हममें सेवा करने की चाहत तो है, परंतु हमारे हृदय में इससे कहीं अधिक ललक अपने नाम और ख्याति की है। सेवा-धर्म-प्रेम का मार्ग है। प्रेम में व्यापार नहीं होता, पर हम एक व्यवसायी की भाँति प्रेम के वशीभूत हो सेवा कहाँ करते हैं? हम तो एक प्रकार से अहसान करते हैं। जितना करते हैं, उससे अधिक उसका अहंकार करते हैं। सेवा-साधना तो अपने को समाज का अंग मानकर उसके लिए अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करना भर है। यह कोई अतिरिक्त अनुदान नहीं, जो हम समाज को देते हैं। हमारी भावना तो यह रहती है, मानो हम किसी को ऋण दे रहे हों। हम सेवा के लिए समय-साधनों आदि का विनियोग करते हैं। उन्हें इस दिशा में लगाने की क्षमता का विकास भी करते हैं, किन्तु अपनी निश्छल भावना का उपयुक्त विकास करना चूक जाते हैं।
हम सेवाकार्य में त्याग करते हैं, पर त्याग के अभिमान को नहीं छोड़ते। अभिमान के कारण भेद एवं विश्रृंखलताएँ उत्पन्न होती हैं केवल तप, त्याग और बलिदान के द्वारा ही उन्हें हटाया जा सकता है।
क्या हमारे हृदय में सात्विक भावना मौजूद है? समाज, सभाएँ, आश्रम सभी कुछ मौजूद हैं। ये सब अपना-अपना काम कर रहे हैं। समाजसेवा का कार्य जो भी, जैसा भी और भी जितना भी होता है, वह अच्छा ही है। परन्तु दुःखी प्राणियों और पीड़ित वर्ग की गुप्त सेवा करने वाले लोग कहाँ हैं? हमारे हृदय में निर्धनों और निर्बलों के प्रति प्रेम एवं आदर का अभाव है। यह ठीक है कि बहुधा सेवा अपने से कम साधन वालों की ही की जाती है। पर इसका यह अर्थ तो नहीं कि उन्हें हीन तथा तिरस्कृत माना जाए। यह भाव रहते सेवा तो कभी हो ही नहीं सकती। जब हम यह मानें कि इनका भी कुछ हक है जो इन्हें मिलना चाहिए, तभी सेवा की सार्थकता है अन्यथा भ्रान्त दृष्टिकोण से तो अहंकार ही बढ़ेगा।
कुछ व्यक्ति आध्यात्मिक जीवनयापन करते देखे तो जाते हैं, पर गरीबों-असहायों को शीतल छाया बिलकुल भी नहीं देते। इस सजला, सुफला, शस्यस्यामला भारतभूमि पर लाखों नर-नारी अन्न-वस्त्र दवा-दारु सेवा-सहायता के बिना आए दिन तड़प-तड़प कर अपने प्राण गँवा रहे हैं और हम अपने नाम, प्रतिष्ठा और अधिकार के मद में उस ओर देखते तक नहीं। परहित के लिए हड्डियाँ तक दे डालने वाले दधिचि जैसे ऋषियों की भूमि में गुप्तदान और गुप्त-सेवा आदि की पवित्र, सात्विक भावनाओं के प्रति आदर क्या एकदम उठ गया? लगता है-त्याग निस्पृहता एवं संवेदना अब इस जगत में नहीं रही। परन्तु परमात्मप्रेम की ज्योति आज भी बुझी नहीं है। वह परम ज्योति जितने अन्तःकरणों को छू सके, उनमें प्रकाशित हो सके, प्रज्ज्वलित हो सके, उतना ही शुभ होगा। इस शुभ में ही सेवा का मर्म निहित है
मानवीसत्ता के दो भाग हैं-एक का नाम जड़ है, तो दूसरा भाग चेतन कहलाता है। दोनों का सम्मिलित स्वरूप ही प्रत्यक्ष दीखने वाला मानव है। शरीर जड़ है और यह पंचतत्वों से बना है। इसके अंदर चेतन आत्मा का निवास है। शरीर की भौतिक प्रगति के क्षेत्र में भौतिक विज्ञान समर्थ है, जिसकी पहुँच जड़ पदार्थों तक ही सीमित है। आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में समर्थ विद्या का नाम अध्यात्म है-अध्यात्म अर्थात् अपने आप का विज्ञान। अध्यात्म, चेतना का विज्ञान है। जड़ शरीर के लिए जड़ जगत से साधन उपक्रम अपनाने पड़ते हैं और उन्हें जुटाने के लिए भौतिक विज्ञान की विद्या अपनानी पड़ती है। ठीक इसी प्रकार आत्मा को चेतना की प्रगति और समृद्धि के लिए चेतना विज्ञान का सहारा लेना पड़ता है। अध्यात्म विज्ञान का प्रयोजन इसी महती आवश्यकता की पूर्ति करता है।
आत्मोत्कर्ष के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जो कुछ उपाय-उपक्रम अपनाना या करना होता है, उसी का नाम उपासना एवं साधना है। इसे दो पहियों पर चलने वाली आत्मिक प्रगति की यात्रा कह सकते हैं। जिस प्रकार इन्द्रियजन्य वासनाओं और तृष्णाओं की पूर्ति भौतिक साधन-सामग्री के आधार पर होती है, उसी प्रकार आन्तरिक समाधान, संतोष, आनन्द की-उल्लास की असीम शान्ति भरी स्थिति अध्यात्म विज्ञान के आधार पर उपार्जित सम्पदाओं से होती है। नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, लघु से महान, आत्मा से परमात्मा बनने का अवसर इसी पथ पर चलने से मिलता है। नर-पशु को देवता बनाने की स्थिति इसी प्रयास द्वारा संभव होती है। अगणित ऋद्धि-सिद्धियों की राह यही है। महामानव, देवदूत एवं ऋषिकल्प स्थिति प्राप्त करने का यही आधार-अवलम्बन है। जीवनलक्ष्य की पूर्ति इन्हीं प्रयत्नों से संभव होती है।
आत्मोत्कर्ष के पथ पर अग्रसर करने वाले अध्यात्म विधि-विज्ञान की दो धाराएँ हैं-आत्मदर्शन और विश्वदर्शन। इन्हें आत्मबोध और तत्त्वबोध भी कहते हैं। ब्रह्मविद्या का समग्र ढाँचा इन्हीं दो धाराओं की सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक विधि-व्यवस्था समझाने के लिए खड़ा हुआ है। आत्मबोध के अंतर्गत आत्मसत्ता के स्वरूप, लक्ष्य, धर्म, चिन्तन एवं कर्तव्य की वस्तुस्थिति समझी-समझाई जाती है और तत्त्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक सम्बन्धों एवं कर्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ सम्बन्ध बनाते हुए परिवार तथा समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निर्धारण किया जाता है। अध्यात्म जगत की यह दो धाराएँ-पवित्र गंगा-यमुना कही जाती हैं। इनका संगम तीर्थराज प्रयाग है, जिसमें स्नान करने से परम पुरुषार्थ का पुण्यफल प्राप्त होता है।
महाशक्ति गायत्री की उच्चस्तरीय साधना में साधकों को आत्मबोध और तत्त्वबोध की दोनों साधनाओं का समन्वय करना पड़ता है। इन दोनों साधनाओं का लक्ष्य एक ही है। दोनों एक-दूसरे पर अन्योऽन्याश्रित हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं। इसके लिए ध्यानमुद्रा में बैठकर सामने एक बड़े दर्पण में वक्षस्थल से ऊपर का अपना शरीर ध्यानपूर्वक देखना चाहिए और उसका दार्शनिक विवेचन-विश्लेषण गंभीर मनःस्थिति में करना चाहिए। यही आत्मबोध की प्रत्यक्ष विधा है।
वेदान्त के स्वर्णिम सूत्र आत्मसत्ता का निरूपण करते हुए कहते हैं-तत्त्वमसि अयमात्माब्रह्म, प्रज्ञानं ब्रह्म, सोऽहम्, शिवोऽहम्-सच्चिदानंदोऽहम् इन विवेचनाओं में आत्मसत्ता को ब्रह्मसत्ता का एक अविनाशी अंश एवं अभिन्न घटक बताया गया है। वस्तुतः वह वैसा ही है भी। रामायणकार के शब्दों में-ईश्वर जीव अंश अविनाशी’ ही नहीं, ‘ईश्वर जीवहि नहि कछु भेदा’ भी है, परन्तु भ्रान्तियों और मलीनताओं के कीचड़ में फँसाकर उसे उसी तरह दीन-दयनीय बना दिया गया, जिस प्रकार भारी दलदल में गरदन तक फँसा हुआ हाथी अपने उद्धार का कोई मार्ग न पाकर हृदय विदारक करुण क्रन्दन करता है। प्रायः हर व्यक्ति भवबन्धनों से बँधा हुआ, दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का सताया हुआ रुदन-क्रन्दन करता हुआ संक्षोभों की आग में जलता हुआ जी रहा है।
दर्पण में अपना स्वरूप देखते हुए आत्मबोध के साधक को अपनी इसी दयनीय स्थिति पर करुणा व्यक्त करनी चाहिए। ईश्वर का अविनाशी अंश इस धरती पर ईश्वरीय प्रयोजन पूरे करने के लिए-पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आया था। पर वह सब तो एक प्रकार से सर्वथा विस्मरण ही हो गया। पैर उस जाल-जंजाल में फँस गया, जिसे आटे की गोलियों के लोभ में गला फँसाने वाली मछली, पिंजड़े में फँसे हुए चूहे के समतुल्य दुर्दशाग्रस्त स्थिति कहा जा सकता है।
शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के उपरान्त एक बार ही मनुष्य जन्म मिलता है। वह चाहे तो ईश्वरीय निर्देश और अध्यात्म-कर्तव्य का पालन करते हुए पूर्णता के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है और अपूर्णता से पूर्णता का वरण कर सकता है। यदि वैसा न करके मनुष्य पशुता एवं पैशाचिकता की दुष्प्रवृत्तियों में उलझ पड़े तो उसे फिर चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने का दीर्घकालीन दुस्सह दुख सहना ही पड़ेगा। यदि कोई चाहे तो मनुष्य जन्म का सदुपयोग करके भवबन्धनों के कुचक्र से निकल सकता है, अन्यथा फिर अपने सामने कोल्हू में पेले जाने और चक्की में पीसे जाने की स्थिति आँखों के सामने खड़ी है।
दर्पण के सामने बैठकर अपनी छवि शीशे में देखते हुए आत्मविश्लेषण किया जाता है। ईश्वर का अविनाशी राजकुमार-विश्व में सुरम्य परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए नियुक्त किया गया विशेष प्रतिनिधि-पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकने के सुअवसर से सम्पन्न सौभाग्यशाली-यह है जो दर्पण में बैठा हुआ है। इसके काय-कलेवर में ईश्वर की समस्त शक्तियाँ और विभूतियाँ भरी पड़ी हैं। इसका एक-एक कण ऐसी विशेषताओं से सँजोया गया है कि वह चाहे तो सहज ही महामानवों की, देवदूतों की पंक्ति में बैठ सकता है।
सूक्ष्मरूप में मानव शरीर में समस्त देवताओं की, ऋषियों की दिव्यसत्ता विद्यमान रहती है, उसे थोड़ा भी पोषण मिले तो यह बीज विशालकाय वट-वृक्ष में परिणत होकर अपने को धन्य और विश्वमानव को सुसम्पन्न बना सकता है। इसमें गाँधी, बुद्ध, ईसा, आद्य शंकराचार्य, रामकृष्ण बनने की परिपूर्ण संभावनाएँ हैं। इतना सब कुछ होते हुए भी अवांछनीय गतिविधियाँ अपना ने के कारण यह दर्पण में बैठा हुआ महामानव किस दयनीय दुर्दशा से ग्रसित हो रहा है, यह कैसे आश्चर्य और दुर्भाग्य की बात है। लोभ और मोह के, वासना और तृष्णा के, स्वार्थ और संकीर्णता के बन्धनों ने इसे किस बुरी तरह जकड़ रखा है। जीभ और जननेन्द्रियों का गुलाम बनकर इसने अपने शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य को किस बुरी तरह चौपट कर डाला। परिवार के उचित उत्तरदायित्वों को निबाहना और परिजनों को सुसंस्कृत बनाना तो कर्तव्य था, पर उनके लिए ही सब कुछ करना, उन्हीं की इच्छानुकूल चलना-यह कहाँ की बुद्धिमानी थी? आत्मकल्याण के-देश धर्म, समाज और संस्कृति के समस्त कर्तव्यों से इसी निमित्त मुख मोड़ लेना, यह कहाँ की समझदारी थी? कुत्साओं और कुंठाओं से ग्रसित जीवनक्रम और स्वरूप बना लेने की उसी की पूरी जिम्मेदारी है, जो इस दर्पण में बैठा है। मकड़ी का जाला उसी ने बुना है और उसमें स्वयं फँसा है। वह चाहे तो जाल को समेट कर पेट में फिर भर सकता है और स्वच्छन्द विचरण, जीवनमुक्ति की स्थिति प्राप्त कर सकने में पूर्ण सफल हो सकता है।
दर्पण में दृष्टिगोचर प्रतिबिम्ब के सहारे आत्मविश्लेषण की अधिक गहराई में प्रवेश किया जा सकता है और पतन-पराभव की स्थिति से ऊँचे उठकर उत्थान के उच्च शिखर पर पहुँच सकने का पथ-निर्धारण किया जा सकता है। भविष्य के लिए ऐसी सुसंतुलित गतिविधियों का निर्धारण किया जा सकता है, जिसमें भौतिक और आत्मिक उत्तरदायित्वों के निर्वाह की सुसंतुलित गुँजाइश बनी रहे।
दर्पण एक माध्यम है आत्मबोध का। आमतौर से हम बाह्य जगत में इतने घुले और व्यस्त रहते हैं कि अपने को एक प्रकार से भूल ही बैठे होते हैं। याद तो शरीर और मन की क्षुधा एवं तृष्णा-वासना ही रहती है। आत्मचेतना भी कुछ होती है, हम भी आत्मा हैं और आत्मा के कुछ अपने स्वार्थ और कर्तव्य भी हैं क्या? यह बात पढ़ी-सुनी तो कई बार होती है, पर उसने तथ्य के रूप में कभी हृदय की गहराई तक प्रवेश नहीं किया होता। यदि आत्मबोध की यथार्थता अन्तःकरण में सजग हुई होती तो निश्चित रूप से भौतिक सुख-सुविधाएँ प्राप्त करने की तरह आत्मोत्कर्ष के लिए भी कुछ करने की प्रेरणा उठी होती और उस दिशा में भी कुछ तो बना ही होता।
अकेला दर्पण आत्मबोध, आत्मदर्शन करा दे, यह किसी भी प्रकार संभव नहीं। यदि ऐसा होता तो प्रायः हर व्यक्ति दिन में कई-कई बार दर्पण में अपना चेहरा देखता और सजता-सँवरता रहता है, पर इसे उससे मिलता क्या है-मात्र आत्मप्रवंचना और छद्म-अहं की तुष्टि। परन्तु जब यही दर्पण आत्मसाधना का माध्यम बन जाता है, तो वह उपासनात्मक प्रतीक का कार्य करने लगता है। पूजा-उपासना के पीछे जो प्रेरणाएँ भरी पड़ी हैं, उनसे प्रभावित होकर उपयुक्त
चिन्तन और कर्तृत्व अपनाते हुए दिव्यजीवन की रीति-नीति अपनायी जा सके तो ही इन उपासनात्मक कर्मकाण्डों का महत्व है। आत्मबोध की विचारधाराओं से अन्तःकरण को भरने में सहायता करना ही दर्पण-उपकरण का उद्देश्य है। उसी प्रकार पूजा का उपयोग यही है कि वह जीवन-निर्माण की प्रेरणाओं को उभारें और उन्हें सक्रिय बनाये।
आत्मबोध की-आत्मविश्लेषण की साधना के द्वारा प्रायः सम्बन्धित सभी समस्याओं पर प्रकाश पड़ जाता है। आत्मबोध, आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार और आत्मविकास की पृष्ठभूमि क्या हो सकती है? आस्थाओं, आकांक्षाओं में क्या हेर-फेर होना चाहिए, गतिविधियों में रीति-नीति में एवं कार्यपद्धति में क्या उलट-पलट की जानी चाहिए, इसकी एक प्रभुप्रेरित रूप-रेखा सामने आती है।
यदि प्रस्तुत दिव्य-संदेशों को अन्तःकरण की गहन भूमिका में प्रतिष्ठापित किया जा सका और उन्हें क्रियारूप में परिणत करने का प्रबल पराक्रम भरा आत्मबल उपलब्ध हो सका तो समझना चाहिए कि दर्पण के माध्यम से की जाने वाली आत्मबोध की साधना गायत्री माता का दिव्य-वरदान बनकर सामने आयी। आत्मबोध से लाभान्वित ऐसी आत्माओं की प्रत्येक विचारणा एवं प्रत्येक क्रियापद्धति में मात्र आदर्शवादिता ही उभरती, छलकती दिखाई पड़ती है। भगवान बुद्ध को जिस दिन आत्मबोध हुआ, उसी दिन से वे दिव्य मानव बन गये। बुद्ध को सामान्य राजकुमार से भगवान बना देने का श्रेय उस आँतरिक जागरण को ही दिया जाता है, जिसे ‘आत्मबोध’ के रूप में पुकारते हैं। यह दिव्य उपलब्धि जिसे भी मिल सकेगी, वह बुद्ध की तरह उसी मार्ग पर चलने वाला और वैसा ही सत्परिणाम प्राप्त करने का अधिकारी माना जाएगा। *
‘हरि नारायण गोविन्द! माधव मोहन मुकुंद। देवर्षि की वीणा की झंकार आयी और गन्धर्वों के वाद्य मूक हो गए। अप्सराओं के नृत्यचपल पग रुक गए। देवराज इन्द्र अपने आसन से शीघ्रतापूर्वक उठे और उन्होंने पारिजात के सुमनों की अंजलि ली। अब देवर्षि ऐसे तो नहीं हैं कि किसी को अर्चना का पूरा अवसर दें। उन्हें इसकी अपेक्षा तो क्या रहेगी, दृष्टि भी इधर नहीं देते कि किसने कब उनके पदों में प्रणिपात किया। सुरपति एक सुमनाँजलि उनके श्रीचरणों में अर्पित कर लें, इतना ही सौभाग्य कम नहीं है।
देखता हूँ! शतक्रतु अब भी सावधान नहीं है, जबकि अमरावती का ऐश्वर्य किसी क्षण उनसे छीन लिया जा सकता है। पुष्प-पराग के मृदुल आस्तरण पर प्रणति के पश्चात् सुर एवं सभासद बैठें, इसके पूर्व ही देवर्षि की वाणी ने सबको आतंकित कर दिया। इतना प्रमाद देवधानी के अधीश्वर को शोभा नहीं देता।
क्या हुआ? कोई असुर आ रहा है? दैत्येन्द्र बलि तो रसातल में हैं और अभी तो यह केवल अट्ठाइसवीं चतुर्युगी है। उनके इन्द्रासन पर आने का समय तो इस मन्वन्तर के पश्चात् होगा। उनका कोई आश्रित! कोई अन्य दानव, राक्षस! मय ने तो कोई नवीन त्रिपुर नहीं बना डाला? उसके लिए कुछ असम्भव नहीं है। कोई तपस्वी? धरा पर तो कलियुग चल रहा है। निष्प्राण से हैं आजकल मर्त्यलोक के निवासी। वहाँ न आज दीर्घकालीन तप सम्भव है और न अश्वमेध महायज्ञों की अविच्छिन्न परम्परा ही संभव है।
देवता, गन्धर्व, किन्नर, अप्सराएँ कोई बोल नहीं रहा था, किंतु देवता संकल्प की भाषा में बोलते हैं। वाणी के मूक रहते हुए भी वहाँ एक व्याकुल कोलाहल उनके अंदर व्याप्त हो रहा था।
भारत की पुण्यधरा के प्रति सुरपति सावधान नहीं रहेंगे, तो किसी क्षण अमरावती से निष्कासित कर दिए जा सकते हैं। आसन पर बैठते-बैठते देवर्षि ने चेतावनी दी। जहाँ नारायण को बार-बार आने को विवश कर दिया जाता है, वहाँ सुरपति का सेव्य कब, कौन, कहाँ है? इस सम्बन्ध में सावधानी रखनी चाहिए। अधिकारी की उचित सेवा नहीं होगी तो क्या सर्वेश्वर इन्द्र को लोकपालधिप बने रहने देंगे?
कौन हैं वे महाभाग? सहस्राक्ष तो प्रयत्न करके भी धरा पर-भारतीय धरा पर भी ऐसा कोई नवीन तपस्वी, कोई त्यागी अथवा सिद्ध नहीं देख पाते। कलाप ग्राम के महायोगियों अथवा भगवान दत्तात्रेय के आश्रितों से उन्हें कोई भय नहीं है। जो थोड़े-से अमरपुरुष-ऋषि आदि हैं, उनसे वे परिचित हैं। उनका आशीर्वाद प्राप्त है उन्हें। अब यह नवीन स्थिति किधर से आयी है, वे कुछ समझ नहीं पाते।
देवेन्द्र केवल योग, तप, यज्ञ और त्याग ही देख पाते हैं-देवर्षि ने आक्षेप किया। परात्पर ब्रह्म भावाधीन है, यह वे प्रायः भूल जाते हैं। आद्याशक्ति की भक्ति करने वालों पर देवराज की दृष्टि जाती ही नहीं।
वे तो स्रष्टा के भी वंदनीय हैं, इन्द्र ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाया। किन्तु वे नित्य, निष्काम एवं अहैतुक कृपालु-उनकी सेवा भला इन्द्र क्या करेगा? और उनसे किसी को क्या भय हो सकता है।
वे कब क्या करेंगे, यह भी कैसे कहा जा सकता है। देवर्षि ने कहा-अब इस आदिशक्ति गायत्री के साधक विद्यारण्य को ही ले लो। कब उसके मन में क्या इच्छा होगी, किस कामना को वह झिड़क देगा और किसे पकड़ लेगा-देवी वीणापाणि भी बता सकती हैं क्या?
भगवती सरस्वती कुछ क्षण पूर्व ही सुरसभा में पधारी थीं और देवराज ने उनकी अर्चा की थी। देवर्षि ने इस बार उनकी ओर संकेत किया।
वह पराशक्ति का स्नेहलालित शिशु। वाणी की अधीश्वरी का स्वर भी वात्सल्यविभोर हो उठा-उसे तो प्यास लगे तो भी मचलकर पुकार सकता है-निखिलेश्वरी-को उसका रोष-उसका मचलना-वह कहाँ निष्काम है। किन्तु उसकी कामना ने जो आश्रय लिया है। किसकी शक्ति है, जो उस हृदय की छाया का स्पर्श कर सके।
वह सकाम है तो सुरों के लिए आतंक नहीं बन सकता। महेन्द्र की दृष्टि कामदेव की ओर उठी।
मुझे आशा करनी चाहिए कि इन कुसुम कलेवर देवता को उधर भेजने की अज्ञता देवाधीश नहीं करेंगे। उठते-उठते देवर्षि ने चेतावनी दी। वह कोई योगी-तपस्वी नहीं है कि कामना के जागरण से उसकी अर्जित साधना क्षीण होगी। कहीं उसके मन में स्वर्ग को भोग लेने की इच्छा आ गयी-तो कल छिनती अमरावती आज और अभी छिन जाएगी। वह माँ! कहकर मचलेगा तो महेश्वरी सौ अश्वमेधों की मर्यादा भूल जाएँगी। उसमें कामना न जगे, देवधानी वहीं तक निश्चिन्त रह सकती है।
देवर्षि तो परिव्राजक हैं। वे कहीं जमकर बैठना जानते नहीं। वे चले गए, किन्तु बड़ी आशंका दे गए। सृष्टि में एक ऐसा साधक हो गया है, जो इच्छा करते ही इन्द्र पद पर आ धमकेगा और उसे अवरुद्ध करने का कोई उपाय सुरों के समीप नहीं है। केवल उसकी सद्भावना पर निर्भर रहना है। कितनी असहाय स्थिति है यह।
मैं कोई सहायता सुरपति की नहीं कर सकती। देवराज कुछ कहें, इससे पूर्व ही भगवती सरस्वती ने उन्हें निराश कर दिया। कोई माता अपने शिशु का किंचित् अहित सोच भी नहीं सकती। देवराज जानते हैं कि महाशक्ति गायत्री की ही ज्योति रमा, उमा और मुझमें प्रतिफलित हैं और जहाँ उनका सहज वात्सल्य सक्रिय होता है, हमारा स्नेह वहाँ सहज प्रवाहित होता है।
देवेन्द्र सोचने लगे-देवर्षि के वचनों के बारे में, वे सुरपति के सेव्य हैं। उन्होंने निश्चय किया, जहाँ दण्ड और भेद की नीति न चल सकती हो, साम और दान वहाँ दुर्बल के आश्रय हैं। उन्हें यह उचित लगा कि उन महाभाग से परिचय कर लिया जाए। उन्हें यदि किसी प्रकार कृतज्ञ बनाया जा सके, अमरावती निःशंक हो जाएगी उनकी ओर से।
“वरं ब्रूहि। सुप्रस्नोऽस्मि।” विद्यारण्य अपनी प्रातः कालीन साधना समाप्त करके आसन से उठने ही वाले थे कि उनका उपासना-कक्ष प्रकाश से पूर्ण हो गया। उनके सम्मुख दिव्याम्बर धारी, रत्नकिरीटी, वज्रधर इन्द्र प्रकट हो गए थे।
आपके आयुध के कारण मैं समझता हूँ कि आप देवराज हैं। इस मानव का अभिवादन स्वीकार करें। विद्यारण्य ने दण्डवत प्रणाम तो नहीं किया-किन्तु हाथ जोड़कर मस्तक झुका लिया। आप आ ही गए हैं, तो अतिथि के समान मेरी अर्चा स्वीकार करें।
“वरं ब्रूहि।” देवराज ने अर्चा के उपरान्त पुनः आग्रह किया।
आप जानते हैं कि मैंने आवाहन नहीं किया था। मैं आपका आराधक नहीं हूँ। विद्यारण्य के स्वर में अतिशय नम्रता के साथ अद्भुत दृढ़ता थी-मैं कंगाल नहीं हूँ कि याचना करूँगा। भिक्षाजीवी मैं हूँ नहीं। आप स्वतः पधारे, आपने मुझ मानव पर कृपा करके दर्शन दिया-आपके औदार्य से, आपकी कृपा से मैं अनुग्रहीत हुआ। विद्यारण्य ने देवराज को बोलने का अवसर ही नहीं दिया। वे कह रहे थे-मैं उन आदिशक्ति माँ गायत्री का पुत्र हूँ, जिनके भ्रूभंग से कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड बनते और मिटते रहते हैं। महाकाल भी जिनके भय से कम्पित होता रहता है लक्ष्मी जिनकी कृपा की कामना दूर करबद्ध खड़ी होकर करती है, उनके शिशु को आप वरदान देंगे?
देवराज की अंगकान्ति मलीन हो उठी। उन्हें लगा कहीं यह अद्भुत व्यक्ति मेरे इस प्रयत्न को अपना अपमान मानकर रुष्ट न हो जाए, कोई भिक्षुक यदि सम्राट से कहे कि मुझसे कुछ माँग ले तो भिक्षुक का अहंकार क्या सम्राट का अपमान नहीं है। सम्राट असन्तुष्ट हो उठे-उन्हें दोष कैसे दिया जा सकेगा?
आप मुझे वरदान देने पधारे, इस आपके भोलेपन से मुझे प्रसन्नता हुई है। विद्यारण्य की वाणी ने इन्द्र को आश्वस्त किया। आप ‘पधारें।’ जिनके पुत्र को आपने प्रसन्न करने का प्रयत्न किया, वे कृपामयी आपको पुरस्कृत करेंगी।
पुरस्कार तो उन्हें मिल चुका था। वे यह आश्वासन लेकर अमरावती लौट रहे थे कि इस महामानव से उन्हें कोई भय नहीं है। इन्द्र जैसे देवता के तुच्छ पद की कामना उनके अन्तर में कभी उठेगी, इसकी कोई सम्भावना नहीं है।
परन्तु उनके मन में एक अद्भुत जिज्ञासा बनी रही, जिसे उन्होंने देवगुरु बृहस्पति के सामने प्रकट करते हुए कहा-वे नितान्त निष्काम भी नहीं लगे मुझे और उनकी सकामता भी मेरी प्रज्ञा ग्रहण नहीं करती।’
मनुष्य के पुरुषार्थ चार ही हैं-अर्थ धर्म काम और मोक्ष। अर्थ और काम की उपलब्धि संसार में जिस सीमा तक सम्भव है, देवराज इन्द्र की कृपा उसे सहज दे सकती है और धर्म से, यज्ञ-योगादि से, तप-त्याग से जिस स्वर्ग की उपलब्धि होती है, उसके वे स्वामी हैं। वे स्वयं वरदान देने पहुँचे और उपेक्षित कर दिए गए। त्रिवर्ग ही तो ठुकराया उन महाभाग ने।
अपवर्ग की बात भी इन्द्र नहीं समझ पाते। अपवर्ग के लिए चित्त में कामना का लेश भी नहीं होना चाहिए। विद्यारण्य का चित्त निष्काम नहीं है, यह देवराज देख सकते हैं। कामनाएँ मिटें, घटें-निष्काम उपासना ही महाशक्ति की, की जाए, ऐसा भी कोई प्रयत्न उस साधक में नहीं है। कैसा है यह साधक? क्या होना है उसका?
उनकी कामनाएँ, कामनाएँ नहीं हैं इन्द्र! देवगुरु ने सुझाया। भुने हुए बीज उगा नहीं करते। परात्पर-तत्व से युक्त होकर कामना, कामना नहीं रह जाती।
किन्तु लौकिक कामनाएँ चित्त में उठती हैं। इन्द्र अपनी बात को स्पष्ट नहीं कर पाते, यह वे अनुभव कर रहे हैं।
शिशु अपनी माँ से कुछ न चाहे, ऐसा तो कोई नियम नहीं है। देवगुरु कह रहे थे। वह अपना परमकल्याण भी माँ से चाहता है और भोजन-वस्त्र भी। उसकी लौकिक कामना भी उपासना है। उसकी लौकिक इच्छा भी अपनी माँ को सन्तुष्ट करने, उन्हें प्रसन्न करने के लिए है। उसकी इच्छापूर्ति करके उसकी माँ को प्रसन्नता होती है। कामना ही हो उसकी-वह उस कामना को लेकर भटकता कहाँ है। वह कामना भी तो उसे जगतमाता के समीप ही ले जाती है।
जब कोई परात्पर-तत्व को अपना मान लेता है। वह माता-पिता भाई-स्वामी कुछ भी उसे स्वीकार करके सर्वथा उसी पर निर्भर हो जाता है, तो वह पूर्णतत्व उसका हो जाता है। देवगुरु ने अत्यन्त स्नेहपूर्वक समझाया। पूर्णतत्व से युक्त होकर तो द्वेष, काम, भय आदि की वृत्तियाँ भी मुक्तिदायिनी हुई हैं। चित्त आनन्दघन में लगा हो, बस यही तो अपेक्षित है।
इन्द्र ने मस्तक झुका लिया। उनका यही क्या कम सौभाग्य है कि वे ऐसे महापुरुष के साथ प्रत्यक्ष कुछ क्षण व्यतीत कर आए हैं। असुर भी मुक्त होते हैं जिनसे द्वेष करके, उनसे प्रेम करने वाले की सकामता का परीक्षण करने की आवश्यकता भला इन्द्र को क्या हो सकती है। तुम चतुर्वर्ग की सीमा में सोच रहे थे, यही भ्रम का कारण था। देवगुरु ने स्नेहपूर्वक दृष्टि उठाई। वेदमाता गायत्री की भक्ति मानव का पंचम पुरुषार्थ है-ऐसा सार्वभौम पुरुषार्थ कि उसके अंक में केवल शेष पुरुषार्थ ही नहीं, पुरुषोत्तम स्वयं समा जाता है।
परम पूज्य गुरुदेव का विशेष लेख (पुनर्प्रकाशित)
संसार में अवांछनीयता कम और उत्कृष्टता अधिक है। तभी तो यह संसार अब तक जीवित है। यदि पाप अधिक और पुण्य स्वल्प रहा होता तो अब तक यह दुनिया श्मशान बन गई होती। यहाँ सत्य, शिव और सुंदर इन तीनों में से एक का भी अस्तित्व जीवित न रहा होता। आग दुनिया में बहुत है, पर पानी से अधिक नहीं। इतने पर भी हम देखते हैं कि अनाचार घटता नहीं, बढ़ता ही जाता है। सरकारी प्रयत्न रोकथाम के लिए काफी बढ़ाये गये हैं, पर उनकी पकड़ में दुष्टता की पूँछ भर आती है। सारा कलेवर तो जहाँ का तहाँ जमा बैठा रहता और अपना विस्तार करने में संलग्न रहता है। आश्चर्य इस बात का है कि सज्जनता का स्पष्ट बहुमत होते हुए भी दुष्टता क्यों पनपती और फलती-फूलती चली जाती है? रोकथाम की सर्वजनीन आकांक्षा क्यों फलवती नहीं होती? असुरता की शक्ति क्यों अजेय बनती जा रही है? देवत्व उसके आगे पराजित होता और हारता, झक मारता क्यों दिखाई देता है?
