्रथम चिन्ह यही है कि सामान्य से असामान्य की दिशा में छलाँग लगाये। संसार के ऐतिहासिक महामानवों में से प्रत्येक को महानता का पहला पाठ यही पढ़ना पड़ा है कि साथी-सम्बन्धियों के परामर्शों और अपने कुसंस्कारों की प्रत्यक्ष अवमानना करके ऐसा कदम उठाये जिसे अपने मतलब से मतलब रखने वाले-मोहान्ध में जकड़े हुए व्यक्ति अव्यावहारिक बताये और घाटे का सौदा ठहराए। प्रवाह में तो हाथी तक बहते चले जाते है। धारा को चीरकर उल्टा चलने का साहस मछली वर्ग के असाधारण शक्तिसम्पन्न प्राणियों में ही होता है। महानता का जन्म इसी स्तर की साहसिकता के साथ होता है। वे लोभ-मोह की महत्त्वाकाँक्षाओं के बन्धन काटते है और लिप्सा-लालसाओं को ताक पर रखकर आदर्शवादिता के मार्ग पर चलते है। पर आने वाली कठिनाइयों को जान-बूझकर स्वीकार-शिरोधार्य करते है।
देवमानव वे है जो आदर्शों के क्रियान्वयन की योजना बनाते और सुविधा की ललकलिप्सा को अस्वीकार करके युगधर्म के निर्वाह की काँटों भरी राह पर एकाकी चल पड़ते हैं यही साहसिकता उन्हें आत्मकल्याण और लोक-कल्याण के दुहरे प्रयोजन पूरे कराती हुई पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचते है। प्रज्ञावतार की प्रथम प्रेरणा प्रथम प्रक्रिया देवमानवों के उत्पादन की होती हैं। वे आत्म-परिवर्तन का अनुगमन की प्रेरणा देता है। अग्रगमन ही साहसिकता है। यह पराक्रम देवमानवों के भाग्य में ही बदा होता हैं समयानुसार अनुगमन तो असंख्यों करने लगते है। आँधी के साथ उड़ने वाले पत्ते तो अपना रुख बदलते ऊँचे उछलने नीचे गिरने की हलचलें सहज ही करते रहते है।
अवतार के अनुयायी आरम्भ में थोड़े ही होते है पीछे वह समुदाय बढ़ता चला जाता हैं राम के साथियों में सुग्रीव हनुमान जैसे कुछ ही साथी थे कृष्ण के प्रारम्भिक सहयोगी पाँच पाण्डव थे। बुद्ध की प्रथम दीक्षा में सात सम्मिलित हुए थे। ईसा के व्रतबद्ध शिष्य तेरह थे। अग्रगामियों के कंधों पर सेनापतियों जैसी योजना बनाने और व्यवस्था जुटाने का उत्तरदायित्व आता है। साधनों और सहयोगियों के अभाव में भी पर्वत उठाने और समुद्र लाँघने जैसे असम्भव दीखने वाले कार्यों के लिए आत्मबल और ईश्वरीय-सहयोग पर विश्वास करते हुए कटिबद्ध हो जाना यही सिद्ध करता है कि इन आत्माओं पर दैवी-आवेश अवतरित हो चला। कालान्तर में ऐसी ही आत्माओं को लोग अवतार या अवतार के उपकरण कहने लगते है। प्रथम चरण में ढलाई इन्हीं की होती है।
अवतार के द्वितीय चरण में अनेक व्यक्ति आदर्शवादी साहस का परिचय देते दिखाई पड़ते हैं कृपणों को उदारता अपनाते डरपोकों को साहस करते स्वार्थियों को परमार्थ अपनाते पतितों को आदर्श अपनाते देखकर यही सिद्ध होता है कि हवा का रुख बदला और मौसम पलटा। वर्षाऋतु आते ही सारा माहौल बदल जाता हैं आसमान में छाई धूल और धुन्ध को धकेलकर सुहावनी घटाएँ अपना अड्डा जमाती है। तवे जैसी जलती भूमि पर जल भरा दीखता है। हरियाली उगती और सोये मेढ़कों की आवाज हर दिशा में सुनाई पड़ती है। जबकि हर व्यक्ति स्वार्थसिद्धि के ताने बाने बुनने के अतिरिक्त और कुछ सोचने करने से आगे बढ़ ही न पाये तब कुछेक व्यक्तियों की परामर्श परायणता निस्सन्देह आश्चर्यवत् प्रतीत होती हैं और उसे किसी आवेश का चमत्कार कहा जाता है। आदर्शों को चर्चा का विशय और वाक् विलास का प्रसंग भर माना जाता हैं उन्हें प्रत्यक्ष अपनाया जाने लगे तो समझना चाहिए कि कही से कुछ विशिष्ट उतरा और महान उभरा है। अवतार की चेतना जन-समाज में घुल-मिले उत्कृष्ट तत्त्वों को ऐसे ही साधारण आचरण करने-उदारता का परिचय देने एवं ऐसा कर गुजरने के लिए उकसाती है जिसे अभिनन्दनीय और अनुकरणीय कहा जा सकें अवतारकाल में उन्हीं उदाहरणों की संख्या बढ़ती और परम्परा बनती चली जाती हैं।
प्रज्ञावतार की इस पुण्यवेला में इस स्तर की अनुकृतियाँ द्रुतगति से बढ़ रही है। भविष्य में उनका विस्तार और भी तेजी से होगा। युगनिर्माण परिवार में लाखों सदस्य अपना समयदान और अंशदान अन्तः प्रेरणा से अनुप्राणित होकर कर रहें है। उन बूँद-बूँद अनुदानों का समुच्चय नवयुग के अनुरूप वातावरण बनाता चला जा रहा है। जाग्रत आत्माओं को युगदेवता का आवाहन सर्वत्र भावश्रद्धा के साथ सुना गया हैं। आत्माहुतियाँ लेकर जीवनदानियों का एक समर्थ वर्ग शान्तिकुञ्ज पहुँचा है और सृजन प्रयोजन में अदम्य उत्साह के साथ जुट गया है।
प्रव्रज्या अभियान के विस्तार में ऐसे ही झरने झरते दृष्टिगोचर होते हैं वरिष्ठ कनिष्ठ और समयदानी वर्ग के परिव्राजकों के बादल जिस तरह उमड़ रहे है उनसे यह अनुमान लगाने में तनिक भी कठिनाई नहीं होती कि तवे-सी जलती धरती पर मखमली चादर बिछने और जीवनदायी हरीतिमा उगने में अब बहुत विलम्ब नहीं रह गया हैं
अपने देव-परिवार के परिजनों द्वारा नवसृजन के एक-से-एक बढ़कर उच्चस्तरीय आदर्श अनुदान उपस्थित करने में इन दिनों होड़ सी लग रही हैं गायत्री शक्तिपीठों के निर्माण में कितनों ने अपनी सामर्थ्य को लाँघते हुए कितने बढ़े-चढ़े अनुदान प्रस्तुत किए है इसका इतिहास अगले दिनों एक विशाल ग्रन्थ के रूप में सचित्र छपेगा। उसे पढ़ने वाले देखेंगे कि इस युगचुनौती को किस उच्चस्तरीय भावश्रद्धा के साथ स्वीकार किया गया और उस निर्माण में कितने साहस भरे त्याग-बलिदान का नियोजन किया गया। इतिहास के पृष्ठांकन पर महामानवों के त्याग-बलिदान चिरकाल से अनेकों पीढ़ियों को आदर्शवादी प्रेरणाएँ देते रहें है। उनसे अनुप्राणित होकर असंख्यों ने अपने जीवन की दिशाधारा बदली और अनुकरण की हिम्मत जुटाई है। अग्रगामी आदर्शवादी ही अन्तरिक्ष के ग्रह-तारकों की तरह धरती वालों को प्रकार देते और वस्तुस्थिति जताने से लेकर रास्ता दिखाने तक का महान प्रयोजन पूरा करते हैं।
मध्यकाल में यह परम्परा शिथिल ही नहीं लगभग समाप्त हो गई थी। साधु-ब्राह्मण तक धर्म-व्यवसायी बन गये थे। देश-भक्ति-लोकसेवा-जन-कल्याण का आचरण तो अनेकों ने ओढ़ा और वाक्शक्ति के आधार पर धुएं के बादल भी खड़े किए पर अपने निजी आवरण से ऐसी प्रेरणा प्रस्तुत न कर सके जिससे वे श्रद्धा के पात्र बनते और भावभरी प्रेरणा देकर दूसरों को अनुकरण के लिए सहमत करते। प्राचीनकाल में भारतीय देवमानवों की एक ही प्रमुख विशेषता थी कि वे उत्कृष्ट चिन्तन और पूरी तरह सँजोते थे। उनके क्रिया−कलाप साहसिक परमार्थ-प्रयोजनों से भरे रहते थे। त्याग-बलिदान को ही वैभव और वर्चस्व मानते थे। यह परम्परा नष्ट हुई और धर्म का स्वरूप बनकर रह गया। ऐसी दशा में विनिर्मित हुए वातावरण में महामानवों का उत्पादन बन्द हो जाना स्वाभाविक ही था। यही है वह महान क्षति जिसका दुष्परिणाम वर्तमान हेय परिस्थितियों और विकट विपत्तियों के रूप में अपनी पीढ़ी को भुगतान पड़ रहा है। युग बदलना है तो प्रवाह भी बदलेगा ही। महान व्यक्तियों का उत्पादन-सामान्य लोगों द्वारा आदर्शवादी क्रिया-कृत्यों का सम्पादन यह दोनों ही कार्य ऐसे है जिनसे निराशा भरी परिस्थितियों में भी आशा की चमक उत्पन्न होती है। सामान्य समझे जाने वाले लोगों की भी जब अन्तःप्रेरणा में प्रेरित होकर परमार्थ-प्रयोजनों के लिए कोई अभिनन्दनीय कार्य करने के लिए अनायास ही कटिबद्ध पाया जाए तो समझना चाहिए कि युगदेवता का चमत्कार सिर पर चढ़कर बोला।
युगसृजन के लिए प्रचुर साधनों की आवश्यकता पड़ेगी। कार्यक्षेत्र व्यापक है तक उससे सम्बद्ध असंख्य अन्य प्राणियों तक चली जाती हैं इतने बड़े क्षेत्र एवं वर्ग की स्थिति को नीचे से उठाकर ऊँची उछाल देना निस्सन्देह बहुत बड़ा कार्य हैं इसलिए श्रमबल मनोबल एवं साधनाबल की प्रचुर परिमाण में आवश्यकता पड़ेगी। इस आवश्यकता को न तो चन्दा संग्रह करके पूरा किया जा सकेगा और न शासन के लिए इतने बड़े लक्ष्य को पूरा करने की बात सोच सकना सम्भव होगा। इतनी बड़ी सम्पदा जन-जन के मन-मन में उभरने वाली भावश्रद्धा के कारण स्वेच्छा-समर्पित अनुदानों से ही सम्भव होगी।
युगचेतना की प्रेरणा हर जाग्रत आत्मा के लिए यह है कि वह न केवल जीवनक्रम का उत्कृष्ट बनाये वरन् युगसृजन के छुटपुट नहीं ऐसे अनुदान प्रस्तुत करे जिनकी स्मृति से इतिहास के पृष्ठों का धन्य बनने का अवसर मिले। दुष्टता और भ्रष्टता पिछले दिनों एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगाते रहे हैं। अब यह प्रतिस्पर्धा दूसरे स्तर की है। भीम ने ब्राह्मण के बालक को बचाने के लिए अपना प्राण देने को अधिकार माता तथा भाइयों से लड़ झगड़कर प्राप्त किया था। गुरु गोविन्द सिंह के बच्चों में से प्रथम बलिदान होने वाले बालक ने अपने सौभाग्य को उच्च स्वर से सराहा था। अब प्रतिस्पर्धाएँ इसी स्तर की चलेगी। कि असंख्यों को प्रेरणा देने वाले आदर्शवादी त्याग-बलिदान में कौन-कौन किस से आगे निकलता है। दंगल में कुश्ती पछाड़ने वाले पहलवान अपनी विजयध्वज उड़ाते हुए हाट-बाजारों में निकलते हैं आदर्शवादी अनुदान प्रस्तुत करने में किसने अपने कितने साथियों को पछाड़ा और अपनी आन्तरिक बलिष्ठता का कितना भारी प्रमाण प्रस्तुत किया यही प्रसंग लोग चर्चा का विशय बनेगा। इतिहास के पृष्ठ इन्हीं दिव्य-संस्मरणों से रंगे और लिखें जाएँगे। यही वह आधार है जिससे युगनिर्माण के लिए अभीष्ट शक्ति एवं सम्पदा प्रचुर परिमाण में सहज ही उपलब्ध होती चलेगा। अनुकरणीय आदर्श का ताँता लगते इन दिनों भी देखा जा सकता है।। अगले दिनों इस दिशा में और भी अधिक उत्साह उत्पन्न होगा। इसी को युग-अवतार का सामयिक एवं समर्थ अनुदान कहा जाएगा।
अपनी गिरफ्तारी से कुछ दिन पूर्व ईसा यरुशलम में ही प्रचार कर रहें थे, जहाँ कि उनकी जान के ग्राहक सबसे ज्यादा थे, साथ ही जहाँ प्रचार की सबसे अधिक आवश्यकता थी। उनके शिष्यों ने उनमें यरुशलम छोड़ देने के लिए अनुरोध करते हुए कहा-यहाँ के लोग आपको मार डालने की घात में है। “किन्तु ईसा ने वहाँ से जाना अस्वीकार करते हुए कहा-जीवन का उत्सर्ग किए बिना न तो सत्य की प्रतिष्ठा होगी, न उसका महत्व बढ़ेगा।”
स्थूल रूप से मनुष्य का जो स्वरूप दिखाई देता है, वह उसकी काया, बुद्धि, व्यवहार, श्रमशीलता, लगन और पुरुषार्थ का ही सम्मिश्रण है। इस बहिरंग स्वरूप के बल पर कितनी ही लौकिक सफलताएँ प्राप्त की जा सकती है। साधारण, सामान्य, दीन स्थिति से ऊपर उठकर असाधारण, असामान्य सम्पन्न स्थिति तक पहुँचने वाले व्यक्ति अपने श्रम, लगन, सूझ-बूझ और व्यावसायिक कौशल का ही प्रयोग करते है। अचर्चित और असाधारण वर्ग के लोग अपनी सेवा, लोकसाधना, प्रचार, जनसंपर्क और व्यवहार कुशलता के बल पर ख्याति अर्जित कर लेते है। दुर्बल से बलवान, अख्यात से विख्यात, मंदबुद्धि से बुद्धिमान, निर्धन से धनवान् आदि सफलताएँ बहिरंग सत्ता की ही उपलब्धियाँ कही जा सकती है।
मनुष्य की बहिरंग उपलब्धियाँ और सफलताएँ भी उल्लेखनीय व प्रशंसनीय है, परन्तु उन उपलब्धियों को जितने आसानी से प्राप्त किया जाता है। उतनी ही जल्दी व्यक्ति उन्हें गँवा भी देता हैं। अपने प्रयत्नों में जरा कही चूक हुई नहीं कि व्यक्ति उस स्तर से गिर पड़ता है। सरकस में तार चलने का खेल दिखाने वाले कलाकार बड़े अभ्यासपूर्वक यह सिद्धि प्राप्त करते है। फिर भी जरा-सी चूक उन्हें गिराने के लिए काफी होती है। इन उपलब्धियों में कही टिकाऊपन नहीं है।
आँतरिक दृष्टि से सफल और सशक्त व्यक्ति हर परिस्थिति में स्थिर दिखाई देते है और अपने उच्च प्रयोजनों में अनवरत संलग्न रहते है। मनुष्य की सामर्थ्य को जगाने और उसके सदुपयोग करने के विज्ञान के नाम ब्रह्मविद्या है। ब्रह्मविद्या के बल पर ही व्यक्ति आन्तरिक दृष्टि से वह ऊर्जा प्राप्त करता है, जिससे बड़े-बड़े कार्य सम्पन्न किए जाते है। ऊर्जा के बल पर किए गए कार्य टिकाऊ परिणाम भी उपलब्ध करते है और उनसे असंख्य आत्माओं सभी समुदायों और सभी वर्गों को लाभ भी पहुँचता है। वर्षा के दिनों में जब हर कही पानी उपलब्ध होता है। तो पोखर-तालाबों का उतना महत्व नहीं रहता। लेकिन गर्मी और सूखे के दिनों में जब पानी दुर्लभ हो जाता है तो वे पोखर-तालाब भी लगभग रीते जाते है। इसके विपरीत गंगा यमुना जैसी नदियाँ जो अक्षय जल-सम्पदा के भण्डार हिमालय से जुड़ी रहती है ऐसे समय में अपनी उपयोगिता सिद्ध करती है।
युगपरिवर्तन जैसा महत कार्य उन अन्तरंग सामर्थ्यवान व्यक्तियों के बल पर ही सम्भव है जिन्होंने ब्रह्मविद्या को अपने जीवन का आधार बनाया है तथा जिन्होंने अपना सम्बन्ध उस महाशक्ति से जोड़ा है जिसके बल पर इतने बड़े कार्य सम्पन्न हो सकते है। इस तरह के कार्यों सम्पन्न हो सकते है। इस तरह के कार्यों को संपादित करने के लिए ब्रह्मविद्या के बीज-सूत्र का नाम गायत्री है। गायत्री के एक-एक अक्षर में वह तत्त्वज्ञान सन्निहित है जिसकी व्याख्या में ब्रह्मविद्या का इतना व्यापक विस्तार हुआ है।
