सत्यकार्य के प्रति समर्पण ही तुम्हें धरती की आत्मा को रफ्तार के साथ चल सकने की सामर्थ्य देता है। निठल्ला होना तो मौसम की बहारों के लिए अजनबी बन जाना है और जीवन की उस शोभायात्रा से अलग-थलग हो जाना है, जो अनन्त को शानदार समर्पण करती हुई अपने समूचे ऐश्वर्य एवं आन-बान के साथ निकल रही है।
कार्य करते हुए तुम वह बांसुरी बन जाते हो, जिसके हृदय से समय की साँस गुजरती है और संगीत में बदल जाती है। आखिर तुम में से कौन है, जो गूँगी और खामोश नरकुल बने रहना चाहेगा, उस वक्त, जब सारा संसार एक ही बाँसुरी के स्वरों में शामिल हो रहा है? तुमसे हमेशा कहा गया है? कि कर्म एक अभिशाप है और श्रम है दुर्भाग्य। किन्तु मैं तुमसे कहना हूँ कि जब तुम कर्म करते हो, तब तुम धरती के प्राचीनतम स्वप्न के एक अंक को पूरा करते हो, जिसका दायित्व तुम्हें तभी सौंपा गया, जब वह स्वप्न जन्मा था। सत्कर्म में डूबे रहना ही सही अर्थों में जिन्दगी से प्यार करते रहना है। जिन्दगी को कर्म के माध्यम से प्यार करना ही उसके अन्तरंग रहस्यों को बारीकी से जान लेना है, किन्तु यदि तुम अपने कष्टों से घबराकर यह कहने लगे कि तुम्हारा जन्म एक विपत्ति है और हाड़-माँस की बनी काया का पोषण तुम्हारे माथे पर लिखा हुआ अभिशाप है, तो मेरा उत्तर यही है कि तुम्हारे माथे के पसीने के अलावा और कुछ नहीं है, उस लिखे हुए अभिशाप को धो सके। तुमसे यह भी कहा गया होगा कि जीवन अंधकारमय है। मैं भी कहना कि जीवन सचमुच अंधकारमय है, यदि आकाँक्षा न हो। सारी आकांक्षायें अन्धी हैं। यदि ज्ञान न हो। सारा कर्म खोखला है, दि प्रभु-प्रेम न हो। जब तुम प्रभु-प्रेम से प्रेरित होकर कर्म करते हो, तब तुम विश्व- मानवता के लिए स्वयं को अर्पित करते हो, क्योंकि विश्वात्मा का साकार रूप ही तो यह विश्व है। प्रभु प्रेम से प्रेरित कर्म क्या होता है? यह अपने हृदय से खींचकर काते गए सूत से कपड़ा बुनना है, मानो स्वयं प्रभु ही पहनने वाले हो उसे। यह इतने प्यार से भवन निर्माण करना है, मानो सर्वेश्वर स्वयं ही रहने वाले हों वहाँ। यह इतनी कोमलता से बीज बोना और इतने आनन्दित होकर फलों का संचय करना है। मानो स्वयं प्रभु ही खाने वाले हों वे फल। यह अपने हाथों किये गये प्रत्येक कर्म को अपनी दिव्यता की ऊर्जा से भर देना है और ऐसा महसूस करना है, मानो समस्त निर्जीव सत्ताएँ तुम्हारे आस-पास खड़ी तुम्हारे कर्मों को निहार रही हों। पवन जो संवाद शाह बलूत से करता है, वह उसकी अपेक्षा अधिक मीठा नहीं हो सकता, जो वह घास के तिनकों से करता है। केवल वहीं व्यक्ति महान है जो अपने कर्म से पवन के स्वरों को एक गीत में बदल देता है और अपने भगवतम से उस गीत की मिठास को प्रगाढ़ कर देता है। प्रभु को दृष्टिगोचर बना देना ही सत्कर्म है।
नववर्ष का आगमन कालचक्र की शाश्वत गति का प्रमाण है। काल का चक्र अपनी शाश्वत गति से घूमता रहता है। इसकी परिधि में दिवस-रात्रि, सप्ताह एवं महीनों का आना-जाना चलता रहता है। इसी क्रम में वर्ष का अवसान व नववर्ष का आगमन होता है। पुराना वर्ष अपने 364 दिन के पंखों को धीरे-धीरे समेटता हुआ, कुछ खट्टे-मीठे अनुभव देकर चलता जाता है और प्रस्तुत होता है नया वर्ष जो अपने साथ नयी आशा-उमंग एवं खुशियों की लहर आता है। इसके स्वागत के लिए हर व्यक्ति बेताब रहता है। विश्व के सभी देशों के नागरिक अपनी अपनी संस्कृति एवं परम्परा के मुताबिक इसका स्वागत करते हैं। सबके अपने-अपने विचित्र, अनोखे व दिलचस्प रंग-ढंग होते हैं।
जापान में नववर्ष को खुशियों के त्योहार के रूप में बनाया जाता है। लोग तरह तर के व्यंजन बनाते हैं। और घरों को बाँस व चीड़ की लकड़ियों से सजाते हैं। परम्परागत पोशाकें पहनकर लोग व्यंजनों का आनन्द लेते हैं व एक-दूसरे को यादगार तोहफे भेंट करते हैं। यह उत्सव पाँच दिन तक चलता है। सुबह ही लोग नदियों व कुओं से स्वच्छ जल लाकर चावल का व्यंजन बनाते हैं और उसका कमल की जड़ के साथ सेवन करते हैं। उनकी मान्यता है। कि ऐसा करने से व्यक्ति के आयुष्य में वृद्धि होती है। यहाँ के लोग घर को सजाने में प्रयुक्त बाँस को दृढ़ता तथा सच्चरित्रता और चीड़ को जीवन का प्रतीक मानते हैं। एक मजेदार बात जापान के संदर्भ में यह है कि नववर्ष में यहाँ डाकियों की बन आती है, क्योंकि यहाँ डाकिये को कुछ देकर ही उपहार के पार्सल लेने की परम्परा है।
बर्मा में नववर्ष का उत्सव तीन दिन तक मनाया जाता है। इसे तिजान के नाम से जाना जाता है। इस दिन वहाँ लोग बुद्ध भगवान की प्रतिमा पर सुगन्धित जल का वर्षण कर विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। इसके बाद मिठाई बाँटकर खुशी व्यक्त करते हैं। चीन में इस दिन रात्रि भर जागरण होता है व खूब आतिशबाजी की जाती है दूसरे दिन सभी को पकवान खिलाए जाते हैं। यहाँ की ताए जाति के लोग नववर्ष को पाँच दिन तक मनाते हैं। सर्वप्रथम भगवान बुद्ध की वन्दना-अर्चना की जाती है। उसके बाद एक दूसरे पर होली की तरह सादा जल डाला जाता है। जिसे लोग ‘छपाका’ कहते हैं। यह मान्यता है कि छपाका मनुष्य को स्वस्थ रखता है। दक्षिण अफ्रीका में नये वर्ष का उत्सव विचित्र ढंग से मनाया जाता है। यहाँ की परम्परा के अनुसार नवविवाहितों को इस दिन खूँखार साँड़ से लड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है। जिसे नवविवाहित पति-पत्नी मार कर अपने इष्टदेव को चढ़ाते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से रोगमुक्ति का लाभ होता है। ईरान में लोग बड़े रोचक ढंग से नववर्ष का स्वागत करते हैं। यह अलग बात है कि उनका यह स्वागत समारोह 21 मार्च को होता है। उत्सव से 14 दिन पूर्व गेहूँ व जौ के बीच बोए जाते हैं और उन्हें अंकुरित होने दिया जाता है। परम्परा के अनुरूप, नववर्ष दिन इनको प्याली में डालते हैं। ऐसा करना शुभ माना जाता है।
मलेशिया, चिली, थाईलैण्ड, सुमात्रा आदि देशों में नागरिक अपने-अपने देवी देवताओं का पूजन करते हैं। तथा सुख समृद्धि की कामना करते हैं। महिलाएँ सुहाग की प्रतीक वस्तुओं का आदान-प्रदान कर सुख-समृद्धि का कामनाएँ करती हैं। स्पेन में इस दिन रात्रि के 12 बजे के बाद एक दर्जन ताजे अंगूर खाने की परम्परा है। उनकी मान्यता है कि ऐसा करने से वे सालभर स्वस्थ रहते हैं।
नववर्ष के अवसर पर इटली के लोग चितकबरी, खूबसूरत, आकर्षक पोशाकें पहनकर खुशियाँ मानते हैं और एक-दूसरे को बधाइयाँ देते हैं। पोप की राजधानी वेटिकन सिटी में इस अवसर पर अनेक धार्मिक कार्यक्रम होते हैं। धर्मगुरु पोप नए वर्ष के प्रारम्भ होने की प्रार्थना के साथ विश्वशान्ति का संदेश देते हैं। यूगोस्लाविया में नए वर्ष का जश्न अपने ढंग से मनाया जाता है। यहाँ नाच-गाने हंगामे के साथ दिवाली की तरह खूब पटाखे व आतिशबाजी की जाती है, जिसमें बच्चे के साथ बड़े बूढ़े सभी भाग लेते हैं। किसान विचित्र ढंग से इसे मनाते हैं। वे सुअर की पूँछ पकड़ कर घर के प्रत्येक सदस्य को छुआते हैं। उनकी मान्यता कि इससे घर में सुख- शान्ति आती हैं। जर्मनी में नए वर्ष को मनाने के अनुसार प्रत्येक पिता अपनी पुत्रियों को एक हजार पिन या इसके बराबर कीमत के उपहार भेंट करता है। इसी कारण इस त्योहार को ‘पिनपिनी’ नाम से जाना जाता है। इसे वे सुख-समृद्धि एवं सौभाग्य का सूचक मानते हैं। ब्रिटेन में नया वर्ष पारम्परिक एवं सामाजिक तौर-तरीकों से मनाया जाता है। ब्रिटिश लोग इस मौके पर खूब जश्न मनाते हैं और हर ओर लोग केक-पेस्टी एवं शराब में डूबे दिखाई देते हैं। मस्ती में लोग अपने-अपने साि के साथ नाचते हैं। इस दिन लंदन का ट्रेफलगर स्क्वायर खुशी से शोर मचाते लोगों से भर जाता है। विचित्र बात यह है कि यहाँ परिवार का मुखिया अपने हाथ में बड़ा-सा टेबल सजाकर, उस पर गर्म पेय से भरा एक कटोरा रखता है, जिसमें से प्रत्येक सदस्य एक-एक चम्मच लेकर मुंह में डालते हैं। ऐसा करना वे स्वास्थ्य एवं समृद्धि के लिए शुभ मानते हैं।
रोम उपहार बाँटने परंपरा है। इस दिन यहाँ आतिशबाजी के धमाकों से आकाश गूँज उठता है। स्कॉटलैंड में नववर्ष के प्रथम दिवस को लोग ‘डेसले डे ‘ कहते हैं। 31 दिसम्बर की रात को लोग अपने घरों के कमरों में परिवार सहित एकत्रित हो जाते हैं और आने वाले पहले मेहमान की प्रतीक्षा करते हैं। उस मेहमान के आते ही सभी उसके स्वागत-सत्कार में जुट जाते हैं। ये लोग प्रथम मेहमान को स्वास्थ्य, सुख एवं समृद्धि का सूचक मानते हैं। इस तरह नए वर्ष का स्वागत विश्व के हर काने में अपने-अपने ढंग से होता है। नए साल के आने की खुशी में, मनुष्य समुदाय में आशा-उमंग एवं उत्साह का भाव जाग्रत होना स्वाभाविक है। इसकी अभिव्यक्ति सभी अपने-अपने ढंग से अपनी-अपनी परम्पराओं एवं प्रथाओं के अनुरूप करते हैं। सभी देशों एवं सभी सामाजिक परम्पराओं में भारत एवं भारतीयता है। परंपरा के अनुसार, भारतीय नववर्ष का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। भारतीय यह उत्सव नौ दिनों तक नवरात्रि के रूप में उपासना-समारोह करके मानते रहे हैं। पाश्चात्य अंधानुकरण शैली ने आज के दौर में प्राचीनता के गौरव को विस्मृत- सा दिया गया है। 31 दिसम्बर की रात्रि को यह विस्मृति अपने चरम तक जा पहुँचती है। इस अवसर को भारतीय परंपराओं के नवोन्मेष के रूप यदि मनाया जाने लगे, तो यह नववर्ष के उल्लास की सार्थक अभिव्यक्ति होगी।
वर्ष 1998 का आगमन भारतीय इतिहास में कोई नए वैशिष्ट्य जोड़ने के लिए हुआ है। इनमें से सर्वप्रमुख है, पुण्यभूमि हरिद्वार में गंगातट पर इसी वर्ष की बसन्त पंचमी से शताब्दी एवं सहस्राब्दी के अन्तिम महाकुम्भपर्व का आयोजन। आध्यात्मिक चेतना से जुड़ा यह महापर्व अपने देश की सामाजिक, सांस्कृतिक अवधारणाओं का मूर्त रूप है। यह प्राचीनतम लोकपर्व राष्ट्र के समन्वयात्मक साँस्कृतिक जीवन का व्यावहारिक आधार है। इस पर्व से राष्ट्रीयता का भाव सुदृढ़ होता है। अमृतपर्व कुम्भ वसुधैव कुटुम्बकम् के विचारपक्ष के अग्रसर करता हुआ आत्मवत् सर्वभूतेषु में तदाकार हो जाता है। चिरपुरातन से ही इसकी गौरव-गरिमा अक्षुण्य है। इसकी ठीक-ठीक शुरुआत का अनुमान लगाना कठिन है। आर्षसाहित्य के मर्मज्ञों एवं इतिहास विशेषज्ञों के इस विषय पर अलग-अलग मत है। श्रीमद्भागवत पुराण के सागर मन्थन प्रसंग में कुम्भ का उल्लेख मिलता है। इस विवरण के अनुसार सागर के चौदह रत्न निकले। ये थे-कालकूट विष, कामधेनु, कल्पवृक्ष, कौस्तुभमणि, उच्चैः श्रवा अश्व, ऐरावत गज, रम्भा अप्सरा, सुरा लक्ष्मी, चन्द्रमा, शार्गंधनुष, धन्वन्तरि, पाँचजन्य शंख एवं अमृत कुम्भ। जनकल्याणार्थ भगवान सदाशिव कालकूट स्वयं पी गये। विश्वमोहनी बने भगवान विष्णु ने अमृत देवताओं को पिला दिया। हालाँकि यहाँ पुराणों में मतान्तर मिलता है। वामन पुराण के विवरण के अनुसार, आचार्य बृहस्पति का संकेत पाकर इन्द्र का पुत्र जयन्त अमृत कुंभी लेकर भाग गया। मोहान्ध दैत्यगणों ने उसका पीछा किया। फिर लगातार बारह वर्षों तक दैत्यों और देवताओं के बीच घनघोर युद्ध चला। युद्ध के समय जयन्त के हाथों पकड़े अमृतकुम्भ से त्रिलोक के बारह स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरी थीं। इनमें से आठ स्थान देवलोक और चार स्थान पृथ्वीलोक में अवस्थित हैं। पृथ्वी के ये चार स्थान हैं। हरिद्वार, प्रयाग उज्जैन और नासिक। पुराणों में वर्णित एक अन्य कथा के अनुसार, पक्षिराज गरुड़ अपनी माता विनिता को सर्पों की माता कद्रू की कैद से छुड़ाने के लिए शर्त के अनुसार स्वर्ग से अमृतकुम्भ लाए थे। उन्होंने सर्पों को अमृतकुम्भ सौंपकर अपनी माता को मुक्ता कराया, परन्तु सर्प इसे पी पाएँ इन्द्र इसके पहले ही वापस ले गये। इसी समय कुम्भ से अमृत की चार बूंदें पृथ्वी के चार स्थानों पर गिर गयीं। कालान्तर में इन्हीं चार स्थानों को कुम्भ पर्व के आयोजन के लिए पवित्र माना गया। वायु पुराण और नारदीय पुराण में सरस्वती नदी के तट पर स्थित कुम्भ और श्री कुंभ तीर्थ का वर्णन किया गया। वेदों की कई ऋचाओं में कुम्भ, घट एवं कलश के संदर्भ में अनेकों आख्यान मिलते हैं। ऋग्वेद और अथर्ववेद में घृत और मधुपूरित कुम्भ का उल्लेख मिलता है। कालिदास ने ‘काँचन कुम्भ तीर्थ’ कहकर कुम्भपर्व की प्राचीनता एवं महत्ता प्रतिपादित की है।
अथर्ववेद के एक मन्त्र में कुम्भ के गुह्य अर्थ का प्रतिवादन हुआ है-
पूर्णः कुम्भोधि काल आहितस्तं वै पश्यामों बहुधा नु सन्तः। स इमा विश्वा भुवनानि प्रत्यड़् कालं तमाहुः परमे व्योमन्।
अर्थात् एक कुम्भ काल के ऊपर भरा रखा है। हम उस घड़े को विविध दृष्टियों से देखते हैं। वह घट सभी सत्तावलों के सम्मुख चलता है। उस काल को बुद्धिमान लोग अति ऊँचे सुरक्षित स्थान में बताते हैं। ऋग्वेद की एक ऋचा के अनुसार, इन्द्र अपने बल से नवघट की तरह मेघों का भेदन करता है। यहाँ इन्द्र को सूर्य या विद्युतरूप में व्यंजित किया गया है। इसका आशय यह है कि शरीररूपी घट में आत्मारूपी अमृततत्व विद्यमान रहता है, परन्तु इसे असद्भाव, लोभादि वृत्तियाँ आच्छादित किये रहती हैं। इसकी कारण मानव अमृतत्व पाने से वंचित रहता है। किन्तु विचारवान एवं विवेकी पुरुष शरीर रूपी घट में निहित ब्रह्मतत्व का साक्षात्कार नारायण रूपी महासागर में व्याप्त अमृततत्व से करते रहते हैं। सन्त कबीर ने ठीक इसी तरह कहा-
जल में कुम्भ-कुम्भ में जल है, बाहर भीतर पानी। फूटा कुम्भ जल जलहि समाना, संतो यह अकथ कहानी॥
इतिहास विशेषज्ञों ने कुम्भ पर्व की प्राचीनता अनेकों स्थानों पर प्रमाणित की है। चीनी यात्री ह्वेनसाँग के यात्रा विवरण के अनुसार सम्राट हर्षवर्धन 644 ई. के माघ मास में प्रयाग में होने वाली पंचवर्षीय धर्म महासभा में भाग लिया था। इतिहासकारों का मानना है कि यही अर्द्धकुंभ का अवसर था, जिसमें सम्राट हर्षवर्धन ने अपना सर्वस्व दान कर दिया। अनेक साँस्कृतिक विद्वानों के अनुसार, नवीं सदी में आदिगुरु शंकराचार्य ने हिन्दू संस्कृति की नींव को सुदृढ़ करने और लोग-कल्याण की दृष्टि से कुम्भ का प्रचलन प्रारम्भ किया था। भगवान शंकराचार्य पुरी, द्वारका, श्रृंगेरी एवं ज्योतिष्पीठ के रूप में चार मठों की स्थापना करने के पश्चात उनके संचालन एवं परिचालन हेतु अपने उत्तराधिकारियों को नियुक्त किया। साि ही उन्होंने उन सभी को निर्देश दिया कि एक निश्चित अवधि के उपरान्त वे आपस में मिलने तथा विचार-विमर्श के लिए एकत्रित हों। अतः कई इतिहासवेत्ताओं का कहना है कि इस आवश्यकता के अनुरूप कुम्भ पर्व प्रासंगिक हुआ तथा विचार-विनिमय का माध्यम बना। लिपिबद्ध प्रमाणों के अनुसार, कुम्भ पर्व इतिहास के मध्यकाल में अपने पूर्ण विकसित रूप में था। इतिहासकार जदुनाथ सरकार के नअसुर सन् 1234 ई. में नागा संन्यासियों ने जो निर्णायक विजय प्राप्त की थी, वह कुम्भ के अवसर पर थी। 17 वीं शताब्दी के फारसी के धार्मिक ग्रन्थ ‘ द बिस्तान ए मुजाहिब’ भी 1640 ई. में हुए एक भीषण युद्ध का वर्ण है- जो कुम्भ के अवसर पर ही हुआ था। एशियाटिक रिसर्चेज के छठवें खण्ड में कैप्टन टामस हॉर्डविक ने भी सन् 1796 में आयोजित हुए हरिद्वार के कुम्भ मेले का जिक्र किया है। पहले भी ऐतिहासिक दस्तावेज में सन् 1398 में हरिद्वार के कुम्भ मेले का विवरण मिलता है, जिसमें विदेशी आक्रान्ता तैमूर लंग लंग ने भारी लूट-पाट की थी। प्रयाग में कुम्भ महापर्व का उल्लेख चैतन्य महाप्रभु के जीवनवृत्त से ज्ञात होता है। इतिहासकारों के अनुसार 1514 ई. में चैतन्य महाप्रभु स्वयं प्रयोग के कुम्भ मेले में उपस्थिति हुए थे। 14 वीं शताब्दी के सरस्वती गंगाधर की मराठी पुस्तक गुरुचरित्र में नासिक में आयोजित होने वाले कुम्भ मेले का विस्तृत विवरण मिलता है। नासिक से ही प्राप्त एक ताम्रपत्र में नासिक में आयोजित होने वाले कुम्भ महापर्व का विवरण प्राप्त होता है। मध्यकालीन इतिहास के विशेषज्ञ बताते हैं कि अकबर बादशाह ने कुम्भ के महोत्सव पर तीर्थयात्रियों पर लगने वाले।
जजिया कर को सन् 1564 में उठा लिया था। उन दिनों भारत के विभिन्न क्षेत्रों से लाखों की संख्या में धर्मप्रिय जनता हरिद्वार प्रयाग, उज्जैन एवं नासिक में आयोजित होने वाले कुम्भ मेलों में भाग लेती थी। बाद के समय औरंगजेब ने हरिद्वार में पड़ने वाले महाकुम्भ पर्वों पर आने एवं आयोजन सम्मिलित होने का उल्लेख मिलता है। जगद्गुरु शंकराचार्य एवं समर्थगुरु रामदास के कुम्भ पर्व में सम्मिलित होने के बारे इतिहासकार साँकेतिक विवरण देते हैं। सन् 1678 ई. में हरिद्वार महाकुम्भ पर्व पर प्रणामी संत महामति प्रणानार्थ पधारे थे। यहीं पर उन्होंने विद्वानों से शास्त्रार्थ करके निष्कलंक बुद्ध की पदवी प्राप्त की थी। आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानंद ने हरिद्वार महाकुम्भ के अवसर पर ही पाखण्ड खण्डिनी पताका फहराई थी। सन् 1915 में हरिद्वार के महाकुम्भ के अवसर पर महात्मागाँधी जी भी स्वामी श्रद्धानन्द के साथ सम्मिलित हुए थे। देशभक्तों के साथ सम्मिलित हुए थे। देशभक्तों के महामिलन का यह अनोखा अवसर था। इसी अवसर इतिहास की धारा को मोड़ने वाले अनेकों विचार पुष्पित -पल्लवित हुए। ज्योतिषीय परम्पराओं में कुम्भ पर्व को कुम्भ राशि और कुम्भ योग से जोड़ा गया है। कुम्भ योग चार प्रकार का होता है। विष्णु योग के अनुसार जब बृहस्पति कुम्भ राशि में होता है और सूर्य मेष राशि में प्रविष्ट होता है तो कुम्भ पर्व हरिद्वार में लगता है। जब बृहस्पति मेष राशि चक्र में प्रवेश करता है। और सूर्य तथा चन्द्रमा मकर राशि में, माघ अमावस्या के दिन होते हैं तो कुम्भ का आयोजन प्रयाग में किया जाता है। सूर्य एवं बृहस्पति सिंह राशि में प्रकट होने पर कुम्भ पर्व नासिक में गोदावरी तट पर लगता है। बृहस्पति कुम्भ राशि में होने पर उज्जयिनी में कुम्भ का आयोजन होता है। इस प्रकार हरिद्वार में कुम्भ पर्व की महत्ता सर्वाधिक है, क्योंकि बृहस्पति के कुम्भ राशि में होने का सब यहीं के आयोजन के प्राप्त है। 1615 ई. में रचित सलासतुत तवरिस में भी इसी तरह का उल्लेख है। इस विवरण के अनुसार 12 वें वर्ष जब बृहस्पति कुम्भ राशि में प्रविष्ट होता है और सूर्य मेष राशि में तब भारी संख्या में लोग हरिद्वार में इकट्ठे होकर पवित्र धार्मिक स्नान करते हैं और तत्वज्ञानियों से ज्ञानमृत का पान करते हैं। कुम्भ पर्व अपने चरित्र और उद्भव में गंगानदी से भावपूर्ण सम्बद्ध है। गंगा परब्रह्म की प्रतिनिधि है। तत्वदर्शी उसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश की समष्टिरूपा कहते हैं। भारतीय संस्कृत गंगाजल को देवत्व और शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करती है। गंगाजल अमरत्व का कोव है, तो कुम्भ अमृत पर्व है। वस्तुतः वे चार स्थान जहाँ पौराणिक आख्यानों के अनुसार, अमृत कुम्भ से अमृत की बूंदें गिरी थीं, मूल रूप से सुरसरिता गंगा से ही जुड़े हुए हैं। हरिद्वार एवं प्रयोग गंगा का नाम गौतमी व गोदावरी पड़ा। इसी प्रकार का मत उज्जैन में क्षिप्रा नहीं के विषय में भी है। क्षिप्रा नदी उत्तर प्रवाह के कारण पवित्र हो जाती है। स्कन्दपुराण के एक विवरण के अनुसार क्षिप्रा उस स्थान से पूर्व वाहिनी हो जाती है, जहाँ वह ए बार गंगा द्वारा आलिंगन बद्ध हुई थी। इस तरह कुम्भ तमाम रूपों से किसी न किसी प्रकार गंगा से सम्बन्धित मिलता है। गंगाद्वार होने के कारण हरिद्वार के महाकुम्भ पर्व का वैशिष्ट्य अपने ढंग का और अनोखा है। इस नदी का अन्तिम महाकुम्भ गंगा की गोद में एवं हिमालय की छाया में अवस्थित तीर्थनगरी हरिद्वार में सम्पन्न हो रहा है। पुराणों में हरिद्वार का गंगाद्वार, हिम प्रदेश और मायापुरी के नाम से उल्लेख किया गया है। यह मायापुरी, अयोध्या, मथुरा, काशी, काँची, पुरी एवं अवन्तिका आदि छह अन्य पवित्र पुरियों से श्रेष्ठ एवं पवित्रतम मानी गयी है। पौराणिक कथा गाओ के अनुसार हरिद्वार लोकप्रसिद्ध महर्षियों की तपस्थली है। कहा गया कि कश्यप, अत्रि वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, भारद्वाज आदि सप्तऋषि यहीं तप करते थे। वायुपुराण के अनुसार गंगा ने सप्तऋषियों को तप करते देखा और असमंजस में पड़ीं कि उन्हें कष्ट देने से कैसे बचा जाय? अन्ततः गंगा सात धाराओं में विभक्त हो गयीं। इसलिए इसे सप्तऋषि क्षेत्र भी कहा जाता है, जिसका गौरव अद्यावधि अक्षुण्ण है। महायोगी गोरखनाथ का भी हरिद्वार में उग्र तप करने का उल्लेख मिलता है। वैराग्य शतक के रचनाकार योगीभर्तृहरि ने भी यही कठोर तप-साधना सम्पन्न की थी। भगवान दत्तात्रेय ने भी इसी स्थान पर तप और योग की अलौकिक साधनाएँ पूरी कीं। आधुनिक युग में तप और अध्यात्मिक साधनाओं की गौरवपूर्ण परम्पराओं का पुनर्जागरण युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव ने शांतिकुंज की स्थापना के साथ प्रारम्भ किया। वे स्वयं परमवंदनीय माताजी के साथ युगान्तरीय तपस्या में प्रवृत्त हुए। उनके इस अलौकिक प्रयास से ही शांतिकुंज ने युगतीर्थ एवं इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री की महिमा प्राप्त की। बसन्त पंचमी यानि 1 फरवरी, 1998 महाकुम्भ के विशेष स्नान पर्व में से प्रथम स्नान पर्व है। परमपूज्य गुरुदेव के अध्यात्मिक जन्मदिन होने के कारण इस स्नान का महत्व शतगुणित हो जाता है। अन्य स्नान पर्व भी क्रमशः (2) 11 फरवरी 98 माघ पूर्णिमा, (3) 25 फरवरी, 98 महाशिवरात्रि (4) 28 मार्च, 97 चैत्र अमावस्या (5) 28 मार्च, 98 चैत्र प्रतिपदा नवसम्वत्सर (6) 5 अप्रैल, 98 रामनवमी (7) 13 अप्रैल, 98 वैशाखी (8) 14 अप्रैल, 98 कुम्भपर्व पुण्यकाल (9) 26 अप्रैल, 98 वैशाख अमावस्या (10) 29 अप्रैल, 98 अक्षय तृतीया (11) 11 मई, 98 वैशाख पूर्णिमा (12) 14 मई, 98 वृष संक्रान्ति को होंगे। इनमें से हर एक का अपना विशिष्ट महत्व है।
शास्त्रकारों ने इसकी महत्ता प्रतिपादित करते हुए लिखा है-
सहस्रंकीर्तिके स्नानं माघे स्नानिशतानि च। वैशाखनमैदा कोटि कुम्भस्नानेन तत्फलम्॥
यानि कि कार्तिक मास के एक हजार स्नान माघ मास के सौ स्नान वैशाख एक स्नान के फल के बराबर होता है। एक अन्य स्नान पर कहा गया है-
अश्वमेघ सहस्राणि वाजपेयशतानि च। लक्षं प्रदक्षिणा भूमेः कुम्भ स्नानेन तत्फलम्॥
अर्थात् एक हजार अश्वमेध यज्ञ सौ वाजपेय यज्ञ तथा एक लाख बार धरती की परिक्रमा करने से जो पुण्यफल होता है। वह कुम्भ स्नान करने से हो जाता है। युगऋषि की हरिद्वार स्थित तप-स्थली शांतिकुंज का दर्शन, उनके विचारों के हृदयस्पर्शी उद्बोधन आने वाले तीर्थ-यात्रियों को इस बार वर्तमान महाकुम्भ पर्व सार्थक पुण्यफल दे सकेंगे। इसी दृष्टि से इन दिनों विशेष तीर्थसत्रों की व्यवस्था की गयी है। इनमें सम्मिलित होकर जन-जीवन यह अनुभव कर सकेगा कि यह लोकपर्व किस तरह मरणशील मानव को मृत्योर्माऽमृतंगमय की ओर अग्रसर करता है।
भगवान की बनाई समस्त कृतियों में मानवी-काया व मस्तिष्क को सबसे विलक्षण माना जाता रहा है। इतने अधिक व विविधतापूर्ण ढंग से बनाई गयी, जीव-जन्तुओं, कृमि -कीटकों, वृक्ष- वनस्पतियों से भरी इस सृष्टि का यों तो हर घट अपने आप में अद्भुत है एवं उस परमसत्ता की विराट व्यवस्था का परिचायक है, फिर भी मनुष्य को देखने, गहराई से समझने के बाद लगता है कि प्रजापति ब्रह्मा ने सर्वाधिक परिश्रम इसी घटक को बनाते समय किया होगा। तभी तो जितनी परत खोलते हैं, कुछ न कुछ नया मिलता चला जाता है। जितने क्रिया-कलापों की समा टटोलने का प्रयास करते हैं, उतना ही क्षितिज और दूर और दूर दिखाई देता है। कोई न कोई तो कारण रहा ही होगा तभी तो मनुष्य को ऐसा बनाया गया और उसे रहस्यों की पिटारी के रूप में प्रस्तुत किया गया। परमपूज्य गुरुदेव जी ने जनवरी 1970 में मनुष्य शरीर जैसी मशीन नहीं’ शीर्षक से लिखे एक लेख में लिखा था कि यह विलक्षण संरचना बाती है कि संसार में कोई अदृश्य किन्तु बुद्धिसंपन्न शक्ति है। अवश्य ही। मनुष्य उसकी बराबरी तो नहीं कर सकता। किन्तु उस चेतना के महासागर में डुबकी लगाकर कुछ तो जानने का प्रयास कर सकता है कि किन उद्देश्यों को स्पष्ट कर हमारे प्रत्येक क्षण को महत्वपूर्ण बना सकता है। विगत दो अंकों से प्रकाशित इस लेखमाला में शरीर के विभिन्न अंगों का आम बोलचाल की भाषा में वर्णन कर उनके वास्तविक स्वरूप व विराटतम संभावनाओं की चर्चा की जा रही है। इस समापन किश्त में मस्तिष्क एवं स्नायुसंस्थान, रक्त से वाजीय द्रव्यों को छानने वाले गुर्दों के रूप में एक समग्र मूत्रवाहीतंत्र तथा हारमोन्स के रूप में शरीर का कायाकल्प करने वाले व प्रजनन-प्रक्रिया के लिये उत्तरदायी महत्वपूर्ण घटकों की चर्चा की जा रही है। जहाँ तक मस्तिष्क का प्रश्न है, इसे यदि पूरे शरीर यन्त्र का एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर’ कहा जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी कुल दस खरब से अधिक न्यूरॉन्स (स्नायु कोशों ) से यह समग्र मस्तिष्क व उससे संचालित स्नायु संस्थान बना है। फिर भी यह संख्या मात्र मस्तिष्क के अंदर स्थित स्नायुकोशों व सिनेप्सों की है जो कि पूरे संस्थान का मात्र दस प्रतिशत ही है। शेष नब्बे प्रतिशत तो इस दस खरब की संख्या के अतिरिक्त हैं, तरह-तरह के आकृति के हैं व अतिसूक्ष्म बनावट के हैं। कई लोग जब मस्तिष्क व कम्प्यूटर की तुलना करते हैं तो कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को नकार देते हैं। गणितीय गणना, तर्क गति से किये जाने वाले कार्य एवं स्पष्ट प्रामाणिक परिणामों की दृष्टि से कम्प्यूटर मानवी मस्तिष्क से कुछ आगे है, किन्तु इतनी वैज्ञानिक नि-नूतन की प्रगति के बावजूद भी इसमें कुछ ऐसी खूबियाँ नहीं विकसित हो पायीं जो कि मानवी मस्तिष्क में हैं। ये हैं -विभिन्न चेहरों पहचान लेना तथा संवेदनापरक अनुभूतियाँ व उनकी अभिव्यक्तियाँ। कंप्यूटर को संवेदना से न कोई लेना-देना है, न किसी कला-कौशल की तारीफ से। वह तो हरेक का मूल्याँकन गणितीय आधार पर करता है। एक और महत्वपूर्ण पक्ष मानवी जीवन का है, जो कि उसी आध्यात्मिक पहचान बनाता है, उसके धार्मिक रुझान एवं सुसंस्कारिता का परिचायक है। इस सम्बन्ध में वैज्ञानिकों ने शोध के उपरान्त एक निष्कर्ष निकाला है कि मानवी मस्तिष्क के अन्दर एक ऐसा स्थान है, जो उसे भगवान और धर्म में आस्था रखने हेतु प्रेरित करता रहता है। यह नसों के एक सर्किट के रूप में मौजूद है एवं मनुष्य के भगवान के विषय में चिंतन करते ही सक्रिय हो जाता है। मनुष्य के कानों के ऊपर स्थित टैम्पोरल लोब उसके भी दांये हाथ से लिखने वाले के दायें मस्तिष्क में इसकी उपस्थिति बतायी गयी है। इसे आस्था केन्द्र की उपमा देते हुए सेनडियागो स्थित कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के स्नायु वैज्ञानिकों का दल कहता है कि अमूमन यह सेण्टर सभी व्यक्तियों में मौजूद होता है, किसी में कम व किसी में अधिक विकसित। अनुसंधान दल के प्रमुख डॉ. विलयानुर रामचंद्रन भारतीय मूल के हैं एवं उनकी यह रिपोर्ट लंदन के संडे टाइम्स में दिसम्बर के प्रथम सप्ताह में प्रकाशित हुई थी। इससे विश्व भर के तमाम आस्तिकों के विश्वास को बल मिला है। एक प्रश्न और उठता है कि धर्म-कला के प्रति रुचि-भाव परम अनुभूतियों का यदि केन्द्र हर मानवी मस्तिष्क में है तो क्या यह नास्तिकों व नर-पिशाच, नर-पामर स्तर के व्यक्तियों में बिल्कुल भी विकसित नहीं होता या वे अपने किसी और केन्द्र के द्वारा इस पर नियंत्रण स्थापित कर इसे निष्क्रिय कर देते हैं। विचार करने की विस्तृत शोध करने वाली बात है। यह मात एवं पिता का भगवत्सत्ता में विश्वास भी इस केंद्र जगाने -विकसित करने की एक बड़ी महत्वपूर्ण भेमा निभाता है, ऐसा वैज्ञानिकों का मत है।
प्रायः 3 पौंड भार वाला यह अंग वजन या बनावट के आधार पर किसी निहायत बेवकूफ व अति बुद्धिमान में अन्र का कोई पैमाना नहीं बनता। र्लु पाश्चर जिनने विज्ञान के क्षेत्र में नए कीर्तिमान खड़े किये,ो जीवन के मध्यकाल में ही मस्तिष्क में रक्तस्राव के कारण आधे से अधिक भार वाले मस्तिष्क को साथ लेकर जीवन भर जीना पड़ा, किन्तु इससे उनकी कार्यक्षमता-बौद्धिक कौशल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इस प्रकार वजन थोड़ा बहुत कम-ज्यादा भी हो तो भी व्यक्तित्व का विकास एवं बौद्धिक क्षमता इसके माइक्रोस्ट्रक्चर व न्यूरोहारमोन्स की प्रगतिशील स्थिति पर ही निर्भर रहते हैं। जन्म के समय शिशु के पास एक परिपूर्ण विकसित मस्तिष्क होता है। इसमें वृद्धि यों तो प्रारम्भ के बारह वर्षों तक तेजी से व फिर 20 वर्ष की आयु तक सतत् होती रहती है पर वह मात्र मस्तिष्क कोशिकाओं व उनसे जुड़े सम्बन्धित स्नायुसूत्रों में बढ़ोत्तरी के रूप में। मस्तिष्कीय कोषाओं की आकृति में वृद्धि होती रहती है, कोई नई प्रकृति वाला स्नायु कोष जन्म के बाद नए सिरे से जुड़ता नहीं प्रयासस्वरूप जाग्रत अवश्य किया जा सकता है। यह जानने योग्य बात है कि एक समय मात्र सात से तेरह प्रतिशत मस्तिष्क का हिस्सा जाग्रतावस्था में रहता है। प्रायः 94 से 99 प्रतिशत लोगों की यही स्थिति जीवन भर रहती, शेष 87 प्रतिशत हिस्सा अविज्ञात के गर्भ में छिपा रहता है। जो उसे जगा व विकसित कर लेता है, वह प्रतिभासंपन्न-अतीन्द्रिय क्षमताओं से सुशोभित देखा जा सकता है। मस्तिष्क के तीन भाग सुविख्यात हैं- फोरब्रेन, मिब्रेन न व हाइण्टर ब्रेन बोलचाल की भाषा में जिन्हें क्रमशः अग्र, मध्य व पृष्ठ मस्तिष्क कहा जाता है। अग्र मस्तिष्क विकास की दृष्टि से सबसे बाद में विकसित हुआ, किन्तु सर्वाधिक हिस्सा पूरे मस्तिष्क में शेयर करने वाला अंग है। संवेदन तन्तुओं से सन्देशों को ग्रहण करना विचारों स्मृतियों का संग्रह चलाये रखना इसी का काम है। बौद्धिक कला-कौशल इसी क्षेत्र में विद्यमान होता है। बाँया भाग शरीर के दांये हिस्से को एवं दांये भाग शरीर के बाँये हिस्से को विकसित करता है। इसी का एक अंग थेलेमस हमारी एकाग्रता को एवं दूसरा अंग हाइपोथेलेमस हमारी भाव संवेदनाओं,-भूख, प्यास व शरीर को आराम देने वाली चिन्तक चेतना को नियन्त्रित करता है। मध्य मस्तिष्क हर आने वाले संदेश की जाँच पड़ताल करता, परखता व उन्हें फिल्टर करता है। स्पाइनल कार्ड (सुषुम्ना) नाड़ी के माध्यम से पूरे शरीर से आने वाले हर संदेश को सही रूप में ऊपर अग्र मस्तिष्क तक पहुँचना इसी का काम है। जितनी भी स्वचालित प्रक्रियायें हैं, यथा चींटी के काटते ही हाथ का शरीर के उस भाग तक पहुँच जाना, पीठ के दर्द के समय हाथ का उस हिस्से को मलने लगना, आग का स्पर्श होते ही तुरंत हट जाना मूत्र विसर्जन हेतु ब्लैडर से संदेश मिलने पर उसके लिए प्रयासरत होना आदि, ये सभी यही से नियन्त्रित होती हैं। इन्हें आंटोनॉमिक कहा जाता है। शरीर की चेतनावस्था एवं निद्रा-जाग्रत चक्रों का नियन्त्रण भी इसी हिस्से द्वारा होता है। पृष्ठ मस्तिष्क इसके तुरंत पीछे की ओर होता है। शरीर का हिलना-डुलना, चलना-फिरना, संतुलन बनाये रखना यही से संचालित होता है। जितनी भी हमारी दक्षताएं कार्य प्रणाली से सम्बन्धित हैं-उनका एक विराट मेमोरी बैंक यही पर सरेबेलम में स्थित होता है। इस छोटे से भाग में बिना शरीर के विराट घटाकाश में अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
इस विलक्षण संस्थान के बारे में जिसे भानुमती का जादुई पिटारा भी कहा जाता है, इतना कहना ही काफी है कि जितनी कार्य-कुशलतायें मस्तिष्क सम्पन्न करता है, वे यदि किसी कम्प्यूटर से सम्पन्न करायी जाये तो इसे इतना ही बड़ा-विराट बनाना होगा, जितना की हमारी पृथ्वी का आकार है। सोचा जा सकता है कि इस नियन्ता ने कितने परिश्रम व लगन के साथ किस मानवीय-काया व उसमें भी इस संस्थान को, जो कि सारी गतिविधियों का संचालक है, को विनिर्मित किया होगा। मानवीय बुद्धि ससीम है। अतः वह ऐसा निर्माण करने की सोचना तो दूर प्रयास भी आरंभ नहीं कर सकती। कई व्यक्ति शतरंज खेल में विख्यात खिलाड़ियों की कम्प्यूटर से मूठ-भेड़ एवं उसमें कम्प्यूटर की जीत का प्रसंग सुनकर सोचने लगते हैं कि सम्भवतः कम्प्यूटर अब मानवीय मेधा का पर्याय बन सकता है, किन्तु ऐसा है नहीं। उस विधाता की बनाई किसी कृति के एक क्रिया परक पक्ष को आर्टिफिशियल इंटेलीजेन्स, रोबोट आदि के द्वारा किया जा सकता है-उनका प्रदर्शन भी किया जा सकता है, पर उसे हूबहू बनाकर मानव का विकल्प बना पाना नितान्त असंभव है। यही मनुष्य के पुरुषार्थ की सीमा का एवं परमसत्ता की वैविध्यपूर्ण विलक्षणता का परिचय हमें मिलता है। इस संस्थान से शरीर के विभिन्न हिस्सों में संदेश स्नायु-तन्तुओं के द्वारा जाते हैं। इसके गति बड़ा अन्तर देखने को मिलता है। हाथ से किये गये किसी क्रिया-कौशल भरे कार्य की इम्पर्ल्स की गति 25 मील प्रतिघटे होगी, तो एक चुम्बन की प्रतिक्रिया प्रायः 140 मील प्रति घण्टे की रफ्तार से दौड़ती पायी जाती हैं, जितना कष्टदायी दर्द होगा। उतना ही उसके मस्तिष्क तक पहुँचने की गति धीमी होती जायेगी। यहाँ तक 2 मील प्रति घण्टा। इसका मूल कारण यही है कि इस बीच स्थानीय स्तर पर ऊतकों की मरम्मत का अवसर मिल जाये एवं अनावश्यक रूप से शरीर का व्यवस्था-तंत्र मस्तिष्क के स्तर पर विचलित न हो। कितनी विलक्षण व्यवस्था शरीर के एक-एक घटक है? इसी पर आश्चर्यचकित होकर यदि ऋषि कह बैठते हैं-“ आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम्-तो किसी को इस उक्ति पर कोई असमंजस नहीं होना चाहिए।
मस्तिष्क में उत्सर्जित होने वाले रस स्रावों व किसी के भी व्यक्तित्व को चलाने हेतु उत्तरदायी शरीर व्यापी हारमोन की संक्षिप्त चर्चा के पूर्व शरीर के और महत्वपूर्ण घटक गुर्दों (किडनीज़) की चर्चा कर ली जाय। वह भी इसलिए कि ये होते तो पेट में है, किन्तु अपना प्रभाव मस्तिष्क से लेकर समय स्नायु संस्थान रक्तवाही संस्थान, हार्मोन्स, हृदय एवं चयापचय के लिए जिम्मेदार अंगों पर बड़ा गहरा डालते हैं। हार्मोन्स एवं गुर्दों का परस्पर बड़ा सघन सम्बन्ध है।
गुर्दों का शरीर का रिसायकलिंग संस्थान कहा जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। गुर्दे शरीर में से उन सभी बाय प्रोडक्टस को हटा देते हैं, जो शरीर में रहते तो सम्भवतः हानिकारक हो सकते थे। डेढ़ लीटर पानी शरीर में पहुंचना प्रतिदिन जरूरी है, ताकि गुर्दे यह कार्य कर सकें। रक्त का अम्लीय-क्षारीय स्तर समान रूप से बनाये रखना गुर्दों का सबसे प्रमुख कार्य है। लगभग 2 लीटर रक्त प्रति मिनट गुर्दों में सतत् प्रतिक्षण जीवन भर पहुँचता व क्षन कर आगे बढ़ता रहता है। रिनल आर्टरी से आकर यह रक्त रिनेल वेन से वापस रक्त वाही संस्थान में पहुँच जाता है। यह रक्त मात्र 5 मिनट में पूरे शरीर का चक्कर लगाकर गुर्दों में पुनः पहुँच जाता है। एवं यह चक्र अनवरत चलता रहता है। इस परिवहन व छनने की क्रिया का परिणाम ही है कि प्रायः 60 ग्राम (2 औंन्स) ठोस पदार्थ मूत्र में घुलकर शरीर से बाहर प्रतिदिन निकाल दिये जाते हैं। इस प्रकार पिये गये जल से मूत्र का घनत्व अधिक होता है। इस छानने की क्रिया के लिए 4 ग् 2.5 इंच के आकार की गुर्दों में प्रमुख भूमिका छोटी-छोटी इकाइयाँ निभाती हैं। इन इकाइयों को जिन्हें ग्लोमरयुलर फिलेट्रेशन यूनिट (नेफ्रान) कहते हैं, जिनकी संख्या पाँच से दस लाख के बीच होती है, को यदि सिरे से सिरे मिलाकर फैलाया जाय तो एक व्यक्ति के गुर्दे से ही 50 मील लम्बी दूरी तक को घेरा जा सकता है और भी सूक्ष्मता की ओर चले तो इनमें विद्यमान छोटी-छोटी रक्तवाही नलिकाओं शिराओं के जाल को यदि फैलाया जाय तो एक ही व्यक्ति के गुर्दे से उन नलिकाओं के दो फेरे पूरी धरती के चारों ओर लगाये जा सकते हैं। कितना विराट लघुतम से घटक में भरा पड़ा है, यह जानकर अणोरणीयान् महतोमहीयान्’ को उपमा सार्थक जान पड़ती है।
गुर्दे लगभग सारा जल, जो उनके पास रक्त के माध्यम से पहुँचा देते हैं। मात्र 1 प्रतिशत को छोड़कर, जो कि मूत्र का रूप ले लेता है, अपूर्ण है। गर्मी में शरीर का पानी उत्सर्जित करने का कार्य यदि त्वचा भी करती है, तो ठण्डक में यह कार्य मात्र गुर्दे करते हैं। कई प्रकार के बुखारों व पीलिया में मूत्र का रंग पीला हो जाता है तो टाइफ़ाइड बुखार में यह रंग नीला हो जाता है। यदि गहरा नीले रंग का मूत्र बार-बार जा रहा हो तो हैजे की शंका की जानी चाहिए। वस्तुतः गुर्दे सारे शरीर के अन्दर की वास्तविक स्थिति का दर्पण होते हैं। इस दर्पण यदि पढ़ा जा सके तो शरीर की स्वस्थता की स्थिति जानी जा सकती है। गुर्दे कई प्रकार के हार्मोन्स का उत्सर्जन शरीर की आन्तरिक स्थिति की यथावत् रखने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाते हैं।
काया की माया बड़ी निराली है। इसके सम्बन्ध में जितना जानने का प्रयास किया जाय, और भी अधिक रहस्य हाथ लगते चले आते हैं। हारमोन्स रूपी रसस्राव जो सूक्ष्मतम कुछ माइक्रोमीटर की मात्रा में रक्त में सतत् घुलते रहते हैं इस रहस्य भरी दुनिया का एक परिचय देते हैं। हमारी चुस्ती-फुर्ती बनाये रखने, प्रजनन प्रक्रिया द्वारा वंश को बढ़ाते रखने, कामोल्लास की गति के सुनियोजन द्वारा सकारात्मक मानसिक विकास करते चलने एवं प्रसन्नता, क्रोध, स्नेह-दुख जैसे भावों की अभिव्यक्ति में हारमोन्स की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण होती है। तुरन्त की माँग हो, जैसे तनाव की प्रतिक्रिया स्वरूप शरीर पर संकटापन्न स्थिति भी आ जाने पर अथवा थोड़ी समयावधि वाली माँग हो, जैसे-बच्चे के लिए दुग्ध का स्तनों में निर्माण-प्रत्येक में कुछ गिने-चुने छोटे-छोटे आकार के नाम मात्र के अंग ही सारी भूमिका कुछ ही बूँदों के रस को रक्त के द्वारा विभिन्न घटकों तक भेजकर पूरी कर देते हैं। हाइपोथेलेमस जो स्नायु-संस्थान का घटक है एवं पिट्यूटरी मिलकर यह तय करते हैं कि कब बालक को किशोर में बदलना है एवं देखते-देखते आवाज़ में कठोरता, चेहरे व काखों में बाल तथा एवं यौन भावनाओं में परिवर्तन आने लगता है। यह चमत्कार पारस्परिक ताल मेल से चलने वाली उस प्रक्रिया का है, जो शरीर-संचालन हेतु विभिन्न घटक अपनाते हैं। बच्चियों में स्तनों का विकास ऋतुस्राव का प्रारंभ भी इन्हीं हारमोन्स के स्राव की ही परिणति है।
अखण्ड ज्योति पाठक हारमोन्स पर विस्तार से अगले दिनों पढ़ेंगे, क्योंकि अब आज की बीसवीं शताब्दी की समापन की बेला में हमारे पास आधुनिकतम शोधों के कारण बहुत कुछ जानकारियाँ उपलब्ध हैं। फिर भी एक तथ्य यहाँ इनकी प्रभाव क्षमता से सम्बन्धित बताना प्रासाँगिक होगा। अमेरिकी विश्व विद्यालयों में एक अध्ययन से पाया गया है कि प्रायः 1000 क्रूरतम अपराध करने वाले व्यक्तियों में से 60 से अधिक प्रतिशत में एड्रीनल ग्रंथियों, जो गुर्दे के ऊपर अवस्थित होती हैं, कि कार्य-प्रणाली में बिखराव पाया गया है। इस कारण उनमें हारमोन्स का स्तर विशेषतः एड्रीनेलिन व सिरम कार्टिसाल अधिक देखने में आया। यह अकेला तथ्य ही परिचायक है। इस निष्कर्ष का कि देखने में छोटे लगं-घाव करे गम्भीर” वाले ये सूक्ष्मतम मात्रा में स्रावित होने वाले हारमोन्स व्यक्तित्व में किस स्तर का परिवर्तन ला सकते हैं।
वस्तुतः मानव तन अभी तक वैज्ञानिकों के लिए एक पहली बना हुआ है। जब काया की माया को जान पाने में पसीना छूटता है, तो चेतना, जो काया के कण-कण में गुँथी है- उसे जान पाना तो और भी कठिन है शरीर को जान लेना-उसके सूक्ष्मतम स्वरूप को समझ लेना हमारी इस लेखमाला का लक्ष्य नहीं रहा है। लक्ष्य है-शरीर पर सर्वतोभावेन नियन्त्रण करने की क्षमता-योगाभ्यास के माध्यम से प्राप्त कर इसी विलक्षणताओं का सदुपयोग, सुनियोजन करना, व्यक्तित्व को इच्छानुसार श्रेष्ठतम स्तर की ओर ढालना-बदलना-सुधारना। आत्मसाधना का विज्ञान ज्ञात एवं अभिज्ञात क्षमताओं के नियन्त्रण-संचालन का विज्ञान है। विधिवत् एक विधान है। इसे हृदयंगम कर जीवन क्षेत्र में लागू कर रही हम अपनी अपूर्णता को पूर्णता में बदल सकते हैं।
एक समय एक व्यापारी ने व्यापार के सिलसिले में परदेश जाने का निश्चय किया जाने से पहले बारी-बारी से उसने अपने परिवार के सदस्यों से पूछा की परदेश से वह उनके लिए क्या लाये? सबने अपनी-अपनी इच्छा बता दी। अन्त में वह अपने दास के पास गया और उस पर कृपा करते हुए पूछा कि वह उसके लिए क्या लाए? दास ने बड़ी विनम्रता से कहा, मेरे लिए सुखफल लाइयेगा।
परदेश जाकर व्यापारियों ने बहुत-सा धन कमाया और अपने परिवार के लोगों के लिए बहुत-सा समान और तोहफे खरीदे। आखिरी दीन उसे अपने आज्ञाकारी दास की इच्छा का ध्यान आया और वह सुखफल का पता करने लगा।
सबने आश्चर्य प्रकट किया कि इस नाम का कोई फल नहीं होता। पहली बार यह नाम सुना था। अन्त में व्यापारी एक महात्मा से मिला। उनसे अपने दास की इच्छा बढ़ायी।
महात्माजी थोड़ी देर गम्भीरता से सोचते रहे, फिर बोले, आपको सुख किसमें मिलता है? जब चिन्ता न हो, पीड़ा न हो और जब भय न हो। सामान्य जीवन में तो ऐसे क्षण यदा-कदा ही आते हैं। इन्हें चिरस्थायी बनाना हो तो स्वयं शाश्वत स्वरूप की अनुभूति चाहिए। जिसे आत्मज्ञान कहा गया है। दास बहुत गहरी बात कही है। व्यापारी समझ गया।
घर आने पर उसने दास को सम्बोधित करते हुए कहा-जाओ मित्र, आज से हम तुम्हें दासत्व से मुक्त करते हैं, अब तुम महात्मा जी के शरण में जाओ, वे तुम्हारे सद्गुरु हैं। सद्गुरु की शरण में रहकर आत्मज्ञान ही इस लोक में सुखफल है, जिसका स्वाद पाकर फिर कभी दुख नहीं व्यापता।
अन्नं ब्रह्मेते ............ अन्नेन जातानि जीवन्ति।
अन्न से ही प्राणि उत्पन्न होते हैं, अन्न से वे जीवित रहते हैं और अंत में मरकर अन्न में ही लीन जो जाते हैं तब निश्चय ही यह अन्न संसद प्राणियों की उत्पत्ति, पालन तथा प्रलय का मूल कारण है-तब .......... तब यह अन्न की ब्रह्म है? निदिध्यासन करते हुए भृगु के मन में यह विचार विद्युत प्रकाश की भाँति चमका।
कई मास पहले उन्होंने एक दिन जिज्ञासु भाव से अपने पिता वरुण ऋषि से जाकर पूछा था ‘-अधीहि भगवो ब्रह्मेति .... भगवन्। ब्रह्म क्या है, मुझे बतलाइये? अन्नं प्राणं चक्षुः क्षाोत्रं मनो वाचमिति....” अन्न प्राण, आँख, कान, मन और वाणी ये सभी ब्रह्म ज्ञान के द्वार अर्थात् उसके प्राप्ति के साधन है। यदि तुम्हें ब्रह्मवेता बनना है तो उसके लिए तप साधना करो, उसके लिए मन, वचन, कर्म से प्रयत्न प्रारंभ कर दो। हे पुत्र। तुम्हारी प्रबल जिज्ञासा और तप साधना एक दिन तुम्हें उस परम् सत्य का साक्षत्कार अवश्य करा देगी, जिसे ब्रह्म कहते हैं।
पिता द्वारा बतायी विधि से साधना करने के बहुत दिनों बाद उन्हें ऐसा अनुभव हो रहा था कि अन्न ही ब्रह्म है पर हृदय का संशय नहीं मिटा। तर्क बुद्धि ने उससे कहा, नहीं यह ब्रह्म नहीं है। संशय में पड़े-पड़े वह पुनः पिता वरुण के पास जाकर बोले-भगवन् मुझे उस ब्रह्म के बारे में बतलाइये।
“ तपसा ब्रह्म विंजिज्ञास्व ...... तपो ब्रह्मेति ......
जाओ ...... तप से ब्रह्म को जानों अभी तुम्हारे लिए तप ही ब्रह्म है। अपनी साधना में अविचल रहो वत्स। देखना श्रद्धा न डिगे-पथ पर चलते रहना ........ ब्रह्म ज्ञान मिलेगा। “ पिता ने आदेश दिया।
मास बीते-वर्ष बीत चला। एक दिन पुनः
भृगु को बोध हुआ, तब उसने निश्चय किया कि-प्राणों ब्रह्मेति..... प्राणेन जातानि जीवन्ति ....... जगत का जीवन यह प्राण ही ब्रह्म है। इस प्राण से ही जीव उत्पन्न होते, जीते और अन्त में इसी में लय हो जाते हैं। किन्तु उसको फिर भी शंका बनी रही। मानों उससे कोई कह रहा था कि ब्रह्म तो कुछ और ही है।
इसी उलझन वह फिर से पिता के पास गये और बोले -’ भगवन्। मुझे ब्रह्म के बारे में बताइये। “ ‘ पुत्र। तप से, साधना से वह जाना जाता है तुम अपनी साधना से ही उसे जानने की इच्छा करो, जाओ प्रयत्न जारी रखो ...... ब्रह्म आ मिलेगा। “ ब्रह्मवेता वरुण ऋषि ने वही शब्द फिर दुहराये।
भृगु चल पड़े ....... उनके बताये साधनों से तप करने। उनकी श्रद्धा अविचल थी। मन, वचन, कर्म से सम्पूर्ण शक्ति लगाकर वह वर्षों साधना करते रहे। कई वसन्त और पतझड़ आये पर भृगु को ब्रह्म का ज्ञान नहीं हुआ ...... किन्तु उनकी साधना चलती रही, अखण्ड-अनवरत रूप से। उन्होंने कभी यह भी नहीं सोचा कि आखिर जब पिता ब ब्रह्म ज्ञानी है तो वे बुद्धि से, विचारों से मुझे क्यों नहीं समझा देते?
