गीत हमें अच्छे लगते है। अपनी मनःस्थिति के अनुकूल गीत गाते रहते हैं। कहते हैं गीता गाने से मन हल्का होता है। चित्त शान्त होता है, उत्साह बढ़ता है। लेकिन गीत तो बहुत गा लिए। गीतों के साथ संगति देने वाले, स्वर में स्वर मिलाने वाले भी मिल गए, पर कुछ हुआ नहीं। मन भारी का भारी, चित्त चंचल-अशान्त उत्साह शिथिल और इन सबके कारण वही दुर्गति न ऊपर उठे, न आगे बढ़े। संतुलन की स्थिति चित्त को न मिली, उत्साह न आ सका। किसी ने कहा, प्रभु को पुकारों, विश्वास हिल उठा, गला बैठने लगा, लेकिन स्थिति बदली नहीं। आखिर क्यों? क्या वह सुनता नहीं?
अरे नहीं, वह सुनता है और देखता भी है। हम ही हैं अभागे, जो देखते भी नहीं और सुनते भी नहीं। अपने गीत गाने में इतने खो गए है कि उसकी गीता के स्वर सुनाई ही नहीं देते। कानों पर से हाथ हटाएँ, कोलाहल के बीच उभरती हुई उसकी वाणी सुनें। वह तो उद्बोधन के लिए सदा तैयार है हम ही “षाधि माँ त्वाँ प्रपन्न्म्” के लिए तैयार नहीं। वह तो योगक्षेमं वहाम्यहम् अभी भी कह रहा है, हमारे ही अन्तः करण में “ करिष्ये वचनं तवं” का भाव नहीं उभरता।
अब अपनी अलापना बन्द करें, उसकी सुनें। गाना है तो हम भी गीता ही गाएँ। लेकिन गीता भला कैसे गाएँ, वह तो भगवान गाते है। हम तो उसकी सुनें। गीता के स्वर वही जानता है, पर स्वर-में-स्वर हम भी मिला सकते है। गीता वह अपने लिए थोड़े ही गाता है? हम सबमें प्राण संचार के लिए गाता है, गति देने के लिए गाता है। उन स्वरों का सुनें, अंतर में झंकृत होने दें। फिर अपने आप एक सिहरन उठेगी, होंठ फड़केंगे, पाँव थिरकेंगे। यह कोई सामान्य गीत नहीं, यह तो अभियान गीत है। उस पर तबले की नहीं, कदमों की ताल दी जाती है। संगति के लिए अलाप नहीं, क्रिया−कलाप सँभालने पड़ते है।
गीता वह अकेले नहीं गाता, बहुतों को साथ लेकर गाता है। उसका साथ देना, जो सीख ले, वही संगति दे पाता है। उसका ढंग ही कुछ निराला है। अर्जुन दी-तानपूरे का तार चढ़ाकर नहीं-गाण्डीव की प्रत्यंचा से, गुरुगोविन्द सिंह ने मंजीरे नहीं तलवारें खनखनायीं। उसकी संगति में विवेकानन्द ने स्वर अलापा और विनोबा के पग थिरके। हर युग में उसकी गति के अलग ढंग बनते है। "करिष्ये वचनं तव” का संकल्प जगते ही उसका ढंग अपने आप समझ में आ जाता है।
पर हम गीता गाना कहाँ चाहते है? वह गीता कहाँ सुनना चाहते है, जिससे जीवन फड़क उठे और धन्य हो जाए। लेकिन जिस आनन्द की लहरें उठाने के लिए हम गीत गाने का असफल प्रयोग करते रहे है, वह तो गीता गाने से मिलेगा। आओ इसी क्षण अपने गीत की सीमा से आगे बढ़ें, उसकी गीता गाएँ।
उस दिन बाल मुनि श्वेतकेतु एक गृहस्थ के यहाँ भिक्षा लेने के लिए पहुँचे। घर में एक वृद्ध पुरुष व उसकी पुत्रवधू दो ही व्यक्ति थे। वृद्ध पुरुष को धर्म-कर्म में कोई अभिरुचि न थी, जबकि पुत्रवधू विदुषी होने के साथ धर्मशील भी थी। पुत्रवधू ने सभक्ति साधु को प्रणाम किया। बालमुनि श्वेतकेतु की छोटी अवस्था व चेहरे के तेज ने उसके मन में कई सवाल उभार दिए। युवती ने पूछा-मुनिवर अभी तो सवेरा ही है?
बालमुनि ने उत्तर दिया-बहिन मुझे काल का पता नहीं।
मुनि ने पूछा- तुम्हारा पुत्र कितने वर्ष का है?
सोलह वर्ष का।
और तुम्हारा पति?
आठ वर्ष का।
तुम्हारे घर क्या आचार-विचार है?
हम तो हमेशा बासी ही खाते हैं।
तुम्हारे श्वसुर कितने वर्ष के है?
वह पालने में झूल रहे है?
वृद्ध पुरुष उनके इस वार्तालाप को सुन-सुनकर आगबबूला हो रहा था। एक-एक प्रश्न उसके हृदय में चुभन पैदा कर रहे थे। युवती और मुनि के प्रश्नोत्तर समाप्त हो गए। मुनि भिक्षा ग्रहण कर चले गये। उनके चले जाने के तुरन्त बाद वृद्ध पुरुष झल्लाते हुए अपनी पुत्रवधू से बोला, ऐसा ही बेवकूफ ये साधु और ऐसी ही घर की इज्जत को धूल में मिलाने वाली तुम। खबरदार यदि कभी ऐसा अवसर आया।
पुत्रवधू शाँत स्वर में बोली-पिताजी आप मुझे कोई आदेश दें, मुझे स्वीकार होगा। किन्तु, साधु को भिक्षा लेने आने के लिए मैं कैसे रो सकती हूँ। इससे तो अच्छा है, आप मुनि के आश्रम पर जाएँ, वहाँ बालमुनि के गुरु होंगे। आप उनके सामने सारी घटना बताकर मुनि को अपने घर आने के
लिए मना कर आइए।
वृद्ध पुरुष को बात जँच गयी। उसने सोचा मैं बहुधा विचार ही करता था, कभी इन साधुओं को डांटूं पर कभी ऐसा अवसर आया ही नहीं। आज सही मौका हाथ आया है। जिन्दगी में पहली बार वह वृद्ध साधुओं के स्थान पर पहुँचा उसने गुरु के समक्ष बालमुनि की शिकायत करते हुए कहा-आज आपका शिष्य मेरे घर भिक्षा लेने आया था, उसने वहाँ बहुत हो अशोभनीय बातें कहीं। गुरु ने बालमुनि को बुलाया, बालमुनि ने प्रार्थना की-इनसे पूछा जाए, मैंने आज क्या अशिष्ट आचरण किया?
गुरु का संकेत पाकर वृद्ध बोला- मेरी पुत्रवधू ने इस बालमुनि से कहा अभी तो सवेरा ही हुआ है और इसने उत्तर दिया, मैंने काल को नहीं जाना है। क्या ये दोनों गँवार है कि आसमान में चढ़ते सूर्य को देखकर भी इन्हें काल का पता नहीं चला?
गुरु के पूछने पर बालमुनि बोला-भगवान यह वार्तालाप सत्य है, हम दोनों, में यह बात हुई थी। बहिन के मन में जिज्ञासा थी, सांकेतिक भाषा में उसने पूछा था, अभी आपने इस उभरती हुई अवस्था में ही संन्यास जैसे कठोर मार्ग का अनुसरण कैसे कर लिया? मैंने उत्तर दिया, बहिन काल (मृत्यु) का कोई भरोसा नहीं है। भगवान्! इसमें उस बहिन का क्या अशिष्ट प्रश्न था और मेरा क्या अनुचित उत्तर?
वृद्ध पुरुष बीच में ही टोकते हुए बोला-महाराज इस बात को जाने दीजिए, किन्तु जरा यह बताइए, आपके इस साधु ने पूछा तुम्हारे घर क्या आचार-विचार है, तो मेरी पुत्रवधू ने उत्तर दिया, हम तो बासी ही खाते है, इस प्रकार की बातें करने की क्या आवश्यकता थी।
बालमुनि ने कहा-गुरुदेव जब मैंने उस बहिन का
तत्वभरा प्रश्न सुना, तो मेरे मन में भी धार्मिक जिज्ञासाएँ उभर आयी। मैंने भी उनसे पूछा लिया, तुम्हारे घर क्या आचार है अर्थात् तुम्हारे यहाँ धार्मिक विचारों का चलन कैसा है? यानि कि क्या तुम वर्तमान में भी पुण्यकर्मों में निरत हो या सिर्फ पिछले जन्म के पुण्यों का भोग कर रहे हो? तो उस बहिन ने कहा, हम तो बासी ही खाते है। अर्थात् हमारे यहाँ वर्तमान में पुण्यकर्मों का चलन नहीं है, सिर्फ पिछले पुण्यों का भोग कर रहे है। इसमें मैंने और उस बहिन ने कौन-सा अभद्र वार्तालाप किया?
