वसन्त में परिवर्तन के प्रवाह की मर्मर ध्वनि सुनायी देती है। एक गहन-गम्भीर अन्तर्नाद गूँजता है। इसकी छुअन भर से समूची प्रकृति अपने सड़े-गले, जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों को उतारकर, वासन्ती परिधान पहनकर सजने–सँवरने लगती है। परिवर्तन का यह वासन्ती प्रवाह पतझड़ को रंग−बिरंगी कोयलों एवं सुरभित-सुगन्धित फूलों में बदल देता है। कँपकपा के महापर्व का गौरव दिया है
युगपरिवर्तन के वासंती प्रवाह का रहस्यमय उद्गम तक हुआ, जब परमपूज्य गुरुदेव को उनके गुरु ने भागीरथी तपश्चर्या का उद्बोधन, आह्वान प्रस्तुत किया ओर उस निर्देश को शिरोधार्य करने के लिए गुरुदेव तत्क्षण उद्यत हो गए। वे एकनिष्ठ भाव से समग्र श्रद्धा नियोजित करके युगपरिवर्तन के प्रवाह को जगती पर लाने के लिए उसी प्रकार तत्पर रहे, जिस प्रकार गंगाप्रवाह के अवतरण का लक्ष्य बनाने जैसा था। जिसके आधार पर उन्हें महत्वपूर्ण क्षमताएँ, प्रतिभाएँ, बल्कि मानवीय जीवन के हर पहलू को आमूल-चूल बदल डालने के लिए उतारू है। यही कारण है कि इनसानी जिन्दगी के हर छोर पर दरकन और दरारें पड़ चुकी है। सब तरफ पुरानेपन के ध्वंस और महानाश की चीत्कारों ओर हाहाकार की आर्ज गूँज हैं। पर इसी के साथ नवसृजन की कोमल किलकारियाँ है एवं नवचेतना के अंकुरण का मधुर संगीत भी है, ये स्वर अभी कितने ही मन्द क्यों न हों, किन्तु जिनके पास तनिक-सा भी अन्तर्ज्ञान है, वे इन्हें समझ सकते हैं।
राजनैतिक एवं आर्थिक क्षेत्रों की संकटग्रस्त स्थिति की चर्चा सर्वत्र है, पर प्राकृतिक, सामाजिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विपदाएँ ही कहाँ कम हैं? सच तो यह है कि हर तरफ पुरानापन टूटकर नवसृजन हो रहा है। अकेला व्यक्ति या कोई एक परिवार अथवा फिर कोई एक देश या समाज नहीं, बल्कि पूरा का पूरा युग परिवर्तित हो रहा है। अकेला व्यक्ति या कोई एक परिवार अथवा फिर कोई एक देश या समाज नहीं, बल्कि पूरे याग परिवर्तित हो रहा है। इस युगपरिवर्तन के अनेक पहलू हैं, अगणित, अत्याम है और साथ ही हैं, इसके विविध मोर्चों पर जुझारू संघर्ष के लिए समर्थ युगसैनिकों के लिए वीरोचित आह्वान।
आह्वान के ये स्वर ही इस युगपरिवर्तन अंक में शब्दों में पिरोए गए हैं। युगपरिवर्तन के विविध पहलुओं, विभिन्न आयामों को उजागर करता हुआ यह अंक युगसैनिकों के लिए आमंत्रण पत्रिका है। उनके लिए आने वाले तीन वर्षों के लिए जीवन-नीति का स्पष्टीकरण है। यह संदेश। आमंत्रण!! आह्वान!!! शब्दों की सतह पर नहीं, भावों की गहराइयोँ में ही सुना और समझा जा सकता है।
इसे धारण करने के लिए हम सावधान हो जाएँ युगपरिवर्तन का वासन्ती प्रवाह हम तक पहुँचे यह कामना करते हुए बैठे न रहें वह तो सदा से समर्थ है और अपना काम करेगा ही। हम तो कामना करें इस प्रवाह हम तक पहुँचे यह कामना करते हुए बैठे न रहे। वह तो सदा से समर्थ है और अपना काम करेगा ही। हम तो कामना करें इस प्रवाह की वासंती ज्वाला की, वासंती शौर्य के शोलों की जिसके तेज से अनीति एवं अवांछनीयताएं जलकर भस्म हो जाएँ। युगपरिवर्तन की प्रक्रिया पूरी हो और नवयुग मुसकरा उठे।
खण्डहरों ने देखने वालों के मनों में अगणित भाव उकेर दिए। प्रायः सभी के हृदय में स्पन्दन तीव्र हो उसके। एक से रहा न गया। वह बोल उठा- अपने देश की भी तो यही दशा है। अतीत के गौरव के खण्डहर ही तो अब शेष हैं। कहने वाले के स्वर में क्षोभ था, पीड़ा थी और थी कुछ सार्थक कर गुजरने की व्याकुलता। उसकी ओर उसके साथियों की बातें सुनकर उनके अधरों पर हल्का-सा स्मित झलका। अभी कुछ ही दिनों पहले उनका मद्रास आना हुआ था न जाने कैसे इन सबको उनका पता चल गया। फिर तो जैसे-तैसे उन्हें राजी कर लिया अपनी ‘त्रिपलीकेन साहित्य सभा’ में उद्बोधन देने हेतु। उनके द्वारा दिए गए उद्बोधन का प्रत्येक शब्द सुनने वालों के दिलों का प्रत्येक शब्द सुनने वालों के दिलों में गहरे उतरता चला गया। जिसने सुना वही आश्चर्य एवं आशा से पूरित हो गया। सभी में एक नयी चेतना जाग उठी। सभी में एक नयी चेतना जाग उठी। सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक, आध्यात्मिक विषयों की इतनी सारगर्भित, सरल एवं मर्म स्पर्शी विवेचनाएँ भला और कहाँ सुनने को मिलतीं। संस्कृत-अंग्रेजी की मिली-जुली काव्यात्मक भाषा सुनकर सभी अकल्पनीय मनोदशा में तैरने लगें।
उस दिन से आज तक ये सभी उनके साथ थे। सबके हृदय में गहरी टीस थे। सबके हृदय में गहरी टीस थी अपने महादेश के प्रति। सभी भारतमाता के अतीत के गौरव को वापस लाना चाहते थे। किन्तु कैसे? ये सब तो जैसे विशाल महासागर में बैठे उन यात्रियों की तरह थे, जिन्हें गन्तव्य का तो पता था, पर मार्ग एवं केवट के अभाव की बेचैनी उन्हें विकल कर रही थी। इन्हें पाकर लगा, यही तो है, जिसकी उन्हें पाकर लगा, यही तो हैं, जिसकी उन्हें तलाश थी। उन्हें लेकर आज ये सब महाबलीपुरम आए थे। एक ओर थे पाण्ड्य एवं चोल राजाओं द्वारा बनाए गए वास्तुकला के अद्भुत नमूने, जो कला-प्रवाह के थपेड़ों से जराजीर्ण हो रहे थे। दूसरी ओर था विशाल महासागर, जिसके गर्भ से सूर्य उदित हो रहा था। ठीक मानव-जाति के सौभाग्य सूर्य जैसा। रश्मियों से जलराशि स्वर्णिम हो उठी थी। महासागर अपने स्वर्णिम जलकणों को लहरों की अंजलि बनाकर इन देवपुरुषों के चरणों में अर्पित कर धन्य हो रहा था।
स्नेह से अपने शिष्य के कंधे पर हाथ रखते हुए बोले-निराश मत हो आलसिंगा। एक दिन इन्हीं खंडहरों से वहां सौंदर्य प्रकट होगा, जिसे देखकर विश्व की आँखें चौंधिया जाएँगी। वर्तमान दशा के कारण ीरत पर कटाक्ष ओर व्यंग्य रूप को देखकर दाँतों तले उँगली दबा लेगा। आत्मविश्वास भरे इस कथन पर वह आश्चर्यचकित था। प्रायः सभी की यही दशा थी।
एक इशारे से उन्होंने सभी को और पास बुलाया और सबके साथ नजदीक पड़ी एक पत्थर की शिला पन बैठ गए। स्वामीजी! एक अन्य नवयुवक पाषाण खण्ड पर बैठते हुए कहने लगा- मैं आपकी बातों पर अविश्वास तो नहीं करता, किन्तु...............?
शान्त हो सुनो! इन शब्दों ने जादुई असर किया। सबके सब निस्पन्द हो उनका वाणी की प्रतीक्षा करने लगे। उन्होंने अपने अर्द्वोन्ममिलित नेत्रों को पसार कर एक गहरी दृष्टि सब पर डाली। उनकी आँखों से निकलती नीली लहरें सभी को एक अनजाने देश में ले जाने लगीं। वे कह रहे थे, आज मैं तुम सबके सामने एक रहस्य उद्घाटित करता हूँ। वह रहस्य! जो कठोर साधनाओं के द्वारा मेरे अन्तराल में उतरा है। वह रहस्य! जिसे हिमालय की ऋषिसत्ताओं ने मेरे समझ उद्घाटित किया है।
युगपरिवर्तन होने को है। वर्तमान युग के स्थान पर सतयुग की प्रतिष्ठापना होगी। विश्व की प्राणशक्ति अकुलाकर जाग रही है। विश्व-कुण्डलिनी के इस जागरण को केन्द्र बनेगा। भारत! ऋषियों की चिरपुरातन गौरवभूमि पुनः जगतगुरु का मुकुट पहनेगी। आवाज किन्हीं अतल गहराइयों से उभर रही थी। वह महाकाल की महत्चेतना से एकात्म हो बोल रहे थे। निस्तब्धता स्वरों को धारण कर रही थी।
वह कह रहे थे, युगपरिवर्तन व्यक्ति, जाति, प्रशासन अथवा किसी देश का नहीं, स्वयं महेश्वर महाकाल की योजना है। उसी सृजेता का संकल्प है, जिसके संकेत मात्र से निहारिकाओं की सृष्टि होती है। सैकड़ों, लाखों, करोड़ों ब्रह्माण्डों का उदय और अवसान होता चरण में उपयुक्त समय पर एक शक्तिपुंज महामानव सामने आएगा और तब सभी चूहे जो आज दबे-दबे दिखाई देते है, साहसी बन जाएँगे।
शब्द सभी की रगों में लहू के साथ दौड़ने लगे। रोमांच का अनुभव होने लगा सबको। उनकी शब्द-सरिता प्रवाहमान थी, जब कभी कोई महापुरुष आता है, तो परिस्थितियाँ पहले उसके पैरों के नीचे तैयार रहती हैं। वह ऊँट की पीठ को तोड़ देने वाले बोझ का अन्तिम तृण साबित होगा। हम उसके लिए भूमि तैयार कर रहे हैं।
सतयुग की वापसी ईश्वर की योजना है। हमें उसके लिए भूमि तैयार करनी है मेरे बच्चो! सभी जैसे सोते से जगे। चेतना के अतल सागर से सभी के मन एक−एक करके उबरने लगे। थोड़े क्षण के लिए सभी मूक हो गए।
भूति की तैयादी? पर किस तरह? कई कण्ठों से आतुरवाणी निकली।
यह एक दिन का काम नहीं, इक्कीसवीं सदी ही मानवता के उज्ज्वल भविष्य का उद्घोष करेगी। तभी सतयुग साकार होगा। पथ हर कदम पर शूलों से भरा है, परन्तु भय क्या? हम स्वयं काल के भी काल महेश्वर महाकाल के सहचर हैं। उनका नाम लेकर, उन पर अनन्त विश्वास रखकर भारत के युगों से संचित पर्वतकाय अनन्त दुःख राशि में आग लगा दो। उल्लसित युवक गैरिक परिधान से आवेष्ठित महाकाल के अग्रदूत स्वामी विवेकानन्द की जय पुकार उठे। सभी की अंतर्चेतना युगपरिवर्तन को सुनिश्चित जान पुलकित हो उठी।
युगपरिवर्तन की प्रक्रिया में हिमालय से ऊँची तप-साधना एवं सागर से भी गहरे दैवीरहस्य समाए हैं। इसका संचालन किसी सामान्य व्यक्ति या शक्ति के बस की बात नहीं। व्यक्ति के प्रयासों की सीमा है। सामान्यक्रम में उसे अपने ही जीवन को शुभ और आनन्द से भरा पूरा करना दुष्कर, दूभर लगता है। प्रकृति की शक्तियां भी छोटे-मोटे परिवर्तन, गति परिवर्तन, गति, लय-उभार करने में ही यदि सवाल स्वयं प्रकृति को बदलने का हो, मनुष्य को बदल डालने की आवश्यकता जब अनिवार्य समझी जाने, लगे, समूचा जीवनक्रम एक नए ढाँचे में बदलने के लिए आकुल-आतुर हो उठा हो, तब इसे कौन करे?
निराश के इस घोर-घने अँधेरे में आशा की लाल-मशाल बनकर पुनः उसी को संकल्पित होना पड़ा, जिसने कभी ‘एकोऽहम् बहुस्याम् का संकल्प पूरा किया था। जो प्रकृति एवं उसकी शक्ति का नियन्ता है। काल के गतिमान चक्र का अधीश्वर महाकाल है। मानव समाज के प्रत्येक बड़े कार्य एवं सृष्टि की व्यापक फेरबदल में वह स्वयं सूत्र संचालक का दायित्व सँभालता आया है। इसे ही पश्चिम के मनीषी ‘ट्साइट गाइस्ट’ और पूर्वी तत्वेत्ता ‘महाकाल’ के नाम से सम्बोधित करते है। यह नाम है। ही गम्भीर अर्थ से परिपूर्ण।सड़ी-गली मान्यताओं, रूढ़ियों, कुरीतियों से खण्डहर हो चुकी सामाजिक संरचना को मटियामेट कर उसके स्थान पर नूतन सृजन करने वाली महाशक्ति का उद्गम स्रोत यही है। महाकाल के अपने हाथों में बागडोर थामते ही संसार की समस्त शक्तियाँ एकजुट होकर उसके संकल्प की पूर्ति हेतु संलग्न हो जाती है। अध्यात्म के ध्रुवकेन्द्र देवात्मा हिमालय के ऋषि तपस्वियों की तप-साधना इसी महत् संकल्प को पूरा करने में नियोजित हो जाती है, फिर चाहे मनुष्य सहायता दे अथवा प्रतिरोध करे, किन्तु उसका काम रुकता नहीं, जब तक संकल्प पूरा न हो जाए। हाँ होशोहवासपूर्वक सहयोग करने वाले युगशिल्पी एवं युगनायक का गौरव अनायास पा लेते हैं
इतिहास के इन क्षणों में पुनः एक बार भगवान महाकाल का संकल्प गूँजा है। ठीक वे ही स्वर जो कुरुक्षेत्र में सुनायी दिए थे- “मैं महाकाल हूँ। खण्डहर हो चुके लोकों को उजाड़ कर, नष्ट कर नवसृजन करता हूँ। देखो, मैं पूरी शक्ति के साथ उठ खड़ा हुआ हूँ। वे योद्धा जी विरोध सैन्यदलों में व्यूह बाँधे खड़े हुए है, तेरे बिना भी नहीं बचे रहेंगे। इसलिए तू उठा खड़ा हो और महान यश का लाभ कर, क्योंकि सब कुछ पहले ही मेरे द्वारा किया जा चुका है, केवल निमित्त मात्र बन सव्यसचिन् “ (गीता-अध्याय 11, श्लोक 32-33)।
हवा की प्रत्येक साँस से, सृष्टि के प्रत्येक स्पन्दन से उठ रही इस धरती की नन्दन-कानन बनने के लिए है। महाकाल स्वयं को दो रूपों में प्रकट करते हैं। अपने पहले रूप में वे रुद्र होते हैं और दूसरे में शिव। रुद्र होते है और दूसरे में शिव। रुद्र की विनाशलीला शिव के सृजन के लिए शुरुआत से आज तक हुई घटनाओं का सरसरी से आज तक हुई घटनाओं का सरसरी नजर से जायजा लें, तो महारुद्र का माण्डव नर्तन समझा जा सकेगा। शुरुआत से लेकर लगभग आधी सदी तक मानव जाति दो महायुद्धों की तैयारियाँ करने और विनाश के ज्वालामुखी को भड़काने में जुटी रही। जर्मनी के तहखानों का लहू अभी तक सुखा नहीं था कि को कोरिया युद्ध की लपटों से घिर गया। एक के बाद एक कम्बोडिया, वियतनाम, बोस्निया, ईरान, ईराक जैसे अनेकों ने महारुद्र की विनाशलीला में अपनी भागीदारी निभाई। जी. विलकिन की पुस्तक ‘ह्यूमन रेस इन ट्वेन्टियथ सेंचुरी’ के अनुसार इस सदी में लगभग दो सौ छोटे-बड़े युद्ध लड़े गए। धरती पर कोई ऐसी जगह नहीं बची, जिसे महारुद्र के चरणों ने प्रकम्पित न किया हो। इस प्रकम्पन से न जाने कितने राममुकुट भू-लुँठित हुए, इक्के–दुक्के जो बचे हैं वे भी अपने अवसान की तैयारी कर रहे है। जिनके राज्य में कभी सूर्य नहीं अस्त होता था, वे ही अब कोने में सिमटते जा रहे है।
बात युद्धों की नहीं है। मान्यताएँ, नीतियाँ, प्रणालियाँ बनी और वहीं। नाजीवाद, फासीवाद धूमकेतु की तरह उल्टा होकर काल के प्रचण्ड झोंकों में बह गया। साम्यवाद के वितान फैले और सिमटने लगें। साम्यवाद के वितान फैले और सिमटने लगें। हीगल, मार्क्स एंगल्स गुजरे जमाने की चीजें होती जा रही हैं। जिनकी पूजा होती थी, उनके बुत टूटने लगें हिटलर, कावूर, नेपोलियन के व्यक्तित्व व कर्तृत्व दोनों तिरस्कृत हो काल के किसी कोने में जा पड़े है।
ऐसे में प्रकृति भला पीछे क्यों रहती? उसने भूकम्प, सूखा, बाढ़ जैसे पुराने युग के हथियारों के साथ ही ग्रीनहाउस प्रभाव, ओजोन की छतरी को फाड़ना, खनिज सम्पदाओं की रिक्तता, हवा, पानी की विषाक्तता जैसे अनेकों सिहरन पैदा कर दी। सदी के अन्तिम दशक में प्रवेश करते-करते धरती के ख्यातिनामा वैज्ञानिक, चिन्तक, समाज के कर्णधार चीत्कार कर उठे अब हम धरती को नहीं बचा सकते, महाप्रलय आने ही वाला है।
किन्तु कहाँ? बीत चली कालरात्रि का ब्रह्ममुहूर्त आते-आते रुद्र के क्रिया–कलापों में शिवत्व झलकने लगा है। भले ही अभी यह सबको स्पष्ट न ही रहा हों, किन्तु ऐसा कुछ घट रहा है, जो ‘ह्यूमन साइकिल’ नामक’ अपने ख्यातिनामा ग्रन्थ में इसे स्पष्ट करते हुए श्री अरविन्द कहते है, “दक्षिणेश्वर में जो काम शुरू हुआ था, वह पूरा होना बाकी है। सामान्यजन तो इसे समझ भी नहीं सके हैं। स्वामी विवेकानन्द ने जो कुछ प्राप्त किया, जिसे अभिवर्धित करने का प्रयत्न किया, वह अभी तक मूर्त कहाँ हुआ है? विजय गोस्वामी ने भविष्य के जिस सत्व को निगूढ़ रखा, वह उनके शिष्य तक नहीं जान पाए और अब अधिक उन्मुक्त ईश्वरीय प्रकाश की तैयारी हो रही है, अधिक ठोस शक्ति प्रकट होने की है। यह कार्य युग परिवर्तन की प्रक्रिया ही है।
किन्तु सदी के अन्तिम दशक के इन अन्तिम वर्षों में जैसे-जैसे ब्रह्ममुहूर्त की घड़ियाँ अरुणोदय की और बढ़ रही हैं, विनाश के आवरण को ढके सृजन स्पष्टतर होने लगा है। आज के जमाने में इसका एक सुस्पष्ट चिह्न है, उन दुनिया के हर कोने में अँगड़ाइयाँ ले रही जन-चेतना। उसे सिर्फ व्यवस्था को बदल डालने मात्र से संतुष्टि नहीं है। वह स्वयं में, समूचे समाज में एक मौलिक परिवर्तन करना चाहती है। महायोगी श्री अरविन्द का संकेत भी इसी ओर है।
अब तक हो चुके परिवर्तनों के इतिहास के पन्ने पलटें, उनके प्रभावी कारणों की ओर देखें, तो यही लगता है। कि सारी फेरबदल राजनैतिक, आर्थिक, भौगोलिक, जैविक जनसंख्यात्मक और साँस्कृतिक कारणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। यद्यपि ऊपर से न दिखते हुए भी इनका किसी न किसी प्रकार मनोवैज्ञानिक कारणों से सम्बन्ध रहा है, किन्तु सामान्यक्रम में राजनैतिक कारण ही प्रधान समझे जाते रहे है। ‘व्यवस्था से कष्ट हो रहा है, व्यवस्था बदल दो।’ यही नीति प्रभावी रही है। राजतन्त्र नहीं तो अधिनायकवाद या फिर साम्यवाद, प्रजातन्त्र अथवा समाजवाद। बदलाव के बाद भी उद्देश्य कोसों दूर रहा। प्रिंस क्रोपाटिकिन का’ क्रान्ति की भावना’ में मानना है कि परिवर्तन करने वाले जब शासन-व्यवस्था सँभाल लेते है, तो कुछ ही समय बाद सारी समस्याएँ फिर से ज्यों-की त्यों खड़ी दिखाई देती है। फ्राँस की राज्यक्रान्ति में इसी की झलक देखी गयीं। फ्राँस ही व्यवस्था तो बदली, परन्तु स्थिति अभी तक समस्या-संकुल बनी हुई है।
ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि व्यवस्था से कही अधिक दोषी वह समाज रहा, जिसने व्यक्ति को सही ढंग से गढ़ा नहीं। समस्त विसंगतियों, दुरावस्थाओं का मूल कारण समाज की जीवनीशक्ति कहे जाने वाले उस वर्ग का अभाव रहा, जिस पर व्यक्ति को गढ़ने, तराशने की जिम्मेदारी थी। इसके अतिरिक्त प्रथाएँ, परम्पराएँ, रीतियाँ, रिवाज, मान्यताएँ, मूल्य और प्रतिमान यही मिलकर वह साँचा बनाते हैं, जिसमें व्यक्ति ढलता है। और आज वह इतना जर्जर हो अपनी उपयोगिता खो बैठा कि इसमें उस इनसान को गढ़ने को ताकत नहीं रही, जो नए समय के अनुरूप नए आदमी तैयार कर सके। ऐसी दशा में आवश्यक हो गया है कि यह सभी परिवर्तन हो, जिससे कि मनुष्य सुधर-सँवर सके।
हालांकि इनसान का मोह इन्हें हर हाल में अपने से चिपटाए रखना चाहता है। इसी वजह से युगपरिवर्तन के लिए संकल्पित महाकाल ने आन्तरिक एवं बाह्य ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं, जिनके दबाव में आकर कोयले को हीरा बनना ही पड़े। सी ढंग से सांचा जाय तो यह भी एक अनुग्रह है, जिसकी वजह से हम सबको पुरानी सड़ी-गली केंचुल उतारकर सर्वथा नवीन सौंदर्य प्रकट करने का अवसर मिल रहा है। रिकाँस्ट्रक्शन ऑफ ह्यूमेनिटी के रचनाकार सुविख्यात मनीषी पी.ए. सोरोविन का स्पष्ट मानना है, इस बार के परिवर्तन पिछली फेरबदल से कही अधिक चिरस्थायी और उपयोगी रहेंगे। उनके अनुसार, इस बार हो रहे परिवर्तन, प्रत्यावर्तन में राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक परिवर्तनों के साथ मानवी अन्तःकरण में भी भारी फेर बदल हुए बिना न रहेगी।
मनुष्य ने देवत्व-मानव की नियति है। शायद इसी वजह से महाकाल की संकल्पशक्ति के लिए, बल्कि अपनी सोच बदलने के लिए विवश है जो अभी तक अड़े हुए हैं, उनका नष्ट होना एक अनिवार्य सत्य बन चुका है। सभी विवेकीजनों को स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि व्यवस्था बदलने भर से पर्यावरण-संकट, प्राकृतिक असंतुलन सुधरने वाला नहीं है। उसके लिए तो हमें ही बदलना होगा। सत्य भी यही है असन्तुलित प्रकृति नहीं बल्कि असन्तुलित तो स्वयं मनुष्य है। प्रकृति तो अपने नियन्ता परमपुरुष भगवान महाकाल के संकेतों के अनुसार इनसान को सुधारने के लिए सक्रिय भर हुई है।
महाकाल के उस महान संकल्प के क्रियान्वयन का केन्द्र है व्यक्ति और परिधि है-समाज। दिव्यदर्शियों की दृष्टि में इस सृजनात्मिका शक्ति की धुरी के रूप में मातृभूमि को चुना गया है। तीन चरणों वाली इस संकल्पित योजना का पहला चरण है, व्यक्ति की सोच को उलटना।
संकल्पित योजना के दूसरे चरण में रीतियों, मूल्यों, प्रथा-परम्पराओं में व्यापक स्तर की फेर-बदल7 होगी धर्म और धार्मिकता का नए सिरे से मूल्याँकन होगा। हर कोई यह समझ सकेगा कि धर्म का अर्थ साम्प्रदायिक कट्टरता या मन्दिर, मस्जिद के झगड़ों नहीं है। वरन् यह व पारसमणि है जिसका स्पर्श पाकर क्रूरकर्मा अंगुलिमाल महाभिक्षुक बन सका। आज की परम्पराओं, प्रथाओं की कतर–व्यौंतकर वे ही नीतियाँ रची जाएँगी जो समूची वसुधा को आत्मीय भावनाओं के सूत्र में पिरोकर एक कुटुम्ब का रूप दे सकें। महाकाल के महासंकल्प के रूप में संचालित युगपरिवर्तन प्रक्रिया का अन्तिम चरण है समाज। जिसने अभी बीहड़-वियावान जंगल का रूप ले रखा है। जहाँ उत्कृष्ट चिंतन, मृदुल व्यवहार एवं उत्तम चरित्र कभी किसी बिरले भाग्यशाली को ही दिखाई पड़ते है। वही समाज युगपरिवर्तन प्रक्रिया के द्वारा अपना स्वरूप बदलकर ऋषि-मनीषियों का आरण्यक बन जाएगा। इक्कीसवीं सदी में समाज ऐसी पाठशाला का रूप ले लेगा, जहाँ आदमी सोचना, जीना एवं व्यवहार करना सीख सके।
अपना लीला-पार्षद बनाने के लिए उन्होंने हम सबसे साहस भरा कदम उठाने को आह्वान किया है। परवाह नहीं यदि हम शक्तिहीन है,, पुराने समाज ने हमें नीचा और नगण्य माना है। जिन्हें भी अति प्रबल परिवर्तन का आदेश प्राप्त होता है, वे स्वयं महाकाल की अनन्त शक्ति से ओत-प्रोत हो जाते हैं। हम क्या हैं, कैसे हैं, भूलकर जैसे भी हैं? भगवान महाकाल के संकल्पपूर्ति के अन्तिम चरण में अपनी भूमिका निभाने के लिए तत्पर हैं। वर्तमान सदी के इस अन्तिम दो वर्षों में ऐसा सौंप जाएगी, जिसके गौरव से हम अनेक जन्मों तक पुलकित, प्रफुल्लित होते रहेंगे।
युगपरिवर्तन का अर्थ है-आमूल चूल परिवर्तन। छोटे-मोटे सुधारों और सामान्य परिवर्तनों से जब बात न बने तो पूरे युग का ही बदलाव जरूरी हो जाता है। पिछले दिनों छुट-पुट सुधारों का सिलसिला काफी चलता रहा है। साम्यवादी काफी चलता रहा है। साम्यवादी आन्दोलन ने अपने शुरुआती दौर में यह घोषणा बहुत जोरों से की थी कि संसार की समस्त कठिनाइयों को हम मिटा देंगे। उनका कहना था कि सारी परेशानियों की जड़ धन की कमी है। धन बढ़ेगा तो सारी कठिनाइयाँ भी स्वतः समाप्त हो जाएँगी। इसके लिए अधिक उत्पादन पर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था, उतना नहीं दिया गया, वरन् धनियों को गरीबी का कारण ठहराकर वर्गसंघर्ष खड़ा कर दिया गया। इस वर्गसंघर्ष ने दुनिया में जो मार-काट मचाई, खून-खराबियाँ, अशान्ति फैलाई, वह जगविदित है।
पूँजीवादी क्षेत्रों में भी दुनिया की परेशानियों-कठिनाइयों के निवारण के लिए प्रयत्न कम नहीं किए गए। विज्ञान और वैज्ञानिकों ने इस निमित्त न केवल अनेकानेक आविष्कार किए, बल्कि वैभव और समृद्धि के लिए ढेरों नए आधार विनिर्मित किए। इसमें सफलता भी कम नहीं मिली। पूर्वजों की तुलना में अपनी पीढ़ी कही अधिक समृद्ध है। सुविधा-साधनों की दृष्टि से इन समय की पीढ़ी के लोग इतने सौभाग्यशाली है, जितने सृष्टि के आरम्भ से लेकर अपनी शताब्दी के मध्यकाल में कभी नहीं रहे। यह बात अलग है कि इन सुविधा साधनों के संचय की ललक और उपभोग की लिप्सा की वजह से गरीबी अभी तक दूर नहीं हुई।
बढ़ते हुए मनोरोग और अपराध यह बताते है कि बढ़ा हुआ वैभव भी व्यक्ति को सुखी और समुन्नत बनाने में कुछ अधिक कारगर सिद्ध नहीं हो पा रहा है। हाँ, इस वैभव को अनुदिन बढ़ाने में प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन एवं पारिवारिक स्नेह, सौजन्य, सहयोग, सौहार्द घटते-घटते समाप्ति के बिन्दू तक जा पहुँचा है। एक बाड़े में रहने वाली भेड़ों की तरह कुटुंबों में कई व्यक्ति रहते तो है, पर एक-दूसरे पर प्यार और सहयोग उड़ेलने का स्थान पर अपनी-अपनी गोटी बिठाने में लगे रहते हैं। अधिकार की माँग है और कर्त्तव्य की उपेक्षा। फलतः परिवार-संस्था का टूटना-बिखरना इस सदी की सबसे बड़ी त्रासदी बन गयी है। पति-पत्नी का रिश्ता एक प्राण दो देह माना जाता है। किन्तु लगता है वे आदर्श समाप्त हो गए। यौनलिप्सा ही वह आधार रह गया है, जिसकी वजह से दोनों एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं। इसी प्रसंग में बच्चे आ सकते हैं और उनके प्रति जो प्रकृति प्रदत्त माया-मोह होता है उस सूत्र से भी पति-पत्नी किसी प्रकार बँधे रहते हैं। यदि यौन-आकर्षण और बालकों का मोह हटा लिया जाय तो सहज सौजन्य से प्रेरित भाव-भरा दाम्पत्य जीवन कदाचित ही कहीं दृष्टिगोचर होता होगा। गृहस्थ जीवन का भावनात्मक आनन्द उच्चस्तरीय होता है, इसकी अनुभूति ही नहीं, कल्पना भी वर्तमान युग के लोगों के हाथ से छिनती जा रही है।
यही हाल समाज का है। समाज व्यवस्था का ढाँचा ऊपर से तो किसी प्रकार कागज से बने विशालकाय पुतले की तरह खड़ा है, पर उसके भीतर खोखलेपन के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं। संबंधियों के बीच किस प्रकार बुनने–उधेड़ने की दुरभिसन्धियाँ चलती है, उसे विवाह-शादियों में होने वाले लेन-देन को देखकर भलीप्रकार समझा जा सकता है भ्रष्टाचार, नशेबाजी फैशनपरस्ती, विलासिता,धूर्तता, उच्छृंखलता जैसे प्रचलन सभ्यता के अंग बन चुके हैं। यों कहने को तो अपने समय को तर्क और बुद्धि का युग कहा जाता है, पर अन्धविश्वासों और कुरीतियों को जितने उत्साह से इन दिनों अपनाया जा रहा है, उतना शायद पिछले दिनों के उस समय में भी न रहा हो, जिसे हम अनगढ़, आदिमकाल कहते हैं। ढोंगी, बाजीगरी, जादूटोनों ने आध्यात्म को जिस तरह ग्रस लिया है, उसे देखते हुए लगता है विवेक के अरुणोदय को लाने के लिए एक और भगीरथ तप जैसे प्रचंड पुरुषार्थ की आवश्यकता हैं।
सामूहिक जीवन में शासनतन्त्र की प्रधानता है, पर अब तो सरकारें आया राम, गया राम हो गयी हैं। राजनैतिक अस्थिरता के इस युग में शासन प्रमुख का सारा समय अपनी ही स्थिरता और कुशल की चिन्ता करते बीतता है, वह राष्ट्र की चिन्ता कब करे? जहाँ सरकारें स्थिर हैं भी, तो वे अपने संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति के लिए दूसरे देशों के प्रति जो रवैया अपनाती हैं, उससे शोषण, आधिपत्य, विग्रह और युद्ध का कुचक्र ही गतिशील होता है।
इन दिनों एक समस्या सुलझाते सुलझाते दस नयी समस्याएं खड़ी होती हैं। वर्तमान की विभीषिकाओं को परास्त करना इतना आसान नहीं है। एक गज जोड़ने के साथ-साथ दस गज टूटने का क्रम चल रहा है।
ऐसी दशा में समाधान एक ही है ‘युगपरिवर्तन’। प्रकृति, परिवेश, परिस्थितियां, प्रवृत्तियाँ, सामाजिक गतिविधियाँ, राजनैतिक संरचना, वैज्ञानिक एवं आर्थिक सोच को एक साथ, समूचे रूप से पूरी तरह बदल डालने का महाउपक्रम। हालाँकि यह कार्य सरल नहीं है और न ही मानवीय पुरुषार्थ से सम्भव, परन्तु जब मनुष्य का बाहुबल थक जाता है और पतन एवं विनाश की आशंका बलवती हो जाती है, तो प्रवाह उलटने का कार्य दैवीचेतना स्वयं करती है और एक बार फिर से मानव की अन्तः प्रकृति, बाह्य परिस्थितियों, सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक संरचनाओं के अनुसार स्वयं को तैयार करते है। समूची सृष्टि के साथ युगपरिवर्तन का मोहक राग छिड़ जाता है। जिसके हर स्वर, लय एवं ताल में उज्ज्वल भविष्य की गूँज को स्वयं में, प्रकृति एवं परिवेश में, जीवन के प्रत्येक कण में तीव्र से तीव्रतर होते हुए अनुभव किया जा सकता है। यही गूँज आज चारों ओर हर कहीं ध्वनित है- युगपरिवर्तन ही युग की नियति है। मानव की भवितव्यता है।
युगपरिवर्तन की अरुणिमा-आभा सबसे पहले चैतन्यलोक में घनीभूत होती है, बाद में परिवर्तन की ये सूक्ष्म तरंगें स्थूल जगत में विभिन्न घटनाक्रमों के रूप में आकार धरण करती है। भविष्यद्रष्टा महामानव अपनी अतीन्द्रिय क्षमताओं से परिवर्तन की इस आहट को महसूस करते है। उनकी यह अनुभूति भविष्यत् का शब्दचित्र बनकर मानवता के समक्ष प्रस्तुत होती है। ज्योतिर्विद् मनीषी भी काल परिवर्तन की इन्हीं आहटों का ब्यौरा अपनी गणितीय व्याख्या से प्रतिपादित करते है। आज भविष्यद्रष्टा दिव्यदर्शी हों या फिर कालगणना करने वाले ज्योतिषाचार्य, सभी युगपरिवर्तन की प्रक्रिया के तीव्र वेग से संचालित होने पर एकमत हैं। इन सभी के अनुसार इस परिवर्तन प्रक्रिया की परिणति धरती पर सतयुगी सम्भावना को साकार करके ही रहेगी। ये सभी मनीषी वर्तमान विप्लवी एवं भीषण हलचलों के पीछे उज्ज्वल भविष्य की स्वर्णिम छटा निहार रहे हैं। इनका अनुसार भारत फिर से चक्रवर्ती, जगद्गुरु बनेगा एवं विश्व का नेतृत्व करेगा,
अमेरिकन कम्प्यूटर ज्योतिर्विद् जॉन नेसविट एवं पैट्रिशय आवर्देन ने सन् 1982 में अनपीन कृति’ मेगाट्रण्ड्स’ में दस भविष्यवाणियों का संकलन प्रस्तुत किया था। इनके अनुसार सन् 2000 तक का समय समस्त संसार के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इन दौरान दुनिया के सभी देशों एवं मानवता के सभी क्षेत्रों में परिवर्तन की प्रक्रिया अपने तीव्रतम वेग में होगी। इस दौर के बाद इक्कीसवीं सदी में इनसानियत शीर्षतत बुलन्दियों को स्पर्श करेगी।
इनकी भविष्यवाणियों के अनुसार सन् 2000 के पूर्व महाविनाश का आतंक रह-रहकर मानवता को भयाक्रान्त करता रहेगा, परन्तु अन्ततः मानवीयता विजयी होगी सन् 2000 मानवता के इतिहास का स्वर्णकाल सिद्ध होगा। पूरे विश्व में परिवर्तन की आँधी उमड़ेगी यूरोप के देशों में योग, ध्यान तथा पुनर्जन्म पर आस्था एवं विश्वास की बढ़ोत्तरी असाधारण रूप से होगी। प्रत्येक देश भारत के मार्गदर्शन में अपने साँस्कृतिक मूल्यों का सृजन, संरक्षण एवं संवर्धन करेगा। राजनीति में सेवाभावी, चरित्रवान, एवं उच्चशिक्षित व्यक्तियों का पदार्पण होगा। हर क्षेत्र में महिलाएँ आगे आयेगी। महिलाओं का वर्चस्व बढ़ेगा। भारत सबसे समृद्ध देश के रूप में उभरकर आएगा।
ख्यातिनामा ज्योतिषाचार्य बेजान दारुवालास ने भी भारत के भविष्य को उज्ज्वल एवं उमंग भरा बताया है। अपनी गणनाओं के माध्यम से इन्होंने स्पष्ट किया है कि अगली सदी के प्रथम दशक में भारत का विकास विश्वपटल पर उभरकर दीखने लगेगा। दूसरे दशक में यह एक ‘सुपर पॉवर’ बन जायेगा। तभी लोग ‘मेरा भारत महान’ बन जाएगा। तभी लोग ‘मेरा भारत महान ‘ गर्व से कह सकेंगे। 2022 तक भारत दुनिया का मसीहा बन जायेगा। राजनैतिक या सामाजिक कारणों से नहीं वरन् साँस्कृतिक विरासत की वजह से भारत की प्रतिष्ठा विश्व में सर्वोच्च होगी।
कोट्टम राजू नारायण राव ज्योतिष के क्षेत्र में शास्त्रीय मान्यताओं को आधुनिक संदर्भों में देखकर निष्कर्ष निकालते हैं। इन्होंने तेईस सौ सालों के इतिहास की प्रमुख घटनाओं और उन तिथियों में ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति का अध्ययन करने के पश्चात स्पष्ट किया है कि भारत का भविष्य सुनहरा एवं समुज्ज्वल है। इनके अनुसार, आने वाले दो-ढाई सालों में तनाव, विग्रह, हिंसा एवं प्राकृतिक विपदाओं की चौतरफा इसके पश्चात का परिवर्तन सुखद होगा।
उन्होंने इसे पुष्ट करने के लिए ज्योतिषीय गणनाएँ की हैं। बाराहमिहिर के अनुसार, भारत का लग्न मकर है। शनि मंगल के साथ राहु और केतु के संयोग इसकी नियति तय करते है। ईसा से 327 साल पूर्व भारत पर सिकन्दर का हमला हो या गजनी-गोरी को आक्रमण, शनि और मंगल केन्द्र में रहे है। मोहम्मद गजनी ने 24 नवम्बर, 1027 को भारत पर हमला किया था, उसे दिन शनि और राहु एक ही अंशों में स्थित थे। सोमनाथ मन्दिर 25 मई, 1024 को विध्वंस हुआ, उस समय मंगल और केतु मिथुन राशि में एक-दूसरे से काफी निकट थे। 1398 में तैमूर का हमला, 99 अप्रैल, 1526 को पानीपत का प्रथम युद्ध, 5 नवम्बर, 1556 को पानीपत का द्वितीय युद्ध इन्हीं ग्रहों के योगों का संकेत करता है। 9 सितम्बर, 1938 को द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारम्भ होने के समय शनि के साथ केतु की युति थी। 9 अगस्त, 1942 को प्रातः दस बजे मंगल और राहृ सिंह राशि में थे, तब भारत छोड़ो आन्दोलन प्रारम्भ हुआ 6 और 9 अगस्त, 1942 को प्रातः दस बजे मंगल ओर राहु सिंह राशि में थे, तब भारत अगस्त, 1945 को जापान में अणुबम गिराने के समय शनि और राहु साथ बैठे गिराने के समय शनि ओर राहु साथ बैठे थे। भारत विभाजन के फैसले, 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के समय शनि और राहु का अपूर्व संयोग था। इसी तरह 14 मई, 200 को छह ग्रह एक साथ वृष राशि में होंगे यह योग भारत के उज्ज्वल भविष्य का संकेत करता है। इसी के साथ संसार में नए युग कस सूत्रपात होगा।
भविष्यद्रष्टा टाम वैलेण्टाइन ने सन् 1980 में किए गए अपने भविष्यकथन में 5 मई, 2002 को तीव्रतम परिवर्तनकारी समय घोषित किया है। इस दौरान इस एक ध्रुवीय विश्व में भोगवादी पाश्चात्य ताकतों को वर्चस्व समाप्त हो जाएगा एवं नूतन परिवर्तन परिलक्षित होगा।
सिख धर्म के दशम गुरु गुरुगोविन्दसिंह ने अपने पवित्रतम ग्रन्थ ‘गुरु ग्रन्थ साहिब’ में एक दिव्य अवतारी चेतना द्वारा सतयुगी सम्भावनाओं को साकार होना बताया हैं जापानी सन्त भी शूशमा ने 1985 में अपनी स्थूल काया को त्यागने के पूर्व महापरिवर्तन का संकेत करते हुए कहा था- “इस सदी के अन्त तक विनाश के उमड़ते भयावह बादलों के बावतूद अगली सदी की शुरुआत से धरती पर स्वर्गीय परिस्थितियों के अवतरण का क्रम प्रारम्भ हो जाएगा। इस अद्भुत सृजन की कोई कल्पना नहीं कर सकता है।” महापरिवर्तन की इन आहटों को समझने वाले विवेकीजन स्वयं को भावी युग के अनुरूप तैयार कर सकेंगे। भावी सदी- संवेदनाओं एवं सृजन की सदी होगी। विनाशकारी निष्ठुरता का इसमें कोई स्थान न होगा। अनुमान लगाने में आसानी मिलेगी कि आज इंटरनेट पर जब हम रोजमर्रा के सामान की खरीदी की बात कर रहे हैं, एक-दूसरे की जानकारियों का आदान-प्रदान कुछ ही जानकारियों का आदान प्रदान कुछ ही सेकेण्डों में कर लेते है, तब विज्ञान की स्थिति तब क्या थी, कैसे-कैसे वह अधुनातन स्थिति में पहुँचता चला गया है?
सन् 1900 से 1100 के बीच की अवधि में विज्ञान की कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ संक्षेप में इस प्रकार है।
विगत दो सौ वर्षों से विश्व वसुधा एक क्रान्तिकारी नवसृजन की प्रक्रिया से गुजर रही है। इस पूरी अवधि जब हम दृष्टिपात करते हैं, तो एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आता है। कि इस अवधि में विज्ञान ने प्रगति के चरम शिखर पर पहुँचने की जो द्रुतगामी यात्रा की है, वह किसी ओर क्षेत्र में हमें दिखाई नहीं पड़ती। वैज्ञानिक क्रान्ति ने चाहे वह भौतिकी के क्षेत्र में हो, अंतरिक्ष-विज्ञान, रसायनशास्त्र सारे विज्ञान अथवा चिकित्साशास्त्र, सारे विश्व को एक ‘ग्लोबल विपेज’ के रूप में एक ही छाते के नीचे लाकर खड़ा कर दिया है। उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्ष यद्यपि विज्ञान के आविष्कारों की दृष्टि से शैशवकाल के माने जाते है। फिर भी इतिहास साक्षी है कि आज तो आधुनिकतम विकास, किंतु साथ-साथ एक बेचैनी से भरी गतिशीलता हमें चारों ओर दिखाई देती है, उसका बीजारोपण तब हो चुका है। उस समय का मानव कदाचित लौट आए व आज के विकसित युग को देखे तो शायद ही उसे विश्वास ही कि मानवी पुरुषार्थ के बलबूते यह सब मात्र दो सौ वर्षों में सम्भव हो गया है। भारतवासी वेदों की वैज्ञानिकता में गहरी श्रद्धा रखने वाली देव-संततियों को तो अविश्वास नहीं होता क्योंकि वे अपोरुपेष्य वेदवाणी से लेकर नागार्जुन, चत्क, सुश्रुत, कणद, पतंजलि आदि ऋषिगणों के माध्यम से इस वैज्ञानिक प्रगति से भली-भाँति परिचित है। फिर भी प्रकाश की गति से भी तीव्रगति से जो कुछ भी विगत दो सौ वर्षों में इस क्षेत्र में हुआ है, यह विस्मयकारी है, युगपरिवर्तन को इंगित करने वाला प्रतीत होता हैं
विज्ञान जा आधुनिक स्थिति में हमें खड़ा दिखाई पड़ता है, उसका अद्यतन इतिहास योँ तो काफी पुराना है, किन्तु चूँकि युगपरिवर्तन की इस वेला में हम इस क्षेत्र की विगत दो सौ वर्षों की उपलब्धियों के एक सफरनामे की चर्चा कर रहे है तो उस पर एक दृष्टि डाल कर देखें कि कब-कब किस क्षेत्र में विगत दो सौ वर्षों में विज्ञान जगत के महारथियों ने क्या-क्या उपलब्धियाँ अर्जित की। एक पर्यवेक्षण से पाठकों को अनुमान लगाने में आसानी मिलेंगी कि आज इंटरनेट पर जब हम रोजमर्रा के सामान की खरीदी की बात कर रहे हैं, एक-दूसरे की जानकारियों का आदान-प्रदान कुछ ही सेकेण्डों में कर लेते हैं, तब विज्ञान की स्थिति क्या थी, कैसे-कैसे वह अधुनातन स्थिति में पहुँचता चला गया है?
