राष्ट्रजागरण की बात बहुत लोगों द्वारा, बहुत अवसरों पर, बहुत बार दुहराई जाती है, हालाँकि राष्ट्र की सारी गतिविधियाँ चल रही हैं। चुनावों का सिलसिला चलता है, नयी योजनायें बनती हैं, आकर्षक नारे दिये जाते हैं, समस्याओं का समाधान करने के लुभावने वादे किये जाते हैं- फिर भी राष्ट्र जाग्रत नहीं है। दरअसल सक्रियता-जागृति की पर्याय नहीं। सक्रिय मनुष्य में मनुष्यता का अभाव बेतरह खटकता है। इसी तरह राष्ट्र की विभिन्न गतिविधियों के बीच राष्ट्रीय भावना का अभाव बराबर अनुभव हो रहा है और उसे निवारण के उपाय सफलीभूत न होने से हर राष्ट्रप्रेमी का अन्तःकरण चीत्कार कर रहा है। राष्ट्रीय-चरित्र, राष्ट्रीय-गौरव, राष्ट्रीय- मर्यादा, राष्ट्रीय- आत्मीयता, राष्ट्रीय-समृद्धि आदि की वृद्धि और उत्कर्ष की बात क्या की जाये- उसका कोई न्यूनतम स्वरूप भी निर्धारित न हो सकता चिन्तनीय बात है। ऐसा लगता है कि राष्ट्र सचमुच सोया पड़ा है, सामान्य निद्रा में नहीं- मूर्च्छा जैसी गहन स्थिति में। उसे चैतन्य, जाग्रत, सतेज बनाने के लिए विशेष प्रयास किया जाता आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। पर प्रयास करे कौन? राष्ट्रीय-चेतना को कौन उभारे? उसे कैसे विकसित करे? घूम-फिरकर हमारी आदत कुछ दलों और उनकी सरकार की ओर देखने की पड़ गयी है।पर यह बड़ी भारी भ्रान्ति है। जब सरकार विदेशी थी तो उसने सोये राष्ट्र का उपयोग अपने स्वार्थ में करने के लिए उसे उसी स्थिति में रखना पसन्द किया और आज जब वह आन्तरिक है तो वह भी उसी सुप्त समाज का एक अंग है। सोया हुआ अंग सोये हुए को कैसे जगा सकता है? जिनकी दृष्टि स्वयं में सीमित है, उनसे विस्तृत दृष्टिकोण की कामना कैसे करें?
राष्ट्रजागरण का महान कार्य तो जाग्रत अन्तःकरण वाले व्यक्तियों का है। प्रचलित मान्यताओं के परे जिनका मस्तिष्क सोच सकता है, ऐसे व्यक्ति ही राष्ट्रीय चेतना जाग्रत कर सकते हैं। जिनके जीवन की गतिविधियाँ किन्हीं अंशों में स्वार्थ की सीमा के बाहर सक्रिय हैं व्यक्तिगत स्वार्थों की अपेक्षा सामूहिक हितचिन्तन जिनके स्वभाव में तथा उसके अनुरूप जीवन प्रक्रिया चलाने के जो थोड़े- बहुत अभ्यस्त हैं, वे ही इस कार्य में आगे आ सकते हैं। तात्कालिक लाभ की मृग-मरीचिका में भटकते नागरिकों को जो दूरगामी परिणामों का स्मरण दिलाकर अपेक्षाकृत अधिक स्थायी लाभप्राप्ति के लिए पुरुषार्थ की प्रेरणा दे सकें, ऐसे विकसित दृष्टिकोण तथा समर्थ व्यक्तियों का यह कार्य है।
ऐसे व्यक्तियों को प्राचीनकाल में ‘पुरोहित’ कहते थे। पुरोहित शब्द से भी यही भाव निकलता है कि जो सामने का लाभ नहीं- आगे का- दूरगामी हित समझकर उसकी प्राप्ति की व्यवस्था बना सकें। हीन स्वार्थों के स्थान पर महत स्वार्थों की सीढ़ियों पर चलाते हुए ‘परमार्थ’ तक लोगों को गति दे सकें- वही पुरोहित है। पुरोहित में ‘चिन्तक और साधक’ दोनों गुण आवश्यक हैं। जो चिन्तन-विश्लेषण द्वारा सही परामर्श दे सके तथा आदर्श जीवन-पद्धति से मूर्तिमान प्रेरणा रूप बनकर रहे वही पुरोहित है। अपने जीवन में आदर्श का अभ्यास करने के साथ-साथ व्यक्तिगत हित के साथ-साथ समाजहित की जो कल्पना कर सके, ऐसे व्यक्ति इस वर्ग में आ सकते हैं। राष्ट्रजागरण का कार्य प्रमुख रूप से ऐसे ही प्रकाशवान व्यक्तित्वों का है। ये संगठित होकर स्वयं को इस महान प्रयोजन के लिए समर्पित कर सकें तो यह महान राष्ट्र विश्वमंच पर पुनः सिंहनाद कर सकता है।
-परम पूज्य गुरुदेव
“मुझे परमधर्मात्मा सेठ झगडूशाह के दर्शन करने हैं।” गौरवर्ण आतप में तपकर ताम्र हो चुका था, क्षीणकाय और मलिनवत बतला रहे थे कि उस पर यदि किसी ने कृपा की है तो वह दरिद्रता की देवी ही है। इतने पर भी उसके मुख पर कर्मठता की उल्लासपूर्ण चमक थी।
“आप दूर से आये जान पड़ते हैं और ब्राह्मण लगते हैं। मैं आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ।” हाथ जोड़कर, मस्तक झुकाकर उस काठियावाड़ी पुरुष ने बड़ी श्रद्धा के साथ प्रणाम किया।” झगडूशाह को आपके दर्शन करने चाहिये। वह कब ऐसा धर्मात्मा और दानी हुआ कि उसके दर्शन करने आप जैसे ब्राह्मण पधारें।”
“उन उदारचेता से आपको ईर्ष्या उचित नहीं।” आगन्तुक कैसे जानता उसके सामने जो घुटनों के ऊपर धोती बाँधे बिना उतरोय के किंचित स्थूलकाय, अधेड़ उम्र का, बड़ी-बड़ी मूँछों वाला व्यक्ति है, उसी से मिलने वह आया है और यही वह व्यक्ति है, जिसके समुद्री व्यापार को धाक सुदूर पश्चिम के गौराँग देशों तक मानी जाती हैं आगन्तुक ने उसे सामान्य व्यक्ति ही समझा था। “ मैं सेठजी से मिलकर ही विश्राम करूंगा। आप उनका घर बतलाने की कृपा करें।”
“आपके इस सेवक का ही नाम झगडूशाह है।” आगन्तुक दूर से आया है, उसके चरणों पर धूल की परत जम रही है। वह बहुत थका लगता है। उसे उलझन में डालना अनुचित जानकर प्रार्थना की गयी- “आप भीतर पधारने की कृपा करें।”
“आप!” आने वाला दो क्षण स्तब्ध देखता ही रह गया, सामने खड़े व्यक्ति को। उसने क्या-क्या सोच रखा था उसके बारे में। कितने तड़क-भड़क से सज्जित सेवक व आवास तथा सैनिकों से घिरे व्यक्तित्व की कल्पना की थी उसने और यह उसके सामने खड़ा ग्रामीण जैसा दिखता व्यक्ति.....।
“आप पधारें!” झगडूशाह ने फिर आग्रह किया।
“यह सेठ जी का निजी सदन है?” तनिक अवकाश मिलने पर एक सेवक से उसने पूछ लिया, “यह उनका अतिथि गृह है।” बड़ा सम्मानपूर्वक उत्तर मिला।
“सेठजी!” आप यदि अन्यथा अर्थ न लें तो मुझे एक बात पूछनी थी। “आप आज्ञा करें।” सेठ ने सरल भाव से कहा।
“आप देश के श्रेष्ठतम श्रीमंतों में से है। स्वदेश और विदेश के अनेकों धनपति आपके अतिथि होते होंगे। आपकी अतिथिशाला आपके गौरव के सर्वथा अनुरूप है किन्तु आप जानते हैं कि मैं ब्राह्मण हूँ और ब्राह्मण अतिथि का सत्कार धर्मनिष्ठ गृहस्थ प्रायः अपने घर में ही करते हैं। परम्परा से पृथक जो व्यवहार आपे किया है, उसका कुछ कारण तो होगा? मुझसे ऐसी कोई त्रुटि- कोई प्रमाद आपने....।”
“नहीं देव!” सेठ ने आतुरतापूर्वक ब्राह्मण के चरण पकड़ लिये। “आप हुए हैं। आपकी समुचित सेवा मेरा कर्तव्य है। विश्राम कर लें, तब यह दास आपके श्रीचरणों से अपने आवास को भी पवित्र करायेगा।”
विश्राम के पश्चात सेठ जी के घर जाने पर आगन्तुक को जो अनुभूति हुई, वह अवर्णनीय थी। उसे जहाँ ले जाया गया था- कठिनाई से ही कह सकते हैं कि वह झोपड़ी नहीं थी, क्योंकि पक्की दीवालों से बना घर था। कुल तीन कक्ष उसमें पूजन कक्ष भी शामिल था।
प्रायः आभूषणरहित एक सामान्य नारी ने उसका सत्कार किया। सेठ उन्हें बार-बार ‘सती’ न कहते तो वह जान भी नहीं पाता कि वह सेठानी है। कोई विलास सामग्री नहीं। गुजरात काठियावाड़ में ग्रामीण कृषक के घर में भी उससे अधिक साज-सज्जा और सामग्री मिल जाती है। अतः उसने अनुभव किया कि वह किसी गृहस्थ के घर न पहुँचकर देवालय पहुँच गया है। “आप इतने अल्प में निर्वाह कैसे कर लेते हैं?” “अल्प में निर्वाह की बात ही कहाँ है अतिथि देवता?” सेठ के व्यवहार और वाणी में आडम्बर उसे सर्वथा नहीं दिखा। वे कह रहे थे- “अपने देश भारत की संस्कृति त्याग की संस्कृति है।” धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इसके चार पाये हैं। समाज और संस्कृति के लिये इन चारों की समान मजबूती आवश्यक है। इसमें अर्थ की मजबूती का दायित्व व्यापारी वर्ग का है। अर्थ की मजबूती का एक ही अर्थ है- धन का अविरल प्रवाह, समाज के प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक स्थिति तक समान रूप से पहुँचे। जिस पर उस प्रवाह- संचालन का दायित्व है वही यदि उसे अवरुद्ध करने लगे तो उससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी?” “अवरुद्ध.....,” युवक अतिथि को समझने में कठिनाई हुई।
“धन को भोग के लिए अपने पास समेट- बटोरकर रख लेना प्रवाह को अवरुद्ध करना ही हुआ। झोपड़ी के निवासी भी क्या मेरी जैसी सुविधा जुटा पाते हैं?” जैसे सेठ को अपनी सादगी पर अभी सन्तोष नहीं था। “देव!” सेठ दो क्षण माँग रहे। “आपने अपने आगमन से मुझे धन्य किया। आपका परिचय भी जानना चाहता था एवं आने का उद्देश्य भी।”
“तक्षशिला से अध्ययन पूर्ण कर तीर्थयात्रा को निकल पड़ा था।” युवक ने बिना किसी भूमिका के परिचय दिया। “लोक मुझे शीलभद्र के नाम से जानता है। तीर्थयात्रा के प्रारम्भ से ही आपकी कीर्ति कानों में पहुँच चुकी थी। इधर आया तो आपके दर्शन की उत्कण्ठा हुई। अब आने का उद्देश्य बताता हूँ। आप जानते हैं देश में इस समय एक ही विश्वविद्यालय है- ‘तक्षशिला’, मेरी आकाँक्षा थी कि मगध में भी उसी स्तर का एक विद्याकेन्द्र स्थापित किया जाए, ताकि जा छात्र गंधार नहीं जा सकते, वे अपना शिक्षण यहाँ निकट रहकर पूर्णकर सक लें।”
“आकाँक्षा नहीं संकल्प कहें।” सेठ के मन में ऐसा उल्लास उमड़ पड़ा- जैसे उन्हें कोई निधि मिल गया हो। अब कहने को कुछ न बचा था- वर्तमान बिहार के राजगृह से आठ मील दूर नालन्दा में सेठ ने अपना वैभव उड़ेलना शुरू किया। विश्वविद्यालय के साथ आठ विस्तृत कक्ष और तीन सौ प्रकोष्ठ बने। सभासदन दस भागों में विभक्त था। शिक्षार्थियों के रहने के लिये तीन सौ छात्रावास भवन बने। भवन बनाकर ही सेठजी को संतुष्टि नहीं मिली। उन्होंने रत्नसागर, रत्नोधि और रत्नोरंजक नाम के तीन विशाल पुस्तकालयों की स्थापना के लिये अपरिमित धन दिया।
शीलभद्र उस महान विश्वविद्यालय के कुलपति हुए। शान्तरक्षित, शीघ्रवद्ध प्रभाकरमित्र आदि उनके सहयोगियों के प्रचंड, अध्यवसाय ने उस विद्याकेन्द्र को विद्यातीर्थ में परिणत कर दिया। चीनी यात्री ह्वेनसाँग के अनुसार- यह स्थान उस समय विश्व का अद्वितीय विद्यापीठ बन गया था। दूसरी सदी में आचार्य शीलभद्र के निर्देशन में उस स्थापना को पूर्ण कर सेठ ने कहा- “आज मैं अपनी संस्कृति को अर्घ्य देकर अर्थ का प्रयोजन सिद्ध कर स्वयं को धन्य मानता हूँ।” महान संस्कृति का विजयछत्र अभी भी अर्घ्यदान माँग रहा है। आवश्यकता उनकी है तो अि के प्रयोजन का पहचान सकें।
मनुष्य एवं अन्य जीवों की मूलसत्ता अत्यन्त छोटी होती है, पर उसी में सम्पूर्ण जीव समाहित होता है। उस सर्वथा सूक्ष्म इकाई से सर्वांगीण सुन्दर प्राणी के विकास को अंगुलिनिर्देश कहाँ से मिलता है? उसका मार्गदर्शन एवं संचालन करने वाली वह कौन-सी शक्ति है, जो उसे यह बतलाती है कि अमुक कोशिका से अमुक अवयव बनेंगे एवं उसका आकार प्रकार अमुक प्रकार का होगा? इस सम्बन्ध में शरीरशास्त्री भी अब लगभग उसी निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं, जिसके बारे में तत्वज्ञानी ऋषियों ने बहुत पहले ही कह दिया था कि सृष्टि के समस्त पदार्थ और प्राणियों का अभिवर्धन, विकास, नियमन, नियंत्रण ईश्वर के अधीन है।
उल्लेखनीय है कि प्राणीशास्त्रियों की जीव विकास को लेकर आरम्भ से ही कई प्रकार की जिज्ञासायें रहीं हैं, यथा जीव की उत्पत्ति कैसे होती है? उसके विकास पर अंकुश किसका होता है? किस विधान के अंतर्गत जीवन-मरण का चक्र चलता है और किसके निर्देश पर वे अव्यक्त से व्यक्त एवं व्यक्त से अव्यक्त में निश्चित अवधि बिताकर आते जाते रहते हैं? जीवविज्ञान की समस्याओं चर्चा जिस विभाग के अंतर्गत होती है, उसे ‘मार्फोजेनिसिस’ कहते हैं, जिसका अर्थ है ‘आकृति का अस्तित्व’।
सर्वविदित है कि विज्ञान के अध्ययन अनुसंधान का क्षेत्र “अपरा” प्रकृति है। इसी में वह अपनी समस्त उलझनों का हल ढूंढ़ने का प्रयास करता है। पदार्थगत रहस्यों का उद्घाटन करने में वह सफल भी होता है, पर जो पहेली ‘परा’ प्रकृति से सम्बन्धित है, पदार्थ ज्ञान के आधार पर उनको कैसे सुलझाया जा सकेगा? इसी प्रकार का स्वर मूर्धन्य विज्ञानी रुपर्ट सेल्ड्रेक की रचना- ‘ए न्यू साइन्स ऑफ लाइफ’ से ध्वनित होता है।
सेल्ड्रेक ने अपने उपयुक्त ग्रंथ में जीव विकास के सम्बन्ध में पाँच प्रकार के प्रश्न उठाये हैं और उन पर गहन विचार मंथन करते हुए यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि प्राणीशास्त्री भले ही विकास की नियंत्रित और सुसम्बद्ध प्रक्रिया को जीन और डी.एन.ए. जैसे इकाइयों की परिणति मानें, पर वास्तविकता यह है कि उस पर किसी पदार्थ सत्ता का नहीं, अपार्थिवसत्ता का आधिपत्य हैं। वह कहते हैं कि यदि जीन को विकास प्रक्रिया का विधाता माना गया, तो फिर एक के बाद एक प्रश्न- प्रति प्रश्न पैदा होते जायेंगे, जिसका जवाब दे पाना शरीरवेत्ताओं के लिये आसान काम नहीं होगा। जैसे बीज कोष यदि विकास सम्बन्धी सम्पूर्ण क्रियाविधि को संचालित करते हैं, तो फिर उन्हें निर्देश देने वाली पदार्थ सत्ता कौन है? उस अज्ञान पदार्थ सत्ता का संचालन कहाँ से होता है, फिर वे किनके द्वारा नियंत्रित होते हैं? इन सवालों के उत्तर में यह कहा जा सकता है कि भौतिक विज्ञान का अनुसंधान अभी उस गहरायी तक नहीं पहुँचा है कि ऐसे गम्भीर प्रश्नों का हल खोज सके। भविष्य में बीजकोषों के उपरान्त यदि विज्ञान ऐसी सूक्ष्म स्तर की इकाइयों को ढूंढ़ लेने में सफल हो भी जाता है, तो भी आगे चलते हुए अन्ततः हम एक ऐसे बिन्दु पर पहुँच जायेंगे, जहाँ हमें किसी अभौतिक सत्ता को स्वीकार करना ही पड़ेगा।
सेल्ड्रेक के प्रश्नों से ऐसा आभास मिलता है कि विज्ञान अपने पूर्वाग्रह से उबर कर अब किसी परासत्ता को अंगीकार करने की स्थिति में पहुँचा है। इस संदर्भ में उनने जो पहला प्रश्न उठाया है, वह वृद्धि और विकास से संबंधित है। उनका कहना है कि शुक्राणु और अण्डे के मिलन के बाद जो भ्रूण-कलल पैदा होता है, वह एक कण के सदृश्य संरचना है। धीरे-धीरे उसके आकार में वृद्धि होती जाती है और वक एककोशीय संरचना कोशा-विभाजन द्वारा बहुकोशीय बन जाती है। इस स्थिति में वह बिलकुल गेंद की शक्ल और रूप ग्रहण कर लेती है। सेल्ड्रेक की मूल समस्या इसी स्थिति से सम्बन्धित है, वे कहते हैं कि भ्रूण-कलल जब आरम्भ से ही गोलाकार रूप में बढ़ता हुआ ‘लास्टोसील’एवं ‘ब्लासटुला’ ‘अवस्थाओं तक अपना व आकार अक्षुण्ण बनाये रहता है, तो फिर बाद में उसकी उक्त शक्ल’ में व्यवधान क्यों पैदा होता है? वह अपना प्रारम्भिक गेंदनुमा स्वरूप खो क्यों देता है? पदार्थसत्ता स्वयं कभी अपना स्वरूप खोती नहीं। वह अपने मौलिक रूपाकार में ही वृद्धि करती रह सकती है, पर यहाँ तो एक निश्चित अवधि के पश्चात् भ्रूण अपना वास्तविक स्वरूप परिवर्तित कर लेता है और मानवाकार में बनने-ढलने लगता है, ऐसा क्यों? नियत समय के उपरान्त उसे रूप-परिवर्तन की प्रेरणा कहाँ से मिलती है? यदि इसे पूर्णतः याँत्रिक प्रक्रिया भी मान लें, तो भी उपकरणों में त्रुटियाँ और गड़बड़ियाँ तो प्रायः होती ही रहती है, किन्तु यहाँ ऐसी कोई भूल कभी नहीं देखी जाती। यदि 64 सेल अवस्था में आकार परिवर्तन होना है, तो बराबर उसी अवस्था में यह घटित होगा, न तो इसमें 32 सेल अवस्था की गुँजाइश है, न 128 सेल अवस्था की। ऐसी त्रुटिहीनता किसी याँत्रिक प्रक्रिया से परे ही हो सकती है, उसके अंतर्गत कदापि नहीं।
इसके अतिरिक्त विभिन्न आकृति व प्रकृति वाले अंग-अवयवों का विकास एक नितान्त माँसयुक्त पिण्ड से कैसे होता है? यह समझ से परे हैं। माँस की ऊतक एक प्रकार की है, जबकि मानव शरीर में त्वचा, रक्त, अस्थि, मज्जा, नाखून, बाल आदि कितनी ही प्रकार की ऊतकें होती हैं। यह सब अकेले रक्त-माँस के पिण्ड (गर्भ की आरम्भिक अवस्था) से कैसे उत्पन्न हो जाती हैं और उनके सही-सही विकास का नियमन कहाँ से होता है? क्या इस समूची प्रक्रिया में किसी अदृश्य सत्ता का हाथ होना नहीं माना जाना चाहिये?
सेल्ड्रेक की दूसरी समस्या भी गर्भ से संबंधित है। अपवादों को छोड़ दिया जाये, तो अक्सर देखा यह जाता है कि किसी भी जन्तु के आधे हिस्से को नष्ट कर देने के बाद जीव की मौत हो जाती है। गर्भ के साथ ऐसी बात नहीं। इसकी पुष्टि के लिये वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग किया। उन्होंने ‘ड्रेगन फ्लाई’ के अण्डे के भीतर पल रहे गर्भ के साथ छेड़छाड़ की। अण्डे के मध्य भाग को एक मजबूत धागे से कसकर बाँध दिया और गर्भ के दो हिस्से कर दिये। तत्पश्चात् उसके एक भाग की हत्या कर दी गयी। इतने पर भी उस विभाजित गर्भ का विकास रुका नहीं, वह एक सम्पूर्ण ‘महामक्खी’ के रूप में विकसित हुआ, अन्तर सिर्फ इतना पाया गया कि उसका कद थोड़ा छोटा बना रहा। यही प्रयोग ‘सी-अर्चिन’ नामक एक समुद्री जीव में दुहराया गया। परिणाम वहाँ भी पहले जैसा ही देखा गया अर्थात् आधे गर्भ से ही एक सम्पूर्ण ‘सी-अर्चिन’ पैदा हो गया। इसका आकार भी सामान्य प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न अर्चिन से बतिपय लघु रहा।
उपर्युक्त दोनों प्रयोगों में जब गर्भ को दो हिस्सों में विभक्त करके छोड़ दिया गया, उनमें से किसी भी गर्भार्द्ध को विनष्ट नहीं किया गया, तो दोनों हिस्सों में से दो सर्वांगपूर्ण प्राणी उत्पन्न हुए। यह स्थिति बिल्कुल निम्न कहलाने वाले जीवधारियों तक में ही केवल सीमित है, सो बात नहीं, वरन् धरती का सर्वोपरि प्राणी मनुष्य तक में समान रूप से देखी जाती है, फर्क मात्र इतना है कि यहाँ सब कुछ स्वतः सम्पन्न होता है। विज्ञानवेत्ता बताते हैं कि मानव की दशा में जहाँ एक बार में एक एक अधिक बच्चे पैदा होते हैं, वहाँ इसका मतलब गर्भ का सुनिश्चित विभाजन है। अब यह बात और है कि यहाँ कार्य प्राकृतिक ढंग से होता है, पर गर्भ के टुकड़े तो हुए ही। पिछले दिनों इस संबंध में एक आश्चर्यजनक घटना प्रकाश में आई।
विगत नवम्बर में अमेरिका की केनी मैकाए नामक एक 24 वर्षीया महिला ने वहाँ के मैथोडिस्ट अस्पताल में एक साथ सात बच्चों को जन्म दिया। इनमें से चार लड़के और तीन लड़कियां हैं एवं सभी स्वस्थ हैं। एक साथ इतने अधिक बच्चे के जन्म होने की विश्व की यह पहली घटना है। ऐसा कैसे हुआ।? इस सम्बन्ध में मैकाये का कहना है कि उसने प्रजनन शक्ति बढ़ाने वाली दवाओं का सेवन किया था। संभव है इन्हीं दवाओं के प्रभाव के कारण भ्रूण एक साथ सात हिस्सों में बंट गया और प्रत्येक भाग पृथक-पृथक भ्रूण की तरह व्यवहार करता हुआ स्वतंत्र तथा सम्पूर्ण शिशु के रूप में विकसित हो गया।
“सेल्ड्रेक का असमंजस यहाँ यह है कि गर्भ के खण्ड-खण्ड में अंट जाने के बावजूद उसके सभी टुकड़े स्वयं में सम्पूर्ण इकाई की तरह क्योंकर व्यवहार करते हैं? ऐसा करने का निर्देश उन्हें कहाँ से मिलता है? भ्रूण खण्डित होने के पश्चात् तो उन्हें विनष्ट हो जाना चाहिये था, पर ऐसा नहीं होता। क्या यह किसी अलौकिक सत्ता को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है?
इनकी तीसरी आपत्ति ‘रीजनरेशन’ के संबंध में है। निम्न श्रेणी के जीवों की यह एक प्रमुख विशेषता है। वे अपने कटे हुए अंगों का पुनरुत्पादन बड़ी सरलता से कर लेते हैं। छिपकली की पूँछ किसी प्रकार कट जाये या काट दी जाये, तो वे उसे कुछ ही दिनों में दुबारा उगा लेती हैं। केंचुए में यह प्रक्रिया और भी आश्चर्यजनक ढंग से होती है। सम्पूर्ण केंचुए के यदि कई टुकड़े कर दिये जायें, तो सभी हिस्से स्वतंत्र केंचुए के रूप में विकसित हो जाते हैं। जिनमें सिर नहीं है, वे सिर विकसित कर लेते हैं, जिनमें जननाँग नहीं है, वह खण्ड नये सिरे से अपने जननांग पैदा कर लेते हैं। ऐसी ही विचित्रता जन्तुओं की आँतों में पायी जाने वाली ‘टेपवर्म’ (फीताकृमि) में देखी जाती है। वे भी अपने अलग-अलग खण्डों में से पृथक-पृथक सम्पूर्ण कृमि उत्पन्न कर लेते हैं। इसे शरीरशास्त्र की सामान्य प्रक्रिया कैसे कहा जाय? उन छोटे-छोटे टुकड़ों को अपने अभावग्रस्त अंगों का ज्ञान कैसे हो जाता है और वे कहीं सिर, कहीं जननाँग कैसे विकसित करने लगा जाते हैं, यह कार्य इतना सटीक और दोषरहित होता है कि कभी भी किसी एक ही खण्ड में वही अंग दुबारा पैदा नहीं होते, जो उस भाग में पहले से ही विद्यमान हैं अर्थात् सिर वाले हिस्से में पुनः सिर नहीं पनपता या जननाँग वाले भाग में भूलवश भी उसका पुनरुत्पादन नहीं होता। इससे भी अचम्भे की बात यह है कि वे टुकड़ों में कट-बंटकर भी जीवित बने रहते हैं। यह शरीरशास्त्र के सामान्य सिद्धान्त के विपरीत है। तिलचट्टे का सिर यदि काट दिया जाये, तो यह सच है कि बहुत समय तक वह जिन्दा बना इधर-उधर घूमता फिरता रहता है, लेकिन अन्ततः उसकी मौत सुनिश्चित है। यहाँ वैसा क्यों नहीं होता? स्पष्ट है- अंग-अवयवों का कटना- मिटना ही मरण का निमित्त नहीं है। उसे सुनिश्चित करने वाला तत्व कोई और है।
इसी तथ्य की पुष्टि एक अन्य प्रयोग से भी हुई। उसमें वैज्ञानिकों ने छिपकली की आँख में से लेन्स निकालकर उसे अन्धा बना दिया। विज्ञानवेत्ताओं का विश्वास था कि अब छिपकली स्थायी रूप से अन्धी हो गई और आजीवन ज्योतिहीन बनी रहेगी, किन्तु जो परिणाम प्राप्त हुआ, वह चौंकाने वाला था छिपकली ने अपने नेत्र -लेन्स का पुनरुत्पादन कर लिया, जो आशा से एकदम विपरीत था। अब तक की अवधारणा के अनुसार, सम्पूर्ण शरीर-तंत्र पर बीजकोषों (जीनों) का नियंत्रण होता हैं उसी के अधीन काया की समस्त क्रियायें नियमित और संचालित होती हैं। निम्न श्रेणी के प्राणियों में अंगों के पुनरुत्पादन की क्रिया भी उसी के अधीन है। दिप्कली के मामले में इसका प्रश्न ही पैदा नहीं होता, कारण कि उसका लेन्स त्वचा से निर्मित होता है। जब छिपकली पूर्णतया वयस्क बन जाती है, तो न सिर्फ त्वचा से अपितु शरीर के शेष भाग से भी लेन्स का सम्बन्ध बिल्कुल समाप्त हो जाता हैं। वह एक सजीव आँख के अन्दर निर्जीव काँच की तरह होता है। अंगों के पुनरुत्पादन की प्रक्रिया के लिए यह आवश्यक है कि विनष्ट अवयव का अपने जनक अंग से हर प्रकार का संपर्क बना रहे तभी बीजकोष उसके रीजनरेशन में सहायक होते हैं। यहाँ इसका सर्वथा अभाव था, इसलिये शरीरविज्ञानियों को यह बिल्कुल भी आशा नहीं थी कि लेन्स को एक बार काटकर निकाल देने के उपरान्त छिपकली उसे दुबारा उगाने में समर्थ सिद्ध होगी, लेकिन आश्चर्य की बात कि आइरिश (पुतली का भीतरी हिस्सा) में से उसका पनपना आरम्भ हो गया और करीब एक महीने बाद एक नवीन लेन्स ने उसका स्थान ग्रहण कर लिया। यह नया लेन्स हर प्रकार से पुराने की अनुकृति थी। उसमें कहीं कोई दोष नहीं था। यहाँ सेल्ड्रेक जीवविज्ञानियों के समक्ष एक प्रश्न प्रस्तुत करते हैं कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? सर्वमान्य नियम की उपेक्षाकर यह घटना कैसे घटी? इसके पीछे क्या किसी परोक्षसत्ता के हाथ की बात नहीं स्वीकारी जा सकती?
उनका अगला प्रश्न रूप-विन्यास का है। वे इस बात से हैरान हैं कि मानवी शुक्राणु और अण्डाणु में से कोई भी आकृति मनुष्य शक्ल से मिलती-जुलती नहीं है, फिर भी उनके संयोग से मानवाकृति का जन्म होता है, ऐसा क्यों? कोई अन्य आकृति भूलवश भी उससे क्यों नहीं पैदा होती? सूच्यग्र के बराबर शुक्राणु और अण्डाणु! इसके बावजूद इतना चमत्कारी परिणाम कि शिशु में माँ की छवि भी झलके और पिता का चेहरा भी झाँके। इतना ही नहीं, दोनों के स्वभाव और आदत संबंधी गुण-दोष भी अवतरित हों एवं वंश-परम्परा के रूप में पीढ़ियों से चले आ रहे रोगों का का क्रम भी न टूटे। पदार्थ स्तर पर इतनी शुद्धता और त्रुटिहीनता असंभव है। वे कहते हैं कि यदि इसके पीछे बीजकोषों की भूमिका होना स्वीकारा जाये, तो वह भी पदार्थसत्ता की ही सूक्ष्म इकाई है। उससे इतनी शुद्धता की आशा करना अनुचित होगा। पदार्थ से निर्मित निर्जीव यंत्र-उपकरणों से अगणित गलतियाँ होती रहती हैं, फिर उक्त मामले में किसी प्रकार की कभी भी अशुद्धि न होने के पीछे क्या निमित्त माना जाये? इसका उत्तर दे पाने में विज्ञानविद् असमर्थ हैं।
इसके अतिरिक्त कशेरुकी प्राणियों (वटिबे्रट) के भ्रूण, विकास की आरम्भिक अवस्था में लगभग मिलते-जुलते देखे जाते हैं। उसके बाद ही वे अपना जातिगत रूप और आकार ग्रहण करना प्रारम्भ करते हैं। एक जैसी अवस्था के उपरान्त अपनी-अपनी जातिगत विशेषताओं वाली शक्ल ग्रहण करने संबंधी मार्गदर्शन उन्हें कहाँ से मिलता है? बीजकोषों से? नहीं! यह अवधारणा पहले ही अमान्य हो चुकी है, कारण कि पदार्थसत्ता कभी भी इतना सही और शुद्ध दिशादर्शन नहीं करा सकती, कभी-न-कभी भूल उससे अवश्यम्भावी है, जबकि जीवजगत में कभी भी ऐसा देखा-सुना नहीं गया, जिसमें घोड़ी से गधा पैदा हुआ हो और बकरी से बिल्ली जनी हो। क्या इससे किसी अलौकिक सत्ता के अस्तित्व का होना सिद्ध नहीं होता?
उनकी अन्तिम शंका परिस्थितियों से संबंधित है। वे कहते हैं कि परिस्थितियाँ एक जैसी हों, परिवेश एक जैसे हों, चुनौतियाँ और आवश्यकतायें एक जैसी हों, इसके बावजूद भिन्न-भिन्न जीवों के विकास की शैली भिन्न-भिन्न होती है, ऐसा क्यों? यह भी नहीं कि यह विशेषता केवल जीवजगत की हो, वनस्पतिजगत में भी यह व्यतिरेक समान रूप से दृष्टिगोचर होता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि कोई एक ही तत्व दोनों में से प्रक्रिया का समान रूप से नियमन करता है। उदाहरण के लिये, उष्ण कटिबंधीय वृक्षों को लिया जा सकता है। कटिबंध एक ही है, इतने पर भी अलग-अलग पेड़ों का स्वभाव अलग-अलग है। पर्यावरण समान है, फिर भी वनस्पतियों के आचरण में असमानता झलकती है।
आमतौर पर एक जलवायु और एक वातावरण में प्राणियों और वनस्पतियों में अक्सर सदृश्यता ही दिखलायी पड़ती है। शीतप्रधान देशों के निवासी गोरे होते हैं तथा उनके बाल भूरे ही होंगे। इसमें किसी प्रकार के व्यतिक्रम की कोई गुंजाइश नहीं है। रेगिस्तानी इलाकों में उगने वाले पौधों में काँटे अवश्य होंगे। इन उपाँगों के माध्यम से ऐसे (जेरोफाइटिक) पौधे अपने अन्दर के जल को सुरक्षित रखने में सफल होते हैं। बर्फीले क्षेत्र में साइकस और पाइनस प्रकृति के ही वृक्ष पाये जाते हैं, दूसरे नहीं।
इतने पर भी क्या कारण है कि एक ही प्रकार की मिट्टी में अगल–बगल खड़े पादपों की प्रकृति में जमीन-आसमान जितना अन्तर पाया जाता है? एक वृक्ष अपनी पत्तियों को धरती के लगभग समानान्तर रखते हुए पेड़ के नीचे छाया करने का कार्य करता है, जबकि उसी के पार्श्व में मौजूद दूसरा पेड़ अपनी पत्तियों को खड़ी मुद्रा में रखते हुए ऐसा कोई आच्छादन बनाने में किसी प्रकार का उत्साह नहीं दिखाता, फलतः उसके नीचे धूप व्याप्त रहती है। अब सवाल यह है कि एक ही जलवायु, एक ही वातावरण, एक ही कटिबन्ध में दो नितान्त पृथक प्रकार के पादप कैसे पैदा हो गये? उपरोक्त तर्कों के आधार पर वार करने पर यह आश्चर्यजनक मालूम पड़ेगा।
ऐसी ही विसंगति प्राणियों में भी देखी जाती है हाथी और जिराफ पर विचार करें, तो ज्ञात होगा कि दोनों की प्रकृति करीब मिलती-जुलती है। हाथी को पेड़ के पत्ते खाने पड़ते हैं और जिराफ को भी अपने भोजन के लिए उन्हीं पर निर्भर रहना पड़ता है। विकासवादियों के कथनानुसार, जिराफ को चूँकि ऊंचे-ऊंचे वृक्षों की पत्तियाँ खानी पड़ती थीं, इसलिये उसकी गर्दन पर निरन्तर दबाव बना रहा, जिससे वह लम्बी हो गई। दलील अपने स्थान पर सही है। असमंजस एक ही है कि बिल्कुल इसी प्रकार का प्रयत्न करने वाले हाथी की नाक लम्बी क्यों हुई? जबकि गर्दन एकदम सामान्य बनी रही। दोनों के सामने अस्तित्व संबंधी चुनौती एक जैसी है, फिर भी एक की गर्दन लम्बी हो जाती है, जबकि दूसरे की नाक, ऐसा क्यों?
इन प्रश्नों का सटीक और तर्कसंगत जवाब देने में विज्ञानवेत्ता असमर्थ हैं। ऐसे में उनके समाधानों को सारगर्भित कैसे माना जाये? कुल मिलाकर इस संदर्भ में वे एक ही बात कहते हैं कि विकास में बीजकोषों की भूमिका निर्णायक होती है, पर सेल्ड्रेक उक्त तर्क को यह कहकर निरस्त कर देते हैं कि विकास की आरंभिक अवस्था में शरीर के समस्त बीजकोष एक जैसे होते हैं, उनमें विभेद तो बहुत बाद में उत्पन्न होता है। बीजकोषों में जब यह अन्तर उत्पन्न होता है, उससे पूर्व ही काया के अन्तराँगों और बहिराँगों का निर्माण आरम्भ हो चुका होता है। ऐसी स्थिति में किस कोश से कौन-सा अवयव बनना है? शरीरशास्त्री यहाँ निरुत्तर हो जाते हैं।
रूपर्ट सेल्ड्रेक कहते हैं कि जीव-विज्ञानी जब तक इनका हल पदार्थस्तर पर ढूँढ़ते रहेंगे, तब तक उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी, जबकि यह उससे ऊपर की चीज है। इसे उन्होंने मोफोंजेनेटिक क्षेत्र नाम दिया है और कहा है कि हर जीवधारी का ऐसा अपना एक निजी क्षेत्र होता है। यहाँ से उसे हर प्रकार का नियंत्रण और निर्देश प्राप्त होता है। यह वास्तव में और कुछ नहीं, जीवचेतना का ही बदला हुआ नाम है।
आत्म-चेतना परमात्मचेतना की अंशधर है। जीवों में परिवर्तन, वृद्धि और विकास के रूप में जो कुछ भी सजीवता और सक्रियता दिखलायी पड़ती है, उसकी यथार्थ निमित्त वास्तव में यही है। यह इस बात से भी स्पष्ट परिलक्षित होता है कि प्राणहीन कलेवर अपनी वृद्धि और विकास तो दूर, देर तक काया की यथास्थिति बनाये रख पाने में भी असमर्थ साबित होता है और जल्द ही सड़ने-गलने लगता है। वास्तव में हमें अन्तः-चेतना को ही समस्त कायिक गतिविधियों का नियामक और नियंत्रक मानना पड़ेगा। आत्मा चूँकि परमात्मा का प्रकाश है। अतएव यह कहने में हर्ज नहीं कि प्राणी के अन्तर के सम्पूर्ण क्रिया−कलाप उसी के द्वारा संचालित है। विज्ञान अब इस निष्कर्ष पर पहुँच चुका है।
समाचार पढ़कर उसने सिर ऊपर उठाया और ‘ओह’! कहकर चुप हो गयी। उसकी आँखें छत की ओर ताकने लगीं। माथे की लकीरें, मुखमुद्रा यह सूचित कर रही थीं कि वह कुछ विशेष सोच में है। सामने बैठे हुए पति ने उसके भावों को पढ़ने का प्रयास करते हुए पूछा- “किस सोच में डूब गयीं?’
“लगता है अब महाक्रान्ति होकर रहेगी, कोई इसे रोक नहीं सकता।” उसका शरीर स्वयं की गहराइयों से उभरा।
“तुम्हें तो बस सुबह-शाम, दिन-रात क्रान्ति के ही सपने आते हैं।” कहने वाले के अधरों पर व्यंग्य भरी मुसकान खेल गयी।
“नहीं-नहीं, इन दिनों के समाचार-पत्रों की बारीकी से समीक्षा करें तो आप भी कह उठेंगे कि सचमुच वह सब आ जुआ है जो ‘युग-परिवर्तन’ के लिये आवश्यक है।”
“ऐसा क्या है इनमें।” व्यापारी पति का स्वर कुछ उपेक्षित-सा था।
“देख नहीं रहे, पूर्व संस्कारों और लोक-परम्परागत रूढ़ियों के श्वासरोधक वातावरण में जनसामान्य घुट रहा है। राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक भवन ऐसी दशा में रहने योग्य नहीं रह गया। एक नयी जीवनशैली की आवश्यकता प्रत्यक्ष दिखायी देती है। अब आज के ही समाचार पत्र में निकला लेख ‘क्रान्ति के नये आयाम’ पढ़कर देखिये ने।” कहकर उसने सामने रखे अखबार की ओर इशारा किया। फिर कुछ पल रुककर पति के चेहरे की ओर देखते हुए बोली- “विश्व के जिस कोने में झाँकें, हर ओर से नये विचारों की भरमार दिखाई देगी, जो जनजीवन में घुसने के लिये उतारू हैं। यह सब क्रान्ति की उठती आँधी की सूचनायें नहीं तो और क्या हैं?़”
पत्नी के इस वैदूष्यपूर्ण शब्दों को पति आश्चर्यचकित हो सुन रहा था। डाइनिंग टेबल पर पड़े समाचारपत्र को उलटते-पलटते बोला- “हम लोगों को इसमें क्या? हम तो व्यापारी हैं।”
“तो क्या आप समझते हैं, समग्र परिवर्तन होने पर व्यापारिक नीतियाँ न बदलेंगी।”
“क्यों बदलने लगीं भला?”
“नहीं, जब लोग धन कमाने के लिये पागलों की तरह उतारू हो जाते हैं। जब लोग दो चार सालों में ही तमाम धनराशि बटोरते और उतनी ही शीघ्र खो बैठते हैं, ऐसी दशा में यह बात साफ हो जाती है कि उत्पादन और वितरण का नियंत्रण रखने वाली हमारी आर्थिक संस्थायें लड़खड़ाने लगी हैं। आज सारे विश्व में इसी वजह से विपन्न आर्थिक संकट गहराया हुआ है। इतना ही नहीं ऐसे में वह समाज को सुख-समृद्धि देने की जगह दुःख-दैन्य अधिक देने लगती है और समाज भला यह क्यों सहने लगा? नयी व्यवस्था-आर्थिक ढाँचे को नये सिरे से ढालने के लिये दौड़-धूप शुरू हो जाती है। है न यही बात?” कहकर सामने बैठे पति के चेहरे पर नजर दौड़ाई। कोई उत्तर न पाकर उसने नौकर को मेज पर रखे बर्तनों को उठा ले जाने के लिये इशारा किया और स्वयं कुछ सोचने लगी। पति नये चिन्तन को पाकर स्तब्ध थे। यों इनके विवाह को अभी बहुत दिन नहीं हुए थे। विवाह के पूर्व उनकी पत्नी की सामाजिक कार्यों के प्रति लगन, क्रान्तिकारी विचारधारा को देखकर उसके पिता चिन्तित हो उठे कि कहीं बेटी क्रान्तिकारी न हो जाये और उन्होंने उसका विवाह मुम्बई के एक धनी नवयुवक से कर दिया। उम्मीद थी शायद अतुल वैभव के प्रवाह में उसकी विचारणा बह जाये। पर कहाँ? उसके इसी क्रांतिकारी स्वभाव के कारण घर में सभी उसे सनकी समझते। जो वैभव की कीचड़ में रहते हुए भी कमल की तरह उससे अलग थी।
फेर-बदलकर एक ही बाधा थी, उसका नारी होना, किन्तु क्या नारी होना कोई अभिशाप है? नहीं, तो फिर महापरिवर्तन के इस पर्व पर नारी आगे बढ़कर हिस्सा क्यों नहीं ले सकती? जबकि वह समाज का आधा भाग है। विचारों का प्रवाह अविरल बह राह था कि यकायक सामने बैठे पति ने प्रश्न किया- “चुप क्यों हो गयी?”
“चुप तो आप हो गये, मैं तो यह सोच रही थी कि इन क्षणों में हम लोगों का भी कुछ कर्तव्य है। आखिर हम समाज से अलग तो नहीं हैं। होने वाले परिवर्तन से अछूते भी नहीं रह सकते। क्यों न उत्साहपूर्वक जन-चेतना को जाग्रत करने हेतु उठें?”
“किन्तु व्यापार, जीविकोपार्जन, यह कौन करेगा?”
“ऐसा नहीं हो सकता कि आप व्यापार संभालें और मैं लोगों में परिवर्तनकारी विचारों की सरिता बहाऊँ।”
“तुम!” कहकर उसने आश्चर्य से पत्नी की ओर देखते हुए कहा- “हद करती हो, लोग क्या कहेंगे? रुस्तमजी के परिवार की कुलवधू हाटबाट घूमे, यों ही डोलती फिरे।” सुनकर उसे ऐसा लगा जिस कुर्सी पर वह बैठी है वह धंस रही है। थोड़े ही समय में स्वयं को संभालते हुए बोली- “अगर आप बुरा न मानें तो एक बात कहूँ।”
“कहो।”
“काफी समय से पुरुषों ने समाज में अपना एकाधिपत्य बनाये रखा है। जब-जब उन्होंने नारी के विषय में कानून-मर्यादायें बनायीं तो उस समय वे पूरी तरह भूल गये कि पुरुष को पैदा करने वाली माता, स्नेह देने वाली बहिन और कोई नहीं नारी है। उन्हें सिर्फ इतना याद रहा कि वह खिलौना है, मन बहलाने का साधन, विलास की वस्तु जिसकी कोई आकाँक्षा, अस्तित्व, विकास कुछ नहीं है। क्या यह सच नहीं है?”
