चले बर्बर समाज से शाँति करुणा के साम्राज्य की ओर

मानवीय अंतराल में मुख्यतः दो पक्ष होते है। एक ओर प्रेम, करुणा, दया, संवेदना आदि दिव्यगुण हैं, तो दूसरी ओर हिंसा व आक्रामकवृत्ति मौजूद हैं। महर्षि अरविंद ने मनुष्य के तीन-चौथाई भाग को पशुतुल्य प्रदर्शित किया है। अतः हिंसा मानवीय वृत्ति के रूप में दृष्टिगोचर होती है। इसके अनेक स्वरूप हैं। समाज की कई प्रथा परंपराओं में भी हिंसा की झलक मिलती है। इससे व्यक्ति और समाज दोनों को असह्य यंत्रणा का भार झेलना पड़ता है। वैज्ञानिक व मनोवैज्ञानिक हिंसा के लिए मनुष्य के हारमोन एवं जीन को उत्तरदायी मानते है।

अनेकों मनोविज्ञानी, आचारशास्त्री हिंसा को अपने-अपने मत से व्यक्त करते हैं। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एस. फ्रायड व्यवहार में हिंसा को वासनात्मक कुंठा से उत्पन्न अहंकार की परिणित मानते हैं। आचारशास्त्र के जनक कोनार्ड लारेज ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ऑन एग्रेजन में फ्रायड के विचारों की नये ढंग से व्याख्या की है। इनकी मान्यता है कि हिंसा मनुष्य की जन्मजात वृत्ति है, जो अनुकूल परिस्थिति पाकर फूट पड़ती है। आचाराँग के अनुसार हिंसा करने वाले लोग कई प्रकार के होते है। इसने मुझे मारा। यह मुझे मारता है। कुछ लोग इस डर से हिंसा के लिए उद्यत होते हैं तथा यह मुझे मारेगा-कुछ लोग इस निमित्त से बर्बर हो उठते हैं।

मानव समुदाय में कई जातियों के लोग अभी भी बर्बर व आक्रामक जीवन जी रहे है। इस तरह की कुछ घटनाओं का वर्णन जन्म इथोलाजिस्ट आइबल आइबेसफेल्ट के 'द बायोलॉजी ऑफ पीस एण्ड बार' में मिलता है। इनका कहना है कि मानव सदा से शत्रुता और मित्रता की सीमारेखा में झूलता और मित्रता की सीमारेखा में झूलता रहता है। जो भी तत्व अधिक प्रभावी होता है, उसमें वह हावी हो जाता है। इसने अस्मत के क्रिया–कलापों का चित्रण किया है। इण्डोनेशिया, न्यू गुएना इरीएन के डेल्टा क्षेत्र में अवस्थित है। यहाँ के केसुरीना तट पर 20 हजार अस्मत नामक लोग निवास करते हैं। अस्मत लोग बर्बर एवं हिंसक होते हैं। इनकी खास विशेषता है कि पे आपस में एक-दूसरे को जिंदा खा सकते हैं। बर्बरता और निर्दयता के पर्याय अस्मत सीधे सिर पर वार करते हैं। कालाहारी की झाड़ियों में रहने वाले व्यक्ति भी इसी प्रकार क्रूर होते हैं। इनमें एक विशेष प्रकार की आवाज प्रचलित है। कुँग कहने पर सब अपना भाला, बर्छा, कुल्हाड़ी लेकर दौड़ते हैं। कुँग का मतलब है-आदमी जिसे मारता है। अमेजन के मुण्डरुक लोगों के लिए हिंसा व हत्या सामान्य खेल के समान होता है। इनके यहाँ प्रवेश करने वाले किसी अन्य आदमी को हिंसक जानवर समझकर मार देने का प्राचीन रिवाज है।

इरीयन तथा अमेजन के लोग भी बर्बर होते हैं। एक सर्वेक्षण से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर कहा जाता है कि इन लोगों को उच्च एवं पर्याप्त मात्रा में प्रोटीनयुक्त भोजन न मिलने के कारण इनकी मस्तिष्कीय संरचना हिंसक हो जाती है। हत्या इनकी मूलवृत्ति में समाहित है। बच्चों का शिक्षण भी इन्हीं की बर्बर पाठशाला में होता है। अंततः पूरी पीढ़ी इसी तरह क्रूरता का परिचायक होती है। आये दिन कबीलों के बीच खूनी लड़ाइयाँ होती रहती हैं। यहाँ बलिप्रथा प्रचलित है। शक्तिशाली बनने एवं देवता को प्रसन्न करने के लिए मनुष्य की बलि दी जाती है। इनके बलिदान की प्रथा भी बड़ी अजीबोगरीब ढंग की होती है। चुना हुआ मनुष्य स्वस्थ, निरोग एवं सबल होना चाहिए। इसे कई दिन तक एक अदृश्य जगह पर छुपाकर रखा जाता है। बलि के दिन उस आदमी को योद्धा की तरह सजाया जाता है। हाथ में धनुष-बाण सिर पर विचित्र पंखों का मुकुट तथा शरीर में पशुओं का चर्म पहनाया जाता है। इस दिन सबके सामने घुमाने के पश्चात् देवता के सामने किया जाता है।

वेनेजुएला और ब्राजील की सीमारेखा में दस हजार लोगों का एक समूह है। इन्हें यानोमाओ के रूप में माना जाता है। अमेरिकन विज्ञानी नेपोलियन चगनन ने द फायर्स पीपुल नामक शोधग्रंथ में इनकी विस्तृत विवेचना की है। चगनन के अनुसार इनकी वृत्ति अतिशय हिंसक होती है। चोरी, डकैती, लूटपाट, अपहरण व बलात्कार आदि तो इनके लिए आम बात है। यानोमामो परले दर्जे के धोखेबाज एवं चालाक होते हैं। इसका प्रसार पूरे समाज उस संक्रामक राग से ग्रसित होता है। सन 1964 में इनका अध्ययन करने हेतु एक दल बड़ी मुश्किल से कुछ विवरण दे सका। दो कबीलों के बीच की लड़ाई अक्सर किसी महिला को लेकर होती है। बात बढ़कर खूनी संघर्ष का रूप ले लेती है। स्त्री को यहाँ सौदे के रूप में देखा जाता है। स्त्री को यहाँ सौदे के रूप में देखा जाता है। मुख्य रूप में झगड़े के केन्द्र में किसी स्त्री को माना जाता है। इसलिए इन वारदातों से बचने हेतु लड़की को जन्म के पश्चात् मार दिया जाता है। परिणाम यह हो रहा है कि समाज में बर्बर पुरुषों की संख्या बढ़ती चली जा रही है। यहाँ रिश्ते की हर दीवार तोड़ दी गयी है। यानोमामो समुदाय प्रकार से हिंसा का पर्याय है।

द इवोलुशन ऑफ वार में कीथ ओटरबीन ने बर्बरता की छियालीस घटनाओं का उल्लेख किया है। इसमें हिंसक जीवारो से जापान की क्रूर जाति फ्यूडल तक का विस्तृत वर्णन है। इसके अनुसार भय और अविश्वास व्यक्ति को क्रूर निर्दयी एवं हिंसक बना देता है। हिंसा का एक अन्य कारण है सेक्स। कामान्ध व्यक्ति अपना विवेक खोकर अति जघन्य कृत्य को सहजता से कर बैठता है। अमेरिकन हेरी टर्नीहाई ने स्पष्ट किया है कि आदिमानव से लेकर आज तक हिंसा वही है, परंतु इसके स्वरूप में परिवर्तन हुआ है। यह यानोमामो और जुलू के बीच हो या अस्मत या आस्टेहैगेरियन सेना के मध्य हो, धरती को बड़ी कठिन स्थिति से गुजरना पड़ा है। वर्तमान दौर में हिंसा के साथ जुड़ी मानवीय दुर्बुद्धि और भी भीषण तथा भयावह हो गयी। कुछ जाति, सम्प्रदाय और धर्म में बलिप्रथा का प्रचलन मिलता है। मनुष्य-मनुष्य की ही बलि चढ़ाता है। यह भी हिंसा का एक रूप है। वाल्टर बुरकर्ट ने ऐसे मनुष्यों को होमो सेपीएनन्स कहने के बजाय होमोनिकेन्स अर्थात् मानव हत्यारा का नाम दिया है। ग्रीक के इतिहासकार पासेनियास जीयुस ने माउण्ट लेक्यान में एक विचित्र प्रथा का लोमहर्षक चित्रण किया है। इनका कहना है कि इस क्षेत्र के लोग बच्चों को बलि देने के पश्चात् उसके माँस को सामूहिक रूप से भक्षण करते हैं। इनकी मान्यता है कि बच्चों के शरीर में देवता निवास करते है। इसलिए इस देवता को उदरस्थ करने हेतु इसे खाया जाता है। डाइंग गाँड में जे.जी. फ्रेजर ने उल्लेख किया है कि पूरे यूरोप, एशिया, पैसीफिक क्षेत्र में किसी पुल, बिल्डिंग मंदिर या किला की नींव रखते समय मानव बलि की प्रथा थी। जूडीयो क्रिश्चियन परंपरा में भी बलि प्रथा का वर्णन मिलता है। केन ने अपने भाई अबेल को तथा ईशाक अपने पिता अब्राहम के हाथों बलि चढ़ा था।

मेयान में देवताओं को मानवरक्त अर्पित किया जाता है। यहाँ मानवरक्त को सर्वाधिक पवित्र माना जाता है। एजटेक सभ्यता में भी कुछ इसी प्रकार की मान्यता है। एडियन शिखर में सुंदर बच्चों को जिंदा दफना देते हैं। एण्डीयन गाँव में जब कभी किसी बुजुर्ग का रोग जटिल हो जाता है है तो उसको बचाने के लिए पाँच से नौ साल के बच्चों को पानी में बहा देने का रिवाज है। देवताओं से बच्चों के जान के बदले रोगी की प्राण की भिक्षा माँगी जाती है। सन 1982 में यूनेस्को ने अपने सर्वेक्षण में पाया कि कई प्रकार की जातियाँ आज भी किसी विशिष्ट परिस्थिति में बच्चों को जिंदा गाड़ देती हैं। एक खोजी दल ने तो 17716 फीट ऊँचे माउण्ट प्लोनो शिखर पर एक सभ्य परिवार के बच्चे को जीवित दफना देने की घटना का पर्दाफाश किया है।

आक्रमण वृत्ति कई प्रकार से व्यक्त होती है। डी. ईगान में होपी लोगों की वृत्ति को अच्छे ढंग से चित्रण किया है। होपी हिंसक, कुटिल एवं खतरनाक होते है। ये अपने शब्दों के तरकश से विष बुझा तीर छोड़ते है। इस क्षेत्र में इन्हें महारत हासिल है। ये अपने परंपरागत गीत, संगीत तथा उत्सव में भी ऐसे ही विस्फोटक शब्दों का प्रयोग करते है। ग्रीनलैण्ड, अलास्का तथा एल्यूशियन द्वीप के इनूइट लोगों में पोलरस्टेस पाया जाता है। पोलर स्टेस अति भयंकर हिंसक घटना होती है, जिसमें सैकड़ों लोग एक साथ समाप्त हो जाते हैं। होता यों है कि शीत के प्रकोप से बचने के लिए बहुत सारे लोग सामूहिक रूप से एक ही आवास में निवास करते है। ठण्ड की अधिकता के कारण ये एकदम सटकर रहते है। इस परिस्थिति में उत्पन्न तनाव पोलर स्टेस कहलाता है। ई.ए. होयबल ने इन लोगों को क्रूर और निर्दयी कहा है। इनके गीत आक्रामक होते हैं एवं लोग नृत्य को वीभत्स ढंग से पेश करते है। मध्य आस्ट्रेलिया की आदिवासी महिलाएँ अपने सिर को एक दूसरे से टकराती हैं। यह इनकी परंपरा में आता है। फिर यह दृश्य रक्तरंजित एवं भयावह होता है, क्योंकि सिर टकराते समय इनके अंदर की हिंसक प्रवृत्ति जाग उठती है और चारों ओर फटा सिर तथा खून के फव्वारे बहते दिखायी देते है।

न्यूजीलैण्ड के माओरिस लोग यायावर तथा बर्बर होते है। इन लोगों ने न्यूजीलैण्ड के निरीह तथा निर्दोष पक्षियों की तरह 18 प्रजातियों को समाप्त कर डाला। इनका आक्रमण कठिन व चुनौतीपूर्ण होता है। सामान्य रूप से शरणार्थी जैसे ये किसी जंगल में पड़े रहते हैं। छापामार युद्ध में ये प्रवीण माने जाते हैं। इस क्षेत्र में ऐसे बर्बर लोगों की संख्या लगभग चार हजार के आस-पास बताई जाती है। बी.एस. एगलर्ट ने एक हजार वर्ष पूर्व इस्टर द्वीप के लोगों के बारे में जानकारी दी है। इनके मतानुसार यहाँ पर टाँगाटा रीमा टोटो नामक लोगों की संख्या सात हजार के आस-पास थी। अपने संस्कृति के नाम पर ये अति कट्टर होते हैं। किसी कारणवश इनके बीच मतान्तर हो गया। फिर क्या था, लड़ाई हुई इनके प्रमुख 1722 लोगों में से मात्रा 111 व्यक्ति ही शेष बच पाये, बाकी लोग हिंसा के शिकार हुए।

हिंसा सुलगते हुए धुएँ से कालांतर में युद्ध का रूप धारण कर लेती है। युद्ध हिंसा का विप्लवी व विस्फोट स्वरूप है। युद्ध में हिंसा का नग्न नृत्य होता है। हिंसा चिनगारी है तो युद्ध दावानल। आर.जी. सील्स ने वार स्पोर्टस एण्ड एग्रेजन में एक सर्वेक्षण का हवाला दिया है। इनके अनुसार 130 सामाजिक संरचनाओं का विराट अध्ययन करने पर मात्र छह समाजों में ही सर्वाधिक शाँति पाई गई। ये छह समाज भी उनमें से जो किसी सामूहिक हत्या आदि में संलग्न नहीं थे। ग्यारह यूरोपीय देशों के 1055 वर्षों के इतिहास को पलटने पर पता चलता है कि इनका 47 प्रतिशत समय सैन्य कार्यवाही में गुजरा है अर्थात् प्रतिवर्ष औसत दो युद्ध हुए हैं। जर्मनी ने सबसे कम 28 युद्ध लड़े, जबकि स्पेन ने अपने समय और श्रम का 67 प्रतिशत भाग युद्ध में झोंक दिया। स्पेन प्रति तीन साल में दो लड़ाई लड़ता रहा है। वार एजह्यूमेन इनडेवर में ए. रेस्टिंग ने लिखा है कि सन 1900 से लेकर अब तक विश्व सभ्यता को तीन बड़े विध्वंसक युद्धों को झेलना पड़ा है। युद्ध में अशाँति फैलती है। इसके आतंक की परिणति इतनी गहरी होती है कि व्यक्ति तड़प-तड़प कर जीता है और इसी परिस्थिति में पुनः हिंसा के भड़कने का खतरा होता है।

लार्ड बायरन ने स्पष्ट किया हे कि हिक्सोस, हुरियन, केसीटेस, एशिरियन हूण, तुर्क तथा तार-तार जाति हिंसा के पर्याय थे। इन्होंने हिंसा की नई-नई तरकीबें खोज निकाली। अलेक्जेन्डर हिंसा का जीता-जागता उदाहरण था। इसने तो युद्ध और हिंसा का नक्शा ही बदल दिया था। जे.एम. विंटर ने द काजेज ऑफ वार में हिंसा और युद्ध को रेखांकित किया है। विंटर के मतानुसार हिंसा तो हर आदमी के अंदर होता है। यह उसकी लाचारी है और युद्ध मानव समाज की विवशता। इनसे व्यक्ति और समाज तबाही के कगार पर पहुँच जाती है। शेष रहता है-सर्वनाश जिसके मूल में होती है-हिंसा व आक्रामकता।

आखिर यह हिंसा होती क्यों है। इसका स्नायविक केन्द्र कहाँ है? इसका विश्लेषण भी बड़ा विवादास्पद है। ए.जे. हर्बर्ट के द फिजियोलॉजी ऑफ एग्रेसन में मध्य मस्तिष्क या लिम्बिक ब्रेन को हिंसक केन्द्र के रूप में वर्णित किया गया है। इस क्षेत्र में तीन प्रकार की कोशिकाएँ होती है। जो आक्रामकता को प्रदर्शित करती है। कोशिकाओं को हटाकर या दबाकर हिंसा-भय व अनुवांशिक दुर्गुणों में भी कमी लायी जा सकती हैं एक बार एक बार एक व्यक्ति की एक दुर्घटना में इस क्षेत्र की कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त हो गयी थीं। परिणामतः उसके व्यवहार में आश्चर्यजनक ढंग से परिवर्तन हो गया था।

अनेकों वैज्ञानिकों ने हिंसा को अनुवांशिक गुणों के वाहन जीन से संबंधित होने का दावा किया है। इस तथ्य की पुष्टि करने के लिए अनुसंधान कार्य जारी है। एच.जी. बर्नर ने अपने ग्रंथ एबनार्मल बिहेवियर में कुछ इस तरह के उदाहरण देकर समझाया है। बर्नर के अनुसार 1979 में एक डच परिवार के पुरुषों के जीन में कुछ असामान्यता पाई गई। ये सारे सदस्य अत्यंत हिंसक थे। डकैती, हत्या, अपराध की तमाम घटनाओं में इनको लिप्त पाया गया। एक अन्य प्रयोग में चौदह कुख्यात अपराधियों के मूत्र का परीक्षण किया गया। इससे मालूम हुआ कि इन गतिविधियों के पीछे सिरोटोनीन नामक हारमोन क्रियाशील होता है। वैज्ञानिक एक ऐसी जीन की खोज में है जो वास्तविक रूप में इसका जिम्मेदार है। सदर्न कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के साइकोलाजिस्ट एडीयन रेन ने चवालिस कुख्यात अपराधियों का गहन अध्ययन किया। ये लम्बे समय तक जेल की सजा काट रहे थे। उसमें एक पेशेवर खूनी था, जो पाँच सालों में पैंतालीस खून कर चुका था। पेशेवर हत्यारे का जब अध्ययन किया गया तो रेन को कई नये तथ्यों का समाधान प्राप्त हुआ। इसके थैलेमस के एक विशिष्ट क्रियाशील क्षेत्र में छोटी-छोटी गांठें पड़ गयी थी। संभवतः यही उसके आततायी होने का कारण हो।

तो क्या इसका कोई समाधान नहीं है? इस वृत्ति को परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है हिंसा का प्रेम में बदला जा सकता है। अपने साँस्कृतिक इतिहास के पृष्ठों को पलटने पर मालूम होता है कि कई डाकू संत बन गये। अनेक आततायियों ने अपना बर्बर और क्रूर रास्ता छोड़कर समाज सेवा का कार्य किया। आश्चर्य की बात है कि सीमेई उन्नत कृषि कार्य के लिए जाने जाते है। जंगली हाथी, शेर तथा अन्य हिंसक जानवरों के बीच रहते हुए भी इन्होंने शांतिपूर्ण स्वभाव को डिगने नहीं दिया। प्रकृति ही इनका सर्वस्व है। डेण्टन के अनुसार सीमेई अपनी बर्बरता को सृजनात्मकता दिशा में मोड़कर सफल हुए। सन 1950 में ब्रिटिश थल सेनाध्यक्ष ने इनके बारे में कहा कि ये लोग अति निर्दयी तथा मनुष्य का खून पीने वाले है।

न्यू गुएना के सेपीक नदी पर बसने वाले अवेंटीप लोगों का इतिहास भी कुछ इस प्रकार का है। अवेटीप देखने में डरावने व भयंकर थे। लगता था कि इनका जन्म हिंसा के गर्भ से हुआ है। हत्या को एक सामान्य कर्म के रूप में अपनाने वाले अवेटीप प्रकृति की गोद में आकर संवेदनशील एवं शाँत हो गये। प्रकृति की पाठशाला में जीवन के नूतन अध्याय का श्रीगणेश किया।

वस्तुतः स्वभावतः मनुष्य हिंसक है नहीं। प्रेम करुणा, संवेदना, सहानुभूति जैसे दिव्य गुण ही उसे शोभा देते है। अंगुलिमाल, रत्नाकर, चण्ड अशोक का हृदय परिवर्तन साक्षी है कि हिंसक वृत्ति को सद्भावना में बदला जा सकता है। हिंसक व्यक्ति को एक सामाजिक रोगी माना जाय व उसकी करुणा प्रेम के द्वारा चिकित्सा की जाय। हिंसा को एक अभिशाप मानकर समस्त विश्व को शाँति के एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया जाए। यही .ऋषियों की प्रेरणा है-उनका बताया मार्ग है।


जिसकी हर श्वास राष्ट्र की स्वतंत्रता हेतु थी

गंगा का सुहाना तट। संध्या की लाली गंगा की लहरों पर धीरे-धीरे तैरती जा रही थी और गंगा की धारा सिंदूरी रंग डूबता-उतरता लालिमा में परिणत हो रहा था। उस दृश्य को अपने नेत्रपटल पर समेट लेने को तत्पर एक गौरवर्ण, उन्नत मस्तक, ऊँचे कद-काठी के संन्यासी अपने साथ चल रहे युवक शिष्य से कह रहे थे-श्याम! मुझे ऐसा लगता है कि प्राच्य संस्कृति का सूर्य भी पाश्चात्य सिंदूरी रंग में डूबता हुआ, कहीं इस प्रकार कालिमा में गुम न हो जाय।

“नहीं, स्वामी जी! ऐसा नहीं होगा।” श्याम ने सम्मानपूर्ण प्रतिवाद किया। “आप जैसे समर्थ पुरुष के रहते यह अनर्थ नहीं होगा। “मैं अकेला क्या कर सकता हूँ और और कहाँ तक यह संभव हो सकेगा। “ संन्यासी ने अपने अंतर्व्यथा को गति दी-आज हमारी संस्कृति दासता और हीनता रोगों से ग्रस्त होकर दिन-प्रतिदिन जर्जर होती जा रही है। कोई ऐसा रणबाँकुरा नहीं दिखायी देता जो अपने देश से बाहर जाकर अपने संस्कृति सूर्य की आभा से अन्य देशवासियों को आलोकित कर सके।

युवक चुप रहा। परंतु उसका अंतर आंदोलित हो रहा था। संन्यासी, जो अपने समय में भारतीय संस्कृति के उत्कर्ष तथा रक्षण में यदि और योद्धा दोनों की ही भूमिका निभा रहे थे, युवक शिष्य को कुछ निर्देश दे रहे थे। प्रखर तेज से भरे इस संन्यासी का नाम स्वामी दयानंद। जो निर्देश स्वामी दयानंद ने श्याम को दिये, उसे शिरोधार्य कर वे सम्पूर्ण समर्पित भाव से लंदन जाने की तैयारी में जुट गये। संयोग ही था कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी को संस्कृति भाषा के अध्यापन कार्य हेतु एक योग्य और विद्वान प्राध्यापक की आवश्यकता थी। इसके लिए यूनिवर्सिटी के प्रबंधकों ने स्वामी दयानंद से सहयोग माँगा था। संस्कृत के विद्वानों की कमी नहीं, परंतु स्वामी जी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में केवल संस्कृत का अध्यापक ही भेजना नहीं चाहते थे, बल्कि यह भी चाह रहे थे कि जो व्यक्ति इस कार्य के लिए नियुक्त किया जाय, वह सच्चे अर्थों में भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि भी हो।

अपने युवा और मेधावी शिष्य श्यामकृष्ण वर्मा में स्वामी दयानंद ने आवश्यक सभी विशेषताएँ देखी और लंदन जाने की प्रेरणा देते हुए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के व्यवस्थापकों को उनका नाम भी प्रस्तावित कर दिया। श्यामकृष्ण वर्मा की यह पहली विदेश यात्रा थी। श्याम ने विद्यालय के साथ-साथ स्वतंत्र अध्ययन भी जारी रखा था। यद्यपि उन्होंने विद्यालय में भी इसी तरह के विषय चुने थे, जिनसे धर्म और संस्कृति की शोध एवं अनुसंधान में सतत् संलग्न रह सके। पर स्वतंत्र रूप में भी वे अपने प्रिय विषयों-संस्कृत साहित्य तथा भारतीय शास्त्रों के अध्ययन में निरंतर जुटे रहते। अनवरत अध्यवसाय और गहरी लगन के प्रभाव से उद्धत उनकी यह प्रतिभा देर तक छुपी न रह सकी और उनकी प्रतिभा चमकने लगी। उन्हें जगह-जगह प्रवचन-उद्बोधन के लिए आमंत्रित किया जाने लगा। प्राचीनतम शैली को अधुनातन शैली में परिवर्तन कर प्रतिपादन करने की उनकी अद्भुत क्षमता को देखकर तत्कालीन विद्वानों का ध्यान उनकी ओर आकृष्ट हुए बिना नहीं रहा। स्वामी दयानंद जैसे पारखी ने उनकी प्रसुप्त प्रतिभा को बहुत पहले ही परख लिया था। स्वामी दयानंद श्याम की विद्वता के अतिरिक्त व्यक्तित्व की सरलता से अत्यधिक प्रभावित थे। वे सतत् उन्हें अपने पास बुलाकर देश व समाज संबंधी भावी योजना के प्रति दिशा-निर्देश देते रहते थे।

स्वामी दयानंद की प्रेरणा और प्रोत्साहन पाकर जब श्याम लंदन आ गये और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी पहुँचे तो सभी उन्हें देख हैरान हो गये। श्याम धोती-कुर्ता पहनकर विशुद्ध भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। अंग्रेज अधिकारियों की कल्पना ठीक इसके विपरीत थी, वे तो इस भारतीय विद्वान को कोट-पैन्ट और टाई पहने हुए आने की सोच रहे थे। गुलाम देश को अपनी अस्मिता का कहाँ भान होता है। किसी परतंत्र राष्ट्र के नागरिक को अपनी संस्कृति की क्या पहचान हो सकती है? इन्हीं मान्यताओं के कारण वे ऐसा सोच रहे थे। इन मान्यताओं से उत्पन्न कल्पनाओं की तस्वीर जब टूटी तो वहाँ के अधिकारी हतप्रभ से रह गये।

पारस्परिक चर्चा में एक अवसर पर श्यामजी ने इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहा भी था-भारत राजनीतिक दृष्टि से भले ही पराधीन है, पर उसकी आत्मा आज भी उन्मुक्त है। यद्यपि वह सो गयी है, पर आज दिन जाग्रत होगी उस दिन तमाम बेड़ियाँ अपने आप खुल जायेंगी और भारत माता की हुंकार सारे विश्व में झंकृत होने लगेगी। फिर समस्त विश्व उसके चरणों में नतमस्तक हो जायेगा। भारतीय संस्कृति की अमर पताका फिर से फहराने लगेगी।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में संस्कृत अध्यापक के पद पर नियुक्त होकर, श्याम वर्मा अपना कर्तव्य तो पूरा करते रहे, परंतु उन्होंने अपने आप को अध्यापन कार्य तक ही सीमित नहीं रखा, वरन् स्वयं भी गंभीर अध्ययन में तन्मयतापूर्वक जुट गये। उन्होंने पश्चिमी साहित्य, संस्कृति, धर्म और सामाजिक प्रवृत्तियों को गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया। इस दौरान उन्हें कई महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लगे। उन्होंने पाया कि यूरोपीय देशों के निवासियों में देशभक्ति, प्रगतिशीलता, श्रम निष्ठा और कर्तव्यपालन का भाव कूट-कूटकर भरा है। जबकि भारतीय लोगों ने इन तत्वों को विस्मृत कर दिया है। ये दिव्यगुण एवं विशेषताएँ यदि भारतीय समाज में भी विकसित हो सकें, तो भारत निश्चय ही अपने पुरातन गौरव को प्राप्त कर सकता है।

लंदन प्रवास में वर्मा जी वेदज्ञ विद्वान मैक्समूलर के संपर्क में आये। मैक्समूलर तब वैदिक साहित्य पर शोध कार्य कर रहे थे। वर्मा जी ने देखा की उनका दृष्टिकोण व्यापक नहीं हैं एवं काफी पूर्वाग्रहयुक्त है। उनने यही सोचा कि इसके लिए मैक्समूलर स्वयं दोषी भी नहीं है क्योंकि उनके अध्ययन का आधार संस्कृत न होकर विदेशी भाषाएँ तथा व्याख्याएँ ही रही है, जो किसी भी प्रकार प्रमाणिक या असंदिग्ध नहीं कही जा सकती थीं। वर्मा जी ने मैक्समूलर से घनिष्ठ संपर्क बढ़ाया और उन्हें मूल भाषा में वेदों के अध्ययन की प्रेरणा दी। इसके लिए उन्हें संस्कृत सीखने में सहयोग प्रदान किया और भारतीय धर्म पर वस्तु परक दृष्टिकोण भी बताया। यह संपर्क अधिक दिनों तक बना रहता, तो शायद मैक्समूलर के भाष्यों में विसंगतियाँ नहीं होती। अपनी समस्त प्रतिभा एवं क्षमता इस महत्वपूर्ण सूत्र को व्यवहारिक रूप में देने के लिए नियोजित कर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में अपना सेवाकाल पूरा होने के तत्काल बाद ही वे अपनी मातृभूमि वापस लौट आये।

भारत लौटने पर सबसे पहले उन्हें आर्थिक साधनों के अभाव का सामना करना पड़ा। क्राँति का हर कदम कँटीले काँटों और धधकते अंगारों पर रखकर ही चलना पड़ता है। ये परिस्थितियाँ भी उसी की एक स्वरूप थी। उन्होंने अपने अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपनी प्रतिभा के आधार पर आर्थिक समाधान जुटाने का प्रयास किया। वर्मा जी सतत् अपने लक्ष्य के प्रति सचेत रहे और निष्काम कर्मयोगी के रूप में वकालत के क्षेत्र में उतर पड़े। मुम्बई हाईकोर्ट में कुछ समय वकालत करने के पश्चात् उन्होंने अजमेर में इसे आगे बढ़ाया। कुछ समय तक वर्मा जी देशी रियासतों में भी उच्च प्रशासकीय पदों पर भी कार्यरत रहे।

भारत में रहते हुए उन्होंने अनुभव किया कि वे भारतीय स्वतंत्रता के लिए यहाँ की अपेक्षा विदेशों में रहकर अच्छी तरह इसे अंजाम दे सकते थे, अंततः वर्मा जी तमाम संचित साधनों को खपाकर अपनी योजनाओं को लेकर विदेश चले गये। वहाँ उन्हें पूर्व का कटु अनुभव काम आया और कठोर अग्नि परीक्षाओं से गुजरते देश की स्वतंत्रता का बिगुल बजाते भ्रमण करने लगे। इंग्लैण्ड में उन्होंने इण्डिया हाउस का गठन किया। इस संस्था के माध्यम से वे भारतीय मूल के छात्रों को एकत्रित एवं संगठित कर उन्हें भारतीय संस्कृति में दीक्षित करना चाहते थे। उनके मार्गदर्शन में सभी के दिलों में देशभक्ति का अरमान और शिराओं में उमंगों का उफान उफनने लगा। वर्मा जी ने लंदन प्रवास के दौरान आये दादा भाई नौरोजी तथा काँग्रेस के संस्थापक सर ए.ओ. ह्यूम से भी संपर्क स्थापित किया। परंतु क्राँति का तीव्र वेग कहाँ समझौतावादी एवं मंथर गति के विचारों को प्रश्रय देता। भारतीय स्वतंत्रता को समर्पित वर्मा जी के नेतृत्व में युवाशक्ति अपने इस प्रयास पुरुषार्थ में और भी तीव्रगति से कार्य करने लगी।

वर्माजी ने लंदन में पढ़ रहे भारतीय छात्रों में उसी स्तर की क्राँतिकारी भावनाएँ आरंभ कीं तथा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ने की प्रेरणा भरी। छात्रों को प्रेरित एवं जागृति करने के लिए उन्होंने दयानंद, छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप के नाम पर तीन छात्रवृत्तियाँ आरंभ की। छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले छात्र अंग्रेजों की नौकरी नहीं करेंगे। ऐसी प्रतिज्ञा करते थे।

वर्मा जी लंदन में ही रहकर होमरुल लीग बनाई और इण्डियन सोसियोलॉजिस्ट नामक मासिक पत्रिका भी निकालने लगे। इसके साथ ही वे प्रतिवर्ष 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की जयंती भी मनाते। उनके इन प्रयासों ने इंग्लैण्ड सरकार की नींद हराम कर दी। अंग्रेज सरकार उनकी गिरफ्तारी का षड्यंत्र रचने लगी। चौकन्ने वर्मा जी ने इसकी भनक लगते ही अपना कार्य क्षेत्र स्थानान्तरित कर कर दिया और वे फ्राँस आ गये।

फ्राँस सरकार भी इनको किसी षड्यंत्र की योजना में गिरफ्तार करने पर विचार कर रही थी। ठीक उसी दौरान 31 मार्च 1930 को जिनेवा में उनकी स्थूलकाया पंचतत्व में विलीन हो गयी। आजीवन राष्ट्र को समर्पित इस अमर शहीद ने मृत्यु के समय भी व्रत नहीं त्यागा और अपने परिवारजनों के लिए वसीयत में लिखा- “मेरी समस्त सम्पत्ति को संस्कृति को समर्पित किसी यूनिवर्सिटी को अर्पित कर दी जाय, ताकि उसका सही उपयोग हो सके।”

सम्पत्ति के नाम पर इनके पास एक अच्छा-खासा पुस्तकालय था। वर्मा जी के मरणोपरान्त यह पुस्तकालय पेरिस विश्वविद्यालय विभाग को सौंप दिया गया। जहाँ आज भी हजारों छात्र उसके सान्निध्य में भारतीय संस्कृति और धर्म का परिचय व प्रकाश प्राप्त करते हैं। श्री श्यामकृष्ण वर्मा जी सदैव इतिहास के पृष्ठों पर एक मौन राष्ट्रभक्त व संस्कृति सेनानी के रूप में याद किये जाते रहेंगे।


किसी भ्रान्ति में न रहें, क्रान्ति होकर रहेगी

आजकल सारी दुनिया एक असाधारण संक्रमण प्रक्रिया से गुजर रही है। राजनैतिक, आर्थिक और अन्य क्षेत्रों में संकटग्रस्त स्थिति के बारे में रोज ही पढ़ा जाता है। पिछले महायुद्धों और आने वाले सम्भावित युद्धों के बारे में सोचकर हर एक का मन सशंकित है। विवेकवान और दिव्यदर्शी जानते हैं कि जिन महान परिवर्तनों के बीच हम आजकल गुजर रहे हैं, वैसा मानव जीवन के पूर्व इतिहास में कभी नहीं हुआ। इतिहास के विराट ज्ञान में इसकी कोई मिसाल नहीं दिखाई देती। हो सकता है कि हर कोई उन विषयों को कुछ भी महत्व न दे, जिनके बारे में रोज सुना, देखा और अनुभव किया जाता है लेकिन इन सबका व्यापक लेखा-जोखा करने पर विचारशीलों के मन में यह अनुभूति सघन हो जाती है कि हम एक महान क्रान्ति से गुजर रहे हैं, जिससे सारे मानव समाज का ढाँचा पलटना अवश्यम्भावी है। यह एक बहुत बड़ी बात है कि हम सब इस महापरिवर्तन के समय मौजूद हैं।

ऐसे में समय का तकाजा यही है कि हम अपनी समस्याओं पर इस दृष्टिकोण से विचार करें। दुनिया भर में राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक परिवर्तन अवश्य होंगे। यह बात सुनिश्चित तौर पर कही जा सकती है कि दुनिया के जिस पुराने ढाँचे के आधार पर चलकर सारा संसार पिछले वर्षों मुसीबत में फँसता रहा है, उसे बदलना ही होगा। यदि हम वर्तमान समस्याओं को सुलझाने, युद्धों को टालने, शान्ति और सुशासन स्थापित करने का प्रयत्न करना चाहते हैं तो हमें इस दुनिया की नई रचना करनी होगी। नवयुग का सूत्रपात ही एकमात्र हल है।

यह अनुभूति स्पष्ट है कि आज जो राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर संकट उभरा है, उसकी जड़े गहरी हैं। उसे मनोवैज्ञानिक कहिए या आध्यात्मिक, उसका सम्बन्ध मनुष्य की आत्मा से है। इससे अधिक एवं व्यापक उसकी व्याख्या सम्भव नहीं है। आज दुनिया एक गहरी आत्मिक उथल-पुथल से गुजर रही है। सम्प्रदायों के संकुचित अर्थों में नहीं, न ही पोथियों के पन्नों में कैद शब्दों के सीमित दायरे में इस सत्य को समझा जा सकता है। यह तो समस्त मानवीय चेतना का तीव्र मंथन है, जो व्यक्ति ही नहीं, राष्ट्रों की परिधि में भी व्यापक है। इसकी परिणति मानवता के आमूलचूल परिवर्तन के रूप में होगी।

यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है, साथ ही एक महान चुनौती है। हममें से प्रत्येक के सामने इसे स्वीकार करने के सिवा और कोई चारा नहीं। यह हम सबको अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि हम बड़ी-बड़ी घटनाओं के अति निकट खड़े हैं। एक के बाद एक तीव्र वेग से आने वाली घटनाएँ कष्ट में, मुसीबत में फँसा सकती हैं। परन्तु इस सबके बदले हमें एक नवीन और सुन्दर भविष्य आगत के रूप में देखना चाहिए। हिमालय के दिव्य क्षेत्र से आध्यात्मिक धाराएँ पुनः सक्रिय रूप से प्रवाहित हो चली हैं। इनके कल-कल निनाद में सतत् यही ध्वनि गूँजती है- “किसी भ्रान्ति में न रहें, क्रान्ति होकर रहेगी। समय रहते चेतें और स्वयं को तैयार करें।”


नादब्रह्म जिनकी सिद्धि थी

शिवरात्रि का पावन पर्व। मैसूर राजवंश की परम्परा के अनुसार तत्कालीन नरेश कृष्णराज (तृतीय) ओडेयर ने संगीत सम्मेलन का आयोजन किया था। आज के दिन सम्पूर्ण रात्रि भर जागरण करना राजपरिवार की अपनी परम्परा थी।

एक संगीतज्ञ महोदय द्वारा मैसूर में प्रचलित संगीत ‘पल्लवी’ गाया गया, जिसे दोहराने में श्रोता असफल रहे। गायन भी कुछ जमा नहीं। थोड़ी देर के लिए सभा में निस्तब्धता छा गई। राजसभा अपमानित-सी हुई। महाराज को यह सहन नहीं हुआ, उन्होंने राजसभा के सुविख्यात संगीतज्ञ चिकरामप्पा को सम्बोधित करते हुए व्यंग्य बाण फेंका- “क्या हमारे संगीतज्ञ को कंगन, सिन्दूर बाँटा जाय।”

महाराज की यह व्यंग्योक्ति सुनकर संगीतज्ञ का स्वाभिमान फुँकार उठा। उन्होंने धीर-गम्भीर स्वर में उनकी चुनौती स्वीकार करते हुए कहा- “महाराज इस गाने के लिए बड़ों की क्या आवश्यकता, मेरा सात वर्ष का शेषण्णा इसे गाएगा"

संगीत की स्वर-लहरियों को संपादित वातावरण में उठाने वाले इस पुष्पपादप को उसके कलाकार पिता ने अपने हाथों तीन वर्ष की आयु में ही दीक्षित कर दिया था। बालक शैषण्णा गाने लगा। सधा हुआ कण्ठस्वर, मुग्ध कर देने वाली रसयुक्त स्वरलहरी वातावरण में तैरने लगी। सभी श्रोता इस बाल कलाकार की कला साधना पर मुग्ध हो उठे। एक समाँ-सा बँध गया। संगीत की समाप्ति पर महाराज अपने आसन से उठे और बालक को अपनी भुजाओं पर उठा लिया। उन्हें सिंहासन पर अपनी गोद में बिठाकर मूल्यवान शाल के उपहार के साथ-साथ उनके द्वारा शुभाशीष दिये गये। “ हमारी सभा के गौरव की रक्षा करने वाला यह बालक अपने जीवन में यशस्वी संगीतज्ञ बने।”

कृष्णराज ओडेयर की यह शुभकामना साकार होकर रही। यह बालक आगे चलकर विश्वविख्यात पाश्चात्य संगीत सम्राट विथोवन तथा मोजार्ट की सानी का संगीतज्ञ बना। संगीत की चमत्कारी शक्ति के बारे में बैजूबावरा एवं संगीतराज तानसेन से जुड़ी जो बातें प्रचलित हैं कि संगीत की स्वर लहरियों में हिरन अपनी सुध-बुध खो बैठता है, मनुष्य अपने आन्तरिक विकारों को भूल जाता है, दीपक राग गाने से बुझे दीपक जल उठते हैं, मेघ-मल्हार गाने पर शारीरिक ताप मिट जाता है, ऐसे ही अनेक चमत्कारों की शक्ति उनके संगीत में विद्यमान थी।

ऐसा ही एक अवसर दिसम्बर,1924 के बेलगाम में हुए अखिल भारतीय काँग्रेस के अधिवेशन में आया। महात्मा गाँधी तथा देश के अन्य गणमान्य नेता इस अवसर पर उपस्थित थे। कर्नाटक प्रदेश अपने संगीत के लिए भारत में ही नहीं विदेशों में भी विख्यात है। अतः एक कार्यक्रम कर्नाटक संगीत का भी रखा गया था। अधिवेशन के अन्तिम दिन संगीत कार्यक्रम रखा गया था। इस दिन सोमवार था पूज्य बापू के मौन का दिन। कल डेढ़ घण्टे का संगीत कार्यक्रम था और अन्त में तीस मिनट का महान संगीतज्ञ शेषण्णा का वीणावादन। वीणा पर शेषण्णा की उँगलियाँ नृत्य कर रही थीं और उनसे फूट रही थीं आलोकित स्वर लहरियाँ। इस स्वर सागर में श्रोता मन्त्र होकर हो डूब-उतरा रहे थे। बीन की रागिनी पर लहराते हुए नाग किसी स्थिति में सब समय और स्थिति से अनभिज्ञ एक-दूसरे ही लोक में विचरण कर रहे थे। कलाकार तो अपनी कला के साथ अभिन्न हो चला था। उसकी तन्मयता का कोई छोर नहीं था।

आधा घण्टा बीत गया। समय खींचकर एक घंटे तक पहुँच गया। उसकी सुध न संगीत को थी, न अमृतपान करते श्रोताओं को उसका भान था। एक श्रोता का ध्यान अपनी घड़ी पर गया तो उसे समय का ध्यान आया। उसने पर्ची पर समय बीत जाने की सूचना बापू के पास पहुँचाई, किन्तु वे इस आनन्द से विरत होना नहीं चाहते थे। उन्होंने उत्तर लिखा- “कोई चिन्ता नहीं।” शेषण्णा के नादब्रह्म में लीन बापू ध्यानस्थ हो चुके थे। सचमुच इस साधन ने ‘शब्दब्रह्म’ की उपासना को ही इष्ट मानकर पूरी निष्ठा, श्रम और आत्मिक पवित्रता के साथ यह साधना की थी। उसी का परिणाम था कि वे संगीत की ऊँचाइयों तक पहुँच सके थे।

कार्तिक कृष्ण पंचमी सम्वत् 1952 के दिन जन्मे इस संगीतज्ञ को संगीत की प्रतिभा अपनी पैतृक सम्पदा रूप के मिली थी। एक तो पारिवारिक वातावरण व संस्कारों का प्रभाव था और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण उनकी कठोर नियमित साधना और इष्ट का अटूट विश्वास। 25 वर्ष की आयु में उन्होंने भारत भर में भ्रमण करके कर्नाटक संगीत का प्रचार किया। जहाँ भी वे गये, सामान्य जन से लेकर राजा-महाराजा तक उनसे प्रभावित हुए। मान-सम्मान धन-दौलत उपहार सब इस पर न्यौछावर हुए, किन्तु उन सबको उन्होंने निर्लिप्त भाव से ग्रहण किया। अपनी सम्पदा को उन्होंने ब्रह्म की सम्पदा समझकर विद्वानों, समाज सुधारकों व छात्रों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मुक्त हाथों से बाँट दी। ऐसे निष्काम भाव को धारण करके ही उन्होंने वीणा पाणि का वरद्हस्त अपने मस्तक पर धारण किया था। चौदह वाद्ययन्त्रों पर उनका अधिकार था। सबमें वे निष्णात थे, फिर भी वीणावादन में उन्हें विशेषता हासिल थी। देशभर के राजा-महाराजाओं से लेकर जॉर्ज पंचम तक और सामान्य जनता से लेकर तिलक, नेहरू, गाँधी जी, महामना मालवीय, सरोजिनी नायडू और रवीन्द्र नाथ ठाकुर तक उनके वीणावादन पर मुग्ध थे। उनकी ख्याति देश, देशान्तरों में भी फैली। लंदन, पेरिस, बर्लिन आदि नगरों के कला-संस्थाओं से उनके पास आमन्त्रण आये किन्तु वे जा नहीं सके।

इतनी ख्याति पाकर भी वे नितान्त निरभिमानी रहे। स्वयं को जीवन भर संगीत का विद्यार्थी मानते रहे। उनके संगीत की चमत्कारी शक्ति में उनकी भीतर-बाहर की निर्मलता तथा आचरण की पवित्रता का बहुत बड़ा हाथ था। 74 वर्ष की अखण्ड संगीत साधना करके सम्वत् 2026 की आषाढ़ पूर्णिमा के दिन स्वरलहरी विराट नाद में लीन हो गई। संगीत की उच्चता और पवित्रता को आज के वातावरण में संव्याप्त वासना एवं कामुकता के पंक से कलुषित कर उसकी शक्ति का दुरुपयोग करने के पाप से बचने के लिए आज के तथाकथित संगीतकार उनके जीवन से कुछ प्रेरणा लें तो वे संगीत विद्या व संगीतकार दोनों की गरिमा की रक्षा कर सकते हैं।


भावसंवेदना के जागरण की बात अब वैज्ञानिकों के मुख से सुनें

मानव जीवन का समस्त क्रिया क्षेत्र बहिरंग में बुद्धि पर आधारित रहा है। शारीरिक समर्थता-बलिष्ठता भौतिक वैभव के बाद तीसरी महत्वपूर्ण आवश्यकता बौद्धिक कुशलता किसी भी क्षेत्र में सफलता अर्जन हेतु मानी गई है। यों देखा जाय तो बीसवीं सदी बुद्धि के चरम उत्कर्ष की सदी रही है। सारे आविष्कार इसी डेढ़ सौ वर्षों की अवधि में हुए हैं व बौद्धिक विकास की पराकाष्ठा के परिचायक हैं। ऊपर वर्णित तीन विभूतियों को देखते हैं तो एक खालीपन-सा प्रतीत होता है, जब हम आज के विकास में कुछ खोखलापन चारों ओर तर्क-वितर्कों का का जाल, धूर्तता की चालबाजियाँ तथा बढ़ता हुआ पारस्परिक क्लेश देखते हैं। इसके लिए मानव की चौथी विभूति का स्मरण आता है, जिसे ऋषिगणों ने बहुत ही अधिक महत्वपूर्ण मानकर मानवीय सत्ता को ‘रसौ वै सः’ की उपाधि से अलंकृत किया था। वह विभूति है, भावसंवेदना। जब तक विचार शक्ति के साथ सजल भावसंवेदना व भावनाओं की शक्ति का समन्वय नहीं होता- बौद्धिक विकास अधूरा माना जाता है। भाव रूपी विचार सामर्थ्य के विकास की क्षमता को आज वैज्ञानिक इमोशनल क्वोशेण्ट(ई.क्यू.) नाम देते हैं एवं इसे आई.क्यू.(इंटेलीजेंट क्वोशेण्ट-बुद्धिलब्धि की तुलना में अधिक महत्व देते पाये जाते हैं।