सन् 1800 से 1900 के बीच की अवधि में विज्ञान की कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ संक्षेप में इस प्रकार हैं-
(1) सर विललियम इर्शेल द्वारा सन् 1800 में इन्फ्रारेड किरणों की खोज हुई।
(2) एलेसेण्ड्रा वोल्टा द्वारा सन् 1800 में विद्युत सेल का निर्माण किया गया।
(3) रिचर्ड ट्रेविथिक द्वारा 1904 में प्रथम रेलवे इंजिन का निर्माण हुआ, किन्तु पहली रेल के संचालन का यह श्रेय जॉर्ज स्टीवेन्सन एवं उनके बेटे रॉबर्ट को जाता है। जिनने 1824 में 10 मील लम्बी स्टाँकटन-डालिगटन (ब्रिटेन) रेलवे लाइन पर पहली बार तथा लिवरपुल-मैनचेस्टर रेलवे लाइन पर जो 40 मी लम्बी थी, इसे 1830 (15 सितम्बर) में चलाया। भाप से चलने वाला पहला पवानी का जहाज, जिसने इंग्लैण्ड से अमेरिका की अटलांटिक समुद्र की दूरी को 14 दिन में पार किया ‘ग्रेट वैर्स्टन; नाम से था। इसे ब्रूनेल ने बनाया था।
(4) प्रर्किस्सन द्वारा अपने नाम पर शरीर की नसों का कम्पन रोग पर्किन्सन्स डीसिज नाम से 1917 में रखा गया तब से यह बीमारी इस ी नाम से जानी जाती है। एवं बुढ़ापे की अज कष्टकारी व्याधि है।
(5) चार्ल्स बैबेज द्वारा 1823 में कैलकुलेटिंग मशीनों (संगणकों) का निर्माण किया गया।
(6) जोसेफ नीप्से 1827 में पहली बार एक प्राकृतिक दृश्य का चित्राँकन कर ‘फोटोग्राफी’ प्रक्रिया का फोटोग्राफ खींचने के साथ ही यह विविधता स्थापित हो गयी।
(7) अंधों के पढ़ने के लिए ब्रेललिपि की खोज 1821 में लुई ब्रेल द्वारा की गयी। लेवी स्ट्राँफस द्वारा खदानों में काम करने वाले मजदूरों के लिए बनाए गए।
(8) 1831 में माइकलफैराडे द्वारा पहली विद्युत मोटर का निर्माण एवं व्यावहारिक स्तर पर डायनेमो का सफल प्रयोग सम्भव हुआ। विद्युत जगत की यह सर्वप्रथम क्रांति थी, जिसकी आज चरमतम स्थिति देखी जा सकती है।
(9) 1838 में ब्रिटेन में पहले इलेक्ट्रिक टेलीग्राफ सिस्टम का जन्म हुआ (बिहटस्टीन एवं कुक के द्वारा)। बाद में 1844 में सैमुअलोस्र की कोड पद्धति से संदेश भेजे जाने का क्रम आरम्भ हुआ।
(10) 1846 में पहली बार एनेस्थेसिया की औषधियों के सफल प्रयोग द्वारा डॉ. जॉन कालिन्स वाने के माध्यम से एक ऑपरेशन सम्भव को पाया डॉ. वारेन के इस आपरेशन में डॉ. विलियम माँर्टन एनेस्थेटिस्ट थे। इससे पूर्व अफीम खिलाकर या मरीज की आंखें बन्दकर दाँतों के बीच चमड़े का टुकड़ा रखकर, उसे भली-भांति बाँधकर अर्द्धनिद्रा की स्थिति में आपरेशन किए जाते है।
(11) 1846 में लुई पाश्चर ने बताया कि बीमारियाँ जीवाणुओं के कारण होती है।
(12) लोहे का बल्क उत्पादन करने की कला जो ‘बेसेमर प्राँसेस’ नाम से जानी जाती है।, 1856 में खोजी गयी।
(13) हेनरी ग्रे ने मुर्दों की चीर की एनोटॉमी 1853 में लिखी। आज भी यह एक प्रामाणिक ग्रंथ है एवं इसके एवं विवाद को जन्म दिया।
(14)1851 मेचार्ल्स डार्विन ने ‘ओरिजन ऑफ स्पेसीज’ के नाम से विकासवाद के नाप पर एक नये सिद्धांत एवं विवाद को जन्म दिया।
(15) 1854 में फ्लोरेंस नाइटिंगेल ‘नर्सिंग’ की जन्मदाता बनी।
(16) 1853 में ही जॉन लुस्ट्राम ने पहली माचिस (सेफ्टी मैच) की तीली से जलाने की प्रक्रिया की खोज की।
(17) ‘सिगर’ की सिलाई की मशीन का आविष्कार 1851 में हुआ।
(18) आज विश्वप्रसिद्धि प्राप्त हर किसी के द्वारा पहनने वाले गड़रियों के वस्त्र ‘जीन्स’ 1853 में पहली बार लेवीस्ट्रॉस द्वारा पहनने लेवीस्ट्राँस द्वारा खदानों काम करने वाले मजदूरों के लिए बनाए गए।
(19) जोसेफ लिस्टर 1865 में एण्टीसोष्टिक के क्षेत्र में नूतन अनुसंधान कर्त्ता के रूप में ख्यातिलब्ध हुए।
(20) 1861 में पहला रंगीन फोटोग्राफ खींच पाने में सफलता अर्जित की गयी है।
(21) मैण्डेल ने 1866 में अपनी जेनेटिक्स के सिद्धांतों का प्रथम प्रारूप सबके समझ रखा।
(22) 1863 में पहली धरती के नीचे की रेलवे (टूयूबेट्रेन) ब्रिटेन में आरम्भ हो गयी। यह लंदन में पहली बार बनकर एक नमूने उसके रूप में सबके समक्ष आयी।
(23) स्विट्जरलैंड में 1964 में रेडक्रॉस की स्थापना हुईं।
(24) स्वेज कैनाल 1869 में आरम्भ कर दी गयी। इसने अफ्रीका पार कर हिन्दमहासागर की यात्रा की अत्यधिक छोटा कर दिया।
(25) ग्रामे’ नामक एक बेल्जियन आविष्कर्ता द्वारा एक शक्तिमान जेनरेटर 1870 में तथा जोसेफ स्वाँन द्वारा 1878 में आर्कलाइट से अलग कार्बन फिलामेण्ट बल्ब का आविष्कार किया गया, जिसे थॉमस अल्वा एडीसन ने गया, जिसे थॉमस अल्वा, एडीसन ने 1880 में परिपूर्ण रूप देकर ‘लाइट बल्ब’ प्रतिवर्ष निकलने लगे थे।
(26) पहली विद्युत चालित रेल बर्लिन में 1871 में चलायी गयी।
(27) एलेक्जेण्डर ग्राहमबेल,रा 1876 में टेलीफोन का आविष्कार 11 वीं सदी की सबसे बड़ी देन है। 1876-77 में ही एडीसन ने फोनो ग्राफ का आविष्कार किया।
(28) 1885 में र्काबेन्ज द्वारा पेट्रोल से चलने वाली कार चलाकर दिखाई गयी।
(29) स्टीमटर्बान चार्ल्स पारसन द्वारा 1884 में तथा डैमसर द्वारा मोटरसाइकिल का निर्माण 1885 में किया गया। डनलप के न्यूमोटिक टायर जो आज हर गाड़ी में लगें दिखाई देते है, 1885 में खोजे गए थे।
(30) कोडाक कैमरे का आविष्कार 1888 में जॉर्जईस्टमैन द्वारा किया गया।
(31) हेनरीहर्ट्ज द्वारा रेडियो वेव्स की खोज 1888 में की गयी तथा भविष्य की विज्ञान की सम्भावनाओं पर एच.जी. वेल्स द्वारा ‘द वार ऑफ वर्ल्ड्स’ में ही लिखा गया।
(32) 1895 में मारकोनी ने संचार हेतु रेडियो तरंगों का प्रयोग किया एवं इस प्रकार संचार-क्रान्ति का सूत्रपात किया। इसी वर्ष रोएंटजन ने एक्स किरणों की खाज की, जिनसे चिकित्सा जगत में विलक्षण क्रान्ति हो गई।
(33) मैडमक्यूरी ने 1898 में रेडियम की खोज की, जो बाद में विज्ञान के ध्वंसात्मक की खोज की, जो बाद में विज्ञान के ध्वंसात्मक एवं सृजनात्मक दोनों ही पक्षों का आधार बना।
(34) जैपलिन ने यूरोप में पहला एयरशिप 1898 में बनाया। एक अवधारण के रूप में यह स्थापित हो गया कि मनुष्य उड़ सकता है।
इस प्रकार से देखा जाय तो 1851 सेल लेकर 1900 के बीच में महत्वपूर्ण के स्वरूप को ढाला। यह अवधि आधुनिक विज्ञान के स्वर्णयुग के रूप में जानी जाती है।
(1) 1901 में सबसे पहला अटलांटिक पार संदेश ‘बेतार के तार द्वारा मारकोनी द्वारा भेजकर विश्व की दूरी को बहुत कुछ कम कर दिया गया। 1874 में जन्मे इस वैज्ञानिक ने इटली में प्रयोगक्रम आरम्भ किया, किन्तु यह उपलब्धि इसे 1901 में मिली। इसी वैज्ञानिक की खोज के कारण 1912 में ‘टाइटैनिक’ नामक जहाज के डूबने पर रक्षानौकाएँ पहुँचकर 700 से अधिक व्यक्तियों को बचा पाने में सफल हुई। आज फैक्समशीन एवं इंटरनेट संदेशों को सीधे डाउनलोड करने के समय में हम 1901 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित इस महान वैज्ञानिक मारकोनी की खोजों को नकार नहीं करते।
(2) 1903 को हवाई यात्रा का स्वर्णयुग आरम्भ करने के आविष्कार वाला वर्ष कहा जाता है। ‘फ्लायर’ नामक 12 हार्सपावर की उड़ने वाली मशीन से आँरविल एवं विल्बर राइट बंधुओं ने पहली उड़ान नार्थ कैरोलिना (अमेरिका) में किट्टी हाँक बीच के समीप भरकर यह सिद्ध कर दिया कि मशीन में बैठकर मनुष्य उड़ सकता है। 1903 में आरम्भ यह प्रयास यूरोप में 1903 में पहली लम्बी दूरी की फ्लाइट से लेकर 1928 में अटलांटिक पर (बिना रुके) फ्लाइट (किंग्सफोर्ड स्मिथ) से लेकर 1986 में बिना ईंधन के सारे विश्व की परिक्रमा करने की स्थिति (डिकरुटीन एवं जीनाथीगर) तक पहुँची तो इसका श्रेय प्रारंभिक शोधकर्ता राइट बन्धुओं को ही जाता है। इसी वर्ष फ्रांसीसियों ने साइकल से फ्राँस की यात्रा कर एक रिकार्ड की स्थापना की।
(3) 1905 में आइन्स्टीन ने अपना सुप्रसिद्ध सापेक्षिकता का सिद्धांत’ भौतिक जगत को दिया, जिसने आधुनिक भौतिकी की नींव डाली।
(4) विश्व की पहली बिजली से चलने वाली वाशिंग मशीन 1907 में खोजी गयी। इसी वर्ष प्लास्टिक ‘बेकेलाइट’ का भी आविष्कार हुआ।
(5) 1908 में हेनरी फोर्ड द्वारा मॉडल टी कार (टिन निजी) विश्व के समक्ष रखी गयी। 1901 के अंत तक 10,000 से अधिक कारें बिक विश्व चुकी थीं। औद्योगिक व परिवहन क्रान्ति की शुरुआत यदि 1908 में हेनरी फोर्ड के माध्यम से होकर आज यहाँ तक पहुँची है कि तेजी से चलने वाले अनेकानेक मॉडल हमारे पास मौजूद हैं तो उसका श्रेय इस बेहूदी-सी दीखने वाली टिनलिजी कार के जन्मदाता को जाता है।
(6) 1914 में पनामा नहर खोल दी गयी।
(7) हृदयघात (हार्टअटैक) की डायग्नोसिस (निदान) प्रथम बार किसी जीवित व्यक्ति पर 1912 में अमेरिका में की गयी।
(8) रदरफोर्ड द्वारा परमाणु के विखण्डन का शोधकार्य 1916 में खोला गया।
(9) पहला गर्भनिरोधक प्रशिक्षण क्लीनिक बुकलिन न्यूयार्क में 1916 में खोला गया।
(10) टी.वी. के लिए पहला वैक्सीन फ्राँस में 1923 में खोजा गया।
(11) टीश्यु रूमाल (प्रयोग करे एवं फेंकें) को 1924 में विश्वविख्यात किया गया।
(12) 1912 में मधुमेह (डायबिटीज) के लिए इन्सुलिन चिकित्सा की शोध (बैरिंग एंड बेस्ट) सम्पन्न हुई।
(13) 1923 में जॉन लेगी बेयर्ड ने पहली टेलीविजन प्रक्रिया की शोध की।1931 में जोरोकिन द्वारा पहला टेलीविजन कैमरा बनाया गया।
(14) एलेक्जेण्डर फ्लेमिंग ने 1928 में पेनसिलीन को फंगन से पैदा कर ‘एण्टीबायोटिक युग’ की शुरुआत की।
(15) उल्हुअस हक्सले की ब्रेव न्यू वर्ल्ड 1932 में लिखी गयी।
(16) प्लास्टिक पर आवाज को अंकित करने का शुभारंभ 1930 में जर्मनी में हुआ।
(17) 1932 को रेडियो क्षेत्र में आविष्कार का स्वर्णिम वर्ष माना जाता हैं मई 1932 में लंदन में ब्रोडा कॉस्टिक हाउस से ये सेवाएँ आरम्भ हुई बी.बी. सी. की विधिवत स्थापना इसी वर्ष होकर समाचार,नाटक, संगीत का संचार क्रमशः लंदन, इंग्लैण्ड व सारे यूरोप में होने लगा।
(18) सी.टाँम्बा द्वारा प्लूटो की खोज 1930 में की गयी।
(19) 1934 में नॉयलॉन की खोज अमेरिका में हुई।
(20) व्हिटल द्वारा जेटइंजिन का आविष्कार 1941 में हुआ तथा फर्मी द्वारा न्यूक्लियर रिएक्टर की खोज अमेरिका में 1942 में हुई।
(21) 1946 में पहले इलेक्ट्रॉनिक कम्प्यूटर का निर्माण अमेरिका में सम्पन्न हुआ। 1947 में ट्रांजिस्टर्स की खोज होने से रेडियो पार्टेबल बन गया।
(22) 1947 में ही लाँग प्ले रिकार्ड्स बनने लगे। एवं ग्रामोफोन द्वारा घर-घर सुने जाने लगे।
(23) ‘कैन्सफिल्म फेस्टीवल’ के साथ 1946 में विधिवत फिम्मों का अन्तर्राष्ट्रीय आदान-प्रदान क्रम आरम्भ हो गया, जिसने आज विराटतम रूप ले लिया है।
(24) पहला अणुबम परीक्षण बिकनि एटाँल पर 1944 में अमेरिका द्वारा किया गया, किन्तु 6 अगस्त, 1945 के दिन एनोलाँ गे बी-21 युद्धक विमान द्वारा पहली विनाशकारी अणु विभीषिका का ख्ोल हिरोशिमा में अमेरिका द्वारा खेला गया। जहाँ यह बम डाला गया उसके 13 वर्गमील क्षेत्र में सब कुछ नष्ट हो गया, एक लाख से अधिक व्यक्ति मरे एवं ढाई लाख अणु-धर्मिता से हुए रोगों से 5 वर्ष के भीतर मर गए। 20,000 टन टी.एन.टी. की ताकत वाले इस बम ने अनायास ही विश्व को अणुबमों की स्पर्धा द्वारा विज्ञान के लिए विनाशकारी युग में ला पटका।
ऊपर वर्णित सभी घटनाक्रमों में ध्यान देने योग्य बात यह है कि इसी अवधि में दो विश्वयुद्ध (1994 से 1998 तथा 1931 से 1945) हुए। सारा विश्व इसकी चपेट में रहा विज्ञान की सृजनात्मक उपलब्धियाँ सम्भवतः इसी कारण इस एक विनाशकारी घटनाक्रम के सामने फीकी पड़ गयी। फिर भी पेनसिलिन एवं इन्सुलिन की खोज एवं उड़ान तथा रेडियो तरंगों का सम्प्रेषण फिल्मों के क्षेत्र में हुआ, अन्वेषणकार्य आगे की प्रगति का एक आधारशिला बने।
15959 से लेकर 1990 तक की वैज्ञानिक उपलब्धियों की यात्रा कुछ इस प्रकार रही है।
(1) 1953 में डी. एन. ए (डिऑक्सी राइबो न्यूक्लिक एसिड) कणों की खोज (क्रिक एवं वाट्सन) से पत्थर की स्थापना हुई। गुणसूत्रों जीवकोषों की जानकारी से लेकर जेनेब्कि इंजीनियरी के प्रयोगों का एक द्वार इससे खुलता चला गया।
(2) ‘प्लास्टिक मनी’ (क्रेडिट, कार्ड) का पहला नमूना ‘डाइनर्सक्ल’ द्वारा 1950 में जन-जन के समझ रखा गया।
(3) 1957 में स्पूतनिक -1 उपग्रह रशिया द्वारा अंतरिक्ष में छोड़ा गया। लायका नामक एक कुतिया पहली बार एक जीवित प्राणी के रूप में अन्तरिक्ष की परिभ्रमण करने में सफल हुई।
(4) जवाब में अमेरिका ने भी ‘नासा’ की स्थापना अंतरिक्षीय अभियान हेतु 1947 में की।
(5) ‘डिस्नेलैण्ड’ के रूप में एक जादुई दुनिया 1955 में कैलीफोर्निया में वॉल्टडिस्ने द्वारा प्रस्तुत की गयी।
(6) 1961 में यूरीगागरिन अंतरिक्ष में पहुँचने वाले पहले व्यक्ति बन गए।
(7) काम्पेक्ट डिस्क (सी.डी.) फिलिप्स द्वारा 1963 में विश्व को परिचित करायी गयी। इसी वर्ष अमेरिकन व रूस के बीच एक ‘हाँटलाइन’ (टेलीफोन वार्ता हेतु) स्थापित हुई।
(8) 1963 मैं न्यूजीलैण्ड में गर्भावस्था में एक बच्चे को रक्त दिया गया।
(9) डॉ. क्रिश्चियन बर्नार्ड द्वारा पहला हृदय प्रत्यारोपण ऑपरेशन 1967 में किया गया एवं इसने चिकित्सा जगत में एक नए युग शुरुआत की।
(10) सर फ्राँसिस चिचेस्टर ने सरकंडों की नाव से सारे विश्व की परिक्रमा 1967 में सम्पन्न की।
(11) माँ के शरीर के बाहर प्रयोगशाला में पहली मानवी प्रजनन क्रिया का प्रायोगिक रूप कृत्रिम निषेचन द्वारा 1961 में सम्पन्न हुआ।
(12) अपोलो-11 नासा की स्थापना के 11 वर्षों बाद 20 जुलाई 1961 को चन्द्रमा पर उतरा एवं इसी प्रकार नील आर्मस्ट्राँग एवं एड्रीनल ने अंतरिक्षीय युग की स्वर्णिम शुरुआत की।
(13) 1970 में पहला हृदय का पेसमेकर सफलतापूर्वक मनुष्य में लगाया गया।
(14) 1972 में मस्तिष्क की स्कैनिंग करने वाले प्रथम उपकरण की खोज की गयी, जो आज कैट स्कैनिंग एम. आर. आय. एन. एम. आर. पी. ई. टी. तथा आप्टिकल स्कैनिंग के रूप में उपलब्ध है।
(15) 1973 में स्काय लैब अंतरिक्षीय प्रयोगशाला स्थापित की गयी।
(16) 1975 में यू.एस. ‘अपोलो एवं सोवियत’ सोयुज’ अंतरिक्ष में परस्पर आकर मिले। पहली बार दो महाशक्तियों के अंतरिक्ष यात्री ने अंतरिक्ष में विचरण कर अंतर्महाद्वीपीय एकता का संकेत साथ कार्य करके दिया।
(17) ब्रिटेन में 1978 में पहली ‘टेस्टट्यूब बेबी’ (परखनली में बालक) का जन्म हुआ।
(18) 1975 में घड़ियों में एल.सी.डी. (लिक्विड क्रिस्टल) उसने इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों के निर्माण के क्षेत्र में एक नयी क्रान्ति आरम्भ कर दी।
(19) जापान द्वारा पहला वीडियो गेम 1975 में जन-जन के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
(20) मंगलग्रह पर 1976 में वाईकिंग-1 पदार्पण।
(21) 1977 में सूर्य की शक्ति से संचालित कैलकुलेटर एवं न्यूट्रोन का विकास सम्भव हो सका। पार्योनियर-2 शनि ग्रह तक 1971 में जा पहुँचा।
(22) 1980 में विश्व-स्वास्थ्य संगठन ने स्माँलपाँक्स (बड़ी माता) के सारे विश्व से मिट जाने की घोषणा की।
(23) सोनी का ‘वाकमैन’ (कान पर रखकर चलते हुए सुनने वाला टेपरिकार्डर)1980 में ही सबके समक्ष आया।
(24) कंप्यूटर की सर्वसाधारण तक सुलभता छोटे रूप में एवं हर उपकरण में पर्सनल माइक्रो कम्प्यूटर्स के रूप में पहली बार 1980 में सम्भव हुई व आज 18 वर्ष में देखते-देखते यह घर-घर तक पहुँच गया है।
(25) घातक ‘एड्स’ (एक्वायर्ड इम्यूनो डेहिफशिएन्सी सिण्ड्रोम) वैज्ञानिकों द्वारा 1981 में पहचानी गयी व सबके सम्मुख इसका एक चित्र आया।
(26) स्टीवन स्पीलबर्ग की ई.टी. नामक बहुप्रचलित फिल्म जो सुदूर अंतरिक्ष से धरती पर आए प्राणी के विषय में थी, 1982 में प्रसारित हुई।
(27) मेलबोर्न में 1984 में पहला बालक हिमीकृत भ्रूण (फ्राँजन एम्ब्रियो) से पैदा हुआ।
(28) चेनैबिल रिएक्टर (रूस) में 1986 में भयानक विस्फोट से हजारों मील की दूरी तक रेडियोधर्मिता का प्रभाव फैला एवं 1945 के बाद दूसरी बार विश्वमानस एवं 1945 के बाद दूसरी बार विश्वमानस ने रेडियोधर्मिता के अभिशाप वाले स्वरूप को जाना।
(29) सोवियत अंतरिक्षयात्रियों ने स्पेस स्टेशन में 326 दिन रहकर एक नया कीर्तिमान 1988 में स्थापित किया।
(30) अंतरिक्षयान चैलेन्जर (अमेरिका) में 1976 में विस्फोट से सभी सात अंतरिक्षयात्री मारे गए नेपच्यून ग्रह के विस्तार से चित्र वाँयेजर -2 के माध्यम से 1989 में धरतीवासियों को देखने को मिले।
1911 से 1997 के अंत तक के समय में विज्ञान जगत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण चर्चा के विषय रहे-एड्स की रोकथाम हेतु विभिन्न उपचारों की खोज, कम्प्यूटर-इंटरनेट-वर्ल्डवाइड वेव का बढ़ता स्वरूप, जिसने एक डिजिटल पीढ़ी को खड़ा करके रख दिया, डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक क्रान्ति के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जासूसी प्रक्रिया का अंतर्राष्ट्रीयकरण, अणुबमों की विभीषिका से निपटने के लिए आणुविक शक्ति के शान्तिपूर्वक उपयोग पर व्यापक बहस, कैंसर-हृदय रोगों से होने वाली मौतों की रोकथाम हेतु जेनेटिक इंजीनियरिंग की दिशा में अधिकाधिक प्रयोग, मानवी नस्ल की ‘क्लोंिग’ (कलम लगाने) की प्रक्रिया की दिशा में जमकर नैतिकतापरक बहस एवं भेड़ों की दिशा में अनेकानेक अभूतपूर्व सफलताएँ, वैज्ञानिकों द्वारा आयुर्वेद हर्बल हीलिंग-वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति को विधिवत मान्यता दिया जाना वीडियो-उपग्रहों से प्रसारण द्वारा एक व्यापक नेटवर्क का निर्माण-कैबल टी. वी. घर-घर में पहुँच जाना। ये कुछ ऐसी मोटी उपलब्धियाँ है जिनने आज के विज्ञान का स्वरूप गढ़कर सामने रख दिया है एवं आज का मनुष्य स्वयं को तकनीकी ही नहीं, हर दृष्टि से एक ऐसी स्थिति में पाता है जहाँ वह 1800 से 1850 की मानव पीढ़ी से सुविधा साधनों की दृष्टि से बेहतर स्थिति में है।
सचमुच वैज्ञानिकों को साधुवाद दिया जाना चाहिए एवं विज्ञान के इस स्वरूप को जो आज विकसित स्थिति में उतर आता है, युगांतरकारी मानते हुए इस निष्कर्ष पर हमें पहुँचना चाहिए कि 21 वीं सदी के अमन की वेला में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हम पहुँच गए है। जेट एज, इलेक्ट्रॉनिक एज, डिजिटल एज, माइक्रोचिप एज या संचार क्रान्ति (इन्फोंटेक) एज या संचार क्रान्ति (इन्फोटेक) एज जो भी नाम दिया जाए, उसने विश्व को बहुत कुछ सिकोड़कर सारे विश्ववासियों को एक दूसरे के समीप ला दिया है, किन्तु क्या इससे मनुष्य के मानसिक शान्ति मिली है या मनुष्य यह अनमोल निधि उससे छिन गयी हैं। क्या विभिन्न रोगों पर नियंत्रण दिलाने का वादा करने वाले वैज्ञानिक वार्धक्य की रोकथाम पर शोध करते-करते कई मनोशारीरिक तनावजन्य व्याधियों को जन्म नहीं दे गए है? क्या वास्तव में वान के इन आविष्कारों से मनुष्य विशाल उदार दृष्टिकोण वाले मानव के बदले में एक संकुचित स्वकेन्द्रित -आत्महत्या को उतारू मनुष्य के रूप में विकसित नहीं हो गया है? क्या पर्यावरण, तकनीकी व वैज्ञानिक प्रगति की इस होड़ में बुरी तरह प्रदूषित हो अब मनुष्य के लिए घातक नहीं बन गया है-प्रकृति प्रकोप प्रतिकूल मौसमों के कारण महामारियां इसी वजह से नहीं पनपी हैं? आधुनिकता की इस दौड़ से बेहद ऊपर से तो आस्तिक पर अंदर से बेहद नास्तिक नहीं तोता चला गया है? ये सारे प्रश्न हमसे-आपसे एक उत्तर की उपेक्षा करते हैं।
युगपरिवर्तन सुनिश्चित है। उसी धारा में विभिन्न प्रक्रियाएँ जो गतिशील थी वैज्ञानिक प्रगति ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर मानवजाति को एक संतृप्तीकरण (सैंचुरेशन) की स्थिति में ला खड़ा किया है। अब विज्ञान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ उसे अध्यात्म मूल्योँ की,मानवमात्र के लिए सर्वांगपूर्ण प्रगति के लिए पर्यावरण से मैत्री रखकर किए जाने वाले प्रयोगों की आवश्यकता प्रतीत हो रही है। यह कार्य मान’वैज्ञानिक अध्यात्मवाद’ को धुरी बनाकर शमा्र आचार्य जी ने ‘भविष्य का धर्म-वैज्ञानिक जी ने ‘भविष्य का धर्म-वैज्ञानिक धर्म’ कहकर इक्कीसवीं सदी के आगमन की वेला में इसे एक शुभ संकेत कहा है कि अब सभी विज्ञान के सृजनात्मक उपभोग सुनियोजन की दिशा में ही सोच रहे हैं।
26 जनवरी, 1998 की ‘न्यूजवीक’ पत्रिका के ‘मिलेनियम 2000 नामक स्तम्भ में सम्पादक ने लिखा है कि हम अब विज्ञान के अंतिम चरण में पहुँच चुके हैं। जॉन हार्गन के इस लेख में उद्धत करते हुए लिखा गया है कि जितनी भी महत्वपूर्ण शोधें सम्भव थी 1998 के आते-आते ही चुकी। फिर भी वे कहते है कि चमत्कारी मानवी मस्तिष्क, स्मृति के कोश, अत्यधिक तापमान पर कार्य करने वाले सुपर कन्डर्क्टस वायुमण्डल में अचानक आ जाने वाले चक्रवात स्तर के कम्पनवत् फान, पदार्थ व प्रतिपदार्थ के बीच समन्वयात्मक सम्बन्ध ये कुछ ऐसे विषय हैं जिन पर वैज्ञानिकों को बहुत कुछ सोचना है एवं यह वे अपने सोचने के आयाम को ऊपर उठाकर ही कर सकते हैं। प्रतिवर्ष 30,000 से अधिक व्यक्ति आज अमेरिका में पी-एच.डी. करते हैं नये विषयों की खोज में सक्रिय इन सभी को चुनौती देते हुए स्तम्भ लेखक थाँमक ने लिखा है। कि भविष्य अब विज्ञान के बाद की सदी का है। अतः उन्हें अविज्ञात के गर्भ में गोते लगाने के लिए तैयार रहना चाहिए।
विज्ञान ने ‘वसुधैव कुटुम्बक की स्थिति तो ला दी है, किन्तु हम अपने को इस योग्य अभी बना नहीं पाए है कि उस ‘ग्लोबल ग्राम ‘ में रह रहे है। वैसी मानसिकता हमारी विकसित हो चुकी है, ऐसा कह सकें। कलेवर तो विज्ञान ने दिया, पर जब तक मनःस्थिति अध्यात्म प्रधान नहीं होगी, यह निष्प्राण ही बना रहेगा एवं इस आधुनिकतम प्रगति का सकारात्मक सुनियोजन नहीं हो सकेगा। निश्चित की इक्कीसवीं सदी युगावतार के आगमन की, प्रज्ञावतार के प्रकटीकरण की -परिवर्तन की इस वेला में एक आध्यात्मिक क्रान्ति लेकर आ रही है। हम सब अपनी विगत उपलब्धियों पर गर्व तो करें, पर भविष्य जो बड़ी तेजी से सामने आता दिख पड़ रहा है, के लिए स्वयं को तैयार भी करें।
यह आचार्य कृप भगवान व्यास को प्रणाम करता हैं हिमालय का अत्यन्त दुर्गम दिव्यक्षेत्र कलापग्राम, जो नित्य सिद्ध महायोगियों की साधनाभूमि है, जो मनुष्य तो दूर, गन्धर्वादि उपदेवताओं के लिए भी अगाम्य एवं अदृश्य है, उसी अलौकिक एवं अद्भुत भूमि में आज कुछ हलचल जान पड़ती थी। जहाँ अखण्ड शान्ति, नित्य घनीभूत सत्वगुण छाया रहता है। वहाँ समाधि से अचानक व्युत्थान बड़े आश्चर्य की बात थी। हजारों-हजार साल बीत गए-समूचे युग का पटाक्षेप हो चुका, ऐसा कभी यहाँ हुआ ही नहीं। प्रयत्न करने पर भी आचार्य कृप आज पुनः समाधि नहीं लग पाएं विवशतः वे अपने आसन से उठे और महर्षि व्यास से मिलने के लिए चल दिए।
संकल्प की भाषा में, परा-पश्यन्ती के स्वरों में बात करने के अभ्यासी इन दानों देवपुरुषों का प्रत्यक्ष मिलन बड़ा अचरज भरा था। द्वापर के अन्त में जब परम योगेश्वर भगवान कृष्ण अपनी लीला समेट रहे थे, उसके थोड़े ही समय बाद ये दानों दिव्य विभूतियाँ इस सिद्धभूमि में पधारी थीं। इस अलौकिक क्षेत्र में इन्होंने स्वल्पसमय में अगणित रहस्यमय साधनाएँ संपन्न की। समाधि में सतत् लीन रहकर सृष्टि के गुह्यातिगुह्य सत्यों एवं रहस्यों का साक्षात्कार किया। भगवान व्यास तो पहले भर ऋषि थे- तप, योग और ज्ञान के सतत् अभ्यासी उनकी लोकोत्तर साधना यहाँ आने के पश्चात और भी विशिष्ट और महनीय हो गयी थी। आचार्य कृप तो युद्धविद्या के आचार्य थे, कुरु राजकुमारों, पाण्डुपुत्रों को उन्होंने युद्धविद्या का प्रथम पाठ पढ़ाया था। इसका श्रीगणेश करते समय उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि भाई-भाई आपस में ही इसका प्रयोग करने लगेंगे। उनका आपस का वैर महायुद्ध का रूप ले लेगा।
विगत की घटनाएँ उनकी प्रेरक बनीं और सबसे अधिक प्रेरक एवं पूजनीय तो था-योगेश्वर अधिक प्रेरक एवं पूजनीय तो था- योगेश्वर कृष्ण का व्यक्तित्व, जिनके आशीष एवं अनुग्रह से वे कलापग्राम आए थे। यदा-बदा विगत उनके मनोभावों में स्पन्दित होने लगता था। वह-रहकर एक ही टीस सर्वेश्वर स्वयं धरा का उद्धार करने आए, मैं उनका सार्थक सहयोग न कर सका। सत्य को जानते हुए भी विवशतः उन्हें दुषे्रधन का साथ देना पड़ा। इस घटना ने उन्हें मर्माहत कर दिया था, परन्तु सर्वान्तर्यामी श्रीकृष्ण ने अपनी लीला का अवसान करने के कुछ समय पूर्व कहा था-खिन्न न हों आचार्य। विधि का विधान सुनिश्चित होता है। फिर भी मैं आपको वरदान देता हूँ कि आप मेरे आगामी अवतार के न केवल साक्षी होंगे, बल्कि सहयोगी भी होंगे। तब तक आप हिमालय के दिव्यक्षेत्र कलापग्राम में तप करें।
उस समय से समाधि लीन रहते हुए एक दीर्घकालखण्ड व्यतीत हो गया। अब वे युद्ध के आचार्य नहीं ज्ञान, तप एवं योग के आचार्य थे। आज की दृष्टि से असाधारण, अकल्पनीय, दीर्घकाय, प्रलम्बबाहु, कमलदल विशाल लोचन उत्रत नासिका, प्रशस्त भाल एवं वक्ष और पाटल गौरवर्ण, अत्यन्त सुन्दर-सुगठित किंचित तपःकृशदेह, जटाजूट, बढ़े श्मश्रु केश, केवल कल्कल, परिधान स्रष्टा की अनुपम कृति लगते थे महर्षि व्यास वर्ण में किंचित कृष्ण अवश्य थे, पर उनकी काया के चारों ओर छायी रहने वाली तपस्या की अनोखी छटा प्रदान करती थी। अद्भुत था उनका सम्मान अपने अग्रज के समान करते थे, किन्तु महर्षि व्यास उन्हें सदा अपना समकक्ष मित्र ही मानते थे।
आज कुछ अकल्पनीय होने वाले लगता है। कृपाचार्य ने कहा’ अनेक बार प्रयत्न करके भी एकाग्र नहीं हो सका। जैसे कोई आकर्षण हिमशिखरों से नीचे जन-संकुल जगत की ओर खींच रहा है।
आप जानते ही हैं कि हम दोनों स्रष्टा के एक संकल्पविशेष के यन्त्र हैं। महर्षि व्यास बोले-स्वयं मेरी भी आज यह अवस्था है। लगता है कि वह समय आ गया है जिसके लिए योगेश्वर कृष्ण ने आपको संकेत दिया था। अबकी बार सर्वेश्वर स्वयं कल्कि अवतार लेकर धर्म-स्थापना की अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेंगे। निष्कलंक अवतार द्वारा महाकाल की युग-परिवर्तन प्रक्रिया के मूर्त होने की शुभ घड़ी आ पहुँची है।
महात्मन्! श्रजस का लेश भी यहाँ वर्जित है। सहसा दोनों ही महाविभूतियों वर्जित है। सहसा दोनों ही महाविभूतियों के हृदय में कोई अलक्ष्यवाणी गूँजी तुम्हारा साधनाकाल पूर्ण हो गया है। अभी तुम्हें भावी अवतार प्रक्रिया के क्रिया–कलापों को साक्षात अपने नेत्रों से देखना है।
आदेश आ गया। वहाँ प्रत्यक्ष मिलन कोई महत्व नहीं रखता। अदृश्य-दृश्य का भेद नगण्य है। मन का संकल्प ही परस्पर विचार-विनिमय, उपदेश-ग्रहण एवं आदेशप्राप्ति का सुपरिचित माध्यम है। उस सिद्धस्थली में दोनों अमर विभूतियों ने हाथ जोड़कर सिर झुकाया और एक साथ वहाँ से चले।
मनुष्य रूप में है। ये? आचार्य कृप एवं भगवान व्यास के सम्मुख आज के मनुष्यों का आकार अत्यन्त क्षीण था। उनके शरीर ही नहीं, मन भी उन दोनों महानुभावों को संकीर्ण एवं संकुचित लगे। हम सीधे महेन्द्रांचल पर चलेंगे। थोड़ी देर भगवती भागीरथी के तट पर हरिद्वार में ध्यानस्थ रहकर दोनों उठे। इस आगामी सतयुग के युगनिर्माता एवं शास्त्रनिदेशक भगवान परशुराम है। उनके पावन चरणों में प्रणाम करके हमें आदेश की अपेक्षा करनी है।
महेंद्रांचल साधारण पर्वत नहीं है। इस दिव्यगिरि पर देवता भी संकोच एवं श्रद्धा के साथ ही उतरते है। भगवान परशुराम की अनेक युगों से यह साधना स्थली माया का आच्छन्न करने वाला प्रभाव इसका समीप नहीं आता। देवपुरुष परशुराम का सत्संग पाने के लिए अगणित ऋषि तपस्वीगण भी इसकी गुफाओं में, साधन कानूनों में अपने आराध्य का चिन्तन करते नित्य तन्मय रहते हैं। दिव्य लतातरु, पुष्पित- पल्लवित मधुरफल वनभूमि और रत्नोज्ज्वल गुफाएँ। यहाँ न केवल पशुओं का नाद, पक्षियों का कलरव, भ्रमरों का गुँजन ही, बल्कि निर्झरी की तरंगित ध्वनि में भी ओंकार का दिव्यनाद गूँजता है। यहाँ का पत्ता-पत्ता इस दिव्यगूँज के साथ नर्तन करने में लीन रहता है।
गगन से दो चन्द्रमा भूमि पर आ जाएँ, इसी प्रकार महेन्द्र के शिखर पर दो विभूतियाँ उतर आयी। ब्रह्मर्षि परशुराम निर्धूम अग्नि की तरह वहाँ प्रकाशित थे। वे जैसे इन्हीं दोनों की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनकी पारदर्शी प्रज्ञा में सब कुछ स्पष्ट था। जिज्ञासाएँ एक पल में ही समाधान के स्वरों में बदल गयी।
धन्य हो गए योगेश्वर कृष्ण की लीलाभूमि के समीप का वह छोटा-सा ग्राम। पवित्र हो गया यशस्वी ब्राह्मणश्रेष्ठ का कुल। भगवान कल्कि रूप में ब्राह्मणश्रेष्ठ का कुल। भगवान परशुराम बड़े ही विह्वल स्वरों में कल्कि के प्रज्ञावतार के आगमन की कथा सुना रहे थे। आचार्य कृप एवं महर्षि व्यास दोनों को ही उन्होंने आज ही भुजाओं में भर लिया था। पूर्व परिचित तो वे थे ही, बड़े आत्मीयभाव से वे कहने लगे। आप दोनों तो उनके परमप्रिय है। आप से मिलने वे स्वयं पधारेंगे।
पर कहाँ? आचार्य कृप ने चकित भाव से पूछा। जबकि भगवान व्यास ब्रह्मर्षि परशुराम का संकेत समझ चुके थे। देवभूति का संकेत समझ चुके थे।
देवभूमि हिमालय ही उनकी मिलनस्थली होगी इस साँकेतिक शब्दावली के साथ ही पुनः कल्कि का वर्णन करने लगें जगत को ब्रह्मणत्व का गौरव प्रदान करने तथा जन-जन का जगज्जननी गायत्री महाविद्या का रहस्य बताने के लिए ही उनका अवतरण हुआ है। लोकशिक्षण के लिए उन्होंने स्वयं भी उग्र तप साधना की है। उनका तपः तेज दुर्धर्ष है।
वे परमप्रभु किधर...........................? जिज्ञासा इस बार भी आचार्य कृप की ही थी।
वे उग्रतेजा रूप में ही इस बार अवतीर्ण हुए है। परशुराम जी ने प्रश्न का तात्पर्य समझ लिया-विचारक्रान्ति ही उनका प्रचण्ड परशु है। जिसके द्वारा वे तीव्र वेग से समूचे भूमण्डल के मानव समुदाय के मन-मस्तिष्क को बदल डालने के लिए कृतसंकल्प है। उनके दर्शन करना चाहोगे?
देव! छयामय! एकबारगी चौंक उठी ये दोनों ये महाविभूतियाँ। महाभारत कालीन विषमताओं, विचित्रताओं को उन्होंने अपनी आँखों से देखा-असह्य था वह उनके लिए। प्रबल वेग से घूमता कालचक्र, महायुद्ध, गृहयुद्ध, शीतयुद्ध, व्यक्तियुद्ध, प्रकृतियुद्ध, आदि अनेक प्रकार के क्लेश, संघर्ष उद्वेग, अवरोध के तूफान उठते नजर आ रहे थे। इन सभी को महातपस्वी निष्कलंक भगवान अपने तप-तेज से नियंत्रित करते हुए, मनुष्यों की रक्षा करने में संलग्न थे, पर साथ उन्हें बदलने के लिए विवश कर रहे थे।
प्रज्ञावान महर्षि अपनी अंतःप्रज्ञा से उन प्रखरप्रज्ञा पुरुष के कर्तृत्व को देख रहे थे। ज्ञानयज्ञों-वाजपेय यज्ञों का संचालन, देवमानवों का अद्भुत संगठन एवं जन-जन में देवत्व का अवतरण। यमुना तट से गंगा तट पर हिमालय की तलहटी में आकर उन्होंने सूक्ष्मजगत को जिस आश्चर्यचकित करने वाली रीति से परिवर्तित किया-उससे वे हतप्रभ थे।
कल्कि के रूप में सर्वेश्वर की पूर्ण चेतना का अवतरण हुआ। उनके कर्तृत्वों स्थूलशरीर से ही नहीं, कल्कि अपने पाँच सूक्ष्मशरीरों से भी अपनी लीला का संचालन करेंगे। वे मानवता को उज्ज्वल भविष्य देने के लिए संकल्पित है। उनके संकल्प को अन्यथा कर सके ऐसी शक्ति देव, दानव, मानव किसी में नहीं।
पर अभी तो.......? अन्तर्प्रज्ञा से निहार रहे भविष्यलोक से वे वर्तमान में आ गए। सचमुच बड़ा ही दुखद है वर्तमान! भगवान परशुराम ने एक दीर्घ निःश्वास ली। युग बीत गए, धरती स्वादिष्ट फल, उर्वरकों का इतना उपयोग किया कि धरा बंजर बन गयी। समुद्री काई को आहार बनाना चाहा, किन्तु अपने ही आविष्कृत अद्भुत विस्फोटकों से उन्होंने सागरीय आहार को भी विषैला बना दिया। इस समय तो मानव न तो खाद्य-अखाद्य का विचार करता है और न ही आचार व्यवहार का।
यह हीनसत्व ......। कृप ने खिन्न स्वर में कहा, अपने मस्तिष्क पर बड़ा गर्व किया इसने, किन्तु अपने गर्व में अपने ही आविष्कारों का आखेट हो गया। खिन्न स्वर ही था भगवान परशुराम का भी, इसने ऐसे विस्फोटक निर्मित किए कि उसने अपने को ही समाप्त करने की ठान ली। ईश्वर की सत्ता, धर्म-परलोक आदि को इसने पहले ही अस्वीकार कर दिया था। स्थूल भोगों को ही महत्ता देने का परिणाम जो विनाश होता है, उसी को भुगत रहा है मनुष्य।
और अब यह दीन पशुप्राय मानव.........। महर्षि व्यास एवं आचार्य कृप अतिशय क्षुब्ध होने के कारण बोल नहीं सके।
कोटप्राय कहो वत्स! भार्गव बता रहे थे-परन्तु प्रज्ञा पुरुष के रूप में स्वयं भगवान अपनी युग-परिवर्तन प्रक्रिया के प्रचण्ड वेग से नरपशु नरकीटक एवं नरपिशाचों को ऐसे देव-मानवों का रूप देंगे, जिन पर धरा युगों तक गर्व कर सके। अपनी उग्र तपस्या से वे समस्त मानवजाति के पापों को भस्म करने में लगे हैं। उनका परमोज्ज्वल तप ही मानव जाति का उज्ज्वल भविष्य बनेगा।
इस परमविश्वास के साथ ही परशुराम ने उन दोनों दिव्य देहधारी महापुरुषों की ओर देखा। उनकी दृष्टि में सहज स्नेह था, कर्तव्य के प्रति आग्रह था और निर्देश देने की आतुरता थी। पल के मौन के पश्चात वह कहने लगे-
सन्त सुकरात से मिलने गये एक भक्त ने प्रश्न किया “महात्मन्! चन्द्रमा में कलंक और दीपक तले अँधेरा क्यों रहता है?” सुकरात ने पूछा- “अच्छा तुम्हीं बताओ-तुम्हें दीपक का प्रकाश और चन्द्रमा की ज्योति क्यों नहीं दिखाई देती?”भक्त ने विचार किया सचमुच संसार में हर वस्तु में अच्छे और बुरे दो पहलू हैं, जो और जिन्हें केवल बुरा पहलू देखना आता है, वे बुराई संग्रह करते है।
हिमालय के हृदयक्षेत्र में रहकर ही अप दोनों प्रज्ञावतार की इस लीला के साक्षी एवं सहयोगी को दीर्घकालीन साधना से प्राप्त लगाओ यही युगसाधना है। कल्कि अवतार की चेतना तुम्हें समय-समय पर इसके लिए आवश्यक दिशा-दर्शन कराती रहेगी।
महाभार्गव का निर्देश पाकर वे दोनों देवपुरुष अपने गन्तव्य की और चल पड़े। अब उन दोनों को ही युगपरिवर्तन हेतु की जाने वाली युगसाधना में सम्मिलित होने की शीघ्रता थी।
आर्थिक जगत का वर्तमान युग संक्रमणकाल से गुजर रहा हैं विश्व अर्थ व्यवस्था में तीव्र परिवर्तन हो रहा हैं आर्थिक समानता का प्रबल-पोषक एवं पक्षधर साम्यवाद का प्रबल-पोषक एवं पक्षधर साम्यवाद बिखर चुका है। आकर्षक का दूसरा तंत्र पूँजीवाद भी आर्थिक एकाधिकारवाद में सिमट गया है। साम्राज्यवाद भी अन्तर्राष्ट्रीय स्वतंत्र व्यापार से आरम्भ होकर बलवान पूँजीवाद राष्ट्र के एकाधिकारवाद में परिवर्तित हो गया है। अब नव साम्राज्यवाद का प्रचार-प्रसार चल पड़ा है। उदारीकरण, भूमंडलीकरण आदि की नयी चकाचौंध पैदा की है, परन्तु इसके पुरोध देश स्वयं आर्थिक मन्दी एवं बेरोजगारी जैसी समस्याओं से ग्रसित होते जा रहे हैं। मुद्रा का अवमूल्यन इसका उपहार है। ऐसे टूटते–दरकते समय में समस्त संसार की नजर भारतीय अर्थव्यवस्था पर टिकी हुई है। दुनिया भर के प्रख्यात अर्थशास्त्रियों ने भारत को इक्कीसवीं सदी की मान आर्थिक महाशक्ति के रूप में घोषित किया है। प्रायः सभी का यही मत है कि भारत ही समूचे विश्व को आधुनिक, स्थायी एवं सुदृढ़ अर्थतन्त्र प्रदान करेगा।
आर्थिक संक्रमण की शुरुआत उस समय हुई, जब द्वितीय महायुद्ध के समय विश्व को सर्वाधिक आर्थिक-संकट देखना पड़ा। इस महायुद्ध के पश्चात विश्व में पूँजीवाद और साम्यवाद की द्विध्रुवीय स्थिति पैदा हो गयी। अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देश पूँजीवाद के समर्थक थे, तो रूस,जर्मनी आदि देश साम्यवादी हो गए। मार्क्स के साम्यवाद का आर्थिक समानता का नारा निर्धन, गरीब एवं अभावग्रस्त वर्ग को बहुत आकर्षक लगा। इसी के साथ साम्यवाद ने प्रचण्ड तूफान बनकर तमाम देशों को अपनी चपेट में ले लिया, परन्तु साम्यवाद के साथ अधिनायकवाद ने लोमहर्षक दबाव की स्थिति उत्पन्न कर दी। साम्यवादी देशों को स्वल्प आर्थिक प्रगति के बदले गुलामी की असह्य मार झेलनी पड़ी। इसके परिणामस्वरूप रूस बिखर गया एवं बर्लिन की दीवार टूट गयी। साम्यवाद की इस असफलता को पूँजीवाद की विजय माना गया।
पूँजीवादी विकास का सिद्धांत है। श्रम के द्वारा अपार अर्थोपार्जन। पूँजीवाद इंग्लैण्ड में अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पैदा हुआ। इसके तहत उद्योगपतियों ने बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना की। इसी प्रक्रिया में पूँजीवाद ने ब्रिटेन से भारत में प्रवेश किया हालाँकि सन् 1994 के प्रथम विश्वयुद्ध के बाद पूँजीवाद का आर्थिक-संकट का सामना करना पड़ा। परन्तु यह आस्ट्रिया, फ्राँस एवं जर्मनी में पनपता रहा। ब्रिटेन के समान अमेरिका ने भी क्षेत्र और जनसंख्या के आधार पर पूँजीवाद को अपनाया। अमेरिका में पूँजीवाद को अपनाया। अमेरिका में पूँजीवाद, जैक्सन, जैक्सा एवं लिंकन के प्रयास ने पनपा। इसके बाद भारत, चीन, मिश्र, दक्षिणी अमेरिका के देश, मलाया, जावा और अफ्रीका का विशाल महाद्वीप इसके घेरे में आ गए। ब्रिटेन के पूँजीवाद एकछत्र राज्य के बाद जर्मनी, जापान, फ्राँस और अमेरिका के आधिपत्य ने समूचे संसार को अपनी चपेट में ले लिया। पूँजीवाद एकछत्र राज्य के बाद जर्मनी, जापान, फ्राँस और अमेरिका के आधिपत्य ने समूचे संसार का अपनी चपेट में ले लिया। पूँजीवाद छल-बल-छद्म द्वारा अपना प्रसार करता गया। डॉ. राम मनोहर लोहिया ने इसे इस तरह रेखांकित किया है, 50000 करोड़ श्रम घंटे, पूँजीवादी अर्थनीतियों के द्रव्योत्पादक 250 करोड़ श्रम घंटे के बराबर है।
पूँजीवाद अपने लाभ के लिए जब दूसरे देश में पुहँता है, तो साम्राज्यवाद बन जाता है। व्यापार ही इसका मुख्य आधार है। यह अपने व्यापार के विस्तार के लिए पिछड़े देशों के कच्चे माल पर एकाधिकार रखने का प्रयास करता है। एकाधिकार रखने का प्रयास करता है। ब्रिटेन ने भारत को इसी व्यापार नीति के तहत सदियों तक गुलाम बनाए रखा। ब्रिटेन सदियों तक गुलाम बनाए रखा। पूँजीपतियों को ही समर्थ और सक्षम बनाते है। पिछले एक दशक में विश्व आर्थिक परिवेश में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। रूस के साम्यवादी पतन के साथ ही यूरोप और अमेरिका के आर्थिक सुधार को एकमात्र विकल्प माना गया। इससे विश्व में एकध्रुवीय स्थिति बन गयी। परिणामस्वरूप अमेरिका में नव साम्राज्यवादी अर्थ-व्यवस्था ने जन्म लिया। इसने विश्व के आर्थिक ने जन्म लिया। इसने विश्व के आर्थिक एकीकरण का सपना सँजोया। खुली अर्थव्यवस्था, मुक्त बाजार व्यवस्था, उदारीकरण, भूमण्डलीकरण आदि इसी की देन है। इस अर्थनीति ने जहाँ अर्थ-व्यवस्था, मुक्त बाजार व्यवस्था, उदारीकरण, भूमण्डलीकरण आदि इसी की देन है। इस अर्थनीति ने जहाँ अर्थ-व्यवस्था को मजबूत किया है, वहीं आर्थिक मंदी, शेयर बाजार में प्रचण्ड भूचाल, मुद्राओं के अवमूल्यन ने इस प्रकार प्रश्नचिह्न लगा दिया है। पोलैंड, हंगरी, वल्गारिया, स्लोवाक गणराज्य, मंगोलिया, रुमानिया आदि में पूर्व कम्यूनिस्ट सरकारों के वापस अपने को खुली अर्थव्यवस्था के प्रबल विरोध के रूप में माना जा रहा है। पूर्व सोवियतसंघ के यूक्रेन, कजाकिस्तान, पायलोरुस भी इस अर्थनीति को अस्वीकार कर चुके है। उदारीकरण एवं खुले बाजार वाले आर्थिक सुधार का डंका पीटने वाले विकसित देश स्वयं ही अपने बुने जाल में फँस रहे हैं।
पूर्व राष्ट्र थिरोडोर रुजवेल्ट ने अमेरिकी अर्थसाम्राज्य का समस्त विश्व पर अधिकार करने का सपना देखा था। अमेरिका के नक्शे कदम पर बढ़ते हुए जापान, जर्मनी, ब्रिटेन एवं फ्राँस जैसे विकसित देश इसे और भी पुष्ट कर रहे है! अमेरिकी अर्थव्यवस्था, अमेरिका कॉर्पोरेट सेक्टर की समस्याओं से घिरी हुई है। अमेरिका अर्थव्यवस्था, अमेरिका कॉर्पोरेट सेक्टर की समस्याओं से घिरी हुई है। अमेरिका में अभी भी 12 फीसदी अराजेगरी उसकी समृद्ध अर्थव्यवस्था पर कराय व्यंग्य है। अतिविकसित कहलाने वाला जापान भी आर्थिक मंदी एवं बेरोजगारी के किसी भी तरह अपना बचाव नहीं कर पाया है। इकोनॉमिक आपरेशन एण्ड डेवलपमेंट नामक एक संगठन के अनुसार, आयरलैण्ड में 24 प्रतिशत, स्पेन में 23 प्रतिशत,जर्मनी में 16 प्रतिशत इंग्लैण्ड में 15 प्रतिशत तथा फ्रांस में 12 प्रतिशत बेरोजगारी बढ़ी है। कनाडा, आस्ट्रेलिया, जर्मनी एवं न्यूजीलैण्ड भी इस समस्या से ग्रस्त हैं। इस संगठन के अनुसार खुली अर्थव्यवस्था का ही परिणाम है कि अर्जेण्टीना, ब्राजील, कनाडा, इटली, फ्राँस एवं स्पेन का मुद्राबाजार चरमरा गया है। मैक्सिको ने खुली अर्थव्यवस्था को अपनाकर विश्वव्यापार के शिखर को स्पर्श किया था, परन्तु उसी व्यवस्था ने इसे एक सप्ताह के अन्तराल में अपने पूँजी बाजार में 60 करोड़ डॉलर की शिकस्त दी। वहाँ की मुद्रा में 16 प्रतिशत की रिकार्ड गिरावट आयी।
पूँजीवादी देशों में आर्थिक मंदी मुख्य समस्या है। इससे मुक्ति पाने के लिए विश्व उपभोक्ता बाजार पर प्रभुत्व जमाने का प्रयास किया गया समाजवाद की अतिकेन्द्रित अर्थव्यवस्था से उत्पन्न निराशा ने पूर्वी यूरोप एवं एशिया को मुक्त बाजार की ओर प्रयाण करने की प्रेरणा बाजार की ओर प्रयाण करने की प्रेरणा भरी। पोलैण्ड में साम्यवादी तानाशाही से लोकतांत्रिक व्यवस्था में संक्रमण तो हुआ परन्तु यह परिवर्तन आर्थिक क्षेत्र में सम्भव नहीं हो सका। पोलैण्ड की राह पर रूस भी अग्रसर हुआ, परन्तु उसे भी निराशा हाथ लगी। रूस में बाजार अस्थिर आसमान छूने लगी। रूस में बाजार अस्थिर है तथा विदेशी मुद्रा भण्डार में लगातार कमी होती जा रही है। विगत वर्ष तक विदेशी निवेशकों की दृष्टि में वर्चस्व रखने वाले एशियाई देशों की अर्थ व्यवस्था भी एकाएक कमजोर हो गयी।
1997 के दिसम्बर माह में दक्षिण कोरिया अभूतपूर्व आर्थिक संकट में फँस गया था। वहाँ की मुद्रा में डॉलर के मुकाबले 50 प्रतिशत की भारी कमी आयी। दक्षिण कोरिया को 10 अरब डॉलर देकर उसको दिवालिया होने से बचाया जा सका, जबकि दक्षिण कोरिया ने 1985 से 1994 तक 8 प्रतिशत आर्थिक दर की की वृद्धि की। यहाँ की औसत आय 27 से 40 प्रतिशत तक पहुँच गयी, जो अमेरिका के बराबर है। 27 नवम्बर, 1997 को अपने देश को भी रुपये के अधिकतम अवमूल्यन का सामना करना पड़ा। चीन में भी कमोबेश समस्याएँ है। पाकिस्तान धीमी निर्यात वृद्धि तथा कर्ज के भार से दबता चला जा रहा है। अभी विश्व के 53 देश उदारीकरण को अपनाकर संकटग्रस्त है। 27 जनवरी, 1997 के न्यूजवीक अंक में शेल इण्टरनेशनल के मुख्य अर्थशास्त्री विनसेण्ट केबल ने स्पष्ट किया है। कि विश्व की वर्तमान अर्थव्यवस्था आन्तरिक भ्रष्टाचार एवं महँगाई के कुचक्र में बुरी तरह से फँस चुकी है।
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी खामी है-शेयर बाजार में लगातार होती अभूतपूर्व मन्दी। दस वर्ष के अन्तराल के बाद एक और काले सोमवार को न्यूयार्क शेयर बाजार में 7.2 प्रतिशत को ऐतिहासिक गिरावट देखी गयी। देश की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए अमेरिका राष्ट्रपति बिल क्लिन्टन को जनता को आश्वस्त करना पड़ा। हाँगकाँग शेयर बाजार की इस गिरावट ने न्यूयार्क, टोकियो, लन्दन, फ्रैंकफर्ट मनीला, सिंगापुर के शेयर बाजारों में अरबों डॉलर का नुकसान किया। अमेरिका की बिजनेस पत्रिका’ फोरबेस’ के अनुसार अमेरिका के पाँच धनाढ्यों को चार अरब डॉलर का नुकसान हुआ। भारत का शेयर बाजार भी इससे प्रभावित हुआ। पूरे विश्व में 700 अरब डॉलर की क्षति हुई।
एक ओर जहाँ विश्व को भारी आर्थिक उथल-पुथल से गुजरता पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर विश्व-आर्थिक एकीकरण का प्रयास भी अपना प्रभाव छोड़ रहा है। सारे विश्व को आर्थिक व्यवस्था के एक सूत्र में पिरोने के लिए विश्व-व्यापार संगठन की स्थापना हुई है- टाइम नामक विख्यात पत्रिका के आठ दिसम्बर, 1997 के अंक में इण्टरनेशनल मॉनीटरी फण्ड की स्थापना को एक अभूतपूर्व प्रयास कहा गया है। अमेरिका, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन फ्राँस तथा सऊदी अरब के सहयोग से स्थापित आई.एम. एफ. विश्व में आर्थिक रूप से संकटग्रस्त देशों को सहायता प्रदान करता है। इसी की सहायता प्रदान करता है। इसी की सहायता से मैक्सिको को आर्थिक मन्दी से उबारा जा सका। रूस, फिलीपीन्स, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया तथा थाइलैंड को भी इससे भारी सहायता मिली है। यूरोप के 15 देशों ने अपनी संकीर्ण सीमाओं को लांघकर आर्थिक एकीकरण की नयी मिसाल पेश की है। जनवरी, 2002 से पूरे यूरोप में ‘यूरो’ नाम से मुद्रा यूरोप में ‘यूरो’ नाम से मुद्रा का प्रचलन हो जाएगा। इसी के साथ 1 जनवरी, 1999 से यूरोपीय देशों के राष्ट्रीय बैंकों का विलय कर एकीकृत यूरोपीय सेन्ट्रल बैंक काम करने लगेगा। यह समूचे विश्व के आर्थिक एकीकरण की ओर एक सराहनीय कदम है।
अमेरिका, लैटिन अमेरिका, यूरोप के आर्थिक संगठनों के बाद एशिया में भी आफ्ता तथा नवनिर्मित बिस्टेक आदि संगठन विश्व-एकीकरण के प्रयास में संलग्न हैं। दक्षेस सम्मेलन में दक्षिण एशिया को सन् 2001 तक मुक्त-व्यापार क्षेत्र बनाने का संकल्प लिया गया।1997 में विश्व के 70 देशों में वित्तीय क्षेत्र खोलने पर ऐतिहासिक समझौता हुआ है। भारत का सम्बन्ध जापान, जर्मनी, ईराक से और भी सुदृढ़ हुआ है तथा यूरोप एवं अमेरिका के साथ सम्बन्धों में सुधार हुआ हैं भारत में नववर्ष की शुभागमन आर्थिक दृष्टिकोण से लाभप्रद रहा है। काले धन की बाहर निकालने के प्रयास में 31 दिसम्बर, 19 तक 31 हजार करोड़ रुपये की अघोषित सम्पत्ति जमा हुई, जिससे साढ़े दस हजार करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ।
आर्थिक संक्रमण के इस दौर में अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक विश्लेषकों को कुछ ऐसे संकेत मिल रहे है, जिसके अनुसार इक्कीसवीं सदी आर्थिक रूप से अमेरिका एवं यूरोप की नहीं वरन् एशिया की होगी। एशिया में तमाम विसंगतियों के बावजूद सम्बन्धित देशों की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई एवं इसका नागरिकों के जीवन -स्तर में सुधार हुआ है। सभी अर्थशास्त्री इस पर एकमत है। सारी दुनिया एक नूतन अर्थव्यवस्था की माँग कर रही है। राम मनोहर लोहिया के अनुसार पूंजीवादी-साम्राज्यवादी ढाँचे के अंतर्गत घटने वाली घटनाओं के कारण पूँजीवाद समाप्त हो जाएगा। जरनर प्लेण्डर ने अपनी बहुचर्चित कृति’ ए स्टेक इन द फ्यूचर’ में पूँजीवाद को समाप्तप्राय बताया है। इनके अनुसार विश्व एक नयी अर्थ-व्यवस्था की तलाश में है। प्रख्यात अर्थशास्त्री लेस्टर थूरों ने अपनी ख्यातिनामा पुस्तक ‘द फ्यूचर ऑफ कैपिटेलिज्म’ में उल्लेख किया है कि पूंजीवाद के ही प्रति आसक्ति टूटती जा रही है। आंतरिक संजय के व्यतिक्रम के कारण साम्यवाद समाप्तप्राय है। फोरानीक, रोमन मेडीवल एवं मेण्डोस्यिन अर्थतन्त्र भी कोई प्रभावी नहीं हो पा रहा है ऐसे में विश्व को स्थायी, मजबूत एवं सुदृढ़ अर्थव्यवस्था की आवश्यकता है।
