ध्यान की गहनता में अदृश्य स्पंदनों के साथ गुरुदेव की वाणी स्फुरित हो उठी-उठो जागो!! और देखो, जैसा बाह्य जगत है वैसा ही एक अंतर्जगत भी है। वत्स! यदि बाह्य जगत में आश्चर्य है, रहस्य है, विशालता है, सौंदर्य है, महान गौरव है तो अंतर्जगत में भी अजेय महानता और शक्ति अवर्णनीय आनंद तथा शांति और सत्य का अचल आधार है। हे वत्स! बाह्य जगत अंतर्जगत का आभास मात्र है और इस अंतर्जगत में तुम्हारा सत्यस्वरूप स्थित है। वहाँ तुम शाश्वतता में जीते हो, जबकि बाह्य जगत समय की सीमा में ही आबद्ध है। वहाँ अनंत और अपरिमेय आनंद है, जबकि बाह्य जगत में संवेदनाएँ, सुख तथा दुःख से जुड़ी हुई हैं। वहाँ भी वेदना है, किंतु अहो, कितनी आनंदमयी वेदना है। सत्य का पूर्णतः साक्षात्कार न कर पाने के विरह की अलौकिक वेदना और ऐसी वेदना विपुल आनंद का पथ है।”
आओ, साधक बनो! अपनी वृत्ति को इस अंतर्जगत की ओर प्रस्तुत करो। वत्स! मेरे प्रति उत्कट प्रेम के पंखों से उड़कर आओ। गुरु और शिष्य के संबंध से अधिक घनिष्ठ और भी कोई संबंध है क्या? हे वत्स, मौन! अनिवर्चनीयता!! यही प्रेम का लक्षण है। आंतरिक मौन की गहन गहराइयों में भगवान विराजमान हैं। युगसाधना के अनिवार्य कर्तव्य को करते हुए अपनी आन्तरिकता को मुझसे जोड़ो। स्वयं को मेरे अलौकिक अस्तित्व से एकाकार करो। जो मैं हूँ, तुम वही बनो। भगवत् पवित्रता के लिए भक्तों के हृदय विभिन्न मंदिर हैं, जहाँ सुगंधित धूप की तरह विचार ईश्वर की ओर उठते हैं। तुम जो कुछ भी करते हो, उसका आध्यात्मीकरण कर लो। रूप-अरूप सभी में ब्रह्म का, देवत्व का दर्शन करो। ईश्वर से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है।
अंतर्जगत की अंतरतम गुहा में, जिसमें व्यक्ति उत्कट गुरुप्रेम या कठोर साधना द्वारा प्रविष्ट होता है, वहाँ ईश्वर सर्वदा सन्निकट हैं। वे भौतिक अर्थ में निकट नहीं, किंतु आध्यात्मिक अर्थ में हमारी आत्मा के भी आत्मा के रूप में, वे हमारी आत्मा के सारतत्त्व हैं। स्वयं को साधना के लिए समर्पित कर दो। साधना का उज्ज्वलतम रूप गुरुप्रेम है। जितना तुम मेरे प्रेम में डूबते हो, उतना ही तुम मेरे निकट आते हो, क्योंकि मैं अन्तरम का निवासी हूँ। मैं आत्मा हूँ, विचार या रूप से अछूती आत्मा! मैं अभेद्य, अनश्वर आत्मा हूँ। मैं परमात्मा हूँ। ब्रह्म हूँ।
युगसन्धि-काल के इन अंतिम पलों में समूची मानवता तुम्हारी कठोरतम साधना से झरने वाले अमृतबिंदुओं की ओर प्यासे चातक की भाँति टकटकी लगाये है। साधना तो वह विरासत है, जो मैंने तुम्हें सौंपी है। इससे प्राप्त होने वाली अनंतशक्ति तुममें समा जाने के लिए आतुर है। परावाणी की यह गूँज ध्यान के उन्मीलन के बाद भी बनी रही। उनके स्वर अभी भी अन्तर्चेतना में झंकृत हो रहे थे-उठो जागो!! और साधक बनो!!!”
जीवन को भली-भाँति समझ लेने के बाद, सहज ही यह सवाल उठता है कि क्या ऐसा संभव नहीं है कि परिस्थितियों के ढाँचे में ढले, लोक प्रवाह में बहते हुए, संग्रहित कुसंस्कारों से प्रेरित वर्तमान अनगढ़ जीवन को, अपनी इच्छानुसार, अपने स्तर का फिर से गढ़ा जाय? जवाब न और हाँ दोनों में ही दिया जाना संभव है। ना उस परिस्थिति एवं मनोदशा में, जब आंतरिक परिवर्तन की उत्कट आकांक्षा का अभाव हो और उसके लिए श्रेष्ठतम पुरुषार्थ करने की उमंगें न उठती हों। दूसरों की कृपा-सहायता के बलबूते उज्ज्वल भविष्य एवं उन्नत जीवन के सपने तो देखे जा सकते हैं, पर वे पूरे कदाचित ही कभी किसी के होते हैं। दैवी और संसारी सहायता मिलती तो हैं, पर उन्हें पाने की लिए पात्रता की अग्निपरीक्षा में गुजरते हुए अपनी पुरुषार्थ का साहस न जगे तो कहा जा सकता है कि जीवन को महामानवों के स्तर पर गठित करना एक प्रकार से असंभव ही है।
‘हाँ’ उस मनोदशा में कहा जा सकता है, जब स्वयं में यह विश्वास उभरा हो कि हम अपने स्वामी स्वयं हैं। अपने भाग्य भविष्य का निर्माण कर सकना स्वयं हमारे अपने हाथ में है। दूसरों पर न सही, खुद के शरीर और मन पर तो अपना अधिकार है ही और उस मौलिक अधिकार का उपयोग करने से भला हमें कोई किस तरह से वंचित कर सकता है? यह तो स्वयं के मन की दुर्बलता ही है, जो हमें ललचाती, भ्रमाती और गिराती रहती है। एक बार तनकर खड़े हो जाने पर प्रचण्ड पुरुषार्थ करने के लिए कमर कस लेने पर भीतरी और बाहरी सभी दबाव समाप्त हो जाते हैं। फिर अभीष्ट दिशा में निर्भयता एवं निश्चिंतता के साथ बढ़ा जा सकता है।
प्रचण्ड पुरुषार्थ का तात्पर्य है-धैर्य और साहस का ऐसा अद्भुत समन्वय जिससे संकल्प के डगमगाते रहने की बालबुद्धि उभरते रहने की आशंका न हो। स्थिर बुद्धि के सतत् प्रयत्न करते रहने और फल प्राप्ति में देर होते देखकर अधीर न होने की-वरन् दुगुने उत्साह से साधना करते रहने की सजीवता जहाँ भी होगी, वहीं जीवन की सारी अलौकिक विभूतियाँ सामने खड़ी दिखाई देंगी।
जीवन के तत्त्वदर्शन को बारीकी से समझने पर एक ही सत्य निखरकर सामने आता है कि ईश्वर के पास जो कुछ है वह सब कुछ उसने बीज रूप में मनुष्य को सौंप दिया है, साथ ही उसे यह स्वतंत्रता दी है कि इन साधारण और असाधारण उपलब्धियों में से, जो भी जितनी चाहे उतनी प्रसन्नतापूर्वक बिना किसी रोक-टोक के प्राप्त कर सकता है। शर्त एक ही कि साधनात्मक पुरुषार्थ के माध्यम से अपनी पात्रता प्रामाणिकता सिद्ध करे और उसी अनुपात में प्रगति पथ पर अग्रसर कराने वाले अनुदान प्राप्त करता चला जाय।
जीवन के इस श्रेष्ठतम पुरुषार्थ से असंभव भी सहज संभव हो जाता है। इसके माध्यम से ऐसी असंख्य उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं, जिनके सहारे मानवी व्यक्तित्व असाधारण रूप से परिष्कृत होता चला जाता है। उस उपलब्धि के सहारे एक से एक बढ़ी-चढ़ी सफलताएँ अपने आप ही भागी चली आती हैं और गुण, कर्म, स्वभाव की विभूतियों से सुसम्पन्न होने के कारण उन्हें महामानवों के स्तर पर पहुँचने का सौभाग्य मिलता है। कहना न होगा कि पात्रता स्वयं ही अपने अनुरूप सुनिश्चित विश्व व्यवस्था के कारण सहज ही सत्परिणाम उपलब्ध करती चली जाती है।
व्यक्ति की अंतरंग सत्ता में ऐसे बीज तत्व मौजूद हैं, जिन्हें विकसित करने पर प्रतिभाशाली बना जा सकता है। प्रयत्न और पुरुषार्थ के बल पर पिछड़ी परिस्थितियों में पड़े हुए व्यक्ति भी उच्च शिखर पर पहुँचते है। इन्हीं तत्वों को अध्यात्म प्रयोजनों के लिए भी प्रयुक्त किया जाता है। प्रतिभाशाली व्यक्तित्व सहज ही जनसहयोग और अभीष्ट साधनों को आकर्षित करते हैं। परिष्कृत अन्तःकरण का चुम्बकत्व निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त ब्रह्मचेतना के प्रवाह में से अभीष्ट धाराएँ अपनी ओर मोड़ सकता है। इस आंतरिक आदान-प्रदान से साधक को आध्यात्मिक विभूतियों से धनी बनने का अवसर मिलता है।
खिले फूल पर भौंरे, तितली, मधुमक्खी जैसे जीव जंतुओं से लेकर बाल-वृद्ध सभी का मन ललचाता है। अन्तःकरण को कषाय-कल्मषों से मुक्त कर लेने पर ही सात्विक सौंदर्य उभरता है। उस पर दैवीय शक्तियाँ सहयोग के लिए अनायास बरसने लगती हैं। भूमि में पड़े हुए बीज, खाद-पानी पाकर समयानुसार अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित और फलित होते चले जाते हैं। व्यक्ति के अंतराल में छिपी ईश्वरीय क्षमताएँ भी जब जाग्रत और परिपक्व होती हैं तो लगता है कि सामान्य व्यक्ति असामान्य बन गया है। साधनात्मक पुरुषार्थ की चरम परिणति के रूप में सिद्ध होने का विकास यही है।
तथ्य को समझ लिया जाय तो सांसारिक मृगमरीचिका के मायाजाल में अपने पुरुषार्थ को बरबाद नहीं करना पड़ेगा। भटकन से पीछा छूटे तो यह सहज ही अनुभव किया जा सकता है कि जीवन के पुरुषार्थ की श्रेष्ठतम दिशा और दशा आध्यात्मिक साधना ही है। जिसे जितनी इस दिशा में सफलता मिलेगी वह उतना ही आत्मबल सम्पन्न होता चला जायेगा और विभूतिवान बनेगा।
पचास साल या आधी सदी का पिछला कालखण्ड राष्ट्रीय जीवन के इतिहास में मानकों का अकल्पनीय परिदृश्य कुछ ऐसा है, जिससे आज हमारी अपनी भारतीय अस्मिता या भारतीयता की पहचान ही संशय और दुविधा से ग्रस्त हो चली है। भारतीयों को लेकर बहुतों के मन में जो कल्पना उठती है, वह आज की आर्थिक, राजनीतिक उथल-पुथल में धूमिल पड़ गयी है। आज का भारतीय समाज जिस तरह टुकड़ों में बँटकर हिंसा, दुराग्रह, भ्रष्टाचार और अविश्वास के चलते मूल्यहीनता के दलदल में फँसता जा रहा है, वह राष्ट्रीय और मानवीय इतिहास में एक अभूतपूर्व स्थिति है। स्वराज्य और स्वाधीनता की मशाल लेकर जिस अंधेरे को दूर भगाने के लिए अहिंसक और क्राँतिकारी उपायों की सहायता से इस गरीब देश ने ब्रिटिश साम्राज्य से टक्कर ली थी और नेतृत्व गाँधी जैसे तपस्वी व्यक्ति के हाथ में था, इस बात पर भरोसा करने को दिल नहीं मानता। हमारे सरोकार, रीतिरिवाज, आदर्श और लक्ष्य जो हमारे आचरण का नक्शा बनाते हैं, प्रश्नों के दायरे में आ गये हैं।
ये सवाल हमारे अस्तित्व के मर्मस्थानों को कुछ इस तरह छीलते और कुरेदते हैं, जिससे असहनीय विकलता होती है। जो सच्चाई उभरकर सामने आती है, वह यही बयान करती है कि अशिक्षित, अभावग्रस्त तथा पिछड़े समझे जाने वाले वनवासी किसी के लिए विपत्ति का कारण नहीं बनते, पर बुद्धिमानों, धनवानों, सत्ताधारियों, कलाकारों ने अपनी समर्थता का दुरुपयोग करके जनसाधारण को जो हानि पहुँचाई है, उसका लेखा-जोखा सामने रखने पर आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है। विज्ञान ने जिन प्रलयंकर आयुधों का निर्माण करके उद्धतों के हाथ में सौंप दिया है, उसे देखते हुए मानवीय अस्तित्व ही आतंकित, आशंकित हो रहा है। एटमी हथियारों के साये में पल रहे नन्हें-नन्हें मासूम बच्चे साधारण शाक-भाजी के लिए तड़पते-तरसते हैं। दुर्व्यसनों, अनाचारों, अपराधों का घटाटोप समर्थता और सम्पन्नता के सहारे दैत्य-दानव की तरह बढ़ा है। कुचक्रों, षड्यंत्रों और छल प्रपंचों की करतूतें दिनों-दिन गगनचुम्बी बनती चली जा रही है। यह बुद्धिमत्ता की ही कुटिल देन है।
विचारणीय यह है कि आज की परिस्थितियों पर, वर्तमान के घटाटोप अंधेरे पर अंकुश कौन लगाए? कैसे लगाए? कैसे लगाए? प्रत्यक्ष है कि बाहरी रोकथाम इस संदर्भ में असफल न सही, पर दुर्बल और उपहासास्पद जरूर रही है। रिश्वत लेने और देने वालों के विरुद्ध कानून है। दहेज और छुआछूत को अपराधों में गिना और दण्डनीय ठहराया गया है। व्याभिचार के बलात्कार के विरुद्ध कड़े कानून हैं। कोई भी कुकृत्य ऐसा नहीं है, जिसके विरुद्ध दण्ड-विधान न हो। न्यायाधीशों की नियुक्ति इसी निमित्त होती है। पुलिस यही देखभाल करने में जुटी रहती है। बंदीगृहों की इमारतें इसी रोकथाम के लिए खड़ी हैं। इस सरंजाम की आवश्यकता को उपयोगी मानते हुए भी, जब यह पर्यवेक्षण होता है कि अपराधों के विस्तार में इस प्रतिबंध से कितनी रोकथाम हुई तो निराशा भरी गहरी साँस लेते हुए सफलता को नगण्य और असफलता की बहुलता को स्वीकार करना पड़ता है।
आज चतुराई इतनी बढ़ गयी है, कि कोई किसी को भी चकमा दे सकता है। जब लोग स्वयं के साथ ईश्वर एवं समाज की आँखों में धूल झोंकने में जुटे हैं, ऐसे में शासन के नियंत्रण की बिसात ही क्या है जो अपनी ढीली पकड़ से अनाचार को शिकंजे में कस सके। नीति-मर्यादा निर्वाह के बिना समाज का व्यवस्थाक्रम कैसे चले? अनाचार के घुटन भरे वातावरण में कोई भला आदमी भी कहाँ तक साँस रोके खड़ा रहे? आज के तूफानी प्रवाह में किसी हल्के-फुल्के के पाँव कब तक टिके रहें?
व्यक्ति के दृष्टिकोण में निकृष्टता, स्वभाव में दुष्टता और आचरण में भ्रष्टता का अनुपात बढ़ेगा तो फिर निजी जीवन तथा सामाजिक प्रचलन में शालीनता, सुव्यवस्था का स्थिर रहना कठिन है। प्रगति की तूफानी गति ने देश और समाज में मत्स्य न्याय को, जंगल के कानून को, जिसकी लाठी उसकी भैंस को मानवी रीति-नीति का अंग बना दिया है। नीत्सेवाद, स्वेच्छावाद, अवज्ञावाद, उपयोगितावाद जैसे कितने ही दर्शन इस बात का खुला प्रतिपादन करने में जुटे हैं कि नीति-मर्यादाओं का, धर्म-सदाचार का जो झीना-पुराना लबादा बच रहा है, उसे भी उतार कर कचरे के ढेर में फेंक दिया जाय। आचरण के क्षेत्र में तो आस्तिक नास्तिकों की तुलना में बुरे सिद्ध हो रहे हैं। धर्मात्मा की तुलना में वे कहीं अच्छे सिद्ध हो रहे हैं जो अपने को धार्मिकता का पक्षधर तो नहीं कहते, किंतु भले मनुष्यों जैसा जीवन जीते हैं।
यों धरती पर सदा न तो सब भले लोग ही होते है और न सब बुरे ही। दोनों का अस्तित्व किसी-न-किसी रूप में हर स्थान पर, हर क्षेत्र में पाया जाता है। सवाल बहुलता का है। आजादी के बाद अपने देश का एक वर्ग जहाँ साधनों की दृष्टि से सम्पन्न होता जा रहा है, वहीं उसका दृष्टिकोण, स्वः चरित्र एवं लक्ष्य क्रमशः अधिकाधिक पतनोन्मुख हुए है। वर्गविशेष के पास साधनों की बहुलता होते हुए भी सामूहिक जीवन में विपन्नता द्रुतगति से बढ़ती चली जा रही दुर्बलता, रुग्णता, चिंता, उद्विग्नता, तंगी, गरीबी, असुरक्षा, आशंका से जितना आतंकित मनुष्य आज है, उतना कदाचित उससे पूर्व कभी भी न रहा होगा। आपाधापी, निष्ठुरता और आक्रामकता की बढ़ती हुई दुष्प्रवृत्तियाँ-लगता है कहीं हमारे राष्ट्रीय अस्तित्व एवं मानवीय सौंदर्य को निगल ही न लें।
एक ओर उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ, दूसरी ओर महाविनाश की परिस्थितियाँ। दोनों के मध्य सामान्य बुद्धि के द्वारा कोई कड़ी नहीं जुड़ती। यह पहेली उलटी-सीधी सहज ही सुलझाने वाली नहीं है। विसंगतियों के मध्यवर्ती सूत्रों को जोड़ने के लिए मानवी प्रकृति के मर्मस्थल तक पहुँचाना होगा और समझना होगा कि व्यक्ति की मूलभूत सत्ता उसकी आस्थाओं पर अवलम्बित है। विशेषतः आस्थाओं पर अवलम्बित है। विशेषतः मानवी गरिमा, जिसे प्रकारांतर से दूरदर्शी विवेकशीलता, चरित्रनिष्ठा, उदार सहकारिता आदि नामों से पुकारा जाता है। मानवी व्यक्तित्व ही वह धुरी है, जिसका स्तर गिरने या उठने से मनुष्य भला-बुरा सोचता और बनता है। इस मर्मस्थल तक पहुँचने की सामर्थ्य उन साधनों में नहीं है, जिनके आधार पर सामान्य जानकारियों का आदान-प्रदान होता रहता है। नीति, धर्म सदाचार की शिक्षा देने वालों की कहीं कोई कमी नहीं। इस संदर्भ में भाषणों और पुस्तकों की भी कमी नहीं।उतने पर भी उन्हें ध्यान से पढ़ने और श्रद्धापूर्वक अपनाने वाली पृष्ठभूमि ही नहीं है, जो उन परामर्शों पर गौर करे और अपनाने के लिए संकल्प भरी श्रद्धा उभारे। इसमें दोष न प्रचारतंत्र का और न निरोधक विधि-व्यवस्था का। दुर्बलता उस आसक्त-अन्तराल की है।, जो तत्त्वदर्शन और साधना-प्रयोग का खाद-पानी न मिलने के कारण अपनी उर्वरता गँवा बैठी है और मरुस्थल जैसा अनगढ़ और श्मशान जैसा वीभत्स बन कर रह रही है।
आस्था-क्षेत्र को सुधारने-सँभालने और सँजोने की जिम्मेदारी जिस विधि-व्यवसाय के ऊपर निर्भर है, उसी को अध्यात्म-साधना कहा गया है। यह आसक्त प्रधान होने से उसी स्तर की है, जो सहगामी विकृतियों से उबार सके। दल-दल में फँसे हाथी को प्रशिक्षित हाथी ही जंजीर से जकड़कर किनारे तक घसीट जलाने में सफल होते है। लाठी को रोकने के लिए लाठी और घूँसे की प्रत्युत्तर घूँसे से देने पर ही काम बन पड़ता है। मानवीय आसक्ति संसाधन के अवांछनीयता से विरत करके उसे शालीनता का पक्षधर बनाने के लिए आध्यात्मिक साधना की प्रयोग-प्रक्रिया का अवलम्बन ही एकमात्र उपाय है।
प्रचलित आध्यात्मिकता का स्वरूप अलंकारिता ने कुछ-का-कुछ कर दिया है। प्रतीकों का अवलम्बन सीढ़ी के सहारे ऊपर तक चढ़ने जैसा होना था, पर वे भ्रान्ति-ग्रस्त होकर साध्य बन गए है। इष्ट कहते है-जीवन-लक्ष्य को। अब उस स्थान पर सस्ते मनुहार को बाँटने, असंगत मनोकामना पूरी करने वाले देवी-देवता आ विराजे है। आत्मशोधन के स्थान पर देवता को फुसलाने और उससे उचित-अनुचित मनोकामना पूरी करा लेने भर का बाल-विनोद आडम्बरों से लदकर बैठ गया है। विडम्बना कितनी ही बड़ी क्यों न हो, उसे अध्यात्म साधना की मान्यता नहीं मिल सकती। इन दिनों जादूगरी और ब्रह्म-विद्या का एक ही अर्थ बनकर रह गया है चमत्कार-कुतूहल दिखाने वालों का उस खुली बिरादरी में जमघट लगा रहता है, पर यह वास्तविकता थोड़े ही है। इसे अधिक-से-अधिक प्रवंचना का प्रपंच भर कह सकते है। साधना-विज्ञान का स्वरूप इससे ऊँचा है। मानवीय अन्तःकरण को इसी से परिष्कृत कर व्यक्ति एवं समाज में परिवर्तन लाए जा सकते है।
मनुष्य की दूरदर्शी विवेकशीलता को जगाया जाना आवश्यक है।उसे अपनी गौरव-गरिमा का बोध होना चाहिए। साथ ही आस्था-क्षेत्र के उस विभूति भण्डार का भी ज्ञान होना चाहिए, जहाँ से मनुष्य में देवत्व का उदय होता है और उतना बन पड़ने पर सर्वत्र ऐसा वातावरण उमड़ पड़ता है, जिसे धरती पर स्वर्ग का अवतरण कहा और अनुभव किया जा सके।
न केवल नीति-सदाचार के सनकी में मनुष्य को साधनात्मक पुरुषार्थ का अवलम्बन उच्चस्तरीय स्तर तक पहुँचा सकता है वरन् उसे वह विवेक-दृष्टि और साहसिकता भी प्रदान कर सकता है, जिसके सहारे व्यक्तित्व में सन्निहित अनेकानेक प्रतिभाओं को भी प्रखर परिष्कृत किया जा सके। जड़ पदार्थ को भौतिक-विज्ञान ने अनगढ़ स्थिति से अविज्ञान के गर्त से उबारा और मानवीय विधा-सम्पादन की दृष्टि से असाधारण रूप से उपयोगी बनाया है, परंतु व्यक्ति की आंतरिक संरचना एवं समाज की प्रवृत्तियों में अपेक्षित परिवर्तन लाने के लिए अध्यात्म-विज्ञान को भी प्राचीनकाल की तरह इन दिनों अपनी वरिष्ठता सिद्ध करनी है और प्रमाणित करना है। व्यक्तित्व को प्रखर बनाने, स्तर की दृष्टि से असाधारण रूप से समुन्नत बनाने की क्षमता उसमें विद्यमान है। आध्यात्मिक साधनाओं में महान शक्ति हैं निश्चित रूप से विज्ञान से भी बड़ी। विज्ञान मात्र सुविधा-संवर्द्धन में समर्थ है, जबकि आध्यात्मिक साधनाएँ व्यक्ति के अंतराल में ऐसे तत्वों की प्रतिष्ठापना कर सकने में समर्थ होती है, जिनके सहारे विकृतियों के माहौल से लड़ सकना और उन्हें पूरी तरह निरस्त कर सकना हो सके। सामयिक विकृतियों समस्याओं और विभीषिकाओं के समाधान में उसका अनुपम योगदान हो सकता है, साथ ही उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना का सबसे बड़ा आधार भी उसी के सहारे खड़ा हो सकता है। स्मरण रहे, इक्कीसवीं सदी में जिस उज्ज्वल भविष्य का दिव्यदर्शन किया गया है, वह साधनों की बहुलता से नहीं, व्यक्तित्वों की प्रखरता और पवित्रता से ही साकार होगा। अध्यात्म साधनाओं को समझने स्वीकार करने और अपनाने से ही भविष्य में प्रगति और समृद्धि का विस्तार सम्भव बन सकेगा।
साधना की उपलब्धियों की चर्चा किसी को भी चमत्कृत कर देने के लिए पर्याप्त हैं, परन्तु इनका अर्जन उन्हीं के लिए सम्भव है, जो इसके तत्त्वदर्शन को आत्मसात् कर चुके हैं। इस तत्त्वदर्शन के दो आयाम हैं- जिन्हें आस्थापक्ष और क्रियापक्ष का नाम दिया जा सकता है। आस्थापक्ष में विचारों और भावनाओं को प्रभावित करने वाले समस्त ज्ञान-विस्तार को सम्मिलित किया गया है। वेद, शास्त्र, उपनिषद्, दर्शन आदि इसी प्रयोजन के लिए रचे गए हैं। स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन-मनन कथा-प्रवचनों का महात्म्य इसी आधार पर बताया गया है ताकि उस प्रक्रिया के सहारे मानवी चिन्तन का परिष्कार होता रहे और विकृत मनोवृत्तियों से छुटकारा मिलता रहे। इससे विवेकयुक्त दूरदर्शिता का पथ प्रशस्त होता है। प्रज्ञा, भूमा, ऋतम्भरा-इसी परिष्कृत चिन्तन का नाम है।” ऋतं ज्ञानेन मुक्ति” “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमही विद्यते” जैसी उक्तियों में सद्ज्ञान को साधना का प्राण माना गया है। वेदान्त दर्शन को तो विशुद्ध रूप से ज्ञान-साधना ही कहा जा सकता है।
सद्ज्ञान-संवर्द्धन की इस बहुमुखी प्रक्रिया को साधना विज्ञान में योग’ नाम दिया गया है। ‘योग’ का अर्थ है- जोड़ा देना। किसी किससे जोड़ देना- आत्मा को परमात्मा से जाड़ देना। यह स्मरण रखने योग्य तथ्य है कि परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं, वरन् सर्वव्यापी अलौकिक चेतना है। उत्कृष्ट आदर्शवादी आस्थाओं, आकांक्षाओं के रूप में उसकी अनुभूति, अपने विचार संस्थान में की जा सकती है। आत्मसाक्षात्कार का, ब्रह्म साक्षात्कार का अर्थ यही है कि अपनी आस्थाएँ परिष्कृत स्तर की देवोपम दिखने लगें। संकीर्ण स्वार्थपरता, अहंकारिता, विलासिता एवं अनुदारता जैसी दुष्प्रवृत्तियों के भवबन्धनों से छुटकारा मिल जाए। परिष्कृत विचारों एवं भावनाओं की सुखद प्रक्रिया को देखते हुए इसी को ‘स्वर्ग’ कहा गया है। ललक-लिप्सा निकृष्टता एवं कुसंस्कारी आदतों के भवबन्धनों को ताड़ फेंकने की यही स्थिति ‘मुक्ति’ कहलाती है। स्वर्ग किसी ग्रह-नक्षत्र पर बसा हुआ गाँव नहीं है और न मुक्ति से किसी लोक विशेष में जाकर भगवान जी से सेवा कराने का मौका मिलता है। तथ्य इतना भर है कि परिष्कृत दृष्टिकोण अपनाने वाला स्वर्गीय सुख-सन्तोष पाता है और आत्मीयता के विस्तार के साथ संबद्ध सेवा-उदारता की नीति अपनाने वाले को लोभ-मोह की जकड़न से छुटकारा मिल जाता है। विवेकवान-साधना-परायण लोग लोकप्रवाह की परवाह न करके स्वतन्त्र चिन्तन की नीति अपनाते हैं और जीवनमुक्ति का आनन्द लेते है।
योग का उद्देश्य चित्तवृत्तियों का परिशोधन है। महर्षि पतंजलि ने प्रकारान्तर से योग की यही परिभाषा की है। पशु-प्रवृत्तियों को देव आस्थाओं में बदल देने वाले मानसिक उपचार का नाम योग है। यह विशुद्ध रूप से चिन्तन-परक होता है। योगीजन इन्हीं प्रयत्नों में तल्लीन रहते हैं और अपने संग्रहित कुसंस्कारों को उच्चस्तरीय आस्थाओं में परिणत करने के लिए भावनात्मक पुरुषार्थ करते रहते हैं। निष्कृष्टता जितने अंशों में उत्कृष्टता के साथ जुड़ जाती है, उतने ही अंशों में आत्मा को परमात्मा की प्राप्ति हो चली, ऐसे माना जाता है।
साधना-विज्ञान का दूसरा पक्ष क्रियापरक है- इसे ‘तप’ कहते हैं। आत्मकल्याण इसका एक चरण है और लोककल्याण दूसरा। इन दोनों के लिए जो कोशिशें करनी पड़ती हैं, उनसे अभ्यस्त पशु-प्रवृत्तियों को चोट पहुँचती है। स्वार्थ-साधनों में कभी आती है और परमार्थ प्रयोजनों की सेवा-साधना करते हुए कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। स्वार्थ-सुविधा में कटौती करके ही परमार्थ की दिशा में कुछ किया जा सकता है। मोटेतौर पर यह घाटे का सौदा है। अभ्यस्त प्रवृत्तियों के विपरीत पड़ने के कारण इसमें कष्ट भी अनुभव होता है। इन कठिनाइयों को पार करने के लिए शरीर की तितिक्षा का, मन की सादगी का तथा इस मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का सामना करने योग्य आन्तरिक साहसिकता का सहारा लेना पड़ता है। अपने को इस ढाँचे में ढालने के लिए जितने भी प्रयास किए जाते हैं, वे सब इसी तप की श्रेणी में गिने जाते है।
इन दिनों सत्य की अनदेखी किए जाने के कारण आसन, प्राणायाम, नेति, धोति, बन्धु, मुद्रा आदि व्यायामों को ही योग की संज्ञा दी जाने लगी है। इसी तरह व्रत-स्नान मौन आदि कष्टसाध्य अभ्यासों को ही तप मानकर सन्तोष कर लिया जाता है। इस प्रचलन में यह सर्वथा भुला दिया गया है कि साधनाएँ हमेशा ही किसी साध्य की प्राप्ति के लिए ही जाती है। उपासनात्मक कर्मकाण्डों का उद्देश्य भावनात्मक स्तर को प्रयत्नपूर्वक ऊँचा उठाना है यदि आस्थाओं का स्तर न बदला जा सके और मात्र चित्र-विचित्र शारीरिक क्रियाओं को करते रहा जाय तो इतने भर का प्रभाव केवल शरीर तक ही सीमित रह जाएगा। चेतना का परिष्कार सम्भव न बन पड़ेगा। जो साधना का मूलभूत उद्देश्य है। साधना के तत्त्वदर्शन को और भी अधिक बारीकी से समझना हो तो इसे चार बिन्दुओं में स्पष्ट करना पड़ेगा- (१) आत्मज्ञान (२) ब्रह्मज्ञान (३) तत्त्वज्ञान, (४) सद्ज्ञान। आत्मज्ञान वह है जिस में जीव का, जीवन का, अन्तः चेतना के उत्थान-पतन का निरूपण किया जाता है और आत्मा-चिन्तन आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास का सूक्ष्मदृष्टि से प्रकाश-युक्त मार्गदर्शन किया जाता है। दूसरे शब्दों में, इसे जीवात्मा की विवेचना कह सकते हैं।
ब्रह्मज्ञान वह है- जिसमें परमात्मा की सत्ता की व्याख्या करते हुए अचिंत्य एवं नेति-नेति कहकर बौद्धिक असमर्थता प्रकट कर दी गयी है, परन्तु मनुष्य जीवन के साथ परमात्मसत्ता का जितना तालमेल बैठता है, उस पर कई दृष्टियों से प्रकाश डाला जाता है। आत्मा के साथ परमात्मा के मिलन में निस्सन्देह लोहे और पारस के संपर्क से सोना बन जाने वाली किम्वदन्ती सार्थक देखी जा सकती है। अमृत और कल्पवृक्ष के लाभ-माहात्म्य का जो अलंकारिक वर्णन मिलता है उसे परमात्मा के सान्निध्य से मिलने वाली भौतिक तथा आत्मिक उपलब्धियों को देखते हुए अक्षरशः सही माना जा सकता है। सिद्धियों का, चमत्कारी अलौकिकताओं का जो विवरण साधना ग्रन्थों में मिलता है, उसे परमात्मसत्ता के साथ जीवात्मा के सान्निध्य-संपर्क की सुनिश्चित प्रतिक्रिया कहा जा सकता है। ईश्वरप्राप्ति को जीवन-लक्ष्य की पूर्ति, पूर्णता में परिणति, परमपुरुषार्थ, परमलाभ आदि नामों से पुकारा जाता है। आत्मा को परमात्मा की उच्चस्थिति में विकसित कर लेने वाले व्यक्ति, निस्संदेह नर रूप में नारायण कहे जा सकते है। उनकी विशेषताओं-विभूतियों का पारावार नहीं रहता।
तत्त्वदर्शन का तीसरा पक्ष है- तत्त्वज्ञान। इसे विचार-विज्ञान भी कह सकते हैं। विचारों की प्रचण्ड शक्ति और उनकी प्रतिक्रियाओं से बहुत कम लोग परिचित होते हैं। तथ्य यह है कि हाड़-माँस के पुतले में जितना चेतन-चमत्कार देखा जाता है, वह सब विचार वैभव का ही परिणाम है। व्यक्तित्व की उत्कृष्टता-निकृष्टता मनुष्य की प्रतिभा, वरिष्ठता और सर्वतोमुखी दुर्बलता का मूल्याँकन किसी के विचारों का स्तर देखकर ही किया जा सकता है। सफलता और असफलता के कारणों में साधनों का- परिस्थितियों का नहीं, संकल्पशक्ति और व्यवस्था बुद्धि का ही प्रमुख महत्त्व रहता है। जो लोग गलत ढंग से सोचते हैं और गलत विचारों को अपनाते हैं, उनके जीवन का स्वरूप और भविष्य दोनों ही अन्धकार से ढक जाते हैं। मस्तिष्क को जिस तरह सोचने की आदत है, उसका गुण-दोष के आधार पर विवेचन करते हुए मात्र औचित्य को अपनाने की साहसिकता को मनस्विता कहते हैं। मनस्वी लोग ही जीवन का सच्चा आनन्द लेते हैं और दूसरों के श्रद्धाभाजन बनते हैं।
चौथा पक्ष है-सद्ज्ञान सद्ज्ञान का तात्पर्य है- नीतिशास्त्र, व्यवहार-कौशल शिष्टाचार, सदाचार, कर्त्तव्य-पालन और उत्तरदायित्वों का निर्वाह। धर्म इसी को कहते हैं। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, उसे एकाकी नहीं, सहजीवन अपनाना पड़ता है। सहकारिता के बिना, पारस्परिक आदान-प्रदान के बिना न स्थिरता रह सकती है, न प्रगति सम्भव हो सकती है। हमें परस्पर मिल-जुलकर ही रहना होता है और सामाजिकता के नियमों का पालन करते हुए, नागरिक उत्तरदायित्वों को निबाहते हुए सज्जनता का जीवन जीना पड़ता है। इस क्षेत्र में जहाँ जितनी उच्छृंखलता बरती जा रही होगी, वहाँ उतनी ही अशान्ति फैलेगी और विपन्नता उत्पन्न होगी। अपने आपके प्रति, स्वजन-सम्बन्धियों के प्रति, सर्वसाधारण के प्रति हमारी रीति-नीति एवं व्यवहार-पद्धति क्या हो? उसकी सही और शालीनतायुक्त गतिविधि अपनाने को लोकव्यवहार एवं सद्ज्ञान कहा जाता है।
साधना का तत्त्वदर्शन इन चारों ज्ञान प्रक्रियाओं के परिष्कार एवं समन्वय के आधार पर विनिर्मित होता है। इसके पारंगतों को मनीषी, ऋषि, तत्त्वज्ञानी ब्रह्मवेत्ता, द्रष्टा, आत्मदर्शी आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है। वे अपने में परमात्मा का दर्शन करते हैं। इन चारों के समन्वयात्मक स्वरूप की अभिव्यक्ति साधना के क्रियात्मक पक्ष से होती है, जिसे ‘तप’ कहते हैं। इसे तीन बिन्दुओं में स्पष्ट किया जा सकता है- (१) आत्म-निग्रह के लिए की गयी तितिक्षा (२) परमार्थ प्रयोजनों के लिए त्याग और बलिदान, (३) साधनात्मक कर्मकाण्डों के माध्यम से आत्मशिक्षण की प्रसुप्त शक्तियों का जागरण।
आत्मनिग्रह में अस्वाद व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य, मौन, सर्दी-गर्मी के ऋतु-प्रभाव का सहन, सादगी, मितव्ययिता दिनचर्या का निर्धारण और उसका कड़ाई से पालन, इस तरह शरीर और मन की पुरानी अवांछनीय आदतों पर रोकथाम के लिए बरती हुई कड़ाई तितिक्षा वर्ग में आती है। सेवा-सहायता सामूहिक सत्कर्मों में सहयोग, लोक-कल्याण की प्रवृत्तियों में समय, श्रम एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाना। अनीति के विरुद्ध संघर्ष करने में लगने वाली चोटों को सहने के लिए साहस एकत्र करना, लोकप्रवाह से विपरीत चलने के कारण मिलने वाले अपमान, विरोध एवं प्रहार का धैर्यपूर्वक सामना करना। परमार्थ प्रयोजनों में इस प्रकार की कष्ट-सहिष्णुता तप-साधना का दूसरा चरण है।
तीसरे तप वर्ग में विभिन्न प्रकार के साधनात्मक कर्मकाण्ड आते हैं। जप-ध्यान प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरुष चरण आदि अनेकों सम्प्रदायों में प्रचलित अनेकों विधि-विधान इसी उपासना वर्ग में आते हैं।
साधनात्मक तत्त्वदर्शन के उपर्युक्त चार और तीन कुल मिलाकर सात सोपान हैं। विभिन्न अलंकारों के साथ इन्हीं सात तथ्यों को मनीषियों ने विभिन्न प्रतिपादनों के साथ प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है। साधना के तत्त्वदर्शन को समझने के लिए अनेकानेक शास्त्र पढ़ने को और विद्वानों के प्रवचन-प्रतिपादन सुनने को मिलते हैं। उनमें इन सात महातथ्यों के अलावा और कुछ नहीं है। यदि इस तत्त्वदर्शन को सही रीति से समझा, अपनाया और आत्मसात् किया जा सके तो साधनात्मक उपलब्धियों का अर्जन अपने जीवन का अनिवार्य प्रसंग बने बिना नहीं रहेगा।
जड़ और चेतन तत्त्वों के सम्मिश्रण से बनी मनुष्य की स्थूल शारीरिक व्यवस्था तो एक सीमा तक ही लोगों ने जानी है और आहार-विहार की अनुकूलता उपलब्ध कर स्वस्थ एवं सुन्दर बनने का यथासम्भव प्रयत्न किया है, किन्तु चेतन तत्त्व की, सूक्ष्म और कारण शरीर की व्यवस्था कैसे रखी जाय, इसे कोई बिरले ही जानते हैं। इस ज्ञान के अभाव में मानव जीवन के द्वारा उपलब्ध हो सकने वाले महत्वपूर्ण लाभों से हम प्रायः वंचित ही रह जाते हैं।
मानवीय अस्तित्व को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है- (१) स्थूल, (२) सूक्ष्म, (३) कारण। साधना-विज्ञान में मनुष्य के यह तीन शरीर बताए गए हैं। जिस प्रकार केले के तने को चीरने पर उसमें एक के भीतर एक परतें निकलती हैं, उसी प्रकार आँखों से दीख पड़ने वाले रक्त-माँस से बने इस स्थूल शरीर के भीतर एक सूक्ष्म शरीर है। इसके भीतर एक कारण शरीर का अस्तित्व विद्यमान है। जिस प्रकार हम शरीर के ऊपर बनियान, उसके ऊपर कुर्ता, उसके ऊपर उपर्युक्त तीन आवरण धारण किए हुए हैं।
स्थूल शरीर वह है- जिससे हम खाने, सोने, चलने-बोलने आदि की क्रियाएँ सम्पन्न करते हैं। सांसारिक जीवन इसी से चलता है। रोटी कमाने, शुभ-अशुभ कर्म करने, इन्द्रिय सुख भोगने आदि के प्रयोजन इसी शरीर से पूरे होते हैं।
इसके भीतर सूक्ष्म शरीर है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार इन चार वर्गों में विभाजित अन्तःकरण मनुष्य का एक प्रकार से सूक्ष्म शरीर ही है। विचारणा, प्रतिभा, स्फूर्ति, आकांक्षा, अभिरुचि, पीड़ा जैसी मानसिक गतिविधियाँ इसी शरीर में सन्निहित हैं। यों यह आवरण स्थूल शरीर में दूध में घुले हुए मक्खन की तरह समाविष्ट है, फिर भी इसका प्रधान स्थल मस्तिष्क माना गया है तीसरा कारण शरीर आत्मा के अति समीप होने के वजह से उच्चस्तरीय दिव्य भावनाओं का आधार है। उसमें केवल भावनाएँ संचरित होती है। जिनका आन्तरिक अधःपतन अत्यधिक हो चुका है, उनको छोड़कर शेष सभी के कारण शरीर में दया, प्रेम, करुणा, संवेदना, धर्म, कर्त्तव्य, संयम जैसे उच्चभाव उठते रहते हैं। जिनने दुष्टता में परिपक्वता प्राप्त कर ली है, उन्हीं का करण शरीर नरपिशाचों जैसी कुचेष्टाएँ करने पर सहमत हो जाता है।
तीनों शरीरों का संक्षिप्त परिचय यहाँ इसलिए दिया गया है, ताकि तीनों शरीरों की त्रिविध साधना का सर्वांगीण स्वरूप समझने में सुविधा हो। युग-परिवर्तन की, नवनिर्माण की प्रक्रिया उन्हीं व्यक्तियों के द्वारा सम्पन्न होगी, जिनमें देवत्व का प्रकाश समुचित मात्रा में प्रखर हो चला है। तथाकथित लेखक, वक्ता, नेता, अभिनेता, आन्दोलनकारी, प्रतिभावान व्यक्ति अपने साधनों के आधार पर कुछ समय के लिए चमत्कार जैसा जादू खड़ा कर सकते हैं, पर उनमें स्थिरता तनिक भी न होगी। बालू की दीवार की तरह उनकी कृतियाँ देखते-देखते धूल-धूसरित हो जाती हैं और जिनका आज जयघोष था, कल उनके अस्तित्व का पता लगाना भी कठिन हो जाता है। स्थिरता तो सच्चाई और आत्मबल की गहराई में सन्निहित है। इक्कीसवीं सदी में अपने देव-परिवार के सदस्यों को जो महान कार्य करने हैं, वे प्रखर साधनाओं के आधार पर ही संभव हो सकते हैं। इन कार्यों का भारी उत्तरदायित्व वहन कर सकने की क्षमता केवल देवत्व-सम्पन्न महामानवों में ही मिलेगी। अतएव नवनिर्माण के कर्णधारों, सूत्र-संचालकों सेनानायकों को इन्हीं दिनों स्वयं के व्यक्तित्व को साधना की प्रचण्ड ऊर्जा से ओजस्वी बनाना आवश्यक है।
स्थूल, सूक्ष्म और करण शरीरों की चर्चा इसलिए करनी पड़ी, क्योंकि इन तीनों को ही समान रूप से देवत्व सम्पन्न बनाने से ही समग्र देवत्व की आवश्यकता पूरी होती है। इन तीनों को ठीक तरह साधने-संभालने का नाम ‘साधना’ है। साधना से ही मनुष्य में देवत्व का उदय होता है। यह बात ठीक तरह से समझ लेनी चाहिए कि उपासना शुरुआती शिक्षा है और साधना उच्चस्तरीय प्रशिक्षण। भजन-पूजन से मन की प्रवृत्ति माया से ब्रह्म की ओर मुड़ जाती है। ईश्वर के स्मरण और सान्निध्य की उपयोगिता प्रतीत होती है। आत्मकल्याण का मार्ग मिलता है। इससे आगे का प्रयोजन साधना के द्वारा पूर्ण होता है। मनोवृत्तियों की वासना-तृष्णा से विरत कर संयम-परमार्थ में प्रवृत्त करना साधना का उद्देश्य है। इस मार्ग पर जितना आगे बढ़ा जाता है, उतनी ही आन्तरिक पवित्रता निखरती है और ईश्वरीय प्रकाश का दिव्यदर्शन होता है।
मानवीय व्यक्तित्व में देवत्व का अधिकाधिक समावेश करने के लिए हर श्रेयार्थी को साधना का अवलम्बन लेना पड़ता है। साधना के दो वर्ग हैं- (१) एक विशिष्ट लोगों की-विशिष्ट प्रयोजन के लिए विनिर्मित प्रक्रिया (२) सर्वसाधारण के लिए सहज, सुगम, सौम्य पद्धति। विशिष्ट प्रक्रिया योगी- यती, एकान्तवासी, सांसारिक उत्तर-दायित्वों से निवृत्त असाधारण मनोबल सम्पन्न, कठोर तपश्चर्या के लिए समुद्यत लोगों के लिए है। हठयोग, षट्चक्र-बेधन कुण्डलिनी जागरण, तन्त्र-योग प्राणयोग आदि साधनाएँ इसी प्रकार की है पर यह मार्ग अत्यन्त कठिन है। भूल होने पर इस राह में खतरे-ही-खतरे हैं। निश्चय ही उससे ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त होती हैं, पर उन उपलब्धियों से चमत्कार-प्रदर्शन द्वारा लोगों को विस्मित-चकित कर देने की आकांक्षा मात्र अहंकार ही बढ़ाती है। सिद्धियों द्वारा किसी का तात्कालिक कष्ट-निवारण भी सम्भव है और उसमें थोड़ा-बहुत आत्म–संतोष भी प्राप्त हो जाता है, लेकिन यह मार्ग है जोखिम भरा ही।
सौम्य साधना-पद्धति का मार्ग सर्वसाधारण के लिए सुगम है। आजीविका-उपार्जन तथा सामान्य गृहस्थ जीवनयापन करते हुए इस साधनाक्रम को अपनाया जा सकता है।
इस सौम्य साधना-पद्धति द्वारा स्थूल-सूक्ष्म-कारण तीनों शरीरों का संस्कार-परिष्कार परिमार्जन और परिवर्धन किया जाता है। इसके तीन प्रयोग हैं- (१) कर्मयोग, (२) ज्ञान योग, (३) भक्तियोग। तीनों की सन्तुलित क्रियापद्धति का अवलम्बन ही श्रेयस्कर हैं। श्रीमद्भागवतगीता व अन्य धर्म ग्रंथों में इसी प्रक्रिया का विवेचन है। अपनी विचारपद्धति-कार्यपद्धति और भावस्थिति में यदि इन तीनों आस्थाओं का समुचित समावेश कर या जाय, तो हम अपनी असह्य यंत्रणा की वर्तमान मनोभूमि से मुक्त होकर इसी जीवन में देवत्व के अभ्युदय की अनुभूति कर सकते हैं। इस क्रिया विधान में कर्मयोग, ज्ञानयोग एवं भक्तियोग तीनों का इस ढंग से समावेश किया गया है कि व्यक्ति के तीनों शरीर परिपुष्ट होते चलें और समाज के विकास के पुण्यप्रयोजन का भी कार्य होता चले।
कर्मयोग की आधारशिला है- प्रातःकाल आँखें खुलते चारपाई पर पड़े-पड़े ‘हर दिन नया जन्म हर रात नयी मौत’ की विचारणा-प्रक्रिया को अपनाना तथा प्रस्तुत दिन के सर्वोत्तम सदुपयोग की तैयारी कर निश्चित कार्यक्रमों, गतिविधियों एवं विचार प्रक्रिया का निर्धारण। सम्पूर्ण दिन मन में किस स्तर की भावनाएँ, किस काम के साथ संयोजित की जाएँगी, यह भी निश्चित कर लेना अनिवार्य है। दिन भर इसी निर्धारण का दृढ़ता से पालन सामान्य जीवनक्रम को ही कर्मयोग की साधना का फल प्रदान करेगा। फिर रात्रि में शयन पूर्व बिस्तर पर पहुँचते ही दिन की गतिविधियों का लेखा-जोखा कर सफलताओं के लिए ईश्वर को धन्यवाद देना तथा भूलों के लिए सच्चे पश्चात्ताप के साथ क्षमा-प्रार्थना कर, पूर्ण निश्चिन्तता के साथ शान्तिपूर्वक निद्रा देवी की गोद में सो जाना।