लौकिक पूँजी और भौतिक सामर्थ्य की अपने स्थान पर उपयोगिता है। पर उसे आधार मानकर नहीं चला जा सकता है। व्यापक परिवर्तन के महान उद्देश्य इन साधनों के बल पर सम्भव नहीं है। कई देशों में भौतिक साधनों और शक्तियों के द्वारा परिवर्तन के प्रयास हुए भी है। परन्तु उन्हें आँशिक ही सफलता मिल गई है। आँशिक सफलता भी बाहरी दबाव और दण्ड के भय से मिली अन्यथा जहाँ भी जब भी जिसे अवसर मिला वही हर किसी ने अपने उन स्वार्थों को पूरा करने में जरा-सी चूक नहीं आने दी जिन्हें सामाजिक या राष्ट्रीय अपराध घोषित किया गया। इसका एकमात्र कारण है व्यक्ति को प्रभावित करने निर्देशन देने और किसी दिशा में नियोजित करने के प्रयासों का अभाव।
यह प्रयास केवल आत्मशक्ति सम्पन्न व्यक्ति ही कुशलतापूर्वक कर सकते है। व्यक्ति वही कुछ नहीं है जो बाहर से दिखाई देता है। बल्कि उसकी मूलसत्ता तो उसकी चेतना है जहाँ आस्थाओं की जड़ें विद्यमान रहती है, निष्ठाओं से जड़ें, पोषण और अंकुरण को प्राप्त करती है। आस्थाओं का शोधन और निष्ठाओं का परिष्कार किए बिना सुधार के सभी प्रयास व्यर्थ जाते हैं।
आस्थाओं का परिष्कार ही नव-निर्माण का मूल आधार है और यह कार्य आत्मशक्ति सम्पन्न व्यक्तियों द्वारा ही किया जाना सम्भव है। शरीरबल, बुद्धिबल, धनबल, मनोबल का अपना महत्व है, परन्तु उनके उपयोग की दिशा भी व्यक्ति की चेतना पर निर्भर करती है। व्यक्ति की चेतना यदि निकृष्ट स्तर की है तो वह इन बलों का प्रयोग कर अपना व समाज का भारी अहित ही करेगा बाहर से लाख प्रतिबन्ध लगाये जाने पर भी उसके प्रयासों को रोक पाना आसान नहीं होगा। यदि रोक भी दिया गया तो वह बल बिना उपयोग में आई संपत्ति की तरह व्यर्थ पड़ा रहेगा। इसके विपरीत यदि परिष्कृत चेतना द्वारा इन साधनों का उपयोग किया जाए तो उसके सभी पक्षों में सत्परिणाम प्रस्तुत हो सकते है।
आत्मशक्ति के द्वारा मनुष्य की व्यष्टिगत और समष्टिगत चेतना को परिष्कृत करके जिस नये युग के अवतरण की चर्चा इन पंक्तियों में की जा रही है उसे यदि एक सूत्र में व्याख्यायित किया जाना हो तो वह सूत्र होगा, मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण। इस लक्ष्य को प्राप्त करने स्वप्न को साकार करने का मार्गदर्शन गायत्री के प्रत्येक अक्षर में निहित है।
गायत्री को गुरुमन्त्र जाता हो गुरुतत्त्व द्वारा मिलने वाली श्रद्धा, प्रेरणा भाव-संवेदना एवं अनुशासन का प्रकाश गायत्री को गुरुमन्त्र कहा गया है। इसीलिए गायत्री को गुरुमन्त्र कहा गया है। कितने ही मंत्र है, वैदिक, पौराणिक, तांत्रिक।मन्त्रों की संख्या का ठीक-ठीक अनुमान भी लगा पाना सम्भव नहीं हैं ऐसी स्थिति में गायत्री को ही गुरुमन्त्र क्यों कहा गया? यह विचारणीय हो सकता हैं। भारतीय संस्कृति में गुरु की व्याख्या करते हुए उसके दो महत्वपूर्ण कार्य बताये गए हैं एक ज्ञानवर्धन और दूसरा-अशुभ निवारण गायत्री की शक्ति के भी दो पक्ष है पहला सृजनात्मक और दूसरा विध्वंसात्मक गायत्री की सृजनात्मक शक्ति को ब्रह्मविद्या कहा जाता है और ध्वंसात्मक शक्ति को ब्रह्मास्त्र। साधन की तुलना राजहंस से की जाती है जिस पर आरूढ़ गायत्री साधक का कल्याण करती है और दुखदायी विघ्नों का निवारण करती है।
इसी शक्ति की चर्चा जब युगशक्ति के अवतरण संदर्भ में की जाती है तो ’ परित्राणाय साधूनां’ और ’विनाशाय दुष्कृताम् की अवतार प्रतिज्ञा पूरी होती है। सृजन और ध्वंस एक सम्मिलित पूरक प्रक्रिया है। नया कुछ निर्माण करना हो तो पुराने को हटाना पड़ता है खेत में फसल उगानी हो तो पहले जमीन पर उगी हुई खरपतवार उखाड़नी पड़ती है कपड़े को रँगने के लिए पहले धुलाई कर उस पर जमा मैल साफ करना पड़ता है किसी भी क्षेत्र में निर्माणकार्य तभी पूरा होता है जब वहाँ उपस्थित कूड़ा-कबाड़ा गन्दगी मलीनता और कषाय-कल्मष हटाए जाएँ।
भारतीय शास्त्रों में जिन 24 अवतारों का उल्लेख आता है उनकी यही क्रियापद्धति रही। अधर्म का अनीति-आतंक का निवारण और धर्म-नीति-सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन अभिवर्द्धन। इस संदर्भ में एक बात और उल्लेखनीय है- अवतारों की संख्या 24 ही क्यों गिनी जाती है? जबकि समय-समय पर कितनी ही विभूतियाँ अवतरित होती रहीं। इस संख्या में नाम या क्षेत्रविशेष का महत्व नहीं है। वस्तुतः संकेत युगशक्ति के रूप में अवतरित होती रहने वाली गायत्री महाशक्ति की ओर है, उसे नाम और रूप भले ही चाहे जो दिया जाता रहा हो।
गायत्री के 24 अक्षरों में वे सभी सिद्धान्त सूत्ररूप में सन्निहित हैं, जिनके आधार पर युगान्तरकारी परिवर्तन प्रस्तुत होते है। ईश्वरीय शक्ति का अवतरण-प्राकट्य हर ऐसे संधिकाल में होता है, जब परिवर्तन के अलावा कोई उपाय नहीं रह जाता। उसके स्वरूप और क्रिया−कलाप में हेर-फेर अवश्य होता रहता है। हिरण्याक्ष राक्षस जब धरती को समुद्र में ले जाकर छुप गया तो भगवान को वाराह का रूप धारण करना पड़ा। हिरण्यकश्यप को वरदान था कि वह न मनुष्य से मारा जा सकेगा और न पशु से, न घर में मारा जा सकेगा न बाहर, न मल्लयुद्ध में मारा जा सकेगा न शस्त्रयुद्ध में। इसलिए भगवान को मनुष्य और सिंह का सम्मिलित रूप धारण कर देहरी में नखों को शस्त्र की तरह उपयोग कर हिरण्यकश्यप का संहार करना पड़ा। इसी प्रकार आततायियों का संहार करने के लिए परशुराम, मर्यादा की स्थापना के लिए राम, योग का कर्मप्रधान रूप प्रस्तुत करने के लिए कृष्ण और बौद्धिक क्रान्ति के लिए बुद्ध रूप में अवतरित होना पड़ा। इस अवतरण प्रक्रिया में कहीं भी जड़ता नहीं है। अधर्म का विनाश और धर्म की स्थापना ही प्रधान लक्ष्य रहा है।
आज की परिस्थितियाँ भिन्न हैं। पहले असुरता सीधे आक्रमण करती थी और समाज-व्यवस्था को अस्त- व्यस्त, तहस-नहस करती थी। आज असुरता ने छद्म आक्रमण की नीति अपनाई है और वह जनमानस में विकृतियाँ उत्पन्न कर रही है। आदर्शों और मर्यादाओं की अवज्ञा इतने व्यापक स्तर पर होने लगी है कि उनके लिए कटिबद्ध व्यक्ति अपवाद बनते चले जा रहे है। ईश्वर के अस्तित्व को मानने और देवस्थानों पर प्रतिमा के सामने सिर झुकाने वालों का अभाव नहीं है, अभाव है उन व्यक्तियों का, जिन्हें सच्चे अर्थों में आस्तिक कहा जा सके। ईश्वर के अस्तित्व के अस्वीकार करने वाला उतना नास्तिक नहीं है, जितना कि उसे मानते हुए भी आदर्शों और मर्यादाओं की अवज्ञा करने वाला। फलतः इन दिनों चारों ओर जितने भी संकट, जितनी भी समस्याएँ दिखाई देती हैं, उनके मूल को खोजे तो विदित होगा कि आज का संकट आस्थाओं का संकट है।
इस बार नवयुग की, युग गायत्री की अवतरण प्रक्रिया भी असुरता के उन्मूलन और देवत्व के उदय के सनातन उद्देश्य से पूर्ण होगी। परिस्थितियों के अनुरूप उस चेतना के उदय हेतु प्रयासों अवांछनीयता, असुरता को निरन्तर करने का यह धर्मयुद्ध, धर्मक्षेत्र में -अन्तःकरण की गहराई में उतरकर लड़ा जाना है और जनमानस के परिष्कार द्वारा, आस्थाओं के परिशोधन द्वारा नवयुग के निर्माण में ग्वाल-बालों की-रीछ-वानरों की भूमिका निभाने के लिए हर जागरूक व्यक्ति को आगे आना है।
गायत्री तत्त्वज्ञान की जानकारी जन-जन तक पहुँचाना युगशक्ति के विस्तार का प्रथम चरण है। अब तक यह प्रयास लेखनी और वाणी द्वारा किया जाता रहा। व्यक्तिगत रूप से लाखों साधकों ने इस तत्त्वज्ञान को अपनाने में तत्परता दर्शायी और उसके अभीष्ट परिणाम भी उत्पन्न हुए। पिछले दिनों इन प्रयासों में सामूहिकता का समावेश किया गया, जिसे इस युग की नवीनता और विशेषता कहा जा सकता है। व्यक्तिगत सफलताएँ तो असंख्य है और उत्साहजनक भी, परन्तु महत्वपूर्ण-उल्लेखनीय सामूहिक प्रयासों को ही समझा जाना चाहिए। साधना स्वर्णजयंती वर्ष में एक लाख साधकों ने मिलकर प्रतिदिन 24 करोड़ गायत्री जाप का अभियान चलाया। यह इस युग का अद्वितीय और अपने आप में अकेला प्रयास था। युगसन्धि महापुरश्चरण अभियान जो 1979 में आरम्भ हुआ, वह तो और भी विलक्षण परिणामदायी है। इस अभियान का वातावरण पर, जन-मानस पर जो सूक्ष्म प्रभाव पड़ा है, उसका गम्भीरतापूर्वक विवेचना किया जाए, तो वह स्पष्टतः दिखाई पड़ सकता है। गायत्री यज्ञों दीपयज्ञों, अश्वमेधों के रूप में सामूहिक आयोजनों की जो अभियान श्रृंखला चल पड़ी है, वातावरण के निर्माण और सूक्ष्मजगत के परिवर्तन में उसका भी अपना विशिष्ट स्थान है।
यह सूक्ष्म परिवर्तन स्थूल आँखों से होते हुए नहीं दिखाई दे सकते। परिवर्तन-प्रक्रिया जब सम्पन्न हो चुकेगी, आसुरी शक्तियाँ निष्प्राण होकर निर्जीव हो जाएगी तथा दैवी-शक्तियाँ और दैवी-प्रवृत्तियाँ चारों ओर गतिमान दिखेगी, तब इन प्रयासों की उपलब्धियाँ आकलित्न की जा सकेगी। जिस प्रकार असुरता का प्रत्यक्ष आक्रमण नहीं दिखाई पड़ा, उसी प्रकार उसका उन्मूलन भी स्थूल दृष्टि से नहीं देखा जा सकेगा। लेकिन जो व्यक्ति युगशक्ति के अवतरण को पहचान रहे हैं और उसके प्रसार-विस्तार में लगे हुए हैं वे अपने आप को कृतकृत्य और धन्य अनुभव करेंगे।
भौतिक-प्रगति के लिए भौतिक-पुरुषार्थ करने पड़ते हैं और आत्मिक-प्रगति के लिए चेतना का स्तर उठाने और प्रखरता को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है। भौतिक-जीवन को गतिशील रखने के लिए प्राणिमात्र को प्रकृति-प्रेरणा का अनुसरण अनिवार्य रूप से करना पड़ता है। पेट में भूख लगती है और आहार-उपार्जन करने के लिए दौड़-धूप करना आवश्यक हो जाता है। शरीर में समर्थता बढ़ने पर कामुकता की तरंगें उठती हैं और साथी ढूँढ़ने, परिवार बसाने का मानसिक ताना-बाना बुना जाने लगता है। प्राणिजगत का अस्तित्व और पराक्रम इन्हीं पेट-प्रजनन के दो प्रगतिचक्रों के सहारे सरलतापूर्वक लुढ़कता रहता हैं। आत्मिक-प्रगति का प्रसंग दूसरा है। चौरासी लाख योनियों के संग्रहित स्वभाव-संस्कार मनुष्य-जीवन के उपयुक्त नहीं रहते, ओछे पड़ जाते हैं। बच्चे के कपड़े बड़ों के शरीर में कहाँ फिट होते हैं? मानव-जीवन की सार्थकता के लिए जिन सद्भावनाओं से अन्तःकरण को और सत्प्रवृत्तियों से शरीर को सुसज्जित करना पड़ता है, वह पूर्व अभ्यास एवं प्रभावी-प्रचलन होने के कारण कठिन पड़ता है। यह सहज-सुलभ नहीं, वरन् प्रयत्नसाध्य है। नीचे गिराने में पृथ्वी की आकर्षण-शक्ति का क्रम ही निरन्तर सहायता करता रहता है, पर ऊँचा उठाने के लिए विशेष साधन जुटाने होते है। आन्तरिक अभ्युत्थान के इसी पराक्रम को साधना कहते है।
इस तथ्य को हजार बार समझा और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि जिस साधना से सिद्धि मिलने का माहात्म्य बताया जाता है, वह जीवन-देवता की अभ्यर्थना ही है, परब्रह्म की प्रसन्नता के लिए उसकी मर्यादाओं का पालन करने भर से काम चल जाता है, किन्तु अन्तरात्मा में विद्यमान दिव्य-ज्योति को प्रखर बनाने के लिए विशेष रूप से पुरुषार्थ करने होते हैं और वही साधना कहलाती है।
साधना मार्ग पर चलने के लिए प्रथम चरण इष्ट-निर्धारण का उठाना पड़ता है। प्रगति की आन्तरिक महत्त्वाकाँक्षा स्वाभाविक है, पर उसका स्वरूप भी तो निश्चित होना चाहिए। उमंगें असीम हैं और उनकी स्वरूप भी तो है और उनकी दिशाधारा भी अनेकों। पानी पर उठने वाली लहर की तरह महत्त्वाकाँक्षाओं की कोई सीमा नहीं। एक के बाद दूसरी लहर उठती है और हवा के झोंकों के साथ अपनी दिशा बदलता है। प्रवाह की दिशाधारा न हो तो पराक्रम अस्त - व्यस्त रहेगा। किसी लक्ष्य तक पहुँच सकना सम्भव ही नहीं हो सकेगा। दिशा -विहीन भगदड़ से मात्र थकान और निराश ही हाथ लगती है। कस्तूरी के हिरन को अभीष्ट स्थान का पता नहीं होता, फलतः वह भटकता,थकता और खिन्न रहता देखा जाता है। मानवी - अन्तरात्मा की भूख प्रगति की दिशा में अग्रसर होने की है। महत्त्वाकाँक्षाओं के उभार इसी का परिचय लक्ष्य एवं स्वरूप सामने न रहने से मनुष्य - जीवन की गाड़ी कायिक - लिप्साओं की ओर ही लुढ़कने लगती है और वासना, तृष्णा एवं अहंता की पूर्ति ही जीवनोद्देश्य बनकर रह जाती है। इस स्तर की सफलताएँ काया को भले ही कुछ सुख-सुविधाएँ प्रदान कर सके, परन्तु अन्तः - करण की उच्चस्तरीय प्रगति में इससे तनिक भी सहायता नहीं मिलती है। कई बार तो अनियन्त्रित भौतिक महत्त्वाकाँक्षाएँ आतुर होकर कुकर्म करके भी वैभव - उपार्जन में जुट पड़ती है और उल्टे अधःपतन एवं विक्षोभ का कारण बनती है।