मनो ब्रह्मेति ..... मनसा जतानि जीवन्ति ....... एक दिन वह साधना करते-करते बुदबुदाये-यह मन ही ब्रह्म है ...... मन से ही जीव उत्पन्न होते हैं-जीते हैं तथा अंत में मरकर उसी में समा जाते हैं। निश्चय ही यह ‘मन’ जगत की उत्पत्ति वृद्धि तथा लय का कारण है। फिर भी अभी भ्राँति बनी हुई थी। अंतर्द्वंद्व बराबर ज्यों का त्यों चल रहा था। वह निश्चय नहीं कर पा रहे थे कि ब्रह्म क्या है? और तब वह सिर को एक झटका देते हुए पिता के पास चल दिये ‘ न जाने कि उनका संशय नहीं मिट रहा था।
पिता श्री। मुझे ब्रह्म ज्ञान नहीं हुआ। आप मुझ पर दया करके बताइये-वह क्या है? अरे तुम लौट आये पर पुत्र वह तो तप से,साधना से ही जाना जाता है वह तप ही अभी तुम्हारे लिए ब्रह्म है अभी और साधना करो। पिता वरुण के वही इन्हें गिने पुराने शब्द थे।
भृगु सच्चे जिज्ञासु थे वह एक बार पुनः साधना में तल्लीन हो गये। उनकी निष्ठा और भय के प्रति एकाग्रता देखकर निराशा उलटे पाँव भागी-सचमुच उनकी वह साधना, वह लगन अद्भुत थी। कष्ट कठिनाइयों के झंझावातों में वह स्थिर रहे। वर्षा, आतप और धूप उनके सहयोगी सिद्ध हो चले उस तरुण तपस्वी के सिर पर प्रलय के मेघ घिरे, बरसे और वह केवल मुस्कुराते रहे मान अपमान दुनियादारों के उपहार-प्रलाप उसे पथ से विरत न कर सके। भूख प्यास उसे क्षुब्ध न कर सकी। मोह-ममत्व के फंदे उसे फाँस न सके। यौवन की भरी दुपहरी में उसकी इन्दियावत् स्थिर रहीं। हाँ अपनी अनवरत एकाकी साधना से वह ऊबे नहीं और ... कई वर्ष बीत गए।
वह सच्चे साधक थे और असफलता ही तो उनकी अपनी शक्ति की कसौटी थी वह साधना में तत्पर ही रहे। उनके रोम-रोम में एक ही ध्वनि उनके प्राणों में एक ही स्पन्दन, विचारों और भावनाओं की एक ही प्रति ध्वनि थी-ब्रह्म क्या है?
वह जान न पाये पर उनके प्रश्न का उत्तर बन कर धीरे-धीरे एक विशेषता, एक नई बात उनके चलने फिरने, उठने बैठने बोलने–चालने खाने पीने पहनने–ओढ़ने अर्थात् इच्छा, ज्ञान और कर्म के क्षेत्र में उतर रही थी, उनके मानवीय जीवन का चिरन्तन सत्य समन्वय बनकर। संसार के लिए अब वह अपरिचित नहीं रह गये थे। सर्वत्र उनकी ही चर्चा थी हर काई कहता था लग्न हो तो ऐसी, निष्ठा तो ऐसी, धुन हो तो ऐसी।
और एक दिन वर्षों बात सुनाई पड़ा, उत्तरापथ-दक्षिणापथ के कोलाहलपूर्ण जनपदों में आश्रमों और आरण्यकों में पण्य और कुटीरों में कि धन्य-धन्य। अरे वह तो लगता है कि साक्षात ब्रह्म रूप ही हो गया है ऐसा है उसका तेज वही भृगु वरुण ऋषि का पुत्र। आज वह अपने पिता के पास जा रहे थे, किन्तु पिछले चार-पाँच बार कि भाँति नहीं। आज तो दिव्य तेज से उनका भव्य ललाट चमक रहा था। प्रखर आत्म विश्वास की, सत्विवेक की स्निग्ध किरणें उनके स्तर नेत्रों से फुटी पड़ रही थी उनके रोम- रोम से देव दुर्लभ शान्ति और आनन्दश्रोत उफान में अयमात्मा ब्रह्म अनाहत नाद निनादित था। उन्होंने संसार को स्वयं पढ़ समझ लिया था उसकी ब्रह्म स्वरूपिणी चेतना को भी।
मन्दस्मित के साथ पुलकित हो वह पिता के चरणों पर झुका... और पिता वरुण उसके मुख को देखते हुए मुसकरा रहे थे पिता-पुत्र की इस मुसकान में अद्वैत था- सच्चा अद्वैत।
भृगु ने साधना के सूत्रों को यजुर्वेदीय तैत्तिरीयोपनिषद् की भृगुवल्ली में लिखा जो विश्व के समस्त साधकों को इस महामंत्र को बोध कराते हैं कि रोटी, प्राण मन तथा वानादि साधनों में तो सत्य का एक अंश मात्र है। यथार्थ सत्य तो इन बसे परे है। इसी परमसत्य के बोध में ही तो अयमात्मा ब्रह्म का नाद गुँजित होता है।
मृतकों को जीवित कर पाना सम्भव है क्या? इस सम्भाव्यता पर विज्ञान वर्षों से विचार करता रहा हैं ओर पिछले दिनों कई प्रयत्न भी किये हैं, पर इस दिशा में अब तक जो परिणाम सामने आये हैं, उन्हें उत्साहवर्द्धक किसी भी प्रकार नहीं कहा जा सकता। प्रयास की दृष्टि से वे महत्वपूर्ण हो सकते हैं, पर प्रतिफल के रूप में उनकी महत्ता नगण्य ही कही जाएगी। दूसरी ओर गुह्नोवेत्ताओं का इस संदर्भ में सुनिश्चित दावा है कि ऐसा कर सकना सम्भव है। देखना यह है कि उक्त दावा कितना ठोस साबित होता है।
यों देह का निष्प्राण हो जाना शरीरशास्त्र की दृष्टि में मरना कहलाता है, किन्तु अध्यात्म-विज्ञान उस स्थिति को भी मुर्दे की श्रेणी में रखता है, जहाँ भावी उमंग और उत्साह तिरोहित हो जाते हैं। इसे जिन्दा मुर्दा कहा गया है। एक मुर्दा वह है, जो कब्र में सड़ने -गलने के लिए पड़ा रहता है, दूसरा वह, जो जीवितों की तरह हाथ-पाँव तो चलाता है, क्रिया तो करता है, पर सब कुछ यंत्रवत। इन्हें न तो सही-सही जीवित कहा जा सकता है, न ठीक-ठीक मृत ही। इनको अर्द्धजीवित-अर्द्धमृतक कहना ही उचित होगा।
अफ्रीकी देश हैती की ‘ आर्टिबोनाइट घाटी’ में ऐसे मुर्दे वर्षों से देखे जाते रहे हैं। यों अध्यात्म विज्ञान के तथाकथित ‘मृतकों’ से आर्टिबोनाइट घाटी के मुर्दे एकदम भिन्न हैं, किन्तु दोनों की प्रकृति लगभग समान है। जनश्रुति है कि यहाँ के ओझा और ताँत्रिक कब्र से खोदकर निकाली कई लाशों में गुलाम आत्माओं का प्रवेश कराकर उनसे तरह-तरह के काम करवाते हैं। ये कार्य निजी भी हो सकते हैं। ये कार्य निजी भी हो सकते हैं और दूसरों कि निमित्त भी उनसे खेती भी करायी जा सकती है और खदान भी खुदवाई जा सकती है। मार्गों को साफ कर सकते हैं और उसमें पहाड़ा खड़ा करना भी उनकी क्षमता के अधीन है। कुल मिलाकर वे अपने मस्तिष्क के अज्ञानवर्ती होते हैं और आदेश मिलते ही वे यंत्र की तरह कार्य करने में जुट पड़ते हैं। इसमें न तो किसी प्रकार की सुविधा-असुविधा कोई अड़चन डाल पाती है न कार्य की विशालता-दुरूहता। इस प्रकार के चलते-फिरते मुर्दे वहाँ के स्थानीय बोली में जाम्बी कहलाते हैं, एक समय में वहाँ के वे अजीबोगरीब जाम्बी इतने चर्चित हुए थे कि कई देशों ने इन पर हिट फिल्ते बनायी। हॉलीवुड में भी इस कथानक पर अनेक चलचित्र बने, जिनमें ‘व्हाईट जाम्बी’ ‘किंग ऑफ जाम्बीज़’ तथा ‘ फ्रैंकस्टीन मास्टर’ प्रसिद्ध है।
आरम्भ में हैती के जाम्बी कपोल-कल्पना भर माने जाते थे, किन्तु सन् 1966 में वहाँ की आर्टिबोनाइट घाटी में जब एक ऐसी महिला निरर्थक विचरण करती देखी कई, जिसकी मौत साठ वर्ष पूर्व हो चुकी थी, तब धूम मच गई। फेलिसिया मेण्टर नामक यह महिला एक फिल्म कलाकार थी, जोरा हर्स्टन से उसकी गहरी दोस्ती थी। यह एक नृतत्ववेत्ता थी। फिल्म शूटिंग दौरान एक दुर्घटना में वह घायल हो गये, जिसके फलस्वरूप सन् 1929 उसकी मृत्यु हुई। यह सारी घटना हर्स्टन के समक्ष ही हुई थी। जब वह जख्मी हुई, तब भी जोरा हर्स्टन वहाँ मौजूद थी और जब उसने अस्पताल में अन्तिम साँस ली उस समय भी वह वहीं थीं। दफनाने की क्रिया भी उसके सामने सम्पन्न हुई, इसलिए उसकी मौत के सम्बन्ध में वह एक दम निर्भ्रान्त थी।
एक बार जोरा अपने साथियों के साथ उक्त घाटी के वनवासियों की जीवन-शैली का अध्ययन करने के उद्देश्य से वहाँ पहुँची। वह एक कबीले के लोगों से मिलने के उपराँत घाटी के दूसरे किनारे पर बसे दूसरे कबीले के लोगों से मिलने जा रही थीं कि सामने से आती निर्वस्त्र फेलिसिया मेण्टर को देख हक्का-बक्का रह गयी उसकी समझ में यह तनिक भी नहीं आया कि मरने के इतने वर्ष बाद वह वहाँ उस स्थिति में कैसी घूम रही थी? उसने इतना अवश्य महसूस किया कि उसकी आँखों में एक अजीब सूनापन है। ऐसा उसने इससे पूर्व फेलिसिया के चेहरे पर कभी नहीं देखा था। उसे इस बात पर भी आश्चर्य हुआ कि उसकी दृष्टि जोरा पर पड़ने के बावजूद भी उसमें किसी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। वह असमंजस में थी कि कही उसे धोखा तो नहीं हुआ? फेलिसिया के पीछे-पीछे थोड़े फासले पर एक पुरुष चल रहा था। उसने उससे उस स्त्री का परिचय पूछा। व्यक्ति ने बताया कि वह एक जाम्बी है, जिसका मालिक वह स्वयं है। इसके पश्चात् उसने जाम्बी स्त्री के निर्जीव शरीर का प्राप्तिस्थान और फिर उसके जाम्बी बनाने की प्रक्रिया का सविस्तार उल्लेख किया। अब जोरा की दुविधा समाप्त हो गयी। उसे इस बात का भरोसा हो गया कि वह नग्न नारी उसकी मित्र फेलिसिया ही है। चर्चा के दौरान ताँत्रिक ने यह रहस्योद्घाटन भी किया कि जाम्बी में सोचने समझने की शक्ति नहीं होती। मालिक के इशारे पर वह यंत्रवत् कार्य करते हैं। कदाचित इसी कारण जोरा को देखकर भी उसने किसी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई थी।
इस घटना के उपराँत जोरा ने वहाँ के जाम्बियों का अनेक वर्षों तक गहराई से अध्ययन किया एवं इनके निष्णातों से इस सम्बन्ध में गहन चर्चा की। इसके बाद इस विषय पर एक पुस्तक लिखी, नाम था दि जाम्बीज़ फैक्ट आँर फिक्शन ‘। उक्त रचना में उसने उन सभी तथ्यों और घटनाओं का वर्णन किया है, जिन्हें उनने स्वयं अपने आँखों से देखा था। एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा है कि एक बार क्लेरिना क्लेमोण्ट नामक एक महिला का निधन अतिशय रक्तस्राव के कारण गोनेब अस्पताल में हो गया। परिजनों ने कब्र में दफना कर उसे अन्तिम विदाई दी। देहान्त के करीब दो वर्ष पश्चात एक दिन अचानक वह बड़ी विचित्र हालत में अपने घर में प्रकट हुई सभी उसे भूत समझकर भाग खड़े हुए। बाद में वह मकान में इधर-उधर कुछ समय तक निरुद्देश्य घूमने के उपराँत जैसे आयी थी वैसे ही चली गयी जब उसकी कब्र खोदकर देखा गया तो उसकी लाश गायब थी अब उसके सम्बन्धियों को यह विश्वास हो गया कि वह क्लेरिना का प्रेत नहीं वरन् जाम्बी था।
एक अन्य घटना के बारे में वे लिखती हैं कि हैती के अल्बर्ट श्वाइत्जर अस्पताल में एक युवक फेरियों नार्सिस अपने गुर्दे का इलाज करा रहा था। चिकित्सकों ने उसकी तकलीफ का कारण गुर्दे का पथरी का होना बताया और उसकी सर्जरी कर दी। ऑपरेशन सफल रहा। पथरी निकाल ली गयी, पर असावधानीवश उसमें संक्रमण हो गया, जो धीरे-धीरे बढ़ता ही गया। एक गुर्दा पहले ही खराब हो चुका था। अब दूसरे में संक्रमण हो जाने से अकस्मात् उसका देहान्त हो गया। एक वर्ष पश्चात् उसके माँ-बाप सहित अनेक लोगों ने उसे पागलों की भाँति इधर-उधर भटकते देखा। बाद में ज्ञात हुआ कि उससे ईर्ष्या रखने के कारण उसके चचेरे भाई ने उसे एक सयाने का गुलाम बना दिया।
40 की शताब्दी में ग्लेरियों फर्नाण्डों का जाम्बी काफी चर्चित हुआ था, वह अक्सर लोगों के घरों में घुसकर मनमानी करने लगता था। उसका चेहरा एकदम पीला और आंखें श्वेत थीं। लोग उसकी भयानक मुखाकृति से भयभीत होकर भाग खड़े होते थे। कहते हैं कि एक बार रात्रि में वह किसी के घर में घूस गया। मालिक ने उसे समझ कर पकड़ लिया और उसी खूब पिटाई की, किन्तु जब इतनी मार के बाद भी उसके मुँह से कोई शब्द नहीं निकला, तो मालिक को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने बत्ती जलायी, तो उसे देखते ही एक भीषण चीख साथ वह बेहोश हो गया। जब होश आया तो जाम्बी जा चुका था। कहा जाता है कि इनके इस प्रकार के कार्य भी ओझाओं से प्रेरित होते थे। वह अपनी इच्छा से कुछ भी नहीं करते। ओझा यदि चाहें तो इनके माध्यम से वह किसी को भी परेशान कर सकता है।
जोरा हर्स्टन ने अपने कृति में एक बालक जाम्बी का रोचक विवरण प्रस्तुत किया है। ब्रॉयन अलर्क नामक इस बालक के असामयिक निधन के बाद जब उसकी काया को पृथ्वी के सुपुर्द किया गया, उस वक्त उसकी उम्र 15 वर्ष थी एवं वह नवीं कक्षा का छात्र था। दूसरे दिन रात के अंधेरे में तांत्रिकों ने उसकी मृत देह कब्र में से निकाल ली और उसमें किसी गुलाम आत्मा को प्रविष्ट करा दिया, फिर बच्चों की स्कूली पोशाक पहनाकर उसे परतंत्र बनाने वाले लोगों ने विद्यालय भेज दिया वहाँ बालक की मृत्यु के सम्बन्ध में किसी को कुछ ज्ञात नहीं था। स्कूल पहुँचते ही उसने सहपाठियों कान उमेठने शुरू कर दिये। सभी उसके इस व्यवहार से क्षुब्ध थे। इतना शाँत लड़का आज ऐसी धृष्टता क्यों कर रहा है, उनकी समझ में नहीं आया। कईयों ने तो पिटाई कर दी, फिर भी उसके आचरण में कोई परिवर्तन नहीं आया। उसके मित्र यह महसूस कर रहे थे कि आज उसका चेहरा बिल्कुल सूखा-सूखा एवं पीला प्रतीत हो रहा है तथा उसका व्यवहार एकदम याँत्रिक जैसा है। इसके अतिरिक्त वे और कुछ अंदाज नहीं लगा सके। दूसरे दिन वह कक्षा में तनिक जल्दी पहुँच गया। इसके बाद जो कोई अन्दर आता, उसी के साथ मारपीट शुरू कर देता। शिकायत अध्यापक तक पहुँची। उन्होंने विद्यार्थियों की मदद से हाथ पैर बंधवा कर कक्षा के एक कोने में डाल दिया और पिता को सूचित किया। वहाँ ब्रॉयन को सचमुच देखकर उसके पिता के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वे मुर्दों पर कब्जा करने के प्रसंग से भली भाँति अवगत थे। अतः वहाँ से सीधे कब्रगाह पहुँचे, ब्रॉयन की कब्र खोदी, देखा खाली है। उसका संदेह पक्का हो गया कि किसी ने उनके मृत लड़के को जाम्बी बना लिया। स्कूल आकर शिक्षकों को इसकी सूचना दी। जाम्बी बालक को मुक्त कर दिया। उसके बाद से वह फिर कभी स्कूल नहीं आया।
अमेरिका के मूर्धन्य जादू विद्या विशारद अल्फ्रेड मेट्राँक्स ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘दि एग्जोर्सिजम’ में एक घटना की चर्चा करते हुए लिखा है। एक बार मार्विन मोनरो नामक एक इंजीनियर कार से न्यूयार्क जा रहा था। दुर्भाग्यवश रास्ते उसकी कार बिगड़ गयी। वह इलाका लगभग जनशून्य था। एक्के-दूक्के मकान ही कही-कही थे। थोड़ी देर में मोनरों के पास एक वृद्ध आया और उसे अपने मकान में ले गया तथा अपने नौकर को निकटवर्ती शहर में किसी मैकेनिक की तलाश में भेजा मोनरों मृत आत्माओं की गुलामी के बारे में विश्वास नहीं करता है। वह वृद्ध सयाने से यह बात छुपी न रह सकी। उसने माह पूर्व मरे अपने अभिन्न मित्र सेलेस्टीन के बारे में पूछा। वह कुछ बोल पाता इसके पूर्व ही वृद्ध ने हाँथ हवा में लहराया सेलेस्टीन की आत्मा आज्ञाकारी सेवक की तरह बिना एक पल भी गवांए वहाँ उपस्थित हो गयी। यह देख मोनरो हतप्रभ रह गया। उस वृद्ध ने बताया कि सेलेस्टीन की यह आत्मा उसके कब्जे में है और उससे कहीं भी, कभी भी किसी प्रकार का कार्य लिया जा सकता है। उसने यह बताया कि यह अशरीरी आत्मा हैं, पर इसे किसी दूसरे के मुर्दे शरीर में प्रविष्ट कराकर भी उससे तरह-तरह के काम कराये जा सकते हैं, किन्तु शरीर युक्त जाम्बी की तुलना में अशरीरी आत्मा रखना अधिक सरल और सुविधाजनक है, ऐसा उसका निजी मत् था। कारण बताते हुए उसने कहा कि दोनों से कार्य एक जैसे लिये जा सकते हैं, पर जाम्बी कलेवरयुक्त होने के कारण उसे रखने की समस्या सदा बनी ही रहती है। देयविहीन प्रेम आत्माओं के साथ यह कठिनाई नहीं होती।
हैती के चलते-फिरते मुर्दे जग विख्यात हैं। वहाँ के घुमंतू मुर्दों का इतिहास जानने के लिए हैती का इतिहास जानना जरूरी है। ज्ञातव्य है कि इसी छोटे से देश की खोज सन् 1492 में कोलंबस ने की थी। उस समय वहाँ स्पनी और पुर्तगालियों का वर्चस्व था। दो शताब्दी तक इन जातियों ने हैति को जमकर लूटा तत्पश्चात् सन् 1697 में फ्राँस में इस पर अधिकार कर लिया। फ्राँसीसी उपनिवेश ने वहाँ के मूल निवासियों और अफ्रीकी गुलामों पर बहुत कहर बरसाये। ‘ मैरुन ‘ नाम से जाने-जाने वाले इन गुलामों पर कहर हद दर्जे से भी पार कर गया। इससे बचने के लिए मौका पाते ही मैरुन वहाँ से भाग निकल के और हैती के सघन जंगलों में शरण लेते, इन भगोड़े गुलामों में मैकेण्डल नामक एक गुलाम था फ्राँसीसी सैनिकों ने उस पर मरमांतक जुल्म ढाये थे। अब वह उनसे बदलना लेना चाहता था, वह गुह्यविद्या का जानकार था एवं उसके माध्यम से मुर्दों को प्रेम आत्माओं के वशीभूत करना जानता था। यह विद्या उसने अन्य अनेक साथियों को सिखा दी यही से हैती के घुमंतू मुर्दों की गाथा आरंभ होती है। इसके पश्चात् फ्रांसीसी सैनिकों में से जो कोई मरता रात के अंधेरे में ये गुलाम उसकी मृत काया को कब्रिस्तान से चुरा लाते और अपना जाम्बी बना लेते। 100 वर्षों तक यही होता रहा, फलस्वरूप वहाँ के जंगलों में मृत सिपाहियों के मुर्दे बड़ी संख्या में चलते फिरते नजर आने लगे। फ्रांसीसी उन्हें मरने वालों के प्रेम समझते रहे और इस प्रकार अंत तक सच्चाई से अनभिज्ञ बने रहे।
यों विज्ञान इन प्रसंगों को प्रमाणिक तो नहीं मानता पर मरने के बाद फिर से जीवित होने की संभावना से सर्वथा इनका इन्कार भी नहीं करता। स्वयं विज्ञान देवता भी इस प्रकार के प्रयास में संलग्न हैं, जिसमें मृत्यु के बाद व्यक्ति को पुनर्जीवित किया जा सके। समझा जाता है कि टैक्सास में ह्यूस्टन में ह्यूस्टन स्थित नासा के लायडन बी. जॉनसन स्पेस सेण्टर में अनेक मानीकाया निष्क्रिय अवस्था में विशेष प्रकार से निर्मित धात्विक खोलों में लम्बे काल के उपरान्त फिर से जीवित हो उठने के इन्तजार में सुरक्षित बन्द पड़ी हुई है। कहा है कि ये उन लोगों के शरीर हैं, जिन्होंने स्वेच्छापूर्वक इस प्रयोग के लिए स्वयं को प्रस्तुत किया। मुर्दे की तरह गहरी सुषुप्ति में पड़े हुए ये शरीर वर्षों बाद पुनः जिन्दा हो सकेंगे। या नहीं, यह कहना अभी ठीक नहीं है।
वैसे हैती की घटनाओं को वैज्ञानिक कोई जादू-चमत्कार नहीं मानते, इसे एक विशुद्ध वैज्ञानिक प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। वहाँ के मुर्दों पर हुए अनुसंधान में अनेक लाशों में धतूरे का अंश पाया गया है। इसके अतिरिक्त बुफो मैरीनस नामक मेंढक तथा कुछ जहरीली मछलियों के विष पाये गये हैं। धतूरे को हैती में ‘जाम्बीज कुकुम्बर’ अर्थात् ‘प्रेत ककड़ी ‘ कहते हैं। इससे प्रतीत होता है कि धतूरे का प्रयोग इस प्रक्रिया में होता हो।
वहाँ के मुर्दों का लम्बे समय तक गहन अध्ययन करने वाले अमेरिकी शरीरशास्त्री एल. हेफलीक अपनी शोध का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए अपनी कृति ‘दिं लिविंग डेड’ में लिखते हैं कि धतूरे और मेढ़क के विष से मनुष्य के शरीर और मस्तिष्क कदाचित इतनी गहरी निष्क्रियता की दशा में पहुँच जाते होंगे कि साधारणतः लोग इसे मृत मान बैठें और शरीर को दफना दें। इन्हीं शरीरों को निकालकर वहाँ के तथाकथित ओझा उन्हें पुनः होश में ले आते होंगे। होश लाने की प्रक्रिया के सम्बन्ध में वे लिखते हैं कि सम्भव है उनके पास कोई ऐसी औषधि हो, जिसके प्रयोग से वे उनकी मूर्च्छा को दूर करने में सफल हो जाते हों, पर ऐसा करने से पूर्व व्यक्ति को जहर देकर मृत्युतुल्य मूर्च्छा की स्थिति लाना आवश्यक है। जो वास्तव में ही मर गये हों, उनका जाम्बी तैयार कर सकना सम्भव नहीं। अतएव यह सुनिश्चित है कि वहाँ के गुनी जिनका जाम्बी निर्मित करना चाहते होंगे, उन्हें परोक्ष रूप से उपरोक्त मूर्च्छाकारक पदार्थ अवश्य खिलाते होंगे, लेकिन हेफीक यह बता पाने में असमर्थ रहे कि मूर्च्छा टूटने के पश्चात् वे ओझों के वशवर्ती गुलाम क्यों व कैसे हो जाते हैं? उनकी स्वाभाविकता समाप्त किस प्रकार हो जाती है और वे यंत्रवत क्यों बन जाते हैं। व्यक्ति यदि मूर्च्छा से पूर्ण स्वस्थता की स्थिति में लौटता है, तो वह किसी का गुलाम बनकर क्योंकर रहना चाहेगा और यदि अर्द्धमूर्च्छा की अवस्था में है, तो उससे निर्देशों का पालन करा पाना सम्भव नहीं। हैती के मुर्दे निर्देशों का सही-सही पालन भी करते हैं और चलते-फिरते भी हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अर्द्धमूर्च्छित कैसे कहा जाए? स्पष्ट है-यह प्रकरण अभी रहस्य के आवरण में ढँका है ओर इस पर से पर्दा उठना अभी शेष है।
इस संदर्भ में एक सम्भावना यह भी व्यक्त की जा रही कि यह ‘ सोमनाबुलिज्म रोग’ (नींद की चलने की बीमारी) का ही एक अभिनव संस्करण है, जिसमें मस्तिष्क स्थायी निद्रा की दशा में बना रहता है और व्यक्ति क्या कुछ कर रहा है, उसे होश ही नहीं होता। इस अवस्था में यदि वह दूसरे के आदेश-निर्देशों का रोबोट की तरह पालन करने लगे, तो कोई आश्चर्य नहीं, किन्तु यह एक सम्भावना मात्र है। इससे सत्य-तथ्य की जानकारी नहीं मिलती।
गुह्यविज्ञान भौतिक विज्ञान के आगे की कड़ी हैं। उसके इच्छित कार्य करा लेना कोई बड़ी बात नहीं शरीर जितना मजबूत होगा, उसकी शक्ति उतनी ही बढ़ी-चढ़ी होती है। कमजोर काया पहलवानों जैसा काम कहाँ कर पाती है? दोनों की अपनी-अपनी सीमाएँ और क्षमताएं हैं। पदार्थ विज्ञान की पहुँच सिर्फ पदार्थ स्तर तक है, अस्तु, वह भौतिक संसार की उन्नति-प्रगति पर विचार करे और गुह्यविज्ञान को पदार्थों के रहस्यमय एवं गूढ़ पक्ष पर शोध-अनुसंधान करने दे। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में अपने-अपने ढंग का प्रयास करें, तभी कोई कहने योग्य सफलता मिल सकती है इससे कम में नहीं।
श्री गुरुगोविन्द सिंह जी महाराज के पास खूब अशर्फियाँ थीं, खजाना था फिर भी वह यवनों से युद्ध होते समय अपने लड़ाकू शिष्यों को मुट्ठी भर चने देते थे। एक दिन उन शिष्यों में से एक शिष्य ने श्री गुरुगोविन्द सिंह जी की माताजी से जाकर कहा कि माताजी हमें यवनों से लड़ना पड़ता है और गुरुगोविन्द सिंह जी के पास अशर्फियां ,खजाने है फिर भी वह हमें एक मुट्ठी चने ही देते हैं और, लड़वाते हैं। माताजी ने श्री गुरुगोविन्द सिंह जी को अपने पास बिठाकर कहा कि- पुत्र, यह तेरे शिष्य तेरे पुत्र के समान हैं फिर भी तू इन्हें एक मुट्ठी चने ही देता है, ऐसा क्यों करता है|
श्री गुरुगोविन्द जी ने माताजी को उत्तर दिया- माता क्या तू अपने पुत्र को कभी विष दे सकती है?
माताजी ने कहा - नहीं।
गुरुगोविन्द सिंह जी ने कहा-माता मेरे यहाँ पर जो अशर्फियां हैं, खजाने हैं वह इतने पवित्र नहीं हैं, उनके खाने से इनमें वह शक्ति नहीं रहेगी। जो मुट्ठी भर चने खाने से इनमें शक्ति है वह फिर न रहेगी और फिर यह लड़ भी नहीं सकेंगे।
बीस अँगुलियों की कमाई का, धर्म उपार्जित, ईमानदारी से प्राप्त किया हुआ अन्न ही मनुष्य में सद्बुद्धि उत्पन्न कर सकता है। जो लोग अनीतियुक्त अन्न ग्रहण करते हैं उनकी बुद्धि असुरता की ओर ही प्रवृत्त होती है।
परिश्रम और ईमानदारी के साथ कमाये हुए अन्न से ही शुद्ध बुद्धि हो सकती है और तभी भगवद् भजन, साधना, कर्तव्यपालन, लोकसेवा आदि सात्विक कार्य हो सकते हैं।
अध्यात्म में शुद्ध, लोक सेवा आदि सात्विक आहार की क्या भूमिका होती है, इस संदर्भ में उक्त प्रसंग जाना जा सकता है।
-साधना से सिद्धि-1 वांग्मय क्रमाँक 5 से
उपासना-गृह में अखण्ड दीप प्रज्ज्वलित था। वर्षा से निरन्तर जल रहे इस दीपक की ज्योति इस साधक को आत्म ज्योति बन चुकी थी, जो ब्रह्ममुहूर्त के इन क्षणों में इस सिद्ध ज्योति के सम्मुख ध्यानस्थ। उसके चैतन्य में सर्वमयता स्थिर हो गयी थी। अहम् इदं के मध्य जो आच्छादित था, दूर हो गया। साधक के कण-प्रतिकण में अणु गैस परमाणु में व्याप्त अव्यक्त सुनाई पड़ने लगा। कभी तो भेरी बजती, कभी मृदंग, कभी वीणा, कभी शंख ध्वनि होती और कभी सब मिलकर वाद्ययन्त्र से अलौकिक स्वर उपजते। उसे अपनी चेतना सर्वत्र अणु-परमाणुओं के विद्युत कणों के नृत्य और घूर्णन अनुभव होने लगे।
ध्यानस्थ योगी के पिण्ड में अस्यकान्मणियाँ सक्रिय हो गयीं। उसके सहस्रार चक्र में कण-कोशिकाएं और कोष्ठक विद्युत की सतत् गति से इंद्रियातीत अनुभवों, दृश्यों, सुगन्धों, स्पर्शादि की सृष्टि करने लगे। उसके हृदय कमल के कुछ ऊपर स्थित सौषुन्न ज्योति मिलती और पृथक हो जाती। फिर से सूक्ष्म होकर सिमटकर बिन्दु रूप हो जाती और वे ज्योति बिन्दु तथा ध्वनि उस साधक के चिदाकाश में नक्षत्रों ओर खद्योंतो से चमकते। उसे एक बारगी समूचा ब्रह्माण्ड अपने भीतर विद्युत बिन्दु और अनाहतनाद के रूप में अनुभव होने लगा।
उसकी चेतना अब मूल नाद और बिन्दु के रूप में क्रीड़ारत हो गयी थी और भेद-ग्रन्थि खुल गयी थी। कुण्डलिनी अब मधुर चित्रिणी या सुषुम्ना में विचर रही थी, यह मधुर कूँजन करने लगे, चिन्मय शून्य रूप सिक्ख का साधारण कर वह कुल शक्ति स्वाभायमान हो गयी और साधक अपनी साधुता के उच्चतम स्वपान पर कैलाश शिखर पर जा बैठा।
दिव्य दर्शन के इस क्रम अचानक उसकी चेतना में एक आह्म्रन गूँजने लगा। अंतर्चक्षुओं के सामने हिमालय के पर्वत शिखरों की श्रृंखला उभरने लगी। इस श्वेत धवल शिखरों के मध्य एक ज्योति पुंज प्रकट हुआ। जिसने शनैः-शनैः एक महायोगी का रूप ले लिया। इस महायोगी की दिव्य छटा उसकी चिर-परिचित थी। यही तो थे, उसका मार्ग दर्शक, जन्म-जन्मान्तर के पथ-प्रदर्शक उसकी श्रद्धा-भक्ति का साकार विग्रह, इसके हृदय धन दिव्य गुरु इस छवि को निहारते हुए उसकी समग्र चेतना उसके चरणों में लीन होने के लिए आतुर-आकुर हो उठी।
साधक की इन भावनाओं की प्रतीति उन दिव्य देहधारी को हुई। उनके होठों में हल्का-सा, किन्तु वात्सल्य पूर्ण भावों से भरा-स्मित झलका। इसी के साथ वह कुछ कहने को हुए, उनके स्वर साधक की समूची चेतना में समग्र सत्ता के प्रत्येक अणु-परमाणु में गूँजने लगे-‘ आज तुम्हारी साधना पूर्ण हुई,वत्स! अब तुम्हें लोक सेवा के महाकार्य का शुभारंभ करना है। इसके मार्ग दर्शन के तुम्हें देवात्मा हिमालय के आँगन में आना होगा। हिमालय के हृदय-क्षेत्र में पहुँचकर तुम वहाँ निवास करने वाले सप्तऋषि, दिव्यदेह समर्थ सत्ताओं और सृष्टि की संचालक देव शक्तियों के दर्शन कर सकोगे। उनका अनुग्रह और आशीष ही तुम्हें अपने कार्य के लिए बल देगा, तुम्हें समर्थ बनायेगा। “
“ ध्यान रहे वत्स, ऋषि सत्ताओं का निवास स्थलीय, हिमालय का यह दिव्य क्षेत्र सब तरह गुह्य और अलौकिक है। सामान्य मानव तो क्या अतिश्रेष्ठ एवं समर्थ साधक भी यहाँ तक नहीं पहुँच सकते। इस दिव्य क्षेत्र के प्रवेश द्वार तक तुम पहुँचने की तैयारी करो, शेष मार्गदर्शन तुम्हें वही मिलेगा। अब विलम्ब न करो आयुष्मान्! अपनी यात्रा प्रारम्भ करो “ इन शब्दों के साथ ही गुरुमूर्ति ओझल होने लगी। अन्तः की गहराइयों में डूबी चेतना शनैः शनैः बहिर्मुख होने की ओर अग्रसर हुई। कुछ पलों के बाद नयन उन्मीलित हुए। सामने अखण्ड दीपक की लव का मन्द-मन्द प्रकाश उपासना गृह की इस छोटी-सी कोठरी में हिमालय का संचार कर रहा था। एक अलौकिक सुगन्ध और अद्भुत आभा अभी भी वहाँ बिखर रही थी। साधक ने उस सिद्ध ज्योति को अपने समर्थ गुरु की प्रत्यक्ष मूर्ति मान बड़ी भक्तिभाव से प्रणाम किया और उठ खड़ा हुआ। आखिर अब उसे अपनी हिमालय-यात्रा की तैयारी जो करनी थी। हिमालय-यात्रा के लिए अपने गुरुदेव का आदेश पाकर साधक का मन अतिशय पुलकित और प्रफुल्लित था। उसके मुख पर छायी प्रसन्नता की दीप्ति से ऐसा लग रहा था, मानव उसके सर्वस्य मिल गया।
वेदों-शास्त्रों पुराणों में पढ़े-सुने गये ऋषिवाणी के दर्शन और उनके अनुग्रह-आशीष की बात उसे रोमाँचित कर रही थी। गृहजनों एवं परिजनों को उसने अपनी हिमालय यात्रा की बात बड़ी हिचकिचाहट से बताई। उसे कहीं मन के किसी कोने में आशंका हो रही थी कि शायद ये सब मना कर दें। परन्तु आज तो जैसे सबके सब किसी अदृश्य शक्ति के सम्मोहन में बन्धे थे। उन्होंने ने आज्ञा ही नहीं दी, प्रसन्नता पूर्वक यात्रा की तैयारी में अपना सक्रिय योगदान दिया। गाँव-पुर-नगर छोड़ते हुए उसने अतिशीघ्र देव आत्मा हिमालय के हृदय क्षेत्र के प्रवेश द्वारा पर कदम रखे। उत्साह के अतिरेक में उसे यही ने पता चला वह कितने समय में यहाँ आ पहुँचा है। बस वह ध्यान की गहराइयों में देखी गयी दृश्यावली को अपने सामने जीवन्त पाकर अभिभूत हो गया। अपने बढ़ते पावों के साथ उसने देखा कि सामने एक पहाड़ी गाँव है। गाँव यानि कि भूरे रंग की कुटियों का समुदाय। तीन हजार गज से भी अधिक ऊंचाई पर हिमाच्छादित शिखरों से घिरी हुईं यात्रियों की पर्वतीय मार्ग स्थित अन्तिम धर्मशाला।
बस्ती के कुछ दूर नदी के किनारे एक साधु खड़ा था। अपने पर्णकुटी के पास खड़ा व शायद प्रातः अरुणित सौंदर्य के दर्शन कर रहा था। ढलानों पर हरियाली फैली थी। ऊंचे देवदारों वृक्षों के जंगल में 1-2 ग्रामीण जन लकड़ियां बटोर रहे थे। कुछ पक्षी इधर-उधर चहकते, दिखायी-सुनायी दे रहे थे। नदी का प्रवाह अच्छी तरह से सामने था। उपत्यिका में स्थान-स्थान पर विविध आकार के शिला प्रखण्ड बिखरे पड़े थे। हवा शीतल स्निग्ध और उत्साहवर्धक थी। साधु ने उगते हुए सूरज की दिशा में अपने मुख को किंचित ऊपर उठाये हुए हाथ जोड़ दिये। सूरज-अभ्यर्थना के वैदिक स्वरों को गूँज-‘ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्’ के अक्षरों के रूप में पर्वत शिखरों ध्वनित हो उठी।
ऊषाकाल समाप्त हुआ। प्राची के शिखरों पर सूर्योदय की स्वर्णिम आभा फैल गयी। अपनी पर्णकुटी से वह महिमावन्त साधु नदी की ओर चल पड़ा। शायद उसे किसी के आगमन की प्रतीक्षा थी। आत्म निर्भर सबल और ऋजु-पदन्यास उसकी गरिमा के परिचायक थे। तपःपूत ऋषि के अलावा ऐसी उन्नत धारण-शक्ति कहाँ सम्भव? ऊंचा कद विशालभाल और कमर तक पहुँचता लहराता केश-कलाप। ज्योतिर्मय कृश शरीर, शाँत और प्रसन्न मुद्रा पर फैला हुआ तेजोमय आनन्द दर्शन मात्र से सारी शंकाओं का समाधान करता हुआ अनिवर्चनीय शाँत भाव। आयु का अनुमान लगाना कठिन परन्तु शारीरिक गठन से लगता था कि आयु साठ के आस-पास हो।
नदी से अपने जलपात्र को पूर्ण करके ऋषि अपनी कुटी में लौट आए। जलपात्र एक कोने में रखकर दरवाजे से झाँकने लगे। क्षणमात्र उनके चेहरे पर एक विशेष उल्लास का भाव उमड़ आया। कुटी से बाहर आकर देखा कि झोपड़ी के पीछे की ढलान पर एक युवक उतर रहा है। थोड़ी ही देर में आगन्तुक नजदीक आ पहुँचा। बड़े आदर-भाव से लेकिन विस्मय के साथ उसने ऋषि के चरण-कमलों पर मथा टेक दिया। मुँह न खोलते हुए ऋषि ने स्वीकृति का हुँकार भर दिया। आगन्तुक खड़ा हो गया। उसकी आंखें चमक रही थीं, होंठों पर मधुर मुसकान थी। मुख-मण्डल निखर रहा था।
प्रदीर्घ पैदल प्रवास की थकान उनके चरणों में माथा रखते ही पल भर में लुप्त हो गयी और वह किंचित् विह्वल भाव से थी। मौन भंग न करते हुए ऋषि एक साफ-सुथरे पत्थर पर बैठ गए। उन्होंने नवागत को सामने के शिलाखण्ड पर बैठने का संकेत किया। उसके बाद शब्द सुनने को मिले।
तो आयुष्मान्। तुम आ पहुँचे। ऋषि का संतोष शब्दों में प्रकट हो रहा था।
गुरुदेव! आप जानते थे कि मैं आ रहा हूँ।
साधक के इन स्वाभाविक प्रश्नों का उत्तर देना ऋषि को आवश्यक नहीं लगा। उन्होंने कहा, पहले स्नान करो। कुछ खाओ और आज दिन भर आराम करो। यह कहकर वे एक ओर चल पड़े। चलते-चलते उन्होंने साधक की ओर स्नेह भरी दृष्टि से देखते हुए कहा, जो जन्म-जन्मान्तर से गुरु और शिष्य रहे हैं, उन्हें कुशल-प्रश्न आदि औपचारिक बातों की आवश्यकता नहीं होती।
गुरु की इस सघन कृपा को स्वयं पर अनुभव कर नवागत के मुखमण्डल पर विस्मय और संतुष्टि के भाव उभर आए। उसका काष्ठ गदगद हो गया। आँखों में आनन्दाश्रु आ गए। अनिवर्चनीय आनन्द से उसने आंखें मूँद लीं। कपोलों पर आँसू झरने लगे। अतीव आदर-भाव से अनायास हाथ जुड़ गये। सहजतया माथा झुक गया। वह अपने को सँभाल नहीं सका और सहसा गुरु के चरणों पर गिर गया। गुरु ने दाहिना हाथ उसके माथे पर रखा और आशीर्वाद देकर धीमी गति से निकल गए।
अनादि और अनन्त काल की गरिमा को संजोता हुआ दिन तालबद्ध गति से आगे बढ़ने लगा। हिमाच्छादित शिखर चमक रहे थे। निरभ्र नीले आकाश में दो कौए एक उपत्यिका से दूसरी तक उड़ते हुए दिखाई दिये। नदी में बहते हुए पानी की ही केवल ध्वनि वाणी सुनायी देती थी। निर्मल पानी उसे आकृष्ट कर रहा था, मंत्र-मुग्ध कर रहा था। स्वस्थ हृदय से प्रकृति के सौंदर्य को समाहित कर लेने का संकेत कर रहा था। मार्गदर्शक के बताए इंगित एक ल् एक करके निबटाता गया। होते-होते दिन ढल गया। संध्या समय की निःस्तब्धता फैल गयी।
अस्ताचल से एक बार दिनपति ने जगती को देखा और उनके विराग की छाया सम्पूर्ण धरातल पर विस्तीर्ण हो गयी। सम्पूर्ण हिमाच्छादित गिरि-शिखर-गौरिकवर्णी वीरांगी संन्यासी के वेश में परिवर्तित हो गये। तरु-वीरुध एवं लताओं ने भी उसी वर्ण को अपना लिया। प्रत्येक शिला रंग गयी उसी रंग में। पक्षियों ने दिशाओं में मंत्रपाठ प्रारम्भ किया और इसी समय गगन से धुनी हुई रुई के समान अस्त होते सूर्य की किरणों में रंगी हिम इस प्रकार गिरने लगी, जैसे आकाश से गेरू की वर्षा हो रही हो। उसने भी इशारे में बताए हुए स्थान पर सोने का उपक्रम किया।
दूसरे दिन उसने वहीं बहते निर्झर में स्नान किया- सन्ध्यावन्दन भी। जीवन में उसने पहली बार ब्रह्मकमल ऐसा, जिसकी सुगन्ध थोड़ी देर में ही नींद कहें या योगनिद्रा ला देती है। देवकन्द वह जो जमीन में शकरकन्द की तरह निकलता है। उस दिन सुबह से ही आकाश में इधर-उधर कुछ मेघखण्ड जमा हो रहे थे, लेकिन उससे सूर्य प्रकाश में आवरण उत्पन्न नहीं हो रहा था और फिर हिमप्रदेश में जितनी मात्रा में मिले उतनी धूप भी अनुग्रह समान थी।
यह दिन भी वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य को निहारने, उसी में परमसत्ता की झाँकी देखने में निकल गया। पता ही नहीं चला कि कब सूरज ढला और रात्रि आ पहुँची। परावाणी में निर्देश मिला-समीपस्थ एक निर्धारित गुफा में जाकर विश्राम करने का। संकेत था-उस रात्रि में गुरुदेव के दर्शन होंगे और सचमुच उस रात्रि को गुफा में गुरुदेव सहसा आ पहुँचे। पूर्णिमा थी। हिमपात भी अधिक नहीं हो रहा था। चन्द्रमा का सुनहरा प्रकाश समूचे हिमालय पर फैल रहा था। उस दिन उसे ऐसा लगा कि हिमालय सोने का है। दूर-दूर तक बर्फ के टुकड़े तथा बिन्दु बरस रहे थे, वे ऐसा अनुभव कराते थे, मानो सोना बरस रहा है। उन महान ऋषि के आ जाने से गर्मी का एक घेरा उसके चारों ओर बन गया, अन्यथा रात्रि के समय इस विकट ठण्ड और हवा के झोंकों में साधारणतया निकलना सम्भव न होता। दुस्साहस करने पर इस वातावरण में शरीर जकड़ सकता था। उसकी आत्मा कह रही थी कि वह पुण्य घड़ी आ गयी, जिसके लिए उसे बुलाया गया था। गुरुदेव ने मौन रहकर ही उसे इंगित किया, और वह चुपचाप उनके पीछे-पीछे चल पड़ा। आश्चर्य! उसे सचमुच महान आश्चर्य हुआ कि उसके पैर जमीन से ऊपर उठते हुए चल रहे थे। आकाशगमन-अंतरिक्ष में चलने की यह सिद्धि उसे अनायास ही गुरुकृपा से प्राप्त हो गयी थी। उसे अनुभव हो रहा था कि उन बर्फीले ऊबड़-खाबड़ हिम-खण्डों पर चलना इस आश्चर्यजनक क्षमता के बिना कठिन ही नहीं शायद असम्भव भी होता।
वह एक साधारण गौरवर्णीय युवक था। अवस्था शायद सैंतीस-अड़तीस की रही होगी। सुन्दर कहा जा सकता। त्वचा में कोमलता के साथ सात्विक तेज की मनोहारी झलक थी। चेहरे पर दाढ़ी हल्की-हल्की बढ़ गयी थी। उससे परिपक्वता का स्पष्ट आभास हो रहा था, केश अधिक बढ़े नहीं थे, तो भी कन्धों को छूने लगे थे। मुखमण्डल को देखकर उसकी पारदर्शी सच्चाई निष्ठा और निग्रह को कोई परख सकता था। होंठों पर सदैव सत्य विराजमान था। लगातार उपवास एवं कठोर तपश्चर्या के बावजूद भी शरीर सुदृढ़ था। कष्ट उठाने से थकावट होते हुए भी वह ओजस्वी था।
अपने मार्गदर्शक के पीछे-पीछे वह काफी समय तक चलता रहा। अद्भुत था, यह चलना भी। उसके पदतल भूमि को स्पर्श न करते हुए आगे बढ़ रहे थे, वह नीचे देखना चाहता था, जिज्ञासा उसे बाध्य कर रही थी, लेकिन वह गर्दन झुका नहीं सका। कोई स्पन्दन शक्ति चमत्कारपूर्ण रीति से उसके देह को अधीन किए हुए थी। वह नित्य की तरह चल रहा था, लेकिन हवा पर शरीर बहुत हल्का-भारहीन लगता था। जैसे-जैसे वह आगे पदन्यास करता था, उसका शरीर तैरता हुआ आगे-आगे जाता था। अचानक उसका शरीर ऊपर की ओर जाने लगा और वह हिमाच्छादित पर्वतों की एक बाद अनेक उत्तुँग शिखरों को पार करते हुए वह दूर तक फैले सुविस्तीर्ण मैदान में अपने गुरुदेव के साथ ही उतर आया।
हिमशिखरों के बीच वह विस्तृत मैदान उसे अद्भुत लग रहा था वहाँ कोई सभा या विचार-गोष्ठी का आयोजन शुरू हो रहा था। श्वेत चमकदार और काफी बड़ी अलग-अलग सात शिलाओं पर सात महर्षि बैठे हुए थे। उन्हीं के पास मखमली भूमि पर अन्य दिव्य देहधारी ऋषि सत्तायें एवं देवशक्तियाँ विराजमान थी। उन सभी की देह से निकलने वाला प्रकाश समूचे वातावरण को उजास से भर रहा था। उसने देखा निरभ्र नीले आकाश में चन्द्रमा के नेतृत्व में सभी सभी तारे धरती और हिमशिखरों पर अपनी ज्योति- धाराएँ उड़ेलने में तत्पर थे। पास ही कहीं सरोवर के पानी कल-कल वातावरण को संगीतमय बना रही थी। और हिमालय के ऊँचे-ऊँचे बर्फ से ढके श्वेत-धवल शिखर-शाश्वत जाग्रत प्रहरी के नाते खड़े थे, पहरा दे रहे थे।
इन दोनों गुरु-शिष्य को देखकर सभी के चेहरों पर एक अनोखी चमक उभर आयी। ऐसा लगता जैसे सभी को इन्हीं की प्रतीक्षा गुरु ने स्फटिक शिलाओं पर बैठे ऋषियों से अपने शिष्य को परिचित कराया ये हैं सप्तऋषि मण्डल के सदस्य-गौतम, भारद्वाज, विश्वामित्र, जमदग्नि, वशिष्ठ, कश्यप, और अत्रि। इन्हीं के मार्गदर्शन एवं नेतृत्व में अन्य दिव्यधारी ऋषिसत्ताएँ एवं देवशक्तियाँ सृष्टि की सूक्ष्म व्यवस्था का संचालन करती हैं। वत्स! यही है हिमालय का यथार्थ दिव्य रूप। यही है वे विभूतियाँ, जिनके कारण पर्वतराज हिमालय का यशोगान होता है।
गुरुवाणी सुनकर शिष्य चमत्कृत एवं कृत-कृत्य था, तभी सप्तऋषियों के समवेत स्वर उसकी चेतना उभरे- वत्स! तुमको हम सभी ने इसीलिए यहाँ बुलाया है। ताकि तुम हिमालय के दिव्य संदेश को मानव में प्रसारित कर सको, उसे सुना सको। यह वही हिमालय है जिसकी गोद में मानव ने प्रथम बार अपनी आंखें खोली हैं। इसी के आँचल की छाँव में मानव सभ्यता की शुरुआत हुई है। यही सबसे पहले वेदमंत्रों के स्वर गूँजे थे। इसी देवात्मा क्षेत्र में वे आविष्कार और अनुसंधान हुए, जिसे मानव को भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिक उत्कर्ष दिया। इसी के आश्रय और सामीप्य से भारतवर्ष में स्वर्गादपि गरीयसी की महिमा पायी थी। भारतभूमि, देवभूमि एवं भारतवासी देवगण के रूप में विश्व विख्यात हुए थे।
परंतु आज से तो ...... आगे कुछ वह संकोचवश कह न सका।
हमें भारत एवं विश्व की वर्तमान परिस्थितियों की जानकारी है आयुष्मान्! नवसृजन के प्रेरक महर्षि विश्वामित्र कह रहे थे, वर्तमान समस्याएँ जो भी हैं एक-दूसरे से गुँथी हैं। एक से दूसरी का घनिष्ठ सम्बन्ध है, चाहे वह पर्यावरण हो अथवा अणु-आयुधों का जमाव, बढ़ती अनीति-दुराचार हो अथवा अकाल-महामारी जैसी दैवी-आपदाएँ। सबसे पीछे इंसान की दुर्बुद्धि काम कर रही है। समाधान तभी सम्भव है जब मानवीय बुद्धि का शोधन हो।
मानवीय बुद्धि का शोधन? उसे महर्षि की बात अटपटी लगी हाँ आयुष्मान्! दूसरे शब्दों में विचारक्रान्ति। जिस गायत्री मंत्र की तुमने वर्षों साधना की है, वह यथार्थ में विचारक्रान्ति का ही मौलिक सूत्र है। मानवीय वृत्तियों एवं विचारों को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करने वाला मंत्र। सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन का कारगर चिंतन समाया है इसमें।
सद्विचारों के साथ सत्कर्म का पाठ पढ़ाने के लिए मानव को यज्ञीय जीवन का मर्म-सन्देश देना होगा। “ महर्षि जमदग्नि का स्वर था- उसे ‘इदं म मम्’ का मर्म समझाना होगा।
परन्तु तर्कप्रवण एवं भोग परायण मनुष्य आज सद्विचारों एवं सद्ज्ञान को किस तरह स्वीकार करने के लिए तैयार होगा। साधक की बात में दम था। वह कह रहा था जब सभी “ यावद् जीवेत्-सुखम जीवेत्’ की रीति- नीति अपनाने में एक दूसरे से होड़ लगाये हों, ऐसे में त्याग की बातें भला उन्हें कैसे समझ में आयेंगी?
उसकी बात से उपस्थित ऋषि समुदाय सोच में पड़ गया। देव शक्तियाँ विराजमान हो गयीं। तब आखिर किस तरह सम्भव है। मानव-समाज का अभ्युदय?
