जमीन फाड़ती है, पत्थरों से टकराती है तब कहीं आगे बढ़ती है और अपने अस्तित्व की रक्षा कर पाती है। मुलायम मिट्टी के बिछौने में पड़ा हुआ बीज यदि ऊपर ढके ढेलों को ढकेलने की हिम्मत नहीं दिखलाता, तो बीज से वृक्ष बनने का गौरव उसे कैसे मिल पाता? आगे बढ़ने वाली जातियों का इतिहास जिन्होंने भी ध्यान पूर्वक पढ़ा है, तो यही पाया है कि उन्नति के शिखर के लिए उन्हें संघर्ष के बीच बढ़ना और रास्ता बनाना पड़ा और यह सिद्ध करना पड़ा कि बाधाओं के मुकाबले उनका साहस और संघर्ष की शक्ति चुक नहीं सकती। तब कहीं उन्हें सफलता का राजसिंहासन मिल पाया।
सच्चे अर्थों में जीवित वही है जो अत्याचार से लड़ सकता है। अन्याय और अनीति से टकरा सकता है, रोष प्रदर्शित कर सकता है। सामने अनीति होती रहे और चुपचाप खड़े देखते रहे, यह कायरता का प्रमुख चिह्न है। वीरतापूर्वक जीने की नीति में ही मानवीय प्रगति का आधार छिपा हुआ है। हमें दुनिया की जिन्दादिल कौम की तरह अपना वर्चस्व बनाए रखना है, तो इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं कि हम भीतर और बाहर की बुराइयों से लड़ने के लिए एक तत्पर सिपाही की भाँति अपना प्रत्येक मोर्चा मजबूत बनाये और आज से, अभी से अनीति को मिटाने में जुट जायें।
आगे बढ़ने की इच्छा और नये जन्म में कोई अन्तर नहीं है। अन्तरात्मा कहे कि उन्नति करनी चाहिए तो यह समझना चाहिए कि तुम्हारी जीवनी-शक्ति अदम्य साहस और विश्वास से ओत-प्रोत है। अब एक ही बात शेष रहती है, वह यह कि उठो और बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ चलो। फिर जब तक मंजिल नहीं मिल जाती, संघर्ष का संबल मत छोड़ो। वीर और विजयी की भाँति मुश्किलों से टकराते हुए आगे बढ़ते ही चले जाओ।
साहसी व्यक्तियों को शक्ति उधार नहीं माँगनी पड़ती, उनका अन्तरात्मा ही उन्हें बल प्रदान करता है। नीति के पथ पर बढ़ने वाले को ईश्वर का विश्वास और उसका अनुग्रह काफी है। ऐसा व्यक्ति जब बुराइयों को, अन्ध परम्पराओं को और सामाजिक कुण्ठाओं को रौंदता हुआ आगे बढ़कर चल पड़ता है, तो उसका अनुसरण करने वाले अपने आप उपज पड़ते है। फिर संसार की कोई शक्ति उसे पराजित करने में समर्थ नहीं होती।
एक बात याद रखने की है, वह यह कि सच्चाई और ईमानदारी से प्रेरित संघर्ष ही स्थायी प्रगति का आधार है। अकेला संघर्ष ही काफी नहीं, उसमें सत्य का समन्वय होगा, तो ही भीतरी शक्ति का आशीर्वाद मिलेगा।
अन्याय एक चुनौती है, जो इन्सान की इंसानियत को ललकारती है। उसका उत्तर कोई डरपोक और कायर नहीं दे सकता। उस बेचारे को अपने स्वार्थ, अपने प्रलोभनों से ही मुक्ति कहाँ?
पर जिनमें मनुष्यता शेष है, वे अनीति और अन्याय के प्रतिकार के लिए जान की बाजी लगाते हैं। मनुष्य जीवन की सच्ची शोभा भी यही है।
कामना तो आखिर कामना ही है। अर्जुन ने हठ किया तो द्रौपदी ने कह दिया- आप ला सकते हैं तो मेरे लिए नन्दनवन के वह परिजात ला दें जो जल में नहीं, पत्थरों में पैदा होते हैं, जिनकी सुगन्ध कस्तूरी-मृग से भी मादक होती है, जिसका सौंदर्य दिव्य सौंदर्य की अनुभूति करा देता है।
अर्जुन चले और नन्दनवन पहुँचे। वहाँ के रक्षक से उन्हें युद्ध करना पड़ा। तब कहीं एक फूल द्रौपदी के लिए ला सके।
महाभारत की इस कथा में सम्भवतः कल्पना अधिक, तथ्य कम जान पड़ता हो, किन्तु यह कल्पना नहीं आश्चर्यजनक रहस्य ही है कि ऐसा नन्दनवन आज भी इसी भारतभूमि में वैसे ही विद्यमान है, जैसी महाभारत में कथा आती है। समुद्र-तल से १३२.. फुट ऊँचा हिमालय की गोद में स्थित स्थान आज भी,’फूल घाटी’ के नाम से विख्यात है। प्रति वर्ष हजारों विदेशी पर्यटक यहाँ पहुँचते और जहाँ, वहाँ की मादक छटा को देखकर मुग्ध होते हैं, वहीं यह आश्चर्य भी है कि १.-१५ मील क्षेत्र में प्राकृतिक तौर पर उगते आ रहे इन हजारों प्रकार के चित्र-विचित्र पुष्पों को किसने रोपा? सारे संसार में ऐसा कोई भी स्थान नहीं, जहाँ प्राकृतिक तौर पर इतने अधिक, इतने सुन्दर, इतने वर्ण के पुष्प और कहीं खिलते हों।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह फूल प्रकृति की उतनी अधिक देन नहीं है। जितनी इस बात की संभावना कि यह पौधे अतीत काल में सुनियोजित ढंग से विकसित किये गये हों। सम्भव है यह कोई राज्योद्यान रहा हो, यह भी सम्भव है कि यहीं कभी किसी महर्षि का तपोवन-आश्रम रहा हो। जो भी हो महाभारत काल के बाद तो यह स्थान सैकड़ों रहस्यों की तरह छुपा ही रहा, जिनके लिए प्रतिवर्ष देश-विदेश के सैकड़ों पर्वतारोही भारत आते और हिमालय के आश्चर्य खोजने का प्रयत्न करते हैं।
जहाँ अनेक धार्मिक व्यक्तियों का यह विश्वास है कि हिमालय में राजाओं द्वारा छिपाये हुए खजाने हैं, यज्ञों के बहुमूल्य पात्र, आभूषण और अस्त्र हैं, वहाँ पर्वतारोहियों का यह कथन है कि हिमालय के प्रत्येक वनस्पति, औषधि है। जहाँ धार्मिक लोग विश्वास करते हैं कि वहाँ अभी भी अखण्ड अग्नियाँ स्थापित हैं, ऐसे ऐसे गुप्त आश्रम हैं जहाँ अर्द्धसहस्र आयु के भी सन्त महात्मा समाधिस्थ हैं, वहाँ पर्वतारोहियों ने हिमालय की कल्पना ही हिमालय में नहीं की, उनके पद चिह्न भी देखें हैं। आदि साधना-भूमि होने के कारण हमारा भी विश्वास है कि हिमालय में अध्यात्म-विज्ञान की वह अदृश्य तरंगें, वह ज्ञान अब भी विद्यमान है जिसे प्राप्त कर इस भौतिक युग की सम्पूर्ण जड़वादी मान्यताओं, परम्पराओं, सिद्धान्तों को बालू की दीवार की तरह बदला जा सकता है। पुष्प घाटी ऐसे-ऐसे रहस्यों की ही पुष्टि का एक प्रमाण है।
तीर्थयात्रा और आत्मकल्याण के लिए साधनाओं की दृष्टि से अब हिमालय ही एक पुण्य स्थान बचा है। वहाँ चित्ताकर्षक शान्ति है, अतुलित प्राण और सौंदर्य भरा है, उसमें। जो एक बार इस पुष्प घाटी को ही देख आता है, वह हिमालय का सौंदर्य भूलता नहीं। वह वहाँ बार-बार जाता है। पुष्पघाटी तक पहुँचने के लिए जोशीमठ पहुँचना पड़ता है। वहाँ से बद्रीनाथ को जाने वाली सड़क पर मध्य में गोविन्दघाट स्थान पर उतरना पड़ता है। यहाँ से पैदल चढ़ाई है और आगे घाघरिया तक की ७ मील की दूरी को पार करने के लिए पूरा एक दिन लग जाता है।
घाघरिया से कुल एक घण्टे में मुख्य घाटी पहुँच जाते हैं। उसकी दाहिनी ओर कुबेर भण्डार पर्वत और आगे ‘कामेट चोटी’ हैं। बायीं ओर सप्राष्टंग पर्वतों की चोटियाँ हैं। कामेट झरना सामने ही बहता हुआ आ रहा है। म्यूडार ग्राम पर पहुँचते ही यह पुष्पघाटी मिल जाती है और अनेक प्रकार के गुलाब, कुमुदिनी, गुल्दावदी, सिल्पाड़ा, जंगली गुलाब, चम्पा, जुही, बेला, और कुछ फूल तो ऐसे हैं, जिनके नाम वैदिक साहित्य में हैं पर अब उनकी सही जानकारी करना कठिन है। अंग्रेजों ने इनके नाम वड़ ऑफ पमडाइज, ग्लाडेओली, हिमालयन, आरकिड, हिविस्टकम आदि रख लिये हैं। कथींड के सफेद व बैगनी फूलों के गुच्छे बड़े मोहक लगते हैं। बुराँस फूल तो गुलाब के सौंदर्य को भी मात देता है। जब यह बुराँस पूरी तरह अपनी ऋतु में फूलता है, तो यह वन नन्दनवन या स्वर्ग से भी सुहावना प्रतीत होता है। कितना ही देखो न तो आँखें थकती है और न वहाँ से हटने का जी करता है।
ब्रह्म-कमल यहीं पाया जाता है। कमल जल में ही हो सकता है पर प्रकृति के संसार में क्या बन्धन? उसने यहाँ पत्थरों में कमल उगा कर यह दिखा दिया कि उसकी सत्ता सर्वशक्तिमान है। यह कमल श्वेत रंग का होता है, इसकी सुगन्ध ऐसी जादूभरी होती है कि हल्की-सी महक से ही अनन्त सुख और शान्ति का आभास होता है, इसलिए इसका नाम ब्रह्म-कमल पड़ा है। इसे पाकर ही द्रौपदी की इच्छा पूर्ण हुई थी।
फूल कहीं भी हो, वह तो प्रकृति का उन्मुक्त सौंदर्य है। जो लोग अपने घरों के आस-पास थोड़े से भी फूलों के पौधे लगा देते हैं, तो वह स्थान इतना अच्छा और आकर्षक लगने लगता है कि बार-बार वहाँ जाने का मन करता है, फिर एक ऐसे प्रदेश में पहुँच कर जहाँ १. इंच से लेकर २८ इंच ऊँचाई के पौधे केवल फूलों से ही आच्छादित हों, उस स्थान के सौंदर्य का तो वर्णन ही क्या किया जा सकता है, यह स्थान तो ईश्वर या उस दिव्य आत्मा के समान है, जिसके इस सौंदर्य और आनन्द की अनुभूति ही हो सकती है, अभिव्यक्ति नहीं।
वैयक्तिक हो, चाहे सामाजिक सुव्यवस्था, दोनों के लिए धर्म-धारण अर्थात् अध्यात्म से बढ़कर और कोई साधना नहीं हो सकता। व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में संव्याप्त अवांछनीयता पर बलपूर्वक नियंत्रण करने में शासन की अधिकांश क्षमताएँ नष्ट होती रहती हैं, फिर भी कुछ कहने लायक समाधान नहीं मिलता। यदि धर्म-धारणा को प्रखर और समुन्नत बना सकने योग्य वातावरण उत्पन्न किया जा सके, उचित साधना जुटाये जा सके, तो निःसंदेह सामाजिक सुव्यवस्था और राष्ट्रीय समर्पण का प्रयोजन सहज ही पूरा हो सकता है। सार्वभौम और सर्वकालीन सुख शान्ति की स्थापना धर्म-धारणा को सुदृढ़ और समुन्नत बना कर ही की जा सकती है।
यों तो आज सुख-शान्ति के लिए अधिक सुविधाजनक साधनों की खोज में विज्ञान और शासन के प्रयास निरन्तर चले आ रहें है। दोनों अपने-अपने ढंग से अपनी-अपनी क्षमताओं को मनुष्य को समुन्नत बनाये में खपा रहें हैं और उसकी फलश्रुतियाँ भी सामने हैं, इतने पर भी इस तथ्य को भूला दिया जाता है कि मनुष्य एक चेतनात्मक परिपूर्ण सत्ता है आनन्द का उद्गम उसके भीतर है। वहीं अन्तर्ज्योति जब बाह्य जगत पर प्रतिबिम्बित होती है तो सौंदर्य, संतोष एवं सुखानुभूति का अनुभव होता है। अतः उत्कर्ष चेतना का भी होना चाहिए। चेतना का परिष्कार किये बिना, विचारणा का स्तर ऊँचा उठाये बिना विपुल साधना सम्पत्ति होने पर भी न आनन्द मिल सकेगा और न उल्लास व संतोष। विचारणा को उत्कृष्टता के स्तर तक उठाने और सुदृढ़ बनाने में धर्म का तत्त्वज्ञान ही समर्थ हो सकता है। भौतिक विज्ञान इस प्रयोजन की पूर्ति में बहुत अधिक सहायता नहीं कर सकता।
इस संदर्भ में प्रख्यात मनोवेत्ता जुँग ने अपनी कृति ‘माॅर्ड्रन मैन इन सर्च ऑफ सोल’ में कहा है कि जब विज्ञान में भी किसी वस्तु का ज्ञान प्राप्त करने के लिए विशिष्ट यंत्र ही आवश्यक ही उपयोगी होते हैं। इसमें न तो माइक्रोस्कोप द्वारा दूरस्थ तारे को देखा जा सकता है, वरन् शक्तिशाली टेलिस्कोप की जरूरत पड़ती है और न ही सर्जन की छुरी कैंची से मलेरिया के अत्यन्त सूक्ष्म जीवाणु-विषाणु देखे जा सकते हैं। उपयुक्त यंत्र उपकरण से ही तत्संबंधित वस्तुओं की, बीमारियों की जाँच परख की जा सकती है। इसी प्रकार बुद्धि के द्वारा अध्यात्मिक सत्य का परीक्षण नहीं किया जा सकता, भले ही वह कितनी ही तीक्ष्ण क्यों न हो।
पदार्थ से सुख मिलता है, यह सिद्धान्त भी अपने स्थान पर ठीक है, पर गलत यह भी नहीं कि उत्कृष्ट चिन्तन उपलब्ध साधनाओं की मात्रा अधिक न होने पर भी जो हस्तगत है, उससे इतना आनन्द उठाया जा सकता है, जो परिपूर्ण संतोष प्रदान कर सके। इसी तरह भौतिक विज्ञान द्वारा सुविधा साधनाओं की दिशा में निरंतर किये जा रहे अभिवृद्धि के प्रयासों से भी समुचित लाभ तभी उठाया जा सकेगा, जब भावना एवं दृष्टिकोण को ऊँचा उठा सकने में समर्थ धर्म तत्वों को समझने के लिए भी समानान्तर प्रयास किया जाये। आज जहाँ विज्ञान ने शक्ति को पदार्थ के रूप में और पदार्थ को शक्ति के रूप में परिवर्तित करके यह सिद्ध किया है कि सूक्ष्म को स्थूल में और स्थूल को सूक्ष्म में परिवर्तित किया जा सकता है, वही दर्शन और अध्यात्म हजारों वर्षों पूर्व से यह सिद्ध करता आ रहा है कि विचार को घटना के रूप में विकसित किया जा सकता है और घटनाएँ विचारों का निर्माण कर सकने में समर्थ हैं।
वस्तुतः मानव जीवन उतना जटिल नहीं है जितना कि बन गया है या बना दिया गया है, हँसी-खुशी की संभावनाओं से वह भरा-पूरा है। शरीर और की मन की संरचना इस प्रकार हुई है कि वह बाहर के तनिक से साधनों की सुविधा प्राप्त हो जाने पर सहज की स्वस्थ और सुखी रह सकता है। अतिस्वल्प साधनों से अन्य जीवधारी अपना संतोषपूर्ण व्यवस्थाक्रम चलाते रहते है, न उन्हें रुग्णता सताती है और न ही खिन्नता। यदि उन्हें सताया न जाये तो शरीरयात्रा की प्रचुर परिमाण में उपलब्ध साधन- सामग्री से ही अपना काम चला लेते हैं और हंसी-खुशी के दिन काटते हैं।
मनुष्य को यह सुविधा तो और भी अधिक मात्रा में उपलब्ध है। उसका अस्तित्व एवं व्यक्तित्व इतना समर्थ है कि न केवल शारीरिक सुविधा की सामग्री, वरन् मानसिक प्रसन्नता की परिस्थिति भी स्वल्प प्रयत्न से प्रचुर मात्रा में प्राप्त कर सकता है। इतने पर भी देखा यह जाता है कि मनुष्य खिन्नता और अतृप्ति से ही घिरा रहता है। भौतिक सम्पदा व विज्ञानजन्य विपुल साधन-सुविधा उपलब्ध होने पर भी असंतोष व आधि-व्याधियों की घटाएँ उस पर सदा छायी ही रहती है।
तमाम सुविधाएँ एवं सौभाग्य जैसे समस्त साधना प्राप्त होने पर भी दुर्भाग्य की जलन में झुलसते रहने के पीछे एक ही कारण ढूँढ़ा जा सकता है। कि सहज रीति -नीति को छोड़कर हम जाल-जंजाल भरी विद्रूप विडम्बनाओं में उलझ गये और अपना मार्ग स्वयं कंटकाकीर्ण बना लिया। सहज स्वाभाविकता का नाम है- ‘धर्म’ और इसके विपरीत आचरण को अधर्म कहते हैं। वैयक्तिक और सामाजिक कर्तव्यों को जो सही तरह समझता है और सही तरह पालन करता है, उसे स्वल्प साधनों में भी तुष्ट, पुष्ट और प्रगतिशील देखा जा सकेगा। धर्म की धारणा निश्चित रूप से सुख-शान्ति के प्रतिफल प्रदान करती है।
मूर्धन्य मनीषी एलिस ने कहा है कि मनुष्य के मन और शरीर को आधि-व्याधियों ने इसलिए घेरा है कि उसे धर्म का समुचित संरक्षण नहीं मिला। यदि आहार-निद्रा की तरह धर्म को भी जीवन की अनिवार्य आवश्यकता माना गया होता तो हम आज जिन शोक संतापों की विविध ज्वालाओं में घिर कर जल भून रहे हैं, उन व्यथाओं को सहने से सहज ही बच सकते थे।
सन्त आंगस्टाइन ने मानव की, मानव के प्रति कर्तव्य घोषणा को माना है जबकि सेन्टपाल का कथन है कि पतन के गर्त के उत्थान के शिखर पर चढ़ने की सीढ़ी को धर्म कहना उपयुक्त होगा। हेम्रोज ने भी अपना मन्तव्य कुछ इसी तरह से व्यक्त किया है। उन्होंने धर्म को दो धाराओं में विभक्त किया है- एक आस्थामूलक और दूसरी व्यवहारपरक। आस्था की स्थापना आध्यात्म के आधार पर होती है और आचरण व्यवहार का समीकरण धर्माचरण पक्ष पक्ष द्वारा किया जाता है। दोनों के समन्वय को धर्म कह सकते है। ईश्वरवाद के सहारे धर्म-सिद्धान्तों की व्याख्या और पुष्टि की जा सकती है। दार्शनिक विलियम बैंक ने धर्म को आत्मा का कवित्व कहा है। वे कहते हैं कि पुराणों के अलंकार में परियों की गाथाएँ और जादुई किम्वदन्तियाँ भरी पड़ी हैं। इन सब का सार निष्कर्ष यह है कि आत्मा की भावसरिता यदि उत्कृष्टता की दिशा में बह निकले तो उसका प्रतिफल व्यक्ति और समाज के लिए उतना ही सहज और आकर्षक हो सकता है, जैसा की देवताओं का सौंदर्य, वैभव और कर्तृत्व। इसी तरह ल्यूवा ने धर्म को एक सनातन राजमार्ग बताया जिस पर धीरे धीरे चलते हुए मनुष्य जाति विकास के वर्तमान स्तर तक पहुँचने में समर्थ हुई है और भविष्य में और कुछ अधिक पाने की आशा कर सकती है।
इस संबन्ध में फ्रेजर का अपना अलग मत है। वे धर्म को ईश्वरीय आदेश और आत्मतृप्ति का आधार मानते हैं। कोमटे की मान्यता है कि अन्तरात्मा के मृदुल रस का बाह्य संसार के समन्वित करके कैसे बहुमुखी सरसता उत्पन्न की जा सकती है, इस आवश्यकता की पूर्ति कर सकने वाली कला का नाम ही धर्म है।
धर्म-धारण के सम्बन्ध में वस्तुतः अलग-अलग मनीषियों, दार्शनिकों के अपने अलग-अलग मत हैं, इतने पर भी सब ने उसे कर्तव्यनिष्ठा से जुड़ा हुआ बताया है। संत डाइनाइसिअस का निरूपण यह था कि अपने और अदृश्य जगत और अदृश्य जगत के परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाली धाराओं का एकात्म बना देने वाले महासमुद्र का नाम धर्म है। उसके आधार पर ही विरोध को सहयोग में एवं पृथकता को एकता में बदला जा सकता है। वर्तमान समय की तो यह एक अनिवार्य आवश्यकता ही बन गयी है। जब एक देश दूसरे देश से, एक धर्मावलम्बी दूसरे धर्मावलम्बी से ही नहीं, वरन् मानव समाज का प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक घटक एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में सम्मिलित है ओर एक दूसरे को रौंदकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है, ऐसी स्थिति में धर्मधारणा ही एकमात्र वह कारगर उपाय रह जाता है, जो भूले हुए को सही मार्ग पर ला सकता है। और कर्तव्यबोध करा सकता है।
प्रख्यात जर्मन दार्शनिक मैक्समूलर ने अपनी कृति ‘ऐन इन्ट्रोडक्सन टू द् साइन्स ऑफ रिलीजन’ में धर्म की विवेचना करते हुए लिखा है कि धर्म अन्तरात्मा की पुकार है, जो तर्क और जानकारियों को प्रभावित तो करती है, पर उससे प्रभावित नहीं होती। उसका आधार अतीन्द्रिय है। दिव्य चेतना ही हमें धर्मनिष्ठा अपनाने के लिए प्रेरित करती है। इसी संदर्भ में विलियम जेम्स ने लिखा है कि धर्म एक दूरगामी चिन्तन है, जिससे व्यक्ति की सामयिक परिस्थितियों की अपेक्षा समष्टि की सर्वांगीण और सर्वकालीन आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाता है। मनीषी अलबर्ट का कहना है कि धर्म हमारे भौतिक जीवन को सुखी बनाने में सहायक हो सकता है, पर भौतिक सुखों के लिए धर्म का उपयोग करना न तो उचित होगा और न संभव। धर्म एक आध्यात्मिक भूख है, जिसे तृप्ति करने के लिए भौतिक कष्ट भी सहने पड़ सकते हैं।
धर्म वस्तुतः एक नैतिक भावनात्मक एवं परिष्कार की नियोजित प्रक्रिया है। इसका लाभ परलोक में मिलेगा, इसकी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। धर्म-धारण जहाँ भी होगी, वहाँ आत्मसंतोष और आत्म उल्लास की ऐसी शक्ति विद्यमान रहेगी, जिसके सामने भौतिक दृष्टि से अभाव ग्रस्त समझा जाने वाला जीवन भी शांति और धैर्यपूर्वक सरल एवं सुरम्य बनाया जा सके।
धर्म मस्तिष्क नहीं अपितु अन्तः करण की देन है। इस संबंध में दार्शनिक पास्कल का कहना है कि हृदय के विवेक से धर्म का उदय होता है। उसे मात्र तर्कों की बैसाखी लगाकर नहीं खड़ा किया जा सकता। कान्ट ने भी धर्म की परिभाषा करते हुए उसे ऐसी मानवीय कर्तव्यनिष्ठा बताया है, जो मस्तिष्क तक सीमित न रहकर अंतःकरण के निष्ठा में घनीभूत हो गयी।
तत्त्वदर्शियों के उपर्युक्त अभिवचनों में धर्म शब्द के अंतर्गत जिस आधार की चर्चा की गयी है, उसे उत्कृष्टतावादी चिन्तन और आदर्शवादी कर्तव्य के अंतर्गत ही गिना-समझा जाना चाहिए। कर्तव्य परायण का ही दूसरा नाम धर्म है। शारीरिक मानसिक पारिवारिक सामाजिक और सार्वभौमिक जिम्मेदारियों से मनुष्य की उच्छृंखलता का मर्यादित किया गया है, उसे अपने स्तर के अनुरूप सृष्टि संतुलन के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ भी निबाहनी होती हैं। धर्म का प्रयोजन इसी मानवोचित शालीनता और कर्तव्यनिष्ठा को अक्षुण्ण बनाये रखना है। संस्कृति और सम्प्रदायों में क्षेत्रीय और सामयिक परिस्थितियों के अनुसार आचार-व्यवहार की व्यवस्था रहती है। इसलिए परिस्थिति के अनुसार इनमें बार बार सुधार परिवर्तन करना पड़ता है, पर धर्म के बारे में ऐसी बात नहीं है। वह शाश्वत और सनातन है। उसका स्वरूप सदाचार मर्यादा और लोकहित के रूप में चिर अतीत से ही निर्धारित किया जा चुका है। उसमें परिवर्तन की आवश्यकता कभी भी किसी को नहीं पड़ सकती। आवश्यकता है तो मात्र इतनी की हम उसे अपने जीवन में धारण करें, गुण, कर्म, स्वभाव का अंग बनायें, चिन्तन चरित्र व्यवहार में उतारें। स्थायी सुख शान्ति तभी मिल सकती है।
सिद्धार्थ गणराजा थे। उनकी पत्नी त्रिशला जितनी रूपवती थी उतनी ही विदुषी भी। जब से वह क्षत्रिय कुण्डग्राम में आयी, सिद्धार्थ का जीवन प्रफुल्लित हो उठा। वैशाली उस समय एक विशाल नगर था। लिच्छवियों की इस राजरानी के सौंदर्य से एकतंत्रो राजरानियाँ भी पराभूत सी रहती। कुण्डग्राम उसी वैशाली के क्षत्रिय का एक उपनगर था। सिद्धार्थ वहाँ के शासक थे। कुण्डग्राम में व्यापारी भी रहते हैं। व्यापारियों की बढ़ती हुई शक्ति ने उन दिनों यह प्रभाव डाला था कि कुछ लोग कुण्डग्राम को वाणिज्यग्राम भी कहने लगे थे।
वैशाली उन दिनों अपने पूर्ण वैभव पर पहुँच चुकी थी। गण के क्षत्रियों की वहाँ बड़ी शक्ति थी और वे सब विचारशील दार्शनिक थे। जहाँ एक ओर वे शत्रुओं से लोहा लेने में रणकौशल एवं बहादुर थे, वहीं दूसरी ओर उनकी दूरदर्शी विवेकशीलता की सब ओर सराहना होती थी। अपने जातीय गौरव को सुरक्षित रखने के लिए सबके सब प्राण-पण से सचेष्ट रहते थे।
वैशाली नगर लगभग १२ मील लम्बा था। उस समय इसमें तीन विभाग थे। सिद्धार्थ राजा के समय इसके वैभव का पार नहीं था। क्षत्रिय कुण्डग्राम नगर में अ स्थित था। ब्राह्मण कुण्डग्राम दक्षिण में था और इसी बीच का प्रमुख भाग वैशाली कहलाता था। प्रायः बाहर के लोग इस प्रकार का भेद नहीं करते थे। तभी उन्हें प्रकार राजा सिद्धार्थ वैशालक के नाम से भी पुकारा जाता था।
कुण्डग्राम के पूर्व और उत्तर का उपभाग कोल्लंगी कहलाता था। उसमें ज्ञातवंश-नागवंश के कुलीन क्षत्रिय रहते थे। कोल्लंगी अपने पास के पलाशवन के कारण अत्यन्त सुन्दर दिखाई देता था। इसके अद्भुत सौंदर्य के कारण लोग इस नगर को दूर-दूर से देखने आते थे।
सिद्धार्थ के पास पर्याप्त धन था, भूमि थी, दास-दासी थे। नागरिकों में उनका बड़ा सम्मान था। वह दुईपलास के देवमन्दिर में जाकर सिर झुकाते और सिर उठाते तो कुण्डग्राम के ७... घरों के सुंदर कलशों पर दृष्टि पड़ती। जिनमें से ज्यादातर सुवर्ण थे। दुईपलास के मन्दिर से वैशाली के घरों के ऊपर रजतकलश और ताम्रकलश भी दिखाई देते। उन्हें देखकर दृष्टि चौंधिया जाती। जो यवन और यवनियाँ उत्तर पश्चिम के दास बनाकर यहाँ बेचे जाते थे, वे तो इस वैभव को देखकर पराभूत हो जाते। मिश्र से यहाँ दास-दासी लाये जाते। पारसीक देश के नये विशाल साम्राज्य से जो व्यापारी यहाँ आते थे, वे स्वीकार करते कि उनके देश में इतनी विशाल राजधानी नहीं थी। अग्निपूजक ईरानी सम्राट भी इतने वैभव का स्वामी नहीं था। यद्यपि उसके पास अमित धन बताया जाता था।
वैशाली के व्यापारियों की नावें सहलाती तक जातीं, उधर मिश्र तक। उन दिनों जबकि मिनाओन तथा फीनिशियन सभ्यताओं का ग्रीस के आर्यों पर प्रभाव पड़ रहा था और वे होमर के नये काल्यों को गाने लगे थे। भारतीय व्यापारियों का वे सब भारी सम्मान करते थे। फिलिस्तीन में उस समय यहूदियों के दाऊद और सुलेमान के साम्राज्य समाप्त हो चुके थे। और उत्तर-पश्चिम में अनेक आर्य जातियाँ इधर बढ़ती -घटती घूम रही थी।
वैशाली का यह सारा ऐश्वर्य गणराजा सिद्धार्थ के इर्द-गिर्द घूमता था। उनकी पत्नी त्रिशला अधिपति चेटक की पुत्री थी। चेटक स्वयं भी एक धनी गणराजा था। उनका जामाता होने के कारण सिद्धार्थ का मान पहले से भी बढ़ गया था। चेटक स्वयं ईश्वर परायण एवं धर्मनिष्ठ व्यक्ति थे। उनकी दूसरी पुत्री चेलना मगध की एकतंत्रीय राजा विम्बसार श्रेणिक की पत्नी थी। चेलना का ईश्वर विश्वास उसके साथ मगध में भी पहुँच गया था। उसके पास सदैव ऋषि, मनीषी, मुनि, यति आते रहते थे।
वशिष्ठ गौत्रीय चेटक की पत्नी सुभद्रा के गर्भ से जब त्रिशला का जन्म हुआ था, तो लोगों ने उसे प्रियकारिणी कहा था। कुछ लोगों ने उसे विदेहदिन्ना कहा था। काश्यप गौत्रीय सिद्धार्थ से विवाह होने पर उसने पहले नन्दिवर्धन को जन्म दिया, फिर कन्या सुदर्शना को। इस बार त्रिशला पुनः गर्भवती थी। दैवज्ञ, ज्योतिषी कालचक्र के ज्ञाता गर्भस्थ शिशु के बारे में आश्चर्यजनक भविष्यवाणी कर रहे थे। वैशाली का प्रताप भी अनुदान बढ़ रहा था। सभी यही कह रहे थे कि यह सब रानी त्रिशला के गर्भ में आयी जीवात्मा के अमित पुण्यों का फल है।
स्वयं रानी त्रिशला को भी इस अलौकिक अद्भुत लग रहा था। माँ वे पहले भी बनीं थी। उन्होंने पुत्र एवं कन्या दोनों को ही एक एक बार गर्भ में धारण किया था। परन्तु इस बार की अनुभूति विचित्र और विलक्षण थी। पल-पल उन्हें लगता था कि उनकी कोख में ईश्वर की दिव्य-ज्योति समा गयी है। अनजानी प्रसन्नता एवं अनचाहे उल्लास की लहरें हर क्षण उनकी अन्तर्चेतना से फूटती झरती रहती। हर समय उन्हें यही लगता रहता, मानो वे किसी दिव्यधाम की निवासिनी हो गयी हैं। जाग्रति की अलौकिक आभा सोते समय भी अपना प्रकाश बिखेरती रहती। उन्हें अद्भुत एवं दिव्य स्वप्न दिखाई देते। एक रात तो जैसे इन दिव्य स्वप्नों की बाढ़-सी आ गयी।
प्रातः जगकर उन्होंने अपने पति से कहा- आर्य पुत्र! रात मैंने बड़े अद्भुत स्वप्न देखे थे।
वह क्या थे? गणराजा सिद्धार्थ ने बड़े ही कुतूहल से पूछा।
देव पहले मैंने एक श्वेत गजराज देखा।
अत्यन्त शुभ है वह तो ..............................।
दूसरी बार मैंने देखा, कि एक वृषभ उस हाथी के सामने होकर निकला।
वृषभ?
तीसरी बार मैंने एक सिंह देखा।
सिद्धार्थ ने सिर हिलाया।
चौथी बार लक्ष्मी को देखा।
लक्ष्मी उस समय आर्यों में पूज्य हो चुकीं थी। सिद्धार्थ ने त्रिशला की ओर देखा जो अपनी बहुमूल्य शैया पर एक हाथ की कुहनी उठाये हथेली को सिरहाने के तकिये पर टिकाकर कुछ भूली हुई सी कुछ विमुग्ध सी बोलती जा रही थीं। उनके रेशम वस्त्र अत्यन्त स्वच्छ थे। पर्यटक से फूलों के हारों की गंध आ रही थी। रक्तचन्दन से लिप्त वस्त्र पहने सिद्धार्थ अपने स्वर्णमुकुट को सिर पर ठीक करके अपनी अँगूठियों में जड़े हीरे को देखते हुए बोले, किस रूप में.........।
आर्यपुत्र, देवी रूप में।
जाज्वल्यमान............
मनोहरा
स्मितमयी...........
ममलासना
दिव्य
परमशान्तिमयी
सिद्धार्थ ने कहा- साधु।
त्रिशला ने फिर कहा, फिर मैंने देखी सुगन्धित और खिले हुए पुष्पों की माला और उसके बाद ही मैंने चन्द्रमा देखा उसके बाद मुझे सूर्य दिखाई दिया।
चन्द्र भी, सूर्य भी?
हाँ, आर्यपुत्र।
पर उसके अनन्तर मैंने वायु के वेग में फहराती हुई ध्वजा देखी। ऊपर, सबसे ऊपर। उसे देखकर मुझे उत्साह हुआ।
सिद्धार्थ चुप रहा। त्रिशला ने कहा। फिर मुझे कलश दिखाई पड़ा। उसके पश्चात मैंने अपने को प्रफुल्ल कमलों से भरे हुए सरोवर में रमणीक तट पर पाया। वह बहुत सुंदर था। कमलों के माँसल दल खिले हुए थे। भ्रमर उन पर गुँजार कर रहे थे। दूर दूर तक श्वेत दलों का स्वच्छ स्वरूप दिखता था। नीचे जल पर बिछे पुरइनों पर जल की बूँदें मोतियों की भाँति दिखाई देती। वे सुघर मृणाल अत्यन्त मृदुल और स्निग्ध-सी अपने ही पराग से सुरभित मंद मंद पवन के सीकरों से आन्दोलित-सी धीमे-धीमे झूम उठती थी और निर्मल जल पर पराग की फुही सी कमल गर्भ में से भर जाती।
देव! दृश्य बदल गया। मैंने देखा मैं एक विस्तृत तीर भूमि पर खड़ी। मेरे सामने एक भव्य श्वेत राशि आन्दोलित हो रही थी। वह क्षीर समुद्र था। कितना श्वेत था वह, मैं कैसे बताऊँ? वहाँ कलुष की एक बूँद भी नहीं थी। फेन उठते थे, फिर उर्मियाँ गति लय पर संगीत सा उठाती और दूर जाकर लय हो जाती। जहाँ से दृष्टि क्षितिज तक फैल जाती और उसका अन्त कहीं नहीं दिखाई देता। किन्तु देव उस क्षीर सिंधु के भीतर से मुझे हाहाकार और गर्जन सुनाई नहीं दिया। वहाँ की वायु स्निग्ध थी, उसमें चिकनापन नहीं था। चारों ओर संगीत की लहरियाँ ही जैसे प्रतिध्वनित हो रही थी।
मैं आगे बढ़ी। अनन्त आकाश में उड़ता हुआ मुझे एक देदीप्यमान दिव्य विमान दिखाई पड़ा। उसमें हँसी के आकार की मणि जड़ित मूर्तियाँ बनी हुई थी और छोटी-छोटी घंटियाँ मधुर-मधुर स्वर से बज रही थी। उनके हीरक और नीलमणि जब मरकतों और मुक्ताओं की किरणों से प्रतिच्छादित होते तो उस विमान से मनोहर संगीत सुनाई देता। मैं विभोर-सी देखती रही, जब तक वह दृष्टि से लुप्त न हो गया। मैंने मुड़कर नीचे देखा तो बहुत ऊँचे पर ही मेरी दृष्टि चकित-सी ठहर गयी। मैं सोचने लगी वह क्या था। उस पर प्रकाश लकलक कर रहा था।
महाराज सिद्धार्थ के नेत्र कुछ फैल गये। पास खड़ी दासी के हाथ में हिलता चँवर अब मन्द हो गया। वातायन पर झूलती अमिट, धूपलहरी को फिर पवन प्रकोष्ठ लौटा आया और प्रकाश आँचल पकड़कर प्रभात वहाँ स्निग्धता से चपल चरणों को रोक कर खड़ा हो गया। आस्तरणों की सिलवटों में रात की खुमारी दुबकने लगी। विशाल दीवारों पर बने सुंदर चित्रों के पात्र जैसे त्रिशूल का वह अद्भुत स्वप्न सुनने लगे।
त्रिशला ने फिर कहा मेरी दृष्टि क्षण भर नहीं ठहरी, तब मैंने देखा कि वह एक नीलमणि था, बहुत बड़ा। उसके चारों ओर लाल रंग के रत्न जड़े थे। कितने थे वे रत्न के ढेर। जैसे-जैसे दृष्टि उतरती, उनका फैलाव बढ़ता जाता। वे असंख्य विभिन्न रंगों के चमकते रत्न मेरे सामने राशि-राशि रखे थे। मैं सोचने लगी थी कि समस्त लोकों का वैभव यहाँ आकर एकत्र हो गया है, उन पर जब प्रकाश चमकता तो इन्द्रधनुषों की भीड़ उमगने लगती। और फिर प्रकाश जाकर उन रत्नों के पक्ष पर मुस्कराने लगता।
दासी का हाथ फिर चलने लगा। उसने देखा महाराज सिद्धार्थ स्तब्ध थे। त्रिशला जैसे किसी सुदूर के भव्य स्वप्न को फिर समेट लेने का यत्न कर रही थी। और उसके बाद त्रिशला कहा मैंने निर्धूम जाज्वल्यमान अग्निशिखा देखी। बस केवल शिखा। अनन्त नील पर अपने ही आलोक से प्रज्वलित-सी पवित्र, जिसमें कोई कम्प नहीं था, किन्तु अकम्प दीप्ति थी। मैं उसे देखती ही रह गयी।
सिद्धार्थ ने कहा- फिर?
