नवसृजन का पावन यज्ञ

नवसृजन की जो चिनगारी हिमालय की ऋषिसत्ताओं ने देवपुरुष परमपूज्य गुरुदेव को सौंपी थी, वह अब महाज्वाला का रूप ले चुकी है। युगपरिवर्तन के हवनकुण्ड में इसकी लपटें प्रबल से प्रबलतर-प्रबलतम हो रही हैं। महाकाल की नित-नवीन प्रेरणाएँ नवसृजन की विविध आयामों को प्रकट कर रही हैं। इसी प्रेरणा से विवश एवं वशीभूत होकर युगतीर्थ-शान्तिकुञ्ज ने एक नए भूखंड को क्रय किया और अब इन दिनों नए सिरे से नए निमार्ण के नए निर्धारण हो रहे हैं। नवनिर्माण के प्रयासों में ऐसी हलचलें हो रही हैं, जिनमें चिरपुरातन को चिरनवीन के साथ जोड़ा जा सके। भारतीय विद्याओं के पुनर्जीवन के साथ उनका समुचित प्रशिक्षण एवं प्रसार हो।

युगपरिवर्तन की पुण्यक्रिया यही है कि व्यक्ति को सुसंस्कृत और समाज को समुन्नत बनाने की इस पुण्यक्रिया की व्यापक प्रतिष्ठा की जाए, जिसे अपनाकर हमारे महान पूर्वज देवोपम जीवनयापन करते हुए, इस पुण्यभूमि को चिरकाल तक स्वर्गादपि गरीयसी बनाए रहे। अतीत के उसी महान गौरव को वापस लाने के इस भगीरथ प्रयत्न को एक शब्द में नवसृजन का पावन यज्ञ कह सकते हैं। इस महायज्ञ की संचालक दैवीचेतना की प्रौढ़ता दिनों-दिन तीव्र होती जा रही है। जहाँ कहीं भी चेतना में जाग्रति का अंश है, वहाँ इसमें सक्रिय भागीदारी के लिए आमंत्रण की पुकार स्पष्ट सुनी जा रही है। आस्थावान् निष्क्रिय रह नहीं सकते। निष्ठा की परिणति अपनी आहुति नवसृजन के पावन यज्ञ में समर्पित करने के रूप में होकर की रहती है। आस्थावान् निष्क्रिय रह नहीं सकते। निष्ठा की परिणति अपनी आहुति नवसृजन के पावन यज्ञ में समर्पित करने के रूप में होकर ही रहती है। श्रद्धा का परिचय प्रत्यक्ष करुणा के रूप में मिलता है। करुणा की अन्तःसंवेदनाएँ पीड़ा और पतन की आग बुझाने के लिए अपनी सामर्थ्य को प्रस्तुत किए बिना रह नहीं सकती। यही चिन्ह है, जिसकी कसौटी पर व्यक्ति की आन्तरिक गरिमा का यथार्थ परिचय प्राप्त होता है। आध्यात्मिकता, आस्तिकता और धार्मिकता की विडम्बना करने वाले तो संकीर्ण स्वार्थपरता के दल-दल में फँसे भी बैठे रह सकते है। पर जिनकी अन्तरात्मा में दैवी-आलोक का वस्तुतः अवतरण होगा, वे लोककल्याण के लिए समर्पित हुए बिना नहीं रहेंगे।

अखण्ड ज्योति और उसके परिजनों के मध्य लम्बे समय से इन्हीं तथ्यों को समझने-समझाने का उपक्रम चलता रहा है। स्वाध्याय-सत्संग की आरम्भिक शिक्षा का प्रयोजन बहुत हद तक पूरा हो चुका। अब परीक्षा की घड़ियाँ हैं। जो पढ़ा या पढ़ाया गया, उसकी पहुँच कितनी गहराई तक हो सकी है, यही जानना परीक्षा का उद्देश्य होता है। जो उत्तीर्ण होते हैं, उन्हीं का परिश्रम और मनोयोग सराहा जाता है, अन्यथा पढ़ने वाले और पढ़ाने वाले दोनों ही अपयश के भागी बनते हैं। भावी नवसृजन का स्वरूप क्या और कैसा होगा, इन्हीं जिज्ञासाओं के समाधान के लिए अखण्ड ज्योति का नवसृजन अंक समर्पित है।


सृजन का प्रेरक प्रवाह

शान्तिकुञ्ज की दृश्य गतिविधियाँ अदृश्य से उफन रहे सृजन के प्रेरक प्रवाह की देन है। देवात्मा हिमालय के दिव्यक्षेत्र से उमड़ने वाला यह प्रवाह ही यहाँ के विभिन्न क्रिया–कलापों के रूप में मूर्त होकर अपना विस्तार करता है। इसे परमपूज्य गुरुदेव की भागीरथी तप-साधना के प्रभाव से हुआ गंगावतरण कह सकते हैं। अपनी प्रचण्ड तप-साधना एवं महान ऋषिसत्ताओं के कृपाप्रसाद से ही वे शान्तिकुञ्ज को इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री का रूप देने में समर्थ हुए। सूक्ष्मवेत्ता एवं दिव्यदर्शी हिमालय के इस दिव्यप्रवाह को यहाँ के व्यापक परिसर में सहज की उफनते-उमड़ते आन्दोलित-आलोड़ित होते हुए अनुभव कर सकते हैं। हिमालय की चेतनधाराएँ स्वाभाविक क्रम में यहाँ रहने वाले एवं आने वालों को पवित्रता, प्रखरता एवं तेजस्विता के अनुदान बाँटती रहती है।

अतीत के पुनरागमन-वर्तमान के निर्धारण और भविष्य के संयोजन के त्रिविध उद्देश्य पूरे कर सकने में यह नवसृजन का प्रेरक प्रवाह पूरी तरह से समर्थ है। परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माताजी की सम्मिलित तपशक्ति जन-जन को इससे अनुप्राणित-प्रेरित एवं प्रभावित कर रहीं है। अनुदिन नवीन विस्तार इसकी तीव्रता एवं प्रखरता का ही परिणाम है। इसी के फलस्वरूप नितनयी योजनाएँ बनती और असाधारण क्रम में अपना विस्तार करती हैं। विस्तार के इसी क्रम में शान्तिकुञ्ज से ढाई गुना बड़ा स्थान उपलब्ध हो गया है। इसकी विधिवत् रजिस्ट्री आदि सम्पन्न होकर महाशिवरात्रि की पावन वेला में वरुण देवता के अभिसिंचन के मध्य भूमिपूजन-भगवान महाकाल का पूजन भी सम्पन्न हो चुका है। प्रायः 11 लाख वर्ग फुट (131 बीघा) में फैली यह भूमि हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग से सटी हुई वर्तमान शान्तिकुञ्ज से मात्र दो फर्लांग की दूरी पर है।

भारतीय संस्कृति के खुले विश्वविद्यालय का नवसृजन यहाँ होने को है, जिसके माध्यम से देवसंस्कृति के विविध आयाम प्रकट होकर अपनी दिव्यता से समूचे विश्व को चमत्कृत कर देंगे। यूँ वर्तमान क्षणों तक यह योजना अभी कल्पना के गर्भ में है। इन क्षणों में उनके द्वारा उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रिया और सम्भावना का सुखद अनुमान ही लगाया जा सकता है। पर निकट भविष्य में जब वह मूर्त रूप में सामने होगी तो प्रतीत होगा कि मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण के संदर्भ में जो सोचा, कहा और किया जा रहा था, वह अनर्गल नहीं था,

नवसृजन के प्रेरक प्रवाह से ही यह प्राणवान संकल्प उभरा है, और यह सर्वविदित है कि प्राणवान संकल्प साधनहीन परिस्थितियों में भी किस प्रकार उगते-बढ़ते और फलते-फूलते हैं। इसके अनेक उदाहरण इतिहास के पृष्ठों पर अंकित हैं। इस श्रृंखला में नवयुग के अवतरण को लक्ष्य रखकर किए गए इन प्रयासों को अपने समय का दुस्साहस ही कहा जाएगा। प्रचण्ड संकल्पों की सामर्थ्य जिन्हें विदित है, वे जानते हैं कि मनुष्य को भगवान की निकटतम प्रतिकृति ही कहा जा सकता है। जब वह ईश्वरीय उद्देश्य को लेकर अपनी समस्त आस्था को नियोजित करके कर्मक्षेत्र में उतरता है, तो सचमुच ही असम्भव जैसी कोई वस्तु रह नहीं जाती।

ग्वाल-बालों की कमजोर कलाइयाँ और पोले बाँस की लाठियाँ महाशैल गोवर्धन उठा सकती थी, इस पर कौन-किस आधार पर विश्वास करें? इतने पर भी अनहोनी होकर रही, गोवर्धन उठ ही गया। नवसृजन का संकल्प महाकाल का है। उसी के प्राण इस महाअभियान में संलग्न हैं, जब मनुष्यों के प्राणवान संकल्प पूरे हो सकते हैं तो सृष्टि संतुलन का उत्तरदायित्व सँभालने वाली शक्ति की इच्छा क्यों न पूरी होगी?

इक्कीसवीं सदी के अगले दिन सुखद सम्भावनाओं से भरे पड़े हैं। दिव्यदर्शी बहुत समय से इस प्रभात के आगमन की सूचना दे रहे थे। अब ब्रह्ममुहूर्त की उदीयमान ऊषा ने सुनिश्चित आश्वासन दिया है कि अरुणोदय सन्निकट है। उसके लिए अब अधिक समय प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। इन दिनों उभरते उग्र विग्रहों को सूक्ष्मदर्शी प्रसवपीड़ा मानते हैं और कहते हैं-अधीर होने के आवश्यकता नहीं है। महान उद्भव के दर्शन अब होने ही वाले हैं।

इस प्रभातवेला में नवसृजन का प्रेरक प्रवाह तीव्र गति से उफनता-उमड़ता चला आ रहा है। इसकी प्रत्येक हलचल एवं हर स्पन्दन से यही स्वर उठ रहे हैं कि युग सृजन के लिए जाग्रत आत्माओं को अपने भावभरे अनुदान प्रस्तुत करने ही चाहिए। सृजन प्रयोजनों में प्रस्तुत भारतीय-संस्कृति के खुले विश्वविद्यालय का निर्माण इमारत की दृष्टि से कम और लक्ष्यपूर्ति की दृष्टि से अधिक महत्व का है। इसके अंतर्गत आयुर्वेद की शोध, विद्या-विस्तार के अभूतपूर्व कार्यक्रमों के साथ जो प्रखर साधकों एवं समर्पित परिव्राजकों के निर्माण की जो योजना सँजोयी है वह अद्भुत एवं आश्चर्यजनक है। इसके लिए सबसे बड़ी आवश्यकता उन आत्माओं के योगदान की है जो स्वयं जाग चुके और दूसरों को जगा सकने की स्थिति तक जा पहुँचे हैं, क्योंकि ऐसे ही लोग महाकाल की इस अश्रुतपूर्ण योजना के लिए अपने समय, श्रम एवं धन के भावभरे अनुदान प्रस्तुत कर सकते हैं। साथ ही औरों को भी इसके लिए प्रेरित कर सकते हैं।

इस देश के निवासियों में महानता अभी भी कम नहीं है। ऋषियों के रक्त की पूँजी अभी भी पूर्णतया समाप्त नहीं हुई है। वह सब केवल सो भर गया है। मोहनिद्रा इतनी गाढ़ी हो गयी है कि नरपशुओं की तो बात ही क्या, जिनमें नर-नारायण की क्षमता भरी पड़ी है, वे भी लोभ और मोह की जंजीरों से इस बुरी तरह फँस गए है कि परमार्थ की युगसृजन की ईश्वरीय पुकार तक को समझ सकना भी उनके लिए सम्भव नहीं हो रहा है। जैसे-तैसे धक्का-मुक्की करने भर से थोड़ा-बहुत कुसमुसाते हैं और जैसे ही दबाव कम हुआ कि पूर्व स्थिति में फिर मूर्छाग्रस्त हो जाते है, जबकि युग परिवर्तन के लिए उत्कृष्ट प्रतिभाओं की प्रचण्ड जनशक्ति नियोजित होनी चाहिए। वर्तमान कार्ययोजना इसी महान उद्देश्य के लिए है। इसके द्वारा जिन रचनात्मक प्रवृत्तियों का सूत्र-संचालन होने वाला है, उसे ‘धर्मचेतना के पुनर्जीवन का देवप्रयास’ कहा जा सकता है। इसके माध्यम से प्रवाहित होने वाली नवसृजन की धाराएँ राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय परिधि में साँस्कृतिक जागरण के अलौकिक दृश्य प्रस्तुत करेंगी। हमें ऐसी ही आशा करनी चाहिए।


जीवन विद्या का आलोक केन्द्र

यदि हम आज के दौर में व्यक्ति और समाज के उत्कर्ष की बात सच्चाई एवं गहराई से सोचते हैं तो हमें उसके मूल आधार अध्यात्म कही जाने वाली जीवनविद्या की ओर ध्यान देना होगा और उसको स्वस्थ स्थिति में लाकर जन-मानस में गहराई तक प्रतिष्ठापित करने के लिए घोर प्रयत्न करना होगा। यदि इस ओर ध्यान न दिया गया तो राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक, वैज्ञानिक क्षेत्रों में कितने ही कुछ भी प्रयत्न क्यों न किए जाते रहें उनका तनिक भी सन्तोषजनक परिणाम उत्पन्न न होगा। कोई योजना कितनी ही उत्तम क्यों न हो, उसे चलाने वाले, कार्यान्वित करने वाले, उत्कृष्ट व्यक्तित्व और आदर्शवादी गतिविधियाँ अपनाने वाले नहीं होंगे तो विफलता ही हाथ लगेगी। ओछे लोग जो भी कार्य हाथ में लेंगे, उसे अपने दुर्गुणों के कारण कलुषित कर देंगे। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हम हर क्षेत्र में देख सकते हैं। उच्च आदर्शों के लिए बनी हुई संस्थाएँ आज पद-लिप्सा और धन-लोभ के कारण संघर्ष का अखाड़ा बनी हुई हैं। मानव जीवन का प्रत्येक क्षेत्र इन दिनों कंटकाकीर्ण और असुविधाओं से भरा हुआ है। जो आधार हमें प्रगति और प्रसन्नता दे सकते थे, वे ही हमारे शोक-संतापों और दुःखों में बढ़ोत्तरी कर रहे हैं। शरीर रुग्ण, मन अशान्त, परिवार विखण्डित, समाज विक्षुब्ध, विज्ञान घातक, राजनीति भ्रष्ट, देश आतंकित, धर्म जंजाल, शिक्षा अनुपयुक्त किसी भी दिशा में दृष्टिपात करें सर्वत्र उलझनें और विभीषिकाएँ ही दिखती हैं। लगता है सुख-शान्ति के सारे आधार उलटकर दुःख दैन्य के कारण बन गए हैं। इस विडम्बना का एकमात्र कारण जीवनविद्या की उपेक्षा है। जीवनविद्या मानव जीवन का प्राण है। उसे जिस क्षेत्र से भी तिरस्कृत, बहिष्कृत किया जाएगा उसी में विपन्नता उत्पन्न हो जाएगी। जल के बिना मछली नहीं जी सकती है, मानवीय शान्ति भी अध्यात्म की उपेक्षा करके जीवित नहीं रह सकती। आज की श्मशान जैसी सर्वव्यापी जलन की एकमात्र कारण यही है।

आर्थिक क्षेत्र में उपार्जन-उत्पादन काफी बढ़ा है। पैसा पहले की अपेक्षा कम नहीं, अधिक है। पर इतने पर भी हम आर्थिक तंगी और भी चौगुनी-सौगुनी अनुभव कर रहे हैं। कारण यह है कि व्यक्तिगत जीवन में हम अधिक अपव्ययी आर विलासी बनते चले जा रहे हैं और व्यापारिक क्षेत्र में जमाखोरी, मुनाफाखोरी, तस्करी, मिलावट, धोखाधड़ी पनप रही है। कमाई बढ़ती है, पर तंगी दूर नहीं होती, इस गोरखधन्धे के पीछे उत्पादक-उपभोक्ता और व्यापारी, वितरकों की ओछी दृष्टि ही झाँकती है। लोग केवल आवश्यकता पूर्ण करने भर के लिए उचित श्रम एवं संग्रह करने का आदर्श अपना लें तो जितनी कुछ अर्थव्यवस्था है, उसी में बड़े संतोष, आनंद के साथ सारे समाज का काम चल सकता है। इसी के साथ वास्तविक प्रगति के सभी अवरुद्ध मार्ग सहज ही खुल सकते हैं।

बढ़ते हुए अपराधों की संख्या के कारण-आर्थिक कम, जीवनविद्या से विमुखता अधिक है। नीति, धर्म और सदाचार का बाँध टूट जाए, व्यक्ति, ईश्वर, परलोक और कर्मफल की सुनिश्चितता पर विश्वास न करे तो फिर वह राजदण्ड और समाजदण्ड से बचने की हजारों तरकीबें ढूँढ़ निकालेगा और गुप्त या प्रकट रूप से परिस्थिति के अनुसार दुष्कर्म करता रहेगा। किसी भी धूर्त और सूझबूझ वाले व्यक्ति के लिए प्रलोभन अथवा आतंक की स्थिति उत्पन्न कर शासन अथवा समाज के दण्ड से बहुत ही सरलतापूर्वक बचते हुए अपराध करना बड़ा आसान है। यही कारण है कि आज दुराचारियों की संख्या दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है।

गिरते हुए स्वास्थ्य का एकमात्र कारण मात्र असंयम है। जब तक विलासिता और वासना के प्रति वर्तमान आकर्षण बना रहेगा, जब तक आहार-विहार की मर्यादाओं को तोड़कर अप्राकृतिक रीति-नीति को अपनाए रहा जाएगा, सर्वजनीन स्वास्थ्य की स्थिति निरन्तर गिरती ही चली जाएगी। मात्र औषधि उपचार से स्वास्थ्य का संरक्षण एवं संवर्द्धन हो सकने की भ्रान्त धारणा मृगतृष्णा की तरह है। उससे मन बहलाव तो हो सकता है, पर प्रयोजन की पूर्ति सम्भव नहीं। अस्वस्थताजन्य संकट बढ़ते ही जाएँगे, बीमारियों का प्रकोप और प्रवाह दिन-प्रतिदिन प्रबल ही होता चला जाएगा। इस दुष्परिणाम से उबरने का उपाय चिकित्सा विज्ञान की प्रगति नहीं, संयम शिक्षा सही सिद्ध होगी। जीवनविद्या की शरण में आए बिना हम स्वस्थ जीवन से वंचित होते चले जाएँगे।

संसार के समस्त सुखों की तुलना में पारिवारिक सौहार्द का महत्व भारी बैठता है। परन्तु आज परिवारों की स्थिति दयनीय है। परिवार-संस्था में जगह-जगह से दरारें टूट-फूट बड़े ही साफ-तौर पर देखी जा सकती हैं। दरअसल पारिवारिक आनन्द के लिए गहन अन्तस्तल से निकलने वाले सद्भाव की आवश्यकता है और इसे केवल वे ही उपलब्ध कर सकते हैं, जो स्वयं उदार, सहृदय और सेवा-भावनाओं से परिपूर्ण हैं। परिवार में स्वर्गीय वातावरण का सृजन केवल जीवनविद्या के आदर्श ही कर सकते हैं। जब यह तथ्य लोगों के अन्तःकरणों में प्रतिष्ठापित हो जाएगा, तभी यह आशा की जा सकेगी कि गरीब रहते हुए भी छोटे घर-घरौंदों में रहकर व्यक्ति आनन्द और उल्लास भरे दिन बिता सके।

परिवार का व्यापक स्वरूप समाज है। आज समाज में बड़े पैमाने पर फैली हुई कुरीतियों और अनैतिकताओं ने उसे जर्जर, विसंगठित और दीन-दुर्बल बनाकर रख दिया है। ऐसे समाज का हर सदस्य अपने को अशान्त एवं असुरक्षित ही अनुभव करेगा, उसे अपने चारों ओर घिरा वातावरण आक्रमणकारी, आशंका भरा और अविश्वस्त ही अनुभव होता रहेगा। समाज में अवांछनीय परम्पराएँ चल पड़ें तो उसके सदस्यों का स्तर हर दृष्टि से दयनीय बना रहेगा। इन दिनों यही स्थिति है। आपने समाज में नारी जाति के प्रति, अछूतों के प्रति जो ओछी मान्यता प्रचलित है, उसने आधी जनसंख्या को अविकसित, असमर्थ और असन्तुष्ट बनाकर रख दिया है। आधे शरीर को लकवा मार जाने की तरह हम सामाजिक तौर पर अपंग और असहाय बनकर रह गए हैं।

समाज-सुधार के लिए यों कतिपय-विभिन्न प्रकार के प्रयत्न तथा आन्दोलन चलते रहते हैं और उनकी असफलता और निरर्थकता भी सामने आती रहती है। समाज का बिगाड़ अविवेक और अनौचित्य को अस्वीकार करने के साहस की कमी से हुआ है। सुधार उस दिन से आरम्भ होगा, जिस दिन लोग अनीति और अनौचित्य का प्रतिरोध करने के लिए खड़े हो जाएँगे कि वह अवांछनीयता कितने दिनों से प्रचलित तथा कितनों के द्वारा व्यवहृत है। अनौचित्य के विरुद्ध एकाकी लड़ने का शौर्य जीवनविद्या का तत्त्वज्ञान अपनाने से ही सम्भव है। यह उपलब्धि जिस दिन अपने लोगों में जड़ जमाने लगे समझना चाहिए कि समाज-सुधार की प्रक्रिया तेज हो चली।

राजनीति में आज की गन्दगी हर किसी को निराश करती है। लगता है स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए अतीत में जो महान बलिदान हुए थे, व्यर्थ चले गए। नितनयी योजनाएँ बनती हैं और जनता पर कर और ऋण का भार बढ़ता चला जाता है। जिन लाभों के उसे सब्जबाग दिखाए जाते हैं, वे अन्त तक आकाश-कुसुम ही बने रहते है। न देश में प्रगति, न विदेश में प्रतिष्ठा, डींगे हाँकने से काम क्या बनना है, खोखलापन कहाँ तक छिपाया जा सकता है? हमें स्वराज पाए पचास वर्ष हो चुके-इतने समय में युद्ध जर्जरित जापान, इटली, जर्मनी आदि देश कहाँ से कहाँ जा पहुँचे। अफीमची कहे जाने वाले चीन ने भी अपना कायाकल्प कर लिया। सुव्यवस्थित आधार पर बढ़ने वाले कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं, यह देखकर जहाँ हर्श और आश्चर्य होता है, वहीं अपनी ओर देखकर दुःख भी होता है। हमारा नेतृत्व अपने संकीर्ण स्वार्थों के मकड़जाल में बुरी तरह से उलझा हुआ है। भाषा, प्रान्त, सम्प्रदाय आदि के संकीर्ण स्वार्थों को प्रमुखता देने की होड़ लगी हुई है।

तथ्य यह है कि राजनीति को कूटनीति मात्र बना दिया गया है। उसके साथ जिन आदर्शों का समावेश होना चाहिए वह कहने-सुनने भर के लिए रह गए हैं। नेता लोग जोड़-तोड़ मिलाकर उल्लू सीधा करने की नीति पर विश्वास करते हैं। आदर्शों के लिए मर मिटने की लगन यदि उनमें रही होती तो आज गाँधी, तिलक, सुभाष जैसे नेताओं का अभाव अनुभव न होता। उत्कृष्ट व्यक्तित्वों का राजनेतृत्व जनसाधारण में कितना उत्साह उत्पन्न करता है, इसके उदाहरणों से इतिहास का पन्ना-पन्ना भरा पड़ा है। देश की उत्साहजनक राजनैतिक स्थिति के लिए तब तक हमें प्रतीक्षा ही करनी पड़ेगी, जब तक कि हर राजनेता के व्यक्तित्व को आदर्शवादिता और उत्कृष्टता की कसौटी पर कसे जाने और खरे उतरने के लिए विवश नहीं कर दिया जाता। जीवन-विद्या के आदर्शों से जुड़कर ही राजनीति देश में स्वराज्य, रामराज्य और सतयुग के दृश्य उत्पन्न कर सकती है।

अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में वर्ग और क्षेत्र विशेष के संकीर्ण स्वार्थों के लिए जो संघर्ष, शोषण, घृणा, आरोप, आक्रमण, विद्वेष और अनाचार उत्पन्न किए जाते रहते हैं, उनकी कोई भी चिनगारी कभी भी विश्वयुद्ध की आग लगा सकती है और चिरसंचित मानव-संस्कृति का अन्त हो सकता है। बढ़ते हुए परमाणु हथियारों की विभीषिका किसी भी दिन मानवजाति को अपना अस्तित्व गँवा बैठने के लिए विवश कर सकती है। अन्तर्राष्ट्रीय शतरंज का खेल इन दिनों जिस स्तर पर खेला जा रहा है, उसका परिणाम मानव जाति को कभी न उबरने वाले संकट में धकेल देना ही हो सकता है। छुट-पुट उपायों से काम न चलेगा। आयोग और कमीशनों की रिपोर्ट समस्याओं का हल न ढूँढ़ सकेंगी। विश्वशान्ति का आधार आध्यात्मिकता के आदर्श ही हो सकते हैं।

आध्यात्म कही जाने वाली जीवन-विद्या एक ऐसा तथ्य है, जिसके ऊपर मानव कल्याण की आधार-शिला रखी रही हुई है। उसे जिस सीमा तक उपेक्षित एवं तिरस्कृत किया जाएगा, उतना ही दुःख-दारिद्रय बढ़ता जाएगा। हमारी सम्पन्नता, समृद्धि, शान्ति, समर्थता एवं प्रगति का एकमात्र अवलम्बन जीवन विद्या ही है। यदि हमें सुखी और प्रगतिशील होकर जीना है तो स्मरण रखा जाना चाहिए कि दृष्टिकोण में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का समुचित समन्वय नितान्त अनिवार्य है। इसकी विमुखता सर्वनाश को सीधा निमंत्रण देने के बराबर है।

युगनिर्माण मिशन की स्थापना इसी समझ एवं सोच को लेकर की गयी थी। शान्तिकुञ्ज के द्वारा इसी का विस्तार हो रहा है। और अब जीवनविद्या के सूत्रों को अधिक सुव्यवस्थित ढंग से प्रशिक्षित-प्रचारित करने के लिए एक नए आलोक केन्द्र की योजना है। जीवनविद्या का यह आलोक केन्द्र-शान्तिकुञ्ज का ही एक नया आयाम होगा। प्रारम्भिक दौर में इसके चार संकाय होंगे-साधना संकाय, शिक्षा संकाय, स्वास्थ्य संकाय तथा स्वावलम्बन संकाय।

साधना संकाय के अंतर्गत जीवन-साधना के सामान्य सूत्रों के शिक्षण के साथ ही विशेष साधना-सत्र आयोजित किए जाएँगे, जो देश और विश्व के किसी भी कोने में जाकर वहाँ की परिस्थितियों और मनःस्थितियों को ध्यान में रखकर हर वर्ग एवं सम्प्रदाय के लोगों को जीवनविद्या के ऋषिमान्य सूत्रों के प्रति आस्थावान् बना सकें। शिक्षा संकाय के अंतर्गत शिक्षण और लोकशिक्षण के संदर्भ से विचारक्रान्ति को सार्वभौम बनाने की प्रभावी योजना लागू की जाएगी। स्वास्थ्य संकाय के माध्यम से देश एवं विदेश में शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य-संवर्द्धन के साथ ही रोगों से बचाव एवं उनके निवारण के लिए ऋषिमान्य जीवन-पद्धति और उपचार प्रक्रिया की शोध-अनुसंधान प्रशिक्षण एवं विस्तार की योजनाबद्ध व्यवस्था की जाती है। स्वावलम्बन संकाय एक ऐसे ज्योति-स्तम्भ के रूप में होगा-जिससे निःसृत होने वाली ज्योतिर्मय किरणें आज के कठिन समय में हर व्यक्ति को स्वावलम्बी जीवननिर्वाह हेतु मार्गदर्शन कर सकें।

जीवनविद्या के आलोक केन्द्र में संचालित होने वाले ये चारों की संकाय आध्यात्मिक जीवनशैली के विविध सूत्रों का सुव्यवस्थित रूप से प्रशिक्षण देंगे। शान्तिकुञ्ज की यह भावी योजना अध्यात्म कही जाने वाली विद्या की रक्षा के लिए एक तरह का धर्मयुद्ध है, जिसमें मानवीय आदर्शों की रक्षा में कुछ त्याग और बलिदान करने का शौर्य एवं साहस उठता हो, उनके लिए इन पंक्तियों के माध्यम से भावभरा आह्वान किया जाता है। आज फिर वही परीक्षा की घड़ी आ गयी है, जब अध्यात्म की जीवनरक्षा के लिए बड़े-से-बड़ा त्याग करने की हिम्मत दिखाई जाए। अखण्ड-ज्योति परिवार के उन परिजनों को, जिनके हृदय में कुछ सार्थक कर गुजरने का तूफान मचल रहा है-शान्तिकुञ्ज द्वारा संकल्पित इस योजना को पूरी करने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। उन्हें ही इस बात का प्रण लेना है कि उक्त की अन्तिम बूँद और साँस का अंतिम प्रवाह शेष रहने तक जीवन-विद्या के आलोक को जन-जन तक पहुँचाने में जुटे रहेंगे। उनके इसी संकल्प में मानवता का उज्ज्वल भविष्य निहित है।


विद्या−विस्तार की पुरातन परम्परा

गुरुकुल-आरण्यकों की प्रणाली आज की प्रचलित शिक्षापद्धति से सर्वथा भिन्न रहीं है। गुरुकुलों का उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से विद्या को विकसित करना रहा है। यहाँ की व्यवस्था-वातावरण का सृजन इसी उद्देश्य को लेकर किया गया था। गरीब-अमीर सभी को बिना किसी भेदभाव, तप-तितीक्षा व्रत-अनुशासन को स्वीकार कर विद्या का अभ्यास करना पड़ता था। उज्जयिनी में स्थित महर्षि संदीपनि के गुरुकुल की कथा पुराण-विख्यात है। वहाँ राजपुत्र कृष्ण और गरीब ब्राह्मण सुदामा दोनों ने समान तप करके विद्या की उपलब्धि की। चक्रवर्ती नरेश दशरथ के पुत्र राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न को सारे वैभव को तिलाञ्जलि देने पर ही ब्रह्मऋषि वशिष्ठ के गुरुकुल में प्रवेश मिल सका।

आरण्यकों की व्यवस्था में गुरुकुलों से बहुत कुछ साम्य होते हुए भी तप-साधना गुरुकुलों का उद्देश्य था विद्या-अर्जन एवं व्यक्तित्व का गठन, वहीं आरण्यकों का प्रयोजन था- विद्या का प्रचार तथा व्यक्तित्व का लोकहित में समर्पण। लेकिन शिक्षण की प्रक्रिया और विद्या का स्वरूप दोनों में एक-सा था। प्रागैतिहासिक काल में चतुर्दिक् फैले महर्षि अगस्त्य की वेदपुरी, भारद्वाज की प्रयाग स्थित प्रशिक्षणशाला, विश्वामित्र के सिद्धाश्रम आदि ने जीवन-विद्या के प्रशिक्षण द्वारा अपने समय को माँग को पूरा किया। वेदपुरी में महर्षि अगस्त्य के प्रशिक्षण की सराहना करते हुए आदि कवि वाल्मीकि लिखते हैं-अनीतिकारी आसुरी शक्तियाँ उस दिशा से भय खाती थी। दस हजार छात्रों वाली भारद्वाज की प्रशिक्षणशाला जन-जन को जाग्रत और कर्तव्यनिष्ठा के लिए सचेत रहने वाले प्रहरी तैयार करती थी। सिद्धाश्रम को केन्द्र बनाकर उपयुक्त पात्रों को विद्या दान करके विश्वामित्र ने दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध व्यूह-रचना की। रामराज्य की सतयुगी परिस्थितियाँ इन्हीं गुरुकुल-आरण्यकों की उर्वरता का परिणाम थीं।

बीच के समय में भी भारत को सोने की चिड़िया- स्वर्णभूमि कहलाने का सौभाग्य ऐसे ही विश्वविद्यालयों ने प्रदान किया। गान्धार तक्षशिला, राजगिरि के समीप नालन्दा, भागलपुर स्थित विक्रमशिला एवं काठियावाड़ के वल्लभी विश्वविद्यालयों ने अपने समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चाणक्य की दुर्धर्ष प्रखरता तक्षशिला से उपजी थी। यहीं के स्नातक उसके प्रथम सहयोगी थे, जिनके सम्मिलित प्रयासों से जनजाग्रति की लहर फैली और विशाल भारत की समाज संरचना अपना सौंदर्य प्रकट कर सकी। विचारक्रान्ति के अग्रदूत कुमारिल भट्ट नालन्दा में गढ़े गए, निकट रखी मजबूत नींव पर शंकराचार्य ने साँस्कृतिक क्रान्ति की भव्यता निर्मित की। चोल सम्राट देवपाल के समय विक्रमशिला में गढ़े गये परिव्राजकों ने भारत ही क्यों सुदूर वर्मा, मलाया आदि जगहों पर पहुँचकर विद्या का प्रसार किया। पाँचवीं से आठवीं शती तक वल्लभी के स्नातकों ने अकेले काठियावाड़ ही नहीं, समूचे भारत की जनचेतना को जीवन्त और सचेत रखा। यहाँ के आचार्यगण व्यक्तित्वों को ढालने में इतने माहिर थे कि अन्य देशों के लोग भी यहाँ विद्या-अर्जन के लिए तरसते थे। उज्जयिनी, काँचीपुरम, अमरावती, औदेतपुरी आदि जगहों पर भी जीवनविद्या के ऐसे ही आलोक केन्द्र थे, जहाँ से साधारण व्यक्ति असाधारण प्रखर बनकर निकलते थे। वे स्वयं के साथ देश और समाज की उपयोगिता में खरे साबित होते थे।

गुरुकुल-आरण्यक की इस महत्वपूर्ण एवं उपयोगी परम्परा के अतिरिक्त तीर्थों का भी विद्या−विस्तार में मूल्यवान योगदान रहा है। इसी कारण पुराणों के सर्वाधिक पृष्ठ इसके महत्व से भरे पड़े हैं। स्कन्दपुराण का बहुत बड़ा अंश इसी विवरण को अपने में सँजोये है। दूसरे अनेक पुराणों-उपपुराणों में भी तीर्थों के महत्व, तीर्थयात्रा के पुण्यफल पर प्रचुरता से प्रकाश डाला गया है। इस सारे वर्णन एवं विवरण का उद्देश्य जनसाधारण को तीर्थचेतना का सान्निध्य पाने के लिए प्रोत्साहित करना है। इस पारस को छूकर लोग अपने भीतर की लोहे जैसी कठोरता, कलुष-कालिमा को धो सकें और बहुमूल्य सुवर्ण जैसा अन्तःकरण बना सकें-इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु सारा सरंजाम जुटाया गया था। इन्हें उस कल्पवृक्ष की उपमा दी गयी थी-जिसके संपर्क में अपने वाले अपने आन्तरिक अभावों और संकटों से छुटकारा पा सकते थे। प्रत्येक तीर्थस्थान अपने समय में किसी ऋषि की तपस्थली अथवा अवतारों की लीलाभूमि रहा है। उन दिनों ऋषि अपने छात्र-शिष्यों तथा गायों के साथ घूमते रहते थे। वे सुविधाजनक स्थानों पर पड़ाव डालते, कुछ समय वहाँ रुकते और फिर आगे बढ़ जाते। इस क्रम में आस-पास की जनता भी लाभान्वित होती थी। इस तरह छात्रों का अध्ययन और लोकशिक्षण साथ-साथ चलता रहता था। आज जो छोटे-छोटे तीर्थ, देवस्थान, धर्मस्थान दिखाई देते हैं वे ऋषियों के निवास और शिक्षण-प्रक्रिया के स्मारक-चिन्ह जैसे हैं। इस प्रक्रिया में संलग्न ऋषिगण तरह-तरह के व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयोगों द्वारा वातावरण को दिव्य स्पन्दनों से भर देते थे। उनकी तपश्चर्या से उद्भूत प्राण-ऊर्जा तीर्थचेतना की प्रखरता को जन्म देती इसकी समर्थता से तादात्म्य साधने वाले व्यक्तित्व स्वयं की दिशाधारा और स्वरूप में वाँछित बदलाव की अनुभूति किए बिना नहीं रहते थे। प्रयोगों के इसी क्रम में नर-नारायण ने बद्रीनाथ, ऋषि दम्पत्ति अत्रि-अनुसूया ने चित्रकूट, अवधूत श्रेष्ठ दत्तात्रेय ने गिरनार, ब्रह्मा जी ने पुश्कल और भगवान शिव के तप ने कैलाश के दिव्य क्षेत्र को जन्म दिया।

प्राचीनकाल में इनका स्वरूप खुले विश्वविद्यालय का था, जहाँ पर हर कोई बिना किसी भेद-भाव के और बिना किसी रोकटोक के पहुँच सकता था। यहाँ पर आत्मिक विश्रान्ति पाने तथा उद्विग्नता का शमन करने में सहायक वातावरण रहता था। योगी-तपस्वी यहाँ सतत् अपनी आत्म-साधना में निरत रहते थे। तीर्थसेवन के लिए आने वाले उनके समीप ठहरकर जीवनक्रम पर नए सिरे से विचार करते और तपस्वियों, ज्ञानियों से अपनी समस्याओं के समाधान तथा उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण के लिए परामर्श प्राप्त करते थे। बात भी सही है। जीवन की उलझनों की समीक्षा के लिए इनके जाल-जंजाल से कुछ दूर रहकर उन पर विचार करना जरूरी होता है। व्यक्ति तीर्थ में पहुँचने पर सम्बद्ध लोगों से दूर हो जाता है। इसलिए उनके प्रति राग-द्वेष भी झीना हो जाता है। उसी मनोदशा में अपने-पराए गुण-दोषों को समझना आसान होता है। आधा हल तो समस्याओं का सही स्वरूप समझने में ही निकल आया मानना चाहिए। इसी क्रम में पापों के प्रायश्चित के लिए आवश्यक तपश्चर्या करने से वह प्रयोजन भी पूरा हो जाता है, जिसे पाप निवृत्ति कहा है। आत्मशोधन और आत्मपरिष्कार के विधि-विधान तपःपूत ऋषियों के संरक्षण में पूरी करने से तीर्थसेवन के सभी उद्देश्य पूरे हो जाते थे। साथ ही जीवनविद्या का सार-मर्म भी प्राप्त हो जाता था।

कभी-कभी धर्मसेवियों, ऋषि-तपस्वियों का मिलन सम्मेलन भी यहाँ होता था, ताकि वे मिल-जुलकर विद्या−विस्तार के कार्य को और भी अधिक गति दे सकें। कुम्भपर्व जैसे आयोजन इसी उद्देश्य से निर्धारित किए गए थे। विभिन्न वर्गों के मूर्धन्य मनीषी अभी भी विविध सेमिनारों के रूप में मिलते-जुलते हैं। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, न्याय व्यवस्था आदि जनोपयोगी विषयों पर मिल-जुलकर उचित समाधान के लिए ढूँढ़-खोज होती है। प्राचीनकाल में कुम्भ जैसे पर्वों का ठीक यही स्वरूप था। ऐसे विशाल आयोजनों की महत्वपूर्ण भूमिका यही थी कि उस अवसर पर विभिन्न मनीषियों के निर्धारणों, प्रतिपादनों तथा प्रेरणाओं से अवगत होकर समुचित निष्कर्ष पर पहुँचा सके। यह समस्त गतिचक्र तीर्थों की धुरी पर ही घूमता था। उन दिनों तीर्थयात्रा से लौटने वाला व्यक्ति आध्यात्मिक विश्रान्ति के उपरान्त नई क्षमता, नई दृष्टि और नई स्फुरणा से नए सिरे से अपने सामान्य जीवन में प्रवेश करता था।


स्वतन्त्रता की स्वर्णजयंती और जीवनमूल्यों का वर्तमान संकट

स्वतन्त्रता मानवीय अन्तःकरण की एक महत्वपूर्ण जरूरत है-उसे उसकी प्राप्ति का अवसर मिलना निहायत जरूरी है। इस दिशा में किए गए प्रयत्नों का समर्थन होना ही चाहिए। इन्हें सराहा ही जाना चाहिए। पर इसके साथ ही यह नहीं भुला दिया जाना चाहिए कि व्यक्ति और समाज में दुष्प्रवृत्तियों की भी कमी नहीं। यदि उन्हें भी स्वतन्त्र कर दिया गया तो जीवन-मूल्यों का भयावह संकट खड़ा हो जाएगा। इस संकट के चक्रव्यूह में पड़कर हजारों-हजार बलिदानों, भारी त्याग-तप से मिली हुई राष्ट्रीय आजादी भी अपने आप ही सिसक-सिसक कद दम तोड़ देगी। इन दिनों हम सब जिस सामाजिक, राष्ट्रीय एवं मानवीय संकट से गुजर रहे है, उसकी जड़ में जीवन-मूल्यों का संकट ही है।

सद्गुणों, सत्प्रवृत्तियों को सुविकसित होने के लिए, उन्हें फैलाने के लिए आजादी मिलना ठीक है। पर साथ ही दुर्गुणों, दुष्प्रवृत्तियों का दमन-नियन्त्रण भी उतना ही जरूरी है। सच तो यह है कि इस नियन्त्रण की आवश्यकता और भी अधिक है। क्योंकि आज की परिस्थितियों में बाहुल्य दुष्प्रवृत्तियों का हो चला है। सत्प्रवृत्तियाँ तो किसी अनजाने कोने में जा छुपी हैं।

आजादी का उज्ज्वल पक्ष सबके सामने है। उससे जनता को जो राहत मिली है उस पर हर किसी को सन्तोष और गर्व हो सकता है। स्वतन्त्रता आन्दोलन ने एकाधिकारवाद को चुनौती दी और शासन-व्यवस्था सामाजिक उत्पीड़न तथा अर्थपाश से जिस हद तक जनसाधारण को त्राण दिलाया, उतने अंशों में उसे सराहा ही जाएगा। परन्तु अचानक वे कौन-से कारण आ खड़े हुए कि भारत में आजादी की आधी शताब्दी पूरी होने के साथ-साथ समूची राष्ट्रीय राजनीति भ्रष्टाचारी ताकतों की गुलाम हो गयी। इसी के समानान्तर राष्ट्रीय मध्यम वर्ग भोगवाद की माँग से मदमस्त होता जा रहा है। पूरे देश में तामसिकता का प्रबल आवेग है और समाज अनैतिकता की आँधी की चपेट से घिरा हुआ है। जीवन-मूल्यों के महावटवृक्ष जो देश और समाज को अपनी शीतल छाँव से राहत पहुँचाते थे, आज टूट-उखड़ रहे हैं।

समाज मूलतः जीवनमूल्यों की सत्ता से संचालित होता है। ये जीवन-मूल्य देशकाल-पात्र सापेक्ष होते हैं, यह ठीक है। फिर भी इनका सनातन आधार सात्विकता है जिसका मूल तत्व करुणा है। परोपकार इनकी पृष्ठभूमि है। इससे सहयोग सम्भव होता है और सहयोग समाज की, मानवीयता की पहली शर्त है, अन्यथा समाज क्रमशः भीड़, फिर युद्धक्षेत्र और अन्ततः दबंग की जमींदारी बन जाया करता है। सहयोगी परस्परावलम्बन तथा शोषण पर आधारित समूहीकरण, मानव समाज की दो सतत् सक्रिय प्रवृत्तियाँ रही हैं। अनैतिकता समाज में अमानवीयता फैलाने का पहला अध्याय होती है। अतः किसी भी सजग व्यक्ति को अनैतिकता की हर आहट से सावधान हो जाना चाहिए।

स्वतंत्रता का अर्थ नैतिकता की अवहेलना या फिर जीवनमूल्यों की अवमानना नहीं है। स्वाधीनता के उत्साह के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस प्रभाव का लाभ उठाकर कहीं अवांछनीय दुष्प्रवृत्तियाँ ही छुट्टल न हो जाएँ। इस सम्बन्ध में समुचित सतर्कता न बरतना ही वह कारण है, जिसकी वजह से स्वतन्त्रता आन्दोलन की सफलता व उपलब्धियाँ स्वर्णजयंती की आभा के बावजूद धूमिल व कलंकित हो रही हैं।

विचारों की अभिव्यक्ति लेखन-भाषण की स्वतन्त्रता को स्वतन्त्रता आन्दोलन का मुख्य आधार माना गया है। यह उचित भी है पर यह छूट अवांछनीय को नहीं मिलनी चाहिए, जैसी कि इन दिनों मिल रही है। उदाहरण के लिए, लेखन की स्वतन्त्रता सामने है। उसने जनता का कितना हितसाधन किया, इसका लेखा-जोखा किया जाना चाहिए। इन दिनों जो लिखा जा रहा है, जो छापा और बेचा जा रहा है, उस साहित्य पर गौर किया जाना चाहिए। इसमें से अधिकाँश ऐसा है, जो मनुष्य की पशुता को उभारता है, दुष्प्रवृत्तियों को भड़काता है, धूर्तता सिखाता है, भ्रम-जंजाल में फँसाता है। इसका परिणाम सामने आ रहा है। लोक-चिन्तन का स्तर गिरता जा रहा है। सोचने की दिशा विकृत होती जा रही है। चारित्रिक स्तर गिर रहा है, गतिविधियों में तेजी से अवांछनीयता प्रवेश कर रही है। पाप-पुण्य का जैसा विश्लेषण हमारे साहित्यकार कर रहें हैं, उससे यही समझा जाने लगा है कि उचित-अनुचित का भेद करना निरर्थक है। अपनी सुविधा और रुचि स्वतन्त्रता के आधार पर जो ठीक लगे सो कर गुजरना चाहिए।

लेखन व्यवसाय में संलग्न लोगों का श्रम और चिन्तन इसी दिशा में चल रहा है, क्योंकि प्रकाशन में जिनका पैसा लगता है, वो तुरंत–फुरंत लाभ कमाना चाहते हैं। यह तभी सम्भव है, जब लोगों की माँग का पोषण किया जाए। कहना न होगा कि प्रचलित वातावरण में कुरुचि का बढ़ना स्वाभाविक है। कुरुचि का पोषण ही पसन्द किया जा रहा है। ऐसे में व्यवसायी के लिए यही रास्ता लाभदायक है कि वह जल्दी और अधिक लाभ कमाने के लिए कुरुचिपूर्ण उत्पादन करे। पैसे देकर वह लेखक का श्रम, दिमाग और सहयोग खरीदता है और गाड़ी आगे चल पड़ती है। बाज़ार में उपलब्ध आज का सारा साहित्य इकट्ठा करके उसका वर्गीकरण किया जाए और उपयोगिता-अनुपयोगिता की कसौटी पर कसा जाए, तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि लेखन और प्रकाशन की स्वतंत्रता का वैसा उपयोग नहीं हुआ, जैसा कि होना चाहिए था। यह उपक्रम जीवन-मूल्यों का उत्थान कम, पतन अधिक कर रहा है। इस निष्कर्ष पर कोई पहुँचता है तो गलत न कहा जा सकेगा। पत्र-पत्रिकाओं व पुस्तकों के माध्यम से इन दिनों जनसाधारण को जो दिशा मिल रहीं है, उस पर ज्यादा संतोष नहीं किया जा सकता। सुरुचिपूर्ण साहित्य की तुलना में कुरुचिपूर्ण लेखन और प्रकाशन की बाजी मार रहा है।

विचारों की अभिव्यक्ति का दूसरा माध्यम वाणी है। धार्मिक मंच पर कथा-प्रवचनों वाले महंत, महाराज जी जो कहते-बोलते रहते हैं, उसमें कितना विवेक, कितना सौंदर्य, कितना प्रकाश और कितना तथ्य रहता है-इसका विश्लेषण करने पर किसी उत्साहवर्द्धक नतीजे पर नहीं पहुँचा जा सकता। राजनैतिक मंच से अपनी पार्टी के हित को प्रधान रखने वाले धुँआधार भाषण सुनने को मिलते हैं। पिछड़े देश की जनता को जिस राष्ट्रीय कर्तव्यनिष्ठा के आरम्भिक शिक्षण की जरूरत है, उसे कौन सिखाता है? भड़काने वाले, विग्रह उत्पन्न करने वाले गरमागरम लच्छेदार भाषण कहीं भी सुन लीजिए। सृजनात्मक प्रशिक्षण के अभाव में वक्ताओं की वाणी जनता का कितना हितसाधन कर सकती है इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है।

वाणी का दूसरा क्षेत्र है-रंगमंच संगीत अभिनय को मनोरंजन की दृष्टि में प्रयोग में लाया जाता है, पर उसमें छिपी हुई ऐसी क्षमता भी है, जो मस्तिष्क और चरित्र को आश्चर्यजनक रीति से प्रभावित करती है। इसलिए उस अभिव्यक्ति को मात्र मनोरंजन कहकर महत्त्वहीन नहीं ठहराया जा सकता। यंत्रीकरण के इस युग में संगीत और अभिनय का केन्द्र सिनेमा हो गया है। हजारों सिनेमाघरों में करोड़ों लोग रोज सिनेमा देखते हैं। उसमें क्या दिखाया अथवा सिखाया जाता है और मनोरंजन के लिए जाने वाले दर्शक वहाँ से क्या प्रभाव लेकर लौटते है।, इसकी ओर गम्भीरता से ध्यान दिया जाना चाहिए। उसमें कितना सुरुचिपूर्ण अंश है और कितना कुरुचिपूर्ण, उसका विश्लेषण किया जान चाहिए। मनोरंजन की उपयोगिता-आवश्यकता को समझा जा सकता है पर उसे विषाक्त करने की स्वतन्त्रता क्यों मिलनी चाहिए, जो सामाजिक जीवन के आधारभूत मूल्यों के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगा दें?

जन-जीवन यदि इतना प्रबुद्ध होता कि विष और अमृत का भेद कर सकता और हंस की तरह दूध पीने और पानी छोड़ने में प्रवीणता दिखा सकता तब तो खैर कहना ही क्या था? फिर तो धर्मशास्त्र से लेकर राज्यशासन तक की भी आवश्यकता ही न पड़ती। जनमानस की बालक जैसी सुरक्षा करना, प्रबुद्ध नेतृत्व का कर्तव्य इसीलिए है कि दुष्प्रवृत्तियों के उभरने की परिस्थितियाँ उत्पन्न न होने पावें। जिन्दगी के हर क्षेत्र में जो कुरुचि घुस पड़ी है, उसे प्रस्तुतकर्ताओं की नागरिक स्वतन्त्रता पर समर्थन दिए जाने का प्रचलन है। यही नहीं आगे भी दिनों-दिन अश्लीलता का विष और भी अधिक मात्रा में घुलाने की छूट मिलती जा रही है। इसके प्रभाव के रूप में शारीरिक और मानसिक विकृतियों के चक्रव्यूह में और भी बेतरह फँसना पड़ेगा। अभिव्यक्तियाँ की स्वतन्त्रता यदि इस प्रकार के अनर्थ सँजानेे लगे तो उससे वह नियंत्रण-बन्धन क्या बुरा है जो पराधीनता की स्थिति पैदा करके अवांछनीय अभिव्यक्तियों को कड़ाई के साथ रोक दे।

मनुष्य के मौलिक अधिकारों के नाम पर न जाने क्या-क्या करने की छूट मिल चुकी है और भविष्य में न जाने आगे वह और क्या क्या करके रहेगा। हिप्पी संस्कृति इसी उच्छृंखल स्वाधीनता की परिणति है। जहाँ-तहाँ नवयुवक-नवयुवतियाँ भौंड़ी वेश-भूषा बनाए नशे में धुत्त, शील और मर्यादाओं के घोर विरोधी बने हुए जहाँ-तहाँ निरुद्देश्य घूमते दिखाई पड़ते हैं। इन्हें कुछ सिरे-फिरे लोग नहीं मान लेना चाहिए। यह एक संस्कृति है, जो नई पीढ़ी के मस्तिष्कों पर ग्रहण की तरह आच्छादित होती चली जा रही है। इनका मानना है कि स्वतन्त्रता तो पूरी स्वतन्त्रता। बन्धन तोड़ने तो फिर पूरे तोड़ने। आजादी तो फिर पूरी आजादी। दाम्पत्य जीवन, परिवार व्यवस्था, सामाजिक सदाचार सभी एक-एक करके ढहते-मिटते जा रहे है। गम मिटने के लिए नशे के देवता की आराधना का प्रचलन बढ़ा है। अपराधों की स्वतन्त्रता के लिए भी तेजी से कदम बढ़े हैं। राष्ट्रीय स्वाधीनता के इन पचास वर्षों में जीवन-मूल्य बेतरह ध्वस्त हुए हैं। इनमें बुरी तरह गिरावट आयी है।

व्यक्तिगत जीवन में स्वेच्छापूर्वक गतिविधियाँ अपनाने की छूट का समर्थन किया जाना चाहिए, पर वह एक सीमा तक। व्यक्त एकाकी नहीं है। उसका व्यक्तिगत जीवन भी समाज को प्रभावित किए बिना नहीं रह सकता। व्यसन, व्यभिचार, नशेबाजी, उद्धत रहन-सहन जैसी कुरुचिपूर्ण छूट आज व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के नाम पर मिली हुई है, सो लोग उसका पूरा-पूरा उपयोग करने में लगे हैं? क्या इनका प्रभाव उनके परिवार पर नहीं पड़ता? समाज की गतिविधियाँ बिना प्रभावित हुए रहती हैं क्या? ये तथ्य समझे ही जाने चाहिए और इस समस्या पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए कि स्वतन्त्रता के दूध में उच्छृंखलता का, असामाजिकता का विष कहीं इतना तो नहीं मिल रहा है कि वह खाद्य ही अखाद्य बन जाए।

स्वाधीनता की स्वर्णजयंती मनाने वाले राष्ट्र के सम्मुख उपरोक्त सभी प्रश्न यक्ष की चुनौती बनकर सामने खड़े हैं। धर्मराज युधिष्ठिर की तरह वनवास की पीड़ा भोगते जगद्गुरु भारत की प्यास तब तक नहीं बुझेगी, जब तक वह इन प्रश्नों के न्यायोचित उत्तर न तलाश लें। स्वतन्त्रता का सही अर्थ खोजना आज एक राष्ट्रीय कर्तव्य बन चुका है। स्वतन्त्रता, स्वाधीनता के नाम पर पारिवारिक-सामाजिक प्रशासनिक, राजनैतिक हर स्तर पर जो अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता पनपी है, नैतिकता सिसक रही है। आज की दशा में जीवनमूल्यों का वर्तमान संकट, सामाजिक की अपेक्षा राष्ट्रीय अधिक है। यह एक ऐसी प्रबल राष्ट्रीय चुनौती है, जिसे स्वीकार करना राष्ट्र के प्रत्येक विचारशील नागरिक एवं प्रगतिशील वर्ग का कर्तव्य है।

विचारक्रान्ति आन्दोलन का केन्द्र कहे जाने वाले शान्तिकुञ्ज ने इस राष्ट्रीय कर्तव्य को गहराई से समझा और स्वीकार किया है। देश की स्वतन्त्रता के पचासवें वर्ष पूरे होने के अवसर पर ‘देवसंस्कृति के खुले विश्वविद्यालय’ की स्थापना की प्रस्तावित योजना के पीछे जीवनमूल्यों के संरक्षण व प्रशिक्षण का स्वप्न निहित है। इसके माध्यम से विविध रूपों में देशवासियों को यह बोध कराया जाएगा कि आजादी का अर्थ अनुशासनहीनता या उच्छृंखलता नहीं है। यह भूलने की बात नहीं है कि पिछले दिनों जो वातावरण रहा है-इन दिनों जो परिस्थितियाँ है।, उनने मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियों को बहुत आगे तक परिपुष्ट किया है। सत्प्रवृत्तियाँ अभी तक एक प्रकार से अविकसित स्थिति में पड़ी हैं। स्वतंत्रता सत्प्रवृत्तियों को मिले, दुष्प्रवृत्तियों को नहीं। इस तथ्य को यदि ध्यान में रखा गया तो ही हजारों-लाखों बलिदानों एवं कुर्बानियों से मिली हुई आजादी वह प्रयोजन पूरा कर सकेगी, जो उसका उद्देश्य है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए कृतसंकल्प शान्तिकुञ्ज प्रत्येक हृदयवान एवं विचारशील से अपना सक्रिय सहयोगी होने की अपेक्षा करता है। इस अपेक्षा को पूरा करना ही आज के समय का वैयक्तिक एवं राष्ट्रीय कर्तव्य है। 5 पैराग्राफ नहीं जुड़े हैं यहाँ पर!