कर्मयोग की इस साधना के साथ ही ज्ञानयोग की साधना भी जुड़ी है। उस हेतु मन में उत्कृष्ट विचारों का अनवरत समावेश आवश्यक है। प्रेरक स्वाध्याय ही इसका मार्ग है। रूढ़िवादी रीति से किन्हीं किस्से-कहानी जैसी किताबों का पढ़ना स्वाध्याय नहीं है। व्यवहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा दिखलाने वाला स्वाध्याय ही आवश्यक है और उसे दैनिक जीवन का एक नित्यकर्म मानकर किया ही जाना चाहिए।
यह हुई ज्ञानयोग की निजी साधना। इसे ज्ञानयज्ञ का रूप देना चाहिए। समाज में सद्विचारों का सर्वाधिक अभाव है। विश्वव्यापी शोक-सन्ताप का यही कारण है। जनमानस का स्तर परिवर्तित करने का ही दुःख-दारिद्र्य की प्रचण्ड आग बुझेगी। विचार-क्रान्ति आज की सर्वोपरि आवश्यकता है। ज्ञानयज्ञ इसी आवश्यकता की पूर्ति करने वाला महान अभियान है। एक घण्टा समय और बीस पैसा नित्य खर्च करना देखने में तो एक छोटा-सा काम है, पर उसका सम्मिश्रण परिणाम अत्यधिक है। यह युगपरिवर्तन का एक सशक्त माध्यम है। साधक का आत्म-कल्याण एवं विश्व-कल्याण दोनों ही ज्ञान यज्ञ द्वारा सहज सम्भव हैं।
भक्तियोग का अर्थ है-अन्तरात्मा में दिव्य भावनाओं का अनवरत प्रवाह। परमब्रह्म से अपने अनन्य प्रेम का स्मरण, तादात्म्य की प्रचण्ड अनुभूति ओर अनन्य उभयपक्षीय प्रेम हिलोर की प्रखर अनुभूति का स्मरण-अभ्यास अवरुद्ध आन्तरिक रस स्रोतों को पुनः मुक्त करता है। इस गहरे प्रेम स्रोतों का प्रांजल प्रवाह सम्पूर्ण परिवेश में सरसता, सौमनस्यता तथा प्रफुल्लता की वृद्धि करता है। सच्चा साधक, सच्चा भक्त मात्र ईश्वरीय ध्यान छवि को प्यार नहीं करता, अपितु ब्रह्माण्ड में संव्याप्त ईश्वरीय सत्ता से प्राणिमात्र से अनन्य आत्मीयता भरा प्रेम सम्बन्ध स्थापित कर लेता है।
यह तादात्म्य भावना पग-पग पर करुणा, उदारता, सहृदयता, सहानुभूति, सेवा, सज्जनता के रूप में, कार्यरूप में प्रकट-परिणत होती रहती है। ईश्वर भक्त भला परिग्रही-स्वार्थी किस तरह हो सकता है? उसके लिए तो एक ही मार्ग है- अपनी समस्त उपलब्धियों को विश्वमानव के चरणों में व्यवहारतः समर्पित कर देना। इससे कम में कभी भी ईश्वरीय अनुकम्पा प्राप्त नहीं हो सकती। लोकमंगल में अपना सर्वस्व समर्पित करने वाला परमार्थ-परायण व्यक्ति ही सच्चा ईश्वरभक्त कहा जा सकता है। अपने परिवार का पालन भी वह इसी भावभूमि के आधार पर ही करता है, सभी लोगों के साथ उसके व्यवहार का भी यही आधार होता है। वासना-तृष्णा से सर्वथा रहित, निर्मल-निश्चित अन्तःकरण वाला व्यक्ति ही भक्तियोग का अधिकारी है। शबरी, मीरा, सूर, तुलसी आदि भक्तों ने तथा सभी ऋषि-मुनियों ने इसी भावभूमि पर पहुँचकर ईश्वर-दर्शन आत्मसाक्षात्कार का परमानन्द प्राप्त किया था और दूसरों के लिए भी वही राजमार्ग खुला है।
स्थूल शरीर का कर्मयोग से परिष्कार, सूक्ष्म शरीर का ज्ञानयोग द्वारा उत्कर्ष एवं कारण शरीर में भक्तियोग द्वारा परमेश्वर की प्रतिष्ठापना ही सार्वभौम मार्ग है। तीन शरीरों की यह त्रिविध साधना करने वाले का परिष्कृत जीवन स्वयं के लिए, परिवार के लिए और समस्त संसार के लिए मंगलमय होता है। निर्मल अन्तःकरण में ईश्वर के दर्शन होते है और उसे देखने पर वह सब उपलब्ध हो जाता है, जो कुछ इस संसार में पाने योग्य है।
सोने को आग में डालकर उसमें घुसी हई मिलावट एवं कुरूपता को दूर किया जाता है। इस अग्नि-संस्कार से ही उसकी आभा निखरती है, प्रामाणिकता सिद्ध होती है। यदि तपाने के झंझट से बचने की सोचा जाय तो सोने और पीतल में कोई अन्तर ही न सिद्ध किया जा सकेगा। मनुष्य की महान विभूतियों को भी प्रकट एवं प्रखर बनाने के लिए यह आवश्यक है कि वह तप-साधना के अग्नि-संस्कार को सहन एवं स्वीकार करे। तप का अर्थ है- सदुद्देश्य के लिए उस हद तक बढ़ चलना, जिसमें भौतिक कष्टों की हँसते-खेलते उपेक्षा की जा सके। इस तथ्य को जीवन-प्रक्रिया में उतारने के लिए, आत्मबल-सम्पन्न तपस्वी जीवन की भूमिका में विकसित होने के लिए ऐसे उपचार-कर्मकाण्ड अपनाने पड़ते हैं, जो अभीष्ट प्रयोजनों की पूर्ति में सहायक सिद्ध हो सकें। इन्हीं साधनाओं को तपश्चर्या का बहिरंग कलेवर कह सकते है।
व्रत-उपवास शीतल जल स्नान, धूप-आतप सहना, धूनी तापना, नंगे पाँवों चलना, देर तक खड़े रहना, कठोर आसन लगाकर बैठना, मौन रहना, भूमिशयन, नमक-शक्कर आदि के स्वादों का त्याग, ब्रह्मचर्य जैसे क्रिया-कलापों को तप-साधना में गिना जाता है। जो इन उपचारों को क्रियान्वित करते हैं। तपस्वी कहलाते हैं। तप-साधना की महिमा-माहात्म्य अध्यात्म शास्त्रों में भरा पड़ा है। तप के प्रताप से देवशक्तियों के द्रवित होने और अभीष्ट वरदान प्रदान करने के कितने ही पौराणिक उपाख्यान पढ़ने और सुनने को मिलते हैं। तपस्वी का सम्मान करने के लिए हमारी सहज श्रद्धा उमड़ती है। जहाँ दूसरे लोग सुख-सुविधाओं का तनिक भी त्याग नहीं कर सकते, वहाँ तपस्वी इन कष्टसाध्य क्रिया-कलापों को खुशी-खुशी अपना लेता है। उसमें संकल्पशक्ति की प्रखरता स्पष्ट है। दूसरे लोगों की तुलना में वह स्वतन्त्र निर्णय करने और जन-सामान्य के प्रचलित ढर्रे का व्यतिक्रम करने में समर्थ है। इस साहसिकता के सामने यदि मानवी श्रद्धा नत-मस्तक होती है, तो उसे सर्वथा उचित ही कहा जाएगा।
तपश्चर्या का बहिरंग ढाँचा किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए, तत्त्वदर्शियों ने किस प्रयोजन की पूर्ति के लिए बनाया, इस तथ्य पर गहराई के साथ विचार करने की जरूरत है। यदि यह सब निष्प्रयोजन रहा होता, तो उसे मात्र उत्पीड़न ही कहा जाता। दूसरों की हत्या करने की तरह आत्महत्या भी अपराध है, ठीक इसी तरह अपने आपको सताना भी आत्म-उत्पीड़न ही कहा जाएगा और उसकी निन्दा की जाएगी। ऐसा हुआ भी है। पारसी धर्म में उपवास को निन्दनीय ठहराया गया है, क्योंकि इससे आत्म-कष्ट होता है। फ्रायड जैसे मनोवैज्ञानिक ब्रह्मचर्य को आत्मप्रताड़ना कहते है और उसकी ढेरों हानियाँ गिनाते हैं। सर्दी-गर्मी का दबाव, अंगों को तोड़ मरोड़, असुविधापूर्ण रहन-सहन अपनाकर जीवनी-शक्ति का अपव्यय जैसे अनेकानेक तर्क इस पक्ष में पड़ते हैं कि तप की कष्टप्रद साधना हानिकर है। ‘बुद्ध चरित्र’ में आता है कि तथागत जब कठोर उपवासों द्वारा काया को अत्यन्त दुर्बल बना चुके तो एक देवकन्या ने प्रकट होकर उन्हें मध्यम मार्ग को अपनाकर औरों को भी उसी पर चलने का उपदेश देने लगे।
शरीर को बलिष्ठ बनाना एक लक्ष्य है, उसकी प्राप्ति के लिए अमुक प्रकार के व्यायाम, अमुक सीमा तक किए जाने चाहिए। पर यदि कोई अत्युत्साह के आवेश में उन व्यायामों को ही चमत्कारी मान बैठे और सब कुछ छोड़कर उन्हीं को पकड़कर बैठ जाय तो इससे लक्ष्य की प्राप्ति में सहायता के स्थान पर उल्टी बाधा ही पड़ेगी। व्यायाम के साथ उपयुक्त आहार-विहार रहन-सहन दिनचर्या भी आवश्यक है। इन सब बातों की उपेक्षा करके अकेले व्यायाम पर चिपट पड़ना असन्तुलित प्रयास ही कहा जाएगा। तप-साधना में अक्सर ऐसी ही भूल की जाती है। यह भुला दिया जाता है कि इन प्रयोजनों का आविष्कार-आविर्भाव किस निमित्त किया गया है और उसका कितना उपयोग, किस दृष्टिकोण से करने पर कितना लाभ हो सकता है? यह समस्त पृष्ठभूमि ध्यान में रखते हुए ही यदि तप-साधना का अवलम्बन किया जाय तो ही वे लाभ मिल सकेंगे- जिनका वर्णन तप-साधना के महात्म्य प्रकरण में बताया गया है।
तप-साधना के समस्त उपाय-उपचार इसलिए बनाए गए हैं कि आदर्शवादी जीवन-प्रक्रिया अपनाने में स्वभावतः ही कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इन्हें हँसते-खेलते सहन करते रह सकना अपने स्वभाव का अंग बन जाय। उस तरह की कष्टसाध्य जीवन-प्रणाली अभ्यास में उतरकर सहज-स्वाभाविक बन जाय। स्पष्ट है कि न्यायोपार्जित जीविका सीमित ही रहेगी। फिर उदार व्यक्ति की अन्तरात्मा भी तो निष्ठुर पाषाण जैसी न रहेगी। उसे सत्प्रयोजनों के लिए अपनी आजीविका का एक अंश अनिवार्य रूप से खर्च करते रहना पड़ेगा। सीमित आजीविका और परमार्थ-प्रयोजनों का अतिरिक्त भार-इन दो कारणों से आदर्शवादी को प्रायः दूसरों की तुलना में आर्थिक तंगी में ही रहना पड़ता है। सादा-जीवन उच्चविचार’ का प्रथम साधना सिद्धान्त इसी आधार पर बना है। कारण कि जो भी तप-साधना अपनाना चाहते हैं, उन्हें प्रथम साधना मितव्ययिता की, सादगी की गरीबी की करनी चाहिए। इस अभ्यास से ही उसकी परिस्थितियाँ ऐसी रह सकेंगी, जिनमें तपस्वी जीवन की रीति-नीति का निर्वाह सम्भव हो सके और उसको बिना अनीति उपार्जन की अपेक्षा किए, सत्कर्मों के लिए आवश्यक खर्च में बिना कृपणता बरते, बड़ी सरलता और प्रसन्नता के साथ अपना ढर्रा चलाते रह सकना सम्भव हो जाए। तपश्चर्या के विविध अभ्यास इस प्रमुख प्रयोजन को भली प्रकार पूरा कर सकने की सफलता प्रदान करते हैं।
व्रत-उपवास में नमक-शक्कर जैसी स्वादिष्टता को छोड़ने का प्रयोजन यह है कि स्वल्प, सस्ता एवं सादा भोजन भी यदि मिलती रहे, तो वह गरीबी की स्थिति अखरे नहीं। न्यायोपार्जित आजीविका में से सत्प्रयोजनों का अंशदान निकालकर जो बच जाय, उस रूखे-सूखे को अमृत मानकर गुजर कर ली जाय। ऐसी सादगी का अभ्यस्त व्यक्ति अर्थ-प्रलोभन के लिए दुष्कर्म करने से सहज ही बच जाता है और सन्मार्ग पर चल सकने योग्य मनोभूमि को अक्षुण्ण रख सकता है। व्रत-उपवास इसी अभ्यास के लिए हैं। नमक-शक्कर जैसे स्वादों को छोड़कर रूखे पर गुजर करने का अभ्यास करना तप-साधना में सफलतापूर्वक आगे बढ़ सकने की क्षमता प्रदान करता है।
तपस्वी को इन्द्रिय लिप्साओं पर नियन्त्रण करना पड़ता है। उनके उभार मनुष्य का मस्तिष्क उद्विग्न करते हैं और उन वासनाओं की पूर्ति के लिए चिन्तन, समय, श्रम, मनोयोग, कौशल एवं धन का बहुत बड़ा अंश नष्ट करना पड़ता है। ब्रह्मचर्य की बात इसी दृष्टि से है। वैसे भी आज की परिस्थितियों में सन्तान का सीमाबंधन युग की अनिवार्य आवश्यकता है। उसकी पूर्ति के लिए ब्रह्मचर्य सर्वोत्तम उपाय है। शक्तियों को सदुद्देश्य में लगाने के लिए, जनसंख्या संकट से लड़ने के लिए ब्रह्मचर्य का श्रेष्ठतम स्थान प्राप्त है। इससे न केवल शारीरिक-मानसिक समर्थता का लाभ है वरन् उपरोक्त दो काम ऐसे हैं, जिन्हें आत्मिक प्रगति एवं सामाजिक स्थिरता की दृष्टि से सर्वोच्च स्थान दिया जा सकता है। कामुकता पर नियंत्रण करने की प्रवृत्ति को, ब्रह्मचर्य व्रत को इसीलिए सम्मानजनक स्थान प्राप्त है। पतिव्रत-पत्नीव्रत आदि के बन्धन इसी दृष्टि से हैं। गृहस्थ आरंभ में रहते हुए भी अधिकाधिक संयम बरतने का निर्देश इन्हीं कारणों से है। ब्रह्मचर्य की तप-साधना अकारण नहीं है। उसके पीछे जिस उद्देश्य की पूर्ति का समावेश है- उसे ध्यान में रखकर चला जाय तो अपना और अपने प्रभाव क्षेत्र का आत्मिक स्तर बढ़ता चला जाएगा।
वाणी का मौन या सीमित व उपयोगी शब्दों का उच्चारण एवं मंत्र-जप ये दोनों ही प्रयोजन वाणी पर नियंत्रण करने की दृष्टि से हैं। आवेशग्रस्त, कटु, दुर्वचन न बोलें, छल, व्यंग्य, तिरस्कार एवं गिराने वाले शब्दों का उच्चारण न करें। उच्चारण का प्रत्येक शब्द श्रेयस्कर सदुद्देश्य के लिए बोला जाय, तो उसमें स्नेह-सौजन्य का समुचित समावेश होगा।
जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए जहाँ एक पक्ष व्यक्तिगत जीवन को श्रेष्ठ, संयमी, सदाचारी बनाने का है वही दूसरा पक्ष यह भी है कि अपनी विभूतियों का समर्पण लोकमंगल के लिए किया जाय, मात्र संयमी-सदाचारी तो पेड़-पत्थर भी होते है। वे किसी का कुछ बिगाड़ते नहीं और न अनैतिक आचरण करते हैं। मनुष्य की मर्यादा की रक्षा इसी में है कि वह स्वयं के देवत्व का विकास करते हुए अपनी दैवी विभूतियों को लोकहित में प्रयोग करे।
मनुष्य जीवन इसीलिए मिलता है कि इस सृष्टि को सुरम्य, समुन्नत बनाने के लिए अपनी सम्पदाओं एवं विभूतियों को इसी दिशा में अधिकाधिक नियोजित किया जाय। स्वार्थ की पशु-प्रवृत्ति से ऊँचा उठकर परमार्थ की पुण्य प्रवृत्ति में संलग्न होना ही तपस्वी जीवन की सार्थकता का उज्ज्वल पक्ष है। इस दिशा में जो जितना चल सका समझना चाहिए कि उसने तप-साधना के लक्ष्य को समझा और उसे पूरा करने की दूरदर्शिता का परिचय दिया। तपस्वी जीवन की रीति-नीति अपनाने के लिए जिस साहसिकता का परिचय देना पड़ता है, वह है- दुनियादारी से भिन्न प्रकार की रीति-नीति अपनाने में भय या संकोच न अनुभव करना।
सर्दी-गर्मी सहना, भूमि पर सोना जैसे कठोर कर्म इस मनः स्थिति को विकसित करते हैं कि कष्ट-सहिष्णुता को तपस्वी जीवन की अनिवार्य साधना माना जाय। आत्मसाधना के लिए सर्वस्व का उत्सर्ग करना ही पड़ता है। त्याग-बलिदान का परिचय दिए बिना आत्मकल्याण की साधना में एक इंच भी प्रगति नहीं हो सकती। अपनी अमीरी और महत्त्वाकाँक्षाओं को जनकल्याण के लिए समर्पित किए बिना तप-साधना सम्भव नहीं हो सकती। पहाड़ जैसे वैभव के ढेरों में से राई-रत्ती दान-पुण्य करते रहने का कृपण-प्रदर्शन लोगों को बहकाने और आत्मप्रवंचना करने के लिए ही उपयुक्त हो सकता है सच्चे तपस्वी को तो त्याग-बलिदान के अन्तिम चरण तक पहुँचना पड़ता है। उसकी निष्ठा और श्रद्धा का परिचय तो अपनी सम्पदा एवं सामर्थ्य का किस सीमा तक विसर्जन किया जा सका-इसी कसौटी पर कसने के बाद प्राप्त होता है।
अनिवार्यतम निर्वाह के अतिरिक्त अपनी समस्त सुख-सुविधाओं को, सम्पत्तियों और विभूतियों को विश्व-मानव के लिए समर्पित करना ही तप-साधना का श्रेष्ठतम स्वरूप है। आत्मकल्याण की साधन इससे कम साहस में हो ही नहीं सकती। कहना न होगा कि तप-साधना से निखरा हुआ व्यक्तित्व अपने आप में एक देवता होता है और उसके अपने ही चमत्कार-वरदान इतने अधिक होते हैं कि तपस्वी को देवोपम सिद्ध पुरुष की संज्ञा दी जा सके।
सामान्य अर्थों में योग का अर्थ है- जोड़-मिलना साधना के क्षेत्र में यह शब्द आत्मा और परमात्मा को मिलाने वाली पुण्य प्रक्रिया के रूप में प्रयुक्त होता है। इसे सद्ज्ञान और सत्कर्म का समन्वय भी कह सकते हैं। धन और ऋण तार मिलने से विद्युत धारा प्रवाहित होती है। दोनों तारों में बहती तो वह पहले से ही है, पर परिचय तभी मिलता है जब दोनों का मिलन हो। संसार में सबसे बड़ा दुःख वियोग है। प्रियजनों से बिछुड़ जाने पर जितना कष्ट होता है, उतना अन्यत्र कहीं भी- कभी नहीं होता। आत्मा को अपने परमप्रिय परमात्मा से विलग होने पर अहर्निश पग-पग पर कुकर्म घेरते हैं और शोक-सन्ताप दुःख देते हैं। इस दुःख-सन्ताप का सुख और शान्ति में परिवर्तन, वियोग को योग में बदलने पर ही होता है।
मोटे शब्दों में भौतिक और अध्यात्म का समन्वय योग कहा जा सकता है। साधनों की कमी नहीं। निर्धन कहलाने वाले व्यक्ति के पास भी शरीर, मन, बुद्धि, प्रतिभा आदि साधन होते हैं। सहयोग, प्रभाव, संपर्क भी हर किसी को न्यूनाधिक मात्रा में उपलब्ध रहता ही है। धन तथा अन्य साधन भी कमोबेश होते ही हैं। यह सब मिलाकर इतना हो जाता है कि इतने को ही यदि उचित रीति-नीति से उचित प्रयोजनों में संलग्न किया जा सके तो आश्चर्यजनक प्रतिफल दृष्टिगोचर हो सकते हैं। पर यह होता अत्यन्त विचित्र है। यह सभी साधना आदर्शवादी लक्ष्य के अभाव में ऐसे ही अस्त-व्यस्त होते रहते हैं और उस अपव्यय के फलस्वरूप चित्र-विचित्र कुपरिणाम उत्पन्न होते रहते हैं। अपनी ही क्षमता अपनी ही विनाश में संलग्न रहे, तो इसे अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारना ही कहा जाएगा।
साधना और सत्प्रयोजन का समन्वय हो सके तो उसे व्यावहारिक जीवन का योग कहा जाएगा। इस सुयोग की व्यवस्था जिनने भी बनाई होगी, वे स्वल्प साधनों से भी आशातीत प्राप्ति कर सकने में समर्थ हुए होंगे। जिन्हें यह सन्मार्ग नहीं मिला जो साधनों को, अपनी चित्तवृत्तियों को बालक्रीड़ा के मनोविनोदों में गँवाते रहे और दुर्जनों की भांति उन्हें दुष्कर्मों में नष्ट करते रहे, ऐसे मनुष्यों की जीवन-सम्पदा सुरदुर्लभ होते हुए भी अभिशाप-दुर्भाग्य हो सिद्ध होती रहेगी।
योगाभ्यास का आरम्भ चित्त-वृत्तियों के निरोध से आरम्भ होता है। महर्षि पतंजलि ने अपने योगदर्शन के प्रथम पाद के द्वितीय सूत्र में योग की व्याख्या करते हुए उसे चित्तवृत्तियों को रोकने की प्रक्रिया बताया है। आमतौर से इसका अर्थ चित्त-निरोध एकाग्रता का अभ्यास समझा जाता है, लेकिन यह अभ्यास योग का बहुत छोटा अंश है- इसे योग का भौतिक भाग कह सकते हैं। एकाग्रता की आवश्यकता अध्यात्म साधना में ही नहीं, भौतिक कार्यों में भी पड़ती है। अनेकों ऐसे व्यक्ति भी उसमें पारंगत होते हैं, जिनका साधना से दूर का भी सम्बन्ध नहीं है। सरकस के नट-नर्तकों का सारा खेल एकाग्रता की ही सिद्धि पर टिका होता है। वैज्ञानिक, कलाकार, चित्रकार, मूर्तिकार, साहित्यकार आदि अपने-अपने विषयों में तन्मय हो सकने की विशेषता उत्पन्न करते और सफल होते है। निशानेबाजी की प्रतियोगिता एकाग्रता के बली पर ही जीती जाती है। ऐसे ही दूसरे ढेरों काम हैं, जिनसे लोग एकाग्रता सम्पादित करते हैं और चमत्कारी सफलताएँ प्राप्त करते हैं। आध्यात्मिक साधनाओं में भी इस विशेषता की आवश्यकता पड़ती है। इतना होते हुए भी मात्र इसी विशेषता के आधार पर किसी को योगी नहीं कहा जा सकता।
चित्त-निरोध का अर्थ है-मन की अस्त-व्यस्त उछल-कूद को नियंत्रित करके किसी विशेष प्रयोजन में लगे रहने का अभ्यास। यह जरूरी भी है और सराहनीय भी, पर इससे योगसाधना का प्रयोजन पूरा नहीं होता। आत्मिक प्रगति के लिए मात्र चित्त की नहीं-गहराई में उतरकर चित्तवृत्तियों के निरोध की बात सोची जानी चाहिए। चित्त-निरोध और चित्तवृत्तियों के बीच का अन्तर प्रत्येक विचारशील के मन-मस्तिष्क में स्पष्ट रहना चाहिए।
कितने ही महान साधक–साधिकाएँ ऐसी हुई हैं, जिनमें एकाग्रता कम चंचलता अधिक थी। मीरा, चैतन्य, रामकृष्ण परमहंस, सूरदास आदि भक्त शिरोमणि स्तर के समझे जाने वाले श्रेष्ठ साधना प्रयोजनों को एकाग्रता की नहीं वरन् व्याकुलता की सिद्धि थी। लक्ष्य के प्रति व्याकुलता का भी उतना ही मूल्य है, जितना एकाग्रता का। स्वामी विवेकानन्द से किसी ने पूछा कि ईश्वर-प्राप्ति की सम्भावना किस स्तर की मनोभूमि में होती है? इसका उत्तर देने के लिए उन्होंने बात को फिर कभी के लिए टाल दिया। एक दिन वे उस प्रश्नकर्ता को अपने साथ नदी स्नान के लिए ले गए। उसे भी अपने साथ पानी के भीतर चलने के लिए कहा। कंठ तक पानी में उतर जाने पर उनने जिज्ञासु की गर्दन पकड़ ली और उसे बलपूर्वक पानी में डुबो दिया। जब वह घबराया तो उन्होंने उसे छोड़ दिया। इस विचित्र व्यवहार का करण पूछने पर स्वामीजी ने उत्तर दिया कि यही तुम्हारे उस दिन के प्रश्न का उत्तर है। जिसमें तुमने ईश्वर को प्राप्त करने की मनःस्थिति के बारे में पूछा था। डूबते समय तुम्हें अपनी प्राण-रक्षा के लिए उत्कट प्रयत्न करने के अतिरिक्त और किसी बात का ध्यान नहीं था। ठीक यही स्थिति साधक की होनी चाहिए, उसे ईश्वरप्राप्ति के लिए इतनी व्याकुलता हो कि अन्य कोई बात सूझ ही न पड़े। इस प्रसंग में उस एकाग्रता का समर्थन है, जो व्याकुलता के कारण उत्पन्न हुई हो।
किन चित्तवृत्तियों का निरोध करना होगा, इसका संकेत पातंजलि योग दर्शन के प्रथम पाद के सूत्र ६ में दिया गया है। इसमें कहा गया है- प्रमाण, विपर्यय, किल्प, निद्रा, स्मृति। प्रायः यही पाँच प्रकार की चंचलताएँ मन पर छाई रहती हैं और उसे उच्च उद्देश्यों से विरत करके पशु-प्रवृत्तियों में उलझाती है। प्रमाणवृत्ति उसे कहते है- जो इन्द्रिय विषयों के पूर्वाभ्यास से सम्बन्धित विषयों के प्रसंग सामने आने पर उभरती है। विपर्यय कहते हैं- प्रतिकूल ज्ञान को। वस्तुस्थिति की जानकारी न होने से चित्त कस्तूरी के हिरण की तरह मृगतृष्णा में मारे-मारे फिरने वाले हिरण की तरह उद्विग्न फिरता है। विकल्प का अर्थ है- भव आशंका, सन्देह, अशुभ सम्भावना आदि कुकल्पनाओं से उत्पन्न कातरता। निद्रा का अर्थ है- आलस्य, प्रमाद, उपेक्षा, अवसाद, अनुत्साह। स्मृति वे यादें हैं, जो निकृष्ट योनियों में रहते समय अभ्यास में बनी रहीं, स्वभाव का अंग रहीं। उनकी छाया मनुष्य योनि में भी छायी रहती है और उसके फलस्वरूप कई कार इतने जोर से उभरती है कि विवेक-मर्यादाओं के बाँध तुड़वाकर वैसा करा लेती है, जिसके सम्बन्ध में सीधा पश्चात्ताप करना ही शेष रह जाता है।
जिस युग में, जिस समाज में, जिस वातावरण में हम रहते हैं, उसमें अवांछनीय प्रचलनों की कमी नहीं। उनका आकर्षण मन को अपनी ओर खींचता-लुभाता रहता है। पानी स्वभावतः नीचे गिरता है। अधिकांश लोग अवांछनीय गतिविधियाँ अपनाकर अनुपयुक्त जीवन जीते हैं। इसमें वे तात्कालिक लाभ भी पाते हैं, पीछे भले ही उन्हें दुष्परिणाम भुगतने पड़ें। इस तत्काल लाभ की बात सहज ही मन को आकर्षित करती है और दबी हुई दुष्प्रवृत्तियाँ उभर कर उस मार्ग पर घसीट ले जाती हैं, जो मनुष्य जैसे विवेकवान प्राणी के लिए अशोभनीय है।
योगसाधना का मूल उद्देश्य इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों के साथ प्रचण्ड संघर्ष करना है। जिस महाभारत में कृष्ण और अर्जुन ने सम्मिलित भूमिका निबाही थी, वह आत्मपरिष्कार में योगसाधना के साथ पूरी तरह सम्बन्धित है। कौरव दल इन्हीं कुसंस्कारों का नाम है, जो निकृष्ट योनियों से साथ चले आ रहे है और वातावरण में घुसी अवांछनीयता के कारण भड़कते हैं। कौरवों ने पाण्डवों की सारी सम्पदा हथिया ली थी। उसे वापस लेने के लिए युद्ध करना पड़ा। आत्मिक गरिमा पर असुरता आच्छादित हो रही है। उसके इस चंगुल से छुड़ाने के लिए विरोध- प्रतिरोध का, महाभारत करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं रह गया था। योगाभ्यास में भी इसी विरोध-प्रतिरोध का, विरोध-संघर्ष का उल्लेख है। इसमें आत्मा और परमात्मा का सद्ज्ञान- सत्कर्म का, साधना एवं सत्प्रयोजन का समन्वय कर देने पर विजय सर्वथा निश्चित हो जाती है।
योग के इस दार्शनिक पक्ष को परिपुष्ट करने के लिए कतिपय कृत्यों का अवलम्बन लेना पड़ता है। पहलवान बनने के लिए व्यायामशाला में सिखाए जाने वाले दण्ड-बैठक आदि कर्मकाण्डों को पूरा करना पड़ता है, साथ ही ब्रह्मचर्य, पौष्टिक आहार, मालिश आदि की विधि-व्यवस्था अपनानी पड़ती है। इन अभ्यासों से अंतरंग में छिपी बलिष्ठता उभरती है और मनुष्य कुछ ही समय में पहलवान स्तर का बनता चला जाता है। योगाभ्यास की निर्धारित गतिविधियाँ अपनाने का प्रतिफल कुछ ऐसा ही है।
इन अभ्यासों को उपयोगिता और आवश्यकता दोनों हैं। शास्त्रकारों ने योग-साधना का माहात्म्य भी बताया है और उसके स्वरूप एवं तत्त्वदर्शन को समझाने का प्रयत्न करते हुए कहा है-
अभ्यासात्कादिवर्णनियथा शास्त्राणि बोधयेत्। तथा योग सामासाद्य तत्त्वज्ञानचलभ्यते।
जैसे क-ख-ग से अक्षरारम्भ का अभ्यास करते हुए शास्त्रज्ञ, विद्वान बन जाते हैं, वैसे ही योग का अभ्यास करते-करते तत्त्वज्ञान प्राप्त हो जाता है।
ज्ञान और कर्म के उभययुग्मों के समन्वय को योग से योग की प्राप्ति कहा जाता है-
योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात्प्रवर्तते। योऽप्रमत्तस्तु योगे ने सायोगी रमते चिरम्-महायोग विज्ञान
योगसाधना से ही योग को जानना चाहिए। साधना से ही योग की प्राप्ति होती है। जो सावधानी से योग-साधना में निरत है, वहीं चिरकाल तक आनन्द पाता है।
योगसाधना के प्रभाव से (१) अणिमा, (२) लघिमा, (३) महिमा, (४) गरिमा, (५) प्राप्ति, (६) प्रकाम्य, (७) वशित्व, (८) ईशित्व- जैसी अलौकिक सिद्धियों के मिलने का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। ये सिद्धियाँ पढ़ने-सुनने में अतिरंजित लगती है, परन्तु इनके पीछे एक सुनिश्चित विज्ञान निहित है। सुनिश्चित वैज्ञानिक कारणों से अतिरंजित लगने वाली ये सिद्धियाँ सहज उपलब्ध हो जाती है। दूसरे शब्दों में इन्हें मनुष्य की चेतना-क्षमता का भौतिक वस्तुओं पर नियंत्रण भी कहा जा सकता है।
वैसे भी आत्मसत्ता, ब्रह्मसत्ता की प्रतिनिधि है। प्रतिनिधि ही नहीं अंश और प्रतीक भी है। बाधा इतनी मात्र है कि भ्रान्तियों के कारण अथवा प्रमाद के कारण अथवा इस तथ्य को न जानने के कारण आत्मचेतना का ऐसा विकास सम्भव नहीं है। यदि इस आत्मचेतना को जाग्रत किया जा सके और योगाभ्यास तथा तप-साधन के द्वारा उसका विकास किया जा सके, तो उस जाग्रति के द्वारा जो कुछ इन्द्रियातीत है, वह सहज ही इन्द्रियगम्य बन सकता है। बुद्धि की सीमा के बाहर लगने वाली अगणित अलौकिक विभूतियाँ सहज हो उपलब्ध हो जाती है।
कर्म की धुरी पर ही सृष्टि का गतिचक्र अविराम चक्कर काट रहा है। संसार का दृश्यस्वरूप इसी गति प्रक्रिया पर अवलम्बित है। कर्म किए बिना यहाँ कोई नहीं रह सकता। जीवित रहने के लिए कर्म आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। अविकसित मनुष्येत्तर जीवों में यह प्रकृति प्रेरणा से परिचालित है। उदरपूर्ति और कामतुष्टि जैसे दो सीमित प्रयोजनों तक ही उनके सुख और आनंद की अनुभूतियाँ सीमित है। अतएव उनके लिए सुख-दुःख की उच्चस्तरीय वैचारिक और बन्धनमुक्ति की आत्मिक अनुभूतियाँ निरर्थक हैं।
मानसिक और बौद्धिक दृष्टि से सुविकसित होने के कारण मनुष्य ऐन्द्रिक सुख की निम्न परिधि में नहीं रह सकता। उसे उच्चस्तरीय शाश्वत आनन्द की खोज है, जिसके लिए वह सांसारिक मृग-मरीचिका में अज्ञानवश भटकता रहता है। ऋषियों ने इस भटकाव से बचने के लिए व जीवन के शाश्वत आनन्द की प्राप्ति के लिए ज्ञानयोग, भक्तियोग अथवा कर्मयोग का मार्ग अपनाने का निर्देश दिया है। कर्मयोग के पथ को राजमार्ग इसलिए माना गया है।, क्योंकि यह हर मनःस्थिति के व्यक्तियों एवं आज की परिस्थितियों के अनुकूल है। भटकाव की गुँजाइश कम है, जबकि ज्ञानयोग या भक्तियोग में एक निश्चित प्रकार की मनः स्थिति का होना अनिवार्य है। कर्मयोग सभी के लिए इस वजह से उपयुक्त है, क्योंकि मनुष्य जीवनपर्यन्त किसी-न-किसी रूप में कर्मों से जुड़ा रहता है। उनसे अलग होना सम्भव नहीं। अतएव यदि कर्मयोग की सर्वसुलभ साधना बन पड़े, तो इसी जीवन में स्वर्ग और मुक्ति का आनन्द लेना हर किसी के लिए सम्भव है।
‘कर्म’ आत्मा और परमात्मा को एकाकार कर देने वाला ‘योग’ तब बन जाता है, जब वह निष्काम हो। निष्काम आखिर क्यों-कामनायुक्त क्यों नहीं? क्योंकि मन की कामना ही समस्त भव-बन्धनों का कारण है। गीताकार ने भी इस रहस्य का उद्घाटन करते हुए कहा है- ‘मन एवं मनुष्याणां कारण बन्धमोक्ष्योः’ कामनायुक्त कर्म जहाँ बन्धनों में बाँधता है, वहीं निष्काम कर्म मुक्ति का साधन बन जाता है। एक क्षण के लिए भी कर्म से विरत रहना सम्भव नहीं है, साथ ही कर्म भवबन्धनों से भी जकड़ता है, फिर संसार में किस तरह रहा जाय? जीवनमुक्ति का आनन्द किस तरह उठाया जाय? यजुर्वेद का ऋषि इस समस्या का समाधान प्रस्तुत करते हुए कहता है- ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथाः अर्थात् संसार को भोगें, परन्तु निर्लिप्त होकर, निःसर्ग होकर, निष्काम भाव से।
कर्मयोग की सर्वसुलभ साधना को अपनाने वाला साधक अपनी समस्त इच्छाओं, आकांक्षाओं को परमात्मा को समर्पित कर देता है। कर्मफल के प्रति उसकी आसक्ति नहीं रहती। अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों के प्रति वह तत्पर और सजग रहता है। उनके निर्वाह में सन्तोष की अनुभूति करता है। शरीर से कर्म और मन से चिन्तन करते हुए भी वह सांसारिक पदार्थों एवं व्यक्तियों के प्रति अनासक्त होता है। अर्जुन को सम्बोधित करते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
योगस्थः कुरु कर्माणि सÄõत्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समोभूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
अर्थात्- हे अर्जुन! आसक्ति छोड़कर सिद्धि और असिद्धि के विषय में समभाव योग में स्थित होकर कर्म करो। समत्व को ही योग कहते हैं।
समत्व का अर्थ हुआ- समान भाव, समभाव की एकरूपता से चित्तवृत्तियों की चंचलता पर स्वाभाविक रोकथाम लग जाती है। महर्षि पतंजलि ने भी इसे स्वीकारा है। भगवान श्रीकृष्ण ने महर्षि पतंजलि के समूचे योगदर्शन को एक ही शब्द ‘समत्व’ में अन्तर्हित कर दिया है। हर पल चित्त की चंचलता कर्मों को करने में बाधा डालती है। सुख-दुःख जय-पराजय हानि-लाभ के द्वन्द्व मानसपटल पर सतत् उभरते रहते हैं। जय होने पर घमण्ड होता है और पराजय से व्यक्ति हताशा के महागर्त में गिर जाता है। परिस्थितियों से जो मनः स्थिति को प्रभावित न होने दे, वह समत्व योग की ही उपासना करता है। बाह्य परिस्थिति जैसी भी बने, जिसकी वृत्ति में चंचलता नहीं है, वही कुछ कर्तव्यपालन कर सकते हैं।
निष्काम कर्मयोग का साधक वस्तुतः चित्तवृत्तियों पर नियंत्रण रखने वाला कठोर तपस्वी भी होता है। जो पल-पल अपनी मनःस्थिति पर पैनी नजर रखता है। सिद्धि हो चाहे असिद्धि, हम जीवनक्षेत्र में सफल हों या फिर असफल, कभी भी अपनी समस्वरता पर उसका प्रभाव न पड़ने देंगे- यही कर्मयोग के साधक का लक्ष्य होता है।
कर्मयोग के परम उपदेष्टा भगवान श्रीकृष्ण का सार जैसे त्यक्त्वा अर्थात् फल की आसक्ति को त्यागने पर देते हैं। सत्य यही है कि यही तो मानव आमंत्रित दुर्बुद्धिजन्य आपत्तियाँ हैं। संग से ही विषयासक्ति की कामना कामना से क्रोध, क्रोध से मूढ़ता, मूढ़ता से भ्रम व भ्रम से बुद्धि नाश होता है। बुद्धि का नाश ही मनुष्य के नाश का कारण है। इसीलिए कहा गया है कि-
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि स त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥
“जो मनुष्य आसक्ति छोड़कर ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्मों को करता है, वह पानी में कमलपत्र की भांति पाप से लिप्त नहीं होता।” इसलिए फलेच्छा का त्याग करके किए गए कर्म ही सात्विक कहे जाते हैं। ऐसा व्यक्ति ही कर्मयोग परायण साधक कहा जा सकता है।
ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म बहुत अनिवार्य है। साधारण मनुष्य जो कर्म करता है, वह स्वार्थवश करता है। उस समय इस जीव को परमात्मा का विचार गौण होता है। यह अज्ञान का ही द्योतक है। इसलिए इस अज्ञान के निवारण तथा ब्राह्मण बुद्धि से कार्य करने से ज्ञान की प्राप्ति कराने वाले इस कर्मयोग को श्रेष्ठ कहा जाना अत्युक्ति नहीं होगी। पर इस कर्मयोग का आरम्भ वहीं से होता है, जिसे भगवान से त्यक्त्वा अर्थात् अनासक्ति कहते हैं।
कर्मफल के प्रति अनासक्ति का होना इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि मनुष्य का अधिकार मात्र कर्म करने पर है। फल पर उसका कोई अधिकार नहीं है। यह सच है कि कर्मों का फल अपने निश्चित समय पर मिलता है, पर यह भी उतना ही सत्य है कि यह प्रक्रिया किन्हीं अदृश्य के हाथों संचालित है। कई बार कर्मफल प्रक्रिया में व्यतिरेक पड़ते भी दिखाई पड़ता है। एक निश्चित प्रकार के कर्म करते हुए भी उसका परिणाम उल्टा देखकर मन में कर्मफल व्यवस्था के प्रति आशंका उठती है। प्रायः ऐसा कर्मफल के सिद्धान्त को सही रूप से न समझने के कारण की होता है। प्रत्यक्ष जीवन और उससे जुड़ी भली- बुरी उपलब्धियाँ मात्र इसी जीवन को ही नहीं, जन्म-जन्मान्तरों के उन संचित कर्मों का परिणाम होती हैं, जो पिछले जन्मों में किए गए होते हैं। वे ही कर्मफल के सुनिश्चित विधान के अनुसार कालान्तर में रोग-शोकों के रूप में प्रकट होते दिखाई देते हैं। अतएव कर्मफल का सिद्धान्त अक्षरशः सत्य होते हुए भी उसमें आसक्ति का न होना ही श्रेयस्कर है। फलासक्ति हो और उसके तद्नुरूप परिणाम न निकलने से भारी निराशा होती है।
श्रीमद्भागवतगीता में भगवान श्रीकृष्ण-अर्जुन को कर्मयोग का उपदेश देते हुए कहते हैं- जो सुख-दुख सर्दी- गर्मी, लाभ- हानि, जीत-हार यश-अपयश जीवन-मरण भूत-भविष्य की चिन्ता न करके मात्र अपने कर्तव्य कर्म में निरत रहते हैं, वही सच्चा कर्मयोगी है। कर्मयोगी इस सत्य से भली-भाँति परिचित होता है कि सांसारिक द्वन्द्व तो एक के बाद एक आते हैं और आते रहेंगे। इनका प्रभाव क्षणिक और अस्थाई है तथा मात्र नाशवान् शरीर तक ही सीमित है। स्थायी, शाश्वत तो आत्मा है, उसका उत्थान-पतन ही मनुष्य का वास्तविक उत्थान और पतन है। अतएव जो भी कर्म किए जाएँ, वे आत्मोन्नति को ध्यान में रखकर।
कर्मयोग की साधना के सम्बन्ध में कितने ही व्यक्तियों के मस्तिष्क में अनेकों प्रकार की भ्रांतियाँ बैठी हुई हैं। कितने ही अतिवादी यह कहते हैं कि “हम जो भी काम करते हैं वह वास्तव में हमसे कराए जाते हैं और वह कराने वाला परमात्मा है। हमारे द्वारा किया जाने वाला काम अच्छा है या बुरा, इसकी न तो हमें चिन्ता करनी चाहिए और न ही अपने ऊपर उत्तरदायित्व लेना चाहिए। सबके लिए जिम्मेदार परमात्मा है।” इस भ्रान्तियुक्त धारणा के कारण मनुष्य सत्कर्म एवं दुष्कर्म के बीच अन्तर नहीं करता और दोनों ही वे प्रवृत्त होता है। ऐसे में मन को अपनी निम्नगामी प्रवृत्तियों को तुष्ट करने की खुली छूट मिल जाती है। फलतः वह पतन के गर्त में गिरता चला जाता है।
सृष्टि का नियामक-संचालक होते हुए भी परमात्मा ने मनुष्य को अतिरिक्त रूप से विवेक-बुद्धि देकर उसे कर्मों का अधिष्ठाता बनाया है। उसे कर्म करने की पूरी-पूरी छूट दे रखी है। चाहे तो वह सत्कर्म का मार्ग अपनाकर आत्मिक प्रगति की ओर बढ़ सकता है अथवा दुष्कर्मों में प्रवृत्त होकर अपनी अवनति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। भले-बुरे कर्मों के लिए इस प्रकार पूर्णरूपेण उत्तरदायी मनुष्य ही है, न कि परमात्मा। थोड़ी देर के लिए यह मान भी लिया जाय कि कर्मों के लिए प्रेरणाएँ परमात्मा से मिलती हैं, तो इस सत्य की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती कि सत्यम् शिवम् सुंदरम् से युक्त परमात्मा कभी मनुष्य को दुष्कर्म करने की प्रेरणा देगा। ऐसी प्रेरणाएँ अपने ही मन की उपज होती हैं। उस महान सत्ता का प्रतीक- प्रतिनिधि आत्मा के रूप में अपने भीतर बैठा हुआ है, जो सदा उच्चस्तरीय प्रेरणा ही सम्प्रेषित करता है, पर मन द्वारा उनकी उपेक्षा-अवहेलना होने से वे व्यवहार में नहीं उतर पातीं। मन की अपेक्षा यदि सचमुच ही अपनी गतिविधियों आत्मप्रेरणा के अनुरूप परिचालित किया जाय, तो कभी दुष्कर्मों की ओर बढ़ने का अवसर ही न प्रस्तुत हो। अतएव सत्कर्म-दुष्कर्म का दायित्व अपने ऊपर न मानकर परमात्मा पर मानना कर्मयोग का गलत अर्थ लगाना है।
कर्मयोग शब्द स्वयं भी अपने वास्तविक अर्थ को प्रकट करता है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है- कर्म और योग। कर्म में किया-प्रेरणा संकल्प, इच्छा की गतियाँ निहित हैं, लेकिन उसकी दिशा योग शब्द से तय होती है। अर्थात् इन सभी गतियों की दिशा परमात्मा से मिलने के लिए होनी चाहिए। वैसे भी गीता योग शब्द की व्याख्या इस प्रकार करती है। योगः कर्मसु कौशलम्- कर्म। से कुशलता ही योग है। कार्यकुशल वही हो सकता है जिसे उचित-अनुचित कर्मों के बीच स्पष्ट अन्तर का बोध हो। कुशल शब्द के अंतर्गत सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् का भाव समाहित है। इसलिए कार्यकुशलता में अशुभ कर्मों के लिए कोई गुँजाइश नहीं है। कर्मयोग की साधना का वास्तविक अर्थ यही है कि किसी भी काम को पूरी कुशलता के साथ कर्तापन का अभिमान छोड़कर किया जाय और उसके फल के प्रति निर्लिप्त-निस्पृह रहा जाय। निश्चित रूप से यदि इस तत्त्वदर्शन को हृदयंगम किया जा सके तो कर्मयोग की सर्वसुलभ साधना का अवलम्बन लेकर साधक जीवन के सामान्य दायित्वों का निर्वाह करते हुए भी स्वर्गमुक्ति का उच्च-स्तरीय आनन्द प्राप्त कर सकता है।
हम स्वयं में क्या हैं? जीवन का स्वरूप एवं लक्ष्य क्या है? जीवन के साथ जुड़ी हुई विभूतियों का सही उपयोग क्या हैं? इन सवालों को उपेक्षा के गर्त में डाल देने से एक प्रकार की आत्म-विस्मृति छायी रहती है और जीवननीति का निर्धारण हो नहीं पाता। इन्द्रियों की उत्तेजना ही प्रेरणा बनकर रह जाती है। प्रचलित ढर्रे का अनुकरण ही स्वभाव बन जाता है। अहंता की तृप्ति के इर्द-गिर्द ही तथाकथित प्रगति की कामना चक्कर काटती रहती है। अन्य कीट-पतंगों की तरह अज्ञान के अंधेरे में पड़े मनुष्य भी शरीर के लिए किसी तरह जीवित रहते और मौत के दिन पूरे कर लेते हैं। अज्ञान के वशीभूत होने पर हम जीवन भी इसी प्रकार भारभूत ही जीते हैं। कोई उच्च उद्देश्य सामने न रहने और उस दिशा में कोई महत्वपूर्ण प्रयास न बन पड़ने पर जीवन का शाश्वत आनन्द मिल नहीं पाता।