वैज्ञानिक प्रगति की चरम स्थिति में पहुँचे इस युग के वैज्ञानिक भी अब स्वीकारने लगे हैं कि विचारबुद्धि की उड़ान मात्र ही पर्याप्त नहीं है। इसके लिए इस व्यक्ति में संवेदनशीलता एवं सहानुभूति का होना भी अत्यावश्यक है। सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट फ्रास्ट का कथन है कि आज मनोरोग बड़ी तेजी से पनप ही इसलिए रहे हैं कि करोड़ों डॉलर का व्यवसाय करने वाला व्यापारी व्यवस्था सँभालने वाला कुशल मैनेजर समग्र व्यक्ति नहीं है। भाव संवेदना का जीवन में अभाव उसके पूरे व्यक्तित्व को विखण्डित बना देता है व एक दर्द भरा त्रासदी युक्त जीवन जीते उन्हें देखा जा सकता है। ई.क्यू.(भावनालब्धि) का होना, न होना ही वह भाव है, जो किसी व्यक्ति को सर्वांगीण सफलता के, एक पूर्व स्वस्थ समग्र विकास के शीर्ष पर पहुँचाने का पैमाना अब माना जाने लगा है।

विकसित ई.क्यू. ही मानवीय मूल्यों को पहचानने, दूसरों का दर्द समझने, जीवन लक्ष्य को तदनुसार कटिबद्ध करने, आन्तरिक शक्तियों को बढ़ाने एवं सम्पदा का सुव्यवस्थित सुनियोजन करने का कार्य करता है।

एवमैन एवं रॉबर्ट कूपर ने अपने बहुचर्चित शोधग्रंथ एक्जीक्यूटिव ई.क्यू. में इस पर अपना गहन मन्थन प्रस्तुत कर प्रबन्धन विधा को नये आयाम प्रदान किये हैं। उनके अनुसार अकेला बौद्धिक चिन्तन मानव जीवन को शुष्क व नीरस ही नहीं विकृतियों से पूर्ण भी बना देता है। कई प्रकार के दुर्व्यसन पलने हेतु भूमि भी इससे तैयार हो जाती है। यही नहीं बहुविध प्रशिक्षित ऑफिसर्स, मैनेजर्स, व्यापारीगण आदि के पारिवारिक जीवन प्रायः विश्रृंखलित से देखे गये हैं। वे लिखते हैं कि असफल विवाह, विवाहेत्तर सम्बन्धों की बहुलता ऐसे व्यक्तियों में अधिक मिलती है। इनकी सन्तानें भी कई दुर्व्यसनों का शिकार होती देखी गई हैं। वस्तुतः दैनन्दिन जीवन की प्रतिपल की घटनाओं का अगर सूक्ष्म विश्लेषण किया जाय तो ज्ञात होता है कि मानव जीवन का सबसे बड़ा सम्बल हृदय है न कि मस्तिष्क। भावनाएँ सीधे हृदय के तारों को स्पर्श कर ऊर्जा के अनन्त स्रोतों को खोल देती हैं। यदि विचार शक्ति आनन्द की इस गंगोत्री से जुड़ जाए तो मनुष्य की प्रसुप्त पड़ी अनेकानेक विभूतियों का जाग्रत होने में मदद मिलती है। मनोवैज्ञानिक अब इस निष्कर्ष पर पहुँचने लगे है कि ई.क्यू. जीवन के विराट अनुभव, समझदारी एवं बहुमुखी व्यक्तित्व के समुच्चय की कुँजी है। इमोशनल क्वोंशेण्ट आन्तरिक एवं वाह्य जीवन को जोड़ने का एक महत्वपूर्ण कार्य भी करता है, जो आज की सर्वोपरि आवश्यकता है। संवेदना एवं विचारणा का यह समन्वय व्यक्तित्व के बहुआयामी पक्ष को सामने लाता है। इससे सामाजिक दायित्वों, नैतिक मूल्यों के प्रति प्रतिभाओं में जागरूकता भी आती है, जो कि आज की एक अनिवार्य आवश्यकता मानी जानी चाहिए।

अमेरिका में प्रबन्धन विधा के मानदण्ड अब पूरी तरह बदल गये हैं। वहाँ पर व्यापार, प्रशासन, वैज्ञानिक, सामाजिक आदि प्रायः सभी क्षेत्रों में आई.क्यू. के स्थान पर ई.क्यू. को मान्यता मिलने लगी है। ऐसा नहीं कि ई.क्यू. आई.क्यू. का निरस्त करता है वरन् इसे और भी प्रभावशाली एवं समग्र बनाने का प्रयास करता है। ई.क्यू. के द्वारा सफल व्यक्ति ही सही अर्थों में प्रभावशाली हो सकता है। रॉबर्ट कूपर के अनुसार, एक संवेदनशील व्यक्ति की बुद्धि ही समुचित न्याय एवं उचित निर्णय सुना सकती है। इन्हीं सब उपलब्धियों के कारण अमेरिका का विश्व प्रसिद्ध रिसर्च सेंटर ‘ई.सी. सिस्टम इन कार्पोरेशन सेन्फ्रांसिस्को’ ने सबसे प्रथम ई.क्यू. मैप का निर्माण किया है। इस संस्था के एस्थर एन.आरेलेई और कारेन ट्रोकी के नेतृत्व में एक वैज्ञानिक दल ने अमेरिका और कनाडा के लगभग दो हजार संगठनों का गठन सर्वेक्षण कर उसके आधार पर ई.क्यू मैप तैयार किया है। अब इसकी लोकप्रियता क्रमशः बढ़ती चली जा रही है। यह मैप अब यूरोप के सभी देशों में तथा जापान में भी उपयोग में लाया जा रहा है। इससे अब तक लाखों की संख्या में उच्च पदस्थ मैनेजर एवं अधिकारियों का सफल परीक्षण किया जा चुका है। इसमें सफल अधिकारियों की कार्यक्षमता कई गुना अधिक बढ़ी देखी गई है। ई.क्यू. मैप के क्वोशेण्ट मीटर पर सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाला व्यक्ति अति संवेदनशीलता के साथ तीक्ष्णबुद्धि सम्पन्न वाला माना जाता है।

सफलता के लिए संघर्ष की साधना के साथ आन्तरिक जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता भी अब महत्वपूर्ण मानी जाने लगी है। इसी भाव से अनुप्रेरित होकर जेम्स मेक ग्रेगर वर्न्स ने कहा है- आज प्रतिष्ठित व्यक्ति भी कोर बुद्धिवाद से निकलकर किसी सुन्दर भाव संसार में पनाह लेना चाहते हैं। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि जितने भी बड़े पदाधिकारी होते हैं, उनका वैयक्तिक एवं पारिवारिक जीवन लगभग असफल एवं असंतुलित-सा रहा है। वर्न्स ने इसका कारण स्पष्ट करते हुए कहा है कि आई.क्यू. मनुष्य के मस्तिष्क के केवल चार से सात प्रतिशत भाग को ही स्पर्श करता है। संसार मात्र दिमाग के इन केन्द्रों तक ही सीमित नहीं है। शेष 94 से 97 प्रतिशत मस्तिष्क का क्षेत्र अभी भी अनछुआ और अविज्ञात-सा पड़ा हुआ है। ई.क्यू. यानी भावना क्षेत्र का विकास इसी अविज्ञात क्षेत्र को जाग्रत करने का एक प्रयास है। जीवन और बहिरंग जगत का बहुत बड़ा भाग संवेदना से सम्बन्धित है। ई.क्यू के प्रयोग इसी कारण प्रभावशाली व सफल सिद्ध हो रहे हैं।

विक्टर बन्धुओं द्वारा लिखित ‘बिल्ड योर ब्रेन पॉवर' नामक पुस्तक में उल्लेख है कि मनुष्य अपने संपूर्ण जीवनकाल में मस्तिष्क के मात्र एक हजार भाग का ही उपयोग कर पाता है। शेष बुद्धि इसके दायरे से बाहर होती है। इसी बात की व्याख्या करते हुए आर.जे. र्स्टन वर्ग ने भी अपनी कृति ‘इमोशनल इन्टेलिजेन्स में लिखा है कि यह दुनिया मात्र निष्क्रिय बुद्धि द्वारा नहीं देखी जा सकती। इस बुद्धि से दैनिक जीवन के हर पहलू को परखा नहीं जा सकता है। यह सब भावपूरित विचारधारा से ही संभव हो सकता है। आज के बौद्धिक ऊहापोह में जकड़ी मानवता को बुद्धि की आवश्यकता तो है ही, परन्तु यही सर्वमान्य मानदण्ड नहीं है। एकांगी विकास के कारण भले ही सफलता के एक पक्ष को प्राप्त कर लिया जाए, परन्तु इसका परिणाम किसी से छुपा नहीं है। आधुनिक अर्थप्रधान इस युग में बेशुमार दौलत के बावजूद शाँति, सहानुभूति कहाँ है? समाज के बहुमुखी विकास से नीतिगत व्यवस्था कहाँ तक सफल हो सकी है? नित्य नये यंत्रों, तकनीकी आविष्कारों के बाद भी इतनी अराजकता, आतंक व कटुता का वातावरण किसने पैदा किया, इस अनुत्तरित प्रश्न के पीछे झाँकने पर एक ही चीज़ दिखाई देती है और वह है बुद्धि का निरंकुश उपयोग। इसी बात को लेकर दार्शनिक से लेकर समाजशास्त्री तक एवं अधिकारी से लेकर न्यूरोसाइंटिस्ट तक सभी विचारों के साथ-साथ भावपक्ष के समन्वय की बात करते हैं। रॉबर्टकूपर ने तो बड़े स्पष्ट ढंग से घोषणा की है कि बीसवीं सदी की उपलब्धि यदि आई.क्यू. है, तो इक्कीसवीं सदी ई.क्यू की होगी।

भावसंवेदना का अभाव मनुष्य को क्रूर और बर्बर बना देता है। आज का अति सभ्य समाज और संसार संभवतः पुराने युग की ओर अग्रसर होता प्रतीत हो रहा है। आयोवा कॉलेज ऑफ मेडिसिन, यूनिवर्सिटी के न्यूरोलॉजी विभाग के अध्यक्ष आर. डोमसीसो के अनुसार वर्तमान मानवजाति के असामान्य और असभ्य व्यवहार का कारण है, संवेदनशून्यता। इन्होंने आगे स्पष्ट किया है कि मस्तिष्क के विचार केन्द्र ‘रीजनिंग’ तथा इसके लिए जिम्मेदार तंत्र ‘डिसीजन मेकिंग’ संवेदना और भावना से जुड़े होते हैं। इनका पारस्परिक साम्य ही उस संतुलन का आधार है, जिसे गीताकार ने आदर्श मानकर योग को ‘समत्वं योग उच्यते’ उक्ति से परिभाषित किया है। इन दोनों के मध्य आये व्यतिक्रम के कारण ही सारी विसंगतियाँ उठ खड़ी हुई हैं। इस समस्या का समाधान हार्वर्ड मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट रोसेन्थाल ने सुझाया है कि विचार और भाव के सुनियोजित सम्बन्धों से बुद्धि की क्षमता और शक्ति में असाधारण रूप से वृद्धि हो जाती है। यही भावपूर्ण बौद्धिक ऊर्जा एक संतुलित व्यक्तित्व का निर्माण करती है।

भावनाशील व्यक्ति ही समझदारी एवं ईमानदारी को जीवन का एक अंग बनाते हैं। भावसंवेदना लबालब व्यक्ति एक ओर जहाँ आन्तरिक जीवन में प्रसन्न और शाँत रहते हैं, वहीं उनकी बुद्धि बाहरी दुनिया के प्रति सचेत एवं जागरूक होती चली जाती है। केवल भावना का होना भी उतनी ही हानि पहुँचा सकता है, जितना कि बौद्धिक निरंकुशता। इस तरह भाव अंतर्जगत को संचालित करता है, तो विचार बाह्मजगत् को व्यवस्थित करता है। ई.क्यू. दोनों के बीच साम्य एवं सन्तुलन बिठाता है। एम. स्काट फिट्ज गेराल्ड के अनुसार मानव मस्तिष्क में एक तरह के दो विचार उठते हैं। इन्हीं को इमोशन और आइडिया कहते हैं। अगर इन दोनों का तारतम्य रहे एवं व्यक्ति इन भाव तरंगों का सूक्ष्म विश्लेषण करे, जिसे मोटी बुद्धि नहीं जान सकती तो उसकी अन्तर्दृष्टि विकसित होने लगती है, जो जीवन के समस्त आयामों को सफलतापूर्वक देख सकती है। अमेरिका के क्राँतिकारी विचारक पित्रिम सोरोकीन ने तो यहाँ तक कहा है कि इमोशन एवं इन्ट्यूशन ही वह नींव है, जिस पर दर्शन और मनोविज्ञान का भवन खड़ा हो सका है। ग्लोबल एथिक्स इंस्टीट्यूट के संस्थापक रुशमोर कीडर का कहना है कि अनियंत्रित बुद्धि के प्रयोगों ने ही हिटलर, मुसोलिनी, स्टालिन जैसे क्रूर निरंकुश नायक विश्व को इसी सदी में दिए हैं।

जिस तथ्य को आज वैज्ञानिक भाषा में प्रतिपादित कर इतना कुछ जोर देकर प्रबंधन कला का अंग बनाए जाने की आवश्यकता बतायी जा रही है, यह चिरपुरातनकाल से हमारे ऋषिगण प्रतिपादित करते आए हैं। उनके अनुसार भावसंवेदना जब ज्ञान का अनुदान करती है, तब ही ज्ञान सार्थक होता है। “श्रद्धया सत्यमाप्यते” से आशय यही है कि श्रद्धातत्व से, भावशक्ति से अभिप्रेरित व्यक्ति ही सत्य को, इष्ट को, लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। यज्ञीय जीवन जीने के लिए मनुष्य को उसके आविर्भाव काल से ही ऋचाएँ शिक्षण देती आई हैं। यज्ञीय जीवन अर्थात् परमार्थ के लिए किया गया सत्कर्म। परमार्थ की भावना का जागरण अर्थात् अन्दर के भावसंवेदना से सराबोर होने के कारण नेतृत्व क्षेत्र में अत्यधिक सफल सिद्ध हुई है। आज पुनः भारतीय अध्यात्म का संदेश अपने बदले हुए रूप में ई.क्यू. को विकसित करने के रूप में वैज्ञानिकों की शब्दावली बनकर आया है। यदि यह भाषा हमें समझ में आ जाए व हमारी जीवनशैली वैसी बन जाए, तो जीवनरूपी उद्यान में अगणित रंगीन सुगंधि भरे पुष्प खिलने लगें। व्यक्तित्व सर्वांगपूर्ण विकसित हो, पारम्परिक प्रतिद्वंद्विता के स्थान पर सहयोग-सहकार की वृत्ति चारों तरफ दिखाई देने लगे। मानव में देवत्व, धरती पर स्वर्ग जैसे वातावरण की भविष्यवाणियाँ सार्थक सिद्ध होने लगेंगी। देर से ही सही, मनुष्य आ तो रहा है सही रास्ते पर, हमें उस परमसत्ता को इसके लिए कृतज्ञता ज्ञापित करना चाहिए।


यह दुनिया बन रही है, एक पागलखाना

मनोरोग दिखाई नहीं पड़ते। उनकी हानि प्रत्यक्ष नहीं है। ध्यान देने पर समझ में आती है। साधारणतया तो ऐसा लगता है कि मानसिक रोगी ढीठता दिखाता और उच्छृंखलता बरतता है। यह प्रतीत ही नहीं होता कि यह किसी विकृति से ग्रसित होने के कारण अपनी भौतिक क्षमता गँवाता और विकृतियों के दलदल में फँसता चला जा रहा है। बज रोग का आभास ही नहीं, तो उसका इलाज कौन करे? कई बार महिलाओं की बीमारियों को बहानेबाज़ी कहकर टाल दिया जाता है। मानसिक रोगों की बात तो इसलिए भी उपेक्षा में पड़ी रहती है कि उनकी उपस्थिति की कोई जानकारी तक सर्वसाधारण को नहीं है, फिर भी यह एक तथ्य है कि मानसिक व्याधियों से मनुष्य समाज का जो अहित होता है, वह शारीरिक बीमारियों से होने वाली हानि की तुलना में किसी भी प्रकार कम भयंकर नहीं है। शरीर के पीड़ित या अपंग रहते संसार के असंख्य व्यक्तियों ने अति महत्वपूर्ण काम करने में सफलताएँ पायी हैं, पर ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं हुआ, जो मानसिक दृष्टि से अपाहिज होने पर कुछ कहने लायक सफलता प्राप्त कर सका हो। सच तो यह है कि ऐसे लोग अपनी यात्रा तक शान्ति और सम्मानपूर्वक पूरी नहीं कर पाते।

महर्षि अष्टावक्र आठ जगह से कुबड़े थे। चाणक्य को अति कुरूप कहा जाता है। सुकरात की कुरूपता भी प्रख्यात है। सूरदास और विरजानन्द अंधे थे। प्रसिद्ध खगोलवेत्ता स्टीफनहॉकिन्स अपाहिज हैं, उनकी दोनों टाँगे बेकार हैं और वे पहियेदार कुर्सी पर चलते हैं, इतने पर ही ब्लैकहोल्स के संबंध में उन्होंने जो शोध-अनुसन्धान किए, उसने बौद्धिक प्रखरता की दृष्टि से उन्हें आइन्स्टीन के समकक्ष प्रतिष्ठित कर दिया है। ऐसे असंख्य प्रसंग हैं, जिनमें अस्पतालों में पड़े-पड़े लोगों ने महान कृतियाँ तैयार की हैं। शरीर एक उपकरण है, पर मस्तिष्क की स्थिति सूत्र-संचालक की है। मस्तिष्क लड़खड़ा जाने पर तो मनुष्य अपने और साथियों के लिए भार बन जाता है, जबकि अंधे और अपंग भी अपनी उपस्थिति से परिवार को कई तरह लाभान्वित करते रहते हैं।

पूर्ण पागलों की संख्या तो संसार में इस अनुपात में बढ़ रही है, जिसे देखते हुए दुनिया की सभी बीमारियों की दौड़ उससे पीछे रह गई है। खुले फिरने वाले पागलों की संख्या और उनके द्वारा जनसाधारण को होने वाली असुविधा ऐसी है, जिसे दूर करने के लिए पागलखानों की बड़ी संख्या में आवश्यकता अनुभव की जा रही है। जेलखानों से अधिक पागलखाने बनें, तब उपद्रवी पागलों के द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले संकटों से बचा जा सकता है। अधपगले, सनकी, असंतुलित, अस्त-व्यस्त अव्यवस्थित, अदूरदर्शी लोगों की संख्या तो इतनी बढ़ी चढ़ी है कि मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से सही मनुष्य की संख्या सामान्य आबादी का एक छोटा अंश ही मिल सकेगा। शारीरिक दृष्टि से जितने लोग रुग्ण हैं, मानसिक विकृतियों से ग्रसित रोगियों की संख्या उससे कम नहीं, अधिक ही मिलेगी। इसका अन्दाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी अस्पतालों में आधे से भी अधिक बिस्तर मानसिक रोगियों के लिए सुरक्षित रहते हैं, जिन पर प्रतिवर्ष एक अरब डॉलर से भी ज्यादा खर्च आता है।

आखिर बढ़ते मनोरोगों का कारण क्या है? फ्राँसीसी मनःशास्त्री हाल्ब वाच्स ने इसका जवाब अपनी पुस्तक ‘लेस काँजेज ड्यू स्यूसाइड’ में दिया है। वे कहते हैं कि निश्चित रूप से इसका निमित्त भौतिक दरिद्रता नहीं है। यदि ऐसी बात रही होती, तो पिछड़े और गरीब कहे जाने वाले देशों में इस परिणति बढ़ी-चढ़ी आत्महत्याओं के रूप में सामने आती, किन्तु अध्ययनों से जो तथ्य सामने आए हैं, वह इस बात के प्रमाण हैं कि समृद्ध देशों में मानस रोगों की व्यापकता अधिक भयावह है। वहाँ नशाखोरी और आत्महत्या का जो अनुपात देखा गया है, वह निर्धन देशों की तुलना में बहुत बड़ा है। ऐसे ही निष्कर्ष सम्पन्न लोगों और अविकसित एवं असभ्य कही जाने वाली जनजातियों के संबंध में भी आए हैं। विपन्न लोगों में आत्महत्याएँ शायद ही कभी होती हों, जबकि सम्पन्न समुदाय इससे बुरी तरह ग्रसित है।

आत्महत्या और मानसिक असंतुलन के बीच संबंध-सूत्र जोड़ते हुए एच. गोल्धमर एवं ए. मार्शल अपने ग्रन्थ ‘साइकोसिस एण्ड सिविलाइजेशन’ में लिखते हैं कि यह सच है कि मानसिक अस्थिरता सदैव आत्महत्या के रूप में सामने नहीं आती, पर अधिकाँश अवसरों पर इसकी अन्तिम परिणति आत्मघात ही होती है। वे कहते हैं कि जब व्यक्ति परिस्थिति और परिवेश से तालमेल बिठाने में असमर्थ होता है, तो उसका मन उस दुरावस्था को छिन्न-भिन्न कर देने के लिए विद्रोह करता है, पर आदमी का स्वयं का मनोबल इतना सुदृढ़ नहीं होता कि वह उस अवस्था से लोहा ले सके। परिणाम यह होता है कि इस निरन्तर द्वन्द्व के कारण उसकी मानसिक संरचना पूरी तरह ध्वस्त हो जाती है, जो अन्ततः आत्महत्या का कारण बनती है।

इस प्रकार किसी भी समाज और समुदाय में आत्महत्याओं और यहाँ तक मद्यपों की बढ़ी-चढ़ी संख्या इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उक्त समुदाय बड़े पैमाने पर मानसिक रुग्णता का शिकार है। प्रसिद्ध मनःशास्त्री एरिक फ्राँम ने भी इस तथ्य को परोक्ष रूप से स्वीकारा है। अपनी रचना ‘द सेन सोसाइटी’ में वे लिखते हैं कि यों तो मद्यपान सभ्य समाज में एक प्रकार का फैशन-सा बन गया है, पर फैशन के कारण शराब पीने वालों की संख्या गम गलत करने के लिए इसका सहारा लेने वालों की तुलना में एकदम नगण्य है। वे कहते हैं कि विश्वभर में मद्यपान के आँकड़े इस बात के प्रमाण हैं कि जिन देशों में मद्यसेवियों का प्रतिशत जितना ज्यादा है, वहाँ आत्महत्याओं का परिमाण भी उसी अनुपात में अधिक है। यदि मद्यपान को शौक और सभ्यता का प्रतीक माना जाए एवं उसे ‘स्टेट्स सिम्बल' का प्रमुख आधार भी स्वीकार लिया जाए, तो भी यह स्पष्ट कर पाना मुश्किल होगा कि क्यों शराब पीने वाले अधिकाधिक लोगों के समुदाय में अधिकाधिक आत्मघाती होते हैं। सच्चाई तो यह है कि मौज-मस्ती के लिए कम, दुःख-दर्द भुलाने के लिए इसका अवलम्बन लोग अधिक लेते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका, स्विट्जरलैंड, डेनमार्क, फिनलैण्ड, स्वीडन, फ्राँस आदि में आत्महत्याओं का औसत सर्वाधिक है और तदनुसार मद्यसेवन करने वाले लोगों का प्रतिशत भी विश्व के अन्य राष्ट्रों की तुलना में वहाँ अधिक है। हमारे देश में मद्यनिषेध के कतिपय असफल प्रयासों के बाद अब धीरे-धीरे सारे समाज पर पुनः सुरा की मादकता, साथ में उससे जुड़े रोगों में बढ़ोत्तरी आती जा रही है।

मद्यपान मानव समाज की प्रगति एवं सुव्यवस्था में अवरोध ही कहे जा सकते हैं। खेद इस बात का है कि गरीबी, बीमारी, अशिक्षा, उद्दण्डता से भी अधिक कष्टदायक और भयानक बढ़ती हुई विक्षिप्तता की हानि को समझने और उसकी रोकथाम करने के लिए प्रयत्न नहीं किया जा रहा है।

अपराध भी वस्तुतः एक प्रकार का आवेश है, जिन्हें मनुष्य एक प्रकार के उन्माद में ग्रसित स्थिति में करता है। चोर-उचक्के अपने कुकृत्यों की हानियाँ समझते हैं और उन पर पछताते भी हैं, छोड़ना भी चाहते हैं, भलमनसाहत के रास्ते पर चलने पर लोग कितनी प्रगति कर गए और कितने सम्मानित हुए, यह तथ्य वे आँखों से देखते हैं, दूसरे उन्हें समझाते और वे बात को समझते भी हैं, कुछ समय उनका विवेक जाग्रत भी रहता है और भले आदमियों की तरह रहते भी हैं, फिर कभी ऐसी उमंग उठती है कि रोके नहीं रुकती, यहाँ तक कि व्यक्ति उस छोड़े हुए कार्य को करने के लिए एक प्रकार से विवश ही हो जाता है और फिर उसे कर ही गुजरता है। समाजशास्त्री इस धृष्टता-दुष्टता आदि का नाम दे सकते हैं, पर मनोरोग शास्त्र की दृष्टि से यह व्यक्ति की असहाय स्थिति है, ठीक वैसी ही जैसी सिरदर्द से आक्रान्त मनुष्य की होती है। विश्लेषण करने पर उनकी मनःस्थिति सामान्य लोगों जैसी नहीं होती, वरन् असामान्य और असन्तुलित पायी जाती है।

मानसिक दृष्टि से सन्तुलन और सामंजस्य ही स्वस्थता का चिन्ह है। मस्तिष्क के भीतर अगणित घटक हैं और वे एक दूसरे के साथ सुसम्बद्ध रहकर ही संयुक्त सहयोग से उत्पन्न क्षमता द्वारा अपने हिस्से के कार्य ठीक तरह से पूरे कर पाते हैं। यदि उनकी सुसम्बद्धता कहीं लड़खड़ाती है और तालमेल बिगड़ता है तो फिर चित्र-विचित्र प्रकार के छोटे-बड़े मानसिक रोग आरम्भ हो जाते हैं। मनोवैज्ञानिकों ने संतुलन के चार पक्ष गिनाये हैं- (1) इफेक्ट- सतर्कता, सजगता। (2) थाँठ - विचार प्रवाह, कल्पना। (3) बिहेवियर - व्यवहार, अभ्यास (4) मूड - रुझान, उत्साह। इनमें से किसका सन्तुलन किसके सम्मिश्रण में कितनी मात्रा में गड़बड़ाया, इसी आधार पर मनोरोगों के अनेक स्वरूप बनते और लक्षण प्रतीत होते हैं। इनके लक्षण इस प्रकार देखे जाते हैं-

(1) सतर्कता के अभाव में मनुष्य यह निर्णय नहीं कर पाता कि लोग उसकी किस क्रिया के बारे में क्या करेंगे, क्या सोचेंगे, किस कार्य का परिणाम उसके लिए क्या होगा। अपनी मर्जी ही उसे सबकुछ लगती है। लोगों की प्रतिक्रिया एवं क्रिया के परिणाम उसे सूझते ही नहीं। कल्पना की दौड़ दूर तक नहीं जाती। वर्तमान समय और अपना मन इन दोनों में ही वह उलझकर रह जाता है, फलतः ऐसे कृत्य करता है, जो उपहासास्पद होते हैं, बेतुके और हानिकारक भी।

(2) विचार प्रवाह में गड़बड़ी पड़ जाने से कल्पनाएँ अनियन्त्रित हो जाती हैं। क्या सोचना उपयुक्त है, क्या नहीं? क्या संभव है, क्या असंभव? इस निष्कर्ष पर पहुँचने में वे परले दर्जे की नासमझी बरतते हैं। साधनों और परिस्थितियों का ज्ञान न रहने से वे अपनी हर कल्पना को सफलतापूर्वक संभव हो सकने योग्य मान बैठते हैं। यह भी अनुमान नहीं लगा पाते कि इन कल्पनाओं को पूरा करने के लिए कितना समय लगेगा और क्या साधन जुटाने होंगे। संक्षेप में उनकी मनःस्थिति शेखचिल्ली जैसी हो जाती है, जो कुकल्पनाओं की आदतवश जीवन में लाभ कम, हानि ही अधिक उठाता रहा।

(3) अनुमान तंत्र में गड़बड़ी होने से मनुष्य के लिए यह अन्दाज लगाना कठिन पड़ता है कि दूसरे लोगों का व्यवहार उसके साथ कैसा और किस उद्देश्य से प्रेरित है। शत्रुओं को मित्रवत मानने का पागलपन भी कई बार पाया जाता है और अनेक बार मित्र को शत्रु मानने की मूर्खता कर बैठते हैं एवं भयभीत बने रहते हैं ऐसे लोग निरन्तर इसी उधेड़बुन में पड़े रहते हैं कि अमुक व्यक्ति अपने शत्रु बने हुए हैं, जादू टोना कर रहे हैं, मारने, जहर देने, मिटा देने जैसे षड्यन्त्र रचे हुए हैं। यह वहम अनेक प्रकार का हो सकता है। कितनों को ही दुर्घटना, मृत्यु, आक्रमण, हानि, विछोह, जेल आदि का भय सताता रहता है। मनःशास्त्र की भाषा में इसे ‘फोबिया’ कहते हैं। ऐसे फोबियाग्रस्त लोग हमेशा अशान्त बने रहते हैं और यह निर्णय कर पाने में अक्षम होते हैं कि किस कठिनाई का निराकरण किस प्रकार करना चाहिए एवं किन समस्याओं का समाधान किससे पूछना चाहिए? ऐसे लोग अपने संबंध में तरह-तरह के गलत अनुमान लगाते रहते हैं।

(4) मूड गड़बड़ाने से व्यक्ति नशेबाजों की स्थिति में चला जाता है। कभी तो पूरे उत्साह में, प्रसन्नता में उन्हें पाया जाता है और कभी चिन्ताओं-निराशाओं में इस कदर डूबते हैं, मानो आसमान इन्हीं के ऊपर टूट पड़ा या टूटने वाला है। ‘मूड’ से संचालित व्यक्ति कभी एकरस नहीं रह पाता।

मस्तिष्क यंत्र को प्रकृति ने जितना उपयोगी बनाया है, उतना ही उत्तम उसकी सुरक्षा का प्रबन्ध भी किया है। उसके भीतर ही ऐसी व्यवस्था है, जहाँ छोटी-मोटी गड़बड़ी की कोई पहुँच न हो सके। आमतौर से मस्तिष्क को सोचने का सही तरीका मालूम न होने से ही परेशानियाँ पैदा होती हैं, जो आरंभ में सामान्य और उपेक्षणीय रहते हुए भी बाद में भीषण रूप धारण कर लेती हैं। मनःक्षेत्र का सुसंचालन कर सकने वाला चिन्तन क्रम धर्म और अध्यात्म के तत्त्वज्ञान से जुड़ा हुआ है। उसे अपनाया जा सके, तो संसार में फैले पागलपन और असंतुलन से छुटकारा मिल सकता है।


कद नहीं, हमारे आदर्श ऊँचे बनें

असाधारण होना मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति है। सामान्य आदमी ऊँचा उठने पर असामान्य कहलाने लगता है। छोटा आदमी जब बड़ा बनता है, तब उसका खूब स्वागत-सम्मान होता है। इनसान का अपना एक औसत कद है। उसको जब वह पार करता है, तो वह भी आश्चर्य और आकर्षण का केन्द्र बन जाता है।

अमेरिका के रॉबर्ट वैडलो के साथ यही हुआ। जब वह पैदा हुआ, तब एकदम सामान्य था। वजन लगभग 4 किलो ग्राम. था, किन्तु एक वर्ष का होते-होते उसके भार में असामान्य वृद्धि हुई। वह 20 कि.ग्राम. से भी अधिक वजनी हो गया। पाँच वर्ष की अवस्था में उसका कद और वजन दोनों ही असाधारण हो गए। अब उसकी लम्बाई एक औसत व्यक्ति जितनी (5 फुट 4 इंच) थी एवं भार करीब 48 कि.ग्राम. था। देखने में भी वह उस उम्र के बच्चों की तुलना में अधिक वयस्क दिखलाई पड़ने लगा। साढ़े पाँच वर्ष की अवस्था में वह पाठशाला में भर्ती हुआ। वहाँ उसके लिए अलग साइज की बेंच और डेस्क की व्यवस्था करनी पड़ी। वैडलो अन्य बच्चों की तरह सामान्य बुद्धि का बालक नहीं था। वह मेधावी था। उसकी बुद्धिलब्धि (आई.क्यू.) भी दूसरे बच्चों से अधिक थी। इस प्रकार शरीर के आकार-प्रकार के साथ बुद्धि में भी निखार आया।

साढ़े दस वर्ष की आयु में उसकी लम्बाई 6 फुट 3 इंच थी। तब वह पाँचवीं कक्षा में था। अब उसका कद अपने पिता से भी ज्यादा था एवं अपने से बड़े बच्चों को आसानी से पछाड़ सकता था। उसका वजन सामान्य से लगभग साढ़े तीन गुना ज्यादा था।

अपने 12 वें जन्मदिन पर वह 6 फुट 11 इंच लम्बा था। जब 13 वर्ष का हुआ, तो लम्बाई 7 फुट 2 इंच के करीब थी और भार लगभग 116 कि. ग्रा.। 14 वर्ष की वय में वह स्काउट संघ में सम्मिलित हुआ। इस समय उसका कद 7 फुट 6 इंच और वजन 122 कि.ग्रा. था। वह संसार का सर्वाधिक लम्बा स्काउट बन गया। उसकी असाधारण लम्बाई आय का एक उत्तम स्रोत साबित हुई। अब उसे विद्यालय की फीस, पुस्तकें और पोशाक मुफ्त में मिल जातीं। जूते बनाने वाली एक कम्पनी ने उसके साथ यह अनुबंध किया कि वह उसके शोरूम आकर कुछ समय बैठा करे। इसके बदले में कम्पनी उसकी पोशाक समेत पढ़ाई का पूरा खर्च उठाएगी।

जब उसका 16 वें वर्ष में प्रवेश हुआ, तब उसकी लम्बाई 7 फुट 11 इंच थी और वजन करीब 175 कि.ग्रा.। उस समय उसके मुकाबले का लम्बा व्यक्ति अमेरिका में कोई नहीं था।

18 वर्ष की अवस्था में वह कॉलेज में दाखिल हुआ। उस समय तक उसका कद 8 फुट 4 इंच था और वजन 190 कि.ग्रा.। कॉलेज में उसके अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता। उसे सामान्य छात्रों के लिए बने बेंच और डेस्क का ही इस्तेमाल करना पड़ता। इससे उसे बैठने में परेशानी होती। वह जीवविज्ञान का विद्यार्थी था, अतः जब प्रयोगशाला में जाता, तो वहाँ उसकी असाधारण लम्बाई के आगे में मेज़ की ऊँचाई अत्यन्त बौनी पड़ जाती, अस्तु काफी झुककर उसे वहाँ काम करना पड़ता। इससे उसको बहुत कष्ट होता था।

22 वर्ष की आयु में वह बीमार पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई। तब वह आठ फुट 11 इंच लम्बा तथा लगभग 200 कि.ग्रा. का भीमकाय युवक था। मौत से पूर्व वह रिंगलिंग ब्रदर्स की सर्कस कम्पनी में काम करता था।

उसके एक भाई और दो बहिनें थीं, जो सभी सामान्य आकार-प्रकार के थे। वह ऐल्टन, इलिनाँय, अमेरिका का रहने वाला था। उसकी लम्बाई को आज तक दुनिया का कोई भी व्यक्ति प्राप्त नहीं कर सका।

वर्तमान समय का सर्वाधिक लम्बा व्यक्ति पाकिस्तान का मोहम्मद आलम चन्ना है। उसका जन्म सिन्ध के एक खादिम परिवार में हुआ। जब वह 10 वर्ष का था, तब तक उसकी वृद्धि बिल्कुल सामान्य ढंग से हुई, किन्तु उसके बाद उसमें अप्रत्याशित तीव्रता आ गई। तीन वर्ष बाद ही वह अपने पिता की लम्बाई को पार कर गया। उसका वर्तमान कद 8 फुट 3 इंच है। जीवित व्यक्तियों में आज वह दुनिया का सबसे लम्बा आदमी है।

आरम्भ में वह सेहवन शरीफ के मजार में खादिम था। वहाँ पर उसे दर्शनार्थियों से काफी उपहार मिल जाते थे, पर यह पर्याप्त नहीं थे। इनसे जीवन की सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाती थी, इसलिए वह कोई ऐसी नौकरी करना चाहता था, जिससे उसकी जिन्दगी की गाड़ी आसानी से खिंच सके।

शुरू में वह सिपाही बनना चाहता था, लेकिन उसकी वह इच्छा जब पूरी न हो सकी, तो उसने किसी अन्य नौकरी की तलाश करनी प्रारम्भ की। उसने कई पंचतारा होटलों के भी चक्कर लगाये, यह सोचकर कि शायद वहाँ दरबान की नौकरी मिल जाए, पर सफलता नहीं मिली।

जगह-जगह की यात्रा करना उसके लिए एक कष्टसाध्य अनुभव साबित हुआ। बस की दो सीटों के बीच का स्थान इमना अपर्याप्त होता कि सामान्य ढंग से बैठने में भी उसे काफी तकलीफ होती। बस में खड़ा-खड़ा सफर करना उसके लिए सरल नहीं था। कमर और सिर को इस क्रम में उसे बहुत झुकाना पड़ता, इतने पर भी सिर में चोट लगने की संभावना सदा बनी ही रहती। टैक्सी में भी वह राहत महसूस नहीं कर पाता। रिक्शे वाले उसके इस डर से रिक्शे में नहीं बिठाते कि कहीं उनका रिक्शा टूट न जाए। इस प्रकार अपनी असाधारण लम्बाई पर कभी-कभी चन्ना को गर्व अनुभव होता, तो अधिकाँश समय इससे उसको कठिनाई ही उठानी पड़ती। 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स' में दुनिया के सबसे लम्बे व्यक्ति के रूप में उसका नाम दर्ज कर लिया गया है। इस समय सरकार की ओर से वह 500 रुपये का मासिक अनुदान पाता है। उसी से किसी प्रकार अपना खर्च चलाता है। यद्यपि यह राशि उसके लिए बहुत अल्प है, पर इतने में ही उसे संतोष करना पड़ता है।

पिछले दिनों वह बीमार पड़ गया। पाकिस्तान में उसके शरीर के अनुपात के उपकरण उपलब्ध न होने कारण उपचार के लिए उसे इंग्लैण्ड भेजने की व्यवस्था की जा रही थी। चिकित्सक यह प्रमाणित कर चुके हैं कि उसकी असाधारण लम्बाई किसी बीमारी का परिणाम नहीं है।

एन्नास्वान नोवास्कोशिया, कनाडा की रहने वाली थी। पैदा होने के एक वर्ष के भीतर उसका वजन 8 कि.ग्रा. हो गया था। 6 वर्ष की अल्पवय में ही वह अपनी माँ जितनी लम्बी हो गयी। 15 वर्ष की अवस्था में उसका कद 7 फुट हो गया। उसके बाद उसकी लम्बाई 6 इंच और बढ़ी। वयस्क होने पर वह 7 फुट 6 इंच थी एवं उसका वजन 181 कि.ग्रा. था। इसी समय उसकी मुलाकात ‘बर्नम म्यूजियम’ के मालिक से हुई। उसे उसने अपनी सर्कस कम्पनी में भर्ती कर लिया। प्रदर्शन के दौरान स्वान को वह 2 फुट 11 इंच ठिगने जनरल टाँम थम्ब के साथ प्रस्तुत करता।

थोड़े वर्ष उपरान्त जब पी.टी. बर्नम की सर्कस कम्पनी बन्द हो गई, तो एन्ना स्वान ने केंचुकी, अमेरिका के मार्टिन वान ब्यूरेन बेट्स से शादी कर ली। 15 वर्ष की उम्र में बेट्स का कद 6 फुट था। वयस्क होने पर उसने सेना में नौकरी कर ली। उस दौरान भी उसकी लम्बाई बढ़ती रही। बाद में 7 फुट 3 इंच पर उसका कद स्थिर हुआ। उसका कुल वजन 219 कि.ग्रा. था।

दोनों का विवाह लंदन के एक प्राचीन गिरजाघर सेंट मार्टिन में सम्पन्न हुआ। उस दौरान एन्ना ने जो गाउन पहन रखा था, वह 91.44 मीटर (100 गज) कपड़े का बना था। इसमें लगभग 51 गज लेस प्रयुक्त हुई थी। दोनों महारानी विक्टोरिया और प्रिंस ऑफ वेल्स के विशिष्ट मेहमान बने। वहाँ उन्हें कीमती उपहार प्रदान किए गए।

एन्ना के दो संतानें हुईं, दोनों ही असाधारण आकार-प्रकार की थीं। जन्म के कुछ काल पश्चात् उनकी मौत हो गई।

फ्रेडकेम्पस्टर का जन्म एवेबरी (इंग्लैण्ड) के विल्टशायर नामक गाँव में हुआ था। वह आरम्भ से ही कुछ असामान्य आकार-प्रकार का था। जब पैदा हुआ, तो उसकी लम्बाई 25 इंच तथा वजन 7.50 कि.ग्रा. था। वह कुल 29 वर्ष जीवित रहा, उस समय उसकी लम्बाई 8 फुट 5 इंच थी।

वह एक माली था। पेड़-पौधों से उसको गहरा लगाव था, इसलिए डेविजेज में एक उद्योगपति के उद्यान में इसने नौकरी कर ली। बाद में उसकी असाधारण कद की चर्चा एक सर्कस कम्पनी के मालिक के कानों तक पहुँची, तो उसने उसे अपने सर्कस में भर्ती कर लिया। स्थान-स्थान पर उसकी नुमाइश होने लगी। इससे शोमैन की आमदनी काफी बढ़ गई। उसने फ्रेड से अनुबन्ध कर लिया और प्रदर्शन हेतु जर्मनी ले गया। तब प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ा हुआ था। उन दोनों को जासूसी के संदेह में कैद कर लिया गया। जब युद्ध समाप्त हुआ, तब उन्हें छोड़ा गया। तब तक फ्रेड का स्वास्थ्य काफी गिर चुका था। वह बीमार चल रहा था। इंग्लैण्ड आकर उपचार से स्वस्थ हो गया, पर ज्यादा दिन ठीक न रह सका। वह पुनः बीमार पड़ा और उसकी मौत हो गई।

स्काटलैंड में केप ब्रेटँन नामक एक द्वीप है। उसका एंगस मैकेस्किल नामक व्यक्ति न सिर्फ भीमकाय था, वरन् उसकी शक्ति भी दैत्य के समान थी। उसका कद 7 फुट 9 इंच एवं वजन 194 कि.ग्रा. था। उसका सीना 70 इंच चौड़ा था। उसकी हथेलियों का विस्तार सामान्य से दुगुना था। वे लगभग 6 इंच चौड़ी थीं। उसके पैर के पंजे भी असामान्य रूप से बड़े थे और उसी के अनुपात में उसके जूते भी। वे कितने बड़े रहे होंगे, इसका अनुमान इसी घटना से लगाया जा सकता है कि एक बार उसके एक जूते में किसी बिल्ली ने बच्चे जन दिए। इक्कीस दिनों तक वह उन्हें उसी में पालती रही। इस दौरान उसे स्थान की कोई कमी महसूस नहीं हुई।

एंगस को एक बार एक मुक्केबाज से चुनौती मिली। उसने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। इस पर वह बढ़ चढ़ कर बातें करने और उसे कायर कहने लगा। लोगों को भी ऐसा प्रतीत हुआ कि अपने से सर्वथा कम वजन (114 कि.ग्रा.) वाले मुक्केबाज से शायद वह डर गया। इन्हीं कारणों से न चाहते हुए भी एंगस को मुकाबला स्वीकार करना पड़ा।

केप ब्रेटँन में एक निश्चित तिथि को दो अखाड़े में आमने-सामने थे। उपस्थिति हजारों की भीड़ ने करतल ध्वनि से उनका स्वागत किया। रेफरी ने घोषणा की कि यह मुकाबला अपने ढंग का अनोखा है और शायद इतिहास में प्रथम, जिसमें एक गैर-मुक्केबाज किसी मुक्केबाज से भिड़ रहा हो।

रेफरी ने सीटी बजायी। मुकाबले से पूर्व हाथ मिलाने के लिए दोनों ने अपनी-अपनी हथेलियाँ आगे बढ़ायी। अभी पल भी नहीं बीता था कि वह शेखीखोर मुक्केबाज तड़पता हुआ नीचे गिर पड़ा। उसके दाहिने पंजे से खून टपक रहा था। पंजा बुरी तरह क्षत-विक्षत था। उसमें कई हड्डियाँ चूर-चूर हो गई थीं। उसका मुक्केबाज जीवन सदा के लिए बर्बाद हो गया। एंगस ने उसकी हथेली को इस बुरी तरह दबाया कि अस्थियाँ चरमरा उठीं और पंजा बेकार हो गया।

एक अन्य मौके पर महारानी विक्टोरिया ने उसे अपने यहाँ आमंत्रित किया और शक्ति-प्रदर्शन की उससे इच्छा व्यक्त की। एंगस ने दरबार में इधर-उधर देखा। जब उसे कोई भी ऐसी वस्तु दिखलाई नहीं पड़ी, जिसके द्वारा वह अपनी ताकत दिखा सके तो, उसने दायें पैर से नंगे फर्श को भरपूर शक्ति के साथ दबाना शुरू किया। जब वहाँ से उसने अपना पैर हटाया, तो सब यह देखकर हैरान रह गए कि वहाँ पाँव का स्पष्ट निशान इस तरह बन गया, जैसे वह सीमेंट का नहीं, मिट्टी का फर्श हो। उसके इस करतब पर महारानी ने उसको बहुमूल्य उपहार भेंट में दिए।

अपने उत्तरार्द्ध जीवन में वह एक सर्कस कम्पनी में सम्मिलित हो गया। उस दौरान उसके प्रदर्शन बड़े ही रोचक हुआ करते। वह अक्सर एक बौने को अपनी बायीं हथेली में उठाए रहता। वहाँ वह तरह-तरह की मुद्रायें बनाकर लोगों का मनोरंजन किया करता।

उक्त नुमाइश-यात्रा के दौरान एक बार उसने ऐसा प्रदर्शन किया कि वह जानलेवा बन गया। हुआ यों कि न्यूयार्क में एक व्यक्ति ने उसके सामने एक हजार डॉलर की एक शर्त रखी और उससे एक भारी-भरकम वजन उठाने को कहा। लगभग एक हजार किलोग्राम के उस लौह पिण्ड को उसने सिर से ऊपर उठा तो लिया, पर असावधानीवश उसमें लगी एक वजनदार जंजीर उसके कंधे पर आ गिरी और कंधा जख्मी हो गया। यही जख्म अन्ततः उसकी मृत्यु का कारण बना।

