हम प्रगतिशील बनें

प्रगतिशीलता का अर्थ है-एक नवचेतना, एक जागरूक विवेक, जिसके आधार पर कोई हित-अहित ठीक तरह से देख-समझ सके। जो राष्ट्र गुण-दोष हानि-लाभ के दृष्टिकोण से किसी बात का निर्णय करके अपने लिए मार्ग निर्धारित करते हैं, वे राष्ट्र प्रगतिशील ही कहे जाएँगे। जो अपनी अहितकर कुरीतियों, प्रथाओं एवं परम्पराओं को छोड़ने के लिए और उनके स्थान पर नई, उपयोगी एवं समयानुसार प्रथा-परम्पराएँ प्रचलित करने के लिए खुशी-खुशी तैयार रहते हैं, वे समाज जाग्रत चेतना के पुँज कहे जाएँगे।

इसके विपरीत जो समाज अथवा राष्ट्र अपने संस्कारों और पिछड़ेपन को कसकर पकड़े हुए किसी गलत रास्ते पर इसलिए चलते जाते हैं कि उस पर वे बहुत समय से चले आ रहे हैं, प्रगतिशील समाज नहीं कहे जाते। अहितकर प्रथा-परम्पराओं को गले लगाए रहना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि अमुक समाज पिछड़ा हुआ समाज है।

बहुत कुछ प्राचीन होने पर भी प्रगतिशीलता की दृष्टि से हमारे भारतीय राष्ट्र की गणना अभी नवोदित राष्ट्रों में ही है। उसने अभी केवल राजनैतिक स्वतंत्रता ही उपलब्ध की है। उन्नति एवं विकास के नाम पर अभी उसे कुछ खास उपलब्धियाँ नहीं प्राप्त हो सकी हैं। यह बात ठीक है कि देश की उन्नति के प्रयत्न चल रहे हैं, किन्तु उन सब प्रयत्नों की पृष्ठभूमि केवल आर्थिक ही है। मात्र आर्थिक उन्नति से ही कोई राष्ट्र समुन्नत राष्ट्र नहीं बन सकता। किसी राष्ट्र की वास्तविक उन्नति तो उसकी सामाजिक उन्नति में ही निहित रहती है।

इस कटु सत्य को स्वीकार करने पर किसे आपत्ति हो सकती है कि हमारा समाज प्रगतिशीलता के नाम पर बिल्कुल निकम्मा बना हुआ है। इसका अस्तित्व अभी भी जातीय द्वेष, साम्प्रदायिक बैर के पंक में डुबा है। अब तक उसमें स्वतंत्र चिंतन और नवचेतना नहीं आ सकी है किन्तु यदि अपने भारतीय राष्ट्र को शक्तिशाली बनना है, अपनी स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना है, तो उसे अपनी उन आंतरिक दुर्बलताओं को दूर करना ही होगा, जो उसकी वास्तविक प्रगति के पथ में अवरोध बनी हुई है।

सारा संसार जानता है कि भारतीय समाज के पास न तो बुद्धि की कमी है, न विद्या की और न वीरता की व बलिदान की। यदि उसमें कोई कमी है तो केवल उस प्रगतिशीलता की, जिसकी आज के युग में बहुत आवश्यकता है। आज जब अपने समाज, अपने राष्ट्र को अग्रगामी बनाने के लिए संसार के सारे लोग प्रयत्नशील हो रहे हैं, तब क्या कारण है हम भारतीय ही अपने पिछड़ेपन से पीछा छुड़ाकर प्रगतिशीलता के पथ पर आगे न बढ़े?


ऐसे मिलते हैं सत्पात्र

बरसात के दिन थे। आकाश की नीलिमा घने बादलों से ढकी हुई थी। ऋषिवर धौम्य आनन्दविभोर होकर अपने आश्रम में शिष्यों को विद्यादान कर रहे थे। प्राचीन भारत में विद्वान नगर के बाहर आश्रम बनाकर निवास करते थे। वहीं रहकर वे कठोर तप साधनाएँ करते और अपने शिष्यों को विद्याध्ययन कराते थे। शिष्य भी सदा उन्हीं के आश्रम में निवास करते थे। और पढ़ने-लिखने के साथ-साथ भक्तिभाव से गुरुजनों की सेवा-शुश्रूषा करते थे। आश्रम की खेती बाड़ी का काम भी संभालते थे। ऋषिवर अयोद धौम्य ऐसे ही गुरु थे। उनके आश्रम में निवास करने वाले शिष्यों की संख्या सैकड़ों तक जा पहुँची थी।

महर्षि की तपस्या एवं अपूर्व विद्वता की ख्याति समूचे आर्यावर्त में परिव्याप्त हो चुकी थी। श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ होने के सभी मानक उनमें प्रत्यक्ष थे। समस्त विद्याएँ एवं ऋषियों सिद्धियाँ उनमें प्रतिष्ठित थी। समूचे देश के जिज्ञासु उनका सान्निध्य पाने को लालायित रहते थे। आने वाले प्रत्येक बाल युवा मन की एक ही कामना थी कि महर्षि उसे अपने तप एवं ज्ञान का उत्तराधिकारी समझे। वह उनके अनुग्रह एवं आशीष से कृतकृत्य हो सकें। ऋषिवर की खोज भी कुछ ऐसी ही थी। वह भी योग्य सत्पात्र की खोज में संलग्न थे, जिसके वे शिक्षक ही नहीं सद्गुरु बन सकें। अपने पास ज्ञान की कामना लेकर आने वाले प्रत्येक की आँखों में झाँककर वे पात्रता की खोज किया करते। आज भी वे विद्यादान करते हुए कुछ ऐसा ही ढूँढ़ रहे थे।

तभी सहसा बादल घने हो गये। आकाश में बिजली चमकने लगी। बादलों की तीव्र गड़गड़ाहट के साथ ही बूँदा-बाँदी प्रारंभ हुई और फिर मूसलाधार पानी बरसने लगा। बात की बात में जहाँ देखो वहाँ पानी ही पानी फैल गया। महर्षि चिंतित होकर बोले “ऐसा पानी तो कभी नहीं बरसा। यदि खेत का बाँध पक्का न किया गया तो उसकी सारा फसल बह जाएगी”।

“ मेरी कुटी रिसती है जाकर देखूँ उसमें पानी न भर जाए।” एक शिष्य बोला और वहाँ से चला गया।

“मेरी कुटी का पिछला भाग टूट गया है। अब उसकी क्या दशा होगी। चलकर देख भाल करूँ। “ दूसरा शिष्य बोला और अपनी कुटी की ओर चल दिया।

“मेरी वल्कल वसन तो बाहर ही पड़े हैं, कहीं वह न जाएँ। तीसरा शिष्य बोला और वह भी जल्दी -जल्दी वहाँ से निकल गया।

उसी तरह एक न एक बहाना बनाकर लगभग सभी शिष्य खिसक गये। लेकिन आरुणी शांत न रह सका। वह उठकर खड़ा हुआ और बोला-मुझे आज्ञा दीजिए भगवन् मैं जाता हूँ और बाँध मजबूत किए देता हूँ।”

महर्षि धौम्य ने कहा-ठीक है बेटा! तुम्हीं जाओ, परन्तु इतना याद रखना कि बाँध कच्चा न रहने पाये परिश्रम भले ही अधिक करना पड़ेगा “गुरु के शब्द सुनते ही आरुणी दौड़ते-दौड़ते खेत पर पहुँचा, तो देखा की बाँध एक ओर से टूट गया है और उसके रास्ते खेत का पानी सर्राटे से बाहर जा रहा है। बस, आरुणी एक क्षण के लिए भी नहीं रुका, बाँध को मिट्टी से भरने की चेष्टा करने लगा और इसके साथ ही मानो उसके तथा वर्षा के बीच युद्ध छिड़ गया। पानी का वेग निरंतर बढ़ता जा रहा था, साथ ही आरुणी के प्रयत्न भी उसी गति से तीव्र होते जा रहे थे। जब तक वह मिट्टी का एक ढेर रखता और दूसरा बनाने लगता, इतने में पहले वाला ढेर बह जाता।

अब आरुणी क्या करे? कैसे गुरु की आज्ञा का पालन करे? कैसे खेत का पानी रुके? क्या वह वर्षा से हार मान ले, परंतु आरुणी हार मानने वाला नहीं,जीत पर मरने वाला शिष्य था। जब उसे कुछ न सूझा, तब उसने वर्षा पर विजय पाने के लिए एक बिल्कुल नया अनोखा उपाय खोज निकाला। वह स्वयं टूटे हुए स्थान पर जा लेटा। अभिप्राय यह की मिट्टी के बाँध के स्थान पर हाड़ -माँस का बाँध बना डाला और हाड़ -माँस के इस बाँध के सामने वर्षा को हार माननी पड़ी-खेत के बहते हुए पानी को रुकना पड़ा।

जब दूसरे दिन महर्षि शिष्यों को पढ़ाने बैठे, तब उनमें आरुणी को न देख चिंतित स्वर में बोले -”आज आरुणी दिखाई नहीं देता। कहाँ गया वह?”

“कल संध्या समय खेत की ओर जाता दिखाई दिया था।” एक शिष्य बोला।

महर्षि खेत की ओर चल दिये और पहुँच कर बड़े ही विकल स्वरों में उन्होंने पुकारा -आरुणी! आरुणी!! बेटा आरुणी!!!

जब कहीं से कोई उत्तर न मिला, तब ऋषिवर धौम्य व्याकुल होकर खेत के चक्कर काटने लगे। अन्त में वे ठीक स्थान पर जा पहुँचे, तो देखा कि बेसुध आरुणी ने टूटे हुए बाँध को घेर रखा है। उसके शीत से जकड़े हुए शरीर पर गीली मिट्टी की तहें जम गयी है और वह धीमे-धीमे साँस ले रहा है।

असली बात समझने में उन्हें विलम्ब न लगा। उनकी आँखों से भाव बिंदु टपकने लगे। वे उसे तुरंत आश्रम उठा लाये। थोड़ी देर बाद आरुणी होश में आ गया। महर्षि धौम्य की प्रसन्नता शब्दों में छलक पड़ी। “बेटा! तुम्हारी गुरु भक्ति पर हमें अभिमान है। बहुत दिनों से चल रही मेरी खोज आज तुम्हें पाकर पूरी हुई। मैं आशीर्वाद देता हूँ कि समस्त विद्याओं के साथ तुम अध्यात्म विधा के अधिकारी बनोगे।” आरुणी भी अपने गुरुवर को आज सतगुरु के रूप में पाकर कृतकृत्य हो गए।


चक्रों के ज्ञान-विज्ञान पर अब जा रहा है सबका ध्यान

साधना-विज्ञान में चक्रों के रूप में जिन सूक्ष्म-संस्थानों का उल्लेख हुआ है, उनके बारे में मर्मज्ञों का कथन है कि ये वास्तव में दिव्य शक्तिकेन्द्र है। उन केन्द्रों को साधना उपचारों के माध्यम से जब उत्तेजित किया जाता है, तो जाग्रत होने पर वे साधकों को ऐसी ऊर्जा ओर अनुभूति से ओत−प्रोत करते है, जिसे साधारण कहना चाहिए। इस क्षेत्र में दीर्घकालीन अनुसंधान के उपरांत अब विज्ञान भी उन्हें ऐसे संस्थान के रूप में स्वीकारने लगा है, जहाँ से उत्सर्जित शक्ति को म नहीं नहीं, पदार्थ स्तर पर भी जाँचा-परखा जा सके।

शरीरवेत्ताओं का कहना है कि स्थूल दृष्टि से चक्रों पर विचार करें और शरीर में उनकी ढूँढ़ खोज करे, तब तो शायद निराश होना पड़े, कारण कि साधना विज्ञान में उनका जो स्वरूप बतलाया गया है, वह स्थूल न होकर सूक्ष्म है। इतने पर भी शरीरशास्त्र ने कुछ ऐसे नाड़ीगुच्छक ढूँढ़ निकाले हैं, जिनकी चक्रों के गोचरस्वरूप के रूप में चर्चा की जाती है, पर चह उनकी स्थूल अभिव्यक्तियाँ ही हैं यह कहना कठिन है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि चक्रों की अवधारणा कोई कल्पना- जल्पना न होकर एक सच्चाई है।

इण्टरनेशनल एसोसिएशन फॉर रिलीजन एण्ड पैरासाइकोलॉजी’ के अध्यक्ष एवं जापान के मूर्धन्य परामनोविज्ञानी डॉ. हिरोषी मोटोयामा ने विगत पन्द्रह वर्षों में इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किये है। शोधों के दौरान उनने यह जानने का प्रयास किया कि चक्रों की वास्तविक सत्ता है या नहीं? यदि है तो स्वसंचालित तंत्रिका तंत्र एवं भीतरी अंगों से उनका क्या संबंध है? इसके लिए ऐसे साधकों का चयन किया गया, जो लम्बे समय से योगाभ्यास में निरत थे एवं साधना के दौरान जिन्हें चक्रों की अनुभूतियाँ हुई थी। उक्त अध्ययन में पाया गया कि जाग्रत चक्रविशेष से संबद्ध कायिक प्रणालियों की गतिविधियों में भी स्पष्ट अंतर होता है यह भी उपर्युक्त मान्यता की ही पुष्टि करता है कि चक्रों का अस्तित्व है।

अपने शोधपूर्ण निबंध 'ए इकोफिजियोलॉजिकल स्टडी ऑफ योग’ में डॉ. मोटोयामा लिखते है कि चक्र वस्तुतः चेतन के भिन्न -भिन्न चक्रों में प्रतिष्ठित साधक अलग-अलग प्रकार की चेतनात्मक अनुभूतियाँ करते हैं। आज्ञाचक्र में अवस्थान करने वालों का अनुभव अनाहत में आरूढ़ साधक से भिन्न होगा। इसी प्रकार अन्य चक्रों के संबंध में भी है। वे कहते है कि ये संस्थान भिन्न-भिन्न चेतना आयामों के प्रतिनिधि केन्द्र तो हैं, पर इसका यह मतलब नहीं कि इनका प्रभाव सिर्फ सूक्ष्म स्तर तक ही सीमित है। स्थूल स्तर पर भी ये मनोशारीरिक गतिविधियों को प्रभावित करते हैं ऐसा अध्ययनों से विदित हुआ है।

योगविद्या के निष्णातों का कथन है कि मानवी चिंतन, चेतना से प्रभावित है। व्यक्ति का चेतनात्मक स्तर जितना उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट होगा, उसके चिंतन और क्रिया−कलाप भी तद्नुरूप ही भले बुरे होंगे। शरीरशास्त्री इसकी व्याख्या शरीर संरचना और उनकी गतिविधियों के आधार कर करते है अर्थात् अंतःस्रावी रसों में न्यूनाधिकता, गुणसूत्रों या बीजकोशों में पायी जाने वाली असामान्यताएँ वे आधार है, जो व्यक्ति के गुण, कर्म, स्वभाव को प्रभावित करते हैं- उनका ऐसा मत है। चेतना विज्ञानियों का अभिमत है कि चूँकि चेतना, काया का सर्वप्रमुख और अविनाशी तत्व है, इसलिए यह मानना ही उचित होगा कि शरीर के विकास का संचालक और नियंत्रक वही है। वह यदि अनगढ़ और अपरिष्कृत है, तो यह संभव है कि उससे नियंत्रित अंग-अवयव भी विकारग्रस्त हो। इस प्रकार स्वस्थ अवयव प्रकारांतर से यही सिद्ध करते हैं कि उनकी चेतना उतनी परिष्कृत है, जितनी अंगों के स्वस्थ विकास के लिए अभीष्ट हो। डॉ. मोटोयामा कहते हैं कि इसके आगे के विकास परिष्कार से अंगों की गतिविधियाँ भी तद्नुरूप और अधिक नियमित, संतुलित एवं उच्चस्तरीय हो जाती है यह वास्तव में और कुछ नहीं, दिव्यजागरण की स्थिति है। इस प्रकार शरीर स्तर पर सूक्ष्म शक्ति संस्थानों के प्रभाव को बनाकर उनने यह साबित करने को प्रयास किया है कि चक्रों की सत्ता और महत्ता दोनों यथार्थ हैं।

इसके लिए ‘चक्रयंत्र’ नामक एक ऐसे उपकरण का उनने विकास किया, जिसके माध्यम से चक्रों की सक्रियता के दौरान शरीर के विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र के भीतर होने वाले परिवर्तनों का पता लगाया जा सके। यह यंत्र प्रकाश प्रतिरोधक एवं सीसे के आवरण से युक्त किसी टेलीफोनबूथ की भाँति होता हैं इसमें ऊपर नीचे दायें बायें चारों ओर खिसकने वाले ताँबे के इलेक्ट्रोडयुक्त खण्ड होते है, ताकि आवश्यकतानुसार आगे-पीछे कर इन्हें व्यक्ति के वाँछित भाग पर केंद्रित इलेक्ट्रोड के मध्य एक अति संवेदनशील विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न किया जाता है। शरीर से उत्सर्जित किसी भी महत्वपूर्ण ऊर्जा के फलस्वरूप यह अत्यन्त संवेदनशील क्षेत्र प्रभावित होता है जिसे मापकर चक्रों की उपस्थिति एवं उनकी सक्रियता निष्क्रियता का प्रमाण प्रस्तुत किया जा सकता है।

किसी चक्र विशेष की जाँच के लिए ध्यान मुद्रा में बैठे हुए साधक से लगभग १६ से. मी. की दूरी पर उक्त चक्र के सम्मुख उपकरण का ताँबे का इलेक्ट्रोड रखा जाता है। इलेक्ट्रोड में विद्युत चुंबकीय क्षेत्र पैदा करने के लिए उसके पार्श्व में एक फोटो इलेक्ट्रिक सेल होता है। ध्यानस्थ साधक जब सम्पूर्ण एकाग्रता के साथ उस चक्र पर ध्यान केन्द्रित करता है, तो चक्रयंत्र से जुड़े उपकरणों में स्फुट परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है इस बदलाव को ध्यान आरंभ करने से पूर्व, मध्य में एवं ध्यान के पश्चात ना लिया जाता है। उपकरण के अत्यंत सूक्ष्मप्रवर्द्धक जुड़े होने के कारण शक्ति के सूक्ष्मातिसूक्ष्म उत्सर्जन को रिकॉर्ड कर पाना संभव होता है। इसके साथ ही त्वचा, हृदय, रक्त जैसे अवयवों एवं उसकी विद्युतीय गतिविधियों का भी अध्ययन किया जाता है, ताकि चक्र उद्दीपन के दौरान उत्पन्न होने वाली ऊर्जा के प्रभावों को जाना जा सके एवं उसकी तुलना तथा व्याख्या की जा सके।

डॉ. मोटोयामा ने अपने प्रयोगों में तीन प्रकार के लोगों का चुनाव किया पहली श्रेणी में उन्हें रखा गया, जो योगाभ्यास से सर्वथा अपरिचित थे। दूसरी श्रेणी उन लोगों की थी, जो साधारण दर्जे के योगाभ्यासी थे और हलका-फुलका अभ्यास किया करते थे। तीसरा वर्ग सही अर्थों में साधकों को था। जब पहली श्रेणी के लोगों को चक्र पर ध्यान करने को कहा गया, तो पाया गया कि उनके सम्मुख रखे चक्रयंत्र में किसी प्रकार की कोई हलचल नहीं हुई अर्थात् विद्युतीय गतिविधियों में कोई अन्तर परिलक्षित नहीं हुआ। दूसरे वर्ग के लोगों परी इस प्रयोग में विद्युतिक गतिविधियाँ स्पष्ट देखी गई। ध्यान से पूर्व, मध्य में एवं आज्ञाचक्र पर ध्यान के पश्चात् बड़ी मात्रा में विद्युतीय तरंगों की विद्यमानता का संकेत मिला, जो इस बात का प्रमाण था कि चक्र सक्रिय दशा में है, किंतु उसमें नियंत्रण का अभाव था, इसलिए एकाग्रता की जाँच चक्रयंत्र द्वारा की गई, तो उसके गर्भाशय के आस-पास के स्वाधिष्ठान चक्र वाले हिस्से की ऊर्जा में एक अव्यवस्था दिखलाई पड़ी। यह इस बात की सूचक थी कि वह क्षेत्र रोगग्रस्त है, वहाँ के किसी न किसी अंग में कोई व्याधि है।

चक्र संबंधी इस शोध के दौरान कुछ असाधारण तथ्य भी देखे गए। जब एक साधक पर मणिपुर चक्र संबंधी प्रयोग किया जा रहा था, तो एकाग्रता केक दौरान उस क्षेत्र में व्यापक स्तर पर ऊर्जा की उपस्थिति दर्ज की गई। इसके अतिरिक्त उसे एक अतीन्द्रिय ऊर्जा के उत्सर्जन की भी प्रतीति हुई, किंतु इस असाधारण अनुभूति कि दौरान शरीर के अन्दर विद्युतीय क्रिया−कलाप सूचित करने वाले यंत्रों की हलचल बिल्कुल समाप्त हो गई, जो आश्चर्यजनक था। अनुभूति खत्म होते ही वे फिर गतिशील हो उठे।

इसकी संभावित व्याख्या करते हुए शोधकर्ता कहते है कि शायद अनुभूति के दौरान इतनी प्रचण्ड मानसिक ऊर्जा निकलती हो कि वहाँ पहले से व्याप्त शारीरिक ऊर्जा उसके प्रभाव में आकर निष्प्रभावी बन जाती हो, अतएव उपकरण कुछ क्षण के लिए उसकी उपस्थिति रिकॉर्ड नहीं कर पाते। अनुभूति के विलुप्त होते ही जब यथास्थिति बनती, तो यंत्र पुनः सक्रिय हो उठते।

इसकी पुष्टि के लिए एक अन्य परीक्षण किया गया। इसके लिए अनाहत चक्र पर ध्यान के अभ्यासी साधक का चयन किया गया। जब वह शरीर मन से पूर्णतया तनावमुक्त हो गया, तो संबद्ध भागों में विद्युतिक क्रियाशीलता में वृद्धि देखी गई। इसके पश्चात उससे अनाहत चक्र पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा गया, साथ ही ऐसी व्यवस्था की गई कि जैसे उसे अतीन्द्रिय उत्सर्जन का अनुभव हो, वैसे ही वह बगल के उपकरण का स्विच दबा दे। इससे एक चार्ट पर नियत चिन्ह के उभरते समय चक्र यंत्र के प्रकाश निरोधक कक्ष में स्थित फोटो इलेक्ट्रिक सेल ने एक मद्धिम प्रकाश की उपस्थिति का संकेत दिया। यंत्र के मॉनीटर ने भी अत्यंत उच्च विद्युतीय शक्ति की सूचना दी।

उपर्युक्त प्रयोग इस तथ्य की ओर इंगित करते हैं कि चक्रों की ऊर्जा का रूपांतरण प्रकाश, विद्युत जैसे भौतिक रूपों में भी संभव है। इससे योगियों के उस कथन की पुष्टि होती है कि चक्र मनः शक्ति को मनःशक्ति में रूपांतरित करने के केन्द्र हैं। यहाँ डॉ. मोटोयामा का मत है कि यदि इस दिशा में और गहन शोधें की जा सकें, तो भौतिकी के ‘ऊर्जा संरक्षण सिद्धांत (लॉ ऑफ कंजर्वेशन ऑफ एनर्जी) की वर्तमान मान्यता में संशोधन अनिवार्य हो जाएगा।

यू. पी. एल. ए. अमेरिका के किनसिलओलाॅजिस्ट वैलरी हण्ट एवं सहकर्मियों ने भी अपने अनुसंधान में चक्रों के स्पष्ट प्रमाण प्राप्त किए हैं। उनके प्रयोग में एक व्यक्ति की गहन पेशीय मालिश की गई, इतनी कि अवचेतन की गहराइयों में विद्यमान तनाव भी निकल जाए। शोधकर्ताओं का दावा है कि इस प्रकार की मालिश से चक्रों की सक्रियता बढ़ती है। इस तरह आठ नौ घंटे की अनवरत मालिश से जब चक्र पूर्णरूपेण उत्तेजित हो जाते हैं, तो आरम्भ, मध्य और अंत में उनके रंगों में आने वाले बदलाव को मशीन के पर्दा पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। शोधकर्मी वैज्ञानिकों का कहना है कि पेशीय मालिश के प्रारंभ में चक्र असमान तथा छोटे मालूम पड़ते है। उस समय उनका रंग गहरा या मटमैला होता है। मालिश की समयावधि बढ़ने के साथ-साथ उनका आकार विस्तार भी बढ़ता गया, रंग चमकीला होता गया एवं तरंगें अधिक व्यापक एवं घनीभूत हो गई। लगभग आधी अवधि की मालिश में चक्रों के मूल रंग नीले, पीले, नारंगी, लाल आदि उभरकर सामने आ जाते है। छठवें घंटे में सभी चक्रों का रंग नीला भासने लगता है। सातवें तथा आठवें घण्टे में इनका मूल रंग एक बार पुनः झलकता है, पर इस बार वे हलके एवं सम्मिश्रित होते है। इस समय तक वे अपनी उच्चतम आवृत्तियों में आ जाते है। यह क्षण अद्भुत आनन्द का होता है।

हण्ट का प्रयोग अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। इससे न सिर्फ एनर्जी लेवल स्तर के चक्रों की पुष्टि होती है, अपितु यह इस तथ्य को भी साबित करता है कि व्यक्ति के मानसिक और भावनात्मक अवस्था का रंगों से सुनिश्चित संबंध है। इसके अतिरिक्त योगियों और मनोवेत्ताओं के इस कथन को भी पुष्ट करता है कि शरीर से ही संबद्ध प्रत्यक्ष ज्ञान के अधिक सूक्ष्म स्तरों का अस्तित्व वास्तव में है। यद्यपि इसे यथार्थ में यह सामान्य प्रत्यक्ष ज्ञान की ही सूक्ष्म स्तर पर विकास की एक अवस्था है।

इस प्रकार षट्चक्रों की शरीर स्तर पर सिद्धि संभव हो जाती है। ‘थ्योरिज ऑफ द् चक्राज ब्रिज टू हाइयर कांशसनेश नामक शोध प्रबंध में डॉ. मोटोयामा लिखते हैं कि यह ऐसे केन्द्र हैं,जिनका कोई भौतिक अस्तित्व या आकार न होने पर भी उनके अपने विशिष्ट कार्य हैं, ये सशक्त भौतिक एवं मानसिक ऊर्जा के उत्पादनकर्ता है, जिसका मनुष्य के शरीर, मन और भावनाओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वे कहते है कि चक्र वास्तव में ऐसे संघनित ऊर्जा क्षेत्र हैं, जिसकी घनीभूत शक्ति एक अदृश्य आवरण के भीतर अत्यंत छोटी परिधि में सीमाबद्ध मानी जा सकती है। मुर्गी के अण्डे की तरह जब तक उसके ऊपरी आच्छादन को तोड़ा नहीं जाता, तब तक ऊर्जा से मुक्त नहीं हो पाती। ध्यान के माध्यम से साधक जब उस घेरे को तोड़ने में सफल होता है तो वहाँ पर ऊर्जा का तीव्र विस्फोट होता है जो मन को इन्द्रियातीत अनुभूतियों से भर देता है शरीर और अप्रभावित नहीं करते और उनमें स्फुट परिवर्तन दृश्यमान होता है।

चक्र क्या है? इसकी अतीन्द्रिय व्याख्या करनी हो, तो यही कहना पड़ेगा कि ये चेतना को व्यापक और विस्तृत बनाने वाले ऐसे संस्थान है, जहाँ व्यष्टि ओर समष्टि सत्ता की पृथकता समाप्त होकर अद्वैत का उदय होता है। इसकी शरीर स्तर पर विवेचना करते हुए विज्ञानवेत्ता इसे मात्र ऊर्जा स्तर (एनर्जी लेवल )भर मानते हैं, पर दोनों प्रकार की मान्यताओं में एक समानता अवश्य है, दोनों ही इसे शक्ति के प्रचण्ड स्रोत के रूप में स्वीकारते हैं। इस दृष्टि से यह कहा जा सकता है। कि विज्ञान अब योगियों के निष्कर्षों के अधिक निकट पहुँचता जा रहा हैं। संभव है वह अपने अगले चरण में शरीरशास्त्रियों एवं मनोवेत्ताओं के उन जिज्ञासाओं के भी समाधान तलाश ले कि भौतिक और मानसिक स्तर पर इस शक्ति के प्रादुर्भाव का आधार क्या है एवं हमारे मन शारीरिक स्तर व्यवहार तथा अनुभव को नियंत्रित करने हेतु यह शक्तियाँ किस प्रकार कार्य करती हैं? इस दिशा में अभी गहन शोध की आवश्यकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि विज्ञान अपने बढ़ते कद के साथ उन ऊँचाइयों को स्पर्श कर सकेगा, जहाँ इन गूढ़ प्रश्नों का हल ढूँढ़ा जा सके।


बोया और काटा का सिद्धांत (Kahani)

किसी को कुछ, किसी को कुछ देने के लिए लोग भगवान की निंदा कर रहे थे। उसे सुन रहे थे कोई दार्शनिक वे लोगों को साथ लेकर खेतों पर गए। एक में गुलाब बोया था, दूसरे में तम्बाकू। बदबू। दार्शनिक ने कहा-जमीन बहुत बुरी है। किसी को क्या, किसी को क्या देती है। उसका पक्षपात देखा।” लोग बोले-नहीं यह धरती का पक्षपात नहीं, बोने वालों के कृत्यों का फल है।” हँसते हुए ज्ञानवान ने कहा-भगवान की यह सृष्टि एक प्रकार का खेत है। उसमें कर्मों का जो जैसा बीज बोता है, वह वैसा ही काटता है।”


सिद्धियों का सच्चा अधिकारी

वे तीन भाई थे। उनका कोई न था। तीनों ही अनाथ थे। गरीबी से तंग आकर गाँव-गाँव रोजी-रोटी की तलाश में भटकना ही उनकी दिनचर्या बन गयी थी। एक दिन काफी भटकने के बाद उन्हें एक बूढ़ा राहगीर मिला जब बूढ़े को उनकी दुःखद कथा का पता चला तो उसने सहानुभूतिपूर्वक कहा- आज से तुम तीनों मेरे बेटे हुए और मैं तुम्हारा पिता। मैं तुम्हें सहारा दूँगा। बस तुम लोग सच्चाई का रास्ता मत छोड़ना।

तीनों भाइयों ने बूढ़े की बात मानने का वचन दिया तथा उसके साथ चल पड़े। राह में उन्हें एक सुन्दर घर दिखाई दिया। करीब ही आम का बगीचा, था, जहाँ फलों से लदे वृक्षों के बीच एक अत्यंत सुन्दर लड़की थी। उसे देखते ही सबसे बड़ा भाई बोला-काश-ऐसी सुंदर मेरी पत्नी होती तो जीवन में खूब सुख मिलता।” इतना सुनते ही बूढ़ा बोला-तो आओ, इससे तुम्हारा रिश्ता किए देते है। खुशी से जिंदगी गुजारो, परन्तु सच्चाई का रास्ता मत भूलना।” वे लोग लड़की के घर पहुँचे बड़े भाई की शादी हो गयी और वह घर का मालिक बन गया।

बूढ़ा अब अपने मुँह बोले दोनों छोटे बेटों को साथ लेकर आगे बढ़ चला। वे पहले की तरह जंगलों और मैदानों को पार करते हुए आगे बढ़ते रहे। चलते-चलते रास्ते में एक खूबसूरत घर दिखाई दिया। घर के पास तालाब था, जिसके पीछे एक पनचक्की थी। घर के पास ही एक युवती अपने कार्य में व्यस्त थी। ऐसी कार्यनिपुण युवती को देखते ही मँझले भाई ने कहा, “काश ऐसी ही युवती मेरी पत्नी होती। दहेज में तालाब और पनचक्की मिलती। मैं भी चैन से जीवन गुजारता।

बूढ़े फकीर ने मँझले भाई की भी शादी उस लड़की से करा दी। विदा लेते समय बूढ़े ने कहा-बेटे खुश रहो, पर सच्चाई का साथ कभी न छोड़ना।”

वे आगे चल पड़े। तभी तभी छोटे भाई तथा बूढ़े को रास्ते में एक झोंपड़ी दिखाई दी। झोपड़ी में से कराहटों की मन्द मन्द आवाजें आ रही थी। छोटे भाई से रहा न गया। उसने झोपड़ी के अन्दर देखा- एक वृद्ध व्यक्ति खाट पर पड़ा था। लगता था कि उसे कोई लम्बी बीमारी थी। छोटे भाई का मन दया से द्रवित हो गया। उसने फकीर से कहा- “बाबा! मेरा मन है कि मैं अपना जीवन दीन दुःखियों की सेवा में लगाऊँ।” तब बूढ़ा फकीर बोला!” शाबाश ऐसा ही होगा। बस बेटे सच्चाई के रास्ते पर चलते रहना।” इस तरह तीनों भाइयों को सुव्यवस्थित कर बूढ़ा अपनी राह चल पड़ा। तीनों भाई अपनी-अपनी तरह से जिंदगी जीने लगे।

इस बीच बूढ़ा फकीर तप साधना में अपना समय काट रहा था। एक दिन उसे अपने मुँहबोले बेटों की याद आयी और उसने उनकी खोज खबर लेने का निश्चय किया। वह एक गरीब भिखारी का वेश बनाकर अपने सबसे बड़े पुत्र के पास पहुँचा। उसने गिड़गिड़ाते हुए उससे खाना माँगा। लेकिन लालची पुत्र ने बेरुखी से कहा-अरे बूढ़े! खाना क्या मुक्त में मिलता है? खाना चाहिए तो मेहनत मजदूरी करो और बदले में खाना लो।”

जबकि सच यह था कि उसकी तिजोरियाँ धन से भरी पड़ी थीं। उसके गोदाम अन्न से भरे थे, लेकिन उसका मन दरिद्र था। बूढ़ा फकीर अत्यंत दुःखी हुआ और उसको क्रोध भी आया। वह खाली हाथ वहाँ से चल पड़ा। थोड़ी दूर जाकर उसने पलटकर बड़े भाई की सम्पत्ति पर एक नजर डाली और उसकी सारी दौलत मिट्टी के ढेर में बदल गयी।

अब बूढ़े फकीर ने मँझले भाई के द्वार पर जाकर भोजन की याचना की बेटा, एक चुटकी आटा दे दे, मैं बूढ़ा भिखारी दाने-दाने को तरस रहा हूँ। मँझला बेटा बोला, “मेरे पास तो खुद ही अपने लिए आटा नहीं है, तुम्हें कहाँ से दूँ। बूढ़े बाबा यहाँ से भी खाली हाथ चल दिये। थोड़ी दूर जाकर पलट कर देखा तो पनचक्की और घर धू-धूकर जल उठे। अंत में बूढ़े बाबा अत्यंत दुःखी हृदय से अपने छोटे पुत्र के पास पहुँचे। छोटा पुत्र अब तक पहले जैसे ही अपने सेवाकार्य में जुटा था। जब बूढ़े बाबा ने भोजन की गुहार लगायी तो उसने प्रेमपूर्वक कहा-आप झोपड़ी के अंदर चलिए। हम दोनों साथ ही साथ भोजन करेंगे। अंदर पहुँचकर सबसे पहले छोटे बेटे ने उसके कपड़े बदलवाए। जब बूढ़ा फकीर कमीज बदल रहा था तब छोटे भाई ने देखा कि उसकी छाती में एक बहुत बड़ा घाव हैं। बूढ़े को भरपेट भोजन कराने के बाद उसने घाव के बारे में पूछा।

बूढ़े ने कहाँ-यह घाव अत्यंत गहरा है और मैं तो बस अब एक दिन का ही मेहमान हूँ।”

“हे भगवान! क्या इसकी कोई दवा नहीं, छोटे भाई ने पूछा। बस एक दवा है, लेकिन उसे कोई देगा नहीं हालाँकि उसे हर कोई दे सकता हैं बूढ़े ने कहा। छोटे भाई ने बताने के लिए जब बहुत आग्रह किया तो भिखारी के वेश में खड़े बूढ़े फकीर ने कहा-यदि कोई अपनी छाती के रक्त की कुछ बूँदें इस घाव पर छिड़क दे, तो घाव अपने आप सूख जाएगा।

छोटे भाई ने बिना एक पल की देरी लगाए पास में पड़ा चाकू उठा लिया और उसने स्वयं की छाती पर मारने का प्रयास किया, परंतु वह मार पाता, इसके पहले ही फकीर ने उसे अपनी छाती से लगा लिया और बोला-बेटे मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था।” अब तो लड़के ने भिखारी की ओर ध्यान से देखा बूढ़े बाबा मुस्करा रहे थे। वे बोल “बेटे तीनों भाइयों में अकेले तुम ही सच्चाई के मार्ग पर चले, इसलिए आज मैं तुम्हें अपनी सारी सिद्धियाँ और तप शक्ति का अधिकारी बनाता हूँ। मन लगाकर सेवाकार्य में निरत रहना। यही मानव जीवन का सार है।” यह कहकर बूढ़े बाबा नजरों से ओझल हो गये।


मानवेत्तर प्राणियों का यह चित्र-विचित्र संसार

रहस्यमय! अलौकिक!! आश्चर्यजनक!!! ये विशेषण सामान्यक्रम में मानवजीवन का ही श्रृँगार बनते है। लेकिन कभी-कभी अन्य जीव जन्तुओं के ऐसे जीवन प्रसंग सामने आ जाते हैं, जब लगने लगता है कि उपर्युक्त विशेषण इनके साथ जुड़कर ही अपनी विशेषता और सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं उनके जीवन की विचित्रताएँ विशिष्टताएँ मनीषियों बुद्धिजीवियों के सामने अनेक मोहरूपमयी पहेलियाँ सुलझाने के लिए छोड़ जाती है, जिन्हें सोच-सोचकर वे रोमांचित एवं हतप्रभ होते रहते हैं।

बीकानेर के पास एक गाँव का बीस वर्षीय बकरा एक ऐसा ही अनूठा उदाहरण है। यह संभवतः भारत का सबसे अधिक आयु का बकरा हैं। इसके खान-पान के सही अंदाज और रहन-सहन व व्यवहार के विशिष्ट तौर तरीके स्वयं में एक दिलचस्प पहलू हैं गर्मी के मौसम में रोजाना दो किलो आम का रस पीना इस बूढ़े बकरे को खास पसन्द है। वह प्रातः ठीक नौ बजे घर के बाहर चौक पर सूर्य के सामने मुँह करके कुछ इस तरह बैठता है, मानो सूर्य की उपासना कर रहा हो। उसका यह क्रम भीषण धूप और लू में भी सायं चार बजे तक चलता रहता हैं। सायंकाल घर में घुसने से पहले वह अपने अगले पैरों से घर का कुंडा खटखटाता हैं घर में घुसने के बाद दो फीट ऊँचे नल को खेल कर स्वयं पानी पी लेता है।

गर्मी के दिनों में नीबू का शरबत अथवा बर्फ का ठण्डा दूध बड़े चाव से पीना इस बकरे का प्रिय शौक है। वह घर या सड़क पर पड़ी किसी भी खाद्य वस्तु को छूता तक नहीं। भूखे लगने पर रसोईघर से पन्द्रह फीट दूर चार इंच लम्बी जीभ निकालकर खड़ा हो जाता है। भोजन के क्रम में केवल देशी घी का पराठा सब्जी के साथ अपने मालिक साठ वर्षीय अब्दुल सत्तार के हाथों से ही खाता है। बर्तन में परोस कर दिये जाने पर वह खाने की तरफ नजर उठाकर देखता भी नहीं।