जब हम ज्ञान की आवश्यकता एवं उपयोगिता पर चर्चा करते हैं, तो उसका दायरा केवल बाह्यज्ञान ही सिमटा रहता है। हम भूल जाते हैं कि अन्तःज्ञान का महत्व उससे भी कहीं अधिक हैं आत्मज्ञान की आवश्यकता भौतिकज्ञान की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। आत्मज्ञान की आवश्यकता यदि अनुभव की जा सके तो सबसे पहले यह विचार करना होगा कि हम हैं क्या? इस प्रश्न का उत्तर तलाशने से ही ज्ञानसाधना का शुभारम्भ होता है। आखिर हम क्यों जी रहे हैं? इन सवालों के जवाब में आत्मवेत्ता, महामनीषियों ने जो निष्कर्ष निकाले हैं, वे बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। उन्हें अपनाया जा सके तो ज्ञानसाधना से बन्धनमुक्ति की बात प्रत्यक्ष नजर आने लगती है।
अणु क्या है? सुविस्तृत पदार्थ वैभव का एक छोटा-सा घटक। आत्मा क्या है? परमात्मसत्ता एक एक छोटा-सा अंश। अणु की अपनी स्वतन्त्र सत्ता लगती भर है, पर जिस ऊर्जा आवेश के कारण उसका अस्तित्व बना है तथा क्रिया−कलाप चल रहा है, वह व्यापक ऊर्जातत्त्व से भिन्न नहीं है। एक ही सूर्य की अनन्त किरणें दिग्दिगन्त में फैली रहती हैं। एक ही समुद्र में अनेकानेक लहरें उठती रहती हैं। देखने में किरणें और लहरें स्वतन्त्र हैं और एक-दूसरे से भिन्न हैं। तो भी थोड़ी गम्भीर दृष्टि का उपयोग करने पर यह जाना जा सकता है कि यह भिन्नता कृत्रिम और एकता वास्तविक है। अलग-अलग बर्तनों के बीच में रहने वाले आकाश अपनी सीमा में बँधे होने के कारण अलग-अलग लगते हैं, तो भी उनका अस्तित्व निखिल आकाशीय सत्ता से भिन्न नहीं हैं। पानी में अनेकों बुलबुले उठते और विलीन होते रहते हैं। बहती धारा में भँवर पड़ते हैं, दिखने में बुलबुले और भँवर अपना स्वतन्त्र अस्तित्व प्रकट कर रहे होते हैं, पर यथार्थ में वे प्रवाहमान जलधारा की सामयिक हलचल मात्र हैं। इसी तरह जीवात्मा की स्वतन्त्र सत्ता दिखती भर है, पर न केवल उसका अस्तित्व, बल्कि स्वरूप भी व्यापक चेतना का एक अंश मात्र है।
ज्ञानसाधना के उत्कर्ष में यही एक निष्कर्ष निकलता है कि हम विश्व-चेतना के एक अंश मात्र हैं। समष्टि ही आधारभूत सत्ता है, हम उसकी छोटी चिंगारी भर हैं। एकता को शाश्वत समझा जाय-पृथकता को कृत्रिम। सबको अपने में, अपने को सबमें समाया हुआ देखा, समझा और माना जाय। सबके दुःख में अपना दुःख माना जाय, सबके सुख में अपना सुख। यह मानकर चलने से सीमित परिधि में सुखी होने की क्षुद्रता घटती है और व्यापक क्षेत्र में सुख-संवर्द्धन की योजना सामने आती है।
सीमा-संकीर्णता को अवास्तविक मानने से व्यक्तिवाद पर अवलम्बित स्वार्थपरता घटती चली जाती है। अपने को बड़ी मशीन का छोटा पुर्जा भर समझने से यह बात ध्यान में रहती है कि उसकी निजी उपयोगिता भी पूरी मशीन का अंग बनकर रहने में ही है। अलग निकलकर, अलग-से-अलग बड़प्पन और सुखोपभोग की बात सोची जाएगी तो यह पृथकता अपनाकर कुछ लाभ नहीं उठाया जा सकेगा। हानि ही होगी। पृथकतावादी-स्वार्थपरता के भवबन्धनों से मुक्ति पाने में इस ज्ञानसाधना से श्रेष्ठ विधि कोई और नहीं।
अपनापन ही प्यारा लगता है। यह आत्मीयता जिस पदार्थ अथवा प्राणी के साथ जुड़ जाती है, वही आत्मीय परमप्रिय लगने लगता है। अपनेपन का दायरा छोटा हो तो मात्र शरीर की, बहुत हुआ तो परिवार की सुख-सुविधा सोची जाती रहेगी और उतने तक ही प्रिय लगने की परिधि सीमित बनकर रह जाएगी। यह क्षेत्र जितना अधिक बढ़ेगा, उतनी ही प्रियता की परिधि विस्तृत होती चली जाएगी। यदि व्यापक क्षेत्र में आत्मीयता विस्तृत कर ली जाय तो अपनेपन का प्रकाश बढ़ता जाएगा और उस क्षेत्र का वैभव परमप्रिय लगने लगेगा। यह अनुभूतियाँ उन्हें सहज ही मिल सकती हैं, जो सीमाबन्धनों की तुच्छता को निरस्त करके समष्टि के साथ जुड़े हुए कर्तव्यों का पालने करने के लिए कटिबद्ध होते हैं।
ज्ञानसाधना से अनुभव होने वाली एकता के साथ यह भी सत्य उजागर होता है कि अंशी के सारे गुण सूक्ष्म रूप से अंश में विराजमान रहते हैं। अतएव परमात्मा की समस्त विशेषताएँ तथा सम्भावनाएँ आत्मा में विद्यमान हैं और उन्हें विकसित करने के साधन जुटाकर उच्चतम स्तर तक पहुँचाया जा सकता है।
इस तथ्य को समझ लेने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि जीव की मूल सत्ता गुणों की दृष्टि से ईश्वर सत्ता गुणों की दृष्टि से ईश्वर के समतुल्य ही है। इस सम्भावना को विकसित करना मनुष्य जीवन में ही सम्भव हो सकता है। उच्च पद करने में नियोजित की जाने वाली प्रतियोगिताओं की तरह ही अपना मनुष्य जीवन मिला हुआ है। परीक्षा में भाग लेने का अवसर जिन्हें मिला है, वे अपनी प्रतिभा और पुरुषार्थ-परायणता का परिचय देकर उत्तीर्ण होने का प्रमाणपत्र प्राप्त करते और प्रतियोगिता जीतकर उच्च पद प्राप्त करते हैं। मनुष्य जीवन भी एक ऐसा ही अवसर है। उसकी भी एक ऐसा ही अवसर है। उसकी सार्थकता इसमें है कि अपने छोटे-से जीवात्मा स्तर को विकसित करके महात्मा-देवात्मा की कक्षाएँ पार करते हुए परम-आत्मा बनने की पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करें। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की उदात्त रीति-नीति अपनाने वाले ही इस महान जीवन-लक्ष्य को प्राप्त करते देखे जा सकते हैं।
मनुष्य जीवन भगवान का जीवात्मा को दिया गया सबसे बहुमूल्य उपहार है। इससे अधिक महत्वपूर्ण चेतन संरचना उसके भण्डार में और कोई नहीं है। इसे अनुपम और अद्भुत कह सकते हैं। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि सभी प्राणी ईश्वर के पुत्र हैं। एक समदर्शी पिता को अपनी सन्तानों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए और समान अनुदान देने चाहिए। फिर ऐसा क्यों हुआ कि मनुष्य को ही इतना अधिक दिया गया और अन्य प्राणी उससे वंचित रखे गए? यदि यह सब विभूतियाँ मात्र मौज-मजा करने के लिए मनुष्य को मिलीं होतीं, तो निश्चय ही उसे अन्याय और पक्षपात कहा जाता, किन्तु परमात्मा न तो ऐसा है ओर न ऐसी नीति अपना सकता है। उसने मनुष्य को अधिक विश्वस्त, अधिक प्रामाणिक और अधिक समझदार बड़ा माना है। इसी वजह से उसने उसके हाथ में अतिरिक्त साधन सौंपे हैं, जिनके सहारे वह इस सुरम्य उद्यान को अधिक सुन्दर, अधिक सुविकसित, अधिक समुन्नत और अधिक सुसंस्कृत बना सके।
खजांची के पास ढेरों सरकारी रुपया रहता है। शस्त्र भण्डार का स्टोरकीपर सेना के हथियार और गोला-बारूद अपने ताले में रखता है। मिनिस्टरों को अनेकों सुविधा-साधन एवं अधिकार मिले होते हैं। यह सब विशुद्ध रूप से अमानतें हैं इन्हें निजी लाभ के लिए प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। ठीक इसी प्रकार से मनुष्य को जो कुछ मिला है, वह संसार को अधिक सुखी, समुन्नत बनाने के लिए मिली हुई धरोहर के रूप में हैं। परन्तु अज्ञान के अँधेरे से घिरे होने के कारण ऐसा हो नहीं पा रहा है। यदि ऐसा हो सका होता तो मानव जीवन इतना पाप-पंक में फँसा और दुनिया विनाश की आग में न झुलस रही होती।
ज्ञान-साधना में प्रवृत्त होने का तात्पर्य है-स्वयं के स्वरूप एवं उत्तरदायित्व के बोध के लिए तत्पर होना। इसी के माध्यम से ऐसा कुछ बन पड़ेगा कि पूर्णताप्राप्ति की दिशा में अग्रसर होते हुए अनुकरणीय, आदर्श एवं पवित्रतम् जीवन जिया जाय और अपने जीवन की समस्त उपलब्धियों में से न्यूनतम अंश लेकर शेष का परमार्थ प्रयोजनों में उपयोग किया जाय। यही है ज्ञान-साधना की फलश्रुति।
शरीर और मन जीवन रूपी रथ के दो पहिए-दो घोड़े हैं। इन्हें काम करने वाले दो हाथ-आगे बढ़ने वाले दो पैरों से उपमा दी जा सकती है। अन्तःकरण की आस्था एवं आकांक्षा के अनुरूप यह दोनों ही स्वामिभक्त सेवक सदा कार्य करने के लिए तत्पर रहते हैं। शरीर की अपनी स्वतन्त्र कोई सत्ता या इच्छा नहीं है, यह जड़ है। इन्द्रियाँ भी जड़ पंचतत्वों से बनी हैं। अन्तःकरण में जैसी उमंगें उठती हैं, उसी दिशा में शरीर की क्रियाशीलता चल पड़ती है। इसी प्रकार मन भी अपनी मर्जी से कुछ नहीं करता। उसमें सोचने का गुण तो है, पर क्या सोचना चाहिए? यह निर्धारण करना अन्तःकरण का काम है। सज्जनों का चिन्तन एवं कर्त्तृत्व एक तरह का होता है और दुर्जनों का दूसरी तरह का। इसमें दोनों ही शरीर और मन सर्वथा निर्दोष होते हैं। अन्तःप्रेरणा का निर्देश बजाते रहना भर उनका काम है। इसलिए शरीर को दुष्कर्म करने या मन को दुर्बुद्धिग्रस्त होने का जो दोष दिया जाता है, वह अवास्तविक है। इन दोनों वाहनों को प्रेरणा एवं दिशा देने का काम अन्तःकरण रूपी सारथी का है।
शरीर में क्रिया, मन में विचारणा और अन्तरात्मा में भावना काम करती है। भावनाओं को ही श्रद्धा, आस्था, निष्ठा, मान्यता आदि नामों से जाना जाता है। इन्हीं सबके समन्वय से आकांक्षा उभरती है और फिर उसी की निर्देशित दिशा में, शरीर और मन के सेवक काम करने के लिए कटिबद्ध हो जाते हैं।
ज्ञानसाधना का अर्थ है-अन्तरात्मा के गहन स्तर में यह अनुभूति एवं आस्था उत्पन्न करते रहना कि हम सत-चित-आनन्द परमात्मसत्ता के अविच्छिन्न अंग है। हमें पूर्णताप्राप्ति के लिए श्रेष्ठतम जीवनक्रम अपनाना है और जो उपलब्ध है, उसे लोकहित के लिए प्रयुक्त करना है। ज्ञानसाधना में निरत जाग्रत आत्मा संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि को लाँघ जाती है। वह सबको अपने में और अपने को सबमें देखती है। इसलिए उसके सामने व्यक्तिवादी आपाधापी फटकने नहीं पाती। उसके चिन्तन एवं कर्तृत्व में व्यापक लोकहित की भावना काम करती है। कहना न होगा कि ज्ञानसाधना से बन्धनमुक्त हुई आत्माओं की प्रत्येक विचारणा और प्रत्येक क्रियापद्धति में मात्र आदर्शवादिता ही उभरती-छलकती दिखाई पड़ती है। ऐसे लोग अभावग्रस्त और संकटग्रस्त हो सकते हैं, पर अन्तःकरण में उन्हें असीम आनन्द और सन्तोष की अनुभूति हर घड़ी होती रहती है।
कष्ट भाग्य के धकेले नहीं आते। उन्हें अपनी अनुपयुक्त गतिविधियों द्वारा हम स्वयं न्योता बुलाते हैं। ईश्वर तो उन्हें चिन्तन सुधारने और प्रतिभा निखारने के लिए भेजते हैं।
अध्यात्म क्षेत्र की दो धाराएँ प्रमुख हैं-ज्ञान व भक्ति। प्रचलित मान्यता यही रही है कि ये दोनों हो धाराएँ परस्पर विरोधी हैं। दोनों में कोई समन्वय नहीं हैं। ज्ञानमार्ग का एकमात्र लक्ष्य तत्त्वदर्शन व विश्लेषण-गवेषणाएँ आदि होता है, जबकि भक्तिमार्गी का अनुयायी भक्ति-भावना में अपने को तन्मय रखना चाहता है, दर्शन की बौद्धिक उलझनों में अपना समय व श्रम नहीं लगाता। ये दोनों ही मान्यताएँ एकाँगी एवं अपूर्ण है। शरीर में भगवत्सत्ता ने मस्तिष्क के साथ हृदय को भी सर्वोपरि स्थान पर रखा है। बुद्धि है तो भावसंवेदनाएँ भी हैं। दोनों परस्पर विरोधी नहीं, एक-दूसरे की पूरक हैं। हृदय की भाव-संवेदनाएँ ही अपनी कोमलता द्वारा विचारों में वह गुणवत्ता जोड़ती हैं, जिससे कि बुद्धि प्रज्ञा बन सके। विचार कितने ही सशक्त व प्रभावशाली क्यों न हों, संवेदनशीलता जुड़े बिना वे कल्याणकारी नहीं हो सकते। इसीलिए भक्ति-साधना का महत्व सर्वाधिक बताया गया है।
ज्ञानमार्ग, योगसाधना एवं कर्म-योग को यदि एक पलड़े पर रखें व दूसरे पर भक्ति को, तो भक्ति वाला पलड़ा ही भारी लगता है। ज्ञान में वेदान्त को शीर्षस्थ माना गया हैं वेद का शीर्ष है-वेदान्त जिस में उपनिषद्, श्रीमद्भागवतगीता एवं ब्रह्मसूत्र के रूप में ‘प्रस्थनत्रयी’ के तीन घटक बताए गए है। ज्ञानमार्ग में वेदान्त के चार महावाक्य हैं-तत्त्वमसि सोऽहम्, अयमात्मा ब्रह्म, सर्व खिल्विदं ब्रह्म। इन चार महावाक्यों को जीवन में प्रतिष्ठित कर लेना सामान्य व्यक्ति के लिए एक बहुत अत्यन्त ही कठिन कार्य है। देह के रहते आज के इस भौतिकवादी युग में किसी एक की भी प्रतिष्ठा लगभग असंभव है। कोई बिरला आचार्य शंकर, रमण महर्षि, विवेकानन्द, गुरुदेव श्रीराम शर्मा आचार्य जी अथवा श्री अरविन्द जैसा प्रकट हो जाय तो बात अलग हैं। इसमें शुद्ध बुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। बुद्धि आज छल-कपट से भरी हुई है। बुद्धि की सही प्रखर धारणा हो एवं धारणा के बाद वह प्रज्ञा रूप में प्रतिष्ठित हो तो ही ज्ञान-योग सध पाता है।
काकभुशुण्डि-गरुड़ संवाद में श्रीरामचरितमानस में आया है-ज्ञान के पंथ कृपाण के धारा। परत खगेश लगे नहिं वारा।’ अर्थात् हे खगेश! ज्ञान का रास्ता दुधारी तलवार पर चलने के समान है। इसका वार पलटकर लगते देर नहीं लगती। इसलिए आज के इस संक्रान्ति काल में ज्ञानयोग के मार्ग से भक्तियोग का मार्ग ही श्रेष्ठ बताया गया है। दूसरा एक मार्ग योगसाधना का बताया गया हैं, जिसकी विशद व्याख्या भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म की पराकाष्ठा के रूप में गीता के छठवें अध्याय में ‘आत्मसंयम योग’ नामक अध्याय में की है। योग में पतंजलि द्वारा बताया राजयोग एवं गोरखनाथ द्वारा बताया गया हठयोग सुप्रसिद्ध हैं। दोनों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है-समय की सुव्यवस्था, खानपान का संयम, नियमित योगाभ्यास। आजकल के प्रदूषण भरे भौतिकता प्रधान युग में संयम कितना सध सकता है, इसे अपने अंदर झाँककर देखा जा सकता है। पत्र-पत्रिकाएँ समाचार पत्र, केबल टीवी-फिल्मों से भरी बहिरंग की दुनिया में सतत् चिंतन क्षेत्र पर कुविचारों का आक्रमण होता रहता है। आज योग के नाम पर बहिरंग का कर्मकाण्ड मात्र ही संपन्न हो रहा है-पूज्यवर गुरुदेव को अनुसार शरीर के तल से साधना कर पाना आज संभव नहीं है-मन के तल से आरंभ कर अंतःकरण की ओर जाना व समर्पण भाव से परमात्मचेतना में स्वयं को प्रतिष्ठित कर सकना भक्तियोग से ही संभव है। गीता में योग को साधने की अनिवार्य शर्तों के रूप में जो वर्णन आया है। उसमें बताया है-
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
अर्थात् “उचित आहार-विहार कर्मों से उचित चेष्टा-उचित जागरण व शयन ही दुःखहरण करने वाला योग सिद्ध होता है।” देखने योग्य है कि इनमें से कितना आज के इस विज्ञान की पराकाष्ठा वालों युग में साधा जा सकता है।
तीसरा है-कर्मयोग यदि कर्म भक्ति से विहीन है-समर्पण भाव से रहित है, तो कर्मयोग नहीं है। फिर तो वह कर्म आसक्ति मात्र हैं। कितना ही हम कहें-अकर्ता अनासक्त भव से कर्म कर रहे हैं-कहाँ कर पाते हैं। अकर्ता का भाव कठिनाई से ही आ पाता है। चर्चा चाहे जितनी ही ज्ञान बघारने के रूप में कर ली जाय, किंतु निष्काम कर्मयोग कठिनाई से ही सध पाता है। जो ईश्वर के मन्दिर के रूप में शरीर को माने, लिप्साओं को शत्रु समझे, औषधि रूप में सात्विक आहार ग्रहण करे एवं संतुलित श्रमसाधना का स्वयं के लिए निर्धारण करे उसका कर्मयोग सध भी जाता है एवं आरोग्य-दीर्घायुष्य के रूप में फलित भी होता है। आज की परिस्थितियों में यह भी बड़ा दुष्कर कार्य है।
अंत में यदि कोई सर्वसुलभ है- तत्त्वज्ञानियों ने, गीतकार ने, रामायण-रामचरितमानस के रचयिता ने जिसकी व्याख्या की है-वह भक्तियोग ही है, जो बड़ी सरलता से सध जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने तीनों योगों की चर्चा श्रीमद्भागवतगीता में की है। प्रथम छह अध्याय में कर्मयोग की, द्वितीय छह अध्याय में भक्तियोग की, अंतिम छह अध्याय में ज्ञानयोग की। किंतु सबके बाद एक ही तथ्य कहा है-
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
अर्थात् हे अर्जुन! तू ज्ञान को, योग को, कर्म को सभी रास्तों को छोड़कर मेरी शरण में आ जा-मेरी भक्ति कर। मैं तुझे सभी तरह के पापों से मुक्त कर दूँगा। तू शोक किसी भी स्थिति में मत कर।
भक्ति में शुद्ध व समर्पित भावों की आवश्यकता पड़ती है। भक्ति के प्रभाव से वनवासिनी शबरी, पाषाण रूप अहिल्या, राक्षस कुल के विभीषण, केवट, निषादराज, ब्रज की गोपियाँ, बाल-ग्वाल सभी का उद्धार हो गया। इसीलिए समस्त योग साधनाओं, तांत्रिक साधनाओं, ज्ञानमार्ग के ग्रन्थों रो अधिक भक्तियोग को महत्व दिया गया है। भक्ति का अर्थ है-सत्य को बुद्धि से नहीं हृदय से पाइए। विचारों से नहीं भाव से पाइए। चिन्तन से नहीं प्रेम से पाइए। भक्ति-सिद्धि में आक्रामक चित्त-ईर्ष्यालु मन एक बाधा को समान है। अतः एक प्रेयसी की तरह ही प्रभु को पाया जा सकता है। प्रभु को पाना है तो अत्यन्त शान्त-निष्काम भाव वाली दशा हो। न अपना पता रहे, न उसका पता। वस्तुतः चेतना को परिष्कृत सतोगुणी स्थिति एक पहुँचाने की भावविभोरता ही भक्ति है। इसी को भगवत्प्रेम कहा गया है।
अद्वैत वेदान्त के महान पण्डित मधुसूदन वेदान्त के मर्मज्ञ माने जाते थे। उनने अंत में भक्तिमार्ग को अपना लिया। लिखा है-
अद्वैत वीथी पथिकै रुपास्या। स्वराज्य सिंहासन लब्धदीक्षा॥ शठेन केनापि वयं हठेन। दासीकृता गोपवधू विटेन॥
अर्थात् “अद्वैत वेदांत की वीथियों-गलियों में भ्रमण करने वाले आत्मराज को उपलब्ध कर चुके- मुझ को दृढ़तापूर्वक गोपकुमारियों के स्वामी श्रीकृष्ण ने अपना भक्त बना लिया है।’ इसके पीछे भी एक कथा है-मधुसूदन सरस्वती के पाण्डित्य का लोहा सारा भारतवर्ष मानता था। रामचरितमानस के लोकभाषा में लिखे जाने पर भी उन दिनों काफी वितण्डावाद मचा था, जिसे मधुसूदनजी ने ही सुलझाया था। उन दिनों उनके समकालीन एक भक्त थे नाभादास। दोनों एक-दूसरे से मिलते रहते थे। एक ज्ञानमार्गी, दूसरा बिना पढ़ा-लिखा अष्टछाप के आठ कवियों में से एक बल्लभाचार्य संप्रदाय का भक्त। नाभादास की मस्ती व भक्ति देखकर मधुसूदन सरस्वती उनसे कहते थे-तुम्हें कृष्ण नजर आते हैं या यूँ ही रट लगाते रहते हो। तुम अद्वैत की साधना करो-जीवो ब्रहमेव ना परः’ से ही तुम्हारा कल्याण होगा।” एक दिन नाभादास ने उन्हें भावजगत में ले जाकर गोलोक धाम की सारी लीलाएँ दिखाई। यह आभास कराया कि भक्ति का मार्ग ज्ञानमार्ग से कितना ऊँचा है। नाभादास की सरलता-निष्कपट व्यवहार, कृष्ण सखा वालों स्वरूप ने मधुसूदन को ज्ञानी से भक्त बना दिया। उपर्युक्त संस्कृत श्लोक इसके बाद ही मधुसूदन सरस्वती ने लिखा था। चैतन्य महाप्रभु द्वारा समस्त ग्रंथ-निबंध गंगा नदी में बहाकर खड़ताल हाथों में ले भक्तिमार्ग का आश्रय ले पूरे बंगक्षेत्र ही नहीं, समूचे भारत में भक्ति की गंगा बहा उसका कल्याण कर देना जगतविख्यात है।
श्रवण कुमारों का आह्वान
पूज्यवर शरीर नहीं, विचार थे। वे कहते थे-जैसे श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को सभी तीर्थों की यात्रा कराई, वैसे ही आप भी हमें भारत के तीर्थ-प्रत्येक गाँव, प्रत्येक घर में ले चलें। हमारे ये विचार क्रान्ति के बीज हैं, जो अगले दिनों धमाका करेंगे।”
अन्य कई अवसरों पर उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि “तुम हमारा काम करो, हम तुम्हारा काम करेंगे।” क्या आप श्रवण कुमार की भूमिका संपन्न करने हेतु महाकाल का आह्वान स्वीकार करते हैं। यदि आप टोलियों में निकले हैं और यदि साहित्य का प्रचार-प्रसार किया है, तो निश्चित ही उनके मूर्तिमान् स्वरूप वांग्मय को लेकर देश में जगह-जगह जाकर इनकी स्थापना कराने हेतु संकल्प भाव से कार्य करेंगे।
इसके लिए यदि आप एक बार में तीन माह का समय निकाल सकते हैं तो कृपया अपना नाम-पता फोन नं., समय दान की अवधि जनवरी-मार्च या अप्रैल-जून या अक्टूबर-दिसंबर में ), आयु, स्वास्थ्य की स्थिति, योग्यता, प्रचार-प्रसार का अनुभव (मिशन में या अन्य कहीं) वांग्मय स्थापना का विवरण, परिवार में आप पर कौन-कौन आश्रित हैं। आदि का उल्लेख करते हुए हमें शीघ्र लिखने का अनुग्रह करें।
व्यवस्थापक, अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
भक्तियोग के विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी ने प्रभु श्रीराम एवं भक्त शबरी के संवाद के माध्यम से जो प्रतिपादन श्रीरामचरितमानस में किया है, वह अपने आप में अनूठा है। शबरी जो कोलो की शबर जाति के मुखिया की बेटी थी, उसको भगवान ने पात्र बनाया नवधा भक्ति की व्याख्या के लिए, यह तथ्य चौंकाने वाला है आज के विषमता भरे युग में। प्रभु को पाने की आकुलता-विकलता हो तो लिंगभेद, जातिभेद, ऊँच-नीच का भेद कुछ भी आड़े नहीं आता।
भगवान इस नवधा भक्ति का वर्णन करने से पूर्व शबरी से कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति जाति-पाँति कुल-धर्म बड़प्पन, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता इन सभी की दृष्टि से ऊँचा होते हुए भी यदि भक्तिहीन बादल की तरह शोभारहित दिखाई पड़ता हैं इतना महत्व दिया है मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी ने।
प्रथम भक्ति इस नवधा भक्ति के अंतर्गत संतों के सत्संग के रूप में वर्णित की गयी है। साधुओं के, श्रेष्ठजनों के सत्संग से हमारी जड़ता-मूढ़ परंपरागत मान्यताएँ टूटती हैं एवं हमें होश आता है कि जिन्दगी कुछ अलग ढंग से अपने आपको सुव्यवस्थित बनाकर जी जा सकती है। सत्संग में प्रथम कोटि का सत्संग है, सत्य का, परमात्मा का संग। यह सर्वोच्च कोटि का सत्संग बताया गया है, जो कि समाधि की स्थिति में परमात्मसत्ता से एकात्मता स्थापित करके मिलता है। दूसरी कोटि का सत्संग वह है जो सत् तत्व से आत्मसात् हो चुके महापुरुषों के साथ किया जाता है। ऐसे व्यक्ति वे होते हैं, जिनके पास बैठने पर हमारे अंतःकरण में ईश्वर के प्रति ललक-जिज्ञासा पैदा होने लगे। आज ऐसे व्यक्ति बिरले ही मिलते हैं, अतः तीसरी कोटि का सत्संग उनके विचारों का सामीप्य, महापुरुषों द्वारा लिखे गए अमृतकणों का स्वाध्याय भी उसकी पूर्ति करता है।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि “गंगाजी की तरफ जाते ही शीतलता सहज ही मिलने लगती है।” महापुरुषों के चिन्तन की ओर उन्मुख होते ही तपते मन को शांति मिलती है। संतों के सत्संग की जब बात होती है और जब ‘प्रथम भक्ति संतन कर संग’ की व्याख्या करते हैं तो लगता हैं कि संत की परिभाषा भी होनी चाहिए। गोस्वामी जी के शब्दों में-
सठ-सुधरहिं सत संगति पायी। पारस परसि कुधातु सुहाई॥
अर्थात् संतों का संग पाकर जड़-मूर्ख-बदमाश भी सुधर जाते हैं यथा पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है। संत उन्हें कहा जाता है, जो व्यक्ति को परमात्मा का प्रकाश दिखा दें-उसे आत्मा की ओर उन्मुख कर दें, सद्गुरु से परिचय करा दें। संतों का हृदय नवनीत के समान होता है। जीवमात्र के प्रति उनके मन में दया होती है-अगाध प्रेम होता है। हम परमपूज्य गुरुदेव का स्मरण ऐसे संत के रूप में करते हैं, जिनके सान्निध्य में आकर अनेकों लोग बदलते चले गए, उनके दुख मिटते चले गए। सत्संग की महिमा अपरम्पार है एवं जिसे यह प्राप्त हो गया, वह नवधाभक्ति के प्रथम प्रसंग के माध्यम से भगवत्कृपा का पात्र बन गया।
दूसरी भक्ति भगवान श्रीराम ने इस प्रसंग में बतायी है-दूसरी रति मम् कथा प्रसंगा। अर्थात् मेरे (भगवान के) कथा प्रसंगों में प्रेम-अभिरुचि भगवान ने श्रीमद्भागवत में कहा है-मैं वहाँ रहता हूँ जहाँ मेरे भक्त मेरी चर्चा करते हैं। भक्ति साधना में सबसे सुलभ मार्ग है-भगवान के लीला-प्रसंगों का चिंतन कर-गुणगान कर उनमें मन को लगा देना। देखा जाय तो आर्ष साहित्य में लोकमानस को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है, पुराणों के कथा-प्रसंगों ने, जिनमें या तो भक्त की कथा है या भगवान की। आदमी के मन को भगवान के स्वरूप में लीन करने की इनमें जबर्दस्त शक्ति है। श्रीमद्भागवत सर्वाधिक लोकप्रिय है। देवी भागवत एवं रामचरितमानस का भी लगभग इसी के समकक्ष स्थान है। परमपूज्य गुरुदेव ने प्रज्ञापुराण को प्रचलित कर कथा-साहित्य को नए आयाम दिए। भगवद्भक्ति की ओर उन्मुख करने वाले कथा-प्रसंग लोकमानस को छूते हैं-भावसंवेदना जगाते हैं एवं कल्याण का पथ प्रशस्त करते हैं। इस भक्ति का एक श्रेष्ठतम उदाहरण अभिमन्यु पुत्र राजा परीक्षित द्वारा अपने जीवन के अंतिम क्षणों में श्रीमद्भागवत कथा को सुनकर मोक्ष को प्राप्त होना है। ऐसा कहा जाता है कि इनके युग में कलियुग आया एवं उनके द्वारा बताये चार स्थानों (द्यूतक्रीड़ा, व्यभिचार, चोरी, स्वर्ण) में से स्वर्णमुकुट में आकर विराजमान हो गया। कलियुग के अधिष्ठित होने का भाव है-बुद्धि का तापसी हो जाना। एक तपस्यारत ऋषि से पानी माँगने व उनकी समाधि में लीन स्थिति को उपेक्षा मानकर राजा परीक्षित द्वारा उनके गले में मरा सर्प डालने पर ऋषिपुत्र द्वारा श्राप दे दिया गया था कि एक सप्ताह में वे मृत्यु को प्राप्त होंगे। शाप अटल था। अब प्रश्न यह था कि मृत्यु को उत्तम कैसे बनाया जाय? परीक्षित सोचने लगे कि मरे तो ऐसी मृत्यु कि ईश्वर में लीन हो जाएँ। गीता में प्रसंग आया है।-
यं यं वापि स्परन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तकेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥
अर्थात् जिस-जिस भाव स्मरण करते हुए प्राणी शरीर को छोड़ते हैं, उसी भाव को वे प्राप्त हो जाते हैं।
यही विचार कर ऋषिगणों से परामर्श कर शुकदेव जी से भागवत कथा सुनने का निश्चय किया। शुकदेव जी ने भक्ति में विभोर होकर कथा सुनायी। परीक्षित ने भी श्रद्धायुक्त होकर कथा सुनी। परीक्षित फूल में छिपे तक्षक द्वारा काटे जाने के बाद सायुज्य मुक्ति को प्राप्त हुए। तब से ही श्रीमद्भागवत सप्ताह का प्रचलन है। आज के युग में परिस्थितियाँ बड़ी विषम है। स्थान-स्थान पर कथा-आयोजन होते देखे जाते हैं, अनेकानेक कथावाचक व महात्मा आयोजनों में बोलते, टीवी पर भी कहते देखे-सुने जा सकते हैं, परन्तु कथा में प्रभाव नहीं है। कारण मात्र यह है कि कथावाचक का आदर्श शुकदेव समान हो, सुनने वाला भी परीक्षित जैसा होना चाहिए। भगवत् कथामृतों में भगवान के दिव्य लीलाओं का वर्णन ही है एवं यह भावपूर्वक सुनना, मनन करना नवधा भक्ति के दूसरे प्रसंग में आता है।
तीसरी भक्ति है-अभिमानरहित होकर गुरु के चरणकमलों की सेवा। (गुरुपद पंकज सेवा तीसरी भक्ति अमान) गुसाईं जी का इस भक्ति के वर्णन से तात्पर्य है-गुरु ही ब्रह्मा-शिव-विष्णु हैं उनके प्रति सर्वस्व समर्पण जब तक नहीं होगा, भक्ति नहीं सधेगी। गुरु की पहली चोट भक्त के, साधक के अहंकार पर ही होती है। सामान्यतया हम गुरु को सामान्य मनुष्य मान बैठते हैं। गुरु इन्सान जैसा दीखता अवश्य है, क्योंकि उसे संवाद स्थापित करने के लिए, लीलासंदेह के लिए मानवी चोला पहनना ही पड़ता है। श्री अरविंद कहते थे-गुरु की चेतना का शिष्य में अवतरण होता है। यह तभी हो पाता है जब शिष्य की चेतना भी शिखर पर हो। गुरु के लिए उनने ‘डिसेण्डिंग कांशसनेश तथा शिष्य के लिए ‘एसेण्डिंग कांशसनेश शब्द इसीलिए प्रयुक्त किया है। जब तक अहं नहीं गलेगा, अभीप्सा तीव्रतम नहीं होगी, गुरुकृपा अवतरित नहीं होगी। गुरु अपने धरातल से काफी दलदल में फँसे शिष्य को उबारकर ऊपर ले जाता है। गुरु की सेवा अर्थात् स्वयं भगवान की, सच्चिदानन्द परमेश्वर की सेवा। ऐसा व्यक्ति स्वयं ईश्वर को पा जाता है। उसके लिए कुछ भी असंभव-असाध्य नहीं रहता।
श्री अरविंद के एक शिष्य थे चंपकलाल। उनका स्वभाव था श्री अरविंद के दैनन्दिन कार्य में उनकी सेवा में ही स्वयं को नियोजित करना। १९२६ का प्रसंग है-उनने श्री अरविंद से पूछा-एक शिष्य के नाते हमारा क्या कर्त्तव्य हैं हमारे लिए निर्देश बतायें। योगीराज बोले-तुम्हारे लिए एक ही काम है, तुम हमेशा चुप रहना। बहुत कम बोलना। हमारे पास रहते हो तो लोग तुम से हमारे बारे में पूछेंगे। कुरेद-कुरेद कर जीवनचर्या के बारे में विस्तार से जानना चाहेंगे। तुम चुप ही रहना। चंपकलाल ने इसे गिरह बाँध लिया। १९२६ से १९५० तक वे मौन रहे। जब श्री अरविंद ने समाधि ली तो उनने उठकर चंपकलाल को छाती से लगाया- चंपकलाल, मेरे बेटे! मैं तुम्हें आशीर्वाद देकर जा रहा हूँ।” इस कृपास्पर्श ने चंपकलाल को महायोगी-सिद्धसाधक बना दिया। श्री अरविंद के महाप्रयाण के बाद अमेरिका की ‘श्री अरविंद सोसायटी’ ने श्री चंपकलाल को वार्षिक बैठक में बुलाया। श्री माँ ने कहा-तुम चले जाओ। बोलोगे तुम अपने व्रत के कारण बिल्कुल नहीं। मात्र खड़े होकर श्री अरविंद का ध्यान कर लेना। उनने ऐसा ही किया। सभी को अनूठी तृप्ति मिली। संदेश मिला कि उनको क्या युगधर्म निबाहना चाहिए। चंपकलाल की वाणी’ नामक पुस्तक जो श्री अरविंद आश्रम से प्रकाशित हुई है, पढ़कर अनुमान लगाया जा सकता है कि गुरु की सेवा से बिना पढ़ा-लिखा भक्त भी कैसे साधना की उच्चतम सोपानों पर पहुँच सकता है। मानरहित गुरु की भक्ति साधक को सब कुछ दे सकने में समर्थ है गुरु शिष्य के, भक्त के बने बनाए व्यक्तित्व को कूट-कूट कर मिट्टी बनाकर उससे एक नया खिलौना बनाता है, यदि वह उसके प्रति पूर्ण समर्पित हो जाय। परमपूज्य गुरुदेव इसी को गलाई-ढलाई धुलाई-रँगाई नाम से संबोधित करते थे।
नवधा भक्ति के अंतर्गत चौथी भक्ति है-कपट छोड़कर गुणसमूह का गान। (मम गुण गण करइ कपट तजि गान) श्रीमद्भागवत में परीक्षित से श्री शुकदेव जी ने कहा है-हे राजन! कलियुग में अनेकों दोष हैं, पर एक महान गुण है। इस युग में भगवान के संकीर्तन से व्यक्ति मुक्त होकर परमगति को प्राप्त होता है। भगवद् गुणगान संकीर्तन की चार पारस्परिक पद्धतियाँ हैं- हनुमदीय शाँभवीय, नारदीय, वैयासकीय। हनुमदीय पद्धति में भगवन्नाम जप मस्ती में मस्त होकर किया जाता है। स्वरताल बिगड़ जाय, कोई बात नहीं। प्रेम का मूल्य ज्यादा होता है शाँभवीय पद्धति में स्वरताल के साथ नृत्य का भी योगदान होता है। नारदीय पद्धति में वाद्ययंत्रों के साथ ताल-मृदंग आदि के साथ झुण्ड बनाकर संकीर्तन किया जाता है। वैयासकीय पद्धति में कथा के साथ-साथ बीच में संकीर्तन भी चलता है।
भगवान ने गीता में कहा है-
अपिचेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभक्। साधुरेव स मन्तव्यः सभ्यग्व्यसितो हि सः॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रति जानीहि न में भक्तः प्रणश्यति॥
अर्थात् यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है, तो वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है। वह भजन के प्रभाव से शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और परमशान्ति को प्राप्त होता है। हे अर्जुन! मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
संकीर्तन भक्ति से कैसे लोग बदलते हैं, वातावरण बदलता है-इसका सबसे बड़ा उदाहरण है-चैतन्य महाप्रभु द्वारा की गयी बंगक्षेत्र में महाक्रान्ति। बंगाल को कीकर देश माना जाता था। कहा जाता था कि समस्त तीर्थों का फल बंगाल जाने से समाप्त हो जाता है। भगवन्नाम संकीर्तन ने बंगाल की भूमि को उर्वर बना दिया।
वहाँ महामानव जन्म लेने लगे। पापी व्यक्ति भी भावों के प्रवाह से उबर गए। वस्तुतः कपट छोड़कर भक्ति की जो बात भगवान ने कही है उसे समझना जरूरी है। कपट छोड़ने के बाद ही अंदर से भावों का समुद्र उमड़कर आता है। भावसमाधि सर्वोच्च अवस्था है जो भगवत् कीर्तन से शीघ्र ही प्राप्त हो सकती है।
पाँचवीं भक्ति है-मेरे (भगवान के) मंत्र का जाप और मुझमें (परमात्मा में) दृढ़ विश्वास। (मंत्र जाप दृढ़ विश्वास-पंचम भजन सो वेद प्रकाश)। मंत्र का माहात्म्य समझकर भावपूर्वक परमात्मसत्ता में विश्वास रख जब जप किया जाता है, तो वह भक्ति का पाँचवाँ सोपान ही नहीं बन जाता-सिद्धि का मूल भी बनता है जप में लम्बी साधना की नहीं, गहरी साधना श्रद्धा-विश्वासपूर्वक किये जाने की सर्वाधिक आवश्यकता है।
मंत्र की व्याख्या हेतु महार्थमंजरी में वर्णन आया है-शक्ति के वैभव विकास में मननयुक्त अपूर्णता से त्राण करने वाली, विश्व-विकल्प (दुनियादारी) की झंझटों से मुक्ति दिलाने वाली अनुभूति ही मंत्र है।”
भगवान कहते हैं- जपात सिद्धि जपात सिद्धि जपातसिद्धिर्नसंशया। (जप से निश्चित ही सिद्धि ही मिलती है, इसमें कोई संशय नहीं।)
ईश्वर को संबोधित-निवेदन ही मंत्र है। चाहे वह नमो भगवते वासुदेवाय हो, नमः शिवाय हो अथवा गायत्री मंत्र के रूप में सद्बुद्धि की अवधारणा की प्रार्थना-जप यदि विश्वासपूर्वक किया जाय तो निश्चित ही फल देता है।
योगदर्शन का सूत्र है-तद् जपस्य तदथ्रभावनम्’ अर्थात् मंत्र का जप उसकी भावना, उसके देवता पर प्रगाढ़ भक्ति रखकर करना चाहिए। यदि मंत्र की सामर्थ्य पर जिस गुरु ने मंत्र दिया है, उसकी सत्ता पर एवं मंत्र के देवता पर विश्वास रख निरन्तर जप किया जाय, तो मंत्र की सामर्थ्य असंख्य गुनी हो जाती है।
नवधा भक्ति में छठवीं भक्ति हैं-इंद्रियों का निग्रह, अच्छा चरित्र, बहुत कार्यों से वैराग्य और निरन्तर संतपुरुषों के आचरण में निरत रहना। (षट् दम शील-विरति बहुकर्मा-निरति निरन्तर सज्जन धर्मा)। दम का अर्थ है-संकल्पपूर्वक हठ के साथ अपने ऊपर नियंत्रण। मानसिक संयम सधते ही शारीरिक स्वयमेव सध जाता है। दम अर्थात् आत्मानुशासन प्रबलतम स्तर पर। इंद्रियों पर ताले लगा लेना ताकि अंतर्मुखी होकर इंद्रियों की संरचना में हम फेर-बदल कर सकें। इसी पक्ष की महत्ता बताते हुए, परमपूज्य गुरुदेव ने विचारसंयम, इन्द्रियसंयम, समयसंयम, अर्थसंयम चारों पर जोर दिया एवं अस्वाद व्रत के माध्यम से उसका शुभारंभ करने को कहा, ताकि सभी क्रमशः सध सकें। दम के बाद ही अंतर्जगत में शान्ति का पथ प्रशस्त हो पाता है। दम के बाद इस भक्ति में भगवान श्रीराम ने शील की चर्चा की है। अश्लील का उलटा है शील। शील अर्थात् शालीनता का निर्वाह। शीलव्रत की चर्चा शास्त्रों में आती है। जब पति-पत्नी सद्गृहस्थ के रूप में परस्पर सहमति से संयम-पूर्वक जीवनयापन करते हैं, तो इसे शीलव्रत कहते हैं। अमर्यादित काम को मर्यादित करते हुए जीवनयापन शीलव्रत का पहला चरण है। दूसरा चरण है- काम का ऊर्ध्वारोहण आध्यात्मिक प्रगति के लिए। यह भारतीय संस्कृति के बहुआयामी एवं सबके लिए सुलभ एक दार्शनिक प्रतिपादन का परिचायक है।
अगला पक्ष इस भक्ति में हैं बहुत कर्मों से, बहुत सारी आकांक्षाओं से विरक्ति-दूर रहना। भगवान ने कर्मों से साथ जुड़ी कामनाओं के त्याग को संन्यास कहा है-काम्यानाँ कर्मणा न्यासं सन्यासं कवयोः विदु। काम्य कर्मों से विरति अर्थात् न लोभ करें, न भय से। लोकहित के लिए कर्म करें-फल परमात्मा को अर्पित करें। स्वामी विवेकानन्द कहते थे कि एक साधक के, भक्त के कर्म आत्मकल्याण व जगहित के लिए अर्पित होने चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव की जीवनशैली हम देखें तो पाते हैं कि उनके सभी कर्म लोकहित के लिए समर्पित हुए। लेखनी जीवन भर उनने चलायी। विचारक्रान्ति का कार्य अंतिम समय तक लेखनी से करते रहे। एक कोठरी में बंद होकर भी सारे विश्व को प्रचण्ड झंझावात से आंदोलन किया जा सकता है, यह उनने विरति बहुकर्मा की अपने भक्तिसाधना वाले स्वरूप से दर्शाया। इस भक्ति का चौथा चरण है- संतपुरुषों के आचरण में लगे रहना-संतपुरुषों के आचरण में लगे रहना-संतपुरुषों में क्रोध नहीं होता, वे सदैव क्षमाशील होते हैं। हम यदि ये दोनों गुण अपना लें-तो संतों का आचरण हमें भक्ति की पराकाष्ठा पर पहुँचा सकता है।
नवधा भक्ति में सातवीं है- जगतभर को समभाव से परमात्म में ओत-प्रोत मानना और संतों को ईश्वर से भी अधिक करके मान्यता देना। (सप्तम सम मोहिमय जग देखे, मोते संत अधिक करि लेखा।) यही बात भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कही है-
यो माँ पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च में न प्रणश्यति॥
अर्थात् जो मुझे सर्वत्र संव्याप्त देखता है-सबको मुझमें देखता है उसके लिए मैं अदृश्य नहीं हूँ-नष्ट नहीं हूँ, न वह मेरे लिए अदृश्य है- (नष्ट नहीं होता)। सोना एक धातु है। उससे बने विभिन्न आभूषणों में अँगूठी-कंगन-बाजूबंद को हम अलग-अलग रूप में देखते हैं, किंतु सुनार को आभूषणों में सोना ही दिखाई देता है। भक्त भी सभी को प्रभु में-प्रभु को सभी में देखता है। वह किस का अहित करे-नुकसान पहुँचाए सोच ही नहीं पाता। आत्मवत् सर्वभूतेषु की साधना परमपूज्य गुरुदेव ने १९७०-७१ की अखण्ड ज्योति में वर्णित की है कि किस तरह इस साधना से उनने आत्मिक प्रगति के सोपान चढ़े। हमें भक्ति के इस स्वरूप को इसी रूप में समझना चाहिए।
इस भक्ति के दूसरे प्रसंग में भगवान कहते हैं-मुझसे अधिक मेरे भक्तों को मानना। गोस्वामी जी ने कहा है-रात ते अधिक रामकर दासा। जो तप-जप-योग से संभव नहीं है वह भक्ति से संभव है। चाहे हम भक्त अम्बरीष की कथा में देखें-चाहे मीरा-प्रहलाद के प्रसंगों में, भक्त की महिमा ही चारों ओर झलकती दिखाई देती है। सर्वस्व का समर्पण कर देने वाले भक्त की भगवान रक्षा करते हैं एवं सदा उनके साथ रहते हैं।
आठवीं भक्ति है- (यथा लाभ संतोषा। सपनेहु नहिं देखहिं परदोषा) जो कुछ मिल जाय उसी में संतोष, स्वप्न में भी पराये दोषों को न देखना। कबीरदास जी ने कहा है- ‘साईं इतना दीजिये जामे कुटुम्ब समाय। मैं भी भूखा न रहूँ साधु न भूखा जाय।’ परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा है-जिन्हें वैभव का संरक्षक होकर रहना पड़ा है, वे भी निजी जीवन में जनक की तरह परिश्रमी एवं मितव्ययी किसान जैसी रीति-नीति अपनाते रहे हैं। चाणक्य एक चक्रवर्ती शासक के प्रधानमंत्री और विश्व-विद्यालय के सूत्र-संचालक थे। फिर भी इस अमानत में से अपने निजी प्रयोजन के लिए मात्र सूखी रोटियाँ ही उपलब्ध करते थे।” (नवं/दिस. १९८२ प्रज्ञा अभियान)