स्पान पत्रिका के मई, 1994 अंक में पीटर एफ. डूकर ने इस नूतन अर्थ व्यवस्था के लिए भारत की ओर संकेत किया है। डूकर ने स्पष्ट किया है कि भारत के पास अथाह और अनन्त सम्पदा है। इसे सुनियोजित करने की आवश्यकता हैं। वाशिंगटन स्थित संस्था एक्सेक्युटिव इंटेलीजेन्स रिष्यु ने अपनी दो रिपोर्टों- ‘द यूरेसियन लैण्ड ब्रिज’ तथा’ दि न्यू रोड’ में विश्व में गहरे आर्थिक संकट की ओर संकेत करते हुए कहा है कि चीन और विशेष रूप से भारत ही इस संकट को दूर करने में सक्षम हो सकते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रबिल क्लिंटन के अनुसार भारत विश्व की दस महाशक्तियों में से एक श्रेष्ठतम महाशक्ति है। विश्व बैंक ने भी भारत को संसार की दस सम्भावित बड़ी आर्थिक शक्तियों में सबसे श्रेष्ठ माना है। अमेरिका के वाणिज्य मंत्री विलियम एम. डेली की मान्यता है कि भारत इक्कीसवीं सदी की महान अर्थशक्ति बनेगा। उन्होंने कहा कि भारत की वर्तमान अव्यवस्ि उसकी राह का रोड़ा नहीं बनेगी। निवर्तमान अमेरिकी राजदूत फ्रैंकवाइजनर ने स्पष्ट किया है कि भारत अगली शताब्दी में आर्थिक महाशक्ति के रूप में पदार्पण करेगा। यह आने वाले वर्षों में अग्रणी राष्ट्रों के समूह का नेतृत्व करेगा।भारत अगली शताब्दी में आर्थिक महाशक्ति के रूप में पदार्पण करेगा। यह आने वाले वर्षों में अग्रणी राष्ट्रों के समूह का नेतृत्व करेगा। भीतर में वर्तमान अमेरिकी राजदूत रिचर्ड एफ. सेलेस्टों ने भी भारत को विश्व की आर्थिक शक्ति के रूप में घोषित किया है। न्यूजर्सी से अमेरिकी सीनेट के उम्मीदवार एवं डेमोक्रेटिक पार्टी के रॉबर्ट जो टारिचेली जैसे भारत के आर्थिक महाशक्ति बनने की भविष्यवाणी की है। जर्मनी के विदेशमंत्री क्नास निकल ने भारत को एशिया एवं विश्व के अग्रणी राष्ट्र के रूप में उल्लेख किया है। उनके अनुसार इसकी भूमिका निर्णायक होगी। जर्मनी के प्रमुख राष्ट्रीय अखबार फ्रैकेफर्ट एलोमनी जीतंग, डयूशलैण्ड रेडियो बर्लिन और सेन्टर फॉर एप्लाइड पॉल्टिकल रिसर्च के संयुक्त सम्मेलन में वहाँ के रक्षामंत्री रुदे ने भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने के अपने वक्तव्य को बार-बार दुहराया।
विख्यात पत्रिका ‘टाइम’ के 25 मार्च, 1997 के अंक में भी भारतीय अर्थ व्यवस्था को विकासशील घोषित किया है। प्रसिद्ध उद्योगपति राहुल बजाज के अनुसार,भारत का भविष्य आर्थिक रूप से उज्ज्वल है। उद्योग संगठन फिक्की के महासचिव तथा देश के प्रमुख अर्थशास्त्री डॉ. अमित मित्रा ने उल्लेख किया है। कि भारत सन् 2020 तक विश्व का आर्थिक नेतृत्व करने में सफल हो जाएगा। महात्मा गाँधी के अनुसार भारत की भावी अर्थव्यवस्था ग्राम-स्वराज्य के रूप में होगी। उन्होंने आर्थिक पुनर्गठन के लिए सरलता, श्रमपूजा, सुखद कार्य संपन्नता तथा मानवमूल्यों, सुखद कार्य संपन्नता तथा मानवमूल्यों के सृजन एवं संचयन पर बल दिया है। एडमस्मिथ, जे.एस. मिल. रिकार्डो तथा माल्थहम आदि अर्थशास्त्री भी इस सत्य को स्वीकार करते है। गाँधीजी ने पूँजीवादी विरोधी नरपंथी एवं कार्लमार्क्स दोनों से आगे बढ़ते हुए ग्राम आधारित अर्थव्यवस्था तथा कुटीर उद्योगों पर जोर दिया है। योजना आयोग के पूर्व सदस्य जे. डी. सेठना, सुरेश देसाई, मार्क लूट्ज तथा ए. एम. हक जैसे अर्थशास्त्र विशेषज्ञों का मानना है कि गाँधी की मूल आर्थिक मान्यताओं को संशोधित कर आधुनिक अर्थतन्त्र को व्यावहारिक बनाया जा सकता है। आधुनिक भारतीय अर्थ-व्यवस्था पुस्तक के सम्पादक डॉ.एस.सी.गुप्ता के अनुसार, भारतीय प्रधान अर्थव्यवस्था होने के कारण इसकी जड़ें काफी गहरी है। इसी कारण भविष्य में इसकी समृद्धि संभावित ही नहीं, वरन् सुनिश्चित है। यद्यपि आज भारत की स्थिति द्वितीय विश्वयुद्ध से जर्जर जापान के समान एवं अमेरिका के समान विश्व की सार्वभौम महाशक्ति बन जाएगा। महायोगी श्री अरविन्द के शब्दों में “भविष्य का भारत अध्यात्म एवं धर्म के क्षेत्र में ही नहीं वरन् आर्थिक क्षेत्र में भी महाशक्ति अवश्य बनेगा।”
“इतिहास बताता है कि साधन-हीनता ने साधनों की विपुलता को पछाड़ा। इससे असमर्थों की साहसिकता देखते बनती है। यह चमत्कार मात्र अवतार ही कर सकते है। आदर्शों के लिए घाटा स्वीकार करते हुए लड़ मरने का साहसिकता का अनुदान अवतार के अतिरिक्त और किसी के पास होता ही नहीं।” परमपूज्य गुरुदेव प्रातःकाल सम्राट पुष्यमित्र के यज्ञ की समाप्ति हो चुकी थी। रात्रि का अतिथियों के सत्कार में नृत्योत्सव रखा गया। जब यज्ञ के ब्रह्ममहर्षि पतंजलि भी उसमें उपस्थित हुए तो उनके शिष्य चैत्र के मन में शंका उत्पन्न हुई अध्ययन में नहीं रमा।
एक दिन जब महर्षि चित्तवृत्ति निरोध में सहायक है? “द्रष्टा पतंजलि अभिप्राय मुस्कराए और बोले वत्स क्या नृत्य-संगीत और रास-रंग भी चित्तवृत्ति निरोध में सहायक हैं? “ द्रष्टा पतंजलि सभिप्राय मुस्कराए और बोले वत्स वास्तव में तुम्हारा प्रश्न तो यह है कि क्या उस रात को मेरा सम्राट के नृत्योत्सव में सम्मिलित होना संयमव्रत के विरुद्ध नहीं था, किन्तु ऐसा लगता है कि संयमव्रत के सही अर्थों को तुम नहीं समझे। सुनो सौम्य, आत्मा का स्वरूप है ‘रसौ वै सः किन्तु ऐसा लगता है कि संयमव्रत के सही अर्थों को तुम नहीं समझे। सुनो सौम्य, आत्म का स्वरूप है ‘रसौ वै सः उस रस का परिशुद्ध और अविकृत रखना ही संयम है। विकृति की आशंका से रसविमुख होना ऐसा ही है। जैसे कोई गृहिणी भिखारियों के भय से भोजन ही पकाना बन्द कर दे अथवा कोई कृषक भेड़-बकरियों के भय से खेती करना ही छोड़ दे। यह संयम नहीं पलायन है। आत्मघात का दूसरा रूप है। आत्मा को रसवर्जित बनाने का प्रयत्न ऐसा ही भ्रमपूर्ण है जैसे जल को तरलता से अथवा अग्नि को ऊष्मा से वियुक्त करना। इस भ्रम में मत फंसो वत्स। “जीवन व्यवहार में अध्यात्म का यह दृष्टिकोण समाहित कर लो तो तुम कुण्ठरहित जीवन जी सकोगे।”
महापरिवर्तन के इस वर्तमान युग में प्रकृति भी परिवर्तनों से अछूती नहीं रही है। सब ओर भयंकर उथल-पुथल मची हुई है। प्रदूषण के कहर ने वायु, जल जमीन किसी को नहीं छोड़ा है यह जहरीला जहर सभी को निगलता प्रतीत हो रहा हैं वायुप्रदूषण से धरती का सुरक्षा कवच तार-तार हो रहा है। फलस्वरूप पृथ्वी के तापमान में बढ़ोत्तरी होने से प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ गयी है। पर्यावरण के इस उलट-फेर से सारे संसार के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान लग गया है। इस आसन्न संकट के समाधान के लिए एक के बाद एक ढेरों अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन हो रहे है लेकिन कोई समुचित एवं कारगर समाधान न मिल पाने से जीवन के हर क्षेत्र में बेचैनी बढ़ती जा रही है।
वायुमंडल पर सर्वाधिक प्रभाव वायुप्रदूषण का है। इसके जिम्मेदार मुख्यतः औद्योगिक देश हैं। मानवनिर्मित ष्टह्र2 का 10 प्रतिशत केवल उत्तरी पैदा करते हैं। सन् 1988 में विश्व में 6255.9 लाख टन ष्टह्र2 वातावरण में छोड़ा गया। सन् 1989 में यह बढ़कर 9594.26 लाख टन ष्टह्र2 वातावरण में घुलती रहती है। 1990 से अब तक जापान से निकलने वाली ष्टह्र2 में 12 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। इसके अलावा आस्ट्रेलिया ने 8 प्रतिशत एवं अमेरिका ने 6 प्रतिशत की वृद्धि की है। वैसे जनसंख्या व प्रदूषण की वृद्धि की है। वैसे जनसंख्या व प्रदूषण के अनुपात में औसतन एक अमेरिकन नागरिक प्रतिवर्ष पाँच टन कार्बन हवा में छोड़ता है। यूरोपीय व जापानी नागरिक प्रतिवर्ष दोसे तन टन, चीन 0.6 टन एवं एक भारतीय 0.2 टन ष्टह्र2 वातावरण में छोड़ते है। इस तरह एक अमेरिकन 25 गुना अधिक पर्यावरण को प्रदूषित करता है।
कार्बनडाइ-आक्साइड मुख्यतः उद्योगों एवं वाहनों द्वारा उत्पन्न होती है। भारत में सन् 1950 में 1500 उद्योग थे, जो अब बढ़कर 20 लाख के ऊपर पहुँच गए हैं। यही नहीं अपने देश के महानगरों की गाड़ियां वर्तमान समय में प्रतिदिन 8 से 10,000 टन धुँआ उत्सर्जित करती है। वाहनों के प्रदूषण से उत्पन्न कार्बन मोनो आक्साइड होमोग्लोबिन में आक्सीजन से 210 गुना अधिक घुलनशील है। यह साँस के माध्यम से फेफड़ों में प्रविष्ट होकर साँस सम्बन्धी अनेकों रोग उत्पन्न करती है। इसके अलावा सुस्ती आँखों में जलन, खुजली, त्वचा में रूखापन, थकान, बेचैनी तथा हृदय रोगों की सम्भावना बढ़ जाती है। सेन्टर फॉर साइन्स एण्ड एन्वायरमेण्ट नामक पर्यावरणवादी स्वयंसेवी संगठन ने ‘स्लोमर्डर द डेहलीर स्टोरी ऑफ वेहिकुलर पॉल्यूशन्स नामक बहुचर्चित पुस्तक निकाली है। इसके अनुसार दिल्ली में 1995 में वायुप्रदूषण से हुई मौतों की संख्या 9900 है। यह संख्या कलकत्ता में 10700 है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार भारत के 36 शहरों में 1995 में 51,779 मौतें हुई। कलकत्ता, दिल्ली, मुम्बई, कानपुर और अहमदाबाद में सन् 1995 में भयावह प्रदूषण की वजह से पूरे देश की तुलना में दो तिहाई नवजात शिशुओं की मौतें हुई।
ओजोन मण्डल धरती का सुरक्षा कवच है, परन्तु बढ़ते विनाशकारी प्रदूषण है, परन्तु बढ़ते विनाशकारी प्रदूषण ने इसमें छेद कर डाला है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह छेद यूरोप महादेश जितना बढ़ा हो गया है। इससे सूर्य की प्रखर किरणें धरती की सतह के तापमान को बढ़ा देती हैं। इसे ग्लोबलवार्मिंग कहते हैं। वैज्ञानिक आकलन के अनुसार, ओजोन मण्डल प्रतिवर्ष पाँच प्रतिशत को दर नष्ट होता जा रहा है। इसके कारण धरती का तापमान प्रतिवर्ष 0.10 सेल्सियस बढ़ जाता है। ओजोन मण्डल को ष्टह्र2 तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन सबसे अधिक क्षति पहुँचाते है। ष्टह्र2 की उम्र सर्वाधिक होती है। यह एक बार उत्पन्न होने के बाद वातावरण में 100 साल तक सक्रिय रहती है। जबकि सी.एफ. सी. पैदा होने के 15 साल बाद ओजोन मण्डल में सक्रिय रूप से क्रियाशील होती है। एक अनुमान के अनुसार, पिछले 200 वर्षों में ष्टह्र2 एक तिहाई बढ़ चुकी है। इसी तीव्रता से बढ़ते जाने पर इक्कीसवीं सदी के वातावरण में इस गैस की मात्रा दो गुनी हो जाएगी। इससे धरती का तापमान काफी बढ़ जाएगा।
ओजोन परत के क्षतिग्रस्त होने से धरती पर पराबैगनी किरणों की बौछार बढ़ जाना स्वाभाविक है। इससे मानवशरीर की त्वचा की सबसे ऊपरी परत टूट जाती है। और पहली रक्तवाहिकाएँ भी नष्ट हो जाती हैं इन क्षतिग्रस्त कोशिकाओं से हिस्टामीन नामक रसायन कोशिकाओं से हिस्टीमीन नामक रसायन का स्राव॰ होने लगता हैं जो ब्रोकाइटिस, अल्सर व निमोनिया जैसी बीमारियों का करण हैं इस वजह से स्किन कैंसर की सम्भावना भी बढ़ जाती है। एक सर्वेक्षणानुसार ओजोन की मात्रा में एक प्रतिशत की कमी से प्रतिवर्ष 2 लाख, व्यक्तियों को स्किन कैंसर हो सकता हैं ओजोन मण्डल की ही क्षरण मोतियाबिन्द और रेटिना को भी खराब कर सकता है। इनसानों के साथ-साथ जानवरों की प्रतिरक्षाप्रणाली पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ता है।
कीटनाशकों के दुरुपयोग ने भी प्राकृतिक सन्तुलन में काफी उथल-पुथल मचाई है। इससे उपयोगी कीड़े-मकोड़ों एवं कीटाणुओं की कई प्रजातियाँ नष्ट हो रही हैं सन् 1950 में कीटनाशक नष्ट हो रही हैं सन् 1950 में कीटनाशक की खपत 2000 टन थी। आज लगभग 84 हजार कीटनाशक दवाएँ भारत के पर्यावरण में हर साल घुल रही है। अपने देश में प्रतिबन्धित होने के बावजूद डी.डी.टी.की कुल खपत 7500 टन प्रतिवर्ष है। चाहे लम्बे समय तक अपना भाव बनाए रखती है। इसके अलावा बी.एच.सी. मेथइस पैराफिन, इण्डोसल्फेन और डाई ब्रोमो क्लोरोप्रोपेन आदि घातक रसायनों के प्रयोग पर्यावरण को लगातार प्रभावित कर रहे है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. ओ.पी. लाल ने एक शोध रिपोर्ट में उल्लेख किया है। कि अधिक मात्रा में रासायनिक दवाओं के प्रयोग की वजह से जनसामान्य के मस्तिष्क, पाचन−तंत्र, छाती एवं स्नायुतन्त्र बुरी तरह से प्रभावित हो रहे हैं। प्राकृतिक असन्तुलन का एक बड़ा कारण वनों का विनाश भी है। इससे पर्यावरण में ष्टह्र2 गैस की असाधारण रूप से वृद्धि होती हैं वनों का लगभग 14 करोड़ हेक्टेयर हिस्सा हर साल उजड़ रहा है। विश्व में लगभग ढाई लाख वनस्पति प्रजातियाँ है। इसमें से 5050 प्रजातियाँ नष्ट हो चुकी है। 25,000 दुर्लभ किस्म की वनस्पतियाँ समाप्ति की ओर बढ़ रही है। इसके अलावा 15000 प्रजातियों को प्रदूषण का खतरा हैं इसके सर्वाधिक प्रभाव यूरोप, आस्ट्रेलिया, अमेरिका तथा न्यूजीलैण्ड में हो रहे हैं। बन-विनाश का भारी असर जीवधारियों पर भी है। सन् 1990 के ह्रश्वष्टष्ठ आँकड़ों के अनुसार विश्व में 115 स्तनधारी जीव एवं 171 पक्षियों की प्रजातियाँ नष्ट हो चुकी है। 100 प्रजाति प्रतिवर्ष की दर से विलुप्त होती जा रही है। यही स्थिति रही तो धरती इन जीवों से शून्य हो जाएगी। वन-विनाश की तीव्रता से अमेरिका का ग्रेट प्लेन क्षेत्र रेगिस्तान में बदल गया है।
जल प्रकृति का मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण घटक है। आज पृथ्वी की समस्त घटक है। आज पृथ्वी की समस्त जलराशि में 0.8 प्रतिशत ही मनुष्य के पीने लायक हैं वर्तमान विश्व की स्थिति यह है। कि 2 अरब लोगों को स्वच्छ जल नहीं मिल पाता है जबकि हर 21 साल में पानी की माँग दुनिया में दो गुनी हो जाती है। 22 देश ऐसे है जो पानी के अभाव से बुरी तरह त्रस्त हैं 18 देशों में सुखा पड़ जाता है। जल-प्रदूषण की स्थिति भयावह होती जा रही है। लगता है आगामी समय में कही जल को लेकर महायुद्धों की नौबत न आने लगे। अपने ही देश के 21 प्रमुख शहर अपना कचरा सीधे समुद्र में उड़ेलते है। इनकी सम्मिलित मात्रा 24.921 लाख लीटर है, जो जल तत्व को प्रदूषित किए जा रही है।
सब ओर संव्याप्त इस प्रदूषण ने धरती के तापमान को बढ़ा दिया है। वैज्ञानिकों को आशंका है कि यदि इस तापमान में कुछ और वृद्धि हुई तो ध्रुवों में सदियों से जमे हुए विशाल हिमखण्ड पिघलने लगेंगे। जिससे समुद्र का जल स्तर बढ़ जाने से महासागरों के तटीय क्षेत्र जलमग्न हो जायेंगे। मालदीव जैसे इलाकों के लिए तो यह भयंकर खतरे का संकेत है। समुद्र स्तर में मात्र दो मीटर की बढ़ोत्तरी से समूचा मालदीव समुद्र में डूब जाएगा। इन परिस्थितियों से अपना महादेश भी अछूता नहीं है। यहाँ का भी एक बड़ा भू-भाग समुद्र से मिलता है, अतः यहाँ के तटीय क्षेत्र भी सुरक्षित नहीं है। अफ्रीका में ब्रेनिन खाड़ी तट की भूमि बराबर जलमग्न होती जा रही है। पिछले पचास सालों से धाना में क्वेटा निवासियों को इसी कारण विस्थापित होना पड़ा रहा है। ग्रेंड पोपो में कोकोआ बाग का दो कि. मी. अन्दर का भाग समुद्र के गर्भ में समा गया है। अमेरिका, कनाडा तथा यूरोप को इस आशंकित जलप्रलय का सबसे अधिक समाना करना पड़ सकता है।
यही क्यों मौसम की बिगड़ती स्थिति भी व्यापक प्राकृतिक परिवर्तनों का संकेत है। मौसम की इस विकराल प्रवृत्ति को अलनीनों कहते है। एक अमेरिकी मौसमविद् एन्टस लीनमा का कहना है कि वर्तमान समय शताब्दी का सबसे शक्तिशाली अलनीनों देख रहा हैं अन्य अमेरिकी वैज्ञानिकों के अनुसार इसका उफान प्रशान्त महासागर में उठता है तथा इसका प्रभाव एशिया, अफ्रीका, दक्षिणी तथा उतरी अमेरिका में होता है। इसी की वजह से कींस खा, तो कही बाढ़ आ रही हैं अलनीनों का विनाशकारी प्रभाव 1982-83 में हुआ था। इस वर्ष 2000 व्यक्ति मारे गये तथा 2 अरब डॉलर की क्षति हुई। यह सब पृथ्वी के तापमान में वृद्धि के कारण हो रहा है। 1996 अक्टूबर में कैलीफोर्निया तट तथा आसपास बहुत असामान्य मौसम रहा-तूफान, वर्षों और बाढ़ ने यहाँ जो तबाही मचाई, उसने पिछले सभी रिकार्डों को ध्वस्त कर दिया है। इंडोनेशिया में सूखा की स्थिति अभी से नजर आ रही है। इथेपिया तो इसका ज्वलन्त उदाहरण है। भारत में उड़ीसा का कालाहाण्डी क्षेत्र सूखा के लिए प्रख्यात हो चुका है।
समुद्री चक्रवात का विश्व में सर्वाधिक प्रभाव बंगलादेश पर हुआ है। सर्वाधिक प्रभाव बंगलादेश पर हुआ है। यहाँ पर 1970 में 3 लाख लोग मारे गये थे। सन् 1995 में 11,000 तथा 1999 में 2 लाख लोगों की जाने गयी, सन् 1974 में लुईसुइना में समुद्री तूफान ने 10,000 लोगों की जाने ली। 1979 में फ्लोरिडा में 2400 तथा 1988 में मैक्सिको में 534 व्यक्ति मारे गए। सन् 1976 में सेलवेस समुद्र में 30 मीटर की लहरें उठी, जिसमें फिलीपीन्स के 5,000 लोग काल के गाल में समा गए। इसी प्रकार 1979 में इंडोनेशिया के समुद्र में 10 मीटर की ऊँची लहरों के उठने से 187 लोग तथा 1983 में जापानी समुद्र से उठीं 15 मीटर की समुद्री तरंगें 1078 लोगों को समुद्र में खींच ले गयीं। 1997 में अपने ही देश के आन्ध्रप्रदेश में आये समुद्री तूफान की चपेट में 1 हजार लोगों की मृत्यु हो गयी। इसी वर्ष कनाडा के क्यूबेक प्रांत में आए बर्फीले तूफान से हुई तबाही तो अवर्णनीय है।
समुद्री चक्रवातों को ही तरह प्रचण्ड 1 दिसम्बर, 1997 में पूर्वांचल में तूफानी चक्रवात आया, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। हजारों मकान एवं पेड़ धराशायी हो गए यातायात अस्त−व्यस्त हो गया। इस तूफान की चपेट में बनारस पूर्वी उत्तर प्रदेश के चन्प्दौली, आजमगढ़, सुल्तानपुर, मऊ तथा बिहार के कुछ इलाके आए। यह तूफानी चक्रवात इतना भयंकर था कि इससे 10 किमी. चौड़े तथा 100 किमी. लम्बे क्षेत्र में भयावह एवं विकराल स्थिति पैदा हो गयी। 5 किलों से लेकर 20 किलों तक बर्फ के टुकड़े आसमान से गिरें। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार इन क्षेत्रों में यह पहली ऐसी घटना थी।
पिछले पाँच सालों में बादल फटने की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई है। 1997 में टिहरी में बादल फटने से काफी जान-माल का नुकसान हुआ। बड़ी संख्या में मवेशी एवं फसल दबकर नष्ट हो गए। लगभग 5 करोड़ की क्षति हुई। यहाँ पर बादल फटने से आयी अचानक बाढ़ ने तबाही मचा दी। शिमला में बादल फटने से आंध्रा नदी में भयंकर बाढ़ आ गयी थी।, जिसमें 139 आदमी बह गए। सुप्रसिद्ध वनस्पतिविज्ञानी प्रोफेसर आदित्य नारायण पुरोहित के अनुसार बादल फटने की ये बेशुमार घटनाएँ वृक्षों की अंधाधुन्ध कटाई का ही परिणाम है।
वृक्ष कटने से जो प्राकृतिक असन्तुलन पैदा होता है- भूस्खलन भी उसी का परिणाम है। इससे पर्वतवासियों को भारी संकट का सामना करना पड़ता है। वर्षों या बादल फटने से पहाड़ खिसककर नदी में गिर जाते है। इससे स्थाई झील बन जाती है। एवं इस झील के फटने-फूटने से भयंकर तबाही शुरू हो जाती है। पिथौरागढ़ में 1977 में भूस्खलन से 44 लोग मरे। प्रख्यात पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा के अनुसार पिछली शताब्दी में गंगोत्री ग्लेशियर केवल 7.3 मीटर घटा, जबकि इस शताब्दी में 1990 तक 4 कि.मी. पीछे खिसक चुका है।
सरकारी सर्वेक्षणों के अनुसार अपने देश में सन् 1951 में बाढ़ग्रस्त भूमि की माप 1 करोड़ हेक्टेयर थी। 1960 में यह बढ़कर करोड़ हो गयीं। वर्ष 1996 में सात करोड़ हेक्टेयर जमीन बाढ़ग्रस्त हुई। इस बाढ़ में साढ़े नौ हजार से अधिक लोगों के मरने, तीन लाख मकान ढहने तथा चार लाख हेक्टेयर रबी की फसल नष्ट होने की घटनाएं हुईं। इसी वर्ष हिमांचल, केरल, बिहार, और मेघालय में आँधी-बाढ़ से सैकड़ों लोगों की जाने गयी और हजारों बेघर-बार हुए। असम की ब्रह्मपुत्र नदी में आयी बाढ़ ने जो विप्लव मचाया, उससे 500 गाँवों में खड़ी फसल वाली 18 हजार हेक्टेयर भूमि समेत 44 हजार हेक्टेयर भूमि समेत 55 हजार हेक्टेयर भूमि समेत 55 हजार हेक्टेयर से अधिक भूक्षेत्र प्रभावित हुआ। प्रकृति में इन दिनों जो व्यापक उथल-पुथल चल रही है, उसके प्रभावों एवं परिणामों की सीमा नहीं हैं इसका सर्वाधिक व्यापक प्रभाव भूकम्प के रूप में देखा जा सकता हैं भूकम्प के इतिहास में चीन इस त्रासदी का सबसे बड़ा उदाहरण है। 1976 में वहाँ आए भूकम्प से 2 लाख, 42 हजार लोगों की मृत्यु हुई। 1978 में ईरान 40,000 तथा फिलीपीन्स की दो घटनाओं में 3253 व्यक्ति मारे गए। 1991 में उत्तरकाशी में आए तीव्र भूकंप के झटकों ने सब कुछ उलट-पुलट कर रख दिया। 1993 में पाकिस्तान में 1300 लोग तथा रूस में इस क्रम में सैकड़ों को जान से हाथ धोना पड़ा।1992 में तुर्की में 2000 तथा कमरों में 500 लोग भूकम्प से मृत्यु को प्राप्त हुए। 1993 में महाराष्ट्र के लातुर एवं उस्मानाबाद में आए भूकम्प ने हजारों की मौत के मुँह में धकेल दिया। 1995 में भूकम्प ने 5000 लोगों की जाने ली तथा 10 मई, 1997 को ईरान में 2400 लोग भूकम्प के तेज झटकों की चपेट में आए। मई, 1997 को ही मध्यप्रदेश के जबलपुर इलाके में आए भूकम्प से सैकड़ों लोग मारे गए, 421 गाँव एवं घर नष्ट हो गए। इस तबाही से एक अरब 31 करोड़ रुपये की सम्पत्ति बर्बाद हो गयी।
प्रकृति एवं पर्यावरण में जो परिवर्तनों का दौर चल रहा हैं, उसके प्रभाव से 1997 का दौर चल रहा है, उसके प्रभाव से 1997 एवं 98 के प्रारम्भिक महीनों की ठण्ड ने पिछले सारे रिकार्ड तोड़ दिये। 1 दिसम्बर, 1997 को हुआ मंसूरी में भयंकर हिमपात, सत्रह वर्षों के बाद इतने शीघ्र एवं प्रचण्ड रूप से हुआ है। 1998 की जनवरी में पहाड़ों पर धूप व मैदानी इलाकों में बर्फीले पर धूप व मैदानी इलाकों में बर्फीले कुहासे ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया है। समूचे हिमांचल प्रदेश में भी इतनी जल्दी हिमपात प्रदेश में भी इतनी जल्दी हिमपात होने का रिकार्ड कायम हुआ। दिल्ली की ठण्ड ने तो 30 सालों की ठण्ड को पीछे छोड़ दिया। पहाड़ी इलाकों की बात जाने भी दे तो मैदानी इलाकोँ में ठण्ड शून्य से -2 डिग्री सेल्सियस तक जा पहुंची।
प्रकृति में हो रही इस अभूतपूर्व उथल-पुथल एवं परिवर्तनों से सारा विश्व चिन्तित एवं परेशान है, इसलिए विभिन्न पर्यावरण सम्बन्धी अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में धरती का प्रदूषण मुक्त करने की योजनाएँ बनायी जा रही हैं। सन् 1992 में रियोडी जेनेरा के पृथ्वी सम्मेलन में अनेक रचनात्मक योजनाओं एवं कार्यक्रमों की घोषणा की गयी। इसी के सार्थक प्रयास के कारण आज ओजोन मण्डल को बचाने का जबरदस्त अभियान शुरू हो सका है। ओजोन परत की रक्षा के लिए मिथाइल ब्रोमाइड बन्द करने हेतु सितम्बर, 1997 में मांट्रियल में सौ से अधिक देशों ने समझौता किया है। औद्योगिक देश 2005 तक इसके उत्पादन को बन्द कर देने के लिए सहमत हुए है। अमेरिका स्थित ‘वर्ल्डवाच इन्स्टीट्यूट’ नामक एक संस्था के अनुसार सी.एफ.सी. गैस के उत्पादन में 1988 से अब तक 46 प्रतिशत की गिरावट आयी है। कई अन्य देशों की कम्पनियों ने भी दिशा में सकारात्मक रुख अपनाया है।
पर्यावरण सुधार के लिए दिसम्बर, 1997 में हुए जापान के क्योटों सम्मेलन को भी ऐतिहासिक समझा जाएगा। विश्व के 14 देशों ने इक्कीसवीं सदी में धरती को प्रदूषण मुक्त करने का फैसला किया। इसके अलावा यूरोप, अमेरिका और जापान सहित 21 देश ग्रीनहाउस गैसों की कटौती पर सहमत हो गए है। इस समझौते का सभी पर्यावरणविदों ने स्वागत किया हैं दिसम्बर, 17 में भारत में हुए इंडियन एसोसिएशन ऑफ पार्लियामेटेरियन्स ऑन पापुलेशन एण्ड डेवलपमेंट के दो दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में 13 देश के राजनीतिज्ञों ने भाग लिया। इन सभी ने विश्व को जलप्रदूषण से मुक्त कराने के कारगर कार्यक्रम की घोषणा की। पिटर स्वाँट्ज ने ‘द आर्ट ऑफ द लाँग व्यू ‘ में पर्यावरण के प्रति हाल में ही पैदा हुई सकारात्मक सोच का उल्लेख करते हुए कहा है, धीरे-धीरे ही सही पर ऐसी सम्भावनाएँ लगातार बन रही हैं, जिन्हें देखकर लगता हैं कि भविष्य में पर्यावरण स्वच्छ हो सकेगा। ‘वर्ल्ड लाइफ एण्ड फण्ड’ के एडम मार्क हेत ने भी इस सकारात्मक सोच का आशाजनक माना है।
इस बदली हुई सोच का उन दैवी प्रयासों की सफलता का एक अंश माना जा सकता है, जिसकी शुरुआत परमपूज्य गुरुदेव ने आज से लगभग एक दशक पूर्व अपनी सूक्ष्मीकरण साधना के माध्यम से की थी। उन्हीं के शब्दों में, अभी बीसवीं सदी के शेष वर्ष ऐसी ही उखाड़ -पछाड़ से भरे है, जिनमें घटाएँ, घुमड़ती, बिजली कड़कती और अनिष्ट की सम्भावना उतरती दीख पड़ेगी। पर अन्ततः इक्कीसवीं सदी में विश्व की, राष्ट्र की कुण्डलिनी जाग्रत होने का प्रभाव इस रूप में देखा जा सकेगा। कि उससे जड़ पदार्थ, जीवनधारी मनुष्य एवं परिस्थितियों के प्रवाह प्रभावित होंगे।
मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी, खनिजों के भण्डार तथा उत्खनन का अनुपात बढ़ जाएगा। धातुएँ मनुष्य की आवश्यकताओं से अधिक ही उत्पन्न होगी। खनिज तेलों की कमी न होगी। वृक्ष-वनस्पति उगाने के लिए मनुष्य को अधिक प्रयास नहीं करना पड़ेगा। वे प्रकृति की हलचलों से ही उपजते और बढ़ते रहेंगे वनौषधियाँ फिर प्राचीनकाल की ही तरह इतनी गुणकारक होगी कि चिकित्सा के लिए बहुमूल्य उपचार न ढूँढ़ने पड़ेंगे। जलवायु में पोषक तत्व बढ़ेंगे और वे प्रदूषण का परास्त कर देंगे। मलीनता घटेगी और शुद्धता अनायास ही बढ़ेगी प्रकृति-प्रकोपों के समाचार यदा-कदा ही सुनने को मिलेंगे। बाढ़-सूखा। अकाल महामारी, भूकम्प, ज्वालामुखी विस्फोट ओलावृष्टि आदि हानिकारक उपद्रव प्रकृति के अनुकूलन से सहज ही समाप्त होते चले जाएँगे। प्राकृतिक सन्तुलन एवं विधेयात्मक परिवर्तन के इस प्रवाह की शुरुआत इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक के उत्तरार्द्ध में ही दिखाई देने लगेगी। पर्यावरण-संकट का समाधान करके ही रहेगी।
समस्त विश्व प्रबल परिवर्तन के गतिचक्र में तीव्रता से धूम रहा है। समाज, राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले परिवर्तनों की झलक साफतौर पर देखी जा रही है। इस बदलाव से चिकित्सा जगत भी अछूता नहीं हैं विगत कुछ दशकों पूर्व चिकित्सा और चिकित्सकों का संसार एलोपैथी के आकर्षण में बुरी तरह फँस गया था, परन्तु आकर्षण का यह मोहजाल अब टूटता-बिखरता प्रतीत हो रहा हैं इसके दुष्प्रभावों से छटपटाते इनसान और समाज पुनः प्रकृति की ओर वास कदम बढ़ा रहे है। बदलाव की ओर बढ़ते इन कदमों परिणामस्वरूप सारे विश्व में सरल, सहज एवं समग्र चिकित्सा का यह बदलता हुआ प्रतिमान स्पष्ट संकेत करता है। कि आयुर्वेद प्रणाली ही भावी विश्व की चिकित्सा-पद्धति बनेगी?
हालांकि एलोपैथी का प्रारंभिक आकर्षण बड़ा ही तीव्र एवं प्रबल होता है। सम्भवतः इसीलिए यह काफी लोकप्रिय भी हुई। इस लोकप्रियता के साथ इस क्षेत्र में नए-नए शोध-अनुसंधान होने लगे। सन् 1928 में अलेक्जेंडर फ्लेमिंग द्वारा पेनिसिलीन की खोज को एलोपैथी चिकित्साजगत में एक वरदान माना गया, परन्तु सन् 1940 तक अति-अति इसका वास्तविकता सामने आ गयी। यह प्रयोग तीव्र प्रतिक्रियात्मक होने की वजह से प्रायः असफल सिद्ध हुआ। एलोपैथी दवाएँ रोग को दबा देती है। परिणामस्वरूप दवा का असर समाप्त होते ही रोग के जीवाणु और तीव्रता से आक्रमण शुरू कर देते है। एण्टीबायोटिक दवा के विरुद्ध जीवाणु एन्जाइम बनाते हैं। यह विरुद्ध जीवाणु एन्जाइम बनाते हैं। यह एन्जाइम एंटीबायोटिक के प्रभाव को कम करने लगते है। इस इस तरह सभी जीवाणु मिलकर इस दवा के प्रयोग के अनुपात में इसकी प्रतिरोधी क्षमता में वृद्धि करते है। दवा के प्रयोग के अनुपात में इसकी प्रतिरोधी क्षमता भी बढ़ती जाती है। एक जीवाणु कई प्रकार की एण्टीबायोटिक दवा के खिलाफ प्रतिरोध हो जाता है। चिकित्सकों के पुरोध हो जाता है। चिकित्सकों के अनुसार, 15 प्रतिशत जीवाणुओं में यह क्षमता पैदा हो गयी है। कुछ जीवाणुओं ने तो इतनी उच्चश्रेणी की प्रतिरोधक क्षमता अर्जित कर ली है। कि उन पर किसी भी दवा का कोई असर नहीं होता। इस तरह असरहीन एण्टीबायोटिक दवाएँ शरीर में अपने दूसरे प्रकार के दुष्प्रभाव छोड़ने लगती है।
एलोपैथी का असर तो तत्काल दिखता है, परन्तु कुछ समय के पश्चात पुराने रोग के स्थान पर एक नया रोग पनपने लगता है। रोग और दवा नया रोग पनपने लगता हैं रोग और दवा का बढ़ता क्रम मानवीय प्रतिरक्षाप्रणाली को समाप्त करके ही रुकता है। आज सारे संवेदनशील चिकित्सक इसके घातक परिणामों के प्रति चिन्तित एवं परेशान दिखाई पड़ रहे है। अमेरिकी वैज्ञानिकों के अनुसार, एलोपैथी पुँसत्वहीनता को बढ़ाती है। अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्राँस जापान, रूस एवं जर्मन आदि देश अत्यधिक मात्रा में एलोपैथी के ट्रैक्वेलाइर्ज-एलोपैथी के टै्रक्वेलाइजर्स-एण्टीडिप्रेसेण्ट्स के अत्यधिक सेवन के कारण इस चपेट में आ गए है। प्रसिद्ध अमेरिका वैज्ञानिक एवं चिकित्सक डॉ. डब्ल्यू. हिक्स ने अपने शोध ग्रन्थ’ रिवोल्ट अगेन्स्ट डॉक्टर्स’ में एलोपैथी चिकित्सा को जनस्वास्थ्य के लिए घातक बताया है। डॉ. नार्मनवार्न एलोपैथी के दुष्प्रभाव को रेखांकित करते हुए कहते है। कि वर्तमान समय में एलोपैथी अपना प्रभाव खो चुकी है। इन दवाओं से अत्यधिक साइड इफेक्ट्स (दुष्प्रभाव) होने की सम्भावना होती हैं इसलिए हर व्यक्ति इनके सेवन से पूर्व आशंकित एवं सशंकित दिखता है।
एण्टीबायोटिक दवाओं के बारे में चिकित्सकों की मान्यता है कि शायद ही ऐसी कोई एण्टीबायोटिक दवा हो, जिसका शरीर में कोई साइड इफेक्ट न होता हो। यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल न होता हो। यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज के प्रोफेसर डॉ. अशोक ग्रोवर ने अपने सर्वेक्षण के पश्चात कुछ वर्ग की दवाओं के दुष्प्रभावों की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की थी इनके अनुसार, पोनिसिलीन वर्ग की दवाओं से मृत्युसंकट का सामना करना पड़ सकता हैं यह बुखार डायरिया तथा किडनी के रोगियों के लिए मिर्गी जैसी बीमारी पैदा कर सकती हैं स्ट्रेप्टोमाइसिन के प्रयोग से आँखों एवं कानों में विकार उत्पन्न होता है। टेट्रासाइक्लिन वर्ग की दवाओं से चमड़े में चकत्ते, स्किन एलर्जी, जी मिचलाना, उल्टी-दस्त आदि हो सकते है। सल्फा वर्ग की दवाई बुखार एवं पीलिया को आमंत्रण देती है। क्लोरोमाइसिटीन से एनीमिया, इरथ्रोमाइसिन से जीव मिचलाना, उल्टी आना तथा जिगर में सूजन आदि की संभावना रहती है।
इसी तरह अमाइलोग्लाइको वर्ग की दवाएँ मरीज के गुर्दे एवं श्रवणतंत्र पर अपना असर छोड़ती है। क्लोरोस्पोनिकाले हड्डियों के द्रव में गड़बड़ी पैदा करती है। इससे शरीर सूखने लगता है। एस्प्रिन पेट करती है। गर्भवती महिलाओं द्वारा इसका उपयोग करने पर नवजात शिशु का वजन कम हो जाता हैं यदा-कदा इसी वजह से बच्चों में ‘राईसिडल’ नामक खतरनाक बीमारी के लक्षण भी सामने आए हैं विकार पैदा करती है, जिससे अल्सर होते को देखते हुए अमेरिका, ब्रिटेन सहित कई देशों ने इन दवाओं को प्रतिबन्धित कर दिया है सन् 1983 में ल्यूटा प्राक्सीवान, कार्ब्यूटाइल एवं फटिजैसिक औषधियों को इनकी शारीरिक-प्रतिक्रिया के कारण प्रतिबन्धित कर दिया गया था। इस दवाओं प्रतिबन्धित कर दिया गया था। इन दवाओं के प्रयोग से कैंसर, लकवा, विकलाँगता व नेत्रहीनता में वृद्धि होती हैं इन घातुओं दवाओं के कारण मृत्युदर में भी बढ़ोत्तरी हो रही हैं
कुछ साल पूर्व वेदनाहीन प्रसव के लिए थियोडेलॉमाइड्स ने विश्वव्यापी ख्याति प्राप्त कर ली थी, परन्तु इसके प्रभाव इसे प्रतिबन्धित किया गया। इसी तरह क्लोरोफेनिकल जैसी एण्टी एलर्जिक दवाओं ने भी काम नुकसान नहीं किया। इसी तरह प्रायः दस्त रोकने से लेकर जोड़ो का दर्द कम करने वाली सभी दवाएँ ऐसी हैं जो घातक एवं विषैला प्रभाव छोड़ती है। ये औषधियाँ मानवरक्त को प्रदूषित करती है।
इस कारण लकवा, कैंसर, विकलाँगता जैसे भयानक रोगों का जन्म होता है लगातार इनका प्रयोग शरीर की रोगप्रतिरोधी क्षमता को समाप्त कर देता है, साथ ही इनसे शारीरिक एवं मानसिक विकृतियों में भारी वृद्धि होती है। इन्हीं कारणों से विकसित देशों में इन दवाओं पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है।
ज्यादातर ऐलोपैथी दवाएँ मारक अस्त्र नहीं है जो विषाणुओं को तो मारे, परन्तु स्वस्थ कोशिकाओं को संरक्षण दे सके। इन दवाओं का प्रभाव अभी तक हानिकारक ही सिद्ध हुआ हैं इससे रोगी की प्रतिरोधक क्षमता घट जाने से रोगी पर दवा का असर ही नहीं होता इसीलिए इवान इलिच ने ठीक ही कहा है एलोपैथी रोग एवं रोगी दोनों को समाप्त कर देती है। अपोलो अस्पताल चेन्नई के वरिष्ठ डॉक्टर के. हरनाथ के अनुसार, इन दवाओं से श्वसन सम्बन्धी संक्रामकता बढ़ रही है। विस्कोसिन हॉस्पिटल एण्ड क्लीनिक अमेरिका के डायरेक्टर डॉ. ली. वर्मेल्यून ने कहा है। कि एलोपैथी दवाएँ संरक्षात्मक होने की बजाय विघटनकारी होती जा रही हैं इसीलिए ये दवाएँ आधुनिक मानव-समाज पर प्रायः दवाएँ आधुनिक मानव-समाज पर प्रायः प्रभावहीन होती जा रही है। एलोपैथी की इन असरहीन दवाओं के कारण आज टी.बी.के जीवाणु फिर से सक्रिय हो उठे हैं। प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका साइंस के अनुसार आज के जीवाणु इन दवाओं से कीं अधिक चालक एवं चतुर हो गए है। अमेरिका जैसे विकसित देशों में टी.बी.की धीमी वृद्धि हर साल रिकार्ड की जा रही है। क्लोरोक्वीन द्वारा मलेरिया की समाप्ति का सपना समाप्त हो गया है। मलेरिया की नयी दवाएँ भी प्रभावहीन हो रही है। इक्वेडोर में कालरा का प्रकोप बहुत अधिक व विविध रूपों में बढ़ गया हैं अफ्रीका तथा दक्षिण व मध्य अमेरिकी देशों में भी ऐसा तमाम बीमारियाँ है जिन पर अत्याधुनिक दवाएँ भी कारगर नहीं हो पा रही है।
पुरानी बीमारियाँ एक बार फिर से सक्रिय हो रही है। ऑल इण्डिया मेडिकल इंस्टीट्यूट के वी. रामलिंगम स्वामी के अनुसार, एलोपैथी और विषाणुओं के संघर्ष में विषाणु और विषाणुओं के संघर्ष में विषाणु बहुत भारी पड़ रहे है। श्री रामचन्द्र मेडिकल कॉलेज एण्ड रिसर्च इन्स्टीट्यूट की प्रोफेसर डॉ. विजय लक्ष्मी धानाशंकरन कहती है। कि एलोपैथी अविश्वसनीय होती जा रही साया बनकर आती है चेन्नई के वरिष्ठ सर्जन डॉ. एस. रामकृष्णन ने भी एलोपैथी दवाओं पर गम्भीर चिन्ता प्रकट की है। विश्वस्वास्थ्य संगठन के सर्वेक्षण से पता चलता है कि एशिया और अफ्रीका देशों में एलोपैथी दवाओं का सर्वाधिक दुष्प्रभाव हो रहा है। इन देशों में ऐसी बीमारियां फैलने लगी है। जिनका समाधान इन दवाओं द्वारा सम्भव नहीं है। यह मुद्दा समस्त चिकित्सा जगत के सामने चुनौती बनकर खड़ा हो गया है।
आधुनिक चिकित्सा-पद्धति की असफलता एवं असमर्थता से त्रस्त दुनिया ने चिकित्सा के प्रचलित मानदंडों को बदल डालने के लिए कमर कस ली है। उसके कदम प्राकृतिक जीवन की ओर मुड़ने लगे है। अजा समूचे विश्व में आयुर्वेद की प्राचीन परम्परा के प्रति आस्था और विश्वास बढ़ रहा है। अब सभी यह जानने लगें है कि आयुर्वेद एक ऐसी प्रणाली है, जो सहजता से समग्र उपचार कर देती है। यह मानवीय काया की विकृति को समूल नष्ट करके सुखी एवं समुन्नत जीवन जीने का उपाय भी सुझाती है। इससे किसी प्रकार की कोई निषेधात्मक प्रतिक्रिया नहीं उत्पन्न होती। इन्हीं सब अमूल्य विशेषताओं के कारणों से विश्व में इसका प्रचलन एवं लोकप्रियता बढ़ रही है। अब श्रीलंका, माँरीशस, नेपाल आदि देशों में आयुर्वेद को राजकीय मान्यता प्राप्त है।
इसके अतिरिक्त अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्राँस, जर्मनी, जापान, आस्ट्रिया आदि देशों में भी आयुर्वेद के कई संचालित हो रहे है। सन् 1990 में मानीशस में अंतर्राष्ट्रीय आयुर्वेद सम्मेलन हुआ था। इसका परिणाम उत्साहवर्द्धक रहा हैं इसके ठीक एक वर्ष पश्चात नेपाल में सितम्बर, 1999 में भी अन्तर्राष्ट्रीय आयुर्वेद सम्मेलन का आयोजन हुआ। इसमें चीन, डेनमार्क, मारीशस तथा अन्य कई देशों के 400 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में आयुर्वेद चिकित्सा की विभिन्न विधाओं, विकासात्मक प्रवृत्तियों तथा आयुर्वेद को विश्वव्यापी बनाने के लिए विस्तारपूर्वक चर्चा की गयी। मारीशस एवं नेपाल की भाँति इंडोनेशिया में 1992 में तीसरा अन्तर्राष्ट्रीय आयुर्वेद सम्मेलन आयोजित हुआ था।
यों प्राचीन समय से ही आयुर्वेद विदेशों में प्रचलित रहा है इसके प्रमाण वर्षों पूर्व प्रकाशित डॉ. जौलजी की इंडियन मेडिसन नामक आयुर्वेद ग्रन्थों में खोजे जा सकते है। इन ग्रन्थों में आयुर्वेद की विषयवस्तु तथा इसके सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन किया गया है। अब तो चिकित्सापद्धति के इस महापरिवर्तन काल में इसकी लोकप्रियता दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं एक सर्वेक्षण से पता चला है। कि 20 राष्ट्रों के 180 से भी अधिक डॉक्टर आयुर्वेद चिकित्सा का प्रयोग करने लगे है। एशिया के प्रायः सभी देश इस परम्परा को अपनाए हुए है। अमेरिका, फ्राँस, जर्मनी, इटली, आदि देशों में आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार में विगत एक दशक में काफी तेजी आयी है। श्रीलंका में आयुर्वेद के विकास और नवीनतम अनुसंधान को काफी प्राथमिकता दी जाने लगी हैं
आज की तिब्बती चिकित्सा का मूल आधार आयुर्वेद ही है। तिब्बती चिकित्सा में शरीर के नौ छिद्र तथा नौ सौ नसों व त्रिदोष की कल्पना आयुर्वेद की ही देन है। इसमें भी आधुनिकता का समावेश करके इसका अधिकाधिक प्रचलन किया जा रहा है। ईरान और अरब में भी इस चिकित्सा को अपनाने के संकेत मिल रहे हैं। चीन में भी आयुर्वेद का काफी विकास हुआ है॥ जर्मनी में आयुर्वेद चिकित्सा विधियों को बड़ी मात्रा में अपनाया जा रहा है। स्विट्जरलैण्ड के वाल्फेनौमिन में एक आयुर्वेद क्लीनिक का खूब प्रचार हो रहा है। यूनाइटेडिकगड में आयुर्वेद पत्रिकाएँ खूब पढ़ी जाती हैं एवं उसके नुस्खों को बड़े सम्मान से अपनाया जाता है।
इधर पिछले एक दशक में अमेरिका में आयुर्वेद का प्रचलन तीव्रता से बढ़ा है। आयुर्वेद की इस बढ़ती लोकप्रियता के बारे में अमेरिका के ही चिकित्साविशेषज्ञ गरनी विलियम्स थर्ड ने प्रसिद्ध स्वास्थ्य पत्रिका लंगाविटी में विस्तार से वर्णन किया हैं उनके अनुसार, आयुर्वेद का उपचार सरल व समग्र होता है। टफ्ट्स एवं बोस्टन विश्वविद्यालय दीपक चोपड़ा ने तो अमेरिका में आयुर्वेद एण्ड स्ट्रेस मैनेजमेण्ट’ बहुत लोकप्रिय हुई है। हॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री एलिजाबेथ टेलर एवं डेमीमूर और प्रख्यात अभिनेता डेविड लिचे भी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति की ओर आकर्षित हुए है। इन दिनों अमेरिका में तेरह आयुर्वेदिक संस्थाएँ बहुप्रचलित है। जिनमें चोपड़ा सेन्टर फॉर वेलबिइंग’ जो लहोला सान डियागो में है, काफी प्रसिद्ध हुई है। अमेरिका के ही आयुर्वेदिक इंस्टीट्यूट एण्ड वेलनेस सेन्टर के प्रशासक चार्ल्स राडमैन ने स्पष्ट किया है कि सरल, सस्ता एवं सम्पूर्ण उपचार पद्धति होने के कारण इसका आकर्षण दिनों-दिन बढ़ रहा है। ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के डॉ. हरिशर्मा ने आयुर्वेद पर कई तरह के अनुसन्धान एवं अन्वेषण किए है। इनकी शोध काफी चर्चित भी रही है। अमेरिका में आयुर्वेद के अटूआलोचक भी अब यह मानने लगे हैं। कि ये औषधियाँ स्वास्थ्य के लिए हितकर एवं उपयोगी है। नेशनल काउंसिल अंगेन्स्ट हैल्थ फाइ के अध्यक्ष विलियम जार्विस भी समालोचकों में से एक हैं, परन्तु वे भी अब यह मानने लगे है कि युगपरिवर्तन के इस दौर में चिकित्सापद्धति का परिवर्तन भी सामयिक है। उनका कहना है कि भारतीय जड़ी-बूटी विशेषज्ञ मार्क ब्लूमेंथल के अनुसार, अमेरिका में पिछले दो-तीन सालों में आयुर्वेदिक दवाओं की बिक्री तिगुनी हो गयी है। यहाँ। प्रतिवर्ष 50 लाख डॉलर की आयुर्वेदिक दवाओं की बिक्री होती है। निकट भविष्य में इसमें भारी वृद्धि का अनुमान है।
अपने देश में भी इस चिकित्सापद्धति की ओर रुझान दिनोंदिन बढ़ रहा हैं भारत के शहरों में लगभग एक तिहाई तथा गाँवों में दो तिहाई लोग आयुर्वेद को ही अपना रहे है। सन् 1982 में अपने देश में 3349 आयुर्वेदिक फार्मेसियां थी। जो अब बढ़कर 6,000 के आस-पास हो गयी है। 40 से अधिक राष्ट्रीय स्तर के फार्मास्यूटिकल संस्थान 2 करोड़ से 75 करोड़ रुपये सालाना की बिक्री करते है। एक विदेशी कम्पनी ने तो आयुर्वेद को अपनाकर 45 से 150 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष लाभांश प्राप्त किया है। मुम्बई में झाण्डू सत्तत के दशक में प्रतिवर्ष करीब दस लाख डॉलर की बिक्री करता था, जो 1996 में बढ़कर डेढ़ करोड़ डॉलर हो गया है। इसी तरह हिमालय ड्रग कम्पनी भी सालाना 1.8 करोड़ डॉलर का कारोबार करने लगी है। ये आँकड़े एलोपैथी की असफलता एवं आयुर्वेद की है। इस लोकप्रियता को देखकर सहजतापूर्वक कहा जा सकता है। कि आयुर्वेद ही इक्कीसवीं सदी की नवीनतम एवं आधुनिकतम चिकित्सापद्धति के रूप में अपनाई जाएगी।
“भगवान का द्वार निजी प्रयोजनों के लिए अनेकों खटखटाते पाये जाते है।, पर अबकी बार भगवान ने अपना प्रयोजन पूरा करने के लिए अपने सभी साथी-सहयोगियों को पुकारा है। जो इसके लिए साहस जुटायेंगे, वे लोक और परलोक का सिद्धियों विभूतियों से अलंकृत होकर रहेंगे।
सुभाषचन्द्र बोस के पिताजी ने उन्हें कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में भर्ती करा दिया। सुभाष ने कॉलेज में अपनी विचारधारा के विद्यार्थियों को तलाशना शुरू कर दिया। बहुत जल्दी वहाँ उन्होंने समूह बना लिया, जा अपने आध्यात्मिक विकास और राष्ट्रसेवा को सर्वोपरि मानते थे। उस समय प्रेसीडेंसी कॉलेज में विद्यार्थियों के चार गुट बने हुए थे। चारों ही गुट अलग-अलग विचारधारा के थे। धनिक, सेठ साहूकार, जमींदार और राजाओं के लाड़लों का गुट मौजमस्ती और आवारागर्दी के चक्कर में रहता था। दूसरा समूह किताबी कीड़ों के नाम से प्रख्यात था। तीसरा समूह स्वामी विवेकानन्द और रामकृष्ण परमहंस के भक्तों के नाम से जाना जाता है। इनका ध्येय इन संतों के उपदेशों के अनुसार जीवन व्यतीत करने का था। इसी समूह में सुभाष था। आखिरी समूह क्रान्तिकारियों का था, जो किसी भी तरह से ब्रिटिश शासन को समाप्त करना लक्ष्य मानते थे।
उन्हीं दिनों श्री अरविन्द अपनी क्रान्तिकारी विचार धारा से आध्यात्मिक विचारधारा में जा चुके थे, पर बंगाल के नवयुवकों को उम्मीद थी कि श्री अरविंद अपनी तपस्या पूरी करने के बाद एक बार फिर लौटेंगे और राष्ट्र की आध्यात्मिकता की उस सीढ़ी पर पहुँच चुके थे जहाँ विश्व-ब्रह्मांड और आत्मा की एकात्मता स्थापित हो जाती है और जीव उस अनन्त का स्पर्श करने लगता है। जहाँ न तो कोई अपना हैं और न कोई पराया।
सुभाष श्री अरविन्द के आध्यात्मिक ज्ञान से प्रभावित थे। उसके लिए उनका यह रूप पूजनीय था। श्री अरविन्द लोगों के पत्रों का जवाब भी देते थे। जिसे पचासों लोग पढ़ते और मनन-चिंतन करते थे। सुभाष के एक मित्र ने श्री अरविन्द को पत्र भेजकर अपनी शंका के समाधानार्थ निवेदन किया। श्री अरविन्द का उत्तर आया तो उसने वह सुभाष को भी पढ़वाया। कुछ पंक्तियाँ ऐसी ही थीं जिनने सुभाष के जीवन में बम-विस्फोट का काम किया। ये पंक्तियाँ थीं- ‘‘हममें से प्रत्येक को दैवी विद्युत का डायनेमो बनना चाहिए, जिससे कि हम अनुभूति से ओत-प्रोत हो जाएँ। तुम श्रम करो, जिससे मातृभूमि सबल बने, समृद्धशाली बने, तुम कष्ट सहो जिससे मातृभूमि सुखी हो।”
आज पूरा विश्व एवं समूची मानव सभ्यतापरिवर्तन के दौर से गुजर रही है। जड़ता, अव्यवस्था एवं अराजकता की प्रतीक पुरातन व्यवस्था चरमराकर ढह रही है। और इस ध्वंस के बीच एक नई चेतना का उदय हो रहा है, जो अपने अनुरूप एक नयी व्यवस्था की माँग कर रही है। जन-जीवन को गम्भीर रूप से प्रभावित करने वाला राजनैतिकतंत्र एवं शासन का क्षेत्र भी परिवर्तन की इस प्रक्रिया से अछूता नहीं हैं इस क्षेत्र में विश्वव्यापी उथल–पुथल, उठा-पटक एवं परिवर्तन के नजारे साफतौर पर देखे जा सकते है।
अपने प्रारंभिक दौर से लेकर आज तक शासन के मोटेतौर पर तीन रूप प्रचलित रहे है- राजतंत्र, कुलीनतंत्र और लोकतंत्र। राजतंत्र में शासन की समस्त शक्तियाँ एक ही व्यक्ति के हाथ में केन्द्रित रहती है। कुलीनतंत्र में शासन की प्रभुसत्ता थोड़े-से हाथों में केन्द्रित रहती है। लोकतंत्र में शासन की सत्ता बहुसंख्यक व्यक्तियों के हाथों में केन्द्रित रहती है। लोकतंत्र में शासन की सत्ता बहुसंख्यक व्यक्तियों के हाथों में रहती है। अपने विकृत एवं भ्रष्टरूप में ये पद्धतियां क्रमशः आततायी तंत्र, वर्गतंत्र एवं भीड़तंत्र में बदल जाती हैं में न करके व्यक्तिविशेष या वर्गविशेष के स्वार्थों की पूर्ति में किया जाने लगता है।
पुरातनकाल में सामान्य तौर पर राजतंत्र एवं कुलीनतंत्र की शासन व्यवस्थाएँ प्रचलित थी, किन्तु एक लम्बे समय के ऐतिहासिक अनुभव से स्पष्ट हुआ कि राजतंत्र व कुलीनतंत्र जन-साधारण के हित में कार्य न करके एक वर्ग के ही स्वार्थों का ध्यान रखते है। इस शासन-व्यवस्थाओं के परिवर्तन के रूप में लोकतंत्र का आविर्भाव हुआ। ‘कम्पेरेटिव गवर्नमेन्ट’ के विद्वान लेखक प्रो. एम. ई. फाइनर ने विश्व की प्रचलित शासन-प्रणालियों का ब्यौरा प्रस्तुत करते हुए, उन्हें तीन श्रेणियों में विभाजित किया है। प्रथम-लिबरल डेमोक्रेटिक स्टेट यानि कि उदार लोकतंत्र राज्य, दूसरा- टोटलेटेरियन स्टेट- अर्थात् एकदलवादी या सर्वाधिकारवादी राज्य एवं तीसरा-थर्ड वर्ल्ड स्टेट-इसे तृतीय विश्वराज्य भी कह सकते हैं।
इनमें उदार लोकतांत्रिक राज्य तीन तरह से परिभाषित किया है। (1) जनमत पर आधारित शासन व इसके प्रति जवाबदेही। (2) जनमत अपनी अभिव्यक्ति में स्वतन्त्र होता है। (3) जनमत के खण्डों में विवाद होने पर बहुमत को मान्यता दी जाती है। इस शासन-व्यवस्था के अंतर्गत तकरीबन एक-तिहाई से अधिक देश आते है। इंग्लैंड, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, बेल्जियम, हालैण्ड, स्विट्जरलैण्ड, संयुक्त राज्य अमेरिका व स्केंडक्यिन देशों में शताब्दी से भी अधिक समय से यह व्यवस्था प्रचलित है। पिछले समय के कुछ उतार-चढ़ावों के साथ फ्राँस,जर्मनी, इटली और जापान भी इसी प्रणाली का उपयोग कर रहे है। भारत, जाम्बिया, श्रीलंका, जैसे देश इसकी प्रयोगशाला के तहत चल रहे हैं। लेबनान, पाकिस्तान, चाइल व इरुगुए में यह डाँवाडोल स्थिति में रही है।