इस बकरे को पन्द्रह सीढ़ियाँ चढ़कर मकान की छत पर खुली हवा में सोना बहुत भाता है। उसके मालिक कहना है कि वह अब तक कभी ज्यादा बीमार नहीं हुआ है। लेकिन हलकी-सी हरारत होने पर भोजन त्याग देता है। घर के बाहर चौखट पर आजादी में दखल होने पर स्थान छोड़ देता है। उसकी मालकिन श्रीमती नसीबन अपने पाँच पुत्रों से भी बढ़कर उसे प्यार दुलार करते है। पशु चिकित्सकों द्वारा बीस वर्ष की आयु बताए जाने वाले इस बकरे की मालकिन इसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज कराए जाने के लिए आतुर हैं। वर्तमान में बीस वर्ष की आयु में उसका वजन ७५ किलो है। वह घर के सदस्यों की तरह रहता है। घर के किसी भी शुभकार्य में उछल कूद मचाकर खुशी प्रकट करना उसकी सर्वप्रिय आदत है।

क्रूस दंपत्ति का बंदर भी अपनी विचित्र विलक्षण हरकतों के लिए चर्चित रहा है। वे इसे प्यार से विल कहकर पुकारते थे। वह प्रातः उठकर ब्रुश से अपने दाँत माँजता, टेबल पर बैठकर परिवारजनों के साथ नाश्ता करता था। उसे मुर्गी के माँस से बनी चीजें पसंद थी। उसका अपना शयनकक्ष था, जिसमें नन्हा पलंग और बिस्तर लगा रहता था। वहीं रंगीन टी. वी. सेट था, जिसे वह आम इनसानों की तरह देखा करता है। उसकी मृत्यु होने पर क्रूस दंपत्ति के घर का एक सदस्य कम हो गया। शोक सन्तप्त दंपत्ति ने उसके लिए स्थानीय गिरजे में प्रार्थना सभा भी करवाई। हालाँकि पादरी की इस बात के लिए काफी आलोचना हुई कि उन्होंने एक बंदर की आत्मशान्ति के लिए प्रार्थना होने दी।

अगला किस्सा है दो कुत्तों के प्रेम विवाह का। इसके पात्र है दूल्हे राज रॉकी और दुल्हन रानी डेजी। दोनों एक समारोह में मिलें, वहाँ दोनों की नजरें मिली और दोनों की भावनाएँ एक दूसरे से गहराई पूर्वक जुड़ गयी। फिर तो उनका साथ-साथ घूमना, एक दूसरे के बिना आँसू बहाना उन दोनों की ही दिनचर्या में शामिल हो गया। उन दोनों की प्रेम भावनाओं की इस प्रगाढ़ता के वशीभूत होकर दोनों के ही मालिकों ने उनकी शादी का फैसला किया। उनकी शादी बड़ी धूमधाम से मनाई गयी। दोनों को शादी की पोशाकों में सजाया गया। शादी समारोह में उनकी प्रजाति के सैकड़ों कुत्तों व उनके मालिकों ने भाग लिया। एक विशाल भोज की व्यवस्था भी इस अवसर पर की गयी यह अनोखी शादी न्यूयार्क में हुई। इस अवसर पर खुशी प्रदर्शित करने वाले तमाम कार्यक्रम भी हुए जिसमें वर-वधू ने बन-ठन कर अपने अपने पोज देकर फोटो खिंचवाए और शादी के बाद दूल्हे राजा दुल्हन को अपने घर ले गए।

अमेरिका के शहर लॉसएंजलिस के पुलिस विभाग में एक ऊँचे पद पर आसीन मिस्टर बयार्ड की आयु मात्र चार वर्ष है और उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस तक प्राप्त हैं सभी लोग इस आश्चर्य जनक पुलिस अफसर का लोहा मानते है, क्योंकि मिस्टर बयार्ड कोई व्यक्ति नहीं बल्कि दक्षिण अफ्रीका में जन्मा एक नीले सुनहरे रंग का तोता है इसका काम बच्चों को सुरक्षित ढंग से साइकिल चलाने तथा स्केटिंग करने की हिदायत देना है। अपनी नन्हीं-सी पेट्रोलिंग कार को ये तोते साहब स्वयं ही ड्राइव करते हैं। २७ वर्षीय सिमेंसन उनका सहायक है, जो तोते की हिदायत लोगों को समझाता है। दोनों मिलकर स्कूलों तथा अनाथालयों के छोटे व पंगु बच्चों को दुर्घटना से बचने व सुरक्षित तरीके से

साइकिल चलाने की सीख देते रहते हैं टी. वी. के कार्यक्रमों में भी वे दर्जनों बार भाग ले चुके हैं। बच्चे बड़े उत्साह के साथ इस अफसर तोते की बातों को सुनते अनुपालन करते है।

अमेरिका के ही सेनफ्रांसिस्को नगर के पास स्थित रुयूजाल में महापौर का चुनाव खासा रोमांचक रहा। वहाँ के एक नागरिक ने उम्मीदवार के तौर पर अपने कुत्ते’ बाँस’ को खड़ा किया। चुनाव प्रचार व अन्य औपचारिक वार्ताओं के बाद जब मतदान हुआ तो चुनाव परिणाम और भी विस्मयकारी साबित हुआ। बाँस अपने निकटतम प्रतिद्वन्द्वी से ३. के मुकाबले ७५ वोट पाकर जीत गया। यही नहीं उसने अपनी संवेदनशील सेवाओं से वहाँ मतदाताओं को प्रभावित भी किया।

अरिजोना में एक वैज्ञानिक आइरीनपीयरबर्ग के पास एक पालतू तोता है जिसे वे प्यार से ‘एलेक्स’ कहकर पुकारते है। वह कम से कम पचास चीजों का नाम बता सकता है। सौ तक गिनती गिनता है। जब थके हुए लोग घर आते है, तो एलेक्स तुरन्त पूछता है” ए मैन, क्या कुछ गड़बड़ है? इसी तरह जालंधर के संगीत प्राध्यापक अरुण मित्र के पास ‘सीता’ नाम की एक मादा तोता है। जो बिल्ली की म्याऊँ और कुत्ते की भौं-भौं की हू-ब-हू नकल करती है। घर आने वाले मेहमानों के साथ अंग्रेजी, हिन्दी व पंजाबी में सिखायी गयी बातों को बखूबी कहता है। स्लेटी रंग की यह तोता मूलतः अफ्रीका निवासी है, जिसे वहाँ ग्रे पैरेट के नाम से जाना जाता है। अपनी जबरदस्त संहारक शक्ति के कारण यह किसी भी भाषा में बोले गए शब्दों वाक्यों को बहुत जल्दी कंठस्थ कर लेती हैं। इसकी औसतन आयु भी ६. से ७. वर्ष के बीच होती है।

इंग्लैण्ड में एक मादा गोरिल्ला ने अंग्रेजी के एक हजार से अधिक शब्दों का अभ्यास किया है। जिनमें से पाँच सौ शब्द वह रोज बोलती है। यही नहीं वह बड़े मजे से मानवोचित शिष्टाचार को भी निभाती है। उसका भोजन भी आम इनसानों की भाँति है। अचरज की बात यह भी है कि उसे अपने गोरिल्ला होने पर गर्व है, जिसे वह अपने हाव-भाव एवं अंग्रेजी भाषा के माध्यम से प्रकट करती रहती है।

बैंकॉक में कुछ दिनों से एक कुत्ता खूब चर्चा में है। इसकी उदारता से प्रभावित होकर थाइलैंड की सार्वजनिक कल्याण परिषद ने इसे बतौर वेतन २५ हजार डॉलर प्रतिमाह उपलब्ध कराने का निर्णय किया है। यह कुत्ता अपनी माँ से बिछुड़े पिल्लों को विभिन्न ढंग से भोजन कराता है। इन आठ पिल्लों की माँ जब जहर खाकर मर गयी तब जोंग नामक इस कुत्ते ने भोजन के रूप में अपना खाना उगल-उगल कर एक सप्ताह खिलाकर उन्हें माँ के दूध के अभाव में मरने नहीं दिया। पिल्लों ने माँ के मरने के बाद किसी तरह भोजन नहीं किया था। उसकी सेवा का यह क्रम अन्यों के लिए भी जारी है।

जानवरों की इन विशेषताओं के कारण जापान में पालतू जानवरों के योगाभ्यास के केन्द्र खोले जा रहे हैं। ताकि शहरी जीवन के तनाव भरे वातावरण में भी शारीरिक एवं मानसिक रूप से वे स्वस्थ रह सके। इस अभियान की निदेशक शिगेनारी मासूदा का मानना है कि छोटे-छोटे फ्लैटों में अधिक समय तक रहने से जानवरों के पंजे कमजोर हो जाते हैं तथा वे निराशा व मोटापे के शिकार होने लगते है। इससे बचने के लिए उन्हें बाकायदा योगाभ्यास कराने की बात सोची जा रही हैं।

कंबोडिया के दक्षिणी भाग में स्थित एक छोटे से गाँव में दो साँड़ इन दिनों अच्छे खासे चर्चा का विषय बने हुए है। ये दोनों अपनी बिरादरी के सिद्ध पुरुषों से कम नहीं है। लोग दूर-दूर से इनका आशीर्वाद लेने आते हैं और इनका प्रसाद ग्रहण कर धन्य हो जाते हैं। इनके प्रसाद को हर मर्ज की दवा बताया जाता है। इनके आशीर्वाद से मरणासन्न व्यक्ति भला-चंगा हो जाता है। अंधा देखने लगता है, रोगी स्वास्थ्यलाभ पाता है। इन साँडों को अपना पेट पालने के लिए कोई श्रम नहीं करना पड़ता। लोग स्वयं ही इनकी सेवा में तत्पर रहते है। वे इन्हें ताजी हरी घास व फल सब्जियाँ खिलाकर प्रसन्न रखते है। इनकी कृपा हो तो ये व्यक्ति के हाथ पर जीभ फेरकर उसके कष्टों का निवारण करते है।

यदि किसी को इनकी सेवा का अवसर नहीं मिलता तो वे इनके गोबर मूत्र को ही प्रसाद रूप में ग्रहण करके अपने भाग्य पर संतोष कर लेते हैं। ऐसा ही प्रसाद ग्रहण करने वाली एक महिला बताती है कि वह १७५ किलोमीटर की यात्रा करके वहाँ आयी। उसने ७. अमेरिकी सेन्ट में गोबर मूत्र की दो थैलियाँ खरीदी। हेमनान नामक इस महिला ने बताया कि इस प्रसाद के सेवन से उसके सिरदर्द और दौरों की समस्या हमेशा के लिए ठीक हो गयी है। गाँव वालों का कहना है कि इन दोनों साँडों का सौभाग्य है कि ये दोनों कसाई के हाथों कटने से बच गए। साँडों के मालिक ने इन्हें कसाई के हाथों बेच दिया था। रात को देख एक स्वप्न ने उसे इन्हें वापस लाने के लिए विवश किया। स्वप्न में मालिक को ये दोनों साँड कंबोडिया के सिद्धपुरुष प्रीहाकोओ और प्रीहाकीओ के रूप में दिखाई दिए। वह किसान दूसरे ही दिन साँडों को खरीद कर वापस घर ले गया। रास्ते में एक साँड ने एक लँगड़े व्यक्ति को अचानक चाटा तो उसका मर्ज देखते-देखते दूर हो गया। इस घटना के बाद दोनों साँडों की ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी।

ऐसे एक नहीं अनेकों उदाहरण है, जो अन्य मानवेत्तर प्राणियों की रहस्यमयता एवं विचित्रता को उजागर करते हैं मानवेत्तर प्राणियों का यह रोचक संसार एक ही संदेश देता हुआ प्रकृति के अनुदान हमें भी कम नहीं मिले। आखिर हम भी आप से कम तो नहीं।


पिरामिडों में छिपे रहस्य व उनका संदेश

मानव द्वारा की गयी रचनाओं में पिरामिड सदैव ही रोमांचक एवं आश्चर्य का विषय रहे हैं इनमें गीजा का पिरामिड तो विश्व के महानतम सात आश्चर्यों के से एक माना जाता है। सदियों से इसकी कथा-गाथा इसकी वास्तुकला, ऐतिहासिकता चर्चा का विषय बनी रही है। यह पिरामिड सबसे बड़ा, सबसे भारी, सबसे पुराना, साथ ही गणित एवं ज्यामितीय दृष्टि से सबसे अधिक पूर्ण व समग्र हैं। यह महाद्वीप के केन्द्र में उत्तर दक्षिण अक्ष पर स्थित हैं समय के साथ उसके संदर्भ में नये-नये रहस्यों पर पर्दा उठता रहा है।

इस महान पिरामिड की सार्वभौम उपयोगिता का एक रहस्य अभी हाल में प्रकट हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार इस पिरामिड की आकृति उत्तर-दक्षिण अक्ष पर रहने की वजह से यह ब्रह्माण्ड में व्याप्त ज्ञात व अज्ञात शक्तियों को स्वयं में समाहित कर अपने अंदर एक ऊर्जा युक्त वातावरण तैयार करने में सक्षम हैं जो जीवित या मृत, जड़ व चेतन सभी तरह की चीजों को प्रभावित करता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए इन दिनों विज्ञानवेत्ता कुछ इंच से लेकर कई फुट तक के पिरामिड मॉडल तैयार करने में लगे है। इन घरेलू पिरामिडों का शुभारंभ फ्रांसीसी वैज्ञानिक मॉसियर बॉक्सि के प्रयोग के साथ हुआ। कई सालों पहले वह ग्रेट पिरामिड में गया था, वहाँ उसने बादशाह कक्ष में एक मरा कुत्ता देखा, जो सूखकर ममी बन चूका था, किंतु वह किसी तरह की सड़न या दुर्गन्ध से मुक्त था। इसे देखकर उसके मस्तिष्क में यह विचार कौंधा कि पिरामिड की आकृति में अवश्य कोई राज छुपा हुआ है। उसने ढाई फुट ऊँचा एक पिरामिड बनाया और बादशाह कक्ष के स्तर पर एक मृत बिल्ली को रखा, जो कि धरातल और शीर्ष के बीच एक तिहाई दूरी पर स्थित था। कुछ दिनों बाद वहाँ रखा बिल्ली का शव सूखकर ममी में बदल गया।

बॉक्सि के प्रयोग निष्कर्षों से प्रभावित होकर चैकोस्लोवाकिया के रेडियो इंजीनियर करेल डर्वल ने पिरामिड के कई छोटे-छोटे मॉडलों पर प्रयोग किए। जिसके आश्चर्यजनक परिणामों को शीला आस्ट्रेडर और लिन श्रोडर ने अपनी पुस्तक’ साइकिक डिस्कवरीज बिहाइण्ड द् आयरन कर्टेन’ में प्रस्तुत किया है। करेल डर्वल का निष्कर्ष था कि पिरामिड के अंदर के स्थान की आकृति व इसमें घटित होने वाली भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रक्रिया में परस्पर घनिष्ठ संबंध हैं। इसके उचित उपयोग द्वारा हम क्रिया कोक तीव्र व धीमी कर सकते है। उपर्युक्त शोध के बाद इस विषय पर कई अनुसंधान व प्रयोग हुए हैं। ‘द् सीक्रेट पॉवर ऑफ पिरामिड’ में विपुल और एड पेरिट ने वृक्ष वनस्पति, ठोस द्रव पदार्थों, जीव जंतुओं व मानवीय चेतना पर पड़ने वाले इसके रहस्यमय व उल्लेखनीय प्रभावों का विस्तार से वर्णन किया हैं।

वैज्ञानिकों ने बीजों के अंकुरण व पौधे के विकास पर पिरामिड शक्ति का अद्भुत प्रभाव देखा है। उनके अनुसार पिरामिड में रखे गये बीज अधिक तीव्रता के साथ अंकुरित होते हैं। मैक्सग्रेथ ओर ग्रेग नेल्सन ने अपनी पुस्तक’ पिरामिड पॉवर’ में ऐसे ही प्रयोगों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि बागवानों ने पाया है, जो बीज बोये जाने से पूर्व पिरामिड में रखे गए थे, वे अधिक तीव्रता से अंकुरित हुए व इन्हें अन्य बीजों की अपेक्षा कम समय में अधिक स्वस्थ व सबल पौधों के रूप में विकसित होते देखा गया।

आरिगन की मनःचिकित्सक टेनीहेल का दावा है कि उसने एक पौधों का कटा हिस्सा पिरामिड ऊर्जा में रखा, जो पाँच दिनों तक जीवित रहा। जबकि इसका दूसरा हिस्सा बाहर पानी में रखने पर आधे घंटे में ही मुरझा गया। इतनी ही नहीं पिरामिड में एक सप्ताह या अधिक समय तक रखे गए जल द्वारा सींचे जाने पर पौधों की विकास गति भी अधिक तीव्र देखी गयी। इसी के अंतर्गत एक प्रयोग के तहत टमाटर की पौध को खेत में रोपे जाने से पूर्व दो सप्ताह तक पिरामिड में रखा गया। इन पौधों का विकास सामान्य टमाटर के पौधों की अपेक्षा बहुत अच्छा देखा गया व इनकी उत्पादन क्षमता भी असाधारण रही। इस क्रम में अलग-अलग क्षेत्रों में पौधों के विकास पा पड़ने वाले भिन्न-भिन्न प्रभावों को जानने के लिए भी प्रयोगों की एक श्रृंखला आयोजित की गयी। इन प्रयोगों में पिरामिड के शीर्ष पर तीव्रतम गति से पौधों को विकसित होते देखा गया, जबकि फर्श पर रखे गये पौधे सबसे धीमी गति से बड़े हुए।

प्रयोगकर्ता ने द्रवपदार्थों पर भी पिरामिड शक्ति के पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया है। एक प्रयोग के अंतर्गत ताजा दूध को दो समान के बर्तनों में भरा गया। एक बर्तन को पिरामिड के अंदर रखा गया और दूसरे को उसी के समान वायु, ताप वक प्रकाश की परिस्थितियाँ में रखा गया। छह दिन के बाद पिरामिड के अंदर वाले दूध में दही की परतें जमना शुरू हो गयी थी। जबकि बाहर के दूध में जम रही दही की सतह पर फफूँद जमने लगी थीं। एक दिन बाद इसमें और भारी फफूँदी जम गयी थी और इसे फेंकना पड़ा। छह सप्ताह बाद प्रयोग पूरा हुआ व पिरामिड में रखा दूध ठोस मलाईदार चिकने पदार्थ में बदल गया, जो दही की तरह दिख रहा था व स्वाद में भी वैसा ही था। इस पर किसी तरह की फफूँदी के कोई भी निशान नहीं थे। इस विशेषता को देखते हुए फ्राँस की एक कम्पनी ने दही बनाने के लिए पिरामिड आकार के उपकरण बर्तनों को पेटेंटीकरण करा लिया है। इटली की एक कम्पनी भी दूध के लिए पिरामिड आकृति के कार्बन प्रयोग में ला रही हैं।

आकहामा के एक रसायनविद् ने एक प्रयोग में पाया कि बैक्टीरिया संक्रमित दूध को पिरामिड में रखने पर दस दिनों के अंदर १६ प्रतिशत बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं। पिरामिड के अंदर चार सप्ताह तक रखा गया जल, सामान्य जल की अपेक्षा अधिक शीघ्रता से वाष्पित होता हैं २५. ग्राम जल पर पिरामिड के अंदर एवं बाहर कई प्रयोग किए गये। प्रत्येक बार पिरामिड में रखा हुआ जल, पन्द्रह दिन के अंतराल में

बाहर रखे गये जली की अपेक्षा २१ ग्राम अधिक वाष्पित हो रहा था।

विशेषज्ञों के अनुसार पिरामिडीय जल को कटे व जले हिस्से पर लगाने से घावों को शीघ्र ठीक होते देखा गया है। इनके अनुसार प्रतिदिन एक गिलास जल पाचनतंत्र को अधिक सशक्त करता है इससे अपच शीघ्र ठीक होती हैं और पेट अच्छे ढंग से साफ होता हैं। श्रीमती पेटिट ने पिरामिड द्वारा आवेशित जल को पाँच सप्ताह तक त्वचीय लोशन के रूप में प्रयोग करने पर सौंदर्य में निखार आते हुए देखा है। द्रवपदार्थों के अतिरिक्त ठोस खाद्य पदार्थों पर भी पिरामिड ऊर्जा के प्रभाव देखे गये है। माँस को पिरामिड में तीन सप्ताह तक रखने पर इसके भार में ६६ प्रतिशत की कमी तो अवश्य आयी परंतु यह खराब नहीं हुआ।

विज्ञान वेत्ताओं द्वारा पिरामिडों के अंदर किया गया आहार परीक्षण, मृत शरीर का ममी बनना और निर्जलन की उच्च दर यह स्पष्ट करते है कि पिरामिड में सक्रिय ऊर्जा विद्युत चुम्बकीय स्पैक्ट्रम के सूक्ष्म हिस्से की ओर से हैं लेकिन इसमें चुम्बकीय गुण भी है, जिसके प्रभाव से रेजर के ब्लेड की धार को तीखा होते देखा गया है ऐसी ही एक ब्लेड से ५. से २... तक शेव करते देखा गया हैं। अच्छे स्तर की सटी से बेहतर परिणाम पाए गये। इससे यह स्पष्ट होता है कि जितना अधिक धातु रूप में गैरलौहतत्व इसमें विद्यमान होता है उतना ही पिरामिड ऊर्जा कस धातु के परमाणुओं पर प्रभाव कम पड़ता है।

पेड़ पौधों, खाद्य-पदार्थों धातु आदि पर पिरामिड ऊर्जा के प्रभाव के साथ इसका मनुष्य शरीर व चेतना पर पड़ने वाले प्रभावों का भी व्यापक अध्ययन हुआ है। पिरामिड के अंदर कटे अंग, जख्म व खरोंच आदि शीघ्र ठीक होते देखे गये हैं। ‘द् सीक्रेट पॉवर ऑफ पिरामिड ‘ के सहलेखक एड पेरिट ने अपने स्वयं के अनुभव का उल्लेख पुस्तक में किया है। उनके प्रोस्टेट रोग के लक्षण उभर आए थे इसी दौरान प्रयोग के तौर पर पेरिट ने सप्ताह में दो तीन रातें पिरामिड में सोना प्रारंभ किया। साथ ही नियमित रूप से पिरामिडीय जल का प्रयोग करते रहे। छह माह के अंतराल में प्रोस्टेट की तकलीफ छूमंतर हो गयी। जाँच करने पर इसके कोई भी लक्षण नहीं नजर आए।

‘पिरामिड पॉवर’ के लेखक मैक्सटॉय और ग्रेगनेलसन ने ऐसे लोगों का भी उल्लेख किया है। जो पिरामिड के समीप सोने भर से ठीक हुए। कुछ लोगों ने पिरामिड मॉडल को अपने बिस्तर या कुर्सी के समीप रखा। पिरामिड के सान्निध्य में कई रात की नींद या कई दिनों तक साथ बैठने भर से लोग के लक्षण एकदम विलुप्त हो गये या बहुत कुछ ठीक हो गये। विशेषज्ञों के अनुसार पिरामिडीय ऊर्जा मनुष्य की कायचेतना ही नहीं उसकी मनः चेतना को भी प्रभावित करने में सक्षम हैं। प्रयोगकर्ता वैज्ञानिकों ने कई ऐसे लोगों पर प्रयास किए, जिन्हें पिरामिड की कोई खास जानकारी नहीं थी। उन्हें पिरामिड के अंदर बैठने के लिए कहा गया और उनके अनुभवों का संग्रह किया गया। जिसके सर्वमान्य निष्कर्ष थे, संसार नीरवता एवं शांति की अनुभूति, संसार से अधिक अनासक्ति व भौतिक सुख भोगों में कम रुचि। ध्यान से परिचित लोगों ने बताया कि वे अधिक सरलता से मन को एकाग्र कर पा रहे थे। सभी विश्रांति का अनुभव कर रहे थे। व स्वयं को ऊर्जा द्वारा आवेशित पा रहे थे। नियमित रूप से पिरामिड ढाँचे में ध्यान का अभ्यास करने को कहना है कि उन्होंने ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के साथ एकात्मकता का अनुभव किया। कुछ लोगों को तरह-तरह की आध्यात्मिक अनुभूतियाँ हुई व कुछ लोगों ने अपनी अतीन्द्रिय क्षमताओं को जाग्रत पाया।

आँरीगन की अतीन्द्रिय क्षमता संपन्न महिला टेनी हेल ने एक सप्ताह तक पिरामिड के अंदर किए गये गहन ध्यान व उपवास से अपने अंदर अद्भुत परिवर्तन अनुभव किया। उनकी पूर्व विद्यमान अतीन्द्रिय क्षमताओं में और निखार आ गया। ध्यान के बाद पिरामिड से बाहर आते ही उनके मस्तिष्क में दैवी संदेशों की बाढ़-सी आ जाती हैं। एक बार तो उन्होंने टाइपराइटर के पास बैठकर इसी स्थिति में लगभग सौ अलग-अलग तरह की भविष्यवाणियाँ कर डाली, जिनमें अधिकांशतः समय की कसौटी पर सही निकली।

फ्लोरिडा के दो अतीन्द्रिय शोधकर्ता रॉन आस्टर्ब्रो और श्रीमती रोज स्टीमन लकड़ी से बने एक विशाल पिरामिड में रहते हैं। वे मात्र फलों का रस लेते हैं और अधिकांश समय ध्यान में लगाते हैं। एक माह के बाद इस दंपत्ति ने शारीरिक कष्टों में हलकेपन का अनुभव किया। उन्हें जीवन का स्वरूप व मूल उद्देश्य अधिक स्पष्ट हो गया और दैवी संदेश भी आने लगे। स्वप्न अधिक स्पष्ट व सजीव हो गये। कई लोगों का कहना है कि पिरामिड ऊर्जा का नियमित सेवन एकाग्रता को बढ़ाता है विद्यार्थियों ने इसके द्वारा अपनी पढ़ाई लिखाई में आशातीत सुधार होते देखा। पिरामेडीटेशन के प्रधान व पिरामिडगाइड के संपादक गैरीस्टोप ने अपने प्रयोगों में पाया कि पिरामिड में ध्यान करने वालों की मस्तिष्कीय तरंगों की सक्रियता में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी होता है। करेलडर्वल पिरामिड को कॉस्मिकएंटीना की संज्ञा देते है, जो उनके अनुसार ब्रह्माण्ड में व्याप्त गहन स्तर के ऊर्जा स्रोत से ट्यूनिंग करता है और इसे केन्द्र में फोकस करता है। उनके अनुसार शायद इसी कारण प्राचीनकाल में मिश्र के धर्मपुरुष सूर्यदेवता की उपासना में पिरामिडीय टोप का उपयोग करते थे। इसके द्वारा उनका उद्देश्य सूर्य की विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा को मस्तिष्क में केंद्रित कर ग्रहण करना था।

मिश्र के गेट पिरामिड के अन्दर चेतनात्मक परिवर्तन के अलौकिक अनुभवों की कुछ ऐतिहासिक घटनाएँ उल्लेखनीय है। १९७८ में नेपोलियन बोनापार्ट ने मिश्र पर विजय पा ली थी। व मिश्र के महान पिरामिड में भी पधारे और बादशाह कक्ष में प्रवेश करने पर कुछ समय एकाकी रहने का आग्रह किया।’ सीक्रेट ऑफ ग्रेट पिरामिड’ पुस्तक में पीटर हाॅपकिन घटना का उल्लेख करते हुए लिखते है कि बाहर आने पर नेपोलियन को बहुत पीला और प्रभावित होते देखा गया था। जब एक सहायक ने विनोदात्मक स्वर में पूछा कि क्या कोई रहस्यात्मक दर्शन हुए है? तो बोनापार्ट ने रूखे स्वर में कहा था कि इस घटना की दुबारा चर्चा न की जाए। बस उन्होंने मात्र इतना संकेत किया कि उन्हें अपनी नियति का पूर्वाभास हो गया है।

१९३. के दशक में दार्शनिक लेखक डॉ. पाल ब्रंटन की पिरामिड में बितायी गयी एक रात का घटनाचक्र भी अलौकिक रहस्यों का उद्घाटन करता है। उनसे एक सौ वर्ष पूर्व व उसके बाद आज तक शायद ही कोई गीजा के पिरामिड में पूरी रात ठहरा हो। विशेष अनुरोध पर ही उन्हें अनुमति दी गयी थी। संकल्प के धनी ब्रंटन महोदय पिरामिड में निहित सत्य की खोज के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने एक रात केन्द्रीय कक्ष में खुद अंधेरे में बितायी। वहाँ वह मन शांत व स्थिर करके बैठ गए। धीरे-धीरे अदृश्य जगत के जीवन दर्शन शुरू होने लगे। एक कालप्रेत उनकी ओर बढ़ा और धमकी भरी मुद्रा में उसने अपने दोनों हाथ उनकी ओर उठाए मानो वह उन्हें भयाक्रान्त करना चाहता हो। ऐसे अनेक प्रयास और हुए। अंत में इसका चरमोत्कर्ष आया। भयावह भूत की घटनाएँ निम्न जगत की शैतानी दहशत उनके चारों ओर इकट्ठा होती गयी।

इस घटनाचक्र का अंत सनसनीखेज आकस्मिकता के साथ हुआ। वहाँ सब कुछ शांत हो गया। पुनः एक नई उपस्थिति अनुभव हुई। भयावह, दुष्ट व शैतानी वातावरण अब पवित्रता व सात्विकता से भर गया। डॉ. ब्रंटन ने कई दोस्ताना व शुभचिंतक आत्माओं को अपनी ओर आते देखा। वे लम्बे थे और सफेद वस्त्र पहने थे। वे मनुष्य से अधिक कुछ देवतुल्य लग रहे थे। कुछ देर तक उन्हें देखते रहने के बाद इसमें से एक बोला कि ब्रंटन महोदय तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था। लेकिन जब उन्होंने अपनी अडिगता का संकल्प दुहराया, तो देवपुरुष बोला ऐसा ही हो! तुम्हें चुन लिया गया, अपने संकल्प को निभाना अलविदा!

जब प्रथम आकृति चली गयी, तब फिर दूसरी समीप गयी और बोली मेरे पुत्र! गुह्यशक्तियों की समर्थ सत्ता ने तुम्हें अपने हाथों में ले लिया हैं। इसी के साथ उन्हें पत्थर की शवपेटिका पर लेटने के लिए कहा गया। उनका सारा शरीर धीरे-धीरे सुन्न पड़ गया। इसके बाद जैसे वह अज्ञात में कूद पड़ा। शरीर के बाहर एक बोतल उन्हें पिरामिड के अन्य भाग में ले गया, जहाँ उन्हें शिक्षण दिया गया। जिसकी चर्चा ब्रंटन महोदय ने नहीं की। ’द् विज्डम ऑफ ओवरसेल्फ’ नामक अपनी रचना में उन्होंने पिरामिड रहस्यों का सार प्रकट करते हुए लिखा है। पिरामिड का रहस्य वास्तव में मनुष्य के अपने और पुरातन दस्तावेज संग मानवीय प्रकृति में विराजमान है।”

पिरामिड के रहस्यों की खोज में अभी मनुष्य के कई प्रश्न अनुत्तरित है। पिरामिड में अभी और क्या ज्ञान छिपा है? इसमें विद्यमान ऊर्जा का स्वरूप क्या है? इस ज्ञात व अज्ञात ऊर्जा का मूल श्रोत क्या है? पिरामिड में और क्या-क्या रहस्यों का उद्घाटन होना है? लगता है कि मानवीय चेतना का समग्र अनुसंधान किए बिना यह खोज अधूरी ही रह जाएगी।

पूर्व अंतरिक्षयात्री एडगर मिचैल के अनुसार हम अज्ञात की खोज में अपनी क्षमता की बाह्य सीमाओं की बुलन्दियों को छू रहे हैं। इस खोज को और आगे बढ़ाने के लिए हमें इनके अन्वेषणकर्ता का भी अध्ययन करना होगा। यदि ज्ञान और ऊर्जा के सभी मार्ग चेतना की ओर जाते है, तो हमें अंत इसे भी समझना होगा, अन्यथा यात्रा लक्ष्य से भटक जाएगी। यह भी मनुष्य के पिरामिड का संदेश प्रतीत होता हैं। जो कभी आरेकल ने दिया था कि ऐ मनुष्य! स्वयं को जान।

आखिर ब्रह्माण्ड में विद्यमान समस्त आकृतियों और संरचनाओं में मनुष्य ऊर्जा का उत्पादन, अभिवर्द्धन व उपयोग करने वाला सबसे जटिल और सक्षम माध्यम हैं। उसके अन्दर सारा ब्रह्माण्ड समाया हुआ है। ज्ञान-विज्ञान और शक्ति की सारी संभावनाएँ उसमें बीज रूप में विद्यमान है। प्रत्येक प्रयोग में इसके अभिन्न रूप से जुड़े होने के कारण कोई भी प्रयोग या खोज इसके प्रभाव से अछूती नहीं रह सकती। पिरामिड के अध्ययन व रहस्योद्घाटन में भी मानवीय चेतना की प्रभावोत्पादक क्षमता व उसकी हिस्सेदारी एक महत्वपूर्ण घटक है। इसके रहस्यों की कुँजी मानवीय चेतना के रहस्यों में छिपी है उस गति से हम मानवीय चेतना के विविध आयामों से अवगत होंगे, उतना ही अधिक हम पिरामिड में निहित रहस्यों का समझ पाएँगे। डॉ. पाल ब्रंटन का यह कथन करता प्रतीत होता है। कि बाहर के पिरामिड को जानने से पूर्व अंदर के पिरामिड का साहचर्य भी हमें इसी ओर प्रेरित करता और सहायक सिद्ध होता है। दैनिक जीवन से लेकर आत्मिक जीवन तक पिरामिडों का सहयोग हम सबके लिए वरदान से कम नहीं।


सहयोग सहकार का अनोखा पाठ

वह गाँव का सबसे धनी किसान था। उसके पास तीन सौ बीघा जमीन थी। गाय-भैंस तथा भेड़-बकरियों के रेवड़ उसके पास थे। नकद रुपये जितने उसके पास थे, गाँव में किसी व्यक्ति के पास नहीं थे। वह कम ब्याज पर लोगों को रुपये उधार भी देता था। इसीलिए उसकी प्रसिद्धि ‘बोहरा’ के रूप में हो गयी थी।

उसके चार बेटे थे किशन बोहरा ने अपने चारों बेटों के लिए एक सी चार हवेलियाँ बनवा दी थी। घर में सभी प्रकार की सम्पन्नता थी, लेकिन फिर भी कोई चिन्ता बाकी रह गयी थी तो वह चारों बेटों का आपसी वैमनस्य। उसने अपने बेटों को बहुत समझाया, किंतु वे आपस में झगड़ना छोड़ते ही न थे। एक बार जब वह बीमार हुआ, तब उसने मन में विचार किया कि अब मैं कुछ ही दिनों का मेहमान हूँ, पता नहीं अब किस दिन मेरे प्राण पखेरू उड़ जाएँ।

यही सब सोचते हुए उसने अपने चारों बेटों को बुलाया। उन्हें पास बिठाकर वह कहने लगा-बेटों-मैं अब काफी बूढ़ा हो गया हूँ और मेरा अंतिम समय समीप है। मैं शान्ति से प्राण त्याग सकूँ। इसलिए तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ। पहली बात तो मैं तुमसे यही चाहता हूँ कि तुम परस्पर झगड़ा मत करो। एकता से रहो, संगठित रहो। दूसरी बात यह है कि मेरे मरने के बाद तुम घर के बँटवारे पर आपस में झगड़ना मत। मेरे पलंग के पायों के नीचे मिट्टी के चार बरवों को तुम स्वेच्छा से एक एक ले लेना, वही तुम्हारे हिस्से की जायदाद होगी। अब तुम प्रण करो कि भविष्य में एकता व प्रेम से रहोगे। उसके चारों बेटों ने अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए एकता से रहने का संकल्प लिया।

कुछ दिन बाद किशन बोहरा का देहांत हो गया। तेरह दिन तक पूर्ण विधि विधान से उसके बेटों ने उसके क्रियाकर्म किए। उसके बाद चारों भाइयों ने पलंग के पायों के नीचे से वे वार बरवे निकाले, जो उसने अपने बेटों की वसीयत के रूप में रखे थे। बरवे देखकर वे चारों अचंभे में पड़ गये। क्योंकि उन बरवों में से एक बरवे में कुछ सिक्के, दूसरे बरवे में कुछ हड्डियाँ, तीसरे में मिट्टी तथा चौथे में कुछ कंकड़ रखे थे।

वसीयत की इस गुत्थी को उन चारों भाइयों में से कोई भी सुलझाने में समर्थ नहीं था। चारों बरवे निकालकर वे एक दूसरे का मुँह देखने लगे, मानो आपस में पूछ रहे हो कि यह बँटवारा हमारी वसीयत है या फिर कोई पहली। पूरे गाँव में यह चर्चा गर्म हो गयी कि किशन बोहरा के पलंग के चारों पायों के नीचे से जो बरवे निकले है, उनमें सिक्के, हड्डियाँ, मिट्टी तथा कंकड़ हैं और कुछ नहीं।

गाँव के बहुत से लोग आए किंतु बटवारे की इस गुत्थी को कोई भी सुलझाने में समर्थ नहीं था। उनके गाँव से थोड़ी दूर पर एक गाँव था-उदयपुर उदयपुर गाँव के पटेल पूरणसिंह की ख्याति चारों ओर इस विशेषता के कारण फैली हुई थी कि वे जटिल से जटिल समस्या का समाधान पलभर में कर देते थे। उन चारों भाइयों में से सबसे बड़ा भाई एक दिन अपने तीनों भाइयों को लेकर पटेल पूरणसिंह के घर गया और उन्हें अपनी आपबीती कह सुनायी। पटेल पूरणसिंह ने उन चारों को आश्वस्त किया कि उनकी समस्या का समाधान हो जाएगा। पटेल ने चारों बरवे अपन पास रखकर उन चारों को पाँच दिन बाद आने के लिए कहकर विदा किया।

पाँच दिन बाद वे चारों भाई जब पटेल पूरणसिंह के पास आए, तो वह बटवारे की गुत्थी सुलझाते हुए बोला जिस बरवे में मिट्टी है, उसे स्वीकार करने वाले के हिस्से में पूरी जमीन रहेगी। तुममें से जो भाई सिक्कों वाला बरवा स्वीकार करेगा वह नकदी तथा घर के सोने-चाँदी का मालिक होगा। हड्डियों वाले बरवे का स्वामी घर के तमाम मवेशियों का हकदार होगा और जिसके हिस्से में कंकड़ों वाला बरवा आएगा। वह सारे मकानों का अधिकारी होगा।

चारों भाइयों को बँटवारे का रहस्य समझ में आ गया। किंतु बड़ा भाई रामदीन कुछ सोचकर उदास हो गया। पटेल ने उसकी उदासी भाँपते हुए पूछा, क्यों भाई! अब क्या नयी समस्या आ गयी, जो तुम उदास हो गये।

रामदीन कहने लगा-मेरे हिस्से में सारी नकदी तथा घर के जेवरात आ गये मान लो। यहाँ तक तो बात ठीक है किंतु मकान, जमीन तथा पशुधन पर तो मेरा कोई हक नहीं होगा और एक किसान के लिए तो ये सब आवश्यक हैं यह बात तो आप भी भली-भाँति जानते है, क्योंकि वो भी किसान हैं इस तरह अलग-अलग तो हम सभी अधूरे रहेंगे।

अब रामदीन की बातों को उसके भाइयों ने भी समझा वे भी इस बटवारे को स्वीकारने से झिझकने लगे।