कुछ पलों के अनन्तर सप्तमहर्षियों के मुख पर हल्की-सी मुस्कान थिरक आयी, वे कहने लगे-वत्स! सद्विचारों को उन्नत आदर्शों के साथ जन-जीवन के समक्ष प्रस्तुत करो। अतीत के महामानवों के जीवन को प्रेरणाप्रद घटनाओं का वर्तमान समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुतीकरण होने से जन-साधारण के अन्तः करण में आदर्शवादी मान्यताएं हुलसेंगी। वह उन्हें अपनाने के लिए अग्रसर होगा। सप्तऋषियों के इस विचार-मन्थन से समस्त ऋषि समुदाय एवं देवशक्तियाँ सहमति थीं। सभी को लग रहा था कि अतीत के महापुरुषों महादेवियों के गौरवशाली जीवन-प्रसंगों को देखकर जन भावनाएँ उद्वेलित-आन्दोलित हुए बिना न रहेगी। उन सभी के जीवन में आदर्श-परायणता, कर्तव्यनिष्ठा, राष्ट्रप्रेम, समाज-सेवा के तत्वों की अवश्य जाग्रति होगी।
सप्तमहर्षि उससे कह रहे थे-आयुष्मान्! गायत्री-मंत्र की सतत् साधना एवं गुरु के अनुग्रह ने तुम्हें प्रज्ञापुरुष बनाया है। अब तुम्हारी बारी है-तुम जन-जन की बुद्धि का शोधन करो, उसकी संवेदनाओं को जाग्रत कर उन्हें प्रज्ञापुत्र बनाओ। भावनाओं से ओत-प्रोत शुद्ध-बुद्धि ही तो प्रज्ञा है। ऐसी प्रज्ञावान आत्मायें ही मानव को उज्ज्वलभविष्य की राह दिखायेगी।
अपने मार्ग-दर्शक के साथ स्वयं वह भी इन दिव्य-ऋषियों का अनुग्रह एवं आशीष पाकर धन्य अनुभव कर रहा था। देवी-ऊर्जा से उसका शरीर आभामय हो गया। उसके नेत्रों में पहले से अधिक रहस्यात्मक तेज चमकने लगा। उसका धीर-गम्भीर मुखमण्डल अति तप्त सूर्य के समान चमकने लगा। शीतलता की अनुभूति नष्टप्राय हो गयी। सभी को भक्तिभाव से विह्वल मन से प्रणाम कर, वह अपने दिव्य गुरु के साथ वापस लौट गया।
कुछ ही समय में हिमालय के दिव्य क्षेत्र का प्रवेशद्वार आ गया। उसका गुरु मानो शिखर पर थे। प्रेरक मनः स्थिति में थे। कहने लगे वत्स! आज अलग होने से पहले में प्रास्थानिक संदेश देना चाहता हूँ। विश्वास रखो मानव की आत्मशक्ति अविनाशी है। उसका अमर्यादित विस्तार हो सकता है। उसका वैभव असीम है। एक दिव्य तत्व मानव देह में चेतना उत्पन्न करता है। वह तत्व हमारे अन्दर भी होता है और बाहर भी रहता है। वह शाश्वत परोपकारी रहता है। प्रत्येक व्यक्ति इसके अनुरूप जीवन-यापन कर अपने को वैभव प्रदान करता है और इसके विपरीत जीवनयापन कर अपना विनाश भी स्वयं कर लेता है। अब जाओ और अपने देशवासियों के सामने, समूची मानवजाति के सामने आदर्श महामानवों के प्रेरक चरित्रों को हृदयस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत करो, ताकि वह आत्मविनाश से आत्मसृजन की ओर कदम बढ़ा सके। “ दिव्यगुरु के संदेश को शिष्य ने श्रद्धा से शिरोधार्य किया और उसके कदम हिमशिखरों से जनसंकुल की ओर लौट पड़े।
12 जनवरी 1863 को भारत के उज्ज्वल भविष्य की पहली किरण फूटी थी। स्वामी विवेकानंद के रूप में इसी शुभ दिन भारत के भविष्यत् ने नवजन्म पाया था। स्वामी जी भारतीय पौरुष, मेधा एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष के प्रतीक थे। वे शाश्वत के प्रतिनिधि थे। उन्होंने अपनी गहन अंतर्दृष्टि से भारत का उज्ज्वल भविष्य देखा था। नवयुग के इस ऋषि ने भविष्यवाणी की थी कि इक्कीसवीं सदी में भारत जगद्गुरु एवं आध्यात्मिक गुरु बनेगा। और यह आध्यात्मिकता द्वारा समस्त जगत पर विजय प्राप्त करेगा। धर्म एवं विज्ञान एक हो जायेंगे और यही भविष्य का धर्म होगा। प्रखर प्रतापी मानव-जाति ही एकमात्र जाति होगी। धर्मधरा भारत के सतत् प्रवाहित अध्यात्मिक ज्ञानधारा से सारा संसार आप्लावित हो उठेगा।
भारत सनातन धर्म का देश है। यही वह भूमि है, जो पवित्र आर्यावर्त में पवित्रतम् मानी जाती है। यही वह ब्रह्मवर्त है, जिसका उल्लेख हमारे महर्षि मनु ने किया है। यह वही भूमि है जहाँ से आत्मतत्व की उच्चाकाँक्षा का वह प्रबल स्रोत प्रवाहित हुआ है, जो आने वाले युगों में संसार को अपने बाढ़ से आप्लावित करने वाला है। यह निश्चय ही फिर से उठेगा और ऐसा उठेगा कि दुनिया देखकर दंग रह जाएगी। उस आगत भविष्य के सशक्त स्वरों का कोमल पर स्पष्ट मर्मर अभी से सुनायी देने लगा है। भावी भारत का संदेश वर्तमान भारत के लिए यह मर्मर ध्वनि सबलतर और स्पष्ट होती चली जा रही है। पूर्वाकाश में अरुणोदय हो रहा है, सूर्य उदित होने में अब अधिक विलम्ब नहीं है। कितने ही पर्वत-शिखरों से, कितनी ही हिम-नदियाँ, कितने ही झरने, कितनी जल धाराएं निकलकर विशाल सुरतरंगिणी के रूप में महावेग से समुद्र की ओर जा रही हैं। कितने ही विभिन्न प्रकार के भाव देश, देशान्तर के कितने ही साधु हृदयों और ओजस्वी मस्तिष्कों से निकलकर कितने ही शक्ति-प्रवाह धर्मभूमि भारत में छा रहे हैं। भारतीय गगन में अँधेरा कितना ही घना एवं भयावह क्यों न दिख रहा हो, किन्तु अब उसके हटने एवं घटने में विलम्ब नहीं है।
इस देश का दृश्य रूप आज की परिस्थितियों में कितना ही निराशाजनक क्यों न लग रहा हो, किन्तु इसके अदृश्य संस्कार अभी भी प्रभावी हैं। जिस किसी के पैर इस पावन धरती पड़ते हैं, वह चाहे विदेशी हो अथवा धरती का पुत्र यदि उसकी आत्मा जड़, पशुत्व कोटि तक पतित नहीं हो गयी है, तो अपने आप को पृथ्वी के उन सर्वोत्कृष्ट और पावनतम पुत्रों के जीवन्त विचारों से घिरा अनुभव करता है, जो शताब्दियों से पशुत्व को देवत्व तक पहुँचाने के लिए श्रम करते रहे हैं और जिनके प्रादुर्भाव की खोज करने में इतिहास असमर्थ है।
यह धरती दर्शनशास्त्र, नीतिशास्त्र और आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान की विविध धाराओं की जन्मस्थली है। यहाँ की वायु भी आध्यात्मिक स्पन्दनों से पूर्ण है। यहाँ उन सभी के अनवरत संघर्ष शाश्वत विश्रांति पाते हैं, जो अपने कन्धों से पशुत्व का जुआ उतार फेंकने के लिए प्रयत्नशील हैं। उस समस्त शिक्षा-दीक्षा के लिए यहाँ युग-युग से आह्वान के गान गूँजते हैं, जिसको सुनकर मनुष्य पशुता का जामा उतार सके और जन्म-मरण हीन सदानन्द अमर आत्मा के रूप में आविर्भूत हो सके। यही वह धरती है जिसके सुख का प्याला परिपूर्ण और दुःख का प्याला और भी अधिक भर गया था, अंततः सर्वप्रथम यहीं मनुष्य को यह ज्ञान हुआ कि यह तो सब निस्सार है।
यहीं सर्वप्रथम यौव के मध्याह्न में, वैभव-विलास की गोद में, ऐश्वर्य के शिखर और शक्ति के प्राचुर्य में मनुष्य ने काया की श्रृंखलाओं को तोड़ दिया। यहीं मानवता के इस महासागर में सुख और दुख, शक्ति और दुर्बलता वैभव और दैन्य, हर्ष और विषाद, स्मित और आँसू तथा जीवन और मृत्यु के प्रबल तरंगाघातों के बीच चिरन्त शान्ति और अनुद्विग्नता की घुलनशील लय में त्याग का राजसिंहासन आविर्भूत हुआ। यहीं इसी देश में जीवन और मृत्यु की, जीवन की तृष्णा की और जीवन के संरक्षण के निमित्त किए गये मिथ्या ओर विक्षिप्त संघर्षों की, महान समस्याओं से सर्वप्रथम जूझा गया और उनका समाधान किया गया। ऐसा समाधान, जो ‘ न भूतो न भविष्यति’ है। और यहीं, केवल यहीं पर उस सत्य की उपलब्धि हुई कि जीवन स्वतः भी किसी सत्तत्व की छाया मात्र है।
यही वह देश है, जहाँ और केवल जहाँ पर धर्म व्यावहारिक और यथार्थ था। और केवल यहीं पर पर नर-नारी साथ-साथ कदम से कदम मिलाकर साहसपूर्वक कार्यक्षेत्र में कूदे। यहाँ ओर केवल यहीं पर मानव हृदय इतना विस्तीर्ण हुआ कि उसने केवल मनुष्य जाति को ही नहीं, वरन् पशु-पक्षी और वृक्ष-वनस्पति तक को अपनी आत्मीय भावनाओं में समेट लिया। सर्वोच्च देवताओं से लेकर बालू के कण तक महानतम और लघुतम सभी को मनुष्य के विशाल और अनन्त हृदय में स्थान मिला और केवल यहीं पर मानवात्मा ने इस विश्व का अध्ययन एक अविच्छिन्न एकता के रूप में किया, जिसका हर स्पन्दन उसका अपना स्पन्दन है।
मैं आज अनुभव की अग्रभूमि पर खड़े होकर, अपने को समस्त पूर्वाग्रहों से मुक्त करके अत्यंत विनम्रता के साथ स्वीकार करता हूँ कि आर्यों के ऐ पावन देश! तू महान है। राजदण्ड टूटते रहे और फेंक दिया जाते रहे, शक्ति का कन्दुक एक हाथ से दूसरे हाथ में उछलता रहा, पर भारत में उच्चात्मा से निम्नात्मा तक जनता की विशाल राशि अपनी अनिवार्य जीवनधारा का अनुगमन करने के लिए मुक्त रही है और राष्ट्रीय जीवनधारा प्रबुद्ध गति से प्रवाहित होती रही है। उन बीसियों ज्योतिर्मय शताब्दियों की अटूट श्रृंखला के सम्मुख मैं तो विस्मयाकुल खड़ा हूँ, जिनके बची यहाँ-वहाँ एकाध धूमिल कड़ी है, जो अगली कड़ी को और भी अधिक ज्योतिर्मय बना देती है और उनके बीच इनकी गति में अपने सहज महिमामय पदक्षेप के साथ प्रगतिशील है। मेरी यह जन्मभूमि अपने यशोपूरित लक्ष्यसिद्धि के लिए, जिसे धरती और आकाश की कोई शक्ति रोक नहीं सकती, सतत् गतिमान है।
वर्तमान अवनति के भीतर से भविष्य का भारत आ रहा है, अंकुरित हो चुका है। उसके नए पल्लव निकल चुके हैं और उस शक्ति पर विशालकाय उर्ध्वमूल वृक्ष का निकलना प्रारम्भ हो चुका है। भविष्य के भारत-निर्माण का पहला कार्य आध्यात्मिक भावों का विस्तार ही है, जिसे सर्वधर्म समभाव के रूप में क्रियान्वित करना होगा। भारतीय आध्यात्मिकता ही हमारा जीवन-रक्त है। भारतीय मन पहले धार्मिक है फिर कुछ और। अतः धर्म को सशक्त बनाना होगा। हमारे शास्त्र-ग्रंथों में भरे पड़े आध्यात्मिकता के रत्नों को सार्वजनिक कर देना होगा।
ध्यान रहे, भविष्य का भारत बलशाली तो बनेगा, परन्तु दूसरों का पराजित करके जबरन उन पर अपना आधिपत्य स्थापित करने वाला राष्ट्र कभी नहीं बनेगा, वह राजनीतिक शक्ति तो बनेगा, परन्तु छल-छद्म, कुटिलता उसका स्वभाव कभी भी नहीं बन सकती। राष्ट्रों की संगीत संगति में भारत इस प्रकार का स्वर कभी नहीं दे सकेगा। पर आखिर भारत का स्वर होगा क्या? यह स्वर होगा केवल ईश्वर का। भारत वास्तविक शक्ति-सामर्थ्य का उदाहरण उपस्थित करेगा। आक्रमण, दुस्साहस, संघर्ष ये बातें दुर्बलता की प्रतीक हैं। भारत का प्रारब्ध था, उसका भाग्य था कि वह जीत जाय और अब उसका भविष्य है कि अपने विजेता पर विजय प्राप्त करे और अब यह महादेश अपने विजेताओं पर विजय प्राप्त करेगा। यह विजय आर्थिक और राजनैतिक नहीं-साँस्कृतिक और आध्यात्मिक होगी। एक महान गति आ रही है, जिसे वे लोग ही पहचान सकते हैं, जो समय के संकेतों को समझते हैं। भारत भविष्य का महान विजेता होगा। वह अपने विचारों के प्रचार के लिए देव-संस्कृति दिग्विजय अभियान छेड़ेगा और यह अभियान उस समय तक जारी रहेगा, जब तक कि संसार उसके चरणों में नहीं आ जाता।
भारत की विचारधारा बह चली है और प्रत्येक जाति की नस-नस में समाने लगी है। युगचक्र फिर घूमा है, वैसा ही समय फिर आया है। भारत समस्त संसार की उन्नति तथा सारी सभ्यता को अपने योगदान के लिए फिर से तैयार हो रहा है। भारतीय आध्यात्मिक और दार्शनिक विचारों की फिर से सारे संसार पर विजय प्राप्त करेगी। फिर से भारत को जगत पर विजय प्राप्त करनी होगी। यही मेरे जीवन का स्वप्न है। हमारे सामने यही एक आदर्श है, वह आदर्श है, भारत की विश्व पर विजय। उठो भारत! तुम अपनी आध्यात्मिकता द्वारा जगत पर विजय प्राप्त करो। राष्ट्र के मूल आदर्श के अनुगमन से ही अपूर्व महिमा-मण्डित भावी भारत का निर्माण होगा। मेरा दृढ़ विश्वास है कि भारत वर्ष किसी काल में भी जिस श्रेष्ठता का अधिकारी नहीं था, शीघ्र ही उस श्रेष्ठता का अधिकारी होगा। प्राचीन भारत में सैकड़ों ऋषि थे और अब हमारे बीच लाखों होंगे, निश्चय ही होंगे और पूर्वज अपने वंशधरों की इस अभूतपूर्व उन्नति से बड़े सन्तुष्ट होंगे। इतने ही नहीं मैं निश्चित रूप से कहता हूँ कि वे परलोक में अपने स्थानों से अपने वंशजों को इस प्रकार महिमान्वित और महत्वशाली देखकर अपने को महान गौरवान्वित समझेंगे। अब सोने का समय नहीं है, हमारे कार्य पर ही भारत का भविष्य निर्भर है।
निकट भविष्य में उन महान आत्माओं का अवश्य ही अवतरण होगा, जिनके द्वारा भारत को विश्व की आध्यात्मिक अवस्था को सम्पादित करने का व्रत पूरा करना है। जिस देश में महापुरुषत्व, ऋषित्व, अवतारत्व या लौकिक विचारों में शूरत्व से अनुप्राणित पुरुष-सिंह एक बार आविर्भूत हो चुके हैं, वहाँ पुनः मनीषियों का अभ्युत्थान अधिक सम्भव है। प्राकृतिक जगत की यह घटनाएँ। अवश्यमेव भूतकाल में भी हुई हैं और भविष्य में भी होंगी। इस राष्ट्र में आपत्ति के दिनों में भी आत्मज्ञानी महापुरुषों का अवतार लेना कभी बन्द नहीं हुआ, फिर अब तो कालचक्र ने उज्ज्वल भविष्य के संकेत देने शुरू कर दिए हैं। भारतीय राष्ट्र कभी नष्ट नहीं हो सकता है। यह अमर है और उस समय तक टिका रहेगा, जब तक इसका धर्मभाव अक्षुण्ण बना रहेगा। हम ऐसे नरश्रेष्ठों से अपनी वंश-परम्परा स्थापित करना चाहते हैं और जब तक पवित्रता के ऊपर हमारी इस प्रकार गम्भीर श्रद्धा रहेगी, तब तक भारत का विकास होता रहेगा। मानवता के लिए हजारों वर्षों से अपना यह राष्ट्र प्रचण्ड स्वार्थ-त्याग और आत्मबलिदान करता रहा है। भारत में महान आत्माओं के आविर्भाव का अनुकूल समय शीघ्र आएगा और उनके सतत् प्रयास से यथार्थ धर्म, आत्मा से आत्मा की आराधना अधिक सजीव और शक्तिशाली हो सकेगी। जिस दिन श्री रामकृष्ण देव ने जन्म लिया है, उसी दिन से आधुनिक भारत के निर्माण तथा सतयुग का आरम्भ हुआ है। उनके अगले अवतार में तो ये भाव अपना चरम विस्तार पा जाएँगे।
आज भारत को आवश्यकता है उच्चतम ज्ञान के साथ-उच्चतम प्रेम की। अनन्त ज्ञान के साथ अनन्त प्रेमयोग का उस अनन्त सत्ता के साथ एकीभूत होना ही एकमात्र धर्म है। भारत को अनन्त सत्ता, अनन्त ज्ञान और अनन्त आनन्द का समन्वय करना होगा। यही इसका लक्ष्य है। आज भारत को शंकर रूपी बुद्धि के प्रखर सूर्य के साथ बुद्धदेव का अद्भुत प्रेम और दयाकुल विशाल हृदय रखना सम्भव है। इसी सम्मिलन से उच्चतम दर्शन की उपलब्धि होगी। विज्ञान और धर्म एक-दूसरे का आलिंगन करेंगे। यही भविष्य का धर्म होगा। भारतीय और पाश्चात्य सभ्यताओं के मेल से संसार में नए युग का उदय होगा। मेरा विश्वास है, जब एक जाति, एक वेद तथा शान्ति एवं एकता होगी, तभी सतयुग आएगा। सतयुग का यह विचार ही भारत को पुनर्जीवित करेगा।
संसार में केवल एक ही देश है भारत। इसका भविष्य उज्ज्वल है, क्योंकि इसे मानवता का उपकार करना है। भारतीयों को जगत के एकत्व और एक ही सत्य के अस्तित्व की सम्यक उपलब्धि करने का उपाय अवश्य बतलाना पड़ेगा। हमारी इस पवित्र मातृभूमि का मेरुदण्ड, मूलभित्ति या जीवन केन्द्र एकमात्र धर्म हैं। हमारी इस मातृभूमि में इस समय भी धर्म और अध्यात्म विद्या का जो स्रोत बह रहा है, उसके बाद समस्त जगत को आप्लावित कर राजनीतिक उच्चाभिलाषाओं एवं नवीन सामाजिक संगठनों की चेष्टाओं में, समाप्तप्राय, अर्द्धमृत तथा पतनोन्मुखी जगत की जातियों में नवप्राणों का संचार करेगी। भारत में हजारों वर्षों से धार्मिक आदर्श की धारा प्रवाहित हो रही है। भारत का वायुमण्डल इसी धार्मिक आदर्श से सदियों तक पूर्ण रहकर जगमगाता रहा है। अब यह हमारे रक्त में मिल गया है। हमारे रोम-रोम में वही धार्मिक आदर्श रम रहा है। वह हमारे शरीर का अंश है और हमारे जीवन की शक्ति बन जाएगा। सत्य-सिद्धान्त हमारे खून के साथ मिल जाएगा और जीवन के साथ एक हो जाएगा। भारत सब दिशाओं में अपनी शाखाएँ और जड़े फैलाता हुआ, धर्म के सम्पूर्ण क्षेत्र को आच्छादित कर लेगा।
विचारशील मानव-जाति का भावी धर्म भारतीय ऋषियों द्वारा अन्वेषित अद्वैत ही होगा। यही सब धर्मों का बौद्धिक सार है। वेदान्त के बिना सभी धर्म-अंधविश्वास है। इसके साथ मिलकर प्रत्येक विचार धर्म बन जाता है। जो अपने जीवन में सबसे अधिक चरित्र का उत्कर्ष दिखा सकेंगे, चाहे वे सम्प्रदाय कितने ही दूर भविष्य में जन्म लें, इसी को स्वीकार करेंगे। यही भावी परम्परा तथा भावी प्रणाली जीवित रहेगी एवं वह सबको निगलकर भविष्य में शक्तिमान होगी। न संख्या-शक्ति, न धन, न पाण्डित्य, न वाक्-चातुर्य कुछ भी नहीं, बल्कि पवित्रता, शुद्ध जीवन-एक शब्द में अनुभूति, आत्मसाक्षात्कार को विजय मिलेगी। भारत में सिंह जैसी शक्तिमान दस-बारह आत्माएँ होने दो, जिन्होंने अनन्त का स्पर्श कर लिया है, जिनका चित ब्रह्मानुसन्धान में लीन है। जो न धन की चिन्ता करते हैं, न बल की, न नाम की, ये व्यक्ति ही भविष्यत् भारत के निर्माता होंगे। भविष्य में भारत धर्मप्रवण या अन्तर्मुख होगा। वेदान्त में ही वह महान तत्व है, जिससे संसार के भावजगत में क्रान्ति होगी और भौतिक जगत के साथ धर्म का सामंजस्य स्थापित होगा।
भविष्य में आध्यात्मिक शक्ति से ही मानव-जाति का उत्थान होगा। भारत संसार का आध्यात्मिक गुरु है। आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि और आध्यात्मिक विचार ही भारत का सारे संसार की जातियाँ का सिरमौर बना देंगे। प्राचीनकाल से ही संसार को आध्यात्मिकता की शिक्षा देना भारत का भाग्य रहा है। आध्यात्मिकता ही सदैव से भारत की निधि रही है। आज समस्त संसार आध्यात्मिक ऊर्जा प्रत्येक राष्ट्र को देनी होगी। केवल भारत ही मानव-जाति का उत्थान करेगा। सारे भारत में, मानव-जाति की पूर्णता में अनन्त विश्वास रूप प्रेमसूत्र ओत-प्रोत भाव से विद्यमान है और इस विश्वास एवं भाव का सारे संसार में प्रसार होगा। नवीन आलोक भारत के चारों ओर फैलेगा। यदि ऐसा कोई देश है, जहाँ आध्यात्मिकता तथा अंतर्दृष्टि का सर्वाधिक विकास हुआ हो तो वह भारत है। यहीं से उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम सभी ओर दार्शनिक ज्ञान की प्रबल तरंगें प्रवाहित हुई है और यहीं से वह धारा भी निकलेगी, जो सम्पूर्ण पृथ्वी की भौतिक सभ्यता को आध्यात्मिकता से पूर्ण कर देगी। इसी के साथ भारत महानता के पथ पर आरुढ़ होगा।
विश्व ने बौद्धिक, तकनीकी एवं वैज्ञानिक उन्नति भले ही कितनी कर ली हो, पर उसके सामने अभी यह प्रश्न तो हल करने के लिए शेष ही है कि शान्ति की जय होगी या युद्ध की, सहिष्णुता की जय होगी या असहिष्णुता की, शुभ की विजय होगी या आध्यात्मिकता की। भारत के भविष्य में ही इसका समाधान निहित है। असाँसारिकता एवं त्याग-समाधान के यही स्वर भारतीय जीवन-रचना के प्रतिपाद्य विषय है। इसके अनन्य संगीत की यही रागिनी है, इसके अस्तित्व का यही मेरुदण्ड है, इसके जीवन की यही आधारशिला हैं। इसके अस्तित्व का एक मात्र हेतु ही मानव-जाति का अध्यात्मीकरण है। भारत का-भविष्य एवं नियति आध्यात्मिक है। भारत की आध्यात्मिक शक्ति संसार के समस्त ध्वंसात्मक तत्वों का नाष कर देगी। भारत का प्रभाव धरती पर सर्वदा मृदुल ओस कणों की भाँति बरसता है, नीरव और अव्यक्त, पर सर्वदा धरती के सुन्दरतम सुमनों को विकसित करने वाला। यह तो केवल आरम्भ मात्र है, महान सिद्धियाँ तो बाद में उपलब्ध होंगी। संसार के करोड़ों-अरबों व्यक्ति भारत के संदेश की प्रतीक्षा कर रहें हैं, जो उन्हें भौतिकता के घृणित गर्त में गिरने से बचा लेगा, जिसकी ओर आधुनिक अर्थोपासना ढकेल रही है।
भारत का दान है धर्म-दार्शनिकता, ज्ञान और आध्यात्मिकता। भारत का लक्ष्य रहा है आध्यात्मिक ज्ञान की निरन्तर खोज। भारत के हृदय से भारतीयता विजय प्राप्त करेगी। प्रेम से अलौकिक शक्ति मिलती है, प्रेम से भक्ति उत्पन्न होती है। ले जाता है। वस्तुतः यही उपासना है, मानव-शरीर में स्थित ईश्वर की उपासना। यह भाव पूरे भारत में नहीं, सम्पूर्ण पृथ्वी पर फैल जाएगा।
भारत में एक अपूर्व विचार-क्रान्ति का जन्म होगा। भारतीय विचार-तरंगें पूरे विश्व में फैल जाएँगी। सर्वप्रथम हमारे उपनिषदों, पुराणों ओर अन्य सब शास्त्रों में जो अपूर्व सत्य छिपे हैं, उन्हें उन सब ग्रन्थों के पन्नों से बाहर निकालकर, मठों की चहारदीवारी को भेदकर, वनों की शून्यता से दूर लाकर, कुछ सम्प्रदाय विशेषों के हाथों से छीनकर देश में सर्वत्र बिखेर देना होगा, ताकि वे सभी सत्य दावानल के समान सारे देश को चारों ओर से लपेट लें। हमारे भाव और विचार भारत की सरहदों के पिंजड़ों में ही बन्द नहीं रह सकते, बल्कि वे तो हम चाहें या न चाहें, उन सभी देशों में अपना स्थान प्राप्त कर रहे है।
इसका कारण यही है कि संसार की सम्पूर्ण उन्नति में भारत का दान सबसे श्रेष्ठ रहा है, क्योंकि उसने संसार को ऐसे दर्शन और धर्म का दान दिया है, जो मानव-मन की उन्नति करने वाला सबसे अधिक महान, सबसे अधिक उदात्त और सबसे श्रेष्ठ विषय है। इस दान एवं ज्ञान का विस्तार भारतवर्ष भविष्य में सारे संसार में और भी अधिक तीव्रता से करता रहेगा। भारतवर्ष को एक महान सत्य संसार को सिखाना है, क्योंकि यह अन्यत्र कहीं नहीं है। यही आध्यात्मिकता है, यही आत्मविद्या है, यह त्याग की भावना ही भारत को गौरवान्वित करेगी।
स्वामीजी ने अपने अनुभव को शब्द देते हुए स्पष्ट स्वरों में कहा-मैं भारत में उस ज्वार तरंग की प्रथम मर्मर ध्वनि का अनुभव कर रहा हूँ, जो निकट भविष्य में सारे भारत पर अपनी सम्पूर्ण अमोघ शक्ति के साथ फूट पड़ेगी और अपनी अनन्त शक्तिसम्पन्न बाढ़ द्वारा जो कुछ दुर्बल और सदोष है, उसको दूर बहा ले जाएगी तथा भारतीयता को उठा विधि-नियोजित उच्चासन पर बिठा देगी। जहाँ उसका पहुँचना निश्चित और अनिवार्य है। वहाँ वह भूतकाल की अपेक्षा और भी अधिक शक्तिशाली बनेगा। शताब्दियों वक नीरव कष्ट सहते रहने का उपयुक्त पुरस्कार पाएगा और संसार की समस्त जातियों के मध्य में अपने उद्देश्य के रूप में आध्यात्मिक प्रकृति सम्पन्न मानव जाति के विकास को पूर्ण करेगा। भारत के जातीय जीवन में ज्यों-ज्यों स्फूर्ति आती जाएगी त्यों-त्यों भाषा, शिल्प, संगीत इत्यादि अपने आप ही भावमय एवं प्राणपूर्ण होते जाएँगे। तब देवता की मूर्ति को देखते ही भक्तिभाव का उद्रेक होगा। आभूषणों से सज्जित नारी को देखते ही देवी का बोध होगा एवं घर-द्वारा सम्पत्ति सब कुछ प्राण-स्पन्दन से डगमग करने लगेगी।
भविष्य में भारत ऐसी स्थिति में पहुँचेगा, जहाँ जाति नहीं रह जाएगी। भविष्यत् भारत की योजना है कि मनुष्य को ब्राह्मण बनाया जाए। ब्राह्मण मानवता का आदर्श है, तप और त्याग है। शतियों पुरानी इस जातीय व्यवस्था के भीतर इतनी जीवनीशक्ति है कि उससे लाखों नई व्यवस्थाओं का निर्माण किया जा सकता है। रीति यह है कि पुरातन का विकास हो। नए युग का विधान है कि जनता ही जनता परित्राण करे। भविष्य में समस्त जातियाँ मानव-जाति में समा जाएँगी। प्रत्येक मानव ब्राह्मणत्व की ओर अग्रसर होने में गौरव का अनुभव करेगा। भारत का ध्येय निर्माण है विनाश नहीं। भारत वेदान्त के उदात्त सत्य को प्रकट करेगा। यहाँ का आदर्श है सहायता, झगड़ा नहीं सर्वांगीण विनाश नहीं, समन्वय और शान्ति, संघर्ष नहीं। मेरा दृढ़ विश्वास है कि हमारी मातृभूमि का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। भारत के जन-समुदाय को उठाने से ही भारत का पुनर्जागरण होगा। भविष्य में धर्मोपदेशक हमारे जनसमुदाय के दोनों प्रकार के आध्यात्मिक और लोकशिक्षण होंगे। एकं सद विप्राः बहुधा वदन्ति ही हमारी जाता की समग्र जीवन समस्या का समाधान है। इसी अद्भुत भाव को भारत सारी दुनिया को देगा।
इक्कीसवीं सदी में भारतवासी अपने अतीत युग के इतिहास की ही भाँति फिर से अन्यान्य जातियों एवं देशों के बीच अपने समुचित गौरव पद पर आसीन होंगे। वे अपने जीवन में शुद्ध, निष्कपट उत्साह को पुनः प्रबल रूप से जगायेंगे। भारत में अपनी सम्पत्ति, शक्ति अथवा अन्य गुण के बल पर अपने जातीय बन्धुओं को आगे बढ़ाकर ही अपने चच्तर लोगों के साथ भाईचारा स्थापित हो सकेगा। यदि समस्त समुदायों के श्रम का उपयोग करने वाली एक जाति की शक्ति की अभिव्यक्ति कम से कम एक विशेष अवधि में आश्चर्यजनक फल उत्पन्न कर सकती हैं, तो फिर यहाँ इन समस्त जातियों का संचयन और केन्द्रीकरण होने जा रहा है। मैं अपने मानव चक्षुओं से उस भावी राष्ट्र को धीरे-धीरे परिपक्व होता देख रहा हूँ, धरती के समस्त राष्ट्रों में सर्वाधिक महिमामण्डित और ज्येष्ठतम भारत का भविष्य। सर्वाधिक अद्भुत ऐतिहासिक सत्य है कि संसार की सब जातियों के भारतीय साहित्य में निबद्ध सनातन सत्य समूह को सीखने के लिए धैर्य धारण कर भारत के चरणों के समीप बैठना होगा। भविष्य में सबका जीवन आशाप्रद है। सबके लिए मुक्ति का रास्ता खुला हुआ है और जल्दी या देरी से माया के बन्धन से मुक्त होंगे।
भारत को उठना होगा, गरीबों को भोजन देना होगा, शिक्षा का विस्तार करना होगा और पूरे प्रपंच की बुराइयों का निराकरण करना होगा। भारत तभी जागेगा जब विशाल हृदय वाले सैकड़ों स्त्री-पुरुष भोग-विलास और सुख की सभी इच्छाओं को विसर्जित कर मन, वचन और शरीर से राष्ट्रसेवा के लिए कटिबद्ध रहेंगे। भारत को नवविद्युत शक्ति की आवश्यकता है, जो जातीय धमनी में नवस्फूर्ति उत्पन्न कर सके। भारत के समाज का आमूल परिवर्तन करना आवश्यक है। मैं जानता हूँ कि यह और अच्छा होगा। भारत ऋषियों द्वारा प्रदर्शित पथ पर बढ़ेगा और अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर दिखाएगा। भारत की सम्भावनाएँ बढ़ी हैं और वह उनको प्रस्फुटित कर दिखाएगा।
मैं दिव्यदृष्टि से देख रहा हूँ कि भारत की नारियाँ ऋषियों के मुख से निकले धर्म का प्रचार करेंगी और ऐसी बड़ी तरंग उठेगी, जो सारे संसार को डुबो देगी। वे भविष्य में सिंहनी बनकर खड़ी होंगी। भारत में शंकर आदि महामनीषियों ने वेदान्त रूपी जिन भावों को प्रचार किया था, भावी सतयुग में जन-जीवन उसी के अनुसार जीवनयापन करेगा और यह नारियों के द्वारा ही कार्यरूप में परिणत होगा।
भारत के इस भविष्य-निर्माण के लिए बलिदान तो करना ही होगा। बिना बलिदान के कोई भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। अपने कलेजे को बाहर निकालना होगा और निकालकर उसे पूजा वेदी पर उसे लहूलुहान चढ़ा देना होगा। अतीत के अवशेषों से एक ऐसा नवजाग्रत भारत पैदा हो रहा है, जिसके लिए वीरों को शौर्य एवं रक्त का मूल्य चुकाना होगा। मैं जो चाहता हूँ वह लोहे की नसें और फौलाद के स्नायु हैं, जिनके भीतर ऐसा मन वास करता हो जो वज्र के समान पदार्थ का बना हो, बल-पुरुषार्थ और ब्रह्मतेज। भारत तभी भविष्य का आधार बनेगा, जब उसके प्रत्यक्ष हृदयस्वरूप सैकड़ों शिक्षित, चरित्रवान, आत्मत्यागी नवयुवक इस महासंग्राम को लड़ने के लिए तैयार होंगे। मनुष्य केवल आत्मदानी मनुष्य चाहिए, बाकी सब कुछ अपने आज हो जाएगा। पूर्ण निष्कपटता, पवित्रता, विशाल बुद्धि और सर्वजयी इच्छाशक्ति के धनी व्यक्ति ही भारत के भविष्य को गढ़ेंगे। इसी के साथ सारे संसार में क्रान्तिकारी परिवर्तन हो जाएगा। प्रभु की आज्ञा है, भारत की उन्नति अवश्य होगी। आध्यात्मिकता की बाढ़ आ गयी है। निर्बाध, निस्सीम, सर्वग्राही उस प्लावन को मैं भारत की पृष्ठभूमि पर आवर्तित होते देख रहा हूँ। भारत का पुनरुत्थान होगा, पर वह जड़ की शक्ति से नहीं, वरन् आत्मा की शक्ति के द्वारा वह उत्थान विनाश की ध्वजा लेकर नहीं वरन् शान्ति और प्रेम की ध्वजा से, परिव्राजकों के वेश से सम्पादित होगा। मैं अपने सामने यह एक सजीव दृश्य देख रहा हूँ कि हमारी यह प्राचीन भारतमाता पुनः एक बार जाग्रत होकर अपने सिंहासन पर पूर्व की अपेक्षा अधिक महामहिमान्वित होकर विराजेगी।
युगनायक स्वामी विवेकानन्द की यह भविष्य दृष्टि साकार होने को है। इक्कीसवीं सदी के आगमन के साथ भविष्य का महिमामण्डित भारत अपना स्वरूप विनिर्मित करने लगेगा। इसमें भागीदारी बनने वाले वीर हृदय पुरुष एवं महिलाएँ निश्चित ही भारत के भविष्य निर्माता का महाश्रेयस् प्राप्त किए बिना न रहेंगे।
‘रसो वै सः’- भारतीय तत्ववेत्ताओं ने जीवन को इसी रूप में परिभाषित किया है। रस यानि आनन्द-उल्लास, उमंग-उछाह। ये अवसर जीवन में बार-बार आएँ, अनवरत आएँ और सदा-सदा के लिए बने रहें, इसीलिए देवसंस्कृति में पर्वों का सृजन किया गया। निर्मल आनन्द के पर्याय ये सभी पर्व लोक-जीवन को देव-जीवन की ओर उन्मुख करते हैं। परन्तु इनमें भी मकर-संक्रान्ति के साथ ये अनुभूतियाँ कुछ अधिक ही गहराई के साथ जड़ी हैं। यह जन-आस्था तथा लोकरुचि का पर्व है। इसे समूची सृष्टि में जीवन अनुप्राणित करने वाले भगवान सूर्य की उपासना का पर्व भी कहते हैं। इस अवसर पर उमड़ने वाले सात्विक भव देश की सांस्कृतिक चेतना को पुष्ट करते हैं।
तभी तो लोकसंस्कृति पर्व-मकर संक्रान्ति सम्पूर्ण भारत में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भले ही इसके नामों में क्षेत्र-विशेष या भाषा-विशेष की विविधता झलकती हो, किन्तु हृदय के भावों में हर कहीं एक-सी समरसता और मधुरता है। यह पर्व पंजाब में लोहड़ी या माघी, उत्तरप्रदेश के पर्वतीय भागों यथा अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ में क्रमशः घुघुतिया, पुसूड़िया, उत्तरप्रदेश के मैदानी भागों एवं मध्यप्रदेश में लि या खिचड़ी संक्रान्ति, बंगला में बिसु, बिहार में दहीचूड़ा, महाराष्ट्र में मकर संक्रान्ति, दक्षिण में तिल-गुड़, तमिलनाडु में पोंगल तथा असम में मोगाली बिहु के नाम से अपने क्षेत्रीय जीवन में उत्साह एवं पवित्रता का संचार करता है। विभिन्न क्षेत्रों से उल्लास एवं सात्त्विक भावनाओं की ये एक-सी तरंगें राष्ट्र की साँस्कृतिक एवं सामाजिक संघबद्धता को सुदृढ़ करती हैं।
पौषमास की कड़ाके की सर्दी के साथ संसार के प्राणदाता भगवान सूर्यदेव दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश कर वातावरण में गर्मी की आहट की सूचना देते हैं। इसी के साथ जीवन में नवचेतना तथा नवस्फूर्ति संचरित होती है। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में गमन को ही संक्रान्ति कहते हैं। मकर संक्रान्ति प्रायः प्रतिवर्ष 14 जनवरी को ही पड़ती है। सूर्य के उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ते जाने की अवधि को दक्षिणायन तथा दक्षिण से उत्तर की ओर के यात्राकाल को उत्तरायण कहते हैं। वृत के 360 अंशों के समान ही पृथ्वी की परिक्रमापथ 360 अंशों में विभाजित है। इसके अण्डाकार परिक्रमापथ को 30-30 अंशों के समूहों में 12 राशियों में विभक्त किया गया है। पृथ्वी की परिक्रमा करते समय सूर्य जिस राशि में दिखाई देता है, वही सूर्य की राशि कही जाती है। संक्रान्ति बारह राशियों में सूर्य का संक्रमण है-रवेः संक्रमण राषौ संक्रान्तिरिति कथ्यते। मकर संक्रान्ति नवम् धनु राशि से दशम मकर राशि में संक्रमण है।
चन्द्रमास साढ़े उन्तीस दिन का एवं चन्द्रवर्ष 354 दिन का होता है, परन्तु सौर-दिन 30 दिन का एवं सौर वर्ष 365 दिन 6 घण्टे का होता है, चन्द्रवर्ष निश्चित नहीं होता है, उसमें परिवर्तन आता रहता है। इसी परिवर्तन के कारण चार वर्षों में फरवरी उन्तीस दिन की होती है। सूर्य का संक्रमण एक निश्चित अवधि एवं समय में सम्पन्न होता है। इसी कारण मकर-संक्रान्ति प्रायः हर वर्ष 14 जनवरी को ही आती है।
संक्रमण पर्व मकर संक्रान्ति का मकर शब्द का भी विशेष महत्व माना जाता है। इस महत्व को अलग-अलग भाषियों ने अपने-अपने ढंग से प्रतिपादित किया है। हरीति ऋषि के अनुसार, मकर मत्य वर्ग के जल-जन्तुओं में सर्वश्रेष्ठ है- मत्स्यानाँ मकरः श्रेश्ठो। इसीलिए यह गंगा का वाहन है। प्रायः सभी शास्त्रकारों ने गंगा को मकरवाहिनी माना है। वायुपुराण में मकर को नौ निधियाँ पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द नील एवं खर्व हैं।
इसे इस प्रकार कहा गया है
पद्मों स्त्रियाँ, महापद्म शंखाँ मकर कच्छपाँ। मुकुन्द कुन्द नीलष्च वर्चाऽपि निधियो॥
कामदेव की पताका का प्रतीक मकर है। अतएव कामदेव को मकरध्वज भी कहा जाता है। बिहारी सतसई में महाकवि बिहारी ने भगवान श्रीकृष्ण के कुण्डलों का आकार मकरकृत बताया है।
मकराकृत गोपाल के कुण्डल सोहत कान। ध्स्यो मनो हिय धर समर ड्येढी लसत निसान॥
ज्योतिष गणना की बारह राशियों में से दसवीं राशि का नाम मकर है। पृथ्वी की एक अक्षांश रेखा को मकर रेखा कहते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार, सुमेरु पर्वत में उत्तर में दो पर्वत में से एक का नाम मकर पर्वत है। तमिल वर्ष में ‘तई’ नामक महिला का उल्लेख है, जो सूर्य के मकर रेखा में आने के कारण उसका नामकरण हुआ।
पुराणों में मकर संक्रान्ति का काफी विस्तार से वर्णन मिलता है। पुराणकारों ने सूर्य के दक्षिण से ऊर्ध्वमुखी होकर उत्तरस्थ होने की वेला को संक्रान्ति पर्व एवं संस्कृति पर्व के रूप में स्वीकार किया है। पौराणिक विवरण के अनुसार, उत्तरायण देवताओं का एक दिन एवं दक्षिणायन एक रात्रि मानी जाती है। इस काल में महात्मा भीष्म की इच्छामृत्यु वाली घटना भी इसके महत्व एवं महिमा को प्रतिपादित करती है। महाभारत में इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख है कि शर–शैय्या पर पड़े गंगापुत्र महासंकल्पवान वीरवर भीष्म, दर्शन करने आए हेसरूप ऋषियों से सूर्य के उत्तरायण होने पर अपने शरीर-त्याग करने का संकल्प दुहराते हैं।
गमिश्यामिस्वकंस्थानमासीद्यन्मे पुरातनम्। उदगायनआदित्येहंसः सत्यं ब्रवीमिवः धरयिष्याम्य प्राणानुत्तरायणकाँक्ष्या॥
यह वैज्ञानिक सत्य है कि उत्तरायण में सूर्य का ताप शीत के प्रकोप को कम करता है। शास्त्रकारों ने भी मकर संक्रान्ति को सूर्य उपासना का विशिष्ट पर्व माना है। इस अवसर पर भगवान सूर्य की गायत्री महामंत्र के साथ पूजा-उपासना, यज्ञ-हवन का अलौकिक महत्व है। मकर संक्रान्ति पर्व के देवता सूर्य को देवों में विश्व की आत्मा कहकर अलंकृत किया गया है। आयुर्वेद के मर्मज्ञों का मानना है, शीतकालीन ठण्डी हवा शरीर में अनेक व्याधियों को उत्पन्न करती है। इसीलिए तिल-गुड़ आदि वस्तुओं का इस अवसर पर प्रयोग करने का विशेष विधान है। चरक संहिता स्पष्ट करती है-’शीते शीतानिलर्स्पषसंरुद्धो बलिनाँ बली। रसं हिन्स्त्यतो वायुः शीतः शीते प्रयुप्यति।’ इस प्रकोप के निवारण के लिए आयुर्विज्ञान विशेष घी-तेल, तिल-गुड़, गन्ना, धूप और गर्म पानी सेवन की सलाह देते हैं। उनके अनुसार,
तस्मात्तुषारसमये स्निग्ध-म्ललवणान् रसान् गोरसनिक्षुविकृतीर्वसाँ तैलं नवौदनम। अभ्यड्डोत्सादनं मूर्धि्रं तैलं जै्रनताकमातपम्। हेमन्तेऽभ्यस्यत्स्तोय-मुष्णाश्रायुर्नहीयते॥
शिवरहस्य ग्रन्थ में मकर संक्रान्ति के बारे में कहा गया है ‘वस्याँ कृष्ण तिलैः स्नानं कार्य चोर्द्वतनं शुभैः। तिला देयाष्च विप्रभ्यो सर्व देवोत्तरायणे। तिल तैलेन दीपाष्च देयाः षिव गृहे शभाः। होमं तिलैः प्रकुर्वेति सर्व देवोत्तरायणम्।’ इसके अनुसार उत्तरायण एवं मकर संक्रान्ति के अवसर पर हवन-पूजा, व्यवहार व खान-पान में तिल एवं तिल से बनी वस्तुओं पर अधिक जोर दिया गया है। लोक व्यवहार में भी तिल-खिचड़ी आदि गर्म पदार्थों के सेवन पर विशेष जोर दिया जाता है। सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में रहता है तब रवी की फसल चना, गेहूं आदि फसल पकने की स्थिति में होती है। इस समय सूर्य के ताप से उन फसलों को बढ़ने और पकने में सहायता मिलती है। यही कारण है कि मकर संक्रान्ति के लोकपर्व पर लोग अन्य को सूर्य भगवान को अर्पित करते है।
हमारे ऋषि-मनीषियों ने सुखी जीवन के लिए अनेकानेक विधाओं का उल्लेख किया है। इस क्रम में उन्होंने नी स्नान को भी महत्व दिया है। नदियों के उद्गम स्रोत पर्वत हैं, जहाँ से ये नदियाँ निकलती हैं। उन पर्वतों पर दिव्य औषधियाँ फलती-फूलती हैं तथा वर्षा के जल में मिलकर नदियों में गिरती हैं। अतः बहते हुए पानी में स्नान का महत्व बढ़ जाता है। इसी वजह से पुराणों में अन्य व्रतों के साथ स्नान व्रत का भी वर्णन है। माघ स्नान व्रत एक माह का होता है। यह पौष शुक्ल एकादशी अथवा पूर्णमासी से माघ शुक्ल एकादशी अथवा पूर्णमासी तक किया जाता है।
तीर्थ राज प्रयाग में और गंगा सागर में स्नान करना सौभाग्य की बात मानी जाती है। माघ की अमावस्या के दिन जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तो गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर स्नान-ध्यान एवं सत्संग को पुण्य-फलोत्पादक कहा गया है। फिर जब 12 वर्षों में एक बार बृहस्पति और मेष या वृष राशि का संक्रमण होता है, तो इस पर्व को अतिविशिष्ट पुण्यकाल कहते हैं। इसका महत्व ज्योतिषवेत्ताओं के अनुसार अनेकों गुना अधिक है।
मकर संक्रान्ति में तिल आदि के दान के अलावा ज्ञानदान की भारी महिमा है। स्नान-दान करना भारतीय जनमानस की चिर-पुरातन लोकमान्यता है, परन्तु स्नान नदी में शरीर धोने एवं दान सिर्फ वस्तुओं के दान तक सीमित नहीं है। स्नान से जहाँ शरीर, वाणी एवं मन की पवित्रता अपेक्षित है वहीं दान का सर्वश्रेष्ठ प्रकार सत्कार्य के लिए अपनी उपार्जित सम्पदा का एक अंश, समय अथवा स्वयं का ही उत्सर्ग है। विचार-क्रान्ति की ज्ञान-दान परम्परा में इसी का श्रेष्ठतम रूप झलकता है। आचार्य हेमाद्रि के अनुसार इस, संक्रमण के आगे-पीछे की 15-15 घड़ियाँ शुभ बतायी गयी हैं। आचार्य बृहस्पति ने संक्रान्ति के क्षणों की 20-20 आगे-पीछे की घड़ियों को शुभ फलदायक मानते हैं।
पद्मपुराण में मकर संक्रान्ति के दिन दान को इस प्रकार स्पष्ट किया है-
सर्व एव शुभ कालः सर्वो देषस्तथा शुभः सर्वो जनो दान पात्रं मकराष्चे दिवाकरः॥
अर्थात्-जब दिवाकर मकरस्थ होते हैं तब सभी समय, प्रत्येक दिन एवं सभी देश व स्थान शुभ हैं और हर व्यक्ति दान के श्रेष्ठतम प्रकार ज्ञान-दान का सुपात्र है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, मकरराशि के स्वामी सूर्य पुत्र शनिदेव है। शनि के स्वामी सूर्य पुत्र शनिदेव हैं। शनि के प्रकोप से मुक्ति पाने के लिए इस दिन गायत्री महामंत्र से की गई सूर्योपासना महाशुभ है। मत्स्यपुराण में भी इस दिन व्रत रखने एवं सूर्योपासना करने को श्रेष्ठ माना गया है। स्कन्दपुराण में भी मकर संक्रान्ति के दिन सूर्य उपासना के साथ यज्ञ हवन एवं दान को पुण्य-फलदायक बताया है।
महाभारत में तिल दान एवं तिल खाने की बात को इस तरह स्वीकारा गया-
तिलान दधात, तिलान मष्यान तिलान प्राण रूप स्पृषेत। तिलं तिल मिति बूयात तिला पापन हरा हिते॥
अर्थात्- तिल का दान, तिल का भक्षण तथा प्रातः तिल का उबटन लगाकर स्नान करे तथा मुख से तिल की महिमा औरों को बतायें, क्योंकि यह तिल समस्त पाप रूप रोगों का शमन करता है। यही कारण है कि मकर संक्रांति पर तिलदान एवं तिल-सेवन की प्रथा समूचे भारतवर्ष में प्रचलित है। महाराष्ट्र की महिलाएँ तिल के साथ हल्दी और कुमकुम भी दान करती हैं। कई क्षेत्रों में जल-कुम्भादि के साथ सत्तू दान भी किया जाता है। हरियाणा एवं उत्तरप्रदेश की सब वधुएं अपनी-अपनी रीति के अनुसार इस दिन अपने पूज्यजनों को तिल-ताम्बूल एवं कम्बल आदि गरम वस्त्र देकर उनका सत्कार करती हैं। तिल स्नेह का प्रतीक है तो गुड़ मिठास का। इन दोनों का समन्वय कर तिलोहड़ी के रूप में कई जगी मकर संक्रान्ति का आयोजन होता है।
लोकसंस्कृति के विविध पक्षों को अपने में सँजोये यह पर्व भारतीय, सामाजिक, साँस्कृतिक चेतना को आध्यात्मिक भावना एवं साधना से जोड़ता है। पर्व ही तो सभ्य एवं सुसंस्कृत समाज का मूल आधार है। जिस प्रकार पर्व को आधार बनाकर पर्वत समुन्नत होता है, पर्वताकार होता है और जिस प्रकार गन्ने की पोर की तरह मानव शरीर भी पोर-पोर से जुड़ता हुआ जीवन में उत्कर्ष पाता है, उसी प्रकार विभिन्न जीवन-पद्धतियों की समस्त जीवन्त परम्पराओं को मकर-संक्रान्ति का लोकपर्व भारतीय समाज को समुन्नत बनाता रहा है। यह साँस्कृतिक संक्रान्ति पर्व ऋतु चक्र, महाभारत काल की आस्था, पौराणिक जन-विश्वास प्राकृतिक निधि, जलदेवता, वरुणा तथा गंगा वाहन ‘मकर’ से जुड़ा है और सूर्य-रश्मियों के क्रान्तिकारी उत्कर्ष से भरा है। इसी के साथ इसमें एक संदेश भी निहित है, संक्रान्ति के अवसर पर गायत्री महामंत्र से सूर्योपासना का महिमान्वित संदेश। वर्तमान क्षणों में यह संदेश युग-आह्वान भी है, इसे सुनकर जो अपनी उपासना में आगे बढ़ेंगे वे ही युग-संक्रान्ति की उपलब्धियों को बटोर सकेंगे।
क्या दण्डस्वरूप मनुष्य को यातनाएँ दी जानी चाहिए? मनोवैज्ञानिकों का इस सम्बन्ध में सुनिश्चित मत है कि गलतियों को सुधारने का यह कोई ऐसा तरीका नहीं, जिसे सफल और सशक्त कहा जा सके। सच्चाई तो यह है कि अपराध की स्थिति में व्यक्ति को अपराध-बोध कराने की आवश्यकता है। यंत्रणाएँ उन्हें इस स्थिति तक नहीं पहुँचने देतीं, जिसमें वह अपने स्वभाव की समीक्षा कर सकें। इतने पर भी यातनाएं भिन्न-भिन्न देशों और कालों में सजा के रूप में दी जाती रही हैं।
यातनाओं का आरम्भ कब और कहाँ से हुआ-यह ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता, पर इतना अवश्य है कि उसका इतिहास अत्यन्त पुराना है। यों तो प्राचीनतम बैबीलोनियन और मोजेक के कानूनों में इनका उल्लेख नहीं मिलता, पर इतिहास साक्षी है कि बैबीलोनियन और हिब्रू लोगों ने भी युद्ध-बंदी बनाये और उन्हें यातनाएँ दी। परसियन और ग्रीक लोगों के अनुरूप ही सीरियन और मिस्त्रियों में इसका कानूनी प्रावधान था।
यातनाओं की आवश्यकता किसलिए पड़ी और मनुष्य-समाज ने इसे क्यों अपनाया? इस सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए बहुचर्चित ग्रन्थ ‘टाँर्चर्स थ्रू एजेज’ में लिखते हैं कि समाज परिवार का एक बृहत्तर रूप है। जब छोटे-से परिवार में अपने-अपनों के बीच मतभेद और मनमुटाव उभरते रहते हैं, तो समाज जितने बड़े आकार वाली संस्था में विद्वेष-वैमनस्य न हो, यह कैसे सम्भव है? जहाँ मानव होंगे, वहाँ लड़ाइयाँ भी होती हैं, और कुचक्र भी रचे जाते हैं, यंत्रणाएँ भी दी जाती हैं तथा प्रेम भी प्रदर्शित किये जाते है। आदमी की क्रूरता किसी एक कारण से है, साबात नहीं। इसके अनेक कारण गिनाये जा सकते हैं। वे लिखते हैं कि कई बार इसका निमित्त मात्र निर्बलता होती है। सामने वाला कमजोर हो और दूसरा पक्ष सबल, तो अपना रौब गालिब करने के लिए वह कुछ भी अमानवीय कदम उठा सकता है। कितनी ही बार प्रतिद्वन्द्विता की परिणति पाशविकता के रूप में सामने आती है। वर्गविभेद और आर्थिक असमानता भी इसके मनोविनोद भी हो सकता है, जिसमें मनुष्य अथवा जन्तु को तड़पते-छटपटाते देखकर कर्ता को अपार सुख मिलता है। यह विकृत मानसिकता का लक्षण है। प्राचीन समय में आपराधिक व्यक्तियों के लिए भी इस प्रकार के कठोर दण्ड के राजकीय विधान के प्रमाण मिलते हैं।
यद्यपि आजकल कानून इसकी अनुमति नहीं देता और इसे अपराध की श्रेणी में रखा गया है, फिर भी चारी-छिपे ऐसे रास रचे ही जाते रहते हैं। संतोष इतना ही है कि वे पुराने जमाने जितने नृशंस एवं लोमहर्षक नहीं होते है। यातनाओं के उल्लेख का सबसे प्रथम प्रमाण ग्रीक इतिहास में मिलता है, जिसमें बताया गया है कि तब अपराधियों से सच्चाई उगलवाने के लिए ही इनका इस्तेमाल किया जाता था, किन्तु यंत्रणाओं का जन्मकाल इसे नहीं माना जा सकता, कारण कि इससे भी प्राचीन बैबीलोनिन सम्यता कि दौरान भी ये प्रचलन में थी। ग्रीस में यद्यपि गुलामों और युद्धबन्दियों को ही ऐसे पैशाचिक दण्ड दिये जाने का नियम था, लेकिन यदा-कदा गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाया करते थे और सर्व-साधारण भी कई बार इस कुचक्र में पड़कर मौत में मुँह में समा जाते है। उस समय यूनान में तीन प्रकार के यातना-यंत्र प्रचलित थे-’व्हील’ ‘रैक’ ‘साँड’।
इतिहास कार फ्लेवियस ने एक स्थान पर लिखा है कि हृील यातना-यंत्र का उपयोग 200 वर्ष ईसा पूर्व में सीरियनों ने मैकावियाँ युद्ध में दौरान सर्वप्रथम किया था जिस किसी को दण्ड देना होता, उसे इस वृहदाकर चक्के से बाँध दिया जाता। हाथ और पैर आमने-सामने दो खम्भों से कसे होते, फिर पहिये को घुमाकर दोनों अंगों को काया से पृथक् कर दिया जाता, तदुपरान्त उसकी खाल खींच ली जाती। यंत्र के नीचे आग धधकती रहती। वह आग शरीर से बहने वाले रक्त से बुझ जाती।
फ्लेवियस ने एक यहूदी बालक को मिले इस दण्ड का रोंगटे खड़े कर देने वाला वर्णन किया है। उसका दोष मात्र इतना था कि उसे जो निषिद्ध माँस का टुकड़ा यंत्र ही अधिक उपयोग में आते थे। रैक का यदा-कदा और यत्र-तत्र ही प्रयोग होता था। इसकी चर्चा अरिस्तोफेन, एनाक्रियन एवं लूसियन जैसे तत्कालीन साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में की है। दण्ड देने के उपरोक्त तीन तरीकों के अतिरिक्त एक अन्य वीभत्स उपाय भी अपनाया जाता। इस सम्बन्ध में लूसियन ने लिखा है कि एक बार एक लड़की को पकड़ा गया। उसको एक मरे गधें के पेट में सिल दिया गया। सिलाई ऐसी की गई कि उसका सम्पूर्ण शरीर मृत जानवर के अन्दर रहे और केवल सिर ही बाहर निकला रहे। बाद में उसे एक रेगिस्तान में छोड़ दिया। मृत्यु देने वाले उसकी पीड़ा और छटपटाहट से आनन्दित हो रहे थे। गधे के भीतरी अवयव सड़ने गले, उसमें कीड़े लग गये थे, बाहर उससे भीषण बदबू आ रही थी। लड़की बेचारी असहायों और अपंगों की तरह चीख-चिल्ला रही थी। उसके हाथ-पैर सब कुछ थे पर किसी काम के नहीं, वह गधें के पिंजन में कैद थे। चिलचिलाती धूप उस पर अग्नि-वर्षा कर रही थी, पर वह एकदम विवश भी, अपीन सुरक्षा तक नहीं कर सकती थी। गिद्ध, लोमड़ी उसके माँस नोचते, किन्तु वह तो मानो अस्थिमज्जा से बनी प्रतिमा की तरह गधे की उदर-पीठिका में प्रतिष्ठित थी। लाचारी मौत को निमंत्रण दे रही थी और दुर्भाग्य अपनी किस्मत पर रो रहा था। वह देख सकती थी, सोच सकती थी, समझ सकती थी, लेकिन कर कुछ भी नहीं सकती थी, केवल मृत्यु को निकट आते अनुभव कर रही थी। यह कहर उस स्थिति की रोमाँचक अनुभूति कर सकें।
यूनानियों का दूसरा यातना-यंत्र था- पीतल का साँड़। यह धात्विक साँड़ भीतर से पोला था। इसके पोले पेट में एक दरवाजा खुलता था। वास्तविक जन्तु की तरह उसमें मुँह और नासारन्ध्र भी थे। इसके रचनाकार के बारे में कहा जाता है कि वह एथेन्स निवासी पेरिलस नामक एक व्यक्ति था और वहाँ के सम्राट फालारिष को प्रसन्न करने के लिए यह अद्भुत उपकरण बनाया था। कहते हैं कि इसकी परीक्षा के लिए स्वयं निर्माता को ही इसमें भून डाला गया, इसके पश्चात् ही राजा ने आम यातना के लिए इसकी स्वीकृति दी। उत्पीड़न के लिए व्यक्ति को साँड़ के पेट में बन्द करके नीचे से आग जला दी जाती थी। धातु के गर्म होते ही अन्दर कैद व्यक्ति बुरी तरह चीखता था और चिल्लाते-चिल्लाते मर जाता था। अनेकों को मौत के घाट उतारने वाले राजा के भी इसी साँड़ ने लिए।
रोमनों की युक्ति कुछ भिन्न थी। वे प्रताड़ित करने के लिए विशेष प्रकार के कोड़ों का प्रयोग करते। इन कोड़ों को बिच्छू कहा जाता। इनमें लोहे के काँटे और कील बँधे रहते। कभी-कभी इनकी जगह चिमटे भी ले लेते।
सजा देने के लिए रोमनों के पास एक अन्य साधन भी था। यह लकड़ी का एक घोड़ा था उसकी पीठ पर हाथी जैसा एक हौदा बना रहता। इस पर पीड़ित व्यक्ति बैठता। घोड़े के दोनों ओर दो खम्भों पर चरखी लगी थी। उसके ऊपर से एक रस्सी डाली जाती। इससे अभियुक्त के हाथ-पैर बाँधकर चरखी के सहारे ऊपर उठाया जाता। इस यंत्रणा को बर्दाश्त कर लेने वाले के शरीर को लौह कंघे से विदीर्ण कर दिया जाता।
प्राचीन चीन में सबको एक ही डण्डे से हाँकने का रिवाज नहीं था। वहाँ अपराध की गुरुता और लघुता के आधार पर भिन्न-भिन्न प्रकार के उत्पीड़न का निर्धारण था। छोटी गलती के पानस्ते (तलेवे पर छड़ी का प्रहार) जैसे छोटी सजा, जबकि गम्भीर अपराध के लिए लिगचे जैसा हृदयविदारक प्रावधान। यह यातना हत्या के दोषियों को दी जाती थी। इसमें आरोपी को सर्वप्रथम भोजन के साथ अफीम खिला दी जाती, उसके बाद उसकी लिगचे प्रताड़ना आरम्भ होती। इसमें धीरे-धीरे हम्यारे के सभी अंग काट डाले जाते, जिससे अन्ततः उसका प्राणांत हो जाता। सबसे पहले उसकी भौंह काटी जाती। व्यक्ति तड़पकर रह जाता। फिर दोनों कंधे पृथक् किये जाते, तत्पश्चात् वक्ष, इसके बाद कोनी से नीचे हाथ, तब कोहनी और कंधे के बीच का भाग, ग्यारहवें-बारहवें वार में दोनों जाँघों का माँस उतारा जाता, अगले बार में पैराँ की तली काटी जाती। अन्तिम पन्द्रहवाँ प्रहार उसके मर्मस्थल पर होता, जिसे बार उसी प्राण-चेतना शरीर छोड़ देती। यह आघात हृदय स्थल पर होता। तलवार उसमें वेध दी जाती। शेष प्रहार मृत-काया पर सम्पूर्ण किये जाते। चीन में लिंगचे की सजा अन्तिम बार सन 1920 में दी गई थी, तब से लेकर अब तक फिर उसे नहीं दोहराया गया।
मौत की यंत्रणा देने का एक दूसरा रास्ता भी था। भयानक काण्ड करने वाले चीनियों के लिए इसे अपनाया जाता। गाँक अर्थात् आदमकद ताम्बे का घण्टा। जिस किसी को दण्ड देना होता था, उसको इस घण्टे में कैद कर दिया जाता। पीछे एक आदमी बाहर से उसकी दीवार पर हथौड़े की चोट करता रहता। ध्वनि-तरंग-बार-बार बन्द व्यक्ति के सिर, कान, आँख एवं अन्दर के मर्मस्थलों से टकराती और उनकी रक्तवाहिनियों को फाड़कर रख देती है। इस प्रकार बन्दी रक्तस्राव के कारण मर जाता।
भीषण वेदना देने वाली एक अन्य यंत्रणा भी प्राचीन समय चीनी परंपरा में सम्मिलित थी। यह चूहे द्वारा दी जाती थी। दोषी को लकड़ी के भारी-भरकम लट्ठे से इस कदर कसकर बाँध दिया जाता कि वह तनिक-भी हिल-डुल नहीं सकें। अब एक विशेष प्रकार से बने पिंजरे में एक जंगली खूँख्वार चूहे को बन्द कर दिया जाता। पिंजरे के ऊपर एक बड़ी-सी कटोरी संलग्न होती। उसमें दहकते अंगारे भर दिये जाते। इसके बाद पिंजरे की तली का बन्द द्वारा खोल दिया जाता। आग के प्रभाव से लोहा गर्म होने लगता। जैसे-जैसे वह गर्म होता, चूहा कैद से निकल भागने के लिए इधर-उधर रास्ता ढूँढ़ता। उसे सिर्फ एक ही सम्भावना नजर आती-पेट की खाल काटकर उदर में घूस जाना। आदमी पीड़ा से तड़पता रहता और चूहा पेट में घुसकर खून चूसता रहता। इस क्रम में वह कई बार फेफड़े, यकृत एव हृदय तक को कुतर डालता। व्यक्ति निरीह बना सब कुछ सहता हुआ अन्त में मृत्यु की गोद में समा जाता। बर्मा में होने वाले अत्याचारों की जानकारी अंग्रेज पर्यटक हेनरी वाऊजर की कृति ए माँमेण्ट अमोंग बारबेरियन्य से मिलती है। उन्होंने लिखा है कि उन दृश्यों को देखकर ऐसा लगता था, जैसे हम आज भी जंगलियों की तरह ही हिंस्र और असभ्य है। वहाँ के कैदियों को उत्पीड़ित करने के लिए तत्कालीन समय में एक विशेष व्यवस्था बनायी गयी थी। उन्हें लकड़ी के एक लम्बे-चौड़े पटरे पर लिटाकर पहरेदार उन पर लकड़ी की कीलदार जूते पहनकर उछलते-कूदते थे। यह क्रम तक तक जारी रखा जाता था, जब तक उनकी हड्डियाँ टूट-टूटकर चूर्ण-विचूर्ण न हो जाएँ। सम्पूर्ण वातावरण में भयावह पैशाचिकता छा जाती और स्थान लहू से रक्तरंजित हो उठता।