सुनने वाला अचकचाकर बोला- “नहीं.... नहीं- यह बात नहीं है।” पर कहने से क्या? शब्दों की सच्चाई उसके अन्तर को भेदती चली गयी।
“यदि नहीं है, तो महिलायें सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा क्यों नहीं ले सकतीं”।
वह सोचने लगा कथा तथ्यपूर्ण है। नारी और पुरुष सामाजिक विकास के दो गतिमान चरण हैं। प्रत्येक की अपनी विशेषताएं हैं। वह मुखर हो बोला- “तुम्हारा मत ठीक है। वर्तमान समय में आवश्यक हो गया है कि नारी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायें”
सुनकर उसे ऐसा लगा जैसे विश्व की सारी प्रसन्नता एक साथ आ जुटी हो। उसकी आँखों की चमक दूनी हो गयी। उल्लास भरे स्वर में बोली- “तो जन-चेतना के जागरण हेतु मैं सक्रिय हो सकती हूँ।”
“हाँ, मैं भी व्यापार से कुछ समय निकालकर अपनी भागीदारी निभाऊंगा।” जनजाग्रति हेतु क्रियाशील होने वाली यह महिला थी- भीकाजीकामा, जिनके प्रेरक कर्त्तृत्व ने अनेकों दिलों में देशप्रेम का तूफान ला दिया। उनके पति रुस्तमजीकामा बाम्बे क्रान्तिदल के संचालक हुए। यद्यपि 1936 में उन्होंने पंचभौतिक काय-कलेवर छोड़ दिया, किन्तु उनका कथन “क्रान्ति की सफलता नारी के बगैर नहीं” आज भी न केवल जीवन्त है, बल्कि पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सच है।
काया प्रकृति की देन है। वह लम्बी नाटी, कानी- कुबड़ी, लूली-लंगड़ी जैसी भी हो, भगवान का उपहार मानकर उस पर संतोष करना पड़ता है। बौनेपन को ही लें। यह शरीर का सामान्य स्वभाव नहीं है, इसलिये छोटे कद के कारण अक्सर लोग परेशान हो उठते हैं। इतने पर भी यह सत्य है कि दुनिया में कितने ही बौने उसे सहज रूप में लेकर हंसी-खुशी की जिन्दगी जीते है।
जनरल टॉमथंब की गिनती इतिहासप्रसिद्ध बौनों में होती है। उसका वास्तविक नाम चार्ल्सशेयरवुड स्ट्रेटॉन था। वह न्यूयार्क, अमेरिका का रहने वाला था। 5 महीने की उम्र में उसका वजन 4.86 कि.ग्रा. तथा कद 1 फुट 3 इंच था। इसके बाद उसमें 2 फुट 1 इंच की और बढ़ोत्तरी हुई, तत्पश्चात् वृद्धि रुक गई। इस प्रकार आजीवन वह 3 फुट 4 इंच का बना रहा।
न्यूयार्क में ‘बर्नम म्यूजियम’ नामक एक सर्कस कम्पनी थी। इसका मालिक पी.टी. बर्नम था। उसने जब टाँमथम्ब को देखा, तो उसे अपनी कम्पनी में 3 डॉलर प्रति सप्ताह के वेतन पर भर्ती कर लिया। इसके उपरान्त उसे स्टेज कार्यक्रम के लिए प्रशिक्षित किया जाने लगा। कुछ ही दिनों में वह इस कला में निपुण हो गया और तरह-तरह के कार्यक्रम देकर लोगों का मनोरंजन करने लगा। बाद में उसके आयोजन न्यूयार्क से बाहर अन्य शहरों में भी होने लगे। उसके करतबों की चर्चा जंगल की आग की तरह समस्त अमेरिका में फैल गयी और बड़ी संख्या में लोग उसके अभिनय देखने आने लगे। इससे पी.टी. बर्नम की आय कई गुनी बढ़ गयी। टाँम थम्ब उसके लिये सोने के अण्डे देने वाली थम्ब उसके लिये सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी साबित हुआ। इससे खुश होकर बर्नम ने उसका वेतन 3 डॉलर से बढ़ाकर 25 डॉलर प्रति सप्ताह कर दिया।
टॉमथम्ब ने एशिया एवं यूरोप के कई देशों की यात्राएं कीं और नाम कमाया। इनमें भारत, जापान, आस्ट्रेलिया, मिश्र, इटली, फ्राँस, ब्रिटेन, बेल्जियम तथा स्पेन प्रमुख हैं। इन देशों में जाकर उसने अनेक कार्यक्रम किये और प्रचुर धन कमाया। वह वहाँ के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञों, धनपतियों एवं शाही परिवार का अतिथि बना और ढेर सारे उपहार प्राप्त किये।
सन् 1869 में उसने भारत सहित अन्य एशियाई देशों का भ्रमण किया। भारत में दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता जैसे शहरों में उसके प्रोग्राम हुये। वह बनारस भी गया और वहाँ काशी नरेश का मेहमान बना। राजा ने टाँम थम्ब को उपहारस्वरूप एक शिकारी हाथी प्रदान किया। मिश्र के शासक ने उसे अपनी निजी ट्रेन दी। इसके अतिरिक्त आस्ट्रेलिया के शासक फ्राज जोजफ, इटली के बादशाह विक्टर इमेनुअल और वहाँ के पोप भी टाँम थम्ब के आतिथेय बने, सबने महंगी भेंटें दीं।
इससे पूर्व उसने अन्य अनेक यूरोपीय देशों की यात्रायें कीं। बर्नम के साथ वह इंग्लैण्ड गया। वहाँ अपने कारनामों से धूम मचा दी। इसके पश्चात् वहाँ के अनेक प्रतिष्ठित लोगों ने उसे दावत पर आमंत्रित किया। वह महारानी विक्टोरिया का भी मेहमान बना एवं बहुमूल्य उपहार प्राप्त किये। इंग्लैण्ड से वह फ्राँस गया। वहाँ सम्राट लुई फिलिप का विशिष्ट आतिथ्य ग्रहण किया। कीमती सामान मिले। अन्त में स्पेन पहुँचा। वहाँ महारानी ईसाबेला ने थम्ब और बर्नम का बड़े उत्साह के साथ स्वागत किया।
तदुपरान्त दोनों स्वदेश लौट आये। सन् 1847 में टॉमथम्ब ने तत्कालीन राष्ट्रपति पोल्क से ह्वाइट हाउस में भेंट की। सन् 1863 में उसकी शादी लैविनिया नामक एक वामन लड़की से हो गई। लैविनिया का मद 81.28 से.मी. (2 फुट 8 इंच) और वजन 13.15 कि.ग्रा. था। उक्त विवाह में करोड़पति व्यक्ति से लेकर प्रशासनिक अधिकारी तक सम्मिलित हुए थे। तत्कालीन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने भी उस वामन दम्पत्ति को अनेक उपहार भिजवाये थे।
अन्ततः सन् 1883 में थम्ब की मृत्यु एक दुर्घटना में हो गयी। तब उसकी उम्र 45 वर्ष थी और वजन 32 कि.ग्रा.। इसके बहुत समय बाद तक लैविनिया जीवित रही। सन् 1919 में जब वह मरी, तब उसकी आयु 78 वर्ष की थी।
बौनों के इतिहास में इंग्लैण्ड के जेफरी हडसन का स्थान अत्यन्त उल्लेखनीय है। उसका जन्म सन् 1619 में इंग्लैण्ड के एक कस्बे में हुआ था। हडसन के माता-पिता औसतन ऊंचाई के थे, किन्तु हडसन का कद 16 वर्ष की वय में भी मात्र 8 इंच था। वह एक सिपाही और जासूस था।
अपने ठिगनेपन के कारण वह कोई भारी-भरकम कार्य कर पाने में असमर्थ था। इसे देखते हुए उसके पिता ने उसको बर्किंघम के ड्यूक की पत्नी की सेवा में प्रस्तुत किया। काफी समय तक वह वहाँ बना रहा।
एक बार इंग्लैण्ड के सम्राट-चार्ल्स प्रथम और महारानी मारियाड्यूक के यहाँ भोज पर बुलाये गये। खाने के दौरान एक बड़ी मर्तबान पेश की गई। जब उसका ढक्कन उठाया गया, तो उसमें से हडसन बाहर निकला। उसके आकार -प्रकार और व्यवहार से महारानी बहुत प्रभावित हुईं और उसको अपने साथ राजमहल ले गईं। इसके बाद वह स्थायी रूप से वहीं रहने लगा।
इंग्लैण्ड में जब गृहयुद्ध छिडा़, तो कहते हैं कि राजकीय घुड़सवार दस्ते में वह भी सम्मिलित था। महारानी मारिया को सन् 1644 में फ्राँस भागना पड़ा, तब उनके साथ हडसन भी था। एक बार वह समुद्री जहाज में सवार होकर कहीं जा रहा था कि तुर्की के समुद्री डाकुओं ने उस जहाज को लूट लिया। सम्पत्ति के रूप में उन्हें हडसन भी हाथ लगा। डाकुओं ने भारी कीमत में उसे बेच दिया। स्वतंत्र होने पर वह फिर इंग्लैण्ड जा पहुँचा। वहाँ उसे ड्यूक ऑफ बर्किंघम की ओर से अच्छी धनराशि वजीफे के रूप में मिलने लगी।
हडसन रोमन कैथोलिक सम्प्रदाय से संबद्ध था, अस्तु उसे सन् 1679 में ‘पोप षड्यन्त्र’ में सम्मिलित होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया, किन्तु शीघ्र ही छोड़ दिया गया। शाही रिकार्डों से ज्ञात होता है कि जेफरी हडसन को कैप्टन की हैसियत से सम्राट की खुफिया सेवा की ओर से भारी वेतन मिलता था। उसके अनेक वस्त्र इंग्लैण्ड के ऐश मोलीन संग्रहालय में अब भी सुरक्षित हैं।
रिचर्डगिब्सन इंग्लैण्ड के शाही परिवार का बौना चित्रकार था। उसका जन्म सन् 1675 में कोम्बरलैण्ड में हुआ था। जब उसकी आयु 30 वर्ष थी, तब उसका कद 3 फुट 10 इंच और वजन 25 कि.ग्रा. था। आरम्भ में वह मोर्टलेक की एक धनवान महिला के यहाँ नौकर नियुक्त हुआ। चित्रकला के प्रति उसकी गहरी रुचि थी। इस बात का पता जब उसकी स्वामिनी को लगा, तो उसने उसके लिये एक शिक्षक की व्यवस्था कर दी, जो उसे नियमित रूप से इसका प्रशिक्षण देता था। बाद में हडसन की तरह गिब्सन भी चार्ल्स प्रथम के दरबार में पहुँच गया। जहाँ उसे सर पीटरलिली जैसे प्रसिद्ध चित्रकार से पुनः प्रशिक्षण प्राप्त हुआ।
शाही महल में नैन्सी नामक एक ठिगनी लड़की भी थी। वह महारानी की विशिष्ट परिचारिका थी। गिब्सन और नैन्सी ने आपस में विवाह कर लिया। विवाह की सारी व्यवस्था शाही दरबार की ओर से हुई। इस बौने जोड़े ने हंसी-खुशी का जीवन जीते हुए कई शासकों का शासनकाल देखा।
दोनों ने सामान्य व्यक्ति की तरह लम्बी जिन्दगी जी। सन् 1690 में जब गिब्सन की मौत हुई, तब वह 74 वर्ष का था। नैन्सी उसके बाद अनेक वर्षों तक जीवित रही। सन् 1709 में अन्ततः 89 वर्ष की उम्र में उसका देहान्त हुआ। उनके 9 संतानें थीं। सभी औसतन कद की थीं। कोई भी माता पिता पर नहीं गयीं।
रिशबोर्ज फ्राँस का नन्हा जासूस था। उसकी लम्बाई मात्र 1 फुट 5 इंच थी। आरम्भ में वह फ्राँस के एक ड्येक की पत्नी की सेवा में नियुक्त था। बाद में वह फ्राँसीसी सम्राट के लिये कार्य करने लगा। फ्राँसीसी क्रान्ति के दौरान उसने राजा के लिये महत्वपूर्ण कार्य किये। इनमें सबसे प्रमुख उसके द्वारा की गई जासूसी थी। जब वह जासूसी करता तो, अबोध बच्चे की तरह एक महिला की गोद का सहारा लेता। महिला उसे गोद में उठाये पेरिस आती-जाती। उसके वस्त्रों में गुप्त संदेश होते। इन संदेशों को वह वाँछित व्यक्ति तक पहुँचाता और उससे उसके संदेश एवं अन्य प्रकार के महत्वपूर्ण सूत्र प्राप्त करता। जब वह सेवामुक्त हुआ, तो उसके उल्लेखनीय कार्यों के लिये पेंशन दी जा रही। रिशबोर्ज की मृत्यु सन् 1858 में 90 वर्ष की वय में हुई।
सन् 1933 के आरंभिक दिनों में जर्मनी के रिंगलिंग ब्रदर्स के सर्कस में एक अत्यन्त बौनी महिला ने अपने अजीबोगरीब कारनामों से धूम मचा रखी थी। उसकी सम्पूर्ण लम्बाई 21 इंच और उसका नाम लियाग्राफ था। बाद में जब जर्मनी में हिटलर के नेतृत्व में नाजी सरकार सत्ता में आई, तो वहाँ के जासूसी संगठन ‘गेस्टापो’ ने उसे बन्दी बना लिया। आरोप यह था कि वह एक आवारा महिला है, जबकि उसका वास्तविक अपराध उसका यहूदी होना था।
संसार की सर्वाधिक ठिगनी महिला लूसिया जारैट थी। सानकार्लोस, मैक्सिको में जब वह पैदा हुई, तब उसका वजन मात्र 226.8 ग्राम था और कद केवल 7 इंच। वयस्क होने पर उसकी लम्बाई में सिर्फ 12 इंच की और वृद्धि हो सकी। उसकी भुजाओं की लम्बाई 8 इंच और कमर मात्र 4 इंच थी। वजन लगभग 2.28 कि.ग्रा. था। अत्यंत मिनी शरीर प्राप्त करने के बावजूद वह शरीर से बिलकुल स्वस्थ थी। वह एक सर्कस की कलाकार थी। जब वह 26 वर्ष की थी, तो एक ट्रेन दुर्घटना में मारी गयी।
बौनों में जाँनी रोवेन्टाइन की आवाज सबसे आकर्षक और मधुर थी। वह न्यूयार्क का रहने वाला था। जब 20 वर्ष का था, तो एक विज्ञापन कम्पनी की मालिक मिल्टन ब्यू ने न्यूयार्क के एक होटल में उसकी सुरीली आवाज सुनी। वह उससे बहुत प्रभावित हुआ और 20 हजार डॉलर वार्षिक का अनुबंध कर लिया। वह अपने विज्ञापनों में उसकी चित्ताकर्षक आवाज का इस्तेमाल करने लगा। इससे उसे कई गुना मुनाफा हुआ। जॉनी अपनी जान से भी कीमती अपनी आवाज को मानता था, इसलिये उसका बीमा करा रखा था। उसका कद 47 इंच और वजन 22.24 कि.ग्रा. था।
मिचेल वार्विकशायर, इंग्लैण्ड का रहने वाला था। वह लगभग तीन फुट का था। एक बार उसके साथ बड़ी रोचक घटना घटी। मछली का शिकार करना उसका सबसे बड़ा शौक था। एक बार टेम्स नदी में वह मछली पकड़ने गया। संयोग से एक बड़ी मछली उसकी बंसी में फंस गयी। जो मछली फंसी, उसका वजन लगभग 7 किलो जितना था, जबकि मिचेल का अपना भार कुल 15 किलो था। वह मछली का निकालने का प्रयास करता और मछली उसे अपनी ओर खींचती। इसी खींचतान में वह नदी में जा गिरा। दैवयोग से तभी उधर से एक राहगीर गुजर रहा था। उसने मिचेल को नदी में गिरते देख लिया और उसकी प्राण- रक्षा की।
बौनों पर अब तक कई पुस्तकें लिखी जा चुकी है, पर जितनी प्रसिद्धि जोनाथन स्विफ्ट की रचना ‘गुलिवर्स ट्रैवेल’ को मिली, उतनी शायद ही किसी अन्य को मिनी हो। उसमें ‘लिलीपुट’ नामक जिस वामनलोक का वर्णन है, वह काफी रोचक है। उसी की तर्ज पर बीसवीं सदी के प्रारम्भ में कोनी आइलैण्ड के समीप ठिगनों का एक नगर बसाया गया, उसका भी नाम लिलीपुट रखा गया। लिलीपुट की बौनी संरचनाओं में एक थियेटर, फायरहाउस एवं एक मा था। इसके अतिरिक्त अनेक निजी मकान थे। अनेक छोटे-छोटे प्ले ग्राउण्ड, वाहन एवं उथले गड्ढों जैसे स्वीमिंग पुल को देखकर ऐसा लगता था, मानो सचमुच ही अपने विश्व से यह कोई अलग ही लोक हो। यद्यपि वहाँ तीन सौ बौनों के रहने भर की ही व्यवस्था थी, पर उसे देखकर बड़ा अद्भुत अनुभव होता था। संसार के प्रसिद्ध बौने अक्सर वहाँ घूमने-फिरने जाया करते थे। इनमें न्यूयार्क के जनरल टॉमथंब की पत्नी लेविनिया एवं उसका दूसरा पति काउण्ट प्राइमोमैगरी प्रमुख थे। दोनों अपना अधिकाँश समय यहीं गुजारा करते। बौनों की यह नगरी दुनिया के आकर्षण का केन्द्र थी पर दुर्भाग्यवश 27 मई, 1911 में यह जलकर नष्ट हो गया।
सन् 1933 में अमेरिकी प्रोग्रेस मेले का शताब्दी समारोह मनाया जाना था। इसके लिये आयोजकों ने एक अनोखी युक्ति सोची। उन्होंने यूरोप भर के सारे बौनों को उस अवसर पर एकत्रित किया। देखने पर ऐसा प्रतीत होता था, जैसे बौनों का ही यह काई शहर हो। सन् 1939 के न्यूयार्क विश्व मलेन में एक बार पुनः यही दृश्य उपस्थित हुआ। मेले में ठिगने सर्वाधिक संख्या में देखे गये।
फ्राँस के मूर्धन्य मनीषी ज्याँ पाँल सार्त्र ने अपने एक संस्मरण में पेरिस के एक ऐसे परिवार का उल्लेख किया है, जिसमें सात पीढ़ियों में लोग बौने होते आ रहे हैं। उन्होंने लिखा है कि उक्त परिवार के सभी सदस्य तीन से साढ़े तीन फुट के बीच के हैं। जब वे सब एक स्थान पर एक साथ इकट्ठे होते हैं, मानो बालकों का कोई झुण्ड किसी विशेष प्रयोजन के लिये एकत्रित है। उनके पूर्वज सामान्य कद-काठी वाले थे, किन्तु उसके बाद सात पीढ़ियों में परिवार का कोई भी सदस्य औसत कद नहीं प्राप्त कर सका।
वमन नगरी की चर्चा में यदि रूस के जार पीटर द्वारा पीटर्सबर्ग के समीप बसाये गये शहर का उल्लेख न हो, तो वर्णन अधूरा माना जायेगा। उक्त शहर की आबादी ढाई सौ के करीब थी और वहाँ सामान्य लम्बाई वाले लोगों का बसना निषिद्ध था। इस नगरी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यहाँ क्रेता-विक्रेता, उत्पादक और उपभोक्ता सभी बौने थे। जार की आरे से यहाँ के निवासियों को अनेक सुविधायें मिली हुई थीं।
पीटर का प्रियपात्र वँलकोफ नामक एक बौना था। उसने राजकुमारी (जारेण्ना) थ्योडोरुना की एक बाँदी से शादी कर ली। इस शादी में जार ने व्यक्तिगत रुचि दिखायी और विवाह का सारा प्रबन्ध स्वयं अपने हाथों में ले लिया। विवाहोत्सव के लिये उसने बौनों के एक बड़ा समुदाय को एकत्रित किया। यह समुदाय विवाह-जुलूस के रूप में विवाहित जोड़े के आगे-आगे चल रहा था। उसके पीछे जार और नवदंपत्ति था। विवाहोपरान्त भोजन की व्यवस्था थी। इसमें गणमान्य अतिथि आमंत्रित थे। अतिथियों में अनेक बौने भी थे। प्रीतिभोज का प्रबन्ध भी आकर्षक था। बड़े कद के मेहमानों को बड़े कद के मेजबान मिले और छोटे कद के मेहमानों को ठिगने मेजबान। उनके लिये छोटे आकार के बर्तनों को भी विशेष रूप से व्यवस्था की गयी थी।
प्रायः शासनसत्ता और राज्यव्यवस्था जैसे जटिल कार्य औसत ऊँचाई वाले लोगों के ही हाथों होते है, पर लीदिया के बौने बादशाह क्रोसस और अत्तिला का प्रसंग कदाचित इस क्षेत्र में अपने प्रकार का अकेला ही है। अत्तिला के बारे में ऐसा कहा जाता है कि उसने करीब 5 लाख सैनिकों की विशाल वाहिनी का नेतृत्व किया था। दोनों कुशल शासक थे।
पुराने जमाने में उच्च घरानों में बौनों को रखने का विशेष रिवाज था। तब यह प्रतिष्ठासूचक माना जाता था, सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में यह शौक काफी बढ़ गया और सम्पूर्ण यूरोप में अभ्यागतों के स्वागतार्थ बौनों को रखने की प्रथा आम हो गयी। कई देशों में यह प्रचलन 19 वीं शताब्दी तक जारी रहा।
ऐसा उल्लेखनीय मिलता है कि रोमन सम्राट अपने दरबार में बौने रखा करते थे। रोमन साम्राज्य की नींव रखने वाले राजा आगस्टस के बारे में कहा जाता है कि उसने बाद के उत्तराधिकारियों के लिये बौने रखने की परम्परा एक प्रकार से अनिवार्य ही कर दी थीं अपने शासन के दौरान उसने यह निर्देश जारी किया था कि जहाँ कहीं बौने मिलें, उन्हें दरबार में प्रस्तुत किया जाये बौनों को पालने और इकट्ठा करने की प्रवृत्ति सनक स्तर पर वहाँ के एक अन्य शासक डोमेट्सियन में भी थी।
प्राचीन रोम में बर्तनों की खरीद-फरोख्त का धन्धा अत्यन्त लाभदायक व्यापार समझा जाता था। तब उनकी ऊँची कीमतें मिलती थीं। अतएव बच्चों को ठिगना रखने का एक व्यवसाय ही चल पड़ा था। उन्हें एक विशेष प्रकार की दवा की खुराक खिलायी जाती। इससे उनकी वृद्धि रुक जाती और वे बौने हो जाते। यह एक प्रकार से मनुष्य की पैशाचिक प्रवृत्ति कही जा सकती है, जो आज ‘बोंसाई’ पौधों के शौक के रूप में दिखायी देती है।
शरीर से बौनापन एक अजूबा जरूर है, पर हमारे चिन्तन और व्यवहार में बौनापन न दीखे, इसी में मनुष्य की गरिमा है। चिन्तन और कर्तृत्व का बौनापन आदमी को अधोगामी बनाता तथा पशुस्तर तक नीचे गिराता है यह शारीरिक ठिगनेपन से भी अधिक दुःखदायी स्थिति है, कारण की इसमें जीवात्मा पर मलीनताओं का ऐसा और इतना बोझ बढ़ता है कि उसे हटाने-मिटाने में जन्म-जन्मान्तरों जितना समय लग जाता है। इस भार के न रहने पर इतनी अवधि में कदाचित वह चरम लक्ष्य को प्राप्त कर लेती, पर इसके कारण जन्म-मरण के चक्र में ही आबद्ध रहकर बार-बार उसको इस संसार में आना पड़ता हैं अपने अन्तःकरण के बौनेपन को दूर करके मुक्ति का लक्ष्य शीघ्र पाया जा सकता है। उसमें यदि हिमालय जितनी विशालता हो, तो काया का ठिगनापन महत्वहीन बन जाता है।
25 जनवरी, 1960 की रात को राष्ट्रपति राजेन्द्रप्रसाद जी की बड़ी बहिन भगवती देवी का निधन हो गया। भगवती देवी राजेन्द्रबाबू के लिये माँ भी थीं और बहिन भी। वे ही एकमात्र घर की ऐसी सदस्य थीं, जो उन्हें उनके अदम्य आदर्शवाद और नरमी के लिए डाँट सकती थीं। भाई-बहिन के दृष्टिकोण में बड़ा अन्तर था, पर दोनों में था प्रगाढ़ स्नेह। बहिन यथार्थवादी थीं, भाई का मानव की नेकनीयती में अटूट विश्वास था। परन्तु दोनों ममता के बंधन में बंधे हुये थे। बहिन की मृत्यु से उन्हें इतना सदमा पहुँचा कि वे दख से बेसुध होकर रातभर मृत्युशैय्या के निकट बैठे रहे।
रात के आखिरी पहर में घर के किसी सदस्य ने उन्हें स्मरण कराया कि कल 26 जनवरी है और भारतीय गणतंत्र की दसवीं सालगिरह का दिन है, जिसमें उन्हें राष्ट्रपति की हैसियत से सलामी लेनी है। इतना सुनते ही सार्वजनिक कर्त्तव्य के निजी दुख को जैसे ढंक लिया।
अगले दिन वे सलामी की रस्म के दौरान घन्टों तक खड़े रहे। उनके चेहरे पर न दुख की रेखा थी, न थकान की क्लान्ति। सलामी की रस्म के उपरान्त वे घर लौटे बहिन की अंत्येष्टि के लिये अरथी के साथ यमुना तट तक गये। इसी कर्तव्यपरायणता ने तो बाबू राजेन्द्रप्रसाद जी को सबसे अधिक चाहा जाने वाला जनता का राष्ट्रपति बनाया।
“जीवन क्या है भगवान?” प्रश्न ने सभी उपस्थितजनों के चित्त को अपनी ओर खींच लिया। कभी वे भोजन कर चुके तथागत के तेजस्वी चेहरे की ओर देखते, कभी प्रश्न पूछने वाली के मुख की ओर, जिसमें गर्व और श्रद्धामिश्रित भाव थे। पहले के ढलने के साथ दूसरी की चमक बढ़ती जा रही थी।
सचमुच इस पहेली ने कभी-न-कभी हर किसी के मन में उलझन पैदा की है। किसी-न-किसी क्षण हरेक के मन को मथा है, पर नवनीत बिरलों को मिला है। रहस्य की अनुभूति कम ही कर पाये हैं।
तथागत ने एकबारगी सभी की ओर देखा, लगा जैसे उनके अन्तर की उथल-पुथल को पढ़ रहे हों। फिर शान्त स्वर में कहा- “जीवन एक प्रवाह है।” “पर कौन-सा प्रभु? सूत्रमयी भाषा के मर्म को समझ पाना हर किसी के बूते की बात नहीं। प्रवाह यह भी है और वह भी। आपके जीवन की धारा भी गतिमान है और मेरे जीवन की भी। गति में साम्य होते हुए भी दिशा में विरोध है। फिर किस जीवन की यथार्थता समझा जाये?” “प्रवाह का ऊर्ध्वमुख होना यथार्थता है और अधोमुख होना आभास।” बुद्ध ने ठहरकर वाणी को गति दी। “मुर्दे सड़ते हैं, गलते हैं, विषैले कीटाणुओं को बिखेरते हैं, वातावरण को प्रदूषित करते और अनेकों को अपना जैसा होने के लिये प्रेरित करते हैं, पर यह जीवन नहीं है, प्रचलन नहीं है। विवेक का अवलम्बन लेना होगा। प्रचलन तो ऊपर से नीचे गिरने का दिखायी पड़ता है। आकाश में विचरने वाली उल्कायें प्राणविहीन हो जमीन पर आ गिरती हैं। हिमशिखरों की बर्फ पिघलकर गहरे गड्ढे वाली नदी बनकर खारे समुद्र में जा मिलती है। यह है संसार का अधोमुख प्रवाह, जिसका अनुसार करने वाले अधोगामी चिन्तन और प्रयास अपनाते हैं। परन्तु अग्नि की तरह कुसंस्कारों, कल्मषों को तहस-नहस कर धधकती ज्वाला का रूप ले ऊर्ध्वमुख प्रवाहित होने का नाम ही जीवन है।”
सुनकर सभी चेहरे फक पड़ गये। तथागत के इस कथन ने उन्हें सोचने पर विवश किया कि वे जिन्दा है अथवा जीवित मुर्दा। “पर क्या मुर्दे भी जीवित हो सकते हैं- प्रभु!” जैसे तैसे साहस जुटाकर उसने अगला प्रश्न किया।
“हाँ, अवश्य।”
“पर किस प्रकार?” स्वर में उत्साह था।
“जीवितों प्राण प्रवाह से जुड़कर। संघर्ष के मंत्र में दीक्षित होकर। उल्टे को उलट कर सीधा करने का बीड़ा उठाकर, पशुता की ओर से मुख मोड़कर। वासना, तृष्णा, अहन्ता से पल्ला छुड़ाकर देवत्व की ओर बढ़ चलना ही एकमात्र उपाय है।” “किन्तु मेरी स्थिति तो एक विवश की सी है।” क्या इनसे उबर पाना संभव है?” पहला प्रश्न पूछने वाली देवी ने कहा।
“विवशता नहीं मोह कहो- देवी! संसार में विवशता कहीं भी लेशमात्र नहीं है। हम स्वयं ही अपने को मोह की जंजीरों से जकड़ने और बाद में विवश होने का दिखावा करते हैं। जंजीरें सोने की हों या लोहे की, बाँधती दोनों ही है। इन्हें खोले बिना त्राण नहीं। खोलने का नाम ही संघर्ष है। संघर्ष की शुरुआत जीवन की शुरुआत है।”
संघर्ष! संघर्ष!! संघर्ष!!! शब्द हथौड़े की तरह उसके कानों में बजने लगें। जैसे एक नवीन प्राण प्रवाह उसकी रग-रग में प्रवाहित हो रहा था। अतीत के दृश्य एक-एक करके आँखों में तैरने लगे।
वैशाली जनपद की नगरवधू धन और सम्मान, वैभव और विलास। अधिकतम जिसे संसार चाहता है- सभी कुछ तो मिला उसे। पर क्या कभी तृप्ति मिली है? नहीं। शान्ति मिली? नहीं। उसके एक इशारे पर कितने ही अपनी जान न्यौछावर करने को तैयार हो जाय, किंतु अंतर्मन की जलन क्या कभी शान्त हुई? नहीं। वह अपने आप में बुदबुदायी। वह सुखद क्षण था।जब उसके मन में भगवान बुद्ध को निमंत्रण देने का विचार आया। कितना अंतर्द्वंद्व उठा था मन में। एक तीव्र संघर्ष ही तो था। सही कहते हैं भगवन्- संघर्ष ही जीवन है। सचमुच अभी तक वह मृत्यु थी, अब जी उठी है। प्रभु ने मृत संजीवनी जो प्रदान की। प्रभ सामने बैठे मुस्कुरा रहे थे।
“सचमुच में मृत्यू थी?” भगवन् आपने मुझे जीवन दिया। अब एक और कृपा करें।”
“निःसंकोच कहो।”
बोल पड़ी आम्रपाली- “कर्तव्य समझायें।”
“ संघर्ष की मृत संजीवनी औरों को प्रदान कर। मुर्दों में नवजीवन का संचार कर। सब जी उठेंगे। संघर्षशीलता, उमगने- पनपने, विकसित होने भर की देरी है।”
“ तैयार हों- भगवन्। आप मुझे प्रव्रज्या देने की कृपा करें।” आम्रपाली का स्वर था।
तथागत ने आनन्द की ओर देखा। आनन्द ने अपना उत्तरीय उतार कर आम्रपाली को भेंट किया। क्षण भर के लिए वह भीतर गयी, पर दूसरे ही क्षण वह उसी उत्तरीय वह धारण किये सामने आयी। कंजूक और कौशेय, आभूषण और श्रृंगार कुछ भी नहीं था। उसके नेत्र सजग थे। उसमें आकर अर्हन्त बुद्ध के चरणों में मस्तक रखा। बुद्ध ने सिर पर हाथ रखकर कहा- “उठ कल्याणी! जाकर द्वार-द्वार बता कि जीवन क्या होता है? अपनी स्वयं की अनुभूति को सभी से कह। सभी को इस रहस्य का बोध करा कि जीवन प्रवाह को किस तरह मोड़ा जाता है।”
वह बोल उठी “प्रभु। आज से और अभी से सम्पदा का कण-कण धर्म कार्य के लिये समर्पित है। सप्तभूमि प्रसाद जन जागृति के केन्द्र के रूप में विकसित हो- यही कामना है।”
“अवश्य पूरी होगी।” तुमने अपनी सम्पत्ति और समय को मानवहित में नियोजित कर युग धर्म को पूरा किया है। सही अर्थों में जीवन क्या है? तुम आचरण द्वारा बता सकोगी।”
बुद्ध के धर्मसंघ की वह प्रथम परिव्राजिक बनी। लोगों उसे संघर्ष की देवी के रूप में जाना। इस तरह मोड़ी जाती है जीवन की धारा- वैशाली के नागरिक आज प्रत्यक्ष रूप से देख रहे थे। उस पुण्यघड़ी से अन्तिम श्वाँस तक वह युगावतार का सन्देश देती रहीं। समाज ने अपमानित, तिरस्कृत किया, किन्तु एक दिन सभी ने उनकी प्रामाणिकता स्वीकार की। संघर्ष से परिवर्तन का मर्म समझा व नवीन जीवन की ओर अग्रसर हुये।
समस्त सृष्टि को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। उसका दो दृश्यमान स्वरूप है, जिसे इन्द्रियाँ देखती एवं अनुभव करती हैं। तथा यंत्रों के माध्यम से जिसकी प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त की जाती है- यह उसका विज्ञान पक्ष है। पदार्थ वेत्ताओं के शोध अनुसंधान यहीं तक सीमित होते हैं। इसे ‘पदार्थ विज्ञान’ कहते हैं, शास्त्रीय भाषा में कहना हो तो यही ‘परा’ प्रकृति है। इसका दूसरा वर्ग ‘अपरा’ प्रकृति कहलाता है। यह विशुद्ध चेतना का विषय है। पिछले दिनों तक विज्ञान वेत्ता संसार को उसके गोचर स्वरूप तक ही परिमित मानते थे, पर अब उसकी व्याख्या विवेचना में व अब कहते सुने जाते हैं कि पदार्थ मात्र अणुओं की हलचल की प्रतिक्रिया भर नहीं उससे आगे भी और कुछ है। यह एक प्रकार से उसके ‘अपरा’ स्वरूप को ही अंगीकार करना हुआ।
प्रकृति के इस अपरा स्वरूप की चर्चा यदि बोलचाल की भाषा में करनी हो, तो इसे ‘सूक्ष्म जगत’ कहेंगे। विज्ञान की गति अब इस क्षेत्र में भी होने लगी है और अब वह इस क्षेत्र की हलचलों की आणुविक गतिविधियाँ कह कर नहीं टालता, न ही ताप, प्रकाश शब्द के कम्पनों से उसकी तुलना करता है, वरन् इस क्षेत्र की हलचलों को अब समष्टिचेतना के नाम से पुकारता और उल्लेख करता है। बल्ब में जलने वाली बिजली और प्रकाश अब कोई पृथक तत्व नहीं रहे, अपितु अंतरिक्ष में विद्यमान विद्युत शक्ति की ही एक चिंगारी समझी जाती है एवं दोनों का सघन सम्बन्ध स्वीकार किया जाता है। यही बात अब व्यष्टि के संबंध में लागू समझी जाती है और व्यष्टि चेतना समष्टि चेतना का ही अंग अंश समझा जाता है। व्यष्टि चेतना को एक चिंगारी और समष्टि चेतना को व्यापक अग्नि के समतुल्य माना जाने लगा है।
वैयक्तिक चेतना विश्वव्यापी समष्टि चेतना का ही एक अंग है। व्यक्ति के अन्दर उसके निजी क्रिया-कलापों, चिन्तन, विचारणा, भावना, आकाँक्षा तक तो वह स्वतंत्र है, किन्तु इसके आगे उस पर समष्टि चेतना का अंकुश है। इस समष्टि चेतना को विज्ञान क्षेत्र में ब्रह्माणी चेतना नाम दिया गया है इस तथ्य को व्यक्ति और समाज के उदाहरण से भी भली-भाँति समझा जा सकता है। व्यक्ति समाज का ही एक अविच्छिन्न अंग है। वह समाज से अलग नहीं रह सकता। एकाकी रहने लगे, तो भी वह समाज से पृथक होने का दावा नहीं कर सकता। उसे अब तक जो ज्ञान, अनुभव, संस्कार, कौशल मिला है, जो शरीर पोषण प्राप्त हुआ है, सबके लिये वह समाज का ही ऋणी है। यदि वह नितान्त एकान्त में रहने लगे, संन्यासी बनकर गिरिकन्दराओं में जीवन व्यतीत करने लगे, तो भी उसे निर्वाह के लिये कुछ उपकरण साथ रखने ही पड़ेंगे। माला, कमण्डलु, कौपिंग, कुल्हाड़ी जैसी साधनों के बिना तो संन्यासियों के भी काम नहीं चलता। अंग्रेज समाजशास्त्री ई- डब्लूमैकी अपने ग्रंथ ‘सोसल मैन इन ऐन अनसोसल कल्चर’ में इस तथ्य को दृढ़ता के साथ प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य जब तक एकाकी रहा, तब तक वह आदिम जंगली स्थिति में रहा। उसका सामाजिक जीवन आरम्भ करना ही मनुष्य की प्रगति यात्रा का पहला चरण था। इस प्रकार एकान्तवासी कहलाने वाले का भूतकालीन और वर्तमान क्रिया कलाप निश्चित था अनिवार्य रूप से समाज के साथ जुड़ा रहता है तथा आगे भी यथावत बना रहेगा।
यों तो व्यक्ति स्वतंत्र इकाई प्रतीत होता है पर उसकी यह स्वतंत्रता एक सीमा तक ही है। उससे आगे उसे समाज की सहायता प्राप्त करनी ही पड़ेगी। भारतीय समाज विज्ञानियों का कथन है कि मनुष्य समाज से भी पृथक नहीं रह सकता। पृथक रहने वाला या तो पशु होगा या देवता। मनुष्य न ताक पशु है न देवता, इसलिये उसे सामाजिक संरचना के अंतर्गत ही अपना निर्वाह और विकास करना पड़ता है तथा उससे अविच्छिन्न रूप से सम्बन्ध रखना पड़ता है। ठीक इसी प्रकार व्यष्टि चेतना स्वतंत्र भले ही दिखायी दे, वह है समष्टि चेतना का ही एक अंग। लोक रुचि और लोक मान्यताओं के बदलते रहने का यही कारण है। लोगों का चिन्तन प्रवाह अपने में प्रायः एक ही दिशा में होता है। मनस्वी और स्वतंत्र चिन्तक हर समय अपवाद स्वरूप हुए हैं, परन्तु सामान्यतः लोकचिन्तन के प्रवाह की धारा एक ही दिशा में बहती है। युद्ध और शान्ति के दिनों में इस तथ्य को बड़ी आसानी से साकार हुआ देखा जा सकता है। अपने समय में पूर्वजों के कथन का प्रमाणित मान लेने की श्रद्धा अब उखड़ रही है तथा तर्क और प्रमाणों पर आधारित बुद्धिवाद को मान्यता मिली है। किसी जमाने में त्याग,बलिदान और आदर्शवादिता अपनाने में एक दूसरे के बीच प्रतिस्पर्धा चलती थी और इस क्षेत्र में जो जितना सफल होता था वह उतना ही गौरव अनुभव करता था। अब उससे सर्वथा भिन्न स्थिति है। इस समय विलासिता ही धर्म है। संग्रह, उपभोग और पद प्रदर्शन के प्रलोभन भूत हर मस्तिष्क पर छाया हुआ है। इसी प्रवाह को लोकमानस कहा जा सकता है। समय पर कई तरह के फैशन, कई तरह के व्यसन, कई तरह की परम्परायें बनती है। तथा कालान्तर में उसका स्थान नये फैशन, व्यसन और प्रचलन ले लेते हैं। जन सामान्य इस प्रवाह में अनजाने ही बहने लगते हैं।
ब्रह्मांडीय चेतना के अस्तित्व और उसके व्यक्ति चेतना के साथ सम्बन्धों व आदान प्रदान की बात अब दिनोंदिन स्पष्ट होती जा रही है तथा उसे प्रमाणित माना जा रहा है। मनुष्य के अचेतन मन को अत्याधिक अद्भुत और रहस्यमय होने की बात तथ्यरूप में स्वीकार कर ली गयी है। चेतन मन की बुद्धि क्षमता इसकी तुलना में अति तुच्छ है। इसी प्रकार अंतरिक्ष में मनुष्यों के छोड़े हुए विचार और उनके आदान-प्रदान की जानकारी भी ऐसे ही उथली और कम महत्व की समझे जानी लगी है और रहस्यमय उस प्रभाव को माना जाने लगा है, जो सृष्टि की अचेतन चेतना से सम्बन्ध है।
साधारणतया शरीर चेतना जीवन निर्वाह और आकाँक्षा पूर्ति में ही संलग्न दिखायी पड़ती है। इसकी हलचलों का प्रयोजन केवल शरीर को सुखी तथा सक्रिय बनाये रखना भर प्रतीत होता है, लगता है शरीर मुख्य है तथा उसकी तृप्ति, पुष्टि सुरक्षा एवं प्रगति के लिए सरंजाम जुटाने भर के लिये उसका सृजन एवं उदय हुआ है। आमतौर पर ऐसा ही समझा जाता है और इसी स्तर का उपयोग भी होता है। इतना ही नहीं, यह भी समझा जाता है कि शरीर-सुख के लिए मानवीय चेतना का जितना भी उपयोग हो सके, उत्तम है और इसी में उसकी सफलता-सार्थकता समझी जाती है।
इसमें वास्तविकता कितनी है? गहराई में उतरने पर बात कुछ दूसरी ही प्रतीत होती है। मानव शरीर व्यष्टि-चेतना के निवास का एक विकसित स्थल है। यहीं ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ - जीव चेतना का मिलन-समागम संभव होता है और उस आदान प्रदान के आधार पर प्राणिजगत की अनेकानेक सुविधायें एवं संवेदनायें उपलब्ध होती हैं। इसमें कई ऐसे और इतने शक्तिशाली केन्द्र हैं कि उनमें माध्यम से पिण्ड और ब्रह्माण्ड की एकता का अनुभव एवं लाभ चमत्कारी रूप में दिखायी देने वाली मात्रा में हस्तगत कर सकना संभव हैं इनके अंतर्संबंधों और आदान प्रदान के क्रम को कोई खगोलीय प्रक्रियाओं द्वारा समझा जा सकता है।
उदाहरण के लिए, पृथ्वी को ही लिया जाय। प्रत्यक्षतः यह एकाकी दिखायी देती है। उसकी सम्पदा एवं हलचल अपनी ही परिधि में अपने लिये ही काम करती दृष्टिगोचर होती है। बहुत समय तक नक्षत्रविज्ञानी भी ऐसा ही मानते रहे। यह तो पीछे पता चला कि वह वस्तुतः अंतर्ग्रही आदान-प्रदान पर जीवित हैं। सूर्य-ऊर्जा का शोषण पृथ्वी पर वातावरण की सृष्टि करता है और इस वातावरण से, जिसे ऊर्जा-ईंधन भी कहा जा सकता है, जड़ परमाणुओं और चेतना जीवाणुओं को विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ संपन्न करने के लिए आवश्यक सामर्थ्य प्रचुरता से उपलब्ध होती है। पृथ्वी इस प्रकार अपनी विशिष्टताओं को बनाये रखने के लिए बहुत कुछ तो सूर्य पर निर्भर करती है। दूर रहते हुए भी सूर्य पृथ्वी को इतना उदार-दुलार देता है कि उसे देखते हुए पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका जैसा संबंध मानने को जी करता है। पृथ्वी भी तो सूर्य का मुँह निहारते रहने और परिक्रमा करते रहने में अपने जीवन की सार्थकता समझती है, न केवल सार्थक समझती है, वरन् सार्थक बनाती है।
चन्द्रमा यों पृथ्वी का उपग्रह है, पर वह भी पृथ्वी को कोई कम प्रभावित नहीं करता। यह प्रभाव समुद्र-तट पर जाकर प्रतिदिन के सामान्य रूप और पूर्णिमा-अमावस्या के ज्वार-भाटे देखकर सहज ही जाना जा सकता है। उल्लेखनीय है कि चन्द्रमा को ‘रसराज’ कहा गया है। यह संज्ञा अकारण ही नहीं दी गयी है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में वनस्पतियों तथा प्राणियों की सरसता में जो घट-बढ़ होती रहती है, इससे पता चलता है कि चन्द्रमा न केवल पृथ्वी पर समुद्र को, वरन् पृथ्वी में विद्यमान समग्र सरसता को भी व्यापक रूप से प्रभावित करता है।
दूसरे खगोलीय पिण्डों के बारे में भी यही बात लागू हुई देखी जा सकती है। सौरमण्डल के ग्रह- उपग्रह अपने-अपने स्तर के रंग-बिरंगे, छोटे-बड़े उपग्रह पृथ्वी पर नियमित और निरन्तर भेजते रहते हैं। पृथ्वी भी इन अनुदानों को चुपचाप नहीं ले लेती बल्कि उनका प्रतिदान चुकाती है। कहा जा सकता है कि वह आदान प्रदान के सामान्य शिष्टाचार को समझती है और उसी के अनुसार अपने प्रतिदान-प्रत्युपहार का क्रम निर्धारित करती है। इन प्रेषणों का लाभ वे ग्रह भी उसी प्रकार उठाते हैं, जिस प्रकार पृथ्वी उनसे उठाती है।
यह ब्रह्माण्ड एक विशाल शक्ति-सागर है और इसका प्रत्येक घटक एक-दूसरे से एक परिवार की तरह सम्बद्ध है। यह शक्ति-सागर जड़- चेतना से मिश्रित है। इसमें प्राणियों की सत्ता एक बुलबुले की तरह उठती, अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाती और समयानुसार विलीन हो जाती है। वैज्ञानिकों का प्रतिपादन है कि इस विराट शक्ति-संसार में दो धारायें हैं- एक भौतिक शक्ति है और दूसरी प्राणिज। ये दोनों शक्तिधारायें मिलकर एक युग्म बनाती हैं। विकासमान विज्ञान अब जीवन को रासायनिक संयोग मात्र नहीं मानता; अब विज्ञान भी मनश्चेतना की मरणोत्तरसत्ता को स्वीकार करने लगा है और चेतना को जगत की एक स्वतंत्रता सत्ता मानने की ओर अग्रसर है।
अपने देश के ऋषियों ने बहुत पहले ही इस सत्य को पहचाना था कि विश्व में जड़ और चेतन की द्विधा शक्ति अपने-अपने नियम प्रयोजनों में संलग्न है। पौराणिक शब्दावलियों में इस शक्तियों को ‘परा’ और ‘अपरा’ शक्ति कहते हैं। इस शक्ति-सागर का वैभव भी महासमुद्र की तरह ही है, जिसके किनारे बैठकर मनुष्य ने सीप और घोंघे ही ढूंढ़े हैं। झंकृत परमाणुओं में और चेतना जीवाणु घटकों में जो सामर्थ्य-चेतना विद्यमान है, उसका बहुत छोटा अंश ही जानना और प्राप्त कर पाना संभव हो सका है। खींचतान से, छीना-झपटी से सब कुछ पाना शक्य नहीं, वह तो समुद्र में घुस जाने से ही संभव है।
सीमित को असीम से और तुच्छता को महानता से जोड़ देने पर ही असाधारण हुआ जा सकता है और असामान्य विलक्षणतायें अर्जित की जा सकती है। सामान्य स्तर पर चेतना शरीर और उससे संबंधित अनेकों प्रयोजनों के बारे में ही सोचती, निर्णय करती और व्यवस्था बनाती है, असामान्य की स्थिति उच्चस्तरीय होती है और उस दशा में ब्रह्माण्ड चेतना के आदान-प्रदान की गति तीव्र होती है तथा ऐसी उपलब्धियाँ हस्तगत होती है, जिन्हें विलक्षण और चमत्कारिक ही कहा जा सकता है। सामान्य जानकारियाँ और सामान्य अनुभव तो इन्द्रियशक्ति के आधार पर ही प्राप्त होते है, लेकिन यदि प्रसुप्त अतीन्द्रिय शक्ति को जाग्रत किया जा सके, तो व्यापक ब्रह्माण्ड के साथ अपना संपर्क जुड़ सकता है और ससीम से असीम स्तर का बना जा सकता है।
इस प्रकार का विकास-विस्तार जिस आधार पर सम्पन्न हो सका है, वह योग है। योग-साधना का उद्देश्य ससीमता को असीमता के साथ जोड़ देना है। इस प्रयोजन में जो जितना ही सफल होता जाता है, वह उस वैभव पर उतना ही आधिपत्य स्थापित करता चलता है, जिसका प्रभाव जड़-चेतन जगत में अपने चारों ओर फैला हुआ दीख पड़ता है। सीमित रहने और सीमाबद्ध होने से मनुष्य तुच्छ और दरिद्र ही बना रहता है, पर असीम के साथ संलग्न हो जाने पर महानता प्राप्त करने में कोई कमी नहीं रह जाती। सम्पन्नता से भरे पूरे भण्डार में अपनी भागीदारी जितनी अधिक होती है, अपनी स्थिति उतनी ही विभूतिवान होती चली जाती है। सिद्धपुरुषों में दिखाई देने वाली विशिष्ट क्षमताएं और कुछ नहीं, विराट के साथ उनकी घनिष्ठता का ही उपहार है। वह स्थिति ऐसी बन जाती है कि उसमें आत्मा और परमात्मा के मध्य बहुत अन्तर नहीं रह जाता, दोनों एक समान दीख पड़ते हैं। यह वास्तव में व्यक्तिचेतना को विश्वचेतना से जोड़ देने की ही फलश्रुति है।
होली-मंगलोत्सव भारतवर्ष में मनाये जाने वाला एक प्रख्यात लोकपर्व है। रस, रंग माधुर्य से सराबोर यह पर्व आँतरिक उल्लास को उभारने वाला एक साँस्कृतिक पर्व है। यह पर्व कृषि कुसुमित संस्कृति के एक प्रतीक के रूप में भी प्राचीन समय से प्रचलित है। यह सार्वभौम विशेषता ही है, जिसके कारण देश के हर वर्ग, जाति,धर्म एवं सम्प्रदाय के लोग इसे बड़े उत्साह व आनन्द के साथ मानते हैं। रंगों का यह पर्व प्रकृति से मानव को एकाकार कर तादात्म्य स्थापित कर देता है एवं जीवन को उल्लास के साथ जीने की रीति-नीति का शिक्षण भी देता है।बसन्त से ही आरम्भ हो जाने वाले इस पर्व में जहाँ एक ओर वासन्ती रंगों से रंगी प्रकृति सुन्दर छटा बिखेरती है, वहाँ दूसरी ओर गुलाल-अबीर से रंगा मानव-समुदाय अपनी आन्तरिक पुलकन को भी प्रकट करता है। होलिकापर्व निष्क्रिय जड़ता पर जीवन्त एवं सजीव चैतन्यता की स्थापना का पर्व है।
वैदिककाल से ही होली पर्व मनाने की परम्परा रही है। भारत के साँस्कृतिक जीवन की चिरन्तन मान्यताओं से संबंधित यह पर्व कृषियज्ञ प्रसूत हमारी संस्कृति की आनन्द रूप में अभिव्यक्ति का त्योहार है। इसे नवसस्येष्टि यज्ञ भी कहा जाता है, क्योंकि रबी की फसल इस समय तक आधी पक चुकी होती है। होलिका शब्द के बारे में निरुक्त कहता है-
“तृणाग्नि भ्रार्ष्टछपक्व शर्माधायं होलकः” अर्थात् तिनकों की अग्नि में भुने हुए अधपके फली वाले अन्न को ‘होलक’ कहते हैं। होलिका शब्द की व्युत्पत्ति इसी होलक शब्द से हुई मानी जाती है। भारत के कुछ प्रान्तों में गेहूँ-चना आदि की सिकी–भुनी बालियों को ‘होला’ कहा जाता है। इन नवान्न बालियों को प्रज्वलित अग्नि में भूनने की परम्परा अति प्राचीन है। संभवतः इसी कारण इसे होली पर्व नाम दिया जाने लगा। वैदिक ऋचाएं भी यही कहती हैं कि फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को आर्यगण वैश्वदेव की पवित्राग्नि में नवान्न गेहूँ और जौ आदि बालियों से हवन किया करते थे। पौरोहित्य के ग्रन्थों में होली को ‘यवाग्रयन यज्ञ’ नाम से संबोधित किया गया है। होली मन्वन्तरारंभ का पर्व भी है। इस प्रकार वैदिक काल के नवसस्येष्टि यज्ञ में कालान्तर में होलिकोत्सव का रूप ले लिया, ताकि व्यक्ति के चार पुरुषार्थों में से एक ‘काम’ को धर्म-प्रधान रूप से उल्लास के साथ सुनियोजित किया जा सके। ऋग्वेद इस नवान्न महोत्सव की प्राचीनता को इस तरह वर्णित करता है-
“गिरा च श्रुष्टिः सभरा असन्नो नेदीय इत्सृण्यः पक्वमेयात्।” (ऋग्वेद 10/101/3)
शास्त्रकारों ने होलिकादहन को एक यज्ञ की संज्ञा देते हुए इसके निमित्त लकड़ी-संचयन को भी एक पुण्यकार्य माना है। उनके अनुसार, फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पंचमी से पूर्णिमा तक की दस तिथियों में होली की लकड़ी एकत्रित की जानी चाहिये। भविष्यपुराण होली को हास्य-विनोद का पर्व उल्लिखित करते हुए कहता है-
नानारंग मर्येर्वस्त्रैश्चंदनागरु मिश्रितैः अबीरं च गुलालं व मुखे ताम्बूल मसतम्। वशोत्थं, जलमंत्रं च धर्म मंत्रं करैघृतम्॥ गालिदानं तथा हास्य ललनार्त्तनं स्फुटम्॥
अर्थात् होलिकोत्सव को मनाने के लिए भाँति-भाँति के सुन्दर व रंगीन वस्त्र पहनें। अबीर, गुलाल, चन्दन एक-दूसरे को लगायें। हाथों में बाँस तथा चमड़े की पिचकारियाँ लेकर एक- दूसरे के घर जायें और रंग डालें। नर-नारी सभी इस हास्यविनोद के पर्व में शामिल हों।
वस्तुतः होली बहुत प्राचीन उत्सव है। इसकी आरंभिक काल में ‘होलिका’ कहा जाता था। भारत के पूर्वी भागों में अभी भी यह शब्द प्रचलित है। जैमिनी एवं शबर ने भी इस कथन की पुष्टि की है। ‘होलिका’ उन 20 क्रीड़ाओं में से एक है, जो सम्पूर्ण भारत में कभी प्रचलित थीं। इसके अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा पर लोग श्रंग से एक-दूसरे पर रंगीन जल छोड़ते हैं और सुगंधित चूर्ण बिखेरते हैं। लिंगपुराण इस पर्व को ‘फाल्गुनिका’ कहकर संबोधित करता है एवं इसे विभूति एवं ऐश्वर्यप्रदायक पर्व मानता है। डाँरु रामानन्द तिवारी ‘हमारी जीवन संस्कृति’ में लिखते हैं- “राग-रंग और उल्लास का यह पर्व अपनी व्यापकता, स्वच्छता और संपन्नता में अनुपम है। अनेक विशेषताओं से युक्त वर्ष का यह अंतिम पर्व जीवन में संस्कृति के पूर्ण समन्वय का द्योतक है। वैदिक यज्ञ और लोकोत्सव का एक अद्भुत समन्वय इसमें मिलता है। होली के पर्व पर अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचकर वर्ष की रागिनी नये वर्ष की नई रागिनी को जन्म देती है।”
मात्र बंगाल को छोड़कर सारे देश में यह उमंग का पर्व प्रचलित रूप में मनाया जाता है। बंगाल में चैतन्य महाप्रभु का जन्म इसी पावन
दिन होने के कारण होली पर्व ढोलयात्रा पर्व के रूप में मनाया जाता है। होलिकादहन यहाँ कम ही देखा जाता है। यात्रा का समग्र परिवेश राधाकृष्ण की प्रेमलीला व राधाकृष्ण सहित अन्यान्य देवी-देवताओं की मूर्तियों की यात्रा के रूप में बदल गया। तीन से पाँच दिन तक चलने वाले इस पर्व में 16 खंभों से युक्त मण्डप में श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित की जाती है। प्रतिमाओं को पंचामृत से स्नान कराया जाता है। रंगों, गुलाल, चन्दन आदि से पूजा की जाती है एवं सभी मिलकर फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी को रात्रि को आनन्दोत्सव मनाते हैं। बिहार एवं उत्तर प्रदेश में तो होली अपने प्रचलित रंगोत्सव के रूप में बसन्त पंचमी से प्रारम्भ होकर फाल्गुन पूर्णिमा तक मनायी जाती है। ब्रज की होली तो विश्वप्रसिद्ध है। दक्षिण भारत में इसे ‘कामदहन पर्व’ के रूप में मनाया जाता है।
भारत के बाहर भी यह पर्व सुप्रसिद्ध है। चीनी भाषा में इसे ‘फोश्चेइचिये’ कहते हैं। चार दिन तक चलने वाले इस उत्सव में पहले दो दिन पुराने साल की विदाई के लिए एवं अन्तिम दो दिन नये वर्ष के स्वागत के लिये होते हैं। उत्सव की शुरुआत ‘काओशंग’ नामक आशिबाजी से होती है। घण्ट-घड़ियाल, धौंसों एवं काओशंग की सम्मिलित आवाज सुरीली सिम्फोनी की सृष्टि करती है। घड़े, लोटे व अन्य पात्रों द्वारा रंग मिल जल से होती सदृश हर्षोल्लास मनाया जाता है। इसी पर्व के दौरान एक लम्बे बाँस पर पाँच ताबीज बाँधकर उछाले जाते हैं। जिसके हाथ में ये ताबीज गिरते हैं, वे साल भर लाभ की स्थिति में रहते हैं, ऐसी मान्यता है।
जर्मनी में बसंत के आगमन पर हंसी- ठिठोली, उमंग एवं मस्ती का पर्व ‘कार्निवाल’ नाम से मनाया जाता है। क्रिसमस व नये साल के मनाने के तुरन्त बाद जनवरी के अंत या फरवरी के प्रारम्भ में कार्निवाल की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। राइन नदी के तट पर विचित्र वेशभूषा धारण कर अजीबोगरीब मुखौटे लगाकर मुँह व शरीर पर तरह-तरह के रंग पोतकर निकलने की एक प्रतिस्पर्धा-सी चलती है। जर्मनी के सारे शहर 15 दिन की अवधि तक चलने वाले इस पर्व पर रंग से सराबोर हो जाते हैं। ‘कार्निवाल’ के प्रमुख चार दिनों में जर्मन समाज के जीवन के अंग माने जाने वाले अनुशासन को एक तरफ रख दिया जाता है एवं चारों ओर आनन्द-उल्लास की बाढ़-सी आ जाती है। इस दौरान एक मूर्ख सम्मेलन का आयोजन भी (बतर्ज-भारत में मनाये जाने वाले मूर्ख व टेपा सम्मेलन) किया जाता है। जर्मनवासियों के अनुसार आज के टूटते- बिखरते समाज का स्वस्थ-स्वच्छ मस्ती भरा पर्व कार्निवाल तनाव-घुटन से मुक्त करने का एक सफल प्रयास है।
होली का नैसर्गिक संबंध ऋतुपरिवर्तन से है। शिशिर और हेमन्त कालीन शीत की ठिठुरन के बाद बसंत का आगमन उल्लास लेकर आता है। फाल्गुन मास व बसंत दोनों मिलकर प्रकृति में अपूर्व आनन्द व उमंग का रंग घोलते हैं। कोयल की कूक, खिलते पुष्पों की सुगंध व आम्र-मंजरियों की मादकता से भरा बहता पवन तन-मन में उत्साह एवं जीवन के प्रति एक नयी दृष्टि का विकास करता है। प्रकृति के इन रूपों को देखकर मानवमन हर्षित हो उठाता है एवं कभी कवि, कभी साहित्यकार, कभी कलाकारों के माध्यम से भावनाएं अभिव्यक्त होने लगती है। रत्नावली में कवि का वर्णन है कि “होलीपर्व के शुभावसर पर उड़ते हुए केशर मिश्रित गुलालों से ऊषाकाल का भ्रम हो रहा है।”
एक कवि ने तो इन शब्दों से मानो अपना सारा उल्लास ही इसमें भर दिया है-
केसर के रंग बहै छज्जनपै छाजन पै। नारे पै नदी पै और निकास पै उछाल है॥
ग्वालन कवि कुँकुम की त्रालन रसाल पै। तंलन तमालन पै फूटत उसाल है॥
गुँजन गुलालन पै, लालन पै ग्वालन पै। बला बाल बालन पै घुमड्यो गुलाल है॥
होली और भगवान श्रीकृष्ण का संबंध अटूट है। इसे साहित्य के प्रत्येक ग्रन्थ में वर्णित देखा जा सकता है। गर्ग संहिता, फागुकाव्य, बसन्तविलास, पृथ्वीराज रास (चंदवरदायी कृत) सूरदास एवं परमानन्द के काव्यों में मीरा-रसखान के दोहों में सभी जगह होली एवं कृष्ण का सरस, सजीव एवं सुन्दर चित्राँकन मिलता है। फागविलास और फागविहार नामक रीतिकालीन नागरीदास नामक कवि की दो रचनायें होली पर सुप्रसिद्ध हैं। बिहारी, घनानन्द पद्माकर, केशव, सेनापति आदि सभी रीतिकालीन कवियों ने अपनी लेखनी से होली का रंग भरा है। भवभूति के ‘मालती माधव’ नाटक में तो इसी पर्व का बड़ा सुन्दर चित्रण है। 1857 की होली का चित्रण करते हुए बहादुरशाहजफर ने लिखा था-
हिन्द में कैसे फाग मत्ती जोराजोरी फूल तख्त हिन्द बना केशर की सी क्यारी। कैसे फूटे भाग हमारे लुट गई दुनिया सारी गोला में गुलाल बनायो तोप की पिचकारी॥
कितनी विडम्बना है कि जो वेदना जफर ने अभिव्यक्त की, आज भारत की आजादी की स्वर्णजयन्ती पर उपरोक्त पंक्तियों के लिखने के 141 वर्षों बाद भी वही कहानी दुहरा रही है। भारतवर्ष जातिवाद, क्षेत्रवाद, संकीर्णता, साम्प्रदायिकता से घिरा हुआ है। आतंक के साये में आज अपने ही भाईयों के खून से होली खेली जा रही है। कहीं बम के धमाके हैं, तो कहीं राजनैतिक दांव–पेंचों पर जनसाधारण को नचाया जा रहा है। युवाशक्ति नशे में, डूबी, दिखायी पड़ती है, तो संस्कृति के नाम पर अश्लीलता का नंगानाच देखने को मिलता है। विश्वविद्यालयों-कालोनियों-परिसरों के प्राँगण अराजकता से भर गये हैं। रंग तो गहराया है, पर है वह स्वार्थपरता-भ्रष्टाचार व अवसरवाद का।
ऐसी स्थिति में होली हमें पुनः याद दिलाने आयी है समरसता से भरे उमंगों से भरे एक ऐसे अवसर की, जब हम छोटे- बड़े का भेद मन से निकालकर स्वयं के मन का मैल निकाल फेंकें। होली का त्योहार सामूहिकता के भाव की वृद्धि करने वाला तथा संगठन और एकता को सुदृढ़ बनाने आता है। यदि यही उद्देश्य रखकर समता के इस पर्व को मनाया जाये तो आपस की असमतारूपी असुरता को होली में जलाकर नष्ट किया जा सकता है। होली के अनेक उद्देश्य व शिक्षाएं हैं, किन्तु यहाँ इसके इतिहास के साथ-साथ एक पक्ष को ही स्पर्श किया गया है। एक सबसे बड़ी महत्वपूर्ण शिक्षा इस पर्व की यह है कि मनुष्य को दीन-दुर्बल ओर डरपोक होकर नहीं रहना चाहिये। सर्वदा इस संसार में नृसिंह की तरह निर्भय और वीर का जीवन जीना चाहिये। जैसे प्रह्लाद ने इस पर्व पर असुरता को अपनाने के बजाय भले ही वह उसकी अभिभावक रही हो, भगवत्सत्ता को, श्रेष्ठता को, आदर्शों को अपनाया, हमें भी वैसा ही साहस अपने अंदर जगाना चाहिये, तभी ही इस पर्व को मनाने की सार्थकता है।