वृद्ध ने कहा, यह तो ठीक है, पर जरा इससे यह तो पूछिए-मेरे पुत्र व पौत्र की अवस्था पूछने का इसका क्या प्रयोजन था। इस प्रश्न का उत्तर मेरी पुत्रवधू ने भी तो सर्वथा ही असंगत दिया है। मेरा लड़का आठ वर्ष का और पौत्र सोलह वर्ष का और मैं जो कि बूढ़ा हो चला हूँ, दाँत टूट गए है, केश सफेद हो गए है, मैं अभी पालने में ही झूलता हूँ।
बालमुनि ने कहा- जब मैंने उस बहिन को इतना धर्मपरायण व तत्त्वज्ञ जाना, तो सहसा मेरे हृदय में आया कि इसके घर में और कोई धर्मज्ञ है या नहीं, यह भी जानना चाहिए। इसी उद्देश्य से मेरा प्रश्न था। उसने मुझे बताया मेरा लड़का तो जन्म से ही धर्म-कर्म को जानता है, क्योंकि वह मेरे ही संपर्क में रात-दिन रहता है, उसकी अवस्था सोलह वर्ष की है। मेरे पति धर्म में तनिक भी विश्वास नहीं करते थे, किन्तु मेरे बार-बार समझाने-बुझाने से वे धर्म के मर्म को धीरे-धीरे समझने लगे है और सच्चाई के मार्ग पर आठ वर्ष से अग्रसर है, जबकि मेरे श्वसुर पर अब तक मेरी धार्मिक बातों का असर नहीं है।
बालमुनि की तथ्यपूर्ण बातों ने अब तक वृद्ध पुरुष के ज्ञानचक्षु खोल दिए थे। उन्होंने विनम्रतापूर्वक क्षमा याचना करते हुए महागुरु के चरणों की सौगन्ध खाते हुए शपथ ली कि अब से वे भी धर्मपरायण परिवर्तन को देखकर बालमुनि के आनन्द का पारावार न रहा।
काल और वस्तु के मध्य परस्पर गहरा संबंध है। काल के प्रभाव से वह अपना स्वरूप और अवस्थाएँ बदलती रहती हैं, यह सर्वविदित है। इसको साधारण घटनाक्रम कहेंगे। असाधारण दशा में वस्तुएँ काल से अप्रभावित रहती है। इन्हें ‘नित्य’ कहते है। यह अभौतिक घटना हुई।
काल के संबंध में साधारण ज्ञान प्रायः हर एक को है। जब विभिन्न प्रकार की घटनाएँ इस भौतिक संसार में घटती है, तो उनमें से कौन पूर्ववर्ती और कौन परवर्ती है, इस प्रकार का जो भाव उत्पन्न होता है, वास्तव में यह काल-बोध है। साधारण लोग घटनावलियों के इसी क्रम के आधार पर काल-निर्णय करते है। काल-निर्णय में कालक्रम का महत्वपूर्ण स्थान है। मानव शरीर के विकास-मार्ग में जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त अनेक अवस्थाएँ आती है। यह क्रमबद्ध अवस्थाएँ काल का धर्म है। एक ही देह एक के बाद एक इन सभी अवस्थाओं को प्राप्त करते चलती है। इसीलिए यह कहना ठीक ही है कि शरीर काल के अधीन है। इस अनित्य अथवा नश्वर संसार की सभी वस्तुएँ इसी तरह एक क्रम में दिखलाई पड़ती है। यही परिवर्तनशीलता या काल की अधीनता है।
नित्य या अनश्वर वस्तु में काल का कोई प्रभाव नहीं भासता, कारण कि जो नित्य है, वह एक प्रकार से हमेशा प्रकाशवान रहता है। कभी भी उसमें दशान्तर नहीं होता। इसे एक उदाहरण द्वारा भली-भाँति समझा जा सकता है। अ,ब,स तीन अवस्थाएँ है। यदि यह नित्य अर्थात् अनश्वर है, तो ‘अ’ सदा ‘अ’ ही बनी रहेगी। उसी प्रकार ‘ब’ और ‘स’ सर्वदा एक ही स्थिति में अपरिवर्तनीय रहेंगी। ‘अ’ का कभी ‘ब’ में परिवर्तन न हो सकेगा और न ‘ब’ कभी ‘स’ में बदल सकेगी। ऐसी स्थिति ये यही कहना पड़ेगा कि यह काल के प्रभाव से परे है या इनमें किसी प्रकार का कालगत संबंध नहीं है।
कालगतता नश्वरता की प्रतीक है। एक ही वस्तु में यदि समय के साथ-साथ विभिन्न प्रकार की अवस्थाएँ उत्पन्न होती है, तो यह कहा जा सकता है कि उसमें कालगतता है। साधारण मनुष्यों में दिखलाई पड़ने वाली यह सर्वसामान्य घटना है, किन्तु योगीजन कुछ सीमा तक इस पर विजय प्राप्त कर लेते है। यही कारण है कि लम्बी उम्र निकल जाने के बाद भी उन पर इसका कोई प्रभाव नहीं दृष्टिगोचर होता और वे एकदम युवा प्रतीत होते है। हिमांचल क्षेत्र में आज भी ऐसे अनेक यति देखे जा सकते है, जिनकी मियादी आयु (क्रोनोलॉजिकल एज) सौ वर्ष कायिक वय (बायोलॉजिकल) की दृष्टि से वे चिरयुवा प्रतीत होते है।
अलौकिक जगत में इसका सर्वोत्तम उदाहरण कृष्ण की नित्य लीला है। श्री कृष्ण की बाल-लीला में उनके बाल भव प्रकाशवान है। यही नित्य है। इसके विपरीत वे अपनी किशोर-लीला में नित्य किशोर हैं, जबकि युवा लीला में वे चिरयुवा है अर्थात् जो नित्य बालक है, वे ही नित्य युवा भी ह॥ उनका बाल्य भाव जिस प्रकार नित्य है, उसी प्रकार उनका किशोर भाव और युवा भाव भी नित्य हैं। भौतिक शरीर जिस प्रकार बालक से किशोर और किशोर से यौवन में परिवर्तित होता है, वैसा अभौतिक श्री कृष्ण देह के साथ घटित नहीं होता, कारण कि उनका बालक, किशोर और युवा शरीर एक साथ वर्तमान है और नित्य है। इसे और स्पष्ट कर कहें, तो यह कहा जा सकता है कि यदि कोई व्यक्ति श्री कृष्ण के बालरूप के दिव्य-दर्शन कर रहा है, तो यह सम्भव है कि कोई दूसरा आदमी उसी समय उनके किशोर रूप के दर्शन करें, जबकि तीसरा आदमी उनके युवा स्वरूप के, अर्थात् उनके तीनों रूप एक साथ विद्यमान है और एक दूसरे से स्वतंत्र है। यहाँ यह कहना ठीक नहीं होगा कि श्री कृष्ण का बालरूप पूर्ववर्ती है और किशोर एवं युवा रूप परवर्ती कालीन। बालक कृष्ण अपने बालक रूप में तब भी बने रहेंगे, जबकि यहाँ सहस्रों कल्प बीत जाएँ। इसी प्रकार किशोर और युवक कृष्ण की अपनी-अपनी अवस्थाओं में कोई परिवर्तन नहीं आएगा।
तत्त्ववेत्ताओं का कहना है कि यह अनित्य संसार भी वास्तव में नित्य का ही प्रकाश और मूर्त रूप है, पर ज्ञानचक्षु विकसित न होने के कारण इस तथ्य को हम ठीक-ठीक समझ नहीं पाते। हम जिसे जागतिक या अनित्य घटनाएँ कहते है, उसके पीछे भी वास्तव में मूलसत्ता कारणभूत होती है। लौकिक दृष्टि से जिसे पूर्व का या द का कहकर उल्लेख किया जाता है और जो साँसारिक पहलू से परिवर्तनीय प्रतीत होता है, वह तत्त्वतः ऐसा नहीं है। जिनकी अन्तर्दृष्टि विकसित हो गई है, उनके लिए यह स्थिति भी अपरिवर्तनशील है। एक उदाहरण द्वारा यह स्पष्ट हो जाएगा। च,छ,ज तीन वस्तुएँ इस तरह अवस्थान कर रही है कि च के पश्चिम में छ तथा छ के पश्चिम में ज है-ऐसा कहा जा सकता है। दूसरे शब्दों में च अपना स्थान बदलकर ज की जगह आ जाए, तो च को छ के पश्चिम में कहा जाएगा। ऐसे ही ज को छ के पूर्व में स्थिति माना जाएगा। इसी प्रकार का व्यतिक्रम छ के स्थान त्यागने पर हो जाएगा। अतः च,छ,ज को यदि स्थिर मान ले और इनका स्थान-परिवर्तन आदि संभव न हो, तो इनके मध्य जो दिशागत संबंध है, यह यथावत बना रहेगा। यहाँ यदि एक की स्थिरता में परिवर्तन के पीछे गतिशीलता स्वीकार कर ली जाए, तो उनके पारस्परिक सम्बन्धों में भी परिवर्तन होगा, किन्तु यदि सभी समान गति से समरूपता रखते हुए गतिशील हो, तो इस गतिशीलता के बावजूद संबंध में कोई परिवर्तन नहीं होगा।
काल में गति करने की क्षमता साधारण लोगों में मौजूद नहीं होती। यह केवल योगियों की विशेषता है, अतः इस प्रसंग को समझ पाना साधारण लोगों के लिए तनिक कठिन होगा, फिर भी लौकिक उदाहरण द्वारा इसे स्पष्ट किया जा सकता है। पटना में जब सूर्योदय हो चुका होता है, पर हरिद्वार में तब वह प्रतीक्षित होता है। इस प्रकार पटना-वासियों के लिए जो सूर्योदय काल है, वह आस्ट्रेलिया के लिए पूर्वाह्न और हरिद्वार-वासियों के लिए रात्रि के अन्तिम प्रहर का अन्तिम भाग। स्थान के साथ संबंध विच्छेद कर साँसारिक काल की अभिव्यक्ति सम्भव नहीं। उदयकाल करने पर किसी-न-किसी स्थान को साथ में लेते हुए उदयकाल कहना पड़ेगा। मध्याह्न और सूर्यास्त आदि कालों के बारे में भी यही नियम है। स्थान-संबंध से परे उदयकाल सम्भव नहीं। पृथ्वी के गतिशील होने के कारण सम्पूर्ण पृथ्वी का उदयकाल एक ही नहीं है, किन्तु नित्य लोक में ऐसी किसी भी गति का अभाव होने कारण वहाँ का हर काल ही नित्य है अर्थात् ऐसे नित्य देश है, जहाँ का उदयकाल भी नित्य है। दूसरे शब्दों में वहाँ सर्वदा नवोदित सूर्य ही दृष्टिगोचर होगा, पूर्वाह्न, मध्याह्न और अपराह्न है। शेष काल वहाँ अनुपस्थित होते है, पूर्वाह्न, मध्याह्न एवं रात्रि का अभाव होता है। नित्य देश अनन्त है। देश भेद के हिसाब से प्रत्येक काल ही नित्य है, पर नश्वर या अनित्य संसार में गतिशीलता होने के कारण हम ऐसे किसी नित्य काल की प्रतीति नहीं कर पाते, किन्तु यदि उक्त गत्यात्मकता के अनुरूप हम स्वयं को गतिशील बना ले, तो नित्य काल का आभास इस भौतिक दुनिया में बैठे-बैठे प्राप्त किया जा सकता है।