वाऊजर लिखते हैं कि शारीरिक उत्पीड़न के साथ-साथ वहाँ पर मानसिक त्रास भी दिये जाते थे। इसके लिए एक बड़े पिंजरे में दो खाने बनाये जाते। पिंजरे की दोनों कोठरियों को पृथक् करने वाली दीवार एक अत्यन्त कमजोर जाली की बनी होती। इसमें एक और कैदी को रखा जाता और दूसरी ओर भूखी शेरनी कैद कर दी जाती। बन्दी यह सोच-सोचकर ही पागल हो जाता कि यदि बीच की जाली उसके धक्के से टूट गई, तो वह उसे अपना आहार बनाकर ही छोड़ेगी।
परतंत्र भारत में अँग्रेज सहित अन्य विदेश शासकों ने भी कोई कम कहर नहीं ढाये। इस सम्बन्ध में मद्रास पे्रसीडेन्सी में सन् 1855 में हुई कथित यातनाओं के जाँच-ब्यौरे का उल्लेख करना ही पर्याप्त होगा। इस आयोग की रिपोर्ट ने लंदन- पार्लियामेण्ट को ही हिलाकर रख दिया था ओर सफाई में अँग्रेज अफसरों को कहना पड़ा था कि ऐसी यातनाएँ अंग्रेज मस्तिष्क की उपज नहीं, स्वयं भारतीय अधिकारियों की देन है। कहते हैं कि तब अंग्रेज विद्रोहियों के साथ बड़ी बर्बरतापूर्ण ढंग से बरताव करते थे। यंत्रणा के रूप में चिमटे से उनकी खाल उधेड़ दी जाती थी। बिच्छू एवं दूसरे जहरीले कीड़ों से अणुकोष आँख जैसे सुकोमल अंगों को कटवाया जाता, मूँछों में सहारे अधर में लटकाना, दम घुटने तक पानी में डुबोये रखना, गर्म लोहे से दागना, हाथ-पैर काट लेना, कमर से बाँधकर उलटा लटका देना, रक्त-संचार को रस्सी बाँधकर रोक देना जैसे कितने ही छोटे-बड़े कायिक कष्ट दिये जाते थे।
मुगल शासक इससे भी दो कदम आगे निकल गये। उनने सिखों के पाँचवें गुरु अर्जुनदेव और सातवें गुरु तेगबहादुर एवं उनके शिष्यों को अमानुषिक ढंग से मौतें हीं, वह दिल-दहलाने वाली थीं। गुरु अर्जुनदेव पर खौलता तेल तब तक डाला गया, जब तक उनके प्राण निकल नहीं गये। दिल्ली के वर्तमान चाँदनी चौक पर गुरु तेगबहादुर के दो शिष्यों में से एक को पानी में उबाल दिया गया, जबकि दूसरे को आरे से चिरवाया गया। इतने पर भी इस्लाम धर्म नहीं स्वीकार करने के अपराध में गुरु तेगबहादुर का सिर औरंगजेब ने कलम करवा दिया।
कश्मीर में हरीसिंह के पूर्ववर्ती तुर्क शासकों ने स्थानीय लोगों पर जिस प्रकार के अत्याचार किये, वैसा दूसरा उदाहरण अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। इस्लाम धर्म नहीं स्वीकार करने वाले कश्मीरी पंडितों के बारे में जिन्दा बन्द करके नदी में प्रवाहित कर दिया जाता। वे तड़पते हुए प्राण त्याग देते। इनसानों तक ही उनके अत्याचार सीमित नहीं रहे, जानवरों के साथ भी उनने क्रूरता का व्यवहार किया। कहा जाता है कि बादशाह वहाँ की पहाड़ी चोटियों पर जाकर बैठ जाते और उन ऊँचाई से हाथियों को धकेल दिया जाता। बुरी तरह उनके अंग-भंग होते, तथा लुढ़कते-पुढ़कते हजारों फुट गहरी खाइयों में गिरकर मर जाते। इस दृश्य को देखकर उन्हें बहुत मजा आता।
तुर्कों की निर्दयता के बारे में अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं, लेकिन सबसे पुराना उदाहरण इतिहासकार ग्राफटन के क्रानिकल से मिलता है। सोलहवीं शताब्दी में जब तुर्कों ने आँस्ट्रिया पर हमला किया, तब उन्होंने उन पर भीषण अत्याचार किये। आँख निकाल लेना, जिन्दा रहते पेट फाड़ कर आँतें खिंचवाना, पिंजरे में बन्दकर समुद्र किनारे लहरों के प्रचण्ड थपेड़े खाने के लिए छोड़ देना आदि वहाँ की कुछ मुख्य यातनाएँ थी।
कहते हैं कि नाजियों द्वारा फ्राँसीसियों का जैसा उत्पीड़न हुआ था, उसमें जितने जिन्दा बच गये, वे भी उनके ही चरण-चिन्हों पर चले। गेस्टापों ने अपने शासन-सत्ता के दौरान कैसे-कैसे अमानवीय दण्ड दिये थे- यह कोई छिपी बात नहीं। उस क्रूर शासन के समापन के बहुत समय बाद भी पीड़ितों के बदले की भावना खत्म नहीं हो सकी थी। इसका एक ताजा उदाहरण 1957 में देखने को मिला, जिसमें एक फ्रेंच पैराटुपर ने अल्जीरिया में अपने क्रूर कर्मों के द्वारा उत्तेजना फैला रखी थी। तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति दगाल ने उक्त घटना को छिपाने का बहुत प्रयत्न किया, पर इसमें वे सफल नहीं हो सके। हेनरी एलेगएक फ्रेंच सम्पादक ने उस अमानवीय प्रसंग को सम्पूर्ण विश्व के समक्ष प्रकट कर दिया। उसके इस दुस्साहस के कारण सरकार ने उसे 12 जून, 1957 को गिरफ्तार कर लिया और यंत्रणाओं की एक भीषण श्रृंखला शुरू हुई। उन्हें बिल्कुल वस्त्रहीन कर तवे की भाँति तप्त जमीन पर लिटाया गया, फिर गुप्ताँगों को नुकीले औजारों से खुरचा गया। सिर को पानी के अंदर तब तक डुबोये रखा, जब तक वह बेहोश न हो जाए। अनेक दिनों तक चिलचिलाती धूप में नग्न रखने के उपरान्त उस नमक का घोल पीने को दिया, लेकिन यातना का सबसे भयानक क्षण वह था, जब उसको सोडियम पेंटोथाँल की सुई लगाई गई, फिर बिजली के झटके दिये गये। कारागार से छूटने के बाद एलेग ने एक पुस्तक लिखी- दि क्वेष्चन जिसकी भूमिका में फ्राँस के तत्कालीन विचारक ज्याँ पाँल सार्त्र ने भारी मन से कहा था क भौतिक उन्नति की श्रेणी में आ गए हों, पर हमारा अन्तस् आदिम-असभ्यों की तरह ही अब भी बर्बर बना हूआळै। हम जंगल के अविकसित स्थिति में न रहें हो तो क्या हुआ? हमारी मानसिकता आज भी वैसी ही जंगली बनी हुई है।
स्पेन में भी पुराने समय में भीषणतम अत्याचार होते थे। इसी की एक आपबीती विलियम लिथगो ने अपनी कृति दि क्रूवेल्टी में वर्णित की है। घटना के अनुसार उन्हें जासूस समझकर पकड़ लिया गया, इसके बाद घोर त्रास दिये जाने लगे। रेक में लम्बा करके एक हाथ की खाल खिंचवा ली गई, कारण कि उसमें राजा जेम्स प्रथम का नाम एवं चित्र बना हुआ था। इसके बाद का उल्लेख करते हुए वे लिखते है-मेरी आँख बार-बार चौंक उठती। काल-कोठरी में किसी के प्रवेश करते ही उसके जल्दी आचरण याद कर बेहोशी छाने लगती और मुँह से झाग निकलने लगता, मूर्च्छा की स्थिति में भी होंठ फड़कते तथा कराह के दारुण स्वर से कोठरी गूँजने लगती। हाथ से खून रिस रहा था। मेरे एक-एक अंग को तोड़ा गया। उठती-बुझती साँसों को देखकर भी उन्हें संतोष न हुआ तो चीख बन्द करने के लिए चेहरे पर एक तीव्र प्रहार किया। बाद में लिथगो को दयनीय हालत में कारामुक्त कर दिया गया।
उपरोक्त घटनाओं को देखकर ऐसा लगता है, मानों प्राचीन शासकों ने दण्ड और यातना के मध्य कोई फर्क नहीं समझा। व्यक्ति अपराध करता है, तो निश्चय ही कानून की दृष्टि से वह दोषी है। उसे सजा दी जानी चाहिए, ताकि वह यह अनुभव कर सके कि जो कुछ किया, गया, वह अनुचित था, अमानुषिक यातना देना-यह वास्तव में उस मनोवृत्ति द्योतक हैं, जहाँ से मानसिक पिछड़ेपन की पाशविकता से ऊँचा उठकर संस्कृति और सभ्यता का विकास हुआ। आज भी इस मानसिकता से हम पूरी तरह उबर नहीं सके हैं। वह अब भी जीवित है, जिसमें यातना का स्वरूप अवश्य बदल गया है, पर उसके पीछे झाँकती सामन्ती मानसिकता ज्यों की त्यों बनी हुई। यदा-कदा इसी को राजसत्ताधीश भी प्रच्छन्न रूप में ‘थर्ड डिग्री’ के परिवर्तित नाम से इस्तेमाल करते हैं।
इन सभी नृशंसताएं के बारे में अब तक काफी कुछ लिखा जा चुका है और लिखा जा रहा है। इन उल्लेखों में दो प्रकार के शब्दों की किसी-न-किसी रूप में अवश्य चर्चा होती है-एक ‘सैडिज्म’ दूसरा ‘मैषोचिज्म।’ ऐसे साहित्यों में से प्रत्येक में न्यूनाधिक ‘सैडोमैषोचिज्म’ अवश्य विद्यमान होता है। इन दोनों ‘इज्मों’ का जन्म कैसे हुआ? यह उल्लेखनीय है। वास्तव में ये दोनों शब्द यूरोप के दो व्यक्तियों के नाम से प्रचलित हुए, जिनके स्वयं के जीवन में भी क्रूरता, कठोरता और यंत्रणाओं के अभिन्न तरीके सम्मिलित थे।
काउण्ट डोनेसन अलफोंसे फै्रं्रकौस द सेड-यह एक फ्राँसीसी था, जो एक अभिजात्य घराने से सम्बन्ध रखता था और दूसरा सिवेलिगर लियोपोल्ड फाँन सैकोर मेषोचे-यह आँस्ट्रिया का रहने वाला था और एक सम्भ्रान्त परिवार का था।
समाजवादी देशों का एक विशिष्ट नारा है “अपराधियों को समाप्त कर दो, अपराध समाप्त हो जायेंगे।” साम्यवादी व्यवस्था में गहरी पैठ रखने वाले लोग जानते होंगे कि यह नारा कितना असफल रहा। यदि इसमें तनिक भी तथ्य होता, तो एकीकृत सोवियत संघ में करोड़ों रुबलों का घेटाला सामने नहीं आता। वस्तुतः यह सिद्धान्त ही गलत है। बल, यातना या दबाव के द्वारा समाज को सुधारा और बदला नहीं जा सकता। उसके लिए हमें भिन्न तरीका अपनाना पड़ेगा। स्नेह और प्यार का, शालीनता और सज्जनता का रास्ता ऐसा है, जिसके बल पर हिंस्र पशुओं को भी पालतू बना लिया जाता है, तो फिर मनुष्य इन तत्वों से सर्वथा अप्रभावित बना रहे, ऐसी बात नहीं। उसकी मूल सत्ता इतनी मलीन नहीं कि वह अपनी भलाई-बुराई समझाने पर नहीं समझ सके। हम स्नेह का सहारा लें, समाज हमें परिवर्तित दिखाई पड़ेगा।
वे दंपत्ति थे। पत्नी का नाम था, एनिटा, इटली के महान क्रान्तिकारी योद्धा गैरीबाल्डी उसके पति थे। पारिवारिक जीवन के साथ राष्ट्रीय जीवन में भी वे एक-दूसरे के सहचर थे। उन दिनों वे दोनों रायोग्रेड में रह रहे थे, जब गैरीबाल्डी को अपनी सेना सहित एक युद्ध में संलग्न होना पड़ा। उस समय उसकी पत्नी एनिटा उसके साथ ही अष्वारोहण करती हुई युद्ध में अविराम उसे सहयोग दे रही थी। वह एक निर्भय देशप्रेम में गपी वीर स्त्री थी। सुन्दरता, सौम्यता, शील, सौजन्य के साथ ही उसके चरित्र में शौर्य और साहस का अद्भुत मिश्रण था। जब संग्राम में सामने से शत्रु सेना की तोपें अग्निपिण्ड बरसा रही होतीं, तो उस समय वह खुले मैदान में तोपों की परवाह न करती हुई इटालियन फोज् के तोपची के रूप में गोले दाग रही होती।
उसका यह वीरोचित कर्म न केवल उसके पति गैरीबाल्डी, बल्कि उसकी पूरी सैन्य टुकड़ी को ऊर्जा-उत्साह और नव-स्फूर्ति प्रदान करता था। उस जैसी वीरान जंगल में अपने चार दिन के घास-फूस के झोंपड़े में जिस सुरुचि, श्रम और सहिष्णुता के साथ गृहस्थी का सजा-सँवरा रूप खड़ा करने में सक्षम थी, उसी उत्साह, सूझ-बूझ, साहस के साथ वह युद्ध, अनवरत संघर्षों तथा फरार जीवन के कष्ट, झेलने में अग्रणी थी। दुःखों, कष्टों, भूख, प्यास, थकान के बीच उसके मुख पर कभी हताशा या म्लानता नीं देखी गयी। पर पग पर चरितार्थ करती चलती थी कि जब उसका उसके पति का सम्पूर्ण जीवन स्वतंत्रता के लिए समर्पित है तो ये सब विषम परिस्थितियाँ उसके लिए उपहार ही हैं। घोर दुर्दिनों में कभी गैरीबाल्डी के सामने ऐसा कोई क्षण नहीं आया जब उसे एनिटा को धैर्य या सांत्वना देने का कोई मौका आया हो। उल्टे वही सब प्रकार के अभावों, संघर्षों तथा मुसीबतों में पति को तथा उनके संघर्षशील सहयोगियों को नवसाहस, संबल, शक्ति और नवस्फूर्ति प्रदान करती थी। वह गैरीबाल्डी के सभी साथी सैनिकों की माँ-बहिन सभी कुछ थी। कोई सैनिक उसे माता कहता तो कोई बहिन, कोई उसे अपना पथ-प्रदर्शक मानकर विश्वास जताता। भीषण-से-भीषण संकटों में भी वह हँसती रहती तथा अपनी प्रसन्नमुद्रा से गैरीबाल्डी की हारी -थकी सेना को प्रसन्नता प्रदान करने में जुटी रहती।
उस दिन युद्ध के बीच जब-वह तोपची के काम को वीरतापूर्वक अंजाम दे रही थी, शत्रु सेना की तरफ से यह अफवाह उड़ा दी गयी कि गैरीबाल्डी मारा गया। उस क्षण युद्ध खत्म हो चुका था तथा युद्ध में एनिटा अश्व मारे जाने से उसे कैछ किया जा चुका था। पति के रण में खेत रहने की खबर सुनकर उसने शत्रु शिविर से आग्रह किया कि मुझे अपने पति का शव खोज लेने दिया जाय। फलतः उसके साथ एक सैनिक निगरानी के लिए भेजकर उसे समराँगण से अपने मृत पति की लाश खोजने भेजा गया। शव तो न मिला, न मिलना ही था, क्योंकि गैरीबाल्डी जीवित था। एनिटा को लड़ाई के मैदान में अपने पति का ऊपरी चोगा मिला। वह उस आच्छादन को कन्धों पर ओढ़कर शत्रु सैनिकों के साथ लौटा रही थी कि एक स्थान पर कुछ मौका पाते ही वह फरार हो गयी।
बाद में जानकर लोगों को आश्चर्य हुआ कि पूरे चार दिन और चार रातों तक अविराम चलती ही रही। इस बीच उसने उस कण्टकमय वन्य और पर्वतीय पथ का साठ मील का फासला पैदल तय कर डाला। उस जंगल में कहीं शेर-बाघ दहाड़ते थे, तो कहीं अजगर लहराते थे, पर एनिटा उनके बीच निर्भीक भाव से पथ पारा करती गयी। पूरे साठ मील के सफर में उस बियावान में एक भी आदमी कहीं नहीं आया। बड़ा बीहड़ पथ था वह और वस्तुतः सच कहें तो पथ या पगडण्डी जैसे कोई चीज वहाँ थी नहीं। वह घास-काँओं के बीच ही रास्ता बनाती बढ़ती गयी थी।
कहीं-कहीं उसे जंगली बेरों की झाड़ियाँ मिलीं तो चार क्षण रुककर उसने उन बेरों से अपनी क्षुधा शान्त कर ली, किसी झरने से पानी पी लिया, पर सोना नहीं, विराम नहीं करना। अविराम चलकर पाँचवें दिन वह जब एक वन से गुजर रही थी, एक अज्ञात आदमी उसे मिला और उसके प्रति पूरी हमदर्दी जताते हुए उसने आग्रहपूर्वक अपना अश्व उसे दे दिया, ताकि इतनी थकावट और भूख-प्यास के बीच उसे यथाशीघ्र अपनी मंजिल मिल सके। आगे उसे कई नदियाँ मिलीं। उन्हें पार करते हुए उसे चार दिन अश्वारोहण करते चलना पड़ा, तब नौवें दिन उसे गैरीबाल्डी दिखाई दिया। गैरीबाल्डी ने देखा, विगत आठ दिनों की अनवरत यात्रा तथा भूख, प्यास व थकान ने एनिटा को जर्जर बना डाला है। उसने पीठ ठोंककर उसे इन बात के लिए शाबाशी दी कि ऐसे बुरे दिनों में भी उसने धैर्य नहीं खोया।
लेकिन विषमता तो जैसे उसकी अभिन्न संगिनी थी। एक दिन दोनों देश-प्रेमियों के जीवन में ऐसा आया, जब सागर में संतरण करते समय इनका जलयान आँधी-तूफान में फँसकर ध्वस्त हो गया जहाज छोटा ही था। साथी सैनिक उससे दूर छूट गए। यह घटना सान्टा केटिरिना के तट पर हुई। उस दिन तो एनिटा को जहाज का मात्र एक तख्ता ही नसीब हो पाया खड़े होने के लिए। उसी पर पाँव टिकाकर वह शत्रु सेना पर तोप के गोले बरसाती हुई तोपची का दायित्व पूरी सजगता से निभाती रही। शत्रु सेना जान ही नहीं सकी कि गैरीबाल्डी के तोपखाने की गनर एक स्त्री है।
संघर्षों के इन्हीं झंझावातों के बीच एनिटा ने एक बेटे को जन्म दिया। नाम रखा। मेनोटी। उसके जन्म के साथ ही गैरीबाल्डी को एक युद्ध में फँस जाना पड़ा। एनिटा फिर भी पीछे नहीं रही। आखिर एक तोपची के नाते उसे अपने समररत पति का साथ जो देना था। गैरीबाल्डी ने उसे टोका भी-”एनिटा! तुम हाल में ही प्रसवकक्ष से बाहर आयी हो। बेहतर होगा, अपने बच्चे की देखभाल करने शिविर में रुको, मेरे साथ मत चलो।” पर उसने कहा, “जब एक नया युद्ध मेरी परीक्षा लेने आया है, तो कोई भी मजबरी हमें शिविर में नहीं रोक सकती। मैं सेना के साथ ही रहूँगी और लड़ूंगी।” यह कहकर उसने अपने इकलौते बेटे को एक कपड़े में बाँधकर, उसे झोली की तरह गलें में लटकाकर सेना में आ मिला। इस बार तीन मास तक एनिटा और गैरीबाल्डी को सेना सहित युद्ध में व्यस्त रहना पड़ा। लास एनटास में हुए इस युद्ध ने बहुत भयावह रूप धारण कर लिया। लोगों ने उन कष्टों, अभावों की कभी कल्पना भी न की होगी, जो इन दोनों देशानुरागियों ने उन तीन महनों में झेले।
उस वन और समुद्री तट पर रोज भयंकर तूफान उठते थे, अंधड़ चलते थे, खूब शीत पड़ता था और उस शीत में वर्षा भी झेलते थे ये लोग। भेजन के नाम पर जंगली बेर। जड़ें और सूखा काष्ठ जलाने को न मिलने पर रात भर जागते बीतता। कई-काई दिन खाने को कुछ न मिल पाता। मिलता तव केवल पानी और उस स्थिति में भी चलना बीस-तीस मील। तब भी एनिटा गैरीबाल्डी को हँसाए बना न रहती। घोर संकट वेला में भूख-प्यास, थकान और शीत में काँपते रहकर हँसना ऐसे ही महाप्राणों के वष क है, जिनके चरित्र में देशहित, सर्वोपरि रहती है। उन दोनों के जीवन ऐसे ही संस्कारों से जगमग थे। सानजिबराइल के पथ पर कई नदियाँ पार करते समय अनेकों बार ऐसा हुआ कि झोली में पड़े नन्हे बच्चे को गैरीबाल्डी अपने गले में टाँगे और एनिटा के साथ अपने शस्त्रोस्त्रों को ऊपर उठाये ये दोनों जुझारू नहीं पार कर रहे थे।
उन्हें आगे का जीवन फरार बिताना पड़ा। अतः गैरीबाल्डी ने अपने सैनिकों को स्वतन्त्र कर दिया और उनसे कहा कि फिलहाल तुम लोग अपने मनचाहे स्थानों पर जा सकते हो। फिर मौका आया तो हम सब इकट्ठे होकर देश की स्वतन्त्रता के लिए लड़ेंगे। हमारा ध्येय कभी विस्मृत न हों। रायोग्रेड से चलकर वे दोनों मोंट वीडियो आए। इस यात्रा में भरण-पोषण के लिए उनके पास कुछ न था। एक दिन उन्होंने सोचा, क्यों न जंगलों-खेतों में सक्र्र्रय लोगों के गाय-बैल हम दोनों चरा लिया करें। अहो देशभक्ति! इटली के महान-क्रान्तिकारी सेनापति और उनकी तेजस्विनी पत्नी अपने लक्ष्य-सिद्धि के लिए चरवाहा बन गए। दिन-दिन भर गया-बैल, भेड़-बकरियों के रेबड को चराते हुए वे दोनों लोगों को जनक्रान्ति का संदेश दिया करते।
तभी पुनः युद्ध ने उन्हें पुकारा। हुआ यों कि ब्यूनसआयरिस और रोजस के बीच लड़ाई शुरू हो गयी। गैरीबाल्डी और उसकी पत्नी से लोगों ने सहायता माँगी। वे दोनों तत्पर हो गए। इसमें मिली सफलता के पश्चात् दोनों ने ही नए सिरे से राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के लिए फौज संगठित की। इसका ध्वज श्यामवर्णी था। मध्य में अंकित था एक धधकता ज्वालागिरि। इसका भावार्थ यह था कि उसका अपना देश संतप्त-शोकाकुल है तथा उसके अन्तर में दुःख का दावानल धधक रहा है। इन दोनों के ही प्रेरणा-गुरु मेजिनी थे, जो आजीवन जब तक देश पराधीन रहा उसकी स्मृति स्वरूप काले कपड़े ही पहनते रहे। गैरीबाल्डी के सैनिक लाल रंग की वर्दी पहनते थे। इस सेना में अपना घर-परिवार त्याग कर आए ऐसे युवक थे, जिनका एकमात्र जीवनोद्देश्य था-राष्ट्र को स्वतन्त्र कराना।
गैरीबाल्डी और उसकी पत्नी ऐसे जाग्रत जनों के सेनापति और संरक्षक थे। एनिटा उन लोगों से कहा करती-”तुम आज अपने हृदय पर हाथ रखकर सुनो तो कि तुम्हें अपने देशवासी पूर्वजों के रक्त का स्पन्दन सुनाई पड़ता है या नहीं, जिन्होंने अपने देश के लिए महान कार्य किए। आओ तुम भी शपथ लो कि कभी अपनी मातृभूमि का दूध नहीं लजाओगे और दुनिया को यह अपने जीवन में चरितार्थ कर दिखाओगे कि तुम्हारा जन्म देश की सेवार्थ हुआ है और हम अपने देश की सच्ची संतान है।” एनिटा की ओजस्वी वाणी सुनकर उनमें से हर एक शपथ लेता कि कैसा भी भयावह संकट घिर आए, हम अडिग होकर स्वतन्त्रता के लिए संघर्षरत रहेंगे।
वे दोनों ही कभी भी अपने जख्मी या युद्ध में पंगु हो जाने वाले सैनिकों की जना भी उपेक्षा नहीं करते थे। वरन् उनकी तीमारदारी व दवा-इलाज में खाना-सोना भूल जाते। युद्ध के बीच में भी वह अपने घायल साथी को स्वयं उठाकर लाते। प्रायः ऐसे क्षणों में स्वयं उसकी जान जाने का खतरा सामने आ खड़ा रहता। लेकिन वह अपने सैनिकों को सदैव ही ऐसी शिक्षा देते रहते कि अपना कोई भी सैनिक समराँगण में उपेक्षित न पड़ा रहे। इसके लिए सब ओर उनकी कीर्ति फैली थी। सैकड़ों मरणासन्न घायल एनिटा की सेवा ने बचा लिए थे।
देश की खुशहाली के दिनों में जब देश के शासन ने उसे जनरल की उपाधि दी, कहा कि आज से आपको प्रधान सेनापति बनाया जाता है, तो गैरीबाल्डी ने कहा-”पद मैं स्वीकार नहीं करता।” तब उसे राज्य द्वारा लाखों पाउण्ड देकर पुरस्कृत करने की चेष्टा की गयी। गैरीबाल्डी ने कहा, “देश की मुझसे जो भी सेवा बन पड़ी उसके लिए कोई भी धनराशि, पद या पुरस्कार मुझे स्वीकार नहीं।” और देखा यह गया उन दिनों वे पति-पत्नी भीषण अर्थाभाव व गरीबी झेल रहे थे। उनका बेटा रिकियो मेनोटी काफी बीमार था। डॉक्टर बुलाया गया तो पथ्य के नाम पर उनके घर में मात्र थोड़ा-सा कच्चा मटर था। न रोटी, न पनीर और न एक प्याला दूध उस बीमार बच्चे के लिए-और बच्चा अभी छोटा ही था। एनिटा भी प्रसूति और युद्ध के कारण काफी कमजोर हो गयी थी। उस डॉक्टर का दिल भर आया। गैरीबाल्डी और एनिटा से छिपाकर उसने यह स्थिति उनके मित्रों को लिख भेजी। तब उन्हें विवशतः यह सहायता स्वीकार करनी पड़ी।
आगे जब इटली के युद्ध मंत्री ने उन पर जोर डाला कि देश ने जो धनराशि आपके लिए सुनिश्चित की है, उसे यदि अपने लिए न लेना चाहे तो अन्य किसी कार्य में खपा दें। इस पर गैरीबाल्डी और एनिटा ने उनसे अनुरोध किया कि राज्य की ओर से उनको दी जाने वाली धनराशि रुग्ण तथा घायल सैनिकों में बाँट दी जाए। इस संदर्भ में उन्होंने इटली के युद्धमंत्री को जो ऐतिहासिक पत्र लिखा था, उसकी कुछ पंक्तियां प्रत्येक राष्ट्रभक्त के लिए हृदयस्पर्शी हैं-
महाशय! हम दोनों से देश की जो भी यत्किंचित् सेवा बन पड़ी, उसके बदले सरकार हमें जो भी प्रतिष्ठा-पुरस्कार तथा पद-गरिमा प्रदान करना चाहती है, यथार्थ में हम उसके हकदार हैं ही नहीं। अगर मैं सरकार से देश की लाड़ली सन्तानों के खून के बदले में कोई पुरस्कार, पद या प्रतिष्ठा खरीदूँगा तो वह मेरी आत्मा का पतन सिद्ध करेगी। जिस समय मैंने अपने देश-बन्धुओं में कुछ जाग्रति, उत्साह और साहस उत्पन्न करने की कोशिश की थी, उस वक्त मेरे मानस में यही भावना थी कि अपने देशवासियों को अत्याचारों और पीड़न से बचाऊँ, अतः आज अगर मैं उस सेवा के पुरस्कार स्वरूप कोई प-प्रतिष्ठा आदि स्वीकार करूं तो वह आत्मवंचना ही होगी। अमेरिकी संग्राम में भी उन्होंने इसी एक उद्देश्य से भाग लिया था कि उस युद्ध में मेरे देशवासी साथी निपुणता प्राप्त कर लेंगे। जिससे आगे वे देश की स्वतन्त्रता में अच्छी तरह भागीदार हो सकेंगे। इन्हीं दिनों की बात है जब गैरीबाल्डी एवं एनिटा मोंट वीडियो में थे। एक रात फ्राँसीसी नौसैनिक बेड़े का प्रधान उनसे भेंट करने आया। अभी तक गैरीबाल्डी और एनिटा ने शौर्य, सच्चाई, ईमानदारी आदि सद्गुणों से विश्व में जो कीर्ति अर्जित की थी, उसी से प्रभावित होकर वह उनसे मिलने को उत्सुक हुआ था। उसकी कल्पना थी कि ऐसा वीर सेनापति और उसकी पत्नी अवश्य काफी वैभव और ताम−झाम के साथ रहते होंगे। किन्तु उस समय वह अवाक् रह गया, जब उनके यहाँ जाने पर उसने देखा कि जिस एक मामूली से झोंपड़े में वे दोनों रह रहे हैं, उसमें दरवाजे तक नहीं है।
महज आड़ के लिए एक खुली-सी टट्टर है और वह भी कम जर्जर नहीं। फ्राँसीसी नौसेनाध्यक्ष जैसे ही उस टट्टर को हटाकर घुसने को हुए कि वह गिरते-गिरते बचे, क्योंकि टट्टर को अन्दर से बन्द समझकर उसमें जरा धक्का दिया थाँ। उस टट्टर में था क्या? वह जरा से धक्के में ही अलग जा गिरी और एडमिरल महोदय वहाँ रखी एक कुर्सी से टकरा गए। उनके मुख से अनायास यह क्षेभ मुखर हो उठा, ऊफ क्या आवास है कि प्रधान सेनापति गैरीबाल्डी से जो आदमी मिलने जाए, उसे अपनी जान की जोखिम जरूर उठानी पड़े। वाह भाई वाह!
गैरीबाल्डी को क्या पता कि उस अँधेरे में उससे मिलने कौन आया है। आवाज और आहट सुनकर उसने अवश्य पत्नी से पूछा, “एनिटा! क्या बात हैं।”
वह बोली, “क्या तुमने सुना नहीं दरवाजे पर कोई कुछ कह रहा है।” गैरीबाल्डी ने कहा, “तो कुछ हो तो उजाला कर लो न!”
एनिटा ने कह दिया, “क्या जलाऊ! मोमबत्ती है न कोई लैम्प। एक सेण्ट भी नहीं कि मोमबत्ती मँगवा लूँ।”
गैरीबाल्डी ने शान्त, धीर और ठण्डे स्वर में कहा, “हाँ तुम ठीक कहती हो एनिटा, इसमें झूठ क्या है?” उसके शब्दों में दार्शनिकता तटस्थता का भाव था।
तब तक फ्रेंच नौसेनाध्यक्ष अन्दर आ गया, पर वे परस्पर पहचानें कैसे अँधेरे में। अन्दाज से ही गैरीबाल्डी ने स्वागत करते हुए कहा, “आइए महोदय! चले आइए।”
वह आ तो गया ही था, अपना परिचय स्वयं देने लगा तो गैरीबाल्डी कह उठा, “ओह! एडमिरल! छरअसल मैंने एक वार्त्ता निश्चित तो की थी मोंटवीडियो रिपब्लिक के साथ, किन्तु जब सूची बनी तो उसमें मैं नाम लिखना भूल गया। अब यहाँ यह है कि एक मोमबत्ती भी नहीं और जैसा कि एनिटा कह रही है, एक सेण्ट(1/100 डालर यानि तत्कालीन भारत के दो पैसे) भी घर में नहीं कि वह मोमबत्ती मँगा सके। खैर अँधेरा रहने दो। उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। मेरा ख्याल है कि आप मुझसे बात ही करना चाहेंगे। देख तो आपने होगा ही।” होता क्या, उस अंधकार में ही दोनों बातें करते रहे। फिर गम्भीर मौन धारण किए एडमिरल सीधे युद्धमंत्री जनरल-ओविस के पास पहुँचा, उससे गैरीबाल्डी का रहन-सहन जैसा देखा था, बताया। युद्धमंत्री ने तत्काल 200 पौण्ड अपने आदमी के जरिए गैरीबाल्डी के घर भिजवा दिए।
गैरीबाल्डी ने सारी रकम एनिटा को दे दी। एनिटा ने उसमें से तीन पेंस मात्र रखकर शेष धन अपने सेना के मृत सैनिकों की विधवाओं में बँटवा दिया, उन तीन को अपने हाथ में लिए एनिटा मुसकराते हुए अपने पति से कहने लगी, इससे हम लोग मोमबत्तियाँ खरीद लाएँ, ताकि फिर कभी कोई नौ सेनाध्यक्ष आए तो उसे कुर्सी से टकराना पड़े। अपने घरेलू कामों में उस दंपत्ति ने उन रुपयों से एक पाई भी नहीं खर्च किया। मानव-चरित्र की यह बुलन्दी क्या आज भी किसी समाज के लिए प्रेरणादायक नहीं?
इतने बड़े सेनापति के झोंपड़े में दरवाजा बिना सिटकनी का और वह भी दरवाजे की जगह एक निर्बन्ध चला आए और जब चाहे चला जाए। द्वार खोजने और बन्द करने का कोई झंझट नहीं। जब -जब उस झोंपड़े में खुली हवा का झोंका आता गैरीबाल्डी और एनिटा कह उठते, “सच में घर में द्वार बिना किवाड़ों का ही ठीक है। वर्षा और वायु दोनों ही दृष्टियों से बड़ा लाभप्रद और सुविधाजनक है। खूब खुली हवा आती है और फिर मेहमानों के लिए भी कोई बाधा नहीं।”
पता नहीं गरीबी के इन गौरव वचनों से कितने लोग अपनी सहमति रख पाएँगे किन्तु इन महान देशभक्त दंपत्ति का यह रहन’-सहन उन्हें आज के युग में जहाँ पद-प्रतिष्ठा, प्रलोभन ही चरम उपलब्धियाँ हैं, कुछ सोचने पर विवश करेगा। एक दिन फ्राँस के प्रधान सेनापति पेशे कोई ओविस को इन महान क्रान्तिकारी दंपत्ति के जीवन के प्रति भरे हृदय से यह कहना पड़ा कि ये दोनों ही एक जैसे हैं। इन महान विभूतियों ने उस देश के खजाने से एक सेण्ट भी नहीं लिया, जिसकी उन्होंने अपना रक्त बहाकर रक्षा की और जो अनवरत उसकी स्वतन्त्रता के पहरुए उसी उत्साह से बने रहे।
यह गैरीबाल्डी का ही काम था कि उसने दो-दो राज्य जीतकर विक्टर इमानुएल को दे डाले। उन राज्यों की विजय पर उसे ‘युवराज के केलेटा किसी ‘ तथा ‘द ग्र्रान्ड क्रास ऑफ एननषिएटा ‘ जैसी उपाधियाँ प्रदान की गयीं, परन्तु उसने उन्हें कभी नहीं स्वीकार किया। फिर उसे पाँच लाख फे्रंक सालाना आमदनी का एक पुरस्कार प्रदान किया और शासकों से कहा, जिस सेना ने देश को विदेशी दासता से मुक्त कराया, उसे याद रखिएगा। इतना कहकर वे दोनों एक ऐसे पथरीले द्वीप पर चले गए जिस के परेरा कहते थे। आखिर वे निर्वासित क्रान्तिकारी थे। उस टापू पर उन्होंने एक गरीब और साधनहीन किस्म की जिन्दगी बसर की। अपने हाथों से वे उस कंकरीली जमीन पर खेती करते। उन्हें सन्तोष और सुख था तो यह कि उसने अपने देश को लाखों लोगों को, गुलामी के चंगुल से आजाद कराया, उन्हें एकता प्रदान की।
क्रान्तिकारी जीवन होता ही ऐसा है। मृत्यु उसे पग-पग पर खोजा करती है, अनन्त कष्ट उसके जीवन को ग्रस लेते हैं। गैरीबाल्डी की पत्नी एनिटा केपरेरा से बाहर आते ही लम्बे सफर के कारण बीमार पड़ गयी। फिर भी वे दोनों एक साथ रहे। कहीं घोर दलदल पड़ता तो कहीं भयंकर मरुस्थल। एक जगह पैदल चलते हुए एनिटा ऐसी गिरी कि लगा अब उठेगी नहीं। चारों ओर आस्ट्रियन फौज इन्हें सूँघती-खोजती फिर रही थी। आग लामसड्योला ग्राम आया, जहाँ पहुँचकर एनिटा की दशा अत्यधिक बिगड़ गई। उसे गैरीबाल्डी ने एक दयालु किसान के जर्जर झोंपड़े में लिटा दिया। उसकी नाड़ी टटोली तो समझ गया कि अब वह अन्तिम विदा ले रही है। उसका हाथ छूकर वह बोला-
“एनिटा जाओ! तुम्हें भी अपनी पूर्व मृत बेटी की तरह देश के चरणों में न्योछावर करता हूं।” एनिटा की झील-सी गहरी आँखें उसकी ओर उठी-वह कांपते स्वर में बोली- “मुझे पहले वचन दो, देश को पूर्णतया स्वतन्त्र कराने का मेरा स्वप्न अवश्य पूर्ण करोगे।”“ऐसा ही होगा एनिटा!” गैरीबाल्डी भर्राए गले से बोला, मरते दम तक मेरा संघर्ष जारी रहेगा, यह मेरा तुमसे वायदा है। गाँव के उसी झोंपड़े में उस वीर क्रान्तिकारिणी ने संसार से विदा ली। गैरीबाल्डी भी मृत्युपर्यन्त अपने राष्ट्रीय संघर्ष में लगा रहा। उसकी राष्ट्र भक्ति विश्व के प्रत्येक राष्ट्र कि सच्चे सेवक के लिए अनुकरणीय आदर्श है, जिनके जीवन की चादर सदा बदाग ही जिन्होंने ज्यों की त्यों धरि दीन्ही चदरिया।
पृथ्वी क्या है? मिट्टी, पत्थर का बना जड़-पिण्ड। इसे ग्रह-गोलक भी कह सकते हैं, प्राणियों के लिए आहार जुटाने वाली आधार भी है यह। इसको मानव एवं मानवेत्तर जीवों का निवासस्थल कहने में भी हर्ज नहीं। इस प्रकार उसकी कितने ही प्रकार से व्याख्या-विवेचना की जा सकती है। इतने पर भी वैदिक अवधारणा में वह एक माँ है, और ममतामयी माता की सर्वोपरि विभूतियों से सम्पन्न है। ऋषियों की यह मान्यता कल्पनालोक की कोई उड़ान नहीं, न कोरी भावुकता है। यह वास्तव में दिव्य अन्तःकरण में प्रस्फुटित वह संवेदना है, जिसमें जड़ में भी जीवन की साक्षात अनुभूति होती है, इसलिए सूक्तकार ने उसे ज्यों-का-त्यों अलंकारिक वर्णन माना जाना चाहिए, न अत्युक्तिपूर्ण ही।
अथर्ववेद के बारहवें काण्ड का पहला सूक्त भूमि या पृथ्वीसूक्त कहलाता है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इसमें पृथ्वी के संदर्भ में कवि ने अपने उद्गार व्यक्त किये हैं। यहाँ एक बात स्पष्ट है, इसमें पृथ्वी के संदर्भ में कवि ने अपने उद्गार व्यक्त किये हैं। कि वैदिक कवि अर्थात् ऋषि द्रष्टा हुआ करते थे। वे सब कुछ अंतर्दृष्टि और अनुभूति के आधार पर लिखते थे। वर्तमान कवि काल्पनिक हैं। वे जो कुछ भी लिखते हैं, उनका आधार कल्पना, मान्यता, विचारणा होता है। सत्य-तथ्या से उसका सम्बन्ध हो-यह कोई जरूरी नहीं। ऐसी स्थिति में ऋषि की तुलना कवि से नहीं की जा सकती, न ही उनके कथनों का सीधा-सपाट अर्थ लगाया जा सकता है, उनमें निहित गम्भीर भावों को समझना पड़ेगा, तथा ऋषि की वास्तविक मनः स्थिति का अन्दाज लगाया जा सकता है, जिसमें रचना-कार्य सम्पन्न हुआ। भूमिसूक्त को पढ़कर ऐसा लगता है, कि ऋषि ने पृथ्वी से तदाकार कर लिया हो और तब जो अनुभूति हुई, उसे लिपिबद्ध किया हो। प्राचीन चीन में ऐसे चित्रकार हुआ करते थे जब उन्हें किसी वस्तु का, उपवन का चित्र बनाना होता, तो वे तब तक उसे प्रारम्भ नहीं करते, जब तक कि स्वयं उन्हें इसकी जीवन्त प्रतीति न होद जाए, अर्थात् ध्यान करते-करते जब उन्हें ऐसा स्पष्ट अनुभव होने लगता कि चित्र ऐसा स्पष्ट अनुभव होने लगता कि चित्र वे ही हैं, उपवन वे स्वयं हैं, तो ऐसी स्थिति में जो तस्वीर बनती, उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता, मानों उपवन को ही उठाकर कैनवास पर रख दिया हो। ऐसा वस्तु से एकाकार होकर ही सम्भव है। ऋषि ऐसे ही होते थे। उनकी रचनाओं में जहाँ कहीं भी इस प्रकार के वर्णन उपस्थित हुए हैं, उन्हें भावुक हृदय की अतिरंजना नहीं माना जाना चाहिए, वरन् एक सत्य के रूप में उसकी यथार्थता स्वीकार की जानी चाहिए।
रामकृष्ण परमहंस एक दिन दक्षिणेश्वर की अपनी कोठरी में बैठे हुए थे। सामने में मैदान से होकर एक व्यक्ति गुजरने लगा कि वे एकदम से तड़पने लगे। कुछ समय पश्चात् उनकी पीठ पर काले-नीले धब्बे पड़ गये। पूछने पर ज्ञात हुआ कि ऐसा उस व्यक्ति के मैदान पर चलने के कारण हुआ। उनकी सत्ता मैदान से किस कदर एकात्म हो गई थी, इस उदाहरण से यह समझा जा सकता है।
भूमिसूक्त के ऋषि कुछ ऐसी ही अभिन्नता अनुभव कर भावविभोर हो उठते हैं और अन्तःकरण गा उठता है-”माता भूमिः पुत्रों अहं पृथिव्याः” अर्थात् यह भूमि मेरी माँ है और विशाल हृदय का चरमोत्कर्ष। जिस समय पड़ के साथ ऐसा भाव और व्यवहार रहा हो, उस समय मानवी जीवन कितना उन्नत रहा होगा-यह विचारणीय है। सम्पूर्ण मंत्र पर यदि दृष्टिपात करें, तो ऐसा आभास मिलेगा, जैसे यह पृथ्वी मंत्र के रचनाकार को पहाड़, पर्वतों, नदी-नालों का भौगोलिक पिण्ड जैसी नहीं दीखती, उसमें उसको अपनी माँ की अनुभूति होती है, वह उसकी आत्मा से एकाकार हो जाता है और तब भावविह्वल होकर कहता है- यत् ते मध्यं पृथिवि यच्च नभ्यं यास्त ऊर्जस्तन्वः संबभूवु। तासु नो धेह्यभि नः पवस्व माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तु॥
(12/1/12) अर्थात् हे पृथ्वी! हे माँ! यह जो तुम्हारा मध्य भाग है और जो उभरा हुआ ऊर्ध्व भाग है, यह जो तुम्हारे शरीर के विभिन्न अंग ऊर्जा से भरे हुए हैं, हे मातः! तुम मुझे अपने उसी शरीर में सँजों लो और दुलारो, मैं तुम्हारे पुत्र जैसा हूँ, तुम मेरी माँ हो और पर्जन्य का हम पर पिता जैसा संरक्षण बना रहे।
वास्तव में यह जीवन्त अनुभव ही ऋषिकाल में भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति का निमित्त था। आज जड़ तो दूर, प्राणियों के साथ भी जीवितों जैसा कहाँ बरताव होता हैं? इन दिनों जिस कदर मार-काट, हत्याओं और यंत्रणाओं का ताण्डव नृत्य चहुँओर हो रहा है, उसे देखते हुए कदापि नहीं लगता कि मनुष्य सृष्टि का मुकुटमणि प्राणी है और दूसरे जीवों से वह श्रेष्ठ है। उसकी वरिष्ठता का सर्वोपरि आधार भाव-संवेदना है। वह यदि शुष्क हो गई, तो मनुष्य और नरपशु में कदाचित् ही कोई अन्तर रह जाएगा। नरपशु अधम इसलिए है, कारण कि उसका प्रेम मोहजनित होता और परिवार-परिधि तक सीमित रहता है। मनुष्य को इस क्षेत्र में एक विशिष्ट विभूति मिली हुई है। वह समाज में जब कभी कष्ट-तकलीफ, आपदा-विपदा देखता है, तो उसकी करुणा छलक पड़ती है, वह उन्हें घटाने-मिटाने का प्रयत्न करता और ऐसी गतिविधियाँ अपनाता है, जिन्हें देखकर उसे परमात्मा का राजकुमार कहना सार्थक ही है। संकट तब उत्पन्न होता है, जब मानवी संवेदनाएँ सूख जातीं और अन्तराल छूँछ बन जाता है। अपना-पराया, छोटा-बड़ा, जड़-चेतन जैसी संकीर्ण मान्यताएँ इसी मनोदशा की देन हैं, अन्यथा जिनका अन्तः करण विकसित और विस्तृत हो गया हो, उनके लिए छोटा क्या, बड़ा क्या? जड़ क्या और चेतना क्या? सब एक ही सत्ता के विकास-विस्तार हैं, सब में उस एक की ही आभा और ऊर्जा संचरित एवं प्रकाशित हो हरी है। इस विकास की ही चरम परिणति ऋषियुग में भूमिसूक्त के रूप में सामने आई, ऋषि गा उठे-सा नो भूमिर्विसृजताँ माता पुत्राय में पयः (12/1/10) अर्थात् वह भूमि मेरे लिए उसी प्रकार दूध प्रवाहित करे, जैसे माँ अपने बेटे के लिए करती है। इस मंत्र में सूक्तकार ने भूमि के साथ माँ का सचमुच ही सम्बन्ध जोड़ लिया है और उससे शिशु की भाँति दूध की कामना कर रहे हैं।
आज के बुद्धिवादी इसे किसी अर्द्धविक्षिप्त मस्तिष्क का ही कथन मानेंगे, क्योंकि जिस भावभूमि में उसका सृजन हुआ है, उससे शायद ही वे परिचित हों। जिस अवधारणा में चन्द्र, सूर्य सहित समस्त ग्रहपिण्ड देवता स्वीकारे गये हों, उसमें पृथ्वी को माँ मान लेने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। भौतिक अनुदानों की दृष्टि से भी यदि विचार किया जाए, तो भी वह माँ से किसी प्रकार कम साबित नहीं होगी। मनुष्य इस भूमि पर जन्म लेता और उसकी मिट्टी में खेलकूद कर बड़ा होता है। पृथ्वी उसके आहार की व्यवस्था अपने धान्यों से करती है, अमृततुल्य शीतल जल वह अपना हृदय निचोड़कर देती है। इस क्रम में वह भले ही जलविहीन हो जाए, पर उसे देने में कृपणता नहीं बरतती। क्या इसे मातृहृदय नहीं कहेंगे? क्या यह मातृस्नेह से किसी प्रकार कम है? सम्पूर्ण जीवन भर आदमी उसी में आश्रय पाता और मृत्यु के उपरान्त पुनः उसी की गोद में समा जाता है। कवि भूमि में इन उपकारों से अभिभूत होकर कह उठता है-विष्वंभरा वसुधानी प्रतिष्ठा हिरण्यवक्षा जगतो निवेषनी। वैष्वानरं बिभ्रती भूमिरग्निमिन्द्र ऋषभा द्रविणेनोदधातु (12/1/6) अर्थात् समस्त संसार का निर्वाह करने वाली यह धरती धन से परिपूर्ण है, इसकी छाती सोने की है, सारा जगत उसमें प्रतिष्ठित है, सम्पूर्ण विश्व की यह क्षुधा तृप्त करती है। हमारी कामना है कि यह हमें समृद्धि से ओत−प्रोत करे।
कवि की वाणी यही नहीं रुकती, वह इस बात से भी चकाचौंध है कि किस प्रकार जल की अजस्र धाराएँ बिना किसी प्रामद के अहर्निश बहकर उसे वर्चस्व सम्पन्न बना रही हैं- यस्यामापः परिचराः समानीरहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति। सा नो भूमिर्भूरिधारा पयो दुहामथो उक्षतु वर्चसा॥ (12/1/9)
भूमि के अनुदानों से ऋषि-अन्तःकरण इतना भावप्रवण हो उठता है कि उसका उद्दाम वेग रोके नहीं रुकता, स्तुतिगान के रूप में वह फूट पड़ता है-यह वह पृथ्वी है, जिस पर अश्विनी कुमारों ने अपना रथ चलाता था, जिस विष्णु ने अपने पगों से लाँघा था, जिसे इन्द्र ने शत्रुहीन बनाया था। (12/1/10) यही वह पृथ्वी है, जहाँ प्राचीनकाल में ऋषियों ने अनेक प्रकार के काव्य लिखे थे- यस्याँ पूर्वे भूतकृत ऋषियो गा उदानृचुः (12/1/39)
धरती की अद्भुतता को निहारकर कवि इतना विस्मय-विमूढ़ हो जाता है कि उसे कुछ सूझता ही नहीं, आगे क्या लिखें, पर अन्दर का भावोद्वेग भी कोई कम नहीं, वह अन्तस् को मथने लगता है। कवि चाहता है कि पूरी पृथ्वी को कागज पर उतार दे, इसलिए भावदृष्टि के समक्ष जो कुछ आता है, उसी को लिखता चला जाता है-इसी पृथ्वी पर समुद्र हैं, नदियाँ हैं जल है-यस्याँ समुद्र उत सिंधुरापों (12/1/3), इसी पृथ्वी पर पत्थर और हिमियुक्त पर्वत एवं वन हैं- गिरयस्ते पर्वता हिमवन्तोऽरण्यं ते (12/1/11), इसी पर जीव-जन्तु विचरण करते हैं-मर्त्यास्त्वं बिभर्षि द्विपदस्त्वं चतुष्पदः (12/1/17), जिसकी सुगन्धि सूँघते हुए गंधर्व और अप्सराएँ नहीं अघाते-यं गंधर्वा अप्सरसष्च भेजिरे तेन मा सुरभि कृणु (12/1/23), इसी पर समस्त वृक्ष-वनस्पतियाँ खड़े हैं-यस्याँ वृक्षा वानस्पत्या ध्रवास्तिष्ठन्त (12/1/26), इसी भूमि पर चट्टानख् पत्थर और मृत्तिका है-शिला भूमिरष्मा पाँसुः सा भूमिः संधृता धृता। (12/1/26)।
पर अपने लाभ के लिए जब इस मिट्टी का धरती माता का उत्खनन करना पड़ता है, तो कवि-हृदय की पीड़ा घनीभूत हो उठती है। कवि सोचने लगता है-माँ! तुम रत्नगर्भा हो, तुममें कितने ही प्रकार के खजाने भरे पड़े हैं, पर माँ का पेट विदीर्ण कर डालने वाला बिच्छू बनकर उन्हें तुम्हारे गर्भ से कैसे खेद निकालूँ? यह कृतघ्नता नहीं होगी? क्या तुम्हारे उपकारों का बदला यही होना चाहिए? द्वन्द्व में फँसा कवि अन्ततः इससे उबरता है और भारी हृदय से प्रार्थना करता है- वह तो करना ही पड़ेगा, पर हे भूमि माँ! उससे तुम्हारे हृदय और मर्मस्थलों को पीड़ा न पहुँचे-यत् ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु। मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदययर्पिपम् (12/1/35)
उक्त मंत्र में ऋषि इतने करुणा-विगलित हो उठते हैं, मानो पृथ्वी का नहीं अपनी जन्मदात्री माँ का ही गर्भ काट रहे हों। जड़ और चेतना का यह कैसा अभिन्न संयोग है। दोनों सत्ताएँ तद्रूप हो उठती हैं। एकात्मता और एकरूपता की इतनी तीव्र अनुभूति का ही यह परिणाम था कि तब प्रकृति और पर्यावरण एकदम सुरक्षित थे। आज एकात्मता तो दूर, आदमी में सहृदयता भी नहीं रही। भौतिकवादी विचारधारा ने मानवी अन्तराल को इतना संवेदनशून्य बना दिया है कि उसे स्वार्थपरता के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। हर वस्तु के बारे में वह इस दृष्टि से विचार करता है कि उसका कैसा, कितना, किस प्रकार का उपयोग स्वयं के लिए लाभकारी होगा? भले ही उससे प्रकृति, पर्यावरण और समाज को अपार क्षति पहुँचे। यह एक प्रकार की चिन्तन-शैली है। जड़ के साथ किसी दूसरे प्रकार का भी बरताव हो सकता है, इसे आज का जनमानस अमान्य करता और कहता है कि जड़ के साथ जड़ जैसा ही आचरण हो सकता है। कदाचित इसी मनोवृत्ति और प्रवृत्ति के कारण वर्तमान लोग स्वयं भी जड़ीभूत हो गये हैं। भावनात्मक एकता, प्रेम, स्नेह, श्रद्धा जिन्हें पिछले दिनों तक प्राणी-प्राणी के मध्य का आदान-प्रदान समझा जाता था, वह भी अब कहाँ दिखाई पड़ते? जब जीव-जीव के बीच ही जड़ता को इसके उपयुक्त कैसे स्वीकारा जाता कि उसके साथ सद्भावना का व्यवहार हो सके। यही है जड़ और चेतन के मध्य का, मनुष्य और प्रकृति के मध्य का वर्तमान जीवन-दर्शन। इसी भोंडे तत्वदर्शन ने दोहन और शोषण को जन्म दिया। जड़ का दोहन और जीवन का शोषण-यह दो ऐसी अतिवादी गतिविधियाँ आरम्भ हुई, जिसने रही-सही मानवी संवेदना की अन्त्येष्टि कर दी। यही कारण है कि आजकल जीवन ही नहीं, जड़ ने भी प्रतिकार और प्रतिक्रिया दिखानी शुरू कर दी है।
पृथ्वी जड़ है-यह सत्य है, पर मिथ्या यह भी नहीं कि जड़ की भी पृथक एवं स्वतन्त्र सत्ताएँ होती हैं। जब वह कुपित होतीं, तो ऐसे अनर्थ खड़े करती हैं कि जीवन दूभर हो जाए। शालीनता-सज्जनता सबको प्रिय है, स्नेह-सौजन्य का वातावरण बना रहता है, तब तक प्राणी ही नहीं, प्रकृति भी सद्भाव दिखाती और सहयोग करती हैं लेकिन स्थिति बदलते ही प्रतिशोध के लिए कमर कस लेती है। इन दिनों यही हुआ है। पृथ्वी का जिस निर्दयता से दोहन चल पड़ा है, उससे उसके प्रकोप में अभिवृद्धि ही हुई है। विशेषज्ञ बताते हैं कि आज से सौ वर्ष पूर्व भूकम्पों और ज्वालामुखी विस्फोटों की विभीषिका इतनी विकराल नहीं थी, जितनी अब देखी जा रही है। यह वास्तव में और कुछ नहीं, क्रिया की प्रतिक्रिया है। वह अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी। यह इस बात पर निर्भर है कि हम उसके साथ किस प्रकार का बरताव करते हैं। यह आदान-प्रदान जब तक चलता रहा, तब तक वैयक्तिक शान्ति बनी रही, उसके मिटते ही संकट गहरे होते चले गये।हम पृथ्वी से माँ जैसी स्नेह, संवेदना जोड़ें, वह हमें शान्ति, समृद्धि और सौभाग्य प्रदान करेगी।
विज्ञान अर्थात् विशिष्ट ज्ञान। इस अर्थ की सार्थकता विगत पौने दो शताब्दी से भी अधिक समय तक विज्ञान सिद्ध करता रहा है और नये-नये क्षेत्रों में ऐसी जानकारियाँ उपलब्ध कराता रहा है, जिससे कि उनमें कितने ही क्रान्तिकारी परिवर्तन सम्भव हुए, रूढ़ियां टूटीं और यथार्थता सामने आई। अब ऐसा लगता है कि क्षेत्रवाद और नस्लवाद के कुचक्र में पड़कर वह अपना वास्तविक अर्थ एवं दायित्व खोता जा रहा है तथा समाज और संसार को पुनः उन्हीं अन्धमान्यताओं की ओर धकेल रहा है, जिनसे उबरने में सदियों बीत गए।
ज्ञान की दो धाराएँ हैं, एक को दर्शन और दूसरे को विज्ञान कहते हैं। फिलॉसफी या दर्शन ज्ञान का वह विभाग है, जिसमें आकृतियों, मुद्राओं, प्रतीकों, गुणावलियों के माध्यम से वस्तु में छिपे गूढ़ भावों, प्रेरणाओं, शिक्षाओं की जानकारी मिलती है, जबकि विज्ञान किसी भी वस्तु या क्रिया के सम्बन्ध में उसके पदार्थपरक बोध को कहते हैं। उदाहरण के लिए यज्ञ को लिया जा सकता है। यज्ञ का विज्ञान उसका वह पहलू है, जिसमें वह वातावरण-परिशोधन और स्वास्थ-सम्वर्धन सम्बन्धी भूमिकाएँ निभाता है। यह वैज्ञानिक अध्ययन एवं विश्लेषण का विषय है। इसके द्वारा उस दौरान बनने वाली गैसों और तत्वों की पड़ताल कर यह सिद्ध करना पड़ता है कि शरीर और वातावरण में इनकी कब, कैसी, किस प्रकार की प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप उक्त प्रक्रियाएँ सम्पन्न होती हैं। इसका दर्शनपक्ष इस बात की प्रेरणा देता है कि हमारा जीवन यज्ञीय होना चाहिए, अर्थात् हमें परमार्थ-परायण होना चाहिए इस प्रकार दर्शन किसी भी वस्तु या क्रिया में निहित भाव को अभिव्यक्त करता है और विज्ञान उसके पदार्थ परक प्रक्रियाओं को बतलाता है। यह वास्तव में ज्ञान और चिन्तन की दो प्रणालियाँ हैं। इनसे विकास में सहायता मिलती है। मध्ययुग में चिन्तन की दार्शनिक प्रणाली में अनेक प्रकार की त्रुटियां आ गई और उसमें इतनी विसंगतियों एवं कुरीतियों का समावेश हो गया कि व्यक्ति और समाज उन्नति के स्थान पर अवनति की ओर मुड़ चले। वे प्रगतिशील न होकर प्रतिगामी बनने लगे। इससे उबारने का काम विज्ञान ने, चिन्तन की वैज्ञानिक प्रणाली अपने जिम्मे लिया। उसने तर्क, तथ्य और प्रमाणों के आधार पर परम्पराओं तथा मान्यताओं में घुसी रूढ़ियों की बेड़ियाँ तोड़नी प्रारम्भ कीं और यह स्थापित किया कि ओछा तत्वदर्शन अपनायें रहने वाला उठ सकता। यही कारण है कि पिछले दिनों के पिछड़ेपन की अविकसित स्थिति से उबरकर आज हम अपेक्षाकृत अधिक उन्नत और अधिक ऊँचा नहीं उठ सकता। यही कारण है कि पिछले दिनों के पिछड़ेपर की अविकसित स्थिति से उबरकर आज हम अपेक्षाकृत अधिक उन्नत और अधिक ऊँची अवस्था में पहुँच सके। यह विज्ञान और वैज्ञानिक चिन्तन की उपलब्धि है। दुर्भाग्य की बात है कि अब वही विज्ञान रूढ़िवाद को जन्म दे रहा है।
विगत कुछ वर्षों में अनुसंधान के नाम पर ऐसे शोध-निष्कर्ष प्रकाशित किये गए हैं, जो पूरी तरह पक्षपातपूर्ण लगते हैं। कभी हिटलर ने जर्मनी को विशुद्ध आर्य बताया था और उस विशुद्धता के अक्षुण्ण रखने के नाम पर भी जर्मनी के इतिहास में एक काला अध्याय बना हुआ है। विज्ञानवेत्ताओं के वर्तमान प्रयास वैसे तो नहीं, पर इन दिनों वे जिस प्रकार के वितण्डावाद में फंसे हुए हैं, उसे घृणित अवश्य कहा जाएगा, उससे हिटलर जैसी नस्लवादी मानसिकता की बू आती है। विज्ञान का सहारा लेकर वे यह सिद्ध करने की कोशिश में है कि मनुष्य में बुद्धि-कौशल जाति, क्षेत्र और शारीरिक संरचना पर निर्भर है। उसे सत्य ठहराने के लिए वे तरह-तरह के अध्ययनों और सर्वेक्षणों की मदद ले रहे हैं।
पिछले दिनों चार्ल्स मरे और रिचर्ड हरन्स्टीन ने संयुक्त रूप से एक पुस्तक लिखी, नाम था- ‘दि बेल कर्व’। उक्त पुस्तक में लेखबद्ध ने विभिन्न प्रकार के तर्कों और अध्ययनों के आधार पर यह मान्यता स्थापित करने का प्रयास किया है कि मनुष्य में बौद्धिक क्षमता जन्मजात एवं आनुवंशिक होती है। अपने इस दावे की पुष्टि में उन्होंने अमरीकी समाज में काले-गोरों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है और प्रतिपादित किया है कि श्वेत, अश्वेतों में बौद्धिक क्षेत्र में काफी बढ़-चढ़े एवं प्रखर हैं। इस प्रखरता का श्रेय उनने उनमें विद्यमान उत्तम किस्म के जीनों को दिया है। इतना ही नहीं, गरीब, पिछड़े, और अभावग्रस्तों को बुद्धिहीन बताया और कहा है कि उनके विकास के निमित्त होने वाले प्रयास अनावश्यक ही नहीं निरर्थक भी हैं।
वैज्ञानिकों का यह निष्कर्ष उनके बौद्धिक दिवालियापन को दर्शाता है, कारण कि दुनिया में आज तक कोई ऐसा राष्ट्र और जाति नहीं देखी गई, जिसके सारे लोग बुद्धिमान हों। इसी प्रकार ऐसा भी कोई देश या समुदाय प्रकाश में नहीं आया, जहाँ सम्पूर्ण लोग बुद्धिहीन हों। वास्तव में हर समाज और समुदाय में दोनों प्रकार के व्यक्ति देखे जाते है। वहाँ यदि बुद्धिसम्पन्न लोग होते है, तो बुद्धिहीनों की भी कमी नहीं होती। अस्तु, बुद्धि के संदर्भ में ‘जीन’ को जातिगत नहीं, व्यक्तिगत विशेषता माना जाना चाहिए। आइन्स्टीन को ‘सापेक्षवाद का सिद्धान्त’ प्रतिपादित करने वाला विलक्षण मस्तिष्क माना गया, पर हर यहूदी आइन्स्टीन है-ऐसा सोचना बालबुद्धि होगा। इस सिद्धान्त के बारे में ऐसा कहा जाता है कि इसे भली-भाँति समझने वाले दुनिया में तीन ही व्यक्ति हुए है, जिनमें से एक स्वयं आइन्स्टीन थे। अब जबकि वह सिद्धान्त संदेह के घेरे में आ गया है और उस पर उँगली उठाने वाला वैज्ञानिक भारतीय है, तो उसके बुद्धि-कौशल की अद्भुतता का अनुमान लगाया जा सकता है, पर इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि प्रत्येक भारतवासी वैसी ही विलक्षण मेधा का मालिक है। इसे उसकी निजी विशिष्टता माननी पड़ेगी। यदि बौद्धिक तीक्ष्णता के लिए जीन को जिम्मेदार मानें, तो यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि शुरू से है ही वह सक्रिय अवस्था में नहीं होता, वरन् निष्क्रिय और निस्तेज दशा में पड़ा रहता है। उसकी निष्क्रियता उभारनी पड़ती है, तभी वह स्थिति प्रस्तुत होती है, जिसमें व्यक्ति को अद्वितीय बुद्धिसम्पन्न कहा जा सके। आइन्स्टीन का जीवन स्वयं इस तथ्य की पुष्टि करता है। अपने स्कूली जीवन में वे एकदम साधारण विद्यार्थी थे। यदा-कदा इसके लिए उन्हें प्रताड़ना के कारण उनकी बुद्धि पर जो पड़ा और सम्बद्ध जीन उत्तेजित हो गया, फलस्वरूप उस सिद्धांत का जन्म हुआ, जिसे आज ‘सापेक्षवाद’ के नाम से लोग जानते हैं।
इसी प्रकार का मत अमेरिकी समाज-विज्ञानी एन्ना फोर्ड ने व्यक्त किया है। उनका कहना है कि बुद्धिमत्ता पर विचार करते समय वैज्ञानिकों ने परिस्थिति और परिवेश की उपेक्षा कर दी। यह उचित नहीं है। वे यह मानती हैं कि बुद्धिमत्ता वस्तुतः जीनों और अवसरों का सम्मिलित परिणाम है। अकेला जीन इसके लिए पर्याप्त नहीं। उसे सक्रिय बनाने वाला कारक भी जरूर है। बच्चों के पालन-पोषण के स्तर में यही भूमिका सम्पन्न करता है। उनके अनुसार किसी के बौद्धिक स्तर में परिवर्तन इस बात पर अवलम्बित है कि उसे उसकी न्यून बुद्धि की जानकारी कराने वाली घटना कितनी मर्मस्पर्शी है। डाँट, फटकार, अपमान, उपहास आदि प्रसंग ऐसे हैं, जो कई बार व्यक्ति को भीतर से झकझोर देते और कठोर निर्णय लेने के लिए मजबूर करते हैं। यही वह बिन्दु है, जो बौद्धिक स्तर में बदलाव के लिए निर्णायक मोड़ साबित होता है। ऐसे अवसरों पर तत्सम्बन्धी जीन अचानक क्रियाशील हो उठता और व्यक्ति को कहीं-से-कहीं पहुँचा देता है। वैज्ञानिकों द्वारा उक्त जीन को जातिगत वैशिष्ट्य घोषित किया जाना और उस आधार पर उस जाति की बौद्धिक वरिष्ठता प्रमाणित करना-इसे पूर्वाग्रहर्ण ही तो कहेंगे, जबकि जीवविज्ञानियों का मानना है कि जाति अथवा नस्ल का न तो कोई प्राणिशास्त्रीय आधार है, न जीन नस्लीय भेद करने में सहायक है। ऐसी स्थिति में क्या वैज्ञानिक रूढ़िवाद नहीं कहलायेगा?