स्वावलम्बन शिक्षा की अनिवार्य शर्त बने

स्वावलम्बन व्यक्तिगत ही नहीं राष्ट्रीय गौरव में भी अभिवृद्धि करता है। देश की युवा जनशक्ति यदि कार्य-कुशल एवं स्वावलम्बी हो, तो राष्ट्र भी समर्थ सशक्त एवं सक्षम होगा। आज हम यदि पिछड़े देशों की कतार में हाथ बाँधें, असहाय की-सी स्थिति में खड़े हैं तो इसका एक प्रमुख कारण बढ़ती हुई बेरोजगारी है। हमारे देश में बेरोजगारों की संख्या दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही है। एक ओर तो स्कूल-कालेजों की संख्या में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है और दूसरी ओर पढ़े-लिखे बेकारों की संख्या द्रुतगति से बढ़ रही है।

देश में हर साल बढ़ती हुई शिक्षित बेरोजगारों की संख्या इस तथ्य का स्पष्ट बोध कराती है कि प्रचलित ढर्रे की शिक्षा, शिक्षार्थी बनाने और उसकी रोजमर्रा की व्यावहारिक समस्याओं को सुलझा पाने में असमर्थ है। शिक्षा का स्तर भी हमारे यहाँ निरंतर घटता जा रहा है। पढ़ाई-लिखाई लोग केवल पेट भरने तथा नौकरी करने के उद्देश्य से करते है॥ उसमें भी असफलता हाथ लगती है। ग्रामीण युवक भी कृषि आदि न करके कुर्सी पर बैठकर कलम चलाने की लालसा से शहरों की ओर दौड़ते हैं। अधिकांशतः छात्रों का उद्देश्य उचित-अनुचित किन्हीं भी साधनों से डिग्री प्राप्त कर लेना होता है। इसलिए शिक्षा के क्षेत्रों में पात्र-कुपात्रों की भीड़ बढ़ने के साथ-साथ शिक्षितों की बेकारी बढ़ती जा रही है, क्योंकि हर पढ़े-लिखे को नौकरी मिल नहीं सकती और शारीरिक श्रम प्रधान अन्य कामों से वे जी चुराते हैं। अब तो स्थिति यहाँ तक आ पहुँची है-बी-ए एम.ए. नहीं चिकित्सक, इंजीनियर एवं पी.एच.डी. भी बेकार है।

इन सबका एक ही कारण है कि शिक्षा के साथ स्वावलम्बन को जोड़कर नहीं रक्षा गया। उसे शिखा की अनिवार्य शर्त के रूप में नहीं स्वीकारा गया। यदि शिक्षा के साथ स्वावलम्बन जोड़कर रखा गया होता, तो न तो शिक्षित युवक, नौकरी के लिए मारे-मारे फिरते, न ही उनके अभिभावक हैरान-परेशान होते। सरकार की स्कूल-कालेजों पर खर्च की गयी भारी धनराशि बेकारी बढ़ाने में न लगती। शिक्षा पाकर निकले हुए युवा इतने परिश्रमी एवं अनुभवी होते के बेकारी-बेरोजगारी उनके पास न फटकती। इस कठिनाई का हल सरकार के ऊपर छोड़कर चुप हो जाना चाहिए अथवा देश के विचारशील वर्ग तथा जन-सामान्य का भी कुछ कर्तव्य होता है कि निदान के लिए कुछ कारगर कदम उठाए जाएँ? यह विचारणीय है। सभी जानते हैं कि सरकारी योजनाएँ जनसामान्य के सहयोग से ही सफल हो पाती हैं। पिछले कई सालों से यह समस्या देश की अस्मिता के सामने मुँह फाड़े खड़ी और दिन-प्रतिदिन विकराल होती जा रही है। सरकारी सेवाओं में सीमित व्यक्तियों की ही आवश्यकता होती है। इसलिए यह सोचना नितान्त अविवेकपूर्ण है कि कोई समय ऐसा भी आ सकता है कि जब सरकारी सेवाओं से सभी शिक्षितों को रोजगार के अवसर मिल जाएँगे। आवश्यकता से अधिक नियुक्तियाँ तो व्यर्थ का असन्तुलन ही उत्पन्न करेंगी।

हमारे राष्ट्रीय जीवन के समक्ष उभरे इस महाप्रश्न के हल के लिए दो ही उपाय हैं। एक में तो सरकारी सहयोग अपेक्षित है तथा दूसरे में जन-सहयोग ऐसे कई देश हैं, जहाँ शिक्षा भागों में विभक्त है। सामान्य और विशिष्ट शिक्षा। सामान्य शिक्षा के साथ सामान्य ज्ञान की विविध धाराएँ जुड़ी हुई हैं, जिनका लक्ष्य है-दैनिक जीवनकाल में काम आने वाली सामान्य ज्ञान की बातों से छात्रों को अवगत कराना। इस शिक्षा के साथ तकनीकी एवं औद्योगिक ज्ञान का शिक्षण अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ है। जिन्हें हम विकसित देश कहते एवं मानते हैं वहाँ प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा के साथ ऐसी ही व्यवस्था है।

इन देशों में विद्यार्थी अपनी स्कूली शिक्षा के साथ-साथ तकनीकी और औद्योगिक शिक्षण प्राप्त करते रहते हैं। जिन विद्यालयों में ऐसी व्यवस्था नहीं है वहाँ अनेकों ऐसी गैर सरकारी संस्थाएँ हैं, जो इस प्रकार का शिक्षण देती हैं। यही वजह है कि वहाँ विशिष्ट शिक्षा न प्राप्त करने वाले छात्रों को भी रोजगार के लिए भटकना नहीं पड़ता। वे विभिन्न कार्यों हेतु इतनी योग्यता प्राप्त कर लेते हैं कि अपनी जीवन-गाड़ी स्वयं खींच सकें। कुटीर उद्योग, कृषि करने की विशिष्ट तकनीक, ड्रॉइंग, पेंटिंग छोटे-छोटे मोटरपार्ट्स बनाना, इलेक्ट्रॉनिक के सामानों को ठीक करने, बनाने की प्रवीणता जैसे अनेकों प्रकार के शिक्षण प्रचलित हैं। कितने ही छात्र विद्यार्थी जीवन में ही इनमें अपनी प्रतिभा विकसित करके स्वावलम्बी होकर शिक्षा-अर्जन करते रहते हैं। किन्हीं कारणों से जो आगे की शिक्षा नहीं प्राप्त कर पाते वे अपना स्वतन्त्र व्यवसाय खोल लेते हैं अथवा फिर किसी-न-किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान में सहज ही रोजगार उपलब्ध कर लेते हैं।

विशिष्ट शिक्षा के लिए वे ही छात्र उन्मुख होते हैं जो अत्यंत मेधावी होते हैं और भविष्य में शोध-प्रयोजनों में अपनी क्षमता लगाना चाहते हैं। कई देशों में तो देश की आवश्यकता के अनुरूप शिक्षा दी जाती है। जिस विभाग में जितने व्यक्तियों की जरूरत होती है, उतने ही व्यक्ति उस विषय में नामाँकित किए जाते हैं। फलस्वरूप असन्तुलन की स्थिति नहीं उत्पन्न होने पाती और न ही अपने देश जैसी स्थिति आती है कि विशिष्टता हासिल करने के बाद भी युवाओं को रोजगार के लिए भटकना पड़े। अपने देश में भी यह व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। देश को प्रतिवर्ष कितने अध्यापकों, कितने इंजीनियरों, कितने चिकित्सकों की आवश्यकता है, इसका पूर्व निर्धारण हो सके तथा इन विषयों में विशिष्टता प्राप्त करने में नामांकन पर प्रतिबन्ध लगाकर उतने ही छात्र लिए जाएँ तो आज की स्थिति का सामना न करना पड़े। विशिष्ट शिक्षा प्राप्त करने वालों के लिए यही रीति-नीति उचित है।

सामान्य शिक्षा प्राप्त करने वालों के साथ तकनीकी ज्ञान का प्रशिक्षण अनिवार्य रूप से जुड़ा होना आवश्यक है। अपने यहाँ हाईस्कूल, इण्टर अथवा बी.ए. पास करने के बाद यदि किसी सरकारी दफ्तर में नौकरी नहीं मिलती, तो युवकों को बेकार बैठना पड़ता है। उनमें इतनी अतिरिक्त योग्यता नहीं होती, जिसके बलबूते कोई स्वतन्त्र रोजगार अथवा व्यवसाय कर सके। फलस्वरूप दर-दर भटकना ही उनकी नियति बन जाती है। प्रचलित शिक्षा के साथ औद्योगिक प्रशिक्षण का क्रम समाविष्ट किया जाना अनिवार्य है, जिससे छात्रों में स्वावलम्बन के लिए आत्मविश्वास पैदा हो सके और पढ़ाई छूटने के बाद उस तकनीकी योग्यता के सहारे छोटे-छोटे उद्योग खोलकर अपना निर्वाह कर सकें। बेरोजगारी और अधिक न बढ़े, इसके लिए शिक्षा के साथ उपयुक्त व्यवस्था जितनी शीघ्र बनायी जा सके उत्तम है।

इस क्रम में निम्नलिखित प्रयास किए जा सकते हैं।

1- प्राइमरी तक की शिक्षा प्रत्येक नागरिक के लिए अनिवार्य होनी चाहिए। 2-

2- सरकार की ओर से इस प्रकार का सर्वेक्षण होना चाहिए कि देश में किस प्रकार के कार्यों के लिए, कितने व्यक्तियों की आवश्यकता है। इस आवश्यकता के अनुसार ही विद्यार्थियों को उन-उन विषयों की शिक्षा देनी चाहिए।

3- उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए हर किसी व्यक्ति को कॉलेज में प्रवेश की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। अपितु प्रतिभा, योग्यता और आवश्यकता के अनुसार ही उन्हें प्रवेश कराना चाहिए।

4- बालक को उसकी रुचि-रुझान के अनुरूप ही शिक्षा देनी चाहिए। मनोवैज्ञानिक परीक्षणों से उसकी रुचि किस ओर है, यह जान करके उसी विषय की शिक्षा दिलानी चाहिए। किसी बालक की रुचि यदि साहित्य में है, परन्तु अभिभावक उसे विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने को विवश करें, तो निश्चित ही वह अपनी प्रतिभा का समुचित उपयोग न कर पाएगा। ऐसी स्थिति में वह न तो वैज्ञानिक बन पाएगा, न ही साहित्यकार।

5- 8 वीं कक्षा के बाद ही विद्यार्थियों को उपयुक्त विषयों के विशेष अध्ययन में लगा दिया जाए, तो समय भी बचे और धन भी।

6- विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ-साथ शारीरिक श्रम के लिए भी प्रोत्साहित करना चाहिए। उन्हें हस्तशिल्प, कुटीर उद्योग आदि की शिक्षा देनी चाहिए, जिससे कि आवश्यकता पड़ने पर वे उनके द्वारा अपनी आजीविका भी कमा सकें।

7- शिक्षित व्यक्ति कुछ ही घण्टे काम करके अधिक धन प्राप्त कर लेते हैं, जबकि अशिक्षित व्यक्ति सारे दिन लगे रहकर भी अपना पेट नहीं भर पाते। यह विषमता कम होनी चाहिए तथा श्रमिकों को उचित वेतन एवं सामाजिक प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए।

परिश्रम करने के प्रति जो दृष्टिकोण आज का शिक्षित वर्ग अपनाने लगा है, वह हीनतम वृत्ति है। शिक्षितों की बेरोजगारी समस्या के हल में यह एक व्यापक मनोवैज्ञानिक अवरोध है। अंग्रेजी हुकूमत ने ऑफिस में काम करने वाले बाबुओं को प्रतिष्ठा दी, वह अब भी भारतीय मानस में बैठी चली आ रही है। बाबूगिरी का काम करने वाले, कुर्सी पर बैठकर कलम घिसने वाले व्यक्ति बड़े होते हैं तथा शारीरिक श्रम करने वाले, छोटे-मोटे काम करने वाले छोटे। यह बेतुकी मान्यता आज भी अपने देश में प्रचलित है। राष्ट्रीय मानस से जब तक इस ग्रन्थि को नहीं निकाल फेंका जाता, तब तक बेरोजगारी की समस्या का हल आकाशकुसुम ही बना रहेगा।

शान्तिकुञ्ज-जिस देवसंस्कृति के विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए कृत-संकल्पित है, उसमें स्वावलम्बन संकाय का महत्वपूर्ण स्थान है। इस स्वावलम्बन संकाय का उद्देश्य मात्र कुटीर उद्योगों-गृह उद्योगों के प्रशिक्षण तक ही सीमित नहीं है, अपितु ऐसी राष्ट्रव्यापी मानसिकता का निर्माण करना है, जो श्रम करने में संकोच न करें। श्रम की प्रतिष्ठा को स्वयं की प्रतिष्ठा एवं राष्ट्र की प्रतिष्ठा माने। आज के समय में स्वाभिमानपूर्वक स्वावलम्बी जीवन-निर्वाह की सुविधा एवं क्षमता हर व्यक्ति तक पहुँचाना आवश्यक हो गया है। इसके बिना न तो व्यक्ति जीवन में सुनिश्चितता सम्भव है और न सामाजिक कार्यों में स्थिरतापूर्वक योगदान किया जा सकता है। आज के दौर में भौतिक प्रगति के साथ अर्थकेन्द्रित जीवनपद्धति विकसित और स्थापित हो चुकी है। अर्थोपार्जन की अंधी दौड़ से लोगों को बचाना जितना जरूरी हो गया है, उतना ही आवश्यक है उन्हें औसत स्तर के जीवन-निर्वाह योग्य अर्थोपार्जन की रीति-नीति सिखाना।

यह कार्य व्यक्तिगत सम्पन्नता बढ़ाने के लिए आतुर स्वार्थकेन्द्रित व्यक्तियों के बस का नहीं। इस हेतु जन-जीवन से अभाव मिटाने के लिए संकल्पित, परमार्थनिष्ठ व्यक्तियों को आगे आना होगा। स्वावलम्बन संकाय के अंतर्गत ऐसे ही ऋषि सम्मत अर्थनीति के प्रति आस्थावान् व्यक्तियों को प्रशिक्षित किया जाएगा। व्यक्ति स्वावलम्बी होंगे तो देश स्वावलम्बी होगा। इसी आधारभूत सत्य को ध्यान में रखकर स्वावलम्बन संकाय के अंतर्गत जड़ी-बूटियों और विभिन्न कृषि-उत्पातों को क्षेत्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों तक पहुँचाने के लिए ताना-बाना बुना जा रहा है। इसके संचालन एवं प्रबन्धन के लिए योग्य व्यक्तियों को प्रशिक्षित किया जाएगा।

कुटीर उद्योगों एवं ग्रामोद्योगों के माध्यम से जनजीवन के लिए उपयोगी वस्तुओं के प्रमाणित उत्पादन, निरीक्षण एवं वितरण हेतु प्रशिक्षक तैयार करने की व्यापक रूपरेखा बनायी जा रही है। इस क्रम में पर्यावरण के संरक्षण एवं सन्तुलन को बनाए रखने योग्य विभिन्न उद्योगों के विकास-विस्तार एवं प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की जानी है। हरीतिमा-संवर्द्धन भूमि-संरक्षण पशुधन-गोधन संरक्षण, पशु-ऊर्जा से घरेलू एवं ग्रामोद्योगों के संचालन सम्बन्धी शोध-अनुसंधान की व्यवस्था भी विचारणीय है, इसके लिए आवश्यकता होने पर मिशन के स्तर पर सहकारी संगठनों की स्थापना और उनमें कुटीर उद्योगों के प्रचलन को जन-स्तर पर किया जाएगा। इस क्रम में स्वावलम्बन संकाय को स्वावलम्बन आन्दोलन की गंगोत्री बनाए जाने का संकल्प उभरा है। इस महत कार्य के लिए थोड़े-से विचारशील और समर्थ परिजन उठ खड़े हों तो जो समस्या आज सभी के लिए सिरदर्द बनी हुई है, उसका हल देखते-देखते निकल सकता है। इस आन्दोलन में भागीदारी उज्ज्वल राष्ट्रीय जीवन के लिए उठाया जाने वाला सार्थक एवं समर्थ कदम होगा।


वसन्त (kahani)

“वसन्त इतना न हँसो, जानते नहीं हो तुम। मैं तुम्हारा पतझड़ तुम्हारे आगे खड़ा हूँ। “

“जानता हूँ पतझड़!’ बसन्त बोल-तुम मेरा नाश कर दोगे पर तुम यह नहीं जानते कि दुबारा फिर आऊँगा, तब मेरा स्वागत नई कोपलें, नये पल्लव, नये फूल कर रहे होंगे और तब मैं और भी वेग से संसार का सौंदर्य बढ़ा रहा होऊँगा।”


सतयुग की वापसी सुनिश्चित करने वाली शिक्षा-प्रणाली

सुसंस्कारों से भरी-पूरी जीवन-प्रक्रिया ही सतयुग की वापसी को सुनिश्चित और सम्भव बना सकती है। मानवीय व्यक्तित्व का मूल्याँकन इसी आधार पर होता है। महत्वपूर्ण कार्य इसी के सहारे बन पड़ते हैं। गौरव-गरिमा इसी के आधार पर निखरती है। महामानवों में गणना कराने वाली विभूति यही है। अपने देश का अतीत इसी के बल पर उज्ज्वल रहा है। इसके लिए शिक्षा-प्रणाली का स्वरूप कुछ इस ढंग से रखा गया था, जिसके सहारे व्यक्ति अनिवार्य रूप से सभ्य एवं सुसंस्कारी बन सके। शिक्षा की सार्थकता भी ऐसा ही सान्निध्य-संपर्क देने एवं वातावरण का निर्माण करने में है। अनुकरणप्रिय वृत्ति होने के नाते मनुष्य को ऐसा सान्निध्य और वातावरण चाहिए, जिससे सद्गुणों का निरन्तर अभ्यास बढ़ता रहे। पठन-पाठन अध्ययन-चिन्तन का उपक्रम ऐसा होना चाहिए, जिससे चेतना का स्तर सुविकसित होता हों सुसंस्कारों की विभूति जिसे उपलब्ध है, वह शरीर से चाणक्य जैसे कुरूप, अष्टावक्र जैसा अपंग एवं सुदामा जैसा निर्धन होते हुए भी इन कमियों के कारण जीवन के किसी भी क्षेत्र में रुकता नहीं, सफलता की दिशा में दुर्गति से आगे बढ़ता जाता है।

अतीतकाल में भारत देवमानवों की निवासस्थली देवभूमि माना जाता रहा है। इसका कारण यहाँ जन्मने वालों के कायाकलेवर सम्बन्धित विशेषता से कोई सम्बन्ध नहीं रहा है। शरीरों की रचना जैसी पुरातनकाल में थी, वैसी ही अब भी है। सच तो यह है कि साधन-सुविधाओं की दृष्टि से हम अपने पूर्वजों की तुलना में कहीं अधिक सुसम्पन्न हैं। कमी है तो मात्र सुसंस्कारिता की। इस अभाव के कारण ही व्यक्ति हर दृष्टि से दीन-हीन हो गया है। धूर्तता, वितृष्णा जैसे दुर्गुणों के कारण व्यक्ति सम्पन्न और शिक्षित कहाते हुए भी असन्तोष और उद्वेग से हर घड़ी घिरा रहता है। स्वयं बेचैन रहता है और अपने संपर्क-क्षेत्र में आने वाले हर किसी को चैन से नहीं रहने देता।

पुरातनकाल के सतयुगी वातावरण को वापस लाने के लिए हमें सुसंस्कारिता का वातावरण पुनः बनाना होगा। यह कही बाज़ार में नहीं बिकती और न पेड़ों पर लगती है। इसके लिए व्यक्तित्व को गढ़ने-ढालने वाली शिक्षा-प्रणाली को फिर से लागू करना होगा। तभी ऐसे व्यक्ति उपजेंगे एवं पनपेंगे, जिनका कार्यक्षेत्र सज्जनों से घिरा और शालीनता की विचारधारा से भरा होगा। पहले घर-परिवार एवं समाज इसी विशेषता से भरे-पूरे थे। उनके सामने ऐसा चिन्तन रहता था, जिसके कारण आदर्शवादिता उनके कार्यों में घुली रहती थी। एक-दूसरे को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने, औरों के लिए समय निकालने, ध्यान देने की अनिवार्यता सभी के जीवन में थी। अब यह परम्परा एक तरह से समाप्त हो गयी है।

जब संस्कार ही अच्छे नहीं रहे, तो जीवन कहाँ से अच्छा होगा? संस्कारों को सतही तौर पर न देख पाने के बावजूद इनका प्रभाव स्पष्ट है। जीवन समुद्र की तरह है। समुद्र जैसा कुछ बाहर से दिखाई देता है, वस्तुतः वैसा ही या उतना नहीं है। बाहर की सतह पर सिर्फ कुछ लहरें उठती या तैरती दिखाती है। सब कुछ समतल लगता है। पर भीतर इसके सिवाय भी बहुत कुछ है। उसकी गहराई मीलों की है। प्रचण्ड जलधाराएँ बहती हैं। लाखों प्रकार के जलचर इतनी अधिक संख्या में हैं, जितने इस धरती पर भी नहीं रहते। खनिज तथा दूसरे प्रकार के पदार्थ असीम मात्रा में भरे पड़े हैं। इतनी विशालता एवं व्यापकता है समुद्र की, यह उतना स्वल्प नहीं जितना कि खुली आँखों से सतही तौर पर दिखता है।

ऐसी ही कुछ इनसानी जिन्दगी है। उसकी सतह छोटी है। खाना, कमाना, सोना, हँसना, रोना जैसे क्रिया–कलापों की हलचल मात्र जीवन नहीं है। शरीर और परिवार के दायरे तक वह सीमित नहीं है। जीवन की तह में अनेक प्रकार के सुख-दुख आनन्द, इच्छाएँ, आकर्षण, विग्रह, उद्वेग, भ्रम, भय भरे पड़े हैं। उसमें परस्पर विरोधी प्रचण्ड धाराएँ बहती हैं, जो एक-दूसरे से टकराती भी हैं और एक दूसरे को उदरस्थ भी करती हैं। विस्फोट, कम्पन और तूफान भी आते हैं और कई बार ऐसे अप्रत्याशित शक्तिचक्र उफन पड़ते हैं, जिनसे समूचा वातावरण प्रभावित होने लगता है। इस तरह इनसानी जीवन उतना सतही नहीं है, जितना कि आमतौर पर समझ लिया जाता है।

हालाँकि सतही समझ और सोच के कारण प्रायः यही सिखाया जाता है कि जीवन का मकसद क्लर्क, अफसर, व्यापारी डॉक्टर आदि बनना है। स्कूल-कालेजों का समूचा ढाँचा-ढर्रा इसी के लिए है। शिक्षा के प्रचलित उपक्रम में कहीं कोई नहीं बताता कि जीवन का क्षेत्र कितना बड़ा और कितना गहरा है। उसे ठीक तरह समझने और उपलब्धियों से लाभान्वित होने के लिए सोचने और करने का सही तरीका क्या होना चाहिए?

सारे शैक्षिक सरंजाम परीक्षाएँ कराने में व्यस्त हैं। बौद्धिक कुशलता के आधार पर उन्हें श्रेणी प्रदान की जाती है। उपलब्ध परीक्षा-अंकों के आधार पर उनके स्तर का वर्गीकरण किया जाता है। जिसे कम अंक मिले उसे अधिक नम्बर पाने वाले की तुलना में हेय ठहराया जाता है। इस प्रकार ऊँच-नीच के आधार पर टिकी एक नए किस्म की जाति-बिरादरी खड़ी की जाती है। हो सकता है कि मस्तिष्क का एक अंश प्रकृति प्रदत्त ढंग से विकसित होने के कारण कोई छात्र बहुत अच्छी श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ हो, किन्तु जीवन के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उसकी पहुँच बहुत ही भौंड़ी और गन्दी हो। क्या मानवीय श्रेष्ठता का श्रेय सिर्फ परीक्षाओं के आधार पर निर्धारित होना सम्भव है?

शिक्षा का प्रयोजन केवल छात्रों को कमाऊ बना देने तक नहीं समेट दिया जाना चाहिए। यदि बात इतनी ही होती, तो उन्हें उतना श्रम कराने और समय गँवाने की क्या आवश्यकता है। बाप-दादों के धन्धे में कुशलता बिना पड़े या कम पढ़े होने पर भी प्राप्त की जा सकती है। इससे आमदनी भी नौकरियों में मिलने वाली राशि की अपेक्षा अधिक ही होगी। शिक्षा का उद्देश्य इससे कहीं अधिक विस्तृत होना चाहिए। यदि जानकारियाँ मस्तिष्क में ठूँसते रहने का नाम ही शिक्षा है, तो उसका सरल तरीका यह है कि काई साक्षर व्यक्ति विश्वकोष उठाकर अपनी रुचि के विषयों का विवरण पढ़ने लगे, तो उसे इतनी अधिक जानकारियाँ उपलब्ध हो जाएँगी, जितनी प्राध्यापकों को भी नहीं होती। इतनी-सी बात के लिए कष्टसाध्य पढ़ाई में सिर क्यों खपाया जाए? समय क्यों गँवाया जाए?

शिक्षा का सही मकसद है, व्यक्ति में अच्छे संस्कारों का बीजारोपण साथ ही उसे यथार्थता का ज्ञान देना। दुनिया वैसी ही नहीं है, जैसी कि हमें दिखाई देती है या बताई जाती है। व्यक्ति और समाज की समस्याएँ वहीं नहीं है जिनकी चर्चा की जाती रहती है। यथार्थता की तली तक पहुँचने के लिए किस प्रकार की गोताखोरी की जानी चाहिए, इसी कला को सिखाना शिक्षा का उद्देश्य है। भ्रान्तियों, विकृतियों, कुसंस्कारों के बन्धनों से छुटकारा पाकर अच्छे संस्कार एवं स्वतन्त्र चिन्तन की क्षमता पाना ही जीवन जीने का मकसद है। इसी से जीवन और जगत की यथार्थ स्वरूप का बोध होता है। तत्त्वदर्शियों ने इसी को मुक्ति कहा है, जिसे केवल संस्कारवान आत्माएँ ही प्राप्त करती हैं।

इसे पाने के लिए छात्र में ऐसे संस्कारों एवं साहस को विकसित करना पड़ेगा कि वह विवेक और तथ्य का सहारा लेकर यथार्थता की तह तक पहुँच सके। सभी तरह के भ्रम-जंजालों के आवरण चीरकर जो लोग सत्य को समझने और स्वीकार करने में तत्पर हो सकें, ऐसी ऋतम्भरा-प्रज्ञा को प्रसुप्ति से विरतकर सक्रिय जागरण में संलग्न करना ही विद्या का मूलभूत उद्देश्य है। यदि हमें ऐसा कुछ सीखने को नहीं मिलता, हमारे, अन्तःकरण में सुसंस्कारों का संवर्द्धन नहीं होता, तो शिक्षा कैसे पूरी हुई?

आज सर्वत्र भय, अविश्वास, सन्देह और आशंका का साम्राज्य व्याप्त है। हर व्यक्ति बेतरह डरा हुआ है। अवांछनीय और अनुचित को जानते-मानते हुए उसे अस्वीकार करने का साहस नहीं होता। अपनी मौलिकता मानों मनुष्य ने खो दी है। अपने पास मानों उसकी कोई समझ है ही नहीं। कुसंस्कार उसे बुरी तरह से जकड़े हुए हैं। इन्हीं के चक्रव्यूह में फँसी हुई उसकी मनोभूमि एक प्रकार से पराधीनता के पाश में जकड़ी हुई है। ऐसे बंदिश और बाधित व्यक्ति को शिक्षित कैसे कहा जाए? शिक्षा की सार्थकता तो मनुष्य की स्वतन्त्र चेतना को कुसंस्कारों की मूर्छना से विरत करने में है। उसे इस योग्य बनाने में है कि वह जीवन का स्वरूप समझ सके, समस्याओं की तह तक पहुँच सके, यथार्थ निर्णय कर सके और औचित्य को अपनाने के लिए साहसपूर्वक अड़ सके।

आज के दौर में धर्मशास्त्रों, राजनेता, मनीषी और कलाकारों के प्रतिपादन परस्पर विरोधों और भ्रान्तियों से भरे पड़े हैं। इनमें से किसी सही ठहराया जाए, किसे गलत कहा जाए अथवा इनमें कितना अंश उपयोगी, कितना अनुपयोगी है? इसका निर्णय अच्छे संस्कारों एवं स्वतन्त्र चिन्तन का विकास किए बिना और किसी तरह हो ही नहीं सकता। जब तक सुसंस्कारों का संवर्द्धन नहीं किया जाता, तब तक मानव जीवन की, विश्ववसुधा की कुरूपता को हटाना किसी भी तरह सम्भव नहीं। यह संसार, मानव-जीवन सुन्दर और सुखद बनाया गया है, पर कुसंस्कारजन्य दुर्बुद्धि ही है, जिसने सब कुछ विकृत और दुखद बनाकर रख दिया। इस विडम्बना से मुक्ति दिला सकने की क्षमता केवल सार्थक शिक्षा में है। शिक्षा वहीं है, जो मानवीय अन्तःकरण में अच्छे संस्कारों को पल्लवित कर सके, ढर्रे में घुसे हुए अनौचित्य को हिम्मत और निर्भयता के साथ निकाल कर फेंक सके।

पुरानी दुनिया अब टूट रहीं है। प्रचलित ढर्रे अब बिखरने ही वाले हैं। युद्धों से, दाँव-पेंचों से, अभाव से, दारिद्रय से, शोषण, उत्पीड़नों से, छल-प्रपंचों से आम आदमी ऊब चुका है। सुविधा-साधनों की बढ़ोत्तरी के साथ दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि भी बेहिसाब हो रही है। जो चल रहा है, उसे चलने दिया जाए, तो आज के समय का शोषण कल वीभत्स और नग्न रक्तपात के रूप में सामने आ खड़ा होगा और मानवी सभ्यता बेमौत मर जाएगी। उस स्थिति को बदले बिना और कोई चारा नहीं। नई दुनिया अगर न बनाई जा सकी, तो इस बढ़ती हुई घुटन से मनुष्यता का दम घुट जाएगा।

नई दुनिया का निर्माण संस्कारवान व्यक्ति ही कर सकते हैं। पहले भी गुरुकुल-आरण्यकों से निकले तपःपूत महापुरुषों ने इस मोर्चे पर अपने साहस के जौहर दिखाए थे। उनके समर्थ संकल्प एवं सार्थक बलिदान ने अतीत के भारत में सतयुगी दृश्य साकार किए थे। आज पुनः इसी लोकोत्तर परम्परा की आवश्यकता है। क्योंकि वर्तमान की सड़न को यथावत चलने दिया गया तो उससे असह्य विपत्ति ही बढ़ेगी। तथ्य यही बताते हैं कि अब तो नई दुनिया में ही मनुष्य जीवन रह सकेगा और विश्व का सौंदर्य स्थिर रह सकेगा। ऐसा नवीन विश्व जीवन्त लोगों द्वारा ही विनिर्मित हो सकेगा। अतएव जीवन में सत्-संस्कारों का बीजारोपण करने वाली, उन्हें पुष्पित-पल्लवित करने वाली समग्र शिक्षा की व्यवस्था हमें करनी ही पड़ेगी। इसके बिना प्रगति की समस्त संभावनायें अवरुद्ध ही पड़ी रहेंगी।

युग-सन्धि के इस ऐतिहासिक पर्व पर जिन कामों को शीघ्रता से पूरा करना है, उनमें से यह सर्वप्रमुख है। इसका विशेष उत्तरदायित्व अग्रिम पंक्ति में खड़े होने वाली जाग्रत आत्माओं का है। उन्हें समय की आवश्यकता को देखते हुए, लोकहित की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपने को खपाना चाहिए, ताकि उनके पीछे अनेकों चलें। यह महत कार्य देखने में किसी को भले ही थोड़ा कठिन लगता हो, परन्तु वह है सर्वथा सामयिक और श्रेयस्कर ही।


आत्मा की बात (Kahani)

भूखे-प्यासे साधु के मन ने कहा-काया को कष्ट क्यों देते हो, किसी से भीख माँग लो।” साधु अभी एक ओर मुड़ने ही वाले थे कि आत्मा बोली-जिससे माँगोगे वह भी तो तुम्हारे जैसा होगा। तुम स्वयं क्यों नहीं कमा लेते?”

मन ने कहा-तुम तो तपस्वी हो, अपरिग्रही हो तुम्हें कमाना नहीं चाहिए।”

आत्मा ने तत्काल उत्तर दिया-यदि अपरिग्रह का यह अर्थ है तो उससे अच्छा तो परिग्रह ही है, जो कम से कम हाथ तो नहीं फैलाता।”

साधु ने आत्मा की बात सुनी और उस दिन से साधना-उपासना के साथ स्वावलम्बी जीवन का अभ्यास भी प्रारम्भ कर दिया।”


भारतीय विद्याओं का पुनर्जीवन समय की अनिवार्य आवश्यकता

अतीत का विश्वगुरु भारत। बीसवीं सदी के अन्तिम दशक का अन्तिम चरण। पर्यावरण में प्रदूषण की अन्तहीन परतें। भ्रष्टाचार और विदेशी कर्ज के असह्य बोझ की विकल छटपटाहट। ज्ञान और तकनीक के लिए औरों के सामने अनोखी दयनीयता। बढ़ती हिंसा, अलगाव एवं आतंक के गहरे स्याह कुहरे में सहस्राब्दियों के प्रयत्न से विकसित देश की आत्म-छवि धूमिल, अदृश्यप्राय।

क्या यह वही देश है जहाँ याज्ञवल्क्य, वामदेव प्रभृति महर्षियों ने ज्ञान के अलौकिक आयाम खोजे थे, जहाँ की विचार-परम्परा में समस्त सृष्टि को ब्रह्म का प्रतिरूप माना गया था। वह देश, जहाँ नारी शक्ति मानी जाती थी और जिसकी पूजा को सामाजिक आदर्श बनाया गया था? जहाँ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने गायत्री महाविद्या का अन्वेषण करके धियो यो नः प्रचोदयात् के रूप में समस्त मनुष्य जाति को सन्मार्ग की राह सुझायी थी। क्या यह वही महादेश है, जहाँ गणित, विज्ञान के अनेकों नवीन सिद्धान्तों के साथ आयुर्वेद, ज्योतिषशास्त्र जैसी अलौकिक विद्याएँ जन्मी थीं।

इसी देश में वर्धमान महावीर ने जीव दया का सिद्धान्त प्रतिपादित किया था और अहिंसा को परमधर्म के रूप में प्रतिष्ठित किया था। वह देश जिसमें गौतम बुद्ध का महाकरुणा का सिद्धान्त जन्मा और पल्लवित-पुष्पित हुआ। क्या यह वही देश है, जहाँ दरिद्र-समुदाय में स्वामी विवेकानन्द ने नारायण के दर्शन किए थे, जहाँ की राजनीति में महात्मा गाँधी ने सत्य और शुचिता के बीज बोए थे। इसी देश की धरती में तो सुभाष बोस, भगतसिंह और चन्द्रशेखर आजाद सरीखे वीरों ने अपने लहू से बलिदानों की कथाएँ लिखी थीं।

आज तो सब कुछ बदला-बदला नजर आता है। पुराना कुछ भी तो पहचाना नहीं जाता। विचार हों या परम्पराएँ अथवा फिर जीवनशैली, विदेशों की नकल ही अपना राष्ट्रीय आदर्श बन चुका है। वैज्ञानिकता हो या अर्थनीति, हर कहीं हम विदेशियों के अनुयायी हैं। हिंसा मनोरंजन बन गयी है, क्रूरता उसका अन्तःकरण। नारी के प्रति आदर छेड़-छाड़ में अभिव्यक्त होता है, उसका चरम है बलात्कार। कम दहेज को निमित्त बनाकर कितनी स्त्रियाँ रुलाई जाती हैं, जलाई जाती है-यही है नारी का सम्मान, उसकी पूज? हिंसा के बढ़ते ज्वार ने जीव-दया और करुणा के प्रकाश-स्तम्भों को ध्वस्त कर दिया। भारतीय ज्ञान व विचार की परम्पराएँ इतिहास के पृष्ठों में जा छुपी हैं। समस्त भारतीय विधाएँ स्थिति की विपन्नता पर आँसू बहा रही हैं। उनके रुदन के स्वर स्पष्ट हैं।

यह विष का लावा कहाँ फूटा? राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के पाँच दशक में अपनी सीमित आर्थिक-प्राविधिक उपलब्धियों के बावजूद हम नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक रूप से एकाएक अपंग क्यों हो गए? साँस्कृतिक विघटन की प्रक्रिया चुपचाप चलती रही, हमें उसका अहसास तब हुआ, जब उसने अपने एक तेज झटके से हमारी मूल आशाओं और मान्यताओं को ही तहस-नहस कर दिया। खण्डित परम्पराओं और विश्रृंखलित मूल्यों के अवशेषों को सहे जाते हुए हम आज यह सोचने के लिए विवश हैं। यह क्या हुआ कैसे हो गया? स्वाधीनता प्राप्ति के बाद माहौल इतनी तेजी से क्यों बदला? पाँच हजार वर्षों की परम्पराएँ पचास वर्षों में अवमूल्यित कैसे हो गयीं? विदेशी निर्भरता कैसे हमारे आत्म-सम्मान को बहा ले गयी?

इन सारे महाप्रश्नों के पीछे झाँकती है, हमारी आत्म-उपेक्षा आत्म-अवमानना एवं आत्महीनता। ‘नात्मानंवसादयेत’ के महामंत्र को हम भारतीय प्रायः भूल चुके हैं। यदि कभी हम लोग इस राष्ट्रीय अवसाद से उबरने का प्रयत्न करते भी हैं, तो सिर्फ अतीतजीवी होकर। यह स्मरण ही हमारे लिए पर्याप्त होता है कि हमारे पूर्वज-पूर्व पुरुष महान थे और उन्होंने महानतम कार्य किए। इन उपलब्धियों की वर्तमान में कोई आवश्यकता है, यह सोचने के लिए न तो हममें हिम्मत है, न ही फुरसत। भारतीय विद्याओं के पुनर्जीवन हेतु इन पर गहन शोध-अनुसंधान की बात सोचने वाले कितने होंगे? यह शायद राष्ट्रीय सर्वेक्षण की वस्तु है, जबकि समस्या का समाधान, वर्तमान विपन्नता का एकमात्र हल समय की अनिवार्य आवश्यकता यही है।

भारतीय विद्याओं को पुनर्जीवन ही हमारे राष्ट्रीय माहौल को बदल सकता है। इसमें आमूलचूल परिवर्तन ला सकता है। इसकी ज्ञान की धाराएँ ही हमारी आस्थाओं, मान्यताओं, भावनाओं, विचारों प्रवृत्तियों, रूढ़ियों का शोधन कर सकती हैं। हमें आँतरिक अवसाद और आत्महीनता की पीड़ा से सदा-सदा के लिए छुटकारा ला सकती है और इसकी वैज्ञानिक धाराएँ आर्तक्रन्दन करते हुए राष्ट्रीय जीवन के लिए अमृत कलश हैं। आयुर्वेद एवं यज्ञ विज्ञान से समर्थ विधा भला स्वास्थ्य-संकट एवं पर्यावरण-संकट से उबरने कि लिए और क्या होगी?

भारतीय विद्याओं की इस महासामर्थ्य के बलबूते ही शान्तिकुञ्ज ने राष्ट्रव्यापी ही नहीं, विश्वव्यापी नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति का महासंकल्प लिया है। देवसंस्कृति के विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ इन पर व्यापक शोध-अनुसंधान के महान आयामों को विकसित किया जाना है। शुरुआती दौर में यह प्रक्रिया आयुर्वेद, मंत्रविद्या, यज्ञविद्या, ज्योतिर्विज्ञान तक ही भले सीमित रहे, परन्तु थोड़े ही समय में इसकी विधि शाखाएँ-प्रशाखाएँ आना स्वरूप और आकार ग्रहण करने लगेंगी। इस प्रयास का एक ही उद्देश्य है, राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय गौरव की वापसी। यह इस महान सत्य की उद्घोषणा है- भारत के पास अभी भी विश्व को अजस्र अनुदान देने की सामर्थ्य है।

अपने समय की इस अनिवार्य आवश्यकता को पूरा करके ही हम सही ढंग से अपने राष्ट्रीय एवं मानवीय दायित्व का निर्वाह कर सकते हैं। भारतीय विद्याओं के पुनर्जीवन हेतु शोध और अनुसंधान का जो ढाँचा यहाँ खड़ा किया गया है और आगे किया जाना है, वह एक स्थानीय संस्था में चलने वाला प्रयोग-परीक्षण भर नहीं है। वरन् आशा की गयी है कि साधनों के अभाव में अभी छोटे रूप में प्रयोगात्मक आधार दिया जाए, तो आगे यह निश्चित रूप से विस्तृत रूप लेगा। इसकी सफलता ही-इक्कीसवीं सदी में राष्ट्रीय जीवन में उज्ज्वल भविष्य का स्वरूप ग्रहण करेगी।


चिरपुरातन आयुर्वेद की गौरवमयी परम्परा

भारतीय विद्याओं में आयुर्वेद की गौरवमयी परम्परा है। महर्षियों ने इसे अतिपुरातन और शाश्वत कहा है। सुश्रुत के अनुसार, ब्रह्मा ने सृष्टि के पूर्व ही इसकी रचना की। सभी संहिताकारों ने ब्रह्मा से आयुर्वेद का प्रादुर्भाव माना है। भारतीय वांग्मय के प्राचीनतम ग्रन्थ वेदों में आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति ने प्राप्त किया। प्रजापति से अश्विनीकुमारों ने और उनसे इन्द्र ने उस ज्ञान को प्राप्त किया- ब्रह्मणा हि यथाप्राक्तमायुर्वेदं प्रजापतिः। जग्राह निखिलेनादावश्विनौ तु पुनस्ततः। मनीषियों ने आयुर्वेद को उपवेद के रूप में स्वीकार किया है। यद्यपि कुछ विद्वान इसे ऋग्वेद का तथा अधिकाँश अथर्ववेद का अविच्छिन्न अंग मानते है। चरणव्यूह तथा प्रस्थानभेद में आयुर्वेद शब्द का प्रयोग हुआ है और वहाँ इसे ऋग्वेद का उपवेद माना गाया है, जबकि चरक, सुश्रुत, कश्यप आदि आयुर्वेदीय संहिताएँ आयुर्वेद का संबन्ध अथर्ववेद से मानती हैं। वैसे अधिकाँश विद्वानों के अनुसार, चिकित्साशास्त्र का उपजीव्य मुख्यतः अथर्ववेद ही है। इसकी नौ शाखाएँ हैं- पैप्पलाद, तौढ़, मौद, शौनकीय, जलद, ब्राह्मपद, देवदर्श एवं चारणवैद्य। गोपथ ब्राह्मण में इसे यद् भेषजं तद् अमृतं यद् अमृतं तद् ब्रह्म के रूप में निरूपित किया गया है।

अथर्ववेद भृग्वडिंगरस के रूप में भी प्रसिद्ध रहा है। अश्विनौ के समान अथर्वण और अंगिरस युग्म भी चिकित्सा की दो प्रचलित पद्धतियों की ओर संकेत करता है। अथर्वण मुख्यतः दैवव्यापाश्रय चिकित्सा करते थे और अंगिरस अंगों के रस से सम्बन्ध रखने के कारण युक्तिव्यापाश्रय से सम्बन्धित थे। व्यवहार में वे क्रमशः सोम और अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करते थे। वेदों में रुद्र, अग्नि, वरुण, इन्द्र, मरुत आदि देवता भिषक कहे गए हैं। परन्तु अश्विनीकुमारों को देवानां भिषजौ के रूप में निरूपित किया गया है। अश्विनीकुमार आरोग्य, दीर्घायु, शक्ति, प्रज्ञा, वनस्पति तथा समृद्धि के प्रदाता कहे गए है। वे सभी प्रकार की औषधियों के ज्ञाता थे। आथर्वण दधिचि से उन्होंने मधुविद्या और प्रवर्ग्यविद्या की शिक्षा प्राप्त की, अश्विनौ ने वैदिक देवताओं की चिकित्सा की थी। ये काय-चिकित्सा एवं शल्य-चिकित्सा सम्बन्धी दोनों कार्यों में दक्ष थे। आयुर्वेद के आठ अंगों में ये दोनों अंग ही प्रधान है, शेष अंग सामयिक हैं। इन दो प्रधान अंगों के मिश्रित होने से अश्विनौ एक उपाधि थी, जो काया-चिकित्सा एवं शल्य-चिकित्सा दोनों में ही दक्ष व्यक्तियों को प्रदान की जाती थी।

औषधियों तथा स्वास्थ्य से सम्बन्ध रखने वाले दूसरे देवता रुद्र वेदों में वर्णित है। रुद्र को चिकित्सकों में श्रेष्ठतम चिकित्सक कहा गया है-भिषक्तमं त्वा भिषजां श्रृणोमि (ऋग्वेद 2।33।4) रुद्र से औषधियों की याचना हुई, स्तुतस्त्वं भेषजा राशस्यमें (ऋग्वेद 2।33।12) ऋग्वेद में आयुर्वेद के आचार्यों का उल्लेख मिलता है। इनमें प्रमुख हैं दिवोदास और भारद्वाज। इन्होंने धरती में काया और शल्य चिकित्सा का प्रचार-प्रसार किया। वेद में वैद्य का लक्षण बताते हुए कहा गया है कि जो सम्पूर्ण औषधियों को अपने पास ठीक रखता हो, आयुर्वेद का पूर्ण एवं सांगोपांग ज्ञाता हो, युक्ति और योजना को जानने वाला हो, राक्षसों का नाश करने में समर्थ और रोगों को जड़ से उखाड़ने वाला हो। यत्रौषधीः समग्मन राजानः समितामिव विप्रःस उच्वयते भिषग् रक्षोहामीय चातनः।

औषधि का अर्थ है- वेदना को दूर करने वाली वस्तु। ओषं रुग्ज धयति इति औषधि। वेदों में औषधि के लिए माता शब्द आता है- औषधि रीतिमातस्तद्रोदेवी रूपब्रवे।

यजुर्वेद में औषधियों का उपयोग यज्ञकर्म तथा स्वास्थ्य के लिए करने का विधान है। शुक्ल यजुर्वेद में औषधियों की प्रशस्ति मिलती है तथा उनके द्वारा बलास, अर्श, शलीपद, हृदय रो, कुष्ठ आदि रोगों के निवारण का उल्लेख मिलता है। तैत्तरीय संहिता में दुष्टिप्राप्ति, यक्ष्मा और उन्माद के निवारण के लिए मंत्र आए हैं। यहाँ त्रिदोषवाद का स्पष्ट संकेत मिलता है। ऋग्वेद में जो तथ्य सूत्ररूप में हैं, उनका विस्तृत विवरण अथर्ववेद में हुआ है। आयुर्वेद का मौलिक सिद्धान्त त्रिदोष है, जिस पर उनके सभी अंग आधारित हैं। इसके अतिरिक्त शरीर-क्रिया तथा द्रव्यगुण के सम्बन्ध में भी आयुर्वेद की मौलिक विचारधारा है। ऋग्वेद में इन सिद्धान्तों का अत्यन्त सूक्ष्मरूप में उल्लेख है। कालक्रम से आयुर्वेद की सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि का भी विकास हुआ है, जिसका निदर्शन अथर्ववेद में मिलता है।

अथर्वण ऋषि ने चिकित्सा को चार भागों में बाँटा है- आथर्वणी आंगिरसी दैवी और मानुषी। इनमें मानुषी चिकित्सा औषधियों से सम्बन्धित है। दैवी चिकित्सा वायु-जल-पृथ्वी आदि की ओर संकेत करती है। अथर्ववेद में रोग दो प्रकार के कह गए हैं- शपथ्य और वरुण। इसमें कृमियों का विस्तृत विवरण मिलता है। इनका वर्गीकरण दृष्ट, अदृष्ट, वर्णभेद, आकृतिभेद तथा अधिष्ठान भेद से किया गया है। वेदों में रोग के तीन कारण बताए गए हैं-1. शरीर अंतर्गत विष, जिसके लिए यक्ष्म शब्द आता है। 2. रोगों के कारण कृमियातुधान। 3. वात, पित्त, कफ। रोग मुक्ति के लिए वेद में प्राकृतिक खनिज, समुद्रज, प्राणिज तथा उद्भिज द्रव्यों का औषधि के रूप में प्रयोग मिलता है। इसमें औषधियों के गुणबोधक बहुत नाम आते हैं, जैसे अंशुमती, अफला, प्रचेतस आदि। अथर्ववेद में वनस्पतियों का उपयोग अलग-अलग तथा स्वतन्त्र रूप से मिलता है। इसमें रसायन के द्वारा मनुष्य को अजर, निरोग एवं दीर्घायु बनाने का भी उल्लेख है- रसायनं च तज्ज्ञेयं यज्जराव्याधिनाशनम्।

ब्राह्मण ग्रन्थों तथा उपनिषदों में भी आयुर्वेद की प्रचुर सामग्री मिलती है। ऐतरेय ब्राह्मण में औषधियों को रोगनिवारकत्व अंजन से नेत्ररोग निवारण, वरुण कोप से जलोदर रोग की उत्पत्ति आदि का उल्लेख हुआ है। गोपथ ब्राह्मण में यह स्पष्ट किया गया है-ऋतु-सन्धियों में रोग की उत्पत्ति होती है। छान्दोग्य उपनिषद् में मधु विद्या प्रसंग, हृदय नाड़ी वर्णन, आहार का रसमय विवेचन एवं दीर्घायुष्य पर पर्याप्त सामग्री मिलती है। बृहदारण्यक उपनिषद् में शरीरांगों का वर्णन, हृदय-वर्णन तथा नेत्र-रचना आदि विषय उपलब्ध होते हैं। कल्पसूत्रों में भी इसी प्रकार का विवेचन हुआ है। यूँ उपनिषदों का प्रतिपाद्य विषय ब्रह्म है, उसी के संदर्भ में आवश्यक चर्चा आयुर्वेद के वाक्यों में की गयी है।

ऋग्वेद में औषधियों की अल्प संख्या का ही वर्णन मिलता है, जो अथर्ववेद में पर्याप्त हो गयी है। मजूमदार के अनुसार अथर्ववेदीय औषधि विज्ञान पर्याप्त उन्नत था, जो दीर्घकालीन अनुभव एवं प्रयोग का परिणाम था। रामायण में वर्णित वृक्ष-वनस्पतियां प्रायः स्पष्ट हैं। जैसे- कुटज अर्जुन, कदम्ब, नीम, अशोक, सप्तवर्ण आदि। रामायण में रावण की यानभूमि का उल्लेख है। इसमें दिए गए आसवों के नाम, यानभूमि का वर्णन पूर्णतया आयुर्वेद के ग्रन्थ के सदृश हैं। रामायण में युद्धकाण्ड के औषध पर्वतानयन अध्याय में औषधि पर्वत का वर्णन हुआ है। इसी पर्वत को अनुमान लंका में लाए। रामायण के अनुसार, ये औषधियाँ-

मृतसंजीवनीं चैव विशल्यकरणीमपि। सुवर्णकरणीं चैव संधानीं चे महौषधीम्॥ ताः सर्वा हनुमन्गृह्म क्षिप्रमार्गन्तुमर्हसि। (वा.रा.यु. 74.।33)

मृत संजीवनी, सुवर्णकरणी तथा संधानकरणी थी, जिन्हें हनुमान लाए। इतिहासकारों के अनुसार, इस काल में आयुर्वेद की शल्यचिकित्सा एवं औषधि चिकित्सा उन्नत अवस्था में थी।

महाभारत में अश्विनौ का उल्लेख चिकित्सा सम्बन्ध में आता है। भीम की विषपान से मुक्ति, कश्यप द्वारा तक्षक साँप से काटे हुए वृक्ष को पुनर्जीवित करना भीष्म की चिकित्सा के लिए दुर्योधन द्वारा शल्य चिकित्सा के लिए दुर्योधन शल्य चिकित्सा निपुण वैद्यों को साथ लाने की घटनाएँ स्पष्ट करती हैं कि आयुर्वेद महाभारत काल में अति विकसित अवस्था में था। कच द्वारा संजीवनी विद्या प्राप्त करना एवं युधिष्ठिर के पास वैद्यों का साथ होना भी इसी तथ्य की पुष्टि करता है। पाणिनि सूत्र ‘तस्य निमित्तं संयोगोत्पातौ’ पर कात्यायन ने वात-पित्त-कफ का उल्लेख किया है। वात के रोगी को वातकी कहा है। पित्त सिध्यादिगण में और श्लेष्मा पामादिगण में आता है। पाणिनि के सूत्र गर्गादिभ्योयंत्र के गर्गादिगण में जतूकर्ण, पराशर, अग्निवेश शब्द आते हैं। कथादिभ्यष्टक के कथादिगण के आयुर्वेद शब्द से ‘तत्र साधुः’ इस अर्थ में आयुर्वेदिक शब्द निष्पन्न हुआ है।

बौद्धकाल के ग्रन्थ ‘सर्द्धम पुण्डरीक’ में आयुर्वेद परम्परा का पता चलता है। इसमें उल्लेख मिलता है, जिस प्रकार इस त्रिसहस्र-महासहस्र लोक धातु में पृथ्वी, पर्वत और गिरिकन्दराओं में उत्पन्न हुए जितने तृण, गुल्म, औषधि-वनस्पतियाँ हैं, उन सबको महाजल मेघ समकाल में वारिधार देता है। एक अन्य ग्रन्थ ‘विनय पिटक’ में स्वेद कर्म, रक्तमोक्षण, काढ़ा पीने, पट्टी बाँधने, घाव भरने आदि चिकित्सा की विवेचना हुई है। इसके अलावा रोगी की सेवा तथा परिचर्या सम्बन्धित सूचनाएँ भी दर्शायी गयी हैं। बौद्धकाल में मुख्य आयुर्वेदिक ग्रन्थ ‘नावनीतकम’ में पाचन, रसायन, बाजीकरण के योग, मुखलेप आदि का विस्तृत विवरण मिलता है।

आयुर्वेद वैदिक काल से चलकर संहिताकाल तक पहुँचा। विषय में समस्त अंग जिसमें समाहित हों, उसे संहिता कहते हैं। प्रारम्भिक काल में आयुर्वेद की अनेक संहिताओं की रचना विभिन्न महर्षियों द्वारा हुई। प्राचीन संहिताओं में चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा कश्यप संहिता उपलब्ध है। प्रथम दो संहिताएँ पूर्ण रूप से तथा अन्य दो खण्डित रूप में मिलती हैं। सुश्रुत संहिता के उपदेष्टा धन्वन्तरि भगवान विष्णु के अंश माने जाते हैं, जो समुद्र-मंथन से निकले कलश से प्रादुर्भूत हुए थे। वह सभी रोगों के निवारण में कुशल थे। भारद्वाज से आयुर्वेद की शिक्षा ग्रहण कर उसे अष्टांग में विभक्त किया एवं अपने शिष्यों को प्रशिक्षित किया। हरिवंशपुराण, वायुपुराण तथा ब्रह्माण्डपुराण के अनुसार, यह परम्परा इस प्रकार है-काश दीर्घतपा, धन्व, धन्वंतरि, केतुमान, भीमरथ, दिवोदास, प्रदर्तन, वत्स तथा अलर्क।

वैदिककाल में जो महत्व अश्विनौ को प्राप्ति, वही पौराणिक काल में धन्वन्तरि को मिला। अश्विनौ को प्राप्त था, वही पौराणिक काल में धन्वन्तरि को मिला। अश्विनौ के हाथों में जीवन और योग का प्रतीक मधुकलश था, तो धन्वन्तरि को अमृतकलश प्राप्त हुआ। धन्वन्तरि केवल शल्य-तंत्रज्ञ न होकर समस्त आयुर्वेद के ज्ञाता थे। इसी काल में आयुर्वेद के आठ अंग तथा शल्य-तंत्र का विकास हुआ। दिवोदास के काल तक यह पर्याप्त उन्नति कर चुका था। कुछ विद्वानों ने दिवोदास को धन्वन्तरि द्वितीय कहा है। दिवोदास ने ही शल्य प्रधान आयुर्वेद परम्परा प्रचलित की, जिसे धान्वन्तर समुदाय कहते हैं। काशिराज की वंश परम्परा में आयुर्वेद की रक्षा और प्रचार-प्रसार का कार्य प्रारम्भ से ही होता आया है। दिवोदास के 12 शिष्य हुए हैं। दिवोदास-धन्वन्तरि के उपदेशों को सुश्रुत ने अपनी संहिता में उल्लेख किया है। अग्निपुराण में सुश्रुत को गवायुर्वेद, अश्वायुर्वेद आदि से सम्बन्धित बताया गया है। नागार्जुन के ‘उपाय हृदय’ में भी सुश्रुत का उल्लेख हुआ है। इसमें श्रीपर्वत, सह्याद्रि, देवगिरि, मलयाचल आदि पर्वतों का विशद वर्णन मिलता है। चन्दन के लिए मलयज शब्द का प्रयोग सुश्रुत ने ही किया है।