इस तथ्य को प्रस्तुत उदाहरण द्वारा हृदयंगम कर सकते है। योगविद्या में पारंगत यदि कोई अवलोकन सूर्योदय काल पटना में है, तो वह उसके लिए प्रातःकाल होगा। छह घण्टे बाद दिन की मध्यस्थता आएगी। इस समय पृथ्वी के पश्चिमी भाग में कहीं अरुणोदय हो रहा होगा, ऐसे समय उक्त अवलोकन यदि अपनी योगशक्ति का प्रयोग करते हुए मनोवेग से उस पश्चिमी हिस्से में पहुँच जाए, तो वहाँ उसे सूर्य उदय होता हुआ दिखलाई पड़ेगा। पटना में रहकर वह अपनी दृष्टि को उतना व्यापक और विस्तृत नहीं बना पाता, इसलिए उसे सिर्फ पटना का मध्याह्न नजर आता है, यूरोप का उदीयमान सूर्य नहीं, किन्तु जब योग का आश्रम लेते हुए पृथ्वी या सूर्य के अनुरूप गति वह स्वयं में विकसित कर लेता है, तो न सिर्फ सूर्योदय वरन् किसी भी विशिष्ट काल को लौकिक परिवर्तित अवस्था में रहते हुए अनवरत रूप से उसकी अनुभूति कर सकता है।
यहाँ समान गतिशीलता के आधार पर काल की नित्यता समझाने का प्रयास किया गया, किन्तु उसको अनुभव करने का एक और
भी तरीका है। परमसत्ता कण-कण में सर्वत्र विद्यमान है। यदि अवलोकन इस जगतव्यापी सत्ता के साथ स्वयं को संयुक्त कर सके, तो फिर उसे स्थान त्यागने और यूरोप जाने की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी। चूँकि व्यष्टिसत्ता और समष्टिसत्ता मिलकर एकाकार हो चुकी है, इसलिए प्रेक्षक की इच्छा पृथ्वी में सर्वत्र स्फुरित हो सकती है। यदि ऐसा हुआ, तो वह प्रातःकाल का अनुभव करेगा और इसके लिए उसे अन्यत्र कहीं जाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। इस प्रकार अखण्ड व्यापक सतत् से तद्रूप हो सभी प्रकार के कालों की प्रतीति की जा सकती है।
भूत, भविष्य और वर्तमान-इन तीन कालों से प्रायः सभी अवगत है, लेकिन एक अनन्त वर्तन महाकाल में ही विद्यमान है तथा भूत, भविष्य अमूर्त रूप में है। वर्तमान का प्रकाश आवरणरहित होकर जब सर्वत्र एक साथ-एक रूप में स्फुरित होता है, तब सिर्फ महावर्तमान की सत्ता मौजूद होती है। इस महावर्तमान को केवल दृष्टा स्तर से योगीजन ही उपलब्ध कर पाते है। सर्वसाधारण इसे ग्रहण इसलिए नहीं कर पाते, क्योंकि यह अत्यन्त सूक्ष्म होता है।
महावर्तमान ही वास्तव में नित्य काल है। सामान्य लोग सिर्फ सद्यः वर्तमान को ही जान, समझ और पकड़ पाते है। जो बीत गया, उसे अनुभव करने की सामर्थ्य उनमें नहीं होती, कारण कि कल के साथ गति बनाये रख पाने में वे असफल होते है। गति न हो, तो वर्तमान भूत बन जाता है। योगी लोग इसमें निष्णात होते है, इसलिए वे एक महावर्तमान में जीते है, जिसमें विगत, अनागत दोनों सम्मिलित होते है। यह एक उच्चस्तरीय विज्ञान है। हम यदि अपने जीवनक्रम को उच्चस्तरीय बनाते हुए साधना की उस उच्च भूमिका में आरूढ़ हो सकें, तो हमारे लिए भी नित्य वस्तुएँ, नित्य काल, नित्य लोक, नित्य घटनाओं की अनुभूति कर पाना सम्भव होगा, ऐसा योगशास्त्र के मर्मज्ञों का कथन है।
श्रम बड़ा है या बुद्धि? इस विषय पर दो स्नातकों में विवाद चल पड़ा। दोनों ही अपनी-अपनी बातों पर दृढ़ थे और अपने-अपने दावे की पुष्टि में दृष्टान्त न कर पा रहे थे। निर्णय न कर पा रहे थे। दीर्घतपा ने दोनों को अपने पास बुलाया और कहा “वत्स! श्रम और बुद्धि की सार्थकता पास-पास रहने में ही है, दोनों में से कोई भी न बड़ा है, न छोटा, दोनों का महत्व समान है।”
क्या हम ईश्वर को देख सकते हैं, उससे वार्तालाप कर सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर नहीं में भी दिया जा सकता है और हाँ में भी। नहीं उस स्थिति में जब ईश्वर को कोई आसमान में ठहरा हुआ और मनुष्यों जैसी आकृति-प्रकृति का मानकर चला जाए। यह विशुद्ध भावनात्मक कल्पना है, जो सम्भवतः ध्यान की एकाग्रता अथवा उत्कृष्टतम मानव का स्वरूप निर्धारण करते हुए उसके सदृश बनने की लक्ष्य स्थापना के लिए की गई प्रतीत होती है। उसके अनेक नाम-रूप ही नहीं गुण-स्वभाव की भारी भिन्नता वाले अगणित स्वरूप भी यहीं बताते कि यह यथार्थता नहीं काल्पनिक स्थापना है। यदि ईश्वर को कोई यथार्थ आकृति होती, तो वह सूर्य, चन्द्र आदि की तरह समस्त विश्व में एक ही प्रकार की दृष्टिगोचर होती। तब देश, जाति एवं सम्प्रदायों द्वारा प्रस्तुत अनेकानेक ईश्वरीय आकृतियाँ क्यों दिखाई पड़ती। तब इन ईश्वरों के बीच मान्यताओं और क्रिया–कलापों का जमीन आसमान जितना अन्तर क्यों रहता।
ऐसे काल्पनिक ईश्वर को देखना और उससे वार्तालाप करना यदि किसी के लिए सम्भव हो सके, तो उसे उसकी भावातिरेकता ही कहा जाएगा। अपनी कल्पना और आस्था का समन्वय भी क विचित्र है। उससे अँधेरे में खड़ी झाड़ी भूत बनकर हमें इतना डरा देती है कि प्राणघातक संकट आ उपस्थित हो। भूत-पलीतों के विविध क्रिया-कौतुक मनुष्य की सघन कल्पनाओं के अतिरिक्त और क्या है? ठीक इसी प्रकार ईश्वर भी संकल्पशक्ति एवं आस्थाओं से मिश्रित भावुकता के आधार पर गढ़ा जा सकता है। उसके दर्शन भी हो सकते है और वार्तालाप भी हो सकता है, पर इसका परिणाम कुछ नहीं। कल्पना की परिपुष्टि कल्पना के आधार पर कर लेने का रात्रि स्वप्न अथवा दिवास्वप्न किसी का कुछ प्रयोजन पूरा नहीं कर सकता। ऐसे भावुक लोगों की कमी नहीं, जो अपने कल्पित देवी-देवताओं के अक्सर दर्शन करते रहते है। वे कभी स्वप्न में दिखाई पड़ते है, कभी अर्द्धजागृत अवस्था में। यदि वह दर्शन वास्तविक रहे होते तो इतना बड़ा देव-अनुग्रह प्राप्त करने वाले के व्यवहारिक जीवन में स्तर में तथा परिस्थितियों में अन्तर अवश्य पड़ा होता। देवता जिस पर इतने प्रसन्न हो कि दर्शन देने दौड़े आये, उस पर वे अन्य कृपाएँ भी अवश्य करेंगे और उसका स्तर देवोपम बना देंगे। पर यदि वैसा कुछ नहीं होता और दर्शनों का सिलसिला चलता रहता है, तो यथार्थवादी इतना ही कह सकता है कि विनोद की एक अच्छी मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि हाथ लग गई।
इस स्तर के ईश्वर का दर्शन करने की बात सोचना बालबुद्धि से अधिक और कुछ नहीं है। विवेकवान व्यक्ति इस जंजाल में नहीं उलझते वरन् तत्व-चिंतन की गहराई में उतरकर इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि अनन्त में संव्याप्त दिव्य चेतना ही ईश्वर है। मनुष्य और इस ईश्वर का मिलन स्थल मानवी अन्तःकरण ही हो सकता है। व्यक्ति की समाविष्ट दिव्यचेतना का केन्द्रस्थल उसका अन्तःकरण है। सजातीय के साथ ही सजातीय का मिलना सम्भव है। आत्मिक चेतना ही ईश्वरीय चेतना के समकक्ष है। अस्तु, उन्हीं दोनों का पारस्परिक मिलन सम्भव हो सकता है। हाड़-माँस से बनी शरीर सत्ता और उसके साथ जुड़ी हुई इन्द्रियाँ स्वयं जड़-पदार्थों को ही देख सकती या अनुभव कर सकती है। यदि ईश्वर जड़ पदार्थों का बना, अचेतन स्थूल वस्तुओं जैसा रहा होता, तो ही आँख से उसे देखना और कान से उसकी आवाज सुनना सम्भव हो सकता था। जिस प्रकार एक मनुष्य दूसरे को देखता है या अपनी कहता उसकी सुनता है, उस स्तर का दर्शन अथवा वार्तालाप सम्भव नहीं हो सकता।
अर्जुन ऐसा ही आग्रह कर रहा था कि मुझे भगवान का दर्शन करना है। इस पर कृष्ण ने कहा-यह चर्मचक्षुओं से सम्भव नहीं हो सकता। इसके लिए उसे दिव्य चक्षु दिये गये। दिव्य चक्षु अर्थात् दिव्यदर्शन, तत्त्वदर्शन, विवेक। उसी के माध्यम से अर्जुन ने एक विराट विश्व-ब्रह्माण्ड के दर्शन किये थे। वैसा ही हमारे लिए भी सम्भव हो सकता है। यदि प्रत्यक्ष ईश्वर देखना हो, तो यह विश्व उसी का स्वरूप देखा जा सकता है और उसके अन्तराल में सन्निहित विश्वात्मा की परमात्मसत्ता के रूप में, भाव-सम्वेदना के क्षेत्र में सहज ही अनुभव किया जा सकता है।
उससे वार्तालाप करना हो तो सत् शास्त्रों के स्वाध्याय में, महामानवों के सत्संग-सान्निध्य में, तत्त्वदर्शन के मनन-चिन्तन में सम्भव हो सकता है। टेलीफोन वार्ता की तरह भगवान से वार्तालाप करने की और टेलीविजन पर चलते-फिरते ईश्वर को देखने की निरर्थक उड़ाने उड़ना छोड़कर ही हम वास्तविकता के निकट पहुँच सकते है। भ्रम-जंजाल गढ़कर तो हम अपने आपको अवास्तविकता के ऐसे जाल में अधिकाधिक फँसाते चले जाएँगे, जिसमें बालू से तेल निकालने जैसे निरर्थक प्रयासों की तरह निराशा ही हाथ लगेगी। सुखद कल्पना गढ़ लेना और ईश्वर के साथ क्रीड़ा-कल्लोल हास-विलास करते रहना एक बात है और वैसी यथार्थता का होना दूसरी। कल्पना की उड़ाने सम्भव है किसी का भावनात्मक समाधान कर सकें, पर वास्तविकता के क्षेत्र में उसके हाथ कोई बड़ी उपलब्धि मिल नहीं सकेगी, यह भी सत्य है।