इन समस्त उलझनों का समाधान एक ही है’ इष्ट निर्धारण ‘ इष्ट अर्थात् लक्ष्य। साधक का कोई इष्टदेव होता है। साधना का विधि - विधान उसी के अनुरूप चलता है। यों उपास्य केवल एक ही है। ’दिव्यजीवन ‘ किन्तु उसके लिए पुरुषार्थ करने की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि, उपासनात्मक उपचारों के सहारे ही बनती है। दिव्य -जीवन की कल्पना करते रहने भर से तो कोई काम नहीं बनता,पहलवान बनने के लिए व्यायाम की, विद्वान बनने के लिए स्वाध्याय की, धनी बनने के लिए व्यवसाय की आवश्यकता पड़ती है, इसी प्रकार आत्मिक - प्रगति का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उपासनात्मक उपचार अपनाने पड़ते है। दिव्य -जीवन की चरम परिस्थिति ही पूर्णता है। इसी स्थिति को स्वर्ग, सिद्धि एवं मुक्ति की प्राप्ति कहते है। आत्मसाक्षात्कार एवं ईश्वर दर्शन भी यही है। इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जो पुरुषार्थ करना पड़ता है उसे साधना विधान के रूप में अपनाना होता हैं साधना में शिक्षा और प्रेरणा का समावेश होता है फलतः उसकी प्रतिक्रिया जीवनोत्कर्ष के रूप में प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगती है।
कहा जा चुका है कि साधना क्षेत्र का प्रथम चरण इष्ट-निर्धारण है। प्रगति के किस बिन्दु तक पहुँचना है, इसका सुदृढ़ निश्चय होना आवश्यक है भव्य भवन बनाने वाला सर्वप्रथम अभीष्ट निर्माण के नक्शे का मॉडल बनाते है। आत्मिक -प्रगति के लिए किस मार्ग से जाना है? किस स्तर का साधन जुटना है, उसके लिए कितने ही प्रकार के निर्धारण अपनाए जाते रहे है। इन्हें इष्टदेव या देव कहते है। राम-भक्त बनने के लिए हनुमान मर्यादा-पुरुषोत्तम बनने के लिए राम पूर्ण-पुरुष बनने के लिए कृष्ण ब्रह्मतेजस् प्राप्त करने के लिए सविता को इष्ट बनाने की परम्परा है। इसी प्रकार और भी कितने ही हल्के-भारी इष्टदेव है जिन्हें स्थिति एवं रुचि के अनुरूप अपनाया जाता है। इस निर्धारण से मन को एक निश्चित दिशा में आगे बढ़ने और तदनुरूप प्रयास करने हेतु साधन जुटाने का मार्ग मिल जाता है। उस प्रयत्न से न केवल प्रयास को दिशा मिलती हैं वरन् उसी स्तर के अंतःक्षेत्र की प्रसुप्त शक्तियाँ भी जगने लगती है साथ ही परब्रह्म के शक्ति-भण्डार में से उच्चस्तर की अनुग्रह वर्षा भी अनायास ही आरम्भ हो जाती हैं आकांक्षाएँ आवश्यकता बनती है। आवश्यकता पुरुषार्थ की प्रेरणा जगाती हैं प्रेरणा भरे पराक्रम में प्रचण्ड चुम्बकत्व होता है। वह तीन दिशा में काम करता हैं प्रथम व्यावहारिक गति विधियों को अभीष्ट की प्राप्ति के अनुरूप बनाता है। द्वितीय-प्रसुप्त क्षमताओं को जगाकर प्रगतिपथ पर अग्रसर होने के लिए अदृश्य आधार खड़े करता है। तृतीय-दिव्यलोक से दैवी-अनुदानों के बरसने का विशिष्ट लाभ मिलता है। तीनों ही आधार मिलकर त्रिवेणी संगम बनाते है।
इष्ट-निर्धारण प्रगतिक्रम का सुनिश्चित आधार-पथ निश्चित कहता है। ईश्वरीयसत्ता का मनुष्य में अवतरण ‘उत्कृष्टता ’ के रूप में होता हैं चिन्तन और चरित्र में उच्चस्तरीय उमंगें उठने लगती हैं तथा उसी स्तर की गति विधियाँ चल पड़ती है। उत्कृष्टता की उपासना ही ईश्वर की उपासना हैं वही उपाय है। लक्ष्य इसी को बनाना पड़ता है। इष्टदेव का निर्धारण किस रूप में किया जाए आज इस संदर्भ में अनेकों विकल्पों के जंजाल बने खड़े है। प्राचीनकाल में ऐसा न था तत्त्वज्ञानी एक निश्चय पर पहुँचे थे और उन्होंने उसी निष्कर्ष को उपयोगी बताकर समस्त साधकों को उसे अपनाने का परामर्श दिया था। भारतीय-संस्कृति जिसे वस्तुतः विश्व-संस्कृति जिसे चाहिए साधना-संदर्भ कहा में एक ही निश्चय पर पहुँची है कि आत्मिक-प्रगति की साधना के लिए इष्ट रूप गायत्री का ही वरण होना चाहिए।
यों गायत्री का स्थूल रूप चौबीस अक्षरों के एक शब्दगुच्छक के रूप में है और उसकी प्रतिमा हंसारूढ़ देवी के रूप में बनती है। यह नाम और रूप निर्धारण है। उसके बिना मस्तिष्कीय संरचना किसी तथ्य को पकड़ने समझने में ही समर्थ नहीं होती। इसलिए चिन्तन को किसी दिशा में आगे बढ़ाने के लिए नाम रूप का अवलम्बन अनिवार्य होता हैं उपासना उपक्रम इस निर्धारण के बिना बन ही नहीं पाता।
समस्त देव-प्रतिमाओं का निर्धारण इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए किया गया। श्रद्धा का आरोपण और संवर्द्धन इस प्रतिमा-प्रतिष्ठापन के सहारे ही सहज-सुलभ रीति से अग्रगामी बनता है। वस्तुतः समस्त देवालयों का अस्तित्व मनुष्य की श्रद्धा-समुच्चय पर ही आधारित होता है। एक के लिए वह शक्ति-स्रोत बनता हैं दूसरे के लिए उपहासास्पद बनकर रह जाता हैं अनेकानेक आकृतियों के देवताओं का गठन यही सिद्ध करता हैं कि मानवी श्रद्धा अपनी अभिरुचि के अनुरूप किसी केन्द्र-बिन्दु का आस्था का समीकरण करती हैं उसे सशक्त बनाती हैं और उससे असाधारण लाभ उठाती है। एकलव्य के द्रोणाचार्य मीरा के गिरधर गोपाल रामकृष्ण परमहंस की काली इसी प्रकार के भाव-निर्धारण कहें जा सकते है। श्रद्धा की शक्ति अपार हैं उसके द्वारा परिपोषित तत्त्व देवताओं की तरह ही अनन्त सामर्थ्य-सम्पन्न अजस्र वरदायिनी एवं अद्भुत चमत्कारी बनकर प्रकट होते है। गायत्री महाशक्ति के नाम-रूप का निर्धारण भी इसी स्तर का समझा जा सकता हैं। इसके बिना साधक का भावनात्मक समाधान हो ही नहीं सकता ऋतम्भरा-प्रज्ञा को गायत्री-माता के रूप में इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए प्रतिष्ठिता किया गया है।
गायत्री को इष्ट मानने की अनादि परम्परा हैं। सृष्टि के आदि में ब्रह्माजी ने कमल-पुष्प पर बैठकर आकाशवाणी द्वारा गायत्री-उपासना निर्देशित की थी और सृष्टि-सृजन की सामर्थ्य प्राप्त की थी। इसका उल्लेख पुराणों में मिलता हैं त्रिदेवों उपासना गायत्री रही है। देवगुरु बृहस्पति ने दक्षिणमार्गी और दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने वाममार्गी साधनाएँ गायत्री के ही आत्मिक और भौतिक पक्षों को लेकर प्रचलित की थी। आदि मानव-देवों में सप्तऋषियों का नाम आता हैं वे सभी गायत्री का सप्त व्याहृतियों के प्रतीक माने जाते हैं राम कृष्ण आदि अवतारों की इष्ट गायत्री रही है। इसी महामन्त्र की व्याख्या में चारों वेद तथा अन्यान्य धर्म-शास्त्र रचे गये हैं दत्तात्रेय के चौबीस गुरु योग और चौबीस तप प्रसिद्ध हैं यह सभी गायत्री के तत्त्वज्ञान और साधना-विधान का विस्तार हैं। गायत्री गुरुमन्त्र है। दीक्षा में उसी को माध्यम बनाया जाता है। हिन्दू-धर्म के दो प्रतीक हैं-शिखा और सूत्र। दोनों ही गायत्री के प्रतीक है। गायत्री का ज्ञान-पक्ष सिर पर शिखा के रूप में और कम-पक्ष कन्धे पर यज्ञोपवीत के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। परम्परागत उपासना विधि ‘सन्ध्या’ है। सन्ध्या में गायत्री का समावेश अनिवार्य हैं इन तथ्यों का पर्यवेक्षण करने से स्पष्ट हो जाता है कि गायत्री ही अनादि धर्म-परम्परा एवं अध्यात्म-प्रक्रिया का आधारभूत तथ्य हैं उपासना में उसी का उपयोग सर्वोत्तम है।
तत्त्वदर्शन की दृष्टि से गायत्री ऋतम्भरा-प्रज्ञा है।। ऋतम्भरा अर्थात् विवेकसंगत श्रद्धा। प्रज्ञा अर्थात् श्रेय-साधन दूरदर्शिता। समग्र विवेकशीलता को गायत्री कह सकते है। इसी बीज मन्त्र का विशाल वृक्ष ब्रह्म-विद्या है। अध्यात्म का यह दार्शनिक पक्ष हैं साधना-प्रयोजन में इसी के विचित्र उपचार योगाभ्यासों तप-साधनों एवं धर्मानुष्ठानों के रूप में प्रचलित है। इष्ट का लक्ष्य का उपास्य का निर्धारण दिव्यदर्शियों ने गायत्री के रूप में गहन अध्ययन और अनवरत अनुभव अभ्यास के आधार पर किया है। वह प्राचीनकाल की तरह आज भी अपनी उपयोगिता यथावत अक्षुण्ण रखे हुए है। विज्ञ-साधकों के लिए उसी का अवलम्बन ग्रहण करना हर दृष्टि से उपयोगी है।
गायत्री-सार्वभौम और सर्वजनीन है। उसे किसी देश धर्म सम्प्रदाय तक सीमित नहीं किया जा सकता। भारत में उत्पन्न होने के कारण उसका नाम भारतीय-संस्कृति पड़ा हैं पर उसकी कोई प्रक्रिया उस परिधि में रहने वाले लोगों तक सीमित नहीं रखी जा सकती।
मालवा वालों को मालवीय कन्नौज वालों को कान्यकुब्ज मिथिला वालों को मैथिल मथुरा वालों को माथुर कहा तो जाता हैं पर वे उतने ही क्षेत्र में रहने के लिए बाध्य नहीं है। कश्मीरी सेव नागपुरी सन्तरे बम्बइया केला उसी क्षेत्र में बिकें और खाए जाएँ ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं हैं गायत्री-भारतीय संस्कृति की आत्मा कही जाती हैं पर इसका तात्पर्य यह नहीं कि इसी देश के निवासी या इसी धर्म के अनुयायी उसका उपयोगी कर सकते हैं भारतीय-संस्कृति वस्तुतः दैवी-संस्कृति हैं उसे मानवी कह सकते है। गायत्री की उपयोगिता सबके लिए समान हैं देश, धर्म, जाति, भाषा, सम्प्रदाय आदि के नाम पर अपने पराये की विभाजन-रेखा नहीं बननी चाहिए।
मुमुक्षु ने मुसकराते हुए कहा-बन्धुओं। मैंने कोई त्याग नहीं किया है वरन् लाभ लिया हैं बैंक में रुपये जमा करना त्याग नहीं वरन् ब्याज का लाभ हैं ग्राहक को वस्तु देकर दुकानदार किसी प्रकार के त्याग का परिचय नहीं देता वह तो बदले में उसकी कीमत लेकर लाभ कमाता हैं। समुद्र के किनारे खड़े हुए व्यक्ति को जब मोती दिखाई दे तो उन्हें समेटकर कौन झोली न भरना चाहेगा। उस समय यदि उसकी झोली में शंख और सीपियाँ होंगी तो उन्हें खाली कर मूल्यवान वस्तुएँ भरना क्या त्याग की वृत्ति का परिचायक हैं? उसी प्रकार क्रोध लोभ मोह आदि को छोड़कर अपने स्वभाव में अहिंसा परोपकार और क्षमा जैसे सद्गुणों को स्थान देना त्याग नहीं वरन् एक प्रकार का लाभ है। मैंने भी तो कोई त्याग नहीं किया है वासनाओं से छुटकारा पाना कोई त्याग या साहस नहीं हुआ। ”त्याग की यह परिभाषा सुन सभी लोग नतमस्तक होकर चले गये।
नवयुग-सृजन एक बड़ा काम है। उसके लिए सहयोगी तो गीध, गिलहरी भी हो सकते है, पर महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों को निभाने के लिए अंगद, हनुमान जैसे वानरों और नल-नील जैसे रीछों की आवश्यकता पड़ती है। गौ चराने, गेंद खेलने और गोवर्द्धन उठाने में लाठी का सहयोग देने के लिए तो ग्वाल-बाल भी अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सके, किन्तु महाभारत जीतने में भीम, अर्जुन से ही काम चला। स्वतन्त्रता संग्राम के जीतने में भी सत्साहसियों की जेलयात्रा को ही सराहा जाएगा, पर नेहरू-पटेल जैसी हस्तियाँ आगे न आतीं, तो महान प्रयोजन कदाचित ही पूर्ण हो पाता। महान परिवर्तनों योगदान तो असंख्यों का रहा है, किन्तु उसका सूत्र-संचालन महामानव ही करते रहे है। छप्पर तो बाँस-बल्लियों पर भी खड़े रहते है, पर नदी या नाले का पुल बनाने में ऐसे मजबूत पाए लगाने पड़ते है, जो उस परिवहन का भार सह सके।
युगसृजन में सहयोगी कोई भी हो सकता है, पर उसका उत्तरदायित्व कंधों पर ओढ़ने वाले सृजनशिल्पियों को नल-नील जैसा प्रबुद्ध एवं परिपक्व होना चाहिए। ऐसी भूमिका निभा सकना हर किसी के वश की बात नहीं है। सिखाने-पढ़ाने से थोड़ा-सा काम तो चलता है, पर प्रखरता मौलिक एवं संस्कारगत होनी चाहिए। लोहे की मजबूती होनी चाहिए। लोहे की मजबूती उसकी संरचना में ही सन्निहित है। कारखानों में ढालने, खरादने का काम होता है, कृत्रिम लोहा नहीं बन सकता और न उसका स्थानापन्न किसी अन्य धातु को बनाया जा सकता है।
प्रशिक्षण, वातावरण एवं संपर्क का प्रभाव तो पड़ता है, पर महामानव इतने से ही नहीं बन जाते। उनके लिए संस्कारगत मौलिकता एवं संचित प्रखरता की भी आवश्यकता होती है। विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को आग्रहपूर्वक माँगा था ओर उन्हें बला-अतिबला विद्याएँ सिखाकर महान परिवर्तन के लिए उपयुक्त क्षमता सम्पन्न बनाया था। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त, समर्थ रामदास ने शिवाजी, बुद्ध ने आनन्द, मत्स्येन्द्र ने गोरखनाथ, रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द को बड़ी कठिनाई से ढूँढ़ा था। आगन्तुकों की भारी भीड़ में से इन सभी शक्ति सम्पन्नों को कोई काम का न लगा। बड़ी कठिनाई से ही वे अपने थोड़े से अनुयायी उत्तराधिकारी ढूँढ़ने से सफल हुए। विवेकानन्द ने निवेदिता से कहा था मुझे मात्र तुम्हारे लिए योरोप की यात्रा करनी पड़ी।
अवतार के समय देवता उसकी सहायता करने आते और देह धारण करते है। सामान्य मनुष्यों की मनःस्थिति नरपशुओं जैसी होती है, वे पेट और प्रजनन के लिए मरते-खपते है तथा लोभ-मोह अहंकार की लिप्साओं से बने कोल्हू में पिलते रहते है। यही उनकी प्रवृत्ति और नियति होती है। उनमें थोड़ा-सा उत्साह तो भरा जा सकता है और एक सीमा तक प्रगतिशील भी बनाया जा सकता है, किन्तु बहुत प्रयत्न करने पर भी वे देवभूमिका निभा सकने में सफल नहीं हो पाते। इसके लिए संचित संस्कारों की आवश्यकता है। खिलौने बालू के नहीं, चिकनी मिट्टी के बनते है। हथौड़े की चोट जंग लगे लोहे नहीं, फौलादी इस्पात ही सह पाते है।