नागार्जुन नाम के अनेक आचार्यों का उल्लेख मिलता है। ‘उपाय हृदय’ के रचयिता दार्शनिक नागार्जुन, गुप्तकालीन नागार्जुन, सरहपा के शिष्य सिद्ध नागार्जुन, रसवैशेषिक के निर्माता भदन्त नागार्जुन आदि के नाम विशेष रूप से विख्यात हैं। इनमें से कौन-से नागार्जुन सुश्रुत संहिता के प्रतिसंस्कर्ता हैं, यह निर्णय करना कठिन है। सुश्रुत संहिता में विषयवस्तु की दृष्टि से सूत्रस्थान में मौलिक सिद्धान्त, शल्य कर्मोपयोगी साधन यंत्र, शास्त्र, क्षार, अग्नि, जलौका आदि, अरिष्ट विज्ञान तथा द्रव्यगुण विज्ञान वर्णित है। निदान स्थान में प्रमुख रोगों का निदान है। शरीर स्थान में शास्त्र का वर्णन हुआ है। चिकित्सा, बाजीकरण, रसायन और पंचकर्म का वर्णन है। कल्पस्थान में विषों का प्रकरण है। उत्तरतंत्र काया-चिकित्सा का खुलासा करता है। इससे स्पष्ट होता है कि मूल संहिता शल्य प्रधान थी, जिसमें अन्य अंगों का समावेश कर अष्टांगपूर्ण बना दिया गया।

जिस प्रकार चरक परम्परा में अग्निवेश चरक तथा दृढ़बल के तीन स्तर हैं, उसी प्रकार सुश्रुत संहिता में आद्य सुश्रुत, नागार्जुन तथा चन्द्रह के चार स्तर हैं। चरक और सुश्रुत ये दो ग्रन्थ आयुर्वेद के आकार ग्रन्थ हैं। इन्हीं के आधार पर अन्य ग्रन्थों हैं। इन्हीं के आधार पर अन्य ग्रन्थों का निर्माण हुआ। वाग्भट्ट ने स्पष्टतः इन दोनों का महत्व स्वीकार किया है। शास्त्र एवं कर्मकुशल वैद्य ही योग्य माने गए हैं। चरककाल में चिकित्सा धर्मार्थ थी। अर्थ और काम इसके उद्देश्य नहीं थे, किन्तु सुश्रुतकाल में वैद्यों के लिए आयुर्वेद अपनी जीवनयात्रा को भी साधन बना। इस काल में चिकित्सा के प्रयोजन धर्म, अर्थ, कीर्ति आदि माने गए। इन दिनों चिकित्सा में औषधि के साथ-साथ मंत्रों का भी प्रयोग होता था। इसी कारण राजा के पास रस-विशारद-वैद्य के साथ मंत्र-विशारद-पुरोहित भी रहने का प्रमाण मिलता है, जो उसे दोषज तथा आगन्तुज व्याधियों से उसकी रक्षा करते थे।

वर्तमानकाल में उपलब्ध चरक संहिता अनेक परिवर्तनों के पश्चात् प्राप्त हुई। आयुर्वेद की परम्परा में ब्रह्मा से प्राप्त इस ज्ञानधारा को कई कड़ियों के उपरान्त पुनर्वसु, आत्रेय ने प्राप्त किया। उन्होंने इस ज्ञान को अपने शिष्य अग्निवेश, भेल, जतूकर्ण, पराशर, हारीत और क्षारपाणि को हस्तान्तरित किया। इनमें सर्वप्रथम आत्रेय के उपदेशों के तंत्ररूप में निबद्ध करने वाले अग्निवेश थे। उसके बाद भेल आदि ने भी अपने तंत्रों की रचना की। सूत्ररूप अग्निवेश तंत्र पर आगे चलकर चरक ने संग्रह तथा भाष्य लिखा, जो चरक संहिता के नाम से विख्यात हुआ। कालान्तर में दृढ़बल ने इसका पुनः प्रतिसंस्कार किया। काल की दृष्टि से वर्तमान चरक संहिता में तीन स्तर हैं 1. उपदेष्टा आत्रेय तथा तंत्रकार्ता अग्निवेश, 2. भाष्यकार चरक, 3. प्रतिसंस्कर्ता दृढ़बल।

पुनर्वसु आत्रेय अत्रि के पुत्र तथा शिष्य दोनों थे। पुनर्वसु आत्रेय, कृष्णात्रेय तथा भिक्षुआत्रेय ये तीन शब्द संहिता में मिलते हैं। आयुर्वेद परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए पुनर्वसु आत्रेय का योगदान ही महत्वपूर्ण है। इनके शिष्यों में सर्वप्रथम अग्निवेश का नाम आता है। इन्होंने आत्रेय के उपदेशों को तंत्ररूप में निबद्ध किया था। सुश्रुत में भी छह कायचिकित्सा का उल्लेख है, जो सम्भवतः अग्निवेश आदि छह तंत्रकारों के लिए अभिप्रेत हो सकता है। अग्निवेश तंत्र ने ही परिष्कृत होकर चरक संहिता के रूप धारण किया। 15वीं शताब्दी के टीकाकार शिवदास सेन ने अग्निवेश तंत्र का उद्धरण दिया है। इससे स्पष्ट होता है कि चरक संहिता बनने के बावजूद अग्निवेश तंत्र अपने मूलरूप में बाद तक प्रचलित रहा है, जैसे पातंजलि महाभाष्य लिखे जाने के बावजूद पाणिनि के सूत्रों का अस्तित्व नष्ट नहीं हुआ।

चरक संहिता का मध्यकालीन अंश चरक की ही देन है। इस काल में धन्वन्तरि देवरूप में पूजित थे। चरक संहिता में अथर्ववेद का अधिक प्रभाव दिखाई देता है, इसी कारण देवव्यपाश्रय चिकित्सा भी लोक-प्रचलित थी। इसमें दर्शन, स्पर्श तथा प्रश्न के रूप में विविध रोग-परीक्षण विधि बतायी गयी है। चरक ने अरिष्ट शब्द का प्रयोग औषधीय मद्य के लिए किया है। कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी उसका उल्लेख है। फिर भी चरक को स्पष्ट ढंग से उद्धृत करने वाले प्रथम व्यक्ति बाग्भट्ट ही है। वाग्भट्ट प्रथम की रचना ‘अष्टांग हृदय’ चरक का अनुसरण करती है। इससे प्रतीत होता है कि बाग्भट्ट (छठी शती) एक चरक की मान्यता संहिताकार के रूप में हो चुकी थी। लगभग इसी काल में हरिश्चन्द्र ने इसकी व्याख्या का कार्य अपने हाथों में लिया था। कुछ विद्वानों ने चरक का काल दूसरी शती ई. पूर्व बताया है। जिस प्रकार शल्यतंत्र में धन्वन्तरि को सम्प्रदाय घोषित किया गया, उसी प्रकार कार्य-चिकित्सा के लिए चरक सम्प्रदाय का प्रचलन हुआ। बाराहमिहिर तथा पूर्ववर्ती व्याख्याताओं ने भी इस सम्प्रदाय का जिक्र किया है।

गुप्तकाल भारतीय वांग्मय ने पुनरुत्थान का युग था। इस काल में प्राचीन संहिताओं को प्रतिसंस्कृत कर उन्हें युगानुरूप बनाया गया। मान्यता है कि गुप्तकाल में ही आयुर्वेदीय संहिताओं को आधुनिक स्वरूप मिला, जो आज तक प्रचलित है। अतएव चरक संहिता में जो गुप्तकालीन तथ्य उपलब्ध होते हैं, वे दृढ़बल के द्वारा नियोजित माने जाते हैं। दृढ़बल के समय में चरक संहिता काफी लोकप्रिय हो चुकी थी। स्वयं दृढ़बल ने अग्निवेश कृत ग्रन्थ के लिए तंत्र तथा चरक कृत प्रतिसंस्कार हेतु ‘संहिता’ शब्द का प्रयोग किया है। गुप्तकाल में आयुर्वेद पर्याप्त विकसित हो चुका था। इस प्रकार तत्कालीन आयुर्वेद शास्त्र को सामग्रियों से परिपूर्ण एवं सुसज्जित कर चरक संहिता को वैज्ञानिक जगत के समक्ष उपस्थित करने का श्रेय दृढ़बल को जाता है। इसका काल चौथी शती के आस-पास है।

चरककाल में कई परिषदों का वर्णन हुआ है। किसी विषय का निर्णय करने के लिए या समझाने के लिए मिलकर विचार होता था। इसी कारण अत्रिपुत्र ने कहा है, वैद्यसमूहो निःसंशय कारणम्। कश्यप संहिता में भी ‘इतिपरिषद’ कहकर इसे स्पष्ट किया है। यह परम्परा उपनिषद् काल की है। चरक संहिता आत्रेय समुदाय का प्रमुख आकार ग्रन्थ माना जाता है। जिस समय आधुनिक चिकित्सा विज्ञान शैशवावस्था में था, उस समय चरक संहिता में प्रतिपादित आयुर्वेद सिद्धान्तों की गरिमा एवं गम्भीरता से सारा विश्व विस्मित एवं प्रभावित था। आधुनिककाल में चिकित्सा विज्ञान के विख्यात आचार्य असलर इस परम्परा से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। आयुर्वेद की बृहत्रयी में चरक परम्परा मूर्धन्य मानी जाती है। मध्यकाल में श्रीहर्ष ने नैषधीय चरित में चरक का निर्देश किया है। वाग्भट्ट ने भी इसे प्रथम स्थान दिया है तथा इसे अधिक उपादेय ठहराया है। चरक संहिता का अरबी अनुवाद 8वीं शती में ‘शरक इण्डियानस’ के रूप में लिखा है कि चरक संहिता का अनुवाद संस्कृत से फारसी और उससे अरबी में हुआ।

भेल अग्निवेश के सहाध्यायी एवं पुनर्वसु आत्रेय के प्रमुख छह शिष्यों में थे। इन्होंने भेल संहिता की रचना की। चरक संहिता की शैली पर इसके स्थानों और अध्यायों का विभाजन है। इसकी योजना अग्निवेश तंत्र के समान थी। इसमें आयुर्वेद के विभिन्न अंगों-काय चिकित्सक और मूल चिकित्सक दोनों का साथ-साथ उल्लेख है। इससे दोनों का साथ-साथ उल्लेख है। इससे दोनों का समान प्रचार सूचित होता है। इसमें शल्यकर्म का भी निर्देश अश्मरी, उदर वातरक्त में हुआ है। ‘आयुर्वेद का वांग्मय में प्रियव्रत शर्मा ने हारीत संहिता का वर्णन किया है। यह वाग्भट्ट तथा उसके बाद के व्याख्याकारों द्वारा उद्धृत की गयी है। इसके अनुसार इस काल में आठ प्रकार कि चिकित्सा में यंत्र, शास्त्र, अग्नि, क्षार, औषधि, पथ्य, स्वेदन और मर्दन का प्रचलन था। जतूकर्ण, क्षारपाणि, पराशर आदि चिकित्साशास्त्रियों ने भी अपनी-अपनी संहिताओं की रचना कर आयुर्वेद की परम्परा को नवगति एवं नूतन संचार प्रदान किया।

आयुर्वेद की इस परम्परा में काश्यपसंहिता विशेषतौर पर उल्लेखनीय है। यह वृद्ध जीवक तंत्र का ही दूसरा नाम है। इसमें महर्षि कश्यप उपदेष्टा हैं। तथा ऋचीक पुत्र वृद्ध जीवक ने उनके उपदेशों को सूत्र रूप में निबद्ध किया है। इस संहिता में सूत्र, निदान, विमान, शरीर, इन्द्रिय, चिकित्सा, सिद्धि तथा कल्प ये आठ स्थान हैं। इसे छठी शती ई. पूर्व यानि कि बुद्ध के समकालीन माना जाता है। इसके बाद जीवकसंहिता, खरनाद संहिता तथा विश्वामित्र संहिता ने आयुर्वेद को और भी सामयिक एवं समृद्ध किया। आयुर्वेद के क्षेत्र में चार वाग्भट्ट विदित हैं, वृद्ध वाग्भट्ट, मध्य वाग्भट्ट, लघु वाग्भट्ट एवं रस बाग्भट्ट। 'अष्टांग संग्रह’ के रचयिता वृद्ध वाग्भट्ट प्रथम के नाम से प्रसिद्ध है। इन्होंने अनेक प्राचीन संहिताओं को आधार लेकर युगानुकूल ग्रन्थ बनाए व इसका प्रचार-प्रसार किया। इनका काल बाराहमिहिर के काल (505-587) के लगभग माना जाता है। विषों का चिकित्सकीय उपयोग इन्होंने ही सर्वप्रथम बताया है। इनके काल में चिकित्सा में विषों और धातुओं का प्रयोग विशेष रूप से होने लगा था। इसी के साथ सरलतम वानस्पतिक द्रव्यों का प्रचलन अधिक था। इनके अन्य ग्रन्थ अष्टांगावतार, अष्टांग निघण्टु आदि है।

वाग्भट्ट प्राचीनकाल के अन्तिम संहिताकार थे। परंतु उनके द्वारा दिए गए सिद्धान्तों का अनुसरण मध्यकाल एवं आधुनिककाल तक निरन्तर होता रहा है। मध्यकाल में उग्रादित्यकृत कल्याण-कारक नागार्जुन लिखित योगशतक, सिद्धिसार संहिता, वररुचिकृत संहिता, नागमतृतंत्र, पण्डित केशव द्वारा रचित आयुर्वेद प्रकाश प्रमुख है। इस काल में दामोदर सुनु शार्डगधर द्वारा लिखित ‘शार्डगर संहिता’ विशेष उल्लेखनीय है। यह मध्यकाल की एकमात्र संहिता है, जो तत्कालीन प्रवृत्तियों एवं विचारों का प्रतिनिधित्व करती है। इसके अनुसार उस समय आयुर्वेद जगत में औषधि-द्रव्य औषधि कल्पनाएँ, चिकित्साक्रम तथा रसौषधियों का भी प्रचलन बढ़ गया था। कल्पनानुसार ही चिकित्सा अपनाई जाती थी।

मध्यकाल में अधिकाँश आयुर्वेद विद्वान एवं टीकाकार हुए, जिन्होंने आयुर्वेद के प्रचलन एवं परम्पराओं की गति दी। आठवीं शती में आषाढ़ वर्मा, हिमदत्त, क्षीरस्वामीदत्त, शिव-सैन्धव वैष्णव, चेल्लदेव तथा पतंजलि ने आयुर्वेद की परम्पराओं को आगे बढ़ाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत की। पतंजलि प्रणीत ‘चरकवर्तिका’ आयुर्वेद की मुख्य कृति है। 9वीं शती में जेज्जट ने वृहत्त्रयी की सभी संहिताओं पर व्याख्या लिखी। गयदास, चक्रपाणि, डल्हड़, विजय परीक्षित, निश्चलकर, शिवदास सेन प्रभृति टीकाकारों ने जेज्जट को उद्धृत किया। माधव ने ‘सुश्रुत श्लोक वार्तिका’ की रचना की। इस काल में सुधीर, अमितप्रभ तथा भ्रदवर्मा भी प्रसिद्ध हुए। दसवीं शताब्दी में चन्द्रनन्दन, भासदत्त, ब्रह्मदेव, भीमदत्त, अंगिरी, ईश्वर सेन आदि ने आयुर्वेद की परम्परा को अग्रसर किया। चन्द्रनन्दन ने ‘अष्टांग हृदय’ पर ‘पदार्थ चन्द्रिका’ नामक टीका लिखी। तीसराचार्य के पुत्र चन्द्रढ ने अपने पिता की रचना ‘चिकित्सा कलिका’ पर ‘योगरत्न समुच्चय’ नामक चिकित्सा ग्रन्थ लिखा। इन्होंने योगमुष्टि, चन्द्रढसारोद्धार तथा वैद्यक कोष भी लिखा।

11वीं शती में भास्करभट्ट, नरदत्त, सुवीर, वंगदत्त, नन्दी, वराह, कीर्तिकुण्ड, वृन्दकुण्ड, श्रीकृष्णवैद्य, गयी सेन आदि आयुर्वेदाचार्य हुए। चक्रपाणि ने चरक संहिता पर आयुर्वेद दीपिका नामक व्याख्या लिखी। यह बंगाल में बहुत प्रचलित-प्रचारित हुई। इन्होंने आयुर्वेद प्रचार के लिए देशव्यापी भ्रमण किया। इनके अलावा इस काल में गदाधर, वाष्पचन्द्र, ईशानदेव, गुणाकर, ध्रुवपाद, भव्यदत्त, बबुलकर, सनातन, विजयरक्षित, कण्डदत्त प्रभृति विद्वानों ने आयुर्वेद के क्षेत्र में अपना योगदान प्रस्तुत किया। 13वीं शती में अरुणदत्त, इन्दु, निश्चलकर, हेमाद्रि, वोपदेव तथा आशाधर का उल्लेख मिलता है। वोपदेव ने आयुर्वेद में 9 ग्रन्थ लिखें तथा अपने पिता के सिद्धयंत्र पर प्रकाश व्याख्या और स्वरचित शतश्लोकी पर चन्द्रकला व्याख्या लिखी। 14वीं शती में आयुर्वेद परम्परा पर्याप्त विकसित रूप में थी। इस काल में आढ़ भल्ल ने षार्डगधर पर दीपक टीका लिखी। इसके बाद वाचस्पति ने अपना योगदान दिया। 15वीं शती में शिवदास सेन ने चरक परम्परा पर अधिक बल दिया। वे चरक संहिता की तत्व प्रदीपिका व्याख्या के रचयिता है। कुछ विद्वानों ने भावप्रकाश को 16वीं शती का माना है। 17वीं शती में काशीराम वैद्य ने षार्डगधर संहिता पर गूढ़ार्थ टीका लिखी है। नरसिंह कविराज तथा रुद्रभट्ट ने भी आयुर्वेद के क्षेत्र में अद्वितीय कार्य किया। 18वीं शती में रामसेन मीरजाफर के राजवैद्य कवीन्द्र मानी के रूप में प्रसिद्ध हुए। रसेन्द्र सार-संग्रह तथा रसेन्द्र चिन्तामणि पर इन्होंने टीका लिखी है। 11वीं शती में गंगाधर राय ने चरक संहिता पर जल्पकल्पतरु नामक विद्वतापूर्ण रचना की। इनकी शिष्य-परम्परा बड़ी लम्बी है, जो सारे भारत में फैली हुई है।

आयुर्वेद की प्राचीन यात्रा अनेक परिवर्तनों को पार करके बीसवीं शती तक पहुँची। इस काल में हाराचन्द्र चक्रवर्ती योगीन्द्रनाथ सेन, ज्योतिषचन्द्र सरस्वती, दत्ताराम चौबे, जयदेव विद्यालंकार, अत्रिदेव विद्यालंकार, रामप्रसाद शर्मा, गोविन्द घाणेकर, दत्तात्रेय अनन्त कुलकर्णी, लालचन्द्र वैद्य आदि प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य हुए हैं, जिन्होंने आयुर्वेद के मूलतत्वों को बरकरार रखते हुए उन्हें विकसित किया। परन्तु बीसवीं सदी के इस अन्तिम दौर में पदार्थ विज्ञान एवं चिकित्सा विज्ञान ने शोध-अनुसंधान की अनेकों कसौटियाँ सामने रख दी है। ऐसे में इन पर अपने को खरा साबित करके ही आयुर्वेद अपनी महत्ता बरकरार रख सकता है।

शान्तिकुञ्ज ने अपने इक्कीसवीं सदी, उज्ज्वल भविष्य के उद्घोष के साथ आयुर्वेद की गौरवमयी परम्परा में सर्वदा नवीन शोध-अनुसंधान करने का संकल्प लिया है। इस महासंकल्प के द्वारा आयुर्वेद परम्परा संहिता काल से निकल कर इक्कीसवीं सदी में मानवीय स्वास्थ्य के उज्ज्वल भविष्य की सम्मोहक संरचना करेगी।


आयुर्वेद शोध को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता

शरीर वनस्पतियों का ही बदला हुआ रूप है। शहद, शक्कर, फल, अन्न सभी वनस्पतियों से ही बनते हैं। वायु में पोषक आक्सीजन वनस्पतियों का ही उत्पादन है। इन्हीं के आधार पर मनुष्य जीवित रहता है। यहाँ तक कि माँस भी उन्हीं प्राणियों का खाने योग्य होता है, जो शाकाहारी होते हैं। जिन वनस्पतियों से शाकाहारी होते हैं। जिन वनस्पतियों से शरीर बना है, उनमें कई प्रकार के रासायनिक तत्व होते हैं। इनका सन्तुलित मात्रा में बने रहना ही सबल एवं सुदृढ़ स्वास्थ्य का आधार है। आहार, विहार, मौसम, चोट, असंयम की वजह से जब बीमारी आ घेरती है, तो विश्लेषण करने पर पता चलता है कि शरीर में कहीं रासायनिक सन्तुलन बिगड़ गया। विषाक्त इसी कारण उत्पन्न होती है। विकृतियों के लक्षण उभरने का यही कारण है।

गड़बड़ियों को ठीक करने के लिए बिगड़े हुए रासायनिक सन्तुलन को बनाना पड़ता है। इसमें निष्कासन और अभिवर्द्धन के दोनों ही पक्षों को क्रियान्वित करना पड़ता है। इन प्रयोजनों के लिए वनस्पतियों का आश्रय लेना ही अधिक कारगर है। यों शरीर में अनेकों तरह के खनिज, लवण, वसा, प्रोटीन आदि पदार्थ पाए जाते हैं, पर वे अवयवों में टिकते, रमते तभी हैं, जब वनस्पतियों से उन्हें उपलब्ध कराया जाए। अन्य माध्यमों से उन्हें शरीर में प्रवेश कराने पर वे टिकते नहीं। शरीर में प्रवेश कराने पर वे टिकते नहीं। शरीर की संरचना उन्हें धकेल कर बाहर निकाल देती है। उदाहरण के लिए, अन्न-शाक आदि में रहने वाला क्षार ही पचता हे। यदि उसे खनिज रूप में प्राप्त करके जबरन शरीर में ठूँसा जाए, तो वह मलद्वारों से, स्वेद, साँस आदि से होकर बाहर निकल जाएगा। अंगों पर उन्हें खदेड़ने का अनावश्यक भार पड़ेगा। यही बात अन्य रसायनों के संबंध में भी है। यदि उन्हें रोग-निवारण अथवा पौष्टिकता सम्वर्द्धन के लिए प्रयुक्त किया जाता है, तो सही मार्ग यही है कि उन्हें वनस्पतियों के माध्यम से ही प्राप्त क्या जाए। अन्य माध्यमों से अपनाई गयी चिकित्सा-प्रणाली क्षणिक चमत्कार भले ही दिखा दे, उसका स्थायी एवं उपयोगी प्रभाव नहीं हो सकता। अतएव शारीरिक दुर्बलता एवं रुग्णता का निवारण करने के लिए ऐसी वनस्पतियाँ ढूँढ़नी पड़ती हैं, जो कमियों को पूरा कर सकें, विषाणुओं का दमन कर सकें।

आज की सुविकसित, अत्याधुनिक एवं बहुप्रचलित चिकित्सा-पद्धति एलोपैथी है। रोगविज्ञान, शरीरविज्ञान एवं शरीर क्रिया-विज्ञान की दृष्टि से गहन अध्ययन एवं शोध के आधार पर रोगों की सम्भावना, स्वरूप एवं जटिलताओं के सम्बन्ध में बड़ी मजबूत नींव इस पद्धति के वेत्ताओं ने खड़ी की है। इस सम्बन्ध में इनके प्रयास सराहनीय हैं। परन्तु यह बात चिकित्सा एवं औषधि के सम्बन्ध में खरी नहीं उतरती। एक नहीं, उतारने देते कि यह पद्धति सुनिश्चित है, हानिरहित है। इञ्जेक्शनों, कैप्सूलों, टॉनिकों, एन्टी-बायोटिकों को भारी मात्रा में लेने की प्रथा-परम्परा जोरों पर है। इनकी चकाचौंध से उपजे बुधिभ्रम को डॉक्टर पूरे उत्साह के साथ बढ़ा रहे हैं। किसी को भी यह समझने-समझाने की फुरसत नहीं है कि उस उत्तेजक और मारक उपचार के पीछे क्या प्रतिक्रिया होती है? रोग तो समयानुसार चला जाता है, पर विषाक्त औषधियों की प्रतिक्रिया जीवनभर एक नयी व्याधि बनकर पल्ला पकड़ लेती है। उसे छोड़ने का नाम नहीं लेती। उपचार कराने वाले नए-नए कष्ट, व्यथाएँ साथ लेकर लौटते हैं। इसके सभी पक्षों को समीक्षा करने के बाद इस पद्धति पर पुनर्विचार करना जरूरी हो जाता है। आरम्भिक लाभ के बावजूद अन्ततः घाटा कहाँ तक स्वीकार्य है, इस पर विवेक-बुद्धि यही कहती है कि इस अदूरदर्शिता को जनमानस से मिटाया जाना चाहिए। तुरन्त का चमत्कार हतप्रभ तो कर देता है, पर अपने दूरगामी दुष्परिणाम छोड़ देता है। यह उपेक्षणीय तो नहीं है, पर एलोपैथी का शब्दार्थ भी कुछ ऐसी ही इंगित करता है। ‘द बुक ऑफ नॉलेज एनसाइक्लोपीडिया’ के अनुसार एलोपैथी वह चिकित्सा-पद्धति है, जो औषधि के प्रयोग से व्याधि के अलावा अन्य दूसरे लक्षण पैदा करती है। भावार्थ यही है कि एक बीमारी का उपचार करने के लिए दूसरा रोग उत्पन्न कर देना।

इन सब तथ्यों पर विचार करने पर यही ठीक जान पड़ता है कि उन पक्षों का पुनर्मूल्यांकन किया जाए, जो रोग का कारण बनते हैं। ऐसा करने पर ही उपयुक्त समाधान की खोज सम्भव है। शरीर का धर्म है अपनी रक्षा के लिए व्यवस्था बनाना। जीवनी-शक्ति के रूप में उसे एक सुरक्षा संस्थान मिला हुआ है। सक्त के श्वेत कण एवं इम्यून संस्थान सुरक्षा सेना, सीमा आरक्षी बल का कार्य करते है। बाह्य आक्रमणकारी जीवाणु-विषाणु पहले मानव शरीर में सुरक्षा पंक्ति की कमजोरी का जायजा लेते हैं। उनकी घातक सामर्थ्य में वृद्धि शरीर की कमजोरी के साथ बढ़ती जाती है एवं परिणाम में शरीर रोगी हो जाता है।

रोग से निवृत्ति भी इस पर निर्भर करती है कि कितना शीघ्र विकार द्रव्यों का निष्कासन सम्भव हो पाता है। शरीर के निष्कासन सम्भव हो पाता है। शरीर के निष्कासन संस्थान का समर्थ होना व्यक्ति के समग्र स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। आन्तरिक अंगों में से एक का भी व्याधिग्रस्त होना कमजोर जीवनी-शक्ति अपाहिज शारीरिक स्थिति एवं नए-नए रोगों के आक्रमण में व्यक्त होता है। चयापचय के परिणामस्वरूप उत्पन्न विकारद्रव्य जब एकत्र होते चले जाते हैं, आहार-विहार में व्यतिक्रम आ जाता है, प्रकृति के अनुकूल दिनचर्या का निर्धारण नहीं हो पाता है, तो रोगों की बाढ़-सी आ जाती है।

इस मूल आधार को समझने के बाद सार्थक चिकित्सा-व्यवस्था का स्वरूप निर्धारित कर सकना सम्भव है। किसी भी लक्षण को दबाने के बजाय उसे जन्म देने वाले करण को जड़ से मिटाना ही श्रेयस्कर है। दर्द को, वेदना को हरेक औषधियों से उस समय तो मिटाया जा सकता है, परंतु मूल रूप में बैठे रोग को यदि समूल नष्ट नहीं किया गया, तो वह नए रूप में अधिक तीव्रता से उभर कर आ सकता है। अन्ततः निष्कर्ष यही निकलता है कि प्रचलित चिकित्सा-पद्धति में जितना श्रेष्ठ है, वह तो ग्राह्य है, पर सामयिक लाभ का दर्शन किसी भी मूल्य पर जीवन में नहीं उतारा जा सकता। वैसे भी देश में 75 फीसदी निर्धन बसते हैं, देहातों में रहते हैं और छोटे साधनरहित गाँवों में रहकर किसी प्रकार गुजर करते हैं। वहाँ न अस्पताल है और न डॉक्टर। हों भी तो उनकी तगड़ी फीस और दवाओं की महँगी कीमत कहाँ जुटाई जाए? इस विवशता की स्थिति में असंख्यों असहाय रहकर रुग्णता से पीछा नहीं छुड़ा पाते और मौत के मुँह में जाते है। इस प्रकार अकाल मृत्यु की कल्पना करने मात्र से सिहरन उत्पन्न होती है।

समस्या का क्या समाधान होना चाहिए? इस सम्बन्ध में गहन गम्भीर विचार करने पर एक ही प्रकाश-किरण आशा बँधाती है कि किसी प्रकार वनौषधि विज्ञान-आयुर्वेद की चिरपुरातन परम्परा पुनर्जीवित हो सकती तो कितना अच्छा होता। जीवन-मरण जैसी एक महती समस्या का समाधान निकल आता। इस सम्बन्ध में कठिनाई एक ही है कि आयुर्वेद मृतप्राय स्थिति में है। ग्रन्थ वहीं है, प्रयोग-विधान वहीं है, परन्तु प्रभाव वही नहीं है। शुद्ध रूप में वनस्पतियाँ मिलना आज अतिदुर्लभ हो गया है। पंसारी की दुकान पर बीसियों वर्ष पुरानी जड़ी-बूटियाँ मिलती है, जबकि उनका गुण एक बरसात निकलने पर समाप्त हो जाता है। नकली रूप-रंग वाली घास-फूस की भी बेतरह मिलावट होती है, पकने पर औषधियों का लाया जाना चाहिए, पर नयी, कच्ची, पुरानी, सूखी भी उसी ढेर में सम्मिलित करके बेचने वाले मुनाफ़ा कमाते है। उन्हें उपयुक्त खाद-पानी न मिलने पर उपयुक्त गुणों का समावेश नहीं हो पाता। इन कठिनाइयों के रहते उपलब्ध वनस्पतियों में से ज्यादातर गुणहीन एवं अप्रामाणिक होती हैं। ऐसे में वे अपना प्रभाव किसी तरह से दिखाएँ?

मात्र हैरान-परेशान होना, माथे पर हाथ रखकर सोचते रहन और दुर्भाग्य को कोसना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए साहस पूर्ण कारगर उपाय करने की आवश्यकता है। शान्तिकुञ्ज ने इसकी शुरुआत अपनी स्थापना के कुछ ही समय बाद कर दी थी, परन्तु अब इसे सर्वथा नया और व्यापक रूप देने का निश्चय किया गया है। प्रारम्भिक दौर में देश के विभिन्न क्षेत्रों से दुर्लभ, किन्तु अतीव गुणकारी औषधियों को रोपा-पनपाया गया और इस स्थिति एक पहुँचाया गया है, जिसमें कि इस संदर्भ में हुए ऋषि प्रतिपादनों को सत्य सिद्ध करके दिखा सके। इस दिशा में उठे कारगर कदमों से महर्षि चरक, धन्वन्तरि जैसों को सच्ची श्रद्धांजलि भी हो सकती है और उसे आयुर्वेद की शोध के पुनर्जीवन का नाम दिया जा सकता है।

यद्यपि अभी वर्तमान में शान्तिकुञ्ज और ब्रह्मवर्चस का वनौषधि उद्यान छोटा है परन्तु पिछले दिनों जिस भूमिखण्ड को खरीदा गया है, वहाँ ऐसी व्यवस्था करने का प्रावधान है, जहाँ से पौधा और बीज समूचे देश में भेज सकने और गाँव-गाँव जड़ी-बूटी उगाने का प्रबन्ध हो सके। इस प्रयत्न की सफलता पर देशवासियों की स्वास्थ्य-रक्षा का एक अति महत्वपूर्ण आधार खड़ा हो सकेगा। तब निर्धनता किसी को भी अकाल मृत्यु का ग्रास न बनने देगी और न किसी को साधनों के अभाव में रुग्णता की व्यथा लम्बे समय तक सहन करते रहने के लिए विवश होना पड़ेगा। वनौषधियों के चमत्कारी गुणों से अवगत होने और उसका सही रीति से उपयोग कर सकने की सुविधा होने पर अपना निर्धन देश चिकित्सा क्षेत्र में पराधीनता से भी मुक्ति पा सकेगा और साथ ही आरोग्य संवर्द्धन-स्वास्थ्य संरक्षण के संदर्भ में महती सफलता प्राप्त कर सकेगा। शुद्ध, सही, सार्थक एवं जीवन्त वनस्पतियाँ यदि उगाई, बढ़ाई और उपलब्ध की जा सकें, तो समझना चाहिए कि देश आरोग्य के सम्बन्ध में स्वावलम्बी हुआ।

अस्पताल-दवाखाने खोल देने से राष्ट्रीय आरोग्य के लक्ष्य को पा लेना सम्भव नहीं। सरकारी एवं गैरसरकारी अर्थ-सुविधा के बल पर उन्हें कहीं भी खोला तो जा सकता है, परन्तु यदि चिकित्सापद्धति एवं औषधियाँ ही उपयुक्त गुण वाली न हुई तो आलीशान भवनों वाले चिकित्सालयों से भला क्या बात बनेगी? वैसे भी यहाँ प्रायः गरीबों का प्रवेश वर्जित ही बना रहता है। इन चिकित्सकों एवं चिकित्सालयों के खर्चीले ठाट-बाट को पूरा कर सकना तो धनपतियों के बूते की ही बात है। निर्धन तो उनके इर्द-गिर्द चक्कर लगाते, हसरत भरी निगाहों से देखते और निराश ही वापस लौटते है, जबकि आवश्यकता इसी वर्ग को राहत देने की है।

शान्तिकुञ्ज ने आयुर्वेद की शोध का जो कार्य हाथ में लिया है, उसकी अपनी विशेषता है। यह शोधकार्य मात्र प्रयोगशालाओं तक ही सीमित नहीं है, यह आयुर्वेद को सर्वजन-सुलभ बनाने वाला अभियान भी है। यहाँ प्रयोग-परीक्षण के साथ आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार का कार्य भी चलता रहता है। मसाला वाटिका एवं गृहवाटिका के माध्यम से उपयुक्त औषधियों को घर-घर लगाने, पहुँचाने की योजना यहीं से क्रियान्वित की जाती है। अभी बाहर के रोगियों की बहुत बड़ी सेवा कर सकने की व्यवस्था तो नहीं बनी है, पर आश्रम में आने वाले हजारों शिविरार्थियों और स्थायी कार्यकर्ताओं की प्रायः एक हजार संख्या यहाँ उपस्थित रहती ही है। उन्हें सुयोग्य आयुर्वेदाचार्यों के द्वारा रुग्णता निवारण के लिए जड़ी बूटी उपचार से लाभान्वित किया जाता है। उसके जो परिणाम सामने आए हैं, उन्हें देखते हुए यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि निकट भविष्य में यहाँ स्थापित होने वाले आयुर्वेद शोध संस्थान के द्वारा जो कार्य किया जाएगा, उससे देश ही नहीं विदेशों में भी रहने वाले लोगों की रोगनिवारण समस्या का समाधान सम्भव हो सकेगा।


ईश्वर-विश्वासी (Kahani)

प्रख्यात विभूति-हातिम परदेश जाने लगे तो अपनी पत्नी से पूछ बैठे-तुम्हारे लिए खाने-पीने का कितना सामान रख जाऊँ?”

“जितनी मेरी आयु हो।” -कहकर पत्नी हँस पड़ी।

“तुम्हारी आयु जानना मेरे बूते की बात नहीं।”

“तब तो मेरी रोटी का इन्तजाम भी आपके बूते से बाहर है। यह काम जिसका है, उसी को करने दीजिए।”

पत्नी की ईश्वर आस्था पर मुग्ध होकर हातिम परदेश चले गये। तब एक पड़ोसिन ने पूछा-बेटी हातिम तेरे लिए क्या इन्तजाम कर गये हैं?”

हातिम की पत्नी ने कहा-माँ मेरे पति क्या इन्तजाम करेंगे? वे तो खाने वाले थे। खाना देने वाला तो अब भी यहीं है।”

ईश्वर-विश्वासी को किसी का आश्रय आवश्यक नहीं रहता।


धन्वन्तरि परम्परा के पुनर्जीवन हेतु एक अद्वितीय अनुसंधान केन्द्र

आज के युग में जिस तरह से अशक्ति का दौर बढ़ रहा है, ऐसा लगता है कि विज्ञान ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। इक्कीसवीं सदी के द्वार पर खड़ा चिकित्सा-विज्ञान कोई ऐसी नयी रामबाण दवा ईजाद नहीं कर पाया, जो व्यक्ति की जराजीर्ण होती जा रही जीवनीशक्ति का उपचार सुझा सके। एक औषधि नयी निकलती है, तो अनेकों बीमारियाँ जन्म लेने लगती हैं। दुष्प्रभावों से मुक्त तो कोई औषधि है ही नहीं। कृत्रिम रासायनिक औषधियों के दुष्प्रभाव इतने है कि प्रयोग की अवधि पूरी होने तक भी उनमें से एक अंश को ही समाप्त किया जा सकता है। अन्ततः रोगी एक बीमारी से मुक्त हो, औषधिजन्य दुष्प्रभावों से और अधिक बीमार व अशक्त होता चला जाता है।

आयुर्वेद के रूप में भारतीय संस्कृति की एक बड़ी महत्वपूर्ण देन संपूर्ण विश्ववसुधा को प्रदत्त है। इस चिरपुरातन विधा के होते हुए भी हम क्यों निर्बल, निस्सहाय-सी स्थिति में पाश्चात्य सभ्यता का अनुगमन करते व संश्लेषित रसायनों पर आधारित चिकित्सा-पद्धति का अंधानुकरण करते हैं। यह एक विचित्र-विडम्बना भरी स्थिति है। आयुर्वेद उतना ही पुराना है-जितना इस सृष्टि का इतिहास। पीड़ित मानवता के लिए सीधे ब्रह्माजी क्षरा इसे जन-जन के लिए सुलभ कराया गया। शरीरमाद्यं खलु धर्म साधन के अंतर्गत शरीर व उसके अंदर सुरक्षित रखे मन-मस्तिष्क एवं अंतःकरण रूपी दिव्य भाण्डागार की सुरक्षा करना, उसे सही स्थिति में बनाए रखना भगवान ने एक धर्म-उसका साधन बताया है। ब्रह्माजी से धन्वन्तरि के माध्यम से जिन्हें आयुर्वेद का जन्मदाता कहे जाने का श्रेय परमब्रह्म की सत्ता द्वारा दिया गया, यह विस्तार पाते हुए एक सुव्यवस्थित चिकित्सा-प्रणाली के रूप में सभी को सुलभ हुआ। धन्वन्तरि ऋषि थे या मुनि-यह चर्चा बाद में की जा सकती है-वे समुद्र-मंथन से निकले चौदह रत्नों में से एक हैं। इसी से भगवान के इस चिरपुरातन अनुदान के महत्व को समझा जा सकता है। सृष्टि शुभारंभ में मत्स्यावतार के बाद प्रकट कच्छपावतार के माध्यम से सुर व दानवों के मध्य एक समुद्र-मंथन की प्रक्रिया संपन्न हुई थी। उसमें से लक्ष्मी भी निकलीं, हलाहल भी निकला, किंतु सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि धन्वन्तरि अपने हाथ में अमृत-कलश लेकर मानवमात्र के लिए चिरयौवन एवं अक्षुण्ण स्वास्थ्य का संदेश लेकर अवतरित हुए एवं उन्हीं को आयुर्वेद के जन्मदाता मानकर पूजा भी जाता है। धनतेरस-धन्वन्तरि के धरती पर प्रकट होने का कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन पड़ने वाला एक महत्वपूर्ण पर्व है, पर कितने व्यक्ति यह जानते है कि वह धन्वन्तरि के रूप में आयुर्वेद के ब्रह्माजी के माध्यम से धरती पर अवतरित होने का पुण्यपर्व भी है।

आयुर्वेद चरण व्यूह के अनुसार ऋग्वेद का एक उपवेद भी माना जाता है। एवं भावप्रकाश के अनुसार यह अथर्ववेद का उपवेद है। अथर्ववेद में बहुत से मंत्र मानवी काया व मन के स्वास्थ्य के संवर्द्धन व उनके माहात्म्य के संबंध में मिलते है। वेदों का ज्ञान जिसमें समाहित हो ऐसा विलक्षण ज्ञान का भण्डार कैसे उपेक्षा का व अप्रामाणिकता का शिकार होता चला गया-यह जब हमें ज्ञात होता है, तो मन को बड़ी पीड़ा होती है। जब-जब मानव-जाति ने वेद भगवान के आदेशों-अनुशासनों की अवज्ञा की है, तब-तब उन्हें अशक्ति, अभाव, अज्ञान के त्रिविधि तापों, कष्टों से गुजरना पड़ा है। आयुर्वेद की चिरपुरातनता के बावजूद भी उसमें समाहित विज्ञानसम्मत प्रतिपादन एक स्वस्थ शरीर, मन व अंतःकरण की सर्वांगपूर्ण आचारसंहिता का निर्माण करते हैं। ऋषि मुनियों ने निश्चित ही अपनी काया के एक-एक सूक्ष्मतम अवयव तक जाकर साधना की गहनतम स्थिति में ये अनुसंधान किये होंगे, तभी तो वे वह सब कुछ तब लिखकर दे गए जबकि आज का सूक्ष्मदर्शी इलेक्ट्रान-माइक्रोस्कोप उनके पास नहीं था। इसी आधार धन्वन्तरि एवं उनके बाद आयुर्वेद को विस्तार देने वाले चरक, सुश्रुत से लेकर बाग्भट्ट शांग्र्र्डगधर आदि सभी ने स्रष्टा के उस विज्ञान को नये आयाम दिए। वनौषधियों से काया व मन की चिकित्सा, रस-भस्मों के माध्यम से समग्र कायाकल्प एवं शल्यक्रिया द्वारा असाध्य रोगों से मानवमात्र को मुक्ति दिलाने का भागीरथी कार्य इसी समग्र आयुर्वेद के माध्यम से संपन्न होता चला गया।

आज जो आयुर्वेद हम सबके सामने है, वह विश्वभर के जिन-मानस द्वारा स्वीकार किया जा सके, उसके लिए विज्ञान की दृष्टि से परखे जाने की आवश्यकता है। कारण संभवतः यह है कि विज्ञान सम्मत उपचार-प्रक्रिया के बावजूद विगत पाँच-छह सौ वर्षों में इसके साथ समन्वित हुई अन्य चिकित्सा-पद्धतियों के कारण, साथ ही साथ कुछ मानव-जाति द्वारा स्वयं अप्रामाणिकता का समावेश इसमें होने के कारण यह संदिग्धता के घेरे में आ गया है। आयुर्वेद समग्र रूप में मनुष्य को शरीर, मन व आत्मा का समुच्चय मानता रहा है। जब तक इस चिकित्सा-प्रक्रिया में यम-नियम से लेकर ‘स्वस्थवृत्त समुच्चय’ के सभी सूत्रों एवं पातंजलि योगसूत्र के दर्शन को भी साथ लेकर चलने की विधि अपनायी जाती रही, तब तक यह अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होता रहा व मानव जाति को रोगमुक्त ही नहीं, अक्षुण्ण यौवन का वरदान भी देता रहा। मध्यकाल में एक ऐसा समय आया जब आयुर्वेद के कुछ वनौषधि प्रधान एवं रस-भस्म प्रधान योगों का बाजीकरण-शरीर-सुख हेतु शक्ति संवर्धन के निमित्त अधिक प्रयोग किया जाने लगा। संभवतः यूनानी-तिब्बती चिकित्सा-पद्धति के समावेश के कारण यह विकृति आयी हो। साथ ही नाड़ी विज्ञान के आधार पर वात-पित्त-कफ के कुपित होने की स्थिति जानकर तदनुसार चिकित्सा करने वाले वैद्यों की पीढ़ी समाप्त होते चले जाने एवं उस परम्परा में नयी पीढ़ी समाप्त होते चले जाने एवं उस परम्परा में नयी पीढ़ी के न जुड़ने के कारण भी आयुर्वेद इतना उपयोगी नहीं सिद्ध हो पा रहा था। अप्रामाणिक लोगों द्वारा डिस्पेन्सिग-पंसारियों द्वारा केमिस्ट ड्रगिस्ट बन जाना व वीर्य कालावधि तथा गुण समाप्त होने की अवधि के बाद भी जड़ी-बूटियों के प्रयोग न इस पर एक ग्रहण-सा लगा दिया। आधुनिक चिकित्सा-पद्धति का समावेश इसके साथ होने पर इंटीग्रेटिड चिकित्सा प्रणाली (समन्वयात्मक चिकित्सा पद्धति) के लोकप्रिय होने का एक दुष्परिणाम यह सामने आया कि आयुर्वेद के अधिकाँश नए स्नातक वैद्यक को नहीं, आधुनिक तुरंत प्रभाव दिखाने वाली औषधियों को वरीयता देने लगे व उसी आधार पर चिकित्सा करने लगे। इससे आयुर्वेदिक योगों, घटकों में भी मिलावट होने लगी, क्योंकि लोग स्वरूप तो वैसा ही चाहते थे, किंतु प्रभाव तुरंत देखना चाहते थे। संभवतः आयुर्वेद हमारी देवसंस्कृति की तरह एक लम्बे समय तक अप्रामाणिकता के लाँछन से ग्रसित रहा।

आयुर्वेद को शुद्ध रूप में प्रयोग करने वालों ने एक सबसे बड़ी सेवा यह की है कि उसे आज विश्वस्तर पर लोकप्रियता के शिखर पर उन्होंने उसे पहुँचा दिया है, साथ ही शुद्ध आयुर्वेद में मात्र स्थूल शरीर प्रधान नहीं-उसके सूक्ष्मतम प्रभावों के विषय में जन-जाग्रति लाने में भी वे सफल हुए है। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की यह हार्दिक इच्छा थी कि आयुर्वेद का आधुनिकतम विधाओं की तरह अनुसंधान हो, साथ ही वनौषधियों के रसायनपरक से लेकर सभी प्रभावों का विश्लेषण कर उन्हें सार्वजनीन-जनसुलभ बनाया जाए। पूज्यवर जन-जन को अगली सदी के आगमन तक उत्तम स्वास्थ्य रूपी अनुदान देना चाहते थे। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना के मूल में साधना-अनुसंधान के साथ-साथ वनौषधियों के स्थूल प्रयोगों व यज्ञपरक प्रभावों का विश्लेषण इसीलिए रखा गया था।

अब तक के अनुसंधानक्रम में प्राप्त निष्कर्षों ने परमपूज्य गुरुदेव एवं परम वंदनीय माताजी के विश्वास को प्रबल ही किया है। प्रायः पाँच सौ से अधिक वनौषधियाँ अब सबको शुद्ध रूप में चूर्ण स्वरूप उपलब्ध है। उनकी निर्माण व प्रभाव समाप्ति की तिथि घोषित रूप में छापकर विक्रय करने से इन औषधियों की प्रामाणिकता भी बढ़ी है, लगभग सभी प्रकार के रोगों के लिए स्वयं पूज्यवर द्वारा बतायी गयी औषधियों ने रामबाण का काम किया है। घटती जा रही जीवनी-शक्ति के लिए रसायन रूप में अश्वगंधा-मुलहठी-शतावर हृदय रोगों के लिए अर्जुन-पुनर्नवा-शंखपुष्पी उदर रोगों के लिए कालमेध-शरपुंखा-कुटकी-विल्व-हरीतकी तथा मानसिक रोगों के लिए ब्राह्मी-मण्डूकपर्णी जटामासी-ज्योतिष्मती-वचा-अमृता आदि के सफल प्रयोगों ने सारे भार व विश्व में कीर्तिमान बनाए है। प्रज्ञापेय अपने आप में चाय व काफी के विकल्प के रूप में एक स्नायु-संस्थान के सशक्त टानिक के रूप में विशुद्ध आयुर्वेदिक योग की तरह अत्यधिक लोकप्रिय हुआ है।

किंतु इतने मात्र से वह लक्ष्य पूरा नहीं होता दीख रहा था, जिसकी अपेक्षा गुरुसत्ता को थी। वे चाहते थे कि इन सब औषधियों के अतिरिक्त शतपुटी-सहस्रपुटी-रस-भस्मों के ऊपर वैज्ञानिक प्रयोग हो। सभी वनौषधियों, रसायनों व रस-भस्मों का वैज्ञानिक विश्लेषण कर कौन-सी किस रोग में श्रेष्ठ पायी गयी है- आयुर्वेद में कहाँ-कहाँ उनके बारे में वर्णन आया है, तदनुसार उनके प्रयोग किस तरह न्यूनतम दुष्प्रभावों को लक्ष्य में रख किए जा सकते है, यह समग्र कार्य एक प्रोजेक्ट के रूप में किए जाने की पूज्यवर की इच्छा थी। गैस लिक्विड क्रोमेटोग्राफ, हाई परफार्मेन्स लिक्विड क्रोमेटोग्राफी, डार्क फील्ड रिफ्रेक्टोमेट्रीन, डार्क विजन एवं इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप के माध्यम से सूक्ष्मीकृत वनौषधियों व उनके सम्पुट या भावना के माध्यम से शोधी गयी रसायनों, भस्मों पर विशद कार्य किए जाने के लिए बड़े स्थान पर पूरी तरह से इस कार्य के लिए समर्पित एक संस्थान व टीम की आवश्यकता समझी जा रही थी, जिसे अब शान्तिकुञ्ज के समीप मिली नवीन भूमि में बनाए जा रहे अनुसंधान संस्थान के माध्यम से पूरा किया जाना है। यहाँ पर रिसर्च व थैरेपी इस तरह की दो प्रयोगशालाएँ अलग-अलग बनायी जा रही है। एक में जड़ी-बूटियों के एकाकी व योगिक प्रयोगों पर रसभस्मों, लौह, स्वर्ण, हीरा-मुक्ता अभ्रक-यशद आदि के अति सूक्ष्मीकृत स्वरूपों के निर्माण व उनके प्रायोगिक जन्तुओं पर परीक्षण किए जाएँगे। टाॅक्सिटी लेवल व थेराप्यूटिक लेवल को परखा जाएगा। कैसे किसी योग को इस रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है कि वह सबके द्वारा स्वीकार किया जा सके-यह सारा अनुशीलता रिसर्च विंग में होगा।

थेराप्यूटिक विंग में आयुर्वेद की समस्त निदान की पद्धतियों को आज के आधुनिक परिप्रेक्ष्य में विकसित किया जाएगा। वात, पित्त, कफ के कुपित होने की स्थिति में नाड़ी देखकर निदान कैसे किया जाता है-यह भी यहाँ स्थापित होगा। साथ ही ज्योतिर्विज्ञान का आश्रय लेकर किसी के लिए कोई जड़ी-बूटी या योग व नक्षत्र विशेष में तोड़ा गया ही क्यों प्रभावी होता है, यह भी परखने हेतु वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाएगा। वात, पित्त, कफ की कुपित स्थिति में रक्त में व अन्य घटकों में क्या परिवर्तन होते है- यह आधुनिकतम यंत्रों से जाँचकर अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचकर कौन-सी औषधि किस रोग में उपयुक्त होगी-यह सारा निर्धारण यहाँ किया जाएगा। रोगी यहाँ एक दिन के लिए आकर जाँच-पड़ताल करवा के उसी दिन अपनी औषधि लेकर जा सकेंगे।

कहना न होगा कि पीड़ित मानवता के लिए आयुर्वेद रूपी अनुदान को विश्वव्यापी स्वरूप देने का प्रयास निश्चित ही अपने आप में एक अद्वितीय-अभूतपूर्व स्तर का पुरुषार्थ माना जाएगा। इसमें साधनों को भी अत्यधिक परिमाण में लगना है- बहुमूल्य उपकरणों से इसे इसे सज्जित किया जाना है-साथ ही वैसे ही प्रतिभाशाली चिकित्सकों, वैद्यों की भी आवश्यकता यहाँ पड़ेगी। सभी परिजनों से इस कार्य में पूरा सहयोग देने, ऐसे उदारमना श्रीमन्तों को जोड़ने एवं विशेषज्ञ स्तर के चिकित्सा की सभी विधाओं से जुड़े लोगों से संपर्क कर उनका संबंध शान्तिकुञ्ज के केन्द्रीय तंत्र से जोड़ने का अनुरोध इन पंक्तियों द्वारा किया जा रहा है।


सम्बन्ध नहीं, नीति और न्याय का पक्ष ही वरेण्य है (Kahani)

रावण ने एक कूटनीतिक चाल फेंकी। बोला-अंगद-जिस राम ने तेरे पिता को मारा, तू उसी की सहायता कर हो, मेरे मित्र का पुत्र होकर भी तू मुझसे बैर कर रहा है। अंगद हँसा और बोला-रावण अन्यायी से लड़ना और उसे मारना ही सच्चा धर्म है, चाहे वह मेरा पिता ही क्यों न हो। अंगद के तेजस्वी शब्द सुनकर रावण को उत्तर देते न बना।

सम्बन्ध नहीं, नीति और न्याय का पक्ष ही वरेण्य है।


दुर्लभ वनौषधि वाटिका

वनौषधि वाटिका आयुर्वेद-अनुसन्धान एवं वनौषधियों के विस्तार की अनिवार्य आवश्यकता है। परमात्मा ने अपने युवराज के रूप में मनुष्य की रचना की, तो उसे विशिष्टता सम्पन्न अंगों से भरपूर काया दी। कहीं कोई व्यतिक्रम होने पर रुग्णता की सम्भावना हो, तो निवारण एवं जीवनी-शक्ति-सम्वर्द्धन हेतु धरती पर हरीतिमा की चादर बिछा दी। यह हरियाली पोषक तत्वों से भरी-पूरी तो है ही, साथ ही इसमें अद्भुत गुणों वाली वनौषधियों का समुच्चय भी है। अमृतोपम गुणों वाली जड़ी-बूटियों को उसने अपने प्राकृतिक रूप में ही जीवित रखा, ताकि आवश्यकता पड़ने पर मनुष्य उनका प्रयोग कर सके।

इधर जब से मनुष्य ने भ्रम एवं भूल से हरीतिमा को उजाड़ने के साथ प्रकृति का दोहन-शोषण शुरू किया, वनौषधियाँ भी विलुप्त होती गयी। इसी का परिणाम है आज का भयावह स्वास्थ्य-संकट इसी के चलते वृद्धों एवं दुर्बलों को ही नहीं, युवाओं और बच्चों का भी बहुतायत में बीमार देखा जाने लगा है। आज की रुग्णता से भरी मानव समाज की परिस्थितियों को देखते हुए फिर से हमारा ध्यान उसी पद्धति की ओर आकर्षित होने लगा है, जो जड़ी-बूटियों के ऊपर आश्रित थी। आज यह बेजान काय-कलेवर के रूप में किसी तरह जिन्दा है। समय-परिवर्तन के साथ ही लोग इस क्षेत्र में अपनी विशेषता खोते चले गए, अन्यथा अपने समय में यही एकमात्र पद्धति जनसामान्य से लेकर विशिष्टजनों तक सभी को हर दृष्टि से स्वास्थ्य समर्थ बनाए रखती थी। रोगों से ही नहीं वरन् बुढ़ापे की जीर्णावस्था से भी मुक्ति दिलाने में इसे समर्थ विधा के रूप में जाना जाता था। कई तो ऐसी जड़ी-बूटियों का परिचय मिलता है, जो लोगों को मृत्यु तक से छुटकारा दिलाती थी।

ऐसी ही जड़ी-बूटियों में संजीवनी सुपरिचित नाम है। आयुर्वेद शास्त्रों में इसका उल्लेख सोम औषधि के नाम से मिलता है। इसके विषय में यह वर्णन किया गया है कि आरम्भ में इसका एक पौधा होता है। शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को उसमें एक पत्ते का उद्भव होता है। क्रमानुसार द्वितीय को दो, तृतीय को तीन तथा पूर्णिमा तक 15 पत्ते निकल आते हैं तथा कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से क्रमशः एक-एक पत्ते नित्य झड़ने लगता है। अमावस्या तक यह पौधा सूखी लकड़ी के सदृश रह जाता है। परन्तु इस स्थिति में इसकी उपयोगिता बढ़ जाती है। यह घन-घोर अन्धकार में रेडियम की तरह चमकता है तथा अत्यन्त गुणकारी हो जाता है। शास्त्र इसके गुण को इस प्रकार प्रतिपादित करते हैं-

अणिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्तिः प्राकाम्यं महिमा तथा। ईशित्वं च वशित्वं च तथा कामाव संमिता॥

अर्थात्-अणिमा गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, महिमा, ईशित्व, वशित्व ....... इन आठ ऐश्वर्ययुक्त सिद्धियों को संजीवनी उपलब्ध कराती हैं इनको पाकर व्यक्ति देवतुल्य बन जाता है।