गोस्वामी जी के इस भक्ति के प्रतिपादन के दूसरे भाग में सपने में भी दूसरों का दोष न देखने की बात जो कही गयी है-वह आत्मिक प्रगति की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है। यह मानवी स्वभाव है कि सामान्यतया जीवन व्यापार में असफलता का दोष मनुष्य दूसरों पर मढ़ देता है। बहिर्मुखी दृष्टि होने के कारण दूसरों के दोष अधिक दिखाई देते हैं, अपने आपको निर्दोष मान बैठते हैं। दूसरों के दोषों का चिन्तन करते-करते हमारा अंतःकरण भी दूषित होता चला जाता है। एक प्रसंग है-श्यामाचरण लाहिड़ी के जीवन का। वे हिमालय में महावतार बाबा के दर्शन कर लौटे। इलाहाबाद कुंभ में स्नान हेतु आए। वहाँ देखा गांजा–सुलफा पीने वाले साधुओं को, उनकी लोकसेवा के स्थान पर अधिक पाने की कामना को। सोचने लगे ये तो इस लोक से भी गए-परलोक से भी। विचार आया-मेरा बस चले तो इन दुष्टों को मार डालूँ। तभी एक दृश्य दिखाई पड़ा-एक सुलफा पी रहे साधु के पैर उनके गुरुदेव महावतार बाबा स्वयं दवा रहे हैं। आँखें मलीं-दृश्य वही था-उनके ही गुरु थे। थोड़ी देर में दृश्य बदला गया। घर पहुँचे-पूजा में उपासनास्थली पर महावतार बाबा प्रकट हुए-सूक्ष्मशरीर से संकेत किया कि-आत्मविकास करना है, तो दूसरों को सुधारों, अपने प्रगतिपथ को अवरुद्ध क्यों करते हो।” यह संदेश हम सबके लिए है। श्रीरामकृष्ण कहा करते थे-दोषे गुणे मानुस।” एक-दूसरे के गुणों को देखें-दोषों को नहीं, क्योंकि दोष-गुण तो हर मनुष्य में होते हैं। यही दृष्टि हर भक्त की होनी चाहिए।
नवधाभक्ति में नवीं भक्ति है- (नवम सरल सब सन छल हीना। मम भरोस हिय दरष न दीना।) सरलता-सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में परमात्मा का भरोसा एवं किसी भी स्थिति में हर्ष व दैन्य का भाव न होना। भगवान इस अंतिम भक्ति प्रकरण में सर्वाधिक जोर देते हैं-सरल व निष्कपट होने पर। ऐसा वही हो पाता है जिसकी भावनाएँ ईश्वरोन्मुख हों-कामनाएँ न के बराबर हों। ईश्वर भक्ति के माध्यम से मिलता ही उसे है, जो बुद्धि के सारे मानदण्डों, कुचक्रों से भरे षड्यंत्रों से उबर चुका है। बुद्धि से प्रज्ञा के धरातल पर पहुँच गया है।
परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा है-दूसरे क्षुद्र लोगों की तरह हमने भी गुरु-शिष्य का ढोंग बनाकर अपनी कामनापूर्ति की माँग-पर-माँग रखी होती और प्रेम को लाभदायक धंधे के रूप में मछली पकड़ने का जाल बनाया होता तो निराशा और शिकायतों भरा मस्तिष्क लेकर ही खाली हाथ लौटना पड़ता। दिव्य तत्व में आखिर इतनी अक्ल होती है कि मनुष्य की स्वार्थपरता और प्रेम भावना की वस्तुस्थिति का अंतर समझ सके।” (अखण्ड ज्योति अप्रैल ६९, पृष्ठ ६२)। वस्तुतः जब हृदय निष्कपट बच्चों की तरह सरल हो जाता है, तो उसमें वह चुम्बकत्व पैदा होता है, जो परमात्मा को स्वयं आकृष्ट कर सके।
इस भक्ति के दूसरे प्रसंग ‘मम भरोस’ की जहाँ चर्चा की गयी है-वहाँ गीता का वह वाक्य ठीक लगता है जिसमें कहा गया है-तेषां नित्याभियुक्तानाँ-योगक्षेम वहाम्यहम्।” मेरे से युक्त-मेरे में लीन भक्तों की जिम्मेदारी मैं वहन करता हूँ। हमें इतना विश्वास होना चाहिए कि प्रभु ही हमारे रक्षक हैं। हमें उन पर पूरा भरोसा है। सफलता है तो प्रभु की, हमारी नहीं। हमें हर्षोन्मत्त हो श्रेय स्वयं को नहीं प्रभु को देना चाहिए। दैन्यभाव भी नहीं रखना चाहिए। जो भगवान का अपना है-वह किसी से डरेगा क्यों। आत्म-अवमानना का भाव क्योंकर रखेगा। भक्त दुख-सुख से परे हो जाते हैं, जब भगवान पर भरोसा दृढ़ होता है।
सच्चा भक्त वही है जो हर परिस्थिति में, सुख-दुख में भी उनका ही होकर रहे। बच्चा गिरकर माँ की गोद में ही शान्ति पाता है। सच्चे भक्त को भगवान की गोद में शिशुवत रहने का अभ्यास पालना चाहिए। इसी में दूसरे चरण की व्याख्या हो जाती है।
नवधा भक्ति का प्रसंग शबरी को सुनाते हुए अंत में भगवान श्रीराम कहते हैं-नवमहँ जिनके एकौ होई। नारी पुरुष सचराचर कोई। इन नौ में से एक भी जिनके पास होती है, वह स्त्री पुरुष, जड़-चेतना कोई भी हो तर जाता है। नवधा भक्ति में से हम एक भी अपने जीवन में उतर लें, तो हमारे जीवन को कुसंस्कारों से, प्रारब्ध कर्मों के अंतःकरण से मुक्त होने में कोई देरी नहीं लगती। भक्ति ही कलियुग में साधने योग्य है। उसमें यदि नवधा भक्ति का सूत्र भी हमारे जीवन में उतर जाय तो हमारा कल्याण हो जाएगा।
साधनाक्षेत्र में समर्पण का असाधारण महत्व बताया गया है। अपने निज के पुरुषार्थ के बलबूते तो एक सीमा तक ही बढ़ा जा सकता है। बाह्य अनुदान न मिले होते तो मनुष्य का प्रगतिपथ पर एक पग भी आगे बढ़ा पाना संभव न रहा होता। गर्भस्थ शिशु की स्थिति से जन्म के बाद भी बहुत समय तक मनुष्य दूसरों के सहयोग के बल पर ही अपनी विकासयात्रा पूरी कर पाता है। माँ के अनुदान न मिलें तो वह गर्भ में दम तोड़ देगा एवं माता-पिता से लेकर समाज का उसे भिन्न-भिन्न रूपों में सहयोग न मिले तो वह जन्म के बाद की प्रगति व्यवस्था के क्रम में आगे बढ़ नहीं सकेगा। जो तथ्य लौकिक जीवन पर लागू होते हैं, वही आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश करने पर भी लागू होते हैं। इस क्षेत्र में प्रगति करने के लिए व्यक्ति को आत्मशोधन की तपश्चर्या से तो गुजरना पड़ता है, किंतु समर्पणयोग-भक्तियोग की साधना बिना दैवी-अनुग्रह एवं परम लक्ष्य की प्राप्ति होती नहीं।
श्रीमद्भागवतगीता में यों तो कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग की त्रिवेणी बही है एवं तीनों को छह-छह अध्याय देकर त्रिपदा के माहात्म्य का वर्णन इसमें समाहित है, किंतु पूरी गीता में स्थान-स्थान पर भगवान एक ही बात अर्जुन से कहते हैं-वह है समर्पण का, शरणागति का आमंत्रण। अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकाँक्षाओं को, अहं को ईश्वर को समर्पित कर उनकी इच्छा अनुसार ही चलने की प्रेरणा श्रीकृष्ण बार-बार देते हैं। बारहवें अध्याय में वे कहते हैं-तू अपना मन मेरे में ही लगा। मेरे में ही बुद्धि को लगा। इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा। मुझको ही प्राप्त होगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं हैं।”
वस्तुतः व्यष्टि का समष्टि में, व्यक्तिवाद का समूहवाद में, संकीर्णता का उदारता में, निकृष्टता का उत्कृष्टता में विसर्जन ही समर्पण है। भक्तियोग में क्रियाकृत्यों, कर्मकाण्डों के मूल में भी समर्पण की भावनाओं को ही सर्वाधिक प्रधानता दी गयी है। समर्पण भक्ति की, निष्ठा की पराकाष्ठा वाला स्वरूप हैं। समर्पण के लिए भक्त को, साधक को इस भावना को सदैव परिपुष्ट करना पड़ता है-मैं पतंगे की तरह हूँ-इष्टदेव दीपक की तरह। अनन्य प्रेम के बलबूते द्वैत श्रद्धा को समाप्त कर अद्वैत की उपलब्धि के लिए मैं अपने इष्ट प्रियतम के साथ एकात्म होता चला जा रहा हूँ। जिस प्रकार पतंगा दीपक पर आत्मसमर्पण करता है, अपनी सत्ता को मिटाकर प्रकाशपुँज में लीन होता हैं, उसी प्रकार मैं अपने अस्तित्व-इस अहंकार को मिटाकर ब्रह्म में, समष्टि चेतना में विलीन हो रहा हूँ। मैं अपनी समस्त श्रद्धा के साथ अपना सर्वस्व प्रभु को समर्पित कर रहा हूँ।”
भक्ति का अर्थ ही है अपने आपे का समर्पण। ज्ञान से-अहं ब्रह्मास्मि” कहकर निर्वाण किसी को प्राप्त हुआ हो, चाहे योग के विभिन्न मार्गों से-एक ही चीज शाश्वत रही है-प्रभुप्रेम प्यार सभी में एक सार्वभौम घटक रहा है। इस प्यार का स्वरूप है-ईश्वर से, सिद्धान्तों से, आदर्शों से घनिष्ठ प्रेम। समष्टि में संव्याप्त, कण-कण में विराजमान सत्ता से प्रगाढ़ प्रीति। भगवान से प्रेम करने वाला ही सिद्धि वाली भक्ति पाता है। श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी जी ने कहा है-साधन सिद्धि राम पग नेहू। अर्थात् ‘प्रभु के चरणों में प्रति साधना भी है-सिद्धि भी।’ साधना जब सिद्धिदात्री बन जाए तो फिर चाहिए क्या एवं यह भक्तियोग के समर्पण वाले, विसर्जन वाले मार्ग पर चलकर प्राप्त करना अत्यन्त सरल है। प्रीति करें तो कैसे? प्रीति होती उससे है, जिसके हम पास रहते हैं- जिसकी हमें हर पल याद बनी रहती है। लौकिक दृष्टि से दो पड़ोसी भी एक साथ रहते हैं, तो लगाव पैदा हो जाता है-आपस में प्रीति भरे संबंध बन जाते हैं। प्रभु के पास रहना आध्यात्मिक दृष्टि से संतों की भाषा में ‘सुमिरन’ (स्मरण) द्वारा संभव है। सारे संसार के भक्त अपना सर्वस्व अर्पण करने के लिए भगवद्सुमिरन की बात कहते रहे हैं।
प्रेम जब कामनाओं से परे होकर, कामवासना से ऊपर चलकर भगवत्प्रेम बन जाता है तो जैविक नहीं, आध्यात्मिक स्तर की उच्चता प्राप्त कर रूपान्तरित हो भक्ति में-समर्पण में बदल जाता है। वैज्ञानिकों के लिए प्रेम एक जैविक तथ्य है। पाश्चात्य जगत कामवासना व प्रेम में, उच्चस्तरीय समर्पण में, समाज-राष्ट्र-परमात्मा के प्रति भक्ति के स्वरूप में कोई अंतर कर ही नहीं पाया, इसी कारण वहाँ का पारिवारिक जीवन असफल रहा है। प्रेम-भक्ति वस्तुतः संवेदना की एक प्रकार से खेती है। इसी से जीवन में इसका संचार होता है। यही दाम्पत्य जीवन में बिना किसी सौदे के समर्पण एवं सामाजिक क्षेत्र में मानवमात्र के प्रति करुणा के विस्तार के रूप में देखी जाती है। वस्तुतः प्रेम-भक्ति का पुष्प उसी तरह उगता, पुष्पित, पल्लवित होता है, जैसे कीचड़ में कमल। कमल व कीचड़ की रासायनिक संरचना में अंतर है, किंतु जैविक जीवन की भावनाओं की उच्चतम अभिव्यक्ति के रूप में दैनन्दिन जीवन की भोग-वासनाओं की जिंदगी रूपी कीचड़ से। यही प्रेम जब भक्ति का रूप लेता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो हमारी जीवन वीणा से छेड़ा हुआ संगीत बज रहा हाँ। भक्ति में स्वर्गीय सौंदर्य है। भक्ति में वासनाओं का, कामवासनाओं का रूपान्तरित ईश्वरीय स्वरूप है।
भक्तियोग-समर्पण योग हमें इस तथ्य की जानकारी कराता है कि मनुष्य भगवान के एवं भगवान मनुष्य के अस्तित्व का एक अंश है। ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुखरासी’ वाली भावना को ध्यान में रख अंश का-जीव का जब तक अविनाशी ब्रह्म में, ईश्वर में समर्पण-विलय न हो। तब तक लक्ष्य की पूर्णता कहाँ हो? किसी उर्दू शायर ने लिखा हैं-
तू है मुजि है बंकाराँ मैं हूँ एक आबजूँ। या तो मुझे हमकिनार कर या दरकिनार कर॥
मुजि है बेकराँ अर्थात् असीम विस्तार वाला महासागर, आबजूँ अर्थात् एक छोटा-सा झरना। हमकिनार करना यानी अपने में मिला लेना-दरकिनार करना यानी परे उठाकर फेंक देना। यहाँ सूफी शैली में साधक कहता है कि हे परमात्मा! तू तो निस्सीम महासागर है एवं मैं एक छोटा-सा झरना हूँ या तो मुझे अपने में मिला ले या मुझे पर हटा कर फेंक दे। समर्पण की यही इन्तिहाँ है। बूँद का समुद्र में, भक्त का भगवान में, क्षुद्र का महान में, पुरुष का पुरुषोत्तम में समर्पण, विलय, विसर्जन आकुलता की इसी सीमा पर जाकर होता है। अंश को पूर्णता मिलती है तो पूर्ण में समाकर ही।
वस्तुतः प्रभु से मिलन-सुधारस (भगवान से प्रेम) का पान ही जीवात्मा का लक्ष्य होना चाहिए-मृगतृष्णा में पड़ कर वह भटक जाता है एवं इसी कारण दुख, शोक, उद्वेग, अशान्ति का कारण बनता है। समर्पण एक प्रकार से अंतःकरण की समस्त व्याधियों के उपचार का शुभारंभ है।
सर्वस्व के समर्पण में अंततः बाधक क्या है-सारे महात्मा, ज्ञानी-ऋषिगण एक ही तथ्य बताते आए हैं कि अहं को गलाए बिना समर्पण संभव नहीं। अहं प्रकृति व आत्मा के मध्य एक गाँठ है। जब अहं आत्मा को परे धकेलकर अपने को ही सब कुछ मान लेता हैं, तब यह घातक बन जाता है एवं सारी प्रगति के मार्ग अवरुद्ध हो जाते है। हम अपने अस्तित्व के बारे में भ्रमित होकर जो करते हैं, उसका अभिमान करते हैं-यहीं अहंकार है। आध्यात्मिक प्रगति के क्षेत्र में एक तथ्य सदा ध्यान में रखने योग्य है कि जहाँ कहीं भी अहं का बीज मौजूद होगा, उसे गलाकर, परिष्कृत कर समर्पण की स्थिति नहीं लायी जाएगी, तब में प्रगति तो रुकी ही रहेगी, अवनति-ही-अवनति होने का भय है। पहली गड़बड़ होते ही आत्मजगत में निगाह जानी चाहिए कि कहाँ गड़बड़ी हैं। हमारे भीतर कौन-सा ऐसा असामंजस्य है जो बाहर फलीभूत हो राह है। यह असामंजस्य अहंरूपी अवरोधक तत्व के कारण हो सकता हैं, जिसके कारण भगवत्चेतना अंदर कभी प्रवेश नहीं कर पाती। अहं का अर्थ होता है-व्यक्ति के अंदर भाव आना कि सृष्टि का केन्द्र मैं हूँ। औरों को मेरे साथ तालमेल बिठाना चाहिए।
बिनोवा लोकसेवी के लिए साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले के लिए कहते थे कि उन्हें यश का दान करना चाहिए। वे कहते हैं कि हम सबसे दान माँगते फिरते हैं, क्या हम कुछ दान दे सकते हैं। हम जो कुछ काम करते हैं उसका यश हमें न लेकर दूसरों को देना चाहिए। श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि “यदि तुम्हारा अहं नहीं गया तो तुम्हारा गुरु स्वयं ब्रह्मा हो तो भी वह तुम्हारा कल्याण नहीं कर सकता।”
समर्पण हानि-लाभ देखे बिना-नाम-यश की कामना रखे बिना किया जाता है। परमपूज्य गुरुदेव बाँसुरी का उदाहरण देते हुए कहते थे कि पोली बाँस में अहं की गाँठ ही बाधक है। जैसे ही वह गाँठ निकली, राग निकलने लगते हैं एवं श्रीकृष्ण के होठों से सटने की पात्रता उसे मिल जाती है। अहं बड़ा सूक्ष्म होता हैं, किंतु समूची आध्यात्मिक प्रगति की अवरुद्ध कर देता हैं। अहं वाणी की मधुरता का भी हो सकता है, लेखनी का भी, विद्वत्ता का भी, सिद्धि का भी एवं वैराग्य का भी। अहं हर दृष्टि से बाधक है। भक्तियोग का पहला सोपान है-अहं का विसर्जन-विलय कोई भी महान कार्य इस सृष्टि में बिना समर्पित सेवा के संभव नहीं हुआ। हर साधक का पहला लक्ष्य होना चाहिए-अंतर्जगत पर एक दृष्टि डालकर अहंकार रूपी नाग को कुचलना। यह एक कठिन साधना है, पर सर्वस्व को समर्पित करके ही तो सर्वस्व की प्राप्ति की जा सकती है। यदि यह तथ्य ध्यान में रहे एवं कबीर के इन पदों का मर्म समझ में कही कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। संत कबीर कहते हैं-
तू तू करता तुझ गया मुझ में रही न हूँ। वारी फेरि बलि गई जित देखीं तित तू॥
जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं। प्रेम गली अति साँकरि ता में दुई न समाइ।
समर्पण की यह पराकाष्ठा है। इस स्तर पर भक्त व भगवान, साधक व इष्ट, शिष्य व गुरु की चेतना एक-दूसरे में मिल जाती है एवं फिर साधक सर्वस्व को प्राप्त करने का अधिकार पा लेता है।
ज्ञातव्य
साधना प्रशिक्षण सत्रों की घोषणाएँ हो चुकी हैं। सारे भारतवर्ष के ४८ स्थानों पर चार टोलियों द्वारा ये प्रशिक्षण १ दिसंबर १८ से २० जनवरी ११ के बीच पूरे होने जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश को हरिद्वार, सहारनपुर, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, देहरादून व पूरे गढ़वाल मण्डल हेतु प्रशिक्षण केन्द्र शान्तिकुञ्ज ही रखा गया है। इस क्षेत्र के कार्यकर्ता २९, ३०, ३१ दिसम्बर १९९८ की तारीखों में शान्तिकुञ्ज में एकत्र होंगे। विस्तृत जानकारी हेतु पत्र व्यवहार कर लें।
मुख को एक अग्निचक्र की उपाधि दी गयी है। इस चक्र की-मुख में विद्यमान ऊष्मा को जब पूरे पाचन संस्थान की अग्निप्रक्रिया से जोड़ा जाता है, तो यह एक बड़े विराट तंत्र का एक घटक सिद्ध होती है। यह समग्र संस्थान यज्ञाग्नि को एक दिव्यकुण्ड के समान हैं, जहाँ। मात्र पाचन कार्य ही नहीं होता, वाक्शक्ति का भी उद्भव यहाँ से होता है। यह अग्निचक्र स्थूल रूप में पाचन का, सूक्ष्मरूप में उच्चारण का और कारणरूप में चेतनात्मक दिव्यप्रवाह उत्पन्न करने की त्रिविध प्रक्रिया संपन्न करता है। जपयोग का-मंत्र विद्या का सारा विधान इसी चक्र की रहस्यमयी सामर्थ्य के साथ जुड़ा हुआ हैं। जहाँ विचारों की सामर्थ्य से मनोमय जगत में क्राँतिकारी परिवर्तन किए जा सकते हैं, वहाँ शब्द-सामर्थ्य से स्थूलजगत में, पदार्थ और आकाश स्थित पिण्डों में जबर्दस्त विस्फोट किया जा सकता है। ऋषिगण इन शब्दों-ऋचाओं के रूप में प्रार्थनाओं का ही विधिवत प्रयोग कर विश्वब्रह्माण्ड पर अपना आधिपत्य रखते थे। इसी से मंत्रविज्ञान के रहस्य को इतना महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
मंत्रविज्ञान में शब्दों का चयन ध्वनि-विज्ञान के आधार पर किया जाता है। मंत्रस्रष्टाओं की दृष्टि में शब्दों का गुँथन ही अत्यधिक महत्वपूर्ण रहा हैं उनका सृजन यह ध्यान में रखते हुए किया जाता है कि उनका उच्चारण किस स्तर का शक्ति कम्पन उत्पन्न कर रहा है और उनका जपकर्ता पर, बहिर्वातावरण पर तथा अभीष्ट प्रयोजन के निमित्त प्रभाव पड़ रहा है या नहीं। मानसिक, वाचिक एवं उपाँशुजप में ध्वनियों को हलका-भारी किया जाता हैं यह सारी प्रक्रिया ध्वनिविज्ञान के सिद्धान्त पर उनके प्रभावों को दृष्टिगत रख निर्धारित की गयी है। वेदमंत्रों के अक्षरों के साथ-साथ उदात्त-अनुदात्त और स्वरित क्रम से उनका उच्चारण नीचे-ऊँचे तथा मध्यवर्ती उतार-चढ़ाव के साथ किया जाता है। सस्वर उच्चारण का यह विधान बनाया ही इसलिए गया है कि मंत्र-जप के द्वारा अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति कर सकने वाला शक्तिप्रवाह उत्पन्न हो सके।
मंत्र जप की प्रतिक्रिया भीतर होती है एवं बाहर भी। आग जहाँ लगती है, वहाँ उस स्थान पर भी गरमी पैदा कर देती है तथा वायुमण्डल में भी ऊष्मा बिखेरकर अपने प्रभाव क्षेत्र का परिचय देती है। जप का ध्वनिप्रवाह इतनी गर्मी पैदा करता है कि शरीर में जहाँ भी चक्र-उपत्यिकाओं के समूह हैं, वहाँ एक विशिष्ट स्तर की शक्ति का संचार होने लगता है। बाहर यह प्रभाव पड़ता है कि लगातार के संघात से मंत्रजप की विशिष्ट तरंगों से निखिल अंतरिक्ष में विशिष्ट तरंगों से निखिल अंतरिक्ष में विशिष्ट स्पन्दन पैदा होने लगते हैं जो प्राणीमात्र व वनस्पतिजगत सहित समस्त वातावरण को प्रभावित करते हैं। मंत्रों के क्रमबद्ध उच्चारण से शरीर के अन्तः-संस्थानों में विशिष्ट प्रकार की हलचलें उत्पन्न होकर अंदर की प्रसुप्ति को जाग्रति में बदलने की महत्वपूर्ण प्रक्रिया संपन्न होती है।
मंत्र-साधना अंतःऊर्जा का सुनियोजन भी करती है, साथ ही अतिरिक्त विश्व ऊर्जा की व्यवस्था जुटाकर हमारी जैविक व मनोवैज्ञानिक प्रकृति के रूपान्तरण भी करती है। यह कार्य मात्र ऊर्जा-तरंगों के विज्ञान के सुनियोजन द्वारा ही संभव हैं। वैज्ञानिक-मांत्रिक-तांत्रिक तीनों के लक्ष्य अलग-अलग होते हैं किन्तु ढूँढ़ते तीनों ही सुव्यवस्थित ऊर्जा तरंगों को ही हैं। वैज्ञानिक भौतिक जगत की ऊर्जा को प्रयुक्त करता है, तो योगी-मांत्रिक आध्यात्मिक जगत की ऊर्जा को। तांत्रिक सूक्ष्म भौतिक जगत ऊर्जा का प्रयोग करके अपना कार्य सिद्ध करता है। वैज्ञानिक ऊर्जा का दोहन कर संसाधनों की वृद्धि करते हैं, तो तांत्रिक उसका अपनी इच्छाओं-मनोकामनाओं की पूर्ति के निमित्त प्रयोग करते हैं। योगी का-मांत्रिक का लक्ष्य पवित्र होता है। हमारे ऋषिगणों ने विभिन्न ऊर्जा स्तरों का पता लगाकर सूक्ष्मजगत में अनुसंधान कर मंत्रों को देवताओं की प्रकृति के अनुरूप चुना। ध्वनि की शक्ति, बीज मंत्रों के कम्पन एवं संकल्प शक्ति के समुच्चय से मंत्रविज्ञान का सारा प्रारूप बनाया गया है।
शिवसूत्रवार्तिक के अनुसार मंत्र चित्तशक्ति का स्वभाव होते हैं-चिच्छक्तें स्वभावों यः स मंत्रः परिणीयते।” वस्तुतः ईश्वर को भावपूर्वक संबोधित निवेदन ही मंत्र है। मंत्रों के कई प्रकार हैं-एक प्रकार के मंत्र पुँमंत्र (जिनमें मंत्र का देवता पुरुष होता है), स्त्री मंत्र (उपास्य देवी होती है) तथा नपुंसक मंत्र (तंत्रशास्त्रों के ) कहे जाते हैं। दूसरे वर्गीकरण के अनुसार मंत्र-सिद्ध साध्य, सुसिद्ध या अरिमंत्र-चार प्रकार के हो सकते हैं। सिद्ध वह जो गुरु द्वारा स्वयं प्रमाणित कर दिया गया हो-साध्य खुद साधना करके सिद्ध किया गया हो, सुसिद्ध वह जो गुरु परम्परा के अंतर्गत प्राप्त हुआ हो तथा अरिमंत्र शत्रुनाशक प्रभाव वाले। एक वर्गीकरण के अनुसार मंत्र पिण्ड (एक अक्षर का), कर्त्तरि (दो अक्षर का), बीज (३ से १ वर्णों का ), अथवा माला मंत्र (बीस वर्णों का) इस रूपकार हो सकते हैं मंत्र अपनी प्रकृति के अनुसार एक और वर्गीकरण के अनुसार सात्विक, राजसिक, तामसिक भी होते हैं राजसिक जहाँ मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु होते हैं वहाँ तामसिक में तांत्रिकों के मंत्र आते हैं। पाँचवाँ वर्गीकरण साबर व डामर मंत्रों के रूप में वर्णित किया गया हैं साबर मंत्रों में न कोई मेल होता है, न अर्थ-जप का विधान। झाड़ने-फेंकने आदि के लिए ये गाँव-गाँव में प्रचलित हैं। डामर मंत्र प्रेत-पिशाच-यज्ञ-किन्नरों को साधने के लिए हैं। इनके बारे में रामायणकार ने लिखा हैं-
कलिविलोगी जगहत हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल निज सिरजा॥
अनमिल आखर अरथन जापु। प्रकट प्रभाव महेश प्रतापु॥
अर्थात् ‘कलि के प्रकोप को देखकर विकल हो भगवान शिव व पार्वती जी ने इन मंत्रों की रचना की। इनमें न कोई मेल है-अर्थ-न जप का विधान किन्तु महेश का प्रभाव प्रत्यक्ष है।’
मंत्र तो लाखों की संख्या में है। हमें तो अपना इष्ट-लक्ष्य प्राप्त करने के लिए महामंत्र रूप में गायत्री मंत्र युग के विश्वमित्र द्वारा दिया गया है। उसी की सात्विक उपासना यदि ध्यानपूर्वक कुछ आत्मशोधन की तपश्चर्या के साथ कर सकें, तो जप का प्रभाव निश्चित ही फलदायी परिणाम के रूप में मिलता है। मंत्र का जप उसकी भावना को अनुसार उसके देवता पद प्रगाढ़ विश्वास रखकर किया जाना चाहिए मंत्रजप फलदायी हो इसके लिए तीन बातें विशेष ध्यान देने योग्य हैं। पहली मंत्र की सामर्थ्य पर विश्वास। मंत्र में अतुलनीय सामर्थ्य हैं, हमें इससे सब कुछ मिल सकता हैं, यह है दृढ़ विश्वास। दूसरी जिस गुरु ने मंत्र दिया है, उसकी सत्ता पर पूरा पक्का भरोसा। उसने अनुभूत किया है, इसलिए हमें अपनी गुरुसत्ता पर विश्वास रख उसका जप करना चाहिए। गुरुपरम्परा से जुड़ा मंत्र सुसिद्ध मंत्र कहलाता है। मंत्रशोधन के ताड़न-उत्कीलन-शापविमोचन जैसे तरीके इसमें करने नहीं पड़ते। तीसरी महत्वपूर्ण बात हैं-मंत्र को देवता पर विश्वास। गायत्री मंत्र का देवता सविता है। वह देवता सर्वसमर्थ है-सृष्टि का स्वामी है एव हम जो भी अभ्यर्थना मंत्र के माध्यम से कर रहे हैं, वह हमारी अभ्यर्थना निश्चित ही हमें लक्ष्य के समीप ले जाएगी, यह भव निरंतर सशक्त करते रहना चाहिए। इन तीनों बातों का ध्यान रखने से मंत्र की सामर्थ्य असंख्य गुनी हो जाती है।
मंत्र के शब्दार्थ पर महार्थ–मंजरी में वक्तव्य आया है-मनन त्राण धर्माणों मंत्र” अर्थात् मनन और त्राण मंत्र के ये दो धर्म हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने मंत्र ज पके विषय में लिखा है कि “मंत्र जप वही सार्थक है जिसमें मानसिक एकाग्रता एवं निष्ठा का समुचित समावेश हो। परिष्कृत व्यक्ति की परिमार्जित वाणी से जिसकी साधना की जाए, जिसकी रहस्यमय क्षमता पर गहन श्रद्धा हो तथा जिसका अनावश्यक विज्ञापन न करके उसे गोपनीय रखा जाए।” गोपनीय से यहाँ आशय है- मिलने वाले फलितार्थ कर उस प्रसंग को हलका न बनाना।
मंत्र विनियोग के पाँच अंग हैं- ऋषि, छंद, देवता, बीज, तत्व। इन पाँच मंत्र समग्र बनते हैं। ‘ऋषि ‘ से आशय है ऐसा व्यक्ति-मार्गदर्शक गुरु जिसने उस मंत्र में पारंगतता प्राप्त कर ली हो। ‘छंद’ का अर्थ हैं जय, मंत्र की संरचना और उच्चारण शैली। ध्वनि तरंगों के कम्पन इसी लय पर निर्भर है। ‘देवता’ से अर्थ है- चेतना के महासागर में से अपने लिए अभीष्ट शक्तिप्रवाह का चयन। निखिल ब्रह्माण्ड में प्रवाहित शक्ति तरंगों में से सुयोग्य का निर्धारण। ‘बीज’ से अर्थ है उद्गम। किस मंत्र के देवता का शरीर में स्थान कहाँ है, उसे किस विधि से प्रभावित करें, यह जानकारी बीज-विज्ञान से मिलती है। इसे किसी मंत्र में शक्ति भरने वाला सूक्ष्म इंजेक्शन भी कह सकते हैं। ‘तत्व’ जो अंतिम मिलती है। प्रामाण्य-फलप्रद-बहुलीकरण एवं आयत क्षमता के रूप में ये प्रवृत्तियाँ समझायी गयी है।
मंत्रविज्ञान को मर्म को यदि समझा जा सके एवं उपर्युक्त विवेचन के अनुसार मंत्रजप भावपूर्वक नियत निर्धारण के अनुरूप किया जा सके, तो निश्चित ही इसके सत्परिणाम मिलकर रहते हैं। जप में चार तत्व प्रधान होते हैं-ध्वनि संचम, उपकरण एवं विश्वास। इसी प्रकार इसका फल मिलने को पीछे भी चार महत्वपूर्ण आधार हैं-श्रद्धा विश्वास, नियमितता एवं आचार-विचार मंत्रजप में उच्चारण तो मात्र मंत्र का कलेवर है-प्राण है उसकी भावनाएँ। हृदय को शिव, प्राण एवं अग्नि की तथा जिह्वा को शक्ति, रयि एवं सोम की उपाधि दी गयी है। भावपूर्वक जप करने से शब्दशक्ति के स्फोट के माध्यम से निश्चित ही फलदायी परिणाम उपलब्ध होते हैं। साइमेटिक्स के सिद्धान्त के अनुसार मंत्र साधना के द्वारा देवता के प्रति प्रगाढ़ विश्वास व अर्थ के ध्यान को साथ जप द्वारा ब्रह्माण्ड में एक अनूठा वाद्यमण्डल-इलेक्ट्रॉनिक नाद उत्पन्न होता है। गायत्री मंत्र पर यह सिद्धान्त ऐसा सटीक बैठता है कि इसके परिणाम कभी असंदिग्ध नहीं रहते। साधना महासमर भावविह्वल होकर किये गये सुनिश्चित विधि- विधानपूर्वक गायत्री जप-अनुष्ठान द्वारा जीता जा सकता है एवं भावी विषम संभावनाओं को निरस्त किया जा सकता हैं, यह विश्वास रखकर हर साधक को बिना प्रभाव के इसमें जुटे रहना ही चाहिए।
“यदि हमें हिन्दू धर्मानुयायी होने और एक मंत्र विशेष पर उसका पक्षपाती होने के दोष से मुक्त किया जा सके, तो हमें यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि गायत्री मंत्र की शब्द संरचना अनुपम एवं अद्भुत है। आगम और निगम का समस्त भारतीय अध्यात्म इसी पृष्ठभूमि पर खड़ा है। मंत्र व तंत्र की अगणित शाखाएँ इसी का विस्तार परिवार हैं। अन्य धर्मावलम्बियों के अन्य मंत्र हो सकते हैं पर जब कभी सार्वभौम, सार्वजनीन मंत्र की खोज दुराग्रहों-पूर्वाग्रहों से दूर रहकर निष्पक्ष भाव से की जाएगी, तो उसका निष्कर्ष गायत्री मंत्र ही निकलेगा।”
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
बहुधा यह सवाल किया जाता हैं, तंत्र अन्ततः है क्या? इसकी विचारभूमि, इसका व्यावहारिक ज्ञान और इसकी सिद्धि का सीमान्त आखिर क्या है? इन सवालों के जवाब में यह कहा जा सकता है कि तंत्र क्या नहीं है। संसार का जो दृश्य स्वरूप है, इसमें जितना कुछ हो रहा है वह सब तंत्र के रूप में विख्यात ज्ञानधारा के प्रति हमारा कोई भी आग्रह हो सकता है, किन्तु इस शब्द के जितने अर्थ हो सकते हैं वे सारे मिलकर जिस स्थिति की सिद्धि करते है वही तंत्र है।
इस विषय की और अधिक व्याख्या करने के लिए हम विचार करें, चिंतन को कुछ अधिक सूक्ष्म ओर संवेदन को कुछ और सुकुमार बनाएँ तो लगेगा कि सारा विस्तार अपने आप में तंत्र है। वेद ने उदात्त चिंतन के रूप में जो ऋचाएँ दीं, वे बुद्धि की निर्मल ज्योत्सना में हमें समग्र से एकाकार हो जाने की प्रतीतियाँ थीं। हमारे अंतर्मन में झंकृत वीणा के अनुवाद की हार्दिक अनुभूति थीं। यही ऋक् जब बैखरी वृत्ति का विषय बनी तो साम की अनवरत गति बनी। वेदत्रयी का आत्मबोध संसार को कामना वितान का व्याख्याता बनकर अथर्व रूप में चतुर्थ वेद बना। यह विस्तार विशेषतः वेदत्रयी का चौथे वेद में प्रकट होना ही तंत्र की मूल परिभाषा है।
यही मूलज्ञान उपनिषदों में विस्तारित होता हुआ पुराणों में अत्यंत विकसित हो गया। गोत्र प्रवर्तकों की संहिताओं, अनुशास्ता ऋषियों की स्मृतियों और यज्ञ के प्रचार ने तंत्र का अर्थ विस्तार तो किया ही, नियंत्रण भी किया और कार्यविधि भी। दरअसल हमारी नजर संकीर्ण है और बहिर्मुखी भी। शब्द को हम नितान्त स्थूल मानकर उसका व्यवहार करते रहते हैं। उसमें जीते और मरते रहते हैं। उसके मर्म को समझाने की वृत्ति और क्षमता हमारे मन में उदित ही नहीं होती। शब्द वाक्देवी का ही श्री विग्रह है। सम्पूर्ण देवत्व की आधार भूमि और अवतार वेदी है। उनके लीला विलास इसी स्तर पर, इसी परिधि में सम्भव होते हैं। स्वयं अक्षर पुरुष क्षरित होकर इस संसार का सृजन-रक्षण-संहार करता है और यह त्रिविध वृत्ति शब्द को विस्तारित व अनुभूति को विस्तारित करती जाती है।
किसी रंगीन कपड़े को देखकर हम उसे ग्राह्य अथवा उपेक्षणीय कह दिया करते हैं। इसके पीछे हमारी उपयोगितावादी धारणा अथवा अन्य आग्रह हो सकते हैं, किन्तु उसके रंग संयोजन अथवा सूत्र (सूत) के रूप, गुणों का विश्लेषण तांत्रिक ही कर पाता है। यहाँ तांत्रिक शब्द रसायनशास्त्री के लिए प्रयुक्त हुआ है। पदार्थ के मूल रूप को जानना ही मंत्र है और उसके संयोग व मिश्रण से सम्भावित स्थितियों को जानना तथा मूर्त करना तंत्र की ही प्रक्रिया है।
एक ज्ञानातीत सत् है-निष्फल निर्विघ्न, अवाच्य। ऐसे अस्ति को हम परम कहते है। यह परम शिव के साथ जुड़ता है, तो परमशिव और ब्रह्म के साथ जुड़ने पर परमब्रह्म कहलाता है। इसमें जो कुछ हैं, वह शब्द या अनुभूति का विषय नहीं हो सकता, किन्तु इसी परम से इच्छा, ज्ञान और क्रिया की त्रिवेणी झरती है। यही निष्काम अपने ऐश्वर्य से विस्तारित होता हुआ जब ज्ञानमय अवस्था में आता है, तो मंत्र स्वरूप हो जाता है। यहीं इसका समागम अष्टपदी वाक् से होता है। यहाँ पर प्रमुख होता है, पदार्थ गौण। क्योंकि पदार्थ उसके स्थूल होने पर ही आकार ग्रहण करेगा। इस ज्ञानगम्य अवस्था को तत्त्वदर्शी लोग अर्थरूप शिव ओर शब्दरूप शक्ति का ऐक्य भाव कहते हैं किन्तु इच्छा, ज्ञान को यहीं निवृत्त नहीं करती, शिव और शक्ति का सायुज्य यहीं विरत नहीं होता, प्रत्युत और आगे बढ़ता और विकसित होता है। तब उस क्रियामय अवस्था को प्राप्त करना पड़ता है और यहाँ से तंत्र साधना प्रारम्भ होती है।
प्रकृति क्रियामयता के कारण विस्तारित होती है और जड़-चेतन में अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों का सृजन करके ही शान्त नहीं होती, उनको नियतकाल तक क्रियाशील रखकर पुनः स्व स्वरूप में संवरित करके शान्त हो जाती है। इस व्यापार में कितना विस्तार होता हैं, इच्छा का बल क्रिया को कितनी तत्परता से विक्षुब्ध करता हुआ, मथता हुआ संसार का रूप और नाश का वृत्त लिखता हैं प्रवृत्ति के रहस्यों का अनावरण करते हुए उसे व्यक्ति के लिए उपयोगी बनाना तंत्र साधना का व्यावहारिक पक्ष है और विस्तार का ज्ञान प्राप्त करके उसके मूल रूप को जानना तंत्र साधना का ज्ञान मार्ग है। जिसे आत्मपक्ष कहा जाता है।
भगवान महाकाल की यह इच्छामयता जो रूप धारण कर रही है, जिस तरह कार्य कर रही है, उसमें व्यवस्थित एवं संगत पद्धति है और यह व्यवस्था ही नानाविधि देह और स्थितियों की कारक है। एक ही शक्ति स्थानभेद से क्रिया भिन्न दिखती है अन्यथा शक्ति के स्तर पर कहीं कोई अन्तर नहीं। स्थान के कारण देवत्व मुक्ति के निकट रहता है और दानवता बन्धन के निकट। इसी स्तरवैषम्य के कारण सुरासुरों का द्वन्द्व निरंतर चलता रहता है।
तंत्र इस संघर्ष का कारण भी बतलाता है और उसके प्रवर्तन की स्थितियों से परिचित भी कराता हैं इसीलिए वह लोक को समर्पित है और व्यक्ति का त्राण करता है। तंत्र साहित्य को पढ़कर हम आश्चर्यविमूढ़ हो जाते हैं। हमारे पूर्वज महर्षियों ने प्रकृति की कार्यविधि को समझने के लिए कितना श्रम, कितनी साधना और कितने परीक्षण किए थे, इसका ठीक-ठीक अनुमान भी लगा सकना हमारे लिए असम्भवप्राय है। उन्होंने पशुओं और पक्षियों की देह रचना का, उनकी चेष्टाओं और देहगत भिन्नताओं का सूक्ष्म निरीक्षण करके प्रकृति के ग्रह पक्ष को, उसकी कार्यप्रणाली के रहस्य को समझा था। किसी पशु के पेशाब में क्या गुण है, किसी पक्षी की जीभ में क्या विशेषता हैं, किसी जीव के रोम अथवा पंखों में क्या प्राकृतिक विचित्रता है और उनका उपयोग किस काम के लिए, किस तरह से किया जा सकता है, ये सारे निष्कर्ष तंत्र साधना को व्यावहारिक विस्तार देते हैं।
किसी व्यक्ति से कोई काम कराना है अथवा उसे रोगादि से मुक्त करना है तंत्र-साधक अपनी ही शैली से उसका उपचार करता है। आयुर्वेद स्वास्थ्यशास्त्र है, वह व्यक्ति को स्वस्थ रखने के अलावा कुछ सोचता ही नहीं, किन्तु तंत्र तो महाव्यापक है। वह रोगी भी कर सकता है और रोगमुक्त भी। जिन्होंने तंत्र-साधना की गहराइयाँ जानी हैं, वे जानते हैं कि वेद मुक्तिमार्ग हैं इसलिए व्यक्तिपरक है, क्योंकि मुक्ति सामूहिक स्तर पर सम्भव नहीं। किन्तु तंत्र-साधना प्रवृत्ति और निवृत्तिपरक होने के नाते व्यक्ति और समाज दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी है। संग में विस्तार है और विस्तार की अपनी आवश्यकताएँ हैं, इसलिए तंत्र प्रवृत्तिपरक है किन्तु उस प्रवृत्ति मूल में वह एकत्व को ढूँढ़ता है, इसलिए निवृत्ति उसका चरम है।
जिन्होंने भी तंत्र साधनाएँ की हैं और उसकी सिद्धियों का अनुभव पाया हैं, वे जानते हैं कि वर्तमान का रसायन विज्ञान और भौतिक विज्ञान कितना भी अभिमान करें किन्तु वह प्राचीन तंत्र विद्या से बहुत-बहुत पीछे हैं। इसके अतिरिक्त एक आपत्तिजनक तथ्य यह भी है कि इस विज्ञान में और आविष्कार पद्धति में आगे चलकर मनुष्य गौण ही नहीं, तिरोहित हो जाता है, इसलिए सारा संसार निष्प्राण हो जाता है। जबकि मनुष्य की महिमा सर्वोपरि है, उसकी उपस्थिति एक आश्वस्ति है किन्तु वैज्ञानिक विकास की विडम्बना यह है कि उसने मानव को अनुपस्थित करके उसका अभीष्ट साधन करने की स्वचालित एवं जड़ प्रक्रिया का विस्तार कर डाला है। परिणाम यह है कि व्यक्ति आत्मविमुख हो गया है। उसकी उपलब्धियाँ। एक प्रश्नचिह्न बन गयी हैं।
जब हम प्रकृति के सीमाबंधन से मुक्त हो ही नहीं सकते तो प्रकृति को ही प्रमाण क्यों नहीं मानते? प्रकृति को आधार मानने से हम सम्भावित विकृतियों के समाधान भी उसी प्रकृति में ढूँढ़ सकेंगे। मूलतः प्रकृतिपूजक चिंतन व्यक्ति को सहजता से ऊपर उठाकर विशिष्टता के स्तर पर ले जाता है। तंत्र-साधना भी व्यक्ति की क्षुद्रता एवं पाशविक बन्धन-शीलता पर विजय जाने का मंत्र देती है और आश्चर्य यह कि यहाँ विकृतिमय संसार में विकृतियाँ ही चिकित्सक बनती हैं। आप काम के रजोगुणी आवेश से ग्रस्त हैं, तो उसके लिए दूसरा पक्ष भी काम की उत्तेजना से प्रेरित होकर आपको शान्त कर सकेगा। रावण के क्रोधमत् रूप का उपचार राम के रौद्ररूप से ही सका। यह विकृतियों का गणित था, प्रकृति का इससे भिन्न है और ये प्रकृति व विकृति मिलकर ही सम्पूर्ण बनती हैं।
तंत्र-साधनाएँ प्रकृतिपरक हैं, इसलिए आत्मपक्षी हैं। यह देह ही इनकी प्रयोगशाला है। इस देह-यंत्र की तांत्रिक व्यवस्था को समझने पर समष्टि पर नियंत्रण की एवं स्थूल को इच्छानुसार बनाने की प्रभुता हमें प्राप्त ही जाती है। विज्ञान को इस यथार्थ पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि क्रिया में कोई अन्तर नहीं, अन्तर है उपादानों की दृष्टि में। अणु ऊर्जा को प्रयोग में लाने के लिए व्यापक सरंजाम जुटाने पड़ते हैं। इसके विपरीत तंत्र-साधनाएँ व्यक्ति के देह कोशों को ही इसके लिए उपयोगी बनाते हैं, ताकि विखण्डन की ऊर्जा को दिशा एवं प्रयोजन के अनुरूप शक्ति के आवेग एवं प्राकट्य को सह सके। यह सब साधना-विधि में बोले जाने वाले विनियोग एवं न्यास से सिद्ध हो जाता है।
निश्चित रूप से हम कह सकते हैं कि जिस तरह बिजली से अनेकों काम होते हैं, उसी तरह तंत्र-साधना एवं सिद्ध मंत्र अनेक काम कर देते हैं। विशेष बात यह है, इसके लिए उपकरणों के जंजाल की जरूरत नहीं। यद्यपि ऊर्जा को पाने के लिए हमें भी उतनी ही श्रम-साधना करनी पड़ती है। शब्द में अन्तर्हित शक्ति के बीज, न्यूक्लियस का विखण्डन करने के लिए उसे सूक्ष्म से सूक्ष्मतर एवं शुद्ध अवस्था में लाने के लिए जप करना होता है। इस जप से हमारा अन्तःशरीर शक्ति के प्रबल आवेश को सहन करने की क्षमता प्राप्त करना है और मंत्र की नाभिकीय शक्ति प्रकट होने की योग्यता मिलती है।
मंत्र के अलावा टोटके जैसी पद्धति भी तंत्र के ही अंतर्गत आती है। किसी व्यक्ति के अंग से स्पर्श की हुई वस्तु अथवा उसका पसीना, नाखून आदि पदार्थों को लेकर जो प्रयोग किए जाते हैं, वे भी तंत्र-साधना के अंतर्गत आते हैं। वास्तविकता यह है कि तंत्र-साधना का क्षेत्र इतना विस्तृत है कि उसमें कुछ भी छूटा नहीं हैं। सारा स्थूल और ज्ञानेन वचसा अगम्य महाकाल भी इसी तंत्र-साधना के विस्तार में आते हैं। तंत्र-साधना के द्वारा परकाया प्रवेश, अणिमा आदि सिद्धियाँ, कायाकल्प आदि सब कुछ सम्भव है। सत्य तो यह है कि साधना है ही असम्भव को सम्भव बनाने वाला विज्ञान, परन्तु इसको करने के लिए आवश्यक पात्रता चाहिए। कुपात्र में तो अमृत भी विष बन जाता है। सत्पात्र विष को भी औषधि के रूप में प्रयुक्त पात्र हैं उनके लिए यह द्वार आज भी खुला रहेगा।