ऐसे ही बुद्धि को जन्मजात विभूति के रूप में अंगीकार करने वालों को इन बातों पर भी विचार करना पड़ेगा कि भेड़ियों के झुण्ड में पलने वाला बालक भेड़ियों जैसा आचरण क्यों करने लगता हैं? उसके खान-पान, आदत, व्यवहार और यहाँ तक कि दो पैरों से चलने की मूल-प्रवृत्ति में परिवर्तन क्या हो जाता है तथा क्यों वह चौपायों की तरह चलने लगता है? यदि सचमुच उसे जन्मजात बुद्धि मिली है, तो फिर उसके आधार पर पशु-झुण्ड में अपनी मौलिकता को बनाये रख पाने में वह सफल क्यों नहीं हो पाता एवं किसी कारण स्वयं को उनसे पृथक पहचानने में असफल सिद्ध होता है? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जिनका जवाब देकर ही शोधकर्ता अपने को तथ्यपूर्ण साबित कर सकते हैं। उत्तर के अभाव में इस निष्कर्ष पर पहुँचना असम्भव हैं कि मनुष्य, जन्म से ही बुद्धिमान होता है। सच्चाई तो यह है कि जन्म से हर आदमी। की बुद्धि एक जैसी होती है यह तो प्रयास, पुरुषार्थ और परिस्थितियाँ हैं, जो उसको पैना और प्रखर बनाते हैं। हीरे खदानों में बिखरे पड़े रहते हैं, किन्तु जौहरी उसे तराशकर जब सुन्दर-सुगढ़ बनाते हैं, तब उसकी कीमत आँकी जाती है। लोहे को अपने वर्तमान स्वरूप में आने से पूर्व कई प्रकार के अग्नि-संस्कारों से होकर गुजरना पड़ता है। यही बात बुद्धि के साथ भी लागू होती है। अनुभव और प्रयोग द्वारा जो उसे जितना निखार लेता है, उसमें उतनी ही कुशाग्रता आ जाती है। उपयोग और उपभोग से पुर्जे घिसते एवं शक्ति क्षीण होती है-यह नियम सार्वभौम नहीं है। बुद्धि के सम्बन्ध में बात उलटी है। उसकी जितनी रगड़ाई तथा घिसाई होगी, आयुध की तरह वह उतनी ही तेज होती जाएगी। अतएव अनुसंधानकर्त्ताओं का यह कथन अमान्य हो जाता है कि मानव जन्मजात रूप से बुद्धिमान होते है।
जहाँ तक निर्धनों का सवाल है, तो शोधकर्मी वैज्ञानिकों की यह धारणा कि वे बुद्धिरहित होते हैं, उतना ही हास्यास्पद है, जितना कि पूर्ववर्ती यूनानी मान्यता कि स्त्रियों में आत्मा होती ही नहीं। इस प्रकार के चिन्तन को वैज्ञानिक कहने में लज्जा अनुभव होती है। यह तो किसी सनकी मस्तिष्क की उपज है, अन्यथा दिमागी प्रखरता का धन से भला क्या सम्बन्ध हो सकता है? यह समझ से परे है। अभावग्रस्तता भौतिक विकास को तो अवरुद्ध कर सकती है, लेकिन बौद्धिक तेजस्विता को वह कैसे प्रभावित करेगी-यह तो विज्ञानवेत्ता ही जाने। दुनिया भर में ढूँढ़ने पर ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएँगे, जहाँ विपन्नता में जीकर भी व्यक्ति ने अपनी बौद्धिक समर्थता के आधार पर उत्कर्ष को प्राप्त किया। लालबहादुर शास्त्री कितनी गरीबी की अवस्था में पले, यह सर्वविदित है, पर वे भारत के प्रधानमंत्री जितने शीर्ष पद तक भी पहुँचे। क्या इसमें उनका बुद्धि-कौशल नहीं मानना चाहिए? विवेकानन्द ने संन्यासी जीवन में जिस निर्धनता को ओढ़ा था और जिस प्रकार के अर्थाभाव से उस दौरान वे गुजरे थे, ऐसी विकट परिस्थितियाँ यदा-कदा ही किसी के सामने उपस्थित होती हैं। इतने पर भी प्रचण्ड तर्कशीलता के आधार पर अपनी बातों का लोहा मनवाने में वे अनुपम थे। शिकागो धर्म महासभा में उन्होंने जिस प्रकार भारतीय संस्कृति का झंडा गाड़ा उसे भी उसकी महामेधा का परिचायक ही कहना पड़ेगा। फिर अनुसंधानकर्ताओं की इस उक्ति को सही कैसे ठहराया जाए कि अर्थहीनता और बुद्धिहीनता एक-दूसरे की सहचरी हैं? वास्तविकता तो यह है कि सरस्वती कभी लक्ष्मी की अनुगामिनी नहीं होती, न वह उसके आश्रित होती है। वह अपना स्वतन्त्र विकास स्वयं करती है। अस्तु, अभावग्रस्तता और मूर्खता का परस्पर रिश्ता जोड़ना बुद्धिवादियों द्वारा पिछड़ों के प्रति रची गई दुरभिसंधि नहीं तो और क्या है? इसे सम्पन्न समुदाय द्वारा विपन्नों पर बौद्धिक धाक जमाने की कुचेष्टा ही कहनी चाहिए।
मानवी प्रजातियों पर मानसिक भिन्नता के आधार पर बौद्धिक श्रेष्ठता साबित करने का यह कोई प्रथम प्रयास नहीं है। इससे पूर्व स्वीडन के प्रकृतिविद् कार्ल वान लीने ने ऐसा प्रयत्न किया था। उनने एशिया के निवासियों को कुटिल, अकर्मण्य, दीर्घसूत्री, द्वेषी एवं मंदमति घोषित किया, जबकि यूरोपवासियों को स्फूर्तिवान, बुद्धिमान, सरल सहकारी और खोजी प्रवृत्ति वाला बताया था। वे किस आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचे, इसका कोई उल्लेख नहीं किया। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि यह मात्र उनके जातिप्रेम और क्षेत्रप्रेम की ही परिणति है, इससे अधिक और कुछ नहीं। यदि सचमुच ही एशिया के निवासी मन्दबुद्धि और आलसी प्रकृति के होते, तो समस्त एशियाई देशों को अविकसित ही होना चाहिए था, जबकि एशिया में जापान और चीन दो ऐसे राष्ट्र हैं, जिन्हें अब विकसित की श्रेणी में सम्मिलित कर लिया गया है। भविष्यविज्ञानियों के कथनानुसार, भारत इक्कीसवीं सदी में सुपर पॉवर बन जाएगा। यदि इन राष्ट्रों में यथार्थ में बुद्धि की कमी रही होती, तो इनकी प्रगति अवरुद्ध ही बनी रहनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जापान के तकनीकी उत्कर्ष की दुनिया में कोई बराबरी नहीं और चीन ने पिछले कुछ दशकों में कृषि से लेकर रक्षा-अनुसंधान के क्षेत्र में स्वयं को जितना उन्नत बनाया और जनसंख्या की निर्बाध गति को जिस ढंग से नियंत्रित किया है, उसे कोई निर्बुद्धि राष्ट्र कैसे सम्पन्न कर सकता था? निश्चय ही रूढ़िवादी जमाने में विश्व को धकेलने का तथाकथित विज्ञान का यह षड़यंत्र है।
यदि नस्ल ही बुद्धि का तात्विक आधार होती और जगत का कुछ भाग मेधाहीन बना रहता तो वहाँ के निवासियों को बौद्धिक वर्चस्व का अधिपति नहीं, अधीन बनना पड़ता, लेकिन विश्व पटल में जो दृश्य दिखाई पड़ रहा है, वह इसके विपरीत हैं पश्चिम के कितने ही देशों में एशियाइयों और अफ्रीकियों ने अपने बुद्धि कौशल का जो वर्चस्व स्थापित किया है, उसे अप्रतिम ही करना पड़ेगा। आज ब्रिटेन और अमेरिका की अनेक शोधशालाओं में अगणित भारतीय वैज्ञानिक कार्यरत हैं। उनकी उपलब्धियाँ भी कोई कम स्तर की नहीं। अमेरिका में रहकर अनुसंधान करने वाले भारतीय वैज्ञानिक का डॉ. हरगोविन्द खुराना को जीन संबन्धी शोधकार्य पर विज्ञान का सम्मानित नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त रमन्स इफेक्ट नामक प्रकाश सम्बन्धी शोधकार्य पर भौतिकी का नोबेल पुरस्कार एक अन्य भारतीय वैज्ञानिक सी.वी.रमण को मिला। साहित्य सम्बन्धी नोबेल पुरस्कार ‘गीतांजलि’ काव्य पर रवींद्र नाथ ठाकुर ने प्राप्त किया। इसके अलावा कितने ही छोटे-बड़े अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव भारतीयों को प्राप्त हुआ। अमेरिका के अन्तरिक्ष कार्यक्रम में कई प्रतिभावान भारतीय
विज्ञानवेत्ताओं का योगदान रहा है। वे आज भी अपनी बौद्धिक क्षमताओं के बलबूते कई देशों में शिक्षा, राजनीति विज्ञान, साहित्य, सेना और शासन के सर्वाच्य पदों पर आसीन हैं। इतने पर भी दुनिया के कुछ देश अपनी बौद्धिक वरिष्ठता की दुँदुभि बजाकर स्वयं को इसका पितामह घोषित कर दें, तो इसे विद्वेष से उपजी घृणा का परिणाम ही कहना चाहिए।
इसका एक ताजा उदाहरण दृष्टव्य है। विगत दिनों एक वरिष्ठ भारतीय वैज्ञानिक ने रूबी नामक रत्न पर प्रकाश सम्बन्धी प्रभावों का विशेष अध्ययन किया। इससे जो परिणाम प्राप्त हुआ, वह चौंकाने वाला था। प्रयोग से पूर्व उसे असम्भव माना जाता था। शोधपत्र को अमेरिका की एक विज्ञान-अनुसंधान पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेजा गया। प्रकाशक ने उसे आद्योपान्त पढ़ने के उपरान्त यह कहकर छापने से इनकार कर दिया कि भारत जैसे साधनहीन और प्रतिभाहीन देश में इस प्रकार का अनुसंधान कैसे संभव है।
जबकि वहीं के एक वैज्ञानिक ने सत्यता जानने के लिए जब उस प्रयोग को दोहराया तो उसे सही पाया। अब इसे क्या कहा जाये? क्या यह रूढ़िवादी विचार धारा नहीं है? कोई देश अविकसित हो सकता है, वहाँ साधनों की भी कमी हो सकती है, किन्तु इससे वहाँ के वैज्ञानिकों की बुद्धि कुन्द तो नहीं हो जायेगी? विज्ञान और विज्ञानवेत्ताओं को इस विचार धारा से उबरना पड़ेगा, तभी हम राष्ट्र विश्व और स्वयं विज्ञान को भी विकास की दिशा में प्रवाहमान रख सकेंगे, अन्यथा प्रतिगामी विचारों के पुनः उसी चक्रव्यूह में जा फंसेंगे, जिससे निकालने में एड़ी-चोटी का पसीना बहाना पड़ा। ऐसा इसलिए कारण कि विज्ञान लगातार उसी दलदल में धंसता चला जा रहा है, जिससे मुक्त करने का कभी उसने बीड़ा उठाया था।
हाल में हुए अनुसंधानों से ऐसा ही प्रतीत होता है। अब तक विज्ञानवेत्ता क्षेत्र के आधार पर बौद्धिक श्रेष्ठता को सिद्ध करते रहे थे, पर अब उससे भी दो कदम आगे बढ़कर शरीर-सौष्ठव और सुन्दरता के आधार पर बौद्धिक वरिष्ठता की वकालत कर रहें हैं, अर्थात् जिसकी शरीर-रचना आकर्षक सुडौल और सुगठित होगी, वह बुद्धिमान होगा और अनाकर्षक और कुरूप दिखने वाले, अपंग और अपाहिज बुद्धिहीन। यह निष्कर्ष अमेरिकी शरीरशास्त्रियों का है।
लंदन के ‘संडे टाइम्स’ में छपे समाचार के अनुसार कुछ समय पूर्व अमेरिकी विज्ञानविदों ने शारीरिक समरूपता (सिमेट्री) पर किये गये दो पृथक-पृथक अध्ययनों के आधार पर इस बात का दावा किया है कि जिन लोगों के शरीर का दांया हिस्सा बिल्कुल समान है, जिनके दोनों भाग अपेक्षाकृत कम समरूप या असमरूप हैं। इस आशय का निष्कर्ष विगत दिनों सम्पन्न हुए अमेरिकन एसोसियेशन फॉर दि एडवान्समेन्ट ऑफ साइंस’ की बैठक में प्रस्तुत किया गया। प्रस्तुतकर्ता थे डॉ. रैण्डी थोनेक्लि।
अमेरिका के न्यू मैक्सिको विश्वविद्यालय में प्राणिशास्त्र के प्राध्यापक डॉ. थोर्नबिल न उक्त अध्ययन लगभग ढाई सौ नर-नारियों पर किया। उनने कैलिपर की मदद से प्रत्येक व्यक्ति के सिर से लेकर पैर तक दोनों हिस्सों को बारीकी से नापा। इसके पश्चात उनकी बुद्धि की परीक्षा ली गयी। उनके अनुसार जिन व्यक्तियों के दाँये-बाँये दोनों खण्ड समरूप थे उनकी बुद्धि कुशाग्र पायी गयी।
ब्रिटेन के शरीर शास्त्री इस अवधारणा से असहमत हैं। उनका कहना है कि शरीर का, मेधाशक्ति से सम्बन्ध जोड़ना बेतुका और अवैज्ञानिक है। इससे अन्धमान्यता को बल मिलेगा एवं समाज दिग्भ्रान्त होगा। यह सच है कि सुगठित शरीर, सुन्दरता और आकर्षक साज-सज्जा का सामने वाले पर अच्छा प्रभाव पड़ता है, पर इससे उसकी बुद्धि का अनुमान लगाना गलत है। ढूँढ़ने पर कितने ही ऐसे सौंदर्यसम्पन्न मिल जाएँगे, जो बिल्कुल जड़बुद्धि होते हैं। इसके विपरीत ऐसे अगणित लोग भी हैं, जो काले-कलूटे लूले-लँगड़े, काने-कुबड़े, पैनेपन को देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। अब्राहम लिंकन कुरूप थे, किन्तु वे अमेरिका जैसे समृद्धशाली देश के राष्ट्रपति थे। विश्व के किसी अतिविकसित राष्ट्र का राष्ट्राध्यक्ष बुद्धिहीन या अल्पबुद्धि वाला होगा-यह कैसे स्वीकार किया जाए? अष्टावक्र की काया आठ स्थानों से टेढ़ी थी, लेकिन अल्पायु में ही उसने जिस प्रकार की बौद्धिक प्रखरता और ज्ञान का परिचय दिया, उससे राजा जनक के दरबारी दंग रह गए। स्टीफनहॉकिंस इंग्लैण्ड के मूर्धन्य खगोलवेत्ता हैं। उन्होंने ब्लैक होल सम्बन्धी ऐसी खोजें कीं और सिद्धान्त दिये, जिसे खगोल विज्ञान को एक नई दिशा दी है। इन सब का वर्णन उनने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हॉकिंस यूनीवर्स ‘ किया हैं बौद्धिक कुशाग्रता की दृष्टि से वे आइन्स्टीन के समकक्ष माने जाते हैं। इतने पर भी वे अपाहिज हैं, उनकी दोनों टाँगे बेकार हैं और पहियेदार कुर्सी पर चलते हैं।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि बुद्धि की तीक्ष्णता रूप लावण्य पर निर्भर नहीं। ऐसी बात होती, तो विश्व की समस्त सुन्दरियाँ विलक्षण मेधा की स्वामिनी होतीं, लेकिन ऐसा कहाँ देखा जाता है? बुद्धि सम्पन्नता की सहचरी है-यह मत भी स्वीकार्य नहीं। उस पर किसी जाति या क्षेत्र का एकाधिकार भी नहीं माना जा सकता। यहाँ तक कि पिता की बौद्धिक विरासत पुत्र में प्रकट ही हो जाए-इसकी भी कोई गारण्टी नहीं। यह सब आनुवांशिकता के नियम के अधीन है। इतने पर भी यदि विज्ञानवेत्ता जोड़-गाँठ करके किसी जाति अथवा क्षेत्र की बौद्धिक वरिष्ठता प्रमाणित करें, तो यह विज्ञान जैसे प्रामाणिक शास्त्र के लिए दुःख और दुर्भाग्य की बात है। कहीं ऐसा न हो कि वह अपनी इस प्रवृत्ति के कारण हमें सैकड़ों वर्ष पीछे के अंधवादी अन्धकार युग में धकेल दे। हममें से हरेक को इससे सावधान रहना चाहिए।
इतना पता ही है कि यह द्वीप है, क्योंकि इसके चारों ओर समुद्र हिलोरें मारता है। इसकी लम्बाई-चौड़ाई इतनी बड़ी है कि एक ओर से दूसरी ओर किनारे तक जाने में तीन दिन लग जाते हैं, उतना ही चौड़ा भी है। वैसे कभी किसी ने इसे अपनी लाठी से नापा नहीं है। कुछ लोग इसे गोल कहते हैं। लेकिन गोल हो या चौकोर, है बहुत अच्छा। ऊँचे-ऊँचे वृक्ष हैं और वे खूब घने हैं। सदा हरे-भरे रहते हैं। प्रायः वर्षा होती रहती है और जब बादल हटते हैं, धुले आकाश में चमकती धूप निकलती है। यहाँ दूसरे साधारण तथा भयंकर पशु भी बहुत हैं। शायद जो अच्छी भूमि होती है, वहाँ सभी रहना चाहते हैं। यहाँ कई झीलें हैं, निर्मल झरने हैं, फूलों से भरे सरोवर हैं और दो नदियाँ भी हैं। यहाँ के लोगों को अपने इस टापू पर गर्व है। उन्हें पूरा विश्वास है कि इससे अच्छी और कोई भूमि नहीं है। वहाँ के लोग नारियल के कच्चे फलों का पानी पीते हैं। पकने पर उसकी गिरी खाते हैं। नारियल का तेल उनके घरों की मुख्य वस्तु है। पके केले तो वे लोग खाते भी हैं, कच्चे भी उनके बहुत काम आते हैं। जैसे कच्चे केले की रोटी और केले का ही साग होता है। शायद ही अन्य किसी जगह ऐसा भोजन खाया जाता है।
गेहूँ की रोटी उबला चावल और दाल तो अब कुछ सालों से यहाँ के कुछ लोग सफेद मनुष्यों की देखा-देखी खाने लगे हैं। वैसे टापू के कुछ बुजुर्ग लोग युवकों को टोकते भी हैं। कि इन सफेद लोगों की हर बात में नकल करना अच्छी बात नहीं है। ये लोग तो ऊदबिलाव की भाँति मछलियाँ भी खाते हैं। ये उन्हें उबाल लेते हैं-इतने से क्या हो गया? पानी में चंचलता से घूमने वाली कोमल उज्ज्वल सुन्दर मछली, क्या पेड़ों पर फुदकने वाली मनोहर चिड़िया या वन में कूदने-दौड़ने वाले हिरन अथवा शशक की भाँति ही देखने में अच्छी लगने वाली और प्यार पाने योग्य नहीं है? क्या मनुष्य को चाहिए कि उसे दुख दे?
टापू के लोगों ने तो यहाँ तक सुना है कि ये सफेद लोग अपनी धुएँ वाली काली लाठी से दूर से ही चिड़िया को, मृग को बेचारे शशक को भी मार देते हैं और उन्हें भी खा जाते हैं। ये मायावी लोग है, इनके पास जाना, मेल-जोल बढ़ाना ज्यादा अच्छा नहीं है। इन लोगों ने टापू के कुछ लोगों को पता नहीं क्या-क्या खाना सिखा दिया है। नहीं तो जब से पृथ्वी बनी यहाँ के लोग पवित्र नारियल और केले का उत्तम आहार ही करते हुए हैं।
यदि आप इनके घर देखें, इनके घर भोजन करें दो इनको बड़ी प्रसन्नता होगी। ये सब तो इसे अपने ऊपर बड़ी कृपा मानते हैं क्योंकि यह तो इनका स्वभाव है कि ये तब तक भोजन नहीं करते, जब तक घर में एक नवीन अतिथि को भोजन न करा दिया जाय और यह तो सभी जानते हैं कि यह बहुत कठिन नियम है। कोई बहुत ही कृष्ण करता है, तब किसी के घर वह अतिथि बनकर पहुँचता है। भगवान ने वनों में इतने नारियल और केले लगा रखे हैं कि कोई किसी के घर को देखकर मन बरबस प्रसन्नता से छलक उठता है। उसने भी अभी इसी वर्ष नारियल के हरे पत्तों से अपने घर को बनाया है। ऊँचे लट्ठों पर उसने उसे इस प्रकार बनाया है, कि जब भी अतिथि आए, उन्हें कम से कम सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ें। उसके घर में केवल दस सीढ़ियाँ चढ़कर आप पहुँच जाएंगे। यद्यपि चीते तथा सर्प के चढ़ने का भय होता रता है, फिर भी अतिथि को कभी पुकारना न पड़े, इसलिए वह रात्रि को भी सीढ़ी को लटकता रहने देता है। उसे ऊपर नहीं खींचता। कोई भी उसके यहाँ पधारे यही पाएगा किस उसे छोटी-सी दुलारी कन्या अतिथि को देखते ही प्रसन्नता से किलकने लगेगी। यहाँ तक कि गाय भी हुम्मा-हुम्मा करके उसका स्वागत करेगी। वह बड़ी ही उत्तम गाय है। दोनों समय गृहस्वामी के बर्तन को भर देती है।
अतिथि का स्वागत करना भी उसने सीख लिया है। उसके जीवन में बदलाव का ज्वार तब आया, जब आज से कई वर्ष पूर्व एक सज्जन उसके घर अतिथि हुए थे। उस समय उसका निवास कुछ वैसी ही प्राकृतिक शैली का था, जैसा कि उसके पूर्वज हजारों वर्ष पूर्व अपनाते आए थे। अतिथि के रूप में पधारे सज्जन ने ही उसे यह ज्ञान कराना शुरू किया, कि वे सब के सब निहायत अपढ़, असंस्कृत और असभ्य हैं। कुछ ऊँचे लट्ठे भूमि पर गाड़कर पृथ्वी से दस-बारह फीट की ऊँचाई पर लकड़ियों तथा पत्तों से जो घर बनाने की प्रथा है। उसे तो निहायत गन्दा घोंसला ही कहेंगे। इस घोंसलेनुमा घर में भी ढेर सारे लोग। संयुक्त परिवार को प्रथा तो परिवार-प्रथा कम दासप्रथा ज्यादा है, ऐसा वे श्वेत वर्ग के अतिथि सज्जन कह रहे थे। बड़ी अद्भुत लगी उसे ये बातें, उसे उसी दिन उनसे मित्रता कर ली। उनके ही कारण पाश्चात्य जाति के लोगों से उसका परिचय हुआ। उन्हीं से जिन्हें टापू के सरे निवासी सफेद आदी कहकर जानते थे, परिचित थे।
उन्होंने ही उन सब को सभ्य आदमी बनाने का, शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। उनके पक्के मकान सहज ही नहीं बन गए। वनों को काटने में, वन-पशुओं का विरोध तथा प्राकृतिक कठिनाई इतनी अधिक नहीं थी जितनी कठिनाई अपने स्वजनों के विरोध से किसी प्रकार बचने में उठानी पड़ी। घर में किसी ने उसका साथ नहीं दिया। कोई भी अपनी प्राचीन प्रथा-परम्पराओं को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। उसे भी सब उसी पुराने बाड़े में रखना चाहते थे। इस क्रम में काफी वाद-विवाद हुआ। किसी प्रकार लड़-झगड़कर वह घर से भाग आया। घर से भागकर उन श्वेत सज्जन के कहने पर उसने अपनी इच्छा से एक श्वेत लड़की से विवाह कर लिया। बड़े भाई ने, पूरे परिवार ने उससे सम्बन्ध तोड़ लिया। उसने सोचा चलो अच्छा ही हुआ, क्योंकि नवीन समाज में उसे अब संकुचित लज्जित नहीं होना पड़ेगा कि उसका सम्बन्ध एक असभ्य असंस्कृत परिवार से है।
उसका द्वीप छोटा है, इसलिए यूरोप से आये उदार लोगों को अपना प्रभाव यहाँ फैलाने में बहुत समय नहीं लगा। यद्यपि वृद्ध लोग विरोध करते रहे और वे अब भी विरोध ही करते है किन्तु युवकों ने इस सभ्यता के प्रकाश का स्वागत किया। इस नये प्रभाव से द्वीप में प्रर्याप्त पक्के मकान हो गए, जो सुरक्षित ढंग से बनाये गये थे। जहाँ-तहाँ पादरी लोग शिक्षा देने लगे। उसने स्वयं इतना अभ्यास कर लिया कि पुस्तकें पढ़ लेता है। द्वीप में दो तीन चिकित्सालय भी चलने लगे।
आप उसके घर जाये तो यही देखेंगे कि वे यूरोप से बने वस्त्रों का पर्याप्त प्रयोग करने लगे हैं। यद्यपि केले के पत्ते लपेटने वाले लोग भी बहुत हैं, किन्तु अब इसे सभ्यता का चिन्ह माना जाने लगा है। उन सब ने मिलकर वनों को बहुत कुछ काटकर घटा दिया दिया है। धान की खेती भी करने लगे हैं। वन्य पशु तो आखेट के कारण स्वतः ही घट गए। उसका द्वीप धीरे-धीरे उन्नत होने लगा मछलियों का व्यवसाय उन्होंने अभी ही प्रारम्भ किया है और यह आर्थिक दृष्टि से काफी उत्तम भी साबित हुआ। उसने अपने घर के आस-पास फूल लगा रखे हैं और मुर्गियाँ, बत्तखें और खरगोश भी पाल रखे हैं। उसकी नजर में अब ये स्वादिष्ट भोजन के साधन हैं ही, अच्छी-खासी आमदनी भी इनसे हो जाती है।
उसके गाँव में सप्ताह में दो बार पादरी आने लगा। पादरी का ठहरना खाना भी उसी के घर होता। उसके उपदेश के प्रभाव से युगों पुरानी परम्पराएँ टूटने लगीं, क्योंकि अब तक उन्हें अन्धविश्वास माना जाने लगा था। यूरोपीय अतिथियों ने उन सब को यही सिखाया था कि जो कुछ भी तुम मानते हो, तुम्हारा है वह सब अंधविश्वास है- जो कुछ पश्चिम का है-वह सब का सब अनुकरणीय है, क्योंकि यह आधुनिकता है। आधुनिकता का यह प्रभाव उसे ही नहीं सारे द्वीपवासियों को अपने में लपेटने लगा।
इसी क्रम में दस वर्ष और बीत गये। वह उस कथा को दोहराना नहीं चाहता, जो विदेशियों के कारण उसके पास छोटे-से सुन्दर टापू पर घटी है। अत्याचार उत्पीड़न और शोषण की यही कहानी उससे कुछ भी भिन्न नहीं है, जो हमारे-आपके यहाँ घटित हुई। यदि हमारा आपका देश कभी इन पाश्चात्य लोगों की अधीनता में रहा है। यदि सौभाग्य से ऐसा नहीं है तो पुस्तकालय में किसी पराधीन देश का इतिहास देख लेना आपके लिए पर्याप्त होगा। उसकी पराधीनता एवं उसके उत्पीड़न का क्रम भी वहीं है, जो सदा सर्वत्र रहता आया है। अब इस सब इतिहास को दोहराने से क्या लाभ? वह तो केवल अपने लोगों की और अपनी बात सोचता है? शिकारी तो जाल फैलाता ही है और दाने भी डालता है उसमें, किन्तु खेद तो पक्षी पर है, जो नेत्र रहते भी उस जाल पर जा बैठता है। उसने, उन सभी ने शिक्षा प्राप्त की, स्वच्छता सीखी, सभ्यता सीखी और बहुत कुछ सीखा। उन्हें पक्के मकान मिले, कल-कारखाने मिलें, चमकते-दमकते वस्त्र मिले, बिजली मिली नवीनतम चिकित्सा एवं मनोरंजन के साधन मिले, रेल मोटर, वायुयान तथा सभी वैज्ञानिक उपकरण मिले, लम्बी लम्बी उपाधियाँ मिलीं, तितली सी पत्नियाँ मिली और इसी प्रकार बहुत-सी बातें मिली। लेकिन यह अधूरी रह जायेगी, यदि यह न कहा जाय कि इसी के साथ उसे और उसके साथियों को चोरी मिली, झूठ मिला, क्रोध मिला, अनाचार मिला, अविश्वास मिला, अश्रद्धा मिली, कलह मिला, आडम्बर मिला, विलासिता मिली, फिजूलखर्ची मिली और ऐसी ही यूरोपीय सभ्यता का वह सब प्रसाद मिला जो सभ्य देशों को प्राप्त होता है।
उन्होंने अपनी झोपड़ियाँ छोड़ दी कहने को सभ्यता छोड़ दी, केले के छिलके लपेटने छोड़ दिए, साभ ही भोलापन छोड़ दिया। इसी के साथ ही उसे अपनी शान्ति, अपना सुख, अपना आचार भी छोड़ देना पड़ा। उसे दया, क्षमा, सादगी, सरलता सब छोड़ देनी पड़ी। उसके समाज में जो आज नेता है, जो विद्वान हैं वे बार बार कहते हैं कि उन्हीं के सत्प्रयत्न से यहाँ के लोगों का जीवन स्तर इतना ऊँचा हुआ है, किन्तु उसे उनकी बात स्वीकार नहीं, उसे लगता है कि बाहरी जीवन-स्तर ऊँचा होने के साथ-साथ वास्तविक जीवन उसी क्रम से नीचा होता गया है और मानवता तो द्वीपवासियों से तो बहुत ही दूर जा पड़ी है। उसका टापू अब वैसा हरा- भरा कहाँ है? कहाँ हैं वे केले और नारियल के प्राकृतिक वन? केले और नारियल दिखाई तो अब भी पड़ जाते हैं, पर अब वे शोभा के लिए लगाये गये हैं। अब वे लट्ठों पर बनी पवित्र कुटीरें दिखाई ही नहीं पड़ती।
कहाँ है अब वैसे सरल, निष्कपट एवं स्वस्थ लोग? अब तो नियमित रूप से घरों में हर सातवें दिन डॉक्टर आता है। उसे रोज न आना पड़े, यह गृहपति के लिए सौभाग्य की बात है। अब दूसरों से व्यवहार करते समय यह मान लिया जाता है कि वह यदि मूर्ख नहीं है तो हमें ठगेगा और हमें उसको ठगना है। यह तो सामाजिक कर्त्तव्य है अतिथि सत्कार की चर्चा ही व्यर्थ है।
पाश्चात्य दुनिया ने उसे जो भी दिया है, उससे वह बेहद क्षुब्ध है। क्यों? इसका ठीक-ठीक उत्तर तो वह भी नहीं सोच पाता है। फिर भी उसका मानना यही है कि हमने जो किया है, उसका फल अब सामने है, तब भला क्षोभ क्यों होना चाहिए। अब तो उसका पुत्र भी उसकी बात नहीं मानता। वह भी अपने बड़े भाई से इसीलिए अलग हुआ था, क्योंकि संयुक्त परिवार उसे दासता नजर आ रहा था। बड़ों का स्नेह उसे काटने दौड़ता है। अब अगर उसी का पुत्र उसकी दासता को स्वीकार नहीं करता तो पुत्र का क्या दोष? पाश्चात्य दृष्टि से वह सभ्य है, शिक्षित है, फिर भला क्यों किसी की दासता स्वीकार करें? अब वह भी अपनी पसन्द की एक लड़की से विवाह करने जा रहा है, जब उसने अपने पुत्र को रोकना चाहा, तब पुत्र ने उसे स्पष्ट कह दिया मेरे व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप करने का आपको कोई अधिकार नहीं। उसे मालूम है कि उस लड़की का आचरण अच्छा नहीं है। वह अच्छे खानदान की भी नहीं है हारकर उसे यही सोचना पड़ा, जो भी हो, उसके साथ जब मुझे नहीं, मेरे बेटे को पूरा जीवन व्यतीत करना है, तो मैं बीच में पड़ूँ क्यों मुझे क्या अधिकार? यही हाल उसकी लड़की का है? आखिर वह भी तो पाश्चात्य रंग में रंगी है। जब उसने उस दिन अपनी पुत्री से बड़े प्रेम से पूछताछ की तो वह क्रोध से लाल हो गयी। वह कहने लगी-आचार की ये रूढ़ियां हम स्त्रियों को गुलाम बनाने के लिए गढ़ी गयी हैं। पुरुषों की दासता मैं स्वीकार नहीं कर सकती। किसी को कोई अधिकार नहीं कि मेरे आने-जाने, मिलने-जुलने पर प्रतिबन्ध लगाये। मैं अपने सम्बन्ध में स्वयं विचार कर सकती हूँ। पुत्री का जवाब सुनकर वह चुप रह गया। ठीक ही तो है, जैसे पुरुष स्वतंत्र है, वैसे ही स्त्री भी स्वतंत्र है, पर शायद उसने स्वच्छन्दता को ही स्वतंत्रता समझ लिया।
यही तो पाश्चात्य संस्कृति की विशेषता है कि वे स्वच्छन्दता को ही स्वतंत्रता का प्रर्याय समझ बैठे हैं।
और उसकी पत्नी! अब यह कोई न ही पूछे तो अच्छा है। उसकी वह पत्नी जिसके साथ उसके अपने बुजुर्गों को ठुकराकर विवाह किया था, वह इस समय सातवाँ विवाह कर चुकी है। वैसे उसके भाग्य इस विषय में अच्छे हैं, क्योंकि उसकी दूसरी पत्नी ही उसके घर में अब तक है। हाँ यह बात अलग है कि उसकी वर्तमान पत्नी के लिए यह तीसरा पतिगृह है। वैसे यह गृह देवी संयोगवश ही उसे प्राप्त हुई और तब तक वह सीख चुका था कि अपनी रुचि और स्वतंत्रता का गर्व कितना कष्टदायी है। अब उसके घर में उसे छोड़कर शेष सब स्वतंत्रता हैं। केवल वह ही उसकी इच्छा का गुलाम है। सबके लिए धन कमाने का यंत्र बनकर रह गया है। जीवन में सिर्फ परिश्रम ही परिश्रम है, परिश्रम के पश्चात मिलने वाला विश्राम नहीं। क्योंकि जब विश्राम के स्थान पर जोकि ‘घर’ कहा जाता है, तब वहाँ इस प्रकार का स्वागत मिलता है कि उसे पाकर उसके घर का कुत्ता भी वहाँ दो क्षण बैठना न चाहेगा। नहीं, आप भ्रम में न पड़ें। उसका घर पाश्चात्य रीति-रिवाज से सुरक्षित और सभ्य है। उसके घर का कोई व्यक्ति समाज की सभ्यता, शिष्टता का अनादर कभी नहीं करता। उसका पुत्र, पुत्री और पत्नी कभी उसका अपमान नहीं करेंगी, यदि कोई तीसरा व्यक्ति वहाँ हो। उसकी दोनों संतानें प्रातः- साँय गुडमॉर्निंग- गुडइवनिंग कहना नहीं भूलते। उसकी पत्नी भी अब शिष्टाचार पूरे चुकाती है, जो एक सभ्य स्त्री को चुकाना चाहिए। पाश्चात्य जीवनशैली ले द्वीप निवासियों को याँत्रिक सभ्यता तो दी है। वह भी सोचता है कि हम यंत्र युग के प्राणी हैं, तब हमें क्यों न इस यंत्र के आचारों पर संतुष्ट हो जाना चाहिए। पर हृदय लेकिन क्या स्वयं उसने अपने पास हृदय को जीवित रहने दिया है? जब उसने स्वयं ही अपने हाथों अपनी भावनाओं का गला घोंट दिया, तब उसके न मिलने पर अफसोस क्यों। औरों की बात छोड़ दीजिए, स्वयं उसका अपना शरीर और मन है। वह श्रम करता है या कपट करता है, पर उसने सोने की ढेरी लगा दी है। इतने पर भी उसे सुख क्या मिला है? चिकित्सक कहता है कि उसे मधुमेय हैं उसका पेट खराब है। उसे सब मीठी वस्तुएं छोड़ देनी पड़ी हैं। रूखे उबले शाकों पर उसे रहना पड़ता है। कोई आमोद-प्रमोद का उसके लिए उपयोग नहीं। वह दौड़ नहीं सकता। चल नहीं सकता। कुछ दूर और तो और दो घण्टे बैठा भी नहीं रह सकता। मन की दशा और दयनीय है, क्रोध, ग्लानि, क्षोभ, विषाद, दुःख के अतिरिक्त वहाँ कुछ भी नहीं। अशान्ति, क्लेश, शोक-जीवन जैसे इन तीनों शब्दों से ही बना है।
अब उसका घर द्वीप की पुरातन शैली का नहीं है। घर का बगीचा द्वीप के सुन्दरतम उपवनों में है। घर का भवन बहुत बड़ा और कलापूर्ण सामग्रियों से सुसज्जित है। बड़ी तड़क भड़क से आने वाले का राजोचित सत्कार किया जा सकता है। किन्तु इस राजोचित ठाठ-बाट में हर कहीं एक गहरी हृदय शून्यता समायी है। यह खोखलापन ही तो पाश्चात्य आधुनिकता का प्रर्याय है। भौतिकवादी जड़ संस्कृति का अनुदान है।
इस घर में रहते हुए उसे कई वर्ष और व्यतीत हो चुके। उसका घर, अपने इस घर के बारे में जब वह स्वयं सोचता है, तब उसे कहीं अंतस् की गहराइयों में महसूस होता है कि उसका घर या भवन तथा उसकी जो भी सम्पत्ति है, सही मायने में तो वह समाज की थी। उसने तो सिर्फ छल, झूठ और कपट के व्यवहार के द्वारा समाज से उसे ठग लिया था। इससे इस सच्चाई में कोई अन्तर नहीं पड़ता कि आज के समाज में इसे नीतिपटुता प्रैक्टिकल होना या व्यवहार कुशलता का या फिर कोई दूसरा उत्तम नाम दिया जाता है। इससे भी कोई अन्तर नहीं पड़ता कि समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति ऐसा ही करते हैं।
समाज आज इस बटोरी गयी सम्पत्ति पर उसका स्वत्व मान चुका है, यह तो ऐसी ही बात है, जैसे हम चोर के पास जो चोरी की वस्तु है, उसे चोरी की न जानने के कारण चोर के स्वत्व की वस्तु मानते हैं। जैसे ही उसे इस सत्य का बोध हुआ, उसने अपनी सबकी सब सम्पत्ति सामाजिक कार्यों के लिए दे डाली। स्त्री पुत्र, और पुत्री के प्रति भी उसके कर्तव्य पूरे हो चुके थे। क्योंकि स्त्री को अपने लड़के के साथ रहना स्वीकार था और सन्तानों की शिक्षा पूरी हो चुकी थी। वे दोनों ही स्वतंत्रता रहना चाहते थे। जीवन के पूरे विचार आचार एवं उपार्जन सब में ही वे स्वतंत्रता थे। लेकिन उसे तो जैसे यह जिन्दगी बोझ लगने लगी थी। उसके बड़े भाई की उदारता सराहनीय थी। उसके वापस लौटने पर उन्होंने पूछा तक नहीं पिछली भूलों के विषय में। अब वे द्वीप निवासियों का पुराना जीवन व्यतीत करे रहें थे। अवश्य ही उनके लिए उनके झोपड़े में चावल या आलू उबाल लिया जाता था तथा रोटियाँ सेक ली जाती थीं। वैसे अभी भी वे स्वयं नारियल तथा केले के पुराने आहार पर ही रहते हैं।
इस वापसी पर कईयों ने कहा कि उसने सभ्यता छोड़ दी? हाँ, सभ्यता के नाम पर उसने कृत्रिमता अवश्य छोड़ दी, विज्ञान के दिये नये-नये उपहार भी छोड़ दिये। इसी के फलस्वरूप उसके शरीर को रोगों ने छोड़ दिया। अब वह बड़े मजे से केले और नारियल का संग्रह करता है, यथेष्ट चल भी चलता हैं, थोड़ा बहुत दौड़ने भी लगा है। इसी के साथ उसके मन नें भी बहुत कुछ छोड़ दिया है। अब शोक, क्लेश, क्षोभ उसे तंग नहीं करते। जैसे ही उसने द्वीप के पुराने जीवन को अपनाया, वैसे ही द्वीप ने उसे सुख शान्ति के अलौकिक उपहार दे डाले। यह बात ठीक है कि द्वीप का पूरा समाज पहले की स्थिति में नहीं लौट सकता। नारियल के वन जितनी सरलता से काटे गये थे, उतने शीघ्र नहीं लगाये जा सकते सबके हृदय की सर्वथा नहीं बदले जा सकते। लेकिन एक काम किया जा सकता है कि द्वीप के उस विशाल वृक्ष के नीचे देवता का वह जो छोटा-सा मन्दिर है उसे फिर से बनाया जा सकता है। सम्भवता द्वीपवासी देवता को फिर से अपना सकते हैं, और देवता को तभी अपनाया जा सकता है, जब सत्य, सदाचार तथा परिश्रम से पवित्र जीवन एवं पूजा सामग्री लेकर सब उस छोटे से देव-मन्दिर में जाएँ।
यह सोच और आप बीती अफ्रीका के एक छोटे से द्वीप में रहने वाले रुथ दुमन्तरा की है, जिसने पाश्चात्य जीवन शैली में दर्द भोगा, वैज्ञानिक कृत्रिमता के दुख झेले। आधुनिकता की हृदय-शून्यता अनुभव की। और यह वह फिर से अपने द्वीप को पुरातन सभ्यता की ओर लौट गया। उसका कहना है कि पुराना है वह सबका सब बुरा नहीं है। हमारी भाव-संवेदनाओं की गंगोत्री अतीत के गौरव में ही है। इसकी मौलिकता देव-मन्दिरों में ही कही है। इपने अनुभव के आधार पर वह सभी से पूछता है, मानवता क्या उस छोटे-से मन्दिर बनने के लिए देव मन्दिर की देव संस्कृति की ओर बढ़े बिना भी कोई दूसरा मार्ग मिल सकता है।
23 जनवरी, 1897 को एक स्वप्न मुस्कराया था। आज से एक शताब्दी पूर्व नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के जन्म के समय भारतमाता ने अपने अभ्युदय की आशाएँ सँजोयी थीं। भारत के राष्ट्रीय संघर्ष की ज्वालाएं उनके अस्तित्व में धधकती दिखाई दीं। वे सच्चे अर्थों में राष्ट्रपुरुष थे। उन्होंने राष्ट्रनिर्माण का स्वप्न देखा था। अपनी मनोभावनाओं को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा भी मैं अपने सपनों से प्रेम करता है। इन सपनों से मुझे प्रेरणा और संकल्पशक्ति प्राप्त होती है। मेरा सपना है स्वतंत्र, विशाल, महिमाण्डित एवं गौरवशाली भारत का अभ्युदय।
नेताजी कहा करते थे- भारत विश्व प्रासाद की नींव का पत्थर है। हमारी धरती अति प्राचीन है और हमारी सभ्यता एवं संस्कृति भी महान और प्राचीन है। क्षितिज के उस पार, बल खाती हुई नदी के दूसरी ओर, लहराते हुए जंगलों के पार इन धूमिल पर्वतों की ओट में हमारी जन्मभूमि है। जिसके धरातल से आकर्षित होकर स्वर्ग के देवता उतर आये थे। यह हमारी जन्मभूमि है, जिसकी धूल में राम और कृष्ण घुटनों के बल चले थे। मातृभूमि की उसी चरण धूलि में हमने तुमने जन्म लिया है। इसी धूल में हमारे इन सुगठित शरीरों का निर्माण संभव हुआ है। हमारी नसों में, रगों में उसी जन्मभूमि का अकूत प्यार समाया हुआ है और संचरित हो रहा है। हमें यदि अपनी स्वर्गादपि गरीयसी मातृभूमि के लिए कष्ट सहने पड़ते हैं तो क्या यह प्रसन्नता का विषय नहीं है। मेरी मातृभूमि मेरी रग रग में सतत् समायी हुई है। मेरी कल्पना की आंखों के आगे हर क्षण मौजूद है। इस आन्तरिक निकटता में असीम आनन्द है। जन्मजात आशावादी होने के कारण अखण्ड भारत के प्रति मेरा आत्मविश्वास अभी भी दृढ़ है। गहन अंधकार के पश्चात् प्रकाश के दर्शन होते हैं। वर्तमान समय में भले ही हम लोग गहन तमिस्रा से गुजर रहे हों, परन्तु उदीयमान नवप्रभात अति सन्निकट है।
एक व्यक्ति की भाँति राष्ट्र के जीवन में भी विस्तार का नियम होता है। प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक विशेष विश्वास या आदर्श होता है। इसी आदर्श में समस्त जीवनदायिनी शक्ति निहित होती है। भारत की यह जीवनदायिनी शक्ति आध्यात्मिकता है। यही कारण है कि भारत की सभ्यता और संस्कृति अगणित आघातों को सहने के बावजूद जीवन्त और प्रखर है। अन्धकार युग में भी यहाँ वैचारिक क्रान्तियाँ जारी रही। उपनिषद् युग से लेकर रामकृष्ण विवेकानन्द तक विविधता में एकता जीवन का आदर्श रहा है। इसी विविधतापूर्ण साँस्कृतिक परम्परा के आधार पर विशुद्ध भारतीय ढंग से संघबद्ध होकर भावी सभ्यता का आधार विनिर्मित होगा। भारतीय आदर्श युद्ध नहीं प्रेम है। यह प्रेम ही भविष्यत् सभ्यता के आधार का निर्माण करेगा। मेरा विश्वास है कि यह भगवद् इच्छा है कि भारत और भारतीयता उत्तरोत्तर अधिकाधिक जीवन्त और प्रखर हों। क्योंकि इसे विश्व की बहुत कुछ देना है और सिखाना है। अकेला भारत राष्ट्र ही है, जिसके पास दुनिया की भलाई का एक मिशन है। केवल यहीं पर अति मानव के आदर्श की अनुभूति सम्भव है। भारत की समस्या विश्व की समस्या है। विश्व की मुक्ति भारत पर निर्भर करती है। अतएव मैं कहता हूं कि भारत की रक्षा का अर्थ मानवता की रक्षा है। भारत की मुक्ति मानवता की मुक्ति है।
हम भारत का नव-निर्माण करना चाहते हैं, इसे सर्वश्रेष्ठ बनाना चाहते हैं, तो हमें अपने विचारों को बदलना पड़ेगा। विचार और रचनात्मक गतिविधि मूलतः जीवन की पहचान होती है। हमारे पास सद्विचारों की गौरवपूर्ण सम्पदा भारी मात्रा में है, आवश्यक है तो इसका घर-घर वितरण। सुनहरे भारत के भविष्य हेतु विपुल एवं सम्पूर्ण संसाधन हमारे पास विद्यमान हैं। अतः हमारा भविष्य निश्चय ही गौरवशाली है। आज हमें राष्ट्रीय जागरण की जरूरत है। इसी के बलबूते भारत अपनी विशिष्ट सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक संरचना को विकसित करने में सक्षम होगा। अपने देश को विश्व संस्कृति व सभ्यता में कुछ नया योगदान करना है। अतः राष्ट्र को एक ऐसी विचारक्रान्ति की आवश्यकता है, जो व्यक्ति और राष्ट्र को सभी प्रकार के बन्धनों से मुक्त करा सके और आत्मनिर्भरता और आत्माभिव्यक्ति की नूतन शक्ति प्रदान कर सके। हम सामाजिक बेड़ियों को तोड़ते हुए, मनुष्य की सृजनात्मक सक्रियता को विकास का अवसर प्रदान करने हेतु एक और बेहतर संसार का निर्माण करना चाहते हैं। इसकी जड़ एकमात्र मानव स्वभाव की गहराई में ही समाहित हैं। जिन्हें खाद-पानी दे सकना सिर्फ और सिर्फ विचार क्रान्ति से ही सम्भव है।
राष्ट्रनिर्माण निर्जीव माँसपेशियों की थिरकन भर नहीं है। मेरा विचार है कि रचनात्मक गति जीवन में आनन्द प्रदान करती है। नूतन राष्ट्र की कल्पना से ही मैं आत्मविभोर हो उठता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी निजी क्षमता एवं प्रवृत्ति के अनुसार अपनी पूर्णता को प्राप्त करे, यही सम्पूर्ण राष्ट्र के जीवन में अध्यात्मिक अवनति, साँस्कृतिक अधः पतन नितान्त निर्धनता और राजनैतिक दासता की बेड़ियाँ टूटने ही वाली हैं। भारतवर्ष प्रखर एवं शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में अतिशीघ्र स्थापित होगा। आज का तमसाच्छन्न देश कल बाहर निकलकर आनन्द एवं ज्योतिर्मय प्रकाश से जगमगा उठेगा। ऐसे में हमारी राष्ट्रीय साधना है कि सभी शक्तिमान आत्माएँ भारत के गाँव-गाँव और घर-घर में उज्ज्वल भविष्य का सन्देश पहुँचा दें, तभी समूचे राष्ट्र में नव-जागरण एवं नये जीवन का संचार हो सकता है। ध्यान रहे राष्ट्र सेवा मात्र शरीर से ही नहीं आत्मा से भी की जा सकती है। आत्मा के आह्वान पर बलिदानों के रक्त से मातृभूमि की अर्चना और अभ्यर्थना करनी पड़ती है, आध्यात्मिक जाग्रति के बल पर ही भारत का पुनर्निर्माण सम्भव है।
सुभाष चन्द्र बोस भारत को अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करते थे। उनके मानस पटल पर विशाल राष्ट्र का भव्य स्वरूप था और वे उसकी समग्रता के आराधक एवं उपासक थे। उनके अनुसार विभिन्न धर्म, सम्प्रदाय, जाति या वर्ग के व्यक्ति राष्ट्रीय उत्थान का लक्ष्य लेकर चलें तो उनकी आस्था और विश्वास में कभी टकराहट नहीं पैदा होगी। राष्ट्र ही राष्ट्र धर्म होना चाहिए। इसकी व्याख्या उनके एक पत्र से स्पष्ट होती है- भारत के हिन्दुओं की यह अविच्छिन्न परम्परा रही है कि वह उन सभी समुदाय, जाति तथा वर्गों को समुचित सम्मान देकर प्रतिनिधित्व देते हैं, जो भारत को अपनी मातृभूमि मानते हैं। अपने राष्ट्र की जनता ने साम्प्रदायिकता के विरुद्ध लड़ाई लड़ी है, क्योंकि साम्प्रदायिकता की भावना विशुद्ध और निष्कलुष राष्ट्रीयता के विकास के लिए अत्यन्त घातक है।
सांप्रदायिक कठ्रता के विरोधी होते हुए भी धर्म-भावना उनके रोम-रोम में समायी थी। उनकी मान्यता थी कि धर्म व्यक्ति की आत्मा को बलिष्ठ और शक्तिशाली बनाता है और आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं। आदमी केवल रोटी खाकर जीवित नहीं रहता, उसके लिए नैतिक और अध्यात्मिक खुराक की भी आवश्यकता है। किसी भी देश और किसी भी युग में केवल तप और त्याग के बल पर ही कोई समाज उन्नत और समृद्ध होता है। शाश्वत सिद्धान्त तो यही कि शहीद का खून ही गिरजाघर, मन्दिर, मस्जिद का बीज होता है। यह आत्मा की विधि है कि देश को जीवित रखने के लिए व्यक्ति को मरना पड़ता है। सुभाष के जीवन में स्वामी विवेकानन्द का गहरा प्रभाव पड़ा था। वे उन्हें अपना अध्यात्मिक गुरु मानते थे। उन्होंने राष्ट्रीय एकता के मंत्रदृष्टा स्वामी विवेकानन्द के विचारों से ही अपने मन की स्थिरता, राष्ट्रीय के प्रति अविचलता, संकल्पों की अडिगता और कर्मयोग की भावना प्राप्त की।
4 अप्रैल 1927 को अपने एक मित्र गोपाल ला सान्याल को लिखे गए एक पत्र में उनके अन्तर की अभिव्यक्ति झलकती है-जब तक हम अपना जीवन शत- प्रतिशत बलिदान करने को तैयार नहीं होंगे, तब तक हमारे लिए दृढ़ और अडिग खड़ा रहना सम्भव नहीं। मैंने अपना जीवन उस प्रार्थना के साथ प्रारम्भ किया था, तुम्हारी पताका लेकर चल रहा हूँ उसे वहन करने की शक्ति तुम्हीं देना। मुझे पता नहीं कि भविष्य के गर्भ में मेरे लिए क्या हूँ केवल अपने अन्तर को विकसित करते जाने में ही अनन्त आनन्द है। मुझे बाह्य नहीं आन्तरिक मानदण्ड प्रिय है। संसार मेरे जीवन को व्यर्थ समझे तो मेरी दृष्टि में वह व्यर्थ नहीं है और शायद मेरे ईश्वर की दृष्टि में भी इस संसार में सभी वस्तुएँ क्षण-भंगुर हैं, लेकिन विचार और आदर्श अवश्य अमिट हैं। हमारी आशाएँ आकाँक्षाएँ और एक आदर्श राष्ट्रीय जीवन को पत्थर की दीवार में कौन भला कैद कर सकता है।
मानवता सत्ता में निहित दैवीय प्रयोजन में मेरा सदैव विश्वास रहा है। मुझे कोई सन्देह नहीं कि मैं अपेक्षाकृत एक उत्तम, शुद्ध और आदर्श व्यक्ति के रूप में सामने आऊँगा, जो निर्द्वन्द्व और निः स्वार्थ भाव से स्वयं का महान लक्ष्य की सेवा में पूर्णतः समर्पित कर देगा। कष्ट सहन के लिए बिना मनुष्य अपने आध्यात्मिक लक्ष्य से एकीकृत नहीं हो सकता और सब तक वह इस अग्निपरीक्षा से होकर न गुजरे तक उसे अपने भीतर संचित असीम शक्ति के बारे में निश्चयात्मक बोध नहीं हो सकता। इस अनुभव का ही यह परिणाम रहा है कि मैं अपने आप को अधिक गहराई से जान सका हूँ और मेरा आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया हैं जिसका हृदय जितना विशाल होता है, उसकी पीड़ा भी उतनी ही विशद होती है। ईश्वर जिसे प्रेम करता है वे बार-बार दुःख और विपत्तियों का शिकार होते हैं।
राष्ट्र- निर्माण में आने वाले समस्त कष्टों को वे ईश्वरीय वरदान समझते थे। साथ ही वे राष्ट्र की युवा शक्ति के द्वारा ही भारत माता के सुनहरे भविष्य का स्वप्न देखते थे। युवा शक्ति का आह्वान करते हुए उनका स्वर था-ऐ युवाओं! तुम ही वह शक्ति हो, जिसके बल पर भारतमाता के अधिकारों की रक्षा सम्भव है। मत भूलो कि शक्तिहीनता सबसे बड़ा अभिशाप है। मत भूलो की असत्य और अन्याय से समझौता करना सबसे बड़ा पाप है। इस शाश्वत नियम को याद रखो यदि तुम जीवन प्राप्त करना चाहते हो, तो जीवन दे डालो और यह याद रखो कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करना जीवन का सबसे अहम् कर्तव्य है, उसके लिए चाहे कितना ही मूल्य क्यों न चुकाना पड़े। आज हमारी केवल एक इच्छा होनी चाहिए, मरने इच्छा, रखो ताकि शहीदों के खून से राष्ट्रनिर्माण का रास्ता तैयार हो सके। यदि तुम गुलाब के फूलों की सुरभि चाहते हो तो उसके तीखे कांटों से परहेज मत करो। यदि तुम भोर की अरुणिमा का आनंद उठाना चाहते हो तो उसके अँधेरे का तिरस्कार मत करो। यदि तुम राष्ट्रनिर्माण का वरदान चाहते हो तो उसका मूल्य चुकाओ और याद रखो यह मूल्य तप और त्याग।
हमारी निष्ठा केवल भारतवर्ष के लिए होनी चाहिए। आओ हम भारतमाता के लिए जिएँ और मरें। आओ हम समग्र शक्ति-संचय के साथ उत्सर्ग करें। दुनिया में ऐसी कोई ताकत नहीं जो सत्पथ पर बढ़ते हमारे कदमों को रोक दे। जो सत्य में विश्वास रखता है अन्त में उसी की विजय होती है॥ केवल सत्य और न्याय ही विजयी होता है। मैं उसे ही सच्चा वीर मानता हूँ जो आँखों में राष्ट्रीय अभ्युदय के सपने, हाथों में मौत के फूल और दिल में देशभक्ति का तूफान लिए होता है। हमारा आदर्श है अच्छी स्थिति की आशा करो और बुरी स्थिति के लिए तैयार रहो। महान सत्य यह है कि एक व्यक्ति का जीवन पूर्ण सत्य है और एक जीवति मनुष्य के लिए स्वतन्त्रता अभीष्ट है। यह अत्यन्त उदात्त आदर्श है जिसे आत्मसात और ग्रहण करना बहुत कठिन है। परन्तु हमारे युवाओं को इस आदर्श को ग्रहण करना होगा। जब एक राष्ट्र विनिर्मित होता है, तो यह निर्माण पूर्ण और समग्र होना चाहिए। इसके लिए ऐसा युवा रक्त चाहिए, जो इस पवित्र और पावन उद्देश्य के लिए अपना सर्वस्व उत्सर्ग कर दे।
एक बार जब हमारे हृदय में देशप्रेम की इच्छा उदीप्त हो जाएगी तब वह अपनी पूर्ति के लिए स्वयं ही उपकरण की तलाश कर लेगी। इसके प्रभाव से बलिष्ठ शरीर, परिशुद्ध बौद्धिक और नैतिक बल के रूप में हमारा सम्पूर्ण जीवन नैतिक बल के रूप में हमारा सम्पूर्ण जीवन महान उपकरण बन जाएगा। जिसका हृदय एक नवीन और उच्चतर जीवन की प्राप्ति की आकाँक्षा से परिपूर्ण है, वह कभी परिस्थितियों की परवाह नहीं करता। एकमात्र देश के लिए बलिदान हो जाना ही हमारा ध्येय है। भीषण तूफान के पूर्वाभास के रूप में समय-समय पर हवा के झोंके आते रहे हैं और थोड़े-थोड़े अन्तराल में बिजली कड़क रही है। ऐसी विषम परिस्थितियों में हम जैसे यात्रियों का यही कर्तव्य है कि अपने लक्ष्य की ओर आंखें लगाए हुए अपने हृदय में आशाएँ, आकाँक्षाएँ और उत्कंठाएँ लिए राष्ट्र-निर्माण के आग्नेयपथ पर अग्रसर हों। इसका कोई महत्व नहीं कि भारतमाता के लिए जीवित रहेगा, कौन नहीं? हमारे लिए आत्मसंतोष की बात यह है कि हम भारतमाता के लिए अपना सर्वस्व समर्पण कर देंगे। मैं सर्वस्व चाहता हूँ, इससे कुछ कम नहीं।
यह मेरे स्मरणीय दिन है, जब मैंने सब सुख-सुविधाओं को तिलाँजलि देकर संघर्ष के क्षेत्र में कदम रखा, जिसके प्रति हर युग के युवाओं में मन में तीव्र आकर्षण रहा है। इसलिए हे युवाओं! मैं तुम्हें आह्वान करता हूँ, आओ अपने देश के लिए, अपनी माटी के लिए अनन्त बार मर मिटे। यहाँ तक कि अपने निष्कपट विचारों के लिए हमें मृत्यु का वरण करना पड़ सकता है। यद्यपि उस मृत्यु के कारण हम अमरत्व को प्राप्त करेंगे। अतएव हमें किसी भी आपातकाल के लिए कटिबद्ध रहना है। त्याग, कष्ट और कठिनाइयों के अभाव में क्या जीवन शुष्क और नीरस प्रतीत नहीं होगा। हमें तमाम बेड़ियों को तोड़ने के लिए कठोर प्रहार करना होगा। आओ हम स्वयं अपने तथा देशवासियों के मन में उज्ज्वल भविष्य की कामना को को जाग्रत करें। इससे मिथ्या मानदण्ड घिसे–पिटे रीति-रिवाज और प्राचीन प्रतिबन्ध ध्वस्त हो जाएँगे और राष्ट्र सुनहरे, भविष्य में प्रवेश करेगा।