शारीरिक स्तर पर संजीवनी अग्नि, जल, विष आदि का प्रभाव नहीं पड़ने देती। इसके सेवन से सुदृढ़ माँसपेशी, तेजस्वी दृष्टि, उच्च-श्रवण शक्ति तथा नवजीवन की प्राप्ति होती है। व्यक्तित्व में तेजस्विता तथा प्रतिभा का समन्वय होता है तथा व्यक्तित्व में अनूठापन आ जाता है। लघुस्तर पर तपेदिक, बाल रोग, शिरोशूल, मानसिक रोग, भूत-प्रेत बाधा, बुखार, दृष्टिदोष, सर्पदंश आदि से उत्पन्न रुग्णता को दूर करने में इसकी सक्षमता का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार संजीवनी का प्राप्तिस्थान हिमालय की पर्वत-श्रृंखला विंध्याचल पर्वत देवगिरि श्रीपर्वत, महेन्द्र, मल्लिकार्जुन पर्वत, सह्माद्रि एवं सिन्धु नदी का उद्गम माना जाता है। परन्तु वर्तमान समय में इसे दुर्लभ जड़ी-बूटी के रूप में जाना जा सकता है। यद्यपि जानकार बताते है कि उचित स्थान पर खोजने पर इसे अभी भी प्राप्त कर लाभ उठाया जा सकना सम्भव है। आयुर्वेद के अनुसार चमकने वाली अन्य दिव्य औषधियों के नाम इस प्रकार हैं-त्रिपदा गायत्री, रैक्त, अनिष्टम्, स्वयंप्रभ, एष्टम, पार्वत, जाग्रत, शांकर, अंशवान, करवीर लालवृत, प्रतानदान, कनकप्रभ, श्वेतान, कनियान, दूर्वा, रजतप्रभ, अंशुमान, मंजुमान, चन्द्रमा, महासोम आदि। इनसे सम्बन्धित कुछ विशेष विवरण अब तक अप्राप्त हैं।

अथर्ववेद में अपामार्ग नामक औषधि का उल्लेख भी मिलता है। 17वें सूक्त के 1-8 मंत्र के अंतर्गत इसके सहस्रवीर्य, रक्षोघ्न, कृमिघ्न, रसायन, क्षुधातृष्णा मारण, विषघ्न, अर्शोघ्न, अश्मरी नाशन तथा ओजोवर्धन प्रभाव की जानकारी दी गई है। यजुर्वेद के अंतर्गत इसके चूर्ण से हवन करने पर राक्षसों के अर्थात् दुष्ट चिन्तनजन्य विकारों के विनाश होने की बात कही गयी है। इसका प्रभाव पापनाशन, मृत्युनाशन तथा दुःखनाशन के रूप में भी प्रतिपादित किया गया है। शौनकीय अथर्ववेद संहिता (7।65।3) के अनुसार यह कुष्ठ रोगनाशक भी है। याज्ञवल्क्य शिक्षा तथा विष्णु धर्मसूत्र में इसके दातौन को अत्यन्त उपयोगी बनाया गया है। ज्योतिर्विज्ञान में कहीं-कहीं बुध ग्रह को सहायक बनाने हेतु भी इसको समिधा रूप में प्रयुक्त करने का विधान बताया गया है। इसे सौभाग्य-दायिनी घोषित किया गया है। अपामार्ग की मंजरी को सर्प-वृश्चिक आदि के भय से निवृत्ति के लिए भी घर में रखने का विधान है। अपामार्ग यों सर्वसुलभ औषधि है, पर अधिकाँश लोग इसके दुर्लभ गुणों से अनजान हैं।

हिमालय क्षेत्र में अमृत तालाब के निकट कूण्ठ नामक वनौषधि के पाए जाने का उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है। नेत्र-रोग शिरोरोग, प्राणविकार, यक्ष्मा, कास-श्वास वातविकार के लिए इसका सेवन अति उपयोगी बताया गया है। रसायन तथा बाजीकरण के रूप में भी इसका प्रयोग अत्यन्त गुणकारी रूप में भी इसका प्रयोग अत्यन्त गुणकारी रूप में हुआ है। पिप्पलाद संहिता के अनुसार, यह शूलहर तथा विषघ्न भी है। केशव पद्धति (28।13) में इसके चूर्ण को नवनीत के साथ मिलाकर लेने से शिरोरोग, राजयक्ष्मा में लाभ मिलता है।

ऋग्वेद एवं अथर्ववेद में पर्ण नामक विशिष्ट बूटी का विवरण मिलता है। पहचान के रूप में इसके त्रिपदा गायत्री के सदृश तीन-तीन पत्ते एक साथ होने की बात कही गयी है। इसे ब्रह्म अर्थात् ज्ञान का प्रतीक माना गया है। अथर्ववेद में इसे बल, आयु, समृद्धि तथा यशदायक बताया गया है। इसके लिए पर्णमणि को शरीर में धारण करने का विधान है।

सुमेरु पर्वत पर 11,000 से 17,000 फीट तक पायी जाने वाली ‘रुदन्ती’ नामक बूटी प्राचीन काल में दिव्य रसायन के रूप जानी जाती थी। इससे उस समय में सोना बनाया जाता था। इसके लिए राँगा-ताँबा आदि को गलाकर इसे रुदन्ती के ताजे रस में डालते थे। परन्तु इसकी पूर्ण प्रक्रिया का ज्ञान आज उपलब्ध नहीं है। सामान्य रूप से सेवन करने पर भी यह बूटी शरीर को महान शक्ति प्रदान करती हैं। यह बुढ़ापे की जीर्णता तथा रोग-नाशक भी है। यह आयुवर्द्धक तथा मरणासन्न व्यक्ति को नवजीवन प्रदान करने वाली है। यह गर्म बूटी है, इसलिए जाड़े के मौसम में ही इसके सेवन करने का सुझाव दिया गया है। आयुर्वेद ग्रन्थों में इसे भी संजीवनी के रूप में घोषित किया गया है। अतिविशा, कटू, रोहिणी, घावपूर्णी आदि बूटियाँ भी इसी श्रेणी में आती हैं, जिनसे अनेक रोगों का निदान सम्भव हो सकता है।

हिमालय क्षेत्र चिरपुरातन काल से अनेकों प्रकार की एवं विभिन्न गुणों वाली बूटियों एवं वनौषधियों को केन्द्र मान जाता रहा है। शास्त्रों में एक आख्यान इस प्रकार आता है कि समुद्र-मन्थन के उपरान्त प्राप्त अमृतकलश को धन्वन्तरि देवलोक की ओर ले जा रहे थे। रास्ते में अमृत की चन्द बूँदें छलकती हुई भूमि पर गिरती गयी। जहाँ-जहाँ ये बूँदें गिरीं, वहाँ जड़ी-बूटी एवं दिव्य औषधियों प्रकट होती चली गयी। इस प्रकार से लाखों-करोड़ों जड़ी-बूटियों के उद्भव की सम्भावना व्यक्त की जाती है।

अब आवश्यकता इस बात की है-मनुष्य आधुनिकता की अन्धी दौड़ में जीवजगत-वनस्पतिजगत एवं पर्यावरण के बीच तारतम्य को नष्ट न करें, अन्यथा उसकी भौतिक प्रगति उसकी जीवन-रक्षा न कर सकेगी। इसलिए पुनः नए सिरे से उपयोगी जीवनदायी वनस्पतियों का आरोपण करने उन्हें विकसित एवं प्रसारित करने की आवश्यकता जान पड़ी है। शान्तिकुञ्ज ने समय की इस महान जरूरत को पहचाना है और वनौषधि अनुसंधान केन्द्र के साथ ही दुर्लभ वनौषधि वाटिका लगाने का निश्चय किया है।

यह दुर्लभ वनौषधि वाटिका पाने नाम के अनुरूप ही दुर्लभ वनौषधियों से भरी-पूरी होगी। इन दिनों शान्तिकुञ्ज के आयुर्वेदाचार्य एवं वनस्पति-विशेषज्ञ हिमालय के गहन प्रदेशों के साथ देश के अन्य भू-भागों से औषधि पादपों का संकलन एवं चयन करने में लगे हुए है। इस संदर्भ में नष्टप्राय एवं बहुमूल्य प्रजातियों को प्राथमिकता दी गयी है। गंगा की गोद एवं हिमालय की छाया में शान्तिकुञ्ज के निकट बनने वाले आयुर्वेद अनुसंधान केन्द्र में ही इनका रोपण किया जाएगा।

यह वनौषधि उद्यान कई मायने में अनोखा एवं अनूठा होगा। उद्यान परिसर में ही एक यज्ञशाला होगी, जिसमें नियमित यज्ञ-हवन होगा, ताकि यज्ञ के माध्यम से बरसने वाले प्राणपर्जन्य को आत्मसात् करके औषधियाँ वैदिकयुग की भाँति प्राण संपन्न हो सकें। साथ ही यज्ञधूम के वाँछित हो सकें। साथ ही यज्ञ धूम के वाँछित प्रभावों को उन पर देखा जा सकेगा। इसी क्रम में प्रातः-सायं वनौषधि वाटिका में प्राचीन वैदिक मंत्रों का सस्वर संगीत बजाया जाएगा। पिछले दिनों कई स्थानों पर संगीत के प्रभाव से पेड़-पौधों का असाधारण विकास देखा गया है। वैदिक मंत्रों की सस्वर गूँज का प्रभाव तो सर्वथा असन्दिग्ध है। इस बात के लिए पूरे प्रयत्न उगाये जाने वाले औषधि पादपों का स्तर वैदिक काल से तनिक भी न्यून न रहे।

बाद में इस बात की व्यवस्था की जाएगी कि अपने परिजन, मिशन के कार्यकर्ता यहाँ से इन दुर्लभ औषधि पादपों की पौधों को प्राप्त कर सकें और इनकी रोपाई अपने गृहउद्यान एवं स्थानीय स्तर पर बहुतायत में करें। दुर्लभ वनौषधि वाटिका का स्वरूप प्रारम्भ में भले ही छोटा हो, परन्तु धीरे-धीरे इसका विराट विस्तार होता चलेगा। इस केन्द्रीय उद्यान की सहायता से ही क्षेत्र की प्रत्येक शक्तिपीठ-प्रज्ञापीठ में अनेकों वनौषधि उद्यानों की सम्भावना साकार होगी। इसके दुहरे लाभ होंगे। एक तो मनुष्य को शक्ति व सामर्थ्यों से युक्त नया जीवन मिलेगा तथा दूसरा वातावरण में संव्याप्त प्रदूषण की समस्या सुधरेगी। आयुर्वेद के पुनर्जीवन की सम्भावना इस माध्यम से साकार करके ही मानवता की सबसे बड़ी सेवा की जा सकेगी। विश्वास किया जाता है कि अपने प्रियपरिजनों में से प्रत्येक इसे धर्मकार्य-पुण्यप्रयोजन का श्रेष्ठतम स्वरूप मानकर अपनी श्रद्धा-संवेदना श्रम एवं मनोयोग को इस हेतु नियोजित करने के लिए प्राणपण से कोशिश करेगा।


अधिक श्रद्धावान (Kahani)

वाजिश्रवा के शिष्यों-धर्मद और विराध में विवाद छिड़ गया। दोनों अपने-अपने को अधिक श्रद्धावान सिद्ध करना चाहते थे।

दोनों गुरु के समीप गये और निर्णय देने का आग्रह किया। गुरु ने कहा-अपनी-अपनी श्रद्धा की व्याख्या करो, तब निर्णय देंगे।”

धर्मद बोला-देव आश्रम जीवन में मैंने आपकी प्रत्येक बात मानी। उचित-अनुचित का भी ध्यान नहीं किया। आपकी किसी भी आज्ञा को तर्क या विवेक से परखने का प्रयत्न नहीं किया। क्या इससे बढ़कर भी कोई श्रद्धा हो सकती है?”

गुरुदेव मुसकराये, अब उन्होंने विराध को संकेत किया। विराध बोला-भगवन्-मुझे ज्ञान की प्रबल आकांक्षा है, अतएव आप पर श्रद्धा भी अगाध है, पर साथ ही यह भी परखना आवश्यक समझता हूँ कि जो कुछ कहा या बताया जाता है, वह सत्य से परे तो नहीं। सत्य का मूल्य अधिक है, इसलिए सत्य को पाने के लिए सर्वस्व छोड़ने के लिए तैयार रहता हूँ।”

गुरु ने कहा-धर्मद-सत्य को परखकर धारण की जाने वाली श्रद्धा ही श्रेष्ठ है।”


गंगा की गोद एवं हिमालय की छाया में एक अभिनव साधना-आरण्यक

अपने परिजनों की चिरसंचित लालसा थी कि कोलाहल-जनसंकुल से दूर उन्हें एकान्त साधना का अवसर सुलभ हों। विचारक्रान्ति अभियान की विविध-विधि गतिविधियों का केन्द्र बनने के कारण शान्तिकुञ्ज अब पूरी तरह क्रान्तिकुंज में बदल चुका है। यहाँ आने वाले परिजनों की व्यापक भीड़-भाड़ के साथ क्रान्तिकारी परिवर्तनों के लिए ताना-बाना हर पल बुना जाता रहा है समय का तकाजा भी यही है। युगसन्धि का अब थोड़ा ही समय शेष है, इसलिए इन दिनों इस तरह के प्रयत्नों में जितनी भी तीव्रता लायी जा सके, कम है। लोकसेवा के सत्प्रयोजनों में जिस पवित्रता, प्रखरता एवं तेजस्विता की कदम-कदम पर आवश्यकता है, वह साधना से ही अद्भुत होती है। शान्तिकुञ्ज के दिव्यक्षेत्र से आध्यात्मिक विभूतियों, सिद्धियों, शक्तियों के दिव्य-अनुदानों का सिलसिला तो लगातार चलता रहता है, परन्तु इन्हें ग्रहण वही कर पाते हैं, जिनमें साधना की समुचित योग्यता एवं पात्रता है।

इस योग्यता को अपना हर परिजन प्राप्त कर इसे, इसी उद्देश्य से शान्तिकुञ्ज के समीप ही एक साधना-आरण्यक के निर्माण की बात सोची गयी है। स्थान शान्तिकुञ्ज के समीप होने के कारण यहाँ निर्माण की गयी कुटीरों में साधकगण अपनी गम्भीर साधनाओं के लिए समुचित एकान्त पा सकेंगे। सभी जानते हैं कि साधना की सफलता में स्थान, क्षेत्र व वातावरण का असाधारण महत्व है। विशिष्ट साधनाओं के लिए घर छोड़कर अन्यत्र उपयुक्त स्थान पर जाने की आवश्यकता इसी लिए पड़ती है कि पुराने निवासस्थान का ढर्रा अभ्यस्त रहने से वैसी मनःस्थिति नहीं बन पाती, जैसी महत्वपूर्ण साधनाओं के लिए विशेष रूप से आवश्यक है।

यों यह कार्य घर से कुछ दूर एकान्त वाटिका, नदी तट जैसे स्थानों पर भी हो सकता है, पर सुविधा हो तो हिमालय एवं गंगातट की बात सोचनी चाहिए। बाह्य शीतलता के साथ आन्तरिक शान्ति का भी तारतम्य जुड़ा रहता है। हिमालय की भूमि ही ऊँची नहीं है यहाँ की साधनागत सुसंस्कारिता भी ऊँची है। प्राचीनकाल में हिमालय क्षेत्र ही स्वर्गक्षेत्र कहलाता था। देवमानवों की यही भूमि थी। दिव्यद्रष्टा जानते है कि अभी भी दिव्य आत्माएँ वहीं निवास करती है। कृपाचार्य, हनुमान आदि चिरंजीवी उसी क्षेत्र में निवास करते है। अपने मिशन की सूक्ष्म संचालक सत्ता के परमगुरु स्वामी सर्वेश्वरानन्दजी का निवास भी यहीं है।

इतिहास साक्षी है कि प्रायः सभी ऋषियों की तपश्चर्याएँ इसी क्षेत्र में सम्पन्न हुई हैं। सात ऋषियों की तपोभूमि हरिद्वार के उस स्थान पर थी, जहाँ आजकल सप्त-सरोवर है। उनके आश्रमों को बचाने के लिए गंगा ने अपनी धारा को सात भागों में बाँटा। पाण्डव इसी क्षेत्र में तप करते हुए स्वर्ग सिधारे थे। गुरु वशिष्ठ की गुफा यहीं थी। व्यास जी और गणेश जी ने मिलकर 18 पुराण इसी क्षेत्र के वसोधारा नामक स्थान में लिखे थे। भगीरथ, परशुराम, विश्वामित्र, दधिचि जैसे परम-प्रतापी तपस्वियों की साधना हिमालय में ही सम्पन्न हुई थी। संक्षेप में भारत की आध्यात्मिक विभूतियों की भूमि यदि हिमालय को माना जाए, तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी। इस मूर्तिमान् देवता की छाया में कितनों ने न जाने क्या-क्या पाया है? अभी भी उसकी यह विशेषता अक्षुण्य है।

हिमालय की छाया-गंगा की गोद और वहाँ का भावभरा वातावरण, साथ ही यदि शक्तिशाली संरक्षण-मार्गदर्शन मिलता हो तो उसे साधना क सुअवसर एवं साधक का सौभाग्य मानना चाहिए। ऐसे ही वातावरण में साधना का स्वर्गीय दिव्य आनन्द प्राप्त करने के लिए राजा भर्तृहरि बेचैन थे। भर्तृहरि शतक में उनकी अभिव्यक्ति इस प्रकार है-

गंगातीरे हिमगिरि शिला वद्ध पद्मासनस्य ब्रह्मज्ञानाभ्यसन विधिना योगनिद्रांगतस्य।

अर्थात्- जीवन का सौभाग्य दिवस कब आएगा, जब मैं गंगा के तट की हिमालय शिला पर पद्मासन लगाकर ब्रह्मानंद में लीन समाधिस्थ होकर बैठूँगा।

अपने इसी उच्चस्तरीय मनोरथ को पूरा करने के लिए उन्होंने राजपाट का सारा जंजाल त्यागा और योगी का देव-जीवन अपना कर जीवन-लक्ष्य की सिद्धि प्राप्त की।

युगसाधकों की उच्चस्तरीय साधना के लिए जिस उपयुक्त स्थान एवं वातावरण की आवश्यकता थी, उसी के अनुरूप भूमि का चयन किया गया है। यह प्रस्तावित साधना आरण्यक गंगा की धारा से थोड़ी ही दूर पर है। सात ऋषियों की तपोभूमि इसी के पड़ोस में है। गंगा की जलधारा आगे शहरों में जाकर भले ही प्रदूषित हो चुकी हो, पर यहाँ अभी वैसी स्थिति नहीं बनी। यहाँ वह अपनी मौलिक विशेषता को पूर्ववत् बनाए हुए हैं।

यहाँ पर साधना का अपना महत्व होगा। नित्य गंगास्नान, मात्र गंगाजलपान, ठहरना, बैठना, गंगामाता की ही गोद में। इन सभी विशेषताओं के कारण अगले दिनों जिस साधना आरण्यक का निर्माण किया जा रहा है-वह सब तरह से उपयुक्त है। इसे दैवी-अनुग्रह एवं सहयोग के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। इसके निर्माण के लिए परम सात्विक धन भी भावभरी श्रद्धा के लिए अपने को सार्थक बनाने के लिए मचलता हुआ चला आएगा, ऐसा विश्वास किया गया है।

आत्मोत्कर्ष की साधना सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए अपना श्रम करना तो आवश्यक है ही-वातावरण का उपयुक्त होना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जनकल्याण के लिए किए जाने वाले प्रयासों के साथ स्वयं पूज्य गुरुदेव के जीवन में हिमालय के अधिक एकान्त एवं गहन प्रदेशों में की जाने वाली विशेष तप-साधना की भिन्नता नहीं, अधिक उपयोगी वातावरण का अधिक प्रखर सान्निध्य का लाभ लेना ही था। उचित समझा गया कि अखण्ड-ज्योति के वे परिजन जो लेखों का पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं समझते, बल्कि साधना-क्षेत्र में कुछ साहस भरे विशिष्ट कदम बढ़ाना चाहते हैं, उनके लिए अन्य आधार अपनाने की तरह यह भी आवश्यक है कि वातावरण एवं सान्निध्य की प्रखरता का लाभ उठाते हुए अपनी साधना-प्रक्रिया सम्पन्न करें। गंगा की गोद एवं हिमालय की छाया में बनाए जाने वाले इस अभिनव साधना-आरण्यक का उद्देश्य यही है।


पर्यावरण संरक्षण के लिए वनौषधियों का महत्व

पिछले कुछ सालों से पर्यावरण बड़े-बड़े आयोजन इस संदर्भ में हो रहे है। इसके बावजूद पर्यावरण का संकट है कि बढ़ता ही जा रहा है। इसका मूल कारण है कि प्रकृति के प्रति हमारी सोच में, हमारे व्यवहार में एक बुनियादी विकृति है। हम प्रकृति पर विजय प्राप्त करना चाहते है। गर्व से उस पर आधिपत्य जमाना चाहते हैं, जबकि जरूरत इस बात की है कि हम विनम्रता के साथ उससे सह-अस्तित्व का सम्बन्ध बनाएँ।

निश्चय ही इतिहास कभी भी ऐसा नहीं रहा। प्राचीन भारत के वैदिक वांग्मय में ऐसे अनेक सूक्त-ऋचाएँ उक्तियों कथानक मिलते है, जिनमें प्रकृति के प्रति गहरा श्रद्धाभाव है। वेदकालीन ऋषि-तत्त्ववेत्ता प्रकृति को माता कहकर वन्दना करते थे। अकेले भारत ही नहीं अमेरिकी महाद्वीप से लेकर बेबीलोन, मिश्र आदि की अनेक प्राचीन सभ्यताओं में प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा-भावनाओं के अनेक उदाहरण मिलते है। उदाहरण के लिए, ग्वाटीमाला की माया सभ्यता की नैतिक सोच में जीवन के हर रूप की उत्पत्ति के स्रोत या बीज को एक ही माना गया। इनमें से कुछ बीज पेड़-पौधे बन गए, कुछ नदी बन गए। इस तरह सबको एक ही बीज से उत्पन्न हुआ मानकर इस सोच ने मनुष्य को प्रकृति के सभी रूपों के प्रति प्रेम और रक्षा की भावना अपनाने के लिए प्रेरित किया।

किन्तु जैसे-जैसे मनुष्य प्रकृति के अनुदानों से लाभान्वित होता गया, उसके लोभ में भी बढ़ोत्तरी होती गयी। लोभ की वृत्ति ने श्रद्धा के भाव को कम कर दिया। इस क्रम में यूरोपीय आधुनिक विधा के महत्वपूर्ण विचारक फ्राँसीसी बेकन ने तो यहाँ तक कह डाला कि मनुष्य का प्रमुख कार्य प्रकृति पर विजय प्राप्त करना है और उसे अपना गुलाम बनाना है। इसके साथ ही प्रकृति पर आधिपत्य जमाने की सोच बढ़ती गयी। प्रकृति पर आधिपत्य जमाने का मतलब यह है कि हम प्रकृति को कितना भी नुकसान पहुँचाएँ, इसकी तनिक भी चिन्ता नहीं। हम केवल अपने उपभोग और इसके लिए जरूरी उत्पादन-कार्य को अधिक से अधिक बढ़ाना चाहते है और इसका प्रकृति के विभिन्न रूपों जैसे-वायुमण्डल की शुद्धता, धरती के उपजाऊपन, जलस्रोतों की प्रचुरता आदि पर क्या असर पड़ेगा, उसकी हमें कोई परवाह नहीं।

दूसरी ओर प्रकृति के साथ विनम्र सह-अस्तित्व का अर्थ यह है कि हमें अपनी जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ इस बात का भी पूरा खयाल है कि हम प्रकृति पर अधिक दबाव डालकर उसके विभिन्न रूपों को नुकसान न पहुँचाएँ। प्रकृति पर हमारा दबाव कम से कम रहे। अतः उसके संसाधनों का उपयोग हम संयम से करना सीखते है। अपनी उपभोग की वस्तुओं को वास्तविक जरूरत तक सीमित कर हम सादगी का जीवन अपनाते हैं। प्रकृति की अपनी सीमाओं को समझे बिना उसके संवेदनहीन दोहन से प्रकृति में आश्रय लेने वाले सभी प्राणि-वनस्पतियों की तो क्षति होती ही है, साथ में मनुष्य का भी नुकसान होता है।

हजार वर्षों से मनुष्य वनों से अपनी जरूरत के तरह-तरह के फूल, फल, जड़ी-बूटियाँ-पत्ते लकड़ी लेता रहा और वन खुले दिल से देते रहे। किंतु फिर मनुष्य ने लकड़ी की उपयोग केवल जरूरत के लिए नहीं अपव्यय के लिए करना शुरू कर दिया। उसने अन्धाधुन्ध वनों की कटाई तो की, किन्तु नए वृक्ष रोपने की तनिक भी आवश्यकता नहीं समझी। उसने लकड़ी की लुगदी बनाकर उसके इतने विविध उपयोग सीख लिए कि लगने लगा कि अपने असीमित उपभोग का अधिकाँश बोझ वह वनों पर डाल देना चाहता है। नतीजा यह हुआ कि एक ही वर्ष में लाखों एकड़ वन उजाड़ने लगे। वहाँ रहने वाले तरह-तरह के जीव -जन्तुओं में त्राहि-त्राहि मच गयी। कितने ही लुप्त हो गए, कितने ही लुप्त होने के कगार तक पहुँच गए। हजारों तरह की वनस्पतियाँ जिनके तरह-तरह के उपयोग हो सकते थे, लुप्त हो गयी।

वनस्पतियों के नष्ट होने से वायुमण्डल में विषाक्तता बढ़ने लगी। आज की परिस्थितियों में वातावरण कितना विकृत एवं प्रदूषित हो गया है कि अकेले मानव स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, अन्य जीव-जन्तुओं के स्वास्थ्य के लिए भी गम्भीर खतरा उत्पन्न हो गया है। वायुमण्डल की बहुत ऊपरी परत में भी उसके प्रदूषकों ने पहुँचकर ओजाने परत में छेद कर दिया। इससे सूर्य की किरणों में भी ऐसे हानिकारक तत्व आ गए जिनके त्वचा कैंसर, दमा, मोतियाबिन्द आदि ज जाने कितनी स्वास्थ्य-समस्याएँ पैदा हो गयी है।

पर्यावरण प्रदूषण का स्वरूप कोई भी हो, परन्तु उससे होने वाली हानि में सर्वप्रथम मानवीय स्वास्थ्य-संकट है। आए दिन ऐसी-ऐसी बीमारियाँ पैदा हो रही हैं, जिनके बारे में न तो कहीं पढ़ा गया और न कहीं सुना गया। देखने का तो खैर कोई सवाल ही नहीं पैदा होता। इस भयावह प्रदूषण को नियंत्रित करने, पर्यावरण को संरक्षण देने के सम्बन्ध में भी हमें उस उपाय को शीर्ष स्थान देना होगा, जो पर्यावरण संकट से उबारने के साथ हैं हमारे स्वास्थ्य-संकट से भी छुटकारा दिलाए।

इस क्रम में वनौषधियों को स्थान-स्थान पर लगाना सर्वमान्य उपाय है। गृहवाटिका हो या वन, हर कहीं इनकी उपस्थिति वातावरण में प्राणतत्त्व को बढ़ाने वाली सिद्ध होगी। इनका संपर्क एवं सान्निध्य मानव के गिरते स्वास्थ्य को सम्बल प्रदान करेगा। जिन औषधियों को वन में रोपा जाना चाहिए, उनमें जामुन, नीम, हरड़, बहेड़ा, आँवला, पीपल, बरगद, बेल, अर्जुन, अशोक, सहजन, कचनार, अमलतास, वरुण, शिरीष श्रेष्ठ है।

जहाँ वन या खुले मैदान सुलभ नहीं हैं, वहाँ गृहवाटिका में वनौषधियों को उगाकर पर्यावरण के समृद्ध किया जा सकता है। गृहवाटिका में उगायी जाने योग्य वनौषधियाँ तुलसी, घृतकुमारी, पोदीना, गुलाब, पथरचटा, गिलोय, पोई, अश्वगंधा, शतावरी, वचा, अकरकरा, ब्राह्मी, वासा, आज्ञाघास, गेंदा आदि मुख्य है। अपने घर में व समीप के परिसर में यदि उपरोक्त वनौषधियों को उगाने-रोपने की परम्परा चल पड़े, तो पर्यावरण-संकट का देखते-देखते सार्थक समाधान निकल सकता है। इन औषधियों का सामीप्य एवं इनके गुणों का परिचय हमें रोजमर्रा के जीवन में अपने वाली स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से भी छुटकारा देता रहेगा। यह कार्य प्रकृति का श्रृंगार भी है और उसके प्रति अपनी श्रद्धा की भावभरी अभिव्यक्ति भी।


यज्ञ विधा का वनौषधि विज्ञान

ऋग्वेद में कहा गया है, वात आवातु भेषजम् अर्थात् जब भेषजयुक्त औषधयुक्त वायु चारों ओर अच्छी प्रकार बहती है, तो वह सर्वश्रेष्ठ भेषजवात अर्थात् रोगों को नष्ट करने वाली वायु बन जाती है। अथर्ववेद में स्पष्ट किया गया है कि यज्ञादि में दी जने वाली आहुतियों में टी.बी. आदि रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है।

मु´्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्। अथर्ववेद 3-11-1

वेद, विज्ञानाचार्य पं. वीरसेन वेदत्रयी ने अपने निबन्ध विश्व-स्वास्थ्य के लिए यज्ञ की उपयोगिता’ के अंतर्गत उल्लेख किया है कि यज्ञ के अद्भुत प्रभाव से हृदय, वात, श्वास, उन्माद, लकवा, वाक्-सामर्थ्य हीनता, रक्तचाप, शारीरिक पीड़ा, गलित कुष्ठ, कल्पवात, कैंसर, क्षय, सन्तानहीनता, अशक्ति आदि अनेकों रोग दूर होते है। रोगों से मुक्ति, यज्ञ में प्रयुक्त वनौषधि के प्रयोग पर निर्भर करता है। इस तरह इन वनौषधियों द्वारा हवन करके पर्यावरण के प्रदूषण-मुक्त करने में भी सहायता मिलती है। इस सम्बन्ध में महर्षि दयानन्द का कथन है कि हवन के समय प्रयुक्त वनौषधियाँ सूक्ष्म होकर वायु में फैल जाती हैं और वायुमण्डल को दुर्गन्ध से निवृत्ति कर सुगन्ध से भर देती हैं। यह हवन सामग्रियाँ अग्नि के सामर्थ्य के साथ दुर्गन्ध युक्त वायु को हटाकर उस स्थान पर पवित्र वायु का संचार करती है। इस तरह वनौषधियाँ वायु, वृष्टि, जलादि को शुद्ध एवं पुष्टिकारक बनाती है।

शतपथ ब्राह्मण में यज्ञ से रोग-निवारण की विधियों का विस्तार से उल्लेख किया गया है। इसमें अग्निहोत्र में प्रयुक्त किये जाने वाली वनौषधियों का वर्णन मिलता है। अपामार्ग होम द्वारा देवों ने राक्षसों को अपने मार्ग से हटा दिया था। मार्कण्डेय पुराण में इस पौधे का नाम आघाट दिया गया है। एकलिंग रचित ‘शतपथ ब्राह्मण’ भाग-3 में स्पष्ट किया गया है कि अर्क को हवियों के रूप में प्रयुक्त किया जाता था। अर्क को अन्न कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण के नवम खण्ड में शतरुद्रीय में रुद्र को समर्पित 425 हवियों में से एक हवि अर्क पत्र की भी है। अथर्ववेद तथा तैत्तरीय संहिता के अनुसार ‘अवका’ यज्ञ विषयों में प्रयुक्त किया जाता था। यह एक जलीय पौधा है। क्रमुक लाल रंग के मीठे फल वाला एक ऐसा वृक्ष है, जिसे हवन करने के बाद उसका भस्म नहीं मिलता। वैद्यक ब्राह्मणों से अश्वत्थ, अश्वबाल, उदुम्बर, कापर्मर्य, छाढिर, गवेधुक, सोम आदि वनौषधियों का प्रयोग शरीर एवं मन को निरोग तथा शाँति बनाये रखने के लिए किया जाता था।

महर्षि दयानन्द ने देवयज्ञ में प्रयुक्त होने वाले चार प्रकार के पदार्थों का वर्णन किया है-

1- पौष्टिक पदार्थ-घृत दूध, अन्न जैसे गेहूँ, चावल, जौ, ज्वार आदि।

2- सुगन्धित पदार्थ-केसर कस्तूरी, अगर, तगर, श्वेतचन्दन, जायफल, जावित्री, इलायची आदि।

3- रोग निवारक पदार्थ- गिलोय, सोमलता, गुग्गुल आदि।

4- मिष्ठान्न पदार्थ- शक्कर, गुड़, शहद, छुहारे, मुनक्का आदि।

इन पदार्थों का रासायनिक गुणधर्म उनकी भौतिक अवस्था पर आधारित है। पदार्थों की ठोस अवस्था की अपेक्षा सूक्ष्म अवस्था में पदार्थों के घटक अत्यधिक संख्या में परस्पर मिलते हैं इसलिए पदार्थ की वाष्पीय अवस्था में इनका सम्बन्ध बढ़ जाता है। हवन सामग्री को जलाने से अल्डीक्लाइड, एमाइन्स, पिलोनिलिक, सायक्लिक टरयेनिक श्रेणी के पदार्थों की पहचान हो चुकी है। हवन में घी का विशेष उपयोग किया जाता हे। यह वाष्परूप में बदलकर सामग्रियों के सूक्ष्म कणों को चारों और से घेर लेता है और उस पर विद्युत शक्ति का ऋणात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है। केसर में लीन रंगद्रव्य, एक उड़नशील तैल, स्थिर तैल, कोसीन नामक ग्लूकोसाइड तथा पिकोकोसीन नामक तिक्त तत्व शर्करा होती है। इसकी भस्म में पोटेशियम और फास्फोरस होता है। यह मस्तिष्क को बल देता है। केसर वातावरण को परिष्कृत करता है। गुलाब में टैनिक एसिड तथा गैलिक एसिड होता है। चन्दन का हवन करने से वायुमण्डल शुद्ध एवं सुगन्धित होता है। यह शामक, दुर्गन्धहर, दाहप्रशमन तथा रक्तशोधक है। हवन में इसका प्रयोग मानसिक व्यग्रता एवं दुर्बलता को दूर करने के लिए किया जाता है।

वनौषधियों में ब्राह्मी मेधावर्द्धक तथा मानसिक विकार, रक्त, श्वास, त्वचा सम्बन्धी रोगों का निवारक माना जाता है। इसमें हाइड्रोकोटिलीन एशियाटिकोसाइड तथा मस्तिष्कीय संरचनाओं के लिए उपयोगी आइजोब्रालीक एसिड होता है। वायुमण्डल का शोधन करने के लिए जायफल एवं जावित्री का हवन किया जाता है। इनके सूक्ष्म कणों में वक्रता कम होने से इनका रासायनिक प्रभाव बढ़ जाता है। सतावरी का हवन वात, पित्त विकारों को दूर करने के लिए किया जाता है। यह नाड़ीबलदायक भी है। अश्वगंधा में ग्लाइकोसाइड, विठानिआल अम्ल, स्टार्च शर्करा तथा एमिनो एसिड पाया जाता है। यह बलवर्धक एवं पुष्टिदायक होता है। वट-वृक्ष की समिधा का प्रयोग रक्तविकारों को मुक्त करने के लिए किया जाता है। कर्पूर के धुएँ में नजलानाशक गुण होता है। खाण्ड का हवन हैजा, टीवी, चेचक आदि बिमारियों को शीघ्र नष्ट करता है।

गिलोय, चिरायता, शहद आदि रक्तशोधक औषधियाँ है। कर्पूर, गुग्गुल कृमिनाशक है। डॉ. लेनवान लाक्स का कहना है कि कृमि मनुष्य को भयावह रोग से ग्रसित कर देता है। गुग्गुल आदि कृमिनाशक सामग्री का हवन करने पर इनके सूक्ष्मकण के श्वास-प्रश्वास द्वारा शरीर के अन्दर पहुँच जाते है। एवं कृमियों का नष्ट कर देते है। इसमें शक्कर भी मिलाया जाता है, ताकि इसके माध्यम से सारे कृमि एक जगह एकत्रित हो जाए एवं इन्हें आसानी से नष्ट किया जा सके।

वेदों का वैज्ञानिक अध्ययन करने वाले एक संस्थान ने दावा किया है। अग्निहोत्र में विशिष्ट वनौषधियों का प्रयोग कर न केवल शारीरिक एवं मानसिक रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है, बल्कि वातावरण को भी शुद्ध एवं परिष्कृत किया जा सकता है। इस संस्थान ने डेंगू जैसे घातक रोगों के निवारण के लिए भी हवन के महत्व को दर्शाया है। शिवपुरी महाराष्ट्र के वेद विज्ञान अध्ययन संस्थान के प्रवक्ता रवि राजू के अनुसार दिल्ली में फैलने वाले डेंगू रोग के लिए हवन ही एकमात्र सार्थक एवं पूर्ण उपचार हो सकता है। श्री राजू के अनुमान है कि विश्व में लगभग पाँच लाख लोग नियमित रूप से यज्ञ करते हैं। इन्होंने आगे स्पष्ट किया है कि यज्ञ की वनौषधि विज्ञान अत्यन्त लाभदायक एवं चमत्कारपूर्ण परिणाम उत्पन्न करता है। इससे वायुमण्डल प्रदूषण मुक्त रहता है। यज्ञ के अन्त में प्राप्त वनौषधियों की भस्मों का भी उपयोग रोगोपचार के लिये किया जाता है। डॉ. एल.बी. कोटरीकर ने इन भस्मों से अनेकों रोगों से सफल उपचार की पुष्टि की है। दिल्ली के एक वैज्ञानिक डॉ. सेल्वामूर्ति ने इन वनौषधियों के महत्व को स्वीकारा है। इनके अनुसार यज्ञ से तनाव कम होता है एवं मानसिक शाँति में अभिवृद्धि होती है। इससे मस्तिष्कीय अल्फा तरंगों में 20 प्रतिशत की वृद्धि देखी गयी है।

रोगियों की प्रकृति एवं रोग के आधार पर ही विभिन्न वनौषधियों के प्रयोग का विधान है। प्रत्येक रोग के लिए इसका अनुपात एवं प्रकार अलग-अलग होता ह। शीत ज्वर में पटोल पत्र, नागरमोथा, कुटकी, नीम की छाल एवं पुष्प गिलोय, करंचा आदि से बनी हवन सामग्री का प्रयोग, किया जाता है। खाँसी के लिए मुलहठी, पाल, हल्दी, अनार, कटेरी, उन्नाज, अंजीर की छाल तथा लौंग के एक निश्चित अनुपात का उपयोग किया जाता है। जुकाम हेतु दूब, पोस्त, कासनी, अंजीर, सौंफ, उन्नाज, बहेड़ा, धनिया व कालीमिर्च लिया जाता है। मंदबुद्धि के लिए शतावरी, ब्राह्मी, ब्रह्मदण्डी, गोरखमुखी, शंखपुष्पी, मण्डूकपर्णी, बच व मालकौंगनी की हवन सामग्री बनायी जाती है। मस्तिष्क रोग में बेर की गुठली का गूदा, मौलश्री की छाल, पीपल की काँपल, इमली के बीजों का गूदा, काखजंघा, बरगद के फूल, सिरेटी, गिलोय का प्रयोग किया जाता है। चर्म रोग दूर करने हेतु शीतल चीनी, चोपचीनी, नीम के फल, चमेली के पत्ते, दारुहल्दी, कपूर, मेथी व पद्माख मिलाया जाता है। रक्तविकार से छुटकारा पाने के लिए धमासा, शाखा, अड़ूसा, सरपाँखा, मजीठ, कुल्की तथा रासना की हवन सामग्री का निर्माण किया जाता है।

ऋतु विचार के अनुसार भी औषधियों का प्रयोग किया जाता है। क्योंकि अलग-अलग ऋतुओं में इसका प्रभाव अलग-अलग होता है। वसंत ऋतु मैं गुग्गुल, धूप, देवदारु, गिलोय, मुनक्का, गूलर की छाल, सुगंध कोकिला, हाआबेर, चिरायता, सफेद चन्दन, लाल चन्दन, कमल गट्ठा, कर्पूर कचरी, इन्द्रजौ, शीतल चीनी, तालीसपत्र, अगर, तगर, मजीठ, जावित्री एवं केसर को एक निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है। ग्रीष्म ऋतु में गूगल, देसी शक्कर, गुलाब चिरौंजी, शतावर, खस, गिलोय, सुपारी, आँवला, जटामासी, नागरमोथा, बायबिडंग, छरीला, दालचीनी, लौंग, लालचन्दन, तगर, मजीठ, बड़ी इलायची, धूप का बुरादा, तालीसपत्र, उन्नाज, पद्माख तथा केसर का उपयोग किया जाता है।

वर्षा ऋतु में गूगल, देसी शक्कर, देवदारु, राल, गोला, जायफल, जटामासी, बच, सफेद चन्दन, छुआरा, नीम के सूखे पत्ते, जड़सहित मकोय, सुगन्ध कोकिला, काला अगर, इन्द्रजौ, धूप, तगर तेजपत्र, बेल का गूदा, गिलोय, तुलसी, वायविडंग, नागकेसर, चिरायता, छोटी इलायची एवं केसर का प्रयोग किया जाता है। शरद ऋतु में गूगल, सफेद चन्दन, चिरौंजी, गूलर की छाल, पीली सरसों, कर्पूर कचरी, जायफल, चिरायता, जटामासी, सहदेवी, लाल एवं पीला चन्द्रह, नागकेसर, गिलोय, दालचीनी, पित्तपापड़, मोचरस, अगर, इन्द्रजौ, असगंध, शीतल चीनी, पत्रज, तालमखाना, धान की खील, मुनक्का, देसी शक्कर व केसर से बनी हवन सामग्री का उपयोग किया जाता है।

शिशिर ऋतु में प्रयोग किये जाने वाली हवन सामग्रियों में गूगल, देसी शक्कर, अख़रोट की गिरी, मुनक्का, काले तिल, लालचन्दन, चिरायता, छुआरा, जटामासी, तुम्बरु, राल, काफूर वायविडंग, बड़ी इलायची, मुलहठी, मोबास, गिलोय, तुलसी, चिरौंजी, काकड़ासिंगाी, शतावर, दारुहल्दी, पद्माख, प्रसुपीर, रेणुका, शंखपुष्पी, काँच की बीज, भोजपत्र आदि मिलाया जाता है। हेमन्त ऋतु में गूगल, देसी शक्कर, कपूर कचरी, मुनक्का, अख़रोट गिरी, काले तिल, गोला, सुगन्ध कोकिला, हाआबेर, मुसली काली, पित्तपापड़, कूट गिलोय, दालचीनी, जावित्री, मुश्कवाला, तालीस पत्र, तेजपत्र, सफेद चन्दन, रासना एवं केसर से बनी हवन सामग्री का उपयोग में लाया जाता है। वनौषधियों की यह यज्ञीय प्रक्रिया समस्त मानवता को स्वास्थ्य, आयुष्य एवं आरोग्य का वरदान देने वाली है।


शाश्वत दान (Kahani)

माधवराव पेशवा अपने जन्म-दिन पर दान दे रहे थे। अन्न, वस्त्र, स्वर्ण आदि का भारी मात्रा में दान किया जा रहा था। पंक्ति में खड़े एक बालक ने उनके सामने  यह दान लेने से इनकार कर दिया। चौंकते हुए पेशवा ने उस बालक से जानना चाहा, “क्यों भाई! आखिर तुम किस प्रकार का दान चाहते हो?”

गंभीर मुद्रा बनाकर उसने कहा, “पेशवा साहब! इन नश्वर पदार्थों का दान की बजाय आप मुझे शाश्वत दान प्रदान करने की कृपा करें।”

“अपना आशय स्पष्ट करो वत्स।” पेशवा आश्चर्यचकित थे। “शाश्वत दान से तुम्हारा अभिप्राय?” पेशवा ने बड़े स्नेह से पूछा।

“शाश्वत दान है-विद्या अतः मुझे विद्या दान की आकांक्षा है।” पेशवा ने उस बालक की बात से प्रभावित होते हुए उसे अध्ययन हेतु काशी भेज दिया। उन्होंने राज कर्मचारियों को इस प्रबन्ध के सारे निर्देश दे दिए। शाश्वत दान पाने वाला यह बालक आगे चलकर प्रसिद्ध न्यायाधीश रामशास्त्री बना।


आयुर्वेद की प्रखरता का रहस्य

प्राचीन भारतीय वाङ्मय के अगणित पृष्ठ चिकित्सकीय चमत्कारों से भरे पड़े है। इन प्रसंगों को पड़ने से उस काल की आयुर्वेदिक प्रखरता का पता चलता है। संजीवनी बूटी से मृतप्राय लक्ष्मण का पुनर्जीवित होना, महाराज वेन के शरीर की कोशिकाओं से पृथु का जन्म होना, दक्ष के कटे सिर का जुड़ना आदि अनेकों ऐसे प्रकरण है, जिन्हें पढ़-सुनकर आज के महान चिकित्सा-वैज्ञानिकों को भी दाँतों-तले उँगली दबानी पड़ जाए।

आयुर्वेद अभी भी है। पुरातनकाल की ग्रन्थावली का विशालकाय कलेवर इन दिनों भी उपलब्ध है, परन्तु उसमें अब वैसी प्रखरता नजर नहीं आती, जो चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत कर सके। इसकी प्रखरता के रहस्य की खोज-बीन में जो तथ्य उजागर होते है उनसे पता चलता है कि प्राचीनकाल का आयुर्वेद तप-साधना तथा मंत्र-विद्या से गुँथा हुआ था। वैद्यक कर्म ऐसे प्रखर व्यक्तित्व वाले महर्षिगण करते थे, जिनमें प्राण-अनुदान देने की अलौकिक सामर्थ्य होती थी। जिनका संकल्प अचूक होता था। जो अपनी गहन अन्तर्दृष्टि द्वारा रोगी के रोग ही नहीं, उसके व्यक्तित्व की गहरी छान-बीन करने में समर्थ होते थे।

आयुर्वेद से जुड़ी हुई तप-साधना किन्हीं कर्मकाण्डों या फिर क्रिया-उपचार विशेष तक सीमित नहीं है। यह अखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त प्राणऊर्जा को ग्रहण एवं संग्रह की विधि है। ब्रह्माण्ड में अनन्त ऊर्जा संव्याप्त है, परन्तु उसे धारण करने के लिए अपने व्यक्तित्व में कतिपय परिवर्तन आवश्यक होते है। असंयमी, वाचाल, कुविचारी इसे ग्रहण नहीं कर सकते। इसीलिए तप का पहला और अनिवार्य चरण है संयम। इसके अंतर्गत अपने व्यक्तित्व में निहित ऊर्जा का क्षरण रोकना होता है। तप-साधना का अगला एवं महत्वपूर्ण चरण है-परिशोधन विकारों से ग्रस्त व्यक्ति ब्रह्माण्डव्यापी महाप्राण को धारण नहीं कर सकते। इसके लिए स्वयं का शोधन अनिवार्य है। इस शोधन के पश्चात् ही यह सम्भव हो पाता है कि व्यक्ति प्राणऊर्जा का अजस्र भण्डार बन सके। शोधन के पश्चात् अर्जन की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है और प्राणऊर्जा स्वयमेव ही संग्रहित होने लगती है।

जिस हम रोग कहते हैं, उसकी शुरुआत प्राणों के क्षरण से ही होती है। जब प्राण निर्बल होने लगते है, तो अपने आप ही अगणित बीमारियाँ घेर लेती है। चिकित्सा के सारे उपाय प्राणों को सबल-सुदृढ़ बनाने के लिए होते हैं। खान-पान औषधियाँ सब कुछ इसी के लिए है। परन्तु ऐसे अवसर भी आते है, जब औषधियाँ एवं पौष्टिक खान-पान भी लाभदायक नहीं होता। ऐसे में वैद्य के तपःपूत व्यक्तित्व द्वारा किए गए प्राण-अनुदान ही काम आते हैं।

अथर्ववेद के अनेकानेक मंत्रों में इस प्रकार की चिकित्सा का वर्णन मिलता है। वैद्य रोगी से कहता है, सोरिष्ट न मरिष्यसि न मरिष्यसि मा बिभेः। (अथर्व 5.30.8)। अर्थात् है रोगी, तू भयभीत न हो, तू नहीं मरेगा। मैं तुझे जीवन देकर शतवर्ष की आयु दे रहा हूँ। प्राणानुदान की इस प्रक्रिया में वैद्य अपनी तप-साधना से प्राप्त प्राणऊर्जा का एक अंश देकर रोगी को स्वास्थ्य-लाभ प्रदान करता है। प्राणऊर्जा प्राप्त करके रोगी जीवनी-शक्ति इतनी सुदृढ़ हो जाती है कि रोगों का नामोनिशान नहीं रहता है।

आयुर्वेद की प्राचीन चिकित्सापद्धति में मंत्रविद्या का भी महत्वपूर्ण स्थान था। मंत्र-चिकित्सा ध्वनि-तरंग चिकित्सा है। मंत्रों से जो ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं, वे तरंग के रूप में ऊपर जाती हैं और सूर्य की सूक्ष्म शक्तियों को आत्मसात् करके साधक के शरीर में प्रविष्ट होती है। इन शक्तियों के प्रभाव से शरीर के रोग दूर होते है।

ऋग्वेद और अथर्ववेद में मंत्रशक्ति का उल्लेख है। ऋग्वेद का कथन है कि मंत्र तेजोमय हैं। ये रोगों और रोग कृमियों को नष्ट करते है (ऋग्वेद 7.8.6)। एक अन्य स्थान पर कहा गया है, यस्मिन् इन्द्रो वरुणो देवा ओकांसि चकिरे? अर्थात् वेद मंत्रों में इन्द्र आदि देवों का निवास है। अथर्ववेद का कथन है अन्तर्गायत्र्याममृतस्य गर्भे (अथर्व 13.3.20) अर्थात् गायत्री में अमृत का बीज है। इसी मंत्रशक्ति से देवों ने असुरों को हराया। वैदिक विवरण के अनुसार अथर्व ऋषि को मन्त्रविद्या का विशेषज्ञ माना गया है। उनके सिर में दिव्यशक्तियों का खजाना भरा हुआ था।

मंत्रों के सस्वर पाठ से सूक्ष्म तरंगें उत्पन्न होती हैं, वे शरीर और मन को पुष्ट करती है। इससे शरीर में विद्यमान दूषित तत्व नष्ट होते हैं। इसका फल यह होता है कि मनुष्य मानसिक तनाव, शिरोरोग, स्नायुरोग आदि से मुक्त होता है। मंत्रशक्ति से दुर्विचारों का नाश होता है, अतः मन शुद्ध और पवित्र रहता है। मन की पवित्रता से अनेक रोग तो अपने आप शान्त हो जाते है।

आधुनिक काल में यदि आयुर्वेद के प्राचीन गौरव की फिर से स्थापना करती है, तो उपयुक्त दोनों ही तथ्यों पर ध्यान देना होगा। मंत्रविद्या के विशेषज्ञों ने गायत्री मंत्र को सभी वेदों का सार कहा है। इसमें समस्त वैदिक-तांत्रिक मंत्रों का सार निहित है। गायत्री मंत्र का सविधि अनुष्ठान का पालन आयुर्वेद के मर्मज्ञों के जीवन में उसी प्रखरता का समावेश कर सकता है, जो कभी पुरातन काल में थी।


शक्ति का केन्द्रीकरण (Information)

नदी में तेज बाढ़ आई। भयंकर शब्द करती हुई चली गई, पीछे उसका कोई भी चिन्ह शेष न रहा।

वर्षा ऋतु प्रारम्भ हुई। एक गड्ढे पर बूँदें ध्यान लगाकर गिरने लगीं। हर बूँद के साथ मिट्टी का एक कण टूटकर अलग हो जाता। बरसात समाप्त हुई, तब वह गड्ढा एक विशाल तालाब बन चुका था।

जहाँ शक्ति का केन्द्रीकरण होता है, जहाँ मिल-जुलकर सम्पन्न किये जाने वाले अनवरत प्रयत्न किए जाते हैं, वहीं ऐसी उल्लेखनीय सफलता के दर्शन होते है।


वेदकालीन महर्षियों की देन-ज्योतिर्विज्ञान

ज्योतिर्विज्ञान वेदकालीन महर्षियों की अलौकिक प्रतिभा की देन है। भारतीय विद्याओं में इसका अनूठा स्थान है। मनुष्य की संरचना और उसकी प्रकृति का इससे गहरा सम्बन्ध है। इसके अंतर्गत पिण्ड और ब्रह्माण्ड, व्यष्टि और समष्टि के सम्बन्धों का अध्ययन समग्र रूप से किया जाता है। ग्रह, नक्षत्र, तारे, राशियाँ मन्दाकिनियाँ, निहारिकाएं एवं मनुष्य, प्राणी, वृक्ष, चट्टानें आदि विश्वब्रह्माण्डीय घटक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से एक-दूसरे को प्रभावित-आकर्षित करते हैं। इन ग्रह-नक्षत्रों का मानव-जीवन पर सम्मिलित प्रभाव पड़ता है। वे कभी कष्ट दूर करते हैं, तो कभी कष्ट भी देते हैं। ये तत्व मनुष्य की सूक्ष्म संरचना एवं मनःसंस्थानों पर कार्य करते हैं और उसकी भावनाओं तथा मानसिक स्थितियों को अधिक प्रभावित करते हैं। ज्योतिर्विज्ञान के अध्ययन और उपयोग से ज्योतिषी को मानव-जीवन के सभी क्षेत्रों में गहरी अन्तर्दृष्टि प्राप्त हो जाती है।

प्रारम्भिक काल में ज्योतिर्विज्ञान अध्यात्म-विज्ञान की ही एक शाखा थी। अध्यात्म-विज्ञान की ही एक शाखा थी। इसे एक पवित्र विद्या माना जाता था। जिसका स्वरूप स्पष्टतः धर्मविज्ञान पर आधारित था। अपने इसी रूप में इसने चाल्डियन एवं मिश्री धर्मों तथा प्राचीन भार, चीन एवं पश्चिमी यूरोप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस समय इसकी विश्वसनीयता असंदिग्ध मानी जाती थी और उसका प्रचार-प्रसार विश्व के समस्त भागों पर था, परन्तु मध्यकाल में ज्योतिर्विज्ञान पर अनेकों आघात हुए और अल्पज्ञ तथा स्वार्थी लोगों के हाथों पहुँच जाने पर इस विद्या की अवनति हुई। ज्योतिष की मूलभूत तत्वमीमांसा एवं उसके आध्यात्मिक तत्वदर्शन से उस समय के ज्योतिषी बहुत अंशों में अनभिज्ञ थे। उन्होंने ज्योतिर्विद्या के केवल उन सिद्धान्तों पर अमल किया, जिसका मेल नए यांत्रिक भौतिक विज्ञान के तथ्यों से बैठता था। उस समय केवल वहीं सिद्धान्त मान्य रहे जो दृश्य जगत की बाह्य भौतिक घटनाओं एवं तथ्यों पर आधारित थे। केपलर के ज्योतिष विज्ञान को ग्रहों की चाल पर आधारित मानने के कारण भी ज्योतिष विज्ञान की दुर्गति हुई।

वास्तव में इस विद्या के सिद्धान्तों का सुदृढ़ आधार अभौतिक एवं आध्यात्मिक है। इसे भौतिक यंत्रवाद और मात्र ग्रहों-तारों-राशियों एवं भावों का निर्धारण करने वाले एवं व्यवस्था-क्रम दर्शन वाले खगोलीय विज्ञान के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इस शास्त्र के आविष्कर्ता भारतीय महर्षि रहे हैं, जो अलौकिक आध्यात्मिक शक्तियों से सम्पन्न थे। योग-विज्ञान जो कि भारतीय आचार्यों की विभूति माना जाता है, इसका पृष्ठाधार है। यहाँ ऋषियों ने योगाभ्यास द्वारा अपनी सूक्ष्म प्रज्ञा से शरीर के भीतरी ही सौरमण्डल के दर्शन किए और अपना निरीक्षण कर आकाशीय सौर मण्डल की व्यवस्था की। अंकविद्या जो इस शास्त्र का प्राण है, उसका आरम्भ भी भारत में ही हुआ। मध्यकालीन भारतीय संस्कृति नामक पुस्तक में श्री ओझा ने लिखा है, “भारत ने अन्य देशवासियों को जो अनेक बातें सीखायीं, उनमें सबसे अधिक महत्व अंकविद्या का है। संसार भर में गणित, ज्योतिष, विज्ञान आदि की आज जो उन्नति पायी जाती है। उसका मूल कारण वर्तमान अंक क्रम है। जिसमें 1 से 9 तक के अंक और शून्य इन 10 चिह्नों से अंक-विद्या का सारा काम चल रहा है। यह क्रम भारतवासियों ने ही निकाला और उसे सारे संसार ने अपनाया।

उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि प्राचीनतम काल में भारतीय ऋषि खगोल एवं ज्योतिषशास्त्र का ज्ञान रखते थे। कतिपय विद्वान भारतीय ज्योतिष में ग्रीक प्रभाव मानते हैं, परन्तु विचार करने पर वास्तविकता कुछ भिन्न नजर आती है। प्राचीन भारत में ग्रीस देश से अनेक विद्यार्थी विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन करने के लिए आते थे और वर्षों रहकर भारतीय आचार्यों से भिन्न-भिन्न शास्त्रों का अध्ययन करते थे। जिससे अधिक सम्पर्क के कारण कुछ शब्द ई. पूर्व तीसरी शती में, कुछ छठी शती में कुछ 15-16वीं शती में ज्योतिष में मिल गए। भारत के ज्योतिर्विद् ईसवी सन की चौथी और 5वी शती में ग्रीस गए। इससे भी 5वी और छठी शती के प्रारम्भ में अनेक ग्रीक शब्द भारतीय ज्योतिष में आ गए।

समस्त विश्व ने भारत से जो अगणित-अनगिनत अजस्र अनुदान पाए, उसमें ज्योतिष का स्थान अद्वितीय है। डब्ल्यू. डब्ल्यू. हण्टर ने इण्डियन गजेटियर में साफ तौर पर लिखा है कि 8वीं शती में अरबी विद्वानों ने भारत से ज्योतिषविद्या सीखी और भारतीय ज्योतिष ‘सिद्धान्तों’ का सिन्दहिन्द नाम से अरबी में अनुवाद किया। अरबी भाषा में लिखी गयी ‘आदन उल अम्बाफितल कालूली अतवा’ नामक पुस्तक में लिखा है कि भारतीय विद्वानों ने अरबी के अंतर्गत बगदाद की राजसभा में जाकर ज्योतिष-चिकित्सा आदि शास्त्रों की शिक्षा दी थी। कर्क नामक एक विद्वान शक संवत् 694 में बादशाह अलमसूर के दरबार में ज्योतिष और चिकित्सा के ज्ञानदान के निमित्त गए थे।

भारतीय वांग्मय के प्राचीनतम ग्रन्थों में आयी ज्योतिर्विज्ञान की शब्दावली भी यही प्रमाणित करती है कि इसकी जन्मस्थली भारत ही है। ऋग्वेद संहिता में चक्र शब्द आया है, जो राशिचक्र का द्योतक है। द्वादशारं नहि तज्जराय (ऋक् 1-164-11) मंत्र में द्वादशारं शब्द 12 राशियों का बोधक है। प्रकरणगत विशेषताओं के ऊपर ध्यान देने से इस मंत्र में स्पष्टतया द्वादश राशियों का निरूपण देखा जा सकता है। इसके अलावा ऋग्वेद के अन्य स्थलों एवं शतपथ ब्राह्मण आदि ग्रन्थों के अध्ययन से पता चलता है कि आज से-कम-से-कम 28,000 वर्ष पहले भारतीयों ने खगोल और ज्योतिषशास्त्र का मन्थन किया था। वे आकाश में चमकते हुए नक्षत्र पुँज, आकाश-गंगा निहारिका आदि के नाम-रूप-रंग-आकृति आदि से पूर्णतया परिचित थे।

‘अलबेरुनीज इण्डिया’ के पृष्ठों में अलबेरुनी की स्पष्टोक्ति है कि ज्योतिष शास्त्र में हिन्दू लोग संसार की सभी जातियों से बढ़कर है। मैंने अनेक भाषाओं के अंकों के नाम सीखे हैं, पर किसी जाति में हजार के आगे की संख्या के लिए मुझे कोई नाम नहीं मिला। हिन्दुओं में अठारह अंकों तक की संख्या के लिए नाम है।, जिनमें अन्तिम संख्या का नाम परार्द्ध बताया गया है। इण्डिया-ह्वाट इट केन टीच अस’ में प्रो. मैक्समूलर ने लिखा है, भारतवासी आकाशमण्डल और नक्षत्र मण्डल आदि के बारे में अन्य देशों के ऋणी नहीं हैं। वे ही इनके मूल आविष्कर्ता हैं। फ्राँसीसी पर्यटक फ्राक्वीस वर्नियर भी भारतीय ज्योतिषज्ञान की प्रशंसा करते हुए लिखते है कि भारतीय अपनी गणना द्वारा चन्द्र और सूर्यग्रहण की बिलकुल ठीक भविष्यवाणी करते हैं। इनका ज्योतिषज्ञान प्राचीनतम और मौलिक है।

‘टरवीनियरस ट्रेविल इन इण्डिया’ में फ्राँसीसी यात्री टरवीनियर ने भी भारतीय ज्योतिष की प्राचीनता और विशालता से प्रभावित होकर कहा है कि “भारतीय, ज्योतिष ज्ञान में प्राचीनकाल से ही निपुण हैं। वे व्यक्तिगत, राष्ट्रीय एवं वैश्विक जीवन के प्रत्येक पक्ष के संबन्ध में सटीक भविष्यवाणी करने की अद्भुत क्षमता रखते हैं।

एनसाइक्लोपीडिया ऑफ बिट्रैनिका में में लिखा है कि इसमें कोई सन्देह नहीं कि हमारे वर्तमान अंक क्रम की उत्पत्ति भारत से है। सम्भवतः ज्योतिष सम्बन्धी उन सारणियों के साथ, जिनको एक भारतीय राजदूत सन् 773 ईसवी में बगदाद में लाया-इन अंकों का प्रवेश भारत से हुआ। फिर ईसवी सन् की 9वीं शती के प्रारम्भिक काल में प्रसिद्ध अबूजफर मोहम्मद अल खारिज्मी ने अरबी में उक्त क्रम का विवेचन किया और उसी समय से अरबों में उसका प्रचार बढ़ने लगा। यूरोप में शून्य सहित यह सम्पूर्ण अंक क्रम ईसवी सन् की 12वीं शती में अरबी से लिया गया है इस क्रम से बना हुआ अंकगणित ‘अल गोरिट्मस’ नाम से प्रसिद्ध हुआ।

‘थियोगोनी ऑफ द हिन्दूज’ में काण्ट आॅर्मर्स्टजन ने लिखा है कि वेलों द्वारा किए गये गणित से ही प्रतीत होता है कि ईसवी सन् 3000 वर्ष पूर्व ही भारतीयों ने ज्योतिष शास्त्र और भूमिति शास्त्र में अच्छी पारदर्शिता प्राप्त कर ली थी। कर्नल टाड ने अपने ‘राजस्थान’ नामक ग्रन्थ में लिखा है हम उन ज्योतिषियों को यहाँ (भारत में) पा सकते हैं, जिनका ग्रह-मण्डल सम्बन्धी ज्ञान अब भी यूरोप में आश्चर्य उत्पन्न कर रहा है। मिस्टर मारिया ग्राहम लेटर्स ऑन इण्डिया में अपना मत व्यक्त करते हुए कहते है कि समस्त मानवीय परिष्कृत विज्ञानों में ज्योतिष मनुष्य ऊँचा उठा देता है। इसके प्रारम्भिक विकास का इतिहास मानवता के उत्थान का इतिहास है। भारत में इसके आदिम अस्तित्व के बहुत से प्रमाण मौजूद है।

मिस्टर सी.वी. क्लार्क एफ.जी. एफ. कहते हैं कि अभी बहुत वर्ष पीछे तक हम सुंदर स्थानों के अक्षांश के विषय में निश्चयात्मक रूप से ज्ञान नहीं रखते थे किन्तु प्राचीन भारतीयों ने ग्रहण ज्ञान के समय से ही इन्हें जान लिया था। इनकी यह अक्षांश-रेखाएँ वाली प्रणाली वैज्ञानिक ही नहीं अचूक है। ‘एन्सिएण्ट एण्ड मेडिवल इण्डिया में प्रो. विलसन का मानना है कि भारतीय ज्योतिषियों को प्राचीन खलीफों विशेषकर हारुँ रशीद और अलमायन ने भली भाँति प्रोत्साहित किया। वे बगदाद आमंत्रित किए गए और वहाँ उनके ग्रन्थों का अनुवाद हुआ। डॉक्टर राबर्टसन का कथन है कि 12 राशियों का ज्ञान सबसे पहले भारतवासियों को ही हुआ था। भारत ने प्राचीनकाल में ज्योतिर्विद्या में अच्छी उन्नति की थी।

प्रो. कोलबुक और बेबर साहब ने लिखा है कि भारत को ही सबसे प्रथम चन्द्र नक्षत्रों का ज्ञान था। चीन और अरब के ज्योतिष का विकास भारत से ही हुआ है। उनका क्रान्तिमण्डल हिन्दुओं का ही है। निस्सन्देह उन्हीं से अरब वालों ने इसे लिया है। विख्यात चीनी विद्वान लियांग चिचाप के शब्दों में “वर्तमान सभ्यजातियों ने जब हाथ-पैर हिलाना भी प्रारम्भ नहीं किया था, तभी हम दोनों भाइयों (भारत और चीन) ने मानव सम्बन्धी समस्याओं को ज्योतिष जैसे विज्ञान द्वारा सुलझाना आरम्भ कर दिया था।”

प्रो. वेलस महोदय ने प्लेफसर साहब की कुछ पंक्तियाँ मिल्स इण्डिया के खण्ड दो में उद्धृत की हैं, जिनका आशय है कि ज्योतिष ज्ञान के बिना बीजगणित की रचना कठिन है। विद्वान विलसन कहते है कि भारत ने ज्योतिष और गणित के तत्वों का आविष्कार अति प्राचीनकाल में किया था। डी. मार्गन ने स्वीकार किया है कि भारतीयों का गणित और ज्योतिष यूनान के किसी भी गणित या ज्योतिष के सिद्धान्त की अपेक्षा महान है। इनके तत्व प्राचीन और मौलिक हैं।

डॉ. थोबो बहुत सोच-विचार और समालोचना के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भारत ही रेखागणित के मूल सिद्धान्तों क आविष्कर्ता है। इसने नक्षत्र विद्या में भी पुरातनकाल में ही प्रवीणता प्राप्त कर ली थी। यह रेखागणित के सिद्धान्त का उपयोग इस विद्या को जानने के लिए करता था। वर्जेस महोदय ने सूर्य सिद्धान्त के अंग्रेजी अनुवाद के परिशिष्ट में अपना मत उद्धृत करते हुए बताया है कि भारत का ज्योतिष टालमी के सिद्धान्तों पर आधारित नहीं है, बल्कि इसने ईसवी सन के बहुत पहले ही इस विषय का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर लिया था।


नींव का पत्थर (Kahani)

लालबहादुर शास्त्री बड़े हँसमुख और मिलनसार स्वभाव के थे। लेकिन जब वे लोकसेवा मण्डल के सदस्य बने, तो अचानक वे बहुत ज्यादा संकोची हो गए। वह कतई नहीं चाहते थे कि उनका नाम अखबारों में छपे और लोग उनकी प्रशंसा करें। एक दिन उनके एक मित्र ने उनसे पूछा-आपको अखबारों में अपना नाम छपवाने में इतना परहेज क्यों है?”

शास्त्री जी कुछ पल सोचकर बोले, ”लाला लाजपत राय ने मुझे लोकसेवा मण्डल के कार्य की दीक्षा देते हुए कहा था, ‘लालबहादुर, ताजमहल में दो प्रकार के पत्थर लगे हैं। एक बढ़िया संगमरमर है, जिसकी चमक सारी दुनिया देखती है और सराहती है। दूसरा पत्थर ताजमहल की नींव में लगा है, जो सदा अँधेरे में रहता है। लेकिन ताजमहल की सारी चमक एवं खूबसूरती उसी पर टिकी है।’ लालाजी के ये शब्द मुझे हर समय याद रहते हैं और मैं नींव का पत्थर ही बने रहना चाहता हूँ। “


ज्योतिर्विज्ञान को नए सिरे से समझने का प्रयास

अपना भूलोक सौरमण्डल के बड़े परिवार का एक सदस्य है। सारे परिजन एक सूत्र में बँधे हैं। वे सभी अपनी-अपनी कक्षाओं में घूमते और सूर्य की परिक्रमा करते हैं। सूर्य स्वयं अपने परिवार के ग्रह-उपग्रहों के साथ महासूर्य की परिक्रमा करता है। यह क्रम आगे बढ़ते-बढ़ते ब्रह्माण्ड के नाभिक महाध्रुव तक जा पहुँचता है। इतने सारे जटिल व्यवस्था-क्रम के बावजूद सारे ग्रह-नक्षत्र न सिर्फ एक-दूसरे के साथ बँधे हुए हैं। वरन् इनके बीच अत्यन्त महत्वपूर्ण आदान-प्रदान भी चलता रहता है। इन सभी के मिले-जुले प्रयास का ही परिणाम है कि ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति बनी रहती है। यदि ऐसा न बन पड़ता तो कहीं भी अव्यवस्था फैल सकने के अवसर उत्पन्न हो जाते। ग्रहों के बीच यह आपसी सहयोग एवं आदान-प्रदान इतना अधिक महत्वपूर्ण है कि इसे ब्रह्माण्डीय प्राण-प्रवाह की संज्ञा दी जा सकती है।

इस पृष्ठभूमि को जान लेने के बाद आज के वैज्ञानिक युग में भी ज्योतिर्विज्ञान को नए सिरे से समझने का प्रयास आवश्यक हो जाता है। विज्ञान के क्षेत्र में इसे उच्चस्तरीय स्थान प्राप्त है। ऋतु-परिवर्तन वर्षा, तूफान, चक्रवात, हिमपात, भूकम्प जैसी प्रकृतिगत अनुकूलता-प्रतिकूलताओं की बहुत कुछ जानकारियाँ वैज्ञानिक लोग अन्तर्ग्रही स्थिति के आधार पर ही प्राप्त करते हैं। खगोल भौतिकविदों का ऐसा अनुमान है कि मौसमों की स्थिति पृथ्वी पर अन्तरिक्ष से आने वाले ऊर्जा-प्रवाहों के सन्तुलन-असन्तुलन पर निर्भर होती है। साधारणतया पृथ्वी के ध्रुवों पर ही अन्तरिक्षीय ऊर्जा से होकर ही ब्रह्माण्डव्यापी अगणित सूक्ष्म-शक्तियाँ सम्पदाएँ पृथ्वी को प्राप्त होती है।

इनमें से जो उपयुक्त हैं उन्हें तो पृथ्वी अवशोषित कर लेती है एवं अनुपयुक्त को दक्षिणी ध्रुव द्वारा से अनन्त आकाश में खदेड़ देती है। जिस प्रकार वर्षा का प्रभाव प्राणिजगत एवं वनस्पति-समुदाय पर पड़ता है।, उसी प्रकार अन्तर्ग्रही सूक्ष्म-प्रवाहों का जो अनुदान पृथ्वी को मिलता है, उससे क्षेत्रीय एवं सामयिक स्थिति में भारी उलट-पुलट होती है। यहाँ तक कि इस प्रभाव से प्राणिजगत भी अछूता नहीं रहता। मनुष्यों की शारीरिक और मानसिक स्थिति भी इस प्रक्रिया से बहुत कुछ प्रभावित होती है ज्योतिर्विद्या के जानकार बताते हैं कि वर्तमान की स्थिति एवं भविष्य की सम्भावना के सम्बन्ध में इस वान के आधार पर पूर्व जानकारी से समय रहते अनिष्ट से बच निकलने और श्रेष्ठ से अधिक लाभ उठाने की विधा को यदि विकसित किया जा सके, तो यह मानव का श्रेष्ठतम पुरुषार्थ होगा। ऋषिगणों ने इसके लिए समुचित मार्ग भी सुझाया है। आवश्यकता पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर इस विज्ञानसम्मत प्रणाली को समझने की है।

आधुनिक वान ने भी यह बात अच्छी तरह से समझ ली है कि मनुष्य पृथ्वी पर बसने वाला विराट सत्ता का एक घटक है एवं पृथ्वी उस विराट के प्रतीक सूर्यमण्डल का ही एक अंश है। तीनों में एक ही प्राण प्रवाहित हो रहा है। बच्चा गर्भावस्था में व जन्म के तुरन्त बाद एक रज्जुनाल से माँ से जुड़ा रक्त पाता रहता है। इस रक्त-प्रवाह से ही जो माँ हृदय की गंगोत्री से प्रवाहित होता है, शिशु के सारे क्रिया−कलाप चलते है। सारे जीवकोषों का निमार्ण, एक ही निषेचित डिम्बाणु से अरबों सेल्स का बनना इसी प्रक्रिया के सहारे बन पड़ता है। इसे वैज्ञानिक अपनी भाषा में एम्पेथी या समानुभूति कहते है। मनुष्य, पृथ्वी, सूर्य-महासूर्य एवं परब्रह्म-ये सभी इसी समानुभूति की एक कड़ी है। जो भी सूर्य पर घटित होगा, वह मनुष्य एवं अन्यान्य जीवधारियों के रोम-रोम में स्पन्दित होगा। मानवीय रक्त में तैर रही रक्त-कोशिकाएँ एवं न्यूक्लीय एसिड जैसा जीन्स, जीन्स बनाने वाला क्षुद्र घटक सूर्य के अणुओं से समानुभूति-ऐक्य रखता है एवं अच्छे-बुरे सभी प्रभावों में बराबर हिस्सा लेता है। सूर्य के हमसे करोड़ों मील दूर अवस्थित होने पर भी इस प्रभाव में कोई अन्तर आने वाला नहीं।

इस अन्तर्ग्रही प्रभाव को, सौर-गतिविधियों के मानवीय शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव को जुड़वा बच्चों के उदाहरण से अच्छी तरह समझा जा सकता है। एक ही अण्डे से पैदा होने वाले दो बच्चे जो गर्भाशय से साथ-साथ विकसित होते है। उनको जन्मोपरान्त कहीं कितनी भी दूर क्यों न रखा जाए, उनके व्यवहार, चिंतन-आदतों में काफी कुछ साम्य मिलता है। यह एक अणु से एक पर्यावरण से विकसित होने की परिणति है। मानव, पृथ्वी, सूर्य भी इसी तरह से एक ही अणु से विनिर्मित होने के कारण समानुभूति के आधार पर परस्पर प्रभावित होते है। यही ज्योतिर्विज्ञान का केन्द्र बिन्दु है। हर क्षण, हर पल पृथ्वी के कण-कण का सूर्य के महाकणों से एक सम्बन्ध सूत्र जुड़ा हुआ है। इसी प्रकार मानवीय जीवकोषों का उस विराट से विभु से सम्बन्ध ऐसे जुड़ा है, जैसे दो बिजली के तार जुड़े होते है। जिनमें सतत् विद्युतधारा प्रवाहित होती रहती है।

इस समानुभूति को अब विज्ञान ने एक नयी परिभाषा दी है, क्लीनिकल इकोलॉजी अर्थात् पर्यावरण से प्रभावित जीव-विज्ञान इसी में सूर्य में घटने वाली सभी घटनाओं, धब्बों, सूर्य की लपटों, सौर-कलंकों भू-चुम्बकीय तूफानों, मौसम में अप्रत्याशित परिवर्तनों के जीवधारियों पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया जाता है, यह चेतन जगत की एक लयबद्धता का परोक्ष के प्रभाव का प्रत्यक्ष प्रमाण है। हर ग्यारहवें वर्ष सूर्य-कलंकों के आने व अति संवेदनशील वृक्षों में वर्तुल बने, यह देखकर उसकी आयु का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। यदि मौसम अधिक गर्म होता है, तो ये वर्तुल चौड़े बनते हैं और जब मौसम अपेक्षाकृत ठण्डा व शुष्क होता है, तो ये वर्तुल संकरे होते है। मौसम के इतने से व्यतिरेक से भी इतनी दूर अवस्थित पृथ्वी के वनस्पति समुदाय पर बिलकुल सटीक प्रभाव पड़ सकता है, यह इसका प्रमाण है।

जब वृक्ष-वनस्पति इतने संवेदनशील है कि करोड़ों मील दूर अवस्थिति सूर्य पर होने वाले परिवर्तनों को अपने ऊपर अंकित होने देते हैं। तब मानवीय काया के सूक्ष्मतम जीवकोषों एवं अतिसूक्ष्म स्नायुकोषों की तो इन प्रभावों के प्रति और भी अधिक गहरी समानुभूति होनी चाहिए। विज्ञानवेत्ताओं ने अपने शोध-अनुसंधान में पाया भी है कि सौरमण्डल स्थित पल्सार्ज एवं ब्लैकहोल से निकलने वाले न्यूट्रीनो कण जो प्रकाश की गति से भी तेज चलकर धरती को पार करते हैं, मानवीय मस्तिष्क के ‘माइन्जेन’ अणुओं से अधिक मेल खाते है। इसी प्रकार अतिसूक्ष्म न्यूक्लीय अम्लों पर भी उनका प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार सौर मण्डल के परिवार के किसी भी सदस्य के धरती स्थित जीवधारियों पर पड़ने वाले प्रभाव को झुठलाया नहीं जा सकता। यह तो ठीक तरह से तय नहीं हो सकता कि वृक्षों की तरह मानवी मस्तिष्क में भी हर ग्यारहवें साल वर्तुल पड़ते है या नहीं, किंतु यह सत्य है कि इस अवधि में मानसिक आवेग, उत्तेजना, उन्माद, बेचैनी बहुत तेज हो जाती है। आत्महत्या, परस्पर आक्रामक व्यवहार एवं दुर्घटनाओं में सहसा बढ़ोत्तरी हो जाती है। रेडियो-धर्मिता के परिवर्तन जो इतने विराट अन्तरीप में घटते हैं, इसका ठीक-ठाक अध्ययन ज्योतिर्विज्ञान के अंतर्गत ही सम्भव है।

विज्ञान ने इन दिनों अन्तरिक्ष का असाधारण महत्व समझा है। सभी जानते है कि वायु एवं जल की अथाह सम्पदा आकाश के पोले ईथर में भरी है। विज्ञान के ज्ञाता इस तथ्य से परिचित है कि बिजली, रेडियो, लैसर आदि की तरंगें आकाश में संव्याप्त होती है। ध्वनि, ताप, प्रकाश आदि की तरंगें आकाश में प्रवाहित होती है तथा अन्तर्ग्रही अनुदान भी उसी क्षेत्र में मिलते हैं। अदृश्य जगत की सम्पदा सूक्ष्म-अन्तरिक्ष में ही समाहित है। विचार तरंगें इसी परिसर में परिभ्रमण करती रहती है। ऐसे अनेकानेक आधार हैं, जिनसे स्पष्ट है कि भूमण्डल की तुलना में अन्तरिक्ष में विद्यमान साधन-सम्पदा का महत्व और स्तर असंख्य गुना अधिक है।

अध्यात्मवेत्ता अनादि काल से ही अपनी गतिविधियों को अन्तरिक्ष पर केन्द्रीभूत रखे रहे है। उनकी सामर्थ्यों का उत्पादन क्षेत्र अदृश्य जगत, सूक्ष्म-जगत रहा है। ऋद्धि-सिद्धियाँ भौतिक एवं आध्यात्मिक विभूतियाँ दिखाई तो प्रत्यक्ष रूप में पड़ती है, किन्तु इनका उपार्जन परोक्ष जगत से ही सम्भव हो पाता है। मानवी अन्तराल में तो उसकी बीज सत्ता भर विद्यमान है। लेकिन वह सुविकसित होने और विभूतियों को करतलगत करने में अदृश्य सूत्र जगत का ही अवलम्बन लेती है। साधना की तो जाती है अन्तराल में पर उसका प्रतिफल दैवी शक्तियों का सहयोग लेने पर ही मिलता है।

विषाक्तता बढ़ने से आकाश में प्रदूषण बेतरह भर गया है। इसकी वजह मनुष्यों के जीवनस्तर में भारी गिरावट आयी है, साथ ही अन्यान्य प्राणियों, इनसानों को भी दुर्बलता और रुग्णता का अभिशाप सहते हुए अकाल मृत्यु के मुँह में जाने के अलावा और कोई चारा नहीं रहा। प्राकृतिक प्रकोप इन्हीं दिनों अधिक परिमाण में दिखाई दे रहे हैं। पृथ्वी अनय ग्रहों के प्रवाहों से निश्चित ही प्रभावित होती है। सौरमण्डल के चक्र में बँधी होने के कारण पृथ्वी का वातावरण भी अन्यान्य ग्रहों पर प्रभाव डालता है। अतएव असन्तुलनों और प्राकृतिक विपदाओं में मनुष्य द्वारा प्रदूषित पृथ्वी के वातावरण का भी सहयोग हो सकता है, ऐसा पर्यावरण विशेषज्ञ मानने लगे हैं। इस विषाक्तता के परिशोधन का आज किसी को कोई कारगर उपाय नहीं सूझ रहा। अनन्त अन्तरिक्ष के किसी कोने में जो आणुविक एवं अन्यान्य कचरे को फेंकने की बात सोची जाती है, वह मनुष्य के लिए कोई हानिकारक प्रभाव नहीं उत्पन्न करेगी यह सन्देहास्पद है। अन्तरिक्ष क्षेत्र में बढ़ते हुए तकनीकी कदमों के साथ बढ़ते उपग्रहों की संख्या भी भावी विभीषिकाओं का एक निराशाजनक पहलू प्रस्तुत करती है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

भौतिक विज्ञान तथा उसका तकनीकी ज्ञान प्राचीनकाल में भले ही इतना सुविकसित न हो, पर जिन उपलब्धियों के लिए आज अन्तरिक्षविज्ञानी प्रयत्नशील है, वे सारे प्रयोजन ज्योतिर्विज्ञान द्वारा गणना आदि के माध्यम से पूरे किए जाते थे। अन्तरिक्ष के अन्तराल में ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति उनसे मिलने वाले अनुदान तथा उनके हानिकारक प्रभावों की जानकारी ज्योतिर्विज्ञान देता था। आत्मविज्ञान उससे लाभ उठाने, प्रतिकूलताओं से सुरक्षा-उपचार की विधि-व्यवस्था जुटाता था। अतीत की खोई हुई इस महान विद्या ज्योतिर्विज्ञान की विलुप्त कड़ियों को ढूँढ़ने की पुनः आवश्यकता है। इस विज्ञान को नए सिरे से समझने का प्रयास हो सके तो वान के कदम से कदम मिलाकर चलते हुए विना किसी क्षति के अन्तरिक्ष जगत से एक से बढ़कर एक भौतिक एवं अन्यान्य अनुदानों से लाभान्वित होना सम्भव है।

अखण्ड ज्योति अध्यात्म एवं विज्ञान को परस्पर सहयोगी बनाने के निमित्त दार्शनिक स्तर पर ही नहीं, अनेक आधारों को लेकर प्रयत्नरत है। इन्हीं अनेकों में से एक ज्योतिर्विज्ञान को नए सिरे से समझने का प्रयास भी है। इससे ऋषि-परम्पराओं के आधार पर चलते रहे भूतकालीन प्रयासों की गरिमा को समझा जा सकता है और उसका आधुनिक विज्ञान सम्मत स्वरूप प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। इस संदर्भ में अगली दिनों बनाए जाने वाले देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के अंतर्गत ज्योतिर्विज्ञान प्रभाग को अपने ढंग का अनोखा ही समझा जा सकता है। यह प्रयास अभी आरम्भिक रूप में है। क्रम यथावत चलता रहा तो प्रदान चल पड़ने की सम्भावना है, जैसा कि कुटुम्बी-पड़ोसियों के साथ आमतौर से चलता रहता है।


भागने की मत सोचो (Kahani)

एक बार स्वामी विवेकानन्द बनारस की एक गली से गुजर रहे थे। तभी एक बन्दर उनके पीछे दौड़ा। स्वामी जी बन्दर से बचने के लिए आगे दौड़ने लगे। बन्दर उन्हें पीछे से खदेड़ने लगा।

चूहे-बिल्ली की इस दौड़ को देखकर एक साधारण से व्यक्ति ने कहा-स्वामी जी भागते क्यों हैं आप? पीछे मुड़कर मुकाबला कीजिए। ऐसा सुनते ही स्वामी जी एकदम पीछे मुड़े और बन्दर का सामना करने के लिए वहीं खड़े हो गए। अब तो बन्दर भाग खड़ा हुआ।

स्वामी जी लिखते हैं कि इस घटना का मेरे ऊपर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। उस साधारण से आदमी से मुझे असाधारण सीख मिली। जब कभी विपत्तियाँ आएँ, जीवन संकटों के चक्रव्यूह में घिर जाए, तो उससे भागने की मत सोचो। तुम्हारी पलायनवादी मनोवृत्ति से तो ये और प्रबल हो जाएँगे। इनका डटकर मुकाबला करो जीवन में सफलता अर्जित करने का यही मंत्र है।


जीवन-साधना का महत्व एवं उपयोगिता

साधना चेतनाक्षेत्र का ऐसा पुरुषार्थ है, जिसमें सामान्यश्रम एवं मनोयोग का नियोजन भी असामान्य विभूतियों एवं शक्तियों को जन्म देता है। साधारण स्थिति में हर वस्तु तुच्छ है। पर यदि उसे उत्कृष्ट बना दिया जाए, उसकी सूक्ष्मता तक प्रवेश पा लिया जाए तो उसे ऐसा कुछ मिलता है, जिसे विशिष्ट और महत्वपूर्ण कहा जा के। ऊपरी तौर पर समुद्र में खारे पानी के सिवा और क्या नजर आता है? पर उसकी गहराई में उतरने वाले उसे रत्नाकर के रूप में अनुभव करते है। बात दोनों ही सही है, उथली दृष्टि से खारे पानी का गड्ढा बेकार में इतनी जमीन घेरे हुए है। सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर समस्त भू-मण्डल को सुख वर्षा के रूप में जीवन रस देने वाला वही प्रतीत होता है। धूलि के छोटे-छोटे कण यों ही बेकार नजर आते है। पर जब उनसे प्रचण्ड अणुशक्ति प्रकट होती है, तो सारी दुनिया चमत्कृत रह जाती है। स्थूल से सूक्ष्म में जितना गहरा उतर जाता है, उतने ही रहस्यमय तथ्यों का उद्घाटन होता जाता है।

जीवन मोटी दृष्टि से ऐसा ही एक खिलवाड़ है, जिसे ज्यों-त्यों करे काटना पड़ता है। निर्वाह की आवश्यकता जुटने गुत्थियों को सुलझाने और प्रतिकूलताओं के अनुकूलन में माथा-पच्ची करते-करते मौत के दिन पूरे हो जाते हैं। अभावों और संकटों से पीछा ही नहीं छूटता। कई बार तो गाड़ी इतनी भारी हो जाती है कि खींचे नहीं खिंचती। फलतः प्रयत्नपूर्वक अथवा प्रवेश करना पड़ता है। नीरस और निरर्थक जीवन एक ऐसा अभिशाप है, जिसे दुर्भाग्य के रूप में स्वीकार करना पड़ता है। किन्तु लगता यही रहता है कि बेकार जन्मे और निरर्थक जिए। पर साधारण तौर पर जीवन का यही स्वरूप है, जो विपरीत परिस्थितियों में तो अन्य प्राणियों से भी गया-बीता प्रतीत होता है।

असाधारण जीवन इससे आगे की बात है। सफल-समर्थ एवं समुन्नत स्तर के व्यक्ति सौभाग्यशाली नजर आते हैं और उनकी स्थिति प्राप्त करने के लिए मन ललचाता है। भौतिक सम्पन्नता से सम्पन्न और आत्मिक विभूतियों के धनी लोगों की न प्राचीनकाल में कमी थी और न अब है। पिछड़े और समुन्नत स्तर के व्यक्ति सौभाग्यशाली नजर आते है और उनकी स्थिति प्राप् करने के लिये मन ललचाता है। भौतिक संपन्नता से सम्पन्न और आत्मिक विभूतियों के धनी लोगों की न प्राचीनकाल में कमी थी और न अब है। पिछड़े और समुन्नत वर्गों के बची अन्तर देखने से अचरज होता है कि एक जैसी काया में रहने वाले इनसानों की स्थिति में इतना ऊँचा या नीचा होने का क्या कारण हो सकता है? स्रष्टा का पक्षपात एवं प्रकृति के अंधेर कहने से भी काम नहीं चलता। क्योंकि दोनों की सुव्यवस्थित एवं सुनियोजित सत्ता में अन्धेरगर्दी की थोड़ी-सी भी गुँजाइश नहीं है। यदि अव्यवस्था एवं व्यतिक्रम होता तो ग्रह-नक्षत्र अपनी धुरी पर घूमते नजर न आते। परमाणुओं के घटक उच्छृंखलता बरतते और परस्पर टकराकर उसी मूल स्थिति में लौट गए होते, जिसमें कि महत तत्व अपनी अविज्ञात स्थिति में अनन्तकाल से पड़ा था। अन्धेरगर्दी के रहते इस सृष्टि-संरचना एवं प्रक्रिया की कोई गुँजाइश नहीं थी।

मनुष्यों के बीच पाए जाने वाले आसमान-जमीन जैसे अन्तर का यही कारण नजर आता है कि जीवन की ऊपरी परतों तक ही जिन्होंने मतलब रखा, उन्हें छिलका ही हाथ लगा, किन्तु जिन्होंने गहरे उतरने की चेष्टा की, उन्हें एक के बाद एक बहुमूल्य उपलब्धियाँ मिलती चल गयी। गहराई में उतरने को अध्यात्म की भाषा में साधना कहते है। साधना किसकी? इसका एक मात्र एवं सुनिश्चित उत्तर यही है, जीवन की। जीवन मनचाहा फल देने वाला कल्पतरु है। जो भी इसका जितना सदुपयोग कर सका, उतना ही वह धन्य हो जाता है। उसके होठों पर सदा-सर्वदा मुसकराहट के फूल खिलते हैं। स्रष्टा ने बीज रूप में वैभव का अपरिमित भण्डार इसी मानवीय काया में समेटा-सँजोया हुआ है। हमारी भूल इतनी ही रही कि न उसे खोजा गया और न काम में लाया गया। इस भूल का परिमार्जन आत्मज्ञान है। यह जाग्रति जब सक्रिय बनती है तो आत्मोत्कर्ष के लक्षण तत्कालीन दृष्टिगोचर होने लगते है। इसी आत्म-परिष्कार का नाम साधना है।

साधना से सिद्धि तक पहुँचने की बात सौ फीसदी सच है। भौतिक जगत में विविध क्षेत्रों में साधनारत पुरुषार्थी चमत्कारी सफलताएँ पाते देखे गए हैं। जीवन तो ऐसा विलक्षण क्षेत्र है जो कि जड़-जगत के किसी मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण घटक से भी कहीं अधिक बहुमूल्य है। जड़ सीमित है, चेतन असीम और अनन्त है। जड़ से केवल साधन भर पाए जा सकते है, जबकि चेतन में तो आनन्द और उल्लास के भण्डार भरे पड़े है। इनकी साधना का एक सुविस्तृत विज्ञान है।

साधना के इन अभ्यासों को ऊपरी तौर पर देखने से यह भ्रान्ति होती है कि यह सब कुछ कहीं बाहर से माँगने-पाने का उपक्रम है, पर वस्तुतः बात ऐसी नहीं है। पात्रता का सम्वर्द्धन ही साधना है। इसके लिए जीवन के बहिरंग को व्यवस्थित और अन्तरंग को परिष्कृत को योग एवं व्यवस्थित को तप कहते है। साधना के यही दो क्षेत्र है। बहिरंग को सभ्यता की मर्यादा में रहना पड़ता है और अन्तरंग को सुसंस्कृत बनाने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। साधना का तत्वदर्शन यही है। सरकस में काम करने वाले पशुओं को इस कदर प्रशिक्षित कर देते हैं कि उनके आश्चर्यजनक करतब देखकर बुद्धिमान इनसान भी हैरत में पड़ जाता है। लगभग यही प्रक्रिया अनगढ़ एवं अव्यवस्थित जीवन-सम्पदा को सुव्यवस्थित और समुन्नत बनाने के लिए करनी पड़ती है। साधना के समस्त उपचार इसी महान उद्देश्य के लिए बनाए गए है।

सामान्य प्रचलन है कि सिद्धियाँ तो दैव अनुग्रह से बरसती है। साधना इसी के लिए की गयी मनुहार है। यह मान्यता बहुत थोड़े अंशों में ही सच है। दुकानदार माँगने से कोई वस्तु निकाल कर दिखा देता है, पर देता तभी है जब उसकी उचित कीमत चुका दी जाए। प्रार्थना को अपनी आवश्यकता की अभिव्यक्ति माना जा सकता है, परन्तु इसे याचना कहना या समझना भारी भूल है। याचना का मतलब तो बिना मूल्य दिए कुछ बहुमूल्य पाने के लिए गिड़गिड़ाना है। इस उपाय से पहले तो अनुदान मिलते नहीं है, यदि किसी तरह मिल भी जाते हैं, तो उनका स्तर बहुत हल्का होता है। यह न तो सन्तोषप्रद है, न ही सम्मानजनक। उसका उपयोग करते समय आत्मग्लानि ही होती रहती है।

फिर यह प्रचलन तो मानवीय है। विश्व-व्यवस्था में तो बिना कीमत दिये तो कुछ नहीं मिलता। यहाँ तो कर्म फल विधान की अकाट्य विधि-व्यवस्था सब ओर लागू नजर आती है। स्रष्टा की समुचित सृष्टि इसी धुरी पर परिभ्रमण करती है। यहाँ का नियम यही है कि पात्रता प्रस्तुत करने वाले को ही अनुदान दिये जाए। पवन प्राण वायु की प्रचुर मात्र के लिए हर एक सामने खड़ा रहता है, पर उसे सक्षम फेफड़े ही ग्रहण कर पाते हैं। सामर्थ्य एवं सक्षम होते हुए भी पवन मृतकों को कुछ भी दे सकने में असमर्थ व असहाय ही रहता है। मनोरम-मनमोहक नजारों से भरी-पूरी इस दुनिया को निहारने का आनन्द मात्र उन्हीं को मिलती है जिनकी आँखें सही है। ध्वनि प्रवाह के अगणित उतार-चढ़ावों को समझने एवं सुनने का आनन्द उठाने की सुविधा इस दुनिया में विद्यमान है, पर उस से लाभान्वित हो सकना उन्हीं के लिए सम्भव है, जिनकी कान की झिल्ली ठीक है। बाहर से दैवी-अनुग्रह बरसने की बात सत्य होते हुए भी यह निर्वाध नहीं है। यह शर्त जुड़ी ही हुई है, कि अनुदान उपलब्ध करने के लिए पात्रता अनिवार्य है।

पात्रता का विकास करने वाले को अतिरिक्त याचना नहीं करनी पड़ती। जो उपयुक्त है, वह अनायास ही मिलता है। उपयुक्त का तात्पर्य है अपने स्तर के अनुरूप। स्तर को बढ़ाए बिना न तो विभूतियाँ मिलती है और न मिलने पर ठहरती है। अतएव पात्रता की समर्थता का अभिवर्द्धन अनिवार्य रूप से आवश्यक है। साधना में यही करना पड़ता है। यह प्रयास जितना प्रौढ़, प्रखर एवं परिपक्व होता है उसी अनुपात में विभूतियाँ भी उफनती और बाहर से बरसती और दृष्टिगोचर होने लगती है।

पेड़ अपनी आकर्षण-शक्ति बादलों को खींचते और बरसने के लिए मजबूत करते है। पौधों पर ओस के कण अपने आप ही जमा हो जाते है। खदानें अपने सजातीय कणों को दूर-दूर तक आमन्त्रण भेजती है और उन्हें अपने निकट खींच बुलाती है। यह चुम्बकत्व है, जो जहाँ जितना अधिक होता है, सजातियों को उसका उसी स्तर का आह्वान-आमंत्रण मिलता है। परिणाम में वे उसी गति से दौड़ते-भागते चले आते हैं। खिलते फूलों का चुम्बकीय आकर्षण मधुमक्खियों तितलियों और भौंरों का न्योता बुलाता है। निखरे यौवन से अनेकों आँखें अनायास ही आकर्षित हो जाती है। प्रतिभा अनेकों का अपना प्रशंसक एवं अनुयायी बनाती है। ये आकर्षण शक्ति के चमत्कार है। साधक का चुम्बकत्व दैवी-शक्तियों का अदृश्य रूप में आमन्त्रण देता है और उन्हें अनुग्रह बरसाने के लिए विवश करता है।

सिद्धियों-विभूतियों की एक धारा ऊपर से, बाहर से बरसती है और दूसरी नीचे से, भीतर से उभरती है। दैवी-अनुग्रह से अनेकों लाभान्वित होते है। ठीक उसी प्रकार आत्मोत्कर्ष की प्रक्रिया द्वारा प्रसुप्त क्षमताओं का जागरण होता है। इसके साथ अनायास ही वे विभूतियाँ प्रकट होती है जिनसे सामान्यजन वंचित ही नहीं अपरिचित बने रहते है। मनुष्य की भीतर बहुत कुछ है, इतना कुछ जिस स्रष्टा की सामर्थ्य के समतुल्य कहा जा सकता है। वृक्ष का विशालकाय ढाँचा छोटे-से बीज में सुनिश्चित रूप में विद्यमान रहता है। सौरमण्डल की समस्त प्रक्रिया सूक्ष्म रूप से नये परमाणु में यथावत गतिशील रहती है। जड़ें नीचे से रस खींचती और पेड़ के कलेवर को हरा-भरा पुष्पित, फलित बनाने के सारे सरंजाम जुटाती है। यद्यपि ये आँखों से दिखाती नहीं, जमीन में दबी रहती है तो भी जानकारों को पता रहता है कि पेड़ तो मात्र कलेवर है, उसकी शोभा-समर्थता का स्रोत तो अदृश्य जड़ों में ही पूर्णतया सन्निहित है। जीव का छोटा अन्तराल लगभग उतना ही समर्थ है, जितना कि ब्रह्म का विराट विस्तार। व्यक्ति भीतर से ही उगते-उठते हैं। बाहर तो उस अंतरंग प्रगति का परिचय भर मिलता है।

जीवन की प्रसुप्त शक्तियाँ भीतर से ही जगती-उभरती हैं। उनके उफनने पर उसी तरह की प्रवाहधारा बहने लगती है,? जैसे कि यमुना, नर्मदा आदि कुण्डों से निकलकर भू-तल पर प्रवाहित होती है। ब्रह्म की दिव्यशक्तियाँ साधक पर अन्तरिक्ष से घटाओं की तरह बरसती है। निर्झर भी ऊपर से नीचे गिरते और भूमि पर गतिशील होते देखे जाते हैं। ये दोनों ही सौभाग्य हर किसी के लिए सहज सुलभ है। पात्रता का परिचय देकर इस संसार के विभिन्न बाजारों में से कुछ भी, कितनी ही मात्रा में खरीदा जा सकता है। इसी प्रकार बलिष्ठता, बुद्धिमत्ता, प्रतिभा आदि सामर्थ्यों के भी अपने-अपने क्षेत्र है और उनमें उपलब्धियाँ पर्याप्त करने वाले अपनी योग्यता एवं तत्परता के अनुरूप जो चाहे सो, जितना चाहे सो पा लेते है। जिनकी पात्रता नहीं, उनके प्रार्थना-याचना करते रहने पर भी कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता।

जीवन-साधना का यह सिद्धान्त शाश्वत सत्य की तरह स्पष्ट है। उसमें न सन्देह की गुँजाइश है, न विवाद की

गायत्री महाविद्या के तत्वदर्शन एवं उसकी समर्थ साधना से अखण्ड-ज्योति के पाक चिर-परिचित हैं। यदि उसे पात्रता का समर्थता का, व्यक्तित्व के परिष्कार की प्रक्रिया माना जाए और उस महाप्रयास में निरत हुआ जाए, तो ऐतिहासिक एवं विद्यमान अध्यात्मवादियों की तरह हर कोई आने स्तर को क्रमशः अधिकाधिक ऊँचा उठा सकता है। इतना ऊँचा जिसकी गरिमा को हिमालय से कम नहीं वरन् अधिक ही उत्तुंग, समुन्नत एवं समृद्ध कहा जा सके। इन दिनों लोकसेवा के लिए जिन उत्कृष्ट व्यक्तित्वों को भारी आवश्यकता है, उसका निर्माण इसी जीवन-साधना से ही सम्भव है। जीवन-साधना के हवनकुण्ड में अपनी आहुति देकर ही स्वयं के व्यक्तित्व में निहित अनन्त शक्तियों का जागरण सम्भव है।


वाणी और भावना (Kahani)

एक लड़की ने पूछा “पिताजी! कौआ और कोयल दोनों काले है।, पर लोग कौवे को मारते और कोयल को प्यार करते हैं, यह क्यों?” बालिका पर एक करुण दृष्टि डालकर पिता ने उत्तर दिया- “कोयल सबको प्यार करती है, इसलिए मीठा बोलती है। वाणी और भावनाओं की मधुरता के कारण ही वह सर्वप्रिय बन गई है और कौआ तो अपने स्वार्थ और धूर्तता के कारण ही उस आदर से वंचित है।”


विद्या-विस्तार की प्रव्रज्या परम्परा

चरैवेति-चरैवेति ‘ प्राचीनकाल के महर्षियों का आदर्श वाक्य रहा है। इसी का अनुसरण करे हुए उन्होंने प्रव्रज्या की पुण्य परम्परा स्थापित की, जिससे विद्या-विस्तार का प्रयोजन पूर्ण हो सके। वैदिक काल में विद्या−विस्तार के जितने भी प्रयोग किए गए-प्रव्रज्या उन सभी में अनिवार्य रूप से गुँथी रही। प्रायः सभी ऋषियों, सन्तों और धर्म प्रवक्ताओं को परिव्राजक बनकर ही रहना पड़ा है। एक स्थान को कभी भी उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र नहीं बनाया। देवर्षि नारद के ढाई घड़ी से अधिक कहीं भी न ठहरने की कथा तो लोकविख्यात है। इतनी ही अवधि में उन्होंने ध्रुव, प्रह्लाद, पार्वती, सावित्री आदि न जाने कितनों को न जाने क्या-क्या मार्गदर्शन दे दिया। उसी के बलबूते उनका जीवन धन्य-धन्य हो गया।

आमतौर पर सुगमता और सुविधा लोगों को अपने परिचित, निकटवर्ती तथा सगे-सम्बन्धियों वाले क्षेत्र में बसने के लिए विवश करती है। परिचित-सम्बन्धियों से कई प्रकार की सहायता की आशा भी रहती है और भाषा आदि की सुविधा के कारण अनुकूलता भी। संसार में सामान्यजनों का निर्वाह इसी प्रकार होता रहता है, किन्तु महामानवों को इससे सर्वथा भिन्न रीति-नीति अपनानी पड़ती है। उनके लिए सभी अपने होते हैं। पराया कोई भी नहीं। इसीलिए अपनों की निकटता जैसा मोह उन्हें सताता नहीं। वे हमेशा उपयोगिता एवं आवश्यकता को ध्यान में रखते हैं और जहाँ भी पिछड़ापन दिखता है, वहाँ न देने, विद्या का आलोक पहुँचाने के लिए तत्परता से पहुँच जाते हैं।

बादल समुद्र से उत्पन्न होते हैं, पर बरसने के लिए जहाँ भी सूखी भूमि देखते हैं, वहीं चल पड़ते हैं। ऋषियों-सन्तों की भी यही नीति रही है। विद्या-विस्तार के महायोजना हेतु सदा-सर्वदा गतिशील रहने के कारण उनके गले राम-द्वेष दोनों ही नहीं पड़ते हैं, फिर सेवा प्रयास की परिधि का भी व्यापक विस्तार होता है। इसीलिए धर्मशास्त्रों में साधु-ब्राह्मण को प्रव्रज्या प्रवृत्ति अपनाना अनिवार्य धर्म-कर्तव्य कहा गया है। तीर्थ-यात्रा की पुण्य-परम्परा का प्रयोजन यही है।

विशाल भारत की सीमाएँ कभी विश्व के कोने-कोने तक फैली हुई थी। इसलिए धर्म-संरक्षकों ने उसके कोने-कोने में भ्रमण करने, रुकने और स्थानीय आवश्यकता को पूर्ण करने का सुनियोजित कार्यक्रम बनाया था। नदियों, समुद्रों पहाड़ों, दलदलों और वनों की कठिन यात्राओं का सामना करते हुए उनने विश्व का कोई भी कोना ऐसा नहीं रहने दिया था, जिसमें संस्कृति और ज्ञानसम्पदा के अभाव में मनुष्यों को पिछड़ी और गईबीती स्थिति में रहना पड़े। बीच-बीच में विश्राम करने और सुविधा-साधनों का आदान-प्रदान करने के लिए धर्मकेन्द्रों की स्थापना भी की गयी थी और उन्हें तीर्थ का नाम दिया गया था। ऋषियों-संतों को पारस्परिक संपर्क और स्थिति की जानकारी इन्हीं केन्द्रों के माध्यम से होती थी।

वैदिक काल की इस प्रव्रज्या परम्परा को अपनाकर ही महात्मा बुद्ध ने धर्म चक्र-प्रवर्तन किया। उनके धर्मध्वज एवं ज्ञान-उपदेशों को लेकर महेन्द्र, संघमित्रा, कौडिन्य, कुमारजीव ने सुदूर देशों की यात्रा की। शंकराचार्य ने इसी प्रक्रिया को और अधिक प्रखर बनाने के लिए चार धामों की स्थापना की। न वे स्वयं कभी एक स्थान पर रहे और न ही उन्होंने अपने शिष्यों, अनुयायियों को कभी एक स्थान पर जमे रहने की सलाह दी। चैतन्य महाप्रभु बंगाल में जन्मे पर उनका कार्यक्षेत्र अधिकतर उत्तर प्रदेश रहा। समर्थ गुरु रामदास ने महाराष्ट्र का कोना-कोना छाना और उससे लगे हुए जिन प्रान्तों में पहुँच हो सकी, वहाँ जाने में झिझकें नहीं। सन्त ज्ञानेश्वर अपने दोनों भाइयों निवृत्तिनाथ, सोपानदेव एवं छोटी बहिन मुक्ताबाई के साथ आजीवन अविवाहित रहकर प्रव्रज्या की पुण्य-परम्परा का निर्वाह करते हरे। जन-जन तक पहुँचकर उन्होंने ज्ञान-सम्पदा का विवरण किया। दक्षिण भारत के रामानुजाचार्य, बल्लभाचार्य आदि उत्तर भारत में रहे और उन्होंने अपना मध्यवर्ती कार्यक्षेत्र वृन्दावन को बनाया।

व्रजभूमि में बल्लभ कुल का गोस्वामी सम्प्रदाय जन्मा, पर वह गुजरात में फला-फूला अयोध्या के निकट जन्मे स्वामी नारायण की जीवनचर्या प्रायः गुजरात में ही बीती। एकनाथ, नामदेव, तुकाराम की मंडलियाँ एक दिन के लिए भी चैन से न बैठी। महाराष्ट्र से उनका कार्यक्षेत्र आरम्भ हुआ और मध्य भारत तक बढ़ता ही चला गया।

सिद्धयोगी सम्प्रदाय के मत्स्येन्द्र नाथ, गोरखनाथ, नेपाल, बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि के सभी महत्वपूर्ण स्थानों पर छाए रहे, इनमें से मत्स्येन्द्रनाथ आसाम के, गोरखनाथ गोरखपुर के और जालन्धर नाथ पंजाब के थे। गहिनीनाथ महाराष्ट्र के थे। ये अपने महान तप से अर्जित ज्ञान-सम्पदा को समूचे भारत में फैलाते-बाँटते रहे। कबीर, सुर, तुलसी, मीरा आदि सन्तों में से कोई ऐसा नहीं हुआ, जिन्होंने अपना कार्यक्षेत्र अपनी जन्मभूमि तक सीमित रखा हो। नानक पंजाब में जन्मे और उनके शिष्यों ने सिख धर्म को सारे भारत में फैला दिया।

आज के दौर में सन्तों की बात जाने भी दें, तो भी लोकसेवा के सार्वजनिक क्षेत्र में यदि उदात्त भावनासम्पन्न कार्यकर्ताओं की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती, तो आज की विश्वव्यापी उलझन का समाधान मिल जाता। शान्तिकुञ्ज का उद्देश्य ऐसे ही परिव्राजक, कार्यकर्ता उत्पन्न करने का है, जो यश-लोलुपता से प्रेरित होकर नहीं अन्तरित प्रेरणा, आत्मा को-परमात्मा का प्राप्त करने की आकांक्षा से विद्या−विस्तार के क्षेत्र में उतरें और इसे ईश्वरीय पूजा मानकर पवित्रतम मनःस्थिति में पूरा करें।

त्याग और बलिदान को जो योग-साधना एवं तपश्चर्या के स्तर की श्रेयसाधना मानते है, उन्हें इन पंक्तियों को अपने लिए लिखा गया आमंत्रण-पत्र मानना चाहिए। आज की विश्वव्यापी मानवी दुर्दशा पर जिन्हें वस्तुतः दुख है, जिनके मन में विकृतियों के प्रति आक्रोश है, जिन्हें उत्कर्ष-उत्थान के नवयुग में आस्था है, उनका पवित्रतम कर्तव्य हो जाता है कि परिव्राजक बनने की महान परम्परा का सच्चे मन से समर्थन करें और उसे क्रियान्वित करने के लिए आवश्यक वातावरण विनिर्मित करें। प्रव्रज्या की पुण्यपरम्परा के बिना विद्या−विस्तार का विश्वव्यापी आयोजन किसी अन्य तरह से पूरा नहीं हो सकता। उच्च मनोभूमि एवं प्रचण्ड कर्मठता को ही अपना सब कुछ मानने वाले परिव्राजक ही विश्वमानव की ठोस एवं गम्भीर सेवा कर सकेंगे।


युग की माँग-परिव्राजकों का प्रशिक्षण अभियान

सूर्योदय की निकटवर्ती सम्भावना सर्वप्रथम पूर्व दिशा से प्रकट होती है। उसे ऊषा की लालिमा के रूप में देखा जा सकता है। प्रभाव का प्रकाश धीरे-धीरे बढ़ता है और जो ऊषा को मात्र कुतूहल समझाते थे उसके आधार पर सूर्योदय की सम्भावना को स्वीकार करने में अचकचा रहे थे, उनका भी सन्देह मिटाता है। वे देखते है कि प्रकाश की आभा धीरे-धीरे बढ़ती ही जा रही है। अन्ततः वह समय आ ही पहुँचता है, जब अरुणोदय की आरम्भिक किरणें धरती पर उतरती हैं और देखते-देखते दिनमान की प्रखरता सारे वातावरण में आभा और ऊर्जा के रूप में अपने अस्तित्व का प्रमाण देती है। तब तो सभी को वस्तुस्थिति स्वीकार करती ही पड़ती है। विचारशील इससे पहले ही सम्भावना को समझ लेते हैं और ब्रह्ममुहूर्त में ही अपने प्रभातकालीन कर्तव्य का निर्वाह करने लगते हैं। दूरदर्शी इन्हीं को कहा जाता है।

युग-अवतरण के पीछे महाकाल की इच्छा और प्रेरणा का अनुमान लगाने में जिन्हें असमंजस था, वे भी इस पुण्य-प्रक्रिया को उसी प्रकार सुविस्तृत होते देख रहे है, जैसे कि ऊषा का हल्का-सा आलोक क्रमशः अधिक प्रखर होता और अरुणोदय की प्रत्यक्ष स्थिति तक जा पहुँचता है। इन दिनों ध्वंसात्मक शक्तियाँ भी जीवन-मरण की बाजी लगाकर विघातक विभीषिकाएँ उत्पन्न करने में कोई कमी नहीं रहने दे रही है। फिर भी आशा का केन्द्र यह है कि उनका सामना करने वाले देवत्व का शौर्य और पराक्रम भी निखरता और प्रखर होता चला आ रहा है।

निराशा तभी तक रहती है, जब तक पराक्रम नहीं जनता। चेतना के ऊँचे स्तर जब उभरते हैं, तो न दुष्टता ठहर पाती है, न भ्रष्टता। जीतता सत्य ही है, असत्य नहीं। जीवन ही शाश्वत है, मरण तो उससे आँख-मिचौनी खेलने भर के लिए जब-तब ही आता है। सूर्य और चन्द्र का आलोक अमर है-उस पर ग्रहण तो जब-तब ही चढ़ता है। स्रष्टा की इस सुन्दर कलाकृति की गरिमा शाश्वत है। विकृतियाँ तो बुलबुलों की तरह उठतीं और उछल-कूद का कौतुक दिखाकर अपनी लीला समेट लेती हैं। यदा-यदा हि धर्मस्य’ का आश्वासन देने वाले, युग-विकृतियों का निराकरण करने के लिए समय-समय पर सन्तुलन को सँभाले लिए आता रहा है। आज की विभीषिकाएँ जब दिव्य अवतरण की पुकार करती हैं, तो भला आना-कानी क्यों होती? विलम्ब क्यों लगता? युगान्तरीय चेतना के रूप में महाकाल की अवतरण-प्रक्रिया का परिचय हम सब इन्हीं दिनों प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त कर रहे है।