युगसृजन के आरम्भिक चरण बालक स्तर के है, उनमें हर स्तर के व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ कर सकने योग्य शत सूत्री कार्यक्रम बनाये गए है। गाँधीजी ने स्वतन्त्रता आन्दोलन को सर्वसुलभ बनाने की दृष्टि से नमक सत्याग्रह, विदेशी वस्त्र एवं शराब की दुकानों पर धरना, प्रतिबन्ध उल्लंघन जैसे कार्यक्रम बनाये थे। वे व्यापक भी हुए थे, इतने पर भी उस आन्दोलन का सूत्र संचालन कर सकने की क्षमता नेहरू, पटेल जैसे मुट्ठी भर लोगों में ही थी, स्पष्ट है कि यदि उच्चस्तरीय हस्तियाँ बागडोर न सँभालती, तो जेल आन्दोलन को उतनी जल्दी और उतनी आवश्यकता सफलता न मिल पाती, जैसी कि उसमें मिल सकी। महामानव ही किसी देश, समाज या युग की वास्तविक सम्पदा होते है। प्रखर व्यक्तियों का कुशल नेतृत्व ही उफनती नदी में नाव खेता और तूफानों से टकराते हुए जहाज को किनारे लगाता है।
युगसृजन के अनेक महत्वपूर्ण कामों में सबसे प्रमुख है उस प्रयोजन को पूरा कर सकने में समर्थ क्षमताओं को ढूँढ़ निकालना और उन्हें प्रशिक्षित परिपक्व करना। यह कार्य धीमी गति से तो अभियान के प्रथम दिन से ही चल रहा है, पर अब उसमें अधिक तीव्रता लाने की आवश्यकता पड़ रही है, क्योंकि उत्तरदायित्व क्रमशः अधिक भारी होते चले जा रहें है। सामान्य भारवहन सामान्य क्षमता के सहारे भी होता रहता है। जब-जब अधिक उठाना, अधिक होना एवं अधिक दौड़ता हो तो वाहन तथा साधन उसी स्तर के जुटाने होंगे। आरंभिक चरण में जाग्रत आत्माओं से भी काम चलता रहा है, पर अब अधिक क्षमता सम्पन्नों की आवश्यकता पड़ रही है। अस्तु ढूँढ़ने का प्रयास अधिक सुविस्तृत किया जा रहा है। उपयुक्त प्रतिभाओं से संपर्क साधना, उन्हें तत्पर तथा सक्षम बनाना एवं कार्यक्षेत्र में उत्तर सकने की सामर्थ्य से सुसम्पन्न करना ही इन दिनों मिशन की परोक्ष गतिविधियों का मूर्धन्य प्रयास है। प्रत्यक्ष कार्यक्रम तो पूर्ववत् है। व्यक्ति, परिवार और समाज के नवनिर्माण की जो रचनात्मक प्रवृत्तियाँ चल रही है, उनमें हेर फेर कुछ नहीं करना है। मात्र उनका स्तर एवं विस्तार ही बढ़ना है। प्रत्यक्ष क्रिया–कलापों में इतना अभिवर्द्धन होगा, किन्तु परोक्ष ढूँढ़ खोज के लिए उन प्रयासों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, जो समर्थ प्रतिभाओं को ढूँढ़ने और उछालने की सामयिक माँग पुरा कर सकें।
एक जैसी शक्ल-सूरत और समान परिस्थिति वाले व्यक्तियों के मध्य भी कई बार स्तर की दृष्टि से जमीन-आसमान जैसा अन्तर पाया जाता है यह उनकी उस आन्तरिक संरचना का होता है, जो जन्म-जन्मान्तरों के संचित संस्कारों से बनती है। यह सम्पदा किस के पास है, यह जाँचना, जन-जन की तलाशी लेने के समान है। तलाशी ऐसी भी नहीं जो चोरों, जमाखोरों के यहाँ पुलिस द्वारा छापा मारकर पकड़ने जा सकती है, पर अन्तर की प्रवृत्तियों जाँच-पड़ताल और खोजबीन करना कठिन है। लोग भीतर कुछ होते है और बाहर कुछ बनते रहते है। दंभ बहुत और तथ्य कम वाले बहरूपियों, अभिनेताओं और बाजीगरों से जन-समाज भर पड़ा है। इनकी गहराई में कैसे उतरा जाए? खारी जलराशि से भरे समुद्र में गहरी डुबकी मारकर मोतियों को किस तली-तलहटी में ढूँढ़ा जाए। उन क्षेत्रों में पाए जाने वाले मगरमच्छों से बचने और जूझने की कुशलता के बिना कोई गोताखोर सफल नहीं हो सकता। इस प्रयास में भी ऐसी ही तैयारी करनी पड़ रही है।
युगपरिवर्तन सृष्टि के इतिहास में अभूतपूर्व अवसर है। पिछले दिनों दुनिया बिखरी थी। स्थानीय समस्याओं के सामयिक समाधान करना ही तत्कालीन रहता था। रावण, कंस, दुर्योधन, आदि के अनाचार सीमित क्षेत्र में थोड़े-से व्यक्तियों के द्वारा होते थे। अधिक होने से उसके समाधान भी लंका युद्ध, महाभारत जैसे उपचारों से निकले और मुट्ठी भर प्रतिभाओं ने वे कार्य सम्पन्न कर दिए। वैसी स्थिति अब नहीं। दुनिया सिकुड़कर बहुत छोटी हो गई है। हवा का प्रभाव एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचता है। 600 करोड़ मनुष्य अब एक-दूसरे को प्रकारान्तर से प्रभावित करते है।
इन विषम परिस्थितियों में बहुमुखी समस्याओं की जड़े लोकमानस में अत्यन्त गहराई में घुसी हुई होने के कारण युगपरिवर्तन अतीव कठिन है। गुण, कर्म, स्वभाव की लोकधारा को उलटना, समुद्र के खारी जल को हिमालय की सम्पदा बना देना कितना कठिन है, उसे हर कोई नहीं समझ सकता। उसे भुक्तभोगी बादल ही जानते है कि उसमें कितना साहस करने, कितना भर ढोने, कितना उड़ना और कितना त्याग करना पड़ता है। युग-परिवर्तन के भावी प्रयासों को लगभग इसी स्तर का माना जाना चाहिए।
युगसंधि में दुहरे उत्तरदायित्व जाग्रत आत्माओं को सँभालने पड़ेंगे। विनाशकारी परिस्थितियों से जूझना ओर विकास के सृजन-प्रयोजनों को सोचना। किसान और माली को भी यही करना पड़ता है। खरपतवार उखाड़ना, बेतुकी डालियों को काटना, पशु-पक्षियों से फसल को रखाना जैसी प्रतिरोध-सुरक्षा की जागरूकता दिखाने पर ही उनके पल्ले कुछ पड़ेगा, अन्यथा परिश्रम निरर्थक चले जाने की आशंका बनी रहेगी। उन्हें एक मोर्चा सृजन का भी सँभालना पड़ता है। बीज-बोना खाद देना, सिंचाई का प्रबन्ध करना रचनात्मक काम है। इसकी उपेक्षा की जाए, तो उत्पादन की आशा समाप्त होकर ही रहेगी। इसे दो मोर्चों पर दुधारी तलवार से लड़ने के समतुल्य माना जा सकता है। युगसंधि में जाग्रत आत्माओं को यही करना पड़ता है। समस्या 600 करोड़ मनुष्यों की है। वे एक स्थान पर नहीं समस्त भूमण्डल पर बिखरे हुए बसे है। अनेक भाषा बोलते है। अनेक धर्म सम्प्रदायों का अनुसरण करते है। शासन पद्धतियों और सामाजिक परम्पराओं में भिन्नता है। मनःस्थिति और परिस्थिति में भी भारी अन्तर है। इतना होते हुए भी उन सबसे संपर्क साधना है। युगचेतना से परिचित और प्रभावित करना है। इतना ही नहीं संपर्क-प्रशिक्षण और अनुरोध को इतना प्रभावी बनाना है, जिसके दबाव से लोग अपनी आदतों, इच्छाओं और गतिविधियों में अभीष्ट परिवर्तन कर सकने के लिए सहमत ही नहीं, तत्पर भी हो सके। यह कार्य कहने-सुनने में सरल प्रतीत हो सकता है, पर वस्तुतः उतना ही कठिन और जटिल हैं ऐसा उत्तरदायित्व उठाने वालों को कैसा होना चाहिए, उसका अनुमान लगाने पर यही कहना पड़ता है कि उनकी मजबूती घहराती नदियों पर मीलों लम्बे पुल का उस पर दौड़ने वाले वाहनों का बोझ उठा सकने वाले पायों जैसी होनी चाहिए।
आवश्यक नहीं कि हर व्यक्ति को समाज की संरचना के लिए आन्दोलन परक कार्य ही करना पड़े। वह क्षेत्र छोटा होता है और उसमें थोड़े-से व्यक्ति ही खप सकते है। सृजन प्रयोजन बहुत बड़ा है। उसके असंख्यों पक्ष है। उनमें से जो जिसे कर सके वह उसे सँभाले। कला, साहित्य, विज्ञान, उत्पादन, व्यवसाय, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे अनेकों क्षेत्र ऐसे है, जिनमें बिना अधिक जन संपर्क साधे भी अभीष्ट प्रयोजनों निरत रहा जा कसता है और आन्दोलनकारियों द्वारा भी अधिक महत्व का ऐसा कार्य किया जा सकता है, जो नवयुग की आवश्यकता में अपने ढंग से पूरा करने में असाधारण योगदान कर सके। युद्ध जीतने में सभी को तलवार नहीं चलानी पड़ती। वे लोग भी द्वितीय पंक्ति के सैनिक ही है, जो युद्धसामग्री बनाते अथवा सैनिकों पर पड़ने वाले खर्च को अपने परिश्रम से जुटाते है। आन्दोलनकारियों, प्रचारकों की तरह ही वे लोग भी उपयोगी है, जो उनके लिए साधन-सामग्री जुटाने अथवा कार्यक्षेत्र बनाने में तत्पर रहते है। ऐसे लोगों का घर रहकर काम करना भी परिव्राजकों की ही तरह महत्वपूर्ण कार्य है।
इतने पर भी एक आवश्यकता यथावत बनी हुई है, देव आत्माओं में पायी जाने वाली विशिष्टता का अवतरण। विशिष्ट समय पर ऐसी ही विशिष्ट आत्माओं का अवतरण होता है। वे जन्मजात रूप से ऐसी धातु के बने होते है कि सम्भव हो सके। अणुशक्ति उत्पन्न करने के लिए यूरेनियम जैसे रासायनिक पदार्थों की जरूरत पड़ती है। यह नकली नहीं बन सकता। सोने की अपनी मौलिक विशेषता है। स्वर्णकार उसे आभूषणों में गढ़ तो सकता है, पर कृत्रिम सोना अभी तक बनाया नहीं जा सका। यों नकली नग हो जेवरों में प्रयुक्त होते है, उनका निर्माण भी बहुत होता है, फिर भी असली मणि माणिक अभी भी विशेषता के कारण अपना मूल्य और महत्व यथास्थान बनाये हुए है। महामानवों की ढलाई, गढ़ाई के लिए शान्तिकुञ्ज की फैक्टरी अनवरत तत्परता के साथ लगी हुई है।
युगपरिवर्तन की इस ऐतिहासिक बेला में ऐसी देव-आत्माओं की विशिष्ट आवश्यकता अनुभव की जा रही है, जिनमें मौलिक प्रतिभा विद्यमान है। सामान्य स्तर की श्रेष्ठता हर मनुष्य में मौजूद है। उसे सीमित समय में, सीमित मात्रा में उभार सकना ही सम्भव हो सकता है। कम समय में, कम परिश्रम में जिन्हें महान उत्तरदायित्वों का वहन कर सकने के लिए उपयुक्त बनाया जा सके, ऐसी प्रतिभाएँ सर्वत्र उपलब्ध नहीं हो सकती और न उनसे उतने बड़े पुरुषार्थ की आशा की जा सकती है, जैसी कि इस विषम बेला में आवश्यकता पड़ रही है। इसके लिए विशेष रूप से खोजबीन करने की आवश्यकता पड़ेगी।
मोती पाये तो समुद्र में ही जाते है, पर उन्हें निकालने के लिए पनडुब्बी को गहरी डुबकी लगाने की और सुविस्तृत क्षेत्र की खोजबीन करनी होती है। मोती न तो इकट्ठे मिलते है ओर न किसी किनारे पर जमा रहते है। बहुमूल्य वस्तुएँ सदा से इसी प्रकार खोजी जाती रही है। प्रकृति के अन्तराल में बिजली, ईथर आदि तत्त्व आदि काल से भरे पड़ो थे, पर उनसे लाभान्वित हो सकना तभी सम्भव हुआ जब उन्हें खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने असाधारण श्रम किया। जंगलों में बहुमूल्य जड़ी बूटियाँ पुरातनकाल में भी उगती थी और अब भी उनकी संजीवनी क्षमता यथावत मौजूद है। पर उन्हें हर कोई, हर जगह नहीं पा सकता। चरक ने दुर्गम स्थानों की यात्रा की और उस परिभ्रमण में वनस्पतियों के गुण धर्म खोजे। इस शोध का परिणाम ही चिकित्सा विज्ञान के रूप में सामने आया और उसका लाभ समुचित मानवजाति ने उठाया। चरक यदि वह प्रयास न करते तो बूटियाँ अपने स्थानों पर बनी रहती और रोगी अपनी जगह। उनका आपस में सम्बन्ध ही न बनता, तो दोनों ही घाटे में रहते। न जड़ी-बूटियाँ यश पातीं और न मनुष्यों को रोग-निवृत्त होने का अवसर मिलता।
अपने समय में एक बहुत बड़ा काम युगमानवों को खोज निकालना है। बड़े काम के लिए बड़ी हस्तियाँ ही चाहिए। उन्हें एक सीमा तक ही शिक्षा और परिस्थितियाँ विकसित कर सकती है। नेपोलियन और सिकन्दर किसी सैनिक संस्था द्वारा विनिर्मित नहीं किए जा सके। वशिष्ठ और विश्वामित्र किस आश्रम में, किस साधन के सहारे विनिर्मित किए जा सके, इसका पता लग नहीं पा रहा है। अंगद और हनुमान, भीम और अर्जुन, चाणक्य और कुमार जीव, बुद्ध और महावीर, गाँधी और पटेल, शिवाजी और प्रताप किस प्रकार तैयार किए जाएँ, उसका कोई उपाय अभी भी सूझ नहीं पड़ रहा है। ईसा जरथुस्त्र, अरस्तू और सुकरात, लिंकन और वाशिंगटन, विवेकानन्द और रामतीर्थ, गोविन्दसिंह, नानक और कबीर किस प्रकार तैयार किए जाएँ, इसका कोई मार्ग मिल नहीं रहा है॥ शतरूपा-उपलब्ध करने के लिए भारी लगता। अरविन्द और रमण, रामकृष्ण परमहंस और विरजानन्द जैसी हस्तियाँ हैं युगनिर्माण जैसे महाप्रयोजन सकती है। काम बड़ा है, तो उसके अनुरूप व्यक्तित्व भी चाहिए। यह आवश्यकता जब भी जितनी मात्रा में भी पूरी हुई, तब उसी अनुपात से व्यापक समस्याओं के समाधान सम्भव हुए है। जनसाधारण के लिए जो कर्तव्यपालन ही सम्भव होता। वे अपनी निज की समस्याओं को सुलझाने में ही अधिकाँश क्षमता खो बैठते है, जो बचती है उससे लोकमंगल का प्रयोजन एक सीमा तक ही पूरा कर पाते है। यों बूँद बूँद से भी बड़ा भरता है, पर उन बूँदों का संचय करने ओर उस संचय का सदुपयोग करने की प्रतिभा भी तो किसी में चाहिए।
नवनिर्माण में असंख्य दिशाधाराएँ है, विकृतियों से जूझने के लिए असंख्य मोर्चे है, पाटने के लिए अनेक खाई, खन्दक और बनने के लिए अनेकों पुल बाँध सामने है। इनके लिए जितनी साधन सामग्री चाहिए उससे अनेक गुनी आवश्यकता उन हस्तियों की है, जो मौलिक विशेषताओं से संचित सम्पदाओं की दृष्टि से सम्पन्न एवं समर्थ कहीं जा सके। उथले लोग गुब्बारे की तरह फूलते और बबूले की तरह फूटते रहते है।
युगसृजन के लिए सम्पदा, प्रतिभा, शिक्षा, श्रमशीलता जैसी विभूतियाँ प्रचुर परिमाण में चाहिए ही। पर उससे भी अधिक आवश्यकता उन देवात्माओं की है, जिनमें आन्तरिक वर्चस विपुल परिमाण में भरा पड़ा है। वर्चस ही आत्मबल है। ओजस्वी, मनस्वी, तेजस्वी व्यक्ति वही होते है, जिनमें इस आन्तरिक वैभव की, दैवी, अनुदान की समुचित मात्रा विद्यमान हो।