ईश्वर-दर्शन उचित भी है और आवश्यक भी। पर उस लाभ से लाभान्वित तभी हुआ जा सकता है, जब उसके लिए उपयुक्त स्थान चुनें और उपयुक्त आधार अपनाएँ। मानवी अन्तःकरण ही स्थान है जहाँ उत्कृष्ट भावनाओं एवं विचारणाओं के रूप में मनुष्य और परमेश्वर का मिलन सम्भव हो सकता है। उसी मिलन में वार्तालाप की भी पूरी सम्भावना विद्यमान है। मिलन और वार्तालाप की दोनों आवश्यकताएँ एक ही स्थान पर, एक ही समय पूरी हो सकती है। इसके लिए अपने अन्तःकरण को छोड़कर अन्यत्र भटकने की जरूरत नहीं है। प्रतीक पूजा का आधार इसीलिए लिया जाता है कि हमारी विमूढ़ चेतना क्रमशः ईश्वर के सान्निध्य में पहुँचे, इसके लिए श्रद्धा उगाये और तादात्म्य होने के लिए अभ्यास जुटाये। इससे आगे की मंजिल पूरी करने के लिए तो हमें बहिरंग जड़ जगत में से अपने को समेटकर अन्तरंग क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए ही कदम बढ़ाने पड़ते है। ईंट-पत्थरों के बने देवालयों स्थापित पाषाण प्रतिमाएँ आरम्भिक श्रद्धा-जागरण की दृष्टि से ही उपयुक्त होती है। ईश्वरप्राप्ति का, उसके दर्शन अथवा वार्तालाप का उद्देश्य पूरा नहीं करा सकतीं। इसके लिए तो उसी तीर्थ में जाना पड़ेगा, जहाँ ईश्वरीय प्रकाश की सीधी किरणें आती है और जिसे अन्तःकरण के नाम से जाना जाता है। सच्चा देवमंदिर अपना अंतःक्षेत्र ही है, उसी में अन्तःकरण रूपी सजीव देवप्रतिमा प्रतिष्ठापित है। इसी मर्मस्थल से संपर्क बनाकर हम अपने अध्यात्म लक्ष्य तक पहुँच सकते है। आत्म-साक्षात्कार एवं ईश्वर दर्शन के महान लक्ष्य की पूर्ति के लिए हमें इस सुनिश्चित स्थान के साथ ही गहन संपर्क बनाना होगा।
अपने भीतर ही वह सत्ता विद्यमान है, जो हमारा श्रेष्ठतम मार्गदर्शन कर सके और समस्त समस्याओं का हल प्रस्तुत कर सके। अभीष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन जुटा सकना भी पूर्णतया उसकी सामर्थ्य के अंतर्गत है। इस सत्ता केन्द्र का नाम अन्तःकरण है। मनुष्य और ईश्वर का जब कभी -जितना कुछ भी संपर्क बनेगा, इस केन्द्र स्थल पर बनेगा। आत्मा और परमात्मा की प्रणयकेलि का सुसज्जित एकान्त उद्यान यही है। वस्तुतः ईश्वर की सत्ता और महत्ता अत्यन्त व्यापक है, उसे चिन्तय और अनिवर्चनीय कहा जा सकता है।
सुविस्तृत ब्रह्माण्ड में ग्रह नक्षत्र में, एक से दूसरे की दूरी कितनी अधिक है, इसके गणना-अंक देखते ही बुद्धि चकरा जाती है और उनकी भ्रमण कक्षाओं के क्षेत्र की कल्पना की जाए, तो बुद्धि को प्रतीत होगा कि इतने विस्तार का चिन्तन तक उसके लिए असम्भव है। मानवी जानकारी से बाहर भी न जाने कितनी निहारिकाएँ और होंगी, वे जिन घेरे को स्पष्ट करती होंगी, उनके भीतर भिन्न-भिन्न प्रकार की परिस्थितियाँ और शक्तियाँ काम कर रही होंगी? उनमें रहने वाले जड़-चेतन पदार्थों की स्थिति में कितनी भिन्नता और कितनी विशेषज्ञता होगी, उन सबका नियन्त्रण-संचालन का सूत्र सँभालने वाला कितना कार्य किस प्रकार सम्पन्न करता होगा? उसकी स्वयं की स्थिति कितनी सुविस्तृत होगी? इन सब प्रश्नों पर जब विचार करना आरम्भ करते है, तो तत्त्वदर्शी-मनीषियों की तरह हमें भी अचिन्त्य, अनिवर्चनीय, अनादि, अनंत, नेति-नेति आदि कहकर अपनी चिंतनात्मक असमर्थता और तुच्छता स्वीकार करनी पड़ती है। समग्र ईश्वर को प्राप्त करना तो दूर?, सके विस्तार संबंधी कल्पना तक कर सकना हमारे लिए शक्य नहीं।
ईश्वर को अणोरणीयान् महतो महीयान् कहा गया है। महतो महीयान् को प्राप्त कर सकना अपने साधनों को देखते हुए सम्भव नहीं। हम उसकी अणोरणीयान् सत्ता से ही संपर्क बना सकते है और उस मर्मस्थल में तादात्म्यता प्राप्त करके अपनी व्यापकता भी ईश्वर की तरह ही असीम बना सकते है॥ ब्रह्म-वेत्ता प्रयास में निरत रहे हो और उन्होंने तत्त्वज्ञान के मार्मिक रहस्योद्घाटन करते हुए यही कहा है कि ईश्वर से संपर्क बनाने का एकमात्र सही स्थान अन्तःकरण ही हो सकता है।
आमतौर से हमारी अभिरुचि बाह्य जगत में बिखरी पड़ी रहती है। बहिर्मुखी चिन्तन में निरत और लिप्सा-लालसाओं के साधन जुटाने में व्यस्त मनुष्य के लिए वह सम्भव ही नहीं हो पाता कि
अंतःक्षेत्र में प्रवेश करके वहाँ भरे पड़े अमृत भण्डार को कल्पवृक्ष को पारस को देखने और समझने में समर्थ हो सके। जब इतना ही नहीं बन पड़ा, तो उस रत्नभण्डार को कुरेद कर बहुमूल्य रत्नों को प्राप्त कर सकना तो बन ही कैसे पड़ेगा?
ईश्वर को प्राप्त कर सकना मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी सफलता है। इससे बड़ी सम्पदा एवं उपलब्धि दूसरी हो ही नहीं सकती। विश्व की समस्त विभूतियों के अधिपति के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेने पर उसकी समस्त सत्ता से भी अपना संबंध बना जाता है। इसी स्थिति में जो पहुँच गया उसके लिए हर वस्तु करतलगत हो गई। उसे और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रह गया। इस स्थिति की गरिमा को देखते हुए तत्त्वदर्शी ईश्वरप्राप्ति का माहात्म्य वर्णन करते रहे है और विचारवान लोगों को उस उपलब्धि के लिए प्रयत्न करने की प्रेरणा देते रहे है। स्वाध्याय-सत्संग मनन-चिन्तन योग-तप आदि के समस्त साधन, उपचार ईश्वरप्राप्ति का लक्ष्य पूरा करने के लिए ही बनाये गये।
यह ईश्वर कहाँ मिले? कैसे मिले? इस प्रश्न का उत्तर बालबुद्धि के प्राथमिक विद्यार्थियों को पूजापरक बाह्योपचारों की ओर इशारा करके दिया जाता है। इन्हें तीर्थयात्रा, देव-दर्शन नदी-स्नान व्रत-उपवास दान-पुण्य कथा-कीर्तन विधान-कर्मकाण्ड आदि के साधन बताये जाते है। पर जिन्हें विवेकजन्य प्रौढ़ता प्राप्त हो गई, उन्हें दूसरी बात बतानी पड़ती है। उन्हें अन्तःभूमिका में प्रवेश करने, अन्तःकरण को टटोलने के लिए कहा जाता है। वस्तुतः ईश्वरीय सत्ता के साथ संपर्क बना सकना और उस संपर्क के साथ जुड़े हुए अनुदानों को प्राप्त कर सकना अन्तःकरण के इस सजीव तीर्थ में ही सम्भव होता है, जिसकी तुलना में बहिरंग जगत के समस्त साधन-अनुदान तुच्छ जान पड़ते है।
नारी प्रकृति की अनुपम कृति है। सृष्टि के विकासक्रम में उसका महत्वपूर्ण स्थान है। वह मानव-जीवन की जन्मदात्री है। उसे सौंदर्य, दया, ममता, भावना, संवेदना, करुणा, क्षमा, वात्सल्य, त्याग एवं समर्पण की सजीव प्रतिमूर्ति माना गया है। नारी के इन्हीं दैवी गुणों की वजह से वेदकाल से लेकर आधुनिक काल तक उसका महत्व अक्षुण्ण रहा है। मेघाच्छन्न मध्यकाल एवं आधुनिक उपभोक्तावादी समाज भी अपनी लाखों कोशिशों के बावजूद उसके वजूद को समाप्त नहीं कर सके। हर युग में नारी की प्रतिभा, विद्वत्ता व विशिष्टता से व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तथा विश्व तक उपकृत होते रहे है। उत्थान और निर्माण में नारी के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
वैदिक काल नारी इतिहास का स्वर्ण युग रहा है। उन दिनों नारी को आदर्श के रूप में देखा जाता था। विद्या का आदर्श सरस्वती में, धन का लक्ष्मी में, पराक्रम का दुर्गा में, सौंदर्य रति में एवं पवित्रता का गंगा में। सृष्टि की संचालिका शक्ति प्रकृति का भी नारी रूप में चित्रण किया गया। डॉ. राजकिशोर सिंह ने अपने ग्रन्थ प्राचीन भारतीय कला एवं संस्कृति में नारी की महत्ता को शब्दांकित करते हुए कहा है, “ममता की मंजूषा, स्नेह का सदन, दया का उद्गम, क्षमा की सुमेरु, विधाता की कलापूर्ण सृष्टि का श्रृंगार, पृथ्वी की कविता, देश-निर्माण की आधारशिला, उमा-रमा-सरस्वती के समान नारी का इस भारत-वसुंधरा में सदा-सर्वदा से आदरणीय स्थान रहा है।”
वैदिक काल या प्राचीन भारत में स्त्रियाँ ऊँची-से-ऊँची शिक्षा ग्रहण करती थी। इसीलिए उनके प्रति गरिमापूर्ण भाव रहा है। यजुर्वेद में नारी को सम्बोधित करके कहा गया है-हे नारी! तू स्तुति योग्य उत्तम वाणी युक्त, आदरणीय, पूजनीया, कमनीय, चन्द्र के समान आह्दकारिणी, श्रेष्ठ शील से प्रकाशमान अर्थात् ज्योति के समान अज्ञानान्धकार को अपने दिव्य गुणों के प्रकाश से दूर करने वाली है। तू दीनता एवं हीनता के भावों से रहित, परम्परा से पूर्ण, विविध गुणों से प्रसिद्ध अथवा विविध विद्याओं का जिसने श्रवण किया हुआ है तथा विविध विद्याओं में प्रवीण-यह तेरे नाम है। तू उत्तम गुणों के लिए मुझे उपदेश दिया कर। नारी का ऐसा दिव्यतम वर्णन उसकी विशिष्टता की झलक दिखने के लिए पर्याप्त है। यजुर्वेद में ही नारी को सोमपृष्ठा कहा गया है, जिसका अभिप्राय है, वेदमंत्रों के प्रति अभिरुचि रखना एवं इनके लिए जिज्ञासु होना। डॉ. उपेन्द्र ठाकुर ने अपनी रचना साहित्य और संस्कृति में इस तथ्य का सुरुचिपूर्ण विवेचन किया है। उनके अनुसार महर्षि अत्रि के परिवार की विश्ववारा मन्त्रदृष्टा के रूप में विख्यात थी, वहीं ऋषि कक्ष्ज्ञीवानप की पुत्री घोषा ऋग्वेद के दो मण्डलों तथा अगत्स्य ऋषि की पत्नी लोपामुद्रा दो ऋचाओं की प्रणेता मानी गयीं। जारा असंग की पत्नी रानी शाश्वती तथा ब्रह्मवादिनी अपाला उस युग की विख्यात दार्शनिक थी।