महात्मा की अन्तिम घड़ी निकट थी। सब शिष्य और प्रशंसक उन्हें घेरकर बैठ गये। मरते समय सब प्रशंसा करने लगे। एक शिष्य ने कहा- ऐसा ज्ञानी हमने नहीं देखा, शास्त्र तो मानो कंठस्थ थे। महात्मा ने थोड़ी आँखें खोलीं। जैसे किसी ने ठण्डा जल छिड़क दिया हो। थोड़ी देर में दूसरा शिष्य बोला-ऐसा दानी भी नहीं देखा। सदा देने को ही तैयार रहता। फिर लम्बी साँस ली महात्मा ने सन्तोष की।तब तक तीसरा शिष्य बोला- सेवा की भावना तो बाबा के रग-रग में कूट-कूट कर भर दी गयी थी। महात्मा के चेहरे पर कुछ मुस्कान फूटी फिर सबको चुप होते देख महात्मा जी बोल पड़े- अरे तुम में से किसी ने मेरी विनम्रता के बारे में तो कुछ कहा ही नहीं। प्रशंसा मरते दम तक सहाती है। इसकी भूख सदैव बनी रहती है।
तीन पौण्ड से भी अधिक अर्थात्! लगभग चौदह सौ ग्राम वजन वाला मानवी मस्तिष्क जादुई क्षमताओं और गतिविधियों से भरापूरा है। इसके क्रिया-कलाप जिन ज्ञानतंतुओं-नर्वसेल्स से मिलकर संचालित होते हैं, उनकी संख्या प्रायः दस अरब है। इनमें से प्रत्येक की अपनी दुनिया, अपनी विशेषता और अपनी संभावनायें हैं। इन दस अरब कोशों को अद्भुत विशेषताओं से सम्पन्न देव-दानव कहा जा सकता है। इसमें जितने किस्म का, जितनी मात्रा में ज्ञान भरा रहता है, उसकी तुलना में विश्व के बड़े-से-बड़े पुस्तकालय एवं सुपर कम्प्यूटर को भी तुच्छ ठहराया जा सकता है। 25 वर्ग इंच की यह छोटी-सी पुस्तक अपने अन्दर इतनी स्मृतियाँ व अगाध ज्ञान समेटे हुए है, जिसकी तुलना में किसी आधुनिक माइक्रोफिल्म को भी तुच्छ ठहराया जा सकता है। इतने पर भी मस्तिष्क की अधिकाँश क्षमता प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती है। काम न मिलने पर या प्रयुक्त न होने पर हर चीज निरर्थक हो जाती है। इसी प्रकार इन कोषों से दैनिक जीवन की आवश्यकतायें पूरा कर सकने के लिए अवश्य थोड़ा-सा काम लिया जाता है, तो उतना मिला होता, उन्हें साधनात्मक, उपाय-उपचारों द्वारा उभारा और प्रशिक्षित किया गया होता तो वे अबकी अपेक्षा लाखों गुनी क्षमता प्रदर्शित कर सके होते और अपना मस्तिष्क सचमुच कल्पवृक्ष की तरह चमत्कारी सिद्ध होता।
मस्तिष्क के यों तो विविध क्रिया−कलाप हैं, पर सबकी कार्यपद्धति और प्रणाली अद्भुत एवं विलक्षण है। उन सबका न तो अभी पूर्णतया अध्ययन किया जा सका है और न उनके बारे में जाना जा सकता है। उदाहरण के लिये, स्मरणशक्ति को ही लें, तो अभी तक ऐसा कोई अन्तिम उदाहरण देखने को नहीं मिला है, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि मनुष्य अधिक से अधिक इतना स्मरण रख सकता है। स्मरणशक्ति की प्रखरता से मनुष्य अधिक विचारशील व ज्ञानवान समझा जाता है और उसके ज्ञान की परिधि अधिक बड़ी होती है, जबकि भुलक्कड़ लोग महत्वपूर्ण ज्ञानसंचय से तो वंचित रहते ही हैं, साथ ही दैनिक काम-काज में भी जो आवश्यक था, उसे भी भूल जाते हैं और समय-समय पर घाटा उठाते तथा ठोकरें खाते हैं।
वस्तुतः स्मरणशक्ति मानवी मस्तिष्क की एक प्रमुख क्षमता है, जिससे व्यक्ति की आयु, बुद्धिमत्ता, ज्ञान, सामर्थ्य, विश्वसनीयता, मित्रता तथा ईमानदारी जैसी भावनायें पूरी तरह प्रभावित होती हैं। किसी निर्धारित कार्य, तथ्य, आँकड़े, नाम और चेहरों की विस्मृति होने का अभिप्राय स्मरणशक्ति की कमी का द्योतक माना जाता है। परन्तु विस्मृति का अर्थ यह कदापि नहीं होता कि जो चीजें हम भूल गये हैं, वे सदा के लिये विलुप्त हो गयी हैं। हमारे मस्तिष्क में कितने ही ज्ञानकोष ऐसे हैं, जिनमें माइक्रोफिल्मों की तरह न जाने कब-कब की स्मृतियाँ सुरक्षित रहती हैं। आमतौर से जिन बातों को हम भूल चुके होते हैं, वे भी वस्तुतः विस्मृत नहीं होतीं, वरन् मस्तिष्कीय ज्ञानकोषों के स्नायुतंतुओं के एक कोने में छिपी पड़ी रहती हैं जब अवसर पाती हैं तो वर्षा की घास की तरह उभरकर ऊपर आ जाती हैं। ‘स्पीच एण्ड ब्रेन’ नामक अपनी कृति में पेनफील्ड एवं रॉबर्ट ने कहा है कि मनुष्य की स्मरणशक्ति स्नायुतंतुओं के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। आकृति विज्ञान के विशेषज्ञ ह्यूबैल तथा विसेल का भी मानना है कि मानवीय मस्तिष्क के अत्यन्त महत्वपूर्ण भाग कार्टेक्स में अतिसंवेदनशील स्नायुतंतु विद्यमान हैं, जो बड़ी आयु की अपेक्षा नवजात शिशु में अधिक होते हैं। अनुसंधानकर्ता स्नायु-विज्ञानियों ने किये गये प्रयोगों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि स्नायुकोशिकायें मनुष्य को ही नहीं, वरन् जानकारों के भी संवेदी और प्रेरक स्नायुतंतुओं को समान रूप से प्रभावित करती हैं। दिल्ली के नवजात बच्चों पर किये गये प्रयोगों में देख गया है कि इन संवेदी कोशिकाओं को अलग कर देने पर बच्चे की आकृति-प्रकृति को निर्धारित करने वाले स्नायुकोषों को विशेष क्षति उठानी पड़ती है।
विश्वविख्यात शरीरशास्त्री एस.आई. फ्रैज गैल का कहना है कि स्मृति केन्द्र के साथ ही मानवी मस्तिष्क में कोई ऐसा महत्वपूर्ण भाग है, जहाँ से सभी प्रकार की क्रियाओं के संचालन की प्रेरणा मिलती है। गैल को मस्तिष्क-विज्ञान का विशेषज्ञ माना जाता है। उनके अनुसार दैनन्दिन जीवन की प्रेरणाएं, ध्वंस और सृजन की प्रवृत्तियाँ, भूख-प्यास मिटाने की अभिलाषा, ज्ञानार्जन की क्षमता, अभिभावकों के प्रति स्नेह-सम्मान की सद्भावना तथा श्रद्धा का प्रादुर्भाव इसी क्षेत्र में होता है।
एस.आई. फ्रैज पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने सन् 1907 में व्यावहारिक अथवा प्रायोगिक मनोविज्ञान को जन्म देकर विशिष्ट ख्याति अर्जित की है। स्नायुक्षति के मनोवैज्ञानिक प्रयोगों में सर्वप्रथम उन्होंने बंदर और बिल्ली के मस्तिष्क के अग्रभाग को अलग कर देने के पश्चात पाया कि स्व-निर्मित आदतें तो समाप्त हो जाती हैं, लेकिन मूल स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आता। इसी तरह के प्रयोग-परीक्षणों में हारवर्ड यूनिवर्सिटी के मूर्धन्य मनोवेत्ता के.एस. लेसले ने स्मृतिभंडार के कॉर्टिकल कनेक्शन को चूहों के मस्तिष्क से अलग किया तो उनकी स्थिति पागलों जैसी हो गयी। इस प्रयोग को उन्होंने ‘ला ऑफ मास एक्शन’ नाम दिया। इसे ही ‘ला ऑफ इक्वीपोटेंन्सियलिटी’ भी कहा जाता है। उन्होंने यह भी सिद्ध किया है कि ईश्वरीय-चेतना की भाँति स्मरणशक्ति भी हर जगह मौजूद है, कहीं कम तो कहीं ज्यादा, लेकिन जानवरों तथा अन्य प्राणियों की तुलना मनुष्य से नहीं की जा सकती। मनुष्य को यह क्षमता ईश्वर के विशिष्ट उपहार के रूप में मिली है। अब इसे विकसित करना अथवा न करना उसकी बुद्धिमत्ता पर निर्भर करता है।
व्यक्ति की वाणी प्रभावहीन कैसे बन जाती है? इस संदर्भ में अनुसंधान कर रहे फ्राँस के स्नायु रोग विशेषज्ञ डॉ. पाल बोका का कहना है कि स्मरण शक्ति क्षीण होने पर ही यह स्थिति उत्पन्न होती है। स्मरण शक्ति को उभार कर उन्होंने बहुत से रोगियों का उपचार करने में सफलता पायी है, जो वाणी दोष से पीड़ित थे उनका कहना है कि प्रायः मस्तिष्क के बायें भाग की कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने के कारण ऐसा संभव होता है।
मान्ट्रिल न्यूरोलॉजिकल इंस्टीट्यूट कनाडा के सुविख्यात मस्तिष्क वेत्ता विशारद डॉ. बिल्डर पेनफील्ड ने विद्युतीय प्रेरणा भी दी का प्रयोग करके एक ऐसे रोगी का उपचार करने में सफलता पायी, जो पहले कुछ भी नहीं बोल सकता था उनके अनुसार मस्तिष्क के बायें भाग के कार्टेक्स के अंतर्गत वाणी के तीन केन्द्र हैं- बाल्यकाल में तो इन केन्द्रों को बदल सकना भी संभव है किन्तु अधिक उम्र के व्यक्तियों के वाणी केन्द्र को प्रत्यारोपित करना संभव नहीं हो सकता।
डॉ. पेनफील्ड ने मस्तिष्क के भीतर एक ऐसी पट्टी का पता लगाया है जो स्मरण शक्ति का मूल भूत आधार है। इस आश्चर्यजनक केन्द्र का पता उन्हें तब चला जब वे एक रोगी के मस्तिष्क पर इलेक्ट्रोड लगाकर उसकी स्मृति वापस लाने का प्रयत्न कर रहे थे। जैसे इलेक्ट्रोड मस्तिष्क पर फीट करके उसमें विद्युत धारा प्रवाहित की गयी रोगी के मस्तिष्क से कई जन्म पूर्व की स्मृतियाँ प्रकट होने लगीं इस विलक्षण केन्द्र को उन्होंने डबल ‘काँनसियसनैस’ के नाम से सम्बोधित किया है। यही वह केन्द्र या पट्टी है जिसमें से देखे सुने और सोचे हुए सभी विचार जो मस्तिष्क के भीतर प्रवेश करते हैं उन्हें उसमें से होकर गुजरना ही पड़ता हैं। अतः वे स्मृतियाँ माइक्रोफिल्मों की तरह अथवा टेपरिकार्डर में भरी आवाज की तरह जम जाती है, और एक कोने में पड़ी रहती है। साधारणतया प्रयुक्त न होने पर वे स्मृति के गर्त में चली जाती है, परन्तु यदि विशेष प्रयत्न किये जाये तो उन्हें उभारा जा सकता है और कितनी ही पुरानी देखी-सुनी या सोची हुई बात फिर से उसी स्पष्टता के साथ सजग की जा सकती है।
वस्तुतः स्मरण प्रक्रिया संभालने वाली यह काले रंग की दो पट्टियाँ हैं जो क्षेत्रफल में लगभग 25 वर्ग इंच और मोटाई में एक इंच के दसवें भाग के बराबर है। मस्तिष्क के भीतर यह चारों ओर लिपटी हुई है। कनपटियों से नीचे इन्होंने एक सिरे से सारे मस्तिष्क का घेरा डाला हुआ है। अपने प्रयोग परीक्षणों में पेनफील्ड ने जब इलेक्ट्रोड के माध्यम से इस पट्टी के विभिन्न स्थल सजग किये तो वहाँ उन स्थानों में अंकित पुनर्जन्म की घटनायें और बातें रोगी को ज्यों की त्यों स्मरण हो आयी, किन्तु जैसे ही इलेक्ट्रोड हटा लिये गये वैसे ही वह स्मृतियाँ पुनः विलुप्त हो गयीं। ऐसे अनेक उदाहरण प्रस्तुत करके उन्होंने यह सिद्ध किया है कि मनुष्य के पास उसके सारे स्मरण तथा स्थान सुरक्षित रिकार्डों की तरह सुरक्षित रहते हैं। हाँ वे हर समय स्मरण नहीं आते प्रयत्नपूर्वक उन्हें उभारा जा सकता है। किसी भी विस्मृत बात को स्मृति पटल पर लाया जा सकता है। स्मृति की शारीरिक संरचना विश्लेषण वैज्ञानिक स्तर पर भी कर सकना अब संभव हो गया है। एक न्यूरान की परिधि एक वर्ग सेमी. का 10 करोड़वाँ भाग सुनिश्चित हुआ है जिसका मनुष्य की स्मरण शक्ति से सीधा सम्बन्ध है।
प्रायः पुरानी बातें हम भूल जाते हैं। इतनी बातें याद कर सकना संभव भी नहीं इसलिये स्मरण विस्मरण का क्रम साधारणतया चलता रहता है, किन्तु साथ ही यह भी होता रहता है कि दैनिक जीवन में काम आने वाले समस्त घटनाचक्रों की एक अति सूक्ष्म साउण्ड फिल्म बनती रहती है, जिसे आवश्यकतानुसार कभी प्रोजेक्ट किया जा सकता है।
दैनिक अनुभूतियों में कुछ बहुत ही कटु और सामान्य क्रम के विपरीत होती है। वे दूसरों के ऊपर या अपने ऊपर क्रोध व्यक्त करती हुई पैर में गहराई तक चुभे हुए काँटे की तरह दर्द करती रहती है किसी ने अपने साथ दुर्व्यवहार किया है तो विक्षोभ दूसरों के प्रति घृणा, द्वेष, क्रोध एवं प्रतिरोध के रूप में उभरता है। और यदि कोई पाप, अपराध, छल या अनैतिक कार्य किया है तो उसकी क्षुब्ध प्रतिक्रिया आत्म विकार के रूप में अपने ही ऊपर बरसी रहेगी। दोनों ही परिस्थितियों में ज्वालामुखी की तरह रह-रह कर फूटते रहने वाला उद्वेग मन स्थिति को अशान्त किये रहता है। और ज्वरग्रस्त शरीर की तरह उद्वेगग्रस्त मस्तिष्क भी दुर्बल होता जाता है।
स्मृतियों का भण्डार हर मनुष्य के भीतर सुरक्षित रहता है, पर उन्हें ढूंढ़ने और सामने लाने वाले यंत्र कुँठित हो जाते हैं, इसलिये वे अपने ही दफ्तर की फाइल को आप ढूंढ़ निकालने में असमर्थ हो जाते है, यही विस्मृति है। यदि ढूंढ़ निकालने वाले पुर्जों को तेज रखा जाय और उसे कार्य में दिलचस्पी और फुर्ती बनी रहे तो स्मरण शक्ति तीव्र रखी जा सकती है। कई व्यक्तियों में तीव्र स्मरण की विशेषता जन्मजात होती है पर यह किसी के लिए संभव हो सकता है कि प्रयत्नपूर्वक उसे अधिक तीव्र और सक्षम बना लें। स्मरण शक्ति के धनी कितने ही व्यक्तियों ने ऐसा ही किया है। उनमें यह विशेषता जन्मजात नहीं थी। अभ्यास और मनोयोग के समन्वय से उन्होंने उसे बढ़ाया और आश्चर्य की तरह देखे जाने वाले स्मृति के धनियों में अपना नाम लिखाया।
वस्तुतः स्मृति का धनी होना या न होना, न कोई जादू है और न कोई वरदान यह किसी कार्य में गहरी अभिरुचि रचाने, सावधानी के साथ समझने और मनोयोग पूर्वक उसे मस्तिष्क में संभाल कर रखने की पद्धति भी है। ढूंढ़ निकालने का अभ्यास भी कुछ अधिक मुश्किल नहीं है। सरकस में काम करने वाले लोगों को जितना परिश्रम और अपने शरीर और जानवर साधने में करना पड़ता है उतना ही प्रयत्न यदि मस्तिष्क को साधने में जाय तो काई मन्द बुद्धि भी कभी कालिदास की तरह बौद्धिक प्रतिभा का धनी बन सकता है। ध्यान धारणा की अध्यात्मोपचारपरक प्रक्रिया भी मस्तिष्क की विभिन्न क्षमताओं और शक्तियों को जाग्रत करने में विशेष रूप से सहायक होती है, इसे अपना कर हर कोई अपनी स्मरण शक्ति हो तीव्र बना सकता है।
गायत्री मंत्र सर्वोपरि मंत्र है। इससे बड़ा और कोई मंत्र नहीं। गायत्री महामंत्र में समस्त संसार को धारण पोषण और अभिवर्धन करने वाले परमात्मा से सद्बुद्धि विवेक प्रदान करने की प्रार्थना की गयी है। संसार में जो काम अन्य किसी मंत्र से नहीं हो सकता वह निश्चित रूप से इस महामंत्र द्वारा हो सकता है। श्रद्धा विश्वास पूर्वक की गयी यह उपासना साधक की अन्तश्चेतना को उसके मन मस्तिष्क को अन्तःकरण को विचारों और भावनाओं को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करती है। गायत्री भूलोक की प्रत्यक्ष कामधेनु हैं। जो व्यक्ति उसकी पूजा, उपासना, आराधना, अभ्यर्थना करता है वह प्रतिक्षण माता का अमृतोपम दुग्धपान करने का आनन्द लेता है और समस्त अज्ञानों, अभावों, आसक्तियों के कारण उत्पन्न होने वाले कष्ट कठिनाइयों से क्लेशों, दुखों से छुटकारा पाकर मनोवांछित फल प्राप्त करता है। योग्य एवं तपस्वी गुरु के संरक्षण में की गयी गायत्री साधना अभीष्ट लाभ पहुँचाती है। वृहत्पारासर स्मृति 8-60 में कहा भी गया है “रोग, शोक, द्वेष तथा अभाव की स्थिति में गायत्री महाशक्ति की उपासना करने से इन कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। अग्निपुराण में भी उल्लेख है-
“एहिकसमुष्यिकं सर्वगायत्री जपतो भवेत्।
अर्थात् गायत्री जप से सभी साँसारिक कामनायें पूर्ण होती हैं।
श्रद्धा एवं विश्वासपूर्वक की गयी गायत्री उपासना से व्यक्ति के बाहरी और भीतरी अर्थात् लौकिक एवं आत्मिक दोनों ही उन्नति के द्वार खुल जाते हैं माता का आँचल पकड़ने वाले व्यक्ति के ममतामयी गायत्री महाशक्ति न केवल मनोरथ को पूर्ण करती हैं वरन् मातृत्व संरक्षण भी प्रदान करती हैं। गायत्री संहिता में कहा गया है-
दयालुः शक्तिः सम्पन्ना माता बुद्धिमती यथा। कल्याणकुरुतेह्यैव प्रेम्णा बालस्य चात्मनः॥
तथैव मामा लोकानाँ गायत्री भक्तवत्सला। विदधाति हितं नित्यं भक्ताँ धु्रवात्मनः॥
अर्थात्- जिस प्रकार दयालु, समर्थ तथा बुद्धिमान माता प्रेम से अपने बच्चे का कल्याण करती हैं, उसी प्रकार भक्तों पर स्नेह रखने भक्तवत्सला जगजननी गायत्री माता अपने भक्तों का सदैव कल्याण करती हैं। सुसंस्कारी साधक गायत्री माता का आश्रय लेने के पश्चात कोई गंभीर या अनैतिक भूलें नहीं करते हैं। फिर भी मानवीय दुर्बलताओं के कारण उनसे यत्किंचित् त्रुटियाँ हो जाती हैं तो उसका वैसा दुष्परिणाम नहीं होता। गायत्री संहिता में ही आगे उल्लेख है-
कुर्वन्नाति त्रुटिर्लोके बालकौ मातरं प्रति। यथा भवति कश्चिन्न तस्या अप्रीतिभाजनः॥
कुर्वन्नापि त्रुटीर्भवतः क्वाचित् गायत्र्युपासने। न तथा फलमाप्नोति विपरीतं कदाचन॥
अर्थात्- जिस प्रकार संसार में माता के प्रति भूलें करता हुआ भी कोई बालक उस माता का शत्रु नहीं होता उसी प्रकार गायत्री माता की उपासना करने में भूल करने पर कोई भी साधक कभी भी विपरीत फल को प्राप्त नहीं होता। अतः जैसे भी बने वैसे जप करने पर भी परमपावनी गायत्री कल्याण ही करती हैं। फिर विधि पूर्वक उपासना करने के लाभ का कहना ही क्या है?
यों तो गायत्री उपासना साधना की अनेकों विधियाँ हैं सामान्य साधकों के लिये 9 दिन में 24000 का लघु अनुष्ठान तथा 40 दिन में सवा लक्ष का अनुष्ठान निर्धारित है। जिसे प्रायः लोग आसानी से कर लेते है, परन्तु गायत्री का पूर्ण पुरश्चरण 24 लाख का होता है। जो लोगों को कठिन पड़ता है। जिसमें लगभग 6 घंटे साधना में लगने पड़ते हैं। इतना समय सामान्य रूप से निकाल पाना कठिन होता है। इसके साथ ही इसमें तपश्चर्यापरक कठिन अनुबन्ध भी जुड़े होते हैं जिसे निभाना कमजोर मनःस्थिति के व्यक्तियों के लिये मुश्किल पड़ता है। ऐसे साधकों के लिये जो लम्बी अवधि का संकल्प करना चाहें और प्रतिदिन घंटे-दो घंटे से अधिक समय लगाने की स्थिति में न हों उनके लिये एक विशेष गायत्री साधना बहुत उपयुक्त रहती है। जिसे गायत्री अभियान साधना कहा जाता है। यह एक वर्षीय गायत्री साधना है, जिसके अंतर्गत एक वर्ष में निर्धारित तपश्चर्याओं के साथ 5 लक्ष गायत्री मंत्र जप पूरा किया जाता है।
इस साधना अभियान में जप संख्या बहुत अधिक नहीं होती, फिर भी दीर्घकालीन श्रद्धाभाव साधना क्रम साधना के आन्तरिक उत्कर्ष की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यह एक वर्ष की तपश्चर्या साधक को गायत्री महाशक्ति से तादद में करा देती है। श्रद्धा और विश्वास पूर्वक की हुई अभियान साधना अपना फल दिखाये बिना नहीं रहती। यह एक वर्षीय अभियान साधना एक ऐसी तपस्या है जो साधक के अभावों, कष्ट, कठिनाइयों का तो शमन करती ही है, साथ ही इसके परिणामस्वरूप साधक अपने भीतर, बाहर तथा चारों ओर एक दैवी वातावरण का अनुभव करता है।
एकवर्षीय गायत्री अभियान-साधना की विधि इस प्रकार है-
यह एक संकल्पित साधना है, अतः एक वर्ष में पाँच लाख जप पूरा करने का अभियान किसी भी महीने की शुक्लपक्ष की एकादशी से आरम्भ किया जा सकता है। गायत्री महाशक्ति का आविर्भाव शुक्लपक्ष की दशमी को मध्यरात्रि में हुआ है, इसलिये उसका उपवास पुण्य दूसरे दिन एकादशी को माना जाता है। अभियान आरम्भ करने के लिए यही मुहूर्त सबसे उत्तम है। जिस एकादशी से आरम्भ किया जाये, एक वर्ष बाद उसी एकादशी को समाप्त करना चाहिये।
महीने की दोनों एकादशियों को उपवास करना चाहिये। उपवास में दूध, दही, छाछ, शाक आदि सात्विक पदार्थ लिये जा सकते हैं। जो एक समय भोजन करके काम चला सकें, वे वैसा करते रह सकते हैं। बाल, वृद्ध, गर्भवती या कमजोर प्रकृति के व्यक्ति दो बार भी सात्विक आहार ले सकते हैं। उपवास के दिन पानी कई बार पीना चाहिये।
अभियान- साधना का क्रम इस प्रकार है- (1) नित्यकर्म, स्नान आदि (2) ब्रह्म संध्या- जिसके प्रमुख अंग हैं- पवित्रीकरण, आचमन, रक्षाबंधन, प्राणायाम, न्यास, अधमर्षण, पृथ्वीपूजन, चन्दनधारण, कलशपूजन, दीपपूजन, गुरुवन्दना, सर्वदेव नमस्कार (3) गायत्री- आवाहन, पूजन (4) जप (5) विसर्जन (6) सूर्यार्घ्यदान आदि। यह क्रम नित्य चलना चाहिये, जिन्हें यह ज्ञात न हो, उन्हें इनका विस्तृत विवेचन ‘गायत्री की दैनिक साधना’ नामक पुस्तक में देख लेना चाहिये।
गायत्री की नित्य- नैमित्तिक साधना में न्यूनतम एक माला से लेकर अधिकतम जितना हो सके, उतना जप करने का नियम हैं, किन्तु अभियान-साधना में जप का एक सुनिश्चित क्रम है। इस साधना में साधारण दिनों में प्रतिदिन 11 मालायें जपनी चाहिये। हर महीने की दोनों एकादशियों को 24 मालाएं जपनी चाहिये। वर्ष में तीन संध्यायें होती हैं, उन्हें नवरात्रियाँ कहते हैं। इन नवरात्रियों में 24-24 हजार के तीन अनुष्ठान पूरे करने होते हैं। जैसे प्रतिदिन प्रातःकाल, मध्याह्न, सायंकाल की तीन संध्यायें होती हैं, वैसे ही वर्ष में ऋतु-परिवर्तनों की संधियों में तीन नवरात्रियाँ होती हैं। (1) वर्षा के अन्त और शीत के आरम्भ में आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से लेकर नवमी तक (2) शीत के अन्त और ग्रीष्म के आरम्भ में चैत्र शुक्ल-पक्ष प्रतिपदा से नवमी तक (3) ग्रीष्म के अन्त और वर्षा के आरम्भ में ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक। यह तीन नवरात्रियाँ हैं। दशमी गायत्री जयन्ती को पूर्णाहुति का दिन होने से यह भी नवरात्रियों में जोड़ दिया गया है। इस प्रकार दस दिन की इन संध्याओं में चौबीस माला प्रतिदिन के हिसाब से चौबीस हजार जप हो जाते हैं। इस प्रकार एक वर्ष में पाँच लाख जप पूरा हो जाता है।
जप-संख्या का हिसाब इस प्रकार और भी अच्छी तरह समझ में आ सकता है-
(1) बारह महीने की चौबीस एकादशियों को प्रतिदिन 24 मालाओं के हिसाब से 24x24=576 माला।
(2) नौ-नौ दिन की नवरात्रियों में प्रतिदिन की 24 मालाओं के हिसाब से 27x24=648 माला।
(3) वर्ष के 360 दिनों में से उपरोक्त 27+51=576 दिन काटकर शेष 309 दिनों में 11 माला प्रतिदिन के हिसाब से 3399 माला।
(4) प्रति रविवार को पाँच मालायें अधिक जपनी चाहिये अर्थात् 10 की जगह 15 माला रविवार को जपी जायं। इस प्रकार एक वर्ष में 52x50=260 मालायें।
इस प्रकार कुल मिलाकर- 576+648+3399+260=4883 मालायें हुई। एक माला में 108 दाने होते हैं। इस प्रकार 4883 x 108 =5,27,364 जप हुआ, पाँच लाख सत्ताईस हजार तीन सौ चौंसठ, बीच में किसी कारण जप कम हो पाया हो तो उसकी पूर्ति हेतु अतिरिक्त जप कर लेना ठीक ही है, विशेष रूप से स्त्रियों के लिये। ध्यान रखा जाना चाहिये कि गिनती से अधिक महत्व भावविह्वल होकर जप करने का होता है।
तीनों नवरात्रियों में कामसेवन, पलंग पर सोना, दूसरे व्यक्ति से हजामतें बनवाना, चमड़े का जूता पहनना, मद्य माँस सेवन आदि विशेष रूप से वर्जित है। शेष दिनों में सामान्य व्रत रख जा सकता है, उसमें किसी कठोर तितिक्षा या विशेष तपश्चर्या का प्रतिबन्ध नहीं है।
इस अभियान साधना को पूरा करने की और भी तिथियाँ हैं। पहली विधि तो ऊपर बतायी जा चुकी है। दूसरी विधि में साधारणतया 11 माला प्रतिदिन ओर रविवार या अन्य अवकाश के दिन 24 मालाएं करनी होती हैं। यदि अवकाश के दिन अधिक न करनी हों तो पाँच लाख को 360 दिनों में बराबर विभाजन करने पर प्रायः 14 माला का हिसाब बन जाता है। वर्ष में 5 लाख का जप इसी क्रम में पूरा करना आसान हो जाता है। इसमें अपनी सुविधा का क्रम भी निर्धारित हो सकता है, पर वह चलना नियमित रूप से ही चाहिये। वर्ष पूरा हो जाने पर उसकी पूर्णाहुति का हवन कर लिया जाये। इसमें एक हजार आहुति से कम न हों। महीने में एक बार शुक्लपक्ष की एकादशी को 108 मंत्रों से हवन कर लेना चाहिये। हवन में घर परिवार के सदस्यों से लेकर अन्यान्य व्यक्तियों, साधकों को सम्मिलित कर लेने से वह सुविधापूर्वक सम्पन्न हो जाता है।
अभियान एक प्रकार का लक्ष्यवेध है। इसके लिए अनुभवी, सुयोग्यगुरु या पथप्रदर्शक की नियुक्ति आवश्यक है, जिससे कि बीच-बीच में जो अनुभव हों, उनके सम्बन्ध में परामर्श किया जाता रहे। कई बार जब प्रगति में बाधा उत्पन्न होती है। तो उसका उपाय अनुभवी मार्गदर्शक से जाना जा सकता है। एकाकी यात्रा की अपेक्षा विश्वस्त पथ-प्रदर्शक की सहायता सदा ही लाभदायक सिद्ध होती है।
नित्यप्रति स्नानादि से निवृत्त होकर, शुद्ध होकर, प्रातःकाल एवं शाम को दोनों समय जप किया जा सकता है। प्रातःकाल उपासना में अधिक समय लगाना चाहिये, इससे संध्या के समय कम समय में जप सम्पन्न हो जाता है। जप के समय मस्तक के मध्य भाग अथवा हृदय में प्रकाश पुँज ज्योतिस्वरूप गायत्री का ध्यान करते रहना चाहिये।
साधारणतया एक घण्टे में दस मालायें जपी जा सकती हैं। अनुष्ठान के दिनों में ढाई घंटे प्रतिदिन और साधारण दिनों में एक घंटा प्रतिदिन उपासना में लगा देना कुछ विशेष कठिन बात नहीं है। सूतक काल, यात्रा में, बीमारी आदि के दिनों में बिना माला के मानसिक जप चालू रखना चाहिये। किसी दिन साधना छूट जाने पर उसकी पूर्ति अगले दिन की जा सकती है।
हवन आदि की कोई असुविधा पड़े तो वह सहयोग के आधार पर पूरी की जा सकती है। किसी साधक की साधना खण्डित न होने देने एवं उसका संकल्प पूरा कराने का सूक्ष्म-संरक्षण शाँतिकुँज की संचालक सत्ता ने संभाल रखा है। इस क्षेत्र में कदम बढ़ाने वालों को समुचित उत्साह, प्रेरणा, पथ-प्रदर्शन तथा सहयोग सुनिश्चित रूप से मिलता है। यह आश्वासन ही नहीं, महाकाल की सत्ता की उद्घोषणा भी है।
गायत्री अभियान की साधना एक वर्ष में पूरी होती है। इस साधना की महानता को देखते हुए इतना समय कुछ अधिक नहीं है। इस तपस्या के लिये जिनके मन में उत्साह है, उन्हें इस मनोवाँछित फल प्रदान करने वाली शुभ साधना का आरम्भ इसी माह से कर देना चाहिये। आगे चलकर माँ भगवती अपने आप संभाल लेती हैं। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि शुभ आरंभ का परिणाम शुभ ही होता है।
“आप क्या सोचते हैं कि व्याख्यान देते घूमने से समाज की सेवा हो जाती है?” एक ने एक दिन पूछ ही लिया उनसे। उस समय एक पूरे जिले के आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे वे। न जाने कितनी बार उन्हें जेल जाना पड़ा। ऐसी कोई कठिनाई नहीं, जिसे उन्होंने न उठाया हो अथवा उठाने के लिये तत्पर न हों।
“हमारी सेवा साधारण घरेलू सेवा से थोड़ी अलग तरह की है।” प्रश्न ने उन्हें चौंकाया नहीं, सुनकर झल्लाये भी नहीं। हंसते हुए उत्तर दिया था- “हम स्वच्छता, सावधानी, जीवनविद्या का प्रचार करते हैं।स्वयं हम इन्हें न रखें तो लोग सीखेंगे कैसे? हम जनता के विचारों को जाग्रत, परिमार्जित करते हैं। ठीक दिशा दिखाना और उधर चलने की प्रेरणा देना हमारा काम है। यही हमारी सेवा है। जनजागरण से अधिक महत्त्व की सेवा और क्या होगी?”
बड़ी विलक्षण प्रतिभा है उनकी। युक्तिपूर्ण उत्तर देना तो जैसे स्वभावगत विशेषता है। वक्तृत्व शक्ति की तो पूछिये मत उनकी वक्तृत्वता सुनकर तो यदा-कदा लोग यह भी मानने लगते हैं कि जिसमें वक्ता बनने की योग्यता नहीं, वह समाज की सेवा कैसे करेगा? वे तो साधारण बातचीत में भी चुटकियाँ लेते हैं, उपदेश देते, व्याख्यान से ही करते चलते हैं। गाँधी बाबा ने जो आत्मनिरीक्षण, आत्मशोधन की प्रबल प्रेरणा दी थी किसी दूसरे ने उसे कितना ग्रहण किया, यह कहना तो कठिन है, किन्तु उन्होंने उसे बड़ी गम्भीरता से लिया था। यह प्रेरणा ही उन्हें राजनीतिक क्षेत्र में ले आयी थी, यह कहना कुछ असंगत न होगा। समाजसेवा को उन्होंने एक साधन माना था- आत्म-शुद्धि का। यह आत्मशोधन की प्रेरणा उनके भीतर कभी मन्द भले ही पड़ी हो, सुप्त नहीं हुई और आज तो पता नहीं वह कुछ ज्यादा ही जग पड़ी।
‘व्याख्यान’ देने से ही समाज का कल्याण हो जायेगा। उस दिन एक के द्वारा ही क्यों, अनेकों के द्वारा अनेकों बार पूछे गये ऐसे सवालों के जवाब उन्होंने दिये थे। जवाब भी ऐसे कि पूछने वाले सुनकर चुप रहने के लिये विवश हुए बिना न रहे। आज जब कोई प्रश्नकर्ता नहीं। जब सर्वत्र उनके स्वागत में भीड़ जयध्वनि करती, मालायें सजाये खड़ी रहती है, यह प्रश्न उनके मन में प्रबल क्यों होता चला जा रहा है? उनके भीतर बैठकर कौन उनसे इतने तीखे स्वर में बार-बार पूछता है, इसका कोई समाधान वे नहीं कर पाते।
हम स्वच्छता, सावधानी, अनुशासन का प्रचार करते हैं। खुद इन्हें जीवन में न उतारें तो लोग कैसे सीखेंगे? आज उनका यह स्वयं का जवाब जैसे उनके मस्तिष्क में धधककर जल उठा है।
कितनों ने हमारे व्याख्यानों से स्वच्छता की शिक्षा ली? कितनों ने सावधानी सीखी? कितनों ने अनुशासन का पालन करना अपनाया है? निराशा से सिर झुक गया उनका।
स्वयंसेवक मेरे जैसे बाल रखते हैं। मेरे समान नंगे सिर रहते हैं। यही चप्पल पहनते हैं। यह घड़ी न सही, घड़ी बाँधते हैं। उन्होंने कभी इस बात का गर्व किया था कि लोग रहन-सहन में उनका अनुकरण करने लगे हैं। उनके जैसी धोती पहनना, वैसा ही कुर्ता बनवाना, कुर्ते के ऊपर का बटन इन्हीं की तरह खुला रखना, अब तो आस-पास के लोग भी कुछ बातों में उनकी नकल करते हैं।
इनमें अनेकों त्रुटियाँ हैं। बोलने में कुछ गर्दन एक ओर झुकाकर बोलते हैं, चलने में हाथ कुछ ज्यादा ही हिलाते हैं। हाथ धोने में.... अब रहने दीजिये त्रुटियों की बात। कमियाँ किसमें नहीं होतीं? पर यह है क्या? उनकी कमियाँ इतनी व्यापक क्यों होती चली जा रही हैं। लोग कमियों की इतनी ठीक-ठाक नकल क्यों करते हैं?
व्यापक-व्यापकतर-व्यापकतम होते जा रहे हैं उनके दोष। जैसे सम्पूर्ण दिशायें, पूरा आकाश मैला-घिनौना होता जा रहा है उनके दोषों से। आँखें बन्द कर लीं। कोई वज्र -कर्कश स्वर में पूछ रहा है उनसे- “क्या यही है तेरे व्याख्यानों का प्रभाव? यही समाज की सेवा की तूने।”
एक वह भी तो था। था नहीं, है- आज बरबस याद हो आयी अपने मित्र की। दुबला-पतला, कुछ ललाई लिये गेहुँआ गोरा शरीर, गंभीर गोलमुख, घुटा सिर, बड़ी-सी चुटिया, विबाईयाँ भरे नंगे पैर, खादी का मटमैला कुर्ता, खूब मोटी कुछ मटमैली धोती-विद्यापीठ में सभी चिढ़ाते रहते थे। चमड़े की चप्पल की जगह लकड़ी की चट्टियाँ पहनता था। चुटिया और जनेऊ की तो काफी हंसी होती थी, पर था बड़ा गम्भीर। उसी गम्भीरता का प्रभाव था कि विद्यापीठ के जीवन में भी कुछ दिन कुछ छात्र चोटी रखने और संध्या करने लगे।
दोनों विद्यापीठ में साथ-साथ पढ़े थे। उन दिनों तो जैसे विद्यापीठ की शिक्षा में उत्तीर्ण होने का प्रमाणपत्र ही था- समाज-सेवा। देशसेवा की प्रबल प्रेरणा ने ही इस संस्था की नींव रखी। देश के स्वाधीनता संग्राम में इसके शिक्षकों और छात्रों ने कितना बलिदान किया। यह क्या किसी से छुपा है। वह भी तो इन्हीं में से एक है।
पर वह वक्ता तो नहीं है। स्मृति रेखायें सिमट-सिमट कर उनके मन की कैनवास पर एक चित्र तैयार कर रही थीं। वह तो साधारण बातचीत में भी शब्दों को तौल-तौलकर मुख से निकालता है, जैसे कोई बहुत बड़ी सम्पत्ति खर्च कर रहा है। दस शब्द की जगह चार में काम चला सके तो वह साढ़े चार बोलने वाला नहीं। विद्यापीठ से वह अपने घर चला गया। इधर अब यदा-कदा उनके बारे में थोड़ा-बहुत पता चल पाता है।
गाँव वाले उसकी प्रशंसा करते नहीं अघाते। यों तो वह खेती करता है। दोपहर विश्राम के समय चरखा चलाता है। घर में उसने चरखे लाकर रख दिये हैं। खेत में उसने कपास बोना शुरू कर दिया। घर में चरखे चलें तो बाजार में कपड़े नहीं लेने पड़ते।
कभी-कभी वह आस-पास की गलियाँ झाड़ देता है। गाँव के लोग पता नहीं क्यों उसका इतना सम्मान करते हैं, शायद इसलिये कि रोज शाम को वह पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर लोगों को रामायण सुनाता है। लोगों को कहता है- तुम अपने−आप पढ़ो तो कितना आनन्द आयें। बड़े- बूढ़े भी अब उससे क.....ख.....ग पढ़ते हैं। भोजन के बाद रात्रि में लगती है उसकी पाठशाला। अब लोग इधर-उधर कूड़ा डालते डरते हैं, “भैया देखेंगे तो झाड़ू लेकर जुट पड़ेंगे।” उसका पूरा गाँव साफ रहने लगा।
सबेरे- सबेरे एक मील जाकर गंगा-स्नान करता है। संध्या-गीता का पाठ तो जैसे उसके जीवन का अंग है। ‘देखा-देखी पाप, देखा-देखी पुण्य’ सो गाँव के तो जैसे अब सभी गंगा स्नान, संध्यापाठ करने वाले हो गये। स्त्रियों की चर्चा मत कीजिये, उनमें तो सृष्टिकर्ता ने श्रद्धा बाँटते समय एक बहुत बड़ा भाग दे रखा है। अब तो साधारण हलवाहे तक स्नान करके सूर्य भगवान को एक लोटा जल चढ़ाते हैं, तब मुँह में दाना जाता है।
सब कुछ याद आने लगा। अतीत की रेखाओं और वर्तमान के रंगों ने मिलकर एक चित्र तैयार किया। प्रतीक को देखकर प्रतीक्य के मिलन की अभिलाषा जगना स्वाभाविक है, एक तो मित्र से मिलने की चाह, दूसरे सुना है उसने किसी साधु की संगति पाई है, तो यह जिज्ञासा भी।
“कितने स्वयंसेवक हैं यहाँ?” यहाँ आने पर गाँव की स्वच्छता, लोगों की तत्परता ने उन्हें चकितकर दिया था। यह उनकी सरकारी यात्रा नहीं थी। उनका आना सहसा हुआ है। पहले से कोई तैयारी हो यह संभव नहीं।
“हम सभी स्वयंसेवक ही हैं सम्पूर्ण बाबू।” उनके मित्र दयानन्द ने छोटा-सा उत्तर दिया। “मेरा मतलब तो ऐसे लोगों से है जो बराबर यहीं रहकर आश्रम का काम करते हैं।”
अब उनकी समझ में सारी बात आयी। स्पष्टीकरण आवश्यक था। “यह आश्रम नहीं है, यह तो एक सज्जन ने अपना खाली मकान पूरे गाँव को दे दिया है। हममें से जिसे अवकाश मिलता है- यहाँ आकर बैठता है। वैसे तो यह हमारी रात्रिशाला, पंचायत, अतिथिशाला और जो भी सामूहिक काम आ पड़े सबका स्थान है।”
कोई स्वयंसेवक नहीं, कोई नेता नहीं। एक बार उन्होंने चारों ओर देखा। मन ही मन वह कह रहे थे- बापू की बात का मर्म तो देवदत्त ने समझा।
“यहाँ के लोग आपकी ही नकल करते हैं?” थोड़ी देर पीछे उन्होंने बात चलते हुए पूछ लिया था। वैसे उनका मन कहता था - इसकी नकल पूरा देश करने लग जाये तो बापू का सपना आज ही साकार हो उठे।
“नहीं तो।” देवदत्त ने सिर हिला दिया। “अच्छे काम लोग समझकर करें, यह नकल नहीं है।” देवदत्त के उत्तर की जगह उनका ध्यान लोगों की ओर अधिक था। उनकी आँखें चारों ओर घूम रही थीं। जहाँ पहुँचना, वहीं की अधिक से अधिक परिस्थिति समझ लेने का उन्हें पुराना अभ्यास है। लेकिन यहाँ उन्हें आश्चर्य हो रहा था, कोई देवदत्त की नकल करता नहीं लगता। देवदत्त थोड़ा आगे झुककर चलते हैं, उनके कुर्ते की दो एक बटन टूटी ही रहती है। बोलते समय वे प्रायः आने बायें हाथ की अंगुलियाँ समेटकर मुट्ठी बना लेते हैं लेकिन दूसरों में तो कोई ऐसा नहीं दिखता, जिसमें ये बातें आयी हों। परन्तु उनकी चुटिया व्यापक नहीं हुई, उसका कारण? यह कारण उन्हें समझ में नहीं आ रहा था।
“सुना है तुम किसी साधु के पास जाते हो?” उनकी बात सुनकर देवदत्त मुस्कराया, बोला- “अच्छा! अच्छा!! संध्या समय टहलता भी हो जायेगा गंगा किनारे और सन्तदर्शन भी।” वैसे देवदत्त को अपने इस मित्र के बदलाव पर थोड़ा आश्चर्य था।
“तनिक वह गाय का गोबर उठा लाना। एक अंजलि तो होगा ही।” पहुँचते ही साधु ने आदेश झाड़ दिया। विचित्र था वह साधु भी। न जान, न पहचान, एक दूध-सी उजली खादी पहले कोई भला आदमी दर्शन करने आया तो उसे प्रणाम करके बैठते-बैठते गोबर उठा लाने की आज्ञा दे दी गयी। आदमी भी कोई साधारण नहीं- उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री।
“आप बैठिये।” देवदत्त ने उन्हें रोका और स्वयं उठने लगे। “उन्हें ही जाने दो भाई! वह तो गाय का पवित्र गोबर है।” साधु महाराज ने देवदत्त को रोक दिया।
“हमें स्वच्छता रखने और कूड़ा उठाने का अभ्यास है।” वे हंसकर उठे। इतने ग्रामीणों के सामने साधु की बात न मानना उचित नहीं जान पड़ा। गाय का गोबर गीला था। कुर्ते को ऊपर चढ़ाकर किसी प्रकार उठा लिया उन्होंने। हाथ की अंजिल कपड़े से दूर किये बहुत संभालते हुए चले आये किसी तरह। भले ही उन्होंने गांवों की सफाई में थोड़ा- बहुत भाग लिया हो, भले ही टोकरी भरते और उठाते समय के उनके चित्र समाचारपत्रों में छपे हों, किन्तु उनकी एक-एक अंगभंगी कह रही थीं- कितना गन्दा उलझन भरा काम है यह।
“यहीं रख दो।” साधु ने कह दिया। गोबर भरे हाथों को धोने जा रहे थे, तब तक दूसरी आज्ञा मिली- “वह पुस्तक उठा लाओ और तनिक पोंछ दो उसे।”
“मैं हाथ धो लूँ।” उन्होंने देख लिया था कि देवदत्त कुएं से पानी ला रहा है।
“हाथ पीछे धो लेना।” साधु बोला- “पहले पुस्तक साफ करके दे दो।”
“महाराज पुस्तक में गोबर लग जायेगा। वह एकदम गंदी हो जायेगी।” यह साधु उन्हें पहली दृष्टि में ही बड़ा विचित्र लगा था। अब बहुत कुछ विश्वास हो गया था, शायद समय भी... वह कुछ और सोचते इससे पहले साधु के शब्द उनके कानों में पड़े, वह कह रहे थे- “बाबू सम्पूर्णानन्द! एक छोटी-सी किताब उठाने और साफ करने में तो तुम पहले अपना हाथ देखते हो और इतने बड़े समाज के दोष दूर करने चले हो, समाज-सेवा करने चले हो अपनी ओर देखते ही नहीं।” साधु के शब्दों में पर्याप्त गंभीरता थी- “तुम्हारे हाथों में गोबर लगा है, तो जिन-जिन पुस्तकों को छुओगे, वे मैली हो जायेंगी। तुम्हारे भीतर बुरा हो तो तुम समाज में अपना क्षेत्र जितना बढ़ाओगे, उसमें उतनी ही बुराई फैलाते जाओगे।”
शब्दों से झरते भावों को वे ग्रहण करते रहे। साधु की महानता और अपनी क्षुद्रता उन्होंने परख ली। महानता का पथ-प्रदर्शक वह साधु उनका गुरु बना और उसके शब्द गुरुमंत्र, जिसकी गूँज जीवन के अंतिम पल तक उनके कानों में रही “पहले अपने दोष दूर करो तब समाज के दोष दूर करने चलो।”
वस्तुतः आत्मसाधना ही वास्तविक समाज-सेवा की कुँजी है।
आदर्शवादी दुस्साहस ही अवतार है। वह एक भावनात्मक प्रवाह के रूप में उत्पन्न होता है और असंख्यों को अनुप्राणित करता है।
-परमपूज्य गुरुदेव
भावनाओं की क्रियात्मक अभिव्यक्ति और मधुर स्वप्नों को साकार करने के लिए दाम्पत्य जीवन में कुछ व्यावहारिक सत्यों को जानना अत्यधिक अनिवार्य है, ताकि गृहस्थ जीवन बिना किसी अवरोध के चल सके। पति-पत्नी में किसी को अपनी कौटुम्बिक श्री- सम्पन्नता, व्यक्तिगत सुन्दरता, योग्यता, प्रतिभा और किसी पक्ष को लेकर अभिमान नहीं करना चाहिये। पत्नी के माता-पिता अच्छे सम्पन्न हैं, बचपन में उसने उस सम्पन्नता को जीभरकर भोगा है, किन्तु उसके पति की कौटुम्बिक सम्पन्नता वैसी नहीं है, तो पत्नी को यह ध्यान रखना चाहिये कि वह अपनी बातों और व्यवहार में उसको प्रकट न करे। इससे पति का स्वाभिमान आहत होता है। जो पत्नियाँ अपने मायके की सम्पन्नता और ससुराल की विपन्नता को लेकर आलोचना, प्रशंसा करती हैं वे इस प्रकार की भूल करके अपने सुखी गृहस्थ जीवन में आग लगाती हैं। यही बात पति द्वारा भी हो सकती है। यही बात पति द्वारा भी हो सकती है। इसी प्रकार अपनी सुन्दरता, योग्यता, शिक्षा, प्रतिभा आदि का गर्व भी किसी पक्ष को नहीं करना चाहिये। यदि ऐसा करना हो तो उसमें दूसरे पक्ष को भी मिलाकर, व्यक्ति को नहीं दम्पत्ति की प्रशंसा करने से मनोमालिन्य उत्पन्न नहीं होता।
इसी प्रकार बाहर के व्यक्तियों के सामने पति या पत्नी से अनावश्यक सेवा लेना या उससे पत्नी की तरह नहीं नौकरानी की तरह व्यवहार करना, उसे भीतर ही भीतर कचोट जाता है। पति रहे हों स्वभाव के सरल व पत्नी के हर कार्य में सहयोग देने व अनुरोध को मानने वाले, पर अपनी सहेलियों और उनके मित्रों के सामने पत्नी यदि उन्हें ऐसे आदेश देती हो जैसे वे उन्हीं के वशवर्ती हैं, तो पत्नी के इस व्यवहार से वे स्वयं को अपमानित ही अनुभव करेंगे। यह ठीक है कि पति के हर अनुरोध को पत्नी अपना दायित्व समझकर पाल लेती या पति अपने पत्नी के हर अनुरोध को उसी प्रकार स्वीकारते हैं। इससे एक दूसरे को यह प्रतीति होती है- देखो! वे हमें कितना मानते हैं और अपनी इस पारस्परिक सहकारिता को वे अपने मित्रों, परिचितों पर प्रकट करके अपने मधुर दाम्पत्य की एक झलक उन्हें दिखाना चाहते हैं। यह चाहना स्वाभाविक है और बुरा भी नहीं है, पर उसके लिये जो ढंग अपनाया जाता है वह गलत होता है। इसको वार्तालाप द्वारा भी प्रकट किया जा सकता है। आदेश-अनुरोध का स्वर दूसरी तरह का हो सकता है, जिसमें अपनी गुरुता और दूसरे की लघुता की ध्वनि न निकले। पत्नी को “मधु, सुरेश के लिये चाय बनाओ,” कहने की अपेक्षा यह कहा जाए- “भाई चाय बनाना तो कोई मधु से सीखे। चीनी के साथ वह और भी कुछ मिलाती है, जिसका स्वाद किसी दूसरे केिथ की बनी चाय से नहीं मिलता। सुरेश के आने की क्षुशी में वैसी ही और बना दो, इसके साथ-साथ हम भी एक बार और तृप्त हो लेंगे”, तो बात कुछ और ही हो जायेगी।
दाम्पत्य जीवन में स्वावलंबन और सहयोग का समन्वय आवश्यक होता है। एक-दूसरे को सहयोग देना ही चाहिये, पर वह अति की सीमा न लाँघ जाये ओर न बिल्कुल ही असहयोग किया जाये कि दूसरा पक्ष स्वयं गृहस्थी की चक्की में अकेला पिसता हुआ अनुभव करे। संतुलित सहयोग से पारम्परिक प्रीति बढ़ती है, पर यदि घर के हर काम को अपना काम समझकर साथी के सहयोग की अपेक्षा किये बिना किया जाता रहे तो वह दूसरे की ‘उपयोगिता’ ‘आवश्यकता’ पर चोट करेगा। पति यदि घर के सारे काम अपने हाथ से करने लगे, तो पत्नी मन में यह सोचे बिना नहीं रह सकेगी कि इन्हें मेरी जरूरत ही क्या थी। अपने-अपने क्षेत्र का काम पति, पत्नी मुख्य रूप से संभालें, पर दूसरे के कामों में भी थोड़ा सहयोग देते रहें, तो इससे एक-दूसरे का ध्यान रखने की बात स्पष्ट होती है, जो प्रीति को प्रगाढ़ बनाती है। पति-पत्नी के काम में थोड़ा हाथ बंटा दे और पत्नी-पति के कामों में सहयोग दे, यह सहयोग आवश्यक ही नहीं, आकर्षक भी है। चाहे यह सहयोग किसी छोटे-से काम में ही मिला हो, एक दूसरे के मन को मुदित करता है।
पति-पत्नी का क्षेत्राधिकार सामान्य रूप से एक अलिखित विधान की तरह घर और बाहर बंट जाता है। भारतीय ही नहीं विश्व के सभी परिवारों सामान्यता में घर की मालिक पत्नी और बाहर का कर्ता पति होता है। अतः दोनों के बीच अपने आप हो जाने वाले इस समझौते का सीमातिक्रमण किसी की नहीं करना चाहिये। पत्नी के अधिकारक्षेत्र में पति सम्मति, सुझाव और सहयोग का अधिकारी है। यह उसका अधिकार ही नहीं दायित्व भी है। इसी प्रकार बाहर के मामलों में पत्नी के वैसे ही अधिकार और कर्तव्य होते हैं। इनका सामान्य रूप से निर्वाह होता रहे, तो कोई गतिरोध उत्पन्न नहीं होता, पर एक-दूसरे के क्षेत्र में अनावश्यक दखलन्दाजी करने पर उत्पन्न हो सकता है। इसका ध्यान रखा जाना आवश्यक है। सम्पत्ति के मामले में योग्यता, विवेक व बुद्धि के आधार पर किसी एक को प्रमुख बनाया जा सकता है, पर वह उसे लेकर अभियान या दूसरे पक्ष पर दबाव डाले तो सम्बन्धों में रुक्षता आने लगती है।
जीवन के प्रति सही दृष्टि लेकर चलने का दाम्पत्य सम्बन्धों ओर उसकी मधुरता पर बहुत प्रभाव पड़ता है। जो व्यक्ति जीवन को मात्र फूलों की सेज मानकर चलते हैं या वैसा पाने की आकाँक्षा संजोए रहते हैं, वे भूलते हैं कि जीवन में सुख और दुख दोनों ही आते हैं। दोनों को भोगने के लिये समान रूप से उत्साह संजोये रखने वाले व्यक्ति ही उसका सच्चा आनन्द उठा सकते हैं। जो दम्पत्ति विवाह के पूर्व अपने भावी दाम्पत्य जीवन को मात्र सुखों की सेज मानकर उसमें प्रवृत्त हुये थे, उनकी यह मान्यता जब यथार्थ के थपेड़ों से टूटने लगती है, तब प्रायः ऐसा होता है कि वे आगत दुःख का कारण अपने जीवन साथी को मानने लगते हैं। यह एक प्रकार का दुराग्रह ही होता है।
जब कोई एक पक्ष जीवन को बोझिल, कंटीला और असह्य मानकर उसका कारण अपने साथी को समझने लगता है। ऐसी स्थिति में दुःख और भी असह्य हो जाता है। जिस दुख को एक-दूसरे के स्नेह, सेवा, सहानुभूति और जीवनोत्साह के सहारे सह्य बनाया जा सकता था वही अब भयंकर हो उठता है। इसीलिये आरम्भ से ही जीवन का यथार्थ स्वरूप लेकर चलना ठीक रहता है। संभावित दुःखों के लिये की गयी यह पूर्व मानसिक तैयारी उन्हें सहने, परित्राण पाने में बहुत सहायक होती है। अपने दुःख में भी यथासम्भव बहादुरी से काम लेने वाले और अपने साथी पर उसका बोझ नहीं डालने वाले पति-पत्नी एक-दूसरे पर अपने दुःख का भार डालकर उसे किनाराकसी करने की ओर उन्मुख नहीं करते। यह विवेकपूर्ण बात है। प्रकट करना भी पड़े, तो वह इस रूप में हो कि उससे दूसरे पक्ष को चोट न पहुँचे। पति का अफसर उससे नाराज है। ऑफिस में वह उससे अच्छा व्यवहार नहीं करता। इससे पति दुःखी है। किन्तु यह अफसर का कुछ कर नहीं सकता, ऐसी स्थिति में उत्पन्न हो चुके रोष को पत्नी से लड़-झगड़ कर उतारा जाये, यह निरी मूर्खता ही है। पति बाहर से थका-हारा लौटा है और श्रीमती जी दिन भर के अपने कष्टों का कच्चा चिट्ठा उनके मत्थे मारकर उस खीझ से मुक्ति पा लेती है, जो बच्चों के ऊधम, पड़ोसियों के व्यवहार या अन्य कारणों से उपजी है। ऐसा रोज ही होने लगे, तो पति-पत्नी का पारस्परिक प्रेमरंग चाहे वह कितना ही गहरा क्यों न हो, धीरे-धीरे उतरता जायेगा और एक दिन जब वह बिलकुल ही घुल-पुँछ जाएगा तो पति-पत्नी एक दूसरे की सूरत से ही चिढ़ने लगेंगे।
परस्पर मिलते समय यथासम्भव प्रसन्न और उल्लसित रहना वह टॉनिक है जो दाम्पत्य जीवन के यौवन को स्थायित्व प्रदान करता है। घटनाओं पर पति-पत्नी का वश न हो, पर अपने आवेगों पर अंकुश लगाने की क्षमता हो तो विकट से विकट परिस्थितियों में भी वे एक-दूसरे के सहारे हंस सकते हैं, मुसकरा सकते हैं। पति कितना ही सहनशील हो, फिर भी यह बात वे कभी पसन्द नहीं करते कि उनका साथी किसी दूसरे स्त्री-पुरुष से उनकी तुलना करे व दूसरों की सराहना करें। पत्नी को पति का यह कहना “देखो श्रीमती... किस सुघड़ता से घर संभालती है।” और पत्नी द्वारा किसी अन्य मित्र या पुरुष का प्रशंसा करना कभी एक-दूसरे को अच्छा नहीं लगेगा। यह भूल अच्छे-अच्छे दंपत्तियों में मनोमालिन्य व शंकाएं उपजा देती हैं। पारस्परिकता, एकनिष्ठता पति-पत्नी के लिए बहुत आवश्यक है। विवाह के पहले का जीवन कैसा ही क्यों न रहा हो, बाद का जीवन एकनिष्ठ होकर जीना बहुत आवश्यक है। पति भूलकर भी विवाह के पूर्व किसी अन्य स्त्री से रहे रागात्मक सम्बन्धों का जिक्र पत्नी से करे और न ही पत्नी को इसलिये विवश करे। अति भावुकता के शिकार होकर जो पति-पत्नी अपने विश्वास या निष्ठा को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से अपने विवाह के पूर्व की ऐसी बातें एक-दूसरे से कह देते हैं। यह भावुकता पिचानबे प्रतिशत दंपत्तियों के बीच संदेह का अंकुर उपजा देती है। जो सराही हवा पाकर भभक उठने वाली राख में दबी चिंगारी की तरह थोड़ा-सा सहारा पाते ही पनप कर उसके विश्वास के तोड़ देते हैं।
पुत्री के लिए दुहिता शब्द का प्रयोग करने के पीछे यही अर्थ है कि उसके दूर रहने में हित है। पति-पत्नी बचपन से ही एक दूसरे से परिचित होते हैं उनके जीवन के भले-बुरे प्रसंगों से विज्ञ होते हैं तो उनके भावी जीवन में झंझावात आने की स्थितियाँ अधिक आती हैं। जीवन के बुरे प्रसंग समय पाकर वर्तमान में प्रेत की तरह आ धमकते हैं और उन्हें एक दूसरे से विरत बना देते हैं और किसी दृष्टि से विवावपूर्व गुजरी सच्चाइयों को साथी पर प्रकट करना ठीक हो सकता है या नहीं यह हमारा विषय नहीं। व्यवहारिकता के क्षेत्र में तो वे वर्जित ही हैं जो दंपत्ति यह नहीं चाहते की उनके दाम्पत्य जीवन में कोई झंझावात आये और विश्वास के वृक्ष पर जमे उनके नींव को ही बिखेर कर रख दे उन्हें अपने अतीत के संबंधों की गठरी को बंधी ही रहने देना चाहिये। साथी से कुछ भी छिपा नहीं रखने की यह भावुकता भरा जुआ उन्हें नहीं खेलना चाहिये।
विवाह के पूर्व देखे गये स्वप्न यदि मात्र कल्पना की उड़ान नहीं है तो उन्हें साकार होना ही चाहिये। उन सपनों को कैसे सत्य का जामा पहनाया जा सकता है उसके लिये भावनाओं और व्यवहारिकता के दोनों पाँवों को स्वस्थ व सबल बनाकर अभीष्ट लक्ष्य की ओर एक-एक डग भरते हुए बढ़ना पड़ता है। कभी गिरते हैं तो फिर उठ खड़े होने वाली बात को भुला नहीं देना चाहिये। यों प्रत्येक व्यक्ति शारीरिक मानसिक रचना में भेद होता ही है फिर भी सामान्य अवयव कलेवर व मानस का सामान्य स्वरूप अवश्य होता है। अग्रलिखित व्यवहारिक सत्य सामान्य रूप से सभी दंपत्तियों के साथ लागू होते हैं। किन्हीं को ये निरर्थक भी लग सकते हैं। फिर भी इससे इनकी उपयोगिता कम नहीं हो जाती।
दाम्पत्य जीवन की बगिया जब महकती है तो उसकी सौरभ से परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व भी पुलकित, प्रफुल्लित होता है। अतः दाम्पत्य की मधुरता बनी रहे वह सफल व सार्थक हो उसमें पति-पत्नी का अपना ही सुख-दुख नहीं है। सारे समाज का जुड़ा है। यह पति-पत्नी की कामना ही नहीं दायित्व ही है। आज के युग में स्थिति यहाँ तक आ पहुँची की कुछ लोग विवाह संस्था को ही अनावश्यक मानने लगे हैं। ऐसी स्थिति में इस बुद्धिवाद के युग में दाम्पत्य व्यवहार का जानना और भी आवश्यक हो गया है। उपयुक्त तथ्य उस प्रयोजन को बहुत कुछ पूरा कर सकते हैं।
साधु ने स्वप्न देखा कि दोनों हाथों में ऊँचे डंडे लेकर वह मोक्षमहल की ऊपरी मंजिल पर चढ़ने का प्रयास कर रहा है, किन्तु चढ़ने में असफल रहता है। कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करे। पास ही में खड़े एक बुजुर्ग ने देखा तो वे हंसने लगे और साधु से पूछा कि वे क्या कर रहे हैं? साधु ने कहा- मेरे पास सम्यक ज्ञान और सम्यक दर्शन के दो डण्डे हैं, इनके सहारे मोक्षमहल की ऊपरी मंजिल पर जाना चाहता हूँ, किन्तु चढ़ नहीं पाता, कृपया आप ही मार्गदर्शन करें। बूढ़े ने कहा- स्वामी जी सम्यक ज्ञान और सम्यक दर्शन के दो डण्डों में जब तक सम्यक चारित्र्य आड़ी सीढ़ियाँ न लगाओगे, तब तक किस पर पैर रखकर ऊपर बढ़ सकोगे। आखिर टिकने के लिये कुछ तो अवलम्बन चाहिये। बिना चरित्र के ज्ञान, कर्म, दर्शन, भक्ति, साधना-उपासना सब कुछ अपूर्ण है। मोक्ष तो नितान्त असम्भव है।
आनन्द प्रातः बुद्ध के पास जाकर बोला- “भगवन्! देख रहे हैं। सूरज उग रहा है। पक्षी कलरव कर रहे हैं। मन्द-मन्द समीर बर रहा है। कोयल कूक रही है। नाना प्रकार के फूल खिले हुये हैं। क्या यह सुन्दर नहीं है?” प्रश्न सुनकर बुद्ध मौन रह गये। आनन्द ने उत्तर न पाकर फिर प्रश्न किया- “क्या मेरा प्रश्न असंगत है, जैसा मैंने देखा, क्या वह सुन्दर नहीं है, आप उत्तर क्यों नहीं देते?”