फिर मेरी आँख खुल गयी, स्वामी।
सिद्धार्थ उठ खड़ा हुआ।
व्यायाम करके जब उन्होंने जब उन्होंने शरीर पर तैल मर्दन कराके स्नान किया और दासियों ने उन्हें सुन्दर वस्तु आभूषण पहना दिये, तब वे गण के सभा स्थल में रथ पर बैठकर पहुँच गये। स्वप्न शास्त्रज्ञ वृद्धों को उन्होंने बुलवाकर त्रिशला के सारे स्वप्न सुनाकर उनका फल पूछा।
वृद्ध शास्त्रज्ञ सुप्रतीक ने अपने सफेद वालों पर बाँधे सफेद उष्णीश को हाथ से छूकर कहा महाराज, स्वप्न आने के नौ कारण होते हैं।
सिद्धार्थ ने कहा- आर्य स्पष्ट करें।
वृद्ध ने कहा- देव स्वप्न अनुभव से आते हैं। किसी बात को सुनकर मन में धारण कर लेने से स्वप्न आते हैं। गहराई से देखने और चित्त में उसकी स्मृति बनाये रखने से उससे सम्बन्धित सपने दिखाई देते हैं। प्रकृति का विकारमयी होना भी स्वप्न दिखाई देने का एक कारण है। स्वप्न सहज भी आ जाते हैं। स्वप्नों का जंजाल चिन्ताओं के कारण बढ़ता है। दैवी उपद्रवों से भी स्वप्न आते हैं। धर्मरतों को पवित्र स्वप्न दिखते हैं। पापी को अनिष्टकर व पापमय स्वप्न दिखाते हैं। पहले ६ कारणों से दिखे स्वप्न निरर्थक होते हैं, बाकी तीन फलदायक। वे यदि प्रथम प्रहर रात में देखे गये हो तो देखने वाले को बारह मास में फल मिलता है। दूसरे पहर में देखने पर ६ मास में और तीसरी पहर में देखने पर एक मास में फल दिखाई दे जाता है।
राजा सिद्धार्थ सुनते रहे।
वृद्ध शास्त्री सुप्रतीक ने कहा- त्रिशला देवी की बुद्धि धर्मरता है। सतत् साधना एवं तपश्चर्या से उन्होंने अपने को पवित्र बना लिया है। उनका मस्तिष्क महानताओं की कल्पना करता है। वे जीवन के सुदूर और श्रेष्ठ रूपों की ही कल्पना करती हैं। उनके स्वप्नों में ईश्वरीय चेतना के दिव्य संकेत की झलक मिलती है। उनके गर्भ से इसलिए एक अतिमहान एवं विशिष्ट पुत्र का जन्म होगा। उनके कुक्षि से जन्म लेने वाला पुत्र समस्त लोकों पर छा जायेगा आर्य।
कुछ और अधिक बतायें आचार्य! राजा सिद्धार्थ ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की।
ऐसे लक्षणों के स्वप्नों से तो आभास होता है कि ऐसी माता का पुत्र तीर्थंकर बनेगा।
तीर्थंकर! महाराज सिद्धार्थ के नेत्र आश्चर्य और आनन्द से फट गये। वह विह्वल हो उठे।
वृद्ध सुप्रतीक कह रहे थे- स्वप्नों से स्पष्ट होता है कि त्रिशला देवी उच्चस्तरीय चेतना के संपर्क में है। ऐसी माता के पुत्र लोकमंगल के लिए जन्म लेते हैं राजन! आप यह निश्चित जाने कि उनके पराक्रम से नीच विनष्ट हो जायेंगे।
सुवर्ण के सिक्कों से झोलियाँ भरकर स्वप्नशास्त्र के मर्मज्ञ आचार्य सुप्रतीक तो चले गये। किंतु समस्त नागकूल के क्षत्रियों में सिद्धार्थ के तीर्थंकर होने वाले पुत्र की कल्पना फैल गयी। त्रिशला ने सुना तो उनका हृदय और भी उदात्त हो गया और उनके मन में यह बात जम गयी कि पुत्र की किसी भी प्रकार छोटी बातें नहीं सिखाई जायेगी, क्योंकि वह महान बनने के लिए पैदा होगा।
नौ महीने साढ़े सात दिन पूर्ण होने पर चैत्र सुदी त्रयोदशी के दिन हस्तोत्तरा नक्षत्र के योग में महारानी त्रिशला देवी ने एक दिव्य पुत्र को जन्म दिया। बालक का नाम वर्धमान रखा गया। ज्योतिषियों ने जन्म-कुण्डली बनाकर कहा कि कुण्डली परम श्रेष्ठ है। उन्होंने भवनपति और व्यंतर ज्योतिषी, दिक्कुमारियों, शक, बारह देवलोकों बाठा व्यंतर आदि के क्रमशः दस-बीस और बत्तीस इन्द्र सूर्य और चन्द्र की उपस्थिति की ओर इंगित किया।
नागकूल में पारस्परिक उपहारों की धूम मच गयी। पूरे दस दिन का महोत्सव मनाया गया। बीस प्रकार के कर से उस वर्ष सभी को मुक्त कर दिया गया। प्रजा में जय-जयकार हुआ। तीसरे दिन पुत्र को चन्द्र और सूर्य के दर्शन कराये गये। छठे दिन नगर की परमसुन्दरी कुलीन रमणियाँ प्रासाद में मंगलगीत गाने आयीं। कुमकुम, अंगराग धारण किये एवं सुगंधित बहुमूल्य वस्त्रों और स्वर्णाभरणों से वे देवलोक की निवासिनी प्रतीत होती।
महारानी त्रिशला ने भी आनन्द से रात्रि जागरण किया। जागरण के अन्त में कुलीनों को भेंट दी गयी। ग्यारहवें दिन जातकर्मोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया गया। बारहवें दिन समस्त कूल एकत्र हुआ और प्रीतिभोज के उपरान्त बालक वर्धमान को आशीष दी। उन आशीर्वादों से प्रासाद की वैभवमयी भीति प्रतिध्वनित होने लगी। छोटे-सुडौल माँसल एवं सौंदर्य की साकार मूर्ति बालक वर्धमान को कूललनाएँ बार-बार गोद में लेतीं और तब बालक वर्धमान बड़ा होने लगा। बड़े होने के साथ साथ ही उसमें अपूर्व आध्यात्मिक तेज साकार होने लगा। उनके बचपन में ही सभी को महारानी त्रिशला के देखे गये स्वप्नों की सार्थकता नजर आने लगी और काल प्रवाह में एक घड़ी वह भी आयी, जब सभी को स्वीकार करना पड़ा कि सचमुच स्वप्नों के भी अर्थ होते हैं। माता द्वारा देखे गये सपनों को सार्थकता प्रदान करते हुए बालक वर्धमान सचमुच में एक दिन तीर्थंकर महावीर बन गये।
जब भी अनावश्यक, अनुपयोगी एवं अवांछनीय विचार मन में उठने लगे, तभी समझ लेना चाहिए कि भगवान से अपना सम्बन्ध विच्छेद होना शुरू हो गया है।
उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के भावपक्ष के तीन चरण हैं- (१) भजन (२) मनन (चिन्तन) इन तीनों को मिला देने से ही एक समग्र साधन-प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल और वायु के तीनों अंग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाये तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार आत्मिक जीवन के लिए भजन, मनन, और चिन्तन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है। अन्तः करण की स्वस्थता, प्रखरता परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीनों आधारों पर ही निर्भर है। गायत्री महामंत्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणा भी इसी त्रिवेणी को कहा जा सकता है।
सर्वोच्च साधना अद्वैत स्थिति का है। इनमें प्रवेश किये बिना न तो मनोलय होता है और न ईश्वरी प्राप्ति। जब तक ईश्वर से भिन्न अपनी अलग सत्ता बनी रहेगी, तब तक अपना विलय परमेश्वर में न होगा तब तक अपूर्णता का, पृथकता का अन्त न होगा। लययोग ही समाधि की, मुक्ति की परम स्थिति तक पहुँचा सकता है।
उच्चस्तरीय भजन के लिए शरीर को शिथिल और मन को उदासीन करना पड़ता है, ताकि न शरीर की माँसपेशियों पर कोई तनाव रहे और न मस्तिष्क में कोई आकर्षण-उत्तेजना पैदा करे। यह स्थिति कुछ ही दिन के अभ्यास से उपलब्ध हो जाती है। किसी आराम कुर्सी, कोमल बिस्तर या दीवार, पेड़ आदि का सहारा लेकर शरीर को निद्रित एवं मृतक स्थिति जैसा शिथिल कर देना चाहिए। इसे शवासन एवं शिथिलीकरण मुद्रा कहते हैं। शारीरिक दृष्टि से यह पूर्ण विश्राम है। मानसिक दृष्टि से इसे ध्यान भूमिका कहा जाता है। उत्तेजित तनी हुई नाड़ियाँ एवं माँसपेशियाँ होने पर कभी किसी का ध्यान लग ही नहीं सकता। इसलिए पद्मासन, बद्ध पद्मासन जैसे तनाव उत्पन्न करने वाले आसन और किसी प्रयोजन के लिए उपयोगी भले ही हों-ध्यान के लिए उल्टे बाधक होते हैं।
यही बात मन के सम्बन्ध में भी है। समस्त संसार में शून्यता संव्याप्त है। प्रलयकाल की तरह नीचे अथाह नील जलराशि और ऊपर नील आकाश है। सर्वत्र परमशान्तिदायिनी एवं नीलिमा एवं नीरवता संव्याप्त है। कहीं कोई व्यक्ति या पदार्थ नहीं। मन को आकर्षित करने वाली कही स्थिति परिस्थिति शेष नहीं। उस परम शून्यता में बालक की तरह अपनी निर्मल चेतना कमल पत्र पर लेटी हुई तैर रही है। अपने पैर का अँगूठा अपने मुँह में लगा हुआ है और आत्मा स्वरस का पान कर रही है। प्रलयकाल का ऐसा चित्र बाज़ार में बिकता भी हैं। मनःस्थिति को उसी स्तर का बनाने का प्रयत्न किया जाये तो शून्यता की मानसिक स्थिति बनती और बढ़ती चली जाती है। शारीरिक शिथिलता और मानसिक रिक्तता की उपर्युक्त स्थिति भजन साधना की पूर्व भूमिका समझी जानी चाहिए।
शिथिल शरीर एवं मनः स्थिति में भजन ठीक प्रकार हो सकता है। भावपरक ध्यानयोग का यही पूर्वार्द्ध है। आपरेशन करते इंजेक्शन लगाते समय हिलने डुलने पर प्रतिबन्ध रहता है। एक का रक्त दूसरे के शरीर में प्रवेश करते समय दोनों व्यक्ति अपने हाथों को हिलाते-डुलाते नहीं हैं। भजन के समय भी मानसिक संस्थान को इसी प्रकार शान्त रहना चाहिए।
भजन का उत्तरार्द्ध यह है कि उस सर्वशक्तिमान, सर्ववैभववान, सर्व उत्कृष्टताओं से सम्पन्न, सर्वाधिक प्रेम परमेश्वर को अपनी सत्ता में प्रविष्ट होते हुए, घुलते हुए अनुभव किया जाये। ब्रह्माण्डव्यापी दिव्यप्रकाश के सागर में अपने आप को मछली की तरह निमग्न अनुभव किया जाये। जिस प्रकार मिट्टी के ऊपर जल गिरने से दोनों के मिश्रण का एक नया रूप कीचड़ बनता है। वैसे ही भावना की जानी चाहिए कि परमप्रकाश अपने रोम रोम में संव्याप्त हो रहा है।
(१) शरीर के अंग प्रत्यंग में विश्व श्याम एवं बलिष्ठता का रूप धारण कर रहा है। (२) मस्तिष्क में विवेक और प्रखर प्रतिभा प्रखर तेजस बनकर बिखर रहा है। अंतरात्मा के हृदय संस्थान में वह देवत्व और आनन्द रूप बना बैठा है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरों में परमात्मा की परमज्योति को ज्वलन्त अग्नि की तरह समाविष्ट देखना, अपने को उस आलोक से आलोकित अनुभव करना भजन साधना की प्रधान ध्यान विद्या है।
इस संयोग की बेला में आनन्दानुभूति उठनी चाहिए। माता पुत्र का प्रेमी प्रेयसी का मिलन जितना सुखद होता है, उससे भी अधिक तृप्तिदायक यह आत्म-परमात्मा मिलन होता है। इस मिलन की प्रतिक्रिया को भी अनुभूति में उतारना चाहिए। शरीर और मन परमेश्वर को समर्पित किया गया और उसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद यही होना चाहिए कि अपना काय कलेवर पूर्णतया परमेश्वर की इच्छानुसार गतिशील रहे। अपनी कोई इच्छा कामना परमेश्वर पर न थोपी जाये। उसी की इच्छा में अपनी इच्छा मिलाई जाये। परमेश्वर जिसमें प्रसन्न हो वही सोचना और वही करना सच्चे भजन परायण भक्त के लिए उचित है। बदला पाने के लिए किया गया भजन तो वेश्यावृत्ति है।
कहा जा चुका है कि भावनात्मक साधनाओं के लिए संध्यावन्दन की तरह ब्रह्ममुहूर्त का बन्धन नहीं है। उसे सुविधानुसार नित्य उपासना के साथ आगे-पीछे किया जा सकता है। यही बात भजन साधना पर लागू होती है। उसे भजन के साथ या आग-पीछे किया जा सकता है। वातावरण शान्त और स्थान एकान्त होना चाहिए। आँखें बन्द करके आराम कुर्सी पर पड़े हुए होना चाहिए। यह सोचना चाहिए कि शरीर मृत अवस्था में पड़ा है और प्राण उसमें से निकल कर किसी ऊँचे स्थान पर हंस पक्षी की तरह जा बैठा। अब पड़ी हुई लाश के अंग-प्रत्यंगों को पोस्टमार्टम के समय उघाड़े गये अवयवों की तरह उलटना पलटना चाहिए और समझना चाहिए कि कपड़ों से भरी हुई पेटी की तरह यह काया अपने सामयिक उपयोग के लिए मिली थी। इसी प्रकार मस्तिष्क को एक छोटे डिब्बे की तरह खोलकर देखना चाहिए कि उसमें मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के चार आभूषण उपकरण, औजार सुसज्जित रखे थे।
इस ध्यान को जितना गहराई से, जितनी देर किया जा सकना सम्भव हो करना चाहिए और इस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि प्राण हंस की आत्मसत्ता सर्वथा स्वतंत्र है। शरीर की वस्त्र पेटी और मस्तिष्क की उपकरण पिटारी, जीवनरथ के दो अश्व वाहनों की तरह थी। काय-कलेवर लक्ष्यपूर्ति के लिए सहायक के रूप में मिला था। उसकी शोभा-सुसज्जा के लिए आत्म कल्याण के लक्ष्य को तिलाञ्जलि नहीं दी जानी चाहिए।
मृत्यु को, आयुष्य की क्षणभंगुरता को, विषयों की मृग मरीचिका को, कुछ भी साथ न जाने वाले वैभव की निरर्थकता को यदि मनुष्य गम्भीरता से समझे तो उसकी आँखें खुले, कि क्या करना चाहिए था, क्या किया जा रहा है। किधर चलना चाहिए और किधर चला जा रहा है। जीवन और मृत्यु दोनों एक दूसरे के साथ इस प्रकार जुड़े हुए हैं कि किसी के कभी भी नीचे-ऊपर भी होने में तनिक भी आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए। यह वस्तु स्थिति समझ में आये तो हर व्यक्ति अपने बहुमूल्य क्षणों का ठीक प्रकार उपयोग करना सीखें और न निरर्थक बाल क्रीड़ाओं में न उलझे, जिनमें आमतौर से लोग अपने को घुलाये भुलाए रहते है। मृत्यु की विस्मृति ही वह कारण है, जिसने नरजन्म के श्रेष्ठतम सदुपयोग के प्रति उदासीनता उत्पन्न कर रही है।
मनन का दूसरा अर्थ है आत्मबोध। अपना वास्तविक स्वरूप, जीवन का उद्देश्य, शरीर और आत्मा का सम्बन्ध, श्रेय और प्रेय में से एक का चुनाव अपनी गतिविधियों और रीति-नीतियों का सुनियोजित निर्धारण जैसे अनेक महत्वपूर्ण निर्णय इसी केन्द्र पर टिके हुए हैं कि आत्मबोध हुआ या नहीं। यह चेतना जब तक जगेगी नहीं तब तक लोभ और मोह की लिप्सा प्रचण्ड ही बनी रहेगी, तृष्णा और वासना की प्रबलता उभरी ही रहेगी। मायापाश के भवबन्धनों से छुटकारा मिलेगा ही नहीं, फलतः व्यथा वेदनाओं में झुलसते रहने की दुर्गति से छुटकारा ही नहीं मिलेगा। यदि आत्मबोध का लाभ न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव-जीवन का उद्देश्य और आनन्द हाथ से चला गया।
भजन अर्थात् ईश्वरीय सत्ता के साथ आत्मसत्ता का समीकरण-परस्पर विलय-समन्वय की अनुभूति। मनन अर्थात् आत्मबोध। शरीर और आत्मा के स्वार्थ और सम्बन्धों का पृथक्करण। जीवन लक्ष्य के प्रति आस्था और रीति-नीति का साहस पूर्वक निर्धारण। दोनों की साधना विधियाँ सरल हैं। एक ही समय या दो पृथक-पृथक सुविधा के समय और शान्त एकान्त स्थान में सुसंतुलित चित्त से यह दोनों ध्यान चिन्तन किये जा सकते हैं। भावनाओं की जितनी गहराई इनमें लगेगी उतनी ही अन्तर्ज्योति प्रखर होती चली जायेगी और आत्मा के साथ परमात्मा का प्रणय-परिणय होने पर जिन दिव्य-सम्पदाओं की उपलब्धि होनी चाहिए, वे सहज ही करतलगत होती चली जाएँगी।
भावसाधना का तीसरा चरण है- चिन्तन। चिन्तन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का आदर्शवादिता और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसंतुलित निर्धारण। इसके लिए प्रातःकाल उठते ही हर दिन नया जन्म हर रात नयी मौत का तथ्य सामने रखकर आज की समयपरक और भावपरक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए। एक ही दिन के लिए यह जन्म है। आज ही रात को मृत्यु, निद्रा की गोदी में जाना है, इसलिए ईश्वर प्रदत्त समय सम्पदा और वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए, जीवन लाभ लेने के लिए साहस पूर्वक तत्पर होना चाहिए। किसी भी व्यवधान को इस निर्धारण में बाधक नहीं होने देनी चाहिए।
प्रातः काल से लेकर सोने के समय तक की समयचर्या निर्धारित करनी चाहिए, विश्राम, उपार्जन से लेकर परमार्थ प्रयोजनों तक के लिए उचित रीति से समय विभाजन किया जाये। उपार्जन के और परिवार पोषण के उत्तरदायित्व अभी जिनके कंधों पर है, इन्हें भी आठ घण्टे कमाने के लिए, छह घण्टा सोने के लिए, चार घण्टा नित्य नैमित्तिक कर्मों के लिए लगातार सांसारिक प्रयोजनों के लिए अधिकतम २. घंटे ही खर्च करने चाहिए। शेष ४ घंटे जीवनोद्देश्य की पूर्ति में लगाने चाहिए।
हर क्रिया के साथ एक विचारणा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहती है। क्या कार्य, किस लाभ या प्रयोजन के लिए किया जा रहा है? उसमें रुचि या उत्साह किस लिए है इसका कुछ न कुछ कारण- आकर्षण होना ही चाहिए। मनोगत आकांक्षा और शरीरगत क्रिया दोनों के सम्मिश्रण से समग्र कर्म बनता है, उसी के आधार पर संस्कार बनते हैं। पाप-पुण्य का निर्धारण होता है और कर्मफल की प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। भावरहित क्रिया तो मात्र उछल कूद भर होती है। हमें अपने क्रिया कलाप के साथ उच्च आदर्शों से भरी पूरी भावना नियोजित रखनी चाहिए। पत्नी को अपने संरक्षण में रखी गयी ईश्वर की पुत्री समझा जाना चाहिए। वह पिता के घर से जिस स्थिति में आई थी, उसकी अपेक्षा अधिक स्वस्थ, सुयोग्य, सुविकसित, प्रसन्न, प्रफुल्लित बनाने का प्रयास निरन्तर करते रहने की बात सोचनी चाहिए। यदि उसके प्रति कर्तव्य स्नेह, सौजन्य बरसाया जाता रहा तो वह पत्नी भौतिक सुविधा और आत्मिक प्रगति की दोनों ही दृष्टि से बड़ी सुखद-श्रेयस्कर सिद्ध होगी। बालकों को ईश्वर के उद्यान में उगे हुए सुरभित पुष्प माना जाए ओर उन्हें माली की तरह सींचा-संभाला जाये। अपनी सम्पदा, बुढ़ापे की लकड़ी, वंश चलाने वाले उत्तराधिकारी, मात्र प्रियपात्र यदि उन्हें जाना समझा जायेगा तो वे ही बालक सम्बन्ध रूप सिद्ध होंगे और लोक परलोक में विविध विधि दुर्गति का कारण बनेंगे। दृष्टिकोण का अन्तर रहने के कारण एक व्यक्ति के लिए शिशु पोषण परिवार पालन अपार उद्वेग उत्पन्न करेंगे, जबकि परिष्कृत चिन्तनशैली से की गयी परिवार सेवा योग साधना बन जाती है। पिता-माता भाई-बहन आदि का भरा पूरा कुटुम्ब किसी भावनाशील व्यक्ति के लिए अपने सद्गुणों के विकास के लिए विनिर्मित प्रयोगशाला ही सिद्ध होता है। इन थोड़े से व्यक्तियों की सुव्यवस्था बनाना एक छोटे राज्य का सुशासन चलाने के समान है। नेतृत्व, सुसंचालन सुव्यवस्था की दिशा में किसने कितनी योग्यता प्राप्त की, उसकी परीक्षा पारिवारिक जीवन में बरती गयी रीति-नीति से होती है। जो उसमें उत्तीर्ण होते हैं, उन्हें भगवान अधिक बड़े क्षेत्र का, अधिक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व सौंपते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए परिवार के लिए उपार्जन एवं सुविधा-व्यवस्था में लगने वाला अधिकांश समय तथा मनोयोग नियोजित किया जाते तो घर ही तपोवन बन सकता है। ऐसे लोगों को तपोवन में घर बनाने की आवश्यकता नहीं है।
शरीर को भगवान का मन्दिर भगवान के प्रयोजनों में काम आने वाला वाहन माना जाए और उसे स्वस्थ-सुव्यवस्थित बनाने वाले क्रिया-कलाप अपनाये जाएँ तो शरीरयात्रा के लिए किया गया पुरुषार्थ प्रकारान्तर से ईश्वर की सेवा पूजा स्तर का ही रहेगा। उपार्जन में यदि ईमानदारी, उचित लाभ जनता की आवश्यकता-पूर्ति परिवार व्यवस्था के लिए श्रमसाधना के रूप में किया जाए तो वही व्यापार, नौकरी, कृषि, शिल्प, बुद्धि, श्रम आदि एक प्रकार से कर्मयोग का क्रिया कृत्य ही माना जायेगा। शरीर को यदि वासना प्रदर्शन, अहंकार, अनाचार के लिए अनीति और उच्छृंखलतापूर्वक सजाया, पोसा और बलिष्ठ बनाया जा रहा है तो उसे शरीराभ्यास के बन्धनकारक स्वार्थपरता की श्रेणी में गिना जायेगा। भोजन यदि भगवान का प्रसाद, शरीर इंजन का ईंधन, क्षुधा रोग की औषधि की तरह किया जा रहा है, तो वह परमार्थ है, किन्तु यदि चटोरेपन की लालसा से अनुपयुक्त आहार किया जा रहा है, तो वही सामान्य दीखने वाली भोजन प्रक्रिया पाप परिणाम प्रस्तुत करेगी।
तात्पर्य यह है कि दिनभर की समस्त कार्य पद्धति के साथ उच्चकोटि की भावनाएँ नियोजित रखी जाएँ। हर दिन कागज पर पूरी दिनचर्या नोट कर ली जाए, जिसमें दिन भर का समय विभाजन और हर कार्य के साथ जुड़ी रखी जाने वाली भावनाओं का विवरण लिखा रहे। यह कागज मेज पर या जेब में रखा रहे। निर्धारित कार्य पद्धति और विचार प्रक्रिया में कितनी सफलता मिल रही है, कितनी असफलता, इसका निर्णय हर घण्टे करते रहा जाए। इस प्रकार चलता हुआ क्रम रात को सोते समय यह बतायेगा कि सब मिलाकर कुल कितने प्रतिशत सफलता मिली, कितनी असफलता,। सफलता के लिए प्रसन्न हुआ जाय और जो भूलें हुई हों उन्हें दूसरे जन्म में दूसरे दिन सुधारने के लिए अधिक सतर्कता जाग्रत की जाए।
रात्रि को सोने के लिए जब बिस्तर पर जाया जाए तब संन्यास जैसी भावनाओं को हृदयंगम किया जाए। जो कुछ कर्तव्य थे वे ईश्वर के सौंपे हुए थे, ईमानदारी से पूरे किये गये। जो शेष हैं उन्हें ईश्वर पूरा करेगा। कुटुम्ब, परिवार, धन, वैभव आदि सब भगवान का था उसकी धरोहर उसे सौंपकर निश्चिन्ततापूर्वक निर्लिप्त मन से अनासक्त कर्मयोगी की तरह निद्रा मृत्यु की गोद में शयन किया जा रहा है। अन्तिम मृत्यु के लिए यह श्रेष्ठतम साधना है। इस मनःस्थिति में यदि महाप्रयाण किया जाए तो परलोक में निश्चित रूप से परमशान्ति और सद्गति ही मिलेगी।
चिन्तन का स्वरूप शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को आदर्शवादिता और उत्कृष्टता के खाँचे में इस तरह कस देती है कि असावधानी के कारण पनपने वाली दुष्प्रवृत्तियों के पनपने की कोई गुँजाइश न रहे। ढीली-पोली जीवन चर्या पर ही विकृतियाँ सवार होती हैं। यदि जागरूकता और सतर्कता बनी रहे तो दुष्ट दुर्भावों को सेंध लगाने का अवसर नहीं मिले। यदि वे कदाचित आक्रमण करे भी तो चिन्तनशील उसके लिए विरोधी विचारों की सेना सदा लड़ने के लिए तैयार रखता है। कभी कामुकता के विचार मन में उठे तो उसे निरस्त करने के लिए व्यभिचार से उत्पन्न होने वाले असंख्य अनर्थों का, संयम-ब्रह्मचर्य से उपलब्ध होने वाले सत्परिणामों की लम्बी सूची तैयार रखता है और जैसे ही उस स्तर के दुष्ट विचार उठे कि प्रतिरोधी सदाचार परायण विचार-श्रृंखला पर गम्भीरतापूर्वक ऊहापोह आरम्भ कर देता है। जहाँ यह प्रक्रिया आरम्भ हुई वहाँ कुविचारों के निराकरण में तनिक भी देर नहीं लगती।
उच्चस्तरीय भावनात्मक साधन के लिए भवन, मनन और चिन्तन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए। गायत्री महामंत्र के उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भावसमन्वय से ही सम्भव होती है और इसी संयोग के फलस्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका माहात्म्य वर्णन विभिन्न अध्यात्म-प्रसंगों में किया गया है।
शिवपुराण में उल्लेख है-
यतः सर्व समुत्पन्न येनैव पाल्यते हितात्। यस्मिंणलीयते सर्व येन सर्वमिदं ततम्। तदैव शिवरुपं ही प्रोच्सते हि मुनीश्वराः॥
अर्थात् जिससे जगत की रचना, पालन और नाश होता है, जो इस सारे जगत के कण कण में संव्याप्त है, हे मुनीश्वर! वह वेद में शिव रूप कहे गये है। अन्य शास्त्रों में भी इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहा गया है-
सर्वाननशिराग्रीवः सर्वभूत गुहाशयः। सर्वव्यापी स भगवाँस्तस्मात् सर्वगतः शिवः।
अर्थात् जिसके सब ओर मुख, सिर और ग्रीवा है, जो समस्त प्राणधारियों की हृदय-गुहा में निवास करते हैं, जो सर्वव्यापी और सबके भीतर रम रहे हैं, उन्हें ही शिव कहा जाता है। अमरकोष के अनुसार, श्वः श्रेयसं शिवं भद्रं कल्याणं मंगलं शुभम्।
अर्थात् शिव शब्द का अर्थ मंगल एवं कल्याण होता है। स्वः-श्रेय-शिव-भद्र-कल्याण-मंगल और ये सभी शब्द समानार्थक हैं। विश्वकोष में भी शिव शब्द का प्रयोग मोक्ष में, वेद में और सुख के प्रयोजन में किया गया है। यथा- शिवम् च मोक्षे क्षेये च महादेवे सुखे। अतः शिव का अर्थ हुआ आनन्द, परम मंगल और परम कल्याण। जिसे सब चाहते हैं और जो सबका कल्याण करने वाला है वही ‘शिव’ है।
भगवान शंकर के साकार और निराकार दो रूपों का वर्णन विस्तारपूर्वक प्रायः सभी पौराणिक, आध्यात्मिक ग्रंथों में किया गया है। उनकी प्रतिमा पर विचार करें तो प्रतीत होगा कि अलंकार रूप से ऐसे अगणित तथ्य उस आकृति में जोड़े गये हैं, जिन पर ध्यान देने वाला शिव-उपासक निरन्तर आत्मिक प्रगति की ओर बढ़ता रह सकता है। कहना न होगा कि उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य में ही उपासना और साधना के सारे रहस्य सन्निहित हैं और उन्हें अपनाने वाला सच्चे अर्थों में ईश्वर भक्त और सिद्ध पुरुष बन सकता है।
कहा गया है-
साधकानाम् हितार्थाय ब्रह्मणो रूप कल्पना।
अर्थात् साधकों का साधन प्रयोजन पूरा करने के लिए भगवान के रूप की कल्पना गढ़ी गयी।
ब्रह्म एक है। उस एक ब्रह्म की ही विद्वानों ने अनेक रूपों में वर्णित तथा चित्रित किया है। देवताओं की आकृति-प्रकृति आयुध वाहन आदि अनेकानेक प्रकार के दृष्टिगोचर होते हैं और कई बार लगता है कि वे परस्पर विरोधी ही नहीं, प्रतिस्पर्धी भी हैं। इस प्रकार की मान्यता सर्वथा भ्रामक है। तथ्य यह है कि परब्रह्म की विविध शक्तियों को अलग-अलग नाम-रूप देकर उन्हें साधकों की रुचि के अनुरूप विनिर्मित किया गया है। साधना में ध्यान का प्रमुख स्थान है। ध्यान के लिए कोई आकृति चाहिए। निराकार ब्रह्म को इसी प्रयोजन के लिए साकार रूप में प्रस्तुत किया गया है। नामों और रूपों की भिन्नता वाला देव प्रकरण साधकों की सुविधा भर के लिए है। उससे एक ब्रह्म की सत्ता को चुनौती नहीं दी जाती है और न ही बहुदेववाद का प्रतिपादन होता है।
वस्तुतः देवताओं की आकृति-प्रकृति में साधकों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण शिक्षाएँ तथा प्रेरणाएँ प्रस्तुत की गयी हैं, ताकि ध्यान-धारणा का प्रयोजन पूरा करते हुए साधक उस देव आकृति के सहारे अपने लिए उपयुक्त प्रकाश एवं प्रेरणा भी प्राप्त करता रह सके।
भगवान शिव की प्रतिमाएँ व शिवलिंग शैवमन्दिरों में सर्वत्र स्थापित है। वैष्णव सम्प्रदाय में शिवलिंग को शालिग्राम के रूप में माना गया है। दोनों ही लिंग हस्त, पाद चक्षु, कर्णादि विहीन स्त्री- पुरुषादि भेद विनियुक्त और विशेष भाव विनियुक्त है। उपासना ग्रंथों में इन दोनों की ब्रह्म लिंगों के लिए लगभग सामान्य विशेषणों का प्रयोग हुआ है। शिर, वक्ष हस्तपादादि विहीन चक्षु कर्णादि सर्वेन्द्रिय विवर्जित, निर्विशेष दण्डाकृति के रूप में उन्हें मान्यता दी गयी है।
यह शिवलिंग या शालिग्राम गोलाकार ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। यह समस्त संसार ही ब्रह्म है। यह गोल पाषाण से बनी शिवलिंग प्रतिमा का संकेत है। विश्वसेवा ही शिव अथवा विष्णु की सच्ची भक्ति है। लोकमंगल के लिए किये गये प्रयासों में उपासना का सारा तत्त्वज्ञान भरा पड़ा है।
बाल्मिकी रामायण और पुराणों में विस्तारपूर्वक वर्णन आता है कि भगीरथ जब गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाये तो पहले भगवान शिव ने उसे अपनी जटाओं में धारण कर लिया। वस्तुतः यह एक अलंकारिक वर्णन है। शिव के मस्तक में से गंगा का प्रवाहित होना उत्कृष्ट विचारधारा के प्रवाह का संकेत है। इसी तरह शिव के जटाजूट की व्याख्या करते हुए शास्त्र कहते हैं-
विश्रामोऽयं मुनीन्द्राणाँ पुरातनवटो हरः। वेदान्त साँख्य योगाख्यास्तिस्नस्तज्जटयः स्मृताः।
अर्थात् मुनीन्द्रों के विश्राम स्थान, पुरातन वटवृक्ष स्वरूप हर ही है। उस वटवृक्ष की जटाओं के रूप में सिर के आभूषण हैं- वेदान्त, साँख्य और योग। भगवान शिव के जटाजूट का यही दर्शन है।
भगवान शिव के ललाट पर चन्द्रमा स्थित है। चन्द्रमा मन का प्रतीक माना जाता है। अतः ललाट पर चन्द्रमा का धारण शान्ति और संतुलन से मनः स्थान को भरे रहने की बात को इंगित करता है। यही कारण है कि शिव का मन सदैव स्वच्छ, निर्मल, पवित्र, शांत और सशक्त बना रहता है। जब कभी कामदेव उसमें विकृति उत्पन्न करने की कुचेष्टा करता है, तब वे उसे अपने तीसरे नेत्र से भस्म कर देते हैं। तीसरा नेत्र ध्यान का नेत्र है, विवेक का नेत्र है। सामान्य मनुष्य चर्मचक्षुओं से तात्कालिक लाभ ही देखते हैं और आज की तत्क्षण लिप्सा के लिए भविष्य को अंधकारमय बनाते है। तीसरा नेत्र विवेक का, दूरगामी परिणामों को देखता है और उपलब्धि भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए वर्तमान की रीति-नीति निर्धारित करता है। शिवभक्ति के पीछे यह प्रेरणा है कि हमारे मस्तिष्क में से ज्ञानगंगा प्रवाहित होती रहे। परिस्थितियाँ हमें उद्विग्न एवं असंतुलित न करें। चन्द्रमा जैसा धवल और प्रकाशपूर्ण हमारा दृष्टिकोण है। हम दूरदर्शी बने और तीसरे नेत्र से वह देखें जो सर्वसाधारण को दिखायी नहीं पड़ता। भविष्य-निर्माण हमारा लक्ष्य हो, उसके लिए आज की सुख-सुविधा को छोड़कर यदि तपस्वी, संयमी और परमार्थी रीति-नीति अपनानी पड़े तो संकोच न करे। विवेक दृष्टि के जागरण से कुविचार सहज ही नष्ट हो सकता है। इस तथ्य को कोई भी विचारशील व्यक्ति अपने जीवन क्रम में घटित कर सकता है।
श्मशान में निवास, चिता-भस्म का शरीर पर लेपन और मुंडमाला धारण का प्रयोजन मृत्यु का स्वागत एवं सहगमन है। जन्म और मरण दोनों ही जीवनसंकट के दो पहिए हैं। जन्म के साथ मृत्यु जुड़ी हुई है। जो आज जन्मा है उसे कल मरना ही पड़ेगा। यदि इस तथ्य को भली-भाँति हृदयंगम किया जा सके, तो प्रत्येक साँस को बहुमूल्य सम्पदा समझ कर उसके सदुपयोग की आतुरता एवं सतर्कता बनी रह सकती है। कुकर्म और कुमार्ग से बचा जा सकता है और मिथ्या अहंकार से छुटकारा मिल सकता है।
भूत-प्रेतों की सेना साथ रहने का अलंकार भी इसी दृष्टि से है कि मरणोपरान्त भगवान से ही पाला पड़ेगा। शिव भूत-प्रेतों को, पतित, दुखी और असमर्थों को भी साथ लेकर चलते हैं। शिवभक्त की उदारता भी पिछड़े और पतित लोगों को स्नेह देने एवं ऊपर उठाने की होनी चाहिए।
शिव द्वारा विष को कंठ में धारण करने का अर्थ है- अवांछनीयता को न तो पचाना और न उगलना, वरन् ऐसे स्थल पर दबा देना, जहाँ से अपने ऊपर तथा दूसरों पर कोई बुरा प्रभाव न पड़े। जीवन में कितने ही अवांछनीय व्यक्ति तथा घटनाक्रम ऐसे आते हैं जिनकी प्रतिक्रिया को यदि पेट में रखे तो घृणा, द्वेष से अपना नाश होता है। और यदि प्रतिशोधात्मक उग्र रूप धारण किया जाये तो सुधार के साथ नया विग्रह उत्पन्न होता है।
एक नास्तिक राजा एक साधू की बड़ाई सुनकर उसके पास गया। साधू ने उसकी ओर ध्यान न दिया और अपने कुत्ते पर हाथ फेरता रहा। राजा ने क्रोध में आकर कहा-तू बड़ा है या तेरा कुत्ता”? साधू ने उत्तर दिया “सह हम तुम दोनों से बड़ा है, जो अपने एक टुकड़ा देने वाले मालिक के दरवाजे पर पड़ा रहता है और एक तुम और हम हैं जो भगवान द्वारा सभी प्रकार का आनन्द मिलने पर भी उसका नाम तक नहीं लेते”
ऐसी दशा में उबलते हुए दूध की तरह न उगलते ही बनता है और न पीते ही। शिव ने मध्य वर्ती मार्ग अपनाया और उसे अधर में लटका दिया, कंठ में भर लिया। विश्व पर छायी विषाक्त विभीषिकाओं को अपने ऊपर ओढ़कर सज्जन स्वयं तो कष्ट उठाते हैं और कुरूप बनते हैं, पर लोकहित को ध्यान में रखते हुए उन्हें ऐसी विपत्ति ओढ़ने में भी हिचक नहीं होती।
शिव के कंठ में, भुजाओं में, कन्धे पर सर्प लिपटे हुए हैं। वे सर्प से प्रभावित नहीं होते। सर्प उन्हें काटते नहीं, वरन् उनके संपर्क में आकर सर्प ही अपनी विषैली प्रकृति छोड़ देते हैं, और स्नेह का बदला सौजन्य से देते है। शिव-साधक की जीवननीति यही होती है वह विषैले सर्पों से भी द्वेष नहीं करता, उन्हें भी गले लगाता है। उनके शरीर को मारने की अपेक्षा प्रकृति को बदल देता है। यही दृष्टिकोण द्वेष दुर्भाग्य के निराकरण का स्थाई हल है। शिव शरीर पर सर्प के लिपटे रहने के पीछे यही प्रतिपादन है।
शिव की प्रिय आहार में विल्वपत्र और धतूरों के साथ एक और विशेष पदार्थ सम्मिलित है, जिसका नाम है भाँग। भाँग अर्थात् भंग, विच्छेद, विनाश। अब प्रश्न उठता है कि किसका विनाश या भंग? उत्तर है। माया और जीव की एकता का भंग, अज्ञान आवरण का भंग, संकीर्ण स्वार्थपरता का भंग, कषाय कल्मषों का भंग। यही है शिव का प्रिय आहार। जहाँ शिव की कृपा होगी वहाँ अंधकार भरी निशा भंग हो रही होगी और कल्याणकारक अरुणोदय का पुण्य दर्शन मिल रहा होगा।
शिव का वाहन है- वृषभ। वृषभ को धर्म का प्रतीक माना गया है। पुराणों में इस वृषभ के चार पैर बताये गये हैं-
(१) सत्य (२) प्रेम (३) विवेक (४) संयम। धर्मरूपी वृषभ इन्हीं के सहारे खड़ा होता है। और चलता है। शिव का वाहन धर्म वृषभ है। सौम्य पराक्रमी सत्ता का प्रतीक यह बैल है, जिस पर सवार होकर शिव का अवतार होता है।
शिव प्रतिमा के किसी भी पक्ष पर विचार करें उसमें आत्मा को ऊँचा उठाने वाला, प्रेरक प्रकाश प्रचुर परिमाण में भरा पड़ा है। शिव भक्ति के साथ साथ शिव प्रेरणाओं को वैवाहिक जीवन में स्थान देने की तत्परता बरती जाये तो निःसंदेह हमारा वही कल्याण हो सकता है। जिसका शिव एवं शंकर नाम के अर्थ में संकेत है।
मोटी बुद्धि प्रेम और मोह को एक मानती है, जबकि उनमें जमीन-आसमान जितना अंतर है। व्यक्तियों अथवा वस्तुओं के प्रति इतनी अधिक आसक्ति का होना उन्हें पाने अथवा कब्जे में रखे रहने के लिए, कुछ भी करने पर उतारू रहा जाये मोह है। व्यक्तिगत रुचि, रुझान, आकर्षक अथवा उपयोग की दृष्टि से किन्हीं पदार्थ एवं व्यक्तियों के साथ घनिष्ठता स्थापित हो जाती है और वह इतनी सघन हो जाती है कि विछोह की बात सोचने से कष्ट होता है। मोह यह चाहता है कि प्रिय वस्तु का साथ छूटने न पाये चाहे इसके लिए अपना अथवा प्रियपात्र का कितना ही अधिक क्यों न होता हो। यह मोह भी मोटी बुद्धि को प्रेम ही लगता है और इसी शब्द से अशक्ति का उल्लेख भी किया जाता है, पर वास्तविकता सर्वथा इससे भिन्न होती है।
चूँकि एक आदर्श है। इसलिए उसकी घनिष्ठता-एकात्मता आदर्श के साथ ही जुड़ी रहेगी। जहाँ आदर्श न हो वहाँ प्रेम का अस्तित्व रह ही नहीं सकता। व्यक्तिगत मोह किसी के रंग, रूप और व्यवहार उपयोग एवं आकर्षण के आधार पर पनपता है। जो रुचिकर लगा उसी के प्रति आकर्षण बढ़ गया। जिसकी समीपता में सुखद कल्पना कर ली गयी, उसी के पीछे मन चलने लगा। यह आसक्ति किसी को देखने मात्र से पनप सकती है और उसके घनिष्ठ सान्निध्य की आतुरता उन्माद बनकर कुछ भी कर गुजर सकती है। प्रेम के नाम पर ऐसी ही दुर्घटनाएँ आये दिन होती रहती है। इनका परिणाम वैसा ही होता है जैसा नशा उतरने पर पैसा, समय और खुमारी गँवाकर असहाय, अशक्त बने हुए शराबी का। इस प्रेमोन्माद में कभी किसी को शान्ति दायक परिणाम हाथ नहीं लगा है। यह जुआ खेलने वालों को सदा हार ही हाथ लगती रही है।
प्रेम न तो आकस्मिक होता है आर न अकारण। उसके पीछे ऐसे तथ्य होते हैं जो आदर्शवादिता की पृष्ठभूमि पर ही उदय हो सकते हैं। उसमें रंग रूप की, आकर्षक व्यक्तित्व की आवश्यकता नहीं पड़ती वरन् यह परख रहती है कि प्रियपात्र कितना आदर्शवादी है उसमें सज्जनता कर्तव्यनिष्ठा, उदारता, सहृदयता जैसे सद्गुणों की कितनी मात्रा है। जहाँ विभूतियों के प्रति आकर्षण होगा वहाँ मैत्री केवल सद्भावसम्पन्न सच्चरित्र व्यक्ति से ही बन पड़ेगी और तब तक यथावत बनी रहेगी जब तक उन सद्गुणों का अस्तित्व अक्षुण्ण रह सके।
मोह में गुणों की अपेक्षा नहीं रहती। शारीरिक आकर्षण ही इसके लिए पर्याप्त है। कुरूप से अरूप वाले की मनुहार जहाँ हो रही हो वहाँ मोह के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। ऐसा आदर्श रहित आकर्षण सर्वथा अस्थिर रहता है। उसमें अधिक गहरे नशे की प्यास रहती है। अपनी कुरूप पत्नी के प्रति रुखाई धारण करके जो रूपवान प्रेयसी के पीछे लगा फिरता है, उसके सम्बन्ध में यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि वह उस प्रेयसी के प्रति भी अपनी अनुरक्ति देर तक बनाये रह सकेगा। नवीनता का अधिक गहरे नशे का आकर्षण उसे फिर कहीं से कहीं ले भागेगा। दूसरे के बाद तीसरी, तीसरी के बाद चौथी प्रेयसी तलाश करने की कभी न बुझने वाली अतृप्ति इन मोहग्रस्तों में सदा ही बनी रहेगी। वे किसी के भी सगे न बन सकेंगे।
सरल लोभी भ्रमर और पराग प्रेमी मधुमक्खियाँ एक फूल को चूसकर दूसरे पर जा बैठती है। तितलियों को एक फूल पर बैठे रहने से संतोष नहीं होता, उन्हें क्षण क्षण नवीनता चाहिए। प्रेम जहाँ होगा वहाँ यह अस्थिर उन्माद कभी भी दृष्टिगोचर न होगा। जहाँ आस्थाएँ काम कर रही होंगी, तो विश्वास दे सकने और पा सकने की स्थिति बनेगी।
आजीवन मैत्री निर्वाह का आधार वही तो बनेगा। प्रेम-धर्म निबाहना केवल सूरवीरों का काम है- उसके लिए बहुत चौड़ा दिल चाहिए। मोहग्रस्त लोभीजन उसका निर्वाह कर सके, यह सम्भव नहीं हो सकता।
मोहग्रस्त मनः स्थिति में भौतिक अनुदान, उपहार देने या पाने की प्रवृत्ति रहती है। यदि इस स्तर की प्रेम विडम्बना नर नारी के बीच चल रही होगी, तो उनमें यौन-लिप्सा की आतुर माँग होगी। भले ही प्रियपात्र का गृहस्थ भविष्य एवं स्तर पतन के गर्त में गिरता हो तो गिरे। उन्माद की पूर्ति किसी भी कीमत पर होनी चाहिए। आवेश यह मोह ही प्रेम जैसा लगता है और उस आतुर मनःस्थिति में पड़े हुए उन्मादी अपने आपको प्रेमी कहने लगते हैं, जबकि यह आचरण प्रेम के तत्त्वदर्शन की सीमा को छू भी नहीं रहा होता।
विशुद्ध प्रेम व्यक्तियों के बीच आदर्शवादी विशेषताओं के कारण होता और पनपता है। वास्तविक सौंदर्य शरीर का नहीं, आत्मा का होता है। वह आकृति को देखकर ठिठकता नहीं, वरन् गहराई में प्रवेश करके प्रकृति के मर्मस्थल तक चला जाता है। ऐसे व्यक्ति शारीरिक आकर्षण को तनिक भी महत्व नहीं देते। उनके लिए काली कुरूप आकृति में कोई न्यूनता दिखाई नहीं पड़ती जिसकी तुलना में किसी रूप यौवन सम्पन्न को महत्व दिया जा सके। ऊपर चमड़ी के भीतर सर्वत्र रक्त, माँस, अस्थि जैसे घिनौने और दुर्गन्ध युक्त पदार्थ ही तो भरे पड़े हैं। उनमें केवल मूढ़मति ही उलझती है। शरीर-आकर्षण को लेकर आरम्भ हुआ प्रेम संध्याकाल के रंगीले बादलों की तरह देखत-देखते धूमिल होता चला जाता है और फिर कुछ समय बाद उसका कहीं भी पता नहीं चलता।
प्रेम गुणग्राही होता है और वह केवल वहीं जमता है जहाँ व्यक्ति में आदर्शवादी विशेषताएँ परिलक्षित होती है। यह आत्मा की भूख है कि आत्मिक विभूतियों से भरे व्यक्ति सजातीय आकर्षण से प्रभावित होकर उसकी भावनात्मक समीपता चाहे। जड़वादी मोहग्रस्तता के पीछे यौन-लिप्सा का तांडव रहता है। जबकि आत्मवादी प्रेम में केवल सद्भावनात्मक आत्मीयता के आदान प्रदान की माँग रहती है। ऐसे प्रेमीजन यदि नर नारी है तो आजीवन अति पवित्र सम्बन्ध खुशी खुशी बनाये रह सकते हैं। और एक दूसरे के चरित्र को उज्ज्वल सिद्ध करने के लिए अपनी दुर्बलता को सदा-सदा तक काबू रख सकते हैं।
पुरुष और नारी के बीच नारी और नारी के बीच उन्मादी प्रेम सघन नहीं हो सकता, किन्तु निष्ठावान् प्रेम के लिए लिंगभेद जैसी कोई अड़चन नहीं है। दाम्पत्य जीवन में एक दूसरे पर जैसी निर्भरता होती है, एक दूसरे के सान्निध्य में जितना आनन्द प्राप्त होता है, वैसा विश्वस्त और भावभरी स्थिति नारी और नारी के बीच भी रह सकती है। मैत्री और कामुकता दो भिन्न वस्तुऐं हैं। आवश्यक नहीं कि दोनों साथ रहें। कामुकता विहीन मैत्री भी उसी प्रकार निभ सकती है, जिस प्रकार दुनियादार लोगों की मैत्रीविहीन कामुकता का क्रीड़ा प्रायः चलता रहता है।
देवता और असुर भावनात्मक उभार के दो सिरे है। मध्यवर्ती स्थान शांत और संतुलित रहता है। सामान्य मनुष्य हर किसी से मानवोचित सद्व्यवहार करते हैं और अपने कर्तव्य धर्म पर आरूढ़ रहकर मध्यवर्ती गतिविधियाँ चलाते हुए जीवनक्रम पूरा करते हैं। न उन्हें किसी से आध्यात्मिक घनिष्ठता होती है न किसी से रोष, विद्वेष ही सताता है। वे जानते हैं मनुष्यों की पारस्परिक सहिष्णुता और सद्व्यवहार के आधार पर ही गुजर करनी पड़ती है। इसलिए सम्बन्धों का संतुलित निर्वाह करते हुए गुजर करनी चाहिए।
न अति की सीमा तक मैत्री बढ़ानी चाहिए,
न घृणा द्वेष की आग में जलना चाहिए। लोग जैसे भी हैं। बने रहे, हमें अपना कर्तव्य भर पालन करते रहना है, यह मानकर चलते रहना सरल पड़ता है और सुलभ भी है। इस नीति से जिन्दगी आसानी के साथ कट जाती है और सम्बन्धित लोगों के रिश्ते का देर तक ठीक प्रकार निर्वाह होता रहता है।
इसके आगे की भावुक स्थिति को असामान्य या अतिवादी कह सकते है। वह इस छोर पर पहुँचेगी या उस छोर पर। या तो आदर्शवाद व्यक्तियों के साथ सघन होकर उच्चस्तरीय आत्मिक विकास की भूमिका बनाएगी या फिर लोभ और मोह में उलझकर उन्माद जैसी स्थिति उत्पन्न करेगी। उसमें रुझान ही प्रधान रहता है। दुष्ट और दुर्गुण भी प्रिय लगने लगता है, यहाँ तक की उस तथाकथित प्रेमी की प्रसन्नता की लिए स्वयं का भी दुष्कर्मों में सहयोग समर्थन चल पड़ता है। तब प्रियपात्र को आदर्श की ओर ले चलने का उत्साह समाप्त हो जाता है और मित्र को प्रसन्न करने के लिए कुछ भी कर गुजरने को मन रहता है, भले ही वह कर गुजरना कितना ही अनैतिक या अवांछनीय क्यों न हो। यह पतन का अन्तिम छोर है। प्रेम का विकृत स्वरूप कितना विघातक हो सकता है, इसका परिचय इस मोहग्रस्त उन्मादी आवेश की स्थिति वाले वातावरण में कहीं भी देखा जा सकता है।
प्रेम का उज्ज्वल पक्ष ऐसा है जिसमें उस पवित्र सूत्र में बंधे दोनों पक्षों का केवल उत्कर्ष और कल्याण ही होता है। ऐसी मित्रता एक आदर्शवादी अन्तःकरण को दूसरे परिष्कृत व्यक्तित्वों के साथ बाँधती है। एक और एक मिलकर ग्यारह बनने की उक्ति उन पर लागू होती है। उनका भावनात्मक आदान प्रदान परस्पर एक दूसरे को ऊँचा उठाता है और आगे बढ़ाता है। ऐसी मित्रता का आरम्भ सदुद्देश्य के लिए होता है, इसलिए उसका अन्त भी सुखद संतोषजनक ही रहता है। परिस्थितियाँ इन मित्रों को दूर दूर रहने के लिए विवश कर दे तो भी उनकी सद्भावना और घनिष्ठता में कोई अन्तर नहीं आता, जबकि मोहग्रस्त लोग जब तक सामने रहते हैं, तब तक देख देख कर जीने की बात करते हैं, पर जब विलग हो जाते हैं तो कुछ ही समय में उनकी स्थिति अपरिचितों जैसी हो जाती है।
मोह में आदान प्रदान करने की शर्त जुड़ी रहती है। हमने उसके लिए यह किया इसलिए उसने हमारे लिए यह करना चाहा-ऐसा लेखा जोखा जहाँ भी लिया जा रहा होगा, वहाँ लाभ-हानि के आधार पर संतोष अथवा आक्रोश भी व्यक्त किया जा रहा होगा। अपेक्षा पूरी होने पर वह आतुर प्रेम भयंकर प्रतिशोध भी बन जाता है और आज दाँत काटी रोटी वाले मित्र कल जान के ग्राहक बने दिखाई पड़ते हैं। प्रेमोन्माद में यह ज्वार भाटे जैसी उठक पटक स्वाभाविक भी है। सच्चे प्रेम में आँधी तूफान नहीं आते। उसमें एक रस शीतल और सुगंध पवन बहता रहता है। प्रेम देने के लिए किया जाता है लेने के लिए नहीं। झंझट तो तब खड़ा होगा जब लेने की अपेक्षा की जायेगी और वह जो चाहा था सो मिल सकेगा। प्रेम इसी चट्टान से टकराकर नष्ट- भ्रष्ट होता है। अनुदान अपने हाथ की बात है, प्रतिदान दूसरे के हाथ की। प्रतिदान का अभिलाषी मोह है और अनुदान के लिए समुन्नत प्रेम। मोहग्रस्त का पग-पग पर खोज का जलन का, उलाहने का, पश्चाताप का, अनुभव होता है किन्तु जहाँ प्रेम है वहाँ शान्ति स्थिरता और प्रसन्नता की स्थिति कभी परिवर्तन दृष्टिगोचर ही न होगा। ऐसा परिष्कृत प्रेम ही आत्मा की उच्चस्तरीय आवश्यकता है। उसे पाकर मनुष्य इतना आनन्द पाता है, जितना ईश्वर का अपनी गोदी में बिठाकर अथवा स्वयं उनकी गोदी में बैठकर पाया जा सकता है।
ब्रह्माण्ड के प्रतिनिधि इस पिण्ड में सभी अतएव और सभी क्रिया−कलाप अनोखे हैं, पर ध्रुव केन्द्रों की सत्ता और महत्ता का जितना बखान किया जाये उतना ही कम है। पृथ्वी को जो भी सामर्थ्य मिलती है, उसका आधार सूर्य है। सूर्य का शक्तिप्रवाह धरती के जिस मर्मकेन्द्र में होकर प्रवेश करता है, उस स्थान नाम उत्तरी ध्रुव है। जिस तरह भोजन मुँह में होकर किया जाता है उसी तरह धरती का मुँह उत्तरी ध्रुव है। चिड़ियाँ अपने छोटे बच्चे को मुँह में पिसा हुआ चारा उगलकर खिलाती रहती है उसी तरह सूर्य रूपी चिड़िया अपने छोटे बच्चे इस भूपिण्ड को यह सब वैभव प्रदान करती रहती है, जिससे उसका जड़ चेतन परिवार इतना सुरम्य बना हुआ है।
वह मुँह जहाँ होकर यह भूलोक सामर्थ्य ग्रहण करता है, उस मुख गह्वर को उत्तरी ध्रुव ही कहना चाहिए। मनुष्य कायारूपी धरती का मुँह ब्रह्मरन्ध्र हैं। इसके चुम्बकीय केंद्र बिन्दू को सहस्रारचक्र कहते हैं। धरती पर अनायास ही प्रकृति क्रम से सूर्य की सामर्थ्य बरसती और प्रविष्ट होती है, उसी प्रकार ब्रह्मरन्ध्र रूप सूर्य अपनी सामान्य क्षमता धरती के प्रतिनिधि मूलाधार चक्र को प्रदान करता रहता है। मानव जीवन की अगणित प्रकट और अप्रकट क्षमताएँ इसी कारण प्रकाश से आती है, और मनुष्य को विभूतिमयी प्रतिभा, अपनी गरिमा प्रदर्शित करती है। कुण्डलिनी शक्ति को दीप्तिमान अग्नि कहा गया है, पर उसका मूलस्रोत सहस्रारचक्र ही है। उसे भी कालाग्नि कहा गया है।
कायगत यह दो अग्नियाँ ही शरीर मन के माध्यम से विविध-विधि क्रिया−कलाप उत्पन्न करती है। यह अग्नि संतुलन यदि अस्त-व्यस्त असंतुलित, असम्बद्ध या शिथिल हो जाये तो मनुष्य हारा हुआ, टूटा हुआ, निराश, हताश, और हतवीर्य दिखाई पड़ता है। वह जीवित भले ही रहे पर उसमें से आशा और स्फूर्ति की चमक इस प्रकार से पलायन ही कर चुकी होगी। ओजस्, तेजस, मनोबल, आत्मबल, ब्रह्मवर्चस की जो दीप्तिमान चिनगारियाँ मनुष्य के भावनाक्षेत्र और क्रियाक्षेत्र में उठती हुई दिखाई पड़ती है, उन्हें इन्हीं दो दिव्य अग्नियों का प्रकाश परिचय कहा जायेगा। अध्यात्मिक भाषा में इसे कुण्डलिनी शक्ति की प्रस्फुटित आभा कहकर सम्बोधित किया जाता है।
ध्रुवीय चुम्बकत्व पृथ्वी की मौलिक सम्पदा नहीं है। कुछ दिन पूर्व तक वैज्ञानिक यह समझते थे कि अपनी कक्षा में घूमने से तथा सूर्यताप सम्मिश्रण से यह चुम्बकत्व उत्पन्न होता है। पर अब सेनडियागो (कैलीफोर्निया) में खगोल विज्ञानी डॉ. डब्ल्यू. एक्सफर्ड ने अपनी दीर्घकालीन शोध के उपरान्त उसे सूर्य से प्रवाहित हो रहे एक निर्झर के रूप में प्रतिपादित किया है। उन्होंने वाशिंगटन की इंटरनेशनल मैग्नेटोस्फियर कांफ्रेंस में अपना शोध निबन्ध पड़ते हुए कहा कि सूर्य का शक्ति प्रवाह समस्त धरती पर नहीं वरन् उत्तरी ध्रुव के एक विशेष स्थल पर बरसना है, जो ध्रुवप्रभा के रूप में खुली आँखों से भी देखा जा सकता है। वहाँ से वह प्रकाश फिर पृथ्वी से वायुमण्डल तथा अन्तर्गर्भ में प्रवेश करके धरती में जीवन उत्पन्न करता है। यह शक्ति प्रवाह इतना तीव्र होता है कि यदि धरती उसे अपने व्यापक क्षेत्र में तत्काल वितरित कर दे तो वह क्षण भर में जल-बल कर भस्म हो जाए।
मानवी काया की ठीक यही स्थिति है- ख्तना के प्राण सूर्य ‘सविता’ से उसकी दिव्य किरणें ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश करती हैं। जहाँ से वह प्रपात दक्षिण ध्रुव तक बहता चला आता है और वहाँ नियंत्रित, परिष्कृत होकर विभिन्न दिव्य नाड़ियों द्वारा शरीर और मन के विभिन्न क्रिया–कलापों का संचालन करने के लिए वितरित हो जाता है। कुण्डलिनी का वही प्रत्यक्ष जननेन्द्रिय मूल में अवस्थित अग्नि गह्वर कामबीज ही है। इसी को संग्रह भण्डार कहना चाहिए। जिस प्रकार बड़ी नदियों पर बाँध बनाकर उनका पानी एक विशाल जलाशय में रोक लिया जाता है और फिर वहाँ से नहरें निकाल कर सुविस्तृत भूमिखण्ड की सिंचाई होती है, उसी प्रकार सूर्यरूपी हिमालय से निकलने वाली प्राण-प्रवाह की सरिता का जल ब्रह्मरन्ध्र से अवतरित होता है। उसे उद्गम स्थल कह सकते हैं। यहाँ से यह प्रवाह मेरुदण्ड में होकर बहता हुआ कामबीज के बाँध में जमा होता है। इस विशाल जलाशय पर नियंत्रण करने वाले जितना जल जहाँ जिस नहर में भेजकर भूखण्ड को सींचना चाहते हैं, उसकी व्यवस्था बना देते हैं। मूलाधार के शक्ति गह्वर में अनन्त भण्डार पड़ा है। यही समय कामोत्तेजना के रूप में उछलता, उफनता, लहराता, गरजता दिखाई पड़ता है। यदि उस जल का कोई उपयोग न किया जाये और ऐसे ही जमा रहने दिया जाये तो वह तोड़-फोड़कर अपना रास्ता बनाता है। नहरों में काट देने से सिंचाई होने लगती है और बाँध टूटने का खतरा भी चला जाता है। कुण्डलिनी विद्या को इस बाँध जलाशय के उपयोग का उपयुक्त मार्ग ही कहना चाहिए। जो उसे मानते हैं, अपरिचित रहते हैं उन्हें ऐसे खतरों का सामना करना पड़ता है, जिसके लिए पीछे पश्चात ही हाथ रह जाए।
दक्षिण ध्रुव को वितरक संस्थान माना गया है। उत्तर ध्रुव से लेकर दक्षिण ध्रुव तक एक ऐसी विद्युत पट्टी है, जिसमें असह्य उष्मा भरी रहती है। सूर्य से आने वाला शक्तिप्रवाह ध्रुव पर अवतरित होता है। वहाँ टकराकर उसमें उछाल आता है। जैसे रबड़ की गेंद पूरे वेग से वहाँ टकराने पर उछल जाती है, उसी प्रकार यह शक्तिप्रवाह भी उछलकर उस स्थान पर गिरता है, जिसे दक्षिण ध्रुव कहते हैं। उछाल के आकाशमार्ग को हम चाहें तो अपने काय-विश्व में मेरुदण्ड कह सकते हैं। ब्रह्मरन्ध्र से टकराकर सविता का दिव्यप्राण उछलकर जिस मार्ग से संचय-भण्डार में स्थिर होता है, उसे मेरुदंड कह सकते हैं। मस्तिष्कीय ऊष्मा को योनि गह्वर तक पहुँचाना मेरुदण्ड का काम है। इस मार्ग की प्रवाह धारा को इड़ा कह सकते हैं। कुण्डलिनी समस्त शरीर को पोषण भेजती है, मस्तिष्क को विशेष रूप से इस विशेष संचार मार्ग को पिंगला कहा गया है।
उत्तरी ध्रुव में एक विशेष प्रभामण्डल संव्याप्त रहता है। सूर्य न रहने पर भी वहाँ दीप्तिमान प्रकाश बना रहता है। सूर्य चन्द्र आदि न होने पर भी यह प्रकाश अस्तित्व बहुत अचम्भे जैसा जगाता है। यह चुम्बकीय विद्युत कणों की प्रकीर्णता ही है। यह प्रकाश जैसा दीखने वाला विद्युतीय परिमंडल एक लंबी रज्जुमाला जैसा होता है। उसकी कई रंग की ज्योतियाँ झिलमिलाती-सी दिखती हैं। यह रंग तेजी से परिवर्तित -उद्भूत और तिरोहित होते रहते हैं। अलास्का विश्वविद्यालय के ध्रुव शोध केन्द्र संस्थान ने इस रंग भरी झिलमिल के जो चित्र खींचे, वे अपरिचित लोगों के लिए बहुत ही कौतुकवर्धक थे।
कुण्डलिनी साधना के संदर्भ में जब नादबिन्दु साधना के शिक्षण का समय आयेगा तब बताएँगे कि इस दिव्य साधना के क्रम विस्तार में जब आज्ञा-चक्र में ध्यान एकत्रित किया जाता है, तो किस प्रकार रंग-बिरंगी झिलमिल उपजाती, उड़ती और विलीन होती दीखती है। यह दिव्य शक्ति संस्थान के पुनर्जागरण का चिन्ह माना जाता है। यह झिलमिल उत्तरी ध्रुव की तरह साधक के ब्रह्मरन्ध्र में चुम्बकीय प्रवाह की हलचल को ही प्रमाणित करती है।
सूर्य इन दोनों ध्रुवों को अपनी अत्याधिक शक्ति प्रदान करता है। फिर भी वे इस लिए ठण्डे हैं कि वहाँ सूर्य की रोशनी तथा गर्मी फैलकर नष्ट हो जाती है। लगभग ५...... वर्ग मील क्षेत्र उत्तरी ध्रुव और ३...... वर्ग मील क्षेत्र दक्षिणी ध्रुव एक प्रकार का दर्पण क्षेत्र है, जहाँ से सूर्यकिरणें परिवर्तित होकर लौट आती हैं, सूर्य की ९. प्रतिशत शक्ति इन ध्रुवप्रदेशों में नष्ट हो जाती है। या यों कहना चाहिए कि वहाँ की बर्फ और नम वायुमण्डल में ऊर्जा जब्त हो जाती है, इसलिए यह क्षेत्र जहाँ अत्याधिक शीत वाला है वहाँ अन्दर शक्ति की मात्रा भी बहुत अधिक है।
भगवान मनुष्य को जो भी अनुदान - वरदान और अनुग्रह प्रदान करते हैं, उनका ७. प्रतिशत भाग इन दोनों ध्रुवों को सूर्यचक्र और अग्निचक्र को ही प्राप्त होते हैं। पर इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि हमारी ठण्डक - उपेक्षा, अकर्मण्यता, मोहग्रस्तता- में वह सारे दिव्य अनुदान - वरदान निरर्थक चले जाते हैं। उस अनुदान का सदुपयोग कैसे किया जा सकता है और उस माध्यम से सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर कैसे आगे बढ़ा जा सकता है, यह विज्ञान कुण्डलिनी योग में भरा पड़ा है।
जब पहली बार वह अन्वेषक लकड़ी के जहाज इन प्रदेशों में पहुँचे तो वे देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि यहाँ एक मील दूर बैठे आदमी से भी उसी तरह बातचीत की जा सकती है मानो वह बिलकुल पास ही बैठा है मानो वह बिलकुल पास ही बैठा हो ट्रैक्टर और विद्युत जनरेटर की आवाजें दसियों मील दूर से सुनी जा सकती हैं। चलते समय बर्फ में चरमराते जूतों तक की चरमराहट की आवाज़ एक मील दूर तक सुनाई पड़ती है। लेकिन यह यह सब होता तभी है जब तापमान शून्य से नीचा होता है। कभी - कभी हवा की परत आकाश में इतनी सघन हो जाती है कि आकाश में उड़ते वायुयान की आवाज भी नीचे नहीं आ पाती। खामोशी और आवाज की परस्पर विरोधी परिस्थितियाँ इन ध्रुवों में देखकर प्रकृति का यह निरालापन देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।
अपना मनःक्षेत्र आदि सांसारिक विषयविकारों की ज्वलनशील आग से विरत करके शून्य तापमान तक ले जाया जा सके तो इस संसार में कहाँ क्या हो रहा है। - कौन क्या कर या सोच रहा है, इसकी सूक्ष्म ध्वनि बहुत स्पष्ट से सुनाई पड़ सकती है और भूतकाल एवं वर्तमान की घटनाओं, परिस्थितियों को ही नहीं भविष्य की संभावनाओं को भी जाना जा सकता है। यदि अपना मन तपश्चर्या की योगाग्नि की गरम पट्टी को आकाश से आच्छादित कर ले तो फिर संसार के आकर्षण, प्रलोभन, कुतूहल, भय, मनोविकार के ढोल ही क्यों न बजते रहें, उनका एक भी शब्द कान में नहीं आता और घोर कोलाहल भरे वातावरण में रहते हुए भी चित्त को समाधिस्थ जैसा बनाकर रखा जा सकता है। यह ध्रुवों जैसी परिस्थितियाँ कुण्डलिनी साधना द्वारा उपलब्ध की जा सकती है, क्योंकि वस्तुतः शरीरगत ध्रुवों का ज्यों-का त्यों लेखा - जोखा ही कुण्डलिनी विज्ञान में सन्निहित है।
साधना शास्त्रों में पवित्र जीवन अग्नि के रूप में कुण्डलिनी शक्ति का वर्णन किया गया है। प्रदीप्त अग्नि जिस प्रकार अपने क्षेत्र को ऊष्ण एवं बना देती है, वैसा ही प्रकाश कुण्डलिनी जागरण का भी होता हैं
चन्द्राग्निविसंयुक्ता आद्या कुण्डलिनी मता। हृत्प्रदेशे तु सा ज्ञेया अंकुराकारसंस्थिता॥ - अग्निपुराण
चन्द्र और सूर्य की शक्ति से भरी हुई कुण्डलिनी शक्ति हृदय प्रवेश में रहती है, उसकी ज्योति अंकुर के आकार की है।
मूलाधरादारभ्य ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्तं सुषुम्ना सूर्याभा। तन्मध्ये तटित्कोटि समा तमोनिवृत्तिः। तर्द्दशनार्त्सवपापनिवृत्तिः॥ मण्डल ब्राह्मणोपनिषद्
मूलाधार से लेकर ब्रह्मरन्ध्र तक सूर्य के प्रकाश जैसी सुषुम्ना नाड़ी फैली हुई है। उसकी के साथ कमलतन्तु से सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति बंधी हुई है। उसी के प्रकाश से अन्धकार दूर होता है और पापों से निवृत्ति होती है।
महाराज विजयप्रताप कौशाम्बी राज्य के अधिपति थे। उनका जीवन यश - समृद्धि एवं वैभव से भरा - पूरा था। महारानी सुनन्दा रूपवती, गुणवती एवं मृदुल स्वभाव की थीं। दोनों का जीवन बड़े सुख एवं आनन्द से बीत रहा था। कौशाम्बी निवासी भी महाराज विजय प्रताप के कुशल प्रशासन एवं समर्थ में अपने उत्कर्ष की ओर गतिशील थे।
कुछ दिनों के पश्चात आनन्द में विषाद को उत्पन्न करने वाली गर्भ से एक बालक ने जन्म लिया, जो एक सिर, अन्धा, बहरा, गूँगा और लँगड़ा था। उसके शरीर के अनेक अंग गायब थे। उसे शरीर कहना भी मुश्किल था, मात्र एक माँसपिण्ड था, इसके बावजूद विचित्र बात यह थी कि वह जीवित था। महारानी सुनन्दा का मन दुख से भर गया, पर वह कर भी क्या सकती थी। बालक का जन्म हो चुका था और वह उसकी माता थी। माता का हृदय अपने पुत्र के लिए कुछ अन्यथा सोच भी नहीं सकता है।
उसने इस अनोखे बालक को तलघर में ले जाकर छिपा दिया। तलघर में ही उसे खिलाती, पिलाती, उसका पालन-पोषण करती रहती। कभी भूलकर भी उसे वह बाहर नहीं निकालती थी। उसने इस बालक का नाम मकराक्ष रखा। तलघर में ही रहकर वह धीरे-धीरे बड़ा होने लगा।
उसी नगर में एक दीन-हीन किन्तु वीभत्स मनुष्य रहता था। वह भौंड़ा, अन्धा और गरीब था। उसकी शक्ल बड़ी भद्दी थी। यहाँ तक कि उसे देखने मात्र से डर लगता था। उसके आस-पास मक्खियाँ भिनभिनाया करती थीं, वह अपने एक साथी की सहायता से लकड़ी के सहारे में घूम-घूमकर भीख माँगा करता था।
बसन्त ऋतु के दिन थे। खेतों में सरसों एवं वन में पलाश के फूल मुसकराते हुए अपनी छटा बिखेर रहे थे। उन्हीं दिनों भगवान महावीर कौशाम्बी नगर के राज्योद्यान में पधारे। बिजली की तरह सारे नगर में यह खबर फैल गयी। झुण्ड के - झुण्ड स्त्री-पुरुष उनके दर्शन करने और उपदेश सुनने के लिए राज्योद्यान की ओर उमड़ पड़े। उन दर्शनाभिलाषी स्त्री-पुरुषों में साधारणजन से लेकर स्वयं राजा विजय प्रताप और महारानी मृगावती भी थीं। उस अंधे मनुष्य के कानों में भी राज्योद्यान की ओर जाते हुए मनुष्यों की भनक पड़ी। वह अपने साथी से पूछ बैठा- क्यों भाई, आज इतना शोरगुल क्यों हो रहा है? क्या आज कोई पर्व है?