तिनके की तरह विनम्र, पेड़ की तरह सहन करने की शक्ति, स्वयं मान की इच्छा न हो, दूसरों को मान दें तथा सदैव हरि का स्मरण करते रहें यही साधक के लिए अनिवार्य हैं। -चैतन्य महाप्रभु
सूक्ष्म तत्व प्राण से विनिर्मित है। जड़ और चेतन का सम्मिश्रण प्राण है। जिस प्रकार नीला और पीला रंग मिलने से हरा रंग बनता है। पानी और मिट्टी का सम्मिश्रित स्वरूप कीचड़ के रूप में परिलक्षित होता है। ठीक उसी प्रकार प्रकृति और पुरुष, जड़-चेतन का सम्मिश्रण प्राण है। इसी के आधार पर जीवन स्थिर रहता है। जब वह शरीर से पृथक हो जाता है, तो मरण की स्थिति बन जाती है।
यह प्राणतत्त्व शरीर में भी विद्यमान है ओर उसका स्वरूप विश्व-ब्रह्माण्ड में भी व्याप्त है। जड़-चेतन की एक मात्रा जब आपस में गुँथ जाती है, तो उसे जीव की संज्ञा दी जाती है। वह शरीरगत अवयवों को गति प्रदान करता है, साथ ही अहम् की ग्रंथि बनकर चिंतन तंत्र के माध्यम से अपनी चेतना का परिचय देता है। चेतना का गुण है, चिन्तन। चिंतन को ही सजीवता का चिह्न माना जाता है। आस्था, आकांक्षा, भावना, कल्पना, विवेचना आदि उसी के भेद-उपभेद हैं। प्राणवान को साहसी समझा जाता हैं पराक्रमी, पुरुषार्थी और जीवट का धनी। महाप्राण प्रतिभावान होते हैं और अल्पप्राण कहकर दीन-दुर्बलों कायरों का तिरस्कार किया जाता है। वैभववान् होने की तरह प्राणवान होना भी किसी के समर्थ सौभाग्यवान होने का चिह्न है। ऐसों का वर्तमान सुव्यवस्थित होता है और भविष्य उज्ज्वल।
जिस प्रकार जमीन पर बिखरा हुआ रेत बिना किसी अड़चन के अभीष्ट मात्रा में बटोरा जा सकता है, जिस प्रकार विशाल जलाशय में अपनी आवश्यकता का पानी उपलब्ध पात्र में भरा जा सकता है, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड व्यापी महाप्राण में से प्राण-साधना के द्वारा अपनी सूक्ष्म सत्ता में प्राणतत्त्व को इच्छित मात्रा में धारण करके अपना चेतना पक्ष बलिष्ठ बनाया जा सकता है। इससे शरीर की भी शोभा-समर्थता बढ़ती है।
प्राण-साधना की सामान्य विधियाँ प्राणायाम के रूप में जन-सामान्य में प्रचलित हैं। अनेकों इसे करना भी जानते हैं, परन्तु यथार्थ में प्राण-साधना प्राणायाम की क्रिया के अलावा भी और कुछ है। इच्छा, भावना, संकल्प की विशेषताएँ जुड़ जाने से ही इसका यथार्थ मूल्य और महत्व प्रकट होता है। वैसे भी सामान्य क्रियाएँ भावना जुड़ जाने से समर्थ परिणाम प्रस्तुत करती हैं। जबकि भावनाविहीन होने पर इनका पूरा लाभ नहीं मिल पाता। भावना और संकल्प का चमत्कार तो सर्वत्र देखा और अनुभव किया जा सकता है। एक-सी क्रियाएँ करने पर भी परिणाम में भारी अन्तर देखे जा सकते हैं।
इस अन्तर की खोज-बीन करने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि मात्र क्रियाओं को पूरा कर लेना ही पर्याप्त नहीं हैं। उसमें भावना और संकल्प का पुट नहीं जुड़ा तो अभीष्ट परिणाम निकलना संदिग्ध ही बना रहेगा। अपेक्षाकृत पहलवान से अधिक श्रम करते हुए भी मजदूर द्वारा सामर्थ्य अर्जित न कर पाने का एक ही कारण होता है कि उसकी क्रियाओं में संकल्प और भावना का समावेश नहीं होता। फलतः वह बलिष्ठ बनने का लाभ नहीं प्राप्त कर पाता। जबकि पहलवान की प्रत्येक क्रिया अपने लक्ष्य के लिए भावना एवं संकल्प से अनुप्राणित होती हैं। फलस्वरूप वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति में सफल होता है।
प्राण-साधना में भी प्राणायाम की क्रिया से अधिक महत्व भावना, इच्छा, संकल्प का है। प्रायः देखा जाता है कि एक जैसे साधना विधान पूरे करते हुए भी एक व्यक्ति चमत्कारी सामर्थ्य अर्जित कर लेता है, जबकि दूसरा कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाता। साधना के परिणामों में भारी अन्तर का कारण स्पष्ट है। जिसे भावना एवं संकल्प के होने-न होने के रूप में समझा जा सकता है।
प्राण-साधना के चमत्कारी परिणामों का वर्णन योग ग्रंथों में मिलता है। उसे अनेकों प्रकार की सिद्धियों का एक समर्थ माध्यम माना गया है। योगियों में विलक्षण विलक्षण सामर्थ्य विकसित हो जाने का वर्णन पढ़ा-सुना और देखा जाता है। यह संकल्प-युक्त प्राण-साधना का ही परिणाम है। व्यक्तित्व में प्राण का संचय करते रहने से अनेकों प्रकार की शक्तियाँ अपने आप ही विकसित हो जाती हैं। योगीगण इस तथ्य से भली प्रकार परिचित होते हैं कि प्राण का विपुल भण्डार सर्वत्र भरा पड़ा हैं, पर सामान्य जीवनधारी मात्र उस भण्डार में से जीवनयापन करने की आवश्यकता पूरी करने योग्य अल्प मात्रा ही उससे प्राप्त कर पाते हैं। जिस प्रकार बूँद-बूँद के मिलने से घड़ा भरता है, उसी तरह योगी प्राणतत्त्व का संचय और अभिवर्द्धन करते रहते हैं।
प्राणतत्त्व की प्रचुरता भौतिक सफलताओं का कारण बनती है और आध्यात्मिक प्रगति की भी। भौतिक जीवन में प्राणवान व्यक्ति का सर्वत्र वर्चस्व होता है। व्यक्तित्व की प्रभावोत्पादक क्षमता सहज ही अपने अनुयायियों, सहयोगियों एवं समर्थकों की संख्या बढ़ाती है। प्राण-बल से सम्पन्न व्यक्ति ही सार समर में विजय हासिल कर पाते हैं तथा कुछ महत्वपूर्ण कहा जाने योग्य काम कर पाते हैं। मनोबल-संकल्पबल की दृढ़ता प्राणतत्त्व के आधार पर ही बनती है। जो हर प्रकार की सफलताओं का आधार बनती है। आध्यात्मिक क्षेत्र में भी प्राणवान ही सफल होते और कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ अर्जित कर पाते हैं। कुछ को यह सम्पदा जन्म-जन्मान्तरों की साधना को फलस्वरूप अनायास ही मिल जाती है। पर विशिष्ट साधना प्रक्रिया अपनाकर हर कोई प्राण के लहलहाते महासागर में से अपनी झोली भर सकता और प्राण सम्पन्न बन सकता है।
विविध प्रयोजनों के लिए प्राण प्रक्रिया के अनेकों भेद-उपभेद हैं। परन्तु इन सबमें श्रेष्ठ और समर्थ साधना वह है, जिससे अपने भीतर पड़े शक्ति के भाण्डागार को जाग्रत किया जा सके। कुण्डलिनी के रूप में यह महाशक्ति हर मनुष्य के रूप में सुप्तावस्था में पड़ी रहती है परन्तु प्राण-साधना के अभाव में इसके विशेष लाभ नहीं उठाए जा पाते। कुण्डलिनी जागरण के लिए प्राणशक्ति का प्रचण्ड आघात आवश्यक होता है। शरीर में विद्यमान प्राण की मात्रा से इस प्रयोजन की पूर्ति नहीं हो पाती। निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त प्राणतत्त्व को आकर्षित करना तथा अपने भीतर भरना पड़ता है। कुण्डलिनी जागरण की साधना में सूर्यबेधन स्तर की प्राणसाधना की आवश्यकता पड़ती है।
प्राण के प्रहार से जीवाग्नि के उद्दीपन-प्रज्ज्वलन का उल्लेख अनेकों साधना ग्रंथों में अनगिनत स्थानों पर हुआ है। यह वही अग्नि है जिसे योगाग्नि, प्राणऊर्जा जीवनशक्ति अथवा कुण्डलिनी कहते हैं। अग्नि में ऐसा ही ईंधन डाला जाता है, जिसमें अग्नितत्त्व की प्रधानता वाले रासायनिक पदार्थ अधिक मात्रा में? होते हैं। कुण्डलिनी प्राणाग्नि है उसमें सजातीय तत्वों का ईंधन डालने से ही उद्दीपन होता है। सूर्यबेधन प्राणायाम द्वारा इड़ा-पिंगला के माध्यम से अन्तरिक्ष से खींचकर लाया गया प्राणतत्त्व मूलाधार में अवस्थित चिंगारी जैसी प्रसुप्त अग्नि तक पहुँचाया जाता है, तो वह भभकती है और जाज्वल्यमान लपटों के रूप में सारी सत्ता को अग्निमय बनाती है।
इसके लिए किसी शान्त-एकान्त स्थान में सुखपूर्वक बैठकर स्थिर चित्त हो अभ्यास करना चाहिए। आसन सहज, मेरुदण्ड सीधा, नेत्र अधखुले, घुटनों पर दोनों हाथ, यह प्राणमुद्रा कहलाती है। इस अध्यास के लिए प्रातः व सायं बेला ठीक है।
इस अभ्यास का प्रारम्भ करते हुए दाईं नासिका का छिद्र बंद करके धीरे-धीरे श्वास खींचना चाहिए। भावना यह हो कि वायु के साथ प्राणऊर्जा की प्रचुर मात्रा मिली हुई है। वह प्राणऊर्जा को सुषुम्ना मार्ग से वाम मार्ग के ऋण विद्युत प्रवाह इड़ा धारा द्वारा मूलाधार तक पहुँचाना, वहाँ अवस्थित प्रसुप्त चिंगारी को झकझोरना, जाग्रत करना, यह सूर्यबेधन प्राण-साधना का पहला भाग है। उत्तरार्ध में प्राण को पिंगला (मेरुदण्ड के दक्षिण मार्ग के धन विद्युतप्रवाह) में से होकर वापस लाया जाता है। जाते समय अन्तरिक्ष स्थित प्राण शीतल होता है। ऋणधारा भी शीतल मानी जाती है। इड़ा को-पूरक को चंद्रवत् कहा जाता है। इड़ा को चंद्रनाड़ी कहने का यही प्रयोजन है। लौटते समय अग्नि उद्दीपन-प्राण प्रहार की संघर्ष प्रक्रिया से ऊष्मा बढ़ती और प्राण में सम्मिलित होती है। लौटने का पिंगला मार्ग धन विद्युत का क्षेत्र होने से ऊष्ण माना गया है। दोनों ही कारणों से प्राणवायु ऊष्ण रहता है इसीलिए उसे सूर्य की उपमा दी गयी है।
प्राणसाधना में साधक को अपने भाव के अनुरूप लाभ मिलता है। श्वास द्वारा खींचे गए प्राण को मेरुदण्ड मार्ग से मूलाधार चक्र तक पहुँचाने का संकल्प दृढ़तापूर्वक करना पड़ता है। यह मान्यता परिपक्व करनी पड़ती है कि निश्चित रूप से अन्तरिक्ष से खींचा गया और श्वास द्वारा मेरुदण्ड मार्ग से प्रेरित किया गया प्राण मूलाधार तक पहुँचता है और प्रसुप्त कुण्डलिनी को-प्राणाग्नि को अपने प्रचण्ड आघातों द्वारा जगा रहा है। प्रहार के उपरान्त प्राण को सूर्य नाड़ी पिंगला द्वारा वापस लाने तथा समूची सूक्ष्म सत्ता को प्रकाशित-आलोकित करने की भावना परिपक्व करनी पड़ती है।
दूसरी बार इससे उल्टे क्रम में अभ्यास करना पड़ता है। अर्थात् दाहिनी नासिका से प्राण को खींचना और बायीं ओर से लौटाना होता है। इस बार पिंगला से प्राण का प्रवेश कराना तथा इड़ा से लौटाना पड़ता हैं मूलाधार पर प्राणप्रहार तथा प्राणोद्दीपन की भावना पूर्ववत् करना पड़ती है। एक बार इड़ा से जाना-पिंगला से लौटना। दूसरी बार पिंगला से जाना-इड़ा से लौटना। यही है सूर्यबेधन प्राणायाम का संक्षिप्त विधि-विधान कहीं-कहीं यौगिक ग्रंथों में सूर्यबेधन प्राणायाम को ही अनुलोम-विलोम प्राणायाम भी कहा गया है। लोम कहते हैं सीधे को, विलोम कहते हैं उल्टे को। एक बार सीधा एक बार उल्टा। फिर उल्टा, फिर सीधा। यह सीधा-उल्टा चक्र ही लोम-विलोम कहलाता है। लोम-विलोम की पूरी प्रक्रिया से एक पूरा सूर्यबेधन प्राणायाम होता है।
इस प्राणसाधना का अतीव महत्व है। कुण्डलिनी महाशक्ति के जागरण के लिए प्राणऊर्जा की प्रचुर परिमाण में आवश्यकता पड़ती है। यह प्रयोजन इसी से पूरा होता है। प्राण-साधना के द्वारा प्राणऊर्जा का अभिवर्द्धन साधक की भौतिक एवं आध्यात्मिक सफलताओं का मार्ग प्रशस्त करता है।
भली भई जो गुरु मिल्या, नहिं तर होती हाँणि। दीपक दिष्टि पतंग ज्यूँ, पड़ता यूँ ही जाँणि॥
माया दीपक नर-पतंग भ्रमि-भ्रमि इवै पडंत। कहै कबीर गुरु ग्यान थै, एक आध उबरंत॥ -कबीर
कबीरदास जी कहते हैं कि “बड़ा अच्छा हुआ जो हमें ठीक समय पर गुरु-सद्गुरु के रूप में मिल गया, नहीं तो बड़ी हानि होने की संभावना थी। कौन जानता है कि कबीर भी औरों की तरह मायारूपी दीपक को अपना पूर्ण लक्ष्य समझ कर पतंगे की तरह कूद न पड़ता। सारी दुनिया ही तो ऐसी है। कौन है जो इस माया दीपक का पतंग नहीं बन गया? ऐसे बड़भागी उँगलियों पर ही गिने जा सकते हैं जो गुरु की कृपा से उबर जाते हैं।”
संस्कार शब्द ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान भारतीय जीवनपद्धति में पाया है अनैतिक आचरण कुसंस्कार की तथा श्रेष्ठ अनुकरणीय सुसंस्कारों की प्रतिक्रिया है, ऐसा हमारे यहाँ माना जाता है। आखिर ये संस्कार हैं क्या? आद्यशंकर कहते हैं -” संस्कारों हि नाम संस्कार्यस्य गुणाँधानेन वा स्याद्योषाय नयेनन वा” (1-1-4-ब्रह्मसूत्रभाष्य) अर्थात् जिसका संस्कार किया जाता है उसमें गुणों का आरोपण अथवा उसके दोषों को दूर करने के लिए जो कर्म किया जाता है, उसे संस्कार कहते है गौतम धर्मसूत्र में कहा गया है कि संस्कार उसे कहते हैं जिससे दोष हटते हैं और गुणों का उत्कर्ष होता है। संक्षेप में संस्कार साधना जीवात्मा के परिशोधन-परिष्कार की साधना है। जिसके माध्यम से समय-समय पर जीवात्मा पर छाया कषाय- कल्मषों का निष्कासन-निराकरण किया जाता है।
जिस प्रकार विभिन्न प्रकार की मिट्टी को विधानानुसार संस्कारों द्वारा शोध कर उससे लोहा, ताँबा, सोना आदि बहुमूल्य धातुएँ प्राप्त कर लेते हैं। जिस प्रकार आयुर्वेदिक रसायन बनाने वाले औषधियों को कई प्रकार के रसों में मिश्रित कर उन्हें गजपुट, अग्निपुट विधियों द्वारा कई बार तपाकर संस्कारित कर उनमें मकरध्वज जैसी चमत्कारी व अन्यान्य औषधियों का निर्माण कर लेते हैं, ठीक उसी प्रकार मनुष्य के लिए भी समय-समय पर विभिन्न आध्यात्मिक उपचारों का विधान कर उसे अनगढ़ से सुगढ़ बनाने की महत्वपूर्ण पद्धति तत्त्ववेत्ता ऋषियों ने विकसित की थी। इसी साधना को षोडश संस्कार नाम दिया गया है। ऋषिगण इस तथ्य से सुपरिचित थे बार-बार तपाए जाने-सुसंस्कारित किए जाने से मनुष्य से संचित कुसंस्कार नष्ट होते हैं। आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त होता है। यही नहीं इन सूक्ष्म उपचारों द्वारा जीवन की मार्मिक संधियों-महत्वपूर्ण अवसरों पर विशिष्टताओं का-देवत्व का अभिवर्द्धन सुनिश्चित सत्य बना देता है।
वस्तुतः साधना विज्ञान का मूलभूत एक ही उद्देश्य है, श्रेष्ठ, सुसंस्कृत देवमानव का निर्माण। ऋषि यह मानते हैं कि जन्म-जन्मान्तरों की वासनाओं का लेप जीवात्मा पर रहता है। मनुष्य योनि में ही वस्तुतः आत्म-तत्व पकड़ में आता है। वैदिक व्यवस्था यह करती है कि संस्कार साधना के द्वारा जीवसत्ता के मानवगर्भ में आते ही उस पर छाए मलिनता कषाय-कल्मषों को हटा दिया जाए और उसे ऐसा शिक्षण दिया जाए और उसे ऐसा शिक्षण दिया जाए, जिससे कि वह अपने खोए स्वरूप को पुनः पा सके। ऋषिगणों ने मानवजीवन को आत्मा की विराट यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना वह गहन समीक्षा कर गर्भ में आने को लेकर चिता में समर्पण तथा उसके बाद भी मरणोत्तर विराम तक महत्वपूर्ण मोड़ों पर जीवात्मा को सँभालने-सँवारने की व्यवस्था की है।
मानवेत्तर योनियों से घूमकर आई हेय स्तर की आत्मा भी इन संस्कारों की भट्टी में-जिनकी विधान ऋषिगण ने किया है तपकर प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व में ढल जाती है। प्राचीन गृहसूत्रों में संस्कारों के विधि-विधानों का विस्तार से वर्णन कर उन्हें सामूहिक चेतना के जागरण, मन की उल्लास प्रफुल्लता से जुड़ी वृत्तियों के उभार तथा मनोविकारों के निराकरण हेतु ऋषिप्रणीत आध्यात्मिक साधना के रूप में संबोधित किया गया है।
आर्य संस्कृति के अनुसार वेद, स्मृति, तंत्र में सब मिलाकर ४८ संस्कार पाये जाते हैं, किन्तु इनमें भी १६ प्रमुख हैं। यदि विधिपूर्वक इनकी साधना की जाए, तो प्रथम आठ संस्कार प्रवृत्तिमार्ग में शेष आठ मुक्तिमार्ग पर मनुष्य को पहुँचा देते हैं ऐसी महर्षियों की मान्यता है। इस संस्कार साधना की इतनी महत्वपूर्ण फलश्रुतियों के बावजूद इनकी अवज्ञा क्यों होती चली गयी वह आज के आधुनिक पाश्चात्य सभ्यता प्रधानसमाज में इन्हें उपेक्षा का दृष्टि से क्यों देखा जाता है, यह एक विचारणीय प्रश्न है? परमपूज्य गुरुदेव ने षोडश संस्कारों को युगानुकूल बनाकर इन्हें व्यापक स्तर पर सम्मत प्रतिपादनों द्वारा इन्हें व्यापक स्तर पर सम्पन्न किए जाने की एक सुव्यवस्था प्रक्रिया को जन्म दिया। इसे युगऋषि के द्वारा किया गया संस्कार साधनाओं का अभिनव जागरण भी कह सकते हैं।
परमपूज्य गुरुदेव ने दूरदृष्टि से देखा कि इस बदले हुए वैज्ञानिक युग में व्यक्ति के लिए आध्यात्मिक साधनाओं के लिए समय उतना है नहीं जितना कि पहले कभी हुआ करता था। दूसरे जिस तरह अशुद्ध मंत्रोच्चारण का उसका अर्थ वह उनसे न ली जाने वाली शिक्षा न समझकर जिस प्रकार इनके नाम पर लकीर पीटी जाती है उससे भी जनउपेक्षा बढ़ी है। प्रत्येक संस्कार के साथ खर्चीले साधन होने व उनके विकल्प न सोचने के कारण भी जनरुचि इनसे हटी है। प्रीतिभोज के नाम पर हर संस्कार के साथ जुड़ा एक अनिवार्य उपक्रम ही इतना खर्चीला हो जाता है कि वह परस्पर प्रीति के स्थान यजमान के मन में धर्म साधना के प्रति आक्रोश ही पैदा करता है। इन सारी वजहों के कारण सभी संस्कारों के साथ जुड़े कर्मकाण्डों में युगानुकूल संशोधन भी जरूरी था। उनके साथ जुड़ी शिक्षाओं को सुगम भाषा में समझाए जाने की आवश्यकता भी थी तथा भाव-संवेदनापरक माहौल उभारने के लिए उस स्तर के पुरोहितों के उत्पादन का तंत्र भी अनिवार्य थी। इस सबके समाधान हेतु परमपूज्य गुरुदेव ने संस्कार साधना सम्पन्न करने वालों के शिक्षण हेतु व्यापक प्रक्रिया विकसित की और संस्कारों को साधना का गरिमामय स्वरूप प्रदान किया।
पारम्परिक ढंग से ४८ संस्कारों में जिन षोडश संस्कारों को शास्त्र मान्यता देते आए हैं, वे इस प्रकार हैं-१ गर्भाधान (२) पुँसवन (३) सीमान्तोन्नयन ये प्रथम तीन जन्म से पूर्व के संस्कार हैं। (४) जातकर्म (५) नामकरण (६) निष्क्रमण (७) अन्नप्राशन (८) चूड़ाकर्म (९) कर्णवेध-ये छह संस्कार जन्म के बाद बाल्यावस्था के हैं। इसके पश्चात बालक के शिक्षा ग्रहण करने योग्य होने पर (१०) विद्यारम्भ (११) उपनयन (यज्ञोपवीत) (१२) वेदारम्भ (१३) केशान्त (१४) समावर्तन संस्कार ब्रह्मचर्य व्रज के समापन व विद्यार्थी जीवन के अन्त के सूचक के रूप में माना जाता था (१५) विवाह संस्कार गृहस्थ जीवन के शुभारम्भ तथा (१६) अन्त्येष्टि जीवन के समापन पर अन्तिम संस्कार के रूप में सम्पन्न होता था। इन षोडश संस्कारों में वानप्रस्थ और संन्यास को ऋषियों ने न गिनकर इनकी गणना वर्णाश्रम व्यवस्था में कि थी। परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी दृष्टि युगानुकूल बनाते हुए इनकी संख्या घटाकर दस कर दी है, जो आज कि दृष्टि से अत्यंत अनिवार्य व व्यावहारिक हैं। उन्होंने दो संस्कारों नए जोड़े हैं जो आज के प्रचलन के अनुरूप हैं। वे हैं जन्मदिवसोत्सव तथा विवाह-दिवसोत्सव संस्कार मनाना। यह सनातन धर्म की विशेषता है कि स्मृतियों से लेकर अन्यान्य निर्धारणों में समय-समय पर परिवर्तन किये जाते रहे हैं। ऋषिगण पूर्वाग्रहों से विवेक को सर्वोपरि मानते आए हैं। परिणाम यही है कि कुछ कट्टर धार्मिक कर्मकाण्डियों को छोड़कर शेष सहिष्णु व्यक्तियों ने अपने को समाज के अनुरूप ढाल लिया है। सामयिकता उपयोगिता, सार्वजनिक और सत्परिणामों की सम्भावनाओं को सुनिश्चित करने वाली परिपाटी ही इक्कीसवीं सदी के मुंहाने पर खड़ी युवाशक्ति, प्रबुद्धों तथा नारी-शक्ति को स्वीकार्य होगी। यह मानते हुए शान्तिकुञ्ज,हरिद्वार के बारह संस्कारों को जन-जन तक लोकप्रिय बनाया व इन्हें सम्पन्न किए जाने की विराट स्तर पर व्यवस्था भी की।इन दिनों धूम-धाम से सम्पन्न हो रहे संस्कारों महोत्सव संस्कार साधना को ही सामूहिक स्तर पर सम्पन्न होने की झलक दिखाते हैं।
संस्कार साधना में जिन संस्कारों को यहाँ सम्मिलित किया गया है, वे हैं-१ पुँसवन संस्कार (२) नामकरण संस्कार (३)अन्नप्राशन संस्कार (४) मुंडन संस्कार (५) विद्यारम्भ संस्कार (६) यज्ञोपवीत संस्कार (७) विवाह संस्कार (८)वानप्रस्थ संस्कार (९) अन्त्येष्टि संस्कार (१०) मरणोत्तर -श्राद्ध संस्कार (११) जन्मदिवस संस्कार (१२) विवाहदिवस संस्कार।
पाठकगण इस सूची में देखेंगे कि वानप्रस्थ तथा श्राद्ध संस्कार का इनमें समावेश है, जिनको उल्लेख पारम्परिक षोडश संस्कारों में नहीं है। साथ ही जन्मदिवस व विवाह दिवस जैसे आधुनिकतम संस्कार भी हैं, जो धूम-धड़ाके से पाश्चात्य विधि से बर्थडे व मैरेज एनिवर्सरी नाम से मनाए जाते हैं। यदि साधना की भावभूमि एवं इसके सहयोगी कर्मकाण्डों से जुड़े शिक्षण के साथ इन्हें मनाया जाए तो जीवन में श्रेष्ठ प्रेरणाओं का समावेश भी हो सकता है। इस दृष्टि से ये अत्यन्त उपयोगी हैं। इनका विस्तृत विवेचन पढ़ने के लिए परिजन ‘षोडश संस्कार विवेचन’ (वाङ्मय क्रमांक ३३) देख सकते हैं।
यहाँ पर चर्चा तो संस्कारों के माध्यम से सम्पन्न की जाने वाली उस साधना की है, तो जीवन की मार्मिक संधियों में जीवनसत्ता को उत्तरोत्तर निर्मल एवं जाग्रत करती है। अध्यात्म साधना अपनी संस्कृति की सर्वप्रधान विशेषता है इसलिए शास्त्रकार ऋषियों ने अपने सम्पूर्ण शास्त्रों और संस्थाओं को आत्मा के रंग में रंग डाला है। संस्कारमय जीवन आध्यात्मिक साधना की दृढ़ भूमिका है। संस्कारों के द्वारा आध्यात्मिक जीवन का क्रमशः विकास होता है। संस्कारवान व्यक्ति अनुभव करता है कि उसका सारा जीवन एक महान यज्ञ है और जीवन की प्रत्येक भौतिक क्रिया का सम्बन्ध आध्यात्मिक तत्व से हैं। संस्कारों के द्वारा ही कर्म प्रधान सांसारिक जीवन का मेल आध्यात्मिक अनुभव से होता है। इस प्रकार संस्कारवान जीवन से शरीर और उसकी विविध क्रियाएँ पूर्णता की प्राप्ति में बाधक न होकर साधक होती हैं। शास्त्रोक्त संस्कारों को नियमपूर्वक करता हुआ मनुष्य भौतिक बन्धन और मृत्यु को पार करके अमृतत्त्व को प्राप्त करता है।
समर्थ रामदास विवाह मण्डप से ‘सावधान’ सुनते ही भाग निकले। उन्होंने गोदावरी के किनारे टाकली गाँव में एक गुफा खोद डाली। उसी में बैठकर रात्रि में व दिन में कमर भर पानी में खड़े रहकर गायत्री मंत्र जप करते थे। पानी में खड़े रहने से उनकी त्वचा सफेद पड़ गयी थी। जाड़ा-धूप पानी सभी मौसम में यही विधान उनका रहता था। इसी मंत्रजप के चमत्कार से उन्हें भगवान श्रीराम के दर्शन हुए। लोककल्याण शक्ति संचार हेतु परिव्रज्या का आदेश मिला। घूमते-घूमते माँ के पास भिक्षा लेने पहुँचे। माँ ने अपने बेटे नारायण (समर्थ का पूर्व नाम) की आवाज सुनी तो भागी-भागी चली आयीं। पुत्रवियोग में वे आँखों की ज्योति खो बैठी थी। जब पुत्र की आवाज सुनी-” हम राम के दास हैं-रामदास तो तुरन्त चिल्लायी-तू-नारायण है क्या? तुरन्त समर्थ ने माँ को प्रणाम किया एवं स्पर्श किया। तत्क्षण ही उनकी आँखों की ज्योति लौट आयी। समर्थ के अनेकानेक चमत्कार सिद्धियाँ है। गायत्री की बारह वर्ष तक की गयी साधना व श्रीरामनाम जप ने ही उन्हें यह नाम दिलाया।
ध्यान -साधना की अनगिनत प्रक्रियाएँ एवं प्रयोग हैं। उनमें से किसी को भी अपनाने से पहले उसके स्वरूप और परिणति के बारे में भली प्रकार विचार कर लेना चाहिए। अन्धश्रद्धा से प्रेरित होकर किसी तथाकथित मार्गदर्शक के कथन-प्रोत्साहन को आँखें बन्द करके अपना नहीं लेना चाहिए अन्यथा अनुपयुक्त चयन हानिकारक भी हो सकता। जिस लाभ की कल्पना की गयी थी, उसकी मिलना तो दूर, उल्टे हानिकारक परिस्थितियों में फँसना पड़ सकता है।
ध्यान के प्रथम चरण में साधक को अपना समर्पण-भाव इष्ट के साथ तादात्म्य करना पड़ता है। द्वैत को अद्वैत में बदलना पड़ता है। एकत्व और अद्वैत के स्तर तक पहुँचना पड़ता है। ईंधन जब अपने को आग में झोंकता है, तो वह कुछ ही देर में अग्निरूप हो जाता है। इष्ट के साथ तादात्म्य स्थापित करने पर उस दिव्य केन्द्र की दिव्यक्षमता का अवतरण साधक की समग्र सत्ता में होने लगाता है। समर्पण की प्रतिक्रिया अवतरण है। रबड़ की गेंद जिस कोण से जिस स्थान पर जितने जोर से फेंकी जाती है, वह लक्ष्य से टकराने के बाद उतनी ही तेजी से उस मार्ग से वापस लौटती है। ध्यान के साथ भी जुड़ी हुई श्रद्धा-शक्ति बनकर प्रयोक्ता के पास शब्द बेधी बाण की तरह वापस लौटती है। लौटते समय वह अधिक परिष्कृत स्तर की होती है। उसमें इष्ट की विशेषता भी जुड़ी होती है। इसका प्रयोग किस हेतु किया जाए, यह निर्णय करना साधक की अपनी विवेक-बुद्धि पर निर्भर करती है। भगीरथ, पार्वती, दधिचि, विश्वामित्र,
वशिष्ठ आदि ने अपने तपश्चर्या का प्रतिफल पुण्य-प्रयोजनों के लिए किया था।
आमतौर पर देवी देवताओं के ध्यान नहीं किए जाते हैं। आध्यात्मिक साधना में वह पुरातन प्रचलन है, पर देव वर्ग में से किसी को चुनने से पूर्व यह निरख-परख लेना चाहिए कि उपास्य की प्रकृति क्या है? अनेक देवी देवता तमोगुणी भी हैं। उनका स्वभाव व्यवहार, प्रयास चरित्र जैसे पक्षों में अनैतिकता की भरमार होती है। इसमें से कई मांसभोजी, मद्यपान, आक्रमणकारी और युद्धप्रिय होते हैं। उनकी उपासना साधक में उन्हीं दुर्गुणों का आविर्भाव करेगी। कुछ दिनों में उसकी प्रकृति में उन्हीं के दुर्गुणों की भरमार होने लगेगी।
वामाचार में कि जाने वाली ध्यान-साधनाओं में प्रायः यही देखने को मिलता है। उसमें तमोगुणी देवताओं की सिद्धि की जाती है और उस आधार पर मिले अनुदानों को मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तम्भन जैसे हेय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। कर्म अपना प्रतिफल निश्चित रूप से देते है और लौटकर करने वाले स्वयं भी उस कुकृत्य के दुष्परिणाम से बचे नहीं रह सकते। इस तथ्य को समझते हुए प्रारम्भिक चयन में समुचित सावधानी बरती जानी चाहिए। सात्विकता का अवलम्बन ही श्रेयस्कर समझा जाना चाहिए। इस क्रम में आदर्शवादी उदारचेताओं में हनुमान, नारद, बुद्ध जैसों की गणना होती है और देवियों में सरस्वती, गायत्री जैसों को उच्चस्तरीय इष्ट माना जाता है। उनमें आदर्शवादी विभूतियों की विशिष्टता गिनी जाती है।
जिन्हें देवी-देवताओं में रुचि नहीं, वे किन्हीं आदर्शों को अपने में विकसित करने के लिए उनका प्रतीक कमल पुष्प भी मान सकते हैं। इस मान्यता में मात्र छवि का ध्यान नहीं करना चाहिए, वरन् उन आरोपित विभूतियों का भी समन्वय करना चाहिए। यह तथ्य प्रत्येक ध्यान केन्द्र के सम्बन्ध में लागू होता है। यदि मात्र छवि को ही आधार माना गया है और उसके साथ अभीष्ट गुणवत्ता का आरोपण नहीं किया गया है, तो छवि-दर्शन मात्र कुतूहल की ही पूर्ति करता है। साधक को वह अनुदान प्रदान नहीं कर सकता, जो गुणवत्ता का समन्वय करने पर मिल सकता था।
महामानवों को भी इष्ट मानकर चला जा सकता है। विवेकानन्द, श्री अरविन्द, अपने आराध्य परमपूज्य गुरुदेव जैसे आदर्शों के धनी भी यदि अपनी ध्यान−धारणा के केन्द्र रहें तो हर्ज नहीं। गाय जैसे पशु हंस जैसे पक्षी, पीपल जैसे वृक्ष को आराधना के केन्द्र रखने पर अपनी सत्ता में समाहित विशेषताएँ साधक को प्रदान करते रह सकते हैं।
वेदान्त दर्शन में अन्तरात्मा की उत्कृष्टता को ही परब्रह्म माना गया है। सोऽहं, शिवोऽहम् अयमात्माब्रह्म, तत्त्वमसि जैसे सूत्रों में आत्मा और परमात्मा की एकता का सिद्धान्त स्वीकारा गया है। पर यहाँ ध्यान रखने योग्य है कि आत्मा का शुद्ध श्रेष्ठ उत्कृष्ट स्तर ही इस प्रतिपादन के अनुरूप बनता है। यदि दोष-दुर्गुणों के कीचड़ से सनी हुई चित्त चेतना को अपना स्वरूप मानने की भूल की गयी तो जुड़े हुए दुर्गुण भी परब्रह्म का स्वरूप बन जायेंगे और साधक अपनी निकृष्टता को भी अपनाए रहेगा और उनके निराकरण की आवश्यकता समझेगा जबकि वेदान्त का वास्तविक प्रतिपादन आत्मा में समाहित परमात्मा के दिव्यचेतना के साथ ही सम्बन्ध साधना है। उसके साथ मायाजाल की तरह गुँथ गई निकृष्टता के प्रति तो तिरस्कार का भाव रखना ही है। स्मरण रहे, दुष्प्रवृत्तियाँ बिना संघर्ष के हटती नहीं है। इसके लिए तप-तितिक्षा संयम-साधना और परमार्थ-परायणता के त्रिविध अभ्यास भी अनिवार्य रूप से करने होते है।
सोऽहम् साधना यों प्राणायाम के माध्यम से भी चलती है। श्वास खींचने के साथ सो और छोड़ते समय हम की ध्वनि एकाग्र के साथ ही यह भाव भी सघन रखना पड़ता है कि वह (परमात्मा) हम (आत्मा) दोनों के बीच सघन समन्वय और आदान प्रदान का जो उपक्रम चलता है, उसे अधिक स्पष्ट रूप से अनुभव किया जाय। इस प्रकार प्राणयोग द्वारा भी ध्यान-साधना हो सकती है। जपकाल में इष्ट की छवि को अन्तरात्मा के साथ अपनी आत्मा का समर्पण-विलय अनुभव करते रहने से भी यही परिणाम उपलब्ध किया जा सकता है।
छाया पुरुष या दर्पण के पीछे भी यही उद्देश्य जुड़ा हुआ है। धूप में या प्रकाश की ओर पीठ करे खड़ा होने पर शरीर की छाया सामने उपस्थिति समझा जा सकता है। इससे भी अधिक सुगम दर्पण साधना है। यमदूत शरीर का प्रतिबिम्ब दिखा सकने वाला आदमकद दर्पण हो तो उत्तम, अन्यथा उसका साइज इतना तो होना ही चाहिए, जिसमें बैठने पर चेहरे की प्रतिछाया समान आकार में दिख पड़। इसको विशुद्ध आत्मसत्ता की प्रत्यक्ष छवि माना जाए और उसमें दिव्यगुणों का सघन समावेश अनुभव किया जाए। साथ ही उसके दुर्गुण, कषाय-कल्मष हिमऋतु में झड़ने वाले पत्तों की तरह झड़ते जाने कि मान्यता को अधिकाधिक प्रखर बनाया जाए। यह आत्मदर्शन हैं इसकी महिमा देवदर्शन के समतुल्य है।
छवि निर्धारण एकाग्र समर्पण की अवधारणा एवं उत्कृष्ट का आरोपण इन तीनों का समन्वय होने पर ही ध्यान की पूर्णता बनती है। मात्र छवि पर कल्पना को केन्द्रित करने से अध्यात्मिक प्रगति का उद्देश्य पूरा नहीं होता, उतने भर से मात्र एकाग्रता सम्पादन भर की थोड़ी सहायता भर मिलती है। यों एकाग्रता साधन भी भौतिक और आत्मिक प्रगति के साथ काम आने वाली आवश्यक उपकरण जैसी उपलब्धि है, पर उतने तक सीमित रहने से आत्मिक प्रगति का महान प्रयोजन पूरा नहीं होता।
परब्रह्म को सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय मानना और उन विभूतियों का भक्तिभावना के माध्यम से जीवनचर्या में समावेश होना, यही है ध्यान साधना का वास्तविक स्वरूप यही है देव-अनुग्रह और अध्यात्मिक प्रगति का स्पष्ट चिन्ह। इसी स्थिति को प्राप्त करने के लिए अनेक आकार-प्रकार की विविध विधि ध्यान-साधनाएँ की जाती हैं। इस तथ्य को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए।
सर्वथा निराकार का ध्यान जिन्हें अभीष्ट हो, वे नादयोग की ध्यान-साधना कर सकते है
कानों को बन्द करके अनाहत दिव्यध्वनियाँ सुनी जाती है। गहराई में उतरने और अन्तराल में उठती दिव्यध्वनियों के साथ सम्बन्ध जोड़ने पर कई प्रकार के चित्र-विचित्र शब्द सुनायी पड़ते हैं। शंख, घंटा, घड़ियाल मृदंग, नफीरी आदि से मिलते-जुलते ये शब्द होते हैं। आरम्भ में ये ध्वनियाँ काफी मन्द होती हैं और रुक-रुककर सुनायी पड़ती हैं पर अभ्यास करते रहने से उनमें स्पष्टता, समस्वरता आती है। किसी स्तर की कोई भी ध्यान-साधना क्यों न हो, उसके साथ उत्कृष्टता की पक्षधर भाव-संवेदनाओं का जुड़ा रहना आवश्यक है, क्योंकि आत्मपरिष्कार की बात इसी समन्वय के आधार पर बनती है।
इस क्रम में सविता देवता का ध्यान सर्वोत्तम माना गया है। सविता अर्थात् प्रातःकाल का उदीयमान स्वर्णिम सूर्य। यही गायत्री शक्ति का देवता भी है। सविता ध्यान का विधान यह है कि अपने को निश्चल बालक जैसा माना जाए और ध्यान किया जाए कि उसकी धीमी किरणें अपने सम्पूर्ण शरीर पर बिखर रही हैं। मात्र बिखरती ही नहीं,, शरीर के सभी अवयवों में प्रवेश भी करती हैं।
भाव यह रहे कि स्थूल शरीर में किरणों का प्रवेश बलवर्धन करता है। सूक्ष्मशरीर मस्तिष्क प्रदेश में उनका प्रवेश बुद्धि-वैभव और प्रज्ञा अनुदान की वर्षा करता है। कारण शरीर-हृदय देश को श्रद्धा-सहृदयता और सद्भावना से सरोवर करता है। इसी प्रकार काया के भीतर वाले छोटे-बड़े सभी अंग-प्रत्यंग सविता की किरण प्रवेश द्वारा लाभान्वित होते हैं। सभी को उनकी आवश्यकता के अनुरूप बल मिलता है। उनके भीतर जो अंधकाररूपी विकार थे, वे इस प्रकाश के प्रवेश से तिरोहित होते हैं। अपना व्यक्तित्व निखरता है और स्थूलशरीर को ओजस, सूक्ष्मशरीर को तेजस और कारण-शरीर को वर्चस उपलब्ध होता है। जैसे सूर्योदय के समय कमल पुष्प खिलने लगते हैं, वैसे ही अपनी समग्र सत्ता इस सविता साधना से विकसित उल्लासित-प्रफुल्लित एवं तरंगित होती है।
इस ध्यान का अभ्यास करते समय सविता को निर्जीव अग्निपिण्ड मात्र नहीं मानना चाहिए। अध्यात्मिक भाव मान्यताओं के अनुरूप यह परब्रह्म का तेजस्वी प्रतीक है, प्राणशक्ति का सृजेता प्राणियों का प्राण और पदार्थों का गतिधर्म। आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य मात्र भौतिक पदार्थों का ही उपहार नहीं देता, अपितु चेतना को जीवन्त बनाए रखने वाले पंच प्राण भी उसे से आते है। उसके ध्यान से हम अपने आन्तरिक चुम्बकत्व संकल्पशक्ति से अभीष्ट मात्रा में अभीष्ट स्तर के प्राण आकर्षित और धारण कर सकते है। सूर्य में असीम ऊर्जा है। उस ऊर्जा का चेतना पक्ष जितना अभीष्ट हो, जितना धारण करने की क्षमता हो उतना प्राप्त कर सकते हैं। सविता का ध्यान सर्वोत्तम है। इसी ध्यान-साधना से हमें प्रत्यक्ष लाभ भी प्राप्त कर सकते हैं। भौतिक ऋद्धियाँ भी और आत्मिक सिद्धियाँ भी। अपनी अंतरात्मा भी शनैः-शनैः परमात्मा का सायुज्य पा लेती है।
बड़प्पन की निशानी दौलत नहीं है और न अमीरी का परिचय खर्चीले प्रदर्शनों से मिलता है। बड़े वे हैं जिनके विचार ऊँचे और क्रिया–कलापों में आदर्श भरे हैं।
शरीर की उत्पत्ति कामबीज से है। फ्राइड के अनुसार वह बालकपन में दुग्धपान से लेकर साथियों की छेड़छाड़ के अनेक रूपों में विकसित होता है। किशोरावस्था में वह जोश बनकर उभरता है। होश को पीछे छोड़कर जोश की जो तूफानी लहरें उठती हैं, उनमें मनोविज्ञानी कामतत्व की प्रबलता देखते है। लड़कों में नये स्थानों पर नये केश उत्पन्न होने-जननेन्द्रिय में प्रौढ़ता बढ़ने के रूप में उसकी अभिवृद्धि प्रकट होती है। लड़कियों में रजो दर्शन तथा वक्षस्थल का उभार इसी का प्रमाण है कल्पनाक्षेत्र में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षक कल्पनाओं के आँधी-तूफान उठने लगते हैं। आगे चलकर इसकी परिणति प्रणय में होती है। दाम्पत्य सूत्र जुड़ते हैं, आदान-प्रदान के भावभरे रसास्वादन मिलते हैं और सन्तानोत्पत्ति का क्रम चल पड़ता हैं। एक नये गृहस्थ का नये परिवार का श्रीगणेश होता है और पति पत्नी को उसी विविध व्यवस्थाएँ जुटाने में अपनी लगभग पूरी शक्ति झोंकनी पड़ती है। यह ‘कामबीज’ से उत्पन्न वट-वृक्ष है, जिसका विस्तार भली या बुरी व्यस्त क्रिया-प्रक्रियाओं में होता है। जीवनसम्पदा का उत्सर्ग इसी वेद पर होता देखा गया है। बीच-बीच में उच्छृंखल यौनाचार की कल्पनाएँ अथवा क्रियाएँ अपना अलग ही कुहराम मचाती रहती है। उन पर सामाजिक नियन्त्रण न हो तो उस स्वेच्छाचार की प्रतिक्रिया से सामाजिकता का, पारिवारिकता का, सभ्यता का मानवी प्रगति का अंत हुआ ही समझना चाहिए। अपराधों के घटना क्रम में काम-विग्रह का उसकी विकृत प्रतिक्रिया का जितना हाथ रहता है उतना सब अनाचारों से मिलकर भी नहीं होता। नीति मर्यादाओं का उल्लंघन इसी प्रबल प्रेरणा से आये दिन होता रहता है।
इतने प्रेरक तत्व को तुच्छ मानकर नहीं चलना चाहिए। उसकी सामर्थ्य असीम है। एक शरीर से दूसरे का उत्पन्न होना इसी सृष्टि का अभ्यस्त किन्तु अद्भुत आश्चर्य है। मानवतत्व की भावना, विचारणा एवं क्रिया को अपने जाल-जंजाल में समेट-बटोर कर बैठ जाना इसी आकर्षण का काम है। भव-बंधनों की चर्चा जब-तब होती रहती है। प्रकारान्तर से वह संकेत कामविग्रह के लिए किया गया होता है। गीता के कर्मयोग में निष्काम होने पर जोर दिया गया है। यों उसका मोटा अर्थ भावनाओं से पीछा छुड़ाकर कर्तव्यपरायण होना है। गहराई में उतरने पर उसमें ‘काम’ रहित होने पर उच्चस्तरीय आत्मिक प्रगति होने, आत्म-कल्याण एवं दर्शन का लाभ मिलने का तथ्य सामने आ खड़ा होता है।
यहाँ विवाहित रहने या अविवाहित रहने की उपयोगिता के पक्ष-विपक्ष में कुछ नहीं कहा जा रहा है। व्यक्ति विशेष की मनःस्थिति, परिस्थिति एवं कार्य पद्धति को देखते हुए दोनों ही मार्ग उपयोगी हैं, जिन्हें उच्च आदर्शों में निरत रहना है उन्हें अपनी शक्तियाँ बचाकर लक्ष्य के लिए अधिक कुछ कर सकना तभी हो सकता है, जब गृहस्थ का भार ढोने से अवकाश मिले। प्राचीनकाल से साधु परम्परा यह रास्ता अपनाती रही है। परिव्राजक कार्यपद्धति में न्यूनतम निर्वाह में, चिंता मुक्त रहने में उन्हें सुविधाएँ अविवाहित रहकर ही मिलती थीं। इसके विपरीत जिन्हें आश्रम चलाने पड़ते, वे ब्राह्मण गृहव्यवस्था के लिए पत्नी के सहयोग की सुविधा देखते थे। जो भी हो यह प्रसंग यहाँ नहीं उठना है। चर्चा कामप्रक्रिया की हो रही थी। वह शरीरक्षेत्र से कम और मनः क्षेत्रों से अधिक सम्बन्धित है। शरीर का ब्रह्मचारी मन व्यभिचारी रहे तो उसे इस प्रति-बन्धन की विडम्बना का काई लाभ न मिल सकेगा। इसके विपरीत यदि मन पवित्र रहे, तो गृहस्थ भी एक योगी बन सकता है। तब घर में तपोवन का वातावरण बना देना कुछ कठिन न होगा। वासना और विलासिता का स्थान यदि स्वच्छ, सहकार और बालकोपम हास्य-विनोद ग्रहण कर ले तो उसे बाधित ब्रह्मचर्य से कम नहीं अधिक लाभदायक ही कहा जाएगा।
समस्या यहाँ आकर अटक जाती है कि यदि कामबीज जीव-चेतना की इतनी गहराई में घुसा बैठा है - उसकी शक्ति इतनी प्रबल और जड़ इतनी गहरी है तो फिर उससे बच सकना कैसे हो सकता है? तब ब्रह्मचर्य के लाभों से लाभान्वित कैसा हुआ जा सकता है? यदि संयम न बरता जाए, तो ओजस की क्षति होती है। यदि बरता जाए तो दमित मानस विकृत ग्रंथियों का हानिकारक संग्रह करता है। इधर खाई उधर कुआँ आखिर किया जाय तो क्या किया जाए?