बुद्ध चारों ओर देखते, आनन्द की तरफ भी देखते, मुसकराते और चुप रह जाते आनन्द फिर पूछता- “ प्रभु इतना ही कह दो कि कोई उत्तर नहीं देना।” बुद्ध मौन तोड़ते हुए बोले- “आनन्द मैंने तो स्रष्टा के कण-कण को परम आनन्द और सौंदर्य से ओत-प्रोत पाया है। मेरे मन के अन्दर से रूप, कुरूप, सुन्दर और असुन्दर का भेदभाव मिट गया है। मैं अब तेरी भेद-भाव की दृष्टि से ‘हाँ’ या ‘ना’ का उत्तर देने में असमर्थ हूँ। अब तो फूल और काँटा, गुलाब और चम्पा जो जैसे हैं, सब वैसे ही दिखाई देते हैं। मेरी भेदभाव की दृष्टि ही जाती रही।” आनन्द को उस दिन से सोचने की नई दृष्टि मिली।
बात उन दिनों की है जब भारत वर्ष में अंग्रेजों का राज्य था, उन दिनों पश्चिमी कमान के मिलिट्री कमाण्डर एल.पी. पैरेल थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा में एक मार्मिक घटना का उल्लेख इन शब्दों में किया है।
मेरा कैम्प आसाम में ब्रह्मपुत्र के किनारे लगा हुआ था, उस दिन मोर्चे पर शांति थी। मैं जिस स्थान पर बैठा था उसके आगे एक पहाड़ी ढलान थी। ढाल पर एक वृद्ध साधू को मैंने चहलकदमी करते देखा। थोड़ी देर में वह नदी के पानी में घुसा और एक नवयुवक के बहते हुए शव को बाहर निकाल लाया वृद्ध साधू अत्यन्त कृषकाय थे। शव को सुरक्षित स्थान में ले जाने में उन्हें कठिनाई हो रही थी, तथापि वे यह सब इतनी सावधानी से कर रहे थे कि शव को खरोंच न लगे यह सारा दृश्य मैंने दूरबीन की सहायता से बहुत अच्छी तरह देखा।
इस बीच अपने सिपाहियों को आदेश देकर मैंने उस स्थान को घिरवा लिया। वृद्ध वृक्ष के नीचे जल रही आग के किनारे पालथी मारकर बैठे। दूर से ऐसा लगा वे कोई क्रिया कर रहे हैं थोड़ी देर यह स्थिति रही फिर एकाएक वृद्ध का शरीर एक ओर लुढ़क गया अभी तक जो शव पड़ा था वह युवक उठा बैठा और अब उस वृद्ध के शरीर को निर्ममता से घसीट कर नदी की ओर ले चला। इसी बीच मेरे सैनिकों ने उसे बन्दी बना लिया। तब तक कौतूहलवश मैं स्वयं भी वहाँ पहुँच गया था। मेरे पूछने पर उसने बताया महाशय! वह वृद्ध मैं ही हूँ। यह विद्या हम भारतीय योगी जी जानते हैं। यह योगाभ्यास से सम्भव है। अभी मुझे संसार में रहकर कुछ कार्य काना है जबकि मेरा अपना शरीर अत्यन्त जीर्ण हो गया था इसी लिये यह शरीर बदल लिया। आत्मा के लिये आवश्यक और समीपवर्ती प्राण शरीर होता है। मनुष्य देह तो उसका वाहन मात्र है। इस शरीर पर बैठकर वह थोड़े समय की जिन्दगी की यात्रा करता है। किन्तु प्राण शरीर तो उसके लिये तब तक साक्षी है जब तक कि वह परम तत्व में विलीन न हो जाये।
हम जिसे जीवन कहते हैं प्राण, शरीर और आत्मा की शाश्वत यात्रा की रात उसका एक पड़ाव मात्र है। जहाँ वह कुछ क्षण (कुछ दिनों) विश्राम करके आगे बढ़ता है। यह क्रम अनन्त काल तक चलता हैं। जीव उसे समझ न पाने के कारण ही अपने को पार्थिव मान बैठता है। इसी कारण वह अधोगामी प्रवृत्तियां अपनाता है। कष्ट भोगता और अन्तिम समय अपनी इच्छा शक्ति के प्रतीत हो जाने के कारण मानवेत्तर योनियों में जाने को विवश होता है।मुक्ति और स्वर्ग प्राप्ति के लिये प्राण शरीर को समझना उस पर नियंत्रण आवश्यक होता हैं
-मरणोत्तर जीवन- तथ्य एवं सत्य (वाड.मय् क्र. 16)
सन् 1880 की सुबह। लन्दन की एक जेल में विलियमएडिस नामक एक अपराधी एकान्त में बहन चिंतन की मुद्रा में बैठा कुछ सोच रहा था। परेशानी उसके चेहरे पर स्पष्ट झलक रही थी। दो वर्ष पूर्व आज ही के उस मनहूस दिन के बारे में वह सोच रहा था, जिसने उसे यहाँ तक पहुँचा दिया। दो वर्ष का समय कल तक तो उसने भली प्रकार काट लिया, पर आज न जाने क्यों उसका मन भारी हो रहा था। रह-रह कर एक वीभत्स दृश्य उसकी आँखों के आगे उभर कर जाता।
रक्तपात-मारकाट! लोगों की चीख-पुकारें! मासूम बच्चों के करुण क्रन्दन! निर्जीव शरीरों से अटा पड़ी बाजार की गलियाँ उनसे उठती कराहें, दम तोड़ते लोग, धूंह-धूंह करते जलते मकान, दुकान। राख के ढेर में परिवर्तित होती गलियाँ। उफ! कैसा लोमहर्षक दृश्य था कितना भयानक कितना घृणित व्यक्ति, व्यक्ति के खून का प्यासा बैठा था। काले और गोरे एक दूसरे का मानो रक्त पी जाना चाहते थे। जहाँ कही दिख जाते एक दूसरे पर झपट पड़ते और दूसरे ही क्षण लहू में सना शरीर जमीन पर पड़ता नजर आता। उफ! ओ कैसा क्रूर दिन था, कितने लोगों की जानें ले लीं घर उजड़ गये पुत्र के सिर से पिता का साया उठा गया, भाई भाई जुदा हो गये, माँ की कोख सूनी हो गयी।
चिन्तनप्रवाह थमा, कुछ क्षण के लिये। उसमें गतिरोध आया, और एक सवाल उभरा पर इसका नायक कौन था अंतर्मन से कोई पूछ रहा था।
प्रश्न के उठते ही मानो हथौड़े चलने लगे। मर्माहत हुआ, तो साँस फूलने लगी। चेहरे पर पसीने कुछ बूँदें निकल आयीं और साथ ही उभरा इसका उत्तर “तुम ही तो था।”
हाथ लगातार चल रहा था, पर अनेक आघातों के बाद चोट जब चेतना में घुसी, तब उसे होश आया। एक लम्बी साँस ली और बुदबुदाया- हाँ ‘ इस दंगे का सूत्रधार मैं ही तो था, सिर्फ मैं। पा आखिर मुझे इससे क्या मिला? हाँ सचमुच कारावास, यातना, मानसिक प्रताड़ना के अलावा कुछ नहीं मिला।
एडिस पुनः विचारमग्न हो गया। तभी सामने से कोई कैदी एक गीत गुनगुनाते हुए निकला।
धर्म की चेतना, भाव संवेदना है जगायी जहाँ, कौन कहता उसे नासमझ की तरह भी न समझदार हो बस हमारे लिये है यही वेदना।
एडिस जैसे सोते-से जगा। यह पंक्तियाँ उसके कर्ण-कुहरों में बार-बार प्रतिध्वनित होने लगीं। वह सोचने लगा कि गीत में कितना प्राण छुपा है। धार्मिक चेतना से यहाँ तात्पर्य सेवा, सहायता, सहिष्णुता, त्याग, नैतिकता और कर्त्तव्य-परायणता, जबकि धार्मिक उन्माद किसी संप्रदाय विशेष के प्रति कट्टरता है। समस्त विश्व के धर्म-सम्प्रदाय देखने में भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, पर उनकी धार्मिक चेतना सदैव एक ही होती है। स्वरूप बदल जाने से चेतना नहीं बदल जाती। मनुष्य काले-गोरे सभी रंग के होते हैं, पर क्या सभी का रक्त लाल नहीं होता? हड्डियाँ श्वेत नहीं होतीं? हृदय, फेफड़े, गुर्दे का आकार एक जैसा नहीं होता? निस्सन्देह होता है। ऐसे ही समस्त विश्व की धार्मिक चेतना अर्थात् धर्म का सार एक ही है। उसका शरीर सदा उच्चस्तरीय और महान होता है, रक्तपात करना नहीं। अनैतिकता, अमानवीयता को रोकना होता है, अनैतिक अमानवीय बनना नहीं और मैं उसे स्वार्थपरता की संकीर्ण परिधि में ले जाना चाहता था। रंग, भाषा, जाति, लिंग, क्षेत्र के आधार पर बाँटना चाहता था। नहीं मैं इससे असफल रहा हूँ। मैंने निरीहों का खून बहाया है। मैं पापी हूँ, हत्यारा हूँ।
वह लगातार जमीन पर प्रकार करता जा रहा था। मैंने अवश्य की पाप किया है, इस कारण निर्दोषों की आह मेरी अशान्ति बनी हुई है, पर अब मैं कर क्या सकता हूँ? इसका प्रायश्चित क्या हो सकता है? इस नरक से मुक्ति कैसे पाऊँ? क्या आत्महत्या कर लूँ?
नहीं- उसी आन्तरिक आवाज की गंभीर वाणी उभरी- यह तुम्हारी मुक्ति का रास्ता नहीं। तुम्हारी इससे मुक्ति तभी हो सकती है, जब तुम काले और गोरे लोगों में एक-दूसरे के प्रति प्रेम उत्पन्न कर दो। यही सर्वोत्तम प्रायश्चित है।
समाधान पाकर मन में उठते ज्वार-भाटे कुछ शान्त हुए। एडिस ने थोड़ी राहत अनुभव की। उसने निश्चय किया कि शेष कारावास काटकर जब तक निकलेगा, तो यही करेगा, पर अभी दो वर्ष और बाकी थे। मन तो बाहर निकलकर प्रायश्चित करने को छटपटाता रहता, किन्तु किसी तरह वह उसे समझ लेता कि जब तक वह यहाँ है, तब तक क्यों न किसी और उपाय से मानवता की सेवा की बात सोची जाय। इसी विषय पर चिन्तन-मनन करता रहता।
अचानक एक दिन उसके मस्तिष्क में एक विचार कौंधा। प्रतिदिन सुबह-सुबह प्रायः सभी कैदी उंगलियों से दाँतों को माँजा करते। इस प्रक्रिया में कइयों के मसूड़े बुरी तरह छिल जाते, उससे खून निकलने लगता, उसने सोचा- “क्यों न इस छोटे स्तर के रक्तपात को बन्द कर अपने प्रायश्चित का शुभारम्भ करूं। कैदियों में काले-गोरे दोनों प्रकार के लोग हैं भी। इस प्रकार उन्हें थोड़ी राहत पहुँचाकर मेरी आत्मा को कुछ संतोष तो होगा ही। बस फिर क्या था। कई दिनों सोच विचार के बाद एक दिन एक लकड़ी में अनेक बारीक छिद्र करके उनमें पशुओं के बाल चिपकाकर दाँत साफ करने का एक ब्रुश बना डाला। जब प्रयोग सफल रहा तो उसने इस प्रकार के अनेक ब्रुश बनाकर सभी कैदियों को बाँट दिये। बाकी समय में वह ब्रुश बनाने में लगा रहता। इस प्रकार उसने बड़ी संख्या में ब्रुश बना डाले। दो वर्ष बाद जब उसकी रिहाई हुई तो वह उन सबको अपने साथ ले गया और अपने क्षेत्र में काले-गोरे समुदाय के प्रत्येक घर में एक-एक ब्रुश देकर उसकी उपयोगिता समझायी एवं पिछली गलती की क्षमा माँगी।
उसने ब्रुश देते हुए लोगों से कहा- इसे आप देख रहे हैं। इसमें कई रंग के बाल एक साथ गुँथे हुए हैं, तभी उपयोगी ब्रुश बन पाये हैं। वस्तुतः हम पहले गलती कर रहे थे। हमारा रंग, भाषा, जाति, जन्म, सम्प्रदाय कुछ भी हो, हमें इस ब्रुश की तरह मिलकर रहना होगा, तभी समाज, राष्ट्र के लिये उपयोगी बन सकेंगे।”
एडिस की शिक्षा लोगों की समझ में में आ गयी। सभी ने उनसे ऐसी एकता प्रदर्शित करने का वचन दिया और करते भी रहे। वारविकशायर क्षेत्र में तब से आज तक फिर कोई ऐसी घटना नहीं घटी। विलियम एडिस ने काले व गोरे दोनों समुदायों की उन्नति-प्रगति के लिये अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया। अपने इसी कार्य से ब्रुश के आविष्कर्ता वैज्ञानिक एडिस ‘सन्त एडिस’ के नाम से प्रख्यात हुये।
संसार में वृक्ष-वनस्पतियों का अपना महत्व है। ये हमें प्राणवायु प्रदान करते हैं। इनके नहीं रहने पर यहाँ विषैली गैस भरी रहती और तब शायद कोई जीवधारी भी जीवित नहीं रह पाता। यह समस्त प्राणियों के जिन्दा रहने का महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध कराते हैं। इतने पर भी यह नहीं समझा जाना चाहिये कि जीवजगत को वनस्पतिजगत का यह अकेला अनुदान है। ध्वारा ईंधन एवं अन्य कितने ही प्रकार के छोटे-बड़े उपयोगों में यह जन्तु और मनुष्य के बराबर काम आते हैं, इसलिये उनका संहार नहीं, संरक्षण किया जाना चाहिये।
दुनिया भर के पेड़ों पर दृष्टिपात करें, तो उनमें एक-से-एक विलक्षण प्रकृति वाले मिलेंगे। कुछ जीवनोपयोगी पदार्थ देते हैं, तो कुछ का काम प्राणहरण करना है, कुछ की छाया शीतलता और शान्तिदायक होती है, तो कुछ पीड़ा और वेदना प्रदान करते हैं। इसके बावजूद वे पर्यावरण को लाभ ही पहुँचाते हैं, अस्तु, उनका उच्छेदन नहीं संवर्द्धन होना चाहियें
यह दृश्यलोक दो प्रकार के तत्त्वों से बना हुआ है। यहाँ अच्छाई भी है और बुराई भी, असुरत्व भी है और देवत्व भी। इसे प्राणिजगत में ही नहीं वनस्पतिजगत में भी समान रूप से देखा जा सकता है।
गाय अमृतोपम दुग्ध प्रदान करती है- यह सर्वविदित है, पर दूध के समान हर पौष्टिक पेय प्रदान करने वाला एक वृक्ष आमेजन घाटी के जंगलों में पाया जाता है। रूप, रंग और स्वाद में दूध से काफी मिलता-जुलता होने के कारण ही इन पयप्रदाता पेड़ों को ‘काउ-ट्री’ कहते हैं। स्थानीय वनवासी श्वेतरंग के इस गाढ़े पदार्थ का उपयोग चाय अथवा काफी बनाने में करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह तरल पदार्थ कई प्रकार के पोषक तत्वों से संव्याप्त है और पोषक तत्वों की वनवासियों की आवश्यकता की एक बड़े भाग की पूर्ति इससे होती रहती है। इस तरल को प्राप्त करने के लिये पेड़ों में बड़ा-सा चीरा लगाना पड़ता है। इससे रस बर्तन में इकट्ठा होने लगता है। एक ही वृक्ष पर अनेक चीरा लगाकर कई दिनों तक रस प्राप्त किया जा सकता है। आश्चर्य तो यह है कि यह वनस्पति दूध दही की तरह जम भी जाता है और इसका स्वाद उसी प्रकार कुछ खट्टा मालूम पड़ता है, पर स्थानीय लोग इसे खाने के काम में प्रयुक्त नहीं करते, वरन् इसका गोंद बना लेते हैं।
एक अन्य वृक्ष अमेरिका, आस्ट्रेलिया और दक्षिणी गोलार्द्ध के कई देशों में पाया जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इनकी पत्तियों की विशिष्ट भौगोलिक दिशा है। ये पंक्तियाँ हर समय उत्तर-दक्षिण दिशा दर्शाती रहती हैं। अन्धकार में भी इन्हें छू कर दिशा का ज्ञान प्राप्त कर सकना संभव है। यह वृक्ष 6-7 फुट तक ऊंचे होते हैं।
मध्य अमरीका के जंगलों में एक ऐसा पदार्थ है, जो -कैंडल-ट्री’ के नाम से प्रसिद्ध है। नाम के अनुरूप इसका गुण भी है। इसमें 3-4 फुट लम्बी फलियाँ लगती हैं। इनमें बड़े परिमाण में तेल पाया जाता है। इसी कारण से यहाँ के निवासी अपनी प्रकाश संबंधी जरूरत की पूर्ति इससे करते हैं। फलियों में मोम की भाँति धागा पिरोकर उसे जलाते और घर का प्रकाशित करते हैं।
वृक्ष से यदि बूंदा–बांदी होने लगे, तो उसे क्या कहा जाये? जो भी कहें, पर यह सत्य है कि ब्रिटिश कोलम्बिया में ऐसे तरुवर बहुतायत से पाये जाते हैं, जिनकी पत्तियों से लगातार जल की बूँद टपकती रहती है। इतना जल इनमें कहाँ से आ जाता है? इस संबंध में वनस्पतिशास्त्रियों का कहना है कि बरसात के दिनों में ये इतना पानी अवशोषित कर लेते हैं कि वह बूँद-बूँदकर अगली बरसात तक गिरता रहता है। स्थानीय लोग इसका उपयोग पेयजल के रूप में करते हैं।
आग और पेड़ का संबंध जहर और जन्तु की तरह है। दोनों से अस्तित्व-लोप होता है। जहर से जन्तु मरते हैं तथा अग्नि से वृक्षों को हानि होती है। जापान में पेड़ों की कुछ ऐसी किस्में हैं, जो आग का आभास पैदा करती हैं। शाम होते ही उनकी शीर्षस्थ टहनियों से धुँआ निकलने जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता है। इतने पर भी वे हरे-भरे बने रहते हैं। कोई अजनबी उक्त दृश्य को यदि पहली बार देखे, तो यही कहेगा कि पेड़ में किसी कारणवश आग लग गयी है, पर वस्तुतः वह आग होती नहीं। धुँआ जैसा दीखने वाला पदार्थ जलवाष्प होता है। यह वाष्प इतना सघन होता है कि सामने वाले को धुँआ का भ्रम पैदा हो जाता है। वनस्पतिविशेषज्ञ बताते हैं कि वाष्पीकरण की क्रिया वैसे तो हर पादप में होती है, किन्तु उनमें वाष्प की मात्रा इतनी कम और उसके निकलने की गति इतनी धीमी होती है कि वह लगभग अदृश्य स्तर का बना रहता है, उक्त पादपों में गति और मात्रा दोनों ही असाधारण स्तर की होती है, इसलिये भ्रान्ति जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
साबुन यदि पेड़ में फलने लगे, तो इसे आश्चर्यजनक ही कहना पड़ेगा। ऐसा ही एक पादप उत्तरी अफ्रीका के वनों में पाया जाता है। इसमें अखरोट की शक्ल के बड़े-बड़े फल लगते हैं। जब यह पकते हैं, तो पेड़ से गिर पड़ते हैं। इन फलों को यदि पानी में डाला जाय, तो झाग उत्पन्न होने लगता है, वह भी इतना, जितना असाधारण और उच्च किस्म के साबुनों से निकलता है। आदिवासी कबीले के बंजारे इसे वस्त्र धोने नहाने के काम में लाते हैं।
इन उपयोगी वृक्षों के अतिरिक्त कुछ ऐसे भी पेड़ होते हैं, जो मनुष्यों में डर, भय, कष्ट एवं यहाँ तक कि मृत्यु के संत्रास उत्पन्न करते हैं। मलाया, मैडागास्कर, त्रिनिदाद, बारबडोस एवं कुछ अन्य उष्णकटिबंधीय देशों में एक ऐसा वृक्ष पाया जाता है, जिसके पत्ते अत्यन्त वृहदाकार होते हैं। 8 फुट लम्बाई वाले इन पत्तों की संख्या एक पेड़ में 20-24 तक होती है। वर्षा अथवा आँधी आने पर ये पत्ते परस्पर जब टकराते हैं, तो ऐसी भयावह ध्वनि पैरा करते हैं, जिसे सुनकर अनजान व्यक्ति एकदम घबरा उठते हैं। इसी कारण उन्हें ‘ट्रेवलर्स ट्री’ के नाम से पुकारा जाता है।
‘मशीनिल’ नामक वृक्षों के फूलने का समय बसंत ऋतु है। जब इनमें फूल आते हैं, तो सम्पूर्ण पेड़ गहरे लाल रंग की छटा बिखेरने लगते हैं। इन फूलों में पीले पाउडर की तरह भारी मात्रा में परागकण उत्पन्न होते हैं। हवा के हलके झोंके से ही वे आस-पास सघन रूप में बिखर जाते हैं। ऐसे समय यदि कोई व्यक्ति इनके निकट पहुँच जाये और ये कण शरीर पर पड़ जायें, तो तत्काल भयंकर खुजली होने लगती है। बाद में वे स्थान चकत्तों के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। ब्राजील के वनों में यह पेड़ बड़ी संख्या में देखे जाते हैं।
‘वैड वुमन’ नाम से जाने, जाने वाले पादम मैक्सिको के मोरेलाँस राज्य में होते हैं। ये ऊसर भूमि में ही उगते हैं। पल्लव विहीन इनकी शाखायें परस्पर बुरी तरह आलिंगनबद्ध होती हैं और ऊपर की ओर उठी होती है। इनकी डालों और तने में एक विषैला रस होता है। यदि इसे किसी मनुष्य अथवा जन्तु पर डाल दिया जाये, तो असह्य खुजली और तेज बुखार के साथ कुछ दिनों में उसकी मृत्यु हो जाती है। जानवरों के शरीर तनों में रगड़ जाने से भी वही प्रतिफल उत्पन्न होता है, अन्तर यह होता है कि इसमें मौत कुछ विलम्ब से आती है। प्रशासन की ओर से इन वृक्षों में खतरे का निशान अंकित करा दिया गया है। इसके अतिरिक्त इन्हें चारों ओर से जालीदार बाड़ों से घेर दिया गया है। चरवाहों को ऐसा निर्देश है कि वे अपने पशुओं को उनके समीप न ले जायें।
कई पेड़ तेज विस्फोट भी पैदा करते हैं। मैक्सिको में उगने वाले इन वृक्षों में बेल की शक्ल के फल लगते हैं। फल का ऊपरी आवरण काफी कठोर होता है। जब वे पूरी तरह पक जाते हैं, तो तीक्ष्ण आवाज के साथ फट पड़ते हैं। इस दौरान यदि वृक्ष से 10-15 फुट की परिधि में कोई आदमी अथवा जानवर है, तो उसके घायल होने की संभावना बनी रहती है। उस फल में एक विषैली गैस भी होती है, जो आस-पास के वातावरण में फैल जाती है। यह स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होती है।
जमैका और गुयाना के कुछ भागों में पादम की एक ऐसी प्रजाति देखी गयी है, जिससे हमेशा एक लेसदार द्रव्य टपकता रहता है। यह किसी प्रकार यदि आँखों में पड़ जाये तो नेत्रज्योति चली जाती है। इसके अतिरिक्त यह शरीर में विषैला प्रभाव छोड़ता है।कहा जाता है कि इस पेड़ के नीचे कोई रात्रि विश्राम कर ले, तो फिर सुबह तक वह जिन्दा नहीं बचता, इसलिये स्थानीय लोग बात-बात पर उसके नीचे सो जाने की धमकी देकर सरलतापूर्वक अपनी बात परिवार वालों से मनवा लेते हैं।
कुछ पेड़ ऐसे होते हैं, जो अम्लीय प्रभाव वाले रस पैदा करते हैं। दक्षिणी कैलीफोर्निया में ‘बु्रसेरा’ नामक ऐसे ही वृक्षों की बहुलता है। देखने में ये विशाल बरगद की तरह मालूम पड़ते है। इनकी शाखायें दो ओर झुकी होती हैं- एक ओर कुछ कम, दूसरी ओर अधिक। बीच वाला भाग डालियों और पत्तों से सघन रूप से आच्छादित होता है। इन वृक्षों पर किसी धारदार उपकरण से प्रहार करने पर वहाँ से लाल रंग का ऐ रस निकलने लगता है। भूल या अज्ञानतावश यदि यह तरल प्रवाही देह के किसी हिस्से में पड़ गया, तो तीव्र जलन शुरू हो जाती है, मानो कोई तीक्ष्ण अम्ल वहाँ गिर गया हो। बाद में आग से जलने की तरह ही वहाँ फफोले पड़ जाते हैं। स्थानीय लोग इस वानस्पतिक अम्ल का उपयोग साँप, बिच्छू, बर्र जैसे जीवों के काटने के उपचार के रूप में करते हैं।
बबूल भारत में प्रचुरता से पाये जाते हैं। रेगिस्तानी इलाकों के ये प्रमुख क्षुप हैं, पर मिट्टी वाले भूभागों में भी उगते -पनपते देखे जाते हैं। इनके पत्ते यदि कोई रोएंदार जानवर खा ले, तो उन पर इसका प्रतिकूल असर पड़ता है और उनके सारे रोयें झड़ जाते हैं, शरीर एकदम गंजा हो जाता है। इसीलिये यह केवल ऊंट के ही प्रिय खाद्य हैं। उसकी देह में इसका अवाँछनीय प्रभाव रोमहीनता के कारण नहीं दिखाई पड़ता।
कुछ वृक्ष ऐसे होते हैं जो संगीत की स्वरलहरियाँ पैदा करते हैं। अफ्रीकी देश बारबडोस की घाटियाँ ऐसे ही पेड़ों से भरी पड़ी हैं। इनकी पत्तियाँ और फलियाँ अजीबोगरीब ढंग से कटी-फटी होती हैं। इनके मध्य से जब हवा गुजरती है, तो उसकी तीव्रता के हिसाब से उनमें विभिन्न प्रकार के संगीत स्वर उभरते हैं। रात के सन्नाटे में जब यह स्वरलहरियां निकलती और रह-रहकर परिवर्तित होती हैं, तो बड़ा ही डरावना प्रतीत होता है। इसी कारण से इस द्वीप में तब मौसमी हवायें चल रही होती हैं, तो इन जंगलों में रात गुजारना विरले साहसियों का काम होता है।
लालसागर और नील नदी के मध्यवर्ती भूभाग में फैले नूबिया के वलों में सुरीली ध्वनि उत्पन्न करने वाला ऐसा ही एक और पादप पाया जाता है। इसे ‘सोफर’ के नाम से स्थानीय लोग पुकारते है। अक्सर इन वृक्षों में ‘गाल’ नामक एक रोग लग जाता है, जिसके कारण स्थान-स्थान पर इनकी शाखाओं में गाँठें पड़ जाती हैं। इन गाँठों में कीड़े लग जाते हैं, जो उनमें छोटे-बड़े मोटे-पतले सुराख बना देते हैं। हवा जब इन सुराखों से टकराती है, तो सीटी बजने जैसी सुमधुर आवाज निकालती है। आवाज कभी धीमी, कभी तीव्र होती है। यह सब हवा की गति पर निर्भर है।
वृक्ष माँसाहारी भी होते हैं। ऐसे अनेक प्रकार के पेड़ अफ्रीका एवं मैडागास्कर के जंगलों में पाये जाते हैं। ऐसा ही एक पादम ‘पिचर प्लान्ट’ है। इसमें सुराही की शक्ल की संरचनायें होती हैं। इस संरचना के अन्दर जब कोई कीट प्रवेश करता है, तो उसके मुंह पर लगा ढक्कन स्वतः बन्द हो जाता है। इसके बाद कीट के रस-रक्त को वह चूस लेता है। इसी प्रकार का एक और वृक्ष ड्रोसेरा है। उसमें धतूरे के आकार के फल आते हैं एवं उसमें बड़े बड़े एवं नुकीले काँटे लगे होते हैं। इसके अतिरिक्त फल की सम्पूर्ण सतह पर एक चिपचिपा पदार्थ होता है। जब कोई कीटक इस पर बैठता है, तो वह उसी में चिपककर रह जाता है। इसके पश्चात फल की सतह पर लगे काँटे उसे चारों ओर से जकड़कर बुरी तरह चूस लेते हैं।
मानवपक्षी पेड़ों की प्रकृति भी ऐसी ही होती है। जब कोई मनुष्य अथवा जानवर इनके निकट आते है तो इनकी काँटेदार शाखायें उसे चारों ओर से अपने पाश में बाँध लेती हैं। फिर वह लाख प्रयत्न करके भी इनके बन्धनों से मुक्त नहीं हो पाते। पेड़ इनके रक्त को पूरी तरह चूस लेता है, इसके पश्चात ही उसके बन्धन ढीले पड़ते हैं।
विविधता प्रकृति का नियम है। यहाँ बिलकुल एक जैसा कुछ भी नहीं। दो सजातीय सदस्यों में भी कितनी ही भिन्नतायें होती हैं। फूल एक ही जैसे एक रंग के कहाँ होते? वृक्षों की प्रकृति और प्रकार में अगणित समानतायें होती हैं। यदि ऐसा नहीं होता, तो प्रकृति नीरस-निरानन्द बन जाती। एकरसता से उबारकर सरसता प्रदान करने में प्रकृति के इन उपादानों, वृक्ष-वनस्पतियों का बहुत बड़ा हाथ है। अशान्ति के क्षणों में इसीकारण से व्यक्ति प्रकृति की गोद में जाना चाहता है और वहाँ की विविधता को निहारकर असीम शान्ति की अनुभूति करता है। अस्तु, इसे वनस्पतिजगत का परोक्ष अनुदान कहना पड़ेगा। उसके प्रत्यक्ष उपहारों में ऐसी और इतनी वस्तुयें सम्मिलित हैं, जिनके अभाव में शायद जीवन ही कठिन हो जाये। इसलिये वृक्ष-वनस्पतियाँ का संरक्षण ही नहीं, संवर्द्धन भी होना चाहिये। इसी में जीवन और जगत का कल्याण है।
उपयुक्त समय पर उपयुक्त कार्य करने का सर्वत्र विधान है। अनुपयुक्तता का अवरोध असफलता उत्पन्न करता है। रबी फसल को खरीफ के समय में बोया जाये, तो किसानों को निराशा ही हाथ लगेगी। परीक्षा का समय खेल-कूद कर गुजारने वाले विद्यार्थियों का अनुत्तीर्ण होना सुनिश्चित है। नौकरी की उम्र निकल जाने के बाद आवेदन करने वालों को हाथ मलना पड़ता है। अब चिकित्सा-क्षेत्र में भी असमय की अड़चन आने लगी है।
हाल के शोध अनुसंधानों से ज्ञात हुआ है कि किसी भी रोग के सफल इलाज के लिये रोगी की उत्तम चिकित्सा ही पर्याप्त नहीं है, उससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उसका उपचार कब और दिन के किस हिस्से में किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि शरीर क्रियाओं को नियंत्रित करने के लिए उसका ऐ अपना स्वसंचालित तंत्र है। इसे आम बोलचाल की भाषा में ‘कायिक घड़ी’ कहते हैं। यही घड़ी समस्त शरीरगत क्रिया–कलापों का नियमन-नियंत्रण करती हैं अलग-अलग क्रियाओं की अलग-अलग घड़ियाँ है। उदाहरण के लिए, रक्तचाप को लिया जा सकता है। प्रातः जैसे ही यह घड़ी चालू होती है, व्यक्ति की नींद टूट जाती और बिस्तर छोड़ते ही उसका रक्त चाप बढ़ने लगता है। इसी प्रकार रात होते ही यह रक्तचाप गिरना प्रारम्भ करता है। ऐसे ही देह के रसस्रावों को यह प्रभावित-परिवर्तित करने वाला एक पृथक तंत्र है। विषाणुओं से युछ करने वाली श्वेत रक्त–कणिकाओं की संख्या में वृद्धि ओर ह्रास को नियमित करने वाली इसी तरह की एक भिन्न ‘बॉडी क्लॉक’ है। शरीर शास्त्र में इन घड़ियों को -सेकेंडियन रिद्म’ कहते हैं। इन लयों का अध्ययन जिस विज्ञान के अंतर्गत होता है, वह ‘क्रोनोबायोलॉजी कहलाता है और इसके द्वारा की जाने वाली चिकित्सा ‘क्रोनोथेरेपी’।
“क्रोनोथेरेपी एक अभिनव चिकित्साप्रणाली है, जिसके अंतर्गत रोग की लयात्मकता के हिसाब से उपचार किया जाता है। ‘टेक्सा मेडिकल स्कूल यूनिवर्सिटी’ के ‘हरमन सेण्टर ऑफ क्रोनोबायोलॉजी’ प्रभाग के निदेशक डॉ. रोनाल्ड पोर्टमैन कहते हैं कि तब हृदय रोग, अनिद्रा, अवसाद और कैंसर जैसी व्याधियों में उनकी लयात्मकता को ध्यान में रखकर दवा दी जाती है, तो वह काफी प्रभावशाली होती है और सामान्य तरीके से किये गये उपचार की तुलना में अधिक सशक्त साबित होती है। वे कहते हैं कि हृदय रोग की स्थिति में अधिकाँश मौतें प्रातः से दोपहर के बीच होती देखी जाती है। इसके पीछे लयात्मकता सम्बन्धी एक प्रमुख कारण है। चूँकि रक्तचाप सुबह से शाम वाले हिस्से में वृद्धि करता है, अतः इस भाग में दवा देने पर दोनों के मध्य एक प्रकार की रस्साकशी शुरू हो जाती हैं दवा अपना असर डालकर उसकी वृद्धि को रोकना चाहती है, जबकि रक्तचाप अपनी प्रकृति के हिसाब से बढ़ना चाहता है। दोनों अपना-अपना प्रभाव स्थापित करना चाहते हैं। इसी संघर्ष में दवा की शक्ति चुक जाती हैं अतएव ऐसी स्थिति में औषधि सोने से पूर्व लेना अधिक लाभकारी होती देखी गयी है।
पश्चिम के कई देशों में दस पद्धति को परखा और आजमाया जा रहा है। इसमें अमेरिका, फ्राँस, जर्मनी आदि मुख्य हैं। ब्रिटेन में भी कई वैज्ञानिकों का ध्यान इस ओर गया है। वहाँ के जॉन मूर्स यूनिवर्सिटी, लीपरपूल के शरीर विज्ञानी डॉ. जेम्स वाटरहाउस का कहना है कि विश्वस्तर पर इसे प्रतिष्ठित करने में अभी काफी विलम्ब है और इस बात परीक्षा करने में भी काफी समय लगेगा कि प्रत्येक रोग पर क्या यह एक समान प्रभावकारी है अथवा अलग-अलग। दाम रोग में इसकी विश्वसनीयता परखी जा चुकी है। यद्यपि दिन के वक्त व्यक्ति कई प्रकार के एलर्जीकारक तत्वों के संपर्क में आ सकते हैं और दमा जैसे लक्षण पैदा हो सकते हैं, पर दमा के दौरे प्रायः रात में ही पड़ते देखे जाते हैं। इसका कारण कोर्टिसोल नामक एक इम्यूनरोधी रसस्राव है। रात के समय इसकी मात्रा एकदम न्यून होती है, अतएव दवा लेते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिये कि उसे उस समय के आस-पास ही लिया जाये। देखा यह गया है कि दमा के पुराने मरीजों को दमारोधी औषधियाँ प्रायः सुबह के समय दी जाती हैं। डॉ. वाटरहाउस के अनुसार यह उचित नहीं है। वे कहते हैं कि ऐसी स्थिति में औषधियों का प्रभाव तब तक लगभग समाप्त हो जाता है, जब उसकी सर्वाधिक आवश्यकता महसूस की जाती है, इसलिये दोपहर बाद ही इनका सेवन अधिक उपयोगी और लाभकारी है। इस दशा में दिन के समय में भी थोड़ी सुरक्षा बनी रहती है, लेकिन महत्वपूर्ण सुरक्षा वह रात को प्रदान करती है, जब व्याधि अपने चरम पर होती है।
इस प्रणाली द्वारा विभिन्न प्रकार की बीमारियों के साथ-साथ कैंसर का भी सफल इलाज किया जा सकता है। अमेरिका एवं फ्राँस जैसे देशों में विशेषज्ञों के कई दल इस दिशा में कार्यरत हैं। अनुसंधानकर्ता इस बात का पता लगाकर कि किस अवयव के कैंसर में किस समय दवा देने पर अधिक प्रभावी सिद्ध होती है, यह प्रमाणित करना चाह रहे है कि अलग-अलग अंगों के कैंसर में दवा सेवन का समय तदनुसार पृथक-पृथक होना चाहिये। एक ही समय का उपयोग हर प्रकार के कैंसर के लिए उचित नहीं। ज्ञातव्य है कि कीमोथेरेपी में प्रयुक्त होने वाली औषधियाँ कैंसरजन्य कोशिकाओं को मारती हैं, किन्तु इन दवाइयों का सबसे बड़ा दोष यह है कि ये स्वस्थ कोशिकाओं को भी नहीं छोड़ती, जिसके कारण रोग नियंत्रण के साथ-साथ रोगी पर उसका अवाँछनीय असर भी स्पष्ट झलकने लगता है। इन प्रभावों को निरस्त करने के लिए वैज्ञानिकों ने यह सुनिश्चित करना चाहा कि किस अंग की कैंसर कोशिकाएं कब सर्वाधिक संवेदनशील होती हैं। इसके लिये कोशिका-विभाजन चक्रों का अध्ययन आरम्भ किया गया। इससे विदित हुआ कि भिन्न-भिन्न स्थानों की सामान्य कोशिकाओं की सक्रियता का समय भिन्न-भिन्न है। एक अध्ययन के दौरान देखा गया कि आँत की कोशिकाएं दिन के समय अधिक क्रियाशील होती हैं। इस आधार पर क्रोनोथेरेपी के विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि बड़ी आँत के कैंसर के लिए कीमोथेरेपी उपचार का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात हो सकता है, तब स्वस्थ सेलों को नुकसान पहुँचने की कम-से-कम संभावना होती है।
इस संबंध में पिछले महीने की ‘दि लैन्सेट’ पत्रिका में एक अध्ययन प्रकाशित हुआ है। इस फ्राँसीसी अध्ययन में 186 ऐसे मरीजों को चुना गया, जिन्हें बड़ी आँत एवं मलाशय के कैंसर थे। सभी रोगी कैंसर की उन्नत अवस्था वाले थे। इन्हें दो दलों में विभाजित किया गया। एक दल को कीमोथेरेपी की खुराक सामान्य तरीके से खिलायी गई, जबकि दूसरे को सेकेंडियन रिद्म के हिसाब से। इसके बाद दोनों दलों के रोगियों का सूक्ष्मतापूर्वक अध्ययन किया गया, इस अध्ययन से उनमें स्पष्ट अन्तर दिखलाई पड़ा।
पाल ब्राउसे अस्पताल के चिकित्सक एवं शोधदल के प्रमुख डॉ. फ्राँसिसलेवी के अनुसार क्रोनोथेरेपी उपरोक्त स्थिति में अधिक प्रभावी देखी गई। इसके अतिरिक्त पार्श्व प्रभाव के रूप में मुँह की सृजन जैसे अवाँछनीय असर में छह गुना एवं गम्भीर अतिसार में दो गुना की स्पष्ट कमी दृष्टिगोचर हुई। इसके साथ औषधि के उन अप्रिय प्रभावों में पचास प्रतिशत की कमी देखी गई, जिसके कारण रोगियों के हाथ और पैर सुन्न हो जाय करते थे बालों झड़ने जैसी आम शिकायत भी इस उपचार प्रणाली द्वारा इलाज किये गये मरीजों में नहीं पायी गई। इस पद्धति की एक अन्य विशेषता यह थी कि इसमें दवा का असर साधारण तरीके से की गयी चिकित्सा की तुलना में अधिक लम्बे समय तक बना रहा। यह अवधि इसमें लगभग छह माह थी, जबकि कीमोथेरेपी की प्रचलित पद्धति में यह चार माह जितनी पायी गई। इसके बाद उसकी दूसरी खुराक की आवश्यकता रोगियों को महसूस होने लगी।
रॉयल मॉर्सडेन अस्पताल के कैंसरविद् एवं अनुसंधान दल के एक प्रमुख सदस्य डॉ. डेविडकर्निंघम का विचार था कि यद्यपि उपरोक्त दोनों प्रकार की प्रणालियों द्वारा बचाये गये मरीजों की संख्या में कोई बड़ा अन्तर नहीं था, फिर भी क्रोनोथेरेपी की उपयोगिता और आवश्यकता की उपेक्षा नहीं की जा सकती। इसके बारे में और अधिक अध्ययन एवं अनुसंधान की जरूरत है, कारण कि एक परीक्षण के आधार पर शतप्रतिशत तथ्यों का पता नहीं लगाया जा सकता। इसके लिये प्रयोगों की एक लम्बी श्रृंखला अभीष्ट है।
इन्हीं दिनों मॉर्सडेन अस्पताल, अमेरिका में इसी प्रकार का एक और अध्ययन किया गया। उससे प्राप्त परिणाम काफी उत्साहवर्द्धक था। उक्त प्रयोग में 200 ऐसे व्यक्तियों का चुनाव किया गया, जो क्षयरोग से ग्रस्त थे। दो समूह बनाये गये। एक को प्रचलित ढंग का उपचार दिया गया, जबकि दूसरे की कायिक घड़ी पर आधारित चिकित्सा की गई। देखा गया कि जिस किसी को भी बीमारी की चक्रीय प्रकृति के आधार पर औषधि दी गई, उस समूह के लोगों ने कम समय में तेजी से स्वास्थ्य-लाभ किया। औषधि आरम्भ करने के पश्चात् तीन माह बाद लिया गया उनका एक्सरे चौंकाने वाला था। रिपोर्ट इस बात की पुष्टि कर रही थी कि वे पूर्ण रूप से स्वस्थ होने के एकदम करीब थे, जबकि से सभी टी.बी. के गम्भीर रोगी थे। इसी समयान्तराल पर जब दूसरे समूह के लोगों का स्वास्थ्य-परीक्षण किया गया, तो उसमें सुधार तो देखा गया, पर उतना और वैसा नहीं, जैसा कि क्रोनोथेरेपी के रोगियों में परिलक्षित हुआ। इससे स्पष्ट है कि -व्याधि की चक्रीयता और रिद्म (लय) का स्वस्थ होने की प्रक्रिया से गहरा सम्बन्ध है। विशेषज्ञों का मत है कि यदि इस विज्ञान को भली-भाँति समझा सके, तो बीमारियों को न सिर्फ समूल नष्ट किया जा सकेगा, वरन् असाध्य रूप से ग्रसित बीमारों को अल्प समय में पूर्णरूपेण स्वस्थ भी बनाया जा सकेगा।
इस प्रकार के अनेक प्रयोग अमेरिका के कितने ही विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केन्द्रों में चाल रहे हैं। फ्लोरिडा के ‘सेण्टर फॉर ट्रीटमेण्ट ऑफ साइकिक डिजोर्डर्स’ नामक शोध संस्थान में पिछले दिनों क्रोनोथेरेपी पर आधारित कई परीक्षण किये गये। सभी से लगभग एक ही निष्कर्ष सामने आया कि अवसादग्रस्त लोगों में यदि रोग की लयात्मकता की सूक्ष्मतापूर्वक जाँच कर उस आधार पर उनको औषधि दी जाये, तो वह ज्यादा प्रभावकारी साबित होता है।
उपर्युक्त नतीजों से उत्साहित होकर ‘टेक्सन क्रोनोबायोलॉजी सेण्टर’ ने ‘अमेरिकन मेडिकल एसोसियेशन’ को इस बात की सलाह दी कि वह क्रोनोथेरेपी पर सम्मेलन का आयोजन करे, ताकि विश्व के वरिष्ठ वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से इस सम्बन्ध में गम्भीर चर्चा की जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि आगे के शोध-अनुसंधान का इसका स्वरूप क्या हो?