टोटलेटेरियन स्टेट अर्थात् सर्वाधिकार राज्य को दो आधारों पर परिभाषित किया जाता है। प्रथम पूरे समाज एवं राज्य का राजनीतीकरण होता है, इस पर शासन का पूर्णाधिकार होता है। द्वितीय-शासन का पूर्णाधिकार होता है। द्वितीय-शासन के एकमत या दृष्टिकोण के अतिरिक्त दूसरे मत या दृष्टिकोण के अतिरिक्त दूसरे मत को स्वीकार या बर्दाश्त नहीं किया जाता। लगभग एक दशक पूर्व तक सोवियत संघ व यूरोपीय समाजवादी राज्य पोलैण्ड, पूर्वी जर्मनी, चैकोस्लोवाकिया, हंगरी, रोमानिया, बुल्गालिया और अल्वानिया इसी के अधीन है। क्यूबा और यूगोस्लाविया हल्के रूप में इसी के प्रकार है।
तीसरे वर्ग में उन राज्यों की गणना की जाती है, जो स्पष्टतः न तो उदार लोकतंत्र में आते हैं। और न ही एकदलीय सर्वाधिकारवादी राज्य में। दूसरा इनमें से ज्यादातर यूरोपीय व ओटोमन साम्राज्य के अधीन रहे है। अफ्रीका में लाइबेरिया, इथोपिया, एशिया में टर्की, अफगानिस्तान, नेपाल ईरान, थाइलैण्ड इसके अपवाद है। लेटिन अमेरिका देश मिश्र, यूनान, इराक आदि इसके अंतर्गत आते है। इनमें भी तीन तरह के राज्य है। प्रथम-मुखौटा लोकतंत्र जिसमें लोकतंत्र का वास्तविक संचालन कोई राजा या धनिक वर्ग पीछे से करता है, जैसे थाइलैण्ड। दूसरा-अर्द्धलोकतंत्र जैसे ढाका या फिर तीसरा सैनिक शासन।
शासन की प्रणालियों में एकदलीय- सर्वाधिकारवादी व्यवस्था, साम्यवादी ढाँचा अपने अंतर्विरोधों के तहत ढह गया। पिछले दशक के अन्त तक चार दशकों से सुपर पॉवर के रूप में प्रतिष्ठित सोवियत संघ में यह प्रणाली खण्डित हो गयी। परिवर्तन की इसी लहर में पूर्वी यूरोप के अन्य देशों में जैसे चैकोस्लोवाकिया, यूगोस्लाविया, रोमानिया, जर्मनी आदि में भी कम्यूनिस्ट सरकारों का ढाँचा चरमरा गया। चीन में भी वैयक्तिक स्वतंत्रता के पक्षधर लोकतंत्र के प्रति आस्था को लेकर हुए खूनी संघर्ष ने यह साबित कर दिया कि हम युगपरिवर्तन के मुंहाने पर खड़े है। परिवर्तन की यह लहर बड़ी उथल–पुथल से भारी एवं कभी-कभी सामान्य समझ से परे है। पूर्वी यूरोप एवं सोवियत संघ में एक के बाद एक साम्यवादी सरकारों के पतन के बाद एक साम्यवादी सरकारों के पतन के बाद पश्चिमी यूरोप के देशों में वयस्क हो चुके लोकतांत्रिक प्रणाली वाले देशों ने साम्यवादी पार्टियों के पक्ष में अपना निर्णय में मात्र दो देश जर्मनी एवं स्पेन ही वामर्पथ की इस लहर से बचे है।
वर्ष 1997 में ब्रिटेन में हुए आम वाले थे। चुनाव के परिणामों ने तकरीबन दो दशकों के बाद लेबर पार्टी को भारी बहुमत से जिताकर सत्ता पर आसीन कर दिया। इसी के साथ ही वहाँ एक नए परिवर्तन ने जन्म लिया, जिसके तहत राजनीतिक व्यवस्था के अतिकेन्द्रीयकरण को समाप्त करके उसे अधिक लोकताँत्रिक बनाने की दिशा में कदम उठाए जाने लगें इसी के प्रथम चरण में स्काटलैण्ड को अलग संसद देने व वैल्स को अलग असेम्बली देने का निश्चय किया गया। वर्ष 17 के सितम्बर माह माह में स्काटलैंड की अलग संसद के गठन के प्रस्ताव के लिए किए गए जनमत-संग्रह में जनता ने तीन-चौथाई मत देकर परिवर्तन के बढ़ते कदमों पर अपनी मंजूरी प्रकट कर दी।
ब्रिटिश राजनीति की यह घटना निश्चित ही महापरिवर्तन का संकेत है। क्योंकि वही जन्मे वेस्ट मिनिस्टर वाला संसदीय मॉडल ज्यादातर देशों का प्रेरणास्रोत रहा है। तभी तो वेस्ट मिनिस्टर मॉडल ज्यादातर देशों का प्रेरणास्रोत रहा है। तभी तो वेस्ट मिनिस्टर मॉडल को विश्व भर की संसदों की जननी कहा जाता है। यहाँ से हुए संसदीय प्रणाली का प्रभाव भीतर सहित विश्वभर की समस्त संसदों पर पड़ने की संभावना है। विश्वभर में विकेन्द्रीकरण एवं स्वशासन की उठ रही बढ़ती माँग की पृष्ठभूमि में उक्त घटना महत्वपूर्ण स्थान रखती है। वर्ष 19 के जून माह में फ्राँस में समाजवादियों को राष्ट्रपति चुनाव के प्रथम चरण में मिली कामयाबी ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि समूचे विश्व में महापरिवर्तन की तरंगें संव्याप्त हो रही है। यही नहीं समाजवादी पार्टी के नेता लायनेल जसस्मिन नए प्रधानमंत्री बन गए। यूरोपीय संघ के 15 में से 11 देशों में पहले से ही वामपंथी व मध्यमार्गी रुझान वाली पार्टियां या गठबन्धनों का शासन था। ब्रिटेन व फ्राँस में भी वामपंथी सम्मान वाले दलों की जीत या खुले बाजार अर्थव्यवस्था की पक्षधर अमेरिका व्यावसायिक पत्रिका ‘वॉल स्ट्रीट जनरल’ ने पहली खबर छापी “परिवर्तन के महादौर में यूरोप वामपंथी हो गया।”
वर्ष 17 के ही सितम्बर माह में वियतनाम के संसदीय चुनावों में साम्यवादियों को 450 में से 384 सीटें मिलीं। वर्ष 17 का सबसे बड़ा राजनैतिक परिवर्तन रहा हाँगकाँग का चीन में विलय। इसी के साथ एशिया में ब्रिटेन के साम्राज्यवाद का सूरज सदैव के लिए अस्त हो गया। इस घटना को उपनिवेशवाद के ताबूत में आखिरी कील के रूप में देखा जा रहा है। दो शताब्दी पूर्व अपना व्यापार घाटा पूरा करने के लिए चीन में अफीम बेचने का कारोबार शुरू करने वाला ब्रिटिश साम्राज्यवाद एक दिन इस द्वीप का मालिक बन बैठा था। वर्ष 17 में ही इस्लामी अनुदारवाद के गढ़ के गढ़ ईरान में उदारवादी नेता मोहम्मद खातमी भारी मत से ईरान के पाँचवे राष्ट्रवें राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। इसी के साथ ही 1979 में आरोपित धार्मिक कट्टरवादी व्यवस्था एक उदारवादी रुख अपनाने की ओर अग्रसर हुई। टर्की में आधुनिक टर्की के जन्मदाता मुस्तफा कलाल अतातुर्क टर्की के जन्मदाता मुस्तफा कलाल अर्तातुर्क द्वारा 1920 के दशक में रखी गई धर्मनिरपेक्ष टर्की की नींव हिलती नजर आयी। यहाँ भी परिवर्तनों का दौर रहा।
राजनैतिक परिवर्तनों के क्रम से अफ्रीका भी अछूता नहीं रहा। पिछला वर्ष जयर के लिए मुक्तिवर्ष के रूप में याद किया जाएगा। 6 मई को जायार सेचले आरे माबूत् की 32 वर्षीय तानाशाही के शिकंजे से मुक्त हुआ। क्रान्तिकारी नेता लारेंट कषीला के नेतृत्व में तानाशाही का तख्ता पलटा गया और देश को कांगो नाम दिया। गया। अल्जीरिया में भी कई दशकों के बाद लोकतंत्र के दर्शन हुए। मिस्र एक तरह से आतंकवादियों के राजनैतिक वर्चस्व से मुक्त हुआ।
दक्षिणी एशिया के लिए वर्ष 17 राजनैतिक परिवर्तनों की दृष्टि से तूफानी साल रहा। पड़ोसी देश पाकिस्तान में परिवर्तन एवं उथल-पुथल की गहमागहमी रही। पाकिस्तान में सत्ता के तीन भागीदारों-सेना, राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री में स अब तक जनता के प्रतिनिधि का दावा करने वाले प्रधानमंत्री की स्थिति का दावा करने वाले प्रधानमंत्री की स्थिति सबसे कमजोर रही है। उसकी सत्ता कभी सुरक्षित नहीं रही। पिछले दिनों राष्ट्रपति एवं न्यायपालिका के बीच हुए जबरदस्त टकराव में लोकतंत्र और निखरकर सामने आया।
वर्मा और तिब्बत में अपने लोकताँत्रिक शासन के लिए संघर्ष चलता रहा। इसी के साथ भूटान में भी राजशाही के विरोध में जनता का स्वर मुखरिता हुआ। वर्मा में सूकी के नेतृत्व में चल रहे लोकतांत्रिक संघर्ष के परिणामस्वरूप यहाँ फौजी शासन का शिकंजा थोड़ा हल्का हुआ, लेकिन भूटान का लोकतांत्रिक आन्दोलन और दलाईलामा की तिब्बत मुक्ति एवं स्वायत्तता के स्वर भूटान नरेश एवं चीनी शासकों तक नहीं पहुँच सके। नेपाल में सत्तापरिवर्तन का चक्र तीव्र गति से घूमता रहा यहाँ तीन सरकारों बदलीं। शेर देउवा के बाद राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टी के लोकेन्द्र बहादुर चंद और उसके बाद नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी के सूर्य बहादुर थापा प्रधानमंत्री के रूप में आए। देश के दो प्रमुख दलों द्वारा दिए निर्णयों से नेपाल की राजनीति में बहुदलीय संसदीय व्यवस्था मजबूती की ओर अग्रसर हुई।
अपने देश के राजनैतिक पटल पर पिछले कुछ वर्ष अभूतपूर्व परिवर्तनों से भरे रहे। इसी दौर में राष्ट्र की राजनीति पर चार दशकों से छाए रहने वाले शीर्ष राजनैतिक परिवार का एक प्रकार से सूर्य अस्त हो गया। स्वाधीन राष्ट्र की स्वर्ण जयन्ती मनाने का संकल्प लेकर आयी पिछली लोकसभा में एक के बाद एक लगातार तीन प्रधानमंत्री सत्ता सिंहासन से नीचे उतरने पर विवश हुए। इसके बावजूद लोकसभा को अन्ततः भंग ही करना पड़ा। पिछले दिनों के भारतीय राजनैतिक परिदृश्य पर यदि गौर किया जाए तो यही कहना होगा, अन्य देशों की अपेक्षा भारत में ये परिवर्तन अपेक्षाकृत तीव्र गति से घटित हो रहे हैं। मानो अपना ही देश इन सब परिवर्तनों की धूरी है।
इन परिवर्तनों के माध्यम से शायद भारतीय जनमानस अपने राष्ट्रीय जीवन के पक्ष प्रश्नों के समाधान खोज रहा है।? आज की विखंडित, विचारधाराहीन, व्यक्तिकेन्द्रित और साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भ्रष्टाचार, घोटाला, फर्जी सदस्यता, भाई-भतीजावाद, मूल्यहीनता आदि से ग्रस्त भारतीय राजनीति की अर्थप्रणाली से प्रबुद्धजन, सचेत नागरिक आहत और अवाक् है। कीचड़ से सनी इस राजनीति के लिए आम राजनेता ही नहीं बल्कि यात्राभत्ता, महँगाईभत्ता और गए, वेतनमान में उलझा शिक्षित मध्यमवर्ग, दिन-प्रतिदिन की जोड़-तोड़ में उलझा पेशेवर समूह और पारस्परिक बहस करने समूह और पारस्परिक बहस करने समूह और पारस्परिक बहस करने एवं कागज काले करने में मशगूल बुद्धिजीवी सभी जिम्मेदार है।
आजादी की पचासवीं वर्षगाँठ के अवसर पर भारतीय राजनीति के अवमूल्यन पर गहन चिन्तन की आवश्यकता है। कहा जाता है। कि जनमा को उसकी योग्यता के और स्तर के मुताबिक ही शासनतंत्र मिलता है देश की जनता द्वारा भ्रष्टाचार और घोटालों के विरुद्ध सशक्त अभियान और पहल का अभाव इस कथन की पुष्टि करता प्रतीत होता हैं हमें इस सत्य का अहसास दिलाता है कि हम अभी भी जाग्रत नहीं हुए।
सदियों के बाद गुलामी, भूख, भय, बीमारी, अज्ञान, अकाल, दमन से दबी भारतीय जनता को गाँधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आन्दोलन ने निर्भय ओर राजनीति में भागीदार बनाया। सत्य, अहिंसा, त्याग, राष्ट्रीय एकता, जनता की भाषा, लोक वेशभूषा, कथनी और करनी की एकता पर आधारित गाँधी के नेतृत्व ने स्वराज, स्वदेशी, स्वावलम्बन, सादगी, संगठन, रचनात्मक कार्यक्रम और संघर्ष से ओत-प्रोत कर इस अर्द्धमूर्च्छित देश को नयी दिशा दी। आजादी का हमारा संघर्ष देशी हाथों में सत्ता हस्तान्तरण के उद्देश्य मात्र तक सीमित नहीं था। इस संघर्ष के पीछे लाखों गाँव, कस्बों शहरों से बने भारत को एक नैतिक समाज और मूल्य युक्त मनुष्य बनाने की प्रेरणा थी। संघर्ष की इस प्रक्रिया के साथ तिलक, गाँधी, सुभाष, नेहरू, पटेल, राजेन्द्रप्रसाद, गफ्फार खाँ, मौलाना आजाद, आचार्य कृपलानी, आचार्य नेरन्द्रेव, जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया का मतभेदों के बावजूद भी सामूहिक नेतृत्व भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद जैसे सैकड़ों क्रान्तिकारियों का अन्यतम बलिदान, डॉ. हेडगेवार एवं गुरु गोलवलकर जैसों का समर्पित जीवनदान, डॉ. हेडगेवार एवं गुरु गोलवलकर जैसों का समर्पित जीवनदान, स्वामी विवेकानंद, श्री अरविन्द और रवीन्द्रनाथ टैगोर की आध्यात्मिक शक्ति एवं साँस्कृतिक चिंतन जुटा हुआ था।
आजादी के आदि हमारी इस पूरी विरासत और सामूहिक चिन्तन की सुघड़ अभिव्यक्ति हुई। आर्थिक राजनैतिक, सामाजिक न्याय, समानता, धर्मनिरपेक्षता, जाति, वर्ण, वर्ग, लिंग के भेदभावों से युक्त, मौलिक अधिकारों और राज्य के प्रति नीति-निर्देशक तत्वों पर आधारित एक सार्वभौम लोकतांत्रिक गणतांत्रिक स्वरूप बनाने में हम सफल हुए, परन्तु धीरे-धीरे हमारे देश का नेतृवृन्द त्याग की उपेक्षा करता गया, सेवाभावना की अवहेलना कर सत्ता के मोह से वशीभूत होता गया। परिणति आज की स्थिति हैं हालांकि पिछले ढाई हजार वर्षों के भारत के समाज संस्कृति, राजनीति और इतिहास पर ध्यान दिया जाय तो पराजय, हताशा कुहरा और विभ्रम के बीच से भी प्रकाश की किरण फूटी हैं यह प्रकाश की दीप्तिमान किरण परिवर्तन के सतत् क्रम महाकाल का कालदण्ड परिवर्तन के सतत् प्रहारों से देश की राजनीतिक जड़ता एवं घने अँधेरे को तोड़ देने के लिए उतारू हैं इन तीव्र परिवर्तनों के माध्यम से ही भारत की जनता “क्व कारोमि, कुत्र गच्छामि, को राष्ट्रनुद्वारियसि” की अपनी पहेलियों को सुलझाने में व्यस्त है।
इन्हीं प्रश्नों प्रक्रिया के द्वारा एक सर्वथा नए परिवर्तन की बाट जोह रहे हैं। आने वाला परिवर्तन की बाट जोह रहे हैं। आने वाला परिवर्तन कितना सार्थक होगा, यह भले ही ठीक तौर पर न कहा जा सके, पर इतना सुनिश्चित तथ्य है कि परिवर्तन का यह सिलसिला तथ्य हैं कि परिवर्तन का यह सिलसिला इक्कीसवीं सदी में अपने लक्ष्य युगपरिवर्तन को सिद्ध करके रहेगा। और तब अपना महादेश अवश्य ही अपने स्वप्नों को साकार करेगा। जो उसने अपनी स्वाधीनता के समय सँजोये थे। इसी के साथ विश्व राजनीति भी सात्विक गुणों की आभा से प्रदीप्त हो सकेगी।
साधु को न जाने क्या सूझी, दुकानदार के यहाँ नौकरी कर ली। दुकानदार ने कहा-”देखना, बिगड़ मत जाना ” उसका इशारा रुपये-पैसों की बेईमानी से था। साधु बोला”निश्चित रहो, अपनी फिकर करो। किन्तु न जाने इस झंझट में क्यों आ फँसा बेचारा।
जब थोड़ी पूँजी एकत्रित हो गई तो एक दिन साधु बोला-”मेरा मन तीर्थयात्रा पर जाने का करता है, क्या आप भी चलेंगे। व्यवसायी बोला- मन तो करता है, किन्तु क्या -क्या तैयारी करनी होगी। संन्यासी बोला, “वह सब तो मैं करवाता रहूँगा, उसकी फिकर छोड़ो | साल भर में संन्यासी दुकानदार की चालबाजियों से पूरी तरह परिचित हो गया। उसे सब चीजों के वास्तविक दाम भी मालूम हो गया। अब जब भी काई ग्राहक आता, व्यवसायी उसको तोलने, नापने में गड़बड़ी करता, तो संन्यासी कहता बतलाता तो कहता प्रभु! याद रखना तीर्थयात्रा करनी है, दुकानदार के दिल की धड़कन बढ़ जाती। साल बाद अब दुकानदार ने कहा- संन्यासी जी’ अब चलें तीर्थयात्रा, ऐसे में फुरसत भी है। किन्तु संन्यासी ने कहा- तात्! तीर्थयात्रा तो पूरी हो गई। ईमानदारी की गंगा में नित्य ही डुबकी लगाने का मौका मिलता रहा। तीर्थयात्रा के बहाने स्मृति सदैव यही बनी रही हक तीर्थयात्रा पर चलना हैं अब चोरी, बेईमानी, ठगी बोल- आपने तो मेरी आँखें खोल दीं जीवन धन्य कर दिया।
सृष्टि का एक शाश्वत नियम है। ‘परिवर्तन ‘ मानव समाज, संस्कृति और सभ्यता को हमेशा हर युग में इस परिवर्तन प्रक्रिया से गुजरता पड़ता हैं जो मान्यताएँ कभी उपयोगी’ समयानुकूल जान पड़ती थीं, उनमें परिवर्तन-सुधार करना पड़ता है। एक व्यवस्था, एक नियम, एक कानून प्रत्येक काल में उपयोगी सिद्ध हों, जरूरी नहीं बदलती परिस्थितियों, माँगों, समय की आवश्यकताओं के अनुरूप हेर-फेर होता चले, तो समाज की सुव्यवस्था बनी रहती है। ‘परिवर्तन’ की इस व्यापक व्याख्या के मूल में ही क्रान्ति शब्द का मर्म छिपा हुआ है। क्रान्ति का अर्थ हिंसा नहीं अपितु वैचारिक परिवर्तन की एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें जनचेतना दैवी अनुकूलन के आधार पर अनौचित्य का विरोध करने, छोड़ने तथा औचित्य को अपनाने के लिए विवश हो जाय। ‘क्रान्ति’ यदि व्यक्ति के अन्तरंग और बहिरंग का आमूल-चूल परिवर्तन करती है तो उसका स्वरूप सही हैं यदि वह भौतिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, राजनैतिक आधार पर रूढ़िवादिता, तानाशाही, भोगलिप्सा साधनों पर निर्भरता लाती है। तो यह उसका विकृत स्वरूप है। इसीलिए सभी क्रान्तियों में ‘विचारक्रान्ति’ के अहिंसात्मक, आध्यात्मिक स्वरूप को ही वरेण्य-श्रेष्ठ माना गया है। एवं युग जब भी बदला है, तो मानव के आन्तरिक परिवर्तन की धुरी पर आधारित क्रान्ति से ही बदला है।
वैचारिक परिवर्तन द्वारा पतन-निवारण, आत्म-निर्माण से समाज एवं विश्वनिर्माण की अवधारण जो हमें परमपूज्य गुरुदेव ने दी, उसके मूल में विचारक्रान्ति रूपी यह नया दर्शन ही था। इसी के प्रवर्तक के रूप में बुद्धावतार के उत्तरार्द्ध प्रज्ञावतार के विराट स्वरूप को लेकर वे आए एवं व्यक्ति-व्यक्ति के विचारों को बदलने का संकल्प लेकर ‘युग-निमार्ण योजना’ खड़ी कर सकने में सफल हुए। आज तो हवा युगपरिवर्तन के अनुकूल बढ़ती दिखाई देती है, उसके मूल में विचारक्रान्ति की यह तीव्र आँधी ही है, जो दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही चली जा रही है अपने प्रबलतम वेग से। इस क्रान्ति की गति को ‘ह्यूमेनिटी इन इवाँल्यूशन ‘ ग्रन्थ में विद्वान वाट्स कनिंधम के विचारों को पढ़कर समझा जा सकता हैं वे लिखते है कि ईसा के मरने के अठारह सौ पचास वर्षों में जितना तेजी से बदलाव आया वह मात्र विगत डेढ़ सौ वर्षों में सम्पन्न हो गया है। उसमें भी विगत डेढ़ सौ वर्षों के परिवर्तन से कहीं अधिक है। अब आगामी छह वर्षों में जो होने जा रहा है, वह सभी कीर्तिमानों को तोड़ने वाला एवं युग-परिवर्तनकारी होगा। यह छह वर्ष उनने 1998 के प्रारम्भ से 2003 की अवधि तक के बताए है। इस परिवर्तन में धुरी इसी पर केन्द्रित होगी कि जनमानस का प्रवाह पाशविक इंस्टीक्ट्स (वृत्तियों) से हटकर दैवी एवं विराट कौटुम्बिकता का औदार्यपूर्ण भाव लिए होगा।
‘क्रान्ति’ सदा व्यक्ति के अन्तराल में घटती है। परिवर्तन-बदलाव तो सामूहिक होता है जब यह एक समष्टिगत प्रक्रिया बन जाती है, तो समूह मन का बदलाव ही जन क्रान्ति कुछ इसी प्रकार की है। इस विचारक्रान्ति को गत दो शताब्दियों से सतत् सम्पन्न हो रही छुटपुट क्रान्तियों, चाहे वे राजतंत्र से लोकतंत्र के रूप में, चाहें, उपनिवेशवाद की समाप्ति के रूप हों, चाहे विज्ञान की उपलब्धियों के सहारे मनुष्य के पास अगणित साधनों के बाहुल्य के रूप में अथवा चाहे परम्पराओं-रूढ़िवादिता व सड़ी-गली मान्यताओं के मिटाने के रूप में हों, की एक महाक्रान्ति की तैयारी के रूप में समझा जा सकता हैं व्यक्ति ढले नहीं, उसके विचारक्रांति को महाक्रान्ति कहा गया है एवं इसका माध्यम से नवयुग के अवतरण की बात कही गयी है।
क्रान्ति की निरन्तरता ही धर्म है। भारतीय दर्शन की अध्यात्म मान्यताएँ जीवन जीने की कला का न केवल शिक्षण देती है, वरन् व्यक्ति-निर्माण की व्यावहारिक प्रक्रिया भी बताती हैं पतन से उबरकर उत्कर्ष की ओर जाने का मार्ग भी बताती है। इसीलिए तो भारतीय अध्यात्म को क्रान्तिकारी दर्शन की उपमा दी गयी है एवं विश्व का हर दार्शनिक हर युग में इससे प्रभावित होकर अपना मंतव्य पूर्वार्त्य आध्यात्म दर्शन के पक्ष में ही लिखता चला आया हैं क्रान्ति की यही प्रक्रिया उठा पटक की बेला में आज पाश्चात्यीकरण की एक आँधी लेकर आयी है, किन्तु यह टिकने वाली नहीं। सारा विश्व इस परिवर्तन की प्रक्रिया उठा पटक की बेला में आज पाश्चात्यीकरण की एक आँधी लेकर आयी है, किन्तु यह टिकने वाली नहीं। सारा विश्व इस परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजर रहा हैं एवं एक नया धर्म-मानव से गुजर रहा है। एवं एक नया धर्म-मानव धर्म जन्म ले रहा है, जो अपौरुषेय कही जाने वाली वेदों की वाणी के आधारशिला पर रखा जाएगा। युग-निर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान और कुछ नहीं इसी क्रान्तिधर्मी प्रक्रिया का व्यावहारिक कलेवर मात्र है।
परिस्थिति प्रधान युग बीत गया अब मनःस्थिति-वैचारिकता प्रधान युग ही सारी समस्याओं का समाधान कर मनुष्य को खुलकर साँस लेकर जीवन जीने की विद्या प्रदान करेगा। मनःस्थिति हो प्रेरणाओं का प्रवाह पैदा करती है-संकल्प को जन्म देती हैं, जिससे परिस्थितियाँ बदलती चली जाती है। साधन-सामग्री के अभाव को या उनके स्वरूप को दोष देना बेकार है। वस्तुतः वैचारिक विकृति ही हर किसी को गिराती, सताती, तनावग्रस्त कर रोगी बनाती एवं जीवन को नारकीय बनाती देखी जा सकती है। अचिंत्य चिंतन अपनाने से दुर्गति होती है। यह मनुष्य ने इन दो सदियों में अच्छी तरह सीख लिया हैं मनःस्थिति बदलेगी तो ही परिस्थिति बदलेगी, यह सबकी समझ में आ रहा हैं एवं इसी को विचारक्रान्ति का बीज कहा जा सकता हैं
परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने कहा कि”युग का अवसान सद्विचारों एवं सत्प्रवृत्तियों के घट जाने से होता हैं युग का निर्माण करना यदि अभीष्ट हो तो सद्विचारों एवं उच्च आदर्शों की प्रतिष्ठापना ही करनी होगी एवं तब युगपरिवर्तन का कार्य भी कठिन नहीं प्रतीत होगा” ( अखण्ड ज्योति, जनवरी 1962, पृष्ठ 44) इसी चिंतन को और भी परिमार्जित करते हुए उनने सितम्बर, 1962 की अखण्ड ज्योति में नवयुग के संविधान के रूप में -युगनिर्माण सत्संकल्प’ की घोषणा की एवं प्रत्येक की विस्तार से व्याख्या करते हुए एक विशेषाँक सबके समझ प्रस्तुत किया उनने लिखा कि अखण्ड-ज्योति परिवार उसी आधार पर सारी विचारणा, योजना, गतिविधियाँ, कार्यक्रमों को संचालित करेगा। आज राजनैतिक पार्टियाँ कर्मकारण की रहते हैं किन्तु परमपूज्य गुरुदेव ने इसे ‘घोषणा-पत्र’ निकालती है। बड़े-बड़े वादे उनमें रहते हैं किन्तु, परमपूज्य गुरुदेव ने इसे ‘घोषणा-पत्र’ कहते हुए नवयुग के आगमन तक सबके लिए इसे एक दैनिक धर्मकृत्य की तरह नित्य पढ़ने, मनन करने एवं जीवन में उतारने जैसा एक संकल्पपत्र कहा एवं तब से ही युगनिर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान, गायत्री परिवार, अखण्ड ज्योति के दर्शन की यह मूल धुरी बना रहा हैं सारी योजनाएं इसी एक केंद्रक के जो विचार क्रान्ति परिक्रमा करती रही हैं। बाह्य ओर परिक्रमा करती रही हैं बाह्य कलेवर भले ही लोगों को धर्मकृत्य, कर्मकाण्ड प्रधान देखने में लगा हो, किन्तु उसका अंतरंग एक ही सूत्र पर टिका है “हम बदलेंगे-युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा। “ उन दिनों प्रकाशित युग निर्माण सत्संकल्प पर एक दृष्टि डालकर देखें तो प्रतीत होगा कि समग्र धर्मशास्त्र-नैतिकी एवं अध्यात्म दर्शन का निचोड़ समाहित है।-
(1) ‘‘मैं आस्तिक 5 और कर्त्तव्यपरायणता कोह मानव जीवन का धर्म-कर्त्तव्य मानता हूँ। शरीर को भगवान का मन्दिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करूंगा। मन को जीवन का केंद्रबिंदु मानकर उसे सदा स्वच्छ रखूँगा। “ युग-निर्माण का यह समग्र सूत्र पूज्यवर ने आस्तिकता एवं कर्तव्यपालन की धुरी पर केन्द्रित रखा।
(2) “अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानूँगा और सबके हित में अपना हित समझूंगा। व्यक्तिगत स्वार्थ एवं सुख को सामूहिक स्वार्थ एवं सामूहिक हित से अधिक महत्व न दूँगा। “ मैं नहीं सब, “ आर्थिक ही नहीं सामाजिक समता भी ‘ व्यक्ति और समाज की अभिन्नता वाला यह समग्र सूत्र-समुच्चय अपने आप में एक क्रान्तिकारी नूतन दर्शन है एवं आज की सभी समस्याओं का समाधान भी
(3) “नागरिकता, नैतिकता, मानवता, सच्चरित्रता, शिष्टता, उदारता, मानवता, सहिष्णुता जैसे सद्गुणों को सच्ची संपत्ति समझकर उन्हें व्यक्तिगत जीवन में निरन्तर बढ़ाया चलूँगा। साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवाकार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने दूँगा। चारों ओर मधुरता, स्वच्छता एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करूंगा। “ आत्मसुधार एवं गुणों के अवलम्बन द्वारा अध्यात्म मूल्यों को जीवन में कैसे उतारा जाए, इसका समग्र शिक्षण संकल्प के इस खण्ड से मिलता है।
(4) “परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्व दूँगा। अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करूंगा। मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानूँगा। “विवेक ही विजयी हो, सदा नीि पर चलने की प्रेरणा मिले-यह इस संकल्प खण्ड का सार है।
(5) “मेरा जीवन स्वार्थ के लिए नहीं, परमार्थ के लिए होगा। संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य -प्रचार के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाता रहूँगा। “ देवमानव होने के नाते मनुष्य की जिम्मेदारी, परमार्थ में सच्चा स्वार्थ तथा अपनी विभूतियों का परमार्थ हेतु नियोजन यह युगनिर्माण की धुरी है।
(6) “दूसरों के साथ वह व्यवहार न करूंगा, जो मुझे अपने लिए पसन्द नहीं। ईमानदारी और परिश्रम की कमाई ही ग्रहण करूंगा। नारी जाति के प्रति माता, बहिन और पुत्री की दृष्टि रखूँगा।” इस संकल्प खण्ड में आत्मवत् सर्वभूतेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्, मातृवत् परदोरषु की नवयुग से सृजन का मूल आधार कही जा सकती हैं।
(7) “मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। इस विश्वास के आधार पर मेरी मान्यता है कि मैं। उत्कृष्ट बनूँगा और दूसरों को श्रेष्ठ बनाऊँगा, तो युग अवश्य बदलेगा। हमारा युगनिर्माण सत्संकल्प अवश्य पूर्ण होगा।” मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, भाग्य विधाता है। युगनिर्माण की धुरी हैं संकल्पशक्ति द्वारा आत्मनिर्माण, स्वयं को श्रेष्ठ बनाना, श्रेष्ठ चिंतन-चरित्र व व्यवहार विकसित करना। अंतिमसूत्र में यही सब सारभूत दर्शन छिपा पड़ा है। बाद में परमपूज्य गुरुदेव छिपा पड़ा है। बाद में परमपूज्य गुरुदेव ने इन्हीं सूत्रों को 18 संकल्पों के रूप में संशोधित रूप में 1986 में प्रस्तुत कर संधिकाल में परिवर्तन का मूल आधार बनाते हुए इसे प्रस्तुत किया था। आज उपरोक्त सूत्र नयी शब्दावली में सब ओर पढ़े जाते है।
(7) “मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। इस विश्वास के आधार पर मेरी मान्यता है कि मैं। उत्कृष्ट बनूँगा और दूसरों को श्रेष्ठ बनाऊँगा, तो युग अवश्य बदलेगा। हमारा युगनिर्माण सत्संकल्प अवश्य पूर्ण होगा।” मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, भाग्य विधाता है। युगनिर्माण की धुरी हैं संकल्पशक्ति द्वारा आत्मनिर्माण, स्वयं को श्रेष्ठ बनाना, श्रेष्ठ चिंतन-चरित्र व व्यवहार विकसित करना। अंतिमसूत्र में यही सब सारभूत दर्शन छिपा पड़ा है। बाद में परमपूज्य गुरुदेव छिपा पड़ा है। बाद में परमपूज्य गुरुदेव ने इन्हीं सूत्रों को 18 संकल्पों के रूप में संशोधित रूप में 1986 में प्रस्तुत कर संधिकाल में परिवर्तन का मूल आधार बनाते हुए इसे प्रस्तुत किया था। आज उपरोक्त सूत्र नयी शब्दावली में सब ओर पढ़े जाते है।
युगपरिवर्तन की प्रस्तुत वेला में इस महान कार्य के लिए जो सुविधाएँ सामने आयेगी, उनका उद्भव अदृश्य जगत से होगा। अदृश्य से ही जो कुछ भी किया जाना है वह ब्राह्मीचेतना से जुड़ा कारणशरीर ही सम्पन्न करेगा। इक्कीसवीं सदी में ऐसे ही परिवर्तन होंगे, पर यह प्रतीत न होगा कि यह कैसे हो रहे है। और कौन कर रहा है? -परमपूज्य गुरुदेव ‘नवसृजन के निमित्त महाकाल की तैयारी से
युगपरिवर्तन के इन अन्तिम वर्षों में अन्तर्ग्रही उथल-पुथल में अचानक तीव्रता आयी है। सौर−कलंकों, सौर ज्वाला, चन्द्रग्रहण एवं सूर्यग्रहणों की संख्या यकायक बढ़ गयी है। इसके अलावा अष्टग्रही योग, धूमकेतुओं का उदय एवं उल्कापात किन्हीं नवीन घटनाओं की ओर संकेत करते है। पृथ्वी का सूर्य से सीधा सम्बन्ध होने के कारण सौर-परिवर्तन से यहाँ का भौगोलिक परिवेश और पर्यावरण अत्यन्त प्रभावित होता है। खगोलविद् एवं अन्तरिक्ष विशेषज्ञ सन् 2000 तक अन्तरिक्षीय घटनाओं में भारी वृद्धि की सम्भावनाओं को देखते हुए पृथ्वी की परिस्थितियों में आमूल-चूल बदलाव को सुनिश्चित मान रहे है। प्रख्यात ज्योतिषविद् इस अन्तरिक्षीय परिवर्तनों को अरुणोदय के पूर्व की सघन तमिस्रा का द्योक मान रहे हैं। उनके अनुसार निश्चय ही ये आकाशीय हलचलें युगपरिवर्तन की स्पष्ट परिचायक है।
ज्योतिषवेत्ताओं के अनुसार 6,7 8 ग्रहों के एकत्रित होने से विभिन्न कुयोग बनते हैं। 11 जनवरी से 12 फरवरी, 1962 तक 25 दिन का षड्ग्रही योग था। इसी बीच 24 जनवरी से 9 फरवरी तक सप्तग्रही योग आया। 2 फरवरी से 5 फरवरी सन् 1962 अष्टग्रही योग आया। 2 फरवरी से 5 फरवरी सन् 1962 अष्टग्रही योग का काल था, जिसे परम पूज्य गुरुदेव ने युगपरिवर्तन की सक्रिय शुरुआत के शुभमुहूर्त्त की संज्ञा दीं। 4 फरवरी को सूर्यग्रहण भी था। इस अष्टग्रही योग के बारे में परमपूज्य गुरुदेव ने 1961 के अक्टूबर अंक में पहले से ही लिख दिया था-पिछले अज्ञातवास में हमें उच्चकोटि के तत्वदर्शियों का सान्निध्य प्राप्त करने का अवसर मिला है। उनके व्यक्तिगत निष्कर्ष यह हैं कि इस योग के फल स्वरूप जहाँ एक ओर विनाश की विभीषिका सामने आएगी, वहीं युग परिवर्तन के उपयोगी तत्वों का इस अवधि में तीव्रगति से अवतरण और विकास होगा। ज्ञान और विज्ञान दोनों की उन्नति चरमोत्कर्ष को पहुँचेगी। निर्माण और उत्पादन के कार्य भी बड़े विशाल परिणाम में होंगे, किन्तु इसी के साथ युगपरिवर्तन चक्र की धुरी होने के कारण अपने महादेश भारत को लगातार एक के बाद एक कई अग्नि-परीक्षाओं से गुजरना पड़ेगा। 1962 का चीनी आक्रमण शायद इसी की शुरुआत थी। अंतरिक्ष के प्रभावों के विषय में पुरातन ज्योतिषी ही नहीं, आधुनिक खगोल विज्ञानी एवं अन्य वैज्ञानिक सभी एकमत हैं डॉ. मौरिय के अनुसार पूर्णिमाकाल में सूर्य और और चन्द्रमा तीनों एक ही सीधी रेखा में आते हैं। उस वक्त उनके सम्मिलित विद्युत चुम्बकीय प्रभाव एवं गुरुत्वाकर्षण में जो परिवर्तन प्रभाव एवं गुरुत्वाकर्षण में जो परिवर्तन होता है, वह काया के सूक्ष्म विद्युतप्रवाहों पर सीधा प्रभाव डालता है। ग्रहण के समय का प्रभाव और भी व्यापक एवं परिवर्तनकारी होता है। इससे प्रकृति में भारी उलट-फेर की सम्भावना बनता हैं इन्हीं परिवर्तनों के संकेत के रूप में सन् 1962 में 1962 में हृमसेन नामक धूमकेतु का उदय हुआ था। 1962 में इकेवर पुच्छलतारा दिखाई दिया था। इसी वर्ष 1 जनवरी 6 जुलाई एवं 30 दिसम्बर को तीन बार स्वल्पग्रास चंद्रग्रहण हुए। 1964 में 234 जून को खग्रास चन्द्रग्रहण देखा गया। 23 नवम्बर, 1965 को ग्रस्तोदय सूर्यग्रहण हुआ। इक्रोवासेवी धूमकेतु भी इसी साल उदय हुआ था। इसी वर्ष अपने देश को पाकिस्तान के साथ युद्ध के रूप में एक नयी अग्नि-परीक्षा से गुजरना पड़ा।
1966 ई. में 20 मई को सूर्य ग्रहण हुआ। 24 अप्रैल एवं 18 अक्टूबर को दो बार खग्रास चन्द्रग्रहण का योग बना। 1967 में ही सिडनी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एम,टी, बटलर ने घोषणा की थी कि इकास क्षुद्रग्रह पृथ्वी से टकराने की पूर्ण सम्भावना है। इस बारे में परमपूज्य गुरुदेव ने अखण्ड-ज्योति, 1968 के नवम्बर अंक में लिखा कि जब-जब ऐसे विस्फोट हुए हैं अथवा ऐसी परिस्थितियाँ बनी है ओर पृथ्वी के धरातल में हलचल हुई है, तब-तब मानव-जाति का इतिहास करवट बदलता रहा है।
सन् 1968 में 6 अक्टूबर का खग्रास चन्द्रग्रहण तथा 22 दिसम्बर को आशिक सूर्यग्रहण तथा 22 दिसम्बर को आँशिक सूर्यग्रहण हुआ। 1969 में तोगों सातों कोसाका नामक धूमकेतु ने अन्तरिक्ष में अपनी धूम मचाई। 1970 में बेनेट धूमकेतु को आसमान में देखा गया। वर्ष 1971 में भारत को एक बार फिर अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ा। हालांकि 1971 में हुए भारत-पाक युद्ध में भारत ने एक नया इतिहास रचा। इसी के साथ बंगलादेश एक नए राष्ट्र के रूप में उदय हुआ। 6 अगस्त, 1971 एवं 30 जनवरी, 1972 को दो बार खग्रास चंद्रग्रहण आया। 30 दिसम्बर, 1973 की खण्डग्रास चन्द्रग्रहण हुआ एवं कोहोयूसिक धूमकेतु का उदय हुआ। 1974 में 4 जून की खण्डग्रहण हुआ एवं कोहोयूसिक धूमकेतु का उदय हुआ। 1974 में 4 जून को खंडग्रास तथा 29 नवंबर को खग्रास चंद्रग्रहण का योग बना।
इस अन्तरिक्षीय उथल-पुथल के साथ युगपरिवर्तन के लिए छेड़े गए अभियान ने भी एक नए आयाम में प्रवेश किया। 1971 से शान्तिकुँज मुख्य रूप से परमपूज्य गुरुदेव की गतिविधियों का केन्द्र बना। 1974 आते-आते प्राण प्रत्यावर्तन सत्रों के माध्यम से सृजन सैनिकों में एक नयी चेतना का अवतरण हुआ। युगपरिवर्तन की प्रक्रिया में तेजी आने के साथ ही अन्तर्ग्रही हलचलों में भी तेजी आ गयी। 18 नवम्बर, 1875 को खग्रास चंद्रग्रहण एवं कोवायासी वर्गर मिलन पुच्छल तारा दिखाई दिया। 1976 में 13 मई को आँशिक चन्द्रग्रहण। तथा 29 अप्रैल को सूर्यग्रहण हुआ। वेस्ट धूमकेतु इसी वर्ष देखा गया। 24 मार्च एवं 16 सितम्बर, 1978 को खग्रास चन्द्रग्रहण हुआ। इसके बाद 13 मार्च, 1979 को खंडग्रास चन्द्रग्रहण तथा 16 फरवरी, 1980 एवं 31 जुलाई, 1981 को सूर्यग्रहण की प्रक्रिया ने अपने प्रभाव दिखाए।
सन् 1982 को सभी ने एकमत से आकाशीय योग की दृष्टि से अद्भुत माना। यद्यपि परमपूज्य गुरुदेव ने वर्ष 1980 से सन् 2000 तक के समय को युगसंधिकाल घोषित किया था, तो भी 1980 से इस प्रक्रिया के तीव्र होने के संकेत अन्तरिक्ष में साफतौर पर न नजर आए। इस वर्ष 9 जनवरी एवं 30 दिसम्बर को दो बार पूर्ण चंद्रग्रहण तथा 15 दिसम्बर को दो बार पूर्ण चन्द्रग्रहण तथा 15 दिसम्बर को सूर्यग्रहण दिखाई दिया। सन् 1986 में 24 अप्रैल एवं 16 अक्टूबर को भी दो बार खग्रास चन्द्रग्रहण का योग आया। इसी साल हेली धूमकेतु आकाश में काफी चर्चित हुआ। 1988 में 3 मार्च को चंद्रग्रहण तथा 18 मार्च व 11 सितम्बर का सूर्यग्रहण देखे गए। 20 फरवरी, 1989 को हुए खग्रास चन्द्रग्रहण ने एक बार फिर अन्तरिक्षीय हलचलों की तीव्रता को सूचित किया।
सन् 1990 में 9 फरवरी को खग्रास एवं 6 अगस्त को स्वल्पग्रास सूर्यग्रहण आया था। वर्ष 1990 में परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के साथ उनकी सूक्ष्मसत्ता की विशेष सक्रियता के साथ युगपरिवर्तन की हलचलों में तीव्रता आयी। 31 दिसम्बर, 1991 को खण्डग्रास चन्द्रग्रहण हुआ। 9 दिसम्बर, 19912 एवं 4 जून, 1993 को दो बार खग्रास चन्द्रग्रहण देखा गया। बृहस्पति ग्रह का दस हजार वर्षों से चक्कर लगाने वाले एक धूमकेतु को अमेरिकी खगोलविद् कैरोलीन शूमेकर एवं डेविडलेवी ने पता लगाया। इन्हीं के नाम से इसे शूमेकर लेवी के नाम से जाना गया। जुलाई, 19992 में यह धूमकेतु बृहस्पति के प्रबल आकर्षण के फलस्वरूप 21 टुकड़ों में विभक्त हो गया। 17 जुलाई, 1994 की मध्य रात्रि से बृहस्पति ग्रह से ये टुकड़े एक-एक कर टकराना शुरू हुए और 22 जुलाई की दोपहर तक यह टकराव जारी रहा। दो लाख नौ हजार किलोमीटर प्रतिघंटे के वेग से हुई इस टक्कर के कारण बृहस्पति पर पृथ्वी के आकार का एक विशाल गड्ढा विनिर्मित हो गया। इस विस्फोट से उत्पन्न ऊर्जा दो लाख टी. एन. यानि कि इस हजार हाइड्रोजन बमों के बराबर थी। अगर यह घटना पृथ्वी पर होती तो महाविनाश हो जाता है।
वर्ष 1994 में वंदनीय माता जीव भर अपने स्थूलशरीर का परित्याग करके सूक्ष्मशरीर से युगपरिवर्तन प्रक्रिया को और अधिक तीव्रतर बनाने में तत्पर हो गयी। 15 अप्रैल, 1995 को ग्रस्तोदय चन्द्रग्रहण तथा 24 अक्टूबर, कार्तिक अमावस्या को व्यापक प्रभावों वाला अमावस्या को व्यापक प्रभावों वाला अमावस्या को व्यापक प्रभावों वाला अमावस्या को व्यापक प्रभावों वाला सूर्यवस्या को व्यापक प्रभावों वाला सूर्यग्रहण हुआ। 3 अप्रैल, 1996 को खग्रास चंद्रग्रहण दिखाई दिया। 1997 का वर्ष आकाशीय हलचलों के लिए बड़ा रोमाँचक रहा। खुली आँखों से देखा जाने वाला हलचलों के लिए बड़ा रोमांचक रहा है। खुली आँखों से देखा जाने वाला हेलीबाँप धूमकेतु कई सप्ताह तक आकाश में आकर्षण का केन्द्र बना रहा। आगामी वर्षों में सन् 2000 तक के इस संक्रांतिकाल में चार और ग्रहण होंगे। 22 अगस्त, 1998 को सूर्यग्रहण होंगे। 22 अगस्त, 1998 को सूर्यग्रहण, 28 जुलाई, 1999 को पश्चिमी देशों में चन्द्रग्रहण तथा सन् 2000 को 29 जनवरी को विदेशों में एवं 16 जुलाई को भारत में पूर्ण चन्द्रग्रहण का योग है।
भारत के दो वैज्ञानिकों प्रो. के. आर. रामनाथन और डॉ. एस. अनन्त कृष्णनन के अनुसार धरती पर आकाशीय पिण्डों का व्यापक प्रभाव पड़ता है। इन वैज्ञानिकों के अनुसार धूमकेतु सूर्य की सन्तानें है, परन्तु ये ग्रहों के आस-पास एक विशाल धूमकेतु या उल्कापिण्ड पृथ्वी के वातावरण में विकराल आग के गोले के समान प्रवेश करेगा। दीखने में यह छोटे सूर्य के समान होगा एवं पृथ्वी में प्रचण्ड परिवर्तन खड़ा करेगा। व्याख्याकार रेने नूर बजेन के मतानुसार यह युगपरिवर्तन की अन्तिम घटना होगी। दिव्यद्रष्टाओं के अनुसार धूमकेतु अनेकानेक क्रान्तिकारी परिवर्तनों को जन्म देता हैं इसे अगणित शासकों एवं सम्भावनाओं के उत्थान पतन से संबद्ध माना जाता है।
सूक्ष्मवेत्ताओं ने 1997 में दिखे हेलबाँप को भी नवयुग के अभ्युदय का संदेशवाहक माना है।
नवम्बर, 1997 में ही अन्तरिक्ष में ग्रहों की पेरड का एक दुर्लभ दृश्य देखा गया। 18 नवम्बर से 20 नवम्बर तक सूर्यास्त के ठीक आधे घंटे ग्रहों को एक ही पंक्ति में देखा गया। यह दुर्लभ आकर्षक आकाशीय घटना 15 सालों के बाद घटित हुई। इसके पूर्व 10 मार्च, 1882 को ये आठों ग्रह एक ही वृत्तपाद में आ गए थे। इस बार ये आठों ग्रह 130 डिग्री क्वार्ड्रे में फैले थे।
ग्रहों का यह संयोग नवयुग के पूर्वाभास का द्योतक है। अमरीकी अन्तरिक्ष अनुसंधानकर्त्ताओं के अनुसार, अपने सौरपरिवार में नौ ग्रहों के अलावा एक दसवाँ ग्रह भी हैं। यह शनि और पृथ्वी के परिपथों को काटता हुआ गति करता है। सूर्य से सर्वाधिक दूरस्थ कक्षा में स्थित यह ग्रह एक हजार साल में अपना परिक्रमापथ पूर्ण करता है। सुदूर भविष्य में इसे पृथ्वी से भी स्पष्ट देखा जा सकेगा। अमेरिकी अन्तरिक्षवेत्ता जॉन एण्डरसन की एक रिपोर्ट के आधार पर कैनेथ सीडेलमान का कहना हैं कि यह प्लेनेट देन पृथ्वी से पाँच गुना बड़ा है।
जैवब्रह्मांडशास्त्री डेनियल हृटमायर इस ग्रह के साथ भावी प्राकृतिक परिवर्तनों को अनिवार्य मानते है।
अंतरिक्षीय हलचलों में सर्वाधिक प्रमुख है-आठ अप्रैल, 1997 की नासा तथा यूरोपीय एजेन्सियों द्वारा देखी गयी सूर्य की प्लाज्मा में भीषणतम उथल पुथल। वैज्ञानिकों ने इसका प्रभाव पृथ्वी के चारों ओर खासकर ध्रुवीय प्रदेशों में प्रचण्ड आतिशबाजी के रूप में अनुभव किया। सूर्य से आने वाला यह चुम्बकीय अंधड़ 18 लाख मील प्रतिघंटे की रफ्तार से पृथ्वी की ओर आना शुरू हुआ। है। पृथ्वी से 145000 कि.मी दूर सूर्य के तरफ वाले कक्ष में स्थित सोहों उपग्रह के अनुसार सूर्य के अधिक क्रियाशील होने से चुम्बकीय बादलों का निर्माण होने से चुम्बकीय बादलों का निर्माण होता है।, जिसका प्रभाव पृथ्वी के वायुमण्डल पर पड़ता है। इसी अन्धड़ की अधिकता के कारण 11 जनवरी 1990 को बीस करोड़ डॉलर से बने अत्याधुनिक टेलीस्टार उपग्रह ने काम करना बन्द कर दिया था। इससे लाखों अमेरिकियों तक पहुंचने वाला टेलीविजन प्रसारण बन्द हो गया है। विश्वविख्यात साप्ताहिक पत्रिका टाइम के 9 सितम्बर, 1996 के अंक के अनुसार इसी तरह के चुंबकीय तूफान से 1985 में कनाडा अत्यधिक प्रभावित हुआ। इस दौरान वहाँ टी.वी. टेलीफोन तथा रेडियो का प्रसारण यकायक बंद हो गया एवं पाइपों में चुम्बकीय जल प्रवाहित होने लगा।
मोटाँना स्टेट यूनिवर्सिटी की एक बैठक में वैज्ञानिकों ने आशा प्रकट की है। कि सूर्य में उठा इस बार का चुम्बकीय तूफान पृथ्वी की प्राकृतिक स्थिति एवं पर्यावरण में आमूलचूल परिवर्तन को एकबारगी सुधारने वाला दैवीप्रयास है। हालाँकि कइयों का यह भी कहना है कि सम्भवतः यह धरती के पर्यावरण को एकबारगी सुधारने वाला दैवीप्रयास है। हालाँकि कइयों का यह कहना है कि अगर इसकी तीव्रता में वृद्धि हुई तो पृथ्वी का अस्तित्व संकट ग्रस्त भी हो आब्जर्वेटरी’ एवं ‘सोलर हीलियों स्फेरिक आब्जर्वेटरी’ एवं ‘फास्ट आँरोरल स्फेरिक आब्जर्वेटरी’ एवं ‘ फास्ट आँरोरल सन स्पाट एक्सप्लोरा’ नामक उपग्रहों के नवीतम आँकड़ों से पता चलता है। कि सन् 2000 तक सूर्य में चुम्बकीय तूफान नासा के भौतिकवेत्ता जू गर्मन ने कहा है कि सोलर मिनीमम दो सूर्य धब्बों के बीच आता है। सूर्य का धब्बों के बीच आता हैं सूर्य की धब्बा प्रत्येक 11 वर्ष की अवधि में आता है।
उज़्बेकिस्तान के विज्ञानी एन. केनोसेरित ने उल्लेख किया हैं कि सूर्य धब्बों के दौरान पृथ्वी की गतिविधियाँ तीव्रतम हो जाती हैं इनके अनुसार धरती के इतिहास में जब-जब सूर्य में तीव्र प्रतिक्रियाएँ हुई। है, धरती पर क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए है। इन दिनों सूर्य अपने 11 वर्षीय सक्रियता के शान्त चरण को समाप्त कर तीव्र सक्रियता की ओर अग्रसर हो रहा है। गर्मन का कहना है कि सन् 2000 के अन्दर ही सूर्य में ऐसे कई चुम्बकीय अन्धड़ उठने की सम्भावना है।
कोलारिडो के अन्तरिक्षशास्त्री डेनियलबेकर के अनुसार जब सूर्य टर्बोचाज्ज होता है, तो सूर्य की प्लाज्मा प्रचण्ड तूफान-सी उमड़ते हुए पृथ्वी की ओर दौड़ती चली आती है। सूर्य की इस सक्रिय अवस्था में सूर्य के चुम्बकीय क्षेत्र कोरोनल छिद्र से विस्फोटक प्लाज्मा के धब्बों की संख्या बढ़ जाती है। इसका प्रभाव पृथ्वी पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। सूर्य के बारे में नवीनतम जानकारी देन वाले सोलर मैक्जीमम मिशन एवं यूलीसिसस अन्तरिक्ष अभियान के अनुसार सोलर वाइण्ड के कारण सूर्य के चारों ओर बहुत बड़ा स्थान रिक्त हो गया हैं इसे हिलीयोस्फियर कहते है। इसका आकार सूर्य एवं पृथ्वी के बीच की दूरी के सौ गुना अधिक बड़ा होता है। सन् 2000 तक इसमें तीव्र प्रतिक्रियाएँ होने की सम्भावना है।
युलिसीस उपग्रह के अनुसार, सूर्य के ध्रुवीय क्षेत्र में चुम्बकीय क्षेत्र की रेखाएँ धरती की तरह दो ध्रुवों में विभक्त नहीं होती। ये अन्तरिक्ष में एक समान रूप से फैली होती हैं इनकी इस विशेषता के कारण ब्रह्मांड का चुम्बकीय क्षेत्र अपना नियंत्रण रख पाता है। सन् 2001 तक इन रेखाओं तथा सौरकलंकों में काफी परिवर्तन होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इससे सौर विचलन के बढ़ने से अन्तरिक्ष में चुम्बकीय तूफान उमड़ सकता है। सोलर प्लाज्मा पृथ्वी की चुम्बकीय रेखाओं को प्रभावित करने के साथ ही बड़ी मात्रा में आन्तरिक भूगर्भीय हलचलें पैदा करेगी, ऐसा वैज्ञानिकों का अनुमान है।
नासा के एडवान्स कंपोजिशन एक्सप्लोरा के अनुसार सन् 2000 तक सूर्य में कभी भी उपरोक्त विचलन हो सकता हैं विज्ञानवेत्ता विचलन हो सकता है। विज्ञानवेत्ता यह भी मानते है कि सन् 2001 तक सौर−कलंकों की संख्या पिछले सभी रिकार्ड को तोड़ देगी। प्रसारण विशेषज्ञ जॉन केपमेन के अनुसार, सौपप्लाज्मा में तीव्रता ला सकता है। भविष्यवक्ता एडगरकेसी ने बहुत पहले सन् 2000 के आसपास संसार में भौगोलिक परिवर्तन की भविष्यवाणी की थी। अमेरिकन भविष्यवक्ता रूथ माँटगुमरी के अनुसार सन् 2000 तक पृथ्वी की धुरी में बदलाव आने से सम्पूर्ण विश्व का वायुमण्डल एवं मौसम परिवर्तित हो सकता है।
चर्चित कन्नड पत्रिका ‘तरंग’ में प्रकाशित भविष्यवाणी के अनुसार, आठ मई, 1999 को ब्रह्मांड के आठ उपग्रहों के एक साथ मिलने की सम्भावना हैं विशेषज्ञों का मानना है कि इस मिलन के परिणाम काफी व्यापक परिवर्तन लाने वाले होंगे। विश्व के प्रख्यात ज्योतिषविदों के अनुसार 4 मई, 2000 को अन्तरिक्ष में एक अद्भुत एवं महत्वपूर्ण घटना घटित होने वाली है। ज्योतिषाचार्यों की मान्यता है कि उस दिन पृथ्वी के एक तरफ सभी ग्रह सीधे एक पंक्ति में आ जाएँगे। मंगल को छोड़ कर सभी ग्रहों की एक ही राशि मेष में युति होगी। शुक्र के अलावा समस्त ग्रह सूर्य से अस्त होंगे। पाँच ग्रह एक ही नक्षत्र भरणी में स्थित हो रहे है। गुरु व शनि की दीप्ताँश के भीतर ही युति होगी। सभी ग्रह राहु व केतु के रेखाँश के भीतर आयेंगे अर्थात् काल सर्प योग का निर्माण हो रहा है।
इन सभी ग्रहों के पृथ्वी के एक ही सीध में आ जाने से सबकी समन्वित ध्रुव का स्थान परिवर्तित होने की सम्भावना बनती है। इससे पृथ्वी में तीव्र परिवर्तन होंगे। इस दिन काल सर्प का योग विश्व को महापरिवर्तन की ओर मोड़ सकता है। 4 मई, 2000 को नीचे अन्दर हो रही है। यह युति दीप्ताँश के अन्दर हो रही है। यह युति भारत के अध्यात्म क्षेत्र में एक बहुत बड़ी क्रान्ति का सृजन करेगी तथा भारत फिर विश्व का धार्मिक एवं आध्यात्मिक गुरु बनेगा। इस दिन मेष में सभी ग्रहों की युति शून्य अंश पर नहीं होने के बावजूद वह प्रभाव एक नए युग का सूत्रपात करेगा। 2 फरवरी से 5 फरवरी, 1962 के अष्टग्रही योग से प्रारम्भ हुई युगपरिवर्तन की सक्रियता अपनी परिसमाप्ति 4 मई अष्टग्रही योग के अवसर पर करेगी।
इस अवधि में हुई और होने वाली विभिन्न अन्तरिक्षीय हलचलों की चर्चा करते हुए परमपूज्य गुरुदेव ने वर्ष 1989 की अखण्ड-ज्योति के मई अंक में स्पष्ट घोषणा की थी, “पिछली सहस्राब्दियों के समय जो परिवर्तन हुए होंगे, उनकी तुलना में इस प्रकार की अन्तरिक्षीय हलचलों को हद दृष्टि से अद्भुत माना जाना चाहिए। इसे नयी सदी में आने वाले नवयुग के प्रभातकालीन अरुणोदय की वेला कहा जा सकता है।”
दिगम्बरो वापि च सम्बरो व त्वगम्बरों वापि चिदम्बरस्थः। उन्मत्तवद्वपि बाल वद्वा पिशाचवद्वपि चरन्तवन्यान्॥
इस अस्फुट उच्चारण के साथ वह खिलखिलाकर हँसते हुए एक ओर भाग चले। बालकों का झुंड उनके पीछे-पीछे दौड़ा थोड़ी देर तक यह भाग-दौड़ होती रही, फिर वे कुछ दूर पर एक पेड़ के नीचे खड़े हो गए। कि सम्भवतः अब उन्होंने अपने क्रीड़ा सखा बालवृन्द की थकान को जान लिया था। बालकों के साथ क्रीड़ा उन परम वीतराग, योगेश्वर, अवधूत नागा निरंकारी महाराज का सहज स्वभाव था। कानपुर जनपद पर पालीग्राम उनकी इन नित्यलीलाओं का वर्षों से साक्षी था।
आस-पास के सभी ग्रामवासी नागा महाराज की यौगिक विभूतियों से परिचित थे। महाराज उनके लिए गुरु मातृ, सहायक, स्वामी, सखा सभी कुछ थे। ग्रामवासी उनके बारे में इतना ही जानते थे कि इनके शरीर का जन्म पंजाब प्रान्त के किसी राजधराने में हुआ था किसी -किसी से इन्होंने शरीर के जन्मस्थान का नाम अठीलपुर नगर बताया था, जो कि रावी नदी के पश्चिम में था। ज्ञात नहीं अब उस नगर के भग्नावशेष चिन्ह किसी रूप में मिलते हैं या नहीं?