इस खोज को इन दिनों सबसे अधिक महत्व दिया जा रहा है। कठिन उत्तरदायित्व सामने है, उन्हें निभाने योग्य प्रतिभाओं के आगे आने और लाने की आवश्यकता ऐसी है, जिसे एक क्षण के लिए भी आगे नहीं टाला जा सकता।
अपने प्रिय शिष्य योत्जी के साथ ऋषि लाओत्से किसी यात्रा पर जा रहे थे। वे उस नगर के पास से गुजरे, जहाँ के राजा को कुछ दिने पूर्व युद्ध में मार दिया गया था। राजप्रसाद जो कभी हास विलास का केन्द्र था, आज भूत प्रेतों का वास बना हुआ था।
खण्डहर देखकर लाओत्से ने कहा कितना भयंकर लगता है यह स्थान आदमी की गति न होने से स्थान नीरव और उदास लगते है। पता नहीं, उस दिन धरती की स्थिति क्या होगी, जिस दिन पृथ्वी से मानव का अस्तित्व उठ जाएगा।
क्या वह संभव है भगवन् कि पृथ्वी जन्म शून्य हो जाए? शिष्य योत्जी ने प्रश्न किया।
हाँ क्या! यह संभव है। लाखों, करोड़ों आदमी भले ही न मरें, पर जिस दिन धरती से उन आदमियों का अन्तर्द्धान हो जाएगा, जिनके आधार पर मनुष्यता और धरती की प्रतिष्ठा है, जिस तरह एक राजा के न होने से यहाँ आदमियों की हलचल का महत्व नहीं रहा, उसी तरह प्राणप्रद पुरुषों के न होने से धरती की शोभा जाती रहती है। संसार की गति उसमें बसने वाले साधारण आदमियों से नहीं है, बल्कि उस आदमी के कारण है, जिसकी स्फूर्ति से अनेक आदमियों के जीवन सही दिशा में चलते है। उनका न रहना और संसार का प्रेतवास बनना एक समान है।
अन्तरिक्ष विज्ञान भू-विज्ञान से कम महत्वपूर्ण नहीं है। जल और थल की तरह आकाश पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील मनुष्य यदि चाहे तो अपने पुरुषार्थ में एक कड़ी और जोड़ कसता है कि ग्रहों के सूक्ष्मप्रभाव से पृथ्वी के वातावरण तथा प्राणिपरिवार को जो अनुकूलता, प्रतिकूलता सहन करनी पड़ती है उसके सम्बन्ध में उपयुक्त जानकारी प्राप्त करे और तद्नुरूप उपाय खोज निकाले। प्राचीनकाल में ज्योतिष विज्ञान के दोनों पक्ष ग्रहों की गतिविधियाँ तथा उनकी सूक्ष्म प्रतिक्रियाओं की जानकारी भली प्रकार उपलब्ध रहती थी, फलतः वे प्रतिकूलताओं से बचने तथा अनुकूलताओं से लाभ उठाने का मार्ग भी निकाल लेते थे। मनुष्य ने ज्ञान विज्ञान को अनेक शाखा प्रशाखाओं में विकसित करके प्रगति के पथ पर बहुत आगे तक बढ़ चलने में सफलता पाई है। ग्रह विद्या का महत्व इन सबकी तुलना में कम नहीं वरन् अधिक ही है। अन्य विज्ञान सामयिक, सीमित और सम्बद्ध लोगों को ही प्रभावित करते है और क्षेत्र भी अत्यन्त व्यापक। ऐसी दशा में उनके साथ जुड़े हुए संबंध सूत्रों और आदान प्रदानों के संबंध में भी हमारी जानकारी उपयुक्त स्तर की होनी चाहिए।
मौसम से लेकर राजनैतिक घटनाक्रमों तक को देखकर लोग अपनी योजनाओं का निर्धारण परिवर्तन करते रहते है। ग्रहों की स्थिति से उत्पन्न प्रभावों के संबंध में भी यह तथ्य कम महत्वपूर्ण नहीं है। अनुकूलताओं का सम्भावनाओं का यदि पूर्वाभास मिल सके, तो निश्चय ही वैयक्तिक एवं सामूहिक सुख शान्ति एवं प्रगति के ऐसे सूत्र मिल सकते है, जो उज्ज्वल भविष्य की संरचना में अत्यन्त लाभदायक सिद्ध हो सके।
अन्तरिक्ष का महत्व विज्ञान क्षेत्र ने समझा है। इसमें भरी हुई सम्पदा सूक्ष्म होने के कारण धरती और समुद्र में पाये जाने वाले सम्पदा भण्डार से कहाँ अधिक है। अब तक जो भी कुछ पाया गया है, उसमें जल और थल की अपेक्षा आकाश का अनुदान अधिक है। वर्षा आकाश से होती है। हवा भी आकाश में भरी है। बिजली, रेडियो, लैसर आदि के संचार आकाश से है, ध्वनि, ताप, प्रकाश आदि की तरंगों का प्रवाह आकाश में ही चलता है। धरती को अन्तर्ग्रही अनुदान भी उसी क्षेत्र से मिलते है। अदृश्य जगत की सत्ता उसी का घोल है। दिव्यप्राणी इसी में निवास करते है। विचार-तरंगें इसी में परिभ्रमण करती है। ऐसे ऐसे अनेकों आधार जिनसे स्पष्ट है कि दृश्य भू मण्डल की तुलना में अदृश्य आकाश में विद्यमान असंख्य गुना अधिक है।
अध्यात्म विज्ञानी तो अनादिकाल से अपनी गतिविधियों को आकाश पर केन्द्रीभूत रखे रहे है। अदृश्य जगत, सूक्ष्मजगत ही उनका उत्पादन क्षेत्र रहा है। उस कमाई का दृश्य पृथ्वी पर तो खर्च भर करते है। ऋद्धि और सिद्धियों का प्रयोग प्रदर्शन ही प्रत्यक्ष हैं यह तो उपार्जन का प्रयोग उपभोग करना भर है। जहाँ से यह सब कमाया जाता है, वह परोक्ष हैं परीक्षा का विस्तार आकाश में है, मानवी अन्तराल में तो उसकी बीज सत्ता भर है। साधना का आरम्भ अन्तराल में किया जाता है, पर उस आरम्भ को प्रतिफल तक पहुँचने के लिए अन्तरिक्षीय शक्तियों का ही सहयोग लेना पड़ता है।
भौतिक विज्ञानी इस तथ्य को अब पहले की अपेक्षा और भी अधिक अच्छी तरह समझने लगे है। धरती से वनस्पति और खनिज सम्पदा उपलब्ध करने के प्रयास चिरकाल से चलते आ रहे है। इन दिनों उनमें कटौती की गई और अन्तरिक्ष को खोज पर पूरा ध्यान केन्द्रित किया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि धरती और समुद्र के उपार्जन की आवश्यकता नहीं रही या वे क्षेत्र अब सम्पदारहित ही गये। अन्तरिक्ष को प्रमुखता देने का अर्थ है कि यहाँ से अधिक मूल्यवान उपार्जन सम्भव है। उदाहरण के लिए, सौरऊर्जा को लिया जा सकता हैं। धरती पर कोयला, भाप तेल, बिजली, अणु यह पाँचों ईंधन जितने उपलब्ध हो सकते है वे कम भी पड़ते जा रहे है और महँगे भी सिद्ध हो रहे है। अस्तु प्रयत्न यह चल रहा है कि सौरऊर्जा करतलगत की जाए। यह सस्ती है और अकूत भी। लेसर से लेकर मृत्यु किरणों तक एक से एक बढ़कर ऐसी शक्तियाँ आकाश से ही उपलब्ध ही रही है, जो अणुविस्फोट जैसे आत्मघाती युद्धोन्माद के परिणाम उत्पन्न कर सकती है। न केवल युद्ध विजय वरन् सुविधा संवर्द्धन की दृष्टि से बहूमूल्य उपलब्धियाँ भी उसी से मिल सकती है। उदाहरण के लिए, तार, टेलीफोन, रेडियो, टेलीविजन की आवश्यकता पूरी करने के लिए छोटे-छोटे उपग्रहों से काम लिया जा रहा है। यह पद्धति नितान्त सरल और सस्ती है। सोचा यह जा रहा है कि आकाश विजय के साथ ऋतुओं पर भी नियन्त्रण किया जा सके। जब जहाँ इच्छा हो, वहाँ उतनी वर्षा करा लेने गर्मी सर्दी का घटा बढ़ा लेने से वनस्पति उपार्जन और प्राणियों की सुविधा में भारी प्रगति हो सकती है। सौरऊर्जा के हस्तगत होते ही ईंधन का संकट सदा सर्वदा के लिए समाप्त हो जाएगा। तब समुद्र को लहरों से बिजली बना लेना और उसके खारी जल को मीठा बना लेने में कोई कठिनाई न रहेंगी। यही है वे स्वप्न अथवा लक्ष्य, जिन्हें पूरा करने के लिए अब विज्ञान, वैभव और वर्चस्व ने मिलकर आकाश विजय की ठान ठानी है।
प्रस्तुत संकटों में सबसे भयानक है वायुप्रदूषण। विषाक्तता बढ़ते जाने से आकाश में कचरा इतना भर गया है कि उसके रहते मनुष्यों एवं प्राणियों के लिए दुर्बलता, रुग्णता तथा दुःख भोगते-भोगते अकाल मृत्यु के मुँह में चले जाने के अतिरिक्त और कोई चारा न रहेगा। धुँआ, विकिरण, कोलाहल आदि ने आकाश को विषवमन करते और अभिशाप बरसाते रहने की स्थिति में डाल दिया है। इसका परिशोधन करने का कारगर उपाय एक ही है कि इस कचरे की अनन्त अन्तरिक्ष में कहाँ अन्यत्र धकेल दिया जाए। धरती के इर्द गिर्द फैले हुए वायुमण्डल के घेरे में इस अभिवृद्धि को कैसे रोका जाए? जो भरा हुआ है उसे शुद्ध कैसे किया जाए? इन दोनों प्रश्नों के उत्तर सूझ नहीं रहे है, साथ ही यह तक नहीं सूझ रहा है कि दिन दिन बढ़ने वाला कचरा किस प्रकार रुक सकता है। मशीनों का चलना बन्द किया जा सकना कठिन है। फिर ईंधन जलने और विषैली भाप उड़ने पर भी अंकुश कैसे लगे? इस जीवन मरण की समस्या के लिए अपने आकाश की महान आकाश के साथ कुछ तालमेल बिठाने की बात सोचनी पड़ रही है। अन्तरिक्ष का महत्व ऐसे ऐसे अनेक कारणों से स्वीकारा गया है और उसे अन्वेषण, परीक्षण आधिपत्य से लेकर दोहन तक के लिए कदम बढ़ाया गया है।
इस संदर्भ में यह तथ्य भी ध्यान रखने योग्य है कि अन्तरिक्ष क्षेत्र से अध्यात्म क्षेत्र का दूर रखने से अब काम चलने वाला नहीं है। वरन् समय को देखते हुए पूर्णकाल की अपेक्षा उस क्षेत्र में अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। भूतकाल में अन्तरिक्ष में कोई संकट नहीं था। प्रतिकूलताओं से लड़ने जैसी कोई बात नहीं थी। अनुकूलताएँ बढ़ाने भर का उद्देश्य सामने था। इसके लिए कुछ थोड़े से ही लक्ष्य ओर प्रयत्न पर्याप्त माने जाते थे। वर्षा पर नियन्त्रण प्राप्त करने और उसके साथ प्राणतत्त्व को धरती पर उतारने की पर्जन्यप्रक्रिया काम में लाई जाती थी, फलतः अन्न, वनस्पति एवं पशुधन की प्रचुरता तथा समर्थता का समुचित लाभ मिलता था। सतयुग में कही कोई अभाव नहीं था। इस संदर्भ में मानवीप्रयत्न यज्ञोपचार द्वारा अन्तरिक्ष के अनुकूलन के रूप में सफल होते रहते थे। प्राणियों के लिए सबसे प्रमुख आहार वायु है। साँस के द्वारा जो ग्रहण किया जाता है वह मुख के द्वारा खाये और पेट के द्वारा पचाये आहार की तुलना में असंख्य गुना अधिक मूल्यवान है। यज्ञोपचार द्वारा प्राणवायु की उच्चस्तरीय मात्रा जीवधारियों का मिलती रहती थी और उनकी शारीरिक ही नहीं, मानसिक स्थिति भी ऊँची रहती थी। सतयुग उन्हीं उपलब्धियों की कालपरिधि को कहा जाता था।
साधना, स्वाध्याय सत्संग, मनन चिन्तन द्वारा प्राणवान आत्माएँ आकाश में ऐसे प्रचण्ड प्रवाह छोड़ती थी जिनमें जनमानस का अनायास ही बहते रहने और श्रेष्ठ चिन्तन का उसके फलस्वरूप उस उत्पादित उच्च चरित्र का लाभ मिलाता था। अन्तरिक्ष उच्चस्तरीय विचार सम्पदा से भरी रहता था, इसमें अध्यात्म क्षेत्र के मूर्धन्य मनीषी सदा प्रयत्नरत रहते थे।
ज्योतिर्विज्ञान का एक और पक्ष है, अन्तर्ग्रही प्रवाहों में हेर फेर कर सकने की क्षमता का उपार्जन। चेतना की शक्ति का तत्त्वज्ञान जिन्हें विदित है वे यह भी समझते है कि जड़ पर नियमन करने की सामर्थ्य भी उसे प्राप्त शरीर के बहुमूल्य यन्त्र को प्राण की चेतना ही चलाती और जीवित रखती है। रेल, मोटर, जहाज स्वसंचालित यन्त्र उपग्रह आदि चलते भले स्वयं हो, पर उनका संचालन विचारशील मनुष्य ही करते हैं। उनमें प्रचण्ड शक्ति विद्यमान तो है, पर मात्र अपनी धुरी पर ही परिभ्रमण कर सकती है, उसे दिशा देनी हो अथवा उलट पुलट करनी हो तो उसमें चेतना ही को ही अपना पुरुषार्थ प्रकट करना होगा। अन्तर्ग्रही प्रवाह जैसे भी चलते है उनका सामान्यक्रम अपने ढर्रे पर ही चलता रहेगा। उसमें अतिरिक्त परिवर्तन करना हो तो चेतना की सामर्थ्य का ही उपयोग करना होगा। अन्तर्ग्रही शक्तियों की विशालता और प्रचण्डता अद्भुत है और कल्पनातीत हैं इतने पर भी यह तथ्य समझा जाना चाहिए कि इतने की प्राणशक्ति का प्रहार उस प्रवाह में सारे परिवर्तन कर सकता है ऐसा परिवर्तन जो पृथ्वी के उसके प्राणियों के लिए उत्पन्न अविज्ञात कठिनाइयों को रोकने और अदृश्य अनुदानों को बढ़ाने में समर्थ हो सके। ग्रहविज्ञान की पूर्णता इसी में है कि स्थिति को जानकारी तक सीमित न रहकर अभीष्ट हेर फेर भी कर सके। रोग का निंदा नहीं पर्याप्त नहीं, कुशल चिकित्सक को रुग्णता हटाने और आरोग्य बढ़ाने का उपचार भी करना होता है। ज्योतिर्विज्ञान न केवल ग्रह नक्षत्रों की स्थिति से अवगत कराता है वरन् सूक्ष्मजगत् में उसके अदृश्य प्रभावों के अनुकूलन का भी प्रबन्ध करता है।
जो इन अविज्ञात तथ्यों को समझ सके उन्हें यह जानने में कठिनाई न होगी कि मानव जाति के सामने प्रस्तुत अनेकानेक विभीषिकाओं के पीछे विद्यमान् अदृश्य कारणों का निराकरण करने से यह विज्ञान कितना अधिक कारगर हो सकता है। युगनिर्माण के लिए मानवी पुरुषार्थ की आवश्यकता और महत्ता तो निश्चित रूप से है ही, किन्तु साथ ही समझना यह भी चाहिए कि इस पुष्ट प्रयोजन में अदृश्य शक्तियों का अनुकूलन भी अभीष्ट है इस क्षेत्र की जानकारी तथा ज्योतिर्विज्ञान की सहायता व्यवस्था में ज्योतिर्विज्ञान की सहायता लेना आवश्यक है। अभीष्ट परिवर्तन मानवी प्रयासों के अतिरिक्त अदृश्य का अनुकूलन भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
इस संदर्भ में एक बात और जान लेने योग्य है कि ब्रह्माण्ड में मात्र जड़ ग्रह पिण्ड ही परिभ्रमण नहीं करते, इससे सचेतन शक्तियों का अस्तित्व, प्रयास प्रभाव भी कम नहीं हैं ब्रह्माण्ड के शोधकर्ता अब इस निष्कर्ष पर पहुँच चूके है कि अन्तरिक्ष में पृथ्वी जैसी स्थिति के कितने ही अन्य ग्रहों को भी है और उनमें मनुष्यों से भी अधिक विकसित प्राणी रहते हैं। उनका ज्ञान और विज्ञान धरती निवासियों की तुलना में कहीं अधिक बढ़ा चढ़ा है। यह कपोल कल्पना नहीं है अब ऐसे प्रमाण मिल रहे है जिनसे प्रतीत होता है कि अन्यान्य ग्रह नक्षत्रों में ने केवल विकसित स्तर के प्राणियों का अस्तित्व पृथ्वी निवासियों के साथ संपर्क साधने के लिए भी प्रयत्नशील है।