क्रोनोबायोलॉजी चिकित्सा विज्ञान की एक नवीन शाखा है। इसकी वैज्ञानिकता को सिद्ध करने और चिकित्सकों का इसके प्रति विश्वास जगाने में अभी दशकों लग जायेंगे। अमेरिका को यदि छोड़ दिया जाये, तो जर्मनी और फ्राँस में गिने-चुने विज्ञानवेत्ता ही ऐसे होंगे, जो इस पर गंभीरता पूर्वक विचार कर रहे हैं। ब्रिटेन में अभी भी इसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा हुआ है। वहाँ के चिकित्साशास्त्री क्रोनोथेरेपी के सम्बन्ध में यह तो स्वीकार करते हैं कि कुछ मामलों में इसकी प्रभावोत्पादकता असंदिग्ध है, पर हर प्रकार की व्याधियों में यह प्रभावशाली सिद्ध होगी, इस पर वे संदेह व्यक्त करते हैं।
इसे पूर्ण प्रणाली का दर्जा मिलने में भले ही अभी विलम्ब हो, पर चिकित्सा जगत में समय की महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता। ठीक समय पर रोगग्रस्तों की उपचार-व्यवस्था नहीं की गई, तो जान जाने का खतरा बना ही रहता है। ऐसे ही यदि रोग और रोगी दोनों को प्रभावित कर सकता है।
इन प्रसंगों उदाहरणों में समय की उपयुक्तता महत्वपूर्ण तथ्य हैं इसमें तनिक भी व्यतिरेक होने पर असफलता ही हाथ लगती है। आने वाले दिनों में चिकित्सा जगत में समय की उपयुक्तता को ही प्रमुख आधार माना गया, तो इसे आश्चर्यजनक नहीं माना जाना चाहिये।
अब यह लगभग सिद्ध हो चुका है कि मनुष्य-मनुष्य का परस्पर जोड़ने वाला कोई-न-कोई संबंध -सूत्र अवश्य है, जिसके जिसके माध्यम से सूक्ष्मस्तर पर सूचनाओं का आदान-प्रदान संभव होता है। पिछले दिनों तक इसे अध्यात्म क्षेत्र की विशिष्टता के रूप में जाना-समझा जाता था, पर अब इसे विज्ञानवेत्ता भी एक सुनिश्चित तथ्य के रूप में स्वीकारने लगे हैं।
इस संदर्भ में प्रथम वैज्ञानिक परीक्षण सोवियत संघ में हुआ। परीक्षण से प्राप्त परिणाम दस बात की पुष्टि करते थे कि उच्चस्तरीय मानसिक धरातल से उद्भूत तरंगों को उच्चस्तर पर अवस्थान करके ग्रहण किया जा सकता है। प्रयोग के लिए वैज्ञानिकों के एक दल का गठन किया गया। इस दल ने दो ऐसे व्यक्तियों का चयन किया, जो सहजता से उच्चमानसिक धरातल में प्रतिष्ठित हो सकें और उस स्थिति को देर तक बनाये रह सकें। इनमें एक थे कैमेन्स्की नामक एक शिक्षाविद् और दूसरे निकोलाई नामक मूर्धन्य मनःशास्त्री। कैमेन्स्की को मास्को में रखा गया एवं निकोलाई को चार सौ मील दूर लेनिनग्राद की एक शान्त-एकान्त प्रयोगशाला में। कुछ समय पश्चात् निकोलाई ने जब स्वयं को संदेश ग्रहण करने के लिये पूरी तरह तैयार कर लिया, तो उससे सम्बद्ध ई.ई.जी. मशीन चालू कर दी गई। उसमें अल्फा तरंगें आने लगीं। निकोलाई को इस बात की तनिक भी जानकारी नहीं थी कि दूसरी ओर विचार- सम्प्रेषण की प्रक्रिया कब प्रारम्भ होगी। थोड़ी देर उपरान्त जब मास्को से विचार -सम्प्रेषण की क्रिया प्रारम्भ हुई, तो निकोलाई की मानसिक तरंगों में महत्वपूर्ण परिवर्तन परिलक्षित हुआ। यह इस बात का संकेत था कि इस ओर संदेश सफलता पूर्वक ग्रहण किये जा रहे हैं। टेलीपैथी संबंधी विज्ञान सम्मत यह प्रथम प्रमाण था इस प्रयोग के द्वारा जो एक महत्त्वपूर्ण बात सामने आयी, वह यह थी कि प्रयोग की सफलता के लिए ग्राही व्यक्ति की मनोदशा एक विशिष्ट स्तर की एवं भावनाएं उच्चस्तरीय होनी चाहिये, तभी वह सूचना ग्रहण करने योग्य बनता देखा गया। ग्राही की मानसिक तरंगें इसी बात की द्योतक थीं। इसके प्रमाणस्वरूप ग्रहीता के स्थान पर निकोलाई की जगह एक ऐसे व्यक्ति को रखा गया, जो आक्रामक प्रवृत्ति का एवं निषेधात्मक चिन्तन वाला था, तो उन विचारों को पकड़ने में सर्वथा विफल रहा, जो दूसरी ओर से उसके लिये भेजे जा रहे थे।
वास्तव में विचार के रूप में सम्प्रेषित होने वाली यह तरंगें और नहीं, विशेष स्तर के विशिष्ट तरंग दैर्ध्य वाले मस्तिष्क के विद्युतीय कम्पन होते हैं। ग्रहण करने वाले व्यक्ति की मनोदशा भी जब ऐसी ही उच्चस्तरीय होती है, तभी वह उन्हें आकर्षित कर पाता है, अन्यथा नहीं। रेडियो कार्यक्रम में प्रसारण केन्द्र से संगीत को एक विशेष आवृत्ति पर भेजा जाता है और उस आवृत्ति को जब हम अपने ट्राँजिस्टर सेट पर मिलाते हैं, तभी उसे सुन पाते हैं। मनुष्य में उसकी भिन्न-भिन्न मानसिक तरंगों के लिए उसका चिंतनतंत्र जिम्मेदार है। व्यक्ति यदि सात्विक प्रकृति का है, तो उसकी विचारणा- भावना भी सौम्य-सात्विक होती है, तो अपनी ही प्रकृति की सतोगुणी तरंग उत्सर्जित करती है। ऐसे ही व्यक्ति सूक्ष्म-संदेशों को पकड़ने में सफल होते देखे गये हैं।
प्रयोगों के दौरान यह भी देखा गया है कि ग्रहीता और प्रेषक जब उच्चस्तरीय भावधारा से जुड़े होते हैं, तो उनमें से एक दिमागी तरंग में परिवर्तन से वही बदलाव दूसरे में संचरित होता है। रूसी शोधकर्ताओं द्वारा सम्पन्न किये गये एक ऐसे ही प्रयोग का उल्लेख एम. रिजल ने ‘इण्टरनेशनल जनरल ऑफ पैरासाइकोलॉजी’ नामक पत्रिका के एक लेख में किया है। इस प्रयोग में कैमेन्स्की के समक्ष जलने-बुझने की आवृत्ति अल्फा दायरे में थी। दूसरी ओर निकोलाई ने जब स्वयं को संदेश प्राप्त करने के अनुकूल बनाया, तो थोड़ी देर पश्चात् देखा गया कि उसकी तरंगों की आवृत्ति भी बिलकुल वही हो गई है, तो सम्प्रेषक की थी। ऐसा ही निष्कर्ष जैफर्सन मेडिकल कॉलेज, फिलाडेल्फिया के दो शरीरशास्त्रियों द्वारा दो जुड़वा भाइयों पर किये गये प्रयोग से मिला, जिसका वर्णन न्यूयार्क के ‘हैराल्ड ट्रिब्यून’ पत्र के ‘ट्वीन प्रूव इलेक्ट्रॉनिक ई.एस.पी.’ नामक निबन्ध में जे. हिक्सन द्वारा किया गया है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि शब्द-शक्ति कभी नष्ट नहीं होती। हम जो कुछ सोचते-विचारते हैं, वह विचार-तरंगों के रूप में अंतरिक्ष में घूमता रहता है। वैज्ञानिकों ने इस परिधि को ‘विचारमण्डल’ नाम दिया है। उनका कहना है कि भाव-तरंगें इसी क्षेत्र में मंडराती रहती हैं। यदि हम अपनी विचार-चेतना को उस स्तर तक परिष्कृत कर सकें, तो ऊपर चक्कर काटती उदात्त विचारणायें सहज ही हम तक आकर्षित होकर हमारे कार्य में सहयोग दे सकती हैं। अमेरिकी शरीरशास्त्री डब्ल्यू. पेनफील्ड एवं एच.जास्फर अपनी पुस्तक ‘एपीलेप्सी एण्ड दि फक्शनल एनोटॉमी ऑफ दि ह्यूमन ब्रेन’ में लिखते हैं कि सापेक्षवाद के जनक एवं विज्ञानजगत के मूर्धन्य भौतिकीविद् अलबर्ट आइन्स्टीन की मस्तिष्कीय तरंगों की जाँच से पता चला था कि उनके दिमाग से अनवरत अल्फा तरंगें निकलती थीं, चाहे वह जटिल गणितीय गणना में ही क्यों न उलझे हों। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि अल्फा तरंगें मस्तिष्क की समग्र सक्रियता की स्थिति में नहीं, शिथिलता की दशा में निकलती हैं, किन्तु आइन्स्टीन के मामले में यह एकदम विपरीत था। वहाँ सक्रिय मस्तिष्क में भी अल्फा तरंगें देखी गईं। इसका अर्थ यह हुआ कि उनकी मानसिक क्रियाशीलता गहरे ध्यान स्तर की हुआ करती थी। अर्थात् ध्यान की स्थिति में साधक जिस उन्नत भावभूमि में आरुढ़ होते हैं, वैसी ही उच्चस्तरीय मनोदशा जटिल गणनाओं के समय में आइन्स्टीन की हुआ करती थीं इस स्थिति में अनेक बार उन्हें आश्चर्यजनक रूप से कठिन गणितीय गणनाओं संबंधी समस्या के हल हाथ लगे। कहते हैं कि ‘सापेक्षवाद का सिद्धान्त’ ऐसी ही एक चिन्तन-प्रक्रिया की फलश्रुति था।
शशिभूषण सान्याल की गणना बंगाल के प्रसिद्ध संतों में होती हैं। वे जितने बड़े ज्ञानी और विद्वान थे, वैसे ही अद्भुत कर्मयोगी भी थे। अक्सर अध्ययन और लेखन में इतने तल्लीन हो जाते थे कि समय का ध्यान नहीं नहीं रहता और कभी-कभी तो 15-16 घंटे तक लगातार कार्य करते रहते। वे उच्चकोटि के ईश्वरभक्त भी थे। ज्ञान, कर्म और भक्तियोग में एक समान गति होने के कारण ही लोग उन्हें ‘योगत्रयानन्द’ के नाम से पुकारने लगे। बाद में वे इसी नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने साधना-विज्ञान पर कुछेक उच्चस्तरीय पुस्तक भी लिखीं। लेखनसंबंधी चर्चा के दौरान वे प्रायः कहा करते कि जब कभी उनकी बुद्धि निरुपाय हो उठती और यह नहीं सूझ पड़ता था कि आगे की जटिलता का समाधान क्या हो, तभी अकस्मात उसका हल दिमाग में कौंध उठता और वे उस बौद्धिक गतिहीनता के अवरोध को सरलतापूर्वक पार कर लेते। कभी गहरी उधेड़बुन में फंसते, तो आगे का मार्गदर्शन उन्हें विस्मयकारी ढंग से मिलता और लेखनकार्य संबंधी गतिरोध से उबर जाते। इसे ईश्वरीय सहायता कह लें या विचार-मंडल से उच्चस्तरीय विचारों का आदान-प्रदान, बात एक ही है। उपरोक्त उदाहरणों से ऐसा प्रतीत होता है कि गहन-चिन्तन की स्थिति और गहरे-ध्यान की अवस्था, दोनों अभिन्न हैं। जब किसी एक विषय -वस्तु के गिर्द विचारणा चलती है, तो वह चिन्तक को धारणा-ध्यान जैसी भूमिका में प्रतिष्ठित कर देती है, अन्तर एक ही है कि मनीषी का चिंतन सापेक्ष सत्य की तलाश कर रहा होता है, एक को पुस्तकीय तथ्य कहें, तो दूसरे को चरम सत्य कहना पड़ेगा। एक माया है, तो दूसरा ब्रह्म, एक कह तुलना बर्फ से करें, तो दूसरे को अगोचर वायप् मानना पड़ेगा। यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, अतः उन्हें दो नहीं, तत्वतः, एक ही कहना चाहिये।
कर्मयोग इसी तथ्य का प्रतिपादक है और इस बात की घोषणा करता है कि इसके माध्यम से भी उस एकत्व अद्वैत की प्राप्ति की जा सकती है, जिसका उल्लेख ज्ञानयोग और भक्तियोग की चर्चाओं में होता है। यदि यह सत्य है कि गहराई में उतारकर विचारमंडल के उच्चस्तरीय तथा अभीष्ट विचारों से संपर्क-सूत्र जुड़ जाना अथवा उस दशा में परमात्मा का सहयोग प्राप्त कर लेना कोई आश्चर्यजनक या अनहोनी बात नहीं।
दैनिक जीवन में भी किसी-किसी के समय यदा-कदा ऐसे घटनाक्रम घटित हो जाते हैं। देखा यह जाता है कि हम किसी विषय पर सोचते हुए गहराई में उतर जाते हैं, तभी गहन तमिस्रा में तड़ित-प्रकाश की तरह समाधान उभरकर ऐसे सामने आता है, मानो किसी ने बलात् उसे मस्तिष्क में प्रविष्ट करा दिया हो। विज्ञानवेत्ताओं के अनुसार, ऐसा इसलिये होता है कि इस स्थिति में निकलने वाली मानसिक तरंगें विचारमंडल के कम्पन प्रवाह के एकदम सारूप्य होती हैं, अतएव वहाँ से उसी स्तर का विचार-प्रवाह मस्तिष्क में संचारित होने लगता है। यही समस्या का परोक्ष हल है।
बिजली के निगेटिव और पॉजिटिव तार जब परस्पर जुड़ते हैं, तो तत्काल विद्युतधारा उसमें दौड़ने लगती हैं। ठीक उसी प्रकार जब चिन्तक का मानसिक धरातल विचारमंडल के आयाम में आ जाता है अर्थात् जब दोनों एकस्तरीय एवं एकप्रकृति होकर परस्पर सम्बद्ध होते हैं, तो अन्तरिक्ष से वाँछनीय विचारधारा मानवी मस्तिष्क में दौड़ने लगती है। सर्वसाधारण में यह प्रवाह अवरुद्ध बना रहता है। अध्यात्मविद्या के आचार्य इसका एक ही कारण बताते हैं। वे कहते हैं कि विद्युत किसी कुचालक पदार्थ में नहीं दौड़ सकती। उसके लिये सुचालक का अनुबन्ध अनिवार्य है। सामान्य मस्तिष्क उस दिव्य प्रवाह के लिये कुचालक और कुत्सित स्तर का साबित होता है, अस्तु उसे ग्रहण कर पाने में समर्थ नहीं हो पाता। जो लोग अपनी चिन्तन-चेतना को परिष्कृत कर लेते हैं, वो मानसिक एकाग्रता द्वारा अनायास ही ऐसे उच्चस्तरीय विचार-प्रवाहों से संपर्क साधने में सफल होते हैं जो उनके भौतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र की कितनी ही समस्याओं से हल ढूंढ़ने में समर्थ सहायक की भूमिका सम्पन्न करते हैं।
विचारणा वास्तव में चेता की उत्पाद है। कच्चा माल जिस स्तर का होगा, उससे निर्मित वस्तु की गुणवत्ता भी तदनुरूप होगी। यहाँ निकृष्ट के माध्यम से उत्कृष्ट हस्तगत करने का कोई प्रावधान नहीं है। कीचड़ सदा गंदगी और बदबू ही फैलाती है, जबकि कमलपुष्प अपनी मोहक सुवास से वातावरण को भर देता है। यों कमल कीचड़ में ही खिलते हैं फिर भी सुगन्ध और दुर्गन्ध की सत्ता अपना पृथक अस्तित्व बनाये रहती है। न कमल फूल कभी दुर्गन्धित होते हैं, न कीचड़ में ही खुशबू आ पाती है। दोनों की प्रकृति कभी एकाकार नहीं होती, कारण कि वे विरोधी गुणधर्म वाले हैं। कीचड़ की निकृष्टता कमलपुष्प की सुगन्धि को नहीं प्रभावित कर पाती, वैसे ही कमल की उत्कृष्टता कीचड़ की सड़ाँध में कहाँ समा पाती है? विलय-विसर्जन के लिये परस्पर घुलने-मिलने के लिये दो तत्वों का समानधर्मी होना अत्यन्त आवश्यक है। विचारणा और चेतना तात्विक दृष्टि से यों एक ही है और एक के परिष्कार से दूसरे का परिमार्जन स्वतः सम्पन्न हो जाता है। इतने पर भी भिन्न प्रकृति और स्तर होने के कारण ही विचारमण्डल के दिव्य चेतना प्रवाह से संपर्क साधने में वे विफल रहते हैं।
हम प्राण चेतना के अनन्त सागर में रह रहे हैं। समस्त संसार उसी का क्रीड़ा-कल्लोल है। अपनी व्यष्टिसत्ता भी उसी की अभिव्यक्ति है। जो प्राण हममें है, वही अन्यों में और इस शून्याकाश में संव्याप्त है। उसका मूल तत्व एक ही है, पर व्यक्तिभेद और जीवभेद के आधार पर उसकी प्रकृति भिन्न-भिन्न होती है।
स्वामी अभेदानन्द ने एक स्थान पर लिखा है कि योगीजन दूसरों के मनोभावों को इसलिये सरलता से समझ लेते हैं क्योंकि हमारे प्राण-परमाणु वातावरण में घुलते-मिलते रहते हैं। संदेश-सम्प्रेषण की स्थिति में ही परमाणु तरंग रूप में निर्दिष्ट व्यक्ति तक पहुँचते और उससे बार-बार टकराते हैं। यदि उक्त व्यक्ति का प्राण-कम्पन सम्प्रेषक के प्राण-कम्पन के समतुल्य हुआ, तो संदेश उसकी सम्पूर्ण चेतना में संचारित हो जाता है, अन्यथा सम्प्रेषक की प्राण-तरंगें बिना संपर्क के वापस लौट आती हैं।
हम अपनी चिन्तन-चेता को परिष्कृत करें, परमात्मा का दिव्यप्रवाह हमारे अन्दर प्रवाहित होता चला जायेगा। परिमार्जन से कम स्तर पर जीवसत्ता और परमसत्ता का मिलन-समागम संभव नहीं। अस्तु, इसे नैमित्तिक क्रिया की तरह अभीष्ट और आवश्यक मानते हुए तत्परतापूर्वक सम्पन्न कराने का हर एक को प्रयत्न करना चाहिये
वजन का अपना महत्व है। आमतौर पर भी चीजें मूल्यवान मानी जाती हैं और हलकी को कम कीमत का आँका जाता है। सोना वजनदार और चमकीला है, इसलिये उसकी कीमत ज्यादा है।इसके विपरीत चाँदी हलकी है, अस्तु वह कम मूल्य की है। मनुष्य का मूल्याँकन उसके स्थूल वजन पर नहीं, व्यक्तित्व की गुणवत्ता पर निर्भर है। इतने पर भी आये दिन कितने ही स्थूलकाय आश्चर्य और आकर्षण के केन्द्र बने रहते हैं।
रॉबर्ट अर्लह्यूज इलिनाँय, अमेरिका का रहने वाला था। जब उसका जन्म हुआ, तब वजन साढ़े पाँच किलो था। यों तो यह वजन सामान्य की तुलना में कुछ अधिक ही था। किन्तु उस समय माता पिता ने इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया, सोचा अच्छी तन्दुरुस्ती के कारण ही यह भार असामान्य-सा प्रतीत होता रहा है। पर जल्द ही उनकी यह धारणा बदल गई। बन्दे के वजन में द्रुतवृद्धि शुरू हुई। जब वह मात्र 6 वर्ष का था तो उसका वजन 92.5 कि.ग्रा. था। यह वजन इतना, जो इतनी छोटी उम्र में कभी नहीं देखा गया। दस वर्ष की आयु में वह 170.3 कि.ग्रा. हो गया। जब उसकी अवस्था 17 वर्ष की हुई तो शरीर का कुल भार 305.2 कि. ग्रा. था, जो 24 वर्ष की वय में बढ़कर 400.01 कि.ग्रा. हो गया। मृत्यु से कुछ दिन पूर्व उसका अधिकतम वजन 486.02 कि.ग्रा. था
अर्ल ह्यूज ने इतिहास का सर्वाधिक वजनी व्यक्ति होने का गौरव प्राप्त किया। उसका सीना 315 से.मी. चौड़ा और कमर की मोटाई 305.1 से.मी. थ। वह आरम्भ में खेती करता था। पर जल्द ही उसका शरीर इतना भारी-भरकम और मोटा हो गया कि आसानी से उठना-बैठना और श्रमसाध्य कार्य कर सकना उसके लिये असंभव हो गया। हराकर उसे वह काम छोड़ना पड़ा। इसके बाद एक सर्कस में भर्ती हो गया। यहीं उसने जीवन के शेष दिन गुजारे।
वह एकदम ढीले ढाले कपड़े पहनता था, ताकि पहनने-उतारने में सुविधा हो। सामान्य डील-डौल वाले व्यक्ति के लिये साधारणतः 2-3 मीटर तक के कपड़े की आवश्यकता शर्ट बनने में होती है, किन्तु ह्यूज को इसके लिये साढ़े चार मीटर कपड़े की जरूरत पड़ती है।
नुमाइश के लिये अनेक बार उसको शहर से बाहर जाना पड़ा उसकी अन्तिम यात्रा इण्डियाना की रही। वहां वह एक ट्रक के ट्रेलर में अठा रहता और शरीर का प्रदर्शन करता। इस दौरान एक बार वह बीमार पड़ गया। उसे अस्पताल पहुँचाया गया। यहाँ एक समस्या उठ खड़ी हुई। वह इतना अधिक मोटा था कि दरवाजे छोटे पड़ गये, किसी भी द्वार से वह अन्दर प्रविष्ट न कर सका। अन्ततः उसे लौटाकर पुनः ट्रेलर पर ही ले जाया गया, वहीं उसके उपचार की व्यवस्था की गई। वह ठीक हो गया, पर अब उसको एक-दूसरे रोग ने आ घेरा। उसको यूरीमिया नामक व्याधि हो गई। इसके कारण उसके सारे शरीर में विष फैल गया और अन्ततः इण्डियाना में ही उसकी मृत्यु हो गई।
उसका ताबूत 85 इंच लंबा, 53 इंच चौड़ा एवं 32 इंच गहरा था। उसे क्रेन के सहारे कब्र में उतारा गया।
जाँली दरेन फ्लोरिडा, अमेरिका की रहने वाली थी। उसका वजन 393 किलो से भी अधिक था। एक बार वह अपने बिस्तर से गिर पड़ा, तो अपने भारी भरकम शरीर के कारण स्वयं उठ न सकी। पाँच-छह लोगों ने मिलकर उसे उठाया।
वह अमान्दा रिबर्ट के उपनाम से अधिक प्रसिद्ध थी। जब उसका जन्म हुआ, तब एकदम सामान्य थी। 21 वर्ष की आयु में जाँली का वजन 54.5 कि.ग्रा. था। तब वह सुन्दर, पतली-दुबली युवती थी। इसी वर्ष उसका विवाह हो गया। शादी के लगभग एक वर्ष बाद उसके एक बच्चा हुआ। इसी समय उसके अन्तःस्रावी ग्रन्थियों में कुछ खराबी आ गयी उसके शरीर में मोटाई बढ़ने वाले रक्तस्राव की मात्रा अचानक बढ़ गयी और वह तेजी से मोटे होने लगी। एक महीने के अन्दर उसका वजन 5 किलो बढ़ गया। इसके बाद वह बढ़ता ही गया। काफी उपचार हुआ, फिर भी उस पर काबू नहीं पाया जा सका। उसके असाधारण मोटापे के कारण एक सर्कस कम्पनी ने उसे अपने यहाँ भर्ती कर लिया। वह कोनी द्वीप चली गयी। वहाँ सर्कस के ही एक सहयोगी से दुबारा शादी कर ली। 60 वर्ष की अवस्था में एक बार बीमार पड़ी और उसकी मृत्यु हो गयी।
जैक इकर्ट भी एक भीमकाय व्यक्ति था। उसका वजन 336 कि.ग्रा. तथा कमर 475 से.मी. थी। छाती भारी एवं लटकती हुई। तोंद घुटने तक झूलती थी। उसकी जंघायें खम्भानुमा प्रतीत होतीं। उकड़ूं या पालथी मारकर बैठ पाना उसके लिये संभव नहीं था। वह एक भारी-भरकम और मजबूत कुर्सी पर बैठा रहता।
वह एक सर्कस का पात्र था। सर्कस कम्पनी के साथ उसने कई बार विदेश यात्रा भी की। उसे चलने-फिरने में बड़ी कठिनाई होती थी, इसलिये ट्रक को ही उसने घर बना लिया था।
एक बार वह मारडी ग्रेस सर्कस में हिस्सा लेने जा रहा था कि रास्ते में उसकी टक्कर एक दूसरे ट्रक से हो गयी। इससे वह जख्मी हो गया। उसे अस्पताल ले जाया गया वहाँ उसके लिये एक विशेष बिस्तर की व्यवस्था की गयी। इसके बावजूद भी उसे बचाया नहीं जा सका। कुछ दिन बाद उसकी मौत हो गयी। तब उसकी उम्र 62 वर्ष थी।
एली कार्बण्टन उत्तरी कैगेलिना का रहने वाला था। आरम्भ में उसकी काया साधारण बालक की तरह थी। 10 वर्ष का होते-होते उसकी भूख नियंत्रण से बाहर चली गयी। यह इतना खाने लगा कि जल्द ही उसकी परिणति मोटापे के रूप में सामने आने लगी। कुछ ही वर्षों में उसकी देह इतनी विस्मृत हुई कि घर के दरवाजों से निकलना ओर उनमें प्रवेश करना उसके लिये असंभव हो गया। उसका शरीर इतना भारी हो गया था कि बैठने-उठने के लिये उसे दूसरों का सहारा लेना पड़ता। जमीन पर वह नहीं बैठ पाता। उसके बैठने के लिये एक बड़ी और मजबूत स्टूल बनायी गयी थी। उसकी मृत्यु बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से हुई। एक दिन वह छत पर टहल रहा था। उसके भारी-भरकम शरीर का वजन छत न संभाल सकी और गिर पड़ी। वह भी गिरा और हृदयगति रुक जाने के कारण मौत हो गई।
रूथ पोण्टिकसे इण्डियाना (अमेरिका) की रहने वाली थी। उसकी माँ भी स्थूलकाया थी। उसका भार 274 कि.गा. था। वह रिंगलिंग ब्रदर्स के सर्कस में काम करती थी। इस प्रकार पोण्टिको को मोटापा विरासत में मिला था। आरम्भ में उसकी देह साधारण ही थी इसलिये टेलीग्राफ कम्पनी में नौकरी कर ली, पर बाद में उसकी मोटाई बड़ी तेजी से बढ़ी। वह इतनी मोटी हो गयी कि ऑफिस का कार्य करने में कठिनाई होने लगी। स्वतः उठना-बैठना भी उसके लिये दूभर हो गया, अतः नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा। अन्त में वह एक सर्कस कम्पनी में भर्ती हो गयी। वहाँ उसकी भेंट जाँब पोण्टिकाो से हुई। उसका वजन 317 कि.ग्रा था। दोनों ने विवाह कर लिया।
सेलेस्टा गेयर के बारे में कहा जाता है कि उसकी भूख इतनी बढ़ी-चढ़ी थी कि भोजन करने के दो घंटे उपरान्त उसे भूख लग आती। यदि उस समय तुरन्त खाना नहीं मिलता, तो परेशान हो जाती। उसके भोजन में 2 कि.ग्रा. माँस, 3 किग्रा. हरी सब्जी 5 कि.ग्रा. दूध नियमित रूप से सम्मिलित होते। इसके अतिरिक्त केक, पेस्ट्री, आइसक्रीम भी काफी मात्रा में रहते। वह सिनसिनाटी, ओहियो की रहने वाली थी। जन्म के समय उसका वजन सामान्य था। जब खाने-पीने लायक हुई तब अवश्य उसका आहार उस उम्र के बच्चों से अधिक था। धीरे-धीरे उसकी यह मात्रा बढ़ती ही गयी। जब 5 वर्ष की हुई तो उसका वजन 69 कि.ग्रा. था। यह सामान्य से काफी अधिक था। जब वह 11 वर्ष की हुई, तो वजन 85 कि.ग्रा. था। वह अपने बढ़ते भार से चिन्तित हो उठी। भार घटाने के लिये उसने तैरना प्रारम्भ किया, पर यह उसके लिये सिरदर्द बन गया। व्यायाम से उसकी क्षुधा और उद्दीप्त हो गयी। अब वह पहले से भी ज्यादा खाने लगी।
स्कूल की पढ़ाई समाप्त कर उसने नौकरी कर ली। मोटापा वहाँ भी आड़े आया। स्थूलता बढ़ने के कारण उसकी स्फूर्ति और सक्रियता घटने लगी। विवश होकर उसे नौकरी छोड़नी पड़ी। अब वह 21 वर्ष की हो चली। इस समय उसका वजन 148 किग्रा. था थोड़े दिन पश्चात फ्रैंकगेयर नामक युवक से उसने शादी कर ली; शादी के पश्चात वह सर्कस में भर्ती हो गयी। इस समय उसका भार 195 कि.ग्रा. हो था। अगले 25 वर्षों तक वह सर्कस से जुड़ी रही। उसने अपना नाम बदलकर जॉलीगेयर रख लिया।
सेलेस्टा का अधिकतम वजन 236 कि.ग्रा. था इस स्थिति में उसका चलना-फिरना तो दूर, खड़ा रह सकना भी एक प्रकार से कठिन हो गया। एक बार कुछ अधिक समय तक खड़ी रह गयी, तो वह बीमार पड़ गयी, उसके पैर सूज गये, साँस लेने में परेशानी होने लगी। उसे अस्पताल में भर्ती किया गया। डॉक्टरों की सलाह पर अब उसने भोजन घटाना शुरू किया। इसका अच्छा प्रभाव पड़ा। थोड़े ही समय में उसके भार में 14 किग्रा की मी आ गयीं 6 महीने उपरान्त वह 183 किग्रा की रह गयी। आगे उसमें और घटोत्तरी हुई। पचासवें साल में उसका वजन मात्र 70 किग्रा रह गया। उसका सीना जो पहले 436 सेमी था, वह अब केवल 95 सेमी रह गया, कमर का घेरा घटकर आधा हो गया, कूल्हे जो पहले 214 सेमी थे, वह सिमटकर 105 सेमी रह गये।
जल्द ही वह एकदम सामान्य हो गयी। उसे वजन में 180 किग्रा की कमी को वास्तव में अद्भुत और असाधारण ही कहा जायेगा, इससे स्पष्ट है कि मनुष्य यदि कुछ भी करने के लिये ठान ले, तो उसे प्राप्त करना कठिन नहीं है।
शरीर के वजनदार होने की सार्थकता वजनदार व्यक्तित्व में निहित है। व्यक्तित्व यदि उथला हुआ, तो डील-डौल वाला शरीर भी किसी काम का नहीं वह तो भारभूत बनकर प्रगति में और अड़चन ही पैदा करेगा। हम अपने गुण, धर्म, स्वभाव को इतना उदात्त और आकर्षक बनायें कि उससे हमारा व्यक्तित्व वजनदार बने। मनुष्य के लिये भारी-भरकम काया नहीं, भारी-भरकम व्यक्तित्व अभीष्ट है। उसी के लिये हरेक को प्रयत्न करना चाहिये।
बूढ़ा युवकों को पेड़ों पर चढ़ने- उतरने की तकनीक सिखाता। युवक ऊंचे-ऊंचे वृक्षों पर चढ़ना उतरना सीखते। एक युवक पेड़ पर चढ़ने की कला में पारंगत होने आया बूढ़े ने कहा- पेड़ पर चढ़ने उतरने में बड़ी सावधानी रखने की जरूरत है। युवक बोला- इसमें कौन-सी नई बात है। यह तो सभी जानते हैं और वह देखते देखते वृक्ष की अन्तिम चोटी पर पहुँच गया। बूढ़ा देखता रहा, हिम्मत बढ़ता रहा। जब उतरने लगी तब बूढ़ा चुपचाप बैठा रहा। युवक बड़ी सावधानी से सम्हल–सम्हल कर उतर रहा था। जब तीन-चौथाई दूरी तक युवक उतर आया तो बूढ़ा बाला- बेटे जरा सम्हल के उतरना। असावधानी व जल्दबाजी मत करना। युवक बड़ा हैरान था कि तब वह पेड़ की चोटी से उतर रहा था तब तक बूढ़ा चुपचाप बैठा रहा और अब आधी से भी कम दूरी रहने पर मुझे सावधान कर रहा है। वृद्ध बोला- “यह तो मुझे भी मालूम है कि तब तुम ऊपर से उतर रहे थे, तब तो स्वयं ही सावधान थे, किन्तु लक्ष्य को समीप और सरल देखकर ही अक्सर लोग असावधानी बरतते हैं। बेटे इसीलिये मैंने तुम्हें सावधान किया था।”
विवाह प्रेम की परिणति है। मौलिक जगत में प्रेमभावना के अंतिम उत्कर्ष का नाम है विवाह। विवाह के भी कई अजीबोगरीब रूप हैं। सामान्यक्रम में विवाह संस्था समाज की मर्यादाओं को बनाये रखने के लिये बनायी गयी है। किन्तु, कहीं-कहीं मनुष्य की विचित्र क्रियायें मजेदार प्रथाओं-परम्पराओं का रूप ले लेती हैं। जो भी हो, विचित्रताओं से भरे होते हैं ऐसे विवाह।
इटली के प्रसिद्ध लेखक फ्रांसिस्कोकालोन्ना का पोलिओ नामक एक लड़की से प्रेम हो गया। परन्तु इस प्रेमप्रस्ताव को विवाह के रूप में पहले कौन रखे, यही सबसे बड़ी समस्या थी। फ्रांसिस्को बहुत ही संकोची स्वभाव का था। इस प्रस्ताव को मूर्त रूप देने के निष् एयपे 1,65,000 शब्दों वाली पूरी पुस्तक ही लिख डाली। ‘ए ड्रीम ऑफ लव’ नामक इस प्रेमकृति के 37 अध्यापकों के प्रारम्भिक अक्षर मिलकर लेटिन भाषा का यह अर्थ देते हैं- “ फ्रांसिस्कोकालोन्ना पोलियो से प्रेम करता है एवं विवाह के ये उसके समक्ष प्रस्ताव रखता है।” इसके पश्चात दोनों परिणय सूत्र में आबद्ध हो गये। एडगर वालेस अंग्रेजों के प्रसिद्ध जासूसी उपन्यासकार के रूप में विख्यात थे। लेखनकार्य एवं अन्य कारणों से वह लम्बे समय तक अविवाहित रहे। एडगर वालेस की जितनी सचिव एक सुन्दर महिला थी लम्बे अरसे तक साथ रहने के कारण दोनों का आपस में प्रेम हो गया। इनके बीच भी संकोच सबसे बड़ी समस्या बनकर आयी। एक दिन एडगर जब अपने उसी निजी सचिव से उपन्यास लिखवा रहे थे तो एक वाक्य को बीच में ही अधूरा छोड़कर झटके के साथ कहा- क्या तुम मुझसे विवाह करना पसन्द करोगी? बस क्या था, उसकी निजी सचिव ने हाँ कह दी। लेखन को वहीं अधूरा छोड़कर विवाह-कार्य सम्पन्न हुआ। उपन्यास का भी वहीं समापन कर दिया गया।
विवाह-प्रस्ताव को प्रस्तुत करने के लिए आड़े आये संकोच की एक और घटना इस प्रकार है। ज्यों बेडफोर्ड का व्हेल शिकारी भी एक संकोची युवक था। वह अपनी प्रेमिका को बहुत प्रेम करता था, परन्तु शादी के विषय में कुछ नहीं कह पाता था। अपने विवाह प्रस्ताव को अंजाम देने के लिए उसने व्हेल के दाँतों का प्रयोग किया। उसने व्हेल के दाँतों को सुन्दर ढंग से तराशकर एक अनुपम कृति बनायी और उसमें अपनी विवाह सम्बन्धी बातों को लिखा। स सुन्दर कृति को भी स्वयं न देकर उसने उसे अपने साथी द्वारा भिजवाया। प्रेमी को उपहार मिला। फिर जाकर कहीं विवाहकार्य सम्पन्न हो सका।
इंग्लैण्ड में एक नवयुवक मेहुर के विवाह की घटना बहुत प्रसिद्ध एवं अजीबोगरीब है। वह विवाह तो करना चाहता था, परन्तु उसके पसन्द की कोई लड़की नहीं मिलती थी, कोई लड़की पसन्द आती तो वह मेहुर को नापसन्द कर देती। इस उधेड़बुन में आशा-निराशा के बीच झूलते हुए अपनी अज्ञात प्रेमिका के नाम उसने एक प्रेमपत्र लिखा उस पत्र को उसने बोतल में बन्द करके समुद्र में बहा दिया। इस बात को बहुत समय हो जाने के कारण मेहुर लगभग भूल ही चुका था। वह बोतल बहती हुई संयोगवश डेनमार्क पहुँची और वहाँ ऐ सुन्दर युवती के हाथ लगी। उस युवती ने बड़ी उत्सुकता से पत्र पढ़ा और उसमें अंकित पते पर पत्र डाल दिया। मेहुर ने तत्काल उसका उत्तर भेजा। दोनों ने एक दूसरे का विवरण जानने में शीघ्रता दिखाई, फिर परस्पर एक-दूसरे को पसन्द किया और अन्ततः विवाहकार्य सम्पन्न हो गया।
ऐसी ही अनोखी दास्तान अमेरिका के एक सैनिक चके विल्सन के साथ हुई। उसकी नियुक्ति एक अत्यन्त निर्जन स्थान पर हुई थी। वहाँ सैनिकों के अलावा अन्य कोई व्यक्ति दूर-दूर तक नजर नहीं आता था। एकदम एकान्त व जनशून्य स्थान पर विल्सन के मन में विवाह का अंकुर फूटा, परन्तु यह संभव कैसे हो सकता था। उसने यों ही एक बोतल में अपना फोटो और एक प्रेमपत्र लिखकर रखा और समुद्र में बहा दिया। तीन महीने पश्चात् वह पत्र इंग्लैण्ड की एक टाइपिस्ट मिस पोला जोनिंग को मिला। उसे विल्सन का चित्र और विवरण खूब आकर्षक लगा। तत्काल उत्तर लिखने बैठ गयी। संयोग कहें या विधि का विधान, दोनों का विवाह हो गया।
जमैका के एक किसान का विवाह केले के बुच्छे के माध्यम से संभव हो पाया। किसान एक आकर्षक युवक था और केले की खेती करता था। उसके साथ भी भाग्य आँख मिचौली का खेल खेलता रहा। जिसे वह पसन्द करता, लड़की नापसन्द कर देती थी। यों सामान्यतया उसे भी कोई लड़की उपयुक्त नहीं लग पाती थी। इस उधेड़बुन में उसने एक अज्ञात लड़की के नाम लम्बा-चौड़ा पत्र लिख डाला। इस पत्र को उसने केले के गुच्छे में अन्दर की ओर रखकर इस तरह बाँध दिया कि वह बाहर से नजर न आये। दैवयोग से यह गुच्छा इंग्लैंड की एक युवती के हाथ लगा। वह युवती विवाह करना तो चाहती ही थी। वह पत्र में प्रेम की कसक को पढ़कर भाव-विभोर हो उठी। उसने जमैका के उस किसान के साथ पत्र-व्यवहार किया आकर कुछ ही दिनों में वे दोनों परिणय-सूत्र में बंध गये।
प्रेम का भावावेश यों बड़ा ही खतरनाक होता है। कई बार व्यक्ति इसमें बहकर हर खतरे को नजरन्दाज कर देता है। अंततः कई बार इसकी परिणति बड़ी खतरनाक होती है। उसी वजह से असफल प्रेमी आत्महत्या जैसी वारदातों में फंसकर स्वयं अपने जीवन का अन्त कर बैठते हैं। अमेरिका के एक युवक एण्ड्रू डेटन ने अपने प्रेम को विवाह की मंजिल पर पहुंचाने के लिए अपना पैर ही कटवा डाला। डेटन माइ आर्नले नामक एक सुन्दर युवती से प्रेम करता था। आर्नले का झुकाव भी डेटन की तरफ स्पष्ट था। दोनों का प्रेम प्रसंग जब-जब विवाह की मंजिल को स्पर्श करने लगता, तो माइ आर्नले इसे अस्वीकार कर देती। कारण था आर्नले का लंगड़ा होना बचपन में ही वह एक हादसे में अपना एक पैर खो बैठी थी। अतः वह नहीं चाहती थी कि उसके लंगड़ेपन के लिए डेटन को काइ्र असम्मान एवं असुविधा का सामना करना पड़े। इसी वजह से वह बार-बार विवाह प्रस्ताव को इनकार कर देती। डेटन आर्नले को हद से अधिक चाहा था। वह किसी भी कीमत पर उसे चाोना नहीं चाहता था। इसके लिये डेटन नया एवं खतरनाक समाधान ढूंढ़ निकाला। एक सर्जन के पास जाकर अनुनय-विनय करके उसने अपनी एक टाँग कटवा डाली। डेटन के इस बलिदान को देखकर आर्नले की आँखों से आँसू झरने लगे। इसके पश्चात डेटन एवं माइ आर्नले का विवाह बड़े ही शानदार ढंग से सम्पन्न हुआ।
विवाह कहाँ और किस प्रकार हो? यह भी कभी-कभी एक मनोरंजक घटना बन जाती है। अमेरिका के प्रेमीयुगल -लाने गैरी तथा मैरी शा क्रिस्टी ने अपना विवाह उड़ते हुए हवाईजहाज में किया। विवाह के उपरान्त वे हवाई छतरी लगाकर सैकड़ों फुट की ऊंचाई से हवाई अड्डे पर कूद पड़े। इटली के एक दूसरे प्रेमीयुगल ने इससे भी रोमाँचक कारनामा दिखाया। इस विवाह में चौबीस बाराती थे। विवाह की सारी रस्में उड़ते हुए हवाईजहाज में अदा की गई। इसके पश्चात तो इनका नजारा देखने लायक था। दूल्हा- दुल्हन सहित सभी बाराती दावत के स्थान पर पैराशूट से उड़ते हुए उतरे तथा सभी ने भोज का आनन्द उठाया। बम्बई के मशहूर तथा धनाड्य परिवार का एक विवाह भी उड़ते हुए जहाज में ही हुआ। हवाईजहाज में ही विवाह की सारी परम्परायें मुम्बई महानगरी की परिक्रमा करता रहा।
आकाश में विवाह होने के पश्चात 12 फुट पानी के नीचे भी एक अनोखा विवाह का विवरण मिलता है। मलेशिया के युवक जोआना लियोग तथा वहीं की युवती एडी औंग ने शादी करने का निश्चय किया। दोनों गोताखोर थे इसलिये उन्होंने अपना विवाह पानी के अन्दर 12 फुट नीचे जाकर करने का निश्चय किया। पानी के अन्दर ही उन्होंने अपनी अंगूठियां बदलीं आध्र परिणयसूत्र में आबद्ध हो गये इस अद्भुत विवाह को देखने के लिये बारातियों के अतिरिक्त दर्शक भी काफी संख्या में थे, परन्तु सब थे किनारे पर। पानी से सराबोर दूल्हा-दुल्हन को ढेर सारी बधाइयाँ और शुभकामनायें दी गयीं।
व्यक्ति को अपना व्यवसाय सबसे प्रिय होता है उसका संसार इसी के आसपास घूमता है। कुछ लोगों में यह अपनत्व आवश्यकता से अधिक होता है। इसलिये वे उसे अपने जीवन के सभी क्षेत्रों के साथ जोड़ना पसन्द करते हैं। स्पेन का एक युवा अरनेस्तो लोटस सर्कस में काम करता था। सर्कस में ही काम करने वाली अलंकार रेमस से उसका प्रेम हो गया। इन दोनों ने अपना वैवाहिक कार्यक्रम बड़े ही विचित्र ढंग से करने की योजना बनायी। उन्होंने चालीस फीट ऊंचे झूले पर चढ़कर अपना विवाह किया। बेचारे पादरी को भी इस पवित्र रस्म को पूरा करने के लिये इतने ही ऊंचे झूले पर चढ़ना पड़ा।
कभी-कभी परिजनों का व्यवसाय भी अपने बच्चो के विवाह का स्थान निर्धारित करने में मदद करता है। पुर्तगाल में मारिया रेवेज और लोआगो रोमोस का विवाह भी कुछ इसी तरह से पूरा हुआ। लड़की का पिता विभिन्न प्रकार के केक बनाने का विशेषज्ञ था। वह उस क्षेत्र में केक व्यवसायी के रूप में प्रसिद्ध था। हरेक बड़े उत्सव एवं समारोह में उसी का बनाया केक उपयोग में लाया जाता था। उसने अपनी बिटिया के विवाह के लिए कई महीने तक परिश्रम करके केक का आलीशान मण्डप ही बना डाला। इस मण्डप की ऊंचाई 14 मीटर थी। इसमें 12 हजार अण्डे, दो टन शक्कर और एक टन मैदा इस्तेमाल किया गया था। इसे शहर के मध्य रखा गया था। इसी केक के सुन्दर एवं भव्य मण्डप में मारिआ रेवेज और लोआगो रोमेस का विवाह सम्पन्न हुआ। विवाह के पश्चात वे उस मण्डप को खाली करके अलग मण्डप में आये तथा केक के मण्डप को बारातियों को बड़े प्रेम से परोसा गया। सभी उसे देखते-देखते चटकर गये।
इटली का एक पर्वतारोही वहाँ की एक अध्यापिका के प्रेम में पड़ गया। प्रेम का जादू कुछ ऐसा चढ़ कि अध्यापिका पर्वतारोही बनने को कृतसंकल्प थी एवं इसके लिये उसने कठिन प्रशिक्षण प्राप्त भी किया। दोनों का संकल्प अंत में विवाह में परिणत हुआ। यह अद्भुत विवाह सम्पन्न हुआ 12 हजार छह सौ फुट ऊंची चोटी पर। इस विवाह में सम्मिलित होने के लिये केवल 40 व्यक्तियों को ही विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था, लेकिन उनमें से 14 व्यक्ति ही उस चोटी पर पहुँच पाये। बड़ी कठिनाई से पादरी को भी वहाँ पहुँचाया गया, जिसने 12 हजार छह सौ फुट ऊंचे शिखर पर पूरी रीति-नीति से विवाह कार्य पूरा किया।
एक अन्य शादी लिफ्ट में सम्पन्न हुई। दूल्हे थे 49 वर्षीय बोव मैकलीर तथा दुल्हन 27 वर्षीया मीवोन हेम। दोनों की प्रथम दृष्टि एक लिफ्ट में टकरायी थी। लिफ्ट में ही दोनों के प्रेम की पहली कोपल फूटी, इसलिये दोनों ने निश्चय किया कि वे उसी में शादी करेंगे। मीवोन हेम एक स्टोर की लिफ्ट में नौकरी करती थी। एक बार लिफ्ट की मरम्मत के लिये मैकेनिक बोव मैकलीर आया तो उसे देखते ही मीवोन का शादी करने का मन हो गया। बोव मैकलीरको ही मीवोन ही पसन्द आयी। इसलिये लिफ्ट को ही विवाह-स्थल का चयन किया गया। दूल्हा-दुल्हन, पादरी तथा कुछ निकट के रिश्तेदार किसी तरह इसी लिफ्ट में सिकुड़कर बैठ गये। विवाह के दौरान लिफ्ट चालू रही। इस तरह लिफ्ट में ऊपर-नीचे चढ़ते-उतरते यह अजीबोगरीब विवाह सम्पन्न हुआ।
स्म एब्रोहेन्स तथा उसकी प्रेमिका टेरेसा हेमिंगर का परिणय इंग्लैण्ड के लारसेन नगर में युनिसाइकिलों में बैठकर हुआ। सेम एब्रोहेन्स आठ बार विश्व युनिसाइकिल चैम्पियन रह चुका था। टेरेसा हेमिंगर की भी युनिसाइकिल में रुचि थी। अतएव दोनों ने इस प्रकार की राह चुनी। चीन में मान्यता है कि अविवाहित मरने पर परलोक बिगड़ जाता है। चीन का 67 वर्षीय लियान नामक एक वृद्ध भी अविवाहित था परलोक की बान की लेकर उसे काफी चिन्ता हुई और उसने शादी करने का मन बना लिया। अब समस्या खड़ी हुई कि इस वृद्ध से शादी करे तो कौन करे। लियान ने एक मृतक महिला से विवाह किया। 165 डॉलर में मृतक महिला के शव को खरीदा गया एवं अन्यान्य क्रिया सम्पन्न की गयी। बाद में शोक यात्रा के साथ शव को दफना दिया गया।
टेलीफोन से बात करते हुए भी एक बार एक शादी हो गयी। भारतीय मूल का एक युवक अब्दुल कादिर लन्दन में रहता था। पहले तो उसने विवाह नहीं किया, परन्तु काफी समय बाद शादी करने की धुन उस पर सवार हुई। उसने टेलीफोन डायरेक्टरी की मदद ली। कादिर ने हैदराबाद की एक अपरिचित युवती नाजमा सुल्ताना से बातचीत की। किसी प्रकार का पूर्व परिचय न होने के बावजूद टेलीफोन से एक बार बात करके ही शादी तय हो गई। दोनों ने एक-दूसरे को पसन्द किया। सबसे अनोखी बात तो तब देखने में आई, जब काजी को बुलाकर टेलीफोन पर ही निकाह पढ़ा दिया।
बेलेन्शिया स्पेन का एक युवक बन्दूक का एक कुशल निशानेबाज था। अचानक उसके मन में विवाह करने की उमंग उठी और ठीक उसी समय संयोग से उसे स्पेन की एक लड़की से प्रेम हो गया। वह उसे बेहद चाहने लगा। प्रतिदिन शाम को वह उस लड़की की खिड़की पर बन्दूक से निशाना दागता। यह उसका नित्य का क्रम था। प्रेम ने विवाह का रूप ले लिया। उसने सगाई के पहले भी बन्दूक द्वारा छर्रे दागे, फिर कहीं विवाह कार्य सम्पन्न हुआ। मान्यता है कि स्पेन के ग्रामीण इलाकों में अभी भी सगाई के पूर्व छर्रे दागे जाने का प्रचलन है। हमारा देश भी इस मामले में कम थोड़े ही हैं।
विश्व में विवाह प्रणालियाँ एवं रस्मो-रिवाज चित्र-विचित्र और अनोखे प्रकार की पायी जाती हैं। यह प्रथा-परम्परायें चाहे कैसी भी क्यों न हों, भावनायें प्रेमपूर्ण व सोद्देश्य होनी चाहिये,जिससे कि गृहस्थजीवन सुखी एवं आनन्द से भरा रह सके।
विद्युत की उपयोगिता सर्वविदित है। घर से लेकर बाहर तक, छोटे यंत्र से बड़े उपकरणों एवं लघु औद्योगिक इकाइयों से विशालकाय कारखानों को सर्वत्र प्रकाश एवं ऊर्जा संबंधी आवश्यकता की पूर्ति इसी से होती है। इस दृष्टि से वह अत्यन्त उपयोगी है। बिजली यदि नहीं होती, तो आज जितनी प्रगति समाज शायद ही कर पाता और सर्वसाधारण उस लाभ से वंचित रह जाते, जिसे भौतिक सुविधा-साधनों के रूप में वे उठा रहे हैं। विकास के निमित्त निश्चय ही यह उसका बहुमूल्य योगदान हैं, पर उसके उस पहलू को भी भुला नहीं दिया जाना चाहिये, जो स्वास्थ्य के लिये गंभीर खतरा पैदा करता है।
उल्लेखनीय है कि बिजली हमेशा अपने इर्द-गिर्द एक विद्युत चुंबकीय क्षेत्र का निर्माण करती है। इस क्षेत्र का बड़ा या छोटा होना इस बात पर निर्भर करता है कि विद्युत कितनी शक्तिशाली है। छोटे उपकरणों में प्रायः न्यून वोल्टेज से ही काम चल जाता है, किन्तु बड़े यंत्रों को चलाने के लिए उच्च वोल्टेज की आवश्यकता पड़ती है मशीन की विशालता और वोल्टेज की उच्चता के अनुपात में ही उसका विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र व्यापक होता हैं। इसके विपरीत कम वोल्टेज वाले लघुयंत्रों में इसकी परिधि छोटी होती है।
हाल के अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि उक्त विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र का मानवी स्वास्थ्य पर अवाँछनीय असर पड़ता है। इससे पूर्व ऐसी धारण की थी कि विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र का स्वास्थ्य पर किसी प्रकार प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। अस्सी के दशक में वाँल्डर, कोलोरैडो के एडलीपर नामक भौतिकविद् और नैन्सी वरदीमर नामक महामारी विज्ञान विशेषज्ञों ने संयुक्त रूप से एक शोध पत्र प्रकाशित किया, जिसमें इस बात का उल्लेख किया गया था कि विद्युत संवाहक लाइनों के नजदीक रहने वाले बालकों को, उन बालकों की तुलना में जो इन लाइनों के दूर के मकानों में रहते हैं, रक्त कैंसर का दुगुना खतरा रहता है। इससे पहले ऐसी मान्यता थी कि एकस-रेज, अल्फा-रेज, बीटा-रेज जैसी आयनीकरण सम्पन्न करने वाली विकिरणों के विपरीत आयनीकरण की क्षमता से रहित उस विकिरण का प्राणियों पर किसी तरह का अवाँछित असर नहीं पड़ता, जो पॉवरलाइन अथवा वैद्युतिक उपकरणों से निकलती है। तब से लेकर अब तक अनेक शोध- अध्ययन इस दिशा में हुए है, जिससे इस तथ्य की पुष्टि हुई है कि विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र का स्वास्थ्य पर सुनिश्चित प्रभाव पड़ता है।
पॉलब्रोडियर ने एक पुस्तक लिखी है, नाम है- ‘करेण्ट्स ऑफ डेथ’। उक्त रचना में ब्रोडियर लिखते हैं कि इन दिनों आम स्वास्थ्य संबंधी समस्या बढ़ी है और मनुष्य पहले की तुलना में अधिक बीमार एवं रोगग्रस्त हुआ है। इसके कारणों की चर्चा करते हुए वे कहते हैं- “यों तो पर्यावरण से लेकर रहन-सहन तक के अनेक कारक इसके लिये जिम्मेदार है, पर बिजली के यंत्रों से बनने वाले विद्युत चुम्बकीय क्षेत्रों की भी कोई कम महत्वपूर्ण भूमिका नहीं है। दैनिक उपयोग में काम आने वाले छोटे-छोटे विद्युत उपकरणों का जब नियमित इस्तेमाल किया जाता है, तो प्रयोगकर्ता को उस अवधि में उससे उत्सर्जित किरण का सामना करना पड़ता है। बार-बार इस विकिरण के संपर्क में आने से उसमें कितनी ही प्रकार की शारीरिक-मानसिक जटिलतायें उत्पन्न होने की संभावना रहती है।”
लेखक ने उक्त पुस्तक में शहरी और ग्राम्यजीवन पर तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि सुदूरवर्ती गाँवों में रहने वाले लोग, जो प्रकाश एवं ईंधन के लिये दूसरे ऊर्जा -स्रोतों पर निर्भर रहते हैं।, उनका स्वास्थ्य बिजली के विद्युत चुम्बकीय विकिरण के प्रभाव में 24 घंटे रहने वाले शहरियों की तुलना में अधिक उत्तम होता है। वे इसे स्वीकारते हैं कि ग्रामीणजन प्रकृति के अधिक सन्निकट होते हैं, इसलिये स्वस्थता का एक यह भी कारण हो सकता है, लेकिन दूसरी ओर उनका यह भी कहना है कि यदि उक्त निमित्त को हटा दिया जाये, तो भी शहरी लोगों के विद्युतीय विकिरण के बीच बराबर रहने के कारण दोनों के स्वास्थ्य में स्पष्ट अन्तर दिखलायी पड़ेगा।
विकिरण की गंभीरता को दर्शाने वाले कई ऐसे उदाहरणों की भी ब्रोडियर ने चर्चा की है, जिसमें अमेरिकी प्रशासन ने स्वास्थ्य-हित को ध्यान में रखकर विद्युत चुम्बकीय विकिरण उत्सर्जित करने वाले स्रोतों को आबादी से दूर ले जाने की सलाह दी। सितम्बर, 1985 की एक घटना का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं कि टेक्सास सिटी काउंसिल ने विद्युत ऊर्जा की आपूर्ति करने वाली कैबल लाइन बिछाने की सिर्फ इसलिये अनुमति नहीं दी, कारण कि वह एक कॉलेज के सामने से होकर गुजर रही थी, दूसरे मामले में ‘हाउस्टन प्रकाश और ऊर्जा कम्पनी’ को वहाँ से कोर्ट ने बिजली की लाइन बिछाने का पूर्व निर्धारित मार्ग बदलने का निर्देश दिया, क्योंकि उसके रास्ते में बच्चों का एक स्कूल पड़ता था। तीसरी घटना न्यूयार्क की है। फैरेज मिचेल नामक एक अमेरिकी टेलीग्राफकर्मी ने जब ‘कम्प्यूटर वीडियो डिस्प्ले टर्मिनल’ में कार्य करने के उपरान्त उभरने वाले त्वचा के चकत्तों एवं दूसरी कायिक तकलीफों के बारे में प्रबंधक से शिकायत की, तो उसने बिना किसी ननुनच के उसे उचित मुआवजा दिया।
उपर्युक्त प्रसंगों से यह स्पष्ट है कि विद्युत विकिरण का स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता, किन्तु किसी को यह नहीं समझ लेना चाहिये कि इस प्रकार का बुरा असर सिर्फ विद्युत ट्राँसमिशन लाइन का ही होता है। घरेलू उपयोग में का आने वाले छोटे-बड़े सभी विद्युत यंत्र जिनमें कपड़ों का प्रेस, मिक्सी, रेफ्रिजरेटर, लैम्प, वाशिंग मशीन, टीवी रेडियो, एयर कूलर, एयर फ्रेशनर, हेयर ड्रायर, शेवर (दाढ़ी बनाने का विद्युत यंत्र) आदि एवं ऑफिस में काम आने वाले कम्प्यूटर, फोटोकॉपियर सम्मिलित हैं- सबका आकार, आयतन एवं उत्सर्जित विकिरण के हिसाब से अपने-अपने छोटे-बड़े प्रभाव है। इन प्रभावों की चर्चा करते हुए प्रसिद्ध अमेरिकी शरीरशास्त्री एण्डी कोगलन ‘न्यूसाइटिस्ट पत्रिका’ में लिखते हैं- “ऐसा समझा जाता है कि छोटे विद्युत उपकरण स्वास्थ्य की दृष्टि से निरापद हैं, पर ऐसी बात नहीं है। यह संभव है कि विद्युत टोस्टर रक्त, स्तन अथवा मस्तिष्क कैंसर का उपहार दे जाये, उपेक्षणीय आकार वाले बिजली चालित शेवर एवं टूथब्रश से भी ऐसी ही संभव्रुता बनती है, विद्युत प्रवाहित बिजली के तारों के नीचे टहलने से नींद में व्यतिक्रम पैदा होने की आशंका बनी ही रहती है।” वे कहते हैं कि घरों में बिजली चालित कोई बड़ी मशीन न हो तो इसका यह अर्थ नहीं कि पूर्णतः सुरक्षित है। यदि एक बड़े आकार के यंत्र की जगह वहाँ छोटे -छोटे कई उपकरण हों तो इससे घर का पूरा वातावरण विकिरणयुक्त बन जाता है। इस वातावरण में जो भी रहेगा, उसे किसी न किसी प्रकार की शारीरिक, मानसिक व्यथा-वेदना बनी हा रहेगी।
अंग्रेज शरीरवेत्ता विलहेल्म रीच अपनी कृति ‘एन इनसिडियस डेथ ट्रेप’ में लिखते हैं कि जिस प्रकार कोहरे ओर धुन्ध के प्रभाव से सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता और मनुष्य के कई प्रकार के कार्य प्रभावित होते हैं, दुर्घटनाओं की संभावनायें बढ़ जाती हैं, उसी प्रकार विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र वास्तव में एक प्रकार का ‘इलेक्ट्रॉनिक स्माँग’ (धूम कोहरा) है, जो मानव के भीतरी संसार को अव्यवस्थित कर देता है। इससे अन्तराँगों के क्रिया−कलाप त्रुटिपूर्ण बन जाते हैं और व्यक्ति शारीरिक ही नहीं, मनोवैज्ञानिक रूप से भी स्वयं को परिवर्तित अनुभव करता है। विकिरण के असर से सैब्रो-स्पाइनल द्रव्य में पाया जाने वाला एक विशेष प्रकार का यौगिक घट जाता है, जिसके कारण आदमी में व्यवहार संबंधी बदलाव भी सामने आने लगता है, इसके अतिरिक्त मानसिक समस्यायें भी प्रकट होने लगती हैं व्यक्ति अवसादग्रस्त अनुभव करता है एवं आत्महत्या संबंधी भावनायें प्रबल हो उठती हैं। इतना ही नहीं, उक्त प्रभाव से शरीर का अन्तःस्रावी तन्त्र भी अप्रभावित नहीं रह पाता तथा काया की रात्रिकालीन मेलाटोनिन हारमोन की आपूर्ति घट जाती है। इस ह्रास से देह की जनन क्षमता, कैंसर से लड़ने की ताकत और सेकेंडियन रिद्म सहित मिनी ही गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं। कोशिका झिल्ली को भी नुकसान पहुँचता है, जो कैंसर का मुख्य निमित्त बनता है।
जानने योग्य तथ्य यह है कि विद्युत चुम्बकीय तरंगों की आवृत्ति हर्ट्ज अर्थात् एक कम्पन प्रति सेकेण्ड। घरेलू विद्युतीय यंत्र 50-60 हर्ट।ज कम्पन पैदा करते हैं, जबकि प्रकाश जो कि स्वयं एक विद्युत चुम्बकीय विकिरण है, उसकी आवृत्ति 10 14 अरब हर्ट्ज है। वैज्ञानिकों के अनुसार 300 हर्ट्ज से नीचे की तरंगों की एकदम न्यून आवृत्ति मानी गयी है। जिस प्रकार 20 हर्ट्ज से नीचे की इन्फ्रासोनिक ध्वनियाँ घातक होती हैं, उसी प्रकार अब विद्युत चुम्बकीय तरंगों के बारे में यह तथ्य सामने आया है कि अत्याधिक न्यून आवृत्ति वाली यह विकिरणें शरीर पर अप्रिय असर डालती हैं। कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता डॉ. रोस एडे एवं डॉ. सुजेन बोबिन ने प्रयोगों द्वारा यह प्रदर्शित किया कि अत्यधिक न्यून आवृत्ति वाले विद्युत विकिरणें उसे प्रक्रिया को प्रभावित करती है, जिसके अंतर्गत मस्तिष्क की ऊतकें कैल्शियम तत्व मुक्त करती है। इससे कोशिकाओं के क्रिया-कलाप पर गंभीर असर पड़ता है, फलस्वरूप शरीर-क्रिया में कितनी ही प्रकार की अनियमितताएं आ जाती हैं।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के विज्ञानवेत्ता कीथ मैकलाउचलन का मानना है कि चुम्बकीय क्षेत्रों के प्रभाव में आकर शरीर के अन्दर बड़े पैमाने पर स्वतंत्र मूलकों का निर्माण होता है। ये मूलक अत्यन्त क्रियाशील होते हैं और कोशिकाओं के गिर्द इकट्ठे होकर उनके डी.एन. को विनष्ट करे हैं।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रोपिकल मैटियरोलॉजी के विज्ञानवेत्ता डॉ. डी.वी. जाडव का कहना है कि बड़ी संख्या में घनीभूत धनायन भी विद्युत चुंबकीय क्षेत्र का निर्माण करते हैं, जो कोशिकाओं की वृद्धिप्रक्रिया में अड़चन पैदा करते हैं। उनका कहना है कि ये आयन श्वसन नलिका में प्रवेश कर नलिका और फेफड़े की कोशिकाओं की नलिका वृद्धि में में रुकावट उत्पन्न करते हैं, जिसके कारण श्वसन नलिका संबंधी कितनी ही प्रकार की व्याधियाँ पैदा होती हैं।
डात्र जाडव का मत है कि विद्युत चुंबकीय प्रभावों को कम करने और उसके अवांछनीय असर से बचने का एक उपाय यह हो सकता है कि बिजली के यंत्रों का बाह्य आवरण इस ढंग से बना हो, जो विकिरण पैदा करने वाले पुर्जे को चारों ओर से कवच की तरह ढक कर रखे ताकि विकिरण सीधे बाहर न निकल सके। उनका विश्वास है कि न्यून वोल्टेज की आपूर्ति करने वाले बड़ी संख्या में ट्राँसफार्मर लगाकर किसी ऐसी तकनीक का विकास किया जाये, जो कम वोल्टेज पर भी उपकरणों को कुशलतापूर्वक चला सके, तो इससे भी विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र की शक्ति को घटाया जा सकता हैं शक्ति हीन क्षेत्र का प्रभाव भी उपेक्षणीय होगा। इस प्रकार स्वस्थता को काफी हद तक इसके दुष्प्रभावों से बचाया जा सकेगा।
विज्ञानवेत्ताओं के अनुसार न्यून स्तर की विकिरणें तो कंक्रीट की छतों एवं धरती से बराबर निकलती ही रहती हैं, इसके अतिरिक्त अन्तरिक्ष से भी उसकी बौछार होती रहती है, पर चूँकि उसकी माख इतनी कम और शक्ति निर्बल होती है कि मनुष्य सहित सभी प्राणी उसे आसानी से बर्दाश्त कर लेते हैं, फलतः उनका कोई बुरा प्रभाव उन पर नहीं पड़ने पता। विशेषज्ञ बताते हैं कि धरती में कोई भी ऐसा स्थान नहीं, जो सर्वथा विकिरण रहित हो, यहाँ तक कि वन्यप्रदेशों के स्वच्छ-शुद्ध प्राकृतिक वातावरण में भी उसकी विद्यमानता बनी रहती है। इससे कोई प्राणी कभी बीमार नहीं पड़ता। यदि ऐसी बात रही होती, तो ईश्वरीय सृष्टि में इस खतरे को क्योंकर बनाये रखा जाता, जो उसके सुन्दर संसार को ही जीवन विहीन बना दे। अतः कम स्तर की अत्यल्प शक्ति वाली विद्युतचुम्बकीय विकिरणों से कोई नुकसान नहीं। हानि तब होती है, जब बढ़ी-चढ़ी महत्वाकाँक्षा की पूर्ति के लिये व्यक्ति ऐसे-ऐसे तंत्र उपकरण एकत्रित करने लगता है, जिनके नहीं रहने से भी साधारण साधनों और सामान्य उपकरणों से काम चलाया जा सकता था और ऐसे परिणाम प्राप्त किये जा सकते थे, जिन्हें उत्तम कहा जा सके लेकिन विद्युतयंत्रों का अनावश्यक जखीरा इकट्ठा कर और उससे तिसृप्त होने वाली विकिरणों के अधिकाधिक संपर्क में आकर मनुष्य ऐसी मुसीबत मोल लेता है, जिसे किसी भी प्रकार विवेकपूर्ण नहीं कहा जा सकता।