चार्ली बायर्न आयरलैण्ड का रहने वाला था। उसका कद 8 फुट 2 इंच था। जिन दिनों प्रदर्शन के निमित्त वह लंदन आया हुआ था, उन्हीं दिनों उसकी भेंट एक ब्रिटिश सर्जन एवं शरीर शास्त्री जॉन हण्टर से हुई। वह उसके दैत्याकार से बहुत प्रभावित हुआ। उसकी इच्छा थी कि मृत्यु के बाद बायर्न का कंकाल उसे मिल जाए, इसलिए वह उससे इस संबंध में कोई अनुबंध करना चाहता था, पर सफलता नहीं मिली। बायर्न ने कुछ ऐसा सुन रखा था कि मृत्यु उपरान्त जो शव वह प्राप्त करता है, उसकी दुर्गति करके रख देता है। उसे उबाल-उबाल कर उसके माँस को हटाता है। इसके कारण हन्टर से उसे घृणा हो गयी थी। मृत्यु के बाद वह अपनी लाश हन्टर को देने को तैयार न था, जबकि हण्टर येन-केन-प्रकारेण उसकी प्राप्ति सुनिश्चित कर लेना चाहता था। हण्टर के दुराग्रह और प्रयत्न को देखकर वह सशंकित हो उठा। उसने अपने सम्बन्धियों से इस बात का वचन ले लिया कि मौत के पश्चात् उसकी काया को समुद्र में डाल दिया जाए, पर शायद उसकी नियति में चिकित्सक के म्यूजियम की शोभा बढ़ाना ही लिखा था।

एक दिन वह बीमार पड़ा और उसकी मौत हो गई। हण्टर ने 500 पौंड में उसे खरीद लिया और अपनी जिज्ञासा शान्त करने एवं यह देखने के लिए कि उसमें क्या विशिष्टता थी, स्थान-स्थान पर चीरा। बाद में उसे उबालकर उसके अस्थिपञ्जर को पृथक् कर लिया और अपने म्यूजियम में टाँग दिया। हण्टर के निधन के बाद वह म्यूजियम ‘रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स’ के संरक्षण में चला गया, जहाँ बायर्न के कंकाल को आज भी देखा जा सकता है।

एक अन्य भीमकाय व्यक्ति पैट्रिक काँटर था। वह भी आयरलैण्ड का निवासी था एवं चार्ली बायर्न की तर्ज पर स्वयं को ‘ओ ब्राइन’ कहता था। उसे इस बात का गर्व था कि वह आयरलैण्ड के बादशाह ब्राइन बोरिड की वंशावली से है। वह किन्सेल, आयरलैण्ड में पैदा हुआ था। उसकी लम्बाई 8 फुट 3 इंच थी, जबकि पूर्ववर्ती काँटर ब्राइन 8 फुट लम्बा था। आरम्भ में बायर्न मेहनत-मजदूरी करके अपना गुजर-बसर करता था, किन्तु अपनी तीव्र वृद्धि के कारण जल्द ही लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन गया। इससे उसे काम करने में अड़चन होने लगी। हमेशा लोग उसको घेरे रहते, अस्तु मजदूरी का काम उसे त्यागना पड़ा उसके पिता ने उसे एक सर्कस कम्पनी में भर्ती करवा दिया। वहाँ नुमाइश से काफी आय होने लगी। जिस कम्पनी में वह प्रदर्शन कार्य करता था, उसमें काउण्ट बोरोलाब्स्की नामक एक बौना भी था। कहते हैं कि एक बार एक डिनर के अवसर पर काँटर ने जब अपने कंधे से लटकते थैले के अन्दर हाथ डाला तो उसमें से काउण्ट बोरोलाब्सकी बाहर निकला था। फ्लोरिडा के रिंगलिंग म्यूजियम में आज भी एक तस्वीर मौजूद है, जिसमें काँटर और काउण्ट दोनों को साथ-साथ देखा जा सकता है। चित्र में काउण्ट काँटर के घुटनों से भी नीचा है। सन् 1806 में ओ ब्राइन की जब मृत्यु हुई, तो उसकी इच्छानुसार उसको 12 फुट गहरी कब्र में दफनाया गया।

विलफर्ड थामसन 8 फुट 7 इंच लम्बा था। वह विन्सकान्सिन, अमेरिका का रहने वाला था। उस जमाने में दुनिया का सर्वाधिक लम्बा होने का गौरव उसे प्राप्त हुआ। वह एक शिक्षक था। बाद में एक सर्कस कम्पनी में भर्ती हो गया। 12 वर्ष तक वहाँ काम करता रहा। यहीं रहते हुए उसने मेरी बारस से शादी कर ली, तत्पश्चात् सर्कस का काम छोड़ दिया और सेल्समैन की नौकरी कर ली। फिर वकालत की पढ़ाई शुरू की एवं मार्क्वेट विश्वविद्यालय से लाँ की डिग्री प्राप्त कर पोर्टलैण्ड, अमेरिका में वकालत आरम्भ की। 45 वर्ष की आयु में उसका देहान्त हो गया।

कद का अपना महत्व है। उससे कुछ यश-ख्याति तो अर्जित की जा सकती है, महानता नहीं। मनुष्य महान है। उसे अपने आन्तरिक कद को इतना ऊँचा उठा लेना चाहिए, जिसके आगे काया का बाह्य डील–डौल तुच्छ, नगण्य और बौना साबित हो। कद बढ़ाने के लिए आज हारमोन्स के इंजेक्शन दिए जाते हैं एवं ऊँची एड़ी के जूते पहनकर उपहासास्पद स्थिति में चलते पुरुषों व महिलाओं को देखा जा सकता है। इस कद की ऊँचाई में रखा क्या है, जिसमें शरीर को चलने में कठिनाई भी हो व सामान्य जीवनक्रम भी अस्त-व्यस्त हो जाए। वस्तुतः ऊँचाई आन्तरिक आदर्शों की होनी चाहिए, चिन्तन व अपने संकल्पों की होनी चाहिए। यदि प्रयास उस दिशा में किए जाएँगे तो आध्यात्मिक, भौतिक सभी क्षेत्रों में सफलताएँ हस्तगत होती चली जाएँगी।


अभी हिम्मत क्यों हारूं (Kahani)

स्काटलैंड का सम्राट ब्रूस अभी गद्दी पर बैठ भी नहीं पाया था कि दुश्मनों ने आक्रमण कर दिया। बड़ी मुश्किल से सँभल पाया था कि दुबारा फिर हमला कर दिया गया। हारते-हारते बचा। इस बार कई राजाओं ने हमला कर दिया, तो बेचारे की राजगद्दी भी छिन गई। लगातार चौदह बार की असफलताओं के कारण उसके सैनिक भी कहने लगे कि ब्रूस के भाग्य में सब कुछ है, पर विजय नहीं, उन्होंने साथ छोड़ दिया।

निराश ब्रूस एक पहाड़ी पर बैठा था। एक मकड़ी हवा में उड़कर एक-दूसरे पेड़ की टहनी से जोड़कर जाला बुनना चाहती, पर जाला हर बार टूट जाता। मकड़ी ने बीस बार प्रयत्न किया, फिर भी हिम्मत न हारी। 21 वें बार अन्ततः सफल हो गई, तो ब्रूस उछला और बोला - अभी तो सात अवसर बाकी हैं, अभी हिम्मत क्यों हारूं? एक बार फिर सारी शक्ति लगाकर चढ़ाई की और न केवल अपना राज्य वापस कर लिया, वरन् सभी दुश्मनों को परास्त करता हुआ सबका सम्राट बन बैठा।


सबसे प्यारा, सबसे न्यारा, भारतवर्ष हमारा

भारतवर्ष की स्थापना से ही इसका मूल स्वरूप साँस्कृतिक माना जाता रहा है। राजनीति नहीं, अध्यात्म-नैतिक उसकी मूल प्रेरणा स्रोत रही है। धर्म हमारे राष्ट्र के कण-कण में संव्याप्त है इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद आध्यात्मिक राष्ट्रीयता के रूप में जाना जाता रहा है। यहीं कारण रहा है कि हमारे ऋषियों ने भारत भूमि को माता कहा है। “माता भूमि पुत्रोहं पृथिव्याः” वाला यह राष्ट्र ही हैं जहाँ ऋषियों ने ब्रह्मज्ञान पाया व ब्रह्मसाक्षात्कार किया। विश्व को परिवार मानने की सुंदर कल्पना भी इसी भूमि से उपजी है।

राष्ट्र का शाब्दिक अर्थ है-रातियों का संगम स्थल। राति शब्द देने का पर्यायवाची है। राष्ट्रभूमि और राष्ट्रजनों की यह संयुक्त इकाई राष्ट्र इसीलिए कही जाती है कि यहाँ राष्ट्रजन अपनी-अपनी देन राष्ट्रभूमि के चरणों में अर्पित करते है। स्वामी विवेकानंद ने राष्ट्र को व्यष्टि का समष्टि में समर्पण कहते हुए इसकी व्याख्या की है। आध्यात्मिक राष्ट्रीयता के उद्घोषक श्री अरविंद ने कहा है-राष्ट्र हमारी जन्मभूमि है। यह जमीन का टुकड़ा मात्र नहीं, न ही एक शाब्दिक नाम है, न मन की कपोल कल्पना है। यह वह विराट शक्ति है, जो लाखों-लाख लोगों की शक्तियों का, जिससे राष्ट्र बनता है, समुच्चय है। श्री माँ के शब्दों में जैसे महिषासुर मर्दिनी सहस्रों देवताओं की सम्मिलित शक्ति से उद्भूत है, राष्ट्र उसी से अभिपूरित है। भवानी अनंतशक्ति का रूप है। वे शाश्वत से निकलकर शाश्वत भाव से भारत के भीतर विद्यमान है।

हमारी मातृभूमि भारतभूमि का हृदय संस्कृति सत्य से अनुप्राणित है और इसी में परमात्मा का निवास है। आध्यात्मिकता से ओत-प्रोत संस्कृति की अधिष्ठात्री होने के कारण हमारी मातृभूमि हम सबके लिए पूज्य है। मनुस्मृति हमारे देश की साँस्कृतिक यात्रा की ओर संकेत करती है। भगवान मनु कहते हैं कि भारतवर्ष रूपी यह पावन अभियान सरस्वती और दृषद्वती नामक दो देवनदियों के मध्य देव विनिर्मित देश ब्रह्मवर्त से आरंभ हुआ। इस प्रकार मनु महाराज राजतंत्र से इस देश के विकास की बात नहीं कहते। सदाचार, नैतिकता देवत्व के सम्वर्द्धन प्रचार प्रसार में विश्वास रखने वाली भारतीय संस्कृति का उद्गम भी अध्यात्म से हुआ बताया गया है।

तस्मिन्देशे य आचारः पारर्म्पयक्रमागतः। वर्णानाँ सान्तरालानाँ स सदाचार उच्यते॥

मनुस्मृति का अगला श्लोक ब्रह्मवर्त का, आगे कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पांचाल आदि क्षेत्रों में संव्याप्त होने का वर्णन करता है। मनुस्मृति कहती है-

एतद्देशप्रसूतस्य सकाशाद ग्रजन्मनः। स्वं स्वं चरित्रं शिक्षरेनूपृथिव्याँ सर्वमानवाः॥

इस ब्रह्मर्षि देश का विस्तार हिमालय से विंध्याचल पर्वत के बीच के प्रदेश तक हुआ। मध्य देश नाम से परिचित इस देश से यह यात्रा साँस्कृतिक रूप में निर्भाव बढ़ती हुई अपना अगला चरण आर्यावर्त के रूप में पूर्ण करती हुई चली गयी। इस आर्यावर्त के उत्तससर में उत्तुंग हिमालय की पर्वत श्रृंखला तथा दक्षिण में नर्मदा, कृष्णा, कावेरी स्थित है। पूर्वी तथा पश्चिम सीमाएँ विशाल सागरों से घिरी हुई है।

भारतभूमि की धूलि का एक-एक कण दिव्यता से ओत-प्रोत व पावन है। हर भारतवासी की अभिव्यक्ति सम्पूर्ण व अखण्ड राष्ट्र के लिए अभिव्यक्ति होती हैं। शिव का भक्त काशी से रामेश्वर तक जाता है और विष्णु का अनुयायी समस्त देश की चतुर्दिक् तीर्थयात्रा करता है। गंगा का जल जो गोमुख से लेकर जाया जाता है, रामेश्वर पर चढ़ाया जाता है। साँस्कृतिक एकता और अखण्डता को मजबूत करने के लिए ही अद्वैतवादी जगद्गुरु शंकराचार्य ने देश के चारों सीमाओं पर चार तीर्थों का निर्माण किया। भारत राष्ट्र ने अपनी साँस्कृतिक व धार्मिक चेतना को उसके बाद सर्वत्र फैलाया ही है।

अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त को विश्व का पहला राष्ट्रगान कहा जा सकता है। उसमें मातृभूमि के स्वरूप और उसके साथ बहुमुखी विविधता में समाहित एकता का बड़ा सूक्ष्म वर्णन हुआ है। भूमि के पुत्र के रूप में ही उसका वर्णन है।

सानः माता भूमि। भूमे माताः। नि धेहि मा भद्रया सुप्रतिष्ठितम। माता भूमिः पुत्रोहं पृथिव्याः॥

वेदों का संदेश है कि मातरं भूमि धर्माणा धृताम के अनुसार यह हमारी धर्मभूमि है। साथ ही सत्कर्मों की प्रेरणा भरने वाली कर्मभूमि और मनुष्य को भगवत् दर्शन कराकर उसका जीवन सार्थक कराने वाली मोक्षभूमि भी। संभवतः भारतभूमि की इसी महानता के लिए स्वामी विवेकानंद के हृदय से यह उद्गार निकले हों-यदि पृथ्वी पर कोई ऐसी भूमि है, जिसे मंगलदायिनी पुण्यभूमि कहा जा सकता है, जहाँ ईश्वरप्राप्ति की अभीप्सा रखने वाली हर आत्मा को अपना अंतिम आश्रयस्थल प्राप्त करने हेतु आवागमन करना ही पड़ता है, तो वह भारत राष्ट्र ही है।

भारत राष्ट्र रूपी यह हमारी मातृ भूमि सदा से सबका भरण-पोषण करती आयी है- अन्नादि के द्वारा, औषधियों के द्वारा। इस पवित्र धरा ने न केवल हमें भौतिक सम्पदा से परिपूर्ण किया है, बल्कि आध्यात्मिक रीति-नीति का पाठ भी पढ़ाया है। इस मातृभूमि ने वेदों के अनुसार सात महाशक्तियों को धारण किया हुआ है, ये हैं- बृहद्सत्य, ऋतु, क्षमाशक्ति, दीक्षा, तप, ब्रह्मशक्ति और यज्ञ।

सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो, ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति।

ये सात महाशक्तियाँ ऐसी सम्पत्तियाँ हैं, जिन पर सारे राष्ट्र को खड़ा किया जा सकता है, स्थिर रखा जा सकता है व सारे विश्व का मार्गदर्शक उसे बनाया जा सकता है। सब ओर सब प्रकार की उन्नति करा सकने की सामर्थ्य उसमें विद्यमान है। इसी कारण हमारे राष्ट्र की अवधारणाएँ, स्थापनाएँ आदर्श कोटि की हैं।

भारतभूमि से अध्यात्म का अटूट और अविच्छिन्न सम्बन्ध रहा है। यहीं पर हमारे पूर्वजों ने जीव जगत और ब्रह्म का साक्षात्कार किया। उनके गूढ़ रहस्यों को अनावृत्त कर सारे जगत को ज्ञान का नव आलोक दिखाया। हमारे ऋषि तप की प्रचण्ड महत्ता से परिचित थे। इस तपोभूमि के कण-कण पर हमारे पूर्वजों की तपोगाथा अंकित है और यह पावन तीर्थस्थली के रूप में प्रतिष्ठित है। अपने पूर्वजों की इसी अध्यात्म-साधना के कारण यह सम्पूर्ण भू-खण्ड आकर्षण का केन्द्र-बिन्दु रहा। महाभारत के भीष्म पर्व में भारत की यशोगाथा का वर्णन कुछ इस तरह हुआ है-

अत्रतेकीर्तयिष्यामिवर्षभारतभारतम्। प्रिययमिंद्रस्यदेवस्यमनोवैंवस्वतस्यच॥

पृथोस्तुराजन्वैन्यस्यतथेक्ष्वाकोर्महात्मनः। ययातेरंबरीषस्यमाँधातुर्नहुषस्यच॥

तथैवमुचुकुँदस्यशिबेरौशीनरस्वच। ऋषभस्यतथैलस्यनृगस्यनृपतेस्तथा॥

अर्थात् “हे भारत! अब मैं तुम्हें उस भारतवर्ष की कीर्ति सुनाता हूँ, जो देवराज इन्द्र को प्यारा था, जिस भारत को वैवस्वत मनु ने अपना प्रियपात्र बनाया था, आदिराज बेनु ने जिस भारत को अपना प्रेम अर्पित किया था, महात्मा इक्ष्वाकु को जिससे हार्दिक प्रीति थी, नहुष जैसे तेजस्वी पुरुषों ने जिसे अपने हृदय में स्थान दिया, सम्राट मुचुकुन्द, औशीनर, शिवि, ऋषभ ऐल और नृपति नृग जिस भारत को भक्तिभाव से पूजते थे, महाराज कुशिक, महाराज गाधि, व्रती दिलीप के लिए जो भारत प्राणों से प्यारा था, जिस भारत को अनेक बलशाली क्षत्रियों ने अपने बलिदान से सींचा, जिसे सम्पूर्ण जनता अपने हृदय से चाहती है।”

रामायण, महाभारत एवं समस्त पुराण भारत भक्ति की प्रेरणा से भरे हुए हैं। भारतीय राष्ट्रवाद की व्याख्या करते हुए विष्णुपुराण कहता है-

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमादे्रश्चैत दक्षिणम्॥ वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥

सभी पुराणों में लगभग इसी प्रकार की अनुगूँज है। भारत के गौरवपूर्ण तीर्थों, दिव्य नदियों, पावन पर्वतों के प्रति अपूर्व श्रद्धा-भाव प्रकट किया गया है। वह श्रद्धा और भावना उसकी आध्यात्मिक धरोहर के प्रति समर्पित हुई है। वृक्षों, जंगलों, वनस्पतियों से आच्छादित होने के कारण राष्ट्र को ‘विश्वधायाः’ कहते हैं। यह सारे विश्व का पालन-पोषण करने में समर्थ है। यह राष्ट्र की अमूल्य सम्पत्ति है। वहाँ मौलिक समृद्धि का महत्व तो है, परन्तु भौतिकता को यहाँ कभी भी धर्म से अधिक महत्व नहीं दिया गया। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की यह धारा धर्माचरण का मार्ग दिखाती रही है। इसलिए भूमि की महत्ता को विष्णुपुराण ने बड़े सुन्दर ढंग से शब्दों में गूँथा है।

गायन्ति देवाः किल गीताकानि धन्यास्तु ते भारत भूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषः मुरत्वात्॥

देवता भी कहते हैं - धन्य हैं वे लोग, जिन्हें भारतभूमि में जन्म लेने का सौभाग्य मिला। देवता भी इस पुण्यभूमि में पुण्यार्जन करने हेतु बार-बार जन्म लेने को उत्सुक रहते हैं। इसी कारण जब भी जन्म मिले, भारत वतन मिले का अमर उद्घोष करके क्राँतिकारी फाँसी के फंदे पर झूल जाते थे। मोक्षप्राप्ति व गूढ़ आध्यात्मिक साधना हेतु भारतभूमि को ही उपयुक्त साधनास्थली माना जाता रहा है। भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाली गीता कहती हैं-

ते तं भुवत्वा स्वर्गलोक विशालंक्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति एवं त्रयीधर्मपनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते॥

इस श्लोक से भी संकेत मिलता है कि स्वर्ग में पुण्यकर्म के क्षीण होने पर हम इसी लोक में वापस आते हैं। विष्णु पुराण और गीता में अधिदैव से अध्यात्म की, भारत की ज्ञान यात्रा का सुन्दर चित्रण हुआ है। इस यात्रा का अंत ब्रह्म से तादात्म्य स्थापित होकर ही हुआ है। यही विद्या बाद में ब्रह्मविद्या या वेदान्त के रूप में प्रतिष्ठित हुई। इस प्रकार इतिहास की यात्रा को देखने से स्पष्ट पता चलता है कि यह राजनीति से प्रेरित न होकर विशुद्ध साँस्कृतिक और आध्यात्मिक यात्रा थी।

उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोपीय चिन्तन ने राष्ट्रीयता को राजनैतिक अवधारणा के रूप में स्वीकार करने पर विवश कर दिया। राजसत्ता को ही राष्ट्र निर्माण का मुख्य माध्यम माना गया। स्पष्ट किया गया कि राष्ट्र निमार्ण हेतु भाषा, नस्ल और राज्य की एकता अनिवार्य है। इस चिन्तन ने भारतीय साँस्कृतिक विविधता को अस्वीकार कर दिया एवं इसकी एकता और अखण्डता को खण्डित करने का प्रयास किया। प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् यूरोप और अमेरिका में राष्ट्रीयता की अवधारणा के बारे में पुनः चिन्तन प्रारम्भ हुआ। डब्ल्य, नैस्सन सीनियर ने उल्लेख किया है कि यूरोपीय राष्ट्रीय चिन्तन बर्बरतापूर्ण है एवं राष्ट्र की प्रगति के लिए घोर अभिशाप है। इसके द्वारा कोई भी राष्ट्र विकसित व पल्लवित नहीं हो सकता। सी.जे.एच. ह्येज हेंस कोहन आदि अनेक विद्वानों ने राष्ट्रीयता की इस व्याख्या को अवैधानिक और अनैतिक भी प्रमाणित कर दिखाया। इस पुनः चिन्तन से राष्ट्रीयता की परिभाषा एक समूह चेतना के रूप में की गयी, जो किसी भूखंड पर रहने वाले समाज को उसकी अनेक बाह्य विविधताओं के होते हुए भी एक लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया के फलस्वरूप उस भूमि के प्रति माता-पुत्र भाव से जोड़ देती है।

इसी शताब्दी में ‘राष्ट्र धर्म के बिना राष्ट्र नहीं हो सकता।’ ‘राष्ट्र, धर्म से ही आधारित रहा करता है।’ स्वामी रामतीर्थ ने अपना उद्गार इस तरह व्यक्त किया। कोई मनुष्य परमात्मा से अपनी एकात्मता तब तक अनुभव नहीं कर सकता, जब तक कि समग्र राष्ट्र के साथ तादात्म्य उसके शरीर के रोम-रोम में जोश न भरती हो। एक बार महात्मा गाँधी ने बुनकरों की एक सभा में भाषण देते हुए कहा था- मेरी मान्यता है कि कोई भी राष्ट्र धर्म के बिना वास्तविक प्रगति नहीं कर सकता। हमारे राष्ट्र के पीछे साँस्कृतिक झाँकियाँ दृष्टिगोचर होती है, इसलिए सहस्रों आक्रान्ताओं के आक्रमण के बावजूद यह अखण्ड और एक राष्ट्र है।

श्री अरविन्द ने ‘वंदेमातरम्’ में राष्ट्रीयता के स्वरूप को रेखांकित किया है। उनके अनुसार राष्ट्रीयता केवल एक राजनैतिक कार्यक्रम नहीं है। राष्ट्रीयता एक धर्म है, जो ईश्वरप्रेरित है। राष्ट्रीयता एक सिद्धान्त है, जिसके अनुसार हमें जीना है। राष्ट्रवादी बनने के लिए, राष्ट्रीयता के इस धर्म को स्वीकार करने के लिए हमें पूर्ण आस्तिक बन धार्मिक भावना का पूर्णपालन करना होगा। श्री अरविन्द ने राष्ट्र को एक दैवीसत्ता मानने की अपनी कल्पना के अनुरूप राष्ट्रीयता को “एक आध्यात्मिक आदर्श-एक धर्म माना है। इस आध्यात्मिक राष्ट्र का परिचय है- साधना, तपस्या, ज्ञान और शक्ति।” आगे उन्होंने कहा- “राष्ट्रीयता स्वयं परमात्मा से उद्भूत एक धर्म है। उसका दमन नहीं हो सकता और न हो सकेगा। राष्ट्रीयता अमर है, क्योंकि वह मर्त्य मानव की सृष्टि नहीं है।”

आत्मिकी-आध्यात्मिकता भारतीय जीवन की कुँजी है। इस राष्ट्र के अतीत में सर्वत्र कभी भी समाप्त न होने वाले जीवन के आनन्द का वर्णन एवं उसके लिए अकल्पनीय रचनाओं का प्रयास हमें आश्चर्यचकित कर देता है। अपने समग्र रूप में यह राष्ट्र सर्वांगपूर्ण आध्यात्मिकता और अनुभूति के स्वतंत्र एवं सहिष्णु समन्वय का परिचायक है। एकमेव सत्य को उसके अनेक स्वरूपों में देखते हुए भी उसने किसी भी स्वरूप के लिए अपने द्वार बन्द नहीं किए। इस राष्ट्र ने न तो अपने को विशेष नाम दिया और न अपने अंगभूत मतों और विभागों के लिए पृथक् नामों को स्वीकारा। वह स्वयं अपनी चिरन्तन जिज्ञासा के विषय - ‘ब्रह्म’ की खोज ही करता रहा।

राष्ट्रनिर्माण के प्रथम मन्त्रदृष्टा स्वामी विवेकानन्द ने कहा है - “धर्म इस राष्ट्र के लिए शाश्वत सत्य है। त्याग, सर्वस्व त्याग इस राष्ट्र का सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च आदर्श है। भारतीय राष्ट्र समस्त राष्ट्रों में अत्यधिक सदाचारी और धार्मिक राष्ट्र है। जीवात्मा, परमात्मा और ब्रह्माण्ड के ये सब अपूर्व, अनन्त, उदात्त और व्यापक धारणाओं में निहित जो महान तत्व हैं, ये भारतभूमि में ही उत्पन्न हुए हैं। “

युगनायक स्वामी विवेकानन्द ने इस आध्यात्मिक राष्ट्र के प्रति अपना श्रद्धाभाव समर्पित करते हुए उद्घोष किया था - यदि पृथ्वी पर ऐसा कोई राष्ट्र है जिसे हम धन्य पुण्यभूमि कह सकते हैं, यदि ऐसा कोई स्थान है, जहाँ पृथ्वी के सब जीवों को अपना कर्मफल भोगने के लिए आना पड़ता है, यदि ऐसा कोई स्थान है, जहाँ भगवान की ओर उन्मुख होने के प्रयास में संलग्न रहने वाले जीवमात्र को अन्ततः आना होगा, यदि ऐसा कोई देश जहाँ मानवजाति की क्षमा, धृति, दया, शुद्धता आदि सत्प्रवृत्तियों का सर्वाधिक आत्मान्वेषण की पद्धतियों का विकास हुआ, तो बस वह यही पुण्य भारतभूमि है। यही वह राष्ट्र है, जहाँ पर धर्म, व्यावहारिक और यथार्थ था और केवल यहीं पर मानवता ने इस विश्व का अध्ययन एक अविच्छिन्न एकता के रूप में किया। इसका हर स्पन्दन परमात्मसत्ता का स्पन्दन है। हमारी मातृभूमि - दर्शन, धर्म, आचारशास्त्र, मधुरता, कोमलता और प्रेम से सनी हुई भूमि है। यह राष्ट्र नीति एवं अध्यात्म में इसके राष्ट्रों से बहुत ऊँचा है।

भारत आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का द्योतक है। आज भी प्रत्येक मंगलकृत्य के अवसर पर वेदोक्त मंत्रों में इन्हीं सूक्तों का उच्चारण किया जाता है। ब्रह्मा, कल्प, मनवन्तर और चतुर्युगों की लम्बी काल- यात्रा इसी का प्रचार - प्रसार करती रही है। इस राष्ट्र का अध्यात्म एवं धर्म हर जन के प्राणों में प्रकट हो। यह ऋषियों की कल्पना हम सब आने वाले संधिकाल के वर्षों में साकार करें।


बुद्धि का तो काम है पत्थर फेंकना (Kahani)

देव, दानव, मनुष्य, ऋषि-मुनि गंधर्व, किन्नर तथा यक्ष सभी परेशान थे। आकाश हैरान हुआ खड़ा था, पृथ्वी स्तब्ध थी। सम्पूर्ण वनस्पतियाँ उसके अभाव में जीवनहीन-सी पड़ी थीं, किन्तु सूर्यदेव थे कि निकलने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उन्होंने साफ मना कर दिया था उगने से। आखिर हारकर स्वयं प्राची उनके पास पहुँची। अनुनय भरे स्वर में बोली- “चलो प्रिय! तुम्हारी अनुपस्थिति में सब चेतनाहीन हो रहे हैं। बड़ी उत्कट प्रतीक्षा हो रही है तुम्हारी।”

लेकिन सूर्यदेव बहुत क्रोधित थे। शिकायत भरे स्वर में बोले - “मैं नहीं जानता था कि यह संसार इतना कृतघ्न है। अनादिकाल से जो मेरी पूजा करता चला आ रहा था देवता कह-कह कर, वही मानव अब कोरी बुद्धि के विकसित हो जाने पर मुझे केवल आग का गोला कहता है। ऐसे संसार के लिए अब मैं एक किरण तक नहीं दूँगा।”

प्राची ने सुना और तनिक गाम्भीर्य में डूब गई। फिर सूरज से बोली - “तुम इतना समझते हुए भी अनजान बन गये। प्रिय! बुद्धि का तो काम ही है पत्थर फेंकना और मन का काम है, उन्हें झेलना। मन यदि समुद्र जैसा बन जाए तो उसमें ऐसे-ऐसे जाने कितने पत्थर समा जाएँगे। हाँ! और उसे कच्चा घड़ा बना लिया तो एक ही चोट में वह टूटकर बिखर जाएगा। अब तुम जैसा उचित समझो करो, पर मन को सीमित करके नहीं।”

सूर्यदेव ने प्राची को नमन किया और अपने रथ पर आरूढ़ हो गये। तम से आच्छादित धरा प्रखर आलोक से दीप्त हो उठी।


ब्राह्मणत्व की कसौटी पर वे खरे उतरे

कनाडा के एक नगर में सड़क पर खड़ी कार में आकर दो व्यक्ति बैठे। एक वृद्ध था और दूसरा युवक। दोनों पिता-पुत्र थे। कार में स्टेयरिंग पर बैठते समय पुत्र ने अख़बार खोला। पिता ने पूछा- “यह क्या है?”

“टाइम्स।” पुत्र ने उत्तर दिया।

“कहाँ से खरीदा?”

“उस नुक्कड़ वाली दुकान से।” पुत्र ने कहा। इस पर उसके पिता बोल उठे - “जाओ जाकर वापस कर आओ, मेरे पास भी टाइम्स है। मैं पढ़ लूँ फिर तुम पढ़ लेना।”

तीस-चालीस पैसे के अख़बार को वापस करने की बात कोई सामान्य व्यक्ति कहता तो मितव्ययिता की दृष्टि से उचित भी था, पर राँल्सराँयस कार का मालिक कहे तो यह अटपटा-सा लगता है और तब तो और भी ज्यादा, जबकि कोई करोड़पति व्यक्ति कहे। पर वह व्यक्ति अर्थसंयम के बल पर ही करोड़पति बना था। एक नाई के लड़के से जिसे दो वक्त रोटी ठीक से न मिल सके, वह उस समय का संसार का सबसे बड़ा प्रेस मालिक बन गया था। लॉर्ड टॉमसन सभी नवयुवकों के लिए निश्चित ही एक आदर्श माने जाते रहे हैं, जो असफलता एवं प्रतिकूलता की छाती को चीरकर सतत् बढ़ते रहे और हिम्मत और साहस के बूते मजबूत इरादों का परिचय देकर एक मिसाल बन गए।

लार्ड टॉम्सन का जन्म सन् 1894 में कनाडा के एक अतिसामान्य परिवार में हुआ। होश संभालते ही उन्हें अपने पैतृक व्यवसाय में जुट जाना पड़ा। टाम्सन की अभिरुचि भिन्न होने के कारण यह कार्य उन्हें बोझ-सी प्रतीत हुआ। वे अपने परिवार को विरासत में मिली गरीबी से मुक्त कराना चाहते थे। किसी तरह टाम्सन ने खेती का काम शुरू किया। कड़ाके की शीत और शरीर पर अपर्याप्त कपड़े। मौसम से जूझते हुए उन्होंने मिट्टी के साथ पसीने का रंग घोलना चाहा, परन्तु रंग न घुला और सफलता ने अंगूठा दिखा दिया।

इस क्षेत्र को छोड़कर उन्होंने अपने व्यवसाय को व्यापार की ओर मोड़ दिया। व्यापार में पूँजी और लाभ का खेल चलता है। कम पूँजी से लाभ की आशंका धूमिल होती है। यही टाम्सन के साथ भी हुआ, इसलिए यह क्षेत्र भी उन्हें छोड़ देना पड़ा। आर्थिक तंगी और असफलता पर असफलता का सिलसिला सामान्य आदमी का मनोबल भी तोड़ डालता है, पर टाम्सन किसी दूसरी ही मिट्टी के बने थे। वे अपने परिवार वालों को कहा करते- मैं दस साल बाद करोड़पति बन जाऊँगा और घर के लोग उसे उलाहने देते। कहते कि पहले सुबह की रोटी का प्रबन्ध तो कर लो।

तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद भी टाम्सन के हौसले पस्त नहीं हुए और वे अपने प्रयासों में निरन्तरता बनाये रहे। 1929 में उनके परिवार के साथ एक जबर्दस्त हादसा हुआ, जिसने उनके जीवन को न केवल एक दिशा दी, वरन् उनके कदमों में गति भी पैदा कर दी। हुआ यह कि उनकी लड़की की एक दुर्घटना में बाँह टूट गई। अर्थाभाव के कारण पर्याप्त इलाज नहीं हो सका और हाथ जैसा का तैसा ही रह गया। टाम्सन को अपनी विवशता के कारण लाड़ली बेटी इमी की यह स्थिति बुरी तरह कचोट गई और उन्होंने संकल्प ले लिया कि जीवन की इस विवशता और संघर्ष को वह जीतकर रहेंगे। वह दिखाएँगे कि दृढ़ मनोबल और संकल्पवानों के सामने परिस्थिति बाधक नहीं होती। टाम्सन के मन-मस्तिष्क पर योजनाबद्ध तरीके से अर्थोपार्जन की बात सूझी। इसे क्रियारूप में बदलने हेतु अथक मेहनत एवं अटूट लगन के साथ लक्ष्य के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व होम कर दिया।

काफी मेहनत और परिश्रम करके अपनी अर्जित पूँजी से उन्होंने एक प्रेस खरीदा। सारी पूँजी इसी में खप गई। भविष्य की आर्थिक सोच उनके परिश्रमी हाथों ने पूरी कर दी। यही कारण था कि प्रेस कर्मचारियों को वेतन के दिन नकद रुपये के स्थान पर चेक देकर वे उसे एक सप्ताह बाद भुनाने को कहते। सप्ताह भर में अख़बार के एजेण्टों एवं ग्राहकों का शुल्क बैंक में जमा हो जाता और कर्मचारियों को उन चेकों से भुगतान हो जाता था। इस तरह पैसे के अभाव में आपसी तालमेल से वह कार्य आगे बढ़ता रहा। अपने काम को बढ़ाने के लिए उन्होंने ऐसे व्यक्तियों की तलाश की, जिनके पास पर्याप्त सम्पदा थी और जो महीने में न्यूनतम निर्वाह राशि से अपना काम चला सकते थे। उन लोगों को वे समझाते कि वेतन तो बाद में पर्याप्त मिलेगा, परन्तु समय के साथ खिलवाड़ मत करना।

इस तरह की सूझ-बूझ सहानुभूति परक व्यवहार जैसे गुणों के कारण उनके कर्मचारियों तथा अधिकारियों को कभी भी परेशान-हैरान नहीं होना पड़ा। वे स्वयं मितव्ययी थे एवं सादगीपूर्ण जीवन जीते थे। एक ब्राह्मण की सबसे बड़ी यही तो विशेषता है - स्वयं पर कठोरता एवं औरों पर उदारता। टाम्सन इस विचारधारा के प्रबल समर्थक थे और इसे जीवन में उतारा भी। जीवन के इन सिद्धान्तों को वे अन्त तक अपनाए रहे। कई बार उन्हें राज-परिवारों में आमंत्रित किया गया। महारानी ने भी उन्हें आग्रहपूर्वक बुलाया परन्तु हर परिस्थिति में वे स्वच्छ एवं सादगीपूर्ण परिधान ही पहनकर जाते। यही उनका परिचय था। वे कहते - व्यक्ति हमेशा अपने स्वभाव, चरित्र, चिन्तन एवं व्यवहार द्वारा ही जाना जाता है, बाहरी श्रृंगार एवं परिधान से नहीं। कीमती एवं महँगे सूट मात्र दिखावा एवं आडम्बर हैं, इनसे व्यक्ति के अहंकार का व्यर्थ पोषण होता है। इसलिए मैं इसमें अपने परिश्रमजन्य साधन-सम्पत्ति क्यों बर्बाद करूं?

टाम्सन खरीददारी में भी सदा अपने इन्हीं सिद्धान्तों को ध्यान में रखते। वे अपने स्वयं को प्रेस के एक कर्मचारी से अधिक नहीं मानते थे और वे इसी औकात को लेकर जीवन-निर्वाह खर्च करते थे। अपने इसी रीति-नीति के कारण दुर्व्यसनों से, दुष्प्रवृत्तियों से स्वयं बचे रहे व उनका परिवार भी सुसंस्कृत रूप में विकसित हुआ। लार्ड टाम्सन अपव्यय बचाने और धन कमाने की कला में पूरी तरह माहिर थे। घाटे में चल रहे किसी भी अख़बार को खरीदकर उसे सफलतापूर्वक चला देना उनकी व्यापारिक कुशलता थी। वे इस क्षेत्र के एक दक्ष व्यापारी माने जाने लगे थे। एक बार उन्होंने कहा भी कि अख़बार को किसी वाद विशेष से नहीं जुड़ना चाहिए। उसे स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं निर्भीक होना चाहिए। इसके बगैर अख़बार समाज और जनता की सेवा नहीं कर सकता। मैं अपने कर्मचारियों को इसी की शिक्षा देता हूँ। “ आज भी उनके पुराने सम्पादकीय को पत्रकारिता के शिक्षण में बड़ी मान्यता प्राप्त है।

सन् 1976 में उनका देहान्त हुआ। एक साधारण परिवार से संघर्ष एवं साहस के साथ बढ़कर सफलता की बुलन्दियों को स्पर्श करने वाले टाम्सन का जीवन-दर्शन किसी भी नवयुवक के लिए प्रेरणादायी है। उनका जीवन हमें यह संदेश देता है कि जीवन में कभी भी दैन्य एवं निराशा को कोई स्थान नहीं दिया जाना चाहिए।


वृक्ष-वनस्पतियों में भी होती है संवेदनशीलता

प्रकृति सृष्टि की माता है। उसके आँचल में पादप एवं जीव अपने स्तर पर पल्लवित एवं विकसित होते हैं। अब यह सर्वमान्य है, पौधों में संवेदना होती है। इसी वजह से ही वे मनुष्य के स्पर्श, विचार एवं भावनाओं को समझ जाते हैं। सद्भावना का सिंचन कर इनकी क्रियाशीलता में वृद्धि की जा सकती है। इस पर अनेकों वैज्ञानिक प्रयोग भी हुए हैं। सजीवों की भाँति पौधों में भी तंत्रिका-तंत्र तथा सूक्ष्म-रसायन का अनोखा संसार होता है, हालाँकि यह बहुत ही सरल रूप में होता है। पौधे खतरों से सावधान होने के लिए विशिष्ट सांकेतिक भाषा का प्रयोग भी करते देखे गये हैं।

पेड़-पौधों में चेतना का स्तर एक विशेष प्रकार का होता है और यह जीव-जन्तुओं से भिन्न होता है। इस मान्यता के जनक थे प्रसिद्ध भारतीय वनस्पतिविद् जगदीश चन्द्र बसु। इन्होंने पौधों में संवेदनशीलता के अस्तित्व का सफल प्रयोग करके अनुसंधान का एक नूतन आयाम जोड़ा। इससे वनस्पति जगत में खोज की एक प्रक्रिया चल पड़ी। जगदीश चन्द्र बसु के इस प्रयोग का अनेकों वैज्ञानिकों ने सूक्ष्म विश्लेषण किया। आधुनिकतम अन्वेषणों से भी पता चला है कि पौधों में संवेदना होती है। उच्चवर्ग के पौधों में यह विकसित होती जाती है। निम्नवर्ग के जंतुओं में संवेदना मिश्रित होती है। अतः विकास की प्रक्रिया एक सीधी रेखा में चलती है, जो पादप से प्रारम्भ होती है। भाव-संवेदन उसके तंत्रिका तंत्र के आधार पर निर्भर करता है। वैज्ञानिकों के अनुसार पौधों का तंत्रिका सरल होता है, इसमें जटिलता नहीं पाई जाती।

ऐसे कई पौधे हैं, जो स्पर्श मात्र से सिकुड़ जाते हैं। छुईमुई, विनसफ्लाइट्रेप इसके अच्छे उदाहरण हैं। कुछ पौधों को समय का भी ज्ञान होता है। सूर्यमुखी जो सूर्य की दिशा के साथ गति करता है। कमल दिन में खिलता है तथा कुमुदिनी रात में। आखिर ऐसा क्या है, जो ये पौधे जीवों के समान क्रियाशील होते हैं। इस सूक्ष्म कार्य के बारे में काफी कुछ अनुसंधान-अन्वेषण किया गया है। डार्विन ने देखा किडायोनिया म्यूसीपोला को छूने से यह सिकुड़ जाता है। इसका अध्ययन करते हेतु डार्विन ने पौधे को यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लन्दन के विश्व प्रसिद्ध मेडिकल फिजियोलॉजिस्ट जीन वर्डन सैर्ण्डसन को सौंपा। सैर्ण्डसन ने इसकी गतिविधियों को जानने के लिए पौधे को एवं छुईमुई को इलेक्ट्रोड के माध्यम से विद्युत परिपथ से गुजारा। इसके अनुसार जब इन पौधों को छुआ जाता है, तो इसकी पत्तियों के बाहरी किनारे पर विद्युत आवेश की प्रबल धारा बह उठती है। इसे जीवों के न्यूरान के समान प्रदर्शित किया। अंततः सैर्ण्डसन ने स्पष्ट किया कि पौधों में भी जीवों के समाज तंत्रिकातंत्र होता है।

जीवधारियों की सबसे बड़ी विशेषता है उनमें सन्निहित क्रियात्मक आवेग। वनस्पति जगत में उसकी मात्रा कम होती है, परन्तु जीव-जंतुओं में अधिक। पौधों में पूर्ण विकसित तंत्रिका-तंत्र तथा न्यूरान का सुसंचालित व विकसित जाल का अभाव होने के कारण ही क्रियात्मक आवेग में कमी पायी जाती है। इस आवेग को सर्वप्रथम सन 1960 से 70 के दशक में आणुविक और कोशिकीय आधार पर ज्ञात किया गया। सन् 1970 के बाद इस विषय पर अनेकों अनुसंधान हुए। अमेरिकन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने स्वीकारा कि यह आवेग कोशिका के प्लाज्मोडेस्मेटा द्वारा प्रसारित होता है। कोशिकाभित्ति पर अवस्थित सूक्ष्मरन्ध्र को ही प्लाज्मोडेस्मेटा कहते हैं। आवेग इन्हीं छिद्रों के माध्यम से गुजरता है। जब किसी संदेश का प्रसारण होता है, तो इन छिद्रों के कुछ दूरियों पर अनेक जंक्शन बन जाते हैं। यह जंक्शन ही संदेश को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने में सहयोग करते हैं। जीवों में यह प्रक्रिया त्वरित एवं जटिल होती है।

पौधों के तंत्रिका-तंत्र में रासायनिक तत्वों का विशेष महत्व होता है। इन रसायनों को न्यूरोट्राँसमीटर कहा जाता है। हर न्यूरान में न्यूरोट्राँसमीटर भिन्न होता है तथा विशिष्ट कार्य को सम्पादित करने के लिए प्रयुक्त होता है। इसके नेटवर्क की एक विराट टेलीफोन एक्सचेंज से तुलना की जा सकती है। सन् 1960 में विनस फ्लाइट्रेप तथा छुईमुई जैसे पौधों पर प्रयोग किया गया। इनके सिकुड़ने की पूरी प्रक्रिया को विश्लेषित किया गया, स्पर्श के पश्चात् सिकुड़ने की पूरी प्रक्रिया में आयनों की क्रियाशीलता महत्वपूर्ण होती है। छूने के साथ ही इनमें प्रतिक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। सर्वप्रथम कैल्शियम आयन सक्रिय होकर क्रिया को प्रारम्भ करता है। इसके उद्दीपन से पोटैशियम तथा क्लोराइड आयन एक छिद्र से दूसरे छिद्र तक पहुँचते हैं। जीव-जन्तुओं में पोटैशियम के स्थान पर सोडियम आयन को जिम्मेदार माना जाता है। इसके बारे में ओटावा के कॉल्ट्रन यूनिवर्सिटी के फिजियोलॉजिस्ट स्टुअर्टजैकबसन ने स्पष्ट किया है कि जब इन पौधों को स्पर्श किया जाता है, उस स्थान पर विद्युत आवेश कम पड़ जाता है, तथा ध्रुवीकरण की स्थिति बन जाती है। इसी वजह से पत्तियाँ ढीली होकर बंद हो जाती हैं।

अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार विनस फ्लाइट्रेप तथा छुईमुई के जल में पाए जाने वाले अल्ड्रोवाण्डा भी इस तरह की क्रिया को प्रदर्शित करता है। कई प्राणियों की कोशिकाएँ भी ऐसे ही कार्य करती हैं। इसका अच्छा उदाहरण है, अंतःकरण के काक्लीया के रोए। इनमें ध्वनि कम्पन से क्रियात्मक आवेग उत्पन्न होता है। इसकी संचालन- पद्धति भी ठीक ऐसे ही होती है, परन्तु इसमें गति तीव्र एवं जटिल होती है। अकशेरुकी जीव सीलेण्ट्रेटा परिवार के सी-एनीमोन व जेलीफिश का तंत्रिका-तंत्र भी इसी तरह माना जाता है। यह विशेषता वनस्पति जगत के हजारों जातियों तथा पुष्पोद्भिदों के कई परिवारों में देखी गई है। इसके अंतर्गत ड्रोसेरा, कीटभक्षी पौधे, बायोफीटम, नेप्चूनीया की पत्ती, स्पर्मेनीया, बरबरीस, मोहनीया पुष्प आदि आते हैं, जिन्हें स्पर्श करने पर क्रियात्मक आवेग का जन्म होता है।

कई पौधे ऐसे होते हैं, जिनमें संवेदनशीलता स्पष्ट देखी जा सकती है। इस बारे में ओहियो के स्पेश यूनिवर्सिटी के सुप्रसिद्ध वनस्पतिविद् मार्डेचाई जैफे ने उल्लेख किया है कि संवेदनशीलता हर पौधे में पाई जाती है, परन्तु उसके क्रियाशीलता के अनुपात में भिन्नता हो सकती है। इन्होंने मटर के प्रतान का हवाला देते हुए स्पष्ट किया है। मटर का प्रतान आधार को स्पर्श करते ही स्वतः इसमें लिपट जाता है। यह क्रिया अपने आप होती है। इसमें क्रियात्मक आवेग इतना अधिक होता है कि आधार के स्पर्श किए बिना भी प्रतान कुण्डलित हो जाता है। जैफे ने इसको और स्पष्ट करने के लिए एक पौधे को प्रयोग के लिए चुना। पौधे को स्पर्श करने पर इसमें भारी परिवर्तन देखा गया। प्रतिदिन इसे हल्का सा छुआ जाता था। सूक्ष्म रूप से यूं तो इनकी प्रतिक्रिया प्रति 30 मिनट पश्चात् देखी गई, परन्तु कुछ माह के बाद इसमें परिवर्तन परिलक्षित हुआ। अंत में पौधे का तना मोटा, पत्तियाँ चौड़ी तथा अन्य कई प्रकार के लक्षण देखे गए। यह उसी जाति के एक अन्य पौधे से एकदम भिन्न विकास कर रहा था।