विचार करने पर स्पष्ट होता है कि पाप-शक्ति स्वल्प है। बलवान चोर घर में घुसे और घर-मालिकों में से कुछ स्त्री, बच्चे जग पड़ें, कुत्ते भौंकने लगें तो उन्हें तत्काल उलटे पैरों भागना पड़ता है। स्पष्ट है-पाप अत्यन्त दुर्बल होता है। प्रकारान्तर से दुर्बलता ही निकृष्टता के रूप में परिणत होती है। सत्य में हजार हाथी के बराबर बल बताया गया है। परन्तु उसके हराने और असत्य के मजबूती से पैर जमाये रहने का कुछ तो कारण होना ही चाहिए। वह यह है कि जन-मानस में से उस रोष-आक्रोश का, शौर्य-साहस का अस्तित्व मिटा नहीं तो घट अवश्य गया है, जिसमें अनीति की चुनौती स्वीकार करने की तेजस्विता विद्यमान रहती है। इस कसौटी पर औसत आदमी बड़ा डरपोक, कायर, दब्बू, संकोची, पलायनवादी और कुछ-कुछ वैसा ही बन जाता है, जैसा कि गीता का विषादग्रस्त अर्जुन था। उसमें रोष-आक्रोश उत्पन्न करने के लिए ही भगवान को गीता सुनानी पड़ी और अपने प्राणप्रिय मित्र को क्लीव, क्षुद्र, दुर्बल, अनार्य आदि एक से एक कड़ुई गालियों की झड़ी लगाने की आवश्यकता अनुभव हुई।
अर्जुन समझौतावादी, संतोषी प्रकृति का और सज्जन दीखता है। वह क्षमा करने, संतोष रखने की नीति अपनाना चाहता है और भीख आदि के सहारे संतुष्ट रहना चाहता है। युद्ध का कटु प्रसंग उसे अच्छा नहीं लगा। आज हम सब की मनःस्थिति ऐसी ही हो गई है कि झगड़े में न पड़ने, किसी तरह झंझट काट लेने, अनाचार से निगाह चुरा लेने की बात में ही भलाई देखते हैं। यह भलाई दिखाने वाली सज्जनता का आवरण ओढ़े हुए क्षमाशीलता वस्तुतः परले सिरे की कायरता होती है। इससे अपने को झंझट में न पड़ने से बचाने के अतिरिक्त किसी से दुश्मनी मोल न लेने और बदनामी से बचने जैसे ऐसे तत्व भी मिले रहते हैं, उन्हें प्रकारान्तर से अनीति समर्थक और परिपोषक ही कहा जा सकता है।
दिन-दहाड़े सरे-बाज़ार गुण्डागर्दी होती रहती है और यह भले बनने वाले लोग चुपचाप उस तमाशे को देखते रहते हैं। गुण्डों की हिम्मत बढ़ती है और वे आये दिन दूने उत्साह से वैसी ही हरकतें करते हैं। यदि देखने वाली भीड़ ने जोर से एक साथ शोर ही मचा दिया होता, तो सरे-आम गुण्डागर्दी करने वालों के पैर उखड़ सकते थे और दुर्घटना बच सकती थी। अनाचार की घटनाएँ घटती हैं, पुलिस छान-बीन करती है, पर प्रत्यक्षदर्शी भलेमानुसों में से गवाही देने एक भी नहीं जाता। झंझट से बचने में ही जिन्हें खैर दीखती है, वे अनाचार का सामना करने में जो थोड़ी-बहुत कठिनाई उठानी पड़ती है, उसका झंझट क्यों मोल लें? इस भीरुता पर प्रत्यक्ष रूप से गुण्डागर्दी का लाँछन तो नहीं लगाया जा सकता, पर प्रत्यक्ष रूप से अनीति को खाद-पानी देने की जिम्मेदारी उसी की है। अपनी लड़की से कोई गुण्डा छेड़खानी करे, तो लोग बदनामी के डर से उसे छिपाने की कोशिश करते हैं। इससे दुहरी हानि होती है। अगले दिनों लड़की को फिर कोई छेड़े तो वह बेचारी चुपचाप उसे सहन करती रहती है। जानती है-अभिभावकों में सामना करने की हिम्मत तो है नहीं। छिपाने का ही उपदेश देंगे-ऐसी दशा में उसे छिपाने की बात स्वयं ही करती रहे, तो क्या हर्ज है? दूसरी ओर छेड़ने वालों का साहस सौ गुना हो जाता है। वे चक्रवर्ती शासक की तरह, मूँछें ऐंठते और ताल ठोकते फिरते हैं। मानो इस सज्जन कहलाने वाले कायरों को उन्होंने मक्खी-मच्छर की तरह अपना वशवर्ती बना लिया हो।
छोटे-बड़े प्रत्येक अनाचार के अवसर पर यही दृश्य देखने को मिलता है। विरोध, प्रतिरोध, असहयोग करने के लिए साहस दिखा सकने वाले ढूँढ़े नहीं मिलते वरन् क्षमा का उपदेश देने, गन्दगी पर मिट्टी डालने की बात कहने वाले लोगों की भीड़ सामने आ खड़ी होती है और रोकथाम के लिए जो कुछ किया जा सकता था, वह सम्भव ही नहीं हो पाता। स्थिति कितनी दयनीय और कितनी विषम है। लगता है लोगों ने पाप को सुरक्षित रखने और उसे फलने-फूलने देने की ऐसी नीति अपना ली है जो बाहर से निर्दोष लगती है, किन्तु वस्तुतः वही अनाचार को बढ़ावा देने में खाद-पानी का काम करती है।
भगवान की अवतार प्रतिज्ञा में धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश का उभयपक्षीय आश्वासन है। प्रत्येक अवतार के चरित्र में इन दोनों ही तत्वों का समावेश है। अधिक बारीकी से देखने पर प्रतीत होगा कि अवतारों ने धर्मोपदेश तो कम दिये हैं, वरन् पाप से जूझने और उसे निरस्त करके छोड़ने की आक्रोश प्रक्रिया में ही अपना अधिक समय लगाया है। रामचरित्र में विश्वामित्र यज्ञ-रक्षा से लेकर पंचवटी, दण्डकारण्य आदि में जूझते हुए अन्ततः लंकायुद्ध में जा डटने के ही प्रसंग भरे पड़े हैं। कृष्ण-चरित्र में भी उनके जन्मकाल से ही असुरों से जूझने की, महाभारत रचाने की और अन्ततः अपने ही वंश वालों को नष्ट होने देने की संरचना में समय बीता। भगवान परशुराम, भगवान नृसिंह, वाराह, भगवती दुर्गा आदि के अवतार चरित्रों में अनीति से संघर्ष का ही प्रसंग बढ़ा-चढ़ा है। उनके साथी-समर्थकों की सेना को धर्मस्थापना का, जप-हवन का कितना समय मिला, कह नहीं सकते, पर स्पष्ट है कि भगवत् भक्तों ने ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए अपनी सामर्थ्य झोंक देने का आदर्श उपस्थित किया। रीछ-वानरों ने ग्वाल-बालों ने, पाण्डवों ने, प्रधानतया अनीति विरोधी तप-साधना में ही अपना जीवन घुलाया था।
भगवान बुद्ध ने तत्कालीन अनाचारों के, मूढ़मान्यताओं के विरुद्ध प्रचण्ड क्रान्ति खड़ी की थी, इसी संघर्ष से जूझने के लिए उन्होंने चीवरधारी भिक्षुओं और श्रमणों की सेना खड़ी की थी। स्वार्थ के लिए तो सभी संघर्ष करते हैं, किन्तु परमार्थ के लिए लड़ना मात्र आदर्शवादी लोगों के लिए ही सम्भव होता है। इसलिए बुद्ध शिक्षा में साधना और संघर्ष का समन्वय है। इसी आधार पर उनने अपने साधनों से सारे विश्व में नवयुग का शंख बजाया और नये जागरण का वातावरण बनाया। उनके न रहने पर अनुयायियों ने अहिंसा की, पूजा-पाठ की सस्ती लकीर पीटते रहना तो जारी रखा, किन्तु अनीति से लड़ने की कष्टसाध्य प्रक्रिया की ओर से मुँह मोड़ लिया। फलतः बौद्ध धर्म मध्य एशिया से चढ़ दौड़ने वाले डाकुओं द्वारा देखते-देखते निष्कासित कर दिया गया। शौर्य, साहस की तेजस्विता खो बैठने वालों की जो दुर्गति होती है, वही अपने देश की भी हुई। एकांगी, सस्ती धर्म-मान्यताएँ तो दीन-दुर्बलों को भी अच्छी लगती हैं, पर वास्तविक धर्म में तो अनीति विरोधी संघर्ष ही जुड़ा हुआ है। उसके लिए शौर्य, साहस न हो तो फिर मनुष्य बगलें झाँकता है और उन सिद्धांतों की दुहाई देता है, जो मात्र उच्चस्तरीय विशिष्टताओं को विशेष आदर्श प्रस्तुत करने के लिए ही बनाये गये हैं। पानी में बहते बिच्छू के बार-बार काटने पर भी उसे बार-बार निकालने की कथा किसी विशेष सन्त की कीर्ति में चार चाँद लगा सकती है, पर सर्वसाधारण के लिए शेखसादी की वही उक्ति ठीक है, जिसमें बिच्छू पर दया करना बच्चों को मार डालने के समतुल्य बताया गया है।
गुरु गोविन्दसिंह का अध्यात्म व्यावहारिक और जीवन्त था। उनने अपने शिष्यों के एक हाथ में माला और दूसरे में भाला थमाया। समर्थ गुरु रामदास ने अपने प्रौढ़ शिष्य शिवाजी को तलवार थमाई थी। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को ऐसे ही कार्यों में जुटाया। गाँधी ने अपने अनुयायियों को प्रत्यक्ष मृत्यु से लड़ने का निर्देश दिया और कहा-टूट जाना पर अनीति से लड़ने की हठ छोड़ना मत।
भगवान राम ने ऋषियों के अस्थि समूह के बने टीले रखे। उनकी आँखों में ‘नयन जल छाये।’ किन्तु वे आँसू कायरों, दुर्बलों और भावोन्मादियों के नहीं, वीरों के थे। उनने भुजाएँ उठाकर प्रतिज्ञा की कि जिनने यह दुष्कर्म किये हैं उन निश्चरों से इस पृथ्वी को रहित करके छोड़ेंगे। यदि अनाचार पीड़ित पर वस्तुतः दया आती हो और उससे सहानुभूति उपजी हो तो फिर उसका एक ही उपाय है कि उस अनीति के असुर से जूझा जाए जो इस विपत्ति का कारण है।
यज्ञसंदर्भ में एक श्रुतिवचन का प्रयोग होता है-मन्युरसि मन्यु में देहि। हे भगवान आप मन्यु हैं, हमें मन्यु प्रदान करें। मन्यु का अर्थ है- वह क्रोध, जो अनाचार के विरोध में उमगता है। निंदित क्रोध वह है जो व्यक्तिगत कारणों से अहंकार की चोट लगने पर उभरता है और असन्तुलन उत्पन्न करता है। किन्तु जिसमें लोकहित विरोधी अनाचार को निरस्त करने का विवेकपूर्ण संकल्प जुड़ा होता है वह मन्यु है। मन्यु में तेजस्विता, मनस्विता और ओजस्विता के तीनों तत्व मिले हुए हैं। अस्तु, वह क्रोध के समतुल्य दीखने पर भी ईश्वरीय वरदान के तुल्य माना गया है और उसकी गणना उच्च आध्यात्मिक उपलब्धियों से की गई है।
राजा द्रुपद के अनाचारों से क्षुब्ध उनके सहपाठी द्रोणाचार्य राजसभा में इसलिए गये कि अपनी बाल मित्रता का परिचय देते हुए उसके शुभ-चिन्तन की बात कहेंगे और कुमार्ग से पीछे हटाने का प्रयत्न करेंगे पर हुआ ठीक उलटा। मदान्ध द्रुपद उनके उपदेश सुनने तक के लिए तैयार नहीं हुए और अपमानित करके उन्हें सभाभवन में से निकलवा दिया।
द्रोणाचार्य ने विवेक नहीं खोया। द्रुपद समझाने की सज्जनोचित रीति से नहीं मानते, तो उन्हें दण्ड की दुर्जनों पर प्रयुक्त होने वाली प्रक्रिया का सहारा लेकर हर हालत में उन्हें सीधे रास्ते पर लाने का प्रयत्न जारी रखेंगे। इस निश्चय के साथ वे पाण्डवों को पढ़ाने लग गये। जब छात्र बड़े हुए और गुरुदक्षिणा देने की बात कही तो उनने एक ही उत्तर दिया कि द्रुपद के अहंकार को नीचे गिराना और उसे सुधारना है, इसलिए उसे पकड़कर, मुश्क बाँधकर मेरे सामने ले आओ। शिष्यों ने वही किया। द्रुपद पर आक्रमण हुआ। उन्हें हराया गया और रस्सों से जकड़कर गुरु के सामने प्रस्तुत किया गया। द्रोणाचार्य ने कहा-राजन् अहंकार और अनीति अभी भी छोड़ी जानी है या नहीं? द्रुपद रो पड़े। उनने दोनों ही दुष्टताएँ छोड़ दीं, साथ ही स्वयं भी बन्धनमुक्त हो गये। महाभारत की इस कथा में यह प्रेरणा है कि दुष्टता के उभरने पर मौन नहीं बैठे रहना चाहिए, वरन् सुधार के लिए निश्चित प्रबन्ध करने चाहिए। मीठे उपाय सफल न हों तो कड़ुए भी अपनाये जा सकते हैं। हर हालत में अनाचार का तो अन्त होना ही चाहिए।
वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि विभिन्न क्षेत्रों में छद्म वेशों से छिपे हुए भ्रष्टाचार का अन्त तब तक नहीं हो सकता, जब तक उनके प्रति जन-आक्रोश न जगाया जाए। आज तो स्थिति यह हो गई है कि उचित-अनुचित का भेद तक करना लोग भूलते जाते हैं और किसके साथ सहयोग करना, किसके साथ न करना; इस विवेक को खोते जाते हैं। जिसके साथ मित्रता है, वह उसके पाप-अनाचार का भी चित्र-विचित्र तर्कों से समर्थन करता है। नैतिक दृष्टि से यह अत्यन्त ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। मित्रता के प्रमुख लक्षणों में रामायणकार ने ‘कुपथ निवार सुपंथ चलावा’ का सूत्र दिया है। सच्चा मित्र वह है जो मीठे, कड़ुए उपायों से उसकी अनैतिक प्रवृत्तियों को सुधारें, गलत मार्ग पर चलने से रोकें और सन्मार्ग की दिशा में प्रवृत्त करें। जो उसमें उपेक्षा बरतता है अथवा समर्थन सहयोग करता है वह प्रकारान्तर से अपने मित्र को अधिक भ्रष्ट करने में, अधिक पतित, निन्दित एवं दुःखों के गर्त में डुबोने के लिए प्रवृत्त है। ऐसा व्यक्ति मित्र होने का दावा करते हुए भी असल में उसका पक्का दुश्मन है। सुधार-प्रक्रिया में यह समर्थन ही सबसे बड़ी बाधा है। ऐसे मित्र नामधारी, व्यक्ति अपने मित्र के साथ ही अपना भी लोक-परलोक बिगाड़ते हैं। चोर-चोर मौसेरे भाई की उक्ति हर क्षेत्र में लागू होते देखते हैं। एक का पर्दाफाश होते ही-दूसरे अन्य गठकटे उसकी सहायता के लिए आ धमकते हैं। सोचते हैं संयुक्त मोर्चा बनाकर ही जन-आक्रोश से बचा जा सकता है अन्यथा पाप के प्रति उभरा हुआ रोष आज एक साथी को दबोच रहा है, तो कल दूसरे पर आ चढ़ेगा। इसलिए संयुक्त रूप से बचाव के उपाय करने चाहिए।
देखा गया है कि एक जेबकट पकड़ा जाए तो वह दो-चार चाँटे पड़ते ही दहाड़ मारकर रोने-चिल्लाने लगता है, मानो किसी ने उसकी गरदन काट ली हो। गिड़गिड़ाते, रोते-काँपते वह माफी माँगता है और दीनता की दुहाई देता है। इतने में उसके अन्य साथी भले आदमियों के रूप में बीच-बचाव करने आ पहुँचते हैं। वे तरह-तरह के ऐसे तर्क उपस्थित करते हैं, मानो सज्जनता और साधुता के साक्षात् अवतार हैं। दस-बीस और भोले आदमी इकट्ठे होते हैं, तो सज्जनतावादी तर्क उन्हें भी प्रभावित करते हैं और जेबकट को छुड़ा देते हैं। वह चाण्डाल चौकड़ी अपनी उस्तादी पर खूब प्रसन्न होती है और आपस में कहते हैं यह हथकंडा कितना सस्ता और बढ़िया है कि पकड़े जाने पर बिना दण्ड भोगे इस तरकीब के सहारे सहज ही जान छुड़ाई जा सकती है। दुष्ट लोग आवश्यकतानुसार पकड़े जाने पर फिर इसी फार्मूले का उपयोग करते हैं और देखते हैं कि सज्जनता की आड़ में दुष्टता को पोषण देने का कैसा विचित्र और सरल हथकंडा है।
करुणा और दया अच्छे गुण हैं, किन्तु उनका उपयोग हर जगह कल्याणकारी रूप में नहीं किया जा सकता। सीता छद्मवेशी रावण पर दया करके ही स्वयं विपत्ति में फँसी थी। बिना विवेक कुपात्र को भी दया-करुणा का लाभ पहुँचाना उन सत्प्रवृत्तियों को अपमानित करना है। ऐसा करना देवताओं के हथियार दुष्टों को सौंप देने जैसा मूर्खता और अनीति भरा कार्य है। यदि पात्र-कुपात्र उचित-अनुचित का विवेक न किया गया तो दयालुता और उदारता का जो लाभ सत्प्रवृत्तियों को मिलना चाहिए, वह न मिल सकेगा और दुष्ट प्रवृत्तियाँ अनायास ही उनका शोषण करने में सफल हो जावेंगी। अस्तु, अनीति करने वाले के प्रति इस प्रकार की सम्वेदनाओं का प्रयोग नहीं किया जाना उचित है।
कहने का मतलब है, धर्म के प्रति जिसे जितना प्रेम हो वह अधर्म के प्रति उतना ही द्वेष रखे। जिसे ईश्वर-भक्ति और आस्तिकता पर विश्वास हो वह ईश्वर विरोधी नास्तिकता के एकमात्र आधार अनाचार से बचे और बचावे। इसके बिना ईश्वर और शैतान को, पाप और पुण्य को एक ही समझने की भूल होती रहेगी और भीतर तथा बाहर पनपता हुआ असुरत्व आत्मिक-प्रगति की दिशा में एक कदम भी आगे न बढ़ने देगा।
अनीति को देखते हुए भी चुप बैठे रहना, उपेक्षा करना, आँखों पर पर्दा डाल लेना जीवित-मृतक का चिह्न है। जो उसका समर्थन करते हैं, वे प्रकारान्तर से स्वयं ही दुष्कर्मकर्त्ता हैं। स्वयं न करना, किन्तु दूसरों के दुष्ट कर्मों में सहायता, समर्थन, प्रोत्साहन, पथ-प्रदर्शन करना एक प्रकार से पाप करना है। इन दोनों ही तरीकों से दुष्टता का अभिवर्द्धन होता है।
मानवी साहसिकता और धर्मनिष्ठा का तकाजा है कि जहाँ भी अनीति पनपती देखें वहाँ उसके उन्मूलन का प्रयत्न करें। यह न सोचें कि जब अपने ऊपर सीधी विपत्ति आवेगी तब देखा जाएगा। आग अपने छप्पर में लगे तभी उसे बुझाया जाए, इसकी अपेक्षा यह अधिक उत्तम है कि जहाँ भी आग लगी है वहाँ बुझाने को आत्मरक्षा का अग्रिम मोर्चा मानकर तुरन्त विनाश से लड़ पड़ा जाए। यदि सीधे टकराने की सामर्थ्य अथवा स्थिति न हो तो कम-से-कम असहयोग एवं विरोध की दृष्टि से जितना कुछ बन पड़े उतना तो करना ही चाहिए। असुरता को निरस्त करने और देवत्व को बलिष्ठ बनाने के लिए हमें अपना अनीति विरोधी रुख तो अपनाये ही रखना चाहिए।
स्वाध्याय एवं चिन्तन-मनन की महत्ता का प्रतिपादन शास्त्रों में विस्तारपूर्वक किया गया है। मनुस्मृति 3-75 में उल्लेख है-स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्।” अर्थात् स्वाध्याय में नित्य तत्पर रहना चाहिए, क्योंकि इससे सद्विवेक-सद्बुद्धि का विकास होता है और उससे समस्त समस्याओं का समाधान मिलता है। प्राकृत-उत्तराध्ययन (26-10) भी इसका समर्थन करते हुए कहता है। “सज्झाएवा निउत्तेण, सव्वदुक्ख विमोक्खणे।” अर्थात् स्वाध्याय करते रहने से समस्त दुखों से मुक्ति मिलती है। इसी ग्रंथ के अगले सूत्र (26-37) में इससे मिलने वाले सत्परिणाम का उल्लेख है। “सज्झायं च ताओ-कुज्जा सव्वभावविभावणं।” अर्थात् स्वाध्याय सभी प्रकार के भावों का प्रकाश करने वाला है।
स्वाध्याय की इस महत्ता को जानते हुए प्रायः लोग अच्छी पुस्तकें पढ़ते भी हैं, परन्तु जो पढ़ा गया है, उस पर चिन्तन, मनन और वार्तालाप नहीं करते। यही कारण है कि उस अध्ययन का प्रभाव जीवन में स्थायी नहीं हो पाता। यदि पुस्तकों-शास्त्रों के सारे जीवन में उतारने की प्रक्रिया लोग सीख जाएँ तो सामान्य-सी परिस्थितियों में ही हर व्यक्ति उत्कृष्टता के चरम बिन्दु तक पहुँच सकता है। अच्छी पुस्तकें, महापुरुषों की जीवन-गाथाएँ गोघृत एवं दुग्ध के समान पौष्टिक आहार हैं, जो मन-बुद्धि आचार-विचार तर्क व विवेक को परिपुष्ट करके आत्मोत्थान का उज्ज्वल पथ प्रशस्त करती हैं।
बात उन दिनों की है, जब गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका में थे। उन्होंने बहुचर्चित नेता ग्लैडस्टन की जीवनी पढ़ी थी। उसमें एक प्रसंग ऐसा था, जिसमें गाँधीजी के जीवन की एक धारा को उलट कर रख दिया। “एक दिन एक आम सभा हो रही थी। उसमें ग्लैडस्टन के साथ उनकी धर्म-पत्नी भी थीं। ग्लैडस्टन को चाय पीने की आदत थी। चाय बनाने का कार्य उनकी धर्म-पत्नी ही करती थीं। आम सभा के बीच ग्लैडस्टन ने चाय पीने की इच्छा की तो श्रीमती ग्लैडस्टन ने बिना किसी झिझक, लज्जा या संकोच के अपने हाथ से वहीं चाय बनायी, पति को पिलायी और कप-प्लेट स्वयं अपने हाथ से साफ किये। ऐसा उन्होंने कई स्थानों में किया।”
इस घटना को पढ़कर गाँधीजी के जीवन में जो प्रतिक्रिया हुई, उसका उल्लेख उन्होंने स्वयं इन शब्दों में किया है-पत्नी के प्रति वफादारी मेरे सत्य के व्रत का अंग थी, पर अपनी स्त्री के साथ भी ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, यह बात दक्षिण अफ्रीका में ही स्पष्ट रूप से समझ में आयी।”
गाँधी जी ने उक्त प्रसंग जब रामचन्द्र भाई को बड़े कुतूहल के साथ सुनाया, तो उन्होंने कहा-बापू इसमें आश्चर्य की क्या बात है? अब आप बताइये अपनी बहिनें-बेटियाँ और छोटे-छोटे बच्चे क्या ऐसे कार्य कहीं भी नहीं कर सकते? बड़ों की आज्ञापालन में तो उन्हें प्रसन्नता ही होती है। पत्नी के इस व्यवहार को असामान्य मानने का एक ही कारण हो सकता है, पत्नी से कोई आकांक्षा। साधारण लोग अपनी धर्म-पत्नी को कामवासना की दृष्टि से, भोग-विलास की दृष्टि से देखते हैं। उसमें नारी के प्रति हीनता का भाव आता है। यही भाव हम उसके साथ प्रत्येक कार्य में आरोपित करते हैं। पत्नी उसे ही बुरा मानती है। यदि उसे हीनता या कामुकता की दृष्टि से न देखा जाए, तो सचमुच प्रत्येक स्त्री ग्लैडस्टन की धर्म-पत्नी की तरह ही बहिन-बेटियों की सी सेवा बिना लज्जा या संकोच के कर सकती है।”
गाँधीजी को यह बात बड़ी महत्वपूर्ण लगी। ग्लैडस्टन के जीवन-चरित्र को पढ़ने से जिस मर्म को वह नहीं भेद पाये थे, वह वार्तालाप से खुल गया। तब तक कस्तूरबा और उनमें प्रायः अनबन हो जाया करती थी। उस दिन से बापू ने ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया और इतिहास जानता है कि इसके बाद कस्तूरबा गाँधी ने गाँधीजी को सच्चे मित्र की भाँति खुलकर कंधे-से-कंधा मिलाकर सहयोग प्रदान किया। उन्होंने उनके साथ जेल जाने तक में भी झिझक या संकोच नहीं किया।
स्वाध्यायशीलता और पढ़े हुए को जीवन में रचाने-पचाने के अभ्यास ने गाँधी जी को महान बना दिया। महान मनीषी रस्किन की लिखी पुस्तक- अन टू दिस लास्ट’ के अध्ययन ने तो गाँधी जी के सारे जीवन को ही बदल दिया। यह पुस्तक जीवन भर उनकी मार्गदर्शिका रही।
एक बालक को दस वर्ष की आयु में स्कूल जाना छुड़ा दिया गया, क्योंकि पिता गरीब था। प्रतिकूल परिस्थितियाँ होने पर भी वह कुछ-न-कुछ पढ़ने का अवसर निकाल लेता और प्रत्येक पढ़े हुए पर विचार किया करता और उन्नति के अनेक मनसूबे बनाया करता। इस बालक की जीवनी से पता चलता है कि उसकी क्रियाशीलता व प्रतिभा विलक्षण थी। पुस्तकें पढ़ने का उस पर तुरन्त प्रभाव होता और वह प्रभाव उसके जीवन में कोई-न-कोई परिवर्तन ही लाने वाला होता। व्यापार में ईमानदारी, समाजसेवा और राजनीतिक धड़ेबाजी से संघर्ष करने की हिम्मत भी उसे ऐसे ही मिली, पर मुसीबत यह थी कि वह ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था।
एक दिन वह फ्रेंकलिन की जीवनी पढ़ रहा था। फ्रेंकलिन को भी दस वर्ष की आयु में पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी पर उसने अपने अध्यवसाय से स्वतः ही दुनिया की पाँच भाषाएँ सीखीं और एक साथ वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं राजनैतिक के रूप में विश्वविख्यात हुआ। यह पढ़कर उस युवक ने विचार किया कि क्या वह दूसरा फ्रेंकलिन नहीं बन सकता? बन सकता है, उसके मन ने कहा, अध्यवसाय से क्या संभव नहीं? वह उस दिन से पढ़ने लगा। अंग्रेजी, चिली, फ्रेंच आदि कई भाषाएँ उसने सीखी और राजनीति में भाग लेने लगा। इस पर उसे देशनिकाला दे दिया गया। बहुत दिनों तक चिली में रहकर वह देश में चल रहे स्वार्थवादी राजनीति के विरुद्ध संघर्ष करता रहा। उसने पत्रकार के रूप में अर्जेण्टाइना निवासियों को भ्रष्टाचार के विरुद्ध संगठित कर दिया और एक दिन विद्रोह की ज्वाला फूट ही पड़ी। वह युवक अपने देश लौटा और एक दिन अर्जेण्टाइना का उपराष्ट्रपति बना। इस महत्वपूर्ण पद पर पहुँचकर भी उसने जनसेवा का मार्ग न छोड़ा। उसने अर्जेण्टाइना को साक्षर बनाने का अभियान चलाया और उसे इतना तीव्र किया कि आज अर्जेण्टाइना विश्व के देशों में सबसे अधिक शिक्षित देश है। अमेरिका तक ने उसकी सेवाएँ कीं। एक पुस्तक की प्रेरणा ने उस युवक को ‘डोर्मिगो फास्टिनो सारमिन्टो’ के नाम से विश्वविख्यात कर दिया।
वर्मा की क्लंग घाटी पर आजाद हिन्द फौज का मुकाबला अंग्रेजी सेना की एक टुकड़ी से हो गया। आजाद हिन्द फौज के कुल तीन जवान और अँगरेजों की 169 सैनिकों की भारी-भरकम टुकड़ी। इस भीषण परिस्थिति में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस बैठे स्वामी विवेकानन्द की पुस्तक पढ़ रहे थे। पुस्तक के इस अंश ने-जब संकटों के बादल सिर पर मँडरा रहे हों, तब भी मनुष्य को धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। धैर्यवान् व्यक्ति भीषण परिस्थितियों में भी विजयी होते हैं।” नेताजी को प्रकाश प्रेरणा से आलोकित कर दिया।
घाटी से खबर आयी कि क्या तीनों सैनिक पीछे हटा लिये जाएँ? नेताजी के हृदय में छुपे विवेकानन्द के विचार फूट पड़े। वे बोले-प्रातः काल तो वे स्वयं मुठभेड़ की लड़ाई के लिए चढ़ दौड़े। जब उस चौकी पर पहुँचे तो देखा कि अंग्रेजी सेना के कुछ सिपाही तो मरे पड़े हैं, शेष अपना सामान छोड़कर भाग गये हैं।
सुभाषचन्द्र बोस हैं नहीं, पर स्वतंत्रता का सबसे पहला आनन्द उन्होंने ही लिया। मातृभूमि पर अपना सर्वस्व निछावर करने वाले अमर सेनानी के बारे में यदि यह कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि स्वामी विवेकानन्द के साहित्य ने उन्हें चिरमुक्त बना दिया था। उनमें अगाध निर्भयता, धैर्य और साहस था। यह सब गुण उन्हें विवेकानन्द साहित्य से विरासत में मिले थे। उन्होंने जो कुछ भी पढ़ा, उसके एक-एक वाक्य को अपने जीवन का एक-एक चरण बना लिया। उसी का प्रतिफल था कि वह जापान, सिंगापुर और जर्मनी जहाँ कहीं भी गये, उनका स्वागत उसी प्रकार हुआ जिस प्रकार स्वामी विवेकानन्द का अमेरिका और इंग्लैण्ड में। भारतीय जनमानस में अभी भी वे जीवन्त व्यक्तित्व के रूप में रचे-बसे हैं और प्रकाश एवं प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं। वस्तुतः यह श्रेय स्वाध्याय को ही है, जो सुभाष की जीवनशिला पर क्रियाशीलता बनकर खुद चुका था।
सात वर्ष के एक बालक में पढ़ने की अभिरुचि जाग गयी। जब उसके दोस्त मटरगस्ती कर रहे होते, तब वह कोई कहानी, कविता, नाटक और धार्मिक पुस्तकें पढ़ रहा होता। हर्बर्टस्पेन्सर, स्टुअर्टमिल और टिंडल की पुस्तकों ने उसे बहुत प्रभावित किया। फिर उसने बेकार किस्म के उपन्यास, कहानियाँ पढ़ना छोड़ दिया और रचनात्मक निर्माणात्मक साहित्य ढूँढ़-ढूँढ़कर पढ़ने लगा। वह एक स्टेट एजेण्ट के यहाँ नौकरी कर रहा था, तब भी अच्छी पुस्तकें पढ़ने का चाव उसने न छोड़ा। इससे उसके जीवन में पाश्चात्य बुराइयों का समावेश न हो सका। पश्चिम में जन्म लेकर माँसाहार का कट्टर विरोधी यही बालक एक दिन जॉर्ज बर्नार्डशा के नाम से दुनिया में विख्यात हुआ। उसने जब लेखनी उठाई तो संसार के
सर्वश्रेष्ठ नाटककारों की श्रेणी में जा विराजा। एक फटी-सी पुस्तक मेरे हाथ लगी। आरम्भ के कुछ पृष्ठ फटे थे। पर प्रत्येक पुस्तक से कोई-न-कोई अच्छी बात सीखने का मुझे व्यसन हो गया था। इस पुस्तक को पढ़ने से मुझे बहुत ही मार्मिक पंक्तियाँ हाथ लगीं। उन्हें मैंने अपनी डायरी में नोट कर लिया। वह पंक्तियाँ एक कहानी की थीं और इस तरह थीं-मैं किसान हूँ, मुझे किसान होकर जीने दो और वैसे ही मरने दो। मेरा पिता किसान था, अतः उसके पुत्र को भी वैसे ही होने दो।” मुझे दस वर्ष बाद पता चला कि यह शब्द जॉर्ज ए. ग्रीन के थे।
“इन पंक्तियों में परिश्रमशीलता के भाव थे। डायरी में नोट इन शब्दों ने मुझे निरन्तर परिश्रम करने की प्रेरणा दी। मैंने बहुत-सी पुस्तकें पढ़ी हैं। प्रत्येक पुस्तक से मैंने अनीति के विरुद्ध संघर्ष, मानव-जाति से प्रेम के पाठ पढ़े और सीखे। यों कहूँ कि पुस्तकों का साराँश ही उतर कर मेरे जीवन में समा गया है और जो कुछ भी सफलता दिखायी दे रही है, वह उनका ही आशीर्वाद है।” यह शब्द मैक्सिमगोर्की के हैं, जिन्होंने मानवता की सेवा को ही अपना जीवनव्रत बना लिया था और जीवनपर्यन्त उसी में संलग्न रहे।
विश्व की अधिकाँश प्रतिभाएँ पुस्तकों से निकली हैं। पढ़ते तो सभी हैं, पर पढ़कर अपने जीवन को महान बनाने का जो अवसर सुभाषचन्द्र बोस, जवाहरलाल नेहरू, मैक्सिमगोर्की, मार्क्स, स्टालिन, माइकलफैराडे, डार्विन, लूथरबरबैक आदि ने प्राप्त किया, उस रहस्य को हम कहाँ जान पाए? हम भी यदि इन्हीं महामानवों की तरह पढ़े हुए आदर्शों को अपने जीवन में उतार सकें, तो हमारी भी गणना गाँधी, गोर्की जैसे महान पुस्तक-प्रसूत पुत्रों में हो सकती है।
नीली धूल का कोई सौ फुट ऊँचा गुबार। जमीन के अन्दर से बादलों जैसी गड़गड़ाहट और जोरदार धमाका। धरती में भूकम्प जैसा कम्पन........। पोखरण और उसके आस-पास के गाँवों के लोग परमाणु विस्फोट को इसी रूप में जानते-पहचानते हैं। पर परमाणु विस्फोट इससे कहीं अधिक जटिल और खतरनाक प्रक्रिया है, जिसके दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं। यह खेल उन नन्हें परमाणुओं का है, जो सृष्टि के कण-कण में विराजमान् हैं। प्रकृति का हर तत्व, हर पदार्थ नन्हें-नन्हें असंख्य परमाणुओं के मेल से बना है। इसका विखण्डन करने पर उस तत्व का अस्तित्व ही लुप्त हो जाता है। परमाणुओं के इस खतरनाक खेल के मूल में मानव की अथाह ऊर्जा पाने की लालसा है, जिसे हम अपने विवेक से विकास और विनाश दोनों के लिए ही इस्तेमाल कर सकते हैं। विकास के रास्ते पर चलें तो परमाणुओं से बेहद सस्ती ऊर्जा मिलती है। विनाश के रास्ते पर परमाणु बम हैं, जिनके उपयोग से मानव सभ्यता का लोप हो सकता है।
परमाणु हथियारों में परमाणु बम, हाइड्रोजन बम एवं न्यूट्रान बम आते हैं। परमाणु में प्रोट्रान और न्यूट्रान आपस में एकजुट होकर रहते हैं। यह एकजुटता उस बल या ऊर्जा के कारण होती है, जो सभी कणों को आपस में सन्तुलित एवं बाँधे रहती है। इन्हीं कणों को तोड़ने पर अनन्त ऊर्जा निःसृत होती है। इसी प्रक्रिया को परमाणु विखण्डन कहते हैं। परमाणु बमों का निर्माण इसी आधार पर किया जाता है। इसके लिए यूरेनियम-235 का प्रयोग किया जाता है। यूरेनियम का एक नाभिक टूटने पर थोरियम और क्रिप्टन के दो नाभिक बनते हैं। इसके साथ ही कुछ न्यूट्रान तथा 20 करोड़ इलेक्ट्रान वोल्ट ऊर्जा उत्पन्न होती है। यह प्रक्रिया चेनरिएक्शन के तहत चलती है और असीम-अनन्त ऊर्जा निकलती है। परमाणु विखण्डन से प्राप्त कुल ऊर्जा का 85 फीसदी हिस्सा विस्फोट व ऊष्मा के रूप में सामने आता है, जबकि 15 प्रतिशत अदृश्य बनकर वातावरण में विलीन हो जाती है। इसी विकिरण से दूरगामी प्रभाव उत्पन्न होते हैं। विस्फोट के रूप में निकली ऊर्जा ध्वनि के वेग से सफर करती है। इससे वायुमण्डलीय दाब एवं तापमान में भारी वृद्धि हो जाती है। हिरोशिमा और नागाशाकी में गिराया गया बम इसी कोटि का था।
परमाणु बम का एक अन्य शक्तिशाली रूप है-हाइड्रोजन बम। इसे बनाने के लिए हल्के नाभिकों से युक्त तत्वों वाली हाइड्रोजन गैस के गोले के चारों ओर प्लूटोनियम भरकर उसमें विस्फोट कराया जाता है। इससे गोले का ताप व गैसों का घनत्व अत्यधिक बढ़ जाता है, जिससे गैसें प्लाज्मा में बदल जाती हैं और गैस पदार्थ तरल होने से पूर्व गैस बन जाते हैं। हाइड्रोजन बम एक सेकेण्ड के दस करोड़वें हिस्से यानि 0.06 माइक्रो सेकेण्ड में करोड़ों डिग्री सेंटीग्रेट तापमान पैदा कर सकता है। इसीलिए इसे थर्मोन्यूक्लियर डिवाइस भी कहा जाता है। इसे बनाने में परमाणु बम के विपरीत सिद्धान्त का उपयोग किया जाता है। इसमें परमाणुओं को तोड़ने के स्थान पर जोड़ा जाता है। हाइड्रोजन बम को छोटे आकार में बनाने की सुविधा के कारण मिसाइलों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। सब किलो टन परमाणु बम को लो यील्ड डिवाइस कहा जाता है। उसे कोई साधारण सैनिक अपने हाथ से ही फेंक सकता है। इसका प्रयोग बाँध-पुल को नष्ट करने अथवा फिर सैनिक ठिकानों पर तबाही मचाने के लिए किया जाता है।
हाइड्रोजन बम का प्रथम परीक्षण 31 अक्टूबर सन् 1953 को प्रशान्त महासागर में एक तैरती नौका पर किया गया था। इसकी क्षमता 10 मेगाटन की थी। तब पलभर के लिए आकाश में दो सूर्य चमक उठे थे। यह परमाणु बम की तुलना में सात सौ गुना अधिक शक्तिशाली था। एक किलो टन एक हजार टी. एन. टी. के बराबर होता है। एक मेगाटन का तात्पर्य है-दस लाख टी. एन. टी. के बराबर विध्वंसक शक्ति। अब तक का सबसे बड़ा हाइड्रोजन बम परीक्षण रूस ने 30 अगस्त, 1961 को किया था। इससे अनुमानतः 60 मेगाटन विध्वंसक ऊर्जा निकली थी। यह जापान पर गिराए गए परमाणु बम से हजारों गुना शक्तिशाली था। 6 अगस्त, 1945 को हिरोशिमा में गिराया गया यूरेनियम बम 12.5 किलो टन एवं नागाशाकी में गिराए गए प्लूटोनियम बम का भार 22 किलो टन था। परमाणु बमों की अधिकतम क्षमता कुछ सौ किलो टन तक आँकी गयी है। अमेरिका एवं रूस के अलावा अन्य देशों जैसे इंग्लैण्ड ने सन् 1957 में, चीन ने 1967 में, फ्राँस ने 1968 में एवं भारत ने 11 मई 1998 में हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया।
न्यूट्रान बम का आविष्कार अमेरिकी वैज्ञानिक सैमुअल टी. कोहेन ने किया था। न्यूट्रान से विकीर्ण होने वाली ऊर्जा दीवारों को भेदकर पार कर सकती है। इसके विघातक एवं विषाक्त प्रहार से बच पाना असम्भव है। यह अपने विस्फोट से ऊर्जा का 90 प्रतिशत भाग न्यूट्रान द्वारा बाहर फैलाता है। इसके सूक्ष्मकणों के सौवें भाग से 150 से 200 मीटर क्षेत्र तक पूरी आबादी नष्ट हो सकती है। पाँच किलोमीटर के अन्दर उस क्षेत्र का सम्पूर्ण मानव शक्तिहीन एवं निर्बल हो जाएगा। खुले क्षेत्र में आने वाले लोगों में 50 फीसदी से अधिक तो भयंकर एवं असाध्य रोगों के शिकार हो जायेंगे। न्यूट्रान बम से भवनों, सड़कों, वृक्ष-वनस्पतियों आदि को कोई क्षति नहीं पहुँचती। बम का प्रयोग मानव के विरुद्ध भीषण एवं भयानक अस्त्र के रूप में किया जा सकता है।
एक सर्वेक्षण से प्राप्त रिपोर्ट से पता चलता है कि विश्वभर में सन् 1988 में लगभग 60.000 परमाणु ध्वंसास्त्र मौजूद थे। इसमें से अमेरिका और रूस 95 प्रतिशत से अधिक के मालिक हैं। यह विश्व के समस्त सामरिक हथियारों के आधे के बराबर है। संसार के सम्पूर्ण नाभिकीय हथियारों के भण्डार से लगभग 25 से 30 हजार मेगाटन शक्ति पैदा की जा सकती है। यह शक्ति जापान में गिराए जाने वाले बम से दस लाख गुना अधिक है। इससे सारे संसार को सैकड़ों बार भस्मीभूत किया जा सकता है। इन विनाशकारी आयुधों का जनम अमेरिका है। जे. रॉबर्ट ओपेनहाइगर तथा जनरल लेस्लेग्रोवर्स ने प्रथम बार परमाणु बमों का निर्माण किया। इन्होंने 26 जून, 1957 को पहला भूमिगत परीक्षण किया। अब तक किए गए आकलन के अनुसार अमेरिका 212 वायुमण्डलीय परीक्षण के साथ-साथ कुल 1030 परीक्षण कर चुका है। अब तो वह सुपर कम्प्यूटर के माध्यम से बराबर सबक्रिटिकल टेस्ट कर परमाणु बमों का निर्माण करता जा रहा है। वर्ष 1945 में अमेरिका के पास दो बम थे। तत्कालीन अमेरिकन राष्ट्रपति हेनरी ए. ट्रमेन के अनुसार दोनों ही जापान में गिरा दिए गए थे। आज अमेरिका के पास 12,070 परमाणु बम हैं, इसके अलावा उसके पास हाइड्रोजन एवं न्यूट्रान बमों का जखीरा भी रखा हुआ है। इनमें से 8500 तो मोर्चों पर तैनात हैं। इन हथियारों को वह 13,000 किलोमीटर की दूरी तक मार सकता है।
रूस ने अपना प्रथम परीक्षण ईगोर बी. कुर्चतोक द्वारा निर्मित परमाणु अस्त्र से नोमाया जेम्ल्या से 29 अगस्त, 1949 में किया था। यह प्लूटोनियम बम 20 किलो टन का था। इसी के साथ वहाँ पहला भूमिगत परीक्षण 22 फरवरी, 1962 को किया था। इसके पश्चात् वह 179 वायुमण्डलीय परीक्षणों के साथ कुल 715 परीक्षण कर चुका है। रूस के पास सर्वाधिक 22,500 परमाणु बम हैं, जिनमें से 10,100 तैनात हैं। फ्राँस के पास 482 परमाणु बम हैं। उसने 209 परीक्षण किए हैं, जिसमें 48 वायुमण्डल में किए गए। फ्राँस ने जनरल चार्ल्स एलरेट के बनाए हुए 70 किलो टन वाले प्लूटोनियम बम से 13 फरवरी, 1960 को अपने इन परीक्षणों की शुरुआत की थी। इस क्रम में चीन भी 45 परीक्षण करके 450 बम बना चुका है। ब्रिटेन भी 45 विखण्डन करके 380 परमाणु बमों का मालिक है।
इन पाँच परमाणु सम्पन्न देशों के पश्चात् भारत का स्थान आता है। भारत ने 17 मई, 1974 को बुद्धपूर्णिमा के दिन पोखरण में अपना प्रथम भूमिगत परीक्षण किया था। इसके ठीक चौबीस वर्ष बाद 11 मई की बुद्धपूर्णिमा एवं उसके दो दिन बाद यानि कि 13 मई, 1998 को क्रमशः तीन एवं दो परीक्षण किए। इसी के साथ वह 65 परमाणु हथियारों का निर्माण कर चुका है। परमाणु होड़ में शामिल होने के लिए पाकिस्तान ने भी 28 एवं 30 मई को पाँच तथा एक आत्मघाती परीक्षण करने का तथाकथित दावा किया है। अन्तर्राष्ट्रीय विश्लेषकों के अनुसार पाकिस्तान के पास 15 से 25 परमाणु हथियार माने जाते हैं। परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ. आर. चिदम्बरम् के अनुसार भारत के पास 200 मेगाटन हाइड्रोजन बम बनाने की क्षमता है। भारत अपने सुपर कम्प्यूटर ‘परम’ 10,000 से प्रत्येक माह दो परमाणु बम बना सकता है। 11 मई को जिस हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया गया था, उसकी क्षमता 45 किलो टन थी। इस तरह भारत सब किलो टन से लेकर मेगा किलो टन तक परमाणु अस्त्र सम्पन्न देश बन चुका है। सुपर कम्प्यूटर के जनक डॉ. विजय वी. भटकर के अनुसार, भारत अब भूमिगत परीक्षण किए बगैर प्रयोगशाला में सब-क्रिटिकल टेस्ट कर सकता है। यह टेस्ट क्षमता विश्व में केवल अमेरिका एवं जापान के पास है।
परमाणु हथियार रखने वाले पाँच महारथियों के अलावा कई ऐसे देश हैं, जिनकी धरती पर या तो अमेरिकी परमाणु मिसाइलें तैनात हैं या कुछ देशों ने अपने राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत परमाणु क्षमता प्राप्त कर ली है। परन्तु इन देशों ने इसका परीक्षण नहीं किया है। इजराइल के पास लगभग 64 से 112 परमाणु हथियार होने का अनुमान है। ईराक एवं दक्षिण कोरिया ने भी यह क्षमता हासिल कर ली थी, परन्तु अमेरिकी कूटनीति के हाथों झुकना पड़ा। ताईवान भी इसी श्रेणी का एक देश है। अमेरिका के परमाणु आयुध जर्मनी, ब्रिटेन, इटली, तुर्की, बेल्जियम, नीदरलैण्ड, ग्रीस, जापान और फिलीपीन्स आदि देशों में तैनात हैं।
परमाणु हथियार रखने वाले पाँच देशों के पास घोषित रूप से 1997 के अन्त तक 36 हजार परमाणु बम हैं। इन्हें लड़ाकू विमानों या लम्बी और मध्यम दूरी की बैलेस्टिक मिसाइलों या पनडुब्बी आधारित मिसाइलों से छोड़ा जा सकता है। इन मिसाइलों की मारक क्षमता क्रमशः अमेरिका की 13,000 किमी., ब्रिटेन की 12,000 किमी., फ्राँस की 5300 किमी, रूस की 11,000 किमी., चीन की 11,000 किमी., भारत की 2500 किमी. तथा पाकिस्तान की 1500 किमी. है।
परमाणु हथियारों से होने वाला सम्भावित खतरा बड़ा स्पष्ट है। इसे रोकने के लिए विश्वव्यापी तमाम सन्धियों का अभियान चला। सामरिक अस्त्र परिसीमनवार्ता (स्टार्ट-2) सन्धि के लागू होने पर अमेरिका एवं रूस केवल साढ़े तीन-तीन हजार बम ही रख सकते हैं। इस सन्धि के असफल होने पर दोनों देशों के पास 22 हजार परमाणु बम शेष रहेंगे। आपसी शीतयुद्ध की समाप्ति के पश्चात् अमेरिका ने सारे विश्व में परमाणु निरस्त्रीकरण अभियान चलाया। इसके तहत एन. पी. टी. (परमाणु अप्रसार सन्धि) सी. टी. बी. टी. (समग्र परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि) जैसे सन्धि के प्रस्ताव सामने आए। इसमें भारी भेदभाव एवं पक्षपातपूर्ण रवैये की वजह से भारत ने इस सन्धि प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और अपने परमाणु विकल्प खुले रखे। इसे हास्यास्पद स्थिति ही कहेंगे कि इस सन्धि के उपरान्त भी अमेरिका अपने नाभिकीय आयुधों में भारी वृद्धि एवं विकास करता रहा है। इसमें बी-61 नामक एक ऐसा परमाणु बम है, जिसमें पृथ्वी के भीतर गहरी घुसपैठ कर विस्फोट किया जा सकता है। इसका समावेश सी. टी. बी. टी. पर हस्ताक्षर के पश्चात् हुआ है। अभी दो माह पूर्व ही उसने अपनी प्रयोगशाला में सबक्रिटिकल टेस्ट किए हैं, जिन पर कोई नियम लागू नहीं होता। सी. टी. बी. टी. पर हस्ताक्षर करने के थोड़े दिनों ही पहले चीन एवं फ्राँस ने क्रमशः तीन एवं छह परमाणु परीक्षण किए।
सन् 1954 में प्रथम बार भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पृथ्वी से परमाणु हथियार के उन्मूलन के लिए एक विश्वव्यापी सन्धि का प्रस्ताव रखा था। इस समय अमेरिका के पास 263 और रूस के पास केवल 150 परमाणु बम जमा हो सके थे। 1964 में भारत-चीन युद्ध के दो वर्ष पश्चात् भारत के अग्रणी परमाणु वैज्ञानिक डॉ. होमी जहाँगीर भाभा ने आत्मरक्षा के लिए परमाणु हथियार के पक्ष में प्रस्ताव रखा था। इसके तीन सालों बाद सन् 1967 तक अमेरिका के पास 31,141 परमाणु बम, रूस के पास 8,339, ब्रिटेन के पास 270, फ्राँस के पास 36 और चीन के पास 25 परमाणु बम हो चुके थे। इसी बीच भारत ने रूस के साथ 20 वर्षों की मैत्री सन्धि की, जिसका अमेरिका ने भारी विरोध किया एवं भारत को 1973 के भयंकर तेलसंकट से गुजरना पड़ा। इन्हीं सब अन्तर्राष्ट्रीय दबावों से भारत ने अपने राष्ट्रहित में 1974 की बुद्ध पूर्णिमा को पोखरण में प्रथम परमाणु परीक्षण किया।
इन बमों की भयावहता हमें जापान के भीषण नरसंहार की याद दिलाती है। छह अगस्त सन् 1945 को रात तीन बजे अमेरिकी वायुसेना के कर्नल पाल और रॉबर्ट लुई ने बी. 29 विमान से 31,000 फीट की ऊँचाई से हिरोशिमा पर यह बम डाला था। इस परमाणु बम का नाम था-लिटिल ब्वाय। इस विस्फोट से तत्क्षण 70,000 लोग मारे गए तथा कुछ दिनों के अन्तराल में डेढ़ लाख लोग काल के गाल में समा गए। लाखों लोगों ने जो दीर्घकालीन यातना सही वह असहनीय थी। विस्फोट के केन्द्र में तापमान 3000 से 4000 डिग्री तक पहुँच गया, जबकि लोहा 1550 डिग्री पर पिघल जाता है। यही हाल नागाशाकी का भी हुआ। इन दोनों शहरों में लगभग साढ़े तीन लाख लोगों की मृत्यु हुई। उन दिनों जो भीषण नरसंहार हुआ, उसका प्रभाव वहाँ के वातावरण पर्यावरण में आज तक शेष है।
परमाणविक विस्फोट दो प्रकार के होते हैं। ‘लो एयर वर्स्ट’ जो वायु में कुछ ऊँचाई पर होता है। ग्राउण्ड वर्स्ट में बम धरती पर आकर फटता है। धरती पर हुए विस्फोट की क्षति का दायरा कम होता है। हवा में हुआ विस्फोट दूर तक असर करता है, यदि 20 किलो टन क्षमता का एक परमाणु बम एक शहर पर गिराया जाता है, तो उस केन्द्र से एक किलोमीटर की परिधि में सारी इमारतें पूरी तरह ध्वस्त हो जायेंगी और 95 प्रतिशत लोग तुरन्त मर जायेंगे। एक से दो किलोमीटर के बीच आँशिक से पूर्ण विनाश होगा और 50 प्रतिशत लोग तत्काल मर जायेंगे। दो से तीन किलोमीटर के दायरे में विनाश भारी-भरकम होगा। इस क्षेत्र में केवल 25 फीसदी लोग मरेंगे। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार 30 लाख आबादी वाले एक शहर पर 20 किलो टन के एक परमाणु बम से 13 लाख लोगों के मरने की सम्भावना है।
यदि भविष्य में नाभिकीय युद्ध हुआ तो 80 प्रतिशत ओजोन परत पूरी तरह से नष्ट हो जायेगी। विश्व के नाभिकीय हथियारों के जमा जखीरे का मात्र 5 से 10 फीसदी का ही प्रयोग किया जाए, तो लगभग दस लाख वर्ग किलोमीटर विस्तृत धरती भीषण आग में जलकर भस्म हो जायेगी। इस संभावित भयावहता को देखकर विश्वविख्यात सैन्यविचारक लिटिल हार्ट ने कहा है, नाभिकीय युद्ध मानवी सभ्यता को सम्पूर्ण रूप से विनष्ट कर सकता है। संसार के सुप्रसिद्ध सैन्य इतिहासकार जनरल जे. एफ. सी. फुलर ने स्पष्टतया चेतावनी दी है कि नाभिकीय युद्ध से विजेता एवं विजित दोनों ही समाप्त हो जायेंगे। जोनाथन शेल ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘द फेट ऑफ द अर्थ’ में उल्लेख किया है कि परमाणु युद्ध होने पर हम गहन अंधकार में डूब जायेंगे। एक ऐसा अंधकार, जिसमें कोई राष्ट्र, कोई समाज, कोई विचारधारा, कोई सभ्यता नहीं बचेगी। फिर किसी शिशु का जन्म नहीं होगा और धरती पर कभी मानव अवतरित नहीं होगा। ऐसा भी कोई नहीं बचेगा, जो धरती पर मानव के अस्तित्व को याद कर सके।