शक्ति की सार्थकता तब है, जब उसका सुरक्षित उपयोग है, अन्यथा भस्मासुर की तरह वह सबसे पहला प्रहार अपने संरक्षक और प्रयोक्ता पा ही करती है। अतएव इस ऊर्जा एवं इससे संचालित यन्त्रों का हम इस्तेमाल तो करें, पर उनका उपयोग कब, कहाँ, कैसे हो- यह भी ध्यान में रखें।
यह दुनिया विचित्रताओं से भरी पड़ी हैं यहाँ सबकुछ सामान्य ही सामान्य है, सो बात नहीं, बहुत कुछ असाधारण और अद्भुत भी है, इनसानों को ही लें, तो उनमें भी अनेक ऐसे कारण और वैशिष्ट्य मिल जायेंगे जिसके कारण उन्हें सामान्य की श्रेणी में नहीं, असामान्य के दर्जे में रखना पड़ता है। यह असामान्यता शरीर-रचना, क्रिया या निजी कौशल से संबंधित हो सकती है, इसलिये उन्हें विलक्षण कहना ही उचित होगा।
ऐसा ही एक व्यक्ति जेम्स माँरिस था। न्यूयार्क, अमेरिका का रहने वाला यह आदमी ‘बर्नम एण्ड बेली’ नामक सर्कस में काम करता था। उसके शरीर की त्वचा इतनी लचीली और लचकदार थी कि वह रबड़ की भाँति खिंच जाती थी। छोड़ देने पर पुनः पूर्ववत हो जाती। उसकी इस विशेषता के कारण लोग उसे रबड़ का आदमी कहकर पुकारते थे।
वह एक नाई था और हजामत बनाने का धन्धा करता था। जब उसे अपनी त्वचा की इस विशिष्टता का पता चला तो हर ग्राहक के सामने उसका प्रदर्शन करने लगा। देचाने वाले पहले तो यही समझते कि शायद सभी की चमड़ी ऐसे ही लोचदार होती है, पर जब यह गुण उन्हें अपनी त्वचा में नहीं दिखाई पड़ता तो मोरस के मरतब पर वे दंग रह जाते।
यह बात फैलते -फैलते स्थानीय सर्कस के मालिक पी.टी. बर्नम के कानों तक जा पहुँची, एक दिन वे सच्चाई पता लगाने के लिये वहाँ आये। मारिस ने उनके सामने भी वह प्रदर्शन किया। लोगों को आश्चर्यचकित करने के लिए उन्हें वह अच्छा पात्र लगा और 135 डॉलर साप्ताहिक वेतन पर अपने सर्कस में भर्ती कर लिया।
उसकी त्वचा इतनी खिंचावदार थी सीने की चमड़ी को ललाट तक खींच सकता था और पैर की चमड़ी आठ-दस इंच बाहर तक फैल जाती थी। चिकित्साशास्त्र में इस विशिष्ट दशा को ‘क्यूटिस हाइपरलास्टिका’ कहते हैं इससे शरीर को किसी प्रकार की कोई क्षति नहीं पहुँचती न व्यक्ति को कोई असुविधा होती है।
द्विलैंगिकता निम्न जीवधारियों में एक सामान्य घटना है, पर उच्च जन्तुओं में यह असाधारण बात मानी जाती है। उच्च जीवधारी प्रायः एकलिंगी हुआ करते हैं, किन्तु मनुष्यों में यदा-कदा दोनों लिंग साथ-साथ देखे जाते हैं विश्वभर में ऐसे कितने ही प्रसंग प्रकाश में आये, जिनमें आदमी को द्विलिंगी पाया गया। ऐसे ही एक व्यक्ति की चर्चा ब्रिटिश चिकित्सक फ्रेडरिकड्रिमर ने अपनी पुस्तक ‘वेरी स्पेशल पीपुल’ में की है। बाँबी कार्क नामक वह व्यक्ति लन्दन का रहने वाला था और अर्धनारी-नटेश्वर की कल्पना को सही अर्थों में साकार करता था। उसके शरीर का आधा भाग पुरुषों जैसा था और आधा नारियों जैसा। पुरुष हिस्से में पुरुषोचित सीना था और नारी (स्त्री) भाग में स्तनयुक्त वक्ष। इसके अतिरिक्त उसमें नर-मादा दोनों प्रकार के जननाँग थे। उसने लंदन में स्थान-स्थान पर अपने शरीर का प्रदर्शन किया और धन कमाया। टिकट लेकर ही कोई उसका दर्शन कर सकता था। इसके अलावा पचास सेण्ट अतिरिक्त फीस देकर उसका स्पर्श भी किया जा सकता था। कुछ लोगों ने इसका अनुचित लाभ उठाया उन्होंने स्त्री भाग में थोड़ी ज्यादा ही रुचि दिखाई इससे कार्क का पौरुष आहत हुआ और साथी भाग की बेइज्जती का जवाब जोरदार घूँसा जड़ कर दिया।
इसी प्रकार का एक अन्य द्विलिंगी बिली क्रिस्टीना था। उसके शरीर में भी नर-नारी के दो स्पष्ट हिस्से थे। बिली (पुरुष) की छाती एकदम सपाट थी,जबकि दूसरे भाग में स्थित क्रिस्टीना (स्त्री) का वक्षस्थल नारियों जैसा उभरा हुआ था। बिली वाले कायार्द्ध में दाढ़ी- मूंछें उगा करती थीं, किन्तु क्रिस्टीना वाले अर्द्धांग में होठ और ठुड्डी बाल रहित थे। सिर में बिली वाले हिस्से में बाल पुरुषों जैसे छोटे रखे गये थे, जबकि क्रस्टीना के केश खूब लम्बे थे। पुरुष वाले भाग में लिंग और स्त्री वाले हिस्से में सुविकसित नारी जननाँग था। जगह-जगह उसकी प्रदर्शनी लगायी गयी। लोग अर्द्धनारी-नटेश्वर की भारतीय अवधारणा को मूर्त होते देख दंग रह जाते।
मनुष्यों में यदि द्विलिंगी लोग हुए हैं तो टाँग और बाँहरहित अजूबे इनसान भी। मैथ्यू बुशिंगर ऐसा ही एक आदमी। वह उन्सपीक, जर्मनी का रहने वाला था। टाँगे नहीं होने के कारण देखने में बौना प्रतीत होता था उसके सिर-धड़ की कुल लम्बाई 30 इंच थी। कंधों पर ही हाथ के पंजे जुड़े हुए थे, जिनमें उंगलियाँ तो थी, पर नाखूनरहित। वह शरीर से अपूर्ण और अपंग अवश्य था किन्तु अपना सारा काम स्वयं करता था। इसमें कठिनाई तो होती थी फिर भी किसी कार्य के लिये दूसरे की बाँट नहीं जोहता।
अपने उत्तरार्द्ध जीवन में वह इंग्लैण्ड चला गया। वहाँ पर जॉर्ज प्रथम और ऑक्सफोर्ड के अर्ल ने उसकी काफी सहायता की। अपाहिज होते हुये भी वह प्रतिभाशाली था।उसकी प्रतिभा से संबंधित एक विज्ञापन आज भी ब्रिटिश म्यूजियम के रिकार्ड में सुरक्षित है। विज्ञापन के अनुसार वह सुन्दर-सुन्दर चित्र बना लेता था एवं अपनी दाढ़ी स्वयं बना लेता था। उसने शादी थी की और उसके बच्चे भी हुए। सभी संतानें सामान्य थीं। अन्ततः 58 वर्ष की आयु में कार आइलैंड में उसकी मृत्यु हुई।
कोबले काँफ रूस का रहने वाला था। उसने भी बाँहें और टाँगे नहीं थी। वह सर्कस का कलाकार था, अनेक बार उसने यूरोप के थियेटरों में अपने विकलाँग शरीर के करतब दिखलाये। इन कार्यों वह दायें कंधे से जुड़ी अपने अर्धविकसित बाँह का सहारा लेता। दाँत के माध्यम से कोबेल चित्र बना लेता था और उनसे कलम पकड़ कर थोड़ा बहुत लिख भी लेता था। स्टेज शो में सबसे पहले अपना नाम लिख कर दिखाता और उसे दर्शकों में बाँट देता था। भोजन भी वह उसी अर्द्धांग के सहारे करता। पानी पीना होता तो अपनी आधी बाँह से जल पात्र को पकड़ता और मुँह तक ले जाता। वह आत्म रक्षा के निमित्त पिस्तौल चला सकता था एवं उसमें गोलियाँ भी भर सकता था। आकर्षक कलाबाजियाँ लगाने में उसे निपुणता प्राप्त थी। आनाबिलफर्ट नामक एक स्वस्थ सुन्दर महिला से उसने विवाह किया तथा स्वस्थ सामान्य बच्चों का पिता बना। उसने जीवन के 80 बसन्त देखे।
इन्सान के शरीर में यदि खच्चर का सिर लगा हो तो वह कैसा अजीबोगरीब प्रतीत होगा। ऐसी ही एक महिला ग्रेस मैकडेनियल थी। जेरीहाल्ट मैन ने अपनी पुस्तक फ्रीक शो मैन में इसका विस्तार पूर्वक उल्लेख किया है। वे लिखते हैं कि उसे अचानक देख लेने पर लोग भयभीत हो जाते और अनेक बार तो उसके लोकोत्तर प्राणी होने का भ्रम पाल बैठते। उसका चेहरा माँस की भाँति लाल था और ठुड्डी इतनी विद्रूप तथा बेडौल थी जिसे इन्सानी कदाचित ही कहा जा सकें। जबड़े भी ऐसे जुड़े हुए थे कि बड़ी मुश्किल से उन्हें हिला पाती। उसके दाँत टेढ़े-मेढे एवं नुकीले थे। नाम मोटी लम्बी और भद्दी-सी थी उसे खच्चर की शक्ल प्रदान करने में उसके होठों का बड़ा हाथ था। कुल मिलाकर उसका चेहरा कुरूप तथा डरावना था। इतने पर भी अन्दर से वह अत्यंत शिष्ट तथा शालीन थी।
मैकडेनियर एक सर्कस कम्पनी में काम करती थी। जब मंच पर आती तो उसका चेहरा नकाब से ढका होता। नकाब हटाने ही डर से महिलायें और बच्चे अक्सर चीख पड़ते थें। कुरूपता के बावजूद कई पुरुषों में लिये लिये आकर्षक थी। कईयों से उसे विवाह के प्रस्ताव भी मिले। अन्ततः एक प्रस्ताव उसने स्वीकार कर लिया। वह एक नवयुवक था शादी के बाद उसके एक लड़का हुआ। बड़ा होने पर उसने प्रदर्शनी का भार अपने जिम्मे ले लिया।
मनुष्य बेडौल विकृत और हाथीनुमा हो सकता है। इसका शायद ही किसी को अनुमान हो, पर जॉन मेरिक देखने में ऐसा ही लगता था। वह इतना कुरूप और भयावह था कि यदि अचानक कोई देख लेता तो चीख मारकर बेहोश हो जाता। प्रसिद्ध सर्जन और लंदन के शाही परिवार के चिकित्सक सर फेंडरिक ट्रेवेस ने अपने ग्रंथ दी एलीफेन्ट मैन एट अदर रेमिनिसेन्सेज में इसका सविस्तार वर्णन किया है।
वे लिखते हैं कि मैरीक के बारे में जानकारी इन्हें सर्वप्रथम एक विज्ञापन से मिली। लंदन के जिस अस्पताल में वे कार्यरत थे वहीं सामने एक छोटी सी दुकान थी। जिस पर उसका चित्र और संक्षिप्त उल्लेख था। फेंडरिक ट्रेवेस ने देखा कि दुकान के अन्दर स्टूल पर कम्बल ओढ़े एक व्यक्ति बैठा है। कम्बल हटाने पर उसका जो विभत्स रूप दिखायी पड़ा वैसा उन्होंने जीवन में पहले कभी नहीं देखा था। उसके ललाट पर हड्डी जैसा उभार था और सिर के पीछे कोमल त्वचा का भारीभरकम पिण्ड। जो देखने में ऐसा मालूम पड़ता था। मानो शल्य क्रिया द्वारा अतिरिक्त माँस पिण्ड के रूप में चिपका दिया गया हो। उसकी आकृति गोभी के फूल से बिलकुल मिलती-जुलती थी। सिर के पीछे वाले हिस्से में बिरल और लम्बे बाल लटक रहे थे। उभरे हुए ललाट के कारण उसकी एक आँख उसके नीचे लगभग छुपी हुई थी। इन सबके कारण सिर का सम्पूर्ण व्यास इतना बड़ा था जितना कि किसी नवयुवक की कमर की मोटाई ऊपरी हनु से एक अड्डी बाहर की ओर निकली हुई थी। जिसके कारण उसका ऊपर का होठ बाहर की ओर मुड़ गया था। इससे मुँह में सुराख जैसा प्रतीत होता था। नाक एकदम चपटी थी चेहरा भाव शून्य था पीठ कमर और नितम्ब में जगह-जगह फूलगोभी के शक्ल के मास के विद्रूप लोथड़े लटक रहे थे। दाहिना हाथ काफी बड़ा मोटा और शक्ल रहित था। हथेली और उसके पिछले हिस्से में कोई अन्तर नहीं था। अंगूठा मूली जैसा और अंगुलियां मोटी जड़ों के सदृश्य थीं। दूसरा हाथ एकदम सामान्य था। टाँगें कुरूप एवं आकार रहित थीं। साक्षात मंगल ग्रह से आया प्राणी लगता था।
उसके इस भयानक रूप के कारण इंग्लैंड में उसकी नुमाइश पर रोक लग गयी। हताश होकर उसका मालिक उसे ब्रुसेल्स ले गया पर यहाँ भी उसपर पाबंदी लगा दी गयी। अब मैरी शोमैन के लिये किसी का नहीं रहा। उसने उसे लंदन वापस भेज दिया। यहाँ पुनः उसकी भेंट सर फेंडरिक ट्रेवेस से हुई उन्होंने अस्पताल के एक कमरे में उसके रहने का इंतजाम कर दिया। उस पर खर्च होने वाली राशि की व्यवस्था भी जल्द ही हो गयी। वहाँ के दी टाइम्बस पत्र में एक अपील छापी गयी। जिसमें लोगों से उस असहाय की सहायता करने का अनुरोध था। जॉनमेरिक जीवन के अन्तिम दिनों तक इसी कमरे में बना रहा। जब उसकी मृत्यु हुई तब वह 27 वर्ष का था। मौत का कारण सिर के पीछे लटकता माँसल लोथड़ा था। वह पीठ के बल कभी लेट नहीं पाता था। उस रात उसने इसका प्रयास किया। ऐसा करते समय असावधान रहने के कारण अचानक उसका वजनी सिर पीछे लुढ़क गया और दम घुटने के कारण उसकी यह लीला समाप्त हो गयी। वह लेस्टर इंग्लैण्ड का रहने वाला था।
इस संसार यदि सब कुछ सहज सामान्य होता तो जल्द ही यह दुनिया यहाँ के निवासियों के लिये नीरस और उबाऊ बन जाती। ऐसी परिस्थिति उत्पन्न न हो स्रष्टा ने इसका पूरा-पूरा ध्यान रखा है। सम्पूर्ण ब्रह्मांड में ऐसी अगणित रचनायें मिल जायेंगी। जिन्हें देख कर यह ही कहा जा सकता कि ये अपनी-अपनी जाति और वर्ग के सामान्य सिद्धान्त के हिसाब से बनी है। सर्व मान्य नियम के उपेक्षा करने वाले बहुत से जीवजन्तु इस जगत में विद्यमान हैं। मनुष्य भी इसका अपवाद नहीं। शरीर रचना संबंधी कितने ही व्यतिक्रम इसमें देखे जा सकते हैं। यहीं इन्हें अजूबे की श्रेणी प्रदान करता है। हम उन्हें देखें और इस बात पर विचार करें कि सर्वथा असहाय और अवाँछनीय शारीरिक स्थिति में भी एकदम सामान्य रहते हुए वे इस विविधता से भरी सृष्टि में किस प्रकार जीवन के दिन पूरे करते हैं।
एक दर्जी चतुर्भुज भगवान का भक्त था। वह जिस गाँव में रहता था। वहाँ के लोग उसके चतुर्भुज प्रेम को जानते थे। इसलिये वे कपड़े प्रायः उससे नहीं ही सिलवाते थे।
एक बार उस गाँव में एक अजनबी आया उसे कमीज सिलवानी थी। सामने ही दर्जी की दुकान देख वह उसको कपड़ा दे आया। जब कमीज बन कर तैयार हुई और लेने गया तो देख कर बड़ा हैरान हुआ। उसमें दो की जगह चार बांहें उसने पूछा ये चार बाँहें क्यों लगायी।
दर्जी ने कहा मुझे तो सर्वत्र चतुर्भुज के ही दर्शन होते हैं। तुम्हारी चार बांहें नहीं हैं क्या? मुझे तो चार ही दिखायी पड़ रही हैं तो तुम पहले ही बता देते। तुम्हारी जितनी बाँहें हैं उतनी बना देता। बताया क्यों नहीं मुझे जैसा दिखायी पड़ता है वैसा बना दिया।
आगंतुक ने सिर पीट लिया। सोचने लगा भला ऐसा भगवत् दर्शन किस काम का। जो व्यवहारिक जीवन को ही अनगढ़, असन्तुलित और अस्त-व्यस्त बना दे।
मानवी-काया मानवी-मस्तिष्क का प्रतिबिम्ब कही जा सकती हैं चिन्तन, मनन एवं भावनाओं के अनुरूप ही कायिक क्रिया-कलापों का निर्धारण होता है। भाव-संवेदनाओं और विचारणाओं की उत्कृष्टता के आधार पर ही हमारी आन्तरिक प्रणाली एवं प्राणऊर्जा का निर्माण होता है। विचार और भावनाओं की अदृश्य शक्ति का हमारे भारतीय शास्त्रों में गहन अध्ययन हुआ है और यह निष्कर्ष निकाला गया है कि स्थूल रूप से मनुष्य का जैसा भी कुछ जीवन है, उसकी भावनाओं का ही परिणाम है, भले ही उनका संबंध इस जीवन से न हो, पर कोई भी कष्ट या दुख, रोग-शोक या बीमारी हमार पूर्वकृत कर्मों और उससे पूर्व पैदा हुए मन के दुर्भावों का ही प्रतिफल है। यही कारण था कि प्राचीनकाल के ऋषि, मनीषी, प्रायः इसी प्रयत्न में रहते थे कि लोगों के मन निम्न और अधोगामी न बनने पायें इसके लिये कष्टसाध्य साधनाओं, तीर्थयात्राओं, सत्संग और नित्य स्वाध्याय के कार्यक्रमों का आध्यात्मिक, धार्मिक और वैराग्यपूर्ण चिन्तन का स्रोत मस्तिष्क में निरन्तर प्रवाहित था कि तब लोग स्वल्प-साधनों में ही अपार सुख-शान्ति का रसास्वादन करते थे।
योगवशिष्ठ 6/1/81/30-37 में उल्लेख है कि - “चित्त में उत्पन्न हुए विकार से ही शरीर में दोष उत्पन्न होते हैं। शरीर में क्षोभ या दोष उत्पन्न होने से प्राणों के प्रसार में विषमता आती है और प्राणों की गति में विकास होने से नाड़ियों के परस्पर सम्बन्ध में खराबी आ जाती है। कुछ नाड़ियों की शक्ति का तो स्राव हो जाता है और कुछ में जमाव हो जाता है।”
“प्राणों की गति में खराबी से अन्न अच्छी तरह नहीं पचता। कभी-कभी अधिक पचता है। प्राणों के सूक्ष्मयंत्रों में अन्न के स्थूल कण पहुँच जाते हैं और जमा होकर सड़ने लगते हैं, उसी से रोग उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार मानसिक रोग- ‘आधि’ से ही शारीरिक रोग- ‘व्याधि’ व्याधि उत्पन्न होते हैं। उन्हें ठीक करने के लिये मनुष्य को औषधि की उतनी आवश्यकता नहीं, जितनी कि इस बात की कि वह अपने बुरे स्वभाव और मनोविकारों को ठीक कर लें।”
उक्त तथ्य की पुष्टि अब चिकित्सा अनुसंधानों से भी हो गयी है। वैज्ञानिक मनोवैज्ञानिक, चिकित्सक अब इस तथ्य को गहराई से समझने लगे हैं। इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध चिकित्साविज्ञानी सर बी. डब्लू. रिचर्डसन ने अपनी कृति ‘दि फील्ड ऑफ डिसीजेज’ में लिखा है कि मानसिक उद्वेग एवं चिन्ताओं के कारण त्वचा की एलर्जी एवं फुन्सियों के प्रकोप देखे जाते हैं। कैंसर, हिस्टीरिया, मृगी आदि हालत में भी सबसे पहले मानसिक जगत में ही विकार बढ़े होते हैं।
अनुसंधानकर्ताओं ने दीर्घकाल तक शरीर की थकावट के कारणों की जाँच में जो प्रयोग किये हैं, उनका निष्कर्ष है कि लोगों की थकावट का कारण शारीरिक परिश्रम नहीं होता, वरन् उतावलापन, घबराहट, चिन्ता, विषम मनःस्थिति या अत्यधिक भावुकता होती है। निराशाजनित घबराहट, अधूरी आशाएं और शक्ति से अधिक कामनाएं, भावुकता की परस्पर विरोधी उलझनें भी रोगी में थकान पैदा करती हैं। हीनभावना से भी शरीर टूटता है। थकान से बचने के लिये आवश्यक है कि मन में सदैव प्रसन्नता और आशावादी विचारों का संचार किये रखा जाये। मस्तिष्क की स्वस्थता आर आत्मा की सुख-शान्ति के लिये सुव्यवस्थित और अच्छे विचारों का मन में निरन्तर उठते रहना आवश्यक है। श्रेष्ठ विचार एवं उच्च भावनाएं ही आत्मा का भोजन और पेय है।
मनःचिकित्सकों का कहना है कि बुरे विचार रक्त में विकार उत्पन्न करते हैं और तभी शरीर में रोगाणुओं-विषाणुओं की वृद्धि होती है। यह विचार या भावनाओं के आवेश पर निर्भर है कि उनका प्रभाव धीरे होता है या शीघ्र, पर यह निश्चित है कि मन के भीतर अदृश्य रूप से जैसे अच्छे या बुरे विचार उठते रहते हैं, उसी तरह के रक्तकण शरीर को सशक्त या कमजोर बनाते रहते हैं, मनोभावों की तीव्रता की स्थिति में प्रभाव भी तीव्र होता है। यदि कोई विचार हल्के उठते हैं तो उससे शरीर की स्थूल प्रकृति धीरे-धीरे प्रभावित होती रहती है और उसका कोई दृश्यरूप कुछ समय के पश्चात् देखने में आता है।
भारत के ऋषियों ने तो मन की शक्ति-सामर्थ्य को मानव मात्र के लाभ हेतु उद्भासित किया ही है, पाश्चात्य वैज्ञानिकों एवं चिकित्सकों ने भी इस विषय पर काफी शोध कार्य किये हैं। ‘इन्फ्लुएन्स ऑफ दि माइण्ड अपान दि बॉडी’ नामक अपनी अनुसंधानपूर्ण कृति में विद्वान लेखक ने लिखा है कि पागलपन, मूढ़ता, लकवा, अधिक पसीना आना, पाण्डु रोग, बालों का शीघ्र गिरना, रक्तहीनता, घबराहट, गर्भाशय में बच्चों की विकृति, चर्मरोग, फोड़े-फुन्सियाँ, एग्जिमा आदि अनेक बीमारियाँ मानसिक क्षोभ स ही उत्पन्न होती हैं। इस तथ्य की पुष्टि अमेरिका के मनोवैज्ञानिक चिकित्सकों के एक दल से भी की है। उन्होंने जो रिपोर्ट प्रकाशित की है, उसके अनुसार, शारीरिक थकावट के सौ रोगियों में से 90 को काई शारीरिक रोग नहीं था, वरन् वे मानसिक दृष्टि से दूषित व्यक्ति थे। अपच के 70, गर्दन के दर्द के 75, सिर दर्द और चक्कर आने के 80-80, गले के दर्द के 90 और पेट में वायुविकार के 99 प्रतिशत रोगी केवल भावनाओं के दुष्परिणाम से पीड़ित थे। पेट में अल्सर जैसे मूत्राशय में सूजन जैसी बीमारियों के 50 प्रतिशत रोगी निर्विवाद रूप से अपने दुर्गुणों के कारण पीड़ित थे। शेष के बारे में कोई निश्चित राय इसलिये नहीं बनायी जा सकी, क्योंकि उनका विस्तृत मानसिक अध्ययन नहीं किया जा सका।
यह एक तथ्य है कि रोग तन में नहीं, पहले मन में पनपता है। मानसिक स्थिति में विकृति आते ही शरीर का ढांचा लड़खड़ाने लगता है। स्पष्टतः सारे शरीर पर मन का नियंत्रण है। उसका एक अचेतन भाग रक्त संचार, श्वाँस- प्रश्वास, आकुंचन-प्रकुँचन, निद्रा, पलक झपकना, पाचन, मल-विसर्जन आदि स्वसंचालित क्रिया-कलापों पर नियंत्रण करता है और दूसरा सचेतन भाग विभिन्न प्रकार के जीवन-व्यवहारों के लिये दसों इन्द्रियों को, अंग-प्रत्यंगों को सक्रिय करता है। शरीर और मन का विच्छिन्न सम्बन्ध है। इस तथ्य को जो जानते हैं, उन्हें विदित है कि मन को असंतुलित करने का अर्थ न केवल शोक-सन्तापों में डूबकर असंतोष एवं उद्वेग की आग में जलना है, वरन् अच्छे-भले शरीर को भी रोगी बना डालना है।
अनेकों कठिन एवं कष्टसाध्य बीमारियों के उपचार ढूंढ़ लिये गये हैं, पर एक रोग आज भी ऐसा है जो अनेकों औषधियों के उपरान्त भी काबू में नहीं आ रहा है और वह है- जुकाम। शरीर-शास्त्रियों के अनुसार जुकाम के भी वायरस विषाणु होते हैं, पर उनकी प्रकृति अन्य सजातियों से सर्वथा भिन्न है। चेचक आदि का आक्रमण एक बार हो जाने के उपरान्त शरीर में उस रोग के लड़ने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है, फलतः नये आक्रमण का खतरा नहीं रहता, पर जुकाम के बारे में यह बात नहीं है। वह बार-बार और लगातार होता रहता है। एक बार जिस दवा से अच्छा हुआ था, दूसरी बार उससे अच्छा नहीं होता, जबकि यह बात दूसरी बीमारियों पर लागू नहीं होती।
कनाडा के मूर्धन्य शरीरशास्त्री एवं मनोवैज्ञानिक डॉ. डेनियल कोपान का इस सम्बन्ध में कहना है कि जुकाम उतना शारीरिक नहीं, जितना मानसिक रोग है। जब मनुष्य थका हारा और निढाल होता है, तो उसे अपनी असफलतायें निकट दीखती हैं। उस लाँछन से बचने के लिये कमजोर मनोबल जुकाम को बुला लेता है, ताकि दूसरे उसकी हार का दोष इस आपत्ति के सिर मढ़ते हुए उसे निर्दोष ठहरा सकें। यह रोग वस्तुतः अंतर्मन का अनुदान है, जो व्यक्ति को स्वल्प शारीरिक कष्ट देकर उसे असफलता के लाँछन से बचाता है। ऐसा रोगी बहुत हद तक पराजय की आत्म-प्रताड़ना से बच जाता हैं। जुकाम की दैवीविपत्ति टूट पड़ने से वह हारा उसकी योग्यता, हिम्मत एवं चेष्टा में कोई कमी नहीं थी।यह मान लेने पर मनुष्य को सान्त्वना की एक हल्की थपकी मिल जाती है। अन्तःचेतना इसी प्रयोजन के लिए जुकाम का ताना-बाना बुनती है।
डॉ. कोपान ने अपनी मान्यता की पुष्टि में अनेकों प्रमाण प्रस्तुत किये हैं। खिलाड़ी लोग प्रतियोगिता के दिनों में, विद्यार्थी परीक्षा के दिनों में तथा प्रत्याशी चुनावतिथि पर प्रायः जुकाम-पीड़ित होते हैं और इनमें अधिकाँश ऐसे होते हैं जिन्हें अपनी सफलता पर सन्देह होता है और हार की विभीषिका दिन को कमजोर बना देती है।
जुकाम का कारण यों तो सर्दी-गर्मी या विषाणु माने जाते हैं और उसी को आधार मानकर उपचार किया जाता है, परन्तु इतने से ही रोग मूलरूप से समाप्त नहीं हो जाता। वस्तुतः जुकाम को शारीरिक नहीं, मानसिक रोग कहना अधिक उपयुक्त होगा। इन दिनों अधिकाँश रोगों के मूल में मानसिक विकृतियाँ सामने आ रही हैं। शरीर के अंदरूनी अवयवों में आयी खराबी के कारण उत्पन्न होने वाली परेशानियाँ तो आसानी से दूर हो जाती हैं। शरीर स्वयं ही उनकी सफाई कर लेता है, परन्तु कई घातक रोग- जिन्हें असाध्य भी कहा जाता है, मनोविकारों की ही परिणति होते हैं। हिस्टीरिया को ही लें, तो इस व्याधि से पीड़ित व्यक्ति की कैसी दयनीय स्थिति होती है, यह किसी से छिपा नहीं है। जब दौरा पड़ता है तब सारा शरीर विचित्र जकड़न एवं हड़कम्प की ऐसी स्थिति में फंस जाता है कि देखने वाले भी घबराने लगें। जहाँ सुरक्षा की व्यवस्था न हों, वहाँ यदि दौरा पड़ जाय तो दुर्घटना भी हो सकती है। सड़क पर गिरकर किसी वाहन की चपेट में आ जाने, आग की समीपता होने पर जल मरने की आशंका बनी ही रहती है। मस्तिष्कीय जड़ता के कारण बुद्धि मन्द होती जाती है और क्रिया-कुशलता की दृष्टि से ऐसा व्यक्ति पिछड़ता ही जाता है। हिस्टीरिया व आर्गेनिक इलीलेप्सी (मिरगी) में अन्तर है, पर लक्षण एक जैसे ही हैं। दौर पड़ने के बाद जब होश आता है कि रोगी अनुभव करता है, मानो कई दिनों की बीमारी के बाद उठने जैसी अशक्तता ने उसे घेर लिया है। लोग सोचते हैं कि ऐसा रोग होने की अपेक्षा यदि एक हाथ-पाँव चला जाता है तो कहीं अच्छा रहता।
हिस्टीरिया के सम्बन्ध में खोज-बीन करने पर इतना ही जाना जा सका है कि यह अचेतन मन में पड़ी हुई किसी ग्रन्थ का अवरोध है। मस्तिष्कीय संरचना के बारे में बहुत कुछ खोज-बीन हो चुकी है और उन खोजों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया है कि इस रोग का कारण मन में जमी हुई बहरी ग्रन्थियाँ हैं। विविध प्रकार की इस रोग सदृश मूर्च्छायें भी इसी तरह मानसिक सन्तुलन में प्रत्यक्ष या परोक्ष अवरोध उत्पन्न होने से पैदा होती है।
मनोविकार अनेकानेक रोगों को जन्म देते हैं। अमेरिका के प्रसिद्ध मनःचिकित्सक डॉ. रवर्ट डी. राय ने विस्तृत सर्वेक्षण के बाद लिखा है कि कैंसर, हृदयरोग और क्षय जैसे रोगों को उत्पन्न करने में मनोविकृतियां भी प्रमुख हैं, फिर भी ऐसे व्यक्तियों की संख्या बहुत है, जो मानसिक विकृति से ग्रस्त रहते हैं। इनमें से एक-तिहाई ही उपचार के लिये आते हैं, दो तिहाई तो अपनी स्थिति को समझ तक नहीं पाते और ऐसे ही अस्त-व्यस्त स्थिति में स्वयं दुख पाते और दूसरों को दुख देते हुए भटकते रहते हैं। ‘दि फिलॉसफी ऑफ लौंग लाइफ’ नामक अपनी पुस्तक में जीनमाइनोल ने लिखा है कि जल्दी मृत्यु का एक बहुत बड़ा कारण है- मृत्युभय। लोग बुढ़ापा आने के साथ-साथ अथवा छुटपुट बीमारियाँ उत्पन्न होते ही मृत्यु की आशंका से भयभीत रहने लगते हैं और यह डर उनके मस्तिष्क की बाहरी पर्तों में इस कदर धंसता जाता है कि देर तक जी सकना कठिन बन जाता है। वह डर ही सबसे बड़ा रोग है, जो मृत्यु को अपेक्षाकृत जल्दी ही लाकर खड़ा कर देता है।
अरब देशों में कुछ शताब्दियों पूर्व एक प्रख्यात चिकित्सक हुए हैं- हकीम इब्नेसीना। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘कानून’ में अपने ऐसे अनेकों चिकित्सा अनुभवों का उल्लेख किया है कि अमुक प्रचार के मानसिक उभारों के कारण शरीर में अमुक प्रकार की विकृतियाँ या बीमारियाँ उठ खड़ी होती हैं। चिकित्सा-उपचार में उन्होंने औषधियों के स्थान पर उनकी मनःस्थिति बदलने के उपाय बरते और असाध्य प्रतीत होने वाले रोग आसानी से अच्छे हो गये।
वस्तुतः हमारी अंतःचेतना का, विचारणा एवं भावना का जैसा भी स्तर होता है, उसकी के अनुरूप हमारे मन-मस्तिष्क, नाड़ी संस्थान एवं अवयवों के क्रिया-कलाप का ढाँचा विनिर्मित होता चला जाता है और तदनुरूप ही ढर्रा चलता है। आन्तरिक उद्वेग की ऊष्मा सारे ढाँचे को प्रभावित करती है और इतना ताप पैदा कर देती है, जिससे जीवन-तत्व अपनी नैसर्गिक कोमलता और सरलता को गंवा बैठता है। मनोविकार एक प्रकार की ऐसी आग भीतर ही भीतर जलाये रखते हैं, जिससे स्वास्थ्य के लिये उत्तरदायी तत्व स्वतः ही विनष्ट होते चले जायें। इन्द्रिय भोगों की ललक और संग्रह, स्वामित्व की लिप्सा को वासना एवं तृष्णा कहा जाता हैं। यह न बुझने वाली अग्नि शिखायें जिनके भीतर ही जल रही होंगी, वे अपनी शाँति और समस्वरता को निरन्तर खोते चले जायेंगे।
जिन्हें चिन्ता, भय, क्रोध, असंतोष सवार रहते हैं, जो निराश और अवसाद ग्रस्त बैठे रहते हैं, ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिशोध, कपट और मत्सर की दुष्प्रवृत्तियाँ जिन पर सवार रहती हैं, चिन्तन में निकृष्टता भरी रहती हैं, उनका अन्तःकरण निरन्तर उद्विग्न रहता हैं। मन में तनिक भी संतोष समाधान नहीं होता। यह उद्विग्नता सारी अन्तःस्थिति में ज्वार-भाटा उठाती और उसे बेतरह मथती रहती है। ऐसी विषम स्थिति में ग्रस्त किसी भी व्यक्ति का स्वास्थ्य सन्तुलित नहीं रह सकता। अच्छा होगा कि अनावश्यक ताप पैदा करने वाले इन मनोविकारों, विक्षोभों से बचने और शाँत-सन्तुलित, संतुष्टि, हंसी-खुशी भरी जीवनरीति अपनाने का प्रयास किया जाय।
“भगवान यहाँ हैं और दक्षिण ध्रुव में नहीं हैं?” वह खुलकर हंस पड़ा। “जो यहाँ हमारी रक्षा कर सकता है वह कर कहीं कर सकता है।” क्या कोई उत्तर था किसी के पास, इस अनोखे तर्क का? श्रीमती विल्सन जानती हैं कि उनके पति जब कोई निश्चय कर लेते हैं उन्हें रोक पाना असम्भव होता है।
लम्बा- दुबला शरीर, नीली आँखें, सुनहरे केश वाले विल्सन की रुचि अद्भुत है। आतंकपूर्ण परिस्थितियाँ तो जैसे इनके लिये एक विलक्षण ऊर्जा का स्रोत हैं। सारा दिन काम करने की विचित्र, धुन कोई कुछ कहे, इससे पहले कह देंगे-कर्म मेरी उपासना है और उपासना छोड़ी नहीं सकती। किसी भी स्थिति में शाकाहार ही इन्हें प्रिय हैं चावल-दाल-रोटी उबले आलू, उबली पत्तियाँ, थोड़ा-सा अंजीर बस इतना ही पर्याप्त है उनके लिये।
दक्षिण अफ्रीका से कोई दल दक्षिण ध्रुव का पता लगाने जा रहा है। बस समाचार-पत्र में इतने पढ़ते ही उन्होंने लिखा-पढ़ी की दल के नायक से और अनुमति प्राप्त कर ली। श्रीमती विल्सन को उन्हें जहाज तक छोड़ने आना ही था। चलते समय उन्होंने बड़े भावुकतापूर्ण स्वर में अनुरोध किया।- “आप मेरी एक बात मान लें। भोजन सम्बन्धी अपना नियम अब यहीं रहने दें।” स्वाभाविक था यह अनुरोध। किसी हिमप्रदेश में कोई शाकाहारी बने रहने का हठ करे, बोतल को न छूने की शपथ का निर्वाह करे, कैसे जीवित रहेगा वह? “तुम चिन्ता क्यों करती हो?” हमेशा की भाँति इस बार भी चिर-परिचित उत्तर था- “चिन्ता करने वाला है न! वह सारे संसार की चिन्ता करता है। तुम विश्वास रखो जब तक मैं होश में रहूँगा, उसकी नित्य प्रार्थना करूंगा, उसे भूलूँगा नहीं।”
लेकिन भोजन की समस्या को यहीं तक सीमित नहीं रहना था। यात्रा के प्रथम दिन ही दल के सदस्य तक उनके निश्चय से चौंक पड़े। “आप निरामिष भोजी हैं और शराब छूते तक नहीं?” दलनायक हर्बर्ट अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए “आप होश में भी हैं या नहीं” दक्षिण ध्रुव की यात्रा करने चल रहे हैं।” शान्त बैठ हुये विल्सन की ओर देखते हुए वह कह रहे थे- “हम आपको समीप के द्वीप पर छोड़ देंगे। अमेरिका जाने के लिए एक सप्ताह के भीतर ही आप जहाज पा सकते हैं।” दलनायक को खेद हो रहा था कि वह इस व्यक्ति को साथ क्यों नहीं ले आया। “मैं लौटने के लिये नहीं आया हूँ।” विल्सन ज्यों के त्यों दृढ़ रहे। “सब सदस्य अपने उत्तरदायित्व पर आये हैं। किसी की की मृत्यु के लिये कोई उत्तरदायित्व नहीं है।”
“तुम समझने की कोशिश करो मित्र” हर्बर्ट बैठ गया। और विल्सन का हाथ पकड़कर बड़ी विनम्रता से उसने कहा- “तहाँ बहुत तेज शराब भी गले के नीचे जाकर रक्त में कुछ उष्णता बनाये रखने में किसी भाँति सफल नहीं होती है, वहाँ कोई शराब न छूने का व्रत रखे- कैसे जीवित रहेगा? हमारा जहाज बहुत दूर तक नहीं जा सकता। अन्त में हमें स्लेज पर ही यात्रा करनी है। हमारा एकमात्र भोजन वहाँ साथ चलने वाले बारहसिंगे ही हो सकते हैं। कोई भी भोजन का पदार्थ वहाँ प्राप्त नहीं और न उसे ले जाने के साधन हैं।”
“मैं आपकी सहानुभूति और सलाह का कृतज्ञ हूँ।” विल्सन ने भी स्वर को प्रेमपूर्ण बना लिया- “ये सब कठिनाईयाँ मेरे ध्यान से बाहर नहीं हैं। लेकिन तुम क्या नहीं मानते कि भगवान सर्वसमर्थ है? वे सर्वत्र हैं, तो हमें क्यों भय करना चाहिये और क्यों चिन्ता करनी चाहिये। मैं तो इस यात्रा पर आया ही इसी लिये हूँ कि निर्जन हिमप्रदेश में भी परमात्मा हैं और वहाँ भी वे उस प्रार्थना को सुनने के लिए उपस्थित रहते हैं, जो केवल उनके लिए की जाती है, यह अनुभव करूं।”
“मैं नास्तिक नहीं हूँ। लेकिन इतना आशावादी बनने का खतरा भी नहीं उठा सकता।” हर्बर्ट ठीक कह रहा था। एक सामान्य मनुष्य जैसे सोच सकता है वैसा ही वह सोच रहा था।
“हम पहले प्रार्थना करेंगे” विल्सन ने ही प्रस्ताव किया- “प्रार्थना के बाद भोजन करके तब इस बात पर चर्चा करना अच्छा रहेगा।” परमात्मा। मेरे पिता! तू सब कहीं पर विद्यमान है। तू इस हिमप्रदेश में भी है, जहाँ मैं तुझे प्रणाम करने आ रहा हूँ।” विल्सन का कण्ठ प्रार्थना करते समय गदगद हो रहा था। उनके बन्द नेत्रों से आँसू की बूँदें टपक रही थीं। “जगदीश्वर! तू एकमात्र सबका रक्षक और पालक है। प्रभु तू यहाँ और सब कहाँ है। हम क्यों डरें? क्यों चिन्ता करें? तू है न हमें शक्ति दे कि हम तेरा ही भरोसा करें। तुझे ही स्मरण करें।” सभी को लग रहा था, विल्सन इस भयंकर यात्रा में उनके लिये बहुत आवश्यक है।
सबकी सहानुभूति विल्सन के साथ हो गयी थी, दलनायक हर्बर्ट ने लौटने की बात फिर नहीं छेड़ी। उसने सोच लिया “परिस्थितियाँ जब विवश करेंगी, आहार-सम्बन्धी नियम आने आप लुप्त हो जायेंगे। अभी आग्रह करने का अर्थ उस आग्रह को पुष्ट करना होगा।”
“विल्सन हम प्रार्थना करेंगे।” अब तो दल के सभी साथी प्रार्थना के अद्भुत प्रभाव के देखते-देखते अभ्यस्त हो गये। जहाज छोड़कर दल स्लेज गाड़ियों पर यात्रा कर रहा है। बर्फीले तूफान, बर्फ की दलदल, मार्ग में पड़ी पच्चीस-पचास गत चौड़ी दरारें और मार्ग खो जाना, सच बात तो यह है कि कोई मार्ग है ही नहीं। दिग्दर्शक यंत्र और अनुमान पग-पग पर विपत्तियों का ढेर। किसी भी दारुण विपत्ति के समयदान एकत्रित हो जाता है, प्रार्थना होने लगती है। है न अद्भुत बात, हर बार प्रार्थना के बाद सभी अनुभव करते हैं कि विपत्ति भाग गई, भगा दी गयी और उनका मार्ग सुगम हो गया।
हिम-अपार हिम है, चारों ओर? वृक्षों और हरियाली की तो चर्चा ही बेकार है। बारहसिंगों का झुण्ड और कुत्तों का दल-कुत्तों के बिना स्लेज खींचे कौन? लेकिन ये हिमप्रान्तीय भयानक कुत्ते बार-बार बिगड़ जाते हैं। बार-बार बारहसिंगों पर आक्रमण करते हैं और इनमें भगदड़ मच जाती है। कुत्ते मनुष्य की तरह बुद्धिमान तो नहीं, तो क्षुधा पर नियंत्रण रख सकें। बेचारे स्लेज खींचते-खींचते थक जाते हैं। भूख लगने पर बारहसिंगों को छोड़कर और मिल भी क्या सकता है? बड़ा कठिन है ऐसे में उन्हें नियंत्रित रख पाना। समय-समय बर्फ के नीचे जमी काई चरने के लिये बारहसिंगों को भी छोड़ना पड़ता है।
ऐसे में विल्सन सबका सहारा बन गया। एक वही है जिसका दल पर कोई भार नहीं है। सब दूसरे शराब की बोतल मुँह से लगाते हैं, वह स्प्रिट के द्वारा बर्फ को पिघलाकर उबालता है और गर्म पानी की घूँट पीकर सब से ज्यादा स्फूर्ति पा जाता है।
“मैं चरने जाता हूँ। “ प्रायः वह सबको हंसा देता है। अद्भुत है यह अंग्रेज। उसके अमेरिकन साथी इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते कि बारहसिंगों के साथ बर्फ के नीचे इधर-उधर जमी काई जैसी घास को कोई मनुष्य भोजन बना सकता है। लेकिन विल्सन मजे से उसे पर्याप्त मात्रा में खा जाता है।
“हमें लौटना चाहिये।” अचानक एक दिन कुत्तों ने स्लेज को लौटाने की ठान ली। वे किसी प्रकार आगे नहीं बढ़ना चाहते थे। बारहसिंगों का झुण्ड छोड़ा गया और अदृश्य हो गया। विल्सन ने सलाह दी, लक्षण अच्छे नहीं हैं। बर्फीले तूफान कुछ ही दिनों में चलने लगेंगे। हम लोग जहाज तक लौट चलें तो ठीक है।
कुत्ते लौटते समय गाड़ियों को पूरी शक्ति से खींच रहे थे। जैसे उन्हें भी लगता था कि इस हिमप्रदेश से जितना शीघ्र निकला जा सके, उतना ही उत्तम है।
जहाज पर सभी यात्री आये और समुद्र का जमना प्रारम्भ हुआ। बहुत थोड़ी दूर जाकर जहाज रुक गया। पृथ्वी और जल का भेद मिट चुका था। एक श्वेत चादर यात्रियों को लग रहा था कि बूढ़ी पृथ्वी मर चुकी है और उसे श्वेत वस्त्र से ढक दिया गया है। मौत, केवल मौत दिखती थी उन्हें। मृत्यु की छाया काली होती है, किन्तु उनके यहाँ तो उजली, असीम-उजली, कोमल और शीतल रूप धारण करके मृत्यु आयी थी। पूरा जहाज ढक गया, हिम के अपार अम्बार में। बाहर से उसका कोई अंश दिखता ही नहीं है। जहाज के यात्रियों में साहस नहीं था कि जहाज के बाहर आकर यह देखें। बेचारे कुत्ते मर गये थे। स्लेज खींचने में उन्होंने प्राण होम दिये। मार्ग में हिमपात प्रारम्भ हो गया था। यात्री किसी तरह भागते-दौड़ते जहाज पर पहुँच गये, यही बहुत था। लेकिन अब इस सुरक्षा का क्या अर्थ? इतना नहीं कि अगली ऋतु में कहीं कोई पता लगाने आया तो जहाज के भीतर उनके सिकुड़े शव उसे मिल जायेंगे।
जल -केवल जल पीकर रहना था उन्हें और अन्त में वह भी अलभ्य हो गया। भोजन और शराब की बोतलें कब की समाप्त हो चुकीं। उष्णता की प्राप्ति और बर्फ गलाकर जल बनाना, सबका साधन था स्प्रिट लैम्प आरै अन्त में स्प्रिट भी समाप्त हो गया।
अनाहार और मृत्यु की स्पष्ट मूर्ति ने सबको निराश कर दिया है। किसी में अब आशा नहीं कि प्रार्थना से कुछ होगा। सच तो यह है कि अब कोई कुछ सोचता नहीं, सोचने योग्य है भी नहीं। मृत्यु, मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे हैं सब। केवल विल्सन ही है, जो नित्य दोनों समय प्रार्थना कर लेता है। समय का अनुमान भी वहाँ घड़ी से ही होता है। वह ठीक घड़ी की भाँति समय पर हाथ जोड़कर घुटनों के बल बैठकर बोलने लगाता है- “मेरे प्रभु! मैं कुछ नहीं चाहता। केवल इतना-इतना कि मैं तुझे भूलूँ नहीं।”
अद्भुत है यह- और इसकी प्रार्थना। स्प्रिट समाप्त होने को आया, यह देखते ही इसने बर्फ के टुकड़े मुँह में रखकर चूसने का अभ्यास कर लिया। जिनकी नाड़ियों का रक्त शराब की उष्णता से उष्ण बनता रहा, वे सब मूर्च्छित पड़े हैं और यह शाकाहारी खौलाये पानी पर जीवित रहने वाला विल्सन अब भी उठ-बैठ लेता था। प्रार्थना जारी थी।
साठ दिन-पूरे साठ दिन बीत गये। आज उसे लगा शायद वह अन्तिम बार प्रार्थना करने बैठा है उसका सिर घूम रहा है, उसकी आँखों के सामने घना अंधेरा छा गया। उसका कण्ठ सूख चुका था। ‘परमात्मा’ केवल एक शब्द कह पाया वह। उसे लगा, अब गिरेगा-मूर्च्छा और मृत्यु वहां पर्यायवाची ही थे। कोई है? कोई जीवित है भाई? जहाज के ऊपर डैक पर से नीचे उतरने के बन्द द्वार कोई पीट रहा था। बार-बार एक ही पुकार- “परमात्मा के लिये बोलो, एक बार बोलो।”
“कौन आयेगा यहाँ? भ्रम, भ्रम है मेरा।” विल्सन अर्द्धमूर्च्छित हो रहा था। लेकिन द्वार बराबर पीटा जा रहा था। बराबर कोई पुकार रहा था। अन्त में लेटे-लेटे पेट के बल किसी प्रकार विल्सन खिसका।
“परमात्मा के लिये शराब नहीं, गरम पानी।” द्वार खोलकर विल्सन गिरा और क्षण भर के लिये मूर्च्छित हो गया। किन्तु आगतों में से एक ने जब उसके मुँह से बोतल लगाना चाहा- उसकी चेतना लौट आयी। उसने बोतल हटा दी मुख से।
“जहाज जम गया है। हम साठ यात्री मृत्यु की घड़ियाँ गिन रहे हैं। भोजन और स्प्रिट समाप्त हो गये हैं। जहाज में लगे बेतार के तार से यह अन्तिम सन्देश अमेरिका में सुना गया था। शीतऋतु में जब हिमपात शुरू हो गया था, अंटार्टिका की यात्रा की बात कौन सोचे। सरकारी अधिकारी भी सहानुभूति भर जता कर रह गये।
समाचार पत्रों में छपे इस दारुण समाचार को पढ़कर एक तरुण ने संकल्प लिया, इस हिमसमाधि लेते मानवों के उद्धार का। रोकने के अनेकों प्रयासों के बावजूद उसने यात्रा की। जो प्राण देकर परोपकार करने को प्रस्तुत है, उसको सहायक मिल ही जाते हैं।
कुत्तों, स्लेजगाड़ियों और बारहसिंगों की पूरी सेना मिल गयी उसे अंटार्टिका पहुँचने पर, भोले हिमग्रामवासियों से। उसे गणना नहीं करनी थी कितने झुण्ड कुत्ते और बारहसिंगे हिम की भेंट हो गये। उसे तो लक्ष्य पर पहुँचना था ठीक समय पर पहुँच गया वह। “हमारे यूथ में कुछ मादा बारहसिंगे हैं। तीन-चार ने मार्ग में बच्चे दिये हैं। आपको हम दूध पिला सकते हैं।” जब जहाज के यात्री होश में आये, कुछ पेट में पहुँच जाने से बोलने योग्य हुए, तरुण ने विल्सन के सामने एक प्याला गर्म दूध रख दिया। मूर्च्छित दशा में भी विल्सन को दूध पिला चुका था- वह।
“हम प्रार्थना करेंगे।” होश में आने के बाद दूध पीने से पहले विल्सन घुटना के बल वहीं बैठ गया। उसके पीछे पूरा समुदाय बैठ गया। यह उसकी प्रार्थना का ही प्रभाव तो था, जो वे सब साथ बैठकर प्रार्थना करने लगे थे। प्रार्थना के पहले ही तो समाचार भी आ गया था कि उन्हें लेने पूरी तकनीकी सुविधाओं से युक्त एक जहाज बस उनके समीप आ चुका है। विल्सन के शुक्रगुजार थे सभी, जिनकी प्रार्थना ने उन्हें उन सभी को अपने घरवालों से मिलने की स्थिति तक जिन्दा बनाये रखा था। धन्य है वह मनुष्य व उसकी जिजीविषा। उसकी इच्छाशक्ति व परमात्मा की अनुकम्पा पर ही तो सृष्टि का यह सारा व्यापार टिका है।
(मार्च, 1980 में शाँतिकुँज परिसर में दिया उद्बोधन)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो! गायत्री मंत्र तीन टुकड़ों में बटा हुआ हैं आध्यात्मिक साधना का सारा-का-सारा माहौल तीन टुकड़ों में बंटा हुआ है। ये हैं- उपासना, साधना और आराधना। उपासना के नाम पर आपने अगरबत्ती जलाकर और नमस्कार करके उसे समाप्त कर दिया होगा, परन्तु हमने ऐसा नहीं किया। हमने अगरबत्ती जलाकर प्रारम्भ तो अवश्य किया है, परन्तु समाप्त नहीं किया। हमने अपने जीवन में अध्यात्म के जो भी सिद्धान्त हैं, उन्हें अवश्य धारण करने का प्रयास किया है। त्रिवेणी में स्नान करने की बात आपने सुनी होगी कि उसके बाद कौआ कोयल बन जाता है। हमने भी उस त्रिवेणी संगम में स्नान किया है, जिसे उपासना, साधना और आराधना कहते हैं। वास्तव में यहीं अध्यात्म की असली शिक्षा है।
उपासना माने भगवान के नजदीक बैठना। नजदीक बैठने का भी एक असर होता है। चन्दन के समीप जो पेड़ पौधे होते हैं, वह भी सुगन्धित हो जाते हैं। हमारी भी स्थिति वैसी ही हुई। चन्दन का एक बड़ा से पेड़, जो हिमालय में उगा हुआ है, उससे हमने सम्बन्ध जोड़ लिया और खुशबूदार हो गये। आपने लकड़ी को देखा होगा, जब वह आग के संपर्क में आ जाती है तो वह भी आग जैसी लाल हो जाती हैं। उसे आप नहीं छू सकते, कारण वह भी आग जैसी ही बन जाती है। यह क्या बात हुई? उपासना हुई नजदीक बैठना हुआ नजदीक बैठना यानी चिपक जाना अर्थात् समर्पण कर देना। चिपकने की यह विद्या हमारे गुरु ने हमें सिखा दी और हम चिपकते हुये चले गये। गाँव के गंवार महिला की शादी किसी सेठ के साथ होने पर वह सेठानी, पंडित के साथ होने पर पंडितानी बन जाती है। यह सब समर्पण का चमत्कार है।
मित्रों उपासना का मतलब समर्पण है। आपको भी अगर शक्तिशाली या महत्वपूर्ण व्यक्ति बनना है, बड़ा काम करना है, तो आपको भी बड़े आदमी के साथ, महान गुरु के साथ चिपकना होगा। आप अगर शेर के बच्चे हैं, तो आपको भी शेर होना चाहिये, आप अगर घोड़े के बच्चे हैं तो घोड़ा होना चाहिये। अगर आप संत के बच्चे हैं तो संत होना चाहिये। हमने इस बात का बराबर ख्याल रखा है कि हम भगवान के बच्चे हैं, तो हमें भगवान की तरह बनना चाहिये। बूँद जब अपनी हस्ती समुद्र में गिराती है तो वह समुद्र बन जाती है। यह समर्पण है। अपनी हस्ती को समाप्त करना ही समर्पण है। अगर बूँद अपनी हस्ती न समाप्त करे तो वह बूँद ही बनी रहेगी। वह समुद्र नहीं हो सकती है। अध्यात्म में यही भगवान को समर्पण करना उपासना कहलाती है। भगवान माने उच्च आदर्शों, उच्च सिद्धान्तों का समुच्चय। उच्च आदर्शों, उच्च सिद्धान्तों को अपने साथ मिला लेना ही उपासना कहलाती है। हमने अपने जीवन में इसी प्रकार की उपासना की है, आपको भी इसी प्रकार की उपासना करनी चाहिये।
आप लोगों को मालूम है कि ग्वाल-बाल इतने शक्तिशाली थे कि उन्होंने अपनी लाठी के सहारे गोवर्धन को उठा लिया था। इसी तरह रीछ-बन्दर इतने शक्तिशाली थे कि वे बड़े-बड़े पत्थर उठा कर लाये और समुद्र में सेतु बनाकर उसे लाँघ गये थे। क्या यह उनकी शक्ति थी? नहीं बेटे, यह भगवान श्रीकृष्ण एवं राम के प्रति उनके समर्पण की शक्ति थी, जिसके बल पर वे इतने शक्तिशाली हो गये थे। भगवान के साथ, गुरु के साथ मिल जाने से, जुड़ जाने से आदमी न जाने क्या से क्या हो जाता है। हम अपने गुरु से- भगवान से जुड़ गये तो आन देख रहे हैं कि हमार अन्दर क्या-क्या चीजें हैं। आप कृपा करके मछली पकड़ने वालों, चिड़िया पकड़ने वालों के तरीके से मत बनना और न इस तरह की उपासना करना, जो आटे की गोली और चावल के दाने फेंककर उन्हें फंसा लेते और पकड़ लेते हैं तथा कबाब बना लेते हैं। आप ऐसे उपासक मत बनना, जो भगवान को फंसाने के लिये तरह-तरह के प्रलोभन फेंकता है। बिजली का तार लगा हो, परन्तु उसका सम्बन्ध जनरेटर से न हो तो करेण्ट कहाँ से आयेगा? उसी तरह हमारे अंदर अहंकार, लोभ, मोह भरा हो, तो वे चीजें हम नहीं पा सकते हैं, तो भगवान के पास हैं। अपने पिता की सम्पत्ति के अधिकारी आप तभी हो सकते हैं,जब आप उनका ध्यान रखते हों, उनके आदर्शों पर चलते हों, सिद्धान्तों पर चलते हों। आप केवल यह कहें कि हम तो उन्हें पिताजी-पिताजी कहते थे तथा अपना सारा वेतन अपनी पॉकेट में रखते थे और उनकी हारी-बीमारी से हमारा कोई लेना-देना नहीं था, तो फिर आपको उनकी सम्पत्ति का कोई अधिकार नहीं मिलने वाला है।
साथियों हमने भगवान को देखा तो नहीं है, परन्तु अपने गुरु को हमने भगवान के रूप में पा लिया है। उनको हमने समर्पण कर दिया हैं उनके हर आदेश का पालन किया है। इसलिये आज हम उनकी सारी सम्पत्ति के हकदार हैं। आपको मालूम नहीं है कि विवेकानन्द ने रामकृष्ण परमहंस को देखा था, स्वामी दयानन्द ने विरजानन्द को देखा था। चाणक्य तथा चन्द्रगुप्त का नाम सुना है न आपने। उनके गुरु ने जो उनको आदेश दिये,उनका उन्होंने पालन किया। गुरुओं ने शिष्यों को, भगवान ने भक्तों को जो आदेश दिये, वे उनका पालन करते रहे। आपने सुना नहीं है, एक जमाने में समर्थ गुरु रामदास के आदेश पर शिवाजी लड़ने के लिये तैयार हो गये थे। उनके एक आदेश पर वे आजादी की लड़ाई के लिये तैयार हो गये। यही समर्पण का मतलब है। आपको मालूम नहीं है कि इसी समर्पण का वजह से समर्थ गुरु रामदास की शक्ति शिवाजी में चली गयी और वे उसे लेकर चले गये।
आपने नदी को देखा होगा कि वह कितनी गहरी होती है। चौड़ी एवं गहरी नदी को कोई आसानी से पार नहीं कर सकता है, किन्तु जब वह एक नाव पर बैठ जाता है, तो नाव वाले की यह जिम्मेदारी होती है कि वह नाव को भी न डूबने दे और वह व्यक्ति जो उसमें बैठा है, उसे भी न डुबाये। इस तरह नाविक उस व्यक्ति को पार उतार देता है। ठीक उसी प्रकार जब हम गुरु को, भगवान को, नाविक के रूप में समर्पण कर देते हैं तो वह हमें इस भवसागर से पार कर देता है। हमारे जीवन में इसी प्रकार घटित हुआ है। हमने अपने गुरु को भगवान बना लिया है। हमने उन्हें एकलव्य की तरह से अपना सर्वस्व मान लिया है। हमने उन्हें एक बाबाजी, स्वामीजी, गुरु नहीं माना है, बल्कि भगवान माना है, हमारे पास इस प्रकार भगवान की शक्ति बराबर आती रहती है। हमने पहले छोटा बल्ब लगा रखा था, तो थोड़ी शक्ति आती थी। अब हमने बड़ा बल्ब लगा रखा है तो हमारे पास ज्यादा शक्ति आती रहती है। हमें जब जितना चाहिये, मिल जाता है। हमें आगे बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां लगानी हैं, बड़ा काम करना है, अतः हमने उन्हें बता दिया है कि अब हमें ज्यादा ‘पॉवर’, ज्यादा शक्ति की आवश्यकता है। आप हमारे ट्रान्सफार्मर को बड़ा बना दीजिये। अब वे हमारे ट्राँसफार्मर को बड़ा बनाने जा रहे हैं। आपको भी अगर लाभ प्राप्त करना है तो हमने जैसे अपने गुरु को माना और समर्पण किया है, आप भी उसी तरह मानिये तथा समर्पण कीजिये। उसी तरह कदम बढ़ाइये। हमने उपासना करना सीखा है और अब हम हंस बन गये हैं। आपको भी यही चीज अपनानी होगी। इससे कम में उपासना नहीं हो सकती है। आप पूरे मन से, पूरी शक्ति से उपासना में बन लगाइये और वह लाभ प्राप्त कीजिये जो हमने प्राप्त किये हैं। यही है उपासना।
साधना किसकी की जाये? भगवान की? अरे भगवान को न तो किसी साधना की बात सुनने का समय है और न ही उसे साधा जा सकता है। वस्तुतः जो साधना हम करते है वह केवल अपने लिये होती है और स्वयं की होती है। साधना का अर्थ होता है- साथ लेना। अपने आपको संभाल लेना, तपा लेना, गरम कर लेना, परिष्कृत कर लेना, शक्तिवान बना लेना, यह सभी अर्थ साधना के हैं साधना के संदर्भ में हम आपको सर्कस के जानवरों का उदाहरण देते रहते हैं कि हाथी, घोड़े, शेर, चीते जब अपने मालिक का पेट पालते तथा सैकड़ों लोगों का मनोरंजन करने, खेल दिखाने में समर्थ होते हैं। इन जानवरों को साध लिया गया होता है जो सैकड़ों लोगों को प्राविडेण्ट फंड देते हैं, पेमेण्ट देते हैं उनका पालन करते हैं। ये कैसे साधे जाते हैं? बेटे, यह रिंगमास्टर के हण्टरों से साधे जाते हैं। वह उन्हें हण्टर मार-मारकर साधता है। अगर उन्हें ऐसे कही कहा जाय कि भाई साहब आप इस तरह का करतब दिखाइये, तो इसके लिये वे तैयार नहीं होंगे, वरन् उल्टे आपके ऊपर, मास्टर के ऊपर हमला कर देंगे।
साधना में भी यही होता है। मनुष्य के, साधक के मन के ऊपर चाबुक माने से, हण्टर मारने से, गरम करने से, तपाने से वह काबू में आ जाता है। इसलिये तपस्वी तपस्या करते हैं। हिन्दी में इसे ‘साधना’ कहते हैं और संस्कृत में ‘तपस्या’ कहते हैं। यह दोनों एक ही हैं अतः साधना का मतलब है अपने आप को तपाना। खेत की जुताई अगर ठीक ढंग से नहीं होगी, तो उसमें बुवाई भी ठीक ढंग से नहीं की जा सकेगी। अतः अच्छी फसल प्राप्त करने की लिये पहले खेत की जुताई करना आवश्यक है, ताकि उसमें से कंकड़-पत्थर आदि निकाल दिये जायें। उसके बाद बुवाई की जाती है। कपड़ों की धुलाई पहले करनी पड़ती है, तब उसकी रंगाई होती है। बिना धुलाये कपड़ों की रंगाई नहीं हो सकती है। काले, मैले–कुचैले कपड़े नहीं रंगे जा सकते हैं।
मित्रो उसी प्रकार से राम का नाम लेना एक तरह से रंगाई है। राम की भक्ति के लिये साफ-सुथरे कपड़ों की आवश्यकता है। माँ अपने बच्चों को गोंद में लेती है, परन्तु जब बच्चा टट्टी कर देता है तो वह उसे गोद में नहीं उठाती है। पहले उसकी सफाई करती है, उसके बाद उसके कपड़े बदलती है, तब गोद में लेती है। भगवान भी ठीक उसी तरह के हैं। वे मैले-कुचैले प्रवृत्ति के लोगों को पसन्द नहीं करते हैं। यहाँ साफ-सुथरा से मतलब कपड़े से नहीं है, बल्कि भीतर से है- अंतरंग से है। इसी को स्वच्छ रखना, परिष्कृत करना पड़ता है। तपस्या एवं साधना इसी का नाम है। अपने अन्दर जो बुराइयाँ हैं, भूलें हैं, कमियाँ हैं, दोष-दुर्गुण हैं, कषाय-कल्मष है, उसे दूर करना व उसके लिये कठिनाइयाँ उठाना ही साधना या तपस्या कहलाती है। इसी का दूसरा नाम पात्रता का विकास है। कहने का तात्पर्य यह है कि वर्षा के समय आप बाहर जो भी पात्र रखेंगे- कटोरी, गिलास-जो कुछ भी रखेंगे, उसी के अनुरूप उसमें जल भर जायेगा। इसी तरह आपकी पात्रता जितनी होगी, उतना ही भगवान का प्यार, अनुकम्पा आप पर बरसती चली जायेगी।
घोड़ा जितनी तेजी से दौड़ सकता है, उसी के अनुसार उसका मूल्य मिलता है। गाय जितना दूध देती है, उसी के अनुसार उसका मूल्याँकन होता है। अगर आपके कमण्डलु में सुराख है तो उसमें डाला गया पदार्थ बह जायेगा। नाव में यदि सुराख है तो नाव पार नहीं हो सकती है। वह डूब जायेगी। अतः आप अपने बर्तन को बिना सुराख के बनाने का प्रयत्न करें। हमने सारी जिन्दगी भर इसी सुराख को बन्द करने में अपना श्रम लगाया है। वासना, तृष्णा और अहंता- यही तीन सुराख हैं, जो मनुष्य को आगे नहीं बढ़ने देते हैं। इन्हें ही भव बन्धन कहा गया है। अगर आपका मन संसार की ओर अधिक लगा हुआ है, तो आप आध्यात्मिकता की ओर कैसे बढ़ पायेंगे? फिर आपका मन पूजा उपासना में कैसे लगेगा? आप इस दिशा में आगे कैसे बढ़ेंगे? गोली चलाने वाला यदि निशाना न साधे तो उसका काम कैसे चलेगा? वह कभी इधर को भटके, कभी उधर को भटके तो उससे निशाना कैसे साधा जायेगा? बीस जगह ध्यान रहा तो आप विजेता नहीं बन सकते। भगवान आपको अपनाने के लिये हाथ बढ़ा रहा है, परन्तु ये तीन हथकड़ियाँ वासना, तृष्णा एवं अहंता आपको भगवान तक पहुँचाने में रुकावट पैदा कर रही हैं। आपको इनसे लोहा लेना होगा। आप अगर अपने हाथों को नहीं खोलेंगे तो भगवान की गोद में आप कैसे जायेंगे?