जैफे ने इस विषय में गहन अनुसंधान किया। इस प्रयोग को आगे बढ़ाने के लिए हॉर्टीक्लचर रिसर्च इण्टरनेशनल वेर्ल्सड के नार्मन विडिंगटन तथा टोनी डियर मेन आगे आये और उन्होंने कई शोधें की। इनके अनुसार पौधों को छूकर इनकी उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है। पालसिमन्स ने 17 अक्टूबर, 92 के न्यू साइंटिस्ट अंक में ‘द सीक्रेट फीलिंग्स ऑफ प्लाण्टस’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया था। इसमें उल्लेख किया है कि अकाल, ओलावृष्टि तथा अनेक प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित पौधों को स्पर्श के द्वारा बचाया जा सकता है। कृषि के अपने प्रयोगों में उन्हें सफलता भी प्राप्त हुई। सन् 1990 में स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के जेनेट ब्राम और रोनाल्ड डेविस एरेबिडोप्सीस के जेनेटिक प्रभाव पर अध्ययन किया और पाया कि स्पर्श करके इसके विकास में एक तिहाई से अधिक वृद्धि होती है। इन प्रयोगों से पता चलता है कि स्पर्श से पौधों में वाष्पोत्सर्जन कम तथा मेटाबॉलिज्म और प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया अधिक होती है। रूस और अमेरिका में फूलों के परागकण और उससे शहद उत्पादन में इस विधा का उपयोग किया जा रहा है। कोब यूनिवर्सिटी जापान के ताकुफुमी हिरोमी और सोनासुडा ने तो परागकण के लिए स्पर्श को एक नितांत व महत्वपूर्ण अंग माना है।

मानवी स्पर्श पौधों के लिए वरदान साबित हुआ है जब किसी पुष्पीय पादप को छुआ जाता है, तो बड़ी मात्रा में एथिलीन गैस निकलती है, जो विकास हार्मोन को स्रवित करने में सहयोग करती है। पर्याप्त मात्रा में हार्मोन का स्रवण पौधों की वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उससे तना लम्बा, पत्तियाँ घनी तथा फूल एवं फल अधिक लगते हैं। एथिलीन की थोड़ी - सी मात्रा भी हार्मोन को उत्सर्जित करने में सहायक होती है। प्रति लाख बूँदों में एथिलिन की कुछ बूँदें ही पर्याप्त होती हैं। इसके कारण फ्लोएम में शर्करा व खाद्य-पदार्थ तेजी से बढ़ते हैं व फल-फूल और बीज का उत्पादन अधिकतम होता है।

पौधों में स्पर्श द्वारा संवेदनात्मक स्वरूप को जानने के लिए जर्मनी के ‘वान इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड फिजिक्स’ ने एक यंत्र बनाया है। यह यंत्र पौधों से उपार्जित एथिलीन पर आधारित है। इस यंत्र में एक इन्फ्रारेड लेजर किरणों का पुँज होता है। यह अति सुग्राही होता है, जिसे प्रति सेकेण्ड 2000 बार बंद अथवा चालू किया जा सकता है। इस गैस के अणु इन्फ्रारेड प्रकाश से उत्सर्जित हो जाते हैं। उद्दीप्त एथिलीन अणु से ऊर्जा-तरंगें निकलती हैं और वातावरण में एक सूक्ष्म कम्पन होने लगता है। यह कम्पन 2000 हट्ज आवृत्ति का होता है, अतः इसे परिवर्धित करके सुना जाता है। इस यंत्र से स्पष्ट होता है कि जब पौधों को सद्भावपूर्ण स्पर्श किया जाता है, तो कम्पन अधिक होता है। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि संभवतः पौधे इसका जवाब मूक भाषा में देना चाहते हों। सर्वप्रथम इस तकनीक का प्रयोग नीदरलैण्ड में किया गया था।

मानवी-स्पर्श द्वारा विकास के इस तकनीक का प्रयोग जल में पाए जाने वाले शैवाल, कारा और नीटेला पौधों में भी किया गया। विशेषज्ञ विकास के लिए स्पर्श को बड़ा महत्वपूर्ण मानते हैं। इसका परिणाम बड़ा ही आश्चर्यजनक रहा। जो शैवाल मात्र कुछ ही मिलीमीटर का होता है। उसे छूने पर 1.5 सेमी. लम्बा व 1.5 मिलीमीटर चौड़ा हो गया। कोशिका के अन्दर साइटोप्लाज्म व रिक्तिका सुविकसित होने लगे। गति में भी एकाएक परिवर्तन होता है। कैल्शियम आयन में बड़ी वृद्धि होती है तथा कोशाभित्ति के बीच वोल्टेज बढ़ जाता है। कैल्शियम की अधिकता एक्टीन और मायोसीन प्रोटीन को कम कर देती है तथा पौधों में विकास की दर बढ़ने लगती है। जीव- जन्तुओं की माँसपेशियों में भी ठीक ऐसी ही प्रक्रिया होती है।

मूर्धन्य वनस्पतिविदों ने स्पर्श के द्वारा पौधों के जेनेटिक परिवर्तन को भी विश्लेषित किया है। इस कार्य में उन्हें आशातीत सफलता भी मिली है। ब्राम और डेविस के अनुसार ऐरेबिडोप्संस में पाँच प्रकार के जीन प्रभावित होते हैं। उसमें से एक है काल्मोडूलीन। यह जीन जीवों और पौधों के प्रोटीन अणुओं को नियमित एवं नियंत्रित करता है। काल्मोडूलीन स्तनधारियों के मस्तिष्क में न्यूरल प्रक्रिया हेतु प्रयुक्त होता है। यह पौधों की कोशिकाओं में कैल्शियम को स्रवित करके अन्य बायोकेमिकल संकेतों को प्रसारित करता है। एडीनबर्ग विश्व विद्यालय के मार्कनाइट ने इसे बड़े स्पष्ट ढंग से प्रतिपादित किया है। इसके अनुसार स्पर्श से पौधों में कैल्शियम का प्रवाह फूट पड़ता है। पौधे मानवी स्नेह और ममता का प्रत्युत्तर कैल्शियम नामक रसायन द्वारा देते हैं। स्पर्श से इसकी क्रियाशीलता अद्भुत एवं आश्चर्यजनक हो जाती है।

एक अन्य आश्चर्यजनक तथ्य यह भी सामने आया है कि स्पर्श से जीवों के अंतः करण, त्वचा तथा माँसपेशियों में हलचलें होती हैं। अब तो इस प्रभाव का उपयोग लाल रक्त कणिका और अण्डाणु तक में किया जाने लगा है। जिस प्रकार पौधों के परागकण में यह बड़ा ही उपयुक्त साबित हुआ है, ठीक उसी तरह जीव-जन्तुओं के निषेचन में भी इस विधा को उपयोग में लाया जा रहा है।

पौधों के इस भावसंवेदना को उद्दीप्त करके उनके विकासक्रम को बढ़ाया जा सकता है। इस संदर्भ में गोटिंगम यूनिवर्सिटी के डेनियल कासग्रेव तथा रेनर हेडरीक नामक वैज्ञानिकों ने पत्तियों के स्टोमेटा के क्रिया–कलापों का गहन अनुसंधान किया है, उनके अनुसार पौधों की संवेदना को झंकृत करते ही तीन प्रकार के चैनल बन जाते हैं, जो मुख्यतया क्लोराइड- पोटैशियम और कैल्शियम से संबंधित होते है। पौधों का वातावरण से सहज सम्बन्ध होता है। तूफान के आते ही पौधे अपने बचाव के लिए स्टोमेटा को बंद कर देते है। पानी की अधिकता के कारण भी स्टोमेटा स्वतः बंद हो जाता है। यह प्रक्रिया पत्तियों के आवेग को उद्दीपन प्रदान करती है। यह पौधे की वृद्धि और विकास में भी सहायता प्रदान करती है।

कोशिका - विभाजन के समय तो उस प्रभाव को सुस्पष्ट ढंग से देखा जा सकता है। मैरोलैण्ड यूनिवर्सिटी के वनस्पतिविद् पालडस्चोप और हाडकुक ने क्लीड्रोक हेटेरीफाइला नाम पौधे पर गहन अध्ययन, किया, उनके अनुसार पौधों में पत्तियाँ अति संवेदनशील होती हैं। अतः मनुष्य अपने संवेदनात्मक, स्पर्श के द्वारा पत्तियाँ के आकार में परिवर्तन ला सकता है। इन वैज्ञानिकों ने पत्तियों को आकार में लम्बा व कटा हुआ तथा चौड़ा और छोटा दो तरह की भिन्नताएँ प्रकट करके दिखाई भी है। इसी तरह कुछ वैज्ञानिकों ने संवेदना द्वारा पौधों के निषेचन को प्रभावित कर पाने में सफलता पाई है। निषेचन एक सूक्ष्म व महत्वपूर्ण अवस्था होती हे। क्रियात्मक आवेग पूरी प्रक्रिया में एक विद्युतधारा प्रवाहित करता है, जो नर परागकण से होकर अण्डाणु तक पहुँचता है। इसमें अण्डाणु में दाहिने भाग से विभाजन व विखण्डन प्रारम्भ होता है। यह विशेषता कवक, पौधे एवं जीव जन्तुओं में भी पायी गयी है। स्पर्श संवेदना इनके आनुवंशिक गुणों में भी परिवर्तन ला सकती है। बोरिस मार्टीनेस ने तो इसका प्रभाव जीवाणु तक में रेखांकित किया। मार्टीनस के अनुसार, जीवाणु में स्पर्श से आयन का प्रवाह फूट पड़ता है।

शरीर क्रियाविज्ञानी स्पर्श को एक नूतन विधा के रूप में विकसित करने में उन्होंने पाया है। कि संवेदना से जीवों का न्यूरोट्राँसमीटर एसीटीलकोलाइनह आँखों का ऐडाप्सिन, काल्मोडूलीन आदि विशेष रूप से प्रभावित होते है। पैरामीशियम के कोशिकाभित्ति से आयन स्राव होने लगता है और इसको तैरने के लिए उद्दीपन नहीं जन्तु - जगत भी प्रभावित होता है।

अति प्राचीनतम जीव पैरामीशियम, छुईमुई, फ्लाइट्रेप हो अथवा मटर का प्रतान, निषेचन की क्रिया हो या जल का नियंत्रण, सभी सम्वेदनाओं से निर्विवाद रूप से प्रभावित होते है। यह पौधे के विकास एवं वृद्धि के लिए आवश्यक माना जा रहा है। पौधे मात्र बाहरी स्पर्श से ही क्रियाशील होते हों, ऐसी बात नहीं है। प्रकृति ने इन्हें अनेकों प्रकार की विशेषताओं से भी अलंकृत किया है। ये स्वयं भी प्रकृति में अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति का आकलन कर लेते हैं तथा इसके अनुरूप अपना बचाव व सुरक्षा का उपक्रम करते हैं तथा संकट के समय एक - दूसरे को चेतावनी भी देते हैं। पेड़ों पर ज्यों ही क्षतिकारक कीड़े-मकोड़े पहुँचते हैं, वे एल्केलाइड तथा टर्मिनाइड जैसे रसायनों का उत्पादन शुरू कर देते है। ये रसायन पत्तियों को विषाक्त कर देते है, जो खाने के योग्य नहीं रह जो। यही नहीं वह प्रोटीन भी जिसे कीड़े अपने भोजन के रूप में पेड़ों से प्राप्त करते हैं, इन रसायनों के कारण दूषित हो जाता है। इस तरह पेड़ इन कीड़ों से अपना बचाव कर लेते है। यह सब पेड़ों को पूर्व से ही पता चल जाता है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि आक्रान्ताओं से सुरक्षा हेतु रसायनों का स्रवण वहाँ से तीस-चालीस मीटर की दूरी पर अवस्थित अन्य पेड़ भी करने लगते है।, जिसके कारण वे पूर्व सूचना प्राप्त कर लेते है।

पेड़- पौधे वातावरण से बहुत प्रभावित होते है। वातावरण और वनस्पति जगत का सम्बन्ध बहुत गहरा एवं विस्तृत है। दोनों ऐ-दूसरे पर अन्योऽन्याश्रित है। पेड़ वातावरण की सूक्ष्म हलचलों को ग्रहण करने की सामर्थ्य रखते है। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि सृष्टि-संचालन प्रक्रिया में एक कोड होता है, जो समस्त गतिविधियों को अपने में समाहित किए रहता है। इन्हें कास्मिक कोड टाइम कोड, माइण्ड कोड तथा रिंग कोड आदि के रूप में जाना जाता है। रिंग कोउ पौधों के वार्षिक वलय के तहत विनिर्मित होता हैं। वनस्पतिशास्त्रियों के मतानुसार पेड़-पौधे वातावरण तथा इसके संपर्क में आने वाले हर सजीव के तरंगों से गहरा तादात्म्य स्थापित रखते है। यह समस्त विवरण उनके रिगकोड में संचित होता रहता है। अगर उसे डिकोड करने की तकनीकी ज्ञान हासिल हो सके तो वातावरण के गुप्त रहस्यों को अनावृत किया जा सकता है। यह तथ्य स्पष्ट करते है। कि पौधे अति सुग्राही तथा संवेदनशील होते है।

संत लूथरबरबैक अमेरिका के प्रख्यात वनस्पतिशास्त्री रहे है। उन्होंने अपने प्रेम और संवेदना के बल पर पौधों के शुल्क तथा प्रस्तर रूपी तरंगों को जाग्रत करने में अभूतपूर्व सफलता पाइरै योगानंद ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘ योगीकथामृत’ में संत लूथर बरबैक के साक्षात्कार का विस्तार से वर्णन किया है। बरबैक ने आने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा है कि वैज्ञानिक ज्ञान से भिन्न वनस्पति- संवर्द्धन का गुप्त रहस्य है और वह है प्रेम। साँतारोजा कैलीफोर्निया के अपने बगीचे में कंटकहीन थूहर को दिखाते हुए उन्होंने बताया कि अपनी भावसंवेदना उड़ेलते हुए कँटीले पौधे के शुष्क संवेदना को जाग्रत कर मैंने कहा - “ तुम भय मत करो, तुम्हें आत्मरक्षा के लिए काँटों को आवश्यकता नहीं है। मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा। धीरे-धीरे यह रेगिस्तानी पौधा कंटकहीन किस्म में परिणत हो गया।”

संत बरबैक ने पौधों की संवेदना को सृजनात्मक दिशा में मोड़कर वनस्पति जगत को सैकड़ों वर्णसंकर वनस्पतियाँ प्रदान की है। उन्होंने अख़रोट के वृक्ष पर प्रयोग करके यह सिद्ध कर दिया था कि संवेदना व प्रेम से प्राकृतिक विकासक्रम की गति को अत्यन्त तीव्र किया जा सकता है। इनके बगीचे में केवल सोलह वर्ष में अख़रोट फल देना शुरू कर देता है। सामान्यतः 30.32 साल में इसमें फल आना प्रारम्भ होता है। बरबैक ने अपने प्रसिद्ध शोध ग्रंथ ‘ द ट्रेनिंग ऑफ द ह्यमेन प्लाण्ट’ में स्पष्ट किया है कि पौधों की इच्छाशक्ति की तुलना में मनुष्य की इच्छाशक्ति अत्यंत कमजोर है। ताड़ की कुछ किस्में इतनी दृढ़ हैं कि कोई भी मानवीशक्ति अभी तक उसमें परिवर्तन नहीं जा की। इसके अतिरिक्त इस सम्पूर्ण वृक्ष की जीवनव्यापी दृढ़ता केवल एक नए जीवन का संयोग करा देने से टूट जाती है। वर्णसंकरता या कलम के द्वारा इसके जीवन में पूर्ण और शक्तिशाली परिवर्तन घटित हो जाता है। दृढ़ता टूट जाने पर धैर्य के साथ लम्बे समय तक देख-भाल के द्वारा नए परिवर्तन को स्थापित किया जाता है। प्रेम और संवेदना से यह क्रिया तीव्रता के साथ होती है। अच्छा हो हम पेड़ -पौधों को स्नेह और ममता भरी दृष्टि से देखें और उनका संवर्द्धन करें। इनके विकास में ही हमारी प्रगति सन्निहित है।


जहाँ बाँस के फूल विभीषिका का संकेत बनकर आते है।

प्रकृति में कितनी ही प्रकार की घटनाएँ घटती रहती है। कुछ को शुभ-संकेत के रूप में देखा जाता है और कइयों को अशुभ का आगमन माना जाता है। इन घटनाक्रमों का शुभ-अशुभ से प्रत्यक्षतः कोई संबंध नहीं, इतने पर भी कई बार दोनों का तारतम्य कुछ इस प्रकार बैठता है कि उसे देखकर लगता है कि मानो उक्त घटना के कारण ही प्रस्तुत विपत्ति आई है।

समय-समय पर ऐसे प्रसंग प्रकाश में आते रहते है। पिछले दिनों असम के उत्तरी कछार जिले और मिजोरम में जब जंगली बाँस में पीले एवं चमकीले बैंगनी रंग के फूल खिले, तो उन्हें देखकर स्थानीय लोग भयभीत हो उठे और मन तरह-तरह की शंका-कुशंकाओं से गसत हो गया। इन बाँसों की दो प्रकार की प्रजातियाँ वहाँ पायी जाती है। एक को ‘थिंग ताम’ कहते हैं तथा दूसरे को ‘मऊ ताम’। दोनों की फूल खिलने की अवधि पृथक्-पृथक् है। 20 वर्ष के अन्तराल पर खिलने वाली को ‘ थिंगताम’ एवं हर 50वें साल पुष्पित होने वाली प्रजाति ‘ मऊताभ’ कहलाती है। उनका खिलना वहाँ विपदा का संकेत माना जाता है।

इस बार ‘थिंगताम’ की बारी है। ‘थिंगताम’ अर्थात् छोटा अकाल। जब यह पुष्प निकलते है, तो विभीषिका का प्रकोप छोटे स्तर का होता है, किन्तु ‘ मऊताम’ भीषण और भयावह अकाल का संकेत लेकर आता है।

सन् 1962 में ‘मऊताम’ का प्रकोप शिखर पर था। तत्पश्चात 1977-78 में ‘थिगताम’ की विभीषिका आई। अब 20 वर्ष बाद फिर उकसा समय आ गया है। वास्तव में यह दोनों विपत्तियाँ बाँस के जंगलों के जीवनचक्र से जुड़ी हुई हैं। कृषि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ‘मऊताम’ का अगला चक्र सन् 2007 में असम और मिजोरम को बुरी तरह अपनी चपेट में लेगा। उनका कहना है कि असम पर इसका आँशिक असर पड़ेगा और उसके कुछ हिस्से ही उससे प्रभावित होंगे। पर मिजोरम सम्पूर्ण रूप से भुखमरी के कगार पर होगा।

ऐसा क्यों होता है? क्या बाँस के फूल अमंगल और आपदासूचक है? नहीं, यथार्थ में दुनिया में शुभ-अशुभ कुछ भी नहीं है। जो है, वह सब सापेक्ष है। यहाँ किसी को एकदम बूरा और किसी को बिलकुल भला कहना भी ठीक नहीं। यह सब कुछ स्थिति, परिस्थिति और अवस्था पर निर्भर है। दिन के उजाले में कार्य करने वालों को रात की कालिमा नहीं सुहाती, पर चोर-उचक्कों के लिए वही वरदान सिद्ध होती है। खून-खराबे को उचित कैसे ठहराया जाए? लेकिन आमतौर पर इसके दो प्रारी के परिणाम सामने आते है। समाज में आतंक फैलाने वालों के मारे जाने पर उसके साथी-रिश्तेदार गम के आँसू बहाते है।, जबकि समाज चैन की साँस लेता और खुशियाँ मनाता है। विजय विजेता के लिए जहाँ अपार खुशियाँ लेकर आती है, वहीं दूसरी ओर प्रतिपक्ष को दुःख के गहरे सागर में डूबो जाती है। घटना एक ही है, पर उसके दो प्रकार के नतीजे सामने आते है।

ठीक उसी प्रकार बाँस के फूलों का खिलना न तो पूरी तरह अशुभ है, न बिलकुल शुभ ही। वास्तव में इसे शुभाशुभ का मिश्रण कहना ज्यादा समीचीन होगा, कारण कि एक ओर जहाँ यह सर्वसाधारण के लिए दुर्भिक्ष जैसी विपदा लेकर आता है, वहीं दूसरी ओर जंगलों में निवास करने वाले वनवासियों की आहार संबंधी समस्या का हल भी जुटाता है। इस दौरान जंगली चूहों की संख्या में होने वाली असाधारण वृद्धि से भोजन के लिए वे कई महीनों तक निश्चित हो जाते है, इस प्रकार एक साथ जहाँ यह प्राकृतिक घटना प्रिय है, वहीं अप्रिय भी।

आखिर इस घटना से अकाल का क्या संबंध है? इस बारे में कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यों तो प्रत्यक्ष रूप में इस घटना का दुर्भिक्ष से कोई सीधा संबंध नहीं है, फिर भी परोक्ष रूप में वह इसके लिए जिम्मेदार तो है ही। साठ के दशक में इसके कारण उपस्थित हुए भीषण अकाल का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं कि तब बाँस फूलों का विशाल गुच्छा जैसे लगते थे। थोड़े समय पश्चात् इनमें बीज पैदा हुए और पककर झड़ने लगे। खाने पर उनकी प्रजनन क्षमता में असाधारण वृद्धि हुई। साधारण स्थिति में एक चुहिया एक बार में सामान्यतया पाँच तक बच्चे देती है, किन्तु बाँस के बीज खाने के बाद वे एक बार में बीस-बीस बच्चे देने लगी। कुछ ही महीनों में पूरा इलाका चूहों से भर गया। इस विशाल आबादी के लिए आखिर वह बीज कब तक काम आते। जल्द ही वे समाप्त हो गए और उनके आगे खाद्य संबंधी गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई। स्वयं को जीवित रखने के लिए आहार जरूरी था, सो वे झूम खेतों पर टूट पड़े। उन दिनों उनमें धान की फसल लगी हुई थी। एक ही रात में 20 एकड़ धान की फसल को वे चट करने लगे। फसल सफाया करने के उपरान्त अन्न के गोदामों पर उनका आक्रमण हुआ और उन्हें भी उदरस्थ कर गए। परिणाम यह हुआ कि वहाँ के लोगों को भयंकर भुखमरी का सामना करना पड़ा। आज का मिजोरम तब असम का लुसाई पर्वतीय जिला कहलाता था। साठ के दशक में आई विपत्ति को याद कर वे आज भी काँप उठते है।

असम के उत्तरी कछार जिले को भी समय-समय पर उक्त आपदा झेलनी पड़ी है। सन् 1956 और 1962 में वहाँ चूहों ने भारी उत्पात मचाया था। उन दिनों खाद्यान्नों और सब्जियों की इतनी किल्लत हुई कि उनके भाव आकाश चूमने लगे। बाद में गुवाहटी उस अनाज आपूर्ति के उपरान्त दशा कुछ सँभली, पर फिर भी लुसाई पर्वतीय जिले (वर्तमान मिजोरम) के लिए स्थिति विषम ही बनी रही। हेलीकॉप्टरों से जो चावल के बोरे गिराये गए, वह फट गए, और अनाज जंगलों में बिखर गया, जिन्हें बटोर पाना असंभव था। इसी विकट परिस्थिति ने मिजोरम उग्रवाद को जन्म दिया।

किसी घटना का प्रिय - अप्रिय होना इस बात पर निर्भर है कि उससे व्यक्ति अथवा समाज को क्या हानि और कितना लाभ हैं? लाभ-हानि की व्याख्या-विवेचना व्यक्ति के निजी चिंतन, व्यवहार स्थिति और परिस्थिति पर अवलम्बित है, अतः यह करने में हर्ज नहीं कि शुभ-अशुभ की नाप-तौल सबके लिए अलग-अलग है। समय, परिस्थिति और आवश्यकता के हिसाब से वह बदलती रहती है, अस्तु किसी एक स्थिति या घटना को एकदम अशुभ मान बैठना उचित नहीं।


अपने आप से पूछिए ये तीन प्रश्न

संसार में प्रायः तीन प्रकार के व्यक्ति पाये जाते है। एक आत्मविश्वासी दूसरे आत्म-निषेधी और तीसरे संशयी। अपने इन्हीं प्रकार के कारण एक वर्ग के लोग आपने उद्योग और पुरुषार्थ के बल पर समाज पर छाये रहते हैं, अपना स्पष्ट स्थान बनाकर जीवन को सार्थक बनाते और समय के पृष्ठों पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं। दूसरा वर्ग अपने प्रकार के कारण निराशा निरुत्साह और निःसाहस के कारण रोते-झींकते भाग्य और विधाता को कोसते हुए जीते और अन्त में एक निस्सार और निरर्थक मौत मरकर चले जाते है।

तीसरा वर्ग अपने प्रकार के कारण तर्कों, वितर्कों, हाँ -ना,, क्रिया - निष्क्रियता में अपना बहुमूल्य समय और शक्ति नष्ट करके हुए- कर रहा हूँ - के भ्रम में कुछ भी न करके एक असन्तोष लेकर संसार से चले जाते हैं। उनकी अपूर्णता उन्हें निष्क्रियता का दोष दिलाने के सिवाय कोई उपचार नहीं दिला पाती।

संसार के समस्त अग्रणी लोग आत्मविश्वासी वर्ग के होते हैं। वे अपनी आत्मा में, अपनी शक्तियों में आस्थावान् रहकर कोई भी कार्य कर सकने का साहस रखते हैं जब भी जो काम अपने लिए चुनते हैं, पूरे संकल्प और पूर लगन में उसे पूरा करके छोड़ते हैं। वे मार्ग में आने वाली किसी भी बाधा अथवा अवरोध से विचलित नहीं होते। आशा, साहस और उद्योग उनके स्थायी साथी होते हैं। किसी भी परिस्थिति में वे इनको अपने पास से जाने नहीं देते।

आत्मविश्वासी सराहनीय कर्मवीर होता है। वह अपने लिए ऊँचा उद्देश्य और ऊँचा आदर्श ही चुनता है। हेयता, हीनता अथवा निकृष्टता उसके पास फटकने नहीं पाती। फटक भी कैसे सकती है? जब आत्मविश्वास के बल पर वह ऊँचे से ऊँचा कार्य कर सकने का साहस रखता है और कर भी सकता है, तो फिर अपने लिए निकृष्ट आदर्श और पतित मार्ग क्यों चुनेगा? आत्मविश्वासी जहाँ अपने लिए उच्च आदर्श चुनता है, वहाँ उच्चकोटि का पुरुषार्थ भी करता है। वह अपनी शक्तियों और क्षमताओं का विकास करता, शुभ संकेतों द्वारा उनमें प्रखरता भ्रता और यथायोग्य उनका पूरा-पूरा उपयोग करता है। नित्य नए उत्साह से अपने कर्तव्यपथ पर अग्रसर होता, नए-नए प्रयत्न और प्रयोग करता, प्रतिकूलताओं और प्रतिरोधों से बहादुरी के साथ टक्कर लेता और अन्त में विजयी होकर श्रेय प्राप्त कर ही लेता है। पराजय, पलायन और प्रगमन से आत्म-विश्वासी का कोई सम्बन्ध नहीं होता, संघर्ष उसका नारा और कर्तव्य उसका शस्त्र होता है। निसर्ग ऐसे सूरमाओं को ही विजयमुकुट पहनाया करते है।

आत्मा अनन्त शक्तियों का भण्डार होती है। संसार की ऐसी कोई भी शक्ति और सामर्थ्य नहीं, जो इस भण्डार में न होती हो। हो भी क्यों न? आत्मा परमात्मा का अंश जो होती है। सारी शक्तियाँ, सारी सामर्थ्य और सारे गुण उस एक परमात्मा में ही होते हैं और उसी से प्रकाशित हो-होकर संसार में आते है। अस्तु, अंश आत्मा में अपने अंशी की विशेषताएँ होनी स्वाभाविक हैं। आत्मा में विश्वास करना, परमात्मा में विश्वास करना है। जिसने आत्मा के माध्यम से परमात्मा में विश्वास कर लिया, उसका सहारा ले लिया, उसे फिर किस बात की कमी रह सकती है। ऐसे आस्तिक के सम्मुख शक्तियाँ, अनुचरों के समान उपस्थित रहकर अपने उपयोग की प्रतीक्षा किया करती है।

किन्तु आत्मा का शक्ति -कोश अपने आप स्वयं नहीं खुलता, उसे खोलना पड़ता है। इस उद्घाटन की कुँजी है-शुभ संकेत। अर्थात् ऐसे विचार जिनका स्वर हो कि-” मैं अमुक कार्य कर सकता हूँ। मुझमें उसे पूरा कर सकने का साहस है, उत्साह है और शक्ति भी है। मुझे पुरुषार्थ से अनुराग है, उद्योग करना मेरा प्रियतम व्यसन। विघ्न-बाधाओं से मुझे कोई भय नहीं, क्योंकि संघर्ष को मैं जीवन की एक अनिवार्य क्रिया मानता हूँ। मैं मनुष्य हूँ। मेरे जीवन का एक निश्चित उद्देश्य है। उसे पूरा करने में अपना तन, मन और जीवन लगा दूँगा। सफलता के प्रति आसक्ति और असफलता के प्रति भय मेरी वृत्ति के अवयव नहीं हैं। मैं भगवान कृष्ण के अनासक्त कर्मयोग का अनुयायी हूँ। सफलता मुझे मदमस्त और असफलता मुझे निरस्त नहीं कर सकती। मुझे ज्ञान है कि लक्ष्य की प्राप्ति और उद्देश्य की पूर्ति सफलता, असफलता के सोपानों पर चलकर ही हो सकती है। मैं अखण्ड आत्म-विश्वासी हूँ। मैं यह कार्य अवश्य कर सकता हूँ और निश्चय ही करके रहूँगा

इस प्रकार के शुभ और सृजनात्मक संकेत देते रहने से आत्मा का कमल-कोश खुल जाता है और उसमें सन्निहित शक्तियाँ सुगन्ध की तरह आ-आकर पुरुष में ओत-प्रोत होने लगती है। यह भाव कि” मैं यह कर सकता हूँ” आते ही शरीर, मन और आत्मा की सारी उत्पादक शक्तियाँ एकत्र होकर व्यक्ति की क्रिया में समाहित हो जाती हैं। वह अपने में अक्षय उत्साह, साहस और आशा का अनुभव करने लगता है। उसके मार्ग की बाधाएँ भयभीत होकर हटने लगती है और कदम-कदम पर लक्ष्य स्पष्ट से स्पष्टतर और दूर से सन्निकट होता दिखलाई देने लगता है। शुभ संकेतों से उद्भूत आत्मविश्वास केवल आत्मा तक ही सीमित नहीं रहता, वह क्रियाओं, प्रक्रियाओं और सिद्धि तक फल जाता है।

इसके विपरीत आत्म-निषेधी व्यक्ति अपनी सारी शक्तियों को नकारात्मक बनाकर नष्ट कर लेता है। आत्मनिषेध आसुरी-वृत्ति है और आत्म-विश्वास देववृत्ति। आत्मा की शिव-शक्ति आसुरी वृत्ति वाले का सहयोग कर भी किस प्रकार सकती है। आत्म-निषेध और नास्तिकता एक ही बात है। जो नास्तिक बनकर परमात्मा को छोड़ देते हैं, परमात्मा उसे उससे पहले ही छोड़ दिया, प्रभु जिससे विमुख हो गया, उसके लिए लोक, परलोक, आकाश-पाताल कहीं भी कल्याण की सम्भावना किस प्रकार हो सकती है? ऐसे नास्तिकवादी और आत्म - निषेधी की नाव का भवसागर के बीच डूब जाना निश्चित है।

आत्म-निषेधी की सारी शक्तियाँ, सारे देवतत्व और सारी संभावनायें एक साथ रुक जाती हैं। वह अकेला एकाएक आत्म-बहिष्कृत स्थिति में डूबते व्यक्ति की भाँति व्यर्थ ही हाथ-पैर मारता, थकता और अन्त में अविज्ञात अतल के गहन अन्धकार में डूब जाता है।

आत्म-निषेधी का दुर्भाग्य उसके अन्दर अशुभ एवं नकारात्मक संकेत बनकर किसी प्रेत-पुकार की तरह गूँजता रहता है। उसके मलिन मानस से ध्वनि उठती रहती है कि - “मैं यह काम नहीं कर सकता। मुझमें उसे करने की शक्ति नहीं है। मेरे पास साधनों का अभाव है। समय मेरे अनुकूल नहीं है। मेरी योग्यता कम है। मेरे भाग्य में सफलता का श्रेय नहीं लिखा गया है। इस प्रकार के नकारात्मक संकेत सुन-सुनकर निर्जीव निर्बलताएँ जीवित ही उठती हैं। निराशा, निरुत्साह और भय द्वन्द्व मचाने लगेंगी। तन-मन और मस्तिष्क की सारी शक्ति शिथिल पड़ जाती है। अन्तःकरण अवसन्न होकर निष्क्रिय हो जाता है। शरीर ढीला और मन मुरदा हो जाता है। इस प्रकार का मनुष्य संसार में कुछ भी तो नहीं कर सकता, सिवाय इसके कि वह हारा, पिछड़ा और हताश-सा आगे बढ़ते हुए लोगों को ईर्ष्या से देखे और मन ही मन दबता- सहता हुआ जिन्दगी के दिन पूरे करे।

तीसरे प्रकार के जो संशयी व्यक्ति होते हैं, उनकी दशा तो और भी खराब होती है। आत्म-विश्वासी जहाँ सराहनीय, आत्म-निषेधी दयनीय होता है, वहाँ आत्मसंशयी उपहासास्पद होता है। वह किसी भी पुरुषार्थ के सम्बन्ध में हाँ-न के झूले में झूलता रहता है। अभी उसे यह उत्साह होता है कि वह अमुक कार्य कर सकता है, लेकिन कुछ ही देर बाद उसका संशय बोल उठता है- हो सकता है यह काम मुझसे पूरा न हो। शायद मेरी क्षमताएँ और योग्यताएँ इस काम के अनुरूप नहीं है। लेकिन वह अपने इस विचार पर भी देर तक टिका नहीं रह पाता। सोचता है काम करके तो देखा जाए, शायद कर लूँ। काम हाथ में लेता है तो हाथ-पैर फूल जाते हैं, अपने अन्दर एक रिक्तता और अयोग्यता अनुभव करने लगता है। भयभीत होकर काम छोड़ देता है। फिर बलात् उसमें लगता, थोड़ा-बहुत करता और इस भाव से उसे अधूरा छोड़ देता है कि हो नहीं पा रहा है। बेकार समय नष्ट करने से क्या लाभ।

इस प्रकार संशयी व्यक्ति जीवनभर यही करता रहता है। कार्य आरम्भ करने का साहस नहीं करता और यदि उसमें हाथ डालता है तो कभी पूरा नहीं कर पाता। इसी प्रकार के तर्क-वितर्क और ऊहापोह में उसका सारा जीवन व्यर्थ चला जाता है। शेख-चिल्लियों की तरह अस्थिर मन, मस्तिष्क और अविश्वास वाले संसार में न तो आज तक कुछ कर पाए हैं और न आगे कुछ कर सकते हैं। उपहासास्पद स्थिति में ही संसार से विदा हो जाते हैं।

आत्म-निषेध एक भयंकर अभिशाप है। इस वृत्ति का कुप्रभाव मन, मस्तिष्क पर ही नहीं, सम्पूर्ण जीवन-संस्थान पर पड़ता है। “मैं यह नहीं कर सकता”- ऐसा भाव आते ही मनुष्य का मन और मस्तिष्क तो असहयोगी हो ही जाता है, शरीर पर भी बड़ा कुप्रभाव पड़ता है। रक्त का सहज प्रवाह अवरोधित होने लगता है। उसमें अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न हो जाते हैं। रक्त की पोषण-शक्ति क्षीण हो जाती है। सारे तन्तुजाल और नाड़ी संस्थान निर्बल हो जाते हैं। रोग तक उठ खड़े होते हैं और तब बेचारा मनुष्य किसी काम का नहीं रह जाता। आत्म-निषेध मानव- जीवन के लिए विष विधान के समान है। इससे अपनी रक्षा करनी ही चाहिए।

आत्म-निषेध जीवन के लिए संजीवनी शक्ति के समान है। “मैं यह कार्य अवश्य कर सकता हूँ-ऐसा विश्वास आते ही मानव मन में आशा और उत्साह उत्पन्न हो जाता है। सारा जीवन संस्थान संगठित होकर पुरुषार्थ के लिए अपनी शक्ति और सेवाएँ समर्पित कर देता है। रक्त प्रवाह में एक स्वस्थ- उल्लास और शिराजालों में स्निग्धता आ जाती है। जीवनी-शक्ति को सहायता मिलती है और वह सारी कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों की सक्रियता में सहयोग करने लगती है। मन, मस्तिष्क और शरीर के सारे रोग-दोष दूर हो जाते हैं और मनुष्य एक प्रसन्न-पुरुषार्थी की तरह अपने लक्ष्य पथ पर अभय-भाव से बढ़ता चला जाता है।

इस विवेचना के प्रकाश में अपने आपको देखिये कि आप किस वर्ग में चल रहे हैं। आत्म-विश्वासी आत्म-निषेधी अथवा आत्म-संशयी यदि आप अपने आपको आत्म-विश्वासी पाते हैं - तो बड़ा शुभ है। अपने इस विश्वास को और विकसित कीजिए। नये-नये और ऊँचे काम हाथ में लीजिए और अपने जीवन को सम्पूर्ण सफलता की ओर बढ़ाते चले जाइये।

यदि आप अपने को आत्म-निषेधी अथवा आत्म-संशयी के वर्ग में पाते हैं तो तुरन्त ठहर जाइये और सम्पूर्ण शक्ति लगाकर अपनी विचारधारा को मोड़ देने का प्रयत्न करिये। आत्मा में परमात्मा का विश्वास करिये। अपने मन और मस्तिष्क को शुभ संकेत और संकल्प दीजिए। अपनी दिव्य पैतृकता का सहारा लीजिए। परमपिता का स्मरण करिये और साहसपूर्वक श्रेय-पथ पर बढ़ चलिए। आत्मा आपका साथ देगी, परमात्मा आपकी सहायता करेगा।


माँ की शिक्षा (Kahani)

माँ ने कहा-बेटे! अब तुम समझदार हो गये हो। स्नान करने के बाद प्रतिदिन तुलसी के वृक्ष में जल चढ़ाया करो। तुलसी की उपासना की हमारी परम्परा पुरखों से चली आ रही है।”

बेटे ने तर्क किया- “माँ, तुम कितनी भोली हो? इतना भी नहीं जानतीं कि यह तो पेड़ है? पेड़ों की भी कहीं पूजा की जाती है। इसमें समय व्यर्थ खोने से क्या लाभ है?” “लाभ है मुन्ने! श्रद्धा कभी निरर्थक नहीं जाती। हमारे जीवन में जो विकास और बौद्धिकता है, उसका आधार श्रद्धा ही है। श्रद्धा छोटी उपासना से विकसित होती है और अन्त में जीवन को महान बना देती है, इसलिए यह भाव निर्मूल नहीं।”

तब से विनोबा भावे जी ने प्रतिदिन तुलसी को जल देना शुरू कर दिया। माँ की शिक्षा कितनी सत्य निकली, इसका प्रमाण अब सबके सामने है।


देते रहने का आनन्द ही कुछ और है

संसार और प्रकृति में देने और लेने की दो प्रमुख क्रियाएँ होती है। जो देता है, बाँटता है, वह लाभ में रहता है एवं अनेकों गुना अधिक परिणाम में प्राप्त करता है, जबकि कृपण अनुदार और स्वार्थी घाटे में रहते है। किसान मक्के का एक बीज बोकर सैकड़ों दाने प्राप्त कर लेता है। पेड़ पौधे हर वर्ष मनुष्यों और पशुओं के लिए फल-फूल पैदा करते और प्रकृति अनुदान के रूप में दूसरे वर्ष फिर उन्हें प्राप्त कर लेते हैं। बादल निःस्वार्थ होकर बरसते है अतः नदियों और समुद्रों का अनुदान उन्हें मिलता रहता है। सूर्य अनादिकाल से ऊर्जा, ऊष्मा और प्रकाश बिखेरता आ रहा है। अस्तु प्रकृति व्यवस्था के अंतर्गत उसका वह भण्डार अक्षय बना हुआ है। एक मनुष्य ही ऐसा है, जो देने में कोताही बरतता है अथवा यदि देता है तो पाने की आकांक्षा रखकर। यह आकांक्षा ही दुःख का कारण बनती है। मनीषियों का कथन है कि जो लेने की जितनी कामना और प्रयास करता है, वह उतना ही दुःखी होता है। ऐसी बात नहीं कि दुःख वासनाओं की असफलता से आता है। सफल वासनाएँ भी दुःख लाती है। अर्थशास्त्र का सिद्धांत हैं-इच्छाएँ अनंत होती है। एक इच्छा पूरी हुई नहीं कि दूसरी आ धमकती है। दूसरी के पूर्ण होते ही तीसरी मुँह बायें खड़ी हो जाती है और इस प्रकार अनंत अभिलाषाएँ कुकुरमुत्तों की तरह उपजने लगती है। धनिकों के पास चूँकि इन लालसाओं की पूर्ति के संभावित साधन होते हैं, इसलिए वे जीवन भर इसी कुचक्र में पड़े रहते है, जबकि निर्धनों की आय सीमित होती है। पिछले दिनों अमेरिका के फोर्ड मोटर्स कम्पनी के मालिक का बेटा घरद्वार छोड़कर इस्कान नामक आध्यात्मिक संस्था में सम्मिलित हो गया। एक अरबपति को इस प्रकार का अभावग्रस्त जीवन जीने के लिए क्यों बाधित होना पड़ा? इसके उत्तर में उन्होंने इतना ही कहा कि जितना सुखी और चैन इस ओढ़ी हुई गरीबी में मुझे मिला है, उतना सम्पन्नता और विलासिता में कहा था। राजकुमार सिद्धार्थ ने भी ऐश्वर्य को लात मारकर मुक्ति का पथ प्रशस्त किया था। राजा भर्तृहरि ने भी इन्हीं परिस्थितियों में राज-पाट त्यागकर जंगल की शरण ली थी।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि देने से दीनता घटती है जबकि माँगने से संचय से वह बढ़ती है। यही कारण है कि ऋषि प्रकृति के लोग सदा देते रहते दान करते रहते है। इसमें उन्हें जितना आत्मसंतोष और आनंद मिलता है, उतना और वैसा कोई गड़ा खजाना हाथ लग जाने पर भी कदाचित ही किसी को मिलता हो। विवेकानंद जब धर्म महासभा में भाग लेने अमेरिका गये हुए थे, तो एक दिन कुछ अमेरिकी उनका लिबास देखकर उपहास उड़ाने लगे। इस पर विवेकानंद ने कहा कि आप लोगों को सभ्य आपका दर्जी बनाता है, जबकि हम भारतीय अपनी आँतरिक महानता के कारण सभ्य और सुसंस्कृत कहे जाते हैं। यह सत्य है। बाहरी चमक दमक के आधार पर अंतस् का आकलन करना अविवेकशीलता है, कारण कि बाहर से सम्पन्न दीखने वाले का अंतर भिखारियों जैसा हेय और हीन हो सकता है, जबकि प्रत्यक्ष दरिद्रता के पीछे भी एक महान और विशाल हृदय छुपा हो सकता है। वास्तविक दाता के लिए अंदर की विराटता अनिवार्य है। जो भीतर से संकुचित होगा, वह यथार्थता की अनिवार्य योग्यता से वंचित रहेगा। ऐसा व्यक्ति यदि दान देता दिखलाई पड़े तो वह निष्प्रयोजन नहीं होगा, क्योंकि जो हृदय एकदम निःस्वार्थ नहीं है, उसके द्वारा किया गया परमार्थ भी सर्वथा स्वार्थरहित नहीं होगा। ऐसा दान तामस दान कहलाता है।

अध्यात्म विद्या के आचार्यों ने देश काल, पात्र के आधार पर दान देने की उपयोगिता बतलायी है और कहा है कि जहाँ जब जिसे जैसे दान को सर्वोपरि आवश्यकता हो, तब वैसा ही दान दिया जाना चाहिए। शास्त्रवचन है-

अन्नदानं महादानं विद्यादानं महत्तरम्। अन्नेन क्षणिका तृप्तिर्यावज्जीवं तु विद्यया।

अर्थात् अन्नदान महादान है। विद्यादान और बड़ा है। अन्न से क्षणिक तृप्ति होती है, किंतु विद्या से जीवनपर्यन्त तृप्ति होती है। आज संसार भर में सर्वग्राही संकट दो ही हैं-एक पीड़ा दूसरा पतन। पीड़ा निवारण अन्नदान अर्थदान से ही शक्य हैं, जबकि पतन निवारण विद्यादान के बिना संभव नहीं। इन दोनों में यदि सर्वोपरि सर्वप्रमुख और सर्वाधिक कष्टकारी संकट का चयन करना हो तो वह पतनजन्य पाप ही हो सकता है। क्षुधा-निवारण के लिए कंगालों का विभिन्न उपायों का सहारा लेने की बात तो समझ में आती है पर जो विपुल वैभव के स्वामी हैं, वे वर्जनाओं से विमुख क्यों नहीं हो पाते? यह समझ से परे है। इसलिए सद्ज्ञान दान द्वारा उन्हें यह बात समझानी पड़ेगी कि जब एक जगह टीला खड़ा करना हो, तो यह निश्चित है कि उसके लिए अनेक स्थलों पर गड्ढे खोदने पड़ेंगे। जहाँ एक स्थान पर सम्पत्ति का पर्वत खड़ा हो, वहाँ उसका स्पष्ट मतलब है कि औरों के हितों की हत्या की गई है। अन्यथा नीति की कमाई से स्वल्प जीवन में संपदा का कोठा भर लेना असंभव है। अतएव आज की परिस्थितियों में सद्ज्ञान दान ही सर्वोच्च दान कहा जायेगा। शेष का स्थान इसके बाद ही है।

मूर्धन्य मनीषी जॉन हाल ने कहा है-अपने साधनों के अनुरूप दान करो, अन्यथा ईश्वर तुम्हारे दान के अनुरूप तुम्हारे साधन बना देगा। सच है भगवान के ऐश्वर्य को भगवद् कार्यों के निमित्त ही खर्च किया जाना चाहिए। उसने जो विभूति और सम्पत्ति ज्ञान प्रतिभा कौशल, बल, बुद्धि, विवेक और दौलत के रूप में दी है। उनका नियोजन अपने लिए कम, समाजहित में ज्यादा किया जाना चाहिए, अन्यथा वह अपने अनुदान वापस लेने में भी विलंब नहीं करता। अतः दान की महत्ता और उपयोगिता समझते हुए हमें अभीष्ट का यथेष्ट दान करना चाहिए। समय की माँग यही है।


रहस्यमय वह हवेली और विचित्रता भरी वह रात्रि

दृश्य का अदृश्य हो जाना और अदृश्य का दृश्यमान बनकर प्रकट होना-यह संसार का स्वाभाविक गतिचक्र है। शरीर मरता है, तो उसका बाह्य कलेवर पंचतत्वों में मिलकर अगोचर हो जाता है, पर जीवात्मा का अस्तित्व फिर भी बना रहता है। बाद में वही स्थूल देह धारण कर पैदा होती है। यह सामान्य प्रक्रिया हुई। कई बार असामान्य तरीके से अदृश्य शरीर सूक्ष्म उपादानों से ही अपना गोचर स्वरूप अभिव्यक्त कर कुछ ऐसे घटनाक्रम प्रस्तुत कर जाते हैं जिन्हें देखकर यही सोचना पड़ता है कि आखिर इनके पीछे क्या रहस्य और प्रयोजन है? समय-समय पर ऐसी घटनाएँ प्रकाश में आती ही रहती है।