भविष्य की इन आशंकाओं के बावजूद धरती का स्वर्गीय सौंदर्य नष्ट नहीं होने पायेगा। जिनमें अंतर्दृष्टि है, जो भविष्य की उज्ज्वल किरणों को देख सकते हैं, वे स्पष्ट देख रहे हैं कि मानवी दुर्बुद्धि का यह दौर अधिक दिनों तक टिकने वाला नहीं है। इक्कीसवीं सदी मानवी जीवन का जो स्वरूप प्रस्तुत करने जा रही है, उसमें इंसान परमाणु ऊर्जा का उपयोग करेगा तो अवश्य, पर विनाश के लिए नहीं, अपितु विकास के लिए, जीवन के नवनिर्माण के लिए। पोखरण में हुए परमाणु विस्फोट को भारत के आत्मसम्मान की धमक के साथ वह भी समझा जाना चाहिए कि यह एक ऐसा परिवर्तन बिन्दु है, जो ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे जे आचरहिं ते नर न घनेरे’ की तर्ज पर उपदेश देने वाले देशों को यह सोचने पर विवश करेगा, केवल बातों से नहीं, परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए सार्थक कदम बढ़ाए बिना उन्हें मानवता की भावी पीढ़ी कभी क्षमा नहीं करेगी।
उपयोग और उपभोग का सामान्य सिद्धान्त यह है कि उनसे वस्तुओं की क्षमता, योग्यता और आयु धीरे-धीरे घटती और फिर समाप्त हो जाती है। मशीनों के पुर्जे लम्बे इस्तेमाल के बाद बदलने पड़ते हैं। काया भी अधिक समय तक अनवरत श्रम कहाँ कर पाती है। ज्यादा परिश्रम उसे निष्क्रिय और निस्तेज बनाता है। जब उसकी क्लान्ति समाप्त होती तब थोड़ा विश्राम आवश्यक हो जाता है। विश्राम के बाद वह नई स्फूर्ति और ताजगी के साथ नये सिरे से पुनः सक्रिय हो उठती है। देहान्तर का विधान भगवद् सृष्टि में शायद इसलिए बनाया गया हो कि भारभूत बन गए जीर्ण-शीर्ण शरीर से पिण्ड छूटे और लोकान्तर वास के उपरान्त थकी जीवात्मा जब नवीन देह धारण करे, तो नूतन जीवन का आरंभ नई उमंग और उत्साह के साथ हो। उपयोग का यह मोटा सिद्धान्त हुआ, पर इसे बिलकुल ही अकाट्य नहीं माना जाना चाहिए। अपवाद यहाँ इस क्षेत्र में भी मौजूद है। इसे दैनिक जीवन में सर्वत्र लागू होते देखा जा सकता है।
खिलाड़ी यदि नियमित रूप से अभ्यास न करें, तो वह राष्ट्रीय स्तर तो क्या, स्थानीय स्तर के मुकाबलों में भी हारते और पदक गँवाते देखे जाते हैं। साहित्यकारों, संगीतज्ञों, वक्ताओं, विद्यार्थियों सभी के साथ यही बात समान रूप से लागू होती है। शरीर के संदर्भ में भी सच्चाई यही है कि नियमित श्रम करने से उसके सारे तंत्र समर्थ और सक्षम बने रहते हैं। लगातार कार्य करने से शरीर में थकान आती है, यह सच है, पर मिथ्या यह भी नहीं है कि यदि उसे यों ही निठल्ला पड़ा रहने दिया जाए, तो जंग लगे चाकू की सी स्थिति उत्पन्न हो जाएगी और वह किसी काम का नहीं रह जाएगा।
अब इसी तथ्य की पुष्टि मस्तिष्कीय क्षमता के संबंध में अधुनातन शोधों ने भी की है। इस बारे में अब तक की मान्यता थी कि आयुष्य के साथ-साथ व्यक्ति की उस क्षमता का ह्रास होने लगता है, जिसकी अपूर्व सामर्थ्य से यौवन में उसने स्वयं को असाधारण सिद्ध किया था, पर विज्ञानवेत्ता अब इससे सहमत नजर नहीं आते। उनका कहना है कि अधिक आयु-वर्ग वाले लोगों की मानसिक क्षमता के संबंध में ‘सठियाना’ जैसी लोकोक्तियाँ बहुत प्रचलित हैं, पर वास्तव में यह यथार्थ की अभिव्यक्ति नहीं है। वे इसे स्वीकारते हैं कि शरीर के अन्य अंग-अवयवों के साथ यह बात लागू हो सकती है; लेकिन मस्तिष्क जैसे केन्द्रीय संस्थान के संबंध में यह धारणा नितान्त भ्रमपूर्ण है। यह दावा किया है मैसाचुसेट्स यूनिवर्सिटी के शरीर विज्ञान डब्ल्यू. ई. मेलर ने। अनेक वर्षों तक मस्तिष्क और उसकी क्रियाशीलता का अध्ययन करने के उपरान्त वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि नियमित मानसिक श्रम दिमाग को वृद्धावस्था में भी चिर-यौवन जैसी स्थिति में बनाये रखता है और उसकी क्षमता साधकों की तरह निरंतर निखरती और बढ़ती चलती है।
उक्त निष्कर्ष पर पहुँचने से पूर्व उनने इस आशय के अनेक प्रयोग-परीक्षण खरगोशों पर किये। उनने देखा कि जब उन्हें पिंजड़ों में बंद रखने की तुलना में खुले वातावरण में दूसरे खरगोशों के साथ ऐसे स्थान पर रखा गया, जहाँ खेलने और मस्तिष्क का स्वतंत्र रूप से उपयोग कर सकने की ढेर सारी वस्तुएँ रखी थीं, तो परिणाम चौंकाने वाला प्राप्त हुआ। अधिकाँश खरगोशों की कार्टेक्स केमिस्ट्री और संरचना में स्पष्ट परिवर्तन परिलक्षित हुए। शोधकर्मियों ने इस बात को स्फुट रूप से नोट किया कि कॉर्टिकल पर्त की प्रत्येक न्यूरॉन इकाई आकार-प्रकार में पहले से कई गुनी बड़ी हो गई थी। इसके अतिरिक्त जो एक अन्य विशेषता देखी गई, वह यह थी कि हर एक तंत्रिका कोशा से जुड़ी रहने वाली सहायक कोशिकाओं (ग्लायल सेल्स) की संख्या में वृद्धि हो गई। इसके परिणामस्वरूप इन खरगोशों की बौद्धिक क्षमता में स्पष्ट रूप से अभिवृद्धि दृष्टिगोचर हुई। अन्य खरगोशों की तुलना में ये वैसे कार्य अधिक दक्षता और चतुरतापूर्वक करते पाये गए, जो दूसरों के लिए ज्यादा कठिन और कष्टसाध्य प्रतीत होते थे।
ऐसे ही प्रयोग उन खरगोशों पर दोहराये गए, जिनकी उम्र 6 वर्ष थी। अनुसंधान दल के वैज्ञानिकों का कहना था कि खरगोशों की यह वय शारीरिक क्रियाशीलता की दृष्टि से मनुष्य के 75 वर्ष के बराबर मानी जा सकती है। विशेषज्ञ दल का कहना था कि उपर्युक्त प्रयोग के परिणाम बूढ़े खरगोशों पर भी पहले ही जैसे दृष्टिगत हुए अर्थात् उनकी भी मस्तिष्कीय संरचना में वही बदलाव पाये गए, जो जवान खरगोशों में देखे गए थे। इससे स्पष्ट है-मस्तिष्क पर बौद्धिक दबाव पड़ने पर उसकी क्षमता में अभिवृद्धि सुनिश्चित है। यह दबाव चाहे किसी भी उम्र में पड़े, उससे परिणाम में कोई अन्तर पड़ने वाला नहीं, ऐसा शोधकर्मियों का सुनिश्चित मत है।
एक अन्य प्रयोग में लिवरपूल विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने चिम्पांजी पर कई तरह के बौद्धिक प्रयोग करके यह जानना चाहा कि इससे उनकी मस्तिष्कीय क्षमता और उसकी बनावट पर क्या असर पड़ता है। प्रयोग के दौरान उनने एक कमरे की छत से केलों का बड़ा गुच्छा इतनी ऊँचाई पर लटका दिया, जो उसकी पहुँच से परे हो। उसके अतिरिक्त कमरे में बहुत सारे फल वाले खाली बक्से एक ओर रख दिये गए। अब चिम्पांजी को कोठरी में छोड़कर बाहर से उसकी गतिविधियों का अवलोकन किया जाने लगा। चिम्पांजी ने केलों को देखकर पहले तो उछल-उछल कर उन्हें पाने का असफल प्रयास किया। अनेक प्रयत्नों के बाद भी जब वह सफल नहीं हो सका, तो एक किनारे बैठकर कुछ सोचने लगा। थोड़ी देर पश्चात् वह उठा और किनारे पड़ा एक खाली बक्सा उठा लाया, उस पर चढ़ा और केले की ओर हाथ बढ़ाया। वह अब भी उसकी पहुँच से बाहर था। उतरकर फिर वह सोचने लगा। इसके बाद पुनः एक बक्सा लाकर दूसरे के ऊपर रखा, तदुपरान्त उस पर चढ़कर एक बार फिर केलों को तोड़ना चाहा। इस बार भी असफलता हाथ लगी। इस प्रकार एक-एक कर उसने कई बक्से एक के ऊपर एक रखे और अन्ततः केलों तक पहुँच पाने में सफलता पायी।
ऐसे अनेक प्रयोग बदल-बदल कर उन पर किये गए और उन्हें इस माध्यम से बुद्धि पर जोर डालने के लिए विवश किया गया। अनवरत क्रम से इस प्रकार के प्रयोग उन पर लगभग पाँच वर्ष तक चलते रहे। इसके उपरान्त उनका बौद्धिक परीक्षण किया गया। देखा गया कि जिन समस्याओं से निपटने में पहले उन्हें काफी कठिनाई होती थी, उस अब वे सरलतापूर्वक करने लगे। मस्तिष्क के कार्टेक्स का जब अध्ययन किया गया, तो परिणाम पहले जैसा प्राप्त हुआ, अर्थात् सामान्य चिम्पांजियों की तुलना में उनका यह भाग कुछ मोटा पाया गया। यह इस बात का प्रमाण था कि बुद्धि पर निरन्तर दबाव से वह अधिक पैनी और प्रखर हुई।
उल्लेखनीय है कि आइन्स्टीन के मस्तिष्क पर किया गया अध्ययन भी उपर्युक्त तथ्य की ही पुष्टि करता है। सन् 1955 में 76 वर्ष का आयु में जब उनकी मृत्यु हुई, तो डॉ. हार्वे और डॉ. हैरी जिमरमैन ने कपाल काटकर उनके 1230 ग्राम भार वाले मस्तिष्क को बाहर निकाल लिया और उसे 200 खण्डों में बाँट दिया। दुर्भाग्यवश उस पर जो प्रमुख अध्ययन किया जाना था, वह पूरा न हो सका, कारण कि डॉ. हार्वे ने उन्हें सुरक्षित रखने के विचार से उन पर गर्म फाँर मेल्डीहाइड का इंजेक्शन लगा दिया। इससे डी. एन. ए. पूरी तरह नष्ट हो गया। वस्तुतः अध्ययन उसी का किया जाना था। इतने पर भी कोशिकीय अध्ययनों से जो तथ्य प्रकाश में आए, वह उनके दिमाग की असाधारणता प्रकट करते थे। उनकी बुद्धि वाले हिस्से (कार्टेक्स) में न्यूरॉन सेलों का आकार सामान्य मस्तिष्क की तुलना में अधिक बड़ा था और उनको घेरे रहने वाली सहायक कोशिकाओं की संख्या भी प्रत्येक न्यूरॉन के लिए अपेक्षाकृत ज्यादा थी।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि आइन्स्टीन अपने प्रारंभिक जीवन में फिसड्डी किस्म के विद्यार्थी थे। इसके लिए अक्सर उन्हें अभिभावकों की फटकार सुननी पड़ती। संभव है इससे तंग आकर उन्होंने कुछ कर गुजरने के विचार से बाद में पढ़ाई में अधिकाधिक ध्यान देना प्रारंभ किया हो, जिससे लगातार दिमागी दबाव एवं क्रियाशीलता के कारण उनकी मस्तिष्कीय संरचना में परिवर्तन आना शुरू हो गया हो। यह परिवर्तन बौद्धिक प्रखरता के प्रमाण रूप में तब सामने आया, जब 35 वर्ष की अल्पवय में सापेक्षवाद का जटिल सिद्धान्त दुनिया के समक्ष रखा।
विकासवाद में ‘यूज एण्ड डिसयूज’ का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। इसके अनुसार जिन अंगों का नियमित रूप से बराबर उपयोग होता है और शरीर में जिनकी क्रियाशीलता बनी रहती है, वे धीरे-धीरे और मजबूत होते जाते हैं तथा उनकी शक्ति बढ़ती जाती है। इसके विपरीत जो निरर्थक और निष्क्रिय जैसी स्थिति में पड़े रहते हैं, उनकी न सिर्फ शक्ति क्षीण पड़ती जाती है, अपितु उस अंग विशेष का शनैः-शनैः ह्रास (डीजनरेशन) भी होता जाता है। विकासवादियों का कहना है कि मनुष्य शरीर में पूँछ की हड्डी अब अवशेषांग के रूप में बची हुई है, कारण कि अति आरंभकाल से ही उसकी अनुपयोगिता बढ़ती गई, फलतः तब से लगातार उसका अपविकास होता गया। हजार वर्ष बाद शायद उसका भी अस्तित्व न बचे-ऐसी आशंका विशेषज्ञ प्रकट करते हैं, जबकि बन्दरों में पूँछ का उपयोग शरीर-संतुलन के रूप में निरंतर होता रहा, अतएव वे विकसित होती चली गई।
जहाँ तक मस्तिष्कीय क्षमता का प्रश्न है, तो इस बारे में भी विकासवादी एकमत हैं कि एपमैन, होमोइरेक्टस, नीण्डरथल जैसे आदिमानवों में यह क्षमता वर्तमान मानव से काफी कम थी। यह उनके मस्तिष्कीय आकार से स्पष्ट है। जैसे-जैसे अस्तित्व संबंधी एवं दूसरी समस्याओं के कारण उनके दिमाग पर दबाव पड़ना आरंभ हुआ, वैसे-ही-वैसे मस्तिष्क के आकार और आयतन में भी वृद्धि होती गई और उसी क्रम से उत्तरोत्तर बुद्धि में विकास होता चला गया। यही कारण है कि आज के मानव-होमोसेपियन्स सेपियन्स का मस्तिष्कीय आयतन सर्वाधिक 1400 सी. सी. है। इससे भी उपर्युक्त तथ्य की ही पुष्टि होती है।
अस्तु किसी को अब यह असमंजस करने की जरूरत नहीं कि बढ़ती आयु के साथ दिमागी प्रखरता घटती है। फिर भी जिन्हें ऐसा प्रतीत होता हो, उन्हें यही मानकर चलना चाहिए कि शारीरिक निष्क्रियता के कारण बरते जाने वाले मानसिक निठल्लेपन की ही यह परिणति है। सुन्दर सजा बँगला भी जब सर्वथा खाली पड़ा रहे तो वह चमगादड़ों, अबाबीलों और उल्लुओं का डेरा बन जाता है। उपयोग के अभाव में उसकी भव्यता मारी जाती है। कमरे के फर्श की सफाई जितनी अधिक होगी, उतनी ही उसकी चमक में निखार आएगा। फिर कोई कारण नहीं कि मस्तिष्क के बार-बार के उपयोग से उसकी क्षमता न बढ़े और बढ़ती उम्र के साथ-साथ उसमें प्रखरता न आए। उपयोग और उपभोग का सिद्धान्त अपने स्थान पर सही है। कई संदर्भों में उससे वस्तुओं की क्षमता प्रभावित होती तथा घटती है; पर कई ऐसे भी प्रसंग दैनिक जीवन में देखे जाते हैं, जिनमें तथ्य सर्वथा उससे विपरीत दिखाई पड़ता है। मस्तिष्कीय क्षमता के बारे में भी सत्य यही है कि वह बढ़ती आयु के साथ घटती नहीं, बढ़ती है।
वह आज इस ज्येष्ठ की दोपहरी में बहुत भटका। बहुत-से-दफ्तरों के द्वार खटखटाए। अनेक समाचारपत्रों और दूसरे कार्यालयों में पहुँचा। न जाने कितने दिनों से चल रहा है यह क्रम; कौन गिनने बैठा है इसे? विश्वविद्यालय से एम. ए. करके अपने साथ अनेक प्रशंसापत्र लिए भटक रहा है वह। काम नहीं है उसके लिए! एक एम. ए. के लिए क्या विश्व में कोई काम नहीं है? वह अकेला है, घर पर और कोई नहीं। घर ही नहीं है उसके तो; पर पेट तो है न। अकेले को भी तो भूख लगा करती है। दो-तीन दिन पहले एक कबाड़ी के हाथ वह अपना फाउण्टेनपेन मिट्टी के मोल बेच चुका और अब तो मुट्ठी भर चने लेने में आज उसकी अन्तिम पूँजी भी समाप्त हो गई। उसकी सभी प्रार्थनाओं का जो उसने इधर-उधर भेजी थीं एक ही उत्तर है-काम नहीं। वह जहाँ जाता है उसे द्वार पर दिखा दिया जाता है-काम नहीं’। इतने बड़े संसार में उसके लिए काम नहीं और कल के लिए कौड़ी भी पास नहीं है। काम नहीं-इस ग्रीष्म में, इस तवे से तपते पथ पर वह भटकता रहा और अब उसे लगने लगा है सचमुच संसार में उसका अब कोई काम नहीं है।
रूखे-बिखरे बाल, तमतमाया फीका मुख, पसीने से लथपथ देह और भाल पर चिपकी हुई कुछ अलकें-शरीर कहाँ तक साथ दे किसी का। अब चक्कर आने लगा। पार्क दूर है और कुछ देर विश्राम करना चाहिए। इधर-उधर देखकर मन्दिर में घुस गया वह। शीतल छाया-सुगन्धित वायु जैसे प्राणों को अद्भुत तृप्ति मिली हो। वहीं पास में ‘धम’ से एक खम्भे के सहारे टिक कर बैठ गया। मन्दिर की चिकनी शीतल संगमरमर भूमि बड़ी सुखद लगी। कोई थका हुआ लगता है। पुजारी जी ने एक नजर डाली और विश्राम करने चले गए। भगवान का मध्याह्न विश्राम हो रहा है। मन्दिर के गर्भगृह के पट बन्द हो चुके। वैसे भी आजकल ग्रीष्म की दोपहरी में यदा-कदा ही कुछ श्रद्धालु आते हैं। भगवान का भवन सभी का गृह है न। दर्शनार्थी तो कब के जा चुके। पुजारी भी दो घण्टे तो विश्राम करेंगे ही।
वह तो बहुत एकाकी, थका, खिन्न-सा अनुभव कर रहा था। उसे भला क्या काम मन्दिर से और क्या मूर्ति से। हाँ, इस समय उसे बड़ी शीतलता, बड़ी सुगन्धि, बड़ी शान्ति मिल रही थी। वह विश्राम करने की मनःस्थिति में था। प्यास लगी थी; पर कोई बात नहीं। अभी तो उठा नहीं जा सकता, मन्दिर के बाहर प्याऊ तो वह देख ही आया है।
पिता अच्छे वकील थे। परिमार्जित सुधारक विचार थे उनके। वकालत चलती थी। लेकिन मित्रों का संग और वाहवाही पाने का लोभ, ऐसे में रुपये क्या कभी जेब में टिका करते हैं? पैतृक सम्पत्ति तो वैसे ही नहीं थी। कहीं दूर किसी गाँव में घर है। पर उसने तो सिर्फ चर्चा ही सुनी थी, कभी देखा नहीं उसे। उसके पिता-माता नगर में रहते थे। वहीं उसने जन्म लिया एक सुन्दर बँगले में। बड़े स्नेह से पालन हुआ उसका और बड़े उत्साह से शिक्षा प्रारम्भ हुई। अन्ततः माता-पिता की एक ही तो सन्तान था वह।
कॉलेज और विश्वविद्यालय का जीवन-जेब में कोई अभाव नहीं, प्रतिभा भी सम्पत्ति के समान प्रचुर ही हुई और तब स्वस्थ, सबल वह सहपाठियों में अग्रणी तो रहेगा ही। धर्म की मूर्खतापूर्ण धारणा और ईश्वर की भूल-भुलैया से तो उसके पिता जी ने ही पिण्ड छुड़ा लिया था। माता जी में कुछ बातें थीं, पर उनमें ऐसा कुछ नहीं। फिर वह तो छात्रों में अग्रणी रहा है। नियम, संयम, धर्म, सदाचार, ईश्वर इन सबका उपहास करके इनकी दासता से मुक्ति पा जाना ही तो गौरव है मनुष्य के लिए। आधुनिकता के माहौल में उसने यही सीखा और पाया था।
सहसा पिता जी का हार्टफेल हो गया। इतने बड़े वकील, पर पसलियों के नीचे धुकपुक करता जो छोटा-सा हृदय है, वह तो किसी की अपेक्षा नहीं करता। न्यायालय में खड़े थे और वहीं.... हाँ, तो उसके पश्चात् सम्वेदना, शोक प्रकाश, समाचार पत्रों में संवाद-यह बड़ा दम्भी समाज है। सबने इतना तो ढोंग रचा और जब सहायता की बात आयी, किसी की जेब ऐसी नहीं जो खाली न हो। कुछ ने तो रूखा उत्तर दे दिया। अब तो ये सब पहचानते तक नहीं।
किसे पता था कि पिता जी इतना कर्ज कर गए हैं। वह सामान-फर्नीचर तक नीलाम, वह बंगले से निर्वासित! माता मर गयी इन सब आघातों से और वह स्वयं बेचारा भटक रहा है। भटक ही तो रहा है, यह सब भोगते हुए। कहाँ एम. ए. पास करने के पश्चात् वे पार्टियाँ, वे उत्साह और कहाँ.........। पिता जी योजना बनाते ही रहे अपने होनहार पुत्र के संबंध में और उसी समय मरना था उन्हें।
पता नहीं कितनी बातें स्मरण आयीं। एकाकी रोने और हिचकने का यह पहला दिन तो नहीं है। शरीर के वस्त्र तक बिक चुके। जो लोग बड़े आदर से मिलते थे, अब पहचानते तक नहीं। आज सबसे प्रिय एकमात्र सम्पत्ति फाउण्टेनपेन को भी बेचे दो दिन हो चुके। फुटपाथ पर या पार्क के कोने में सो लिया जा सकता है और अब तो यह अभ्यस्त बात हो गयी। पर भूख, पेट तो नहीं मानता। काम नहीं! सब एक ही बात कहते हैं; सब कहीं एक ही उत्तर मिलता है और सचमुच संसार में क्या काम है उसका।
भगवान, छिः। यह तो मूर्खों की कल्पना है। एम. ए. में प्रथम श्रेणी आने वाला वह भला इसे माने? यह कैसे सम्भव है। पर पता नहीं क्यों यह भगवान आज विचित्र अद्भुत रूप से मन में उठ रहा है। जैसे प्राण पुकारते हों-भगवान! तभी लगा कि कण्ठ सूख रहा है। देर से प्यास लगी है। दोनों हाथ भूमि पर लगाकर वृद्ध की भाँति थका-सा उठा वह और बाहर प्याऊ पर आ गया।
वापस आने पर उसके कानों में शब्द पड़े-भगवान मेरे इस सौदे में लाभ होना ही चाहिए? मैं भली-भाँति पूजा करूँगा आपकी। इन सेठ जी को तो वह भली-भाँति पहचानता है। ये तो व्यापारियों में अच्छे प्रतिष्ठित हैं। ये भला क्यों इस पत्थर की मूर्ति के सामने इस प्रकार हाथ जोड़ रहे हैं? प्रभो मेरा बच्चा आज दस दिन से चारपाई पर है। एक ही लड़का है मेरे। उसे अच्छा कर दो। अच्छा कर दो उसे भगवान और मैं आपकी पूजा करूँगा। ये वकील साहब-ये पढ़े-लिखे सुसभ्य-बेचारे की बुद्धि व्यवस्थित नहीं है, इस समय। आज पहली बार वह मन्दिर में आया था। अब शाम होने को थी, पट खुल गए थे, लोग दर्शनों को आ रहे थे। हारा-थका वह जल पीकर वापस लौट आया था। कहीं जाने का उत्साह नहीं था उसमें। इतने लोग आ गए हैं, इतने लोग खड़े हैं अब एक ओर बैठने का अवकाश तो है नहीं, वह भी पीछे एक ओर खड़ा हो गया। कौतूहलपूर्वक देखने लगा। उसने दर्शन करने और प्रणाम से क्या काम। वह तो देख रहा था यहाँ का कौतुक।
भगवान इस मुकदमे में मेरी लाज रख दो। मैं पाँच सेर लड्डू चढ़ाऊँगा मूर्ख कहीं का-उसने मन-ही-मन उन बाबू साहब पर रुष्ट होते हुए कहा। लोगों में तो बड़ी बुद्धिमानी बघारते हैं और यहाँ इस पत्थर के सामने आए हैं गिड़गिड़ाने। वहाँ वकील की फीस जितनी दे डालते हैं, उतना भी यहाँ नहीं लगाना चाहते और पूरा मुकदमा जीत लेना चाहते हैं। पाँच सेर लड्डू बस इतनी घूस पर्याप्त मान ली इन्होंने।
भगवान! मैं ऐसी भूल फिर कभी नहीं करूँगा। अब सावधान रहूँगा। मेरी जान बचा दो इस बार। ये दरोगा जी हैं। कहीं किसी घात में पकड़े गए जान पड़ते हैं। अब सावधान रहेंगे ये। दूसरों का गला दबाने में थोड़ी भूल हुई, अब सावधानी से दबायेंगे, अब कोई जान नहीं सकेगा-यही तो? इस बार बच जाना चाहिए और तब ये माला चढ़ा देंगे-सवा रुपये का गजरा! बड़ा बुरा लगा, बड़ा क्रोध आया उसे, पर वह चुप रहा।
मेरा यह काम कर दो। मैं तुम्हें लड्डू दूँगा, माला दूँगा, पूजा करूँगा। और कुछ तो यह भी नहीं करना चाहते। वे तो केवल कहते हैं-मेरा अमुक काम कर दो सब आज्ञा देने आते हैं। सब ठगने आते हैं। उस सेठ को सौदे में लाभ हो या न हो, पर दलाल को पूरी दलाली देगा वह। लाभ का कोई पूरा भरोसा दे तो सौ दो सौ देने को भी उद्यत हो जाएगा, पर यहाँ वह पूजा कर देगा और सो भी पूरा लाभ पहले हो तब। दस-पाँच रुपये लगा देगा पूजा में। वह सोचता जा रहा था।
वकील साहब ने बच्चे की औषधियों और डॉक्टरों की फीस में कितना व्यय किया कौन जाने? अभी कोई लड़के को अच्छा करने के विश्वास पर देने-लेने की बात करे तो हजार-पाँच सौ बड़ी बात नहीं और यहाँ वे कहते हैं-बच्चा अच्छा हो जाए तो पूजा करूँगा। पूजा-पथ्य का व्यय भी नहीं। वह भी अच्छा होने पर और डॉक्टर से इन्होंने कहा तक न होगा कि फीस कल ले लीजिएगा। उसके मन में लोगों की स्वार्थपरता के प्रति विद्रोह जगने लगा और तब पता नहीं कहाँ से उसे पत्थर की मूर्ति के प्रति मन में सहानुभूति आ गयी। वे इस भोले भगवान को किस प्रकार ठगना चाहते हैं।
वह सोचने लगा लोग केवल आज्ञा देने आते हैं। सब स्वार्थी हैं, सब ठगने वाले हैं, भगवान मेरा यह काम कर दो, वह काम कर दो, पूजा करूँगा, माला चढ़ाऊँगा। धूर्त कहीं के, सब निराश होकर सारे उपाय करके तब आते हैं और सबसे सस्ते में टकराना चाहते हैं। न जाने क्यों उसका भगवान से, जिसे अब तक वह निरी पत्थर की मूर्ति मानता आ रहा था, अपनत्व जगने लगा था।
इसी अपनेपन के भाव में उसके मन में आया-भगवान मेरे पास कुछ नहीं हैं। मैं यदि चार आना भी पा सकता तो दो आने तुमको दे देता। तुम मेरा कोई काम मत करना-मैं और प्राप्त करूँगा। मैं अवश्य और प्रयत्न करूँगा और तुम्हें दो आने दूँगा। वह स्वयं नहीं समझ सका कि इस पत्थर की मूर्ति के प्रति कैसे वह इतनी बातें कह सका। अपनी भूख के कारण उसमें स्वाभाविक रोष एवं उत्तेजना थी। उसने अनुभव किया कि अब और यहाँ ठहरने पर वह अपने को रोके नहीं रह सकता। अपनी धुन में कुछ सोचता हुआ वह मन्दिर से बाहर आ गया।
बाहर आते ही उसे लगा कि किसी ने आवाज दी। घूमकर देखा तो एक सेठजी कह रहे थे-बाबूजी तनिक यह तार पढ़ देंगे। उसने ध्यान से देखा यही सेठजी तो हैं जो मन्दिर में लाभ का सौदा कर रहे थे भगवान से। हाथ में कोई कागज लिए पुकार रहे हैं-ये आपको कष्ट तो होगा। सेठजी ने बड़ी नम्रता से कहा।
मैं बेगार नहीं किया करता। उसे बहुत रोष है सेठ जी पर। ये स्वयं तो इतने बड़े सौदे में भगवान को भी पूजा पर टकराना चाहते हैं और वह उनका तार पढ़ दे, क्यों पढ़ दे? पर वह इतना अनुदार तो नहीं है, वह तो दूसरों की सेवा, उनके काम के लिए सदा प्रस्तुत रहा है। कुछ सोचकर तार पढ़ दिया।
लेकिन तब उसे बहुत आश्चर्य हुआ जब सेठजी ने चमकती हुई चवन्नी निकाली और उसके हाथ में थमा दी। शायद तार में सेठ जी के बहुत काम की कोई बात लिखी थी। क्योंकि तार का मजमून सुनते ही वह उछल पड़े थे और शीघ्रता से यह कहते हुए आगे बढ़ गये कि बाज़ार में बहुत ही अनुकूल भाव आए हैं इस समय उन्हें किसी चीज की चिन्ता न थी।
पर वह अपने हाथ पर रखी चवन्नी को बड़े विस्फारित नेत्रों से देख रहा था। चवन्नी-इतनी शीघ्र इतनी सरलता से यह चवन्नी मिली है। चवन्नी का मूल्य आज उसकी दृष्टि में जो है, वह दूसरा कैसे समझ सकता है। दो आने मन्दिर के उस भगवान को देने हैं। कितना भोला है वह भगवान भी। सब उसे ठगने को ही पहुँचते हैं। वह चाहे जितना कंगाल हो गया हो, उसका हृदय कभी विश्वासघाती नहीं होगा। वह बेईमानी नहीं करेगा। दो आने भगवान को देगा। उसके लिए तो दो आने आज पेट की भूख मिटा देने भर को हैं ही। मन्दिर की ओर मुड़ा वह।
मन्दिर बन्द हो गया। पुजारी ने द्वार बन्द कर दिए मन्दिर के? उसने बन्द द्वार के सम्मुख खड़े होकर भी अपने आप से ही पूछा। अब तो यह कल खुलेगा। क्या चिन्ता, कल सही। मैं कल दो आने यहाँ के भगवान को दे जाऊँगा। अभी तो भूख लगी है।
लेकिन तभी विचार-श्रृंखला परिवर्तित हुई, अरे! इसमें दो आने दूसरे के हैं, मैं उसका भाग दिए बिना अपना भाग ले लूँ। बेईमानी तो न होगी? मैं अपना ही भाग तो ले रहा हूँ। बँटवारा तो हुआ नहीं, अपना भाग कहाँ से आया? दो आने के चने ही तो लिए जा सकते हैं। बेचारा वह चने की दुकान आया। मन्दिर के बाहर ही जल पीकर भूखा लेट गया वह भूमि पर। आज न सही कल तो चने मिल ही जाएँगे। चवन्नी अपने पास तो है ही।
वह सोच रहा था, मैंने दो आना देने को कहा है। वह मूर्ति सही, पर मैंने उसी को तो देने को कहा है। दो आने के लिए बेईमानी करूँ मैं छिः। उसका उपयोग हो या नहीं। मैंने कहा है न। उसने सोच लिया कि वह दो आने तो मूर्ति को, उस भगवान को देगा ही। इसी सोच-विचार में कब पलकें बन्द हुईं, कब सो गया, यह पता ही न चला।
सुबह आँख खुली, तो फिर से मन्दिर में भीड़ लग चुकी थी। कोई कह रहा था, भगवन्, आपने मेरी विनय पर ध्यान नहीं दिया। आप तो दयामय हैं प्रभो। आज का सौदा........। सेठ जी मन्दिर में दोनों समय आते हैं। द्वार पर उसे देखते ही पहचान लिया उन्होंने। उससे भी आज नम्रता से उनके जयराम जी का उत्तर दिया। सेठजी को पर्याप्त लाभ हुआ, ऐसे सौदों में लाभ हुआ है, जिनमें लाभ की आशा छोड़ चुके थे वे। पर उस सौदे में कहाँ लाभ हुआ, जिसके लिए प्रार्थना कर गए थे वे भगवान से। उस सौदे में तो उन्हें थोड़ी हानि ही रही है। तभी तो वे यह दो पैसे वाली माला लिए आए हैं मन्दिर में। दूसरे सौदों में लाभ हुआ-यह तो कोई बात नहीं, वह तो हो गया। भगवान ने उनके बताए सौदे में क्यों लाभ नहीं कराया? कैसे पूजा करें वे।
भगवान मेरा बच्चा रात को कुछ ठीक रहा है। आप दया करें उस बालक पर, आज मैंने बड़े वैद्यजी को बुलाया है, बस उनकी औषधि से जरूर लाभ हो जाए। लाभ होना चाहिए और वह भी अब बड़े वैद्य जी की औषधि से। पूजा-पूजा तो लड़का पूरी तरह से अच्छा हो जाएगा तब न? अभी तो वह कुछ ही ठीक रहा है।
भगवान..........। वह देखता रहा चुपचाप। बाबूसाहब, दरोगा जी कल वाले अनेक लोग आज फिर आए और चले गए। किसी को थोड़ा लाभ हुआ, किसी को बताए स्थान पर लाभ नहीं हुआ, किसी और स्थान में हुआ तो उसे वह क्यों गिने? कोई आया है याद दिलाने कि उसका काम भूल न जाएँ और कुछ लोग केवल तुलसीदल और एक-आध फूल लेकर आए हैं। भगवान इस बार हाथ संकट में है॥ काम हो जाने पर वे अब आर्थिक संकट अनुभव करने लगे हैं। आगे कभी दूसरा काम पड़ेगा, तब यह कमी पूरा कर देना चाहते हैं वे।
भगवान मेरा काम कर दो। इतने लोग आते हैं, इनका काम होता है-मूर्ख तो नहीं है ये सब। अभी चार आने तो जेब में हैं उसी की। कितनी अकल्पित रीति से मिले ये चार आने। तब यह भगवान है, है ही नहीं, कुछ करते भी हैं। उसने मूर्ति की ओर देखा और एकटक देखता रहा।
पर बड़े भोले हैं ये भगवान। लोग ठगते ही रहते हैं। सब आते हैं, आज्ञा देते हैं और चाहते हैं कि उनका बताया कार्य उन्हीं की बताई रीति से और उन्हीं के बताए समय पर पूरा हो जाए। इतने पर भी कम-से-कम पारिश्रमिक देना चाहते हैं। काम हो जाने पर बहानेबाजी और......। उसे बहुत बुरा लग रहा था यह दम्भ लोगों का।
क्या यही धर्म है? क्या यही आस्तिकता है? जैसे प्रश्न उसके दिमाग में बिजली की तरह कौंध उठे। वह सोचने लगा, मैं नास्तिक ही भला। कम से कम मैं किसी को ठगने का इरादा तो नहीं रखता, भगवान को भी नहीं। अभी उसके विचारों का चक्रवात कुछ देर और उथल-पुथल मचाता रहता, तभी पीछे से किसी ने उसके कन्धे पर हाथ रखा। स्पर्श में अपनापन था, स्नेह की कोमल भावनाएँ थीं, जो अनजाने में ही उसे अन्दर तक छू गयीं। उसने पीछे मुड़कर देखा, तो पाया गैरिक वस्त्रधारी साधु खड़े थे।
परस्पर दृष्टि-विनिमय होने पर वे कहने लगे-मन्दिर के ये भगवान अपने सम्मुख आए आर्तजनों के भाव ही देखते हैं। पदार्थों का इनकी
दृष्टि में क्या मूल्य। इन पूर्णकाम को क्या प्रयोजन पदार्थों का। परन्तु इन बातों से उसकी जिज्ञासा शान्त नहीं हुई। उसके प्रश्न यथावत रहे, जिसे साधु महाराज की गहन अन्तर्दृष्टि ने ताड़ लिया। वे कह रहे थे-धर्म संवेदना है, प्यार है, आर्तजनों का कष्ट मिटाने की भावाकुलता है और आस्तिकता ईश्वर से प्रेम है। उनसे गहरा अपनत्व है।
तब क्या वह स्वयं भी? आगे कुछ और सोचता इससे पहले ही वे साधु महाराज बोल पड़े, हाँ तुम्हारे अन्दर सच्ची आस्तिकता ने जन्म लिया है। भगवान तुम्हें अपने लगने लगे हैं और तुम भी उनके अपने हो। इस अपनेपन के अहसास ने उस युवक को साधु बना दिया। सद्गुरु स्वामी निगमानन्द के चरणों में बैठकर वह महायोगी अनिर्वाण बना। अब उसका एक ही मकसद था, जन-जन को आस्तिकता का सच्चा बोध कराना, सारे जीवन उनका एक ही सन्देश रहा-आस्तिकता ईश्वर से सौदेबाजी नहीं, बल्कि उनसे सच्चा प्रेम है।
प्रसन्नता मनुष्य के सौभाग्य का चिह्न है। जो व्यक्ति हर समय प्रसन्नचित्त रहता है, उसके पास लक्ष्मी का निवास रहता है। जिसकी मुस्कान चली जाती है, प्रसन्नता तिरोहित हो जाती है, उससे लक्ष्मी रूठ जाती है। श्री, लक्ष्मी का बहुत लोकप्रिय नाम है। हँसने से, प्रसन्न रहने से मनुष्य के मुख पर एक श्री, एक कान्ति, एक तेज विराजमान् रहता है, जो संसार के समस्त श्रेयों को खींचकर ले आता है।
प्रसन्नचेता व्यक्ति को देखकर लोग प्रसन्न होते हैं, उसकी ओर आकर्षित होते हैं, उसकी मैत्री प्राप्त करना चाहते हैं। प्रसन्नता एक आध्यात्मिक वृत्ति है, एक दैवीचेतना है। इसका आश्रय ग्रहण करने वाले के सारे शोक-संताप भाग जाते हैं। प्रमुदित मन और प्रसन्नचित्त व्यक्ति के पास बैठकर लोग अपना दुःख-दर्द भूल जाते हैं, सुख और संतोष का अनुभव करते हैं। मुदितात्मा व्यक्ति देवदूत होता है, संसार का कलुष दूर करने वाला होता है।
मनुष्य को जब भी हँसने का अवसर मिले खूब हँसना चाहिए। जो हँसना नहीं जानता, वह जीना नहीं जानता। हँसी, मुसकान और प्रसन्नता यौवन की आधारशिला है। जो हँस सकता है, मुस्करा सकता है, प्रसन्न हो सकता है, वह अस्सी वर्ष की अवस्था में भी नौजवान है। इसके विपरीत जो मन-मलीन और उदास रहता है, वह बीस वर्ष की आयु में भी बूढ़ा है। यौवन का गुण है-आकर्षण हँसने वाले की ओर सारा संसार आकर्षित हो उठता है और रोने-झींकने वाले से सबको विकर्षण रहता है। जो हर समय रोता-झींकता और विषाद करता रहता है, वह जीवन के संजीवनी तत्व को नष्ट कर देता है और जो हर समय प्रसन्न और प्रमुदित रहता है वह अमृत को ग्रहण करता है।
आप हँसेंगे तो संसार आपका साथ देगा। आप रोयेंगे तो आप अकेले रह जाएँगे, कोई आपके पास बैठना न चाहेगा। हास में जीवन और रुदन में मृत्यु की छाया उतनी ही अवधि की वृद्धि कर लेता है। हास्य मनुष्य का सच्चा मित्र, सेवक, साथी और सहचर-सब कुछ है। जो इसको अपने साथ लेकर चलता है, वह जीवन में अवश्य सफल होता है। हास्य शत्रुता का शमन करता है, प्रतिकूलताओं को मित्र और क्रोध को शाँत बनाता है। प्रसन्नचेता व्यक्ति की जिंदगी एक महोत्सव के समान बन जाती है, जिससे उसे क्षण-क्षण उत्साह, उल्लास और आनन्द की प्राप्ति होती है।
हँसना स्वास्थ्य का मूल-मंत्र है। हँसने से मनुष्य के मानसिक तनाव दूर हो जाते हैं। उसे एक मधुर विश्राम प्राप्त होता है। हँसना एक मानसिक, शारीरिक एवं बौद्धिक व्यायाम है। हँसने से नाड़ी संस्थान पर एक विशेष प्रभाव पड़ता है, जिससे वे नवीन शक्ति पाकर क्रियाशील हो उठती हैं। ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध आदि उत्तेजनाओं से जो शारीरिक अस्त-व्यस्तता उत्पन्न हो जाती है, मनोविकारों का जो विष अवयवों में संचित हो जाता है वह हँसने, प्रसन्न होने से दूर हो जाता है। हँसने से फेफड़ों को नवीन शक्ति मिलती है, जिससे शरीर का रक्त शुद्ध और सशक्त बनता है। हास्य से उत्पन्न होने वाली पुलकन से पेट के सारे विकार नष्ट हो जाते हैं। इससे मनुष्य की पाचन-क्रिया का सुधार होता है, शुद्ध रक्त की वृद्धि होती है। आरोग्य के लिए हास्य एक अमोघ रसायन है।
जीवन में पग-पग पर आने वाली कठिनाइयों, मुसीबतों और समस्याओं से मनुष्य में जो एक क्लान्ति, कमजोरी और अरुचि उत्पन्न हो जाती है, वह हँसने से दूर हो जाती है और शरीर में एक नवीन चेतना, नव-स्फूर्ति का समावेश होता है।
संसार के किसी भी महापुरुष का जीवन देख लिया जाए, उनके अन्य गुणों के साथ प्रसन्नता का गुण प्रधानरूप से जुड़ा हुआ मिलेगा। हर स्थिति एवं परिस्थिति में एकरस, प्रसन्न रहना, महापुरुषों की सफलता का सबसे बड़ा रहस्य रहा है। प्रसन्नता मनुष्य की कार्यक्षमता को कई गुना बढ़ा देती है।
अप्रसन्न, उदास तथा खिन्न रहने वाले व्यक्ति की सारी शक्तियाँ शिथिल हो जाती हैं। विषादोत्पादक स्थिति में एक ऐसी तपन होती है, जो मानवजीवन के सारे उपयोगी तत्वों को जला डालती है। खिन्नता मानव जीवन का भीषण अभिशाप है। यह जीती-जागती नरक की भयानक ज्वाला की भाँति मनुष्य को दीन-हीन दुःखी और दरिद्र बनाकर रख देती है। जिसके चेहरे पर मुसकान नहीं, हँसी नहीं, प्रसन्नता नहीं, कोई भी उसके पास बैठना, उसे याद करना, उसके संपर्क में रहना पसंद नहीं करता। हर आदमी उससे दूर भागता है, जिससे उसका जीवन एकाकीपन के भार से दबकर दुरूह बन जाता है।
जीवन में जिसने प्रसन्नता का महत्व नहीं समझा उसने मानो सौभाग्यपूर्ण अभ्युदय के द्वार ही बंद कर दिये। मनुष्य का जीवन रोते-बिलखते काटने के लिए नहीं बल्कि हँसते-खेलते और गाते-मुसकराते हुए महोत्सव की भाँति आनन्द लेने के लिए ही है। जीवन में ऐसी घटनाएँ तथा परिस्थितियाँ भी आती हैं जब हँसी-खुशी का प्रदर्शन सभ्यता की दृष्टि से गलत माना जा सकता है, किन्तु इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि उस दुखद परिस्थिति को इतनी गहराई तक अपना लिया जाए कि सारा जीवन ही विषाद पूर्ण बनकर रह जाए। संसार के क्रम के अनुसार अनेक परिस्थितियों को मनुष्य के दो आँसुओं की भी आवश्यकता हो सकती है। किन्तु उनको उतने ही आँसू देने चाहिए, जितने का कि अधिकार उनको है। सम्पूर्ण जीवन को आँसुओं के रूप उड़ेल देना बुद्धिमानी नहीं। आँसू मनुष्य के लिए अपवाद और हास उसके जीवन का सत्य है, यथार्थ है।
जिस प्रकार कोई कलाकृति अपने निर्माता के अस्तित्व तथा व्यक्तित्व का प्रकट करती है, उसी प्रकार यह सृष्टि भी अपने रचयिता-अपने शिल्पी परमात्मा को व्यक्त करती है। जिसका निर्माण हुआ है, उसका निर्माता अवश्य है, इसमें किसी प्रकार की शंका अथवा तर्क की गुँजाइश नहीं है।
यह समस्त सृष्टि एक सुनिश्चित रचना है। इस रचना का अणु-अणु एक निश्चित नियमावली से अनुशासित है, नियंत्रित है। हजारों प्रकार के प्राणी अपने-अपने नियमानुसार बनते और बिगड़ते रहते हैं; पर क्या मजाल कि उसकी रचना में तनिक-सी गड़बड़ी हो जाए।
सूर्य समय पर निकलता, समय पर अस्त होता है। गुलाब के पौधे में गुलाब और गेंदे के पौधे में गेंदे के ही फूल खिलते हैं। आम के वृक्ष में आम और अमरूद के वृक्ष में अमरूद के ही फल लगते हैं। उसमें भी जिन वृक्षों से जिस प्रकार के फल अपेक्षित हैं, उसी प्रकार के ही फल पैदा होंगे-एक रंग, एक आकार और एक स्वाद। खट्टे वृक्षों में खट्टे और मीठे में मीठे फल ही उत्पन्न होंगे। निश्चित ऋतु में ही वे उत्पन्न होंगे और निश्चित समय पर ही समाप्त होंगे।
एक जंगल में लाखों प्रकार की वनस्पतियाँ होती हैं। हजारों प्रकार के पेड़ एक के पास एक उत्पन्न होते हैं, किन्तु उनकी एक भी पत्ती की बनावट में भूल नहीं होती। इमली से लेकर केले तक की पत्तियों का एक निश्चित आकार-प्रकार होता है। एक पेड़ की पत्ती संसार के किसी दूसरे पेड़ की पत्ती से नहीं मिलती। उनमें कोई-न-कोई किसी प्रकार का थोड़ा-बहुत अन्तर अवश्य होगा। इतनी विविधता और इतने प्रकार-जानने वाला वह कलाकार, वह शिल्पी, वह निर्माता कितना ज्ञानवान, कितना चैतन्य और कितना समर्थ होगा, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है। विश्व की इतनी बड़ी रचना को देखकर और उसके संचालन की आविष्कार-विधि देखकर ऐसा कौन अभागा होगा, जो रचयिता के अस्तित्व में संदेह करेगा।
किसी भी वृक्ष का बीज देखिये। उसके स्तर-स्तर अलग कर डालिये, उसका रेशा-रेशा चीर डालिये, कहीं भी आपको वृक्ष का कोई आकार-उसकी कोई भी तस्वीर-उसका कोई भी अस्तित्व दृष्टिगोचर न होगा। कितना विलक्षण है, कितना अद्भुत है कि जब वह धरती में बो दिया जाता है, तब उसमें विविध प्रकार के वृक्ष का जन्म होता है। जब वृक्ष अस्तित्व में आता है, तब बीज मिट चुका होता है, किन्तु पुनरपि वह वृक्षों द्वारा उत्पन्न फलों में अपना अस्तित्व-अपना स्वरूप प्राप्त कर लेता है। प्रकृति की यह प्रक्रिया कितनी विलक्षण, अद्भुत और विस्मयवर्द्धक है। ध्यानपूर्वक इसको देखने, विचार करने और मनन करने से इसके नियामक, निर्माता और पालनकर्ता का ध्यान आये बिना नहीं रहता। कैसा अखण्ड अनुशासन है कि एक ही मिट्टी से ऊख मिठास, मिर्च कड़ुवाहट और करौंदा खटास प्राप्त करता है। मिट्टी को चखिये, उसमें इस प्रकार का कोई रस, कोई स्वाद आपको नहीं मिलेगा। इतने रस, इतने स्वाद और इतने गुण एक ही मिट्टी में कहाँ से आ जाते हैं....? यह सारे रस आकार-प्रकार-गुण आदि और कुछ नहीं एक उसी परमात्म-शिल्पी का अपना व्यक्तित्व-अपना अस्तित्व है। वह स्वयं धरती है, स्वयं मिट्टी है, स्वयं बीज-वृक्ष और फल है। वह ही स्वयं रस-स्वाद और गुण भी है।
संसार में लाखों पशु-पक्षी और जीव-जन्तु मौजूद हैं। सब एक-दूसरे से भिन्न आकार-प्रकार के, बनावट और स्वभाव भी विचित्र। जितने प्रकार के पक्षी उतने प्रकार के रंग, उतनी प्रकार की बोलियाँ और उतने ही प्रकार के गुण व स्वभाव। इन सब बातों में इतनी अनन्तता, इतनी असीमता और अपरिमितता एक उसी विराट की याद दिलाती है।
रात-दिन प्रकाश-अंधकार गर्मी-सर्दी जल-थल आदि सब उसी की साक्षी देते हैं, उसी के अस्तित्व को प्रकट करते हैं। अग्नि जलाती है, पानी बुझाता है, वायु कंपित करती है, जीवन जिलाता है, और मृत्यु मारती है, किसके आदेश से-किसके संकेत से? एक उसी सत्ता के इशारे मात्र से यह सारे कार्यकलाप होते हैं, सारी प्रक्रियाएँ चलती हैं। बिना उसके संकेत के एक पत्ती भी नहीं हिल सकती, एक श्वास का भी आवागमन नहीं हो सकता।
इतनी बड़ी रचना, इतनी महान कृति को उसने किस उद्देश्य, किस हेतु से, किसके लिए निर्मित किया है?........यह एक गहन प्रश्न है, एक गूढ़ रहस्य है। मनीषियों का मत है कि यह सब एक उस ही परमात्मा ने अपने से, अपने में, अपने लिए ही उत्पन्न किया है। सृष्टि में हर ओर से ओत-प्रोत परमात्मा और परमात्मा में हर प्रकार से समाहित यह संपूर्ण रचना, मनुष्य के समझने के लिए है। समझकर उस रचयिता का ज्ञान प्राप्त कर आनन्द पाने के लिए है।
सृष्टि के प्रत्येक प्रत्यक्ष पदार्थ में जो अप्रत्यक्ष निराकार विस्मय है, विलक्षणता है, कुतूहल है वही परमात्मा की एक झलक है। जिसके सहारे मनुष्य उस चिदानन्द परमात्मा तक पहुँचता है, उस अपने हृदय को विशाल कीजिये, अपनी दृष्टि निर्मल कीजिए और देखिये आपकी सृष्टि के प्रत्येक अणु में उस विराट बिन्दु की झाँकी देखने को मिलेगी।
परमात्मा सत-चित-आनन्द अर्थात् सच्चिदानन्द रूप है। उनका उद्देश्य प्राणिमात्र को आनन्द प्रदान करना है। मनुष्य को छोड़कर संसार का हर प्राणी एक नैसर्गिक आनन्द को प्राप्त करता है। एक मनुष्य ही ऐसा है जो स्वतः आनन्दित नहीं दिखलाई देता। इसका स्पष्ट कारण यह है कि परमात्मा की इच्छा है कि वह उसके संपूर्ण स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करके आनन्द की अनुभूति प्राप्त करे। अर्थात् केवल आनन्द नहीं सच्चिदानंद परमात्मा की पूर्ण अनुभूति करे। सत, चित अर्थात् उसके अस्तित्व का ज्ञान प्राप्त करके आनंद की अनुभूति प्राप्त करे। अन्य पशु-पक्षियों की भाँति मनुष्य परमात्मा का ज्ञान प्राप्त किये बिना आनंद को प्राप्त नहीं कर सकता। उसे सच्चा आनन्द तब ही प्राप्त हो सकता है, जब वह परमात्मा का ज्ञान प्राप्त कर ले।
अपनी इच्छा के अनुरूप ही उसने मनुष्य को उपादान भी दिये हैं, अद्भुत शरीर और विलक्षण विवेक-बुद्धि इनका उपयोग कर मनुष्य सहज ही परमात्मा का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। अपनी विवेक-शक्ति को विकृतियों से मुक्त कर मनुष्य यदि प्रत्यक्ष संसार को एक गहरी अनुभूति से देखे, उस पर चिन्तन करे तो सहज ही वह परमात्मा के अस्तित्व का ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
मनुष्य को आनंद की खोज करने की आवश्यकता नहीं, वह तो सच्चिदानन्द परमात्मा से उत्पन्न इस आनन्द क्या, सृष्टि में स्वयं ही ओत-प्रोत है। मनुष्य को केवल अपनी अनुभव शक्ति को प्रबुद्ध भर करना है। अनुभव शक्ति के प्रबोध के लिए उसे कोई विशेष तपस्या अथवा साधना नहीं करनी है। वह एक विस्मयमूलक दृष्टिकोण से उसकी रचना-इस संसार को देखे और परमशिल्पी की परमरचना समझकर उसका सम्मान करे, इतना भर कर लेने से इसकी अनुभव शक्ति स्वतः प्रबुद्ध हो उठेगी और एक बार प्रबुद्ध हो जाने पर वह शक्ति पुनः निहित नहीं होगी।
स्त्री-पुरुष पशु-पक्षी पेड़-पौधे फल-फूल जिसको भी देखें एक विस्मय और कुतूहल से देखता हुआ निर्माता की सराहना में गदगद हृदय हुआ मनुष्य एक दिन बिना किसी विशेष साधना के परमानन्द को अवश्य पा लेगा। अपने सहित सृष्टि के बाहर सच्चिदानन्द परमात्मा का अस्तित्व कल्पना करने वाले जन्म-जन्मान्तर उसकी अनुभूति प्राप्त नहीं कर सकते। परमात्मा इस सृष्टि में ही है। सृष्टि में जो कुछ है, वह सब उसी का स्वरूप है, उसी का अस्तित्व है।
एक दिन देवलोक से एक विशेष विज्ञप्ति निकाली गई, जिसने आकाश, पाताल तथा पृथ्वी तीनों लोकों में हलचल मचा दी। प्रसारण इस प्रकार था-
“अगले सात दिन तक लगातार श्री चित्रगुप्त जी की प्रयोगशाला के मुख्य द्वार पर कोई भी प्राणी असुन्दर वस्तु देकर उसके स्थान पर सुन्दर वस्तु प्राप्त कर सकेगा। शर्त यही है कि वह विधाता की सत्त में विश्वास रखता हो। इसकी परीक्षा वहीं कर ली जावेगी।”
बस फिर क्या था? सभी अपनी-अपनी बदलने वाली वस्तुओं की सूची तैयार करने लगे। याद कर-करके सभी ने अपनी उन वस्तुओं को लिख लिया, जो उन्हें अरुचिकर या असुन्दर लगती थीं।
निश्चित तिथि पर देवलोक से विमान भेजे गये, जो सुविधापूर्वक सभी को देवलोक पहुँचाने लगे। जब सब लोग वहाँ पहुँच गए तो विधाता ने अपने तीसरे नेत्र की योगदृष्टि से तीनों लोकों का अवलोकन किया कि कोई बचा तो नहीं आने से। उन्होंने पाया कि स्वर्ग तथा पाताल में कोई शेष नहीं रहा, केवल पृथ्वी पर एक मनुष्य आराम से पड़ा अपनी मस्ती में डूबा आनन्दमग्न है। पास जाकर उससे पूछा-तात् तुमने हमारा आदेश नहीं सुना था। तुम भी चित्रगुप्त के दरबार में क्यों नहीं चले जाते और अपने पास जो कुरूप, कुरुचिपूर्ण वस्तुएँ हैं, उन्हें बदलकर अच्छी वस्तुएँ ले आते, जानते नहीं कि अच्छाई की वृद्धि से सम्मान बढ़ता है।”
वह व्यक्ति बड़ी ही नम्रता तथा गम्भीरता से बोला-सुना था भगवन्! किन्तु मुझे तो आपकी बनाई इस सृष्टि में कुछ भी असुन्दर नहीं दीखता। जब सभी कुछ आपका बनाया हुआ है-सबमें ही आपकी सत्ता व्याप्त हो रही है, तो असुन्दरता कहाँ रह सकती है, यहाँ मुझे तो इस सृष्टि का कण-कण सुन्दर दिखाई देता है। प्रभु, फिर भला मैं किसी को असुन्दर कहने का दुःसाहस कैसे कर सकता हूँ?”