उड़नतश्तरियों के पृथ्वी पर आवागमन की बात सर्वविदित है आरम्भ में इन्हें आकाश में वायु, बिजली, गुरुत्वाकर्षण से उत्पन्न प्रकृति व्यक्तिक्रम कहा गया। बुधिभ्रम और नेत्रविभ्रम की संज्ञा दी गयी। दर्शकों के विवरण अत्युक्तिपूर्ण बताये गए, पर जब उड़नतश्तरियों अपने प्रत्यक्ष प्रभाव प्रस्तुत करने लगी तो गम्भीरतापूर्वक उनके अस्तित्व को स्वीकार करना पड़ा। इनके भीतर किन्हीं बुद्धिमान प्राणियों के होने का जो सन्देह किया जाता था, वह भी अब बहुत हद तक दूर हो चुका है। यह भी स्पष्ट है कि यानों और उनके संचालकों का ज्ञान विज्ञान हमसे कहीं अधिक बढ़ा-चढ़ा है। प्रकाश से अधिक गति अपनाने वाले या नहीं इस प्रकार धरती पर आ सकते है। इसी प्रकार अन्तर्ग्रही यात्रा में आने वाले अवरोधों का समाधान भी सामान्य काम नहीं है। फिर इतनी लम्बी यात्राएँ पूरी करके लौटने के लिए ईंधन भी ऐसा चाहिए, जो हमारी जानकारी से बाहर है।
इन सुविकसित प्राणियों के साथ संपर्क साधना सम्भव हो सके, तो निश्चित हो मनुष्यों का विशेष लाभ प्राप्त होगा। निश्चय ही इतनी बड़ी सभ्यता के अधिकारी धरती जैसी दरिद्रता और उस पर रहने वाले पतित-पीड़ित लोगों पर आक्रमण करने और यहाँ से लूट ले जाने के लिए इतनी कष्टसाध्य यात्राएँ नहीं कर सकते। उनका उद्देश्य इस लोक के प्राणियों को अपनी उपलब्धियों से लाभान्वित करना ही हो सकता है भारत के ऋषि मुनि समस्त संसार में ज्ञान और विज्ञान का वितरण करने के सदुद्देश्य से परिभ्रमण करते रहे है। इससे कम सदुद्देश्य इन अन्तर्ग्रही महामानवों का भी नहीं हो सकता। वे हमसे संपर्क साधने का प्रयत्न करते है, पर वह साधता नहीं। क्योंकि इस लोक के वासियों की क्षमता उनकी ओर हाथ बढ़ाने एवं सहयोग करने की नहीं है। इस क्षेत्र में सबसे अधिक बाधक अन्तर्ग्रही विशिष्ट विज्ञान के संबंध में अपना अनजान होना ही है। यदि विद्या प्राचीनकाल की तरह विकसित स्तर की रही होती तो वह संपर्क सध सका होता, जिसके लिए उड़नतश्तरियों में, अन्तर्ग्रही यानों में बैठकर आने वाले महाप्राण प्रयत्नशील है।
प्राचीनकाल में नारद आदि विशिष्ट अन्तर्ग्रही यात्राएँ करते रहे है। लोक लोकान्तरों में उनके परिभ्रमण का वृत्तांत मिलता है और वह उच्चस्तरीय ज्योतिर्विज्ञान ही रहा होगा, जो इन दिनों एक प्रकार से लुप्त ही हो गया।
प्रेतों और पितरों के सम्बन्ध में आस्तिक और नास्तिक, श्रद्धालु और तार्किक कुछ न कुछ जानते और मानते है। इनको भी एक दुनिया है। परलोक, प्रेतलोक, स्वर्ग, नरक आदि के नाम से इसकी चर्चा होती रहती है। यह भी जीवित मनुष्यों जैसी एक दुनिया है। आदान-प्रदान का रास्ता खुला रहता तो जिस प्रकार जलचरों और नभचरों का अस्तित्व मनुष्यों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रभावित करता है, उसी प्रकार इन दिवंगत आत्माओं का सहयोग जीवितों के लिए कई प्रकार से उपयोगी ही सकता है। जीवाणु, परमाणु, विषाणु की जानकारी ने मानवी सुविधा क्षेत्र को बढ़ाया है। अनन्त अन्तरिक्ष में बसी हुई इन सूक्ष्मशरीरधारियों की दुनिया यदि जीवितों साथ सहकार बना सकी होती तो दिवंगतों को अतृप्त घूमता न पड़ता ओर न मनुष्य को उनके दिव्य सहयोग से वंचित रहना पड़ता। दिवंगत स्वजन-संबंधियों के साथ प्रेमाचार तो और भी अधिक सरल है।
देवता इससे ऊँची स्थिति की चेतन सत्ता है। सौरमण्डल के ग्रह और उपग्रह भौतिक दृष्टि से रासायनिक पदार्थों से बने बड़े आकार वाले चलते फिरते ढेले भर है, किन्तु आत्मविज्ञानी जानते है कि प्रत्येक जड़सत्ता का एक चेतन अभियान होता है। उसी के नियमन में इन घटकों को अपनी गतिविधियाँ उपयुक्त रीति से चलाने का अवसर मिलता है। नवग्रहों को अध्यात्मशास्त्र में देवता माना गया है। खगोल विद्या में वे पदार्थ पिण्ड गिने जाते है। अपने अपने स्थान पर दोनों परिभाषाएँ सही है। दिव्यदर्शियों ने तैंतीस कोटि देवता गिनाए है। कोटि का अर्थ यहाँ करोड़ नहीं श्रेणी ही समझा जाना चाहिए। इन समुदाय में ग्रहपिण्ड, निहारिकाएँ पंचतत्त्व, पंचप्राण, देवदूत, जीवनमुक्त, व्यवस्थापक, सहायकवर्ग की उन दिव्यसत्ताओं को गिना जा सकता है, जो परब्रह्म ने होते हुए भी उसका व्यवस्था में हाथ बँटाती रहती है। देवाराधन की प्रक्रिया से इन्हीं के साथ सम्पर्क साधने और आदान-प्रदान का द्वार खोलने का प्रयत्न किया जाता है।
भू-मण्डल से बाहर अनन्त अन्तरिक्ष बिखरा पड़ा है। विज्ञान ने पृथ्वी तथा उसके संबंध वाले अति निकट क्षेत्र से संपर्क साधा और अनुसन्धान किया है। इससे बाहर का ब्रह्माण्ड विस्तार अत्यन्त व्यापक है। इसमें पदार्थ भी है और चेतना भी। ग्रह नक्षत्रों से लेकर असंख्य स्तर की ऊर्जा तरंगों तक का पदार्थ भाण्डागार इसी ब्रह्माण्ड में समाया हुआ है। पितरों से लेकर महाप्राण ओर देव-समुदाय तक के अनेकों सूक्ष्मशरीरधारी इसी विस्तार में निवास करते और अपना विशिष्ट संसार चलाते हैं। यह प्रत्यक्ष और परोक्ष आज एक-दूसरे के साथ ऐच्छिक आदान-प्रदान स्थापित नहीं हो पा रहा है। प्रकृतिप्रवाह से जो अनायास ही मिल जाता है, उतने भर से सन्तुष्ट रहना पड़ रहा है।
युगपरिवर्तन और नवसृजन के लिए मात्र मनुष्यों के ज्ञान, श्रम एवं साधना का नियोजन तो होना ही चाहिए, पर उतने से ही इतना बड़ा कार्य सम्पन्न हो नहीं सकेगा। परिवर्तन की अधिकाँश प्रक्रिया सूक्ष्मजगत में सम्पन्न होगी। प्रत्यक्ष में तो उसी की प्रतिक्रिया भर दृष्टिगोचर होगी। इस प्रयोजन के लिए जाग्रत आत्माओं की तत्परता और विभूतियों की सहायता को जहाँ आमंत्रित किया गया है, वहाँ परोक्ष का सहयोग प्राप्त करने की आवश्यकता को भी ध्यान में रखा गया है।
घोर अँधेरी रात, जब हाथ को हाथ नहीं सूझता था, झरना अपने अविरल प्रवाह से कल कल करता हुआ एकान्त निर्जन विजन में बहता चला जा रहा था।
एक पहाड़ी उपत्यिका ने पूछा निर्झर! तुम्हें थकावट नहीं आती क्या? तनिक रुको! कुछ विश्राम तो कर लिया करो। एक स्नेहपूर्ण दृष्टि डालते है। उसकी दूरी अनन्त है। रुकूँगा तो इधर-उधर भटकूँगा। चलते रहने से वह दूरी कुछ कम ही होगी। यह कह झरना आगे बढ़ता ही रहा।
(प्रज्ञा परिजनों के नाम संदेश)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो! आप सभी जानते हैं कि जब रात्रि समाप्त होती है तो सूरज पूर्व दिशा से ही निकलता है। सूरज के निकलने की और कोई दिशा है ही नहीं। जब चारों ओर अंधकार छाया रहता है, तब हर एक आदमी ठोकर खाता हुआ फिरता है। उसे न तो दिशा का ज्ञान रहता है ओर न ही वस्तु का ज्ञान रहता है। सब जगह घोर अंधकार छाया हुआ रहता है। उस समय उलूक, साँप, बिच्छू, चोर, भूत-पलीत और निशाचरों का साम्राज्य छाया रहता है। भले आदमी खर्राटे भरकर साये हुए रहते है। ऐसे अंधकार के समय में जब चारों ओर निस्तब्धता छायी रहती है, हलचलों का नामोनिशान तक नहीं दिखाई देता, नींद की खुमारी सब पर छायी रहती है। घोर अंधकार के समय में सब जगह सुनसान हो जाता है। उस अंधकार को दूर करने के लिए जब कभी सूरज निकलता है, जब कभी ब्रह्ममुहूर्त आता है, उषाकाल आता है, तब हमें उसके लिए सूरज को ही देखना पड़ता है। प्राची अपने साथ उषाकाल लाती है। प्रातःकाल में ही सूरज की लालिमा चमकती है और वह घोर अंधकार, जो किसी तरह समाप्त नहीं हो सकता, इसको मिटाने के लिए भी कोई समर्थ नहीं हो सकता, वह केवल पश्चिम से उदय होने वाले सूरज के द्वारा ही हो सकता है।
समय जैसे जैसे करीब आता है, वह कुछ कुछ सेकेण्डों में थोड़ा बहुत चारा खाता है। कुछ कुछ सेकेण्डों में उसमें बदलाव होता रहता है।
यही स्थिति प्रायः आज मनुष्य की हो चली है॥ एक अज्ञात भय से वह सदा सशंकित बना रहता है। आज मनुष्य का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार कितना घटिया हो गया है कि इससे प्रकृति नेचर भी नाखुश हो गयी है। रोज ही कोई न कोई प्रकृति प्रकोप की घटना देखने व पढ़ने को मिलती है। प्रकृति का प्रकोप होता है, तो आये दिन महामारियाँ देखने को मिलती है। अदृश्य जगत में भयावह वातावरण उत्पन्न हो गया है। प्रकृति के प्रकोप की वजह से आये दिन भूकम्प आते है। आये दिन दूसरी मुसीबतें आती है। मुसीबतों का अंबार हमारे चारों ओर छाया रहता है। कल के बारे में कोई नहीं जानता कि महायुद्ध के पश्चात् हमारा क्या होगा? कोई नहीं जानता कि आपाधापी जिस तरीके से मनुष्य को हैरान और परेशान करने पर तुली हुई है। उसके परिणाम क्या होंगे? आज ही कौन-सी अच्छी परिस्थितियाँ है, लेकिन कल के दिन हमारे और भी खराब आने वाले है।
अपराध बेतरीके से बढ़ते जा रहे है। आदमी का स्वभाव बहुत उच्छृंखल और अपराधी होता जा रहा है। आज कितनी दुर्घटनाएँ, वर्जनाएँ हो रही है। वर्जनाएँ, जिसके अंतर्गत
भारतीय संस्कृति विश्व संस्कृति बनेगी
मित्रो, लेकिन एक बात ऐसी भी है, जो आपको कभी कभी हो देखने को मिलती है। कभी-कभी समय ऐसे बदल जाता है और चहुँओर ऐसी परिस्थितियाँ बन जाती है, जो मनुष्य के मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालती है। उसे न ही सामाजिक उत्तरदायित्वों का ध्यान रहता है, न अपने निजी कर्तव्यों का ध्यान रहता है। ऐसी भटकाव की स्थिति में, ऐसी मुसीबतें आकर खड़ी हो जाती है जैसे कि आज के दौर में आप चारों ओर मुसीबतों का माहौल, भयानक आशंकाओं आतंकों से भरा वातावरण छाया हुआ देखते है आज किस तरह भयंकर एटमबमों की विभीषिका छायी हुई है। इसके बारे में आप रोज अखबारों में पढ़ते हैं। हवा के जहरीले हो जाने की संसार का तापमान बढ़ने की बात आप रोज पढ़ते हैं। यह सब बातें आप लोगों की जानकारी बाहर थोड़े ही है। आपको इन सबको जानकारी है। क्या आपको मालूम नहीं है कि एटमबमों की वजह से जो विकिरण हवा में भर गया है, उसके कारण कैसी विनाशकारी काली छाया चहुँओर व्याप्त हो गयी है।
उससे कैसे हमारी पीढ़ियाँ कमजोर व अपंग होने वाली है? कितनी महामारियों, बीमारियों दौर आने वाला है? इस विकिरण की वजह से वायुप्रदूषण की वजह से, जो आज के भटकाव ने पैदा कर दिया है। जनसंख्या की बढ़ती हुई स्थिति के बारे में आप सभी को मालूम है। यदि स्थिति यही रही तो थोड़े ही दिनों में इस पृथ्वी पर चलने फिरने की जगह तक नहीं रहेगी। आप सभी जानते हैं कि बकरे के कटने का आदमी को कहा जाता था कि उसे मर्यादा में रहना चाहिए। सृष्टि का नियम बिगड़ता जा रहा है। सृष्टि का यह नियम है कि करने वाले का भरना पड़ता है। करने के भरने वाले परिणाम को कोई नहीं रोक सकता। जहर खाने के बाद में बचाव करने को आशा कौन करेगा? आज ठीक इसी तरह को परिस्थितियाँ है, जिसमें सभी लोग सम्पन्न, अमीर, गरीब, भारती, विदेश और प्रवासी एवं अन्य लोग भी शामिल है।
तो गुरुजी! क्या इस दुनिया का विनाश होगा? नहीं, बेटे, जिस स्रष्टा ने इस बेहतरीन, खूबसूरत दुनिया को बनाया है, जिसके समान अब तक ऐसी खूबसूरत दुनिया कहीं और नहीं है। क्या भगवान अपनी उस खूबसूरत दुनिया को खत्म कर देगा? नहीं, उसे जब यह मालूम हुआ कि लोग इस बेहतरीन दुनिया को तबाह करने का प्रयत्न कर रहे है और इस दुनिया को रसातल में ले जाने की तैयारी हो गयी है॥ तब भगवान ने राष्ट्रपति शासन की तरह से इसकी लगाम अपने हाथों में सँभाल ली है और सँभालने के बाद में इस संसार को फिर से सुव्यवस्थित बनाया है। अवतार भी इसी तरह से हुए है। अवतार कहाँ से होते है तथा किस तरह से होते है? यह आप सभी जानते है। चाहे उसे दसवाँ अवतार कहिए या चौबीसवाँ अवतार कहिए, यह सब भारतभूमि से उत्पन्न हुए है। सूरज के निकलने को एक ही दिशा पूरब दिशा होती है। विनाश चाहे किसी भी प्रकार से हुआ हो, लेकिन इसने सबके उपाय की एक ही जगह है, जहाँ से इन सबको सँभाला जा सकता है। आज फिर वही समय आ गया है कि विनाश की दुनिया जिन लोगों ने पैदा की है, इन सबको ठीक करने का काम एक बार फिर भारत भूमि करने वाली है, जो किसी जमाने में उसने की थी। सतयुग की बातें आपने पढ़ी व सुनी जरूर होगी कि इस जमीन पर स्वर्ग किस तरह से बिखरा हुआ था। आपने भारतभूमि के इतिहास पढ़े होंगे, जैसे रामायण, महाभारत, वेद, गीता, पुराण आदि। आपको इसके विशय में थोड़ी बहुत जानकारी होनी चाहिए। प्राचीनकाल में बहुत लम्बे समय तक एक ऐसा लम्बा समय रहा, जिसको कि सतयुग कहा जा सकता है। उस सतयुग की वापसी फिर होने वाली है।