प्रसंग आज से लगभग दो दशक पूर्व की एक बरसाती रात का है। जुलाई का महीना था। तेज हवा चल रही थी। आकाश मेघाच्छन्न था। बीच-बीच में बूँदा-बाँदी हो जाती। तड़ित प्रकाश और बिजली की कड़क से रात का सन्नाटा और डरावना हो उठता। ऐसी ही एक रात्रि में जॉर्ज टाउन इलाहाबाद की चिन्तामणि रोड पर स्थित मकान की घंटी उठी। चौकीदार की आँखें थोड़ी देर के लिए लग गयी थी। नेत्र खुले तो वह सोचने लगा कि कहीं यह उसका भ्रम तो नहीं? कोई स्वप्न तो नहीं देख रहा था। अभी वह कुछ निर्णय कर पाता कि दुबारा घंटी घनघना उठी। वह बेमन से उठा और फाटक खोला। सामने एक कृशकाय बूढ़ा हाथ में लाठी लिए खड़ा था। चौकीदार को देखते ही पूछा- डॉ. भवनाथ का मकान यही है न? चौकीदार के हाँ कहने पर उसने दूसरा प्रश्न किया घर पर है? स्वीकारोक्ति में उसका सिर हिल गया।

तनिक बुला दीजिए, बड़ी कृपा होगी। हाथ जोड़ते हुए बूढ़े ने मनुहार की। इस बरसाती रात में? टालने की नियत से पहरेदार ने प्रश्न किया-हाँ दुर्भाग्य ही कहे इसे। हमारे स्वामी की स्थिति ठीक नहीं, बहुत बीमार है। डॉ. साहब यदि इस समय नहीं चलेंगे तो हम बर्बाद हो जायेंगे। लुट जायेंगे। इसके साथ ही वह फूट-फूटकर रोने लगा। बाहर वर्षा तेज हो चुकी थी। इसलिए पहरेदार बूढ़े आगंतुक को अंदर बरामदे में ले आया और भीतर डॉ. भवनाथ झा को इसकी सूचना दी। वे सो रहे थे। घड़ी पर दृष्टि दौड़ायी, तो रात्रि का तीसरा पहर प्रारंभ हो चुका था। वर्षा जारी थी। इतनी रात्रि और प्रतिकूल मौसम को देखकर वे असमंजस में पड़ गये। बूढ़ा बार-बार आग्रह कर रहा था। उसकी दीनता को देखते हुए उसे टाल पाना डॉ. भवनाथ के लिए असंभव था। वे चौकीदार से जल्दी लौट आने की बात कहकर चल पड़े। बूढ़ा अपने साथ एक बग्घी लाया था। डॉ. भवनाथ अपनी दवाओं का बैग लेकर उसमें जा बैठे। बग्घी कुछ दूर चलने के बाद वह दायीं ओर मुड़ गयी। अंधकार बहुत गहन था। बारिश अभी हो ही रही थी, इसीलिए आस-पास कुछ दिखायी नहीं दे रहा था। डा. भवनाथ यह अनुमान नहीं लगा पा रहे थे कि वे शहर के किस हिस्से में है और किधर जा रहे है। उनके मन में एक अज्ञात भय भी था कि कहीं वे किसी सुनसान इलाके की ओर तो नहीं चले जा रहे हैं। वे इसी उधेड़बुन में थे कि बिजली कौंध उठी। उनका संदेह सही निकला। जहाँ से वे गुजर रहे थे वहाँ दूर-दूर तक कोई मकान नहीं, दिखायी पड़ा। कोचवान के प्रति उनके मन में शंका पैदा हुई। वे यह निश्चय करना चाहते थे कि आखिर वह उसे कहाँ ले जा रहा है। बग्घी के पीछे से उन्होंने आवाज दी, तभी तीव्र गड़गड़ाहट के साथ पास ही कहीं बिजली गिरी। सम्पूर्ण क्षेत्र प्रकाशित हो उठा। उस प्रकाश में सामने एक विशाल हवेली दिखायी पड़ी। डॉ. भवनाथ को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वह एकदम जनहीन भाग में स्थित थी। थोड़ी देर में बग्घी हवेली के मुख्य द्वार पर पहुँची। उसके पहुँचते ही फाटक खुला और वह अंदर प्रवेश कर गयी।

डॉ. भवनाथ ने देखा कि खिड़कियों से मद्धिम प्रकाश बाहर आ रहा है। उस प्रकाश में उन्होंने इमारत की भव्यता को निहारना चाहा, पर निष्फल रहे। खिड़की से निकली मंद रोशनी से आस-पास का कुछ हिस्सा अस्पष्ट रूप से दृश्यमान हो रहा था, शेष सम्पूर्ण भाग गहन अँधेरे में डूबा हुआ था। कोचवान बग्घी से नीचे उतरा और दवाओं का बैग लेकर सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। डॉ. भवनाथ उसके पीछे-पीछे चल रहे थे। दरवाजा अंदर से खुला था और उस पर आकर्षण पर्दा लटक रहा था। पर्दा हटाकर दोनों कमरे में गये। कमरा अंदर से काफी सजा हुआ था। दीवारों पर रंगीन चित्रकारी थी। कोठरी के किनारे एक मूल्यवान सोफा पड़ा हुआ था। सामने ही हाथी दाँत से नक्काशी की हुई एक टेबल थी। एक कोने पर शमादान जल रहा था। खिड़कियों पर रेशमी पर्दे लटक रहे थे। इस कमरे से गुजरते हुए दोनों ने एक अन्य कमरे में प्रवेश किया। उसके एक सिरे से एक पलंग पर एक युवक निश्चेष्ट लेटा था। पलंग के सिरहाने एक आकर्षण युवती बैठी थी, जिसके चेहरे पर विषाद स्पष्ट झलक रहा था। युवती भी उन्हें कुछ जानी-पहचानी लग रही थी व युवक भी, पर कहाँ देखा था-यह याद नहीं आ रहा था।

दोनों के कोठरी में प्रवेश करते ही युवती की आँखों में एक चमक दिखायी पड़ी। वह उत्सुकतापूर्वक डॉ. भवनाथ को देखने लगी, मानो विश्वास हो चला हो कि अब शायद युवक की जान बच जाये। वे कुर्सी पर बैठते हुए अपने बैग से जाँच उपकरण निकालने लगे। इसी बीच बूढ़े ने बोलना प्रारंभ किया-कई दिन बीत गये, मालिक के स्वास्थ्य में तनिक भी सुधार नहीं हुआ। इस दौरान कितने ही चिकित्सकों का उपचार चला, पर कोई लाभ नहीं हुआ। हमने आपका नाम सुन रखा था। यह भी सुन रखा था कि आपने अनेक दुःसाध्य रोगों का सफल इलाज किया है। बहुत भरोसा है आप पर। कृपया सरकार को बचा लीजिए। इसके साथ ही वह डॉ. भवनाथ के पैरों में गिर पड़ा और फफक कर रोने लगा।

डा. भवनाथ रोगी की गंभीरता को समझ रहे थे। फिर भी उन्होंने बूढ़े को ढाँढस बँधाया और युवक की नब्ज़ टटोलने लगे। काफी प्रयास के बाद भी जब नाड़ी नहीं मिली तो आले से हृदय की धड़कन सुनने की कोशिश करने लगे। किंतु धड़कन भी नहीं सुनाई पड़ी। निराश होकर उन्होंने निर्णय सुनाया “अब ये नहीं रहे।” इसके साथ ही वे युवती की मर्माहत पीड़ा हुई जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर सकी और बेहोश होकर गिर पड़ी।

तत्काल उसको पानी के छींटे दिये गये। थोड़ी ही देर में वह होश में आ गयी। इसके पश्चात् डॉ. भवनाथ चलने को उद्धत हुए तो युवती ने रोकते हुए कहा-डॉ. साहब। अपनी फीस तो लेते जाइये। उन्होंने उसे लेने से इनकार करते हुए कहा-जब बीमार को बचा ही नहीं सका तो फीस किस बात की। और की बात भी इतनी मानवीयता और नैतिकता तो है ही कि मरने से पूर्व उसके औचित्य पर विचार कर सकूँ। यह कहकर वे चलने को प्रस्तुत हुए तो युवती ने रास्ता रोकते हुए उसे ले लेने को कहा। इतने पर भी वे तैयार नहीं हुए तो आग्रहपूर्वक उनके बैग में पाँच अशर्फियाँ डाल दी। वे चल पड़े। दो ही कदम बढ़े होंगे की पीछे से एक जोरदार ठहाका सुनायी पड़ा। डा. भवनाथ ने मुड़ते ही युवती ने कहा-डॉ. साहब मुझे पहचाना। प्रश्न सुनकर डॉ. भवनाथ ने एक तीव्र दृष्टि युवती पर डाली। मस्तिष्क पर बहुत जोर डालने के बाद कुछ-कुछ याद आया। उन्होंने लगभग चीखते हुए कहा-अंजू तुम!

हा। यह सुनते ही डॉ. संज्ञाशून्य होकर गिर पड़े। उसके बाद फिर क्या हुआ? उन्हें कुछ याद न रहा। दूसरे दिन प्रातः जब उनकी आँख खुली तो वे अपने मकान पर थे। शरीर पर एक दो चोट के निशान थे और उन्हें दर्द भी हो रहा था। सिर में भी पट्टी बँधी थी। चौकीदार पास ही बैठा सेवा कर रहा था। सिर में भी पट्टी बंधी थी। उन्होंने चौकीदार से पूछा-यह पट्टी कैसी? मुझे क्या हो गया था।

आपको याद नहीं। कल रात आप मरीज देखने गये थे, वहीं दुर्घटनाग्रस्त हो गये थे। वह बूढ़ा बग्घी वाला आपको यहाँ छोड़ गया। पहरेदार के इतना कहते ही रात की सारी घटना उनको याद आ गयी। उन्होंने तुरंत बैग मंगवाकर देखा उसमें अशर्फियाँ अब भी विद्यमान थी। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वे सोचने लगे कि जिस प्रसंग को घटित हुए वर्षों बीत गये, उसका नाटक रचने की पीछे सूक्ष्मजगत का क्या प्रयोजन हो सकता है? यह सब सोचते-सोचते वह अतीत की स्मृतियों में डूब गये।

इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज के अंतिम वर्ष की परीक्षा समाप्त हो चुकी थी। लड़के-लड़कियाँ घर जाने की तैयारी कर रहे थे। डॉ. भवनाथ तब लखनऊ में रहते थे। अंजू उनके एक मित्र की लड़की थी। वह भी इलाहाबाद में चिकित्सा विज्ञान की छात्रा थी। रंजन उसका सहपाठी था। दोनों ने परस्पर शादी करने का निश्चय किया। और निर्णय लिया था कि घर से वापस ही आते विवाह बंधन में बंध जायेंगे, पर नियति को कौन टाल सकता है? रंजन जब घर पहुँचा तो ज्ञात हुआ कि उसकी शादी कहीं अन्यत्र तय कर दी गयी है। उसने माता-पिता को अपना निर्णय सुनाया और वहाँ विवाह न करने की बात बतायी। लेकिन माता-पिता किसी प्रकार राजी न हुए। हार कर रंजन को उनकी इच्छानुसार ब्याह करना पड़ा। घर से कॉलेज वापस लौटकर रंजन ने जब सारी बातें अंजू को बतायी तो वह कुद्ध हो उठी और आत्महत्या कर लेने की धमकी देने लगी। रंजन ने भवनाथ को वस्तुस्थिति से अवगत कराया और अंजू को समझाने का आग्रह किया। डा. भवनाथ ने उसे अपनी ओर से समझाने की पूरी कोशिश की लेकिन बार-बार वह एक ही बात कहती कि जिस प्रकार रंजन ने उसे धोखा देकर दुःख के सागर में डुबोया है, वैसे ही वह भी उसका चैन छीनकर रहेगी।

दूसरे ही दिन ज्ञात हुआ कि अंजु ने जहर खाकर जान दे दी है। डॉ. भवनाथ को इससे गहरा धक्का लगा, पर अब क्या किया जा सकता था, सिवाय पश्चाताप के। इस घटना के करीब एक महीने बाद रंजन की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गयी। कदाचित अंजू ने विश्वासघात का बदला ले लिया। डॉ. भवनाथ अतीत की गहराइयों में खोये हुए थे कि नौकर के नित्य नैमित्तिक क्रिया से निवृत्त होने का आग्रह किया। विचार प्रवाह भंग हुआ। वे भूत से वर्तमान में आये। उनके मस्तिष्क में एक बार रात की घटना ताजी हो उठी। उन्होंने स्कूटर उठाया और हवेली को तलाशने गंगा पार झूँसी जा पहुँचे। वहाँ हवेली तो क्या कोई झोंपड़ी तक नहीं दिखायी पड़ी। लौटकर वे यही सोचते रहे कि वर्षों बाद उक्त घटना की पुनरावृत्ति क्योंकर हुई? अंजू के प्रेत को वह अशर्फियाँ कहाँ से मिली। इस घटना में नाम आदि सभी वहीं है घटना को संक्षेप में वर्णित किया गया है जिसे जानकर परोक्ष जगत के महत्व को सभी समझ सके। यह एक सत्य घटना है व लगभग तीस-पैंतीस वर्ष पूर्व की है। परोक्ष जगत प्रत्यक्ष संसार की प्रतिच्छाया है। वह जितना गहन और गूढ़ है, उतना ही दुर्बोध्य भी। जिस दिन बुद्धि उसे समझने में समर्थ हो जायेगी, उसी दिन रहस्य पर से पर्दा उठ जायेगा कि क्यों कोई घटना वर्षों बाद भी किसी के समक्ष जीवंत हो उठती है और क्यों उनमें से अधिकाँश समय के गर्भ में दबी पड़ी रहती हैं?


अन्ततः एक दुर्योग टला

निजाम के शाही महल में वह बंदी था। आधी रात होने वाली थी। बाहर निस्तब्धता का साम्राज्य फैल रहा था। भव्य ललाट पर चिंता की रेखाएँ दिखायी पड़ रही थीं। दृष्टि नीचे की ओर थी और लम्बे-लम्बे काले केशों की लटें कानों के पास लटक रही थीं। किसी गहरे विचार ने उसे बेहोश-सा कर दिया था।

“मैं आयी हूँ”। वीणा की झंकार-सी कोमल ध्वनि से सारा कक्ष गूँज उठा। वह अपने ही ख्यालों में खोया हुआ था। उसने कुछ नहीं सुना। अबकी कुछ निकट आकर आगंतुक ने कहा-मैं हूँ रोशनआरा।

वह मानो सोते से जग पड़ा। कौन? रोशनआरा? इतनी रात आने का कष्ट क्यों क्यों उठाया शहजादी? उसने प्रश्न किया। यहीं तो मेरी भी समझ में नहीं आता कि मैं यहाँ क्यों आयी? हृदय में तीव्र अकुलाहट थी। एक बेचैनी सी थी और वहीं यहाँ खींच लायी।”

“किंतु...।”

“किंतु क्या?”

किंतु मैं तो रणचण्डी का उपासक हूँ, शहजादी! तलवार से मुझे प्रेम है। जब से समझ आयी है अपने मातृभूमि को ही प्यार किया है। कर्तव्य ही मेरा प्राणाधार है। असहायों, बेबसों की रक्षा में लड़ते हुए मरना या मर जाना ही जिसके जीवन का लक्ष्य हो, वह भला ऐश्वर्य सम्पन्न शहजादी के किस काम आ सकता है।

जानकर भी अंजान न बनो वीर! रोशनआरा के चेहरे पर एक अद्भुत सम्मोहन उभर आया।

“तुम रूपवती हो। तुम्हारे हृदय में प्रेम है। तुम्हारे मुख पर एक तेजोमयी दीप्ति झलक रही है। फिर भी...।

“क्या फिर भी? रुक क्यों गए? शहजादी! अफसोस है कि तुम्हारे प्रेम के लिए मेरे हृदय में कोई स्थान नहीं है। मेरी प्यारी मातृभूमि परतंत्रता के पैरों तले रौंदी जा रही है। नाराज न हों शहजादी। विदेशियों के भीषण अत्याचारों से अब वह त्राहि-त्राहि कर रही है। मातृभूमि को बंधन से मुक्त कराने के लिए तथा भारतमाता का मस्तक पूर्ववत् उन्नत करने के लिए आज देश का बच्चा-बच्चा व्याकुल हो रहा है। उनकी आँखों में आज दुःखी भारत समा रहा है। वे माया, ममता, प्रेम और प्यार भूल गये है। फिर भी मैं जिस पर गो-ब्राह्मण प्रतिपालक छत्रपति शिवाजी महाराज का पूर्ण विश्वास है, मोह जाल में फँसकर राजद्रोही और देशद्रोही नहीं बनूँगा। शहजादी! महाराज शिवाजी का यह सेवक बजाजी निम्बालकर, शत्रुकन्या एक यवन कन्या के प्रेम की अपेक्षा देशप्रेम को अधिक महत्व देता है। इसीलिए मुझे क्षमा करो। बजाजी मैं यवन कन्या जरूर हूँ किंतु मन से नहीं तन से। आज से चार वर्ष पूर्व जब तुम हैदराबाद फतह करने आये थे और अब्बाजान से तुम्हारा मुकाबला हुआ था उस वक्त मैं भी उनके साथ थी। उस युद्ध में तुम्हारा अपूर्व रण कौशल देखकर मैं तुम पर मुग्ध हो गयी थी।

“परंतु शहजादी मैं विवश हूँ।” हमने पहले देश की स्वतंत्रता और धर्म की रक्षा का व्रत ले रखा है। कहने को तो बजाजी ये बातें कह गया किंतु सतपुड़ा तथा सहयाद्रि जैसे पहाड़ी और दक्षिण जैसे गरम प्रदेश में रहने वाले बजाजी ने अब तक इतनी सुंदर रमणी नहीं देखी थी। रोशनआरा सुंदरता की पुतली थी। उसके शब्दों में आकर्षण था। जब वह किसी से बोलती या किसी तरफ देखती तो वह गति भूलकर अवाक् रह जाता।

रोशनआरा ने मदमस्त करते हुए कहा-तो मैं भी पहले आपका देश स्वतंत्र करने में तन, मन, धन सभी से अपेक्षा करूंगी। देश स्वतंत्रता होने पर हिंदू धर्म के अनुसार आचरण करूंगी।

बजाजी कुछ नहीं बोले। रोशनआरा ने उनके हृदय पर अधिकार कर लिया था। उनकी आँखों में बेहोशी छा रही थी। हृदय उत्तेजना की तीव्रता से स्पंदित हो रहा था। तीक्ष्ण बुद्धि वाली रोशनआरा ने उसके मन को बदलती भावनाओं को ताड़ लिया। वह लगातार मराठा वीर को अपने सम्मोहन पाश में कसती गयी। बूढ़े निजाम को अपनी पुत्री की गतिविधियों का पता था। वैसे भी वह इन दिनों फूला नहीं समा रहा था। आखिर उसने मराठों के शूर सेनापति और शिवाजी महाराज के दाहिने हाथ बजाजी निम्बालकर को कैद कर लिया था। वह चाहता तो उसी रोज बजाजी को मार डालता या फिर मरवा डालता। किंतु वह राजनीति में निपुण था। बजाजी का उसके धर्म में शामिल हो जाना, उसके मरने से कहीं अधिक लाभदायक था। इस्लाम या इस्लामी सल्तनत के डगमगाते हुए सिंहासन को स्थिर करने के लिए निजाम उसको मुसलमान बनाना आवश्यक समझता था और इसीलिए उसने बजाजी को निम्बालकर के कारावास में न रखकर शाही महल में नजरबंद करके रखा था। किंतु बजाजी का मुसलमान होना कोई हँसी-खेल न था।

आज भी वह इसी चिंता में सिर झुकाये बैठा था, इतने में एक गुप्तचर सामने आया और कोर्निस करके खड़ा हो गया। उसने पूछा-क्या खबर है करीम? वह बोला जहाँपनाह! कल रात मैंने जो कुछ देखा है उसे कहते हुए मेरा कलेजा काँप रहा है। कहो-कहो क्या शिवाजी ने कोई किला फतह कर लिया है या फिर वह हैदराबाद लूटने आ रहा है? नहीं जहाँपनाह। ऐसी कोई बात नहीं है मगर जो कुछ है उसे अगर हुजूर सुनेंगे...।

बस-बस तुम्हें जो कुछ कहना है फौरन कहो। फिजूल बातें बनाकर मेरी हैरत को न बढ़ायें। जहाँपनाह। कल रात मैंने हुजूर शहजादी को कैदी के कमरे में तशरीफ ले जाते देखा।

“कौन शहजादी रोशनआरा?”

“हाँ, जहाँपनाह।”

निजाम के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान झलकी, फिर उसका स्थान क्रोध ने ले लिया। उसने करीम को चले जाने का हुक्म दिया। इसी के साथ निजाम ने पुकारा-कोई है? एक सेवक कोर्निश करके खड़ा हो गया। जाओ रोशनआरा को भेज दो। अल्प समय पश्चात् ही रोशनआरा पिता के सामने खड़ी हो गयी। निजाम ने क्रोध भरे स्वर में कहा-रोशनआरा तूने बड़ा गुनाह किया है। पिता के मुँह से यकायक यह बात सुनकर रोशनआरा काँप गयी। उसने डरते हुए कहा-अब्बा जान। यह बिल्कुल झूठी बात है। बादशाह ने फिर झपटकर कहा-झूठी बात? नहीं बिल्कुल सच।

रोशन! सच-सच बता, क्या तू बजाजी को नहीं जानती।

उत्तर में वह खामोश खड़ी रही। किंतु उसका हृदय रो पड़ा। आँखों से अग्निकण बरसाते हुए निजाम ने कहा, चुप क्यों खड़ी है? क्या तू कुरानशरीफ और अल्लाह पाक की कसम खाकर अपनी बेगुनाही की बात कह सकती है। रोशनआरा का फूल-सा चेहरा कुम्हला गया। वह सिसकियाँ भरने लगी। उसने रोते-रोते कहा, “अब्बाजान। आज न जाने आपको क्या हो गया है? लो मैं जाती हूँ, जब आप शाँत होंगे तब आऊँगी। वह जाने लगी। निजाम ने चिल्लाकर कहा-रोशनआरा कहाँ जाती है? ठहर। वह ठहर गये। निजाम ने फिर कहा “रोशन! मेरे पास सबके लिए माफी है, लेकिन इस्लाम के साथ दगाबाजी करने वाले को मैं ख्वाब में भी माफ नहीं कर सकता। समझी। मैं तेरी सब हरकतों से वाकिफ हूँ। कान खोलकर इस्लाम और इस्लामी सल्तनत के लिए मैं ऐसी लाखों बेटियाँ कुर्बान कर दूँगा। लेकिन इस्लाम पर धब्बा नहीं आने दूँगा।

सुख में पली राजकन्या त्याग के महत्व से अनभिज्ञ थी। दुःख का डरावना रूप देखकर वह आकुल हो उठी। वह फूट-फूटकर रोने लगी तथा पिता के चरणों पर गिर पड़ी। दोनों हाथों से पिता के पैर पकड़कर उसने कातर स्वर में कहा-रहम करो अब्बाजान! रहम करो।

इन शब्दों के साथ ही निजाम को अपनी चालाकी सफल होती नजर आयी। उसके मन में विचार तेजी से कौंधे। क्या हर्ज है इस उपाय से बजाजी मुसलमान बन सके। कुछ तुरंत सोचते हुए उसने कहा-रोशन अब्बाजान। तुम्हारा जीवन अब बजाजी के हाथों में है।

वह कैसे अब्बाजान? अगर वह इस्लाम को मानकर मुसलमान बन जाये तो तुम और वह दोनों ही जिंदा रह सकते हो। रोशनआरा चिंतित हो गयी। इसमें तीनों का लाभ होगा। तुम्हारा जीवन सुखमय होगा। इस्लामी सल्तनत की रक्षा होगी। धर्म परिवर्तन के बाद बजाजी निजामशाही का वारिस बन जायेगा। मेरा कहा मानोगी तो कल ही उसके साथ तुम्हारा निकाह कर दिया जायेगा। लालबाग के महल में तुम दोनों आराम से रहना। किसी बात की चिंता न रहेगी। और अगर तुमने मेरा कहा न माना तो शाही हुक्म से कल ही उसका कत्ल कर दिया जायेगा। तुम जिंदगी भर रोती रहोगी। बोलो रोशन। क्या पसंद है रोना या हँसना। रोशनआरा ने अपना कर्तव्य निश्चित किया और धीमे पगों से वह बजाजी के पास जा पहुँची। रोते-बिलखते सिसकते हुए उसने भाँति-भाँति से मराठा वीर को धर्म परिवर्तन की सलाह देनी शुरू की। बजाजी स्तब्ध थे। उनका हृदय युवक हृदय था। रमणी रहस्य से सर्वथा अपरिचित। रोशनआरा के शब्दों ने उनको हृदय से रुला दिया। इसी के साथ चेहरे पर उत्तेजना नाचने लगी। आँखों में बेहोशी खेलने लगी। आवेश में उन्होंने कहा-रोशनआरा जाओ निजाम से कह दो मैं धर्म परिवर्तन के लिए तैयार हूँ। जगत का राज्य मुझे नहीं चाहिए। स्वतंत्रता के लिए हजारों नवयुवक जान पर खेल रहे है, मेरे अकेले न रहने से उसमें कोई बाधा नहीं पड़ेगी। अब मुझे किसी की परवाह नहीं।

कहने की आवश्यकता नहीं कि दूसरे दिन बजाजी के धर्म परिवर्तन एवं निकाह की तिथि तय हो गयी। वह इन क्षणों में लाल महल के बाग में एक पत्थर की चौकी पर बैठे हुए सुखद स्वप्नों में खोए हुए थे। इसी समय एक फकीर उनके सामने आकर खड़ा हो गया। बजाजी ने उनने से पूछा, भाई साहब, आप क्या चाहते है? बाबा फकीर भीख के सिवा और क्या चाहेगा।

भीख? अच्छा ठहरिये। अल्प अवधि के पश्चात् एक तश्तरी में कई अशर्फियाँ लेकर बजाजी बाहर आये। झुककर सलाम करके तश्तरी नम्रतापूर्वक फकीर के सामने की। परंतु फकीर का चेहरा क्रोध से लाल हो गया। नेत्रों से मानों आग बरसने लगा। बह बजाजी के निकट जाकर बोला, फकीर लोग देशद्रोही, धर्मद्रोही तथा राजद्रोही के हाथ की भीख नहीं लेते। फकीर के इन शब्दों ने मराठा वीर के मोह आवरण को छिन्न-भिन्न कर दिया। फकीर कहे जा रहा था, उसके शब्द तीर की तरह बजाजी के कलेजे को छलनी किये दे रहे थे। भारतमाता यवनों के अत्याचार से कातर हो उठी है। देश का बच्चा-बच्चा धर्म तथा स्वतंत्रता के लिए लड़ रहा है और तू जिस पर पूरा विश्वास था, वह बजाजी मेरा शूर सेनापति इस तरह..।

कौन? महाराज! श्री शिवाजी महाराज!!

हाँ, मैं ही हूँ। वाह भाई वाह! खूब स्वाँग बनाया। तुम लोगों के बाहुबल पर ही तो मैंने स्वराज्य की नींव डाली थी। क्या तुम जैसों के विश्वासघात से वह चिरस्थायी हो सकती है। सारा महाराष्ट्र, तुम्हारे निर्णय से दुःखी है। माता जीजाबाई तुम्हारे लिए आँसू बहा रही हैं, उन्हीं की आज्ञा से मैं तुम्हें लेने आया हूँ। क्या अब भी तुम वासनाओं के भंवर से निकलना नहीं पसंद करोगे?

हाय महाराज मैं नीच हूँ, नारकीय हूँ। पातकी हूँ। मेरा उद्धार करो। इन्हीं शब्दों के साथ उन्होंने शिवाजी महाराज के पाँव पकड़ लिये। उठो बजाजी उठो! तुम्हारी अन्तरात्मा पश्चाताप से और भी अधिक उज्ज्वल हो उठी है। लोकसेवा की साधना भी आत्म साधना की ही तरह है। इसमें साधक को अनेकों परिस्थितियों तितिक्षाओं से गुजरना पड़ता है। यह तुम्हारी भी परीक्षा थी, जिसमें तुम असफल होते-होते बच गये। बजाजी के सामने अपने भावुक हृदय की दुर्बलता प्रत्यक्ष हो उठी अब वह संभल चुके थे। देश-धर्म का गौरव उन्हें याद आ चुका है। इसी गौरव से दीप्त वह शिवाजी के पीछे-पीछे शाही बाग के बाहर हो आये। पिंजड़े में बंद पक्षी स्वतंत्रता की हवा लगने पर स्वच्छंद गति से पर फैलाए आकाश में उड़ा जा रहा था।


एक जाग्रत वीर बलिदानी

कलकत्ता के गोरा बाज़ार में एक अंग्रेज अपना डण्डा घुमाता हुआ बड़ी मस्ती से चला जा रहा था। जो भी भारतीय दिखता, भले वह स्त्री हो या पुरुष, वृद्ध हो या बालक, उसके सिर पर डण्डे का प्रहार कर देता। वह कहता जा रहा था। ले पचास-ले इक्यावन, पता नहीं वह कहाँ तक पहुँचना चाहता था। घर से निकलने के बाद इक्यावन व्यक्तियों को तो वह डण्डा जमा चुका था।

इस गोरे अंग्रेज के पीछे ही चल रहा था एक बंगाली किशोर जतीन। वह अभी ही एक गली से निकल कर आया था। अंग्रेज को गिनती गिनकर डण्डा मारते हुए देखा तो एकाएक तो समझ में नहीं आया, परन्तु जब यह अच्छी तरह जान लिया कि गोरों के राज में इन सभी गोरों के किए गए सारे अपराध क्षम्य हैं। वे चाहें जो मनमानी कर सकते हैं। कुछ ही क्षण हुए होंगे पीछे चलते हुए कि जतीन से रहा न गया। वह दौड़कर डण्डेबाज के पास पहुँचा और एक जोर का धक्का दिया। गोरा गिर पड़ा। जतीन ने उसके हाथ से डण्डा छीन लिया और उसी के सर पर कसकर मारते हुए कहा -ले तिरेपन।

आस पास बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई। अपना अधिकारमद भूलकर अंग्रेज ऐसा भागा कि पीछे मुड़कर भी देखा नहीं। उस समय अंग्रेजों से बातें करने में भी लोग डरते थे। पता नहीं गोरे मालिक कब खफा हो जाएँ। ऐसे युग में किसी किशोर द्वारा इतना प्रबल प्रतिरोध, अदम्य साहस का ही काम था। जतीन कोई जन्मजात ही साहसी पैदा नहीं हुआ था। बचपन में तो वह चूहों से भी डर जाया करता था, परन्तु पाँच वर्ष की उम्र में ही दुर्दैव के प्रकोप और संघर्षमय परिस्थितियों ने उसे साहसी बना दिया था।

जन्म के पाँच साल बाद ही पिता का स्वर्गवास हो गया। उसके कुछ ही दिनों उपरान्त माँ भी चल बसी। जतीन का पालन-पोषण उसके मामा के यहाँ हुआ। मामा और नाना अपनी बेटी की अन्तिम निशानी समझकर उसे बड़े लाड़ प्यार से रखते थे। फिर भी जतीन जिसका पूरा नाम ज्योतिन्द्र मुखर्जी था, अपने माता-पिता को विस्मरण न कर सका। उसका ध्यान बँटाया गया और पड़ोस के बच्चों को जतीन के साथ खेलने के लिए कहा गया। उस समय आसपास के सभी बच्चे कसरत करने आया करते थे। अखाड़े में कुश्तियाँ भी चलती। जतीन भी उन बच्चों के साथ जाने लगा दण्ड-बैठक कुश्ती में उसका मन अच्छी तरह लगने लगा। व्यायाम और शारीरिक गठन के प्रति जागरूकता इतनी विकसित हो गई कि जतीन ने किशोरावस्था में ही घुड़सवारी, तैराकी, लाठी तथा तलवार चलाना अच्छी तरह सीख लिया।

बाल-संवर्द्धन की प्रक्रिया मनुष्य को सहज ही आत्मविश्वासी बना देती है और वह सभी भयों से मुक्त हो जाता है। भयमुक्त की सिद्धि ही साधक में साहस का संचार कर देती है। जतीन के नाना-मामा ने माता-पिता को भुलाने के लिए इस ओर प्रवृत्त किया तो वह डरपोक से साहसी और दुर्बल से सबल बन गया। पाँच-साल वर्ष पूर्व जो जतीन घर से बाहर के व्यक्ति की उपस्थिति से भी झेंप जाता था, वही जतीन, दूर देश के आक्रामक शासक वर्ग के लोगों को भी उस प्रकार ललकारने लगा था, तो यह उसके पुरुषार्थ व विकसित आत्मविश्वास का ही फल था।

जतीन की शिक्षा-दीक्षा भी चलती रही। वहाँ भी अंग्रेज बच्चों की ज्यादातियाँ सहन करने के बजाय उन्हें पटकनी देने में उसे मजा आता था। अंग्रेजों के प्रति घृणा से भर उठने का एक बड़ा कारण और भी था। सन् 1904 की बात है। प्रिंस ऑफ वेल्स उन दिनों भारत आये हुए थे। कलकत्ता में उनकी सवारी निकलने जा रही थी। हजारों नर-नारी फुटपाथों पर जमा थे। एक गली के नुक्कड़ पर एक बग्घी खड़ी थी, जिसमें कुछ महिलाएँ भी थी। उन औरतों को परेशान करने के लिए पाँच-छह गोरे युवक बग्घी की छत पर चढ़ गए और औरतों के मुँह के सामने पाँव लटकाकर बैठे सीटियाँ बजाने लगे। जतीन भी सामने फुटपाथ पर खड़ा था। औरतों के साथ उनके परिवार वाले भी थे, परन्तु वे डर के कारण कुछ भी नहीं कह रहे थे। जतीन ने देखा और उससे सारी नारी जाति का भारतीय समाज की मातृशक्ति का यह अपमान सहा नहीं गया। वह तुरन्त लपका और बग्घी की छत पर छहों गोरे युवकों के बीच चढ़कर उसने उन्हें गिरा दिया। उस अप्रत्याशित घटना से युवक कुछ सहस-से गये। वे कुछ समझने की स्थिति में आएँ, इसके पूर्व जतीन ने सबको बग्घी की छत से गिरा दिया। सब वहाँ से भाग खड़े हुए।

इस घटना के कुछ ही समय की बात है कि जतीन रेल से राजघाट जा रहा था। उसके पास वाले डिब्बे में एक वृद्ध अपनी बेटी के साथ बैठा हुआ था। रास्ते में दो अंग्रेज उसी डिब्बे में चढ़े और लड़की के आसपास बैठ गये हालाँकि डिब्बा काफी खाली था। वे लड़की के पास खिसककर उसे भींचने लगे। बेचारा वृद्ध व्यक्ति उनके सामने गिड़गिड़ाने लगा, परन्तु उन्मत्त गोरों पर इसका कोई असर नहीं हुआ।

दूसरे स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी तो जतीन नीचे उतरा और अगले डिब्बे का सारा दृश्य देखा। वह समझ गया कि बात क्या है और लपककर उस डिब्बे में चढ़ गया। गोरे लोग सभी भी वही हरकतें कर रहे थे। डिब्बे में बैठे अन्य दूसरे यात्री बीच में बोलकर आपत्ति मोल लेना नहीं चाहते थे। परन्तु जतीन तो अन्याय और अनाचार के खिलाफ कोई भी खतरा उठाने का साहस रखता था, उन दोनों गोरों के पास गया और जोर के घूँसे मारकर उन्हें प्लेटफार्म पर ले आया। पुलिस को वास्तविक स्थिति समझने में देर न लगी। उन्हें वहीं उतारकर रेल आगे चल दी। कृतज्ञ वृद्ध की आँखों से अश्रु वह बह रहे थे।

दुर्बल, अशक्त और पीड़ितों की अनाचारी और उन्मत्त आततायियों से रक्षा करना ही हर शक्तिशाली इनसान का धर्म है। परन्तु अक्सर देखा यही जाता है कि अच्छे लोग भी ऐसे अवसरों पर किनारा काट जाते हैं, सोचते हैं कौन सोचते हैं, कौन बीच में पड़े। गुलाम राष्ट्र की मानसिकता जो उन दिनों कूट-कूटकर दिमागों में भरी थी, आज भी देखी जाती है, तो आश्चर्य की बात नहीं है। धर्म जब संकट में हो तो ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है।

जतीन अक्सर अंग्रेजों को ऐसी सीख देते कि उन्हें जीवनभर याद रहती भले ही वह कोई सिपाही हो या अफसर। एक बार वे दार्जिलिंग जा रहे थे। जिस ट्रेन में वे सफर कर रहे थे उसी में चार अफसरों की देख-रेख में एक सैनिक टुकड़ी भी जा रही थी। रेल के स्टेशनों पर सैनिकगण उतरकर बड़ी शान के साथ टहलते और यात्रियों को परेशान करने का मजा लेने लगते। कुली संशोधन के भारतवासियों के लिए करते थे। एक स्टेशन पर जतीन अपने एक बीमार सहयात्री के लिए पानी लेने उतरा। पानी का लोटा भरकर वह डिब्बे की ओर चल रहा था। कि एक सैनिक उनसे टकरा गया। अंग्रेज ने कसकर उसकी पीठ पर अपनी छड़ी जमा दी। जतीन ने उस समय तो कुछ नहीं कहा। पानी का लोटा रोगी साथी तक पहुँचाकर वे वापस आये और उस अंग्रेज अफसर की कलाई पकड़कर मरोड़ दी। अन्य गोरे युवकों ने भी जतीन पर आक्रमण किया, परन्तु उनके बलिष्ठ बदन के सामने किसी की भी न चली। उस बात पर तो मुकदमा भी चला था। परन्तु अंग्रेज न्यायाधीश पहली ही सुनवायी में उसे खारिज कर दिया। क्योंकि इससे बात के तुल पकड़ने एवं चारों ओर ऐसी आक्रोश बढ़ जाने की संभावना थी।

किशोरावस्था में ही जतीन भगिनी निवेदिता के संपर्क में आये। भगिनी ने इस स्वाभिमानी, साहसी और पराक्रमी वीर को स्वामी विवेकानन्द के सामने प्रस्तुत किया। स्वामी जी ने इस होनहार किशोर की प्रशंसा की और प्रोत्साहित किया की उस जैसे निडर ही देश को आततायी अंग्रेज शासन के पंजों से मुक्त करवायेंगे।

स्वामी विवेकानन्द से प्रेरणा और प्रोत्साहन पाकर वे राष्ट्रीय आन्दोलन की गतिविधियों में भाग लेने लगे। बाद में आध्यात्मिक जागरण के प्रणेता, राष्ट्रवाद के मसीहा और क्रान्तिकारी अरविन्द घोष के संपर्क में आकर उन्होंने राष्ट्रीयता और स्वाधीनता की क्षीण होती जा रही धारा को तेज बहाव में बदला। श्री अरविन्द ने देश के युवकों का आह्वान किया। और कहा कि “ भारत जमीन का एक टुकड़ा नहीं, यह भूमि हमारी माता है। सिन्धु-हिमांचल के रूप में फैली अखण्ड विराट भारत देश की भूमि हमारी जननी और पोषिका माँ है। मातृसत्ता के रूप में ही हमें इसकी प्रतिष्ठापना करनी होगी। जतीन ने इन विचारों को पूरी तरह अपने हृदय में बिठा लिया और वे क्रान्ति द्वारा अरविन्द के जाज्वल्यमान साहित्य के और भी निकट के संपर्क में आते चले गए। इन दोनों में गुरु-शिष्य का सा सम्बन्ध स्थापित हो अधिक से अधिक विश्वास जतीन करते थे। अपनी आकांक्षाओं को पूरी करने की सामर्थ्य उन्हें जतीन में दिखाई पड़ती थी। राजनीति के आकाश पर जब श्री अरविन्द का सितार सूर्य की भाँति चमकने लगा, तो उन्होंने दैवी शक्तियों के संकेत पर अपनी बाह्य गतिविधियों को समेटकर तपश्चर्या द्वारा जनमानस के आलोड़न की राह ली। जिस समय उन्होंने यह निर्णय लिया, उनके साथी बड़े क्षुब्ध और निराश हुए। वे अनुभव करने लगे कि हम अब नेतृत्वविहीन हो गये हैं। किसके मार्गदर्शन में अब काम करेंगे, यह समस्या उन्हें कचोटने लगी।

अपनी व्यथा और समस्या को सभी साथियों ने श्री अरविन्द के सामने रखा, तो समाधान मिला मैं जा रहा हूँ परन्तु तुम लोगों को चिन्तित नहीं होना चाहिए और न ही निराश क्योंकि अब तुम्हें एक योग्य, साहसी, वीर और देशभक्त नेता का मार्गदर्शन मिलेगा। जिसे स्वामी विवेकानन्द का आशीर्वाद प्राप्त है और वह है- ज्योतिन्द्रनाथ मुखर्जी। जतीन को ही तुम अपना नेता स्वीकार कर स्वातंत्र्य युद्ध जारी रखो।”

श्री अरविन्द के निर्णय से उनके व्यक्ति को पूजने वाले जतीन का व्यथित होना स्वाभाविक था। किन्तु महाभारत के अर्जुन की तरह स्वातंत्र्य समर में अनीति के विरुद्ध नीति और अन्याय के खिलाफ न्याय की लड़ाई पर मोर्चा लेना ही उसकी निर्धारित साधना है, इस प्रतिपादन को जतीन ने स्वीकार कर क्रांतिकारियों का नेतृत्व सँभाल लिया।

अंग्रेजों के अत्याचारों की प्रतिक्रिया अन्दर ही अन्दर सुलगती रही और अंग-भंग योजना का प्रतिरोध करते समय वह फूट पड़ी। उस समय देश का बच्चा बच्चा आततायी के सामने खुलकर मुकाबला करने के लिए आ खड़ा हुआ। निःसन्देह उनके प्रेरणास्रोत भी यही क्राँतिकारी रहे थे, जो लुक–छिपकर अपनी भारतमाता की बेड़ियाँ काट फेंकने के प्रयास कर रहे थे। जतीन और उनके साथियों ने उस हवा में गतिविधियों और भी तेज कर दी। सरकार भी उन लोगों के पीछे हाथ धोकर पड़ गयी। बम कारखाना जो श्री अरविन्द ने बनाया था, के साथ जतीन के कई साथी पकड़ लिए गए व उन्हें जेल में डाल दिया गया।

पन्द्रह महीनों तक उन्हें जेल में तरह-तरह की यंत्रणाएँ दीं। परन्तु जतीन ने स्वाभिमान के साथ अपना सिर ऊँचा रखा और इन यंत्रणाओं की पीड़ा में कभी मुँह से उफ तक नहीं की और न ही क्राँतिकारी के गुप्त संगठन के लिए जबान खोली। यंत्रणाएँ देने वाले अधिकारी परेशान हो गए और उन्होंने दूसरी युक्ति से काम लिया। साथियों के खिलाफ गवाही के बदले उन्हें छोड़ देने, सरकारी मेडल दिए जाने तक की बात कही गयी। किन्तु इन प्रलोभनों को वे ठुकराते चले गए। अविचल एवं शाँत रहकर किसी भी प्रकार का बयान या स्वीकारोक्ति न देने के कारण पुलिस उनके खिलाफ कोई भी अभियोग सिद्ध नहीं कर पायी। इसलिए न्यायाधीश ने उन्हें 21 फरवरी 1911 को रिहा कर दिया।

जब जतीन ने भूमिगत रहकर अपनी गतिविधियाँ चलाना आरम्भ किया। उन्होंने एक व्यापारिक फर्म खोल ली और पुलिस की निगाह में साँसारिक बन गए। उन चिंतित रहते थे, थोड़ी राहत मिली। परन्तु जतीन तो इस सबकी आड़ में उग्र विचारों वाले लोगों से व भारत से बाहर रहने वाले क्राँतिकारी मनोभूमि वालों से संपर्क साध रहे थे।

अंततः 8 सितम्बर, 1915 को उड़ीसा के तट पर पुलिस से उनकी मुठभेड़ हो गई और वे उस स्वतंत्रता की यज्ञाग्नि में समाहित हो गए। यद्यपि उनके साथियों ने उन्हें भागकर वच निकलने की सलाह दी, परन्तु इस क्राँति के अमर शहीद ने कहा-हम उस वीर परम्परा के अनुयायी है, जिसके अनुसार अपने साथियों को रणक्षेत्र में छोड़ भाग निकलना घोर पाप है।”

ज्योतिन्द्रनाथ मुखर्जी एक ऐसे युग में वीर बलिदानी पुरुष के रूप में सामने आए, जबकि देश को ऐसे वीरों की बहुत आवश्यकता थी। मातृभूमि को आराध्य मानकर, ईश्वर समझकर उसका अर्चन-वन्दन करने वाले जतीन सच्चे आस्तिक, शहीद एवं राष्ट्रभक्त के रूप में सदैव याद किये जाते रहेंगे।


परिवार में स्वर्ग जैसा वातावरण कैसे?