बाद में पता चला कि उस कसौटी पर केवल वही मनुष्य खरा उतरा था। बाकी सबको निराश ही लौटना पड़ा था।
यह थी एक दार्शनिक की विश्व-विजय जो संसार की कुरूप से कुरूप वस्तु में भी सौंदर्य का दर्शन करे, वही सच्चा दार्शनिक है।
दुनिया में अजूबों की कोई कमी नहीं। जिस प्रकार प्रकृति में स्रष्टा ने एक-से-एक बढ़कर विलक्षणताएँ पैदा की हैं, उसी प्रकार कितनी ही विचित्रताएँ मनुष्यों में भी देखी जाती हैं। साधारण मनुष्य एक देहधारी होता है, पर असाधारण स्थिति में उसमें दो-दो शरीर भी देखे जाते हैं। उनका चलना-फिरना उठना-बैठना सोना-जागना सब कुछ अद्भुत होता है, इतने पर भी वे सामान्य इनसान की तरह व्यवहार करते हैं।
ऐसे ही दो जुड़वा भाई चांग और इंग थे। उनके शरीर पृथक्-पृथक् न होकर एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। दोनों ने ही लम्बी आयु पायी और मृत्यु लगभग साथ-साथ हुई।
इनका जन्म बैंकॉक के निकट मैक्लांग गाँव में हुआ था। जब पैदा हुए, तो लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, कारण कि वे इस प्रकार के जुड़े हुए बच्चे पहली बार देख रहे थे। दोनों का वक्षस्थल पार्श्व से जुड़ा हुआ था। कटि प्रदेश से लेकर नीचे का हिस्सा अलग-अलग था; पर उनके एक नाभि थी।
प्रारंभ में इन बालकों को दुर्भाग्यसूचक माना गया और किसी आसन संकट की आशंका से सब भयभीत हो उठे। यह खबर उड़ते-उड़ते राजा के कानों तक पहुँची। पुरानी विचारधारा वाले सम्राट के मन में भी डर पैदा हो गया। उसने उन्हें मरवाने की आज्ञा दे दी। इस बात का विद्वान दरबारियों को जैसे ही पता चला, उन्होंने राजा को समझाया कि इससे कोई विपत्ति नहीं आने वाली। यह असामान्य स्तर की सामान्य घटना है। इससे आतंकित होने की आवश्यकता नहीं। इसके बाद थाई नरेश ने अपना आदेश वापस ले लिया। इस प्रकार दोनों बालक जीवित बच गए।
आयु बढ़ने के साथ-साथ उनकी कठिनाइयाँ बढ़ने लगीं। जब वे चलने-फिरने लायक हुए, तो उन्हें अधिकाधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा, कारण कि एक की यदि चलने की इच्छा होती, तो दूसरा बैठना चाहता और दूसरा जब चलना चाहता, तो पहले की कोई और अभिलाषा होती। दोनों अपने-अपने मन की बात करना चाहते; पर देह के जुड़े होने के कारण इसमें व्यवधान पैदा होता और उनमें खींचतान मचने लगती। कई बार यह रस्साकशी इतनी प्रबल होती कि संलग्न स्थान की त्वचा तीव्र खिंचवा के कारण फट जाती तथा वहाँ से रक्त-स्राव होने लगता। वय के साथ-साथ धीरे-धीरे उनमें समझदारी का विकास हुआ एवं वे परस्पर सामंजस्य बिठाना सीख गए। दोनों ने एक-दूसरे की इच्छाओं का आदर करना सीख लिया। इस प्रकार एक को जब किसी बात की तीव्र अभीप्सा होती, तो दूसरा भाई बिना किसी अनख के उसकी पूर्ति में मदद करता।
चांग-इंग के पिता पेशे से मछुआरे थे। नित्यप्रति वे निकटवर्ती नदी में मछलियाँ पकड़ने जाया करते; तो साथ में चांग-इंग को भी ले जाते। धीरे-धीरे वे मछलियाँ पकड़ना सीख गए। इतना ही नहीं, उन्हें तैरना और नाव खेना भी भली-भाँति आ गया। अब वे अपने बूते अपना जीविकोपार्जन कर सकते थे।
कुछ दिन पश्चात् उनके पिता की मृत्यु हो गई। घर पर केवल माँ और चांग-इंग रह गए। आय का कोई स्रोत था नहीं, इसलिए अब भोजन जुटाना मुश्किल पड़ गया। चांग-इंग ने पोल्ट्री फार्म खोल लिया। इसके अतिरिक्त मछली भी पकड़ने और बेचने लगे। इससे किसी प्रकार उनके भोजन-वस्त्र का इन्तजाम हो जाता।
कुछ वर्ष पश्चात् वहाँ के सम्राट की मौत
हो गई। राजसिंहासन पर नये राजा पदासीन हुए। उन्होंने चांग-इंग के बारे में सुन रखा था। दोनों को बुलवाया गया। उन्हें देखकर राजा को उन पर दया आ गई। उनने उन्हें ढेर सारा धन इनाम में दिया।
जब उनकी उम्र 17 वर्ष थी, तो रॉबर्ट हण्टर नामक एक स्कॉट व्यापारी उन्हें यूरोप और अमेरिका के दौरे पर ले गया। दस वर्षों तक विभिन्न देशों में उनकी जगह-जगह नुमाइश लगायी गई। इससे चांग-इंग के पास काफी धन इकट्ठा हो गया। अब अपनी इस प्रकार की प्रदर्शनी से वे ऊब चुके थे। उत्तरी कैरोलिना के एक कस्बे में मकान खरीदा और रहने लगे। बाद में चांग ने ‘एन’ तथा इंग ने ‘एडलिड’ नामक लड़कियों से विवाह कर लिया। दोनों के संतानें हुईं, जो एकदम सामान्य थीं। 63 वर्ष की आयु में एक दिन चांग बीमार पड़ा और उसका निधन हो गया। उसके कुछ ही घंटे पश्चात् स्वस्थ इंग का भी देहान्त हो गया।
ऐसी ही दो जुड़वा बहिनें वायलट और डेजी थीं। उनका जन्म अब से 90 वर्ष पूर्व इंग्लैण्ड के बरहिंगटन कस्बे में हुआ था। दोनों परस्पर कमर से जुड़ी हुई थीं।
जन्म के पश्चात् पिता ने जब उन्हें देखा, तो बहुत निराश हुए और उनकी उपेक्षा करनी शुरू कर दी। माँ मैरी हिल्टन बुद्धिमान महिला थी। उसने उनके आर्थिक महत्व को समझा और उनका भली-भाँति पालन करना प्रारंभ किया। तीन वर्ष की अवस्था से ही वह उनकी स्थानीय मेले-ठेले में नुमाइश लगाने लगी और पैसा कमाने लगी। बारह वर्ष की हुईं, तो उन्हें लेकर विदेश-भ्रमण के लिए निकल पड़ी। आस्ट्रेलिया, अमेरिका, जर्मनी आदि देशों में उनका प्रदर्शन कर उसने खूब धन कमाया।
इस बीच मैरी हिल्टन ने अपनी दोनों लड़कियों को नृत्य और संगीत भी सिखा दिया था। वायलट पियानो बजाती थी और डेजी वायलिन। उनका नृत्य-संगीत सुनकर दर्शक मुग्ध हो जाते एवं बढ़-चढ़कर प्रशंसा करते।
मैरी हिल्टन दोनों के साथ बहुत कठोरता बरतती थीं। उनका जीवन एक प्रकार से गुलामों जैसा गुजर रहा था। वे अब इससे मुक्ति चाहती थीं, पर निर्दयी माँ उन्हें कैसे छोड़ सकती थी। वह जानती थी कि सोने के अण्डे देने वाली इन मुर्गियों को यदि स्वतंत्र कर दिया गया तो वह दाने-दाने के लिए तरस जाएगी। सौभाग्यवश थोड़े दिन बाद माँ की मृत्यु हो गई। वह सोच रही थीं कि शायद अब इस परतंत्र जिन्दगी से छुटकारा मिल जाएगा, पर जालिम पिता धन पैदा करने वाली अपनी बच्चियों की महत्ता को अब समझ चुके थे। वह उन्हें गुलाम बनाये रखना चाहता था, लेकिन अब वे पूर्णरूपेण वयस्क हो चुकी थीं और अपना जीवन अपने ढंग से जीने के लिए कानूनी तौर पर स्वतंत्र थीं। किसी प्रकार उनने अपने पिता पर मुकदमा दायर कर दिया और अदालत के समक्ष अपनी व्यथा-कथा सुना दी। फैसला उनके पक्ष में हुआ और अदालत ने एक लाख डॉलर की धनराशि भी उन्हें दिलवायी।
दोनों ने विवाह किये और उनके बच्चे भी हुए। उन्हें ‘चेण्ड फॉर लाइफ’ नामक एक अमेरिकी फिल्म में काम करने का मौका भी मिला, पर इसी बीच एक सुबह वायलट की मृत्यु हो गई, शाम तक डेजी भी इस संसार से विदा हो गई। उस समय उनकी उम्र 41 वर्ष थी।
मिली और क्रिस्टीन का जन्म कैरोलिना राज्य के कोलम्बस शहर में हुआ था। उनके भी शरीर कमर से जुड़े हुए थे। दो सिर, दो हाथ के अतिरिक्त उनके दो-दो टाँगें भी थीं। कुल मिलाकर वे पृथक् शरीर थीं।
जब मिली-क्रिस्टीन का जन्म हुआ, तब अमेरिका में गुलाम प्रथा थी। उनके माता-पिता एक धनी व्यक्ति के गुलाम थे। उसने जब मिली-क्रिस्टीन की अद्भुत शरीर रचना देखी तो उनसे धन कमाने का निश्चय किया। माता-पिता सहित लड़कियों को एक व्यापारी के हाथ ऊँचे दामों में बेच दिया। व्यापारी ने भी उन्हें अपने पास नहीं रखा और किसी दूसरे के यहाँ विक्रय कर दिया। इस प्रकार कई हाथों में घूमते हुए लड़कियाँ अन्ततः माँ-बाप से बिछुड़ गईं उन्हें जे. पी. स्मिथ नामक एक व्यापारी ने खरीद लिया। वह सहृदय व्यक्ति था। इसलिए उसने उनके माता-पिता को भी खरीद लिया, ताकि मिली-क्रिस्टन की उचित देख-भाल हो सके।
मिली-क्रिस्टीन जब काफी छोटी थीं तभी से उनकी नुमाइश शुरू हो गई। पहली बार इनका प्रदर्शन लंदन में किया गया। उसके बाद से तो दुनिया के अनेक भागों में जीवनपर्यन्त उनकी नुमाइश चलती रही।
जब वह लंदन में थीं, तो महारानी विक्टोरिया ने उन्हें अपने यहाँ बुलाया और ढेर सारे उपहार दिये। मिली-क्रिस्टीन कई दिनों तक राजपरिवार की अतिथि बनी रहीं। इसके बाद यूरोप के विभिन्न देशों की यात्राएँ करते हुए अन्त में वे अमेरिका पहुँची और कोलम्बस शहर में स्थायी रूप से रहने लगीं। इसी मध्य मिली को क्षयरोग हो गया। तब चिकित्सा जगत में इसका कोई इलाज नहीं था। कुछ ही दिनों में उसका शरीर एकदम क्षीण हो गया और अन्त में उसकी मृत्यु हो गई। मिली की मृत्यु के थोड़े ही घंटे बाद क्रिस्टीन भी चल बसी। उनकी कब्र पर निम्न पंक्तियाँ लिखी गईं-एक आत्मा, जिसके दो शरीर थे, दो हृदय जो साथ-साथ धड़कते थे।”
रोजा, जोजफा ब्लैजेक-यह जुड़वा बहिनें चैकोस्लोवाकिया के बोहमिया शहर की रहने वाली थीं। इनकी रीढ़ और पीठ की हड्डियाँ परस्पर जुड़ी हुई थीं। दवा दी जाती, तो उसका असर दूसरी पर भी होता दिखाई पड़ता। एक बार रोजा पीठदर्द से बुरी तरह तड़प रही थी। दर्दनिवारक सारी दवाएँ तात्कालिक राहत ही पहुँचा पा रही थीं, अन्ततः उसे मोर्फिन की सुई लगाकर सुला दिया गया। इसका प्रभाव जोजफा पर भी पड़ा। वह भी गहरी निद्रा में सो गई। दोनों एक सर्कस कम्पनी से जुड़ी हुई थीं। इसके माध्यम से
चैकोस्लोवाकिया में एवं उससे बाहर अनेक देशों में उनका प्रदर्शन किया गया। बाद में दोनों ने एक स्लोवाक युवक से शादी कर ली। रोजा के एक पुत्र पैदा हुआ। जब वे अमेरिका के दौरे पर थीं, तो एक दिन रोजा बीमार पड़ी और मर गई। इसके घण्टे भर बाद जोजफा ने भी शरीर त्याग दिया।
गोडीनो ब्रदर्स फिलीपीन्स में पैदा हुए थे। उनके नाम सिम्पलक्यू गोडीनो और लुइसयो गोडीनो था। उनने दो अलग-अलग लड़कियों से विवाह किया और गृहस्थी बसायी। 27 वर्ष की अवस्था में लुइसयो अचानक ज्वरग्रस्त हो गया। काफी उपचार के बाद भी ठीक न हो सका और उसका निधन हो गया।
भाई की मौत के बाद चिकित्सकों ने सिम्पलक्यू को शल्य क्रिया द्वारा मृत शरीर से पृथक् कर दिया, पर दुर्भाग्यवश उसे एक गंभीर मस्तिष्कीय रोग हो गया और एक पखवाड़े में ही उसकी मृत्यु हो गई।
मनुष्य की शरीर-संरचना चित्र-विचित्र हो सकती है; पर वह जीवन-प्रवाह को किसी भी प्रकार बाधित नहीं कर सकती। कई बार इसके कारण उसकी जिन्दगी अत्यन्त जटिल बन जाती है, जीना मुश्किल हो जाता है, इसके बावजूद अन्दर की दृढ़ता लगातार उसे प्रेरणा देती रहती है और उस सम्बल के सहारे वह जीवन-नौका को पार लगा लेता है। मनुष्य में यदि जिजीविषा और संकल्प का बल न हो, तो शायद पग-पग पर उसे हताश और निराश होना पड़ें यह वह तत्व है, जो उसे किसी भी प्रकार की कायिक विकृति पर विजय प्राप्त करने का साहस प्रदान करते हैं। हमारी काया बनावट की दृष्टि से विलक्षण और कमजोर भले ही हो; पर मानसिक संरचना यदि हर प्रकार से सुदृढ़ हुई, तो इस प्रकार की कोई भी दैहिक त्रुटि जीवन जीने में आड़े नहीं आ सकती।
वह ‘नारी’ थी। जब-जब वह अपने पिता की क्रूरता की कहानियों को सुनती उसका हृदय वेदना से भर उठता। वह अपने पिता के हठ एवं धर्मान्धता से परिचित थी। उसे उनका स्वभाव मालूम था। वे अपने जुनून में कितना ही बड़ा नरसंहार कर सकते थे। चाहते हुए भी वह उनको रोक नहीं पाती थी। उन जैसे हठी को रोके भी तो कौन?
आज जब उसने सुना कि बादशाह आलमगीर के सेनापति रणदूलहखाँ अपनी विशाल फौज के साथ ओरछा जाने वाले हैं। तो वह सिहर उठी। उसके आँखों के सामने अगणित ध्वस्त देवमन्दिर, भग्न देवमूर्तियाँ प्रत्यक्ष हो उठीं। उसका नारी हृदय भीतर ही भीतर तड़प उठा। नहीं, अबकी बार वह ऐसा नहीं होने देगी। ‘मजहब संवेदना है, बर्बरता नहीं।’ न जाने क्यों उसके अब्बाहुजूर ये सच्चाई समझ नहीं पाते हैं। अबकी बार वह चुप नहीं बैठेगी। अपने इस दृढ़ निश्चय के साथ ही वह ओरछा की ओर रवाना हो गयी।
ओरछा पहुँचकर उसने देखा, नगर में रणदूलहखाँ के आने की खबर से बेचैनी थी। उसके आने के पहले से ही शायद उसका फरमान आ चुका था कि आज तीसरे पहर चतुर्भुज जी का मन्दिर तोड़कर उसके स्थान पर मस्जिद बना दी जाए। इस खबर से लोग दुःख और क्रोध से भरे हुए थे, परन्तु शाही सेना का प्रतिवाद करने की शक्ति उनमें न थी। जब यह खबर लोगों ने सुनी तो उन पर वज्रपात हुआ। मन्दिर की रक्षा का कुछ उपाय न था। सारे नगर में दुःख का रोना, शोक की ध्वनि और आत्मनिन्दा के वाक्य सुनायी दे रहे थे। उस दिन नगरवासियों ने अन्न-जल त्याग दिया था।
लोगों में चोरी-छिपे यह चर्चा भी चल रही थी कि प्राणनाथ प्रभु आ गए हैं। इस खबर से लोगों में आशा का संचार हो रहा था, परन्तु मन्दिर के पट बन्द थे। सभी लोग आशंकित थे, पर उनको यह गुमान न था कि प्राणनाथ प्रभु भीतर बैठे परामर्श कर रहे हैं। झुण्ड के झुण्ड लोग मन्दिर के चारों ओर खड़े थे।
भीतर जो लोग एकत्रित थे, उनमें से एक ने कहा-देखिए अब मामला यहाँ तक पहुँच गया कि हमें कुछ न कुछ कर ही डालना चाहिए।
अन्य जो लोग वहाँ बैठे थे, उन पर दृष्टि डालकर उसने सबको घूरते हुए कहा-
सरदारो! क्या बुन्देलखण्ड हम बुन्देलों का नहीं है? और यह मन्दिर क्या स्वर्गीय महाराज चम्पतराय की विजय कामनाओं का केन्द्र नहीं रहा? क्या आज भूल गए कि उस वीर ने विजयों पर विजय करके किस प्रकार इसकी देहली पर मस्तक टेका था। वे भाग्यवान तो वीरगति को प्राप्त हुए और हम उनके दरबारी और सरदार हैं, सो क्या केवल इसलिए कि चुपचाप उनकी दी हुई जागीर को खाते रहें?
श्रोतागण सिर नीचा किये हुए चुप बैठे थे। उन्होंने फिर कहा और आपको मालूम है कि आपके, हमारे, ओरछे के और समस्त बुंदेलखंड के सिर पर लात मारकर जो अधिपति बनकर आए हैं, वह कौन हैं? मुझे कहते हुए लज्जा आती है। वह न उच्चकुलीन है और न कोई सज्जन या वीर पुरुष है। वह एक पतित और दुष्ट प्रकृति का व्यक्ति है। उसकी एक ही विशेषता है कि उसकी पुत्री को शाही खिदमत बजा लाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है बस। उसकी यही योग्यता है। वह सारंगी बजाने का काम किया करता था। क्या आप लोग उस अधम व्यक्ति की प्रजा बनकर रहेंगे?
सरदारो! इस नीच व्यक्ति के अधीन जो न तो प्रतिष्ठित है और न योग्य, किन्तु बादशाह की कृपा से वह हमें अपनी स्वेच्छाचारिता से बर्बाद करना चाहता है। हमारे आराध्य की मूर्ति नष्ट करना चाहता है। क्या हम सब यों ही सहते रहेंगे? क्या यह उचित है? इस गन्दे घास-फूस को क्यों न हम उखाड़ कर फेंक दें और अपना मार्ग साफ कर लें? सज्जनों! मैं आप सबसे पूछता हूँ, आप का क्या उत्तर है?
एक स्वर से सब चिल्ला उठे-अवश्य! भले ही हमें प्राणों की बाजी लगानी पड़े। प्रत्येक व्यक्ति क्रोध और आवेश में बोल रहा था और गुम्बज में उसकी ध्वनि प्रतिध्वनित हो रही थी। एकमात्र प्राणनाथ प्रभु शान्त बैठे थे।
अब वे बोले। उन्हें बोलने का उपक्रम करते देख सभी चुप हो गए। प्राणनाथ प्रभु ने हँसकर कहा-यह सब तो ठीक है, पर पहल कौन करेगा? मुगलवाहिनी से टकराने का साहस किसमें है?
इस प्रश्न के उत्तर में सर्वत्र सन्नाटा छा गया। इस मण्डली में एक कोने में एक अल्पवयस्क बालक बैठा था। वह अपरिचित और विदेशी था। न जाने कब और कैसे वह इन लोगों के बीच आकर बैठ गया था। शायद इसे प्राणनाथ प्रभु की सिफारिश पर इस गुप्त सभा में सम्मिलित कर लिया गया था।
उसने धीरे से खड़े होकर मुस्करा कर कहा-यदि प्रभु का हुक्म हो तो यह सेवा आपका यह तुच्छ सेवक करेगा।
प्राणनाथ प्रभु हँस दिए। सभा ने विस्मित होकर कहा-देखो वह आ रहा है।
सब लोगों ने झरोखों में से देखा-एक दल सवारों का हथियारों से सुसज्जित आ रहा है। उनमें से एक व्यक्ति बहुमूल्य और भड़कीले वस्त्र पहने एक अरबी घोड़े पर सवार आगे चला आ रहा है। उसके पीछे सौ सवार हथियारों से लैस आ रहे हैं।
इस गर्वीले दल को देख यह छोटी-सी मण्डली दाँत पीसने लगी।
बाहर कोलाहल होने लगा। सहस्राधिक मनुष्य चीत्कार उठे। मन्दिर के सिंहद्वार पर भारी-भारी चोटें पड़ने लगीं। सभी लोग द्वार पर आकर एकत्र हो गए। प्राणनाथ प्रभु ने कहा-देखो सभी लोग संयम से रहना। जल्दबाजी मत करना। मैं और यह सुन्दर युवक मिलकर सब ठीक कर लेंगे। अभी तुम सब लोग भीतर ही रहो।
यह कहकर प्राणनाथ प्रभु सिंहद्वार पर आकर बोले-तुम कौन हो?
मैं सिपहसालार रणदूलहखाँ हूँ, द्वार खोल दो।
द्वार खुलवाने का उद्देश्य क्या है?
मैं बुतशिकन हूँ। मैं मन्दिर को ढहा दूँगा, मूर्ति को तोड़ूँगा।
और यदि द्वार न खोले जाएँ?
तो जबरदस्ती दरवाजा तोड़ दिया जाएगा।
बलप्रयोग का यहाँ कोई प्रयोजन नहीं। मैं द्वार खोलता हूँ।
इसके बाद प्राणनाथ प्रभु ने फाटक की भारी साँकल पर हाथ डाला-एक भयानक चीत्कार करके द्वार खुल गया। प्राणनाथ प्रभु अपना भगवा परिधान पहने बाहर निकल आए। तत्क्षण एक प्रचण्ड जयघोष हुआ। हजारों नर-नारी चिल्ला उठे-प्राणनाथ प्रभु की जय!
रणदूलहखाँ उस सतेज मूर्ति को अपने सामने आते देख पीछे हट गया। प्रचण्ड जयघोष ने उसे घबरा दिया था। परन्तु तुरन्त उसने साहस संचय करके कहा-बागी तू कौन है और क्यों यहाँ इतनी भीड़ लगा रखी है।
उत्तर में प्राणनाथ प्रभु एक शब्द भी न बोले। वे चुपचाप खड़े रहे। रणदूलहखाँ ने क्रोध में पागल होकर कहा, अरे गुस्ताख़ मैं पूछ रहा हूँ और तू जवाब नहीं देता। ठहर अभी तेरा सिर भुट्टे-सा उड़ाता हूँ। यह कहकर तलवार खींचते हुए वह आगे बढ़ा।
प्राणनाथ ने वज्रगर्जन करके कहा, वहीं खड़ा रह। दूसरे ही क्षण मन्दिर में से अनेक वीर निकल कर प्राणनाथ प्रभु के पीछे आ खड़े हुए। उन्होंने तलवार खींच लीं।
रणदूलहखाँ ने फिर साहस संग्रह किया, उसने कहा-समझ गया। तू प्राणनाथ गोसाई है, जो तमाम मुल्क में बगावत फैलाता फिरता है।
प्राणनाथ प्रभु बोले नहीं, वज्रदृष्टि से उसे देखते भर रहे।
रणदूलहखाँ ने फिदाईखाँ फौजदार को हुक्म दिया, क्या देखते हो, इस बागी की गर्दन एक ही हाथ से उड़ा दो। परन्तु फिदाईखाँ की हिम्मत न हुई। उसने अपने एक हवलदार से कहा-हैदरखाँ तलवार के एक ही वार से गोसाई का सिर धड़ से अलग कर। रणदूलहखाँ ने जो काम फिदाईखाँ को सौंपा था, फिदाईखाँ ने वह हैदरखाँ को सौंप दिया। यह देखकर प्राणनाथ प्रभु मुस्करा दिए। उन्हें मुसकराता देख हैदरखां ने एक सिपाही से कहा-मुहम्मदखाँ खाँ साहेब का हुक्म बजा लाओ, और एक ही हाथ में इसका सिर भुट्टे की भाँति उड़ा दो।
मुहम्मदखां ने तपाक से कहा, वल्लाह हुजूर की मौजूदगी में एक काफिर को कत्ल करूँ? मुझसे हरगिज यह गुस्ताख़ी न होगी। जनाब के एक ही हाथ से इस बदनसीब का सिर कलामुण्डी खा जाएगा। रणदूलहखाँ यह देखकर कुड़ गया। पर वह समझ गया कि इस गुसाई पर हाथ डालना साधारण आदमी का काम नहीं है। उसने होंठों को दाँतों से दबाकर तलवार खींच ली और आगे को बढ़ा।
हजारों की संख्या में खड़े नर-नारी विचलित और उत्तेजित हो उठे। प्राणनाथ प्रभु ने फिर गम्भीर गर्जन से कहा, खबरदार, सब लोग शान्त खड़े रहें। रणदूलहखाँ थर-थर काँपने लगा। पर उसने आगे बढ़कर कहा, गुसाई मरने को तैयार हो जा। मूर्ख मैं अभी नहीं मरूँगा। प्राणनाथ प्रभु बोले। उनके इस कथन पर रणदूलहखाँ ने तलवार ऊपर को उठाई। प्राणनाथ
प्रभु वज्र की भाँति खड़े थे।
अब वह युवक तेजी से मन्दिर के कक्ष से निकला और प्राणनाथ प्रभु के सामने खड़े होकर महीन, किन्तु तीव्र स्वर में बोला, खामोश रणदूलहखाँ, तलवार जमीन पर रख दो और इस बुजुर्ग से दस्तबस्ता माफी माँगो।
तू कौन है? तेरी हिम्मत पर आफरीन है, हट जा बच्चे। वरना यह तलवार तेरे खून से ही पहले सुर्ख होगी। क्या तू सिपहसालार रणदूलहखाँ के गुस्से को नहीं जानता?