वैदिक काल में अनेकानेक विदुषी महिलाओं के प्रखर पाण्डित्य एवं अगाध प्रतिभा का परिचय मिलता है। उन्हीं दिनों सुलभा एक अत्यन्त विदुषी महिला थी। वक्तृत्व कला के क्षेत्र में वह पारंगत व प्रवीण थी। उसके अलावा भी श्रद्धा, सरमा, रोमषा, यमी, अदिति आदि नारी ऋषिकाएं थी, जिन्होंने वेदों के गूढ़ रहस्यों का साक्षात्कार किया था। आध्यात्मिक ज्ञान रखने के साथ ही धार्मिक, सामाजिक क्षेत्र में भी नारी का पुरुष के बराबर स्थान था। यज्ञ में उसकी सहभागिता अनिवार्य थी। डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के शब्दों में स्त्री और पुरुष दोनों नदी के दो तटों की भाँति संयुक्त है। दोनों के बीच में जीवन की धारा प्रवाहित होती है। वैदिक साहित्य में स्त्री और पुरुष की उपमा पृथ्वी और द्युलोक से दी गयी है। जैसे षुक्ति के दो दलों के मध्य मोती की स्थिति होती है, ऐसे ही स्त्री-पुरुष के मध्य संतति है, द्यावा-पृथ्वी पति-पत्नी के समान परस्पर पूरक है। प्रकृति ने नारी को सन्तानोत्पत्ति जैसे विशिष्ट गुण देकर सृष्टि के सभी जीवों में इसकी विशिष्टता का प्रतिपादन किया है।
प्राचीन भारत में स्त्रियों को सभी क्षेत्रों व दिशाओं में उन्नति एवं प्रगति करने का सुअवसर प्राप्त था। इसीलिए उस काल में नारी की प्रतिभा तथा ज्ञान अपूर्व और अद्भुत था। नारी के अन्दर जहाँ विचारशक्ति व आत्मबल था, वहाँ उसके व्यवहार में शालीनता, विनम्रता तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व भी विराजमान् था। तभी उन दिनों नारी अपने आत्मबल, चरित्र आदि दिव्य गुणों के द्वारा राष्ट्र के आदर्शों को ऊँचा उठाती रही। यह ही वह संजीवनी शक्ति थी, जो प्राचीन भारत में नूतन प्राण व जीवन का संचार करती रही। परिवार व समाज में नारी का स्थान पुरुषों के समान था। कन्यादान के समय माता की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती थी। स्त्री को गृहिणी, माता एवं सहचरी के रूप में घर का प्रबंधन व नियमन वही करती थी। पतिव्रता स्त्री को देवी के समान सम्मान दिया जाता था। स्त्री व पुरुष दोनों को ही इच्छानुसार विवाह की स्वतन्त्रता थी। ऋग्वेद में स्त्रियों को पति वरण करने की स्वतन्त्रता प्राप्त होने का वर्णन मिलता है। नववधू को सौभाग्य व मंगल का प्रतीक माना जाता था। उन दिनों विधवाओं द्वारा पुनर्विवाह किए जाने के प्रमाण भी मिलते है। इस तरह वैदिक काल नारी के उत्कर्ष एवं उत्थान का काल था।
उपनिषद् काल में भी नारियों का सम्मान एवं गौरव यथावत बना रहा। बृहदारण्यक उपनिषद् में गार्गी व मैत्रेयी की विद्वता का पर्याप्त दिग्दर्शन मिलता है। इस काल में भी शिक्षा के क्षेत्र में नारी का योगदान सराहनीय रहा। समाज के अन्य क्षेत्रों में भी वह अपनी श्रेष्ठता का परिचय देती रही। इस काल आठों प्रकार के विवाहों का प्रचलन हो चुका था। गृहस्थाश्रम में भी ब्रह्मचर्य का उल्लेख मिलता है। यज्ञों व धार्मिक कार्यों में पत्नी का स्थान पुरोहित के समान होता है।
रामायण काल में नारी को विविध रूपों में चित्रित किया गया है। इस काल की विशेषता अहिल्या, सीता, तारा एवं मन्दोदरी जैसी महान नारियों के कारण मानी जाती है। समाज में कन्या के जन्म को शुभ मानने का उन दिनों आम प्रचलन था। शुभ कार्यों में कुँआरी कन्याओं की उपस्थित अनिवार्य मानी जाती थी। कन्यादान का कार्य महापुण्य समझा जाता था। स्त्रियों को व्यावहारिक व नैतिक शिक्षा के साथ राज धर्म की भी शिक्षा दी जाती थी। स्त्रियाँ संगीत, नृत्य व अनेक कलाओं में प्रवीण व पारंगत होती थी। कौशल्या के मंत्रों सहित आहुति देने, सीता के संध्योपासना करने तथा तारा के मंत्रविद् होने के अनेकों प्रसंग रामायण में आए है। कैकेयी ने सैनिक शिक्षा प्राप्त कर युद्ध क्षेत्र में राजा दशरथ के प्राण बचाए थे। उन दिनों के अनेक प्रसंगों में नारी के शौर्य व पराक्रम का परिचय प्राप्त होता है।
रामायण काल में पर्दे से अधिक महत्व सदाचार को दिया जाता था। विपत्तियाँ में युद्ध, स्वयंवर, यज्ञ आदि अवसरों पर नारियाँ पुरुषों के समान कार्यों का संचालन करती थी। पतिव्रत धर्म सर्वोपरि एवं पवित्र माना जाता था। सीता व अनसूया ने इसे आजीवन निभाया था। विधवाओं को सम्माननीय भाव से देखा जाता था। रामायण काल की नारियों के विषय में शांताकुमार व्यास का कथन है कि उस काल में स्त्रियों की स्थिति सुखद थी। तत्कालीन परिस्थितियों में नारी को एक कन्या, पत्नी, माता और विधवा के रूप में समस्त सम्भव सुविधाएँ और अधिकार प्राप्त थे और इसके सहारे वह परिवार, समाज और राष्ट्र के साँस्कृतिक उत्थान में अमूल्य योगदान कर रही थी। आदिकवि बाल्मिकी के अनुसार नारीत्व की चरम परिणति मातृत्व के रूप में होती है। मनुष्य के चरित्र निर्माण की सूत्रधारिणी माता है, पिता नहीं।
महाभारत काल भी नारी की समृद्धि एवं प्रगति का घोतक है। महाकाव्य महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह के स्त्रियों के प्रति उच्च आदर का भाव प्रदर्शित करते हुए कहा है, स्त्री को सदैव पूज्य मानकर उससे स्नेह का व्यवहार करना आवश्यक है। जहाँ स्त्रियाँ का आदर-सत्कार होता है, वहाँ देवताओं का निवास होता है और उनकी अनुपस्थित में सभी कार्य निष्फल माने जाते है। महाभारत काल नारी को दिव्य गुणों से युक्त माना गया है। महाभारत के अनुसार पत्नी अपने पति का आधा अंग मानी गयी है। उसे संसार में सर्वश्रेष्ठ सखा अर्थात् मित्र स्वीकार किया गया है। वह त्रिवर्ग-धर्म अर्थ और काम का मूल घोषित की गयी है। दुःख से पार जाने के लिए सहारा एक मात्र पत्नी ही है। पत्नी के साथ ही पति की विशेषज्ञ रूप से शोभा और आनन्द है। प्रिय बोलने वाली पत्नियाँ जनशून्य स्थान में मित्र का काम देती है। वे ही धार्मिक कार्यों में पिता के समान परामर्श देने वाली और दुःखी व रोगी पुरुष की उसकी माता की तरह सेवा करने वाली होती है। जिस पुरुष की पत्नी विद्यमान है, ऐसे पुरुष का प्रायः सभी विश्वास करते है। अतएव पत्नी एक बहुत बड़ा सहारा है।
महाभारत काल में स्त्री एवं पुरुष को परस्पर पूरक तथा एक दूसरे के विकास में सहायक माना जाता था। कन्या की दशा सन्तोषजनक थी। लड़कियों के भी विविध संस्कार किए जाने का प्रचलन था। उन्होंने अनेक विषयों एवं क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा तथा ज्ञान की छाप छोड़ी थी। शकुन्तला, सावित्री, शिवा, विदुला, गौतमी, आचार्य, अरुन्धती, दमयंती आदि उस काल की विदुषी महिलाएँ थी। ये शास्त्र ज्ञान के साथ ही धर्म एवं राजनीति में भी निपुण थी। गंगा, सत्यवती, गान्धारी, कुन्ती आदि ने ऐसे ही शिक्षा प्राप्त की थी। द्रौपदी को दी गई पंडित, धर्मज्ञा, धर्मदर्शनी आदि संज्ञायें उसकी विद्वत्ता की ही प्रमाण है। वह स्वयं सारे राजकोष के आय-व्यय का हिसाब रखती थी। उत्तरा गीत-नृत्य व बाह्य में अत्यन्त निपुण थी। सत्यवती अपने पिता के कार्य में सहयोग देती थी। उसने समाज में अन्य कन्याओं के लिए एक आदर्श प्रस्तुत किया था। इतना ही नहीं उन दिनों विवाहित स्त्रियों को संन्यास लेने का अधिकार प्राप्त था।
महाभारत काल में स्त्री को पतिव्रता एवं शीलवती होने पर विशेष महत्व एवं सम्मान दिया जाता था। सावित्री, दमयंती, गान्धारी, द्रौपदी, सत्यभामा, सुभद्रा आदि उस काल की पतिव्रता स्त्रियाँ थी। नारी के शील को ही उसका आभूषण माना जाता था। पत्नी को पति के समान ही सभी अधिकार प्राप्त थे। इस काल में नारी को गृहलक्ष्मी मानकर उसे सुख व समृद्धि का प्रतीक कहा और माना जाता था। समाज में विधवा स्त्रियाँ का भी आदर किया जाता था, जैसे-सत्यवती कुन्ती, उत्तरा आदि को विशिष्ट दर्जा प्राप्त था।
महाभारत काल के बाद मौर्यकाल में नारी की विदुशा एवं प्रतिभा के अनेकों प्रमाण मिलते है। गुप्तकाल में भी अनेक विदुषी नारियों का उल्लेख किया है। वात्स्यायन ने अपने कामसूत्र में स्त्रियों के कुछ ऐसे कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है, जो परिवार के सम्मान तथा प्रतिष्ठा में वृद्धि करने के लिए आवश्यक समझे जाते है। उन दिनों शिक्षा की ओर पर्याप्त ध्यान दिया जाता था। अमरकोष में ऐसी अनेकों महिलाओं का वर्णन है, जो वेदमंत्रों की शिक्षा देती थी। शीला भट्टारिका नामक विदुषी स्त्री इसी काल में हुई। भोज ने अपने ग्रन्थ सरस्वती कण्ठाभरण में शीला भट्टारिका को पाँचाली रीति का सिद्धहस्त प्रयोक्ता माना है। मुद्रक के मूच्छकटिकम् नाटक में प्रख्यात महिला संगीतज्ञों का वर्णन किया गया है। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की पुत्री प्रभावती भी एक विदुषी महिला थी। इस काल में पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था। उन दिनों स्त्रियाँ सार्वजनिक समारोहों में भाग लेती थी। गुप्तकाल में आठ प्रकार की विवाह प्रणालियों का प्रचलन था, परन्तु ब्राह्मण, दैव, आर्य एवं प्राजापत्य विवाह ही श्रेष्ठ माने जाते थे। नारद एवं पाराशर स्मृतियों में स्त्रियों के पुनर्विवाह का भी समर्थन किया गया है।