मनीषियों ने इसका उत्तर कुण्डलिनी जागरण की साधना के रूप में दिया है। इसका कर्मकाण्ड और विधि विधान जितना चमत्कारी है, उससे अधिक महत्वपूर्ण है उसका तत्त्वदर्शन। कुण्डलिनी विधान जानने से पहला उसका दर्शन जानना आवश्यक है। प्रतिपादन यह है कि काम -कला को ब्रह्मविद्या के रूप में परिवर्तित किया जाए। इसे विज्ञान की भाषा में ट्रान्सफॉर्मेशन-रूपान्तरण कहते हैं। काम को कला में परिणत किया जा सकता है। भक्ति-भावना उसी प्रयास का उत्कृष्ट रूप है। ललित कलाओं में उद्देश्यपूर्ण शौर्य-साहस में परमार्थिक सेवासाधना में जो उच्चस्तरीय उल्लास उपलब्ध होता है, उसे ‘काम’ तत्व की परिष्कृत भाव भूमिका कह सकते है। चिंतन की दिशा-धारा मोड़ देने से यह परिवर्तन सम्भव हो सकता है। वर्षा का जल यदि अनियन्त्रित फैले तो खेतों, घरों को डुबाकर हानिकारक सिद्ध होगा। पर यदि नदी- नाले के माध्यम से बाँध बनाकर संग्रह किया जाए और नहरों के माध्यम से सिंचाई के लिए खेतों तक पहुँचाया जाए तो इससे हर प्रकार लाभ-ही-लाभ है। अनियन्त्रित काम प्रवृत्ति का निरोध इसी प्रकार उचित है। उसे हठपूर्वक नष्ट कर देने की बात न सोची जाए वरन् ऐसे प्रयोजन लगा दिया जाए, जिसमें उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति हो।
पौराणिक कथा में कामदेव भगवान शंकर पर प्रकोप करता है। शिवजी के अपने दूरदर्शी विवेक से-तृतीय नेत्र से कामदेव जलकर भस्म हो जाता है। यह विवेकशीलता की पशु-प्रवृत्ति पर प्रत्यक्ष विजय है। कुविचारों को सद्विचारों से ही निरस्त किया जाता है। लोहे से लोहा कटता है। कामुकता के दुष्परिणामों और संयम के सत्परिणामों पर विस्तारपूर्वक विचार किया जाए तो विवेक का निर्णय औचित्य के पक्ष में होगा। चोरघात तो तब लगती है जब घरमालिक सोये हुए हो, जब उनमें से कोई बच्चा रोने लगे- बुड्ढा खाँसने लगे तो बलिष्ठ चोर की भी हिम्मत टूट जाएगी और उसे उलटे पैरों भागना ही पड़ेगा। कामुकता सम्मत कुविचारों के सम्बन्ध में यही बात लागू होती है। यदि आदर्शवाद के समर्थक तर्कों, तथ्यों, प्रमाण और उदाहरणों की सेना सजा ली जाए और जब भी शत्रु सिर उठाये तभी वह सेना लड़ा दी जाए, तो समझना चाहिए औचित्य ही जीतेगा। कल्मषों के उन्मूलन का यही एकमात्र मार्ग है। शिवजी का काम-दहन भी इसी तथ्य के समर्थन में एक प्रेरणाप्रद प्रसंग है। पीछे कामपत्नी, रति सरसता विलाप करती है। विधवा के दुःख को भगवान आशुतोष सहन नहीं कर पाते। वे द्रवित होते हैं और वरदान देते है। भस्मसात् कामदेव शरीर समेत तो जीवित नहीं हो सकते, पर वे सूक्ष्म रूप में फिर सजीव हो जाएँगे और उच्च कही जाने वाली आत्माओं पर भी अपना अस्त्र छोड़ने की अपनी कामना पूरी करेंगे। इस वरदान का अभिप्राय यही है कि पशु-प्रवृत्तियों को भड़काने वाली और जीवन सम्पदा को कुमार्गगामी बनाने वाली कामुकता को परिष्कृत किया जा सकता है। उसे भावनात्मक श्रेष्ठ संवेदनाओं से लगाकर स्थूल यौनाचार के आकर्षण से विरत किया जा सकता है।
कुण्डलिनी के स्वरूप निर्धारण में यह तथ्य और भी स्पष्ट है। कामकेन्द्र मूलाधार चक्र को बताया गया है। यह जननेन्द्रिय के मूल में है। इसे अग्निकुण्ड अग्निसमुद्र भी कहा गया है। उमंगें और उत्साह भरने की क्षमता वहाँ केन्द्रित है। इस स्थिति में उसकी संकाय सर्पिणी की है। सर्पदंश और सर्पविष की भयानकता सर्वविदित है। सामान्य मनःस्थिति अधोगामी और बहिर्मुखी रहती है। उसके क्षरण-स्राव जननेन्द्रिय मार्ग से नीचे की ओर टपकते हैं। उसका प्रत्यक्ष रूप त्वचा तल से ऊपर उभरा होता है। नर और नारी की जननेन्द्रियों की स्थिति इस दृष्टि से लगभग एक जैसी ही है। इसे कुण्डलिनी की गर्हित, मूर्च्छित, अधःपतित स्थिति समझा जाना चाहिए।
कुण्डलिनी जागरण साधना में समुद्र मंथन जैसे प्रयत्न करने पड़ते हैं। फलतः प्रसुप्ति जाग्रति में बदलती है। तप की ऊष्णता पाकर अन्तःऊर्जा उभरती है और ऊपर की ओर चलने का प्रयत्न करती है। गर्मी से वायु, जल आदि सभी का विस्तार होता है। वे ऊपर की ओर उठते हैं। ग्रीष्म में चक्रवात गरम हवा के द्वारा ही उठते हैं। पानी से भाप गर्मी ही ऊपर की ओर उठाती है। मूलाधार से जगी हुई व्यक्तिऊर्जा, प्राणशक्ति कुण्डलिनी ऊपर उठती है, मेरुदण्ड मार्ग से सर्पिणी की तरह, लहराती हुई ब्रह्मरंध्र की ओर चलती है, बिजली की यही चाल है। यह ऊर्जा मस्तिष्क में पहुँचती है। सहस्रार कमल से सम्बन्ध बनाती है और उसी में लय हो जाती है। कमल सात्विकता का कला का दिव्य सौंदर्य का केन्द्र माना गया है। मस्तिष्क के मध्य क्षेत्र में ब्रह्मरंध्र में-सहस्रार कमल अवस्थिति है। उस पर कहीं विष्णु की कहीं शिव की, कहीं सद्गुरु की स्थापना और ध्यान का उल्लेख है। यह प्रतिपादन यही इंगित करता है कि कामुकता में संलग्न अंतःऊर्जा को उस पतन के गर्त से निकाल कर ब्रह्मचेतना में-उत्कृष्ट उल्लास प्रदान करने वाली ब्रह्मविद्या में नियोजित किया जाना चाहिए।
इसी परिवर्तन-परिष्कार को उत्कर्ष-उन्नयन को कुण्डलिनी जागरण कहा गया है। ब्रह्मचर्य की तात्त्विक साधना यही है। इसी में अध्यात्म तत्त्वज्ञान के समस्त सूत्र सँजोये हुए हैं। इस ट्रान्सफॉर्मेशन का-रूपान्तरण का सत्परिणाम, महान जागरण, महान परिवर्तन दिव्य जीवन के रूप में सामने आता है। कामबीज का यह ब्रह्मसमर्पण कितना श्रेयस्कर होता है इसे कुण्डलिनी महाविज्ञान की जागरण साधना एवं तत्वभावना को अपनाकर जाना जा सकता है।
बुल्लेशाह बगदाद के खलीफा थे। सात मंजिल का उनका महल था। वे महत्त्वाकाँक्षाओं, कामनाओं वाली जिन्दगी जी रहे थे। एक दिन एक आवाज ऊपर से आयी। पता लगाओ कि ऊपर से कौन बोल रहा है। कौन बिना इजाजत ऊपर चला गया। एक फकीर को पकड़कर लाया गया। पूछा क्या कर रहे थे ऊपर सातवीं मंजिल पर। बोले-ऊँट खो गया था, ढूँढ़ रहा था। खलीफा बोले-ऊँट वहाँ कैसे जा सकता है। वहाँ कैसे मिलेगा। फकीर बोले- तो तुम्हें भगवद्ज्ञान क्या मंजिलें-महल खड़े करने से, कामनाओं का जाल बढ़ाते चलने से मिल जाएगा। हम तो तुझे संदेश देने आए थे कि क्या करने आया था, क्या करने में लग गया। इतना कहकर फकीर गायब हो गए। उसी दिन बुल्लेशाह फकीर बन गए। गुरु को पहचाना, तप में लीन हो कैवल्य ज्ञान को प्राप्त किया। ईश्वरीय अनुकम्पा गुरु के माध्यम से समय-समय पर ऐसा ही संदेश देने आती है।
मानवी-चेतना को पाँच भागों में विभक्त किया गया हैं इस विभाजन को पाँच कोश कहा जाता हैं अन्नमय कोश का अर्थ है, इन्द्रिय चेतना। प्राणमय कोश अर्थात् जीवनीशक्ति। मनोमय कोश-विचार-बुद्धि। विज्ञानमय कोश-अचेतन सत्ता एवं भाव-प्रवाह आनन्दमय कोश-आत्मबोध-आत्मजाग्रति
प्राणियों का स्तर इन चेतनात्मक परतों के अनुरूप ही विकसित होता है। कृमि-कीटकों की चेतना इंद्रियों की प्रेरणा के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है। उनका ‘स्व’ काया की परिधि में ही सीमित रहता है। इसमें आगे की न उनकी इच्छा होती है, न विचारणा, न क्रिया। इस वर्ग के प्राणियों को अन्नमय कह सकते हैं आहार ही उनका जीवन है। पेट तथा अन्य इन्द्रियों का समाधान हो जाने पर वे संतुष्ट रहते है।
प्राणमय कोश की क्षमता जीवनी-शक्ति के रूप में प्रकट होती है। संकल्प-बल साहस आदि स्थिरता और दृढ़ता बोधक गुणों में इसे जाना जा सकता हैं जिजीविषा के आधार पर ऐसे प्राण मनोबल का सहारा लेकर भी अभावों और कठिनाइयों से जूझते हुए जीवित रहते है, जबकि कृमि -कीटक ऋतुप्रभाव जैसी प्रतिकूलताओं से प्रभावित होकर बिना संघर्ष किये प्राण त्याग देते हैं। सामान्य पशु-पक्षी इसी स्तर के होते हैं। इसलिए साहसिकता के अनुरूप उन्हें प्राणी कहा जाता है। निजी उत्साह-पराक्रम करने के अभ्यास को प्राणशक्ति कहते हैं यह विशेषता होने के कारण कृमि-कीटकों की तुलना में बड़े आकार के पुरुषार्थी जीव प्राणधारियों की संज्ञा में गिने जाते है। यों जीवन तो कृमि कीटकों में भी होता है, पर वे प्रकृति-प्रेरणा की कठपुतली भर होते है। निजी संकल्प विकसित होने की स्थिति बनने पर प्राणतत्त्व का आभास मिलता हैं यह कृमि–कीटकों से ऊँची स्थिति हैं
मनोमय स्थिति विचारशील प्राणियों की होती हैं यह और भी ऊँची स्थिति है। मननात् ‘मनुष्यः। मनुष्य नाम इसलिए पड़ा कि यह मनन कर सकता है। मनन अर्थात् चिंतन। यह पशु-पक्षियों से ऊँचा स्तर है। इस पर पहुँचे हुए जीव को मनुष्य संज्ञा में गिना जाता है। कल्पना, तर्क, विवेचना, दूरदर्शिता जैसी चिन्तनात्मक विशेषताओं के सहारे औचित्य-अनौचित्य का अन्तर करना संभव होता हैं। स्थिति के साथ तालमेल बिठाने के लिए इच्छाओं पर अंकुश रख सकना इसी आधार पर संभव होता है।
विज्ञानमय कोश इससे भी ऊँची स्थिति है। इसे भावसंवेदना का स्तर कह सकते है। दूसरों के सुख-दुख में भागीदार बनने की सहानुभूति के आधार पर इसका परिचय प्राप्त किया जा सकता हैं। आत्मभाव का, आत्मीयता का विस्तार इसी स्थिति में होता है। अन्तःकरण विज्ञानमय कोश का ही नाम हैं। दयालु, उदार, सज्जन, सहृदय, संयमी, शालीन और परोपकारपरायण व्यक्तियों का अंतराल ही विकसित होता है। उत्कृष्ट दृष्टिकोण और आदर्श क्रिया−कलाप अपनाने की महानता इसी क्षेत्र में विकसित होती है। महामानवों का यही स्तर समुन्नत रहता है।
चेतना का यह परिष्कृत स्तर, सुपर ईगो, उच्च, अचेतन आदि नामों से जाना जाता है इसकी गति सूक्ष्मजगत में होती है। वह ब्रह्माण्डीय सूक्ष्मचेतना के साथ अपना संपर्क साध सकती हैं अदृश्य आत्माओं, अविज्ञात हलचलों और अपरिचित संभावनाओं का आभास इसी स्थिति में मिलता है। अचेतन ही वस्तुतः व्यक्तित्व का मूलभूत आधार होता हैं इस अचेतन का अभीष्ट उपयोग कर सकना परिष्कृत विज्ञानमय कोश के लिए ही संभव होता है।
आनन्दमय कोश आत्मा की उस मूलभूत स्थिति की अनुभूति है, जिसे आत्मा का वास्तविक स्वरूप कह सकते है। सामान्य जीवधारी यहाँ तक कि अधिकांश मनुष्य भी अपने आपको शरीर मात्र मानते हैं और उसी के सुख-दुख में सफलता-असफलता अनुभव करते रहते हैं आकांक्षाएँ, विचारणाएँ एवं क्रियाएँ इसी छोटे क्षेत्र तक सीमाबद्ध रहती है। यही भवबंधन है। इसी कुचक्र में जीव को विविध-विधि त्रास सहने पड़ते हैं आनन्दमय कोश जाग्रत होने पर जीव अपने को अविनाशी, ईश्वर अंश, सत्य, शिव, सुन्दर मानता है। शरीर, मन और साधन एवं संपर्क परिकर को मात्र जीवनोद्देश्य के उपकरण मानता है। यह स्थिति ही आत्मज्ञान कहलाती है। यह उपलब्ध होने पर मनुष्य हर घड़ी सन्तुष्ट एवं उल्लसित पाया जाता हैं जीवनमंच पर वह अपना अभिनय करता रहता है। उसकी संवेदनाएँ भक्तियोग विचारणाएँ ज्ञान ओर क्रियाएँ कर्मयोग जैसी उच्चस्तरीय बन जाती हैं ईश्वर मानवी संपर्क में आनंद की अनुभूति बनकर आता हैं रसौ वै सः श्रुति में उस ब्रह्म की उच्चस्तरीय सरसता के रूप में व्याख्या की हैं सत, चित, आनन्द की संवेदनाएँ ही ईश्वर -प्राप्ति कहलाती है, अपना और संसार का वास्तविक सम्बन्ध और प्रयोजन समझ में बिठा देने वाला तत्त्वदर्शन हृदयंगम होने पर ब्रह्मज्ञानी की स्थिति बनती हैं इसी को जीवनमुक्ति, देवत्व की प्राप्ति, आत्मसाक्षात्कार, ईश्वरदर्शन आदि नामों से पुकारते है
आत्मपरिष्कार के इस उच्चस्तर पर पहुँच जाने के उपरान्त अभावों, उद्वेगों से छुटकारा मिल जाता है। परम संतोष का, परम आनंद का लाभ मिलने लगने की स्थित आनंदमय कोश की जाग्रति कहलाती है। ऐसे ब्रह्मवेत्ता अस्थि-माँस के शरीर में रहते हुए भी ऋषि, तत्त्वदर्शी देवात्मा एवं परमात्मा स्तर तक उठा हुआ सर्वसाधारण को प्रतीत होता है। उसकी चेतना कोष व्यक्तित्व का स्वरूप, सामान्य नर-वानरों की तुलना में अत्यधिक परिष्कृत होता है, तद्नुसार वे अपने में आनंदित रहते ओर दूसरों को प्रकाश बाँटते हैं
पंचकोशों का जागरण जीवन चेतना के क्रमिक विकास की प्रक्रिया हैं यह सृष्टिक्रम के साथ मंथरगति से चल रही है। यह भौतिक विकासवाद है। मनुष्य प्रयत्नपूर्वक इस विकासक्रम को अपने पुरुषार्थ से साधनात्मक पराक्रम करके अधिक तीव्र कर सकता है और उत्कर्ष के अंतिम लक्ष्य तक इसी जीवन में पहुँच सकता हैं यही पंचकोशी साधना है। कोशों के जाग्रत होने पर व्यक्ति का स्तर कैसा होता है, इसकी जानकारी शिव गीता में इस प्रकार दी गई है-
कामक्रोधस्तथा लोभो मोहो मातसर्यमेव च। मदश्चेत्यरिषड्वगों ममतेच्छादयोऽपि च॥
मनोमयस्य कोशस्य धर्मा एतस्य तत्र तु। एव मनः समाधाय संयतो मनसि द्विजः॥ अथ प्रवर्तयेश्च्चिंत निराकरे परात्मनि॥
काम -क्रोध, लोभ-मोह मद -मत्सर यह छह शत्रु और ममता, तृष्णा आदि दुष्प्रवृत्तियाँ मनोमय कोश में छिपी रहती है कोश साधना से उनका निराकरण होता है। मानसिकता स्थिरता आने पर चित परब्रह्म परमात्मा में लग जाता हैं।
पाँच कोश जीवात्मा पर चढ़े हुए पाँच आवरण हैं प्याज, की, केले के तने की परतें जिस प्रकार एक के ऊपर एक होती है उसी प्रकार आत्मा के प्रकाशवान स्वरूप का अज्ञान आवरण से ढके रहने वाले यह पाँच कोश है। उन्हें उतारते चलने पर कषाय-कल्मष नष्ट होते है और आत्मसाक्षात्कार का, ईश्वरप्राप्ति का परमलक्ष्य प्राप्त होता हैं
उपनिषद् का तत्त्वदर्शी ऋषि पंचकोश संबंधी जिज्ञासा का समाधान इस प्रकार करता है-
पंच कोशाः के? अन्नमयप्राणमयमनोंमय विज्ञानमया-नन्दमयाः पंच कोशा।
पाँच कोश कौन-कौन है?
-अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश और आनन्दमय कोश।
अन्नमयः काः? अन्नरसेनेव भूत्वाऽन्नरसेनाभिवृद्धि प्राप्यन्नरमसय प्राथिव्याँ यद्धिलीयते सोऽन्नमयकोशः। तदेव सथूलशरीरम्।
अन्नमय कोश किसे कहते है? जो अपने अन्न के रस से उत्पन्न होता है। जो अन्नरस से ही बढ़ता है और जो अन्न रूप पृथ्वी में ही लीन हो जाता है, उसे अन्नमय कोश एवं स्थूलशरीर कहते है।
प्राणमयः कोशः कः? कर्मेन्द्रियैः सह प्राणदियं चकं प्राणामयकोशः।
प्राणमय कोश किसे कहते है?
प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान इन पाँच वायुओं के समूह को और कर्मेन्द्रिय पंचक के समूह को प्राणमय कोश कहते है, संक्षेप में यही क्रिया शक्ति है।
मनोमयः कोशः कः? ज्ञानेनिद्रयैः सह मनो मनोमयकोशः।
मनोमय कोश क्या है?
मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियों के समूह के मिलने से मनोमय कोश बनता है इसे इच्छाशक्ति कह सकते है।
विज्ञानमयः कोशः कः? ज्ञानेन्द्रियैः सह बुद्धिर्विज्ञानमयकोशःः।
विज्ञानमय कोश क्या है?
-बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियों का समन्वय विज्ञानमय कोश है। यह न शक्ति हैं
आनन्दमयः कः? स्वरुपाज्ञानमानन्दमयकोशः तत्कारणशरीरम।
आनन्दमय कोश क्या है?
इसी प्रकार कारण रूप अविद्या में रहने वाला रज और तम के संयोग से मलिन सत्व के कारण कुंठित वृत्ति वाला कोश ही आनन्दमय कोश है।
हनुमान जी ने हमेशा भगवान राम के विनम्र स्वयंसेवक की भूमिका निभाई। कभी अपनी कामना नहीं थोपी। रामराज्य की स्थापना के साथ सुग्रीव ने भी राज्य सँभाला, अंगद भी राजा बने, किन्तु हनुमान जी के मात्र राम की सेवकाई कार्य अपने ऊपर लिया। हनुमान जी से बार-बार पूछे जाने पर उनने मात्र उनकी भक्ति माँगी। भगवान श्रीराम ने सीता जी से कहा-हनुमान को तत्त्वज्ञान का उपदेश दो। सीता ने इन्हें ब्रह्मतत्त्व का उपदेश दिया, जबकि श्रीराम ने उन्हें प्रकृति तत्व, शक्ति तत्व का उपदेश दिया। उपदेश के बाद भगवान ने हनुमान जी से पूछा- अब क्यों सोचते हो, अब भी कुछ माँगना है तो माँग लो?
अध्यात्म रामायण के अनुसार हनुमान जी बोले-
“देहदृष्टातुदसोऽहम् जीव दृष्टा त्वदम् सखा।”
देहदृष्टि से तो मैं। आपका दास हूँ, पर जीवदृष्टि से तत्वदृष्टि से आपका ही अंश हूँ। फिर मेरी इच्छा हो सकती है? अवतारी पुरुष श्रीराम को मात्र हनुमान ही गुरुरूप में पा सके। शेष सभी की तो अपनी-अपनी इच्छाएँ, आसक्तियाँ भी, अतः वह लाभ इन्हें नहीं मिला। कामनाओं का त्याग, उन्हें इतिहास में ऐसा स्थापित कर गया कि राम से अधिक हनुमान के मन्दिर आज है।
कुण्डलिनी योग के अंतर्गत षट्चक्रों एवं शक्तिपात विधान का वर्णन अनेक ग्रंथों में मिलता है। योगवाशिष्ठ, तेजबिन्दूपनिषद्, योगचूड़ामणि, ज्ञानसंकलिनीतन्त्र, शिवपुराण, देवी-भागवत, शांडिल्योपनिषद्, मुक्तिकोपनिषद्, हठयोगसंहिता, कुलार्णवतन्त्र, योगिनीतन्त्र घेरंडसंहिता, कंठरुति, ध्यानबिन्दूपनिषद् , रुद्रयामलतन्त्र, योगकुंडल्योपनिषद्, शारदातिलक आदि ग्रंथों में इस विद्या के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला गया हैं फिर भी वह सर्वांगपूर्ण नहीं है। उसे इस ढंग से नहीं लिखा गया हैं कि उस उल्लेख के सहारे कोई अजनबी व्यक्ति साधना करके सफलता प्राप्त कर सके। पात्रतायुक्त अधिकारी साधक और और अनुभवी सुयोग्य मार्गदर्शक की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ही ग्रंथों में इस गूढ़ विद्या पर प्रायः संकेत ही किये गये हैं।
तैत्तिरीय आरण्यक में चक्रों का देवलोक एवं देव संस्थान कहा गया है। शंकराचार्य कृत आनन्दलहरी के १वें श्लोक में भी ऐसा ही प्रतिपादन है।
योगदर्शन समाधिपाद का ३६ वाँ सू है-
“विशोकायाः ज्योतिष्मती।”
इसमें शोक-संतापों को हरण करने वाली ज्योति शक्ति के रूप में कुण्डलिनी शक्ति की ओर संकेत हैं
इस समस्त शरीर को, संपूर्ण जीव कोशों को महाशक्ति की प्राणप्रक्रिया सँभाले हुए है। उस प्रक्रिया के दो ध्रुव-दो खण्ड हैं एक को चय प्रक्रिया (एनाबॉलिक एक्शन) तथा दूसरे को अपचय प्रक्रिया (कैटाबॉलिक एक्शन) कहते है। इसी को दार्शनिक भाषा में शिव एवं शक्ति भी कहा जाता हैं शिव क्षेत्र सहस्रार तथा शक्ति क्षेत्र मूलाधार कहा गया है। इन्हें परस्पर जोड़ने वाली, परिक्रमण शक्ति का नाम कुण्डलिनी हैं षट्चक्र इसी पूरे क्षेत्र में सूक्ष्मशरीर में विद्यमान हैं
सहस्रार और मूलाधार का क्षेत्र विभाजन करते हुए मनीषियों ने मूलाधार से लेकर कण्ठपर्यन्त का क्षेत्र एवं चक्र संस्थान ‘शक्ति’ भाग बताया हैं और कंठ से ऊपर का स्थान ‘शिव’ देश कहा है।
मूलाद्धाराद्धि षट्चक्रं शक्तिस्थान मुदीरितम्। कण्ठादुपद्धि मूर्द्धातं शाम्ीवं सािनमुच्यते-वराहश्रुति
“मूलाधार से कण्ठपर्यन्त शक्ति का स्थान है। कण्ठ के ऊपर से मस्तक तक शाम्भव स्थान है।”
मूलाधार से सहस्रार तक की काम-बीज से ब्रह्मबीज तक की यात्रा को ही महायात्रा कहते है। योगी इसी मार्ग को पूरा करते हुए परमलक्ष्य तक पहुँचते है। जीव सत्ता-प्राणशक्ति का निवास जननेन्द्रिय मूल में है। प्राण उसी भूमि में रहने वाले रज-वीर्य से उत्पन्न होते है। ब्रह्मसत्ता का निवास ब्रह्मलोक में, ब्रह्मरन्ध्र में माना गया है यह द्युलोक-देवलोक-स्वर्गलोक है। आत्मज्ञान का, ब्रह्मज्ञान का सूर्य इसी लोक में निवास करता है। कमल पुष्प पर विराजमान ब्रह्माजी-कैलाशवासी शिव और शेषशायी विष्णु का निवास जिस मस्तिष्क मध्य केन्द्र में है- उसी न्यूक्लियस को सहस्रार कहते हैं। आत्मसाक्षात्कार की ब्रह्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया यहीं सम्पन्न होती है। पतन के, स्खलन के गर्त में पड़ी क्षत-विक्षत आत्मसत्ता जब ऊर्ध्वगामी होती है, तो उसका लक्ष्य इसी ब्रह्मलोक तक सूर्यलोक तक पहुँचना होता है। आत्मोत्कर्ष की महायात्रा जिस राजमार्ग से होती है, उसे देवयान मार्ग कहा गया है। इस यात्रा में बीच-बीच में विराम स्थल है। इन्हीं को ‘चक्र’ कहा गया है।
चक्रों की व्याख्या दो रूपों में होती हैं, एक अवरोध के रूप में, दूसरे अनुदान के रूप में। महाभारत में चक्रव्यूह की व्याख्या अवरोध के रूप में हैं, अभिमन्यु उसमें मारा गया। वेधन कला की समुचित जानकारी न होने से वह मारा गया था। चक्रव्यूह में सात परकोटे होते है। इस अलंकारिक प्रसंग को आत्मा का सात चक्रों में फँसा होना कह सकते है। भौतिक आकर्षणों की, भ्रान्तियों की, विकृतियों की चारदीवारी के रूप में भी चक्रों की गणना होती है। इसलिए उसके वेधन का विधान बताया गया है। रामचन्द्रजी ने बाली को मार सकने की अपनी क्षमता का प्रमाण सुग्रीव को दिया था। उनने सात ताड़ वृक्षों को एक बाण से बेध कर दिखाया था। इसे चक्रवेधन की उपमा दी जा सकती है। भगवान माहात्म्य में धुन्धकारी प्रेत का बाँस की सात गाँठें फोड़ते हुए सातवें दिन कथा प्रभाव से देव देहधारी होने की कथा है। इसे चक्रवेधन का संकेत समझा जा सकता हैं
चक्रों को अनुदान केन्द्र इसलिए कहा जाता है कि कहा जाता है कि उनके अंतराल में दिव्य संपदाएँ भरी पड़ी है। उन्हें ईश्वर ने चक्रों को तिजोरियों में इसलिए बन्द करके छोड़ा है कि प्रौढ़ता-पात्रता की स्थित आने पर ही उन्हें खेलने-उपयोग करने का अवसर मिले, चक्रवेधन, चक्रशोधन, चक्रपरिष्कार चक्रजागरण आदि नामों से बतायें गये विवेचनों एवं विधानों में कहा गया है कि इस प्रयास से अदक्षताओं एवं विकृतियों का निराकरण होता हैं जो उपयुक्त है उसकी अभिवृद्धि का पथ-प्रशस्त होता है।
‘शारदा तिलक’ ग्रन्थ में कहा गया है-गुदा और लिंग के बीच चार पंखुड़ियों वाला आधारचक्र हैं वहाँ वीरता ओर आनन्द भाव का निवास हैं इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में हैं उसकी छह पंखुड़ियाँ है। इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गुणों का नाश होता है। नाभि में दस दल वाला मणिपुर चक्र है। यह प्रसुप्त पड़ा रहे तो तृष्णा, ईर्ष्या, लज्जा, चुगली, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष मन में जड़ जमाये पड़े रहते है। हृदय स्थान में अनाहत चक्र है। यह बारह पंखुड़ियों वाला है। यह सोता रहे तो अंतःकरण लिप्सा, कपट, तोड़-फोड़ कुतर्क, चिन्ता, मोह, दंभ, अविवेक, अहंकार से भरा रहेगा। जागरण होने पर यह सब दुर्गुण हट जाएँगे। कण्ठ में विशुद्धाख्य चक्र, यह सरस्वती का स्थान है। यह सोलह पंखुड़ियों वाला है। यहाँ सोलह कलाएँ-सोलह विभूतियाँ विद्यमान है। भ्रूमध्य में आज्ञाचक्र है, यहाँ, ‘ऊँ’ उद्गीय हूँ, फट, विषद, स्वधा, स्वाहा, अमृत, सपत स्वर आदि का निवास हैं इस आज्ञाचक्र का जागरण होने से यह सभी शक्तियाँ जाग पड़ती है।
चक्रों की जाग्रति मनुष्य के गुण, कर्म, द्वेषभाव को प्रभावित करती है। स्वाधिष्ठान चक्र की जाग्रति से मनुष्य अपने में नवशक्ति का संचार हुआ अनुनीव करता है उसे बलिष्ठता बढ़ती प्रतीत होती है श्रम में उत्साह और गति में स्फूर्ति की अभिवृद्धि का आभास मिलता है। मणिपुर चक्र से साहस ओर उत्साह की मात्रा बढ़ जाती है।संकल्प दृढ़ होते है और पराक्रम करने के हौंसले उठते है। मनोविकार स्वयमेव घटते है और परमार्थ-प्रयोजनों में अपेक्षाकृत अधिक रस मिलने लगता है भारतीय योगियों की दृष्टि से अनाहत भाव संहित हैं कलात्मक उमंगें, रसानुभूति एवं कोमल संवेदनाओं का उत्पादक स्रोत यही हैं आत्मीयता का विस्तार सहानुभूति एवं उदार सेवा-सहकारिता के तत्व इस अनाहत चक्र से ही उद्भूत होते है। कंठ में विशुद्धिचक्र है। इसमें बहिरंग स्वच्छता और अंतरंग पवित्रता के तत्व रहते है। दोष-दुर्गुणों के निराकरण की प्रेरणा ओर तद्नुरूप संघर्ष-क्षमता यहीं से उत्पन्न होती हैं। इसमें अतीन्द्रिय क्षमताओं के आधार विद्यमान है लघुमस्तिष्क सिर के पिछले भाग में है। अचेतन की विशिष्ट क्षमताएँ उसी स्थान पर मानी जाती है। मेरुदण्ड में कंठ की सीध पर अवस्थित विशुद्धिचक्र इस चित संस्थान को प्रभावित करता है। तदनुसार चेतना की अतिमहत्त्वपूर्ण परतों पर नियंत्रण करने और विकसित एवं परिष्कृत कर सकने के सूत्र हाथ में आ जाते हैं नादयोग के माध्यम से दिव्यश्रवण जैसी कितनी ही परोक्षानुभूतियाँ विकसित होने लगती है।
सहस्रार मस्तिष्क के मध्य भाग में हैं शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थियों से सम्बद्ध रेटीकूलर एक्टीवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है। वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयं ही प्रवाह उभरता है वे धाराएँ मस्तिष्क के अगणित केन्द्रों की ओर दौड़ती हैं इसमें से छोटी-छोटी चिनगारियाँ तरंगों के रूप में उड़ती रहती है। उनकी संख्या की सही गणना तो नहीं हो सकती, पर वे हैं हजारों। इसलिए हजार या हजारों का उद्बोधक ‘सहस्र’ शब्द प्रयोग में लाया जाता है। सहस्रार चक्र का नामकरण इसी आधार पर हुआ है। सहस्र फन वाले शेषनाग की परिकल्पना का यही आधार है। यह संस्थान ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ संपर्क साधने में अग्रणी हैं इसलिए उसे ब्रह्मरंध्र या ब्रह्मलोक भी कहते हैं रेडियो एरियल की तरह हिंदू धर्मानुयायी इस स्थान पर शिखा रखाते और उसे सिर रूपी दुर्ग पर आत्म-सिद्धान्तों को स्वीकृति किए जाने की विजय पताका बताते हैं। आज्ञाचक्र को सहस्रार का उत्पादन केंद्र कह सकते है। उपर्युक्त सभी चक्र सुषुम्ना नाड़ी के अन्दर स्थित है, तो भी वे समूचे नाड़ी-मण्डल को प्रभावित करते है। स्वचालित और ऐच्छिक दोनों ही संचार प्रणालियों पर इनका प्रभाव पड़ता है।
नदी-प्रवाह में कभी -कभी कहीं भँवर पड़ जाते है। उनकी शक्ति अद्भुत होती है। उनमें फँसकर नौकाएँ अपना सन्तुलन खो बैठती है और एक ही झटके में डूबती दृष्टिगोचर होती हैं। सामान्य नदी-प्रवाह की तुलना में इन भँवरों की प्रचण्डता सैकड़ों गुनी अधिक होती हैं शरीरगत विद्युत-प्रवाह का एक बहती हुई नदी के सदृश माना जा सकता है और उसमें पाये जाने वाले चक्रों की भँवरों से तुलना की जा सकती हैं।
गर्मी की ऋतु में जब वायुमण्डल गरम हो जाता है, तो जहाँ-तहाँ छोटे-छोटे चक्रवात-साइक्लोन उठने लगते हैं वे नदी के भँवरों की तरह ही गरम हवा के कारण आकाश में उड़ते हैं उनकी शक्ति देखते ही बनती है पेड़ों को, छतों को, छप्परों को उखाड़ते-उछालते से बन्दर की तरह जिधर-तिधर भूत-बेताल की तरह नाचते-फिरते हैं साधारण पवन प्रवाह की तुलना में इन चक्रवातों की शक्ति भी सैकड़ों गुनी अधिक होती है। शरीरगत सूक्ष्मचक्रों की विशेष स्थिति भी इसी प्रकार की है। यों नाड़ी गुच्छकों-प्लेक्सस आदि में भी विद्युतसंचार और रक्तप्रवाह के गतिक्रम में कुछ विशेषता पाई जाती है किंतु सूक्ष्मशरीर में तो वह व्यक्तिक्रम कहीं अधिक उग्र दिखाई पड़ता है। पवन-प्रवाह पर नियंत्रण करने के लिए नावों पर पतवार बाँधें जाते है, उनके सहारे नाव की दिशा और गति में अभीष्ट परिवर्तन करते है। पनचक्की के पंखों को गति देकर आटा पीसने, जलकण चलाने आदि काम लिये जाते हैं जलप्रपात जहाँ ऊपर से नीचे गिरता है वहाँ उस प्रपात तीव्रता के वेग को बिजली बनाने जैसे कार्यों के लिए प्रयुक्त किया जाता है समुद्री ज्वार-भाटों से भी बिजली बनाने का काम लिया जा रहा है। ठीक इसी प्रकार शरीर के विद्युत प्रवाह में जहाँ चक्र बनते हैं, वहाँ उत्पन्न उग्रता को अध्यात्म प्रयोजनों में प्रयुक्तकर ऋद्धि सिद्धियों का स्वामी बना जाता है।
“कलियुग में प्राण अन्नगत हैं अतएव देहात्मा बुद्धि, अहं बुद्धि मिटती नहीं। इसलिए कलियुग के लिए भक्तियोग ही उपयुक्त है। भक्तिपथ हैं हृदय से व्याकुल होकर उनके नाम का स्मरण करो, उनसे प्रार्थना करो, भगवान मिलेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं।”
-श्री रामकृष्ण परमहंस
पीदे लागा जाई था, लोक वेद के साथि। आगें थैं सतगुरु मिल्या, दीपक दिया हाथि॥
दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया बिसा हुणाँ, बहुरि न आवाँ हट्ट॥
अपनी विशिष्ट शैली एवं उलटबाँसी के लिए प्रख्यात संत कबीर ने सतगुरु के मिलने से हुए चमत्कारी कायाकल्प की चर्चा करते हुए इस प्रसंग में कहा है कि गुरु ने ही कभी न घटने वाली अक्षय बाती (अघट्ट) शरीर रूपी दीपक में आयु रूपी तेल भरकर प्रकट की। सतगुरु की महिमा से संत कबीर का साहित्य पूर्णतः मण्उित है एवं जहाँ देखें, वहाँ समर्पण की महिमा ही दृष्टिगोचर होती है वे लिखते है-
सतगुरु के परताप तें मिटि गयौं सब दुख दंद। कह कबीर दुबिधा मिटी, गुय मिलिया रामानंद॥
दीन-दुनिया से, कराल द्वन्द्व से, संशय और दुविधा से उन्हें छुड़ा सकने वाले युगगुरु रामानन्द ही थे। कबीरदास ने सद्गुरु को पाकर अपने को बड़भागी समझा। स्वयं को एक आदर्श शिष्य बनाया एवं जीवनीर के पुरुषार्थ से ऐसे अध्यात्म का प्रतिपादन कर गए, जो आज भी व्यावहारिक है।
साधना की सफलता में सद्गुरु का महत्व सर्वोपरि बताया गया है। अंतःप्रकृति का, चक्रों-उपत्यिकाओं इड़ा-पिंगला-सुषुम्ना आदि नाड़ियों का, उनके परिष्कार का ज्ञान भी गुरुकृपा से ही मिलता है। गुरु इनसान रूप में वस्तुतः सच्चिदानन्द घनरूपी परमात्मा का दर्शन कराने वाली झरोखे रूपी सत्ता हैं उसी के माध्यम से हमें अनंत का विस्तार दिखाई पड़ता हैं गुरु के बिना अनुभवों में समग्रता नहीं आ पाती। साधना एक प्रकार से शरीर रूपी मकान में वायरिंग के समान हैं उसका स्विच ऑन करने का काम गुरु ही करता है। भगवान तो निराकार चैतन्यमयी सत्ता है। उसकी साकार प्रतिमा कोई हो सकती है तो वह गुरु ही है। गुरु भगवान का सीधा निर्धारण है-उसी के द्वारा की गयी नियुक्ति है। वह सर्वेसर्वा है। उसके खिलाफ कोई अपील नहीं, सुनवाई नहीं। गुरु वस्तुतः एक जिन्दा शास्त्र है। यदि उसे पढ़ा जा सके, उस पर न्योछावर हुआ जा सके तो दुनिया का सारा वैभव आध्यात्मिक शक्ति का भण्डार हस्तगत किया जा सकता है।
जवाला का बेटा सत्यकाम गौतम ऋषि के पास पहुँचा। अपने बारे में सब कुछ सत्य बताकर उसने गुरु की कृपा पायी एवं ब्रह्मज्ञान सीखने की इच्छा प्रकट की तो उनने एक ही बात कहीं कि गुरु की आज्ञा की अक्षरशः पालन करोगे तो निश्चित ही ब्रह्म की प्राप्ति होगी। ऋषिवर ने १० दुर्बल गायें उन्हें दीं। कहा-जब तक १००० पुष्ट गायें, एवं उनकी संततियाँ न हों, वे न लौटें। गौमाता को जंगल में चराते-चराते एवं प्रकृति का ज्ञान प्राप्त कर, गोसेवा के बल पर इसे परमात्मतत्त्व का बोध हो गया। जब लौटा तो उसके साथ १००० से अधिक स्वस्थ गाये थी। चेहरे पर ब्रह्मतेज था। गुरु की आज्ञा का पालन करने से जो कुछ उसने पाया था- वह स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा था।
गुरु-शिष्य परम्परा भारतीय संस्कृति के स्वर्णिम अध्याय का एक गौरवान्वित करने वाला पक्ष है गुरु गोविन्दपाद के शिष्य आद्यशंकर, जनार्दन पंत के शिष्य एकनाथ, निवृत्तिनाथ के शिष्य ज्ञानेश्वर, गहनीनाथ के शिष्य निवृत्तिनाथ मत्स्येंद्रनाथ के शिष्य गोरखनाथ, रामानंद के शिष्य कबीर, रैदास की शिष्या मीरा, भारती तीर्थ के शिष्य चैतन्य महाप्रभु, श्री अरविंद की शिष्या श्री माँ, रामकृष्ण परमहंस के शिष्य श्री विवेकानन्द, स्वामी विवेकानन्द के शिष्य सदानन्द एवं भगिनी निवेदिता, स्वामी विरजानन्द के शिष्य महर्षि दयानन्द, बुद्ध के शिष्य आनन्द, चाणक्य के शिष्य कनहपा, व्यास जी के शिष्य सूत-शौनिक आदि इस परम्परा के कुछ उदाहरणों में से है।
परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपना समर्पण अपने गुरु सर्वेश्वरानन्द जी को किया, जो हिमालय में सूक्ष्मशरीरधारी कि सत्ता के रूप में विद्यमान है एवं इस समर्पण ने उन्हें इस युग का द्रष्टा-नवयुग का अधिष्ठाता, गायत्री मंत्र के माध्यम से जन-जन तक संस्कार चेतना का संचार करने वाला युग-ऋषि ही नहीं महाकाल का प्रतिनिधि, प्रज्ञावतार की सत्ता के रूप में समर्पित कर दिया। परमपूज्य गुरुदेव ने १९६९ की दिसम्बर माह की अखण्ड ज्योति में लिखा है-हम सदा ही अपने मार्गदर्शक की कठपुतली रहे है। उन्हीं के इशारे पर चलते रहे है। सो शेष जीवन की रूपरेखा बनाने तथा निभाने में भी हमारा कोई वश नहीं है। जो उनने अब तक कहा व कराया है, सो हम करते रहे है। बिना अपनी व्यक्तिगत इच्छा का समावेश किए सदा करते रहेंगे। इसी प्रकार नवम्बर १९७० की अखण्ड ज्योति में वे लिखते है-जीवन के १५ से ६० वर्ष तक किसी महाशक्ति के इशारे पर हम कठपुतली की तरह ही चले है। अधिक से अधिक हमें एक निष्ठावान् सैनिक कहा जा सकता है, जिसने लम्बी जिन्दगी के असंख्य क्षणों में से प्रत्येक को अपने सूत्र-संचालक की इच्छानुसार ही बिताया। इसी लेख में वे लिखते है-जब शरीर और मन बेच दिया तो खरीदने वालों की आज्ञा पर चलने के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं।
यह समर्पण एवं गुरु की इच्छा में अपनी हर इच्छा का विसर्जन जैसे-जैसे प्रगाढ़ होता चला जाता है, साधना उच्चतर आयामों पर पहुँचने लगती है। स्वामी विवेकानन्द ने सच्चे शिष्य के लिए गुरु की कृपा चार शर्तों पर खरा उतरने पर ही बरसने की बात कही है। ये चार शर्तें हैं- (१) सद् और असद् का विवेक (२) ईश्वरप्राप्ति की तीव्रतम इच्छा (३) इस लोक और परलोक के सभी कामनाओं का त्याग (४) गुरु के प्रति अटूट निष्ठा। इसमें चारों ही महत्वपूर्ण है, किंतु यहाँ साधना समर में सफल होने के लिए शिष्यत्त्व की चौथी पहचान ‘गुरु के प्रति अटूट निष्ठा’ प्रकरण पर थोड़ा प्रकाश डालना चाहेंगे।
निष्ठा का अर्थ है-अक्षरशः पालन, गुरु आज्ञा के अनुसार चलना। निष्ठा अर्थात् ओर कोई गति। जो गुरु का निर्देश है- उसी के अनुसार जीवन की रीति-नीति का ढल जाना। गुरु वस्तुतः शरीर नहीं होता, वह तो चैतन्य ब्रह्मरूप हैं उसके माध्यम से जीवोद्धार का संकल्प देकर भगवान स्वयं चिन्मय शरीर धारण कर आया है, यह हमें मानना पड़ेगा। कोई व्यक्ति सिद्ध-महात्मा हो सकता है, पर हमारे गुरु हमारे लिए ही सद्गुरु हैं उन्हें शरीर रहने-न रहने पर भी मानना, उनकी ही आज्ञा का पालन करना सच्चे शिष्य के लिए पालन करने योग्य धर्म है। जो ऐसा करता है, वह अपने इन्हीं शाश्वत संबंधों के कारण गुरु की अहैतुकी कृपा का अधिकारी बन जाता है। एक सदी पूर्व एक विलक्षण योगी हुए है-स्वामी भास्करानन्द जी। कानपुर के पास के ग्रामीण अंचल के रहने वाले अपने हिमालयवासी संत गुरु का निर्देश पाकर जीवनभर बनारस में बैठकर साधना करते रहे। गुरु ने कहा-कहीं जाना मत। सभी को सत्प्रेरणा देते रहना। इस लोक -परलोक का सारा वैभव तुम्हें मिल जाएगा। इतिहास साक्षी है कि उनकी तपश्चर्या की ख्याति बिना बनारस से उनके बाहर निकलें विश्वभर में सुगंधि की तरह फैल गयीं। प्रिंस ऑफ वेल्स, रूस के जार भर के राजा-रजवाड़े उनकी चरणरज लेने उनके पास आए। ऐसी सिद्धि मात्र गुरु आज्ञा के निर्वाह के कारण उन्हें मिली।
गुरु के प्रति निष्ठा हमारी प्रेमभावनाओं का उन पर आरोपण हैं भावनाओं व तर्क का कहीं कोई संबंध है नहीं। निष्ठा के माध्यम से गुरुरूपी ईश्वर पर हमारी प्रेमभक्ति टपकती है। यदि गुरु के प्रति समर्पण समग्र हो, सशर्त न होकर सकाम न होकर निष्काम भाव से हो, तो उसी परिमाण में सिद्धि भी मिलती चली जाती है। साधना के भवबंधन पाकर पूर्णता के लक्ष्य तक की यात्रा सरल होती चली जाती है। गुरु-निष्ठा का एक जीता -जागता उदाहरण सिख धर्म की गुरु-शिष्यपरम्परा है, जिसमें सद्गुरु को उनके निर्देशों को गुरुग्रंथ साहिब को ही सब कुछ मानकर उनके प्रति सारा समर्पण किया जाता है।
शास्त्रों ने गुरु को गोविन्द से भी बढ़कर ब्रह्मा-विष्णु -महेश की उपमा दी है। गुरु का आश्रय पाकर एक अदना-सा बिना किसी पहचान वाला व्यक्ति भी अनन्त वैभव को प्राप्त कर जाता हैं बेलें ऊपर उठने के लिए किसी पेड़ का सहारा लेती है। लिपटकर वे शिखर तक पहुँच जाती है एवं सूर्य की किरणों से साक्षात्कार करती हैं साधक को भी मार्गदर्शक का अवलम्बन मिल सके, वह अपनी श्रद्धा उस मार्गदर्शन पर टिका सके, उसे निभा सके तो वह आध्यात्मिक विभूतियों का स्वामी बन सकता है समर्थ सत्ता के साथ जुड़ जाने पर सामान्य भी असामान्य बन जाता है समर्थता के साथ जुड़ने के बाद असमर्थता भी समर्थता में बदल जाती है, फिर लोक में कोई भी कार्य उसके लिए असंभव नहीं होता। गंदे नाले का पानी गंगा में मिल जाने पर वह गंगाजल की तरह सम्मान पाता है। यह समर्थ सान्निध्य का ही प्रभाव है जिसकी तुलना पारस, अमृत कल्पवृक्ष से की जा सकती है एवं परिणति कायाकल्प के रूप में वर्णित की जाती है।
आज की परिस्थितियों में जब चारों ओर आपाधापी मची है, कलियुग की पराकाष्ठा का समय है, धर्मतंत्र भी विकृतियों में उलझा दृष्टिगोचर होता है- एक ही तरीका है कि हम गुरु के ज्ञान-शरीर को मार्गदर्शक मानकर उनके निर्देशों को आत्मसात् कर अपनी निष्ठा दिन-प्रतिदिन और प्रगाढ़ बनाते चले। जिस सद्गुरु ने गायत्री महाशक्ति को युग के विश्वामित्र के रूप में घर-घर तक पहुँचा दिया, सबके लिए सुलभ बना दिया, उन्हें कोई भी अपनाकर उनके सूक्ष्म व कारण शरीर से वही लाभ ले सकता है, जो उनके स्थूल शरीर रहते उनके समीपवर्ती शिष्यों ने पाया, जो समीप नहीं थे, किंतु अपने समर्पण के बल पर जिन्हें अगणित सिद्धियाँ मिली-उनके उदाहरण भी अगणित है। सद्गुरु के बिना साधना के क्षेत्र में प्रगति अकल्पनीय है, हमें विश्वास रख, अपना विश्वास प्रतिक्षण दृढ़ बनाते चल युगधर्म को अंगीकार कर इस युगपरिवर्तन की वेला में शिष्यीव से जुट जाना चाहिए। वे हमारी साधना को गति देंगे-हमें भवबंधन से मल्लाह की भाँति पार करा जीवनमुक्त बनाएँगे-यह विश्वास हमें रखना ही चाहिए।
श्रीराम कृष्ण परमहंस ने जब महासमाधि ली तब उनके पास सम्पत्ति के नाम पर कुछ भी न था। वे स्वयं दूसरे के मंदिर में पुजारी थे। कोई मठ उनने नहीं बनाया। स्वामी विवेकानन्द व साथ के सभी गुरुभाइयों ने अपने अटूट गुरु-विश्वास के भरोसे सात वर्ष तक की अवधि पार की। कितनी ही बाधाएँ आयीं, पर विचलित नहीं हुए भारत में परिव्रज्या करते-करते विश्वधर्म संसद की जानकारी मिली व दैवयोग से अमेरिका जाने की व्यवस्था भी हो गयी। प्रतिकूलताओं के बावजूद -कोई औपचारिक निमंत्रण न होने पर भी भाषण देने का अवसर मिला। ‘ब्रदर्स एण्ड सिसटर्स ऑफ अमेरिका’ शब्द रूपी उनके संबोधन ने मानो जादू का काम किया। वहीं से उन्हें प्रसिद्धि मिलना जारी हुई।
जब अमेरिका से लौटे तो श्रीलंका मद्रास-कलकत्ता सब ओर उनका अभूतपूर्व स्वागत हुआ। कलकत्ता आते ही दक्षिणेश्वर के मंदिर गए एवं श्री रामकृष्ण के भतीजे रामलाल, जो उस समय वहाँ के पुजारी थे, के चरणों में गिर गए। श्री माँ के पास जाने से पूर्व वे काली को प्रणाम करने आए थे। श्री रामलाल को जब उनने प्रणाम किया तो सबने पूछा कि ऐसा क्यों? आप तो उनसे बहुत ऊँचे है। उनने कहा-गुरुवत गुरुपुत्रेषु-गुरु के समान ही गुरु के पुत्र को भी मैं मानता हूँ। सभी को मानना चाहिए। सभी सुनकर उनका श्री रामकृष्ण व परिवार के प्रति अनन्य भाव देखकर भावविभोर हो गए। -’मठ की डायरी’ से
जीवनसत्ता का स्वरूप, लक्ष्य एवं सदुपयोग समझा गया या नहीं? समझने के उपरान्त उत्कर्ष का मार्ग अपनाया गया नहीं? मार्ग पर उत्साह, साहस एवं पुरुषार्थ सहित चला गया या नहीं? इसी चयन-निर्धारण पर उत्थान -पतन की आधारशिला रखी जाती है मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। अवांछनीय अपनाकर पतन के गर्त में गिरने की, उत्कृष्टता कर वरण करके उत्कर्ष के चरम लक्ष्य तक जा पहुँचने की उसे पूरी छूट है। कोई परिस्थितियों का रोना रोता रहे और मनःस्थिति को न सुधारे, तो उस प्रमादग्रस्त से कोई क्या कहे?