जाग्रत आत्माओं में युग की चुनौती को स्वीकार करने के लिए जो उत्साह उमड़ा है, वह देखते ही बनता है। मूर्छितों और अर्धमृतकों को छोड़कर महाकाल की हुंकार ने हर प्राणवान को युगधर्म का पालन करने की युगसाधना में संलग्न होने की प्रेरणा दी है। इसी के परिणामस्वरूप नवसृजन में योगदान देने के लिए हर समर्थ-असमर्थ के चरण बढ़ रहे हैं। इस महाअभियान के पीछे जो दिव्यप्रेरणा सक्रिय है, उसे कठपुतली नचाने वाले बाजीगर के समतुल्य देखा जा सकता है। अपने छोटे-से परिवार पर उसका विशेष अनुग्रह लगता है। अग्रिम पंक्ति में खड़ा होने का अवसर भाग्यवानों को ही मिलता है। हम लोग उन्हीं सौभाग्यशालियों में हैं, जिन्हें महाकाल से नवसृजन के इस पुण्यपर्व पर ध्वजाधारी अग्रदूतों की भूमिका निभाने का श्रेय मिल रहा है।

अब जबकि नवयुग का आगमन अति निकट आ चुका है, अग्रदूतों का दायित्व और बढ़ गया है। यही समय है कि जब घर-घर नवयुग का संदेश पहुँचाने एवं जन-जन को परिष्कृत दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रव्रज्या में तीव्रता लायी जाए। बीसवीं सदी के बचे हुए इन अन्तिम वर्षों का महत्वपूर्ण कदम परिव्राजक अभियान का पुनर्जागरण है। इसमें ऋषियुग का वानप्रस्थ, सन्तयुग की तीर्थयात्रा और बौद्धयुग की श्रमण संस्कृति का समन्वय है। इसे युगत्रिवेणी कह सकते हैं।

इन्हीं दिनों हमें बादलों की तरह बरसने और पवन की तरह प्राण बिखेरने के लिए साहसी कदम बढ़ाने होंगे। दुर्घटनाग्रस्त, रुग्ण, असमर्थ और पिछड़ी मनोभूमि के लोग समर्थों का पता पाने और उनके दरबार तक पहुँच सकने में असमर्थ रहते हैं। समर्थों को ही अपनी सहज करुणा से प्रेरित होकर उनके यहाँ स्वयं पहुँचना पड़ता है। सूर्य ही प्रकाश फैलाने के लिए परिभ्रमण करता है। चन्द्रमा को ही चाँदनी वितरण के लिए यायावरों की तरह भटकन पड़ता है। अंडे से बाहर निकलते ही पक्षी उन्मुक्त आकाश में विचरण करने लगते है। पका फल पेड़ को छोड़ देता है और अपने रस से दूसरों का परिपोषण करने और नया वृक्ष उगाने के परमार्थ में जुट जाता है। नदियों की वंश-परम्परा यही है। ग्रह-नक्षत्र यही क्रम अपनाकर सृष्टि का सौंदर्य बनाए हुए हैं। प्रगति के इसी तत्त्वज्ञान को ऋषि-परम्परा में प्रमुख स्थान दिया गया है।

भारतीय तत्वदर्शन का, अन्तरात्मा का एक बिन्दु पर दर्शन करना हो तो उसे ‘चरैवेति’ सूत्र के अंतर्गत टटोला जा सकता है। शास्त्रकार का यह अनुभव स्वतः सिद्ध है कि जो सोता है उसका भाग्य सोता है। जो बैठा है उसका भाग्य बैठा है और जिसने चलना आरम्भ कर दिया, उसकी सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त हो गया है। अन्त में ऋषि कहता है-चलते रहो, चलते रहो। यह चलना सैलानियों और आवाराओं का नहीं वरन् परिव्राजकों का है, जिसमें शारीरिक एवं मानसिक प्रगति के साथ सामाजिक प्रगति बहुमूल्य आधार जुड़े हुए हैं। व्यक्ति और समाज के उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ भी इसी धर्मप्रयाण में सन्निहित है। परिपक्व व्यक्तित्व के बहुमूल्य लोकसेवी इसी प्रव्रज्या परस्पर की खदान से निकलते रहे है। इसी सम्पदा से भारत का अतीव देवोपम स्तर का चिरकाल तक बना रहा है। इन्हीं परिव्राजकों ने भारतभूमि को स्वर्गादपि गरीयसी बनाया और समस्त संसार को अपने अजस्र अनुदान से कृत-कृत्य बनाया है।

नवयुग के अवतरण में भी इसी आधार को अपनाना पड़ेगा। जलते दीपक ही नए दीपक जलाते है। साँचे में ही खिलौने ढलते है। व्यक्तित्ववान ही परिष्कृत प्रक्रिया प्रचलन का रूप धारण कर सके तो गौरव भरे अतीत को वापस लाने-मनुष्य में देवता का उदय एवं धरती पर स्वर्ग के अवतरण में किसी प्रकार का संदेह नहीं रह जाएगा।

यद्यपि इन दिनों युगांतरीय चेतना को विश्वव्यापी बनाने के लिए विविध भाषाओं का प्रशिक्षण एवं राष्ट्र व विश्व के कोने-कोने में प्रवेश और प्रज्ञा-पुरश्चरण के आयोजनों द्वारा सूक्ष्म वातावरण के अनुकूलन का प्रयास भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। पर जिसे गंगावतरण के लिए किए गए भागीरथ प्रयास की उपमा दी जा सकेगी वह अगले दिनों आरम्भ किया जाने वाला मिशन का परिव्राजक प्रशिक्षण अभियान ही है। इसमें राम के रीछ-वानर कृष्ण के ग्वाल-बाल बुद्ध के श्रमण और गाँधी के सत्याग्रही नए युग के अनुरूप नया कलेवर धारण करके पनपी परम्परा अपनाते हुए स्पष्टतः देखे जा सकेंगे।

आशा की जाती है जाग्रत आत्माओं के नाम भेजा जा रहा महाकाल का युग-निमन्त्रण निरर्थक नहीं जाएगा। परिव्राजक प्रशिक्षण अभियान को व्यापक बनाने के लिए हजारों-लाखों युगशिल्पियों के सम्मिलित होने की उम्मीद है। निश्चित रूप से बड़ी संख्या में जाग्रत आत्माओं की श्रद्धांजलियाँ युगदेवता की झोली में पड़ेगी। इस भावभरी समय-सम्पदा का उपयोग प्रधानता परिव्राजक प्रक्रिया के अंतर्गत ही होगा। प्रायः सभी के जिम्मे एक ही काम रहेगा-नवसृजन के लिए जन-संपर्क जन-संपर्क के लिए परिभ्रमण। निकट भविष्य में उनकी अधिक संख्या होने पर देश के कोने-कोने में तथा विदेशों में अधिक यम तक डेरा डालकर रहने और युगचेतना उत्पन्न करने के लिए भेजा जाएगा।

विदेशों से भारत में ईसाई मिशनरी हजारों, लाखों की संख्या में आते हैं, पर भारत से एक भी मिशनरी विदेश में नहीं जाता है। भाषणबाजी करके मन्दिर, आश्रम बनाने के नाम पर प्रवासी भारतीयों को लूट लाने के लिए ढेरों योग-शिक्षक और धर्मोपदेशक विदेशों में पहुँचते है। उस वर्ग के प्रति विदेशों में अश्रद्धा ही बढ़ रही है। आवश्यकता ऐसे लोगों की है, जो लम्बे समय तक डेरा डालकर उन क्षेत्रों में भारतीय संस्कृति की जड़ें जमाने का काम कर सकें और अपने आपको उसी में खपा सकें। ऐसे मिशनरी भी परिव्राजकों के प्रशिक्षण के इसी महा-अभियान में से निकलेंगे।

अगले दिनों परिव्राजकों के प्रशिक्षण की वैसी ही व्यवस्था बनायी जा रही है, जैसी कि बौद्ध विहारों में श्रमणों कि शिक्षा-दीक्षा सम्पन्न करने के लिए चलती थी। (1) आत्मसाधना, (2) ज्ञान-संचय (3) सेवा-शिक्षण; इन तीनों का ही समन्वय करके एक पाठ्यक्रम बनेगा। उसे छोटे-बड़े प्रशिक्षण सत्र में पूरा करने के व्यवस्था देव-संस्कृति विश्वविद्यालय के निर्माणाधीन परिसर में रहेगी। इसके उपरान्त ही प्रशिक्षित परिव्राजकों को कार्यक्षेत्र में युगान्तरीय चेतना उत्पन्न करने के लिए थोड़े या अधिक समय के लिए आवश्यकतानुसार भेजा जाता रहेगा।

परिव्राजकों की स्थिति के अनुरूप उनके तीन वर्ग बनाए जाएँगे-

(1) वरिष्ठ परिव्राजक-जो पूरा समय देंगे और शान्तिकुञ्ज को ही अपना भावी निवास मानकर चलेंगे। वर्ष में छह-सात महीने प्रव्रज्या के लिए बाहर रहेंगे। शेष पाँच-छह महीने देव-संस्कृति विश्वविद्यालय में उनकी साधना-शिक्षा चलेगी। ऐसे लोग सपत्नीक रह सकेंगे। महिलाओं की साधना-शिक्षा का पृथक् प्रबन्ध रहेगा। इस श्रेणी के लोगों में कुछ ऐसे भी हो सकते हैं, जो रहें तो अपने-अपने घर पर ही, किन्तु समीपवर्ती क्षेत्र में परिभ्रमण करते रहें।

(2) कनिष्ठ परिव्राजक- इस श्रेणी के समयदानी हर वर्ष न्यूनतम दो महीने बाहर जाया करेंगे। शेष महीनों में अपने क्षेत्रों में ही काम करेंगे। छुट्टी के दिन इसी कार्य में लगाया करेंगे और हर रोज दो घण्टा समय देने की योजना बना लेंगे।

(3) समयदानी परिव्राजक- जिनकी पारिवारिक स्थिति अधिक समय तक घर छोड़ने की नहीं है। वे न्यूनतम दो घण्टा हर रोज और साप्ताहिक छुट्टी जन-संपर्क के लिए नियमित रूप से लगाया करेंगे।

उपर्युक्त तीनों प्रकार के परिव्राजकों की प्रशिक्षण व्यवस्था इन दिनों बनायी जा रही है। इन सबके अलग-अलग पाठ्यक्रम बनाए जाने का कार्यक्रम तीव्र गति से चल रहा है। परिव्राजकों की इस प्रशिक्षण योजना को समग्र एवं सुव्यवस्थित बनाने के लिए यह जानकारी मिलना आवश्यक है कि युग की माँग पर किन जाग्रत आत्माओं में कितना समय देने और उसे जनजागरण में लगाने का साहस है। इस संदर्भ में लगाने का साहस है। इस संदर्भ में शान्तिकुञ्ज हरिद्वार से अपना पूरा विवरण प्रेषित करते हुए पत्र-व्यवहार किया जा सकता है। परिव्राजक प्रशिक्षण अभियान में भागीदार होने वाले महाकाल के अनुदानों से चिरकाल तक लाभान्वित होते रहेंगे। मानवता का इतिहास उन्हें युगनिर्माता के रूप में सदा-सर्वदा स्मरण रखेगा।


तत्त्वज्ञान के अधिकारी (Kahani)

वानप्रस्थ ग्रहण करने के बाद महाराजा दिलीप पत्नी सहित वशिष्ठ के आश्रम में पहुँचे। वशिष्ठ ने उन्हें एक गाय-नन्दिनी की सेवा पर नियुक्त किया।

नन्दिनी जब चरने के लिए जंगल में जाती, तो महाराजा दिलीप धनुष-बाण लेकर उसकी रक्षार्थ साथ जाते। पत्नी भी साथ होती। एक दिन एक सिंह नन्दिनी पर आक्रमण करने के लिए लपका। दिलीप ने धनुष की प्रत्यंचा पर बाण चढ़ाया, सिंह रुका और बोला-दिलीप! तुम जिसे सिंह समझते हो मैं वह नहीं, मैं भगवान शंकर का वाहन हूँ, तुम्हारे शस्त्रों का मुझ पर प्रभाव न होगा।”

“आप जो भी हों वनराज!” -दिलीप ने कहा-मैं नन्दिनी पर किसी भी प्रकार का प्रहार नहीं करने दूँगा।”

वनराज ने कहा-मैं मान जाऊँगा, यदि तुम नन्दिनी के बदले में अपना शरीर देकर मेरी भूख मिटाओ।”

“सहर्ष प्रस्तुत हूँ।” और दिलीप ने यह कहकर धनुष-बाण समेटे। उन्होंने सिर झुकाया, परन्तु काफी समय तक कोई हलचल नहीं हुई तो उस स्थान की ओर देखा जहाँ सिंह खड़ा था, परन्तु वहाँ सिंह भी नहीं था, मुसकरा रहे थे महर्षि वशिष्ठ। तुम्हारी साधना-तपश्चर्या पूरी हुई वत्स! अब तुम तत्त्वज्ञान के अधिकारी हो गये हो।”


देवसंस्कृति को विश्वसंस्कृति बनाने का उपक्रम भाषाओं का प्रशिक्षण

देवसंस्कृति चिरपुरातन समय से ही समूचे विश्व के हर क्षेत्र एवं समुदाय को सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों से अनुप्राणित करने में समर्थ रही है। यदि विश्व को आज की परिस्थितियों में एक सूत्र में बाँधने की बात सोची जाए तो ‘एक ही संस्कृति-विश्वसंस्कृति की बात मस्तिष्क में आती है। ऐसा स्वरूप देवसंस्कृति का ही बनता है, जो सारे विश्व की अनेकानेक संस्कृतियों के उपयोगी एवं महत्वपूर्ण अंशों का समुच्चय है। हो भी क्यों नहीं, आखिर देव-संस्कृति ही तो प्रकारान्तर से विभिन्न संस्कृतियों की जन्मदात्री है। अब यदि प्रश्न सम्पूर्ण मानवजाति को आत्मबोध कराने का हो, तो भारतीय संस्कृति ही इसका सार्थक समाधान का सकती है।

युगनिर्माण मिशन की स्थापना का उद्देश्य देवसंस्कृति का प्रसार-विस्तार ही रहा है। विश्ववसुन्धरा के कोने-कोने में बसे 600 करोड़ मानवों तक देवसंस्कृति का आलोक वितरण करने का लक्ष्य तमाम कोशिशों के बावजूद अभी काफी दूर है। इसमें प्रमुख व्यवधान भाषाओं का अपरिचय है। जबकि युगसृजन के लिए धरती के हर कोने में बसे हुए, हर भाषा को बोलने और हर धर्म को मानने वालों तक युगचेतना का आलोक वितरण करना होगा। समय की इस माँग को पूरा करने के लिए आवश्यक हो गया है, संसार भर की प्रमुख भाषाओं के साथ देश की मुख्य भाषाओं को पढ़ाने की ऐसी व्यवस्था हो, जिसके आधार पर सृजनशिल्पी सर्वत्र अपने विचार वहाँ के निवासियों की भाषा में व्यक्त कर सकें। देवसंस्कृति के व्यापक विस्तार के लिए इससे कम में काम चलने वाला नहीं।

देवसंस्कृति की शिक्षणप्रक्रिया अभी तक प्रायः हिन्दू धर्मावलम्बियों तक सीमित रही है, पर छह सौ करोड़ मनुष्य इस छोटे-से-दायरे में नहीं आते। हिन्दुओं के अलावा भारी संख्या में ईसाई एवं मुसलमान है। छोटे-बड़े सभी धर्मों की गिनती को जाए तो संसार भर में प्रायः 60 प्रमुख धर्म है। जनमानस में धर्म क्षेत्र के प्रभाव को देखते हुए उन सभी क्षेत्रों में युगचिन्तन को पहुँचाना पड़ेगा। इसके लिए आवश्यक है कि उन्हीं धर्मों के लोग अपने-अपने शास्त्रों-परम्पराओं का उल्लेख करते हुए वे बातें कहें जो समय की आवश्यकता की पूर्ति करती है, अलगाव घटाती और एकता, समता, सहकारिता, शालीनता जैसी प्रवृत्तियों की मनोभूमि विकसित करती हैं।

बौद्धकाल में धर्मचक्र-प्रवर्तन के लिए नालन्दा विश्वविद्यालय में भाषाएँ पढ़ाई जाती थी और तक्षशिला विश्वविद्यालय में संस्कृतियाँ। उन दिनों सम्प्रदायों का वर्तमान अलगाववादी, विग्रही एवं असहिष्णु स्वरूप नहीं था, मात्र क्षेत्रीय संस्कृतियाँ ही प्रचलित थीं। धर्मप्रचारकों को अपनी बात जनसाधारण के गले उतारने के लिए क्षेत्रीय संस्कृतियों का स्वरूप भी पढ़ाना-समझना पड़ता था। युगपरिवर्तन के संदर्भ में इन दिनों विभिन्न संस्कृतियों-विशेषतौर पर भाषाओं का अध्ययन-अध्यापन आवश्यक समझा गया है। सृजन सैनिकों के बढ़ते हुए कार्यक्षेत्र को देखते हुए इन दोनों प्रयासों को क्रियान्वित किया जाना आवश्यक समझा गया है। भविष्य में निर्माणाधीन जिस देवसंस्कृति विश्वविद्यालय की संकल्पना है, उसमें भाषाओं के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण विभाग होगा। इस हेतु नयी इमारत बनायी जानी है और वह सारा ढाँचा खड़ा किया जाना है, जिसके सहारे मिशन की बढ़ती हुई आवश्यकता की पूर्ति हो सके और मिशन को भाषाई अड़चनों के कारण किए छोटे समुदाय तक सिमटकर न रहना पड़े।

इस नयी व्यवस्था का तात्पर्य है मिशन के कार्यक्षेत्र का कई गुना विस्तार। जनजागरण के दो ही माध्यम है-लेखनी और वाणी, स्वाध्याय और सत्संग। लेखनी से साहित्य सृजा जाता है और उससे स्वाध्याय की आवश्यकता पूरी होती है। विभिन्न भाषाओं को प्रयोग करते हुए युग-चिन्तन का विस्तार करना सत्संग के स्वरूप को स्पष्ट करता है। इन दोनों की कार्यों के लिए अभी से ताना-बाना बुना जा रहा है। हिन्दी से जो लोग अंग्रेजी, गुजराती, तमिल, तेलगू, मलयालम, कन्नड़ आदि भाषाओं में अनुवाद कर सकें, ऐसे परिजनों को इन पंक्तियों के माध्यम से आमंत्रित किया जा रहा है।

भाषाई क्षेत्रों में प्रवेश करते हुए उनका साहित्य निर्माण करने की ही तरह सत्संग की, प्रचार-प्रवचन-परामर्श की आवश्यकता पड़ेगी, अन्यथा मात्र साहित्य छाप लेने भी से क्या बनेगा? इस साहित्य को व्यापक बनाने में प्रचारकों-प्रवचनकर्ताओं की अहम् भूमिका होती ह। कार्यक्षेत्र बढ़ेगा तो देश-विदेश में शाखा-संगठनों का विस्तार होगा। उनके वार्षिक अधिवेशन एवं छोटे-बड़े आयोजन समारोह भी होते रहेंगे। इसके लिए प्रचारक, कार्यकर्ताओं की भरी संख्या में आवश्यकता पड़ेगी, अन्यथा इतनी भाषाओं के क्षेत्रों में काम कौन करेगा और बिना प्रत्यक्ष कार्यक्रम के मिशन आगे कैसे बढ़ेगा? मात्र प्रकाशित साहित्य ही तो वातावरण बनाने और जनजागरण की आवश्यकता पूरी नहीं कर लेगा।

इक्कीसवीं सदी द्वार पर खड़ी है। अब अधिक समय नहीं बचा है। इस बीच युगान्तर चेतना के आलोक को किसी भी कीमत पर विश्व एवं राष्ट्र के सभी कोने में पहुँचाना ही है। इसे समझते हुए मिशन के विस्तार के क्रम में जो नए कदम उठाए जाने हैं, उनमें भाषाओं की आवश्यकता भी खूब पड़ेगी। वे उसी अनुपात में जुटाने पड़ेंगे। प्रशिक्षणार्थियों एवं प्रशिक्षकों के निवास, निर्वाह, प्रवास आदि में भारी व्यय होना लाजमी है। यह सभी धनसाध्य है। इस कार्य का आरम्भ भले ही छोटे रूप में हो, पर समयानुसार कार्य-विस्तार के अनुरूप उसका भी विस्तार हो जाएगा।

भाषाई विस्तार की दृष्टि से साहित्य-सृजन एवं प्रकाशन भी अपने आप में बहुत बड़ा काम है। अन्यान्य भाषाओं की पत्र-पत्रिकाओं में मिशन की विचारधारा के लेख भेजना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसके लिए विभिन्न भाषाओं को जाने वाले सुयोग्य व्यक्तियों को बुलाया जाना है। आशा की जानी चाहिए कि जिस महाशक्ति ने देवसंस्कृति को विश्वसंस्कृति का स्वरूप देने का संकल्प किया है- वही भाषाओं के प्रशिक्षण-व्यवस्था के सरंजाम जुटाएगी। समय ने अपनी माँग को पूरा करने के लिए जो ताना-बाना बुना है, उसे अपने प्रिय परिजन साधन-सरंजाम के अभाव में अपूर्ण-असफल नहीं रहने देंगे, ऐसा विश्वास किया जा रहा है। उनके इन्हीं प्रयासों से देवसंस्कृति विश्वसंस्कृति बनकर रहेगी।


प्रवासी भारतीयों को दायित्व-बोध कराने वाला विशेष प्रशिक्षणक्रम

अपने आत्मीयजन, कुटुम्बी-सम्बन्धी कहीं सुदूर जाकर बसे जाएँ तो भी उनके साथ जुड़ा हुआ अपनापन न तो कम होता है और न ही भावनात्मक सम्बन्ध टूटते है। जल्दी-जल्दी मिलना-जुलना न हो पाने पर भी दूर देशों में बसे प्रियजनों के प्रति ममता का अन्त नहीं हो सकता और न ही होना चाहिए। ये प्रवासीजन भी अपने मूल निवास को भूल नहीं पाते। अपने संस्कृति के प्रति श्रद्धा का सागर हिलोरें लेता रहता है।

परिस्थितियों से विवश, वशीभूत होकर भारत-माता के लाखों-करोड़ों बेटे-बेटियों को विदेश जाना पड़ा और वे प्रवासी भारतीय बन गए। पुरातनकाल में अपने देश से शिल्पी, व्यवसायी, समाज-व्यवस्थापक धर्मोपदेशक विश्व के कोने-कोने में भेजे जाते रहे है। उन्होंने अपनी मौलिक प्रतिभा से जो लाभ विदेशों को पहुँचाया आज भी इतिहास के पृष्ठों में अंकित है। आने इन सपूतों के माध्यम से दिए गए अजस्र अनुदानों के कारण ही भारत को विश्वगुरु की ख्याति मिली। तथागत बुद्ध ने भी अपने हजारों-हजार शिष्यों को धर्मचक्र-प्रवर्तन के लिए भिन्न देशों में भेजा था और उन्हें संसार के विभिन्न भागों की विविध प्रकार की सेवा-साधना का निर्देश दिया था। इन्हीं प्रयासों की परिणति है कि समूचे एशिया में बौद्धधर्म तीव्र गति से फैला और वहाँ उन्नति-प्रगति के विभिन्न प्रयास सम्भव हो पाए।

आज के समय में ये प्रवासी भारतीय, उनके वंशज एवं अनुयायी एशिया में बहुलतापूर्वक और विश्वभर में न्यूनाधिक रूप से फैले हुए है। दुर्भाग्य की बात इतनी रही कि भारत एवं उनके बीच सम्बन्ध कमजोर होते और टूटते गए और एक महत्वपूर्ण कड़ी नष्ट हो गयी, अन्यथा हिन्दूधर्म अपनी बौद्ध शाखा समेत विश्व का सबसे बड़ा धर्म होता और उस संस्कृति की पताका विश्व-गगन में सबसे ऊँची फहरा रही होती। अब तो बौद्धधर्म स्वयं को हिन्दूधर्म का अविच्छिन्न अंग मानने तक को भी तैयार नहीं। इसका एकमात्र कारण यही रहा कि भारतभूमि एवं प्रवासी भारतीय धर्मानुयायियों के बीच सम्बन्ध सुदृढ़ न किए जाने की भूल की गई। इस सम्बन्ध में उपेक्षा बरती गयी। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान गोरे लोगों ने विश्व के अनेक भागों में अपने उपनिवेश कायम किए। उन्हें सुविकसित करने के लिए योग्य कर्मियों की जरूरत पड़ी। इसके लिए वे भारतीयों के ओर आकर्षित हुए ओर उन्हें प्रलोभन देकर विदेशों में ले गए। उन दिनों वे सामान्य शिल्पी श्रमिक भर थे। पर जब वहाँ रहने लगे तो अपनी योग्यता, शिल्प-कुशलता एवं पूँजी के बल पर उनकी स्थिति वहाँ के संभ्रान्त नागरिकों से भी अधिक सम्पन्न हो गयी। बर्मा, लंका, भूटान, नेपाल भी किसी समय विशाल भारत के ही अभिन्न-अविभाज्य अंग थे, पर बाद में विभाजन एवं अलगाव की वजह से वहाँ के भारतीय भी प्रवासी बन गए।

जो जिस देश में निवास करें, वहाँ की नागरिक वफादारी उसे राजनैतिक दृष्टि से निभानी ही चाहिए। पर धार्मिक एवं साँस्कृतिक भावनाएँ भी ऐसी हों, जिन्हें न तो भुलाया जाना चाहिए और न ही तोड़ फेंकना चाहिए। मुसलमान जहाँ भी रहते हैं, मक्का की तरफ मुँह करके अपनी नमाज अदा करते हैं। ईसाइयों की गहरी निष्ठा यरुशलम के प्रति सदा-सर्वदा बनी रहती है। जापानी लोग बुद्ध भगवान से सम्बन्धित स्थानों का दर्शन करने किस श्रद्धा-भावना के साथ आते हैं, यह बताने की जरूरत नहीं। इस सबको देखते-समझते हुए प्रवासी भारतीयों के मन में अपनी संस्कृति के प्रति अपनत्व एवं श्रद्धा की तरंगें उठनी ही चाहिए। वे जहाँ कहीं भी, जिस किसी देश में रहे रहे हैं, वहाँ के अपने कर्तव्यों का कुछ इस ढंग से निर्वाह करें, जिसमें उनकी अपनी साँस्कृतिक महत्ता परिलक्षित हो। उन्हें स्वयं में इस सत्य की गहरी अनुभूति होनी चाहिए कि वे देवसंस्कृति के अग्रदूत हैं, किन्तु न जाने क्यों ऐसा सम्भव नहीं बन पा रहा?

शायद इसकी एक महत्वपूर्ण वजह यह है कि हम भारतवासी अपने प्रवासी भाई-बहिनों के साथ स्नेह-सद्भाव का आदान-प्रदान करने की महत्ता, उपयोगिता एवं आवश्यकता को एक तरह से भूला ही बैठे है। दूर देशों में बसे भारतीयों को यदि उनकी अपनी मातृभूमि से सहयोग, समर्थन व मार्गदर्शन का का सम्बल मिलता रहता तो वे लोग जिस तरह से अपनी धार्मिक भावनाओं और संस्कृति को भूलते जा रहे है, वह दुर्दिन देखने को न मिलता। आदान-प्रदान का सिलसिला चलता रहा होता, तो न सिर्फ प्रवासीजन ही अपनी धर्म-संस्कृति के उद्गम केन्द्र के साथ दृढ़ता से जुड़े होते, बल्कि भारत की संस्कृति आभा भी उन सभी देशों में फैल चुकी होती। मुसलमान एवं ईसाइयों की संख्या में हर कहीं तेजी से बढ़ आ रही है। पर प्रवासी भारतीयों के वंशज ही हिन्दू रह सके है। वहाँ के मूल निवासियों में कहीं भी हिन्दू धर्म का आलोक नहीं फैल सका है। इसका एकमात्र कारण यही है कि हमने इन प्रवासी भाई-बहिनों के प्रति अपने दायित्व का सम्यक् निर्वाह नहीं किया।

कहने के लिए इन प्रवासीजनों के पास अपने यहाँ से प्रतिवर्ष अगणित पुरोहित, पण्डित, स्वामी जी, साधु-बाबा जाते रहते है। परन्तु उनका असली मकसद किसी न किसी बहाने उनका भावनात्मक शोषण करके पैसा बटोरना रहता है। लेने के लिए ही उनकी यात्राएँ होती रहती हैं, देने के तत्व-ज्ञान से ये पूरी तरह अपरिचित ही है। यदि संस्कृति, ज्ञान एवं आध्यात्मिक प्रकाश वितरण करने वाले भारतीय मिशन इनके बीच क्रियाशील रहते तो स्थिति सर्वथा भिन्न होती। प्रवासीजनों में आज जो भी अपनी धर्मभूमि, देवभूमि के प्रति श्रद्धा है, उसका श्रेय उन्हीं को है। उनकी इस श्रद्धा को और अधिक विकसित करने का दायित्व हमारा भी है, ऐसा सोचा भी नहीं गया।

इस चुनौती भरे दायित्व को युग-निर्माण मिशन ने साहस और उत्साह के साथ स्वीकारा है। परमपूज्य गुरुदेव के हृदय में प्रवासी भारतीयों के प्रति गहरी भावनाएँ एवं सघन आत्मीयता थी। इन्हीं संवेदनाओं के वशीभूत होकर उन्होंने वर्ष 1973 में विदेश यात्रा की और विदेश में रहने वाले भारतीयों के मन में देवसंस्कृति के प्रति श्रद्धा और अनुराग के बीच बोए। इन बीजों को खाद-पानी देने का काम इस पत्रिका के सम्पादक के हाथों वर्ष 1991 में शुरू किया गया। इससे अपनी संस्कृति के प्रति श्रद्धा, निष्ठा एवं प्रेम की जो फसल लहलहाई, उसे वंदनीय माता जी का सहज वात्सल्य प्राप्त हुआ। वे स्वयं 1993 से 94 तक तीन बार देश गयी। स्थूल काया से उनके न रहने के बावजूद यह क्रम अभी भी सतत् प्रवाहमान है।

इस वर्ष इसमें एक नया आयाम जोड़ा जा रहा है। यह नूतन आयाम है-प्रवासी भारतीयों को दायित्वबोध कराने वाले विशेष प्रशिक्षणक्रम की शुरुआत। इस प्रशिक्षण के लिए पाठ्यक्रम की योजना प्रायः तैयार की जा चुकी है। इसके मुख्यतया तीन अंग होंगे-1. उपासना का व्यावहारिक मार्गदर्शन, 2. संस्कृति शिक्षण, 3. परिवार समाज एवं विश्वमानवता के प्रति उनका दायित्व-बोध

इन दिनों एक सर्वेक्षण के अनुसार उच्चस्तरीय डिग्री प्राप्त चिकित्सक, इंजीनियर कम्प्यूटरविद् एवं व्यवसायी बड़ी संख्या में विभिन्न देशों में कार्यरत हैं। इनमें अधिकतम अमेरिका, कनाडा, इंग्लैण्ड, जर्मनी, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, साउथ अफ्रीका में हैं। भारत में प्रतिवर्ष हजारों चिकित्सक एवं तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त प्रौद्योगिकी वर्ग के निष्णात व्यक्ति निकलते है। जिनमें से प्रायः पन्द्रह से बीस प्रतिशत तुरन्त बाहर नौकरी के लिए चले जाते हैं। यह क्रम 1960-61 से सतत् बढ़ता चला जा रहा है। शिक्षितों का सघनतम अनुपात अभी ऊपर लिखे देशों में ही है एवं ऐसा अनुमान है कि साढ़े चार करोड़ प्रवासी भारतीयों में से प्रायः दो करोड़ इन देशों में स्थायी नागरिक के रूप में रह रहे हैं।

फिजी, सूरीनाम, मारीशस, मेडागास्कर, मलेशिया, चीन, रूस, फ्राँस, पुर्तगाल, स्पेन, इटली, डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन, टर्की, कुवैत, ईरान, सऊदी अरब, तंज़ानिया, केन्या, यूगांडा, जिम्बाबे में भारतीय बड़ी संख्या में है। लेटिन अमेरिका, उरुग्वे, पनामा, इक्वाडोर में इनकी संख्या कम है पर इनकी उपस्थिति वहाँ बड़ा महत्व रखती है। इन सभी देशों में बसे भारतीयों ने वहाँ जाकर धन एवं सामाजिक प्रतिष्ठा तो बहुतायत में प्राप्त की, पर सम्बन्धों के विच्छिन्न होने के कारण उनके जीवन में प्रायः शान्ति-सन्तोष का नाम नहीं है। इनमें से अधिकाँश देशों में जहाँ-जहाँ अपने मिशन के प्रतिनिधि गए हैं, उन्होंने इन प्रवासीजनों में अपनी संस्कृति से जुड़ने की असाधारण ललक देखी है। इस जिज्ञासा की तीव्रता प्रौढ़ों एवं वृद्धों में ही नहीं, युवा पीढ़ी में भी है। वे अपने पूर्वजों के देश को, वहाँ की संस्कृति को हृदय की गहराइयों से अपनाना चाहते है। शान्तिकुञ्ज में शुरू होने वाला भावी प्रशिक्षण क्रम उनकी इसी जिज्ञासा का समाधान है।

प्रशिक्षण की जो योजना तैयार की गयी है, उसमें सभी तत्वों एवं पहलुओं का ध्यान रखा गया है। इस क्रम में प्रथम-स्थान उपासना को दिया गया है, क्योंकि यही सही अर्थों में मनोवैज्ञानिक एवं व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का आधार है। गंगा की गोद एवं देवात्मा हिमालय की छत्रछाया में इस प्रशिक्षण का महत्व और भी बढ़ जाता है। इसकी व्यावहारिक प्रक्रियाओं को जानकर प्रवासीजन सही मायने में भारतीयता एवं भारतीय-संस्कृति के मूलतत्त्व को आत्मसात् कर सकेंगे।

प्रवासीजनों एवं उनके बच्चों में देवसंस्कृति के सम्बन्ध में अनेक जिज्ञासाएँ उठती है। उदाहरण के लिए, गणेश जी के सूँड़ क्यों है? सरस्वती जी हाथों में वीणा क्यों लिए रहती है? आदि-आदि अपने इन प्रश्नों के सार्थक समाधान न पाकर वे भ्रमित होते रहते हैं। संस्कृति-शिक्षण के अंतर्गत ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक-सभी प्रश्नों का समाधान हो सकेगा, साथ ही प्रशिक्षण का अगला चरण परिवार, समाज एवं विश्व-मानवता के प्रति दायित्वबोध कराना है। आधुनिक परिवेश में जीवन का दायरा आर्थिक समृद्धि तक सीमित हो गया है। इसी वजह से परिवारों में बिखराव है। समाज में अपराधों की भरमार है एवं विश्व-मानवता त्रस्त है। शान्तिकुञ्ज में प्रवासीजनों को विभिन्न उपक्रमों एवं मनोवैज्ञानिक मॉडलों के माध्यम से इस बात के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा कि यथार्थ एवं सार्थक जीवन वहीं जीते हैं, जो पारिवारिक, सामाजिक एवं विश्वमानवता के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करते हैं।

इस क्रम में प्रशिक्षण के पहले सत्र की शुरुआत जून माह से हो रही है, जिसमें विभिन्न देशों में बसे अपने प्रवासी परिजनों के प्रायः तीन-चार सौ बच्चे भाग ले रहे हैं। भागीदारों के मनों में अभी से भारी उत्साह बना हुआ है। शान्तिकुञ्ज उन्हें इस बात का बोध कराने के लिए कृतसंकल्प है कि दूर बसने पर अपनापन कम नहीं होता। आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि इस प्रशिक्षण योजना में भागीदारी करने वाले देवसंस्कृति के प्रति अपना दायित्व निभाएँगे एवं अपने पूर्वजों की गौरव-गरिमा को नवस्थापना करेंगे।


बांटने का सुख (Kahani)

प्यासा मनुष्य अथाह समुद्र की ओर यह सोचकर दौड़ा कि महासागर से जी भर अपनी प्यास बुझाऊँगा। वह किनारे पहुँचा और अंजलि भरकर जल मुँह में डाला, किन्तु तत्काल ही बाहर निकाल दिया।

प्यासा असमंजस में पड़कर सोचने लगा कि सरिता सागर से छोटी है, किन्तु उसका पानी मीठा है। सागर सरिता से बहुत बड़ा है, पर उसका पानी खारा है।

कुछ देर बाद उसे दूर से आती एक आवाज सुनाई दी-सरिता जो पाती है, उसका अधिकाँश बाँटती रहती है, किंतु सागर बस कुछ अपने में ही भरे रखता है दूसरों के काम न आने वाले स्वार्थी का सार यों ही निःसार होकर निष्फल चला जाता है।” आदमी समुद्र के तट से प्यासा लौटने के साथ एक बहुमूल्य ज्ञान भी लेता गया जिसने उसकी आत्मा तक को तृप्त कर दिया।


राष्ट्रीय जागरण का नव अभियान-ग्रामोत्थान

भविष्य के कदमों की आहट जिन्होंने भी सुनी है, उन सबका प्रायः यही कहना है कि कल की दुनिया शहरों की नहीं गाँवों की होगी। शहरों की बेतहाशा बाढ़ ने ही पर्यावरण-संकट के बीज बोए हैं। आज के दौर में तो यह विश्व-संकट बनकर समूची दुनिया के ऊपर मौत के साए की तरह मँडराने लगा है। स्थिति को परखते हुए इनसानी दिमागों ने अपनी गलती स्वीकार कर ली है। विश्वभर के विचारशील वैज्ञानिक, मनीषी अपनी मानसिक संकीर्णता पर पछतावा करने लगे हैं। उन्हें इस सत्य का अहसास हो चुका है-विश्व केवल मनुष्य के लिए ही नहीं है। इसमें मानव के साथ मानवेत्तर प्राणी, पशु-पक्षी पेड़-पौधे एवं पृथ्वी, वायु, प्रकाश, आकाश आदि सभी का समायोजन है।

मानव स्वार्थ पर आधारित भोग-परायण मनोवृत्ति ने शहरों में तो अंधाधुन्ध बढ़ोत्तरी की, पर पर्यावरण-सन्तुलन को इस कदर बिगाड़ दिया कि पर्यावरण-संकट सबसे भयावह संकट बन गया, जिसके सामने परमाणविक विभीषिका भी बहुत तुच्छ लगने लगी है। अपने सुख-साधनों को बढ़ाने के चक्कर में गाँवों को तो उजाड़ फेंका, पर साथ ही परिस्थितिकी सन्तुलन भी नष्ट हो गया। अपने को विचारशील एवं बुद्धिमान समझने वाले सबके सब यह भूल गए कि प्रकृति तो समग्रता में है। इसलिए स्वार्थयुक्त बुद्धि और विकृत संकीर्ण मानसिकता से जिस विश्व की रचना की है, उसमें अकेले मानवी अस्तित्व की ही नहीं, बल्कि प्राणिमात्र तथा वनस्पति जगत आदि सबके सम्पूर्ण विनाश की चेतावनी है।

इससे बचने के लिए अन्य कोई उपाय नहीं-कि यदि हम जीवित रहना चाहते हैं, तो फिर से गाँवों की ओर लौट चलें प्रकृति हमारी स्नेहमयी जननी है, उसी के आँचल की छाँव में हम सही ढंग से पल-बढ़ सकते हैं। अपनी माँ को अपंग और विखण्डित बनाकर जीवन की कल्पना सम्भव नहीं। यही वजह है कि जब मनुष्यता भौतिकवादी और पश्चिमी औद्योगिक विकास से सम्मोहित एवं चकाचौंध हो रही थी, उसी समय सुविख्यात विज्ञानवेत्ता आइन्स्टीन ने सावधान करते हुए कहा था- यह वैज्ञानिक विकास तो ठीक है, परन्तु इसे प्रकृति विरोधी नहीं बनना चाहिए।

इस महान वैज्ञानिक के द्वारा विज्ञान के विकास के संदर्भ में दी जाने वाली इस चेतावनी पर उन दिनों किसी ने भी गम्भीरता से नहीं सोचा। लगातार प्राकृतिक जीवन के सुरक्षा-कवच को तहस-नहस करने वाली कोशिशें जारी रहीं। आज परिस्थितियों ने इस मोड़ पर ला खड़ा किया है कि ग्राम्य जीवन को पुनर्जीवित करने उसका नवोत्थान करने के अलावा और कोई तरीका शेष नहीं बचा है। संयम और सादगी से ओत-प्रोत ग्रामीण संस्कृति ही मानव को उसके वर्तमान अंधेरे से निकाल कर उज्ज्वल भविष्य की डगर पर चला सकती है।

इसी चिन्तन को राहुल सांस्कृत्यायन, विंडेल विल्की आदि मनीषियों ने भविष्य दृष्टि देने वाले अपने-अपने ग्रन्थों में प्रतिपादित किया है। समय की नाड़ी को परखते हुए शान्तिकुञ्ज ने भी इसे आन्दोलन को रूप देने का निर्णय किया है। क्योंकि ग्रामीण जीवन की ओर मुड़ना तभी संभव है, जब गाँव आदर्श ग्राम का रूप ले लें। बदबूदार नालियों, स्वास्थ्य-स्वच्छता से रहित एवं पारस्परिक विग्रह-वैमनस्य से ग्रसित आज के गाँव स्वयं अपना समाधान नहीं खोज पा रहे हैं। ऐसी हालत में इनसे राष्ट्र और समाज के लिए समाधान प्रस्तुत करने की आशा रखना उपयुक्त न होगा।

अतीत, जिसकी चर्चा करते हुए परमपूज्य गुरुदेव ने देश भर के 7 लाख गाँवों को 7 लाख तीर्थों में बदल डालने की बात कही थी। तीर्थों से उनका तात्पर्य था कि गाँव उतने ही सुरम्य पवित्र एवं प्राकृतिक वन-सम्पदा से भरे-पूरे हों, जितने कि वैदिक काल में हुआ करते थे। वहाँ का वातावरण पारस्परिक स्नेह एवं सौहार्द से भरा-पूरा हो। जातीय संघर्ष और ऊँच-नीच के विद्वेष की दुर्गन्ध ग्रामीण-वातावरण को विषाक्त न करें।

वैदिक भारत में ग्रामीण जीवन का स्वरूप कुछ इसी प्रकार का था। साधन-सुविधाओं की दृष्टि से भले ही ये आज के शहरी जीवन की अपेक्षा यत्किंचित् न्यून रहें हो, परन्तु वहाँ की चिन्तन शैली और मानसिक प्रखरता आज के दार्शनिकों और वैज्ञानिकों को जन्म देने वाले स्थानों से कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी थी। संसार के सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में अनेकों स्थान पर (3।33।11।10। 27।19,10।127।5 आदि ) न केवल ग्राम शब्द का उल्लेख है, बल्कि ग्रामीण जीवन की महनीयता और महत्ता के अनेकों प्रमाण मिलते है। वेदों में इस बात को साफ-तौर पर कहा गया है कि ज्यादातर वैदिक ऋषि कृषि कर्म करते थे। खेतों में खड़ी लहलहाती फसलों के बीच ओर घनी अमराई की छाँव के नीचे ही वैदिक ऋचाएँ गूँजी थी, उपनिषदों के स्वर मुखरित हुए थे।

वैदिक जीवन-पद्धति का अन्वेषण करने वाले अधिकाँश अन्वेषकों ने उपर्युक्त कथन की पुष्टि अनेकानेक प्रमाणों से की है। इस सम्बन्ध में डी. एन. मजूमदार की ‘रुरल प्रोफाइल्स’, एम. एन. श्रीनिवास की ‘इण्डियन विलेज’, एस. सी. दुबे की ‘इण्डियाज विलेज एवं ‘इण्डियाज चेंजिंग विलेज' मैरियट की विलेज इण्डिया’, ऐ. आर. देसाई की ‘रुरल इण्डिया इन ट्रान्जिशन’, ओ. लेविस की ‘विलेज लाइफ इन नार्दन इण्डिया’ अमित रे की ‘विलेजेज, टाउन्स एण्ड सेक्युलर विल्डिंग्स इन एन्शियेट इण्डिया’ और आर. मुखर्जी की ‘द डायनिमिक्स ऑफ रुरल सोसाइटी विशेष तौर पर उल्लेखनीय हैं।

इन ग्रन्थों के अध्ययन से न केवल वैदिक संस्कृति को जन्म देने वाले प्राचीन ग्राम्य जीवन का स्वरूप स्पष्ट होता है बल्कि वे सूत्र भी मिलते हैं, जिनको अपनाकर हम फिर से अपनी प्राचीन संस्कृति को कैसे वापस ला सकते हैं। शान्तिकुञ्ज द्वारा इन दिनों जिस राष्ट्रीय जागरण के नव अभियान की कल्पना की गई है, उसकी व्यावहारिक रूपरेखा ग्रामोत्थान में निहित है।

ग्रामोत्थान की सीमा-रेखा साधन-सुविधाओं से खचाखच भरे गाँव तक परिवार-निर्माण एवं समाज-निर्माण के सभी सम्भव सूत्रों का समावेश किया गया है। इस क्रम में जिस पहले सूत्र को प्राथमिकता दी गयी है-वह स्वच्छता। गाँवों स्वच्छता न होने के कारण ग्रामीणजनों की श्रमशीलता का अभाव है। बल्कि इसकी वजह सूझ-बूझ की एवं सोच की कमी ही है। इसके कमी की पूर्ति अपने परिजन बेहतर तरीके से कर सकते है। पूज्य गुरुदेव के विचारों और भावनाओं को लोक-जीवन के लिए ग्राह्मशैली में बताकर उन्हें इसका महत्व बताया जा सकता है, साथ ही स्थान-विशेष की परिस्थितियों के अनुरूप ऐसी योजनाएँ बनाई जा सकती हैं, जिनसे पानी के विकास आदि में सहूलियत हो सके। कूड़े-कचरे बच्चों के मल-मल पशुओं के गोबर आदि को गाँव के बाहर गढ्ढों में दबाया जा सकता है। इससे जहाँ एक ओर घर और रास्ते दोनों साफ सकेंगे वही दूसरी ओर दफन की गयी गन्दगी कम्पोस्ट खाद में परिवर्तित होकर खेतों में काम आ सकेगी। अच्छा हो, ये प्रयास सामूहिक श्रमदान से हों। इससे सामूहिकता एवं सहकारिता की भावना पनपेगी।

बाहरी सफाई के साथ बहुत जरूरी है मानसिक दुष्प्रवृत्तियों एवं दुर्व्यसनों का उन्मूलन। दुष्प्रवृत्तियाँ एवं दुर्व्यसन ग्रामीण अंचल के जीवन में जड़ जमाकर बैठे है। इनके उन्मूलन के लिए गायत्री यज्ञों के माध्यम से देवदक्षिणा के लिए उन्हें संकल्पित किया जा सकता है। इसी के साथ सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन के आयोजन साथ-साथ चलाए जाएँ। इस क्रम में यह भी बताया जाए कि जिस तरह ये दुर्व्यसन हमारे शरीर को खोखला करते हैं उसी प्रकार दहेजप्रथा, मृतकभोज आदि कुरीतियाँ हमारे सामाजिक जीवन को पंगु बनाती हैं। अतएव इनसे छुटकारा पाने में ही कल्याण है।

गाँवों के लोग कुरीतियों की ही तरह अन्धविश्वास और मूढ़ताओं के चक्रव्यूह में बुरी तरह घिरे हैं। भूत-प्रेतों के नाम पर ओझा-बाजीगर उन्हें आदि दिन ठगते रहते है। इनकी निवृत्ति का समर्थ उपाय गायत्री उपासना है। आदिशक्ति की महिमा-महत्ता से परिचित होने पर चित्त की वह हीनग्रन्थि सहज में खुल जाती है, जिसकी वजह से वे तरह-तरह से ठगे जाते रहे, जो धन और भावनाएँ अभी तक इस कुचक्र में खपती रही, उन्हें लोकमंगल में नियोजित करने पर पुण्यलाभ तो होगा ही, साथ में परमात्मा की सहज कृपा मिलने से जीवन की अगणित समस्याएँ अपने आप सुलझ जाएँगी।

ग्रामीण जीवन में खाली समय का उपयोग भी एक प्रश्न है। क्योंकि खेती के काम से बचा हुआ बहुत-सा समय ऐसा होता है, जिन्हें वे ताश-चौपड़ या नाच-नौटंकी में बिताते रहते हैं। उन्हें इस बात का बोध कराना होगा कि वे खाली समय का उपयोग अपनी प्रतिभा के विकास में कर सकते है। साथ ही अपनी उद्यमिता को विकसित करके उन कुटीर उद्योगों-गृह-उद्योगों को अपना सकते है, जो उनके गाँव की परिस्थितियों के अनुकूल हैं। इनमें महिलाओं की भागीदारी होना अनिवार्य है। ग्रामीणजनों को इस बात का बोध कराए जाने की सख्त आवश्यकता है कि महिलाएँ कोई वस्तु नहीं व्यक्ति है। उनका एक समर्थ व्यक्तित्व है, जिसे विकसित होने के भरपूर अवसर मिलने चाहिए।

उद्यमिता विकसित हो सकी, सामूहिकता पनप सकी तो उन प्रवृत्तियों पर सहज अंकुश लग जाएगा, जो ग्रामीण जीवन में जहर घोल रही है। इसके अलावा ग्रामोत्थान के लिए एक अनिवार्य शर्त है-ग्रामतीर्थ की स्थापना। यूँ मन्दिर तो हर गाँव में हैं, पर वे अपना उद्देश्य भूल चुके हैं। अच्छा हो कि इन मन्दिरों को देवालय के साथ पुस्तकालय का रूप भी दिया जाए। मन्दिर के परिसर में उपयोगी जड़ी-बूटी का एक छोटा-सा उद्यान लगाया जाए। ग्रामीण अंचलों में अभी भी जड़ी-बूटियों के इतने अच्छे जानकार मिल जाते हैं, जितना ज्ञान कभी-कभी प्रशिक्षित आयुर्वेदाचार्य भी नहीं रखते। उनके ज्ञान का सार्थक सदुपयोग होना ही चाहिए।

ग्रामतीर्थ की ही भाँति गाँवों में पाठशाला एवं चिकित्सालय की भी जरूरत है। अपने परिजन इसमें महत्वपूर्ण सहयोगी की भूमिका निभा सकते है। ग्रामोत्थान का कार्य तब तक अधूरा रहेगा, जब तक वहाँ के लोगों में कोर्ट-कचहरी का दुर्व्यसन समाप्त नहीं होता। छोटी-छोटी बात की प्रतिष्ठा का सवाल बना लेना, फिर इसके लिए अदालत में अपनी सारी जमा-पूँजी गँवा बैठना-गाँवों में एक आम बात बन गयी है। समझदार सुलझे हुए लोगों की पंचायत यदि ग्रामीण जीवन में सक्रिय हो सके, तो इस महारोग से आसानी से पीछा छुड़ाया जा सकता है।

ग्रामोत्थान की इस योजना को राष्ट्रीय जागरण के नव अभियान के रूप में लिया जाना चाहिए। इसका क्रियान्वयन ही इक्कीसवीं सदी में आ रहे उज्ज्वल भविष्य के स्वागत-समारोह की तैयारी है। साथ ही यह प्राचीन वैदिक संस्कृति का नवजागरण है। ग्रामीण संस्कृति का विज्ञान केवल भौतिकवादी उपभोक्ता संस्कृति का ही निरोधक नहीं वह आध्यात्मिक उन्नयन का भी द्योतक हैं इतिहास को कुरेदने पर पता चलता है कि जो संस्कृतियाँ भोगवादी और अनैतिक रही है, उनका नामोनिशान मिट गया। भारतीय संस्कृति चिरंजीवी इसीलिए रही, क्योंकि यह ग्रामीण संस्कृति है, सादगी एवं संयम की संस्कृति है। इसके उत्थान में ही राष्ट्र का उत्थान एवं कल्याण है। अच्छा हो, हम सब राष्ट्रीय जागरण के नव अभियान में तत्पर हो एक ऐसे भारत का निमार्ण करें, जो किसी आयातित संस्कृति पर नहीं-वरन् भारतीय संस्कृति की नींव पर टिका हो।


प्रेम (Kahani)

कुएँ ने शिकायत करते हुए समुद्र से कहा-पिता! सभी नदी-नाले आपके घर में जगह पाते हैं। आप प्रेमपूर्वक उन्हें अपने घर में स्थान देते हैं। मुझसे ही पक्षपात क्यों? पिता के लिए तो सभी बेटे-बेटी एक समान होते हैं।”

समुद्र ने उत्तर दिया-वत्स! अपने चारों और दीवार बनाकर बैठने पर ही तुम्हें अपने जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित रहना पड़ा है। असीम और अनन्त प्यार पाने के लिए स्वयं को भी असीम बनाना पड़ता है। अपनी सीमाओं का त्याग करके उन्मुक्त रूप से अपने आप को व्यक्त करो, अपनी दीवारों को हटा दो, धरती को हरी-भरी तृप्त करती हुई तुम्हारी धारा जब बन्धनमुक्त हो उठेगी, तब तुम सहज ही मुझमें आ समाओगे।”


गोवंश-समृद्धि की व्यावहारिक रूपरेखा-गौशाला

आर्षकालीन महामानवों ने गाय को माता कहकर वन्दनीय माना है। इस महत्ता का प्रतिपादन अथर्ववेद ने धेनुः सदनम रयीणाम के रूप में किया है। ऋग्वेद में इसे रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री और आदित्यों की भगिनी का गौर दिया गया है। यजुर्वेद में इसके महत्व की व्याख्या करते हुए कहा गया है-

ब्रह्म सूर्यसमं ज्योतिर्द्यौः समुद्रसमं सरः। इन्द्रः पृथिव्यै वर्षीयान् गोस्तु मात्रा न विद्यते॥

अर्थात्-ज्ञान के लिए सूर्य की उपमा है, द्युलोक के लिए समुद्र का उदाहरण है। पृथ्वी बहुत बड़ी है, तो भी इन्द्र उससे अधिक समर्थ एवं शक्तिशाली हैं। परन्तु ऐतरेय ब्राह्मण ने तो गाय को प्रेम एवं सौंदर्य का प्रतीक गाना है। इसके अनुसार-सर्वस्य वै गावः प्रेमाणं सर्वस्य चारुतां गताः। महाभारतकार ने गौ स्तुति करे हुए लिखा है-

गावः श्रेष्ठाः पवित्राश्चपावनंह्येतदुत्तमम् ऋतेदधिघृतेनेहनयज्ञः संप्रवर्तने॥ गावो लक्षम्याः सदामूलंगोषुपाप्मानविद्यते मातरः सर्वभूतानाँ गावः सर्वसुखप्रदाः॥

अर्थात्-गौएँ सर्वश्रेष्ठ पवित्र, पूजनीय और संसार भर में उत्तम है। इनके घी, दूध, दही और गव्य के बिना संसार में यज्ञ सम्पन्न नहीं होते। गौ में सदैव लक्ष्मी निवास करती है। गौ जहाँ रहती रहती है, वहाँ पाप निवास नहीं करते। ये प्राणिमात्र को सुख-सम्पदा से विभूषित करती हैं।

अन्य शास्त्रों में भी मुक्तकण्ठ से गौ महिमा का उल्लेख किया गया है। एक स्थान पर कहा है-गवोयज्ञस्यहिफलंगोषुयज्ञाः प्रतिष्ठिताः। इसी तरह एतद् वै विश्वरूपं सर्वरूपम् गोरूपम् कहकर इसका महत्व बताया है। गायो विश्वस्य मातरः कहकर भी शास्त्रों ने इसे अलंकृत किया है। स्कन्दपुराण, भविष्यपुराण, पद्मपुराण, अग्निपुराण, वृहद्धर्मपुराण, विष्णुपुराण, विष्णुधर्मोत्तरपुराण के अनेक स्थान पर गोवंश की रक्षा और गोदुग्ध की विशेषताओं का वर्णन मिलता है। गौ के दुग्ध, घृत, गोबर एवं गौमूत्र का उपयोग औषधियों तथा यज्ञों के विधि-विधान में बताया जाता रहा है। इसलिए यदि यह कहा जाए कि गौ की महत्ता से भारतीय धर्मशास्त्र ओत−प्रोत है-तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। ,

संसार भर के समुन्नत और प्रगतिशील कहे जाने वाले देशों में भारतीय शास्त्रों के उपर्युक्त कथन को चरितार्थ होते देखा जा सकता है। अमेरिका, डेनमार्क अथवा स्विट्जरलैंड कोई भी प्रगतिशील देश हो, सभी गाय का समुचित पालन करते हैं। अमृतोपम दूध, धी, मक्खन से भरपूर लाभ उठाते हैं। वहाँ न लक्ष्मी का अभाव है, न बल-पौरुष की कमी।

गोदुग्ध के सर्वोत्तम होने की बात संसार भर में एकमत से स्वीकार की जाती है। महर्षि सुश्रुत के शब्दों में, गाय का दुग्ध पवित्र, स्नायुवर्धक, शक्ति, ओज तथा शुक्राणु संवर्धक है। इसमें रोगनिवारण की अद्भुत शक्ति है। यह सर्वांगपूर्ण आहार है। पाश्चात्य जगत के आहार विशेषज्ञ शेरमैन का भी यही दावा है कि गाय का दूध सर्वोत्तम और पूर्ण आहार है। इसमें वे सभी शक्तिवर्धक तत्व विद्यमान हैं, जो मनुष्य के लिए आवश्यक हैं। उन्होंने इसका प्रयोग अलग-अलग चूहों पर करके देखा। पाँच सप्ताह तक एक चूहे का मात्र गोदुग्ध पर, दूसरे को अन्न पर रखा गया। गोदुग्ध लेने वाले चूहे का वजन पाँच सप्ताह में अन्न आहार खाने वाले से डेढ़ गुना हो गया, जबकि अन्न अहारी सुस्त पड़ा रहता एवं दुग्ध आहार करने वाला अपेक्षाकृत अधिक चुस्त हो गया।