साथी ने उत्तर दिया- नहीं, आज किसी पर्व या उत्सव की तिथि नहीं है। नगर के राज्योद्यान में चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का आगमन हुआ है। सब लोग उन्हीं के दर्शन करने और उपदेश सुनने जा रहे हैं।
भगवान महावीर का नाम उसे किसी जादुई चमत्कार की तरह लगा। इस नाम की चर्चा उस जमाने हर बाल-वृद्ध युवक-युवती के जुबान पर थी। महावीर के व्यक्तित्व से सभी चमत्कृत थे। उनके उपदेश, उनका सान्निध्य हजारों-लाखों लोगों के जीवन की दिशा को सन्मार्ग की ओर मोड़ रहा था। अन्धा व्यक्ति मन - ही - मन सोचने लगा कि वह भगवान महावीर के दर्शन तो नहीं कर सकता, क्योंकि वह अन्धा है। पर वह उनके उपदेश तो सुन ही सकता है। क्यों न वह भी राज्योद्यान में पहुँचकर उन्हें प्रणाम करे और उनका उपदेश सुनें वह अपने साथी से बोला-भाई मैं भी भगवान महावीर का उपदेश सुनना चाहता हूँ। तू मुझे भी राज्योद्यान में ले चल। साथी ने प्रसन्नतापूर्वक अपनी सहमति जतायी और दोनों उद्यान में जा पहुँचे, वहाँ बैठकर वे भगवान महावीर का उपदेश सुनने लगे।
हठात् महावीर स्वामी के पट्ट गणधर गौतम स्वामी ने उस अन्धे व्यक्ति को देखा। उसकी शक्ल -सूरत तो विचित्र थी ही, उसके आस-पास मक्खियाँ भी भिनभिना रही थीं। गौतम स्वामी की दृष्टि बार-बार उस व्यक्ति की ओर चली जाती। वह रह-रहकर उसे देखने लगते। उसके प्रति उनके मन में दया जाग उठी। इसी कारण वे भगवान का प्रवचन भी दत्तचित्त होकर न सुन सके।
उपदेश समाप्त होने पर लोग अपने-अपने घर चले गये, पर वह अन्धा व्यक्ति राज्योद्यान में ही रुक गया। गौतम स्वामी ने उसे देखकर भगवान महावीर से प्रश्न किया -प्रभो इस अन्धे मनुष्य का जीवन इतना दुःखपूर्ण क्यों हुआ? मेरे विचार से संसार में इससे बढ़कर और दुखी नहीं हो सकता।
महावीर स्वामी ने उत्तर दिया- वह इसी नगर के राजा विजय प्रताप का पुत्र है गौतम! लोग उसे मकराक्ष कहते हैं। इसने जब से जन्म लिया, तब से तलघर में रहता आ रहा है। उसकी पीड़ा हृदय को कँपा देने वाली है।
भगवान महावीर ने गौतम को बताया कि मकराक्ष का शरीर कैसा है। उसका पालन -पोषण किस प्रकार हो रहा है और अब वह तलघर में किस प्रकार नारकीय जीवन व्यतीत कर रहा है।
गौतम स्वामी के मन में मकराक्ष को देखने की इच्छा तीव्र हो उठी। वह बोले, मैं मकराक्ष को देखने के लिए आपकी अनुमति चाहता हूँ।
महावीर ने गौतम स्वामी को अनुमति दे दी।
गौतम स्वामी मकराक्ष को देखने राजभवन पहुँचे। राजा और रानी दोनों ने हृदय से उनका आदर-सत्कार किया। उनके पास भोजन का पात्र नहीं था, इसलिए वे समझ गए कि गौतम स्वामी का आगमन उनके घर में भिक्षा के लिए नहीं हुआ, फिर उन्होंने किसलिए कृपा की? महारानी सुनन्दा उत्कण्ठा के साथ बोल उठीं-देव आपने अपने चरणों की रज से मेरे भवन को पवित्र किया मैं धन्य हो गयी।
रानी सुनन्दा का हृदय प्रसन्नता से नाच उठा। उन्होंने शीघ्र ही अपने सभी पुत्रों को बुलाकर गौतम स्वामी के सम्मुख खड़ा कर दिया। उनके वे सभी पुत्र सुन्दर वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित थे।
गौतम स्वामी ने एक क्षण रानी सुनन्दा के उन सभी पुत्रों को देखा। वे उन्हें देखते ही बोले, भद्रे, मैं तुम्हारे इन पुत्रों को देखने के लिए यहाँ उपस्थित नहीं हुआ हूँ।
सुनन्दा आश्चर्यचकित रह गयीं उसने विस्मय भरे स्वर में कहा तो, फिर आप किस पुत्र को देखना चाहते है, देव?
गौतम स्वामी ने उत्तर दिया, भद्रे मैं तुम्हारे उस पुत्र को देखने आया हूँ, जिसे तुमने जन्म से ही तलघर में छिपा रखा है। जिसका पालन - पोषण भी तुम वहीं कर रही हो।
सुनन्दा को और अधिक आश्चर्य हुआ, क्योंकि मकराक्ष के जनम और उसके तलघर निवास की बात राजा, रानी और एक सेविका को छोड़कर कोई नहीं जानता था, फिर यह बात गौतम स्वामी को कैसे पता चली? सुनन्दा बोल उठी- तलघर में रहने वाले पुत्र की बात तो किसी को मालूम नहीं है। आश्चर्य है, यह बात आपको कैसे मालूम हुई?
गौतम स्वामी ने उत्तर देते हुए जो कुछ भगवान महावीर से सुना था, महारानी सुनन्दा को कह सुनाया।
मकराक्ष के भोजन का समय हो चुका था। सुनन्दा भोजन, जल और मुँह ढँकने का एक वस्त्र लेकर गौतम स्वामी के साथ तलघर की ओर चल पड़ी।
जब वह तलघर के द्वार पर पहुँची, तो उसने अपने मुँह पर कपड़ा बाँध लिया और गौतम स्वामी से कहा कि वह भी मुँह पर कपड़ा बाँध लें, क्योंकि जिस तलघर में मकराक्ष रहता है, वह भयंकर दुर्गन्ध से भरा हुआ था।
तलघर का द्वार खुला। माँस के एक पिण्ड के तरह मकराक्ष बैठा हुआ अपनी माँ की राह देख रहा था। वह भूख से व्याकुल हो रहा था। उसके आस-पास से ऐसी दुर्गन्ध उठ रही थी कि सिर फटा जा रहा था।
सुनन्दा ने उसके सामने खाना रख दिया। वह श्वान की तरह खाने पर टूट पड़ा और सारा भोजन चट कर गया।
भोजन उसके शरीर में जाकर जल्दी ही रक्त और मवाद के रूप में परिवर्तित हो गया ‘ पर आश्चर्य इस बात का था कि वह रक्त और मवाद फिर उसके शरीर में से निकलकर बाहर टपकने लगा।
गौतम स्वामी मकराक्ष के शरीर और उसकी इस घिनौनी हालत को देखकर सचमुच काँप उठे। वह सोचने लगे कि इस जीव ने ऐसा कौन-सा पाप किया था, जिसे फलस्वरूप इसे ऐसी नारकीय यातना सहनी पड़ रही है? वे भगवान महावीर की सेवा में उपस्थित हुए। उन्होंने उनसे कहा- हे भगवन्!
मकराक्ष सचमुच बड़े दुःख का जीवन बीता रहा है। उसके भयंकर दुखों को देखकर मेरा मन काँप उठा है। पर देव मैं यह जानना चाहता हूँ कि उसने ऐसे कौन से पाप किये थे, जिसके फलस्वरूप उसे यह भयंकर दुख भोगना पड़ रहा है?
भगवान महावीर अन्तर्चेतना के स्पन्दनों में डूब गये वह कुछ पलों तक अपनी गहराइयों में डूबे रहे। फिर अपने आप ही बोल उठे-गौतम उसके पिछले जन्म की कहानी बड़ी अद्भुत है। ध्यान से सुनो। इस भारत क्षेत्र में बहुत दिन हुए एक नगर था। लोग उस नगर को सुकर्णपुर के नाम से पुकारते थे। सुकर्णपुर में एक बहुत बड़ा क्षमतावान मनुष्य रहता था। उसका नाम इकाई था। वह सुकर्णपुर नगर का स्वामी था। उसके अधीन पाँच सौ गाँव और भी थे।
पर वह बड़ा अधर्मी और लोभी था। लूट, हत्या और अपहरण ही उसके जीवन का व्यापार था। वह लोगों का धन जबरदस्ती छीन लेता था उनकी सुन्दर बहू-बेटियों ले जाता था।
धीरे-धीरे इकाई वृद्ध हो गया। उसके शरीर में कई प्रकार के रोग पैदा हो गए। पर फिर भी वह लूट-खसोट करता रहा, पापकर्मों में लिप्त रहा। उसकी अन्तिम बेला भी आ गयी, पर वह आखिरी दम तक चारों ओर डाकुओं को लूट-खसोट के लिए उकसाता रहा। प्राण निकलते समय भी उसके होठों पर हत्या, हिंसा और चोरी ही थिरकती रही। मरने पर वही इकाई राजा प्रताप के पुत्र के रूप में पैदा हुआ। अपनी बात पूरी करते हुए भगवान महावीर ने गौतम स्वामी की ओर गंभीर दृष्टि से देखा और कहने लगे-कर्मफल का विधान सुनिश्चित और अकाट्य है गौतम इस अनिवार्य विधान से कोई नहीं बच सकता।
मकराक्ष के पापकर्मों की कहानी और उसके दुख से गौतम स्वामी के मन में धर्म और सदाचरण की निष्ठा और भी तीव्र हुई। जैसी करनी वैसा फल-आज नहीं तो निश्चय कल’ का मर्म उन्हें और भी स्पष्ट होता चला गया।
साहस और मनोबल दो ऐसे मानवी गुण हैं, जिनके बल पर किसी भी अप्रिय स्थिति का मुकाबला सफलतापूर्वक किया जा सकता है। सैनिक से लेकर साधारण आदमी तक इन्हीं के बूते युद्ध जीतते और संकटों पर विजयी प्राप्त करते हैं। पराजय वस्तुतः इनके ही अभाव का दूसरा नाम है।
आए दिन ऐसे कितने ही प्रसंग प्रकाश में आते रहते हैं जो उपर्युक्त तथ्य की सार्थकता को सिद्ध करते हुए इस बात की प्रेरणा देते हैं कि हम निर्भीक अध्यात्मवादी की तरह जियें और बहादुर सिपाही की तरह मौत से दो-चार होने में भी संकोच न करें।
कैथी कुक ने अपनी कृति फेस-टू-फेस विद डेथ’ में ऐसी अनेक लोमहर्षक घटनाओं का वर्णन किया है, जिसे पढ़ने-सुनने मात्र से ही रोमांच हो जाता है। ऐसा ही एक प्रसंग एन्न क्वार्टरमैन और क्रिस्टीन बायल कोवस्की का है। एक बार दोनों ने ब्रिटिश कोलम्बिया के रीवेलस्टॉक पर्वतीय क्षेत्र में जाने का निश्चय किया। यह क्षेत्र में जाने का निश्चय किया। यह क्षेत्र स्कीइंग के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस हेतु घाटी से ऊपर पर्वत की चोटी पर आगन्तुकों के लिए आवास की व्यवस्था हैं दोनों वही जाने के लिए निकलीं। एन्न वहाँ पर्यटकों के लिए भोजन पकाने का काम करने के लिए भोजन पकाने का काम करने का विचार कर रही थी, जबकि क्रिस्टीन केवल पर्यटन के उद्देश्य से साथ जा रही थी। यों तो इसके लिए हेलीकॉप्टर की व्यवस्था थी। दोनों चाहतीं, तो उससे सीधे उस आवास पर पहुँच सकती थीं। किन्तु एक तो प्राकृतिक सौंदर्य, दूसरे साहसिक यात्रा, तीसरे हिमपात का आनन्द-यह उन दोनों को ही अत्यन्त प्रिय थे, इसलिए निश्चय किया गया कि पैदल चलकर ही वहाँ पहुँचा जाए।
१ अक्टूबर १९९४ को यात्रा आरंभ हुई। दोनों ने मोटर से वहाँ तक सफर किया, जहाँ तक सड़क गई थी। इसके बाद का १७ किलोमीटर घाटी, दर्रे एवं ग्लेशियर युक्त जंगली रास्ता था। इसे तय करने के बाद ही वे अपने गंतव्य तक पहुँच सकती थीं।
सड़क जहाँ समाप्त होती थी, उससे उतरकर पगडंडी के एक किनारे उनने अपनी मोटर खड़ी कर दी। इसके बाद अपने सामान के गट्ठर को पीछे पीठ पर बाँधकर दोनों बढ़ चलीं। वहाँ से छः घण्टे का पैदल मार्ग था।
एन्न ऐसे पहाड़ी रास्ते की जानकार थी। उसे बात का ज्ञान था कि पर्वतीय दर्रों में अक्सर भालू रहते हैं, सो उन्हें भगाने के एक विशेष रसायन अपने साथ ले लिया। रसायन एक ऐसे पात्र में था, जिसकी घुण्डी दबाते ही उसका फव्वारा फूट पड़ता था। पात्र को पीठ पर लटके बैग से बाँध लिया।
क्रिस्टीन भी साहसी महिला थी। अनेक बार वह पर्वतारोहण के साहसिक अभियानों पर निकल चुकी थी। स्वीमिंग की शौकीन थी, मोटर चलाना भी काफी प्रिय था। दोनों की मुलाकात एक पर्वतीय होटल में काम करते समय हुई थी, तब से उनके बीच घनिष्ठता बढ़ गई थी। समान प्रकृति और रुचि होने के कारण वे अभिन्न मित्र बन गई, इसलिए इस यात्रा में भी साथ - साथ थीं।
कुछ आगे बढ़ी, तो पगडंडी और संकीर्ण हो गई। इसके बाद खड़ी चढ़ाई और कठिन घाटी की शुरुआत हुई। रास्ता झाड़-झंखाड़ों से भरा हुआ था। वे किसी प्रकार चट्टानों पर रेंग-रेंगकर आगे बढ़ रही थी और जहाँ दर्रा एकदम संकरा और छिछला होता वहाँ छलाँग लगाकर उस पार हो जातीं। इससे ऊपर- नीचे चढ़ने -उतरने के अनावश्यक श्रम ओर थकान से बच जातीं। आगे बढ़ने के क्रम में वे जोर-जोर वे बातें करती हुई चल रही थीं, ताकि आस-पास कहीं रीछ तो वह दूर भाग जाए।
अभी वे कुछ ही आगे बढ़ी थीं कि भालू के निशान दिखाई पड़े। वह सतर्क हो गई और लगभग चिल्लाकर बातें करती हुई बढ़ चलीं। यात्रा के तीन घण्टे बीत चुके थे। दोनों इस समय १८३. मीटर की ऊँचाई पर एक घाटी के ऊपर थीं। तभी उनकी दृष्टि नीचे घाटी में गई। एक भालू अपने दो बच्चे के साथ दिखलाई पड़ा। वे लगभग ३.. मीटर दूर थे। एन्न तनिक भी भयभीत नहीं हुई कारण कि रीछों से उसका पहले भी आमना-सामना चुका था।
और वह उनके स्वभाव के बारे में जानती थी। उसे मालूम था कि यदि डरा नहीं जाए तो भालू मनुष्य की निकटता से दूर भागते हैं।
पर सामने दृश्य इसके ठीक विपरीत था। भालू बड़ी तेजी से उनकी ओर बढ़ रहा था। आस-पास वृक्ष भी नहीं था कि चढ़कर जान बचायी जा सके। क्रिस्टीन घबरा उठी। उसने एन्न की ओर देखा, मानो पूछ रही हो अब क्या किया जाए?
एन्न सोच रही थी कि कई बार इस प्रकार के उपक्रम आदमी को डराने के लिए भी भालू करते हैं और जब देखते हैं कि व्यक्ति निडर बना डटा हुआ है, तो आगे बढ़ने पर खतरा महसूस कर वे अपना रास्ता बदल लेते हैं। शायद यह भी वैसा ही करे, पर उसके व्यवहार में कोई फर्क आता प्रतीत नहीं हुआ। वह उसी गति से बढ़ता चला आ रहा था। यह देखकर दोनों ने उसे भयभीत करने के लिए चिल्लाना शुरू किया और जोर-जोर से अपनी भुजाएँ हवा में लहराने लगीं। उस पर कोई अन्तर नहीं पड़ा, तो वे भागने लगीं।
तभी एन्न को ध्यान आया-भागना खतरनाक हो सकता है। इससे आक्रमण के प्रति उसका रुझान बढ़ेगा। यह सोचकर उसने क्रिस्टीन को भागने से रोका। दोनों जल्दी-जल्दी चलकर घाटी के दूसरी ओर उतर गए। रीछ आँखों से ओझल हो चुका था। एन्न ने रसायन वाली बोतल अपनी पीठ से उतार कर हाथ में रख ली। उसने अब भी नहीं सोचा था कि वह उन्हीं पर आक्रमण कर देगा।
दोनों प्रार्थना करने लगीं। आँखें बन्द थीं। तभी हलकी-सी आहट हुई। चौंककर उनने नेत्र खोले, तो भालू का सिर चट्टान के ऊपर से झाँकता दिखा। उनके बीच की दूरी करीब ४ मीटर की रही होगी।
एन्न ने रसायन वाली अपनी बोतल संभाल ली और उसकी ओर लक्ष्य करके उसके और नजदीक आने का इन्तजार करने लगी। लगभग डेढ़ मीटर दूर वह रुक गया और अपने दोनों पिछले पैरों पर खड़ा हो गया। उसकी काली-काली डरावनी आँखें एन्न पर स्थिर थीं। एन्न भय से पीली पड़ गई, तभी अचानक होश आया। उसने बोतल की घुण्डी दबा दी। एक लाल रंग का फव्वारा तीव्रता से निकलता हुआ रीछ के चेहरे पर पड़ने लगा। दर्द से कराहता हुआ वह जमीन पर गिर पड़ा। उसके बाद उठकर तेजी से भाग गया।
एन्न ने चैन की साँस ली। क्रिस्टीन से इस सम्बन्ध में भी वह बात कर रही थी कि भालू पीछे से पुनः दौड़ता हुआ आया और क्रिस्टीन की बायीं बाँह में अपने दाँत चुभो दिये। उसकी कोहनी पूरी तरह भालू के मुँह के अन्दर थी और वह उसको बुरी तरह झकझोर रहा था। उसकी पाशविक शक्ति के आगे क्रिस्टीन एकदम असहाय लग रही थी। एन्न समीप ही थी। वह अपनी मित्र की दुर्गति देख क्रुद्ध हो उठी। उसने दूसरी बार पुनः रसायन का छिड़काव उस पर किया।
अब क्रोधित होने की बारी भालू की थी। उसे क्रिस्टीन को एक ओर फेंका और एन्न पर झपट पड़ा। तीसरी बार फिर वह रसायन का प्रयोग करना चाह रही थी, पर बोतल खाली थी। भालू ने उसकी बढ़ी हुई दाहिनी भुजा को अपने जबड़े में कसकर दबा लिया और तीव्र झटका दिया। इससे उसका भी संतुलन बिगड़ गया। दोनों लुढ़कते हुए एक झाड़ी में जाकर रुके। भालू ने जगह-जगह उसे बुरी तरह काटा और पंजे से नोंचा। यहाँ तक कि उसके सिर की त्वचा का एक बड़ा भाग उससे पृथक का एक बड़ा भाग उससे पृथक हो गया। दर्द के मारे वह कराह उठी।
क्रिस्टीन झाड़ी में पड़ी हुई थी। उससे अपनी सहेली की दुर्दशा नहीं देखी गई। उसने अपनी सहेली दुर्दशा नहीं देखी गई। उसने सोचा जब मरना ही है तो अन्तिम साँस तक संघर्ष करूँगी। वह वहीं चीख पड़ी-एन्न घबराना मत। मैं आ रही हूँ।
रीछ के समीप पहुँची क्रिस्टीन ने उसके सिर पर अपने मजबूत जूते का एक जोरदार आघात लगाया। वह लड़खड़ाते हुए गिर पड़ा। इसके बाद उन्मत्तापूर्वक लातों की बरसात कर दी, फिर उसकी नाक पर एक मजबूत प्रहार किया।
भालू थोड़ा पीछे हटा, तदुपरान्त अपनी खीज़ उतारते हुए अपने तीक्ष्ण दाँत क्रिस्टीन के निम्ब में गढ़ा दिये। यह उसका अन्तिम बार था। इसके पश्चात् वह भाग खड़ा हुआ और झाड़ियों में ओझल हो गया।
क्रिस्टीन उठ खड़ी हुई, उसने देखा एन्न एकदम स्थिर और शान्त पड़ी हुई है, उसके कपड़े फटे और रक्तरंजित हैं। वह वही से चिल्लायी-एन्न तुम ठीक तो हो?
मैं मरी हुई का नाटक कर रही हूँ। वह फुसफुसायी।
जब उसे ज्ञात हुआ कि भालू जा चुका है, तो धीरे से सिर उठाकर देखा ऐसा करते ही उसके सिर की उधड़ी हुई खाल हवा में लहराई और वापस बैठ गई।
क्रिस्टीन के बैग प्राथमिक उपचार के थोड़े सामान थे। उनसे सबसे पहले उसने एन्न के सिर की पट्टी की, फिर एक - दूसरे की सहायता से दोनों ने अपनी-अपनी बाहों की मरहम पट्टी की और जल्द वहाँ से चल पड़ी।
रक्त के बह जाने ओर बुरी तरह से घायल होने के कारण वे काफी कमजोरी महसूस कर रही थीं, किन्तु अब वापस लौटने के अतिरिक्त और कोई दूसरा उपाय नहीं था। उनने अपने-अपने बैग के अनावश्यक समान फेंक दिये। इससे बैग हलका हो गया और चलने में कुछ राहत अनुभव होने लगी।
तापमान शून्य के आस-पास था, उस पर वर्षा अत्यन्त कष्टकारी प्रतीत हो रही थी। वे किसी प्रकार भीगते हुए गिरते -पड़ते कठिनाई से आगे बढ़ पा रही थीं। सबसे मुश्किल कार्य खड़ी घाटी में चढ़ना -उतरना सिद्ध हो रहा था, पर मरता क्या न करता, इस कहावत को चरितार्थ करते हुए वे एक-एक कदम घिसटते हुए चली जा रही थीं। जल्द ही दोनों वहाँ पहुँच गई, जहाँ उनकी मोटर खड़ी थी।
मोटर से वे मुख्य सड़क तक पहुँची। उसे चलाने में भी उन्हें कठिनाई हो रही थी। थोड़ी ही दूर पर सड़क निर्माण का कार्य चल रहा था। दोनों ने वहाँ गाड़ी रोकी और सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे कह सुनाया तथा अस्पताल ले चलने का आग्रह किया। उनने उन्हें अस्पताल पहुँचाया जहाँ एक महीने के उपचार के बाद वे लगभग स्वस्थ हो गई।
“ साहस वीरों का भूषण है”-
किसी विद्वान के इस कथन में उतनी ही सच्चाई, जितनी इसमें कि साहसी वीर होते हैं। वीरता ओर साहस का परस्पर युग्म हैं साहस न तो तो शरीर से भीमकाय लगने वाला व्यक्ति भी उस शहतीर की तरह है, जो बाहर से बिलकुल ठीक दीखते हुए भी अन्दर से पूर्णतः खोखला हो। ऐसे व्यक्तियों के कठिन परिस्थितियों में हाथ-पाँव फूलने लगते हैं और घबराहट के मारे जो कुछ किया जाना चाहिए, वह सब भूल जाते हैं। इस अवस्था में यदि तनिक-सा धैर्य थोड़ी-सी हिम्मत से काम लिया जाए, तो देखा जाता है कि मुश्किलें आसान हो जाती है और थोड़े समय पूर्व जहाँ पराजय और असफलता जैसी संभावना दीख रही थी, वही विजय और सुफलता में बदल जाती हैं, इसलिए यह कहना ठीक ही है कि सफलता का पैमाना शरीर- संगठन नहीं, मानसिक संरचना है।
विश्व-स्वास्थ्य-संगठन सर्वेक्षण के अनुसार प्रतिवर्ष लाखों लोगों की मौत हृदय रोगों से होती है। संसार की सबसे अधिक व्यथा हृदय रोगी की है। कैंसर की विभीषिका का नम्बर इसके बाद आता है। अन्य सब रोगों का नम्बर इसे बाद का है।
हृदय के दौरे क्यों आते हैं और उनका उपचार क्या हो सकता है? यह जानने से पहले हमें इस महत्वपूर्ण अवयव की संरचना की थोड़ी जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।
हृदय चार कक्षों में विभक्त है। दायीं ओर के दो कक्षों का काम यह है कि वे रक्त को फेफड़ों में भेजकर उसमें आक्सीजन का सम्मिश्रण करायें। बायीं ओर के दो कक्षों का काम यह है कि शुद्ध रक्त को सम्पूर्ण शरीर में भेजें। दो निकास नलियाँ हृदय से निकलती हैं।
पल्मोनरी आर्टरी-फुफ्फुस धमनी, एओर्टा -महाधमनी, पहली तक जाती है और दूसरी शेष शरीर को महाधमनी में ऐसे वॉल्व होते हैं, जो एक ही दिशा में खुले और बंद हों। उसी विशेष व्यवस्था के कारण उक्त नहीं लौट सकता।
बुढ़ापे से लेकर आहार-विहार तक ही विकृतियाँ और दुश्चिन्ताएँ जैसे कारण मिलकर हृदय रोग उत्पन्न करते हैं। खराबी शरीर में अधिक चर्बी वाले रसायन कॉलेस्ट्राल-इकट्ठे होने से आरंभ होती है। इससे धमनियों में जकड़न-आर्थेरोस्क्लेरोसिस की शिकायत बढ़ती है। नाड़ियाँ मोटी ओर बड़ी होती चली जाती हैं। दूसरी ओर रक्त में चर्बी के थक्के -थ्रोम्बिन में जा उलझते हैं। जब तक नाड़ियों में कोमलता रहती है, तब तक वे रबड़ की तरह फूलकर इन थक्कों के लिए आवागमन का रास्ता देती रहती हैं। पर जब वे अकड़ जाती हैं तो उनकी फूलने -फैलने की क्षमता कुण्ठित हो जाती है। इसी दिशा में थक्के जब अड़ जाते हैं, तो रास्ता रुक जाता है। और दिल का दौरा सामने आता है। नाड़ियों में बढ़ने वाली कठोरता अन्ततः हृदय की कठोरता स्टेनोकार्डिया में परिणत होती है और वह कठोरता जब रक्ताभिषरण में अड़चन उत्पन्न करती है, तो स्थानीय संघर्ष उठ खड़ा होता है। और सूजन या घाव को जन्म देता है। इसी परिस्थिति की डॉक्टरों की भाषा में मायोकार्डियल इन्फेक्शन कहते हैं। क्रमिक रूप से बढ़ती हुई यह विकृतियाँ हृदय रोगों की छोटी-बड़ी साध्य - असाध्य स्थिति के रूप में जानी जाती है।
दिल के दौरे के यों अनेक कारण और उनके स्वरूप हो सकते हैं, पर हार्टअटैक नाम से प्रचलित व्यथा में अधिकांश रोगियों को एक ही कठिनाई का सामना करना पड़ता है कि हृदय को रक्त लाने ले जाने वाली नाड़ियों का ढीलापन घट जाता है और उनकी दीवारें कठोर हो जाती हैं। एक ओर तो नाड़ियों की यह सिकुड़न तथा कठोरता और दूसरी और रक्त में चर्बी का तथा खून की फुटकी-सी बढ़ने लगती है। यह फुटकी रक्त-नाड़ियों में अटक जाती है तो हृदय के अमुक भाग को शुद्ध रक्त मिलना बंद हो जाता है और भूख तड़पकर मरने लगता है। यह तड़पन दिल के दर्द के रूप में प्रकट होती है। यह आंशिक क्षति हुई। इसे विश्राम से दूर किया जा सकता है। नसों पर श्रमजन्य दबाव न पड़े तो आहिस्तगी के साथ उस अवरोध का कोई न - कोई मार्ग निकाल देती हैं। ऐसा भी हो जाता है कि जो दूसरी नाड़ियाँ उस क्षुधित स्थान को रक्त पहुँचाती थीं अधिक सक्रिय होकर अभाव की पूर्ति कर सकने योग्य बन जाए ओर जहाँ अवरोध अड़ गया था, उसमें कुछ अधिक बड़ा संकट न रहे।
कभी-कभी हृदय की कोई दीवार ही घायल हो जाती है या कोई अंग ठीक तरह काम कर सकने के अयोग्य हो जाता है, तो भी दिल में दर्द या दौरे पड़ने लगते हैं। बूढ़ा ओर कमजोर दिल जरा-जरा से कारण पर अपना संतुलन खो बैठता है और उसकी चाल घटने बढ़ने से लेकर उक्त के अवरोध तथा घर्षण से सह्य या असह्य पीड़ा होने लगती है। कहना न होगा कि हृदय की विपत्ति का प्रभाव समस्त शरीर पर पड़ता है। रक्त का शोधन और अभिसरण ठीक तरह न होने पर अंगों को न तो उचित मात्रा में रक्त मिलता और न वह आवश्यक शक्ति देने योग्य शुद्ध होता है ऐसी दशा में सिर चकराने लेकर हाथ-पाँव काँपने तक और घबराहट, बेचैनी से लेकर पसीना छूटने तक अनेकों प्रकार के उपद्रव विभिन्न स्थानों पर उठ खड़े हो सकते हैं। हृदय का दौरा पड़ने पर शरीर की प्रायः सभी स्वाभाविक क्रिया - प्रक्रियाएँ लड़खड़ा सकती हैं।
हृदय रोगों के यों अनेकों भेद - उपभेद हैं, पर उनमें तीन मुख्य हैं -
एंजाइना पैक्टोरिस, २. कोरोनरी थ्रोम्बोसिस ३. कोरोनरी एम्बोलिज्म।
ऐंजाइना पैक्टोरिस में दर्द अधिक होता है, रोगी जोर से चिल्लाता है और बेहोश हो जाता है। दर्द का फैलाव सीने के दायें-बायें, कन्धे, गर्दन और बाजू तक बढ़ जाता है। ऐसे दौरे अक्सर काम करते - करते पड़ जाते हैं। ब्लडप्रेशर, डायबिटीज, सिफलिस जैसे रोग पहले से मौजूद हों तो वे इसे आमन्त्रित करते रहते हैं।
कोरोनरी थ्रोम्बोसिस का दर्द हल्का और लगातार कई दिनों तक टिकने वाला होता है। इस तरह के दौरे प्रायः रात को सोते-सोते पड़ते हैं। प्रायः 40 वर्ष से ऊपर के लोगों पर ही इसका आक्रमण होता है। पसीना छूटना, मुँह से लार गिरना जैसे लक्षण दिखाई पड़ते हैं।
कोरोनरी एम्बोलिज्म उस स्थिति में जिसमें कोई रक्त की फुटकी हृदय नाड़ी में अड़ी होती हो, हड्डी टूटने पर उस जगह से हवा का रक्त के साथ मिलकर बुलबुला उत्पन्न करना उसका हृदय में रुक जाना भी इस उपद्रव का कारण होता देखा गया है।
दिल के दौरों का एक कारण फ्योक्रोमों साइटोमा एक प्रकार का ट्यूमर भी है, जो एड्रीनल रस ग्रन्थि में पाया जाता है। मानसिक तनाव बना रहने पर यह संकट भी उत्पन्न होता है और उसका प्रभाव दिल के दौरे तक जा पहुँचता है। अधिक दिमागी काम करने वाले ही बहुत करके इस व्यथा से जकड़ जाते हैं।
हृदय का दौरा पड़ने पर डॉक्टर अपने ढंग से अपना काम करने में लग जाते हैं। वे उस कारण को ढूँढ़ते हैं, जिसके कारण व्यथा की उत्पत्ति हुई है। परीक्षण - निरीक्षण, इसके बाद दवा-दारु विश्राम, निद्रा और उतने पर भी कुछ न बन पड़े तो आपरेशन या निकम्मे दिल को हटाकर किसी दूसरे का उस स्थान पर फिट करना, यही है चिकित्सकों की सीमा-मर्यादा जिसमें वे भरसक दौड़-धूप करते हैं और कभी-कभी कइयों को कुछ लाभ भी पहुँचाते हैं, पर देखा गया है कि सामयिक उपचार करने के उपरांत भी जड़ नहीं कटती और दौरे बार-बार पड़ते रहते हैं, कुछ दिन विराम मिलने के बाद बीमारी फिर उभर आती है।
इन रोगों का निदान करते हुए-रक्ताभिषरण के कारण उत्पन्न प्रवाह की स्थिति जाँचने का काम इलेक्ट्रो-कार्डियोग्राम से लिया जाता है। दिल की किसी माँसपेशी के मर जाने से लेकर अवरोध एवं घाव होने तक की स्थिति का पता इस परीक्षा से बनने वाले ग्राफों द्वारा चल जाता है। कार्डिएकमानीटर की क्षमता इससे भी अधिक है, वह टेलीविजन के पर्दे पर आने वाली तस्वीरों की तरह दिल की हरकत के चित्र प्रस्तुत करता रहता है।
हृदय के कक्षों में नालियाँ डालकर अन्दर का दबाव जानने का प्रयत्न किया जाता है और रक्त के स्तर का पता लगाया जाता है। इस प्रक्रिया को कार्डियेक कैथेटेराइजेशन कहते हैं। हृदय में डाय का प्रवेश करके उसके फोटोग्राफ लेना ओर आन्तरिक स्थिति का पता लगाना एंजियोकार्डियोग्राम कहा जाता है। ऐसी ही अन्य परीक्षा - प्रक्रियाएँ हैं, जिनके द्वारा हृदय पर कहाँ क्या बीत रही है, इसका विवरण जाना जाता है।
दिल का दौरा पड़ने पर चिकित्सक प्रधानतया एक ही काम करते हैं कि रोगी को अधिकाधिक विश्राम करने की व्यवस्था कठोरतापूर्वक कराएँ। हफ्ते में पूरा विश्राम करने की सलाह देते हैं, यहाँ तक कि करवट बदलने जैसे श्रम में भी दूसरों का सहारा लेने की व्यवस्था करते हैं। स्थिति के अनुसार पूरे या अधूरे विश्राम की व्यवस्था इसलिए कराई जाती है कि रोगी पर शारीरिक श्रम के कारण पड़ने वाले दबाव से उसे बचाया जाए। शारीरिक श्रम स्वभावतः रक्त के अधिक तेज बहाव की माँग करता है, इससे दिल पर बोझ पड़ता है और कष्ट के शमन करने में कठिनाई पड़ती है, इसलिए ऐसी परिस्थिति में विश्राम अनिवार्य हो जाता हैं। दर्द घट जाने पर भी रोगी को निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिए वरन् अंगों को अपनी स्वाभाविक स्थिति में आने तक काम न करने की छुट्टी दी जानी चाहिए। दिल के रोगी दर्द की अधिकता से नहीं आक्सीजन के अभाव में मरते हैं। श्रम बढ़ेगा तो आक्सीजन का खर्च भी बढ़ेगा। रक्त उसे पूरा न कर सका तो मौत निश्चित है। ऐसा संकट खड़ा न हो जाए इसलिए दौरा पड़ने के दिनों में तो रोगी को अधिकाधिक विश्राम करना ही चाहिए और आगे भी जीना चढ़ने, दौड़ने, भारी वजन उठाने जैसे श्रमसाध्य कार्यों से बचना चाहिए।
औषधि के रूप में भी इस अवसर पर ऐसी दवाएँ दी जाती हैं, जो तन्द्रा एवं निद्रा की स्थिति पैदा करें और रोगी की बेचैनी तथा चिल्लाहट बन्द हो जाए। खाने की दवाएँ हो या लगाने की उसमें तन्द्रा-निद्रा लाने वाले तत्व अवश्य रहेंगे। विपत्ति की घड़ी में यह कामचलाऊ उपचार तक प्रकार से आवश्यक हो जाता है।
थके को विश्राम देना-घाव भरने के लिए क्षत-विक्षत स्थान को बिना हिलाये-डुलाये पड़ा रखना उचित भी है। उदर रोगों में उपवास कराके जिस प्रकार इस क्षेत्र को पुनः कार्य करने के लिए समर्थ बनाया जाता है, ठीक उसी प्रकार तन्द्रा उत्पन्न करने वाली औषधियों द्वारा अथवा रोगी को वैसा करने का निर्देश देकर चिकित्सक लोग क्षतिपूर्ति कराते हैं।
एड्रिनेलिन, डिजिटेलिस, मेफेन्टिन आदि औषधियों का डॉक्टर लोग समय पर प्रयोग करते हैं। अनय प्रकार के उपचार भी ढूँढ़े और प्रयोग किये जा रहे हैं। नकली दिल बनाये और लगाये जा रहे हैं। एक का दिल निकाल कर दूसरे के सीने में फिट करने के भी कई प्रयोग हुए हैं। दिल की मालिश से लेकर स्थानीय गड़बड़ी का छोटा आपरेशन तक के अनेक उपचार कार्यान्वित किये जा रहे हैं। रूसी विशेषज्ञ प्रो. कयास्नकोव चैकोस्लोवाकिया के डॉ. केरोल सिक्का प्रो. नेगोवस्की, डॉ. फार्समान आदि विशेषज्ञों ने हृदय चिकित्सा के नये आधार और नये उपकरण प्रस्तुत किये हैं।
छुट-पुट आपरेशन तो कभी-कभी सफल हो जाते हैं, पर हृदय प्रत्यारोपण की दिशा में शरीरशास्त्रियों का अत्याधिक उत्साह होने पर भी अभी उस दिशा में कोई कहने लायक सफलता नहीं मिली है। शरीर ने अपने ऊपर दूसरे दिल का आधिपत्य सहन और स्वीकार नहीं किया है।
चिकित्सकों के सहयोग तथा चिकित्सा -उपचार की आवश्यकता से इंकार नहीं किया जा सकता है। पर उससे भी अधिक आवश्यक यह है कि हृदय रोगों के मूल कारणों को समझा जाए और उनको समय रहते रोका जाए, ताकि इस महारोग की विभीषिका पर अंकुश रखा जा सके। आग लगन पर पानी डालने के लिए दौड़ना अच्छा है। पर इससे भी अच्छा यह है कि आग लगने ही देने की सावधानी बरती जाए।
यदि हम शारीरिक और मानसिक स्थिति को संतुलित बनाये रह सके तो निश्चित रूप से ऐसी सुदृढ़ता और सशक्तता बनी रहेगी, जिसके रहते किसी हृदय को रोगों की व्यथा से ग्रसित न होना पड़े।
विश्व - स्वास्थ्य -संगठन ने संसार भर में इन दिनों हृदय रोगों की वृद्धि का कारण मानसिक उद्वेगों को बताया है। बढ़ती हुई नशेबाजी और कामुकता भी इसका एक बड़ा कारण है। अमेरिका, ब्रिटेन आदि देशों में कुपोषण, गरीबी जैसे अभावजन्य कारण नहीं है, फिर भी वहाँ हृदय रोग पिछड़े कहे जाने वाले देशों की अपेक्षा कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहे हैं, इसका एक बड़ा कारण अनास्था, अशान्ति, अनिश्चितता और असंयमजन्य उद्वेगों का दिन-दिन उभरते जाना ही कहा जा सकता है।
हृदय विशेषज्ञ डॉ. ह्नाकनेन्स का कथन है कि अण्डा, माँस मक्खन जैसी चिकनाइयों का प्रचलन दिल के रोगों को बढ़ा रहा है। यदि लोग इतनी ही राशि, फल-सब्जियों पर खर्च करने लगें और अपनी खाने सम्बन्धी आदतें सुधार लें, तो न केवल दिन के दौरे से वरन् अन्य रोगों से भी रक्षा हो सकती है और सुखपूर्वक जिया जा सकता है।
हार्वर्ड विश्वविद्यालय कैम्ब्रिज (मेसाचुसेट्स) की हृदय रोग अन्वेषी परिषद द्वारा हार्वर्ड बी. स्प्राग के नेतृत्व में जो शोधकार्य चल रहा था उसकी रिपोर्ट 1923 पृष्ठों में प्रकाशित हुई है उसमें जहाँ संरचना सम्बन्धी खराबियों से उत्पन्न होने वाले हृदय रोगों की चर्चा है, वहाँ मानवी रहन-सहन को भी दोषी ठहराया गया है और कहा गया है कि यदि लोग हलका, हरा और सुपाच्य भोजन किया करें, दिनचर्या संतुलित रखें, शारीरिक श्रम में उत्साह रखे और मानसिक उद्वेगों से बचे रहें, नशेबाजी से परहेज रखें तो बढ़ते हुए हृदय रोगों के संकट से तीन-चौथाई मात्रा में छुटकारा मिल सकता है।
एडिनवरा विश्वविद्यालय के डॉ. पैसमोर ने बढ़ते हुए हृदय रोगों के कारण तलाशने में लंबा समय लगाने के उपरांत निष्कर्ष निकाला है कि समृद्धिशाली देशों में एक ऐसा समाज बनता जा रहा है, जिसे कम से कम शारीरिक श्रम करना पड़ता है। जो करते हैं वह मानसिक ही होता है पर उसमें शारीरिक परिश्रम के लिए कोई स्थान नहीं रहता। लिफ्टों पर नीचे-ऊपर उतरने-चढ़ने मोटरों पर चलने तथा दूसरी आवश्यकताओं के लिए यंत्रों पर निर्भर रहने से शरीर के बहुमूल्य अवयवों जंग लगना शुरू हो जाता है। आराम अच्छा तो लगता है, पर उसका अभिशाप भयंकर विपत्तियों के रूप में सामने आता है। इनमें दिल की बढ़ती हुई बीमारियों को अग्रणी कहा जा सकता है।
दिल के दौरे से मरने वाले लोगों में ६३ प्रतिशत अमीर, २५ प्रतिशत मध्यम वर्ग के और ११ प्रतिशत गरीब लोग होते हैं। यहाँ अमीरी और गरीबी का वर्गीकरण आरामतलबी और श्रमशीलता के आधार पर किया गया है।
हैडिलवर्ग (जर्मनी) के हृदय विशेषज्ञ डॉ. हिमेज हुक्समैन ने पश्चिमी बर्लिन में हुई मेडिकल काँग्रेस में अपना निष्कर्ष सुनाते हुए कहा-हृदय रोगों का सम्बन्ध उतना शारीरिक कारणों से नहीं, जितना मानसिक परिस्थितियों से है। देखने में यह लगता है कि यह एक माँस पिण्ड है और उसे शारीरिक कारण ही रुग्ण कर सकते हैं, पर गहरी खोजें उससे आगे आती हैं और वे कहती हैं कि मानसिक घुटन एवं उत्तेजना का सबसे बुरा प्रभाव दिल पर पड़ता है, इसलिए अधिक भावुक अथवा घुटन भरी परिस्थितियों में रहने वाले लोग अधिक मात्रा में हृदय रोगों से ग्रसित पाये जाते हैं। आहार-विहार सम्बन्धी दोष न होते हुए भी शरीररचना में कोई गड़बड़ी न रहते हुए भी अनेकों रोगियों को हृदय रोगों से ग्रसित पाया जाता है। उसका कारण उनकी घुटन भरी असंतुष्ट मनः स्थिति में ही देखा जाना चाहिए और उनके उपचार के लिए दवा-दारु तक सीमित न रहकर उनके चिन्तन में सुधार एवं परिस्थिति -परिवर्तन के रूप में भी किया जाना चाहिए।
मस्तिष्कीय उथल-पुथल शरीर के संवेदनशील संस्थान को अस्त-व्यस्त करके रख देती है। स्नायु-संस्थान की नेत्री ‘ वेगस’ तंत्रिका को लड़खड़ा देने वाले मानसिक विक्षोभ ही होते हैं। इससे सारा नाड़ी-संस्थान ही गड़बड़ा जाता है और फिर उस गड़बड़ी का अन्त हृदयजन्य रोगों के रूप में परिणत होता है। स्नायु रोग, न्यूरोसिस, अति रुधिर तनाव-हाईपरटेन्शन-हृदयकाठिन्य-स्टेनोकार्डिया अन्ततः विविध स्तर के हृदय रोग बनकर मनुष्य के सामने मृत्यु जैसी विभीषिका उत्पन्न करते हैं।
यदि मानसिक आवेगों, उद्वेगों ओर मनोविकारों से बचकर रहा जा सके, विचारो में प्रौढ़ता विकसित करके जीवन में आये दिन प्रस्तुत होते रहने वाले उतार-चढ़ाव से हँसते-खेलते निबटते रहने की कला सीखी जा सके, तो हृदय रोगों की आधी समस्या सहज ही हल हो सकती है। यह प्रयोजन अध्यात्म तत्व-ज्ञान के आधार पर ही पूरा हो सकता है। अस्तु हृदय रोगों से सुरक्षित और दौरा पड़ने पर मनोबल बढ़ाकर भीतरी साहस को बनाये रखने वाले अध्यात्म तत्त्वज्ञान का भी महत्वपूर्ण उपयोग हो सकता है। आज सबसे घातक व्याधि का उपचार है- अपने तनाव को घातक न बनने देकर रचनात्मक बनाकर ऊर्जा में बदल लेना। यही ऊर्जा जीवनशक्ति के अक्षय भाण्डागार का निर्माण करती है। हृदय रोग से इसी से जूझा जा सकता है।
आपकी माता अब शय्या से उठ नहीं पाती। बड़ी उत्कंठा थीं, कोई समाचर मिले घर का और अब समाचर मिला तो यह- उनकी बड़ी इच्छा है, आते समय आँखों में आँसू भरकर उन्होंने कहा है- बलवन्त का मुँह देख पाती मरने से पहले। वैद्यों की जा राय है, वह अच्छी नहीं है उनके सम्बन्ध में।
माँ अभी हैं तो? बलवंतसिंह के नेत्र भर आए। होना तो चाहिए। सन्देश देने वाले ने उलटे घबराहट अधिक बढ़ा दी- मैं। झूठ नहीं बोलूँगा। जब मैं चला उनको तीव्र ज्वर था और दुर्बलता तो बढ़ती ही जा रही थी। वृद्ध शरीर है और पूरे डेढ़ महीने से चारपाई पकड़ रखी है। मुझे किशनगढ़ छोड़े पन्द्रह दिन हो रहे हैं।
हे प्रभु! बलवंत सिंह ने दोनों हाथ जोड़कर किसी अदृश्य को मस्तक झुकाया। माता डेढ़ - दो महीने से रुग्ण हैं और उन्हें अब समाचार मिल रहा है, लेकिन इसमें दोष किसका है? किसे पता है कि वह यहाँ है। यदि बीकानेर से वह कोलायत के मेले के समय ने आया होता, तो यह पता भी उसे नहीं लगता।
घर पर किसके झगड़ा नहीं होता? बड़े भाई ने कुछ कह दिया तो क्या हो गया था? अन्ततः स्नेहवश ही तो उन्होंने डाँटा था। आज बलवन्त सिंह को ढाई वर्ष पुरानी बातें अभी सामने हुई जान पड़ती हैं। चार भाइयों में सबसे छोटा होने के कारण सबका स्नेहपात्र था। वहाँ राजपूत सरदारों का उसका घराना था। किन्तु बड़ा ही पवित्र घर था उसका। उसके पिता की कीर्ति न्याय, सदाचार और पीड़ितों की रक्षा के लिए किशनगढ़ (रैनिवाल) में अब तक गायी जाती है। बड़े भाई ने पिता के स्वर्गवासी होते ही उनका उत्तराधिकार - उनके सद्गुण भी अपना लिए। गुण-दोष संग से भी आते हैं। राजपूत कुमारों का साथ, उसका आचार-व्यवहार अमर्यादित हो गया। अब छोटा भाई प्रजा पर कुदृष्टि करे, जिनकी रक्षा कर्तव्य है, उनकी ही बहू - बेटियों पर व्यंग कसे, यह वे कैसे सह सकते थे?