बालविरागी महाराज बचपन से ही हिमालय की ओर प्रस्थान कर गए। हिमशिखरों से घिरे दुर्गम एवं दिव्यक्षेत्र से लोक-साल उग्र साधना की। सिद्धियां उनकी अनुगामिनी बनी। सूक्ष्मशरीर से लोक-लोकान्तर गमन उनके जीवन का सामान्य सत्य बना। हिमालय की भयावह सत्य बना। हिमालय की भयावह शीत हो या फिर कानपुर फतेहपुर, प्रयाग का सामान्य मौसम दिगम्बर रहना ही उनका स्वभाव था। सर्दी के दिनों में भी यह उसी प्रकार स्नान करते थे, जिस प्रकार गर्मियों में किया जाता है। स्नान के बाद तन में लपेटी गयी विभूति उनके शिवत्व को प्रकाशित करती थी।
उनकी आँखों से सहज ही करुणा और ममत्व की तरंगें निकलती थी। एक अलौकिक आकर्षण था उनके वीतरागी व्यक्तित्व में पवित्र भावना का ऐसा तेजोबल था कि कोई भी उन्हें देखकर सरलतापूर्वक मुग्ध हो जाता था। ग्रामीण जनों से लेकर पढ़े-लिखें उच्चशिक्षित इनके चुम्बकत्व से खिंचे चले आते थे।
आज भी कुछ ग्रामीणजन उनके पास आए थे। इनमें से कुछ कष्टपीड़ित थे, तो कुछ जिज्ञासु। इन्हीं में से पास के ही अपने परिचित के साथ नागा महाराज के दर्शनों के लिए गए थे। उन दिनों विचारशीलों के मन में एक ही जिज्ञासा थी, अंग्रेजी के चंगुल से भारत कभी छूट भी पाएगा या नहीं? जब से अंग्रेजों ने एक गाँव के कुछ लोगों को उनकी देशभक्ति के कारण इमली के पेड़ से लटकाकर फाँसी दे दी, तब से आस-पास के सभी गाँवों में दहशत थी। चारों ओर दहशत, आतंक की छाया थी। भय का घना कुहासा ग्रामीणजनों के मनों में छाया हुआ था। डरे-सहमे इन गाँव वालों को देखकर नागा महाराज मुस्कराए। उनकी मुसकान में आश्वासन था, प्रेम था और था अभयदान का संकल्प। अपनी बाल मण्डली के साथ वे धीरे-धीरे चलते हुए इन सभी के पास आ गए। ये सब भी नागास्वामी के सान्निध्य में थोड़ी राहत महसूस कर रहे थे पास आने पर उन्होंने सबको सम्बोधित करते हुए कहा-चिंता क्यों करते हो तुम लोग? ये अँग्रेज रहने वाले नहीं है। इनके पाप का घड़ा भर चुका है हिंदुस्तान से क्या ये सारी दुनिया से उजड़ जाएँगे। अपनी विलायत में ही दुबके रहेंगे।
कब होगा यह सब महाराज! एक ग्रामवासी ने सहज जिज्ञासा की।
हिन्दुस्तान से तो इनके डेरे 19947 में ही उखड़ जायेंगे पर इनके जाते-जाते भी बड़ा तहस-नहस होगा।
महाराज! इतना घोर कलियुग हैं, तब क्या कल्कि भगवान नहीं आयेंगे। पं. जगदेव प्रसाद के इस प्रश्न ने बरबस सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया।
अवतार तो हो चुका है। यह अवतारी बालक हमें ध्यान में दीख पड़ा है। इसके क्रिया-कलाप अद्भुत होंगे। वह गायत्री मंत्र का प्रचार व धर-धर वेदों की स्थापना करेगा, परन्तु अभी इस देश को बहुत सहना है।
स्वतन्त्रता मिलने के बाद भी? बड़ा आश्चर्य था पूछने वाले के स्वर में।
हाँ। स्वतन्त्रता के बाद भी संकट है। पहले तो स्वतन्त्रता ही खण्डित होगी। देश के टुकड़े होने का दर्द ही क्या कम है। उस पर ये लड़ाइयाँ। बाहर से आक्रमण एवं भीतर अपनों के द्वारा ही घात।
नागास्वामी ने सभी के चेहरों पर आयी निराशा को दूर करते हुए आयी निराशा को दूर करते हुए कहा-नहीं, नहीं! इतनी चिंता भी ठीक नहीं! इतनी चिन्ता भी ठीक नहीं। यह तो संघर्ष है। सारा संकट इस सदी के अन्त तक है। फिर तो पूरा युग ही बदल जाएगा। अगली सदी में हिन्दुस्तान के टुकड़े फिर से हिन्दुस्तान में आ मिलेंगे हमें ध्यानयोग से यह सब स्पष्ट दिखाई हमें ध्यानयोग से यह सब स्पष्ट दिखाई देता है।
नागा महाराज आज भविष्य को अपनी दिव्यदृष्टि से देख रहे थे। उनके स्वर में ओज था। वह कहने लगे-तुम सब परेशान न हो, भारत पर हिमालय के ऋषि-तपस्वियों की छत्रछाया है। अभी वे पराधीनता की बेड़ियों को तोड़ने में लगें है। आगे भी वे भीतर से होने वाले और बाहर के प्रहारों से देश को बचाते रहेंगे। अनर्थ की स्थिति न आ पाए, इसके लिए उनका संरक्षक बना रहेगा। अगली सदी में अपना देश दुनिया का सिरमौर होगा। इस युगपरिवर्तन के लिए ही तो वो अवतार आया है इस समय हिमालय में बारह योगीगण तप कर रहे हैं। दुनिया की लड़ाई और सुलह में हम योगीगण ही आगे रहा करते है। सब कुछ ठीक होगा। अब तुम लोग जाओ। भगवान का स्मरण कतरे हुए स्वयं अच्छे बनो, परिवार को अच्छा बनाओ और देश और समाज के लिए अपने जीवन को लगाओ। वीतराग सन्त की इन बातों में ग्रामवासियों के लिए ही नहीं मस्त राष्ट्र के लिए उज्ज्वल भविष्य का आश्वासन था। युगपरिवर्तन की सुनिश्चित झाँकी दिखाकर वे पुनः अपनी दिनचर्या में लग गए।
युग के परिवर्तन -प्रवाह में नारियों का संसार भी परिवर्तित हो रहा है अब वे धुँधले-कुहासे भरे अतीत को पीछे छोड़कर उज्ज्वल और गौरवशाली भविष्य की ओर पाँव बढ़ा रही है। कल तक वे धर की दहलीज के भीतर ही सहमी, सकुचाई, ठिठनी-सी रहती थी। सहमी, सकुचाई, ठिठकी-सी रहती थी। आज वे दहलीज के पार हैं कल तक उनके सपने आँखों की पलकों पर ही चिपके रहते थे, आज वे सपने धीरे धीरे आकार ले रहे है। नारी शक्ति का यह समवेत स्वर बीसवीं सदी के अन्तिम मोड़ पर युगपरिवर्तन के इन महान क्षणों में अपनी यथार्थता की गूँज सर्वत्र प्रतिध्वनित कर रहा हैं विश्व के हर कोने में ऐसी हवा चल पड़ी है कि महिलाओं के विकास के अनुरूप वातावरण बनता जा रहा है। आर नारी अपने धर की चारदीवारी में सिमटे दोयम दर्जे से उबरकर, स्वयं की अन्तर्निहित क्षमता, सूझ-बूझ एवं साहस का परिचय देती हुई अपने दृढ़ इरादों एवं आत्मविश्वासपूर्ण कदमों के साथ आगे बढ़ रही है। पुरुष प्रधान समाज में वह अपने स्वतन्त्र अस्तित्व का अहसास दिला रही है।
रूस में यह अहसास सघन हो चला है। वहाँ जनसंख्या की 53 प्रतिशत महिला हैं, जिनमें 47 प्रतिशत रोजगार में लगी है। नौकरी में लोगों उच्चशिक्षा प्राप्त महिलाओं की संख्या 40.5 प्रतिशत प्राप्त महिलाओं की संख्या 50.5 प्रतिशत है और 56.2 प्रतिशत उच्चतर शिक्षा प्राप्त है। राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए कई प्रयास चल रहे हैं। इसी उद्देश्य से अक्टूबर, 1993 में ‘वीमेन ऑफ एशिया’ नामक राजनैतिक आन्दोलन की नींव रखी गयी थी। वहाँ 1993 के संसदीय चुनाव में इस आन्दोलन की 21 सदस्या विजयी होकर आयी थी। गत जून माह में राष्ट्रपति बोरिस येल्तिसन ने महिलाओं के हित में एक अध्यादेश जारी किया, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया कि स्त्रियाँ समाज में भूमिका अदा कर रही है, उसी अनुपात में उन्हें राज्यप्रणाली के उच्च व मुख्य पदों उन्हें राज्यप्रणाली के उच्च व मुख्य पदों पर भी प्रतिनिधित्व दिया जाए। प्रथम बार वहाँ इस तरह महिलाओं के लिए न्यूनतम कोटा रखने की बात कही गयी।
ईरान के उदारवादी राष्ट्रपति मोहम्मद फातमी ने एक महिला सम्मेलन में, स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार देने कि मजहब के आधार पर महिलाओं को उनके वाजिब अवारों से वंचित नहीं करना चाहिए अपने वादे को निभाते हुए उन्होंने कई महिलाओं को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त भी किया हैं जिनमें मैसीमेह उब्तेकार तो उपराष्ट्रपति पद पर हैं इस समय ईरानी संसद में 13 महिला सदस्य ओर एक महिला उपाध्यक्ष है। महिलाओं एक महिला उपाध्यक्ष हैं महिलाओं को समान अधिकार देने सम्बन्धी प्रयास के ही परिणामस्वरूप वर्ष 17 के अन्त में ईरान ने पहली बार चार महिला न्यायाधीशों की नियुक्ति की है। तेहरान प्रान्त के एक शहर में पारिवारिक मामलों की अदालतों के लिए इनकी नियुक्ति की हैं तेहरान प्रान्त के एक शहर में पारिवारिक मामलों की अदालतों के लिए इनकी नियुक्ति की गयी हैं इस देश के लिए यह वस्तुतः एक चमत्कारी परिवर्तन वाली प्रक्रिया मानी जा रही है, क्योंकि यहाँ पर सदा से नारी पर प्रतिबंध रहा है।
उगते सूर्य के देश जापान में भी नारियों की स्थिति में बहुत परिवर्तन आया हैं द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद छह वर्ष अमेरिकी कब्जे के बाद पुनर्निर्माण के गत चार दशकों में आर्थिक सुधार व सबके लिए अनिवार्य शिक्षा की इस बदलाव का कारण माना जाता हैं गत बीस वर्षों में जापान के श्रम बाजार में महिलाओं ने पुरुषों की अपेक्षा तेजी से प्रवेश किया हैं वर्ष 1976 से 1996 के बीच प्रबंधकीय पदों पर महिलाओं की उपस्थिति में 60 प्रतिशत वृद्धि हुई हैं अभी तक ज्यादातर महिलाएँ बैंक व डिपोर्टमेण्टल स्टोर तक सीमित थी, जबकि आज भव्य व्यापारिक मंत्रणा कक्ष भी उनके लिए अछूते नहीं रह गए है। वर्षों से जापानी कम्पनियों में प्रबन्धकीय श्रेणी केवल पुरुषों के लिए आरक्षित मानी जाती थी। महिलाएँ केवल लिपिकीय कार्य तथा चाय परोसने तक सीमित थी। इन दिनों पहली बार महिलाएँ प्रबन्ध की ओर अग्रसर हुई है। और उनकी संख्या बढ़ती जा रही है। टकाकोडोई वह पहली महिला थी, जो जापान के इतिहास में पहली बार पार्लियामेण्ट में बहुमत से चुनी गयी। राजनीति व अन्य क्षेत्रों में संख्या अब तेजी से बढ़ोत्तरी पर है।
सिडनी में हुए एक अन्तर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार पुरुषों की तुलना में महिलाएँ अच्छी अधिकारी सिद्ध हो सकती है, क्योंकि वे अपने काम के प्रति अतिरिक्त प्रयास के लिए तैयार रहती हैं और उनका सहयोगी व्यवहार आधुनिक कार्यस्थलों के लिए उपयुक्त रहता हैं महिला प्रबन्धक अपने कर्मचारियों का ऊँचे से ऊँचे लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रेरित करती है। सर्वेक्षण में आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, अमेरिका और कनाडा के उत्पादन और सेवा-संस्थाओं के एक लाख से अधिक कर्मचारियों के विचार लिए गए थे इस सर्वेक्षण से यह भ्रम पूरी तरह टूट गया कि नेतृत्व करने के लिए महिलाएँ उपयुक्त नहीं होती। सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि पुरुष अपनी नेतृत्व क्षमता विकसित करने के लिए महिलाओं से सीख ले सकते है।
अपने देश में भी पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी एक क्रान्तिकारी कदम है। 73 वें संविधान संशोधन बिल के परिणामस्वरूप अधिक से अधिक महिलाओं को लोकतंत्र के आधारभूत स्तर पर राजनैतिक प्रक्रिया में भाग लेने के अवसर मिल रहे पंचायतराज के तनों स्तरों गाँव, ब्लॉक, जनपद एवं जिला स्तर पर महिलाओं के लिए एक तिहाई स्थान आरक्षित किए गए हैं। अपनी भूमिका सक्षमता से निभाते हुए उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि महिलाएँ किसी तरह कम नहीं है। अनुभव से ज्ञात हो रहा है कि वे बहुत अच्छा काम कर रही है।
पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत मिले अधिकारों एवं कर्तव्यों का सदुपयोग करते हुए बस्तर जिले की ग्राम पंचायत कलगाँव की महिलाओं ने अपने पिछड़े गाँव को एक आदर्श गाँव के रूप में बदलकर एक मिसाल कायम कर दी है। 800 महिलाओं से बने महिला मण्डल ने जब रचनात्मक कार्यों को हाथ में लिया तो सर्वप्रथम शराब के विरुद्ध लिया तो सर्वप्रथम शराब के विरुद्ध आन्दोलन छोड़ा महिलाओं के शराब विरोधी आन्दोलन ने शराबियों की शासत कर दी। उन्हें दंडस्वरूप 151 रुपये कर दी। उन्हें दंडस्वरूप 151 रुपये जुर्माना देना पड़ता था। प्रति रविवार मद्यपान, निरक्षरता एवं अंधविश्वास के खिलाफ महिलाएँ रैली निकालती थी। इसी के साथ ‘स्कूल चलो अभियान’ के अंतर्गत बच्चों को स्कूल चलो अभियान’ के अंतर्गत बच्चों को स्कूल भेजा जाने लगा।
उत्तराखण्ड की महिलाएँ भी इस पंचायती राज से मिले एक-तिहाई आरक्षण का भरपूर उपयोग कर रही हैं अब वहाँ कई महिलाएँ ग्रामप्रधान ब्लॉकप्रमुख है। जिला पंचायातों में भी उनकी काफी संख्या हैं इनमें से कई स्वतंत्र रूप से अपने प्रभाव का उपयोग कर रही हैं विशेषतौर पर ‘चेतना आन्दोलन’ के ऊपर अपनी छाप छोड़ती जा रही वे पुरुष प्रधान समाज में अपनी पहचान बनाने में संघर्षरत है। क्रान्तिकारी महिलाओं में गौरादेवी का उदाहरण प्रसिद्ध है, जिन्होंने ‘ चिपको आन्दोलन ‘ का शुभारम्भ कर विश्व को पर्यावरण रक्षा का मार्ग दिखाया।
हरियाणा में पंचायती राज में महिलाओं की भूमिका पर ‘सेन्टर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज एण्ड एक्शन’ की प्रो. सुशीला कौशिक ने चार जिलों की 100 चुनी गई महिलाओं पर अध्ययन किया है इसके अनुसार एक मौन क्रान्ति का शुभारम्भ हो चुका है। उनके अनुसार इनमें से अधिकांश चुनी गई महिलाएँ दो साल पहले अनपढ़ थीं, लेकिन दो सालों में उन्होंने शिक्षित होने और सरकारी कामकाज में सक्षम होने का अदम्य उत्साह प्रदर्शित किया है। पंचायती समिति की अध्याक्षाएँ इन्हीं दो सालों में विभिन्न राजनैतिक पार्टियां से जुड़ गई और उन्होंने 1996 में हुए हरियाणा असेम्बली चुनाव में भाग लिया। अब वे अपने स्वतन्त्र अस्तित्व का अनुभव कर रही है। अब उनके पति एवं बच्चे भी शिक्षा समेत जिन्दगी के विविध मसलों पर उनकी राय लेते है।
दिल्ली स्थित लेडी इर्विन कॉलेज के कम्यूनिटी रिसोर्स मैनेजमेण्ट तथा एक्सटेंशन विभाग की प्रमुख डॉ. अंजिल कपिला और उनकी सहयोगी डॉ. गीता कटरिया और उनकी सहयोगी डॉ. गीता कटारिया और मुदृला सेठ ने सत्ता के विकेन्द्रीकरण एवं स्थानीय प्रशासन में महिलाओं की भागीदारी से उनकी स्थाति में होने वाले परिवर्तन का पता लगाने के लिए एक सर्वेक्षण किया। अखिल भारतीय महिला संघ की सहायता से होने वाला यह सर्वेक्षण पाँच राज्यों -राजस्थान, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, गया। बाद में 86 महिला कार्यकर्ताओं की संगोष्ठी में इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी। विभिन्न राज्यों में महिला समाज के अन्दर होने वाली उथल-पुथल के रोचक प्रसंगों को उजागर करते हुए संगोष्ठी इस निष्कर्ष पर पहुँची कि ग्रामीण महिलाओं में भी असाधारण रूप से जाग्रति बढ़ रही हैं सत्ता में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका एवं अनुकरणीय सफलता की कहानियाँ उन्हें प्रोत्साहित तो करती ही हैं, साथ ही महिला समाज में हो रहे सामयिक एवं राजनैतिक परिवर्तन की ओर भी संकेत करती है।
उत्तरप्रदेश के मुस्लिमबहुल 10 जिलों की लगभग 45 महिलाओं से मिलने के बाद डॉ. अंजलि कपिला ने उनके दृष्टिकोण में दृढ़ निश्चय पाया। वह कहती है समाज के नेतृत्व का उत्तरदायित्व सँभालना महिलाओं के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि हैं। आरक्षण की नीति ने औरतों के विश्वास को और भी मजबूत किया है, जो उन्हें निर्णय लेने का सुअवसर देती हैं विभिन्न क्षेत्रों में पंचायती राज में सक्रिय महिलाओं में से कुछ का मानना है-”हम आरक्षण को बैसाखी की तरह नहीं देखतीं, इसे प्रमुख धारा से जुड़ने का सुअवसर मना रही है। “लखनऊ में ब्लॉक की एक महिलाएँ जो पहले धर से बाहर निकलने में झिझकती थी, आज प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं यह क्रान्तिकारी कदम हैं। फरीदाबाद जिला परिषद की एक सदस्या का मानना है, हम परिवार को चला सकती है, तो समाज का संचालन क्यों कर सकती।
मध्यप्रदेश के पिछड़े एवं आदिवासियों की यात्रा कर चुकी डॉ. मृदुला सेठ कहती हैं कि इन क्षेत्रों में जाग्रति एवं परिवर्तन की लहर शहरों एवं सभ्य इलाकों से कम नहीं है।
उज्जैन की निर्वाचित पंचायत सदस्या का उदाहरण देते हुए वे कहती है कि वह जिला कलेक्टर का स्थानान्तरण कराने में सफल हुई, जो बालबाड़ी के पोषण कार्यक्रम में घटिया मूल्य पर उपलब्ध करा रहा था। राज्यों -राजस्थान, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, हिमांचल प्रदेश तथा मध्यप्रदेश में किया गया। बद में 86 महिला कार्यकर्ताओं की संगोष्ठी में इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी। विभिन्न राज्यों में महिला समाज के अन्दर होने वाली उथल-पुथल के रोचक प्रसंगों को उजागर करते हुए संगोष्ठी इस निष्कर्ष पर पहुँची कि ग्रामीण महिलाओं में भी असाधारण रूप से जाग्रति बढ़ रही हैं सत्ता में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका एवं अनुकरणीय सफलता की कहानियाँ उन्हें प्रोत्साहित तो करती ही है, साथ ही महिला समाज में हो रहे रासयिक एवं राजनैतिक परिवर्तन की ओर भी संकेत करती है।
उत्तरप्रदेश के मुस्लिमबहुल 10 जिलों की लगभग 45 महिलाओं से मिलने के बाद डॉ. अंजिल कपिला ने उनके दृष्टिकोण में दृढ़ निश्चय पाया। वह कहती हैं समाज के नेतृत्व का उत्तरदायित्व सँभालना महिलाओं के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि हैं। आरक्षण की नीति ने औरतों के विश्वास को और भी मजबूत किया है, जो उन्हें निर्णय लेने का सुअवसर देती हैं विभिन्न क्षेत्रों में पंचायती राज में सक्रिय महिलाओं में से कुछ का मानना है-”हम आरक्षण को बैसाखी की तरह नहीं देखती, इसे प्रमुख धारा से जुड़ने का सुअवसर मान रही हैं। “लखनऊ में ब्लॉक की एक पंचायत सदस्य का कहना है वे महिलाएँ जो पहले धर से बाहर निकलने में झिझकती थी, आज प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं यह क्रान्तिकारी कदम हैं फरीदाबाद जिला परिषद की एक सदस्या का मानना है, पंचायत चलाने में क्या कठिनाई है? जब हम परिवार को चला सकती है, तो समाज का संचालन क्यों नहीं कर सकती।
मध्यप्रदेश के पिछड़े एवं आदिवासियों की यात्रा कर चुकी डॉ. मुदुला सेठ कहती है। कि इन क्षेत्रों में जाग्रति एवं परिवर्तन की लहर शहरों एवं सभ्य इलाकों से कम नहीं है।
उज्जैन की निर्वाचित पंचायत सदस्या का उदाहरण देते हुए वे कहती है कि वह सफल हुई, जो बालबाड़ी के पोषण कार्यक्रम में घटिया किस्म का दलिया अधिक मूल्य पर उपलब्ध करा रहा था। डॉ. सेठ के अनुसार, राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में महिलाओं की स्थिति बदलने लगी हैं। परिवार के साथ ही अब वे अपने सामाजिक दायित्वों का भी कुशलता एवं सफलतापूर्वक निर्वाह कर रही है। सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी क्रमशः नारीशक्ति नेतृत्व निभा रही है। यह प्रतिनिधित्व स्वावलम्बी तंत्र में भी फैलता जा रहा है, जो कि एक शुभ संकेत हैं। अधिकाँश राजनैतिक दलों ने प्रस्तुत लोकसभा के चुनावों में भले ही नारीशक्ति के अधिकारों की गाथा का बखान करके भी उन्हें टिकट न दिया हो, पर यह सुनिश्चित है कि आधी जनशक्ति की उपेक्षा की जानी चाहिए कि अगला चुनाव जो हर व्यक्ति शीघ्र ही अपने सिर पर आता देख रहा है, लोकमानस स्वयं आगे बढ़ नारी को नेतृत्व पकड़ायेगा। जाग्रत मुक्त प्रशासन एवं अनाचार अश्लीलता से मुक्त साँस्कृतिक तंत्र दे सकती है।
परमपूज्य गुरुदेव कहते थे कि इक्कीसवीं सदी नारी सदी हैं नारी ही अपनी संतुलित मनःस्थिति, साधक अंतःकरण के बलबूते युगपरिवर्तन में अपनी सशक्त भूमिका निबाहेगी, इसमें किसी को कोई संदेह होना चाहिए। बीसवीं सदी का अंत नारी के रमणी स्वरूप सदी का अंत लेकर आ रहा है, जो भी प्रस्तुतीकरण आज भोग्या -कामिनी किसी के रूप में नारी का हो रहा है, महाकाल के डण्डे उसे ठीक करके रहेंगे एवं पुनः दुर्गावतरण हो नारीशक्ति की चहुंओर जय-जयकार होगी, यह विश्वास सबको रखना चाहिए। विश्वभर सबको रखना चाहिए। विश्वभर सबको रखना चाहिए। विश्वभर से यह स्वर उभर रहा हैं एवं परिवर्तन की बेला में एक विराट आँदोलन का रूप लेकर आएगा, ऐसा भविष्यविदों का मत है। अच्छा हो समय रहते नारीशक्ति भी अपनी गरिमा को अनुभव करते हुए अपने मानसिक परावलंबन के जुए को निकाल फेंके व स्रष्टा के इस अभियान को साकार करने का श्रेय स्वयं ले।
युगपरिवर्तन सुनिश्चित है, अवश्यम्भावी है। सारे विश्व की सम्पूर्ण व्यवस्थाएँ चरमरा रही है। एवं जीवनमूल्य तेजी से टूट रहे है। ऐसे में आशा की एक ही किरण शेष है, वह है- व्यक्ति अपने से बदलाव आरम्भ करे- परिवार एवं समाज तभी बदल पायेंगे। ज्ञानयज्ञ-विचार क्रान्ति के माध्यम से ये तीनों प्रक्रियाएँ कैसे सम्पन्न होंगी, इस पर समय-समय पर पूज्यवर ने जो लिखा है उसे साररूप में तीन भागों में आत्मनिर्माण, परिवारनिर्माण एवं समाजनिर्माण के खण्डों में यहाँ दिया जा रहा है। यह मिशन की समग्र क्रियाप्रणाली का युगपरिवर्तन के सिद्धांतों का एक प्रकार से दिग्दर्शन है, एक झलक-झांकी है।
शुभारम्भ होगा-आत्मनिर्माण से
युगपरिवर्तन प्रक्रिया के अंतर्गत नवनिर्माण अभियान का शुभारम्भ श्रीगणेश अपने आप से शुरू किया जाना है। दूसरे को उपदेश और अपनी उपेक्षा, यह बात अन्य प्रकरणों में चल भी सकती है। पर जहाँ लोकमानस के परिष्कार का प्रश्न सामने आयेगा, वहाँ उसका प्रथम चरण स्वयं ही उठाना पड़ेगा। उत्कृष्टता उपदेश से नहीं, अनुकरण से उत्पन्न होती है, इस तथ्य को जितनी जल्दी और जितनी गहराई से समझ लिया जाय, उतना ही उत्तम है। यदि युगपरिवर्तन का प्रतिपादन समझ में आता है तो इसे जानकारी मात्र न रहने देकर आसक्ति में परिणत किया जाए और दो साहसिक कदम उठाये ही जाएँ। एक यह कि अपनी वर्तमान जीवनचर्या में जितना भी सम्भव हो सके, परिवर्तन किया जाए, भले ही वह परिवर्तन न्यूनतम ही क्यों न हो। अपनी अवाँछनीयताओं को ढूँढ़ना, स्वीकार करना, उन्हें हटाने की आवश्यकता अनुभव करनी और साहसपूर्वक कुछ से तो लड़ पड़ा ही जाए और उन्हें छोड़ने के लिए ऐसा संकल्प निश्चय किया जाए कि भविष्य में उसे निबाहते हुए भी बाधा को आड़े न आने दिया जाए। दूसरा कदम यह है कि अपने में जिन सद्गुणों का अभाव यह है कि अपने में जिन सद्गुणों का अभाव है उनमें से कुछ को अपनाने और स्वभाव-अभ्यास में लाने का व्रत-धारण किया जाए। निकृष्टताओं को उत्कृष्टताओं में परिणत करने के शौर्य-साहस का नाम ही आत्मबल है। तप-तितिक्षा का, साधना उपासना का, स्वाध्याय-सत्संग का एकमात्र प्रयोजन इस आत्मकाल को उत्पन्न करने की, मनः स्थिति बनाना ही है। अवांछनीयताओं के अभिवर्धन का शौर्य साहस प्रदर्शन करने से आत्मबल बढ़ता है। बढ़ा हुआ आत्मबल ही वह शक्ति है,
जिससे आश्चर्यजनक एवं चमत्कारी आध्यात्मिक विभूतियों से मनुष्य सुसम्पन्न बनता है। ज्ञान और तप की सार्थकता उस साहसिकता की कसौटी पर कसी जाती है। जिसके आधार पर दुष्प्रवृत्तियों को उखाड़ना और सत्प्रवृत्तियों को जमाने का संकल्प, साहस और पराक्रम सम्भव हो सके।
उपरोक्त दो प्रयास आध्यात्मिक साधना के वे दो दो चरण है। जिनके सहारे जीवन-लक्ष्य की पूर्ति तक क्रमबद्ध रूप से बढ़ा जा सकता हैं इन्हें साधना एवं उपासना का युग्म कहा जाता है। दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन साधना है। और सत्प्रवृत्तियों का संस्थापन उपासना। असुरता का उन्मूलन और देवत्व का पोषण, यही धर्म-धारणा है और यही ईश्वर-आराधना। यह तथ्य यदि गहराई से समझ लिया जाए तो तत्वदर्शन के उस मूल प्रयोजन को समझा जा सकता हैं जिसके लिए आस्तिकता और धार्मिकता का विशालकाय कलेवर दूरदर्शी ऋषियों ने खड़ा किया है। आत्मिकप्रगति की दिशा में इन्हीं दो कदमों को क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ाते हुए सभी अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सकते है। यह तो हुआ सनातन और शाश्वत सत्य। यदि सामाजिक परिस्थितियों की दृष्टि से भी सोचें तो लोकमानस को निकृष्टता से उत्कृष्टता की ओर मोड़ने के लिए भी इसी उपाय का तात्कालिक उपचार के रूप में भी प्रयोग करना पड़ेगा। विचार-क्रान्ति इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता हैं यह विचार क्रांति भी बंधी और खिंची चली आये। इस समग्र विचारक्रान्ति का शुभारम्भ अपने आप से ही हो सकता हैं दूसरों एक हद एक ही काम करती है। असली प्रभाव तो उपदेशक के चरित्र का ही पड़ता है। अनुकरण के लिए जब तक आदर्श सामने न हो, तब तक उस कष्टसाध्य मार्ग पर चलने का लोगों में साहस ही नहीं होता। भौतिक जानकारियाँ लेखनी और वाणी उसे भी पूरी हो सकती है, पर आध्यात्मिक प्रशिक्षण के लिए तो शिक्षक का परिवर्तित जीवन है प्रधान आधार है। इसके बिना दूसरों में वह उत्साह उत्पन्न ही नहीं हो सकता जिसके आधार पर व्यक्ति में समाज में महत्वपूर्ण परिवर्तन सम्पन्न होते है।
युगनिर्माण की सीढ़ियां है (1) आत्मनिर्माण (2) परिवारनिर्माण (3) समाजनिर्माण। इनमें से क्रमशः एक के बाद सरी पर चढ़ने के लिए अधिक योग्यता ओर समर्थता चाहिए सबसे सरल और सबसे आवश्यक आत्म-निर्माण हैं प्रत्येक स्थिति के व्यक्ति इस दिशा में निरन्तर आगे बढ़ते रह सकते हैं घोर व्यस्त, सर्वथा अयोग्य, असमर्थ यहाँ तक कि रुग्ण-अपंग व्यक्ति भी इस मार्ग पर उपयोगी कदम बढ़ा सकते हैं आत्म-निर्माण है। प्रत्येक स्थिति के व्यक्ति इस दिशा में निरन्तर आगे बढ़ते रह सकते हैं घोर व्यस्त, आगे बढ़ते रह सकते है। घोर व्यस्त, सर्वथा अयोग्य, असमर्थ, यहाँ तक कि रुग्ण-अपंग व्यक्ति भी इस मार्ग पर उपयोगी कदम बढ़ा सकते है। आत्मनिरीक्षण करके गुण, कर्म, स्वभाव में भरे हुए दोष-दुर्गुणों को ढूँढ़ा जा सकता है और उन्हें निरस्त करने का प्रचार आरम्भ किया जा सकता है। लोहे से लोहा कटता हैं और विचारों से विचारों की काट की जाती हैं हेय आदतों, इच्छाएँ और मान्यताएँ जो अपने मनःक्षेत्र में जड़ जमाए बैठी हो, उन्हें आत्मनिरीक्षण की टॉर्च जलाकर बारीकी से तलाशा करना चाहिए और निश्चय करना चाहिए कि उनका उन्मूलन करके ही रहेंगे।। प्रत्येक निकृष्ट चार के विरोधी विचारों की एक सुसज्जित सेना खड़ी करनी चाहिए। उन्हें नोट करना चाहिए और बार-बार उन पर मनन-चिन्तन करते हुए मनः क्षेत्र में गहराई तक प्रतिष्ठापित करना चाहिए।
धर्म और अध्यात्म के विशालकाय कलेवर का एक ही उद्देश्य हैं व्यक्तित्व को उत्कृष्टता के, सज्जनोचित शालीनता के, प्रतिभा और कर्म-कौशल के उच्च शिखर तक पहुँचाना। इस प्रयोजन के लिए जिस उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य की आवश्यकता है, उसे जुटाने के लिए अनवरत अथक प्रयत्न करना इसी का नाम तप-साधना है। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन का इसके अतिरिक्त, और कोई उद्देश्य नहीं। ईश्वरप्राप्ति आत्मसाक्षात्कार, स्वर्ग-उपलब्धि ओर जीवन-मुक्ति का तात्विक स्वरूप यही हैं कि व्यक्ति अपनी समस्त क्षुद्रताओं और निकृष्टता को निरस्त करके सदुद्देश्यपूर्ण सत्प्रयोजनों में निरस्त रहने का अभ्यस्त बन जाय। परिष्कृत आत्मा का नाम ही परमात्मा हैं अपने कषाय-कल्मषों का निराकरण करना ही तप-साधना हैं ईश्वर-प्रेम का सहारा लेकर अन्तःकरण में अपार प्रेमनिष्ठ की धारणा और उसका लाभ उदार सेवा-प्रवृत्ति के रूप में प्राणिमात्र को देना, ईश्वरभक्ति हमें इसी लक्ष्य उदार सेवा-प्रवृत्ति के रूप में प्राणिमात्र को देना, ईश्वरभक्ति हमें इसी लक्ष्य की ओर ले जाती है। अध्यात्म दर्शन की सारी सफलता इस बात पर निर्भर की सारी सफलता इस बात पर निर्भर है कि व्यक्तित्व के समग्र निर्माण के लिए कितना साहस किया गया? दुर्गुणों को निरस्त करने और सद्गुणों को बढ़ाने के लिए कितना प्रयास किया गया।
आत्मनिर्माण के मूलभूत निम्नलिखित चार दार्शनिक सिद्धांतों पर हर दिन बहुत गम्भीरता के साथ बहुत देर तक मनन-चिन्तन करना चाहिए। जब भी समय मिले, चार तथ्यों को चार वेदों का सारतत्व मानकर समझना और हृदयंगम करना चाहिए। यह तथ्य जितनी गहराई तक अन्तःकरण में प्रवेश कर सकेंगे, प्रतिष्ठित हो सकेंगे, उसी अनुपात से आत्म-निर्माण के लिए आवश्यक वातावरण बनता चला जाएगा।
आत्मदर्शन की प्रथम तथ्य है आत्मा को परमात्मा का परमपवित्र अंश मानना और शरीर एवं मन को उससे सर्वथा भिन्न मात्र वाहन अथवा औजार भर समझना।
दूसरा आध्यात्मिक तथ्य है। मानव जीवन को ईश्वर का सर्वोपरि उपहार मानना। इसे लोकमंगल के लिए दी हुई परमपवित्र अमानत स्वीकार करना।
तीसरा आध्यात्मिक तथ्य है- मानव जीवन को ईश्वर का सर्वोपरि उपहार मानना। इसे लोकमंगल के लिए दी हुई परमपवित्र अमानत स्वीकार करना।
तीसरा महासत्य है। है। -अपूर्णता को पूर्णता तक पहुँचाने का जीवन लक्ष्य प्राप्त करना। दोष-दुर्गुणों का निराकरण कतरे चलने और गुण-कर्म स्वभाव की उत्कृष्टता बढ़ाते चलने से ही ईश्वर और जीव के बीच की खाई पट सकती है।
चौथा महासत्य हैं इस विश्व ब्रह्मांड को ईश्वर की साकार प्रतिभा मानना। श्रम-सीकरों और श्रद्धा सद्भावना के अमृतजल से उनका अभिषेक करने की तप -साधना करना। दूसरों के दुःख बँटाने और अपने सुख बाँटने की सहृदयता विकसित करना।
यह चार सत्य चार तथ्य ही समस्त अध्यात्म विज्ञान के साधना विधान के केन्द्रबिन्दु हैं चार वेदों का सारतत्व यही हैं इन्हीं महासत्वों के हृदयंगम करने और उन्हें व्यवहार में उतारने से परमलक्ष्य की प्राप्ति होती हैं जीवनोद्देश्य पूर्ण होता हैं इन महासत्यों को जितनी श्रद्धा और जागरूकता के साथ अपनाया जाएगा, आत्म निर्माण उतना ही सरल और सफल होना चला जाएगा। युग परिवर्तन की प्रक्रिया में युग निर्माण की दिशा में बढ़ते हुए सर्वप्रथम आत्म निर्माण पर ही ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए। यहीं से वह शुरुआत होती है जो समग्र परिवर्तन के रूप में चारोँ और दिखाई पड़ती हैं विचारक्रान्ति का बीज है। आत्मनिर्माण।
परिवर्तन -प्रक्रिया का दूसरा चरण परिवारनिर्माण
आत्मनिर्माण के बाद बारी आती है। परिवारनिर्माण की, जो कि एक प्रकार से मिनी प्रजातंत्र है। गृहस्थों की परिवार संस्था एवं वैरागी संत महात्माओं के अखाड़े, समाज सम्प्रदाय आदि भी एक प्रकार से एक ही श्रेणी में आते है। उद्योग व्यवसायियों के उच्च आदर्श सामने रखकर खड़े किए संगठन, सामाजिक एवं जातीय संगठन भी एक परिवार ही बनाते हैं पूर्ण एकाकी तो कोई जड़ या परमहंस ही रह सकता हैं स्नेह-सहयोग के आदान-प्रदान का तंत्र जब तक एक समूह में मौजूद है, उसे एक छोटा राष्ट्र एक छोटी इकाई मानकर परिवार की परिधि में ही रखना चाहिए, एवं उसके बिना आत्मा की तृप्ति या कल्याण की बात नहीं सोचती चाहिए।
युगनिर्माण के योग्य बनने, विकसित होने के लिए सभी को परिवार निर्माण की पाठशाला में प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए। भोजन, वस्त्र की, शौक मौज, की शिक्षा-सुविधा की व्यवस्था बनाये रहने से ही परिवार की आवश्यकता पूर्ण नहीं हो जाती, वरन् उस छोटे क्षेत्र में ऐसा वातावरण बनाना पड़ता है, जिसमें पलने वाले प्राणी हर दृष्टि, से समुन्नत-सुसंस्कृत बन सके। अधिक खर्च करने, अधिक सुविधा-साधन रहने से, नौकर-चाकरों की व्यवस्था रहने से घर साफ-सुथरा और सुसज्जित रह सकता है। सम्पन्नता के आधार पर बढ़िया भोजन वस्तु? ऐश आराम, विनोद-मनोरंजन के साध मिल सकते हैं, किन्तु व्यक्तित्व को समग्र रूप से विकसित कर सकने वाले सुसंस्कार केवल उपयुक्त वातावरण में ही सम्भव हो सकते हैं ऐसा वातावरण कीं बना-बनाया नहीं मिलता, न कहीं खरीदा जा सकता हैं उसे तो स्वयं ही बनाना पड़ता है।
प्राचीनकाल के गुरुकुलों की बात दूसरी थी, वहाँ उत्कृष्टता का वातावरण बना हुआ रहता था, घर–परिवार में जो कमी रहती थी, उसकी पूर्ति वहाँ हो जाती थी, ऋषि तपस्वी अपने ज्ञान, कर्म और प्रभाव से विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण की आवश्यकता पूरी किया करते थे, पर अब वैसे गुरुकुल, विद्यालय कहाँ है? अब तो वह आवश्यकता प्रत्येक सद्गृहस्थ को स्वयं ही पूरी करनी पड़ेगी इस यदि पूरा न किया गया घर में सुसंस्कृत वातावरण न बनाया जा सका, परिष्कृत-परम्पराओं का प्रचलन न किया जा सका तो उस धर में रहने पलने वाले लोग भूत-बेताल बनकर ही रहेंगे लोग भूत-बेताल बनकर ही रहेंगे। स्वास्थ्य, शिक्षा चतुरता की दृष्टि से वे कितने ही अच्छे क्यों न हो, मानवी सद्गुणों से वंचित ही रहेंगे। कोई कितना कमाता है, कितना बड़ा कहाता हैं यह बात अलग है ओर किसका व्यक्तित्व कितना समुन्नत हैं यह कहाता है यह बात अलग है और किसका व्यक्तित्व कितना समुन्नत है, यह प्रश्न बिलकुल अगल है। बड़ा आदमी बनना सरल हैं श्रेष्ठ, सज्जन बनना कठिन हैं सुख शान्तिपूर्वक रहने के लिए बड़प्पन की नहीं, महानता की आवश्यकता पड़ी हैं उसी का उपार्जन मानव-जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है कोई परिवार इस दिशा में जितना सफल होता है उसकी उतनी ही सार्थकता मानी जा सकती है।
घर के वातावरण में यदि अवांछनीयताएं, विकृतियाँ फैली पड़ी हैं तो इसका एकमात्र कारण सद्प्रवृत्तियों सद्भावनाएँ उत्पन्न कर सकने वाले वातावरण का अभाव है। उसे पैदा करने पर ही उलझनें सुलझेंगी। अन्धकार का अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं, प्रकाश का अभाव ही अन्धकार का अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं, प्रकाश का अभाव ही अन्धकार है। ठीक यही बात पारिवारिक वातावरण पर लागू होती है, जहाँ सद्भावनाओं को आरोपित पल्लवित न किया गया होगा वहाँ दुर्भावनाओं की, दुष्प्रवृत्तियों की कँटीली झाड़ियाँ उगेगी ही और उनके काँटे चुभे बिना रहेंगे ही नहीं। यही है पारिवारिक क्लेश-कलह का दार्शनिक कारण बाहरी दृष्टि से लड़-झगड़ या मानों मालिन्य के दूसरे स्थूल कारण भी हो सकते है उनका निवारण भी किया जा सकता है फिर भी आंतरिक दुर्बुद्धि जहाँ सकता हैं फिर भी आन्तरिक दुर्बुद्धि जहाँ बनी ही बनी हुई है वहाँ द्वेष और कलह के लिए कुछ न कुछ बहाने समाने आते ही रहेंगे और दुर्गन्ध भरी नारकीय सड़न उत्पन्न करते हो रहेंगे। ऐसे घर-परिवार में रहकर कोई व्यक्ति न तो सुखी-सन्तुष्ट रह सकता है और न जीवन में महत्वपूर्ण प्रगति का अभ्यस्त हो सकता हैं
परिवारनिर्माण वस्तुतः एक दर्शन है क्रिया-कलाप तक इसे सीमित नहीं रखा जा सकता। जैसी भी व्यवस्था अभीष्ट हो, उसके लिए परिवार के लोगों की मन स्थिति का निर्माण किया जाना चाहिए यह प्रयोजन तभी सफल हो सकता है जब तक अपना मनोयोग, समय और श्रम उसके लिए नियमित रूप से लगाया जाए। यह अभिरुचि, तरपश्रता एवं संलग्नता तक उत्पन्न हो सकती है। जब परिवारनिर्माण की आवश्यकता को गम्भीरतापूर्वक समझा जाए और यह सोचा परिवारनिर्माण की आवश्यकता को गंभीरतापूर्वक समझा जाए ओर यह सोचा कि इस मान उत्तरदायित्व का निर्वाह करना कितना अधिक महत्वपूर्ण हैं यह काम नौकरों से, बाहरी के आदमियों से कराने का नहीं हैं अन्यान्य लोग बता-सिखा सकते है, परिवार के लोगों में धुल-मूल नहीं सकते, घनिष्ठ आत्मीयता भरा अपनापन ही आन्तरिक आदान-प्रदान का अपनापन ही आंतरिक आदान-प्रदान का ही माध्यम होता है मनःस्थिति पर प्रभाव डालने की क्षमता केवल उन्हीं में होता है। मनःस्थिति पर प्रभाव डालने की क्षमता स्पर्श करे। विशेषतया स्वभाव एवं दृष्टिकोण में परिष्कृत परिवर्तन करने के लिए तो ऐसे ही शिक्षक बाहर से ढूँढ़ना बेकार है, हेय कार्य हमें स्वयं ही करना पड़ेगा। भोजन, स्नान, निद्रा, विनोद आदि की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए श्रम हमें स्वयं ही करना होता है, यह प्रयोजन दूसरों के द्वारा पूरे नहीं कराये जा सकते है। परिवारनिर्माण का कार्य अपने अतिरिक्त बाहर के लोगों से कराया नहीं जा सकता। आज की स्थिति में इस तथ्य को हमें पूरी तरह ध्यान में रखना चाहिए दूसरे, कुछ सामयिक परामर्श दे सकते हैं या क्षणिक प्रभाव डाल सकते सुसंस्कारों की जड़ जमाने के लिए जिस अध्यवसाय की दीर्घकालीन और अनवरत आवश्यकता पड़ती है, उसकी पूर्ति कोई बाहर का व्यक्ति कब तक और कहाँ तक करेगा?