देवता अनेक है, पर तत्काल फलदायक, अत्यन्त निकटवर्ती और अनुदान देने के लिए आतुर जीवन-देवता से बढ़कर और कोई नहीं। जीवन की गरिमा समझने वाले और निर्धारित लक्ष्य के लिए उसे प्रयुक्त करने वाले वह सब कुछ प्राप्त करते है, जो पाने योग्य है। अन्य देवताओं की अनुकम्पा संदिग्ध है, पर जीवन-देवता की साधना का प्रतिफल सर्वथा असंदिग्ध है। दुःख इसी बात का है कि जीवन-साधना का महत्व समझा ही नहीं गया ओर ऋद्धि-सिद्धियों से सुसम्पन्न बनाने की ओर ध्यान गया ही नहीं अन्यथा स्थिति वैसी न होती, जैसी कि सामने है।
जीवन का स्वरूप और रहस्य न समझने पर, उसकी साधना से विरत रहने पर काई अभाव-दारिद्र से, पतन-पराभव से घिरा पड़ा रहे तो इसके लिए अन्य किसी को दोष कैसे दिया जाय? जीवन की अवहेलना से बढ़कर पाप इस संसार में और कोई नहीं। अन्य पापों से कर्ता को तत्काल लाभ तो मिल ही जाता है, पर जीवन की उपेक्षा का पातक ऐसा है, जिसमें आरम्भ से अन्त तक नरक भोगना पड़ता है। भाग्योदय का एक ही चिन्ह है कि जीवन के साथ जुड़ी हुई महान सम्भावनाओं को समझा जाए और उसे कषाय-कल्मषों के गर्त से उबारकर परिशोधन-परिष्कार किया जाय।
जीवन-साधना में मनन और चिन्तन को आवश्यक माना गया है। हर दिन सूर्योदय से पूर्व या सूर्यास्त के बाद जब चित्त शान्त हो तब अपने अन्तरंग -बहिरंग स्थिति का लेखा-जोखा लेना चाहिए और भूलों को सुधारने, कमियों को पूरा करने तथा भावी प्रगति के लिए जो कदम उठाने आवश्यक है, उनका दूरगामी एवं सामयिक निर्धारण करना चाहिए। निर्धारण ऐसा होना चाहिए कि जो वर्तमान स्थिति में बिना समय गँवाकर कार्यान्वित हो सके।
मनन-चिंतन में दो बातें अपने आप ही समायी हुई है-परिमार्जन एवं परिष्कार। इन्हें पथ्य और औषधि के रूप में भी समझा जा सकता है। व्यक्तित्व को पवित्र-प्रखर बनाने वाली सत्प्रवृत्तियों को कैसे अपनाया जाय? वर्तमान स्थिति को देखते हुए इस संदर्भ में क्या कदम उठाए जाएँ। इसका निर्धारण ही नहीं, इसे अपनाने का तत्परतापूर्वक प्रयास भी विलम्ब चलना चाहिए। गुण, कर्म स्वभाव में शालीनता और प्रतिभा के दोनों उपायों का नियोजन रहना चाहिए।
इसके उपरान्त अगला कदम यह है कि जो उपलब्ध है, उसे किस प्रयोजन के लिए, किस अनुपात में, कहाँ लगाया जाय? उपलब्धियों का महत्व तभी है, जब वे सत्प्रयोजन में लग सकें, अनियमित दुरुपयोग -अपव्यय ही चलता रहा तो सम्पन्नता दरिद्रता से भी महँगी पड़ती है। आत्म-साधना का सही तात्पर्य यही है-अपना दायरा बड़ा करना। अर्थात् लोभ-मोह स्वार्थपरता के भवबन्धनों को शिथिल करते हुए समष्टि के साथ अपने आपको जोड़ना। उस दृष्टिकोण को अपनाने पर वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना उमंगती है और उसी के साथ जुड़ने को जी मचलता है। दूसरों के दुःख बाँटने, अपना सुख बाँटने का आत्मभाव जब विकसित -विस्तृत होगा, तो उसका उपयोग लोकमंगल के कार्यों के लिए समयदान, अंशदान के रूप में प्रस्तुत किए बिना बिना चैन पड़ेगा ही नहीं।
मनन-चिंतन के निदिध्यासन को यदि नियमित रूप से गम्भीरता पूर्वक करते रहा जाय, तो परिशोधन-परिष्कार के दोनों कदम भी स्वयमेव आगे बढ़ते रहते हैं। यह प्रक्रिया नियमित -निरन्तर चलता रहे तो पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचाने वाला उपक्रम सुनिश्चित तौर से बनता रहेगा। यहाँ एक बात और समझने की है कि मनुष्य पूर्ण उत्पन्न होने के कारण पूर्ण ही है। जन्मजात रूप से उपलब्ध विभूतियों का दुरुपयोग -अपव्यय ही एकमात्र वह कारण है, जिसके कारण कामधेनु का दूध छलनी में दुहने पर जमीन पर गिरता, कपड़े चिकने करता और खेद-पश्चाताप का निमित्त कारण बनता है।इसे रोक देने की समर्थ दूरदर्शिता ही जीवन -साधना कहलाती है।
यह जीवन-साधना नकद धर्म है। इसके प्रतिफल प्राप्त करने के लिए समय की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़तीं ‘इस हाथ दे उस हाथ ले’ का नकद सौदा इस मार्ग पर चलते हुए हर कदम पर फलित होता रहता है। एक कदम आगे बढ़ने पर मंजिल की दूरी उतनी फुट कम होती है, साथ ही जो पिछड़ापन था, वह पीछे टूटता है। इसी प्रकार जीवनसाधना यदि तथ्यपूर्ण, तर्कसंगत और विवेकपूर्ण स्तर पर की गयी हो तो उसका प्रतिफल दोनों रूप में हाथों हाथ मिलता चलता है। पहला लाभ तो यह होता है। कि पशु प्रवृत्तियों का अभ्यास छूटता है, वातावरण की गंदगी से ऊपर चढ़े कषाय-कल्मष घटते हैं। दूसरा लाभ यह होता है कि नरपशु से देवमानव बनने की विधि -व्यवस्था सही रूप से बन पड़ती है। औरों के साथ स्वयं को भी अनुभव होता रहता है। कि व्यक्तित्व निरन्तर उच्चस्तरीय बन रहा है उत्कृष्टता और आदर्शवाद की ही उपलब्धियाँ निरन्तर हस्तगत हो रही है यही है वह उपलब्धि जिसे जीवन की सार्थकता, सफलता कहते है। तत्त्वज्ञान की भाषा में इसी को भवबन्धनों से मुक्ति, प्रसिद्धि, कैवल्य प्राप्ति कहा जाता है।
आत्मविकास की ओर अभिमुख गतिविधियों; क्रिया-प्रणालियों को नाम साधना है। इसकी अनेकों प्रणालियाँ अनेकों स्थानों पर प्रचलित हैं। विभिन्न मत-पंथ अपने अनुरूप इसका विशिष्ट महत्व घोषित करते हैं। सभी का अपना महत्व भी है, पर समग्रता की दृष्टि से विवेचना-विश्लेषण करने पर इनमें से ज्यादातर को प्रायः करने पर इनमें से ज्यादातर को प्रायः एकाँगी मानना पड़ता है। समूची मानव प्रकृति को रूपान्तरित कर सके, ऐसी प्रणाली ढूँढ़ने पर शायद ही एक-आध मिले। जो मिलेगी भी, वह किसी विशिष्ट योग्यता की अपेक्षा रखती हुई।
सम्पूर्णता के सवाल पर विचार करने पर सर्वजन सुलभ साधना प्रणालियों का अन्वेषण, कर विभिन्न विचारकों, महापुरुषों, श्रेष्ठतम योगियों की दृष्टि एक ही बिन्दु पर टिकती है और वह बिन्दु है-सेवा व्यक्ति विशेष की नहीं समाज की-अथवा यों कहें समाज के रूप में विराट पुरुष की। आधुनिक समय में जबकि समाजसेवा एक फैशन के रूप में उभर चुकी है, अनेकों संस्थाएँ यम हो चुकी हैं। ऐसी स्थिति में आध्यात्मिकता का भाव कुछ विचित्र-सा लगता है, क्योंकि इससे यदि आध्यात्मिकता उभरती होती तो समाज-सेवियों की संख्या के अनुरूप साधकों और योगियों की बाढ़ आयी होती, पर स्थिति ऐसी नहीं है।
विचार करने पर स्थिति स्पष्ट है-यदि समाजसेवियों की संख्या के अनुरूप साधन दिखाई नहीं देते तो साधना के लिए घर से निकलने वालों की संख्या के अनुरूप आत्मोत्कर्ष के धनी कहाँ? इसका सीधा तात्पर्य यह है कि प्रणाली की समग्रता का मर्म नहीं समझा गया। उसे यथारीति अपनाया नहीं गया।
किसी भी साधनाप्रणाली में प्रवेश हेतु अनिवार्य योग्यता है, नैतिकता। पतंजलि हों चाहे गोरखनाथ या फिर कृष्ण, बुद्ध, लाओत्से, ताओ कोई भी क्यों न हों, इस अनिवार्य योग्यता के बिना अपनी साधनापद्धति में प्रवेश नहीं देते। प्रवेश के बाद शुरू होता है, साधनाक्रम। इसमें हठयोग जहाँ अपना पूरा ध्यान शरीर पर जमाता है, वहीं राजयोग मानसिकता में फेर-बदल करता है। तंत्र की गुह्यपद्धतियाँ प्राणिजगत में परिवर्तन व रूपान्तरण का रुख अपनाती है, किन्तु इन तीनों आधारों में एक साथ निखार आए, वे शुद्धात्म चेतना का प्रवाह धारण कर सकें, ऐसी स्थिति नहीं बन पाती हैं।
समाजसेवा जिसे साधना की समग्र प्रणाली माना गया हैं, इसमें नियोजित व्यक्ति के तीनों ही आधार न केवल सशक्त होते हैं, वरन् समूची अंतर्शक्तियाँ अपने यथार्थ रूप में अभिव्यक्त होने लगती हैं। उदाहरण के लिए, देह का स्वाभाविक गुण है जड़ता। इस तमस् का सत्व में रूपान्तरण ही अभीष्ट है। समाजसेवा की साधना पद्धति अपनाने वाले इसे प्रथम चरण में पा लेते हैं, क्योंकि सच्चे साधक को तो नाम, यशविहीन क्रियाशीलता चाहिए। इसे ही सत्व का रूपान्तरण समझा जा सकता है। सारे आवेग-कामुकता क्रोध, मोह, लोभ आदि प्राणिक स्तर पर जड़ जमाए रहते हैं। प्रचलित योगों के किसी भी साधक को इनकी जड़ें उखाड़ने में पसीने आ जाते हैं। फिर भी कभी-कभी असफलता हाथ लगती है। विश्वामित्र और दुर्वासा की कहानियाँ प्रचलित हैं। वर्षों की तपश्चर्या के बाद भी अनेकों बार काम-क्रोध के हाथों पराजित होना पड़ा, जबकि अपने भाव में निष्ठसमाजसेवी इस दुरूह स्तर को कुछ ही वर्षों में रूपान्तरित करने में सफल हो जाते हैं।
योग के विभिन्न मार्गों की चरम परिणति कैवल्य, स्थितप्रज्ञता, समत्व, एकात्मभाव को ही माना गया है। इसी की विभिन्न स्थितियाँ मुक्ति, जीवन-मुक्ति विदेह मुक्ति के नाम से जानी जाती है। विभिन्न योगियों को ये स्थितियाँ कब मिलती हैं, यह तो पता नहीं, पर सेवानिष्ठ अपने वर्तमान जीवन में ही इस परमलाभ से लाभान्वित होता देखा जाता है। लोभ, मोह, अहं से छुटकारा मिला कि उपर्युक्त स्थितियाँ मिलीं। जिसने सर्वहित में अपने स्वार्थों की बलि दे दी उसे लोभ कैसा? जो सारे समाज को अपना परिजन, समूचे विश्व को अपना परिजन, समूचे विश्व को अपना घर मानता घर मानता है, उसे मोह की गुँजाइश कहाँ रही? सुहृदं सर्वं भूतानां में जिसकी स्थिति है, जो स्वयं को विनम्र सेवक और दूसरों को सेव्य मानता है, उसके पास अहंकार भला कैसे फटक सकता है। यही कारण है कि वह इसी जीवन में मुक्ति का परमलाभ प्राप्त कर जीवनमुक्त की स्थिति में आनन्दित रहता है।
साधना की इस समग्र प्रणाली के रहते और अपने ऊपर समाजसेवी का लेबल चिपकाने पर भी जो लोग इसके लाभों से वंचित हैं, इसका कारण प्रणाली की गड़बड़ी नहीं, अपितु स्वयं की खामी है। गरीबों को गले लगाने तथा कष्ट-पीड़ितों की मदद करने की बात हर कोई करता है, लेकिन अपने आस-पास के ऐसे लोगों पर ध्यान देना अनावश्यक लगता है, जिन्हें वस्तुतः सहायता की आवश्यकता है। स्वाभाविक है ऐसे लोग समाजसेवा का सिक्का अपनी प्रतिष्ठा जमाने के लिए उपयोग करते हैं। जिसके पास करने को कोई काम नहीं अथवा जो यह समझते हैं कि इसी प्रकार समाज में कुछ इज्जत कमा लेंगे, ऐसे लोग समाजसेवा का मुखौटा लगा लेते हैं।
कहने का आशय यह है कि निष्ठा-वान समाज-सेवक आत्मप्रचार और अपनी सेवाओं का ढोल पीटने के स्थान पर मूकभाव से अहर्निश जनसेवा में लगे रहते हैं। इसकी शुरुआत वे अपने से करते है। अपने से करते हैं। अपने से शुरुआत करने का अर्थ है कि जिन आदर्शों की स्थापना हम समाज में होते हुए देखना चाहते हैं, उन आदर्शों को स्वयं हम अपने जीवन में उतारें। कथनी-करनी से अपने जीवन को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करें।
बड़ी अनोखी शुभ घड़ी थी, जब राष्ट्रीय साधना ने अपनी अनोखी सिद्धि प्राप्त की। आज से ५१ साल पहले १५ अगस्त के दिन पूरा देश थिरक उठा था। पंडित नेहरू ने दिल्ली में लाल किले की प्राचीर से गुलामी के प्रतीक यूनियन जैक के स्थान पर स्वतन्त्रता का तिरंगा झण्डा फहराया था और देशवासी जूझ उठे थे। हमारे सदियों पुराने सपने साकार हो गए थे और चेहरे चमक उठे थे। यह स्वतन्त्रता केवल हमारे लिए ही महत्वपूर्ण नहीं थी। इसने संसार से उपनिवेशवाद के विध्वंस की घोषणा की थी। हमारी आजादी के १० साल के अन्दर-ही अन्दर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के छोटे-बड़े ११७ देशों ने आजादी की हवा में साँस ली थी। इस तरह हमीं वह पहले राष्ट्र थे, जिसने साम्राज्यवाद की विदाई की विजय-घोषणा की थी।
इस अभूतपूर्व उपलब्धि के पीछे थी-राष्ट्र को समर्थ व सशक्त बनाने वाली हमारी साधना। जिसे एक शब्द में “चरित्र” की संज्ञा दी जा सकती है। अपने प्रचण्ड चरित्रबल के कारण ही गाँधीजी को समूचे विश्व ने “महात्मा” कहकर सम्मानित किया। कृतज्ञ ने उन्हें पिता का गौरव दिया। दुनिया में अब तक कहीं भी कोई संग्राम बिना शस्त्रों के नहीं लड़ा गया। परन्तु गाँधीजी की राष्ट्रीय साधना निराली थी। उन्होंने मुक्ति संग्राम और अहिंसा को इस तरह एक साथ जोड़ दिया कि दुनिया चकित रह गयी। एक ओर ऐड़ी से चोटी तक हथियारों से लदा हुआ ब्रिटिश साम्राज्यवाद था और दूसरी ओर निहत्थी परन्तु अनोखे चरित्रबल से ओत-प्रोत जनशक्ति थी। परन्तु महात्मा गाँधी के नेतृत्व में राष्ट्रसाधकों ने हथियारों पर विजयी होकर विश्व को एक नयी शक्ति से अवगत कराया। संसार को हमारे स्वतन्त्रता संग्राम की यह नयी देन थी।
लेकिन स्वतन्त्रता मिलने के साथ ही हम सब इस राष्ट्रीय साधना से विरत होते चले गए। स्थिति से विरत होते चले गए। स्थिति यहाँ तक आ पहुँची कि बीते वर्षों में हमने एक अन्धी सुरंग तैयार की ली और जितने रोशनदान थे, वे भी अब बन्द हो चुके हैं। यह किसी तरह की हताशा नहीं, एक जायजा है। हम लगातार चरित्रहीनता एवं अधः पतन की अँधेरी सुरंग से गुजर रहे हैं। फिर भी हम चाहते हैं कि बुद्धिजीवियों में, युवावर्ग में उत्साह हो, उमंग हो। आजादी से पहले उत्साह था, लेकिन संभावनाएँ भी उतनी ही थीं। तब त्याग था, उत्सर्ग था। सुभाष, भगतसिंह, आजाद जैसे अनेक लोग थे, जिनके हाथों में अँधेरे को दफन करने वाली मशालें थी। रहें रोशन होती नजर आती थी।
आजादी के बाद स्थिति बदल गयी। राष्ट्रीय साधना और उसे सम्पन्न करने वाले साधक समाप्त हो गए। उनका विकल्प बनाने की जिम्मेदारी समाज को थी। समाज अपना दायित्व निभा न सका। उसने उनकी जगह जो बुत खड़े किए, वे सब मिट्टी के ऐसे बुत थे, जिनके पेट में जो भी चला जाता था, वह लौटकर नहीं आता थे। उनके लिए मूल्यहीनता हैं। जिनके लिए मूल्य मूल्यवान थे, वे धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए। परिवर्तन के काल में ऐसा होता है, पर जो मूल्य हाशिए पर चले जाते हैं, उनकी जगह नए मूल्य आते हैं। जैसे जो पेड़ काटे जाते है, उनके स्थान पर नए पेड़ लगाए जाते हैं, लेकिन हम तो जंगल पर जंगल काटे जा रहे हैं, पर नए वृक्ष लगाने की ओर कोई सुधि नहीं। उसी तरह हम मूल्यों का अवमूल्यन कर रहे हैं और नए मूल्य भी नहीं बना रहे हैं। मूल्य बनें भी कहाँ से? सारे मूल्य तो चरित्र से उपजते हैं, जब चरित्र नहीं बच पा रहा तो मूल्यों का निर्माण कहाँ से हो?
राष्ट्रीय साधना का एक ही अर्थ है राष्ट्रीय चरित्र का विकास। चरित्रबल मानवीय शक्ति का मूल आधार है। पारस्परिक सहयोग द्वारा उद्योगों को बढ़ाना और अर्थव्यवस्था को सुधारना समाज-सुधार के एक अधिक आवश्यक अंग की पूर्ति करना है, पर समाज का वास्तविक उत्थान तभी हो सकता है, जब जन-जन में कर्तव्यपरायणता, धार्मिक सहिष्णुता, सच्चाई और सच्चरित्रता की भावनाओं का भरपूर समावेश हो, अपने देश की प्राचीन संस्कृति की यही विशेषता रही है कि लोग स्वयं का संयम करना सीखें। बढ़ी हुई शक्तियों को सीधे से पचा ले जाना संयम से ही सम्भव है। केवल साधनों की तृष्णा बढ़ती रहे और साधना का विकास न हो तो उन्नति का मूल उद्देश्य नष्ट होकर दुर्भावनाओं का विकास होने लगेगा। साधन तो होंगे, पर लोग सुखी न होंगे।
गीताकार ने अपना यह कठोर निर्णय दिया है कि सूखाकांक्षी का जीवन शुद्ध और उसका प्रत्येक कर्म यज्ञीय भावना के साथ होना चाहिए। स्वार्थ के साथ परमार्थ का भी पर्याप्त होना आवश्यक है। मनुष्य सदा से मातृभूमि का ऋणी रहता है। जन्म से ही वह अगणित ऋणों का देनदार है। राष्ट्रसेवा ऋण चुकाने की भावना को कहते हैं। मनुष्य के हित की दृष्टि से उसके राष्ट्रीय, सामाजिक जीवन में राष्ट्रसेवा का आयोजन बना रहे, तो उसमें सबका कल्याण रहता है। यह अपेक्षाकृत अधिक सरल मार्ग है। जिसमें मनुष्य स्वल्प साधनों में विपुल सुख प्राप्त कर लेता है। राष्ट्रीय जिम्मेदारी पूरी करने का नाम है, कामचोरी। कर्तव्य से पलायन करना निठल्लापन और बेईमानी है। राष्ट्र की समृद्धि में भरपूर श्रम और पुरुषार्थ में राष्ट्रीय साधना की भूमिका प्रमुख रूप से बनी रहनी चाहिए।
लोग कहते हैं-बड़ा दुर्भाग्य है, रोटी नहीं मिलती, कपड़ा नहीं मिलता, जरूरतें पूरी नहीं होती, बड़ी असमानता है। कुछ हद तक सम्भव है ऐसा भी हो, पर अधिकांश कमी यह है कि लोग अपना दोष स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते। समस्या यह है कि जरूरतें आवश्यकता से अधिक बढ़ गयी हैं। अनैतिकता पर कोई नियंत्रण नहीं है। मन स्वतन्त्र है, इन्द्रियाँ स्वतन्त्र हैं। कामनाओं के दल-बल स्वच्छन्द विचरण कर रहे हैं। संयममूलक प्रवृत्तियों के नष्ट हो जाने के कारण ही अभाव घिरे हैं, अन्यथा न तो उत्पादन कम हुआ है और न जरूरत की चीजें कम पड़ी है। सब कुछ पहले से अधिक है, पर क्या करें, लोगों की भूख इतनी बढ़ गयी है, वासनाएँ इतनी घिर गयी हैं कि बढ़े हुए साधनों से भी काम्य प्रयोजन पूरे नहीं हो पा रहे। इस देश में आत्मदर्शी ऋषियों की परम्पराएँ चलती आयी हैं। परिग्रह और भोग से दूर रहकर उन्होंने जो सत्य पाया, समाधान पाया, सुख-शान्ति का अनुभव पाया, उसी को यहाँ के जन-जीवन में उतारा है। उसका सम्पूर्ण सार है, चरित्रबल। चरित्र में ही सुखी जीवन के सारे रहस्य छिपे हुए हैं। चरित्र ही मनुष्य की श्रेष्ठता का उत्तम मानदण्ड है। एक ओर मनुष्य के साथ स्वार्थ भावना है, तो दूसरी ओर राष्ट्र के प्रति कर्तव्य भी है। कर्तव्य बुद्धि द्वारा स्वार्थबुद्धि का नियंत्रण होना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य चाहता है कि दूसरा को उसके साथ छल-कपट का व्यवहार न करे, झूठ न बोले, धोखा न दे, सताए नहीं, दबाने की चेष्टा न करे। ऐसी अवस्था में उसका भी कर्तव्य हो जाता है कि वह भी मन-वचन और क्रिया द्वारा सच्चाई का ही समर्थन व प्रदर्शन करे। हमारे अन्तःकरण की वृत्तियाँ सत्यमय हो जाती हैं, तो व्यवहार शुद्ध हो जाता है। ऐसी स्थिति में उससे और का भला तो होता ही है, राष्ट्रीय दायित्व भी भली-प्रकार पूरे हो जाते हैं। ईमानदारी और सच्चाई राष्ट्र को समर्थ और सशक्त बनाने वाली साधना का अनिवार्य अंग है, यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए। जो नीतियाँ उन्नत उन्नत राष्ट्र के लिए कही जाती हैं, वे सबकी सब चरित्र साधना के अंतर्गत ही आ जाती हैं। नेकी, ईमानदारी, व्यवहारशुद्धि, सत्य सहयोग और सहानुभूति यह सब उसके अंग हैं। हमारे राष्ट्रीय जीवन में जब तक यह श्रेष्ठता विद्यमान रही, तब तक अपना यह देश संसार भर का सिरमौर बना रहा, किन्तु पिछले दिनों पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण का जो प्रवाह चला, उसने यहाँ की जीवन-गति को ही अशुद्ध बना डाला। जो सिद्धान्त मानवता के विपरीत पड़ते हैं, पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव से यह अधिक तेजी से विकसित हुए। विलासिता एवं प्रदर्शन को यहाँ इतना अधिक महत्व दिया गया, जिससे भोगवाद यहाँ के आकर्षण का मूल बिन्दु बन गया।
इस गलत दृष्टिकोण के कारण यहाँ अनेकों राष्ट्रविरोधी प्रवृत्तियाँ पनप उठीं। भ्रष्टाचार की इन दिनों व्यापक चर्चा हो रही है। राजनीति के शीर्ष पुरुषों के साथ प्रशासन के उच्चपदस्थ अधिकारी सभी एक ही पाप पंक में फँसे और सने हुए है। एक-सी दशा में नैतिक जीवन का काई मूल्य नहीं रह गया है। इसलिए विकास के अनेक साधन जुटाने पर भी मूल समस्या ज्यों-की-त्यों उलझी हुई है। राष्ट्र के सन्तुलन और उसी सुव्यवस्था का आधार व्यक्तिनिर्माण है। व्यक्ति के भावभरे सहयोग से ही राष्ट्र उन्नत बनता है। जिस देश के लोग परिश्रमी, ईमानदार सत्यनिष्ठ एवं आदर्शप्रिय होंगे वह अपने आप ही विकसित होता चला जाएगा।
स्वाधीनता के बाद के वर्षों में हम राष्ट्रीय साधना से विमुख होते चले गए। द्वेष, फूट, कलह का तन्तुजाल बुनता चला गया, परिस्थितियों के विपक्ष और विदेशी प्रभाव के कारण ऐसा करने को हम मजबूर हुए हैं। आज बात-बात पर भाषावाद, जातिभेद, प्रान्तवाद के नाम पर हम सभी लड़ने-झगड़ने लगते हैं। पारस्परिक सद्भाव एवं प्रेम की शिक्षा देने वाले धर्म को भी दुर्भाव एवं वैर के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है। क्या इससे कोई राष्ट्रीय समस्या हल हो सकती है। राष्ट्र का जीवन तो व्यक्तियों के जीवन से विनिर्मित होता है। राष्ट्र की गरिमा में व्यक्तियों का आत्मबल मनोबल और शरीरबल गिना जाता है। पर यह तभी सम्भव है जब राष्ट्र के नागरिक, चरित्रवान और आत्मजयी हों। राष्ट्र को धन या साधन उतना सुख नहीं उठाते, जितना कि वहाँ के नागरिकों की चरित्र ही राष्ट्रीय गौरव को शिरोमणि बनाती है।
राष्ट्रीय विकास की इस चर्चा में आर्थिक समुन्नति का ध्यान रहे, यह ठीक है। हमें गरीबी मिटानी चाहिए, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि चारित्रिक विकास के बिना कोई भी भौतिक सफलता स्थिर नहीं रह सकती है। बढ़ी हुई शक्ति का सन्तुलन उदार हृदय, उन्नत मस्तिष्क एवं आत्मनिष्ठा के साथ हो तो ही उनका लाभ प्राप्त किया जा सकता है, अन्यथा भौतिक उन्नति का कुछ लाभ न निकलेगा। वैसे भी अगले दिनों दुनिया जो करवट लेने जा रही है, उसमें व्यक्ति के लिए राष्ट्रीय साधना को जीवन का अनिवार्य अंग बनाना ही पड़ेगा। विश्वविख्यात इतिहासकार अरनाल्डटॉयनवी, जिसने भताओं का इतिहास लिखा है। उसने १९४२ में कहा था कि पचास साल में समूचा विश्व संयुक्त राज्य अमेरिका के वर्चस्व के नीचे आ जाएगा। लेकिन इक्कीसवीं शताब्दी में जब प्रौद्योगिकी का स्थान धर्म ग्रहण करेगा, तो यह सुनिश्चित है कि भारत जो आज पराजित देश है, तब विजयी होगा और जो आज विजयी हैं, पराजित हो जाएँगे। टॉयनवी की अवधारण का एक हिस्सा तो आज सत्य सिद्ध हो रहा है। दूसरा हिस्सा सत्य साबित हो सके इसलिए हममें से प्रत्येक को ऐसी कड़ी साधना की जरूरत है, जो हमारे भारत महादेश को समर्थ सशक्त बना सके।
दैवी अनुदान उपलब्ध करने वालों की सूची तैयार की जा सके तो अनादिकाल से लेकर आज तक एक भी ऐसा न मिलेगा, जिसने उन वरदानों को पुण्य-प्रयोजनों में खर्च न किया हो। जिन्होंने भी इस अलौकिक सम्पदा को अपनी वासना-तृष्णा में खर्च करने की भूल की, उन्हें दुर्गति ही सहन करनी पड़ी। भस्मासुर का प्रसंग सर्वविदित है, जिसमें उसे यातना, निन्दा और अन्त में सर्वनाश को ही भोगना पड़ा था। रावण, कंस, हिरण्यकश्यप, मारीच ने दैवी सिद्धियाँ प्राप्त करके उन्हें निकृष्ट स्वार्थों में लगाना चाहा, तो वे घाटे में ही रहे। यही सनातन क्रम है। “दैवी अनुदान दिव्य प्रयोजनों के लिए” का अकाट्य सिद्धान्त जो सही रूप से समझ पाते है।, उन्हीं की सर्वांगीण प्रगति में दैवी अनुकम्पा का, युगावतार का समुचित सहयोग बन पड़ेगा। सच्चे लाभार्थी ऐसे ही साधक और साधिकाएँ होंगी।
इन दिनों यह सुविधा अधिक सरलतापूर्वक असंख्यों को उपलब्ध हो रही है। वर्षा के दिनों में नमी और हरीतिमा का दृश्य अधिक स्थानों पर देखा जा सकता है। युगसन्धियों में दैवी तत्वों को उभारने के लिए युगावतार की अनुकम्पा वर्षा की तरह झरती है और जहाँ भी थोड़ी अनुकूलता पाती है, वहीं अपनी उत्पादन शक्ति का निश्चय देने लगती है। अवतारों के प्रकटीकरण की बेला में यह प्रवाह और भी तेजी से बहने लगता है। रीछ-वानरों ने, ग्वाल-बालों ने अपनी सदाशयता निश्चित की थी, इतने भर से उन्हें सामर्थ्य और श्रेय का अजस्र अनुदान मिलने लगा था, ठीक वैसा ही अवसर इन दिनों भी है।
कुछ समय ऐसे होते हैं, जब साधकों को सिद्ध ढूँढ़ते रहते हैं, जबकि सामान्य समय में तो साधक ही सिद्धिं को खोजते फिरते हैं। समय विषम होने के साथ अलौकिक भी है। ऐसे समय में युग की आवश्यकता पूरी करने लिए भगवान तूफान की तरह युगावतार बनकर आते है। और अपने प्रवाह में धूलिकणों और तिनकों तक को उठा कर गगनचुम्बी बनने का अवसर प्रदान करते हैं। इसमें सारा पुरुषार्थ उस प्रवाह का होता है, जिसके प्रेरक एवं प्रवर्तक युगावतार स्वयं होते हैं। उड़ने वालों में मात्र हल्का होने की पात्रता होती है। उन्हें सिर्फ अहं का सृजन करके स्वयं को युगदेवता के चरणों में समर्पित करना पड़ता है। बुद्ध के परिव्राजक और गाँधी के सत्याग्रही उन अहंकारियों की तुलना में कहीं अधिक लाभ में रहे, जिनसे लोभ-मोह की हथकड़ी-बेड़ी पुण्यपर्व के रहते हुए भी ढीली करते न बन सकी।
हमेशा से ही अवतारों के सहयोगी अपनी तुच्छ-सी सहायता का इतना बड़ा उपहार प्राप्त करते रहे हैं, जितना सामान्य रूप से कठिनतम साधनाएँ करने पर भी सम्भव न था। युगावतार साधना-परायण जनों का वरण करते हैं और उन्हीं के माध्यम से अपना प्रयोजन पूर्ण करते हैं। प्रज्ञावतार की पुण्यवेला में ऐसा ही सुयोग सामने है। उसमें साधकों के लिए अनुपम अनुदानों का सुअवसर अनायास प्रस्तुत है, किन्तु उसके साथ सदा की तरह अभी भी पुण्य-प्रयोजनों के लिए अनुदानों का उपयोग करने की शर्त जुड़ी हुई है। जो दूसरों की जेब काटकर अपनी मजेदारी का ताना-बाना बुनते है।, उनके लिए तो यह सुयोग भी सन्तोषप्रद सिद्ध न हो सकेगा।
युगसन्धि में नैष्ठिकों को विशिष्ट स्तर के और जाग्रतों को सामान्य स्तर के अनुदान दिए जा रहे हैं। प्रयास और परिश्रम की तुलना में यह उपलब्धि भी इतनी बड़ी है जिसे चन्दन के निकट उगे वृक्षों और पारस का स्पर्श करने वाले लौहखण्डों को मिलने वाले अनायास सौभाग्य के समतुल्य समझा जा सकता है। इसमें प्रयास स्वल्प और लाभ असाधारण हैं। ऐसे लाभ अवसर पहचानने वालों को ही मिलते हैं। युगावतार द्वारा साधकों को दिए जा रहे दैवी अनुग्रह हो इसी तरह का एक विशिष्ट सुयोग-सुअवसर माना जा सकता है।
अध्यात्म-चेतना के ध्रुवकेन्द्र देवात्मा हिमालय से इन दिनों ऐसे ही अनुदान निःसृत हो रहे हैं, जो साधकों को विकसित एवं समर्थ बनाने की दृष्टि से अतीव उपयोगी हैं। इन अनुदान प्रवाहों के तीन स्तर हैं’(१) स्थूलचेतना के लिए प्राणसंचार कुण्डलिनी अनुदान (२) सूक्ष्मचेतना के लिए ज्योति अवतरण दिव्यदृष्टि जागरण (३) कारणचेतना के लिए ब्रह्म संपर्क अमृत अनुभव। यह तीनों ही जीवन के तीनों क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं। इन्हें कर्मयोग, ज्ञानयोग एवं भक्तियोग की साधना की सहज पूर्ति कर सकने वाले अनुदान कर सकते हैं। सत्कर्म, सद्ज्ञान और सद्भाव मही वे उपलब्धियाँ हैं, जिनके सहारे महामानव, ऋषि और अग्रदूत बनने का अवसर मिलता है। इनमें से इन दिनों जिसे अपने लिए जिस स्तर की आवश्यकता अनुभव होती हो, वह उन्हें इन दिनों बिना किसी अड़चन के उपयुक्त मात्रा में उपलब्ध कर सकता है। प्रसाद वितरण चल रहा हो तो उससे राहगीर भी लाभ उठा सकते है।
दिव्य-वितरण की उपर्युक्त तीनों धाराएँ युगदेवता स्वयं निस्सृत करेंगे। स्वयं को उनके कार्य में निमज्जित करने वाले, उनके चरणों में स्वयं को विसर्जित करने वाले इन्हें प्राणऊर्जा, दिव्यदृष्टि और सरसश्रद्धा के रूप में अनुभव कर सकेंगे। साधना की भाषा में इन्हें क्रमशः कुण्डलिनी जागरण, ज्योति अवधारण एवं रसानुभूति के के नाम से जाना जाता हैं। इन तीनों के ग्रहण केन्द्र क्रमशः ब्रह्मरन्ध्र, आज्ञाचक्र एवं हृदयचक्र में है। समर्थता, प्रतिभा, वरिष्ठता यह इन तीनों क्षेत्रों की सिद्धियाँ हैं। सिद्धपुरुष, अध्यात्म क्षेत्र की विभूतियों एवं क्षमताओं से सम्पन्न ऐसे ही व्यक्ति को कहते हैं। युगावतार के इस अनूठे अनुदान को पाने के लिए जो भी प्राणवान परिजन कदम बढ़ाएँगे, निश्चित ही उन्हें महान साधक होने का गौरव मिलेगा।
वर्ष १९९६ की समाप्ति के साथ ही हम सभी इक्कीसवीं सदी की ओर एक कदम और बढ़ चले। इसी के साथ इस युग के अभूतपूर्व युगसन्धि महापुरश्चरण की विशिष्ट साधना का एक वर्ष और पूरा हुआ। हममें से प्रत्येक परिजन की नजर आगामी दो वर्ष बाद सम्पन्न होने वाले महापूर्णाहुति आयोजन पर टिकी है। इन दिनों दृश्य और अदृश्य जगत में महापरिवर्तनों की भरी उथल-पुथल होती है, उसमें से कुछ घटनाक्रम तो मन्दगति से चलते रहते है।, पर कुछ ऐसे होते हैं, जिनमें परिवर्तन की प्रक्रिया बढ़े-चढ़े रूप में होती है और हर किसी को दिखाई भी पड़ती है। तपते ग्रीष्म के बाद आने वाली घटाटोप वर्षा के बीच इतने प्रकार के परिवर्तन होते हैं, मानो सृष्टि का क्रम ही बदल रहा हो। पतझड़ के बाद आने वाला बसन्त भी असाधारण उलट-पुलट का परिचायक होता है। बीज बोने और फसल काटने के दिनों में तैयारी तथा योजना ऐसी होती है, जिसके बीच संगति नहीं बैठती। १७ नवम्बर की रात को हुई भारी उल्कावृष्टि का नजारा भी कुछ ऐसा रहा-जिसका इक्कीसवीं सदी में आने वाले उज्ज्वल भविष्य से ताल-मेल बिठा पाना यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है।
आगामी दो वर्ष भी कुछ ऐसी ही हैं, जिनमें भगवान महाकाल के ताण्डव नर्तन के रोमांचकारी दृश्य स्पष्ट देखे और सुने जा सकेंगे। ऐसे विशिष्ट अवसर जब भी जहाँ कहीं आते हैं विशेष उत्तरदायित्वों को अपने साथ लिए आते हैं। घर-परिवार में भी विशेष अवसरों पर मित्र-कुटुम्बी सगे-सम्बन्धी सभी एकत्रित होते हैं, ताकि उस विशेष घटना की प्रतिक्रियाओं से परिचित होने के अतिरिक्त आवश्यक योगदान भी दे सकें। प्रसवकाल में जहाँ सुसमाचार मिलने की सम्भावना रहती है, वहाँ असह्य कष्ट से लेकर जोखिम तक का खतरा रहता है। सगे-सम्बन्धी इस सूचना को पाकर इर्द-गिर्द ही रहते है, ताकि किसी प्रकार की आवश्यकता पड़ने पर अपनी कोई भूमिका निभा सकें। मृत्यु, बीमारी या दुर्घटना का समाचार सुनकर भी स्वजन दौड़े आते हैं। लोकाचार निर्वाह के लिए ही नहीं, इसलिए भी कि उस संकट की घड़ी में उनको किसी प्रकार की सहायता अपेक्षित हो तो उसे भावनापूर्वक कर सकें। बिखरे हुए कुटुम्बी अवसर किसी बड़े त्योहार पर एकत्रित होते हैं, ताकि दूर-दूर रहने के कारण जो आत्मीयता घट जाती है, उसे साल में एक दो-बार तरोताजा करके उपेक्षावृत्ति विकसित न होने दी जाए।
गायत्री परिवार ने इस दिशा में अपना बड़ा कदम वर्ष १९९५ में प्रथम पूर्णाहुति के अवसर पर बढ़ाया था। परमपूज्य गुरुदेव की जन्मभूमि आँवलखेड़ा में सम्पन्न हुए इस सहस्रकुण्डीय महायज्ञ में, गायत्री परिवार के जितने भी प्रमुख सदस्य थे, वे लगभग सभी उस अवसर पर एकत्रित हुए थे। इसका उद्देश्य था-युगसन्धि महापुरश्चरण की पहली पूर्णाहुति करने के साथ देवसंस्कृति को उपेक्षित स्थिति से उबारना और उसमें पुनर्जीवन जैसी प्राणचेतना उत्पन्न करना। इस महाआयोजन में अत्यन्त महत्वपूर्ण और दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाले निर्णय हुए। संगठन का स्वरूप भी अति व्यापक बनकर उभरा। हजारों-हजार नए लोग जुड़े, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में आँधी-तूफान की गति से प्रज्ञा-प्रवाह को फैला दिया। स्थिति यहाँ तक बन गयी है कि इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य विश्वविधान का एक अनिवार्य सत्य बन गया है।
इक्कीसवीं सदी के आगमन में अब सिर्फ दो वर्ष बाकी बचे हैं। यह संधिपर्व माना गया है। सन्ध्याकाल, ग्रहणकाल, ऋतुपरिवर्तन आदि ऐसे ही मध्यान्तर होते हैं, जिनमें अपने-अपने ढंग की विशेषताएँ देखी जाती हैं। सन् १९८१ से आरम्भ होकर सन् २००० तक चलने वाले इन बारह वर्षों का समय प्राणवानों के निमित्त महाकाल की एक विशेष चुनौती माना गया था और कहा गया था कि वे अपने निजी व्यामोह में यथासम्भव कटौती करें और युगधर्म के परिपालन में ऐसा उच्चस्तरीय दायित्व निभाएँ, जिससे उद्भूत तप-ऊर्जा से नवयुग की ज्ञानगंगा के सतयुगी गंगावतरण की फिर से पुनरावृत्ति हई देखी जा सके।
यह युगसाधना मूलतः भाव, ज्ञान और कर्म के अदृश्य तथ्यों पर आधारित है पर सर्वसाधारण का दृश्यमान परिचय प्राप्त हो सके, इसके लिए बारहवर्षीय प्रत्यक्ष पुरश्चरण की आवश्यकता पड़ी। उपयुक्त वातावरण बनाने, इसे अपनाने और प्रवाह में बहने की इससे आशा की गयी है। सन् १९८१ से आरम्भ हुआ यह पुरश्चरण सफलतापूर्वक अपने १० वर्ष पूरे कर रहा है। प्रज्ञासंस्थानों और प्रज्ञामण्डलों में उसकी छोटी अनुकृतियाँ साप्ताहिक सत्संगों के रूप में हो रही है। दीपयज्ञों के विशालकाय समारोह इसी संदर्भ में हो रहे हैं और भी अनेक गतिविधियों का उद्घाटन, शुभारम्भ, विस्तृतीकरण अपने ढंग से होता रहा है, जिनका प्रत्यक्ष परिचय परिजनों को समय-समय पर मिलता रहा है- आगे भी समय-समय पर यही क्रम जारी रहेगा।
बारहवर्षीय इस युग-साधना में आगामी दो वर्ष अपेक्षाकृत अधिक विशिष्ट और महत्वपूर्ण हैं। इस विशिष्टता का दिव्यदर्शी प्रज्ञावान अधिक स्पष्टता से देख सकते हैं। अखण्ड ज्योति परिजनों में से प्रत्येक से यह अपेक्षा की गयी है कि इस परिवर्तन पर्व में वे मात्र मौनदर्शक न रहेंगे भीम, अर्जुन अंगद, हनुमान जैसे पराक्रम न सही तो वे शबरी, गिलहरी, गिद्ध जैसी समर्पित भूमिका तो अवश्य निभा सकेंगे। समय का अपना महत्व होता है, जो गुजर जाने पर फिर हाथ नहीं आता। समझा जाना चाहिए कि युगसन्धि के इन बचे हुए दो वर्षों में इतना कुछ सम्पन्न होना है, जिसे चिरकाल तक स्मरण किया जा सके।
युगसन्धि महापुरश्चरण का एक पक्ष है- सूक्ष्म वातावरण को सृजनात्मक प्राणचेतना से भर देना। दूसरा है- इस महाअभियान में सम्मिलित होने वालों की प्रत्यक्ष प्रतिभा का परिवर्धन करना। प्रतिभा हो तो प्राणचेतना और उसी के आधार पर मनुष्य की जीवटता, दूरदर्शिता, साहसिकता, क्षमता-दक्षता जैसी अनेकानेक विशेषताएँ उभरती हैं। उन्हीं के बल पर लोग लौकिक जीवन में सम्पन्नता और आन्तरिक जीवन में महानता अर्जित करने में सफल होते हैं। धन तो धूप-छाँव की तरह आँख-मिचौली खेलता रहता है, किन्तु यदि प्रतिभा का स्तर परिष्कृत बन जाय तो उसकी लाभ-श्रृंखला पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है। स्वयं और दूसरों को आगे बढ़ने ऊँचा उठाने का पथ प्रशस्त करती रहती है।
युगसन्धिकाल में साधनापरक तपश्चर्या की साधना में जहाँ व्यक्ति की स्थिति के अनुरूप उपासना का विधान है, वहाँ हर भागीदार को न्यूनतम दो घण्टे समयदान के रूप में अपने क्षेत्र में अनुदान प्रस्तुत करते रहने का विधान है। यह पुण्य और परमार्थ का समन्वय ऐसा है, जिसके फलस्वरूप भागीदारों की प्रतिभा का परिष्कार, वातावरण में सृजन-चेतना का समावेश और नवनिर्माण में पुरुषार्थपरक योगदान तीनों ही पक्ष जुड़े हुए हैं और त्रिवेणी संगम की समता करते हैं। अभियान की इस भागीदारी को एक शब्द में उदीयमान सौभाग्य कह सकते हैं।
यों इस उदीयमान प्रकाशपुञ्ज से आलोकित तो विश्व का कोना-कोना होगा, पर उस सुसंचालन में भागीदारी की प्रमुखता और प्राथमिकता रहेगी। कहावत है कि शालीनता और उदारता का प्रारम्भ अपने घर से करना चाहिए। अपने निजी शरीर के उपरान्त मनुष्य का सबसे अधिक प्रभाव अपने परिवार पर ही होता है। कारण कि उस परिवार के लोग अनेक आदान-प्रदानों के सहारे असाधारण रूप से गुँथे रहते हैं। शान्तिकुञ्ज के सहभागी यों तो करोड़ों बन गए हैं और बनेंगे, पर शुभारम्भ श्रीगणेश के लिए तो अखण्ड-ज्योति के पाठकों-परिजनों से ही अपेक्षा की जाती है। उनके सहयोग पर उत्साह भी बढ़ता है और उपेक्षा बरतने पर निराशा भी होती है।
संदेशों और दायित्वों की एक निराली श्रृंखला है। उसकी कड़ियाँ समयानुसार अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में खुलती और दिखाई देती रहेंगी। अभी इतना ही कहा जाना है कि अखण्ड ज्योति के सभी सदस्य स्वयं महाकाल द्वारा निर्देशित साधना-पुरुषार्थ में तत्पर हों, साथ ही अगले वर्ष प्रारम्भ होने वाले साधनावर्ष के कार्यक्रमों में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाएँ। इस क्रम में समय निकालकर उन्हें शान्तिकुञ्ज में चलने वाले नौ दिवसीय सत्र में अवश्य सम्मिलित होना चाहिए। इसके प्रभाव से उनके भीतर दबी पड़ी महानता निखरेगी, साथ ही वे महाकाल की वाणी को अपने अंतर्मन में साफ-साफ सुन सकेंगे।
सन् २००० के बसन्त पर्व से सन् २००० के बसन्त पर्व तक पूर्णाहुति वर्ष मनाया जाएगा। सन् २००१ में इस युग की महासाधना की महापूर्णाहुति होगी। इसके लिए एक करोड़ साधकों की तैयारी अगले वर्ष मनाए जाने वाले साधनावर्ष में की जानी है। इस बीच लाखों प्राणवान कार्यकर्ता देवसंस्कृति की संस्थापना के लिए समर्पित-संकल्पित नजर आने लगेंगे। इनका स्तर कुछ इतना अलौकिक होगा, जिन्हें विवेकानन्दों का अभिनव संस्करण कहा जा सके।
इस महाकार्य के लिए समय और साधन दोनों की महती आवश्यकता है। यह आवश्यकता इतनी अधिक है, जिसकी कल्पना भी कर पाना आज की परिस्थितियों में जटिल है। इतने पर भी यह सुनिश्चित समझा जाना चाहिए कि निर्धारित योजना अपनी गति को तीव्र से तीव्रतर और तीव्रतम करती जाएगी। हाँ, इतना अवश्य है कि दैवीशक्ति की निर्धारित योजना को पूरा करने के लिए मुफ्त का श्रेय जो भी लेना चाहें ले सकते हैं।
इस दैवीयोजना के अन्य भी महत्वपूर्ण पृष्ठ हैं, जो समयानुसार अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में खुलते रहेंगे और सामने आते रहेंगे। आज तो इतना ही समझ लेना पर्याप्त है कि इक्कीसवीं सदी इस विश्व की सबसे बड़ी, सबसे व्यापक और सबसे आश्चर्यजनक उथल-पुथलों से भी क्रान्ति है। उसके परिवर्तनों और घटनाक्रमों का अंकन तो इतिहास के पृष्ठों पर रहेगा ही, बड़ी बात यह है कि इसी अवधि में इतने महामानव दूध में से मलाई की तरह उछलकर ऊपर आएँगे, जिन्हें देखते हुए भगीरथ द्वारा किया गया गंगावतरण जैसी अनुभूति की जा सके। बगीचा लगाने वालों की तीन पीढ़ियाँ मोद मनाती हैं। स्वतन्त्रता सैनिक इन दिनों भी गौरवान्वित हो रहे हैं।
ऐसा ही कुछ अपने लिए प्राप्त कर सकना सम्भव हो सके, उसकी पृष्ठभूमि समझने के लिए युगसन्धि महापुरश्चरण की महासाधना में भाग लेने के लिए अखण्ड ज्योति के प्रत्येक परिजन का आह्वान किया जाता है। अच्छा हो, इसके लिए बहुत दिनों तक सोचने, विचारने में समय न गँवाया जाय, बल्कि आगामी वर्ष सम्पन्न होने वाले साधनावर्ष के कार्यक्रम से में बढ़-चढ़कर अपनी भूमिका निभाई जाय।
(५ अगस्त, १९८० का शान्तिकुञ्ज परिसर में दिया प्रवचन)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो! बड़ी ही प्रसन्नता की बात है कि इस समय गायत्री महापुरश्चरण की साधना जगह-जगह पर चल रही है। अगर आप विचार करेंगे तो यह पायेंगे कि यह समय बहुत ही संकटकालीन है। इस समय इस धरती पर महामारी, युद्ध के बादल, वायु-प्रदूषण जैसे अनेक संकट घटाटोप की तरह छाये हुए हैं, जिससे महाप्रलय जैसी स्थिति बनती जा रही है। इस परिस्थिति को देखते हुए हमने आप लोगों को गायत्री महापुरश्चरण करने की सलाह दी थी और इस बात पर जोर डाला था कि आपको यह साधना करनी चाहिए। समय की माँग, समय की पुकार यह है कि इन दिनों वातावरण में जो अवांछनीय तत्वों का घुलन एवं मिलन हो गया है, उसे समय रहते निरस्त किया जाय, ताकि जनसाधारण की स्थिति ठीक हो सके एवं सभी को खुले वातावरण में साँस लेने का मौका मिल सके। आवश्यकता इस बात की है कि वातावरण को स्वच्छ बनाया जाय। आज का वातावरण बहुत दूषित हो चुका है। यह ऐसा है जो बच्चे के मस्तिष्क के ऊपर सीधा प्रभाव डालता है। इसके प्रभाव से वे एक कमजोर आदमी की तरह बहकर कहीं-से-कहीं जा पहुँचते है॥ वातावरण का परिशोधन इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
मित्रो! इन दिनों जो परिस्थितियाँ हैं, वे अगले दिनों बहुत ही विपन्न एवं विषम होने वाली हैं। इसके कारण अनेक प्रलयंकारी घटनाएँ घटित होंगी, विनाश की लीला होगी। उस समय मनुष्य के ऊपर बहुत सारी मुसीबतें आयेंगी। चारों दिशाओं में आँधी-तूफान पानी-बाढ़ आदि का प्रकोप दिखाई देगा। इसका कारण है कि इस समय नेचर-प्रकृति नाराज हो चुकी है। वह बदला लेना चाहती है। इस परिस्थिति में कोई भी आदमी सुरक्षित नहीं है। मौसम का भी कोई ठिकाना नहीं रहेगा। गर्मी में सर्दी और सर्दी में गर्मी महसूस होगी। नित्य नयी-नयी बीमारियाँ बढ़ेंगी। डॉक्टरों के पास भी इसका कोई इलाज नहीं होगा। भाई-भाई में, पति-पत्नी में भी विश्वास नहीं होगा। सामूहिक बलात्कार, चोरी, उठाईगिरी, अनाचार, मारकाट जैसे अपराध, जो कि रावण के एवं कंस के जमाने में भी नहीं थे, उससे भी ज्यादा बढ़ेंगे। दहेजलोलुपों द्वारा बहुओं को जलाया जाएगा। लोगों में राग, द्वेष, अहंकार बढ़ता चला जाएगा। महत्त्वाकाँक्षा लोगों के सिर पर चढ़कर बोलेगी।