तू कलंक उत्पन्न हुआ इस कूल में। बड़े भाई ने सामने आते ही आग्नेय नेत्रों से देखा और तड़प उठे थे। किसी न उनसे कह दिया होगा। झूठ भी तो नहीं कहा था। वे ठीक ही तो डाँट रहे थे- यह किसका घर है यह तुझे पता नहीं। पिता की कीर्ति को कलंकित करके यहाँ आते तुझे लज्जा नहीं आयी?
बात कुछ नहीं थी। पिता के समान स्नेह करने वाले बड़े भाई थे वे। क्षमा माँग लेने वे ही काम चल जाता। क्षमा न भी माँगी जाती तो भी दो घण्टे में स्वयं स्नेहपूर्वक समझाते, किन्तु बलवंत का राजपूत उक्त उबल पड़ा- मैं तब ताक इस घर में पाँव नहीं रखूँगा, जब तक मेरे आने से पिता की कीर्ति उज्ज्वल न होती हो। वह उल्टे पैरों लौट पड़ा था। बड़े भाई न सोचा था कि वह थोड़ी देर में लौट आएगा या घूमकर सीधे माता के पास चला आएगा। जब दोपहरी में भी वह घर नहीं पहुँचा’- सब लोग व्याकुल हो गए। लेकिन घर की सबसे अच्छी साँड़िनी (ऊँटनी) घर पर नहीं थी। भाइयों ने, मित्रों ने सप्ताह और महीने बिता दिये पता लगाने में, माता ने रो-रोकर आँखों की ज्योति खो दी, किन्तु बलवंत का पता नहीं लगा, सो नहीं लगा।
तुम कोलायत जा रहे हो? उसकी रुग्ना माता ने कितनी उत्कंठा से कहा था राम प्रताप से- संभव है मेरा बलवंत वहाँ आवे। उससे कहना तेरी वृद्धा माँ मर रही है। अब तो उसे क्षमा कर दे।
बलवंत रो पड़ा फूटकर - माँ! माँ! क्षमा करो मुझे।
भाई की बात लग गयी थी उस समय और जब मनुष्य को बात लग जाती है, यदि वह मनुष्य है तो देवता हो जाता है। बात लगने पर जो पिशाच हो जाते हैं, वे तो मनुष्य पहले भी नहीं थे। बीकानेर में लोग कहते हैं, सरदार बलवंतसिंह तो देवता हैं। ढाई वर्ष पूर्व साँड़नी की पीठ पर चढ़ा बलवंत अकेला बीकानेर पहुँचा था। उसके पास सामान के नाम पर केवल राजपूत की नित्यसंगिनी तलवार थी। सेना में स्थान मिलना कठिन नहीं था तब राजपूत के लिए। ढाई वर्ष में बलवंत सिंह सरदार हो गया है। उसकी तत्परता, परिश्रम, राजभक्ति और इन सब बातों से बढ़कर यह कि एकमात्र वही सेना में ऐसा है, जो समय पाते ही नगर में यह ढूँढ़ने निकलता है, कौन बीमार है? कौन दुखी है? किसी क्या सेवा की जा सकती है?
बीकानेर और वहाँ का गोस्वामी चौंक-काँकरोली के महाराज का यह आत्मीय परिवार, इसकी सेवा-श्रद्धा ने बलवंत सिंह को गायत्री माता की भक्ति का प्रसाद दे दिया है। वह गायत्री साधक हो गया है। गायत्री जप किये बिना जल पी लेना उसके लिए अकल्पनीय बात हो गयी है। आज कोलायत में उसे अपनी माता का समाचार मिला है। शायद यह भी आदिशक्ति माँ गायत्री की ही प्रेरणा थी, जो वह यहाँ आया।
सेना की सेवा ऐसी नहीं होती कि कोई बिना सूचना दिये चाहे जहाँ चल दे और कम से कम उससे तो यह आशा नहीं की जा सकती। एक बात और-ढाई वर्षों से उसे जो कुछ मिला-दुखियों की सेवा के लिए अर्पित हो गया। खाली हाथ घर जाए? इसकी चिंता करने का तो वैसे कोई कारण नहीं है। क्योंकि महाराज बीकानेर वैसे ही इतने उदार हैं कि बिना माँगे ही सब कुछ दे देते हैं। इसी सोच के साथ उसी समय सरदार बलवंतसिंह की साँड़िनी बीकानेर की ओर उड़ चली।
सरदार बलवंत सिंह किशनगढ़ के हैं, यह किसी ने नहीं सोचा था। ढाई वर्षों में उन्होंने अपना परिचय भी किसी को नहीं दिया था। मैं एक दुख का मारा राजपूत हूँ। स्वयं महाराज से इतना ही कहा था उन्होंने। राजपूत - इतना ही परिचय उन दिनों विश्वस्त होने के लिए पर्याप्त हुआ करता था। यदि महाराज ने अनुमान किया होता कि उनका यह युवक सरदार जैसलमेर से आगे किशनगढ़ (रैनिवाल) जा रहा है, तो अकेले नहीं जाने देते। जैसलमेर लुटेरों का प्राँत है और जाना है उसी प्राँत के मध्य से। लेकिन किशनगढ़। सबने समझा यह पास का किशनगढ़ और वहाँ जाने में कोई बाधा थी ही नहीं।
कोई जान भी लेता कि बलवंत सिंह किस किशनगढ़ जा रहे हैं, तो क्या होना था? इस तपते ज्येष्ठ में कोई भी वहाँ जाना चाहेगा तो कोलायत, मोहनगढ़, जैसलमेर के रास्ते से ही जाएगा। कोलायात से सीधे किशनगढ़ केवल ७६ कोस ही तो है। दो -सवा दो सौ कोस का चक्कर क्यों किया जाए? दो दिन लगेंगे और साँड़िनी द्वार पर खड़ी होगी। माँ पता नहीं है या नहीं .........। कोई विक्षिप्त होने पर ही ऐसी बात सोच सकता है। ७६ कोस ७ मध्य में एक गाँव नहीं, एक झोपड़ी नहीं, शमी या करारे की झाड़ी भी है या नहीं, पता नहीं। जिस मार्ग की ओर बढ़ते हुए डाकुओं के भी पैर काँपे वह मार्ग।
माँ शय्या से उठ भी नहीं पातीं। पता नहीं वह हैं भी या नहीं। उसे कुछ दूसरा नहीं सूझ रहा था। जहाँ तक घड़ी एक वर्ष जान पड़ती हो- दो दिन भी बहुत होते हैं। उसी दो दिन के मार्ग पर जो मार्ग था ही नहीं, साँड़िनी उड़ी जा रही थी। बड़ी धीमी है यह साँड़नी। वह बार-बार झुँझला जाता था। साँडनी को उत्साह देता- मरु की रानी! बढ़ बढ़ी चल। तो साँड़नी अपने सवार के मनोभाव समझती थी। कदाचित वह समझती थी आज की यात्रा मृत्युयात्रा है। जब मरना ही है, सवार ने मरने का ही निश्चय किया है ऐसा ही सही। वह पूरे वेग से उड़ी जा रही थी।
कोलायात से आगे बढ़ते ही सूर्योदय हो गया। दिन के साथ वायु का वेग भी बढ़ने लगा। साँड़नी ने एक बर सिर उठाया, कुछ सूँघने का प्रयत्न किया, खड़ी हो गयी और लौटने के लिए मचलने लगी। बढ़ो। बढ़ो! आगे बढ़ो रानी! बलवंत ने पुचकारा- लौटना नहीं है। मेरी देह भी माता के पास तुम पहुँच सको तो मेरा जीवन सफल जो जाएगा। ऊँटनी ने जैसे बात समझ ली। बस चलना ही है तो वह चलेगी। सेना का ऊँट कायर नहीं होता। लेकिन उसने अपनी से सूचित कर दिया कि आगे बढ़ने का क्या अर्थ है?
मरुस्थल में बड़ी अन्धड़ चलता काई मनुष्य बैठ जाए तो उसके ऊपर रेत का पहाड़ खड़ा हो जाएगा और अन्धड़ ज्येष्ठ में न चले तो चलेगा कब? बड़े-बड़े टीबे (रेत के टीले) उड़ते हैं और मील दूर तक नवीन पर्वताकार टीबा बनता है। यह सब क्षणों में होता है- होता ही रहता है, पूरे ग्रीष्म की दोपहरियों में। ऐसे ग्रीष्म में शरहीन, ग्रामहीन, छायाहीन, मार्गरहित मरुस्थल में जो बढ़ पड़े- क्या कहेंगे आप उसे?
बहुत थोड़ी देर में बलवंत को अपने सिर के साफे का ढंग बदलना पड़ा। उसने उसने दोनों कान बन्द कर लिए। अनेक बार दोनों नेत्र बंद कर लेने पड़ते थे उसे। सहसा ऊँटनी चौंकी। उसने अपने पीछे की ओर से रेत उड़ती देखी। भाले को उसने ठीक सम्हाल लिया। चार - पाँच ऊँट उसके पीछे आ रहे थे।
आप कहाँ जाएँगे? पीछा करने वालों में एक ने बड़े प्रेम से पास आकर उसने पूछा।
किशनगढ़! बलवंत सिंह ने भी पूछा-आप लोग?
हम लोगों को भी वहीं जाना है। हमारे साथी जैसलमेर से वहाँ कल ही पहुँच गए होंगे। हम लोग बीकानेर रह गए, कुछ आवश्यक वस्तुएँ लेने के लिए। आगन्तुकों में एक ने पूरा परिचय दिया अपना। कोई बारात गई है। किशनगढ़। ये लोग पीछे रह गए हैं। अब पहुँचने की शीघ्रता है, इससे सीधा मार्ग पकड़ा है। आपका साथ हो गया, यह बड़ा अच्छा हुआ।
आपके साथ तो पानी नहीं है। आगन्तुकों को आश्चर्य हुआ, पर उन्हें क्या मालूम, उसी यात्रा किस मनः स्थिति में प्रारंभ हुई थी। वह कुछ जवाब दे इसके पहले ही वे कहने लगे, कोई बात नहीं! बीच में थोड़ा पानी मिल सकता है। एक देवी स्थान है मार्ग में आगन्तुकों ने आश्वासन दिया- मार्ग हमारा जाना-बूझा है। आवश्यकता होने पर ऊँट रेत में दबे मतीरे ढूँढ़ लेगा।
तभी आँधी का वेग बढ़ गया। रेत झोंके के कारण प्रायः नेत्र बन्द रखने पड़ते थे। ऊँट अपने अनुमान पर स्वतः बढ़े जा रहे थे। सहसा एक भाला ‘खटाक’ से उसकी कोठी में आकर लगा।
अच्छा! दूसरा भाला फिर फेंका गया, किन्तु वह सिर के पास से होता नीचे गिर गया। बलवंत सिंह की साँड़नी सावधान हो गयी थी। स्वयं बलवंत ने अपना भाला संभाल लिया था।
मूर्ख! चिल्लाया एक लुटेरा। बलवंत सिंह जिन्हें साथी मानकर निश्चिन्त हो गया था, दरअसल वे लुटेरे थे। यह तो अंधड़ की कृपा थी कि उनके भाले लक्ष्यच्युत हो रहे थे अन्यथा अच्छे- से -अच्छा सैनिक भी इन लुटेरों दो-दो हाथ नहीं कर सकता।
अच्छा ठहरो! उसने क्रोध में एक की ओर ऊँट झुकाया और भाले का भरपूर हाथ धर दिया। लेकिन चूक गया उसका भी लक्ष्य। मनुष्य का रक्त गिरने के स्थान पर ऊँट पर बंधी बखाल में भरा जल-भर करके गिर रहा था और कोई सम्हाल, इससे पहले बखाल खाली हो गयी।
ठहरो! लुटेरों के सरदार ने हाथ उठा लिए। उसके साथी भी ठिठक गए। कितना बहुमूल्य था वह खाल में भरा पानी। किसी मनुष्य के रक्त से इस समय वह कहीं मूल्यवान था और अब रेत उसे पी चुकी थी।
अब तो मरना है। लुटेरे सरदार ने कहा-तुम्हें भी मरना है और हम सबको भी मरना है। लड़ने से अब कोई लाभ नहीं। जब जीवन की आशा ही नहीं है। तो धन का क्या महत्व। हम सब साथ रहेंगे। तो तुम्हें कुछ सुविधा ही होगी।
मुझे लुटेरों की दया नहीं चाहिए। बलवंत सिंह ने भाला उठा रखा था।
तुम्हें न सही, हमें तो चाहिए। सरदार ने हाथ जोड़ दिये। हम सब साथ रहेंगे तो किसी प्रकार कहीं पानी ढूँढ़ने का प्रयत्न कर भी सकेंगे। तुम्हें हम लोगों पर विश्वास न हो तो हम अपने शस्त्र फेंक देते हैं। लुटेरों ने कमर की तलवारें भी रेत में नीचे फेंक दीं।
देवी के स्थान पर जल नहीं है क्या? बलवंतसिंह चौंका। लुटेरे सहासा इतने दीन बन जाए, यह कोई छोटी बात नहीं थी। पानी न मिला तो इस मरुभूमि में समाधि बनेगी, इसमें संदेह करने का कोई कारण ही नहीं था।
आप समझते हैं कि ऊँट अभी दो घण्टे और चल सकते हैं? लुटेरों के सरदार ने कहा-देवी का स्थान मरुस्थल के केन्द्र में है। वहाँ संध्या से पहले नहीं पहुँचा जा सकता और जल वहाँ है यहाँ नहीं, यह कोई नहीं जानता। आपने सुना नहीं कि गर्मियों में देवी वहाँ प्रत्यक्ष निवास करती हैं। मनुष्य वहाँ जा नहीं सकता और पहुँच जाए तो लौटता नहीं।
माँ गायत्री ही जानती हैं क्या होगा? बलवंत सिंह को आदिशक्ति की कृपा एवं सामर्थ्य पर पूर्ण विश्वास था। अब उसे एक क्षण व्यर्थ नष्ट करना भयंकर दिख रहा था। लेकिन महाभय मुँह फाड़े खड़ा था। आकाश धूल से भर गया था। पश्चिम दिशा अंधकारमयी हो रही थी। अन्धड़ आ आ रहा था और अन्धड़ का सीधा अर्थ था-मृत्यु
रेत भड़भूजे की भट्टी में भी कदाचित इतनी कभी तपती हो, जितनी वहाँ तप रही थी। ऊपर से सूर्य अग्नि की वर्षा कर रहा था। दिशाओं से लपटें आ रही थीं। ऊपर से सूर्य अग्नि की वर्षा कर रहा था। दिशाओं से लपटें आ रही थीं। शरीर झुलसा जा रहा था। कण्ठ सूख गया था इस पर अन्धड़ आ रहा था। बैठ जाएँ तो रेत ऊपर पहाड़-सी समाधि बना देगी और खड़े ऊँट पर बैठे रहें तो पता नहीं कितनी दूर जाकर हड्डियाँ रेत में गड़ेंगी। ऊँट तक निराशा से क्रंदन जैसे ध्वनि करने लगे। हम सब एक-दूसरे को आपस में बाँधकर बैठ जाएँ। लुटेरों के सरदार ने सलाह दी।
मैं तुम लोगों के साथ मृत्यु में भी बटवारा नहीं करूँगा। महाशक्ति जो चाहेंगी वही होगा। लेकिन पाँचों लुटेरों एक-दूसरे को परस्पर बाँधकर बैठ गए और अपने ऊँट उन्होंने अपने चारों ओर खड़े कर लिए। बलवंत सिंह एकाकी खड़ा रहा। परिस्थितियों इतनी विपन्न हो रही थीं कि पुरुषार्थ असहाय था। उसने अपनी चित्तवृत्तियों को एकाग्र किया और उसकी चेतना सूर्यमण्डलस्थ माँ गायत्री के ध्यान में खोने लगी। उसके होठों से अस्फुट स्वरों में ......... ओम् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् के शब्दों के मन्द कम्पन निकल रहे थे। अन्धड़ को आना था- आया बलवंतसिंह को फिर पता नहीं क्या हुआ। अवश्य अन्धड़ ने उसे उठाकर फेंका, इतना स्मरण है। फिर तो मूर्च्छा आते-आते उसे मुख से निकला था- हे माँ! रक्षा करो ...........माता गायत्री प्रकृति की अधीश्वरी शक्ति हैं। स्वयं मूल प्रकृति हैं। समस्त सृष्टि का आदिकारण हैं। उन्हीं के ईषत कटाक्ष से ब्रह्माण्डों का जन्म होता है। हृदय में उनकी कृपा के लिए पुकार उठे और कृपा का अवतरण न हो, यह भला कैसे संभव है?
मरुभूमि में एक छोटा मेघखण्ड प्रकट हुआ। तपती दोपहरी में, भयंकर अंधड़ के मध्य, कहीं और कभी-राजस्थानवासी जानते हैं कि उतंक मेघ कब कहाँ प्रकट होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। वह तो ग्रीष्म की दोपहरी में ही प्रायः प्रकट होता है। राजस्थानी लोकगाथा के अनुसार महर्षि उतंक जब समाधि से जगते हैं - तब देवराज इन्द्र उनकी क्षुधा शांत करने के लिए जलवृष्टि करते हैं। आज की ये जलवृद्धि महर्षि उतंक की प्यास शांत करने के लिए हुई या फिर बलवंत सिंह पर महाशक्ति गायत्री की कृपा का अवतरण था-कौन-क्या कह सकता है?
कुछ भी हो, बड़ी-बड़ी बूँदें पड़ने लगी थीं। धरा और आकाश चारों ओर उगल रहे थे और उस अग्निवर्षा के मध्य कुछ गज भूमि में बड़े जोर से वर्षा हो रही थी। राजस्थानवासियों के अनुसार उतंकमेघ सदा ऐसे ही तो वृष्टि करता है।
बलवंत सिंह के नेत्र खुले। वह भूमि पर पड़ा था। उसके वस्त्र भीगकर रेत से लथ–पथ हो गए थे। उसने अपने सम्हाला। उसकी दृष्टि सबसे पहले ऊँट पर पड़ी। उसकी साँड़नी वर्षा में भीगी उसके पास खड़ी थी।
धन्य हो माँ! बलवंत सिंह ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाया। अब उसमें पर्याप्त स्फूर्ति थी। ऊँट पर चढ़ने के बाद स्वयं पता नहीं कि किधर जा रहा है। मार्ग जानने का कोई उपाय नहीं था। लेकिन सायंकाल की अरुणिमा ने जब मरुस्थल पर गुलाल बिखेरना प्रारंभ किया, तब तक उसका ऊँट देवी स्थान के कुण्ड में जल पी रहा था। वह भी टेकरी पर खेजड़ी के नीचे देवी के चबूतरे के सामने साष्टाँग प्रणाम करते हुए लेट गया।
दूसरे दिन वह अपने गन्तव्य पर पहुँच गया। तू आ गया बेटा। कहते हुए उसकी माता हाथ अपने बिछुड़े पुत्र की पीठ सहला रहे थे।
मैं आ गया माँ! बलवंत का कण्ठ भरा था। सीधे मरुस्थल के मार्ग से आया हूँ। मरुस्थल के मार्ग से? पीछे खड़े बड़े भाई के स्वर में आश्चर्य था।
हाँ भैया! बलवंत न उनके चरणों में मस्तक रखा। माँ गायत्री की भुजाएँ बहुत लंबी हैं। वे मरुभूमि में भी अपनी संतानों की रक्षा कर ही लेती है। उसके इस कथन को सुनकर उपस्थित सभी जनों के मन- माँ गायत्री के प्रति श्रद्धाभक्त हो उठे। सभी को गायत्री उपासना की महिमा का बोध हो रहा था।
बाइबिल में कहा गया है कि हे परमेश्वर! तू मेरी आँखें खोल दें, ताकि तेरी कुदरत को- अजीब क्यों रहस्यों को देख सकूँ।
चमड़े की आँखों से तो केवल सामने की वस्तुएँ देखी जा सकती है। उनमें कर्म-अकर्म और दूरगामी हित-अनहित का पता लगाना कठिन है। जो आज के लिए, अभी के लिए रुचिकर है, उसी माँग इन्द्रियाँ करती हैं। जिसमें तात्कालिक प्रसन्नता मिलती है। व्यक्ति ओर समाज का दूरगामी हित जिस विचारणा और क्रियाशीलता के साथ जुड़ा हुआ है, उसका बोध दिव्यदृष्टि ही कराती है और उसी की प्रेरणा से मनुष्य संयम परमार्थ जैसे प्रत्यक्ष हानिकारक दिखने वाले कर्मों को दूरवर्ती हितसाधन की दृष्टि से करता है। मानवी महानता को समझने और तद्नुरूप गतिविधियाँ अपनाने के लिए हम केवल दिव्यदर्शन के आधार पर ही समर्थन देते हैं। बाइबिल के उपर्युक्त कथन में इन्हीं विशिष्ट आँखों को खोलने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की गयी है।
ईश्वर चमड़े से बानी आँखों द्वारा नहीं देखा जा सकता। वह इन्द्रियगम्य नहीं है। उस तो सूक्ष्म अनुभूतियों और संवेदनाओं द्वारा जाना जा सकता है। विज्ञान की पहुँच स्थूल जगत तक है। सूक्ष्मजगत का अन्वेषण-विश्लेषण चेतनसत्ता की पृष्ठभूमि पर ही संभव होता है। प्रसन्नता की बात है कि पिछली दशाब्दियों में विज्ञान स्थूलजगत को ही सब कुछ मानने की बात पर जितना दुराग्रही था, पर अब उतना नहीं रहा। चेतना की सत्ता को जैसे-जैसे समझ सकना संभव होता जा रहा है। वैसे- विज्ञान भी ईश्वर की सत्ता, गरिमा और उपयोगिता को स्वीकार करने के लिए क्रमशः अधिक लचीला होता जा रहा है। उच्चतर के वैज्ञानिकों ने ईश्वर की सत्ता और महत्ता को अपने ढंग और क्रम से स्वीकार -अंगीकार करना आरंभ कर दिया है।
इंग्लैण्ड की रॉयल सोसायटी के प्रमुख एवं प्रसिद्ध वैज्ञानिक-दार्शनिक सर जेम्स जीन्स ने लिखा है कि विज्ञान के आरम्भिक विकास के समय यह माना गया था कि यह दुनिया जड़-पदार्थों की ही एक तरंग है। पर अब जैसे -जैसे प्रगति के पथ पर विज्ञान कुछ आगे बढ़ा है तब से यह समझा जा रहा है कि बात कुछ ओर ही है। अब हम सोचते हैं कि कोई समष्टि चेतना इस दुनिया का संचालन करती है और जड़-पदार्थ उसके संकेतों - निर्देशों का अनुसरण करते हैं। इस तथ्य पर उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द न्यू बैकग्राउण्ड ऑफ साइन्स’ और ‘ मिस्टीरियस यूनिवर्स’ में अधिक विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला है।
ए. एच. क्राॅम्पटन का कथन है- पूरी तरह आज भले ही साबित न हो सके, पर कल जरूर इस नतीजे पर पहुँचाना पड़ेगा कि विश्वचेतना की शक्ति का अस्तित्व मौजूद है और वही इस संसार को किसी खास मतलब के लिए चलाता हों।
रॉबर्ट ए. मिल्लीकान का यह है विकासवाद का इतिहास यह बताता है कि पदार्थों और प्राणियों की क्रमबद्ध और व्यवस्थित प्रगति होती है और वह क्रम ऐसा है मानो कोई बुजुर्ग किसी छोटे बच्चे को अंगुली पकड़कर चलना सिखा रहा है।
जे वी एस हाल्डेन ने लिखा है - अब हम इस दुनिया को अंधी मशीन नहीं कहेंगे। यों अभी प्रकृति के बारे में बहुत कम जाना जा सका है, पर जितना जान लिया गया है वह इस नतीजे पर पहुँचता है कि दुनिया पदार्थ मात्र ही नहीं है, उसके ऊपर किसी ऐसी शक्ति का शासन है जिसे मन, बुद्धि या चेतना नाम दिया जा सकता है।
सर आर्थर एस. एडिंग्टन के अनुसार - यह मान्यता अब बहुत पुरानी पड़ गयी है कि ईश्वर नाम की कोई चीज नहीं है और दुनिया अपने आप ही अपने ढर्रे पर चल रही है। व्यवस्था - बुद्धि वाली चेतना का इस जगत पर कितना नियन्त्रण है, इस तथ्य को हम प्रकृति की प्रत्येक हलचल में भली-भाँति देख सकते हैं।
हरवर्ट स्पेन्सर कहते थे - विज्ञान जिस चीज को हमारे जानने की पहुँच से बाहर (अननोएविल) कहता है, वह अध्यात्म के सिद्धान्तों को काटती नहीं, वरन् यह कहती है कि उस सम्बन्ध में गहरी खोज की जानी चाहिए।
अलफ्रेड रसल वैलेस ने अपने ग्रन्थ’ सोशल इनवायरमेन्ट एण्ड मॉरल प्रोग्रेस ‘ में लिखा है - यह विश्वास करने का पर्याप्त आधार मिल गया है किस चेतना द्वारा ही इस जड़जगत का संचालन किया जा रहा है। इसी तरह मूर्धन्य वैज्ञानिक सर ए. एस. एडिंगटन का कथन है कि हम विज्ञानी अब यह सोचने लगे हैं कि कोई असाधारण शक्ति इस संसार को एक सोची-समझी व्यवस्था के अनुसार चला रही है। वह शक्ति क्या है? और किसलिए? क्या करती है? इसे अभी नहीं जाना जा सकता तो भी उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर एक नियामक सत्ता का अस्तित्व स्वीकार करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है।
जड़ को प्रधान और चेतना को उसकी प्रतिक्रिया, कभी माना जाता था, पर अब ऐसे आधार सामने आ गये हैं, जिनके कारण चेतना को ही बुनियादी चीज मानकर चलना पड़ेगा। इस संदर्भ में सर ओलीवरलॉज ने व्रिस्टल में एक भाषण देते हुए कहा था- “ वह दिन दूर नहीं जब विज्ञान नये क्षेत्र में प्रवेश करेगा और यह स्वीकार करेगा कि चेतन शक्तियाँ ही जड़शक्तियों का संचालन करती हैं। अभी रूप सिर्फ जड़जगत के बारे में जानते हैं और उसके अंतर्गत चल रही हलचलों से परिचित हैं। पर अगले दिनों यह स्पष्ट हो जाएगा कि चेतना की शक्तियाँ ही प्रमुख हैं, वे ही जड़ - जगत को चलाती हैं। जड़ शक्तियों पर यदि प्रेम और भलाई की शक्तियों का शासन न रहे तो वे इतनी अधिक भयंकर हैं कि उन्हें छूना तक डरावना प्रतीत होगा।
संसार भर के चौदह बड़े वैज्ञानिकों द्वारा मिल - जुलकर लिखी गयी पुस्तक ‘द् ग्रेट डिजाइन में लिखा है कि यह दुनिया बिना रूह की मशीन नहीं है। यह अकस्मात् ही नहीं बन गयी है। जड़ - पदार्थ के पीछे एक दिमाग, एक चेतना कम रही है। उसे भले ही कुछ भी नाम दिया जाए।
अलबर्टआइन्स्टीन ने लिखा है कि इस दुनिया में जैसी क्रम - व्यवस्था सुरीले ताल-मेल के साथ बनी हुई है, उससे स्पष्ट है कि प्रकृति के ऊपर कोई बुद्धिमान चेतना काम रही है। तरकीब और उद्देश्य के बिना यहाँ कुछ भी नहीं है। ऐसी दिशा में विज्ञान को अपना विचार यह बनाना पड़ रहा है कि यह दुनिया इत्तफाक से नहीं बन गयी है। इसके पीछे कोई गहरा उद्देश्य काम कर रहा है।
वैज्ञानिक दार्शनिकता के आधार पर विचार करने से यह तथ्य अधिकाधिक स्पष्ट होता जाता है कि इस ब्रह्माण्ड के अनेक घटकों, ग्रहपिण्डों को परस्पर एक चेतना सुव्यवस्थित सूत्र में बाँधकर रखने वाली एक सत्ता है। उसके कुछ नियम हैं। इनमें मानवी-चेतना को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा नियम है - पारस्परिक सहयोग। परमाणु के अवयव प्रोटोन, इलेक्ट्रॉन अथवा इससे भी सूक्ष्मतर घटक परस्पर एक क्रमबद्ध व्यवस्था के अंतर्गत घनिष्ठ रहकर अणुसत्ता का सृजन करते हैं। अणुओं का समन्वय पदार्थों के विभिन्न रूप प्रस्तुत करता है। यह पदार्थ स्वतंत्र इकाई के रूप में काम नहीं कर सकते हैं। उनका अस्तित्व एवं क्रिया−कलाप अन्यान्य पदार्थों की सत्ता द्वारा आदान-प्रदान मिलने पर ही बना रहता है। हमारी पृथ्वी का भी एकाकी जीवन संभव नहीं, उसे अन्यान्य ग्रह-नक्षत्रों से जो अनुदान मिलते हैं, उसी में उसका जीवन -शकल आगे लुढ़कता है। धरती भी दूसरे ग्रहों को देती है। इसी प्रकार अनेक सौरमण्डल और उनके निहारिका केन्द्र एक अत्यंत सुदृढ़ श्रृंखला में बंधे हुए परस्पर आदान-प्रदान करते हैं। प्राणधारियों का जीवन भी परस्पर सहयोग से ही चलता है। मनुष्य की जितनी अधिक आवश्यकताएँ हैं, उनकी पूर्ति तो संगठित समाज में सहयोग श्रृंखला गतिशील रहे बिना हो ही नहीं सकती। दूसरे प्राणी एकाकी भी जी सकते हैं और प्रकृति के अंचल से अपने आहार - आधार की उपलब्धि कर सकते हैं, किन्तु मनुष्य के लिए सहयोग ही जीवन-प्राण है। इसके बिना उसका निर्वाह एक दिन भी नहीं हो सकता।
प्रत्येक ग्रह - पिण्डों के अणु-परमाणु में अन्यान्य ग्रह-नक्षत्रों की सत्ता का समावेश है। यह अत्यन्त सूक्ष्म होते हुए भी एक तथ्य है। धरती के परमाणुओं का मध्यवर्ती नाभिक अपने में शक्ति भरे बैठा है, उसका मूलस्रोत धरती पर पाये जाने वाले तत्व नहीं, वरन् सूर्य-ताप से अवतरित होने वाला अदृश्य प्रवाह है। सूर्य-ताप के रूप में हम जिस शक्ति की व्याख्या करते हैं, वह भी अकेले सूर्य की नहीं है। गोमुख गंगोत्री में गंगा में गंगा की धार तनिक-सी निकलती है, पीछे उसमें नदी-नालों का जल मिलकर गंगा की विशाल धारा बनता है। ठीक इसी प्रकार सूर्यताप के साथ अन्य ग्रह-नक्षत्रों की शक्ति - धाराएँ मिलती चली आती हैं। श्रेय भले ही सूर्य को मिले, पर वस्तुतः वह एक समन्वित अनुदान ही है।
जड़-जगत की तरह ही चेतन जगत की स्थिति है। हमारी बुद्धि, अभिरुचि, निष्ठा, मान्यता, अनुभूति, मनःस्थिति, प्रतिभा आदि अपनी लगती भले ही है। पर वस्तुतः वह भी समष्टि की ही देन हैं। हमें असंख्य लोगों की चेतना प्रभावित करती है और उस बाहरी दबाव से ही हमारा चेतनात्मक स्तर ढलता है। जिसे मौलिकता कहते हैं अथवा व्यक्तिगत प्रतीक समझते हैं, वस्तुतः वह भी समूहगत चेतना का ही प्रतिफल है। आमतौर से निकटवर्ती एवं सम्बद्ध वातावरण ही हमें बनाता और बदलता रहता है। विश्वव्यापी इसी एकता की सुनिश्चित अनुभूति का नाम आध्यात्मिकता है।
आन्तरिकता के सिद्धान्त अब क्रमशः विज्ञान के साथ अपना मतभेद समाप्त करके एक ही लक्ष्य पर पहुँचने का प्रयत्न कर रहे हैं। विश्वव्यापी चेतना प्राणिमात्र में क्रीड़ा -कल्लोल कर रही है और हर एक को विश्व-व्यवस्था की मर्यादाओं में रहने के लिए बाध्य कर रही है। परस्पर मिल- जुलकर स्नेह-सौजन्य से रहें, बिना दूसरों से टकराये निर्वाह करें और आपसी सहयोग से सर्वतोमुखी सुख-शान्ति का पथ प्रशस्त करें। इस निष्कर्ष पर अध्यात्मवादी दर्शन ही हमें पहुँचाता है। आध्यात्मिकता और वैज्ञानिकता को एक-दूसरे से विलग नहीं किया जा सकता है। जैसे-जैसे हम सर्वव्यापी और नियामक सत्ता का अस्तित्व स्वीकार करते जाएँगे, वैसे-वैसे यह भी अनिवार्य प्रतीत होता जाएगा कि व्यक्ति का वास्तविक हित यही समन्वित आदर्शवादी रीति-नीति अपनाकर चलने में ही है।
मनुष्य को अपनी अपूर्णता बुरी लगी। उसने पूर्ण बनने की सोची और उपाय पूछने ब्रह्माजी के पास पहुँचा। ब्रह्माजी ने कहा - वत्स, सत्य को धारण करना पूर्णता है, जिसके पास जितना उतनी ही पूर्णता प्राप्त कर लेगा, सो, तू सत्य की उपासना कर।
मनुष्य ने विनीत भाव से पूछा-भगवन्! सत्य की उपासना कैसे होती है? प्रजापति ने कहा-उचित जिज्ञासा करते हुए उसका श्रद्धापूर्वक सही समाधान खोजने की चेष्टा को उपासना कहते हैं। इसी आधार से पूर्णता प्राप्त होती है।
शरीर के अवयवों के कार्यरत रहने से जीवन-प्रक्रिया का संचालन होता है, इस मोटे तथ्य को सभी जानते हैं। शरीर शास्त्र के विद्यार्थियों को यह भी पता है नाड़ी संस्थान के संचालन में अचेतन मस्तिष्क की कोई सूक्ष्म प्रक्रिया काम करती है, उसी के आधार पर रक्त-संचार, श्वास-प्रश्वास आकुंचन -प्राकुंचन के क्रिया-कलाप अनायास ही चलते रहते हैं। हमें पता भी नहीं चलता और पलक झपकने-पाचनतंत्र चालू रहने जैसे अगणित कार्यों की अतिसूक्ष्म कार्य-पद्धति अपने ढर्रे पर स्वसंचालित रीति से चलती रहती है।
मस्तिष्क का चेतन मस्तिष्क तो जाग्रत स्थिति में कोई आवश्यकता उत्पन्न होने पर ही कुछ महत्वपूर्ण निर्देश देता है अन्यथा वह ऐसे ही पूर्व स्मृतियों में, भावी कल्पनाओं में उलझा रहता है। यों विद्या-बुद्धि कुशलता, चतुरता आदि में शिर के अग्रभाग में अवस्थित चेतन मस्तिष्क ही काम आता है, पर शरीर की समस्त क्रिया के संचालन यहाँ तक कि मस्तिष्क की गतिविधियों को भी गतिशील रखने में यह अचेतन ही काम करता है।
अचेतन की वह कार्य - पद्धति जो स्वसंचालित रूप से शरीर और मस्तिष्क को गतिशील रखती है - उसे नाड़ी शक्ति (कद्बह्लड्डद्य श्वठ्ठद्गह्द्दब्) कहते हैं यह एक रहस्य है कि शरीर को सक्रिय रखने वाली इस दिव्यशक्ति को स्रोत कहाँ है? चेतन और अचेतन मस्तिष्क तो उसके वाहन मात्र हैं। इन उपकरणों को प्रयोग करने के लिए जो यह क्षमता उपलब्ध होती है, उसका भण्डार उद्गम कहाँ है। शरीरशास्त्री इस प्रश्न का उत्तर कुछ भी न दे सकने में समर्थ नहीं है। नाड़ी शक्ति तक ही उनकी पहुँच हैं यह कहाँ से से आती है, कैसे काम आती है, घटती -बढ़ती क्यों है? इस रहस्यमय तथ्य के अन्वेषण को वे अपनी शोध - परिधि से बाहर ही मानते हैं। वस्तुतः जहाँ भौतिक विज्ञान अपनी सीमा समाप्त कर लेता है, अध्यात्म विज्ञान उसके आगे आरंभ होता है।
जीवन -तत्व यों शरीर में ओत-प्रोत पड़ता है और उसी के आधार पर जीवित रहना संभव होता है, पर यह जीवन-तत्व शरीर का उत्पादन नहीं है। यह अदृश्य और अलौकिक शक्ति है, जिसमें से उपयोगी और आवश्यक अंश यह काय-कलेवर अन्तरिक्ष से खींचकर अपने भीतर धारण लेता है और उसी से अपना काम चलाता है। इस विश्वव्यापी जीवन-तत्व का नाम प्रण है।
प्राण व्यक्ति के भीतर भी विद्यमान है, पर विश्वव्यापी महाप्राण का एक अंश ही है। बकोल के भीतर भरी हवा की सीमा की नाप-तौल की जा सकती है और मोटी दृष्टि से उसका पृथक -स्वतंत्र अस्तित्व भी माना जा सकता है, पर वस्तुतः वह विश्वव्यापी वायु तत्व का एक अंश मात्र ही है। इसी प्रकार विश्वव्यापी महाप्राण का एक छोटा-सा अंश मानव शरीर में रहता है- उसी अंश को जीवन-तत्व के रूप में हम देखते अनुभव करते हैं। यह जब न्यून पड़ता, तो व्यक्ति हर दृष्टि से लड़खड़ाने लगता है और जब वह संतुलित रहता है तो समस्त क्रिया-कलाप ठीक चलते हैं। यह जब बढ़ी हुई मात्रा में होता है तो उसे बलिष्ठता, समर्थता,, तेजस्विता, मनोबल, ओजस, प्रतिभा आदि में देखा जा सकता है। ऐसे व्यक्ति ही महाप्राण कहलाते हैं, वे अपना प्राण असंख्यों में फूँकने और विश्व का मार्गदर्शन कर सकने में भी समर्थ होते हैं। प्राण को ही जीवन का आधार माना जाना चाहिए। शरीरशास्त्री जिस शक्ति-स्रोत की व्याख्या नाड़ी-शक्ति कहकर समाप्त कर देते हैं, वह वस्तुतः प्राणतत्त्व की एक लघु तरंग मात्र ही है।
मानव शरीर में विद्यमान प्राण- शक्ति से ही समस्त अन्तः संचालन और नाड़ीसमूह इसी से अनुप्राणित हैं। मस्तिष्क की कल्पना, धारणा, इच्छा, निर्णय, नियन्त्रण, स्मृति, प्रज्ञा आदि समस्त शक्तियों का उत्पादन-अभिवर्धन तथा संचालन का मर्म जानना हो तो कुण्डलिनी विद्या का आश्रय लेना चाहिए। अचेतन मन अजस्र संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य कहा जाता है और उसे योग की समस्त सिद्धियों का केन्द्र-बिन्दु माना जाता है।
विश्वव्यापी प्राण-जब शरीर में प्रवेश करता है, तो उसका प्रवेश दो छिद्रों के माध्यम से होता है, जिन्हें मूलाधार ओर सहस्रार कहते हैं। सूर्य की शक्ति जब पृथ्वी पर आती है, तो उसके माध्यम दोनों ध्रुव होते हैं। विद्युत भण्डार को जब छोटे यंत्रों में लाना होता है, तब भी प्लग के दो छेदों में दो हुक फँसाने पड़ते हैं। विश्व विद्युत महाप्राण का शरीर विद्युतकाय प्राण में अवतरित करने के लिए भी उपर्युक्त मूलाधार ओर सहस्रार छिद्र ही माध्यम होते हैं। कुण्डलिनी इस शक्ति-संतुलन नाम है। आत्मविज्ञान प्राण की मात्रा आवश्यकतानुसार घटाने-बढ़ाने के लिए इन्हीं छिद्रों का प्रयोग करता है। इस विज्ञान को समझने से जीवन-तत्व के मूल उद्गम का पता ही नहीं लगता वरन् उसकी मात्रा में न्यूनाधिक करके अभीष्ट संतुलन बनाने का भी लाभ मिलता है।
इस संसार में दिखाई पड़ने वाली और न दिखने वाली जितनी भी वस्तुएँ तथा शक्तियाँ हैं, इसे विश्व की अति सूक्ष्म और अति उत्कृष्ट सत्ता कह सकते हैं। श्वास -प्रश्वास क्रिया तो उसकी वाहन मात्र है, जिस पर सवार होकर वह समस्त अवयवों ओर क्रिया - कलापों तक आती - जाती और उन्हें समर्थ, व्यवस्थित एवं नियन्त्रित बनाये रहती है। भौतिक जगत में संव्याप्त गर्मी, रोशनी, बिजली, चुम्बक, आदि को उसी के प्रति स्फुरण समझा जा सकता है। वह बाह्य और अंतर्मन से सम्बोधित होकर इच्छा के रूप में - इच्छा से भावना के रूप में-भावना से आत्मा के रूप में परिणत होती हुई, अन्ततः परमात्मा के रूप में परिणत होती हुई, अनन्तः परमात्मा से जा मिलने वाली इस विश्व की सर्वसमर्थ सत्ता है। एक प्रकार से उसे परमात्मा का कर्तृत्व माध्यम या उपकरण ही माना जाना चाहिए।
यद्यपि प्राणसत्ता एक और अविच्छिन्न है, पर उसके क्रिया -कलापों और सीमा प्रयोजनों के आधार पर समझने की सुविधा के लिए कई नामों में विभाजन कर दिया गया है। यों-पृथ्वी एक है- समुद्र एक है, पर उन्हें समझने-समझाने की सुविधा के लिए कई महाद्वीपों ओर कई नाम के समुद्रों में विभाजित कर दिया गया हैं। एक ही व्यक्ति समय-समय पर अनेक कार्यों के आधार पर क्लर्क, पण्डित, ग्राहक, जनता, नेता आदि माना जाता है - फिर भी उसका अस्तित्व एवं व्यक्तित्व एक ही रहता है। इसी प्रकार यह विश्वव्यापी प्राणशक्ति प्रत्येक जड़-चेतन में समाई हुई है और उपकरणों के अनुसार विभिन्न कार्य कर रही है। अणु की गतिशीलता से लेकर, अंकुर उत्पन्न होने तक के अगणित क्रिया-कलाप उसी के हैं। फिर भी मानव शरीर में उसके विभिन्न क्रिया-कलापों से उसका जो विविध विधि योगदान है, उसके आधार पर सुविधा के लिए उसके कई नाम रख दिये गये हैं। पाँच प्राण मुख्य हैं। पाँच इनके सहायक उपप्राण भी माने गये हैं। पाँच मुख्य प्राणों के नाम - १ प्राण २. अपान, ३ समान, ४. उदान ५. व्यान हैं। उपप्राणों को १. नाग २. कूर्म ३. कृकल ४. देवदत्त ५. धनंजय कहते हैं, इन्हें क्रमशः उपप्राणों की गौण प्रक्रिया सम्पन्न करने वाला जाना चाहिए।