युवक जोर से खिलखिला कर हँस पड़ा। इसके बाद उसने अपने सिर की पगड़ी उतार कर फेंक दी। पिंडली तक लटकने वाली सघन काली घूँघर वाली केशराशि बिखर गई। उसने दर्प से कहा, पीछे हट जा, शहजादी बदरुन्निसा तुझे हुक्म देती है कि अपनी तलवार जमीन पर रखकर झटपट इस बुजुर्ग से माफी माँग।
रणदूलहखाँ का चेहरा पीला पड़ गया। वह थर-थर काँपने लगा। उसने तलवार शाहजादी के चरणों पर रख दी और कहा, हुजूर गुलाम की गुस्ताख़ी माफ फरमाई जाए, हुजूर को मैं पहचान...........।
पहले उस बुजुर्ग से माफी माँग। रणदूलहखाँ घुटनों के बल प्राणनाथ प्रभु के चरणों में गिर गया। प्राणनाथ हँस पड़े और हाथ उठाकर उसे अभय दिया।
सभी उपस्थित लोग शहजादी की प्रशंसा करने लगे। प्राणनाथ प्रभु ने उसके सिर पर हाथ रख आशीर्वाद दिया। अपनी प्रशंसा के उत्तर में वह कहने लगी-मैं एक नारी हूँ। नारी का परिचय उसके हृदय की संवेदनाएँ होती हैं। वह सृजन तो कर सकती है, ध्वंस नहीं। बस मुझसे यह विनाशलीला देखी नहीं गई। और मैं इसे बचाने चली आयी।
इस बीच रणदूलहखाँ जल्दी-जल्दी शहजादी और प्राणनाथ प्रभु को बार-बार सलाम कर अपनी फौज सहित चला गया और इस आतंकित रीति से मन्दिर की रक्षा होती देख लोग बारम्बार हर्षनाद करने लगे। नारी हृदय की संवेदनाओं ने इस तरह भारतीय इतिहास में एक अनूठे अध्याय की रचना कर दी। अब ओरछा के वृद्ध नर-नारी भगवान चतुर्भुज के मन्दिर के रक्षा की इस कहानी को बार-बार चाव से कहा करते हैं।
सूक्ष्मजगत में काम कर रही शक्तियाँ स्थूल पदार्थों को किस प्रकार प्रभावित करती हैं, इसके उदाहरण आये दिन देखने को मिलते रहते हैं। उदाहरणस्वरूप वायुमण्डल में तापमान बढ़ते ही हमारे शरीर गरम होने लगते हैं, वस्तुएँ भी गरम हो उठती हैं और ठण्डक का मौसम आते ही ठण्डी का अनुभव होने लगता है। वर्षाऋतु में हवा की नमी मात्र से घासपात में हरियाली दौड़ जाती है। रेडियो और टेलीविजन के उपकरण अन्तरिक्ष में चल रहे सूक्ष्मप्रवाहों से प्रभावित होते और अपने काम करते देखे जाते हैं। इसी सिद्धान्त के आधार पर हम अपनी प्राणचेतना एवं मनोबल की शक्तितरंगों को आकाश में प्रेषित कर सकते हैं और उससे निकटवर्ती एवं दूरवर्ती व्यक्तियों तथा पदार्थों को प्रभावित कर सकते हैं तथा उन्हें अपनी इच्छानुसार मोड़-मरोड़ सकते हैं।
सम्मोहक विज्ञान के ज्ञाता जानते हैं कि इस विद्या के द्वारा किस तरह शारीरिक और मानसिक चिकित्सा की जाती है और उसका लाभ औषधि उपचार की तरह रोगी को मिलता है। इसी प्रकार प्राणवान व्यक्ति अपनी जीवनीशक्ति का एक अंश दूसरों को देकर उनमें नव-जीवन का संचार कर देते हैं। इसके द्वारा किन्हीं व्यक्तियों को प्रभावित करके उनके चिन्तन एवं चरित्र को मोड़ा जा सकता है, इतना ही नहीं उन्हें स्वास्थ्य, बल, ज्ञान, पराक्रम जैसी विभूतियों से भी लाभान्वित किया जा सकता है।
प्राणचेतना द्वारा मनुष्यों एवं प्राणियों को प्रभावित करने की तरह ही मनोबल के द्वारा पदार्थों को भी प्रभावित किया जा सकता है। उन्हें हटाया, उठाया, हिलाया, गिराया जा सकता है। उनमें अन्य प्रकार की हलचलें एवं विशेषताएँ पैदा की जा सकती है। उनका स्वरूप तक बदला जा सकता है और गुण भी। आग और बिजली की सहायता से पदार्थों के आकार-प्रकार में परिवर्तन हो सकता है, ऐसा मनोबल के संयोग से भी संभव है। कई चमत्कार-प्रदर्शनों में ऐसी घटनाएँ प्रयत्नपूर्वक प्रत्यक्ष की जाती हैं, जिनमें मनोबल ने जड़ पदार्थों में अस्वाभाविक हलचलें पैदा कर दीं अथवा उनके सामान्य क्रिया-कलाप को अवरुद्ध कर दिया। बिना प्रदर्शन के भी ऐसे घटनाक्रम सामान्य जीवनक्रम में घटित होते रहते हैं, जिनमें व्यक्तिविशेष के सम्पर्क अथवा संकल्प के कारण वस्तुओं के स्वरूप एवं क्रिया−कलाप में आश्चर्यजनक परिवर्तन हो गया। विद्युत-प्रवाह की तरह ही यदि मनोबल को भी एक शक्तिधारा माना जा सके, तो फिर उसके द्वारा सम्पन्न होने वाले क्रिया-कलापों को भी आश्चर्यजनक नहीं, वरन् सामान्य ही माना जाएगा।
आग और गर्मी का अन्तर स्पष्ट है। आग प्रत्यक्ष है-स्थूल है। इसलिए उसे आँखों से देखा जा सकता है और इधर से हटाया, जलाया, बुझाया जा सकता है। गर्मी सूक्ष्म है, व्यापक है। इसलिए उसे अनुभव तो किया जा सकता है, पर देखा नहीं जा सकता। उसे हम पकड़ भी नहीं सकते और न ही धकेल सकते हैं। अधिक से अधिक कूलर व वातानुकूलित संयंत्रों आदि के द्वारा अपना कमरा ठण्डा रख सकते हैं, पर गर्मी की ऋतु को बदल देना संभव नहीं। आग स्थूल है, इसलिए जलायी भी जा सकती है और बुझायी भी। बिजली, भाप एवं ईंधन आदि के माध्यम से उत्पन्न होने वाली शक्ति का प्रत्यक्ष प्रयोग रोज ही होता है। इसलिए हम उसे सहज ही पहचानते हैं। मनोबल का सामान्य प्रयोग एक-दूसरे को प्रभावित करने भर का होता है, पर उसे यदि विकसित एवं व्यवस्थित स्थिति में किसी विशेष लक्ष्य के लिए प्रयुक्त किया जा सके, तो प्रतीत होगा कि वह भी कितना शक्तिशाली हैं। उसके आधार पर व्यक्ति को ही नहीं पदार्थों और परिस्थितियों को भी प्रभावित किया जा सकता है।
‘द पॉवर ऑफ माइण्ड’ नामक अपनी कृति में अलेक्जेंडर राल्फ ने प्रमाण प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि प्रगाढ़ ध्यान शक्ति द्वारा एकाग्र मानव मन-शरीर के बाहर स्थित सजीव एवं निर्जीव पदार्थों पर भी इच्छानुकूल प्रभाव डाल सकता है। उनका मत है कि सुनिश्चित रूप से इच्छाशक्ति द्वारा स्थूलजगत पर नियंत्रण संभव है। वस्तुतः हमारे मन के दो भाग हैं-एक चेतन और दूसरा अचेतन। अध्यात्म की भाषा में चेतन को बुद्धि और अचेतन को चित्त कहते हैं। चित्त में ही तरह-तरह की आदतें, संस्कार, आस्थाएँ आदि जड़ जमाये बैठी रहती हैं और अविज्ञात रूप से जीवनक्रम का परोक्ष संचालन करती रहती हैं। अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिक भी अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि हमारा अचेतन मन एक सशक्त सुपर कम्प्यूटर की तरह काम करता है और जिस तरह एक कम्प्यूटर की गई ‘फीडिंग’ के अनुसार ही क्रियाशील होता है, उसी तरह अचेतन भी अपनी आहार हमारे विचारों तथा संकल्पों से प्राप्त करता है। इस तरह अचेतन की दिशा मनुष्य की इच्छाओं से प्रभावित होती है। अतः स्पष्ट है कि इस अचेतन पर व्यक्ति प्रयास द्वारा पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर सकता है और तब अभी अलौकिक लगने वाले काम भी कर सकता है। योगाभ्यास एवं तपश्चर्या की सारी विधि-व्यवस्था इसी प्रयोजन के लिए विनिर्मित हुई है। कभी-कभी ऐसे अपवाद भी देखे जाते हैं कि बिना किसी साधना-प्रयास के अचेतन मन का असाधारण विकास पाया जाता है।
विज्ञानवेत्ता भी अब मानने लगे हैं कि व्यक्ति स्वयं अपना विद्युत चुम्बकीय बलक्षेत्र या गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र या आभामंडल विकसित कर सकता है। पर उसका आधार एवं प्रक्रिया अभी तक वे नहीं जान पाये हैं। मनुष्य चलता-फिरता बिजलीघर है। उसका भीतरी समस्त क्रिया-कलाप स्नायु जाल में निरन्तर बहते रहने वाले विद्युतप्रवाह से ही सम्पादित होता है। वैज्ञानिक इसे ही ‘बायोइलेक्ट्रिसिटी’ कहते हैं। बाह्य जीवन में ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों द्वारा जो विभिन्न प्रकार की हलचलें होती हैं, उनमें खर्च होने वाली ऊर्जा वस्तुतः यह बायोइलेक्ट्रिसिटी ही होती है। रस, रक्त, मज्जा आदि जैसे रासायनिक पदार्थ तो मात्र उसके निर्माण में ईंधन भर का काम देते हैं।
प्राणशक्ति, संकल्पबल या इच्छा शक्ति द्वारा जड़-पदार्थों में हलचल उत्पन्न करने या उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचा देने के आश्चर्यजनक करतब दिखाने वालों के कितने ही उदाहरण विद्यमान हैं। पूर्व सोवियत संघ की एक महिला सैनिक अधिकारी नेल्या मिखाइलोवा के बारे में विख्यात है कि वह अपनी इच्छाशक्ति से स्थिर रखे जड़-पात्रों को गतिशील कर देती है, चलती घड़ी की सुई को रोक देती है और दुबारा चला देती है। इसकी जाँच मूर्धन्य वैज्ञानिकों द्वारा की गई और उसे सही पाया गया। इसी तरह तेल अवीव में जन्मे यूरीगेलर अपनी अतीन्द्रिय क्षमताओं व इच्छाशक्ति से जड़ पदार्थों में हलचल उत्पन्न करने, उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाने तथा दुबारा अपने स्थान पर वापस लाने जैसे विलक्षण करतबों के लिए विख्यात रहे हैं। छात्रजीवन में ही यह विलक्षणता उनमें अनायास ही फूट पड़ी थी।
अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों की दृष्टि अब विचारशक्ति की ओर गयी है। शक्ति अर्थात् ऊर्जा के स्रोत, जैसे-परमाणु विद्युत, भाप, प्रकाश, तेल जैसे साधनों में ही अब विचारशक्ति को भी स्थान मिलने जा रहा है। अध्यात्म शास्त्र में तो आरम्भ से ही विचारों को ऐसा समर्थ तत्व माना है, जो न केवल अपने उद्गमकर्त्ता को, वरन् पूरे सम्पर्क क्षेत्र को भी प्रभावित करता है। इतना ही नहीं, उससे दूरवर्ती एवं अपरिचित प्राणियों तथा पदार्थों तक को प्रभावित किया जा सकता है। टेलीपैथी इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
इस संदर्भ में डबलिन यूनिवर्सिटी के मूर्धन्य वैज्ञानिक सर विलियम वैरेट, इंग्लैण्ड के सोसायटी फॉर साइकिकल रिसर्च के प्रमुख प्रो. सिजविक, लेनिन-ग्राड यूनिवर्सिटी-रूस के शरीरविज्ञानी प्रो. लियोनिद वासिलयेव ने मनुष्य की दूरसंचार क्षमता या विचार-संप्रेषण क्षमता पर गहन अनुसंधान किया है। टेलीपैथी पर प्रयोग कर रहे व्यक्तियों के प्रयोगों को देखा, उन्हें जाँचा-परखा और उन प्रयोगों के पीछे निहित सच्चाई को स्वीकारा है। दूरवर्ती लोगों के मस्तिष्कों को प्रभावित करने में रूसी वैज्ञानिक लियोनिद वासिलयेव ने विशेष सफलता अर्जित की है। दूरसंचार क्षमता का अपना एक प्रयोग उनने एक ऐसे शोध दल पर किया, जो अपने पूर्व में आरंभ किये गये अनुसंधान को छोड़कर उसके प्रति उदासीन हो चुका था। उनने अपने प्रयोगों द्वारा चालू शोध के प्रति धीरे-धीरे उदासीन होने और उसे छोड़कर अन्य शोध में लाने का प्रयोग चालू रखा और उसके सफल परिणाम पर सभी को आश्चर्य हुआ। लियोनिद ने अपना अभिप्राय गुप्त कागजों में नोट करके साथियों को बता दिया था कि वे अमुक शोध मंडली की मनःस्थिति में उच्चाटन उत्पन्न करके अन्य कार्य में रुचि बदल देंगे। कुछ समय में वस्तुतः वैसा ही परिवर्तन हो गया और उस मंडली ने बड़ी सीमा तक पूरा किया गया अपना कार्य रद्द करके नया कार्य हाथ में ले लिया।
श्री डेनियल डगलस होम अपने मनोबल एवं अतीन्द्रिय क्षमता के लिए विख्यात रहे हैं। ‘दि रॉयल एस्ट्रोना-मिकल सोसायटी’ के तत्कालीन अध्यक्ष तथा अन्य प्रमुख वैज्ञानिकों ने डेनियल डगलस की विलक्षण प्रतिभा एवं चमत्कारिक कलाबाजियों का आँखों देखा विवरण लिखा है। प्रख्यात वैज्ञानिक व थीलियम तथा गेलियम धातुओं के अन्वेषणकर्ता सर विलियम क्रूक्स ने भी होम का बारीकी से अध्ययन कर उन्हें चालाकी से रहित पाया था।
इन करिश्मों में हवा में ऊँचा उठ जाना, हवा में चलना और तैरना, जलते हुए अंगारे हाथ में रखना आदि सम्मिलित हैं। सर विलियम क्रूक्स अपने समय के शीर्षस्थ रसायनविज्ञानी थे। उन्होंने भली-भाँति निरीक्षण कर डेनियलडगलस होम की हथेलियों की जाँच की, उनमें कुछ नहीं लगा था। हाथ मुलायम और नाजुक थे। फिर भी क्रूक्स के देखते-देखते होम ने धधकती अँगीठी से सर्वाधिक लाल चमकदार कोयला उठाकर अपनी हथेली में रखा और देर तक रखे रहे। देखा गया कि उनके हाथ में छाले, फफोले कुछ भी नहीं पड़े।
मूर्धन्य विद्वान लार्ड अडारे ने भी ‘रिपोर्ट ऑफ द डायलेक्टिकल सोसायटीज कमेटी ऑफ स्पिरिचुअलिज्म’ में होम के चमत्कारी करतबों का विवरण दिया है, जो होम की अतिमानसिक क्षमताओं तथा अदृश्य शक्तियों से उनके सम्बन्ध पर प्रकाश डालते हैं। इनमें अनेक व्यक्तियों की उपस्थिति में कमरे की सभी वस्तुओं का होम की इच्छा मात्र से थरथराने लगना, किसी एक पदार्थ-जैसे टेबिल या कुर्सी आदि का हवा में चार-छह फुट ऊपर उठ जाना और होम की इच्छित समय तक वहाँ उनका लटके रहना, टेबिल के उलटने-पलटने के बाद भी उस पर सामान्य रीति से रखा संगमरमर का पत्थर और कागज पेन्सिल का यथावत् बने रहना आदि।
सर विलियम क्रूक्स ने भी एक सुन्दर हाथ के सहसा प्रकट होने, होम के बटन में लगे फूल की पत्ती को उस हाथ द्वारा तोड़े जाने, किसी वस्तु के हिलने, उसके इर्द-गिर्द चमकीले बादल बनने और फिर उस बादल को स्पष्ट हाथ में परिवर्तित होने तथा उस हाथ को स्पर्श करने पर कभी बेहद सर्द, कभी ऊष्ण और जीवंत लगने आदि के विवरण लिखे हैं।
साधना और तपश्चर्या से दिव्य क्षमताएँ बढ़ती हैं और उससे कितने ही प्रकार के असामान्य कार्य कर सकना संभव होता है। यह आध्यात्मिक उपलब्धियाँ अगले जन्मों तक साथ चली जाती हैं। प्रायः ऐसे ही लोग बिना साधना-तपश्चर्या के भी पूर्व संचित संपदा के आधार पर चमत्कारी क्षमताओं को प्रदर्शित करते देखे जाते हैं। ऐसी विलक्षणताएँ हर मनुष्य के अचेतन मन में विद्यमान हैं, परन्तु वे प्रसुप्त स्थिति में दबी पड़ी हैं। यदि उन्हें कुरेदा, उभारा, बढ़ाया और परिष्कृत किया जा सके तो मनुष्य सूक्ष्म विभूतियों और स्थूल सफलताओं से परिपूर्ण बन सकता है।
अथर्ववेद के काण्ड-3, सूक्त-11 में उल्लेख है-
यदि क्षितायुर्यदि वा परे तो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव। तमा हरामि निऋतेरुपस्थादस्पार्शमेनं शतशारदाय॥
अर्थात् रोगग्रस्त मनुष्य यदि मृत्यु को प्राप्त होने वाला हो या उसकी आयु क्षीण हो गयी हो, तो भी मैं इसे विनाश के समीप से वापस लाता हूँ। इसे सौ वर्ष की पूर्ण आयु तक के लिए सुरक्षित करता हूँ।
अथर्ववेद के इसी काण्ड में यज्ञीय चिकित्सा द्वारा रोग-निवारण तथा जीवनी-शक्ति के संवर्द्धन का सुविस्तृत उल्लेख है। वस्तुतः यज्ञ एक महत्वपूर्ण विज्ञान है, जिसमें औषधिस्वरूप हव्य होमे जाते हैं, जो बिना नष्ट हुए सूक्ष्मीकृत होकर परिवर्तित स्वरूप में उच्चारित वैदिक मंत्रों की सम्मिलित एवं प्रभावपूर्ण शक्ति से पूरित होकर आकाशमण्डल अर्थात् वातावरण में छा जाते हैं। इनकी सूक्ष्म वैद्युतीय तरंगें एक ओर जहाँ वातावरण का परिशोधन करतीं और प्राणपर्जन्य की अभिवृद्धि करती हैं, वहीं दूसरी ओर मानवी मन में संव्याप्त ईर्ष्या, द्वेष, कुटिलता, पाप, अनीति, अत्याचार, वासना, तृष्णा आदि मानसिक विकारों तथा विविध प्रकार की शारीरिक व्याधियों को नष्ट करती हैं। आयुर्वेद ग्रंथों में भी उल्लेख है कि जब रोगनाशक वनौषधियाँ विधिपूर्वक यज्ञाग्नि में होमी जाती हैं, तो उनसे जो सुगंधित वायु निकलती है, वह श्वास तथा रोम छिद्रों द्वारा रोगी व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करती है और रोग के साथ-साथ रोगोत्पत्ति के कारणों को ही समाप्त कर देती है।
चिकित्सा जगत में अनेकों अनुसंधान हुए हैं और नयी-नयी जीवनदायी औषधियाँ खोज निकाली गयी हैं। यह क्रम अनवरत रूप से चल रहा है। इतने पर भी बीमारियाँ नये-नये रूप धारण कर प्रकटतीं और अपनी चपेट में लेकर लोगों को व्यथित करती रहती है। इसे वातावरण का प्रदूषण कहा जाय अथवा मनुष्य का विचार-प्रदूषण भाव-प्रदूषण दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों ही क्षेत्रों में संव्याप्त विषाक्तता के निवारण के लिए अलग-अलग उपाय उपचार ढूँढ़ने और करने की अपेक्षा कोई ऐसा कारगर एवं प्रभावी निदान खोजना होगा जो वातावरण समेत मानवी चिन्तन चेतना में छायी विषाक्तता का भी निवारण एक ही साथ कर सके और जिसे एक समग्र उपचार की संज्ञा दी जा सके। ऐसा समग्र उपाय उपचार एक ही हो सकता है, जिसकी पहुँच दोनों ही क्षेत्रों में गहराई तक है और वह है-यज्ञ चिकित्सा। यज्ञ-हवन या अग्निहोत्र एक समग्र उपचार प्रक्रिया है, जो शरीर ही नहीं, मन और अन्तःकरण का भी उपचार करती है। इसमें प्रयुक्त होने वाले हव्य एवं मंत्रों के प्रकंपन मानवी मन-मस्तिष्क एवं वातावरण को प्रदूषण से मुक्त करते हैं।
शास्त्रों में यज्ञ से प्राणपर्जन्य की वर्षा होने का उल्लेख है। प्राण और मन अन्योन्याश्रित है। प्राणशक्ति की अभिवृद्धि से मनःसंस्थान सशक्त बनता है। प्रतिदिन नियमित रूप से सुगन्धित द्रव्यों एवं वनौषधियों से हवन करने पर व्यक्ति को उस प्राणसंवर्द्धक ऊर्जा से अनुप्राणित होने का लाभ सहज ही मिल जाता है। हवन में विलक्षण हीलिंग पॉवर एवं स्वास्थ्य-संवर्द्धन क्षमता है, उस संदर्भ में हुए आधुनिक अनुसंधानों ने अब इस तथ्य की पुष्टि कर दी है। यूरोप, अमेरिका एवं एशिया के कई देशों में यज्ञ या अग्निहोत्र से उपचार की अनेक विधियाँ चिकित्सा क्षेत्र में प्रयुक्त की जा रही हैं और उनके परिणाम भी उत्साहवर्द्धक रूप से सामने आये हैं। पोलैण्ड, ब्राजील, पेरू, आस्ट्रेलिया एवं अफ्रीका के वैज्ञानिक इस क्षेत्र में गहन दिलचस्पी दिखा रहे हैं और अनुसंधान कर रहे हैं। देखा गया है कि हवन करते समय हवनकुण्ड के चारों ओर एक विशेष प्रकार की ऊर्जा प्रवाहित होती है। यही ऊर्जा अपने आसपास के वातावरण में फैलकर निषेधात्मक प्रकार की ऊर्जा को निष्क्रिय बनाती एवं विधेयात्मक ऊर्जा की अभिवृद्धि करती है। इसी तरह मंत्रोच्चारपूर्वक किया गया हवन विभिन्न स्तरों पर ऊर्जा का परिवर्तन करता है, जिसका उच्चस्तरीय प्रभाव वृक्ष-वनस्पतियों सहित जीव-जन्तुओं एवं मनुष्यों पर पड़ता है।
इस संदर्भ में पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ के मूर्धन्य वैज्ञानिक डॉ. रामप्रकाश ने यज्ञीय हवन प्रक्रिया का आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर गहन अध्ययन व विश्लेषण किया है। उनका निष्कर्ष है कि यज्ञ-धूम रोगनाशक व पर्यावरण-परिशोधक है। उन्होंने अपनी कृति हवन-यज्ञ और विज्ञान’ में यह सिद्ध किया है कि कुछ मात्रा में निकलने वाली हानिकारक गैसें-जैसे कार्बन मोनोक्साइड आदि किस प्रकार सूर्य किरणों, वायु एवं वृक्ष-वनस्पतियों से मिलकर रासायनिक प्रक्रिया द्वारा आक्सीजन में परिवर्तित होकर स्वास्थ्य संवर्धन का कार्य करती हैं। सुप्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. कुन्दनलाल अग्निहोत्री ने लगातार सैंतालीस वर्षों तक यज्ञ के अद्भुत चिकित्सकीय प्रभाव पर न केवल अनुसंधान किया था, वरन् इसके द्वारा वे टी. बी. क्षय रोग जैसी प्राणघातक बीमारियों का उपचार करने में भी सफल रहे थे। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘यज्ञ चिकित्सा’ में उनने इसका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।
दिल्ली के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. डब्लू सेल्वामूर्ति ने अपने शोधपत्र ‘फिजियोलॉजिकल इफेक्ट्स ऑफ मंत्राज ऑन माइण्ड एण्ड बॉडी’ में लिखा है कि अग्निहोत्र-मंत्र का मनुष्य की फिजियोलॉजी-कार्यिकी तथा नर्वस सिस्टम-तंत्रिका तंत्र पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। इसे उन्होंने न्यूरोफिजियोलॉजिकल प्रभाव की संज्ञा दी है। उनने कहा कि अग्निहोत्र करने से शरीर का तापमान सामान्य से एक डिग्री सेंटीग्रेट कम हो जाता है। इससे मानसिक शाँति मिलती है, तनाव दूर होता है और मस्तिष्क विश्रान्ति की अवस्था में पहुँच जाता है, जिसे विज्ञानवेत्ता ‘अल्फा स्टेट’ के नाम से संबोधित करते हैं। यज्ञ से अल्फा तरंगों में बीस प्रतिशत तक की वृद्धि देखी गयी है।
यज्ञ का हम पर प्रभाव - एक प्रयोग-परीक्षण के लिए आठ स्वस्थ व्यक्तियों का चयन किया गया और उन पर दो दिन अग्निहोत्र का प्रयोग किया गया। प्रथम दिन बिना मंत्र के तथा दूसरे दिन सस्वर मंत्रोच्चार के साथ यज्ञ संपन्न किया गया। इस बीच आठों व्यक्तियों के विभिन्न कायकीय परिवर्तनों, जैसे-हृदयगति ई. ई. जी, ई. सी. जी., रक्तचाप, जी. एस. आर. आदि का सम्बन्धित अत्याधुनिक मशीनों-उपकरणों से जाँच पड़ताल व प्रमापन किया गया। इन परीक्षणों में पाया गया कि यज्ञीय वातावरण, सूक्ष्मीकृत एवं वायुभूत वनौषधियों एवं मंत्रोच्चार के प्रभाव से हृदयगति कम हो गयी। त्वचा का तापमान एक डिग्री सेंटीग्रेट कम हो गया। जी. एस. आर. भी उस समय बढ़ा हुआ पाया गया। ई. सी. जी. का झुकाव ‘बेसलाइन’ की तरफ था। ई. ई. जी. में भी परिवर्तन मापा गया। ‘डेल्टा’ मस्तिष्कीय तरंगों में कमी तथा ‘अल्फा’ तरंगों में अधिकता देखी गयी। इसी तरह ‘थीटा ब्रेन वेव्स’ प्रत्येक परीक्षण में पन्द्रह मिनट तक स्थिर अवस्था में देखी गयी। ‘अल्फा स्टेट’ के कारण मानसिक शाँति व स्थिरता इस प्रयोग परीक्षण में विशेष रूप से पाये गये।
यज्ञ की प्रभावी क्षमता का प्रमुख कारण यह है कि यज्ञाग्नि में मंत्रोच्चार के साथ जो हव्य पदार्थ, वनौषधियाँ आदि आहुति के रूप में डाली जाती हैं, वे सूक्ष्मीकृत होकर लयबद्ध मंत्रोच्चार से उत्पन्न उच्च आवृत्ति की ध्वनि तरंगों के साथ मिल जाते हैं। इस प्रकार उत्पन्न उच्चस्तरीय संयुक्त ऊर्जा तरंगों का प्रभाव स्थायी व दीर्घकालिक प्रभाव उत्पन्न करता है। अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. हार्वर्ड स्टिंगुल ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि अकेले गायत्री महामंत्र में ही इतनी प्रचण्ड सामर्थ्य है कि उसके सस्वर उच्चारण से मानसिक विक्षोभों-दुर्भावनाओं का शमन किया जा सकता है। उन्होंने गायत्री महामंत्र के सस्वर उच्चारण के एक सेकेण्ड में 1,10,000 तरंगें उत्पन्न होने का मापन करके यह रहस्योद्घाटन किया है।
‘ड्रग एडिक्शन’ आज चिकित्सा विशेषज्ञों एवं समाजशास्त्रियों के लिए एक विकराल एवं विश्वव्यापी समस्या बनकर सामने आयी है, जिसका परिणाम लोगों के आचरण से लेकर व्यवहार तक में परिलक्षित हो रहा है। इसके कारण संगठित अपराध बढ़े हैं। नशेबाजी एवं ड्रग एडिक्शन की बुरी लत छुड़ाने के लिए अग्निहोत्र का प्रयोग बहुत सफल रहा है। इस संदर्भ में ‘साइकिएट्री ऑफ इण्डियन आर्मी’ के वरिष्ठ चिकित्सा विज्ञानी लेफ्टिनेन्ट कर्नल जी. आर. गोलेछा ने अपने सहयोगियों के साथ गंभीरतापूर्वक अध्ययन-अनुसंधान किया है। उन्होंने ‘अग्निहोत्र, ए यूजफुल एडजंक्ट इन रिकवरी ऑफ ए रेसिस्टैण्ट स्मैक एडिक्ट’ नामक अपने एक शोधपत्र में निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए कहा है कि वर्षों से स्मैक, हिरोइन जैसी नशीली वस्तुओं का सेवन करने वाले व्यक्तियों का जिन्हें, मनोचिकित्सक भी इस कुटेव से विरत नहीं कर पाये थे, यज्ञ-चिकित्सा के माध्यम से उपचार किया गया तो एक सप्ताह के भीतर ही उनमें परिवर्तन आने लगा। चार दिन तक केवल उन्हें अग्निहोत्र के समय उपस्थित रहने के लिए कहा गया था, पीछे पाँचवें दिन से वे स्वयं यज्ञ करने लगे। तीन माह तक उन्हें इस उपचार प्रक्रिया से गुजारा गया, जिससे उन्हें न केवल नशेबाजी से छुटकारा मिल गया, वरन् बुरी आदतें जो स्वभाव का अंग बन गयी थीं, उनसे भी छुटकारा मिल गया और वे शारीरिक, मानसिक रूप से पूर्णतया
स्वस्थ हो गये।
ड्रग एडिक्शन के साथ ही दूसरी सबसे बड़ी सामाजिक समस्या है-मद्यपान की। संसार में शराब की बुरी लत छुड़ाने के जितने भी प्रचलित चिकित्सकीय एवं मनोवैज्ञानिक तरीके हैं, उनमें यज्ञ या अग्निहोत्र को सबसे उपयुक्त, सरल व प्रभावी पाया गया है। देखा गया है कि नियमित रूप से हवन करने वाले मद्यपियों की मानसिक स्थिति में प्राकृतिक रूप से परिवर्तन आने लगता है और क्रमशः शराब के प्रति उनकी अभिरुचि समाप्त हो जाती है। इस संबंध में श्री गोलेछा ने अपने एक अन्य शोधपत्र ‘अग्निहोत्र इन दि ट्रीटमेण्ट ऑफ अल्कोहलिज्म’ में लिखा है कि अग्निहोत्र एक वैदिक कर्मकाण्डपरक किन्तु एक विज्ञानसम्मत प्रक्रिया है। इसमें सूर्योदय या सूर्यास्त के समय विशेष मंत्रों के साथ सुगंधित औषधीय द्रव्यों का हवन किया जाता है। मानवी मन-मस्तिष्क पर इसका न्यूरोफिजियोलॉजिकल प्रभाव पड़ता है। कम्प्यूटरीकृत ई. ई. जी. अध्ययनों में देखा गया है कि मानव मस्तिष्क से निकलने वाली डेल्टा तरंगें यज्ञीय प्रभाव से कम हो जाती हैं और अल्फा तरंगें अधिक मात्रा में निकलने लगती हैं। इस तरह मन को शाँत एवं स्थिर बनाने में यज्ञीय ऊर्जा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अठारह शराबियों पर किये गये यज्ञीय परीक्षणों में पाया गया कि दो सप्ताह के नित्य नियमित अग्निहोत्र से इनकी शराब पीने की आदत छूट गयी। यह भी देखा गया है कि बीच-बीच में हवन बन्द कर देने से नशे की ओर दुबारा झुकाव बहुत ही कम रह जाता है। लगातार नियमित रूप से हवन करते रहने से न केवल नशेबाजी की आदत से छुटकारा पाया और खोया हुआ शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य दुबारा प्राप्त किया जा सकता है, वरन् इसके द्वारा ब्रह्माण्डव्यापी प्राणचेतना से भी संपर्क साधा व उससे लाभान्वित हुआ जा सकता है।
संपूर्ण विश्व की आबादी इन दिनों जिस गति से बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह चिन्ता होना स्वाभाविक है कि इस बढ़ी हुई जनसंख्या के लिए अतिरिक्त आवास और अनाज कहाँ से जुटे? शिशु जन्म के कुछ माह बाद ही ठोस आहार आवश्यक हो जाता है। वयस्क होने पर शादी के बाद आवास भी चाहिए। बढ़ी हुई जनसंख्या के लिए इन दोनों समस्याओं का साथ-साथ समाधान असंभव है। यदि आहार-संकट का हल अधिकाधिक अन्न उत्पादन करके कर भी लिया गया, तो दूसरा प्रश्न पैदा होगा कि वे रहें कहाँ? यदि आवास को प्रमुखता देकर उनके लिए पृथक्-पृथक् मकान बनाये गए, तो फिर अन्न कहाँ उपजे? यह सवाल सामने आएगा, क्योंकि तब संपूर्ण भूमि मकानों से भर जायेगी और कृषि के लिए स्थान ही नहीं बचेगा। पृथ्वी का अपना सीमित क्षेत्रफल है। सामान्य ढंग से वह एक निश्चित आबादी का ही भार वाहन कर सकती है। रबड़ की तरह खींचकर उसका बढ़ाया जा सकना भी संभव नहीं। ऐसी स्थिति में इन दोनों समस्याओं से एक साथ निपटने के लिए योजनाकारों ने बहुमंजिली गगनचुम्बी इमारतों का सहारा लिया है।
भूमि का उपयोग अन्न के लिए और आकाश का आवास हेतु-इसे इक्कीसवीं सदी की एक महत्त्वाकाँक्षी योजना माना जा सकता है। इससे जहाँ आवास की समस्या सुलझेगी, वहीं प्रत्येक के लिए आहार भी उपलब्ध हो सकेगा। इस प्रकार की परियोजनाओं पर जापान, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा आदि देशों में कार्य या तो प्रारंभ हो चुका है अथवा शीघ्र ही शुरू होने वाला है। उल्लेखनीय है कि इस प्रकार के बहुमंजिले भवन बहुत पहले से ही बनने आरंभ हो चुके थे। पर अब तक इनका उपयोग ऑफिस एवं वाणिज्यिक कार्यों के लिए ही होता रहा। लगभग सभी विकसित एवं विकासशील देशों की राजधानियों में इस प्रकार की इमारतें देखी जा सकती हैं।
ऐसे गगनचुम्बी निर्माणों की श्रृंखला उन्नीसवीं सदी के अन्त से प्रारंभ हुई, जो अब तक जारी है। 19 वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में फ्राँस में एफिल टावर का निर्माण हुआ। यह नौ सौ फुट ऊँचा है। इसके पश्चात् सन् 1931 में अमेरिका के न्यूयार्क शहर में ‘एम्पायर स्टेट बिल्डिंग’ का सृजन हुआ। ऊँचाई में यह फ्राँसीसी मीनार से कहीं अधिक है। इसकी कुल ऊँचाई 1250 फुट है एवं इसमें 102 मंजिलें हैं। सन् 1972 में 1350 फुट ऊँचे ‘वर्ल्ड ट्रेड टावर’ का निर्माण हुआ, जिसमें 110 मंजिलें है। इसके बाद तो धीरे-धीरे अधिक ऊँची इमारतों का निर्माण एक प्रकार से गौरव का विषय बन गया और अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनियों के मध्य इस बात की प्रतिस्पर्द्धा शुरू हो गई कि कौन कितनी ऊँची इमारत खड़ी कर सकती है। इसी होड़ के परिणामस्वरूप गगनचुम्बी निर्माण बनते चले गए। इस क्रम में सन् 1974 में ‘सीयर्स मीनार’ बनी। इसमें 110 मंजिलें हैं एवं ऊँचाई 1450 फुट है। इसके उपरांत 1975 में टोरेन्टो कनाडा में जो ‘सी एन टावर’ बना, वह 1820 फुट ऊँचा है। तत्पश्चात् क्वालालम्पुर में इससे भी उत्तुंग ‘ट्रविन टावर’ बना। आजकल अमेरिका की मिगालिन बिटलर कंपनी शिकागो में अपनी 125 मंजिली व्यावसायिक बिल्डिंग परियोजना को कार्यरूप देने में व्यस्त है। विदित है कि उक्त परियोजना के पश्चात् ताइवान की एक फर्म ने सर्वाधिक ऊँचे व्यावसायिक केन्द्र के निर्माण का श्रेय अपने नाम लिखाने के उद्देश्य से 126 मंजिले भवन के निर्माण पर काम करना प्रारंभ कर दिया है। समझा जाता है कि मलेशिया, थाइलैंड, इण्डोनेशिया और फिलीपीन्स आदि देश यहीं से अपने निर्यात व्यापार को नियंत्रित करेंगे। दुनिया के सर्वाधिक ऊँचे और अधिक मंजिलों वाले होटल का सृजन अभी प्रगति पर है। यह 321 मीटर ऊँचा होगा एवं इसमें 56 तल होंगे दुबई के एक कृत्रिम द्वीप पर यह बनाया जा रहा है। इसकी विशेषता यह होगी कि समुद्र के नीचे भी इसमें तीन तल होंगे। बैंकॉक में सम्प्रति जगह की कमी से निपटने के लिए ‘बर्टस’ नामक एक योजना तैयार की गई है। इसके अन्तर्गत भूतल पर मकान-दुकान उसके ऊपर रेल लाइनें तथा सबसे ऊपर सड़कें बनायी जायेंगी। इससे एक ही स्थान के सीमित घेरे से तीनों प्रयोजन एक साथ पूरे किये जा सकेंगे।
ज्ञातव्य है कि यह सब गैर-रिहायशी निर्माण हैं और इससे बढ़ी हुई आबादी की आवास संबंधी समस्या का हल नहीं होता, इसलिए कई देशों ने अब इस तरह की रिहायशी इमारतें बनाने संबंधी परियोजनाओं पर कार्य करना प्रारंभ कर दिया है। प्रयोग के तौर पर मंगोलिया में बीस मंजिलें रिहायशी भवनों की रचना शुरू हो गई है, जो काफी सफल सिद्ध हुए हैं। आगे ऐसे भवनों को कम-से-कम सौ मंजिला और अधिक-से-अधिक पाँच सौ मंजिला तक बनाने का कार्यक्रम है। इसी क्रम में ‘काजिया’ नामक एक जापानी फर्म ने टोक्यो शहर में ‘डी. आई. बी-200’ नामक एक बहुमंजिली इमारत का प्रस्ताव किया है। इसमें कुल 200 मंजिलें होंगी और संरचना पूर्णतया भूकंपरोधी होगी, जो 6-7 रिक्टर तक के झटकों को आसानी से बर्दाश्त कर सकेगी। एक दूसरी जापानी कंपनी ‘ताकेनाका’ ने ‘स्काई सिटी-1000’ नामक एक सुपरसिटी बनाने की घोषणा की है। यह गगनचुम्बी शहर भी टोक्यो में ही बनाया जाएगा। उम्मीद है कि 1000 मीटर ऊँची इस अट्टालिका में लगभग तीन सौ तल होंगे। ऐसी ही एक अन्य निर्माण योजना ‘एयरोपोलिस-2000’ है। ओहृयाशी नामधारी जापानी कंपनी द्वारा प्रस्तावित इस भवन में पाँच सौ मंजिलें होंगी और इसमें एक विकसित शहर की लगभग सभी सुविधाएँ होंगी। रिहायशी फ्लैटों के साथ-साथ यहाँ दुकानें, बैंक, कार्यालय, बाज़ार सभी कुछ होंगे। इस सुपरसिटी पर करीब 350 अरब डॉलर खर्च होने की उम्मीद है।
एक ऐसी ही सुपरसिटी जापान और आस्ट्रेलिया के सहयोग से एडीलेड, आस्ट्रेलिया में बनने जा रही है। संपूर्ण अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त यह गगनचुम्बी नगरी अपने आकार और ऊँचाई में अद्वितीय होगी? इसे 21वीं सदी की आदर्श स्थापना के रूप में देखा जा रहा है।
ऐसे स्काई स्क्रैपर सुपरसिटी अर्थात् आकाश चूमने वाली इमारतों के निर्माण के लिए जापान एक आदर्श देश है, कारण कि इसका अधिकाँश भाग समुद्र से घिरा है। वहाँ के छोटे-छोटे टापुओं की जमीन को यदि आबादी को बसाने में ही पूरी तरह खपा दिया गया, तो फिर दूसरे कार्यों और अन्न उत्पादन के लिए वहाँ भूमि बचेगी ही नहीं, जिससे विकासकार्य ठप्प हो जायेंगे। ऐसे में विशेषज्ञों का मत है कि छोटी-छोटी अनेक इमारतों की रचना की तुलना में कुछेक विशालकाय गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ खड़ी की जाएँ और पूरे शहर को उनमें बसा दिया जाए। इससे जो जमीन खाली हो, उसका उपयोग कृषिकार्य में किया जाए। वैसे भी टोक्यो में जमीन काफी महँगी है। एक वर्गफुट भूमि की कीमत वहाँ चार लाख डॉलर है। न्यूनाधिक यही स्थिति दूसरे देशों में बड़े शहरों की है, अतः ऐसे निर्माण अब समय की माँग हैं। इसे न सिर्फ जापान जैसे द्वीप-समूह वाले छोटे देश की अनिवार्यता समझी जानी चाहिए, वरन् संपूर्ण विश्व को ऐसी आवासीय योजनाओं पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए तथा इसके दूसरे विकल्पों की भी खोज की जानी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आगामी समय में बढ़ी हुई जनसंख्या के आवास के लिए भूमि का कम से कम एवं आकाश, समुद्र और भूमिगत स्थल का अधिकाधिक उपयोग हो।
जहाँ तक समुद्र पर तैरते भवनों का प्रश्न है, तो इस तरह की एक संरचना बनायी जा चुकी है। टोक्यो के समुद्र में निर्मित इस इमारत का नाम है-ऑफिस बिल्डिंग डेवलपमेंट’। अब इसी तर्ज पर जल-सतह पर विशालकाय शहरों की परिकल्पना की जा रही है। अमेरिकी कंपनी ‘वर्ल्ड सिटी कारपोरेशन’ ने ‘फिनिक्स वर्ल्ड सिटी’ नामक एक ऐसी परियोजना तैयार की है, जिसमें एक साथ कम-से-कम छह हजार लोग रह सकेंगे। इस तैरते शहर में आधुनिक नगरी की प्रायः सभी सुविधाएँ मौजूद होंगी। इसमें थियेटर, पुस्तकालय, प्लेग्राउण्ड से लेकर रिहायशी मकान तक सब कुछ होंगे। कहने को यह एक शहर भले ही हो, पर वास्तव में यह एक जहाज है, जिसमें कई मंजिलें होंगी। इस वर्ष के अंत तक इसके बनकर तैयार हो जाने की आशा है।
इसके अतिरिक्त योजनारहित ढंग से बने व्यापक क्षेत्र को घेरने वाले पुराने शहरों को उजाड़कर नये शहर बसाने की भी योजना दुनिया भर में चल रही है। इन्हें वैज्ञानिक ढंग से बसाते हुए विस्तृत जगह में फैले मकानों को कई गगनचुम्बी इमारतों में समेट लिया जायेगा। इससे जो भूमि खाली होगी, उसका उपयोग बदलते मौसम को रोकने के लिए वृक्षारोपण के रूप में एवं अन्न उत्पादन के लिए किया जायेगा। चीन का पुडोंग प्राँत ऐसा ही एक राज्य है, जो पुनर्निर्माण के लिए प्रस्तावित है। इसमें विशालकाय भवनों के अतिरिक्त भूमिगत रेलमार्गों एवं सुरंगों का निर्माण भी सम्मिलित है, ताकि भूमि के अधिकाधिक हिस्से का उपयोग हरीतिमा संवर्द्धन के लिए हो सके। कुवैत में प्रारंभ में ‘सुबैया’ और ‘रस अजजोर’ के आधुनिकीकरण का कार्य हाथ में लिया गया है। इनके पूरा होते ही दूसरे बड़े शहरों को भी आसमान से बातें करने वाली इमारतों में बसाया जायेगा। अरब देशों में जहाँ उपजाऊ भूमि की किल्लत है और जहाँ का अधिकाँश इलाका रेगिस्तानी है, यह योजना काफी लाभदायक सिद्ध हो सकती है। नाइजीरिया अपनी नयी राजधानी ‘अबूजा’ पर सत्तर के दशक से ही कार्य कर रहा है। जापान के व्यापारिक जिले ‘मारुनोशी’ को नये सिरे से बसाने की चर्चा प्रशासनिक स्तर पर चल रही है। इस परियोजना के अन्तर्गत संपूर्ण जिले में लगभग 75 उत्तुंग इमारतें बनायी जाएँगी, जिनमें समग्र जिले को सिकोड़ने का कार्यक्रम है। इसके योजनाकार प्रसिद्ध जापानी फर्म 'मित्सुबीशी इस्टेट कम्पनी’ के अभियंता हैं। ऐसे ही एक अन्य जापानी फर्म ‘मात्सुशिता’ के अधीन ओसाका शहर के आधुनिकीकरण की परियोजना है। इसे एक व्यापारिक केन्द्र के रूप में विकसित करने का विचार है। पिछले दिनों जापानी इंजीनियरों ने टोक्यो के पूर्वी छोर पर एक अत्याधुनिक शहर बसाया है। इसमें हर प्रकार की आधुनिक सुविधाएँ मौजूद हैं। एक अन्य मिनी शहर पेरिस स्थित यूरो डिज्नीलैंड है। इसके अतिरिक्त विश्व के छोटे-बड़े विभिन्न देशों में नये शहर पुरानों का स्थान ले रहे हैं। म्यांमार में रंगून के निकट एक नया शहर बसाने की योजना पर कार्य प्रारंभ हो चुका है। यह सिटी ‘म्यांमार काॅन्कोर्ड डेवलपमेंट वेंचर’ नामक कंपनी द्वारा एक जापानी फर्म के सहयोग से बसायी जा रही है।