इसी प्रकार के विचार बर्नियर ने व्यक्त किए हैं कि संसार की सुदृढ़ और बहादुर जातियों का सर्वोत्तम आहार गोदुग्ध ही रहा है। क्योंकि इससे दीर्घ आयु और निरोगता आसानी से प्राप्त की जा सकती है। पाश्चात्य जगत के जितने भी इतिहासकार हुए हैं, वे एकमत से स्वीकार करते हैं कि भर में बसी जाति संसार भर की सर्वश्रेष्ठ, वीर और साहसी जाति थी। जिसका मुख्य धन्धा पशु-पालन कृषिकर्म एवं मुख्य आहार गोदुग्ध था।

सुविख्यात विज्ञानवेत्ता डॉ. एस. ए. पीपल्स ने अपने दीर्घकालीन शोध-प्रयत्नों प्रयोग-परीक्षणों के उपरान्त यही निष्कर्ष दिया कि मनुष्य की प्रकृति के लिए गाय का दूध ही सबसे निरापद एवं पौष्टिक सम्पूर्ण आहार है। इसमें सभी जीवनदायी तत्व पाए जाते हैं। यदि कोई आहार न भी लिया जाए और केवल गाय के दूध का ही सेवन किया जाए, तो व्यक्ति न केवल स्वस्थ, पुष्ट और सशक्त जीवन व्यतीत कर सकता है, वरन् उसका स्वभाव भी मानवोचित गुणों से ओत-प्रोत हो सकता है।

उन्होंने अपने अध्ययन में यह पाया कि यदि गाएँ कोई विषैला पदार्थ खा जाती हैं, तो भी उसका कोई प्रभाव उनके दूध में नहीं आता। उसके शरीर में सामान्य विषों को पचा जाने की अद्भुत क्षमता है। अन्य स्तनधारी जीवन यदि विषाक्त आहार ग्रहण करते है, तो उनके शरीर में वह विष जमा होता रहता है और मृत्यु का कारण बनता है। अधिक मात्रा में खा लिए जाने पर तो एक ही बार में मृत्यु हो जाती है। न्यूयार्क की विज्ञान अकादमी की बैठक में अन्य वैज्ञानिकों ने भी उनके इस मत की पुष्टि की।

दूध की उत्कृष्टता चिकनाई के भाग से मापने की भारी भ्रान्ति भारतीय जनमानस में घर कर गयी है और इसी भुलावे में आकर गौर के स्थान पर भैंस पालन का प्रचलन आरम्भ हो गया है, जिससे भारत की आर्थिक दशा और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। चिकनाई को ही लिया जाए, तब तो दूध की अपेक्षा मूँगफली, तिल, सरसों आदि में भी पर्याप्त चिकनाई उपलब्ध हो जाती है, किन्तु गाय के दूध में प्राप्त चिकनाई इस प्रकार संतुलित है कि मनुष्य शरीर को अनुकूल पाचनक्रिया में सहायक तथा शारीरिक कल-पुर्जों के लिए उत्तम स्निग्धता तथा सम्बल प्रदान करती है।

दूध का महत्व चिकनाई से न होकर खनिज लवणों से है। जिनकी मात्रा, उपयुक्तता एवं श्रेष्ठता के आधार पर वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि गाय के दूध में 12 प्रकार के एमिनो एसिड, 11 प्रकार के फैटी एसिड, 6 प्रकार के विटामिन, 7 प्रकार के किण्व, 24 प्रकार के फास्फोरस यौगिक, 11 प्रकार के नाइट्रोजन तत्व उपलब्ध हैं। गाय के दूध में मुख्य एन्जाइम इस प्रकार पाए जाते हैं- पेरिक्सडेज, रिडक्टेज, लाइपेज, प्रोटिएज, लैक्टेज, फास्फेटेज, अलिनेज़, गैटालेज। दूध में पाए जाने वाले खनिजों में कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा-ताँबा आयोडीन, मैंगनीज, फ्लोरीन, सिलीकॉन आदि मुख्य हैं। गोदुग्ध में विटामिन ए-1 कैरोटिन डी. ई., टेकोफेराल, विटामिन बी-1, बी-2 रिवोफ्लेविन, बी-3, बी-4 तथा विटामिन-सी (एसकाॅर्विक एसिड) के रूप में पाए जाते हैं।

गाय के दूध की अनेकों विशेषताएँ में से एक विशेषता यह भी है कि जब अन्य स्रोतों से प्राप्त प्रोटीन कठिनाई से हजम होती हैं, वहीं गाय के दूध से प्राप्त 97 प्रतिशत प्रोटीन भाग पाचन-संस्थान पचा लेता है। दूसरी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि शरीर में उत्पन्न होने वाला यूरिक एसिड जो मूत्र में जलन, दाह और बदबू उत्पन्न करता है, गोदुग्ध सेवन से अधिक मात्रा में नहीं बना पता और शमन होता रहता है। इसमें एक विशेषता यह भी है कि यह रेडियोधर्मिता के प्रभावों से सर्वथा मुक्त है।

इन्हीं विशेषताओं के कारण आयुर्वेद ग्रन्थों में गोदुग्ध को नित्य सेवन करने योग्य महौषधि माना है। इसके गुणों की चर्चा करते हुए धन्वन्तरि, निघण्टु, सुवर्णादि वर्ग में कहा गया है-

पथ्यं रसायनं बल्यं हृद्यं मेधयं गववाँ पयः। आयुष्यं पुस्त्वं कृद्धात रक्तपित्तविकार नुत॥

अर्थात्- गोदुग्ध समस्त रोगों की अवस्था में पथ्यसेवन के लिए रसायन बलकारक, हृदयदौर्बल्य में लाभकारी, बुद्धि, आयु-वीर्यवर्द्धक वात, पित्त, रक्त विकारनाशक है। वैद्यक शास्त्र के अनुसार, इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि जब रोगी को सभी प्रकार के खाद्य पदार्थ सेवन की मनाही कर दी जाती है, तब भी चिकित्सक उसे गोदुग्ध का सत्परामर्श देकर स्वास्थ्य लाभ कराते हैं।

चरक संहिता के अनुसार, गोदुग्ध, मधुर, मृदु, बहल, श्लक्षण, पच्छिल, गुरु, मन्द, प्रसन्न गुणों वाला है। ओज के भी यही लक्षण हैं। सुश्रुत संहिता में गोदुग्ध को मलशोधक, पाचक, चिकना, वीर्योत्पादक, बल, आयु, प्राणसंवर्द्धक, अस्थिसंघ को सुदृढ़ सुनियोजित रखने वाला उत्तम रसायन बताया है, जो वात, पित्त विकारों का भी शमन करता है। सुश्रुत ने प्रवरं-जीवनीयां क्षीरमुक्तं रसायनम्-कहकर इसे जीवनीय माना है। इसके सेवन से ज्वर, भ्रम, मूर्छा, थकावट, तृष्णा, दाह, गुल्म, अफरा, रक्तपित्त, अतिसार, उदररोग, शूल, बवासीर और व्रण जैसे भयंकर रोग दूर हो जाते हैं।

गोदुग्ध से बने हुए पदार्थ भी अनेक रोगों का शमन करते हैं। भावप्रकाश के अनुसार, उक्तं दध्नामशेषाणाँ मध्ये गव्यं गुणाधिकम्॥ अर्थात् सब प्रकार के दहियों में गौदधि सबसे अधिक गुणकारी है। यह उत्तम बलकारक, पाक में स्वादिष्ट, पवित्र, दीपन, स्निग्ध, पौष्टिक और वातनाशक होता है। गाय के मट्ठा को त्रिदोषनाशक सब प्रकार के पथ्यों में उत्तम माना गया है। यह बवासीर और उदर-विकारनाशक है। गाय के मक्खन को अर्दित ओर कास को नष्ट करने वाला एवं बालकों के लिए अमृत तुल्य लाभकारी माना गया है। इसी प्रकार गोघृत कान्ति और स्मृतिदायक, बलकारक, वात-कफनाशक श्रमनिवारक, पित्तनाशक एवं शरीर को स्थिर रखने वाला माना गया है।

पोषण और स्वास्थ्य की दृष्टि से अद्वितीय गोदुग्ध एवं दुग्ध से बने पदार्थों के कारण गाय की महत्ता असंदिग्ध है ही, आर्थिक दृष्टि से भी वह कम उपयोगी नहीं है। यदि गोवंश की रक्षा नहीं की जा सकी, तो बैलों के बिना खेती हमारे कृषि प्रधान देश में किस प्रकार होगी? बैलों को हटाकर ट्रैक्टरों के सहारे भारत का गरीब किसान अपनी छोटी जोतों की खेती कैसे कर सकेगा? उन्हें जुटाने के लिए धन कहाँ से लायेगा? फिर छोटे गाँवों में उन्हें चलाने वाले ड्राइवर एवं सुधारने वाले कारीगर कहाँ से उपलब्ध होंगे? ये सब किसी तरह मिल भी जाएँ, तो फिर इन ट्रैक्टरों के लिए आज की परिस्थितियों में डीज़ल कहाँ से आएगा? वे ट्रैक्टर गोबर तो देंगे नहीं, फिर खाद की आवश्यकता कैसे पूरी होगी? इन सब तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि कृषि, अर्थ-व्यवस्था स्वास्थ्य-रक्षा एवं धार्मिक, साँस्कृतिक हर दृष्टि से गाय को संरक्षण मिलना ही चाहिए।

इस संबन्ध में शान्तिकुञ्ज ने सर्वप्रथम पहल करते हुए गौशाला स्थापित करने का निश्चय किया है। यह गौशाला उसी भूखंड के एक भाग में होगी, जिसे अभी हाल में ही लिया गया है। गौरक्षा के बारे में बहुत कहा और लिखा जाता है। आन्दोलन एवं चर्चाएँ भी कम नहीं होती। परन्तु सार्थक कदम उठाने वाले विरले होते हैं। शान्तिकुञ्ज के संस्थापकों एवं उनके परिजनों का विश्वास कहने में नहीं करने में अधिक रहा है। इसी पूर्व प्रचलित नीति के अनुसार, यह कदम उठाया गया है, ताकि गायत्री परिवार के सदस्य गंगा, गीता, गायत्री के साथ ही गौर का भी महत्व समझें और इस साँस्कृतिक प्रतीक को प्रत्येक घर में सम्मानजनक एवं श्रद्धापूरित स्थान मिल सके।


जलधि की सहायता (Kahani)

स्वाति नक्षत्र था। वारिद जल-बिन्दु तेजी से चला आ रहा था।

वृक्ष की हरित नवल कोपल ने रोककर पूछा,”प्रिय किधर चले?”

“भद्रे! जलनिधि पर सूर्य की कोप-दृष्टि हुई है, वह उसे सुखाय डाल रहा है। जलधि की सहायता करने जा रहा हूँ।”

छोड़ो भी व्यर्थ की चिन्ता। खुद को मिटाकर भी कोई किसी की सहायता करता है? चार दिन की जिन्दगी है, कर लो आनन्दोपभोग। कहाँ मिलेगी कोमल शय्या?”

जल-बिन्दु ने एक न सुनी। तेजी से लुढ़क पड़ा सागर की ओर। नीचे तैर रही थी सीप। उसने जल-बिन्दु को आँचल में समेट लिया। वह जल-बिन्दु न रहकर हो गया ‘मोती’। सागर की लहरों से एक धीमी-सी ध्वनि निकली-निज अस्तित्व की चिन्ता छोड़कर समाज के कल्याण के लिए जो अग्रसर होते हैं, वे बन जाते हैं जनमानस के मोती।”


वीरता वही, जो युग को बदल दे।

सच्ची वीरता वही है, जो जमाने की धारा को मोड़ दे- समूचे युग को परिवर्तित कर दे। लेकिन जमाने की धारा मोड़ने पड़ता है। आन्तरिक शुचिता की बाहर शौर्य बनकर प्रकट होती है।

गया में वटवृक्ष के नीचे तृणासन पर बैठते समय अपने इस संकल्प के कारण राजकुमार सिद्धार्थ बुद्ध बने थे कि ‘मेरे शरीर का अन्त भले ही हो जाए, किन्तु जीवनसत्य का साक्षात्कार और बोध प्राप्त किए बिना यहाँ से हटूँगा नहीं।’ शंकराचार्य जगद्गुरु इसलिए बने, क्योंकि उन्होंने ज्ञान बटोरा नहीं, सम्पूर्ण को समझा, पूर्णता का साक्षात्कार किया, सबको गले लगाया, देश की गली-गली में नंगे पाँव घूमें थे।

कुमारिल भट्ट साधन-शुचिता को नकारकर लक्ष्य प्राप्त करने और मर्यादा उल्लंघन के पाप का स्वतः प्रायश्चित करने वाले ज्ञातकाल में प्रथम पुरुष थे। बिना किसी कष्टानुभूति के तुषा (भूसी) के छिलके के कण-कण के अग्निकण बनते जाने के साथ-साथ वे स्वेच्छापूर्वक पल-पल और साँस-साँस जले थे कि कोई अपने गुरुजन और अपनी आस्था के साथ विश्वासघात और प्रवंचना न करे।

वीरता की अनोखी मिसाल रची सिसोदिया कुलसूर्य महाराणा प्रताप ने, जो साधनहीन रहकर-घास की रोटी खाकर भी लोभ और भय के महाकाय पर्वतों के सामने झुके नहीं, आजीवन संघर्षरत रहकर देश की माटी की आन की रक्षा करते रहे। वीर शिवाजी अपने समय के युग-निर्माता थे। मुगलों का तेज उनके सतत् संघर्ष के सामने लगातार फीका पड़ता गया। वीरता की यह कहानी थमी नहीं लोकमान्य तिलक, महात्मा गाँधी, चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह आदि सभी इस महागाथा के तेजस्वी चरित्रनायक बने। सभी एक ही ध्येय था, एक ही लक्ष्य था-जमाने के आतंक को समाप्त करना, उलटे हो गए प्रचलनों-प्रयासों-प्रवृत्तियों के प्रवाह को उलटकर सीधा करना।

भारत भूमि पर शूरमाओं और वीरों की फसल सहज रूप से उगती रही है। सम्पूर्ण संसार के शूरवीर एक कतार में खड़े हो जाएँ तो भी उनकी कतार भारतीय शूरवीरों की कतार से छोटी ही रहेगी। हो भी क्यों न? जितना प्राचीन राष्ट्र-जितना बड़ा इतिहास, उतनी ही बड़ी कतार। उसके ओर-छोर का पता लगा पाना सम्भव नहीं है। किसका-किसका उल्लेख करें, किसका-किसका स्मरण।

सामान्य चलन में जब वीरता की बात चलती है, तो सहसा किसी युद्ध का, किसी समर भूमि का, किसी शस्त्र-शूरमा का बिम्ब आँखों और मन-मानस के पटल पर उभर आता है। सभी समर-शूरमा अभिनन्दनीय है। सभी बलिदानी और शहीद प्रेरणास्पद एवं पूज्य हैं, किन्तु इन सभी शहीदों और शूरमाओं की शहादत और शौर्य का मर्म खोजें तो यही पाएँगे कि ये सभी अपने जमाने की परिस्थितियों को बदलने में लगे रहे। हाँ इतना अवश्य है कि शौर्य शूरमा के शरीर का तो वीरता मन और आत्मा का गुण-धर्म है। शूरमा का शौर्य उनके मन के संकल्प में से ही जन्मता है। शूर का शौर्य सफलता-असफलता के तराजू पर तौला जा सकता है। वीर की वीरता, जय-पराजय सुख-दुःख सफलता-असफलता से परे उसके सातत्य और संकल्प की कसौटी पर परखी जाती है।

केवल शूरमा धरती का शासक और श्रृंगार होता है। वीर सौरमण्डल का भेदन करके सूर्य पर आसन जमाने वाला, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और सृष्टि का आधार है। जय-पराजय शूरता और कायरता के बीच केवल एक पल, एक कदम और एक शब्द की दूरी होती है। शूरमा का शौर्य इस ‘एक’ के छोटे-से पैमाने से नापा जा सकता है। किन्तु जय-पराजय सुख-दुःख सफलता-असफलता निरपेक्ष संकल्प से अनुप्राणित वीर की वीरता की थाह लेने वाला पैमाना अभी तक बना नहीं। शूर परिस्थितियों से प्रभावित होता है, किन्तु वीर परिस्थिति की छाती को अपनी एड़ियों से रौंदता हुआ चलता है। वीर-किसी का अनुगामी या अनुवर्ती नहीं होता। वह तो बस आदर्शों के सर्वोच्च प्रतिमान के अनुरूप स्वयं को बदलते हुए जमाने को बदल डालने के लिए समर्पित होता है। वह अतीत की कथा सुनकर वर्तमान का कर्म नहीं करता। उसका कर्म उसके अपने संकल्प की अभिव्यक्ति होता है।

भगीरथ और उनसे पहले से लेकर आज तक की सृष्टि में सभी युग-निर्माताओं की जीवनयात्रा का पाथेय रहा है- वीरव्रत यही व्रत स्वामी विवेकानन्द और रामतीर्थ की प्रेरणा थी। इसी ने राम को लोकोत्तर बनाया। यही राम की मर्यादा और पराक्रम बनकर प्रगटा, इसी से उद्दीप्त हो गुरु तेगबहादुर ने सहर्ष शीश दान कर दिया। महर्षि दयानन्द को उनके वीरव्रत ने हौसला दिया। इसी कारण सावरकर सागर तैर गया। यही धरती का धीरज, सागर का गांभीर्य, शहीदों का आत्मबल, तपस्वियों का तप है। यह अविनाशी आत्मा और सर्वव्यापी ब्रह्म की तरह युगपरिवर्तन की प्रत्येक हलचल में समाया हुआ है।

युग वीरों की वीरता मन के वृन्दावन में पले-खिले पुष्प की सुगन्ध है। यह सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश, अग्नि का ताप, जल की शीतलता, पवन की गति और सृष्टि की प्राणवायु है। आरोग्य और दीर्घायु, वैभव और विरक्ति, झंझावात और मन की अडिगता के बीच यही पराक्रम बनकर प्रगट होता है। वीर विजय के प्रमाद या पराजय की प्रताड़ना से प्रभावित नहीं होता। वह तो योगेश्वर कृष्ण की भाँति युग-परिवर्तन के महाप्रयोजन के लिए सर्वथा समर्पित एवं मोहमुक्त रहता है।

आधुनिक युग के प्रसिद्ध दार्शनिक स्वर्गीय सन्त जे. कृष्णमूर्ति ने जीवन का एक महामंत्र दिया-Stand alone, like a solitary tree or mountain.' यदि कि पर्वत या एकाकी वृक्ष की तरह अकेले खड़े रहो जो पर्वत की चोटी पर अनजाना और अकेला खड़ा रह सकता है, वही कोई महान कर्तृत्व कर सकता है। अकेले संघर्षरत रहना वीरता और महानता का मूल्य है। जो यह मूल्य चुकाता है, वही वीर कहलाता है। उसी की कर्मगाथा वीरगाथा बनती है। युग-परिवर्तन के लिए महाकाल ने ऐसे ही महावीरों को न्यौता दिया है। उनकी वीरता किसी वीरव्रती के व्रत, किसी तपस्वी के तप, किसी साधक की साधना, किसी भक्त की भक्ति, किसी शूरमा के शौर्य की तरह स्मरणीय होगी एवं रक्त की स्याही व शरीर की लेखनी से कर्मभूमि के भोजपत्र पर लिखे गये सर्वशक्तिमान परमात्मा के संकल्प के स्तोत्र के रूप में युगों तक उसका गायन किया जाएगा।


गायत्री जयन्ती पर विशेष- - उनके लिए एक आह्वान-अनुरोध जो पूज्य गुरुदेव के अपने हैं

शान्तिकुञ्ज द्वारा नए भूखंड को क्रय करने एवं उस पर देवसंस्कृति के खुले विश्वविद्यालय के नवसृजन का तथ्य परिजन इस अंक के पिछले पृष्ठों में पढ़ चुके हैं। नवसृजन के इस उद्घोष को सुनकर कोई भी सृजनशिल्पी उनींदा, आलसी, अस्त-व्यस्त न रहने पाए। किसी पर न तो खुमारी छाई रहे, न उदासी। न कोई कृपणता अपनाए, न युगधर्म के निर्वाह में उपेक्षा दिखाए। इन दिनों महाकाल की एक ही अपेक्षा और एक ही चेतावनी है।

परमपूज्य गुरुदेव ने इसी आशा और विश्वास के साथ सूक्ष्मलोक में जाकर महातप करने का निश्चय किया था कि उनका परिवार सुसंगठित रहकर नवसृजन के उन पुण्य-प्रयत्नों में सतत् संलग्न रहेगा जिन पर व्यक्ति और समाज की सर्वतोमुखी प्रगति निर्भर है। उनके महाप्रयाण के अवसर पर हममें से प्रत्येक ने अपने-अपने स्थान से मौन संदेश भेजकर यह विश्वास दिलाया था-उनका उपवन सूखने न पावेगा। उनके मिशन को शिथिल न होने दिया जाएगा। उनकी प्रदीप्त की हुई लाल मशाल बुझने न दी जाएगी।

शब्दों में न सही-भाव रूप से हममें से हर किसी ने ऐसा ही आश्वासन दिया था और वे इस आशा और विश्वास के साथ निश्चिन्त होकर सूक्ष्मलोक में अपनी साधना के लिए चले गए। उन्हें पूरा भरोसा था कि उनकी समर्थ मानस सनातन अपने वचन और आश्वासन पर कायम रहेगी और उस ज्ञानदीप को अखण्ड ही रखा जाएगा, जिसका प्रकाश आज नहीं तो कल इन तमसाच्छन्न परिस्थितियों को पलटकर समस्त विश्व को प्रकाशवान बनाने वाला है। हममें से प्रत्येक भावनाशील का कर्तव्य है कि अपने आश्वासन को निभाए और विश्वास की रक्षा करे, जिसे गुरुदेव इन दिनों भी निश्चिन्ततापूर्वक अपने मन में जमाए बैठे होंगे। उनके जाते ही यदि हम कन्धा डाल दें, मुख मोड़ ले पारस्परिक विग्रह खड़े करने लगें, प्रयत्नों को शिथिल कर दें, तो यह शिथिलता गुरुदेव के साथ ही नहीं, विश्व-मानवता के साथ भी विश्वासघात ही होगा, जो यह आशा लगाए बैठी है कि व्यक्ति ओर समाज के नवनिर्माण का, युग-परिवर्तन के महान कार्य का नेतृत्व विचारक्रान्ति अभियान के कर्मवीर सदस्य ही अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर सम्पन्न करेंगे।

भावी देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के द्वारा भारतीय विद्याओं के पुनर्जीवन का जो कार्य होना है, वह कार्य गुरुदेव का व्यक्तिगत नहीं है। वस्तुतः वह युग की सबसे बड़ी चुनौती का एकमात्र समाधान है, जिसे यदि भावनाशील लोग आगे बढ़कर सम्पन्न न करे सके, तो मानवता सर्वनाश के गर्त में जा गिरेगी और संसार का भविष्य हर दृष्टि से निराशाजनक हो जाएगा। हम सब एक चौराहे पर खड़े हैं। यदि उठाने की दिशा में आगे बढ़ते है, तो अपना बेड़ा पार करेंगे और साथियों को तारेंगे, पर यदि लोभ और मोह की जंजीरों में जकड़े हुए खुदगर्जी का ही ताना-बाना बुनते रहे तो न स्वार्थ ही सधेगा, न परमार्थ ही। दोनों हाथों से पतवार छूट जाएगी और उस तूफान में फंस जाएँगे, जिससे फिर उबर सकना सम्भव न रहेगा।

जिसकी आत्मा में जीवन-जाग्रति नहीं हैं, उनसे कुछ नहीं कहा जा सकता। पर जिनमें कर्तव्य और उत्तरदायित्व की भावना शेष है, उनके लिए तो इन ऐतिहासिक घड़ियों में यही उचित है कि तुच्छ स्वार्थों के सीमा-बन्धनों को ढीला करके नवनिर्माण के इस पुण्य-प्रयोजन में अपना भरपूर योगदान दें, क्योंकि मानव-जाति का उज्ज्वल भविष्य देवसंस्कृति के सूत्रों पर ही आधारित है। जाग्रत आत्माओं के ऊपर समय ने जो जिम्मेदारी छोड़ी है और गुरुदेव ने जो मशाल उनके हाथों में थमाई है, उन दोनों के प्रति कर्तव्य का निर्वाह करने के लिए यही उचित है कि इन दिनों चल रहे प्रयासों में तनिक भी शिथिलता न आने दी जाए।

गुरुदेव के न रहने पर हम सबके लिए यह कार्य प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। संसार के सम्मुख सुयोग्य पिता के अयोग्य पुत्रों-पुत्रियों की तरह हमें हेय दृष्टि से न देखा जाए। जब तक वे थे अपने प्रयत्नों से इस महान अभियान को चला रहे थे। अब जबकि जिम्मेदारी हम लोगों के कन्धों पर आ गयी है, तो इसे हर कीमत पर निवाहा ही जाना चाहिए। पीछे हटने की गुँजाइश नहीं रही। समय ने हमें उस कसौटी के आगे चलकर खड़ा कर दिया है। जहाँ असफल होने पर हमें जन्मान्तरों और पीढ़ियों तक पश्चात्ताप की आग में ही जलना पड़ेगा। आगे बढ़ने और अपना सर्वस्व न्योछावर करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। जीतने पर यश और मरने पर स्वर्ग पाने जैसी घड़ियों में हमें अर्जुन की तरह अब गांडीव को तानकर ही रखना होगा।

देवसंस्कृति के विश्वविद्यालय का निर्माण इन दिनों हम सबके सामने प्रबल एवं प्रचण्ड परीक्षा की तरह आ खड़ा हुआ। इस महापरीक्षा से हमें गुजरना ही है। पूज्य गुरुदेव की महिमा और महत्ता के साथ जुड़े रहकर हम लोग चिरकाल से गौरवान्वित होते रहे है। इस गौरव की पात्रता हममें है भी या नहीं, समय ने इस तथ्य को प्रकट कर दी है, जिस पर खोटे सिद्ध होने पर हमें उतना ही लज्जित होना पड़ेगा, जितना कि पहले गौरवान्वित हुए थे।

गुरुदेव के व्यक्तित्व और कर्तृत्व की गरिमा हम उनके पुत्र और पुत्रियाँ ही बखानें, तो यह एक मोह-ममता ग्रस्त परिवार की श्रद्धाभिव्यंजना मात्र कही जा सकती है। किन्तु जो अनुपम आदर्श उनने प्रस्तुत किए हैं, उनकी न केवल देश के कोने-कोने में चर्चा हुई है, वरन् विश्व के महान विचारकों ने उनकी गतिविधियों को मुक्त कण्ठ से सराहा है। उनके व्यक्तित्व को प्रायः सभी ने मानवता की सजीव प्रतिमा मान है। अध्यात्म तत्वों का अवलम्बन करके इस मार्ग का पथिक अपने लिए तथा दूसरों के लिए क्या कुछ कर सकता है, इसके प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करके उन्होंने इन दिनों उपहासास्पद और उपेक्षित कही जाने वाली आत्मविद्या की यथार्थ महत्ता एवं सामर्थ्य की ओर सर्वसाधारण का ध्यान आकर्षित किया है।

अनाचार और अपराधों की बाढ़ में बहकर सर्वनाशी संकट में फँसे हुए मानव समाज को, विनाश के गर्त से बचने एवं ‘जियो और जीने दो’ की नीति पर पुनः लौट चलने के लिए वे अपनी प्रचण्ड सामर्थ्य के अनुसार सूक्ष्मजगत में रहकर भी इतनी तीव्रता और तत्परता से कार्य कर रहे हैं कि प्रवाह को लौटा देने की परिस्थितियाँ बनने की आशामय किरणें इस सघन अंधकार को चीर कर, आज नहीं तो कल निकलने ही वाली है। विदेशियों की उपद्रवी घुसपैठ, उससे उपजे आतंकवाद से लेकर भारत की आन्तरिक दुर्बलता और दुर्दशा तक के हृदयद्रवी संदर्भों से, धर्म-राजनीति और वैयक्तिक मूल्यांकनों के गिरते स्तर से वे कितने व्यथित और दुःखी हैं, इसे वे ही जान सकते हैं, जो दिव्यद्रष्टा होने के साथ, उनसे भावनाओं की गहराई से जुड़े हैं। शरीर रहते हुए वे विश्वपीड़ा के साथ आत्मपीड़ा को जोड़कर कभी भी चैन से न बैठे, प्रतिरोध के लिए जो बन पढ़े करते रहें। दैवीतत्वों के हाथों जो साधना उपलब्ध है, उससे व्याप्त असुरता का समाधान न होते देखा तो इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य को साकार करने के लिए सूक्ष्मजगत में उस दिव्यशक्ति का उद्भव करने चले दिए, जिससे व्यक्ति और समाज के, राष्ट्र और विश्व के सम्मुख उपस्थित विपन्नता का समाधान सम्भव हो सके।

तप-साधना यों अनेक सन्त-महात्मा करते रहते है, पर उनमें से अधिकाँश का प्रयोजन व्यक्तिगत स्वर्ग, मुक्ति, शान्ति, सिद्धि जैसी विभूतियों तक ही सीमित रहता है। व्यक्तिगत लाभ चाहे आत्मिक हों, चाहे भौतिक, उनसे उपार्जनकर्ता के ही वैभव में वृद्धि होती है। ऐसे तपस्वी जिन्होंने अपने आपे को, अपने लाभ, वैभव को एक प्रकार से विस्मृत-विसर्जित ही कर दिया हो, केवल परदुखकातर अन्तःकरण के साथ लोकमंगल और विश्वमंगल ही लक्ष्य रहा हो, आज कहीं ढूँढ़े नहीं मिलते। ऋषि-परम्परा के प्रतीक हमारे गुरुदेव यों जीवन भर जनमानस में प्रकाश उत्पन्न करने के लिए तिल-तिल करके अपने को ज्योतिर्मय दीपक की तरह जलाते रहे, पर अब तो लगता है उनका तप-यज्ञ पूर्णाहुति के समीप जा पहुँचा है। सूक्ष्मजगत में रहकर जिस उग्रतपश्चर्या का अवलम्बन उन्होंने इन दिनों किया है, उसकी तुलना के उदाहरण अन्यत्र ढूँढ़े नहीं मिलेंगे। तत्त्ववेत्ता सूक्ष्म-दर्शियों द्वारा विश्वास के साथ यह आशा की जाती है कि उनका प्रयोजन असफल न होगा और आज के निराशा-जनक वातावरण में कुछ ऐसी किरणें उत्पन्न होंगी, जिन्हें आज की तुलना करने पर अनहोनी ही कहा जा सकता है।

चूँकि हम उनके साथी, सहचर, अनुयायी और परिजन के रूप में अति निकटवर्ती रहे हैं और अति परिचयात् अवज्ञा सूत्र के अनुसार हम उन्हें पहचानने से वंचित रहे एवं सही मूल्याँकन न कर सके। पर देख सकने और समझ सकने वालों ने न जाने उनके बारे में क्या-क्या कहा और आगे क्या-क्या कहने वाले हैं। युग-निर्माण की सुनिश्चित सम्भावना’ पुस्तक में जिन सूक्ष्मदर्शियों के संकेतों का उल्लेख किया गया है, उससे यह आभास लग सकना कठिन नहीं कि एक सुनिश्चित ईश्वरीय व्यवस्था के अनुरूप गुरुदेव कुछ ऐसा करके रहेंगे, जिसके विश्व के इतिहास में सदा अविस्मरणीय ही माना जाता रहेगा। नवनिर्माण एवं युगपरिवर्तन ही माना जाता रहेगा। नवनिर्माण एवं युगपरिवर्तन की सम्भावनाओं के सम्बन्ध में आज की स्थिति को देखते हुए कोई आशंकित और अनिश्चित भी हो सकता है, पर समय बताएगा कि गुरुदेव की महानता विश्वव्यापी महानता के रूप में किस तरह विकसित होगी और उसका लाभ समस्त विश्व के लिए कैसा मंगलमय होगा?

ऐसे महामानव के साथी और सहचर होने का गौरव प्राप्त होना, हम सबके लिए कुछ कम सौभाग्य की बात नहीं है। यदि प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं भी पाया हो, तो भी यह कुछ कम नहीं कि हम लोग उनके कुटुम्बी और सम्बन्धी, मित्र और शिष्य कहलाने का गौरव प्राप्त कर सके। रीछ-वानरों ने राम के साथी सम्बन्धित रहकर चाहे प्रत्यक्ष और भौतिक लाभ कुछ भी न पाया हो, पर उनकी प्रातःस्मरणीय चर्चा जो अनन्तकाल तक होती रहेगी, वह भी कुछ कम महत्व की उपलब्धि नहीं है।

इस गौरवास्पद स्थिति को प्राप्त कर सकने के उपयुक्त हम हैं भी या नहीं-यह परीक्षा भी इन दिनों समय ने लाकर सामने प्रस्तुत कर दी है और उस स्थिति में डाल दिया है कि खरे और खोटे में से एक पक्ष में अपने को खड़े करने की स्थिति में अनुभव करें। हनुमान-अंगद की महत्ता को आकाश तक पहुँचाने में श्रीराम के साथ उनका सम्बन्ध-सहचरत्व ही पर्याप्त नहीं वरन् उन्हें वे कार्य भी करने पड़े जो महामानव के साथ जुड़े रहने वाले उनके सच्चे साथी होने के प्रमाणस्वरूप करने पड़ते हैं। निष्ठा की परख त्याग कर्म एवं समर्पण से होती है, यों परख के बिना छोटे सिक्के तक आगे नहीं चलते हैं, फिर श्रेय साधना की गौरव-गरिमा के पथ पर चलने वाले के लिए तो बिना परीक्षा की कसौटी पर सही सिद्ध हुए आगे बढ़ने की बात ही नहीं बनती।

गुरुदेव ने जीवनभर अगणित परीक्षाओं में अपने को हँसते-मुसकराते हुए झोंका और हर बार वे सही सिद्ध होते गये। अब भी वे सूक्ष्मजगत में मानव कल्याण के लिए तप-निरत हैं। हम सबको अपने पीछे आने के लिए, लोकमंगल के लिए त्याग अनुदान करने का इशारा करके गए है। वे न गए होते तो बाद दूसरी थी। जो कुछ हो रहा था, उसका श्रेय, दोष उन्हीं के मत्थे था। पर अब जबकि उनने अपने अति आत्मीयजनों को कुछ आगे बढ़ने के लिए स्पष्ट संकेत किए हैं और महाप्रयाण के अवसर पर भावनाओं से अनुरोध कर गए हैं कि ज्ञानयज्ञ की लाल मशाल में मेरे हर प्रियजन को श्रद्धा-स्नेह डालते ही रहना है और इसे किसी भी कीमत पर बुझने नहीं देना है। इस अनुरोध की ओर से मुँह मोड़कर यदि हम कृपणता का ही परिचय देंगे, तो आत्मधिक्कार और लोकापवाद की भर्त्सना की जलन ही पल्ले पड़ेगी।

हमें पिता और माता से अधिक प्यार करने वाले और हमारे भविष्य की उज्ज्वल रेखा में रंग भरने का स्वप्न देखने में संलग्न गुरुदेव की छोटी-सी इच्छा और आज्ञापालन करने से हम भी जी चुराये तो यह अपने लिए लज्जा और कलंक की ही बात होगी। सिंह के बच्चे सिंह और हाथी के बच्चे हाथी होते हैं। ऐसा न हो कि हम अपने महान गुरु के महान शिष्य सिद्ध होने की अपेक्षा कायर, कृपण एवं अकर्मण्य कहलाए और इस उपहास के पात्र बने कि जब परीक्षा की घड़ी आयी, कुछ देने की बारी आयी, तो डरकर पीछे हट गए।

गुरुदेव एवं अपने व्यक्तिगत संबंधों के संदर्भ में कहा जाए अथवा राष्ट्र-धर्म समाज-संस्कृति की दृष्टि से अनिवार्य माना जाए, हर दृष्टि से यह आवश्यक हो गया है कि हमें अब हाथ-पर-हाथ रखकर बैठ जाना शोभास्पद न होगा। भारतीय विद्याओं के पुनर्जीवन के लिए, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के नव-निर्माण के लिए इन दिनों हम सबकी ओर जिस आशाभरी दृष्टि से देखा गया है, उससे विमुख होना ठीक नहीं। ढर्रे का जीवन, रोजमर्रा की बातें तो सभी के पीछे लगी हुई है। हमें उससे आगे बढ़ना होगा और सम्पदा एवं सामर्थ्य का महत्वपूर्ण अंश इसके लिए नियोजित करना होगा, ताकि व्यक्ति और समाज जीवन-साधना के सूत्रों को सीख सकें।

चलते-चलते गुरुदेव हम सबके लिए एक अनुग्रह करके गए हैं और मुड़-मुड़कर उसकी पूर्ति के लिए अनुरोध करते गए है कि परिवार का एक व्यक्ति भी ऐसा न बचे, जो देवसंस्कृति के विस्तार के लिए कुछ-न-कुछ प्रयास एवं त्याग हद दिन प्रस्तुत न करता रहे। अनुपात चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो, पर कुछ-न-कुछ करने की अपेक्षा तो इन दिनों सभी से की गई है। व्यक्तिगत कार्यों में चाहे जितने भी खरचे क्यों न हो, फिर भी नवसृजन के इस पुण्य-प्रयोजन में अपनी क्षमता का एक अंश तो देना ही चाहिए। यदि इन दिनों इतने महान प्रयोजन के निमित्त हमारे द्वारा कुछ भी न किया जा सका, तो दिव्यदर्शी गुरुदेव हम लोगों की इस उपेक्षा-अवज्ञा पर दुखी और निराश ही होंगे।

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय का भव्य भवन जिस ईंट-चूने से चुना जाएगा, उसका नाम है-श्रद्धावानों का अंशदान। श्रद्धावानों से तात्पर्य, उन प्राणवानों से है-जिनमें आदर्शों के प्रति गहरी भव-संवेदना ही नहीं, उदार साहसिकता भी मौजूद है। वह स्वप्न जिसे साकार करने की बात इन दिनों सोची गयी है, कोई जादुई चमत्कार नहीं है। पका-पकाया लड्डू कही आसमान से नहीं टूटना है। महाकाल प्रबल प्रेरणा दे रहे है, उसे बढ़ने की जिम्मेदारी अपने परिजनों, सृजनशिल्पियों की है। समुद्र का पुल भी इसी प्रकार बनाया गया था और गोवर्धन भी इसी प्रकार उठा था। बुद्ध का धर्मचक्र-प्रवर्तन जिन्हें स्मरण है, उन्हें विदित है कि एशिया को प्रभावित-परिवर्तित करने में प्रायः दो लाख परिव्राजकों का श्रमदान और हर्षवर्धन, अशोक, अम्बपाली जैसे धनकुबेरों के भावभरे योगदान का प्रचुर परिमाण में समावेश हुआ था। पुरातन सृजन प्रयत्नों की तुलना में वर्तमान की विशालता, गम्भीरता और आवश्यकता अनेक गुनी अधिक है।

साधनों के बिना साध्य की उपलब्धि कैसे हो? साधन तो हर हालत में चाहिए ही। महात्मा गाँधी हो, चाहे महामना मालवीय-अभीष्ट प्रयोजनों की पूर्ति के लिए सभी को आवश्यक साधन जुटाने पड़े। यदि वैसा न बन पड़ा होता तो जिन सफलताओं की गर्वोन्नत मस्तक से चर्चा होती है, उसका कहीं अता-पता भी न होता। कहा जा चुका है कि भावी निर्माणकार्य के लिए सबसे पहली और सबसे बड़ी आवश्यकता प्राणवानों के भावभरे अंशदान की हैं। इस योजना की विशालता के अनुरूप ही प्रचुर परिणाम में जुटाया जाना है। पिछले दिनों इस संदर्भ में यथासम्भव प्रयत्न होते रहे हैं और यत्किंचित् सफलता भी मिलती रही है।

किन्तु इन दिनों प्रगतिचक्र जिस प्रकार गतिशील होता चला जा रहा है, उसे देखते हुए तो उपलब्ध हो सका वह कम दीख पड़ता है। नवजात का का एक छटाँक दूध और एक फुट कपड़े में चल जाता है, पर प्रौढ़ की आवश्यकता तो अनेक गुनी बढ़ जाती है। निर्माणकार्य की आरम्भिक दिशा में परिजनों का स्वल्प योगदान भी पर्याप्त था, पर अब स्थिति वैसी नहीं रही। गतिचक्र की तीव्रता ने अधिक ईंधन की माँग की है। लक्ष्य तक बिना समय गँवाए पहुँचना है तो साधन जुटाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। इसके लिए लोकश्रद्धा की कामधेनु को मनाना और अधिक दूध देने के के लिए सहमत करना पड़ेगा। प्राणवानों का अंशदान ही इन दिनों गूँज रही महाकाल की सामयिक माँग को पूरा करने का एकमात्र साधन है। इसे जुटाए बिना गतिरोध ही आएगा।

इन पंक्तियों को प्रत्येक परिजन को व्यक्तिगत रूप से लिखे गए भावभरे पत्र के रूप में मानना चाहिए। उसी रूप में इन्हें पढ़ना, विचार करना और सोचना चाहिए, साथ ही बिना तनिक-सा भी विलम्ब किए अपनी श्रद्धा को जीवन्त सक्रियता में बदल देना चाहिए। यह भावपूर्ण आह्वान, अनुरोध एवं आमन्त्रण उनसे है- जो परमपूज्य गुरुदेव के आपने है जिनमें उन्हीं की चेतना लहराती है। उन्हीं का प्राण जिनमें सक्रिय है। जो भावनाओं की गहराइयों में उनसे गुँथे हैं, उन्हीं से अपने स्वरूप को समझने और तदनुरूप भावी निर्माण में स्वयं की सामर्थ्य को नियोजित करने के लिए आग्रह किया जा रहा है। इसे व्यक्तिविशेष का अनुरोध न माना जाए, बल्कि परमपूज्य गुरुदेव की आठवीं पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हीं का ऐसा निर्देश निर्धारण माना जाए, जिसे मानने पर आत्मिक जागरूकता सार्थक होती है।

गायत्री जयन्ती-गंगावतरण के पुण्य क्षणों में प्रिय परिजनों के लिए इसी निर्देश का अवतरण हुआ है, जो बहाने तकेंगे वे कृपणता को व्यस्तता के आवरण और चिन्ताओं के आवरण में छिपा लेने पर भी कायर ही कहलायेंगे। अपेक्षा यही की गयी है कि युगचेतना उत्पन्न करने वाले भावी निर्माण का भव्यता के प्रत्येक कण में अपने देव-परिवार के हर सदस्य की श्रद्धा की चमक होगी। यह निर्माण सृजन शिल्पियों की श्रद्धा एवं भावनाओं का साकार रूप होगा।


सज्जनता (Kahani)

संत नानक एक गाँव में गये। वहाँ के निवासियों ने बड़ा आदर किया। चलते समय नानक जी ने आशीर्वाद दिया-उजड़ जाओ।”

वे दूसरे गाँव में गये तो वहाँ के लोगों ने तिरस्कार किया, कटुवचन बोले और लड़ने-झगड़ने पर उतारू हो गये। नानक जी ने आशीर्वाद दिया- ‘‘आबाद रहो।”

साथ में चल रहे शिष्यों ने पूछा-भगवन्! आपने आदर करने वाले को ‘उजड़ जाओ और तिरस्कार करने वाले को ‘आबाद रहो’ का उलटा आशीर्वाद क्यों दिया?”

नानक ने कहा- सज्जन लोग उजड़ेंगे, वो वे बिखरकर जहाँ भी जाएँगे, सज्जनता फैलाएँगे, इसलिए उनका उजड़ना ही ठीक है, किन्तु दुर्जन सर्वत्र अशान्ति उत्पन्न न करें, इसलिए उनके एक ही जगह रहने में भलाई है।”


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी - दीपक से दीपक को आप जलाएँ

(8-4-74 को कुंभ के अवसर पर दिया गया प्रवचन)

गायत्री मंत्र हमारे साथ बोलिए-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियो, भाइयो! जो कार्य और उत्तरदायित्व आपके जिम्मे सौंपा गया है, वह यह है कि दीपक से दीपक को आप जलाएँ। बुझे हुए दीपक से दीपक से दीपक नहीं जलाया जा सकता। एक दीपक से दूसरा दीपक जलाना हो तो पहले हमको जलाना पड़ेगा, इसके बाद में दूसरा दीपक जलाया जा सकेगा। आप स्वयं ज्वलंत दीपक के तरीके से अगर बनने में समर्थ हो सके, तो हमारी वह सारी-की-सारी आकांक्षा और मनोकामना और महत्त्वाकाँक्षाएँ पूरी हो जाएँगी, जिसको लेकर के हम चले हैं और यह मिशन चलाया है और हमने आपको यह कष्ट दिया है और यहाँ बुलाया है। आपका सारा ध्यान यहीं इकट्ठा होना चाहिए कि क्या हम अपने आपको एक मजबूत ठप्पे के रूप में बनाने में समर्थ हो गये? गीली मिट्टी को आप लाना। ठप्पे पर ठोंकना, तख्ते पर लगाना- वह वैसे ही बनता हुआ चला जाएगा, जैसे हमारे ये खिलौने बनते हुए चले जाते हैं। हमें खिलौने बनाने हैं। खिलौने बनाने के लिए हमने साँचे और ठप्पे मँगाए हुए हैं। साँचे में मिट्टी लगा देते हैं और एक नया खिलौना बन जाता है। एक नए शंकर जी बनते जा रहे हैं। एक नए गणेश जी बन जाते हैं। ढेरों के ढेरों श्रीकृष्ण और शंकर जी बनते जा रहे हैं। कब? जब हमारे पास थापने के लिए ठप्पे हों और साँचा अगर हमारे पास सही न होता, तो न कोई खिलौना बन सकता था, न कोई और चीज बन सकती थी।

मित्रो! हमको जो सबसे महत्वपूर्ण काम मानकर चलना है वह यह कि हमारा व्यक्तित्व किस प्रकार का हो? न केवल हमारे विचारों का वरन्, हमारे क्रिया–कलापों का भी। आपके मन में कोई चीज हैं, आप मन से बहुत अच्छे आदमी हैं, मन से आप शरीफ आदमी हैं, मन से आप सज्जन आदमी हैं, मन से आप ईमानदार आदमी हैं, लेकिन आपका क्रिया-कलाप और आपका लोक-व्यवहार उस तरह का नहीं हैं, जिस तरह का शरीफों का और सज्जनों का होता है। तो बाहर वाले लोगों को कैसे मालूम पड़ेगा कि आप जिस मिशन को लेकर चले हैं, उस मिशन को पूरा करने में आप समर्थ होंगे कि नहीं? मिशन को आप समर्थ बना सकते हैं कि नहीं? आपके विचारों की झाँकी आपके व्यवहार से भी होनी चाहिए। व्यवहार आपका उस तरह का न होगा तो मित्र लोगों को ये पता लगाने में, अंदाज लगाने में मुश्किल हो जायेगा कि आपके विचार क्या हैं और सिद्धान्त क्या हैं? जो विचार और सिद्धान्त आपको दिये गये थे वो आपने अपने जीवन में धारण कर लिये हैं कि नहीं किये हैं। आपका ये बातें मालूम होनी चाहिए,बाहर से नहीं भीतर से मालूम होनी चाहिए। जहाँ कहीं भी आप जाएँगे, आपको अपने नमूने का आदमी बनकर के जाना हैं।

नमूने का उपदेशक कैसा होना चाहिए? नमूने का गुरु कैसा होना चाहिए? नमूने का साधू कैसा होना चाहिए? नमूने को ब्राह्मण कैसा होना चाहिए और गुरुजी का शिष्य कैसा होना चाहिए? ये सारी जिम्मेदारियाँ हमने अनायास ही नहीं लाद दी हैं आप पर। आपको बोलना न आता हो तो कोई शिकायत नहीं हमें आपसे। आपको बोलना न आए, लैक्चर देना न आए, जो प्वाइंट्स और जो नोट्स आपने यहाँ लिए हैं, उन्हीं को जरा फेयर कर लेना और अपनी कॉपी को लेकर के चले जाना। कहना गुरु जी ने आपके लिए हमको पोस्टमैन के तरीके से भेजा है। जो उन्होंने कहलवाया है, हम उस बात को कह रहे हैं। चिट्ठी को पढ़कर के हम आपको सुनाए देते हैं। आप अपनी डायरी के पन्ने खोलकर के सुना देना। मजे में काम चल जाएगा।

हम जब अज्ञातवास चले गये थे, तो उससे पूर्व यहाँ लोगों ने आधा-आधा घंटे के लिए हमारे संदेश टेप कर लिये थे और जहाँ कहीं भी सम्मेलन हुआ करते थे, जहाँ कहीं भी सभाएँ होती थीं, लोग उन टेपों को सुना देते थे। कह देते थे कि गुरुजी तो नहीं हैं पर गुरुजी जो कुछ कह गये हैं, संदेश दे गये हैं, शिक्षा दे गये हैं आपके लिए, उस को आप ध्यान से पढ़ लीजिए। लोगों ने सारे व्याख्यान सुने और उसी तरह मिशन का कार्य आगे बढ़ता चला गया।

देवियों और भाइयों, काम हम करने के लिए चले हैं, उसका सबसे बड़ा और पहला हथियार हमारे पास जो कुछ भी हैं, वह है-हमारा व्यक्तित्व और हमारा चरित्र। हमको जो कोई भी सहायता प्राप्त करनी है, वह रामायण के माध्यम से नहीं, गीता के माध्यम से नहीं, व्याख्यानों के माध्यम से नहीं, प्रवचनों के माध्यम से नहीं, यज्ञों के माध्यम से नहीं पूरा होने वाला है। अगर किसी तरह से हमारे मिशन को सफलता मिलनी है और वह उद्देश्य पूरा होना है तो आपका चरित्र-आपका व्यक्तित्व ही एक मार्ग है, एक हथियार है हमारा। व्याख्यान के बारे में आपको ज्यादा परेशान नहीं होना चाहिए। व्याख्यान अगर आपको न आए तो आपने यहाँ इस शिविर में जो कुछ भी सुना हो, समझा हो उसे ही लोगों को सुना देना। हमने प्रायः यह प्रयत्न किया है कि अपने कार्यकर्ताओं के शिविर जहाँ कहीं भी आपको चलाने पड़े, वहाँ सबेरे प्रातःकाल जाकर के प्रवचन किया करना, जो हमने कार्यकर्ताओं के लिए और आपके क्रिया-कलापों के लिए कहे हैं। यहाँ आपको दूसरे लोग समझा देंगे। कि कार्यकर्ताओं में कहें जाने के लिए प्रवचन कौन-से हैं और जनता में कहें जाने जाने वाले प्रवचन कौन-से हैं। हमको जनता के विचारों का संशोधन और विचारों का संवर्द्धन करने के लिए व्याख्यान करने पड़ेंगे और लोकशिक्षण करना पड़ेगा, क्योंकि आज मनुष्य के विचार करने की शैली में सबसे ज्यादा गलती हैं। सबसे ज्यादा गलती कहाँ हैं? एक जगह हैं और वह यह कि आदमी के सोचने का तरीका बड़ा गलत और बड़ा भ्रष्ट हो गया हैं। बाकी जो मुसीबतें हैं, जो परेशानियों हैं वे तो बर्दाश्त की जा सकती हैं, लेकिन आदमी के सोचने का तरीका अगर गलत बना रहा तो एक भी गुत्थी हल नहीं हो सकती और सारी गुत्थियाँ उलझती चली जाएँगी। इसलिए हमें करना क्या पड़ेगा? हमको जनसाधारण के लिए सबसे महत्वपूर्ण सेवा जो हैं, वह यह करनी पड़ेगी कि उनके विचार करने की शैली, सोचने के तरीके को बदल देंगे तो उनकी कोई भी समस्या ऐसी नहीं हैं, जिसका समाधान न हो सके।

सारी समस्याओं का निदान, समाधान जरूर हो जाएगा, यदि आदमी इस बात पर विश्वास कर ले कि आहार और विहार, खान और पार, संयम और नियम, ब्रह्मचर्य, इनका पालन कर लेना आवश्यक है तो मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि अस्पताल को खोले बिना, डॉक्टरों को बुलाए बिना, इञ्जेक्शन लगवाए बिना, और अच्छी कीमती खुराक का इन्तजाम किए बिना हम सारे समाज को निरोग बना सकते हैं। आदमी की स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्याओं का समाधान हम जरूर कर सकते हैं। हमारी लड़कियाँ पढ़ी-लिखी न हों, गाना-बजाना न आता हो और हमारी स्त्रियाँ सुशिक्षित न हों, उन्होंने एम. ए. पास न किया हो, लेकिन हमने एक-दूसरे के प्रति, प्रेम, निष्ठा और वफादारी की शिक्षा दे दी तो फिर जंगली हों तो क्या, गँवार हों तो क्या, आदिवासी हों तो क्या, भील हों तो क्या, कमजोर हों तो क्या, गरीब हों तो क्या? उन के झोंपड़ों में स्वर्ग स्थापित हो जाएगा। उनके बीच में मोहब्बत और प्रेम, निष्ठा और सदाचार हमने पैदा कर दी तब? तब हमारे घर स्वर्ग बन जाएँगे।

अगर ये सिद्धान्त हम पैदा करने में समर्थ न हो सके, तब फिर चाहे हम सबके घर में एक रेडियो लगवा दें, टेलीविजन लगवा दें। हर एक के घर में हम एक सोफासैट डलवा दें और बढ़िया से बढ़िया बेहतरीन खाने-पीने की चीज का इन्तजाम करवा दें, फिर हमारे घरों की और परिवारों की समस्या का कोई समाधान न हो सकेगा। परिवारों की समस्याओं का समाधान जब कभी भी होगा तो प्यार से होगा, मोहब्बत से होगा, ईमानदारी से होगा, वफादारी से होगा। इसके बिना हमारे कुटुम्ब दो कौड़ी के हो जाएँगे और उनका सत्यानाश हो जाएगा। फिर आप हर एक को एम. ए. करा देना और हर एक के लिए बीस-बीस हजार रुपये छोड़कर मरना। इससे क्या हो जाएगा? कुछ भी नहीं होगा। सब चौपट हो जाएगा।

मित्रों! सामाजिक समस्याओं की गुत्थियों के हल, सामाजिक समस्याओं के चैन विचारों के परिवर्तन से होंगे। कौन मजबूर कर रहा है आपको कि नहीं साहब दहेज लेना ही पड़ेगा और दहेज देना ही पड़ेगा। अगर इन विचारों को और इन रीतियों को ही बदल डालें, ख्यालातों को बदल डालें तो न जाने हम क्या से क्या कर सकते हैं और कहाँ से कहाँ ले जा सकते हैं। हमारे पास सबसे बड़ा काम मित्रों जनता की सेवा करने का हैं। इसके लिए हम धर्मशाला नहीं बनवाते, हम चिकित्सालय नहीं खुलवाते, अस्पताल नहीं खुलवाते और प्रसूतिगृह खुलवाते। हम यह कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को परिश्रमशील होना चाहिए ताकि उसे किसी प्रसूतिगृह में जाने की और किसी नर्सिंगहोम में जानें की आवश्यकता न पड़े। लुहार होते हैं आपने देखे हैं कि नहीं, गाड़ी वाले लुहार, एक गाँव से दूसरे गाँव में रहा करते हैं। उनकी औरतें घन चलाती रहती हैं। घन चलाने के बाद उन्हें यह नहीं पता रहता कि बच्चा काँख में पैदा होता हैं या पेट में से पैदा होता हैं। आज बच्चा पैदा होता हैं, कल-परसों फिर काम करने लगती हैं। पन्द्रह घंटे घन चलाती हैं, उनकी सेहत और कलाई कितनी मजबूत बनी रहती है। उनको नर्सिंगहोम खुलवाने की जरूरत नहीं हैं। हमको प्रत्येक स्त्री और पुरुष को यही सिखाने की जरूरत है कि हमको मेहनती और परिश्रमी होना चाहिए। परिश्रमशील होने का माद्दा अगर लोगों के दिमागों में हम स्थापित कर सकें, तो मित्रों हमारे घरों की समस्याएँ, परिवारों की समस्याएँ, समाज की समस्याएँ और सारी समस्याएँ जैसे बेईमानी की समस्याएँ आदि कोई समस्या ऐसी नहीं हैं, जिसका हम समाधान न कर सकते हों।