प्रथम प्राण का कार्य श्वास-प्रश्वास क्रिया का सम्पादन, स्थान छाती है। इस तत्व की अनुभूति ध्यानावस्था में पीले रंग की होती है और षट्चक्र वेधन की प्रक्रिया में यह अनाहत चक्र को प्रभावित करता पाया जाता है।
द्वितीय अपान का कार्य शरीर के विभिन्न मार्गों से निकलने वाले मलों के निष्कासन करना है एवं स्थान गुदा है। यह नारंगी रंग की आभा में अनुभव किया जाता है और मूलाधार चक्र को प्रभावित करता है।
तीसरा समान अन्न से लेकर रस-रक्त और सप्त धातुओं का परिपाक करता है और स्थान नाभि है। हरे रंग की आभा वाला और मणिपुर चक्र से सम्बन्धित इसे बताया गया है।
चौथा उदान का कार्य हैं आकर्षण ग्रहण करना अन्न जल श्वास शिक्षा आदि जो कुछ बाहर से ग्रहण किया जाता है, वह ग्रहण प्रक्रिया इसी के द्वारा सम्पन्न होती है। निद्रावस्था तथा मृत्यु के उपरांत का विश्राम संभव करना भी इसी का काम है। स्थान कण्ठ, रंग बैंगनी तथा चक्र विशुद्धाख्य है।
पाँचवाँ व्यान का कार्य रक्त आदि का संचार, स्थानान्तरण। स्थान सम्पूर्ण शरीर। रंग गुलाबी और चक्र स्वाधिष्ठान है।
पाँच उपप्राण इन्हीं पाँच प्रमुखों के साथ उसी तरह जुड़े हुए हैं जैसे मिनिस्टरों के साथ सेक्रेट्री रहते हैं। प्राण के साथ नाग। अपान के साथ कूर्म। समान के साथ कृकल। उदान के साथ देवदत्त और व्यान के साथ धनंजय का सम्बन्ध है। नाग का कार्य, वायुसंचार डकार, हिचकी, गुदा वायु। कूर्म का नेत्रों के क्रिया-कलाप कृकल का भूख-प्यास देवदत्त का जँभाई, अँगड़ाई, धनंजय को हर अवयव की सफाई जैसे कार्यों की उत्तरदायी बताया गया है, पर वस्तुतः वे इतने छोटे कार्यों तक ही सीमित नहीं हैं। मुख्य प्राणों की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित बनाये रहने में उनका पूरा योगदान रहता है। इन प्राण और उपप्राण के भेद को और भी अच्छी तरह समझाना हो तो तंत्र मात्राओं और ज्ञानेन्द्रियों के संबंध पर गौर करना चाहिए। शब्द तत्व ग्रहण करने के लिए कान, रूप तत्व की अनुभूति के लिए नेत्र, रस के लिए जिह्वा, गंध के लिए नाक और स्पर्श के लिए कार्य त्वचा करती है।, उसी प्रकार प्राण तत्व द्वारा विनिर्मित सूक्ष्म संभूतियों को स्थूल अनुभूतियों में प्रयुक्त करने का कार्य यह उपप्राण सम्पादित करते हैं। यह स्मरण रखा जाना चाहिए। कि यह वर्गीकरण मात्र वस्तुस्थिति को समझने और समझाने के उद्देश्य से ही किया गया है। अलग-अलग आकृति-प्रकृति के दस व्यक्तियों की तरह इन्हें दस सत्ताएँ नहीं मान बैठना चाहिए। एक ही व्यक्ति को विभिन्न अवसरों पर पिता, पुत्र, भाई, मित्र, शत्रु, सुषुप्त, जाग्रत, मलीन, स्वच्छ स्थितियों में देखा जा सकता है, लगभग उसी प्रकार का यह वर्गीकरण भी समझा जाए।
प्राण को पकड़ने की विद्या का नाम प्राणायाम है। एक जगह से उसकी पकड़ मिल जाए और उसे जकड़ने की गुँजाइश हो जाए तो फिर विराट प्राण पकड़ना और उसका प्रयोग कर सकना संभव हो जाता है। छड़ का एक सिरा पकड़ कर घसीटने से सारी छड़ घिसटने लगती है। बकरी का कान पकड़ लेने से सारी बकरी, पकड़ में आ जाती है, फिर उसे जिधर भी ले चलना हो, कान पकड़ वाले के इशारे पर चलती चली जाती है। प्राणायाम की स्थूल प्रक्रिया श्वास-प्रश्वास लेने छोड़ने के क्रम में कुछ विशेष गतिविधि उत्पन्न करना हो सकता है और उसका लाभ स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए उपयोगी माना जा सकता है। पर यह तो उसकी बाह्यतम प्रक्रिया है। मूल लाभ प्राणतत्त्व की स्वच्छन्द गतिशीलता के साथ अन्तः चेतना की पकड़ स्थापित करना है। जिन पहलवानों को कुश्ती लड़ने की विशेष पकड़ आती है वह अपने से बड़े पहलवानों को भी काबू में कर लेते हैं। प्राणायाम को अन्तः चेतना द्वारा प्राण तत्व की पकड़ और उसकी अभीष्ट दिशा में प्रयुक्त करने की कला में अभ्यस्त होने की चेष्टा के रूप में ही देखा-समझा जाना चाहिए।
आत्मज्ञान या शाश्वत जीवन का बोध व्रताचरण के द्वारा होता है। ऊपर चढ़ने की जरूरत पड़ती है तो सीढ़ी लगते है एक डंडे को हाथ से पकड़ कर दूसरे पर पैर रखते हुए ऊपर आसानी से चढ़ जाते हैं। जीवन में क्रमिक रूप से छोटे-छोटे व्रतों से प्रारम्भ करके अंत में महाव्रत की परिधि प्राप्त करना अन्य साधनों की अपेक्षा अधिक सरल है। शास्त्रकार का कथन है-
व्रतेन प्राप्यते दीक्षा दक्षिणा दीक्षाप्राप्यते। तया च प्राप्यते श्रद्धा श्रद्धया सत्यमाप्यते॥
अर्थात् उन्नत जीवन की योग्यता मनुष्य को व्रत से प्राप्त होती है। इसे दीक्षा कहते है। दीक्षा से दक्षिणा अर्थात् जो कुछ कर रहे हैं, उसके सफल परिणाम मिलता हैं। सफलता के द्वारा आदर्श और अनुष्ठान के प्रति श्रद्धा जाग्रत होती है। और श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है।सत्य का अर्थ का मनुष्य के जीवन -लक्ष्य से है। यह एक क्रमिक विकास की पद्धति है। व्रत जिसका प्रारम्भ और सत्य प्राप्ति ही जिसका अंतिम निष्कर्ष है।
व्रत का आध्यात्मिक अर्थ। उन आचरणों से है जो शुद्ध सरल और सात्विक हों और उनका पालन विशेष मनोयोगपूर्वक किया गया है। यह देखा गया है कि व्यावहारिक जीवन में सभी लोग अधिकांश सत्य बोलते है और सत्य का ही आचरण भी करते है किन्तु कुछ क्षण ऐसे आ जाते हैं जब सच बोल देना स्वार्थ और इच्छापूर्ति में बाधा उत्पन्न करता है उस समय लोग झूठ बोल देते हैं या असत्य आचरण कर डालते है। निजी स्वार्थ के लिए सत्य की अवहेलना कर देने का तात्पर्य यह हुआ कि आपकी निष्ठा उस आचरण में नहीं हैं। इसे ही यों कहेंगे कि व्रतशील नहीं है।
बात अपने हित की हो अथवा दूसरे की, जो शुद्ध और न्यायपूर्ण हो उसका निष्ठापूर्वक पालन करना ही व्रत कहलाता है। संक्षेप में आचरण-शुद्धता को कठिन परिस्थितियों में भी छोड़ना व्रत कहलाता है। संकल्प का छोटा रूप व्रत है। संकल्प की शक्ति व्यापक होती है और व्रत उसका एक अध्याय होती है। वस्तुतः व्रत और संकल्प दोनों एक ही समान है।
विपरीत परिस्थितियों में भी हँसी-खुशी का जीवन बिताने का अभ्यास व्रत कहलाता है। इससे मनुष्य में श्रेष्ठ कर्मों के संपादन की योग्यता आती है। थोड़ी-सी कठिनाइयों में कर्म-विमुख होना मनुष्य की अल्पशक्ति का बोधक है, जो कठिनाइयों में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहे, ऐसी शक्ति व्रत में होती है।
नियम -पालन में आत्म-विश्वास और अनुशासन की भावना आती है। जीवन के उत्थान और विकास के लिये वह दोनों शक्तियाँ अनिवार्य है। आत्मशक्ति या आत्म-विश्वास के अभाव में मनुष्य छोटे-छोटे भौतिक प्रयोजनों में लगा रहता हैं अनुशासन के बिना जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। शक्ति और चेष्टाओं का केन्द्रीकरण न हो पाने के कारण कोई महत्वपूर्ण सफलता नहीं बन पाती। आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बिखरी हुई शक्तियों को एकत्रित करना और उन्हें मनोयोगपूर्वक जीवन-ध्येय की ओर लगाये रखना आचरण में नियम-बद्धता से ही पाता है। नियमितता, व्यवस्थित जीवन का प्रमुख आधार है। आत्मशोधन की प्रक्रिया इसी से पूरी होती है।
उतरोतर मुत्कर्ष जीवने लब्धुमुत्सुकः। प्रतिजाने चरिज्ज्यामि व्रतमात्मविशुद्धये॥
मैं जीवन में उत्तरोत्तर उत्कर्ष प्राप्त करने की प्रबल इच्छा रखता हूँ। या कार्य पवित्र आचरण या आत्मा को शुद्ध बनाने से ही पूरा होता है, इसलिये मैं। व्रताचरण की प्रतिज्ञा लेता हूँ।
व्रत-पालन से आत्मविश्वास के साथ संयम की वृत्ति भी आती है।
आत्म-विश्वास शक्तियों का संचय बढ़ाता है और संयम से शक्तियों का अपव्यय रुकता है। इस तरह जब विपुल शक्ति का भण्डार आत्मकोश में भर जाता है, तो आत्मा अपने आप प्रकट हो जाती है। शक्ति के बिना आत्मा को धारण करने की क्षमता नहीं आती। व्रत शक्ति का स्रोत है, इसलिए आत्मशोधन की वह प्रमुख आवश्यकता है। अपनी शक्ति और स्वयं का ज्ञान मनुष्य को न हो तो व जीवन में किसी तरह का उत्थान नहीं का सकता। शक्ति आती है, तभी आत्मविश्वास की भावना का उदय होता है और मनुष्य विकास की ओर तेजी से बढ़ता चला जाता है।
व्रत जीवन की त्रुटियों और भूलों को सुधार कर मनुष्य को शुद्ध बनाता है। असंयमित जीवन के कारण जो अनियमितताएँ और अशुद्धियाँ आ जाती है उनका एक सफल उपचार है व्रताचरण। गाँधी जी का प्रारम्भिक जीवन बिलकुल अस्त्र-व्यस्त रहा है इसलिये उन दिनों में वे कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं कर पाये। पहला व्रत उन्होंने ३६ वर्ष की अवस्था में धारण किया। ब्रह्मचर्य से उनकी प्रसुप्त शक्तियाँ जागी और उनका जीवनक्रम व्यवस्थित होने लग। व्यवस्थित जीवनचर्या और आंतरिक शक्तियों के जागरण से महात्मा गाँधी असाधारण कार्य कर सके। महापुरुषों का जीवन सदैव व्रतशील रहा है आत्म-निर्माण के साधकों को भी सफलता के लिए आचरण की शिक्षा ग्रहण करनी ही पड़ती है।
जीवन की सफलता के लिए जिन-जिन विचारकों ने अपने अनुभव दिये हैं, उन सबने पहले उसे कसौटी पर कसा होता हैं। उन नियमों की सत्यता के लिए हमें लम्बे परीक्षण की आवश्यकता नहीं हैं। इसमें समय बर्बाद करने की अपेक्षा यह अधिक श्रेष्ठ है कि उदाहरण और विवेक के द्वारा नियमों की परख कर लें और उन्हें प्रयोग करने लगें, इतने से ही हम अपने श्रेष्ठ जीवन का निर्माण कर सकते हैं।
पूर्व जन्मों के संस्कारों के थोड़े से अपवाद हो सकते है, किन्तु अधिकांश लोगों के लिये आत्मज्ञान प्राप्त करने का जो एक सरल रास्ता निश्चित किया हुआ है, वह है-व्रतों के पालते रहने की नियमितता। मनुष्य के जीवन में आत्मरक्षा -वृत्ति से लेकर समाज-वृत्ति तक जो मर्यादाएँ निश्चित हैं, उन्हीं के भीतर रहकर ही आत्मविकास करने में सुगमता होती है। एक व्यक्ति के लिए नहीं, सामूहिक हितसाधना का कार्यक्रम इसी प्रकार पूरा होता है। व्यक्ति का निजी स्वार्थ भी इसी में सुरक्षित है कि सबके लिये समान व्रत का पालन करे। दूसरों को धोखे में डालकर आत्म-कल्याण का मार्ग प्राप्त नहीं किया जा सकता। साथ-साथ चलकर लक्ष्य तक पहुँचने में जो सुगमता और आनन्द है, वह अकेले चलने में नहीं है। अनुशासन और नियमपूर्वक चलते रहने से समाज में एक व्यक्ति के भी हितों की रक्षा हो जाती है और दूसरों की उन्नति का मार्ग भी अवरुद्ध नहीं होता।
सृष्टि का संचालन नियमपूर्वक चल रहा है। सूर्य अपने निर्धारित नियम के अनुसार चलता रहता है, चंद्रमा की कलाओं का घटना -बढ़ना सदैव एक-सा रहता है। सारे के-सारे ग्रह -नक्षत्र अपने निर्धारित पथ पर ही चलते हैं, इसी से सारा संसार ठीक-ठीक चल रहा है। यदि ये अपनी-अपनी मर्यादाएँ छोड़ दे तो आपस में टकराकर विश्वनाथ के दृश्य उपस्थित कर दें। अग्नि, वायु, समुद्र, पृथ्वी आदि सभी अपना-अपना व्रत धारण किये हुए हैं। नियमों की अवज्ञा करना उन्होंने शुरू कर दिया होता तो सृष्टि-संचालन का कार्य कभी का रुक गया होता। अपने कर्तव्य का अविचल भाव से पालन करने के कारण ही देव-शक्तियाँ अमृतभोगी कहलाती है। इन्हीं नियमों का पालन करते हुए मनुष्य की आध्यात्मिक प्रतिक्रिया है। पूर्णता प्राप्त करने की कामना मनुष्य का प्राकृतिक गुण है किन्तु हम जीवन को अस्त्र-व्यस्त बनाकर लक्ष्य-विमुख हो जाते हैं। हर कार्य की शुरुआत छोटी कक्षा से होती है, तब कहीं श्रेष्ठता की ओर बढ़ पाते हैं आत्मज्ञान के महान लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रारम्भिक कक्षा व्रत -पालन ही है, इसी से हम मनुष्य जीवन को सार्थक बना सकते हैं। व्रताचरण से ही मनुष्य महान बनता है, यह पाठ जितनी जल्दी सीख लें, उतना ही श्रेयस्कर है।
काशी विश्वनाथ मन्दिर में एक बार शिवरात्रि के दिन आकाश से एक सोने का थाल उतरा। उसमें लिखा कि शंकर भगवान में जिसका सच्चा प्रेम होगा, उसी को यह थाल मिलेगा। काषभ्राज ने ढिंढोरा पिटवाकर, बहुतेरे लोगों को इकट्ठा किया और सच्चे प्रेमी का आह्वान किया।
सर्वप्रथम एक शास्त्रीजी सामने आये। उन्होंने कहा-मैं नित्य रुद्राभिषेक करता हूँ और दर्शन करने के बाद ही भोजन करता हूँ। अतएव थाल मेरे हाथ में दीजिए। थाल शास्त्रीजी के हाथ में आते ही पीतल का हो गया। इससे शास्त्रीजी लजा गये। इसके बाद काशी स्वयं आये और कहने लगे- मैंने विश्वनाथ जी पर सोने का कलश सच्चे प्रेम से चढ़ाया था और शिवरात्रि को दर्शन करने के लिये सच्चे भाव से आया हूँ। राजा के हाथ रखने पर थाल लोहे का हो गया। इससे वे भी शरमा गये, तदनंतर एक बड़े सेठजी आये और कहा-विश्वनाथ जी की जलधारी मैंने ही बनवायी है। फर्श पर रुपये मैंने ही चढ़ाये हैं और हजारों कोस की दूरी से प्रेमवश मैं यहाँ आया हूँ। इसलिए थाल का वास्तविक अधिकारी मैं हूँ। उसे देने पर भी थाल का वही हुआ। हजारों थाल के इच्छुक निराश हो गये।
उसी समय एक किसान,जो बहुत समय से श्री विश्वनाथ जी के दर्शन का इच्छुक था, किन्तु पैसा न होने से प्रायः खेतों में काम पर लगा रहता, इसलिए नहीं आ सकता था। लेकिन आज वह बड़े परिश्रम से कुछ पैसे बचाकर और खाने के लिए सत्तू बाँधकर आ रहा था, क्योंकि बहुत- लोगों को सोने का थाल लेना था, तब भला उस दरिद्रनारायण को कौन पूछता? इस किसान ने उस गरीब को लोटे से पानी पिलाया, सत्तू खाने को दिया और पास की धर्मशाला में पहुँचा आया। इसके बाद वह किसान काशी विश्वनाथ के मन्दिर में गया। महादेव जी की पूजा करके जब वह बाहर निकल रहा था, तब आकाशवाणी हुई-महादेव जी का सच्चा भक्त आया है। इसलिए थाल इसी को दे दो।
इस वाणी सुनते ही थाल पुजारी के हाथ से सरका और उस किसान के हाथ में सुवर्ण रंग में चमकने लगा। यह देखकर सब चकित रह गए।
दरिद्रनारायण की सेवा ही सच्ची ईश्वर-उपासना है।
पिता के वंश, ऐश्वर्य, गुण, शक्ति और सामर्थ्य के अनुरूप बालक अपने जीवनस्तर का निर्माण प्रारंभ करता है। उसके स्वाभिमान, रहन-सहन-खान-पा-वेश-भूषा में पिता की आत्म-स्थिति का अधिकांश प्रभाव होता है। धनी पिता का पुत्र सुंदर वस्त्र पहनता है, अच्छा खाता है, चलने, यात्रा करने में भी उसकी शान-शौकत अन्यों से भिन्न होती हैं। जैसा बाप करता है प्रायः उसी का अनुकरण बेटे की स्थिति भिखारी जैसी होती है। फटे कपड़े अस्त्र-व्यस्त, बाल, रूखा शरीर सब कुछ ठीक भिखारियों जैसा। उससे अधिक शान का जीवन बिताना भला वह भिखारी का बालक क्या जान सकता है, जिसने जीवन में न अच्छा भोजन देख हो, न अच्छे वस्त्र देखा हो, न अच्छे वस्त्र पहने हों और न आलीशान मकान में रहने का सौभाग्य ही मिला हो। शील, गुण और आचरण अधिकांश व्यक्तियों को पैतृक संपत्ति के रूप में ही मिला करते है।
यह उत्तराधिकार मनुष्य को भी ठीक इसी रूप में मिला है परमात्मा का पुत्र होने के नाते उसे वह सारी निधियाँ मिली हैं, जिससे वह सांसारिक जीवन सुविधा और शान के साथ बिता सकता है। परमात्मा के जो गुण और शक्तियाँ बताई जाती है, वह मनुष्य-आत्मा में भी ठीक उसी तरह सन्निहित है। ऐसे कोई अधिकार शेष नहीं जो ईश्वर ने अपने युवराज को न दिये हो। वह अपने बेटों को निराश्रित, निरीह और निर्बल कैसे देख सकता था। अपनी संपूर्ण शक्तियों का अनुदान उसने अपने बेटे मनुष्य को दिया, ताकि व इस संसार में उल्लास का जीवन जी सके। स्वयं सुख भोगकर आने वालों को भी वैसा ही उत्तराधिकार सौंपता हुआ जा सके।
आत्मदर्शी ऋषियों की लेखनी आत्मा का महत्ता प्रतिपादित करते हुए थक गई, पर कथानक पूरा न हो पाया। शक्तियों की सीमा को नेति-नेति कहकर पुकारना पड़ा क्योंकि वे वर्णन भी कब तक करते। १.. वर्षों के जीवन में ये हजार दो हजार पुस्तकों में आत्मसत्ता की महत्ता लिख जाते इससे अधिक और हो भी क्या सकता था, अनन्त शक्तिसम्पन्न आत्मा का गुणानुवाद आखिर कब तक गाया जाता।
किन्तु आज के मनुष्य की दीन-हीन स्थिति देखकर लगता है शास्त्रकार अतिशयोक्ति कर गये हैं-कुछ-का-कुछ लिख गये हैं। परमात्मा पूर्ण वैभव सम्पन्न है, पर मनुष्य के पास पेट भरने के और सुख से रहने के भी साधन नहीं। परमात्मा विश्वदर्शी है, पर मनुष्य अपने आपको भी नहीं जानता। परमात्मा असीम शक्तिशाली है, पर मनुष्य तो छोटे-छोटे कार्यों के लिये भी औरों का मुँह ताकता है। किसी भी गुण राशि में तो उसका और परमात्मा का पुत्र है-अमृत-तत्व का उत्तराधिकारी युवराज है।
वस्तुतः मनुष्य की शक्ति अपार है, उसके गुण अनन्त है, उसकी क्षमता असीम है, पर यह है उत्तराधिकार रूप में ही। परमात्मा संपूर्ण विश्व का पालनकर्ता, सर्वरक्षक, सबका भरण-पोषण करने वाला है, इसलिये उसे भी यह सतर्कता बरतनी पड़ी कि वह अपनी शक्तियाँ योग्य हाथों में सौंपे और उसे भले कार्यों में प्रयुक्त हुआ देखे। जब कोई ऐसा उत्तराधिकारी व्यक्ति उसे दिखाई दे जाता है, तो अपनी तिजोरी की चाबी भी उसे सौंप देता है। अयोग्य व्यक्तियों को वह अपनी शक्तियों देकर उनका दुरुपयोग होता कैसे देख सकता था? उत्तराधिकार तो किसी अच्छे व्यक्ति को ही दिया जाता है।
एक पिता की कई संतानें होती हैं। कोई कपटी, कोई चोर, कोई लवार। कई उनमें से शील-स्वभाव-गुणवान और आज्ञाकारी भी होते है। पिता बड़ी सावधानी से उन सबका निरीक्षण करता रहता है और जिसे योग्य समझता है उसे गृहस्थी का थाल सौंपने, सारा धन दे जाने में प्रसन्नता अनुभव करता है। जो उसकी शान,ऐश्वर्य और वंश-परम्परा से विमुख होकर अकृत्य करता है, उसे देता तो कुछ नहीं, उल्टे उसे दण्ड और भुगतना पड़ता है।
साधारण मनुष्य की जब यह दशा होती है, तो परमात्मा को अधिक कड़ाई अधिक सावधानी रखनी आवश्यक थी, क्योंकि उसका कार्यक्षेत्र भी तो बहुत बड़ा है, सारे संसार में उसी के बेटे तो विचरण कर रहे है।
साधारण मनुष्य का बेटा जब अपने पिता की सम्पत्ति का स्वामित्व पाता है, तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। सब के सामने अकड़कर शान के साथ चलता है। न उसे किसी का भय होता है और न कोई अभाव। तो फिर जिसे परमात्मा का उत्तराधिकार मिल जाए तो उसकी प्रसन्नता, निर्भयता, वैभव तथा ऐश्वर्य का तो कहना ही क्या? वह चाहे तो सारे संसार के सामने ऐंठकर-अकड़कर चल सकता है। उसे भय और अभाव हो भी कहाँ सकता है।
मनुष्य स्वभावतः अधोगामी है, इस दृष्टि से यह नियंत्रण रखना जरूरी भी था। पर ईश्वर न्यायकारी भी है, उसने आत्मकल्याण का मार्ग किसी के लिये भी अवरुद्ध नहीं किया। वह साधन सबको समान रूप से मिले, जिनके माध्यम से मनुष्य अपने लौकिक तथा पारलौकिक दोनों प्रकार के उद्देश्य पूरे लेता।
वायु, जल, प्रकाश, मेघ आदि का उपभोग सब समान रूप से करते हैं विचार, अनुभव, स्मृति, दर्शन, श्रवण आदि के साधन भी प्रायः सभी को एक समान ही मिल हैं इनके द्वारा मनुष्य यदि चाहता तो आत्मविकास कर सकता था, पर उसने किया कहाँ? सब कुछ देखते हुए भी मनुष्य अज्ञानी ही बना रहा। घटनाएँ कई बार घटी, घटती रहती हैं, पर उसने कभी विचार करना नहीं चाहा। इसी कारण वह अपनी वर्तमान स्थिति से ऊपर उठ भी नहीं सका।
लोग कहा करते हैं कि जीव जब माता के गर्भ में बन्दी की सी स्थिति में पड़ा होता है, तब वह परमात्मा से अनेक प्रकार की विनती करता है। वह चाहता है कि इस जन्म-मरण के फन्दे से जितनी जल्दी छुटकारा मिले, बंधनमुक्ति मिले उतना ही अच्छा है। इसके लिए वह तरह-तरह की प्रार्थनाएँ करता है, किन्तु जन्म लेने के बाद इस संसार की हवा लगते ही वह सब भूल जाता है और फिर वही शिश्नोदर परायण जीवन जीने में लग जाता है।
लोगों की भूल यह है कि वे अपने आप को ईश्वर का पुत्र होना स्वीकार करना नहीं चाहते। विज्ञान का सहारा लेकर लोग प्रत्यक्षवाद की दुहाई देते है, किन्तु यह खुला हुआ संसार क्या कम प्रत्यक्ष है जन्म, जरा और यौवन का पाना और खो देना भी किसी को विचार प्रदान नहीं कर सकता क्या?
ईश्वर का पुत्र होने के नाते मनुष्य असीम आध्यात्मिक शक्तियों और दैवी संपदाओं का स्वामी बन सकता है, किन्तु वह अपने को इस स्थिति वाला मानता कब है? अपनी इस धृष्टता के कारण वह मनुष्योचित आचार से भी पतित होकर दुष्कर्म करता है। अपने स्वार्थ के लिए औरों के अधिकारों का अपहरण करता है। खुद का पेट भरे, दूसरा चाहे भूखों से मर जाए, अपना घर भर जाए, दूसरे चाहे कानी कौड़ी के लिये तरसते रहें। इतना ही नहीं वह अपने से गई-गुजरी स्थिति वालों के साथ पैशाचिक उत्पीड़न करता है, दूसरों का खून पीता और अट्टहास करता है। ऐसे दुष्ट पुत्र को परमात्मा अपनी शक्तियाँ देता कैसे? उसे तो दण्ड ही मिलना चाहिए था और यही मिलता भी है।
स्वार्थ और संकीर्णता की दुष्प्रवृत्तियों के रहते हुए मनुष्य परमात्मा का उत्तराधिकारी कैसे बन सकता है उसे चाहिए था कि वह पैतृक गुणों का आधार मानकर चलता और अपने आप को ईश्वर आदेशों का पालन करता। ईश्वर शक्ति का स्रोत हैं, उससे संबंध स्थापित करता तो मनुष्य का जीवन शक्तिसम्पन्न हो जाता। परमात्मा की विशेषताएँ उसमें भी परिलक्षित होती।
हमारा शाश्वत स्वरूप पीछे पड़ गया है और हम अपने आपको मनुष्य का शरीर मान बैठे है, इसीलिए शारीरिक सुखों तक ही सीमित भी है। शरीर में इन्द्रियों के सुख है, सो मनुष्य उन्हें ही भोगने का हर घड़ी इच्छुक बना रहता है। सुख की इस इच्छा में वह अपने विज्ञानमय स्वरूप को भूल जाता है। जब तक शरीर रूपी साधन अपनी प्रौढ़ अवस्था में रहता है, तब तक भोगों की आसक्ति में पड़े रहते हैं और इस बीच अपनी असफलता का दोष औरों के मत्थे मढ़ना सीख जाते है और इस तरह संतोष करना चाहते हैं पर शाश्वत नियम कभी बदलते नहीं। समय पर वृद्धावस्था अपनी ही थी, शरीर दुर्बल पड़ना ही था, मौत को आना ही था, उस समय न किसी को दोष देते बनता है, न कुछ किये होता है। दुख की स्थिति में, अज्ञान की स्थिति में वह मर जाता है और बार-बार इसी चक्कर में पड़ा दुख भोगता रहता है
परमात्मा की सृष्टि में सुख ही सुख हैं। दुःख का नाम भी नहीं है, पर सारे वास्तविक स्वरूप का पहचानना नहीं चाहते। बेटा अपने धनी बाप से बिछुड़ गया है और अपने आप को निर्धन की-सी स्थिति में पड़ा हुआ अनुभव करता है उसका शरीर,प्राण और मन सब अस्त-व्यस्त है, क्योंकि वह जानता भी नहीं कि उसका बाप कितना विशाल है। अपने अमर स्वरूप को मनुष्य पहचान जाए तो यह विशेषताएँ उसमें भी तत्काल परिलक्षित होने लगे।
दुधारू गाय की बछिया भी दुधारू होती है। मीठे आम की नस्ल में उत्पन्न किया हुआ आम भी उसी गुण वाला होता है। संतरे के पेड़ में नीबू के फल नहीं लगते। अपने अमर स्वरूप में मनुष्य भी ईश्वरीय गुणों से ओत−प्रोत है, किन्तु उसकी वह महानता अज्ञानता के अंधकार में छिपी हुई है। मनुष्य अपने पिता परमात्मा के गुण,ऐश्वर्य और वैभव के अनुरूप अपना जीवन-क्रम बनाता तो उसकी शक्तियाँ भी छिपी हुई न रहतीं और वह भी अपने आप को आपने पिता के सदृश ही सत-चित और आनन्द रूप में पाता। हम सभी अपने आप को रक्त, माँस अस्थि मज्जा, मैदे आदि से बना हुआ क्षुद्र शरीर में अवतरित हुई है उसे इस उद्देश्य के लिये वह अग्रसर हो तो सचमुच उसका यह अलभ्य अवसर पाना भी सार्थक हो।
महाराज युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ चल रहा था। धरा के कोने-कोने से जन-समुदाय इन्द्रप्रस्थ में एकत्र हो चुका था। नरेशों की सेनाएँ ऋषियों के समूह वणिकवर्ग के वाहनों की पंक्तियाँ-इन्द्रप्रस्थ मानव -महासागर हो रहा था। मनुष्यों के प्रवाह चले आ रहे थे वहाँ। संसार के सभी भागो के लोग-विभिन्न वेश, विभिन्न भाषा और सबके-सब अपने पूरे साज से आए थे। ऐश्वर्य साकार होकर उतर आया था-इस धरा पर, सबमें अपने ढंग की अनूठी उत्सुकता थी। कोई इधर-उधर नहीं देख रहा था। किसी को तनिक भी अवकाश नहीं था।
वैसे भी यज्ञ अपने आप में एक महान आयोजन है। इससे जुड़े हुए अनेक कार्य चलते हैं। यों कहिए कि अनजाने और अनचाहे विघ्न भी आ उपस्थित होते हैं। भक्तों साधकों ऋषि-मनीषियों की भीड़ को सम्हालना कठिन हो जाता है। अनेक बन्धु-बान्धवों इष्ट-मित्रों सेवकों के सहयोग से यह कार्य सफल हो जाता है। एक व्यक्ति के सामर्थ्य की तो बात ही नहीं।
फिर यह तो विशेष परिस्थितियों में किया जा रहा विशेष यज्ञ था। राजसूय यज्ञ की महिमा के वर्णन से तो शास्त्रों के पन्ने भरे पड़े है ऋषिगण जिसकी कथा-गाथा कहते अघाते नहीं। ऐसे महान यज्ञ के लिए महाराज युधिष्ठिर संकल्पित हुए थे। इसके पीछे महर्षि वेदव्यास की प्रेरणा थी, तो साथ में थी भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण की सहायता। भाइयों सहित महाराज युधिष्ठिर इस समय स्वयं को धन्य एवं कृतकृत्य मान रहे थे।
जो भी सुनता, अपने मन की शान्ति और आत्मा की शुद्धि के लिए राजसूय यज्ञ में सम्मिलित होने में अपना सौभाग्य समझता। भोजन करने वालों की भी बहुत बड़ी संख्या थी। न जाने कितने ब्राह्मण, तपस्वी,महायोगी एवं धार्मिक वृत्ति के महापुरुष आकर अपनी पूजा-आराधना से उस धार्मिक उत्सव को पवित्र कर रहे थे।
यदि महायज्ञ में आने वाले सभी लोग सहयोग करें, सभी कार्यों में तन्मयता से हाथ बंटाएँ और उन्हें मन लगाकर पूरा करें तो सफलता अवश्य मिलती है।
धर्मराज युधिष्ठिर सहयोग की दृष्टि से सभी मित्र और सम्बन्धियों से उनका मनचाहा कार्य पूछ रहे थे। कौन किस कार्य को करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेता है, यही देखने की बात थी। प्रायः सभी ने अपने -अपने जिम्मे कोई-न-कोई सेवाकार्य ले लिया था।
अब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से संकोच एवं विनय के साथ पूछा-भगवान अपने अभी तक अपना इच्छित कार्य नहीं चुना है। राजसूय यज्ञ आपकी कृपा एवं सहयोग के बिना कैसे पूरा होगा?
श्रीकृष्ण मन्द-मन्द मुसकाए, फिर इष्ट दृष्टि निक्षेप करते हुए बोले-मेरी बारी तो सबक अन्त में आएगी। पहले कार्य चुन लेने दीजिए।
फिर तो अप्रिय एवं कठोर कार्य ही बचेंगे, भगवन्!
कोई हर्ज नहीं। वासुदेव कृष्ण ने बड़ी निश्चिन्तता से कहा। और इस प्रकार सबने राजसूय यज्ञ में अपने-अपने मनपसंद कार्य चुन लिए। सभी खुशी -खुशी अपना इच्छित कार्य चुन रहे थे, जिसमें श्रम तो कुछ भी न करना पड़े लेकिन वे काम में अधिकाधिक तत्पर दिखाई दे, लेकिन वे काम में अधिकाधिक तत्पर दिखाई दें, यज्ञ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति माने जाएँ। सभी प्रायः ऐसा कार्य लेना चाहते थे, जो महज दिखावटी हों और वे अधिकाधिक काम करते दिखाई दें। जिसमें वाहवाही और प्रशंसा प्राप्त हो तथा महत्वपूर्ण कार्यों के सम्पादन का श्रेय भी उन्हें मिल जाए।
आखिर सभी ने अपनी -अपनी रुचि के अनुसार यज्ञ में सहयोग देना स्वीकार कर मनपसंद कार्य चुन लिया। अपने निन्यानवे भाइयों सहित दुर्योधन ने ईर्ष्यापूर्ण मन के साथ कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। कर्ण, द्रुपद आदि सभी नरेश महारथी वीर कार्य में संलग्न हो गए। आयु से वृद्ध होने पर पितामह भीष्म भी जिम्मेदारियों को वहन करने में पीछे न रहे। उन्हें सर्वाधिक हार्दिक प्रसन्नता थी। पाण्डुपुत्रों के सम्मान, प्रगति, उत्कर्ष को देखकर वे फूले नहीं समा रहे है।
परन्तु अभी भगवान कृष्ण ने कोई दायित्व नहीं सँभाला था। धर्मराज युधिष्ठिर ने उनके पास जाकर फिर दोहराया -भगवन्! आपकी पुण्य प्रेरणा और सहज सहयोग के बल पर हज तो राजसूय यज्ञ का महाआयोजन शुरू हुआ है। इसमें असंख्य अतिथि आए है, भजन-पूजन और यज्ञकार्य में आए असंख्य अतिथियों के भोजन का प्रबंध भी करना होगा। सभी ने अपना-अपना उत्तरदायित्व स्वयं अपने ऊपर ले लिया है, किन्तु आपने अभी तक चुनाव नहीं किया है।
ठीक है धर्मराज! मैं आपको अपनी रुचि का कार्य बतलाए देता हूँ।
वह कौन-सा कार्य है भगवन्?
श्रीकृष्ण उन्हें समझाते हुए कहने लगे, महाराज! आज हम मात्र दिखावे और औपचारिकता में फँस गए है। हम वे दिखावटी काम करने की जिम्मेदारी लेते हैं, जिसमें वास्तविक श्रम बहुत कम, दिखावा ही अधिक होता है। मिथ्या, प्रदर्शन की थोथी भावना ने हमें जिन्दगी के यथार्थ से दूर ला पटका है। यदि व्यक्ति केवल अनावश्यक दिखावे में ही फँसा रहा, प्रदर्शन से दूर किन्तु अनावश्यक, शुष्क कठोर व नीरस श्रमसाध्य कार्यों की उपेक्षा करता रहा, तो किसी भी महान कार्य में उसे सफलता कैसे प्राप्त होगी।
युधिष्ठिर कुछ समझे नहीं।
श्रीकृष्ण ने आगे कहा- यज्ञ का बाह्य दिखने वाला रूप तो देवपूजन एवं आहुतियों का हवन है। वह निश्चय ही महत्वपूर्ण है, किन्तु यज्ञ का आन्तरिक और अधिक आवश्यक रूप भी है।
वह क्या है भगवन्? यह मर्म स्पष्ट कीजिए।
निष्काम सेवा, ऐसा कार्य करना जो ऊपरी निगाह से नजर न आये, पर हो सर्वाधिक महत्वपूर्ण! इस पर भी कभी चिन्तन किया है आपने?
कृपया कर अपना दृष्टिकोण और स्पष्ट कीजिए भगवन्!
धर्मराज धर्मक्षेत्र में गुप्तदान का सर्वाधिक महत्व है, क्योंकि उसमें दिखावा तनिक भी नहीं, गिरे पड़े पीड़ित लोगों की सहायता ही प्रधान लक्ष्य है। यदि धर्म में मात्र प्रदर्शन का भाव आ गया तो उसका लक्ष्य तो केवल आत्म विज्ञापन ही रहा।
भगवन्! आपने अपनी रुचि स्पष्ट नहीं की अभी तक।
तो सुनो, महाराज मैं आपके राजसूय यज्ञ में अतिथियों के भोजनोपरान्त झूठी पत्तलों का उठाने वहाँ की भूमि साफ करने और स्वच्छता बनाए रखने का कार्य करूँगा। यही होगा मेरा गुप्तदान।
ये शब्द थे या तीक्ष्ण बाण! सुनकर धर्मराज चकित विस्मित हो उठे। उनकी कल्पना हतप्रभ हो उठी। ऐसा वे भला सोच भी कैसे सकते थे। जिन्होंने अपने बचपन में इन्द्र को भी हतप्रभ कर दिया। जिनकी बालक्रीड़ा ने कंस जैसे महाबली असुर को धराशायी कर दिया। जिनके पराक्रम कूटनीति, रणकौशल से सारा आर्यावर्त परिचित है। पितामह भीष्म, महर्षि व्यास जैसे अध्यात्म वेत्ता जिन्हें ईश्वर का अवतार मानते हैं। युधिष्ठिर को सूझ ही नहीं रहा था, वे क्या कहें।
डंके संकोल को भाँपकर श्रीकृष्ण चन्द्र स्वयं उन्हें आश्वस्त करते हुए बोले हाँ मैं सही कह रहा हूँ, जूठन साफ करने और पत्र उठाने का कार्य मैं अपने ऊपर लेता हूँ। उनकी ये बातें सुनकर युधिष्ठिर कहने लगे आप मुझे धर्मसंकट में डाल रहे हैं। मैं किस जिह्वा से ऐसा छोटा काम करने की स्वीकृत दूँ? क्या कहूँ आपसे। आप फिर विचार कर कोई सुन्दर काम चुने। मेरे विचार में तो नये आकर्षक परिधान में बाहर से आने वाले गणमान्य अतिथियों के स्वागत सत्कार का प्रतिष्ठित-सुसंस्कृत कार्य ही आपके उपयुक्त होगा।
धर्मराज यह तो अत्याधिक सरल कार्य है। इसे तो कोई मामूली आदमी आसानी से कर सकता है। महत्व तो उस कार्य को करने में है, जो कठिन है और जिस पर सम्पूर्ण व्यवस्था टिकी हुई है। पर उसमें प्रदर्शन तनिक भी नहीं है। जूठन उठाने ओर झूठे बर्तन माँजने का काम छोटा समझा जाता है, पर व्यवस्था की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इस कठोर कार्य को बाहर से आने वाला कोई भी व्यक्ति नहीं करना चाहेगा। यज्ञ का असली मतलब तो बाहरी और आन्तरिक स्वच्छता है। छोटे कहलाने वाले कार्य हमारे अहंकार को दूर कर आत्मा के मैल को दूर करते हैं। ‘छोटा’ कहलाने वाले कार्यों को न करना मनुष्य की संकीर्ण विचार धारा के परिणाम हैं। समाज का हर एक कार्य चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, अपना महत्व रखता है। हर कार्य फेर-बदल का हर व्यक्ति के जिम्मे होना चाहिए। जिसे ऊँचा उठने और उन्नति के अवसर हर वर्ग को समान रूप से मिल सकें।
मन्दिर का चमकता हुआ स्वर्णकलश इतना महत्वपूर्ण नहीं जितना कि उसकी नींव का पत्थर- आन्तरिक स्वच्छता। आप तो तत्त्वज्ञ हैं धर्मराज! फिर ऐसा क्यों कहते हैं कि यह काम छोटा है?
भगवन्! तब तो धर्म का क्षेत्र बड़ा व्यापक मालूम पड़ता है?