ईश्वर-उपासना मानव-जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है। आत्मिक स्तर को सुविकसित, सुरक्षित एवं व्यवस्थित रखने के लिए हमारी मनोभूमि में ईश्वर के लिए समुचित स्थान रहना चाहिए और यह तभी संभव है जब उसका अधिक चिंतन-मनन अधिक सामीप्य व सान्निध्य प्राप्त करने का प्रयास किया जाए। भोजन के बिना शरीर का काम नहीं चलता। साँस लिए बिना रक्ताभिषरण की प्रक्रिया बिगड़ जाती है। इसी प्रकार ईश्वर की उपेक्षा करने के उपरान्त आन्तरिक स्तर भी नीरस, चिंताग्रस्त, अनिश्चित, अनैतिक, अव्यवस्थित एवं आशंकित बना रहता है। यह हानि कुछ कम हानि नहीं है। दीखने वाली हानियों को लोग आसानी से समझ लेते है, पर इस जीवन के सारे आनन्द और उद्देश्य को ही नष्ट कर देने वाली हानि को हम न तो देख पाते है और न समझ पाते ही है। यह कैसे दुर्भाग्य की बात है।

मानव जीवन की प्रगति और सुख-शान्ति आँतरिक स्तर की उत्कृष्टता पर निर्भर रहती है। इस उत्कृष्टता की पुष्टि एवं अभिवृद्धि के लिए उपासना तंत्र का ऋषियों ने आविष्कार किया, भौतिक सुख-साधन बाहुल्य और बुद्धिबल के आधार पर कमाये जा सकते है, पर गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता पर निर्धारित समस्त विभूतियाँ हमारे आंतरिक स्तर पर ही निर्भर रहती है। इस स्तर को सुदृढ़ और समुन्नत बनाने में उपासना का भारी योग रहता है। इसलिए अत्यन्त आवश्यक कार्यों की भाँति ही उपासना को दैनिक कार्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, आहार, विश्राम, सफाई, गृहस्थपालन, विद्याध्ययन, मनोरंजन आदि का ध्यान रखा जाता है वैसा ही ध्यान उपासना का भी रखा जाना चाहिए। जन-साधारण को सदाचारी और सुनियंत्रित, समाजोपयोगी रखने के विचार से सरकार जन-मानस पर कठोर नियंत्रण कायम करने के लिए विभिन्न प्रयत्न करती है। अनेकों कानून, अध्यादेश एवं नियंत्रण द्वारा लोगों को उचित दिशा में चलाने के लिए अपने दृष्टिकोण के अनुसार कुछ करने के लगी हुई है, पर सफलता बहुत ही स्वल्प-सक्रिय दृष्टिगोचर होती है। सरकारें इन दिनों व्यक्ति पर भारी नियंत्रण करने लगी हैं। अधिनायकवादी, एकत्रित सरकारें मनुष्य की भौतिक और लौकिक समस्त शक्तियों पर काबू पाने और लोगों को अपनी मनमर्जी का बनाने और चलाने का प्रयत्न करती रही है। औजार और कारतूस जिस प्रकार फैक्ट्रियों में बनते हैं, उसी प्रकार मनुष्यों के विचार और प्रवृत्तियों को भी अपनी मनमर्जी का ढाल लेने का प्रयास शासन तंत्र करता रहा है। एक हद तक उसे सफलता भी मिली है, पर यह निश्चित है कि यदि उच्च आदर्शवाद के लिए आध्यात्मिक कोमल भावनाओं के लिए अंतःकरण में कोई स्थान न रहा तो मनुष्य से यह आशा नहीं की जा सकती कि महानता के उच्च गुण उसमें कभी विकसित हो सकेंगे। आँतरिक प्रेरणा से जो प्रेम, त्याग, संयम तथा श्रेष्ठता उत्पन्न हो सकती है, वह सरकारी प्रचार या दबाव के कारण कदापि संभव न होगी। संसार की शान्ति और सुव्यवस्था इसी बात पर निर्भर है कि मनुष्य सतत् उच्चस्तरीय भावनाओं से ओत-प्रोत रहें। यह भावनाएँ भीतर से निकलती है, बाहर से नहीं थोपी जा सकतीं। अंतःकरण पर प्रभाव डालने की शक्ति श्रद्धा और विश्वास में ही सन्निहित रहती है। इसलिए जब तक इन तत्वों को नहीं जगाया जाएगा। तब तक उत्कृष्टता की अंतःप्रेरणा कहीं जाग्रत होगी और जब तक यह जागरण न होगा तब तक मनुष्य अधोगामी प्रवृत्तियों से ऊँचा न उठ सकेगा।

मानव जीवन की प्रगति उसके सद्गुणों पर निर्भर है। जिनके गुण-कर्म स्वभाव का निर्माण एवं विकास ठीक प्रकार हुआ है, वे सुसंयत व्यक्तित्व वाले सज्जन मनुष्य अनेकों बाधाओं और कठिनाइयों को पार करते हुए अपनी प्रगति का रास्ता ढूँढ़ ही लेते है। विपरीत परिस्थितियों एवं बुरे स्वभाव के व्यक्तियों को भी सुसंस्कृत मनुष्य अपने प्रभाव एवं व्यवहार से बदल सकता है और उन्हें अनुकूलता में परिणत कर सकता है। इसके विपरीत जिसके स्वभाव में दोष दुर्गुण भरे पड़े होंगे वह अपने दूषित दृष्टिकोण के कारण अच्छी-खासी मनोभूमि को भी दूषित कर देगा। संयोगवश उन्हें अनुकूलता द्वारा सुविधा प्राप्त भी हो तो दुर्गुणों के आगे वह देर तक ठहर न सकेगी। दूषित दृष्टिकोण जहाँ भी होगा वहाँ नारकीय वातावरण बना रहेगा। अनेकों विपत्तियाँ वहाँ से उपजती रहेंगी।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हर किसी की निजी व पारिवारिक जीवन में सद्गुणों की जननी आस्तिकता को धैर्य, विवेकपूर्वक अपनाने का प्रयत्न करना चाहिए। ईश्वर का भय मनुष्य को नेक रास्ते पर चलाते रहने की दिशा में सबसे बड़ा नियंत्रण है। राजकीय कानून या सामाजिक दण्ड की, दुस्साहसी लोग उपेक्षा करते रहते है। अपराधों और अपराधियों का बाहुल्य पुलिस और जेल का भय भी इन्हें कम नहीं कर पाता। पर यदि किसी को ईश्वर पर पक्का विश्वास हो, अपने चारों ओर प्रत्येक प्राणी में, कण-कण में ईश्वर को समाया हुआ देखे, तो उसके लिए किसी के साथ अनुचित व्यवहार कर सकना संभव नहीं होगा। कर्मफल की ईश्वरीय अविचल व्यवस्था पर जिसे आस्था होगी वह अपना भविष्य अंधकारमय बनाने के लिए कुमार्ग पर बढ़ने का साहस कैसे कर सकेगा। दूसरे को ठगने या परेशान करने का अर्थ है-ईश्वर को ठगना या परेशान करना। ऐसी भूल उससे नहीं हो सकती, जिसके मन में ईश्वर का विश्वास और कर्मफल की अनिवार्यता का निश्चय गहराई तक जमा हुआ है।

सच्चरित्रता को आस्तिकता का पर्यायवाची शब्द माना जा सकता हैं। ढोंग जैसी झूठी भक्ति, जिसमें साढ़े तेईस घण्टे पाप करते रहने और आधे घण्टे पूजा-पत्री करके सारे पापों से छुटकारा मिलने की प्रवंचना सिखाई जाती है, उपहासास्पद हो सकती है। इसी प्रकार देवदर्शन से सफल मनोरथ सहज ही पूरे हो जाने की मान्यता भी एक प्रकार की धृष्टता कही जा सकती है, पर सच्चे अध्यात्म का, सच्ची आस्तिकता का महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं होता। ईश्वर-विश्वास का, आस्तिकता का प्रतिफल एक ही होना चाहिए, सन्मार्ग का अवलम्बन और कुमार्ग का त्याग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म और कर्तव्य का अनुशासन स्थापित करने के लिए ईश्वर-विश्वास से बढ़कर और कोई प्रभावशाली माध्यम हो नहीं सकता।

प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन को सार्थक एवं भविष्य को उज्ज्वल बनाने की आधारशिला-आस्तिकता को जीवन में प्रमुख स्थान देने का प्रयत्न करें। ईश्वर को अपना साथी-सहचर मानकर हर घड़ी निर्भय रहे और सन्मार्ग से ईश्वर की कृपा एवं कुमार्ग से ईश्वर की सजा प्राप्त होने के अविचल सिद्धान्त को हृदयंगम करता हुआ अपने विचारों और आचरणों को सज्जनोचित बनाने का प्रयत्न करता रहे। इसी प्रकार जिसे अपने परिवार में, स्त्री-बच्चों से सच्चा प्रेम हो उसे भी यहीं प्रयत्न करना चाहिए कि घर के प्रत्येक सदस्य के जीवन में किसी न किसी प्रकार आस्तिकता का प्रवेश हो। परिवार का बच्चा-बच्चा ईश्वर-विश्वास बने।

अपने परिवारों के लोगों के शरीर और मन को विकसित करने के जिस प्रकार भोजन और शिक्षण की व्यवस्था की जाती है, उसी प्रकार आत्मिक दृष्टि से स्वस्थ बनाने के लिए घर में बाल वृद्ध सभी की उपासना में निष्ठा एवं अभिरुचि बनी रहे। इसके लिए समझाने-बुझाने का तरीका सबसे अच्छा है। गृहपति का अनुकरण भी परिवार के लोग करते है, इसलिए स्वयं नित्य नियमपूर्वक नियत समय पर उपासना करने के कार्यक्रम को ठीक तरह निबाहते रहा जाए। घर के लोगों से जरा जोर देकर भी उनकी ढील पोल को दूर किया जा सकता है। आमतौर से अच्छी बातें पसन्द नहीं की जाती और उन्हें उपहास-उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता हैं। यही वातावरण अपने घर में भी घुसा हुआ हो सकता है। पर उसे हटाया तो जाना ही चाहिए। देर तक सोना, गंदे रहना, पढ़ने में लापरवाही करना, ज्यादा खर्च करना, बुरे लोगों की संगति आदि बुराइयाँ घर के किसी सदस्य में हो तो उन्हें छुड़ाने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है क्योंकि यह बातें उनके भविष्य को अन्धकारमय बनाने वाली, अहितकर सिद्ध हो सकता है। उसी प्रकार नास्तिकता दुर्गुणों को भी हटाने के लिए घर के लोगों को जरा अधिक सावधानी और सफाई से कहा-सुना जाए, तो भी उसे उचित ही माना जाएगा। अपने कुटुम्ब की सबसे बड़ी सेवा सह हो सकती है कि प्रत्येक परिजन को आस्तिक एवं उपासक बनाया जाए। उस मार्ग को अपनाकर वे अपना भविष्य उज्ज्वल बना सकते है। आस्तिकता धर्म के प्रति विश्वास को जन्म देती है और इस विश्वास पर सुदृढ़ रहने वाला अपने कर्तव्यों पर भी स्थिर रह श्रेष्ठ नागरिक बनता है। फलस्वरूप उसका शरीर, मन, परिवार, व्यवहार, लोक-परलोक सभी कुछ आनन्दमय बनता है। जो लड़कियाँ आस्तिकता के विश्वास को बचपन से ही मन में जमा लेंगी तो वे ससुराल जाने पर पतिव्रत धर्म का भी पालन करेंगी और उस घर के प्रत्येक सदस्य के साथ सद्व्यवहार करना धर्म-कर्तव्य मानेगी। ऐसी दशा में वहाँ वे आँखों का तारा ही बनकर रहेगी। सभी उन्हें दुलार करेंगे और दुःख-दर्द में पलकों की छाया किए रहेंगे। जो गौरव पिता के प्रचुर दहेज देने से भी लड़कियों को ससुराल में नहीं मिल सकता, वह उनके सद्गुणों के द्वारा मिल जाता है। सद्गुण धर्म-विश्वासों के फलस्वरूप ही उत्पन्न होते है और धर्म-विश्वासों को आस्तिकता की देन ही कहा जा सकता है। इस प्रकार जिस कन्या को उनके माता-पिता ने आस्तिकता की, उपासना की शिक्षा दी है, उन्होंने उसका भविष्य आनन्दमय बनाने के लिए सबसे बड़ी सम्पत्ति वसीयत कर दी है। इसके विपरीत जिन लड़कियों की उच्छृंखलता, नास्तिकता, विलासिता और असहिष्णुता के वातावरण में पलने दिया है, वे जहाँ कहीं भी रहेगी, नरक उत्पन्न करेंगी उसमें भी जलेगी और सारे परिवार को भी जलाती रहेंगी। ऐसी आदतों की अभ्यस्त लड़कियों का अहित उन अभिभावकों ने ही किया होता है, जिन्होंने बचपन से उन्हें धार्मिक मान्यताओं से, पूजा-उपासना से वंचित रखा है संभव है। ऐसा उन्होंने प्यारवश किया हो, पर वस्तुतः वह परिणाम में शत्रुता के समान ही अहितकर सिद्ध होता है।

अपने परिवारों के लोगों के शरीर और मन को विकसित करने के जिस प्रकार भोजन और शिक्षण की व्यवस्था की जाती है, उसी प्रकार आत्मिक दृष्टि से स्वस्थ बनाने के लिए घर में बाल वृद्ध सभी की उपासना में निष्ठा एवं अभिरुचि बनी रहे। इसके लिए समझाने-बुझाने का तरीका सबसे अच्छा है। गृहपति का अनुकरण भी परिवार के लोग करते है, इसलिए स्वयं नित्य नियमपूर्वक नियत समय पर उपासना करने के कार्यक्रम को ठीक तरह निबाहते रहा जाए। घर के लोगों से जरा जोर देकर भी उनकी ढील पोल को दूर किया जा सकता है। आमतौर से अच्छी बातें पसन्द नहीं की जाती और उन्हें उपहास-उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता हैं। यही वातावरण अपने घर में भी घुसा हुआ हो सकता है। पर उसे हटाया तो जाना ही चाहिए। देर तक सोना, गंदे रहना, पढ़ने में लापरवाही करना, ज्यादा खर्च करना, बुरे लोगों की संगति आदि बुराइयाँ घर के किसी सदस्य में हो तो उन्हें छुड़ाने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है क्योंकि यह बातें उनके भविष्य को अन्धकारमय बनाने वाली, अहितकर सिद्ध हो सकता है। उसी प्रकार नास्तिकता दुर्गुणों को भी हटाने के लिए घर के लोगों को जरा अधिक सावधानी और सफाई से कहा-सुना जाए, तो भी उसे उचित ही माना जाएगा। अपने कुटुम्ब की सबसे बड़ी सेवा सह हो सकती है कि प्रत्येक परिजन को आस्तिक एवं उपासक बनाया जाए। उस मार्ग को अपनाकर वे अपना भविष्य उज्ज्वल बना सकते है। आस्तिकता धर्म के प्रति विश्वास को जन्म देती है और इस विश्वास पर सुदृढ़ रहने वाला अपने कर्तव्यों पर भी स्थिर रह श्रेष्ठ नागरिक बनता है। फलस्वरूप उसका शरीर, मन, परिवार, व्यवहार, लोक-परलोक सभी कुछ आनन्दमय बनता है। जो लड़कियाँ आस्तिकता के विश्वास को बचपन से ही मन में जमा लेंगी तो वे ससुराल जाने पर पतिव्रत धर्म का भी पालन करेंगी और उस घर के प्रत्येक सदस्य के साथ सद्व्यवहार करना धर्म-कर्तव्य मानेगी। ऐसी दशा में वहाँ वे आँखों का तारा ही बनकर रहेगी। सभी उन्हें दुलार करेंगे और दुःख-दर्द में पलकों की छाया किए रहेंगे। जो गौरव पिता के प्रचुर दहेज देने से भी लड़कियों को ससुराल में नहीं मिल सकता, वह उनके सद्गुणों के द्वारा मिल जाता है। सद्गुण धर्म-विश्वासों के फलस्वरूप ही उत्पन्न होते है और धर्म-विश्वासों को आस्तिकता की देन ही कहा जा सकता है। इस प्रकार जिस कन्या को उनके माता-पिता ने आस्तिकता की, उपासना की शिक्षा दी है, उन्होंने उसका भविष्य आनन्दमय बनाने के लिए सबसे बड़ी सम्पत्ति वसीयत कर दी है। इसके विपरीत जिन लड़कियों की उच्छृंखलता, नास्तिकता, विलासिता और असहिष्णुता के वातावरण में पलने दिया है, वे जहाँ कहीं भी रहेगी, नरक उत्पन्न करेंगी उसमें भी जलेगी और सारे परिवार को भी जलाती रहेंगी। ऐसी आदतों की अभ्यस्त लड़कियों का अहित उन अभिभावकों ने ही किया होता है, जिन्होंने बचपन से उन्हें धार्मिक मान्यताओं से, पूजा-उपासना से वंचित रखा है संभव है। ऐसा उन्होंने प्यारवश किया हो, पर वस्तुतः वह परिणाम में शत्रुता के समान ही अहितकर सिद्ध होता है।


सज्जन (Kahani)

बादशाह को एक नौकर की आवश्यकता थी। तीन उम्मीदवार सामने पेश किये गये।

बादशाह ने पूछा-यदि मेरी और तुम्हारी दाढ़ी में साथ-साथ आग लगे तो पहले किसकी बुझाओगे?”

एक ने कहा-पहले आपकी बुझाऊँगा।” दूसरे ने कहा-पहले अपनी बुझाऊँगा।” तीसरे ने कहा-एक हाथ से अपनी और दूसरे हाथ से आपकी बुझाऊँगा।”

बादशाह ने तीसरे आदमी की नियुक्ति कर दी और दरबारियों से कहा-जो अपनी उपेक्षा करके दूसरों का भला करता है वह अव्यावहारिक है। जो स्वार्थ को ही सर्वोपरि समझता है,वो नीच है और जो अपनी और दूसरों की भलाई का समान रूप से ध्यान रखता है, उसे ही सज्जन कहना चाहिए। मुझे सज्जन की आवश्यकता थी, सो उस तीसरे आदमी की नियुक्ति की गई।”


अपने आपको आप स्वयं ही साधिये

आत्म-सुधार का सबसे अच्छा तरीका यह है कि योगनिद्रा की स्थिति में अचेतन मन से सीधा संपर्क जोड़ा जाए और उस क्षेत्र में जमी हुई विकृत अभिरुचियों, आदतों में आवश्यक सुधार-परिवर्तन किया जाए। ऑटोसजेशन’ अर्थात् स्वसंकेत का एक विज्ञानसम्मत शास्त्र है, जिसके सहारे अपने आपको अभीष्ट दिशा में चल पड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। दूसरों पर इस विद्या का प्रयोग करके उन्हें शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से सुधारना तो और भी सरल है। स्व-सम्मोहन या स्वसंकेत प्रक्रिया द्वारा यदि व्यक्ति अपने आपको स्वस्थ, निरोग, सामर्थ्यवान, प्रतिभासम्पन्न माने और निरन्तर इसी भावना का संकेत अपनी आत्मा को देता रहे, इसी विचार में निश्चय एवं विश्वास भरकर अपने आपको इसी का संकेत दे, तो वह निश्चय ही तदनुरूप ढलता जाएगा। आवश्यकता केवल निरंतर सूचना या संकेत देने की है। जितने उत्कृष्ट एवं परिपुष्ट संकेत होंगे, उतना ही महान परिवर्तन होगा, उतने ही उत्कृष्ट तत्वों की सिद्धि होगी।

यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि सजेशन-संकेत क्या है? उत्कृष्ट, पुष्ट एवं दृढ़ विचार, स्पर्श, ध्वनि, शब्द, दृष्टि तथा क्रियाओं द्वारा अपने अथवा दूसरों के मन पर प्रभाव डालने और अपनी इच्छा द्वारा कार्य सम्पन्न कराने का नाम ‘संकेत’ करना है। संकेत ऐसे वाक्यों से किया जाता है, जिनमें अपूर्व दृढ़ता, गहन-श्रद्धा शब्द-शब्द में शक्ति भरी रहती है। साधक बारम्बार कुछ शब्दों, वाक्यों तथा सूत्रों को लेता है, मंत्रजप की तरह बार-बार उन्हें मन में उठाता है और उन पर अपनी विचार क्रिया दृढ़ करता है। पुनरावर्तन द्वारा कुछ समय पश्चात् ये विचार स्थायी स्वभाव में परिणत हो जाते है। मन को जिस प्रकार का प्रबोध बार-बार दिया जाता है, कालान्तर में वही उसकी स्थायी सम्पत्ति हो जाती है। मन ही हमारे सम्पूर्ण शारीरिक एवं मानसिक क्रिया–कलापों का संचालक है। यह प्रचण्ड शक्ति वाला यंत्र हैं। विचारों को उत्पन्न, परिवर्तन व परिवर्धन करने का कार्य भी इसी संचालक यंत्र द्वारा होता है। अतः स्वसंकेत का सीधा प्रभाव हमारे मन पर पड़ता है। जब मन इन संकेतों से अपना पूर्ण तादात्म्य स्थापित कर लेता है, उन्हें स्वीकार कर लेता है, तब वह अपने क्रिया-व्यापार व्यवसाय उनके अनुसार करने लगता है, सफलता व सिद्धि तब दूर नहीं रह जाती।

प्राचीनकाल में भारतीय ऋषि-मनीषियों ने इस संबंध में गहन अनुसंधान किए थे और अद्भुत सफलताएँ अर्जित की थीं। आधुनिक विज्ञानवेत्ताओं एवं मनोवैज्ञानिकों के अनुसंधानों ने भी अब उक्त तथ्यों की पुष्टि कर दी हैं। शरीर-विज्ञान और मनोविज्ञान की दृष्टि से क्या-क्या परिवर्तन देखे गए है? इससे हमारी जाग्रत चेतना के गर्भ में अन्य परतों तक पहुँच कैसे संभव है, उस संदर्भ में विख्यात लेखक एवं मनोवैज्ञानिक चार्ल्स टी. टार्ट ने अपनी कृति ‘आर्ल्टड स्टेट ऑफ कान्सिअशनेश में विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है।

अपनी उक्त पुस्तक में टार्ट ने रूस के सरेगी स्विमनीनोफ नामक एक पियानो वादक का वर्णन किया है कि किस तरह ‘ऑटोसजेशन’ के माध्यम से उसने अपनी खोयी हुई क्षमता को अर्जित किया और संगीत की दुनिया में अपना नाम अग्रणी संगीतज्ञों में दर्ज कराया। जब वह इक्कीस वर्ष का था तब अपने प्रथम पियानो कन्सरटो में उसे अच्छी सफलता नहीं मिली, फलतः विकृत चिन्तन का शिकार हो गया। आखिर में उन्होंने हिप्नोटिज्म चिकित्सा के लिए विख्यात चिकित्सक डॉ. निकोलाई दाँल से संपर्क किया। डॉ. दाँल स्विमनीनोफ को तीन महीने तक लगातार आधे-आधे घण्टे तक सेसन्स में सामान्य हिप्नोटिज्म चिकित्सा के साथ-साथ बार-बार एक ही सजेशन-संकेत देते रहे कि “तुम पुनः संगीत की अच्छी तर्ज बना लोगे और सफलता के साथ बड़ी आसानी से उसका प्रदर्शन कर सकोगे।

इस प्रकार का ‘हिप्नोटिज्म सजेशन बहुत ही प्रभावी सिद्ध हुआ। धीरे-धीरे वह क्रमशः फिर से नयी-नयी धुनें बनाने लगा। उसके मस्तिष्क में संगीत की नयी-नयी धुनें विहार करने लगीं, उनकी तर्ज बनने लगी और विस्तृत होकर स्वरमाधुरी से लबालब होने लगीं। सन् 1901 में स्विमनीनोफ ने मास्को में प्रतियोगिता में भाग पियानो और आर्केस्ट्रा प्रतियोगिता में भाग की। क्रमशः उसकी लोकप्रियता और ख्याति बढ़ती गयी। आज भी संगीत समारोहों में स्विमनीनोफ की तर्ज को प्राथमिकता दी जाती है, जिसका नामकरण उसने डॉ. निकोलाई के नाम पर किया था।

विश्व के अनेक देशों में विगत चार दशकों से हिप्नोसिस एवं ऑटोसजेशन पर अनेकों अनुसंधान-कार्य हुए हैं। पाया गया है कि इन प्रक्रियाओं द्वारा प्रसुप्त चेतना की परतें को आसानी से उभारा और परिष्कृत किया जा सकता है। विश्व प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक आँल्डुअस हक्सले के अनुसार मनुष्य का चेतना क्षेत्र समुद्र की गहरा और विशाल है। उसकी अनेकों परतें हैं। ऊपरी सतह से नीचे उतरने पर पायी जाने वाली इन परतों को अचेतन, अवचेतन, सुपरचेतन की परतें कहते है। सक्रिय मस्तिष्क को निद्रित कर देना और अचेतन को क्रियाशील बना देना सम्मोहन एवं स्वसंकेत द्वारा संभव है। इस प्रकार की ‘ऑटोजेनिक ट्रेनिंग नाम दिया गया है।

सम्मोहन में प्रायः सम्मोहित व्यक्ति को दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है और उसके निर्देशों और संकेतों के आधार पर चलना पड़ता है। इससे उसके व्यक्तित्व पर बुरा असर पड़ सकता है। यह कमी ‘ऑटोसजेशन या’ ऑटोजेनिक ट्रेनिंग से दूर हो जाता है। यह एक प्रकार की साइकोथेरेपी है, जो स्वयं द्वारा स्वयं के लिए की जाती है। जर्मनी के मनोवैज्ञानिक जे. एच. शुल्त्ज ने अपनी कृति ‘ऑटोजेनिक आँरगन एक्सरसाइजेज’ में इस संदर्भ में विस्तारपूर्वक लिखा हैं। उसके अनुसार इस ट्रेनिंग में विभिन्न प्रकार के संकेतों के माध्यम से शरीर के विभिन्न अंगों में शिथिलन एवं ऊष्मा का संचार किया जा सकता है। क्रियाओं के कारण होने वाली शारीरिक प्रक्रियाओं में परिवर्तन को शरीरक्रिया विज्ञानियों ने अध्ययन किया हैं। पुराने संस्कारों, आदतों को नष्ट करने और नवीन आदतों तथा संस्कारों को उत्पन्न करने का सबसे सरल और प्रभावकारी तरीका स्व-संकेत का अभ्यास है।


कृत्रिम जीवनशैली जन्म देती है कैंसर को

नारी के सामान्य स्वास्थ्य को इन दिनों कैंसर ने जिस तरह प्रभावित किया है, वैसा किसी अन्य रोग ने नहीं। अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि विश्वभर में 60 प्रतिशत महिलाएँ अपनी अधेड़ उम्र के बाद किसी-न-किसी अंग के कैंसर से ग्रस्त हो जाती है। इनमें अकेले 40 प्रतिशत मामले स्तन कैंसर के होते है।

पिछले दिनों स्तन कैंसर के कारणों को जानने के लिए कई देशों में इस पर व्यापक अनुसंधान किए गए। अमेरिकी मेडिकल एसोसिएशन की स्वास्थ्य संबंधी पत्रिका में इस आशय की एक बिलकुल ही नई जानकारी प्रकाशित हुई हैं। उसमें इसका कारण ‘मोटापा’ बताया गया है। शोध दल प्रमुख डायन विल्सन ने चेतावनी देते हुए कहा है कि महिलाओं कि महिलाओं को 18 वर्ष की आयु से लेकर रजोनिवृत्ति काल तक अपने वजन को 5-10 पौण्ड से अधिक किसी भी प्रकार नहीं बढ़ने देना चाहिए। अन्यथा बढ़ा अतिरिक्त भार स्तन कैंसर की संभावना को दुगुना बढ़ा देगा।

लगभग ऐसा ही निष्कर्ष ‘हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ’ में शोधरत चीनी मूल के अमेरिकी विज्ञानी फिपिंग हुआँग का है। वे यह मानते हैं कि मोटापे से शरीर की स्वाभाविक प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न होता है, जो कैंसर के रूप में सामने आता है।

हार्वर्ड स्कूल में इस संबंध में लगभग एक हजार महिलाओं पर एक अध्ययन किया गया। इनमें आधी से अधिक स्त्रियाँ स्थूलकाय थीं, जबकि शेष कृशकाय। भारी-भरकम देह वाली महिलाओं में 40 प्रतिशत ऐसी थीं, जिनका वजन रजोनिवृत्ति के बाद तेजी से बढ़ा, इन नारियों में 70 प्रतिशत मामले स्तन कैंसर के पाये गए। कृशकाय स्त्रियों में सिर्फ 5 प्रतिशत मामले कैंसरजन्य थे, वह भी दूसरे अंगों के।

इससे पूर्व के अनुसंधानों से यह निष्कर्ष निकाला गया था कि रजोनिवृत्ति से पूर्व होने वाले कैंसर को मोटापा रोकने में सहायता करता है। इसके पीछे विज्ञानवेत्ता यह तर्क देते थे कि स्थूलता के कारण महिलाओं में डिम्बाणु कम बनते हैं। कम डिम्ब बनने के कारण एस्ट्रोजेन नामक रक्तस्राव भी स्वल्प होता है। यह हार्मोन कैंसरकारक है। इसके अल्प मात्र में निर्मित होने से कैंसर आशंका भी न्यून रहती है।

वर्तमान अध्ययन से उपरोक्त तथ्य की भी पुष्टि हुई, किन्तु इस अध्ययन में रजोनिवृत्ति (मेनोपाँज) के बाद की स्थिति से संबंधित निष्कर्ष महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिकों के अनुसार मासिक धर्म रुकने के उपरान्त उस प्रौढ़ आयु में जब गर्भाशय का मुँह बन्द हो जाता है, तो शरीर की स्थूलता एस्ट्रोजेन का मुख्य स्रोत बन जाती है। इस अवस्था में एस्ट्रोजेन पर्याप्त परिणाम में बनने लगता है, जो खतरनाक है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस स्थिति से बचने के दो उपाय हैं- या तो शरीर के वजन को नियंत्रित किया जाए अथवा बढ़े-चढ़े कायिक भार की दशा में बनने वाले एस्ट्रोजेन की अतिरिक्त मात्रा पर एस्ट्रोजेनरोधी दवाइयों द्वारा अंकुश स्थापित किया जाए। इन दोनों में विज्ञानवेत्ता वजन घटाने को ही उपयुक्त और आदर्श उपचार बताते हैं।

लिवरपूल यूनिवर्सिटी के शोधविज्ञानी पाँल वाचटेल ने अनेक वर्षों के गहन अनुसंधान के बाद इस मान्यता को भ्रामक बताया है कि कुँवारी रहने वाली लड़कियों अथवा विवाह के उपरान्त निःसंतान रहने वाली महिलाओं में कैंसर की संभावना सर्वाधिक होती है। उन्होंने करीब चार सौ ऐसी स्त्रियों पर अपना अध्ययन किया, जो या तो अविवाहित थीं अथवा विवाह के उपरान्त संतानहीन। इनमें से दस प्रतिशत स्त्रियों के स्तनों में गांठें पायी गई। इनमें से छः प्रतिशत मामले ही कैंसरजन्य थे। शेष सभी स्वस्थ-सामान्य

उपरोक्त अवधारणा के संबंध में शरीर शास्त्री यह तो स्वीकारते हैं कि गर्भावस्था के दौरान नारी देह में कुछ विशिष्ट प्रकार के स्राव पैदा होते हैं, जो जच्चा-बच्चा दोनों को ही उस दौरान रोगों से सुरक्षा प्रदान करते हैं, किन्तु इसे वे एकदम निर्मूल मानते हैं, कि सन्तानोत्पत्ति मात्र से ही किसी को कैंसर-कवच प्राप्त हो जाता है। वास्तविकता तो यह है कि हर शरीर के अन्दर प्रकृति की ओर से ऐसी व्यवस्था की गई है कि वह उसे निरोग बनाये रख सके। रोग का अर्थ ही ‘शरीर की अव्यवस्था’ है। जब शारीरिक प्रक्रिया को किसी भी प्रकार से बाधित करने का प्रयास किया जाता है अथवा उसका स्वाभाविक-क्रम किसी कारणवश अस्त-व्यस्त हो जाता है, तो यही व्यतिक्रम ‘व्याधि’ के रूप में सामने आता हैं। कृत्रिम जीवनशैली में इस प्रकार के व्यतिक्रम अधिकाधिक सामने आते हैं, अतः वहाँ रोगों की संख्या भी ज्यादा होती है। प्रकृति के सान्निध्य में रहने वाले वनवासियों का जीवनक्रम अधिक प्राकृतिक होता

है, इसलिए उनकी कायिक गतिविधियाँ स्वाभाविक बनी रहती हैं, उनमें हस्तक्षेप करने वाले बाह्यकारक नगण्य होते हैं, अतएव वे अधिकाधिक स्वस्थ बने रहते हैं।

कैंसर की स्थिति में शरीर की स्वाभाविक लयात्मकता से छेड़छाड़ होती है, जिसके परिणामस्वरूप किसी अवयव का कोशिका-विभाजन अचानक पड़ोसी ऊतकों के कोशिका-विभाजन से तीव्र हो उठता है। यही कैंसर है। यों तो इसके ठीक-ठीक कारणों को अभी पता नहीं चल पाया है, पर ऐसा विश्वास किया जाता है कि औद्योगीकरण के दूषित वातावरण में रहने, संश्लेषित कृत्रिम आहार लेने एवं बदलती जीवनशैली के कारण शरीर के अन्दर कुछ ऐसी अस्वाभाविक प्रतिक्रिया होती हैं, जो स्तन सहित विभिन्न अवयवों के कैंसर का कारण बनती हैं।

बनावटी जीवनशैली प्रकृति के विरुद्ध है। हम अधिकाधिक प्राकृतिक रहें और प्राकृतिक आहार लें। इससे शरीरगत क्रियाएँ संतुलित एवं नियंत्रित बनी रहती हैं। काया के भीतर सुव्यवस्था बनी रहे, तो अव्यवस्थाजन्य रोगों को पनपने का कोई मौका नहीं मिलेगा, फलतः न सिर्फ स्तन एवं अन्यान्य अंगों के कैंसर से बचा जा सकेगा, वरन् दूसरे रोगों से बचे रहने की गारण्टी भी मिल जाएगी।


शरीर से कुरूप भले ही हों, चरित्र होना चाहिए

पंजाब के एक शहर में महाराजा रणजीत सिंह की सवारी निकल रही थी। रास्ते में हाथी पर बैठो हुए महाराजा के सिर पर एक पत्थर आकर लगा और अगले ही क्षण आस-पास के सैनिकों ने एक बालक को पकड़ा, जो इस शोभायात्रा से बेखबर होकर सड़क के किनारे लगे बेर के पेड़ से फल गिराने के लिए पत्थर फेंक रहा था।

सैनिकों ने राजदरबार में उस बालक को उपस्थित किया। वह बहुत डर रहा था। महाराजा के सिर पर पट्टी बँधी हुई थी, सैनिकों ने शोभायात्रा के समय घटित घटना का विवरण कहा। महाराज ने फैसला दिया, जब पेड़ भी पत्थर लगने पर फल देता है, तो मैं ही इसे दण्ड क्यों दूँ। उसने मुझे लक्ष्य कर तो पत्थर मारा नहीं था, भूल से वह लग गया, इसमें बालक का कोई दोष नहीं है, इसे भेंट देकर वापस भेज दो।”

महाराजा रणजीत सिंह के इस निर्णय पर सबको आश्चर्य हुआ और सुखद हर्ष भी। उनकी क्षमाशीलता के ऐसे कई किस्से सुने जाते है। वे उतने ही क्षमाशील थे जितने कि वीर। क्षमा ही तो वीर का भूषण कहा गया है। अपने प्रति भूल से या जानबूझकर भी अपराध करने वालों को क्षमा कर देना बहुत बड़ा गुण है।

महाराजा रणजीत सिंह शरीर से बिल्कुल भी आकर्षक नहीं थे। उनका कद छोटा था। चेहरा चेचक के दागों से भरा हुआ और एक आँख भी नहीं थी। इतने कुरूप व्यक्ति की प्रतिष्ठा भी भारत के इतिहास में अति सुन्दर वीर के रूप में हुई है। वस्तुतः सौंदर्य का शरीर से कोई सम्बन्ध नहीं है, वह तो व्यक्तित्व और चरित्र का ही अंग है। नाटे कद के व्यक्ति से नियति ने एक आँख छीन ली, किन्तु सूझ-बूझ और नीर-क्षीर विवेकी-बुद्धि के रूप में संसार का अद्वितीय नेत्र इनके पास था। उनका चेहरा चेचक के दाग से भद्दा लगता था, परन्तु उस पर देदीप्यमान दिव्य गुणों की आभा अच्छे चेहरों को मात दे देती थी और इस नैसर्गिक सौंदर्य को प्राप्त किया जाता था उन्होंने अपने समझदार पिता से। पालन-पोषण में उनके माता-पिता ने इस ओर विशेष ध्यान दिया था, वह भी जन्म से ही कुरूप होने के कारण।

1780 ई. में पंजाब की एक रियासत के अधिपति महाराजा मानसिंह के यहाँ उनका जन्म हुआ। जन्म के समय उनका शरीर बड़ा बेडौल और कुरूप था। लोगों की आम धारणा थी कि एक राजकुमार को सुन्दर होना चाहिए। इसलिए राजपरिवार के अन्य सदस्यों और सर्वसाधारण को स्वाभाविक ही क्षोभ और चिन्ता हुई, जिसे उन्होंने महाराज मानसिंह के सामने व्यक्त किया। मानसिंह को दुःख तो था, परन्तु उतना नहीं। उनकी मान्यता थी कि कोई भी चेहरे से सुन्दर नहीं कहा जाना चाहिए, बल्कि सुन्दरता का मापदण्ड तो उसका पराक्रम, शौर्य और साहस समझना चाहिए। सहानुभूति जताने और राजकुमार को कुरूप होने पर अपनी व्यथा कहने के लिए दरबार के कुछ उनके पास पहुँचे तो उन्होंने ललकार कर कहा-मुझे इस बात का जरा भी दुःख नहीं है कि मेरा बेटा सुन्दर नहीं है। पुरुष का पुरुषार्थी और पराक्रमी होना ही उसका सुन्दर होना है। और मैं निश्चय ही अपने बेटे को ऐसा बनाऊँगा।”

राजकुमार के कुछ बड़ा होने पर महाराजा मानसिंह सचमुच ही ही अपने पुत्र को बहिरंग जगत का विजेता एवं सौंदर्यशाली बनाने में जुट गए। वे रणजीत सिंह को घोड़े पर बिठाकर घुमाने ले जाते, घुड़सवारी करवाते, निशाना सिखाते और बन्दूक चलाना सिखाते, बताते। रणजीत सिंह को उन्होंने ऐसे वातावरण में रखा, जो वीरता और साहस की प्रेरणा देता था। रात को सोते समय भी मानसिंह अपने लाड़ले को राम-लक्ष्मण की शौर्य कथाएँ सुनाया करते थे।

ऐसा करने का उनका एक-दूसरा उद्देश्य भी था। पंजाब उस समय कई छोटे-बड़ी रियासतों में बँटा हुआ था। कुल मिलाकर बारह राज्य थे, जो आपस में ही लड़-मरकर अपनी शक्ति नष्ट करते रहते थे। सिक्ख जाति सदा से ही देशभक्ति और बहादुरी की परम्पराओं को पालन करती रही है। गुरुगोविन्द सिंह ने पूरे सिक्ख ने पूरे सिक्ख समाज को सैनिकीकरण किया, इससे बड़े-बड़े साम्राज्य तक भय खाते थे परन्तु बाद में इस सशक्त संगठन को भी फूट और वैमनस्य के संक्रामक रोग ने ग्रसित कर लिया, जिसके परिणामस्वरूप पूरा पंजाब छोटे-छोटे राज्यों में बँट गया और उस सबकी शक्ति क्षीण होने लगी।

महाराजा मानसिंह बुद्धिमान और विचारशील भी थे। उन दिनों अंग्रेज सेनाओं की छोटी-छोटी टुकड़ियाँ जिस प्रकार सिक्ख जनता और भारतीय जन-जीवन को संत्रस्त किया करती थीं, उसे देखकर उनका मन बड़ा व्यथित होता। भारतीय समाज में घुस आए इन विकारों को दूर करने की ठानकर मानसिंह ने सर्वप्रथम पंजाब में एक संगठित राज्य का स्वप्न देखा। उसे साकार करने के लिए प्रयत्न भी किया। अपने पुत्र रणजीत सिंह को वीर योद्धा के रूप में तैयार करने की साधना भी इन्हीं प्रयत्नों की एक कड़ी थी।

रणजीत सिंह को युद्धविद्या में निष्णात करने के साथ-साथ उन्होंने अपने पुत्र के चरित्रगठन की ओर भी ध्यान दिया। क्योंकि जनस्तर पर प्राप्त ही तो स्थायी रख सकता है, अन्यथा इस ओर और कोई ध्यान न देने वाला उन सफलताओं के कारण अहंकारी और अभिमानी ही बनता। व्यक्तिगत रूप से पुत्र को सच्चा सौंदर्य प्रदान करने के लिए तथा उसे सामाजिक हित के लिए उपयोगी बनाने हेतु महाराजा मानसिंह ने अथक प्रयत्न किया।

सन् 1792 में उनका देहान्त हो गया। उस समय रणजीत सिंह की आयु मात्र बारह वर्ष की थी। भारत राष्ट्र का का भावी उद्धारक असमय में ही अनाथ ही अनाथ हो गया। परन्तु माता ने सूझबूझ से काम लिया और रणजीत को अपने संरक्षण में लेकर इसी उम्र में राजगद्दी सौंप दी। राजकाज देखने के लिए उन्होंने अपने एक विश्वासपात्र दरबारी लखपत राय को दीवान नियुक्त कर दिया। रणजीत सिंह का राज्याभिषेक हुए अधिक समय नहीं हुआ था कि राजपरिवार के सभी सदस्य उन्हें अपने हाथों का खिलौना बनाने के लिए तरह-तरह की योजनाएँ बनाने लगे। उन्होंने तथा उनकी माता ने बड़ी सावधानी बरती और षड्यंत्रों को विफल किया।

कुछ वर्षों बाद अफगानिस्तान की राजगद्दी पर शाहजहाँ नाम का एक महत्त्वाकाँक्षी युवक बैठा। उसने सुना कि पंजाब जैसे धन-धान्य सम्पन्न प्रान्त के सीमान्त क्षेत्र का राजा एक किशोर युवक है, तो उसके मुँह में पानी भर आया और रणजीत के राज्य को जीतने के लिए उसने लाहौर पर आक्रमण कर दिया। इस आसन्न संकटकाल में राजमहल के षड्यन्त्र खुलकर बाहर आ गए। सत्रह-अठारह वर्ष के अवयस्क रणजीत सिंह के सम्मुख विकट समस्या उठ खड़ी हुई।

रणजीत सिंह ने धैर्य से काम लिया। इस संकटकाल में उनकी बचपन की शिक्षा काम आई। माता के परामर्श एवं स्वयं की सूझ-बूझ से उन्होंने स्वयं को स्वतंत्र राजा घोषित कर दिया और सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए। शाहजमाँ के पास काफी बड़ी सेना थी और रणजीत सिंह के पास गिने-चुने किन्तु राजभक्त सिपाही। सेना नेतृत्व उन्होंने स्वयं सँभाला और शाहजमाँ का डटकर मुकाबला किया। आततायी सत्ता लोलुपता को विशुद्ध राष्ट्र भक्ति के हाथों पराजित होना पड़ा। शाहजमाँ लाहौर छोड़कर भागा। किन्तु महाराज रणजीत सिंह ने शत्रु के प्रति उदारता का व्यवहार किया। उन्होंने युद्ध के दौरान नदी में डूब गई शाहजमाँ की तोपें, हथियार और छीना गया गोला-बारूद वापस कर दिया। अफ़गान सरदार को इस विचित्र व्यवहार पर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसका हृदय भी अवसाद से भर गया, परन्तु पंजाब विजय की लालसा अभी मिटी नहीं थी। अगली बार पूरी तैयारी के साथ आने की खिसियानी धमकी देकर वह अफगानिस्तान लौट गया।

इस युद्ध के कारण महाराजा रणजीत सिंह का आत्मविश्वास बढ़ गया। उन्होंने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया। माँ ने पिता की उस चिरकालिक इच्छा के सम्बन्ध में बताया जिसके अनुसार वे पंजाब को एक राष्ट्र के रूप में उदय होते देखना चाहते थे। उनके मन में भी राष्ट्र के संगठन की संगतिकरण की प्रबल प्रेरणाएँ उठा करती थीं। अपने विश्वासपात्र सैनिकों को लेकर उन्होंने आस-पास के छोटे-छोटे राज्यों का नवीनीकरण कर संघराज्य की स्थापना का अभियान छेड़ा।

इस विजययात्रा में उन्हें अकल्पित सफलता मिली। इन छोटे-छोटे राज्यों ने जल्दी ही हथियार डाल दिये और महाराजा रणजीत सिंह की अधीनता स्वीकार कर ली। एक विशाल राज्य की सुरक्षा के लिए एक सशक्त एवं आधुनिक शस्त्रास्त्रों से लैस सेना भी चाहिए। एक ओर से अंग्रेजों की बढ़ती हुई शक्ति का भय था तो दूसरी ओर अफगानिस्तान के महत्त्वाकाँक्षी राजा शाहजमाँ का। इन दोनों सम्भावित शत्रुओं से रक्षा का प्रबन्ध करने के लिए उन्होंने सेना का विस्तार करना प्रारम्भ किया। पंजाब की उर्वरा भूमि तो सोना उगलती थी। इसलिए व्यय की कोई खास चिन्ता नहीं थी।

उस समय जब वे अपनी सेनाओं का गठन कर रहे थे, अंग्रेजी सरकार ने इस बड़े साम्राज्य को हस्तगत करने के प्रयत्न किए, परन्तु वे विफल रहे। अंग्रेजों को मुँह की खानी पड़ी। अब वे महाराजा रणजीत सिंह से भय खाने लगे व उन्हें अपना मित्र बनाने के लिए प्रस्ताव रखा। परिणामस्वरूप 1809 में अमृतसर में दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों में संधिवार्ता हुई और अँगरेजों तथा सिक्खों में समझौता हुआ।

हृदय से तो महाराजा रणजीत सिंह नहीं चाहते थे कि एक विदेशी शासक को अपना मित्र बनायें, परन्तु उस समय सैन्यशक्ति कमजोर होने के कारण समझौता करना ही उचित समझा। अमृतसर की संधि के अनुसार महाराजा रणजीत सिंह ने यह वचन दिया कि वे पूर्व दिशा की ओर अपना राज्य नहीं बढ़ाएँगे। इसके बदले में अंग्रेज जनरल एलार्ड और कोर्ट की सहायता से उन्होंने अपनी सेनाओं के आधुनिकीकरण का प्रस्ताव रखा। यह काम पुरा होने के बाद वे अपने वायदे के अनुसार पूर्व में तो नहीं बढ़े, परन्तु पश्चिम और उत्तर दिशा में कई क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।

सन 1809 में अफगानिस्तान का बादशाह शाहजमाँ उनके पास आया। वह इस बार खाली हाथ आया और अकेला था। कारण कि उसे गद्दी से उतार दिया गया था। महाराजा रणजीत सिंह की दयालुता और उदारता के गुणों के बारे में सुनकर वह उनके पास आया था। रणजीत सिंह ने उसकी सहायता की, जिसके बदले में निर्वासित शाह ने कोहिनूर हीरा भेंट में दिया। इधर उनका एक राष्ट्र को संगठित करने का अभियान जारी रखा, धीरे-धीरे उन्होंने अटक, काँगड़ा, मुलतान, कश्मीर और पेशावर को भी अपने राज्य में मिला लिया।

इतने बड़े साम्राज्य के अधिष्ठाता और कुशल शासक होते हुए भी महाराजा रणजीत सिंह एकदम अनपढ़ हुए थे। फिर भी उन्होंने पढ़े-लिखे और उच्चशिक्षितों से अधिक काम किया और सफल हुए। इस सफलता का श्रेय उनके उच्चविचार, महान जीवन और उत्कृष्ट चरित्र को ही दिया जाना चाहिए। वे एक साथ वीर योद्धा, कुशल राजनीतिज्ञ और उदार धर्मप्राण सदैव आगे रहकर अपनी सेनाओं का पथ-प्रदर्शन तथा सम्वर्द्धन किया। पिता से सुनी हुई कहानियों द्वारा उन्होंने राजनीति के मर्म को बहुत गहराई से समझा था।

निष्ठावान् सिक्ख होने के कारण उन्होंने कभी भी सम्प्रदाय के दृष्टिकोण से किसी के साथ पक्षपात नहीं किया। साथ ही उनमें प्रतिभाओं को समझाने और पहचानने की भी अच्छी क्षमता थी। सिक्ख, हिन्दू, मुसलमान सभी सम्प्रदाय के व्यक्तियों को आगे बढ़ने का वे अवसर देते थे। उनके राजदरबार में मुसलमानों को भी वही स्थान प्राप्त था, जो इनके सहधर्मी हिन्दुओं को। लोकसेवा के लिए रात-रात जागने वाला यह महामानव 26 जून 1839 को सदा के लिए सो गया। इन्होंने आजीवन संघर्ष करते हुए राष्ट्रीयता और एकता की भावना को मूर्तिमान् किया, जो कि आज के स्वाधीन भारत के लिए एक अनुकरणीय आदर्श है।


भारतीय तत्त्वदर्शन के अध्येता महामनीषी अलबेरूनी

ग्यारहवीं सदी महमूद गजनबी ने जब मध्य एशिया से पूर्व की ओर बढ़ना आरम्भ किया, तो सभी छोटे-छोटे राष्ट्रों को अपनी सीमा में मिलाता चला गया। प्रतिरोध करने वाले कोई थे भी नहीं। जो प्रतिभाएँ छोटे राज्यों में थीं, उन्हें गजनबी ने खरीद लिया व अपने अधीन कर उनसे वह करवाया, जो वह चाहता था। इन छोटे-छोटे में खीवा भी एक राज्य था, जिस पर 1017 ईसवी में महमूद गजनबी ने आक्रमण कर उसे आपने अधीन लेने का प्रयास किया। अलबेरूनी नाम के मनीषी ने एक अपवाद के रूप में बगावत का बिगुल बजाया व राष्ट्र को स्वतंत्र बनाए रखने हेतु जन-जन को उद्वेलित करने का प्रयास किया। लोगों में बाह्य आक्रमण व शोषण के प्रति विरोध का ज्वर-सा फूट पड़ा। जैसे ही महमूद गजनबी को पता लगा कि अलबेरूनी ने लोगों आक्रमण का प्रतिरोध करने हेतु उकसाया है, उनके चारों ओर शिकंजा कसा जाने लगा। उनका वहाँ रहना दुश्वार हो गया व उन्हें लेगा कि वे पराधीन राष्ट्र में रहकर सम्भवतः वह कार्य न कर पाएँ, जो उनकी अभिरुचि का था। वह भारतीय तत्त्वदर्शन व अध्यात्म मर्म का गहन अध्ययन।