राजपूत काल में स्त्रियों की स्थिति सुदृढ़ एवं सबल थी। अनेक अवसरों पर वे स्वयं अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर रणभूमि में लड़ने जाती थी। राजपूताने की मरुभूमि उस समय नारियों के शौर्य व तेज से आलोकित रहती थी। स्त्रियाँ शीलवती, चरित्रवान तथा पतिव्रता होती थी। ये इस्लाम आक्रमणकारियों से अपने पतिव्रत धर्म एवं सतीत्व की रक्षा के लिए जौहर व्रत का पालन करती थी। इस संबंध में प्रख्यात विद्वान डॉ. राधामुखर्जी ने अपने ग्रन्थ भारत की संस्कृति और कला में इस तरह लिखा अपमान पर विजय का प्रतीक भी है। राजपूत इतिहास में जौहर के विशिष्टतम उदाहरण ह। महमूद गजनबी द्वारा पराजित होने पर उदबन्ध के जयपाल, अलाउद्दीन खिलजी द्वारा पराजित होने पर रणथम्मोर के हमीरदेव, चित्तौड़ के राणा रतनसिंह की रानी पद्मिनी, मुहम्मद तुगलक द्वारा हारने पर कंपिल के राजा एवं रानी, क्रमशः शेरशाह और बाबर द्वारा पराजित होने के पश्चात् चंदेरी के भैय्या पूरनमल और मेदिनीराय, तैमूर के हत्याकांड के दौरान दिल्ली के सम्मान्य निवासियों तथा अकबर के आक्रमण व निर्दय हत्याकांड के दौरान चित्तौड़ के चारों ओर से घिरी हुई सेना के आत्मबलिदान के साथ महिलाओं के जौहर का मार्मिक वर्णन किया गया है। अलबेरूनी ने लिखा है, राजपूत काल में सभी स्त्रियाँ शिक्षित हुआ करती थी तथा सामाजिक जीवन में बढ़-चढ़ कर भाग लेती थी। कन्याएँ नृत्य-संगीत चित्रकला एवं अस्त्रविद्या में पारंगत थी। भास्कराचार्य की पुत्री लीलावती गणित में दक्ष थी। राजशेखर की पत्नी अवंती की श्रेष्ठ कवियित्री माना जाता था। इस काल में कश्मीर की रानी दिद्य तथा काकन्तीय रानी रुद्रम्ब आदि शाशिकाऐं थी। रानी दुर्गावती तो शौर्य एवं पराक्रम की प्रतीक थी। नारियों में आत्म- बलिदान का भाव सर्वोपरि रहता था। वे शौर्य, साहस एवं वीरता की प्रेरणा स्रोत थी।
अभी हाल में हुए स्वतंत्रता आन्दोलन में नारी का योगदान कम नहीं रहा। इसकी बलिदानी प्रथा का शुभारम्भ वीराँगना लक्ष्मीबाई ने किया। इस काल में महिलाओं ने अत्यन्त साहसिक कार्य किए। लार्ड हेस्टिंग्स के समय देवी चौधुरानी ने संन्यासी विद्रोह को नेतृत्व किया था। देशबन्धु सी.आर.दास की पत्नी वासन्ती देवी एवं बहिन उर्मिला देवी ने स्वातन्त्र्य यज्ञ में अपनी ओजस्वी आहुतियाँ दी है। उर्मिला दवे सत्याग्रह कमेटी की अध्यक्ष थी तथा गाँधी जी के साथ नोआखाली में उन्होंने अपना योगदान दिया था। लौह पुरुष सरदार पटेल की पुत्री मणिबेन पटेल तो त्याग की सजीव मूर्ति थी। लीलावती ने स्त्री शिक्षा सेवा संघ की स्थापना की तथा साहित्य संसद की स्थापना में अपना विशेष योगदान दिया। सुभद्रा कुमारी चौहान ने कविता के माध्यम से जाग्रति का शंखनाद किया। श्री अरविन्द की बहिन सरोजिनी देवी, बिस्मिल की बहिन शान्ति देवी, दुर्गा भाभी आदि अनेकों ऐसे नाम है, जिन्होंने स्वतन्त्रता के दीपक की अन्धड़ और आँधियों में जलाते रहने में अपने सर्वस्व को न्योछावर कर दिया।
इस तरह देखा जाए तो विशिष्टता और वरिष्ठता की दृष्टि से हर काल में नारी ने अपना उपभोक्तावादी युग में नारी का भले ही विकृत मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में आकलन किया जाए, परन्तु यह तिमिराछन्न स्थिति अधिक देर तक रहने वाली नहीं है। मेघों का आवरण हटेगा और नारी अभ्युदय रूपी सुनहले सूर्य की आभा फिर से आलोकित होगी
प्राचीन भारत के समान पीर का गौरवमयी एवं दिव्यत्व भाव पुनः निखरेगा। अब वह समय जल्द ही आएगा, जब इक्कीसवीं सदी के रूप में अपने ध्वज को सर्वोच्च ऊँचाई, पर फहरा सकेगी। यह सत्य ही है कि नारी को श्रद्धासिक्त सद्भावना के साथ सींचा जाए, तो यह सीमलता विश्व के कण-कण को स्वर्गीय परिस्थितियों से ओत−प्रोत कर सकती है। यह महाकाल की हुंकार ही है, जिसने नारी को पिछड़े क्षेत्र से हाथ पकड़कर आगे बढ़ाने के लिए धकेला और घसीटा है। अब न सिर्फ नारी के भाग्य में स्वतः की बेड़ियों से मुक्ति लिख दी गयी है, वरन् विधाता ने उसे मुक्तिदूत बनने का गरिमापूर्ण दायित्व भी सौंपा है।
एक बाग में दो वृक्ष थे। एक बिलकुल सुख गया था, दूसरे में सुन्दर फूल लग रहे थे। सूखे वृक्ष में एक गिद्ध रहता था, हरे वृक्ष में कोयल निवास करती थी।
दोनों में प्रायः विवाद हो जाया करता था। गिद्ध कहता संसार मिथ्या है, कोयल कहती संसार सत्य है। बहस में कभी-कभी गरमागरमी भी हो जाती थी।
एक दिन एक तोता उधर आ निकला। उसने दोनों का झगड़ा सुना तो हँसकर बोला-भाइयों-बहिनों व्यर्थ झगड़ा न करो। न संसार सर्वथा सत्य है और न बिलकुल मिथ्या। संसार परिवर्तनशील है, इसलिए झगड़ने की अपेक्षा जो प्रगट है, उसे ही सुन्दर और सफल बनाना बुद्धिमानी है। परिवर्तनों के अनुरूप जो अपने जीवन को ढालते है, वही इस संसार के सही अर्थ को जानते है।
महाभारत विजयोपरान्त धर्मराज युधिष्ठिर को शासन सँभालना था। किन्तु सैकड़ों प्रियजनों के मारे जाने से युधिष्ठिर का हृदय व्यथित था। वे बोले-सैकड़ों लोगों के मारे जाने से मिला यह सिंहासन मुझे नहीं चाहिए।
पर तुम इस नरसंहार के लिए दोषी नहीं हो। तुमने तो धर्मनीति अपनाई है, जो धर्मानुसार कार्य करता है, जीत उसकी होती है। अब राजधर्म का पालन करना चाहिए। लेकिन युधिष्ठिर का हृदय अशान्त ही रहा, तो श्री कृष्ण ने कहा-अभी तो पितामह भीष्म जीवित है। चलकर युधिष्ठिर, अर्जुन, द्रौपदी और भी सगे-संबंधी इकट्ठे होकर पितामह के पास गए। चरण स्पर्श कर युधिष्ठिर ने अपने मन की व्यथा सुनायी।
युधिष्ठिर! युद्ध में जो लोग मारे गए, तुम्हें उनके लिए दुःखी नहीं होना चाहिए। कौरव तो अधर्म के मार्ग पर जा रहे थे, उन्हें इसी तरह मरना था। हरेक मानव को अपने किए कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है। पितामह बोले-तुम्हारा मार्ग धर्म का था, तभी तो तुम जीते। अब तुम्हें धर्मानुसार राजगद्दी पर बैठकर प्रजा की भलाई, राज्य की उन्नति के कार्य करने चाहिए। यदि कोई अपने सामने हो रहे अधर्म और अन्याय का विरोध न करे, तो देखने वाले मनुष्य पर भी दोष लगता है। इस पर द्रौपदी को बहुत हँसी आयी, फिर उसके चेहरे पर उदासी छा गई।
द्रौपदी को इस तरह हँसने और अनमनी होने का कारण समझते हुए पितामह बोले, तुम्हारी वेदना मैं जानता हूँ, बेटी द्रौपदी! कौरवों के उस भरे दरबार में तुम्हारा चीरहरण होते समय मैं गूँगे की भाँति बैठा देखता रहा, अपमान सहता रहा। न मैंने दुर्योधन को रोका न दुशासन को टोका और न ही दरबार से उठकर गया। इसका कारण यह था कि तब इस प्रकार का ज्ञान मुझ में था ही नहीं। कौरवों के राज्य में उनका दूषित भोजन खाते रहने से मेरा ज्ञान नाश हो गया था। तभी तो मैं अन्यायी कौरवों की तरफ से लड़ा और इस दुःखदायी गति का भागी बना हूँ। यहाँ छप्पन दिनों से मैंने अन्न का दाना भी ग्रहण नहीं किया है। इस कारण मेरे शरीर में दूषित अन्न का कण भी न रहने से हृदय में ज्ञान का प्रकाश हो गया है।
इतना कहने के बाद पितामह वहाँ उपस्थितजनों को एक कथा उदाहरण के लिए सुनाने लगे-
श्राजा शिवि की सभा में एक संत रहते थे। वे बहुत त्यागी और धार्मिक वृत्ति के थे। वह राज षिविष् को भी त्याग और भलाई की प्रेरणा दिया करते। राजा शिवि के राज्य में एक ब्राह्मण रहता था। उसने अपनी पुत्री के विवाह में देने के लिए नगर के सुनार को गहने बनाने की खातिर शुद्ध सोना दिया। सुनार बेईमान था। ब्राह्मण से शुद्ध सोना लेकर उसने पीतल के गहने बनाए और उन पर सोने की पालिश कर ब्राह्मण ने वे गहने पुत्री को विवाह में पहना दिए। ससुराल में बहुत जल्दी पता लग गया कि गहने पीतल के है। इस धोखाधड़ी से क्रोधित होकर लड़की के पति ने उसे पीहर भेज दिया।
बेटी से आपबीती सुनकर ब्राह्मण के दुःख की सीमा न रही। सोचते लगा मेरी बेटी के इस दुःख का जिम्मेदार वह कपट सुनार है। उसने राजा शिवि से उस सुनार की शिकायत की। राजा ने सुनार को हेरा-फेरी के आरोप में दण्ड देकर कारागार में बन्द कर दिया और ब्राह्मण की पुत्री को खरे सोने के गहने बनवाकर दिलाए और फिर ससुराल पहुँचा दिया। थोड़े दिन बाद सुनार का जो बेईमानी से जोड़ा धन राजा ने जब्त किया था, उसी धन से खाद्य-सामग्री खरीदकर सेवकों ने पाकशाला में भोजन बनाना शुरू कर दिया। सन्त भी उसी भोजन को खाते थे। कुछ दिन उस भोजन को खाते के बाद सन्त जी के विचार बदलने लगे। साँसारिक सुख पाने की लालसा उनके मन में भड़क उठी। एक दिन चालाकी से उन्होंने रानी का हार चुरा लिया और चलते बने। उनके यों अचानक लापता होने से राजा चिन्ता में पड़ गए। फिर सोचा-हो सकता है वे तीर्थयात्रा पर गए हो। उधर सन्त जी बड़े संकट में पड़ गए, वे सोचने लगे कहाँ पकड़े गए तो? इसी भय के मारे कई दिन कई खण्डहर में भूखे-प्यासे पड़े रहे। जब भूख न सह सके तब घर-घर से भिक्षा माँगकर भूख मिटानी पड़ी। लोभ-मोह जाते रहे। हृदय पवित्र हो गया। अब उन्हें अपनी गलती पर पश्चाताप होने लगा। उन्होंने झोली उठाई और चल पड़े। उन्हें आते देख राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। किन्तु परमहंस दुःखित स्वर में बोले महाराज। रानी का हार में ले गया था चुराकर। मुझे दण्ड दीजिए, चोरी के अपराध मे।