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस राष्ट्र में एक ऐसे समाज के स्वप्नद्रष्टा थे, जहाँ जाति, वर्ग, धर्म, संप्रदाय और लिंग -भेद की असमानता न हो। उनकी समाजवाद की कल्पना वैदेशिक धारणाओं पर आधारित न होकर अनिवार्यतः भारतीय इतिहास और राष्ट्र-परम्पराओं पर आधारित विचार एवं कल्पना है। जिस समाजवाद के वे हामी थे उसका मूल भारत की संस्कृति और सभ्यता में सन्निहित है। वे अपनी पुस्तक ‘ इण्डियन स्ट्रगल’ में लिखते हैं, भारतवर्ष को अपने भूगोल और इतिहास के अनुसार समाजवाद का विकास करना चाहिए, जिसमें नवीनता और मौलिकता हो तथा वह सारे संसार के लिए लाभदायी हो। उनका मानना था, भविष्य में भारत अपने समाजवाद के स्वरूप को स्वयं विनिर्मित करेगा, जो समस्त संसार के लिए अनुकरणीय होगा। समाज-व्यवस्था में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन एवं एक सम्पूर्ण क्रान्ति की आवश्यकता है और और क्रान्ति का जन्म विचारों के व्यापक प्रसार से ही सम्भव होता है। इसीलिए विचार-क्रान्ति की मशाल महामशाल प्रज्वलित करने वाले वह समाज को एक नई दिशा दे सके।
राष्ट्रनायक सुभाष अपने समाजवाद का मूल स्रोत युगद्रष्टा स्वामी विवेकानन्द को मानते थे। उनका कहना था, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज से परे उसका आत्मपरितोष सम्भव नहीं है। व्यक्ति अपने उन्नयन और विकास के लिए उसी तरह समाज पर निर्भर करता है, जिस प्रकार समाज की निर्भरता व्यक्ति पर है। सम्पूर्ण समाज के लिए स्वतन्त्रता का अर्थ होगा- पुरुष के साथ स्त्री, की स्वतन्त्रता, उच्च जातियों के साथ दलितों का उत्थान, केवल धनवानों के लिए ही नहीं निर्धनों की भी स्वतन्त्रता, आबाल-वृद्ध सबके लिए स्वतन्त्रता। इस प्रकार स्वतन्त्रता में समानता अन्तर्निहित है और समानता से विकास ओर प्रगति की प्रतिध्वनि निकलती है। समाज में सबको शिक्षा और विकास के समान अधिकार प्रदान करना होगा। समाज में सबको समान अवसर, सामाजिक नियमों का विवेकसम्मत प्रचलन, कुरीति, अन्धविश्वास तथा जातिप्रथा का अन्त होना आवश्यक हैं समानता, न्याय, स्वतन्त्रता अनुशासन और प्रेम ही सामूहिक जीवन का आधार है। हमारा सम्बन्ध उस राष्ट्र और सामाजिक ढाँचे से है, जो मनुष्यता के चरित्र विकास में सहायक होगा और हमारे सामूहिक मानवता के स्वप्न को साकार करेगा।
वे इस बात को हिमायती थे कि भारतीय राजनीति में वे सभी तत्व समाहित हों जो जन-कल्याणकारी होने के साथ ही उदात्त भावनाओं से भी सम्पृक्त हों। नवम्बर 1944 में टोकियो विश्व-विद्यालय के छात्रों के सम्मुख व्याख्यान देते हुए उन्होंने कहा था-यदि कोई यह कहे कि किसी एक राजनैतिक प्रविधि में मानव प्रगति की अन्तिम सीमा सन्निहित होती है तो उचित नहीं है। मानव प्रगति कभी रुक नहीं सकती और संसार के पिछले अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हमें किसी नयी राजनैतिक प्रविधि का प्रादुर्भाव करना पड़ेगा। देशभक्त नेताओं को निर्माण दमन, यातना, अवमानना और पीड़ा के माध्यम से होता है। इसलिए इन कठिनाइयों का हार्दिक स्वागत करना चाहिए। नेता को जनता का सेवक होना चाहिए। सार्वजनिक सेवा का जीवन संन्यास की तरह होता है। त्याग और सेवा को ही भारतीय राजनीति के सर्वमान्य मूल्यों के रूप में प्रतिष्ठित करना होगा।
इसके लिए हमारा सबसे पहला काम यह होना चाहिए कि हम इस प्रकार के स्त्री-पुरुषों का समूह संगठित कर लें जो अधिक से अधिक कष्टसहन करने और बलिदान देने के लिए तैयार रहें। हमें ऐसे लोग चाहिए जिन पर राष्ट्रसेवा का नशा चढ़ा हुआ हो और जो किसी असफलता या किसी प्रकार की कठिनाई से हतोत्साहित न हों। भारतमाता ऐसे लोगों के पुकार रही हैं, जो अपने जीवन के अन्तिम दिन तक अपने महान उद्देश्य की पूर्ति के प्रयत्न और कार्य करते रहने की प्रतीक्षा करें। जो केवल अपने देश को, केवल अपने इसी लक्ष्य के लिए समर्पित रहें।
मैं अपनी आंखों से भारत का पुनर्जन्म देख रहा हूँ। जहाँ नारी वर्ग में जीवन का नूतन स्पन्दन होगा और वही राष्ट्र को नवजीवन प्रदान करेगी। भारत की महान नारियों का इतिहास वैदिक युग की ही भाँति प्राचीन एवं महान है। हमारे देश में जब देववाणी संस्कृति का युग था, तभी से भारतीय नारी वर्ग की महानता का प्रादुर्भाव हो चुका था। प्राचीनकाल की ही भाँति आधुनिक युग में भी भारत की कोख से सर्वोत्तम वीराँगनाओं का जन्म होगा। उनके अदम्य साहस की कल्पना कल्पनातीत है। भारतीय नारी हर कार्य को बहुत कुशलता के साथ निर्विघ्न सम्पन्न कर सकती है। प्रतिकूल राजनैतिक-परिस्थितियों में भारत की राष्ट्रीयता को नष्ट होने से बचाने का श्रेय भारत की बेटियों को ही है। भारत माता पुत्रियों ने सदा-सदा भारतीयता और मानवीयता की रक्षा की है। नारी शक्ति ने राष्ट्रीय संकट में कैसे पुरुष वर्ग को सदैव बल प्रदान किया है। निश्चित रूप से भारत की नारी वर्तमान चुनौती को भी अपनी वीरता एवं सूझ-बूझ से अवश्य ही स्वीकार करेगी। नारियों में गाँव-गाँव जाने, भूख-प्यास, कष्ट-यातना सहने की अपार क्षमता और सहनशीलता है। उनके कोमल हाथों में हथियार चलाने की अद्भुत क्षमता है, तो लेखनी उठाने की अपार सामर्थ्य भी। भारतीय नारी उत्सर्ग और बलिदान की साक्षात मूर्ति है और उसमें असीम सम्भावनाएँ हैं। बस आवश्यकता है तो केवल जागरूकता और सक्रियता की।
अपने देश की नारियों में कष्ट से पीड़ित, दुःखी लोगों के प्रति सेवा का सुन्दर भाव है तो अनीति के प्रति संघर्षरत रणचण्डी का रूप भी। उनका हौसला और उत्सर्ग की भावना दुनिया के किसी भी देश से महान है। अब वह समय आ गया है जब उन्हें समाज तथा राष्ट्र में पुरुष के सहकर्मी के रूप में अपना स्थान पाने के लिए आगे आना चाहिए। राष्ट्रीय शौर्य की जाग्रत मूर्ति नेताजी का कहना था कि मैंने ईश्वर की और राष्ट्र की पूजा माँ के स्वरूप में ही की है। मातृत्व की कल्पना मनुष्य को पवित्र और शुद्ध बना देती है। इनसान हर हमेशा अपने जीवन में एक ऐसा स्थान तलाशता है जहाँ कोई तर्क-वितर्क न हो, काई विषाद, या आलोचना न हो, बुद्धिपूर्वक किया गया कोई मूल्यांकन न हो, हो तो बस अन्धभक्ति। माँ की सृष्टि का यही तर्क है। भारतमाता के रूप में मैंने यही पाया है। इसी भावना से मैं भारतमाता और उसकी पुत्रियों की पूजा करता हूँ।
राष्ट्रनायक सुभाष हर हमेशा उस शिक्षा के पक्षधर थे, जो राष्ट्रीय भावना से युक्त हो किसी राष्ट्र के निर्माण के लिए उसकी योजनाओं की अपेक्षा उसकी शिक्षा को सोद्देश्य रूप देना अधिक महत्वपूर्ण है। वे इस बात को गहराई से जानते थे। उनके शिक्षा सम्बन्धी विचारों को देखने से पता चलता है कि वे महान शिक्षाविद् और राष्ट्रीय शिक्षा के आदर्शवक्ता थे। उन्होंने हर स्तर के छात्रों के लिए उनके अनुकूल शिक्षा पर जोर दिया है। उनके अनुसार, प्राथमिक शिक्षा के स्तर से ही छात्र-छात्राओं में राष्ट्रीय भावनाओं के प्रति रुझान उत्पन्न करना चाहिए। वर्तमान पाठ्यक्रम सम्मिलित किये जाएँ, जिनसे भारत की संस्कृति और उसकी गौरव-गरिमा का बोध हो। शिक्षा के द्वारा ही छात्रों में देशभक्ति पैदा की जा सकती है। शिक्षा ही विद्यार्थियों में राष्ट्रीय संवेदना को दृढ़ कर सकती है। इससे ऐसे नागरिक उत्पन्न हो सकते है। इससे राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदान कर सकें। आज हमारे सामने निरक्षरता की समस्या कितनी ही भयानक क्यों न हो? किन्तु इसे सुलझाना यदि सरल नहीं तो असम्भव भी नहीं। आजकल हमारे पास बहुत बड़ी संख्या में पुरुष और महिलाएँ बेरोजगार है। इन सभी को शिक्षा के इस महान उद्देश्य में लगाने की विशद् योजना होनी चाहिए। इसके साथ ही देश तथा देशवासियों की आवश्यकता के अनुरूप राष्ट्रीय शिक्षा के स्वरूप को विकसित करने हेतु अन्य महत्वपूर्ण शिक्षा योजनाओं को क्रियान्वित करना आवश्यक है।
सन् 1924 में माण्डले जेल से सुभाषचन्द्र बोस ने कलकत्ता के अपने एक समाजसेवी मित्र हरिचरण बागची को शिक्षा के बारे में लिखा था-बच्चा अपनी समस्त ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से वस्तुओं को परखना चाहता है। अतः प्रकृति के इस नियम का पालन करते हुए बच्चों को उचित शिक्षा देनी चाहिए। छात्रों को केवल सैद्धान्तिक शिक्षा देकर ही संतोष नहीं कर लेना चाहिए, बल्कि उन्हें विभिन्न उद्योगों एवं कलाओं की शिक्षा देने की व्यवस्था भी करनी चाहिए। बच्चों की रुचियों को जाग्रत करने पर उनकी ज्ञानेन्द्रियाँ अधिक सतर्क हो जाएँगी और उनकी बुद्धि कुशाग्र होगी। शिक्षा के माध्यम से बच्चों की सृजनात्मकता, मौलिकता और व्यक्तित्व विकास के लिए सुअवसर प्रदान करना चाहिए। इस उम्र के विद्यार्थियों को अनुशासित, ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, जिससे वे शारीरिक और बौद्धिक रूप से बलिष्ठ हों। विकास त्रिकोणात्मक होना आवश्यक है अर्थात् हमारे शरीर, बुद्धि और भावनाओं का विकास इस प्रकार हो कि हम सन्तुलित मानव बन जाएँ। इस शिक्षा-पद्धति में शारीरिक श्रम का भी स्थान होना चाहिए।
सुभाषचन्द्र बोस राष्ट्रीय शिक्षा के फलस्वरूप भारत के छात्रों को चरित्रवान, आत्मनिर्भर, शक्तिशाली और देशभक्त के रूप में देखना चाहते थे। उनका मानना था कि विश्व-विद्यालय के छात्र समाज और देश के प्रति महान उत्तरदायित्व का निर्वाह कर सकते हैं। उनके विचारों से विद्यार्थियों की उपाधियों और स्वर्णपदक जैसी छोटी-छोटी चीजों के पीछे भागना उपहासास्पद है। ऐसे विद्यार्थियों का पाठ्य-पुस्तकों और परीक्षा भवनों के बाहर कोई जीवन नहीं होता। छात्र सच्चे अर्थों में शिक्षित तभी कहे जा सकते हैं। जब वे समाज और राष्ट्र के लिए कुर्बान हो सकें। उनका कहना था ‘ अपने राष्ट्र के सम्पूर्ण विकास के लिए समग्र शिक्षा की आवश्यकता है। पुलिस, मिलिट्री, उद्योग, व्यापार-व्यवसाय आदि की भी शिक्षा की व्यवस्था हो। यहाँ तक कि समाज- सेवा और राजनैतिक नेतृत्व के लिए भी प्रशिक्षण की व्यवस्था हो। यदि हमारे सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए शिक्षण, प्रशिक्षण की व्यवस्था सम्भव हो सके तो वे अच्छे ढंग से राष्ट्र की सेवा कर सकते हैं। इसके लिए अपने देश में चरित्रवान और उत्कृष्ट व्यक्तित्व वाले अध्यापकों की आवश्यकता है, जो छात्रों के प्रति सहज प्रेम और सहानुभूति के आधार पर शिक्षण दे सकें। शिक्षा की बुनियादी स्थितियाँ हैं। अध्यापक का व्यक्तित्व, अध्यापन विधियाँ ओर पाठ्य विषयों तथा पाठ्यपुस्तकों का चयन। इन सभी की उत्कृष्टता ही राष्ट्र में शिक्षा का ऐसा ढाँचा तैयार कर सकती है, जो राष्ट्रीय चेतना को नवजीवन प्रदान कर सके।
राष्ट्रनायक नेताजी को भारत के विचार का जनक माना जा सकता है। ‘ द इण्डियन स्ट्रगल ‘ में उन्होंने लिखा है कि भारत में साम्यवाद को नहीं अपनाया जाएगा, क्योंकि राष्ट्रवाद के साथ साम्यवाद की कोई सहानुभूति नहीं है और भारतीय आन्दोलन एक राष्ट्रीय आन्दोलन है। हालाँकि कम्यूनिस्ट सिद्धान्त ने आर्थिक विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किया है। सुभाष बोस ने हरिपुरा में 1938 की 51 वें भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अधिवेशन में दिये गये अपने भाषण में इस बात को स्पष्ट करते हुए कहा था-राज्य के स्वामित्व तथा राज्य के नियंत्रण में औद्योगिक विकास की व्यापक योजना अनिवार्य होगी। हमें अत्यंत सावधानीपूर्वक इस बात पर विचार करना होगा और यह फैसला करना होगा किस क्षेत्र के गृहउद्योगों को आधुनिक फैक्ट्रियों की कड़ी प्रतियोगिता के बावजूद फिर से आरम्भ किया जाए तथा किन बड़े उद्योगों के उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाय। चाहे हम आधुनिक औद्योगिकवाद को कितना ही नापसन्द करें, तब भी हम औद्योगिक पूर्व अवस्था में वापस नहीं लौट सकते। अतः ऐसा उपाय करें, जिससे उसकी बुराइयाँ कम हों तथा बन्द पड़े कुटीर उद्योगों को फिर से शुरू करने की सम्भावना बढ़े। इसके लिए प्रयास करने के साथ उत्पादन तथा वितरण के लिए एक ऐसी व्यापक योजना बनानी होगी, जिससे समस्त कृषि तथा औद्योगिक प्रक्रिया का धीरे-धीरे समाजीकरण किया जा सके।
भारत कृषि प्रधान देश है। अतः यहाँ पर कुटीर उद्योगों की, विशेष रूप से कृषि से जुड़े उद्योगों के विकास के लिए बहुत गुँजाइश है। भूमि से अधिक उपज मिल सके, इसके लिए कृषि को वैज्ञानिक आधार प्रदान करना होगा। पहले अपना ध्यान मूल उद्योगों पर देना होगा। पहले अपना ध्यान मूल उद्योगों पर देना होगा। मूल उद्योग वे हैं जो अन्य उद्योगों को सफलतापूर्वक चलाते हैं। आर्थिक योजना पर सर्वाधिक प्रभाव जनसंख्या का पड़ता है। उन्होंने इस बारे में कहा था, जिस देश में लोग गरीबी, भुखमरी और रोगों से पीड़ित रहते हों उसमें यह सहन नहीं किया जा सकता कि एक ही दशक में उसकी जनसंख्या करोड़ों बढ़ जाए। आबादी कुलाचें मारती हुई बढ़ती गयी, तो हमारी योजनाओं पर पानी फिर जायेगा। इसलिए मुनासिब यही होगा कि हम आबादी पर तब तक लगाम लगाए रखें, जब तक इस समय जी रहे लोगों के लिए अनाज, कपड़े और शिक्षा की व्यवस्था न हो जाए।
अपने जन्म के साथ ही नेताजी ने सार्वभौम, प्रभुसत्तायुक्त, शक्तिशाली और विश्ववन्द्य भारत का स्वप्न देखा था। उनके जन्म और जीवन का उद्देश्य अपने इसी स्वप्न को साकार करना था। जिसके लिए वह अपनी जिन्दगी के हर पल जूझते रहे। भविष्यत् की ओर उनकी आशाओं भरी भविष्य में भारत की साँस्कृतिक आर्थिक और राजनैतिक भूमिका सुदृढ़ और स्पष्ट होगी। भारतवर्ष मानवीय संस्कृति और सभ्यता को बहुत कुछ दे सकता है। धर्म, दर्शन, वास्तुकला, चित्रकला, नृत्य-संगीत तथा कला-कौशल के क्षेत्र में अपने देश की महान भूमिका रहेगी। वैज्ञानिक अनुसंधान और औद्योगिक विकास के क्षेत्र में भारतवर्ष बहुत कुछ उपलब्ध कर सकेगा। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस एक उत्कट देशभक्त थे। उन्होंने प्रारम्भ से ही अपने चिन्तन भावना एवं कर्म-साधना को राष्ट्र के सशक्त, समर्थ एवं जाग्रत बनाने के लिए उत्सर्ग किया था। उनकी जन्म-शताब्दी के अवसर पर उनके दस स्वप्न को साकार करने का दायित्व हममें से प्रत्येक उस शख्स का है, जो स्वयं को भारतीय कहने में गर्व की अनुभूति करता है।
ज्यादा का असर प्रभावशाली होता है और कम उपेक्षणीय प्रभाव डालता है-यह कथन सर्वत्र लागू है- यह कथन सर्वत्र लागू नहीं होता। सूक्ष्म की सामर्थ्य सर्वविदित है। यदि उसका उपयोग सही समय पर, सही ढंग से किया जा सके, तो परिणाम चौंकाने वाला होता है।
पत्थर का एक बड़ा पिण्ड वह काम नहीं कर सकता, जो अदृश्य जैसी स्थिति में रहने वाला परमाणु-कण। परमाणु क्या है? विद्युत-बिन्दुओं का संघात मात्र। इन्हीं में शक्ति का अजस्र स्रोत छिपा है और उसी से विश्व का अतिसामर्थ्य युक्त क्रिया-कलाप चह रहा है।
कायिक गड़बड़ियों को दुरुस्त करने में होम्योपैथी के जनक हैनिमैन ने औषधि की सूक्ष्मशक्ति को महत्व दिया है। आयुर्वेद भी इसी सिद्धान्त पर आधारित है। उसमें रस-भस्मों को घोंट-पीसकर जितना बारीक बनाया जाता है, उसकी शक्ति उसी परिणाम में बढ़ती जाती है।
शरीरशास्त्रियों का कहना है कि नमक एवं अन्यान्य लवणों की बड़ी मात्रा खाने पर तो वह भार बन जाती है और मूत्र एवं पसीने के सहारे व्यर्थ निकल जाती है। जीवकोषों द्वारा ग्रहण किये जाने के लिए तो उनकी बहुत छोटी मात्रा ही पर्याप्त है।
विषविज्ञानियों ने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया है कि स्वस्थ शरीर पर किंग कोबरा के विष का जितना घातक असर पड़ता है, उसका सौवाँ भाग भी वैसा ही प्रतिफल उत्पन्न करता है।
दूध में पाये जाने वाले लोहाँश को बहुत सराहा जाता है और कहा जाता है कि दूध की उपयोगिता उसकी लौह पोषक शक्ति से सम्बन्धित है। यह लौह दूध में कितना होता है? एक पाव में एक ग्रेन का छह लाखवाँ हिस्सा। मात्रा की दृष्टि से यह अत्यन्त उपहासास्पद है, पर चूँकि वह जीवकोषों में घुलने लायक इसी स्थिति में उपयुक्त होता है, इसलिए लाभ उचित अनुपात में घुली हुई मात्रायुक्त दूध से हो सम्भव होता है। यदि इस अनुपात से अनेक गुना बढ़ाकर लौह मिश्रण दिया जाए, तो उससे लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक होगी।
शरीर के तापमान पर हजार भाग पानी में एक भाग हाइड्रोक्लोरिक एसिड घुला हो, तो दालों के प्रोटीन और माँस के फाइबर को आसानी से पचा देगा, किन्तु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल की मात्रा अधिक हो, तो उससे पाचन क्षमता बढ़ेगी नहीं, घट ही जाएगी।
काया में लाल रक्ताणुओं की शक्ति उसके लोहाँश पर निर्भर है, पर उस अंश की मात्रा कितनी स्वल्प होगी-यह भी जाना जरूरी हैं एक घन इंच के 120 लाखवें हिस्से से बड़ा एक रक्ताणु नहीं होता। एक छोटी-सी रक्त-बूँद में इस प्रकार के प्रायः तीस लाख लाल करण होते हैं। इतनी छोटी इकाई कितना कम लोहाँश अपने में लादकर लिये फिर सकती है, यह कल्पना की जा सके, तो प्रतीत होगा कि शक्ति के लिए उपयुक्त अनुपात कितना स्वल्प हो सकता है।
मनुष्य की मूलसत्ता कितनी छोटी है, इसका अनुमान लगाने के लिए अमें जानना चाहिए कि शुक्राणु डिम्ब के साथ मिलकर भ्रूण में परिणत होता है, यह मूलतः एक क्यूब मिलीमीटर का दस लाखवाँ भाग होता है। इतनी छोटी सत्ता में मनुष्य का पूरा शारीरिक और मानसिक ढाँचा समाया रहता है।
क्वार्ट्ज क्रिस्टल कितना छोटा कण है, पर वह अपने वेगवान कम्पन से ‘डिजिटल डिवाइसेज’ को क्रियाशील बनाये रखता है। उसके स्थान पर यदि उसका बड़ा टुकड़ा रख दिया जाए, तो आकार का बड़प्पन यहाँ निरर्थक साबित होगा।
लेजर और गामा रेज अदृश्य स्तर की किरणें हैं पर यदि निमिष मात्र के लिए भी किसी पर उनकी बौछार की जाए, तो प्राणी और पदार्थ क्षण मात्र में ही जलकर राख हो जाएँगे। दृश्य स्तर की किरणों में यह सामर्थ्य कहाँ है?
20 -20000 हर्ट्ज की ध्वनियाँ श्रव्य मानी गयी हैं। इस सीमा से नीचे की ध्वनियाँ इन्फ्रासोनिक और ऊपर अश्रव्य की अल्ट्रासोनिक कहलाती है। यह अश्रव्य स्तर की होती हैं और असाधारण क्षमतावान् होती हैं। अल्ट्रासाउण्ड गर्भस्थ शिशु का लिंग और स्वास्थ्य की जानकारी उपलब्ध कराने में समर्थ होती है। इससे आगे की उच्च आवृत्ति पर यह इतनी खतरनाक हो जाती है कि किसी भी प्राणी और इमारत को पल भर में धराशायी कर दे। श्रव्य ध्वनियों में यह क्षमा नहीं होती।
कस्तुरी की शीी को बार-बार धोते रहने पर भी उसकी गंध आती रहती है। इससे प्रतीत होता है कि सूक्ष्मता का प्रभाव उससे कहीं ज्यादा है, जितना कि आम लोग समझते हैं।
कितने ही जीवाणु-विषाणु अत्यन्त सूक्ष्म एवं अगोचर स्तर के होते हैं, पर वही रोगाणु जब स्वस्थ एवं सुदृढ़ शरीर में प्रवेश करते हैं, तो उसे देखते-देखते खोखला बनाकर व्यक्ति को मौत के मुँह में धकेल देते हैं। मजबूत शरीर मूक दर्शक बना अपनी बरबादी देखता रह जाता है। क्या यह लघुतम की महत्तम पर विजय नहीं है।
पानी जब तरल अवस्था में होता है, तो तृषा-निवारण से लेकर कृषि कार्य तक अनेक प्रयोजन पूरे करता है। ठोस बनकर वह बर्फ की माँग भर की पूर्ति करता है, पर भाप अपनी अद्भुत सामर्थ्य के कारण विशालकाय इंजनों को घसीटने लगती है। यह कार्य बर्फ और पानी के बूते की बात नहीं।
स्थूल संसार,, स्थूल जीवन को मोटी दृष्टि से देखने पर सब कुछ जाना-पहचाना घिसा-पिटा, मामूली महत्वहीन और ढर्रे का दिखाई पड़ता है। उसमें न कुछ विशेषता है, न महत्ता, पर जब गहराई में उतरने और अधिक खोजने, समझने और प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है, तो यहाँ सब कुछ अद्भुत और रहस्यमय दिखलाई पड़ने लगता है। भौतिक जगत में भी। गहराई में उतरना ही शक्ति को खोजने और प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है। उस उपाय को भौतिक क्षेत्र में प्रयुक्त करना विज्ञान कहलाता है और आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रयोग करना योगसाधना-तत्वदर्शन। इससे हमें दोनों ही क्षेत्रों में एक-से एक बढ़कर उपलब्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं।
दृश्य का अदृश्य में तौर अदृश्य का दृश्य में बदल जाना वस्तुतः विश्व का चमत्कार है, पर यह है सरल, सहज और स्वाभाविक। शक्ति-पदार्थ में प्रकट होती है और पदार्थ का शक्ति में लय होता है। ब्रह्म माया में परिणत होता है और माया ब्रह्मसत्ता में लीन होती है। कैसा अबूझ और अद्भुत खेल है, पर विज्ञान एक के बाद के रहस्यों की परतें खोलता चला जा रहा है। और हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचा रहा है कि निर्जीव स्थूल के भीतर प्रचण्ड सम्पन्न सूक्ष्म सन्निहित है। जड़ में भी संव्याप्त चेतना के दर्शन हमें इस आधार पर ही हो सकते हैं। विज्ञान क्रमशः अध्यात्म के सिद्धान्तों का समर्थन करने की दिशा में आगे बढ़ता चला जा रहा है।
भौतिक विज्ञान को दो हिस्सों में बाटा जा सकता है- (1) पदार्थ, (2) ऊर्जा। पदार्थ उन वस्तुओं को कहते हैं, जो हमारे चारों ओर बिखरी पड़ी हैं, जिन्हें हम देखते या अनुभव करते हैं, जिन्हें तौला जा सकता है, वे ठोस, तरल, गैस के रूप में रहते हैं और एक स्थिति से दूसरी स्थिति में परिस्थिति के के अनुसार बदलते रहते हैं।
ऊर्जा उस विभाग को कहते हैं, जिसमें ताप, विद्युत, चुम्बकत्व, प्रकाश आदि की गणना आती है। इन्हेँ तौला तो नहीं जा सकता, फिर भी उन्हें तरंगों के रूप में गतिशील देखा जा सकता है। और उनकी सामर्थ्य को अनुभव किया जा सकता है।
ठोस पदार्थों के रूप-परिवर्तन बिना किसी बाहरी दबाव के बिना नहीं होता। उनके परमाणुओं में घनिष्ठता होती है और परस्पर आबद्धता भी। तरल पदार्थों के अणुओं में उतना आकर्षण और आबद्धता नहीं होती, इसलिए वे बहने लगते हैं, जिस पात्र में रखे उसी की आकृति ग्रहण कर लेते हैं। गैसें के अणुओं में परस्पर कोई बंधन नहीं होता, वे सब दिशाओं में फैलते हैं। जरा-सी गैस एक बड़े कमरे में भर सकती है, तीन स्थितियाँ एक होते हुए भी परस्पर बहुत भिन्न हैं, तो भी ऊर्जा की थोड़ी-सी हलचल उन्हें कुछ से कुछ बना देती है। तापमान 100 डिग्री से. से अधिक घट जाने पर पानी बर्फ बन जाता है और 100 डिग्री से. से अधिक बढ़ जाने पर भाप बन जाता है।
पदार्थ जिन परमाणुओं से मिलकर बनता है, वे निरन्तर गतिशील रहते हैं। यह गति तापमान से प्रभावित होती है। गति बढ़ने से पारस्परिक सम्बन्ध-सूत्र में परिवर्तन होता है और वे अपनी संघबद्ध आकृति बदलने लगते हैं। अत्यधिक ठण्डा करने पर लोह रेत की शक्ल में बदल सकता है। ऊर्जा का हेर- फेर वस्तुओं का इतना अधिक परिवर्तित कर सकता है कि उनके पूर्व रूप की कल्पना तक पर विश्वास करना कठिन पड़ेगा।
जो कुछ हम आंखों से देखते हैं, वह वस्तुतः वैसा ही नहीं होता। आकाश हमें नीला दिखाई पड़ता है, गहरे पानी का रंग भी नीला होता है, पर क्या सब सत्य है? नहीं इसे आँखों का धोखा कहना चाहिए। न आकाश में नील घुला है, न पानी नीला है। वास्तविकता तो यह है कि दोनों ही बिना रंग के हैं। आकाश और समुद्र का गहरा जल-यह दोनों ही प्रकाश की नीली किरणें अवशोषित नहीं कर पाते, अतः नीले दिखाई पड़ते हैं। वृक्ष-वनस्पतियाँ हरे इसलिए प्रतीत होते हैं, कारण कि वे बाकी सभी रंग की किरणों को अवशोषित कर लेते हैं। केवल हरी-प्रकाश-किरणों को छोड़ देते हैं। इस कारण पादप हरे दिखाई पड़ते हैं। सच तो यह है कि संसार में किसी भी पदार्थ अपना कोई रंग है ही नहीं।
देखने में हर चीज स्थिर दिखाई पड़ती है पर उनके भीतर अणुओं की भारी भाग-दौड़ मची रहती है। समतल दिखाई पड़ने वाले भी वस्तुतः खुरदुरे और छिद्रयुक्त होते हैं। मेज की सतह को आंखों से देखकर या हाथ से छूकर समतल ही कहा जा सकता है, पर माइक्रोस्कोप से देखने पर उसमें असंख्य छिद्र दिखाई पड़ेंगे। ब्लेड की धार स्पर्श से और आंखों से सीधी दिखती है, लेकिन सच यह है कि वह लहरदार होती है। पानी में मोल भासती नहीं है, किन्तु चीनी जब उसमें घोलते हैं फिर भी आयतन नहीं बढ़ता, तो पता चलता है कि उसके अणुओं में मोल मौजूद थी। रेत को पानी में डालने से आयतन बढ़ता है पर नमक डालने से नहीं। इसे स्पष्ट है कि पानी के अणु नमक या चीनी को अपने भीतर भर लेने के लायक जगह पहले से ही रखे हुए थे, यद्यपि रेत के कण भिन्न स्तर के होने के कारण उसमें घुल नहीं पाते।
परमाणु पदार्थ की सबसे छोटी इकाई है ओर उसे ठोस समझा जाता है, पर वस्तुतः उसमें भी 90 प्रतिशत स्थान पोला होता है। संसार में यह असंख्य पदार्थ हैं, उनकी गणना नहीं हो सकती लेकिन जिन तत्वों से वे बने हैं उनकी संख्या अब 109 गिनी जा सकी है। इन्हीं कणों के मिलने-बिछुड़ने एवं अनुपात घटने-बढ़ने से तरह-तरह की आकृति प्रकृति वाले पदार्थ बनते-बिगड़ते रहते हैं।
अब पदार्थों का ऊर्जा में ओर ऊर्जा का पदार्थों में परिवर्तन सम्भव हो गया है। प्रकृति में यह खेल चलता ही रहता है।
वह कभी पदार्थ को ऊर्जा में बदलती है, कभी ऊर्जा को पदार्थ में, कभी निराकार साकार बनता है, और कभी साकार का निराकार में विलय हो जाता है। हमारे चूल्हे, बायलर यही उलट-पुलट करने में लगे रहते हैं।
हमारी इन्द्रियाँ भी कितनी विलक्षण हैं। समीपवर्ती क्षेत्र में चल रहे इलेक्ट्रान स्पन्दनों की सूचना अपने-अपने तंत्रों द्वारा मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं। बस इतनी भर नगण्य घटना को मस्तिष्क शब्द, रूप, रस गंध, स्पर्श के मीठे-कडुए अनुभवों के साथ अनुभव करता है और उनमें प्रिय- अप्रिय की प्रतीति होती है। यदि दिमाग में रसानुभूति की विशेषता नहीं होती ओर वह ऊर्जा-अंकन यंत्र मात्र रहा होता, तो जो अनुभूतियाँ हमें होती है, उनमें से एक भी न होती। मात्र अणुओं की हलचलें नोट होती रहती और उनका प्रभाव उतना ही होता जितना कि समीपवर्ती तरंगों के साथ जुड़ा होना। रसानुभूति जैसी कोई स्थिति इस संसार में नहीं है। हमारे दिमाग की विलक्षण संरचना ही है, जो हमें कभी हर्ष, कभी विषाद-कभी प्रिय और कभी अप्रिय अनुभव कराती है। कभी हम रोते हैं, कभी गाते हैं। इसका घटनाओं से नहीं, मात्र अपने निज के अनुभूति तंत्र से ही सम्बन्ध है।
प्रकृति और पुरुष का, जड़ और चेतन का, स्थूल और सूक्ष्म का यह अद्भुत समन्वय अज्ञानी को सामान्य और ज्ञानी को असामान्य प्रतीत होता है। मोटी दृष्टि से यहाँ कुछ कूड़ा-करकट भरा पड़ा है, पर तत्वदर्शी देखता है कि कण -कण में शक्ति का अनन्त भण्डार भरा पड़ा है। भावना की प्रत्येक तरंग में अमृत-कलश छलक रहा है। वस्तुतः यहाँ सब कुछ निरर्थक है और सार्थक भी। सामान्य में असामान्य के दर्शन हो सकते हैं और पाषाण में भगवान प्रकट हो सकते हैं, पर इसके लिए सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता है। गहराई में हम जितने उतरते हैं, उतने ही चकित करने वाले चमत्कारों के दर्शन करते हैं। दर्शन की यह सामर्थ्य यदि हमारे अन्दर हो, तो छोटे कण में भी हम इतनी ओर ऐसी महानता को देख सकते हैं, जो जीवन की दिशाधारा ही बदल दे, किन्तु यह योग्यता न हो, तो अच्छाइयों का विशाल पुँज भी हम पर कोई असर न डाल सकेगा। इसीलिए ‘ अधिकस्य अधिकं फलम् ‘ जैसे सूत्र को सर्वत्र लागू होने वाला नहीं माना जा सकता।
पुराणों में उल्लेख है कि सुरलोक में देवताओं के पास कामधेनु गौ है। वह अमृतोपम दूध देती है, जिसे पीकर देवता लोग सदा संतुष्ट, प्रसन्न तथा सुसंपन्न रहते हैं। इस गौ में यह विशेषता है कि उसके समीप कोई अपनी कुछ कामना लेकर आता है तो उसकी इच्छा तुरन्त पूरी हो जाती है। कल्पवृक्ष के समान कामधेनु गौर भी अपने निकट पहुँचने वालों की सभी मनोकामनाएँ पूरी करती हैं।
यह कामधेनु कोई और नहीं, वरन् गायत्री ही है। इस महाशक्ति की जो कोई भी उपासना करता है, उसे किसी प्रकार का कोई भी अभाव नहीं रहता और न कोई किसी प्रकार कष्ट सहता। वह सदा आनन्दित रहता है तथा भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही प्रकार की सम्पदाओं से परिपूर्ण रहता है। इसीलिए गायत्री को सर्वकामधुक अर्थात् समस्त कामनाओं को पूरा करने वाली कहा गया है। यह महाशक्ति मनुष्य के सभी कष्टों का समाधान कर देती है। गायत्री मंजरी में कहा भी गया है-
भूलोकस्यास्य गायत्री कामधेनुर्मता बुधैः। लोक आ आश्रायणों नामुँ सर्वं मेवाधिगच्छति॥
अर्थात्-विद्वानों ने गायत्री को भूलोक की कामधेनु माना है। उसका आश्रय लेकर हम सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं।
गायत्री उपासना मातृ उपासना है। इस उपासना में ईश्वर को माता मानकर उसकी आराधना की जाती हैं। संसार में जितने भी रिश्ते हैं, उन सब में माता का रिश्ता अधिक प्रेमपूर्ण तथा अत्याधिक घनिष्ठ है। ईश्वर को जिस दृष्टि से देखा जाता है, वह उसी तरह प्रत्युत्तर देता है। स्नेह, वात्सल्य, करुणा, ममता, दया, उदारता, कोमलता आदि तत्व नारी में नर की अपेक्षा स्वभावतः अधिक होते हैं। ब्रह्म का अर्द्धवामाँग ब्राही तत्व अधिक कोमल, अधिक आकर्षक तथा शीघ्र द्रवीभूत होने वाला है। इसलिए अनादि काल से ऋषि-महर्षि ईश्वर की मातृभावना के साथ उपासना-आराधना करते रहे हैं और उन्होंने प्रत्येक धर्मावलम्बी मनुष्य को इसी सुख्य-माध्य एवं शीघ्र सफल होने वाली साधना-प्रणाली को अपनाने का आदेश दिया है।
शास्त्रों में-हर किसी को अर्थात् बाल-वृद्ध एवं नर-नारी को बिना वर्ग-भेद, जातिभेद, वर्णभेद व लिंग-भेद के गायत्री उपासना की प्रेरणा दी गयी है। पुरुषों की भाँति नारियाँ भी गायत्री उपासना की समान अधिकारिणी हैं। साधना क्षेत्र में पुरुष-स्त्री का भेद नहीं, दोनों ही वर्ग ईश्वर की आँखों के तारे हैं, इस क्षेत्र में सभी आत्माएँ समान हैं। अतः गायत्री महाशक्ति की आराधना का अधिकार सभी को है, चाहे वे नर हों या नारी। जो लोग यह कहते हैं कि गायत्री वेदमंत्र होने से उसका अधिकार नारी को नहीं है, वे भारी भूल करते हैं। प्राचीनकाल में स्त्रियाँ मंत्रदृष्टा रही हैं। वेदमंत्रों का उनके द्वारा अवतरण हुआ है। गायत्री स्वयं स्त्रीलिंग है, फिर उनका अधिकार न होने का कोई कारण नहीं। नारी में पुरुष की अपेक्षा धार्मिक तत्वों एवं भाव-संवेदनाओं का बाहुल्य होता है। इसके साथ यह भी एक तथ्य है कि माता को पुत्र से कन्या अधिक प्यारी होती है। यह कारण है कि महाशक्ति गायत्री की उपासना-साधना पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों के लिए अधिक सरल और अधिक फलदायिनी है।
जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि गायत्री कामधेनु है और वह अपने उपासक की कामनाएँ पूर्ण करती है। माता का आँचल पकड़ने वाले नर ही नहीं, नारियाँ भी अपनी भौतिक व आध्यात्मिक उन्नति करती आयी हैं और साँसारिक सुख-समृद्धि की प्राप्ति तथा आपत्तियों से छुटकारा पाने की प्रसन्नता अनुभव करती रही हैं। गायत्री उपासना के द्वारा महिलाएँ अपने घर-परिवार के सदस्यों, बच्चों पर धार्मिक संस्कार अधिक अच्छी तरह से डाल सकती हैं और परिवार में स्वर्गीय वातावरण का निर्माण कर सकती हैं। यहाँ कुछ ऐसी साधनाएँ दी जा रही हैं जो हर आयु-वर्ग के लिए उपयुक्त हैं। गायत्री मंत्र वही है, परन्तु अन्तर भाव-क्षेत्र का है। माता को प्रसन्न करने के लिए उपासना के साथ-साथ आवश्यकता के अनुरूप भाव-साधना भी करनी पड़ती है। नौ दिन का पूर्ण अनुष्ठान होता है। तत्कालीन आवश्यकता के लिए इन्हें ही प्रयुक्त किया जाता है। इसके अतिरिक्त एक वर्ष का गायत्री उद्यापन सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। महिलाओं के लिए इसकी विशेष महिमा हैं। इसमें कोई विशेष कठिनाई भी नहीं है और न ही कोई विशेष प्रतिबन्ध है। सरलता की दृष्टि से यह स्त्रियों के लिए विशेष उपयोगी है।
प्रायः देखा गया है कि सधवा महिलाएँ, जिन्हें घर-गृहस्थी के कार्य में विशेष रूप से व्यस्त रहना पड़ता है अथवा जिनके छोटे-छोटे बच्चे हैं जिसके कारण वे उतनी स्वच्छता नहीं रख पातीं जितनी कि अपेक्षित है, उनके लिए देर में पूरी हो सकने वाली अनुष्ठानपरक साधनाएँ कठिन हैं। ऐसी स्थिति में वे संक्षिप्त साधनाओं से काम चला सकती हैं। जो पूरा गायत्री-मंत्र “द्ध भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् “ याद नहीं कर सकतीं, वे संक्षिप्त गायत्री पंचाक्षरी मंत्र-“ द्ध भूर्भुवः स्वः “ से काम चला सकती हैं। रजस्वला होने के दिनों में उन्हें विधिपूर्वक साधना बन्द रखनी चाहिए। कोई अनुष्ठान चल रहा हो तो उन दिनों में रोककर रजः स्नान के पश्चात फिर चालू किया जा सकता है। हाँ इस अवधि-में मौन मानसिक जप अवश्य कर लेना चाहिए। इसमें कोई दोष नहीं है।
गायत्री तंत्र में उल्लेख है-
अशुचिर्वा शुचिर्वापि गच्छन्तिष्ठन् यथा तथा। गायत्री प्रजपेद्धीमान् जयात् पापन्निवर्तते॥
अर्थात्-अपवित्र हो अथवा पवित्र हो, चलता हो अथवा बैठा हो, जिस भी स्थिति में हो, बुद्धिमान मनुष्य गायत्री का जप करता रहे। इस जप के द्वारा पापों से छुटकारा मिलता है। वशिष्ठ स्मृति में तो प्रायश्चित प्रक्रिया के लिए भी गायत्री जप का निर्देश देते हुए कहा गया है-मनसा भर्तुरभिचारे त्रिरात्रं यावकं क्षीरौदनं वा भŒनाऽघ शयति ऊर्ध्व
शिरोभिर्जुहूयात् पूता भवतीत विज्ञायते। “
अर्थात् यदि पत्नी के मान में पति के प्रति दुर्भाव आएँ तो उस पाप का प्रायश्चित करने के साथ 108 मंत्र गायत्री के जपने से वह पवित्र होती है।
निःसंतान महिलाएँ गायत्री साधना को पुरुषों की भाँति ही सुविधापूर्वक कर सकती हैं। अविवाहित या विधवा महिलाओं के लिए तो वैसी ही सुविधाएँ हैं जैसी कि पुरुषों को। जिनके बच्चे बड़े हो गये हैं। गोदी में कोई छोटा बालक नहीं है या जो वयोवृद्ध हैं, उन्हें भी उपासना में कुछ असुविधा नहीं हो सकती। साधारण दैनिक साधना में कोई विशेष नियमोपनियम पालन करने की आवश्यकता नहीं है। दाम्पत्य जीवन के साधारण धर्म-पालन करने में उसमें कोई बाधा नहीं। यदि कोई विशेष साधना या अनुष्ठान करना हो तो उतनी अवधि के लिए ब्रह्मचर्य पालन करना आवश्यक होता है।
विधवा बहने आत्मसंयम, सदाचार, विवेक, ब्रह्मचर्य-पालन, इन्द्रिय-निग्रह एवं मन को वश में करने के लिए गायत्री साधना को ब्रह्मास्त्र के रूप में प्रयोग कर सकती हैं। जिस दिन से गायत्री साधना आरम्भ की जाती है, उसी दिन से मन में शान्ति, स्थिरता, सद्बुद्धि और आत्मसंयम की भावना पैदा होती है। मन पर अपना अधिकार होता है, चित्त की चंचलता नष्ट होती है, विचारों में सतोगुण बढ़ जाता है। इच्छाएँ, क्रियाएं, भावनाएं- सीभी सतोगुणी, शुद्ध और पवित्र रहने लगती है। धीरे-धीरे उसकी साध्वी, तपस्विनी, ईश्वर परायण एवं ब्रह्मवादिनी जैसी सात्विक स्थिति हो जाती है। गायत्री के वेश में भगवान का उसको साक्षात्कार होने लगता है और ऐसी आत्मशान्ति मिलती है, जिसकी तुलना में सधवा रहने का सुख उसे नितान्त तुच्छ दिखाई पड़ता है।
गायत्री साधना में बैठने से पूर्व प्रातःकाल ऐसे जल से स्नान करें, जो शरीर को सह्य हो, अति शीतल या अति उष्ण जल स्नान के लिए अनुपयुक्त है। वैसे तो सभी के लिए, पर स्त्रियों के लिए विशेष रूप से असह्य तापमान का ठण्डा या गरम जल स्नान के लिए हानिकारक है। स्नान के उपरान्त उपासना के लिए बैठना चाहिए। पास में जल से भरा हुआ पात्र रहे। जप के लिए तुलसी की माला और बिछाने के लिए आसन या चटाई-कुशासन सबसे उपयुक्त रहता है। वृषभारूड़, श्वेत वस्त्रधारी चतुर्भुजी प्रत्येक हाथ में, माला, कमण्डल, पुस्तक और कमल पुष्प लिए प्रसन्नमुख प्रौढ़ावस्था गायत्री महाशक्ति का ध्यान करना चाहिए। ध्यान चित्त की चंचलता को दूर करने तथा सद्गुणों की वृद्धि के लिए बड़ा लाभदायक सिद्ध होता है। मन को बार-बार इस ध्यान में लगाना चाहिए और मुख से गायत्री महामंत्र का जप इस प्रकार करते जाना चाहिए, कि कण्ठ से कुछ ध्वनि हों, होंठ हिलते रहें, परन्तु मंत्र को निकट बैठा हुआ व्यक्ति भी भली प्रकार न सुन सके। प्रातः और साँय दोनों समय इस प्रकार का जप किया जा सकता है। एक माला तो कम से कम जप होना ही चाहिए। सुविधानुसार जितना अधिक किया जा सके, उतना ही उत्तम है। अस्वाद व्रत, सप्ताह में एक दिन-गुरुवार या रविवार को उपवास, मौनव्रत, इन्द्रिय संयम, स्वाध्याय, ज्ञानप्रचार जैसी तप-साधनाएं भी साथ में की जाएँ तो और भी उत्तम हैं।
कुमारी कन्याएँ अपने विवाहित जीवन में सब प्रकार की सुख शान्ति के लिए भगवती गायत्री की उपासना कर सकती हैं। पार्वती ने मनचाहा वर पाने के लिए नारद जी के आदेशानुसार विशेष पुरश्चरण किये थे और वे अन्त में सफल मनोरथ भी हुई थी। सीता जी ने मनोवाँछित पति पाने के लिए गौरी-पार्वती की उपासना की थी। वनदुर्गाओं में आस्तिक कन्याएँ भगवती की आराधना करती हैं। गायत्री उपासना सब के लिए सब प्रकार मंगलमयी है।
आशाप्रद भविष्य की साधना में गायत्री माता का चित्र, प्रतिमा अथवा मूर्ति को किसी छोटे आसन या चौकी पर स्थापित करके उसकी पूजा वैसे ही करनी चाहिए, जैसे अन्य देव प्रतिमाओं की की जाती है। प्रतिमा के आगे एक छोटी तश्तरी रख लेनी चाहिए ओर उसी में चन्दन, धूप, द्वीप, अक्षत, नैवेद्य, पुष्प, जल, भोग आदि पूजा सामग्री चढ़ानी चाहिए। मूर्ति के मस्तक पर चन्दन लगाया जा सकता है, पर यदि चित्र है तो उस पर चन्दन आदि नहीं लगाना चाहिए, जिससे उसमें मैलापन न आये। नेत्र बन्द करके ध्यान करना चाहिए और मन ही मन कम से कम 24 मंत्र गायत्री के जपने चाहिए। इस प्रकार की नित्य गायत्री साधना कन्याओं को उनके अनुकूल वर, अच्छा घर तथा अचल सौभाग्य प्रदान करने में सहायक होती है।
सधवाओं को अपने पतियों को सुखी, समृद्ध, स्वस्थ, व दीर्घजीवी बनाने के लिए गायत्री महाशक्ति की शरण लेनी चाहिए। इससे पतियों के बिगड़े हुए स्वभाव, विचार और आचरण शुद्ध होकर उनमें ऐसी सात्विक बुद्धि आती है कि वे अपने गृहस्थ जीवन में कर्तव्य-धर्म को तत्परता एवं प्रसन्नतापूर्वक पालन कर सके। इस साधना से स्त्रियों के स्वास्थ्य तथा स्वभाव में एक ऐसा आकर्षण पैदा होता है, जिससे वे सभी को परमप्रिय लगती हैं और उनका समुचित सत्कार होता है। अपना बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य, आर्थिक तंगी, दरिद्रता, बढ़ा हुआ खर्च, आमदनी की कमी, पारिवारिक क्लेश, मनमुटाव, आपसी राग-द्वेष एवं बुरे दिनों के उपद्रव को शान्त करने के लिए महिलाओं को गायत्री उपासना करनी चाहिए। पिता के कुल एवं पतिकुल दोनों ही पक्षों के लिए यह साधना उपयोगी है, पर सधवाओं की मंगलमय गायत्री उपासना विशेष रूप से पतिकुल कुल के लिए ही लाभदायक सिद्ध होती है।
प्रातःकाल से लेकर मध्याह्न तक यह मंगलमय उपासना कर लेनी चाहिए। जब तक साधना न हो तब तक भोजन नहीं करना चाहिए- हाँ जल पिया जा सकता है। शुद्ध शरीर, शुद्ध मन और शुद्ध वस्त्र से तैयार होकर पूर्व की ओर मुँह करके उपासना के लिए बैठना चाहिए। केशर डालकर चंदन अपने हाथ से घिसें और मस्तक, हृदय तथा कंठ पर तिलक छाप के रूप में लगावें। तिलक छोटे-से-छोटा भी लगाया जा सकता है। गायत्री मूर्ति या चित्र की स्थापना करके उसकी विधिवत पूजा करनी चाहिए। पूजन के सभी कार्यों में पीले रंग की सामग्री ही प्रयुक्त करनी चाहिए। प्रतिमा का आवरण पीले वस्त्रों का रखे। पीले पुष्प, पीले चावल, बेसन के लड्डू आदि पीले पदार्थों का भोग, गौ-घृत, गौ-घृत न मिले तो उसमें केशर मिलाकर पीला कर लेना, चन्दन का चूरा, धूप इस प्रकार पूजा में पीले रंग का अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए।
पूजन के पश्चात नेत्र बन्द करके पीत वर्ण आकाश में पीले सिंह पर सवार, पीत वस्त्र पहने गायत्री माता का ध्यान करना चाहिए। पूजा के समय सब वस्त्र पीले न हों सके तो कम से कम एक वस्त्र पीला अवश्य होना चाहिए। इस प्रकार पीतवर्ण गायत्री का ध्यान करते हुए कम से कम 24 बार गायत्री महामंत्र जपना चाहिए। जब अवसर मिले तो मन ही मन भगवती गायत्री का अध्ययन करती रहें। महीने के हर एक पूर्णमासी को व्रत रखना चाहिए। अपने नित्य आहार में एक चीज पीले रंग की अवश्य लें लें। शरीर पर कभी कभी हल्दी का उबटन कर लेना अच्छा है। यह पीतवर्ण साधना दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने के लिए परम उत्तम है।
जिनकी सन्तान बीमार रहती है, अल्पायु में ही काल–कलवित हो जाती है, केवल पुत्र या कन्याएँ ही होती हैं, गर्भपात हो जाते हैं, गर्भ स्थापित नहीं होता, बन्ध्यादोष लगा हुआ है अथवा सन्तान दीर्घसूत्री, आलसी, मन्दबुद्धि, दुर्गुणी, आज्ञा उल्लंघनकारी, कटुभाषी या कुमार्गमामी है, वे गायत्री महाशक्ति की शरण में जाकर इन कष्टों से छुटकारा पा सकती हैं।
ऐसे हजारों उदाहरण हैं, जिनमें महिलाओं ने वेदमाता गायत्री के चरणों में अपने आँचल फैलाकर संतान सुख माँगा है और भगवती ने उन्हें वह प्रसन्नतापूर्वक दिया है। माता के भण्डार में किसी वस्तु की कमी नहीं, उनकी कृपा को पाकर मनुष्य दुर्लभ से दुर्लभ वस्तु प्राप्त कर सकता है। वह कामधेनु है, कल्पवृक्ष है और सर्वकामधुक हैं। अतः ऐसी कोई वस्तु नहीं जो माता की कृपा से प्राप्त नहीं हो सकती फिर संतान-सुख जैसी साधारण बात की उपलब्धि में कोई बड़ी अड़चन नहीं हो सकती।
जो महिलाएँ गर्भवती हैं वे प्रातः सूर्योदय से पूर्व या रात्रि को सूर्यास्त के पश्चात् अपने गर्भ में गायत्री के सूर्य सदृश प्रचण्ड तेज का ध्यान किया करें और मन ही मन गायत्री महामंत्र का जप किया करें, तो गर्भ में पल रही उनकी संतान तेजस्वी, बुद्धिमान, प्रतिभाशाली, दीर्घजीवी एवं यशस्वी होती है। यह क्रम गर्भ ठहरने से लेकर प्रसव पूर्व तक नित्यप्रति पाँच से पन्द्रह मिनट तक अपनाने से सुख प्रदान करने वाली सुसंतति की प्राप्ति होती है-
ध्यान प्रक्रिया
प्रातः काल कटि प्रदेश में भीगे वस्त्र रखकर शांतचित्त से ध्यानावस्थित होना चाहिए और अपने योनिमार्ग में होकर गर्भाशय तक पहुँचाता हुआ गायत्री का प्रकाश सूर्य-किरणों जैसा ध्यान करना चाहिए। प्रातः उदीयमान सूर्य की सविता की स्वर्णिम किरणों में जो आभा रहती है। वही गायत्री का प्रचण्ड तेजस्वी ‘भर्ग’ है। सविता की शक्ति ही गायत्री है। इसी का ध्यान किया जाता है। ध्यान के समय आंखें बन्द रखें। यह साधना शीघ्र गर्भ स्थापित करने वाली है। कुन्ती ने इस साधना के बल से गायत्री के दक्षिभाग सूर्य भगवान को आकर्षित करके कुमारी अवस्था में ही कर्ण को जन्म दिया था। यह साधना कुमारी कन्याओं को नहीं करनी चाहिए।
साधना से उठकर सूर्य को अर्घ्य-जल चढ़ाना चाहिए और अर्घ्य से बचाकर एक चुल्लू अर्थात्-एक दो चम्मच जल सविता देवता का पुण्य-प्रसाद मानकर स्वयं पीना चाहिए। इस प्रयोग से बन्ध्याएँ गर्भधारण करती हैं, जिनके बच्चे मर जाते हैं या गर्भपात हो जाता है, उनका यह कष्ट मिटकर सद्गुणी संतान पैदा होती है।
प्राचीनकाल की नारियाँ इस तप साधना से ओत−प्रोत होने के कारण ही यशस्वी संतानों को जन्म देती थीं, तभी यह देश नर-रत्नों की खान हुआ करता था आज भी यह मार्ग सबके लिए खुला हुआ है, इसे अपनाकर हर कोई मनोवाँछित फल प्राप्त कर सकता है।
बच्चों के सुख-शान्तिमय एवं स्वस्थ जीवन के लिए गायत्री उपासना का संबल सदैव मंगलमय रहता है। जिनके बच्चे रोगी, कुबुद्धिग्रस्त, आलसी, चिड़चिड़े, अस्वस्थ रहते हों, उनकी माताएँ बच्चे को गोद में लेकर हंवाहिनी, गुलाबी पुष्पों से लदी हुई शंख-चक्र हाथ में लिए गायत्री का धन करें और मन ही मन गायत्री मंत्र का जप करें। माता के जप का प्रभाव गोदी में चढ़े बालक पर होता है ओर उसके शरीर तथा मस्तिष्क में आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ता है। छोटा बच्चा हो तो इस साधना के समय माता उसे दूध पिलाती रहे। बड़ा हो तो उसके सिर पर और शरीर पर हाथ फिराती रहे। बच्चों की शुभकामना के लिए गुरुवार का व्रत उपयोगी है। साधना से उठकर जल का अर्घ्य सूर्य को चढ़ा लेना चाहिए और थोड़ा-सा बचा हुआ जल बच्चे पर मार्जन की तरह गायत्री मंत्र बोलते हुए छिड़क देना चाहिए। इस प्रयोग से बच्चा दिन-प्रतिदिन स्वस्थ होता हुआ चला जाता है।
अपने ऊपर, अपने परिवार पर, परिजनों पर, प्रियजनों पर आई हुई किसी आपत्ति के निवारण के लिए अथवा किसी आवश्यक कार्य में आयी हुई किसी बड़ी रुकावट एवं कठिनाई को हटाने के लिए गायत्री साधना के समान दैवी सहायता के माध्यम कठिनाई से मिलेंगे। कोई विशेष कामना मन में हो और उसके पूर्ण होने में भारी बाधाएँ दिखाई पड़ रही हो, तो सच्चे हृदय से भगवती गायत्री को पुकारना चाहिए। माता जैसे अपनी प्रिय संतान की पुकार सुनकर दौड़ी आती है, वैसे ही गायत्री माता अपनी प्रिय पत्रियों-उपासिकाओं को अपनी अमित करुणा का प्रत्यक्ष परिचय देती और उनकी कष्ट कठिनाइयों को दूर करती है। आवश्यकता मात्र अपने भावभरे अन्तः करण से उन्हें पुकारने भर की है।
योगसाधना में आरुढ़ महाराज भर्तृहरि से किसी ने पूछा, “साधू-सन्त वन में विचरण करते हैं। उनके पास माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी- पुत्र आदि कोई भी परिवारीजन नहीं रहते। उन उनके पास रहने को मकान होता है, न सोने को शय्या और न ही खाने को भोजन। तब वे कैसे जंगल में रहते हैं? यज्ञ में हिंसक जानवरों के बीच में वे कैसे निर्भयता से आत्मसाधना करते हैं?