पटेल पूरणसिंह बोले-भाइयों इस बटवारे का अर्थ है कि तुम अलग-अलग न होकर साथ-साथ रहो। यह तो तुम्हारे पिता ने तुम चारों को सहयोग सहकार का अनोखा पाठ पढ़ाया है। तुम्हारे पिता स्वर्गीय किशन बोहरा बहुत बुद्धिमान व्यक्ति थे। तुम्हें वे हमेशा संगठित रहने को आगाह करते रहते थे और इस बटवारे से एक बार फिर वे तुमको रास्ता दिखा रहे हैं कि बिखरो मत, एक रहे, आपस में प्यार से रहो। परस्पर सहयोग सहकार में ही तुम सबका भला हैं।

पटेल की बात उन सभी ने गाँठ बाँध ली। अपने पिता और पटेल की बुद्धिमानी की प्रशंसा करते हुए उनके पाँव अपने घर की ओर मुड़ चले। पर उन सभी का मन उस अनोखे पाठ को मनन करने में तल्लीन था।


विज्ञान के युग में करें अब इलेक्ट्रॉनिक ध्यान’

मानवी काया से सतत् विविध प्रकार के विद्युतीय संकेत निकलकर बाह्य वातावरण में विसर्जित होते रहते है, जिन्हें विभिन्न उपकरणों के माध्यम से जाँचा-मापा और उनसे उत्पन्न संकेतों को सुना तथा देखा जा सकता है। तदुपरान्त यह ज्ञात किया जा सकता है। कि शरीर स्वस्थ है अथवा अस्वस्थ। हृदय से निस्सृत विद्युतीय तरंगें सबसे अधिक सशक्त होती हैं। इनके कमजोर पड़ने अथवा अधिक बढ़ जाने पर जीवन संकट का सामना करना पड़ता है और धड़कन बंद होते ही व्यक्ति को मृतक घोषित कर दिया जाता है।

मस्तिष्क से भी लगातार विद्युत तरंगें मानसिक स्थिति के अनुरूप विविध रूपों में निकलती रहती है, परंतु हृदय से निकलने वाली तरंगें की तुलना में ये अपेक्षाकृत कमजोर और जटिल होती है। इसके अतिरिक्त त्वचा एवं माँसपेशियों से निस्सृत संकेतों की आवृत्ति उच्च होती हैं। ये सभी संकेत यह बताते हैं कि मनुष्य की वास्तविक मनःस्थिति एवं उससे संचालित शारीरिक स्थिति कैसी है। मानसिक स्थिति के अनुसार ही व्यक्तित्व का निर्धारण होता है।

इस संदर्भ में प्रख्यात अमेरिकी मनोवैज्ञानिक जे. कमिया तथा डॉ. बारबरा ब्राउन ने गहन अनुसंधान करने के उपरांत बताया कि यदि शरीर से निकलने वाले विभिन्न विद्युतीय संकेतों में किसी तरह आवश्यक परिवर्तन या परिवर्धन किया जा सके। तो न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रखा जा सकता है, वरन् मानसिक चेतना को भी परिष्कृत किया एवं उच्चस्तरीय बनाया जा सकता है। इनका मत है कि जब तक हम अपने अंतर बाह्य प्रक्रियाओं तथा उन पर पड़ने वाले विचारों एवं संकल्पों के प्रभाव को अच्छी तरह समझ नहीं लेते, तब तक चेतना के क्षेत्र में वाँछित परिवर्तन कर सकने में समर्थ नहीं हो सकते, क्रिया–कलापों के प्रति जागरूकता न होने पर उनको नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इसके लिए बायोफीडबैक पद्धति को बहुत उपयोगी पाया गया है।

योगविद्या के निष्णात जानते हैं कि योगाभ्यास की विविध प्रक्रियाएँ शारीरिक एवं मानसिक क्रिया–कलापों के नियंत्रण में प्रभावकारी भूमिका निभाती हैं। उनके साथ विचारणाओं -भावनाओं के परिष्कार का उपक्रम भी जुड़ा रहता है। इसके बिना समाधिस्तर का सुख एवं चेतना के उच्च आयामों की उपलब्धि नहीं होती, परन्तु यह एक समय एवं श्रमसाध्य प्रक्रिया है। आधुनिक विज्ञानवेत्ताओं ने योगाभ्यास कर प्रथम आवश्यकतापूर्ति के निमित्त बायोफीडबैक पद्धति को सर्वोत्तम पाया है। इसके द्वारा उपलब्ध परिणामों को मशीन पर चर्मचक्षुओं द्वारा सीधे देखा जा सकता है, जबकि पूर्ववर्ती प्रक्रिया अनुभूतिमूलक है। सामने चलते हुए संकेतों अथवा कौंधते हुए विभिन्न लाइटबार को देखकर साधक सकता है और तद्नुरूप उसमें हेर-फेर कर सकता है। इतना नहीं, इनके द्वारा समस्त शारीरिक हलचलों, हृदय, माँसपेशियों, त्वचा, रक्त के अतिरिक्त प्रत्येक कोशिका की गतिविधि को जाना और स्वसंकेत द्वारा उन पर नियंत्रण साधा जा सकता हैं।

सुप्रसिद्ध मनोवेत्ता एल्मरग्रीन का कहना है कि काया पर मन का आधिपत्य है, अतः उसे प्रशिक्षित करके समस्त कायिक अंग-अवयवों कोशिकाओं को वशवर्ती बनाया जा सकता हैं। क्योंकि यह सभी मन से संचालित है, अतएव माँसपेशियों में उत्पन्न तनाव एवं सिरदर्द जैसी सामान्य बीमारियों को बायोफीडबैक द्वारा सरलतापूर्वक दूर किया जा सकता है। इससे संबद्ध व्यक्ति इलेक्ट्रोमायोग्राफ पर अपनी पेशियों द्वारा छोड़े गये विद्युत चुम्बकीय विकिरण को देखता और इच्छाशक्ति का प्रयोग कर उन्हें इच्छित तरीके से सिकुड़ने फैलाने का निर्देश देता हैं। अभ्यास द्वारा इससे उसी तरह के सुखद परिणाम निकलते है, जिस तरह से प्रशिक्षित मस्तिष्क से शान्तिदायक अल्प तरंगों के निर्माण से मिलते है। इस उपचार में किसी बाह्य चिकित्सक की आवश्यकता नहीं पड़ती, वरन् विशेषज्ञ द्वारा इलेक्ट्रोड आदि लगाने की प्रक्रिया ज्ञात हो जाने पर अकेले भी किया जा सकता है। यह पूर्णतया ’ऑटोसजेशन’ प्रक्रिया पर आधारित है। रॉकफेलर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञानी डॉ. एडमण्ड डेवन ने इस विधि द्वारा विकलाँग व्यक्तियों की संकल्पशक्ति को जगाकर बेकार बने अंगों को सक्रिय बनाने में आशातीत सफलता पायी है उनके अनुसार इससे माँसपेशियों की निष्क्रियता एवं तनाव को भी सफलता पूर्वक दूर किया जा सकता है।

हृदय की गति विधियों पर सामान्य मनुष्यों का कोई नियंत्रण नहीं होता, किंतु योगाभ्यासियों के लिए नाड़ी की गति, हृदय की धड़कन आदि को इच्छानुसार घटा-बढ़ा लेना, लयबद्धता को सुस्थिर बना देना एक सामान्य क्रिया होती हैं। अभ्यास द्वारा अनैच्छिक पेशियों को भी नियंत्रित कर लेने में वे अनियमितता ’सायनस टैकिकार्डिया’ से लेकर हृदय गति रुकने (हार्टब्लॉक) तक का निमित्त कारण बनती हैं। इसे असामयिक मरण से छुटकारा पाया जा सकता है, वरन् दीर्घजीवन की उपलब्धि भी संभव है। अनुसंधानकर्ता डॉ. एल्मरग्रीन ने हृदय रोगियों पर किए गये बायोफीडबैक अध्ययनों में पाया है कि जिन व्यक्तियों की हृदयगति ११. प्रति मिनट थी, तीन माह के अभ्यास से वे ७. प्रति मिनट तक गति को कम करने में सफल हुए। उनके अनुसार इस तरह के बाह्य उद्दीपन, जो यंत्र पर लाल-हरे आदि प्रकाश के रूप में दीखते रहते है, व्यक्ति को अपने संकल्पबल को प्रखर बनने एवं अधिकाधिक कुशलता प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करते है। इच्छाशक्ति के विकास के साथ ही अंतः प्रक्रियाओं पर नियंत्रण सधता जाता है।

'हाइपरटेन्शन' अर्थात् उच्च रक्तचाप इस शताब्दी की सबसे बड़ी बीमारी है। विश्व में ऐसे लोगों की संख्या करोड़ों में है, जिन्हें उच्च रक्तदाब की शिकायत है। अकेले भारत में प्रायः पाँच करोड़ से अधिक व्यक्ति इस रोग से पीड़ित है। इस श्रेणी में प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में नये रोगी जुड़ते जाते है। चिकित्सक एवं दवाइयाँ भी इसमें कोई स्थायी राहत नहीं दिला पाते। वस्तुतः यह एक मनोशारीरिक रोग है, जो चिंतनक्षेत्र की विषमता एवं तनाव के कारण पनपता है। इसका उपचार भी तद्नुरूप ही ढूँढ़ा जाना चाहिए। विशेषज्ञों ने अल्फा ई. ई. बायोफीडबैक को इसके लिए बहुत उपयुक्त पाया है। एक ओर इस उपक्रम में जहाँ मन को विधेयात्मक विचारणाओं से परिपूरित करने का अवसर मिलता है। वहीं भावना क्षेत्र का परिशोधन कर संकल्पबल को बढ़ाया जाता है। हृदय की गतिविधियों एवं ब्लडप्रेशर को नियंत्रित करने में यह युक्ति बहुत कारगर सिद्ध हुई है।

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि वर्तमान समय की अधिकांश बीमारियों का जनक दैनिक जीवन में बढ़ता जा रहा तनाव है। इससे शरीर की ऊपरी त्वचा से लेकर रक्तवाही शिराओं की आंतरिक संवेदनशील माँसपेशियाँ तक प्रभावित हुए बिना नहीं रहती। शवासन, शिथिलासन जैसी योगाभ्यास परक प्रक्रियाओं द्वारा इसे दूर कर लिए जाने का विधान योगशास्त्र में है, फिर भी अब नये आविष्कारों के साथ ही मस्तिष्कीय शक्ति एवं यांत्रिक सुविधाओं के सम्मिलित प्रयोग से कम समय में सरलतापूर्वक इसे सम्पन्न किया जा सकता है। इसी प्रकार थर्मलसेन्सर द्वारा शारीरिक तापमान के उतार-चढ़ावों को निरखा-परखा जा सकता है और स्वसंकेत द्वारा उसे नियमित स्तर पर लाया जा सकता है।

इसी प्रकार जी.एस.आर. बायोफीडबैक द्वारा त्वचा की विद्युतीय प्रतिरोधी क्षमता को घटाया-बढ़ाया जा सकता है। बढ़ी हुई त्वचा प्रतिरोधी क्षमता तनाव शिथिल्य एवं सक्रियता का चिह्न है। मन की उत्तेजना, व्यग्रता सबसे पहले त्वचा प्रतिरोध में ही परिलक्षित होती हैं। शरीर की प्रतिरोधी सामर्थ्य को शक्तिशाली बनाने हेतु स्वसंवेदन, ध्यान प्रक्रिया का प्रयोग किया जा सकता है। एवं विधेयात्मक प्रतिक्रिया का संकेत यह उपकरण देता रह सकता है। इसे इक्कीसवीं सदी के इलेक्ट्रॉनिक मेडीटेशन की उपमा दी गयी है।

इसके अतिरिक्त अनेक ऐसे उपकरण भी है, जिनसे मनोकायिक विद्युतीय संकेतों को पकड़ पाना तो संभव नहीं पर उस अवस्था का अनुमान लगाना सरल है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि शरीर मन कितने सक्रिय निष्क्रिय है। मन की उत्साहहीनता शरीर पर बोझ बनकर सवार रहती है। जो कार्य के परिणाम को बड़े स्तर पर प्रभावित करती है। मनुष्य इन दिनों अपने ही कारणों को लेकर उधेड़बुन में इस कदर फंसा हुआ है कि इससे उसकी मानसिक सजगता और तत्परता कुंद पड़ गई हैं। नतीजा यह होता है कि व्यक्ति को कई बार भारी हानि उठानी पड़ती है, लाभ की संभावना कम हो जाती, असफलता के आसार बढ़ जाते है एवं सफल लोगों का स्तर घट जाता है, अनेक मौकों पर जीवनसंकट भी उपस्थिति हो जाता है।

बर्लिन यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञानी जे.ए.जेड का अभिमत है कि वर्तमान में विश्वभर में सड़क दुर्घटनाओं में जो अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, उसका एक प्रमुख कारण औसत आदमी की मानसिक सजगता में संव्याप्त कमी है। जैसे-जैसे जीवन की जटिलता बढ़ी है, वैसे ही वैसी मानसिक जागरूकता में ह्वास हुआ है और आज वह इस बिन्दु पर पहुँच चुकी है। जिसे चरम नहीं तो कम भी नहीं कहा जा सकता। इस कमी को ’ऑडियो विजुअल रिएक्शन टाइम’ द्वारा मापा जा सकता है।

मानवी मस्तिष्क सम्पूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है। उसके विभिन्न केन्द्रों और हिस्सों में जितना अधिक संतुलन, सक्रियता और प्रमुखता होगी, व्यक्तित्व भी उसी के अनुरूप संतुलित, सफल या असफल होगा। अधिकांश व्यक्तियों में देखा गया कि मस्तिष्क के दायें-बायें दोनों गोलार्धों के मध्य सामंजस्य का अभाव है। इस अभाव के कारण व्यक्ति के जीवन में अनेक प्रकार की कठिनाइयों और परेशानियाँ पैदा होती है। विशेषज्ञ बताते है कि मस्तिष्क का बायाँ हिस्सा अनुभूति अंतर्ज्ञान, भावना, समझ के लिए जिम्मेदार है, जबकि दांया भाग तर्क, बुद्धि, विचार एवं विश्लेषण जैसी भूमिकाओं का निर्वाह करता है। इनमें परस्पर तालमेल न हो, तो स्थिति वैसी ही पैदा हो जाती है, जैसी परिवार के सदस्यों के बीच उक्त गुणों के अभाव में होती हैं इस अभाव को जानने और नापने के लिए जो यंत्र उपयोग में लाया जाता है, उसे ‘मिरर इल्यूजन’ कहते है उपयुक्त दोनों स्थितियों में सामंजस्य के लिए जप और ध्यान का अभ्यास काफी कारगर सिद्ध हुआ है।

‘न्यू माइण्ड न्यू बॉडी’ नामक अपनी पुस्तक में मनोचिकित्सक डॉ. बारगरा ग्राउन कहती है कि ‘बायोफीडबैक’ द्वारा मनःस्थिति की उत्तेजना की शिथिलीकरण में बदलना तथा मानसिक सजगता और मस्तिष्कीय सामंजस्य को आँकना इस युग की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं। सचमुच यदि मनःचेतना पर यंत्रों के माध्यम से ही सही, मनुष्य को योग साधना द्वारा नियंत्रण करने की विद्या सिखायी जा सके, तो इसे चिकित्सा विज्ञान का मानव जगत को अद्भुत कहा जाएगा।


मंत्र-साधना के आधार और चमत्कार

मंत्र-साधना भी यंत्र-साधना की तरह ही एक विशुद्ध विज्ञान है। यंत्रों के सिद्धांत

निर्माण, संचालन, सुधार में दक्षता प्रस्तुत करना ही यंत्र-विद्या का आधार है। यह प्रक्रिया ठीक रहे तो यंत्रों की क्षमता से समुचित लाभ उठाया जा सकता है, पर यदि इन प्रकरणों में त्रुटि रहे तो मशीनें समय और धन की बर्बादी ही करती है, ठीक इसी प्रकार मंत्र-साधना के सभी प्रयोग, प्रकरण सही हो तो उनका लाभ प्राप्त किया जा सकता है अन्यथा अधूरा और अस्त-व्यस्त साधनाक्रम अपनाने पर निराशा और उपहास का ही भाजन बनना पड़ता है।

भौतिकविज्ञान बाह्यजगत को प्रभावित करता है और जड़ प्रकृति में सन्निहित शक्तियों को उपयोग योग्य बनाकर लाभकारी परिणाम उपस्थित करता है। अध्यात्म-विज्ञान अंतरंग क्षेत्र को प्रभावित करता है और चेतन प्रकृति को प्रदीप्त कर उससे सर्वसमर्थ व्यक्तित्व का निर्माण करता है। भौतिकविज्ञान सुख-साधनों का उत्पादन करता है, शरीर को अधिक सुविधाजनक स्थिति में रखने के आधार जुटाता है। यही उसकी परिधि है। अन्तः चेतना तक न तो उसकी पहुँच है और न उस स्तर की क्षमता ही वह उत्पन्न कर सकता है।

यह जगत जड़ और चेतन का सम्मिश्रण है। प्राणधारियों के भीतर चेतना रही है और बाहर पंचभौतिक कलेवर चढ़ा रहता है। दोनों के सम्मिश्रण से ही प्राणिजगत की विविध हलचलें दिखाई पड़ती हैं। नदी, पर्वत जैसे सर्वथा जड़ पदार्थों की बात अलग है जहाँ चेतना है, वहाँ इस बात की भी आवश्यकता अनुभव की जाती है कि वस्तुओं और शरीरों की तरह ही चेतना को भी स्वच्छ, स्वस्थ और सुविकसित रखा जाए। इसी क्रिया कलाप को ‘अध्यात्म’ कहते है।

जड़ प्रकृति की शक्तियों को अधिकाधिक परिचय भौतिकविज्ञान ने सर्व साधारण के लिए सुलभ किया है। अग्नि, विद्युत, ईथर, अणुशक्ति, तरंगें, चुम्बक आदि भौतिक शक्तियों का उपयोग कितना चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करता है, यह सर्वविदित है। चेतन प्रकृति का स्तर और ऊँचा है। वस्तुतः चेतन की ही पड़ के ऊपर अधिकार है। जलयान कितना ही बड़ा क्यों न हो, चेतन संचालक के बिना कुछ कर न सकेगा। अन्तरिक्ष में मानवरहित रॉकेट स्वसंचालित लगते भर हैं, वस्तुतः उन्हें भी धरती पर बैठे हुए वैज्ञानिक ही दिशा देते और नियंत्रण करते है। रेलगाड़ी कितनी ही कीमती क्यों न हो, जीवित ड्राइवर के बिना वह टूटी चट्टान की तरह निरर्थक है। प्राण के बिना शरीर का क्या उपयोग? उपभोक्तारहित संपदा कितनी दबी पड़ी है। महत्व उतनी का ही है जितनी कि चेतना प्राणी उसका उपयोग कर सके। जड़ पदार्थों की तरह जड़-विज्ञान तभी उपयोगी हो सकता है जब उसका चेतन प्राणी द्वारा नियंत्रण एवं उपयोग किया जाए। तात्पर्य यह है कि जड़ की तुलना में चेतना का मूल्य महत्व अत्यधिक है। इसी अनुपात से भौतिक विज्ञान से अध्यात्म विज्ञान की महत्ता एवं उपयोगिता बढ़ी-चढ़ी है।

भौतिकविज्ञान के प्रत्यक्षीकरण में प्रयुक्त होने वाले उपकरण ’यंत्र’ कहलाते है और आत्मविज्ञान से लाभान्वित होने के माध्यम ’मंत्र’ कहे जाते है। यंत्रों के बिना वैज्ञानिक तथ्यों से लाभ नहीं उठाया जा सकेगा। इसी प्रकार मंत्ररहित अध्यात्म सिद्धांत मात्र बनकर रह जाएगा। उसे प्रत्यक्ष न किया जा सकेगा।

समग्र विज्ञान को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। एक पिण्डव्यापी दूसरा ब्रह्माण्डव्यापी। एक अंतरंग, दूसरा बहिरंग जिस प्रकार थ्योरी और प्रेक्टिस के आधार पर बहिरंग शिक्षापद्धति चलती है, उसी प्रकार अध्यात्म प्रगति के लिए आस्था और साधना दो माध्यम है। आस्था के अंतर्गत नीति धर्म, दर्शन, आत्मज्ञान, ब्रह्म एवं सूक्ष्म जगत का वर्णन विवेचन आता है शास्त्रों में उसी का वर्णन हैं आत्मबोध, लोक व्यवहार, चिंतन परिष्कार को अध्यात्म के निष्ठा पक्ष में लिया जाएगा। संयम, नियम, व्रत, तप, साधना प्रभृति क्रिया–कलापों को ‘साधना’ माना जाएगा। दोनों एक दूसरे के पूरक है। एक के बिना दूसरा अपूर्ण रह जाएगा। ज्ञान और कर्म के समन्वय से ही उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं। ज्ञान के बिना कर्म और कर्म के बिना ज्ञान निर्जीव निष्प्राण रहेगा। साधना के बिना तत्व दर्शन समग्र अध्यात्म का प्रयोजन पूरा नहीं कर सकेगा।

विश्वव्यापी ब्रह्मचेतना के साथ मनुष्य का सघन और सुनिश्चित संबंध है पर उसमें मल आवरण विक्षेप जैसे अवरोधों ने एक प्रकार से विच्छेद जैसी स्थिति उत्पन्न कर दी हैं। बिजलीघर और कमरे के पंखे के बीच लगे हुए तारों में यदि गड़बड़ी उत्पन्न हो जाए तो पंखा और बिजलीघर दोनों ही अपने अपने स्थान पर वहीं रहते हुए भी सन्नाटा छाया रहेगा। पंखा चलेगा नहीं निश्चेष्ट पड़ा रहेगा। इन अवरोधों को साफ करना ही मंत्र-साधना का उद्देश्य है। नाली के प्रवाह में कोई रोड़ा आ आए तो पानी इधर-उधर फैलेगा और नाली सूखी पड़ी रहेगी। यही बात हमारे जीवन प्रवाह में भी दृष्टिगोचर होती है अन्न, जल पर जीवित रहने वाला शरीर तो अपना आहार प्राप्त करके गतिशीलता बना रहता है, पर अंतःचेतना को खुराक न मिलने से वह दिन प्रतिदिन दुर्बल एवं मरणासन्न होती चली जाती है। यह है हम सबकी आंतरिक दयनीय दुर्दशा का कारण।

नवजात शिशु माता के दूध पर अवलंबित रहता है। आत्मा का पोषण परमात्मा के साथ प्रत्यावर्तन बने रहने पर ही होता है। बादल तभी बरसते है जब समुद्र से संबंध टूट जाए तो बादलों का बरसना तो दूर उनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। तब केवल धूलकण ही यदा-कदा बदली बनकर घूमते दृष्टिगोचर होंगे। परमात्मा से संबंध टूट जाने पर आत्मा अपना वर्चस्व खो बैठती है, आत्मबल के लक्षण दिखाई नहीं पड़ते, महानता तिरोहित हो जाती है, केवल काय कलेवर ही छिपकली की कटी हुई पूँछ की तरह उछल कूद करता रहता है। हममें से अधिकांश को शरीर मात्र बनकर जीना पड़ रहा है। आत्मा की गरिमा के वर्णित कोई चिह्न अपने में दीखते नहीं इसे आत्मा और परमात्मा के बीच गतिरोध ही समझा जाना चाहिए। परित्यक्ता पत्नी की भाँति उस पर उदासीनता ही छाई रहती है।

साधना इन शिथिल संबंधों को पुनः प्रतिष्ठापित करने की सुनिश्चित पद्धति हैं। मंत्र-साधना उसका कर्मपक्ष नहीं, उसकी भी अपनी गरिमा है, फिर भी वह पूर्ण नहीं। कोई व्यक्ति विद्वान, ज्ञानी दार्शनिक शास्त्रज्ञ, वेदांती होने भर से आत्मबलसम्पन्न नहीं हो सकता। इसके लिए उसे साधनात्मक कर्मकाण्ड अपनाने की अनिवार्य रूप से आवश्यकता होगी। विश्वचेतना के साथ व्यक्ति चेतना को जोड़ने का यही मार्ग हैं। मंत्र-साधना इसी राजमार्ग की तरह समझी जानी चाहिए।

मंत्र का प्रत्यक्ष रूप ध्वनि है। ध्वनि भी क्रमबद्ध, लयबद्ध और वृत्ताकार। एक क्रम से निरन्तर एक ही शब्दविन्यास का उच्चारण किया जाता रहे तो उसका एक गतिचक्र बन जाता है। तब शब्द तरंगें चलने की अपेक्षा वृत्ताकार घूमने लगती हैं। रस्सी में पत्थर का टुकड़ा बाँधकर उसे तेजी से चारों ओर घुमाया जाए तो उसके दो परिणाम होंगे। एक यह कि वह एक गोल घेरा जैसा दीखेगा। रस्सी और ढेले का एक स्थानीय स्वरूप बदलकर गतिशील चक्र के रूप बदल जाना एक दृश्य चमत्कार है। दूसरा परिणाम यह होगा कि उस वृत्ताकार घुमाव से एक असाधारण शक्ति उत्पन्न होगी। इस तेज घूमते हुए पत्थर के छोटे टुकड़े से किसी पर प्रहार किया जाए, तो उसकी जान ले सकता है। इसी प्रकार यदि उसे फेंक दिया जाए तो तीर की तरह सनसनाता हुआ बहुत दूर निकल जाएगा। मंत्रजप से यही होता है। कुछ शब्दों को एकरस, एकस्वर, एकलय के अनुसार बार-बार दुहराते रहने से उत्पन्न हुई ध्वनितरंगें सीधी या साधारण नहीं रह जाती। वृत्ताकार उनका घुमाया जाना अंतरंग पिण्ड में तथा बहिरंग ब्रह्माण्ड में एक असाधारण शक्तिप्रवाह उत्पन्न करता है। उसके फलस्वरूप उत्पन्न हुए परिणामों को मंत्र का चमत्कार कहा जा सकता हैं।

मंत्रों का शब्दचयन योगविद्या में निष्णात तत्त्ववेत्ताओं द्वारा दिव्यचेतना एवं सघन अनुभूतियों के आधार पर किया जाता हैं। यों हम शब्दविन्यास में कुछ प्रेरणाप्रद अर्थ और संदेश भी होते है, पर उनकी महत्ता उतनी नहीं, जितनी शब्दगुँथन की। अर्थ की दृष्टि से उनसे भी अधिक भावपूर्ण कविताएँ हैं और हो सकती है। फिर सूत्र जैसे छोटे मंत्रों में उतनी विस्तृत भावश्रृंखला भरी भी नहीं जा सकती, जितनी मनःक्षेत्र को प्रभावित करने के लिए आवश्यक है। वस्तुतः मंत्र की महत्ता उसके स्फोट में है। ‘स्फोट’ का अर्थ है ईश्वरतत्व में होना वाला ध्वनिविशेष का असाधारण प्रभाव। तालाब में छोटा ढेला फेंकने से थोड़ी और छोटी लहरें उत्पन्न होती है, पर यदि बहुत ऊँचाई से बहुत बड़ा पत्थर पटका जाए तो उससे उसका शब्द और स्पंदन दोनों ही अपेक्षाकृत बड़े होंगे और उसकी प्रतिक्रिया प्रतिध्वनि भी बड़ी लहरों के साथ दिखाई देगी। मंत्रविद्या के संदर्भ में इसी को ‘स्फोट’ कहा जाता है। इसकी तुलना बारूद, कारतूस विस्फोट से उत्पन्न ध्वनि के साथ अथवा अणुबम फटने के साथ की जा सकती हैं। मंत्रसाधक को यह जानना और जताना पड़ता है कि स्फोट की कितनी मात्रा अभीष्ट है। असंतुलित विस्फोट बन्दूक या तोप तक को फाड़ सकता है। असंगत साधना से लक्ष्य प्राप्त होना तो दूर, उलटा अनिष्ट उत्पन्न हो सकता है।

मंत्र की तीसरी धारा है-लय उसे किस स्वर में, किस प्रवाह में उच्चारित किया जा रहा है, उसे लय कहते है। साधारणतया मानसिक, वाचिक और उपाँशुजप नाम से लय की न्यूनाधिकता में इसे उदात्त, और स्वरित कहते हैं। सामगान में सप्तस्वरों तथा उनके आरोह अवरोह को ध्यान में रखा जाता है। यह लयबद्ध ही संगीत का मूल आधार है। इसकी व्याख्या शब्दब्रह्म कहकर की जाती है। जानकारों को पता है कि शास्त्रसम्मत संगीत का शरीर और मन पर ही नहीं, बाह्य वस्तुओं और परिस्थितियों पर भी प्रभाव पड़ता है-दीपक-राग से बुझे दीपक जलने, मेघराग से वर्षा होने की कथा गाथाएँ सर्वथा अविश्वस्त नहीं है। संगीत के वृक्ष-वनस्पतियों फसलों और दुधारू पशुओं पर होने वाले प्रभाव को वैज्ञानिक मान्यता मिल चुकी है। रोगों की निवृत्ति में संगीत की भूमिका निकट भविष्य में और भी अधिक रहेगी। वैदिक और तांत्रिक मंत्रों का सारा वाङ्मय लय-तथ्य को अपने गर्भ में छिपाये बैठा है।

किसी भी रीति से, किसी भी ध्वनि में मंत्र-साधना भावनात्मक आकांक्षा भले ही पूरी करे, उससे वैज्ञानिक लाभों का प्रयोजन पूरा न होगा।

चुम्बकीय लोहे को अपनी ओर आकर्षित करता है, लकड़ी की नहीं। बिजली का प्रवाह भी धातु के तारों के सहारे ही चलता है। रबड़ आदि अधातु पदार्थों में बिजली नहीं दौड़ सकती। इसी प्रकार मंत्रसाधक को अपनी शारीरिक और मानसिक स्वच्छता एवं समर्थता कि लिए प्रयास करते हुए अपना व्यक्तित्व इस योग्य बनाना पड़ता है कि अंतरिक्ष से अवतरित होने वाला शक्तिप्रवाह धारण कर सकना संभव हो सके। राजयोग से यम-नियमों की साधना, मानसिक परिष्कार के लिए और आसन, प्राणायाम का अभ्यास शारीरिक सुव्यवस्था के लिए है। यदि इन आरम्भिक चरणों को पूरा न किया जाए तो फिर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की उच्चस्तरीय साधना सम्भव ही न होगी। आहार विहार के प्रतिबन्ध व्रत संयम का विधान व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए ही हैं स्वच्छ दर्पण में ही मुँह साफ दीखता है, साफ कपड़े पर ही ठीक से रंग चढ़ता है। यदि जीवनक्रम दुष्ट और दुराचारी बना रहे, तो फिर मंत्र-साधना का कर्मकाण्ड कितना ही विधि विधान युक्त क्यों न हो, उसका अभीष्ट परिणाम निकलेगा नहीं।

इसके अतिरिक्त चौथी शर्त है भावभरी मनःस्थिति। इसे दूसरे शब्दों में ’श्रद्धा’ कह सकते है। जिस प्रकार भौतिकजगत की प्रमुख शक्तियों में विद्युत अग्रगण्य है, उसी प्रकार आत्मिक जगत में समस्त उपलब्धियाँ श्रद्धा की उत्कृष्टता पर निर्भर है। मनोविज्ञानवेत्ता विचारों की क्षमता ओर संकल्पशक्ति का गुणगान मुक्तकण्ठ से करते रहे है। मनुष्य को उठाने, गिराने और बनाने में निष्ठा एवं आस्था का महत्व असाधारण है। आत्मबल और मनोबल का चमत्कार सामान्य व्यक्ति को महामानव के रूप में परिणति कर देने में समर्थ होता है।

संसार की महान घटनाओं की पृष्ठभूमि प्रचुर साधनों पर नहीं प्रचण्ड संकल्प शक्ति पर ही रखी गयी है। सफलताओं का समग्र इतिहास अनिश्चय के साथ जुड़े हुए प्रचण्ड पुरुषार्थ की लेखनी से ही लिखा गया है। मैस्मरेज्म, हिप्नोटिज्म, क्लेरोवायेन्स टेलीपैथी आदि योगविद्या के छुटपुट खेल संकल्पशक्ति की ही फुलझड़ियाँ है। इसी तथ्य को साधना का प्राण कह सकते हैं।

अविश्वासी और अन्यमनस्क व्यक्ति उपेक्षा और उदासीनता के साथ कोई साधना करते रहें तो चिरकाल व्यतीत हो जाने और लम्बा कष्टसाध्य अनुष्ठान कर लेने पर भी अभीष्ट लाभ न होगा, किंतु यदि भावभरी मनोभूमि में थोड़ा भरी साधना-विधान अटूट श्रद्धा विश्वास के साथ सम्पन्न किया जाए तो उसका परिणाम तत्काल दृष्टिगोचर होगा। संदिग्ध और आशंकाग्रस्त मनोभूमि मानसिक धरातल को बहुत ही उथला बनाये रखती है, उससे कोई बड़े दैवी अनुदान संजोये नहीं जा सकते। साधनात्मक विधि-विधान का अपना महत्व है, पर यह ध्यान रखने योग्य है कि श्रद्धा को आत्मिक उपलब्धियों का ’प्राण’ ही माना जाएगा। प्राणरहित शरीर को कितना ही संजोया सँभाला जाए, उससे कुछ काम न बनेगा। भावनारहित मनोभूमि मरुस्थल के समान है, जहाँ सफलता की हरी-भरी खेती लहलहाने का स्वप्न कदाचित ही सफल होता है। अस्तु, साधना की सफलता चाहने वाले साधकों को अपनी प्रकृति और प्रवृत्ति को श्रद्धा-शक्ति ही बनाना पड़ता है।

अध्यात्म-विज्ञान की गरिमा भौतिक विज्ञान से असंख्य गुनी बढ़ी-चढ़ी है। मंत्र बहुमूल्य हो सकते हैं पर मंत्रों की महत्ता से उन्हें तौला नहीं जा सकता। संसार की सम्पदाएँ आत्मिक विभूतियों की तुलना में नगण्य है। पड़ और चेतन की गरिमा में जमीन आसमान जितना अन्तर हैं इसे ध्यान में रखा जाए तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना होगा कि हमें भौतिक सम्पदाओं के लिए ही लालायित नहीं करना चाहिए, वरन् आत्मिक विभूतियों को भी उपार्जित करना चाहिए, आत्मबल संग्रह करने के लिए कद बढ़ाना सूर्य की ओर मुँह करके चलने के बराबर है। इससे सम्पत्ति रूपी छाया पीछे-पीछे चलेगी। किंतु यदि छाया की ओर मुँह करके दौड़ा जाए तो वह पकड़ में नहीं आएगी और जितनी तेज दौड़ होगी, वह भी आगे उतनी ही तेजी के साथ दौड़ती चली जाएगी। विभूतिवान सम्पत्ति का लाभ अनायास ही उठा लेते है, जबकि सम्पत्तिवानों को भौतिक विक्षोभ और आत्मिक असंतोष की दुहरी हानि उठानी पड़ती है।

हम आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़े। आत्मविज्ञान की सहायता ले। आत्मबोध से दृष्टिकोण परिष्कृत करें और साधना में निरत रहकर विभूतियों के अधिकारी बने, इस संदर्भ में मंत्र साधना का आश्रय लेना एक प्रकार से अनिवार्य ही है।


Quotation

क्रान्तिकारी विचार ही मनोभूमियाँ बदलते हैं और बदली हुई मनोभूमि में ही महान जीवन एवं समर्थ समाज की संभावना समाविष्ट रहती है।

पुस्तकालय सच्चे देवमंदिर हैं। उनमें महापुरुष की आत्माएँ पुस्तकों के रूप में प्रतिष्ठापित रहती है। सत्संग के लिए पुस्तकालय से बढ़कर विद्वान और निर्मल चरित्र व्यक्ति दूसरा नहीं मिल सकता। अपने वंशजों के एक उत्कृष्ट पुस्तकालय से मूल्यवान वस्तु और कुछ हो ही नहीं सकती। उत्तराधिकार में और कुछ छोड़े अथवा नहीं पर एक अच्छे प्रेरणाप्रद पुस्तकालय की घर में स्थापना करके उस धरोहर को बच्चों, वंशजों के लिए छोड़ ही जाना चाहिए।


भक्त के साथ स्वयं चलते हैं भगवान


खुदा का पैगाम बाँटने वाली संत राबिया

इसके जन्म के समय माँ की आँखें छलक आयी, बाप का सीना दरक उठा। उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि इस नन्हीं-सी मासूम बच्ची को कैसे पालेंगे? आखिर कुछ भी तो नहीं थी उनके पास। जब वह पैदा हुई, तब नाभि पर चुपड़ने के लिये घर में तेल का तुपका भी नहीं था और न ही कोई कपड़ा इस इलाही बच्ची के बदन पर लपेटने के लिये था। घर का दिया भी तेल के बिना एक कोने में पड़ा अल्लाह का रंग देख रहा था।

इसे जन्म देने वाली ने उसके बाप से कहा हमसायों से थोड़ा-सा तेल माँगकर ले आओ। पर वह खुदा का बन्दा हमसायों के बंद दरवाजों को हाथ लगाकर पलट आया और उसने कह दिया कि किसी ने दरवाजा नहीं खोला। हकीकत जबकि यह थी कि उस खुदा के बंदे का संकल्प था कि खुदाबंद के अलावा किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना।

उस रात उसे सोते हुये एक गबी आवाज आकाशवाणी सुनाई पड़ी। तेरी यह बच्ची बहुत मकबूलियत हासिल करेगी जिसके कारण मेरा उन्मत्त भक्त-मण्डली के एक हजार लोग बख्श दिये जायेंगे। साथ ही उस रब्बी ईश्वरीय आवाज ने कहा वालिये बसरा बादशाह के पास कागज पर लिखकर मेरा पैगाम भेज दे कि तू हर रोज मुझे सौ बार दरुद भेजता है और जुम्मे की रात को चार सौ बार। पर पिछली रात तू दरुद भेजना भूल गया।

इसलिये काफिर प्रायश्चित के तौर पर तू इस रूक्के वाले को चार सौ दीनार दे दे।

उस सपने से जागकर उसके वालिद साहब बहुत रोए। पर जिस तरह फरमान हुआ था, सारा ख्वाब कागज पर लिखकर एक दरबान की मार्फत वालिये

बसरा को भेज दिया। यह फरमान पढ़कर वालिये बसरा ने चार सौ दीनार उसके वालिद को दिये और दस हजार दिरहाम जरूरतमंदों और फकीरों बाँट दिये। इसी के साथ उसने खुदा को शुक्रगुजार किया कि उसने उसे याद किया है।

लेकिन वक्त के साथ हालात फिर बदल गये। बसरा में जब अकाल पड़ा, उस दौरान उसके माँ बाप दुनिया में नहीं रहे। तीन बड़ी बहिनें थी जो रोटी का जुगाड़ ढूँढ़ती पता नहीं कहाँ चली गयी। उस हालात में किसी जालिम ने उसको पकड़कर अपनी गुलाम बना लिया और फिर कुछ समय बाद थोड़ी सी रकम के बदले उसे बेच दिया।

खरीदने वाले ने उसके सामने मुश्किल मशक्कत वाले ढेरों काम बिछा दिये। एक दिन कामों से थकी सी वह कही जा रही थी कि गिर गयी और उसके हाथ में चोट आ गयी। उस हालात में उसने सज़दा करते हुये पहली बार स्वयं को खुदा से मुखातिब किया। या अल्लाह! बेसहारा तो मैं पहले ही थी, अब हाथ भी टूट गया.......... पर कोई बात नहीं तेरी रजा में रहूँगी।”

उसी समय दिव्य आवाज आयी- राबिया! गमगीन न हो। तुझे वह रुतबा मिलेगा जिससे वालिये मुल्क भी रश्क करेंगे।”

यह वह आवाज थी जिसने राबिया की रगों में जान डाल दी और मालिक के घर पहुँचकर वह खिदमत में लग गयी, दिन में रोज़ा रखती और रात भर इबादत करती।

एक रात मालिक की नींद टूट गयी, उसने हैरानी से देखा कि कहीं से कोई रोशनी आ रही है। रोशनी का मुकाम ढूँढ़ता वह उस ओर गया, जहाँ एक कोने में राबिया सज़दे में थी ओर उसके इर्द गिर्द नूर फैला हुआ था। उसने आवाज भी सुनी उस समय राबिया अल्लाह से कह रही थी अगर मेरा अख़्तियार होता तो मैं सारा वक्त तेरी इबादत में गुजार देती, पर तूने मुझे किसी और चाकर बना दिया। इसलिये तेरी दरगाह में आते देर हो जाती है।

यह सुनकर उसका मालिक परेशान हो उठा कि मुझे तो खुद ही इस अल्लाह की नेकबंदी की खिदमत करनी चाहिए और मैं उलटे इससे खिदमत करवाता हूँ। सुबह होते ही उसने राबिया की आजाद कर दिया। इस तरह मालिक के घर उसने जो हुज़रा बनाया था उस हुज़रे से बाहर आकर वह गाती बजाती खुदा की इबादत करने लगी।

उसके थोड़े दिनों बाद ही एक रोज वह मक्का शरीफ हज करने के लिये चल दी तो रास्ते में खुदा से बातें करते करते उसने एक सवाल किया। खुदा बंद! मैं तो खाक की बनी हूँ और काबा पत्थर से पर मैं तो सीधे ही तुझसे मुखातिब होना चाहती हूँ।

उस वक्त जवाब मिला-राबिया दुनिया के निज़ाम को इसी तरह रहने दे। मेरा नूर कोहिनूर वह पहाड़ जिस पर हजरत मूसा ने खुदा का जलवा देखा था। से न सहा गया। वह टूटकर टुकड़े टुकड़े हो गया, तू भला किस तरह सहेगी?