प्रश्न इतना भर नहीं है कि परिवार का वातावरण अच्छा बनाया जाए और परिजनों को सुसंस्कृत स्तर तक पहुँचाना जाय। यह केवल एक प़ा हैं परिवारनिर्माण का दूसरा पक्ष और भी अधिक महत्वपूर्ण है वह है अपनी जिन की आदतों, आस्थाओं और गतिविधियों का निर्माण-नियन्त्रण करना। यह कार्य परिवार की प्रयोगशाला में ही सम्भव हो सकता हैं जलाशय में घुसे बिना तैरना कहाँ आता है। व्यायामशाला में प्रवेश किये बिना कोई पहलवान थोड़े ही बन सकता हैं सत्प्रवृत्तियों को परिपक्व करने के लिए अभ्यास करना पड़ता है एवं इस अभ्यास हेतु परिवार से श्रेष्ठ कोई उदाहरण नहीं हो सकता।
परिवारनिर्माण सके लिए प्रयास करना वस्तुतः अपनी श्रेष्ठ मान्यताओं को मूर्त रूप देने के लिए प्रयोगशाला में प्रवेश करना है परिजनों के मध्यम से अपनी शालीनता एवं क्रिया-कुशलता को विकासोन्मुख बनाना हैं इस प्रकार परिवारनिर्माण की दिशा में किये गये प्रयास-केवल कुटुम्बियों की सार्थक सेवा ही सम्पन्न नहीं करते, वरन् अपने व्यक्तित्व को भी निखरते हैं अपनी आदतों में भी उत्कृष्टता का समुचित समावेश करते है, यह दुहरी सफलता प्रस्तुत करता हैं मेंहदी पीसने वाले के हाथ रंग जोते है, वाली उक्ति के अनुसार उस कार्य में संलग्न व्यक्ति के अनुसार उस कार्य में संलग्न व्यक्ति को आत्मनिर्माण का लाभ भी मिलता है।
आजीविका उपार्जन के अतिरिक्त कुछ समय हमें परिवार-निर्माण के लिए भी नियमित रूप से देना चाहिए यह एक उच्चकोटि का मनोरंजन हैं ताश, शतरंज, गपशप, सिनेमा, मटरगश्ती, यारबाजी,आलस्य, अनुत्साहपूर्वक काम करने की मंदगति आदि व्यसनों और प्रमादों में हमारा बहुत-सा समय नष्ट होता हैं हिसाब लगाया जाए तो प्रतीत होगा कि समय की यह बरबादी बहुत बड़ी है। इतनी अधिक है कि उसे बचाकर ही परिवारनिर्माण के अनेक महत्वपूर्ण कार्य करने का अवसर प्राप्त किया जा सकता है और फुरसत न मिलने का बहाना सर्वथा निरर्थक सिद्ध हो सकता हैं मनोरंजनों में सबसे बढ़िया, सबसे सार्थक, सबसे हल्का और सबसे सरल परिवारनिर्माण ही है।
परिवार-निर्माण के दो पक्ष हैं एक व्यावहारिक -क्रियापरक और दूसरा दार्शनिक- दृष्टिकोणपरक। हमें दोनों ही तथ्यों का अपनी क्रिया-प्रक्रिया में समुचित समावेश करके चलना होगा। व्यावहारिक-कार्यक्रम में धर की सुव्यवस्था, सुन्दरता एवं सुसज्जा पर ध्यान दिया जाना चाहिए उसके लिए अकेले ही नहीं लगना चाहिए वरन् क्रमशः सभी लोगों को साथ लगाना चाहिए। स्वयं साथ लगने से दूसरों में उत्साह पैदा होता है, अन्यथा सृजनात्मक कार्यों में रूखापन समझा जाता है और उसे भर-बेकार समझकर कन्नी काटने की मनोवृत्ति रहती है आदेश-निर्देश देते रहने से बात बनती नहीं प्रयोजन तब पूरा होता है, जब स्वयं आगे चला जाए और कंधे से कन्धा लगाकर काम करने के लिए दूसरों को आमन्त्रण दिया जाए। ‘अपने मरे बिना स्वर्ग नहीं दीखता ‘ वाली कहावत ऐसे ही हर काम पर लागू होती है। इंजन आग चलता है तो डिब्बे पीछे लुढ़कने लगते हैं परिवार-निर्माण के लिए बनाये गये व्यवस्था-क्रम में हर मनुष्य को स्वयं ही इंजन की भूमिका सम्पादित करनी पड़ेगी।
इसके लिए परमपूज्य गुरुदेव ने व्यावहारिकता के धरातल पर सबके लिए हृदयंगम करने योग्य पारिवारिक पंचशील सबके लिए प्रस्तुत हैं, जो इस प्रकार है-
(1) सुव्यवस्था- इसमें अपने आपको, साधनों को सुनियोजित आपको, साधनों को सुव्यवस्थित रखने की प्रक्रिया पर ध्यान दिया जाता है। प्रकारान्तर से यही दिया जाता है। प्रकारान्तर में ही स्वच्छता सौंदर्यदृष्टि जैसी सत्प्रवृत्ति का भी समावेश हो जाता हैं
(2) नियमित-श्रम और संयम के समन्वय का नाम ही नियमितता हैं हर काम समय पर करना, परिवार में श्रेष्ठ संस्कार लेने का द्वार खोलने की प्रक्रिया है।
(3) सहकारिता-प्रगति का मूल है सहकार-सद्भाव के साथ किया गया कार्य। स्वच्छता अभियान से लेकर ज्ञानार्जन, स्वस्थ मनोरंजन, सकारात्मक निर्माण आदि में इस गुण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
(4) प्रगतिशीलता- उत्कृष्ट महत्वाकाँक्षाएँ रखकर मनःस्थिति को इस महत्वाकांक्षाएं रखकर मनःस्थिति को इस प्रकार नियोजित करना कि सभी की उन्नति, नियोजित करना कि सभी की उन्नति, प्रगति भौतिक एवं आत्मिक हर क्षेत्र में समान रूप से हो, इस विधा में आते है।
(5) शालीनता- सज्जनता, मधुरता आदि गुण इस विधा में होते है। एवं फलश्रुतिस्वरूप प्रामाणिकता, नागरिकता, सामाजिकता जैसे सद्गुण उभरकर आते हैं यह परिवारनिर्माण की कुंजी है।
परिवार का एक सहयोग-समिति के रूप में विकसित करना चाहिए। के रूप में विकसित करना चाहिए। जिसका हर सदस्य अपने कर्त्तव्य और अधिकार की मर्यादाओं को समझे। न तो कोई पिसता रहे और न किसी को मटरगश्ती करने दी जायं। बड़े- बूढ़े भी ठाली बैठना अपना अधिकार एवं सम्मान न समझें, वरन् सामर्थ्य भर श्रम करते हुए परिवार के विकास में समुचित योगदान करे। विचार-स्वतन्त्रता का सम्मान किया जाएं न किसी पर अवाँछनीय प्रतिबन्ध लगें और न कोई उद्धत उच्छृंखलता बरते, तभी परिवार में सुसंतुलन बना रह सकता है। हराम की कमाई खाने का लालच किसी में पैदा न होने दिया जाए। परिवार के हर सदस्य को स्वावलम्बी बनाया जाय। पूर्वजों की संचित संपत्ति पर गुजारा करना कृत्य माना जाए। हर व्यक्ति स्वावलम्बनपूर्वक कमाये। पूर्वजों की संचित पूंजी सामाजिक सत्कार्यों के लिए दान कर दी जाए। यही श्राद्ध की चिरपुरातन परम्परा है, उत्तराधिकार में प्रचुर सम्पदा छोड़ मरना अपने बच्चों का पतन हनन करना हैं उन्हें सुयोग्य स्वावलंबी बनाया जाएं और अपने परिश्रम की कमाई पर गुजारा करने में स्वाभिमान अनुभव करने दिया जाए।
वस्तुतः परिवार एक पूरा समाज, एक पूरा राष्ट्र है। भले ही उसका आकार छोटा हो, पर समस्याएँ वे सभी मौजूद है जो किसी राष्ट्र या समाज के समाने प्रस्तुत रहती हैं प्रधानमन्त्री अथवा राष्ट्रपति को जो बात अपने देश को समुन्नत बनाने के लिए बात अपने देश को समुन्नत बनाने के लिए सोचनी-करनी चाहिए, वही सब कुछ किसी सद्गृहस्थ को परिवार निर्माण के लिए करना चाहिए। कुशल माली जिस तरह अपने उद्यान को सुरम्य, सुविकसित बनाने के लिए अथक परिश्रम करता है हर पौधे पर पूरा ध्यान रखता है, उसे सींचता-छाँटता है, उसी प्रकार परिवार के हर सदस्य की सुसंस्कृत बनाने के लिए उसके साथ नरम-कठोर व्यवहार करते रहना चाहिए। उपार्जन और यारबासी में ही आमतौर से लोग अपना अधिकाँश समय गुजारते हैं फलतः परिवार की उपेक्षा होती रहती हैं और उसमें ऐसे विषबीज पनपते रहते है, जिनके कारण आगे चलकर कुटुम्ब दुष्प्रवृत्तियों का, फुट-फिसाद का शिकार होकर नष्ट-भ्रष्ट हो ही जाय।
अपने समग्र व्यक्तित्व का विकास करने के लिए गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करने के लिए परिवार-निर्माण का परिष्कृत करने के लिए परिवार-निर्माण के कार्यक्रम को एक उपयोगी प्रयोग-प्रकरण मानना चाहिए। यह छोटे रूप में एक प्रकार की देशसेवा, समाज-सेवा, विश्व-सेवा ही है। अपना और परिवार के सदस्यों का कल्याण तो इसमें ही है।
नवसृजन प्रक्रिया का तीसरा चरण समाज-निर्माण
व्यक्तिनिर्माण एवं परिवार-निर्माण के दो कार्यक्रमों के बाद तीसरी बारी समाज की आती है। व्यक्ति सुखी रहे, इसके लिए समुन्नत समाज की आवश्यकता पड़ती हैं उत्कृष्ट व्यक्तियों का श्रेष्ठ सज्जनों के नेतृत्व में विनिर्मित समूह ही समुन्नत समाज का निर्माण करता हैं समाज का स्तर गिरता तब है, जब श्रेष्ठ व्यक्ति घट जाता है एवं सामाजिक वातावरण में उत्कृष्टता बनाए रखने में सभी रचनात्मक प्रयास शिथिल पड़ने लगते है। समाज गिरता है तो उस का विशेष के प्रायः सभी व्यक्ति निकृष्ट, अधोपतित व दुर्बल बनते चले जायेंगे। अच्छा समाज व्यक्ति अच्छा समाज बनाते हैं। दोनों ही अन्योन्याश्रित है।
जिस मुहल्ले में आग लगी हो, हैजा फैला हो उसमें रहने वाले स्वच्छताप्रिय अथवा जागरूक लोगों की भी सुरक्षा नहीं होती। सुखे के साथ गीला जलने की कहावत चरितार्थ होती है। चोरों और दुष्टों के पड़ोस में रहकर कोई सज्जन भी चैन से नहीं बैठ सकता। बैठना चाहे तो भी वे दुष्टों के पड़ोस में रहकर कोई सज्जन भी चैन से नहीं बैठ सकता। बैठना चाहे तो भी क्यों न किया जाता हरे, पड़ोसी की गनदरी हवा अपना प्रभाव छोड़ेगी ओर निकृष्टता का आकर्षण कुटुम्बियों में भी उसी प्रकार की दुर्बुद्धि के संस्कार पैदा करेगा। वेश्याओं के पड़ोस में रहकर उनकी हरकतें भर देखते रहा जाए तो सदाचार की मानसिक मर्यादाएँ टूटे बिना न रहेगी।
समाज में यदि अनैतिक अवाँछनीय अपराधी-तत्व भरे पड़े हो तो उनकी हलचलें, हरकतें किसी सन्त, सज्जन की उत्कृष्टता को सुरक्षित नहीं रहने दे कसती। विकृत समाज में असीम विकृतियाँ उत्पन्न होती है। और अनेक प्रकार के विग्रह उत्पन्न करती हैं उनकी लपेट में आये बिना कोई नीतिवान व्यक्ति भी रह नहीं सकता। उसे प्रत्यक्ष एवं परोक्ष आक्रमणों का शिकार होना पड़ेगा। जहाँ खाद्य-पदार्थों में मिलावट का बोलबाला हो, पदार्थों में मिलावट का बोलबाला हो, वहाँ स्वास्थ्य रक्षा पर ध्यान रखे रहने वाला व्यक्ति भी बीमार पड़े बिना नहीं रह सकता। कुरीतियों और रूढ़ियों से भरे समाज में सामान्य मनोबल का सुधारवादी ची बोल जाएगा। और उसे सिद्धांतवाद ताक पर रखते हुए समूह गत प्रवाह में बहने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। दहेज के विरोधी और आदर्श-विवाहों के समर्थक को भी जब अपनी जवान कन्या के लिए विवाह का कोई सुयोग बनता नहीं दीखता, तो जाकित बिरादरी वालों ओर दहेज मोभियों की शरण में ही जाना पड़ता है ओर उनके इशारे पर चलने के लिए समाज के विरुद्ध एकाकी खड़े रहने वाले तो कोई विरले ही दुस्साहसी होते है सामान्य मनोबल के लोग तो खड़खड़ा ही जाते है।
व्यक्ति-निर्माण और परिवार निर्माण की तरह ही समाज-निर्माण भी हमारे अत्यन्त आवश्यक दैनिक कार्यक्रमों का अंग माना जाना चाहिए। अपने लिए हम जितना श्रम, समय, मनोयोग एवं धन खर्च करते है, उतना ही समाज को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने के लिए लगाना चाहिए। परोपकार-परमार्थ की दृष्टि से ही नहीं, विशुद्ध स्वार्थ साधन और सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से भी आवश्यक है।
अपनी क्षुद्रता की संकीर्णता को व्यापक आत्मीयता में विकसित करना ही अध्यात्म तत्व-दर्शन का मूलभूत प्रयोजन है। इस दृष्टिकोण को अपनाने पर ही संयम, सदाचार, सेवा एवं लोक मंगल के लिए संकल्प एवं उत्साह उत्पन्न होता हैं और उन्हें निरन्तर निबाहने के लिए साहस, विश्वास बढ़ता हैं ईश्वर भक्ति इस तात्विक दृष्टि का नाम है। इसी तत्व दर्शन का प्रतिपादन करने के लिए धर्म, अध्यात्म एवं ईश्वरवाद का विशालकाय कलेवर खड़ा किया गया है।
प्राचीन काल और ब्राह्मण वर्ग अपना समस्त जीवन लोकमंगल के लिए समर्पित करते थे। वानप्रस्थ आश्रम स्वार्थ की परिधि से निकलकर परमार्थ की कक्षा में प्रवेश करने की सन्धि वेला ही तो है। क्षुद्रता की, संकीर्णता की, आत्मवत् सर्वभूतेषु, वसुधैव कुटुंबकम् के देवत्व में विकसित परिणत करने का व्यावहारिक कार्यक्रम वानप्रस्थ के रूप में आप्त पुरुषों ने निर्धारित किया है। भारतीय संस्कृति की सुनिश्चित परम्परा है कि वैयक्तिक और पारिवारिक प्रयोजनों के लिए किसी को आधे से अधिक समय एवं मनोयोग नहीं लगाना चाहिए।
जीवन का पूर्वार्द्ध-ब्रह्मचर्य-गृहस्थ की भौतिक प्रगति के लिए पर्याप्त हैं उत्तरार्द्ध को वानप्रस्थ एवं संन्यास रूप में समाज के लिए समर्पित चाहिए।
यह समाधान इसीलिए है कि व्यक्ति को अपना महत्वपूर्ण अनुदान समाज-निर्माण के लिए देना चाहिए। उतपजं दान-पुण्य का जो माहात्म्य-महत्त्व बताया गया है, उसके पीछे भी यही प्रयोजन है।
प्राचीनकाल में साधु-ब्राह्मण उन्हें कहते थे, जो लोकमंगल के लिए सर्वतोभावेन आत्मदान करके उसी में निमग्न हो जाएँ। उन दिनों देवालयों और तीर्थस्थानों का निर्माण, जन-कल्याण के लिए संचालित प्रवृत्तियों के केन्द्र-संस्थान के रूप में होता था। उनका संचालन ऋषि-कल्प, देव-पुरुषों के हाथ में रहता था। जनता भी इस झंझट में नहीं पड़ती थी कि इन दिनों किन सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन को प्राथमिकता दी जाए? यह निर्णय साधु-ब्राह्मणों की परिषद् ही करती थी।
धार्मिक जनता साधु ब्राह्मणों को-तीर्थ देवालयों को दान इसी के लिए देती थी कि उसके द्वारा समाज में सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन का प्रयोजन पूरा होता रहे। इस लोक-सेवा के निमित्त बने धर्म-केन्द्रों को भगवान का निवास-गृह माना जाता था और वहाँ जाकर लोग श्रद्धा से मस्तक नवाते थे एवं संचालित सत्प्रवृत्तियों में योगदान की प्रेरणा प्राप्त करते थे। तीर्थ में विशेष समारोह समय-समय पर इसी आह्वान के लिए होते थे कि इन अवसरों पर अधिक संख्या में, अधिक भावना-सम्पन्न लोग एकत्रित हों और समाज-निर्माण के लिए तत्कालीन योजनाओं को अग्रगामी बनाने के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शन एवं अभीष्ट उत्साह प्राप्त करें। समयदान-श्रमदान, साधनदान का एकमात्र उद्देश्य समाज के पिछड़ेपन को भी दूर करना-पिछड़े वर्गों को ऊँचा उठाना होता था। यही उद्देश्य वाजपेय स्तर के ज्ञानयज्ञों, कुम्भयज्ञों का भी था। आज तो वह परम्परा समाप्त-सी है। शांतिकुंज युगतीर्थ द्वारा इसी प्रक्रिया को पुनर्जीवित कर समग्र व्यक्तित्व निर्माण से लेकर समाजनिर्माण की शुरुआत की है। समाजनिर्माण प्रक्रिया में संगठनात्मक, विचारात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक कार्यक्रमों के अंतर्गत समाजनिर्माण की जो सुव्यवस्थित क्रिया-प्रक्रिया प्रस्तुत की गयी है, उसमें उन सभी तत्वों का समावेश है, जो आज की स्थिति में समाजोत्थान के सुनिश्चित आधार बन सकते हैं। विचार-विस्तार जैसा व्यापक और महान प्रयोजन संगठित संस्थान ही पूरा कर सकते हैं। वह मिल-जुलकर करने का काम है। एक व्यक्ति चाहे कितना प्रतिभाशाली क्यों न हो, जन-संपर्क का कार्य बड़े पैमाने पर नहीं कर सकता। इस युग की सबसे बड़ी सामर्थ्य ‘संघ-शक्ति’ ही है। जहाँ भी युगपरिवर्तन की विचारधारा में परिचित-प्रभावित लोग हों, वहाँ उन्हें संघबद्ध होना चाहिए और अपना संगठन केंद्र के अंतर्गत खड़ा कर लेने का संकेत समय-समय पर दिया जाता रहा है। प्रतिदिन 20 पैसा और दो घण्टा समय नियमित रूप से देते रहने वालों को भी इस शाखा-संगठन का सदस्य बनाया जाता है। कोई एक व्यक्ति कार्य-वाहक बन सकता है। यह कोई पद नहीं एक सामाजिक जिम्मेदारी हैं जो कार्यकर्ता को दी गयी है। प्रसन्नता की बात है कि यह भलीभाँति निभाई जा रही है।
संगठन का प्रथम और प्रमुख कार्य विचार-क्रान्ति की भूमिका प्रस्तुत करना है। इसके लिए झोला-पुस्तकालय, ज्ञान-रथ, समय-समय पीर प्रसारित विज्ञप्ति-वित
हम सब युगपरिवर्तन के अन्तिम पड़ाव पर हैं। यह बीसवीं सदी की सांध्यवेला एवं इक्कीसवीं सदी के स्वर्णिम प्रभात का शुभागमन समय है। सदी के इस सफरनामे में बीसवीं सदी अनेकानेक घटनाचक्रों से होकर गुजरी। इस सदी को ‘स्वाधीनचेतना की सदी’ के नाम से जाना जाता है। विश्व के साथ-साथ अपने राष्ट्र के लिए भी यह सदी मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण रही। इसी सदी में राष्ट्र ने सैकड़ों साल की पराधीनता के कालपाश को उतार फेंका। साहित्य, धर्म, राजनीति, विज्ञान, उद्योग एवं व्यापार के क्षेत्र में इसने क्रान्तियों के बीज बोए। बौद्ध-धर्मचक्र-प्रवर्तन का उत्तरार्द्ध विचार-क्रान्ति का शंखनाद इसी सदी में हुआ।
अमेरिका का गहरा होता प्रभाव, कार्लमार्क्स व लेनिन का उदय, साम्यवाद का उदय एवं अवसान, दो विश्वयुद्ध, नागाशाकी और हिरोशिमा पर गिराए गए अणुबम, हिटलर, मुसोलिनी जैसे डिक्टेटरों का अभ्युदय,आइंस्टीन जैसे वैज्ञानिक एवं परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जैसे ब्रह्मर्षि का जन्म इस शताब्दी पर गहन प्रभाव छोड़ने वाली घटनाएँ हैं। भारतीय साहित्य, कला, विज्ञान, संस्कृति, सभ्यता आदि सभी क्षेत्रों पर विश्वजनीन घटनाओं का प्रभाव पड़ा। देश ने विज्ञान, अन्तरिक्ष विज्ञान, कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी, विश्व-व्यापार, शिक्षा आदि क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की, किन्तु भारत के पास जो ऋषिपरम्परा थी विश्वप्रेम और विश्वमानवतािको बोध था, अध्यात्मवाद और सन्तों की तपस्या थी, उसने अपने राष्ट्र की चिन्तनधारा को प्रतिकूल एवं विषमकाल में भी अक्षुण्ण बनाए रखा। इस देश की संस्कृति समूची वसुधा को कुटुम्ब मानने की रही है। इसी कारण इस उर्वर धरा पर समस्त मानवता के कल्याण में तत्पर ऋषि-तपस्वी, अवतार, मानवहितों के लिए समर्पित विचारक एवं लोकसेवी पैदा हुए।
उन्नीसवीं सदी में भारत की जनता जमींदारी, कठोर राजतंत्र और क्रूर विदेशी शासन के तिहरे शिकंजों में कसकर मरणासन्न-सी हो गया था,परन्तु भारतमाता की कोख से उत्पन्न सन्त, शहीद एवं वीर सुपुत्रों -सुपुत्रियों ने राष्ट्र की दासतामुक्ति का बीड़ा उठाया, कुर्बानी दी और पूर्व पुरुषों की भविष्यवाणी को सत्य सिद्ध किया। भारत के पास युगों-युगों की चेतना की सभ्यता का लम्बा इतिहास था। धार्मिक भूमिका और आध्यात्मिक मानस था। अतः वह शीघ्र ही सक्षमता से उठ खड़ा हुआ और चलता हुआ और चलता हुआ था
पहला दशक
स्वामी रामतीर्थ के मुख से जैसे राष्ट्र स्वयं बोल उठा मैं भारत है। विश्व के आलिंगन के लिए मेरे हाथ फैले हैं मैं प्रेम ही प्रेम हूँ। भारत का राष्ट्रवाद सर्वोत्कृष्ट हैं आजादी की लड़ाई में तेजी इसी के आधार पर आयी हृदय में प्रेम के उमड़ते सागर को सँजोयें सत्य और अहिंसा बल बल लिए सन् 1901 में गाँधी का अफ्रीका से भारत आगमन हुआ और वे कलकत्ता काँग्रेस में शामिल हुए। इसी वर्ष प्रथम राष्ट्रीय स्तर की समिति का गठन किया गया तथा एक औद्योगिक कमेटी व शिक्षा-समिति बनायी गयी। 1902 में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी की अध्यक्षता में कांग्रेस का 18वाँ अधिवेशन अहमदाबाद में हुआ। 1903 में नए सम्राट एडवर्ड सप्तम का दिल्ली दरबार लगा। तत्कालीन वाइसराय लार्डकर्जन की दमनकारी प्रवृत्तियों के कारण सन् 1904 में काँग्रेस ने भी अपना रुख बदल लिया। बंगाल बँटवारे ने इस आन्दोलन में चेतना की लहर फूँकी। 15 अगस्त, 1905 में लोकमान्य तिलक के केसरी में लिखे लेख एवं गोखले के नारों ने स्वदेशी आन्दोलन को उग्रराष्ट्रवाद में बदल दिया। काँग्रेस गरम एवं नरम दल में विभाजित हो गयी तिलक पाल एवं लाला लाजपतराय एवं श्री अरविन्द ने गरम दल का नेतृत्व सँभाला।
साम्राज्यवादी लार्डकर्जन की बंग-भंग नीति ने समस्त राष्ट्र को आन्दोलन के लिए प्रेरित किया। 16 अक्टूबर, 1905 का दिन बंगाल में राष्ट्रीय शोक दिवस के रूप में मनाया गया। इसमें 50 हजार लोगों ने भाग लिया। गुरुदास बनर्जी, सुरेन्द्रनाथ टैगोर आदि सभी बंगाल के रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि सभी बंगाल के प्रमुख नेता इस अवसर पर उपस्थित हुए। इन आन्दोलन ने जुझारू राष्ट्रवाद ओर राष्ट्रवाद ओर राष्ट्रीय देक्याभव को जन्म दिया।
शताब्दी के प्रथम दशक में ही अंग्रेजों की षह पर 30 दिसंबर 1906 को ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की स्थापना हुई 1908 में युगान्तर दल ने कलकत्ता के अत्याचार चीफ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड की हत्या की योजना बनायी। इस प्रयास में खुदीराम बोस को फाँसी की सजा हुई। इसी दौरान क्रान्तिकारी साहित्य लिखा गया। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपने गीतों में स्वदेशी टैगोर ने अपने गीतों में स्वदेशी का मूलमंत्र फूँका। उनके गीतों व्याख्यानों एवं लेखों ने जनमानस में नई जान डाली। इसी वर्ष लोकमान्य तिलक को छह वर्षों के लिए माण्डलों जेल भेज दिया सरकार उग्रराष्ट्रवादियों को बुरी तरह अपने दमन-चक्र में पीसने लगी। ‘सन्ध्या’ और ‘बन्देमातर् 8 जैसे राष्ट्रीय पत्रों पर मुकदमा चलाया गया। 1901 में श्री अरविन्द संनरुस ले ला। 1990 में वे एकांत साधना के लिए पाण्डिचेरी चले गए ताकि अपनी आध्यात्मिक शक्ति अपनी आध्यात्मिक शक्ति से भारत की राष्ट्रीय चेतना को और अधिक सक्रिय व जाग्रत सके इस प्रथम दशक में देश को कुछ स्थायी लाभ भी हुए। देश भर में 6 हजार मील लम्बी रेल लाइनें बिछायी गयी। कृषिसुधार के लिए सिंचाई आयोग का गठन हुआ और कृषि अनुसंधान के लिए पूसा इन्स्टीट्यूट बना।
दूसरा दशक
दूसरे दशक की सक्रिय शुरुआत 20 सितम्बर, 1999 को परमपूज्य गुरुदेव के जन्म के साथ हुई उनके रूप में जैसे भारत के उज्ज्वल भविष्यत् ने जन्म लिया। इसी के कुछ दिनों के बाद 12 दिसम्बर, 1911 को सम्राट जॉर्ज पंचम ने दिल्ली दरबार का आयोजन करके बंगाल विभाजन को निरस्त कर दिया। 1912 में गाँधीजी ने गोखले को राजनैतिक गुरु के रूप में स्वीकार किया। सन् 1994 में विश्वयुद्ध आरंभ हो गया इस प्रथम महायुद्ध के साथ ही क्रान्तिकारियों सरगर्मियों बढ़ गयी। खिलाफत आन्दोलन के प्रश्न पर मुसलमान भी उग्रवादी क्रांतिकारियों के निकट जाने लगे बहुत सारे क्रान्तिकारी भारतीय क्रांतिकारियों को सहायता भेजने के लिए बर्लिन में इकट्ठे हुए यह महायुद्ध भारत के राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक परिदृश्य में भारी परिवर्तन लाने वाला साबित हुआ। इसी बीच 1993 में विश्व कवि टैगोर नोबुल पुरस्कार से सम्मानित किए गए। 1995 में उन्हें कैसे हिन्द की पदवी से विभूषित किया गया।
1915 में ही सिंगापुर में नियुक्त पाँचवीं लाइट इंफेंट्री बटालियन के भारतीय सिपाहियों में विद्रोह फूटा। इसी वर्ष वीरेन्द्रनराथ्, भूपेनद्रदत्त, हरदयाल आदि क्रान्तिकारियों ने ‘इण्डिरुन इंडिपेण्डैंस कमेटभ् की स्थापना की। दिसंबर माह में राजा महेन्द्र प्रताप, बरकतुल्ला और ओबेदुल्ला सिन्धी ने काबूल में स्वतन्ख् भारत सरकार बनायी। अँग्रेजों ने 1857 के गदर के बाद पहली बार अत्यन्त दमनकारी कदम उठाया। ईरान में सूफी अम्बाप्रसाद व पाण्डुरंग। खनखेजे ने भारतीय सैनिकों को बगावत को उकसाया, परंतु बगावत सफल न हो सकी, उल्टे गदर पाटी बिखराव की स्थिति में पहुँच गयी यह दशक जवाहरलाल नेहरू का उदयकाल था इसी दौरान आयरलैण्ड में चल रहे होतरुल आन्दोलन की शैली पर 1915 में पूना जोसेफ बपतिस्पा ने होमस्ल लीग की स्थापना की सुझाव दिया। 28 अप्रैल, 1916 को बेलगाँव में इसकी स्थापना भी हुई। बीच तिलक स्वदेश वापस आ गए थे। उनकी साम्राज्यवाद पर जरा भी सहानुभूति नहीं थी। उन्होंने उद्घोष किया, “स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हैं और हम इसे लेकर रहेंगे। इसी समय आयरिश महिला एनीबेसेण्ट भी भारत आयी और उन्होंने स्वतन्त्रता आन्दोलन में बढ़ चढ़कर भाग लिया। पं. मदनमोहन मालवीय ने काशी में हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की।
1917 में विश्वयुद्ध तो अवश्य थमा, पर रूसी क्रान्ति की सफलता ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नींद हराम कर दी। उधर लिक की ओजस्वी वाणी नवयुवकों में नवप्राण फूँक रही थी। ब्रिटिश सरकार ने भारत को खुश करने के लिए ‘स्वशासित संस्थाओं के क्रजिक विकास योजना’ की घोषणा कीं यद्यपि इस घोषणा का स्वागत हुआ, परन्तु इससे असन्तुष्ट तिलक अपने आन्दोलन के माध्यम से राष्ट्रीय-चेतना को झकझोरते रहे। इस दौरान जवाहरलाल नेहरू ने लिखा-देश के वातावरण में बिजली-सी दौड़ गयी। युवाओं में आजादी का तूफान भारतीय हृदय में स्वतन्त्रता प्राप्ति की आकांक्षा बढ़ा दीं वैचारिक रूप से हर रूसी 1917-18 में क्रान्ति ने भारतीय मानस में पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति का उत्साह भर दिया। 1997 में भरत सचिक माँटेग्यू भारत आए तथा 8 जुलाई, 1998 को उत्तरदायी श्ज्ञास्न हेतु यह एक प्रस्ताव प्रकाशित किया।
1917-18 इसमें गाँधी ने चम्परन, खेड़ा और अहमदाबाद का सघन दौरा किया उनकी ख्याति चतुर्दिक् फैलने लगी। 13 अप्रैल, 1919 की जलियावाला बाग ने जनरल डायर ने एक सभी में उपस्थित हजारों निहत्थे पर 1700 चक्र से अधिक गोलियाँ चलायी। जिसमें हजारों लोग मारे गए देश भर में आक्रोश की आँधी उठने लगी। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसी काण्ड की वजह से ब्रिटिश सरकार नाइट हुडे की उपाधि लौटा दी। इसी वर्ष भारत को अंग्रेजी साम्राज्य का अभिन्न अंग बनाए रखने के लिए ‘इण्डिया कौंसिल’ के गठन में परिवर्तन किया गया। केन्द्रीय व्यवस्थापिका में कौंसिल ऑफ स्टेट्स व सेंट्रल लेजिस्लोब्वि कौंसिल ऑफ कौंसिल’ के गठन में परिवर्तन किया गया। केंद्रीय व्यवस्थापिका में कौंसिल ऑफ स्टेट्स व सेंट्रल लेलिस्लेटिव कौंसिल बनी। जातीय संख्या के आधार पर मुसलमानों, यूरोपियनों व सिखों को प्रतिनिधित्व सौंपा गया। परन्तु अंग्रेज कूटनीतिज्ञों ने भारतीय प्रजा को फँसाने, कुचलने के मकसद से ‘रोलेट एक्ट’ रूपी अन्धा कानून लागू किया। यह जोर-जुल्म के सिवा और कुछ नहीं था। इसके विरोध में मदन मोहन मालवीय, मोहम्मद अलीजिन्ना और मजहरुलहक तीनों ने कौंसिल से त्याग–पत्र दे दिया।
इस दूसरे दशक में स्वाधीनता की जड़ें और गहरी हुई हर क्षेत्र में क्रान्ति की लहर उठी। आदिवासियों किसानों, श्रमिकों तथा प्रजा में विद्रोह के स्वर उभरे आन्ध्र के आदिवासियों ने वन सत्याग्रह छेड़ा जगदलपुर और खोंड में भी आदिवासी विद्रोह उठा। बाद में बस्तर और उड़ीसा के कालाहांडी तक इसकी लपटें फैली ये आरने आन्दोलन और विद्रोह गाँधीजी का राष्ट्रवाद हिचकोले खात हुआ। अग्रसर हुआ। राष्ट्रीय क्षितिज में भारतीय महिलाओं का आगमन भी इसी दशक में हुआ। 1857 की वीरांगना झाँसी की रानी भारतीय नारियों का आदर्श बनी। देश की देवियाँ स्वतंत्र संघर्ष की पूरी अवधि कमे पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा लिकर सामलिक रूढ़ियों ओर देश की गुलामी के खिलाफ उठ खड़ी हुई रानी लक्ष्मीबाई की परम्परा में कस्तूरबा गाँधी, सरोजनी पनायडू, मणिबन, अमृतकौर, कमाल नेहरू, कमला च्ट्टोपाध्याय, विजमक्ष्मी पण्डित, दुर्गाबाई देशमुख, मैडम भीकाजीकामा, सिस्टर निवेदिता, अयणा ऑफ अली, कमांडर लक्ष्मी सहगल, इंदिरा और इनकी सहयोगधमा बहनों ने राष्ट्रहित के लिए अनुपम और अद्वितीय कार्य किए।
रोलेट एक्ट, जलियावाला बाग हत्याकाण्ड, खिलाफत आन्दोलन, प्रथम विश्वयुद्ध से उत्पन्न आर्थिक असन्तुलन, अकाल, महामारी, सरकारी दमनचक्र आदि की अंतिम परिणति गाँधीजी ने अगस्त, 1920 के असहयोग आन्दोलन की घोषणा में हुई। 1 अगस्त, 1920 को लोकमान्य तिलक सारे दशा को गिलखत छोड़कर चल गए उनक कार्यों की महत्ता को सारे राष्ट्र ने स्वीकार यिकाँ उन्होंने माण्डले जेल में श्रीमद्गीता की बृहत् टीका गीता रहस्य के नाम से लिखी जो दार्शनिक जगत की उनकी अनुपम देन बनी। उनकी चेष्टा से पूना में न्यू इंग्लिश स्कूल, डेक्कन, एजूकेशन सोसाइटी, फर्ग्यूसन कॉलेज, महाराष्ट्र में शिवाजी उत्सव, गणपति उत्सव आदि शुरू हुए। तिलक के पालेकरगमन के साथ ही गाँधी भारत के राष्ट्रीय जीवन के एक नए आयाम के रूप में उभरे।
1920 के ही समिम्बर महीने में काँग्रेस का शेष अधिवेशन कलकत्ता में हुआ इसमें गाँधी ने स्सवराज्यप्रपप्ळित क लिए सरकार से असहयोग करने का प्रस्ताव रखा, जिसे काँग्रेस ने स्वीकार कर लिया दिसंबर, 1920 में नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में इसे पूर्ण समिति लिमी इसी के साथ गाँधी युग प्रारंभ हुआ। गाँधी जीन ने अपने काम को दो भागों में बाँटा-एक रचनात्मक, दूसरा संघर्ष में रचनात्मक कार्यक्रम स्वदेशी का प्रोत्साहन दिया गया। पंचायती स्थापना, अस्पृश्यता रिवरीण व नशाबन्दी व बुनियादी शिक्षा के कार्यक्रम बनें संघर्षात्मक कार्यक्रम की शुरुआत उन्होंने अपनी कैसर हिन्द पदवी सरकार को लौटाने के साथ की। उनके आह्वान पर हजारों विद्यार्थी स्कूल कॉलेज छोड़कर राष्ट्रीय स्वाधीनता के कॉलेज छोड़कर राष्ट्रीय स्वाधीनता के कॉलेज छोड़कर राष्ट्र स्वाधीनता के लिए कूद पड़े। हजारों-लाखों ने सरकारी नौकरियाँ छोड़ी। विदेशी सामानों की होली जने लगी। किसानों ने लगान देना बन्द किया केरल में ‘मोपाल’ विद्रोह भड़का। इस राष्ट्रीय आंदोलन की एक महान उपलब्धि यह हुई कि देश को अनेक उच्चस्तरीय नेता प्राप्त हुए। मोतीलाल नेहरू, तेजबहादुर, डॉ. राधाकृष्णन, जवाहरलाल, नेहरू, सरदार बल्लभ भाई पटेल, सुभाष चन्द्र बोस जैसे राष्ट्रीय स्तर के व्यक्तित्व तथा हजारों क्षेत्रीय नेताओं ने दलदल में फँसे राष्ट्रीय रथ को स्वाधीनता के राजमार्ग पर ला खड़ा कर दिया।
इसी काल में साहित्य, शिक्षा एवं विज्ञान के क्षेत्र में क्रान्ति आयी। देश में सर्वत्र में क्रान्ति आयी। देश में सर्वत्र महाविद्यालय और विश्वविद्यालय स्थापित होने लगें रवीन्द्रनाथ टैगोर के समकालीन बंकिमचन्द्र एवं डी. एल. राय आदि की कृतियों ने लोकजागरण का सर्वोत्कृष्ट कार्य किया सी.वी. रमण ने विज्ञान का नोबुल पुरस्कार पाकर विज्ञान की विश्वप्रतिभाओं में राष्ट्र चंद्र बसु प्रफुल्लचन्द्रराय आदि की भी वैज्ञानिक प्रतिभा सराहनीय मानी गयी। इस युग में बंकिम की गीत ‘वन्दे मातरम् ‘ आजादी के दीवानों का कंठहार था। मैथलीशरण गुप्त की भारत भारती भी राष्ट्रभक्तों के लिए प्रेरणा बनी। अँग्रेजों के रोमांटिक काव्य के रूप में प्रवेश किया महावीर प्रसाद के द्विवेदी युग के बाद यह एक नयी धारा थी। इसकी ल प्रकृति रचनात्मक थी तथा राष्ट्रीय बोध के साथ जागरण का दिव्य संदेश लेकर छायावादी विद्रोह सामंतवाद और विदेशी साम्राज्यवाद के खिलाफ एक अतिमानसिक ज्वार के सदृश था। निष्कर्ष रूप से कहना चाहिए कि गाँधीवाद ने ीरत को झकझोरा ओर छायावाद ने उसे आत्मविश्वास दिया। महाकवि प्रसाद, नाला, महादेवी वर्मा, परंतु और बाद दिनकर आदि की कृतियाँ इस युग की प्रतिनिधि हैं।
इस दशक में साँस्कृतिक, आध्यात्मिक जाग्रति सूब रही श्री राम कृष्णा मिशन, श्री अरविंद आश्रम ब्रह्मसमाज, आर्यसमाज, र्प्रथनासमज, थियोसोफिकल सोसाइटी आदि सभी ने धार्मिक, सांस्कृतिक चेतना का प्रसार किया सामूहिक, साँस्कृतिक चैतन्यता से अशिक्षा रूढ़िवाद तथा कुसंस्कारों को दूर करने का प्रबल प्रयास किया। गया। इसी सांस्कृतिक चेतना का तकाजा था कि पूरे राष्ट्र ने यह महसूस कर लिया कि अपनी जननी जन्मभूमि के लिए काम करना पड़ेगा, तभी दासता की बेड़ियोँ बटेंगी। इस काल में कृखिदासता की न्यूनता, आधुनिक उद्योग -धन्धों का विकास, न्याय के लिए जाग्रति, आधुनिक सर्वहारा वर्ग का उदय, समाचार एजेन्सी का विकास, भारतीय प्रेस की भूमिका, अस्पृश्यता निवारण, नारीमुक्ति आन्दोलन आदि प्रमुख धाराएँ प्रवाहित हुई।
तीसरा दशक
तीसरे दशक की शुरुआत विप्लवी हलचल से हुई। देश के सभी वर्गों में पराधीनता से मुक्ति की तीव्र छटपटाहट जगी। इसी के साथ सरकार का दमनचक्र अत्यन्त कठोर हो गया। इण्डिपेण्डेन्ट और ‘द डेमोक्रेसी’ सरीखे राष्ट्रवादी पत्रों को बन्द कर दिया गया। वन्देमातरम् प्रताप, केसरी, बाम्बे क्राँनिकाओं को कोपभाजन बनना पड़ा। इसी के साथ लाला लाजपतराय, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू सी.आर. दास, राजेंद्रप्रसाद आदि प्रमुख नेताओं को जेल में डाल दिया गया 29 जनवरी 1922 को चार हजार पुरुषों एवं पाँच सौ संकल्प लिया 17 सितम्बर, 1924 का ब्रिटेन के युवराज का भारत आगमन हुआ। परन्तु उन्हें राष्ट्रवादियों के घोर विरोध को सहने के लिए बाध्य होना पड़ा। सन् 1924 तक आंदोलन की तीव्रता के साथ ही सरकार की दमन नीति चलती रही। 1926 तक भारत के राजनीतिक वातावरण में निराशा के राजनीतिक वातावरण में निराशा के बादल घिरने लगे थे। हिन्दू-मुस्लिम एकता का स्थान भेद और दंगों ने ले लिया गाँधीजी ने दंगे रोकने लिए उपवास भी किए, परन्तु उनका कोई असर नहीं आया। 1926 में कलकत्ते में भयंकर दंगे हुए धूमि पड़ रही राष्ट्रीयचेतना को सतेज एवं प्रखर बनाने के लिए इसी वर्ष पूर्ण एकांतवास की घोषणा की। वह अपेक्षाकृत अधिक उग्रसाधनाओं में संलग्न हो गये परमपूज्य गुरुदेव भी इसी वर्ष वसन्त पंचमी का अपनी मार्गदर्शक सत्ता के निर्देशानुसार अखण्ड दीप प्रज्वलित कर 24 लाख के 24 गायत्री महापुरश्चरणों की साधना हेतु संकल्पित हुए। इसी वर्ष का श्री अरविन्द ने भागवत चेतना के अवतरण का वर्ष कहा।
1927 में साइमन कमीशन की नियुक्ति की घोषणा हुई इसका उद्देश्य उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए समीक्षा करना था। इसमें सत सदस्य केवल ब्रिटेन के ही कंजवेटिव, लिबरल और लेबर दलों से थे आयोग जब तन फरवरी 1928 को मुम्बई पहुँचा, तो इसका स्वागत काले झण्डे किया गया ‘साइमन वापस जाओ’ के गगनभेदी नारे लगाए गये लाहौर में इसके विरोध में प्रदर्शन करते समय लाला लाजपतराय को सार्ण्डस की प्राणहन्ता लाठी का सामना करना पड़ा जिसमें उनकी मृत्यु हो गयी। वीर क्रांतिकारियों चंद्रशेखर, भगतसिंह आदि ने इसका करारा जवाब दिया 18 दिसम्बर, 1928 को गोली मारक सामर्ण्डस की हत्या कर दी गयी तत्कालीन भरत सचिक बेर्केन हेड ने हुए चुनौती प्रस्तुत की। चुनौती यह थी कि भारतीय नेता एक ऐसा संविधान करके दिखाएं, जिसे जनसमर्थन प्राप्त हो। चुनौती को स्वीकार करते हुए मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में आठ सदस्यीय समिति ने 1927 में भारतीय संविधान की रूपरेखा तैयार की। 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में भगत सिंह ने बम फेंका। और स्वयं को जानबूझकर गिरफ्तार कराया। 31 दिसम्बर 1931 को जवाहर लाल नेहरू ने रावी तट पर स्वतंत्रता ध्वज फहराया और सबने मिलकर पूर्ण स्वाधीनता की शपथ ली। उन्होंने 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाने की घोषणा भी की। उसी वर्ष गाँधी जी ने नमक कानून तोड़ा। वे साबरमती आश्रम से 241 मील पैदल चलकर समुद्र तट के गाँव डांडी पहुँचे और समुद्र के पानी से नमक बनाकर नमक कानून भंग कर दिया। नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने इसकी तुलना नेपोलियन के पेरिस मार्च और मुसोलिनी के रोम मार्च से की। इस अवज्ञा आँदोलन में देश के सभी स्त्री-पुरुष बाल-वृद्ध सभी टूट पड़े। सरकार ने काँग्रेस को गैर कानूनी संस्था घोषित कर दिया। सरकारी दमन के विरुद्ध में क्राँति की गतिविधियाँ बढ़ गयी।
चौथा दशक
इस चौथे दशक की शुरुआत भी परिवर्तन के उफनते ज्वार से हुई। सरकार को काँग्रेस का महत्व स्वीकार करना पड़ा। सन 1931 को गाँधी-इर्विन समझौते के साथ ही दूसरा गोलमेज सम्मेलन हुआ। इसी वर्ष भारत में जनगणना हुई। क्राँतिकारियों के लिए ये वर्ष बड़ा ही कष्टदायी रहा। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के एल्फ्रेड पार्क में पुलिस से मुठभेड़ में चंद्रशेखर आजाद की मृत्यु हो गयी। इसके लगभग एक माह बाद 23 मार्च को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को एक साथ लाहौर के केन्द्रीय जेल में शाम 5 बजकर 15 मिनट पर फाँसी दे दी गयी। 1 जनवरी 1932 को गाँधी जी ने पुनः सविनय अवज्ञा आँदोलन छेड़ दिया। गाँधी जी पटेल नेहरू के साथ एक लाख से अधिक गिरफ्तारी हुई। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने मुसलमानों की तरह अछूतों के प्रतिनिधित्व का प्रश्न खड़ा किया। अन्ततः समझौता हुआ। इसके पश्चात गाँधी जी ने अछूतोधार आँदोलन छेड़ दिया। देशभर में इसका व्यापक प्रभाव हुआ। 1935 में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट लागू हुआ। 1937 में प्राँतीय स्वायत्वा का उद्घाटन हुआ और बहुत सारे प्राँतों में काँग्रेस सरकारें बनी। 1938-1939 में दो बार सुभाषचंद्र बोस काँग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। परंतु दोनों बार उन्होंने इस्तीफा दे दिया।इसी दशक में अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ की स्थापना हुई। श्रमिक आँदोलन तीव्रता से फैलने लगा। औद्योगिकी करण के फलस्वरूप पूँजीपति और श्रमिक वर्ग के रूप में समाज दो भागों में बंट गया। इसी असभ्यता के कारण रूसी साम्राज्यवाद ने भारत में प्रवेश किया।
पांचवां दशक
पांचवां दशक स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम चरण के रूप में भारत में आया। 1939 में ही दूसरा महायुद्ध छिड़ चुका था। ब्रिटेन भारत को भी इस महासमर में घसीटने को प्रयासरत हुआ। 1940 में परमपूज्य गुरुदेव ने आध्यात्मिक पत्रिका अखण्ड ज्योति की शुरुआत करके एक नये साँस्कृतिक आँदोलन को जन्म दिया। 1941 में ब्रिटेन की हालत काफी नाजुक हो चुकी थी। जापान मित्र राष्ट्रों के लिए परेशानी का कारण बना रहा। सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज की स्थापना की। मार्च 1942 में सर स्टेनफोर्ड क्रिप्स का क्रिप्य मिशन भारत आया। इसी वर्ष गाँधी जी साम्राज्यवाद से अंतिम संघर्ष के लिए तैयार हुए। 9 अगस्त 1942 को मुम्बई अधिवेशन में भारत छोड़ो प्रस्ताव पास किया गया। करो या मरो के नारे ने पूरे देश में स्वतंत्रता की अग्नि प्रज्वलित कर दी। 8 अगस्त को रखे गये जवाहर लाल नेहरू के भारत छोड़ो प्रस्ताव के विरोध में ब्रिटिश सरकार अतिक्रूर हो गयी। पटना, भागलपुर, मुँगेर नदियाँ तलवार में वायुयानों से जनता पर गोलियाँ बरसायी गयी। अगणित लोग मारे गये। 60 हजार बंदी बनाये गये और 26 हजार दंडित किये गये। 1942 की जनक्राँति ही भारतीय स्वाधीनता का मुख्य आधार बनी। 6 अगस्त व 9 अगस्त 1945 को जापान के हिरोशिमा व नागाशाकी में परमाणु बम गिराये गये। इसी के साथ विश्व युद्ध की समाप्ति हो गयी। अंग्रेज विश्व युद्ध में जीत तो गये परंतु उन्होंने समझ लिया कि भारत में अब उनकी खैर नहीं। 20 फरवरी 1946 कसे ब्रिटेन ने घोषणा कर दी कि अप्रैल 1946 तक भारत छोड़ देगा। लार्ड माउण्टबेंटन नये वायसराय बनकर भारत आये। भारत विभाजन के साथ ही महायोगी श्री अरविंद के जन्म दिवस 15 अगस्त 1947 को भारत स्वाधीन हो गया।
स्वाधीन भारत के 50 वर्ष उत्तरशती
स्वतंत्रता के बाद से भारत के राजनैतिक व सामाजिक फलक पर निरंतर नाना रंग उभरे है। सब मिलाकर है एक विकास यात्रा ही। किंतु इस पर कभी-कभी बदरंग भी उभर जाता है। एक ओर आर्थिक विकास, शिक्षा, विज्ञान की उन्नति, नवीन तकनीकों का विकास, कृषि व उद्योग का उत्पादन क्षमता जनजातियों और कमजोर वर्ग की चेतना स्त्री शिक्षा, विशाल निर्माण कार्य बाँध, नहरें, सड़कें, रेलों का विस्तार, अर्थ विस्तार, बैंकिंग सुविधा आदि काफी बढ़ी है पर समानाँतर रूप से बढ़ी हुई जातीय संकीर्णता, सांप्रदायिक द्वेष, आतंकवाद, भ्रष्टाचार और जघन्य अपराधीकरण भी कम चिंता का विषय नहीं है।
नये भारत के इतिहास की शुरुआत ही सांप्रदायिक दंगों से हुई। 30 जनवरी 1947 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को नाथूराम गोडसे ने गोली मार दी। 26 जनवरी 1950 को भारत सर्व प्रभुत्व सम्पन्न लोकताँत्रिक गणराज्य बन गया। 5 दिसम्बर 1950 को स्थूल एवं सूक्ष्मस्तर पर स्वाधीनता महायज्ञ में अग्रणी की भूमिका निभाने वाले महर्षि अरविंद ने महाप्रयाण किया। सरदार पटेल ने छोटे-छोटे अनेक देशी राज्यों को राष्ट्र में विलीन कर दिया। उनके इस महापुरुषार्थ के कारण राष्ट्र में विलीन कर दिया। उनके इस महापुरुषार्थ के कारण राष्ट्र की जनता ने उन्हें लौहपुरुष की संज्ञा दी। 1950 में सरदार पटेल भी चल बसे। जून, 1953 में परमपूज्य गुरुदेव ने आध्यात्मिक प्रयोगों की प्रथम प्रयोगशाला के रूप में गायत्री तपोभूमि का निमार्ण किया। वर्ष 1956 में भारत के राज्यों का पुनर्गठन किया गया।
आजाद भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने प्लानिंग कमीशन की स्थापना की और पंचवर्षीय योजनाओं से इसका भविष्य जोड़ दिया। नेहरू युग में भारत को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में व्यापक सम्मान मिला। वर्ष 1957 में परमपूज्य गुरुदेव ने सहस्रकुण्डीय महायज्ञ के साथ अपनी 24 वर्षीय साधना की महापूर्णाहुति की। इसी के साथ युग-निर्माण आँदोलन सम्पूर्ण भारत के क्षितिज पर सबसे महान साँस्कृतिक, आध्यात्मिक आँदोलन के रूप में उभरा। नेहरू युग पर सबसे गहरा आघात लगा। 1962 के भारत-चीन युद्ध से। 1964 में नेहरू जी की मृत्यु हुई। इसी के साथ लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री हुए। जिनके समय 1965 में भारत-पाक युद्ध लड़े गये। शास्त्री जी एक मजबूत सेनानी की तरह उभरे, किंतु उनका देहावसान 19 जनवरी 1966 को हो गया। उनका नारा जय जवान’-जय किसान बच्चे-बच्चे की जबान पर चढ़ गया। शास्त्रीजी के बाद महिला नेता के रूप में इंदिरागाँधी को बड़ी चमक मिली। 1967 में देश का प्रथम राकेट रोहिणी-75 विकसित हुआ तथा 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया।
वर्ष 1971 में पाकिस्तान ने फिर भारत पर एक नया युद्ध थोप दिया। जिसका अपना देश ने मुँहतोड़ जवाब दिया। पाकिस्तान हारा ही नहीं टूटा भी। बंगला देश के रूप में भारत एक नये आयाम के रूप में हरिद्वार में शाँतिकुँज की स्थापना की। 1974 में फिर देश में आम चुनाव हुए। इसके बाद सबसे बड़ी राष्ट्रीय घटना के रूप में इमरजेंसी आयी। इसके विरोध में व्यापक जनआक्रोश उभरा और 1977 के चुनाव में वर्षों से शासन करती चली आ रही पार्टी को पराजय का मुँह देखना पड़ा। लोकनायक जय प्रकाश नारायण के आह्वान के रूप में बनी जनता पार्टी शासन में आयी। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। 1979 में स्काईलैब का आतंक उभरा और समाप्त हुआ।
वर्ष 1980 में परमपूज्य गुरुदेव ने घोषणा की कि अब से 20 वर्षों तक यानि की 2000 तक महापरिवर्तन का समय है। राजनैतिक, सामाजिक, अन्तर्राष्ट्रीय घटनाक्रमों में व्यापक पैमाने पर एवं तीव्र गति से फेर-बदल होगी। इसी वर्ष में उग्रवाद ने जोर पकड़ा। 1980 में ही सातवीं लोकसभा का चुनाव जीतकर आयीं श्रीमती इंदिरागाँधी ने यद्यपि उसकी सख्ती से मुकाबला किया, किंतु इसी क्रम में 1975 में उनकी नृशंस हत्या हो गयी। इसी वर्ष भोपाल गैस काण्ड की त्रासदी झेलनी पड़ी। इस बीच परमपूज्य गुरुदेव राष्ट्रीय स्तर पर महापरिवर्तन की पृष्ठभूमि के रूप में शक्तिपीठों की स्थापना कर चुके थे। इसके बाद वर्ष 84 में ही उन्होंने सूक्ष्मीकरण साधना का शुभारंभ किया। राजीव गाँधी इसी साल देश की जनता का सर्वाधिक बहुमत पाने वाले प्रधानमंत्री बने। उनके दौर में सामयिक विकास एवं राष्ट्रनिर्माण के अनेक प्रयासों के बावजूद देश सांप्रदायिकता, आतंकवाद और बाहरी षड्यंत्रों में फंसता गया। 1987 में परमपूज्य गुरुदेव ने सूक्ष्मीकरण साधना कह पूर्णाहुति राष्ट्रीय एकता सम्मेलन के रूप में की। इसी के बाद नौवीं लोकसभा चुनाव हुए। दिसम्बर 1989 में वी.पी. सिंह जनता दल नेता के रूप में देश के सातवें प्रधानमंत्री बन गये। वर्ष 1990 की जून में परमपूज्य गुरुदेव का महाप्रयाण हुआ। चंद्रशेखर देश के अगले प्रधानमंत्री बने।
सदी के अंतिम दशक की दुखद शुरुआत वर्ष 1991 में पेरुम्बदूर में राजीव गाँधी की मृत्यु से हुई। हालाँकि काँग्रेस ने फिर से एक पी.वी. नरसिम्हाराव जी के नेतृत्व में सरकार बनायी। नयी औद्योगिक नीति की घोषणा हुई, साथ ही अरबों का बैंक घोटाला भी चर्चा में रहा। 1992 में वंदनीय माता जी ने देव संस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत शाँतिकुँज से अश्वमेध महायज्ञों की व्यापक श्रृंखला की घोषणा की। वे स्वयं देश-विदेश इन महायज्ञों के संचालन के लिए गयीं। 1993 में 25 महिला इंजीनियर वायुसेना में शामिल हुई। 1994 की महत्वपूर्ण घटनाएं रही डंकल प्रस्ताव, चीनी घोटाला, प्रतिभूति घोटाला, सूरत में प्लेग, इसी वर्ष 19 सितम्बर को वंदनीय माताजी भगवती देवी शर्मा का महाप्रयाण हुआ। 1995 में सार्क सम्मेलन, देश में ही हृदय का सफल प्रत्यारोपण एवं डबवाली अग्निकाँड-राष्ट्रीय परिदृश्य पर छाये रहे। इसी वर्ष आँवलखेड़ा में युगनिर्माण आँदोलन की प्रथम महापूर्णाहुति का भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ।
इसी बीच 11वीं लोकसभा के चुनाव हुए। अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, परंतु राष्ट्रीय परिदृश्य पर अस्थिरता का माहौल हावी रहा। उनके संक्षिप्त कार्यकाल के बाद एच.डी. देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने। सारा वर्ष घोटालों की चर्चा में घिरा रहा। अस्थिरता के बावजूद राष्ट्र ने सी.टी. बी.टी. में हस्ताक्षर न करके अपनी दृढ़ता का परिचय दिया। वर्ष 1997 के साथ स्वाधीन भारत ने अपनी स्वतंत्रता के पचासवें वर्ष में प्रवेश किया। राजनैतिक पटल पर छायी अस्थिरता के कारण श्री इंद्रकुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने। इसी वर्ष शाँतिकुँज ने अपनी स्थापना की रजतजयंती पूर्ण की। गायत्री तपोभूमि के सात क्राँतियों की घोषणा की गयी। छह समारोह प्रत्येक पूर्णिमा को इसी वर्ष शाँतिकुँज में भी सम्पन्न हुए, राष्ट्र के राजनैतिक पटल पर अस्थिरता लगातार हावी रही, जिसके चलते श्री गुजराल को लोकसभा भंग करने की संस्तुति करनी पड़ी।
वर्ष 1997 में राष्ट्र के सामने फिर से अपने भविष्यनिर्माताओं को चुनने की चुनौती आ खड़ी हुई। सदी के इस आखिरी दशक के इन अंतिम वर्षों में देश के सामने बढ़ती हुई जनसंख्या, युद्धों की आशंका, चरित्रवान लोक-नायकों की वजह से डगमगाता लोकतंत्र, गाँवों के विकास का काम, उदारीकरण के क्रूर प्रश्न का हल ढूँढ़ निकालने की जिम्मेदारी है। इसे पूरा करके भी हम और हमारा देश बीसवीं सदी का सफर पूरा करके इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करेगा। जो परमपूज्य गुरुदेव के शब्दों में उज्ज्वल एवं उल्लासमयी होगी।
चीत्कार के रव मथुरा की गलियों में गूँज रहे थे। रह-रहकर उठती आहें पाषाण को भी पिघला देने के लिए पर्याप्त थीं, पर आतताइयों के हृदय शायद पाषाण से भी कठोर थे या फिर पता नहीं, उनमें हृदय नाम की कोई चीज भी थी या नहीं। आज सावनी तीज का दिन था। कुँआरियों-सुहागिनों का त्योहार। पिछले आठ-नौ सालों से चले आ रहे प्रलयकाल में जिन सुहागिनों की ससुरालें मथुरा के आस-पास के गाँवों और कस्बों में हैं, वे तो तीज के दिन अपने मायके नहीं आ पाती हैं, पर शहर के भीतर आस-पास के मुहल्लों में या शहर से लगे गाँवों में जिनके मायके-ससुराल हैं उनके दिलों में तीज का त्योहार उल्लास बनकर बरबस पत्थर पर हरियाली-सा उमंग ही पड़ता है।
इसी मल्हार पर घमासान मच गयी। सेठ हुलासराय के घर घुसकर उनके कर्जदार पठान और उसके साथियों ने खूनी तीज मना डाली। न इज्जत बची, न लक्ष्मी। गाँव के लोग सामना करने आये, तो मारकाट के शोर से पड़ोसी गाँव की आग शहर में भी फैल गयी। द्वेष और घृणा की चिंगारियों ने कब धधकती ज्वालाओं का रूप ले लिया, पता ही न चला। धर्म के नाम पर बदला लेने के लिए स्त्री और धन की लूट कुछ लोगों के लिए पुण्यकार्य बन गयी। कुछ बरसों पहले सिकंदर सुलतान ने जब गद्दी पर बैठने के बाद महावन से आकर मथुरा में पहली मार-काट मचायी थी, तभी से यह सिलसिला बदस्तूर जारी था। आज भी मथुरा के सैकड़ों घरों में क्षत-विक्षत लाशें मानवता के दर्दनाक अन्तः की करुण गाथा कह रही थीं। धर्मान्धता के नाम पर इस तरह के भीषण कृत्य तो अब सामान्य सत्य बन चुके थे। यूँ भी काफिरों का काबा मथुरा और मथुरावासियों को बड़ी ओछी दृष्टि से देखा जाता था। मथ्यते तु जगसर्वे ब्रह्मज्ञानेन येन वा तत्सार भूतं यदस्याँ मथुरा सा निगद्यते। जहाँ ब्रह्मज्ञान से जगत मथा जाता है और जहाँ सारे सारभूत ज्ञान सदा विद्यमान रहते हैं, वही पुरी मथुरा है। तीन लोक से न्यारी कही जाने वाली मथुरा आज अपने अस्तित्व के लिए बिलख रही थी।
कई मथुरावासी भागकर वृंदावन की ओर जा रहे थे। अभी वृंदावन से तकरीबन दो कोस पहले यानी गाँव के किनारे पर पहुँचे थे, तभी उन्हें नाव दिखायी पड़ी।इन चार-छह लोगों ने सुरीर से आती हुई नाव को हाथ हिला-हिलाकर अपने पास बुला लिया। मथुरा मती जइयों! आज खून की मल्हारें गायी जा रही हैं, सुनकर नाव पर बैठी सवारियाँ सन्न रह गयी। उन्नीस-बीस लोग थे। तीन को वृंदावन उतरना था, बाकी सब मथुरा जा रहे थे। सभी के होश हवास सूली पर टंग गये।
आखिर बात क्या हुई भाई?