साथियों! हवा में जो जहर घुलता जा रहा है, वह साँस के साथ आँख, गर्दन गले और छाती में जाएगा और लोग बीमार होते चले जाएँगे। यही स्थिति पानी की होगी। गंगा का पानी पहले साफ था। उसका हम सेवन करते थे। अब उसको नहीं पीने के लिए प्रचार किया जा रहा है, क्योंकि गंगाजल अब प्रदूषणों से भरता जा रहा है। अब धीरे-धीरे जमीन की गर्मी भी कम हो गयी है। हमने उसके गर्भ में समायी सारी चीजें, जैसे-लोहा ताँबा, कोयला, डीजल, पेट्रोल सब निकाल लिया है। जमीन खोखली होती जा रही है। इससे जगह-जगह भूकंप आएँगे। फसल भी कम उत्पन्न होगी। आज विश्वभर में जो लाखों की संख्या में एटॉमिक हथियार बन रहे हैं, वे क्या बच्चों के खिलौने होंगे? नहीं, वे आग उगलेंगे। इससे मात्र तबाही आयेगी। सारी जगहों पर परमाणुयुद्ध की होड़ लग जाएगी। इससे चारों ओर तबाही ही होगी।
मित्रों! क्या इस प्रकार की विपन्नता की स्थिति में, ऐसी संकटकालीन वेला में-जब आदमी मरने मारने को तैयार है, तो आप उनको बचाने के लिए डॉक्टरों की तरह सेवा देने के लिए आगे नहीं आ सकते हैं? यह कैसी विडम्बना है जो आप नौकरी के बाद का चार घंटे का समय भी लोकमंगल के लिए, समाज के लिए, इनसान का भविष्य उज्ज्वल बनाने के लिए नहीं दे सकते हैं। इस प्रकार जब भी परिस्थितियाँ आती हैं, तो लोग अपने ढंग से इसका समाधान करने के लिए आगे आते रहे और प्रयास करते रहे हैं।
आपने भगीरथ का नाम सुना होगा। एक बार धरती पर से पानी समाप्त हो गया था। खेतों के लिए पानी नहीं था। उस समय उन्होंने तप किया और गंगा को प्रसन्न किया। धरती पर पानी का आगमन हुआ। नदियों में, कुओं में, नहरों में पानी आ गया। फसलें लहलहा उठीं। जो लोग पानी के अभाव में मर रहे थे, वे जीवित हो गये।
इस धरती पर एक बार वृत्तासुर नाम का राक्षस पैदा हुआ था। वह किसी के कन्ट्रोल में नहीं आ रहा था। उसके अत्याचार से सब त्राहि-त्राहि कर रहे थे। तब महर्षि दधिचि आगे आये और उन्होंने अपना अस्थिपञ्जर दान दे दिया, ताकि उससे वज्र-धनुष का निर्माण हो सके। आज जो मिसाइलें, अस्त्र-शस्त्र परमाणुबम आपको दिखलाई पड़ रहे हैं, यह क्या वृत्तासुर से कम हैं? आज हमें अनेकों किस्म के हत्यारे दिखाई पड़ रहे हैं? जो मात्र हजार-पाँच सौ रुपये लेकर किसी को भी मार डालने में कोई कसर नहीं छोड़ते।
इस प्रकार की परिस्थितियों में हर व्यक्ति ने अपने स्तर पर, सामूहिक स्तर पर प्रयास किया है तथा समाज, देश, संस्कृति को बचाया है। आज से पच्चीस सौ वर्ष पहले इसी प्रकार की परिस्थिति आयी थी, जब समाज के लोग त्राहि-त्राहि कर रहे थे। उस समय भगवान बुद्ध ने परिव्राजकों, भिक्षु-भिक्षुणियों को एकत्रित करके एक सामूहिक साधना कराने का प्रयास किया था, ताकि वातावरण में सुधार कर सके। इसी प्रकार हर विषम समय में व्यक्तियों के द्वारा सामूहिक प्रयास किये गये हैं।
युगसंधि की इस विषम वेला में भी इस मिशन के द्वारा इसी प्रकार का प्रयास “युगसंधि महापुरश्चरण” के नाम से आरंभ किया गया है। यह प्रयास अद्भुत है। इसका चमत्कार आप लोगों को भविष्य में देखने को मिलेगा। हमने अपनी जिन्दगी में गायत्री के चौबीस महापुरश्चरण किए हैं। इसकी साधना एवं तप से प्राप्त बल के द्वारा ही हमने युगनिर्माण जैसे कठिन कार्य को साहसपूर्वक पूर्ण करने की हिम्मत की है। हमने ध्वंस का समाधान और सृजन का परिपोषण करने के लिए गायत्री जयंती 23 जून, १९८० से बीस वर्ष का युगसंधि महापुरश्चरण आरंभ किया है। इसमें एक लाख नैष्ठिक उपासकों की भागीदारी रहेगी। इसके अलावा दस लाख अनुसाधक होंगे। यह वेला सन् १९८० से सन् २००० तक की होगी अर्थात् यह पुरश्चरण बीस साल का होगा। यह समय महापरिवर्तन के साथ जुड़ा होने के कारण भरी उथल-पुथल का होगा। अंतिम बारह वर्ष तो भयंकर मारकाट वाले होंगे।
हमारा संकल्प एक लाख नैष्ठिक साधक बनाने का है। नैष्ठिक और सामान्यों को मिलाकर दैनिक जप चौबीस करोड़ हो जाएगा। नियमित रूप से इतनी साधना चल पड़ने से अन्तरिक्ष के परिशोधन एवं वातावरण के अनुकूलन में भरी सहायता मिलेगी। इससे भावी संभावित विपत्तियों के टल जाने की आशा की जा सकती है। उज्ज्वल भविष्य के नवसृजन में इस साधना की प्रतिक्रिया बहुत ही सहायक सिद्ध होगी। इसमें जो साधक भाग लेंगे, उन्हें आशा से अधिक लाभ प्राप्त होगा। उनको आत्मकल्याण एवं लोककल्याण का दुहरा लाभ मिलता रहेगा। इसके बारे में जब हम चिन्तन करते हैं, तो हमारा मन गर्व से भर उठता है। हमें इस कार्य से काफी संतोष है।
एकाकी और सामूहिक प्रयत्नों की सफलता के स्तर में काफी अन्तर रहता है। अलग-अलग दस आदमी रहकर जितना काम करेंगे, उन दसों का सम्मिलित प्रयत्न कहीं अधिक सफलता प्रदान करेगा। इसलिए भारतवर्ष में हमेशा से तप एवं सामूहिक साधना का विशेष महत्व रहा है। प्राचीनकाल से लेकर अब तक हुए बहुत से कार्यक्रमों में इस प्रकार की साधना के द्वारा ही लाभ प्राप्त हुआ है। गायत्री महापुरश्चरण भी इसी श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसमें चौबीस लाख परिजन भाग ले रहे हैं। अनेकों कार्यक्रम भी इस श्रृंखला में आयोजित हो रहे हैं, जिसका वातावरण पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा। महात्मा गाँधी के आन्दोलन में भी इस प्रकार की सामूहिक साधना का कम महत्व नहीं रहा है। इसके द्वारा ही दिव्य वातावरण बना और हजारों लोग बलिवेदी पर अपनी कुर्बानी देने के लिए आगे आते चले गये। इस प्रकार की साधना में महर्षि रमण, रामकृष्ण परमहंस एवं अरविन्द की साधना का महत्वपूर्ण स्थान हैं, जिन्होंने एक दिव्य वातावरण बना दिया था।
इस समय की विकट परिस्थितियों और भयानक संभावनाओं को समय रहते रोका जाना चाहिए। इस कार्य के लिए यह समय उपयुक्त है तथा यह साधना, जो सामूहिक रूप से होने जा रही है, वह भी एक सही कदम है। छेद बन्द करने के साथ ही बर्तन में कुछ भरा भी जाना चाहिए। रोग-निवृत्त ही पर्याप्त नहीं है, पोषण भी मिलना चाहिए। अपराधों को रोकना भी एक काम है, परन्तु इसके साथ ही समाज के अंतर्गत रचनात्मक प्रयत्नों का तारतम्य जोड़ना भी आवश्यक है। वास्तव में इन दिनों यही दोहरी आवश्यकता युग की पुकार बनकर सामने खड़ी है, जिसे पूरा करने के लिए जाग्रत आत्माओं को आगे आना चाहिए। ध्वंस को रोकने एवं सृजन को गति देने का काम सदा से इसी वर्ग का रहा है। भगवान राम, कृष्ण, बुद्ध, गाँधी जैसे सभी के कार्य इनके बलबूते ही पूरे होते रहे है।
प्राचीनकाल यानी सतयुग में प्रकृति का पूर्ण सहयोग मनुष्य को मिलता था। भूमि, बादल, पवन सभी चीजें मनुष्य को समृद्ध बनाने में कोई कमी नहीं होने देते थे। इन दिनों प्रकृति ने विक्षुब्ध होकर आक्रोश प्रकट करना आरंभ कर दिया है, जिसके कारण अनावृष्टि, महामारी, भूकम्प, तूफान आदि का विनाशकारी त्रास हर जगह चल पड़ा है। दिव्यदर्शियों का अनुमान है कि इन दिनों प्रारंभ किये जा रहे युगसंधि महापुरश्चरण के क्षरा ये अशुभ लक्षण समाप्त हो जाएँगे। इसके साथ-ही-साथ नवसृजन की गतिविधियों में तूफानी उभार प्रस्तुत होगा, जो उज्ज्वल भविष्य की संरचना में अतिमहत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करेगा।
हमारे नैष्ठिक साधक, जो इसमें हमारा सहयोग करना चाहते हैं, उन्हें इन पाँच संकल्पों को पूरा करना होगा। पहला है-हर दिन न्यूनतम पाँच माला गायत्री महामंत्र का जप। दूसरा-पन्द्रह मिनट की प्राणसंचार की ध्यान-धारणा तीसरा-गुरुवार को बिना नमक का एक समय का भोजन, ब्रह्मचर्य का पालन तथा दो घंटे मौनव्रत का पालन। चौथा-महीने में कम-से कम एक बार न्यूनतम चौबीस आहुतियों का यज्ञ-हवन पाँचवाँ आश्विन एवं चैत्र नवरात्रियों में चौबीस-चौबीस हजार का गायत्री अनुष्ठान।
हमें विश्वास हैं कि हमारे परिजन इन नियमों-संकल्पों का पालन करते रहेंगे और नित्य नये साधकों को बनाने, उन्हें प्रोत्साहित करने का क्रम चलाते रहेंगे तो इस आन्दोलन को बल मिलेगा तथा नवसृजन के, नवनिर्माण के इस कार्य को शीघ्र एवं सुगमता से पूर्ण करने में हमें सहयोग मिलेगा।
प्रज्ञावतार अर्थात् ऋतम्भरा-प्रज्ञा का आलोक-विस्तार अपने युग का अरुणोदय है, जिसके सहारे आत्मिक और भौतिक उभयपक्षीय समस्याओं का हल निकलने की पूरी संभावना है। गायत्री के तत्त्वदर्शन का आलोक जन-जन तक पहुँचना हमारा लक्ष्य है। हमने इस महामंत्र की साधना चौबीस साल तक करके इस महामंत्र के चौबीस अक्षरों में चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को सुसंस्कृत बनाने वाले सभी तत्व कूट-कूट कर भरे हैं। आपके द्वारा इस तरह की जानकारी अगर जन-जन तक पहुँचायी जा सकी तो हमारा पूर्ण विश्वास है कि लोकचिंतन और व्यवहार-प्रचलन में उस उत्कृष्टता का समावेश हो सकता है।, जो युग विभीषिका से जूझने और उज्ज्वल भविष्य की संरचना में पूर्ण तथा सफल हो सके।
इस महान अभियान में जो सबसे आगे-आगे चलेंगे, उन्हें ज्यादा लाभ प्राप्त होगा। यह संकटकालीन परीक्षा की घड़ी है, जिसमें भगवान राम के रीछ-वानरों से लेकर गीध-गिलहरी तक की भूमिका है। इसमें कृष्ण के ग्वाल-बालों की तरह हर एक को अपनी-अपनी लाठी का सहारा देकर गोवर्धन को उठाना है। इसके लिए हममें से प्रत्येक को साहसी होना चाहिए। संभावित कठिनाइयों से किसी को भी भयभीत या आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे अवसरों पर दूरदर्शिता और साहसिकता का अनुपात बढ़ाने से ही काम चलता है। समय रहते रोकथाम करने और कठिनाइयों से जूझने का साधन जुटाने में तत्पर होना ही ऐसे अवसरों पर बुद्धिमत्तापूर्ण होता है। इन दिनों ऐसी ही बुद्धिमत्ता की आवश्यकता है, जो प्राणवानों के शौर्य-साहस को बढ़ाये और जन-जन की प्रखरता को जगाने के लिए काम आये।
मित्रों! आपको इस कार्य के लिए आगे आना चाहिए। यह महापुरश्चरण आपके लिए तथा समाज के लिए बहुत ही लाभदायक सिद्ध होगा। इसको सफल बनाने के लिए आपको प्रयास करना है। भगवान से हम प्रार्थना करते हैं जो भी इसमें भग लें, उनको इसके असंख्य गुना लाभ मिलें। अतः आप सभी से यह निवेदन है कि आप सब इस कार्यक्रम में भाग लें तथा इसे सफल बाने का प्रयास करें। प्रस्तुत युग-संधि महापुरश्चरण की व्यवस्था हमने गायत्री जयंती यानी २३ जून १९८० से बनाई है। यह बीस वर्ष तक लगातार चलेगा। सन् २००० की गायत्री जयंती पर इसकी पूर्णाहुति होगी। इसके भागीदार मात्र जप संख्या ही नहीं पूरी करेंगे, वरन् उस प्रयोग में अधिकाधिक निष्ठा का भी समावेश करेंगे।
युगसंधि महापुरश्चरण के प्रत्येक भागीदार को शौकिया, मनमौजी, अस्त-व्यस्त भजन-पूजन करके मन बहलाने की स्थिति में नहीं रहना होगा, वरन् जो कुछ भी थोड़ा या बहुत करना है, उससे परिपूर्ण नैष्ठिकता का समावेश करना है। इसी मार्ग पर चलते हुए आत्मशक्ति का विकास एवं आत्मकल्याण का लक्ष्य पूरा होता है।
यह युगसंधि महापुरश्चरण देखने में छोटा लग रहा है, परन्तु इसके द्वारा भविष्य में बहुत फायदा होने वाला है। अगर इतना लाभदायक न होता तो हम आपसे इसमें भागीदार बनने के लिए भावभरा निवेदन नहीं करते। यह समय की माँग है कि वातावरण में अवांछनीयता का जो समावेश हो गया है, उसे समय रहते निरस्त किया जाय।
जब बच्चा घर में पैदा होने को होता है तो एक तरफ घर में नवजात शिशु के लिए स्वागत की तैयारी चलती हैं तो दूसरी ओर प्रसूता को प्रसव का भरी कष्ट सहना पड़ता है। युगपरिवर्तन की इन घड़ियों में भी इसी प्रकार ही उथल-पुथल हो रही है। एक ओर ध्वंस चरम सीमा पर पहुँच चुका है, तो दूसरी तरफ नवसृजन की प्रक्रिया जन्म लेने वाली है। हमें इसी सृजन का काम करना है। इस समय मनुष्य की मनः स्थिति एवं परिस्थिति बिल्कुल बदल चुकी है। उनके विचार करने का ढंग गलत हो गया है। इसके कारण अनेकों प्रकार की विभीषिकाएँ नित्य उत्पन्न हो रही हैं तथा अपना तांडवनृत्य दिखाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही हैं।
इस समय की महती आवश्यकता यह है कि सूक्ष्म जगत के वातावरण में परिशोधन किया जाय। प्राचीनकाल में भी ऐसी ही परिस्थितियाँ थीं। लोग रावण के आतंक से त्राहि-त्राहि कर रहे थे। उस समय भगवान राम ने अपनी शक्ति नियोजित की तथा जनसहयोग के माध्यम से रावण को निरस्त करके समाज में शांति स्थापित की थी, रामराज्य की स्थापना की थी। इसके बाद गुरु वशिष्ठ ने यह कहा कि इतना कार्य करने से ही काम नहीं चलेगा। उन दुष्टों ने तो वातावरण को भी दूषित कर दया है, अतः उसके लिए स्वच्छ वातावरण बनाने की भी आवश्यकता है। गुरु वशिष्ठ के कहने पर भगवान राम ने दस अश्वमेध यज्ञ किये। इस अश्वमेध यज्ञ की प्रक्रिया बड़ी ही महान है इसमें लाखों लोग बैठकर साधना करते हैं, तप करते हैं, यज्ञ-हवन करते हैं तथा वातावरण को बदल डालते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भगवान राम के रामराज्य की स्थापना रावण के समाप्त होने से नहीं हुई, वरन् दस अश्वमेध यज्ञों के कारण हुई। भगवान श्रीकृष्ण के जमाने में भी वैसा ही हुआ। महाभारत के बाद उनको भी यज्ञ करना पड़ा। उसके बाद ही वातावरण का सुधार हो सका। यज्ञ एवं उपासक के द्वारा वातावरण में सुधार की बात बहुत प्राचीनकाल से ही चली आ रही है।
युगसंधि का यह विशेष पर्व है ऐसे समय हजारों-लाखों वर्ष के बाद आते हैं। भगवान को युगपरिवर्तन करना पड़ता है, परन्तु वे केवल आप जैसी आत्माओं को ही अपना माध्यम बनाते और प्रभावित करते हैं। निराकार ब्रह्म के लिए यह कठिन है कि वह स्वयं अपने व्यापक विराट स्वरूप को मिटाकर व्यक्तियों का स्वरूप बनाये और सामान्यजनों की तरह उतार-चढ़ाव से जूझने का उपक्रम अपनाये। शासनाध्यक्ष योजना बनाते हैं और निर्देश देते हैं। आज की परिस्थिति ऐसी है जिससे भगवान बहुत ही दुखी है। वह परिवर्तन चाहते हैं। एक समय महर्षि विश्वामित्र ने भी इसी तरह का परिश्रम किया था। शास्त्रों में वर्णन आता है कि उन्होंने एक नयी दुनिया बनाने के लिए घनघोर परिश्रम किया था। उस समय उन्हें अपने शिष्यों के लिए बहुत बड़ा अनुदान देना पड़ा था।
मित्रो! आध्यात्मिक अनुदानों की सामान्य परम्परा भी रही है और आपत्तिकालीन की अतिरिक्त व्यवस्था भी रही है। गुरु शिष्यों को, देवता भक्तों को समय-समय पर अनेकानेक अनुदान देते रहे हैं, परन्तु साथ-ही-साथ इसका भी ध्यान रखा जाता है कि उपलब्धकर्ता उसे संकीर्ण स्वार्थपरता में खर्च न करे। दैवीय वरदान दिव्य प्रयोजनों के लिए दिया जाता है। ऐसा ही अनुदान-वरदान विश्वामित्र ऋषि ने अपने शिष्यों को दिया था। इसी तरह रामकृष्ण परमहंस को जनकल्याण के लिए कुछ करना था। सो उनने विवेकानन्द को ढूँढ़ निकाला और अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति के लिए जितनी शक्ति की आवश्यकता थी, उसे दे दी। इसी प्रकार समर्थ गुरु रामदास का अनुदान शिवाजी को, चाणक्य का चन्द्रगुप्त को मिला था।
आपको मालूम होना चाहिए कि यह युगसंधि का विशेष समय है। इस समय स्रष्टा को परिवर्तन करना है। इस युगसंधि की वेला में नवसृजन का उत्तरदायित्व सँभलने वाली दिव्य शक्तियों का इन दिनों ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए जाग्रत आत्माओं की तलाश है। उन्हें जितना लाभ कठोर तपश्चर्या, साधना की कठिन परिस्थिति को पार करके मिल सकता था, उतना लाभ इस विशिष्ट अवसर पर मिलने वाला है। इसे दैवी अनुदान कहा जा सकता है। इन दिनों युगसंधि की इस उपासना के माध्यम से उच्चस्तरीय अनुदान वितरण ऋतम्भरा-प्रज्ञा द्वारा किया जा रहा है। जिस प्रकार दुर्भिक्ष आदि संकटकालीन परिस्थितियों में सरकार कुआँ खोदने, उद्योग खड़ा करने, नहर बनाने जैसे कामों के लिए विशेष रूप से धन-राशि देती है, उसी प्रकार इन दिनों ऐसे असंख्य संस्कारवान आत्माओं को दिव्य अनुदान मिलने वाला है, किसी जमाने में राम, कृष्ण, बुद्ध, गाँधी के सहयोगियों को प्राप्त हुआ था।
इस धरती पर जब कभी भी अनीति-अत्याचार की बढ़ोत्तरी होती है, तो इसी प्रकार का क्रम चलता है और शालीनता, सज्जनता लाने का प्रयास किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के जमाने में भी ऐसा ही हुआ था। जब कभी ऐसे संकटकालीन समय आते हैं तो बहुत-से लोग ऋषि-चरणों में अपना सब कुछ अर्पण कर देते है। जैसे विश्वामित्र के चरणों में राजा हरिश्चन्द्र भगवान बुद्ध के चरणों में राजा अशोक का समर्पण हुआ था और पूरी शक्ति से उन्होंने सहयोग दिया था। भगवान बुद्ध के समय में जब अराजकता बढ़ी थी तो उन्होंने अपने शिष्यों को परिव्रज्या का पाठ पढ़ाकर इसके निराकरण के लिए उन्हें देश-विदेशों में भेजा था। इस प्रकार वातावरण बनाने में भगवान बुद्ध का तप, उनके शिष्यों का तप बहुत ही महत्वपूर्ण था। उसमें हर्षवर्धन एवं अशोक जैसे लोगों ने पूरा सहयोग दिया।
पिछले दिनों युद्धों के कारण कितने लोग मारे गये, कितना वातावरण गंदा हो गया। इस परिस्थिति में वातावरण के संशोधन में युगसंधि महापुरश्चरण द्वारा एक महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न होगी। युगसंधि में इन दिनों हिमालय के आध्यात्मिक ध्रुव केन्द्र से ऐसी दिव्य क्षमताओं का-प्राणचेतना का प्रसार-विस्तार हो रहा है, जिन्हें ग्रहण-धारण करके असंख्य मनुष्यों का कल्याण हो सकेगा। ऋषि-मुनियों से लेकर लोकसेवी महामानव तक यही कार्य करते रहे हैं। दैवी शक्तियों का अनुदान वे जन-जन तक पहुँचाने में लगे रहे हैं। इससे ही भगवान की इच्छा पूरी हुई है और जन-जन का हित हुआ है। यही कार्य युगसंधि महापुरश्चरण के अंतर्गत हमारे नैष्ठिक साधकों का होगा।
संकटकालीन परिस्थिति आने पर समाजसेवी, डॉक्टर अपना-अपना काम करते हैं, किन्तु हम एक बात बताना चाहते हैं कि ऐसी परिस्थिति में अध्यात्मवादी आदमी को भी हाथ-पर-हाथ रखकर नहीं बैठना चाहिए।
इस प्रकार की साधना में यद्यपि पुरुषार्थ ही प्रमुख है। इसके क्षरा ही वातावरण का परिष्कार संभव होगा। अंगद, हनुमान, नल-नील अर्जुन, शिवाजी आदि को यदि पराक्रम करने का मौका न मिला होता तो सभी लोग इसी प्रकार का सामान्य जीवन जीने वाले कहलाते। युग-परिवर्तन एवं नवनिर्माण के कार्य का श्रेय उनको नहीं मिलता। ग्वाल-बालों को श्रेय इसलिए मिला कि भगवान श्रीकृष्ण को अपनी-अपनी लाठी लगाकर थोड़ा-सा सहयोग दिया और कार्य पूरा हो गया। वे भी श्रेय के भागीदार बन गये। इस तरह का अवसर आने पर हर किसी को लोकमंगल के लिए, जनजागरण के लिए आगे आकर कार्य करने का प्रयास करना चाहिए। इसके द्वारा ही आप ऐतिहासिक लोकचर्चा का विषय बनने में समर्थ हो सकते हैं।
मानवी अन्तराल और अदृश्य वातावरण के क्षेत्रों में व्याप्त विषाक्तता एवं दूषणता का परिशोधन करना तथा उसमें नयी चेतना भरना एक बहुत बड़ा काम है, जिसे भौतिक क्षेत्र के किसी भी कार्य से कम महत्व नहीं दिया जा सकता है। इन दोनों ही क्षेत्रों में आज आध्यात्मिक उपचार की आवश्यकता है। इस समय वातावरण का संशोधन होने से मनुष्य को कितना लाभ हो सकता है, इसे आपको लोगों को समझाने का प्रयास करना चाहिए।
मित्रों! आज आपको जनजागरण के लिए, युगधर्म निबाहने के लिए पुकारा गया है। अतः आपको इस कार्य के लिए आगे आकर और बढ़-चढ़कर कार्य करना चाहिए। वातावरण खराब हो जाता है, तो उसका असर पड़ता है। वातावरण का प्रभाव, परिस्थितियों का प्रभाव क्या होता है, इसे सभी लोग जानते हैं। आज ऐसी परिस्थितियाँ आ गयी हैं कि इसने असंख्य मनुष्यों को दुष्प्रवृत्तियों की ओर, दुश्चिन्तन की ओर धकेल दिया है। इसके कारण कहीं भूकम्प, बाढ़, महामारी तो कहीं अनाचार, अत्याचार, पाप की विभीषिका अपना पसारा फैला रही है। अब समय आ गया है कि आपको रचनात्मक कार्यों की ओर चलना है। यह युगसंधि महापुरश्चरण इसी प्रकार का कार्य है, जिसमें आप सभी लोग शामिल है।
सामूहिकता का लाभ सभी जानते हैं। प्राचीनकाल से लेकर अब तक सभी बड़े-बड़े काम सामूहिकता के क्षरा हल होते रहें हैं। प्राचीनकाल में सभी ऋषियों की सामूहिकता अर्थात् बूँद-बूँद रक्त के द्वारा माता सीता की उत्पत्ति हुई थी। यही सीता भगवान राम से कहीं ज्यादा असुरता को समाप्त करने में तथा रामराज्य की स्थापना करने में सफल हुई। सीता क्या थी? ऋषियों की सामूहिकता का प्रतीक थी। दुर्गा का अवतार क्या था? देवताओं की सामूहिक शक्ति को इकट्ठा करके प्रजापति ब्रह्मा ने दुर्गा का अवतार कराया था। श्रेष्ठ कामों के लिए अच्छे लोगों का सहयोग लेने की प्राचीनकाल से ही पद्धति रही है। भगवान श्रीकृष्ण का गोवर्धन उठाना तथा भगवान राम का समुद्र में पुल बाँधना, यह सब सामूहिकता का ही प्रतीक है।
आज से पच्चीस सौ वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध ने अपने भिक्षु-भिक्षुणियों को इसी प्रकार की सामूहिक सेवासाधना करने के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया था। हमारे सामने महात्मा गाँधी आये। उन्होंने भी इस देशों आजाद कराने के लिए सामूहिक शक्ति का ही उपयोग किया। इसके द्वारा ही स्वराज्य मिलना संभव हो सका था। आज का यह युगसंधि महापुरश्चरण भी इसी तरह का एक महत्वपूर्ण सामूहिक प्रयास है। आपको यह भली-भाँति समझ लेना चाहिए कि यह इस युग का महानतम प्रयास है। गायत्री उपासना के द्वारा ही हमने सारा चमत्कार पाया है। हम देखना चाहते हैं कि आप लोग इसमें कितनी श्रद्धा-निष्ठा के साथ काम करते हैं। हमें विश्वास है कि यह कार्य बहुत व्यापक स्तर पर बढ़ने वाला है। हमें यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि यह कार्य बढ़ेगा। अनेक कार्यक्रम होंगे। इससे वातावरण में अप्रत्याशित रूप से बदलाव आयेगा। नयी पीढ़ियाँ बदलती चली जाएँगी।
गाँधीजी ने स्वतंत्रता आन्दोलन को तीव्र करने के लिए नमक सत्याग्रह चलाया था। इसमें जो लोग आगे रहे, उन्हें श्रेय मिला। नवनिर्माण के इस कार्य के अंतर्गत भी जो आगे रहेंगे तथा अपनी भागीदारी देंगे, उन्हें भी श्रेय, सम्मान सहयोग अधिकाधिक मिलेगा। आपका जो श्रम, भावना, धन इसमें लगा है, वह हजार गुना होकर वापस होगा और आप धन्य हो जाएँगे।
यह जो महापुरश्चरण चल रहा है वह न केवल भारत के लिए, वरन् सारे विश्व के लिए, मनुष्य जाति के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण रहेगा। अगले दिनों युगसृजन में गायत्री महाविद्या को युग-शक्ति का रूप धारण करना है। अगले ही दिनों उसे विश्वदर्शन का, अध्यात्म का केन्द्रबिन्दु बनने का अवसर मिलेगा। अतः आप सब लोग जो इस कार्य में सहयोग देंगे, हमें काफी प्रसन्नता होगी। हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि आप में, आपके घर-परिवार में सुख-शांति आवे, प्रगति को ओर बढ़े तथा आपका भविष्य उज्ज्वल हो। आज की बात समाप्त॥
कुरुक्षेत्र में भव्य मेले का आयोजन था। भगवान कृष्ण भी द्वारिकावासियों के साथ मेले में आए थे। देवर्षि नारद भगवतदर्शन को धराधाम पर पधारे एवं श्रीकृष्ण की पटरानियों से कहा-तीर्थ में दिया गया दान अक्षय होकर शाश्वत रूप से प्राप्त हो जाता है। सत्यभामा के बात जम गयी। उनने सोचा भगवान श्रीकृष्ण से प्रिय कोई नहीं है। वे ही हमें अक्षय होकर प्राप्त हो जाएँ, इससे बड़ी क्या बात हो सकती है, किंतु जो प्रिय है उसे दान में कैसे दिया जाय? जिज्ञासा व्यक्त की गयी तो देवर्षि बोले-उसका मूल्य देकर उसे वापस लिया जा सकता है। अभिमानी सत्यभामा ने कहा- हम श्रीकृष्ण को दान देकर बराबर मूल्य देकर उन्हें वापस ले लेंगे व जन्म-जन्मान्तरों के उनके साथी बनेंगे।
दान दे दिया गया। अखिल ब्रह्मांडनायक श्रीकृष्ण एक तुलापट पर। दूसरे पर हीरे-चाँदी जवाहरात रख दिए गए। पलड़ा ज्यों-का-त्यों रहा। देवर्षि ने कहा-आप संकल्प करती जाएँ, रखती जाएँ। सभी वहाँ मौजूद थे। युधिष्ठिर ने इंद्रप्रस्थ का राज्य, उग्रसेन ने अपना राज्य संकल्पित कर रखा। पलड़ा यथावत रहा। श्री बलराम की माता वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी वहाँ पर थीं। वे बोली-यहाँ नन्दबाबा का भी शिविर लगा है। कन्हैया बिकेंगे तो भक्ति के मोल ही। यह धन सिर्फ ब्रज के लोगों के पास है। सभी वहाँ गए। राधिका जी से अनुरोध किया। उनने सहायता का आश्वासन दिया। सारे मुकुट-संकल्पादि उतार लिए गए। राधाजी ने "श्रीकृष्ण शरणं मम” कहकर एक तुलसीदल तुलापट पर रख दिया। रखते ही श्रीकृष्ण ऊपर व तुलसी दल वाला पलड़ा भारी होकर नीचे हो गया।
भक्ति की महिमा देखकर सभी उपस्थिति जन धन्य हो गए। राधाजी की भक्ति के आगे सारे ऐश्वर्य दो कौड़ी के हैं- यह कहकर सत्यभामा के अभिमान को चूरकर देवर्षि वह तुलसीदल रूपी प्रसाद लेकर संकीर्तन करते प्रस्थान कर गए। धन्य है ब्रज व उसकी भक्ति।
इक्कीसवीं सदी की युगक्रान्ति अब अधिक दूर नहीं। आने वाले चार सौ से भी कम दिनों में हम एक दशक ही नहीं सदी ही नहीं, एक सहस्राब्दी पाकर सन् २००० में प्रवेश करेंगे। परमपूज्य गुरुदेव सहित अनेकानेक महापुरुषों के अनुसार नवयुग के फलितार्थ होने की सही अवधि यही समय है। आगामी चार सौ दिन और उसके बाद के चार सौ दिन हम सबके जीवन में एक बहुमूल्य अवसर बनकर आ रहे है। महाकाल की असीम अवधि में युग की, इतिहास की दृष्टि से सैकड़ों क्या, हजारों वर्षों का भी कोई महत्व नहीं होता। राजतंत्र से प्रजातंत्र की यात्रा में भी हजारों वर्ष लग गए। सभ्यता, शिष्टाचार, अनुशासन सीखने में भी हमें कम समय नहीं लगा। तब काल की गति धीमी थी। अब विकास-परिवर्तन जो भी कहें, तीव्रगति से हो रहा है। अब इसका प्रभाव किसी व्यक्ति, समुदाय या क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं, इससे समूचा विश्व-दृश्य व परोक्ष जगत भी प्रभावित होगा। इच्छा या अनिच्छा से विश्व के सभी निवासियों को प्रवाह के साथ बहने के लिए, समय के साथ चलने के लिए विवश होना पड़ेगा।
यदि हम समय के महत्व को समझते है, तो हमें बिना एक पल गँवाए इनसानियत का पुनः स्थापित करने हेतु मानवी-मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए साधना प्रधान प्रयासों में अभी से जुट जाना चाहिए। समय की गति को देखते हुए ये प्रयास अत्यधिक तीव्र गति से बड़े व्यापक स्तर पर होने चाहिए, तभी यह दार्शनिक क्रान्ति -वैचारिक क्राँति -विश्व के भावनात्मक कायाकल्प की भूमिका संपादित कर पाएगी। साधनात्मक पुरुषार्थ सामूहिक स्तर पर तीव्र होगा तो ही उन दैवी-प्रकोपों से वह मानवमात्र की रक्षा कर सकेगा, जो आने वाली अवधि में अपेक्षित है। यह चर्चा उस युगसंधि महापुरश्चरण के अंतिम चरण के सदी में की जा रही है, जिसमें देवात्मशक्ति-कुण्डलिनी शक्ति के विश्वस्तर पर जागरण की प्रक्रिया संपन्न करने का पुरुषार्थ संपन्न होने जा रहा है। साधनावर्ष जो वसंत पंचमी सन् १९९९ (२२ जनवरी) से वसंत पंचमी सन् २००० (१० फरवरी) तक सारे भारत व विश्व में मनाया जा रहा है, इस महापुरश्चरण का अंतिम तीव्र वेग वाला चरा है, जिसका समापन नवयुग के आगमन की वेला में महापूर्णाहुति के साथ होगा।
आज चारों ओर निगाह डालकर देखें तो दृश्य व परोक्ष दोनों ही स्तर पर अराजकता का साम्राज्य छाया दिखाई देता है। मनुष्य ने ही साधना का, आत्मसंयम का पथ छोड़ आज ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी है कि सारी मानवजाति का अस्तित्व संकट में दिखाई देता है।
विकृत बुद्धिवाद, असीम सुखोपभोग की लालसा एवं कामुकता के उन्माद ने आज जो स्थिति उत्पन्न की है, उससे लगने लगा है कि इनसानियत हैवानियत में बदल गई है। अन्ततः इसका मूल कारण एक ही नजर आता है-तात्कालिक वेला को प्रधानता देने वाले प्रत्यक्षवाद को लोकमान्यता मिल जाना-वहीं सब कुछ नजर आना एवं प्रकारान्तर से यही जीवनदर्शन बन जाना।
मानवीसत्ता के हर पक्ष में घुस पड़ी विज्ञान की प्रगति जन्य अराजकता से यदि लड़ा जा सकता है तो मात्र साधना के अमोघ हथियार से। परोक्ष को साधकर ही प्रत्यक्षवाद पर अवलम्बित इस दर्शन को उलटा जा सकता है। उलटे को उलट कर सीधा करना ही विचारक्रांति है। यही इस युग के महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया है।, जिसे युगसाधना के माध्यम से अगले दिनों संपन्न होना हैं
विचारक्रांति के तीन पक्ष है- बौद्धिक क्राँति से मनुष्य के चिंतन में परिवर्तन नैतिक क्राँति से मनुष्य के चरित्र में परिवर्तन एवं सामाजिक क्रान्ति से व्यक्ति के व्यवहार में आमूलचूल बदलाव। मनुष्य की सत्ता भी इन्हीं तीन हिस्सों में बँटी हुई है-चिंतन -चरित्र एवं व्यवहार। इन तीनों ही क्षेत्रों का साफ-सुथरी रहना समय की महती आवश्यकता है। एक में भी विकृतियों का समावेश हुआ तो सर्वनाश सुनिश्चित है। बौद्धिक क्रान्ति से चिंतन की अवांछनीयता, मनोविकारों, सनकों, अनगढ़ महत्त्वाकाँक्षाओं से जूझा जाता हैं चिंतन का ही प्रभाव चरित्र पर भी पड़ता है। चरित्रनिष्ठा ही नैतिकता है। मानवी गरिमा के अनुरूप दायित्वों का निर्वाह-शिष्टाचार-अनुशासन का परिपालन इन्हीं का समन्वय चरित्र का निर्माण करता है। ये मर्यादाएँ-अनुशासन बने रहें-वर्जनाओं का निर्वाह हो - इस व्रतशीलता के निर्वाह को नैतिक क्रान्ति नाम दिया गया है। ये दोनों ही क्रान्ति धर्मतंत्र के माध्यम से, युगसाधना के निर्वाह से जिसका विस्तार बड़े व्यापक क्षेत्र में है, संपन्न होती है एवं इस युग प्रत्यावर्तन की वेला में उसी तीव्रता संपन्न होने जा रही है जिस तीव्रता से अवांछनीयताओं का समावेश चिंतन व चरित्र में हुआ था।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी व्यक्तित्व का विकसित रूप ही समाज है। सामाजिक क्राँति व्यक्ति के व्यवहार की परिष्कृत व सुव्यवस्थित करती है। जैसे-जैसे विवेकशीलता, दूरदर्शिता, न्याय निष्ठा का विस्तार होता चला जाता है- धर्म धारण विस्तृत आकार लेकर सारे समाज व विश्व को प्रत्यक्ष व परोक्ष जगत को प्रभावित कर जन -जन के व्यवहार में नीतिमत्ता, उत्कृष्टता का संचार कर सतयुगी संभावनाएँ साकार बनाती चली जाती हैं
यदि हमारे अंदर समझदारी का थोड़ा-सा भी अंश विवेक-बुद्धि के रूप में, दूरदर्शिता के रूप में विद्यमान है, तो हमें समय की विषमता का समझना व आने वाले युग की पदचाप को परिवर्तन की आहटों को सुनने का प्रयास, करना चाहिए। यह लोभ-मोह के लिए खपने और अहंकार -प्रदर्शन के लिए खपने और अहंकार-प्रदर्शन के लिए ठाट-बाट बनाने की बात सोचने का समय नहीं है। यह असाधारण व आपदाधर्म के पालन वाला समय हैं सूक्ष्मजगत में साधनारत ऋषिगणों की तपश्चर्या के साथ जुड़ने की ठीक यही समय है। धरती के जीवन का भाग्योदय इन्हीं दिनों होने वाला है। दैवी प्रयास इतने तीव्र होने जा रहे है कि उसमें यदि हमारी साधना का सम्पुट लग भर जाय तो न केवल परिवर्तन शीघ्र होगा- हम उसके केन्द्र में एक भूमिका निभा रहे होंगे। आने वाले समय के अनुरूप हम सभी बन सकें- उसमें अपना जीना सुनिश्चित कर सके- उसके लिए हम सभी को अपनी तैयारी करनी होगी। बदलने जा रही-बनने जा रही दुनिया के अनुरूप हमें अपने आपको भी बदलना होगा एवं यह कार्य मात्र साधना के ब्रह्मास्त्र संभव हैं अब यह व्यक्ति ही नहीं, सामाजिक आवश्यकता भी बन गयी। इसी कारण सारे भारतवर्ष के चप्पे-चप्पे में, विश्व के कोने-कोने में अखण्ड जप-साधना के, उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के ऐसे आयोजन संपन्न होने जा रहे है, जिनसे अभूतपूर्व शक्ति का उपार्जन होगा। इससे जो सुरक्षाकवच विनिर्मित होगा, वह निश्चित ही अंतर्ग्रही प्रभावों ग्रहों की युति के कारण संभावित प्रतिकूल परिस्थितियों से हमारी रक्षा कर सकेगा। प्रस्तुत साधना अंक में साधना प्रक्रिया के उसी तत्त्वदर्शन पक्ष को स्पष्ट किया गया है। आगामी अंक के व्यावहारिक प्रतिपादन से परिजन जान सकेंगे कि अगले दिनों उन्हें किस स्तर पर अपना साधना -पुरुषार्थ किन-किन रूपों में आगे बढ़ाना हैं यदि हम समय रहते जागकर, अपने जीवन की रीति-नीति को बदलकर, जीवन साधनामय बना सके तो हमसे अधिक सौभाग्यशाली कोई ओर नहीं होगा।
साधना प्रशिक्षण के भारतव्यापी सत्र
युगतीर्थ शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में विगत दिनों ३१ अक्टूबर, १ नवम्बर की तारीखों में संपन्न विशेष सत्र में साधनावर्ष हेतु व्यापक मंथन कर प्रारंभिक प्रशिक्षण सत्रों का स्वरूप निर्धारित कर ४८ स्थानों का चयन कर उनकी तिथियों का निर्धारण कर दिया गया। प्रशिक्षणों का प्रारूप पूर्व निर्धारित ५ दिवसीय आयोजन के स्थान ढाई दिवसीय ही रखा गया हैं एक दिसम्बर से प्रायः जनवरी के तीसरे सप्ताह तक चलने वाले इन क्षेत्रीय प्रशिक्षण सत्रों के नाम व उनकी तिथियाँ इस प्रकार है-
उत्तर प्रदेश - (१) आँवलखेड़ा १५ से १७ जनवरी (२) बस्ती १८ से २० दिसम्बर (३) बरेली २५ से २ दिसम्बर (४) बुलन्दशहर १३ से १५ दिसम्बर (५) झाँसी १५ से १७ जनवरी (६) नोएडा ११ से २१ जनवरी (७) शुक्लागंज-उन्नाव १ से ३ जनवरी (८) सुल्तानपुर २९ से ३१ दिसम्बर (९) वाराणसी १३ से १५ दिसम्बर (१०) अल्मोड़ा (तिथि निर्धारण बाद में)।
बिहार- (११) बोकारो ३ से ५ जनवरी (१२) जमशेदपुर १० से १२ जनवरी (१३) कटिहार २३ से २५ दिसम्बर (१४) मुजफ्फरपुर २७ से २९ दिसम्बर (१५) पटना ३१ दिसंबर से २ जनवरी।
मध्यप्रदेश- (१६) भिलाई ११ से २९ जनवरी (१७) भोपाल ३० दिसम्बर १ जनवरी (१८) चित्रकूट ११ से १३ जनवरी (१९) बिलासपुर ३ से ५ जनवरी (२०) उज्जैन २६ से २८ दिसम्बर (२९) जबलपुर ७ से ९ जनवरी।
राजस्थान- (२२) बाड़मेर १३ से १५ जनवरी (२३) चूरु १० से १२ दिसम्बर (२४) जयपुर १८ से २० दिसम्बर (२५) कोटा २२ से २४ दिसम्बर (२६) राजसमन्द ८ से १० जनवरी।
उड़ीसा- (२७) भुवनेश्वर २ से ४ जनवरी (२८) केराकापूत २९ से३१ दिसंबर (२९) सम्बलपुर ६ से ८ जनवरी।
गुजरात-३० अहमदाबाद २५ से २७ दिसम्बर (३१) अमरेली १५ से १७ जनवरी (३२) भुज ६ से ८ जनवरी (३३) डीसा २ से ४ जनवरी (३४) कायावरोहण-बड़ोदरा ११ से २१ दिसम्बर (३५) नवसारी ५ से १७ दिसम्बर (३६) मेहसाणा २९ से ३१ दिसम्बर (३७) राजकोट १० से १२ जनवरी (३९)सारसा २२ २४ दिसम्बर।
महाराष्ट्र- (३९) भुसावल ८ से १० दिसम्बर (४०) नागपुर ४ से ६ दिसम्र (४१ पुणे १२ से १४ दिसम्बर) (४२) हिंगोली १७ से १९ दिसम्बर।
अन्य प्रान्त- (४३) तिनसुकिया १४ से १६ जनवरी (४४) कलकत्ता ८ से १० जनवरी (४५) चण्डीगढ़ ५ से ७ दिसम्बर (४६) कुरुक्षेत्र ९ से ११ दिसम्बर (४७) शिमला १ से ३ दिसम्बर (४८) हैदराबाद २४ से २६ दिसम्बर।
एक केन्द्र बैंगलोर का कार्यक्रम वसंत पंचमी के बाद प्रस्तावित है।
उपर्युक्त कार्यक्रमों के लिए वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की चार टोलियाँ ३ नवम्बर से प्रस्थान कर गयी है।
गायत्री उपासना की धुरी पर ही गायत्री परिवार के समस्त क्रिया-कलाप केन्द्रित है। गायत्री एक समग्र योग-शास्त्र है। योग ही तो कर्म को कौशलता का निखार देकर व्यक्तित्व को विभूतियों से सजाता है। योग ही है तो आत्मा व परमात्मा के मिलन की रसानुभूति को इसी जीवन में साकार करके उसका आनंद प्रदान करता देखा जाता है। योग ही है जो जीवन को समत्व से अभिपूरित कर स्थितप्रज्ञ बनने की कला सिखाता है।
परमपूज्य गुरुदेव ने एक योगी का जीवन जिया एवं स्वामी विवेकानन्द द्वारा जारी किये गए कार्य को सारे भारत एवं विश्व में वैज्ञानिक अध्यात्मवाद को विचारधारा के रूप में व्यापक विस्तार दिया। हम उसी को योगी के रूप में जीवन जीने की कला का शिक्षण, वे अपने जीवन से, वाणी से एवं लेखनी से सतत् देते रहे एवं आज उनके साहित्य का स्वाध्याय कर हम उस शिक्षण को हस्तामलकवत सामने पा सकते हैं।
‘योग’ व ‘योगा’ दो ऐसे शब्द है, जिनके विषय में सर्वाधिक भ्रांतिपूर्ण मान्यताएँ प्रचलित है। राजयोग व हठयोग, क्रियायोग व ध्यानयोग आदि सभी विधियाँ यदि सही रूप में समझ ली जाएँ तो अपभ्रंश हो गए ‘योगा ‘ की हममें से किसी को भी आवश्यकता न रहे। कुछ आँग्लभाषा का चमत्कार- कुछ पाश्चात्य ठप्पा, योग ‘योगा’ बनकर विदेश चला गया व आज की अशान्ति -तनाव भरे मानव के लिए एक संजीवनी बन गया। वापस आयातित होकर यह भरत आया तो ‘योगा’ ही बना रहा व आज भी इसे एक फैशन के रूप में-जिमेशियम के फिजिकल फिटनेस क्लब के घटक के विकृत रूप में देखा जा सकता हैं
शान्तिकुञ्ज गायत्रीतीर्थ एवं विवेकानन्द केन्द्र बैंगलोर के समन्वित प्रयासों से इस दिसम्बर माह में १३ से १८ तारीख तक प्री-कान्फ्रैन्स (पूर्व योग अधिवेशन) के रूप में तथा १९ व २० दिसम्बर की तारीखों में एक पूरे अन्तर्राष्ट्रीय अधिवेशन के रूप में रत में द्वितीय बार इस प्रकार समागम संपन्न होने जा रहा है, जिसमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के विद्वानों द्वारा योग के विभिन्न आयामों आयामों पर चर्चा होगी- शोध-प्रपत्र पढ़े जाएँगे एवं योग ओलम्पियाड के रूप में बच्चे को स्वस्थ-मेधावी बनाने के लिए एक ‘हिमालय’ नामक प्रतिस्पर्द्धा भी होगी। फिर इस तरह का समागम १९१६ के दिसम्बर माह में दिल्ली महरौली के साधना-अनुसंधान केन्द्र पर संपन्न हुआ था। अब यह गायत्री परिवार के मुख्यालय शान्तिकुञ्ज में बड़े विराट व्यापक रूप में संपन्न होने जा रहा हैं अभी तक भारत से बाहर के काफी विद्वज्जनों की इस संबंध में आने की स्वीकृतियाँ आ गयी है। एवं ऐसा लगता है कि अनूठे आयोजन में शीतऋतु के बावजूद अच्छा -खासा समागम हो सकेगा। शिविर में भाग लेने वाले योगसाधकों, प्रशिक्षकों के ठहरने की व्यवस्था शान्तिकुञ्ज में ही की गयी है। अमेरिका, ब्राजील, कनाडा, जापान, इजराइल, हंगरी, इटली, यू.के. आस्ट्रेलिया, अर्जेन्टीना, रूस व दक्षिण अमेरिका आदि देशों से काफी प्रतिभागी इसमें आ रहे है। निश्चित ही यह समागम विश्वसंस्कृति के स्वरूप को परिलक्षित करेगा।
१३ से १८ दिसम्बर, १९९८ की तारीखों में हो रही प्री–कान्फ्रैन्स में ५ ट्रैक में कार्यक्रम विभाजित किए गए है। प्रथम ट्रैक (आयाम ) में बच्चों के लिए व्यक्तित्व परिष्कार प्रशिक्षण का क्रम चलेगा एवं साथ -ही साथ योग शिक्षकों के प्रशिक्षण का क्रम भी चलेगा। द्वितीय ट्रैक में क्वान्टम भौतिकी-अनेकत्व में एकत्व के सिद्धान्त एवं उपनिषद् व चेतना विज्ञान पर चर्चा होगी। तीसरे ट्रैक में योग चिकित्सा उपचार के शिविर चलेंगे। जिनमें योग शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। चौथे ट्रैक में व्यक्ति की प्रबंधन क्षमता द्वारा तनाव चिकित्सा (एस एम ई टी) पर दिन भर प्रशिक्षण चलेगा-साथ-ही-साथ होलिस्टिक मैनेजमेण्ट पर भी चर्चा का क्रम होगा, पाँचवें ट्रैक में योग क्षेत्र में अनुसंधान की विभिन्न धाराओं पर चर्चा होगी। पाँचों ट्रैक विभिन्न हॉलों में साथ-साथ चलेंगे। प्रातः ४ बजे जागरण से दिनचर्या का जारी होगा एवं ९.३० बजे शयन के साथ समापन। प्री-कान्फ्रैन्स का उद्घाटन १३ दिसम्बर रविवार को प्रातः ९.३० पर होगा एवं इसमें उपर्युक्त टैक्स के साथ प्राणिक ऊर्जा संचार, शब्दब्रह्म से ध्यानयोग सिद्धि, उच्चस्तरीय योगाभ्यास आदि के प्रशिक्षण भी निष्णात व योगप्रशिक्षकों के माध्यम से दिये जाएँगे।
इसमें विद्यार्थियों से लेकर बड़ों तक सभी को भाग लेने हेतु आमंत्रित किया जा रहा है। चूँकि अधिक लोगों के प्री–कान्फ्रैन्स एवं मुख्य कान्फ्रैन्स में जो १९-२० दिसंबर को है, भाग लेने की संभावना है- स्थानों को पूर्व से ही आरक्षित करने की व्यवस्था की गयी है। इस अवधि में पूरा आश्रम इसी शिविर के लिए आरक्षित रहेगा। आस-पास के स्थानों में भी आरक्षण किया जा रहा है। पूर्ण जानकारी के लिए एक दिसम्बर का प्रज्ञा अभियान पाक्षिक सभी पढ़ ले। ब्रोशर्स व पोस्टर्स भी शान्तिकुञ्ज से मँगा लें। फार्म भरकर पंजीकरण करा ले। यह प्रशिक्षण उच्चस्तरीय होने के कारण इसमें इस विधा से परिचित परिजनों को ही आवेदन भेजने हेतु कह जा रहा है। आसपास के पाँच जिलों के विद्यार्थियों को भी दक्षिण भारत के आने वाले विद्यार्थियों के साथ ‘हिमालय’ योग ओलम्पियाड में भाग लेने हेतु आमंत्रित किया गया है। संभव है अगले दिनों स्थान बड़ा होने पर यही क्रम में दो बार बड़े स्तर पर आयोजित हो। इसके अतिरिक्त एक अतिरिक्त आकर्षण बैंगलोर की एक कला संस्था द्वारा 'उत्तिष्ठत जागृत’ नामक नृत्यनाटिका होगी। निश्चित ही हिमालय के द्वारा द्वार पर आयोजित इस महाअधिवेशन के फलदायी परिणाम उत्तर-दक्षिण समन्वय के साथ विश्वसंस्कृति की योगसाधना की धुरी पर केन्द्रित होने के रूप में सामने आयेंगे।
*समाप्त*