राबिया ने कहा -मुझे मकान की नहीं मकीन की जरूरत है यानि कि मकान में रहने वाले की! मुझे हुस्ने काबा से ज्यादा जमाले खुदाबन्दी के दीदार की तमन्ना है। वह पल था जब दिव्य रोशनी राबिया की रगों में उतर गयी।

वह लोगों को खुदा का पैगाम देने लगी। लोगों ने इस महान संत राबिया के बताये सूत्र पर मनन करना शुरू कर दिया। ऐसी थी वह संत राबिया जिसका नाम इतिहास में अमर हो गया।


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जीवन कितना ही बड़ा क्यों न हो, पर वह समय की बर्बादी से बहुत छोटा रह जाता है। जो समय की बर्बादी करते है, समय उन्हें बर्बाद करता है।


क्या सही है चमत्कारों का विज्ञापन और प्रदर्शन

मनुष्य की आत्मशक्ति का अंत नहीं। ईश्वर की समस्त शक्तियाँ और विशेषताएँ उसके अंगपुत्र में बीज रूप से विद्यमान है। वह चाहे तो उन्हें विकसित कर सकता है और ईश्वर की हर कृति में जो उसका अद्भुत चमत्कार दीख पड़ता है उसी प्रकार उसके कर्तृत्व भी एक से एक बढ़कर सराहनीय अभिनंदनीय और अनुकरणीय हो सकते है।

ऋषि, योगी, तपस्वी, ज्ञानी सिद्धपुरुष और महामानव इसी चमत्कारी स्तर के हुये है। उनका जीवनक्रम इतनी उच्चकोटि का रहा है। कि उसे सामान्य नर पशुओं की तुलना में उच्चकोटि का कह सकते है। उनने मानवजाति के लिये जो त्याग और बलिदान किये हैं, अनुदान छोड़े है उनका स्मरण करके उनके देवोपम अस्तित्व के सम्मुख नतमस्तक होना पड़ता है। बुद्ध, महावीर, गाँधी समर्थ गुरु रामदास, रामकृष्ण परमहंस विवेकानंद, अरविंद आदि महामानवों को चमत्कारी सिद्धपुरुषों के कर्तृत्व की पीछे उच्चस्तरीय परंपराएँ ही सन्निहित रहती है।

असल की नकल बनाने में कुशल इस दुनिया में बहुत हैं। नकली दाँत नकली आँख, नकली घी, नकली हीरा, नकली सोना जो चाहिए सो मिल जायेगा। असली चीज महंगी और कष्टसाध्य होती है, नकल आसानी से उतारी जा सकती है। असली गाय आठ सौ रुपये की आती है। पर मिट्टी की गाय दस पैसे की मिल जाती है। बालबुद्धि के लोग अक्सर सस्ते से ही मन बहलाना चाहते है इस मानवी दुर्बलता को चतुर लोग जानते है और नकली चीजों से बाज़ार पाट देते हैं, वे बिकती भी खूब हैं।

नकली अध्यात्म भी फैला पड़ा है। असली हीरे जितने बिकते है उससे हजारों गुने अधिक नकली बिकते है। असली आत्मबल कठिनाई से संचित होता है। उसके लिये संयम तप साधना और व्यक्तित्व का समग्र निर्माण करने जैसे कठिन मार्ग पर चलना पड़ते है। चतुर कठिन मार्ग पर चलना पड़ता है। चतुर लोग इस झंझट में पड़कर अपनी विलासी और महत्त्वाकाँक्षी प्रवृत्ति कैसे छोड़ सकते है? वे नकलीपन का आश्रय लेते हे। ऐसे संत महात्मा और सिद्ध योगियों की कमी नहीं जो हाथ ऊपर करके आसमान में से इलायची माँगते और भक्त द्वारा रुपया बनाने जैसे खेलों की भौंड़ी नकल है। पर संत का बाना पहने के कारण लोग उन्हें बाजीगर नहीं मानते और उस अचंभे जैसी बाजीगरी को सिद्धि चमत्कार मान लेते है और उन धूर्तों से बेतरह ठगे जाते है।

यदि लोग थोड़ी समझदारी से काम लें तो वे इस तथ्य पर विचार कर सकते है कि इस प्रकार चमत्कार दिखाने की इन्हें फुरसत कैसे मिली और क्या आवश्यकता प्रतीत हुई? जिनमें आत्मबल होता है वे उसके महत्व को समझते और उसका भोंड़ा प्रदर्शन नहीं करते। नोटों की गड्डी और जेवर जवाहरातों की पोटली कोई बाज़ार में उछालता नहीं फिरता और न यह ढोल पीटता है कि लोगों आओ, देखो मेरे पास कितनी दौलत है। संपन्न व्यक्ति अपने धन को सुरक्षित रखते है और उसे मजबूत तिजोरी में रखते है। अविश्वस्त व्यक्तियों को उसका विवरण भी नहीं बताते। पूछने पर चुप हो जाते है या टाल देते है। कारण स्पष्ट है बहुमूल्य उपलब्धियाँ यदि खुली पड़ी रहे तो उनके खोने चोरी जाने का पूरा खतरा है। वास्तविक आत्मबल सम्पन्न न कभी अपना विज्ञापन कर सकते है। और न चमत्कारों का प्रदर्शन। वे उसे केवल आत्मकल्याण और लोकमंगल जैसे महान प्रयोजनों में ही प्रयुक्त करते है। जहाँ अलौकिक चमत्कारों का विज्ञापन और प्रदर्शन किया जा रहा है। वहाँ पूरा खतरा है। यह हर समझदार आदमी को जान लेना चाहिए।ऐसे प्रसंगों में ढोंग, चालाकी और हाथ की सफाई के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। जो इनके फेर में पड़ेगा वह बुरी तरह पछताएगा। चमत्कारी लोगों के वेश में अक्सर ठग और जेबकट ही इस प्रकार के प्रदर्शन करते है।

बाजीगरी में अपेक्षाकृत ईमानदारी है। वे संत बाबाओं की तरह अनैतिक प्रतिपादन नहीं करते। वे अपनी चतुरता का ही दावा करते है और हाथ की सफाई की बात कहकर अपना गुजार करते है। यह मनोरंजक व्यवसाय है। जादूगर को चतुर भर कहा जा सकता है। उसे ठग कहने की गुंजाइश नहीं है। लेकिन जहाँ कोई अपनी अलौकिकता की बात करे समझना चाहिए कि यही ठगी आरंभ हो गई।

यद्यपि आमतौर से जादूगर अपने कार्यों में चतुरता भर होने की बात स्पष्ट कर देते है तो भी लोग उनके खेलों के पीछे कोई अलौकिकता या सिद्धि चमत्कार हो ने की बात सोचते रहते है। जब तक बात प्रकट नहीं होती तब तक ऐसी ही रहस्यवादी चर्चाएँ होती रहती है और लोग आश्चर्य अनुभव करते रहते है। पर कई बार कुछ गलती हो जाने से उनकी चतुरता का भेद खुल में उन्हें भारी संकट सहना पड़ता है। तब कहीं लोग असलियत समझते है और अनुभव करते है कि सिद्धियों की बात निरर्थक है। जहाँ सिद्धि है वहाँ प्रदर्शन पर कठोर प्रतिबंध रहता है। जहाँ बाजीगरी है वहाँ चालाकी भर है। बुद्धि भ्रम उत्पन्न कर देने का नाम ही जादू है जो इस तथ्य को समझते है वे चमत्कारों की बात से ही अपने मन को विरत कर लेते हैं। उन्हें विवेक की कसौटी पर असली और नकली सिद्धि में भेद करना कुछ भी कठिन प्रतीत नहीं होता।

जादू के चमत्कारों की पोल खोल देने वाली कुछ घटनाएँ इस प्रकार है

सन् १९१८ की बात है। उन दिनों चीनी जादूगर "चुँग लिंग शू" की सारे इंग्लैण्ड में धूम थी।वह ऐसे अद्भुत जादू के खेल दिखाता था कि एक ही प्रकार के खेलों को देखने के लिये दर्शक बार बार आने का लोभ संवरण न कर पाते थे। उसके खेल वस्तुतः ऐसे ही थे।

चुँग अपनी पत्नी को एक विशाल समुद्री सीप के मुँह में धकेल कर उसे बंद कर देता।खोलने पर वह गायब हो जाती और फिर दर्शकों की गैलरी में हँसती हुई प्रकट होती। इसी प्रकार व स्टेज पर एक बड़ी तोप मंगाता। उसमें अपनी पत्नी को ठूँस देता। नीचे बारूद ऊपर लोहे का गोला बीच में चुँग की पत्नी सुईसीन। तोप चलती, गोला दूर न जाकर स्टेज पर ही लौट आता और सुई अन्यत्र प्रकट होती।

बंदूक की गोली चलती सुई की छाती को चीरती हुई पार निकलती। सुई मर जाती। पीछे वह फिर जी उठती।

काँटा बंसी लेकर वह हवा में से जीवित मछलियाँ पकड़कर दिखाता। इसी तरह उसका एक खेल था। छाती पर चीनी की प्लेट रखना और उस पर बन्दूक से गोली रोकना।

२३ मार्च १९१८ की रात का वह प्लेट पर गोले रोकने का खेल दिखा रहा था कि गोलियाँ उसके सीने में पार निकल गई और वह स्टेज पर ही ढेर हो गया।

भूतों के करिश्मे दिखाने में पारंगत अमेरिकी जादूगर राॅबिनसन ऐसे करतब दिखाता था। जिनमें भूतों के अस्तित्व और क्रिया−कलाप को प्रत्यक्ष देखा जा सके पर वह अन्त में यह बता भी देता था कि यह विशुद्ध बाजीगरी है उसके खेलों का असली भूतों से तनिक भी तनिक भी संबंध नहीं है।

प्रिंस में जादूगर चिंग लिंग फू का प्रसिद्ध खेल था। शून्य आकाश में से पानी का भरा घड़ा उत्पन्न करना तथा पक्षियों को पकड़ना। वस्तुतः घड़ा उसकी लम्बाई में पीछे की ओर छिपा रहता था और उसी में पक्षी भी दबे रहते थे। उस दिन गलती से घड़ा फूट गया और भीगे हुये पक्षी बेतरह चिल्लाने लगे। जादूगर की खिल्ली उड़ गई। खेल कई दिन चलने का प्रोग्राम था, पर हॉल के मैनेजर ने उसे दूसरे ही दिन भगा दिया।

३. अक्टूबर १९६६ के धर्मयुग में श्री तिलकचन्द श्रीवास्तव का एक विवरण छपा है कि वे एक बार अपने गाँव गये तो वहाँ देखा कि दूरवर्ती पीपल के पेड़ पर से आग के अंगारे झर रहे हे और सारा गाँव उसे भूत प्रेतों की करतूत समझकर भय और आश्चर्य से उस दृश्य को देख रहा है। इस कुतूहल को गाँव में बाहर से आये हुये एक हट्टे अतिथि ने आश्चर्यजनक ढंग से भंग कर दिया। वे सज्जन इस तरह की घटनाओं के पीछे भूतविद्या के नाम पर उल्लू सीधा करने वाले ओझाओं की करतूत से परिचित थे सो टार्च हाथ से लेकर उस पेड़ के पास निर्भय होकर गये और ऊपर चढ़ गये और आग बरसाने वाले भूत को पकड़कर साथ ले आये।

कहा यह गया था कि डेढ़ फीट लम्बी तथा दो इंच चौड़ी कपड़े की एक पतली थैली बनाई गई थी उसमें एक तह बालू की एक तह लकड़ी के बुरादे की जमाकर भर दी गई थी। उसे मिट्टी के तेल में भिगोया गया था। थैली के निचले सिरे आग लगाकर उसे पेड़ की ऊँची डाली पर टाँग दिया गया था। मिट्टी के तेल में डूबा हुआ बुरादा जलता और नीचे गिरता। बालू की परत कुछ देर के लिये उस अग्निवर्षा को रोक देती और जैसे ही बालू नीचे गिर जाती फिर बुरादे की परत नीचे गिरने लगती और अग्निवर्षा दिखाई पड़ती।

लोगों ने इस करतूत को भली प्रकार देखा और समझा कि भूतविद्या के नाम पर लोगों को डराने और पैसा ऐंठने वाले लोग भोले लोगों को किस प्रकार भ्रम में डालकर व्यवसाय चलाते हैं। जादूगर डेविड डेवाँट की उन दिनों इंग्लैण्ड में बहुत ख्याति थी। रुपये बनाने वाला जादूगर के रूप में उसे बच्चा बच्चा जानता था। जब वह खेल दिखाता तो देखने वाले हैरत में रह जाते। हवा में हाथ मारता और रुपया पकड़ लेता। इस तरह वह डिब्बे भर भरकर रुपये बनाता। और देखने वालों को स्तब्ध कर देता।

एक दिन डेवाँट कही चले जा रहे थे। रास्ते में अकेले पाकर उन्हें हट्टे कट्टे आदमी ने पकड़ लिया और कहा आजकल मैं बहुत तंगी में हूँ। मेरी टोपी रुपयों से भर दीजिये। इतने से ही मेरा काम चल जायेगा।

डेवाँट ने उस टालने बहलाने की कोशिश की पर वह तो अड़ ही गया और मरने मारने पर उतारू हो गया। डेवाँट को लगा कि यदि रुपये न दिये गये तो जान ही चली जाएगी। जादूगर महोदय सिटपिटाए उनने यह कभी सोचा तक न था कि कला कभी उनके लिये इस प्रकार प्राणघातक भी बन सकती है कुछ सूझ न पड़ रहा था कि क्या किया जाय? उनकी जेब में सिर्फ छह शिलिंग थे। एक शिलिंग बनाकर देते और फिर उसे बातों में उलझा देते। इस प्रकार उसने पाँच शिलिंग बनाकर दे दिये। एक ही बचा था, वे इस ताक झाँक में थे कि उधर से कोई मुसाफिर आ निकले तो उसकी सहायता से अपने प्राण बचाए। छठा शिलिंग बनाकर देने को ही थे कि उधर से राहगीरों का एक जत्था आ गया। मालूम पड़ा कि वे घर से भागे हुये इसी विक्षिप्त को खोज रहे थे। वे उसे पकड़कर ले गये और इस प्रकार डेवाँट की जान जाते जाते बची।

फ्रांसीसी जादूगर वूय तिये दे कोलता ने कपड़े से ढ़ककर वस्तुएँ गायब करने का जादू चलाया था। उसी विधि को अंग्रेज जादूगर चार्ल्स कारट्राम ने विकसित किया। वे भरी सभा में कपड़े से ढ़ककर एक समूची महिला को गायब कर देते थे।

डेविड ने भी यही कला सीखी। एक दिन वे महिला उड़ाने का खेल दिखा चुके तो उनके घर एक व्यक्ति आया और कान के पास मुँह ले जाकर बोला आप मेरी बताई एक महिला को इस तरह उड़ा दीजिये कि वह फिर कभी प्रकट न हो। आपको मुँह माँगी फीस दूँगा। डेविड ने मुसकराते हुए कहा मेरा जादू उड़ाने भर में समर्थ है। उड़ाई हुई महिला को वापस न आने की गारन्टी नहीं कर सकता। तो भी आप बताइये आखिर वह महिला कौन है। उस व्यक्ति ने गंभीर स्वर में दीनता प्रकट करते हुये कहा वह है मेरी अक्खड़ सास जो मुझे आये दिन सताती है और तरह तरह की धमकी देती है।

जादूगर जहाँ अपनी चतुरता से लोगों को चकित करके वाहवाही लूटने तथा धन कमाने का लाभ प्राप्त करते हैं वहाँ कई बार उनकी यह चतुरता खतरनाक खेल दिखाते समय उनके लिये जीवन संकट भी उत्पन्न कर देती है। बंदूक से चली हुई गोली पकड़ने का खेल ऐसा ही है। जिसे दिखाने के उत्साह में कई बाजीगरों को जान से हाथ धोना पड़ा है।

सन् १७८५ में जादूगर फिलिप यस्टली की एक पुस्तक प्रकाशित हुई नेचुरल मैजिक इसमें उसने गोली चलने पर भी मृत्यु न होने के प्रयोग का वर्णन किया है। उन दिनों लोग शत्रुता होने पर एक दूसरे को द्वन्दयुद्ध के लिये ललकारते थे और जो चुनौती स्वीकार न करे उसे कायर मानते थे। किसी प्रसंग पर दो सैनिकों ने ऐसे ही द्वन्दयुद्ध की परस्पर चुनौती दे डाली। उसे रोका तो नहीं जा सका। पर उपर्युक्त जादूगर ने वह चतुरता बरती जिससे एक दूसरे पर गोली दाग देने पर भी किसी की मृत्यु नहीं हुई।हुआ यह था कि गोली भरते समय जादूगर उपस्थित था और उसने असली गोलियाँ की जगह नकली गोलियाँ बदल दी। वे ही बंदूकों में भरी गई और आवाज मात्र होकर बात समाप्त हो गई कोई मरा नहीं। तब से यह खेल दूसरे जादूगरों ने भी अपनाया और जहाँ बहुतों ने बहुत धन और यश कमाया वहाँ कइयों ने अपनी जान भी गँवाई।

राम स्वामी संप्रदाय के एक भारतीय जादूगर ने योगविद्या के नाम पर लंदन में इस खेल से धूम मचा दी। सन् १८१८ में वे डबलिन आयरलैण्ड में यह खेल दिखाने गये। दाँत से छूटी हुई बंदूक की गोली पकड़ने वाला जादू यहाँ असफल रहा और जादूगर की स्टेज पर ही मृत्यु हो गईं नकली गोली पकड़ने के स्थान पर असली गोली का उपयोग हो जाने से यह दुर्घटना घटी। पोलैंड के जादूगर देलिन्स्की ने यह खेल आर्चस्टाउट के युवराज के राजदरबार में दिखाने का आयोजन किया, इसमें सफलता प्राप्त करने पर उन्हें बहुत धन और सम्मान मिलने वाला था। जादूगर की पत्नी मदाम लिन्स्की को स्टेज पर खड़ा होना था। युवराज के छह अंगरक्षकों को एक साथ उन पर गोली चलानी थी। मदाम को यह छहों गोलियाँ हाथ से पकड़कर दिखानी थी। यहाँ भी नकली कारतूसों की जगह एक कारतूस असली ही चढ़ गया और उसने उस सुकोमल महिला की रंग मंच पर ही जान ले ली।

फ्रांसीसी जादूगर रवेयार उदयाँ को स्ट्रासबर्ग नगर के एक कलामंच पर अपना जादू दिखाना था। लड़का जिडमानि एक सेब दाँतों के बीच दबाकर रखता था। सामने से पिस्तौल की गोली चलती थी और वह सेब के बीच में ही अटकी रह जाती थी। धातुओं के चूरे से बनी गोली देखने में असली जैसी लगती थी, पर वह पुरा पिस्तौल दागते ही इधर उधर बिखर जाता था और सेब में पहले से ही ठूँसी हुई गोली निकाल कर दिखा दी जाती थी। पर यहाँ भी वही भूल हो गई और नकली असली का अंतर उस झमेले में विस्मृत हो गया। लड़का आर्तनाद के साथ गोली खाकर गिर पड़ा और एक दो बार छटपटाकर वहीं ढेर हो गया। अपने ही पुत्र की मृत्यु का कारण बनने में जादूगर को कितनी मार्मिक वेदना हुई होगी। इसका उल्लेख शब्दों में नहीं हो सकता।

कलकत्ता के जादूगर राजा बोस को एक दिन हरीसन रोड पर एक ऐसे ही चमत्कारी से पाला पड़ गया, जो साधु के वेश में रहता था और करिश्मे दिखाकर लोगों को ठगता था। साधु ने बोस को कोई खाता पीता नागरिक समझा सो उसे रोका और कहा बेटा लो सिगरेट पीते जाओ। यह कहकर उसने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा और सिगरेट निकालकर दे दी। इसके बाद कुछ और भी बहुत-सी दूसरी चीजें दाढ़ी में से निकाल कर दी। जादूगर बोस कुछ देर तो चुप रहे।, पीछे उनने भी साधु के विभिन्न अंगों में से कितने ही पैसे निकाल कर उसे दे दिये और जितना सामान साधु ने दिया और उसका मूल्य चुका दिया। साधु झेंपता हुआ एक और चला गया।

सिद्धि और चमत्कारों के पीछे दौड़ने वालों की आँखें उपर्युक्त उदाहरणों से खुल जानी चाहिए। बुद्धिमत्ता का एक ही निष्कर्ष है कि मनुष्य की आंतरिक महानता ही उसकी चमत्कारिता है। जो ईश्वर के मार्ग पर चलता है उसके जैसा बनता है वह ईश्वर के मार्ग पर चलता है उसके जैसा बनता है वह ईश्वरोपम गरिमा का अधिकारी बनता है। यदि चमत्कारों की बात में कुछ तथ्य है तो बस इतना ही हैं।


Quotation

दूसरों के छिद्र देखने से पहले अपने छिद्रों को टटोलो। किसी ओर की बुराई करने से पहले यह देख लो। कि हममें तो कोई बुराई नहीं है। यदि हो तो पहले उसे दूर करो। दूसरों की निंदा करने में जितना समय देते हो उतना समय अपने आत्मोत्कर्ष में लगाओ। तब स्वयं इससे सहमत होंगे कि परनिंदा से बढ़ने वाला द्वेष को त्याग कर परमानंद प्राप्ति की ओर बढ़ रहे हो।

कोई भी काम करते समय अपने मन को उच्च भावों से और संस्कारों से ओत-प्रोत रखना ही सांसारिक जीवन में सफलता का मूल मंत्र है। हम जहाँ रह रहे हैं उसे नहीं बदल सकते पर अपने आपको बदल कर हर स्थिति में आनंद ले सकते हैं।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य


मन को ग्रंथिमुक्त कर दे, ऐसी हो चिकित्सा पद्धति

शरीर और मन का परस्पर गहरा संबंध है इसे अब विज्ञान भी स्वीकारने लगा हैं। मन कायिक रोगों की पुष्टि हो जाने के बाद इस अवधारणा को बल मिला है कि मन ही स्वस्थता की कुँजी है। वह यदि निर्द्वन्द्व और भयमुक्त बना रहा तो काया भी निरोग रहेगी, अन्यथा रोगी मन जन्म जन्मान्तरों तक उसका पीछा नहीं छोड़ता और व्यक्ति को व्याधिग्रस्त बनाये रहता है। अब ऐसे रोगों के उपचार के लिये मनोविज्ञानी रिग्रेशन थेरेपी का इस्तेमाल कर रहे है।

रिग्रेशन का शाब्दिक अर्थ है पीछे लौटना। यह प्रतिगमनता केवल इस जीवन के पिछले कालखण्ड की नहीं वरन् विगत अनेक जन्मों की यात्रा है। इसमें इस बात की पड़ताल की जाती है कि रोगी के शारीरिक मानसिक कष्ट के पीछे वर्तमान या विगत जन्मों की कोई घटना भूल या भय तो नहीं जो उसकी अंतश्चेतना में भारभूत बनकर व्याधि का रूप धारण कर चुकी है।

मनोवेत्ताओं के अनुसार मनुष्य की दमित इच्छाएँ और वासनाएँ मन की गहरी परतों में दबी पड़ी रहती है। चूँकि इन इच्छाओं की पूर्ति में सामाजिक बंधन और मर्यादाएँ आड़े आती है अतः वे अतृप्त रह जाती है। इनका सार्वजनिक प्रकाशन भी संभव नहीं कारण कि इसमें लज्जा भय संकोच और सामाजिक प्रतिष्ठा में आँच आने का खतरा बना रहता है। स्वप्नों के माध्यम से भी उनका सम्पूर्ण प्रकाशन नहीं हो पाता। इस दशा में दमित वासनाओं के लिये निष्कासन का एक ही मार्ग शेष रह जाता है, वह है काया। वह इसी में से अपनी अभिव्यक्ति करना प्रारंभ कर देती है। यही रुग्णावस्था है। बाढ़ का पानी नदियों में किसी प्रकार अवरुद्ध हो जाय तो वह जल प्रलय की-सी स्थिति उत्पन्न कर देता है इसलिये इस दौरा प्रशासन अत्यधिक सतर्क और सचेष्ट रहता है ताकि उसका प्रवाह रुके नहीं और निर्बाध गति से बहता चला जाय। अतृप्त इच्छाओं का उद्दाम वेग भी ऐसा ही प्रचंड है। सब ओर से अपना रास्ता बन्द पाकर वह शरीर के मार्ग से प्रकट प्रत्यक्ष होने लगता और तरह तरह की मनोकायिक व्यथा की सृष्टि करता है।

रिग्रेशन थेरेपी में इस अवरोध को मिटाया जाता है ओर रोगी के अन्तराल में व्याप्त वासनाओं के घटाटोप को अभिव्यक्त होने का पूरा अवसर दिया जाता है ताकि अवचेतन परत उसके उस बोझ से मुक्त हो सके जिसे वह अब तक ढोती आयी है इसके लिये पीड़ित व्यक्ति को अनेक बार उस जन्म की यात्रा करायी जाती हैं जहाँ से उसका अवचेतन स्तन कुण्ठाग्रस्त होना हुआ था। इस प्रकार की कई यात्राओं के पश्चात मन एकदम हलका हो जाता है और उसी के साथ उसकी व्यथा भी दूर हो जाती है।

इसके लिये सम्मोहन का सहारा लिया जाता है। रोगी व्यक्ति को सम्मोहित कर विगत के अनुभवों से गुजरते हुये उस जन्म तक पहुँचा जाता है जहाँ की कटु अनुभूतियाँ मन की गहन परतों पर बोझ की तरह लदी होती है। इन्हें बार बार कुरेदा जाता है पुनः पुनः उनके स्मरण से अन्तश्चेतना की ग्रन्थि समाप्त हो जाती है और व्यक्ति स्वस्थ हो जाता हैं इस पद्धति से अनेक आश्चर्यजनक सफलताएँ मिलती देखी गई। ऐसे ही एक मामले का वर्णन इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध सम्मोहन चिकित्सक जेफरी इवर्सन ने अपनी कृति "मोर लाइन्ज देन वन" में किया है।

घटना एक ईराकी महिला की है। फातिमा नामक महिला को उच्च रक्तचाप की शिकायत थी। उसने उसका काफी इलाज करवाया पर कोई लाभ न हुआ अच्छी से अच्छी दवाइयाँ निष्प्रभावी साबित हो रही थी। वह बहुत परेशान थी। हारकर उसने रिग्रेशन चिकित्सा पद्धति की मदद ली। जब उसे सम्मोहित किया गया और पिछले जन्मों को ओर ले जाया गया तो उसने अपने किसी विगत जीवन की एक रोमांचकारी आपबीती सुनायी।

ब्बीलोन में भयानक मार काट मची थी। सैनिक सड़कों पर गश्त लगा रहे थे। पुरुषों का चुन चुनकर वध किया जा रहा था। सर्वत्र लाशें पड़ी थी। जमीन रक्तरंजित हो उठी थी। पुरुषों का जब सफाया हो गया तो औरतों का कत्लेआम शुरू हुआ। मैं अपनी एक सहेली के साथ बच निकलने की कोशिश करने लगी। लुक छिपकर कुछ दूर बढ़ी पर अंततः सैनिकों के हाथ लग गई। एक ने मेरे पेट में छुरा घोप दिया। मैं लहूलुहान होकर सड़क पर गिर पड़ी और बेहोश हो गई। मेरी सहेली का क्या हुआ, मुझे कुछ भी नहीं मालूम। शायद उसकी भी हत्या हो गई।

यह लोमहर्षक उल्लेख करते समय यों फातिमा की आँखें बन्द थी और वह अर्धमूर्छा की स्थिति में थी इतने पर भी उसका चेहरा भय से पीला पड़ गया था आवाज काँप रही थी और शरीर एवं हाथ पैरों में एक विचित्र प्रकार की छटपटाहट थी मानो वह हत्यारों के हाथ से बच निकलने के लिये संघर्ष कर रही हो। थोड़ी देर उपरांत उसे सम्मोहन से सामान्य स्थिति में वापस लाया गया अब वह काफी स्वस्थ अनुभव कर रही थी। साधारण चेतना की दशा में लौटकर उसने बताया कि वह जिस कार्यालय में कार्यरत है उसका अधिकारी अत्यन्त क्रोधी स्वभाव का है बात बात पर उग्र हो उठता है जिसके कारण वह अत्यधिक सहमी हुई रहती है। पति और बच्चों के साथ भी उसके सामंजस्यपूर्ण संबंध नहीं है। कदाचित अपने कठोर अधिकारी और हठी पति के रूप में उसका अंतर्मन पूर्वजन्म के हत्यारों की छवि देखता था। जब उक्त चिकित्सा के दौरान उसे अनेक बार इस मर्मान्तक आपबीती की स्मृति दिलायी गई तो उसकी रक्तचाप संबंधी शिकायत पूर्णरूपेण ठीक हो गई।

प्रसिद्ध फ्रांसीसी विद्वान ए.ए. लीबिआल्त ने उपर्युक्त चिकित्सापद्धति पर आधारित उपचार पर फ्राँस से बाहर दूसरे देशों में व्यापक सर्वेक्षण कार्य किया। उसके बाद एक पुस्तक लिखी हिप्नोटिज्म फैक्ट और फैंटेसी। इसमें उनने इस बात को स्वीकार किया है कि यदि मन की वास्तव में कोई सत्ता है तो उसकी अनेक परतें होनी चाहिए। बाह्य परतों से दैनिक गतिविधियों का संचालन होता है जबकि गहनतम स्तर में अतीत की स्मृतियाँ सुरक्षित रहती है। इस बात को अधिक स्पष्ट करने के लिये उनने मन की तुलना जल से करते हुये कहा है कि जिस प्रकार उसमें हलकी वस्तुएँ ऊपर तैरती रह जाती है और भारी तली में बैठ जाती है उसी प्रकार पुरानी स्मृतियाँ गहन अस्तित्व प्रच्छन्न रूप से बनाये रहती है। सम्मोहन इस गहराई तक उतरने की विधा है। वहाँ दबी छुपी स्मृतियों को कुरेदकर जब निकाल दिया जाता है तो वह स्तर उनकी विषाक्तता से मुक्त हो जाता है रिग्रेशन प्रणाली इसी सिद्धान्त पर आधारित है।

अपने सर्वेक्षण में उनने लगभग दो हजार ऐसे मरीजों का अध्ययन किया जिन्हें उक्त प्रणाली से लाभ पहुँचा था इनमें करीब ७. प्रतिशत लोग ऐसे थे जो पूर्वजन्म में अपनी जन्म की कोई रोमांचकारी घटना की स्मृति मात्र ने स्वस्थ बना दिया था।

पश्चिमी दुनिया में इस पद्धति द्वारा उपचार करने वाले लोगों में जिनकी सबसे ज्यादा धूम मची थी वे थे आर्नल ब्लाॅकहाॅम। जीवन भर वे इस क्षेत्र में अनुसंधान करते रहे। इस दौरान उनने अनेक ऐसी जटिल व्याधियों का इलाज किया। जिनसे ग्रस्त लोग जीवन से लगभग निराश हो चुके थे। उसे एगेरोफोबिया अर्थात् सामाजिक भय था वह हमेशा अपनी एकांत कोठरी में उदास पड़ी रहती। दूसरों के बीच जाने में उसे भय महसूस होता था ब्लाॅक्सहॅम ने जब उसे सम्मोहित किया तो वह बारहवीं सदी की यहूदी रिबेका बन गई। सम्मोहन के प्रभाव में आकर उसने जो वृतान्त बताया, वह उसके भय के कारण को स्पष्ट करता था। कार्डिफ में उन दिनों यहूदियों का जो कत्लेआम मचाया गया था, उस कत्लेआम को उसने स्वयं अपनी आँखों से देखा था। वह किसी प्रकार स्वयं की जान बचाने में सफल रहीं ब्लाॅक्सहाॅम की चिकित्सा के बाद जेन एकदम निरोग हो गई। अब उसे कही आने जाने में कोई डर नहीं लगता था।

'एनकाउण्टर्स विद द् पास्ट" नामक ग्रन्थ में इसी प्रकार की एक फोबिया भय के मरीज का वर्णन करते हुये ग्रंथकार पीटर माँस लिखते है कि हेलेना नामक उक्त नारी को आग से भय लगता था। धुँआ अथवा अग्नि को देखते ही उसे मूर्च्छा के दौर पड़ने लगते। मोमबत्ती जलाना भी उसके लिये मुश्किल साबित होता। लम्बे समय तक चली मनः चिकित्सा से भी जब उसे कोई फायदा नहीं हुआ, तो उसकी रिग्रेशन थेरेपी आरंभ की गई। सम्मोहित कर उसको जब सैकड़ों वर्ष पीछे के कालखण्ड में लाया गया तो उसने एक बहुत रोमांचक व्यथा कथा सुनाई

मैं हाथ पाँव बाँधकर चिता में लिटा दिया गया।। इस दण्ड पर लोग मोद मना रहे थे। चारों ओर विशाल भीड़ थी। मेरा अपराध सिर्फ इतना था कि मैंने एक ऐसी स्त्री से दवा ली थी,जिससे लोग घृणा करते थे और जिसका लोगों ने एक प्रकार से सामाजिक बहिष्कार कर रखा था। उस औषधि से मेरा गर्भपात हो गया, यद्यपि मेरा इस तरह को कोई विचार नहीं था। लाख मनुहार करने के बावजूद भी लोगों का दया नहीं आई। चिता में आग लगा दी गई। थोड़ी देर में अग्नि ने मेरा स्पर्श कर लिया। मेरे कपड़े जलने लगे। त्वचा झुलस गई। मैं चीखने चिल्लाने लगी। कुछ ही घंटों में मेरा शरीर जलकर भस्म हो गया। इस बीच मैं तड़पती रही।

हेलेना जब उक्त विवरण सुना रही थी तो उसका सम्पूर्ण शरीर पसीने से तर हो रहा था, चेहरे पर भीषण अकुलाहट थी जैसे मृत्यु की पीड़ा वह साक्षात् अनुभव कर रही हो किन्तु जब सम्मोहन से जगी तो काफी स्वस्थ महसूस कर रही थी। अब वह माचिस भी जला लेती थी और सहज ढंग से भोजन भी पकाती थी। आग का डर लगभग दूर हो चुका था। इस प्रक्रिया को कई बार दुहराने के बाद वह बिल्कुल ठीक हो गई।

इस चिकित्सा प्रणाली के विशेषज्ञों का कहना है कि इससे केवल मानसिक रोगों का ही नहीं वरन् दमा त्वचा पेट गठिया रक्तचाप जैसे अनेक प्रकार के शारीरिक रोगों का भी सफल इलाज किया जा सकता है। कई प्रकार का सिर दर्द में भी यह उपचार रामबाण सिद्ध हुआ है। कतिपय मिर्गी के मरीजों को भी इससे राहत मिली है।

कैलीफोर्निया से निकलने वाली पत्रिका जर्नल ऑफ रिग्रेशन थेरेपी में डॉ. मिलर ने एक ऐसी मरीज की चर्चा की है जिसके जोड़ जोड़ में दर्द था वह बुरी तरह कराहती थी दर्द बराबर बना रहता था। जब उसे पिछले जन्म में धकेला गया। तो बताने लगी कि सोलहवीं सदी में इटली में वह एक डॉक्टर थी पर स्त्री नहीं पुरुष। एक बार उपचार के लिये उसके यहाँ एक बालिका आई। उसकी हाथ की हड्डी टूटी हुई थी। उसे भली प्रकार बैठाने के लिये उसने एक झटका देकर उसे ऐंठ दिया। लड़की दर्द से चीख पड़ी। यद्यपि उसको तकलीफ पहुँचाए बिना भी ऐसा कर पाना संभव था, किन्तु उसने ऐसा नहीं किया शायद इसलिये कि डॉक्टर और उसकी पत्नी के बीच मनमुटाव रहता था। पत्नी बच्चों से घृणा करती थी जबकि उसे उनसे प्यार था। इसलिये यदा कदा बच्चों को देखकर उसे पत्नी पर क्रोध आ जाता, जिसका शिकार बच्चों को ही होना पड़ता था। उस दिन भी यही हुआ।

बालिका की तड़पन भर चीख उसके मन में गहराई तक उतर गई। उसके पीछे छिपी पीड़ा का अनुभव उसे होने लगा। बाद में यही गठिया के विकृत रूप में परिवर्तित हो गई। तब से लेकर अब तक हर जन्म में वह गठिया का शिकार रही। इसकी स्मृति से उसे काफी आराम मिला।

दमा यों कायिक व्याधि है। अनेक बार उसके कारण शारीरिक होते है, पर कई मौकों पर उसके पीछे का निमित्त मानसिक भी देखा गया है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के मनःशास्त्री पॉल डेवेरोक्स अपने लम्बे अनुसंधान के उपरांत इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं। इण्उयाना यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञानी एन.टी.मिरोव एक ऐसे अवसादग्रस्त रोगी का उदाहरण प्रस्तुत करते है जिसके सम्पूर्ण जीवन में अवसाद का कोई वास्तविक कारण दिखलाई नहीं पड़ता था फिर भी मरीज गहन अवसाद की चपेट में था। उसका बार बार सूक्ष्मतापूर्वक मनोविश्लेषण किया गया पर कारण विदित नहीं हो पा रहा था। ऐसा भी नहीं कि किसी एक मनः चिकित्सक ने ही उसका अध्ययन किया हो, अनेक मनः चिकित्सकों से निराश होकर वह अंततः डॉ. मिरोव के पास आया था। अंत में मिरोव ने उसे सम्मोहित कर उसके पिछले जन्मों में झाँकना चाहा तो ज्ञात हुआ कि वह प्रथम विश्वयुद्ध का एक सैनिक था और अग्रिम मोर्चे पर तैनात था उसने अपने सैकड़ों साथियों को मौत के मुँह में जाते देखा स्वयं तो किसी तरह बच गया पर रणभूमि में जा मौत का खेल देखा उससे वह बुरी तरह डर गया चूँकि उसमें वीरोचित् साहस का अभाव था, अतएव वह भय उसके अंतर्मन में प्रवेश कर गया। बाद के जन्मों में यही अवसाद बनकर प्रकट हुआ। डॉ. मिरोव के इलाज से वह स्वस्थ हो गया।

चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि आज मानवी जीवन इतना जटिल हो गया है कि इन दिनों पैदा होने वाली बीमारियाँ भी साधारण नहीं रही। सामान्य-सी लगनी वाली व्याधियाँ भी अब कठिनाई से ही ठीक हो पाती है कारण कि उनमें से करीब ६. प्रतिशत की प्रकृति मनः कायिक होती है शेष ४. प्रतिशत में वातावरण जिम्मेदार है। मानवी मन सम्प्रति कितना अशाँत और तनावग्रस्त है यह कोई छुपा तथ्य नहीं ऐसे में जो रोग पनपते है उनमें मनस् तत्व का भी कोई कम योगदान नहीं होता। चिकित्सक काया का इलाज करते है जबकि व्याधि मन में होती है इसलिये असफल रहते है। पश्चिमी देशों में चिकित्सा की शैली अब कुछ बदल रही है। वे उपचार से पूर्व रोगी का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कर यह पता लगाने का प्रयत्न करते है कि प्रस्तुत व्याधि में मन की कोई भूमिका तो नहीं? इस प्रकार की तनिक भी संभावना दीख पड़ने पर वे इलाज उसी स्तर से आरंभ करते है फलतः उन्हें सफलता मिलती है। यह अधिक सूक्ष्म स्तर की प्रक्रिया है। अब कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों में भी इस संभावना की तलाश की जा रही है। यह तो आने वाला समय ही बतलायेगा कि दोनों में कितना और किस स्तर का संबंध है अथवा संबंध है या नहीं किन्तु इतना निश्चित है कि जटिल जीवन के साथ जो रोग पैदा होते है वे सरल नहीं होते, सरल जैसे दीखते भर है।

सिर पर यदि मन भर का बोझ लदा हो तो मनुष्य की साधारण गतिविधियाँ उससे प्रभावित होती है। वह बहुत थका थका और निस्तेज प्रतीत होता है तथा जो कार्य आसानी से अतिसाधारण लोग भी कर लेते है उनके संपादन में भी उसे भारी कठिनाई महसूस होती है। मन के साथ भी यही बात है। वह यदि द्वन्द्वों और ग्रंथियों के बोझ से मुक्त हलका फुलका रहे तो व्यक्तित्व भी स्वस्थ सुंदर और सरल बना रहेगा। ऐसा व्यक्ति ही प्रगति करता और जीवन में कुछ कहने लायक सफलता अर्जित करता है रिग्रेशनथेरेपी जीवन की गति को इसी धारा में चलाने और बनाये रखने वाली चिकित्सा पद्धति का नाम है।


मृत्यु की शरण (Kahani)

देवकन्या  को ब्रह्मा जी ने सृष्टि संतुलन बनाये रखने के लिये मनुष्यों को मार मार कर परलोक भिजवाते रहने का काम सौंपा। इस क्रूर कर्म को करने के लिये दयालू देवकन्या सहमत न थी। वह दुखी होकर धेनु का श्रम तप करने चली गई। तप पूर्ण हुआ तो विष्णु भगवान ने उसे वर माँगने के लिये कहा। देवकन्या ने प्राणियों को मारने के क्रूर कर्म वाली विधि व्यवस्था से छुटकारा दिलाने का अनुरोध किया। प्रजापति का विधान और निर्माण भी आवश्यक था तथा मृत्यु के करुण भरे इंकार का भी महत्व था सो उनने मध्यवर्ती मार्ग निकाला पाँच दूत मनुष्य लोक में भेजे १. असंयम २. आवेश ३.आलस्य ४. तृष्णा ५.अविवेक। उनने कहा तुम लोगों के भीतर घुसकर लोगों को खोखला करते रहना। धीरे धीरे वे स्वयं मरणासन्न स्थिति में पहुँच जाया करेंगे। देवकन्या मृत्यु से विष्णु भगवान ने कहा जब आत्मघात से दुखी लोग की शरण न पा सकें तब तुम उन्हें दयावश अपनी गोद में सुला लिया करना मृत्यु इस दया धर्म को अपनाने के लिये सहमत हो गई। तब से अब तक लोग अपने कुकर्मों से अकाल मृत्यु मरते रहते हैं। मृत्यु तो उन्हें कष्ट से छुटकारा दिलाने की दया भर दिखाती रहती है।


ब्राह्मणत्व की एक जीती-जागती मिसाल

“जहाँपनाह! यह देखिए आज फिर भोजन बनाते हुए मेरा हाथ जल गया। बड़ी पीड़ा हो रही है। उफ़! पीड़ा से व्याकुल होकर मलिका ने बादशाह से फरियाद की। “अरे! यह क्या! तुम्हारे हाथों में तो सचमुच ही फफोले पड़ गए है।” बादशाह ने सहानुभूति भरे शब्दों में अपनी बेगम से कहा।

सचमुच ही उस दिन बेगम के हाथ भाप से फिर झुलस गए थे। बेचारी नाज़-नख़रों में पली हुई थी। उन्हें खाना पकाने का अभ्यास न था। शाही परिवार में प्रारंभिक जीवन व्यतीत करने वाली लड़की के लिए अपने हाथ से भोजन बनाना हिमालय का बोझा उठाने से कम न था।

उनके वालिद के यहाँ तो प्रत्येक काम के लिए नौकर हाजिर रहता था। शहजादी के मुँह से फरमाइश निकलते ही हुक्म का पालन होता था। दासियाँ हर समय उनकी सेवा में खड़ी रहती थीं। वे सारे दिन आराम फरमाया करती। खानसामा भोजन बनाकर शाही मेज पर लगाता। वे तो सब्जी में नमक-मिर्च के कम-ज्यादा होने तक की शिकायत किया करता। रोटी के मोटी होने या जल जाने की खराबी निकाला करती थीं। लेकिन जब से उनकी शादी बादशाह नसिरुद्दीन से हुई, तब से तो जैसे उनकी दुनिया ही बदल गयी थी।

अब तो हिन्दुस्तान की मलिका होते हुए भी उन्हें अपना खाना स्वयं ही पकाना पड़ता था। शादी के बाद उन्होंने भोजन बनाना सीखा जरूर था, पर अभी पर्याप्त अभ्यास नहीं हो पाया था। वे खुद खाना तो बनाने लगी थी, पर कई बार भाप से उनकी उँगलियाँ जल जाया करती थी। उनकी आँखें कड़वा धुँआ लग जाने से लाल हो जाती, आँसुओं की धार बह निकलती। कभी रोटियाँ कच्ची रह जाती-तो कभी जल जाती। प्रायः आटे में पानी ज्यादा गिर जाने से वह गीला हो जाता और चकले या बेलन पर बुरी तरह से चिपक जाता। उनकी बेली हुई रोटियाँ कहीं मोटी रह जातीं, तो कहीं से फट जाती। कभी छोटी रह जातीं तो कभी चकले के आकार के बराबर हो जातीं। भोजन बनाने की कला में वे स्वयं को पूरी तोर पर असफल महसूस करती। कमबख्त रोटी फूलती ही नहीं। झुँझलाते हुए वह कह उठती-खाना पकाना भी एक अजीब मुसीबत है।”

अनेकों बार उसके मन में आया कि बादशाह नसिरुद्दीन से अपनी भोजन बनाने संबंधी असमर्थता जाहिर कर दें हिम्मत कर कह डालें - “जनाब! मैं हिन्दुस्तान के शहंशाह की बीबी हूँ, कोई रोटी पकाने वाली नाचीज बावरचन नहीं। एक मलिका से अपना खाना पकवाना सरासर अन्याय है। कोई बावरचन रख लीजिए।”

ये विचार उनके दिल और दिमाग को विक्षुब्ध कर देते, पर शिकायत भरे ये लफ़्ज़ उनके होठों पर आते-आते जैसे रुक जाते। वह कुछ भी न बोल पातीं। बस उद्विग्न हो चुप रह जाती।

पर आज उनकी मनोव्यथा चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी। वे भाजन पकाते-पकाते क्रुद्ध हो घायल सर्पिणी सी उठी और झुंझलाते हुई सीधे बादशाह नसिरुद्दीन के पास जाकर शिकायत करने लगीं।

“जहाँपनाह! यह देखिए आज आपका खाना पकाते हुए मेरा हाथ जल गया। हाय, कितनी बुरी तरह जला है? बड़ी पीड़ा हो रही है। सहा नहीं गया तो आपको दिखाने चली आयी। इसी सिद्धान्त को अंजाम देने के लिए शासन प्रबन्ध से बचे हुए समय में टोपियाँ सीते और गरीबों की तरह गुजर-बसर करते। किसी को इस गुप्त रहस्य का पता न था।

नसिरुद्दीन ने प्रेम भरी दृष्टि अपनी प्यारी बेगम पर डाली। प्रेमपूर्वक उनका हाथ अपने हाथ में लेकर देखा। वास्तव में मलिका का हाथ बुरी तरह झुलस गया था। वे मन ही मन बड़े दुखी हुए। कुछ देर तक अपलक बेगम का दुःख भरा मुखमण्डल निहारते रहे।

वे आज बड़ी विक्षुब्ध थी। जब बादशाह ने कुछ कहा नहीं, तो वे फिर कहने लगी- जहाँपनाह! इतने बड़े देश के मालिक होकर भी क्या आप रोटी बनाने के लिए .... मेरे आराम की खातिर .... एक बावरचन नहीं रख सकते? आपको मुझ पर रहम नहीं आता? आप यह सब कैसे गँवारा कर लेते हैं?

शहंशाह को बेगम के जले हाथ देखकर सचमुच बड़ा सदमा पहुँचा एक क्षण के लिए उन्होंने सोचा-मैं ही बेगम की शिकायत का गुनहगार हूँ। दुनिया की तारीख में शायद ही कोई मलिका मेरी बेगम की तरह खाविंद की रोटी पकाती होगी। मैं चाहे शाही खजाने से निजी खर्च के लिए कुछ न लूँ, पर मेरी वजह से इस बेचारी को भी परेशानी उठानी पड़े, यह और मालिकाओं की तरह आराम और सुख-सुविधाएँ न पाए, वह तो वाजिब नहीं है।

परन्तु दूसरे ही क्षण उनकी आत्मा ने उन्हें सचेत किया। उन्हें अपना कर्तव्य धर्म याद आया और अपनी बेगम को प्यार से समझाते हुए बोले-प्यारी मलिका! मुझे मुल्क का मालिका न कहो।

“आप दिल्ली के इतिहास प्रसिद्ध तख्त पर हुकूमत कर रहे हैं आपको रियाया की किस्मत का वारा-न्यारा करने का पूरा हक हासिल है। आपका हुक्म ही कानून है। फिर आप मुल्क के मालिक नहीं, तो भला दूसरा कौन है?

“नहीं, नहीं, मालिक तो सिर्फ खुदा ही है।”

“हुजूर फिर आप क्या हैं? सुनूँ तो दिल्ली का बादशाह अपने-आपको क्या मानता है?

“मैं तो एक नाचीज खिदमतगार हूँ।

शहंशाह का यह संक्षिप्त उत्तर सुनकर बेगम उलझन में पड़ गयी। वह कुछ भी नहीं समझी।

हल्की सी प्यार भरी मुस्कुराहट चेहरे पर लाकर बादशाह नसिरुद्दीन बोले-अरे मालिका! मेरी बात तो दिन के उजाले की तरह साफ है। अब उन्हें काम क्यों करना चाहिए ........ हाय! यह अभागा मुल्क ....... गलती से उन लोगों को संत महात्मा फकीर मानता है जो मेहनत रत्ती भर भी नहीं करना चाहते ........ क्रूर अमीर और भाग्यवान की यही परिभाषा है बेगम?”

बेगम सुनकर चकरा गयी। उन्होंने विषय को फिर बदला बोली-दिल्ली का सारा शाही खजाना तो आपके हाथों में हैं, इसमें खर्च करने में भला आपको कौन रोकता है?

तुम मेरा मतलब नहीं समझी बेगम! ठस सरकारी खजाने में भला मेरा क्या है?

फिर यह साम्राज्य किसका है?

अरे, यह तो सब इस मुल्क की रियाया की चीज है और उसी के कामों में ही खर्च होनी चाहिए।

परंतु खर्च करने में भला आपका हाथ कौन पकड़ता हैं? बेगम ने सुझाव दिया।

यह ठीक है कि सरकारी खजाने को यदि मैं अनुचित तरीके से भी खर्च करूँ तो आज कोई भी मेरा हाथ पकड़ने वाला नहीं है।”

इतने कहते-कहते बादशाह रुक गए।

“तो फिर आपको क्या डर है? भला आपको किसे हिसाब देना है? आपसे हिसाब माँगने की किसकी हिम्मत है?

नसिरुद्दीन कुछ देर चुप रहे। फिर बोले - आज किसी और को हिसाब भले ही न देना पड़ें। जनता के पैसे को खुद अपने काम में लाऊँ तो अल्लाह के सामने गुनहगार ठहराया जाऊँगा .........।

मलिका दिल की गहराइयों से निकली हुई इस सच्ची बात से प्रभावित हुए बिना न रही। वह अपना दुख भूल गयी। उनको अपने खाविंद की मेहनत और पाँचों उँगलियों उँगलियों की कमाई पर निर्भर रहने मालूम हो गया।

वह बादशाह की मेहनत की कमाई और ईमानदारी की तारीफ करती हुई वापस लौटते हुए सोचने लगी। वे कभी भी शहंशाह का खाना पकाने के लिए दासी की माँग नहीं पेश करेंगी।


श्रमदेवता की उपासना से ही मिटेगा राष्ट्र का दारिद्रय

कहते हैं कि लक्ष्मी सदा पुरुषार्थियों का वरण करती है, इसलिए कभी लक्ष्मी को परिश्रम का प्रतीक माना जाता था। आजकल समय के साथ साथ परिस्थितियाँ बदली है। इस बदले परिवेश में उपर्युक्त सत्य में एक तथ्य यह भी जुड़ जाता है कि सर्वथा श्रम एवं पुरुषार्थहीन लोग भी सम्पन्न हो सकते हैं, पर यह असामान्य परिस्थितियों में तो यही देख जाता है कि जो श्रमशील हैं, वे संपन्न नहीं, तो अभाव ग्रस्त भी नहीं होते।

उस दिन इसके अनेकों उदाहरण देखने को मिलते रहे हैं डब्ल्यू. क्लीमेण्ट स्टोन का प्रसंग उन्हीं में से एक है। उसके प्रयास और पुरुषार्थ में कहीं-न कहीं कोई कमी अवश्य रह गई, अन्यथा आदमी अपना तो क्या, समाज और संसार तक के भाग्य को पलटने में समर्थ है।

वे कहते है कि जब उनका जन्म हुआ, उसके पूर्व ही पिता गुजर चुके थे। घर की आर्थिक स्थिति बहुत बुरी थी। पिता एक सामान्य क्लर्क थे, इसलिए जो कुछ धनोपार्जन करते, सब खान में ही चुक जाता, संग्रह की कोई गुंजाइश थी नहीं, सो उनके देहांत के बाद घर में फूटी कौड़ी तक न थी। माँ किसी तरह अपना पेट पाल लेता।

छोटी वय में अक्सर बच्चे खेलने कूदने में व्यस्त रहते हैं, पर घर की कठिनाइयों ने उन्हें दार्शनिकों की तरह गंभीर बना दिया। अब वे दिन भर अख़बार बेचते और शाम को कुछ विश्राम के बाद पढ़ने बैठ जाते इसमें माँ सहयोग करती।

अठारह वर्ष की उम्र तक क्लीमेण्ट काम करते रहे। इस समय तक उनके पास इतना पैसा इकट्ठा हो गया था कि वे स्वयं एजेन्सी ले सके। इसके साथ साथ बीमा पॉलिसियाँ भी बेचने लगे। जिस इमारत में उनने इन्श्योरेन्स कंपनी खोली थीं, वे उसे विश्वसनीय मानने गलते है। क्लीमेण्ट की इन्श्योरेन्स कंपनी के साथ यही हुआ। काम अधिक बढ़ जाने के कारण उनने कई कर्मचारी नियुक्त कर लिए। अब उनके सामान अनेक देशों में जाने लगे। कार्य विस्तार को देख उनने अख़बार का धंधा बंद कर दिया।

अब उनके पास सिर्फ दो व्यवसाय रह गए- बीमा कंपनी एवं कम्प्यूटर पुर्जों का निर्माण यह यत्र रक्तवाहिनियों में अथवा आहारनाल जैसे अवयवों में रेंगते हुए उन अवरोधों और तकलीफों का पता लगा और चित्र उतार सकेगा, जो अन्य उपायों से ज्ञात नहीं सकेगा, जो अन्य उपायों से ज्ञात नहीं हो पाते। इसके अतिरिक्त एक ऐसा रोबोट विकसित किया है, जो मरीज की सर्जरी कर सके।

इसके लिए एक ही कार्य करना पड़ेगा - हम श्रमदेवता की उपासना शुरू करें, साधन-सम्पदा मिलते चले जायेंगे। श्रम का लक्ष्मी से अटूट रिश्ता है। दरिद्र और कंगाल बने रहे या लक्ष्मी का आवाहन कर अपने कोठा भरे? फैसला हमें करना है, निर्णय हमें लेना है।


वीतराग महायोगी - बन्दा वैरागी

आप रक्षा कर सकते हैं, आप बचा सकते हैं मेरे बच्चे को। वह वृद्धा क्रंदन कर रही थी। आप योगी है। आप महात्मा हैं। मेरा और कोई सहारा नहीं है।

मेरा बेटा अब जी जाएगा। बुढ़िया उल्लासपूर्वक उठ खड़ी हुई उसने नहीं देखा कि बन्दा के नेत्र भर आए है। तुम्हारी तपस्या पूरी हो। तुम अकालपुरुष के प्यारे बनो। आशीर्वादों की वर्षा करती वह अपने घर की ओर लौट पड़ी।

पूरे पंजाब में बन्दा वैरागी अतिमानव, लोकोत्तर चमत्कारी महापुरुष माने जाते थे। वे पराजित किए जा सकते है। यह तो कोई सोच भी नहीं सकता था। धीर सिंह ने देखा कि हल पकड़ने वाले हाथ अब भाला या तलवार उठाए है। ग्रामीण तरुणों की संख्या बढ़ती जा रही है। बूढ़े तक दौड़े आ रहे है। प्रताप तो सर्वत्र परमात्मा का।’ बन्दा ने किसी अलक्ष्य के प्रति मस्तक झुकाया।” मिट्टी के किसी पुतले का प्रताप क्या हो सकता है। तुम इन नवीन सैनिकों को सँभाल लोगे? ”जैसी आपको आज्ञा।” धीरसिंह ने ग्रामीण तरुणों को परिस्थिति समझायी और उन्हें व्यूहबद्ध करना प्रारंभ किया। धीरसिंह कह रहे थे-आप सबके सेनापति इस समय बन्दा बैरागी है-महायोगी बैरागी। आपको उनकी आज्ञा का अक्षरशः पालन करना है।”

“हम पालन करेंगे। बैरागी की आज्ञा तो परमात्मा की आज्ञा है। उसे अस्वीकार कोई कैसे कर सकता है?”

पता नहीं था कि शत्रु किधर से आक्रमण करेगा, वह गाँव पर घेरा डालेगा या सीधे घुस पड़ना चाहेगा किन्तु बैरागी ने शत्रु की संख्या या उनके व्यूह की अपेक्षा कब की है। उनका अश्व जैसे वायु में उड़ रहा था। उनका आदेश उनके सैनिक यंत्रवत पालन कर रहे थे। घड़ी भर में गाँव से एक कोस दूर तक चारों ओर मोर्चा जम गया। वृक्षों के शिखर, ऊँचे टीले, गहरे खड्डा सब कही बैरागी के सैनिक सावधान बैठ चुके थे और मैदान में बन्दा के साथ चुने हुए इस घुड़सवार धूल उड़ाते दौड़ लगा रहे थे।

और कुछ ही देर में नजारे ने बदला हुआ रूप ले लिया। एक बार फिर सबको मानना पड़ा कि सचमुच विजय बन्दा बैरागी के चरणों में रहती है। शत्रु का सैन्यदल ठीक कितना था पता नहीं पाँच हजार से अधिक ही होगा। बैरागी के पास कुल पच्चीस सैनिक थे और ग्रामीणों को भी गिन लें तो पाँच सौ से अधिक नहीं। किन्तु युद्ध कठिनाई से तीन चला होगा।

सेना सूबेदार की ही थी, किन्तु वह न तो बैरागी को पकड़ने आयी थी न उनसे युद्ध करने की प्रस्तुत थी। वे लोग तो आए थे-गाँव के निरीह लोगों को लूटने काफिरों को कत्ल करके गाजी बनने साथ ही कोई सुन्दर-सी लड़की को अपनी वासना का शिकार बनाने। उन सैनिकों के भाव भी इसी प्रकार के थे। सिर सौदा करने को उनमें से कोई तैयार न था। बैरागी से सामना हो जाएगा, यह उन्हें पता होता तो इधर कदम रखने की भूल वे कर नहीं सकते थे।

‘अल्लाह हू अकबर’ की पुकार करती आततायियों की समुद्र-सी उमड़ती वह सेना किन्तु उसने सुना ‘सतश्री अकाल’ वाह गुरु की फतह।” बन्दा बैरागी की जय’ और उनके मुखों से अल्लाह हो अकबर बन्द हो गया। वे ‘या खुदा। या अल्लाह। चिल्लाने लगे।

बन्दा बैरागी। शैतान का फरिश्ता है यह काफिर। हवाइयाँ उड़ने लगी शत्रु सैनिकों के मुख पर। शैतान इसके तीरों को सौ गुना कर दिया करता है। मौत इसके साथ दौड़ती है।

सचमुच मौत ही दौड़ रही थी, बन्दा के अश्व के साथ। उनका अश्व जिधर से निकल जाता था, उनके बाणों की बौछार उधर की भूमि को लाशों से ढँक देती थी।

बैरागी आ गया। कयामत उतर आयी उसके साथ। बहुत शीघ्र के पैर उखड़ गए। अपने घायलों तक को कराहते छोड़कर वे भागे और भागते चले गए। उन्हें बन्दा नहीं, बन्दा का भय खदेड़े चला जा रहा था, क्योंकि भागते शत्रु को न बैरागी कभी खदेड़ते थे और न उन पर चोट करते।

“आपकी कृपा से हमने विजय प्राप्त की। “ बन्दा युद्ध से लौटे थे और अपने सदा के नियम के अनुसार वे किसी पर्वत पर अकेले ध्यान करने जाना चाहते थे। धीरसिंह ने आग्रह किया-शत्रु से लूटी सामग्री के वितरण का तो आप आदेश देते जाएँ।”

“आप साक्षात भगवान है। आपने मेरे पुत्र जीवित कर दिया। “ अचानक वह वृद्धा आ गिरी बैरागी के चरणों पर। उसके साथ आया था उसका पुत्र। अब भी वह बहुत दुर्बल था, किन्तु उसके मुख पर आरोग्य की चमक आ चुकी थी।

“माता परमात्मा को धन्यवाद दो। तुम्हारे पुत्र को उन दयामय ने अच्छा कर दिया है। “बन्दा बैरागी ने धीरसिंह की ओर मुख किया “और भाई तुम भी। विजय उस परम प्रभु की हुई और उसी की शक्ति से हई।

“फल हुआ-वह प्रभु की कृपा, उनका प्रसाद “बैरागी अश्व पर बैठते हुए बोले-उसे अपने कर्म का फल मानकर पूरे कर्म का उत्तरदायित्व क्यों सिर पर लेते ही। अपने को-कर्मफल का कारण कभी मत बनाओ फल को भगवान पर छोड़ दो। कोई कर्म तुम्हें बाँध नहीं सकेगा।’6

बैरागी का अश्व उड़ चला। विजय में प्राप्त श्रेय तथा सम्पत्ति न कभी वे लेते थे और न उसकी व्यवस्था का कोई आदेश देते थे। परम वीतराग होना ही उनका ऐश्वर्य था।


सी एफ एन्डूज (Information)

 लखनऊ स्टेशन पर तब एक अँग्रेज स्टेशन-मास्टर था। उसके कमरे के आगे जलती अँगीठी पर एक वृद्धा अत्याधिक ठण्ड के कारण हाथ सेंकने जा पहुँची।

स्टेशन-मास्टर इसमें अपनी तौहीन समझकर आपे से बाहर हो गए और इतने जोर से उसे धमकाने लगे कि यात्रियों की भीड़ जमा हो गई।

भीड़ में से एक व्यक्ति निकला बोला-आप तो ईसाई है न? बाइबिल पढ़ते या सुनते है न? फिर उनके संकेतों को ध्यानपूर्वक क्यों नहीं समझ पाते? यदि आप जैसे समाज के वरिष्ठ लोग भी ऐसा आचरण करेंगे, तो पारस्परिक व्यवहार के सारे मापदण्ड नष्ट हो जाएँगे। “ भीड़ के उस व्यक्ति ने अपनी ऊनी चादर बुढ़िया को ओढ़ा दी और भीड़ के साथ आगे बढ़ गया। यह यात्री था-पादरी सी एफ एन्डूज जो जीवन भर पीड़ित मानवता की सेवा में संलग्न रहे।


कल्कि अवतार और उनकी युगनिर्माण प्रक्रिया

“एक था राजा हिरण्यकश्यप। वह बड़ा दंभी, अहंकारी और अनीश्वरवादी कहा जाता था। उसके राज्य में सर्वत्र हिंसा,लूटपाट,भ्रष्टाचार,सैनिक - सत्ता अन्याय,अत्याचार का जोर था। यज्ञ जप,स्वाध्याय,सत्संग,परलोक,कर्मफल,परमात्मा से संबंध सारी आस्थाओं का अंत हो चुका था तब “

उनका पुत्र प्रहलाद, जन्म से ही धार्मिक संस्कार लेकर आया उसके जीवन की सरलता, निष्कपटता, धर्मपरायणता हिरण्यकश्यप को सह्य नहीं हुई सो उसने न केवल धार्मिक प्रजा को वरन् प्रहलाद को भी प्राणघातक यातनाएँ दी। कुटिलता के इस कुहासे में धर्म और अध्यात्म का प्रकाश नष्ट हो जाने को हो था कि एक प्रखर सूर्य की भाँति नरसिंह अवतार हुआ और उन्होंने हिरण्यकश्यप के सारे कपट- जाल को कुछ ही दिनों में नष्ट करके रख दिया। प्रहलाद की रक्षा के साथ - साथ धर्म अध्यात्म,सामाजिक अनुशासन और व्यवस्था की प्रतिष्ठापना करनी थी सो परमात्मा ने एक अवतार नृसिंह के रूप में लिया।,,

एक बार फिर वैसी ही विद्रूप स्थिति पृथ्वी के राजाओं ने कर दी थी। राजनीति की जो दुर्दशा अब है ठीक वैसी ही परिस्थिति तब भी थी जब भगवान परशुराम ने जन्म लिया और सत्ताधारियों के रूप में पनप रहे धर्माडम्बर पाप और अत्याचार को उन्होंने ने घूम-घूमकर अपने कराल फरसे की धार से काट गिराया।”

“तदनंतर भगवान राम का जन्म हुआ। दंभी, पाखण्डी और आसुरी वृत्तियों के प्रतीक रावण को परास्त कर सर्वत्र धर्म-संस्थापन की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया की पूर्ति उन्होंने की संपूर्ण रामायण उसी का अद्यावधि इतिहास है।”

“ऐसी ही एक आवश्यकता द्वापर युग में प्रतीत हुई थी। जब एक बार फिर दुर्भावनाओं का जाल कुछ ऐसा बिछा कि भाई-ही-भाई का गला काटने को तत्पर हो गया। एक ओर छल कपट पाप अत्याचार की १. अक्षौहिणी जनराशि और दूसरी ओर सत्य, शील, धर्मपरायण कुल पाँच पांडव। तब उनकी रक्षार्थ भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। उन्होंने न केवल कौरवों का विनाश करा दिया वरन् पाप-वृत्ति में डूबे अपने ही यादव कुल में समूल-पर्व रच दिया था।

भगवान किसी व्यक्ति के लिए-वृत्ति के लिए जन्म लिया करता है। महाभाग शौनको। भगवान ने स्वयं कहा था-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मनं सृजाम्यहम्॥

हे अर्जुन। जब-जब पृथ्वी पर धर्म का नाश और अत्याचार की बाढ़ आती है तब-तब मैं मानवीय रूप में अवतरित होकर सृष्टि में व्यवस्था स्थापित करता हूँ, अधर्म का अंत करके धर्म-संस्कृति-सदाचरण की स्वर्गीय वृत्तियों का अवतरण और जनमानस में आच्छादन करता हूँ।

इतनी कथा सुनने के उपरांत ज्ञान की अन्यतम जिज्ञासा वाले शौनक मुनियों ने महर्षि लोमहर्शण के पुत्र श्री सूतजी से प्रश्न किया-भगवन्।द्वापर तक की कथा हो चुकी अब आप कृपया यह बताइए कि कलियुग में भगवान का जन्म किस रूप में होगा उस समय ऐसा कौन-सा दुष्ट और अत्याचारी राजा होगा जिसे मारने के लिए भगवान अवतरित होंगे।

वह सब कथा भी हमें विस्तारपूर्वक सुनाइए जिससे हमारा कल्याण हो।”

शौनकों के प्रश्न करने पर श्री सूतजी बोले-मुनीश्वर ब्रह्माजी ने अपनी पीठ से घोर मलीन घातक को उत्पन्न किया। उसका नाम रखा गया-अधर्म। अधर्म जब युवक हुआ तब उसका मिथ्या से विवाह कर दिया गया। अधर्म व मिथ्या के संयोग से महाक्रोधी पुत्र दंभ का जन्म हुआ उनके माया नाम की एक कन्या उत्पन्न हुई। फिर दंभ और माया के संयोग से लोभ नामक पुत्र और निकृति ने क्रोध को जन्म दिया। क्रोध की संयोनि हिंसा हुई। इन दोनों के संयोग से काली देह वाले महाभयंकर कलि का जन्म हुआ।

काकोदर, विकराल, चंचल, भयानक, दुर्गंधयुक्त शरीर, धूत मद्य, स्वर्ण और वेश्या में निवास करने वाले इस कलि की बहिन दुरुक्ति हुई। इन दोनों ने परस्पर विवाह कर लिया, जिससे भयानक नामक पुत्र और मृत्यु नामक कन्या हुई। भयानक और मृत्यु के निरत और यातना नामक पुत्र-पुत्री उत्पन्न हुए। इन दोनों के संयोग से हजारों अधर्मी पुत्र पैदा हुए जो आधि व्याधि बुढ़ापा दुख-शोक आदि में रहकर यज्ञ, स्वाध्याय दान, उपासना आदि का नाश करने लगे।”

सारी पृथ्वी में आई अधर्म व दुखों की बाढ़ और उसकी बौछारें स्वर्गलोक तक पहुँचती देखकर देवगण बड़े चिंतित हुए। वे पृथ्वी को आगे करके प्रजापति ब्रह्मा के पास गए और बोले-भगवान कलियुग के अधर्मों के कारण पृथ्वी बुरी तरह भयभीत हो रही है। वहाँ सीधे सज्जन व भावनाशील लोगों को बुरी तरह कष्ट मिल रहा है। अब कुछ ऐसा कीजिए कि पृथ्वी सर्वनाश से बच जाए। तब प्रजापति विधाता पृथ्वी और देवताओं को लेकर विष्णुलोक गए और भगवान श्रीहरि से देवताओं की सारी विनती कह सुनाई। तब भगवान ने प्रसन्न होकर पृथ्वी पर आने और अवतार लेने का वचन दिया। -(कल्किपुराण २/१/७)

ऊपर की पंक्तियों में चल रहा आख्यान वस्तुतः कोई नामधारी राजा के वंश का वर्णन न होकर कलियुग के आविर्भाव का भाव-चित्रण मात्र है। उसे इतनी कुशलता से और सूक्ष्म बुद्धि से उपस्थित किया गया है कि वर्तमान युग की व्याख्या में किसी को संदेश न रह जाए।

यह कलियुग है सही, पर न तो आजकल किसी के क्रोध, हिंसा, यातना, दंभ लोभ, निकृति आदि नाम होते हैं और न ही अभी सामाजिक परंपराएँ इतनी विकृत हुई कि सगे भाई-बहिनों में संबंध होने लगे। व्याख्यान पूरा-का-पूरा भाववाचक है और दुर्गुणों की क्रमिक वंशावली का कलात्मक प्रतीक है। यह एक प्रकट तथ्य है कि मनुष्य कोई पाप करता है तो उसे तुरंत छिपाने की आवश्यकता पड़ती है तब वह झूठ बोलता है। पाप और झूठ के संयोग से ही दंभ बनता है। मायाचार उसका दूसरा रूप है। यही दीं व माया जहाँ मिलते है वही लोभ की उत्पत्ति होती है। इस तरह यह वंशावली बढ़ते-बढ़ते हजारों प्रकार की पाप-वासनाओं-बुराइयों-विकृतियों के रूप फैल जाने का नाम युग की विकृति या कलियुग है। कलियुग का नाम लेते ही एक ऐसे युग का बोध होता है जिसमें पाप अधर्म अत्याचार हिंसा सर्वनाश की विभीषिकाएँ यातनाएँ रोग वृद्धावस्था दैन्य दारिद्रय का सर्वत्र बाहुल्य हो उठे। यह सब परिस्थितिवश हुआ, इसके लिए किसी एक व्यक्ति को दोष नहीं दिया जा सकता। ब्रह्माजी का एक नाम विधि भी है। उसका अर्थ है कि कालक्रम में इस तरह की परिस्थितियों का आविर्भाव भी होता ही रहता है।

ज्ञान-संपादन-यज्ञ आदि परमार्थी वृत्तियाँ नष्ट हो जाने के कारण सारी पृथ्वी के लोग दुःख पाने लगते है। तब कुछ विचारशील लोग पीछे लौटते है और सृष्टि प्रक्रिया पर ध्यान देकर देखते है कि यदि धरती पर कभी सुख समृद्धि रही है तो वे परिस्थितियाँ कौन-सी थी। उनसे निष्कर्ष निकल सकना संभव नहीं होता तो वे किन्हीं समर्थ-व्यक्तियों की संरक्षता में एकत्रित होकर उन परिस्थितियों की छानबीन करते है और फिर उनको अवतरित करने की दिशा में कार्यरत भी होते है। अवतार का काम इन भावनाशील आत्माओं को जोड़ना और उनके द्वारा एक नये युग के निर्माण की सशक्त विचार-प्रक्रिया को क्रिया पद्धति में ढालना होता है।

कल्कि अवतार की भाव-भूमिका पर प्रकाश डालते हुए श्री सूतजी आगे लिखते हैं कि देवता धरती को आगे करके ब्रह्माजी के पा गये और उनके समक्ष धरती से अपने दुःखों का वर्णन करवाया। ब्रह्माजी देवताओं को लेकर विष्णुलोक गये। भगवान विष्णु ने पृथ्वी की सुनी और आश्वासन दिया कि हम तुम्हारे कष्ट दूर करने के लिए अवतार लेने आ रहे हैं। फिर देवताओं से कहा- तुम लोग मेरी सहायतार्थ जाकर पृथ्वी में स्थान-स्थान पर जन्म लो।

उपर्युक्त आख्यान से भी वही बात स्पष्ट है। पृथ्वी स्थूल पदार्थों का जड़ पिंड है, वह न तो अपनी कक्षा को छोड़कर किसी लोक निर्माण कर सकती है और न किसी से कुछ निवेदन कर सकती है। संपूर्ण कथानक का आशय यही है कि जब पृथ्वी अज्ञान, अधर्म और पाप - वासनाओं के अंधकार में बुरी तरह घिर गई, तो प्रजापति अर्थात् विधि-व्यवस्था ने एक अतिसार्वभौमिक मानवीय सामर्थ्यों से संपन्न सत्ता का प्राकट्य किया। वह सत्ता जन्मी अकेले पर उसका साथ देने वाले भावनाशील देवपुरुषों की पंक्तियों की पंक्तियाँ उठ खड़ी हुई और देखते-ही-देखते अधर्म का विनाश करने वाली प्रक्रिया प्रचण्ड रूप में सुदर्शन चक्र की भाँति सारे संसार में घूमने लगी। इस तमाम घटनाचक्र के संचालन का श्रेय किसी भी व्यक्ति को मिले वह अलग बात है पर संपूर्ण अवतारों की कथाएँ और श्री सूतजी द्वारा वर्णित कल्कि अवतार का कथानक इसी बात का संकेत करता है कि अब पाप और अधर्म, द्वेष और दुष्प्रवृत्तियाँ जन-जन के मन-मन में घुस गई है। उनको काटने के लिए एक तीक्ष्ण विचार-प्रणाली और संघशक्ति के रूप में ही कल्कि का अवतरण होना चाहिए। जो लोग इन पुनीत उद्देश्य में सहायक होंगे वही देवताओं के अंशावतार व भगवान कल्कि के साथी, सहयोगी, शिष्य भक्त देवात्माएँ होगी।

युगनिर्माण योजना का जन्म ऐसी ही भी भावनाशील आत्माओं का गठबंधन और कर्तृत्व है। कुछ ही दिन में इन्हीं देवात्माओं के कर्तव्य-कंधों पर विराजमान कल्कि के दर्शन करने को मिल जाएँ, तो उसे अतिशयोक्ति न माना जाए। कल्कि पुराण इस बात का प्रत्यक्ष साक्षी है कि युगनिर्माण योजना विशुद्ध रूप से ईश्वरीय प्रेरणा, उन्हीं की इच्छा की पूर्ति है। हम जो कर रहे है उसमें उन्हीं की प्रेरणा एवं इच्छा प्रमुख रूप से काम कर रही प्रतीत होती है।

कल्कि पुराण में प्रतिपादित विश्व व्यवस्था के दो प्रमुख आधार-उपासना और यज्ञ, यही दो आधार युगनिर्माण योजना के भी है। उपासना के दो भाग हैं-१ धर्म या अध्यात्म अर्थात् अपने आपको तत्त्वदर्शन धार्मिक विज्ञान) के द्वारा सृष्टि के मूल परमात्मा, जगतनियंता या विश्व-व्यवस्था के साथ जोड़ना, (२) संस्कृति अर्थात् मानवीय जीवन के अज्ञान और आसक्ति को कम करते हुए, प्रक्षालित करते हुए स्वर्ग और मुक्ति की ओर अग्रसर होना। प्रथम में जप, तप, योग आदि आते हैं, दूसरे में स्वाध्याय, सत्संग, संस्कार, सामाजिक सभ्यता और शिष्टाचार की वह सब बातें आती हैं, जो अपनी प्रसन्नता के लिए हम औरों से चाहते है।

यज्ञ भी उसी प्रकार स्थूल व सूक्ष्म दो भागों में बटा है। (१) स्थूल यज्ञ-आकाश जो पृथ्वी को परिमण्डलाकार घेरे हुए है उसकी शुद्धि विषैले तत्वों को मारने के लिए अग्निकुण्ड में शुद्ध वस्तुओं का हवन (२) सूक्ष्म दूषित चिंतनप्रणाली को विचारमंथन की अग्नि में जलाकर उसमें सद्विचारों और सत्कर्मों की निरंतर आहुतियाँ, जिससे विचार और कर्म में सत्प्रवृत्तियाँ का समावेश हो जाए। कल्कि पुराण के अनुसार भगवान कल्कि की कार्यप्रणाली ऐसी ही है।