हाँ महाराज! धर्म का लक्ष्य तो बाह्य और आन्तरिक शुद्धि है। यह स्वच्छता केवल स्नान, नये वस्त्र धारण, ध्यान, पूजन, अर्चन मात्र से पूरी नहीं होती। इसके लिए पास-पड़ोस की स्वच्छता, नालियों, शौचालयों की सफाई, अंधकार दूर करना प्रकाश का प्रबन्ध, वृक्षारोपण, अपना कार्य स्वयं करना, श्रमदान, बीमारों की सेवा आदि अनेक ऐसे कार्य है, जो मानव की उन्नति में सहायक हैं और इसीलिए धर्म के अंतर्गत आते हैं। सभी के सहयोग से यह शुष्क और गन्दे कहे जाने वाले काम आसानी से सम्पन्न कराये जाते हैं। छोटे कहे जाने वाले कार्यों को पूर्ण करने से अहंकार, आलस्य एवं क्रोध जैसी वृत्तियाँ स्वयमेव नष्ट हो जाती हैं। हम मनुष्यत्व की ओर अग्रसर होते हैं। अज्ञान, मूढ़ता, दुराग्रह, हिंसा, आलस्य, रूढ़िवादिता आदि मानसिक विकारों को दूर करने के लिए ऐसे ही छोटे कहलाने वाले काम आवश्यक हैं। वैसे भी कार्य का स्वरूप नहीं, उसकी पृष्ठभूमि में निहित भावना महत्वपूर्ण होती है।
और लोकविख्यात है, समस्त शास्त्र, पुराण एक स्वर से कहते है- महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में झूठी पत्तलों को उठाने का काम श्रीकृष्ण ने किया था।
परख की कसौटी ऐसी है कि उससे खरे और खोटे की पहचान आसान हो जाती है। वस्तु या व्यक्ति असली या नकली- यह पारखी दृष्टि ही बतला सकती है। उथली नजर तो बाहरी चमक-दमक तक ही पैठ रखती है। रत्नों के पारखी को तो जौहरी कहते हैं, जबकि मनुष्य को परखने वाले ‘सन्त’ और ‘ऋषि’ कहलाते हैं।
इन दिनों सर्वत्र नकल का ही बोलबाला है। नकली रत्न, नकली सोना नकली रुपये, नकली वस्तुएँ और यहाँ तक कि नकली मनुष्य भी खूब देखे जाते हैं। ठगी का धंधा इन्हीं के माध्यम से फल-फूल रहा है। भौतिक दुनिया में नकल पदार्थों की होती है, जबकि अध्यात्म जगत में संतों के स्वाँग रचे जाते हैं। दोनों ही अपने-अपने प्रकार के धोखे हैं, पर पैनी दृष्टि से सक्षम कुछ भी छिपा नहीं रहता और असल नकल के भेद तत्काल खुल जाते हैं।
पुराने जमाने जैसे पारखी अब विरले ही पाये जाते हैं, कास कि आज उन विद्याओं की सीखने हेतु कठिन साधना के लिए शायद ही कोई तैयार हो। हर कोई शार्टकट की तलाश में रहता है। इससे वास्तविक विद्या तो नहीं, ठगी विद्या अवश्य सीखी जा सकती हैं।
आत्मानुसंधान करने वालों को कठोर तपश्चर्या से होकर गुजरना पड़ता है, तभी अन्ततः वह दृष्टि उपलब्ध हो पाती है, जिसके आगे सच-झूठ देर तक आवृत नहीं रह पाते। पदार्थ विद्या में पारंगत होना आत्मसाधना के समतुल्य है। इसमें पदार्थ सम्बन्धी खोज इतनी सूक्ष्म और गहरी होती है कि दुर्धर्ष तप स्तर के मनोयोग के बिना उस सरस्वती साधना में सफल हो पाना संदिग्ध ही बना रहता हैं। जो इसे भली-भाँति सम्पन्न कर लेते हैं, उनकी स्थिति पदार्थ में गति रखने वाले द्रष्टाओं जैसी होती है।
ऐसी ही एक पारखी थी- परथल। प्रख्यात अंग्रेज इतिहासकार एडम वाट्सन ने अपनी रचना ‘द् वार ऑफ द् गोल्डस्मिथ डॉक्टर’ में उक्त युवती एवं उसके अद्भुत विद्या के बारे में विस्तारपूर्वक उल्लेख किया और लिखा है कि उसकी दृष्टि इतनी तीक्ष्ण कि रत्नों के संदर्भ में उसे धोखा दे पाना संभव नहीं था। १५ वीं सदी के पूर्वार्द्ध में सम्पूर्ण भारत और विशेषकर दक्षिण भारत में उस जैसी जौहरी दूसरा कोई नहीं था। दूर-दूर से लोग रत्न राशियों के साथ उसके सम्मुख उपस्थित होते और उनके असली नकली की पहचान करवाते। इस कार्य के के लिए आगन्तुकों से वह किसी प्रकार का कोई धन स्वीकार नहीं करती। परथल अत्यन्त सरल और सुन्दर थी।
मनुष्य के अन्दर जब दिव्यता का विकास होता है, तो वह उसे अद्भुत और असाधारण बना देती है एवं एक ऐसी दृष्टि प्रदान करती है, जिसके समक्ष कोई भी रहस्य प्रच्छन्न नहीं रह पाता, असली-नकली का अपना-अपना भेद स्वयमेव खोलने लग जाते हैं। यह आत्मसाधना की बात हुई।
परथल पदार्थ विद्या की साधिका थी। जिन दिनों का यह प्रसंग है, उन दिनों दक्षिण भारत के विजयनगर राज्य में राजा देवराय द्वितीय सिंहासनारूढ़ थे। इसके उत्तर में कृष्णा और तुँगभद्रा नदियों के बल वाले क्षेत्र में एक मुस्लिम सुलतान फिरोज बहमनी का शासन था। इसी राज्य में रामरती नामक एक गरीब सुनार रहता था। परथल उसी की बेटी थी।
एक बार चन्द्रमौलि शास्त्री नामक एक ब्राह्मण वाराणसी से तीर्थाटन कर लौट रहा था। लौटते समय राजा देवराय को देने हेतु उसने एक रत्न खरीद लिया। विक्रेता ने बताया कि यह दुर्लभ जाति का पुखराज है। रत्नों के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी चन्द्रमौलि भी रखता था। उसके हिसाब से पुखराज को पीला या केसरिया होना चाहिए, पर वह तो एकदम श्वेत था, जिस पर उसको इस ढंग से तराशा गया था कि देखने से बिलकुल हीरा प्रतीत होता था। चन्द्रमौलि को उक्त रत्न के प्रति संदेह बना रहा। उसके मन में बार बार यही आता कि पुखराज के नाम पर हीरा देकर कहीं उसे ठग तो नहीं लिया गया?
उधेड़बुन चलती रही। इसी के साथ वापसी यात्रा में वह मुद्गल नगर पहुँचा। रात हो चुकी थी, अतः एक धर्मशाला में रुक गया। यह बहमनी सुलतान का क्षेत्र था। यह वहाँ की परथल नामक प्रसिद्ध जौहरी की ख्याती से परिचित था, अतएव अपने क्रय किये गये रत्न की परख करने का निश्चय किया।
दूसरे दिन जब वह वहाँ पहुँचा तो उसने अपने आने का मन्तव्य बताया। सुनार ने उसका स्वागत किया। औपचारिक चर्चा के बाद जब परथल को बुलाया गया, तो चन्द्रमौलि ने अपना रत्न उसकी ओर बढ़ाते हुए उसके बारे में जानकारी चाही। परथल ने उसे अपनी हथेली पर रखा, एक तीक्ष्ण दृष्टि डाली, फिर उलट-पुलट कर निरीक्षण किया और अपना निर्णय सुनाते हुए कहा महाराज! यह सफेद जाति का पुखराज है। चन्द्रमौलि ने प्रतिवाद किया कि लगभग एक दर्जन जौहरी इसे हीरा बता चुकें हैं, ऐसी स्थिति में तुम्हारी बात सही है- यह निर्णय कैसे हो?
परथल मुस्करायी। उसने कहा कि इसकी हलकी पीली आभा जो बहुत ध्यान पूर्वक देखने से दिखाई पड़ती है, इस बात का प्रमाण है कि यह पुखराज ही है। फिर भी आप न मानें तो इसकी पुष्टि मैं दूसरे ढंग से करके दिखाती हूँ। इतना कहकर बिना किसी भय के उसने उसे मुँह में डाल लिया।
पिता रतिराम को अपनी बेटी पर पूर्ण विश्वास था। उसके मुख पर मन्द मुसकान बिखरी हुई थी। दूसरी ओर चन्द्रमौलि के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रहीं थी। उसे यह भय था कि निर्णय में चूक से परथल की जान जा सकती है, कारण की हीरा जहरीला होता है।
परथल उसे अब भी अपने मुख के अन्दर रखे हुए थी। पण्डित चन्द्रमौलि अब आश्वस्त हो चुके थे कि वास्तव में वह हीरा नहीं, पुखराज ही है। उसने रतिराम से उसकी बेटी की सराहना करते हुए कहा कि जैसी यह रूप राशि में अनुपम है, वैसी ही अपनी विद्या में अद्वितीय भी। इस जैसी निपुण बेटी पाकर आप धन्य हो गये।
अभी उसकी परस्पर चर्चा चल ही रही थी कि किसी ने आवाज लगाई। ज्ञात हुआ कोई बहमनी सिपाही एक हार की पहचान करवाने आया है। उसे अन्दर बुलाया गया परथल ने हार को सूक्ष्मतापूर्वक निहारा। उसके एक दाने को दाँतों के बीच रखकर किटकिटा कर देखा, तत्पश्चात बोली किसी जौहरी की हाथ की सफाई ने कितनी चालाकी से सुलेमानी पत्थर को पन्ने की शक्ल दे डाली है।
आगन्तुक चौंका तो क्या वास्तव में पन्ना नहीं है?
परथल में दृढ़ स्वर में कहा कि नहीं, यह अच्छी जाति का सुलेमानी है।
पण्डित चन्द्रमौलि वहीं थे। वह परथल के आत्मविश्वास से अभिभूत हो उठे सोचने लगे कितनी गहन साधना है और निर्णय के प्रति कैसा अटल विश्वास है। शब्दों में जिस प्रकार के बलाघात का प्रयोग करती, उससे साफ प्रतीत होता है कि यह सब उसके लिए अत्यन्त मामूली बात है।
कुछ क्षण के लिए वे खो से गये थे। जब सहज हुए तब आगन्तुक जा चुका था। उसने उससे पूछा कौन-सा रत्न किस राशि में पहना जाता है, यह तुम जानती हो।
उसने अस्वीकृति में सिर हिला दिया, तब वे बोले- इसे मैं भली−भाँति जानता हूँ। विद्या का आदान-प्रदान वास्तव में सरस्वती साधना का दूसरा नाम है। तुम मुझे रत्न परखना सिखाओ, मैं तुम्हें रत्न का निर्णय करना सिखलाऊँगा।
परथल सहमत हो गयी। चन्द्रमौलि कुछ समय के लिए मुद्गल नगर में रुक गये। उनने उसको ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान कराया और परथल ने रत्नों की कटाई-छँटाई उसकी आभा, चमक एवं अन्यान्य प्रकार के चिन्हों के आधार पर इन्हें पहचानना सिखलाया।
सीखने-सीखाने का यह क्रम अभी चल ही रहा था कि एक दिन रोचक घटना घट गयी। सुलतान के पुत्र राजकुमार के हाथ किसी जौहरी ने एक हीरे का हार यह कहकर बेच दिया कि वह दुर्लभ किस्मों के हीरों से बना है। इस समय तक परथल की ख्याति हसन के कानों तक पहुँच चुकी थी। उनने इसकी जाँच कराने का निश्चय किया, सोचा इससे परथल की परीक्षा भी हो जायेगी और हार की परख भी। सो एक रोज वह उस हार को लेकर उसके घर जा पहुँचा। राज्य का राजकुमार होने के नाते रतिराम ने उनका यथायोग्य स्वागत किया। इसके उपरान्त उनने वह हार जाँच के लिए परथल को सौंपा। हाथ में उसे लेते ही वह खिलखिलाकर हंस पड़ी। सभी भौंचक्के रह गये। किसी की समझ में कुछ भी नहीं आया कि आखिर परथल हँसी क्यों? इसके पश्चात उसने उस हार को पानी में रगड़-रगड़ के धोया। अच्छी तरह धो चुकने के बाद उसे हसन की ओर बढ़ाते हुए कहा- अब इसके ऊपर का मुलम्मा उतर चुका है। लीजिए इसे मुँह में डालकर इसका रसास्वादन कीजिए।
राजकुमार को मूर्तिवत् मौन खड़ा देख परथल मुस्करायी, बोली कदाचित आप जान जोखिम महसूस कर रहें हैं? लीजिए हमीं इसे चूम लेते हैं। यह कहकर उसने उसके कुछ मनकों को मुँह में डाल लिया ओर लेमनचूस की तरह चूसने लगी, बोली आह कितनी मिठास है।
बाद में जब उन्हें मुंह से निकाला, तो यह सब देखकर दंग रह गये कि मनके आकार में छोटे हो गये थे। परथल ने हसन से कहा- राजकुमार जिस भी जौहरी ने इसे बनाया है, उसकी बुद्धि और कारीगरी की प्रशंसा करनी होगी कि उसने मिश्री की डली को इस बखूबी से तराशा कि उसके हीरा होने का भ्रम पैदा हो जाता है।
अब तक सामान्य हो चुके थे। उनने पूछा- क्या यह सचमुच मिश्री है।
हाँ, आप स्वयं इसे चखकर देख लीजिए। यह कहकर धुले हुए हार को उसने हसन की ओर बढ़ाया। सहन ने उसे मुँह में रखते हुए कहा अरे! सच यह तो मिश्री ही है।
राजकुमार हसन परथल की पारखी विद्या से बहुत प्रभावित हुए उनने उसकी जी भर कर प्रशंसा की और धन्यवाद देते हुए विदा हो गये।
पंडित चन्द्रमौलि यह सब देख रह थे। वह सही-सही आज ही समझ सके कि वह कितनी उच्चकोटि की जौहरी है।
वास्तव में आत्मविद्या के ज्ञाता से पदार्थ का ज्ञान छुपा नहीं रह जाता। इस संसार में सर्वोपरि और सर्वप्रमुख परमात्म तत्व हैं। आत्मतत्त्व उसकी ही चिनगारी है।
जो आत्मा को जान लेता है, उसके लिए परमात्मा भी अविज्ञात नहीं रह जाता। इस परम तत्व को प्राप्त कर लेने के बाद संसार के सभी रहस्य और सभी ज्ञान अनावृत हो जाते हैं, कारण कि सब उसी एक तत्व के प्रकाश और विकास है।
यों परख दृष्टि अनुभव अभ्यास और विवेक बुद्धि द्वारा ही अर्जित की जा सकती है, पर वह जैसी ही नहीं, जिसके बारे में दावे के साथ यह कहा जा सके जो कि कुछ निर्णय और निष्कर्ष निकाला गया है, वह बिलकुल सही ही है। गलती की संभावना वहाँ बनी रहती है। आम लोग इसी दृष्टि का विकास कर कामचलाऊ व्यवस्था बनाते हैं, किन्तु जिनने दिव्य दृष्टि का जागरण कर लिया, वह संत और ऋषिवर के ज्ञानी एवं पारखी कहलाते है। हमें इसी पथ का अनुसरण करना चाहिए।
जीवन अनन्त की यात्रा है। वह अनन्त से उत्पन्न होकर अन्ततः उसी में विलीन हो जाता है, पर उसके लिए एक लम्बा सफर तय करना पड़ता है। इस यात्रा में मनुष्य को पति-पत्नी माता-पिता भाई-बहन स्वजन-परिजन के रूप में कितने ही साथी सहयोगी मिलते हैं। अनेक बार उनका परस्पर संबन्ध इतना प्रगाढ़ हो जाता है कि वे हर जन्म में एक दूसरे का सान्निध्य लाभ चाहते और उसकी प्राप्ति के लिए कई कई जन्मों तक भटकते रहकर इंतजार करते हैं।
ऐसी ही एक घटना लोथल के आलिंगनबद्ध पिंजर की है। प्रसंग उज्जैन एक प्रतिष्ठित व्यक्ति से सम्बन्धित है। पिछले दिनों वे पहली बार अहमदाबाद गये। वहाँ उनके मित्र ने अन्य स्थानों को देखने के साथ-साथ लोथल भी घूम आने का आग्रह किया। इसके लिए गाइड और गाड़ी दोनों की व्यवस्था कर दी। गाइड पहले इन्हें लोथल ही ले चला।
अहमदाबाद से ८. किलोमीटर दूर भावनगर स्थित इस स्थान के बारे में पुरातात्त्विक सर्वेक्षण और विश्लेषण से यह ज्ञात हुआ कि आज से लगभग ४ हजार पूर्व हड़प्पा कालीन सभ्यता के दौरान यहाँ कोई विकसित नगर रहा होगा, जो किसी प्राकृतिक आपदा के चपेट में आकर नष्ट हो गया।
करीब चार घंटे की यात्रा के बाद गाड़ी एक सुनसान से लगने वाले स्थान पर आकर रुकी। वहाँ सामने ही मध्यम आकार का एक भवन था। इसके अतिरिक्त आस-पास वीरान था। गाइड ने बताया कि यह लोथल का म्यूजियम है। यहाँ एक आलिंगनबद्ध मुगल का नरकंकाल है। जो पुरातत्व
इतना कहकर वह गाड़ा से उतर गया और म्यूजियम के गेट की ओर बढ़ने लगा। साथ में वह सज्जन भी थे। अन्दर गये तो कुल चार कर्मचारी दिखाई पड़े। पर्यटक एक भी नहीं थे। पूछताछ से ज्ञात हुआ कि बरसात के मौसम में प्रायः जनहीन रहता है और इक्के दुक्के लोग ही आते हैं। हाँ, सर्दियों में यहाँ काफी भीड़भाड़ रहती है।
खुदाई से प्राप्त पुरासामग्रियों में वहाँ कई प्रकार के मिट्टी के बरतन सिक्के और औजार रखे थे। कुछ ऐसी वस्तुएँ भी मिली, जिनके बारे में वहाँ का क्यूरेटर भी सही सही नहीं बता सका और उस काल में किस प्रयोग में आती थी। यह सब देखते हुए अन्त में वे उस कंकाल के समीप पहुँचे। कंकाल गहन प्रेमपाश में आबद्ध थे। दोनों का चेहरा आमने-सामने था और वे करवट की मुद्रा में पड़े थे। उनका हाथ एक दूसरे के शरीर के ऊपर था। पिंजर की विशिष्ट मुद्रा को देखकर यह निष्कर्ष आसानी से निकलता था कि विनाशलीला रात्रि में हुई होगी कि प्रेमी युगल को कुछ सोचने और सँभलने का अवसर नहीं मिला होगा एवं वे उसी अवस्था में काल कवलित हो गये होंगे।
उक्त कंकाल को देखकर उन सज्जन को बड़ा विचित्र अनुभव हो रहा था। रह-रहकर उनके स्मृति पटल पर अस्पष्ट से दृश्य उभरते और आरोपित हो जाते। स्मृति इतनी धूमिल एवं क्षीण थी कि कुछ स्पष्ट नहीं हो पा रहा था और न ही उनकी समझ में ठीक-ठीक यही आ रहा था कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? वे इसी ऊहापोह में खोये रहे।
खुदाई स्थल पास ही था। म्यूजियम देखन के उपरान्त व वहाँ गए। पुराकाल के भग्न आवासों के अवशेष देखने के पश्चात सब उस स्थान पर पहुँचे जहाँ से आलिंगनबद्ध कंकाल मिले थे। वहाँ कुछ विशेष नजर नहीं आया।
इस समय तक बूँदा−बाँदी शुरू हो गयी थी। गाइड ने आगन्तुक से कहा- अब हमें जल्द ही होटल पहुँचना चाहिए। वर्षा तेज हो गयी तो गाँव की कच्ची गलियों में गाड़ी के फंसने की संभावना है। इसके बाद दोनों कार में बैठे तथा होटल की ओर चल दिये।
होटल यहाँ से लगभग ५ किलोमीटर दूर एक गाँव में था। वह गाँव और आस-पास का क्षेत्र कभी छोटी रियासत रहा होगा। वहीं के जागीरदार के एक भाग में उक्त होटल स्थित था।
भवन अत्यन्त भव्य और दो मंजिला था। पर्यटकों के लिए दूसरी मंजिल के कमरे प्रयुक्त थे। वे दोनों जैसे ही वहाँ पहुँचे, होटल के एक कर्मचारी ने उनका स्वागत किया और उन पर्यटक को उनके कमरे तक पहुँचा दिया। गाइड स्थानीय व्यक्ति था, अतः प्रातःकाल मिलने की बात कहकर चला गया।
रात का भोजन लेकर वे अपने कक्ष में चले गये। होटल के सभी कर्मचारी स्थानीय थे। अतः रात में वे वहाँ न रहकर अपने अपने घर चले जाते थे। जाने से पूर्व रुकने वाले यात्रियों की पूरी व्यवस्था कर जाते।
जब सभी कर्मचारी चले गये, तो होटल एक प्रकार से सुनसान हो गया। उस हवेली में मात्र दो ही लोग रह गये। एक होटल का दरबान था दूसरे पर्यटन के लिए आये वो सज्जन। दरबान चूँकि लम्बे समय से वहाँ नियुक्त था, अतः उस पर सूनेपन का अभ्यस्त हो चुका था। उसे वहाँ कोई परेशानी महसूस नहीं होती थी, पर वे सज्जन पहली बार इस प्रकार के सन्नाटे का सामना कर रहे थे, वह भी विशाल हवेलीनुमा होटल में। उन्हें बड़ा भय अनुभव हो रहा था। वह कभी नीचे उतरकर दरबान के पास जा बैठते और बातें करने लगते, तो कभी अपने कमरे में आकर सोने का प्रयास करते, किन्तु डर के मारे, नींद नहीं आ रही थी। बार-बार उनकी आँखों के आगे म्यूजियम के वे कंकाल घूम जाते।
रात करीब ग्यारह बज चुके थे। उनकी आँख भारी होने लगी। एक ताजा यात्रा की थकान, दूसरे जल्दी सोने की आदत, सो अब नींद को टाल पाना उनके लिए मुश्किल हो गया। वे कोठरी में गये और अन्दर से दरवाजा बन्द कर बिस्तर पर लेट गये। उन्हें कब नींद आ गयी कुछ पता न चला।
थोड़ी ही दूर में वे स्वप्न लोक में विचरण करने लगे। उनने देखा उनके समक्ष एक स्वप्न सुंदरी खड़ी है। उसके वस्त्र आज के युग जैसे नहीं थे। वक्ष और कटि प्रदेश ही ढके हुए थे, शेष सभी अंग अनावृत थे। वह उन्हें पुकार रही थी- श्वेम............श्वेम। उसके चेहरे पर मन्द मुस्कान थी और एक ऐसा भाव जिसे देखने से यह प्रतीत होता था कि मानो वह उनसे चिर−परिचित हो।
यद्यपि उन सज्जन का नाम ‘श्वेम’ नहीं था, पर फिर भी न जाने क्यों इस नाम को सुनकर वे कुछ खो से गये। उनके मस्तिष्क में हलचल-सी होने लगी। इसका प्रभाव व्यग्रता के रूप में मुख-मण्डल पर स्पष्ट झलक रहा था। इस बीच उनकी दृष्टि बराबर उस युवती पर टिकी रही, जैसे कुछ याद करने का प्रयास कर रहे हों। कुछ ही क्षण में उनके चेहरे का भाव बदला और अचानक उनके मुख से निकला-यान्ति तुम।
उक्त संबोधन सुनकर वह हर्षोन्मत्त हो उठी और अपने पीछे आने का संकेत कर आगे आगे चलने लगी। वे सम्मोहन जैसी स्थिति में आ चुके थे और उसके साथ साथ अनायास खिंचे जाने लगे।
रात में घनघोर जंगल था, जिसमें यत्र-तत्र हिंसक पशु विचरते नजर आ रहे थे। वे भयभीत थे, पर यान्ति बार-बार मुड़−मुड़ कर उन्हें आश्वस्त करती कि वे कुछ भी हानि नहीं पहुँचाएँगे, निर्भय रहो। थोड़ी दूर पर एक गुरुकुल दिखाई पड़ा, जहाँ बालक शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। पेड़ों के नीचे बैठे विद्यार्थियों का अध्यापन-कार्य जैसे ऋषि लगने वाले एक व्यक्ति कर रहे थे। आस पास अनेक कुटियाँ बनी हुई थी ओर आगे बढ़ने पर जंगल पार कर मैदानी भाग में आये, तो खेतों में कार्य करते कृषक दिखलाई पड़े। इसके बाद नगर का इलाका आरंभ होता था। यान्ति उन्हें नगर के एक किनारे स्थित एक विशाल कोठी में ले गयी। वहाँ कुछ देर विश्राम करने के बाद उसने जलक्रीड़ा की योजना बनाईं
अब तक दिन का तीसरा प्रहर समाप्त हो चुका था। जलविहार के लिए यह उपयुक्त समय था। यान्ति ने दोनों के लिए कपड़े लिये और कुछ खाद्य सामग्री लेकर नगर के एक छोर पर स्थित समुद्र तट पर आ गयी। वहाँ कुछ नौकाएँ पड़ी थी। दोनों एक नाव में सवार होकर नौका विहार करने लगे। देर तक नौकायन करने के उपरान्त जब शाम घिरने लगी तो उसे किनारे लगाया। वे स्नान के लिए जल में उतर आये। काफी समय तक जलक्रीड़ा करते रहे। अब तक तट के सारे लोग जा चुके थे। कुछ-कुछ धुँधलका घिरने लगा था। दोनों ने कपड़े बदले और भोजन किया, फिर सुस्ताने की नीयत से बालुका पर लेट गये। दोनों एक-दूसरे के बाहुपाश में बँधे थे। अभी इसी स्थिति में कुछ ही पल बीते होंगे कि तीव्र गड़गड़ाहट हुई, मानो आसमान फट पड़ा हो। इसी के साथ समुद्र से लहरों का तूफानी प्रवाह तट की ओर उमड़ा यान्ति और श्वेम का चेहरा एक दूसरे के सम्मुख और विपरीत दिशाओं में था। यान्ति समुद्र की ओर मुँह कर लेटी थी, जबकि श्वेम का चेहरा नगर की ओर था। सागर की उद्दाम तरंगों को राक्षस की लपलपाती जिह्वा की तरह अपनी ओर बढ़ते देखकर युवती की चीख निकल गयी। श्वेम कुछ समय समझ पाता, इससे पूर्व ही धरती हिंडोले की तरह डोली ओर फट गयी। दोनों को संभलने का तनिक भी मौका नहीं मिला एवं वैसे ही आलिंगनबद्ध स्थिति में वे पृथ्वी में गर्भस्थ हो गये।
फिल्म की रील की तरह घूम रहे दृश्य का पटाक्षेप हो गया। इसके पश्चात् यान्ति एक बार पुनः उक्त सज्जन के स्वप्न में प्रकट हुई, बोली- श्वेम! मैं युगों से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी। आज मिलकर बहुत तृप्ति अनुभव कर रहीं हूँ, पर यह मिलन तो क्षणिक है। मैं सदा-सर्वदा के लिए तुम्हारी होकर रहना चाहती हूँ, अस्वीकार मत करना।
इसके बाद सब कुछ अदृश्य हो गया। आँखें खुली, तो ज्ञात हुआ की कोई दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। बाहर होटल का कर्मचारी चाय लिए खड़ा था। प्रातः के सात बज चुके थे। उनने चाय पी और जल्दी दैनिक क्रिया के लिए निवृत्त होकर अहमदाबाद के लिए प्रस्थान कर गये।
कहते हैं कि तभी से उनके आस-पास हरपल कोई छाया मँडराती अनुभव होता है, जो मुसीबतों और कठिनाइयों में सभी प्रकार से उनकी मदद करती एवं आश्वासन देती प्रतीत होता है कि उसके उनका कोई अनिष्ट और अमंगल नहीं होने वाला। वे अब तक कुँवारे ही हैं।
जीवन अनन्त है। इस यात्रा का हर पड़ाव उच्च से उच्चतर बनने के लिए है, मोहग्रस्त होकर पतित होने के लिए नहीं। यदि ऐसा हुआ और वास्तविक अर्थों में हम निर्लिप्त न बन सके, तो अनन्त के उस उद्गम से एकाकार हो पाना संभव नहीं, जिसे ईश्वर कहते हैं। मानवीसत्ता भटकाव का पर्याय न होकर परमात्मा-प्राप्ति के लिए एकनिष्ठता दूसरा नाम है। हमारा लक्ष्य उस सर्वश्रेष्ठ और सर्वोपरि सत्ता को प्राप्त करना ही होना चाहिए कोई दूसरा नहीं। कारण कि इस दुनिया में प्रयोज्य और प्राप्तव्य एकमात्र वही है।
अमेरिका का प्रसिद्ध पत्र ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने अन्तरिक्षविज्ञानी स्वर्गीय रॉबर्ट गोगार्ड से अपनी उस टिप्पणी के लिए माफी माँगी, जो उसने सन् १९२. में छापी थी।
गोगार्ड उन दिनों अन्तरिक्षविज्ञान की शोध कर रहे थे। उन्होंने प्रतिपादित किया था कि शून्य आकाश में राकेटों का चलाया जाना सम्भव है। और इस आधार पर अन्तर्ग्रही यात्राएँ की जा सकेंगी।
इस प्रतिपादन पर व्यंग्य करते हुए ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने लिखा था “गोगार्ड महाशय विज्ञान की लम्बी चौड़ी बातें करते हैं, पर वे जानते उतना भी नहीं। जितनी कि स्कूली बच्चे पढ़ते हैं। जिन्हें पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का ज्ञान होगा, वह कैसे कह सकता है कि राकेट उस आवरण को बेधकर ऊपर निकल जायेंगे और अन्य ग्रहों की यात्रा करेंगे।”
उस टिप्पणी के ४९ वर्ष बाद गोगार्ड का प्रतिपादन सही सिद्ध हुआ। केप कैनेडी राकेट में सवार होकर नील आर्मस्ट्रांग और उसके साथ ही चन्द्रमा पर पहुँचे। पर ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने अपनी ४९ वर्ष पूर्व की टिप्पणी के लिए स्वर्गीय गोगार्ड से क्षमा माँगी कि उन्हीं का प्रतिपादन सही था और टिप्पणी कर्ता गलती पर।
नया युग बढ़ता हुआ चला आ रहा है। मनुष्य को दुष्प्रवृत्तियाँ छोड़नी पड़ेगी। और उसे अपने सोचने और करने की रीति-नीति से परिवर्तन करना पड़ेगा। यह बात असंभव लगती है। मर्यादाओं के बन्धन जिस बुरी तरह टूटते चले जा रहे हैं। एक आदमी दूसरे को ठगने के लिए जिस बेहयाई के साथ उतारू है। सुधार का बाना ओढ़ने वाले भी उस आवरण के भीतर क्या-क्या कुकृत्य कर रहें हैं, इसकी तह में जाने से सहज ही आँखों के आगे अंधेरा छाने लगता है और प्रतीत होता है कि अभी दिल्ली दूर है, विकृतियाँ पूरी प्रौढ़ता पर है और उन्हें देने के लिए उपयुक्त मोर्चा बन नहीं रहे हैं। जो सुधार और निर्माण की बातें करते हैं। उनकी कथनी और करनी में भारी अन्तर है। ऐसी दशा में यह प्रतीत नहीं होता कि परिस्थितियाँ जल्दी ही बदल जायेंगी।
पर वर्तमान स्थिति को देखकर भविष्य का सुनिश्चित निर्णय नहीं किया जा सकता। उसे दूरदर्शी देखते हैं- जिनकी आँखें निकट का ही देख पाती है उनके लिए उस परिवर्तनों की कल्पना कठिन ही लगती है। जो आज की स्थिति से तालमेल नहीं खाते। गोगार्ड का प्रतिपादन ‘न्यूयार्क टाइम्स’ को ऐसा ही भौंड़ा लगा था, पर समय ने बताया कि आज जो बात असंभव लगती है, कल सम्भव भी हो सकती है।
जलयानों की सम्भावना भी किसी समय अवास्तविक लगती थी। नैपोलियन बोनापार्ट इंग्लैण्ड पर हमले की तैयारी कर रहा था। इसी समय एक इंजीनियर रॉबर्ट फुल्टन यह योजना लेकर पहुँचा कि किस प्रकार भाप से चलने वाले जलयान बन सकते हैं और उनसे शत्रु जहाजों के दाँत कैसे खट्टे किये जा सकते हैं।
नैपोलियन झल्ला पड़ा क्या बकवास कर रहें है आप? आग पर पानी गरम करके उससे अलाव के रुख और पानी की धार काटते हुए जहाज चल सकते हैं। ऐसी बेतुकी सनक सुनने की मुझे फुरसत नहीं है। बेचारा इंजीनियर चला गया, जलयान बनने और चलने लगे तो भी बुद्धिमान कहलाने वालों ने इस प्रयास का उपहास ही उड़ाया। डवलिन रॉयल सोसाइटी के सामने अपना अभिमत प्रस्तुत करते हुए प्रो. लाडेस्कर ने कहा-ये मामूली मनोरंजन कर सकते हैं, पर इन जलयानों से अटलांटिक पार करने की कल्पना बेहूदा है।
वह बेहूदी कल्पना आज कितनी सार्थक और साकार सिद्ध हो रही है। इसे हर कोई देख सकता है। पानी के जहाज परिवहन, यातायात और युद्धों में कैसे भूमिका प्रस्तुत कर रहें हैं। इसे समझने में नैपोलियन जैसे समझदार असफल रहे। साधन सम्पन्न इंजीनियरों को यह कल्पना निरर्थक लग रही थी, पर आखिर वह साकार ही हो गयी।
मनुष्य की पशु संस्कारों से ग्रसित बुद्धि और आदत को मर्यादा में चलने के लिए सधाया जा सकेगा। ध्वंस और विघटन में लगे हुए तत्व अपनी प्रतिभा सृजन में नियोजित करेंगे। स्वार्थों के पीछे अन्धा बना जमाना परमार्थ को प्रधानता देने की प्रवृत्ति अपनायेगा। यह बात असम्भव लगती है, पर किसी इंजीनियर को इन परिस्थितियों में भी पक्का विश्वास है कि यह परिवर्तन भले ही आज असम्भव लगता हो पर कल सम्भव होकर रहेगा।
आविष्कारों के क्षेत्र में सदा यही होता रहा है कि आरम्भ में उस कल्पना और चेष्टा को सनक बताया गया और असंभाव्य कहा गया। टैंक बनाने की योजना जब सामने लाई गयी तो इंग्लैण्ड के सेनापति ने कहा -लोहे की गाड़ियाँ घुड़सवारों के स्थान ग्रहण कर सकती है यह कल्पना नितान्त मूर्खतापूर्ण है।
रूस के जब प्रथम-प्रथम अंतरिक्ष यान स्पूतनिक आकाश में भेजा तो अमेरिका के तत्कालीन सेनापति और पीछे के राष्ट्रपति आइजन होवर ने उसका मजाक उड़ाया और कहा- रूसियों द्वारा आसमान में उछाली गयी एक छोटी-सी गेंद युद्ध समस्या को किस प्रकार प्रभावित कर सकती है? इसका कोई महत्व मेरी समझ में नहीं आता।
उस समय वे बातें बेकार मालूम पड़ती थीं, पर आज टैंकों का अपना स्थान है और उन्होंने घुड़सवार सेना को निरर्थक सिद्ध कर दिया है। अन्तरिक्ष यान आज अन्तिम युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करते दिखते हैं और उसी प्रतिद्वन्दता में अरबों रुपया खर्च हो रहा है।
विचारक्रान्ति की बात सुनकर आज भी हँसी उड़ाई जा सकती है। सोचने भर से दुनिया की परिस्थितियाँ और आदमी की आदतें कैसे बदली जा सकती है, यह समझ सकना समझदारों के लिए कठिन पड़ रहा है। विचार दिमाग तक ही सीमित है। क्रिया परिस्थितियों से संबंध रखती है। विचार परिस्थितियों को कैसे बदल सकते हैं और बिना मजबूरी सामने आये कोई सच्चाई के कष्ट साध्य रास्ते पर क्यों कर सकता है। निहित स्वार्थों को विचारों की प्रेरणा भर से कैसे अपने स्वार्थ छोड़ने के लिए सहमत किया जा सकता है, यह बात जटिल और पेचीदा प्रतीत होती है, पर वह दिन दूर नहीं जब यह स्वीकार करने के लिए विवश होना पड़ेगा कि संसार में मानव-जीवन की सबसे बड़ी शक्ति विचार ही है और उनके बरताव से व्यक्ति और समाज का सारा ढाँचा ही बदला जा सकता है।
युद्ध उपकरणों की खोज को जारी रखने को निरर्थक बताते हुए रोम के बड़े सैनिक इंजीनियर जुलियस फोन्टिनस ने कहा था- अब इन प्रयत्नों को बन्द कर देना चाहिए, क्योंकि युद्ध उपकरणों के संबंध में जितने आविष्कार संभव थे, वे चरमसीमा पर पहुँच गए हैं। इसी प्रकार सन् १८९९ में अमेरिकी आविष्कार पेटेंट विभाग के डायरेक्टर ने तत्कालीन राष्ट्रपति मैककिकल्ले को सलाह दी थी कि अब इस विभाग को बन्द कर दिया जाये। क्योंकि जितने आविष्कार अब तक हो चुके हैं उनसे आगे और कोई आविष्कार होने की गुँजाइश नहीं रही। पर हम देखते हैं कि इसके बाद पिछले शताब्दी में कितने अधिक आविष्कार हुए और पेटेंट डायरेक्टर का अनुमान कितना गलत निकला।
अब तक कितने धर्म-सम्प्रदाय निकल चुके, आचार-संहिताएँ बन चुकीं योग और अध्यात्म की खोज हो चुकी, अब इससे आगे कुछ सोचने को बाकी नहीं रह गया, यह आज भले ही माना जाता हो, पर कल बतायेगा कि प्रगति की संभावना अभी और भी बहुत कुछ विद्यमान है। समस्त विश्व का एक धर्म एक आचार, एक शास्त्र, एक राष्ट्र, एक भाषा, एक लक्ष्य होना आज भले ही समझ में न आये, पर कल यह नया आविष्कार होने ही वाला है और वसुधैव कुटुम्बकम्- कृण्वन्तोविश्व-आर्यम् की प्राचीन कल्पना को अगले दिनों साकार होना है, आज असम्भव दीखने वाला यह भविष्य प्रत्यक्ष हो चले, तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए, इस दुनिया में न कुछ असम्भव है न कुछ आश्चर्य।
अब से डेढ़ सौ वर्ष पूर्व विज्ञानी यह मानते थे कि हवा से भारी वजन की चीजों का आसमान में उड़ सकना कभी भी सम्भव न होगा। जब पहला हवाई-जहाज बना और उसके आसमान में उड़ने की सूचना अखबारों में दी गयी तो उन्होंने उसे ‘गप्प’ कहकर छापने से इंकार कर दिया। पहली बार बिना आदमी बिठाये जहाज उड़ा, दूसरे बार आदमी बिठाकर उसने उड़ान की। तब पापुलर साइंस अख़बार ने बड़ी बेरुखी के साथ सिर्फ इतना छापा- यह खोज तमाशे जैसे छुट-पुट काम ही कर सकेगा। किसी बड़े प्रयोजन में इसके आ सकने की आशा नहीं करनी चाहिए।
जब हवाई-जहाज अपनी प्रौढ़ावस्था में आ गये, भारी बोझ लेकर वे द्रुतगति से बढ़ने लगे तो वैज्ञानिकों ने भावी महत्त्वाकाँक्षाओं का निषेध किया। शब्द की गति से अधिक तीव्रता लाया जाना सर्वथा अशक्य है, एक स्वर से वैज्ञानिक ने यही कहा। शब्द की गति प्रतिघण्टा ६६. मील है। इससे अधिक गति वायु की हो सकती है, इसे मानने के लिए कोई तैयार नहीं था। पर प्रगति होती रही। बोइंग ७.७ की चाल ५५. मील हुई। इसके बाद बोइंग ७७७ सारे विश्व में उड़ रहे हैं। जब यह प्रतिघण्टा ६७. मील की चाल से उड़ा उसने शब्द की गति का अतिक्रमण कर लिया। तो वैज्ञानिकों को पिछली भूल सुधारनी पड़ी और कहना पड़ा गति को कितना ही अधिक बढ़ाया जा सकता है। कॉन्कार्ड वायुयान १३.. मील प्रति घण्टे की चाल से उड़ते हैं। तथा लंदन व न्यूयार्क के बीच की दूरी मात्र तीन-साढ़े तीन घण्टे में पूरी कर लेते हैं। अंतरिक्षयान अभी २५ हजार मील की चाल से उड़ रहे हैं। भविष्य में उनकी चाल ५. हजार मील हो जायेगी। योजना तो ६ लाख मील प्रति घण्टे चलने वाले अंतरिक्ष यानों की है।
चिरकाल से एक ढर्रे पर मन्थर गति से लुढ़कती चली आ रही समाज व्यवस्था में अब कोई परिवर्तन नहीं हो सकता, उसे द्रुतगामी नहीं बनाया जा सकता, यह सोचना ठीक नहीं है। नये समाज के आधार और सिद्धान्त अधिक प्रगतिशील हो सकते हैं। मनुष्य के सोचने और करने का प्रतिगामी ढर्रा बदल सकता है। स्वार्थ भरी संकीर्णता एवं अवांछनीय ध्वंसात्मक प्रवृत्ति का परिशोधन करके उन्हें सुरुचिसमपन्न बनाया जा सकता है।
असुरता अवैद्य है। शैतान का पंजा फौलादी है। उसे सब तक नहीं तोड़ा जा सका, यह सोचकर निराश होने की आवश्यकता नहीं है। मानवीय प्रकृति और संसार की परिस्थितियों में परिवर्तन हो सकता है। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण हो सकता है। इस मान्यता एवं चेष्टा को असंभाव्य मानने की आवश्यकता नहीं है।
शारीरिक परिपक्वता की आयु सीमा निर्धारित है। प्रायः बीस वर्ष की आयु तक हर व्यक्ति वयस्क हो जाता है। पच्चीस से तीस की आयु वालों को शारीरिक दृष्टि से परिपक्व माना जाता है। प्रौढ़ता की अवधि इसके बाद शुरू होती है तथा लगभग चालीस तक चलती है। आयुष्य से जुड़े शारीरिक संबंधों का यह मोटा विभाजन है, पर मानसिक दृष्टि से कितनी उम्र वालों को परिपक्व माना जाये निर्धारण में कठिनाई यहाँ आती है। कितने ही व्यक्ति ऐसे होते हैं जो लम्बी वय के बाद भी बचकानी हरकतें करते रहते हैं। कितनों का बचपन जीवन पर्यन्त नहीं समाप्त होता तथा ऐसे आचरण प्रस्तुत करते रहते हैं। जिनमें उनकी नादानी ही झलकती है, जबकि कुछ ऐसे भी देखे जा सकते हैं, अद्भुत सूझबूझ का परिचय देते तथा बड़े दायित्व निभाते पाये गये हैं। बुद्धिमत्ता, योग्यता एवं प्रतिभा का भी सुनिश्चित एवं सीधा संबंध उम्र से नहीं दिखाई पड़ता। मनःशास्त्रियों द्वारा निर्धारित पैमाने भी संबंधित विषय पर स्पष्ट तथा विस्तृत व्याख्या नहीं कर पाते।
मानसिक परिपक्वता जाँच के लिए प्रचलित तरीका बुद्धिलब्धि परीक्षण है। परीक्षण पद्धति के अनुसार बालक की मानसिक आयु में उसकी वास्तविक उम्र से भाग तथा प्राप्त अंक को १.. से गुणा कर दिया जाता है। इस तरह यदि किसी बच्चे की मानसिक आयु ८ हो तो बुद्धिलब्धि १.. होगी। औसत बुद्धिलब्धि भी १.. मानी गई है। अपनी उम्र से अधिक प्रतिभा का परिचय देने वाले बच्चे की मानसिक आयु अधिक होती है। यदि बालक की शारीरिक आयु १. वर्ष तथा मानसिक आयु १५ वर्ष हो तो उसकी आई. क्यू. १५. होगी। मनःशास्त्रियों ने जो सर्वेक्षण और परीक्षण किये हैं, उसका निष्कर्ष है कि कुल जनसंख्या में दो प्रतिशत लोगों की बुद्धिलब्धि इस स्तर की होती है। अपवाद के रूप में थोड़े से व्यक्ति ऐसे पाये गये है, जिनकी बुद्धिलब्धि २.. तक थी। सामान्य वयस्क १.. से १५. बुद्धिलब्धि सीमा के भीतर आते हैं। १.. से कम को मानसिक दृष्टि से अविकसित तथा १५. से अधिक को ‘सुपर’ माना जाता है।
मनःशास्त्र द्वारा बौद्धिक क्षमता मापने का यह मोटा निर्धारण है, जिसके आधार पर लोगों की प्रतिभा मालूम की जाती है। पर बौद्धिक क्षमता मापने का यह सिद्धान्त अपूर्ण है। ऐसे अगणित प्रमाण भी मिले है, जिनमें मानसिक प्रखरता की उपर्युक्त कसौटियों पर अनेकों व्यक्ति खरे नहीं उतरे, पर गंभीरता से अध्ययन करने पर वे असाधारण प्रतिभा के धनी निकले। मूर्धन्य वैज्ञानिक सापेक्षवाद के आविष्कारक आइन्स्टीन विद्यार्थी जीवन में मन्द बुद्धि वाले माने जाते थे। एक दिन उन्हें विद्यालय से निष्कासित भी कर दिया गया था, कारण था- क्लास में हाजिरजवाबी का अभाव। विषयों प्रश्नों की गहराई में वे तुरंत उत्तर नहीं सूझता था। अध्यापक तथा विद्यार्थीगण इसी कारण उनकी क्षमता का मूल्याँकन नहीं कर पाते थे, पर सभी जानते हैं कि आरम्भ में मंदबुद्धि समझा जाने वाला यह बालक इतिहास प्रसिद्ध वैज्ञानिक बना जिसकी बुद्धि का लोहा सभी मानते हैं।
विलक्षण प्रतिभा के ऐसे अगणित प्रमाण मिले हैं, जिनका कोई सीधा संबन्ध बुद्धिलब्धि से नहीं है। वह मान्यता भी पुरानी पड़ती जा रही है। कि प्रतिभा प्रदत्त एक स्थायी जन्मजात अनुदान है। ‘इण्टेलिजेन्स कैन बी टाॅट’ पुस्तक की लेखिका आर्थरलिण्डा के अनुसार कई व्यक्तियों में उनके जीवन के दौरान आई. क्यू. स्तर बढ़ता देखा गया है, जबकि स्कूल में आई. क्यू. (बुद्धिलब्धि) परीक्षण के आधार पर अति मेधावी घोषित छात्र आगे चलकर निष्फल सिद्ध हुए हैं। प्रतिभा के मनोवैज्ञानिक परीक्षणों को चुनौती देने वाले एक उदाहरण भी है, जो बताते हैं कि यह पद्धति कितनी अपूर्ण और एकाँगी है। घोषित मंदबुद्धि पर अद्भुत मेधासम्पन्न व्यक्तियों के प्रमाण इस क्षेत्र में नये सिरे से सोचने तथा अनुसंधान करने की प्रेरणा देते हैं।
‘इडियट जीनियस’ नामक पुस्तक में मनःशास्त्री एरिक पैटर्सन ने एक घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है कि दो दशक पूर्ण न्यूयार्क में रोजलिन नामक महिला के गर्भ से जुड़वा बच्चे पैदा हुए। उनका जन्म निश्चित अवधि से तीन माह पूर्व ही हो गया था। नाम रखा गया चार्ल्स और जॉर्ज। तीन वर्ष की आयु में उनकी बुद्धि की जाँच की गयी। परीक्षण कर्ताओं ने उन्हें मंदगति घोषित किया। उनकी आई. क्यू. ६. से ७. के बीच थी, जो सामान्य से भी कम थी। ‘न्यूयार्क स्टेच साइकियेटिक इंस्टीट्यूट’ के डॉ. विलियम हार्विज ने पिछले दिनों इस युग्म का पुनः परीक्षण किया। इनमें उन्हें विलक्षणता का आभास मिला। उन्होंने जॉर्ज से एक जन्मतिथि बताकर उस पर पड़े दिन तथा उस क्रम में आगे पड़ने वाले विभिन्न तारीखों तथा दिनों का ब्यौरा पूछा। कुछ ही सेकेण्ड में उसने सही-सही विवरण प्रस्तुत कर दिया। सैकड़ों वर्ष पूर्व अमुक दिन कौन-सी तारीख तथा माह था, पूछे जाने पर अधिक समय लगाये चार्ल्स तथा जॉर्ज दोनों ही बता देते थे। आने वाले सैकड़ों वर्ष बाद की जानकारियाँ भी शत प्रतिशत सही देते थे, जबकि उन्हें कैलेण्डर के नियमों का कुछ भी ज्ञान नहीं था। लम्बे समय तक डॉ. हार्विज कारणों की खोज करते रहे, पर विलक्षणता का रहस्योद्घाटन न हो सका। अन्ततः वे यह कहकर चुप हो गये कि प्रतिभा के अविज्ञान स्रोत मानव मस्तिष्क में विद्यमान हैं, जिसकी कोई जानकारी विज्ञान एवं मनोविज्ञान को नहीं है।
इंग्लैण्ड का जेडेदिया बक्सन नामक व्यक्ति भी जार्ल्स और जॉर्ज की तरह ही अद्भुत मेधा का धनी था। बचपन में वह इतना मूर्ख समझा जाता था कि उसके माता पिता ने पढ़ाना ही उचित नहीं समझा। अक्षरज्ञान की भी उसे शिक्षा नहीं मिली, किन्तु आश्चर्य यह है कि कुछ ही वर्षा बाद वह गणित के कठिन प्रश्नों को हल करने लगा। उसकी स्मृति विलक्षण थी। एक बार वह थियेटर में ड्रामा देख रहा था। वहाँ भी उसने संवादों को यथावत दुहराकर सबको चकित कर दिया।