भर्तृहरि ने उत्तर दिया-
धैर्य यस्य पिता, दामा च जननी, शान्तिश्चिरं गेहिनी। सत्यं सूनुस्य, दया च भगिनी, भ्राता मनः संयमः॥ शय्या भूमितलं, दिशाऽपि वसनं, ज्ञानमृतं भोजनं। एते यस्यं कुटुम्बिनो वद सखे कस्माद् भयं योगिनः।
अर्थात्-वन में आत्मसाधना करने वाले जिस साधु-संत के पास धैर्य रूपी पिता, क्षमा रूपी माता, शान्ति रूपी गृहिणी, सत्य रूपी पुत्र, दया रूपी बहिन, संयम रूपी भाई रहता है। पृथ्वी जिसकी शय्या है, दिशाएँ जिसके वस्त्र हैं, ज्ञानामृत (स्वाध्याय) जिसका भोजन है। इतना विशाल परिवार जिसके पास सदा रहता है, ऐसे योगी को भला किससे भय होगा? वह तो निर्भरतापूर्वक सदा ही आत्मसाधना में रत रहता है। संसार के समस्त प्राणी उसके अपने स्वजन हैं।
सूर्य का प्रचण्ड रूप संध्या होते-होते शांत हो गया। आकाश में छाई लालिमा देख पक्षी उड़कर अपने-अपने घोंसलों में आ गए। अंधकार का साम्राज्य आगे बढ़ा, पर चन्द्रमा की किरणें उसे रोकने के लिए प्राण-पण से प्रयत्न करने लगीं। अवन्तिका के राजाधिराज और भगवान महाकलेश्वर के एकनिष्ठ भक्त अपनी प्रजा की यथार्थ स्थिति जानने के लिए सदा की भाँति आज भी वेश बदलकर नगर की परिक्रमा करने चल पड़े। यह उनका नित्य का नियम था। प्रजा को सुखी बनाना नागरिक जीवन को अपराध व भ्रष्टाचार से मुक्त करना वे अपना अनिवार्य कर्तव्य समझते थे। तभी वे रोज रात्रि के समय वेश परिवर्तित कर महलों से निकल पड़ते और नगर की हर गली, हर सड़क, हर चौराहे एवं बाजार में घूमते रहते।
आज घूमते-घूमते वे खेतों में पहुँच गए। चाँदनी रात थी। रस से भरे गन्नों की खेती देखकर उनका मन रस पीने के लिए उमंग उठा। उन्होंने खेत के रखवाले किसान से कहा-“अरे भाई! मैं। विदेशी हूँ चलते-चलते थक गया हूँ। प्यास से गला सूखा जा रहा है, थोड़ा-सा पानी पिला दो।
उनकी बात सुनकर किसान ने कहा-“परदेशी! लगता है तू उज्जयिनी राज्य में पहली बार आए हो। तुम अवन्ती नरेश महाराज वीर विक्रमादित्य के नगर की रीति-नीति, परम्पराओं एवं व्यवहार से परिचित नहीं हो। शायद इसीलिए ऐसा कह रहे हो। तुम्हें मालूम होना चाहिए कि यहाँ पानी माँगने वाले को दूध-दही पिलाया जाता है। खैर तुम तो आज हमारे अतिथि हो और यहाँ के हर निवासी को अतिथि देवो भवः” के संस्कार मिले हैं। अभ्यागत का स्वागत करना हमारा कर्तव्य है, धर्म हैं इसलिए मैं तुम्हें पानी के स्थान पर गन्ने का रस पिलाऊंगा। आइये, महाशय! “
किसान खेत से एक गन्ना तोड़कर ले आया और राजा से बोला-हाथों की अंजलि बनाकर मुँह पर लगाओ। मैं गन्ने के रस को निचोड़ता हूँ। उस एक गन्ने से इतना रस निकाला कि राजा पीते ही तृप्त हो गया। रात्रि-भ्रमण के उपराँत राजा पुनः अपने महलों में लौट आया ओर शय्या पर लेट गया। लेटे-लेटे विचार आया कि गन्ने की बहुत ज्यादा पैदावार है। लेकिन यह किसान मुझे बहुत कम कर देता है। मैं इसका कर बढ़ाऊँगा।
दूसरी रात भी राजा विक्रमादित्य वेश बदल कर निकला। भ्रमण करते हुए वह फिर से उसी गन्ने के खेत में जा पहुँचा। उसने पीने के लिए रस माँगा। कल की भाँति आज भी किसान एक गन्ना ले आया तथा रस निचोड़ा। पर आज अल्पमात्रा में ही रस निकला। राजा ने कहा-“ कोई दूसरा गन्ना लाओ इसमें तो दो चार घूँट ही रस है। किसान भाई! क्या बात है कल तो मैं एक गन्ने से ही तृप्त हो गया था। किसान ने कहा-“ आज तो सभी गन्नों में इतना ही रस निकलेगा। लगता है कि आज राजा की भावनाएँ बदल गयी हैं। राजा ने किसान की बात सुनी अवश्य, लेकिन प्रत्युत्तर में कुछ नहीं कहा। चुपचाप महलों में जाकर सो गया।
प्रातःकाल जब उसकी आँख खुली तब भी किसान का कथन उसके मनोमस्तिष्क में स्पन्दित हो रहा था वह सोच रहा था-भला यह कैसे सम्भव है? क्या भावनाएँ इतनी प्रभावी होती हैं। उसने अपने मन सारी बातें महामंत्री बेताल भट्ट को कह सुनायीं। महामंत्री बेताल भट्ट कुशल राजनीतिज्ञ ही नहीं, मनीषी, तत्वज्ञ और उच्चकोटि के साध भी थे उन्होंने कहा “ राजन! शुभाशुभ भावनाओं का असर स्वयं पर ही नहीं, अपितु दूसरों पर भी पड़ता है। जैसा हम दूसरों के विषय में चिन्तन करते हैं, वैसा ही वह हमारे बारे में सोचता हैं। यदि आप भावनाओं के प्रभाव को परखना चाहें तो आज हम दोनों वेश परिवर्तित करके वनभ्रमण करने चलें तथा शुभाशुभ भावों का प्रयोग करके देखें। “
महाराज वीर विक्रम एवं महामात्य बेताल भट्ट वेश परिवर्तित करके वन की ओर बढ़ गये। उसी समय कुछ लकड़हारे लकड़ियों छोटे-छोटे गट्ठर सिर पर रखे सामने से आ रहे थे। उन्हें देखकर राजा ने कहा-महामंत्री जी! इस ढंग से तो ये लकड़हारे पूरे वन का सफाया कर देंगे। आप इन्हें समझाइये, वरना मैं। इन सभी को बन्दीगृह में बन्द करवा दूंगा।
इतने में ही वे सभी लकड़हारे राजा के समीप पहुँच गए मंत्री ने कहा- “ लकड़हारे! क्या तुम्हें ज्ञात है कि आज महाराज विक्रमादित्य मृत्यु को प्राप्त हो गये हैं। वे बड़े नीतिवान ओर कर्तव्यपरायण राजा थे। उनकी मृत्यु से उज्जयिनी नगरी में शोक छा गया है। “
मंत्री का कथन सुनकर सभी लकड़हारों ने गट्ठा नीचे फेंक दिए और खुशी से नाचने लगे। मानो उन्हें कोई निधि हाथ लग गयी हो। महामंत्री बेताल भट्ट ने उनसे प्रसन्न होने के कारण पूछा। इस पर सभी लकड़हारे एक साथ बोल उठे-“ अहो! आज तो हमारे भाग्य ही चमक उठे हैं। आज हमारी लकड़ियाँ ऊँचे दामों में बिकेंगी। “
उनकी ऐसी नादानी भरी बातें सुनकर दोनों को क्रोध नहीं आया, अपितु वे दोनों आगे बढ़ गये। मार्ग ने मंत्री ने कहा-“ राजन! देख लिया न अशुभ भावों के परिणाम हाथों-हाथ आपने लकड़हारों के बारे में बुरा-सोचा, वे साथ सब भी आपकी मृत्यु की बात सुनकर नाच उठे। “
इतना कहते हुए वे दोनों अभी थोड़ा आगे बढ़ गये थे कि देखा एक वृद्धा ग्वालिन सिर पर दूध-दही का मटका रखे बड़ी मुश्किल से इधर आर रही थी। ग्वालिन को देखकर राजा ने कहा-“ मंत्री जी। यह ग्वालिन कितनी वृद्ध हो गयी है। कमर झुकी हुई, फिर भी लाठी के सहारे चलती हुई दूध-दही बेचकर अपना गुजारा करती है। कितनी दयनीय स्थिति है इसकी। आज से मैं सभी वृद्धा ग्वालिनों को राज्य की तरफ से कुछेक सुविधाओं समेत दुधारू गायें भेंट करूंगा। “ जब वृद्धा ग्वालिन उनके निकट पहुँची, मंत्री बेताल भट्ट बोला-माँ! आज बहुत बुरा हुआ है। राजा विक्रमादित्य की मृत्यु हो गयी है। “
मंत्री का इतना कहना था कि वृद्धा माँ ने ‘ नहीं कहते हुए जोर से सिर हिलाया फलतः मटी नीचे गिर गई, उसे इसका भी भान नहीं रहा। वह करुण विलाप कर कहने लगी-“ हे भगवान! यह क्या हुआ? इतनी बूढ़ी मैं बैठी हूँ और हमारे युवा उदार हृदय महाराज हमें छोड़कर चले गये। यदि मेरा बस चलता तो मैं उन्हें अपनी उम्र भी दे देती, उन्हें मरने नहीं देती।
राजा ने कहा -” माँ अब ऐसा करने से क्या होगा? जो होना था, वह हो चुका अब चलो हमारे साथ। कुछ समय बाद वे तीनों महल में पहुँचे राजा ने उस वृद्धा का बहुत सत्कार-सम्मान किया तथा भाव से विदा किया।
महाराजा वीर विक्रमादित्य शुभाशुभ भावों की परिणति देख चुके थे। उन्होंने समस्त प्रजा के प्रति अपने शुभ मनोभाव रखने को ठान ली। राज्य की तरफ से सबको सुख-सुविधाओं के साधन उपलब्ध करवाये गए। उनके मन-मस्तिष्क में यही शब्द तरंगें स्पन्दित हो रही थीं-यादृशी यस्य भावना, सिद्धिर्भवति तादृशी।”
मनुष्य ने अपनी बौद्धिक क्षमता तथा पारस्परिक सहयोग-सहकार की प्रवृत्ति के कारण भौतिक जगत की अनेकानेक सफलताएँ अर्जित कर दिखायी हैं, जिनके फलस्वरूप आज उसे प्रकृति सम्पदा का स्वत्वधिकारी माना जाता है। इतने पर भी यहीं समझ लेना चाहिए कि ज्ञान पर उसका पूर्ण अधिकार है। यदि तुच्छ समझे जाने वाले दूसरे प्राणियों को भी अवसर और साधन मिलें तो वे भी प्रगतिशील जीवन जी सकते हैं और क्रमशः आगे पहुँच सकते हैं।
यों बौद्धिक क्षमताएँ मनुष्य में है तो सही पर उनका विकास तभी होता है जब दूसरों की सहायता मिले। पढ़ाये, प्रशिक्षित किये बिना कोई बच्चा क्रिया-कुशल नहीं हो सकता। यदि उचित सहयोग-संपर्क न मिले तो जन्मजात बुद्धिमता रहने पर भी मनुष्य अविकसित परिस्थितियों में पड़ा रह सकता है, अथवा कुसंग में कुमार्गगामी हो सकता है। इस दृष्टि से भी मनुष्येत्तर प्राणी कहीं आगे हैं। उन्हें प्रकृति ने ऐसी सूझ-बूझ दी है बिना किसी शिक्षा-दीक्षा के भी इतना सुन्दर-सुव्यवस्थित जीवन-यापन करते हैं कि उनकी सुरुचि, अनुशासन शीलता, साहसिकता, बुद्धिमत्ता और अतीन्द्रिय सामर्थ्य पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।
पशुओं को गया-गुजरा भले ही मान लें, किन्तु उनके गुणों का लोहा तो हमें मानना ही पड़ेगा। ‘स्वामिभक्त ‘ शब्द सुनते ही कुत्ता अपने पालनकर्ता के फेंके हुए चन्द टुकड़ों पर जिन्दगी बसर कर रहा हो, वह समय आने पर सोता रहे या पूँछ लटकाकर एक ओर तटस्थ खड़ा हो जाए? इस तरह का कार्य उसे विश्वासघात व कृतघ्नतापूर्ण ही लगता है। आड़े वक्त पर वह अपने प्राणों का मोह छोड़कर अपनी जान पर भी खेल जाता है।
प्राणशास्त्रियों के अनुसार, कुत्ता अपनी श्रेणी के दूसरे जानवरों की तुलना में अधिक बुद्धिमान होता है। मनुष्य की तुलना में इसकी श्रवणन्द्रियाँ व घ्राणेन्द्रियाँ अधिक सक्षम और तीव्र होती हैं। मनुष्य जितनी दूरी तक देख नहीं सकता, उससे कई गुना अधिक दूरी की चीजों को कुत्ता अपनी घ्राण-शक्ति के सहारे बता सकने में सक्षम होता है। श्रवण-शक्ति भी उसकी कम नहीं है। परीक्षणों के उपराँत वैज्ञानिकों ने पाया है कि दूर की आवाज को कुत्ता जितनी अच्छी तरह सुन-समझ सकता है, औसत स्तर का व्यक्ति उस भिन्नता का अनुभव कदापि नहीं कर सकता। कुत्ते की बुद्धिमत्ता तो देखते ही बनती है। संकट के समय वह अपनी पूँछ को दोनों पैरों के बीच लगाकर मालिक को भयभीत स्थिति से अवगत कराता है। वह स्वामी के आदेशों को सुनने-समझने और तदनुरूप क्रिया-कलाप करने में बड़ी तत्परता का परिचय देता है।
अपनी सूझ-बूझ एवं वफादारी के कारण ही कुत्ता मनुष्य के साथ मैत्री भाव स्थापित कर सका है। महाभारत की एक कथा है, जिसमें कहा गया है कि स्वर्गारोहण से पूर्व जब पाण्डव देवात्मा हिमालय की यात्रा पर गये तो उनका कुत्ता भी साथ था। छत्रपति शिवाजी ने स्वामिभक्ति से प्रभावित होकर कुत्ते की स्मृति में एक बहुत बड़ा स्मारक बनवाया था। प्रख्यात गायक उस्ताद अब्दुल करीम,खाँ का टीपू नाम का कुत्ता शास्त्रीय संगीत अच्छी तरह गा सकता था। वस्तुतः आदिकाल से ही कुत्ता मनुष्य का साथी-सहयोगी बनकर रहा है। ट्रोजन युद्ध के पश्चात जब यूलीसेस घर लौटा तो केवल उसके वफादार कुत्ते ने ही उसे सर्वप्रथम पहचाना। ईसाई धर्मग्रन्थ बाइबिल में कुत्तों के तेरह कथानक मिलते हैं। उनमें सबसे महत्वपूर्ण एक जीवित कुत्ता मृतक शेर से कहीं अच्छा होनक का है। डौग इन द मैंजर की उक्ति इस तथ्य की पुष्टि करती है कि जो स्वयं किसी वस्तु का उपयोग नहीं करेगा, वही दूसरों को खिला सकने में समर्थ होगा। कहने का तात्पर्य यह है कि कुत्ते में परमार्थपरायणता एवं सदाशयता की भावना, कूट-कूटकर भरी रहती है। बारहवीं शताब्दी में फ्राँस के प्रसिद्ध संत बर्नार्ड स्विट्जरलैंड पहाड़ों की दुर्गम चोटी पर आश्रम बनाकर रह रहे थे। उनके यहाँ कुत्ते भी रहते थे। एक बार बड़ी संख्या में तीर्थयात्री पहाड़ों की बरफ में धँसने लगे, तो कुत्तों नहीं उन्हें बड़ी बुद्धिमानीपूर्ण ढंग से निकाला और और नवजीवन प्रदान किया। उनमें से बैरी नाम के कुत्ते का आज भी स्मरण किया जाता है, जिसने चालीस लोगों की जाने बचायी थी।
सन् 1944 में जर्मन खगोलज्ञ फैड्रिक बि हेल्म बेसेल ने साइरस नाम एक तारे की खोज की, जिसे डॉग स्टार के नाम से भी जाना जाता है। रात्रि में इसका प्रकाश अन्य तारागणों की अपेक्षा कही अधिक होता है। डॉग डेज अर्थात् कुत्ता दिवस मनाने का प्रचलन तभी से चला आ रहा है। कुत्ते की वफादारी एवं स्वामिभक्ति की कहानियाँ प्राचीनकाल से ही चली आ रही हैं। वर्तमान में भी ऐसे अनेकों उदाहरण देखने को मिल जाते हैं, जो उक्त तथ्य की पुष्टि करते हैं, सिडनी की एक घटना बड़ी ही विलक्षण है। वहाँ शेप नामक एक कुत्ता प्रतिदिन प्रातःकाल 6 बजे अपने मालिक के साथ रेलवे स्टेशन जाया करता था। दुर्भाग्यवश मालिक की मृत्यु हो गयी। कुत्ते का स्टेशन जाने का क्रम पूर्ववत बना रहा। 6 वर्ष बाद कुत्ता भी मृत्यु की गोद में चला गया। यद्यपि शेप अब नहीं है, फिर भी उसकी स्वामिभक्ति प्रशंसनीय एवं चिरस्मरणीय बनी हुई है।
एडमिरल पियरे और कैप्टेन स्काँट की दक्षिणी और उत्तरी ध्रुवों की सफल खोजयात्रा का श्रेय उनके अपने वफादार कुत्तों को ही दिया जाता है। अंतरिक्ष की खोज के लिए स्पूतनिक -’ 2 राकेट में लाइका नामक कुतिया को भेजा गया था। ध्रुवीय प्रांतों एवं बेल्जियम में तो कुत्तों से गाड़ी खींचने तक का काम लिया जाता है। जिस काम को घोड़े कर सकते है, उसके कुत्ता आसानी से निपटा लेते हैं। तीस से आठ पौण्ड तक का वजन दो ढो सकने में वे पूरी तरह सक्षम होते है। जर्मनी कुत्ते तो पुलिस के सदृश ही अपराधियों को पकड़ने में सहायक सिद्ध हो रहें है। अपराधी को उतना भय बन्दूकधारी सिपाही से नहीं होता, जितना कि कुत्ते से। पुलिस विभाग में आज सर्वत्र डॉग स्क्वैड नामक अलग विभाग बना हुआ है, जहाँ कुत्तों से अपराधियों को पकड़ने से लेकर विस्फोटक सामग्री खोज निकालने तक का काम लिया जाता है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अमेरिकी सेना ने च्के-9 कोर्प्सज् नामक एक यूनिट गठित करके कुत्तों की विभिन्न प्रकार की सेवा-सहायता का लाभ उठाया था। गश्त लगाते समय कुत्ते एक सैनिक का संदेश दूसरे सैनिक को पहुंचाते रहे, जिससे दुश्मन के ठिकानों का पता लग सकें। चिकित्सा सुविधाएँ प्रदान करने में भी उनका सहयोग बड़ा सराहनीय रहा है। घायल सैनिकों को दवा-दारु देने की जिम्मेदारी कुत्तों ने सँभाली थी। जर्मनी में च्रोट बैलरज् नामक कुत्ते की एक ऐसी प्रजाति है, जो गड़रिये का उत्तरदायित्व सँभालते हैं। वे भेड़ों को जंगल में चराकर लाते और उनकी सुरक्षा का भार अपने कंधों पर उठाते हैं। अपने देश के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों विशेषकर हिमालय क्षेत्र में इसी तरह गड़रिये कुत्तों के भरोसे अपनी भेड़ों को छोड़कर निश्चिन्त रहते हैं। भेड़ों की सुरक्षा का सारा भार उन्हीं पर होता है अलास्का और उत्तरी कनाडा में शीत ऋतु में हवाई-यात्रा के दौरान कुत्तों का सहयोग अपेक्षित माना जाता है।
घरेलू काम-काज में भी कुत्ते पूरी तरह हाथ बँटाते देखे जाते है। वे घरों में चूहे तथा जहरीले जीव-जन्तुओं के पैर नहीं टिकने देते। मालिक की जान-माल की रक्षा में उनकी भूमिका बहुत ही सराहनीय रही है। अग्निकांड होते ही पालतू कुत्ते तुरन्त घूमने या गुर्राने लगते हैं। अंधे लोगों को रास्ता बताने तथा उन्हें गन्तव्य स्थान तक पहुँचा सकने में कुत्ते भी सहयोग देने लगे हैं। जर्मनी में तो अंधे लोगों के व्यवसाय का एकमात्र सहारा वहाँ के च्डोबरमैन पिसर्सज् ही हैं। महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आविष्कारों में भी उनकी भूमिका कम नहीं रही है। फ्रैड्र्कि जी. बैन्टिंग और चार्ल्स हरबर्ट बैस्ट नामक विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिक, जिनने इन्सुलिन की खोज की है, उनने अपने प्रयोग का आधार कुत्ते को ही चुना, क्योंकि कुत्ते की शारीरिक संरचना मनुष्य से काफी मेल खाती है। रूस के सुविख्यात मनोविज्ञानी इबान पैन लाव ने च्कन्डीशन्ड रिफ्लैक्सज् के सिद्धान्त का प्रतिपादन कुत्ते की टपकती लार को देखकर ही किया है। ये मात्र कुछ उदाहरण हैं, जिनके प्रेरणा-स्रोत के रूप में कुत्तों को स्मरण किया जाता है।
कुत्ते ने यह स्थिति अकस्मात ही नहीं प्राप्त कर ली। मुद्दतों से वह मनुष्य का सच्चा साथी बनकर रहता चला आया है। कुछ वह अपनी आकाँक्षा के आधार पर अर्थात् अपने पालनकर्ता का अनुग्रह पाने के लिए स्वयं ढला है। न्यू फाउंडलैंड के कुत्तों की तैरने की क्षमता बड़ी विचित्र हैं। उन्हें इस स्तर का प्रशिक्षण दिया जाता है, जिससे वे पानी में डूबते हुए व्यक्ति को बचा सकें। अमेरिका केनेल क्लब की स्थापना का मूलभूत उद्देश्य कुत्तों की विशिष्टताओं को उभारने और मानवी हित में नियोजित करने, उन्हें अधिक उपयोगी और समुन्नत बनाने का प्रयत्न जहाँ भी किया गया है, वहाँ आशाजनक सफलता मिली है।
पशु-पक्षियों का मानसिक और बौद्धिक विकास भले ही मनुष्यों की तुलना में कम हुआ है, फिर भी उनमें प्रेम, सहानुभूति, कृतज्ञता, स्वामिभक्ति आदि गुण तो पाये ही जाते हैं। इससे स्पष्ट है कि भगवान ने हर प्राणी को उसकी स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप ऐसे गुण व साधन दिये हैं, जिसमें किसी के साथ पक्षपात या अन्याय हुआ न कहा जा सके। मनुष्य को भी उनके साथ उदारतावादी दृष्टिकोण तथा स्नेह-सहयोग की प्रवृत्तियों को अपनाना चाहिए। कृतज्ञता का यह गुण यदि मनुष्य इन नगण्य से प्राणियों से ग्रहण करने लगे और एक-दूसरे के उपकार, उनकी सेवाओं के प्रति थोड़ा-सा भी श्रद्धा और सम्मान का भाव रखें, तो उसके सभी साँसारिक विग्रह देखते-देखते दूर हो जाएँ। जीवन को सुखी–समुन्नत इसी आधार पर बनाया जा सकता है।
उड़ीसा के दीवान कृष्णचन्द्र सिंह बड़े आलसी थे। उनके जीवन का लक्ष्य मात्र इन्द्रिय-सुख में लिप्त रहना था। एक बार उनकी पत्नी ने कहा भी- “आप अपना सारा पुण्य इस जन्म में ही समाप्त कर देंगे या अगले जन्म के लिए भी कुछ एकत्रित करेंगे।”
पत्नी की बात को कृष्णचन्द्र सिंह ऐसे ही हँसकर टाल दिया करते थे। परन्तु एक घटना ने उनके मर्म पर गहरी चोट की। एक बार जब वह जेगल के रास्ते से गुजर रहे थे। रास्ते में किसी गरीब की कुटिया थी। लड़की चारपाई पर पड़े हुए अपने रोगी पिता से कह रही थी-”बाबूजी, रात घिर आयी, आपने अभी तक दीपक नहीं जलाया?”
वृद्ध ने उत्तर दिया- “बेटी! जीवन की रात्रि भी निकट है। यदि मैंने सत्कर्मों की दीपक जलाया होता, समय रहते अपने जीवन का सदुपयोग किया होता, तो आज मेरी यह स्थिति न होती। मैंने तो अपने जीवन को भोग-विलास में व्यर्थ गँवा दिया है।”
कृष्णचन्द्र ने वृद्ध में अपने भविष्य का प्रतिबिम्ब पाया। इस घटना ने उनके समूचे जीवन को ही बदल दिया। उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति दीन-दुखियों और असहायों को दान दी और स्वयं तपोवन में जाकर तपस्या करने लगे।
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो! यहाँ इस शिविर में आपको गायत्री साधना करने के लिये बुलाया गया है। इस समय आपको घूमने-फिरने के लिया नहीं, शुद्ध रूप से साधना करने के लिए हमने आपको निमंत्रण दिया था। साधना करने के उद्देश्य से जो आयें है, उनको ठहरना चाहिए। घूमने-फिरने के लिए हरिद्वार आना बहुत व्यर्थ ही रहता है। शुद्ध रूप से इच्छा होनी चाहिए। साधना किसकी, गायत्री की। गायत्री की साधना के सम्बन्ध में आपको क्यों बुलाना पड़ा? इससे पहले भी हम आपको कई बार साधना की करा चुके हैं, आपको बता चुके हैं, फिर क्या जरूरत पड़ गई इस साधना को सिखाने की-इस साधना को बताने की। मित्रो! बहुत समय से हम आपको गायत्री उपासना का कर्मकाण्ड एवं क्रिया-कलाप समझाते रहे हैं कि पावन गायत्री मंत्र क्या होता है ओर गायत्री उपासना कैसे की जा सकती है? कर्मकाण्ड तो कलेवर मात्र है। यह उपासना का शरीर मात्र है, जिसे अभी हमने आपको बताया।
शरीर किसे कहते हैं? शरीर उसे कहते हैं जो दिखायी पड़ता है, जो देखा जा सकता है, जो अनुभव में लाया जा सकता है। हमारा शरीर आपके सामने बैठा हुआ है, कैसा है? उसमें उँगलियाँ हैं, हाथ हैं, नाक है, कान हैं, दाँत हैं, बाल हैं। इसे हम देखते हैं। छू भी सकते हैं इस शरीर को, लेकिन इसके भीतर एक ऐसी विशेषता छिपी हुई है, जिसे आप देख भी नहीं सकते और सुन भी नहीं सकते। केवल अपने गहन अनुभव के द्वारा ही इसको जाना जा सकता है। आपका प्राण कैसा है- बताइये। साहब, प्राण दिखायी तो नहीं पड़ता, कितना शक्तिशाली हैं मालूम नहीं पड़ता। कितना ज्ञानवान हैं- मालूम नहीं पड़ता, कितना चरित्रवान है- मालूम नहीं पड़ता। आँखों से मालूम नहीं पड़ सकता, दिखायी नहीं पड़ सकता। केवल विचारणा के द्वारा आप यह जान सकते हैं कि आपके शरीर में कोई प्राण होगा। फिर आप उससे भी गहराई में जानना चाहें तो यह जान सकते हैं कि आचार्य जी का प्राण कितना शक्तिशाली होगा कितना सामर्थ्यवान, कितना महत्वपूर्ण होगा, कितना विकसित होगा। आप ज्यादा खोजबीन करेंगे तो ही आपको यह मालूम पड़ेगा। ज्यादा खोजबीन नहीं करेंगे तो आपको केवल हमारा शरीर दिखाई पड़ेगा। आप यहां हमारा दर्शन करने के लिए आये हैं, अच्छा साहब क्या देख करके आयें? हमारा शरीर देखकर आये। तो क्या फायदा हुआ-इससे कुछ भी फायदा नहीं हुआ। बूढ़ा आदमी था, बैठा हुआ था, चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ीं हुई थी, सफेद बाल वाला था। हमने देखा तो माला पहना दी। क्या फायदा कर लाया? कोई फायदा नहीं हुआ।
दर्शन का मर्म समझें
वस्तुतः दर्शन करने, सुनने की चीज नहीं। असल में जो फायदा उठाना चाहते हैं वह किससे मिल सकता हैं? जीवात्मा के आशीर्वाद से। शरीर का कोई आशीर्वाद नहीं है। हमारा आशीर्वाद हमारी भावनाओं में जुड़ा हैं-हमारे स्नेह में जुड़ा हुआ है, हमारे सिद्धान्तों में जुड़ा हुआ है, हमारे में मन में जुड़ा हुआ हैं। अगर स्नेह के साथ तुम्हें कोई आशीर्वाद दे या परामर्श दे दे तो उसका कोई असर शरीर पर पड़ेगा क्या? शरीर पर कोई असर नहीं पड़ सकता। गायत्री उपासना-गायत्री साधना के क्रियापरक कर्मकाण्ड की तुलना शरीर के कलेवर से की जा सकती है। शरीर और चेतना दो भिन्न चीजें हैं। इससे शरीर का लाभ है क्या? शरीर का भी लाभ है। हम क्या सेवा कर सकते हैं, हाथ से? हम आपके लिए पानी पिला सकते है, हजामत बना सकते हैं और क्या कर सकते हैं? पैर दाब सकते हैं, हाथ-पाँव से यही सेवा कर सकते हैं, लेकिन हम अपने ज्ञान के द्वारा आपका कायाकल्प कर सकते हैं और अपनी ज्ञान की भावनाओं के द्वारा कोई आशीर्वाद देना चाहें तो आपके जीवन का विकास कर सकते हैं। शरीर की अपेक्षा प्राण बहुत बलवान है। शरीर हमारा वैसे भी कमजोर है, छोटा है। लेकिन प्राण की शक्ति असीमित है। इसी तरह गायत्री उपासना का कर्मकाण्ड परक क्रियाकृत्य भी है। आप लोगों ने बहुत समय से सीखा है ओर जाना है। एक खस बात मैं समझता हूँ कि इतना लाभ तो जरूर हुआ होगा कि मन की एकाग्रता हुई होगी। गायत्री उपासना आप बहुत दिनों से करते रहे हैं फिर क्या लाभ हुआ होगा? अपनी दिशाएँ अस्वस्थ हो तो प्रगति रुक गी होगी उससे। और क्या लाभ हुआ होगा- और कोई खास लाभ तो नहीं हुआ होगा, क्योंकि आपकी उपासना क्रिया-कलाप तक सीमित थी, कलेवर तक सीमित थी। यह भजन था उसका, कलेवर था, शरीर था जो कि बहुत दिनों से आपको हम सिखाते हुए चले आ रहे थे। उसमें क्रियाएँ करनी होती थीं। किससे? शरीर से अब तक अपने कलेवर सीखा होगा। उसमें क्रियाएँ करनी पड़ती थीं।
क्रियाएँ क्या करनी पड़ती थीं? कैसी क्रियाएँ करनी पड़ती थीं? शरीर से करनी पड़ती थीं, जैसे माला घुमानी पड़ती थीं, किससे घुमानी पड़ती थी? हाथ से-अँगुलियों से घुमानी पड़ती थी। किसकी माला? लकड़ी की। लकड़ी की माला चमड़े की अँगुलियों से घुमानी पड़ती थी। हेराफेरी उपासना की जिसको हम भजन कहते हैं, कलेवर कहते हैं। अब तक जो आप उपासना करते रहे हैं, जिसको मुख से उच्चारण करना पड़ता था, जीभ से उच्चारण करना पड़ता था, वह किस चीज की बनी है? चमड़े की। चमड़े की जीभ क्या बोलती थी? गायत्री मंत्र बोलती थी, ॐ नमः शिवाय बोलती थी, राम-राम बोलती थी। अभी तक जो उपासना धूपबत्ती के माध्यम से, चन्दन के माध्यम से, अगरबत्ती के माध्यम से, चावल के माध्यम से आप पूजा-उपासना जो करते रहे हैं, सब भजन था। उस भजन-उपासना का लाभ उतना ही बन सकता है, जितना कि हमारे शरीर और हमारे कान के बीच अन्तर है, वही अन्तर भजन और उपासना में है।
चलें उच्चस्तरीय शिक्षण की ओर
अब इस समय हम यह मान लेते हैं कि आपको पौराणिक कबूतर वाली कहानी की कोई जरूरत नहीं रहीं। अब आपको सुन्दरता का प्रोनउन्येशन बताना चाहिए, उच्चारण बताना चाहिए। अब आपको बालकों की गोलियों की विशेष आवश्यकता नहीं रहीं। अब किन्डर गार्टन के माध्यम से आपको अक्षरों का लिखना बताया जाएगा। हम समझते हैं कि आप रोज तो क्या, जिन्दगी भर किन्डर गार्टन के द्वारा अक्षर सीखते हरे। अब हमें आपको अक्षर सिखाना चाहिए, आपको लिखना सिखाना चाहिए, अब हमें आपको बोलना सीखना चाहिए। अब हमें आपको उच्चस्तरीय शिक्षा देनी चाहिए। दूसरी बातें बतानी चाहिए, ताकि उसका वास्तविक लाभ उठा सकें, अब आपको वास्तविक लाभ उठाने के लिए हमने इस शिविर में बुलाया है। वह उपासना जो आदमी को समर्थ बना सकती है, वह उपासना जो आदमी को शक्तिवान बना सकती है, वह उपासना जो आदमी को सिद्धपुरुष बना सकती है, वह उपासना जो इस भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवनों में आदमी को उठाकर कहीं से कहीं ले जा सकती हैं। उसका मूल उसका प्राण हम आपको सिखाएँ, यही उद्देश्य है इस शिविर का। यह गायत्री का प्राण, साधना का प्राण है। चलिए हमारे साथ-साथ गहराई में डुबकी लगाइए, ताकि आपको गायत्री की बाबत अब तक जो जानकारी है, उसकी अपेक्षा अधिक जानकारी मिलें।
साधना का अर्थ कर्मकाण्ड मात्र पूरा कर लेना नहीं है और न ही गायत्री कोई देवी है। नहीं साहब, वह देवी होती है जो हंस पर सवारी करती है जो फर्र से इस पेड़ पर उस पेड़ पर चली जाती है। आप जानते हैं गायत्री कहाँ रहती है? हाँ! महाराज जी अपने समझाकर तो भेजा है। एक हाथ में पानी का कमण्डलु लेते हैं। बेटे, हाथ में पानी का थरमस लेकर चलती है। पानी का गिलास छोड़ जाएगी तो कैसे काम चलेगा। एक हाथ में किताब लेती है। कौन-सी किताब लेकर चलती है? अखण्ड-ज्योति की किताब लेती है, दूसरी किताब नहीं लेती है। नावेल पढ़ने के लिए नहीं है। रास्ते में किताब नहीं पढ़ती तो बेचारी को कैसे याद होगा- और सवारी? कौन-सी सवारी करती है। रिक्शा, साइकिल की जरूरत नहीं है, मोटर की जरूरत नहीं है। गायत्री जाती हैं तो हंस पर सवार होकर जाती हैं। मोटर-पैट्रोल खर्च करा लेती है, बहुत सारा खर्चा करा लेती है। गायत्री माता ने मोटर दूसरी तरह की खोज ली है। वह हवाई जहाज का भी काम कर सकती है और जमीन पर भी चल सकती है। किसकी सवारी है? वह हंस की है, वह सिर्फ हंस पर सवारी करती है। पैट्रोल भी नहीं खाता है। ड्राइवर भी नहीं हैं। लगाम भी नहीं है। गायत्री माता कह देती है भाई चल हरिद्वार की तरफ, तो चल देता है। गायत्री बड़ी विचित्र है, छोटी-सी गायत्री है, ऐसी गायत्री है जैसे तुम बच्चों की होनी चाहिए। रानी गायत्री की पूजा और भजन कैसा है? वैसा ही जैसा कि बाराती गाते हैं फूल चढ़ा देते हैं, चावल चढ़ा देते हैं, अक्षत चढ़ा देते हैं। गायत्री मंत्र बोल लेते हैं। यह क्यों है? बेटे! बालकों की गायत्री है, बालकों की साधना है। अब हम आपको जवानों की, फिलॉसफरों की, दार्शनिकों की विचारशीलों की गायत्री समझाना चाहेंगे अब आपको साहसियों की विचारशीलों के, तपस्वियों की साधना सिखाना चाहूँगा। मैं समझता हूँ कि अब आप बच्चे नहीं रहे, वरन् जवान हो गए हैं, इसलिए जवानों से जवानों की सी बात कहनी चाहिए। बच्चों को बच्चों की सी बात कहनी चाहिए। जवानों को गायत्री की शिक्षा क्या है? भाइयों! मैं क्या कह सकता हूँ आपसे, गायत्री की कितनी शिक्षाएँ हैं। आज मैं पहले यही बताना चाहूँगा आपको कि गायत्री की शिक्षाएँ और प्रेरणाएँ क्या है। फिर गायत्री उपासना और साधना के रहस्य समझाऊँगा। यह सारे के सारे रहस्य इस शिविर में बताते हुए चला जाऊंगा, जिसके लिए मैंने आपको बुलाया है।
गायत्री का पौराणिक पक्ष क्या है
अब मैं आपको चलिए यह समझाने की कोशिश करता हूँ कि गायत्री क्या है? तीन पौराणिक कथाएँ हमारे सामने हैं। इनके माध्यम से हम आपको यह आसानी से समझा सकते हैं कि गायत्री माता क्या हो सकती है पौराणिक कबूतर, पौराणिक खरगोश के माध्यम से हम आपको बताएँगे कि गायत्री माता क्या है? एक पौराणिक कथा आती है राजा विश्वामित्र की। वे गुरु वशिष्ठ के आश्रम में गये, गुरु वशिष्ठ का आश्रम जंगल में था। छोटी-सी जरा-सी झोंपड़ी थी। अकेले में रहते थे, बिना किसी समान के। कमण्डलु में खाना खा लेते थे और अपने वस्त्रों को बिछाकर गुजारा कर लेते थे। बड़े संतोषी ब्राह्मण थे। गुरु वशिष्ठ के आश्रम में सम्पन्न राजा विश्वामित्र गए। वे जंगल में किसी काम से सेना समेत गये थे। उन्होंने आवश्यक समझा कि गुरु वशिष्ठ के पास चलें और प्रणाम कर आयें। राजा विश्वामित्र प्रणाम करने गए। गुरु वशिष्ठ ने पूछा- दुपहरी में आप लोग यहाँ कैसे आयें? महाराज जी! हम लोग रास्ता भूल गये हैं और सेना के साथ यहाँ पर आ पहुँचे। आप लोगों ने खाना भी नहीं खाया होगा। कहाँ पर खाना खाते, महाराज जी! यहाँ पर पात्र भी नहीं है, भोजन का सामान भी नहीं है। भोजन का समान पीछे रह गया है यहाँ पर भटक गए हैं, पानी मिल जाए वही बहुत है। वशिष्ठ ने कहा- हमारे यहाँ दरवाजे पर आप आए हैं, अतः आप हमारे अतिथि हुए, इसलिए अतिथि का सत्कार करना, स्वागत करना हमारा कर्त्तव्य है। आप भूखे भी हैं और प्यासे भी हैं। हम चाहते हैं कि आपके भोजन का प्रबन्ध करें। अरे, महाराज ही अकेले से क्या फायदा, इतनी बड़ी सेना भी साथ है, इसके भोजन का आप प्रबन्ध जब तक नहीं करेंगे तब तक बात कैसे बनेगी? अच्छा तो चलिए अभी हम करते है। उनके पास एक नन्दिनी नाम की गाय थी। कामधेनु की बेटी नन्दिनी। उन्होंने कहा-नन्दिनी हजारों की संख्या में आए हुए हैं मेहमान। उनके भोजन का प्रबन्ध होना चाहिए। नन्दिनी ने सिर हिला दिया, ठीक है अभी होता है। राजा से कहा गया कि आइए आप सबको भोजन करा ले जाइए। सब लोग बैठ गए।
पौराणिक खण्ड की यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई। मित्रों, कहानी में एक और बात शामिल होती है। जब सब लोगों ने भोजन कर लिया तब विश्वामित्र ने पूछा-महाराज जी ये सब आपने कहाँ से पाया? सामान तो था नहीं, आपके पास, इतना दही, भोग, इनता चमत्कार, इतनी सिद्धि, इतना धन इतनी विशेषताएँ कहाँ से पा लीं। उन्होंने इशारा किया नन्दिनी की ओर। ये नन्दिनी है। नन्दिनी के पास सब कुछ है। यह कामधेनु है। इसकी छाया में बैठकर हर चीज प्राप्त हो जाती है सभी कामनाओं को पूरा करती है, इसलिए इसके कामधेनु कहा गया है। विश्वामित्र ने कामधेनु को छीनना, हड़पना चाहा और बोले-यदि कामधेनु हमें मिल जाए, तो कितना अच्छा हो। गुरु वशिष्ठ बहुत नाराज होते हैं, पौराणिक कथा के मुताबिक। उन्होंने कहा-हमारी गाय को आप नहीं ले जा सकते। राजा विश्वामित्र ने कहा-हम आपकी गाय को अवश्य ले जायेंगे। अच्छा तो आप लेकर दिखाइये। विश्वामित्र गाय को जबरदस्ती लेने के लिए चले। तो गुरु वशिष्ठ ने नन्दिनी को आज्ञा दी-इन सबकी अक्ल ठिकाने कर दो। नन्दिनी ने अपनी सींगों से मार-मारकर सारी सेना को परास्त कर दिया। सेना भग खड़ी हुई और राजा भी भाग खड़ा हुआ। विश्वामित्र ने इस धारणा पर विचार किया कि क्या गाय इतना धन और वैभव इकट्ठा कर सकती है? एक गाय इतना युद्ध कर सकती है? यह गाय बड़ी जबरदस्त है। इस गाय को प्राप्त करने के लिए हमको प्रयत्न करना चाहिए। गुरु वशिष्ठ ने जिस तरह प्रयत्न किया तो, बस उसी तरह विश्वामित्र अपना राजपाट घर वालों को दे करके जंगल में आ गए और उसी नन्दिनी की कृपा पाने के लिए प्रयत्न करने लगे। विश्वामित्र ने कहा-’धिक बलम् छत्रिय बलम् बह्मम तेजो बलम् बलम्’। भौतिक बल, साँसारिक बल जिसमें धन भी आता है, रूप भी आता है, बुद्धि बल भी आता है, ये सारे के सारे है, जिनको हम भौतिक बल कहते हैं। धिक अर्थात् छोटे हैं- नगण्य-नाचीज हैं। ब्रह्म तेजो बलम् बलम् अगर कोई श्रेष्ठ बल है, तो वह है ब्रह्म बल, आत्मा का बल। इसे ही प्राप्त करना चाहिए।
सब गाथा खत्म हो गयी। पौराणिक कहानी खत्म हो गई। क्या अर्थ निकला? प्रायः पौराणिक कहानियों को लो इतिहास मान लेते है। गलती तो गलती है, मैं क्या कह सकता हूँ। वास्तव में यह अलंकार हैं। अलंकार की दृष्टि से ऋषियों ने बड़े महत्वपूर्ण विषयों को समझाने की कोशिश की हैं। सारे आर्ष ग्रंथों, अठारह पुराणों के मैंने भाष्य किए है। पुराणों को लोग इतिहास मान बैठते हैं और फिर यह कहते हैं कि पुराणों में गप्पें लिखी हैं। लेकिन बेटे पंचतन्त्र की किताबों में भी गप्पें लिख रही हैं, जैसे कौवे से लोमड़ी ने कहा-अरे भाई साहब! गाना गा दीजिए अच्छा तो मैं गाना गाता हूँ, रोटी का टुकड़ा मुँह में से गिरा और लोमड़ी लेकर के भाग गई। क्यों साहब, लोमड़ी की बातचीत कौवा सुन सकता है? नहीं! तो क्या कौवे की बातचीत लोमड़ी समझ सकती है? नहीं बेटे! ये झूठ नहीं है। बालकों को आकर्षक ढंग से पहेली के ढंग से, प्रिय बुजुर्गों के ढंग से उनको महत्वपूर्ण बात समझा देती है तो क्या हर्ज है। उसमें मनोरंजन भी रहता है, आकर्षण भी रहता है। इसी तरह का शिक्षण है पुराणों में। कोई क्या समझे-पुराणों में विचित्र कहानियाँ हैं। कहानियों के माध्यम से लोगों को शिक्षण देने की कोशिश की है। बताने की कोशिश की है, बड़े महत्वपूर्ण विषयों को, जो साधारणतः समझ में नहीं आती हैं, कठिन विषयों, जटिल विषयों, फिलॉसफी को समझाने के लिए कथानकों का माध्यम लिया गया है। यह कथा जो मैं अभी-अभी आपको सुना चुका हूँ इसका क्या अर्थ होता है। आत्मबल, आत्मशक्ति संसार की सबसे बड़ी शक्ति है। इसे प्राप्त करने के लिए गायत्री का, ऋतंभरा-प्रज्ञा का अवलम्बन लेना होता है
गायत्री है ऋतम्भरा प्रज्ञा-
गायत्री का ही दूसरा नाम ऋतम्भरा-प्रज्ञा है। ऋतम्भरा-प्रज्ञा, इसका नाम गायत्री है। कितनी शिक्षाएँ इसमें हैं? नन्दिनी की तरह यह भी काम कर सकती है। एक काम यह कर सकती है- जो पाप, ताप, शोक और संताप, कष्ट और अभाव जो हमारे जीवन में हैं, उन्हें यह उसी तरह सींगों से मारकर भगा सकती है जैसे कि विश्वामित्र और उनकी सेना को जो गुरु वशिष्ठ को हैरान करने और नन्दिनी को हैरान करने के लिए आए थे, तो नन्दिनी ने उसको मार गिराया और सफाया कर दिया था। इसी तरीके से अपने जीवन की मौलिक कठिनाइयाँ और बाधाएँ जो हमको रास्ते पर चलने में रुकावट डालती है, उन सारी-की सारी कठिनाइयों को हमारी भ्रामक मनः स्थितियों को भ्रामक यश-लिप्सा को ऋतंभरा-प्रज्ञा मार कर भगा सकती है। इस कहानी का यही अर्थ है कि यह मनुष्य की भौतिक और आत्मिक सफलताओं का द्वार खोल सकती है। हालाँकि आध्यात्मिक शक्ति, आन्तरिक शक्ति हमारे पास है- अक्ल की शक्ति का चमत्कार तो आपने देखा ही है। अक्ल आपके पास हो तो अच्छी नौकरी मिलेगी। कहाँ तक पढ़े हैं? मैट्रिक पास हैं। अच्छा साहब, दो सौ रुपया तनख्वाह मिलेगी। आप क्या पास हैं? बी.ए.पास हैं तो आपको साढ़े तीन सौ रुपये तनख्वाह मिलेगी। एम.ए. पास हैं तो पाँच सौ रुपये से आपकी स्टार्ट करेंगे। पी-एच.डी. हैं तो जिस तरह से आपकी जानकारी होगी उसी तरह से आपको पैसा मिलता जाएगा। यदि आप कमजोर हैं तो एक रुपया रोज मिलेगा। पहलवान हैं और वजन ढोने वाले हैं तो चले जाइए ढकेल पर और पल्लेदारी कीजिए, बाईस रुपया रोज देंगे। अक्ल की ताकत देखी है आपने? हाँ देखी है। धन की ताकत देखी है? बैंक में रुपया जमा कर दीजिए, ब्याज पर ब्याज मिलता चला जाएगा। यह तो हुई धन की ताकत। अब आप आध्यात्मिकता की ताकत को देखेंगे, जो दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है, इसके मुकाबले दुनिया के परदे पर कोई नहीं है, क्योंकि ये चेतना की ताकत है। जड़ की ताकत सीमित है। जड़ क्या है? जड़ हमारा शरीर है। जड़ क्या है? जड़ हमारा पैसा है। जड़ क्या है? जड़ हमारा व्यापार है। दिमाग भी हमारा जड़ पदार्थ का बना है, जिसे ज्ञानेन्द्रिय कहा जाता है, ये भी जड़ है। पदार्थ की सीमा है। पैसे की शक्ति, बुद्धि की शक्ति सब शक्तियाँ जड़ है। जड़ के द्वारा जो फायदा मिल सकता है, चेतना के द्वारा उससे हजारों गुना फायदा हो सकता है। लाखों गुना ज्यादा फायदा हो सकता है। चेतना की शक्ति अगर हमारे पास हो जिस हम ब्रह्मबल कहते हैं और आत्मबल कहते हैं तो फिर उसका कहना ही क्या?