सूतजी बोले-हे शौनको। जब कल्कि भगवान कुछ बड़े हुए तब उनके पिता विष्णुशर्मा ने कहा-

तात ते ब्रह्मसंस्कारं यज्ञसूत्रमनुत्तमम्ः। सवित्री वाचयिश्यामि ततो वेदान्पठिश्यसि॥ कल्कि पुराण २/३१

वत्स। अब तुम्हारा ब्रह्म संस्कार, उपनयन और सावित्री का श्रवण कराऊँगा फिर तुम वेदाध्ययन करना।

इस पर कल्कि पूछते है-

को वेदःका च सावित्री केन सूत्रेण संस्कृता। ब्राह्यणा विदिता लोके तत्तत्वं वद तात माम्॥

हे तात। यह वेद क्या है? सावित्री क्या है? किस सूत्र से संस्कारित पुरुष ब्राह्मण कहलाता है? इतना पूछने पर विष्णुशर्मा ने इसी अध्याय के ३६से ४.वें श्लोकों में बताया-वेद भगवान विष्णु की वाणी और सावित्री ही प्रतिष्ठा अथवा वेदमाता है। त्रिगुण-सूत्र को त्रिवृत्ताकार करके धारण करने पर मनुष्य पवित्र ब्राह्मण ही ब्रह्मवर्चस के अधिकारी होते हैं उन्हें दस संस्कार दस यज्ञ शुद्ध करते है। तब वे यज्ञ ध्यान, जप, तप, स्वाध्याय, संयम और भक्ति करते हुए ब्रह्म विभूति प्राप्त करते है।

तत्पश्चात वे कल्कि भगवान का उपनयन संस्कार कराकर गायत्री महाशक्ति की उपासना की शिक्षा देते है। कल्कि भगवान इसी गायत्री तत्व और संस्कारों द्वारा जनमानस को संशोधित करने और उन्हें यथार्थ में ईश्वर-बोध कराने की प्रतिज्ञा करते है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि गायत्री उपासना और समाज में ब्राह्मणत्व के सच्चे आविर्भाव के लिए जो लोग प्रयत्न व परिश्रम करेंगे वह कल्कि की इच्छा की पूर्ति वाले उनके सहायकगण वह देवात्माएँ ही होती है जो एक निश्चित संकल्प लेकर अवतार के साथ जुड़ी हुई जन्म लेती है।

कोई भी नई प्रतिभा संघर्ष में जन्म लेती है। नन्हा-सा अंकुर भी पृथ्वी की छाती चीरता है, तभी बाहर आ पता है। पुत्रप्रसव में नारी को कितना कष्ट उठाना पड़ता है यह सब जानते है। समाज में फैली हुई अंधतमिस्रा को दूर करने वाले अतीत के महापुरुषों में से किसी का भी जीवनवृत्त उठाकर देख लिया जाए उन्हें अनिवार्य रूप से स्वीकार करना पड़ा। है यह सिद्धांत सभी युगों में एक समान रहा है।

कल्कि की युग-निर्माण प्रक्रिया भी इसी तरह संपन्न होने को है। कल्कि पुराण के अष्टम अध्याय में ४१से ४५ श्लोकों तक कथा आती है-अत्यंत विस्तार वाला बौद्धों लोग न देवताओं को मानते है न पितरों को और न परलोक को। देहात्मवादी कुलधर्म जातिधर्म न मानने वाले धन स्त्री और भोजनादि में अभेद अर्थात् कोई भेदभाव न करने वाले खाने-पीने में ही जो जुटे रहते है उन्होंने भगवान कल्कि का आगमन सुना तो वे अतिक्रुद्ध होकर संपूर्ण दल-बल के साथ उन पर आक्रमण करने लगे।

बौद्धों से बौद्ध धर्मानुयायियों का कोई संबंध नहीं है। वस्तुतः यह बौद्ध ने तो कोई विशेष धर्म-संप्रदायों के व्यक्ति है और न कीकटपुर नाम की उनकी कोई राजधानी है। बौद्ध का अर्थ आधुनिक सभ्यता से प्रभावित वह लोग है जो आज अपने को बुद्धिमान मानते हुए थकते नहीं। उनमें आज अक्षरशः वह गुण देखे जा सकते है जो ऊपर बौद्धों के कहे गये है। आज विज्ञान इतना बढ़ गया है तथापि उपासना देवार्चन यज्ञ ध्यान परलोक पुनर्जन्म आदि को कोई नहीं मानता। खाना पीना प्रजनन और पैसा जुटाना यही लोगों के लक्ष्य रह गये है। शील सच्चरित्रता नष्ट होते जा रहे है। इन बुद्धिवादियों को ठिकाने लगाने का एक महत्वपूर्ण कार्य युग-निर्माण प्रक्रिया का अंग है और वह धर्म के प्रबुद्ध स्वरूप के विस्तार द्वारा ही संभव है। लोहे को लोहा काटता है। विष को विष मारता है। विज्ञान की जिस मान्यता ने लोगों को कुमार्गगामी बनाया है उसकी दिशाएँ यदि अध्यात्म की ओर मोड़ दी जाएँ तो उससे आज के लोगों की इस देह को ही सर्वसुख मानने वाली धारणा को उसी प्रकार काटा जा सकता है जैसे कल्कि बौद्धों की सेना को काटते है।

कल्किपुराण के १६वे अध्याय में यज्ञानुष्ठानों की विस्तृत प्रक्रिया का वर्णन है। वे कृपाचार्य, परशुराम, वशिष्ठ, व्यास, धौम्य आदि ऋषियों के साथ राजसूय एवं वाजपेय यज्ञों का अनुष्ठान करेंगे। यज्ञ धर्म अर्थ काम की सिद्धि देने वाले कहे गये है पर यह अकेले राजसूय यज्ञों से संभव नहीं बाजपेय अर्थात् ज्ञानयज्ञ और अश्वमेध अर्थात् बुराइयों को काटने को अभियान-यज्ञ भी साथ-साथ चलेगा। उसी से आकाश की शुद्धि के साथ जन-मानस का भी परिष्कार संभव है।

समाज-सुधार और धर्म-प्रतिष्ठा के यह महत्वपूर्ण कर्म-कलाप कल्कि भगवान पूर्ण करेंगे वही यह युगनिर्माण मिशन कर रहा है। यह ईश्वरीय प्रेरणा ही है जो उसे समझकर जितना सहयोग देगा वह अवतार की उतनी ही समीपता और आशीर्वाद का अधिकारी होगा। कल्कि पुराण में इसी तथ्य का प्रतिपादन अलंकारिक किंतु प्रखरतापूर्वक भली-प्रकार देखा जा सकता है।


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यदि तुम शांति सामर्थ्य और शक्ति चाहते हो, तो अपनी अंतरात्मा का सहारा पकड़ो। तुम सारे संसार को धोखा दे सकते हो किंतु अपनी आत्मा को कौन धोखा दे सका है? यदि प्रत्येक कार्य में आप अंतरात्मा की सम्मति प्राप्त कर लिया करेंगे तो विवेक पथ नष्ट न होगा। दुनिया भर का विरोध करने पर भी यदि आप अपनी अंतरात्मा का पालन कर सके, तो कोई आपको सफलता प्राप्त करने से नहीं रोक सकता।


एक ही परमचेतना हम सब में संव्याप्त

ज्ञान के उन्मेषकाल से ही भारतीय ऋषि-मनीषियों ने वृक्षों में चेतना का दर्शन किया था। तभी उन्होंने इन्हें चैतन्य सम्पन्न प्रतिपादित किया है। व्यवहारशास्त्र के आदिप्रणेता एवं प्रथमपुरुष मनु ने इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कहा है कि वृक्षों के अंदर ज्ञान आवृत्त रहता है तथा इन्हें भी सुख-दुःख की अनुभूति होती है। जड़-जगत के अन्वेषक वैज्ञानिकों में भी यह सत्य मान्य हो चुका है। इन्होंने अपने अनुसंधान एवं शोध-प्रयत्नों में यह बात अनेकों तरह से सिद्ध की है। इनके निष्कर्षों के अनुसार चेतना की विकास-यात्रा वनस्पतिजगत से प्रारम्भ हुई मानी जानी चाहिए। विज्ञान वेत्ताओं के अनुसार वृक्ष संवेदनशील होते है तथा विविध अनुभूतियों को अभिव्यक्त करते है भले ही अभिव्यक्ति का माध्यम किन्हीं अन्य जीवों जैसा न हो।

कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपने ’वसंतयापन’ शीर्षक निबन्ध में लिखा है कि उन्नति के इतिहास में मनुष्य का एक अंश पेड़ पौधों के साथ लिपटा-सिमटा हुआ है। हमारी प्रकृति में इसका यथेष्ट परिचय मिलता है। अवश्य किसी समय हम लोग शाखामृग थे किन्तु उससे भी पहले किसी एक आदियुग में हम शाखी (वृक्ष) जरूर थे। कविवर इस विषय को आगे बढ़ाते हुए कहते है कि अभिव्यक्ति की अंतिम पंक्ति में आ जाने के कारण मनुष्यों में अनेक विभाग हो गए है। जड़ भाग, उद्भिज भाग, पशु भाग, बर्बर भाग,सभ्य भाग,देव भाग आदि। इस तथ्य का और अधिक स्पष्टीकरण श्रीमद्भागवत पुराण में मिलता है। कपिल मुनि अपनी माता से कहते है कि ”हे जननी। जिनमें चेतना नहीं है उनसे सचेतन प्राणी श्रेष्ठ है। जिनमें साँसें चलती है उनमें वे श्रेष्ठ है। जिनमें ज्ञान का अंश विद्यमान होता है। ”जिनमें ज्ञान का अंश विद्यमान होता है। ’इस श्रेणी का पहला विभाग स्पर्श आदि अनुभव करने वाले वृक्षों का है। इनमें सूक्ष्म रूप से सभी इन्द्रियों की वृत्तियाँ होने पर भी मुख्यरूप से स्पर्शेन्द्रियाँ होती है।

भारतीय समाज में तो वृक्षों की चेतना के अस्तित्व को स्वीकारने के अनेकों प्रमाण मिलते है। विभिन्न पर्वों पर इनकी पूजा इस सत्य की ही अभिव्यक्ति है। हमारे तत्त्वदर्शी ऋषियों ने तो आदिकाल से ही मनुष्य और वृक्ष में असाधारण साम्यता एवं समरूपता की झाँकी देखी थीं। बृहदारण्यक उपनिषद् का ऋषि कहता है-मनुष्य के शरीर में रोमावली पत्ते के समान त्वचा बाहर के छिलके की भाँति तथा उसकी त्वचा में बहता हुआ रक्त वृक्ष की त्वचा से निकलते हुए रस के सदृश है। मनुष्य के माँस अर्थात् माँस-पेशियाँ होती है। जो कि वृक्ष की अंतः संरचना के समान है। पुरुष का नाड़ी जाल वृक्ष की लकड़ी से लगे हुए कोमल भाग के तुल्य है और उसकी हड्डियाँ अंदर की लकड़ियाँ तथा मज्जा जैसी है।”

वृक्ष चेतना के प्रतिपादन के संदर्भ में भारद्वाज और भृगु का संवाद सर्वाधिक रोचक व महत्वपूर्ण है। भारद्वाज ने अपनी जिज्ञासा में वृक्षों के पंचभौतिक तत्वों के अस्तित्व से इंकार किया है। ये इनमें चेतना नहीं मानते। इसके समाधान में महर्षि भृगु की मान्यता है कि वृक्ष-वनस्पतियों में आकाशतत्त्व के कारण फूल और फल प्रकाशित होते है। ऊष्णता या अग्नितत्त्व की वजह से पत्ते, छाल, फल एवं पुष्पों का मलिन होना एवं मुरझाना होता है। यह वृक्षों के स्पर्श का संकेत है।अग्नि वायु और विद्युत के भीषण शब्दों से फल-फूल झड़कर गिरते है। श्रोत से शब्दों से फल-फल झड़कर गिरते है श्रोत से शब्द का ज्ञान होता है। अतः अवश्य ही वृक्ष सुनते है। लता वृक्ष से लिपटती है और चारों ओर से उसके ऊपरी भाग तक गमन करती है ऐसी स्थिति में वृक्षों को दिखाई देने की अनुभूति भी होती होगी क्योंकि दर्शन के बिना गति की संभावना नहीं होती। प्राणशक्ति के कारण पवित्र, अपवित्र गन्ध और अनेक तरह की धूप की गन्ध से वृक्ष रोगरहित होकर पुष्पित तथा पल्लवित हुआ करते है। वृक्षों में रसेन्द्रियाँ भी होती है। ये वायु से संयुक्त होकर मूल के द्वारा जल खीचते है।

‘वैदिक संपत्ति के प्रसिद्ध लेखक पं. रघुनंदन शर्मा ने अपनी इस रचना में एक समाचार पत्र ’लीडर’ के एक लेख को उद्धृत करते हुए कहा है कि बुद्धि संबंधी प्रकाश वृक्षों में भी पाया जाता है। बगीचों में पड़ हुए नलों के सुराखों को वृक्ष सहजता से परख लेते हैं और उन सुराखों में अपनी जड़े डाल देते हैं। इन्होंने एक ऐसी लता का उल्लेख किया है जो किया वृक्ष की चोटी तक जाकर जमीन में वापस आ जाती है और फिर दूसरे वृक्ष पर चढ़ने के लिए तत्पर रहती है भले ही इसका अंतर पचास गज दूर ही क्यों न हो।

वृक्षों में रागात्मक लगाव को रामायण में बड़े ही सुन्दर ढंग से चित्रित किया गया है। भगवान श्रीराम के वनगमन के समय वृक्ष अपनी जड़ों द्वारा जकड़े होने के कारण वेगहीन थे। इसलिए वे वन में जाते हुए श्रीराम के पीछे-पीछे तो नहीं चल सकते थे फिर भी वायुवेग से उनमें जो उद्वेग पैदा हो रहा था उसके द्वारा ऐसा प्रतीत होता था मानो वे ऊँचे-ऊँचे वृक्ष श्रीराम को वापस लौटने के लिए पुकार रहे हो। इतना ही नहीं श्रीराम को वन में छोड़कर जब सुमंत वापस लौटे तब उन्होंने दशरथ को बताया कि लक्ष्मण-सीता सहित राम के वनगमन से सबसे अधिक दुःख एवं कष्ट अयोध्या के वृक्षों को हुआ।

यह शोक इतना था कि राज्य के वृक्ष इस संकट का अनुभव कर कृषकाय हो गया तथा फूल अंकुर और फलियों सहित मुरझा गए।

एक अन्य स्थान पर महर्षि वाल्मीकि कहते है-चित्रकूट जा रहे भरत को मार्ग में भारद्वाज के आश्रम में वृक्षों ने अभूतपूर्व सत्कार किया। उस समय बेल के वृक्ष मृदंग बजा रहे थे बहेड़ के पेड़ शम्या नामक ताल देते थे तथा पीपल नृत्य कर रहे थे। इन अलंकारिक वर्णनों के पीछे वृक्षों के अंदर मानव के समान उल्लास व आनंद दृष्टिगोचर होता है।

डॉ. हरिराम जसटा ने अपनी कृति हिमांचल की लोकसंस्कृति में तिब्बत की एक जनश्रुति का वर्णन किया है। इनके अनुसार जिस समय किसी लामा का जन्म होता है तब उसके जन्मस्थल के आस-पास सारे मुरझाए वृक्षों में नए जीवन का संचार होता है। उनमें मुस्कराती हुई कोमल एवं नयी पत्तियाँ फूटने लगती है। यह किसी महापुरुष के जन्म के स्वागत की तैयारियाँ होती है। पुण्यात्मा के जीवनोत्सवों से वृक्ष भी उमंगित होते हैं। वाल्मीकि रामायण में भी एक ऐसा ही प्रसंग आया है कि जब राम के राज्याभिषेक उत्सव में नर-नारियाँ उमंग व उत्सव में मग्न थी उसी दौरान वनस्पतिजगत में भी हर्षोल्लास का वातावरण था। आदिकवि वाल्मीकि के अनुसार भगवान राम के राज्याभिषेक के समय धरती हरियाली से हरी हो गयी वृक्ष पत्तों से लद गए और पुष्पों में अपूर्व सुरभि भर गयीं। भारत के अलावा अन्य देशों में भी वृक्ष एवं उत्सव के संबंध को दर्शाया गया है। स्वीडन के एक गीत में बताया गया है। कि जब अप्सराएँ नृत्य करने लगती है तब वृक्षों की पत्तियाँ भी उसी ताल एवं लय में थिरकती है। वृक्ष संगीत प्रिय होते है।वैज्ञानिक शोध के अनुसार पेड़-पौधे संगीत के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते है। सोयाबीन और मक्का के पौधों की वृद्धि संगीतमय वातावरण में तीव्रता से होती है। वृक्ष स्वयं भी संगीत का स्वर निकालते हैं। इसे किसी एकांतवचन में गहरे भावात्मक एकात्म से अनुभव किया जा सकता है। वृक्षों को मधुर व मंद संगीत अधिक आकर्षित करते हैं। इन्हें वेद की ऋचाएँ एवं सामगान बेहद पसंद आता है। ऋषियों को आश्रमों में व आस-पास वृक्ष-वनस्पतियों का अधिक फल-फूलों से लदा पाया जाना इसी का प्रमाण है।

आधुनिक विज्ञानजगत के मनीषी जगदीशचन्द्रबसु ने ऋषियों के इस तथ्य को प्रमाणित किया। इन्होंने स्पष्ट किया कि पौधों में बुद्धि रुदन-गायन शयन जागरण वेदना और आनंद की भावना सन्निहित होती है। इसके पश्चात अमेरिकी वैज्ञानिक क्लीव वैक्सटर ने भी पौधों की संवेदनशीलता को स्वीकार। वैक्सटर ने पौधों की कई घटनाओं का साक्षात्कार किया है। इनसे प्रभावित होकर उन्होंने ’सीक्रेट लाइफ ऑफ प्लांट्स’ नामक ग्रंथ लिखकर वनस्पति जगत में सबको आश्चर्यचकित कर दिया। अमेरिकन महिला वैनिक श्रीमती शेट ने भी पौधों में चेतना के प्रभाव का उल्लेख किया है। इन्होंने आगे स्पष्ट किया है पौधे अदृश्य तरंगों के द्वारा मानव की भावनाओं को ग्रहण कर लेते है। ये वातावरण में हो रही सूक्ष्म हलचलों के भी मूकदर्शक होते हैं। ट्रीरिंग इसका प्रमाण है जिसमें समस्त गतिविधियों को कोड की भाषा में लिख दिया जाता है।संभवतः इसी कारण पौधे किसी संत से पुलकित एवं प्रसन्न होते है तथा लकड़हारे से भयग्रस्त हो जाते है। रूस के प्रसिद्ध वैज्ञानिक वी. एन. पुष्किन ने अपने अनेक अनुसंधानों से प्राप्त निष्कर्ष के आधार पर बताया है कि पौधे और मनुष्य के बीच गहरा संबंध होता है। इसी के आधार पर पौधे मनुष्य के भीतर की सूक्ष्म हलचलों व परिवर्तनों को पकड़ लेते है। पौधे अपने रक्षक के साथ गहरी आत्मीयता व प्रेम रखते है। किसी की जीवित कोशिकाओं को नष्ट होते देख पौधे दुःखी हो जाते है प्रो. इवान इसी दोशेविच गुनार के अनुसार मनुष्य के नाड़ी आवेगों के समान पौधों में विद्युत आवेग होते है दक्षिण अफ्रीका में एसीटिव नामक वृक्ष हिंसक मनुष्य से बेहद डरता है जबकि अच्छे लोगों की उपस्थिति में प्रसन्नता व्यक्त करता है। केरनीद्वीप में पाया जाने वाला वृक्ष ‘लाडरोज’ रोता है। इसके अलावा वहाँ पर हँसने वाले गाने वाले तथा माँसभक्षी पेड़ों का भी पता चला है। आदमी के समान पेड़-पौधे बीमार भी होते है। जर्मनी में तो डॉक्टरों को बीमार पेड़ों का उपचार करते पाया जा सकता है। वहाँ के डॉक्टर पेड़ों की सर्जरी तक करते है।

वैज्ञानिक शोध से यह भी पता चला है कि कई प्रकार के वृक्ष भूकम्प की तीव्रता का समय से पूर्व आभास कर लेते है। इन्हें अन्य प्राकृतिक आपदाओं एवं विपदाओं को सूचित करते देखा गया है। एक पेड़ ऐसा भी है जो अपनी वंश−वृद्धि के लिए आत्महत्या कर लेता है। पनामा में बोरो कोलाराडोकं आइलैण्ड पर स्थित एक प्रयोगशाला के अनुसार टेफीगोलिया वर्सीकोलर नामक यह पेड़ ऐसा कार्य करता है। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी निर्बाध रूप से चली आ रही है। अभी तक किसी वृक्ष ने इस परंपरा को नहीं तोड़ा है। यह भी मानव के समान एक संवेदनशील गुण है।

वनस्पतियों को चैतन्यसंपन्न होना तथा मानव के साथ इनका घनिष्ठ संबंध होना एक निर्विवाद सत्य है। इस संबंध को और प्रगाढ़ किया जा सके। तो अनेकानेक प्राकृतिक संकटों को टाला जा सकता है। आवश्यकता इसी बात की है कि वनस्पतिजगत के साथ अपनत्व एवं आत्मीयता का भाव रखा जाए तथा इनके रोपण, संरक्षण एवं विस्तार में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी जाएँ। आखिर एक ही परमचेतना ताप उन्मेष हममें व्याप्त है।


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तुम सुख-दुख की अधीनता छोड़ उनके ऊपर अपना स्वामित्व स्थापन करो और उसमें जो कुछ उत्तम मिले, उसे लेकर अपने जीवन को नित्य नया रसयुक्त बनाओ जीवन को उन्नत करना ही मनुष्य का कर्तव्य है।

-परमपूज्य गुरुदेव


विज्ञान बहुत कुछ कर गुजरा, अब दर्शन की बारी है

विज्ञान का तात्पर्य प्रकृति के कुछ रहस्यों का उद्घाटन अथवा कुछ उपकरणों का निर्माण कर लेना मात्र नहीं है वरन् उसकी व्यापकता मानवी दृष्टिकोण को अधिक सुविस्तृत तथ्यपूर्ण एवं सत्यनिष्ठ बनाने तक चली जाती है। विज्ञान का उपयोग भौतिक सुख-सुविधाओं के संवर्द्धन अथवा जानकारियों का क्षेत्र बढ़ाने तक सीमित नहीं है वरन् वास्तविक उपयोग यह है कि हम तथ्य और सत्य को प्रश्रय दें। परंपराएँ कितनी ही पुरानी अथवा बहुमान्य क्यों न हों यदि वे यथार्थतः और उपयोगिता की कसौटी पर सही नहीं उतरती तो उन्हें बदलने के लिए सदा तत्पर रहे। नये या पुराने के झंझट में न पड़कर विज्ञानी सत्य को ही मान्यता प्रदान करता है।

विज्ञान न केवल एक प्रक्रिया है वरन् एक प्रवृत्ति भी है। जिसका फलितार्थ है-साहसपूर्ण विवेचनात्मक एवं तथ्यसमर्पित यथार्थवादी दृष्टिकोण। सत्य की खोज के लिए यह आवश्यक है कि हम तर्क और तथ्य की कसौटी पर प्रत्येक मान्यता और परंपरा को कसें और उनमें से जो खरी उतरती हो उन्हीं को अंगीकार करें। विज्ञान के इस पक्ष को 'दर्शन' कहा जाता रहा है। वस्तुतः दोनों के समन्वय से ही एक पूर्ण विज्ञान की प्रतिष्ठापना होती है।

मान्यता पुरानी है या नई इस व्यामोह से निकल कर जो तथ्य है उसी को स्वीकार करने की बात यदि मन समा जाए तो समझना चाहिए कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण मिल गया। यथार्थवादी चिंतन और औचित्य का अवलंबन जिन्होंने अपनाया उन्हें विचारक्षेत्र का वैज्ञानिक ही कहना चाहिए। दूसरे शब्दों में उसे दार्शनिक भी कह सकते है।

भौतिकविज्ञान की अपनी सीमा और उपयोगिता है। वह पदार्थ की स्थिति और गति का विवेचन करता है और वस्तु की मूलभूत सूक्ष्मसत्ता का पता लगाता है। वह सूक्ष्म-से-सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम तक पहुँचने के लिए निरंतर आकुल-व्याकुल रहता है। और अधिकाधिक गहराई तक पहुँचने के लिए अधिकाधिक प्रयास करता है।

भावनात्मक क्षेत्र में भी दर्शन-विज्ञान की गतिविधि इसी आधार पर अधिकाधिक कलात्मक और सौन्दर्य-उपासक बनती जाती है। किन व्यक्तियों और किन पदार्थों की कितनी उपयोगिता है इस स्थूल में सन्निहित महान संवेदनाओं की गहराई तक पहुँचने का प्रयास करता है।

चेतना का सूक्ष्मतम स्तर है-सत्य शिवं, सुंदरम्। वस्तुओं में लोभ ओर व्यक्तियों में मोह का दृष्टिकोण बहुत ही स्थूल है। यह अहंता का आरोपण मात्र है। जिस संपत्ति को हम अपने अधिकार के अंतर्गत मानते है, वह हमें प्रिय लगती है और जिन व्यक्तियों को अपने परिवार के मान लेते है, उनमें आसक्ति बढ़ जाती है। इसी प्रिय परिधि की समीपता सुहाती है और उसे बढ़ाने तथा रखाने की ललक लगी रहती है। आमतौर से सुख-संतोष की परिधि उतने ही क्षेत्र में अवरुद्ध होकर रह जाती है। जो किया और चाहा जाता है वह उसी सीमा में बँधा रहता है। यह अंतः की प्रतिध्वनि मात्र है इसमें वस्तु के मूल सौंदर्य का दर्शन हो ही नहीं पाता और व्यक्ति लोभ और मोह के अँवर-डँवर देखता हुआ बालकौतुकों में उलझा रहता है।

कला काव्य एवं सौंदर्य को भावनात्मक संवेदना तथा चिंतन की गायन कला नहीं कला का आवरण है। उस माध्यम से अंतःकरण में जो उल्लास प्रस्फुरण उमगता है, वह संवेदना ही कला है। काव्य किन्हीं तुकबंदी या छन्द विन्यास को नहीं कहते।शब्दों का आवरण उठाकर विशिष्ट स्तर के भावातिरेक को सजाया भर जाता है। उन शब्दों के अंतरंग में जो कोमलता झाँकती है और चेतना में गुदगुदी पैदा करती है वही कविता है। सौंदर्य वस्तुओं की सज्जा दृश्यों की शोभा एवं व्यक्तियों के अंग-गठन पर निर्भर नहीं है वह तो प्रकृति की मृदुल सुषमा एवं आत्मा की कोमलकान्त संवेदनशीलता को अपने अंतरंग-चित्रपट पर कलात्मक तूलिका के साथ चित्रण कर सकने की कलाकारिता है। सुंदरता को दूसरे शब्दों में दिव्यानुभूति कह सकते है। जो विशिष्टता के अनुरूप उमंगती उभरती रहती है। उसका किसी की अंग-संगठन से कोई विशेष संबंध नहीं है।

संभव है वनस्पतिशास्त्री को कोपलों और कलियों में मात्र रासायनिक प्रक्रिया का कोई अमुक क्रम विकास भर दिखाई पड़े। भौतिकी को शोधकर्ता प्रभातकालीन अरुणोदय की प्रकाश किरणों को नेत्रगोलकों के साथ जुड़े हुए प्रभाव-प्रत्यावर्तन मानकर संतुष्ट हो सकता है। किसी की आँखों से टपकते आँसुओं को रसायनवेत्ता कुछ क्षार श्लेष्मा प्रोटीन पानी आदि का सम्मिश्रण बताकर अपना समाधान कर सकते है। खगोलज्ञ के लिए ग्रह-तारकों की दूरी परिधि कक्षा आदि जानना पर्याप्त लग सकता है पर जिनके दृष्टिकोण में संवेदनाओं की कोमलता विद्यमान है उसे पुष्प को प्राकृतिक सौंदर्य को अरुणोदय की पुष्प बेला को किसी करुणार्द्र के अश्रुप्रवाह को झिलमिलाते तारकों वाली निशा को देखकर जो अनुभूति महत्वपूर्ण है। कला, कविता एवं सौंदर्य की परख वस्तुतः संवेदनशील धाराएँ है जो भावना क्षेत्र को अनेकानेक भाव-लहरियों की थिरकन के साथ आंदोलित करती है। इन्हें दार्शनिक उपलब्धियाँ कहा जा सकता है। अंतःकरण का विकास कोमल संवेदनाओं के क्षेत्र में न हो सके तो उसका शारीरिक पिछड़ापन वन्य-प्राणियों से भी गई-गुजरी स्थिति में खड़ा कर देगा।

भौतिकविज्ञान को असंस्कृत समझने का कोई कारण नहीं क्योंकि उसका उद्देश्य न केवल अणु-सत्ता का विवेचन एवं उपयोग जानना है। वरन् चेतना के साथ जुड़ी हुई कोमल संवेदनाओं को उभारकर अंतःकरण की भावभरी रसानुभूति प्रदान करना भी है। इन दोनों प्रयोजनों को साथ लेकर चलने से ही विज्ञान की पूर्णता बनती है अन्यथा भौतिकी को ही विज्ञान मान लेने पर तो वह सचमुच ही असंस्कृत बन जाएगा। तब उसे लँगड़े, काने, कुबड़े, पंगे, नकटे, बूचे की संज्ञा दी जा सकेगी। वह वस्तुतः कुरूप एवं कर्कश ही बन जाएगा।

जीवन को जड़ और चेतन का समन्वय कह सकते है। हमें पदार्थों का भी उपयोग करना पड़ता है और चेतनता से भी वास्ता पड़ता है। हमारा शरीर स्वयं जड़-पदार्थों से बना है और अंतःकरण में चेतना की सत्ता विद्यमान है। उभयपक्षीय वस्तुस्थिति से अधिकाधिक आनन्द लेने के लिए उनकी सूक्ष्मता में प्रवेश करना आवश्यक है ताकि जो अभी तक नहीं मिल सका वह आगे मिल सके। इस आवश्यकता की पूर्ति स्थूल जड़जगत के क्षेत्र में भावसंवेदना के अंतराल में प्रवेश करके वह प्रयोजन सिद्ध किया जा सकता है।

विज्ञान और दर्शन का क्षेत्र पृथक रखा जाए तो दोनों दो है भी नहीं। एक ही तथ्य के दो पूरक पक्ष है। भौतिक जड़ पक्ष को सँभालता है और ब्रह्मविद्या चेतना को सुसंस्कृत बनाती है। तथ्यों की उपेक्षा करने मात्र से चिंतन की कलाबाजी का खेल खड़ा करते रहने वाला दर्शन भ्राँतियों का भण्डार बन जाएगा वह हमें अवास्तविक कल्पनाओं की उड़ान में उड़ते रहने वाला-दिवास्वप्न देखते रहने वाला मात्र बनाकर रख देगा। इसी प्रकार जड़ पदार्थों की क्षमता पर निर्भर होते-होते हम स्वयं हृदयहीन मशीनी मनुष्य मात्र बनकर जाएँगे। विज्ञान को दर्शन के साथ और दर्शन को विज्ञान के साथ अपना ताल-मेल बिठाना पड़ेगा। यद्यपि आज यह बहुत कठिन दीखता है पर कल इसकी अनिवार्यता अनुभव की जाएगी। सत्य और तथ्य का समन्वय करने से ही सर्वतोमुखी प्रगति के दोनों पहिए गतिशील हो सकेंगे।

विज्ञानी को कलाकार बनना चाहिए और कलाकार को विज्ञान के साथ अपना मेल-जोल बढ़ाना चाहिए। दर्शन और विज्ञान को मिलाकर उभयपक्षीय आवश्यकताओं की पूर्ति करनी चाहिए। दोनों को दो धाराओं में बहते हुए भी एक लक्ष्य पर पहुँचना चाहिए। यदि विज्ञानी बिना हित-अनहित का विचार किए घातक आविष्कार को उपयोग होता रहा तो मनुष्य अपनी कलाकारिता को अनावश्यक समझने लगेगा और उसकी सौंदर्यानुभूति समाप्त हो जाएगी। यदि ऐसा हुआ तो विज्ञान की प्रगति सचमुच बहुत महँगी पड़ेगी।

विज्ञान के संपर्क में दर्शन की सत्ता को खतरा उत्पन्न हो जाएगा इस प्रकार सोचना तभी उचित है जब वह अवास्तविक आधारों को लेकर चल रहा हो। अब बुद्धिवादी युग आ गया। क्यों और कैसे की कसौटी पर कसे बिना अगले दिनों किसी भी प्रचलन को स्वीकार न किया जा सकेगा। यथार्थता की परीक्षा से यदि दर्शन भागेगा। तो उसका यह भगोड़ापन ही उसकी सच्चाई समझे ली जाएगी और दंभी बताकर समय का प्रवाह उसका साथ छोड़ देगा तब उसे बेमौत मरना पड़ेगा इससे अच्छा यही है कि वह समय रहते आत्म-निरीक्षण परीक्षण करके इस योग्य बना ले तथ्यों का सामना करने में उसे डरने की तनिक भी आवश्यकता न रहे। दर्शन का गौरव इसी में है। विज्ञान को अपना क्षेत्र जड़ की परिधि से अधिक विस्तृत करके उसे चेतना तक विकसित करना होगा। चेतना जड़ की प्रतिकृति प्रतिच्छाया नहीं। पदार्थ का उपयोग करना मात्र ही उसकी तुष्टि का आधार नहीं है। आत्मा में कुछ ऐसा भी है। जिसे अलौकिक अद्भुत और सरस कह सकते है। प्रत्यक्ष को ही मात्र कसौटी मानकर चेतना की सत्ता को झुठलाया जा सकता है पर इससे काम है और अपना स्तर। उनकी अपनी गरिमा है और अपनी संवेदनात्मक दिव्यता। यदि ऐसा न होता तो उसकी चेतना एक कंप्यूटर जितनी होकर रह जाती।

विज्ञान की उपलब्धियों ने इस भूखण्ड के निवासियों को अत्यंत समीप ला दिया है। द्रुतगामी वाहनों ने दूरी को दूर कर दिया है। संचार साधनों-इंटरनेट व टेलिकॉम नेटवर्क से हम दूरभाषण और दूरदर्शन की आवश्यकता क्षण भर में पूरी ही नहीं कर लेते हमें संसार भर की खबरें तत्क्षण ही मिल जाती है। विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई दुनिया अब एक गाँव में रहने वाले लोगों की तरह इकट्ठी हो गई है। दूरी क्रमशः द्रुतगति से निरस्त होती जा रही है। यह भौतिक उपलब्धियाँ, भौतिक विज्ञान द्वारा प्रदान की गई है। दर्शन को मनों की दूरी दूर विज्ञान ने निरस्त कर दी और दर्शन का काम है कि व्यक्तिवाद की संकीर्णता को हटाने और आत्मवत् सर्वभूतेषु की विश्वमानव एवं विश्वपरिवार की उदात्त मनःस्थिति को विकसित करने में अपने समस्त प्रयासों को केंद्रित कर दिखाए। जड़ता और अह के निविड़ बन्धनों से मानव-जाति को छुड़ाने में दर्शन को ही महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। देवत्व की सदाशयता का विकास कर सकना उसी के हाथ में है। मानवी संस्कृति का संरक्षण दर्शन के अतिरिक्त भला और कौन कर सकेगा? विज्ञान व दर्शन का समन्वय ही इक्कीसवीं सदी की आचार-संहिता का निर्माण करेगा।


यह नोबुल पुरस्कार एक महाक्रान्ति का शंखनाद है

आर्थिक जगत का वर्तमान युग संक्रमणकाल की प्रक्रिया से गुजर रहा है। वैश्विक स्तर पर अर्थतंत्र में बड़ा तीव्रगति से परिवर्तन हो रहा है। ऐसे में जब पूरी विश्व अर्थव्यवस्था पर पश्चिम का ही आधिपत्य हो एक एशियाई नागरिक उस पर भी भारतीय का अर्थशास्त्र का नोबुल पुरस्कार १९९८ वर्ष का पाना एक मायने रखता है। प्रोफेसर अमर्त्यसेन नोबुल पुरस्कार से सम्मानित होने वाले छठे भारतीय हैं एवं अर्थशास्त्र का यह पुरस्कार पाने वाले पहले एशियाई नागरिक है। रॉयल स्वीडिश अकादमी ऑफ साइंसेज के अनुसार कलकत्तावासी चौसठ वर्षीय प्रोफेसर सेन को कल्याणकारी अर्थशास्त्र में उनके योगदान के लिए यह पुरस्कार विगत अक्टूबर को दिया गया है एशियाई विकास बैंक की मानव दरिद्रता का सूचकाँक तैयार करने संबंधी योजना के मुख्य सूत्रधार प्रो. सेन को विश्व का सर्वोच्च सम्मान मलना उनके कार्य की शक्ति और गहराई को दर्शाता है प्रो. सेन ने सामाजिक चयन के सिद्धांत कल्याण और गरीबी की परिभाषा तथा अकाल के अध्ययन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनने निर्धनता और भूख के आर्थिक तंत्र का इतनी गहराई से अध्ययन किया है। कि उन्हें इस क्षेत्र का विशेषज्ञ माना जाता है।

आज आर्थिक समानता का प्रबल पक्षधर एवं पोषण करने वाला साम्यवाद धुर्रियाँ बिखर जाने से मृतप्राय है आकर्षण का दूसरा तंत्र पूँजीवाद भी आर्थिक एकाधिकारवाद के रूप में सिमट गया है अब एक प्रकार से नव साम्राज्यवाद के प्रचार प्रसार का तंत्र चल पड़ा है उसने विश्व में खुली अर्थ व्यवस्था उदारीकरण भूमण्डलीकरण आदि की नयी चकाचौंध तो उत्पन्न की है परंतु उसी को जन्म देने वाले देश अपने में आर्थिक मंदी एवं बेरोजगारी जैसी समस्याओं से ग्रसित देखे जा रहे है। जापान, इंडोनेशिया, रूस, मलेशिया, कोरिया, ताईवान, सिंगापुर से लेकर ब्राजील तक सभी ओर मंदी व मुद्रा अवमूल्यन देखा जा सकता है ऐसे टूटते समय में सारे संसार की नजर भारतीय अर्थ - व्यवस्था पर लगी हुई है यदि यह भविष्यवाणी की जाती रही है कि भारत इक्कीसवीं सदी की एक महान आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरकर आ रहा है तो कुछ गलत नहीं है प्रायः सभी के इस मत को कि भारत ही समूचे विश्व को आधुनिक स्थायी एवं सुदृढ़ अर्थतंत्र प्रदान करेगा प्रो. अमर्त्यसेन को मिले नोबुल पुरस्कार से पुष्टि मिली है।