यद्यपि अधिकांश मस्तिष्कीय विलक्षणताएँ एवं प्रतिभाएँ जटिल गणनाओं एवं तरह तरह की गणितीय समस्याओं के क्षेत्र में ही दिखाई पड़ती है पर ऐसे भी अनेक उदाहरण है, जिनमें कई लोगों ने दूसरे क्षेत्रों में भी ऐसी ही श्रेष्ठता साबित की। ऐसे ही एक व्यक्ति थे १९ वीं सदी के जीनियस जे. एच. पुलेन। उन्हें जीनियस ऑफ अर्ल्सिवुड एसिनम के नाम से भी जाना जाता है। उनने ‘द् ग्रेट इर्स्टन’ नाम से विख्यात जलयान का अत्यन्त जटिल डिजाइन तैयार किया था। वह मॉडल उनने तीन वर्ष के लगातार श्रम के उपरान्त बनाया। उसे देखकर विशेषज्ञ यही कहते पाये गये कि यह किसी साधारण मेधा की उपज नहीं हो सकती है। उसमें जिस प्रकार की जटिलता का समावेश है, वह प्रणेता की दिमागी वरिष्ठता को ही सिद्ध करता है।
सन् १९१. में डेविड एस. विस्काट नामक मनोवैज्ञानिक ने बोस्टन की एक महिला हैरियट का अध्ययन किया। वह विलक्षण प्रतिभा की धनी निकली। मोजार्ट, वीथोवन, स्क्यूवर्ट, डेबूसी, प्रोकोफियेव जैसे विश्वविख्यात संगीतज्ञ के समकक्ष उन्हीं जैसी धुनें निकाल लेती थी। आश्चर्य की बात यह है कि उसने संगीत का कभी अभ्यास नहीं किया, न ही उसे लय, ताल, स्वर, रागिनियों का ही कुछ ज्ञान था।
जॉन न्यूमैन को उन्नीसवीं सदी के मूर्धन्य गणितज्ञ की पदवी मिली थी। वह कठिन गणित के प्रश्नों का उत्तर बिना गुणा भाग किये बिना किसी यंत्र का प्रयोग किये देने के लिए प्रख्यात था। यूरोपीय विद्वान समय समय पर उनसे गणित की समस्याओं पर विचार विमर्श करने के लिए आया करते थे।
वैज्ञानिक क्षेत्र मं मस्तिष्क की विलक्षणताओं के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार की अटकलें लगायी जा रही हैं। कुछ वैज्ञानिक इसका सम्बन्ध मस्तिष्क के प्रोटीन रसायन से जोड़ते हैं। कुछ का मत है कि मस्तिष्क के अन्तराल में कम्प्यूटर जैसी कोई अविज्ञान प्रणाली कार्यरत है। कइयों का मानना है कि मस्तिष्क की कॉर्टिकल पर्त इसके लिए जिम्मेदार है, जबकि अन्य अनेक इसके मूल में बीजकोशों की भूमिका स्वीकारने से नहीं चूकते। दूसरी ओर पेलो अल्टो स्कूल ऑफ प्रोफेशनल साइकोलॉजी के डॉ. टी. एल. ने प्रतिभा का सम्बन्ध मस्तिष्क के वाम भाग से जोड़ते हुए कहा है कि यह क्षेत्र असीम संभावनाओं का छुपा भण्डार है, जिसका अध्ययन गम्भीरतापूर्वक किया जाना चाहिए।
वैज्ञानिकों की अटकलों तथा मनोवैज्ञानिक क्षेत्र के प्रयोग-परीक्षणों से निकले निष्कर्षों के आधार पर मानसिक प्रतिभा के कारणों की स्पष्ट व्याख्या कर सना मुश्किल है। बुद्धि-विश्लेषण एवं प्रखरता के निर्धारण के लिए बनाये गये। बुद्धिलब्धि जैसे मापदण्ड अत्यन्त बौने साबित होते हैं। इंटेलीजेन्स का वह पहलू जो महान तथा महत्वपूर्ण आविष्कारों का जन्मदाता है, किसी भी तरह इन परीक्षणों की सीमा में नहीं आ पाता। सशक्त कल्पनाओं, प्रखर विचारों का इनमें परिचय नहीं प्राप्त किया जा सकता। हिमनदों में बर्फ के शिलाखण्डों का तीन चौथाई हिस्सा पानी के भीतर डूबा रहता है। प्रतिभा की भी लगभग ऐसी ही स्थिति होती है। एक मोटा और अत्यन्त छोटा पक्ष ही बुद्धि का व्यक्त रूप में सामने आता है। उसी को लेकर मनुष्य अपने दैनन्दिन जीवन के क्रिया–कलापों को गतिशील रखता है। अधिकांश भाग तो प्रसुप्त स्थिति में दबा पड़ा रहता तथा उपयोग में नहीं आ पाता है।
जन्मजात प्रतिभा एवं बौद्धिक विलक्षणता का कुछ सुनिश्चित कारण मनोवेत्ता तथा तंत्रिकाशास्त्री नहीं बता पाते। आनुवांशिकी से जोड़े जाने वाले तीर-तुक्कों की भी अब सटीक संगति नहीं बैठती। आनुवांशिकी के नियमों को झुठलाने वाले विपरीत तथ्य एवं प्रमाण भी देखे जाते हैं। मूर्ख माता-पिता मेधावी तथा मेधावी के मूर्ख पैदा होने के उदाहरण भी समय-समय पर मिलते हैं। सबसे अधिक रहस्यमय तथा चौंकाने वाली वे घटनाएँ होती हैं, जिनमें बिना शिक्षण प्राप्त किये विशिष्ट स्तर की प्रतिभा किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में अकस्मात् उभरती दिखाई पड़ती है।
आध्यात्मवादी इनका सम्बन्ध जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारों से जोड़ते हुए कहते हैं कि अनायास प्रतिभा के रूप में दिखाई पड़ने वाली विशेषता पूर्व जन्मों की उपार्जित होती है। शरीर का मरण होते हुए भी कृत्यों के संस्कार सूक्ष्म रूप में बने रहते हैं और ये नये जन्म के साथ प्रकट होते हैं। संभव है कि इस जीवन में उस प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति को कोई शिक्षण न मिला हो, न ही उसने किसी प्रकार का प्रयास किया हो, पर उसको मिला यह अनुदान पूर्व जन्म के संचित ज्ञान की ही अभिव्यक्ति हो।
उपर्युक्त मान्यता को स्वीकार लेने से यह गुत्थी सुलझ जाती है कि क्यों कोई बालक अल्पायु में ही विलक्षण मेधा का मालिक बन जाता है, जबकि उसके दूसरे साथी बालसुलभ बुद्धि का ही परिचय दे पाते है? इस आधार पर उक्त निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि प्रतिभा उम्र की अनुगामिनी कम, संस्कारों की सहचरी ज्यादा है।
शिकागो विश्वविद्यालय के नेशनल ओपीनियन रिसर्च सेन्टर ने डॉ. नार्मन एम. ब्रेडवर्न के तत्वाधान में एक समिति एक समिति इसलिए बिठाई कि वह प्रसन्नता-अप्रसन्नता के कारणों और अनुभवों की गहराइयों को समझने का प्रयत्न करें।
समिति ने विभिन्न वर्गों के अनेकों व्यक्तियों से उनके व्यक्तिगत जीवन-सम्बन्धी गहराइयों में प्रवेश करने का प्रयत्न किया और अनेक प्रकार के प्रश्न पूछकर उनकी संतुष्ट-असंतुष्ट मनःस्थिति को समझने का प्रयत्न किया।
समिति ने जो पूछ-ताछ की और जो उत्तर पाये, उनसे यह निष्कर्ष निकला कि परिस्थितियों से मनःस्थिति पर प्रभाव तो पड़ता है, वह बहुत अधिक गहरा नहीं होता। भली-बुरी घटनाएँ आरम्भ में ही प्रिय-अप्रिय लगती हैं, पीछे वे स्वभाव में सम्मिलित होकर अभ्यस्त हो जाती हैं। तब न सम्पन्न को अपनी सम्पन्नता से प्रसन्नता लगती है ओर न गरीब को गरीबी अखरती है। यही बात अन्य बातों के सम्बन्ध में भी है। परिवार में तालमेल न बैठने के शुरू में जो परेशानी पड़ती है, पीछे वह चख-चख एक ढर्रे में सम्मिलित हो जाती है और अन्य साधारण कारणों की तरह वह लड़−झगड़ भी अपने ढंग से उलझती-सुलझती रहती है। यदि वह ढर्रा टूट जाए, झगड़ालू सदस्य कहीं चला जाये तो फिर घर में सूनापन लगता है और खामोशी अखरती है। लगता है कि एक चालू ढर्रा टूट जाने से कोई अभ्यस्त चीज हाथ से निकल गयी और उसका अभाव अखरने लगा है।
हँसोड़ व्यक्ति किसी सफलता, सम्पन्नता या उपलब्धि के कारण नहीं हँसा करते वरन् उनकी वैसी आदत ही बन जाती है और साधारण-सी बात को लेकर वे स्वयं हँसने और दूसरों को हँसाने का रास्ता ढूँढ़ लेते हैं। जरूरी नहीं कि अपनी ही स्थिति को लेकर कोई प्रसन्न या अप्रसन्न रहे। इसलिए दूसरों से सम्बन्धित बातें भी अच्छी भूमिका निभाती हैं। दूसरों की सफलता, प्रसन्नता अथवा साहसिकता के विवरणों में यदि रस लेने की आदत बन जाये तो उनके समाचार भी उत्साहवर्धक हो सकते हैं और वे उत्साह भरे रह सकते हैं। अमीरों के नौकर स्वयं में कोई सम्पन्न नहीं होते, उन्हें गुजारे भर को मिलता है, पर वहाँ के वातावरण में जो आकर्षक हलचलें होती रहती हैं, उनमें इन नौकरों का मन रम जाता है और वे वहाँ से छोड़कर अन्यत्र जाना नहीं चाहते। भले ही वहाँ आर्थिक लाभ अधिक ही क्यों न होता हो।
गाँव को छोड़कर लोग शहरों में रहने के लिए अधिकतर इसलिए भागते हैं कि वहाँ सम्पन्नता और ठाट-बाट का वातावरण बिखरा दीखता है। भले ही उसका प्रत्यक्ष लाभ अपने को न मिले, पर दूसरों को लाभान्वित होते देखकर एक परोक्ष तृप्ति होती है और उसे देखते भर रहने से खुशी मिलती है। इसी मनोवैज्ञानिक खुशी को पाने के लिए गरीब लोग अनेक कठिनाइयाँ सहते हुए दिन गुजारते रहते हैं।
सुख और दुख की परिभाषा रह व्यक्ति की दृष्टि में अपने अपने ढंग की अलग-अलग है। कई व्यक्ति शादी के साथ जुड़ी हुई समस्याएँ और जिम्मेदारियों से बेहतर डरे होते हैं और सोचते हैं कि विवाह के बन्धनों में बंधना जान बूझकर आफत मोल लेना और दूसरे के हाथों अपनी आजादी बेच देना है। वे अविवाहित रहकर हँसी खुशी के दिन काटते हैं। और उन लोगों को मुँह चिढ़ाते है जो गृहस्थ के जंजाल में रोते कलपते दिन काटते है। इसके विपरीत ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो बिना स्त्री बच्चे के रहने में श्मशान जैसी डरावनी खामोशी देखते हैं। और उनकी कल्पना भर से घबराने लगते हैं। ऐसी दशा में ऐसे किसी तथ्य का प्रतिपादन कर सकना कठिन है कि प्रसन्नता किन कारणों और किन आधारों पर टिकी होती है।
यों तो मोटे तौर पर अच्छे सुविधा-साधन हर किसी को पसन्द होते हैं और वह उन्हें चाहता भी है, पर यह आवश्यक नहीं कि सुविधा साधन मिलने पर व्यक्ति संतुष्ट रहे। वनवासी स्त्री-पुरुष कभी-कभी साधन सम्पन्न नगरी को कौतूहलपूर्वक देखने के लिए जाते तो हैं पर वो वहाँ रहने के लिए तैयार नहीं होते। विवशता में रहना पड़े तो वहाँ से छुटकारा मिलते ही अपनी उस पुरानी जगह लौट जाते हैं, जहाँ अपेक्षाकृत कठिनाइयाँ ही अधिक उठानी पड़ती हैं। विरक्त और त्यागी व्यक्ति अपनी स्वेच्छा स्वीकृत आभावग्रस्तता में गर्व अनुभव करते हैं। और सुविधा-सम्पन्न मिलने पर भी उनका उपभोग नहीं करते। अस्तु यह कह सकना कठिन है कि प्रसन्नता अमुक वस्तु या स्थिति के साथ जुड़ी हुई है। जेल के नाम से आमतौर से सबको डर लगता है पर जिन्होंने उस रहन सहन से स्वयं को अभ्यस्त कर लिया है, उन्हें बाहर चैन ही नहीं पड़ता और कुछ-न-कुछ खटपट करके अपने प्रिय वातावरण में फिर जेल जा पहुँचते हैं। छूटते ही फिर वापस लौटने की तैयारी करने वाले अभ्यस्त कैदियों की संख्या कम नहीं होती।
डॉ. ब्रेडवर्न ने इलिनाय क्षेत्र (यू.एस.ए) के चार छोटे कस्बों का प्रसन्नता - अप्रसन्नता की खोज करने का प्रयोजन लेकर अन्वेषण किया ओर लम्बी पूछ - ताछ की। इन चार कस्बों की आबादी तीन हजार से नौ हजार तक की थी। इनमें से २५ से ५. वर्ष तक की आयु के प्रौढ़ व्यक्ति के २... ऐसे छाँटे गये, जो विभिन्न व्यवसायों में संलग्न थे और विभिन्न परिस्थितियों में रह रहे थे। इनमें से २४ प्रतिशत ने बताया वे, अपनी वर्तमान स्थिति से पूर्ण सन्तुष्ट हैं। ४९ प्रतिशत बताया, हमें परिस्थितियों से कोई शिकायत नहीं है केवल ९९ प्रतिशत ही ऐसे थे, जो अपने को दुखी मानते थे और उसके लिए दूसरों को दोषी मानते थे। आश्चर्य यह था कि जिन लोगों ने अपने को बहुत खुश बताया, वे गुजर - बसर कर सकने जितने ही साधन जुटा पाते थे और स्त्री - बच्चों की अथवा सामाजिक सम्मान की दृष्टि से भी कुछ अच्छी स्थिति में नहीं थे। फिर भी वे मानते थे कि जो मिला है, वह उनके लिए पर्याप्त है। इसके विपरीत जो लोग अपने को अधिक दुखी अनुभव करते थे, वे इन बहुत खुश लोगों की तुलना में कहीं अधिक साधन सम्पन्न थे। मध्यवर्ती लोगों के सोचने का तरीका अलग था, वे कहते थे - जो आया है, सो रहा है, जो आवेगा, उसे देखा जाएगा। भगवान की दुनिया में जब इतने जीव अपना गुजारा कर ही रहे हैं, तो हमीं पर कौन पहाड़ टूट रहा है, जो छोटी-छोटी बातों के लिए अपनी शान्ति गंवाए।
शिक्षा और अशिक्षा का भी प्रसन्नता - अप्रसन्नता से कोई साधा सम्बन्ध नहीं है। यों पढ़ा - लिखा मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक कुशल और कमाऊ होता है और सलीका जानता है, पर इतने पर भी यह आवश्यक नहीं कि उसके सोचने का तरीका संतुलित ही है। चिड़चिड़े तुनकमिज़ाज, महत्त्वाकाँक्षी, बात - बात में शान के गिरने - उठने की सनक जिन पर चढ़ी रहती है, ऐसे अर्धविक्षिप्त लोग पढ़े - लिखों में ही अधिक पाये जाते हैं। अशिक्षितों में अतिभावुकता की बीमारी कम होती है, परिस्थितियों के साथ आसानी से तालमेल बिठा लेते हैं। अस्तु, उनका संतोष भी अक्षुण्ण बना रहता है। संसार के दीर्घजीवियों में अधिक संख्या बिना पढ़ों या कम पढ़ों की है, जिन पर बात- बात में मीनमेख निकालते हैं, उन्हें भय चिन्ता और आशंका से कभी मुक्ति नहीं मिलती। विपत्ति अब आई, तब आई। संकट ने अब खाया, तब मारा की बात सोचते - सोचते उनका आधा खून ऐसे ही सूख जाता है। विकृत भावुकता ही अनेक मनोविकारों के नासूर बनकर बहती है। कहना न होगा कि संगीत, साहित्य-कला के प्रेमी शिक्षित लोग ही बहुत करके बेतुकी भावुकता में अधिक गहराई तक धँसे फँसे पाये जाते हैं और दुख - दैन्य के, शोक - संताप के, असंतोष-उद्वेग के शिकार रहते हैं। उन्हें ही शारीरिक, मानसिक रोगों से अधिक ग्रसित पाया जाता है।
धनी - निर्धन, शिक्षित-अशिक्षित ही नहीं, स्वस्थ- अस्वस्थ और साधनों से सम्पन्न - विपन्न परिस्थितियों वाले व्यक्तियों में सामान्य मान्यता के अनुसार अंत होना चाहिए। सम्पन्नों को सुखी और विपन्नों को दुखी होना चाहिए। पर वस्तुतः ऐसा होता नहीं। मनुष्य के चिंतन का क्रम ही पूर्णतया असंतोष और सन्तोष का सृजन करता है और उसी के आधार पर लोग - प्रसन्न - अप्रसन्न पाये जाते हैं। अनेक झंझटों, शत्रुओं और संकटों के बावजूद कई व्यक्ति अपनी हँसी - खुशी यथावत बनाये रहते हैं। उलझनों को वे शतरंज अथवा टेनिस खेलने की तरह मानते हैं। हार और जीत दोनों का हलकी मुसकराहट के साथ स्वागत करते हैं और अगली पकड़ लड़ने के लिए वे अधिक उत्साह के साथ तत्परता प्रदर्शित करते हैं।
काम- सुख के सम्बन्ध में समझदार लोगों की राय यह पाई गई कि यह सबसे सस्ता और सुलभ साधन है। हाथ - पैर इधर - उधर हिलाये कि बस खुशी - ही - खुशी बिखर पड़ी। पर यह भी एक कला है, जो हँसी, खेल और क्रीड़ा विनोद की भावोत्तेजना में रस उत्पन्न करना जानते हैं, उन्हीं को काम - सुख का मर्मज्ञ कहना चाहिए। फूहड़ तो केवल जीवन - तत्व का क्षरण करते हुए मरण का अनुष्ठान ही रचते हैं।
कार्यरत रहने में जिन्हें रस मिलता है, काम को खेल की तरह करने की आदत जिन्होंने डाल ली है, उनके लिए वह हर घड़ी प्रसन्नता का उपहार देती है, पर जिन्हें काम को देखते ही डर लगती है और उससे जान बचाने की तरकीब ढूँढ़ते हैं, ऐसे आलसी और प्रमादी लोग खीजते है - कुड़कुड़ाते ही देखे जाते हैं। उन्हें थकान घेरे रहती है और साथ वालों पर खीज़ आती रहती है। ऐसे लोग असफल भी रहते हैं और दुखी भी होते हैं।
चिन्ता और खीज़ का सम्बन्ध, परिस्थितियों की विपन्नता से कम और सोचने के तरीके में विकृति भर जाने से अधिक होता है। बचकाने लोग तनिक-सी बात को तल का ताड़ बनाते हैं और भावी संकटों का विकराल रूप कल्पनाक्षेत्र में गढ़ते हैं। उन्हें डराने - सताने के लिए यह मनगढ़न्त ही पूरी चुड़ैल बन जाती है। इसके विपरीत जिन्हें साहस, धैर्य, और पुरुषार्थ का सहारा प्राप्त है, वे दुर्दिनों में भी अपनी आन्तरिक शान्ति अक्षुण्ण बनाये रहते हैं। प्रसन्नता - मनुष्य की आन्तरिक शालीनता की परिणति है। मस्त एक आदत है, जो न केवल अभ्यस्त व्यक्ति को सुखी बनाती है, वरन् उन्हें भी उत्साह प्रदान करती है, जो उस प्रसन्नचित्त मनुष्य के संपर्क में आते हैं। अन्य आदतों की तरह प्रसन्नता भी ऐसी ही है, जिसे हर कोई सतत् अभ्यास से सहज ही बढ़ा सकता है।
रूस के शरीरविज्ञानी इवान पन्नोविच पावलोव लंबे और स्वस्थ जीवन की संभावनाओं पर तीस वर्षों तक शोध - प्रयास में निरत रहे और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि कार्यव्यस्त दिनचर्या आदमी को सक्रिय और निरोग बनाये रहती है। उद्योगी मनुष्य सत्तर वर्ष की आयु तक भली प्रकार कार्यक्षम रह सकता है, किन्तु यदि उसे पचपन वर्ष की आयु में निवृत्त होकर ऐसे ही बैठे - ठाले दिन बिताने पड़े तो उसका स्वास्थ्य तेजी से गिरना शुरू हो जाएगा। कई तरह की बीमारियाँ उपजेंगी और मस्तिष्क में बेसिर-पैर की सनकें उठने लगेंगी। बुढ़ापा जरा - जीर्ण अवस्था का नाम नहीं वरन् उस मनः स्थिति का नाम है, जिसमें भविष्य के सम्बन्ध में उत्साहवर्द्धक सपने देखना बन्द हो जाता है और निराशा आकर घेरने लगती है। बुढ़ापे के सम्बन्ध में अक्सर हम यह सोचते हैं कि बुढ़ापा जीवन का एक ऐसा समय है जबकि मनुष्य आलसी, निष्क्रिय तथा अनुत्पादक हो जाता है। पर सत्य तो यह है कि संसार के कुछ सर्वोत्तम काम मनुष्य ने बुढ़ापे के उपद्रवों के बावजूद अपनी ढलती उम्र में ही सफलता के साथ किये हैं। इतिहास से उन सब बड़ी उपलब्धियों को यदि निकाल दिया जाए जो कि, मनुष्य ने साठ - सत्तर या अस्सी वर्ष की अवस्था में प्राप्त की तो दुनिया की इतनी बड़ी क्षति होगी, जिसकी पूर्ति नहीं हो सकेगी।
इस सन्दर्भ में पश्चिम एवं भारत के वे कुछ महान पुरुष उल्लेखनीय है, जिनकी रचनात्मक शक्ति का ह्रास उनकी ढलती उम्र के कारण कतई नहीं हुआ था और जिन्होंने अपने बुढ़ापे में बड़े महत्वपूर्ण एवं उपयोगी काम करके मानवता की अपूर्व सेवा की।
ऐसे महान पुरुषों में कुछ ये हैं -
महान दार्शनिक सन्त सुकरात, प्लेटो, पाइथागोरस, होमर, खगोल शास्त्री गैलीलियो, प्रसिद्ध कवि हेनरी, एडीसन, लेकर निकोलस कोपरनिकस, विख्यात वैज्ञानिक न्यूटन, सिसरोख्, अलबर्ट आइन्स्टीन, टेनसिन, बेंजामिन फ्रेंकलिन, महात्मा टॉलस्टाय, महात्मा गाँधी तथा जवाहर लाल नेहरू।
महात्मा सुकरात सत्तर वर्ष की उम्र में अपने अत्यन्त महत्वपूर्ण तत्त्वदर्शन की विशद व्याख्या करने में जुटे हुए थे। यही बात प्लेटों के सम्बन्ध में भी थी। वे अपनी अस्सी वर्ष की आयु तक बराबर कठोर परिश्रम करते रहे। इक्यासी वर्ष की अवस्था में हाथ में कलम पकड़े हुए उन्होंने मृत्यु का आलिंगन किया।
सिसरो ने अपनी मृत्यु के एक वर्ष पूर्व तिरेसठ वर्ष की आयु में अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘ ट्रीटजि आन ओल्ड एज’ की रचना की। केरो ने अस्सी साल की उम्र में ग्रीक भाषा सीखी कवि गोथे ने अपने जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि के रूप में अपनी महान रचना ‘ फास्ट’ के लिखने का कार्य तिरासी वर्ष की उम्र में मृत्यु के कुछ समय पहले ही पूरा किया था।
अलबर्ट आइन्स्टीन की तरह ही जो कि अन्तिम दिन तक बराबर काम करते रहे, सेमुअलमॉर्स ने टेलीग्राफ आविष्कार की अपनी प्रसिद्धि के बाद अपने को व्यस्त रखने के लिए अनेक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यों में लगाए रखा। बर्नार्डशा अपनी अन्तिम बीमारी तक लेखक के रूप में बहुत सक्रिय बने रहे। महात्मा टालस्टाय अस्सी वर्ष की अवस्था के बाद भी इतनी चुस्ती - गहराई और प्रभावशील ढंग से लिखते रहे कि उसकी बराबरी आधुनिक यूरोप के किसी लेखक द्वारा नहीं हो सकती। जेम्स माररिनिमू नब्बे वर्ष की आयु के बाद भी साहित्य रचना का कार्य करते हुए अपनी बड़ी पुस्तकों की भेंट दुनिया को दे गये।
व्हिक्टर ह्यूगो तिरासी वर्ष की अवधि में अपनी मृत्यु तक बराबर लिखते रहे। वृद्धावस्था उनकी अद्भुत शक्ति तथा ताजगी में कोई फर्क नहीं कर सकी।
टेनसिन ने अस्सी वर्ष की परिपक्व अवस्था में अपनी सुन्दर रचना ‘ क्रासिंग दी वार ‘ दुनिया को प्रदान की। रॉबर्ट ब्राउनिंग अपने जीवन के संध्याकाल में बहुत सक्रिय बने रहे। उन्होंने सतहत्तर साल की उम्र में मृत्यु के कुछ पहिले ही दो सर्वसुन्दर कविताएँ ‘रेभरी’ और ‘एपीलाग टू आसलेण्डो’ लिखी।
एच. जी. वेल्स ने सत्तर वर्ष की अपनी वर्षगाँठ के उपरांत भी पूरे भी पूरे चुस्त और कर्मठ रहते हुए एक दर्ज से ऊपर पुस्तकों की रचना की।
राजनीति के क्षेत्र में विन्सटन चर्चिल, बेंजामिन फ्रेंकलिन, डिजरैली, ग्लेड्स्टन आदि ऐतिहासिक पुरुष अपनी वृद्धावस्था की चुनौतियों के बावजूद बहुत सक्रिय बने हुए अपने देश की अमूल्य सेवा में अनवरत रूप से लगे रहे।
अभी हाल के इतिहास में महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू ऐसे महान पुरुष भारतवर्ष में हो गये हैं, जो अपनी वृद्धावस्था में अंतिम समय तक देश और पीड़ित मानवता की अटूट सेवा पूरी चुस्ती एवं शक्ति के साथ बराबर करते रहे।
ढलती उम्र की विशिष्ट उपलब्धियों एवं रचनात्मक कार्यों का श्रेय केवल पुरुषों तक ही सीमित नहीं है। महिलाओं का भी इसमें अपना पूरा हक है।
महारानी विक्टोरिया ने अपनी बहुत बड़ी जिम्मेदारियों को ब्यासी वर्ष की अवस्था तक कुशलता के साथ निभाया। मेरी समरभिले ने ब्यासी साल की आयु में परमाणु (मॉलेक्यूलर) तथा अणुवीक्षण यंत्र सम्बन्धी (माइक्रासकोपिकल) विज्ञान पर अपनी उपयोगी एवं बहुमूल्य रचना प्रकाशित की। मिसेज लूक्रेरिया मार सत्तासी वर्ष की उम्र तक महिलाओं को ऊपर उठाने तथा विश्वशान्ति के लिए अथक रूप में निस्वार्थ सेवाकार्यों में जुटी रहीं।
भारतवर्ष में श्रीमती सरोजिनी नायडू एवं मिसेज ऐनी बिसेन्ट ने अपनी वृद्धावस्था तक देश तथा मानवता की अमूल्य सेवाएं की, जलो कि चिरस्मरणीय रहेंगी।
इस तरह से सैकड़ों अन्य उदाहरण दुनिया के इतिहास से दिये जा सकते हैं, जिनसे यह विचार बिलकुल ही खोखला एवं तथ्यहीन साबित होता है जीवन के काम समाप्त हो जाते हैं और उसके बाद का समय अपने तथा समाज के हित में कोई उपयोगी एवं महत्वपूर्ण काम करने के लिए सक्षम नहीं होता है।
पैरिस की ८. वर्षीय महिला सान्द्रेवच्की पिछले दिनों सारवोन विश्वविद्यालय की विशिष्ट छात्रा थीं। उन्होंने ६. वर्ष पूर्व छोड़ी हुई अपनी कक्षा की पढ़ाई पर फिर आरम्भ की इस महिला के तीन पुत्र और सात नाती–नातिन और एक परनाती था। इस प्रकार वह परदादी बन गई थी, तो भी उसने जर्मन और अंग्रेजी भाषा पढ़ने के लिए उत्साह प्रदर्शित किया और विश्वविद्यालय में भरती हो गई। प्राचार्य को उसने भर्ती का कारण बताते हुए कहा - लंबे जीवन के अनुभवों के आधार पर मैं इस नतीजे पर पहुँची हूँ कि आदमी की मशीन लगातार चलते रहने पर ही वह काम करने लायक रह सकती है। उपयोगी काम में लगे रहने पर ही सामान्य स्वास्थ्य को स्थिर रखा जा सकता है। अध्ययन से मेरा मस्तिष्क और शरीर दोनों ही निरोग एवं उत्साह की स्थिति में रह सकेंगे।
बड़ी उम्र हो जाने पर भी मनुष्य के अरमान यदि मरे न हों तो वह बहुत कुछ कर सकता है। डारलिंगटन आइजक ब्रुक ७४ साल की उम्र में फौज में भरती हुआ और कई लड़ाइयाँ लड़ने पर भी सकुशल बचा रहा। अन्ततः वह ११२ वर्ष की उम्र में मरा।
अमेरिकन मेडिकल ऐसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. फ्रेडरिक श्वार्टज ने एक शोध प्रबन्ध प्रकाशित करते हुए कहा है - मनुष्य आयु या परिश्रम के कारण बूढ़े नहीं होते वरन् अपनी अन्यमनस्क, असामाजिक एवं एकाकी मनोवृत्ति के कारण टूटने और मरते हैं। आमतौर से लोग जब तक काम - धन्धे से लगे रहते हैं, तब तक स्वस्थ रहते हैं, किन्तु जैसे ही वे ठाली हो जाते हैं और निष्प्रयोजन दिन काटना आरंभ करते हैं, वैसे ही उन्हें सौ बीमारियाँ धर दबोचती हैं।
डॉ. फ्रेडरिक ने एक ८४ वर्ष के व्यापारी का विवरण लिखा है कि वह अपने कारोबार में सदा व्यस्त रहा और यह पता भी न चला कि उसे कोई बीमारी है, पर जब वह रिटायर हुआ तो डॉक्टरों ने बताया कि उसके शरीर में मुद्दतों पुरानी दसियों बीमारियाँ घुसी पड़ी हैं। जिनकी तरफ कभी उनका ध्यान तक नहीं गया था।
संसार के सबसे अधिक दीर्घजीवी मनुष्यों के सम्बन्ध में अनुसंधान करने वाले इतालवी विशेषज्ञ कार्लोसरतोरी का कथन है कि इस समय संसार में सबसे अधिक आयु वाली बोलोविया निवासी एक महिला है, जिसकी उम्र २.३ वर्ष है। इसके बाद एक सोवियत नागरिक का दूसरा नम्बर है - वह १९५ वर्ष का है। तीसरे नंबर पर ईरान का एक बूढ़ा है, जिसने १९. वर्ष पार कर लिये।
उपर्युक्त विशेषज्ञों ने दीर्घजीवन के अनेक कारणों में से प्रमुख संतुलित और निरंतर श्रम को बताया है। उसका कहना है कि लोग अधिक मेहनत के कारण उत्पन्न थकान से उतने नहीं मरते जितने कि हरामखोरी और कामचोरी कारण अल्प-आयु में मौत के शिकार होते हैं।
कार्नेल विश्वविद्यालय के प्राणिशास्त्री डॉ. एम. मैकके ने कुछ चूहों को भरपेट भोजन दिया और निश्चित रहने की सुविधा दी। वे तीव्र गति से वयस्क ओर मोटे - तगड़े तो हुए, पर ७३. दिन से अधिक न जी सके। इसके विपरीत उन्होंने कुछ चूहे ऐसे ही पाले, जिन्हें मात्रा कम, किन्तु पौष्टिक तत्व की दृष्टि से उपयुक्त भोजन दिया जाता था। वे उतने तगड़े तो नहीं हुए, पर फुर्तीले भी अधिक थे और जीवित भी प्रायः ड्योढ़े समय तक रहे, अपने प्रयोगों के आधार पर उनका निष्कर्ष मनुष्यों के सम्बन्ध में यह है कि कम कैलोरी का सादा और कम भोजन किया जाए तो मनुष्य आसानी से २५. वर्ष जीवित रह सकता है। इसी प्रकार विज्ञानी जॉर्ज आयसन का कथन है - आहार - विहार सम्बन्धी आदतों को सुधार लिया जाए तो सहज ही चिरस्थाई यौवन का आनन्द लिया जा सकता है।
अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ५. वर्षों की आयु से अधिक व्यक्तियों पर परीक्षण किये और यह पाया कि जब मनुष्य का सारा शरीर थक जाता है, तब भी मस्तिष्क नहीं थकता। दूषित जीवन - पद्धति के कारण किसी की ज्ञानशक्ति विक्षिप्त हो गई हो, वैसे थोड़े ही लोग पाये गये अधिकांश परीक्षणों से मनोवैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि आयु बढ़ने के साथ मानसिक शक्ति में किसी प्रकार का ह्रास नहीं होता, यदि होता है, तो वह कम मानसिक कार्य करने से होता है। मस्तिष्क को अधिक क्रियाशील रखने वालों की बौद्धिक शक्ति में अन्तर नहीं आता, शरीर भले ही थक जाता हो।
दीर्घजीवन सरल है ओर स्वाभाविक। उसके लिए किसी विशेष प्रयत्न या उपचार की आवश्यकता नहीं है। सुसंतुलित स्वास्थ्य और निरोग लंबे जीवन के लिए इतना ही पर्याप्त है कि मनुष्य अपने रहन - सहन और आहार - विहार को प्रकृति के अनुकूल, नियमित और व्यवस्थित रखे। मस्तिष्क को उद्विग्नता एवं आवेशों की आग से बचाये रहे। हँसता - हँसाता, हलका - फुलका और सीधा सरल जीवनक्रम जिसने अपनाया, उसे प्रकृति का सहज उपहार दीर्घजीवन - अनायास ही मिला है, हमें भी मिल सकता है।
मनुष्य की निजी आवश्यकताएँ और इच्छाएँ हैं। उनकी पूर्ति के लिए वह प्रयत्न करता है और प्रयत्न करने पर अभीष्ट की प्राप्ति भी होती है, पर वह जो कुछ पाता है, वह उसका अपना उपार्जन ही नहीं होता - उसे जुटाने में समाज का भारी योगदान रहता है। यदि वह न रहे तो एकाकी मनुष्य पेट भरने और तन ढँकने की आवश्यकता भी शायद ही पूरी कर पावे। बुद्धि तो उसमें बहुत है, पर शरीर इतना अशक्त है कि वह बिन दूसरों के सहयोग के अपनी बढ़ी - चढ़ी इच्छाओं की पूर्ति किसी भी प्रकार नहीं कर सकता। इस दृष्टि से वह अन्य जीवों की तुलना में काफी पिछड़ा हुआ है।
गाय, हिरन, लोमड़ी, खरगोश आदि के बच्चे जन्म लेने के कुछ ही देर बाद अपने पाँवों पर खड़े हो जाते हैं। माता का दूध अपने प्रयत्न से पीने लगते हैं ओर कुछ ही दिनों में चल - फिर कर घास आदि ढूँढ़ने और पेट भरने लगते हैं। मनुष्य के बच्चे में यह योग्यता बहुत वर्ष बीतने पर भी नहीं आती। माता दूध न पिलाये तो वह भूखा ही मर जाएगा। अपने पुरुषार्थ से माता को या उनके स्तन को ढूँढ़ने में समर्थ न होगा। सोने, खाने, नहाने, मल - मूत्र विसर्जन जैसे छोटे कामों के लिए भी बहुत दिनों तक उसे अपने अभिभावकों पर निर्भर रहना होता है। अपने पैरा पर खड़े होने की अपना गुजारा आप करने की योग्यता तो कहीं पन्द्रह-सोलह वर्षों में आती है।
आजीवन साथ रहने के लिए प्रस्तुत सुयोग्य पत्नी - मनुष्य का अपना उपार्जन नहीं होती। माँ - बाप उस लड़की को सुयोग्य बनाते ओर उदारतापूर्वक ब्याह कर देते हैं। यह सामाजिक योगदान है। अन्य प्राणी कामोद्देश्य के लिए क्षणिक दाम्पत्य - जीवन बनाते और बिछुड़ जाते हैं। मनुष्य को जो सुव्यवस्थित दाम्पत्य जीवन मिला है, उसमें समाज का अनुग्रह ही मुख्य है। भोजन के लिए अन्न, पहनने के लिए वस्त्र, निवास के लिए घर, शिक्षा के लिए विद्यालय, आजीविका के लिए उद्योग, यात्रा के लिए वाहन, बीमारी के लिए दवा, क्या यह सब उपलब्धियाँ मनुष्य की निजी कमाई हैं, यदि समाज सहयोग प्राप्त न हो तो कितना ही परिश्रम करके उस स्तर की वस्तुएँ प्राप्त नहीं हो सकतीं, जितनी कि हम में से प्रत्येक मिलती हैं। बोलना, लिखना, पढ़ना जो मनुष्य ने सीखा है, उसमें माँ - संगी- साथियों का ही नहीं, असंख्य पीढ़ी के पूर्वजों को योगदान है। सामाजिक, शासकीय, वैज्ञानिक, बौद्धिक सुविधाओं में जो असाधारण लाभ प्राप्त किया जा सका है ओर जिनके बल पर मनुष्य सृष्टि का मुकुटमणि बना है, वह सब कुछ एक प्रकार से समाज का ही अनुदान है। निजी पुरुषार्थ तो उन उपलब्धियों में नगण्य ही समझा जाना चाहिए।
जिस समाज का इतना उपकार और अनुदान लेकर मनुष्य सुख-सुविधाएँ प्राप्त करता है, उसका वह ऋणी है। इस ऋण को चुकाना कृतज्ञता की, प्रत्युपकार की ओर सामाजिक श्रृंखला - परम्परा बनाये रखने की दृष्टि नितान्त आवश्यक है। यदि लोग समाज के कोष से लेते तो रहें, पर उसका भण्डार भरने की बात न सोचें तो वह सामूहिक कोष खाली हो जाएगा। समाज खोखला ओर दुर्बल हो जाएगा, उसमें व्यक्तियों की सुविधा बढ़ाने एवं सहायता करने की क्षमता न रहेगी। फलतः मानवीय प्रगति का पथ अवरुद्ध हो जाएगा। प्राप्त तो करें, पर उसे लौटाए नहीं की नीति अपना ली जाए तो बैंक दिवालिये हो जाएँगे, सरकार खोखली रह जाएगी, जमीन का उपार्जन बन्द हो जाएगा, व्यापार की श्रृंखला ही बिगड़ जाएगी। इस संसार में लो और दो की नीति पर सारी व्यवस्था चल रही है। लो के लिए इंकार की परंपरा यदि चल पड़े तो सारा क्रम ही उलट जाएगा, तब हमें असामाजिक आदिम−युग की ओर वापस लौटना पड़ेगा।
मनुष्य की बुद्धि और श्रमशीलता का आधा भाग, और आधा भाग सामाजिक अनुदान का माना गया है। तदनुसार तत्त्वदर्शियों ने यह व्यवस्था बनाई है कि उसे अपनी जीवनसम्पदा का आधार भाग अपनी शरीरयात्रा के लिए रखना चाहिए और आधा सामाजिक उत्कर्ष के लिए लगा देना चाहिए। पेट भरना, तन ढँकना, निवास, शिक्षा, चिकित्सा, गृहस्थ, उपार्जन, मनोरंजन आदि वैयक्तिक सुविधा - साधनों के लिए उसकी क्षमता का आधे से अधिक भाग खर्च न होना चाहिए। आधा तो समाज- सेवा के लिए सुरक्षित ही रहना चाहिए।
आश्रम धर्म की व्यवस्था भारतीय संस्कृति में इसी दृष्टि से की गयी है। आयुष्य का एक - चौथाई भाग खेल-कूद तथा ज्ञान और शरीर की वृद्धि के लिए यह ब्रह्मचर्य हुआ, एक - चौथाई विवाह, संतान, परिवार, उपार्जन, यश-वैभव मनोरंजन आदि के लिए यह गृहस्थ हुआ। इतना भाग निजी सुख-सुविधा के लिए है। शेष आधार वानप्रस्थ और संन्यास के रूप में लोकमंगल के लिए आत्मिक उत्कृष्टता अभिवर्द्धन के लिए नियुक्त होना चाहिए। जीवन - सम्पदा का यही श्रेष्ठतम विभाजन है। भारतीय धर्म और संस्कृति की यह एक अति-महत्वपूर्ण व्यवस्था है, जिस पर उसकी महान सामाजिक व्यवस्था की आदर्श परिपाटी निर्भर रही है।
सामाजिक उत्कृष्टताओं के अभिवर्द्धन, सत्परंपराओं के संचालन और विकृतियों के निवारण के लिए निरन्तर प्रयत्न किया जाना आवश्यक है। यह प्रयोजन सुयोग्य, अनुभवी और निस्पृह लोगों के द्वारा ही पूरा हो सकता है। अनेक सत्प्रवृत्तियों के गतिशील रहने से ही समाज की श्रेष्ठता और महानता सुदृढ़ रह सकती है। इस कार्य के लिए ढलती आयु के व्यक्तियों को अपना जीवन समर्पित करना चाहिए। उसे उदारता, दान, परमार्थ, धर्म, पुण्य कुछ भी कहा जा सकता है। ऋण चुकाना या कर्तव्यमान भी इसे कह सकते हैं। कहा कुछ भी जाए, यह है नितान्त आवश्यक। यह परंपरा चलते रहने से ही सुयोग्य समाजसेवियों की आवश्यकता पूरी हो सकती है और सामाजिक महानता अक्षुण्ण रह सकी है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी को शास्त्र-मर्यादा या ईश्वरीय - आज्ञा के रूप में ढलती आयु में वानप्रस्थ ग्रहण करके अपना श्रम, समय और मनोयोग लोककल्याण के लिए लगाने का निर्देश किया गया है।
शास्त्रकारों ओर आप्तपुरुषों ने पग-पग पर इस परंपरा के पालन का निर्देश किया है। धर्मग्रन्थों में हर जगह इसी प्रकार के निर्देश की भरमार है।
गृहस्थथस्तु यदा पश्येद्वलीपलितमात्मनः। अपतयस्यैव चापत्यं पदाऽरण्यं समाश्रयेत्। (शंखस्मृति)
जब गृहस्थ का भार बड़ा लड़का संभाल ले, बाल सफेद होने लगें, तब मनुष्य को वानप्रस्थ में प्रवेश करना चाहिए।
उर्षित्वैव गृहे विप्रोद्वितीयादाश्रमात् परम। वलीपलतिसंयुक्तस्तृतीयन्तु समाश्रयेत॥ (संवर्त स्मृति १७)
जब गृहस्थ पालन करने के उपरांत चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ जाएँ, बाल सफेद होने लगे तो तीसरेपन में वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहिए।
एवं वनाश्रमे तिष्ठन् पातयंश्चैव किल्विषम्। चतुर्थमाश्रमं गच्छेत् संन्यासबिधिना द्विजः॥ (हरीत स्मृति ६, १२)
गृहस्थ के बाद वानप्रस्थ ग्रहण करना चाहिए। इससे समस्त मनोविकार दूर होते हैं और वह निर्मलता आती है, जो संन्यास के लिए आवश्यक है।
महर्षिपितृदेवानाँ गत्वऽऽनृण्यं यथाविधि। पुत्रे सर्व समासज्य वसेन्माध्यस्थ्यमास्थितः॥ (मनु. ४/२५७)
ढलती आयु में पुत्र को गृहस्थ का उत्तरदायित्व सौंप दे। वानप्रस्थ ग्रहण करे और देव, पितर तथा ऋषियों का ऋण चुकावे।
उत्पाद्य पुत्राननृणाँश्च कृत्वावृत्तिं च तेभ्योऽनुविधाय काँचित्। स्थाने कुमारीः प्रतिपाद्य सर्वा अरण्यसंस्थोऽथ मुनिर्बुभूषेत्॥ (महा, उद्योग ३७/३९)
पुत्रों को उत्पन्न कर उन्हें ऋण के भार से मुक्त करके उनके लिए किसी जीविका का प्रबन्ध कर दें, अपनी सभी कन्याओं का योग्य वर के साथ विवाह कर दे तत्पश्चात् वन में मुनिवृत्ति से रहने की इच्छा करे।
दूरदर्शिता ओर बुद्धिमत्ता इसमें है कि संतान के समर्थ होने पर अपने शरीर के क्षरण पर भी विचार करे और ढलती आयु में वानप्रस्थ ग्रहण करे। आत्मशुद्धि के लिए यह कदम बढ़ाना आवश्यक है। पापों का शोधन, ऋणों से मुक्ति और आत्म-कल्याण का प्रयोजन पूरा करने के लिए वानप्रस्थ ग्रहण करना ही चाहिए।
गृहस्थः पुत्रपौत्रादीन् दृष्टवा पलितात्मनः। भार्य्यो पुत्रेषु निः निक्षिप्य सहवा प्रविशेद्वनम्॥
तपो हि यः सेवति वन्यवासः समाधियुक्तः प्रयन्तारात्मा। विमुवतपापो विमलः प्रशान्तः स याति दिव्यं पुरुषं पुराणम्॥ (हरीत स्मृति)
जब बाल सफेद होने लगे और पुत्र घर संभालने योग्य हो जाए तो वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहिए। ढलती आयु में तपश्चर्या आरंभ कर देनी चाहिए। इससे पाप और ऋण घुलते हैं, आत्मा को शान्ति मिलती है और दिव्य पुरुष की स्थिति प्राप्त होती है।
वयः परिणतों राजन्कृतकृत्यो गृहाश्रमी। पुत्रेषु भार्या निक्षिप्य वनं गच्छेत्सहैव वा॥ १८ (विष्णु पुराण)
जब गृहस्थ धर्म का पालन करते - करते अवस्था ढल जाए, तब अपनी स्त्री के पालन का भार पुत्रों को सौंप या उसे भी अपने साथ लेकर वन को प्रस्थान करें।
अथ जनको हवैदेही याज्ञवल्क्य- अथ जनको हवैदेही याज्ञवल्क्य-
मुपसमेत्योवाच। भगवनसंन्यासम- नुबूहीति। स होवाच याज्ञवल्यो ब्रह्मचर्य समाप्य गृही भवेत। गृही भूत्वावी भवेत् वनी भूत्वा प्रव्रजेत। (जाबालोपनिषत् 31/1)
एक दिन राजा जनक महर्षि याज्ञवल्क्य के पास गये और कहा - भगवन् संन्यास की शिक्षा दीजिए। इस आश्रम, फिर गृहस्थाश्रम इसके बाद वानप्रस्थ होना चाहिए, इसके उपरांत ही संन्यास है।
जब तक इस वानप्रस्थ परंपरा का निर्वाह भारतीय समाज में ठीक तरह होता रहा, तब तक यहाँ की सामाजिक स्थिति अति उच्चकोटि की बनी रही और उससे प्रभावित होकर घर-घर में नर- रत्न उत्पन्न होते रहे, जिन्होंने समस्त विश्व में श्रेष्ठता की मर्यादाओं को स्थापित करने में महान योगदान दिया। जब से संकीर्ण और स्वार्थी होते चले गये, समाज का ऋणभार लेने की निर्लज्जता अपना बैठे, मरते समय तक पैसा और बेटे - पोतों की बात सोचने वाले क्षुद्रस्तर पर आ गये, फिर समाज को सुयोग्य और निस्वार्थ प्रतिभाएँ मिलती ही कहाँ और उनके बिना सामाजिक स्तर ऊँचा रहता ही कैसे? इस अभाव की पूर्ति के बिना कोई राष्ट्र और समाज प्रखर और महान रह ही नहीं सकता।
इस अभाव की पूर्ति की जानी चाहिए। जनसाधारण का दृष्टिकोण बदला जाना चाहिए। सारा जीवन पैसे और परिवार के लिए ही लगाया जाना सामाजिक अपराध घोषित किया जाना चाहिए। हर व्यक्ति को यह अनुभव करना चाहिए कि आधा जीवन गौ-ग्रास है। वह समाजसेवा की अवधि है। उसका अपहरण करके निजी सम्पदा पढ़ते रहना, पोतों की टहल - चाकरी करते रहना गौ के मुख से ग्रास को छीनने के बराबर है, जो कि एक महापाप है।
८ - ४ - ७४ कुंभ के अवसर पर दिये गये प्रवचन (जून, १९९८) की दूसरी किश्त
मित्रों, हम आपको नेता बनाकर नहीं भेज रहें हैं हम तो आपको कार्यकर्ता और ज्ञानी बनाकर भेज रहें हैं। वॉलेन्टियर की तरह। जहाँ कही भी जाएँ और जो कोई भी कार्य करें, वॉलेन्टियर के रूप में करे। आप उस तरीके से करना, जिस तरीके से हाथ से काम करना सिखाया जाता है। सर्जन अपने आप करके स्वयं दिखाता है और कहता है कि तुमको पेट का आपरेशन करना हो तो देख लो एक बार फिर, भूलना मत। तुम्हारा मुँह इधर होगा तो आपरेशन करना नहीं आएगा। देखो हम पेट को चीरकर दिखाते हैं - ये देखो- ये निकाल दिया और ये सिल दिया और ये बाँध दिया देखो फिर ध्यान रखना और ऐसे मत करना कि पेट का आपरेशन किसी का करना पड़े और कहीं का वाला कहीं कर दो और कहीं का वाला कही कर दो। आपको हर काम स्वयं करने के लिए स्वयंसेवी कार्यकर्ता के रूप में जाना है। आपको किसी का मार्गदर्शक होकर के या किसी का गुरु हो करके या किसी का नेता हो करके नहीं जाना है। दीवारों पर जब वाक्य लिखने की जरूरत पड़ तो आप स्वयं डिब्बा लेना और कहना चल भाई मोहन, अरे तूने इस बता के लिए मना किया, अब मैं लिखकर दिखाता हूँ कि किस तरह से अच्छे तरीके से वाक्य लिखा जाता है, चल तो सही मेरे साथ। अपने साथ आप ले करके चले जाएँगे। अरे वानप्रस्थी जी साहब! आप वहाँ से आए हैं, आप तो गुरुजी वहाँ बैठो, हम बच्चे लिख लेंगे वाक्य। बेटा, बच्चे लिख लेंगे, तो हम साथ-साथ चल देख हम साफ-साफ लिखकर दिखाते हैं। जब आप आगे-आगे चलेंगे, तो ढेरों आदमी आपके साथ चलेंगे, आपकी लिखने वाली बात, अमुक बात और अमुक बात, आसानी से होती हुई चली जाएगी।