इसलिए महत्वपूर्ण कदम हमको यह बढ़ाना पड़ेगा कि जनता का लोकशिक्षण करने के लिए आप जाएँ और जनता में लोकशिक्षण करें। लोकशिक्षण करने के लिए हमने जो विचारधारा आपको यहाँ दी है, उसे एक छोटी-सी पुस्तक के रूप में छपवा दिया है। ये व्याख्यान जो आपको यहाँ सुनने को मिल हैं, वे सारे के सारे प्वाइंट्स छपे हुए मिल जाएँगे। इनका आप अभ्यास कर लेना और इन्हीं प्वाइंट्स को आप कंठस्थ कर लेंगे और डेवलप कर लेंगे तो क्या हो जाएगा कि सायंकाल के प्रवचनों में जो आपको जनता के समक्ष कहने में पड़ेंगे, बड़ी आसानी से कहने में पूरे हो जाएँगे। कार्यकर्ताओं के समक्ष भी आप यही कहना। जहाँ कहीं भी आपको समझाने की, प्रवचन करने की जरूरत पड़े, आप यह कहना कि गुरुजी ने हमें डाकिये की तरह से भेजा है और खासतौर से आपके लिए एक संदेश लिखकर के भेजा है। लीजिए चिट्ठी को पढ़कर के सुना देते हैं। सबेरे वाले प्रवचन जो हमने दिए हुए हैं, अगर आप सुना देंगे, समझा देंगे, तो वे आप की बात मान जाएँगे। आपको व्याख्यान देना न आता हों और समझाने की बात न आती होगी तो भी बात बन जाएगी। व्याख्यान देना और प्रवचन देना, चाहे आप को न आता हो, कोई हर्ज आपका होने वाला नहीं है। ये जो प्वाइंट्स हमने आप को दिये हैं, किसी भी स्थानीय वक्ता को, किसी भी स्थानीय व्याख्यानदाता को समझा देना और कहना कि जो प्रवचन गुरु जी ने दिये हैं, इन्हें आप अपने ढंग से, अपनी शैली से, बोलने की तमीज होगी अपने तरीके से, आप इन्हीं प्वाइंट्स को समझा दीजिए। कोई भी अच्छा वक्ता जिसको बोलना आता होगा, बोलने का ज्ञान होगा, इन बातों को समझा देगा जो सायंकाल की हैं। ये काम और कोई नहीं कर सकेगा जो आपको करना हैं।

वे कौन-से काम हैं, जो आपको करने पढ़ेंगे? आपको यह करना पड़ेगा कि जहाँ कहीं भी आप जाएँ, जिस शाखा में भी आप जाएँ, एक छाप इस तरह की छोड़कर आएँ कि गुरुजी के संदेशवाहक और गुरुजी के शिष्य जो होते हैं, वे किस तरह से और क्या कर सकते हैं और क्या करना चाहिए। आप यहाँ से जाना और वहाँ इस तरीके से अपना गुजारा करना, इस तरीके से निर्वाह करना जैसा कि संतों का गुजारा होता है और संतों का निर्वाह होता हैं। आप जहाँ कहीं भी जाएँ, अपने खानपान संबंधी व्यवस्था को कंट्रोल रखना। खानपान संबंधी व्यवस्था के लिए हुकूमत मत चलाना किसी के ऊपर। वहाँ जैसा भी कुछ हो, जैसा भी कुछ लोगों ने दिया हो उसी से काम चला लेना। आपको तरह-तरह की फरमाइशें पेश नहीं करनी चाहिए। जैसे कि बारातियों का काम क्या है? बाराती लोग सारे दिन तरह की फरमाइशें पेश करते रहते हैं। और नेताओं का क्या होता है? बजाजियों का क्या होता है? जहाँ कहीं भी वे जाते हैं, तो आर्डर करते रहते हैं और तरह-तरह की चीजों के लिए, अपने खाने-पीने की चीजें, अपनी सुविधा की चीजें, बीसों तरह की अपनी फरमाइशें पेश करते रहते हैं। आपको किसी चीज की जरूरत पड़ती हो, चाहे आपको दिन भर भोजन न मिला हो, तो आप अपने झोले में सत्तू लेकर के जाना, थोड़ा नमक ले करके जाना, छुपाकर के अपने कमरे अपना सत्तू और नमक घोल करके जी जाना, लेकिन जिन लोगों ने आपको बुलाया हैं, उन पर ये छाप छोड़ करके मत आना कि आप चटोरे आदमी हैं और आप इस तरह के आदमी हैं कि आप खाने के लिए और पीने के लिए और अमुक चीजों के लिए आप फरमाइशें लें करके आते हैं। इसलिए हमने एक महीने तक आपको पूरा अभ्यास यहाँ कराया। हमने ये अभ्यास कराया कि जो कुछ भी हमारे पास है साग, सत्तू आप घोल करके खाइए। साग, सत्तू आप खा करके रहिए और जबान को कण्ट्रोल करके रहिए। उन चीजों की लिस्ट को फाड़कर फेंक दीजिए कि अमुक चीजें खाएँगे तो आप पहलवान हो जाएँगे। अमुक चीजें आप खाएँगे तो आप का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। मित्रों हम यकीन दिलाते हैं कि खाने की चीजों से स्वास्थ्य का कोई ताल्लुक नहीं है और अगर आपको घी नहीं मिलता, तो कोई हर्ज नहीं, कुछ आपका बिगाड़ नहीं होने वाला है।

हम आपको कई बार कथा सुनाते रहते हैं। एक बार अपनी अफ्रीका यात्रा की मसाइयों को हमने किस्सा सुनाया था, जिन बेचारों को मक्कामुहैया होती हैं। जिन लोगों के लिए सफेद बीज की दाल मुहैया होती है। जिन लोगों के लिए केवल जंगली केला मुहैया होता है। चार चीज उनको मिलती हैं। न कभी उनका घी मिलता हैं, न कभी और कोई पौष्टिक चीजें मिलती हैं, लेकिन उनकी कलाइयाँ, हाथ कितने मजबूत होते हैं। ओलंपिक खेलों में सोने के मैडल जीतकर लाते और शेरों का शिकार करते रहते हैं, ताकत अनाज में नहीं, ताकत शक्कर में नहीं और ताकत मिठाई में नहीं हैं। मित्रों, ताकत का केन्द्र दूसरा हैं। ताकत की जगह वह है जो गाँधी जी ने अपने भीतर पैदा की थी। घी खाकर के पैदा नहीं की थी उन्होंने। वह अलग चीज है जिनसे ताकत आती हैं। इसलिए जहाँ कहीं भी आप जाएँ, हमारे संदेशवाहक के रूप मे, वहाँ पर आपका खान-पान का व्यवहार ऐसा हो जिससे कोई आदमी यह कहने न पाए कि ये लोग कोई बड़े आदमी आए हैं और कोई वी. आई. पी आए हैं। यहाँ से जब आप जाएँ तो प्यार और मोहब्बत को ले करके जाना। अगर आपके अन्दर कड़वापन रहा हो तो उसको यहीं पर छोड़कर जाना। कड़वापन मत ले कर जाना, अपना अहंकार ले करके जाना मत।

कड़वापन क्या हैं? कड़वापन आदमी का घमण्ड हैं, कड़वापन आदमी का अहंकार हैं। अपने अहंकार के अलावा कडुआ कुछ है ही नहीं। आप जब ये कहते हैं कि हम तो सच बोलते हैं, इसलिए कड़वी बात कहते हैं। ये गलत कहते हैं। सच में बड़ा मिठास होता हैं। उस में बड़ी मोहब्बत होती हैं। गाँधी जी सत्य बोलते थे, लेकिन उनके बोलते बड़ी मिठास होती थी। अँगरेजों के खिलाफ उन्होंने लड़ाई खड़ी कर दी और ये कहा कि आपको हिन्दुस्तान से निकालकर पीछा छोड़ेंगे। आपके कदम हिन्दुस्तान में नहीं रहने देंगे। मारकर भगा देंगे और आपका सारा जो सामान है वो यहीं पर जब्त कर लेंगे और नहीं देंगे। गाँधी जी की बात कितनी कड़वी थी और कितनी तीखी थी। और कितनी कलेजे को चीरने वाली थी। लेकिन उन्होंने शब्दों की मिठास, व्यवहार की मिठास को कायम रखाना चाहिए। अगर आपके भीतर मोहब्बत है और प्यार है, मित्रों! तो आपकी जबान में से कड़वापन नहीं निकलेगा। इसमें मिठास भरी होनी चाहिए। प्यार भरा हुआ रहना चाहिए। प्यार अगर दूसरों को चोट पहुँचाते रहते हैं, आपकी जबान में से निकलता नहीं और मिठास आपकी जबान में से निकलती नहीं आप निष्ठुर की तरह जबान की नोंक में से बिच्छू के डंक के तरीके से मारते रहते हैं, दूसरों को चोट पहुँचाते रहते हैं, और दूसरों का अपमान करते रहते हैं, विचलित करते रहते हैं, तब आपका यह कहने का अधिकार है कि आप सच बोलते हैं।

सच क्या हैं? जैसा आपने देखा हैं, सुना है, उसको ही कह देने का नाम सच नहीं है। सच उस चीज का भी नाम है, जिसके साथ में प्यार भरा रहता हैं और मोहब्बत जुड़ी रहती हैं। प्यार और मोहब्बत का व्यवहार आपको यहीं से बोलना-सीखना चाहिए और जहाँ कहीं भी शाखा में आपको जाना है, कार्यकर्ताओं के बीच में जाना है और जनता के बीच में जाना है, उन लोगों के साथ में आपके बातचीत करने का ढंग, बातचीत करने का तरीका ऐसा होना चाहिए कि उसमें प्यार भरा हुआ हो, मोहब्बत जुड़ी हुई हो। उसमें आत्मीयता मिली हुआ हो, दूसरों का दिल जीतने के लिए और दूसरों पर अपनी छाप छोड़ने के लिए। यह अत्यधिक आवश्यक है कि आपके जबान में मिठास और दिल में मोहब्बत होनी चाहिए। आप जब यहाँ से जाएँ तो इस प्रकार का आचरण ले करके जाएँ ताकि लोगों को यह कहने का मौका न मिले कि गुरुजी के पसंदीदा यही हैं। अब आपकी इज्जत नहीं हैं, हमारे मिशन की इज्जत की रक्षा करना अब आप का काम हैं। अपने वानप्रस्थ आश्रम की रखवाली करना आपका काम है।

हमने ये तीन-तीन तरीके की जिम्मेदारी आपके कंधे पर डाली हैं। इन जिम्मेदारियों आप को आप लेकर जाना। फूँक-फूँक कर के पाँव रखना। आप वहाँ चले जाना, जहाँ कि आबोहवा का ज्ञान नहीं हैं। कहीं गर्म जगह हम भेज सकते हैं, कहीं ठंडी जगह हम भेज सकते हैं। कहीं का पानी अच्छा हो सकता हैं और कहीं का खराब अच्छा हो सकता हैं। आप वहीं जा कर क्या कर सकते हैं? आप बीमार नहीं पड़ सकते। बीमारी के लिए मैं दावा बता दूँगा, आप जहाँ कहीं भी जाएँगे, आप बीमार नहीं पड़ेंगे और बीमारी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। मैं ऐसी दवा दे दूँगा कि आप चाहे जहाँ कहीं भी जाना और जो चाहें कुछ खिला दे, वही खाते रहना। वेजिटेबिल की पुड़िया खिलाता हो तो पूरे महीने पूड़ियाँ खाना और बीमार होकर आये तो आप मुझसे कहना। मैं ऐसी गोली देना चाहता हूँ कोई भी चीज खिलता हो, आप खाते रहना और आपके पेट में कब्ज की शिकायत हो जाए तो आप मुझसे कहना, मेरी जिम्मेदारी है। आप मुझसे शिकायत करना कि गुरुजी आपकी गोली ने काम नहीं किया, हमको तो कब्ज की शिकायत हो गई।

इसके लिए आप एक काम करना, अपनी खुराक से कम खाना। यहाँ चार रोटी खाना शुरू कर दीजिए। आप जायके के माध्यम से जाएँगे तो हर आदमी के मेहमान होंगे और मेहमान का तरीका हिन्दुस्तान में यह होता है कि जो कोई भी आता है किसी के घर, तो उस आदमी के लिए अगर हम मक्का की रोटी खाते हैं तो उसे गेहूँ खिलायेंगे और हम गेहूँ की खाते हैं तो आपको चावल खिलायेंगे। चावल खाते हैं, तो मिठाई खिलायेंगे। हम अगर छाछ पीते हैं तो आपको दूध पिलायेंगे। हर हिन्दू यह जानता है कि सन्त-महात्मा का वेश पहन कर के आप जा रहे हैं तो स्वभावतः आपको अपने घर की अपेक्षा अच्छा भोजन कराए, अच्छी-अच्छी चीजें खिलाए। यदि आपने अपनी जबान पर कंट्रोल रखा नहीं तो आप जरूर बीमार पड़ जाएँगे आप ध्यान रखिए आबोहवा तो बदलती ही है। यहाँ का पानी आज, वहाँ का कल, वहाँ का पानी परसों। समय का ज्ञान नहीं, कुसमय का ज्ञान नहीं। यहाँ पर आप ग्यारह बजे खाना खा लेते हैं सम्भव है कि कोई आपको दो बजे खिलाए, आपका पेट खराब हो सकता है। आप बीमार हो सकते हैं, लेकिन ये खुराक जो मैंने आपको बताई है, अगर उसको कायम रखेंगे तो आप कभी भी बीमार नहीं होंगे।

मित्रों! हमने लम्बे-लम्बे सफर किये हैं और तरह-तरह की चीजों और तरह-तरह की खुराकें खाने का मौका मिला है। एक बार मैं मध्यप्रदेश गया तो लाल मिर्च साबुत खाने की आदत उन लोगों की थी। रामपुरा में यज्ञ हुआ। यज्ञ हुआ तो वहाँ वो बड़ी-बड़ी पूड़ी परोस रहे थे और ऐसी सब्जी परोस रहे थे जो मुझे टमाटर की सी मालूम पड़ी। लाल रंग का सारे का सारा टमाटर का साग परोस रहे थे। टमाटर मुझे अच्छा भी लगता है, माताजी मेरे लिए अक्सर बना लिया करती हैं। मँगा लेती हैं। मैंने भी मँगा लिया और रख लिया थाली में। जैसे ही मैंने पूड़ी का टुकड़ा मुँह में दिया कि मेरी आँखें लाल-लाल हो गई। अरे यह क्या? गुरुजी यह टमाटर का साग नहीं है, यह तो लाल मिर्च है। जब हरी मिर्च पक जाती है और लाल हो जाती है तो उनको ही पीस करके उसमें नमक और खटाई मिलाकर के ऐसा बना देते हैं-लुगदी जैसी, उसको आप चटनी कह लीजिए। ऐसी भी जगह मुझे जाना पड़ा है कि मैं क्या कहूँ आपसे।

एक बार मैं आगरा गया और वहाँ भोजन करना पड़ा। दाल-रोटी जो घर में खाते हैं, जहाँ कहीं भी जाता हूँ, वही खाता हूँ और वही कहता हूँ कि तुम्हारे घर में जो कुछ भी हो वही खिलाना। नहीं हो तो मेरे लिए बनाना मत, अलग चीज बनाओगे तो मैं खाऊँगा नहीं। अगर तुम पूड़ी रोज खाते हो तो पूड़ी बना दो मेरे लिए। मुझे ऐतराज नहीं, लेकिन तुम हमेशा कच्ची रोटी खाते हो तो मेरे लिए कच्ची रोटी ही बनाना, मक्का की रोटी खाते हो अपने घर में तो, वही खिलाना, क्योंकि मैं तुम्हारा मेहमान नहीं हूँ, तुम्हारा कुटुम्बी हूँ। आगरा में उन लोगों ने दाल बना दी और रोटियाँ धर दीं। दाल में जैसे ही मैंने कौर डुबोया, इतनी ज्यादा मिर्च के मेरे तो बस आँखों में पानी आ गया। मैं क्या कह सकता था। अगर मैं यह कहता कि साहब दाल बड़ी खराब है उठा ले जाइए। यह आपने क्या दे दिया और मेरे लिए तो दही लाइए और वह लाइए। मेरी आँख में से पानी तो आ गया और मैंने एक घूँट पानी पिया, पीने के बाद रोटी के टुकड़े खाता गया, पर दाल में डुबोया नहीं। हाथ मैंने चालाकी से चलाया, जिससे मालूम पड़े कि मैं दाल खा रहा हूँ। दाल खाई नहीं और वैसे ही रूखी रोटी खाता और पानी पीता रहा। पानी पीने के बाद उतर कर आ गया। उसे पता भी नहीं चला, मुझे भी पता नहीं चला। न उसको शिकायत हुई कि आपने ये कैसे खाया।

हमारे यहाँ एक स्वामी परमानन्द जी और नत्थासिंह भी थे पहले। दोनों साथ थे। हम नत्थासिंह और परमानन्द जी को अक्सर बाहर भेज देते थे। दोनों का जोड़ा था। जब भोजन होता था तब स्वामी परमानन्द उससे कहते थे-नत्थासिंह हाँ! देख मैं मर जाऊँ कभी और तुझे ये खबर मिले कि स्वामी परमानन्द मर गया तो ये मत पूछना कि कौन-सी बीमारी से मर गया। पहले से लोगों से कह देना कि परमानन्द ज्यादा खा करके मर गया। सारा घी स्वामी जी खा जाएँ तो भी पता न चले। जहाँ कहीं भी जाते खाने की उनकी ऐसी ललक कि एक बार खिला दीजिए, खाने से पिण्ड छोड़ने वाले नहीं। टट्टियाँ हो जाएँ तो क्या? उल्टियाँ हो जाएँ तो क्या? पर खाने से बात न आने वाले थे वे।

मित्रों हमारी जबान के दो विषय हैं, जबान हमारी बड़ी फूहड़ है। एक विषय इसका यह है कि यह स्वाद माँगती है और जायके माँगती है। आप स्वादों को नियंत्रण करना-जायके को नियंत्रित करना। सन्त जायके पर नियंत्रण किया करते हैं और स्वाद पर नियंत्रण किया करते हैं। जिस आदमी का जायके पर नियंत्रण नहीं है और स्वाद पर नियंत्रण नहीं है, वह आदमी सन्त नहीं कहला सकता। आपने-हमने ऐसे संत देखे हैं जो भिक्षा माँग करके लाए और एक ही कटोरे में-एक ही जगह में दाल को मिला दिया और उसको मिला दिया और इसको मिला दिया और साग को मिला दिया और खीर को मिला दिया और सबको मिला दिया। एक ही जगह मिलाकर खाया। वे ऐसा किसलिए खाते हैं? इसलिए कि वे जबान के जायके पर काबू करके खाते हैं। जबान के जायके का अभ्यास आपको यहाँ नहीं हो सका तो आप जहाँ कहीं भी कार्यकर्ताओं के बीच में जाएँ, आपको एक छाप छोड़ने की बात मन में लेकर के जानी चाहिए कि हम जबान के जायके को कंट्रोल में करके आए हैं। अब देखना आपके ऊपर छाप पड़ती है कि नहीं पड़ती है।

खान-पान का भी हमारे हिन्दुस्तान में ध्यान रखा जाता है। एक महात्मा ऐसे थे जो हथेली के ऊपर रखकर के रोटी खाया करते थे। उनका नाम महागुरु श्रीराम था। अभी भी वे हथेली पर रोटी रखकर खारे वाले महात्मा के नाम से मशहूर है। मैं नाम तो नहीं लेना चाहूँगा पर आप अन्दाज लगा सकते हैं कि मैं किसकी ओर इशारा कर रहा हूँ। इस समय तो वे नहीं करते इस समय तो वे मोटरों में सफर करते हैं और अच्छे चाँदी और सोने के बर्तनों में भोजन करे है। पर कोई एक जमाना था जब हथेली पर रख करके भोजन करते थे। एक ही विशेषता ऐसी हो गई कि सारे हिन्दुस्तान ने विख्यात हो गए। इस बात के लिए प्रख्यात हो गए कि वे हथेली पर रखकर के रोटी खाया करते है। भला आप संत नहीं है तो क्या, महात्मा नहीं हैं तो क्या? आपकी खुराक सम्बन्धी आदत ऐसी बढ़िया होनी चाहिए कि जहाँ कही भी आप जाएँ वहाँ हार आदमी आपको बर्दाश्त कर सकता हो, अफोर्ड कर सकता हो। गरीब आदमी भी ये हिम्मत कर सकता हो कि हमारे यहाँ पंडित जी का भोजन हो। गरीब आदमी को ये कहने की शिकायत न हो कि हमारे यहाँ घी नहीं होता हमारे धर में दूध नहीं होता, हमारे धर में दही नहीं होगा, हम तो गरीब आदमी हैं, फिर हम किस तरीके से उनको बुलाएँगे, किस तरीके से भोजन कराएँगे। आपकी हैसियत संत की होनी चाहिए और संत का व्यवहार जो होता है, हमेशा गरीबों में ज्यादा होता है। गरीबों जैसा होता है, अमीरों जैसा संत नहीं होता, संत अमीर नहीं हो सकता। संत कभी भी अमीर होकर नहीं चला है। जो आदमी हाथी पर सवार होकर जाता है, वह कैसे संत हो सकता है? संत को तो पैदल चलना पड़ता है। संत को तो मामूली कपड़े पहनकर चलना पड़ता है। संत चाँदी की गाड़ी पर कैसे सवारी कर सकता है? आपको यहाँ से जाने के बाद अपना पुराना बड़प्पन छोड़ देना चाहिए और पुराने बड़प्पन की बात भूल जानी चाहिए।

बस, आपको यहाँ से जाने के बाद अपने पुराने बड़प्पन को भूल जाना चाहिए और जगह-जगह ये नहीं करना चाहिए कि हम तो रिटायर्ड पोस्टमास्टर थे या रिटायर्ड पुलिस इंस्पेक्टर थे या हमारे गाँव में जमींदारी होती थी। आप यह मानकर जाना कि हम नाचीज को करके जा रहे है। संत नाचीज होता है। संत तिनका होता है और अपने अहंकार को त्याग देने वाला होता है। यदि आपने अपने अहंकार को त्यागा नहीं और अपने घमण्ड को त्यागा नहीं तो फिर आप संत कहलाने के अधिकारी नहीं हुए। हमारी पुरानी परम्परा थी कि जो कोई भी संत वेश में आता था, उसको भिक्षायापन करना पड़ता था। क्यों? भिक्षायापन कौन करता है? कमजोर होता है ना? संत वेश धारण करने के पश्चात् हर आदमी को भिक्षा माँगने के लिए जाना पड़ता था, ताकि उसका अहंकार चूर-चूर हो जाए। हम अपने ब्रह्मचारियों को जनेऊ पहनाते थे। जनेऊ पहनाने के समय ऋषि अपने बच्चों को भिक्षा माँगने भेजते थे कि जाओ बच्चों भिक्षा माँगो, ताकि किसी बच्चे को यह कहने का मौका न मिले के हम तो जमींदार साहब के बेटे हैं, ताल्लुकेदार के बेटे हैं और धनवान् के बेटे हैं, गरीब के बेटे हैं, हर आदमी का आध्यात्मिकता का आत्मसम्मान अलग होता है और अपने धन का, अपनी विद्या का, अपनी बुद्धि का, अपने पुरानेपन का और अपनी जमींदारी का और अपने अमुक होने का गर्व होता है, वह अलग होता है। आप यहाँ से जाना तो अहंकार छोड़ करके जाना।

मित्रों, कई आदमियों को-चेलों को बार-बार यह कहने की आदत होती है कि जब वक वे अपनी महत्ता और अपना बड़प्पन, अपने अहंकार की बार का सौ बार जिक्र नहीं कर लेंगे, तब तक उनको चैन नहीं मिलेगा। निरर्थक की बात-चीत करेंगे। निरर्थक की बातचीत करने का क्या उद्देश्य होगा? यह उद्देश्य होगा कि मैं ये था और मैंने ये किया था और मैं वहाँ गया था और मेरा ये हुआ था। मैं पहले ये था, मैं पहले ये कहा रहा था-आधा घंटे तक भूमिका बनाएँगे। आधे घंटे भूमिका बनाने के बाद फिर किस्सा शुरू होगा-मैं मैं......मैं.......मैं.......मैं.........मैं....... को अनेक बार कहते हुए चले जाएँगे। लेकिन मित्रों ये समझदारी की बात नहीं है, नासमझी की बात है। जो आदमी अपने मुँह से, अपनी जबान से, अपने बड़प्पन की जितनी बात बताता है, वह उतना ही कमजोर होता चला जाता है और उतनी ही उसकी महत्ता कम होती जाती है। हम आपको जिन लोगों के पास में भेजने वाले हैं, वे फूहड़ लोग नहीं हैं, बेअकल लोग नहीं है, बेवकूफ लोग नहीं है हमने अखण्ड ज्योति पैंतीस वर्ष से निकाली है और पैंतीस वर्ष से जो आदमी अखण्ड ज्योति पत्रिका को पढ़ते हुए चले जा रहे है, वे काफी समझदार आदमी है। इस बात की तमीज उसको है और हर बात की अकल उसको है क्या आप स्तर का है और क्या आपके स्तर का नहीं है। अपने अहंकार के बारे में और अपने बड़प्पन के बारे में आप जितना कम बोलेंगे, उतनी आपकी इज्जत ज्यादा बढ़ती चली जाएगी और अपने अहंकार के बारे में, अपने बड़प्पन के बारे में जितनी शेखी आप बघारेंगे, उतनी ही आपकी इज्जत कम होती जाएगी और लोग यह समझेंगे कि ये कितना घमण्डी आदमी है और लोलुप आदमी है। यह बहुत बड़ाई करना चाहता है और हमको अपने बड़प्पन की बात बताना चाहता है। यह मैं आपको विदा करते समय में उसी तरह की शिक्षा दे रहा है जैसे कि माँ अपनी बेटी को बिदा करने के समय जब ससुराल भेजती है तो तरह-तरह की नसीहतें देती है और तरह-तरह की शिक्षाएँ देती है कि बेटी सास से व्यवहार ऐसे करना। बेटी ससुर से ऐसे व्यवहार करना। बेटी अपनी ननद से ऐसे व्यवहार करना। बेटी अपनी ननद से ऐसे व्यवहार करना। बेटी, इस तरीके से व्यवहार करना। मैं आपको बेटियों की तरीके से नसीहत दे रहा हूँ, क्योंकि मैं आपको ससुराल भेज रहा हूँ।

ससुराल कहाँ? ससुराल का मतलब जनता के समक्ष भेजने से है, जहाँ पर आपका इम्तहान लिया जाने वाला है। आपके व्याख्यान का नहीं, मैं आपसे फिर कहता हूँ कि आपको व्याख्यान देना न आता हो तो कोई डरना मत ओर कन्फ्यूज मत होना। व्याख्यान के बिना भी काम चल जाएगा। आप चुप बैठे रहना-महर्षि रमण के तरीके से, तो भी काम चल जाएगा। पाण्डिचेरी के अरविन्द घोष ने अपनी जबान पर काबू कर लिया था। कण्ट्रोल कर लिया था। उन्होंने लोगों से मिलने से इनकार कर दिया था और कह दिया था कि हम आप लोगों से बातचीत नहीं करना चाहते हैं। बातचीत न करने के बाद भी महर्षि रमण और पाण्डिचेरी के अरविन्द घोष इतने ज्यादा काम करने में समर्थ हो गए, आपको मालूम नहीं है क्या? बहुत काम करने में समर्थ हो सके। जहाँ कहीं भी आप जाएँ जरूरी नहीं है कि आपको स्वयं ही बोलना चाहिए। आप जो प्वाइंट ले करके गए हैं और जो प्वाइंट इस डायरी में भी लिखे हुए हैं और डायरी के अलावा हमने अलग किताब भी छपवा दी है, उससे आपका काम चल जाएगा। जहाँ कही भी आप जाएँगे वहाँ भी आपको ढेरों के ढेरों व्याख्यान देने वाले वक्ता जरूर मिल जाएँगे। उनको आप बोलना और कहना कि देखो भाई ये हमारे डायरी के पन्ने हैं और देखो ये पुस्तक के पन्ने हैं। आपको इन प्वाइंटों के ऊपर ऐसी-ऐसी बातें कहनी हैं। यहाँ हमको बोलकर सुना दो एक बार। आप इम्तहान लेना और जब आपको लग जाएगा कि वह ठीक बोल रहा है तो कहना बेटा कल तुम्हें यह संदेश गुरुजी का वहाँ पढ़ना है। हम तो सिखाने के लिए आए है। हमें थोड़े ही बोलना है। आपको बोलना पड़ेगा, आपको सम्मेलन करना पड़ेगा। हमको तो अपना काम करना है। हमको तो सिखाना है और तुमको बोलना है। तुमको बोलना चाहिए हमारे सामने


संकीर्णता और भयपूर्ण जीवन (Kahani)

दो बीज धरती की गोद में जा पड़े। मिट्टी ने उन्हें ढँक दिया। दोनों रात में सुख की नींद सोये।

प्रातः काल दोनों जगे तो एक के अंकुर फूट गए, वह ऊपर उठने लगा। यह देख छोटा बीज बोला-भैया ऊपर मत जाना वहाँ बहुत भय है, लोग तुझे रौंद डालेंगे, मर डालेंगे। बीज सब सुनता रहा और चुपचाप ऊपर उठता रहा। धीरे-धीरे धरती की परत पारकर ऊपर निकल आया और बाहर का सौंदर्य देखकर मुसकराने लगा। सूर्य देवता ने धूपस्नान कराया और पवन देव ने पंखा डुलाया। वर्षा आयी और शीतल जल पिला गई। किसान आया और बिस्तर लगाकर चला गया। बीज बढ़ता गया, झूमता, लहलहाता, फूलता और फलता हुआ बीज एक दिन परिपक्व अवस्था तक जा पहुँचा। जब वह इस संसार से विदा हुआ तो अपने जैसे असंख्य बीज छोड़कर हँसता और आत्मसंतोष अनुभव कर विदा हो गया।

मिट्टी के अन्दर दबा बीज यह देखकर पछता रहा था-भय और संकीर्णता के कारण मैं जहाँ था, वहीं पड़ा रहा और मेरा भाई असंख्य गुनी समृद्धि पा गया।


अपनों से अपनी बात- - नवयुग का मत्स्यावतार अपना इतिहास पुनः दुहरा रहा है।

परमपूज्य गुरुदेव अक्सर कहा करते थे कि प्रज्ञावतार का कार्य नवयुग के मत्स्यावतार की तरह विराट रूप लेता हुआ फैलता चला जाएगा वह इस सदी के अंत तक अपने चरमतम रूप में पहुँच जाएगा। चेतना के अंशावतार के रूप में जब भी ऋषिचेतना, द्रष्टास्तर की अवतारी-चेतना इस धरती पर जन्म लेती है-वह सारी भवितव्यता का ढाँचा गढ़कर अपने साथ लाती है। उसे अपने कार्य करने की शैली का -संभावित सहयोगियों का- ऐसी संस्कार प्रधान भूमि का भी ज्ञान होता है, जहाँ उसका कार्य होना होता है, जहाँ उसे लघु से विराट बनते जमाना देखता है व बाद में आश्चर्यचकित हो सोचता है कि यह सब कुछ कैसे इतनी अल्पावधि में होता चला गया। ऐसी अवतारी अंशधारी सत्ता सशरीर नहीं भी रहे, तो भी सूक्ष्मकारण शरीर से सक्रिय हो यह कार्य पूरा करती चली जाती है। श्रेय भले ही उनके सहयोगियों को मिलता रहे-सभी जानते हैं कि इन सबके मूल में सक्रिय वह चैतन्य सत्ता ही है, जिसने उस मूलभूत मॉडल को, नक्शे को अपनी ‘विजन’ में देखकर गढ़ा व जन्म देकर उसे वैसा विराट में बदलने हेतु सारा आंदोलन-अभियान नियोजित किया।

गायत्री परिवार, युगनिर्माण योजना-प्रज्ञा अभियान, युगान्तरीय चेतना-शान्तिकुञ्ज-गायत्रीतीर्थ सभी उसी सत्ता के मत्स्यावतार रूपी विराट स्वरूप के पर्यायवाची नाम हैं, जिनके जन्मदाता हमारे संरक्षक-परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं माता भगवती देवी है। इस ऋषियुग्म के प्यारे समर्पण का कमाल ही है कि इन दोनों से जन्मा एक परिवार आज अन्तर्राष्ट्रीय गायत्री परिवार के रूप में करोड़ों परिजनों के रूप में फैला दिखाई देता है। जब भगवान को अनीति-अत्याचार-दुर्बुद्धि का साम्राज्य बढ़ता दिखाई देता है, तो वह कई देवमानवों का धरती पर भेजकर विभिन्न रूपों में उनसे कार्य कराके अपनी सक्रियता का परिचय देता है। ये देवमानव आ करके अवतारी चेतना के अवतरण हेतु ‘संभवामि युगे-युगे-की प्रतिज्ञा को साकार करने हेतु उपयुक्त वातावरण का निर्माण करते है। अंशधारी यही सत्ताएँ फिर इस कार्य को विराट बनाने में भी गीध-गिलहरी रीछ-वान ग्वाल-बाल-पाण्डव भिक्षुक-अशोक आनन्द आदि की भूमिका निभाते व सहयोग देकर विराटतम रूप देते चले जाते है। यह तो इतिहास ही बताता है कि छोटा-सा बीज कैसे वट-वृक्ष बनता चला गया। अस्तित्वहीन एक छोटी-सा बीज कैसे वट-वृक्ष बनता चल गया। अस्तित्वहीन एवं छोटी-सी नगण्य-सी सत्ता कैसे विराटरूप लेती चली जाती है, इसके दो उदाहरण अवतारों के कथानकों में से ही लेकर यहाँ दिये जा रहे हैं।

श्रेय-सौभाग्य पाने का अब यही अन्तिम अवसर है

पहला उदाहरण तमो मत्स्यावतार का है, जो कभी शुभारम्भ के रूप में ब्रह्माजी के कमण्डलु में छोटी-सी मछली के रूप में प्रकट हुए थे। जब परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने लुप्त होने जा रही-जलप्रलय में विलीन होने जा रही ज्ञान-सम्पदा को बचाने की बात सोची तो उन्होंने ब्रह्माजी के कमण्डलु को ही संदेश विस्तार हेतु अपना केन्द्र बनाया व विराट रूप में स्वयं को बदलना आरम्भ किया। बढ़ते विराट रूप को देख अचंभित ब्रह्माजी ने उस जीव को एक तालाब में छोड़ दिया। देखते-देखते वहाँ भी उन्होंने वही कार्य प्रारम्भ रखा-विस्तार अंतहीन विस्तार। बड़े विराट मत्स्य को अंततः सृजन के देवता ब्रह्मा भगवान द्वारा समुद्र में छोड़ा गया, जहाँ उन्होंने और भी विराट रूप लेकर स्वयं निर्माण के देवता ब्रह्माजी को आश्चर्यचकित कर प्रश्न पूछने पर विवश कर दिया कि वे हैं कौन व किस कारण यहाँ लीला रच रहे हैं। तब जवाब मिला कि विष्णु के अवतारी प्रकरण के अन्तर्गत वे प्रथम अवतार हैं एवं लुप्त होने जा रहे ज्ञान की रक्षा के लिए इस धरती पर आए है। वेद रूपी ज्ञान का मूल यदि न बचाया जा सका, तो भावी जलप्रलय में विलीन हो नष्ट हो जाएगा। अन्ततः यही हुआ एवं ज्ञान के भण्डार की रक्षा सम्भव हो सकी। यह पौराणिक कथा नहीं-मत्स्यावतार के अवतरण का शिक्षण प्रधान वह अंश है, जो बताता है कि जब-जब सद्ज्ञान-मानवमात्र को जीवनकला का शिक्षण देने वाला ज्ञान संकट में पड़ता है, तो उसकी रक्षा भगवत् सत्ता अवश्य करती है, चाहे उसे विराटतम रूप लेकर यह कार्य करना पड़े। लीलाधारी भगवान भिन्न-भिन्न रूपों में आते रहे हैं वे यह कार्य करते रहे है। सृष्टि के आरम्भ में जो भी स्वरूप रहा होगा, तब जलप्रलय से रक्षा के लिए भगवान ने विराट मत्स्य का रूप लेकर यह कार्य अपने युग में इस तरह सम्पन्न किया था।

दूसरा उदाहरण भगवान विष्णु के नौंवे अवतार-बुद्धावतार के प्रकरण का है। यह महत्वपूर्ण व जानने योग्य इसलिए भी है कि इसी का उत्तरार्द्ध प्रज्ञावतार के रूप में इन दिनों विराट रूप लेने जा रहा है। भगवान बुद्ध करुणा के अवतार थे। एक छोटे-से कार्यक्षेत्र, जिसे आज के बिहार का मगध व पाटलिपुत्र वाला हिस्सा व साथ लगा नेपाल एवं उत्तर प्रदेश का छोटा-सा भाग कहा जा सकता है, से आरम्भ हुआ बुद्ध का संघम् बुद्धम् एवं धम्मम् शरणम् गच्छामि का संदेश उनके बाद विराट रूप लेता हुआ विश्वव्यापी बनता चला गया। बुद्ध के जीवनकाल में जितना कार्य नहीं हुआ था-अशोक, संघमित्र, महेन्द्र, आनन्द, हर्षवर्धन-राज्यश्री आदि के माध्यम से एवं कुमारजीव जैसे मरजीवड़ों के जीवट की बदौलत वही विश्वव्यापी विस्तार लेता चला गया। आज ईसाई धर्म यदि यदि किसी धर्म का सर्वाधिक विस्तार है तो वह बौद्धधर्म ही है। बहुसंख्य व्यक्ति चीन, जापान, कोरा, तैवान, कम्पूचिया, थाइलैंड, मलेशिया, लंका जैसे देशों में रहते हैं अथवा वहाँ से सारे विश्व में फैल गए है। बौद्ध धर्म अनुयायी है। अमेरिका-कनाडा में बौद्धधर्म के अनुयायियों ने बड़े-बड़े मन्दिर बनाए है। जापान का तो राष्ट्रिय व धार्मिक आधार ही बौद्धधर्म पर टिका है। भारत में बीजारोपण से जन्मा यह धर्म कैसे सारी विश्व-वसुधा में फैलता चला गया, यह एक आश्चर्य का विषय हो सकता है, परन्तु यह भारतीय संस्कृति की सार्वभौमिकता व करुणा, भाव-संवेदना पर आधारित हमारी ऋषियों की मनीषा का परिचायक भी है। भगवान बुद्ध के विहारों की अवधारण आज भी भग्नावशेषों के रूप में खाड़ी के मुस्लिम प्रधान देशों-दक्षिण उत्तरी अमेरिका, अफ्रीका में प्राप्त खण्डहरों के माध्यम से विश्व-विस्तार के रूप में देखी जा सकती है। बुद्ध का संदेश आज भी प्रासंगिक है-विशेष रूप से विश्वशान्ति के परिप्रेक्ष्य में।

अहिंसा व अणुव्रत का संदेश देने वाले तीर्थंकर महावीर भी बुद्धावतार के समकालीन थे। उनका भी कार्यक्षेत्र बिहार, नेपाल का वही क्षेत्र एवं जैन धर्म भी उसी परिमाण में फैला, यद्यपि उसका विस्तार बौद्धधर्म की तुलना में उतनी गति नहीं पकड़ सका। हिन्दुत्व के व्यापक विराट स्वरूप में बौद्ध-जैन-सिक्ख सभी संप्रदाय-धर्म समा जाते है व बताते है कि छोटे-से शुभारम्भ की अंतिम परिणति क्या होती है। आज भी हम भारतीय संस्कृति के विश्वव्यापी विस्तार की बात सोचते हैं, तो उसके मूल में चैतन्य जगत से उतरा वही एकोऽहं बहुस्याम का संदेश ही है।

आज जब हम यही चर्चा निष्कलंक प्रज्ञावतार के संदर्भ में करते है, तो लगता है। सर्वप्रथम व अब से पूर्व का अंतिम नौवाँ अवतार अपना इतिहास पुनः दुहरा रहा है। परमपूज्य गुरुदेव ने दशावतार को तीन खण्डों में बाँटकर 1967 की जून से नवम्बर तक की अखण्ड-ज्योति के अंकों में बड़े ही विस्तार से उसके लीला-प्रसंगों के विषय में लिखा है। पूज्यवर ने प्रथम खण्ड के रूप में श्री रामकृष्ण परमहंस एवं स्वामी विवेकानन्द के अवतरण व क्रिया–कलापों को, द्वितीय खंड के रूप में योगीराज श्री अरविन्द एवं महर्षि रमण की तपश्चर्या व गतिविधियों को तथा तृतीय खण्ड के रूप में युगनिर्माण योजना, गायत्री परिवार के रचनात्मक क्रान्तिकारी क्रिया–कलापों को वर्णित किया है। यदि विगत डेढ़ सौ वर्षों इतिहास को पलटें तो यह अक्षरशः सही प्रतीत होता है। परमपूज्य गुरुदेव की जीवनावधि के एक-एक वर्ष को देखें तो लगता है कि बड़े ही सुनियोजित रूप में उन्होंने युग के नवनिर्माण राष्ट्र के नवोन्मेष के साथ संस्कृति के विश्वव्यापी विस्तार की परिकल्पना ही नहीं की उसके क्रियान्वयन हेतु एक पूरा समग्र तंत्र भी खड़ा कर दिया, जो उनके महाप्रयाण के बाद भी एक चेतना विस्तार प्रक्रिया के रूप में प्रतिपल-प्रतिदिन विराटतम रूप लेता दिखाई देता है।

युगनिर्माण की प्रक्रिया का बीजारोपण तो 1962 में पूज्यवर की हिमालय यात्रा से लौटने के बाद हुआ, किन्तु गायत्री परिवार के रूप में एक विराट प्रकटीकरण का शुभारम्भ अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलन के साथ 1926 में तंग हो चुका था जब परमपूज्य गुरुदेव की अदृश्य मार्गदर्शक सत्ता हिमालय से आकर उनके कक्ष में अवतरित हुई थी। तब से सतत् जल रहा-मिशन हर निर्धारण का साक्षी व प्रत्येक के मूल में विद्यमान रहा यह अखण्ड दीपक अपने 75 वर्ष सन् 2001 में युगसंधि महा-पुरश्चरण की अंतिम पूर्णाहुति के साथ सम्पन्न करने जा रहा है। अखण्ड दीपक की हीरक जयंती के साथ युग-परिवर्तन का एक नया इतिहास लिखा जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।

ऋषियुग्म रूपी अवतारी चेतना के विराट व्यापक रूप का दर्शन सभी ने 1958 के सहस्रकुण्डी यज्ञ, 1971 की मथुरा विदाई सम्मेलन, 1990 में सम्पन्न श्रद्धांजलि समारोह, 1992 में हुए शपथ समारोह व देव-संस्कृति दिग्विजय अभियान के शुभारम्भ के साथ 1996 तक सम्पन्न 27 विराट आश्वमेधिक पराक्रमों, महायज्ञों एवं प्रथम महापूर्णाहुति में किया, जो आँवलखेड़ा में सम्पन्न हुई। लाखों-करोड़ों व्यक्ति विगत आठ वर्षों में सम्पन्न हुए इन विराट आयोजनों-देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के अन्तर्गत सम्पन्न अश्वमेधों के अलावा हुए संस्कार-महोत्सवों के माध्यम से गायत्री महासत्ता की चेतना से अनुप्राणित हो चुके हैं। प्रत्येक को अब लग रहा है कि संधिकाल की विषम बेला से उबारने हेतु गायत्री महाशक्ति ब्रह्मास्त्र ही उनके लिए रक्षा कवच बनकर आएगा एवं उन्हें सतयुग की उज्ज्वल अरुणिमा आभा का दर्शन करायेगा। न्यूजर्सी वाजपेय यज्ञ जो अगले दिनों अमेरिका के पूर्वी समुद्र तट पर एडीसन नामक शहर के एक्सपोहॉल में 24, 25, 26 जुलाई 1998 की तारीखों में सम्पन्न हो रहा है, इसी युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया की ही एक कड़ी है।

शान्तिकुञ्ज को पूज्य गुरुदेव ने इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री तथा महाकाल का घोंसला कहा है। यह वह स्थान है। जहाँ उनके महारौद्र स्वरूप तप का उत्तरार्द्ध अंतिम बीस वर्ष की तपश्चर्या के रूप में बीता। विश्वामित्र नूतन सृष्टि के सृजेता थे। इस युग के विश्वामित्र ने भी नूतन सृष्टि का सृजन कर शान्तिकुञ्ज के रूप में भविष्य की दुनिया का ढाँचा खड़ा कर दिया व विराट विस्तार लेने की घोषणा कर दी। मत्स्यावतार की तरह बढ़ रही विराट रूप ले रही गुरुवर की चेतना अब शान्तिकुञ्ज के सीमित परिकर में समा नहीं पा रही है। इसी कारण अतिरिक्त स्थान की आवश्यकता पड़ने लगी थी व इस की खोज-पड़ताल काफी दिनों से चल रही थी। विगत शिवरात्रि को महाकाल की प्रतीक स्थापना के साथ शान्तिकुञ्ज के नए विस्तृत बड़े परिसर में निर्माण की शुरुआत हो गयी-यह प्रसन्नतावर्द्धक समाचार परिजन विगत अंक में पढ़ चुके हैं। यह प्रज्ञावतार के विराट रूप के थोड़े से अंश की ही झाँकी है। इसमें क्या बनना है, क्या किया जाना है, इसका विस्तृत अनुशीलन इस विशेषांक में किया गया है व इसे नवसृजन अंक के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। उसे पढ़कर परिजन एक झलक पा सकेंगे, नवयुग के इस मत्स्यावतार की- पूज्यवर की चेतना के विराट व्यापक आकार की।

समय की माँग के अनुरूप नए परिसर में एक ऐसी विश्वविद्यालय स्तर की स्थापना की जा हरी है, जहाँ पर सर्वांगपूर्ण शिक्षण देकर कार्यकर्ताओं का निर्माण किया जा के। विभिन्न विधाओं-भाषाओं में प्रशिक्षण ये कार्यकर्ता जहाँ जाएँगे एक नए शान्तिकुञ्ज का निर्माण कर सकने में सक्षम होंगे। छह माह की अवधि के सघन शिक्षण के बाद जो कार्यकर्ता भाई या बहिन यहाँ से कार्यक्षेत्र में जाएँगे-विचार-क्रान्ति अभियान को एक विराट व्यापक रूप देने योग्य सक्षम-समर्थ बन सकेंगे। इसके अतिरिक्त भारतव्यापी प्रशिक्षण तंत्र को नालन्दा-तक्षशिला स्तर का बनाया जा रहा है, इसकी एक बहुमुखी प्रशिक्षण प्रधान योजना बनायी गयी है, ताकि सार्वभौम संस्कृति प्रधान शिक्षण द्वारा विद्या-विस्तार की प्रक्रिया को बढ़ाया जा सके। इसे देवसंस्कृति विश्वविद्यालय कहा जाए, तो कोई अत्युक्ति न होगी।

आयुर्वेद की समग्र विधाओं का पुनर्जीवन व विज्ञानसम्मत प्रस्तुतीकरण आज के समय की सबसे बड़ी माँग है। घटती जा रही जीवनीशक्ति वाले इस युग में यदि वनौषधि विज्ञान व रस-भस्मों को एक प्रामाणिक तंत्र के पुनर्जीवन द्वारा ऐसी औषधियाँ समाज को दी जा सकी जो उन्हें पीड़ा व अशक्ति से मुक्ति दिला सकें तो यह युग की सबसे बड़ी सेवा होगी। आयुर्वेद व आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का नए समन्वित शोध संस्थान नए परिसर में बनकर जब समग्र रूप में सामने आएगा तब सब इसकी उपयोगिता भली−भाँति समझ सकेंगे। साथ में एक दिव्य-दुर्लभ वनौषधि-वाटिका का निर्माण भी आकर्षण का केन्द्र होगा। प्रवासी भारतीयों उनके बालकों के शिक्षण व निवास हेतु एक समग्र भवन का निर्माण भी उसी परिसर में हो रहा है। इसी वर्ष 29 जुलाई 22 अगस्त की अवधि में 24 दिवसीय विशिष्ट प्रशिक्षण (सृजन) का शुभारम्भ इसी कड़ी में पहला चरण है। इस भवन में अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार व वर्कशॉप भी होंगे तथा विश्वव्यापी विस्तार की भूमिका भी बनेगी।

पूरे अंक में विस्तार से परिजन जो पढ़ चुके हैं, उसे अभी वर्तमान में बनने जा रहे परिसर का एक छोटा-सा हिस्सा मान सकते है। सूक्ष्म व कारण−शरीर से सक्रिय पूज्यवर की प्राणचेतना क्यों व किस प्रकार अगला सारा सरंजाम जुटा रही है, यह जब आगामी दो-तीन वर्षों में सबके सामने आएगा, तब सभी अभी की घोषणा को, भवितव्यता को मात्र अचंभा न मानकर एक युगऋषि-दृष्टा का विराट-व्यापक रूप समझकर नतमस्तक हुए बिना न रहेंगे। जहाँ छह लाख लोगों के भविष्य को नए सिरे से लिखा जा रहा हो वहाँ विश्वव्यापी तंत्र को सक्रिय करने हेतु केन्द्रीय तंत्र को भी अपने आपको रामकाज को समर्पित हनुमान जी की तरह से विराट बनाना पड़ता है। परमपूज्य गुरुदेव ने श्रद्धांजलि समारोह के स्वरूप की-परमवंदनीय माताजी व बाद में उनके उत्तराधिकारी कार्यकर्तागणों द्वारा उत्पन्न होने वाले कार्यों की घोषणा ब्रह्मकमल के बहुगुणित होने के रूप में अपने जीवनकाल में कर दी थी। उन्होंने यह भी कहा था कि कैसे सब कुछ होता चला जाएगा व जहाँ-जहाँ श्रद्धांजलि समारोह में हर कार्यकर्ता का श्रम नियोजित होगा वह सारा स्थान शान्तिकुञ्ज होता चला जाएगा। अभी का विस्तार महाकाल की चेतना के विराट रूप की घोषणा के अनुरूप ही हो रहा है। कोई आश्चर्य नहीं कि अगले 5-6 वर्षों में शान्तिकुञ्ज के आसपास का सारा क्षेत्र गायत्री महाशक्ति की चेतना से अनुप्राणित हो उसी के विस्तार में नियोजित दिखाई दे। द्रष्टास्तर की अवतारी सत्ता का हर कथन हमेशा सत्य होकर ही रहता है, क्योंकि वे जिस स्तर पर अपनी चेतना को स्थित कर कोई बात लिखते या कहते हैं। वह परमसत्ता के स्तर की होती है। प्रस्तुत परिकर के विराट रूप को इसी रूप में देखा जाना चाहिए।

श्रीमन्तों साधनसम्पन्नों को श्रेय अर्जित करने के लिए इससे श्रेष्ठ कोई और समय मिलने वाला नहीं है। यह एक ऐसी वेला है, जो लाखों वर्षों में कभी-कभी बहुमूल्य अवसर के रूप में आती है। जो इस कार्य में श्रेय का भागी बन जाता है, अपने कुछ साधन इसके लिए नियोजित कर देता है, उसका यह जीवन तो धन्य हो ही जाता है, आगे के लिए अनेकों पुण्य उसके हिस्से में लिख दिए जाते है। इससे अधिक कुछ लिखना संभव भी नहीं है, क्योंकि भामाशाहों-जमुनालाल बजाजों पर अब भी विश्वास है कि वे बढ़कर देव-संस्कृति के विराट विस्तार के निमित्त किए जा रहे इस कार्य के लिए बढ़-चढ़ कर आगे आएँगे व अपने साधनों का नियोजन उससे करेंगे। सभी साधक-परिजनों पाठकों से इस श्रेष्ठ कार्य के लिए जो एक और भागीरथी पुरुषार्थ के रूप में सामने आ खड़ा हुआ है, अपनी साधना का एक अंश एक माला प्रतिदिन इसी की सफलता के निमित्त तथा कमाई का एक हिस्सा प्रतिमाह एक दिन की आजीविका इस कार्य के लिए नियोजित करने के लिए भावभरा अनुरोध किया जा रहा है। युगदेवता का यह संकल्प पूरा होकर ही रहेगा। यह विश्वास दैनन्दिन दृढ़ रखकर हम सबको इस प्रज्ञावतार की विराट चेतना का दर्शन करने के लिए दिव्यचक्षु धारण करने हेतु स्वयं को उद्यत रखना चाहिए। कोई भी यह मौका चूकने न पाए, विशाल रूप लेने जा रहे कारवाँ से अलग न रहे, इसका हम सभी को विशेष ध्यान रखना है।


सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण (Information)

सुदामा बगल में दबी चावल की पोटली देना नहीं चाहते थे, सकुचा रहे थे, पर उनने उस दुराव को बलपूर्वक छीना और चावल देने की उदारता परखने के बाद ही द्वारिकापुरी को सुदामापुरी में रूपान्तरित किया। भक्त और भगवान के मध्यवर्ती इतिहास की परम्परा यही रही है। पात्रता जाँचने के उपरान्त ही किसी को कुछ महत्वपूर्ण मिली है। जो आँखें मटकाते, आँसू बहाते, रामधुन की ताली बजाकर बड़े-बड़े उपहार पाना चाहते है, उनकी अनुदारता खाली हाथ ही लौटती है। भगवान को ठगा नहीं जा सकता है। वे गोपियों तक से छाछ प्राप्त किए बिना अपने अनुग्रह का परिचय नहीं देते थे। जो गोवर्धन उठाने में सहायता करने की हिम्मत जुटा सके, वही कृष्ण के सच्चे सखाओं में गिने जा सके।

यह समय युगपरिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण कार्य का है। इसे आदर्शवादी कठोर सैनिकों के लिए परीक्षा की घड़ी कहा जाए, तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति नहीं समझी जानी चाहिए। पुराना कचरा हटाता है और उसके स्थान पर नवीनता के उत्साह भरे सरंजाम जुटते है। यह महान परिवर्तन की-महाक्रान्ति की वेला है। इसमें कायर, लोभी, डरपोक और भांड़ आदि जहाँ-तहाँ छिपे हों, तो उनकी ओर घृणा, तिरस्कार की दृष्टि डालते हुए उन्हें अनदेखा भी किया जा सकता है। यहाँ तो प्रसंग हथियारों से सुसज्जित सेना का चल रहा है। वे ही यदि समय की महत्ता आवश्यकता को न समझते हुए जहाँ-तहाँ मटरगस्ती करते फिरेंगे और समय पर हथियार न पाने के कारण समूची सेना के परास्त होना पड़े तो ऐसे व्यक्तियों पर ही हर किसी का रोष ही बरसेगा, जिनने आपात स्थिति में भी प्रमाद बरता और अपना तथा अपने देश के गौरव को मटियामेट करे रख दिया।

-सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण-1 (वा.क्र. 28)


वरदायी शान्तिकुञ्ज


वरदायी शान्तिकुञ्ज (Kavita)

सुरपुर के उस कल्पवृक्ष का हमें नहीं आभास हुआ, शान्तिकुञ्ज साकार कल्पतरु, है हमको विश्वास हुआ।

गुरुवर-मातृशक्ति ने मिलकर यह तरु यहाँ लगाया था, तपबल के पोषण-सिंचन से इसको सबल बनाया था,

इन पच्चीस वर्षों में इस तरु ने तरुणायी पायी है-हारे-थके हुए पथिकों की इसने थकान मिटायी है,

जिसकी थकान मिटी, कम उसका कभी न फिर उल्लास हुआ, शान्तिकुञ्ज साकार कल्पतरु, है हमको विश्वास हुआ।

इस तरुवर की दिव्य गंध है छायी दसों दिशाओं पर, ऋद्धि-सिद्धियों के अनुपम फल-फूल लगे शाखाओं पर,

शीतल पवन झकोरे इसके सबको बहुत सुहाते हैं, जो आते मुख मलिन लिये, वे खिले फूल बन जाते हैं,

इसके वातावरण बीच हर पतक्षर भी मधुमास हुआ, शान्तिकुञ्ज साकार कल्पतरु, है हमको विश्वास हुआ।

कण-कण में ऋषि-युग्म चेतना बनकर यहाँ जो समाये हैं, महाप्राण का अंश वही पा गये, यहाँ जो आये हैं,

आत्महीनता ग्रस्त आत्मबल पाकर फिर से धन्य हुए, जिन्हें नहीं था आत्म-बोध वे जाग गये, चैतन्य हुए,

जो आया उसके जीवन का पल-पल सतत् विकास हुआ, शान्तिकुञ्ज साकार कल्पतरु, है हमको विश्वास हुआ।

कल्पवृक्ष धरती का सच्चा शान्तिकुञ्ज सुखदायी है, सकल मनोरथ पूरे होते, यह ऐसा वरदायी है,

जो साधक बन आते हैं, पाते अनगिन अनुदान यहाँ, पीकर संजीवनी-सुधा भरते उनमें नवप्राण यहाँ,

जो भी आया यहाँ, न जीवन में फिर कभी निराश हुआ, शान्तिकुञ्ज साकार कल्पतरु, है हमको विश्वास हुआ।

-शचीन्द्र भटनागर

*समाप्त*