प्रसंग कुछ ऐसा है कि अर्थशास्त्र और अध्यात्मशास्त्र दोनों के नियम एक जैसे होने के कारण आज की युगसंधि की वेला में यह पुरस्कार और भी महत्वपूर्ण हो गया है। अध्यात्मशास्त्र के नियम भी अर्थशास्त्र की तरह ही है। उनका निष्कर्ष है कि (१) व्यक्तित्व प्रतिभा और सामर्थ्य को निखारा-निरंतर बढ़ाया जाए (२) संपत्ति और विभूतियों को सत्प्रयोजनों में लगाया जाए (३) ज्ञान और तप से जो लोग ऊँचे उठे उनकी उपलब्धियों होने दिया जाए। यदि अध्यात्म का शास्त्र द्वारा निर्धारित इन अनुशासनों का ध्यान न रखा जाए तो आत्मबल अवांछनीय-आसुरी दिशा में भी लग सकता है। रावण-हिरण्यकश्यप भस्मासुर जैसे तपस्वी धनसंपन्न के बली भी विनाशकारी विभीषिकाएँ उत्पन्न कर सकते है। इसीलिए मात्र साधना उपासना तपस्या आदि आत्मिक उपार्जनों पर ही ध्यान केंद्रित न कर ऋषिगणों ने यह भी देखा है कि इस भावनात्मक उत्पादन का प्रयोग-उपयोग कि प्रयोजन के लिए किया जा रहा है। इसीलिए भारतीय दर्शन इतना व्यावहारिक व हर देश-काल परिस्थिति के लिए उपादेय माना जाता रहा है।

परमपूज्य गुरुदेव ने फरवरी १९७३ की अखण्ड-ज्योति में एक लेख में भूमि श्रम, पूँजी, संगठन साहस इन पाँच साधनों को प्रधान उत्पादक उपकरण माना है। उनने लिखा है कि उनका उपयोग कहाँ किस तरह हो रहा है इस पर भी कड़ी दृष्टि रखी जानी चाहिए अन्यथा इनका दुरुपयोग विघातक उत्पादन भी खड़े कर सकता है और सारे विश्व-समुदाय को विपत्तियों की विभीषिकाओं को सहन करने के लिए विवश होना पड़ सकता है। पूज्यवर ने लिखा है कि विलासी प्रसाधनों पर नियंत्रण रख जो उपयोगी है-श्रम की वृत्ति के साथ संस्कारों का भी संवर्द्धन कर विश्वकल्याण को ध्यान में रख उत्पादित किया जाए-उसी को वरीयता मिलनी चाहिए।

यदि उपर्युक्त बातों पर ध्यान देकर हम आज की परिस्थितियों का मूल्यांकन करें व ग्लोबल अर्थव्यवस्था पर चिंतन करे तो प्रोफेसर अमर्त्यसेन के कुछ निष्कर्ष हमें हम सब पर पूरे राष्ट्र व विश्व पर लागू होते प्रतीत होंगे। अपनी पहली प्रेसवार्ता में डॉ. सेन ने कहा है कि अर्थ-व्यवस्था के वैश्वीकरण का बुनियादी आधार मानव-संसाधन का विकास है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है शिक्षा-साक्षरता विद्या−विस्तार एवं समग्र स्वास्थ्य-संवर्द्धन। किसी को भी संदेह नहीं होना चाहिए। कि ये दो मूलभूत आधार सशक्त हो तो किसी भी समाज की श्रमशीलता संदेह के घेरे में नहीं आ सकती।भारत ने निश्चित ही विगत पचास वर्षों में इन दो क्षेत्रों की उपेक्षा की है। इसी कारण आर्थिक उद्भव की समस्त परिस्थितियाँ होते हुए भी इस महान राष्ट्र को अकाल-भुखमरी-आर्थिक वैषम्य की स्थिति का सामान करना है। उदाहरण केरल का ही ले जहाँ पर शिक्षा स्वास्थ्य की सुविधाएँ आदर्शतम स्तर पर है वहाँ की प्रति व्यक्ति आय औसत भारतीय की आय से कही अधिक है। शिक्षा और स्वास्थ्य शासन पर निर्भर होंगे तो कुछ अधिक सुधार होने की अपेक्षा न कर एक व्यापक गैरसरकारी तंत्र सारे भारत व दक्षिण एशियाई स्तर पर सक्रिय होना चाहिए। इस संबंध में विख्यात चिंतकों का भी यही मत है कि गैरसरकारी स्तर पर ही ऐसे तंत्र को मजबूत किया जा सकता है एवं उदारमना व्यक्तियों के साधनों का नियोजन उसमें होने पर अपेक्षा की सकती है कि राष्ट्र श्रमदेवता के अनुदानों से आत्मावलम्बी हो आर्थिक प्रगति के चरमोत्कर्ष को पहुँच सकते है।

वस्तुतः समुचित श्रम की न्यूनाधिकता ही कायिक और मानसिक स्वास्थ्य संतुलन को नष्ट करने का प्रधान कारण है अध्यात्मशास्त्र,दर्शनशास्त्र एवं अर्थशास्त्र का यदि समुचित समन्वय किया जा तो एक निष्कर्ष निकलता है कि हर व्यक्ति को अपने कायिक और मानसिक क्षेत्र को उर्वर भूमि मानकर उसमें सद्भावों की सत्कर्मों की कृषि करना चाहिए। मात्र धन ही संपदा नहीं है। प्रतिभाशाली स्किल्ड व्यक्ति का उत्पादन ही वास्तविक दौलत है। प्रतिभा,समर्थता और गरिमा को बढ़ाने के लिए भी उसी लगन और तत्परता के साथ पुरुषार्थ किया जाना चाहिए जिस मनोयोग से कि धन कमाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहा जाता है। व्यक्ति परिवार और समाज देश को समुन्नत बनाने के लिए धन से भी बढ़कर प्रतिभाशाली और उच्च चरित्र वाले नागरिकों की आवश्यकता पड़ती है। इनका अकाल होगा तो अर्थ - आधिक्य होते हुए भी तरह - तरह के घोटाले होंगे व वे पूरे जमाने की फिजा बिगाड़ कर रख देंगे।

श्री अरविंद के अनुवाद के अनुसार भारत के पास एक अच्छा-खाया बैक हे तकनीकी दृष्टि से प्रशिक्षित कारीगर स्तर के व्यक्तियों का जिनकी संख्या करोड़ों में है। उनने १९४८ में यह अनुमान लगा लिया था कि इस सदी के अंत तक पहुँचते - पहुँचते प्रायः ३५ करोड़ ऐसे व्यक्ति भारत में होंगे, फिर इस भारत को गरीब क्यों होना चाहिए? उनका मत था कि चरित्रनिर्माण की प्रक्रिया साथ-साथ की भावना विकसित होते रहने पर भारतवर्ष यह सामर्थ्य रखता है कि वह सारे विश्व का आर्थिक नेतृत्व कर सके। क्या यह भविष्यवाणी जो पूज्यवर गुरुदेव की भी है मात्र लिखने-पढ़ने की बात रह जाएगी अथवा वास्तविकता में भी बदलेगी। हमें राष्ट्रीयता के मूल्यों के प्रति निष्ठा बढ़ाने को एक धर्म मानकर श्रमदेवता की प्रतिष्ठा करनी ही होगी तब ही यह स्वप्न आगामी दस वर्षों में साकार हो सकेगा कि भार सारे विश्व का जगद्गुरु पुनः बने, प्रायः हर क्षेत्र में नेतृत्व करें। इसमें निश्चित ही उन प्रवासी भारतीयों का अभूतपूर्व योगदान होगा। जो प्रायः साढ़े चार करोड़ की संख्या में विश्वभर में फैले है एवं कम-से-कम आरामतलबी-हरामखोरी के रोग से अभी कोसों दूर है। धन की ही भाँति प्रतिभा ज्ञान और परमार्थ का उत्पादन निरंतर किया जाना चाहिए ऐसा ऋषिगणों का मत रहा है। यह आत्मिक क्षेत्र की सक्रियता का प्रतीक है। जैसे-जैसे हम इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर रहें है-सारे विश्व में वयोवृद्धों की संख्या में वृद्धि उनका काम से जी चुराना एक प्रकार का सामाजिक अपराध है। कम-से-कम औरों को साक्षर-संस्कारवान बना सकते है सेवा-सुविधा-वैकल्पिक चिकित्सा के साधन जुटाने में मदद कर सकते है। जो सशक्त और समर्थ है वे रिटायरमेंट के नाम पर निष्क्रिय होकर न बैठे समाज के सर्वांगीण उत्थान हेतु आगे आएँ समाजगत उन्नति को ध्यान में रखते हुए अपना श्रम-पुरुषार्थ उसी तरह जारी रखें जिस तरह समझदार कृषक या व्यापारी अभावग्रस्त होने पर भी अधिक वृद्ध हो जाने पर भी आजीवन कार्य-संलग्न रहते है। भारत के सपूत प्रो. सेन, जिनका नामकरण कवीन्द्र गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा अमर्त्य किया गया था को मिला यह विश्व का सर्वोच्च सम्मान समस्त भारतवासियों के लिए एक सम्मान का विषय तो है ही एक चुनौती भी है। यह चुनौती है जड़ता से-तमस् से मुक्ति पाने की। शेष राष्ट्र तो विश्वयुद्ध में भारी हानि सहकर ध्वस्त होकर पुनः खड़े हो गए। हम स्वतंत्रताप्राप्ति के बाद अनेकानेक प्रतिभाओं के जन्मदाता होने के बावजूद-ऋषिचेतना के यहाँ की वायु के कण-कण में समाए होने के बावजूद क्यों नहीं उस प्रसाद से मुक्ति पा सके है जो हमें विकासशील से विकसित राष्ट्र की श्रेणी में खड़ा कर दिखा दे। आध्यात्मिक स्तर पर अगले पाँच-छह वर्षों में ये प्रयास तीव्र होंगे और द्रुतगति से बढ़ते चले जाएँगे हमें मात्र चेतना ही है और अपनी कमियों से मुक्ति पाकर आत्मगौरव को निखारना भर है। संभावनाएँ असीम है। देश के एक प्रमुख अर्थशास्त्री डॉ. अमित मित्रा एवं प्रसिद्ध अर्थशास्त्र डॉ. दीपक बत्रा का मत कि यदि अभी भी चेता जा सके तो भारत सन् २.१. तक सारे विश्व का आर्थिक नेतृत्व कर सकेगा। सारे विश्व की अर्थव्यवस्था का अगले दिनों पुनर्गठन होगा। ग्राम आधारित अर्थतंत्र विकसित होगा, जिसमें सही अर्थों में वैश्वीकरण गाँधीवादी ग्रामस्वाराज्य पर टिका पुनः क्षितिज पर उभरता दिखाई पड़ने लगेगा। यह समय दूर नहीं है। भविष्य का भारत धर्म-अध्यात्म ही नहीं वरन् आर्थिक क्षेत्र में भी एक महाशक्ति बन सारे विश्व का सिरमौर बनकर रहेगा। डॉ. अमर्त्यसेन को अनेकानेक साधुवाद कि उनने उस संभावना की जो नवयुग के अरुणोदय के रूप में भवितव्यता बनकर आ रही है-प्रथम किरण के रूप में राष्ट्र को संधिवेला में यह उपहार दिया।


क्यों आते है साधना क्षेत्र में विघ्न

परमपूज्य गुरुदेव ने साधनात्मक उपचारों के संबंध में लिखा है कि” ये उपचार (उपासना आदि) तो मात्र रेलवे लाइन पर खड़े सिगनल-सड़क पर लगे संकेत-पट मात्र है जो दिशा-निर्देश भर करते है। इन्हें ही हमें सब कुछ नहीं मान लेना चाहिए। संदर्भ है साधना के क्षेत्र में प्रवेश करने वालों के मार्ग में आने वाले विघ्नों का। जब ये विघ्न आते है। तो उन्हें अधिकांश पहचान नहीं पाते एवं कभी-कभी अपनी अनुभूति के प्रतीक रूप में मानकर भ्रमित भी हो जाते है।सामान्य साधना-उपचार है जप-प्राणायाम-ध्यान। इनके साथ-साथ सामान्यतया व्रत-उपवासों का निर्वाह भी होता रहता है। कभी इनको करते समय शरीर में गर्मी चढ़ती दिखाई देती है तो कभी चींटियाँ चलती अनुभव होती है। कभी-कभी ऐसा अनुभव होता है मानों सिर उड़ा जा रहा है। चक्कर आते है व लगता है चारों ओर की दुनिया घूम रही है। मन भी साधना के दौरान बहुत भागता है, स्थिर नहीं रह पाता।

साधना-विज्ञान के ज्ञाता कहते है कि किसी भी साधनापथ के पथिक को उपासना-साधना-जप-प्राणायाम के दौरान होने वाले इन अनुभवों के मूल कारण को समझ उसने उपचार के विषय में अच्छी तरह जान लेना चाहिए। नहीं तो बार-बार साधना की सफलता न मिलने पर निराशा का सामना या मतिभ्रम के कारण व्यवधानों को अनुभूति का एक हिस्सा मान लेने की विडम्बना झेलनी पड़ेगी।

सामान्यतया बुद्धि विचारों की भाषा समझती है एवं मन चित्रों की। जैसे ही हम जप या ध्यान अथवा दोनों साथ-साथ के क्रम में बैठते है तो बुद्धि शांत हो जाती है किंतु को मूर्त रूप देने लगता है। ध्यान की गहराई में ही संस्कार मूर्त रूप ले पाते है। सबसे पहली आवश्यकता है सात्विकता का परिमाण बढ़ाने की। यदि आत्मपरिशोधन नहीं हो पाया सतोगुण नहीं बढ़ा तो मन हमेशा अस्थिर ही बना रहेगा, साधना क्षेत्र में सफलता तो दूर कुछ कदम भी आगे बढ़ पाना शक्य नहीं हो सकेगा। जप करते समय यदि हमें ऐसा भान हो कि हमारा सिर उड़ रहा है-दुनिया घूमती दिखाई दे रही है। तो मानना चाहिए मुखचक्र-अग्निचक्र के परिपाक के कारण शरीर में पित्त बढ़ रहा है-अम्ल की प्रधानता हो रही है। ऐसे में आहार को साधक के स्तर का बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। तला-भुना मिर्च मसाले प्रधान भोजन को कम करके सात्विकता का परिमाण बढ़ाना चाहिए।। दूसरी शिकायत प्रायः यह होती है कि चींटियाँ रेंग रही है अर्थात् मानसिक अस्थिरता-चंचलता बरकरार है।तीसरी शिकायत यह होती है कि जप करते-करते नींद आ जाती है। यह हमारा तमस् है। वर्षों के संचित कुसंस्कारों के कारण भी यह हो सकता है एवं भारी खाना खाकर जप करने या स्वभाव से ही अधिक खा लेने के कारण भी ऐसा हो सकता है। आहार में संतुलन बिठाकर शनैः−शनैः जप करते-करते ही यह गायब होगा। यदि जप करते समय मन भागता है तो यह हमारे अंदर सात्विकता की कमी के कारण है। जब तक ध्यान में बैठने वाले को अंदर से आनंद न आए उसे यह मानना चाहिए कि कही न-कही तमोगुण हावी है रजोगुण थोड़ा ही है एवं सतोगुण होने में अभी देरी है। ध्यान में मन ऐसा लगना चाहिए जैसे कि उसके समक्ष सारी दुनिया का कोई अस्तित्व नहीं है। जैसे किसी को नशे की लत लग जाती है वैसे ही हमें ध्यान की लत लगनी चाहिए कि उसके बिना काम नहीं चले मन आकुल-व्याकुल हो जाए।

श्री रामकृष्ण परमहंस एक अफीमची मोर का उदाहरण देकर अपने दो भक्तों पर उसे लागू करते थे। ईशान चंद्र कवि एवं मास्टर महाशय बार-बार भागकर अपने आराध्य के पास चले आते थे। सत्संग की कुछ ऐसी धुन-श्रीरामकृष्ण के सान्निध्य में बैठने की कुछ ऐसी उमंग मन में बनी रहती थी कि जब भी अवकाश मिलता वे दक्षिणेश्वर आ जाते। श्रीरामकृष्ण कहा करते थे कि एक सुंदर बगीचे का माली एक मोर को वहाँ आते देख बड़ा प्रसन्न होता था। उसके आने से बगीचे के सौंदर्य में चार-चाँद लग जाते थे। उसने मोर को अफीम खिलाना आरंभ की-थोड़ी-थोड़ी मात्रा बढ़ाता जाता ताकि उसे रोज आकर खाने की लत पड़ जाए। फिर वह वही रहने लगा। ऐसे अफीमची मोर से यदि काबू में रख उसे भगवान में लगाना है तो उसी स्तर का अंदर से आनंद ध्यान प्रक्रिया के दौरान पैदा करना होगा। यह नियमितता व प्रगाढ़ विश्वास के स्तर पर होने लगे उसके लिए हर साधक को प्रयासरत होना चाहिए। सोर विघ्न राजसिकता व तामसिकता के स्तर पर होते है। जैसे-जैसे सात्विकता बढ़ती है आत्मपरिशोधन का पथ प्रशस्त होता है साधना गहनतम होती चली जाती है।

परमपूज्य गुरुदेव ने अपने लेख ‘उपासनाएँ सफल क्यों नहीं होती? (मार्च १९८२) में लिखा है-घृत सेवर का लाभ वही उठा सकता है जिसकी पाचनक्रिया ठीक हो। देवता और मंत्रों का लाभ वे ही उठा पाते है जिनने अपने व्यक्तित्व की भीतर और बाहर से विचार और आचार से परिष्कृत बनाने की साधना कर ली है। जो बताए हुए अनुपात और पथ्य का भी ठीक तरह से प्रयोग करते है। अतः पहले आत्म-उपासना फिर देव-उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मंत्र और देवता के भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते है इससे पहले आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान नहीं देते।

आत्मशोधन हेतु-सात्विकता का परिमाण बढ़ाने के लिए क्या किया जाना चाहिए उसके लिए तत्त्ववेत्ता बताते है कि स्थूल दृष्टि से हमें अपना आहार सात्विक बनाना चाहिए एवं समय-समय पर व्रत-उपवास कर शोधन हेतु अवकाश देना चाहिए। श्रीमद्भागवत् गीता में योगीराज श्रीकृष्ण कहते है।

कट्वम्लवणात्युश्णतीक्ष्ण रुक्षविदाहिनः। आहारा राजसस्येश्टा दुःखषोकामयप्रदाः॥

यातयामं गतरंस पूति पर्युशितं च यत्। उच्छिश्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥

अर्थात्-कड़वे-खट्टे-लवण-युक्त-बहुत गरम, तीखे, रूखे दाहकारक और दुःख चिंता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार अर्थात् भोज्यपदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते है। जो भोजन अधपका रसरहित, दुर्गंधयुक्त वासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है वह भोजन तामस पुरुष का प्रिय होता है।”

हम सबको उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में अपने आहार का विश्लेषण करना चाहिए। यदि हम तामसी आहार से बचकर सात्विक आहार की ओर बढ़ सकें तो जप में ध्यान न लगने की शिकायत-आध्यात्मिक प्रगति के अवरोध आते रहते के असमंजस से बचा जा सकता है। योगेश्वर कृष्ण के अनुसार रसयुक्त-चिकने और स्थिर रहने वाले (जिस भोजन का सार-प्रभाव शरीर में बहुत काल तक बना रहे) तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय ऐसे आहार अर्थात् भोजन करते के पदार्थ ही सात्विक पुरुष को प्रिय होते है।

मोटेतौर पर जो भोजन भूख के लिए खाया जाए वह सात्विक आहार जो स्वाद के लिए क्षुधापूर्ति के लिए खाया जाए वह राजसिक एवं जो स्वाद के लिए भूख से कही अधिक खा लिया जाए वह तामसिक कहलाता है। अतः पहली अनिवार्य शर्त सत्वशुद्धि परिशोधन के लिए आहारशुद्धि तभी ध्रुव स्मृति एवं मन की तन्मयता वाली स्थिति आ पाती है। ऐसी ध्रुव-अचल स्मृति ही हमें अपनी अंतरात्मा के बारे में जो भूल गए है। जानकारी कराती है। सात्विकता संवर्द्धन हेतु व्रत-उपवास किए जाने चाहिए किंतु अतिवाद नहीं होना चाहिए। अमृताशन दाल-दलिया हरी सब्जियाँ, फल, अस्वाद व्रत आदि उपायों से व्रत सध जाता है।

सात्विकता बढ़ाने के सूक्ष्म उपायों में मन को स्वाध्याय में निरत करना एक प्रमुख उपचार है। स्वाध्याय पाठ्य पुस्तकों के पठन-मनन-रटन को नहीं कहते। जो स्वयं की ओर प्रेरित करें आत्मस्वरूप की ओर इंगित करें, वही स्वाध्याय है। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे-एक टन पढ़ने से श्रेष्ठ है एक छटाँक पढ़ना व उस पर आचरण करना।” इसमें सर्वप्रथम है-उचित पुस्तकों का चुनाव। पहले उनकी किताबें पढ़ें जिनने आत्मदर्शन किया ईश्वरत्व की प्राप्ति की दिशा में कुछ प्रयास किया फिर उनकी किताबों का स्वाध्याय किया जाए, जिनने ईश्वरप्राप्त पुरुषों की संगति की है अथवा उनके गुणों का वर्णन किया है।

पुस्तकों को पढ़ते समय दृष्टि क्या हो? श्री रामकृष्ण के अनुसार जैसे बालू के ढेर में से चींटी शक्कर ढूँढ़ लेती है ऐसे नीर-क्षीर विवेक की दृष्टि रखकर स्वाध्याय किया जाना चाहिए। इसके बाद अगला कदम क्या हो-पढ़े हुए स्वाध्याय के प्रकाश में स्वयं को निहारा जाए। साधू-महापुरुषों के जीवन में कैसे विघ्न-बाधाएँ आयी कैसे उनने उनका मुकाबला किया हम भी अपने विकारों को ढूँढ़े अस्तित्व के सारे प्रश्न चिन्हों को ढूँढ़े व पता लगाएँ कि हमको कैसे अपनी जीवनपद्धति ढालनी चाहिए। स्वाध्याय के परिप्रेक्ष्य में हमें एक मॉडल अपने लिए बनाना चाहिए ताकि उसे अपने ऊपर लागू किया जा सके। स्वाध्याय सही होगा तो सात्विकता निश्चित रूप से आएगी।

पतंजलि ने कहा है-वीतराग पुरुषं वा चित्तं चित्त समाधि भवति” अर्थात् वीतराग पुरुषों का चिंतन करने से भी चित्त को ध्यानस्थ हो समाधि स्थिति में जाने में मदद मिलती है। मानसिक रूप से हमें हर पल महापुरुषों को परमपूज्य गुरुदेव को अन्य गुरुजनों को याद करते रहना चाहिए। हममें से जिनने अपनी गुरुसत्ता को देखा है उन्हें ईश्वर के पार्षद के रूप में देवलोक की विभूति मानकर सतत् उन्हीं का चिंतन करते रहना चाहिए। इससे हमारी भक्ति बढ़ेगी-संवेदना के तन्तु उभरेंगे-गुरुसत्ता के प्रकाश की किरण हमारे व्यक्तित्व में अवतरित होने लगेगी।

हम और भी महापुरुषों का यथा हनुमान जी-सेवक भाव के प्रणेता के रूप में, महाप्रभु ईसा-आत्मबलिदानी करुणा के अवतार के रूप में कृष्ण-पूर्णपुरुष के रूप में तथा स्वामी विवेकानंद-श्रेष्ठ शिष्य के रूप में स्मरण कर सकते है। उससे उनके गुण हमारे अंदर अवतरित हो ध्यानस्थ होने में मदद मिलेगी। यदि हम ईश्वर का परमपिता परमात्मा-इहलोक के स्वामी परमेश्वर के रूप में स्मरण करना चाहते है। तो उसके लिए मेधा अतिप्रखर व कल्पना स्पष्ट चाहिए। यह ध्यान थोड़ा कठिन अवश्य है किंतु सात्विकता का अभूतपूर्व संचार करता है। परमपूज्य गुरुदेव ने ईश्वर को सद्गुणों का समुच्चय कहा है श्रेष्ठता का समूह कहा है। सात्विकता का प्रवेश ईश्वर के सभी गुणों का ध्यान करने से स्वतः ही समाप्त होने लगते है। सात्विकता की प्रगाढ़ता के साथ-साथ स्वतः ही समाप्त होने लगते है। सात्विकता का संचार अर्थात् शरीर-मन-आत्मसत्ता रूपी खेत की निराई-गुड़ाई मात्र बीजारोपण की देरी है। वह होते ही साधना सिद्धिदायक बन जाती है। साधना वस्तुतः व्यक्तित्व को विचारों का स्नान कराना है। यह यदि नित्य होती रहे तो कषाय-कल्मष रोज धुलते रहते है। ध्यान अंतर्मन का विश्राम है। इस क्रम में और क्या विघ्न आ सकते है ऐसे कौन-से दुर्गुण है जो किसी भी साधन की प्रगतियों को अवरुद्ध ही नहीं करते-करते के द्वारा में भी ढकेल देते है। इस संबंध में विस्तृत चर्चा आगामी अंक-साधना विशेषांक में करेंगे।


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी - संकल्पशक्ति की महिमा एवं गरिमा

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियों, भाइयों! प्रकृति का कुछ ऐसा विलक्षण नियम है कि पतन स्वाभाविक है। उत्थान को कष्टसाध्य बनाया गया है। पानी की आप छोड़ दीजिए, नीचे की ओर बहता हुआ चला जाएगा, उसमें आपको कुछ नहीं करना पड़ेगा। ऊपर से आप एक ढेला जमीन पर फेंक दीजिए, वह बड़ी तेजी के साथ गिरता हुआ चला आएगा, आपको कुछ नहीं करना पड़ेगा। नीचे गिरने में कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती, कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। ऐसे ही संसार का कुछ ऐसा विलक्षण नियम है कि पतन के लिए, बुरे कर्मों के लिए आपको ढेरों साधन मिल जाएँगे, किताबें मिल जाएँगी और कोई नहीं मिलेगा तो आपके पिछले इन मामलों में बहुत मदद करेंगे। वे आपको गिराने के लिए बराबर प्रोत्साहित करते रहेंगे। पाप−पंक में घसीटने के लिए बराबर आपका मन चलता रहेगा। इसके लिए न किसी अध्यात्म की जरूरत है, न किसी की सहायता की जरूरत है। यह तो अपनी प्रकृति ‘नेचर’ ऐसी हो गयी है।

ग्रेविटी-गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी में है। ग्रेविटी क्या करती है? ग्रेविटी ऊपर की चीजों को नीचे की ओर खींचती है। न्यूटन ने देखा कि सेब का फल जमीन पर गिरा। जमीन पर क्यों गिरा? जमीन की एक विशेषता है, कशिश है कि ऊपर की चीज को वह नीचे की ओर खींच लेती है। नीचे की तरफ गिराने वाली कशिश इस संसार में इतनी भरी पड़ी है कि उससे अगर आप बचाव न करें, उसका विरोध अगर आप न करें, उसका मुकाबला अगर आप न करें, तो विश्वास रखिए आप निरंतर गिरेंगे, पतन की ओर गिरेंगे। आज हारा सारा समाज इसी तरफ चल रहा है। आप नजर उठकर देखिए, कहाँ ऐसे आदमी मिलेंगे, जो सिद्धान्तों को ग्रहण करते हों और आदर्शों की अपनाते हों। आप जिन्हें भी देखे, अधिकांश लोग बुराई की ओर चलते हुए दिखाई पड़ेंगे। पाप और पतन के रास्ते पर उनका चिंतन और मनन काम कर रहा होगा। उनका चरित्र भी गिरावट की ओर और उनका चिंतन भी गिरावट की ओर जाता हुआ दिखायी देगा। सारे जमाने में यही भरा हुआ पड़ा है।

ऐसी स्थिति में आपको क्या करना चाहिए? आपको अगर ऊँचा उठना है, तो आपको अपने भीतर से हिम्मत इकट्ठी करनी चाहिए। क्या हिम्मत करें? यह हिम्मत करें कि ऊँचे उठे वाले जिस तरीके से संकल्पबल का सहारा लेते रहे है और हिम्मत से काम लेते रहे है, व्रतशील बनते रहे है, आपको भी उसी तरीके से संकल्पवान और व्रतशील बनना चाहिए। आपने देखा होगा, जब जमीन पर से ऊपर चढ़ते है तो जीने का इंतजाम करते है, सीढ़ी का इंतजाम करते है, तब मुश्किल से धीरे-धीरे चढ़ते है। गिरने में क्या देर लगती है? आपको कोई ढेला ताकत लगानी पड़ती है? ओर गिराने में? गिराने में क्या देर लगेगी? अंतरिक्ष से उल्काएँ अपने आप गिरती रहती है जमीन की ओर। रॉकेट अगर ऊपर फेंकना हो? आपने देखा होगा कि करोड़ों रुपया खर्च करते है तब कहीं जाकर रॉकेट अंतरिक्ष में फेंकना संभव होता है। किन्तु गिरावट में? गिरावट में तो पत्थर के टुकड़े और उल्काएँ अपने आप जमीन पर आ जाती है, बिना किसी के बुलाये और बिना कुछ खर्च किए। पानी को कुएँ में से निकालने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है और कुएँ, में डालना हो, तो कोई मेहनत नहीं, डाल दीजिए। आपको यही करना पड़ेगा।

चौरासी लाख योनियों में भटकते हुए आपने ढेरों-के ढेरों जो कुसंस्कार इकट्ठे कर लिए है, अब इन कुसंस्कारों के खिलाफ बगावत शुरू कर दीजिए। कैसे करें? अपने को मजबूत बनाइए। अगर मजबूत नहीं बनाएँगे तो पुराने कुसंस्कार फिर आ जाएँगे। मन को समझाएँ तो जरा-सी देर के लिए तो समझ जाएगा, परन्तु फिर उसी रास्ते पर आ जाएगा। अतः अपने मनोबल को मजबूत करने के लिए आपको कोई संकल्प ले लेना चाहिए। आपको संकल्प लेना चाहिए। आपको संकल्प-शक्ति का विकास कर लेना चाहिए। संकल्प शक्ति किसे कहते है? संकल्पशक्ति उसे कहते है, जिसमें यह फैसला कर लिया जाता है कि हमें यह तो करना ही है और हर हालत में करना है। हम करेंगे या मरेंगे। इस तरह का संकल्प अगर आप किसी तरीके से कर लें, तब आप विश्वास रखिए, आपका जो मानसिक निश्चय है वह आपकी आगे बढ़ा देगा। अगर आपका मनोबल और निश्चय दृढ़ नहीं है तो फिर आप जैसे ख्वाब देखते रहते है कि यह करेंगे वह करेंगे, तो आप कल्पना ही करते रहेंगे, परंतु कभी कुछ कर नहीं पाएँगे। कल्पनाएँ आज तक किसी की सफल नहीं हुई है और संकल्प किसी के अधूरे नहीं रहे।

इसलिए मित्रो संकल्पशक्ति का सहारा ने के लिए आपको व्रतशील बनना चाहिए आप व्रतशील बने। बस निश्चय कर लीजिए कि अच्छा काम करेंगे, जो भी हो चाहे छोटा हो चाहे बड़ा हो, यह कार्य अवश्य करेंगे। बुराइयों को छोड़ने के लिए संकल्प करने पड़ते है। जैसे आज से हम बीड़ी नहीं पीएँगे अब यह बहाना नहीं करेंगे कि नहीं साहब अगर बीड़ी नहीं पीयेंगे तो हमारा पेट साफ नहीं होगा। अरे पेट साफ नहीं होगा तो उसके लिए कोई दवा ले लो, पर संकल्प कर ली कि हम बीड़ी नहीं पीएँगे। अगर आपका मन कच्चा बना रहा कि हम बीड़ी पीना छोड़े या न छोड़े, आज और पी लें फिर कल छोड़ देंगे, परसों से छोड़ देंगे, इस तरह आप कभी नहीं छोड़ सकते। श्रेष्ठ काम करने के लिए, उन्नति की दिशा में आगे बढ़ने के लिए आपको संकल्प जल्दी-से-जल्दी लेना चाहिए कि हम ये काम करेंगे। संकल्प में बहुत बड़ी शक्ति है। जब कोई व्यक्ति यह संकल्प कर लेता है कि हम यह काम करेंगे, तब वह उस काम को कर लेता है। संकल्पवान व्यक्ति अच्छा काम जब तक पूरा नहीं कर लेते, तब तक कोई और काम नहीं करेंगे, ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेते है। इसके लिए वे कोई-न-कोई व्रत निर्धारित कर लेते है जैसे नमक नहीं खाएँगे, भी नहीं खाएँगे, भी नहीं खाएँगे आदि। देखने में तो यह कोई खास बात नहीं है। आपके अन्य काम करने से नमक का क्या ताल्लुक है? अगर आप शक्कर नहीं खाएँगे तो क्या बात बन जाएगी। घी खान बंद कर दिया तो कौन-सी बड़ी बात हो गयी और इससे कौन-सी बाहरी तौर पर इन चीजों में तो दम नहीं है, लेकिन दम उस बात में है कि आपने इतना कठोर निश्चय कर लिया है और अपने सुनिश्चित योजना कना ली है कि इस कार्य की तो हम को करना ही करना है, तब आप बिल्कुल विश्वास रखिए, आपका काम पूरा हो करके रहेगा।

मित्रो, चाणक्य की बात आपको नहीं मालूम? चाणक्य ने यह निश्चय कर लिया था कि जब तक नन्दवंश का नाश न कर लूँगा, चोटी नहीं बांधूंगा और बाल बिखेर लिए थे। यह अपने व्रत या प्रतिज्ञा को याद रखने का एक प्रतीक है। लोग प्रतिज्ञा को याद रखने का एक प्रतीक है। लोग प्रतिज्ञाएँ भूल जाते है, लेकिन अपने अंदर अगर कोई ऐसा अनुशासन धारण कर ले तो आदमी भूलता नहीं, इसलिए कोई-न-कोई अनुशासन मान ले तो अच्छा है। जैसे एक बार ऐसा हुआ भगवान महावीर के पास एक बहेलिया गया। उसने कहा-हमें अध्यात्म की दीक्षा लेनी है आप से तो भगवान ने कहा-आपको दक्षिणा में अहिंसा का पालन करना पड़ेगा और माँस खाना छोड़ना पड़ेगा। तो उसने कहा कि हम तो बहेलिए है, यह सब तो हम नहीं कर पाएँगे। बच्चों को कहाँ से खिलायेंगे पशु-पक्षी नहीं मारेंगे तो? महावीर ने उसको सलाह दी कि कम से कम एक जीव का माँस खान छोड़ दे, चाहे वह किसी का भी हो। कम से कम एक प्राणी को न मारने का संकल्प ले, तब भी तेरा अहिंसा का प्रण मान लिया जाएगा। बहुत विचार करता रहा बहेलिया, फिर उसने एक जीव का पाया, जिसके ऊपर वह दया करने को तैयार हो गया और उसको न मारने की कसम खाने को तैयार हो गया। उसका नाम था कौआ। कौए को नहीं मारूँगा, कभी नहीं मारूँगा, कौए पर दया करूँगा बस उसने यह संकल्प ले लिया और गुरुदीक्षा ले ली। रोज विचार करने लगा कि कौए पर दया करनी चाहिए। कौआ बेचारा क्यों कष्ट दे, उसके भी तो बाल-बच्चे होंगे, उसको भी तो भगवान ने रचा है। हम अपने छोटे-से लोभ के लिए कौवे को क्यों मार डाले? बस यह विचार जब जड़ जमाता हुआ चला गया, तो धीरे-धीरे बहेलिया ऐसा ही गया कि वह सब प्राणियों पर दया करने लगा और अंततः जैन धर्म का एक बहुत बड़ा तीर्थंकर बन गया। कैसे? दिशा जो मिल गयी।

बुरे कर्म छोड़ेंगे और अच्छे कर्म करेंगे, इसके लिए मन का संकल्प कमजोर न पड़ने पाये और हम भूल-भुलैयों में न पड़ने पायें, इस लिए कोई-न-काई व्रत लेना बहुत जरूरी है। अनुष्ठान में यही होता है। अनुष्ठान में जप की संख्या तो उतनी ही होती है, परन्तु उसके साथ-साथ व्रत और संकल्प लेने पड़ते है। जैसे उपवास का एक, ब्रह्मचर्य का दो, मौन का तीन, जमीन पर सोने का चार, अपनी सेवाएँ अपने आप करने का पाँच आदि। ऐसा क्यों करते है? ये बातें मनोबल को बढ़ाने की प्रक्रियाएँ है। इससे आदमी का संकल्प है। संकल्प को जीवन में से अगर आप निकल दे तो फिर क्या काम बनेगा? राणा प्रताप ने निश्चय कर लिया था कि वह थाली में भोजन नहीं करेंगे। उन्होंने संकल्प किया था कि जब तक आजादी प्राप्त न कर लेंगे तब तक पत्तल में रखकर भोजन करेंगे। आपने कभी गाड़ी वाले लुहार देखे है? गाड़ी वाले लुहार अब भी पत्तल पर भोजन करते है, थालों में नहीं करते। वे अपने आपको राणाप्रताप का वंशज बताते है और यह कहते है कि महाराणा ने प्रतिज्ञा ली थी कि हम घर में नहीं घुसेंगे, बाहर जंगल में घूमेंगे और पत्तल में भोजन करेंगे, इसलिए हम भी घर में नहीं घुसेंगे, बाहर ही घूमते रहेंगे। जब उन्हें आजादी नहीं मिली, फिर हम क्यों सुखों का भोग करेंगे। इस तरीके से संकल्प कर लेना, व्रतधारण कर लेना कई बार बहुत उपयोगी और बहुत अच्छा होता है। अनुष्ठानकाल में नमक का त्याग कर देने वाली बात शक्कर का त्याग कर देने वाली बात, हजामत न बनाने वाली बाज, चमड़े के जूते-चप्पल न पहनने वाली बात ये कई बातें ऐसी है, जो आदमी के संकल्प को और मजबूत कर देती है। आपको आपने संकल्प मजबूत बनाने चाहिए।

संकल्प को पूरा करने में कई बातें, कठिनाइयाँ सामने आती है, तो कोई बड़ी बात नहीं। ये बातें संकल्प को और मजबूत बना देती है। संकल्पबल जब न हो तब? हिम्मत न हो तब? तब आदमी बिना पैंदी के लोटे की तरह इधर-उधर भटकता फिरता है। मनोबल बढ़ाने के लिए कोई-न-कोई अनुशासन जीवन में रखना बहुत जरूरी है। गाँधीजी ने तैंतीस वर्ष की उम्र में ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली थी और यह कहा था कि हम तो यह निभाएँगे। उस महामानव में भी कुछ-न-कुछ तो सच्चाइयाँ रही होंगी।

दूसरों की तरह से शायद उनका मन भी भीतर-ही-भीतर डगमग-डगमग करता रहा होगा, लेकिन उनके संकल्पबल ने कहा नहीं हमने यह निश्चय कर लिया है कि “रघुकुल रीति सदा चली आई। प्राण जाएँ पर वचन न जाई।” इस तरह का संकल्प जब उन्होंने ले लिया, तब उसे निभाया भी। कमजोरियों से लड़ा भी गया। जब संकल्प न लिया होता तब? व्रत न लिया होता तब? निश्चय न किया होता तब? तब फिर कुछ भी संभव नहीं था। संकल्प धारण करने के बाद तो आदमी की आधी मंजिल पार हो जाती है। आपको भी अपने मनोबल की वृद्धि के लिए आत्मानुशासन वह लाठी है, जिसे बरसात में फिसलने वाले और पहाड़ पर चढ़ने वाले लेकर चलते है और उससे जहाँ पर फिसलन होती है, अपने आपको बचा लेते है, सहारा मिल जाता है। संकल्प उस लाठी की तरह है, जो आपको गिरने से बचा लेती है और आपको ऊँचाई पर चढ़ने, आगे बढ़ाने के लिए हिम्मत प्रदान करती है।