उल्लेखनीय है कि नवीन शहर बसाने संबंधी उपरोक्त सभी परियोजनाओं में बिखरे हुए अलग-अलग मकानों का कोई स्थान नहीं है। सभी रिहायशी कमरे एक बहुमंजिले भवन के रूप में होंगे। हर भवन वास्तव में एक लघु शहर जैसा होगा। सभी आवश्यक वस्तुएँ उसमें विद्यमान होंगी। किसी को किसी वस्तुविशेष के लिए कहीं बाहर भागने की परेशानी मोल नहीं लेनी पड़ेगी। इस तरह एक ही नगर में उसकी कई छोटी-छोटी गगनचुम्बी इकाइयाँ होंगी, जो स्वयं में एक पूर्ण नगर होंगी।
इस प्रकार 21 वीं सदी को विशालकाय महलों वाला शहर कहना अनुचित न होगा। आज से चार दशक पूर्व मूर्धन्य वास्तुशास्त्री फ्रैंकलॉयड राइट ने आसमान से बातें करने वाली लगभग एक मील ऊँची एक ऐसी अट्टालिका की कल्पना की थी, जिसमें एक साथ करीब एक लाख लोग कार्य कर सकें। यद्यपि तब के उपलब्ध तकनीकी ज्ञान के द्वारा 530 मंजिली ऊँची इस इमारत का निर्माण संभव था। किन्तु इसे सिर्फ इस कारणवश नहीं बनाया जा सका कि इतनी ऊँचाई तक ले जाने वाली कोई लिफ्ट तब मौजूद नहीं थी।
आज कई प्रकार की लिफ्टों पर अनुसंधान हो रहे हैं। यों अब भी कोई ऐसी लिफ्ट विकसित नहीं हो सकी है, जो अकेले ही भूमितल से शिखर तक की दूरी तय कर सके। फिर भी अब उत्तुंग महलों के कंगूरे तक पहुँच सकना असंभव नहीं रहा। इसमें लिफ्टों की एक श्रृंखला कार्य करती है, जो यात्री को निर्धारित ऊँचाई पर पहुँचाकर छोड़ देती है। उससे आगे का सफर दूसरी लिफ्ट से तय करना पड़ता है। इस प्रकार सबसे ऊपरी तल तक पहुँचना शक्य हो जाता है। अब तो दायें-बायें चलने वाली लिफ्टें भी बन गई हैं। इस प्रकार की लिफ्टें जापान अपने बहुमंजिले भवनों में सम्प्रति बहुतायत से इस्तेमाल कर रहा है। इन दिनों एक ऐसी लिफ्ट पर काम चल रहा है, जो ऊपर-नीचे दायें-बायें चारों दिशाओं में चल सके। यदि ऐसा हो सका तो एक ही बिल्डिंग में कई लिफ्टों की आवश्यकता नहीं रह जायेगी।
किंतु सवाल यह नहीं है सवाल यह है कि ऊँची-ऊँची मीनारों की तरह विशाल अट्टालिकाएँ खड़ी कर लेने भर से ही काम चल जाएगा क्या? उसके साथ क्या अन्य अनेक प्रकार की समस्याएँ भी उठ खड़ी नहीं होंगी? निश्चय ही ऐसा होगा, तो फिर उनका साथ-साथ समाधान भी सोचना पड़ेगा, जैसे कि विशाल भवन की आधारभूमि कब तक उन गगनचुम्बी इमारतों का भार वहन कर सकेगी? क्या लंबे समय बाद उनके जमीन में धसकने की संभावना नहीं बढ़ जायेगी? जैसा कि पीसा की मीनार के साथ हुआ। यह वृहदाकार मीनार अपने उदग्र शीर्ष से 5 मीटर तिर्यक झुक चुकी है। फिर इस विशालकाय निर्माणों का रख-रखाव सरल नहीं है। लंबे काल तक ऐसे महलों में रहना खतरे से खाली नहीं होगा। ऐसे में यदि कोई दुर्घटना हुई, तो एक साथ हजारों लोग मारे जायेंगे। इसके अतिरिक्त अग्निकाण्ड जैसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए भी समुचित प्रबंध करना पड़ेगा, ताकि ऐसी किसी स्थिति में वहाँ फँसे लोगों को तत्काल निकाला जा सके। यों अब तक की ऐसी दुर्घटनाओं में लोगों को सुरक्षित निकाल पाना काफी कठिन साबित हुआ है, इसलिए कोई ऐसा तरीका ढूँढ़ना पड़ेगा, जो पिछले प्रयुक्त उपायों से भिन्न और तकनीकी दृष्टि से अधिक समुन्नत एवं परिष्कृत हो। यदि इन सब से बचाव हो भी गया, तो एक अन्य खतरा भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा से सदा बना ही रहेगा। भूकंपरोधी भवनों के दावे कितने सच्चे साबित होते हैं-यह तो समय ही बतायेगा, पर इस संबंध में जो एक असमंजस और आशंका उठती है, वह यह कि आखिर आकाश को चूमने वाली इस प्रकार की इमारतें कितनी उत्तुंग बन सकेंगी? उसकी भी एक सीमा है। चाँद-सूरज को छूने वाले प्रासाद तो नहीं बनाये जा सकते। ऐसी स्थिति में कुछ काल बाद पुनः वही समस्या सिर उठाने लगेगी-और बढ़ी हुई आबादी को कहाँ बसाया जाए? यह ज्वलन्त पहेली समाज विज्ञानियों और नृतत्त्ववेत्ताओं को चैन से नहीं रहने देगी। इस दशा में समझदारी यही कहती है कि डाल और पत्तियों को काटने-छाँटने की अपेक्षा विषवृक्ष का मूलोच्छेद किया जाए जनसंख्या-वृद्धि पर रोक लगने से सम्पूर्ण समस्या का स्वतः समाधान संभव हो जाएगा, अतः इस मूल बिंदु पर अधिकाधिक ध्यान केन्द्रित किये जाने की आवश्यकता है।
बड़ी प्रखर आत्मजिज्ञासा थी उसमें। वह जीवन की सार्थकता और सत्य का बोध पाना चाहता था। अपने अन्तरमन की इस अभीप्सा को लिए वह महायोगी श्यामाचरण लाहिड़ी के पास आया। लाहिड़ी महाशय गृहस्थ होते हुए भी उच्चकोटि के संत थे। उनकी यौगिक विभूतियों की सुगंध चारों ओर फैली हुई थीं वह उनके चरणों में सिर नवाते हुए बोला-गुरुदेव मुझे आत्मसाक्षात्कार का कोई उपाय बताइए।
लाहिड़ी महाशय ने उसकी जिज्ञासा को परखते हुए कहा-वत्स तुम एक वर्ष तक अमुक मंत्र का जाप एकांत में पूर्ण मौन रह कर करना तथा जप करते हुए जब वर्ष पूरा हो जाए, उस दिन स्नान करके पवित्र होकर मेरे पास आना। तभी मैं तुम्हें आत्मसाक्षात्कार का उपाय बता सकूँगा।
साधक महायोगी की आज्ञानुसार किसी एकांत स्थान में चला गया और एक वर्ष तक मौन रहकर उनके बताए हुए मंत्र का जप करता रहा। समय पूरा होने पर वह लाहिड़ी महाशय के निवास स्थान की ओर चल दिया।
जब संत को साधक के आने का समाचार मिला, तो उन्होंने उसकी पात्रता परखनी चाही। इस क्रम में उन्होंने पास की सड़क पर झाड़ू लगाने वाली हरिजन महिला से कह दिया कि जब साधक गंगास्नान करके यहाँ आ जाए और घर में प्रवेश करने लगे तो उसके शरीर पर अपनी झाड़ू से थोड़ा-सा कचरा डाल देना।
हरिजन महिला ने उनकी बात मानते हुए वैसा ही किया। अर्थात् जब साधक घर के मुख्यद्वार की ओर जाने लगा, तब उसने झाड़ू से थोड़ा कचरा उसके शरीर पर डाल दिया।
कचरा शरीर पर पड़ते ही वह आग-बबूला हो गया। हरिजन महिला का स्पर्श भी उसे नागवार गुजरा। गुस्से में तिलमिलाता हुआ वह उस महिला को मारने के लिए दौड़ा। महिला किसी तरह अपनी जान बचाकर भाग पायी। साधक उसे पकड़ नहीं पाया। वह क्रोध में तमतमाता हुआ पुनः गंगानदी पर स्नान करके वापस लौटा।
लाहिड़ी महाशय के समक्ष जाकर उसने प्रणाम करते हुए कहा-गुरुदेव मैं एक वर्ष तक आपके बताए हुए मंत्र का जप करता रहा हूँ। अब आप मुझे आत्मसाक्षात्कार का उपाय बताइए।
महायोगी ने मुसकराते हुए कहा-वत्स अभी तो तुम सर्प के समान क्रोधित होते हो। साधना का पहला पाठ भी अभी याद नहीं हुआ। तुम पुनः एकांत में जाकर मौन भाव से उसी मंत्र का जप करो। एक वर्ष बाद पुनः आत्मसाक्षात्कार का उपाय जानने के लिए मेरे पास आना।
साधक को उनकी बात सुनकर बड़ी हताशा हुई, किन्तु उसे लाहिड़ी महाशय की योगशक्ति पर एवं उनके अध्यात्मवेत्ता होने पर यकीन था, साथ ही उसे आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने की तीव्र लगन थी। अतः निराश होते हुए भी उसने उनकी बात मान ली और चुपचाप वापस चल दिया।
एकांत स्थान में मौन रहकर जप करते हुए उसका दूसरा वर्ष भी पूरा हो गया। इस बार बड़ी उत्सुकता एवं आतुरता से वह लाहिड़ी महाशय के घर की ओर चल दिया। किन्तु महायोगी को तो अभी उसकी और भी परीक्षा लेनी थी। अतः उन्होंने उस हरिजन महिला को फिर से कूड़ा-कचरा साधक पर डालने के लिए कह दिया।
महिला ने वैसे ही किया। बल्कि अबकी बार तो उसने अपनी झाड़ू साधक के पैरों से छुला दी। साधक यह देखकर उसको पिछली बार की तरह मारने तो नहीं दौड़ा, किन्तु खीज़ और चिड़चिड़ाहट उसे भारी हुई और कुछ कटुशब्द उसने उस महिला को कह दिये।
इसी के साथ वह पुनः स्नान के लिए चल पड़ा। वापस लौटने पर उसने महायोगी से अपनी प्रार्थना फिर से दुहराई। महायोगी बोले-बेटा अभी तुममें आत्मसाक्षात्कार करने की योग्यता पूरी नहीं हुई है। एक बार और जाकर उसी मंत्र का जप एक वर्ष तक मौन रहकर करो। मुझे आशा है कि इस बार तुम अवश्य सफल होंगे।
साधक को लाहिड़ी महाशय की बात सुनकर थोड़ा अचरज हुआ। पर अबकी बार उसके मन में पहले जैसी निराशा नहीं आयी। उसने कोई उत्तर नहीं दिया और मन में कुछ सोचता हुआ शाँति से अपने स्थान पर लौट आया। पुनः मौन धारण करके मंत्र का जप करने में तल्लीन हो गया। उसने साधनारत रहते हुए यह तीसरा वर्ष भी पूर्ण किया। और गंगास्नान करके उनके पास जाने के लिए चल दिया।
तीन वर्ष लगातार एकांत में रहते, मौनव्रत का पालन करते एवं तपस्या करते हुए उसकी आत्मा निर्मल हो गयी थी। क्रोध और अभिमान पूर्णतया नष्ट हो चुके थे। साधुता उसकी आत्मा में रम चुकी थी।
इस बार भी हरिजन महिला वही थी और उसका कार्य सफाई करने का था। अबकी बार तो उसने कचरे से भरी हुई अपनी टोकरी ही साधक पर उड़ेल दी। किन्तु साधक इस बार पूर्णतया बदल चुका था। उसने तनिक भी क्रोध किए बिना दोनों हाथ जोड़कर उस हरिजन महिला से कहा-माँ तुमने मुझ पर बड़ा उपकार किया है। तुम तीन वर्ष से मेरे अन्तःकरण में छिपे क्रोध रूपी शत्रु का नाश करने के महान प्रयत्न में लगी रही हो। तुम्हारी इस कृपा के कारण ही मैं उससे मुक्त हो सका हूँ।
इस बार जब वह गुरुदेव के समीप पहुँचकर उनके चरणों में नत हुआ, तो उन्होंने उसे उठाकर हृदय से लगा लिया और बोले-बेटा अब तुम आत्मसाक्षात्कार का उपाय जानने योग्य हो गए हो। तीन वर्ष के मौन जप ने ही तुम्हारे क्रोध का नाश किया है तथा तुम्हारी आत्मा को पवित्र बनाया है। अब तुम मुझसे जो भी ज्ञान लोगे, उसे सार्थक करोगे। सचमुच इस साधक प्रवर भुवनचन्द्र सान्याल ने आत्महित के साथ व्यापक लोकहित भी किया।
मन में उमंग हो और जीवन में कुछ बनने की ललक, तो अपंगता की अड़चन प्रगति में आड़े नहीं आने पाती। इस क्रम में अवरोध तब पैदा होता है, जब निजी अक्षमता को लेकर मनुष्य अपनी सामर्थ्य को कम करके आँकना शुरू करता है, पर सच्चाई यह है कि उसकी असमर्थता शारीरिक कम, मानसिक ज्यादा होती है। भौतिक अंग-अवयवों की कमी किसी की प्रतिभा के प्रकट-प्रत्यक्ष होने में उतनी बाधा पैदा नहीं करती, जितनी कि मन की हताशा। इसे यदि दूर किया जा सके, तो कोई कारण नहीं कि अपाहिज स्तर के व्यक्ति भी अपनी संपूर्ण क्षमता एवं प्रतिभा का परिचय न दे सकें।
आए दिन ऐसे कितने ही उदाहरण देखे सुने जाते हैं, जिनमें अक्षम जन भी सर्वांगपूर्ण व्यक्ति जैसी क्षमता का प्रदर्शन करते हैं। ऐसा ही एक व्यक्ति कार्ल अंथन था। वह वयाना, आस्ट्रेलिया का रहने वाला था। जब पैदा हुआ तो एकदम स्वस्थ था, किंतु उसके बाँहें नहीं थी। जन्म से ही उसके हाथ कंधों से गायब थे। पिता ने बच्चे की स्थिति देखी, तो पहले तो कुछ निराश हुए, पर अगले ही पल उन्होंने मन को मजबूत बनाया और बालक को स्वावलम्बी बनाने का निश्चय किया। इस दिशा में उनने जो पहला कदम उठाया, वह यह कि सहानुभूति दिखाने वालों को आना बंद करा दिया। जो बालक को देखने का बहुत हठ करते, उनसे पहले ही कह दिया जाता कि उसके सामने कोई भी ऐसी बात न कही जाए, जो उसके बाल-मन को ठेस पहुँचाए। उनका विश्वास था कि बालक के समक्ष उसकी दयनीय स्थिति पर चिन्ता प्रकट करना उसके उत्साह और मनोबल को तोड़ेगा। हीन भावना यदि एक बार उसके मन में घर कर गई, तो पूरी जिन्दगी वह उससे उबर नहीं पायेगा और पराश्रित बनकर जीना पड़ेगा।
बचपन से ही माता-पिता उसे बात का प्रशिक्षण देने लगे कि अपना काम वह स्वयं कैसे करे। उनने सामान्य बच्चों की तरह अंथन को जूते-मोजे पहनने की अनुमति नहीं दी और उसे इस बात के लिए प्रेरित किया कि वह अपने पैरों का इस्तेमाल हाथ की तरह करना सीखे। आरंभ से ही उसकी टाँगों की कसरत कराकर उन्हें इतना लचकदार बना दिया गया था कि वह उन्हें मुँह तक आसानी से ले जा सके। अब जरूरत पड़ने पर वह उनका उपयोग खाने के लिए भी कर सकता था। जब कोई खाद्य वस्तु उसके सामने आती, तो वह उसे टाँग के अँगूठे और बगल वाली अँगुली के सहारे पकड़कर मुँह में डाल लेता। जीवन के एक महत्वपूर्ण मोर्चे पर उसकी यह पहली विजय थी। इसके बाद तो लगन और मेहनत के बल पर कई ऐसे कार्य करना सीख लिया, जिसे हाथ के अभाव में संपन्न कर सकना अत्यन्त दुष्कर समझा जाता था।
जब वह तीन वर्ष का हुआ, तो उस उम्र के अधिकाँश बच्चे चलने-फिरने लगे थे। अंथन उन्हें देखकर बहुत मचलता और उनके जैसा ही खड़ा होने और चलने का प्रयास करता। बार-बार के प्रयत्न के बाद एक दिन वह खड़ा होने तथा एक-दो कदम बढ़ाने में सफल हुआ। इसके बाद धीरे-धीरे वह चलना और दौड़ना सीख गया।
पढ़ने में उसकी रुचि थी। दूसरे बच्चों के साथ वह भी स्कूल जाने लगा। वहाँ साथियों को स्लेट पर लिखता देख वह उनकी नकल करने की कोशिश करता। बाद में उसके पिता कार्ल फ्रांथन ने उसके लिए एक स्लेट ला दी। वह पाँव की अँगुलियों में चॉक फँसाकर उसमें लिखने का प्रयास करता। उसके पिता इसमें उसका सहयोग करते। इस प्रकार उसका अक्षरज्ञान घर पर आरंभ हुआ। बाद में उसे स्कूल में भर्ती करा दिया गया। बड़ा होने पर उसने अपने पैर की अँगुलियों से लिखने का ऐसा अभ्यास कर लिया कि उसकी सुंदर लिखावट को देखकर यह अंदाज लगा सकना मुश्किल था कि इसे हाथ नहीं, पैर द्वारा लिखा गया है।
कठिन मेहनत द्वारा अपनी अपंगता को उसने किसी भी क्षेत्र में आड़े नहीं आने दिया। तैरना भी अपने बूते सीखा। बाजूरहित व्यक्ति के लिए यह अत्यंत कठिन कार्य था। किन्तु यहाँ भी मनोबल, लगन और अभ्यास को सफलता मिली। अंथन के घर के निकट एक तालाब था। गर्मियों में लड़के अक्सर उसमें नहाया करते। उन्हें नहाता देख वह भी उसमें अभ्यास करने लगा। पहले छिछले पानी में इसकी शुरुआत की। जब कठिन अभ्यास के बाद यह भरोसा हो गया कि वह किसी भी प्रकार डूबेगा नहीं, तो थोड़े गहरे जल में तैरना प्रारंभ किया। इस प्रकार धीरे-धीरे उसने इसमें भी निपुणता प्राप्त कर ली।
भुजाओं के बिना वाद्ययंत्र बजा पाना लगभग असंभव है, लेकिन अंथन का उदाहरण इस बात को सिद्ध करता है कि लगन यदि सच्ची हो और संकल्प प्रबल, तो असंभव को संभव कर दिखाना कुछ भी कठिन नहीं कार्ल अंथन का संगीत से गहरा लगाव था। वह स्वयं इसमें पारंगत बनना चाहता था। उसे वायलिन बहुत प्रिय था, अतः उसने संगीत-शिक्षा इसी से प्रारंभ की। वह घंटों वायलिन को स्टूल पर रखकर पैर की अँगुलियों द्वारा उसके तारों को छेड़ा करता। धीरे-धीरे वह इसमें प्रवीण बन गया और तरह-तरह की सुरीली धुनें निकालने लगा। 16 वर्ष की अल्पायु में उसकी ख्याति कुशल वादक के रूप में फैल गयी। उसकी इस उपलब्धि से लोग आश्चर्यचकित थे।
देश-विदेश में अंथन ने संगीत के अनेक कार्यक्रम प्रस्तुत किये। सभी ने उसकी प्रबल इच्छाशक्ति की भूरि-भूरि प्रशंसा की। प्रसिद्ध जर्मन उपन्यासकार जैराट हाॅपर्ट ने उस पर एक उपन्यास लिखा। इसके अतिरिक्त ‘दि आर्मलेस मैन’ नामक वहाँ उस पर एक फिल्म भी बनी, जिसमें उसकी खूबियों को भली प्रकार प्रदर्शित किया गया था। वह एक जुझारू इनसान था।
दुनिया में कितने ही ऐसे व्यक्ति हुए हैं, जिन्हें अपंग तो नहीं कहा जा सकता, पर उनको सामान्य कहना भी अनुचित होगा। ऐसे लोग सर्व-साधारण की तरह जीते रहे, यह बात और है, लेकिन शरीर से वे अद्भुत और असाधारण थे।
फ्रैंक लैंटिनी ऐसा ही एक व्यक्ति था। वह सिसली के रोजोलिनी कस्बे में पैदा हुआ। यों तो वह एक साधारण इनसान की ही तरह था, पर पीठ से जुड़ी अतिरिक्त टाँग उसे असाधारण के दर्जे में पहुँचा देती थी। उसके जन्म के पश्चात् उसके पिता अमेरिका आ गए। तब वह किशोरवय था। इस उम्र में उसने ‘बर्नम एण्ड बेली’ तथा ‘रिंगलिंग ब्रदर्स’ जैसी कई प्रसिद्ध सर्कस कंपनियों में काम किया। वहाँ वह इस तीसरे पैर का इस्तेमाल कई प्रकार के करतब दिखाने में करता था। वह तीन टाँगों का स्टूल बनाकर आसानी से बैठ सकता था। तीसरे पैर से फुटबाल में किक लगा सकता था। उसे साइकिल चलाने में भी कोई परेशानी नहीं होती। साधारण मनुष्य की तरह वह चल-दौड़ भी सकता था, किन्तु इसमें उसे पीछे के अतिरिक्त पैर की सहायता नहीं मिलती, कारण कि वह कुछ छोटा था।
यों तो उसकी टाँग पैसा कमाने का अच्छा स्रोत साबित हुई, पर इस प्रकार के प्रदर्शन को फ्रैंक पसंद नहीं करता था। वह किसी और स्रोत के माध्यम से साधारण आदमी की तरह धन कमाना चाहता था। उसकी तीसरी टाँग इसमें बाधक थी, इसीलिए उसने उसे कटवाने का निश्चय किया। इस सिलसिले में जब वह अपने पिता के साथ डॉक्टरों से मिला, तो उन्होंने जान जोखिम की बात कहते हुए ऐसा करने से इंकार कर दिया। फ्रैंक बहुत निराश हुआ। इसी बीच एक दिन उसे अपाहिजों के एक अस्पताल में जाने का मौका मिला। वहाँ उसने जो कुछ देखा, उससे उसका दृष्टिकोण ही बदल गया। वहाँ उसने देखा कि अंधे, लूले लँगड़े सब मस्तीपूर्वक अपने काम में व्यस्त हैं। किसी को भी अपनी अपंगता की शिकायत नहीं। सभी के चेहरों पर प्रसन्नता थी। इस दृश्य से फ्रैंक को एक नई दृष्टि मिली। उसने अब भाग्य का रोना बंद कर दिया। बाद में उसने विवाह किया और उसके दो बच्चे भी हुए।
लेजारस जोनस बैपटिस्टा काॅलोरेडो-यह दो शरीरों वाले एक स्विस व्यक्ति का नाम था, जिसका जन्म जिनेवा में हुआ था। समस्त यूरोप में उसका प्रदर्शन किया गया। इस क्रम में अनेक चिकित्सकों ने उसका परीक्षण किया। इस विचित्र इनसान के दो सिर थे। एक अविकसित देह पूर्ण विकसित शरीर के साथ जुड़ी हुई थी, इसलिए माता-पिता ने दोनों के पृथक्-पृथक् नाम रखे। पूर्ण विकसित शरीरधारी बेटे का नाम लेजारस रखा गया, जबकि साथ जुड़े अपूर्ण अंगों वाले पुत्र को जोनस बैपटिस्टा के नाम से पुकारा जाता। बैपटिस्टा के केवल एक टाँग थी। भुजाएँ दो थीं, पर उनमें मात्र तीन-तीन अँगुलियों थीं। जब कोई उसकी छाती को धीरे-धीरे थपथपाता, तो प्रत्युत्तर में वह अपने हाथ और होंठों को हिला देता। वह बोल नहीं पाता था, किंतु सब कुछ सुन और समझ सकता था। उसे भोजन की आवश्यकता नहीं पड़ती। लेजारस द्वारा लिये गये आहार से ही उसका काम चल जाता। बैपटिस्टा का सिर तो पूर्ण विकसित था, किंतु आँखें बंद थीं। उसका सिर बालयुक्त था और ठुड्डी में दाढ़ी भी थी, जननेन्द्रिय अल्प विकसित थीं।
जबकि लेजारस हर प्रकार से स्वस्थ-सामान्य था। उसकी विनोदप्रियता के कारण हर समय उसके निकट भीड़ जमा रहती, सामान्य इनसान की तरह उसने जिंदगी गुजारी।
कलकत्ते में सन् 1783 में एक दो सिर वाले बच्चे का जन्म हुआ। उसके दोनों सिर अगल-बगल न होकर एक-दूसरे के ऊपर थे। उस समय के प्रसिद्ध अंग्रेज शरीरविज्ञानी जॉनहण्टर ने उसका विस्तृत अध्ययन किया था और उसे एकदम सामान्य बताया था। उसके दोनों सिरों में आँखें थीं, पर आँसू केवल ऊपर वाले सिर की आँखों से बहते थे। दो वर्ष की उम्र में साँप काट लेने से उसकी मृत्यु हो गई। आज भी उसकी दोनों खोपड़ियाँ लंदन के ‘रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जरी’ में सुरक्षित हैं।
अपंगता का अभिशाप कष्टदायक है-यह सच है, पर हमारी निजी सोच उसे और कष्टदायक बना देती है-यह भी गलत नहीं है। अपाहिज व्यक्ति यह मान बैठता है कि वह किसी काम का नहीं, उसका जीवन निरर्थक है। इसमें उसकी शारीरिक अक्षमता की तुलना में मानसिक हताशा ही अधिक झलकती है। मन यदि कमजोर हुआ, तो शरीरबल से समर्थ व्यक्ति भी किसी कार्य को कर पाने में असफल साबित होता है। इसके विपरीत देह दुबली हो, त्रुटिपूर्ण अथवा अपूर्ण हो, लेकिन मनोबल और उत्साह अपने चरम पर हो, तो कायिक कमी भी कार्य की सफलता में बाधा उत्पन्न नहीं कर पाती और कठिन-से-कठिन काम सरल प्रतीत होने लगते हैं, इसलिए शारीरिक पूर्णता की तुलना में हमें मानसिक समर्थता पर अधिक भरोसा करना चाहिए।
भारतीय संस्कृति की जय। भारत भूमि की जय॥
जय-जयकार के इन दिगन्तव्यापी स्वरों के साथ ही भारतीय सैनिक विजय के उत्साह में नाचने लगे। ग्रीक स्कन्धावार में सफेद ध्वज फहराया जा चुका था। सफेद ध्वज फहराने का अर्थ था-ग्रीक सम्राट सेल्यूकस द्वारा पराजय स्वीकार करना। इस सफेद ध्वज को ही निहार कर सम्राट चन्द्रगुप्त की सेना में विजय का उत्साह छा गया था।
कुछ ही क्षण बाद यवन स्कन्धावार की ओर से दो व्यक्ति आते हुए दिखाई दिए। थोड़ी देर में अपने एक सेनानायक के साथ समीप आकर अपनी तलवार दोनों हाथों में थाम, उसे घुड़सवार की ओर बढ़ाते हुए सम्राट चन्द्रगुप्त ने कहा-नहीं इसकी आवश्यकता नहीं, ग्रीक सम्राट! इसे अपने पास ही रखिए। आपका यहाँ आ जाना ही पर्याप्त है। हम भारतवासी केवल मानवीय विश्वास और शान्ति की स्थायी भावना को ही जीतना चाहते हैं और सम्राट चन्द्रगुप्त ने उनकी तलवार उन्हें वापस थमा दी।
सेल्यूकस विस्मय-विमुग्ध भाव से देखते रहे। फिर मात्र इतना ही कह पाए-धन्य हैं भारतीय संस्कृति।
हम भारतवासी शत्रुता से अधिक मित्रता निभाने पर विश्वास रखते हैं, ग्रीक सम्राट। सम्राट चन्द्रगुप्त ने शान्तभाव से निर्दम्भ स्वर में कहा।
भारतवर्ष की शिक्षा और संस्कृति इतनी महान है, कभी सोचा भी न था। विस्मय-विभोर होते हुए कहा सेल्यूकस ने। दो क्षण बाद वे फिर बोले-शत्रुता निभाने की भूल करने के बाद अब हम उसका सुधार करना चाहते हैं, भारत सम्राट! आप लोग शत्रुता से अधिक मित्रता निभाने पर विश्वास रखते हैं। हम उसके लिए भी तैयार हैं...........।
आप अपने शिविर में पधारें ग्रीक सम्राट। वह सब हमारे आचार्यश्री स्वयं आकर निर्धारित करेंगे।..........आप चलिए। सम्राट चन्द्रगुप्त का संकेत पाकर सेल्यूकस अपने स्कन्धावार शिविर की ओर लौट गए।
अगली सुबह आचार्य चाणक्य, सम्राट चन्द्रगुप्त, सेनापति सिंहरण, अक्षय, मालव गण प्रमुख उदयन आदि के साथ जब यवन स्कन्धावार के समीप पहुँचे तो सम्राट सेल्यूकस और उनके सेनानायक आदि द्वार पर ही उनके स्वागतार्थ प्रतीक्षा कर रहे थे। सभी विशेष रूप से सज्जित शिविर में ले जाए गए। वहाँ की व्यवस्था देखने में सेल्यूकस की बेटी राजकुमारी कार्नेलिया पहले ही व्यस्त थी। सबके पहुँचने पर पहले उसने ग्रीक ढंग से सभी का अभिवादन किया, फिर भारतीय ढंग से हाथ जोड़-मस्तक झुकाकर भारतीय भाषा में स्वागत करते हुए बोली-मैं ग्रीक सम्राट सेल्यूकस की कन्या कार्नेलिया ग्रीक अरस्तू से भी महान आचार्य श्री विष्णुगुप्त चाणक्य, भारत सम्राट और इनके साथ सभी महानुभावों को हार्दिक नमन करती हूँ.......स्वागत करती हूँ। पधारिए..........विराजिए........।
सुनकर आचार्य चाणक्य, सम्राट चन्द्रगुप्त और सभी ने उस भव्य व्यक्तित्व वाली ग्रीक सुन्दरी की तरफ देखा और बस कई क्षणों तक देखते ही रह गए। आचार्यश्री की उत्सुकता को भाँपकर सेल्यूकस ने बताया-मेरी बेटी कार्नेलिया अपने देश में महान अरस्तू की भक्त थी, यहाँ आकर आचार्य चाणक्य की भक्ति उनसे भी बढ़कर करने लगी है। सिंधु के उस पार पहुँचते ही इसने यहाँ की भाषा सीखनी शुरू कर दी थी। यहाँ की स्त्रियों की वेषभूषा, यहाँ की प्रकृति, नदियों, पहाड़ों से भी बहुत प्रभावित है।
बहुत अच्छी बात है। कहकर सबके साथ निर्दिष्ट स्थान पर बैठते हुए आचार्य चाणक्य कुछ देर के लिए विचारमग्न हो गए और फिर सबकी सहमति से मैत्री सन्धि पर बातचीत होने लगी। काफी देर विचार-विमर्श के साथ ही आचार्य चाणक्य की सभी बातें ग्रीक सम्राट ने मान लीं।
सन्धिवार्ता के पश्चात् सभा का वातावरण प्रसन्नता की तरंगों से स्पन्दित हो उठा। आचार्य चाणक्य ने कार्नेलिया की जिज्ञासु निगाहों को भाँपते हुए पूछा कोई जिज्ञासा है क्या बेटी कार्नेलिया?
अपनत्व भरे सम्बोधन ने कार्नेलिया का रहा-सहा संकोच भी समाप्त कर दिया। वह बोल पड़ी-आचार्य श्री हम भारतीय संस्कृति के वैशिष्ट्य को जानना चाहते हैं?
बड़ा ही सरल है बेटी, भारतीय संस्कृति रूप का नहीं, गुणों का सम्मान करती है। आचार्यश्री ने अपनी बात कह तो दी, पर उन्हें लगा कि ग्रीक राजकुमारी उनके कथन को ठीक से समझ नहीं सकी है। उन्होंने पानी से भरे दो गिलास मँगवाए और उनमें से एक राजकुमारी की ओर बढ़ा दिया।
राजकुमारी ने पानी पिया। पर उनका मन तृप्त नहीं हुआ। आचार्यश्री ने दूसरा गिलास भी उनकी ओर बढ़ा दिया। दूसरे गिलास के पानी से उन्हें तृप्ति हुई और चेहरे पर संतोष के भाव नजर आए।
अब आचार्यश्री ने मुसकराते हुए कहा, पहले वाला गिलास का पानी स्वर्णकलश का था। स्वर्णकलश का रूप देखते ही बनता है, मगर उसका पानी आपको बेस्वाद एवं अतृप्तिदायक लगा। दूसरे गिलास का पानी मिट्टी के घड़े का था। कलश के सामने कहीं नहीं टिकता, मगर उसका शीतल, सुस्वाद जल पीकर आपका मन तृप्त हो गया।
बस यही अन्तर है-पश्चिमी संस्कृति एवं भारतीय संस्कृति में। पश्चिमी संस्कृति बाहरी रूप को मान एवं महत्व देती है, जबकि भारतीय संस्कृति आंतरिक गुणों को, विभूतियों को श्रेष्ठ मानती है।
कार्नेलिया को अपनी जिज्ञासा का समाधान मिल गया। भारतीय संस्कृति के वैशिष्ट्य से प्रभावित होकर उसने हमेशा के लिए भारतीय हो जाने का निश्चय किया। आचार्य चाणक्य के आशीर्वाद से सम्राट चन्द्रगुप्त की पत्नी और भारत की महारानी बनी। उसका सारा जीवन भारतीय संस्कृति का पर्याय बन गया।
वर्षा के बाद मौसम बहुत लुभावना और मनभावन हो गया था। बादल छँट गए थे। पुरवाई हवा समूचे वातावरण में शीतलता प्रवाहित कर रही थीं धूप-छाँव का सुखद संगम था। दोपहर समाप्त होने को थी। श्रीकृष्ण ने अपने सारथी दारुक, अग्रज बलराम एवं मित्र सात्यकि से कहा-आज का मौसम तो वनभ्रमण करने का है। चलो आज वनविहार करेंगे।
चारों तैयार हो गए और सघन वन में घूम-घूमकर मौन मुखर प्रकृति का आनंद लूटने लगे। सबने मिलकर एक वृक्ष के नीचे वनभोज किया। आनंद का समय बीतते देर नहीं लगी। बातों ही बातों में कब संध्या गहरी रात्रि में बदलने लगी, पता नहीं चला। आसमान के खुले प्रांगण में तारों को एक-एक करके आता देख सबने मिलकर विचार किया-
हम लोग नगर से बहुत दूर निकल आए हैं। रात गहरी और अँधेरी है। जंगल भी घना है और बीहड़ है। अतः आज रात यहीं बितायी जाए, प्रातः काल होते ही नगर को लौट चलेंगे।
सभी ने रात्रि में विश्राम वटवृक्ष के नीचे करने का निश्चय किया और आपस में मिलकर तय किया कि तीन साथी सोयेंगे और एक साथी पहरा देगा। इसी क्रम में प्रत्येक साथी एक-एक प्रहर का पहरा देने लगा।
पहले प्रहर में दारुक की बारी थी। श्रीकृष्ण, सात्यकि एवं बलभद्र गहरी नींद में सो रहे थे। दारुक पूरी तरह सतर्क, सावधान और चौकन्ना था। थोड़ी देर बाद अट्टहास करता हुआ एक पिशाच प्रकट हुआ। पिशाच ने दारुक से कहा-आज तो मैं तुम चारों का भोजन करूँगा। बहुत दिनों से भूखा हूँ, बड़ा अच्छा पेट भरेगा।
दारुक ने उपेक्षा से कहा-लेकिन मेरे रहते यह कभी सम्भव नहीं। आज मैं तुम्हें हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त कर दूँगा, ताकि आगे भी राहगीर सुरक्षित एवं निश्चिन्त रह सकें।
पिशाच और दारुक दोनों भिड़ गए। पिशाच और मानव शक्ति में कितना अंतर होता है? मानव को पिशाच से कैसे लड़ना चाहिए, दारुक इस जानकारी से अनभिज्ञ था। दारुक ज्यों-ज्यों क्रुद्ध होता था, क्रोधातुर होकर झपटता था, त्यों-त्यों पिशाच का बल बढ़ता जाता था और दारुक का बल घटता जाता था। क्रोध करते-करते दारुक एकदम निर्बल हो गया और बलशाली पिशाच ने उसे दबोच कर दूर फेंक दिया। मार की चोट से दारुक मूर्च्छित हो गया।
दूसरे प्रहर में सात्यकि उठा। उसने जब अपने साथी को बेहोश पड़ा देखा तो उसके क्रोध का पारावार न रहा। वह और भी क्रुद्ध हो गया। परिणाम वही हुआ। पिशाच के बढ़ते बल के सामने सात्यकि देर तक न टिक सके। वह भूमि पर निर्बल होकर गिर पड़े।
अगली बारी बलदेव की थी। तीसरे प्रहर में वे जागे। उन्होंने अपने दोनों साथियों को धराशायी देखा तो क्रोध के कारण उनका खून खौलने लगा। वह बलशाली तो थे ही, क्रोधावेश में उनका बल दुगुना हो गया। वे पूरी शक्ति के साथ पिशाच से भिड़ गए। ज्यों-ज्यों वे क्रोध करते जाते, उनका बल घटता जाता था और पिशाच का बल बढ़ता जाता था। अन्त में अपने साथियों की भाँति उन्हें भी थक-हारकर परास्त होना पड़ा।
चौथा प्रहर श्रीकृष्ण का आया। उन्होंने चारों ओर नजर दौड़ाई तो साथियों को मूर्च्छित पड़ा पाया और सामने ठहाका लगा रहे पिशाच को भी देखा। वे सब कुछ क्षण भर में समझ गए। पिशाच भयानक अट्टहास करते हुए कहने लगा-
आ अब तेरी ही बारी है। तुझे भी तेरे साथियों की कतार में सुला दूँ, तभी चारों को एक साथ खाकर अपना पेट भरूंगा।
श्रीकृष्ण की भौंहों में एक क्षण के लिए बल पड़ें। फिर होंठों पर हलका-सा स्मित झलका। वे सोच रहे थे-क्रोध पिशाच को जीतने का उपाय उपशम है। उपशम शस्त्र से ही यह पराजित हो सकता है। यह सोचकर शान्तिभाव से श्रीकृष्ण पिशाच से बोले-अरे पिशाच! मुझे तो जीतना तेरे लिए सर्वथा असम्भव है।
पिशाच बोला-अच्छे-अच्छे को भी मैंने मौत के घाट उतार दिया है, तो तू किस खेत की मूली है। पिशाच यह कहकर श्रीकृष्ण पर झपटा और श्रीकृष्ण चुपचाप शान्त खड़े-मुसकराते रहे। पिशाच हाथ-पैर पटकता रहा। खड़े-खड़े श्रीकृष्ण पिशाच को शाबाशी देते हुए बोले-
वाह! तू तो बड़ा बलवान है। तेरी शक्ति का कोई जवाब नहीं। तू सचमुच अपराजेय योद्धा है। शाबाश। वाह वीर, वाह। ज्यों-ज्यों श्रीकृष्ण पिशाच की प्रशंसा करते रहें, उसे शाबाशी देते रहे, त्यों-त्यों पिशाच निर्बल पड़ने लगा। उसकी शक्ति क्षीण होने लगी। शान्तभाव से खड़े श्रीकृष्ण के साथ लड़ते-लड़ते पिशाच को लगा कि जैसे कोई उसका बल छीन रहा है। अन्ततः लड़ता-लड़ता वह धड़ाम से धरती पर गिरकर संज्ञाहीन हो गया। तदनन्तर श्रीकृष्ण ने अपने साथियों को होश में किया। तीनों साथियों ने अपनी आँखें खोलीं और बोले-
क्या! पिशाच भाग गया?
नहीं, वह देखो घायल और बेहोश पड़ा है। श्रीकृष्ण ने बताया तीनों आश्चर्य से देखते हुए पूछने लगे-क्या तुमने उसे घायल किया है? हम तीनों को तो उसने धराशायी कर दिया था।
श्रीकृष्ण उन्हें समझाने लगे-देखो बल के साथ शान्ति और धैर्य भी जरूरी होता है। क्रोध रूपी पिशाच शान्ति के खड्ग से जीता जाता है। क्रोध के बदले क्रोध करने पर शत्रु का बल बढ़ता है और शान्ति से उसका बल क्षीण होता है।
प्रायः लोग साधना-उपासना के क्षेत्र में इसलिए प्रवेश करते हैं कि उन्हें इससे वे सिद्धियाँ मिल जायेंगी, जिसके आधार पर सब कुछ प्राप्त कर लेने का दावा शास्त्र करते हैं। जिस आत्मकल्याण के उद्देश्य को पूरा करने के लिए साधना-उपासना का समग्र स्वरूप ऋषियों ने गहन अनुसंधान के उपरान्त खड़ा किया, वह मात्र चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए नहीं हो सकता। पर इसे विडम्बना ही कहा जाना चाहिए कि साधना-क्षेत्र में प्रवेश करने वालों की रुचि जितनी सिद्धियाँ प्राप्त करने की होती है, उतनी आत्मोत्कर्ष की नहीं। ऐसी आकांक्षा क्यों की जाती है? गहराई से विचार करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि मात्र इसलिए कि कठोर जीवन-संघर्ष के झंझावातों से न जूझना पड़े और सब कुछ सहज-सरल ढंग से प्राप्त हो जाए। यह परमात्मा के व्यवस्था नियमों को तोड़ने की आकांक्षा ही कही जाएगी, अन्यथा परमात्मा ने प्रत्येक मनुष्य को इतने साधन और इतनी शक्तियाँ प्रदान कर रखी हैं कि उनका यदि भली-भाँति उपयोग किया जाए तो विशेष कुछ आवश्यकता रह ही नहीं जाती।
सिद्धियाँ और चमत्कारी क्षमताएँ जिन्हें प्राप्त होती हैं, वे भी केवल इसलिए कि उनका प्रयोग मानव कल्याण के लिए किया जा सके। कई बार किन्हीं व्यक्तियों को अनायास ही कोई सिद्धि या अतीन्द्रिय क्षमता प्राप्त हो जाती है, तो उन्हें अपनी इन क्षमताओं के कारण प्रायः परेशान ही होते देखा गया है। उदाहरण के लिए, पीटरहरकौस को ही लिया जाए जो विश्व के सर्वाधिक प्रसिद्ध और सफल भविष्यवक्ता रहे हैं। उन्हें अतीन्द्रिय दर्शन की यह क्षमता एक दुर्घटना में अनायास ही प्राप्त हुई थी और इस कारण उन्हें इतना अधिक परेशान होना पड़ा कि वे सोचने लगे कि किस प्रकार से इस सिद्धि से छुटकारा पाया जाए? उनमें जब यह क्षमता जागृत हुई तो वे जिस किसी को भी देखते थे, उसके बारे में सब कुछ जान जाते थे। न केवल जिसे देखते थे, उसके बारे में, वरन् उससे संबंधित जीवित और मृत व्यक्तियों के बारे में उनका भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ किसी फिल्म की तरह आँखों के आगे नाचने लगता था। उनकी इसी असाधारण अतीन्द्रिय चेतना से कई लोग उनकी जान के दुश्मन बन गये और कई बार उन पर प्राणघातक हमले भी हुए।
जिस दुर्घटना के कारण उनकी यह तृतीय दिव्य दृष्टि जाग्रत हुई थी, वह एक्सटर्डम-हालैण्ड के पास एक सैनिक मुख्यालय में घटी थी। सीढ़ी से पैर फिसल जाने के कारण तीस फीट की ऊँचाई से वे गिरे थे और उनके सिर हड्डियाँ चटक-सी गयी थीं और वे गिरते ही बेहोश हो गये थे। अस्पताल में जब उन्हें भरती कराया गया तो डॉक्टरों को स्वयं आश्चर्य हुआ कि इतनी बुरी तरह चोट खाने के बाद भी वह कैसे बच गये थे? भला उनके बचने की क्या उम्मीद की जा सकती थी?
दूसरा आश्चर्य तब हुआ, जब चार दिन तक लगातार बेहोशी में डूबे रहने के बाद पीटर ने पलकें झपकाईं और धीमे से कराहे। उनकी कराह सुनकर ड्यूटी पर काम कर रही नर्स बिस्तर के पास आयी और पीटर ने उसे देखते ही कहा कि वह अपनी सहेली का सूटकेस अभी घर से चलते समय ट्रेन में भूल आयी है बात एकदम सही थी। हालाँकि नर्स को स्वयं अभी तक सूटकेस ट्रेन में ही छूट जाने की बात याद नहीं आयी थी।
चमत्कार ही था कि चार दिन से बेहोश पड़े मरीज ने किसी व्यक्ति को उसके संबंध में ऐसी बात बतायी थी जिसका उसे स्वयं भी ध्यान नहीं था। इस चमत्कार के बाद तो पीटर चमत्कार पर चमत्कार इतने करने लगे कि अपने चमत्कारों से वह खुद परेशान हो उठे।
वह धीरे-धीरे ठीक होते जा रहे थे और अस्पताल में अपने आस-पास के मरीजों से बात-चीत करते हुए उनकी निजी जिंदगी के अज्ञात पहलू उघाड़ते रहते थे। एक बार उनने अपने पास ही लेटे मरीज को बताया कि तुमने अपने पिता की अन्तिम निशानी भी बेच डाली है, जो सचमुच पास वाले मरीज ने अपने पिता द्वारा दी हुई घड़ी बेच दी थी और उससे मिली हुई रकम जुए में हार गया था। जुए के खेल में ही मारपीट से वह बुरी तरह घायल होकर अस्पताल में भरती हुआ था तथा स्वास्थ्यलाभ कर रहा था। उसके आस-पास मौजूद किसी भी व्यक्ति को नहीं मालूम था कि उस व्यक्ति ने अपने स्वर्गीय पिता की घड़ी बेच दी है और उसकी रकम जुए में हार गया। वह व्यक्ति बड़ा परेशान हुआ और इस ढंग से पोल खोल दिये जाने पर मन-ही-मन नाराज हो उठा।
पीटर हरकौस जिन दिनों अस्पताल में थे और पहले से काफी स्वस्थ भी हो गये थे, उन्हीं दिनों ठीक होकर जा रहे एक व्यक्ति को उन्होंने रोका। वह पास आकर खड़ा हुआ तो पीटर ने कहना शुरू किया, मित्र मेरी बात मानो तो तुम अभी बाहर मत निकलो, जर्मन जासूस तुम्हें ढूँढ़ रहे हैं और तुम्हें देखते ही वे गोली मार देंगे।
वह व्यक्ति बड़ा घबड़ाया और पीटर की बात अनसुनी कर आगे बढ़ गया। न जाने क्या हुआ कि पीटर जोर से चीख उठा-रोको उसे मत जाने दो, वह ब्रिटिश जासूस है और जर्मन सैनिक उसे मार डालेंगे। यह कहते-कहते वह उठ पड़ना चाहते थे कि डॉक्टरों और नर्सों ने पकड़कर सम्हाला। तब तक वह व्यक्ति अस्पताल से बाहर जा चुका था और कुछ ही देर बाद बाहर गोलियाँ चलने की आवाज सुनाई दी। सचमुच वह व्यक्ति भून दिया गया था।
उसी अस्पताल में कुछ ऐसे नये-नये लोग भरती हुए थे, जो जर्मनी के विरुद्ध भूमिगत संघर्ष चला रहे थे। पीटर के द्वारा उस ब्रिटिश जासूस के संबंध में मचाये गये इस हो-हल्ले से उन्हें शंका हुई कि कहीं वह जर्मनी का जासूस तो नहीं है? जिसने चिल्लाकर बाहर घूम रहे अपने साथियों को इस व्यक्ति के ब्रिटिश जासूस होने की सूचना दी। अस्पताल में भरती हालैण्ड मुक्ति मोर्चे के लोग पीटर के बारे में यह संदेह कर रहे थे और पीटर स्वयं दुविधापूर्ण स्थिति में थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे मुझे दूसरे लोगों के बारे में सब कुछ मालूम हो जाता है? और क्यों अनचाहे भी उस जानकारी को कह उठता हूँ?