यह सुनकर राजा षिविष् चकरा गए। उन्होंने कहा-महात्माजी आप स्पष्ट बताने की कृपा करें।
परमहंस ने बेईमानी से उपार्जित खाद्य-सामग्री के उपयोग की बात बताई और कहा जब मेरे शरीर में वह अन्न नहीं रहा, तो सच्ची बात कहने का साहस पैदा हो गया।
यह सुनाकर पितामह बोले- धोखाधड़ी से कमाए धन के अन्न का कुछ ही दिन भोजन करने से परमहंस जैसे सन्त की बुद्धि भ्रष्ट हो गयी। मैं तो अधर्मी दुर्योधन के अन्न पर ही जी रहा था। अतः तुम्हारे अपमान के समय धर्म-अधर्म न्याय-अन्याय का विवेक मुझ में नहीं था। अब दुर्योधन के दूषित अन्न का कण भी मेरे शरीर में नहीं है, तभी मैं ज्ञान दे सकने की स्थिति में हूँ। पितामह की बात सुनकर पाण्डवों और द्रौपदी ने बहुत आदर-भाव से उनके चरण स्पर्श किए और द्रौपदी ने अपनी हँसी के लिए हाथ जोड़कर मन से क्षमा माँगी।
भीषण प्राकृतिक प्रकोप से जन-जीवन तबाह। बाढ़ का ऐसा सर्वनाशी दृश्य पहले कभी नहीं देखा गया। ऐसे अगणित समाचारों की गूँज अपने देश के कोने-कोने से ही नहीं, विश्व के अन्यान्य भूभागों से भी सुनायी पड़ती रहती है। अजा समूची धरती ही प्राकृतिक आपदाओं एवं विपदाओं से त्रस्त है। प्रदूषित वातावरण, अनियंत्रित जलवायु, विषम मौसम के परिणामस्वरूप कहीं सूखा, अकाल पड़ रहा है, तो कहीं वर्षा, बाढ़-भूस्खलन की मार झेलनी पड़ रही है। इस प्राकृतिक तबाही एवं बर्बादी की व्याख्या इन दिनों वैज्ञानिकों अलनीनो के रूप में कर रहे है। उनके असर इससे समस्त भूमण्डल में मौसम की विषमता का खतरा उत्पन्न हो गया है। मौसमविद् एवं विज्ञानवेत्ता इससे बहुत आतंकित एवं आशंकित है। निकटतम भविष्य में यह और भी भयावह सिद्ध हो सकता है।
‘अलनीनो’ स्पेनिश शब्द है, जिसका अर्थ है-शिशु 25 दिसम्बर क्रिसमस दिवस के आस-पास इसका पता लगने से पेरुवियन मछुआरों ने इसका नामकरण अलनीनो किया। यह खतरनाक शिशु दुनिया समय चक्र के अनुसार तबाही का भीषण दृश्य उपस्थित करता रहा है। इस दौरान अलनीनो समुद्र में गर्मी पैदा करता है, जिससे पेरुवियन सागर का तापमान 3.5 डिग्री सेंटीग्रेट तक बढ़ जाता है। अलनीनों के गमग् जल अवस्था के विपरीत लानिनो के ठण्डे जल वाली अवस्था के रूप में जाना जाता है। इस लानिनो को लाविजों यानि कि बूढ़ा आदमी भी कहते है। ये अलनीनो एवं लानिनो सामान्य ऋतु चक्र परिवर्तन के विपरीत अपना तबाही चक्र फैलाते रहते है। अलनीनो के जन्म के बारे में वैज्ञानिकों में मतान्तर है। इसका गहन अनुसंधान करने वाले कोलम्बिया विश्वविद्यालय के समुद्र विज्ञानी रिचर्ड फेयर बँक्स ने स्पष्ट किया है कि यह मात्र एक दशक पुराना शिशु नहीं है, बल्कि हजारों वर्षों से अवतरित है। फेयर बैक्स ने अलनीनो का गहन अध्ययन एवं प्रयोग करने के लिए किरिब्राटी गणतन्त्र के क्रिसमस द्वीप में महीनों गुजारे। इसी स्थान को अलनीनो का केन्द्र माना जाता है। इन्होंने वहाँ पर मूंगों द्वारा इसकी प्राचीनता का पता लगाया। मूँगा एक अच्छा तापमापक और वर्षामापक यंत्र है। जब पानी के तापमान में बढ़ोत्तरी होती है, तो मूँगे स्ट्राँशियम को अपने कंकाल में समाहित कर लेते है। इसे देखकर हजारों साल के तापमान के उतार-चढ़ाव को रिकार्ड किया जा सकता है। वर्षा के दौरान आक्सीजन की अधिकता से ये लवण की मात्रा इकट्ठा करते है। इन मूँगों के माध्यम से फेयर बैक्स ने अपना शोध-निष्कर्ष निकाला कि अलनीनो बहुत प्राचीन समय से इस प्रकृति में है। भले ही उसका स्वरूप इतना भयावह न रहा हो।
उसी खोज में अमेरिका के वण्डर-विल्ड विश्वविद्यालय के भू-आकृति-विज्ञानी जे. वोलर ने पंरु के उत्तरी रेगिस्तान की प्राचीन परतों का अध्ययन किया। अलनीनो काल के अलावा यह स्थान शेष समय में पृथ्वी का सर्वाधिक शुष्क क्षेत्र माना जाता है। अलनीनो के समय तूफानों के पश्चात् होने वाली भारी वर्षा के कारण यहाँ की मिट्टी सघन होकर लाल पर्त में परिवर्तित हो जाती है। इन परतों के आधार पर वोलर का कहना है कि अलनीनो चक्र बीस लाख वर्ष पुराना हो सकता है। ‘यूनिवर्सिटी ऑफ अरकान्सास ट्रीरिग लैब’ के डेविड स्टाहले का मत इससे भिन्न है। इन्होंने जावा के सागौन एवं मैक्सिको के देवदार तथा उत्तर-पश्चिम के कुछ अन्य वृक्षों के आँकड़ों को प्रस्तुत किया है। ये सभी वृक्ष 1703 के आस-पास के है। इन वृक्षों की रिंग वर्षा की तीव्रता के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है। स्टाहले का कहना है कि 1880 के बाद मौसम चक्र में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। 1880 के बाद ये रिंग अलनीनो से काफी प्रभावित हुई। इनमें परिवर्तन 7.5 वर्ष के बजाय 4.2 वर्ष में दर्ज होने लगे। लानिनो के विशिष्ट नमूने 4.2 वर्षों में अपना चक्र पूरा करते है। अतः अलनीनो का जन्म 1880 के लगभग माना गया।
ओहियो स्टेट विश्वविद्यालय के पुराभूतेत्ता लोनी थाम्पसन ने बर्फ का अध्ययन करके मौसम के इतिहास एवं भविष्य की जानकारी करने का प्रयास किया है। ये अपने शोध दल को लेकर पेरु के एण्डीज नामक स्थान पर पहुँचे। उन्होंने वहाँ क्वेलक्काया बर्फ की टोपी में छेद करके अलनीनो वं लानिनो के अल्पकालिक किन्तु विशिष्ट उतार-चढ़ावों को दर्ज किया। इनका भी यही निष्कर्ष रहा है कि अलनीनो काफी पुराना है। प्रिंसटन विश्वविद्यालय के समुद्र-विज्ञानी जार्ज फिलण्डर के मतानुसार अलनीनो मात्र उष्ण कटिबंधीय तथा 1700 किलोमीटर भूमध्य सागरीय समस्या ही नहीं है। वह समस्त संसार के लिए घातक एवं खतरनाक हो सकता है। यह पृथ्वी के दोनों उत्तरी एवं दक्षिणी गोलार्धों को प्रभावित कर सकता है।
18 अगस्त, 1997 की टाइम पत्रिका में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार सामान्य क्रम में अलनीनो दो से सात साल के चक्र में आता है। परन्तु 1990 से प्रत्येक साल इसकी उपस्थित देखी जा रही है। हालाँकि अभी तक इसकी स्पष्ट जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी है। वैज्ञानिक इसके भीषणतम रहस्य के बारे में मौन, आशंकित एवं आतंकित है। क्योंकि उनकी कोई भी भविष्यवाणी कारगर नहीं हो पाती है। अलनीनो क्या ग्लोबल तापमान बढ़ा देने का संकेत दे रहा है अथवा यह प्रकृति के मौसम को बदल देने का उपक्रम है? इस विषय में माइकल ग्लैन्प्ज की चेतावनी है कि अलनीनो के रूप में प्रकृति अपना रौद्र धारण कर चुकी है। अब तक का सबसे बड़ा अलनीनो 1982-83 में आया था। इसमें 2000 व्यक्ति मारे गए तथा 13 अरब डॉलर की सम्पत्ति नष्ट हो गयी थी। संभावना है कि 1999 में पृथ्वी को अब तक के सबसे बड़े?अलनीनो का सामना करना पड़ेगा। वैज्ञानिकों ने समुद्री सतह का तापमान, हवा का दब, गति एवं दिशा तथा समुद्री-जल धाराओं का सूक्ष्म विश्लेषण करने के पश्चात् यह आशंका व्यक्त की है।
मौसम, गर्मी, बरसात, हवा की दिशा और सूर्य के ताप पर निर्भर करता है। संसार के समस्त भागों में उष्णता एकरूप नहीं रहती। अपने देश के केरल, तमिलनाडु आदि दक्षिण प्रदेशों में औसतन तापमान समान रहता है, तो उत्तर भारत में सर्दी-गर्मी का स्पष्ट विभाजन अनुभव किया जा सकता है। हवा को ताप मिलने पर यह हल्की होकर ऊपर उठती है ओर फिर जहाँ से चली थी वहाँ से दूर वापस नीचे बैठ जाती है। इसके बीच में कम तापमान वाला क्षेत्र बन जाता है। इसी बीच गर्म क्षेत्र से हवा के इस स्थानान्तरण की भरपाई करने हेतु उत्तर क्षेत्र से ठण्डी हवा गर्मी वाले क्षेत्र की ओर प्रवाहित होती है। इसी प्रक्रिया में हवा पवन में परिवर्तित होकर गर्मी को ढोने का काम करती है।
अलनीनो दक्षिण प्रशान्त में समुद्री धाराओं और हवाओं के पथ में भारी व्यतिक्रम ला खड़ा कर देता है। अलनीनो के प्रभाव से दक्षिण अमेरिका के पश्चिम तट के किनारे ठण्डा पानी नहीं बहता। इसके स्थान पर गर्म पानी दक्षिण की ओर स्ित पूर्वी एवं मध्य पैसिफिक समुद्र की ओर प्रवाहित होने लगता है। इससे दक्षिण अमेरिका का यह क्षेत्र असामान्य रूप से गर्म हो उठता है। परिणामस्वरूप बारिश के लिए उपयुक्त हवाएँ इण्डोनेशिया और आस्ट्रेलिया में पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुँच पातीं और ये क्षेत्र सामान्य मानसूनी वर्षा से वंचित हो जाते है। फलतः आस्ट्रेलिया, इण्डोनेशिया, उत्तर पूर्वी ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका में सूखा पड़ता है।