सुल्तान के राज में मार-काट कोई नई बात है क्या? कहने वाले की वाणी में विवशता और हताशा एक साथ सिमट आयी।
यह सब हाल–हवाल सुनकर मथुरा जाने वाली अठारह सवारियों में से आठ ने तो वहीं उतर कर आड़े तिरछे रास्तों से अपने घर को पहुँचने का निश्चय तुरंत कर लिया। बाकी दस लोग अजब ऊहापोह में पड़ गये। उनमें हाथरस के सीताराम भी थे। नाव पर लौटकर अपने अंधे साथी से बोले -सुस्वामी आपकी भविष्यवाणी सत्य हुई।
कालू केवट पास ही खड़ा था, क्या सूर बाबा ने पहले ही बता दिया था महाराज?
अंधे सूर बाबा मुँह उठाकर बोले-मैं क्या बताऊंगा। यह सब तो श्याम सुँदर की कृपा है। वाक्य पूरे करते उनकी अंधी आँखों से आँसू की बूंदें गिरने लगी। विनाशलीला से उनका मन पूरी तरह से विकल था। इस आँतरिक विकलता की छाप उनके गौर मुखमण्डल को स्याह बना रही थी। उनकी यादों में काफी दिन पहले की साँझ उजागर हो गयी। जब.....।
पीपल के पेड़ के तने से सिर टिकाये हुए बैठे थे। अंधे सूर के मनोलोक में उजाले का अधिकार पाने का भयंकर संघर्ष हो रहा था। क्रोध रंजित करुणा के स्वर मुखर हो उठे थे-किन तेरो नाम गोविंद धरोय। गुरु साँदीपनि का पुत्र शोकताप हरने के लिए तुमने असंभव को संभव कर दिखलाया। यमलोक से उनके प्राण छुड़ा लाये। मैंने तुम पर इतना भरोसा किया, इतनी-इतनी स्तुति चिरौरिया की किंतु सूर की बिरियाँ निठुरहै्व बैठ्यौ जन्मत अंध करयो।
उस दिन भी बड़ी विकलता थी मन में। पिता भी अविचारवश भाइयों का ही साथ देते थे। माँ को छोड़कर घर में सभी हर पल ही उसे तरह-तरह से तिरस्कृत करते रहते थे। घर से निराश होकर उसने अपने श्याम को पुकारा था। माँ की वाणी हर पल उसके हृदय में दीपशिखा की भाँति प्रज्ज्वलित रहती थी। उसने कहा था-पुत्र श्याम सुँदर त्रिलोकी नाथ है। जगत के पालनहार है। इसी विश्वास से ओत−प्रोत होकर उसने पुकारा था। अपने चिर सखा यशोदा के लाडले को।
उलाहने से भरा हुआ पद समाप्त हुआ ही था कि एक गैरित वस्त्र धारी संन्यासी उसके पास आ गये। वह अंधा भला क्या जानता कि वे गेरुआ कपड़ा पहने है अथवा पीला। उन्होंने ही मंत्र विद्या सिखायी। फलित ज्योतिष तुर्कों के साथ बाहर से आयी हुई रमल विद्या का ज्ञान भी उन्हीं से मिला। सबसे बढ़कर उन्हें मिला प्यार, जिसके लिए वे तरस रहा था। उन्होंने सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था-वत्स तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल है।
अंधे सूर के फीके चेहरे पर आशा की चमक धूप-छाँव-सी आयी और उतर भी गयी। कहा-ईंट पत्थर की अंधेरी कोठरी में दीप जलाकर उजाला किया जा सकता है। किंतु काया की अंधी कोठरी में....।
अंतर्ज्ञान से उजाला होगा पुत्र। मैं तुम्हारा वर्तमान नहीं भविष्य देख रहा हूँ। तुम तो श्याम सखा हो वृंदावन बिहारी के अपने हो।
उन्हीं संन्यासी नाद ब्रह्मानंद ने स्वामी हरिदास से उसे मिलाया। हरिदास जी एकाँत साधक थे। उनकी साधना दिनोंदिन ऊंची होती जा रही थी। ब्रह्मानंद जी को देखकर स्वामी हरिदास जी दौड़े हुए आये और वयोवृद्ध के चरण छूने के लिए झुके। स्वामी जी ने उन्हें बीच में ही उठाकर कलेजे से लगा लिया। कहा-देखो मैं तुम्हें प्रेम सरोवर के एक कृष्ण कमल से परिचित कराने के हेतु यहाँ आया हूँ।
कुटिया में चलकर विराजो बाबा। ये तो मेरे जन्म जन्मांतरों के भाई है। कहकर सूर का हाथ पकड़कर चले गये। तभी हरिदास ने मचल कर स्वामी नादब्रह्मानंद जी का हाथ हिलाते हुए पूछा-बाबा तुमने कुँडलिनी तान कैसे सिद्ध की थी।
मैंने सात वर्षों तक अभ्यास किया परंतु सफल न हो सका। फिर ज्वालाजी में एक महात्मा मिले। उनकी प्रेरणा से भगवती आज्ञा शक्ति कृपालु हो गयी।
बाबा हम दोनों को भी प्रसाद मिल जाये।अंधे सूर एवं स्वामी हरिदास जी ने लगभग एक साथ आग्रह किया।
स्वामी नादब्रह्मानंद जी ने तान छेड़ी। बूढ़े स्वामी जी की इस कुण्डलिनी तान ने हरिदास और सूरदास की रसकली खिला दी। समय मानो स्तब्ध हो गया था। एक अलौकिक ज्योति धारा बहने लगीं। हरिदास और सूरदास के बीच अंतर नहीं रहा।
अंधे सूर वहाँ से लौटते हुए सोच रहे थे। सचमुच श्याम सुँदर अपने भक्तों की पुकार सुनते है। सबके सब लगभग एक साथ बोल पड़े-महाराज ये तो सब कहने-सुनने की बातें है। श्याम सुँदर अगर पुकार सुनते तो आज मथुरा की ये दशा न होती।
सूर स्वामी के अन्तःकरण में ये बातें तीर की तरह जा लगी। उनकी भावनाओं को समझते हुए पंडित सीताराम जी बोल उठे। महाराज आप तो भक्त है। आप ही बताइये कब तक ऐसी दशा रहेगी देवभूमि भारत की। कब पूरी करेंगे कन्हाई अपनी दुष्ट दलन की प्रतिज्ञा। परित्राणाय साधूनाँ विनाशाय च दुष्कृताम् का उनका वादा कब पूरा होगा? प्रायः सभी जनों के मन में ढेर सारे सवालों को सीताराम जी ने अकेले पूछ लिया।
इसी पूछताछ में शाम हो गयी। रही बची नाव की सवारियों के साथ सूर-स्वामी पंडित सीताराम का हाथ पकड़े वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर जा पहुँचे।
भावों की एकाग्रता मंदिर में सिद्ध की गयी। उन्हें लगा कि उनके अंदर रंगों का झरना बह रहा है। इसी मध्य उन्होंने देखा कि श्याम सुँदर उनके सामने खड़े मुसकरा रहे है। उनकी साँसों में भारत भूमि की विकलता ध्वनित हो उठी। उनकी अनुभूतियों के आगे पहले प्रकाश का अणु-अणु उनकी जिज्ञासाओं की गूँज से निनादित हो रहा है। ज्योति चारों ओर से सिमट कर फिर बिंदु बन रही है। बिंदु उनकी नाभि, हृदय और कंठ को छूता हुआ ऊपर बढ़ रहा है। इस अलौकिक स्पर्श ने इसे जाग्रत कर दिया और जिज्ञासाओं के समाधान प्रत्यक्ष होने लगे।
सुल्तान का अवसान मुगलों का उदय, मुगलों का अवसान, अंग्रेजों का आगमन और प्रस्थान स्वतंत्र भारत बाद में उसकी करुण दशा और अंत में भारत का भाग्योदय सब एक-एक कर साकार हो उठे। भक्त और भगवान दोनों के अधरों पर मुस्कान थी। भाव-विभोर हो वे गा रहे थे।
रेमन धीरज काहे न धरे एक सहस्र नौ सौ के ऊपर ऐसों योग परे शुक्ला जयनाम सवंत्सर छट सोमवार परे
हलधर पूत पवार धर उपजे देहरी क्षत्र धरे मलेच्छ राज्य की सगरी सेना आपही आप मरे
सूर सबहि अनहोनी होइहै जग में अकाल परे हिंदू मुगल तुरक सब नाशै कीट पतंग जरे
सौ पे शुन्न शुन्न के भीतर आगे योग परे सहस्रबरस व्यापे सतयुग धर्म की बेलि बढ़ै सूरदास यह हरि की लीला टारी नाँहि टरै॥
रे मन तू धीरज क्यों नहीं रखता। ये जो वर्तमान स्थिति है वह निश्चय ही बदलेंगे। मलेच्छों की सेनायें आपस में लड़ भिड़कर समाप्त हो जायेंगी। महानाश की स्थिति बनेगी। यह योग 1999 से पूर्व होगा। फिर दो हजार से आगे सतयुग का दौर आयेगा। ये हरि की लीला से होकर रहेगी। सभी सुनने वालों के मन में सतयुग की वापसी की ललक दिखायी दे रही है।
(उत्तरार्द्ध)
पूर्व अंक में गायत्री महाविद्या के तत्वदर्शन एवं साधना के मर्म के विषय में पूज्यवर की अमृतवाणी पाठकगण पढ़ चुके है। उसी का उत्तरार्द्ध यहाँ प्रस्तुत है। जहाँ तक पिछला क्रम छोड़ा था, वहाँ चर्चा मनःसंयम, मनोनिग्रह, आत्मबल-संवर्द्धन की चल रही थी।
मित्रों! मनोनिग्रह हेतु और भी आगे बढ़े इसके लिए क्या करें? “मातृवत परदारेषु, लोष्ठवत् परद्रव्येषु, आत्मवत् सर्वभूतेषु” ये तीन आधार है, ये तीन कसौटियाँ हैं, जिनके ऊपर कसा जा सकता है कि आप फल प्राप्त करने के अधिकारी भी हैं कि नहीं और आत्मबल आपको मिल भी सकता है कि नहीं। आत्मबल आप संभाल भी सकते हैं कि नहीं और आत्मबल की जिम्मेदारी वहन करने में लायक आपके भीतर कलेजा और हिम्मत है भी कि नहीं। ये बेटे तीन परीक्षाएं है। ये तीन पेपर हैं पी.एम.टी. के। मेडिकल कॉलेज में भर्ती होने के लिए तीन पेपर दीजिए। नहीं साहब, हम पेपर नहीं देना चाहते। हम तो धक्का मारकर मेडिकल कॉलेज में घुसना चाहते है। नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। इम्तिहान दीजिए, पास होइये। पी.एम.टी. में डिवीजन लाइये और हम आपका दाखिला कर लेंगे। नहीं साहब, धक्का मुक्की चलेगी। हम तो धक्के मारेंगे और धक्के मारकर सबसे आगे निकल जायेंगे। बेटे, पहले रेलवे स्टेशनों पर ऐसा होता था हमारे जमाने में। जो धक्के मारता था वे सबसे आगे चला जाता था। टिकट वहीं ले आता था। बाकी रह जाते थे। अब तो क्यू सिस्टम हो गया है ना। आप कमजोर है न। सबसे पीछे खड़े हो जाइये। नहीं साहब, वह पीछे वाला वह पहलवान खड़ा हुआ है। हटाइये उनको, नंबर से खड़ा होना पड़ेगा। जो धक्के मारेगा वह आगे चला जायेगा। साहब हम तो धक्के मारेंगे, किस में मारेंगे, भगवान जी को धक्के मारेंगे और सबसे पहले वरदान ले आएँगे। धक्केशाही नहीं चलेगी अब, लाइन में खड़ा हो, क्यू में खड़ा हो और अपनी जगह साबित कर और हैसियत साबित कर और वह वरदान ले आ, ताकत ले आ।
गायत्री का अनुभव हर सुपात्र के लिए
गायत्री मंत्र क्या हो सकता है, यह मैं आपको समझा रहा था। यह समझा रहा था कि गायत्री की कृपा और गायत्री का अनुग्रह हर आदमी को नहीं मिल सकता, माला घुमाने से मिला होता तो आप में से हर एक को मिल गया होता। आप गायत्री मंत्र की माला कब तक घुमा रहे हैं? अरे साहब बहुत दिन हो गये। आपको छह वर्ष, आपको ग्यारह वर्ष, आपको तीस वर्ष हो गये, पर आपको क्या मिला? महाराज जी, बस यही मिला है कि नाक कट गयी तो कह दिया कि नाक की ओट में भगवान छिपा हुआ है, अब कट गयी है तो भगवान दीखने लगा है। बस इसी तरह ग्यारह माला जप करते हुए हमें 22 वर्ष हो गये और हम यूँ कहे कि हमें कुछ फायदा नहीं होता तो सब लोग यही कहेंगे कि अरे तू तो बड़ा पागल है, तूने काहे को नाक कटा ली, इसीलिए हम तो यही कहते रहते हैं हर एक से कि गायत्री माता अभी हैं, हमको प्रत्यक्ष तो नहीं दिखायी पड़ती, पर रात को सपने में दिखायी पड़ती है। सपने में दिखायी पड़ती है तो क्या लेकर आती है तेरे लिए? नहीं महाराज जी, लेकर तो कुछ नहीं आती मेरे लिए, वैसे ही खाली हाथ आ जाती है। धत् तेरे की। अब मुझे मिलेगा।तो मैं गाली सुनाऊंगा हनुमान जी को। कहूँगा तू मेरे बेटे के यहाँ गया था और सपने में दिखायी पड़ा, पर तुझसे यह भी नहीं बन पड़ा की पाँच रुपयों के नोटों की गड्डी तो दे जाता। नहीं महाराज जी, वह तो कभी नहीं दे गये। धन्य हैं तेरे सपने के हनुमान जी। बेटे! सपने का हनुमान कोई चीज नहीं दे सकता।
ऋतम्भरा-प्रज्ञा प्राप्त करनी हो तो हंस बनें
मैं यह चाहता था कि अब गायत्री की शिक्षा, गायत्री की वास्तविकता आपको बताऊं। कलेवर सिखाने के बाद में वह बात सिखाऊं, जहाँ से गायत्री के चमत्कार, गायत्री की सिद्धियाँ, गायत्री का गौरव छिपा हुआ है। जिसको हम ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। वास्तव में गायत्री का अर्थ आज ऋतम्भरा प्रज्ञा करना पड़ेगा। ऋतम्भरा प्रज्ञा कैसी होती है? बेटे! ऐसी होती है ऋतम्भरा प्रज्ञा, जिसको जो कोई भी आदमी अपने काम में लायेगा उसको कई तरीके अख्तियार करने पड़ेंगे। गायत्री का वाहन हंस है। गायत्री किस पर सवार होंगी? हंस पर सवार होगी और किस पर सवार होगी? कौवे पर। नहीं महाराज जी, कौवे पर नहीं हो सकती गायत्री, हंस पर सवार होती है। हंस किसे कहते हैं। हंस एक प्रतीक है। तू समझता क्यों नहीं है। अरे ये प्रतीक हैं। हंस पर गायत्री नहीं बैठ सकती। हंस पर कैसे बैठ सकती है, हंस तो जरा-सा होता है और गायत्री कितनी बड़ी होती है बता और इतनी बड़ी गायत्री हंस पर बैठेगी तो क्या हो जायेगा बेचारे का? बेचारे का कचूमर निकल जायेगा। हंस पर क्या करेगी बैठकर? गायत्री को बैठना होगा तो हवाई जहाज दिला देंगे। हंस की आफत आयेगी। फिर क्या है हंस? हंस बेटे! वह व्यक्ति है जिसकी दृष्टि ऋतम्भरा प्रज्ञा के अनुकूल है। ऋतम्भरा प्रज्ञा कैसी होती है, जैसे हंस की होती है। हंस की कैसी होती है? हंस कीड़े नहीं खाता। वह मोती खाता है अर्थात् जो मुनासिब है, जो ठीक है, जो उचित है, उसको करेगा, पर जो गैर मुनासिब है, अनुचित है, उसके बगैर काम नहीं चलेगा तो मर जायेगा। भूखा रह लेगा, चाहे मरना ही क्यों न पड़े, पर न तो कुछ अनुचित करेगा और न अभक्ष्य खायेगा। वह सोच लेगा कि न खाने से क्या आफत आ जायेगी। हंस उस व्यक्ति का नाम है, जो नीर और क्षीर का भेद करना जानता है। पानी और दूध को मिलाकर दीजिए। नहीं साहब, पानी हमें नहीं लेना है। हमको दूध लेना है। दूध को फाड़कर अलग कर देगा। पानी को फेंक देगा और दूध को ले लेगा। यहाँ भी वहीं स्थिति है। हंस केवल उचित को ही ग्रहण करता है, अनुचित को नहीं ग्रहण करता। ऋतम्भरा-प्रज्ञा उसी चीज का नाम है। इसे ही जाग्रत करने के लिए हम आपको गायत्री की साधना कराते हैं।
साधना का प्राण समझें
मित्रों! साधना उपासना का प्राण है-समर्पण। बस समर्पण कर लीजिए, फिर देखिए ऐसे ही मारा-मारी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। मैं पहले ही कहे देता हूँ कि माला मत फिरा, समर्पण करना सीख। बेटा ऐसा कर, इसमें बाँस के बाँसुरी की तरह अपने को खाली कर दें। फिर देख मजा आ जायेगा। नहीं गुरुजी, आप तो कर्मकाण्ड बता दीजिए। क्रिया-कृत्य बता दीजिए। बेटे अभी हम इसी कलेवर की बात कह रहे थे, लेकिन बेटे कलेवर ही सब कुछ नहीं है। प्राण को ही समझ। प्राण किसे कहते हैं? प्राण उसे कहते हैं जिसमें हमें अपनी चेतना का परिमार्जन करना पड़ता है और चेतना को साफ करना पड़ता है। अपनी अन्तर्चेतना पर भी जो मल, आवरण और दोष के तीनों आवरण चढ़े हुए हैं, इनको साफ करने के लिए जो हमको मेहनत करनी पड़ती है, मशक्कत करनी पड़ती है, लड़ाई लड़नी पड़ती है, सख्ती बरतनी पड़ती है, उसको साधना कहते है। मन साधे, सब साधे यही साधना का स्वरूप है।
मैं अब आपको समझाने की कोशिश करूंगा कि साधना का स्वरूप क्या हो सकता है? असली साधना क्या है? नकली की तो मैं क्या कहूँगा आपसे। असली साधना कैसे की जाती है? यह बताता हूँ आपको। असली साधना करता है किसान। किसके साथ-जमीन के साथ। जमीन के साथ में क्या काम करता है? बेटे! धूप में खड़ा रहता है। साल भर तक अपना शरीर और अपना पसीना इस मिट्टी में मिला देता है। ठीक साल भर बाद इस मिट्टी में पसीना मिलाने के बाद में क्या करता है? फसल पैदा होती है। अनाज पैदा होता है और मालदार हो जाता है। अपने आप के साथ में करेगा रगड़, तो गेहूँ का खेत जिस तरीके से फसल देने लगता है उसी तरीके से हमारी परिष्कृत चेतना फसल दे सकती हैं। कमजोर आदमी जब शरीर के साथ मशक्कत करना शुरू कर देता है और उस पर चढ़े मुल्लमों को दूर करना शुरू कर देता है और अपने आहार विहार को नियमित करना शुरू कर देता है तो बेटे व चंदगीराम पहलवान हो जाता है। टी.बी. की शिकायत उसकी दूर हो जाती है और वह मजबूत हो जाता है, साधना करने से। शरीर की साधना यदि आप करें तो बीमार होते हुए भी चंदगीराम पहलवान के तरीके से 22 वर्ष की उम्र में टी.बी. के मरीज होते हुए भी आप अपनी जिंदगी में पहलवान बन सकते है। अगर आप शरीर की साधना करना चाहे तब। साधना किसे कहते है। जैसे किसान अपने शरीर की और मिट्टी की मलाई करता है और रगड़ाई करता है। शरीर के साथ में मलाई कीजिये और आप पहलवान बन जाइये। ये तो हुई साधना शरीर की। आप अपनी अक्ल और दिमाग के साथ में मलाई कीजिए, घिसाई कीजिए और देखिए की आपका दिमाग बेअक्ल होते हुए भी आप कालीदास के तरीके से विद्वान बनते है या नहीं। आप विद्वान बन सकते है कालीदास के तरीके से। रस्सी को हम पत्थर पर बार-बार घिसते है तो निशान बन जाता है। राजा के तरीके से और कालीदास के तरीके से बेटे अगर हम रगड़ करना शुरू कर दें तो प्रगति के किसी भी क्षेत्र में हमारे पास सिद्धियाँ आ सकती है और चमत्कार आ सकता है।
पैसा भी आयेगा तो मनोयोग से ही
अक्ल की बाबत हमने कहा और शरीर के बाबत हमने कहा। लीजिए पैसे के बाबत बताते है। बाँटा नाम का एक मोची था। 12 वर्ष की उम्र में उसके माता-पिता का देहाँत हो गया था। जूते सीना उसने सड़क पर शुरू किया। लेकिन इस विश्वास के साथ कि जूते की मरम्मत के साथ सिद्धाँत जुड़े हुए है। प्रेस्टीज प्वाइंट जुड़ा हुआ है कि जूता ऐसा न बन जाये कि कही कोई आदमी हमसे ये कहे कि जूता घटिया बनाकर दे दिया। जो भी काम हाथ में लिया उसे प्रेस्टीज प्वाइंट मानकर लिया। कई आदमियों ने उसकी प्रशंसा की और कहा-कि मरम्मत करने वाला सबसे अच्छा लड़का वो है। जो नीम के दरक के नीचे बैठा रहता है। उसने पुराने जूते को नया बना दिया। लड़का बड़ा हो गया। लोगों ने कहा-बाँटा क्या तू ये कर सकता है कि हमारे लिए अच्छे नये जूते बना दे। नये जूते मैं कहा से बना सकता हूँ। मेरे पास चमड़ा भी नहीं है सामान भी नहीं है। दरांती भी नहीं है। चीजें भी नहीं है। अगर ये मुझे मिल जाता तो मैं बना देता। लोगों ने कहा दरांती हम दे देंगे तू बना दिया कर। लोगों ने सामान लाकर दिया बाँटा ने जूता बनाकर दिया। जो जूते छह महीने चलते थे वे साल भर चलने लगे। लोगों ने अपने परिचितों से कहना शुरू कर दिया कि अच्छे जूते पहनने है तो बाँटा की दुकान पर चले जाइये। इस तरह बाटा की दुकान एक शानदार जगह पर जा पहुँची। जहाँ आज सारे हिंदुस्तान में ही नहीं विश्व भर में बाटा का जूता प्रसिद्ध हो गया। कही भी चले जाइये देहात में चले जाइये। मैं भी तो एक बार अमेरिका गया हर जगह बाटा का जूता देखने को मिला।
हिंदुस्तान में भी वहीं, यहाँ भी वही, अफ्रीका के गाँव में भी बाँटा की दुकान मिली। मैं देखकर आया हूँ बाटा एक करोड़पति उद्योगपति का नाम है।
मित्रों कहाँ से आता है पैसा। कहीं से नहीं आता पैसा। पैसा मेहनत और रगड़ से आता है। शरीर का बचाये-बचाये फिरता है, काम से बचता फिरता है, दूर-दूर रहता है हरामखोर और कामचोर। कहता है कि हमको पैसा नहीं मिलता, हमारी आर्थिक उन्नति नहीं होता, न तो योग्यता बढ़ाता है न ही श्रम में विश्वास करता है। बाँटा के जमाने में योग्यता थी। नवें दर्जे तक पढ़ा हुआ है। अभी भी विदेशों में चमार और धोबी, मोची और भटियारे रात को दो घंटे नाइट स्कूलों में पढ़ने जाते हैं। भीतर वाले को योग्यता के रूप में विकसित करना होगा। मन से काम करना सीखना होगा। और बेटे! किसके संबंध में बताऊं। धन के सम्बंध से लेकर तू प्रतिभा-प्रतिष्ठा तक कही भी चला जा परिश्रम करने वाले को ही सफलता मिलती है।
सारी शक्तियाँ बीज रूप में हमारे अंदर है
साधना के साथ में भी परिश्रम जुड़ा हुआ है। सच्ची साधना करता है वैज्ञानिक। वैज्ञानिक बड़ी मेहनत करता है तो ताकतवर बम बना देता है। यदि वह फंस जाये तो सैकड़ों मील तक ये ताकत कहाँ से आती है। एटम में से नहीं आती है बेटे। साधना से आती है। साधना किस चीज का नाम है। साधना बेटे, इस चीज का नाम है, जिसमें हम अपने भीतर वाली क्षमता का, चेतना का विकास करते है। और विकसित करते हुए चले जाते है। चेतना का आप तो मूल्य भी नहीं समझते? मैं क्या करूं? चेतना का आप मूल्य भी नहीं पहचानते, आप तो बाहर ही बाहर तलाशते है। देवी-देवताओं के सामने नाक रगड़ते है। इस मंत्र के सामने नाक रगड़ते है उस गुरु के सामने नाक रगड़ते है। आपको तो नाक रगड़ने की विद्या आ गयी है। किसी की खुशामदें कीजिए, किसी की चापलूसी कीजिए। किसी के हाथ जोड़िये और बेटे वहाँ से काम बनाकर लाइये। बेटे किसी के सामने चापलूसी करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हमारे भीतर सामर्थ्य का स्रोत भरा पड़ा है सामर्थ्य की शक्ति भरी पड़ी है। उसको उभारने में हम समर्थ हो सके, उसे काम में लाने में समर्थ हो सके। तो मजा आ जाए हमारी जिन्दगी में। हमारी जिन्दगी में क्या-क्या होता है? हमारी भीतर वाली शक्ति कितनी है? बेटे यह समझो कि सारे सौरमण्डल में जितनी ताकत और जो ढर्रा है, वह सब ढंग और ढर्रा छोटे-से एटम के भीतर भरा पड़ा है। वृक्ष जो है उसका पूरा रूप टोटे-से बीज के भीतर में पत्तियां और टहनी फल और फूल सबका नक्शा, सबका खाका, सबका आधार इस बीज के अन्दर भरा पड़ा है। इसी तरह ब्रह्मांड में जो कुछ भी है हमारे पिण्ड में दबा पड़ा है। ओर भगवान में जो कुछ भी है हमारी जीवात्मा में दबा पड़ा है। भगवान के सारे के सारे ब्रह्माण्ड में जो शक्तियां और ताकते है वे सब बीज रूप में हमारे भीतर विद्यमान है। बीज को हम बोए उगाए, बढ़ाए, खिलाए, -पिलाए तो उससे पूरा का पूरा बरगद पेड़ ही सकता है साधना इसी का नाम है बीज को विकसित करके बरगद कैसे बनाया जा सकता है? साधना उसी प्रक्रिया का नाम है साधना और कुछ नहीं है? अपनी जीवात्मा को, अपनी अन्तर्चेतना को विकसित करते-करते हम महात्मा एक, देवात्मा दो और परमात्मा तीन, यहां तक जा पहुंचते है इसे प्राइमरी स्कूल, हाईस्कूल, इन्टरमीडिएट और कॉलेज की पढ़ाई समझ हैं यही है आत्मा से परमात्मा तक विकसित होने की प्रक्रिया।
चेतना का महत्व समझे
महात्मा, देवात्मा और परमात्मा और कुछ नहीं अपने आपे का विकास विस्तार है। अपने आपका विकास ही साधना है और कुछ नहीं है। साधना और कोई करके देता है क्या? नहीं कोई नहीं देता हम अपने आपका विकास स्वयं करते है अपने आपका निखार स्वयं करते है। आत्मशक्ति को आपने देखा नहीं। इंजन कितना बड़ा होता है। इंजन साहब छह लाख रुपये का आता है। लेकिन ड्राइवर 250 रुपये का आता है ड्राइवर घसीटता है इंजन को। उसने कहा खड़ा हो जा इंजन खड़ा हो जाता है। और हवाईजहाज? हवाईजहाज को चलाता कौन है? हवाईजहाज कितने का आता है? पाँच करोड़ रुपये का। कौन चलाता है? बैठे पायलट चलाता है। पायलट नहीं होगा तो हवाईजहाज रखा रहेगा। मशीनें कितनी बड़ी क्यों न हो, आटोमेटिक क्यों न हो, कम्प्यूटराइज्ड क्यों ना हों, लेकिन आदमी के बिना नहीं चल सकती। चेतना का मूल्य चेतना की शक्ति इतनी बड़ी है, जिसको उभरने को प्रक्रिया हम आपको सिखाते है। गायत्री मंत्र के माध्यम से। चेतना, जो आपकी सो गई है जो खो गई है चेतना जो आपकी मर गयी। है। जिसको आपने गंवा दिया है। जिस चेतना का आपने महत्व नहीं समझा, उस चेतना को हम आपको उभारना सिखाते है। गायत्री साधना उसी का नाम है। चेतना हमारी कितनी ताकतवर है। यह हमारी भौतिक ओर चेतना दोनों क्षेत्रों का मुकाबला करने में सक्षम है। इसका मैं। उदाहरण देना चाहूंगा। ये पृथ्वी कितनी बड़ी है। साहब बहुत बड़ी है पृथ्वी का वजन कितना है? बहुत है। पृथ्वी की चाल? पृथ्वी की चाल साहब एक घण्टे में छह हजार मील है बहुत बड़ी है ना। हां बहुत बड़ी पृथ्वी। जहां इसका उत्तरी ध्रुव है वहां अगर एक इनसान का बच्चा चला जाए जहां पृथ्वी का ‘बैलेंसिंग प्वाइंट’ है और उस जगह पर एक बच्चा घूसा मार दे खींचकर, तो पृथ्वी अपनी नींव पर से डगमगा जाएगा वह जिस कक्षा में घूमती है उस कक्षा में न घूम करके अगर घूमना बन्द कर दे अथवा कोई और कक्ष बना ले या हो सकता है कि वह बड़ी बना ले हो सकता है कि बहुत छोटी हो जाए। बच्चे का घूसा लगे तो सम्भव है यह पृथ्वी भागती हुई चली जाए और किसी ग्रह में टक्कर मार दे और मंगल ग्रह का चुरा हो जाय ओर हमारी पृथ्वी का भी चूरा हो जाए या यह हो सकता है कि बड़े दिन होने लगे। 365 दिन की अपेक्षा सम्भव है 20-20 दिनों का वर्ष हो जाए। सम्भव है 24 घण्टों की अपेक्षा 6 घण्टों का दिन हो जाय अथवा छह हजार घण्टों का दिन हो जाए। कुछ पता नहीं कुछ भी हो सकता है। एक बच्चे की चंपत खाकर, घूसा खाकर। चेतना के सामने जड़ तो कुछ भी नहीं है। चेतना, जिसको आप भूल गए। चेतना जिसको आपने समझा ही नहीं? चेतना जिसका आप मूल्य ही नहीं समझते? चेतना जिसका विकास ही नहीं करना चाहते? यही है गायत्री साधना का उद्देश्य कि आप अपनी चेतना को परिष्कृत करें, समर्थ बनाए।
चेतना कितनी सामर्थ्यवान है? बेटे, चेतना की सामर्थ्य दिखाने के लिए मैं आपको बीस लाख वर्ष पहले ले जाना चाहूंगा जबकि पृथ्वी छोटे-छोटे जंगली जीवों और जानवरों से भरी पड़ी थी ओर इस पृथ्वी पर ऊबड़-खाबड़ गड्ढे जैसे चन्द्रमा पर सब जगह गड्ढे -टीले दीखते है उसी तरह पृथ्वी पर हर जगह गड्ढे -टीले थे। ऊबड़-खाबड़ बड़ी कुरूप पृथ्वी थी ओर उसमें बहुत भयंकर जानवर घूमा करते थे। इसमें बाद में क्या कुछ परिवर्तन हुए। यही आदमी की अक्ल और आदमी की चेतना है जिसने सारी की सारी पृथ्वी को कैसा बना दिया है। फूल जैसे कहीं ताजमहल बने हुए हैं। कहीं पार्क बने हुए हैं हजारों एकड़ जमीन समतल बनी हुई है किसी जमाने में जहां झाड़-झंखाड़ थे अब पता नहीं क्या से क्या हो गया। चंबल जहां डाकुओं के रहने की जगह थी, देखना थोड़े दिनों बाद क्या हो जाता है। बेटे, वहां बगीचे लहलहाते हुए दिखाई पड़ेंगे, कितनी फसलें उगती हुई दिखाई पड़ेगा ओर वहां गांव और शहर बसे हुए दिखाई पड़ेंगे। आदमी की अक्ल आदमी की चेतना की सामर्थ्य का क्या कहना?