भारतीय संस्कृति के इस प्रथम मुस्लिम अध्येता, ज्योतिष, धर्म-दर्शन तत्त्वज्ञान एवं खगोल-विज्ञान के क्षेत्र में पाण्डित्य अर्जित करने वाले महामनीषी के जीवन का पूरा वृत्तान्त प्रामाणिक रूप से तो कहीं नहीं मिलता, फिर भी इतिहासकारों की शोधों पर आधारित वर्णन से ज्ञात होता है कि इनका पूरा पता अब- रैहा-मुहम्मद इन अहमद अलबेरूनी था। इनका जन्म 973 ईसवी में उज़्बेकिस्तान राष्ट्र के कैथ नामक एक गाँव में हुआ था। उनके पिता ईरान से आकर दख्वरिज्म नामक नगर के निकट इस गाँव में बस गए थे। शिक्षा और अध्ययन के प्रति उनका विशेष लगाव था। स्वयं उन्होंने तो ज्ञानार्जन में विशेष प्रतिभा का विकास किया ही था, उन्हीं विभूतियों को उत्तराधिकारी के रूप में अपने बेटे के लिए उपलब्ध कराने की ओर भी उन्होंने समुचित ध्यान दिया। अलबेरूनी जब छोटे थे तभी उन्हें सुप्रसिद्ध गणितज्ञ और ज्योतिष विज्ञान के आचार्य बादबुल सरहसनी तथा अवन्सर मंसूर के पास भेज दिया गया। अपनी जिज्ञासा के बल पर अलबेरूनी ने गणित और ज्योतिष में अपनी प्रतिभा को विशेष रूप से निखारा और विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं का अध्ययन भी किया। दर्शनशास्त्र के जिन ग्रन्थों की ओर वे विशेष रूप से आकृष्ट हुए, उनमें भारतीय दर्शन के अतिरिक्त ईरानी, यूनानी तथा इबनानी दर्शन धाराएँ भी थीं। इन क्षेत्रों में फैले धर्म-सम्प्रदायों के आधार, सिद्धान्तों से लेकर रीति-रिवाजों को परिमार्जित रूप में प्रस्तुत करने की ओर भी विशेष ध्यान दिया।

वे अभी साधना में रत ही थे कि सन् 954 ई. में एक पड़ोसी राज्य ने उनकी मातृभूमि पर आक्रमण कर दिया। ज्ञान और अध्यात्म दर्शन के मूर्तिमान् इस व्यक्तित्व के लिए पराधीनता ऐसी ही थी जैसे कि खुली हवा में उड़ने के लिए पक्षी के लिए बन्द पिंजड़ा। अपनी मातृभूमि को छोड़कर वे पड़ोसी देशों के प्रमुख नगरों में भ्रमणरत रह अध्ययन करने लगे। 997 ई. में एक चन्द्रग्रहण हुआ, जिसका अध्ययन अलबेरूनी ने उपलब्ध साधनों से किया। इसी चन्द्रग्रहण को बगदाद के आबुल वफा नामक ज्योतिषी ने भी देखा। बाद में संयोगवश एक समय जब दोनों विद्वानों की भेंट हुई,तो दोनों ने अपने निष्कर्षों से एक-दूसरे को अवगत कराया। अलबेरूनी ने एक विशेष बात पर ध्यान दिया कि दोनों स्थानों पर चन्द्रग्रहण दिखाई देने के समय में अन्तर था। इस आधार पर उन्होंने एक नया प्रयोग किया, जो इतिहास में अपने ढंग से एक प्रथम प्रयास था।

इस प्रयास के बाद उनमें ज्योतिर्विज्ञान के प्रति और गहन शोध की प्रेरणा उत्पन्न हुई और उन्होंने विभिन्न राज्यों में प्रचलित पंचांगों, संवतों, दिनों की तिथियों तथा कालगणना की पद्धतियों का भी अध्ययन किया। इस विषय पर अपने अध्ययन का निष्कर्ष उन्होंने आसार अलवाकिया (पुराने राज्यों का कालक्रम) नामक पुस्तक में किया। यह ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ के वर्षों में लिखी गई थी, जिसमें ईरानी, यूनानी और मध्य एशिया में प्रचलित अन्य सम्वत् तथा इतिहास की महत्वपूर्ण जानकारियाँ संकलित की गई थीं। पुस्तक की चर्चा जुर्जान के राजदरबार में भी पहुँची और वहाँ के शासक ने अलबेरूनी की प्रतिभा का लोहा माना।

कुछ समय बाद वे अपनी मातृभूमि के स्वतंत्र होने पर लौट आए। वहाँ के शासक ने उनको सम्मानित किया और राजदरबार में उच्चपद पर प्रतिष्ठित भी किया, लेकिन वे अपनी मातृभूमि के स्पर्श-सुख का आनन्द कुछ की वर्षों तक ले पाए। सन् 1017 में महमूद गजनबी ने जब खीवा दख्वरिज्म पर आक्रमण किया और खीवा परास्त हुआ तो निर्वासित होकर वे भारत आ गए। यहाँ की संस्कृति का परिचय उन्हें भारतीय ग्रन्थों की अरबी अनुवाद से प्राप्त हो चुका था। भारत के प्रख्यात ज्योतिर्विद् ब्रह्मगुप्त के कई ग्रन्थों का अनुवाद उन्होंने पढ़ डाला था और यहाँ के धार्मिक, पौराणिक, साँस्कृतिक साहित्य का अध्ययन भी अच्छी तरह कर लिया था। ये अनुवाद अलबेरूनी के लिए आकर्षण और रुझान के मुख्य केन्द्र बन गए थे। क्योंकि अब तक उन्होंने जिस देश-प्रदेश के साहित्य या विज्ञान का अध्ययन किया था, इन सबमें भारतीय साहित्य सर्वाधिक परिश्रम और शोध के बाद लिखा गया एवं प्रामाणिक प्रतीत हुआ था।

अनुवाद जब इतने प्रभावपूर्ण हों तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि मूल कृतियाँ और अधिक उत्कृष्ट तथा ज्ञानवर्धन लगें। मूल रचनाओं का अनुवाद करते समय अनुवाद में अपने दृष्टिकोण को भी जोड़ना पड़ता है और उसमें मूलकृति से काफी भिन्नता आ जाती है। इस रचनाओं की ओर आकृष्ट किया। संस्कृत ज्ञान के अभाव में यह कार्य दुष्कर एवं दुरूह था। अतः इसके लिए उन्होंने भारतीय आचार्यों को अपना गुरु बनाया। उस समय न तो भारत पराधीन था और न यहाँ की परम्पराएँ इतनी विकृत ही हुई थीं कि किसी व्यक्ति को, जो भारतीय तत्त्वदर्शन से लाभान्वित होने के लिए उत्कंठित हुआ हो, मना कर दिया जाए। उस समय शिष्यत्व की पात्रता जाति, वर्ण, और धर्म-सम्प्रदाय के आधार पर नहीं परखी जाती थी वरन् पात्रता की कसौटी थी जिज्ञासा, निष्ठा एवं लगन।

अलबेरूनी इस कसौटी पर शतप्रतिशत खरे उतरे थे। पात्रता अर्जित कर लेने पर उसकी पूर्ति प्रकृति स्वयं करा देती है। अलबेरूनी ने संस्कृत भाषा एवं साहित्य में अपनी दक्षता ही सिद्ध नहीं की, संस्कृत वांग्मय का अध्ययन कर उसके पण्डित भी बन गए। इसके बाद जिन भारतीय ग्रंथों से वे सर्वाधिक प्रभावित हुए उनमें भगवद्गीता सर्वप्रथम था। गीता के पैने विचारों और जीवन्त सिद्धान्तों ने उन्हें मुग्ध कर लिया। उन लोगों को गीता का परिचय उन्होंने अपनी भाषा में दिया, जो भारत से बाहर बसते थे, संस्कृत नहीं जानते थे और भारतीय धर्म को हेय दृष्टि से देखते थे। गीता का प्रभाव उनके विचारों ही नहीं, कार्यों पर भी परिलक्षित हुआ। उस सनातन दर्शन के विश्वकोश की चर्चा उन्होंने अपनी बीस पुस्तकों में अनेकों स्थानों पर दी तथा इसे मानवमात्र के लिए आत्मकल्याण का शाश्वत दैदीप्यमान प्रदीप प्रदीप प्रतिपादित किया। अरबी जनता जो अब तक भारतीय धर्म को कुफ्र की निगाह से देखती थी, अलबेरूनी के माध्यम से गीता का परिचय प्राप्त कर उसे आत्मसात् कर मुक्त कंठ से इसकी प्रशंसा करने लगी।

भारत में आकर सर्वप्रथम अलबेरूनी ने ज्योतिष ग्रंथों का अध्ययन कर उनका अनुवाद किया। उनकी मान्यता थी कि मुस्लिम देशों में रहने वाले भाई ज्योतिष की इसलिए उपेक्षा करते हैं कि उन्हें भारतीय ज्योतिष विज्ञान का परिचय अभी तक नहीं मिला है। उन्हें इस विषय की पुस्तकें पढ़ने का अवसर ही कभी प्राप्त नहीं हुआ। यदि वे भारतीय ज्योतिर्विदों की वैज्ञानिक गवेषणाओं से परिचित हो सके, तो बहुत सम्भव है कि अपने ज्ञान के भण्डार को और भी बढ़ा लें। इस दिशा में उन्होंने प्रयास भी किए और अपने समाज की कमियों को दूर करने के लिए बाराहमिहिर की बृहत् संहिता तथा लघुजातक का उन्होंने अरबी में अनुवाद किया। इसके बाद चिकित्सा-विज्ञान में भारतीय शोधों को अपना रुचि का क्षेत्र बनाया और उस समय उपलब्ध चरक संहिता का अरबी में अनुवाद किया।

तदुपरान्त उन्होंने समस्त भारतीय दर्शन का अरबी में अनुवाद किया। सांख्य और योगदर्शन का उन पर सर्वाधिक प्रभाव हुआ। इसके बाद वे गीता की ओर आकृष्ट हुए। तारीखल हिन्दू एक ऐतिहासिक कृति है-जिसमें सैकड़ों स्थानों पर गीता के श्लोक उद्धृत किए है। यह एक प्रकार से तत्कालीन भारत का इतिहास, दर्शन और संस्कृति विषयक विश्वकोष है, जो उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रंथ है। अस्सी अध्यायों में उन्होंने युगों की कल्पना ईश्वर सम्बन्धी, धारणा, आत्मा और कर्म का सिद्धान्त, पुनर्जन्म, स्वर्ग, नरक, मोक्ष, मूर्तिपूजा और विभिन्न प्रतिमाओं के पीछे रहस्यों का वर्णन किया है। इसमें वेद, पुराण, दर्शन ज्योतिष, भूगोल, सृष्टि की विभिन्न जातियों का विवेचन, आर्यों का भौगोलिक परिचय, यज्ञ, दान, विवाह, संस्कार आदि विषयों का समावेश एवं विवेचन किया है।

भारतीय विचारों से प्रभावित होने के बावजूद भी उन्होंने किसी विचार को केवल इसलिए नहीं मान लिया कि वह जनप्रिय और लोकप्रचलित है वरन् तर्कपूर्ण दृष्टि से खोज करने के बाद ही उन्होंने से अपनाया। ज्योतिष में वे ब्रह्मगुप्त से सर्वाधिक प्रभावित थे, फिर भी उन्होंने चन्द्रग्रहण के सम्बन्ध में ब्रह्मगुप्त की राहु से ग्रसने वाली परम्परागत धारणा की अमान्य कर दिया। जबकि इस समय तक आर्यभट्ट ने अपनी वैज्ञानिक खोजों के आधार पर यह सिद्ध कर दिया था कि चन्द्रग्रहण वस्तुतः चन्द्रमा पर पृथ्वी की छाया मात्र है। इस परम्परा-भक्ति के लिए अलबेरूनी ने ब्रह्मगुप्त को भी स्वीकार न कर आर्यभट्ट के सिद्धान्तों की ही पुष्टि की।

उन्होंने स्वयं भी कई वैज्ञानिक खोज की और तत्कालीन ग्रन्थकारों में सर्वोपरि स्थान भी प्राप्त किया। अलबेरूनी के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उन्होंने 146 पुस्तकें लिखी, परन्तु अधिकाँश पाण्डुलिपियाँ अब अनुपलब्ध हैं। भारतीय विद्वत्समाज में भी उनकी अच्छी-खासी प्रतिष्ठा थी और वे थे भी सर्वतोमुखी प्रतिभा से सम्पन्न एक विद्वान, वैज्ञानिक एवं विचारक। इन तीनों प्रवृत्तियों का उनमें ऐसा समन्वय था, जो बहुत कम ही दृष्टिगोचर होता है। साधन और सुविधाओं के अभाव में प्रतिकूलता को चीरकर वे आगे बढ़े तथा प्रगति की मंजिल पाई। बाधाएँ, कठिनाइयाँ एवं रोड़े तो हर व्यक्ति के जीवन में आते हैं, किन्तु प्रतिभाशाली, पुरुषार्थी उनमें घबराते नहीं। आज जब प्रतिभाएँ राष्ट्र को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का गुलाम बनाने को उतारू हैं, राष्ट्र एक और गुलामी की ओर बढ़ता दीखता है, तो एकमात्र मार्ग भारतीय तत्त्वदर्शन का आश्रय ले हर प्रतिभा के धनी को भोगवादी जीवन की सुविधा से परे हटकर सोचने को विवश करने का ही नजर आता है। अगले दिनों महाकाल यह करेगा भी।


दीपक का अस्तित्व (kahani)

दीपक जल रहा था, घृत चुकने को आया। लौ क्षीण हो चली। वायु के झोंकों ने देखा कि दीपक पर विजय पाना आसान है, तो वृन्द-वृन्द मिलकर तेज आक्रमण करने लगे। अंधकार नीचे दबा पड़ा था, अट्टहास कर हँसा और दीपक-बोला अब तो तुम्हारा अन्त आ गया। अब कुछ ही देर में यहाँ उजाला होगा।”

दीपक मुस्कराया और बोला-बन्धु यह देखना विधाता का काम है। मेरा ध्येय है-प्रकाश के लिए निरन्तर जलना, सो अब अन्त समय उससे विमुख क्यों होऊँ।” यह कहकर वह एक बार इतने वेग से जला कि वहाँ का सम्पूर्ण अन्धकार सिमटकर रह गया, भले ही दूसरे क्षण दीपक का अस्तित्व स्वयं भी शेष न रहा ।


संघर्ष, सतत् संघर्ष ही सफलता का मूलमंत्र

अमेरिका के एक बड़े शहर में कृषि वैज्ञानिकों का सम्मेलन चल रहा था। सम्पन्न, बुद्धिमान और प्रतिभाशाली विद्वान अपने शोधकार्यों और निष्कर्षों का विवेचन कर रहे थे। तभी एक विक्षिप्त से व्यक्ति ने सभाकक्ष में प्रवेश किया। गेट पर खड़े चपरासी ने उस व्यक्ति की दयनीय स्थिति को देखकर अन्दर जाने से रोका परन्तु उसके हाथ में परिचयपत्र को देखकर आमंत्रित सदस्य मान लिया एवं अन्दर जाने दिया था।

वह जॉर्जकॉर्बर थे। सभाकक्ष में प्रवेश करते ही सबके मन में उनके प्रति उपहासमिश्रित भाव परिलक्षित हुआ। यहीं नहीं सभी ने उन्हें उपेक्षित भी किया। जॉर्ज कार्बर के कन्धे पर बड़े-बड़े थैले टँगे हुए थे और शरीर पर वस्त्रों के नाम पर फटे-पुराने साधारण कपड़े, लैंस, मॉडल्स और वैज्ञानिक उपकरण थे, जिन्हें कार्बर ने हाल में अपने स्थान पर बैठने से पूर्व उतार दिया। अपना परिचय इन उपकरणों ने स्वयं दे दिया।

चूँकि कार्बर काँग्रेस द्वारा आमंत्रित थे, इसलिए उन्हें सम्मेलन में बोलना तो था ही उनके बोलने का अवसर आने पर सर्वप्रथम वे अपने उपकरण मेज़ पर सजाने लगे। यह भी एक विचित्र स्थिति थी। यूँ भी सभी उन्हें उपेक्षित तो कर ही रहे थे उस पर यह विचित्र हरकतें और। कार्बर इन सब बातों से तटस्थ हो अपने कार्य में जुटे रहे। कार्बर ने अपने उस उपहास पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की। वे अच्छी तरह सभी लोगों के भावों को समझ रहे थे। परन्तु उन्हें अपने प्रायोगिक निष्कर्षों पर अपार विश्वास था। वस्तुतः आत्मविश्वास एक ऐसी शक्ति है, जिसके बल पर किन्हीं भी परिस्थितियों में, कहीं भी अपना मूल्य और प्रभाव प्रतिष्ठापित किया जा सकता है।

उन्होंने जब अपने तथ्यों का विश्लेषण प्रस्तुत किया, तो उनके सूक्ष्म एवं तर्कसंगत विस्तृत भाषण को सुनकर सभी उपस्थित सदस्यों ने दाँतों तले अंगुली ली। जिस आदमी की बाहरी वेशभूषा को देखकर उन्होंने एक असभ्य व सनकी होने का अनुमान था वह एक ही परिच्छेद में चरमराकर टूट गया। कार्बर तीन घण्टे तक धारा प्रवाह बोलते रहे और उनके शोध-निष्कर्षों को काँग्रेस सदस्य मुँहबाए सुनते रहे। उन्हें लगने लगा उसके पूर्व जो भी बातें कही गई है, कार्बर द्वारा प्रतिपादित निष्कर्षों के आगे बहुत फीकी है। अब आभास हुआ कि विद्या-बुद्धि का निवास वस्त्रों में नहीं मस्तिष्क में होता है। विद्वत्ता का परिचय बाहरी चमक-दमक से नहीं, अपितु व्यक्ति के उस ओज और तेज से मिलता है, जो अन्दर से फूटता है। यह परिधान में नहीं, बल्कि व्यक्ति के आत्मविश्वास में झलकता है। सदस्यों को अपने पूर्वाग्रही मान्यता एवं अनुमान पर बड़ी लज्जा एवं ग्लानि महसूस हुई। वे अनुभव करने लगे कि कार्बर की खोजें किसी समयसाध्य अध्यवसायी के शोध-प्रयत्नों का परिणाम हैं।

इस महान अध्यवसायी आत्मा का जन्म अमेरिका के डायमण्ड ग्रोव नामक गाँव में रहने वाले नीग्रो परिवार में हुआ था। उस समय नीग्रो जाति के लोग गोरे अमेरिकनों के दास रहते थे। कार्बर भी अपने माता के साथ एक गोरे मालिक द्वारा साधारण से मूल्य पर खरीदे हुए एक गुलाम से ही बड़े हुए थे।

कुछ बड़ा होने पर कार्बर ने अपने मालिक के बच्चों को कहीं जाते हुए देखा। उसने अपनी माँ से पूछा, तो पता चला कि वे स्कूल जाया करते हैं। बालसुलभ स्वभाव से प्रेरित होकर कार्बर ने भी कहा-माँ मैं भी इन लोगों के साथ स्कूल जाया करूं"

“नहीं बेटे! तुम्हारे भाग्य में यह सब नहीं लिखा है।” माँ ने अपनी असह्य विवशता को समेटते हुए कहा।

“नहीं! जाकर उन लड़कों से पूछ। “ खीझकर उसकी माँ ने कहा। इधर कार्बर सचमुच अपने मालिक के बच्चों के पास पहुँचा और उनसे पूछने लगा कि “भाग्य क्या होता है?”

लड़कों यह बात समझ में नहीं आई, इसलिए उन्होंने पुरा विवरण पूछा। कार्बर ने अपनी माँ से हुई सारी बातें दी, उन लड़कों ने कहा-तो यह बात है। तुम भी हमारे साथ स्कूल चलना चाहते हो।”

हाँ मुझे भी पढ़ने की इच्छा होती है। क्या आप लोग मुझे अपने साथ स्कूल ले चलेंगे?”

मालिक के लड़कों ने उसे वर्णमाला लिखना सिखाया और घर में अभ्यास करने के लिए कहा। कार्बर इसे मंत्र मानकर लकड़ी, टीन और जमीन पर लगातार अभ्यास करने लगा। मालिक उसकी लगन एवं निष्ठा को देख मुस्करा देता। परन्तु माँ को यह सब अच्छा नहीं लगा, क्योंकि वह गोरे स्वामियों के क्रूर, निर्दयी एवं अत्याचारी स्वभाव से पूर्णरूपेण परिचित थी। इसके प्रत्युत्तर में कार्बर ने मालिक की सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार का जिक्र किया तो उसकी माँ को संतोष हुआ।

“अच्छा तो मालिक की खूब सेवा किया करो। “माँ ने सलाह दी और कार्बर रहने लगा। अपनी आज्ञाकारिता और लगन से वह सबका प्रशंसा-पात्र बन गया। प्रसन्न हुआ। अपने इस स्वभाव के कारण कार्बर ने मालिक का हृदय जीत लिया।

कार्बर के गोरे स्वामी ने उसकी आर्थिक दृष्टि से कोई सहायता तो नहीं की परन्तु इसे दासता के बन्धन से मुक्त कर दिया। कार्बर ने इस निर्णय को स्वामी का अनुग्रह ही समझा। वह स्वतंत्र हो गया। परन्तु इस स्वतंत्रता ने भी अगणित समस्याएँ खड़ी कर दीं। वह पढ़े तो कहा पढ़े? यद्यपि अमेरिका में उस समय स्कूलों की कोई कमी नहीं थी, परन्तु समस्या का कारण तो यह था कि कोई भी स्कूल नीग्रो लड़कों को अपने यहाँ प्रवेश नहीं देते थे। कार्बर ऐसे स्कूल की तलाश में लगा, जहाँ नीग्रो बच्चों को प्रवेश दिया जाता था। काफी खोज-बीन के बाद पता चला कि दूर-बहुत दूर न्योशों नामक एक नगर है, जहाँ नीग्रो बालकों की पाठशाला है। कार्बर ने अपने परिवार से विदा ली और अपने अभियान की ओर बढ़ चला।

पाठशाला की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी। एक छोटा-सा सीलन और बदबू भरा कमरा, जिसमें बच्चे कैदियों की तरह भरे हुए थे। कार्बर ने वस्तुस्थिति समझी और परिस्थिति के संग समझौता कर लिया। उसने असुविधाओं और कठिनाइयों के विचारों को त्याग दिया। जिसका जीवन ही इसका पर्याय है, भला वह कैसे इनसे घबड़ायेगा कार्बर ने विद्यालय में प्रवेश कर एकाग्रतापूर्वक अध्ययन में मन को लगाया। प्राप्त परिस्थितियों और कठिनाइयों में अपने लक्ष्य को देखकर ही आगे बढ़ने के लिए सचेष्ट तथा आसपास के वातावरण से निरपेक्ष रहने वाले मनस्वी वीर ही विजयश्री का वरण करते हैं। कार्बर ने भी यहीं किया।

कार्बर के सामने एक और समस्या आई। वह थी व्यय की। भोजन, वस्त्र और आवास के प्रबन्ध की। किसी से सहयोग मिलने की तनिक भी गुँजाइश नहीं थी। कार्बर को इसका स्वयं ही प्रबन्ध करने के लिए कटिबद्ध होना था, सो तलाश प्रारम्भ कर दी। सबसे पहली समस्या थी भोजन के लिए काम खोजना। हर जगह उसे निराशा ही हाथ लगी। फिर भी आशा के दीपक को जलाए रखा। वह न हताश हुआ, न निराश उसके सामने था एक बड़ा लक्ष्य और वह उस लक्ष्यप्राप्ति के प्रति कटिबद्ध था?

कार्बर ने कठोर श्रम की दृष्टि से कपड़े धोने का काम आरम्भ करने का निश्चय किया। लोगों के कपड़े ला वह उन्हें धोता एवं फिर प्रेस कर उनके घर जाकर उन्हें वापस कर आता। निर्वाह योग्य मजदूरी मिलने लगी जीवन का पहिया लुढ़कने लगा। इसी तरह श्रम और लगन से समय बीतता गया। कार्बर को शिक्षा यात्रा आगे बढ़ी-माध्यमिक से महाविद्यालय शिक्षा तक। संघर्षों की यह यात्रा बढ़ती रही दर्द व कठोर तप का इतिहास समेटे।

महाविद्यालयों में कक्षाओं में प्रवेश पाने के लिए आवेदन करते समय कार्बर के सामने और भी प्रबल समस्या खड़ी हुई। कोई भी कॉलेज किसी नीग्रो छात्र को अपने सेक्शन में प्रविष्ट नहीं होने देना चाहता था। जॉर्ज कार्बर की इच्छा थी। कि वे भूमि से जुड़े व्यक्ति हैं, अतः कृषि में डिग्री प्राप्त करें। उन्होंने हालैण्ड विश्वविद्यालय में प्रार्थनापत्र प्रस्तुत किया। अधिकारियों से अनुनय-विनय की, परन्तु उनका आवेदन ठुकरा दिया गया। यहीं नहीं उन्हें तिरस्कृत और अपमानित भी किया गया। जॉर्ज कार्बर अपनी नियति का दोष ही इसे मानकर सब कुछ शान्त भाव में झेलते चले गए। वे इण्डियाना पोलिस के सिम्पसन कॉलेज आए और प्राचार्य से भेंट की। प्राचार्य सहृदय व्यक्ति थे। उन्हें इस नीग्रो छात्र में प्रतिभा के बीजांकुर दिखाई दिए। उन्होंने कार्बर की प्रसुप्त प्रतिभा को परखा और पूछा-कार्बर तुम स्नातक की डिग्री तो ले लोगे परन्तु सम्मानित रूप में आजीविका का लाभ कैसे उठा पाओगे। संभवतः तुम्हें नौकरी न मिलें।

कार्बर ने कहा-मैं अपनी शिक्षा आजीविका के लिए नहीं लोकसेवा के लिए प्राप्त करना चाहता हूँ। मैं अपनी इस समस्त प्रतिभा को लोकहित में समर्पित कर देना चाहता हूँ।” प्राचार्य ने कार्बर की इस सर्वजनहिताय पद्धति को देखा व वे उसके साहस और अडिग आत्मविश्वास से बेहद प्रभावित हुए। कॉलेज की व्यवस्था कमेटी के सम्मुख अपनी सिफारिश के साथ कार्बर का आवेदन-पत्र उन्होंने रख दिया।

व्यवस्था समिति के सदस्य प्राचार्य की सिफारिश को ठुकरा तो नहीं पाए, परन्तु उन्होंने कठोर शर्तों का भार रख दिया। शर्तें अमानवीय एवं क्रूरता की दुनिया से पैदा हुआ हो, भला उसके लिए क्या मान और क्या अपमान। से परे है।” वो शर्तें थी-वे किसी भी छात्रवृत्ति के लिए प्रतियोगी नहीं होंगे न गोरे छात्र के समान अधिकार माँगेंगे। उन्हें छात्रावास में रहने का अधिकार नहीं होगा।”

आत्मनिर्भर एवं आत्मनिष्ठ कार्बर ने इन सब शर्तों को स्वीकारा और अपने उद्योग-कपड़े साफ करने के धन्धे को पूर्ववत् जारी रखते हुए अध्ययन में तन्मयतापूर्वक जुट गए। इस साधना ने उनके सभी मार्ग के अवरोधों को दूर कर दिया। गोरे छात्रों का दुर्व्यवहार और कॉलेज के प्रतिबन्ध उनकी प्रगति को रोकने में असमर्थ सिद्ध हुए तथा वे अंतिम परीक्षा में सर्वोच्च अंकों में प्रथम स्थान प्राप्त कर उत्तीर्ण हुए। उनका स्वप्न पूरा हुआ।

कार्बर की इस सफलता ने सबको हतप्रभ कर दिया। महाविद्यालय के अधिकारी भी अब उन्हें सम्मानपूर्वक दृष्टि से देखने लगे। उन्हें इसी संस्थान में प्राध्यापक नियुक्त कर लिया गया। कॉलेज में उन्होंने न केवल अध्यापन-कार्य ही किया, बल्कि कृषि और वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजें भी उन्होंने की। उन्हीं के अनुसंधानों ने अमेरिका के कृषि उद्योगों को समृद्धि के पथ पर अग्रसर किया।

अब वहाँ के अधिकारी इस बात को सर्वथा भूल गए थे कि कार्बर कभी एक नीग्रो और गुलाम व्यक्ति थे। सर्वत्र कार्बर के मनोयोग और पुरुषार्थ की सराहना की जाने लगी। उनके सेवापूर्ण उपकारों के उपलक्ष में इंग्लैण्ड की रॉयल सोसायटी ने उन्हें अपना फैलो बनाया और स्पिगन मैडल से सम्मानित किया। आज अमेरिका आज अपने देश के उस महान सपूत पर गर्व करता है। कार्बर ने अपनी मेहनत और लगन-निष्ठा के बल पर गोरों के मन से नीग्रो के प्रति हीन भावनाओं को उखाड़ फेंका।

कार्बर का जीवन संघर्ष और लक्ष्य के प्रति समर्पण का पर्याय है। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि गई-गुजरी स्थिति में रहते हुए भी व्यक्ति किस तरह अध्यवसाय और परिश्रम के बल पर अपने जीवन का सर्वोच्च विकास कर सकता है।


सच्चे सन्त (Kahani)

भगवान बुद्ध मगध राज्य के श्रीपाल नगर में प्रवचन कर रहे थे। आनन्द ने प्रश्न किया-भगवन्! आपके उपदेशों पर बहुत थोड़े लोग चलते हैं, फिर भी आप निराश नहीं होते। तथागत ने सरल भाव से कहा-वत्स सुधारक का कर्तव्य सन्मार्ग की प्रेरणा देना है, सफलता का मूल्याँकन करना नहीं, जिन्हें सफलता की कामना होती है, वे सच्चे सन्त नहीं होते।” आनन्द इस उत्तर से अति प्रसन्न हुआ।


पुनः प्रकाशित लेखमाला-1 - महामानवों के अवतरण की नई पृष्ठभूमि

विगत फरवरी, 18 एवं पुनः अप्रैल, 18 में प्रकाशित युगपरिवर्तन संबंधी चिन्तन के क्रम में यह लेख 18 वर्ष बाद पुनः प्रकाशित किया जा रहा है। पूज्यवर की लेखनी से प्रसूत इस लेखक के एक-एक शब्द में आज सही सिद्ध हो रही है भवितव्यता की झलक व युगसृजन के संदर्भ में स्पष्ट मार्गदर्शन मिलता है।

कुछेक घुने बीजों को छोड़कर प्रायः सबमें उगने की सामर्थ्य होती है। ऊसर जमीन भी होती तो हैं, पर आमतौर से हर जमीन में ऐसी क्षमता होती है कि उसे थोड़ा प्रयत्न करके उपजाऊ बनाया जा सके। बादलों का पानी टीलों पर रुकता नहीं और वे भारी वर्षा होने के उपरान्त भी जलरहित ही बने रहते हैं। इतने पर भी यदि उन्हें थोड़ा खोदा-कुरेदा जा सके तो पर्वत शिखरों पर भी तालाब बन सकते हैं। नदी, सरोवर के तट पर रहने वालों की उन दुर्गम स्थानों पर भी उपवन लग सकते हैं। किसान अपने घर से फसल नहीं लाता और न माली की जेब में फल सम्पदा भरी रहती है। प्राकृतिक साधनों का उपयोग भर वे लोग करते हैं और उसी बुद्धिमत्तापूर्ण नियोजन का लाभ उठाते हैं। बुद्धि हर किसी में मौजूद है। मूढ़ और विक्षिप्त थोड़े-से ही होते हैं। हर मस्तिष्क में प्रतिभा रहती है और उसे शिक्षण एवं वातावरण के सहारे विज्ञ एवं प्रबुद्ध बनाया जा सकता है। अध्यापक और विद्यालय इसी प्रयोजन की पूर्ति करते रहते हैं।

संचित संस्कारों वाली प्रतिभाएँ उन बहूमूल्य हीरों की तरह, जिनमें मौलिक विशिष्टता विद्यमान है। उन पर किया गया थोड़ा-सा तराशने, खरादने का प्रयत्न अधिक लाभ और श्रेय दे सकता है। फिर भी उन शिल्पियों का महत्व बना ही रहेगा, जो घटिया पत्थरों को भी इस प्रकार काटते घिसते हैं कि उन्हें हीरों का स्थानापन्न बनने का सौभाग्य मिल सके। सोने का अपना महत्व है, उसे लड़ी के रूप में भी उचित मूल्य पर बेचा जा सकता है। इतने पर भी स्वर्णकारों की कला को सराहा ही जाता रहेगा। वे आभूषण बनाकर सोने को आकर्षण का केन्द्र बना देते हैं। यहाँ तक कि घटिया धातु या मिलावट के सहारे ऐसा बना देते हैं कि उससे भी साज-सज्जा का काम चल सके। प्राचीनकाल में उपाध्यायों के हाथ में यही कला थी। वे मनुष्यों को गढ़ते थे, उन्हें सामान्य से असामान्य बनाते थे। संयोगवश कोई सुसंस्कारी आत्मा हाथ लग सके, तब तो उन शिल्पियों को, उनके कौशल को, ढलाई के कारखाने-गुरुकुलों को अनोखा ही श्रेय मिल जाता था। संदीपनि ऋषि के आश्रम में कृष्ण और विश्वामित्र आरण्यक में राम की ढलाई हुई थी। यही सब प्रयोक्ता धन्य माने जाते हैं।

युगपरिवर्तन की महत्ता आवश्यकता पूरी करने के लिए इन दिनों देवत्व से सम्पन्न आत्माओं को ढूँढ़ निकालना एक बड़ा काम है। साथ ही उन्हें उभारना, प्रशिक्षित-परिपक्व करना भी उतने ही महत्व की प्रक्रिया है। तेल के कुएँ ढूँढ़ निकालना एक बड़ी सफलता है, पर उस कीचड़ जैसे खनिज की सफाई करने वाला तन्त्र खड़ा न हो सका, तो उस ढूँढ़ने भर से भी अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध न होगा। कच्ची धातुओं की खदान खोजने वालों की प्रशंसा होती है, किन्तु उन्हें पकाने, ढालने का कारखाना न लग सके तो उस भारी मिट्टी से कोई प्रयोजन सिद्ध न होगा।

जन-समूह में भीड़-भाड़ का ही बाहुल्य रहता है। उनमें नर-पशुओं की संख्या ही प्रधान होती है। आम आदमी पेट और प्रजनन के लिए ही मरता-खपता है। लोभ-लिप्सा उसे उत्तेजित करके अधिक संग्रही, विलासी बनने की ललक पैदा करती है, फलतः उस आतुरता में अपराधी, अहंकारियों जैसी उच्छृंखलता ही गले बँधती है। इस विपन्नता के फलस्वरूप उद्वेग, तिरस्कार, विग्रह और संकट ही सामने आते हैं। लोग इसी कीचड़ में सड़ते और इसी भाड़ में भुनते रहते हैं। नरक में से जन्मते-नरक में पलते और अन्ततः नरक में ही चले जाते हैं। मनुष्य शरीर भर उन्हें मिलता है, उसका आनन्द, गौरव और प्रतिफल तो उनके सामने स्वप्न में भी नहीं आता है। जन-समूह की यही दुर्गति है। वे अपनी समस्याओं के समाधान में हर किसी के सामने पल्ला पसारते फिरते हैं। इन अभागों से देश-धर्म की, समाज-संस्कृति की, युगपरिवर्तन में सहकार देने की चर्चा करना और आशा रखना व्यर्थ है। वे चैन से जी लें और साथ वालों को शान्ति से दिन काट लेने दे, इतना भी उनसे बन पड़े तो बहुत है।

प्रसंग असामान्यों को ढूँढ़ने-उभारने का चल रहा था। उनका अस्तित्व रहता तो हर युग और क्षेत्र में है, पर खोजने और पकाने की प्रक्रिया शिथिल हो जाने से प्रतिभाएँ जहाँ-तहाँ छिपी और उपेक्षित पड़ी रहती हैं। अभी भी भूमि में इतना वैभव दबा पड़ा है, जिसे उपयोग में आने वाली सम्पदा की तुलना में असंख्य गुना कहा जा सके। सराहना खोज की है। उसी के बलबूते प्रस्तुत उपलब्धियाँ करतलगत हो सकीं हैं और भविष्य में जो कुछ मिलेगा उसमें खोजी और पकाने वाले ही श्रेयाधिकारी बनेंगे। युगपरिवर्तन की परिस्थितियाँ मौजूद हैं। लोकचेतना के अन्तराल में असाधारण विक्षोभ है। वह प्रस्तुत परिस्थितियों को बदलने के लिए घुटने से छुटकारा पाने के लिए आतुर है। स्रष्टा को भी परिवर्तन अभीष्ट है। विनाश को निरस्त और विकास को प्रतिष्ठित करने की प्रक्रिया को अध्यात्म की भाषा में प्रचण्ड परिवर्तन कहते हैं। अदृश्य में इसी की परिपूर्ण तैयारी है। भूमिका दृश्य को निभानी है। नसों में समर्थता और मस्तिष्क में प्रेरणा रहते हुए भी काम तो हाथ ही करते हैं। उठना उन्हीं को पड़ता है। चलते तो पैर ही हैं-आकांक्षा भले ही अन्तःकरण की हो। इन हाथों को ही इस सन्धिवेला में समर्थ और गतिशील बनाया जाना है। आलस्य, उन्हीं को छुड़ाना है। जाग्रत आत्माएँ ही युगसृजन का महान प्रयोजन पूरा कर सकेंगी। युगसृजन की भूमिका निभा सकने वाले शिल्पियों और साहसियों के कन्धों पर ही यह बोझ जाने वाला है। अपने को, अपने यश को, समय को, इतिहास को धन्य बनाने का श्रेय इसी स्तर के जागरूकों को मिलता है। महाकाल के शंखनाद ने इन्हीं योद्धाओं को आमंत्रित किया है। डमरू बजते ही शम्भुगण साथ चल पड़ते थे। कृष्ण की बंशी को सुनकर गोपियों के पग थिरकने से रुकते नहीं थे। युग-निमन्त्रण ने जिनके अन्तराल को आन्दोलित किया है, वे तथाकथित समस्याओं, कठिनाइयों, आकर्षणों और दबावों में से एक की भी परवाह किये बिना तरकस से निकलकर लक्ष्य पर टूट पड़ने वाले तीर की तरह गतिशील हो रहे हैं। नियति को सुव्यवस्थित करना ही इन दिनों का महत्वपूर्ण काम है। राशन, आयुध, सैनिक, मोर्चा सब कुछ सही होने पर भी युद्ध-संचालन का सुव्यवस्थित तन्त्र तो होना ही चाहिए।

असामान्यों की खोज और उनकी परिष्कृति के आधार तैयार है, अब उसे गतिशील ही करना शेष है। प्रशिक्षण के लिए शाँतिकुँज, ब्रह्मवर्चस, गायत्री नगर का तन्त्र आवश्यक साधन जुटाने और व्यवस्था बनाने के आरम्भिक चरण पूरे कर चुका है। विश्वविद्यालय स्तर की कितनी ही सन्न योजनाएँ चल पड़ी हैं। इन्हें संदीपनि आश्रम, विश्वामित्र आरण्यक की उपमा दी जा सकती है। बौद्ध और जैन काल के चैतन्य, विहार और संघारामों की कार्य पद्धति उसमें अपनाई गई है। समय कम और कार्य अधिक होने से प्रक्रिया को सरल एवं संक्षिप्त किया गया है, फिर भी प्रयोजन प्रायः वही पूरा होना है, जिसमें समर्थ महामानवों की नई पीढ़ी ढाली और कार्यक्षेत्र में उतारी जा सके। इस शिक्षण में भीड़ भरने से काम नहीं चलेगा। उच्चस्तरीय विद्यालयों में चुने हुए छात्र ही प्रवेश पाते हैं। प्रवेश के अवसर पर कड़ी जाँच पड़ताल होती है। छात्रवृत्ति देते समय तो अधिकारी वर्ग को छात्रों में से अधिक प्रतिभा-सम्पन्नों का चुनाव करना पड़ता है। ब्रह्मवर्चस स्तर के प्रशिक्षण के लिए पूर्व संचित संस्कारों की सम्पदा वाले ढूँढ़े जाते हैं। साथ ही छात्रवृत्ति जैसी शक्तिपात प्रक्रिया के अनुदान देने के लिए उपयुक्त पात्रता की जाँच-पड़ताल का और भी कड़ा उपक्रम चलता है।

इस संदर्भ में कई योजनाएँ तैयार की गई हैं और कई कदम उठाये गए हैं। प्रचार की दृष्टि से जन-जन को यह समझाया जाता है कि संकीर्ण स्वार्थपरता का समर्थन करने वाली प्रचलित लोक-मान्यता सर्वथा अदूरदर्शितापूर्ण है। लोभ और मोह तक चिन्तन और प्रयास को सीमित रखने वाले नफे में रहते हैं। यह सोचना अवास्तविक है। उस नीति को अपनाने वाले असन्तोष, असम्मान और दैवी-आक्रोश सहते और दुर्बुद्धिजन्य अनेकानेक दुर्व्यसनों, अनाचरणों में ग्रसित होकर पग-पग पर संकट सहते हैं। इसके विपरीत उदारचेता परमार्थ का आनन्द तो लेते ही हैं।, आत्मबल, उच्च चरित्र एवं जनसहयोग के सहारे सुख-साधनों से भी वंचित नहीं रहते। महामानवों के जीवन इतिहास का प्रत्येक पृष्ठ बताता है कि उन्हें स्वउपार्जित, समाजप्रदत्त और दैवी-अनुग्रह के रूप में इतनी अधिक उपलब्धियाँ प्राप्त हुई जितनी किसी संकीर्ण स्वार्थपरायण को कभी भी मिल नहीं सकीं। यह उनकी इच्छा का विषय था कि उन्होंने उन्हें खाया नहीं, दूसरों को खिला दिया। जो खाने और खिलाने के बदले मिलने वाले आनन्दों के स्तर को समझते है, उनके लिए इस वितरण में भी बुद्धिमत्ता ही बुद्धिमत्ता प्रतीत होती है।

आज हर व्यक्ति के सोचने का तरीका विचित्र है। संकीर्ण स्वार्थ-परायणता ही लोगों को रुचिकर लगती है और उसी को अपनाये रहने के लिए स्वजन-सम्बन्धी भी दबाव डालते हैं। क्षणिक लाभों के लिए महान उपलब्धियों को तिरस्कृत करना, यही है आज की दूरदर्शी लोकनीति। इसका विश्लेषण किया जा सके तो यह कहना होगा कि बीज को बेचकर सिनेमा देख लेने की तरह यह अबुद्धिमत्तापूर्ण है। इस आचरण से तत्काल तो लाभ मिला, पर खेत बिना बोया रह गया। परीक्षा में न बैठ सकने पर जो एक वर्ष मारा गया वह उस दिन के खेल-मनोरंजन की तुलना में अधिक घाटे का रहा। अदूरदर्शिता आज की सबसे बड़ी बीमारी है। इससे लोकसमाज को छुटकारा दिलाने के लिए महानता अपनाने पर मिलने वाली भौतिक और आत्मिक उपलब्धियों का सुविस्तृत इतिहास प्रस्तुत करना होगा। आदर्शवादी उदाहरणों के अभाव में आज उत्कृष्टता अपनाने की हिम्मत ही नहीं पड़ती। अनुकरण के लिए महामानवों की बिरादरी का आज तो दर्शन नहीं होता, किन्तु भूतकाल में उसी का बाहुल्य रहा है। साक्षी के लिए यह भी कम महत्वपूर्ण, कम प्रामाणिक एवं कम उत्साहवर्द्धक नहीं है। जन-जन को उस अतीत की झाँकी कराई जा सकती है, जिसमें मनुष्य ने देवत्व की नीति अपनाकर अपने को गौरवान्वित बनाया और दूसरों के लिए स्वर्गीय वातावरण उत्पन्न किया। सतयुग, देवत्व और दूरदर्शी उदारता एक ही तथ्य की त्रिविध प्रक्रिया है। आज का लोकनीति में लिप्सा ही सब कुछ है, तो उसकी परिणति भी सामने है। मछली, कबूतर और हिरन आये दिन जाल में फँसते और प्राण गँवाते हैं। अदूरदर्शी आतुरता ने ही मनुष्य के सामने भी उसी प्रकार के संकट खड़े किये हैं। उससे छुटकारा पाये बिना, ललक-लिप्सा को को शालीनता में बदले बिना न किसी को भौतिक प्रगति का लाभ मिलेगा और न आत्मिक शान्ति का दर्शन होगा। इस तथ्य से जन-जन को अवगत कराने के लिए प्रचण्ड प्रचार अभियान चलाया जाना है। लेखनी, वाणी और प्रचार की समूची प्रक्रिया को उसी केन्द्र पर नियोजित किया जाना चाहिए कि मनुष्य अपना प्रत्यक्ष लाभ आदर्शवादी दूरदर्शिता अपनाने में समझने लगे। इस प्रतिपादन के समर्थन में आज भी अगणित उदाहरण ढूँढ़े और सर्वसाधारण के सामने प्रस्तुत किये जा सकते हैं।

यह प्रचार अभियान जितना ही तेज होगा उतना ही सर्वसाधारण को यह समझने का अवसर मिलेगा कि सच्चे, चिरस्थायी और सर्वांगीण स्वार्थ की पूर्ति वस्तुतः आदर्शवादी रीति-नीति अपनाने से ही है। लाभ में हानि, हानि में लाभ समझने की तमिस्रा दूर करने के लिए ज्ञान यज्ञ की लाल-मशाल का आलोक क्रमशः तीव्रतर किया जा रहा है। आशा की जा सकती है कि निकट भविष्य में विचारशील व्यक्ति जीवन नीति निर्धारण करने में वातावरण के दबाव को अस्वीकार करके साहसपूर्वक स्वयं निर्णय कर सकने में समर्थ हों। इसी प्रकार सच्चे शुभ-चिन्तक भी अपने प्रियजनों को क्षुद्रता से उबरने प्रयासों में इस प्रकार अड़चन उत्पन्न न करेंगे, जैसे कि पिछले दिनों करते रहे हैं और इन दिनों करते हैं। गुरुकुलों के ऋषि-आश्रमों में अपने बालकों को भेजते समय अभिभावकों को संकोच नहीं होता था। आज तो विलासिता और अहंता उभारना ही बच्चों के प्रति अभिभावकों का अनुग्रह माना जाता है। यह परिवर्तन जैसे-जैसे आयेगा, कीचड़ में से कमल उगेंगे और महामानवों की, युगपुरुषों की आवश्यकता इसी समाज में पूरी होती चलेगी। सदाशयता को प्रोत्साहन देने वाली प्रचार-प्रक्रिया को इन दिनों असाधारण रूप से तीव्र करने की आवश्यकता है। युगसृजेताओं की आवश्यकता पूरी करने के लिए यह प्राथमिक और आवश्यक उपाय-उपचार है।