मित्रो! मैं कहानी का अर्थ समझाना चाहूँगा आपको, ताकि गायत्री की परिभाषा समझ में आ जाए कि गायत्री क्या हो सकती है एवं क्यों उसका दूसरा नाम ऋतम्भरा-प्रज्ञा है। एक कहानी सावित्री और सत्यवान की है। एक लड़की बड़ी रूपवती, बड़ी कुलवती, बड़ी सुन्दर, ऐसी सुन्दर जिसकी ख्याति संसार भर में फैल गयी। सभी राजकुमार उसे देखकर यही कहते कि यह तो बड़ी सुन्दर राजकुमारी है। यदि यह हमको मिल जाती तो अच्छा होता। लड़की के पिता के सामने सभी राजकुमार हाथ पसारने लगे और कहने लगे कि इसे हमको दीजिए। लड़की ने अपने पिता से कहा कि हमको अपनी मर्जी का दूल्हा चुनने दीजिए। अच्छा तो आप चुन ले ठीक है, रथ पर सवार होकर सेना को साथ लेकर सावित्री रवाना हुई। रवाना होते-होते वह सारे देशों के राजकुमारों से मिली और पता लगाया कि हमारे लिए कोई दूल्हा है क्या? कोई भी दूल्हा उसको पसन्द नहीं आया। जंगल में एक दिन निकल कर जा रही थी सावित्री रथ समेत। उसने एक लड़के को देखा। वह एक लकड़हारा था। लकड़हारा बड़ा तेजस्वी मालूम पड़ता था और चेहरे पर उसके यशस्विता भी टपक रहा था। सावित्री ने उसको रोका और पूछा-लकड़हारे, तुम कौन हो और कैसे हो? उसने कहा लकड़हारा तो इस समय हूँ, पर पहले लकड़हारा नहीं था। हमारे माता-पिता अन्धे हो गए हैं। यहाँ जंगल में जाकर तप करते हैं, उन्हीं की रक्षा करने के लिए हमने यह आवश्यक समझा कि उनको भोजन कराने से लेकर सेवा करने तक के लिए हमको कुछ काम करना चाहिए और जिम्मेदारी को निभाना चाहिए। इस जंगल में और तो कोई पेशा है नहीं, लकड़ी काटकर ले जाते हैं और गाँव में बेच देते हैं, पैसे लाते हैं और उनका सामान खरीद कर लाते हैं। माता-पिता को रोटी खिलाते हैं, सेवा करते हैं। आपने अपने भविष्य के बारे में क्या सोचा है? भविष्य के बारे में क्या शादी नहीं करना चाहते। अभी हमारे माता-पिता का कर्ज हमारे ऊपर रखा हुआ है, अभी हम शादी कैसे कर सकते हैं। सावित्री ने कहा- तुम कुछ और नहीं कर सकते क्या? पैसा नहीं कमा सकते? पैसे कमा करके हम क्या करेंगे? कर्तव्यों का वजन हमारे ऊपर रखा है। पहले कर्त्तव्यों का वजन तो कम कर लें, तब सम्पत्तिवान बनने की बात सोची जाएगी या शादी करने की बात देखी जाएगी।
अपनी सुविधा की बात बहुत पीछे की है। पहले तो वह करेंगे जो हमारे ऊपर कर्ज के रूप में विद्यमान है, इसीलिए माता-पिता, जिन्होंने हमारे शरीर का पालन किया, पहला काम उनकी सेवा का करेंगे, इसके बाद और बातों को देखेंगे। पढ़ना होगा तो पीछे पढेंगे। नौकरी करनी होगी तो पीछे करेंगे या शादी करनी होगी तो पीछे करेंगे अभी तो हमको कर्ज चुकाना है, माता-पिता की सेवा करनी है।
लकड़हारे की बात सुनकर राजकुमारी रुक गई। अब वह विचार करने लगी कि बाहर से ये लकड़हारा है, लेकिन भीतर से कितना शानदार है। कितना शानदार इसका कलेजा, कितना शानदार इसका दिल, कितना शानदार इसकी जीवात्मा। इसने अपने सुख और भौतिक सुविधाओं को लात मार दी और अपने कर्त्तव्यों को प्राथमिकता दी। यह बड़ा जबरदस्त है। लकड़हारा है तो क्या हुआ। लकड़हारे से सावित्री ने कहा कि हम तो दूल्हा तलाश करने चले थे, अब हम आपसे ही ब्याह करेंगे। अब हम आपको ही माला पहनाना चाहते हैं। वह हँसा, उसने कहा-हमको अपने पेट का तो गुजारा करना ही मुश्किल पड़ता है, फिर तुम्हारा गुजारा कैसे कर सकते हैं? उसने कहा- हम पेट पालने के लिए, आपकी सहायता माँगने के लिए नहीं आए? आपकी सहायता करने के लिए आए हैं। हम बहुत बड़े मालदार हैं। हमारा बाप बहुत बड़ा मालदार है, हमारे पास बहुत सारा पैसा है। हम आपकी सेवा कर सकते हैं? यह सुनकर राजकुमार बोला-नारद जी बता गए थे कि एक साल बाद हमारी मृत्यु होने वाली है। सावित्री ने कहा कि हमारे पास इतनी विशेषता है कि हम आपकी जान बचा सकते हैं। हम आपको सम्पन्न बना सकते हैं? हम आपको यशस्वी बना सकते हैं? हम आपको सब कुछ उपलब्ध करा सकते हैं। हम बड़े मालदार हैं- और सावित्री ने गले में माला पहना दी। क्या आपने सावित्री-सत्यवान की कहानी पढ़ी है? पढ़ी होगी तो जानते होंगे कि फिर क्या हुआ था? राजकुमारी से विवाह करने के बाद सत्यवान के जीवन में एक वक्त ऐसा भी आया था जब यमराज आए थे और सत्यवान का प्राण निकाल कर ले गए थे। तब सावित्री ने कहा था- नहीं यमराज बड़े नहीं हो सकते हैं। हम बड़े हैं आखिर सावित्री ने यमराज से अपने पति का प्राण छीन लिया था। आपने सुना है या नहीं सुना है। हमें नहीं मालूम, पर यह एक कहानी है जो गायत्री का प्राण, गायत्री की जीवात्मा, गायत्री की वास्तविकता और गायत्री की फिलॉसफी हैं। आप इस फिलॉसफी की गहराई में जाइए। समुद्र के किनारे द्वीपों में घोंघे पड़े होते हैं। गहरी डुबकी मारिए और मोती ढूँढ़कर लाए। नहीं साहब, मोती किनारे पर बिखरें होते हैं। हम तो किनारे पर डुबकी मारेंगे और मोती मिल जाएगा। ठीक इसी तरह किनारे पर बैठकर गायत्री का भजन करेंगे तो उससे क्या मिलेगा? यह तो किनारे बैठकर किनारे का भजन है। अरे डुबकी मार करके गायत्री के भजन की वास्तविक स्थिति ढूँढ़कर के ला। जहाँ से लोग शक्तिवान बन जाते हैं, सिद्धपुरुष बन जाते हैं, चमत्कारी बन जाते हैं- वहाँ तक डुबकी मार। वहाँ तक डुबकी नहीं मारेगा, किनारे तक बैठा रहेगा और नजर घुमाता रहेगा तो बेटे, सीप मिल सकती हैं, घोंघे मिल सकते हैं, समुद्र के किनारे। समुद्र दिखाई दे सकता है। झाग मिल सकता है, पर कीमती चीज नहीं मिल सकती। यह कहानी यही कहती है।
सावित्री किसे कहते हैं?
सावित्री बेटे गायत्री का ही दूसरा नाम है और सत्यवान? सत्यवान उसे कहते हैं, जिस साधक ने अपना जीवन समय के लिए सिद्धान्तों के लिए अर्थात् आदर्शों के लिए समर्पित किया है, उस आदमी का नाम है सत्यवान। सावित्री-गायत्री के लिए यह आवश्यक है कि उसका भक्त सत्यवान हो अर्थात् सिद्धान्तवादी हो आदर्शवादी हो। उत्कृष्ट चिन्तन में लगा हो। कर्त्तव्यों में लगा हुआ हो। इस तरह का अगर कोई व्यक्ति है, तो उसे गायत्री का साधक कह सकते हैं। साहब, हम भी साधक हैं, दिन भर चोरी–चकारी करते हैं, सारी जिन्दगी इसी में व्यतीत करते हैं और सबेरे एक घण्टा वक्त मिल जाता है तो माला लेकर बैठ जाते हैं। बेटे, यह साधना नहीं, उसका मखौल है। इसी तरह कितने लोग पूछते रहते हैं कि चंदन की माला अच्छी होती है कि रुद्राक्ष की। अरे बेटे चंदन से क्या मतलब है या रुद्राक्ष से क्या मतलब है। अपने हृदय की बात कहते हैं, अन्तरात्मा की बात कहते हैं। चन्दन में क्या रखा है और रुद्राक्ष में क्या रखा है। बेटे, तू समझता ही नहीं, अभी साधना के लिए पकड़ना पड़ेगा चेतना का स्तर, जहाँ शक्तियाँ निवास करती हैं, जहाँ भगवान निवास करते हैं, जहाँ आस्थाएँ निवास करती हैं। उस स्थान का नाम, उस स्तर कर नाम वह भूमि है जिसे दिव्यलोक कहते हैं, जहाँ गायत्री माँ निवास करती हैं, चेतना निवास करती है, जिसको हमने ऋतंभरा-प्रज्ञा कहा है। चलिए हमें ऋतंभरा-प्रज्ञा ही कहने दीजिए ऋतम्भरा-प्रज्ञा क्या है? वह प्रज्ञा, वह धारणा, वह निष्ठा- जो आदमी को ऊँचा उठा देती है, ऊँचा उछाल लेती है। जिसकी प्रेरणा से आदमी ऊँची बातों पर विचार करता है और नीची बातों से ऊँचा उठता चला जाता हैं, उसे ऋतंभरा-प्रज्ञा कहते हैं। प्रज्ञावान के सामने आदर्श रहते हैं, ऊँचाई रहती है। छोटी-छोटी चीजों को जिनमें कीड़े-मकोड़े लगे हरते हैं, कीड़े-मकोड़े समझता रहता है।
चलिए मनुष्य कह देता हूँ मनुष्यों की शक्ल होते हुए भी आप कीड़े-मकोड़े हो सकते हैं। हम कीड़े-मकोड़े उन्हें कहते है, जिनके उद्देश्य दो होते हैं। एक तो पेट पालना और दूसरा कामवासना को पूरा करना। जानवर सिर्फ दो काम के अलावा तीसरा कोई विचार नहीं करते। पेट की भूख उनकी जब जबरदस्ती धक्का मरती है, तो खाना तलाश करने के लिए चल देते हैं। घास खाने के लिए चल देते हैं। पेट भरने के लिए चल देते हैं। शिकार करने कि लिए चल देते हैं। पेंट की पुकार पेट को आवश्यकता को पूरा करने के लिए जो आदमी काम करता रहता है उसका नाम है कीड़ा उसका नाम मकोड़ा उसका नाम है पशु-पक्षी। उद्देश्य केवल पेट भरना है, पैसे इकट्ठा करना हैं। पैसा और पेट भरना एक ही बात है। छोटे कीड़े पेट भरकर चुप हो जाते है। शहद की मक्खी समझदार है, इसलिए अपने छत्ते में जमा कर लेती है। चींटी जरा-सी समझदार है इसलिए अपने बिल में जमाकर लेती है आदमी जरा कुछ ज्यादा समझदार है, इसलिए बैंक में जमा कर लेता है, जमीन में गाड़ लेता है। फर्क कुछ नहीं है। वह आदमी कीड़ा-मकोड़ा हैं, पशु और पक्षी है। उसका भी लक्ष्य केवल पेट पालना और औलाद पैदा करना है। बस एक सीमा में वह रहना पसंद करता है।
मित्रो! कीड़ा-मकोड़ा वह जिसे कुछ बात ध्यान में नहीं आती, बस पेट भरने जैसा एक फितूर आदमी के दिमाग में हावी होता है। दूसरों पर भी हावी होता है, कीड़े-मकोड़ो परा भी। कीड़े-मकोड़ो में मादा पर हावी होता है, पीछे नर उसका हिमायत करता रहता है, उसकी आवश्यकता पूरी करता है। कीड़े-मकोड़ो में नर ने कभी आज तक किसी मादा को नहीं छेड़ा। छेड़ा होगा तो मादा ने। उसी ने हुकुम दिया होगा। मादा ने इच्छा प्रकट की होगी तो नर ने उसकी सेवा कर दी होगी, बस लेकिन सृष्टि का ये नियम है, कभी कोई नर- कभी कोई जानवर चाहे जितने भी जाति-प्रजाति के क्यों न हों सभी में यही नियम लागू होता हैं। बकरियों के झुण्ड में चले जाइये। एक बकरे को देखिए। बकरा चुपचाप कान लटकाये चल रहा होगा। बकरियाँ सौ होगी पर क्या मजाल कि बकरा किसी को आँख उठाकर देख ले, किसी की तरफ किसी को तंग कर दे। वह बकरी को कभी छेड़ेगा नहीं। बकरी का समय जब आ जाएगा और वह इशारा करेगी तो बकरा सेवा भी करेगा लेकिन मनुष्य? मनुष्य की वह मर्यादाएँ भी चली गई। जानवर दो काम करते हैं- तीसरा कोई काम नहीं। जब उन पर खुराफात सवार होती है, काम-वासना के सम्बन्ध में दिमागी खुराफात पैदा होती है तो वे कामसेवन कर लेते हैं। बच्चे पैदा कर लेते है। बस यही दो काम हैं, उनको तीसरा कोई काम नहीं है। आज का इनसान भी पशु है, कीड़ा-मकोड़ा है, उसके सामने भी जीवन का कोई लक्ष्य नहीं, केवल दो ही लक्ष्य हैं। सारा समय, सारा श्रम, सारी अक्ल, सारी सत्ता उसी काम में खर्च हो जाती है। किसमें, पेट भरने में और बच्चे पैदा करने में और शादी-ब्याह करने में। काम-वासना के ख्वाब देखने और सपने देखने में। बेटे इनका नाम पशु और कीड़े ही हो सकता है, आदमी नहीं हो सकता।
नासमझी पर विजय प्राप्त कराने वाली मनः स्थिति है गायत्री-
बेटे! ऋतंभरा-प्रज्ञा किसको कहते हैं? ऋतंभरा-प्रज्ञा उसे कहते हैं, जो आदमी को उछाल देती है, ऊपर की तरफ। ऊँचे पर जाने वाली चीजों को कभी आपने देखा होगा। हवाई जहाज में हमने बहुत सारे सफर किए हैं। हवाई-जहाज के सफर में हमने देखा तो नीचे जमीन की चीजें बहुत छोटी-छोटी जान पड़ीं। हमने हवाई-जहाज में से चलती हुई रेलगाड़ियां देखी। रेंगते हुए मनुष्यों को देखा, छोटे-छोटे मेढ़कों के तरीके से जानवरों को देखा, जरा-जरा से फुदकने वाले जानवरों के तरीके से वे ऊपर से नन्हें-नन्हें दिखाई पड़ते थे। खेत देखे, गन्ने के खेत ऐसे मालूम पड़ते थे जैसे जरा-जरा से घास-फूस हों और मित्रो, हमने तालाब देखें, झीलें देखी, नदियाँ देखीं, एक लकीर की तरीके से पानी की बहती हुई जरा-जरा सी झीलें। आदमी जब उछल जाता है ऊपर की तरफ, तो उसमें दो बातें हो जाती है। एक तो यह कि जितना दायरा दिखाई पड़ता था, पहले मान लीजिए यहाँ से इतनी लम्बी-चौड़ी जगह दिखाई पड़ती है, अब हम अगर किसी टीले पर खड़े हो जाएँ तो हमें टीले पर से चार मील दायरा दिखाई पड़ेगा। हवाई जहाज पर जब आप चले जाएँगे तो आपको ढाई सौ मील की लम्बाई-चौड़ाई का दायरा दिखाई पड़ेगा। ऊँचे उठे हुए व्यक्ति का दायरा बड़ा हो जाता है और विचार करने का देखने का और सोचने का स्तर ऊँचा उठ जाता है, तब जबकि ऋतंभरा-प्रज्ञा जग जाती है। ऐसे व्यक्ति के लिए वे सभी वस्तुएँ, चीजें बिल्कुल नाचीज हैं, जिनकी जीवन में कुछ खास अहमियत नहीं है। आदमी की दैनिक जीवन की जरूरतें बिल्कुल थोड़ी-सी हैं, नगण्य है। पेट भरने को जरा-सा मुट्ठी भर अनाज चाहिए, तन ढँकने को मुट्ठी भर कपड़ा चाहिए और रहने को जरा-सी जगह चाहिए। आदमी की जरूरतें इतनी कम हैं कि छः फुट लम्बे आदमी को पेट आसानी से भरा जा सकता है और आदमी खुशी की जिन्दगी जी सकता है, पर आदमी जिस बेअक्ली की वजह से जिस बेवकूफी की वजह से सारी जिन्दगी दुखों में व्यतीत कर देता है, कष्टों में व्यतीत कर देता है, चिन्ताओं में व्यतीत कर देता है, वह बेटे, नासमझी हैं। इस नासमझी पर विजय प्राप्त करने वाली जो हमारी मनःस्थिति है, उसका नाम है ऋतंभरा-प्रज्ञा। जीवन का लक्ष्य क्या हो सकता है? जीवन में शान्ति कहाँ से आ सकती है? जीवन की दबी हुई सामर्थ्यों को हम कैसे विकसित कर सकते है? ये हमारी मूर्च्छित सामर्थ्य है? शोचनीय सामर्थ्य है, गयी- गुजरी सामर्थ्य है, लेकिन इससे अत्यधिक महत्वपूर्ण जो सामर्थ्य हैं, उनको विकसित करने के लिए क्या करना चाहिए और कैसे करना चाहिए, ये समझ और ये अक्ल जहाँ से आती है उसका नाम ऋतंभरा-प्रज्ञ
ये जो शुभ कर्म कर डालने में देर करता है, वह चूक जाता है और जो अशुभ कर्म करने में जल्दबाजी करता है, वह भी चूक जाता है। इसीलिए कहा गया है कि अशुभ करते समय जरा सोचो, थोड़ी देर रुको, थमो, ठहरो। किन्तु शुभ विचार आते ही उसे क्रियान्वित करने में देर न करो।
एक बार संत नामदेव से किसी व्यक्ति ने पूछा-महात्मा जी आपका जीवन कितना सादा है, आप कितने उच्च विचार रखते हैं। उक्त सज्जन नामदेव से बात कर ही रहे थे कि उन्होंने कहा-भाई, अन्य बातें छोड़ो, मुझे अभी-अभी तुम्हारे बारे में एक बात मालूम हुई, वह यह कि आज से ठीक सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी। नामदेव की यह बात सुनकर उक्त व्यक्ति घबरा गया, मृत्यु और वह भी केवल 168 घंटे में, भला नामदेव की वाणी झूठी कैसे हो सकती थी। वह व्यक्ति तुरन्त घर आया और अपने घर वालों से नामदेव की उक्त बात कही, सुनकर सभी बड़े व्याकुल हुए। उस व्यक्ति ने बिस्तर पकड़ लिया और जैसे-जैसे एक-एक दिन बीतता उसे मृत्यु निकट आती हुई दृष्टिगोचर होने लगी, अन्त में सातवें दिन नामदेव उस आदमी से मिलने आये। उन्होंने पूछा-कैसी तबियत है? वह बोला-अब तो कुछ ही घण्टों का मेहमान हूँ। नामदेव बोले-इन सात दिनों में कितना पाप कमाया? वह बोला-पाप करने की कौन कहे, पाप करने के विचार तक मेरे हृदय में न आये। नामदेव शांति से बोले-बस हमारा जीवन भी इसी प्रकार है।
आशय यह है कि यदि हम मरण को सदैव स्मरण करें तो पापकर्मों की ओर हमारी चित्तवृत्ति नहीं बढ़ेगी। इस प्रकार इस मृत्यु रूपी अंकुश के लगे रहने से हम दिनों-दिन अच्छे कार्यों की ओर बढ़ते रहते हैं। मृत्यु को याद रखने से कुमार्ग पर जाने से रोक लगती है।
कर्नाटक के छोटे-से गाँव उडुपी में नैष्ठिक ब्राह्मण के यहाँ एकमात्र सन्तान कन्या हुई। सभी उन ब्राह्मण श्री निर्मल पर दबाव डालने लगे कि दूसरा विवाह कर लें, शायद उससे पुत्र प्राप्त हो जाय, वंश चले। श्री निर्मल ने दृढ़ता से इसे अस्वीकार कर दिया। कन्या का नाम था- अक्का महादेवी। उन दिनों कन्याओं को शास्त्रज्ञान के अयोग्य माना जाने लगा था। श्री निर्मल ने अक्का को सभी शास्त्रों का अध्ययन कराया, ज्ञान दिया एवं आध्यात्मिक दिशा दी। रूढ़िवादी लो निर्मल का उपहास करते, कहते- “क्या लड़की से वंश चलेगा?” शिक्षा और वातावरण के प्रभाव से अक्का महादेवी का व्यक्तित्व विकसित होता गया। वे एक महान तपस्विनी, आदर्शवादी विदुषी के रूप में प्रसिद्ध हुई और पिता का नाम रोशन कर दिया। आज भी लोग श्री निर्मल का नाम अमर अक्का महादेवी के पिता के रूप में जानते हैं।
रमण महर्षि के आश्रम में कुछ लड़के भी रहने लगे थे। उनमें से एक लड़का गौशाला में सोया करता था। उसके पास कोई बिस्तर नहीं था। महर्षि की निगाह लड़के पर पड़ी। रमण महर्षि ने दयार्द्रभाव से लड़के से पूछा-तुम रात को भी यही सोते हो? लड़के ने कहा- हां भगवान्। और रात को ओढ़ते क्या हो? उत्तर में लड़के ने अपनी फटी चादर दिखाई। महर्षि फिर कहा- इससे तुम्हें जाड़ा नहीं लगता क्या? लगता है प्रभु। लड़के के उत्तर में फड़कती सर्दी की पीड़ा उबर आयी। लड़के उत्तर सुन कर महर्षि तत्काल अपने माँ की कुटीर में लौट आए। उन्होंने ने माँ की दो पुरानी साड़ियां लीं। थोड़ी-सी रुई मँगवाई और वे गुदड़ी तैयार करने लगे। उनकी माँ भी बैठ कर महर्षि का सहयोग करने लगीं। अपनी माँ की सहायता से थोड़ी ही देर में खोल सिल लिया। उसमें रुई डाल कर कुछ ही घण्टों में गुदड़ी तैयार हो गयी। वे खुद ही जाकर उस लड़के को दे आए।
दूसरे दिन प्रातः रमण महर्षि ने स्वयं गौशाला जाकर उस लड़के से पूछा- रात कैसी नींद आयी। लड़के ने कहा- बहुत मीठी नींद सोया, भगवन्! उस लड़के का उत्तर सुन कर महर्षि के मुखमण्डल पर सच्चे आत्मज्ञान की प्रभा फैल गयी। आत्मवत् सर्वभूतेषु उनके लिए शब्द नहीं सच्ची अनुभूति थे।
अगर आप गहराई में प्रवेश करें तब और अगर बाहर से देखें तो नारी का अर्थ है भोग्या? उसके कान को देखिए, अलग-अलग स्थान को देखिए, कामुकता के हिसाब से देखिए, वासना के हिसाब से देखिए तो वह भोग्या है। लेकिन अगर आप गहराई में जाए तो वह देवी है।
भगवान बुद्ध जन-जागरण के लिए शिष्य समुदाय के साथ देश-भ्रमण कर रहे थे। एक शहर से दूसरे शहर जाते समय श्मशान भूमि आयी। वहाँ एक चिता जल रही थी जो बुद्ध के एक शिष्य के संसारपक्षीय पिता की थी।
चिता के पास से गुजरते समय शिष्य को पता चल गया कि यह चिता मृत पिता की है और वहाँ पर एकत्र भीड़ उसी के बन्धु-बांधवों एवं सगे-सम्बन्धियों की है। फिर भी वह नहीं रुका। पूर्ववत महात्मा बुद्ध के साथ चलता रहा।
तथागत ने उसे टोका और निर्देश दिया कि जब तक तुम्हारे पिता की चिता बुझ ना जाये, तब तक तुम श्मशान भूमि में बैठे रहो। अपने शास्त्र के आदेशानुसार वह शिष्य वहीं रुक गया। बाकी जन आगे बढ़ गए।
संयोग से आगे भी इसी दृश्य की पुनरावृत्ति हुई। इस बार भी श्मशान में महात्मा बुद्ध के अन्य किसी शिष्य के पिता का मृत शरीर जल रहा था। जैसे ही शिष्य को पता चला कि उसके पिता का दाह-संस्कार हो रहा है वह अपने यात्रासंघ से हटकर श्मशान में अपने बन्धु-बान्धवों के साथ जा बैठा।
भगवान बुद्ध को जब पता चला कि उनका शिष्य अपने पिता के अंतिम-संस्कार में शामिल होने श्मशान में जा बैठा है, तो वे उधर मुड़े ओर उस शिष्य को हाथ पकड़ कर उठा लाए। साथ में चल रहे सैकड़ों के शिष्यों के मन जिज्ञासा जगी कि क्या कारण है कि तथागत एक शिष्य को पिता के दाह संस्कार में स्वयं भेज रहे है और दूसरे को स्वयं ही हाथ पकड़ कर उठा लाए हैं।
भगवान बुद्ध ने अपने होंठों पर हल्का-सा स्मित लाते हुए शिष्यों को सम्बोधित करते हुए बताया-शिष्य मैं जानता हूँ, तुम सब जिज्ञासा कुल हो, क्योंकि मैंने एक जैसे दो घटनाओं के लिए भिन्न-भिन्न आदेश दिये हैं। लेकिन परिस्थिति की समानता के बावजूद मनःस्थिति भिन्न थी पहला शिष्य बिलकुल अव्यावहारिक था। उसका कर्त्तव्य था कि असमय में उसके पिता की मौत हुई तो वह अपने परिवारीजनों को सांत्वना दे। इसलिए मैंने उसको श्मशान भूमि में रोक दिया। दूसरा शिष्य मोहाकुल था। अपने पिता की मौत पर वह संसारी लोगों की तरह विलाप कर रहा था। भिक्षु के लिए शोकाकुल होना अच्छी बात नहीं है। इस लिए मैं उसे श्मशान भूमि से उठा लाया। हमेशा ध्यान रखो- सद्गुरु-शिष्य की आन्तरिक स्थिति को भली-भाँति जानते हैं, उसी के अनुरूप उसे निर्देश देते हैं, उसकी व्यवस्था करते हैं, गुरु आदेश के प्रति सदा-सर्वदा श्रद्धा उचित है न कि शंका।
वसन्त पर्व, जो हमारी गुरुसत्ता के आध्यात्मिक जन्मदिवस एवं मिशन के वार्षिकोत्सव के रूप में विगत 72 वर्षों से मनाया जाता रहा है, अब अतिनिकट आ गया। यों तो वह फरवरी माह की पहली तारीख को पड़ रहा है, किंतु पत्रिका जब तक परिजनों के पास पहुँचेगी इसकी तैयारी सब ओर आरंभ हो चुकी होगी। हर वर्ष की तरह इसे भावभरी श्रद्धा और उत्साह-आवेश युक्त तत्परता के साथ मनाया जाना चाहिए। अपने विराट परिवार, अखिल विश्वगायत्री परिवार का यह सबसे बड़ा त्योहार है, इसीलिए समारोहों, आयोजनों की दृष्टि से उसे सर्वोपरि स्थान दिया जाता रहा है। विगत गुरुपर्व से आयोजित सात पर्वों की श्रृंखला में श्रद्धा-समर्पण पर्यावरण-स्वास्थ्य, साधना, शक्ति-संवर्धन, सद्ज्ञान, सद्शिक्षा, संस्कृति, नारी-जागरण तथा स्वावलम्बन-युवा शक्ति जागरण-ये छह विराट समारोह क्रमशः गुरुपूर्णिमा से मार्गशीर्ष पूर्णिमा तक बड़ी सफलता के साथ सम्पन्न हो चुके है। प्रत्येक की अपनी उपलब्धियाँ रही हैं जो समय-समय पर पाठक-परिजन “अखण्ड-ज्योति” मासिक एवं “प्रज्ञा अभियान” पाक्षिक में पढ़ते रहे हैं। अब सातवाँ समारो पौष पूर्णिमा पर न होकर हेमन्त की ठिठुरन की समापन बेला में महाकुँभ के साथ वसंत पंचमी की पावन वेला में हो रहा है। भारतीय संस्कृति कैसे विराट व्यापक रूप लेकर विश्व-संस्कृति बनने जा रही है तथा भारत भर में विभिन्न भाषाओं में पूज्यवर के साहित्य के अनुवाद तथा ऑडियो कैसेट्स का ज्ञानयज्ञ का विस्तार किस विराट रूप में सम्पन्न होने जा रहा है, उसकी झलक-झाँकी इस वसंत से परिजन देख सकेंगे।
यह भलीभाँति जान व समझ लेने चाहिए कि जिस आराध्यसत्ता से हम जुड़े हैं, उसका अवतरण युगपरिवर्तन के निमित्त ही हुआ था वह अभी भी सूक्ष्म व कारण शरीर से वह वही कार्य सम्पन्न कर रही है। गुरु एक जिन्दा शास्त्र के रूप में निरूपित किया गया है। किसी का विद्वान-वक्ता-लेखक-साहित्यकार आवर्डविनर बनना सरल है, पर सद्गुरु बनना सबसे कठिन है। एक ऐसे गुरु में हमें पूज्यवर मिले, जिनने प्राणचेतना की घनीभूत स्थलियों के रूप में आँवलखेड़ा रूपी युग-तीर्थ, गायत्री-तपोभूमि के रूप में अपनी शक्ति से अभिपूरित कर्म भूमि तथा शाँतिकुँज गायत्रीतीर्थ के रूप में एक सुसंस्कारित सिद्धपीठ स्थापित किए। ऐसा तंत्र भी बना दिया कि तीनों ही तीर्थसाधना की पृष्ठभूमि पर उनके द्वारा निर्दिष्ट निर्धारणों के अनुरूप सतत् चलते रहें। पूर्ण पुरुष की यदि कोई अवधारणा किसी के मन में हो सकती है तो उसे साक्षात परमपूज्य गुरुदेव के रूप में उनके व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व के रूप देखा जा सकता है। जिस प्रकार स्वामी विवेकानन्द स्वयं को “कन्डेन्स्ठ इण्डिया” घनीभूत संवेदनसिक्त भारत भूमि का पर्याय मानते थे, ठीक उसी प्रकार हम 1911 में जन्मी हमारी गुरुसत्ता को भारत की जीती-जागती रक्तमाँस की प्रतिमा मान सकते हैं, जिनके मन में राष्ट्र के नवोन्मेष के प्रति टीस थी- भारत को पुनः हिंदुत्व के मूल आधारों पर प्रतिष्ठित कर श्रेष्ठतम ऊँचाई तक पहुँचाने की वेदना थी एवं इसी के निमित्त उनके जीवन का हर पल जिया गया। दृष्टिकोण के परिष्कार से समस्याओं का समाधान तथा प्रत्येक व्यक्ति का स्वयं के लिए नहीं- समाज व राष्ट्र के प्रति समर्पित होकर जीना-यही उनके जीवन का मूल शिक्षण रहा। आज झंझावातों में घिरे मानव समुदाय को-नेतृत्वहीन समाज को आस्था संकट से ग्रसित मानवता को यदि कहीं से कोई आशा दिखाई पड़ती है, तो वह गायत्री परिवार से परमपूज्य गुरुदेव के निर्धारणों में से मिलती दिखाई देती है। युगसंधि की इस वेला में कैसे उच्चस्तरीय चिन्तन बनाए रखा जा सकता है, यह राह उन्हीं ने हमें दिखाई एवं 1995 से 2000 तक के समय को अत्यधिक महत्वपूर्ण बताते हुए साधनात्मक पुरुषार्थ को तीव्रतम नियोजित करने की प्रेरणा दी। इस संकट की घड़ी में उच्चस्तरीय चिन्तन ही हम सब को वरण करना चाहिए, ताकि हम गुरुसत्ता द्वारा सूक्ष्म व कारण जगत से भेजी जा रही आध्यात्मिक प्रेरणाओं को ग्रहण कर सकें
यही संदेश लेकर 1998 का यह वसन्त आया है। वसंत पर्व ज्ञान की देवी भगवती सरस्वती का जन्मदिन है। कहा जाता है कि सृष्टि के आदिकाल में मनुष्य को इसी पावन वेला में विद्या-बुद्धि का, ज्ञान-संवेदना का अनुदान प्राप्त हुआ था। जीवन जो जीवधारियों में, कृमि-कीटकों में व एक अंश में जड़ पदार्थों में भी है, किंतु मनुष्य को इन सबसे ऊँची स्थिति प्राप्त है, उसका एकमात्र कारण उसका क्रमबद्ध सोद्देश्य चिन्तन ही है। सोद्देश्य चिन्तन उल्लासभरी मनः स्थिति तथा विधेयात्मक दृष्टिकोण-ये कुछ ऐसी विभूतियाँ हैं जो मात्र मनुष्य को प्राप्त हैं। यही कारण है कि उसने उस धारा को वैभवसंपन्न और सुन्दर बनाने का प्रयास अपने आदिकाल से किया है। इसके पीछे माँ भगवती सरस्वती का अनुग्रह ही प्रत्यक्ष देखा जा सकता है, जो विवेक-सद्बुद्धि के साथ कलादृष्टि भी देती हैं व जीवन को उल्लास के साथ जीना सिखाती हैं।
प्रकृति इस समय विशेष पर अपने पूर्ण यौवन पर निखरकर आती दिखाई देती है। उसका आन्तरिक उल्लास उभर कर आता है, वृक्ष-हरीतिमा-पुष्पों पर यौवन के उन्माद के छाने के रूप में। पतझड़ की खण्डहरी कुरूपता समाप्त हो जाती है। एवं पुष्प-पल्लवों की शोभा-आभा से वृक्षावली लद जाती है। प्राणियों में भीतर ही भीतर एक अभिनव हलचल का संचार होता है। भ्रमर गूँजने लगते हैं एवं हर जीवधारी एक गुदगुदी अनुभव करने लगता है। चहुँओर उल्लास-अभिव्यक्तियों का बाहुल्य बिखरा पड़ा दीखता है। यह वसंत के ऋतुराज रूप में निरूपित किये जाने का विवरण कोई अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है। प्रकृति का कुछ विधान ही ऐसा है कि ऐसा लगने लगता है मानो कोई मधुर उन्माद जड़-चेतन में नई उमंगों-तरंगों की धारा लहलहाने में अदृश्य रूप से संलग्न है।
मनुष्य भी इससे अछूता नहीं हैं। उनमें भी यह अभिव्यक्ति सहज ही उभरती, उफनती दिखाई देने लगती है। ठण्ड में जितनी निष्क्रियता थी-वसंत के साथ उतनी ही सक्रियता आ जाती है। मनुष्यों के भीतर भी प्रकृति प्रेरणा ढर्रे से बाहर निकलकर कुछ कर गुजरने, ऊँचा उठने की स्फुरणा के रूप में प्रकट होती है। चेतनात्मक स्तर पर प्रगति करते रहने की प्रेरणा सतत् उसे मिलती रहती है और यही मनुष्य की सबसे बड़ी निधि है। वसंत पर्व की यही विशेषता है, जिसने हमारी गुरुसत्ता को आत्मावलोकन की प्रेरणा दी- आत्मिक प्रगति का निज के वास्तविक स्वरूप व उसकी चरम परिणति का पथ दिखाया, उनके स्वयं के जीवन को तो उल्लास से भर ही दिया- एक विराट गायत्री परिवार के संरक्षक-अभिभावक के रूप में उन्हें स्थापित कर दिया। वसंत, विज्ञ-समाज, कला, सौंदर्य व विद्या को जीवन में स्थान देने वालों का पर्व है। धनवान दीपावली को-शक्तिवान विजयादशमी को, विनोदी होली पर्व को- तपस्वी श्रावणी को तथा छात्र गुरुपूर्णिमा को अधिक मान-महत्व देते रहे हैं, पर जो विद्या की, कला की, जीवन जीने की कला की गरिमा जानते हैं वे सरस्वतीपूजन के इस पर्व को विशेष महत्व देकर उसकी प्रेरणाओं को भी उतारते हैं। यह अकारण नहीं था कि “गुरुदेव”नाम से प्रख्यात कवीन्द्र रवीन्द्र नाथ टैगोर ने वसंत पर्व को ही सर्वाधिक महत्व दिया एवं विद्या-कला-संगीत के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थापनाएँ की।
परमपूज्य गुरुदेव के शिष्य हम सभी संजीवनी विद्या के-जीवनकला के उपासक-आराधक हैं-इसीलिए स्वभावतः सरस्वती पर्व को, वसंत पंचमी को हम सभी अपने मिशन का जन्मदिन मानते हैं- युगनिर्माण आन्दोलन का श्रीगणेश उसी पावन दिन जो हुआ था। युगसंधि का मंगलाचरण अगले दिनों यदि वसन्त पर्व को ही हुआ, जोकि सुनिश्चित है तो इसे स्वर्ण-सुयोग ही कहा जाएगा। इस पर्व की विशिष्टता के विषय में सभी को ज्ञात है, फिर भी नए पाठकों-परिजनों के लिए एक बार पुनः याद कर लिया जाय तो ठीक ही होगा।
(1) इसी पावन दिन वि. संवत् 1983 सन् 1926 की वसंत पंचमी की पावन वेला में गुरुदेव को उनके सूक्ष्म-शरीरधारी मार्गदर्शक, जिन्हें हम दादा गुरुदेव (स्वामी सर्वेश्वरानन्द जी) के नाम से जानते हैं, ने भागीरथी तपश्चर्या की प्रेरणा का उद्बोधन-आह्वान प्रस्तुत किया और तत्काल पूज्य गुरुदेव उन निर्देशों को शिरोधार्य करने के लिए उद्यत हो गए। उसी दिन जलाया गया अखण्ड दीपक आज भी सतत् जल रहा- शांतिकुंज से प्रकाश-प्रेरणा दे रहा है एवं उस दिन की बराबर याद दिलाता रहता है। चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों की श्रृंखला इसी दिन आरंभ की गयी थी। इसी दिन मिशन के सूत्र-संचालन तंत्र पर दिव्यप्रेरणा की प्रकाश किरणों का अवतरण होता आया है, जो हर वर्ष के लिए एक नया सन्देश लेकर नवप्रभात की तरह पूज्यवर के अन्तरंग अन्तरिक्ष में आविर्भूत होता जा रहा है।
(2) अखण्ड-ज्योति पत्रिका का शुभारम्भ भी विधिवत सन् 1940 से उसी दिन से आरंभ हुआ।
(3) गायत्री तपोभूमि का शिलान्यास भी 1951 में इसी दिन हुआ।
(4) सहस्रकुंडी गायत्री महायज्ञ का संकल्प इसी दिन लिया गया जिसे कार्तिक पूर्णिमा 1958 में पूरा किया गया।
(5) वेदों के अनुवाद-भाष्य का क्रम इसी दिन आरंभ हुआ, जो पूज्यवर के हिमालय-प्रवास (1959-60) के साथ पूरा हो अपने समग्र रूप में सबके समक्ष आया।
(6) “युगनिर्माण योजना” का सूत्रपात इसी दिन हुआ-इसी दिन युग-निर्माण सत्संकल्प के रूप में विधिवत घोषणापत्र जारी किया गया, जिसे नवयुग के संविधान की संज्ञा दी गयी।
(7) “युगनिर्माण योजना” पत्रिका, युगशक्ति गायत्री तथा सभी अन्य भाषाओं में प्रकाशित पत्रिकाएँ इसी दिवस प्रकाशित होना आरंभ हुई।
(8) युगनिर्माण विद्यालय के रूप में बालकों के स्वावलम्बनतंत्र का निर्माण एवं उसका विधिवत शुभारंभ गायत्री तपोभूमि मथुरा में इसी दिन हुआ।
(9) विधिवत गायत्री परिवार का निर्माण-युगनिर्माण परिवार का शुभारम्भ एवं शान्तिकुँज का निर्माणकार्य इसी दिन आरंभ हुआ।
(10) महिला जागरण अभियान का शंखनाद इसी दिन हुआ।
(11) गायत्री नगर- गायत्री तीर्थ की मंगलमयी स्थापना भी इसी दिन हुई।
(12) विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय को संकल्पित “ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान” का शिलान्यास-विधिवत शुभारंभ इसी दिन हुआ।
(13) प्रज्ञापुराण के रूप में उन्नीसवें पुराण की-प्रगतिशील कथा शैली में जीवन-साधना के सूत्रों को गूँथकर प्रस्तुत किये जाने की योजना इसी दिन बनी है।
(14) गायत्री शक्तिपीठों, प्रज्ञा-संस्थानों, स्वाध्याय-मण्डलों के निर्माण की घोषणा इसी दिन की गयी, जो कि विस्तार लेती हुई सारे भारत व विश्व में फैलती चली गयी।
(15) सूक्ष्मीकरण साधना में प्रवेश तथा युगसंधि महापुरश्चरण की घोषणा का कार्य इसी दिन हुआ, साथ ही आगामी पाँच वर्षों में विशिष्ट कार्य कर अपने लीला-संदोह के पटाक्षेप की घोषणा भी इसी दिन हुई।
(16) वीडियो स्टूडियो का शुभारंभ-विधिवत इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा क्रान्ति का सूत्रपात किये जाने की घोषणा इसी दिन की गयी।
(17) प्रवासी भारतीयों में प्रचार-प्रसार किये जाने हेतु विधिवत तंत्र का गठन इसी दिन हुआ।
(18) भारतव्यापी राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों एवं सहस्रवेदीय दीप महायज्ञों का अगले दिनों संपन्न किए जाने की घोषणा उसह दिन की गयी।
(19) क्रान्तिधर्मी साहित्य के रूप में अपने जीवन भर के चिंतन का मंथन-नवनीत इसी दिन लिखना आरम्भ किया गया एवं एक वर्ष के अन्दर इसका सृजन कर पूरे राष्ट्र को भली-भाँति मथ दिया गया।
(20) वसन्त पर्व पर महाकाल के संदेश के साथ ही परमपूज्य गुरुदेव ने ब्रह्मकमल के रूप में विकसित अपने जीवन के अस्सी वर्ष (1990 में) पूरे होने एवं सुनिश्चित अवधि में स्थूलशरीर को समेट लेने की घोषणा की। ज्येष्ठ पूर्णिमा पर 6 स्थानों पर ब्रह्म दीपयज्ञों की रूपरेखा भी इसी दिन बनाई गयी थी।
ऊपर जिन बसी सोपानों का वर्णन किया गया है, वे परमपूज्य गुरुदेव की जीवनावधि के महत्वपूर्ण मील के पत्थर कहे जा सकते है। उनके 2 जून, गायत्री जयंती, 1990 को महाप्रयाण के बाद भी यही क्रम जारी रहता है एवं सभी महत्वपूर्ण घोषणाएं उसी पावन वेला में होती रही हैं, जिनमें भारतव्यापी शक्ति जागरण (अखण्ड जप प्रक्रिया) अभियान, शपथ समारोह-आश्वमेधिक दिग्विजय अभियान प्रथा प्रथम पूर्णाहुति की घोषणा भी सम्मिलित है। अनुयाज वर्ष की सक्रिय पुनर्गठन प्रक्रिया एवं संस्कार महोत्सवों के शुभारंभ की घोषणा भी इसी पावन घड़ी में की गयी थी। यह सब जो कुछ भी हुआ, अनायास आकस्मिक रूप से नहीं हुआ वरन् एक परम मंगलमयी शुभ घड़ी के रूप में प्रत्येक कार्य को मानकर उस वर्ष से उसे आरंभ किया गया। दैवीचेतना का बाहुल्य-प्रकृति की हर श्रेष्ठ कार्य के लिए अनुकूलता, युग-परिवर्तन के लिए महाकाल की स्फुरणा का प्रादुर्भाव जैसे अविज्ञात सूक्ष्म-कारण इसमें हो सकते हैं, जिनमें अब एक महत्वपूर्ण कड़ी परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीय माताजी की सूक्ष्म-कारण सत्ता का एकाकार हो एक बड़े विराट रूप में सक्रिय हो जाने के रूप में जुड़ गयी है।
‘अखण्ड-ज्योति’ सदस्य-युग-निर्माण गायत्री परिवार के परिजन अब एक देव परिवार के सदस्य हैं एवं अगले दिनों एक महती जिम्मेदारी उनके कंधों पर सौंपी जाने वाली है। वह आत्मशक्ति के उपार्जन द्वारा युगसंधि की प्रसवपीड़ा जैसी संकटापन्न स्थिति से विश्व-वसुधा को भी उबारना-स्वयं को भी इस घनघोर घटाटोप से निकाल कर नवयुग में प्रवेश कराना। इस हेतु शाँतिकुँज का संचालन-तंत्र सतत् सबको झकझोरता एवं साधना-पुरुषार्थ हेतु प्रेरित करता रहता है। नौ दिवसीय साधना-सत्रों में इसी निमित्त आह्वान किया जाता रहता है, ताकि ऊर्जा अनुदानों से कोई वंचित न रहने पाए।
इस वर्ष एक महत्वपूर्ण अवसर और आ पड़ा है-वह है वसंत पर्व से चैत्र पूर्णिमा तक हरिद्वार में इस शताब्दी का अंतिम महाकुम्भ। अगणित परिजन इसका लाभ उठाने आना चाहते हैं, अपने साथियों को लाना चाहते हैं, अपने साथियों को लाना चाहते हैं। इसके लिए जनवरी-फरवरी की सत्र श्रृंखला यथावत रख अब 1 मार्च से 30 जून की चार माह की अवधि पाँच-पाँच दिवसीय सत्रों की श्रृंखला आरंभ की जा रही है। प्रतिमाह छह के हिसाब से ये चौबीस की संख्या में सम्पन्न होंगे। पूर्वानुमति लेकर स्वस्थ-कुछ सोद्देश्य कार्य करने के इच्छुक परिजन इन सत्रों में भागीदारी कर सकते है। इस वर्ष संस्कार-महोत्सवों की श्रृंखला को आम चुनाव के कारण जून की बीस तारीख तक आगे बढ़ा दिया गया है। जुलाई में न्यूजर्सी (अमेरिका के पूर्वी तट पर) में विराट वाजपेय स्तर का संस्कार महोत्सव एवं 251 कुण्डी महायज्ञ संपन्न होगा। इसमें प्रायः 4 लाख भारतीय व अमरीकी नागरिकों के भाग लेने की आशा हैं सितंबर के अंतिम सप्ताह में शारदेय नवरात्रि से पुनः संस्कार-महोत्सव आरंभ होकर 22 जनवरी,1999 वसंत तक समाप्त हो जाएँगे। मूलतः ये उन स्थानों पर अधिक वरीयता के साथ सम्पन्न होंगे, जहाँ बड़े विराट आयोजन अभी तक नहीं हुए। पूर्ण विराम की तिथि पूज्यवर के निर्देशानुसार 22 जनवरी, 99 ही रखी गयी है। इसके बाद सारे भारत व विश्व में साधनात्मक पुरुषार्थ को तीव्रतम गति देने के लिए क्षेत्रीय साधना-सत्र केन्द्र के अतिरिक्त चलेंगे। 1999 का यह वर्ष आयोजन प्रधान नहीं- साधना प्रधान होगा, यह ध्यान रखा जाय ताकि सन् 2000 की पूर्णाहुति के लिए जन-जन की पात्रता विकसित हो सके, संव्याप्त प्रदूषण जो सूक्ष्म जगत में बढ़ता जा रहा है, मिट सके।
अभी इस वसंत से आगामी वसंत तक जिन सात समारोहों के द्वारा रचनात्मक क्रान्ति का तुमुलनाद किया गया था-उन्हें प्रान्तीय-क्षेत्रीय स्तर पर सम्पन्न किए जाने एवं जिले के स्तर पर ऐसे शपथ समारोह आयोजित करने की योजना अविज्ञात के गर्भ में पक रही है, जिससे संपूर्ण क्रान्ति की तैयारी हेतु एक करोड़ प्राणवान कार्यकर्ता तैयार किये जा सकें। विश्वास किया जाना चाहिए कि प्रत्येक परिजन इसमें बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी करेंगे- प्रतिभा रूप में प्राप्त अनुदान का सुनियोजन करेंगे एवं गुरुसत्ता के ‘इक्कीसवीं सदी के उज्ज्वल भविष्य’ के स्वप्न को साकार करने हेतु पृष्ठभूमि बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रखेंगे। अगला अंक ‘युग परिवर्तन’ अंक है। इसमें प्रस्तुत वसंत के इन निर्धारणों को विस्तार से परिजन पढ़ सकेंगे। कभी न चूका जाय, ऐसा समय अब आ गया है। जरा-सा भी प्रमाद अन्यमनस्कता हमें वर्षों पीछे धकेल कर किन्हीं और से यह कार्य करा लेगी। श्रेय लेने वाले आदर्शवाद को घाटे का सौदा न मानकर आगे आयें एवं एक स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता का माहौल बनाएँ, यही सबसे अपेक्षा है।
“समय नहीं है,” यह शिकायत हर किसी की है। मरने के लिए भी समय नहीं है- कहा यही जाता है। हालाँकि बहुत-से लोग निकम्मे-निठल्ले बैठे रहते है-देखा यही जाता है। सम्भवतः ऐसे लोग मरने के आलस के कारण जिन्दा हैं। पर कालदेवता की घण्टी बज रही है। समय तो निकालना ही होगा, कम से कम इन बारह कामों के लिए सच्ची कोशिश हो सके, तो फिर लगेगा हमारे पास समय ही समय है।
1. प्रार्थना के लिए-इससे संसार की धुँध आँखों से हटेगी।
2. सत्संग के लिए-यह प्रसन्नता का झरना है।
3. सत्कार्य के लिए-यह सफलता का मूल्य है।
4. चिन्तन-मनन के लिए-यह शक्ति का स्रोत है।
5. स्वाध्याय के लिए- यह ज्ञान की बुनियाद है।
6. ध्यान के लिए-यह उत्थान का राजमार्ग है।
7. सेवा के लिए-जीवन की संजीवनी बूटी है।
8. हँसने के लिए-जिन्दगी के भार को हल्का करने वाला पथगीत है।
9. सम्मान देने के लिए-यह निश्छल प्यार का निर्झर है।
10. खेल के लिए-यह चिरयौवन का रहस्य है।
11. स्वयं को जानने के लिए-आत्मज्ञान का अमृत मिलेगा
12. नवयुग के निर्माण के लिए-स्वयं के उज्ज्वल भविष्य की चमक दिखाई देगी।
ये बारह कार्य जीवन सूर्य की द्वादश रश्मियाँ हैं। जिनसे निकलने वाला प्रकाश जिन्दगी की हर दिशा को प्रकाश व उल्लास से भर देगा।
*समाप्त*