मित्रो, साधना में आपको अपने मन को समझाना होगा। अगर मन नहीं मानता है तो आपको उसकी पिटाई करनी होगी। बैल जब खेतों में हल नहीं खिंचता है तथा घोड़ा जब रास्ते पर चलने अथवा दौड़ने को तैयार नहीं होता तो उसकी पिटाई करनी पड़ती है। हमने अपने आपको इतना पीटा है कि उसका कहना नहीं। हमने अपने आपको इतना धुलने का प्रयास किया है कि उसे हम कह नहीं सकते। इस प्रकार धुलने के कारण हम फकाफक कपड़े के तरीके से आज धुले हुये उज्ज्वल हो गये। हम अपने आपको रुई की तरह से धुनने का प्रयास किया है। जो धुनने के पश्चात फूल कर स्वच्छ और मोटी हो जाती है कि उससे नई चीज का निर्माण होता है।
भगवान का भजन एवं नाम लेने के लिये अपना सुधार करना परम आवश्यक है। बाल्मिकी ने जब यह काम किया तो भगवान के परमप्रिय भक्त हो गये। उनकी वाणी में एक ताकत आ गयी। उसने डकैती छोड़ दी। उसके बाद भगवान का नाम लिया तो काम बन गया। कहने का मतलब यह है कि आप आपने आप धोकर इतना निर्मल बना लें कि भगवान आपको मजबूर होकर प्यार करने लग जायं। राम नाम के महत्व से ज्यादा आप की जीभ का महत्व है आप जीभ पर कन्ट्रोल रखिये तब ही काम बनेगा जीभ पर काबू रखें आप ईमानदारी की कमाई खाये बेईमानी की कमाई न खायें।
हमने आपकी जीभ को साफ किया है उसे इस लायक बनाया है कि गुरु का नाम लेकर जो भी वरदान देते हैं वह सफल हो जाता है। आप भी जीभ को ठीक कीजिये न। आप आपने आप को सही करें अपने जीवन में सदा जीवन्त तथा उच्च विचार लाये। इस सिद्धान्त को जीवन का अन्त बनाने से ही काम बनेगा। आपको खाने के लिये दो मुट्ठी अनाज और तन ढकने के लिये थोड़ा कपड़ा चाहिये।जो इस शरीर के द्वारा सहज ही पूरा कर सकते हैं। फिर आप आपने जीवन का शुद्ध और पवित्र क्यों नहीं बनाते? अगर यह काम करेंगे तो आप भगवान की गोदी के हकदार हो जायेंगे। ऐसा बनकर आदमी बहुत कुछ काम कर सकता है।
सदा जीवन के माने है कसा हुआ जीवन। आपको अपना जीवन सदा बनाना होगा। माल-मजा उड़ाते हुए लालची और लोभी रहते हुए आप चाहें कि राम-नाम सार्थक हो जायेगा। नहीं। कभी सार्थक नहीं होगा। हमार गुरु ने हमारे महापुरुषों ने हमें यही सिखाया है कि जो आदमी महान बने हैं ऊंचे उठे हैं उन सभी ने अपने आप को तपाया है। आप किसी महापुरुष का इतिहास उठाकर पढ़कर देखें। तो पायेंगे कि अपने को तपाने के बाद ही उन्होंने वर्चस्व प्राप्त किया। और फिर जहाँ भी वे गये चमत्कार करते गये। तलवार से सिर काटने के लिये उसे तेज करना पड़ता हैं पत्थर पर घिसना पड़ता है। आपको भी प्रगति करने के लिये अपने आपको तपाना होगा, घिसना होगा। हमने एक ही चीज सीखी है कि अपने आपको अधिक से अधिक तपायें अधिक से अधिक घिसें। ताकि हम ज्यादा से ज्यादा समाज के काम आ सकें। समाज की सेवा करना ही हमार लक्ष्य है। अगर आप भी ऐसा कर सकें तो बहुत फायदा होगा। जैसा कि हमें हुआ है।
साधना के पश्चात आराधना की बात करता हूँ। आपको कि आराधना क्या है? और किसकी की जानी चाहिये? आराधना कहते हैं समाज सेवा को जन कल्याण को। सेवा धर्म वह नकद धर्म है जो हाथोंहाथ फल देता है। इसमें पहले बोना पड़ता है। आज से साठ वर्ष पूर्व हमारे पूज्य गुरुदेव ने हमारे घर पर आकर दीक्षा दी और कहा की तुम बोने और काटने की बात मत भूलना। कहीं से भी कोई चीज फोकट में नहीं मिलता हैं। चाहे वे गुरु हों या भगवान हों। हाँ यह हो सकता है कि बोया जाय और काटा जाय। हम मक्के का एक बीज बोते हैं तो न जाने कितने हजार हो जाते हैं। यही बाजरे के साथ होता है। उन्होंने हमसे कहा कि बेटे, फोकट में खाने की विद्या एवं माँगने की विद्या छोड़कर बोने और काटने की विद्या सीख, इससे ही तुम्हें फायदा होगा। उन्होंने इसके लिये विधान भी बतलाया कि तुम्हें चौबीस साल तक गायत्री के महापुरश्चरण करने होंगे। इस समय जौ की रोटी एवं छाछ पर रहना होगा। उन्होंने जो भी विधि हमें बतायी, उसे हमने नोट कर लिया था। इसमें उन्होंने हमें एक नयी विधि बतलायी। वह विधि बोने और काटने की थी। उन्होंने कहा कि जो कुछ भी तेरे पास है, उसे भगवान के खेत में बो दो। उन्होंने यह भी कहा कि तीन चीजें भगवान की दी हुई हैं और एक चीज तुम्हारी कमाई हुई है।
शरीर, बुद्धि और भावना- ये तीन चीजें जो भगवान ने दी हैं। यह तीन शरीर-स्थूल, सूक्ष्म, सूक्ष्म और कारण के प्रतीक हैं। इनमें तीन चीजें भरी रहती हैं- स्थूल में श्रम, समय। सूक्ष्म में मन, बुद्धि। कारण में भावना। इसके अलावा जो चौथी चीज है- वह है धन-सम्पदा, जो मनुष्य कमाता है। इसे भगवान नहीं देता है। भगवान न किसी को गरीब बनाता है, न अमीर। भगवान न किसी को धनवान बनाता है, न कंगाल बनाता है। यह तेरा बनाया हुआ है, इसे तू बोना शुरू कर। हमने कहा कि कहाँ बोया जाय? उन्होंने कहा कि भगवान के खेत में। हमने पूछा कि भगवान कहाँ है और उनका खेत कहाँ है? उन्होंने हमें इशारा करके बतलाया कि यह सारा विश्व ही भगवान का खेत है। यह भगवान विराट है। इसे ही विराट ब्रह्म कहते हैं। अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण ने इसी विराट ब्रह्म का दर्शन कराया था। उन्होंने दिव्यचक्षु से उनका दर्शन कराया था। यही उन्होंने कौशल्या जी को दिखाया था। हमारे गुरु ने कहा कि जो कुछ भी करना हो, इसी समग्र सृष्टि के लिये करना चाहिये। यही भगवान की वास्तविक पूजा कहलाती है। इसे ही आराधना कहते हैं।
उन्होंने हमें आदेश किया कि तू इसी विराट ब्रह्म के खेत में बो। अर्थात् जन समाज की सेवा कर। जन समाज का कल्याण करने, उसे ऊँचा उठाने, समुन्नत और सुसंस्कृत बनाने में अपनी समस्त शक्तियाँ एवं सम्पदा लगा, फिर आगे देखना कि यह सौ गली हो जायेंगी। जो भी तीन-चार चीजें तेरे पास हैं, उसे लगा दे, तुझे ऋद्धि-सिद्धियाँ मिल जायेंगी। यह सब तेरे पीछे घूमेगी। तू मालदार हो जायेगा। अब हम तैयार हो गये। हमने विचार दृढ़ बना लिया। उन्होंने पूछा कि क्या चीजें हैं तेरे पास? हमने कहा कि हमारा शरीर है। हमने सूर्योदय के पहले भगवान का नाम लिया है अर्थात् भजन किया है, बाकी समय हमने भगवान का काम किया है। सूर्य निकलने से लेकर सूर्य डूबने तक सारा समय भगवान के लिए लगाया, समाज के लिये लगाया है।
दूसरी, बुद्धि है हमारे पास। आज लोगों की बुद्धि न जाने किस-किस गलत काम में लग रही है। आज लोग अपनी बुद्धि को मिलावट करने, तस्करी करने, गलत काम करने में खर्च कर रहे हैं। हमने निश्चय किया कि हम अपनी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर ले जायेंगे तथा इससे समाज, देश को ऊंचा उठाने का प्रयास करेंगे। हमने अपनी अक्ल एवं बुद्धि को यानी अपने सारे-के-सारे मन को भगवान के कार्य में लगाया।
और क्या था हमारे पास। हमारे पास थी भावना- संवेदना। यह भी हमने अपने कुटुम्बियों के लिये, बेटे-बेटी के लिये नहीं लगायी। हमने अपनी भावना एवं संवेदना के माध्यम से इस संसार में रहने वाले व्यक्तियों के दुःखों के निवारण के लिये हमेशा उपयोग किया। हमने हमेशा यह सोचा कि हमारे पास सुख है तो उसे किस तरह से बाँट सकते हैं? अगर किसी के पास दुःख है, तो उसे किस तरह से दूर कर सकते हैं। यही हमने अपने पूरे जीवनकाल में किया है। इसके अलावा जो भी धन था, उसे भी भगवान के कार्य में खर्च कर दिया। इससे हमें बहुत मिला, इतना अधिक मिला कि हम आपको बतला नहीं सकते। हम लोग कितना प्यार करते हैं, यह आपको नहीं मालूम। लोग यहाँ आते हैं तो यह कहते हैं कि हमें गुरुजी का दर्शन मिल जाता तो कितना अच्छा होता। यह क्या है? यह है हमारा प्यार, मोहब्बत, जो हमने उन्हें दी है तथा उनसे हमने पायी है। गाँधी जी ने भी दिया था एवं उन्होंने भी पाया है। हमने तो कहीं अधिक पाया है। मरने के बाद तो कितने ही व्यक्तियों की लोग पूजा करते हैं। भगवान बुद्ध की पूजा करते हैं। मरने के बाद भगवान श्रीकृष्ण की जय बोलते हैं, जबकि उस समय लोगों ने उन्हें गालियाँ दी थीं। हमारे मरने के बाद कोई आरती उतारेगा कि नहीं, मैं यह नहीं कह सकता, परन्तु आज कितने लोगों ने आरती उतारी है, प्यार किया है, इसे हम बतला नहीं सकते। यह क्या हो गया है? यह है हमारा ‘बोया एवं काटा’ का सिद्धान्त। यह है हमारी आराधना-समाज के लिये, भगवान के लिये।
मित्रों, हमने पत्थर की मूर्ति के लिये नहीं, वरन् समाज के लिये काम किया है। पत्थर की मूर्ति को भगवान नहीं कहते हैं। समाज को ही भगवान कहते हैं। हमने ऐसा ही किया है। हमें दो मालियों की कहानी हमेशा याद रहती है। एक राजा ने एक बगीचा एक माली को दिया तथा दूसरा बगीचा दूसरे माली को। एक ने बगीचे में राजा का चित्र लगा दिया और नित्य चन्दन लगाता आरती उतारता तथा एक सौ आठ परिक्रमा करता रहा। इसके कारण बगीचे का कार्य उपेक्षित पड़ा रहा। बगीचा सूखने लगा।
दूसरा माली तो राजा का नाम भी भूल गया। परन्तु वह निरन्तर बगीचे में खाद पानी डालने, निराई करने का काम करता रहा। इससे उसका बगीचा हरियाली से भरा-पूरा होता चला गया। राजा एक वर्ष बाद बगीचा देखने आया, तो पहले वाले माली को उसे हटा दिया, जो एक सौ आठ परिक्रमा करता और आरती उतारता था। दूसरे उस माली का अभिनंदन किया, उसे ऊंचा उठा दिया, जिससे वास्तव में बगीचे को सुन्दर बनाने का प्रयास किया था।
हमारा भगवान भी उसी तरह का है। उन्होंने कहा था कि जो कुछ भी करना भगवान के लिये करना, समाज के लिये करना। हमने सारी जिन्दगी इसी तरह का काम किया है और जितना किया है उतना पा लिया हैं। आगे जो हमें करेंगे, उसके एवज में भी हम पाते रहेंगे। आपका तो हमेशा दिन धड़कता रहता है। आपको तो भगवान का नाम लेना सहज मालूम पड़ता है, पर भगवान का काम करना मुश्किल पड़ता है पर उसके लिये पैसा लगाना तो और भी मुश्किल मालूम पड़ता है। यह आपके लिये मुश्किल हो सकता है, परन्तु हमारे लिये तो यह एकदम सरल है। हमारे दिमाग, शरीर, साहित्य, हमारी प्लानिंग को देख लीजिये, यह हमारी सिद्धियाँ हैं। ज्ञान की थाह आप ले लीजिये, हमारे धन की जानकारी ले लीजिये, कितने लोग हमारे दर्शन को लालायित रहते हैं। यह सारी हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ हैं। ऋद्धियाँ तो हमारी दिखलायी नहीं पड़तीं। हमें खूब आराम से नींद आ जाती है। पास में नगाड़ा भी बजता रहे तो भी कोई परवाह नहीं। चिन्ता हमारे पास नहीं है। हम निर्भीक हैं। आत्म सन्तोष हमारी ऋद्धि है। हमारा लोकसम्मान बहुत है। लोकसम्मान उसे कहते हैं- जिसमें जनता का सहयोग मिलता है। भगवान का अनुग्रह भी हमें मिला है, अनुग्रह कैसा होता है, कहते हैं कि देवता ऊपर से फूल बरसाते हैं। हमारे ऊपर हमेशा फूल बरसते रहते हैं- जिसे हम प्रोत्साहन, साहस, हिम्मत, प्रेरणा, उत्साह, उम्मीद कह सकते हैं। देवता इसे हमारे ऊपर बरसते रहते हैं।
मित्रों, हम अपने पिता के वफादार बेटे हैं। हमने उनके धन को पाया है। क्योंकि हमने उनके नाम को बदनाम नहीं किया है। हमने अपने पिता की लाज रखी है। हमने अपने पिता के व्यवसाय को जिन्दा रखा है। हमने उनके बगीचे को हमेशा हरा -भरा तथा अच्छा बनाने का प्रयास किया हैं। मनुष्यों को सुसंस्कारी तथा समुन्नत बनाने के लिये जो भी संभव था उसे हमने पूरा किया है। हमारे पिता हमसे हमेशा प्रसन्न रहते हैं। युवराज वह होता है जो अपने पिता के समान हो जाता है। हम अपने पिता के युवराज हैं। हम अपने पिता के समकक्ष हो गये हैं। हमने पिता को गुम्बज की आवाज-प्रतिध्वनि के रूप में देखा है। जो शब्द हमने कहा- वैसा ही सुनने को मिला। हमने कहा जो कुछ भी हमारे पास है, वह तुम्हारा है। हमने कहा कि उमें नहीं चाहिये आपका, उसे भी वैसा ही कहा।
भगवान हमेशा हमारे बॉडीगार्ड के रूप में फिरता रहता है। वह कहता है कि कभी भी हिम्मत मत हारना, साहस मत खोना, किसी से डरना मत। जो तुम्हें तंग करेगा उसे हम ठीक कर देंगे। वह परेशान एवं हैरान हो जायेगा। उसे हम धूल में मिला देंगे। हमारा बॉडीगार्ड आगे-आगे चलता है। हम उसके पीछे चलता हैं हम सुरक्षित होकर मिनिस्टर के तरीके से शानदार ढंग से चलते हैं। यह हमारा प्रत्यक्ष चमत्कार है, जो आप देख रहे हैं।
आध्यात्मिक क्षेत्र में सिद्धि पाने के लिये अनेक लोग प्रयास करते हैं, पर उन्हें सिद्धि क्यों नहीं मिलती है? साधना से सिद्धि पाने का क्या रहस्य है? इस रहस्य हो न जानने के कारण ही प्रायः लोग खाली हाथ रह जाते है। मित्रों, साधना की सिद्धि होने निश्चित है। साधना सामान्य चीज नहीं है। यह असामान्य चीज हैं परन्तु साधना को साधना की तरह किया जाना परम् आवश्यक हैं। साधना कैसी होना चाहिये, इस सम्बन्ध में हम आपको पुस्तकों का हवाला देने की अपेक्षा एक बात बताना चाहते हैं, जिसके आप जाँच-पड़ताल कभी भी कर सकते हैं।
हम पचहत्तर साल के हो गये हैं। कहने का मतलब यह है कि हमारे पूरे 75 साल साधना में व्यतीत हुए हैं। यह दूसरा जीवन एक खुली पुस्तक के रूप में है। हमने साधना की है। उसका परिणाम अवश्य मिला है। और जो कोई भी साधना करेगा, उसे भी परिणाम अवश्य मिलेगा। हमें कैसे मिला, इसके संदर्भ में हम दो घटनायें सुनाना चाहते हैं।
पहली बार हमारे पिताजी हमें महामना मदनमोहन मालवीय जी के पास यज्ञोपवीत एवं दीक्षा दिलाने के लिये बनारस ले गये थे। मालवीय जी ने काशी में हमें यज्ञोपवीत भी पहनाया। भी दी। उस समय उन्होंने हमें बहुत-सी बातें बतलायीं। उस समय हमारी उम्र 9 वर्ष की थी, परन्तु दो बातें हमें अभी भी ज्ञात हैं। पहली बार उन्होंने कहा कि हमने जो गायत्रीमंत्र की दीक्षा दी हैं, ब्राह्मणों की कामधेनु है। हमने पूछा कि क्या यह अन्य लोगों की नहीं हैं। उन्होंने कहा कि नहीं। ब्राह्मण जन्म से नहीं, कर्म से होता है। जो ईमानदार, नेक, शरीफ है तथा जो समाज के लिये, देश के लिये, लोकहित के लिये जीता है, उसे ब्राह्मण कहते हैं। एक औसत भारतीय की तरह जो जिये तथा अधिक से अधिक समाज के लिए लगा दे, उसे ब्राह्मण कहते हैं। गाँधी जी ने भी राजा हरिश्चन्द्र का नाटक देखकर यह वचन दिया था कि हम हरिश्चन्द्र होकर जियेंगे। वे इस तरह का जीवन जिये भी। हमने भी मालवीय जी के सामने यह संकल्प लिया लिया था कि हम ब्राह्मण जीवन जियेंगे। हमने वैसा ही जीवन प्रारम्भ से जिया है।
हमारे दूसरे आध्यात्मिक गुरु, जो हिमालयवासी हैं और जो सूक्ष्म-शरीरधारी हैं, उन्होंने हमारे घर में प्रकाश के रूप में आकर दीक्षा दी। उन्होंने हमें पूर्व जन्म की बातें दिखलाई। उसके बाद उन्होंने हमें गायत्री मंत्र की दीक्षा दी। हमने कहा कि गायत्री मंत्र की दीक्षा तो हम पहले से लिये हुए हैं, फिर दोबारा देने का क्या अर्थ है? उन्होंने कहा कि आपके पहले गुरु ने यह कहा था कि यह ब्राह्मणों की गायत्री है। अब हम यह बतलाते हैं कि बोओ और काटो। इस मंत्र के अनुसार हमने अपने पिता की सम्पत्ति को भी लोकमंगल में लगा दिया। हमने बोया और पाया है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि इसके अलावा अन्य चार चीजों को भगवान के खेत में लगाना चाहिये। समय, श्रम, बुद्धि-जो भगवान से मिली है। धन वह है जो संसार में कमाया जाता है। ये चारों चीजें हमने समाज में लगा दीं। इसके द्वारा हमारी पूजा, उपासना एवं साधना हो गयी। हमारे ब्राह्मण-जीवन का यही चमत्कार है। यही मेरी पूजा है।
समय के बारे में आप देखना चाहें तो इन पचहत्तर वर्षों में हमने क्या किया है, कितना किया है, वह आप देख सकते है॥ हमने भगवान यानी जो अच्छाइयों का समुच्चय है, उसे समर्पण करके यह सब किया है। हमारी उपासना और साधना ऐसी है कि हमने सारी जिन्दगी भर धोबी के तरीके से अपने जीवन को धोया है और अपनी कमियों को चुन-चुनकर निकालने का प्रयत्न किया है। आराधना हमने समाज को ऊंचा उठाने के लिये की है। आप यहाँ आइये और देखिये, अपने मुख से अपने बारे में कहना ठीक बात नहीं है। आप यहाँ आइये और दूसरे के मुख से सुनिये। हम सामान्य व्यक्ति नहीं हैं, असामान्य व्यक्ति हैं। यह हमें उपासना, साधना और आराधना के द्वारा मिला है। अगर आप इन तीन चीजों का समन्वय अपने जीवन में करेंगे, तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपको साधना से सिद्धि अवश्य मिलेगी।
हमारे जो भी सहयोगी, सखा, सहचर एवं मित्र हैं। उनसे हम यही कहना चाहते हैं कि आप केवल अपने तथा अपने परिवार के लिये ही खर्च मत कीजिये, वरन् कुछ हिस्सा भगवान के लिए भी खर्च कीजिये। साथ ही हम यह भी कहते हैं कि बोइये और काटिये। फिर देखिये कि जीवन में क्या-क्या चमत्कार होते हैं। आप जनहित में, लोकमंगल में, पिछड़ों को ऊंचा उठाने में अपना श्रम, समय, साधन लगायें। अगर आप इतना करेंगे तो विश्वास रखिये कि आपको साधना से सिद्धि मिल सकती है। हमने इसी आधार पर पाया है और आप भी पा सकेंगे, परन्तु आपको सही रूप से इन तीनों को पूरा करना होगा। आपकी साधना तब तक सफल नहीं होगी, जब तक आप हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलेंगे। यदि आप हमारे कंधे से कंधा मिलाकर और कदम से कदम मिलाकर चल सकें तो हम आपको यकीन दिलाते हैं कि आपका जीवन धन्य हो जायेगा, पीढ़ियाँ और श्रद्धापूर्वक यह रखेंगी। आज की बात समाप्त।
॥ ॐ शान्ति॥।
एक बौद्धभिक्षु चीन गया। चीन का सम्राट अपनी प्रजा की साथ स्वागत के लिये पहुँचा। सम्राट देखकर हैरान कि जिसकी इतनी प्रशंसा सुनी थी वह तो कुछ पागल-सा दिखाई देता है। एक पादुका पैर में पहने है, एक सिर पर रखे चला हा रहा है। सम्राट से न रहा गया। स्वागत-समारोह के बाद आखिर भिक्षु को हैरानी भरी जिज्ञासावश पूछ ही बैठा। भिक्षु ने कहा- “मुझमें आपमें थोड़ा-बहुत ही अन्तर है। मैंने तो अपनी एक पादुका सिर पर रखकर ही आधी गुलामी स्वीकार की है, किन्तु आप सब भी तो सम्पत्ति के गुलाम हैं, जबकि आपको तो सम्पत्ति का मालिक होना चाहिये था।
गंगा की जल की उफनती लहरें किनारों के अनुशासन को तोड़ती तिरस्कृत करती बढ़ती जा रही थीं। जहाँ तक नजर जाती, जल ही जल दिखायी दे रहा था। स्थिति बाढ़ की थी। किसानों को हजारों एकड़ जमीन जलमग्न थी। कितने ही परिवार बेघर-बार हो गये थे। सैकड़ों पशु पानी में बह गये। प्रकृति के इस प्रकोप से ग्रसित बदायूँ (उत्तर प्रदेश) जिले के गँवा ग्राम के निवासी गुमसुम थे। बाढ़ को देखकर उसाँसे भर लेते थे। समझ में नहीं आ रहा था क्या करें?
उन्हीं दिनों एक संत गाँव में पधारे। प्रवेश करते ही दिखायी पड़ा- दुर्दशा का ताण्डव नर्तन। घूम-फिरकर स्थिति का जायजा लिया, ग्रामवासियों से परिस्थितियों की जानकारी ली। पूछा-”अब तक इसके लिए क्या किया गया?’
“सरकार ने निवेदन।” अनेकों कण्ठों से वाणी निकली। इसके अतिरिक्त और कुछ-सभी की ओर दृष्टि घुमाते हुए उनका अगला सवाल था।
“भला इस भीषण प्रकोप के सामने हम लोग और करते भी क्या? “ प्रतिवर्ष धन-जन की हानि सहने के अलावा।” भीड़ से घिरे साधु ने वाक्य पूरा किया। “आप लोग कुल ग्रामवासी कितने हैं? कुछ क्षण सोचते हुए उन्होंने कहा।”
“एक हजार युवक और अधेड़, स्त्री, बच्चों, वृद्धों को मिलाकर यह संख्या तकरीबन ढाई हजार के आस-पास हो जायेगी। वे बोले-कर्मठता की कसौटी पर इसमें से यदि एक हजार भी खरे उतरें, तो दो हजार भुजदण्ड क्या कुछ नहीं कर सकते? जिनमें से इस आपत्तिकाल में कुछ करने का उत्साह है, कल हमारे साथ आयें।
और अगले दिन उन्होंने प्रातः “हरि बोल” का नारा लगाया और अपने एक हाथ में फावड़ा और दूसरे हाथ में टोकरी लेकर चल दिये बाँध बनाने के लिए। वर्षा थम चुकी थी। जल किनारों की मर्यादा स्वीकारता जा रहा था। गाँव के सैकड़ों स्त्री-पुरुष उनके पीछे चल पड़े। हरिबोल का सामूहिक स्वर उच्चरित होने लगा, मिट्टी खुदने लगी। बाँध तैयार। इस अद्भुत दृश्य को देखने आने वालों की तादाद कम न थी। जो अभी आता कार्य में संलग्न समुदाय के साहस व कर्मनिष्ठा की सराहना किये बगैर न रहता। आस-पास के गाँव वाले अपनी भागीदारी बाँटने आने लगे। दिन−प्रतिदिन श्रमदानियों की संख्या बढ़ती जा रही थी।
उन दिनों की अंग्रेज सरकार का भी ध्यान टूटा। संत के प्रेरक व्यक्तित्व के सामने उसे घुटने टेकने पड़े। अनेकों ओवरसीयर तथा इंजीनियर भी आ जुटे। अगली बरसात के पूर्व ही बाँध बनकर तैयार हो गया। मनुष्य ही क्यों उस क्षेत्र के पशुओं को भी राहत मिली इस बाँध पर किये गए कार्य ने शत सहस्र लक्षाधिक नेत्रों से अपनी ओर आकर्षित किया। सर्वत्र आत्मनिर्भरता की सराहना की गयी। हर किसी के मुँह से निकला कि यदि ऐसे संत नेतृत्व को संभाल लें तो लोकजीवन का उद्धार हुए बिना न रह सके।
लोकजीवन के उद्धारक यह संत थे-हरिबाबा जिनके नाम पर बना ‘हरिबाबा का बाँध’ आज भी उनके कर्तृत्व का मुखर स्मारक है। बाँध बन जाने के बाद बाबा ने वहाँ एक कुटिया बना ली। अभी उनका काम समाप्त कहाँ हुआ था। इस क्षेत्र में परिव्याप्त नैतिक पतन उन्हें इस गंगा की बाढ़ से भी भयंकर प्रतीत हुआ। जो प्रतिवर्ष धन-जन को नष्ट करता था। गाँजा, शराब जैसे अनेकों दुर्व्यसनों में बँधे-फँसे लोग अपनी जीवन संपदा को यों ही फुलझड़ी की तरह जलाकर खुश हो रहे हैं। यह देख उनका निर्मल मन कुछ करने के लिए आतुर हो उठा। वह अकेले थे, पर इससे क्या? निविड़ अंधकार से निपटने के लिए जब माचिस की एक तीली अपने को जलाने का साहस सँजोकर प्रकाश प्रकट करती है तो एक ही क्यों अनेकों दीपक उससे अपने को ज्योतिर्मय कर लेते हैं, प्रकाश बाँटने लगते हैं। कीर्तन-सत्संग का क्रम चल पड़ा। इसमें आने वाले हर एक को वे सदाचार की सीख देते। अनेकों ने व्यसनों का त्याग किया, जिंदगी जीने की सच्ची राह पकड़ी। जिंदगी जीने की राह को स्वयं के लिए खोजने, औरों को सुझाने वाले इस संत का जन्म होशियारपुर जनपद के मेंगरवाला ग्राम में विक्रमी संवत 1941 को हुआ था। पिता प्रताप सिंह ने उनका नाम रखा दीवान सिंह। पिता की लालसा थी कि बालक पढ़-लिखकर बड़ा अधिकारी बने। घर के प्रत्येक कोने में धन के ढेर लगा दे, पर गुरुवर सच्चिदानंद के सत्संग के प्रभाव से उस जीवन की दिशा खोज चुके थे। उस पर चलना बाकी था। माता-पिता ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने स्पष्टतया नकारते हुए कहा-”जीवन में करने के लिए इतना कुछ महत्वपूर्ण है, जिसके सूझ पड़ने पर विवाह उसी तरह महत्वहीन और नगण्य हो जाता है, जैसे सूर्य के प्रकाश के सामने चंद्रमा।” अंतर में वैराग्य का दीपक जलाये वह बढ़ चले ‘आत्मनोमोक्षार्थ जगद्हिताय च’ की परम साधना की ओर।
यों श्रेयपथ पर कदम बढ़ाने वालों का उपहास और विरोध आरंभ होता है, पर जब स्पष्ट हो जाता है कि उच्चस्तरीय लक्ष्य की दिशा में कोई चल ही पड़ा है, तो उसके साथी-सहयोगी भी क्रमशः मिलते और बढ़ते चले जाते है। हरिबाबा के साथ यही हुआ। वह 76 वर्ष की आयु तक मानव में संव्याप्त हरि की सेवा करते हुए हरिधाम पधारे। लोकहित के सागर में स्वहित की बूँदों के विसर्जन का महत्व और गौरव उस समय और अधिक बढ़ जाता है जब इक्कीसवीं सदी अगणित श्रेय सौभाग्य की वर्षा करने के लिए घनघोर-घटाटोप की तरह उमड़ती-घुमड़ती चली आ रही है।
जब मैं इस संसार से प्रस्थान करने लगूँ, तो मेरे अंतिम शब्द हों-
“जो कुछ मैं देख चुका हूँ, वह अद्वितीय, अकल्पनीय, वर्णनातीत, है। मैंने आलोक सागर में विकसित सहस्रार कमल के अदृश्य मधु का रसास्वादन किया है, इसीलिए मैं धन्य हूँ। मैं अनंत आकारों के इस क्रीड़ा-भवन में जीभर कर खेल चुका हूँ और इसमें मैंने निराकार की झाँकी देखी है। मेरा समस्त शरीर, मेरा अंग-अंग उस स्पर्शातीत के स्पर्श से पुलकित है। सो यदि मेरा अंत आता है तो आने दो-ये मेरा अंतिम शब्द हों। -रवीन्द्र नाथ ठाकुर
स्वास्थ्य-रक्षा के लिए जितना संतुलित आहार, जल, वायु, सूर्यताप, निद्रा, विश्राम आदि की आवश्यकता होती है, व्यायाम की उससे कम नहीं। यह सर्वमान्य एवं निरापद तथ्य है कि यदि मनुष्य परिश्रम न करे तो उसके संपूर्ण शारीरिक अवयव अपनी शक्ति खोने लगते हैं। लोहे को किसी जगह यों ही पड़ा रहने दें, तो उसमें जंग लग जाती है, उसकी सारी शक्ति व मजबूती समाप्त हो जाती है। ऐसे ही अपने अंग-प्रत्यंगों को हिलाते-डुलाते क्रियाशील न बनाये रहें तो इस शरीर में जंग लग जाने जैसी बुराई उत्पन्न होने का खतरा रहता है। इसमें स्वास्थ्य का गिर जाना, रोगी हो जाना भी स्वाभाविक है।
शरीर को व्यायाम की, कसरत की आवश्यकता है यह ठीक है, किंतु ऐसे व्यायाम जो शारीरिक दृष्टि से कड़े पड़ते हों, या जिनमें रुचि का अभाव हो, लोगों को अधिक दिन तक अच्छे नहीं लगते। इनके लिए महँगे आहार की भी व्यवस्था करनी पड़ती है, जो हर किसी के लिए सुलभ भी नहीं। इन्हें कोई उत्साह में आकर शुरू भले ही कर दे, किंतु अधिक दिनों तक इन नियमों का पालन नहीं कर सकता, क्योंकि यह आर्थिक रुचि व समय की दृष्टि से महँगे पड़ते है।
अंग प्रत्यंगों को स्वाभाविक रूप में सशक्त रखने वाली कसरत टहलना है। यह सरलतम व्यायाम भी है, यह सर्वसाधारण के लिए सुलभ व उपयोगी है। शारीरिक दृष्टि से दुर्बल व्यक्ति, स्त्री-बच्चे, बुड्ढ़े सभी अपनी-अपनी अवस्था के अनुकूल इससे लाभ उठा सकते हैं, इसमें किसी को भी हानि की संभावना नहीं है। घूमना जितना स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकता है, उतना ही रुचिकर भी होता है। इससे मानसिक प्रसन्नता व शारीरिक-स्वास्थ्य की दोहरी प्रक्रिया पूरी होती है। इसीलिए संसार के सभी स्वास्थ्य विशेषज्ञों तथा महापुरुषों ने इसे सर्वोत्तम व्यायाम माना है और सभी ने इसका दैनिक जीवन में प्रयोग किया है। उन लोगों के लिए जिन्हें प्रतिदिन दफ्तरों में बैठकर काम करना होता है, घूमना अत्यंत आवश्यक है। दिन भर दुकानों में बैठने वालों बुद्धिजीवी व्यक्तियों के लिए भी यह उतना ही उपयोगी है। इससे कुदरती तौर पर सम्पूर्ण शरीर का व्यायाम होता है।
कुश्ती लड़ना, दण्ड-बैठक लगाना, डंबल, मुगदर भाँजना आदि व्यायाम है तो उपयोगी, किंतु इनसे शरीर के कुछ खास-खास स्थानों की माँसपेशियों का ही व्यायाम होता है। इससे वे स्थान तो सुडौल बन जाते हैं, किंतु दूसरे ऐसे स्थान जहाँ इन व्यायामों से हलचल उत्पन्न नहीं होती, शिथिल बने रहते हैं और एक बार जैसे ही इन्हें छोड़ा कि जिस तेजी से शरीर का विकास हुआ था उसी गति से शरीर का पतन हो जाता है। फिर ऐसे व्यायामों से मौसम की प्रतिकूलता का भी हानिकारक प्रभाव पड़ता है, किंतु टहलने से संपूर्ण शरीर की स्वाभाविक तौर पर कसरत होने से रक्त का संचार धीरे-धीरे बढ़ता है, जिससे हल्की-हल्की मालिश जैसी प्रक्रिया संपूर्ण अंग-प्रत्यंगों में उत्पन्न होती है और संपूर्ण अवयव पर्याप्त ऊष्मा प्राप्त कर लेते हैं। अप्राकृतिक व्यायामों से एक ओर जो शारीरिक अपव्यय होता था, उससे भी शरीर बचा रहता है। यही कारण है कि दूसरों व्यायामों के बाद संपूर्ण शरीर महसूस करने लगते हैं, किंतु आप कुछ दूर टहलकर आइये, आपको बिल्कुल भी थकावट मालूम नहीं पड़ेगी।
टहलने से सारे शरीर की सजीवता बनी रहती है। फेफड़े व हृदय की शक्ति बढ़ती है। भोजन पचता है और शरीर की सफाई में लगे हुए अवयव तेजी से अपना काम पूरा करते हैं। इसका सीधा दबाव हड्डियों व माँसपेशियों पर पड़ता है, जिससे ये मजबूत बनती हैं और शरीर में विद्युत शक्ति का संचार होने लगता है, जिससे त्वचा में स्निग्धता आती है, आभा झलकने लगती है, जो गालों पर लाली और चेहरे की चमक बढ़ाती है। यह सब खून की शुद्धता के कारण होता है।
दिनभर के थके हुए शरीर को गति प्रदान करने के लिए यह आवश्यक है कि प्रतिदिन नियमित रूप से कुछ दूर घूम आया करें। नियमित वायुसेवन और टहलने से दीर्घजीवन का लाभ मिलता है। इससे मानसिक स्फूर्ति बढ़ती है। जो अंग कार्य की अधिकता से मुरझा गये थे या शिथिल पड़ गये थे, वे दुबारा प्रफुल्लित व उत्साहित होकर कार्य करने लगते हैं। इन परिस्थितियों में स्वास्थ्य का बना रहना, बीमारियों से बचा रहना प्रायः निश्चित ही मानना चाहिए। जिनके शरीर दुर्बल होते हैं, नियमित रूप से टहलने से उन्हें स्वास्थ्य लाभ मिलता है। जिनका शरीर अधिक मोटा हो जाता है वे सुडौल बनते हैं। इस दृष्टि से तो टहलने को ही सर्वांगपूर्ण व्यायाम मानना पड़ता है। श्वास-प्रश्वास की दोनों प्रकार की क्रियाएं उद्दीप्त होती हैं, जिससे व्यायाम और प्राणायाम के दोनों ही उद्देश्य पूरे हो जाते हैं। व्यायाम का अर्थ है-प्रत्येक अंग को क्रियाशील रखना और प्राणायाम का तात्पर्य है-प्राकृतिक विद्युत शक्ति या प्राण शक्ति को धारण करना। इस प्रकार शरीर और प्राण दोनों की पुष्टि होने से यह सभी दृष्टियों से उपयुक्त है। श्वास-प्रश्वास में तेजी आने से शरीर की अनावश्यक बसा जल-भुनकर समाप्त हो जाती है, जिससे कब्ज, अग्निमंदता में शीघ्रता से लाभ होता है। तेजी से गहरी साँस लेते हुए टहलना कब्ज की अचूक औषधि है। दुःस्वप्नों की निवृत्ति, भरपूर नींद आना इसी कारण से होता है। वीर्य संबंधी रोगों में प्रातःकाल का घूमना अतीव लाभदायक होता है। सर्दी के दिनों में जब ओस गिरती है तो नंगे पाँव हरी दूब पर टहलने से आँखों की ज्योति बढ़ती है, मस्तिष्क ताजा रहता है और सारे शरीर को कुदरती विद्युत बड़ी सुगमता से मिल जाती है। इससे शारीरिक सौंदर्य बढ़ता है, होठों, गालों पर लाली आती है और आलस्य दूर हो जाता है।
अपने लिए सुविधा का समय निकालकर प्रतिदिन टहलना सभी के लिए लाभदायक होता है, किंतु आरोग्य लाभ के विशेष इच्छुक व्यक्तियों को प्रातःकाल का घूमना अच्छा होता है। दिनभर का अस्त-व्यस्त वातावरण, धूल आदि के कण आधी रात तक जमीन में बैठ जाते हैं, जिससे प्रातःकालीन स्वच्छ वायु की अमूल्य लाभ मिलता है। इससे मानसिक प्रसन्नता भी बढ़ती है, जिससे स्वास्थ्य विकास तेजी से होता है। एक साथ स्वच्छ वायु, परिपुष्ट व्यायाम और मानसिक प्रफुल्लता का प्रभाव पड़ने से शरीर का रोगमुक्त स्वाभाविक है। नियमित टहलने वाले न केवल दीर्घायु होते हैं, श्रेष्ठ चिंतक भी बनते हैं।
आप! दायें हाथ से गालों पर लुढ़क आये आँसुओं को पोंछने का प्रयास करते हुए उन तीनों महिलाओं के मुख से लगभग एक साथ यह शब्द निकला। आश्चर्य के आवेश में सिसकियाँ थमने लगी थीं। पास खड़े बच्चे भी उसे सूनी निगाहों से निहार रहे थे। पड़ोसियों की भी लगभग ऐसी ही कुछ दशा थी। उनके आने की खबर सुनकर प्रातःकाल से ही मजदूरों की इस बस्ती में उथल-पुथल थी। ऐसा नहीं आज से पहले वह यहाँ आये नहीं हों। वे तो इन सभी के अपने थे। सबसे उनका सघन अपनत्व था। इसके बावजूद उनको इस रूप में कोई नहीं जानता था। नहीं तो भला इतना आश्चर्य क्यों?
उनके यहाँ पर इस रूप में आने का कारण था-कोलम्बिया स्टेट की एक एस्बेस्ट्स फैक्ट्री में दुर्घटना हो जाना। कुछ ही दिन पहले हुई इस घटना में तीन श्रमिकों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा। श्रमिक दिन भर लोहे की दैत्य जैसी मशीनों के साथ जी-झोंककर काम करता हैं, तब कहीं परिवार की गाड़ी खींचता हैं। उसकी परिवार रूपी मोटर में उसके श्रम का ईंधन जलता है, तो वह चलती है। उन अकाल कवलित श्रमिकों की पत्नियाँ उनके काम से लौटने की प्रतीक्षा कर रही थीं। बच्चे अपने आप को आश्वस्त कर रहे थे कि पापा आने वाले हैं, फिर सब मिलकर साथ खाना खायेंगे। किंतु उन्हें उनके पिता के स्थान पर उनकी मृत्यु की हृदयवेध देने वाली सूचना मिली। क्रूरकाल के एक झोंके ने उनकी दुनिया में अँधेरे की एक चादर तानकर रख दी। कितने समर्थ हाथ उनके आँसू पोंछने के लिए बढ़ें? कौन इन सबके प्राणों की आकुलता का शमन करे। इसी बीच सबने सुना कि स्वयं अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के महानिदेशक उनके दुःख सुनने आने वाले हैं। संवाद ने घाव पर मरहम लगाया। प्राणों का उफान एकबारगी थमा। एक आशा बँधी कि सहायता मिलेगी। सोच रखा था कि जो अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का महानिदेशक है, कितना रौब-दाब होगा उसका कितनी शान-शौकत से रहता होगा? रहे भी क्यों न?