दूसरों के बारे में प्रकट-अप्रकट बातों का अपने आप ज्ञान हो जाने के बाद भी पीटर लाख कोशिश करते कि वे किसी से कुछ न कहें पर उस समय एक आवेग-सा उठता था और न चाहते हुए भी वह अपनी अनुभूतियों को व्यक्त कर देते थे। लोगों की अपनी निजी जिंदगी में कई बातें ऐसी होती थीं जिन्हें वे गोपनीय रखते थे और किसी को बताना नहीं चाहते थे। ऐसे लोग पीटर के सामने पड़ते तो वह उनकी गोपनीय बातों को तुरंत रिकार्ड की तरह बजा देते। इस कारण कई लोग उनके दुश्मन बनने लगे।
इधर हालैण्ड मुक्ति मोर्चे के कुछ सदस्य जो संयोगवश पीटर के संपर्क में आये थे, वे भी उसके बारे में पक्के तौर पर समझने लगे थे कि वह जर्मनी का एजेण्ट है। क्योंकि पीटर अपने स्वभाव के अनुसार उनके ज्ञात-अज्ञात रहस्य उसी प्रकार व्यक्त कर देता था, जैसे वह इन लोगों के एक-एक पल का हिसाब रखता था। रहस्यों को क्षणभर में जान लेना और उन्हें ज्यों-का-त्यों बता देना पीटर की मजबूरी थी, किन्तु यह मजबूरी जर्मनी के विरुद्ध सक्रिय गुप्तदल के लिए उसके जर्मन एजेण्ट होने का प्रमाण था। इसलिए मुक्ति मोर्चे के लोगों ने जर्मन एजेण्ट समझे जा रहे पीटर का सफाया कर देने का निश्चय किया और दल के कुछ व्यक्ति इस काम के लिए नियुक्त हुए।
अवसर पाते ही गुप्तदल के लोगों ने पीटर को धर दबोचा। उन्होंने अपनी सफाई में कुछ कहना चाहा तो मुक्ति मोर्चे के सदस्य हँसी उड़ाते व्यंग्य करते हुए अपना काम निबटाने के लिए पीटर का गला दबाने लगे। पीटर की साँस घुटने लगी, आँखें उबलने लगीं और उन्हीं क्षणों में पीटर ने कोई ऐसी बात कही जिसे वे स्वयं नहीं समझ पाये कि उसने क्या कहा? किन्तु उस बात ने गुप्तदल के आक्रमणकारियों का सारा भ्रम दूर कर दिया। पीटर ने स्पेनिश भाषा में कुछ ऐसे वाक्य कह दिये थे, जो गुप्तदल के लोगों को बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी देने वाले लगे और यह जानकारी दुश्मन का आदमी किसी भी स्थिति में दूसरे को नहीं दे सकता था। हालाँकि पीटर को स्वयं स्पेनिश भाषा का कोई ज्ञान नहीं था, लेकिन इस भाषा में अति महत्वपूर्ण जानकारी सुनने के बाद गुप्तदल वालों को यह विश्वास हो गया कि पीटर अपनी अतीन्द्रिय क्षमता के बारे में जो दावा कर रहे थे, वह बिलकुल सही है।
इस प्रकार अतीन्द्रिय क्षमता के कारण पीटर के लिए दूसरी बार संकट उत्पन्न हुआ। इसके पहले उनके कुछ मित्रों ने उनके द्वारा बहुत ही गोपनीय रहस्य प्रकट कर दिये जाने के कारण उन पर प्राणघातक हमला किया था। यह बात अलग है कि इस बार आसन्न संकट को टालने में अतीन्द्रिय क्षमता ही काम आयी थी, किन्तु संकट भी तो उसी के कारण उत्पन्न हुआ था और इसी के कारण वह अपने कई मित्रों को दुश्मन बना चुके थे। पीटर हरकौस का कहना है कि उन दिनों किसी के बारे में कोई जानकारी देते समय मेरा अपने आप पर बिलकुल भी नियंत्रण नहीं रहता था। मुझे लगता था कि बात अपने आप फिसलती हुई जीभ पर आ रही है और मुँह को खोलती हुई निकली जा रही है।
सन् 1947-48 में जाकर समस्या कुछ सुलझी और पीटर अपने आप पर कुछ नियंत्रण रख पाने में सफल हुए। इस बीच के पाँच-छह वर्ष इतने संत्रास में बीते कि कोई अतीन्द्रिय क्षमता को भले ही सिद्धि या वरदान समझे, किन्तु पीटर के लिए तो वह अभिशाप ही सिद्ध हुई। उसने अपने सैकड़ों मित्र रूठ गये, अनेकों लोग शत्रु बन गये, कइयों ने जान से भी मार देने की कोशिश की और सबसे बड़ी परेशानी तो यह कि किसी के बारे में ऐसी वैसी बात कह देने पर स्वयं भी आत्मग्लानि होती थी। ये वर्ष पीटर ने कितनी तनावपूर्ण मनःस्थिति और परेशानी में बिताये होंगे, इसका अनुमान लगा पाना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है।
अपने आप पर नियंत्रण पाते ही पीटर ने यह संकल्प कर लिया कि वह केवल उन्हीं अनुभूतियों को व्यक्त करेंगे जिनसे दूसरों का हित होता हो। यह संकल्प करने के बाद उनकी परेशानी कुछ सुलझने लगी। पर यह तथ्य अपने स्थान पर है कि जिन सिद्धियों तथा अतीन्द्रिय क्षमताओं की कामना की जाती है, वे वास्तव में यदि प्राप्त हो जाएँ तो मनुष्य के लिए सुविधा होने के स्थान पर दिक्कतें भी खड़ी हो जाती हैं।
इसीलिए मनीषियों ने इस तरह की सिद्धियों को तो स्पष्ट रूप से आत्मकल्याण के मार्ग में बाधक माना है, क्योंकि सिद्धियाँ यदि प्राप्त भी हो जाएँ तो मनुष्य उनके प्रदर्शन में, उनसे भौतिक लाभ उठाने के जाल-जंजाल में भटक जाता है और आत्मसाधना के पथ से विचलित हो जाता है। दूसरे उनकी लौकिक जीवन में भी क्या उपयोगिता? शरीर को बड़ा या छोटा करने, परकाया प्रवेश करने, दृश्य-अदृश्य होने, किसी के मन की बात जान लेने या इसी तरह की और सिद्धियाँ प्राप्त कर ली जाएँ तो भौतिक जीवन में उनसे लाभ क्या होगा? उलटे अनर्थकारी परिणतियाँ ही सामने आयेंगी। अतः आत्मविकास के इच्छुक साधक को सिद्धियों और अतीन्द्रिय क्षमताओं के प्रति आग्रह नहीं करना चाहिए वरन् सरल राजमार्ग पर चलते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए।
यश और सम्मान प्राप्त करने की अभिलाषा प्रत्येक मनुष्य को होती है। किन्तु जिन कार्यों से सम्मान मिलना संभव होता है, उन्हें करने के लिए बहुत कम लोग राजी होते हैं। झूठे सम्मान के लोभी व्यक्तियों को बहुत प्रयास करने पर भी असफलता ही हाथ लगती है। जिस योग्यता पर यश मिलता और सम्मान बढ़ता है, उसे बढ़ाया न जाए तो यह महत्त्वाकाँक्षा अधूरी ही बनी रहेगी। उचित योग्यता के अभाव में भला किसी को सम्मान मिला भी है?
मनुष्य की बड़ी इच्छा होती है कि वह प्रधानमंत्री बन जाए। सेनापति या कोई वरिष्ठ पद पाने की कामना तो बहुत लोग करते हैं, पर राज्य-संचालन सैन्य-व्यवस्था की उचित योग्यता न हुई तो यह अधिकार कैसे मिल सकेंगे, संयोगवश यदि मिल ही जाएँ, तो बन्दर के हाथ में तलवार के समान आफतों को बुलावा देना ही होगा। इस तरह मिला सम्मान दुःख, क्लेश और अशान्ति ही दे सकता है, उससे मनुष्य की आकांक्षा किसी भी तरह पूरी नहीं होती।
इस संसार को व्यवस्थित रखने के लिए प्रकृति ने एक कानून लागू किया है, विनिमय का अधिनियम। एक वस्तु दो, तब दूसरी मिलती है। रुपया दो तो खाट्य, वस्त्र आदि कोई भी वस्तु खरीद सकते हैं। श्रम और योग्यता के बदले में कुछ मिलता है। निष्क्रिय होकर किसी वस्तु की कामना बाल-बुद्धि की परिचायक है। उचित मूल्य चुकाये बिना इस संसार में कुछ भी नहीं मिलता। इस नियम का उल्लंघन हम कभी भी नहीं कर सकते। सीधा उपाय यह है कि जो वस्तु आप प्राप्त करना चाहते हैं उसके लिए वैसी योग्यता भी प्राप्त कीजिए। योग्यता अपने आप अभीष्ट स्थान तक पहुँचा देती है। अयोग्य की कामनाएँ कभी-भी पूर्ण नहीं होती।
आप यदि यह चाहते हैं कि आप सम्मानित व्यक्ति ठहराए जाएँ, आपकी प्रशंसा हो, सभी आपको आदर दें, तो आदरणीय पुरुषों की विशेषताओं का आपको अध्ययन करना होगा। जिन गुणों के आधार पर लोग आदर के पात्र गिने जाते हैं, उनका अनुसरण करेंगे तो आपका गौरव भी जाग्रत होगा और बड़प्पन मिलेगा। किंतु यदि आप बाहरी टीम-टीम के द्वारा लोगों को भ्रम में डालकर सम्मान प्राप्त करने की कामना करेंगे, तो महँगा मोल चुकाकर भी आपके हाथ कुछ न आयेगा। धूर्त व्यक्ति अपनी चालाकियों से कुछ देर के लिए बड़ी-बड़ी बातें बनाकर, धन का अभिमान जताकर, रूप-गुण की झूठी प्रदर्शनी लगाकर कुछ थोड़ा-सा सम्मान प्राप्त कर भी लें, तो वह आँतरिक उल्लास नहीं मिल सकेगा, जो मिलना चाहिए था। उल्टे जब इस नाटक का पर्दाफाश होता है, तो लोग धूर्त और पाखण्डी ठहराकर तरह-तरह से भर्त्सना, उपहास और निंदा करते हैं। कागज की नाव कब तक चलती, उसे डूबना ही था। धूर्तता की जालसाजी का पर्दा खुल जाता है, तो भारी अशान्ति होती है। सम्मान तो मिलता नहीं, अपमान ही भोगना होता है।
यदि आप गुणों का विकास करने में प्रयत्नशील हों तो संदेह नहीं कि आप सम्मान प्राप्त करेंगे। लोग गुणों की पूजा करते हैं, व्यक्ति की नहीं। सच्चाई को सिर झुकाते हैं, बनावटीपन को नहीं। टेसू का फूल देखने में बड़ा आकर्षक होता है, किन्तु लोग गुलाब की सुवास को अधिक पसंद करते हैं।
आप में सब गुणों का विकास हो तो आप अवश्य ही प्रशंसा के पात्र हैं। गुणों की मात्रा जितनी बढ़ती है, जितनी मनुष्य की योग्यता विकसित होती है, उसी अनुपात में लोग उधर आकर्षित होते हैं। अच्छा काम करने वालों की सर्वत्र प्रशंसा होती है। विद्वान सिसरो का कथन है-सम्मान सद्गुण का पुरस्कार है।” यह बात अक्षरशः सत्य है कि सच्चा सम्मान गुणवान् को ही प्राप्त होता है।
आपके किसी एक गुण का विकास सामान्य श्रेणी के व्यक्तियों से जितना अधिक होगा, उतना ही आपको अधिक यश मिलेगा। कर्ण के युग में यह प्रवृत्ति कर्ण में विलक्षणता लिए हुए थी। दान की परंपरा में यह श्रेष्ठतम प्रमाण बना, इसलिए उसे ‘दानवीर’ कहलाने का सौभाग्य मिल सका।
माता-पिता के प्रति आदर और सम्मान की भावनाएँ अधिकाँश लोगों में होती हैं। लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार उनकी सेवा-शुश्रूषा भी करते हैं, किंतु श्रवणकुमार की पितृ-भक्ति पराकाष्ठा का स्पर्श करने लगी थी, इसलिए उसे सर्वोच्च ख्याति मिली। सद्गुणों के प्रति निष्ठावान् होने से ही सर्वोपरि सम्मान मिलता है।
यों मानवता के प्रति उत्सर्ग की भावना कुछ-न-कुछ सभी में होती है। अपनी-अपनी सामर्थ्य और योग्यता के अनुसार लोग इस आध्यात्मिक सद्गुण को अपनाते भी हैं, किंतु देवत्व की स्थापना में अपने आप को जीवित होम कर देने के कारण जो बड़प्पन, गौरव और उच्चपद महर्षि दधिचि को मिल गया, वह अन्य किसी को नहीं। यश-साधना में किसी एक सद्गुण पर पूर्ण रूप से निष्ठावान होना पड़ता है। आजीवन ब्रह्मचर्य रखने वाले भीष्म पितामह, परमभक्त हनुमान, महासती अनुसूया, तपस्वी दुर्वासा, सत्य हरिश्चन्द्र अपने विशिष्ट गुणों के कारण ही उच्चतम सम्मान पाने के अधिकारी बन सके थे। गुणों की विशिष्टता के कारण ही पूज्य-पद प्राप्त होते आये हैं। यह सनातन नियम आगे भी इसी तरह चलता रहेगा।
विशेषतारहित व्यक्ति को कभी लोग पूछते ही नहीं। अपने ही परिवार के एक दो पीढ़ी के ऊपर के पूर्वजों का लोग नाम तक नहीं जानते। इसका एक ही कारण है कि उनमें कोई विशिष्टता नहीं रही होती। किन्तु रघु, अज और दिलीप आदि का अपनी अनेक पीढ़ियों को ज्ञान होना उनकी अपनी ही विशिष्टता के कारण था।
विलक्षणता-अभ्यास और परिश्रम से मिलती है, किंतु सर्वप्रथम इसके लिए अतुलनीय साहस उत्पन्न करना पड़ता है। साहस के बिना वह शक्ति नहीं आती, जो विपन्न स्थिति में धैर्य स्थिर रख सके। सर्वोपरिता प्राप्त करने के लिए घोर कष्टों का सामना किये बिना कोई बच नहीं सकता। साहस से कष्ट-सहिष्णुता आती है, जिससे लोग हँसते हुए उन कठिनाइयों को झेल लेते हैं, जो किसी गुण को उच्चतम नैतिक स्तर पर धारण करने से आती है। जब इस तरह का विशाल हृदय मनुष्य का बन जाता है, तो यश स्वयमेव आकर उसके पाँव चूमने लगता है। यह उच्चता सम्मान की अभिलाषा से न हो। कर्तव्य-बुद्धि के परिष्कार से ही गुणों की पराकाष्ठा तक पहुँच पाना संभव है। यश का लोभ कामना-पूर्ति में विलंब होते या विघ्न आते देखकर बीच में ही गिरा देता है, इसीलिए उसे त्याज्य कहा गया है। यश की अभिलाषा आँतरिक हो और किसी आदर्श पर प्रतिरोपित हो तो ही मनुष्य कठिनाइयों के उच्च शिखर पर चढ़ता चला जाता है।
श्रेष्ठता प्राप्त करने का अभ्यास, आवेश या अंधानुकरण पर आधारित न हो अन्यथा अधिक देर तक उस सत्कर्म में टिके रहना सम्भव न होगा और उतना परिश्रम व्यर्थ चला जाएगा, साथ ही निंदा के पात्र बनेंगे, लोग उपहास करेंगे। इसलिए विचार करें कि अपनी प्रकृति, स्थिति और शक्ति के अनुसार कौन-सी विशेषता सहज ही में प्रकट कर सकेंगे। दान, सेवा, भक्ति, चरित्र की निर्मलता, ब्रह्मचर्य आदि का चुनाव अपनी स्थिति को ध्यान में रखकर करें। विपरीत स्थिति और शक्ति से बढ़कर किए गए प्रयास प्रायः निष्फल होते हैं या फिर साहस इतना बुलन्द हो कि हर स्थिति की कठोरता को अन्त तक सहन कर सकें। इससे अच्छा यही है कि अपनी सामर्थ्य को ध्यान में रखकर ही गुणों का रचनात्मक विकास करें।
सामान्य स्तर के व्यक्ति के लिए भी जीवन में सम्मान प्राप्त करने का एक सीधा-सच्चा उपाय है, और वह है सबके प्रति बैर भाव, ईर्ष्या द्वेष और प्रतिशोध की भावना न रखना, सबके साथ मिलकर, प्रेम, न्याय, दया, करुणा और सहृदयता से रहकर यह स्थिति सहज ही में प्राप्त हो जाती है। ऐसे निर्मल स्वभाव के व्यक्तियों का किसी के साथ विरोध नहीं होता। उन्हें सभी ओर से सम्मान मिलता है।
सम्मानप्राप्ति की आध्यात्मिक भूख को बुझाने के लिए हमें अपनी श्रेष्ठताएँ और विशेषताएँ निरन्तर बढ़ानी चाहिए। अपना चरित्र अपेक्षाकृत अधिक उज्ज्वल बनाने के लिए और जनहित के लिए अधिक त्याग करने का आवश्यक साहस संचय करना चाहिए। उत्कृष्टता के मूल्य पर ही कोई जन-साधारण की श्रद्धा का पात्र बन सकता है।
एक बार एक देवमन्दिर में कोई उत्सव था। नगरवासी प्लेटो को उसमें सम्मिलित होने के लिए सम्मानपूर्वक ले आये। नगरवासियों के प्रेम और आग्रह को प्लेटो ठुकरा न सके। उत्सव में सम्मिलित हुए।
मन्दिर में जाकर एक नया ही दृश्य देखने को मिला। जो भी आता एक पशु अपने साथ लाता। देवप्रतिमा के सामने खड़ा कर, उस पर तेज अस्त्र से प्रहार किया जाता। दूसरे क्षण वह पशु तड़पता हुआ अपने प्राण त्याग देता और दर्शक यह सब देखते, हँसते, इठलाते और नृत्य करते।
जीव-मात्र की अन्तर्व्यथा की अनुभूति रखने वाले प्लेटो को यह दृश्य देखा न गया। उन्होंने पहली बार धर्म के नाम पर ऐसे नृशंस आचरण के दर्शन किये। वहाँ दया, करुणा, संवेदना और आत्म-परायणता का कोई स्थान नहीं था। वे उठकर चलने लगे। उनका हृदय अन्तर्नाद कर रहा था। तभी एक सज्जन ने उसका हाथ पकड़कर कहा-मान्य अतिथि! आज तो आपको भी बलि चढ़ानी होगी, तभी देवप्रतिमा प्रसन्न होगी। लीजिए यह रही तलवार और यह रहा बलि का पशु। प्लेटो ने शान्तिपूर्वक थोड़ा पानी लिया। मिट्टी गीली की। उसी का छोटा-सा जानवर बनाया। देवप्रतिमा के सामने रखा, तलवार चलाई और उसे काट दिया और फिर चल पड़े घर की ओर।
अंध-श्रद्धालु इस पर प्लेटो से बहस करने लगे-क्या यही आपका बलिदान है?” ‘हाँ’ प्लेटो ने शाँति से उसे कहा-आपका देवता निर्जीव है, उसे निर्जीव भेंट उपयुक्त थी, सो चढ़ा दी, वह खा-पी सकता नहीं, इसलिए उसे मिट्टी चढ़ाना बुरा नहीं।” उन धर्मधारियों ने प्रतिवाद किया-और जिन लोगों ने यह प्रथा चलाई, क्या वे मूर्ख थे, क्या आपका अभिप्राय यह है कि हमारा यह कृत्य मूर्खतापूर्ण है।”
प्लेटो मुस्कराए, पर उनका हृदय कराह रहा था। उन्होंने निर्भीक भाव से कहा-आप हों या पूर्वज, जिन्होंने भी यह प्रथा चलाई पशुओं का नहीं, मानवीय करुणा की हत्या का प्रचलन किया है। कृपया न देवता को कलंकित करें, न धर्म को धर्म, दया और विवेक का पर्याय है, हिंसा और अंध-विश्वास का पोषक नहीं।”
किसी के पास कहने को कुछ नहीं था। नगरवासी सिर झुकाये खड़े रहे। प्लेटो उनके बीच से चले आए, ऐसे ही जैसे धर्म को स्वार्थ साधन बनाने वालों के पास से परमात्मा भाग जाते हैं।
(गुरुपूर्णिमा पर्व 1980 पर दिया गया पावन संदेश)
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो! भाइयो!!
आज गुरुपूर्णिमा पर्व के महत्वपूर्ण पर्व पर महाकाल ने कुछ विशेष संदेश भेजा है। इनमें से पहला विशेष संदेश यह है कि युगसंधि के ये बीस साल इतने महत्वपूर्ण हैं, जो पीढ़ियों तक याद रहेंगे। इस समय महाकाल कुछ गलाई करने जा रहे हैं एवं कुछ ढलाई करने जा रहे हैं। बेकार की चीजों-बेकाम की चीजों की गलाई होने जा रही है। बेकार के आदमी एवं बेकार की परिस्थितियाँ सब गलने जा रही हैं। गल करके उनकी ढलाई होगी, नये पुर्जे बनने वाले हैं। नयी चीजें बनने वाली हैं। इन बीस वर्षों में बहुत ही जोरों के साथ गलाई एवं ढलाई का काम चलेगा। इतिहास इस बात को याद करेगा कि बीस वर्षों में सड़ी-गली व्यवस्थाएँ एवं व्यक्ति कैसे समाप्त हो गये और किस प्रकार नया प्रभात हुआ। अब नये व्यक्ति, नयी परम्पराएँ, नये चिन्तन उभर कर आयेंगे। अगले दिनों लोग यह सोचकर अचम्भा करेंगे कि इतने कम समय में इतना परिवर्तन कैसे हो गया। अगर इस समय को आप जान पायें, पहचान पाये तो हमारा ख्याल है कि आप सच्चे अर्थों में भाग्यवान बन सकते हैं।
हमें महाकाल ने संदेश भेजा है कि आप लोग इन बीस वर्षों में कीड़े-मकोड़ों के जीवन से ऊँचा उठकर जीवन जियें और कुछ काम करें। आपको औलाद की चिंता करते-करते करोड़ों वर्ष हो गये। धन की चिंता करते-करते करोड़ों वर्ष हो गये। अगर आप चाहें, तो और भी करोड़ों वर्ष, करोड़ों जन्म इसी प्रकार के कार्यों में खर्च कर सकते हैं। इसमें आपको कुछ मिलने वाला नहीं है। आप अगर हमारी बात मानें तो अपने कुछ विचार एवं चिंतन इस समय बदल दें। इससे आपको लाभ ही लाभ मिलेगा। आपकी परेशानी दूर हो जायेगी, अगर आप जमाखोरी करना बंद कर दें। महाकाल ने दो कार्य बंद करने को कहा है, सो आप अपनी औलाद एवं धन की बात करना अभी बंद कर दें। हम आपको बतलाना चाहते हैं कि जॉर्ज वाशिंगटन ने अपने पुरुषार्थ के बल पर इज्जत एवं धन प्राप्त किया था। भगवान ने उन्हें जन्म से ही नहीं दिया था। आप भी ये चीजें प्राप्त कर सकते हैं। आप क्यों बंधनों में जकड़ कर मर रहे हैं। आप अपनी हथकड़ियों को ढीला कर दीजिए। महाकाल चाहते हैं कि आपका इन दिनों भौतिक चीजों से मन खट्टा हो जाए। जब इस प्रकार का मन आपका इस युगसंधि के समय बन जायेगा, तो हम विश्वास दिलाना चाहते हैं कि आपके पास समय की कमी नहीं रहेगी। आपके पास धन-दौलत की कमी नहीं रहेगी। आप जो भी काम चाहेंगे, उसे पूरा कर सकते हैं। पुरुषार्थ की कमी नहीं होगी।
अतः इस समय हमारा एक ही निवेदन है कि आप महाकाल के, प्रज्ञावतार के सहयोगी का रोल अदा करें। यह संदेश महाकाल ने-प्रज्ञावतार ने, हमारे गुरुदेव ने भेजा है। आप इस काम को कर पायेंगे, तो सारा संसार आपकी सराहना करेगा तथा आप अपने आप भी अपनी सराहना करेंगे। अगर आप इस प्रकार की हिम्मत कर सकेंगे, तो आपको ही लाभ होगा।
महाकाल का दूसरा संदेश यह है कि इस समय आपको भगवान का काम करना चाहिए। आप ऋषियों का-महात्माओं का इतिहास पढ़ लीजिए कि कोई भी व्यक्ति भगवान का केवल नाम लेकर ऊँचा नहीं उठा है। उसे भगवान का काम भी करना पड़ा है। आपको भी कुछ काम करना होगा, अगर आप भगवान का नाम लेकर अपने आपको बहकाना चाहते हैं, तो हम कुछ नहीं कर सकते हैं। अगर आप अपने आपको बहकाते रहे, भगवान को बहकाते रहे तो आप इसी प्रकार खाली हाथ रहेंगे, जैसे आज आप रह रहे हैं। यह आपके लिए खुली छूट है। निर्णय आपको करना है, कदम आपको ही बढ़ाना है। भगवान काम नहीं कर सकता है, क्योंकि वह अपने आप में निराकार है। आप भगवान का साकार रूप बनकर उनका काम करने का प्रयास करें। आदमी का सिर काटने के लिए तलवार की आवश्यकता पड़ती है, परन्तु अकेली तलवार से काम नहीं चल सकता है। पुरुषार्थ निराकार है तथा तलवार साकार है। इन दोनों के मिलने से ही काम बनता है। आप भी इसी प्रकार भगवान का काम करने के लिए आयें तथा प्रयत्न करें। इस युगसंधि की वेला में भगवान जो कि निराकार हैं, उन्हें साकार सहयोगी लोगों की आवश्यकता है।
प्राचीनकाल में भी भगवान का काम जाग्रत आत्माओं ने किया था। आगे जल्दी अवतार नहीं होने वाला है। इस समय सारे विश्व की व्यवस्था नये सिरे से बनने वाली है। उस समय आप कितने महान बनेंगे, इसका जवाब समय देगा। हनुमान ने कितनी उपासना की थी, कितनी कुण्डलिनियाँ जगायी थीं? यह हम नहीं कर सकते हैं, परन्तु उन्होंने भगवान का काम किया था। नल-नील ने जामवन्त ने, अर्जुन ने कितनी पूजा एवं तीर्थयात्रा की थी? पर उन्होंने भगवान के कंधे-से-कंधा मिलाकर काम किया था। इस कारण से भगवान ने भी उनके कार्यों में कंधे-से-कंधा मिलाया था। विभीषण एवं केवट ने भगवान का काम किया था, ये लोग घाटे में नहीं रहे। भगवान का काम करने वाले ही भगवान के वास्तविक भक्त होते हैं। भगवान का नाम लेने वाले भी भगवान के भक्त हो सकते हैं, परन्तु उन्हें भगवान का काम भी करना पड़ेगा। इससे कम में बात बनने वाली नहीं है।
इस समय जो भगवान के भक्त हैं, जिन्हें इस संसार के प्रति दर्द है, उनके नाम यह विशेष संदेश भेजा गया है कि वे अपने व्यक्तिगत लाभ के कामों में कटौती करें एवं भगवान का काम करने के लिए आगे आयें। भगवान के काम के लिए, सहायता के लिए आगे आयें। यही है हमारा गुरुपूर्णिमा का संदेश, यही है महाकाल का संदेश। अगर आप सुन सकेंगे, तो आपके लिए बहुत ही लाभदायक होगा। आप सुनेंगे तो आपको भी लाभ मिलेगा, लेकिन अगर आप इस समय चादर ओढ़कर सोये रहेंगे, तो आपको घाटा-ही-घाटा होगा। अगर इस समय भी आप अपना मतलब सिद्ध करते रहे और मालदार बनते रहे, तो पीछे आपको बहुत पछताना पड़ेगा तथा आप हाथ मलते रह जायेंगे। गाँधी जी के स्वतंत्रता आँकलन में जो आदमी शामिल हो गये थे, वे आज स्वतंत्रता सेनानी हैं और पेंशन पा रहे हैं, मिनिस्टर हैं, राज्यपाल हैं। पर जो लोग भाग नहीं ले सके आज वे लोग पछता रहे हैं कि काश! हम भी कुछ काम कर लेते तो आज नफे में होते। आपकी इन दिनों की चालाकी आपको हजारों वर्षों तक दुख देती रहेगी तथा आप परेशान रहेंगे। अतः आप अभी से अपने बीस वर्षों की कार्यपद्धति बना लें तथा भावी योजना का निर्धारण कर लें
इस समय आपको तीन काम करने हैं। यह युगसंधि का बीजारोपण वर्ष है। इसमें बीज बोने हैं, ताकि फसल हम प्राप्त कर सकें। बीज बोने के लिए हमें तीन काम करने होंगे। पहला काम वातावरण के परिष्कार तथा आपका आत्मबल बढ़ाने के लिए है। इन दोनों उद्देश्यों के लिए आपको युगसंधि महापुरश्चरण करना चाहिए। यह सामूहिक तप है। आपके अकेले का तप इस काम के लिए सार्थक नहीं हो सकता है। अतः महाकाल ने इस समय विशेष शक्ति देने का निश्चय किया है। यह प्राणसंचार की प्रक्रिया है एवं दिव्य-दृष्टि जागरण की प्रक्रिया है। आप नैष्ठिक तपस्या कीजिए, देवता आपको अनुदान देंगे। यह ऐसा कार्य है, जो हर किसी को जो उपासना में विश्वास करते हैं, उन्हें यह तपस्या अवश्य करनी चाहिए। आपकी उपासना इसलिए असफल रही है कि उसमें निष्ठा का समावेश नहीं हुआ है। आप तपस्यायुक्त उपासना कीजिए, फिर देखिये उसमें चमत्कार होता है या नहीं।
मित्रों, आप युगसंधि महापुरश्चरण अवश्य करें। इसमें तपस्या भी शामिल है, निष्ठा भी शामिल है और महाकाल के अनुदान भी शामिल हैं। यह लाभ उठाने का मौका न कभी मिला है और न बीस साल बाद कभी मिलने वाला है। ऐसा आश्वासन किसी ने नहीं दिया होगा कि आपका अनुष्ठान खण्डित हो जायेगा अर्थात् अधूरा रह जायेगा, तो हम उसे पूरा करेंगे। आपकी मृत्यु हो जाने पर भी हम उसे पूरा करेंगे। आप अगर बीच में भी हार जाएँ तो हम आपके बदले का भार उठा लेंगे। यह कितना बड़ा आश्वासन है। हमारा यह कहना है कि कोई भी प्रज्ञापरिजन ऐसा न हो जो इस नियमबद्ध उपासना को प्रारम्भ न करे। यह वातावरण के संशोधन तथा साधकों के आत्मबल के अभिवर्द्धन हेतु प्रारम्भ किया गया है।
दूसरा वाला भगवान का कार्य है-गायत्री चरणपीठों की स्थापना। तब भगवान का कार्य करने के लिए कुछ व्यक्ति आ गये थे-मसलन हनुमान। हनुमान के अंदर पुरुषार्थ भी था, साहस और साधन भी था तथा उनके अंदर भावना भी थी। अब ऐसे आदमियों का मिलना भी मुश्किल है। आपको ऐसी परिस्थिति में क्या करना होगा? आपको एक समानांतर हनुमान अपने क्षेत्र में खड़ा करना होगा, जिसका कलेवर भी हो तथा जिसमें प्राण भी हो। यह हनुमान क्या है? यह है गायत्री चरण-पीठों की स्थापना। ये चरणपीठें बन रही हैं और आपको बनानी चाहिए। आपकी जहाँ भी गायत्री परिवार की शाखाएँ हैं, वहाँ गायत्री चरणपीठें बना देनी चाहिए। गायत्री चरणपीठों के नये नक्शे बना दिये गये हैं।
आपको ऐसी चरणपीठें बनानी चाहिए, जो
कम लागत की होते हुए भी चार बातों को पूरा करने में समर्थ हो सकें। वहाँ एक गायत्री परिवार के कार्यकर्ता का निवास अवश्य होना चाहिए। वे मंदिर हो सकते हैं, परंतु मात्र उसी से जन-जागरण का काम नहीं हो सकता है। अतः वहाँ पर भगवान के काम को करने वाला भी उपस्थित होना चाहिए, जो गतिविधियाँ चला सकें। अगर कार्यकर्ता निवास नहीं होगा, तो वह सुबह घंटी बजाकर घर चला जाएगा। ऐसे वातावरण में काम नहीं हो सकता है। हम ऐसे घण्टी बजाने वाले मंदिर बनाकर क्या करेंगे। इसके बाद उसमें एक हाल होना चाहिए। इस हाल के माध्यम से कई गतिविधियाँ चलेंगी। उसमें सत्संग होगा। दिन में पाठशाला भी चल सकेगी। रात्रि में उसमें कथा का आयोजन भी चल सकता है। प्रौढ़ शिक्षा का काम भी वहाँ चल सकता है। अतः इस चरणपीठ में हमने 16x24 का एक हाल भी जोड़ दिया है। अगर हाल न हो तो काम पूरा नहीं होगा, भले यह खपरैल का ही क्यों न हो, क्योंकि नये युग का संदेश देने के लिए, साहित्य घर-घर देने के लिए, वापस लेने के लिए एक स्थान होना चाहिए। हम अगले दिनों अपने मिशन के द्वारा इस प्रकार एक महत्वपूर्ण कदम उठाने वाले हैं, जिसके द्वारा काम हो सके। इसके बिना काम पूरा हो ही नहीं सकेगा। अतः उसमें देवालय भी होना चाहिए तथा पुस्तकालय भी होना चाहिए। यह प्रज्ञावतार का केन्द्र है। अतः इसमें चार चीजें अवश्य होनी चाहिए, इसके बिना कोई उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता है। वे हैं-(1) मन्दिर, (2) पुस्तकालय, (3) हाल, (4) कार्यकर्ता निवास।
आप में से हर शाखा के परिजनों का यह प्रयास होना चाहिए कि वे अपने ग्राम में एक चरणपीठ की स्थापना कर लें। अगर कोई चंदा नहीं देता है, तो कोई बात नहीं। आप यह बात नहीं कहें, वरन् यह सोचें कि आप कितने बच्चे हैं? हर एक की शादी में आपने दस हजार रुपये खर्च किये हैं, तो इस बच्चे अर्थात् चरणपीठ के लिए भी छह हजार खर्च करें। इसके बिना कृपणता को छोड़ें एवं भगवान के सहयोगी बनें। आप भगवान के निमित्त अपना समय देना शुरू कीजिए, फिर देखिये आपको सहयोग देने के लिए दूसरे आदमी आपके पास आते हैं या नहीं। आप पहले अपना लगाइये तो सही, फिर देखिये दूसरा आदमी किस प्रकार देता है। आप अपना लगाना नहीं चाहते हैं और दूसरों से माँगते हैं। इससे काम नहीं बनेगा। आगे आपको आना पड़ेगा। त्याग की कसौटी पर आपको स्वयं को खरा सिद्ध करना पड़ेगा। अगर आप इस प्रकार कर सकेंगे, तो ही काम बनेगा। छह हजार रुपये कुछ भी नहीं हैं। अगर यह मान लें कि हमें अपनी बेटी, बहिन की शादी करनी है, तो हर व्यक्ति अपनी जेब से निकाल कर दे देता है। आप अगर हिम्मत करेंगे और देंगे, तो आपको देखकर दूसरा आदमी भी अनायास ही देगा। आप अगर देने में आगे आयेंगे तो न जाने कितने लोग आपको सहयोग करने के लिए अमादा हो जायेंगे। हर गाँव में चरणपीठ बनना चाहिए, यह हमारा अनुरोध है आप से।
तीसरे काम के बारे में हम बात बतलाकर अपनी बात समाप्त करेंगे। हमें युगपरिवर्तन की बातों को बतलाने के लिए, युगसंदेश को घर-घर पहुँचाने के लिए प्रज्ञावतार के अलख को घर-घर पहुँचाने के लिए दो प्रकार के व्यक्तियों की आवश्यकता है। हमें इस काम के लिए नंबर एक-संत तथा नंबर दो-ब्राह्मणों की आवश्यकता है। ऐसे अनेक आदमी अन्य कार्यों के लिए मिल सकते हैं, परंतु हमें तो संत चाहिए, हमें तो ब्राह्मण चाहिए।
संत से क्या मतलब है? संत का मतलब है, पुरुषार्थी, त्यागी और तपस्वी। आपके भीतर तो दो ही चीजें जगी हुई हैं। कौन-कौन-सी चीजें जगी हुई हैं? आपके भीतर एक चाण्डाल जगा हुआ है। वह कामवासना की बातें करता है, बेकार की बातें करता है। यह चाण्डाल बिलकुल बेकार है। यही माद्दा आपका जगा है, जो हमेशा आपको परेशान करता रहता है। एक इंच भी आपको आगे बढ़ने नहीं देता है। दूसरी चीज एक और जगी हुई है जिसका नाम बनिया है। इसका मतलब यह है कि वह व्यक्ति किसी भी बिरादरी में पैदा हुआ हो, उसे हर समय पैसा, हर समय दौलत ही दिखायी पड़ती है। हर समय लालच और हर समय लोभ ही घेरे रहता है। यह बनियापन आपका जगा हुआ है। शूद्र आपका जगा हुआ है, परंतु आपके अंदर दो चीजें बिलकुल सोयी हुई हैं, पहला ‘ब्राह्मण’ और दूसरा ‘संत’। इनको पुरुषार्थ, त्याग, साहस जो भी आप नाम चाहें, दे सकते हैं। यह दोनों आपके अंदर सो गये हैं, जिसके कारण आप भगवान का कार्य करने में असमर्थ हैं।
मित्रो, हमें आपके भीतर के संत और ब्राह्मण को जगाना है। हम बाहर के ब्राह्मण से क्या बात करेंगे? बाहर के संतों से हम क्या कहेंगे, बाहर संत कहाँ हैं? उनका नाम लेने से हमारा दिमाग खराब हो जाता है। आप उन बाबाजी से हमें कहने को कहते हैं, जिनने कभी कुछ नहीं किया है और न आगे करेंगे। आपके भीतर जो संत सोया है, आप उसे जगायें। संत किसे कहते हैं? जिसने अपने लोभ एवं मोह को समाप्त कर दिया है। आप देखेंगे कि इस गायत्री परिवार के लोगों में से कितने संत निकलते हुए चले आयेंगे। ऐसे व्यक्ति आपको दिखायी देंगे जिनकी समझदारी कम हो गयी है या जो अपने घर को देखते हुए भी मिशन का काम करते हैं, वे सब संत हैं। महाकाल की प्रार्थना है कि आप संत की भूमिका निभायें एवं परिव्राजक के तरीके से जन-जन तक महाकाल के संदेश को पहुँचाने का प्रयास करें। भगवान का काम करने में अपना समय लगा दें।
उन लोगों का नाम संत है, जो बादलों की तरह से घूमते हैं और भगवान का संदेश हर जगह पहुँचाते हैं तथा हर आदमी के भीतर जीवट पैदा करते हैं। आप लोगों में से हर आदमी के भीतर ब्राह्मण छिपा पड़ा है। ब्राह्मण तो वे हैं, जो काम तो करना चाहते हैं, परंतु घर की जिम्मेदारियाँ एवं अन्य समस्याओं के कारण कुछ कर नहीं पाते हैं। हमने ऐसे ब्राह्मणों का आह्वान किया है कि वे निकलकर बाहर आयें। संत वे हैं, जो बिना लिए काम करते हैं। ब्राह्मणों को लेना पड़ता है। हम उन्हें देने को तैयार हैं, वे घर से निकल कर तो आयें। हम उनके गुजारे का प्रबंध कर सकते हैं। अगर उन्होंने बड़ी गृहस्थी इकट्ठी कर रखी है, तो बात अलग है। अगर बहुत बड़ी हविश बना रखी है तो बात अलग है अन्यथा अगर वे पेट भरना चाहते हैं और तन ढँकना चाहते हैं, तो गायत्री परिवार के सदस्यों को ब्राह्मणोचित खर्च देने को हम तैयार हैं।
आप जानते हैं कि प्राचीनकाल में ब्राह्मणों का खर्च भिक्षाटन से पूरा होता था। हमने भी इस प्रकार का पात्र बना रखा है। गायत्री परिवार के घरों में ज्ञानघट-धर्मघट के रूप में स्थापित कर दिया है। उनसे कह दिया है कि आप नित्य इसमें दस पैसा डालें। हम किसी भी गायत्री परिवार के व्यक्ति को बिना ज्ञानघट के नहीं रहने देंगे। हम किसी को भी मुट्ठी भर अनाज दिये बिना नहीं रहने देंगे। यह ब्राह्मणों की जीविका के लिए हमें चाहिए। ब्राह्मणों के पेट भरने के लिए, उनके तन ढँकने के लिए आपके ब्रह्मभोज का पैसा चाहिए।
इस पैसे का हम क्या करेंगे? इन पैसों को हम इमारत बनाने में, हवन कराने में नहीं खर्च करेंगे। यह ज्ञानघट का पैसा विशुद्ध रूप से ब्राह्मणों के लिए खर्च होगा। ब्रह्मभोज का अर्थ है-हमें कार्यकर्ताओं की आवश्यकता पड़ेगी, हम इसके द्वारा उनकी आवश्यकताओं को पूरा करेंगे। हम चाहते हैं कि हमारी जितनी भी शाखाएँ हैं, उनमें एक चरणपीठ अवश्य बननी चाहिए। उसमें हमें दो कार्यकर्ता चाहिए। उनमें से एक आदमी साइकिल से सारे-के-सारे आस पास के क्षेत्रों में भ्रमण करके विचार क्राँति का काम चलाए। दूसरा आदमी यहाँ मंदिर में रहकर सारी गतिविधियों का संचालन करेगा। इस प्रकार हमें हजारों आदमी चाहिए। हमें उनके लिए पेट भरने एवं तन ढकने
के लिए पैसा चाहिए। अगर उनके छोटे बच्चे हैं, तो उन्हें फाँसी कैसे लगा देंगे। उसको तो भोजन देना ही पड़ेगा। हाँ, आगे वे बच्चा पैदा न करें, यह बात ठीक है, परंतु अभी जो हैं, उनकी व्यवस्था तो बनानी ही पड़ेगी। उसकी पत्नी को भी देना होगा। अतः आप लोगों में से जिस किसी में भी संत की प्रवृत्ति हो, वह जागें और आगे आयें।
हमें संत-ब्राह्मणों को जगाना है तथा इन लोगों के लिए ब्रह्मभोज की व्यवस्था बनानी है। यह सारा-का-सारा काम आपको करना है। आप इस प्रकार के व्यक्तियों की तलाश करें। अगर आपका कुछ प्रभाव है या दबाव है, तो उसका भी उपयोग करें। आप जब विवाह शादी में उसका उपयोग कर सकते हैं, चुनाव में खड़े होते हैं, तो उपयोग करते हैं, तो आपको इस कार्य के लिए भी अपने प्रभाव या दबाव का उपयोग करना चाहिए। अगर आपके पास ज्यादा है, तो ज्यादा देने का प्रयास कीजिए। हम इतने आदमी की व्यवस्था कैसे करेंगे? दस पैसा तो शुरुआत है। अगर संभव हो तो आप दिन का वेतन दीजिए। अगर कुछ संग्रह है तो उसे हमें दीजिए। अगर बेकार की चीजें हैं, तो उन्हें हमें दीजिए। आपकी चीजों की भगवान को आवश्यकता है। आप जो करेंगे, उसका लाभ-मुनाफ़ा आपको अवश्य ही मिलेगा। अगर आप नहीं कर पायेंगे, अपना दिल चौड़ा नहीं कर पायेंगे, तो आप घाटे में रहेंगे। इस समय दिन चौड़ा करने का समय है, उदारता का समय है। यह बीजारोपण का वर्ष है। यह लाभ उठाने का वर्ष है।
यही इस गुरुपूर्णिमा पर महाकाल का संदेश है, जो हमारे जैसे टेपरिकार्डर के माध्यम से आपको सुनाया जा रहा है। हमें आशा एवं विश्वास है कि आप साहस भरा कदम उठायेंगे और भगवान का काम करने में पीछे नहीं रहेंगे। ॐ शाँति।
गुजरात में आया भीषण चक्रवात भावी विभीषिकाओं की पूर्व सूचना लेकर आया है
विगत दिनों 9, 10, 11 जून को गुजरात में आया भीषण चक्रवाती तूफान एक विनाशलीला रचाता चला गया। अनेकों जानें गयीं-काण्डला व नौलखी बंदरगाहों सहित जामनगर, गाँधीधाम, भुज-कच्छ आदि क्षेत्रों में अरबों का नुकसान कर गया। उत्तरकाशी व लटूर में आए भूकम्पों के बाद दैवी प्रकोपों की श्रृंखला बढ़ती चली जा रही है। प्रतिवर्ष कोई नई विपत्ति हर महाद्वीप में बढ़ती ही जाती थी। अमेरिका को जहाँ एलनीनो के कारण प्रतिकूल मौसम का सामना करना पड़ा-वहाँ भारतीय उपमहाद्वीप में इस सदी की भीषणतम गर्मी देखी गयी है। सौरकलंकों-धब्बों की संख्या क्रमशः बढ़ती जा रही है। उड़ीसा, बंगाल क्षेत्र में पिछले दिनों आए तूफान, आंध्र में समुद्री तूफान, उत्तरप्रदेश, बिहार में ओले-बर्फ की सिल्लियों की बारिश तथा लगभग कहर बरसाती रही शीतऋतु यही बताती है कि अभी बहुत कुछ आगामी तीन वर्षों में हम सबको झेलना है।