प्राणी जब पैदा हुआ था तब आदिमानव के रूप में था बन्दर के रूप में था चेतना ने आवश्यकता समझी कि तुम्हें काम करना चाहिए और हमारे हाथों की अंगुलियां बन्दर की अपेक्षा ये दसों अंगुलियां ऐसी बेहतरीन अंगुलियां बन गयी कि दुनिया में किसी के पास नहीं है जैसी हमारे पास है। ऐसा बेहतरीन हाथ दुनिया में और किसी से पास नहीं है जो यह से भी मुड़ता हो वहां से भी मुड़ता हों। जो हर जगह से मुड़ जाता हो ऐसा किसी जानवर का हाथ नहीं है कही नहीं है। यह सब कैसे हो गया? हमारी इच्छानुसार ने पैदा किया। सारी चीजें पैदा कर दी। सारे के सारे चमत्कार ये चेतना के है, जमीन की सफाई से लेकर सभ्यता, संस्कृति ओर वाहन और वान सब किसका है। ये आदमी की चेतना का चमत्कारी है न तू समझता क्यों नहीं है। चेतना को अगर संवारा जा सकें। चेतना को अगर संजोया जा सकें, तो आदमी क्या हो सकता है? हम नहीं कह सकते कि आदमी ओर भगवान। चेतना का परिष्कार-चेतना का सुधार-इसी का नाम साधना हैं जो चीजें ऊबड़-खाबड़ है, बेतुकी है, उन्हें ठीक तरीके से ठीक बना देने का नाम साधना है।
हमारी अन्तर्चेतना ही वास्तविक देवी है।
साथियों! मैं आपको एक बात बताना चाहूंगा कि मनुष्य - जीवन कैसा ऊबड़-खाबड़, बेधड़, कुसंस्कारी है। हमारी जीवन कैसा संस्कारविहीन, दिशाविहीन, लक्ष्यविहीन, क्रियाविहीन, अनुशासनविहीन ओर अस्त-व्यस्त है। इन चीजों को अगर ठीक तरीं से बना लिया जाए विचारणाओं को अगर ठीक तरीके से बना लिया जाए, भावनाओं को ठीक तरीके से बना लिया जाए, क्रियाशक्ति को ठीक तरीके से बना लिया जाए तो मित्रो! हम कैसे सुंदर हो सकते है? हम कैसे बुघड़ हो सकते है? मैं आपको क्या बताऊंगा, मैं तो एक ही शब्द में कह सकता हूं कि अगर आपने चमत्कार वाली बात सुनी हो लाभ वाली बात सुनी हो वरदान वाली बात सुनी हो आशीर्वाद वाली बात सुनी हो वैभव वाली बात सुनी हो अध्यात्म की महत्ता वाली बात सुनी हों अक्ल की बात सुनी हो, अध्यात्म की कभी कोई गरिमा आपने भी सुनी हो वरदान और आशीर्वाद वाली बात आपने सुनी हो तो समझना कि ये सारी की सारी विशेषताएं जो बताइर्ह जा रही है ये आदमी की अन्तर्चेतना के विकसित स्वरूप की बताई जा रही है। ओर किसी की नहीं बताई जा रही है। देवली की बताई जा रही है तो चलिए देवी क्या हो सकती है यह बताता है कोई देवी नहीं है हमारी अंतःचेतना जब विकसित होती है तो कैसी हो जाती है। ऐसी हो जाती हैं जिसको सिद्धि कहते है जिसको हमको संभालना ओर संजोना आता है इसे जीवन में हम संस्कृति कहते हैं सभ्यता कहते हैं। जीवन में साधना इसी को कहते है नाई क्या करता है? नाई हमारी हजामत बना देता है और हमें ऐसा बना देता है जैसे मूंछें अभी निकली ही नहीं। यह मिरेकिल - जादू है हजामत बनाने वाले का। हमको खूबसूरत करने वाले का दर्जी जो हमारे फटे-पुराने से कपड़े थे उनका कुर्ता बना देता है जाकेट बना देता है अरे बेटे, यह कपड़ा तो वही है ढाई गज जो सबेरे पड़ा हुआ था। अब कैसा सुन्दर बना हुआ है कमाल है यहां भी बटन यहां भी कच्ख यही भी गोट यहां भी बाजू। देख ले ये किसका कमाल है दर्जी का कमाल है अभी कैसा था कपड़ा? मैला-कुचैला उल्टी-सीधी सीमा बंटी हुई थी। नील लग करके आ गई टिनोपाल लग करके आ गया। ये क्या चीज है ये चमत्कार है ये साधना है कपड़े की साधना किसकी है ये धोबी की साधना है मूर्तिकारी की साधना है पत्थर का एक टुकड़ा नाचीज से छैनी और हथोड़े को लेकर में मूर्तिकार जा बैठा और घिसने लगा, ठोकने लगा, घिसने और रगड़ने लक्ष्मी की मूर्ति बन गई कि मालूम नहीं पड़ा कि यह वही पत्थर का टुकड़ा है कि लक्ष्मी जी है बेटे ये क्या है? ये साधना है और क्या है।
साधना अर्थात् अनगढ़ से सुगढ़
अभी आपको में साधना का महत्व बना रहा था ये घटिया वाली जिन्दगी बेकार जिन्दगी पत्थर जैसी जिन्दगी को आप बढ़िया और शानदार बना सकते हैं सोने का एक टुकड़ा ले जाइए साहब। अरे हम क्या करेंगे? कहीं गिर पड़ेगा। अच्छा तो अभी हम आते हैं उसका क्या बना दिया। ये कान का बुन्दा बना दिया। ये अंगूठी बना दी मीना लगी हुई। अरे साहब बहुत सुन्दर बन गया है यह। क्या यह वही टुकड़ा है? हां यह सुनार का कमाल है सुनार की साधना है उसने खाबड़-खूबड़ धातु के टुकड़े को कैसी सुन्दर अंगूठी बना दिया कैसा जेवर बना दिया। कैसा नाक का जेवर बना दिया। कैसा-कैसा जेवर बना दिया ये हमारी जिन्दगी, बेतुकी जिन्दगी -बेसिलसिले की जिन्दगी? बेतुकी जिन्दगी। बेहूदी जिन्दगी को हम जिस तरह से संभाल पाते हैं साधना इसका नाम है असल में साधना इसी का नाम है वह जो हमने अभ्यास कराया था शुरू में कि आपको तमीज सिखाए और तहजीब सिखाए कौन-सी? कल में इसको बताऊंगा कि पालथी मारकर बैठ। अरे तमीज से सीख। कभी ठीक काम करता है कभी अक्ल से काम करता है कभी नहीं करता है कमर ऐसी करके बैठना। हां साहब ऐसे ही करके बैठूंगा। मटक नहीं सीधे बैठ। मचक-मचक करता है जित्रों ये सारे के सारे अनुशासन, सारी डिसीप्लीन यह आज का विषय नहीं है कभी समय मिला तो आपको बताऊंगा कि आपको जो भी साधना के बहिरंग क्रिया-कलाप सिखाते हैं आखिर क्या उद्देश्य है इनका क्रिया का कोई उद्देश्य होना चाहिए। क्यों साहब पालथी मारकर क्यों बैठते हैं पद्मासन में क्यों बैठते हैं हम तो ऐसे ही बैठेंगे, टांग पसार कर नहीं बेटे, टांग पसार कर मत बैठिये। नहीं साहब हम तो टांग लम्बी करेंगे। इसको छोटी करेंगे नहीं बेटे ये भी गलत हैं। नहीं हम तो यूं माला जप करेंगे सिर के नीचे तकिए लगाकर। नहीं बेटे ऐसे मत करना। ये ठीक नहीं है यह क्या है डिसीप्लीन है साधना के माध्यम से हम अपने व्यावहारिक जीवन को किस तरीके से अनुशासित रूप दे सकते हैं कि तरीके से उस ढाल सकते हैं किस तरीके से अपने कर्मों को अपने विचारों को अपनी इच्छाओं को आस्थाओं को परिष्कृत एवं अनुशासनबद्ध कर सकते हैं। क्रमबद्ध कर सकते हैं असल में साधना इसी का नाम है।
स्वर्णकार के तरीके से, कलाकार के तरीके से, गायक के तरीके से और वादक के तरीके से जो अपने को साध लेता है उसको ही सच्चा साधक कहा जाता है उसकी ही सही रागिनी निकलती है सुर निकलता है कैसे निकलता है? बा ऽऽऽ। अरे बेटे ये क्या बोलता है। यूं मत बोल तो फिर कैसे बोलूं तू ऐसे बोल। जैसे कि भैरवी रागिनी गायी जाती है गुरुजी सिखाइए। बेटा तू आ जाता हमारे पास हम तुझे सिखायेंगे सरगम सा रे गा म पा सिखा देंगे। तब तू ऐसे बोलना जैसे कोयल बोलने लगती है अभी तू जैसे च्चा रहा था इसे सुर नहीं कहते बेटे ऐसे फिर मत बोलना सुर को गले को इस तरीके से साथ कि ऐसी मीठी-मीठी आवाज आए कि बस मजा आ जाए और ये धागे और तार जो सितार में बंधे हुए हैं उन्हें हिला। इसे भन-भन-भन है मक्खी के तरीके से बजा इस तार के बाद उसे बजा इसके बाद इसे बजा, फिर देख किस तरीके से इसमें से कैसी-कैसी सुरलहरी निकलती है तरंगें निकल सकती हैं कैसी-कैसी ध्वनि निकल सकती है जिन पर तू थिरकने लगेगा और नाचने लगेगा, तो महाराज यह कैसे बजेगा? बेटे यह एक साधना है किसकी? धागों की तारें की यह किसकी है साधना? गले की। यह है साधना पत्थर की। ये किसकी है साधना? हर चीज की है सोने की साधना मुचा की साधना और जीवन की साधना कि जीवन कैसे जिया जा सकता है जीवन कैसे उद्यमशील बनाया जा सकता है जीवन कैसे देवोपम बनाया जा सकता है, जीवन की अस्त-व्यस्तता का उदारीकरण कैसे किया जा सकता है। जीवन ठीक तरीके से कैसे जिया जा सकता है अगर ठीक तरीके से आप यह जान पाए तो बेटे आप धन्य हो सकते हैं सब कुछ बन सकते हैं। आप बाहर का ख्याल निकाल दीजिए।
सब कुछ अन्दर ही मौजूद है।
अब तक आप सोचते थे कि यह सच आप बाहर से पाएंगे। आपका ख्याल था कि बाहर बहुत सारी चीजें होती है मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप ये सोच अपने मन से निकाल दीजिए। जो चीज बाहर दिखाई पड़ती है वास्तव में वह भीतर से ही आती है बाहर तो इसकी खुशबू बिखरती हुई चली जाती है जैसे -कस्तूरी हिरण की नाभि से होती है परन्तु उसे यह मालूम पड़ता है। कि हवा में से पूरब से वह आती है पश्चिम से आ रही है बेटे, सुगन्ध कही बाहर से नहीं आती, भीतर से निकलती है। भीतर से क्या आती है महक, अच्छा साहब यह बताइए कि शहद, अच्छा साहब यह बताइए कि शहद की मक्खियां जो शहद इकट्ठा करती है वह शहद कहा से आता है, फूल के भीतर से आता है। चलिए हम आपको फूल देते हैं और इसमें से शहद निकाल दीजिए, आप नहीं निकाल सकते, तो इसे अपने केमिस्ट के पास ले जाइए, किसी लैबोरेट्री में ले जाइए और उनसे कहिए कि गुरुजी ने भेजे हैं ये फूल और इसमें से आप शहद निकाल दीजिए। कोई नहीं निकाल सकता है मधुमक्खी में मुंह में जो केमिकल्स होते हैं वे फूल के रस को अपने ढंग से इस तरीके से डाइल्यूट करते है इस तरह से कन्वर्ट करते हैं कि वे सारे के सारे रस शहद बन जाते हैं। इस तरह शहद कहा से आता है? मक्खी के भीतर से आता है नहीं साहब बाहर से आता है फूलों में से। नहीं फूलों में से नहीं आता है मात्र सहायता मिलती है फूलों से। दूध कहा से आता है साहब? गाय का दूध कहा से आता है? घास में से आता है अच्छा आप ले जाइए घास, मैं आपको बीस किलों घास देता है इसमें से निकाल लाइए दूध। अरे। महाराज जी इसमें तो नहीं है इसमें नहीं है तो कहा से आ गया दूध। कही से नहीं आ गया। गाय के भीतर जो केमिकल्स है गाय के भीतर जो पदार्थ वे घास को इस तरीके से कन्वर्ट करते हैं कि वह दूध के रूप में परिणत हो जाते हैं गाय के पेट की जो मशीन है वास्तव में वह गाय के दूध की मशीन है वास्तव में वह गाय के दूध की मशीन है नहीं साहब घास में दूध होता है बिनौले पे दूध होता है खली में दूध होता है नहीं बेटे, न बिनौले में दूध होता है न खली में और नहीं खेली की वजह से गाय ज्यादा दूध पैदा कर लेती है लेकिन असल में जो दूध पैदा करता है वो इसका सिस्टम पैदा करता है बाहर से कुछ नहीं आता नहीं साहब दूध बाहर से आता है नहीं बाहर से नहीं आता। चर्बी कहा से आती है सूअर में? साहब उसको मक्खन खाने को दिया जाता है। सूअर को कौन मक्खन खाने को देगा? सूअर को मक्खन खाते देखा है कोई खिलाता है कोई नहीं खिलाता, कहां से आ जाता है? गंदा मैला होता है उसमें इतनी सारी चर्बी इकट्ठी होती है। चर्बी कहा से आती है अरे बेटा भीतर से पैदा होती है, नहीं साहब कोई बाहद चला जाता है चुपचाप। जब सोए रहते है कोई आता है और छटांक भर घी खिला जाता है सांप में जहर कहा से आता है बता दो जरा। कहा से आता है साहब। सांप मिट्टी खाता है। कीड़े खाता है। मिट्टी में कहा से जहर? नहीं और कीड़े में कहा से जहर? इसमें भी नहीं है जहर। चूहे में भी नहीं है। सांप लाइए कहा से आ गया जहर? उसके भीतर से पैदा होता है।
पेड़ में जो होता है वे धरती और वायुमण्डल में से जल खींच लाता है जहां कही भी पेड़ घने होते हैं वहां वर्षा होती है।पीबिया वालों ने गलती की वहां पेड़ बहुत सारे थे। पेड़ों के ठेकेदार आप और उन्होंने पेड़ों को काटना शुरू कर दिया पेड़ खत्म हो गए। बस बारिश खत्म हो गयी। राष्ट्रसंघ ने अपना पैसा देकर यह कहा कि इतने समृद्ध मुल्क में फिर में पानी बरसना चाहिए और पानी बरसाने के लिए आवश्यक है कि इसने पेड़ लगा लिए जाए। ऐसे पेड़ लगाए जाए पानी का ऐसा इन्तजाम किया जाए कि फिर से उस जमीन पर पेड़ उग आए। वह क्षेत्र हरा भरा बन जाए। रेगिस्तान इसीलिए रेगिस्तान है कि वहां पर पेड़ नहीं है। अगर वहां पेड़ होने लगे पेड़ लगाए जाने लगे तो थोड़े समय बाद सारा रेगिस्तान फिर सवे हरा-भरा हो सकता है पेड़ों में वर्षा को खींचने की ताकत है। वह लोहे को खींचने की ताकत है मैगनेट है। मैग्नेट में खींचने की ताकत है वह लोहे को खींच लेता है धातुएं बनती है तो उसका तरीका यह है कि अपने चुम्बक के जोर से मैगनेट के कोर से जहां-कही सजातीय करा होते हैं जर्रे जर्रे से खींच लेते हैं सोने का जर्रे जहां पड़ा है उसको खींचते चले जायेंगे। इस तरह सोने का जर्रा-जर्रा धीरे-धीरे खिंचता चला जाएगा और उस खदान में शामिल हो जाएगा। धातु की खदान बढ़ती चली जाएगी, बड़ी होती चली जाएगी क्योंकि उसका चुंबकीय मैगनेट अपने सजातियों को खींचता चला जाता है। बेटे लाभ, उन्नति, प्रगति, वैभव, सिद्धियों और चमत्कार ये कुछ भी नहीं है। ये आदमी की विकसित चेतना के आकर्षण हैं मैगनेट हैं अपनी चेतना का विकास कीजिए और पाइये हर चीज को।
अध्यात्म का मर्म है आत्मपरिष्कार
प्रायः यह कहा जाता है कि जब गुरुमिलेगा तो ही सब मिलेगा। नहीं बेटे ऐसे गुरु नहीं मिलेगा। तेरे भीतर की चेतना जाग्रत होगी, तो गुरु आवेगा ओर तेरे पैर चूमेगा, तेरे भीतर की चेतना विकसित नहीं हैं तूने अपने आपको घिनौना बनाकर रखा है। कमीना बनाकर रखा है तो गुरु आएगा भी तो उसकी नाक कट जाएगी और सड़ जाएगी और सड़ी हुई नाक को लेकर के भाग जाएगा, कहेगा कि अरे। बाबा ये कहा से आ गया मैं। किसके पास आ गया। नहीं गुरु के हाथ जोड़ेगा, पैर छुऊंगा। नहीं बेटे। नहीं हो सकता। देवता की शक्ति प्राप्त करने के लिए आपके अन्दर देवत्व विकसित होना चाहिए। भगवान की शक्ति का विकास करने के लिए आपके अन्दर भक्ति का विकास होना चाहिए। मन्त्र की शक्ति का विकास करने के लिए आपके भीतर संयमशीलता का विकास होना चाहिए। अपन
युगनिर्माण परिवार का सृजन किसी दिव्यशक्ति की योजनानुसार इसी निमित्त हुआ है कि उसे युगपरिवर्तन का श्रेय मिले। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण सचमुच हो अपने समय का इतना बड़ा काम है जिसे अवतारी सामर्थ्य ही सम्पन्न कर सकती है इसी सामर्थ्य से सुसम्पन्न नर रत्नों का सुदाय ग की पुकार पूरा करने के लिए आगे आ सकता है भौतिक दृष्टि से स्वल्प साधन होते हुए भी बहुत कुछ कर सकने की आत्मबल के धनी अपने परिजनों की बहुत बड़ी भूमिका हो सकती है। नवसृजन के महान प्रयोजन को पूरा करने के लिए असंख्यों द्वारा असंख्य कार्य किये जाने हैं किन्तु प्रश्न अग्रगमन का है झण्डा हाथ में लिए बिगुल बजाते हुए अग्रगामी जब प्रयास करते है तो पीछे-पीछे महारथी भी अपनी चतुरंगिणी को हांकते हुए मोर्चे पर जूझने के लिए बढ़ते चले जाते हैं युगान्तरकारी प्रस्तुत प्रयत्नों को भी अपने समय का महाभारत ही मानना चाहिए। पांचजन्य बज रहा है गाण्डीव की प्रत्यंचा चढ़ने में भी अब देर नहीं है
इस बार के प्रेरणाप्रद वसन्त पर्व पर जाग्रत आत्माओं को युग आह्वान उतरा है। अपने पूरे देवपरिवार में इस दिव्य अवतरण हल हलचलें दिखाई देने लग है जीवित मृतकों की अथवा वितृष्णा के दलदल में बेतरह फंसे हुए लोगों की बात दूसरी है पर जिनमें प्राण अपने भीतर समुद्रमंथन जैसा कुहराम पाया है। हर प्राणवान की आत्मा ने पूछा कि इस युगपरिवर्तन की महासंक्रांति में उसकी अपनी भी कुछ भूमिका हो सकती है यह नहीं। पिछले दिनों समारोहों में यह समुद्र-मंथन आरम्भ हुआ और वसन्त पर्व पर उसमें तूफानी चक्रवात उभरा। इसी के साथ निष्कर्या का प्राणवान परिजन को युग- परिवर्तन में अपनी भूमिकाएं निभानी होगी। जो नल−नील की तरह सेतुबन्ध बाध सकेंगे हनुमान की तरह पर्व एठा सकेंगे वे वैसा करेंगे जिनसे कुछ भी न बन पड़ेगा उन्हें भी गिलहरी की तरह बालों में समा सकने लायक बालू तो ढोनी ही पड़ेगी परीक्षा की इस घड़ी में अचकचा कर खाकटा सिद्ध होने के लिए कोई भी तैयार नहीं है। पूरे या अधूरे मन या साधना में हम में हर किस को अपनी-अपनी मनःस्थिति और परिस्थितियों के अनुरूप युगपरिवर्तन के महाप्रयोजन के लिए सम्भव न रह जाएगा।
परन्तु हथियारों का प्रयोग करने से पूर्व उनकी धार तेज की जाती हैं विजयादशमी पर्व मनाने के अनेक प्रयोजनों में से एक यह भी था कि योद्धा अपने-अपने हथियारों की धार तेज कर ले टूट-फूट की मरम्मत कर लेने और चलाने की कला यदि अभ्यास से उतर गई हो तो उसे फिर से ठीक कर ले। युगपरिवर्तन में छोटी-बड़ी भूमिका जिन्हें निभानी है वे सभी युगांतरकारी सैनिक ही कहे जाएगी। उनका प्रधान हथियार उनका अपना व्यक्तित्व है यदि उसमें प्रखरता मौजूद होगी तो फिर हाथ में जो भी कार्य लेंगे उन सभी में सफल होंगे। व्यक्तित्वहीनों के लिए युग है रंगमंच पर लड़ाई के पैंतरे बदलना एक बात है और रणभूमि में भवानी को बिजली की तरह चमकाना दूसरी। अभिनेता के रूप में तो वक्ता नेता का कार्य कोई मसखरा भी कर सकता है किन्तु प्रभावोत्पादक परिणाम उत्पन्न कर सम्भव हो सकता है युगपरिवर्तन के लिए एकमात्र साधन उस पुण्य प्रयोजन को हाथ में लेने वाले प्रखर व्यक्तित्व ही हो सकते हैं उत्कट तप के साथ ही जाने वाली साधना इसी निर्माण की प्रयोगशाला है।
भावनाओं के उभार, कुछ कर महत्वपूर्ण है कि जो करना है। उसके लिए उपयुक्त सामर्थ्य और कुशलता प्राप्त कर ली जाए। युगपरिवर्तन में लगें हुए और लगने वालों को अपना व्यक्तित्व इस महान प्रयोजन के उपयुक्त बनाना प्रथम कार्य है कार्य पद्धति कि शिक्षा तो बोझ उठाते-उठाते अनुभव के सहारे भी मिलती रहती है। कौशल की कमी भी पूरी कर लेना भी अत्यन्त सरल हैं महत्व तो व्यक्तित्व का है वही अपंग रहा तो फिर लकड़ी की तलवार के सहारे प्रबल शत्रु से जूझकर विजयश्री वरण करते हुए लौट सकता अत्यन्त कठिन है।
शांतिकुंज में रहकर विशेष साधनासत्रों में सम्मिलित होना या फिर घर में सवा-लाख के चालीस दिवसीय अनुष्ठानों में संलग्न होना ऐसा है जिसे सामयिक ही कह सकते हैं परिवर्तन में महान दायित्वों को निभाते रहकर सदा इस रीति को अपनाए रखना रहकर असंभव है घर में रहकर रोजमर्रा के जीवनक्रम के साथ किस प्रकार साधनाएं चलाया जाता चाहिए इसकी क्रमबद्ध विधि-व्यवस्था बनाकर साधकों को दी जा रही है साथ ही उनके आशा की जाती है कि वे इस विशिष्ट अवधि में ओर भविष्य में भी इसका निष्ठापूर्वक पालन करते रहेंगे।
प्रभा समर्पित जीवन किया जाए। अनासक्त कर्मयोगपरायण गतिविधियां ऐसी हो जिन्हें यज्ञीय जीवन की संज्ञा दी जा सके। यही अध्यात्मपरायण व्यक्तियों की रीति-नीति होती चाहिए। इसमें उपासना के लिए एक घण्टे का समय भी पर्याप्त हैं साधना अहर्निश होनी चाहिए एक क्षण भी साधना अहर्निश होनी चाहिए एक क्षण भी साधना विरत नहीं किया जाना चाहिए। प्रमाद जहां भी जब भी आएगा, शैतान को चढ़ दौड़ने का अवसर मिल जाएगा। चौकीदार थोड़े समय कि लिए सो जाए, तो चोरों को घात लगाने में देर नहीं लगती। हम तनिक भी प्रमाद बरतेंगे, तो मस्तिष्क पर दुर्भावनाओं का और शरीर तो मस्तिष्क पर दुष्प्रवृत्तियों का आक्रमण होते देर नहीं लगेगी। युगपरिवर्तन की अवधि में अपनायी जानें वाली साधना पद्धति इसी तथ्य को ध्यान में रखकर साधकों को दी जा रही है, ताकि वे अध्यात्म एवं युगान्तरकारी गतिविधियों के ध्रुवकेंद्र देवात्मा हिमालय एवं वहां निवास करने वाली विभूतियों से जुड़े रहे और निरंतर हो रहे आसुरी आक्रमणों से सुरक्षित रह सकें। क्रम प्रातः आँख खुलते ही आरम्भ हो जाता है और जब तक नींद नहीं आ जाती तब तक चालू रहता है। इस साधना-प्रक्रिया में सूत्र रूप से सभी साधनाएं समाहित कर दी गई है। जिनके प्रभाव अतिविशिष्ट, रहस्यमय एवं सर्वथा गोपनीय है।
प्रातः आँख खुलने से लेकर बिस्तर छोड़ने तक प्रायः आधा घण्टा लग जाता है आलस्य, सुस्ती, अंगड़ाई और करवट बदलने में इतनी देर तो लग ही जाती है इन उनींदे क्षणों में यह विचरना चाहिए कि आज अपना एक ही दिन के लिए नया जन्म हुआ है। रात्रि होते ही मृत्यु हो जाएगी। ‘हर दिन नया जन्म हर राज नयी मौत ‘ वाला सूत्र साधनात्मक जीवन जीने वालों के लिए स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाने योग्य है आज के दिन का श्रेष्ठतम सदुपयोग कैसे हो सकता है इसका क्रमविभाजन इन्हीं क्षणों में कर लिया जाना चाहिए। स्थूलशरीर (देह), सूक्ष्मशरीर (मन) एवं कारणशरीर (भाव) ये तीन कर्मचारी हमें मिले है। इन्हें क्रिया, विचारणा एवं भावना भी कह सकते है हेय तीनों जब किसी एक काम में पूरे सहयोग और उत्साह के साथ जुटते है तो वह कार्य कर्मयोग की साधना जैसा पुण्य फलदायक बन जाता है उसकी सुन्दरता और सफलता देखते ही बनती है।
हर दिन को जीवन की बहुमूल्य सम्पदा मानकर उसके सदुपयोग की दिनचर्या बिस्तर पर पड़े-पड़े ही इन प्रकार निर्धारित कर दी जानी चाहिए कि उसमें समय की बर्बादी के लिए कही कोई गुंजाइश न रहे। आवश्यकतानुसार बीच-बीच में विश्राम की व्यवस्था भी रखी जा सकती है पर वह भी नियमित और निर्धारित होनी चाहिए उठने से लेकर सोने तक कसा हुआ खिंचा हुआ और उसे टाइम–टेबुल बनाना चाहिए और उसे मुस्तैदी के साथ निबाहा जाना चाहिए शरीर को जो कार्य करना है मन पूरी तरह उसमें तन्मय रहे। हर छोटा-बड़ा काम पूरे मनोयोग से किया जाय। दोनों के सहयोग से जो काम होते हैं उन्हीं में कला कौशल निखरता है उन्हीं का स्तर उत्कृष्ट बनाता है काम ही ईश्वर की पूजा है यदि अपना हर काम सुन्दर-सुव्यवस्थित, सर्वांगपूर्ण और सही हो तो उसे कर्मयोग के स्तर पर ही रखा जाएगा। मन के निग्रह की असली साधना अपने दैनिक कार्यों में समग्र मनोयोग लगाने से ही सम्भव होती हैं उपासना में भी यही अभ्यास काम दे जाता है। यदि हर काम आधे मन से करने की आदत होगी तो फिर पूजा ही तन्मयतापूर्वक कैसे सम्भव होगी।
शयनकक्ष में परमपूज्य गुरुदेव का चित्र रहना चाहिए, क्योंकि वे ही युगपरिवर्तन के सूत्रधार एवं देव-शक्तियों के प्रतिनिधि है दूसरा बड़े साइज का दर्पण रहे। गुरुदेव को उठते ही प्रणाम करना चाहिए और सद्बुद्धि की कर्मनिष्ठा की याचना करनी चाहिए। उसके उपरान्त दर्पण में अपने आपको देखते हुए आत्मचिन्तन, आत्मसमीक्षा की साधना करनी चाहिए। आत्मदेव की सद्गुरु परमात्मा का प्रतिनिधि, उद्धारकर्ता एवं इष्टदेव के रूप में नमन करना चाहिए और आग्रह भरा अनुरोध करना चाहिए कि अपनी गतिविधियों का स्तर ऊंचा उठाए ताकि लक्ष्य की ओर सुख-शान्ति पूर्वक बढ़ चलाना संभव हो सके।
उसके उपरान्त स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होना चाहिए और एक घंटे के लिए नियमित उपासना पर बैठना चाहिए। इस एक घण्टे के तीन भाग किये जा सकते है। (1) पन्द्रह मिनट खेचरीमुद्रा (2) पन्द्रह मिनट-ज्योति अवतरण प्राणयोग (सोऽहम्) साधना (3) आधा घण्टा गायत्री जप-सूर्यार्घ्यदान।
खेचरीमुद्रा में पांच मिनट शरीर को शिथिल करना, पांच मिनट मन को खाली करना और पांच मिनट जिह्वा को तालू में लगाने और सोमरस पान करने का विधान है पहल शरीर को शिथिल करना स्वास्थ्य की दृष्टि से तो उपयोगी है ही साथ ही ध्यान धारणा की पूर्ण भूमिका का पथ भी प्रशस्त हो जाता है मन को खाली करने के लिए नीचे नील आकाश का ध्यान करना पड़ता है और सोचना पड़ता है कि अब कही किसी वस्तु या।व्यक्ति का अस्तित्व नहीं रहा मन को खाली करने के लिए यही ध्यान सबसे अधिक उपयुक्त है इसके उपरान्त खेचरीमुद्रा प्रशस्त हो जाती है जिह्वा उलटना दुनियादारी से भिन्न स्तर की अपनी रीति-नीति अपनाने का संकल्प है उच्चस्तरीय चिन्तन का केन्द्र मस्तिष्क उससे टपकने वाला आनन्द (मानवी उपलब्धियों का सन्तोष) उल्लास (सत्पथ गमन की प्रबल प्रेरणा) भरा सोमरस हमें उपलब्ध होता हैं जीभ उसे प्राप्त कर पाचन−तंत्र में भेजती हैं और वह अमृत रस-रक्त में घुल-मिलकर क्रियापद्धति के रूप में परिणत होता है इन्हीं भावनाओं को प्रखर बनाना खेचरीमुद्रा का सारतत्व हैं आज्ञाचक्र में देवात्मा हिमालय की दिव्य विभूतियों के अनुग्रह के रूप में रो--रोग में समावेश, अंधकार का पलायन, तमसो मा ज्योतिर्गमय की स्थिति यह सब है भ्रूमध्य में प्रकाश का चिन्तन का लक्ष्य। आवश्यकतानुसार देवात्मा हिमालय के हिमशिखरों के मध्य उदय होते सूर्य का चित्र रखा जा सकता है पीछे तो यह ध्यान बिना किन्हीं खास उपकरणों के होने लगता है यह अद्भुत ध्यान है इसके माध्यम से यदि भावनाएं ठीक ढंग से प्रगाढ़ हो जाए तो वहां सूक्ष्म व कारण ऋषिसत्ताओं की प्रत्यक्ष अनुभूति भी सहज सम्भव बन पड़ती है।
सोऽहम् साधना में कुछ समय सास लेते समय ‘सो ओर छोड़ते समय ‘हम्’ की अनुभूति ‘ सो’ के साथ ही युगपरिवर्तन के प्रेरक - प्रवर्तक भगवान महाकाल के महाप्राण का काया के कण -कण और मन की प्रत्येक परत में प्रवेश तथा आधिपत्य की स्थापना। ‘हम ‘ के साथ लोभ मोह भरे अहंकार का पलायन। यही है संक्षेप में सोऽहम् साधना जिसको भावभरा प्रयोग हमें महाकाल के महाप्राणों से जोड़ता है और एक अद्भुत प्रत्यावर्तन प्रक्रिया साकार रूप लेती है।
उपरोक्त दोनों साधनाओं के लिए कुल मिलाकर पन्द्रह मिनट हैं प्रतिदिन करना हो तो दोनों साढ़े सात-सात मिनट की जा सकती है अन्यथा यह तरीका भी अच्छा है कि एक दिन पंद्रह मिनट ज्योति-अवतरण और दूसरे दिन सोऽहम् साधना करते रहा जाए, पन्द्रह मिनट खेचरी मुद्रा, पंद्रह मिनट खेचरी मुद्रा, पन्द्रह मिनट प्रकाश का ध्यान तथा सोऽहम् साधना में लगाने से आधा घण्टा हो जाता है शेष आधा घण्टा गायत्री की पांच मालाएं पूरी करने के लिए है।
गायत्री के पांच मुख माने गए है। यह पांच कोशों के प्रतीक है हर कोश का जागरण करने के लिए एक माला। इस प्रकार पांच मालाओं का जप उचित है। इससे कम में जितना चाहिए उतना शक्ति एद्भव नहीं होता। जप के आध भाग में अपने मलीनताग्रस्त होने के कारण माता की गोद में न पहुंचे सकते का दुर्भाग्य ओर शेष आधे भाग में शुद्ध होने पर उस परमशक्ति का प्यार-दुलार मिलने की यथार्थता हृदयंगम की जानी चाहिए जप के उपरान्त सूर्यार्घ्यदान जल-कलश को सूर्य की दिशा में धार बांधकर छोड़ना और परमतेजस्वी सविता देवता से प्रार्थना करना कि हमारे समर्पित व्यक्तित्व को भी जलधार की तरह स्वीकार करें और उसे वर्षा की अथवा ओंस की बूंदें बनाकर विश्वशान्ति के लिए अनन्त अन्तरिक्ष में बखेर दें।
इसके उपरान्त प्रातःकाल से लेकर सोते समय तक अपने को निर्धारित दिनचर्या में जुटा देना चाहिए शरीर मन ओर भाव कहीं आलस्य प्रमाद अथवा मर्याद व्यतिक्रम तो नहीं कर रहे हैं इसका हर घड़ी ध्यान रखना चाहिए और जहां भी गड़बड़ी दिखाई पड़े तत्काल रोकना, दौकना चाहिए आवश्यक कारण आने पर तो दिनचर्या में हेर-फेर करने ही पड़ते है पर उसमें आलस्य-प्रमाद के कारण व्यतिक्रम नहीं होने देना चाहिए। सन्तोष, मृदुलता और शान्ति के साथ हंसते-मुसकराते हुए अपना क्रिया−कलाप पूरा करना चाहिए क्रोध और खीझ के पतन एवं अनाचार के अवसर आने पर अपने को सँभालने समझाने में कुछ कसर नहीं रखनी चाहिए।
रात्रि में सोते समय बिस्तर पर जाकर दिनभर के कामों का लेखा- जोखा लेना चाहिए और गलतियों के कारणों पर विचार करते हुए अगले दिन उन भूलों के सम्बन्ध में सतर्क रहने की अपने आप को चेतावनी देनी चाहिए सोने से पूर्व तत्वबोध का क्रम आवश्यक रूप से अपनाते हुए सोचना चाहिए कि शरीर आत्मा से पृथक हो गया मरी हुई काया चारपाई पर पड़ी है चारों पाउ चार सम्बन्धी हैं जो उसे जलाने कि लिए ले जा रहे हैं आत्मा दूर खड़ी इस मरण को देख रही है संबंधी व्यक्तियों एवं एवं सम्पत्ति साधनों को छोड़कर जीवात्मा अपने कर्मभोग भोगने के लिए अन्यत्र जा रहा है मित्र-सम्बन्धी अपने मुख मोड़कर अपने धन्धे में लगने जा रही है।
छोटी हुई सम्पत्ति हराम में मिले मुफ्त माल की तरह पीछे वाले लोग गुलछर्रे उड़ो में खर्च कर रहे है। बटवारे के लिए परस्पर एक दूसरे का सिर फोड़ रहे है जिन वस्तुओं और व्यक्तियों को अपना समझा जाता था, वह लोभ और मोह निरर्थक साबित हुआ। मृत्यु ने नंगी सच्चाई सामने रख दी और भ्रांतियों का जाल-जंजाल जाल-जंजाल टूटकर एक ओर बिखर गया। अकेले आना -अकेले जाना ‘ वाला सत्य अक्षरशः साबित हुआ आंखों पर से परदा उठा तो पर तब जब सब कुछ हाथ से निकल गया। इससे पूर्व यदि मृत्युदत्त ज्ञान मिल सका होता तो उपलब्धियों के सदुपयोग की बात सोची जा सकती थी। पर अगले जन्म में कल के जीवन में ऐसा प्रयास करेंगे किसी वस्तु या व्यक्ति पर अधिकार जनाने की अपेक्षा उसके सदुपयोग की ही बात को ध्यान में रखकर सारे क्रिया−कलाप निर्धारित किए जाए।
जब झपकी आने लगे तो नादयोग के अनुरूप भावना करनी चाहिए कि भगवान कृष्णा जिस प्रकार रात्रि की नीरवता में बंशी बजाते थे। और गोपियां चुपचाप अपने घरवालों को छोड़कर रासलीला में निरत होकर दौड़ पड़ती थी। उसी प्रकार परमात्मा के आह्वान पर आत्मा अपने प्रियतम से मिलने दौड़ पड़ती है नादयोग की झंकार रात्रि में झींगुर बजते हैं जुगनू इस सास काते है अपने अन्तःकरण में वही नाद निनाद भव-मान्यता के आधार पर सुना जा सकता है इन भावनाओं के साथ भगवान के साथ लिपटकर सोने के लिए आत्मा को निद्राग्रस्त होकर परमशान्ति लाभ करने के लिए समाधिस्थ हो जाना चाहिए। रात में कभी करवट बदलें नींद खुले तो यही प्रतीत होना चाहिए कि भगवान हमारे साथ हैं हम सर्वथा भगवान में विलीन हो चुके हैं।
उठने से लेकर सोने तक की उपासना एवं साधनामिश्रित क्रियापद्धति के साथ युगसाधकों को वर्ष में दो नवरात्रि साधनाएं तथा सप्ताह में एक दिन गुरुवार का एक समय का अस्वादव्रत एवं रविवार का उपवास अनिवार्य रूप से करना चाहिए। सूर्य तत्व ही युगपरिवर्तन को हलचलें अहर्निश उत्पन्न कर रहा है इस सत्य से सभी दिव्यद्रष्टा एवं सूक्ष्मवेत्ता सहमत हैं युगपरिवर्तन की अवधि के इन वर्षों में सौरचेतना का महत्व असाधारण है गायत्री सूर्य की ही दिव्यचेतना शक्ति है रविवार का साप्ताहिक उपवास इससे अपने आपको एकात्म करने के लिए समर्थ एवं सार्थक उपाय है साधना के इस क्रम को आन्तरिक श्रद्धा एवं गहन निष्ठापूर्वक अपनाने वाले अनुभव करेंगे कि उसकी प्रखर उपलब्धियां विश्वात्मा के चरणों में समर्पित होने के लिए उमड़ी पड़ रही है। उनकी स्फूर्ति प्रतिभा एवं समर्थता फूटी पड़ रही है। यही नहीं अपने समर्थ व्यक्तित्व के बल पर महापरिवर्तन की इस अवधि में वे ऐसा कुछ कर दिखायेंगे जिसे युगों तक याद किया जा सकें।
प्रस्तुत, अंक वसंत की वेला में लिखा गया ‘युगपरिवर्तन विशेषांक’ है। एक तो संधिकाल एवं उस पर भी वसंतोत्सव, तो संधिकाल एवं उस पर भी वसंतोत्सव, जो कि हमारी गुरुसत्ता का आध्यात्मिक जन्मदिवस भी है हम सब के लिए बड़े ही महत्वपूर्ण संदेश के साथ आया है कि करवट लेती इस विदाई वेला में यदि हम चेत गए, संभल गए तो निश्चित ही श्रेय के अधिकारी बनेंगे। यदि चूक गए तो पछताने के अलावा कुछ हाथ नहीं लगेगा। इस अंक को दो बार पढ़ें बार -बार पढ़े ताकि आश्वस्त हो सके कि जो भी कुछ होने जा रहा है इसकी बानगी इतिहास एवं हर क्षेत्र के विशेषज्ञ दे रहे हैं यदि सामूहिक आत्महत्या के बेतालनृत्य का भागीदार बनाना हो तो मूकदर्शक बनने व प्रमाद बरतने के अतिरिक्त ओर किया भी क्या जा सकता है प्रस्तुत समय सव्तुतः आपत्तिकाल जैसा समय है जिसमें सूझबूझ से काम लिया जाना चाहिए एवं बड़ी जागरूकता, तत्परता से समर्पण की भावना के साथ आगामी ढाई से लेकर तीन वर्षों की अपनी जीवनयात्रा का एक-एक क्षण सतर्कतापूर्वक नियोजित किया जाना चाहिए। जिस गुरुसत्ता ने ऋषियुग्म ने अपना सारा जीवन देवसंस्कृति को घर -घर पहुंचाने के निमित्त लगा दिया, समिधा व घूत की तरह इस विराट हवनकुण्ड में जिनने अपने आपको होम कर दिया उनके प्रति यदि हमारे अन्दर थोड़ी थी कृतज्ञता की भावना उनके थोड़ी भी कृतज्ञता की भावना उनके अनुदानों के बदले हो तो हमें एक क्षण भी गंवाए बिना अब लोकसेवा के इस परमपुण्य प्रयोजन प्रज्ञावतार के अवतरण की वेला में सम्पन्न किए जाने वाले ब्राह्मण में स्वयं को खपा देना चाहिए। पेट-प्रजनन, सुविधा बटोरने के समय तो और भी आते रहेंगे, किन्तु आपत्तिकाल की यह घड़ियां बार- बार नहीं आएगी प्रत्येक परिजन को जो युगनिर्माण की प्रक्रिया से अखण्ड-ज्योति के तत्वज्ञान से पाठक, हितैषी परिजन जिस भी रूप में से जुटा है प्रयासपूर्वक मणिमुक्तकों की तरह संग्रह करके एवं अदृश्यसत्ता की इच्छानुसार एवं बहुमूल्य माला की तरह पिरोया गया है उसे युगावतार के गले का हीरकहार बनाना है रावण युग की विकृतियों के समाधान के लिए रीछ−वानरों ने जो भूमिका सम्पादित की है कंस और दुर्योधन के अनाचार को निरस्त करने के लिए पाण्डवों ने जो रीति -नीति अपनायी थी, वही ठीक वही हमें भी करना है। प्रश्न हमारी स्वल्प योग्यता, न्यूनशक्ति का साधनों के अभाव का नहीं महत्व है इस विशिष्ट वेला में भावनाओं के उभरते स्तर का यदि हमें युगकर्तव्यों के प्रति उत्साह हो तो संगठित सत्प्रवृत्तियों के प्रति उत्साह हो तो संगठित सत्प्रवृत्तियों को अंगीकार कर यथाशीघ्र प्रवाह को रो सकते हैं जो इन दिनों विश्वमानव का भविष्य सदा के लिए अन्धकारमय बनाने के लिए द्रुतगति से बढ़ता हुआ चला आ रहा है। महाकाल के प्रस्तुत आह्वान को हर किसी को स्वीकार करना ही श्रेयस्कर है इनकार करने से तो अनार्य, अस्वग्ये अकीर्तिकर वाली नियति को ही प्राप्त होना होगा। पलायन की मोहग्रस्तता की स्थिति में अर्जुन को जो गीता सुनायी गयी थी, आज उसे ही हमारी हृदय तन्त्रिकाओं के हर तार को झंकृत करने का अवसर आया हैं गांडीव एक तरफ पटककर बैठ जाने मुंह फुला लेने, हमसे नहीं पूछा’ ‘हम वरिष्ठ थे। हमें क्यों नहीं श्रेय दिया ऐसी रट लगा लेने पर युग की पुकार से विमुख रहकर जी भी कुछ हम खोयेंगे वह अत्यन्त ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा। किले के अंतिम पड़ाव पर पहुंचने पर यह नियति हर किसी को खलनी चाहिए इसकी कसक की अनुभूति उसे होनी चाहिए।
परमपूज्य गुरुदेव जब शक्तिपीठ उद्घाटन के प्रवास के अन्तिम चरण में थे। तब क्षेत्रों से नित्य के अपने क्रम की तरह परमवंदनीय माता जी एवं मिशन के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के नाम ऐ प्रतिदिन व कभी-कभी दो या तीन चिट्ठियां लिखकर अपना उस समय का चिंतन अंतःवेदना एवं भविष्य की योजनाएं भजा करते थे यह क्रम उनके पूरे प्रवास में चला था किन्तु 1982 के वर्ष के अन्तिम दौरे के क्षणों में बड़े व्यथित हृदय से उन्होंने प्रचारात्मक दौरों-शक्तिपीठ उद्घाटनों की भीड़ की मनःस्थिति का अध्ययन कर लिखा था कि “अब बड़े व्यापक स्तर पर साधनों का निर्माण का समय आ गया है हमारे हृदय के टुकड़ों के समान प्रिय ये कार्यकर्ता जब अपनी साधना को भूलकर लोकसम्मान व यरु अर्जन हेतु मेरे चारों और भीड़ लगाते दीखते है तो मुझे बड़ा क्लेश होता है मैं तो चाहता था कि इन शक्तियों को माध्यम से संगठन का मूल ढांचा खड़ा हो किंतु अब जब संधिवेला की एक घड़ी भारी पड़ रही है तब मैं खिन्नता मन में लिए अपने इस दौरे सके लौटूंगा ताकि कुछ नवीन जो किया जाना चाहिए उस पर तुम सबसे विचार वितश्ज्ञ कर सकूं।” प्रज्ञावतार की सत्ता के मन की वेदना क्यों हो सकती थी आज हर कोई समझ सकता है आते ही परमपूज्य गुरुदेव ने दो सम्पादकीय लिखे-” क्या काफिला बिछड़ा ही जाएगा तथा मलाई को तैरकर ऊपर आने का आमन्त्रण। ये अखण्ड ज्योति की ‘अपनी से अपनी बात ‘ अंतर्गत पृष्ठ 53 से 60 तक के पृष्ठों पर अप्रैल 1982 में प्रकाशित हुए। ये वस्तुतः उनके शब्द नहीं उनके मन की पीड़ा थी महाकाल के स्तर की सत्त की अंतर्वेदना थी, जो उसमें भावों के साथ पिरोकर लिखी गयी थी। इसने अगणित पाठकों को रुलाया अंतर्मंथन हेतु उद्वेलित किया। कार्यकर्त्ताओं में नए प्राण फूंके एवं फिर वह समय आरम्भ हुआ जिसमें पूज्यवर की इच्छानुसार तपःपूत वातावरण विनिर्मित होने के साथ -साथ साधना अवधि में संकेत भी सभी को मिलने लगें। इसके कुछ ही माहों बाद तो पूज्यवर की सूक्ष्मीकरण- साधना आरम्भ हो गयी है। उपरोक्त प्रसंग आज की वेला में यही सोच कर दिया गया कि कही वही अवसाद मतिभ्रम-आत्मसम्मोहन हम सभी के ऊपर हावी तो नहीं हो रहा जिसने गुरुसत्ता को व्यथित किया जाता है। व समझ में नहीं आता यह समय पराक्रम और पौरुष का है शौर्य और साहस का है इस विषम वेला में युग के अर्जुन के हाथों में गाण्डीव क्यों छूटे जा रहे हैं उनके मुख क्यों सूख रहे हैं पसीने क्यों झर रहे हैं। सान्तवाद क्या कथा-गाथा जैसा कोई विनोद-मनोरंजन है जिसकी यथार्थता परखी जाने का कोई अवसर ही न आये। “ यह चर्चा यहां इसलिए करनी पड़ी है कि किसी महान प्रयोजन के लिए लम्बी यात्रा पर निकले काफिले के सदस्यों में भटकाव आ गया है उसके कारण और निवारण का समाधान वे स्वयं खोज सके। वरिष्ठों, विशिष्टों, विशेषज्ञों के काफिले को बचकानी हरकतें करते यदि युगऋषि ने देखा व वैसा कुछ लिखकर अपनी अन्तर्वेदना व्यक्त की तो इसे अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने लिखा वरिष्ठ गिरेंगे तो फिर बचेगा क्या? सूरज डूबेगा तो सघन तमिस्रा के अतिरिक्त ओर कही कुछ रहेगा क्या।
आज भी प्रतिभाओं का आह्वान पुनः कचोटते हुए शब्दों को दुहरा का फिर से किया जा रहा हैं ताकि वे युगपरिवर्तन के इस अन्धड़ जैसे प्रवाह की गम्भीरता को समझ सके। वस्तुतः इस आपातकाल में हम सभी को वही करना होगा जो हमारी अंतर्गरिमा के अनुरूप हमारी अंतरात्मा हमें पुकार पुकार कर करने को कहती है अभी तो प्रतिकूलताएं और आनी है विभीषिकाओं का घटाटोप और गहराना है फिर अभी से हाथ खड़े करके कह देना कि हमसे अब नहीं होता अपनी अवमानना के साथ-साथ समय के साथ बेईमानी करने का है मंजिल समीप आ पहुंची सतयुग की लाली के प्रारम्भिक चिह्न दिखाई देने लगे। है मात्र थोड़ी संघर्ष की अवधि सामने है इसे भी अपने साधना पराक्रम के साथ - साथ दैवी इच्छा के अनुरूप को ढालकर पार कर लिया जाए तो फिर जीत ही जीत है यह भाव रखा जाना चाहिए।
प्रस्तुत पंक्तियां वसंत की पूर्वबेला में लिखी जा रही है जिस किसी को भी पूज्यवर की कसक के साथ अपनी भागीदारी करनी हो, उसके लिए यह अंतिम अवसर है। इस अंक में दिए गए साधना पुरुषार्थ में संलग्न हो अब प्रत्येक परिजन को अपनी तैयारी युगसैनिक के में कर लेनी चाहिए ताकि युगसंधि महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति तक वे निर्धारित कर सके। कि उन्हें अब किस रूप में युग के इस महाअभियान में स्वयं को नियोजित करना है इस वर्ष संस्कार महोत्सवों की श्रृंखला चली सभी ओर पर्याप्त उत्साह उमड़ा किन्तु जिस साधना पुरुषार्थ की साथ-साथ अपेक्षा थी। वह प्रचुर परिमाण में उभर कर नहीं आया। यदि कहीं अन्यमनस्कता की पारस्परिक अंतर्कलह या विवाद की स्थिति अंतर्कलह या विवाद की स्थिति आयी है तो उसका कारण एह ही है कार्यकर्ता की साध के रूप में तैयारी में कुछ कमी है इस वर्या चुनाव के बाद के आयोजनों की तो तैयारियों हो चुकी “यथानाम तथा” संकल्पमहोत्सव विराट रूप में सभी और सम्पन्न हो भी जाएगी क्योंकि यह कार्य महाकाल की सूक्ष्मचेतना करा रही है किन्तु भीड़ एकत्र करना, मजमा लगाना मात्र कर्म काण्ड करना हमारा उद्देश्य नहीं है न कभी था हमारा उद्देश्य तो ज्ञानयज्ञ है विचारक्रांति है हस युगप्रवर्तक है एवं प्रज्ञावतार की सत्ता के अंशधर है हमारा पुरुषार्थ अब उसी स्तर का होना चाहिए। यही सब सोचकर अब अधिकाधिक परिजनों को शांतिकुंज विशिष्ट संधिकाल के ऊर्जा संचार सत्रों के लिए आमंत्रित किया जा रहा है इसके साथ-साथ क्षेत्रीय स्तर पर तीन प्रकार के कार्यक्रम दिए जा रहे हैं जो साथ-साथ भी चल सकते है उवं अलग-अलग अवधि में भी पहला प्रज्ञापुराण के पांच अथवा सात दिवसीय आयोजनों को नौकुण्डीय या चौबीसकुण्डीय यज्ञ के साथ समापन-उसी में संस्कारों को प्रतिदिन सम्पन्न कराते चलना। दूसरा प्रबुद्ध वर्ग की गोष्ठियां मल्टीमीडिया प्रोजेक्टर्स स्लाइड प्रोजेक्ट्स के माध्यम से। तीसरा युवा छात्र -छात्राओं तथा जन- सामान्य के लिए योग प्रशिक्षण के दा या तीन दिवसीय सत्र इन तीनों ही आयोजनों में श्रद्धा संवर्ग की समयदान योजन प्रधान (ख) साधना संवर्ग की गायत्री साधना यज्ञ संस्कार देवस्थापना आदि की फलश्रुति प्रधान (ग) पर्यावरण वनौषधि संवर्ग को तत्सम्बन्धी विस्तारपरक तथा (घ) सद्ज्ञान संवर्ग की विद्या−विस्तार साहित्य स्थापना प्रधान प्रदर्शनियां भी यहां से भेजे जाने की व्यवस्था बनायी जा रही हैं प्रस्तुत आयोजनों की श्रृंखला गुरुपूर्णिमा 1998 के बाद आरम्भ होगी किन्तु कार्यकर्ताओं के संगठनपरक अनुयाज दौरे जो केंद्र के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं द्वारा संपन्न होंगे- मार्च में चुनाव के बाद से ही आरम्भ हो जायेंगे।
छोटे -मोटे कार्यक्रम तो क्षेत्रीय स्तर पर 5-5 की टोलियां कराती चलेंगी केंद्रीय कार्यकर्ताओं के लिए अभी से डेढ़ सौ कार्यकर्ताओं के लिए अभी प्रशिक्षण तुरन्त आरंभ किया जा रहा है कार्यक्रम की मांग स्वीकृति का अब तक का जो स्वरूप रहा है उसे भी प्रारूप बनाया गया है जिसे केंद्र से मंगाकर भरकर सभी कार्यकर्ता को सहमति से भेजने के बाद अनुमोदन मिलने पर ही बड़ी तैयारी किसी को करनी चाहिए।
अनुरोध
महाकाल की वसन्त पूर्व पर अवतरित योजना को ही युगपरिवर्तन विशेषांक में दिया गया है।
सभी पाठक इसे दो बार अवश्य पढ़े ओर कम से कम 10 व्यक्तियों को पढ़ाने का दायित्व ले जो सामग्री कलेवर बढ़ जाने के कारण इस विशेष में नहीं जा पायी है उसे मार्च के अंक में सभी पढ़ सकेंगे।
यह पारसमगध घर-घर में स्थापित होनी चाहिए
परमपूज्य गुरुदेव का अस्सी वर्ष जितनी उपलब्धियों से भरा पूरा है उतना ही वह अध्यात्म पथ के पंथियों के लिए सतत् मार्गदर्शन देने वाला एक सथत जीवन दर्शन भी हण् बहुआयामी जीवन तीने ली हमारी गुम्सना ने अपने इस जीवनकाल में अपने वजन से भी पांच गुना अधिक साहित्य अपने हाथों लिख्, हो नहीं विचार किंतु बीज जन जन में आरोपित कर एक युगपरिवर्तन का प्रचण्ड आती है। को जन्म भी दिया है। आज उज्ज्वल भविष्य की किरण यदि हर किमसी को चारों ओ छाएण् क्हासे के बीच दिखाई देती है तो उसके मूल में वह क्रांतिधर्मी चिन्तन है जो विचार बीज के रूप में समाज को विश्व ही हर समस्याओं के समाधान के रूप में परमपूज्य गुरुदेव लिखकर ‘अखण्ड-ज्योति पत्रिका उसी प्राणचेतना का कलेवर है क्रान्ति की संदेशवाहिका है एवं पूज्यवर के विचारों का प्रतिबिम्ब है। पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय आज से प्रायः सवा दो वर्ष पूर्व आंवलखेड़ा की प्रािम पूर्णाहुति पर पहली बार 24 खण्डों के रूप में सबके समक्ष आया था इसके शेष बीस खण्ड कुछ माही बाद एवं पहले घोषित सत्तर विरात 3 माह में जन-जन पहुंच चुके है कुल 108 में से आगे के अड़तीस खण्डों का संपादन चल रहा हैं एवं संभावना है कि युग संधि की महापूर्णाहुति के साधनावर्ष के साथ-साथ में सब भी प्रकाशित हो जायेंगे जिस खण्ड ज्योति संस्थान घीयामंडी मथुरा के पते पर पत्र लिखकर मागा सकते है।
निश्चित ही जिस खण्ड की सर्वाधिक प्रतीक्षा चल रही थी। सभी को उत्सुकता उसके विषय में भी उसे लिखना सम्पादित करना सम्पादन मण्डल के लिए कितना कठिन रहा होगा यह अनुमान सभी लगा सकते है इस खण्ड में मूलतः परमपूज्य गुरुदेव, परमवंदनीय माताजी एवं युगनिर्माण योजना, गायत्री परिवार की समग्र जीवनयात्रा दी गई है इसके अतिरिक्त उनसे जुड़ें चमत्कारी घटनाक्रमों का विवरण विस्तार से दिया गया है समय-समय पर उनके द्वारा लिखों गयी -अपनी से अपनी बात ‘ जो संपादकीय के रूप में अखण्ड- ज्योति में प्रकाशित होती है जिसने अगणित व्यक्तियों को रुलाया हैं उनके मर्म को स्पर्श कर उन्हें पूज्यवर का अपना आत्मीय सम्बन्धी से भी बढ़कर बना दिया है उसकी झलक भी इस खण्ड में दो गयी है इस खंड सर्वांगपूर्ण रूप में जान या समझ नहीं सकता।प्रज्ञावतार के क्रिया−कलाप मानवी रूप में किस तरह कब-कब क्या मोड़ लेते हैं उनका चिन्तन- कृत्व किस तरह औरों के निमित्त नियोजित होता है इसे पढ़कर समझकर भी वाङ्मय को सही अर्थों में आत्मसात कर पाएंगे इस खण्ड में इतना ही नहीं पूज्यवर के बारे में पूज्यवर की कलम से एवं उनके समीप रहे वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की कलम से अनुभव सत्य पहली बार सबके समक्ष एक ही कलेवर में बंधकर आ रहे है इतना ही नहीं इस खण्ड के उत्तरार्द्ध के विराट वाङ्मय के किस खण्ड में क्या-क्या हैं इसकी एक संक्षिप्त में क्या क्या है इसकी एक संक्षिप्त सिनाश्रु भी दी गयी है। इस प्रकार एक ही स्थान पर परमपूज्य गुरुदेव परम वंदनीय माताजी के विषय में तथा उनके बहुमुखी क्रिया−कलाप के समग्र वाङ्मय के स्वम्प को इन प्रीपीडिया विश्व को किया सकता है
1008 थीसिस लिख दो जाए तो भी हा परमपूज्य गुरुदेव के सम्पूर्ण जीवन को समेट नहीं सकते फिर भी एक अकिंचन प्रयास जो बन पड़ा हैं वह इस प्रािम खण्ड के रूप में ‘युगद्रष्टा का जीवन -दर्शन - नाम से प्रस्तुत है निश्चित ही इसे पढ़ने वाले पाठक पूरे वाङ्मय का रसास्वादन कर सकने में सफल हो सकेंगे। समुद्र नमकीन पानी से भरा है यह जानने के लिए बीज में विराट वृक्ष ढाकी देचा जी ताजी है एवं गुणसूत्रों में काया के समग्र स्वरूप का दिग्दर्शन किया जा सकता है ठीक इसी प्रकार युगद्रष्टा का जीवन दर्शन पढ़कर समग्र वाङ्मय की झलक देखी जा सकती है फिर अपनी रुचि अनुसार जो पसन्द हो वे खंड लेकर अपना पुस्तकालय क्रमशः सर्वांगपूर्ण बनाया जा सकता है।
प्रस्तुत प्रािम खंड में जो अध्याय दिए गए है वे इस प्रकार है जीवन संबंधी चार आत्मनिवेदन जो गुरुमाता की लेखनी से लिख गये हैं एक बीज जो गलकर वटवृक्ष बना साधकों डायरी के कुछ पृष्ठ विदाई की घड़ियां गुरुसत्ता की व्यथा वेदना गुरुवर की सूक्ष्मीकरण साधना वसीयत और विरासत बहुआयामी व्यक्तित्व के भी हमारे गुरुदेव लीला प्रसंग मातँलीलामुत देवदूत आया हम पहचान सकें जीवन
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय
वाङ्मय के सत्तर खण्ड उपलब्ध है उक क्रमशः प्रेषण कीव् यवथाबाई जा रही है पाठकों को मार्च 18 के अनं तक प्राप्त होने की आशा है
क स्मुद प्रेरक प्रसंग युगव्यास की जेखी ओर यह विराट बाइमस किस खण्ड में है तथा समग्र साहित्य लिखी गयी पुस्तकों की सूची के अतिरिक्त वाङ्मय के शेष प्रकाशित होने वाले खण्डों में क्या रहेगा यह सब हम इसमें परिशिष्ट में दिया गया है आशा ही नहीं विश्वास भी है कि वासंतीवेला में प्रस्तुत किए जा रहे इस खण्ड को सभी अपने पास रखने का इच्छा रखते हुए तुरंत इसे मंगायेंगे साथ ही औरों को सस्थाई की भेदवमप उपकार आदि कम में देने के लिए भी अतिरिक्त के रूप में अपने पास रखेंगे। वाङ्मय रूपी पारसमणि जहाँ रहेगी, वहाँ नन्दन-कानून निश्चय ही बनकर रहेगा, यह विश्वास सभी के मन में पक्का जम जाना चाहिए।
*समाप्त*