सामने आने पर आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। अरे यही! यह तो उन्हीं के पतियों के साथ फैक्ट्री में मजदूरी करते हैं। सामान्य मजदूर जिसे न तो प्रमोशन की परवाह है और न डिमोशन का भय। घर में कई बार आना-जाना भी हुआ था। हँसमुख स्वभाव। छह फीट का हट्टा-कट्टा गोरा शरीर। श्रम के प्रकाश से प्रदीप्त आँखें। सामान्य मजदूर और अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का महानिदेशक। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहें? उस दृश्य को देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे समय थम गया। एक अपूर्व ठहराव....
“बहिनो! मुझे आने में कुछ देर हो गयी, क्षमा करना।” संबोधन उन तीनों महिलाओं की ओर था। वाणी ने समय को गति दी, ठहराव भंग हुआ। “भाई साहब आप तो अपने हैं, मैंने तो कुछ और सुना था।” कहने वाली के नेत्रों से अभी आश्चर्य की चमक धुली नहीं थी।
“इण्टरनेशनल लेबर आर्गेनाइजेशन के डायरेक्टर जनरल यही न।” पास खड़े एक साथी ने मुसकराते हुए कहा-”ये यह भी हैं और यहाँ के विश्वविद्यालय के वाद-विवाद दल के शीर्षस्थ वक्ता तथा एक वकील भी। याद है न न्यूजर्सी की ड्राईक्लीनिंग इण्डस्ट्रीज का मुकदमा।”
इस के साथ ही जानकार लोगों को याद आ गयी वह घटना जब मजदूरों के हितों को ध्यान में रखते हुए अमेरिकी सरकार को श्रमिक कानून बनवाने पड़े थे। उन्होंने न्यूजर्सी की ड्राईक्लीनिंग इण्डस्ट्रीज व न्यूयार्क के दुग्ध उद्योग के श्रमिकों के हित के लिए बिना फीस पैरवी की थी। अनेकों विभूतियों का स्वामी उच्चतम प्रतिभा से सम्पन्न रहने पर भी यह युवक साधारण मजदूर क्यों? इस प्रश्न ने सभी के मन को स्तब्ध कर दिया। इन महिलाओं को अपना दुःख भूल गया। अनेकों आँखें उस सामने खड़े मुसकरा रहे व्यक्ति में कुछ ढूंढ़ने की कोशिश करने लगीं।
“इतना सब होते हुए भी आप मजदूर क्यों हैं?” मन के मंथन से उभरी जिज्ञासा को प्रकट होने से रोका न जा सका। “मजदूरी मेरा बोझ नहीं शान है।” होंठों पर तैरती मुसकान की रेखा ने अनेकों के अंतर को छुआ। तनिक थमकर बोले-”जीवन के मंदिर में मैंने श्रमदेवता की प्रतिष्ठा की है।”
“श्रमदेवता की प्रतिष्ठा, श्रम और देवता।” समझ पाने का असफल प्रयत्न करते हुए अनेकों मुखों से बुदबुदाहट उभरी। “हाँ श्रम देवता है।” कथन में दृढ़ता थी। बात आगे बढ़ाते हुए वे बोले-”मानव ने अनादिकाल से इसकी आराधना की है। आज जो कुछ भी प्रगति, उन्नति, अच्छाई, विकास दिख रहा है सब कुछ इसी की आराधना का सुफल है।” सभी मौन थे। कोई कुछ कहता भी क्या? प्रत्यक्ष को भी क्या कभी प्रमाण की आवश्यकता पड़ती है? श्रमदेवता का अनुग्रह भाजन सामने जो खड़ा था। कुछ मिनट यों ही बीत गये। फिर वह संवेदनशील स्वर में बोला-”क्षमा कीजिए, मैं भी कहाँ अटक गया। आया था आपकी व्यथा को बँटाने और शुरू हो गयीं यह सब बातें। आप जो भी सहायता चाहें शीघ्र भिजवा दूँगा।”
“सहायता हो गयी भैया।” उनमें से एक महिला ने स्वस्थचित्त हो कहा। “कहाँ अभी तो।.....”
“आपने जो अभी श्रमदेवता की प्रतिष्ठा करने की बात सुझाई, वह किस सहायता से कम हैं? जब ईश्वर का दिया स्वस्थ शरीर और सबल मन हमारे पास है, तब कैसी सहायता? मन में एक संशय था सो भी दूर हुआ। अभी तक सोचती थी कि श्रमशील निकृष्ट होते हैं और श्रम न करने वाले उत्कृष्ट।”
“पर अब?” सभी का जिज्ञासा रूप में एक प्रश्न उभरा। “ सोच पलट गयी।”
“अच्छा।” तनिक आश्चर्य व्यक्त करते हुए उसने कहा-”सच कहें तो हम भविष्य में जीवन जीते हैं। आप सब विश्वास मानिये, शीघ्र ही मानव के भविष्य में ऐसा समय आयेगा, जब जीवन के मंदिर में प्रतिष्ठा योग्य एक ही देवता होगा-श्रम।” बात पूरी करने के साथ ही उसने घड़ी देखी, पास खड़े बच्चों के गाल थपथपाये। उन महिलाओं के हाथ जोड़कर नमस्कार किया और फिर आने का वायदा करके चल पड़े। श्रमदेवता के यह एकनिष्ठ आराधक, जो 79 देशों के सम्मिलित अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के महानिदेशक होकर भी कोलम्बिया की एक फैक्ट्री में मजदूरी करते रहे-डेविड मोर्स थे।
‘सम्पत्ति बढ़े और गरीबी का पूरी तरह अंत हो’ यह आवश्यक है, किंतु यदि यह एकदम न हो सके जो है उसका लाभ हर किसी को मिलना चाहिए। मिल-बाँटकर खा लिया तो इतने से भी भलीप्रकार निर्वाह चल सकता है। अशिक्षित एक भी व्यक्ति न रहे और शिक्षा का प्रसार हो, यह आवश्यक है, लेकिन तुरत-फुरत ही सबको शिक्षित नहीं किया जा सकता। यह तो संभव ही है कि जो शिक्षित हैं वे अपने शिक्षित होने का लाभ सबको दें, तब शिक्षा के अभाव से अनुभव होने वाली रिक्तता भी अखरन जैसी नहीं रहेगी। जहाँ भी ज्ञान संचित है, उसके वितरण और उपयोग की सुविधा हर किसी को प्राप्त होने लगे तो प्राचीनकाल की तरह थोड़ी-सी सुविधाएँ होते हुए भी उनका लाभ जन-साधारण को मिलता रह सकता है।
थोड़े से लोग खेती करते हैं पर उससे पैदा होने वाले अन्न से पेट सभी का भरता है। यही प्रयोग बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भी चल सकता है। प्राचीनकाल के ब्राह्मण ऐसा ही करते थे। अब भी अन्य क्षेत्रों में ऐसे ही होता है, जैसे थोड़े से चिकित्सक प्रायः सारे समाज की स्वास्थ्य सेवा करते हैं। थोड़े से सैनिक पूरे राष्ट्र की सीमा की सुरक्षा करते हैं। थोड़ी-सी पुलिस अपराधियों से निपटती हैं और थोड़े से कलाकार व्यापक क्षेत्र में विनोद और उल्लास का वातावरण बनाये रहते हैं। थोड़े से साहित्यकार को दिशा दे सकते है, थोड़े से राजनेता समूचे देश को प्रगति की ओर अग्रसर कर सकते हैं, तो यह अनिवार्य नहीं है कि पूरे समाज को समुन्नत करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति सर्वगुण सम्पन्न हो। मूर्धन्य वर्ग के थोड़े लोग भी समूचे समाज को समुन्नत और प्रगति की दिशा में अग्रसर कर सकते है।
मूर्धन्य वर्ग द्वारा समाज को समुन्नत करने की संभावना के समान ही प्रज्ञावतार का आलोक भी जाग्रत आत्माओं में ही प्रथम अवतरित होगा। यद्यपि उस आलोक से समस्त भूमण्डल आलोकित होगा, किंतु उसका आरंभ जाग्रत आत्माओं के अन्तःकरणों में प्रज्ञाशक्ति के अवतरण से ही होगा। उनकी विचारणा संकीर्ण-स्वार्थपरता से आबद्ध रहने से इनकार करेगी। चिंतन की, लोभ-मोह की कृपणता में बँधे रहना ही भवबंधन हैं। जाग्रत आत्माओं में जब ऋतम्भरा-प्रज्ञा का अवतरण होगा तो वह इस भवबंधन से मुक्त होने के लिए छटपटायेगा।
हृदय की विशालता ही जीवनमुक्ति है और कला के जागरण पर ही उसके स्वार्थ का विस्तार होता है। फिर उसका आत्मगौरव अहंता के पोषण में नहीं, आदर्शवादिता अपनाने से ही तृप्त होता है। पीड़ा और पतन के उन्मूलन तथा सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन में ही अपनी शक्तियाँ नियोजित होती हैं। निर्वाह करने में संतोष की नीति को जिन्होंने हृदयंगम कर लिया है, उनके पास महान कार्यों को सम्पन्न करने के लिए ढेरों समय, श्रम और चिंतन बच जाता है। इस बचत पूँजी से वे समाज का, ईश्वर का अनुग्रह प्रचुर परिणाम में प्राप्त कर सकते हैं। आत्मगौरव और आत्मसंतोष को भी यदि महत्व मिलता हो तो श्रद्धाशक्ति व्यक्ति को हर घड़ी उसकी अनुभूति होती रहती है। श्रद्धा का अमृत उमगने लगे और अनास्था का विष घटने लगे तो फिर व्यक्तित्व की गरिमा गगनचुम्बी होती चलती है। ऐसे व्यक्तियों द्वारा जो भी काम होते हैं, वे अपनी विशिष्टता और सुँदरता का परिचय देते रह सकते हैं, निजी जीवन में वे स्वस्थ, प्रसन्न, संतुलित, आशान्वित एवं निश्चिंत पाये जाते हैं और पारिवारिक जीवन में सुव्यवस्था तथा सहयोग-सद्भाव का वातावरण बना रहता है।
सात दीपक जलाकर पितरों की विदाई रात 8.30 पर गेंदे की माला व दुर्गा चालीसा माता की
यों पारिवारिक जीवन में सुविधा-सम्पन्नता की भी आवश्यकता पड़ती है, पर उस कमी को शालीनता बनी रहने पर सहन भी किया जा सकता है, अथवा सम्पन्न परिवारों में विग्रह और दुर्भाग्यपूर्ण वातावरण बना रहता है, अन्यथा सम्पन्न परिवारों में विग्रह और दुर्भाग्यपूर्ण सम्पन्न परिवारों में विग्रह और दुर्भाग्यपूर्ण वातावरण बना रहता है, जबकि विपन्नताजन्य कठिनाइयों के रहते हुए भी स्नेह सौहार्द के सहारे सरलतापूर्वक हँसता-हँसाता जीवन जिया जा सकता है। इस मर्म से अपरिचित रहने के कारण अन्य लोग विपुल खर्च करने तथा कठिन श्रम करने पर भी पारिवारिक सद्भावना के लिए तरसते रहते हैं, जबकि श्रद्धा हो तो पत्थर से भी प्रेम किया जा सकता है, परिवार में परस्पर स्वार्थों से बँधे हुए लोगों से प्रेम न होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं है।
मानवी अन्तःकरण में अपने सजातियों को खींच बुलाने की क्षमता सदा से विद्यमान है। समान आकृति के तो नहीं, पर अपने जैसी प्रकृति के असंख्यों लोग मनुष्य के सहज संपर्क में आते रहते हैं और घनिष्ठ बनते जाते हैं। सामाजिक अव्यवस्था के कारण कष्ट तो सभी को होता है, पर साधारणतया निकृष्टता से बचने की सावधानी न बरतने वाले लोग ही प्रायः जमाना खराब होने की शिकायत करते हैं, अन्यथा सज्जनों को अपने स्तर का साथी ढूँढ़ने में कठिनाई नहीं होती। ऐसा संपर्क निकटवर्ती न होकर दूरस्थ होते हुए भी सहायता करता रहता है। यहाँ तक कि महामानवों के साहित्य और चरित्र से भी उतना ही लाभ उठाया जा सकता है जितना की निकटवर्ती बहुत घनिष्ठ सामान्य व्यक्ति भी नहीं दे पाते।
सत्संग-कुसंग का महत्व सभी जानते हैं और मानते हैं पर यह ध्यान नहीं रखते कि सौभाग्य या दुर्भाग्य अनायास ही नहीं टपक पड़ते। उन्हें आग्रह-अनुरोध करके ही पाया जाता है। मनःस्थिति ही परिस्थितियों के लिए उत्तरदायी होती है, इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं, इसीलिए श्रद्धालु व्यक्ति के सगे संबंधी सज्जन ही होते हैं। अन्य प्रकार के लोग या तो निकटस्थ होते ही नहीं, यदि किसी प्रकार हो भी जाय तो ज्यादा देर तक साथ नहीं रहते। श्रद्धा ही स्वर्गीय वातावरण का सृजन करती है और उसके पहले सज्जनों का समुदाय अपने इर्द-गिर्द कर लेती है।
किसी व्यक्ति के प्रति कोई क्यों आकर्षित होता है, इसके तो अनेकों आधार हो सकते हैं, पर किसी के प्रति सघन सम्मान का एक ही कारण है और वह है, चरित्र में प्रामाणिकता बनकर उछलने वाली आदर्शवादी श्रद्धा, इसी से प्रभावित होकर लोग उसका पूरा और पक्का विश्वास करते तथा सहयोग प्रदान करते हैं। महामानवों को मिलने वाली चमत्कारी सफलताओं का मुख्य कारण भी यही है, जिससे की उन्हें जनसहयोग उपलब्ध हुआ। आरंभ में श्रेष्ठ व्यक्तियों को अपनी कठिनाइयों और अवरोधों का सामना करके अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करनी पड़ती है। इसी कसौटी पर आदर्शवादी श्रद्धा को परखा जा सकता है।
जब कोई व्यक्ति लोभ और भय के दबावों को अस्वीकार करके अपनी उत्कृष्टता पर अडिग रहता है, तो जनसाधारण को उसकी वास्तविकता स्वीकार करनी पड़ती है। यही वह परिपक्व आस्था है, जिसमें जन सम्पत्ति और जन सहयोग का उदार अनुदान अजस्र रूप से प्राप्त होने लगता है। जनता का नेतृत्व करने वाले इतिहास के पृष्ठों पर अपने पदचिह्न छोड़ जाने वाले व्यक्तियों की अन्य क्षमताएँ तो सामान्य मनुष्यों जैसी होती हैं, आदर्शों के प्रति अडिग श्रद्धा। भावना स्तर पर सुदृढ़ व्यक्तियों के लिए ही अनुकरणीय चरित्र बनाये रहना संभव होता है, अन्यथा उथले उत्साह वालों का तो कुछ समय में उत्कृष्ट आदर्शवादिता का जोश समाप्त हो जाता है।
लौकिक विशेषताएँ आकर्षक होती है। इसीलिए वे चमत्कृत करती हैं। बल, रूप, धन, चातुर्य, कला, कौशल, प्रतिभा, प्रभाव आदि में भी जन-साधारण का आकर्षण होता है, लेकिन अन्तःकरण की गहराई से निकलने वाला वह सम्मान उन्हें प्राप्त नहीं होता, जो महामानवों को या देवपुरुषों को उपलब्ध होता है। नर्तकों, विदूषकों, गायकों, धनवानों और विद्वानों की ओर भी ध्यान जाता है तथा उनकी विशेषताएं देखकर मनोरंजन भी होता है। अतः आकर्षण की परिधि इतनी ही उथली रह जाती है। मनुष्य की आँतरिक इच्छा जन सम्मान पाने की रहती है। यह उचित भी है और आवश्यक भी, किंतु इसका मूल्य आदर्शवादी श्रद्धा से भरा पूरा आचरण ही हो सकता है। इससे कम में उसे नहीं खरीदा जा सकता। उथली वाहवाही तो विदूषक भी प्राप्त कर लेते है। छद्म लोग भी कई बार वाहवाही पाने में सफल हो जाते हैं। इतने से किसी को न तो संतोष होता है और न ही कोई महत्वपूर्ण सहयोग मिलता है। सरकस में काम करने वाले कलाकारों के करतब देखकर हैरत होती है, लोग प्रशंसा करते हैं, किंतु किसी नट के संकट में फँस जाने पर उसकी कोई सहायता करने नहीं आता। स्मारक अभिनेताओं के ही बनते हैं, जिन्होंने उत्कृष्ट उद्देश्यों के लिए बलिदान किये हैं, ऐसे व्यक्ति ही धन्य बनते हैं और लोकमानस को दिशा प्रदान करते हैं।
में भी देर नहीं लगती। कई बार तो ऐसी या जानी दुश्मनी तक में बदलती देखी गयी है। जमाने का दौर ही कुछ ऐसा है कि दोस्ती की ओट में दुश्मनी निभाई जाती है। समाधान का कारण यहाँ उथले तरीकों से नहीं, प्रामाणिकता सिद्ध करके ही जन सहयोग प्राप्त किया जा सकता है।
अतीन्द्रिय क्षमताएँ और सिद्धियाँ भी उथले कर्मकाण्ड करके प्राप्त नहीं की जा सकतीं। साधना के पीछे श्रद्धा की शक्ति ही काम करती है। उसका अभाव रहने पर कर्मकाण्ड मात्र टंट-घंट और लकीर पीटने भर जैसे क्रिया−कलाप रह जाते हैं, उससे कुछ नहीं बनता। अध्यात्म क्षेत्र के सिद्धपुरुषों में से प्रत्येक की अन्तःभूमिका श्रद्धासिक्त होती है। ईश्वर-दर्शन, आत्मसाक्षात्कार, स्वर्ग मुक्ति जैसी दिव्य सफलताएँ भी किसी कृत्य विशेष से नहीं, अपितु श्रद्धा की शक्ति से ही प्राप्त की जा सकती हैं। इस उत्कृष्टता के रहते सामान्य क्रियाकृत्य भी योगसाधना एवं तपश्चर्या का प्रतिफल प्रस्तुत करते हैं, किंतु यदि भीतर नीरसता छाई हो, भाव संवेदनाएँ प्रसुप्त पड़ी हों तो कितना ही कायकष्ट सहा जाय कितना ही जप, तप क्यों न किया जाय उससे कुछ नहीं बनने का।
भौतिक सफलताओं का क्षेत्र हो या आत्मिक विभूतियों का, सफलता प्राप्त करने के लिए हर हालत में श्रद्धा की सघनता अपेक्षित है। उसके बिना लौकिक पुरुषार्थ भी उस स्तर के नहीं हो सकते, जो सफलता के लिए आवश्यक हैं। धुन के धनी, लगनशील, तन्मयता और तत्परता बरतने वाले थोड़े ही साधनों तथा नगण्य स्वार्थों के रहते भी अनवरत प्रयत्नरत रहकर उन्नति के शिखर पर जा पहुँचते हैं, जबकि अस्थिर मार्ग के आस्थारहित मनःस्थिति के व्यक्ति प्रचुर साधनों के रहते भी अपनी बढ़ी-चढ़ी क्षमता का कुछ लाभ नहीं उठा पाते और अस्त–व्यस्तता के कारण हर समय असफल होते रहते हैं। यदि कुछ प्राप्त कर सके तो वह भी नगण्य ही होता है। दिशा, स्थिरता और तन्मयता ही महत्वपूर्ण उपलब्धियों का आधारभूत कारण होते हैं। इसे प्राप्त कर पाना केवल श्रद्धातत्व के लिए ही संभव है। उसके अभाव में व्यक्ति हवाई कल्पनाएँ करने तथा पत्तों या तिनकों के साथ इधर-उधर भटकने में ही अपना समय गँवाकर और असफलता के लिए अन्य लोगों को दोष देता रहता है।
स्मरण रखा जाना चाहिए कि श्रेष्ठ और सुहृदय व्यक्तित्व बाह्यसाधनों से विनिर्मित नहीं हो सकता। अभ्यास और शिक्षण में उथला शिष्टाचार ही पल्ले पड़ता है। गहराई तो अंतःश्रद्धा से ही उपजती है। पेड़ उतना ही ऊँचा उठता है और उतना ही फैलता-फैलता है, जितनी उसकी जड़े गहरी और मोटी होती है। यद्यपि जड़े नहीं दीखती हैं, तना ही दृष्टिगोचर होता फिर भी तथ्य तो तथ्य ही है। जड़ों के आधार पर ही तना वृक्ष स्थिर रहता है। उथली जड़ों वाले पौधे न स्थिर रह पाते हैं और न ही प्रतिकूल प्रभावों को सहन कर सकते हैं। इसी प्रकार उथली जिंदगी ही जी पाते है। आत्मसंतोष, जनसम्मान और दैवी-अनुग्रह दे सकने जैसी कोई ठोस संपदा उनके पास नहीं होती,फिर मूल्य चुकाये बिना बड़ी उपलब्धियाँ किस प्रकार, किस आधार पर अर्जित की जा सकती हैं। व्यक्ति के अंतराल में सन्निहित उसकी मूलभूत क्षमता एक ही है, श्रद्धा उसी को गँवाने और बढ़ाने पर मनुष्य पतन के गर्त में गिरता तथा आकाश जितना ऊँचा उठता है।
नये युग के सारे संसार का, सारे समाज का सम्पूर्ण ढांचा ही बदल देने की योजना है। निकृष्टता के आवरण उघाड़े और उत्कृष्टता के आच्छादन चढ़ाये जाने हैं। परिस्थितियाँ बदलने के लिए प्रबल पुरुषार्थ की योजना है और उसका निर्माण अंतराल के मर्मस्थल से भावश्रद्धा के रूप में फूटता है। परिवर्तन शब्द कहने और सुनने में सरल होता है, वह रुचिकर भी है और अभीष्ट भी। किंतु कठिनाई एक ही है कि लगभग असंभव नहीं तो अत्यधिक कष्टसाध्य इस कार्य के साधन जुटाना अनिवार्य होता है और पहाड़ जैसा पुरुषार्थ एवं परिश्रम करना पड़ता है।
परिवर्तन का अभीष्ट प्रयोजन पूरा करने के लिए आदर्शवादी श्रद्धा उथले स्तर की नहीं, गहन स्तर की चाहिए। यह न तो समाज में, न साधनों में, न श्रम में और न चातुर्य में सन्निहित है। यह मणि–माणिक व्यक्तित्व के गहन अंतराल में समुद्र की तली में पाई जाने वाली संपदा का न, समर्थता का तथा नहीं साधनों का मूल्याँकन होगा, अपितु श्रद्धा का ही मूल्याँकन किया जायेगा। कौन शुद्ध है और कौन महान, इसका मापदण्ड श्रद्धा ही होगी। इसी सामर्थ्य के बल पर लोग इतने समर्थ होंगे कि पर्वत जैसी अवाँछनीयताओं को उलट सकने और स्वाति वर्षा जैसी सत्प्रवृत्तियों से नन्दनवन जैसा समाज बना सकना संभव हो सकेगा। समर्थ व्यक्ति ही ऐसे चमत्कार उत्पन्न कर सकते हैं, जिन्हें असंभव को संभव कर दिखाने जैसा चमत्कार माना जा सके। ऐसा चमत्कारी मनुष्य एक ही हो सकता है-श्रद्धालु।
विवेक और श्रद्धा का समन्वय ही ऋतंभरा-प्रज्ञा है। वही गायत्री, वहीं ब्रह्मा विद्या अथवा संस्कृति की अन्तरात्मा है। इन दिनों उसी का अरुणोदय प्रज्ञावतार के रूप में हो रहा है। दूसरे शब्दों में, इसे यों कहना चाहिए कि लोकमानस में विवेक युक्त श्रद्धा की प्राण-प्रतिष्ठा होने जा रही है। इसी विभूति से सम्पन्न मनुष्यों को प्राचीनकाल की तरह देवमानव कहा जायेगा। उनका समुदाय और आदर्शवादी क्रिया−कलाप धरती पर स्वर्ग जैसी परिस्थितियों का सृजन करेगा, यही है नवयुग का आधार तत्व, जिसे प्रचुर परिणाम बरसाने के लिए महाकाल का प्रबल पुरुषार्थ अदृश्य रूप से अंतरिक्ष में कटिबद्ध हो रहा है। इस तथ्य को देखने और समझने वाले नवयुग को सन्निकट देख सकते है। (युगशक्ति गायत्री अगस्त 1979 से)
रामानुजाचार्य नदी स्नान करने जाते समय ब्राह्मण के कंधे का सहारा लेते और स्नान करके लौटते समय शूद्र के कंधे पर हाथ रखकर लौटते। यह देख कुछ कट्टरपंथियों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि भगवन् स्नान का क्या महत्व रहा? आचार्य मुस्कुराए। उन्होंने कहा-स्नान करने से तो मात्र मेरी देह पवित्र होती है, किंतु मन का मैल-अहंकार तो ज्यों का त्यों शेष रह जाता है। मैं शूद्र का स्पर्श करके उसी मन की मलीनता को स्वच्छ करता हूँ।
फार्म-4
(1) प्रकाशन स्थान- मथुरा
(2)प्रकाशन अवधि-मासिक
(3)मुद्रक का नाम-मृत्युँजय शर्मा
क्या भारत का नागरिक है- हाँ
पता-जन-जागरण प्रेस, वृंदावन मार्ग, मथुरा
(4)प्रकाशक का नाम-मृत्युँजय शर्मा
पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
(5)संपादक का नाम-डॉ. प्रणव पण्ड्या
क्या भारत का नागरिक है-हाँ
पता-शाँतिकुँज हरिद्वार
(6)उन व्यक्तियों के नाम व पते - मृत्युँजय शर्मा, अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
जो समाचार पत्र के स्वामी हों तथा जो समस्त
पूँजी के एक प्रतिशत से अधिक के साझेदार या हिस्सेदार हों।
मैं मृत्युंजय शर्मा एतद् द्वारा घोषित करता हूँ कि मेरी अधिकतम जानकारी एवं विश्वास के अनुसार ऊपर दिये गये विवरण सत्य हैं। दिनाँक 28-2-98
परमपूज्य गुरुदेव स्पष्ट लिख गये हैं कि युगपरिवर्तन सुनिश्चित है। हम सब उसी प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। मुर्गा जैसे ही बाँग लगाता है, सभी को सवेरा होने का आभास हो जाता है। पौ फटती है। ऊषाकाल का आगमन होता है। चारों ओर लालिमा छा जाती है। अरुणोदय होता है। प्राची का रक्तवर्ण देखते ही बनता है। इक्कीसवीं सदी भारतीय सम्वत्सर परंपरा के अनुसार तो 1942 से ही लग चुकी, किंतु तभी से केवल रही प्रत्यावर्तन-प्रक्रिया अब प्रौढ़ावस्था, चरमावस्था में पहुँच चुकी है। नजरुल इस्लाम जैसे विद्वान इसी सदी के प्रारंभ में लिख गये थे-”अमृत भी आयेगा। अब विलंब नहीं है। हलाहल तो ऊपर आ ही चुका है।” आज जो कुछ भी दृष्टिगोचर हो रहा है, युग परिवर्तन रूपी समुद्रमंथन का हलाहल ही तो है। परिवर्तन की प्रक्रिया धीमी गति से चलती है। जो होने जा रहा है, वह एक क्षण में उलट जाय, ऐसा तो संभव नहीं। सूर्य, पृथ्वी सतत् अपनी धुरी पर अपनी कक्षा में तेजी से अग्रसर रहते हैं, पर अपने कमरे में बैठे उसका आकलन करें तो वह चाल बड़ी धीमी प्रतीत होती है। सूर्य के चलने जैसा तो कुछ अनुमान भी लगता है, पर पृथ्वी घूमती है, इस बात पर तो मात्र विद्वत्जन ही विश्वास कर पाते हैं।
परमपूज्य गुरुदेव की युगपरिवर्तन की भविष्यवाणी को एक अकाट्य एवं विश्वस्त संभावना मानकर चला जाय तो ही समझा जा सकता है कि आज जो भी परिवर्तन दृष्टिगोचर हो रहा है, वह उसी की एक कड़ी मात्र है। परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि हम जो कुछ भी कह या लिख रहे हैं-घोषणा कर रहे हैं, उसके पीछे उच्चस्तरीय अध्यात्म की वे अनुभूतियाँ हैं, जिनमें घटित होने वाले घटनाक्रम का पूर्वाभास संजोया गया है। इसमें विश्वभर की भवितव्यता (जो भी कुछ भविष्य में होने जा रहा है) का निरूपण है। इसमें यह भी बताया गया है कि प्रचण्ड प्रवाह किस दिशा में चल पड़ा है और वह भविष्य में जाकर कब, किस लक्ष्य तक पहुँचकर रुकेगा।
विगत अंक में परिजन युगपरिवर्तन के संबंध में विस्तार से पढ़ चुके हैं। विभिन्न पक्ष सामने रख यह आश्वस्त करने का प्रयास फरवरी अंक में किया गया था कि क्राँतियाँ जब भी आती हैं, इसी प्रकार आती हैं। यह भी वर्णन था कि आमतौर से व्यक्तियों के प्रयास ही परिस्थितियों को प्रभावित करते और उनमें उथल-पुथल पैदा करते हैं। राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, औद्योगिक क्रांतियां कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों अथवा समुदायों के प्रभाव से ही उत्पन्न हुई हैं। चाहे वे मेजिनी द्वारा, कार्लमार्क्स द्वारा, कमाल पाशा द्वारा, अथवा महात्मागाँधी द्वारा संपन्न की गयी हों, चाहे वे चीवरधारी भिक्षुओं द्वारा चंद्रगुप्त चाणक्य द्वारा अथवा स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों द्वारा की गयी हों, किंतु कई बार ऐसा भी होता है कि उमंगे उठी और उन्होंने चमत्कारी कार्य कर दिखाये। समूचे संसार में असाधारण परिवर्तन करके दिखा दिए। उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में जो वैज्ञानिक क्राँति का आधार बना व विज्ञान-अध्यात्म के निकट आकर एकात्मता की स्थिति में आ पहुँचा, यह वर्णन भी विगत अंक में किया जा चुका है। अब इस नये युग की क्राँति एक दार्शनिक, साँस्कृतिक, वैचारिक क्राँति है। इससे विश्व का समूचा वातावरण, समूचा प्रचलन प्रभावित होगा।
आमतौर से भविष्यवाणियों का आधार ग्रह-गणित-ज्योतिष को माना जाता है, पर वास्तविकता यह है कि जो भविष्यकथन की विधा में पारंगत हैं, वे उन संभावनाओं को प्रकट नहीं करते। जो करते हैं, वे जानते नहीं। हाँ नोस्ट्राडेमस, श्री अरविंद, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, परमपूज्य गुरुदेव जैसे महापुरुष अपनी अंतःस्फुरणा के आधार पर समय-समय पर ऐसी संभावनाएं व्यक्त कर मानव के उत्साह को एक उछाल जरूर दे जाते हैं। फिर भी उनके बताए घटनाक्रम समष्टिगत होते हैं। मनीषियों ने किसी कारणवश ही व्यक्तिगत भविष्य बताने का निषेध भी किया है, क्योंकि इससे व्यर्थ चिंता बढ़ती है और मानवी पुरुषार्थ में व्यवधान आता है।
परमपूज्य गुरुदेव की उज्ज्वल भविष्य की उद्घोषणा के दो प्रमुख आधार हैं-पहला तो हैं अदृश्य जगत का वह सूक्ष्म प्रवाह, जो कुछ नई उथल-पुथल करने के लिए अपने उद्गम से चल पड़ा है और अपना उद्देश्य पूरा करके ही रहेगा। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए अनेकानेक प्रतिभाओं को हनुमान-अर्जुन की तरह अपने प्रभाव में लेकर निश्चित सुनियोजित प्रयोजन के निमित्त उन्हें बलपूर्वक लगा देगा। दूसरा आधार पर-उनका निज कमा अवतारी संकल्प। ऐसे संकल्प किसी उच्चसत्ता की प्रेरणा से महाकाल की चुनौती की तरह ही अवतरित होते हैं। परमपूज्य गुरुदेव के चौबीस लक्ष्य के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण, कठोर तप−साधनाएं, चार बार की हिमालय यात्राएं, प्रचण्ड स्तर की सूक्ष्मीकरण साधना ऐसे विलक्षण प्रयोगों के निमित्त ही सम्पन्न हुई। सूक्ष्मजगत की दिव्यचेतना को झकझोर कर खड़ा कर देने, साथ ही साथ अनर्थों को निरस्त करने हेतु उनसे जूझने के उभयपक्षीय प्रयोजनों में उनकी सूक्ष्म व कारणसत्ता सतत् नियोजित हैं।
जो घटित होने जा रहा है, उसे सफल बनाने के लिए दूरदर्शी विज्ञजनों में से कोई भी न चूके, इसी में समय की सबसे बड़ी समझदारी है। श्रेय संभावना की भागीदारी में सम्मिलित होने का सुयोग सौभाग्य जिन्हें अर्जित करना हो उन्हें परमपूज्य गुरुदेव के जीवनवृत्त को एक जीवंत उदाहरण बनाना होगा तथा उनकी ही तरह भौतिक जगत में संयमी सेवाधर्मी बनना होगा। इतना कर सकने का साहस करने वाले ही उनके छोड़े उत्तराधिकार को वहन कर सकेंगे। पीछे से उनका बल कार्य कर ही रहा है, यह विश्वास में रख कर चला जाय, तो आगामी चार-पाँच वर्षों की अवधि में युगपरिवर्तन को स्पष्ट अपने नेत्रों से देखा जा सकेगा। शाँतिकुँज रूपी नवयुग की गंगोत्री का सभी को इस प्रवाह से जुड़ने का विशेष आह्वान है।
आज जब आशंका और आतंक से हर किसी का दिल धड़क रहा है, उबरने का एक ही उपाय नजर आता है-दैवी सत्ता के आश्वासन पर दृढ़विश्वास। शाँतिकुँज गायत्रीतीर्थ की स्थापना का मूलबीज ही यह संकल्पशक्ति रही है जिसे प्रज्ञा अभियान के सूत्र संचालक परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीय माताजी अपने स्थूलशरीर से महाप्रयाण के बाद गायत्री-परिवार, अखण्ड ज्योति परिजनों, युगनिर्माण योजना के सृजन सेनानियों को उत्तराधिकार में सौंप गये हैं। इन दिनों उबरने का एक ही उपाय है-मानवी सुधार के प्रयास यदि असफल हो गये हैं, तो आद्यशक्ति महाप्रज्ञा का अवतरण हो, दुष्चिंतन का स्थान सद्बुद्धि ले एवं चहुँओर परिवर्तन की प्रक्रिया गतिशील हो चले। शाँतिकुँज की विगत सत्ताईस वर्ष की जीवन यात्रा बताती है कि जो प्रयास इसके द्वारा विश्व भर में बन पड़े हैं, उनसे असुरता की लंका निश्चित ही जलेगी-मानव में देवत्व का उदय एवं धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने वाला राम स्वयं फिर से नये रूप में प्रकट होगा। इस प्रकटीकरण के फलस्वरूप युगशिल्पियों की एक सृजनवाहिनी अनायास ही चारों ओर से खिंचती चली जायेगी एवं उनका पुरुषार्थ उन आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा, जिनकी इन दिनों इन्हीं घड़ियों में अविलम्ब आवश्यकता है।
शाँतिकुँज की स्थापना चिरपुरातन ऋषिपरंपरा के पुनर्जीवन के निमित्त हुई है, यह सर्वविदित तथ्य है। हिमालय की छाया-गंगा की गोद में स्थित इस आश्रम को ऐसी तपःपूत ऊर्जा से अनुप्राणित किया गया है, जिससे श्रेष्ठचिंतन करने वाले हर सृजनधर्मी को वह वातावरण मिले जो कभी ऋषिगणों के आश्रमों-आरण्यकों में मिलता था। वातावरण की प्रभावी शक्ति को सभी असंदिग्ध रूप से स्वीकार करते हैं। प्राचीनकाल में बालकों का शिक्षण ऋषियों के गुरुकुल में होता था। और वे नवरत्न बनकर निकलते थे। वयस्कों को तीर्थवास में, अधेड़-वानप्रस्थ स्तर के व्यक्तियों को आरण्यकों में चिरकाल तक निवास करना पड़ता था, ताकि वे परिवार के अनगढ़ वातावरण से पृथक होकर कुछ समय प्रेरणाप्रद स्थिति में रह सकें। आमतौर से व्यक्ति वातावरण में ही ढलते हैं। इसीलिए तो बोर्डिंग स्कूलों, सेनेटोरियमों तथा मिलिट्री छावनियों का महत्व सदा बना हुआ है। यों तो कई तेजस्वी प्रतिकूल वातावरण में भी ढलते देखे गये हैं, किंतु ऐसे जन्मजात प्रतिभावान संचित संस्कारों के धनी होने के कारण अपवाद ही होते हैं। नदी के प्रवाह में बहते अधिक हैं। आज समाज में अपसंस्कृति की अश्लीलता की जो बाढ़ आयी है, उसमें बहते नरपशुओं को देखकर तो यही लगता है कि बिना श्रेष्ठ वातावरण वाली छावनी विकसित किये देवमानवों का निर्माण असंभव है।
ऐसी नर्सरी जहाँ महामानवों की पौधें बनती थीं, खदान, टकसाल व फैक्ट्री जहाँ से नवरत्न निकलते थे-आज कहीं दिखायी देते नहीं।पढ़ाई से अधिक अंतःकरण की ढलाई जिनका लक्ष्य हो, ऐसे तंत्रों का अभाव सबसे अधिक खटकता है। व्यक्तित्वों की ढलाई हेतु एकमात्र सुनिश्चित उपचार है-सुसंस्कृत वातावरण में रहने का अवसर मिले, जिससे कि जो बनना है उसके लिए अतिरिक्त प्रयत्न न करना पड़े। अनुकरण करने एवं अनुशासन पालने भर से चिंतन और चरित्र में परिवर्तन होता चला जाय। समय की इस माँग को शाँतिकुँज द्वारा पूरा किया गया है एवं विगत 27 वर्षों में ऐसे नररत्न श्रेष्ठ वातावरण में ढालने का प्रयास किया गया है। कितनी सफलता मिल सकी, यह तो भविष्य ही बतायेगा, क्योंकि जैसे गंगा में वास करने वाली हर मछली को मोक्ष नहीं मिल जाता तथा तीर्थसेवन करने वाले हर व्यक्ति का दृष्टिकोण नहीं बदल जाता, ऐसे अपवाद सदैव रहे हैं व रहेंगे, किंतु जिन्होंने भी शाँतिकुँज के तपःपूत वातावरण में गुरुसत्ता की प्राणऊर्जा को ग्रहण करने का प्रयास किया है। उन्हें वह अनुदान रूप में मिला है एवं उसे उनके व्यक्तित्वरूपी कल्पवृक्ष के रूप में देखा जा सकता है। यह उसे भी मिला है, जो कुछ दिन का प्रवास यहाँ करके चला गया, उसे भी जिसने कुछ माह का समय देकर यहाँ के वातावरण से कुछ ग्रहण करने का प्रयास किया तथा उसे भी जो स्थायी सेवाएँ यहाँ देते रहकर अपना हर क्षण गुरुसत्ता के लिए जिया गया मानता रहा है। गुणात्मक अंतर तो हो सकता है, पर मिला हर उस सुपात्र को है, जिसने इस तीर्थ की सूक्ष्म चेतना में स्नान करने का पुरुषार्थ न्यूनाधिक मात्रा में संपन्न किया है। शाँतिकुँज-गायत्री नगर-ब्रह्मवर्चस के समुच्चय के रूप में फैला समग्र गायत्री तीर्थ महाकाल का घोंसला है एवं जैसी गुरुसत्ता की घोषणा है, उनका फैला हुआ विराट सूक्ष्म शरीर है। आकार की दृष्टि से यह बहुत बड़ा तो नहीं, किंतु अभी तक इसने गुरुकुल-आरण्यक-तीर्थ, तीनों की दिव्यधाराओं के समन्वय की त्रिवेणी की भूमिका बखूबी निभाई है। जैसे-जैसे युगपरिवर्तन की घड़ियाँ समीप आ रही हैं, ऐसा लगने लगा है कि मत्स्यावतार की तरह पूज्यवर का सूक्ष्मशरीर भी मानों इसमें समा नहीं पा रहा है। अब और स्थान की आवश्यकता पड़ने लगी है। वह भी ऐसी भूमि की, जो संस्कारित हो-समीपस्थ हो व बहुद्देशीय प्रयोजन पूरे करती हो। पर्यटन के लिए शाँतिकुँज न कभी बना था, न अभी है। अभी भी परिजन-यात्रीगण-तीर्थयात्री आते हैं तो इस तीर्थ की चेतना में स्नानकर कृतकृत्य होकर जाते हैं। अनुशासन से भरी दिनचर्या एवं संस्कारयुक्त वातावरण उनके मन-मस्तिष्क का, अंतरंग का एक प्रकार से कायाकल्प कर डालते हैं। पर्व त्योहार से लेकर विभिन्न प्रकार के शिविरों के लिए आने वाले परिजनों की संख्या तेजी से बढ़ी है। सत्प्रवृत्तियों-संवर्द्धन, दुष्प्रवृत्ति-उन्मूलन की महाक्राँति जैसे क्षेत्रों में विराटतम होती चली जाती है। इस युगतीर्थ में आने वाले अध्यात्म-पिपासुओं की संख्या सतत् बढ़ती जाती है। ऐसे में गुरुसत्ता के आदेश-निर्देश के अंतर्गत बड़े दिनों से अतिरिक्त भूमि की तलाश का क्रम चल रहा था, जो ठीक महापूर्णाहुति के तीन वर्ष पूर्व पूर्णता को पूर्व पूर्णता को प्राप्त हुआ एवं एक संस्कारयुक्त भूमि ठीक शाँतिकुँज के समीप मिल गयी है। इससे न केवल यहाँ के क्रिया–कलापों को विस्तार दिया जा सकेगा, वरन् शोध-अनुसंधान के बहुविधि क्रिया−कलाप जो छोटे स्थान से संभव नहीं थे, किये जा सकेंगे।
गायत्रीतीर्थ बनाने का युगऋषि का संकल्प इसी दृष्टि से उठा था कि धरती पर स्वर्ग के अवतरण का स्वप्न छोटे रूप में साकार करके दिखाया जाए। इसी के लिए देवपरिवार बसाया गया। अखण्ड ज्योति, युगनिर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान, युगशक्ति गायत्री पत्रिकाओं द्वारा चल रहा प्रशिक्षण-प्रतिपादन परिजनों के बौद्धिक व भावनातंत्र को प्रभावित करने के निमित्त ही था। उसने अपने दो तिहाई से अधिक यात्रा पूरी कर ली है। अब आवश्यकता इस बात की थी कि इस भावनात्मक प्रशिक्षण से उभरकर आए तंत्र से रचनात्मक कार्य संपन्न कर दिखाए जाएँ ताकि भारतीय संस्कृति के समग्र स्वरूप को इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री शाँतिकुँज में साकार होता देखा जा सके। इमारतें तो सरकारी कालोनी में भी खड़ी हो जाती हैं एवं धमाल-विध्वंस मचाने वाले विश्वविद्यालयों में भी। यहाँ उद्देश्य इमारतें खड़ी करने का नहीं, अपितु चलती-फिरती देवप्रतिमाओं को विनिर्मित करने वाले तंत्र के निर्माण का है। वही स्थायी वैभव है-सच्ची संपदा है। नालंदा-तक्षशिला विश्वविद्यालयों के निर्माण के पीछे भी यही उद्देश्य था-वह उन्होंने भलीभाँति पूरा भी किया। जो आवश्यकता तत्कालीन समाज को थी, आज कहीं उससे भी ज्यादा है। बहुत बड़ी संख्या में युगपुरोहितों की आवश्यकता है, जो सार्थक-संस्कारयुक्त शिक्षा दे सकें-कथनी व करनी दोनों से। बहुत बड़ी संख्या में युग चिकित्सकों की आवश्यकता है, जो जन-जन तक चिर-पुरातन आयुर्वेद की विधा के न्यूनतम अनुसंधानों के निष्कर्ष पहुँचाकर उन्हें राहत दे सकें। बहुत बड़ी संख्या में युगसैनिकों की आवश्यकता है, जो विचारक्राँति के महासमर में मोर्चा लेने हेतु इस छावनी में स्वयं को तैयार कर सकें। बहुत बड़ी संख्या में मिशनरी स्तर के युगशिल्पियों की आवश्यकता है जो भारतीय संस्कृति का तत्वज्ञान उन तक पहुँचा सकें-जहाँ उसकी सर्वाधिक आवश्यकता है। शाँतिकुँज का समग्र परिसर अभी प्रायः पंद्रह एकड़ में फैला है। इसे अब कम से कम चार गुना और बढ़ जाना चाहिए, ताकि वह उपर्युक्त आवश्यकताओं को पूरा कर सके। शाँतिकुँज जब बना था, तब टुकड़ों-टुकड़ों में बना था। पहले वह प्रारंभिक भाग जहाँ पूज्यवर एवं माताजी का निवास रहा है व आज अखण्ड दीपक स्थापित है, बाद में पीछे का मंदिर व गायत्रीतीर्थ वाला सप्तर्षि क्षेत्र तथा उसके बाद गायत्रीनगर, जहाँ सजल-श्रद्धा, प्रखर-प्रज्ञा सहित सभी शिक्षण भवन व आवास स्थित है। बाद में विस्तार−क्रम में समीप की और भूमि उपलब्ध होती चली गयी जो पास के कैम्पस के रूप में उभरी, जहाँ माँ भगवती भवन आचार्य भवन व देवात्मा हिमालय स्थित है। ब्रह्मवर्चस का भवन भी 1978-79 में बनकर तैयार हो गया था व उसका प्रयोगशाला-ग्रंथालय वाला स्वरूप उभरकर आ गया था। यह समस्त भूमि मात्र 15 एकड़ ही थी। अब इन्हीं दिनों एक भागीरथी पुरुषार्थ के रूप में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा शक्तिपीठ निर्माण जैसा एक बड़ा कदम उठाने के बाद अगला साहसपूर्ण कदम प्रायः चालीस एकड़ लगभग डेढ़ सौ बीघा भूमि शाँतिकुँज के सामने ही खरीदने के रूप में उठा लिया गया है। यह लगभग शाँतिकुँज से ढाई गुना अधिक भूमि है एवं वहाँ स्थित है, जहाँ कभी श्रद्धाँजलि समारोह में माँ भगवती नगर बनाया गया था। भावनाशील परिजनों ने वहाँ पुरुषार्थ कर उसे पूरे क्षेत्र को साफकर प्रायः ढाई लाख लोगों के रहने की व्यवस्था बनायी थी। वहाँ जप का क्रम भी चला एवं अंततः वही संस्कारित भूमि अब शाँतिकुँज तंत्र को उपलब्ध हो गयी है।
अभी जब इस नये शाँतिकुँज में विस्तार की योजनाएँ बन रही हैं, सभी तरह के विशेषज्ञों से परामर्श का क्रम जारी है, कई स्वरूप स्पष्ट होकर सामने आ रहे हैं। एक देवपरिवार वहाँ बसे व भारत व विश्वभर में महाप्रज्ञा का प्रकाश फैलाने हेतु गतिशील हो, इसके साथ-साथ एक लक्ष्य जो स्पष्ट हो रहा है, वह है-परमपूज्य गुरुदेव के आयुर्वेद के पुनर्जीवन के स्वप्न को साकार करने का। हम यहाँ की सीमित भूमि में स्मृति उपवन तो न बना सके-किसी तरह हरियाली को जिंदा रख सके-किसी तरह हरियाली को जिंदा रख सके-इस नये परिसर में वनौषधि वाटिका के रूप में स्मृति उपवन तो न बना सके-किसी तरह हरियाली को जिंदा रख सके-इस नये परिसर में वनौषधि वाटिका के रूप में स्मृति उपवन करने का मन है, साथ ही आयुर्वेद के विकसित स्वरूप के प्रस्तुतीकरण हेतु एवं सुनियोजित संस्थान के निर्माण की रूपरेखा बनायी जा रही है। आज आयुर्वेद सारे विश्व में धूम मचाये हुए है। सभी पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति से निराश हो चुके हैं। ऐसे में भारतीय संस्कृति का गौरव हमारा चिरपुरातन आयुर्वेद ही समस्त असाध्य रोगों के उपचारतंत्र के रूप में -जीवनी शक्ति-संवर्द्धन एवं पीड़ा निवारण के उपाय-उपचार के रूप में दिखायी देता है। अगले दिनों आयुर्वेद के परिष्कृत तंत्र की आवश्यकता सभी अनुभव कर रहे हैं। इसका सही रूप सामने आये-सभी वनौषधियों के प्रयोगों को अपनाने लगें व स्थान-स्थान पर ऐसी वनौषधि वाटिकाएँ उगायी जाने लगें-इसकी प्रेरणा देगा यह आयुर्वेद का अपने में अद्भुत अनुसंधान केन्द्र। इस विधा के सभी विशेषज्ञों से संपर्क कर इसे बड़ा विस्तृत रूप दिया जा रहा है, ताकि आधुनिक शोधों के साथ जोड़कर इसे प्रस्तुत किया जा सके। विलक्षण वन औषधियाँ उनका संरक्षण-हिमालय की दिव्यछाया में गंगातट पर उनका सजीव दर्शन, हर किसी को चिरपुरातन ऋषि-आश्रमों की स्मृति दिलायेगा। कई वनौषधियां ऐसी हैं जो लुप्तप्राय-सी हैं, उन्हें भी यहाँ उगाया जायेगा, ताकि उनकी प्रजाति को नष्ट होने से बचाया जा सके। इस संबंध में विस्तार से एक विशेषाँक अखण्ड ज्योति पत्रिका के मई माह में प्रकाशित करने की योजना है। उस विशेषाँक में नये शाँतिकुँज के विस्तार से जुड़ी अपरिमित संभावनाओं, युगपुरोहितों के नालंदा-तक्षशिला स्तर के प्रशिक्षण तंत्र का भी विस्तार से विवेचन होगा। इसे पढ़कर निश्चित ही अपने चिरअतीत के गौरव को यादकर भावी संभावनाओं का एक आभास सबको हो सकेगा।
शाँतिकुँज महाकाल का घोंसला है। इक्कीसवीं सदी की समस्त संभावनाओं का आदिस्रोत है। निश्चित ही अभी हुआ विस्तार यहाँ तक तो सीमित नहीं ही रहेगा। अब आस-पास की अन्यान्य भूमि की भी आवश्यकता विश्वविद्यालय स्तर के प्रशिक्षण तंत्र के निर्माण के लिए पड़ सकती है।प्रवासी भारतीयों के लिए पड़ सकती है। प्रवासी भारतीयों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था का पूरा एक तंत्र यहाँ बनना है। भारत की सभी भाषाओं-बंगला, आसामी, उत्तरपूर्व के छह प्राँतों की भाषाएं पंजाबी, उर्दू, कन्नड़, मलयाली, तमिल, तेलगू, गुजराती, उड़िया, सिंधी, इंग्लिश आदि तथा रशियन, फ्रेंच, जर्मन, जापानी व स्पेनिश भाषा का प्रशिक्षण भी यहाँ अगले दिनों होना है ताकि युग पुरोहित सारे विश्व में ज्ञान का आलोक फैला सकें। इसके साथ ही साथ विभिन्न धर्म-सम्प्रदायों के ग्रंथों की शिक्षाओं की जानकारी भी इस विश्वविद्यालय में दी जायेगी। राष्ट्र के शिक्षातंत्र को एक नयी दिशा देना भी इस प्रशिक्षण−सत्र का मूल उद्देश्य होगा। इसके लिए शिक्षानीति व पाठ्यक्रम भी यहीं तैयार करना होगा तथा पत्राचार पाठ्यक्रम से लेकर नैतिक शिक्षा व्यक्तित्व-परिष्कार प्रशिक्षण के क्रम को सुनियोजित दिशाधारा देने का दायित्व भी इसी का होगा।
महापूर्णाहुति वसंत 2000 से वसंत 2001 तक मनायी जानी है। इसके लिए प्राणवान साधक-याजक-भागीदार तैयार करने की व्यवस्था भी इस विराट तंत्र में बनायी जानी है। काम बड़े विराट स्तर का है, समय कम है। एक प्रकार से भारतीय संस्कृति के एक अनूठे विश्वविद्यालय के निर्माण का, आयुर्वेद के आधुनिक शोध-संस्थान के सृजन का यह महासंकल्प दैवीचेतना से ही उभरा है, वही इसे पूरा भी करेंगी।
अश्वमेध महायज्ञ व विराट संस्कार महोत्सवों जैसे आयोजनों ने इस मिशन के विराट रूप का दिग्दर्शन जन-जन को कराया है। अब बारी आयी है, ऐसे महायज्ञ में आहुति डालने की जो, युगपरिवर्तन की वेला में होने जा रहा है। शाँतिकुँज के वर्तमान संचालक तंत्र ने भारतीय संस्कृति की अपनी विरासत को जिंदा बनाये रखने वालों में सहयोग की अपेक्षा के साथ ही यह बड़ा कदम उठाया है। परमपूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी द्वारा शाँतिकुँज के लोकसेवी कार्यकर्ताओं के लिए सुरक्षित जीवन निर्वाह के साधन इस आपातकाल में इस पुण्य-प्रयोजन के लिए निचोड़ दिये गये। एक पहाड़ जैसा कार्य सामने खड़ा है। यह बिना आत्मीयों-उदारचेताओं के सहयोग से पूरा नहीं होगा। यह गोवर्धन पर्वत उठेगा तो सभी की लाठियों पर, उस गिरधर की उँगली तो यथास्थान है ही, पर आप हम सबको अपनी लाठियाँ लगानी होगी ताकि परिवर्तन की वेला में श्रेय के अधिकारी बन सकें। जिस किसी के मन में देवसंस्कृति को जिंदा बनाये रखने की कसक है, भारत को पुनः जगद्गुरु बनाने की उमंग है-उसे अपना भावभरा सहयोग गायत्रीतीर्थ-शाँतिकुँज को देने के लिए आगे आना चाहिए। संधिकाल के समय की आवश्यकता पूरी करने वाला सभी की आशा का केन्द्रबिंदु एकमात्र यही एक तंत्र है। दैवी आश्वासन पर विश्वास रखने वाले इस तंत्र को आशा है कि भारतीय संस्कृति को विश्वसंस्कृति के रूप में परिणित करने का स्वप्न अवश्य पूरा होगा।
महारानी विक्टोरिया के जीवन में एक बहुत मार्मिक प्रसंग है-एक दिन उन्होंने अपने पति अल्बर्ट की किसी बात पर चिढ़कर कह दिया “महारानी मैं हूँ “। महारानी के इस अहंकार की चोट खाकर अल्बर्ट का पौरुषेय स्वाभिमान जाग उठा, वे वहाँ से उठे और अपने विश्राम कक्ष में जाकर लेट गये। भीतर से दरवाजा बंद कर लिया। महारानी के व्यंग्य के कारण उनका हृदय बुरी तरह झुलस गया था।
महारानी अपने पति की वेदना ताड़ गई। वे उनके विश्रामकक्ष के पास गई और बाहर द्वार खटखटाया। अल्बर्ट ने पूछा-”कौन है? विक्टोरिया ने अपने उसी प्रशासनिक लहजे में उत्तर दिया-”महारानी विक्टोरिया”। अल्बर्ट उत्तर सुनकर यथावत चुप रहे, उन्होंने उठकर दरवाजा खोलना तो दूर कुछ बोले भी नहीं। अब कहीं जाकर विक्टोरिया को अपनी भूल समझ आई। उन्होंने पुनः दरवाजा खटखटाया। अल्बर्ट ने पुनः प्रश्न किया-कौन? इस बार महारानी ने मृदुल स्वर में उत्तर दिया-”आपकी प्यारी पत्नी।” अल्बर्ट का सारा क्रोध, सारा दुःख दूर हो गया। उन्होंने उठकर द्वार खोल दिये। दोनों ने हृदय पुलकित हो उठे, मन का सारा गुबार क्षण भर में धुल गया। सुखी गृहस्थ के लिए आवश्यक है कि पति-पत्नी दोनों ही एक-दूसरे का पूरक समझें। अपने को दूसरे से बड़ा मानना वह हेय धारण है, जिससे दाम्पत्य सौमनस्य चूर-चूर हो जाता है। -गृहस्थ एक तपोवन (वाङ्मय क्र. 61)
*समाप्त*