मुसीबतों के दिन क्या ऐसे ही रहेंगे? क्या विनाश की तबाही इसी तरीके से ही होती रहेगी? क्या इस सुन्दर दुनिया की बरबादी इसी तरह से होती रहेगी? क्या यह समय ऐसा ही बना रहेगा? नहीं, जिस कलाकार ने इस दुनिया को अपनी सारी कला झोंक करके बनाया है, वह इस दुनिया की तबाही नहीं होने दे सकता। इसलिए अब उसका अन्तिम अवतार होने वाला है। फिर समझदारी, जिम्मेदारी और ईमानदारी का माहौल बनने वाला है। एक ऐसा ही भगवान आने वाला है, जिनके द्वारा वसुधैव कुटुम्बकम् का सिद्धान्त लागू होने वाला है। आज के बिखराव फिर से दूर हो दुनिया बनकर रहना पड़ेगा। वसुधैव कुटुम्बकम् के सिद्धान्त के ऊपर चलना होगा। दुनिया को एक राष्ट्र के रूप में, एक भाषा भाषी के रूप में एक धर्म संस्कृति के अनुयायी के रूप में रहना पड़ेगा। दुनिया की एक व्यवस्था के अंतर्गत, एक कानून और नियम के अंतर्गत चलना पड़ेगा। अगले दिनों ऐसी व्यवस्था लागू करनी होगी। ऐसी व्यवस्था कहाँ से आएगी? आप जानते है क्या? ऐसी व्यवस्था सिर्फ भारतीय संस्कृति में है। अगले दिनों एक ऐसी व्यवस्था कायम करनी होगी, जो कि बहुत शानदार होगी, जिसमें सभी ओर से सुख और शान्ति होगी। ऐसी व्यवस्था सिर्फ भारतीय संस्कृति में है, जिनको हम देव को मनःस्थिति को व उसके व्यवहार को ऐसा बनाया जाए कि सारी दुनिया में सुख और शान्ति आये, क्योंकि मनःस्थिति ही सुख और शान्ति प्रदान करती है।
अच्छी परिस्थितियाँ लाने के लिए मनःस्थिति का ठीक होना जरूरी है। यह कार्य धर्म, अध्यात्म और संस्कृति का है॥ इसकी कौन-सी संस्कृति कहेंगे? इसे चाहे इनसानी कहिए, मानवीय कहिए, इसी को पुराने लोग भारतीय संस्कृति कहते है। वास्तव में यह मानवीय संस्कृति है, किसी एक देश की संस्कृति नहीं है। इसके विस्तृत होने का समय आ गया है। अगले दिनों भारतीय संस्कृति हर जगह फैलेगी। यह संस्कृति भारतीयों के माध्यम से लोगों को स्नेह देकर के सारी दुनिया के लोगों का एक रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर देगी। वह दिन अब दूर नहीं है, वरन् नजदीक आ गया है। हुआ क्या है भारतभूमि पर पहले से ही यह प्रकाश फैल रहा है। मानो किसी ने पहले से ही स्कीम बनाकर रख दी हो। जब ऊषाकाल आता है, तो कोई तैयारी करता है क्या? पूरब में से लाल रंग के बादलों में से सूर्य निकलता है। ये सब सूर्य भगवान के निकलने के लिए तैयारियाँ है। भगवान की तैयारी के परिणामस्वरूप यह होता है कि थोड़े समय में अंधकार का पता नहीं चलता, उलूकों का पता नहीं चलता, चोरों का कहीं पता नहीं चलता, चमगादड़ों का पता नहीं चलता, सोने वालों की खुमारी का कहीं पता नहीं चलता, हर जगह जाग्रति की लहर फैल जाती है।
ठीक इसी तरीके की जाग्रति की हर भारतभूमि से चल पड़ी है। क्या यह भारतवर्ष तक सीमित रहेगी? सूरज सीमित कहाँ रहता है? सूरज पूरब से निकलता है अवश्य, परन्तु थोड़े ही समय में ऊपर चला जाता है। सारी दुनिया को थोड़े ही समय में अँधेरे से निकालकर उजाले का मजा चखा देता है। भारतीय संस्कृति के उदय होने का समय आ गया है। देवसंस्कृति के उत्थान होने का समय नजदीक आ गया है। देवसंस्कृति के द्वारा सतयुग को वापस लाने का समय निकट आ गया है। उन लोगों को चुनौती है जिन्होंने ऐसी परिस्थितियों को जन्म दिया, जिससे कि इनसान की बरबादी होकर रहे। जिनने विनाशकारी, एटमबम बनाए, जिन्होंने असमानताएँ, फैलाई, जिन्होंने क्राइम को प्रोत्साहन दिया जिन्होंने आपाधापी का प्रोत्साहन दिया, जिन्होंने गन्दी फिल्में बनायी, जिन्होंने इस तरह की रिवाजें चलायी जिससे इनसान तबाह होने जा रहा है। अब इन लोगों को चुनौती है। किसकी ओर से? भगवान की ओर से, प्रज्ञावतार की ओर से, नये युग की ओर से, जो कि अब बिलकुल नजदीक आ गया है।
इसकी जिम्मेदारी किसकी है? भारतवर्ष की। इसकी जिम्मेदारी फिर से भारतवर्ष ने सँभाली है। पौर्वात्य संस्कृति ने सँभाली है और उस पौर्वात्य संस्कृति की हम और आप संतान है। इन सबकी जिम्मेदारी हमारी नहीं होगी, तो किसकी होगी? पूर्व की दिशा से जब सूर्य निकलता है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन उठाएगा? किरणें ही तो उठाएँगी। किरणों को हो तो फैलता है। वहाँ तो गर्मी फैलायेगी। सूर्य की किरणों को हर चीज में प्रकाश और उल्लास भरना है। आयु और हम उसकी किरणें है किसकी? प्राची की प्राची कौन है? प्राची भारतीय संस्कृति है। भारतीय संस्कृति को किरणें है आप। आप हिन्दुस्तान में हो तो क्या, हिन्दुस्तान से बाहर हो तो क्या। इससे क्या लेना देना? आप सभी भारतीय संस्कृति के अनुयायी है। आप नागरिक कहीं के हो, देश की स्थिति से सिटीजन कहीं के हों, मैं क्या कहूँ आप से? आप तो भारतीय संस्कृति के पुत्र है और आप वही रहेंगे। आप किसी भी मुल्क में रहिए, किसी भी जगह रहिए, कहीं की नागरिकता स्वीकार करिए, कोई भी काम करिए आपके ऊपर बड़ी जिम्मेदारी है। उस जिम्मेदारी की आगाही करने के लिए ही हम आपकी सेवा में हाजिर हुए है। हम आपके पास इसीलिए बार-बार आते है और अपने कार्यकर्ताओं को आपके पास भारतीय संस्कृति के संदेशवाहक के रूप में सतयुग के संदेशवाहक के रूप में इनसानी उज्ज्वल भविष्य के संदेशवाहक के रूप में भेजते है। यह बताने के लिए कि आप महान है, आपकी संस्कृति महान है। आपकी परम्परा महान है। आपको अपनी महान परम्परा को जिन्दा रखना है।
इस महान परम्परा को इसलिए जिन्दा रखना है कि इसकी हवा ने केवल हिन्दुस्तान में बल्कि सारी दुनिया में पैदा की जानी है। यह आप लोगों के द्वारा ही की जाएगी। आप ही इस जिम्मेदारी को सँभालेंगे। जो लोग अमेरिका, हालैण्ड, इंग्लैण्ड, जर्मनी आदि देशों में रहते है, उन सबकी जिम्मेदारी आप लोगों की सँभालनी है। जो लोग अफ्रीका के किसी भी भाग जैसे- यूगांडा केन्या या यूरोप में रहते है अर्थात् प्रवासी भारतीय है, वह सभी हमारे राजदूत के रूप में इस कार्य को करेंगे। जो भी भारतीय संस्कृति के पक्षधर है, उनको चाहे तो हम राजदूत कह सकते है। स्वामी विवेकानन्द भारतीय राजदूत थे। किसके? भारतीय संस्कृति के। भारत सरकार के नहीं। आप कहीं भी रहते है, चाहे अफ्रीका, अमेरिका, जापान, इंग्लैण्ड या अन्य किसी भी जगह रहते है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारे प्रवासी भारतीय चौहत्तर मुल्कों में रहते है। आपको भारतीय संस्कृति के बारे में, नवयुग की वापसी के बारे में लोगों का बताना है। इसकी सिर्फ जानकारी ही नहीं देना, बल्कि हर आदमी को इस कार्य के लिए प्रोत्साहित भी करना है। यह काम आपको ही करना है। अगर आप इस काम को नहीं करेंगे, तो आपकी अन्तरात्मा इसके लिए मजबूर करेगी।
साथियों, आपकी नयी पीढ़ियों आपसे यही अपेक्षा करेंगी कि आप ठीक समय पर ठीक कार्य करें आप ठीक समय पर ठीक कार्य करने के लिए कमर कसकर तैयार रहिए। आप कहीं भी, किसी भी देश में रहते है, बड़े शानदार ढंग से रहिए। आपकी हर आदमी प्रशंसा करता है। भारतवासियों की आपके ऊपर गर्व है। प्रवासी भारतीयों ने अपने अपने मुल्कों में रहकर जो काम किया है वह प्रशंसनीय और सराहनीय है। आप हमसे बहुत दूर है, आपसे हमको, भारतमाता को बड़ी आशाएँ है। आपको भी अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी है, बच्चों की, उनकी पढ़ाई की माता पिता की दल को भी पूरा करिए। पर इन को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए भी उतनी ही मेहनत करनी चाहिए। आप यह काम करेंगे, हमें पूरा पूरा विश्वास है कि आप हँसी खुशी के साथ इसे करेंगे। हम आपने कार्यकर्ताओं के मार्फत आपके पास आते है। आपको जगाते है, समझाते है, झकझोरते है। आपको कभी खुश करते है, कभी नाराज करते है, कभी आपको मनाते है कि आप इस अमूल्य समय को समझिए। अपनी जिम्मेदारी को समझिए। आपको अभी बहुत-सा साहित्य व किताबें भेजी है, जिसमें आपको स्वयं को भारतीय इकाई के रूप में रहना है। ने केवल संतति इकाई के रूप में बल्कि भारतीय संस्कृति की नुमाइंदगी करते हुए उस मुल्क में जो भी रहते है, उन सबको वह संदेश देना है, जिसको इनसानियत का संदेश कह सकते है, भारतमाता का संदेश कह सकते है, वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश कह सकते है, भारतीय संस्कृति का संदेश कह सकते है। यह सब काम आपको करना है।
मित्रो, हमने आपको बहुत सारी बातें बतायी है फिलहाल उनमें से कुछ काम ऐसे है, जो आपको जरूर निवासी है, उन सबका सम्मेलन अपने अपने क्षेत्र में जरूर से करना हैं युगनिर्माण सम्मेलन उसका नाम रखे प्रज्ञा अभियान सम्मेलन नाम रखे। नाम से कुछ नहीं होता है। कुछ भी आप अपने मन से नाम रख सकते है। अगर आप बृहद् सम्मेलन नहीं कर सकते, तो खण्डों में उस सम्मेलन का आप अवश्य करिए, जिससे कि सभी जन सम्मिलित हो सके। उसके माध्यम से आप बता सकते है कि आप ने केवल मिल−जुलकर रहेंगे और न केवल एक दूसरे की सहायता करेंगे, भारतीय परम्पराओं को अपने में समाविष्ट करेंगे, बल्कि नवयुग के आगमन के बोर में लोगों को जानकारी देंगे। इस कार्य के लिए एक सम्मेलन होना जरूरी है, मीटिंग होनी जरूरी है। आपको मालूम होगा कि आज से बीस साल पहले गायत्री तपोभूमि में एक हजार कुण्डीय यज्ञ हुआ था, जिसमें सभी धर्मप्रेमी व समझदार लोगों ने सहयोग किया था। उनके सहयोग से यह यज्ञ अभियान चलाया गया, जिसकी ओर से हम आपको बार बार संदेश देते हैं। आपको अपने अपने क्षेत्र में अपने अपने मुल्क में एक सम्मेलन अवश्य करना चाहिए। उससे आपसी प्यार बढ़ेगा, एक दूसरों से मिलने पर जानकारी बढ़ेगी। इसलिए भावनात्मक एकता की दृष्टि से एक सम्मेलन अवश्य करना चाहिए। इसलिए आप सभी को मिल−जुलकर कार्य करना चाहिए, क्योंकि अकेले आप कोई भी कार्य नहीं कर सकते। भगवान राम ने भी रीछ वानरों को एकत्रित किया था। श्री कृष्ण भगवान ने भी ग्वाल बालों का सहयोग लिया था। गाँधीजी ने भी सत्याग्रहियों का साथ लिया था। अगर आप भी मिल जुलकर कार्य नहीं करेंगे, तो आप सब में प्रेम कैसे बढ़ेगा? इसलिए आप सभी लोगों को मिल−जुलकर सम्मेलन करना चाहिए।
दूसरा काम यह है कि आप प्रज्ञा मिशन जिसको प्रज्ञावतार मिशन कह सकते है अवतार मिशन भी कह सकते, नवयुग के संदेश भी कह सकते है इसके सम्बन्ध में जानकारी देने के लिए आप छोटी छोटी किताबें छाप सकते हैं आप बहुत-सी जानकारी अच्छे साहित्य के माध्यम से लोगे तक पहुँचा हर छोटे बड़े लोगों को बिना पैसे की जानकारी मिलती है। एक काफिला बन जाती है, एक माहौल बन जाता है। हर एक को इस माध्यम से आसानी से मालूम पड़ेगा कि यह संस्था क्या है इस मिशन का उद्देश्य क्या है यह संस्था कितनी शानदार है और यह कितने महत्वपूर्ण कार्य कर चुकी है और आगे क्या क्या कार्य? करने वाली है। यह बात अमर बताएँ नहीं तो आपके समर्थक कहाँ से आएँगे आपको सहयोग कहाँ से मिलेगा आप स्मारिका काहे से छापेंगे। इसके लिए स्मारिका आप जरूर छापे।
इसके अलावा और भी बहुत से काम है जो आपको करने है जिसके बिना हमारा काम नहीं चल सकता। आप भारतीय संस्कृति को नवयुग का संदेश सभी को दे, इसका प्रकाश सब जगह फैलाए। विनाश से उत्पन्न विभीषिकाओं के बारे में लोगों को बताएँ और आगाह करें। आप लोगों को बताएँ कि नयी दुनिया बनाने के लिए अच्छे दिन लोटने के लिए अच्छे लोगों को क्या करना चाहिए। यह सब काम तभी हो सकता है, जब आप लोगों को इकट्ठा करके एक बड़ा सम्मेलन करे, संगठन खड़ा करें संगठन में स्थायित्व लाने के लिए कुछ न कुछ गतिविधियाँ निरन्तर चलनी चाहिए, जिससे लोगों का उत्साह ठंडा न हो पाए। यदि आप यह कर सके, तो आप स्वयं देखेंगे कि जो हम लोग आप से उम्मीद करते थे, वह आपने कितनी सरलता के साथ किया, अगर आप यह काम करेंगे, तो मजा, आ जाएगा। आप लोगों से प्रारम्भिक कदम उठाने के रूप में यह प्रार्थना करते हुए आज की अपनी बात समाप्त करते है। आप लोगों को बहुत बहुत प्यार, आशीर्वाद। आप लोग चाहे जितनी दूर रहते हो, पर हृदय के हिसाब से भावना के हिसाब से विचारणा के हिसाब से आप हमारे बहु नजदीक है। आप बहुत प्यारे है मित्र है सहयोगी है, कुटुम्बी है आप सभी सुखी रहे, समुन्नत रहे और अपने नजदीक वालों को भी ऊँचा उठाने का प्रयास करे ऐसी भगवान से प्रार्थना है।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यंतु या कश्चिद् दुःख्माप्नुयात्॥