महामानवों की भूमिका निभाने की क्षमता जिनमें है, उनकी रुचि अपने अन्तःकरण के अनुरूप साधन सामने आते ही मचलने लगती है। इस कटौती पर किन्हीं का भी अन्तराल जाँचा जा सकता है। शराबी, जुआरी व्यभिचारी अपने अनुरूप परिस्थितियाँ देखते ही मचलने लगते और रोकथाम होते हुए भी संपर्क साधने और सहयोग साधने का ताना-बाना बुनने लगते हैं। बाजीगर का खेल होते ही मनचले बच्चे पढ़ाई छोड़कर दौड़ पड़ते हैं और तमाशे का मजा लेते हैं। सन्त, सज्जन भी सुसंस्कारितावश अपने अनुरूप अवसर सामने आने पर न केवल वहाँ किसी प्रकार जा ही पहुँचते हैं, वरन् रुचि लेने और देने का भी प्रयास बिना माँगे ही करने लगते हैं-अन्तः प्रेरणा उन्हें उसके लिए विवश जो करती है। पकड़ का यही सबसे सरल तरीका है। सीता की खोज में राम सघन वन में विचरते हैं और लक्ष्मण से कहते हैं-” इस क्षेत्र में सीता होंगी तो नदी तट पर संध्या करने अवश्य आयेंगी। चलकर उन्हें वहीं खोजना चाहिए।” इस प्रसंग से प्रकट होता है कि मूल प्रकृति मनुष्य को किस प्रकार विवश करती है और कठिन परिस्थितियों से भी वह उसकी पूर्ति का प्रयास करता है। युगसाहित्य के प्रति अभिरुचि, श्रेष्ठ वातावरण में प्रसन्नता, सत्प्रवृत्तियों में सहयोग, इन तीन प्रयोजनों के इर्द-गिर्द उच्च आत्माएँ इन दिनों जमा हुई पाई जा सकती हैं। वन्य-जीवों को सघन वन में देखना हो तो चुपचाप वहाँ जलाशय के निकट अठ जाना चाहिए। प्यास बुझाने के लिए आने पर उन्हें आँखें भरकर देखा जा सकता है। युगनिर्माण योजना के विविध प्रयास ऐसे हैं, जिनमें सामान्य स्तर के लोगों को न रुचि हो सकती है, न उत्साह। सहयोग की बात तो उनके बस से बाहर ही होती है। किन्तु जिनमें देवत्व के अंश अधिक परिमाण में विद्यमान हैं, वे अपनी मर्जी से नये शुभारम्भ न कर पाने पर भी जहाँ भी अपने अनुरूप वातावरण देखते हैं, उसमें सम्मिलित हुए बिना, योगदान दिये बिना रह ही नहीं सकते। युगनिर्माण, गायत्री परिवार मिशन में इसी प्रक्रिया से अधिक जाग्रत आत्माओं का एकत्रीकरण हुआ है। अब उनकी समर्थता और संख्या अधिक चाहिए, तो उन खोज-प्रयासों को अधिक उच्चस्तरीय, आकर्षक एवं परिणाम में सुविस्तृत किया जाएगा।

इन दिनों धर्मतन्त्र से लोकशिक्षण-गायत्री महापुरश्चरण, धर्मानुष्ठान, शक्तिपीठ संस्थापन, विचार-क्रान्ति अभियान, महिला जागरण जैसे अनेकों सृजनात्मक कार्यक्रम क्रियान्वित किये गये हैं। उनकी जानकारी तो सभी को मिल जाती है, पर उनमें सम्मिलित होने, सहयोग देने की प्रवृत्ति किन्हीं बिरलों के ही मन में उठती है। वातावरण से प्रभावित लोग उस दिशा में कुछ करना तो दूर गम्भीरतापूर्वक सोचने तक के लिए तत्पर नहीं हो पाते। इन परिस्थितियों में भी जिनमें आकर्षण उत्पन्न हो और सहयोग के लिए अन्तःकरण मचले तो समझना चाहिए कि देवत्व की चेतना यहाँ जीवन्त है।

चिंगारी विद्यमान है थोड़े ईंधन की व्यवस्था बन सके तो लपट उठने और ज्वाला जलने में देर न लगेगी। हम यह ध्यान रखें कि यह धर्मरुचि किन में कितनी मात्रा में प्रकट हो रही है। कौन कितनी श्रद्धा एवं तत्परता से इन प्रयोजनों में योगदान दे रहा है। इस प्रकार का उत्साह एवं साहस इस बात का प्रमाण है कि वहाँ दिव्य तत्वों की उपस्थिति विद्यमान है। ऐसे लोगों को युगसाहित्य नियमित रूप से पढ़ने के लिए मिलता रहे, उन्हें सत्संग, परामर्श एवं प्रोत्साहन का खाद-पानी मिलता रहे तो अंकुरों को पादप, पादपों को विशाल वृक्ष बन सकने की सम्भावना सहज ही साकार हो सकती है।

परिवार निर्माण अभियान को अग्रगामी बनाना है। पिछले दिनों यह प्रक्रिया महिला जाग्रति के नाम से चलती थी, अब उसका क्षेत्र अधिक व्यापक बनाया गया है और उसे परिवार-निर्माण की सुविस्तृत योजना के अंतर्गत विकसित किया गया है। पंचशीलों का परिचालन-धार्मिक वातावरण का प्रचलन, पर्व-संस्कारों के माध्यम से नवजागरण जैसी कार्यपद्धति इसमें सम्मिलित की गई है। इस प्रयास से घर-परिवारों का सूक्ष्म वातावरण ऐसा बनेगा, जिसमें देवत्व के अंशों को उभारने का अवसर मिल सके। वर्षाऋतु में सूखी घास हरी हो जाती है और उगाई गई वनस्पति तेजी से बढ़ती है। पतझड़ और ग्रीष्म में भले-चंगे पौधे भी मरते-झुलसते देखे गये हैं। घरों में यदि धार्मिक वातावरण रहे तो सुसंस्कारिता के बीजांकुर जहाँ भी विद्यमान होंगे वे स्वयमेव प्रकट एवं परिपुष्टि होते चलेंगे।

युगसन्धि में देवात्माएँ बड़ी संख्या में अवतार का साथ देने के लिए जन्म लेती हैं। पाण्डेय देवपुत्र थे। हनुमान अंगद भी देवता थे। इन आत्माओं को अवतरित होने के लिए उपयुक्त माध्यम चाहिए। सदाशयता सम्पन्न माता-पिता के रजबीज का आश्रय वे लेते हैं। दृष्ट-दुरात्माओं की उन्हें गन्ध ही नहीं भाती तो उनमें सम्बन्ध कैसे साधें? उनके शरीर में प्रवेश कैसे करें? स्वयंभू मनु और शतरूपा रानी ने तप करके अपनी काया ऐसी बनाई थी कि उसमें देवात्माओं को गर्भनिवास करते हुए कष्ट न हो। मदालसा, सीता, शकुन्तला जैसी महान महिलाएँ ही अपनी कोख से दिव्यात्माओं को जन्म दे सकने में समर्थ हुई। इन दिनों यह प्रयास नये ढंग से किये जा रहे हैं कि दाम्पत्य जीवन में उत्कृष्टता उत्पन्न की जाए। उच्चस्तरीय आत्माओं के जोड़े मिलें। आदर्श विवाह के रूप में उनका शुभारम्भ हो। आजकल दैत्य विवाहों का चलन है। आत्माओं की गरिमा कोई नापता नहीं, रूप के ऊपर सब पागल है। शादियों में दहेज एवं अपव्यय की धूम रहने से गरीबी और बेईमानी पनपती है। जमा-पूँजी की होली जलाकर परिवार का भविष्य अन्धकारमय बनाने की प्रक्रिया परोक्ष रूप से अभिशाप ही बरसाती रहती है। पीड़ितों के घाव चिरकाल तक नहीं भरते। फलतः विवाह का स्वरूप और प्रतिफल दानवी बनकर रह जाता है। पति-पत्नी के बीच भी इस निष्ठुरता से उत्पन्न हुई खाई किसी न किसी रूप में आजीवन बनी रहती है। इन दैव्य विवाहों को एक प्रकार से कन्या का, उस परिवार के धन का अपहरण ही कहना चाहिए। जहाँ भी यह प्रचलन होगा वहाँ सुसंतति की आशा नहीं ही की जानी चाहिए। देवविवाहों से ही देवात्माओं के सुसन्तति रूप में जन्म लेने की आशा बँधी है। इसलिए इन दिनों उस प्रचलन पर भी जोर दिया जा रहा है। इसके पीछे दिव्य आत्माओं के अवतरण की भूमिका बनाना ही रहस्यमय प्रयोजन है। धन की बचत और कुरीति-उन्मूलन तो उसका सामाजिक पथ है।

दिव्य आत्माएँ यदि किसी प्रकार किसी अनुपयुक्त वातावरण में जन्म ले भी लें, तो वहाँ घुटन अनुभव करती है और वापस लौट जाती हैं। कितने ही होनहार बालक ऐसी परिस्थितियों में बड़े होने से पहले ही अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेते है। बहुमूल्य पौधे और प्राणी जब-तक अपने लिए उपयुक्त जलवायु की माँग करते है, तो दिव्य आत्माओं को सुसंस्कृत परिवार में रहने और पलने की बात में कोई तो औचित्य है। परिवार निर्माण अभियान की प्रक्रिया से व्यक्ति और समाज के नव निर्माण का प्रत्यक्ष उद्देश्य तो सन्निहित है ही, उसके पीछे रहस्यमय प्रयोजन ऐसा वातावरण बनाना भी है, जिसमें दिव्य आत्माओं को जन्म लेने और ठहरने के लिए अनुकूलता मिल सके।

शाँतिकुँज गायत्री नगर में पाँच-पाँच दिन के परिवार सत्र लगते है। इनमें पर्यटन, तीर्थाटन की भाव तुष्टि भी जोड़ दी गई है। इन सत्रों में बालकों के नामकरण, अन्नप्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ यज्ञोपवीत आदि संस्कार कराने की व्यवस्था इसलिए रखी गई है कि यदि देवत्व की कहीं विद्यमानता हो तो उसे अभीष्ट परिपोषण मिल सके। साधकों को शक्तिपात-बड़ों को अनुदान, आशीर्वाद के माध्यम से कई बार महापुरुषों का अनुग्रह मिलता है। बालकों को वह लाभ समर्थ हाथों से उपरोक्त संस्कार कराने से भी उपलब्ध हो सकते है उनके उज्ज्वल भविष्य का आधार बन सकता है।

यह सभी आधार ऐसे ही है, जिनसे युग सृजन के लिए उपयुक्त आत्माओं को खोजा और विकसित किया जा सकता है। युगसृजन का काम बड़ा है, उसके लिए समर्थ व्यक्ति चाहिए। उनकी खोज हो रही है। साथ ही उपयुक्त प्रशिक्षण की, समर्थ अनुदान देने की पृष्ठभूमि भी बन रही है। युगनिर्माण योजना के विविध क्रिया–कलापों के प्रत्यक्ष प्रभावों और परिणामों की जानकारी तो सभी को है। इस परोक्ष प्रक्रिया से भी विज्ञपरिजनों को अवगत होना चाहिए। साथ ही उसे सफल बनाने में तत्पर भी।


तैमूरलंग की कीमत (Kahani)

दुनिया के कट्टर और खूँखार बादशाहों में तैमूरलंग का भी नाम आता है व्यक्तिगत महत्त्वाकाँक्षा, अहंकार और जवाहरात की तृष्णा से पीड़ित तैमूर ने एक बार विशाल भू-भाग को देखकर बगदाद में उसने एक लाख मरे हुए व्यक्तियों की खोपड़ियों का पहाड़ खड़ा कराया था। इसी बात से उसकी क्रूरता का पता चल जाता है।

एक समय की बात है। बहुत से गुलाम पकड़कर उसके सामने लाये गये। तुर्किस्तान का विख्यात कवि अहमदी भी दुर्भाग्य से पकड़ा गया। जब वह तैमूर के सामने उपस्थित हुआ, तो एक विद्रूप-सी हँसी हँसते हुए उसने दो गुलामों की ओर इशारा करते हुए पूछा-सुना है कि कवि बड़े पारखी होते है, बता सकते हो इनकी कीमत क्या होगी?”

“इनमें से कोई भी 4 हजार अशर्फियों से कम कीमत की नहीं है।” अहमदी ने सरल किन्तु स्पष्ट उत्तर दिया।तैमूर ने अभिमान से पूछा ”मेरी कीमत क्या होगी?”। निश्चिंत भाव से अहमदी ने उत्तर दिया ”यही कोई 24 अशर्फी।”।

तैमूर क्रोध से आगबबूला हो गया। चिल्लाकर बोला-बदमाश! इतने में तो मेरी सदरी भी नहीं बन सकती, तू यह कैसे कह सकता है कि मेरा मूल्य कुल 24 अशर्फी है।”

अहमदी ने बिना किसी आवेश या उत्तेजना के उत्तर दिया-बस वह कीमत उसी सदरी की है, आपकी तो कुछ नहीं। जो मनुष्य पीड़ितों की सेवा नहीं कर सकता, बड़ा होकर छोटों की रक्षा नहीं कर सकता, असहायों की, अनाथों की जो सेवा नहीं कर सकता, मनुष्य से बढ़कर जिसे अहमियत प्यारी हो उस इनसान का मूल्य चार कौड़ी भी नहीं, उससे अच्छे तो यह गुलाम ही है, जो किसी के काम तो आते हैं।”


पुनः प्रकाशित लेखमाला-2 - धर्म श्रद्धा का सृजनात्मक सुनियोजन हो

आत्म-क्षेत्र तक पहुँच मात्रा एक ही उपकरण की है और वह है, अध्यात्म। साधनों से सुविधाएँ बढ़ती है। बलिष्ठता से पराक्रम सम्भव होता है। बुद्धि से वैभव और वर्चस्व कमाया जाता है। इन तीन आधारों पर परिस्थिति बनती-बिगड़ती है। साँसारिक सफलताओं में प्रायः इन्हीं तीन क्षमताओं का उपयोग होता रहता है। धन, बल और बुद्धि का चमत्कार सर्वत्र बिखरा पड़ा है। इसका महत्व समझा जाता है और उपार्जन का प्रयत्न चलता है। इतने पर भी यह तथ्य अपने स्थान पर अडिग है कि आस्थाओं का क्षेत्र स्वतंत्र है और वह इन समस्त साधनों से प्रभावित नहीं होती। उच्च अन्तःकरण न धनिकों को मिलता है, न बलिष्ठों को और न बुद्धिमानों को। उनका आरोपण एवं अभिवर्द्धन जिसके माध्यम से हो सकता है, वह अध्यात्म दर्शन ही हो सकता है। आस्था संकट का निवारण-सद्भावनाओं का सम्वर्द्धन यदि सचमुच ही अभीष्ट हो तो उसके चिन्तन के लिए ब्रह्मविद्या का और व्यवहार में धारणा का आश्रय लेना होगा।

प्रदर्शन एवं प्रशिक्षण की दृष्टि से कितने ही महत्वपूर्ण आयोजन आये दिन होते रहते है। साहित्य सृजा जाता है और प्रवचनों का उपक्रम बनता है। लेखनी और वाणी की शक्ति को नकारा नहीं जा सकता, किन्तु यह भी सत्य है कि इनसे मात्र मस्तिष्क ही प्रशिक्षित होता है-बुद्धि-कौशल के अनेक प्रकार है, उन्हीं में से एक का नाम आदर्शवादिता भी हो सकता है। मस्तिष्क को आदर्शों की उपयोगिता स्वीकार करने के लिए तर्क और तथ्यों के सहारे सहमत किया जा सकता है। इतने पर भी यह आवश्यक नहीं कि उतने भर से आस्थाएँ भी प्रभावित-परिवर्तन हो सकें।

आस्थाओं की जड़ें शरीर और मस्तिष्क की निचली परतों में नहीं अन्तः-करण की गहराई में जमी होती है। वहाँ श्रद्धा के अतिरिक्त अन्य किसी का प्रवेश निशिद्ध है। श्रद्धा भरे उपचारों से ही भाव सम्वेदनाओं को जगाने एवं जीवन को प्रभावित करने वाली मान्यताओं को जमाने की संभावनाएँ सन्निहित रहती है। अस्तु, व्यक्ति के अन्तराल को बदलने के लिए धर्म श्रद्धा से भरे-पूरे उपाय-उपचारों का प्रयोग करना होता है। एक शब्द में इस तथ्य को यों भी कहा जा सकता है कि धर्मतन्त्र के माध्यम से वह लोकशिक्षण सम्भव है, जो आत्माओं के उत्कर्ष का चमत्कारी परिवर्तन प्रस्तुत कर सके।

यों यह बात धर्मक्षेत्र के सम्बन्ध में भी नहीं जा सकती है कि धर्मजीवी लोग भी कहाँ आस्थावान् होते हैं। छद्म भी एक आक्रामक तत्व है, वह भी अन्य दुष्टताओं की तरह अपने प्रथम चरण में ही कुछ समय के लिए सफलता जैसी चमक दिखाता है। वास्तविकता के अभाव में वह देर तक ठहर नहीं पाता और जादुई खिलवाड़ की तरह अविश्वस्त एवं उपहासास्पद बन जाता है। असत्य कितना ही विस्तृत क्यों न हो, सत्य की प्रतिष्ठा अपने स्थान पर अक्षुण्ण ही बनी रहेगी, भले ही उसका परिपालन करने वाले स्वल्प मात्रा में ही क्यों न हों। प्रज्ञावतार की गतिविधियाँ धर्मछद्म पर नहीं धर्मधारणा पर अवलम्बित होंगी। आर्ष स्तर की ऋषि प्रणीत धर्मचेतना का दर्शन और व्यवहार आज नये सिरे से खोजना और क्रियान्वित करना होगा, तो भी उसकी उपयोगिता पर किसी भी प्रकार का संदेह करने की गुँजाइश नहीं है। खिलौने के बन्दूकों से भी बाज़ार भरा पड़ा है, फिर भी लड़ाई के मैदान में बन्दूक का प्रयोग करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। धर्मछद्म की तमिस्रा के रहते हुए भी धर्म धारणा का अवलम्बन लिए बिना प्रज्ञावतार का प्रयोजन, आस्थाओं का अभिवर्द्धन सम्भव नहीं हो सकता।

अध्यात्म चिन्तन है और धर्म व्यवहार। दोनों को मिलाने पर ही समग्र धर्मतन्त्र बनता है। यही है वह प्रक्रिया, जो लोकमानस के अन्तराल तक पहुँचने, उसे बदलने और उत्कृष्टता के चरम लक्ष्य तक पहुँचाने में समर्थ हो सकती है। आस्थावान् और धार्मिक एक ही होते है। प्रचलित धर्म-परम्परा में भारी परिवर्तन करने की आवश्यकता है। वर्तमान प्रचलनों में से अनेकों के प्रति आक्रोश उत्पन्न करने की आवश्यकता है। इतने पर भी धर्म-तत्व की आत्मा को अपनाए बिना देवमानवों की नई पीढ़ी उत्पन्न कर सकना अन्य किसी उपाय से सम्भव नहीं हो सकता। आस्थाओं का उन्नयन बिना धर्म-धारण का आश्रय लिए सम्भव हो ही नहीं सकता।

जन-जन तक धर्मधारणा का आलोक पहुँचाना प्रज्ञावतार के क्रिया–कलापों का प्रमुख अंग है। इसके लिए प्रथम चरण गायत्री शक्ति की स्थापना एवं प्रव्रज्या अभियान की परिपक्वता के रूप में महाकाल ने कदम उठाया। इन दोनों को मिलाकर शरीर और प्राण मिलने से जीवन तत्व जैसी एक इकाई बनती है। प्रव्रज्या से लोकचेतना उत्पन्न होगी जन- संपर्क उसी के द्वारा सधेगा। घर-घर पहुँचने और जन-जन को नवयुग का सन्देश सुनाने वाले सृजन के अग्रदूत आलोक वितरण का अपना प्रयास जारी रखेंगे। किन्तु उनकी गतिविधियाँ हवा में उड़ने वाले पत्तों की तरह अनिश्चित तो नहीं हो सकतीं। वे निराश्रित तो नहीं रह सकते। प्राचीनकाल में मन्दिर, मठ, धर्मशाला, आश्रम जैसे संस्थानों का निर्माण एक ही उद्देश्य से होता था कि देवालयों में निवास-निर्वाह जैसे सुविधाओं का तथा संपर्क-केन्द्र के माध्यम से बनने वाली सुव्यवस्था का लाभ मिलता रहे। आज धर्म संस्थानों की संख्या तो बहुत है पर उस उद्देश्य की पूर्ति कही होती दिखाई नहीं पड़ती, जिसके लिए ऋषियों ने देवालयों की स्थापना का आन्दोलन प्रारम्भ किया और उसे सफल बनाया था। आत्मा शरीर में आश्रय पाता है और उसे सुनियोजित कार्य में संलग्न भी करता है। प्रव्रज्या को गायत्री शक्तिपीठों के आश्रय मिले और सुयोग-संयोग से धर्म-धारणा को जन-जन के मन में अपना आलोक पहुँचाने का अवसर मिलने लगा।

कर्मकाण्डों, उपासनात्मक विधि-विधानों कथा-प्रसंगों धर्मानुष्ठानों के ब्रह्मस्वरूप का सीधा महत्व समझने-समझाने में कठिनाई होती है, किन्तु जब उनमें सन्निहित प्रेरणाओं का भावभरे वातावरण में हृदयंगम होने और चमत्कारी सत्परिणाम उत्पन्न करने की प्रतिक्रिया सामने आती है, तब पता चलता है कि यह निरर्थक जैसी लगने वाली प्रक्रिया, कितनी मर्मस्पर्शी और कितनी प्रभावोत्पादक है।

दैनिक उपासना द्वारा दिव्यसत्ता के साथ घनिष्ठता और आदान-प्रदान का उपक्रम-योगाभ्यास और तप-साधना द्वारा अतिमानवी क्षमताओं का उन्नयन, षोडश संस्कारों के साथ सम्पन्न होने वाली ज्ञान गोष्ठियों द्वारा पारिवारिक वातावरण में शालीनता का सम्वर्द्धन, पर्व-त्यौहारों में सन्निहित-सामाजिक सत्प्रवृत्तियों का परिपोषण जैसे अनेकानेक उच्चस्तरीय उद्देश्य धार्मिक क्रियाकृत्यों के सहारे भावभरे वातावरण में सरलतापूर्वक सम्पन्न होते रह सकते हैं। कथा-पुराणों में रोचक-संस्मरणों के सहारे संस्कृति की महान परम्पराओं को बाल-वृद्ध नर-नारी जिस प्रकार सुनते, समझते और अपनाते हैं, उसे देखते हुए प्रतीत होता है-प्रत्यक्ष निर्देशन की अपेक्षा यह देव इतिहासों का कथन-श्रवण अन्तरंग की गहराई तक अधिक अच्छी तरह प्रविष्ट हो सकता है। आदर्शवादी अनुकरण महापुरुषों के द्वारा अपनाई गई देव-परम्पराओं के दृश्य मनःक्षेत्र में विचरते रहने पर भी एक बड़ा काम हो सकता है।अनुकरण का उत्साह उठ सकता है। जन-जागरण को घर-घर पहुँचाना और जन-जन से संपर्क साधना आवश्यक है। प्रभावशाली श्रेष्ठ सज्जन इस पुनीतकार्य में श्रद्धापूर्वक जुट पड़े तो यह वातावरण उत्पन्न करना तीर्थयात्रा की पुण्य परम्परा में उत्साह भरने से सम्पन्न हो सकता है। यह सारे कार्य ऐसे हैं जो शासकीय अथवा दूसरे मंचों से किए जाने वाले समाज-कल्याण जैसे कार्यों द्वारा किये जाने वाले रचनात्मक प्रयासों की तुलना में कहीं अधिक गहरा एवं चिरस्थायी सत्परिणाम उत्पन्न करेंगे।

भारत धर्मप्रधान देश है। इसमें अशिक्षा, गरीबी एवं अन्धविश्वास का बाहुल्य होते हुए भी धर्म श्रद्धा की परम्परागत मात्रा अधिकाँश लोगों में विद्यमान है। इसे सही मार्ग न मिलने से उमड़ती हुई धर्मभावना का निरर्थक एवं अनर्थमूलक कार्यों में अपव्यय होता है। इस बर्बादी को बचाया और रचनात्मक प्रयोजनों में लगाया जाना आवश्यक है। भारत में 80 लाख के करीब भिक्षा-व्यवसायी साधु-संत हैं। यदि 7 लाख गाँवों के इस देश में इन्हें श्रमदान, समाज-सुधार प्रौढ़-शिक्षा जैसे कार्यों में लगाया जा सके तो इतना काम कर सकते हैं जिससे देश का काया-कल्प ही हो सके। 80 लाख पूरा समय धर्मप्रयोजनों के लिए लगाने वाले और करोड़ों आधा-अधूरा समय इन्हीं कृत्यों में लगाने वालों की जन-शक्ति का मूल्याँकन किया जाए, तो उसका वजन लगभग उतना ही हो जाता है जितना कि सरकारी एवं अर्द्धसरकारी संस्थाओं में काम करने वाले कर्मचारियों का। इतनी बड़ी जन-शक्ति को अव्यवस्था फैलाने से विरत करके रचनात्मक कार्यों में नियोजित करने का उद्देश्य उनसे-उनके पोषणकर्ता से सम्बन्ध मिलाकर ही पूरा हो सकता है। धर्मतंत्र की समर्थता सर्वविदित है। भूतकाल में उसने मानव-समाज को सुसंस्कृत एवं समुन्नत बनाने में भारी सफलता पाई है।

अब फिर उसकी पुनरावृत्ति हो सकती है। धर्म का तत्त्वदर्शन और उसके द्वारा आकर्षित उत्पादित होने वाले भौतिक बल यदि मानवी-उत्कर्ष का भाव-परिष्कार पक्ष सँभाल सके, तो उसे इस धरती पर बसा हुआ देवलोक का अजस्र वरदान ही माना जाएगा।

धर्मपरायण अर्थात् चरित्रनिष्ठ, व्यक्तित्व सम्पन्न आदर्शवादी, प्रतिभाशाली परमार्थपरायण। यही पर्राशा प्राचीनकाल में समझी जाती थी। धर्मतंत्र के प्रति अगाध निष्ठा अन्धविश्वास की तरह नहीं वरन् उसकी उपयोगिता एवं प्रतिक्रिया को देखकर ही उत्पन्न होती है। इस ढाँचे का लड़खड़ा जाना, मनुष्य का एक अत्यन्त कष्टकारक दुर्राँय है। स्थिति को बदला जाना आवश्यक है। धर्मक्षेत्र पर छाई हुई प्रतिगामिता की प्रगतिशीलता में अन्धपरम्परा को विवेकयुक्त सत् श्रद्धा के रूप में परिवर्तित किया जाना है, तभी वह युगपरिवर्तन की भूमिका निभा सकेगी।


अन्तर भावना का है (Kahani)

एक दिन तानसेन के एक गाने से प्रसन्न होकर बादशाह अकबर ने पूछा-इतना सुन्दर गीत तुमने किससे सीखा? तानसेन ने जवाब दिया-अपने गुरु हरिदास जी से। अकबर ने कहा- चलो उनके पास चलो। इसके बाद अकबर तानसेन को लेकर अपनी सारी मंडली के साथ हरिदास जी के घर गया। हरिदास जी ईश्वर-भक्ति में मस्त रहते थे। वे ईश्वर-भजन के सिवाय और कोई गाना नहीं गाते थे। बादशाह ने हरिदास जी से गाना सुनाने की प्रार्थना की। बादशाह की विनती से उन्होंने एक सुन्दर भजन गाया। बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ और उनका यथोचित सत्कार करके लौट आया। एक रोज कचहरी में अकबर ने तानसेन से उस दिन वाला भजन गाने को कहा। तानसेन ने गाया जरूर, पर बादशाह को उस दिन जैसा आनन्द नहीं मिला।

अकबर ने उनसे पूछा-उस दिन जैसा आनन्द आज क्यों नहीं मिला? तानसेन ने जवाब दिया कि मैं आपको प्रसन्न करने के लिए गाता हूँ, किन्तु हमारे गुरुजी ने आपको प्रसन्न करने के लिए नहीं गाया था, बल्कि बादशाहों के बादशाह को प्रसन्न करने के लिए गाया था। अन्तर भावना का है अन्यथा, शास्त्रीय ढंग तो वही है।

लक्ष्य के अनुरूप प्राण उदय होता है तथा उसी स्तर का प्रयास क्रिया में पैदा होता है।


पुनः प्रकाशित लेखमाला-3 - सुरक्षा साधना का समर्थ ब्रोस्त्र

अपने युग की व्यापक और नानक समस्याओं के आधारित कारण दो हैं। एक चेतना क्षेत्र में बढ़ती हुई असुरता और दूसरा भौतिक क्षेत्र में बढ़ती हुई विषाक्तता।

पहला है आत्मिक क्षेत्र में बुद्धि- विपर्यय एवं आस्था-संकट भ्रष्ट-चिन्तन ने दुष्ट आचरण को बढ़ाया है और अवांछनीयता को उच्छृंखलता के स्तर तक पहुँचाने का अवसर मिला है। फलतः अनीति अपनाने में एक-दूसरे से आगे बढ़ना चाहता है। दुष्प्रवृत्तियाँ क्रमशः परम्परा बनती और मनुष्य स्वभाव में सम्मिलित होती जा रही हैं। फलतः अनीति की क्रिया-प्रतिक्रिया में भयंकर विक्षोभ हो रहे हैं। उत्पीड़न और विग्रह के फलस्वरूप अनेकानेक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। साथ ही ऐसा वातावरण भी बन रहा है, जिसके फलस्वरूप दैवी विपदाओं का टूटना और विनाश के अविज्ञात कारण बनना स्वाभाविक है, यह है चेतना क्षेत्र में बढ़ती हुई असुरता और उसकी प्रतिक्रिया।

दूसरा, भौतिक क्षेत्र में विषाक्तता बढ़ने के कुछ तथ्य सर्वविदित हैं। वायुमण्डल में जिस तेजी से विघातक विष बढ़ता चला जा रहा है, इसकी जानकारी जनसाधारण को भले ही न हो, विश्व की परिस्थितियों पर बारीकी की दृष्टि रखने वाले बुरी तरह चिन्तित हैं। बढ़ते हुए औद्योगिक संस्थान, कल-कारखानों से विषैला धुँआ प्रचुर परिणाम में निकलता है। रेल-मोटर आदि सवारियाँ इस कोढ़ में खाज बनकर उस विषाक्तता को बढ़ने में और भी अधिक योगदान देती हैं। अब तक जो परमाणु विस्फोट हो चुके हैं, उनका विकिरण इतनी बड़ी मात्रा में मौजूद है, जिनका मन्द प्रभाव अगली पीढ़ियों के लिए जीवन संकट उत्पन्न करेगा। नित नये विस्फोटों का सिलसिला रुक नहीं रहा है और अणुयुद्ध की नंगी तलवार आये दिन मानवी अस्तित्व के सिर पर चमकती रहती है।

तीसरा नया सिलसिला अभी-अभी शुरू हुआ है। बारह मंजिला इमारत जितनी विशालकाय और 85 टन भारी एक अन्तरिक्षीय प्रयोगशाला स्काईलैब का मलबा जमीन पर गिरने का संकट लोक चिन्ता का विषय बना हुआ है। मलबा गिरने का स्थानीय संकट उतना बड़ा नहीं है, जितना की उसके कारण उत्पन्न हुआ प्रकृतिगत असन्तुलन। उल्कापातों का प्रभाव सारे वातावरण पर पड़ता है और दूरगामी दुष्परिणाम उत्पन्न करता है। उसे प्राचीन और अर्वाचीन खगोलवेत्ता समान रूप से स्वीकार करते हैं। गिरने से तात्कालिक हानि कितनी हुई, यह छोटा प्रश्न है। चिन्ता का विशय यह है कि पृथ्वी के वायुमण्डल में छेद और विक्षोभ उत्पन्न करने वाले ऐसे अन्तरिक्षीय प्रहार कैसी प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार के उपद्रव पृथ्वी और सूर्य के मध्यवर्ती ओजोन जैसे उपयोगी आच्छादनों को अस्त-व्यस्त कर सकते हैं और धरती की जीवनोपयोगी परिस्थिति में भयानक उलट-पुलट कर सकते हैं। संकट टला नहीं, आरम्भ हुआ है। स्काईलैब इस नई श्रृंखला का अन्त नहीं वरन् श्रीगणेश है। ऐसी ही छोटी-बड़ी प्रयोगशालाएँ प्रायः एक हजार की संख्या में पृथ्वी की परिक्रमा कर रही हैं। समयानुसार उनका बूढ़ा होना और मरना स्वाभाविक है। वे प्रत अन्ततः धरती पर ही गिरेंगे और आये दिन स्काईलैब पतन की तरह चिन्ता का विशय बनेंगे। मृतक यान प्रेतों को धरती पर उतार-उतारकर लाने वाली अन्तरिक्षीय रेलगाड़ी कल्पना का विशय तो है, पर जब तक नौ मन तेल जुटने पर राधा का नाच होगा, तब तक इन प्रेतों का ताण्डव नृत्य विनाश की दिशा में इतना ताण्डव कर सकता है कि उसके सन्दर्भ में पश्चात्ताप करना ही शेष रह जाए।

गुत्थियाँ सूक्ष्मजगत की है। चेतना क्षेत्र और प्रकृति क्षेत्र दोनों की ही अपनी अदृश्य परिधि है। उसका प्रभाव प्रत्यक्ष जगत पर पड़ता है। इन अदृश्य क्षेत्रों से विपदा बरसने लगे तो उसका उपचार भौतिक उपायों एवं साधनों से बन नहीं पड़ेगा। अदृश्य जगत का सूक्ष्म क्षेत्रों का परिशोधन-समाधान अदृश्य स्तर की आत्मिक ऊर्जा के सहारे ही बन पड़ना सम्भव है।

इसी प्रक्रिया में अदृश्य प्रयत्नों की एक दूसरी कड़ी जुड़ती है। वह सूक्ष्म जगत के परिशोधन और अनुकूलन से सम्बन्धित है। पिछले दिनों रजत जयन्ती वर्ष में गायत्री महापुरश्चरण अभियान चला था। उसमें जप और हवन के धर्मानुष्ठान का व्यापक विस्तार हुआ। प्रायः 24 लाख व्यक्तियों ने उसमें भाग लिया। यों इनका रचनात्मक एवं भावनात्मक आधार भी था, किन्तु मूलतः उसे चेतना जगत के वातावरण और प्रकृति जगत के वायुमण्डल के परिशोधन की सूक्ष्म प्रक्रिया भी समझा जा सकता है। यज्ञ से वायुमण्डल की और जप-ध्यान से वातावरण की शुद्धि होती है। इन अदृश्य आधारों को गणित की तरह कागज-कलम से सिद्ध करना और घटनाक्रम की तरह प्रत्यक्ष दिखाना तो कठिन है, पर जो प्रतिक्रियाओं को देखकर तथ्यों का अनुमान लगाने पर विश्वास करते हैं, उन्हें यह जानने और मानने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि इन अदृश्य उपायों का अदृश्य जगत के अनुकूलन पर कितना उपयोगी प्रभाव हो सकता है, होता रहा है और हो रहा है।

उन प्रयासों को अगले दिनों भी जारी रखा जाना है। गायत्री महापुरश्चरण अभियान एक वर्ष तक सीमित न रखकर वह सन 2000 तक घोषित किया जा चुका है। यह श्रृंखला आगामी गायत्री जयन्ती से जून 2000 तक यथावत् चलेगी। इस अवधि में नये स्थानों पर गायत्री महापुरश्चरणों के लिए आधार खड़े करने पर विशिष्ट जोर दिया जाएगा। यों जहाँ पुरश्चरण हो चुके हैं, वहाँ भी फिर से उसे करने पर कोई रोक नहीं है, पर क्षेत्र विस्तार और नये व्यक्तियों तक आलोक पहुँचाने की दृष्टि से नई जगहों में जप-हवन से सम्बन्धित पुरश्चरण योजना को अग्रगामी बनाया जाना अधिक उपयुक्त है।

इस संवर्द्धन में वातावरण परिशोधन का नया प्रयास, नये आधार पर, नई तैयारी के साथ आरम्भ हुआ है। वह है-सुरक्षा प्रयोजन के लिए आरम्भ की गई पौन घण्टे की ध्यान-धारणा। साधना क्षेत्र के वरिष्ठ लोगों का ध्यान इस स्तर का पुरुषार्थ करने के लिए प्रथम बार आह्वान किया गया है। आत्मबल के बलिष्ठों को सामूहिक शक्ति का अर्जन करने और उसे विश्व संकट के निमित्त झोंके देने का यह प्रयोग और उसके परिणाम दोनों ही दृष्टि से अनोखे रहेंगे। सर्वनाशी विभीषिकाओं आशंकाओं के पर्वत अभी भी जहाँ के तहाँ खड़े हैं। अषुरा संभावनाएँ भविष्यवक्ताओं के द्वारा ही नहीं, प्रत्यक्ष का विवेचन करने वाले लोगों के प्रतिपादनों द्वारा भी स्पष्ट हैं। इनके निराकरण का आंतरिक उपाय आत्मशक्ति के दिव्य आयुधों का प्रयोग ही हो सकता है। अणु शक्ति जैसी विषाक्तताओं और विभीषिकाओं से लोहा लेने की सामर्थ्य मात्र उसी में है।

जिनकी साधनाएँ पिछले समय से निष्ठापूर्वक चलती रही हैं, जो कई अनुष्ठान कर चुके और दूसरों को प्रेरणा देने में जिनकी प्रतिभा कारगर सिद्ध होती रही है, उन्हें सुरक्षा-साधना में अग्रणी होना चाहिए। साथ ही दूसरों को भी बना सकते हैं, सहयोग दूसरों से भी ले सकते हैं। किन्तु अग्रणी वरिष्ठों को ही रहना चाहिए। सूर्योदय से पूर्व सस्वर गायत्री पाठ तत्पश्चात आधा घण्टा ध्यान। सर्दियों में यह समय एक घण्टे पहले खिसकाया जा सकता है। इस साधना का समय अरुणोदय काल है ध्यान प्रक्रिया इतनी ही है कि गायत्री परिवार के लाखों सदस्य अपनी प्रचण्ड ऊर्जा एक साथ एकबारगी एक लक्ष्य की पूर्ति के लिए उत्पन्न कर रहे हैं। वह संकल्प शक्ति पर उठती है और अन्तरिक्ष की ऊँची परतों पर छतरी की तरह छा जाती है। इससे वातावरण एवं वायुमण्डल में भरे हुए दुरित धरातल पर गिरने से पूर्व ही रुक जाते हैं। संयुक्त आत्मशक्ति का छाता उन्हें दूर पर ही रोक देता है। इतना ही नहीं इस छत्र-उपकरण का प्रहार करके अदृश्य जगत पर छाई हुई विभीषिका को किसी अविज्ञात क्षेत्र में धकेल कर भावी विपदाओं से बहुत हद तक परित्राण पाया जाता है।

न्यूनतम पाँच-पाँच वरिष्ठ साधकों के सुरक्षा यूनिट हर जगत बनने चाहिए। उनके साधनाक्रम नियमित रूप से चल पड़ने चाहिए। ऐसे यूनिट अपनी मण्डली को शाँतिकुँज से पंजीकृत करा लें, ताकि उन्हें इस प्रयोग में काम आने वाली अभीष्ट सामर्थ्य अनुदान के रूप में नियमित रूप से मिलती रहे।

आशा की जानी चाहिए कि प्रज्ञावतार का यह ब्रोस्त्र युग- विभीषिकाओं को निरस्त करने और उज्ज्वल भविष्य का अरानव सृजन करने की दुहरी भूमिका सम्पन्न करेगा।


भगवान का प्रेम (Kahani)

गुरुकुल में प्रवेशोत्सव समाप्त हो चुका था, कक्षाएँ नियमित रूप से चलने लगी थीं। योग और अध्यात्म पर कुलपति स्कन्धदेव के प्रवचन सुनकर विद्यार्थी बड़ा संतोष और उल्लास अनुभव करते थे।

एक दिन प्रश्नोंद्वारकाल में शिष्य कौस्तुभ ने प्रश्न किया-गुरुदेव! क्या ईश्वर को इसी जीवन में प्राप्त किया जा सकता है?

स्कन्धदेव एक क्षण चुप रहे। कुछ विचार किया और बोले-इस प्रश्न का उत्तर तुम्हें कल मिलेगा और हाँ आज सायंकाल तुम सब लोग निद्रा देवी की गोद में जाने से पूर्व 108 बार वासुदेव मंत्र का जप करना और प्रातःकाल उसकी सूचना मुझे देना।

प्रातःकाल के प्रवचन का समय आया। सभी विद्यार्थी अनुशासनबद्ध होकर आ बैठे। कुलपति ने अपना प्रवचन प्रारम्भ करने से पूर्व पूछा-तुममें से किस-किस ने कल सायंकाल सोने से पूर्व कितने-कितने मंत्रों का उच्चारण किया? सब विद्यार्थियों ने अपने-अपने हाथ उठा दिए। किसी ने भी भूल नहीं की थी। सबने 108-108 मंत्रों का जप और भगवान का ध्यान कर लिया था।

किन्तु ऐसा जान पड़ा-स्कन्धदेव का हृदय क्षुब्ध है, वे संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। कौस्तुभ नहीं था उसे बुलाया गया। स्कन्धदेव ने अस्त-व्यस्त कौस्तुभ के आते ही प्रश्न किया-कौस्तुभ! क्या तुमने भी 108 मंत्रों का उच्चारण सोने से पूर्व किया था?

कौस्तुभ ने नेत्र झुका लिए। विनीत वाणी और सौम्य मुद्रा में उसने बताया-गुरुदेव! अपराध क्षमा करें, मैंने बहुत प्रयत्न किया किन्तु जब जप की संख्या गिनने में चित्र चला जाता तो भगवान का ध्यान नहीं रहता था और जब भगवान का ध्यान करता तो गिनती भूल जाता। रात ऐसे ही गई और वह व्रत पूर्ण न कर सका।

स्कन्धदेव मुस्कराए और बोले- बालकों! कल के प्रश्न का यही उत्तर है। जब संसार के सुख, सम्पदा भोग की गिनती में लग जाते हैं, तो भगवान का प्रेम भूल जाता है। उसे तो कोई भी पा सकता है, वो कर्मकाण्ड से चित्त हटाकर उसे कोई भी प्राप्त कर सकता है।


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी- - धर्मग्रंथ हमें क्या शिक्षण देते हैं, यह जानें


धर्म के लिए माँग (Kahani)

जब वे शासन सत्ता सँभाल रहे थे, तब वे जज भी थे, उनको विचार करना चाहिए था, सीता की बात सुननी चाहिए थी कि वह क्या कह रही है। वह यह कह रही थी कि हम निर्दोष हैं। उसकी बातों को न सुनना उनकी गलती थी तथा जो डिसीजन लिया, वह भी गलत था। आपको इस प्रकार के कथानकों को काट देना चाहिए, जिसमें कहा गया है कि गलती धोबी की थी और सजा सीताजी को मिली। हम रामचन्द्रजी के अनुयायी हैं परन्तु हम अंधे अनुयायी नहीं हैं। उनकी गलत बातों का हम समर्थन नहीं करेंगे। हमारा मिशन बहुत दिनों से व्रत कथा सुनाता रहा है। हम केवल सत्य बातों को मानेंगे, उसे सुनायेंगे। आप मजहब की हर बातें न मानें, जो सत्य हैं उसे मानें, क्योंकि भगवान उसे कहते हैं जो सत्य है। अतः आप सत्य को, विवेक को, इनसाफ को नारायण मानिए तथा उसी कार्य के लिए गतिशील रहिए तो आपको लाभ होगा।

अब हम आपसे यह कहते हैं कि आप रामायण के माध्यम से परिवार, समाज तथा देश को नयी प्रेरणा तथा प्रकाश दीजिए। उसके नये पन्ने पलट कर सबको बतलाइये। भगवान राम के बहुत से पन्ने बड़े ही महत्वपूर्ण हैं तथा बहुत-से पन्ने ऐसे हैं जिस पर बहस करना हमें मंजूर नहीं है। भगवान की वह बात हमें नामंजूर हैं, जो अनुपयोगी है। हमारा उस अंश से ज्यादा सम्बन्ध हैं, जो उपयोगी हो सकता है, दिशा दे सकता है। एक बात और आती है कि रामचन्द्र जी ने दशरथ जी को पिण्डदान देने के लिए माँस का पिण्ड बनाया। यह बात भी हम नहीं मानते है। रामचन्द्र जी ने रावण मारा था, श्रीकृष्ण जी ने गोवर्द्धन उठाया था, इस इस प्रकार की बातें तो हम मानने के लिए तैयार है, पर भगवान की अंतर्गल बातों को हम नहीं मानेंगे। अतः आप यह समझ लीजिए कि आप इस तरह की बातें अपने व्याख्यानों में कभी नहीं करेंगे। हम वास्तव में किसी देवी, देवता या किताब के गुलाम नहीं हैं। हम तो सत्य के पुजारी हैं। हम अकल सत्य और इनसाफ के गुलाम हैं। आप गलत बातों का समर्थन मत करें। श्रीकृष्ण भगवान ने सोलह सौ रानियाँ की थीं, तो हम तीन कर लें तो क्या गलत है? बेकार की बातें मत करें, अपने विचारों को ठीक रखें।

द्वितीय महायुद्ध में ब्रिटेन के एक यहूदी ने ब्रिटेन को अपने अथक परिश्रम और लगनपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धियों से युद्ध - विजय में महत्वपूर्ण सहयोग दिया। वैज्ञानिक की विशेष सैनिक सेवाओं के लिए अधिकारियों ने पुरस्कार देने की इच्छा प्रकट की।

एक उच्च ब्रिटिश शासनाध्यक्ष ने प्रश्न किया-आपने ब्रिटेन की महान सेवा की है, इस उपलक्ष्य में ब्रिटेन आपका सम्मान करना चाहता है। बताइए, आपकी महान सेवाओं के बदले हम आपको क्या दे सकते हैं?”“

करोड़-दो करोड़ की सम्पत्ति, कोई जागीर या पद- प्रतिष्ठा प्राप्त की जा सकती थी। एक बार मन में भावी जीवन का रस-विलासपूर्ण आकर्षण सामने आ प्रस्तुत हुआ, किन्तु दूसरे ही क्षण अन्तःकरण ने कहा-क्षुद्र अतिक्षुद्र स्वार्थ या लौकिक वासना के पीछे अपने धर्म, संस्कृति और जातीय हित को न भूल, कुछ माँगना है, तो धर्म के लिए माँग। चिरंतन धर्म की रक्षा में यदि कुछ योगदान बन सके, तो यह न केवल तेरे, अपितु सारी यहूदी जाति के गौरव का एक भव्य इतिहास बनेगा।”“

और तब उस वैज्ञानिक ने कहा-मान्यवर! यदि आप हमें कुछ दे सकते हैं, तो यहूदियों की मातृ-भूमि वासना कर दें, ताकि हम अपने धार्मिक आदर्शों की रक्षा कर सकें।”“ अंग्रेजी बड़े कृतज्ञ थे। उन्होंने फिलिस्तीन का कुछ भाग दे दिया, जहाँ यहूदी पुनः संगठित हुए। थोड़े-से यहूदियों ने अपने निजी स्वार्थों को त्यागकर अपनी जाति के लिए सर्वस्व त्याग के इस उदाहरण को आदर्श बनाया। सब यहूदी रेगिस्तानी इलाके को हरा-भरा बनाने में जुट गये और सबके सामूहिक श्रम का ही फल है कि आज इज़राइल न केवल आन्तरिक दृष्टि से ही सम्पन्न है वरन् छोटा होने पर भी विश्व-रंगमंच पर एक विशिष्ट महत्व रखता है।

*समाप्त*