मित्रो, शीरी-फरहाद की बात सुनी है न आपने? राजा ने फरहाद से यह कहा कि अगर आप बत्तीस मील लम्बी नहर खोदकर यहाँ तक ला सकें, तो फिर आपकी शादी शीरी से हो सकती है। पहाड़ पर ऊँचाई पर एक तालाब तो था, पर वह शहर से इतनी दूरी कि जिससे पानी के लिए बड़ी किल्लत रहती थी। फरहाद ने भी कह दिया कि हम “करेंगे या मरेंगे।” उसने जब निश्चय कर लिया कि हमको नहर खोदनी है तब? तब वह कुल्हाड़ी और हथौड़ी लेकर चल दिया। उसने पहाड़ काटना शुरू कर दिया। बाहर के आदमी आते, कुछ दिन मजाक होती रही, कुछ मखौल उड़ाते रहे। कोई पागल कहता, कोई बेवकूफ कहता रहा, लेकिन जब देखा कि इस आदमी ने निश्चय कर लिया है कि हम यह काम करके रहेंगे तो लोगों में सहानुभूति भी पैदा हो गयी। संकल्प वालों के प्रति लोगों में सहानुभूति भी होती है और वह सहानुभूति के अधिकारी भी होते हैं जिनके पीछे संकल्पशक्ति नहीं है वह मजाक के, उपहास के पात्र भी बनते है। फरहाद की लोगों ने मदद की। लोग आये और स्वयं भी कुल्हाड़ी हथौड़े चलाने लगे और नहर खोदने में मदद करने लगे। समय तो थोड़ा लग गया, लेकिन फरहाद नपे नहर खोदकर वहाँ तक ला दी, जहाँ तक राजा ने बतायी थी।

साथियों, यह सब संकल्पबल की बातें मैं कह रहा हूँ। संकल्पबल आपको प्रत्येक काम में प्रयोग करने की जरूरत है। ब्रह्मचर्य के संबंध में, खान-पान के संबंध में। समयदान और अंशदान के संबंध में आपको कोई-न-कोई काम ऐसे करने चाहिए, जिसमें कि यह प्रतीत होता हो कि कुछ तो ऐसा संकल्प आपने लिया है, जिसके निर्वाह करने में आय लगे हुए है। यही मनोबल बढ़ाने का तरीका है। मनोबल से बढ़िया और कोई आपके पास शक्ति नहीं है पैसे की ताकत अपने आप में सही है, बुद्धि की ताकत अपने आप में ठीक है, लेकिन ऊँचा उठने का जहाँ तक ताल्लुक है, वहाँ मनोबल और संकल्पबल को ही सब कुछ माना गया है। संकल्पबल और मनोबल से ज्यादा बढ़ करके आदमी के व्यक्तित्व को उभारने वाली, प्रतिभा को उभारने वाली, उसके चरित्र को उभारने वाली और कोई वस्तु है ही नहीं। संकल्पबल की वृद्धि के लिए यह आवश्यक है कि आप छोटे-छोटे कुछ ऐसे नियम या व्रत थोड़े समय के लिए निर्धारित कर लें कि यह काम जब तक न कर लेंगे तब तक हम यह नहीं करेंगे, मसलन शाम को हम किताब के इतने पन्ने जब तक नहीं पढ़ लेंगे, तब तक सोयेंगे नहीं। इसी तरह हम सबेरे का भजन-उपासना जब तक पूरी न कर लेंगे, खाएँगे नहीं। यह क्या है? यह व्रतशीलता के साथ में जुड़ा हुआ थोड़ा-सा अनुशासन है।

अनुशासन उन संकल्पों का नाम है जिसमें किसी सिद्धांत का तो समावेश होता ही है, लेकिन उस सिद्धांत के साथ-साथ में, उस कार्य को पूरा करने के साथ-साथ में ऐसा भी कुछ फैसला किया जाता है, जिससे कि अपने आप में कुछ स्मरण बना रहे। जैसे जब तक हम मैट्रिक पास न कर लेंगे तब तक चप्पल नहीं पहनेंगे। इससे क्या होता है? इससे बराबर यह दबाव बना रहता है कि यह काम करना था, तो इसीलिए नहीं पहनते। यह बात बार-बार आपको याद दिलाती रहेगी कि हमको मैट्रिक करना है, अच्छे नम्बर से पास करना है, दिन भर पढ़ना है। चप्पल पर जब भी ध्यान जाएगा, अरे हम चप्पल कैसे पहन सकते है, हमने तो संकल्प किया हुआ है, व्रत लिया हुआ है। व्रत और संकल्प आदमी की जिंदगी के लिए बहुत बड़ी चीजें है। आप ऐसा ही किया कीजिए। आप को यहाँ से जाने के बाद कई काम करने है, बहुत अच्छे काम करने है, लेकिन वह चलेंगे नहीं। आपका मन बराबर ढीला होता चला जाएगा। उसको ठीक करने के लिए आप एक विचारो की सेना और विचारो का श्रृंखला बनाकर तैयार रखिए। विचार ही विचारों को काटते है। जहर को जहर से मारते है। काँटे को काँटे से निकालते है। कुविचार जो आपके मन को हर वक्त तंग करते रहते है, उसके मुकाबले पर एक ऐसी सेना खड़ी कर लीजिए, जो आप के बुरे विचारों से लड़ सकने में समर्थ हो।

मित्रो, अच्छे विचारो की भी एक सेना है। जब भी बुरे विचार आते है, कामवासना के विचार आते है, व्यभिचार के विचार आते हैं, तो फिर आप ऐसा किया कीजिए कि उसके मुकाबले एक और सशक्त सेना खड़ी कर लिया कीजिए, अच्छे विचारों वाली सेना। जिसमें आपको यह विचार करना पड़े कि हनुमान कितने सामर्थ्यवान हो गए ब्रह्मचर्य की वजह से। भीष्म पितामह कितने समर्थ हो गए ब्रह्मचर्य के कारण। आप शंकराचार्य से लेकर के अनेक संतों, महात्माओं की बातें याद कर सकते है, जिन्होंने अपने को अच्छे विचारों में लगा लिया। अगर उन्होंने अपने को कुविचारों से लगा लिया होता तो फिर बेचारे संकल्पों की क्या बिसात थी जो पूरे होते। कुसंस्कार हावी हो जाते और जो संकल्प किया था वह एक कोने में रखा रह जाता। सदाचार के लिए आप विचार करें तो कैसे करें? आप उनके लिए एक बड़ी सामर्थ्य वाली सेना बना लीजिए। एक सेना बना लीजिए जो भी बुरा विचार आए उसे काटने के लिए। लोभ के विचार आएँ लालच के और बेईमानी के विचार आएँ तो उन्हें काटने के लिए आप ईमानदारी के समर्थन के लिए उनके इतिहास उदाहरण और शास्त्रों के महापुरुषों के वचन संग्रह करके रखिए कि ईमानदारी की ही कमाई खाएँगे बेईमानी की कमाई हम नहीं खाएँगे। इस तरह आपने अगर विचारों की सेना तैयार कर ली है तो वह आपके लिए स्वर्ग होगा। चाहे बेईमानी के विचार आएँ कामवासना के विचार आएँ, ईर्ष्या के विचार आएँ पतन के विचार आएँ तो उनकी रोकथाम करने के लिए आप अपनी सेना को तैयार कर लें और सामने से अड़ा दें।

मित्रों लड़ाई लड़े बिना काम कैसे चलेगा? दुर्योधन से कहीं लड़े बिना काम चला था? रावण से कही लड़े बिना चला था क्या? कंस से लड़े बिना काम चला था? लड़ाई मोहब्बत की है, हिंसा की है अथवा अहिंसा की है कैसी भी है वह बात मैं नहीं कह रहा। मैं तो वह कह रहा हूँ कि आपको अपनी बुराइयों और कमजोरियों के मुकाबले के लिए भी और समाज में फैले अनाचार से लोहा लेने के लिए भी हालात में आपको ऐसे ऊँचे विचारों की सेना बनानी चाहिए जो आपको भी हिम्मत देने में समर्थ हो सके और आपके समीपवर्ती वातावरण में भी नया माहौल पैदा करने में समर्थ हो सके। वस्तुतः वह संकल्प भरे विचार ही होते है जो व्यक्ति को कही-से-कही पहुँचा देते है। हजारी किसान ने बिहार में यह फैसला किया था कि मुझे हजार आम के बगीचे लगाने है। अपने इस संकल्प को पूरा करने के लिए वह घर से निकल पड़ा। उसने यह व्रत लिया कि जब तक उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता मैं जमीन पर ही सोऊँगा, नंगे पैर रहूँगा। उसने निश्चय कर लिया कि हर गाँव में कम-से-कम एक बगीचा अवश्य लगाना है। गाँवों में पहुँचता लोगों से मिलता और कहता कि लीजिए मैं कही से पौध ले आता हूँ गड्ढे भी मैं ही खोद देता हूँ बस आप पौध को उसमें लगा दीजिए। उसकी रखवाली का इंतजाम आप कर लीजिए।पौधों में पानी लगाने की जिम्मेदारी आप उठा लीजिए।इस तरीके से वह हर एक आदमी को समझाता रहा और लोगों ने उसकी बात मान ली। क्यों मान ली? क्योंकि वह संकल्पवान था। यदि संकल्पवान नहीं होता और ऐसे ही व्याख्यान देते फिरता कि भाईसाहब। पेड़ लगाइए हरियाली उगाइये तब? तब फिर कोई लगाता क्या? सरकार कितना प्रचार करती है पर कोई सुनता है क्या? सुनने के लिए यह बहुत जरूरी है कि जो आदमी उस बात को कहने के लिए आया है वह संकल्पवान हो संकल्पवान ही जीवन में सफल होते है।

संकल्पवान कौन होता है? संकल्पवान का अर्थ एक बार फिर सुन लीजिए। संकल्पवान यानी ऊँचे सिद्धांतों को अपनाने का निश्चय और उस निश्चय को रास्ते में कोई व्यवधान न आने पावे, इसलिए थोड़े-थोड़े समय के लिए ऐसे अनुशासन-व्रत अपनाना जिससे कि स्मरण बना रहे मनोबल बढ़ता रहे गिरने न पावे। संकल्प को याद करके अपनी गौरव-गरिमा बनाए रखें इसके लिए आपको व्रतशील स्वरूप होना जरूरी है। पीले कपड़े पहनने के लिए आप से कहा गया है तो यह व्रतशील होने जरूरी है पीले पहनने के लिए आप से कहा गया है तो यह व्रतशील होने की निशानी है। दूसरे लोग पीले कपड़े नहीं पहनते है पर आपको पहनना चाहिए। इसका मतलब यह है कि आप पर दुनिया का कोई दबाव नहीं है और दुनिया की नकल करने में -अनुकरण करने में आपको कोई दिलचस्पी नहीं है। वह क्या है? यह व्रतशीलता की निशानी है। माघ के महीने में प्रयाग में त्रिवेणी के किनारे एक महीने के लिए लोग व्रतशील होने के लिए जाते है और कल्पवास करते है कल्प साधना करते है। वहाँ वे वह निश्चय कर लेते है कि हम जब तक यहाँ रहेंगे अमुक कार्य नहीं करेंगे। आप भी इस कल्पसाधना शिविर में आये है तो व्रतशील हो करके रहिए निश्चय का पालन करते रहिए। यह दृढ़ निश्चय कर लीजिए कि जो नियम बनाया है उसका बराबर पालन करते रहेंगे। भोजन जैसा भी है उसी से काम चला लेंगे। यह नहीं कि साहब। इसका जायका अच्छा नहीं है हम तो कचौड़ी खाएँगे। भाई साहब ऐसा मत कीजिए

संकल्पवान बनिए।

मित्रों, संकल्प में अकृत शक्ति है। संकल्पवान ही सफल हुए है और संकल्पवान ने ही संसार की नाव पार लगाया है। आपको भी संकल्पवान और व्रतशील होना चाहिए।नेकी आपकी नीति होनी चाहिए और उदारता आपका फर्ज होना चाहिए। ओर उदारता आपका फर्ज होना चाहिए। आपने अगर ऐसा कर लिया हो तब फिर दूसरा कदम यह उठाना कि हम काम नहीं किया करेंगे समय-समय पर छोटे-छोटे व्रत लिया कीजिए। हमारे गायत्री परिवार में यह रिवाज है कि गुरुवार के दिन नमक नहीं खाएँगे। ब्रह्मचर्य से रहेंगे दो घंटे मौन रहेंगे।वहाँ इन सबको यह नियम पालन करने पड़ते है। आप भी कुछ ऐसे ही व्रतशील होकर इन नियमों का पालन करते रहेंगे और साथ में किसी श्रेष्ठ उत्तरदायित्व का ताना-बाना जोड़कर रखेंगे तो आपका व्यक्तित्व पैना होगा। आपके विचार सफल होंगे। आपकी प्रतिभा निखरेगी और आप एक अच्छे व्यक्ति में शुमार होंगे अगर आप आत्मानुशासन और व्रतशीलता का महत्व समझेंगे और उसे अपनाने की हिम्मत करेंगे तब। अगर इस तरह का एक कदम भी आप आगे। बढ़ा सकेंगे तो आपको विश्वास दिलाते है कि हम आत्मोन्नति चलेंगे। इन्हीं शब्दों के साथ आज की बात समाप्त।

युगपरिवर्तन का संकेत देती युगऋषि की लेखनी

“अपना निर्माण ही युगनिर्माण की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। जब इन भावनाओं को हम सभी गहराई से अपने अंतःकरणों में जमाने लगेंगे तो उसका सामूहिक स्वरूप एक युग-आकांक्षा के रूप में प्रस्तुत होगा और उसकी पूर्ति के लिए अनेकों देवता अनेकों महामानव नर-तन में नारायण रूप धारण करके प्रकटित हो पड़ेंगे। युगपरिवर्तन के लिए जस अवतार की आवश्यकता है वह पहले आकांक्षा रूप में ही अवतरित होगा उसी अवतार का सूक्ष्म स्वरूप हमारा युगनिर्माण सत्संकल्प है। इसके महत्व का मूल्याँकन हम सभी को गंभीरतापूर्वक करना चाहिए।”

“युगनिर्माण योजना साझे की खेती है सात-पाँच का छप्पर है। सब मिलकर कटिबद्ध होंगे तो ही काम चलेगा। घड़ी के पुर्जे की तरह अखण्ड ज्योति परिवार के हर पुर्जे को अपने जिम्मे का काम निपटाने के लिए प्रसन्नता और उत्साहपूर्वक तत्पर हो जाना चाहिए। “

“इस युग की सबसे बड़ी शक्ति संगठन है। इतिहास साक्षी है कि जब कभी युगपरिवर्तन जैसे महान और व्यापक कार्यों की योजना बनी है तो उसके लिए संगठन करना पड़ा है। लंकाविजय गोवर्द्धन-धारण-बौद्धधर्म प्रसार, आदि की कथाएँ पाठकों को स्मरण है। वे जानते है कि संघशक्ति ही इस धरती का सबसे बड़ा चमत्कार है। बड़े कार्यों के लिए बड़ी शक्ति चाहिए और बड़ी शक्ति सदा से संगठन में सन्निहित रही है। युगनिर्माण जैसे महान कार्य के लिए भी सदा शक्ति ही अपेक्षित है। इसीलिए प्रारंभिक रूप अखण्ड ज्योति परिवार को भी एक धर्म संगठन का रूप दिया जा रहा है।

विभीषिकाओं का यह दावानल जब चारों ओर गगनचुम्बी लपटों के साथ उठता चला आ रहा हो, तब विवेकशील प्रबुद्ध आत्माओं के लिए यह कठिन होगा कि वे आँखें बंद करके यह सब देखते रहें और इस दावानल को बुझाने के लिए कुछ भी प्रयत्न न करें।”

“आत्मसुधार और आत्मविकास में लगे हुए किशोर-किशोरी कई वर्षा तक अपना जीवन साधनामय बनाकर जब विवाह के बंधन में बँधेंगे और प्रबुद्ध नई पीढ़ी के उत्पादन का ध्यान रखेंगे तो अर्जुन-द्रौपदी के संपर्क से उत्पन्न अभिमन्यु की तरह घर-घर में सुसंस्कारी महापुरुष जन्मेंगे। उनके जन्मजात सुसंस्कार थोड़े-से शिक्षण से ही खराद किए हुए हीरे की तरह दमकने लगेंगे

“नये समाज की सभ्य समाज की, नवयुग की रचना करने के लिए हमें एक ही प्रक्रिया पूर्ण करनी होगी और वह है-भावपरिवर्तन

“युगनिर्माण की पृष्ठभूमि राजनैतिक एवं सामाजिक नहीं वरन् आध्यात्मिक है। इतना महत्वपूर्ण कार्य इसी स्तर पर उठाया या बढ़ाया जा सकता है।”

“अगले दिन बहुत ही उलट-पुलट से भरे है। उनमें ऐसी घटनाएँ घटेंगी ऐसे परिवर्तन होंगे जो हमें विचित्र भयावह एवं कष्टकर भले ही लगे पर नए संसार की अभिनव रचना के लिए आवश्यक है।”

“युग कोई ऐसी वस्तु नहीं जो एक नियत समय पर ही आएगी और फिर चिरकाल के लिए दृष्टिपथ से ओझल हो जाएगी। हम अपना सतयुग और कलियुग अपनी प्रेरणा से आप बना सकते है। जब मनुष्य इस जाग्रत जीवन के अधिकार को भूलकर सूक्ष्म स्थान पर पहुँच जाता है वासना-कामना-संस्कारों आदि से नाता तोड़ लेता है उसी समय सतयुग का पुनः उदय हो जाता है।”

“हम दिव्यलोक के अधिकारी है इस बात का हमें फिर से ज्ञान प्राप्त करना होगा। इसी से नवयुग-सतयुग की स्थापना होगी। तब हम ज्ञानरूपी अमृत का कलश लेकर संसार में ही अमरलोक की लीला करेंगे।

“वर्तमान विचारक्रांति महाकाल का तीसरा नेत्र ही है जा दावानल का रूप धारण कर अज्ञान युग की सारी विडम्बनाओं इन उपलब्धियों के बाद विश्वशान्ति के मार्ग में कोई भी कठिनाई शेष न रह जाएँगी। “

“ अगले दिनों संसार का समग्र परिवर्तन करके रख देने वाला एक भयंकर तूफान विद्युत गति से बढ़ता चला आ रहा है जो इस सड़ी दुनिया को समर्थ-प्रबुद्ध स्वस्थ और समुन्नत बनाकर ही शांत होगा।”

“प्रस्तुत शताब्दी एवं इसका अंतिम दशक अत्यधिक महत्वपूर्ण है। युगपरिवर्तन का-मानवजाति के भावनात्मक नवनिर्माण का श्रेय भारतवर्ष को ही मिलने वाला है। इस शताब्दी के अंत तक भारत अपना प्राचीन सर्वस्व संसार के सामने पुनः प्रकट करेगा। इसके प्रयत्न और प्रभाव से यह संसार आज की तुलना में बिल्कुल बदला हुआ प्रतीत होगा। पिछले दिनों रामकृष्ण परमहंस एवं योगीराज श्री अरविंद के रूप में दो खण्डावतारों ने इस दिशा में अपनी रहस्यपूर्ण भूमिका संपादित की है तीसरा अवतरण युगनिर्माण आंदोलन के रूप में आजकल चल रहा है। इसमें महाकाल भी काम कर रहा है और महाकाली भी। पूर्णावतार लगभग तीस वर्ष की कठिन अवधि के उपरांत प्रकट होगा महान व्यक्तियों एवं महान परिवर्तन के रूप में इस दिव्यप्रयोजन को पूरा करने के लिए महाकाल और महाकाली का आवेश प्रवेश हो रहा है इन्हें हम अभिनंदनीय सौभाग्य मानकर सराहें और शतशत प्रणाम करें यही इच्छा होती है।”

विश्व स्तर पर तनाव छाया दिखाई पड़ता है, और लगता है कि कहीं इस सदी का अंत आते-आते हमारा अस्तित्व रह भी पाएगा क्या? वस्तुतः यह बड़ा चुनौती भरा समय है।

आगे के डेढ़-दो वर्षों का समय द्रष्टा-मनीषियों भविष्यवक्ताओं ने और भी खराब बताया है एवं परिस्थितियों के और भी विषम होने की बात कही है। ऐसे में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा मानवमात्र की रक्षा के लिए आरंभ किए गए ‘युगसंधि महापुरश्चरण जो अपनी प्रौढ़ता की स्थिति में पहुँच गया है, को और भी अधिक प्रखर व व्यापक बनाए जाने की आवश्यकता हम सभी को अनुभव करनी चाहिए। अकेले परमपूज्य गुरुदेव ही थे जिनने कहा कि हम फिजाँ को बदलेंगे। दैवीप्रयास ही इस युग की विभीषिकाओं का समाधान कर सकेंगे, पुरुषार्थ को और बढ़ाना चाहिए। अखण्ड ज्योति के फरवरी, १९९. के अंक में परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा है “ इन दिनों नियन्ता कुम्हार की तरह अपना कालचक्र तेजी से घुमा रहा है। उद्देश्य एक ही है नए युग के अनुरूप नए मनुष्य गढ़ना।” यदि हमें इन वाक्यों पर दृढ़ और तीव्रता लाने का संकल्प कर अभी से कटिबद्ध हो जाना चाहिए।

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान जो युगसंधि महापुरश्चरण के रूप में १९८८ की आश्विन नवरात्रि से शान्तिकुञ्ज से आरंभ हुआ था, अब सारे विश्व में प्रायः ५ से ६ करोड़ व्यक्तियों के माध्यम से संपन्न हो रहा है। इस बीच हमारे इस विराट अनुष्ठान की एक पूर्णाहुति नवम्बर, १९९५ में आँवलखेड़ा, आगरा (परमपूज्य गुरुदेव की जन्मस्थली) पर प्रायः पचास लाख से अधिक लोगों द्वारा संपन्न की जा चुकी है। गायत्री परिवार परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण १९९. एवं परमवंदनीय माताजी के महाप्रयाण १९९४ के बाद इस अर्द्धपूर्णाहुति के माध्यम से विराटतम होता चला गया है एवं सारे विश्व में उसका संदेश पहुँच चुका है। अब महापूर्णाहुति में मात्र एक वर्ष एवं कुछ माह शेष रह गए है।

गुरुसत्ता की घोषणा के अनुसार सन् २... की वसंत पंचमी (१. फरवरी, २...) से सारे भारत व विश्वभर के चुने हुए स्थानों पर महापूर्णाहुति संपन्न होनी है, इस प्रकार यह पूर्णाहुति वर्ष होगा जिसका समापन कार्तिकपूर्णिमा सन् २... में शान्तिकुञ्ज हरिद्वार के आस-पास के विराट तीर्थ क्षेत्र में महापूर्णाहुति की अंतिम आहुति के रूप में संपन्न होकर ही होगा। इस वर्ष के आगमन के पूर्व के वर्ष १९९९ को सर्वाधिक विकट, भीषण परिस्थितियों, संभावनाओं से भरा समय मानते हुए इसे साधना वर्ष के रूप में मनाए जाने की घोषणा केन्द्र द्वारा की जा रही है। यह २२ जनवरी, १९९९ वसंत पंचमी से आरंभ होकर १. फरवरी, २... तक भारत व विश्वभर में चलने वाले ढाई-ढाई दिन के अखण्ड जप प्रधान आयोजनों के रूप में संपन्न होगा, ऐसी योजना बनायी गयी है। अंतिम पूर्णाहुति के पूर्व अपने साधनात्मक पुरुषार्थ की आहुति देने की तरह की यह प्रक्रिया इस एक वर्ष में और गति लेगी, ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए। जो कार्य विगत दस वर्षा में संपन्न हुआ है, उससे कहीं सौ गुना अधिक इस अगले एक वर्ष में पूरा करने का लक्ष्य निश्चित किया गया है। इससे गायत्री चेतना का, युगशक्ति का विस्तार गाँव-गाँव घर-घर तक होता चला जाएगा। समूह बन के जागरण के माध्यम से एक सुरक्षाकवच साधकों के चारों ओर विनिर्मित होकर संभावित विभीषिकाओं से रक्षा का विधान भी बन सकेगा। साथ-साथ मिशन का संगठनात्मक आधार भी मजबूत हो इस स्थिति में आ सकेगा कि महापूर्णाहुति का गोवर्द्धन सबकी लाठी के सहारे उठ सके।

वसंत पंचमी २२ जनवरी, १९९९ के पूर्व सारे भारतवर्ष में स्थान-स्थान पर संस्कार महोत्सव एवं प्रज्ञापुराण कथा-आयोजन संपन्न हो रहे है। इसके लिए प्रायः सत्तर कार्यकर्ताओं को लेकर ८ टोलियाँ विगत १५ सितम्बर से कार्यक्षेत्र में फैल गयी है। ये कार्यक्रम पूर्व की तरह चलते रहेंगे-सभी को साधनावर्ष की महत्ता बताते रहेंगे एवं महापूर्णाहुति के स्वरूप को खोलते हुए इन आयोजनों की संपन्न किया जाता रहेगा। उनके साथ-साथ इनके ही समानांतर भारत भर में साधना वर्ष हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रायः ४८ स्थानों पर १५ नवम्बर से १५ जनवरी के मध्य रखे जा रहे है। शान्तिकुञ्ज के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की टोलियों कं द्वारा ये पाँच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम उन स्थानों पर संपन्न होने जा रहे है। जहाँ परिजनों का अपना स्वयं का स्थान है तथा जहाँ कार्यकर्ता स्तर के परिजनों का अनुपात सघन है। इन प्रशिक्षण आयोजनों द्वारा जो ५-५ दिन के होंगे साधनावर्ष के ढाई दिवसीय आयोजनों की पूरी रूप-रेखा बनायी जाएगी। विधि-व्यवस्थाएँ समझाई जाएँगी, ताकि महापूर्णाहुति का सारा संगठनात्मक आधार एवं संभावित चौबीस स्थानों (जहाँ महापू�


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पत्र-व्यवहार में यह ध्यान दें

मिशन का विस्तार जिस गति से हो रहा है, उसी गति से पत्र व्यवहार में भी अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। इस दबाव के बावजूद शान्तिकुञ्ज की पत्राचार व्यवस्था को सुव्यवस्थित बनाये रखने के लिए परिजनों से अनुरोध है कि-

व्यक्तिगत तथा पारिवारिक पत्रों के अलावा सभी पत्रों को आदरणीय शैल जीजी के नाम से सम्बोधित करके ही लिखना चाहिए। सभी विभागों के लिए भेजे गए पत्रों में पते के स्थान पर आदरणीया शैलबाला पंड्या, शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार (उ.प्र.) २४९४११ लिखा जाना चाहिए।

समस्याओं के निदान से संबंधित पत्रों के अलावा जिस विभाग से कार्य है, उसका उल्लेख पत्र में ऊपर ही करना चाहिए। संगठन प्रकोष्ठ के अंतर्गत शक्तिपीठ, प्रज्ञापीठ, परिव्राजक, प्रज्ञामंडल तथा महिला-मंडलों का कार्य होता है। इनमें से जिस विभाग से संबंधित पत्र हो, ऊपर स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिए। इसी प्रकार रचनात्मक, शिक्षा, एकाउण्ट, पाक्षिक, समाचार आदि विभागों का उल्लेख करने से पत्र सुगमता से सही जगह पहुँच सकते है।

कई विभागों से संबद्ध बातें हो, तो एक ही लिफाफे में अलग-अलग कागजों पर भिन्न-भिन्न विभागों के कार्य लिखना उचित है। हर कागज पर अपना पत्राचार का पता भी लिखें। इससे हर विभाग द्वारा शीघ्र कार्यवाही करना संभव हो सकेगा।

अधिकांश पत्रों को रिकॉर्ड के लिए सुरक्षित रखा जाता है। अतः अलग-अलग विभागों के लिए अलग कागज उपयुक्त कागज पर लिखकर पत्र भेजना चाहिए।


महाकाल की वाणी अधिकाधिक व्यक्तियों तक पहुँचाएँ श्रेय के अधिकारी बनें

अखण्ड ज्योति पत्रिका विद्या-विस्तार को मेरुदण्ड है। परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर ज्ञान की ही आराधना की और जन-जन तक ज्ञानामृत बाँटा। अखण्ड ज्योति उसका एक माध्यम बनी और १९३७ से सतत् प्रकाशित इस ज्ञानगंगा ने लाखों-करोड़ों को जीवन जीने की राह दिखाकर उनका भविष्य मंगलमय बनाया है। भगीरथ ने राह बनायी और पतित-पावनी गंगा युगों-युगों तक के लिए अमर हो गयी। परमपूज्य गुरुदेव की वाणी, उनका हृदय, उनका अंत करण तीनों अखण्ड ज्योति में समाहित है। इस गंगोत्री का प्रवाह अनंतकाल तक प्रवाहित होकर जनमानस का परिष्कार करता रहेगा, इसमें किसी को रत्ती भर भी संदेह नहीं होना चाहिए। गंगा जितना आगे बढ़ती है, विराट रूप लेती चली जाती है॥ अखण्ड ज्योति के साथ भी यही हुआ है। आज उसकी पाठक संख्या प्रायः पच्चीस लाख से भी अधिक है। सहयोगी पत्रिका युगनिर्माण योजना (हिंदी), युगशक्ति गायत्री (गुजराती, उड़ीसा), बंगला अखण्ड ज्योति एवं तेलुगु व अंग्रेजी में प्रकाशित अखण्ड ज्योति के माध्यम से यह प्रकाश विश्व के कोने-कोने में पहुँच रहा है।

अखण्ड ज्योति मात्र छपे कागजों का पुलिन्दा नहीं, गुरुसत्ता की प्राणचेतना ही है। इसे महाकाल की वाणी मानकर नित्य परमपुरुष पूज्यवर के सत्संग के रूप में अंगीकार किया जाना चाहिए। स्वयं परमपूज्य गुरुदेव ने समय-समय पर उसके विषय में क्या लिखा है, इसे जरा ध्यान से पढ़ें, तो यह तथ्य समझ में आ सकेगा।

अख़बार अनेक निकलते है ओर अनेक रुचियों के पाठक इनमें से अपने अनुकूल साहित्य खरीदते और पढ़ते रहते है। धार्मिक-आध्यात्मिक पत्र भी अनेक निकलते है और उन्हें उस प्रवृत्ति के लोग मँगाते-अपनाते है। इस प्रक्रिया की तुलना अखण्ड ज्योति से नहीं की जा सकती। वह जानकारी मात्र देने का, पिसे को पीसने का, जो कहा जाता रहा है उसे दुहराने का ढर्रा अपनाकर किसी तरह विज्ञापन या दान के सहारे अपना जीवनक्रम चलाती रहने वाली पत्रिका नहीं है। इसका अपना ढंग, उद्देश्य, क्रिया−कलाप सबसे अनोखा व भिन्न है। नये युग की संदेशवाहिका के रूप में वह अवतीर्ण हुई है और नए व्यक्तित्व, नया समाज, नया विश्व बनाने के लिए अनवरत भगीरथ प्रयत्न कर रही है। जिनमें इस प्रयोजन के उपर्युक्त क्षमता देखी गई है, उन्हें ढूँढ़-ढूँढ़कर एक सूत्र में पिरोया है, उन्हें सोते से जगाया है, दिशा बताई है और लक्ष्य की ओर दृढ़ता के साथ चल पड़ने के लिए आवश्यक उत्साह एवं साहस प्रदान किया है।

निश्चित ही यह माना जाना चाहिए कि समय की विषमता कुछ ऐसी है कि अब मात्र यही एक उपचार ऐसा शेष रह गया है, जिससे मानवता उबर सकती है। अखण्ड ज्योति पत्रिका के पाठकों में जितनी वृद्धि होगी, उतना ही युगपरिवर्तन का मोर्चा विजय की दिशा में अग्रसर होता दिखाई पड़ने लगेगा। अखण्ड ज्योति जो वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का प्रतिपादन अपनी सरल शैली में सतत् करती चली आ रही है अब और भी अनूठे रूप में अगले दिनों पाठकों को पढ़ने को मिलेगी। आगामी दो अंक साधना-विशेषांकों के रूप में प्रकाशित हो रहें। दिसम्बर १८ का अंक युगसाधना के सैद्धान्तिक पक्ष के स्पष्ट करेगा, तो जनवरी २१ का अंक साधना के व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाश डालेगा।

इक्कीसवीं सदी के आगमन की प्रभावबेला में सवेरा बड़ा पुण्य-परमार्थ यही हो सकता है कि हम इस ज्ञान गंगोत्री का विराट विस्तार प्रदान करें, अखण्ड ज्योति पाठकों की संख्या में अधिकाधिक वृद्धि करें। वर्ष के समापन की बेला में सभी से एक भावभरा अनुरोध है कि प्रत्येक पाठक कम से कम दस अनुपाठक और तैयार कर ग्राहक संख्या बढ़ाएँ ताकि नवयुग के आगमन का समाचार कम से कम एक करोड़ व्यक्तियों के द्वारा विश्व-वसुधा को मिल सके। पत्रिका का वार्षिक चन्दा पिछले वर्ष के समाज ६. ही है, आजीवन ७५. विदेश के लिए ५. शीघ्र ही अपना व अपने साथियों का चंदा भेजकर इस पुण्य-प्रवाह को आगे बढ़ाने का श्रेय अर्जित करे। इस समय का यही महापुरुषार्थ है।


Quotation

अखण्ड ज्योति के लेख कागज पर काले अक्षर छाप देने मात्र की प्रक्रिया नहीं है वरन् उसकी एक-एक पंक्ति में एक दर्द, एक आग और प्रकाश भरा रहता है। आत्मिक अनुभूतियों के आधार पर उन्हें लिखा जाता है।

परमपूज्य गुरुदेव

हमारे लिखे साहित्य में कितनी आभा है, कितनी रोशनी है, कितनी मौलिकता है और कितनी शक्ति है, यह कहने की नहीं अनुभव करने की बात है। जिनने इन्हें पढ़ा, तड़पकर रह गए। रोते हुए आँसुओं की स्याही से जलते हृदय ने इन्हें लिखा है, सो इनका प्रभाव होना ही चाहिए, हो रहा है और होकर रहेगा।

विचारक्रांति के अस्त्र-शस्त्र अब हम अपने की हाथों बनाने से लेकर बेचने और चलाने से लेकर और बढ़ाने तक की सारी प्रक्रियाएँ स्वयं ही कर रहे है। रात में लिखते है और दिन में फैलाते है। पर है आखिर हम भी तो स्वाभिमानी। झोली ले दौड़ते, तो आखिर हम भी तो स्वाभिमानी। झोली ले दौड़ते, तो दूसरों की तरह भीख बहुत माँग लेते, पर अड़े इसी आन पर है कि हमारे व्यक्तित्व, वर्चस्व और कर्तृत्व में यदि अपने छोटे परिवार के लोगों तक में चेतना भरने की क्षमता नहीं, तो बाहर के लोगों से किस मुख से कुछ त्याग करने, सहायता देने की बात करें।

परमपूज्य गुरुदेव

इन दिनों हमारी उत्कट अभिलाषा है कि यह आंदोलन एक बार पूरी तीव्रता से, पूरी गत से, पूरी भावना से, पूरी सक्रियता से अपनी प्रौढ़ता प्रदर्शित करें। हमारा पक्का विश्वास है कि जो एक बार इस साहित्य को पढ़ लेगा, अपने भीतर एक अभिनव हलचल और प्रेरणा अनुभव करेगा। इसे लिखा ही ऐसी उच्च मनःस्थिति में जाता है कि प्रभाव उत्पन्न हुए बिना रह ही नहीं सकता। नवनिर्माण के लिए जिस प्रकार के तरंगित हृदय की आवश्यकता पड़ेगी, उसका सृजन यह साहित्य बहुत हद तक कर सकता है।

परमपूज्य गुरुदेव


महत्वपूर्ण ज्ञातव्य

प्रस्तुत अंक के संपादकीय में बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण के अंतिम दो वर्षों की क्रियापद्धति विस्तार से दी गयी है। इक्कीसवीं सदी का आगमन जिन विषम परिस्थितियों से गुजर कर हो रहा है, इसकी चर्चा परमपूज्य गुरुदेव आज से प्रायः पैंतीस वर्ष पूर्व से सतत् अखण्ड ज्योति में अपनी लेखनी एवं अमृतवाणी से करते रहे है। आश्विन नवरात्रि १९८८ की पावन बेला में इसी परिप्रेक्ष्य में एक ऐतिहासिक महाअभियान नवयुग की से युगशक्ति के उद्भव हेतु आरंभ किए गए इस साधना अनुष्ठान में प्रायः २४ लाख से २४. लाख लोगों ने प्रतिवर्ष भाग लिया एवं एक अर्द्धपूर्णाहुति आँवलखेड़ा आगरा (गुरुसत्ता की जन्मभूमि) में नवम्बर, १९९५ की कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर संपन्न हुई।

अब द्वितीय एवं अंतिम महापूर्णाहुति सामने आ पहुँची है। इसे वसंत पंचमी सन् २...- १. फरवरी से आरम्भ होकर वर्ष भर चलना है। इसमें प्रायः चौबीस किए जाने की संभावना है। इस विराट आयोजन की पूर्व तैयारी हेतु पूरे भारत व विश्व में १९९९ की वसंत पंचमी २२ जनवरी से २... की वसंत पंचमी तक साधनावर्ष मनाए जाने एवं इसके लिए साधना प्रशिक्षण सब अभी १५ नवम्बर, १९९८ से आरंभ कर २२ जनवरी, १९९९ तक सारे भारत एवं विश्व में संपन्न कर गायत्री परिवार का संगठनात्मक ढाँचा सशक्त बनाए जाने की रूप-रेखा बनी है। ऐसे स्थान जहाँ से पाँच दिवसीय प्रशिक्षण केन्द्र के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं द्वारा संपन्न किए जाएँगे।

भारत में प्रायः ४८ होंगे। साधनावर्ष में होने जा रहे ढाई दिवसीय आयोजनों का कार्यभार सँभालने वाले केन्द्रों का निर्धारण शान्तिकुञ्ज से किया गया है व सबकी सहमति मँगा ली गयी है। प्रत्येक केन्द्र का निर्धारित क्षेत्र भी यहीं से बना दिया गया है। इन केन्द्रों पर जो पाँच दिवसीय शिक्षण सत्र चलेंगे, ये प्रशिक्षकों का, सक्रिय कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करेंगे। इन प्रशिक्षण सत्रों का एक-एक घण्टा अत्यधिक महत्वपूर्ण व भावी योजनाओं की क्रियापद्धति समाये हुए होगा। परिजनों से अनुरोध है कि वे अपने स्थान-क्षेत्र के प्रचारात्मक आयोजनों, सांस्कृतिक महोत्सवों, श्रीमद्प्रज्ञापुराण आयोजनों को संपन्न तो करें भागीदारी भी करें, परन्तु इन साधना प्रशिक्षण आयोजनों को सर्वोच्च वरीयता दें। इनके माध्यम से ही इन विराट महोत्सवों का अनुयाज-कार्यकर्ताओं का गाँव-गाँव तक फैला तंत्रिका का विकास संभव हो सकेगा। सर्वाधिक ध्यान सभी का इस तथ्य पर डालने के लिए प्रस्तुत संपादकीय लिखा गया है। कृपया ध्यान से पढ़ें।

अखण्ड ज्योति पत्रिका के रूप के आगामी दो अंक बड़े कलेवर में विशेषांकों के रूप में प्रकाशित हो रहे है। दिसंबर १९९८ का अंक साधना विज्ञान के सैद्धांतिक तत्त्वज्ञान वाले पक्ष पर प्रकाश डालेगा, तो जनवरी १९९९ का अंक साधना विज्ञान के व्यावहारिक पहलुओं में साधनामय जीवनपद्धति का रहस्योद्घाटन करेगा। आशा है परिजन पाठक इस पत्रिका के विस्तार फैलाव में कोई कसर शेष न रखेंगे।

*समाप्त*