परमपूज्य गुरुदेव ने शान्तिकुञ्ज को सृजनशिल्पियों की छावनी नाम दिया था। एक ऐसे छावनी, जहाँ युगसैनिक तैयार होते है, तराशे जाते है एवं फिर क्षेत्रों में जाकर वे परिष्कृत धर्मतन्त्र से लोकशिक्षण की प्रक्रिया सम्पन्न करते है। इन दिनों हरिद्वार में महाकुम्भ पर्व पर जब हम विभिन्न प्रकार की छावनियाँ अखाड़ों की पेशावाई, ध्वजा चढ़ाया जाना व उनकी शोभायात्रा देखते है तो लगता है कि संभवतः यही स्वरूप हमारे ऋषियों की मनःस्थिति में रहा होगा कि धर्मतंत्र के दिग्गज युगसैनिक इन कुम्भरूपी विराट ज्ञानयज्ञों वाजपेययज्ञों में बारह वर्ष पूर्व के तथा बीच बीच के वर्षों में अन्य स्थानों पर हुए महापर्वों के निर्धारणों की समीक्षा भी करें, साथ ही भविष्य की योजना भी बनाएँ। अब तो मात्र चिह्न पूजा रह गयी है। स्वरूप कुछ से कुछ हो गया है। मात्र पर्यटन कुछ लक्षण कुतूहल का प्रदर्शन ही एक बनकर रह गया है, जबकि राष्ट्र के अभिनव निमार्ण की दिशा धाराओं को यहाँ सुनियोजित किया जाना चाहिए था। अधिवेशन यदि माना जाता तो निश्चित पुनः जाग उठता, कहीं किसी प्रकार के नैतिक पतन की कोई गुँजाइश नहीं रहती।
विगत अतीत में जो कुछ हो चुका, हो रहा है, उसकी चर्चा तो मात्र मानसिक अवसाद ही लाएगी। अब यह सोचा जाना चाहिए किया क्या जाए जग हम सभी बड़ी विलक्षण प्रक्रिया से गुजर रहे है, समूची धरती के भाग्य के नए सिरे से लिखे जान ले के घटनाक्रम के साक्षी बन रहे है।यह सहस्राब्दी जा रही है दूसरी आ रही है। जो कैलेण्डर प्रचलन में आ गया है इस ईसवी सन का बदलाव है मात्र ढाई वर्ष सन् 2001 में ले जाएगा। विक्रमी संवत् 2055 से लेकर 2065 तक की अवधि भारी उलट पुलट से भरी हुई है। काफी हमारे अभी के क्रिया–कलापों में पैनापन आए हम गतिशील हो एवं समय की महत्ता को पहचानकर संवेदना जगाने वाली इक्कीसवीं सदी में शान के साथ पदार्पण करने हेतु तैयारी कर सके।
इन दिनों हरिद्वार नगरी में तो चकाचौंध लाने वाली भव्यता चरम शिखर पर दिखाई देती है। अंतिम शाही स्नान 13, 14 अप्रैल को है, जब बैसाखी के साथ मेष संक्रान्ति की पावन बेला में लोग गंगाजी में गोते लगाएँगे। अभी से हरिद्वार नगर पुण्य लूटने वालों की भीड़ से भरा हुआ है। एक ज्ञानवर्धन प्रदर्शनी एवं साहित्य, वनौषधि विक्रय केंद्र का शान्तिकुञ्ज द्वारा भी प्रदर्शनी कैंपस में विगत 20 मार्च से शुभारंभ किया गया है। शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार, सभी का प्रिय होने से जब से 1 मार्च, 1998 से 5 दिवसीय सत्रों की शृंखला आरंभ हुई है, लगभग अपनी निर्धारित संख्या से अधिक भरा हुआ है। पूरे अप्रैल माह यही स्थिति रहेगी। यों तो महाकुम्भ का अंतिम स्नान 29 अप्रैल अक्षय तृतीया का है, किंतु इसी दिन उत्तराखण्ड के सभी धामों के कपाट भी खुल जाएँगे। इसलिए भीड़ का आवागमन तो सतत् बना ही रहेगा - बना ही रहना है।।
जिस किसी को हरिद्वार की नव सृजन को संकल्पित इस छावनी में प्रशिक्षण हेतु वास्तविक आध्यात्मिक भावकल्प हेतु एवं आने वाले समय की तैयारी हेतु आना है, उसे समय अप्रैल के बाद का चुनना चाहिए। जून तक 5 5 दिन के सत्र यथावत चलते रहेंगे। इनके साथ साथ एक एक माह के सत्र भी युगशिल्पी स्तर के प्रशिक्षण हेतु नियमित चलेंगे। 5 दिन के इन सत्रों में साधना मात्र इतनी ही हो सकती है कि सत्ताईस माला प्रतिदिन के हिसाब से उपलब्ध 4 दिनों में 108 माला का एक अनुष्ठान संपन्न हो सके, जब तक नये उपलब्ध न लाये कि स्वीकृति नहीं है तो क्या, ठहरने खाने−पीने को मिल ही जाएगा। मई जून के सत्रों में यह मर्यादा बनाए रखने की अपेक्षा सभी कार्यकर्ता बंधुओं, पाठकगणों से शान्तिकुञ्ज का तंत्र करता है
अगले दिनों और भी विशिष्ट सत्र योगसाधना प्रधान एवं समग्र कार्य क्षेत्र को सँभालने वाले अग्रगामियों का एक एवं तीन माह के प्रशिक्षण तथा रचनात्मक कार्यक्रमों के अंतर्गत सार्थक शिक्षा व सार्थक चिकित्सातन्त्र फिलहाल मात्र यही निवेदन कि महाकुम्भ की सभी तिथियाँ पावन है आप जहाँ है, वही रहकर युगसृजन की प्रक्रिया में और गतिशील होने का संकल्प इन दिनों में ले व स्थूल न सही सूक्ष्म रूप सतत् शान्तिकुञ्ज रहने ज्ञानगंगोत्री में स्नान का ध्यान अवश्य करते रहे।
इन दिनों सारे भारत वर्ष में युगनिर्माण योजना, शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार के प्रज्ञा अभियान की संस्कार-महोत्सव श्रृंखला के अंतर्गत स्थान-स्थान पर आयोजनों की श्रृंखला चल रही है। जिस रूप में इन आयोजनों की परिकल्पना की गयी थी, उसमें संस्कारों की महत्ता को प्रमुख मानकर यज्ञ व कुण्डों की संख्या को द्वितीय वरीयता पर रखा गया था। हो यह गया है कि भावावेश में आश्वमेधिक दिग्विजय करने वाले देवसंस्कृति को जन जन तक पहुँचाने का उत्साह दिखाने वाले हमारे युगसैनिक लगता है कहीं भटक से गए है। यदि यह लक्ष्य पूरा होता है तो परमपूज्य गुरुदेव परमवंदनीय माताजी की कण-कण में संव्याप्त सूक्ष्मसत्ता सभी को कोटि-कोटि आशीर्वाद देगी। साथ में सुधारात्मक संघर्षात्मक कार्यक्रमों की श्रृंखला भी अनुयाज प्रयास क्रम में चल पड़ी है। कहीं नशा उन्मूलन की रैली निकल रही है, तो कहीं पर विवाहोन्माद प्रतिरोध दहेज विरोधी आंदोलनों की श्रृंखला चल पड़ी है। यह शुभ चिह्न है। ज्ञानयज्ञ प्रक्रिया के अंतर्गत स्थान स्थान पर साहित्य केन्द्र स्थापित हो गए हैं-यह भी प्रसन्नता की द्योतक सक्रियता है।
अब बारी आती है, इस वर्ष के उत्तरार्द्ध के कार्यक्रमों की, जिनके विषय में निर्धारण अभी से किए जाने लगे है। इनके विषय में सभी विस्तार से समझ लें तो अच्छा है। बालकौतुक की तरह इधर से उधर उछलकर सब कुछ माँगने वालों कार्यक्रमों की मूलभावना को न समझ पाने वालों को बाद में पछताना न पड़े इसलिए स्पष्ट भाषा में लिखा जा रहा है। कई परिजनों का आग्रह रहता है कि हमारे यहाँ प्रज्ञापुराण कथा प्रधान आयोजन अपनी अभिनव शैली के कारण बड़ी भीड़ बटोरते है तो वह कैसा हो यह मार्गदर्शन शान्तिकुञ्ज का ले, किसे कथा के साथ सारा आयोजन संपन्न करना है यह निर्णय शान्तिकुञ्ज तंत्र पर ही छोड़ दें।
इस वर्ष सितम्बर के तृतीय सप्ताह से आरम्भ हो रहे आयोजनों में आमूल चूल परिवर्तन किया जा रहा है। ये आयोजन स्थान के अनुरूप चार दिवसीय भी हो सकते हैं एवं अपवाद रूप में कही-कहीं पाँच दिवसीय भी। इनमें प्रातः यज्ञ एवं ध्यान, दिन में सामाजिक बौद्धिक काँति संबंधी मार्गदर्शन एवं शाम को प्रज्ञापुराण कथा आयोजन के माध्यम से लोक शिक्षण का समावेश रहेगा। तीसरे दिन यही क्रम प्रातः से संध्या तक मात्र कथा का स्वरूप छोटा संकल्प प्रधान होकर दीपयज्ञ प्रधान हो जाएगा। अंतिम दिन पूर्णाहुति के साथ ही प्रज्ञापुराण कथा का अंतिम सोपान मध्यान्तर में संपन्न होकर टोली कार्यकर्ताओं की अनुयाज गोष्ठी लेकर आगे बढ़ जाएगी। अपवाद रूप में कहीं कथा मध्याह्न में एवं बौद्धिक उद्बोधन दी तीन खण्डों में शाम को हो सकते हैं।
इन नूतन अभिनव आयोजनों की मात्र तीन टोलियाँ 22 जनवरी तक के लिए निर्धारित की गयी है। इनकी संख्या बढ़ायी नहीं जाएगी, न ही तिथि 22 जनवरी, 1999 के बाद की बढ़ायी जाएगा, बसंत पंचमी के रूप में इस दिन से साधनावर्ष की शुरुआत होगी, जिसके स्वयं के विषय में गायत्री जयंती गुरुपूर्णिमा पर्व तक सबकी जानकारी हो सकेगी। कार्यक्रम संबंधी निर्धारित प्रारूप भरकर आने पर सभा पक्षों पर विचार विमर्श कर ही कार्यक्रम तय हो सकेंगे। पूर्व निर्धारित सभी कार्यक्रम इसी प्रकार परिवर्धित किये जा रहे हैं।
नवसृजन निश्चित ही बड़ा कठिन कार्य है। जब भी कोई कार्य नए सिरे से आरंभ कर उसे पूरा अंजाम दिया जाता है, अगणित साधन उसमें झोंक देने पड़ते हैं- प्रतिभाशाली विशेषज्ञों की मदद लेनी पड़ती है-सभी से सहयोग की अपील की जाती है। एक विशिष्ट उद्देश्य को लेकर चली युगनिर्माण मिशन की यात्रा चलते-चलते एक ऐसे मोड़ पर आ पहुँची है कि अब ‘करो या मारो’ की स्थिति सामने आ गयी है। गिरते नैतिक मूल्य-शिक्षण-संस्थाओं में संव्याप्त भ्रष्टाचार, समाज में फैला लिंग-भेद का विष, प्रदूषण से लेकर विभिन्न कारणों से बढ़ती जा रही अशक्ति, महामारियों की श्रृंखला हम सबसे अपेक्षा रखती हैं कि यदि मानवजाति को बचाना हो तो इसके लिए परिष्कृत धर्मतन्त्र को ही आगे आकर मार्गदर्शन करना होगा।
गायत्री तपोभूमि मथुरा, शान्तिकुञ्ज हरिद्वार, ब्रह्मवर्चस शोधसंस्थान के रूप में युगऋषि द्वारा की गयी तीन स्थापनाएँ इसी लक्ष्य के निमित्त थीं कि जनता को मात्र सरकार का मुँह न ताकना पड़े। स्वावलम्बन प्रधान अनौपचारिक शिक्षा का प्रचलन, सुसंस्कारी समाज के निर्माण से तथा योग-मंत्र विज्ञान से लेकर यज्ञोपैथी, आयुर्वेद को विद्या का पुनर्जीवन हो-सभी को मार्गदर्शन इन त्रिविध संस्थाओं से मिले, यही परमपूज्य गुरुदेव का लक्ष्य रहा है। सारा विगत का अनुशीलन-पर्यवेक्षण बताता है कि इस कसौटी पर निश्चित ही तीनों संस्थाएँ खरी उतरी हैं। अपने प्रयास-पुरुषार्थ में पूज्यवर के मार्गदर्शन में सक्रिय इन संस्थानों ने कोई कमी न रख ज्ञानयज्ञ विस्तार के माध्यम से युगसंजीवनी घर-घर पहुँचाई है-ऑडियो-वीडियो कैसेट द्वारा जन चेतना जगाई है एवं प्रत्येक को प्रगतिशील चिन्तन के लिए विवश किया है।
अब छह अरब की जनसंख्या के लिए नूतन निर्धारण करने की स्थिति आ गयी है। समूचे विश्व को दिशा देनी है तो उसके लिए प्रस्तुत स्थान, साधन स्वल्प ही पड़ते है। सूक्ष्म रूप में कण-कण में विद्यमान परमपूज्य गुरुदेव की सत्ता की अनुकम्पा से शान्तिकुञ्ज के समीप ही वर्तमान शान्तिकुञ्ज से ढाई गुना बड़ा स्थान उपलब्ध हो गया है। इसकी विधिवत् रजिस्ट्री आदि संपन्न होकर महाशिवरात्रि की पावनवेला में वरुण देवता के अभिसिंचन के मध्य भूमिपूजन महाकाल का पूजन भी संपन्न हो चुका। प्रायः 11 लाख वर्ग फुट (131 बीघा) में फैली यह भूमि हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग से सटी हुई वर्तमान शान्तिकुञ्ज से मात्र 2 फर्लांग की दूरी पर है। यहाँ जो भी कुछ निर्माण किया जाना है उसके संबंध में विस्तार से परिजन जून, 98 में नवसृजन अंक में जानकारी अर्जित कर सकेंगे, यहाँ तो उसका एक खाका मात्र खींचा जा रहा है ताकि तब तक अपने सुझाव, साधन, समय एवं साधना का नियोजन सोच सके।
भारतीय संस्कृति के विश्वविद्यालय एक डीम्ड खुले यूनिवर्सिटी कैंपस के रूप में इसे विनिर्मित करने का मन है। आर्कटिक्टों, इंजीनियर्स, बिल्डर, प्लानर स्तर के विशेषज्ञों, प्रोजेक्ट निर्माताओं सर्वेयर्स, आयुर्वेद के विशेषज्ञ स्तर के चिकित्सकों शिक्षाविज्ञान से जुड़े विद्या-विशेषज्ञों को इसकी प्लानिंग के लिए 11,12 अप्रैल एवं 18,19 अप्रैल, 1998 की अवधि ( दोनों शनिवार-रविवार ) में शान्तिकुञ्ज आमंत्रित किया गया है। इनसे व्यापक विचार-विमर्श किया जाएगा। सभी पाठक-परिजन इस बीच कम से कम चिंतन करके अपने सुझाव-परामर्श तो भेज ही सकते हैं।
आज सार्थक-संस्कार प्रधान शिक्षा प्रदान करने के लिए शिक्षकों के प्रशिक्षण की अनिवार्य आवश्यकता मालूम पड़ती है। लगता है कि धर्मतंत्र के पुरोधाओं को ही अब शिक्षानीति भी बनानी पड़ेगी। नैतिक शिक्षा में गुंथने वाले पाठ्यक्रम भी बनाने पड़ेंगे ताकि देश भर के आदर्श समझे जाने वाले विद्यालयों-शिशुमंदिरों-शक्तिपीठों से यह तंत्र गतिशील हो सके। यह शिक्षा नौकरी प्रधान न होकर अनौपचारिक हो, यह सोच पूज्यवर की रही है। ऐसा चिन्तन करने वाले विशेषज्ञ यहाँ आमंत्रित किए गए हैं। चिकित्सा विज्ञान भी पुनर्जीवन माँगता है। आयुर्वेद की विद्या दिनोंदिन लोकप्रियता के शिखर पर चढ़ रही है, किंतु इसे पुनर्जीवित करने वाला जो तंत्र बनना चाहिए था, वह नहीं बन पाया हैं। आयुर्वेद की एक रिसर्च विंग सहित वैकल्पिक चिकित्सा से जुड़े सभी तंत्रों की नयी भूमि में प्राण-प्रतिष्ठा की जाएगी वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में अधिक उपकरणों द्वारा जब निर्धारण प्रस्तुत किए जाएँगे। सभी मानने को बरबस सहमत होंगे। एक विशाल वनौषधि उद्यान भी यहाँ लगाया जाएगा।
इसके अतिरिक्त प्रवासी भारतीयों के रहने व प्रशिक्षण हेतु एक पूरी विंग यहाँ बनायी जानी है। प्रवासी परिजनों के बच्चों के प्रशिक्षण के लिए पाठ्यक्रम तैयार किया जा रहा है। वे छह माह यहाँ रहकर अपने देश जाएँगे तो निश्चित ही देवसंस्कृति के संदेशवाहक बनेंगे। प्रचारकों का, हिन्दुत्व का, भारतीय संस्कृति का विज्ञानसम्मत प्रचार ही नहीं-क्षेत्र का नवनिर्माण करने वाले लोकनायकों का प्रशिक्षण भी यहाँ किया जाएगा, जो छह माह से एक वर्ष की अवधि का होगा। इससे निश्चित ही एक बड़ा अभाव दूर होगा, जिसके चलते देश बिखराव-खण्डन की ओर जाता दिखाई दे रहा है। एक शब्द में नालन्दा-तक्षशिला स्तर के प्रशिक्षण महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों के निर्माण की अभिनव योजना, सूक्ष्म जगत से अवतरित हुई है। विस्तार से जून, 98 अंक में पढ़े, किन्तु सोचना तो अभी से आरम्भ कर ही दें।
*समाप्त*