परन्तु जब आप पीछे जा बैठेंगे तब, तब लोग हमसे शिकायत करेंगे और कहेंगे कि गुरुजी ने ऐसे लोगों को हमारे पास भेज दिया। चलते तो हैं ही नहीं, सुनते तो हैं, कुछ करते तो हैं ही नहीं। हुकुम चलाना भर आता है। बेटे उनके ऊपर चलाने करे लिए आपको नहीं भेजा है। हमने तो आपको मार्गदर्शन करने के लिए भेजा है। वॉलेन्टियर के रूप में भेजा और सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में भेजा है। जो बात आपको नहीं आती है, वह काम आपको करने चाहिए। उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलना, आगे-आगे बढ़ना चाहिए। जहाँ ये समस्या है लोगों के लिए कि जनता कही भी नहीं आती है, यह आप ध्यान रखना। जनता बहुत खीझी हुई है और बहुत झल्लाई हुई है। उसने ढेरों - के -ढेरों व्याख्यान सुने हैं और व्याख्यान सुनने के बाद में यह भी देखा है कि जो आदमी व्याख्यान दिया करते हैं, रामायण पढ़ा करते हैं, गीता पढ़ा करते है, कैसे - कैसे वाहियात आदमी हैं और कैसे बेअकल आदमी हैं।
व्याख्यान देने वालों की जिन्दगी, उनके स्वरूप और उनके क्रिया−कलाप का फर्क, आवाज का फर्क लोगों ने जाना है। लोगों ने जाना है कि जब संत का बाना ओढ़ लेता है, तो क्या कहता है और जब रामायण पढ़ता है तो कैसे - कैसे उपदेश दिया करता है और जब मकान पर आ जाता है, घर पर आ जाता है तो उसके क्रिया−कलाप क्या होते हैं? लोगों ने जान लिया है और समझ लिया है कि लेक्चर झाड़ना एक धंधा बना गया है। उसमें कोई दम नहीं और कोई अकल नहीं।
मित्रों, क्या करना पड़ेगा? आपको वहाँ जाने के बाद में सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में, एक मार्गदर्शक के रूप में आपको रहना पड़ेगा। जनता अभी आपके पास नहीं आने वाली। वह सहज रूप से नहीं आयेगी। जनता को निमंत्रण देने के लिए आपको स्वयं ही खड़ा होना पड़ेगा। जनता अब नहीं आयेगी, आप ध्यान रखना। जनता बहुत झल्लाई हुई है। जनता पर बहुत रोष छाया हुआ है। संतों के प्रति अविश्वास, नेताओं के प्रति अविश्वास, वक्ताओं के प्रति अविश्वास, सभा - संस्था वालों के प्रति अविश्वास हरेक के प्रति अविश्वास हर आदमी को है। इस जमाने में जब हरेक के प्रति अविश्वास छाया हुआ है। बड़े - बड़े मिनिस्टर आते हैं, तो दो सो आदमी भी नहीं आते। कान में जाकर के. डी. ओ. के डालना पड़ता है और बोर्ड का अध्यक्ष मास्टरों को बुला करके कहना है कि अच्छा भाई कल की छुट्टी है, कल के लिए लीजिए रेनी-डे लिखे देते हैं - वर्षा का दिन ओर कल सब स्कूलों की छुट्टी है। सब बच्चों को और सब मास्टर लोगों को लेकर के वहाँ पर विक्टोरिया पार्क में सब जने ४ बजे तक इकठ्ठा हो जाना ताकि उनको ये मालूम पड़े कि जनता बहुत आई है।
उसमें से कौन होता है? किसमें? व्याख्यान करने वालों में। व्याख्यान करने वालों में तलाश करना कि जब कोई नेता आता है तो सुनने वाले कौन होते हैं? आप एक - एक की पहचान करना कि जो व्याख्यान सुनने आये हैं, इसमें जनता वाले कितने थे और स्कूल वाले कितने थे। आपको ये मालूम पड़ता कि सफेद कुर्ता पहने हुए आगे वाले तो सिपाही बैठे हैं। जो वर्दी को तो उतार आए हैं और मामूली कपड़ा, मामूली पैन्ट कमीज पहने हुए हैं। आगे तो ये लोग बैठे हुए हैं। ताली बजाने वालों में कौन बैठे हुए हैं। मास्टर लोग बैठे हुए हैं, पुलिस के सिपाही बैठे हुए हैं। ताली बजाने वालों में और कौन बैठे हुए हैं? ये बैठे हैं और वो बैठे हैं। जनता को आप तलाश करेंगे तो मुश्किल से पचास आदमी आपको नहीं मिलेंगे। क्यों नहीं मिलते हैं? गाँधी जी की सभा में लोग आते थे और नेहरू की सभा में जाते थे, लेकिन अब सभा में लोग क्यों नहीं आते, क्योंकि नफरत छा गई है? नफरत इसलिए छा गई है कि सिखाने वाले और कहने वाले में अब जमीन - आसमान की फर्क है। इसलिए इनकी बात नहीं सुनेंगे, जरूरी हुआ तो अख़बार में क्यों नहीं पढ़ लेंगे। इन्हें सुनने में हम अपना टाइम क्यों खराब करेंगे? धक्के क्यों खाएँगे? इसलिए यह भी एक प्रश्न आपको हल करना पड़ेगा कि जिन बेचारों ने अपना आयोजन करके रखा है - पन्द्रह दिन का और दस दिन का वहाँ किस तरह से जनता को बुलाया जाए ताकि हमारे विचार और हमारी प्रेरणा, हमारे प्रकाश को फैलाने के लिए वे इतना महत्व दें, जिसके लिए मेहनत करने भेज रहे हैं आपको। जनता को बुलाने के लिए आपको ही आगे - आगे बढ़ना होगा।
मित्रो, शुरू के ही दिन में मैंने आपको यह सब बता दिया था। जनता को अब हम व्यक्तिगत रूप से निमंत्रण दे सकते हैं। पीले चावल ले करके जाना। घर-घर में जाना निमंत्रण देने के लिए और कहना कि मथुरा वाले गुरुजी को आप जानते हैं क्या? गुरुजी को, हाँ जानते हैं, तो उन्होंने एक बात कह करके भेजी है, आपके लिए कुछ खास संदेश भेजा है। आपके लिए कुछ अलग शिक्षाएँ भेजी हैं। कुछ अलग से संदेश भेजा है। जिसे आपको सुनने के लिए जरूर आना पड़ेगा शाम को। इस तरह से एक घर में, दो घर में तीन घर में आप स्वयं जाना और वहाँ के कार्यकर्ताओं को ले करके जाना, टोलियाँ बनाना और निमंत्रण देने के लिए जाना - निमंत्रण देने के लिए व्यक्तिगत संपर्क बनाने वाली बात करनी चाहिए।
एक बात और भी है कि इश्तहारों से आप किसी को नहीं बुला सकते और लाउडस्पीकर पर तो सिनेमा वाले और बीड़ी वाले चिल्लाते हैं। लाउडस्पीकर आप भी लेकर चले जाइये और कहिए- प्यारे भाइयों, शाम को साढ़े छह बजे आना, वानप्रस्थी लोग शान्तिकुञ्ज से आये हैं, प्रवचन करेंगे। तब आप में और बीड़ी वालों में कोई फर्क नहीं होगा। सभी बीड़ी वाले चिल्लाते हैं कि सत्ताईस नम्बर की बीड़ी भाइयों, पिया करो, सत्ताईस नम्बर पिया करो। फिल्मिस्तानी भाई और बीड़ी वाले भाई और गुरुजी के वनस्पतियों में फिर क्या फर्क रह गया है? माइक, इसकी कोई कीमत नहीं, कहाँ कोई इसे सुनने को आते हैं, कान बन्द कर लेता है। बोल - बोलकर माँगकर चला जाएगा। इस माइक की बात कोई नहीं सुनता। इशारों की बात, इश्तहारों की बात नहीं सुनी लोगों ने, पर जब हमको जनता को बुलाना है तो उसको बुलाने के लिए स्वयं ही आपको निकलना पड़ेगा, कार्यकर्ताओं को लेकर के अपने साथ - साथ। कार्यकर्ता को साथ लेकर आपको चलना पड़ेगा।
हमारी जनता को निमंत्रित करने की शैली अलग है। कार्यकर्ता के रूप में जब आप गायत्री तपोभूमि, मथुरा जाएँगे तो आपमें से हर आदमी के हाथ में एक शंख थमा दिया जाएगा। मान लीजिए, आप साठ आदमी हैं और उनमें से चालीस व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें कहाँ जाना है? शाखाओं में जाना है तो चालीसों के हाथ में एक शंख थमा दिया जाएगा और मथुरा में शंख बजाते हुए जब आप मथुरा शहर के बाज़ार में निकलेंगे तो देखना ताँगे वाले खड़े हो जाएँगे और कहेंगे कि अरे देखो तो सही, ये कौन आ गया? चालीस शंख बजाते हुए और पीले कपड़े पहने हुए, झंडा लिए हुए और एक नए बाबाजी के रूप में, एक नये क्रान्तिकारी के रूप में, एक नये व्याख्यानदाता के रूप में जब जाएँगे तो क्रान्ति मच जाएगी। बैंड बाजे बजते हुए सबने देखे हैं, पर चालीस शंख एक साथ बजते हुए किसी ने नहीं देख आज तक। चालीस शंख कैसे बजते हैं? आपको मालूम नहीं। चालीस शंखों की आवाज जब एक साथ बजती है तो कान कैसे काँपते हैं, नवीनता कैसे मालूम पड़ती है? ये शैली आपको गायत्री तपोभूमि सिखाएगा। जब आप जहाँ कही भी जाए तो स्थानीय कार्यकर्ता को ले करके चलना। छोटे - से गाँव में भी आपको सम्मेलन करना है, सभा करनी है, ये शैली तो आपको अख़्तियार करनी ही पड़ेगी। यूँ मत कहना कि मैं बैठा हूँ और तू चला जा। सारी जनता को तो बुलाया नहीं, हमें क्यों लिया। हमारे लिए क्यों सभा की। हम तो बेकार आ गए। अरे बेकार क्यों आ गए बाबा, तुम्हें तो काम सिखाने के लिए भेजा है, चलो हमारे साथ। आगे - आगे शंख ले करके चलना आप गाँव के मंदिरों से, सब पंडितों के यहाँ से, सत्यनारायण कथा कहने वालों के यहाँ से, सभी संतों को जमा कर लेना और जितने भी कार्यकर्ता हैं सबको लेकर के ही शंख बजाते हुए चलना। घंटियाँ बजाते हुए चलना।
मित्रों, आपको चलना पड़ेगा, जनता को आमंत्रित करना पड़ेगा, यह सब आपको ही करना पड़ेगा। आप ही नाचे, आप ही गावे, मनवा ताल बजावे, तीन-चार लोग गा रहे थे। जब मैंने सुना तो बहुत अच्छा लगा। आपको क्या करना पड़ेगा? स्टेज पर व्याख्यान भी आपको देना पड़ेगा और दीवारों पर वाक्य भी आपको लिखने पड़ेंगे। जनता को निमंत्रित करने से लेकर आपको आगे - आगे भी चलना पड़ेगा। निमंत्रण देने जाएँगे तो भी आपको आगे - आगे चलना पड़ेगा। हमारे प्रातः कालीन शिविर बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसमें हमारे कार्यकर्ता जिनकी कि लाखों की संख्या है, बना करके तैयार किये गये हैं। अब उनमें प्रेरणा भरना बाकी है, हवा भरना बाकी है। गुब्बारे बने हुए रखे हैं। हवा भरनी है, ये साइकिल के ट्यूब भी तो बने रखे हैं। एक - एक खराब हो गया है, जो इनके बाह्य ट्यूब हैं, वो लीक करने लगे हैं। ये डनलप के ट्यूब हैं ये अमुक के ट्यूब हैं। ये बढ़िया वाले ट्यूब हैं। खराबी कहीं भी नहीं आयेगी। हवा भरने वाला नहीं आया जिसकी वजह से इनका उत्साह ठंडा पड़ गया और इनका जोश ठंडा पड़ गया। आपको इन लोगों में हवा भरनी पड़ेगी और जोश भरना पड़ेगा। प्रातः कालीन वाले, शाम को तो यह भी होता है कि संगीत बजता है और गाना बजता है। शाम को तो वैसे तमाशबीन लोग रहते हैं, प्रातःकालीन शिविर वाले जो आपके हैं, उसमें संभव है कि प्राणवान लोग न आएँ। उसके लिए आपको स्वयं उनके पास तक जाना पड़ेगा। जहाँ कहीं भी, जिस भी शाखा में आप जाएँगे, वहाँ पर आपको सौ-पचास आदमी जरूर ऐसे मिलेंगे, जिनके पास अखण्ड - ज्योति पत्रिका जाती होगी और युग-निर्माण पत्रिका जाती होगी। ध्यान रखना है कि ये शिविर और शाख वहाँ हों, जहाँ पर कम से कम सौ पाठक ऐसे हो हमारी अखण्ड - ज्योति के जरूर आयें। सौ पाठक वहाँ होंगे जहाँ हमारी पत्रिका १.. की तादाद में नहीं भेजी जाती होगी। वहाँ तो हमने शिविर की व्यवस्था ही नहीं की है। वहाँ तो हमने मंजूरी ही नहीं दी है और ये देखा है कि यहाँ पर पहले से भी स्टेज है क्या? पहले से भी जानकारी है क्या? ये लोग शिविर चला सकते हैं क्या? आप उन सौ आदमियों की लिस्ट माँगना कार्यकर्ताओं से या फिर आप गायत्री तपोभूमि चले जाना और पता करना कि कौन - कौन आदमी हैं, जो हमारी अखण्ड-ज्योति मंगाते हैं, युग-निर्माण मंगाते हैं। आप उन सबके पास बजाय इसके कि तू जाना- तू जाना आप स्वयं ही जाना वहाँ के आदमियों को लेकर के और लिस्ट पर निशान लगाते चले जाना। जिस दिन से आपका आयोजन होगा उससे तीन दिन पहले हम आपको भेजते हैं। पन्द्रह दिन के आयोजन रखते हैं। दस दिन के आयोजन हैं, पाँच दिन आपको फालतू के मिलते हैं। हमने आपको तैयारी करने लिए भेजा है, जिससे आप दो दिन की व्यवस्था बनाकर तब आगे बढ़े। पंद्रह दिन का शिविर आपके लिए है। दस दिन का शिविर शाखा के लिए है। शाखा वालों को जो क्रिया-कलाप करना पड़ेगा, वह केवल १. दिन हैं। पन्द्रह दिन तो आपकी निभ जाए। जब भी पहुँचे, जिस दिन पहुँचे, वहाँ के स्थानीय कार्यकर्ताओं की लिस्ट ले करके आप निकल जाइये, पूछिए आपके पास आती है अखण्ड - ज्योति? हाँ हमारे यहाँ तो आती है। आपको लेख पसन्द आते हैं? हाँ आते हैं। आप गुरुजी से सहमत हैं? हाँ साहब सहमत हैं। हम तो खुद पढ़ते हैं और दूसरों को पढ़ाते हैं। अच्छा तो यह हम गुरुजी का संदेश लेकर के आये हैं और प्रेरणा ले करके और शिक्षा लेकर आये हैं, खासतौर से आपके लिए ले करके आये हैं। इस तरह से आप इनसे कहना कि आपको हमारे प्रातःकालीन शिविरों में जरूर सम्मिलित होना चाहिए। गुरुजी ने हमें अपने सभी कार्यकर्ताओं को यह संदेश आपसे कहने भेजा है। आपको जरूर आना है। हाँ साहब, हम जरूर आयेंगे। कल हमको भी जरूर आना है। सबेरे याद रख लीजिए ओर देख लीजिए इसमें से कौन - कौन आये और कौन -कौन नहीं आये। सायंकाल को आपको यदि फिर समय मिल जाए तो जो लोग नहीं आये थे, उनके पास शाम को जा पहुँचें और कहें साहब, हम तो आपका इंतजार ही करते रहे। गुरुजी ने देखिए कहा था और हमने लाल रंग का टिकमार्क पहले ही लगा दिया था कि इनको जरूर बुलाना और और देखिए आपके पास नाम पर टिकमार्क लगा हुआ है आप ही नहीं आये। ये क्या हुआ? अच्छा तो कुछ काम लग गया होगा? हाँ साहब, आज तो बहुत काम लग गया था, संध्या से जुकाम हो गया था। कल तक तो जुकाम आपका अच्छा हो जाएगा, तो देखो कल जरूर आना। ये टिकमार्क-लाल स्याही का निशान हमें गुरुजी के दिखाना पड़ेगा। आप नहीं आये तो खराब बात होगी। साहब, हम तो जरूर आयेंगे। गुरुजी से कहना कि उनके विचारों को सब सुनने को आयेंगे। कल सुबह फिर बुलाना। एक-एक आदमी आपको जरूर जमा करना पड़ेगा। यह जिम्मेदार उठाने के लिए स्वयं तैयार होकर जाइये।
गुरुजी, यह कार्य तो वहाँ के कार्यकर्ता या अन्य लोग मिलकर सारी व्यवस्था कर लेंगे। यदि वे लोग कर लेते तो मित्रों हम नहीं भेजते आपको। ये काम वो नहीं कर सकते। यह टेकनिक उनको नहीं मालूम हैं। यह आपको मालूम है, इसीलिए वहाँ जाकर के सबसे आगे वाली लाइन में आप खड़े हुए दिखाई पड़ेंगे। खाना बनाने से ले करके सफाई करने तक और शिविर की यज्ञशाला में पत्तियाँ लगाने से लेकर यज्ञशाला का स्वरूप बनाने तक, आपको आगे-आगे बढ़ना चाहिए। आपने यह कह दिया। ओर यार, यह कैसा कुंड बना दिया ऐसे बनते हैं कहीं। तुम तो कैसे कह रहे थे- हम शाखा चलाते हैं। ये तुमने कुंड बना दिया और वेदी बना दी ये सभी कोई तरीका है। ऐसे भी कहीं कुंड बनाते हैं क्या? कुंड ऐसे बनने चाहिए थे। तो आप कहाँ चले गये थे? अख़बार पढ़ रहे थे, अख़बार पढ़ने के लिए आये थे या सामाजिक सहायता करने के लिए आए थे। आपको हम विशुद्ध रूप से कार्यकर्ता बना करके भेजते हैं, नेता बनाकर नहीं। नेता हम आपको नहीं बना सकते। किसी को भी नेता बनाकर हम नहीं भेजेंगे। हर आदमी को कार्यकर्ता ‘सिन्सियर वॉलेन्टियर बना करके भेजेंगे। उस आदमी को भेजेंगे जो काम करने के लिए स्वयं आगे- आगे बढ़े और दूसरों को साथ लेकर चले! आपको व्यक्तित्व अलग नहीं होना चाहिए।
आपकी सबेरे से लेकर सायंकाल तक ही दिनचर्या जो होनी चाहिए, ऐसी होनी चाहिए जिससे कि दूसरा आदमी अपनी दिनचर्या को सही करे। आपके सोने का समय, उठने का समय और जगने का समय क्रमबद्ध होना चाहिए। प्रातःकाल आपको देर से नहीं उठना चाहिए। संध्या आप करते हैं कि नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन नहीं करते तो भी आपको करना चाहिए। यहाँ आपने कितना भजन किया या नहीं किया, आप जानें, आपका काम जाने पर वहाँ जहाँ कहीं भी हम भेजते हैं, हम इसलिए भेजते हैं कि हर आदमी को हम उपासक बनाएँगे और गायत्री की उपासना सिखायेंगे और निष्ठा कना सिखायेंगे। अगर आपकी देखा-देखी यही ढीलम-पोल कार्यकर्ताओं में भी चालू हो गई हो तो फिर सब काम बिगड़ जाएगा। अतः आप उपासना निष्ठापूर्वक करना, चाहे आप आधा घंटा ही करना, पर नियमपूर्वक जरूर करना। भूलना मत कभी अगर कभी आपने ऐसा करना शुरू कर दिया कि आप साढ़े आठ बजे उठे और बहाना बना दिया कि साहब आज तो रात को देर हो गयी थी और साहब आपके यहाँ तो जगह भी नहीं है। आपके यहाँ हवा अच्छी नहीं है, यहाँ तो कोई बैठने को स्थान मिला नहीं, हम तो एकांत में भजन करते हैं, गुफा में करते हैं। आपके यहाँ तो गुफा भी नहीं, एकांत भी नहीं, तो हम यहाँ कहाँ भजन करेंगे। यह गलती मत करना। गुफा मिलती है तो मुबारक, एकांत मिलता है तो मुबारक और चौराहा मिलता है तो मुबारक और छत मिलती है तो मुबारक। जहाँ कहीं भी आपको ठहरा दिया गया- धर्मशाला में ठहरा दिया गया है, तो आपको निष्ठावान् व्यक्ति की तरह रहना और उपासना करनी चाहिए।
मित्रो, आपको इस बात का ध्यान रखकर चलना चाहिए कि आपको थैलों के थैलों और बक्सों के बक्सों कपड़े लेकर नहीं जाना चाहिए। आप ढेरों के ढेरों धोती- कुर्ता लेकर नहीं जा रहे हैं। आप जहाँ कहीं भी जाने वाले हैं, वहाँ आपको वही एक धोती लेकर जाना होगा और एक-दो कपड़े लेकर जाना होगा। अगर आप कहीं अपना तरीका, वह तरीका जो घर में बरतते थे, मैला कपड़ा है तो मैं ही पहने हैं, फटा है तो फटा ही पहने हैं। इसको आप भूलना मत, शरीर को भी स्नान कराना और कपड़े को भी स्नान कराना। कपड़ा कौन है? चुगलखोर। ये हर आदमी की हैसियत को, हर आदमी के स्वभाव को और आदमी के रहन-सहन को बता देता है। ये आदमी कौन है? आप गरीब हैं सस्ता कपड़ा पहनते हैं कोई हर्ज नहीं। आपका कपड़ा फट गया हो तो भी कोई बात नहीं। साबुन आप साथ रखना और सुई-धागा अपने साथ रखना। बटन टूट गया हो तो आप लगाकर रखना ठीक तरह से। करीने से कपड़े पहनना, आपका कपड़ा मैला नहीं होना चाहिए। मैला कपड़ा पहनकर आप अपने व्यक्तित्व को गंवा बैठेंगे। फिर आप रेशम का कपड़ा ही क्यों न पहने हों और टेरेलीन का कपड़ा क्यों नहीं पहने हों, आपकी बेइज्जती हो जाएँगे। आपका शरीर सफाई से रहे, आपके सब कपड़े सफाई से रहें। आप वहाँ-जहाँ कहीं भी जाएँ, आप भले ही अमीर आदमी न हों, बड़े आदमी न हो, लेकिन आपको मैले-कुचैले नहीं रहना चाहिए। मैला-कुचैला वह आदमी नहीं रह सकता, जो शरीर को स्नान कराता है। कपड़ों को भी रोज स्नान कराइए और कपड़ों को राज धोइये।
आपको ये मैं छोटी बातें बता रहा हूँ, लेकिन हैं ये बड़ी कीमती और बड़ी वजनदार। सायंकाल को जब आप सोया करें, तो अपने कुर्ते को तह करके अपने तकिए के नीचे लगा लिया करिए और सोया कीजिए। सबेरे आपका कुर्ता प्रेस आयरन किया हुआ ऐसा भकाभक मिलेगा कि आप कहेंगे कि वाह भई वाह, कैसा बढ़िया वाला प्रेस हुआ। वानप्रस्थ की पोशाक हमने पहनाई है। इसको आप ऐसे मत करना, अपनी शर्म की बात मत बनाना। शर्म की बात नहीं, आप वानप्रस्थ के कपड़े अपनी बेइज्जती मत समझना, हम पीला वाला कपड़ा पहनकर जाएँगे तो लोग हमें भिखारी समझेंगे और हम बाबाजी समझे जाएँगे, जबकि हम तो नम्बरदार हैं, हम तो जमींदार हैं और देखो हम बाबाजी कहाँ है? ठीक है हम इस पीले कपड़े की इज्जत बनाएँगे। जैसे कि लोगों ने बिगाड़ी, हम बनाएँगे इज्जत। किसकी बनाएँगे? पीले कपड़े की बनाएँगे इसलिए पीले कपड़े को आप छोड़ना मत। रेलगाड़ी में जाए तो भी आप पीला पहनकर जाना। लोग-बाग आपसे कहना शुरू करेंगे कि ये बाबाजी लोगों ने सत्यानाश दिया। ये छप्पन लाख बाबाजी हराम की रोटी खा-खाकर कैसे मोटे हो गये हैं? ये फोकट का माँगते हैं रोज और नम्बर दो वाला पैसा, ब्लैक वाला पैसा खा-खाकर कैसे मुस्टंडे हो गये हैं। याद रखिए। आप जहाँ कही भी जाएँगे जो दिखेगा यही कहेगा कि ये देखो ये बाबाजी बैठे हैं इन लोगों को शरम नहीं आती। तब आप क्या करना? डरना मत उससे। उसकी गलती नहीं है? आप उसको समझाना कि हम बाबाजी कैसे हैं और हमारे बाबाजी का सम्प्रदाय कौन-सा है? और हमारा गुरु कैसा है? और हमको जो काम करना है - वह क्या है? और हम किस तरीके से हैं?
एक दिन पानी से भरे कलश पर रखी हुई कटोरी ने घड़े से कहा, कलश तुम बड़े उदार हो। तुम्हारे पास जो बर्तन आता है, उसे तुम पानी से भर देते हो किसी को खाली नहीं जाने देते।
कलश ने उत्तर दिया- हाँ मैंने अपने पास आने वाले प्रत्येक पात्र को भर देता हूँ मेरे अन्दर का सारा सार दूसरों के लिए है।
कटोरी बोली-लेकिन मुझे कभी नहीं भरते, जबकि मैं हर समय तुम्हारे सिर पर ही मौजूद रहती हूँ।
घट ने उत्तर दिया- इसमें मेरा कोई दोष नहीं, दोष तुम्हारे अभिमान का है। तुम अभिमानपूर्वक मेरे सिर पर ही रहती हो, जबकि अन्य पात्र मेरे पास आकर झुकते हैं और अपनी पात्रता सिद्ध करते हैं तुम भी अभिमान छोड़कर सिर से उतरकर विनम्र बनो, मैं तुम्हें भी भर दूँगा।
पूर्णता की प्राप्ति पात्रता एवं नम्रता से होती है अभिमान एवं अहंकार से नहीं।
यह भारतीय अध्यात्म की विशेषता है कि उसमें यथा - उपाख्यानों के माध्यम से मनुष्य के सम्मुख आने वाली अगणित समस्याओं के समाधान बड़ी कुशलतापूर्वक पिरो दिये गये हैं। दार्शनिक और विवेचनात्मक प्रतिपादन हर किसी के गले नहीं उतरते। कथानकों में यह विशेषता है कि वे बाल-वृद्ध नर-नारी शिक्षित-अशिक्षित सभी की समझ में आ जाते हैं और उनके आधार पर किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता हैं यह लोकरंजन के साथ लोकमंगल का एक सर्वसुलभ मार्ग है।
ऋषियों का प्रयास सही रहा है कि यदि समाज विद्यालय तक न पहुँच सके तो विद्यालय को समाज तक पहुँचना चाहिए। समूचा समाज शिक्षार्थी बने और सारी धरती पाठशाला, इसी स्वरूप को विकसित करने के लिए सरल सुगम शैली में भागवत, रामायण, सत्यनारायण, देवीभागवत कथा आदि का विधान बनाया गया। वेदों के दर्शनसूत्र सर्वसाधारण भी सोच-समझकर तद्नुरूप जी सके, विचार के इसी उद्गम बिन्दु से पुराणों की धारा बह निकली। अठारह पुराणों और इक्कीस उपपुराणों के साथ रामायण महाभारत का महत्व कम नहीं है। कथा - साहित्य का यह विशाल भण्डार कलेवर की दृष्टि से वेदों व दर्शनों की तुलना में कई गुना बैठता है। ऋषियों की प्रेरणाओं का संचार करने वाले कथा-कीर्तनों में कला के रहस्य के साथ लोकचेतना का मनोविज्ञान भी संजोया हुआ है। मानव की आस्थाओं एवं उसके आचरण दोनों के साथ-साथ उत्कृष्ट बनाए रखने की प्रेरणाओं के साथ-कथा -संकीर्तनों का विधान हमारी संस्कृति में किया गया है।
भारतीय संस्कृति की सर्वाधिक अनूठी विशेषता यह है कि यहाँ कथा को एक धर्मानुष्ठान का रूप दे दिया गया है। श्रोता और वाचक दोनों को कुछ खास कर्मकाण्डों को पूरा करके अपनी मनोभूमि का निर्माण करना होता है। उसमें मानव के क्रिया-कौशल एवं भावनाशीलता दोनों को ही सद्गुणों के समुच्चय रूपी इष्ट की ओर मोड़ देना ऋषियों का लक्ष्य रहा है। नैमिषारण्य कभी इसी तरह के धर्मानुष्ठान का केन्द्र था, जहाँ से सूत-शौनिक परम्पराएँ गाँव -गाँव तक पहुँच सकी। आज भी इसके चिन्ह रामकथा के नौ दिवसीय एवं भागवत् कथा के सात दिवसीय समारोह के रूप में मिलते हैं। कथानकों से जुड़े प्रतिपादनों से निश्चित ही भावनाओं का स्पन्दन-विकास व जीवन में उतारने का प्रेरणा का स्फुरण होता है, इसमें काई सन्देह नहीं है।
कथा - समारोहों साथ कीर्तन की भी महत्ता है। कीर्तन में नृत्य और संगीत दोनों की समावेश है। समूचे जनप्रवाह का उल्लासमय कर देना ही संकीर्तन का लक्ष्य होता है। एवं इसे कथा के साथ जोड़कर ऋषिगणों ने सोने में सुहागे की तरह सुन्दर बना दिया है। आज के युग में जहाँ व्यक्ति मनोव्यथाओं की टूटन -दरार से पीड़ित है, घुटन–सिसकन ही आज के औसत व्यक्ति के पल्ले पड़ती दिखाई देती है- संवेदनाओं के नर्तन और भावनाओं के उफान से कथा - संकीर्तनों द्वारा वह चिकित्सा की जा सकती हैं जो और किसी पद्धति से की जाने पर संभवतः सफल न होती। कीर्तन की दो शैलियाँ प्रख्यात हैं- नारदीय एवं वैयासकीय। जहाँ नारदीय पद्धति में वाद्यों के साथ अथवा बिना वाद्य के बैठे हुए अथवा खड़े होकर भगवन्नाम की संकीर्तन किया जाता है। वहाँ बीच-बीच में नाम ध्वनि -पद कीर्तन और भगवद्भक्तों की कथा- तथा साथ-साथ प्रतिपादन, यही वैयासकीय पद्धति है।
परमपूज्य गुरुदेव ने समय की विषमता को समझते हुए तद्नुरूप ही उपचारों की बात सोची। आज परिवर्तनशील समय में मनुष्य की परिस्थितियाँ मान्यताएँ-प्रथाएँ-समस्याएँ एवं आवश्यकताएँ भी तेजी से बदली हैं। बदलते समय के साथ समाधान खोजकर उन्हें धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की प्रक्रिया गूंथने का कार्य एक अवतारी स्तर की सत्ता ही सोच सकती है। इस शाश्वत सृष्टिक्रम को ध्यान में रखते हुए प्रज्ञापुराण रूपी युगसाहित्य का सृजन युगऋषियों ने किया। इसका उद्देश्य एक ही था कि प्रस्तुत प्रसंगों से समयानुकूल प्रकाश एवं मार्गदर्शन सभी को मिल सके। अनेकानेक मनः स्थिति वालों के लिए परिस्थिति के अनुरूप समाधान दे सकने की दृष्टि से उन्नीसवें पुराण के रूप में प्रज्ञा- पुराण की रचना हुई, जिसके प्रज्ञोपनिषद के रूप में एक पूरा खण्ड वांग्मय में संकलित है तथा चार खण्डों को पुराण कथा-उपाख्यानों के साथ सरल बोधमय शैली में प्रस्तुत किया गया है।
प्रज्ञापुराण की महत्ता जितनी बतायी जाए कम है। इसके उपलब्ध चारों खण्डों के प्रकाशन से अब तक अगणित आवृत्तियां प्रकाशित हो चुकी हैं। इन खण्डों में समग्र मानव धर्म के अंतर्गत मान्यता प्राप्त इतिहास पुराणों की कथाएँ हैं- प्रेरणाप्रद दृष्टान्त हैं, किन से नीरस-सा लगने वाला दार्शनिक विवेचन भी सरस, प्राणवान् हृदयंगम करने योग्य बन जाता है। इनमें अन्य धर्मावलम्बियों के क्षेत्रों में उचित कथाओं का भी समावेश है। है तो उनका अंश थोड़ा ही, पर उससे इस युगपुराण की सार्वभौमिकता का परिचय मिलता है। कथा-आयोजन को यदि एक सामूहिक धर्मानुष्ठान के रूप में संपन्न किया जाए तो उससे उपस्थित समुदाय को अच्छा-खासा लोकशिक्षण मिलता है। विवेचनों - प्रसंगों के साथ कथानकों का समन्वय तथा साधनात्मक परामर्श न केवल दर्शकों को बाँधे रखता है, समूह चेतना (कलेक्टिव कांशसनेश) को जगाकर एक विलक्षण वातावरण का निर्माण करता है। व्यक्तिगत स्वाध्याय के अलावा भी सामूहिक आयोजनों की दृष्टि से प्रज्ञापुराण कथा के आयोजन बड़े उपयोगी व प्रभावी सिद्ध हुए हैं।
प्रज्ञापुराण के अभी तक प्रकाशित चार खण्डों में से पहले खण्ड में युग-समस्याओं के कारण का मूल आस्था-संकट बताया गया है। इससे ऊबकर प्रज्ञायुग लाने का तत्पर अवतारी सत्ता द्वारा प्रणीत संदेश भी इसमें हैं। भ्रष्ट-चिन्तन एवं दुष्ट आचरण से जूझने हेतु अध्यात्म दर्शन को किस तरह व्यावहारिक रूप में अपनाया जाना चाहिए, उसके लिए विस्तृत व्याख्या के साथ अंत में महाप्रज्ञा के अवलम्बन से संभावित सतयुगी परिस्थितियों की झाँकी दी गयी है। दूसरा खण्ड महामानव खण्ड है। इसमें धर्म के शाश्वत सिद्धान्तों के रूप में प्रचलित।
पाँच दिवसीय पावन प्रज्ञापुराण कथा-आयोजनों की रूपरेखा
शान्तिकुञ्ज के तत्वाधान में होने वाले ये कार्यक्रम पाँच दिवसीय होंगे। बारह सदस्यीय केन्द्रीय टोली प्रायः एक दिन पूर्व निर्धारित स्थान पर पहुँच जाएगी। टोली के सदस्य पहुँचते ही आयोजकों के परामर्श करके प्रदर्शनी सहित सभी व्यवस्थाओं की अंतिम रूप देने में सहयोग करेंगे।
प्रथम दिन - प्रातः ९ से १. बजे कलश यात्रा- जिसमें मात्र २४ कलश रहेंगे। इसके साथ- साथ प्रज्ञापुराण ग्रंथों की विशेष यात्रा। ऐसे व्यक्तियों को वरणी के रूप में तैयार किया जाय जो जोड़े सहित श्रद्धापूर्वक पाँचों दिन कथा-श्रवण कर सकें और जिनके घरों में प्रज्ञापुराण ग्रंथ की स्थापना की जा सके। ऐसे सभी परिजन जिनके यहाँ पहले से प्रज्ञापुराण ग्रंथ है, वे भी अपने ग्रंथ को सिर पर रखकर साथ चलेंगे। शोभायात्रा कलश प्रधान न होकर ग्रंथ प्रधान होगी। पाठ किये जाने वाले पुराण को किसी खुले पर देवचित्रों के साथ सज्जा सहित रखें और यात्रा के समय पूजन आदि की व्यवस्था उसी झाँकी पर बनावें।
यात्रा के समापन के समय विधिवत् व्यासपीठ पर मुख्य ग्रंथ की तथा वरणी श्रोताओं के ग्रंथों की स्थापना की जाएगी। संक्षिप्त के ग्रंथों की स्थापन की जाएगी। संक्षिप्त पूजन- आरती आदि के पश्चात कार्यक्रम समाप्त किया जा सकता है। अथवा यदि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उचित समझें तो उसी समय कथा प्रारंभ करके प्रथम दिन की भूमिकापरक कथा कहकर समाप्त करने की व्यवस्था बनायी जा सकती है। यदि इस समय कथा करना संभव नहीं हो तो मध्याह्न अथवा सायं कथा प्रारंभ कथा होने की घोषणा करके कार्यक्रम समाप्त कर लें।
सायं ६ से ७ बजे से संगीत प्रवचन (प्रबुद्ध वर्ग गोष्ठी) आदि कार्यक्रम रखें। इस सभा के लिए प्रतिदिन बौद्धिक विषयों का निर्धारण एवं विषय-सामग्री यहाँ से तैयार की जाएगी। यदि किसी विशेष वर्ग के प्रबुद्ध लोगों को बुलाया गया हो तो उनके लिए भी उद्बोधन इसी सभा में होगा।
नोट:- जहाँ कथा रात्रि में होगी, वहाँ यह गोष्ठियाँ मध्याह्न काल में रखें।
द्वितीय दिन - प्रातः योग-व्यायाम ६.३. से ८... बजे तक। यह कार्यक्रम शिव-संकल्प पाठ एवं वंदना -गीत आदि के साथ प्रारंभ होगा। ५ से १. मिनट की संक्षिप्त भूमिका के पश्चात् १५-२. मिनट का ध्यान। इसके बाद योगासन, प्राणायाम, बंधमुद्रा आदि का सामूहिक अभ्यास। इसे पुरुष एवं महिलाएँ साथ-साथ करेगी। महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए महिला स्वयंसेवक रहेंगी। संचालन एक स्थान से होगा। पूरा स्थान कनातों से घिरा होगा, ताकि बाहरी लोग खड़े होकर न देखें।
टोली के लोग योगाभ्यास के समय स्थिति सुधारने के लिए महिला एवं पुरुष स्वयंसेवकों की टोली बनाकर इनका प्रशिक्षण कर देंगे। यह कार्य पूर्व संध्या कर लेते हैं।
मध्याह्न- प्रथम दिन की भाँति कथा अथवा प्रबुद्ध वर्ग गोष्ठी संगीत प्रवचन।
सायं - प्रथम दिन की भाँति कथा अथवा प्रबुद्ध वर्ग गोष्ठी, संगीत, प्रवचन।
तृतीय एवं चतुर्थ दिन - द्वितीय दिन की भाँति।
पंचम दिन प्रातः - योग - व्यायाम के स्थान पर विविध संस्कारों का क्रम चलेगा। संस्कारों से पूर्व प्रतीकात्मक यज्ञ के लिए नौ कुण्ड स्थापित कर लिया जाएँगे।
अपराह्न - कथा का समापन एवं दीपयज्ञ।
अंतिम दिन अनिवार्य रूप से कथा प्रारंभ करने का ऐसा समय रखा जाए कि सूर्यास्त होते-होते समाप्त हो और उसी के साथ संक्षिप्त कर्मकाण्ड कराकर दीपयज्ञ सम्पन्न किया जाए।
कथा एवं दीपयज्ञ के समापन पर वरणी परिजनों के यहाँ प्रज्ञा-पुराण ग्रंथ की स्थापना का संकल्प कराया जाए। पश्चात समापन।
विशेष - पूरे आयोजन के लिए एक ही पण्डाल एवं एक ही मंच बनाएँ। योग -व्यायाम तथा कथा- प्रवचन आदि। सभी कार्यक्रम उसी मंच से किये जाएँगे। समापन के दिन मंच के निकट नौ कुण्डीय यज्ञशाला बनाएँ। कुण्ड स्थाई या अस्थायी कैसे भी हो सकते हैं। दीपयज्ञ के समय यज्ञशाला क्षेत्र का उपयोग दीपसज्जा के लिए किया जा सकता है।
उन गुणों का विस्तार में वर्णन है, जिन्हें अपनाकर महामानव बना जाता है। सत्य-विवेक संयम -कर्तव्यशील, अनुशासन- अनुबन्ध, सौजन्य-पराक्रम एवं सहकार परमार्थ रूपी पाँच गुण युग्मों का कथा-शैली में बड़ा ही सुन्दर प्रतिपादन है। तृतीय खण्ड परिवार खण्ड है। आत्मनिर्माण हो भी जाए तो परिवार -निर्माण के बाद गृहस्थ संस्था चलेगी कैसे? इसलिए पूज्यवर ने गृहस्थजीवन सहजीवन, पारिवारिकता की धुरी पर विनिर्मित विश्वपरिवार जैसे विषयों के द्वारा वसुधैव कुटुम्बकम् के दर्शन को इसमें स्पष्ट किया है। परिवारों में संस्कार संवर्धन, शिशुनिर्माण, वृद्धजन माहात्म्य एवं नारी माहात्म्य जैसे प्रकरण इसमें है। चौथा खण्ड देव-संस्कृति के विभिन्न पक्षों यथा-वर्णाश्रम धर्म, पर्व-संस्कार, तीर्थाटन-प्रव्रज्या-मरणोत्तर जीवन, आस्था-संकट व प्रज्ञावतार के विषय में लिखा गया है। इस खण्ड में उद्धृत उदाहरणों में ने केवल वैज्ञानिकता का समावेश है, वरन् सरस भावसंवेदना भी है। अंत में युग कैसे बदलेगा। यह मार्गदर्शन भी है।
प्रज्ञापुराण कथा आज की इस संधिकाल की वेला में सद्ज्ञान विस्तार के पुण्य कार्य के निमित्त ऐसा धर्मानुष्ठान है, जिसका पुण्य दोनों को मिलता है- आयोजित करने वाले को भी इसके लिए पुरुषार्थ करने वाले सृजन सैनिकों को भी तथा लाभान्वित होने वाले श्रोतागणों को भी। ऋतम्भरा -प्रज्ञा ही युग-शक्ति गायत्री के रूप में दूरदर्शी विवेकशीलता की स्थापना के रूप में इस संधिकाल में सबको पार लगा सकती है। प्रज्ञापुराण प्रधान कथा आयोजनों का महत्व इस संधिवेला में और भी बढ़ जाता है।
कभी - कभी हम पशोपेश में पड़ जाते हैं कि युगपरिवर्तन होगा कि नहीं? होगा तो कब? परिस्थितियों जो आज घनघोर घटाटोप के रूप में घुमड़ती दिखाई दे रही है। विषम होती चली जा रही हैं। असुरता जीवन मन के संघर्ष में बढ़-चढ़ दस ढोकती नजर आ रही है। देवतत्व की पक्षधर सत्ताएँ कभी - कभी यह सब देखकर व्यथित हो जाती हैं। ऐसी परिस्थितियों में जब हम युग -संधिकाल में एक विलक्षण मोड़ पर खड़े युग बदलते देख रहें हैं। परमपूज्य गुरुदेव के कुछ कथनों को उद्धृत करने का मन कर रहा है। पूज्यवर ने मई ७१ की अखण्ड-ज्योति में लिखा है- “ अगले दिनों बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति की त्रिवेणी किस तरह उद्भूत होती है, उसे लोग आश्चर्य भरी आँखों से देखेंगे। भावी भारत का संचालन करने के लिए कितने ही कर्मनिष्ठ महामानव अपनी वर्तमान मूर्च्छना को छोड़कर आगे आने हैं। इस चमत्कार को छोड़कर आगे आने हैं। इस चमत्कार को अगले ही दिनों प्रत्यक्ष देखने के लिए हममें से हर किसी को प्रतीक्षा करनी चाहिए। लोकसेवियों की एक ऐसी उत्कृष्ट चतुरंगिणी खड़ी कर देना जो असम्भव को सम्भव बना दें, हमारे ज्वलन्त जीवन का अन्तिम चमत्कार अब तक के जिन छिटपुट कामों को देखकर लोग हमें सिद्धपुरुष कहने लगे। उन्हें अगल दिनों के परोक्ष तत्त्व का लेखा-जोखा यदि सूझ पड़े तो वे इससे भी आगे बढ़कर न जाने क्या-क्या कह सकते हैं। निश्चित रूप से हमारी भावी परोक्ष साधना कुछ ऐसा अनुदान विश्वमानव के सम्मुख प्रस्तुत करेगी, जो इसके भाग्य और भविष्य की दिशा मोड़ दे।
हम सभी छोटे-छोटे चमत्कारों से संतुष्ट हो जाने वाले जीव हैं। ये तो तंत्र के टोने-टोटके हैं, जो गाँव -खलिहान के व्यक्ति भी कर लेते हैं। सिद्ध लोग कुछ चमत्कार ऐसा दिखा तो देते हैं, जिनसे जनमानस अचम्भित हो उठता है, पर उससे लोकहित नहीं सधता। जो उच्चस्तरीय सिद्ध महान संत होते हैं, वे पात्रता के अनुरूप अनुदान देते हैं, देने के बदले मिलने का सिद्धान्त चरितार्थ कर स्रष्टा के अनुशासन को बनाए रखकर यह परंपरा चलाते हैं। परमपूज्य गुरुदेव उससे भी ऊँची स्तर की अवतारी सत्ता में गिने जाने चाहिए, जो कभी - कभी मानव-जाति के भाग्य व भविष्य को नए सिरे से लिखने के लिए अवतरित होती है। होती रही है! आत्मिक प्रगति की उछाल असंख्यों में पैदाकर एक प्रचण्ड झंझावात सारी, विश्वचेतना में पैदाकर बदलाव का माहौल बना देना व आशीर्वाद की उमंगें जन-जन में प्रवाहित कर देने का कार्य और कौन कर सकता है? दिक्कत यही आ जाती है कि हम परिवर्तनकारी सत्ता को व उनके अभियान की प्रचण्डता को समझ पाने में विफल रहते हैं एवं बाद में सिर धुन-धुनकर पछताते हैं। आर्तनाद बाद में करना ही क्यों पड़े, छाती पीटने की जरूरत ही क्यों पड़ें, जब परिवर्तन सामने प्रत्यक्ष दीख पड़ रहा हो।
पूज्यवर पुनः अखण्ड-ज्योति के इसी अंक में एक स्थान पर लिखते हैं। “जिस शक्ति सहारे यह प्रबल प्रयास अब तक चलता रहा है, वह आगे भी स्वयं ही उस चलाएगी। माताजी माध्यम रहें तो भी उनके पीछे वही समर्थसत्ता रहेगी, जो हमारे पीछे रही है। उनके बाद भी यह आन्दोलन घटने की अपेक्षा बढ़ेगा ही। यदि घटने की आशंका होती तो काम बढ़ाने और वर्ग विभाजन की जरूरत क्यों पड़ती है। हमें काम को अधूरा छोड़ने या चलती गाड़ी को ठप्प करने की सूझ क्यों पड़ती? हर किसी को यह परिपूर्ण विश्वास रखना चाहिए कि अगले दिनों अभियान की गति और अधिक बढ़ जाएगी और वह मानवीय भविष्य के निर्माण में अपनी भूमिका अबकी अपेक्षा अगले दिनों हजार गुना तेजी के साथ सम्पन्न कतरा चला जाएगा। “ पूज्यवर के ये उद्गार १९७१ के हैं जब वे मथुरा स्थायी रूप से छोड़कर हिमालय प्रस्थान कर रहे थे। विदाई की पूर्व बेला में उनकी लिखी ये पँक्तियाँ कितनी अंतश्चेतना को झकझोरती हैं, सहज ही समझा जा सकता है। तब और भी जब पूज्यवर के उत्तरार्द्ध रूप में ऋषि परम्परा के बीजारोपण हेतु विनियमित स्थापित महाकाल के घोंसले शान्तिकुञ्ज से उनने महाप्रयाण से पूर्व ठीक इसी प्रकार की घोषणा भविष्य के विषय में बड़ी निश्चिंततापूर्वक की इसी बीच २. वर्ष के अन्तराल में मिशन कहाँ से कहा पहुँच चुका था। पूज्यवर के सामने ही विस्तार ही विस्तार की सभी को झलकियाँ दिखाई देने लगी थी, पर संशय वही था। पूज्यवर के बाद क्या होगा? सशरीर न रहने पर यह मिशन कहीं और संस्थाओं की तरह पिछड़ तो नहीं जाएगा। परमपूज्य गुरुदेव सतत् यही कहते व लिखते थे कि हम अपने परिजनों से बिछुड़ने के लिए नहीं जुड़े हैं। “ अखंड-ज्योति अप्रैल १९९. उनने इस शीर्षक से लिखे एक लेख में अपने भाव इस प्रकार व्यक्त किये-
दृश्यशरीर रूपी गोबर की मशक चर्मचक्षुओं से दिखे या न दिखे, विशेष प्रयोजनों के लिए नियुक्ति किया गया प्रहरी अगली शताब्दी एक पूरी जागरूकता के साथ अपनी जिम्मेदारी वहन करता रहेगा। आगे यह भी लिखते हैं कि हमसे जुड़े परिजनों में से जो अभी कोई प्रमाद या उपेक्षा बरतेगा उसे शान्तिकुञ्ज की संचालक शक्ति झकझोरेगी- कान उमेठेगी और बाधित करती रहेगी। वही संचालक शक्ति आज परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीय माताजी की सूक्ष्म व कारणसत्ता के रूप में हम सभी शान्तिकुञ्ज-गायत्री तीर्थ में विद्यमान हो सतत् झकझोर रही है। हम सभी को युगधर्म को युगधर्म की ओर उन्मुख होने का संकेत कर रही है। अब परिवर्तन की वेला आ पहुँची। मात्र डेढ़ दो वर्ष-कुछ ही माह रह गये हैं हमारी तत्परता कर्मठता ऐसी मतें और बढ़ चढ़कर पूज्यवर के चिन्तन के विस्तार में नियोजित होनी चाहिए। यही इस श्रावणी पर्व पर आत्मसमीक्षा हम सभी को करनी है।
*समाप्त*