गुजरात के तूफान-क्षेत्र का दौरा करके आयी हमारी केन्द्रीय तंत्र की टोली के विवरण को जानकर तो लगता है मानो उस चक्रवात के रूप में साक्षात यमराज पधारे थे। तात्कालिक राहत के जो भी कुछ उपचार क्रम चले हों-अपर्याप्त हैं। गायत्री परिवार दैवी-आपदा राहत कोष की स्थापना कर ऐसे क्षेत्रों में जहाँ सब कुछ उजड़ गया है-जहाँ कोई भी जनतंत्र का पदाधिकारी नहीं पहुँच पाया है-पीड़ानिवारण की सेवा कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने का प्रयास करने को संकल्पित हुआ है। प्रारंभ गुजरात से हुआ है, किंतु सारे भारतवर्ष के लिए इसका स्वरूप अगले दिनों उभर कर सामने आ सकेगा। जो चाहते हों कि पीड़ितों-दुःखीजनों की आह कुछ कम हो सके-वे इसमें सहयोग देने हेतु शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार से पत्राचार कर सकते हैं।
तैत्तरीय ब्राह्मण की एक श्रुति है-यह विश्व किससे उत्पन्न हुआ, यह कौन जानता है? इसके रहस्यों को कौन कह सकता है? देवता भी तो पीछे जन्मे हैं, वे अपने उद्भव से पूर्वकाल का वृत्तान्त कैसे जान पायें? जिसका एक फल यह पृथ्वी है, उस ब्रह्माण्ड-वृक्ष का जन्म किस आरण्यक में हुआ, इसे कौन जानता है? इस सबका जो अधिष्ठाता है, उसे कौन जानता है? वह अधिष्ठाता भी अपने विस्तार का संपूर्ण रहस्य जानता है या नहीं, इसे कौन जाने?” वस्तुतः चेतना का यह वह गूढ़तम रहस्य है, जिसके संबंध में वेद, वेदांत, पुराण, उपनिषद् आदि समस्त आर्षग्रंथों ने नेति-नेति कहकर इसे इन्द्रियों की पकड़ से बाहर बताया है। इसे जानने, समझने और अनुभूति स्तर तक खींच लाने और तदनुरूप दिव्यजीवन जीने-जीवन मुक्त होने के लिए ही अध्यात्मशास्त्र का समस्त कलेवर गढ़ा गया है। गुण, कर्म, स्वभाव एवं चिंतन-चरित्र व्यवहार को परिष्कृत किये बिना, उत्कृष्टता उभारे बिना चेतना का गूढ़ रहस्य समझना और अलौकिक विभूतियाँ, सिद्धियाँ अर्जित कर सकना कठिन है।
स्थूल दृष्टि से समझ में आने वाले दृश्यों को लौकिक और समझ में न आने वालों को अलौकिक कहा जाता है। प्रकृति की समस्त अबूझ पहेलियाँ इसी अलौकिक शब्द के अंतर्गत समेट ली गयी हैं। यद्यपि विज्ञान की पहुँच प्रकृति तक ही सीमित है, जो जड़ पदार्थों का अन्वेषण करती है। चेतना को चेतना द्वारा ही खोजा और उसकी उपलब्धियों-विभूतियों से लाभान्वित हुआ जा सकता है। यद्यपि भौतिक विज्ञान के सिद्धान्त भले ही इस बात से सहमत न हों, फिर भी उक्त तथ्य को समझना ही होगा।
प्रकृति और विज्ञान के अजूबों-चमत्कारों को न समझ पाना हमारे मस्तिष्क का सीमाबंधन है। हमारे मस्तिष्क का अधिकाँश भाग अंधकारमय माना गया है, जो अलौकिकताओं, अतीन्द्रिय क्षमताओं, पूर्वजन्मों के संस्कारों का भाण्डागार है। इस संदर्भ में डॉ. विल्डरपेनफील्ड ने गहन अनुसंधान करके बताया है कि इंच के दसवें भाग जितनी मोटी लगभग पच्चीस वर्ग इंच क्षेत्रफल की मस्तिष्क में काले रंग की दो पट्टियाँ होती हैं, यह पूरे मस्तिष्क को ढके रहती हैं। मनुष्य जब पुरानी बातें याद करने का प्रयत्न करता है तब तंत्रिका-तंतुओं स्नायुओं से निकलती हुई विद्युत-धाराएँ इन पट्टियों से गुजरती हैं ओर वह घटनाएँ याद हो जाती है। सामान्य स्थिति में मनुष्य अपनी मानसिक विद्युत को न तो इतना प्रखर बना पाता है और न ही एकाग्र हुए बिना किसी मदद से इस काली पट्टी के संपूर्ण इतिहास का पता लगा सकता और यह जान सकता है कि वह पूर्व जन्मों में कब क्या था, पर वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि इस भाग में जन्म-जन्मान्तरों के संस्कार, स्मृतियाँ अलौकिक क्षमताएँ विद्यमान हैं। इतना ही नहीं, यह चेतना का वह केन्द्र भी है, जो कभी मरता नहीं, वरन् अपनी वासना और कर्मों के अनुसार बार-बार जन्म लेता और मरता रहता है।
स्थूल इन्द्रियों की अपनी सीमा है। उदाहरण के लिए हमारे नेत्रों की क्षमता लगभग 400 से 700 नैनोमीटर तक देखने की है। एक औसत आयु के व्यक्ति के कानों की ध्वनि-श्रवण-क्षमता 20-20000 हर्ट्ज है। हमारे नेत्र एक्स-किरणों को नहीं देख सकते, किंतु मधुमक्खी के लिए यह दृश्य देख पाना अत्यंत सुगम है। हमारे कान जिन ध्वनियों को सुन-समझ नहीं सकते, कुत्ते और चमगादड़ के लिए यह सब संभव है।
भारतीय धर्मग्रंथों में जिन आठ सिद्धियों का उल्लेख है और जिन्हें योगसाधना से प्राप्त करने की विधि-व्यवस्था भी है, उनके नाम इस प्रकार हैं-(1) अणिमा-लघु शरीर, (2) महिमा-शरीर को विशालकाय बनाना, (3) लघिमा-शरीर को प्रकाश के सदृश बना लेना, (4) गरिमा-शरीर को अधिक भारी बना लेना, (5) प्राप्ति-शरीर को ब्रह्माण्ड के किसी कोने तक पहुँचाना, (6) प्राकाम्य- पानी के भीतर रहना, जमीन के भीतर कई दिनों तक बैठे रहना, आयु को न बढ़ने देना आदि। (7) वाशित्व- लोगों को प्रभावित एवं नियंत्रित करने की क्षमता का विकास, पशु-पक्षी तथा निर्जीव जड़-पदार्थ तक को भी अपनी इच्छानुसार बनाना, (8) ईशित्व- भगवान की शक्तियों-विभूतियों को अर्जित कर लेना। इनके अतिरिक्त भी अनेक ऐसी सिद्धियाँ हैं, जिनका विकास योग-साधनाओं एवं तप-साधनाओं द्वारा होता है। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
(1) भूख-प्यास पर नियंत्रण, (2) ताप-शीत से मुक्ति, (3) राग-द्वेष से रहित, (4) दूर-दर्शन (5) दूर-श्रवण (6) मस्तिष्क का नियंत्रण, (7) शरीर का स्वेच्छा से परिवर्तन, (8) परकाया प्रवेश, (9) इच्छा-मृत्यु (10) देवताओं से वार्तालाप, (11) इच्छानुसार वस्तुओं की प्राप्ति, (12) त्रिकाल ज्ञान, अर्थात् भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान, (13) वासनाओं के जाल-जंजाल से मुक्ति, (14) भविष्यवाणी करने की क्षमता का विकास-वाक्सिद्धि बहुशरीर-कायाभ्यास (16) एक पदार्थ से दूसरे में स्थानान्तरण, (17) ऊपर उछलने हवा में तैरने की क्षमता, (18) बीमारी और कष्टों को दूर करने की पाताल-सिद्धि (19) भूतकालीन ज्ञान की प्राप्ति, (20) विभिन्न निहारिकाओं-मंदाकिनियों ग्रह-गोलकों और ब्रह्माण्ड की जानकारी, (21) भूतजय-प्राणजय, (22) थोड़े समय के लिए किसी भी स्थान पर ठहरना, (23) सर्वज्ञता, (24) गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध ऊपर उठना, (25) छिपी हुई वस्तुओं को खोज निकालना आदि।
पाश्चात्य देशों में इन अलौकिक क्षमताओं के अनुसंधान-अन्वेषण हेतु विज्ञान की एक नवीनतम शाखा पैरासाइकोलॉजी-परामनोविज्ञान प्रकाश में आयी है। सन् 1930 में परामनोविज्ञानी जे. बी. राइन ने मनुष्य के भीतर अतीन्द्रिय सामर्थ्य का पता लगाया ओर सात वर्ष बाद ‘जनरल ऑफ पैरासाइकोलॉजी के नाम से नयी शाखा की स्थापना की। इन अतीन्द्रिय सामर्थ्यों को उनने ‘साइकोकीनेसिस’ और ‘साई’ के नाम से सम्बोधित किया है। ई. एस. पी. अर्थात् एक्स्ट्रा सेन्सरी परसेप्सन उन्हीं की खोज है। यों तो ‘साइको’ शब्द का प्रादुर्भाव ग्रीक शब्द ‘सोल’ से हुआ है। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के आर. एच. थालेस ने इसे सिक्स्थ सेन्स-छठी इन्द्रिय की संज्ञा दी, जिसे आठ प्रमुख भागों में विभक्त किया गया। ये हैं-(1) क्लेयर वाएँस-दूरदर्शन (2) क्लेअर आॅडिऐंस-दूरश्रवण (3) टेलीपैथी-मानसिक संप्रेषण, (4) प्रीकाग्नीसन-पूर्वज्ञान (5) रेट्रोकाग्नीसन-पीछे का ज्ञान, (6) साइकोमैट्री-मानसिक शक्ति का प्रमापन, (7) रेडेस्थेसिया जमीन एवं पानी के भीतर की वस्तुओं का पता लगाना, (8) साइकोकीनेसिस-मनः गतिशास्त्र।
मनोविज्ञानी जे. बी. राइन ने उक्त अतीन्द्रिय क्षमताओं को मनः चेतना का खेल बताते हुए उसे पराजागतिक और पराभौतिक की संज्ञा दी है। वे चेतना का स्वरूप विद्युतीय एवं चुंबकीय स्तर की ऐसी स्वतंत्र इकाई के रूप में मानते हैं, जो मरने के बाद भी अपनी सत्ता बनाये रहता है। उसमें इतने प्रबल संकल्प भी जुड़े रहते हैं, जिनके सहारे पुराने स्तर की तथा नये प्रकार की किसी आकृति का सृजन कर सके। उनकी दृष्टि में यह स्थिति में अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रहने में पूर्णतया समर्थ है।
वस्तुतः यह सारी सृष्टि चेतना का ही खेल है। इस तरह की मान्यता गणितज्ञ ओस्पेन्स्की और भौतिकविद् रॉबर्ट मायर जैसे मूर्धन्य विज्ञान विशारदों की है। ‘इन सर्च ऑफ मिरेकुलस लाइफ’ ‘टर्टियम आर्गेनम थ्योरी ऑफ इंटरनल लाइफ’ जैसे ग्रंथों में ओस्पेन्स्की ने जहाँ चेतना के व्यापक अस्तित्व को सिद्ध करने का प्रयत्न किया है, वहीं रॉबर्टमायर ने ऊर्जा के दर्शन पर जो खोजें की हैं, वे बताती हैं कि उसकी अधिकाधिक सूक्ष्म स्थिति में जो तत्व शेष रह जाता है, उसे चेतना की संज्ञा दी जा सकती है। सुप्रसिद्ध जीवविज्ञानी रूपर्ट शैलड्रेक ने अपनी पुस्तक ‘ए न्यू साइन्स ऑफ लाइफ’ में लिखा है कि कोई भी जीवित प्राणी ‘मार्फिक रिजोनेन्स’ के कारण संसार में कुछ सीखता है। उनके अनुसार मानवी मस्तिष्क में मार्फोजेनिक फील्ड का एक विशेष स्थान है। मैस्मर ने इसी को ‘सटल फ्लूड’ कहा है। येल यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ शरीरशास्त्री प्रो. हैरोल्ड सैक्टनबर में इसी को लाइफ फील्ड की संज्ञा प्रदान की है। वाइटल फोर्स, लाइफ एनर्जी आदि सभी नाम प्राणचेतना के ही हैं। सभी प्राणियों की आँतरिक एकता-चेतनात्मक एकरसता इसी ब्रह्माण्डव्यापी तत्व से जुड़ी हुई है। जुंग जैसे मनोवेत्ता इसे सामूहिक अचेतन के नाम से संबोधित करते हैं। भारतीय ऋषियों ने इसे ‘यूनिवर्सल माइण्ड’ अर्थात् ब्रह्माण्डव्यापी मनः चेतना नाम दिया था।
जिन अतीन्द्रिय क्षमताओं की आज सर्वत्र चर्चा की जाती है, उनमें प्रमुख हैं-दूरदर्शन और दूरश्रवण। इस संदर्भ में कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के स्टैनफोर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट के अग्रणी अनुसंधानकर्ताओं आर. ट्रेग और एच. पुथाप ने गंभीरता पूर्वक खोजें की हैं। विभिन्न प्रयोग परीक्षणों के आधार पर उनने निष्कर्ष निकाला है कि दूरदर्शन और दूरश्रवण जैसी अतीन्द्रिय सामर्थ्य के प्रकट होने में मानवी मस्तिष्क की अल्फा तरंगें एक साथ सक्रिय हो उठती हैं। इन वैज्ञानिकों की खोजों ने महर्षि पातंजलि की भारतीय प्रयोग विद्या की पुष्टि की है। शोध का आधार भी इन्होंने इसे ही बनाया है।
जो घटनाएँ अभी घटित नहीं हुई हैं, वरन् प्रकृति के गर्भ में छिपी हुई हैं, उनकी पूर्व जानकारी को पूर्वज्ञान यानी प्रीकाग्नीसन कहते हैं, अर्थात् घटनाओं के संबंध में पूर्व चेतावनी, खतरा, संकट, आपदा, विनाश और दुर्भाग्यसूचक संकेतों की जानकारी ‘प्रीमाॅनीशन’ अर्थात् पूर्व सूचना भी लगभग वैसी ही अनुभूति है। महर्षि व्यास ने अपने इसी अतीन्द्रिय ज्ञान के आधार पर अभिमन्यु की मृत्यु के संबंध में उत्तरा को पहले ही अवगत करा दिया था। महाभारत युद्ध में वैसा ही हुआ। अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रत्येक घटना का अंकन ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क ‘कास्मिक माइण्ड’ में पहले ही हो जाता है। कभी-कभी ‘इण्डीविजुअल माइण्ड-व्यक्तिगत मस्तिष्क की तरंगों का सामंजस्य कास्मिक माइण्ड से होने लगता है, तो दोनों की तरंगों के मिलने पर इस तरह के पूर्वानुमान होने लगते हैं। उदाहरण के लिए, कई महिलाएँ-पुरुष एक कमरे में सोये हुए हों और एक बच्चा रोने लगता है, तो ऐसे अवसर पर प्रायः बच्चे की माँ ही जगेगी, न कि अन्य महिलाएँ। यह दोनों की मानसिक तरंगों के जुड़ने का एक प्रत्यक्ष उदाहरण है।
भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं को ‘रेट्रोकाग्नीसन’ कहते हैं। क्या हो चुका, इसकी जानकारी भी इसके अंतर्गत आती है। कुछ पाश्चात्य परामनोविज्ञानियों ने इस तरह के अलौकिक दृश्यों को ‘ईथरिक इमेज’ के नाम से संबोधित किया है। अमेरिका के चिकित्साविज्ञानी जोसेफ रोहोड्स बुचमैन साइकोमैट्री का अभिप्राय ‘सोल मेजरमेंट’ बताते हैं। आत्मा के प्रमापन की विधा उन्होंने इसे ही माना है। बोस्टन के भूगर्भविज्ञानी प्रो. विलियम डैण्टन का कहना है कि दस प्रतिशत पुरुषों और चार प्रतिशत महिलाओं में इस तरह की संवेदनशीलता देखने को मिलती है। इसे योग-साधनाओं द्वारा सुविकसित करके न केवल पूर्वाभास, पूर्वानुमान, पूर्वज्ञान, दूरश्रवण, दूरदर्शन जैसी अतीन्द्रिय क्षमताएँ अर्जित की जा सकती हैं, वरन् ओजस-तेजस का धनी भी बना जा सकता है। परिष्कृत चेतना ही परमात्मा है। अपनी आत्मचेतना को विकसित करके हर कोई इस स्तर को प्राप्त कर सकता है और अलौकिक विभूतियों, ऋद्धि-सिद्धियों का स्वामी बन सकता है।
परमपूज्य गुरुदेव ने 20 जून 1971 को गायत्री तपोभूमि, मथुरा से स्थायी रूप से विदाई ली थी एवं वे हिमालय तप-साधना हेतु चले गए थे। एक वर्ष बाद उनने ऋषि परंपरा के बीजारोपण तथा नवयुग की आधारशिला रखने हेतु तपस्वियों का निर्माण करने तथा देव-परिवार बनाने हेतु शान्तिकुञ्ज-गायत्रीतीर्थ में आकर वह पौधा रोपा था, जो आज वटवृक्ष बन गया है एवं सारे विश्व में जिसका संदेश जन-जन तक पहुँच रहा है। विदाई की वेला में अत्यंत मार्मिक संदेश उनके मुख से अमृतवाणी के रूप में चार दिन तक निस्सृत हुए। जिनने भी उन्हें सुना है-उनके लिए वे एक निधि-अनमोल खजाने के रूप में सुरक्षित हैं। उन्हीं संदेशों में भक्ति, समर्पण, गुरुभक्ति परक कुछ अंश यहाँ उद्धत हैं, ताकि जिनने नहीं सुना है, वे इन्हें पढ़कर गुरुतत्त्व की गरिमा का बोध कर सकें एवं अपने लिए किए जाने वाले कर्तृत्वों के संबंध में मार्गदर्शन पा सकें।
“हमारे मार्गदर्शक ने हमें एक ही प्रयोजन के लिए भेजा-विचारक्रांति का ज्ञानयज्ञ। इसी एक उद्देश्य के लिए हमारे मार्गदर्शक ने अनेक प्रकार के दिखाई देने वाले कार्य कराए। उस दिव्यसत्ता के आदेशों का पालन करने में हमने अपने अस्तित्व का एक-एक कण समर्पित किया है और इस समर्पण के मूल्य पर दिव्य अनुकंपा का अजस्र वरदान पाया है। हम चाहते हैं कि यही वंश-परंपरा आगे भी चलती रहे। हमने मूल्य देकर गुरुअनुग्रह और दैवी-अनुरोध है कि जिस दिव्य प्रेरणा का अनुगमन हम करते रहे हैं, हमारे सहचरों को भी उस पथ पर चलना चाहिए।”
“अभीष्ट प्रयोजनों के लिए हमारे मार्गदर्शक का प्रकाश, तप एवं सहयोग हमें अजस्र रूप से मिलता रहा है। परिजनों को भी वैसी ही उपलब्धियाँ मिलते रहने का हम आश्वासन देते हैं। पर यह भूल नहीं जाना चाहिए कि मूल्य हमारे भावी अनुदानों का भी चुकाना होगा।”
“हमारे और हमारे गुरुदेव तथा हमारे जीवन के बीच अतिघनिष्ट और अतिमधुर संबंधों का आधार एक ही रहा कि हम अपने आपको भूले रहें यह पता ही नहीं चला कि हम जीवित हैं या मृत, हमारी भी काई इच्छा-आवश्यकता है या नहीं। ईश्वर की इच्छा का अपनी इच्छा बनाकर, ईश्वर की आवश्यकता को अपनी आवश्यकता मानकर कठिनाइयों, आपत्तियों को अपनी परीक्षा का सौभाग्य मानकर निरंतर अपने इष्टदेव के इशारों पर कठपुतली की तरह नाचते रहे। यही समर्पण-साधना का प्राण है।”
“वेश्यावृत्ति जैसी व्यभिचारिणी भक्ति से भक्ति, भक्त और भगवान तीनों का माथा नीचे होता है। हमारी आत्मिक उपलब्धियों का मूल कारण यह निष्काम समर्पण रहता है। पूजा-उपासना के कर्मकाण्ड इसी समर्पण की पृष्ठभूमि पर उगे पनपे और फले-फूले हैं। यह पृष्ठभूमि न हो तो जीवन भर घण्टा, घण्टी, माला सटकाते रहने का भी कुछ आशाजनक परिणाम प्रस्तुत नहीं हो सकता। स्तुत नहीं हो सकता।”
“हमारी भावी तपश्चर्या का एक-एक कण हम उन लोगों पर बिखेर देंगे जिनने युगसाधना को अपनाकर अपने को उत्कृष्ट बनाने और समाज में आदर्शवादिता की प्रतिस्थापना के लिए अधिक-से-अधिक समर्पण करके दिखाया। हमारे मार्गदर्शक ने हमसे यही कराया और इसी मूल्य पर अपना सहयोग, स्नेह, प्रकाश एवं अनुदान प्रदान किया। हम भी उन्हीं को दे सकेंगे, जो विश्वमानव की आज की सबसे बड़ी आवश्यकता की पूर्ति के लिए कुछ कर गुजरने की हिम्मत दिखा सकें। नवनिर्माण के ज्ञानयज्ञ में जिसका जितना योगदान होगा, उसके अनुपात में हमारा स्नेह, प्रकाश एवं अनुदान कुछ अधिक ही मिलेगा, कम नहीं। हमारे प्रति सच्चे प्रेम की कसौटी भी यही हो सकती है कि किसने किस हद तक इस पुण्यप्रयोजन के लिए क्या किया?
“विदाई संदेश के अंतिम चरण के रूप में हमें मात्र इतना ही कहना है कि हमारे प्रेमी-परिजन लोभ-मोह के जाल से जिस हद तक निकल सकें, निकलने के लिए पूरा जोर लगाएँ। हमें प्रस्तुत जीवनक्रम अपनाना ही इसलिए पड़ा व जीना पड़ा है कि वाणी के द्वारा नहीं, उदाहरण के द्वारा ईश्वर-भक्ति से लेकर जीवन की सार्थकता तक का स्वरूप सजग और सुसंस्कारी आत्माओं के सामने रखकर एक सुनिश्चित मार्गदर्शन कर सकें। हम अपना पूर्वार्द्ध पूरा कर चले। उत्तरार्द्ध अगले दिनों होना है। प्रभुसमर्पित जीवन की क्या दिशा हो सकती है, यह हमारी वाणी से नहीं, भावनाओं और गतिविधियों से सीखा जाना चाहिए।”
“यदि हमारे प्रति किसी के मन में कुछ श्रद्धा और आत्मीयता हो तो उसे दिशा मिलनी चाहिए और ज्ञानयज्ञ के नवनिर्माण के महान अभियान में अधिक तत्परतापूर्वक प्रयुक्त होना चाहिए।”
गुरुतत्व को जीवंत एवं प्रभावी बनाए रखना जीवन की सबसे बड़ी सफलता है। जो इतना नहीं कर पाते उनकी नाव बिना पतवार एवं बिना डाँड की रहने पर प्रवाह में बहती और लहरों के साथ अनिश्चित दिशा में छितराती रहती है। भँवर-तूफान में कभी भी उसके टकराने-डूबने का खतरा बना रहता है। बुद्धिमत्ता इस संदर्भ में सतर्क रहता है और गुरुतत्व का आश्रय अपनाने-अवलंबन पकड़ने और श्रद्धा की सघनता में उसे सींचने में प्रमाद नहीं बरतती।
गुरुपूर्णिमा पर्व इसी प्रयोजन के लिए है। इस अवसर पर इस पर्यवेक्षण का अवसर मिलता है कि विवेक और अनुशासन के रूप में सद्गुरु का अनुग्रह कितना प्राप्त है, कितना नहीं? गुरुतत्व की अभ्यर्थना एक ही हो सकती है-श्रद्धा की अभिव्यक्ति। इसी को श्रद्धांजलि भी कहते हैं। श्रद्धांजलि का प्रत्यक्ष रूप है-परमार्थ-प्रयोजनों के लिए उदार अनुदान। इसी आधार पर कृपणता के अवरोध को हटाने-हल्का करने की बात बनती है। व्यवहार में ऐसा कुछ न हो-मात्र वाचालता और नाटकीयता से काम चलाया जाता रहे, तो थोड़ी विडंबना ही पल्ले पड़ती है। उतने भर से किसी प्रयोजन की पूर्ति नहीं होती।
बीते दिनों जो पत्र आए हैं, उसके अनुसार इस वर्ष गुरुपूर्णिमा पर्व मनाने की तैयारियाँ पहले की अपेक्षा अधिक उत्साह के साथ की गयी हैं। सभी शाखाओं में उस दिन अखण्ड-जप गायत्री-यज्ञ भजन, कीर्तन-प्रवचन दीपदान का पूर्ण निर्धारण समारोह प्रक्रिया का निर्वाह भलीप्रकार किया जाएगा। पर्व-समारोहों के स्थान अब प्रायः निश्चित से हो गए हैं, वहीं मनाए जाते हैं।
इन दिनों प्रत्येक प्रज्ञापुत्र की अपने अंतःकरण में बड़ी सघन अनुभूति हो रही है कि परमपूज्य गुरुदेव की, स्वयं भगवान महाकाल की आकांक्षा क्या है? उन्होंने अपने शिष्यों-शिष्यायों से सामयिक श्रद्धांजलि के रूप में समयदान एवं अंशदान की याचना की है। नवयुग के पगों की आहट जितनी तीव्र होती जाती है, उतना ही इसका मूल्य एवं महत्व बढ़ता जाता है। गुरुपूर्णिमा पर कोई शिष्य कृपणता नहीं बरतता। श्रद्धा को सींचने के लिए किसी न किसी रूप में अपने अनुदान प्रस्तुत करता है, ताकि उसके उदार एवं उदात्त व्यवहार पर नई धार रखी जा सके और नई तेजी लाई जा सके। पूजा-उपकरणों के रूप में परमपूज्य गुरुदेव को कोई कुछ देना चाहता हो, तो वह एक ही वस्तु है-निर्माणाधीन देवसंस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना में अपना भावभरा सहयोग। गुरुपूर्णिमा से लेकर वसंत पर्व के छह महीने हैं। इस अवधि में जो जितना अर्पित कर सकें, उतना इस पुण्य-प्रयोजन के लिए देना चाहिए। यह प्रेरणा इन दिनों सभी परिजनों के अन्तःकरण में उठ रही है। अब तक आए उनके पन्नों से यही झलक मिलती है, यही मन्तव्य स्पष्ट होता है।
जिन दिनों हम अपना जीवनयापन कर रहे हैं, वह अतिविशिष्ट समय है। इसमें मानवजाति की दुर्गति का अगति का, सद्गति में परिवर्तन का प्रयास हो रहा है। दूसरे शब्दों में, इसे मनुष्य के भाग्य-निर्माण की बेला कहना चाहिए। पिछले अंधकार युग की विकृतियाँ इन दिनों वैज्ञानिक, बौद्धिक और आत्मिक प्रगति का ईंधन पाकर दावानल की तरह भड़क उठी हैं। ज्वालामुखी विस्फोटों की तरह ऐसे संकट उभर रहे हैं, जिनके समाधान सूझ ही नहीं पड़ते। एक जगह से सीना जब तक पूरा नहीं हो पाता, तब तक दूसरी दस जगह चादर फट जाती है। सड़े-गले को गलाने की, गले हुए को ढालने की इन घड़ियों में परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मचेतना इन दिनों क्रमशः अधिकाधिक प्रखर होती चली जा रही है। जिनकी आँखें हों, आज ही परमपूज्य गुरुदेव के सूत्र संचालन में हो रहे इस महान परिवर्तन के पुण्यपर्व का माहात्म्य और महत्व देख सकते हैं, अन्यथा इतिहासकार तो इस परिवर्तनकाल के घटनाक्रम का उल्लेख करेंगे ही और भावी पीढ़ियाँ उसे रुचिपूर्वक पड़ेंगी ही।
ऐसी संधि वेला में ईश्वर के विशिष्ट प्रतिनिधि के रूप में आकर पूज्य गुरुदेव ने अपने अंतरंगों को पुकार लगाई है। सद्गुरु के रूप में उन्हें सामयिक कर्तव्य का बोध कराया है। आपत्तिकाल में सामान्य नियम नहीं चलते। उन दिनों विशेष निर्धारण होते हैं और विशेष क्रिया−कलाप चलते हैं। गाँव आग से जल रहा हो, तो सामान्य दैनिक कृत्य नहीं किये जाते। उस समय विशिष्ट परिस्थितियों का सामना करने के लिए जाग्रतों को जुटना होता है-भले ही इसमें हानि की असुविधा सहनी पड़े।
ब्रज के ग्वाल-बाल स्कन्धा के रीछ-वानर इन्द्रप्रस्थ के पाण्डव, बुद्ध के परिव्राजक, गाँधी के सत्याग्रही युगधर्म को समझ सके थे। उनने ईश्वरीय आवाहन को सुना था। तदनुरूप उनने अपने विशेष स्तर को समझा। विशेष उत्तरदायित्व को अनुभव किया और लोभ-मोह को, कृपणता को छोड़कर महामानवों की परंपरा अपनाकर युग-साधना के निर्वाह में जुट गए। चतुरों ने इसमें घाटा बताया और हानि सुझायी, किन्तु भावनाशीलों ने समय की माँग को सद्गुरु-विश्वगुरु के रूप में आए ईश्वर का आमंत्रण माना और इसे प्राणपण से स्वीकार कर लिया।
इतिहास साक्षी है कि उस समय की उनकी भावनाशीलता के पीछे चरमस्तर की दूरदर्शिता सिद्ध हुई। वे स्वयं धन्य बने, भगवान को प्रिय लगे। असंख्यों ने उनका अनुकरण किया। इतिहास ने उन्हें सराहा। पीढ़ियाँ उनके चरणों पर भाव भरी श्रद्धांजलियाँ चढ़ाती रहीं। इतनी उपलब्धियों को प्राप्त करने में उन्हें कृपणता के परित्याग का मूल्य तो चुकाना ही पड़ा है। जो अवतार के शिष्य-सहचर बने हैं उन्हें सदा ही ऐसे दुस्साहस भरे निर्णय करने पड़े हैं। परिस्थितियों की रट लगाए रहने वालों को अभीप्सित अनुकूलता न कभी आयी है और न कभी आ ही सकेगी। सच्चे शिष्य की कसौटी पर खरा उतरने के लिए परिस्थितियों की प्रतिकूलता नहीं, मनःस्थिति की कृपणता ही सबसे बड़ा व्यवधान है, जो उसे हटा फेंकने का साहस करेंगे, वे हर तरह से युग-साधना का पालन करने में सफल होंगे।
परमपूज्य गुरुदेव ने अपने प्रिय-परिजनों को उच्चस्वर से पुकारा है। नवयुग के अरुणोदय ने उन्हें जाग्रति का संदेश भेजा है। ऊषा की अग्रिम किरणें करवटें बदलते रहने से विरत होकर अँगड़ाई लेने और उठ खड़े होने की चुनौती प्रस्तुत कर रही हैं। इस पुण्यवेला में हमें सिद्ध करना होगा कि हम सब सामान्य गुरु के नहीं, विश्वगुरु के शिष्य, सेवक एवं सहचर हैं अवतार के सहचरों को तुच्छताग्रस्त प्राणियों जैसी गतिविधि नहीं अपनानी चाहिए।
पूज्य गुरुदेव की युगान्तरीय चेतना को जन-जन तक पहुँचाने का ठीक यही समय है। इन दिनों हमारी भूमिका ईश्वरीय दूतों की है। इन दिनों हमारे प्रयास संस्कृति का सेतु बाँधने वाले नल-नील जैसे होने चाहिए। रावण की लंका में अपना पाँव जमाकर सबको दहला देने वाले अंगद की तरह-पर्वत उठाने वाले हनुमान की तरह यदि पुरुषार्थ न जगे, तो भी गिद्ध-गिलहरी की तरह अपने तुच्छ को महान के सम्मुख समर्पित कर सकना तो सम्भव हो ही सकता है। गोवर्द्धन उठाते समय यदि हमारी लाठी भी सहयोग के लिए न उठे, तो भी गुरुदेव का ईश्वरीय प्रयोजन पूर्णता तक रुकेगा नहीं। हाँ, हमें ही पश्चाताप का घाटा सहना पड़ेगा।
सच्चे शिष्यों एवं साहसिक शूरवीरों की तरह अब नवयुग के अवतरण में अपनी भागीरथी भूमिका आवश्यक हो गयी है। इसके बिना तपती भूमि और जलती आत्माओं को तृप्ति देने वाली गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतरने के लिए सहमत न किया जा सकेगा।
विनाश का सरंजाम जुटाने वाली असुरता प्रबल है या फिर ईश्वर के शिष्य-सेवक-सहचर अधिक शक्तिशाली हैं? यह प्रश्न वाणी से नहीं व्यवहार से, उत्तर से नहीं उदाहरण से अपना समाधान माँगता है। यह देवत्व की प्रतिष्ठा का सवाल है। हमें पूज्य गुरुदेव के शिष्य होने की सार्थकता इन्हीं क्षणों में, इन्हीं दिनों सिद्ध करनी होगी, ताकि संव्याप्त निराशा में आशा का आलोक उग सके। कोई आगे नहीं चलेगा तो पीछे वालों का साहस कैसे जगेगा? व्यवसायी की बुद्धि लेकर नहीं, शूरवीरों की साहसिकता को अपनाकर ही हमें वह करने का अवसर मिलेगा, जो अभीष्ट, आवश्यक, उपयुक्त ही नहीं, परमपूज्य गुरुदेव के शिष्यों-सहचरों के प्रस्तुत अवतरण का लक्ष्य है।
युगसृजन के पुण्यप्रयोजन की योजना बनाते रहने का समय बीत गया, अब तो करना ही शेष है। विचारणा को तत्परता में बदलने की घड़ी आ पहुँची। भावनाओं का परिपाक सक्रियता में होने की प्रतीक्षा की जा रही है। असमंजस में बहुत समय व्यतीत नहीं किया जाना चाहिए।
लक्ष्य विशाल और विस्तृत है। जनमानस के परिष्कार के लिए प्रज्ज्वलित ज्ञानयज्ञ के, विचारक्रांति के, लालमशाल के टिमटिमाते रहने से काम नहीं चलेगा। उसके प्रकाश को प्रखर बनाने के लिए जिस तेल की आवश्यकता है, वह पूज्य गुरुदेव की प्रत्येक संतान के भाव-भरे त्याग से ही निचोड़ा जा सकेगा। मनुष्य में देवत्व का उदय, संसार के समस्त उत्पादनों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण उपार्जन है। इस कृषिकर्म में हमें शीतवर्षा की परवाह न करके निष्ठावान कृषक की तरह लगना चाहिए। धरती पर स्वर्ग का अवतरण-नया नन्दन वन खड़ा करने के समान है। निष्ठावान माली की तरह हमारी कुशलता ऐसी होनी चाहिए जिससे स्रष्टा के इस मुरझाए विश्वउद्यान में बसंती बहार लाने का श्रेय मिल सके। ऐसी सफलता लाने में खाद-पानी जुटाने से ही काम नहीं चलता, उसमें माली को अपनी प्रतिभा भी गलानी-खपानी पड़ती है। भूमि और पौधों के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने वाले किसान और माली की तरह ही हमें देवत्व के उद्भव और स्वर्ग के अवतरण के लिए अपनी गुरुसत्ता के चरणों में अपनी श्रद्धा और क्षमता का समर्पण प्रस्तुत करना होगा।
राजक्रांति का काम साहस और शस्त्रबल से चल जाता है। आर्थिक क्राँति साधन और सूझ-बूझ के सहारे हो सकती है। ये भौतिक परिवर्तन हैं, जिनके लिए भौतिक साधनों से काम चल जाता है। पूज्य गुरुदेव का उद्देश्य बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्राँति का उद्गम खोजना और संगम बनाना है। इसके लिए चरित्र, श्रद्धा और प्रतिभा के धनी अपनी अस्थियाँ तक दे डालने वाले दधिचि के वंशजों को ही आगे आना और मोर्चा सँभालना है। भवन, पुल, कारखाने आदि को वस्तुशिल्पी अपनी शिक्षा के सहारे बनाने में सहज ही सफल होते रहते हैं। हमें नए व्यक्ति, नए समाज और नए युग का सृजन करना है। इस महाप्रयोजन को हममें से प्रत्येक का भावभरा अनुदान ही पूरा कर सकता है। गुरुपूर्णिमा के श्रद्धापर्व पर इसी की अपेक्षा की गई है। जिनके पास भावना है ही नहीं, जो कृपणता के दलदल में एड़ी चोटी तक धँसे और फँसे पड़े हैं, उन दीन, दयनीय लोगों की तो चर्चा ही करनी बेकार है। कर्ण जैसे उदार व्यक्ति ही मरणासन्न स्थिति में अपने दाँत उखाड़ कर देते रहे हैं। हरिश्चन्द्र ने ही अपने स्त्री-बच्चे बेचे हैं। लोभग्रसितों को तो मनोकामनाओं की पूर्ति कराते रहने से ही फुरसत नहीं, देने का प्रसंग आने पर तो उनका कलेजा ही बैठना लगेगा।
पूज्य गुरुदेव ने हम सबके सामने जो लक्ष्य रखा है, उसके लिए साधनों की आवश्यकता तो है ही। इसी के साथ ऐसी प्रखर प्रतिभाएँ चाहिए, जिनकी नसों में भावभरा ऋषिरक्त प्रवाहित होता है। गुरुदेव ने हम सभी से ऋषिपुत्र-ऋषिपुत्रियाँ बनने की अपेक्षा की है। चतुरता की दृष्टि से कौआ सबसे सयाना माना जाता है, शृंगाल की धूर्तता प्रख्यात है, मुर्दे खोदकर खाने में बिज्जू की कुशलता देखते ही बनती है, खजाने की रखवाली करने वाला सर्प लक्षाधीश होता है, परंतु भावनात्मक सृजन में तो दूसरी ही धातु से ढले औजारों की आवश्यकता है। आदर्शों के प्रति अटूट आस्था एवं गुरु के प्रति भावभरी श्रद्धा की भट्टी में ही ऐसी अष्टधातु तैयार होती है। आवश्यकता ऐसे ही व्यक्तियों की पड़ रही है जो अष्टधातु से ढले हों, शिष्यता की हर कसौटी पर खरे हों। लोकसेवा का क्षेत्र बड़ा है-उसके कोतरों में ऐसे कितने ही छद्मवेषधारी वंचक लूट-खसोट की घात लगाए बैठे रहते हैं पर उनसे कुछ काम तो नहीं चलता। प्रकाश तो जलते दीपक से ही होता है।
परमपूज्य गुरुदेव की संतानों में ऐसी जाग्रत आत्माओं की कमी नहीं-जिनके पास संचित सुसंस्कारिता की पूँजी प्रचुर परिमाण में विराजमान् है। भावना, निष्ठा और प्रतिभा की उनमें कमी नहीं। परिस्थितियाँ भी इतनी प्रतिकूल नहीं कि गुरुचरणों में भावभरी श्रद्धांजलि प्रस्तुत करना उनके लिए संभव न हो। कठिनाई एक ही है ‘कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव’ का बोझ इतना लदा दिखता है, जिसे उतारना बन नहीं पड़ रहा है। लेकिन यह कठिनाई अवास्तविक है। लगभग वैसी ही अवास्तविक जैसी कि छोटे मुँह के घड़े में से चने निकालते समय बंदर मुट्ठी बाँध लेता है और अनुभव करता है कि उसे घड़े ने बाँध लिया है। मनःस्थिति बदले तो परिस्थितियाँ हजार मार्गों से अनुकूल बनने का उपाय खोज निकालती हैं। खोजने वाले ईश्वर को खोज लेते हैं, फिर गुरुदेव के प्रति प्रेम रहते उनकी पुकार के अनुरूप कुछ कर सकने के लिए कोई रास्ता न मिले, यह कैसे हो सकता है?
अब जबकि 1998 बीतता जा रहा है। ऐसे में परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माताजी का मन है कि उनके बच्चे बिछुड़े नहीं, बल्कि विधाता द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली हर कसौटी पर खरे उतरें उनकी यह सोच किसी मोहवश नहीं, बल्कि अपनी संतानों के कल्याण के लिए अभीष्ट है। खरे सिद्ध होने पर ही प्राणऊर्जा का आदान-प्रदान होता रह सकता है, अन्यथा चमक की चकाचौंध ही पहुँच पाती है।
इस गुरुपूर्णिमा को, हममें से हर एक अपने लिए विशेष उद्बोधन की, विशेष आमंत्रण की, कुछ खास कर गुजरने की वेला समझे। जिनमें युगशिल्पियों की मण्डली में सम्मिलित होने की अन्तःप्रेरणा उमगे, वे इसे ईश्वरीय आमंत्रण समझें, साहस समेटें और आगे बढ़ने की बात सोचें जिन्हें आगे बढ़ना हो, तो समय की प्रतीक्षा न करें, परिस्थितियों की आड़ न लें। आदर्शों को अपनाने का शुभमुहूर्त आज का ही होता है। कल की प्रतीक्षा में बैठे रहने वालों की कल तो मरण के उपरान्त ही आती है।
परमपूज्य गुरुदेव का आह्वान और परमवंदनीय माताजी का प्यार उनके लिए भावभरे हाथ और दुलार भरा आँचल पसारता है, जो नवयुग की अवतरण वेला में अपनी गरिमा को जीवन्त करने और प्रखरता का परिचय देने में समर्थ है। चरित्रवान, भावनाशील एवं कर्मनिष्ठ परिजनों को गुरुपूर्णिमा के अवसर पर अपने भीतर प्रखर आदर्शवादिता उगाने हेतु महाकाल का आमंत्रण प्रस्तुत है।
परमपूज्य गुरुदेव का निवास अब प्रत्येक भावनाशील शिष्य का अन्तःकरण है। उन्हें निर्मल आत्मा या प्रकाशस्वरूप परमात्मा के रूप में अनुभव किया जा सकता है। प्रकाश का अर्थ रोशनी नहीं, सन्मार्गगामिनी प्रेरणा है। उसे ऋतम्भरा-प्रज्ञा भी कहते हैं। सद्गुरु का उपदेश अपनी आत्मा की वाणी में सुना जा सकता है। उनका परामर्श और मार्गदर्शन इस रूप में हमें निरंतर उपलब्ध है।
बाहर के गुरु अनेक विषयों पर बात कर सकते हैं। पर सद्गुरु की शिक्षा एक ही होती है, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर असत से सत की ओर बढ़े चलो। पूज्य गुरुदेव जब शरीर में थे, तब उनसे जब तब ही मिलना संभव हो पाता था। अब जबकि वे हमारी अपनी अंतरात्मा में विराजमान् हो चुके हैं, हमारे साथ हर समय हैं। इस रूप में उनका परामर्श हमें हर समय उपलब्ध है।
उनकी प्रेरणा का स्वरूप एक ही है-युगधर्म का निर्वाह। इसे मानने में आँतरिक संतोष का अनुभव स्पष्ट है। बाहर से कष्ट उठाते हुए जब उनके काम में तत्परता बन पड़ती है, तो भीतर से इतना संतोष और उल्लास का अनुभव होता है कि उसकी तुलना में बाकी सब कुछ नगण्य दिखता है।
इन दिनों हममें से हर एक के मन में एक हूक, एक कसक, एक टीस उठती रहती है, आगे बढ़ा जाए, ऊँचा उठा जाए और औरों को भी इसी सन्मार्ग पर लाया जाए। जब तक अपना देव सोया हुआ रहता है, तभी दैत्य उस अमृत को हरण कर ले जाते हैं यह इच्छा धन, ऐश्वर्य, इन्द्रिय भोग, सत्ता, अहंता बढ़ाने के लिए मुड़ जाती है और मनुष्य इसी बड़प्पन के जंजाल में उलझा रहता है। पर समर्थ सद्गुरुदेव हम सबको झकझोरते हुए हमारी चेतना के प्रवाह को अवांछनीयता की ओर से मोड़कर युगसाधना की ओर नियोजित करते रहते हैं। उनके द्वारा उड़ेली जा रही गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता इतनी आनंददायक और इतनी समर्थ है कि उसे पाकर हम स्वर्ग में स्थित देवताओं से बढ़कर संतोष का अनुभव करते रह सकते हैं।
पर इस अनुभूति के लिए एक ही पात्रता, एक ही शर्त और एक ही कसौटी है-युगधर्म का निर्वाह। उनके चरणों में अपनी प्रतिभा, समय-संपदा की भावभरी श्रद्धांजलि। गुरुपर्व पर यह श्रद्धांजलि कहाँ, किसने, कितने उत्साह से, कितने परिमाण में प्रस्तुत की, इसी की प्रतीक्षा का दौर इन दिनों चल रहा है। इस अन्तः मंथन से जो नवनीत निकलेगा, उसी पर युगदेवता की दृष्टि केन्द्रित है।
*समाप्त*