दूसरी ओर दक्षिण अमेरिका के तट पर ऊँचे तापमान के कारण सूखे रेगिस्तानों को भयंकर वर्षा से सराबोर होना पड़ता है। अन्य क्षेत्र जैसे कैलीफोर्निया से क्यूबा तक बारिश की तबाही से घिर जाते है। दक्षिण अटलांटिक में अलनीनो की वजह से हवा के मार्गों में आने वाले बदलाव ने दक्षिण अमेरिका के पूर्वी तट के किनारों के रेत के टीलों की दिशा में परिवर्तन कर दिया है। इसी अलनीनो के प्रभाव से इण्डोनेशिया के जंगलों में लगी आग ने सैकड़ों की जाने ले ली और हजारों-लाखों व्यक्तियों को साँस के रोग से पीड़ित होना पड़ा। आग की धुँध ने एक अरब डॉलर का नुकसान किया। इस्नि जाया प्रान्त में पमरी तरह फसल नष्ट हो गयी। कैलिमिण्टन में साठ हजार से ज्यादा लोग भुखमरी के शिकार हो गए।
मौसम विज्ञानियों के अध्ययन के अनुसार वर्ष 1999 अलनीनो का वर्ष होगा। समूचा एशिया इसके प्रभाव से प्रभावित हो सकता है। इण्डोनेशिया में भयंकर बारिश होगी, इससे प्रबल बाढ़ आएगी। मिट्टी का कटाव होगा। जहरीली राख बहकर नदियों, झीलों तथा प्रवाल भित्तियों पर जम जाएगी, जिससे मछलियों का भण्डार समाप्त हो जाएगा। इण्डोनेशिया के पर्यावरण एवं प्राकृतिक संसाधन सचिव विक्टर रामोस का कहना है कि यहाँ अलनीनो की तुलना में लालीनो से गम्भीर खतरा हो सकता है। अलनिनो का यह प्रभाव पेरु एवं इण्डोनेशिया तक ही सीमित नहीं रहेगा। यहाँ की भारी वर्षा से चीन ओर ताईवान के समुद्री किनारे बर्बाद हो गए है। इन दोनों देशों में पिछली गर्मियों की तुलना में इस दशक के सर्वाधिक प्रचण्ड तूफान उठ रहे है।
नासा के समुद्र विज्ञानी एन्थनी वुसालाषी के अनुसार अलनीनो की वजह से दक्षिण में चिली तथा उत्तर में अलास्का भारी मात्रा में प्रभावित हुए है। गर्मी की वजह से ठण्ड के मौसम में भी सेनडियागो गर्मी से त्रस्त हो उठा है। यही नहीं, इससे उत्तरी पूर्वी ब्राजील को चावल, मक्का की फसलों को भारी हानि पहुँची है। वायुमण्डलीय विशेषज्ञ एडवार्ड साराविक ने स्पष्ट किया है कि इससे न केवल किसान और मछुआरे प्रभावित होते है, बल्कि व्यापारियों तथा जल संसाधनों को भी भारी क्षति उठानी पड़ सकती है।
भारतीय तथा विश्व के अनेक मौसम विज्ञानियों ने अपने यहाँ होने वाले मौसम के व्यतिक्रमों एवं प्राकृतिक प्रकोपों के लिए इसे ही जिम्मेदार माना है। उत्तरप्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र की भीषण बाढ़, बिहार एवं आसाम का जल प्रकोप, एवं उत्तरी क्षेत्र में नए भूस्खलन वैज्ञानिकों की दृष्टि में इसी अलनीनो की देन है। हालाँकि इस विषय में मतान्तर है। फिर भी भारतीय क्षेत्र में प्राकृतिक प्रकोपों के पीछे इसी के प्रभाव को आँका जा रहा है। सर्दियों में अलनीनो का होना आगामी ग्रीष्मकालीन मानसून के कमजोर व दुर्बल होने का संकेत है। ऐसा सन् 1972 में पाया गया था। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार 1975 से 1982 के बीच भारत में 43 बार कमजोर मानसून आया है। इन 43 विफल मानसून में से 19 अलनीनो वर्ष के दौरान रहे। अतः मानसून की असफलता के पीछे अलनीनो कारक को जिम्मेदार समझा जा रहा है।
प्राकृतिक आपदाओं एवं विपदाओं के कारणों का चाहे जो भी नाम दिया जाए, इस विभीषिका का दंश सारे मानव समाज को झेलना पड़ रहा है। प्रकृति के अपार दोहन और शोषण के कारण ही आज यह स्थिति है। प्रकृति माता के चीरहरण को यदि समय रहते रोका नहीं गया, तो अलनीनो जैसे कई और प्राकृतिक संकट खड़े हो जाएँगे, जिससे मानव समाज को भयावह संकटों का सामान करना पड़ सकता है।
साधना विज्ञान में चक्रों के रूप में जिन शक्ति केन्द्रों की चर्चा है, वह वास्तव में और कुछ नहीं, विभिन्न चेतनात्मक स्तर है। उन भूमिकाओं में पहुँचकर साधक चेतना के भिन्न-भिन्न आयामों की अनुभूति करता हुआ उस सर्वोच्च शिखर पर पहुँचता है, जिसे सहस्रार कहते है। पिछले दिनों तक विज्ञानवेत्ता इन्हें कपोलकल्पित भर मानते थे, पर तंत्रिका शास्त्र के गहन अध्ययन के उपरान्त इनकी संगति मस्तिष्क और मेरुरज्जु के विभिन्न केन्द्रों से बिठाने में वे सफल हो गए है। देखना यह है कि विज्ञान-अध्यात्म का यह समागम सर्वसाधारण के लिए कितना उपयोगी साबित होता है?
मनुष्य जीवन विकास-यात्रा का एक पड़ाव है। इस पड़ाव का संबंध हमारे सूक्ष्म-संस्थानों एवं चक्रों से है अर्थात् आज हम जिस स्तर पर अवस्थान कर रहे है, वह यथार्थ में इन्हीं शक्ति केन्द्रों की सक्रियता का परिणाम है। दूसरे शब्दों में इसे इस प्रकार भी कह सकते है कि व्यक्ति व्यक्ति के दृष्टिकोण और सोचते के तरीके में जो भिन्नता दिखलाई पड़ती है, वह पृथक्-पृथक् चेतना केन्द्रों की सक्रियता और निष्क्रियता प्रदर्शित करती है। उदाहरण के लिए संसार के प्रति आदमी के दृष्टिकोण को लिया जा सकता है। स्वाधिष्ठान चक्र में अवस्थिति होने पर मनुष्य दुनिया को इच्छापूर्ति के माध्यम के रूप में देखता है, मणिपूरित के रूप में तथा अनाहत में प्रतिष्ठित होने पर जीवन का उद्देश्य मात्र लोकमंगल होता है।
अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि एक ही चक्र अवस्थान करने के बावजूद दो व्यक्तियों के स्तर और स्थिति में भिन्नता हो सकती है। यह संभव है कि हमारी चेतनात्मक अभिव्यक्ति में मणिपूरित ही सर्वांश में झलकता-झाँकता हो, इतने पर भी ऐसे प्रत्येक व्यक्ति की सक्रियता, सजगता एवं विकास में अन्तर दिखलाई पड़ सकता है। इसका कारण एक ही है-व्यक्ति-व्यक्ति के चक्र-जागरण का भिन्न-भिन्न स्तर। इसे उसके व्यक्तित्व एवं कर्तव्य से जाना समझा जा सकता है। यदि वह व्यक्तिगत स्वार्थों और निषेधात्मक गतिविधियाँ में ही उलझा रहता है, तो यह कहा जा सकता है कि उसकी अवस्थिति जागरण प्रक्रिया के एकदम निचले सोपान में है। वहीं उसकी रचनात्मक एवं लोकमंगल संबंधी प्रवृत्तियाँ इस बात की सूचक है कि वह चक्र जागरण की उच्च भूमिका में आसीन है। साधना विज्ञान के आचार्यों का तम है कि बालकों की तुलना में वयस्कों में मणिपूरित चक्र प्रायः अधिक विकसित होता है, फिर भी सभी लोगों में ऐसा होना आवश्यक नहीं।
चक्र-जागरण जहाँ व्यक्ति को अलौकिक अनुभूतियाँ और गुप्त शक्तियों से भर देता है वहाँ भौतिक स्तर पर उसमें अनेक ऐसी क्षमताएँ विकसित हुई दृष्टिगोचर होती है, जिन्हें साधना शास्त्र के मर्मज्ञों के अनुसार, मूलाधार चक्र के उन्नयन से वक्तृत्व कला, आरोग्यता, काव्य और लेखन शक्ति जैसे गुणों का विकास होता है, स्वाधिष्ठान से निरहंकारिता, मोहनिवृत्ति, रचना शक्ति, मणिपूरित से वाक्–सिद्धि, अनाहत से इन्द्रियजय, विशुद्धि से दीर्घजीवन, तेजस्विता, सर्वहितपरायणता, आज्ञा से विवेक एवं सहकार से भक्ति तथा अमरता।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि हर चक्र का संबंध शरीर के विशिष्ट अंगों से होता है, इसीलिए वे अंग अथवा इन्द्रियाँ उन चक्रों की इन्द्रियाँ कहलाती है। यों तो चक्र अपनी सूक्ष्म शक्ति को समस्त शरीर में प्रवाहित करते है, पर एक ज्ञानेन्द्रिय और एक कर्मेन्द्रिय से उनका संबंध विशेष रूप से होता है। संबंधित इन्द्रियों को वे अधिक प्रभावित करते है। चक्रों के जागरण के चिन्ह उन इन्द्रियों पर तुरन्त परिलक्षित होते है।
शरीर विज्ञान के गहन अध्ययन के उपरान्त वैज्ञानिकों ने योगशास्त्रों में वर्णित विभिन्न शक्ति केन्द्रों अथवा चक्रों संबंधी गुत्थी को सुलझाने में काफी हद तक सफलता अर्जित की है। उनका कहना है कि चक्रों की शरीर शास्त्र की दृष्टि से व्याख्या-विवेचना की जाए, जो उन्हें मेरुरज्जु में स्थित विभिन्न प्रकार के नाड़ी गुच्छक कहने पड़ेंगे। इन गुच्छकों का संबंध कई प्रकार की अंतःस्रावी ग्रन्थियों से होता है। इसके अतिरिक्त मस्तिष्क में इनके पृथक्-पृथक् केन्द्र भी होते है। वे कहते है कि यदि इन केन्द्रों को जगाया जा सके, तो चक्रों को प्रभावित किया जा सकना संभव है अर्थात् वे इसे उभयपक्षीय प्रक्रिया मानते और कहते है कि चक्रों के जागरण द्वारा मस्तिष्क के संबंधित भागों को प्रभावित कर चक्रों को उद्दीप्त करना एक ही बात है॥
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेण्टल हेल्थ अमेरिका के न्यूरोफिजियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. पॉलमैकलीन अपनी रचना ‘ए ट्रइयून कन्सेप्ट ऑफ दि ब्रेन ‘ में लिखते है कि मस्तिष्क के तीन ्रसतर वास्तव में मनुष्य में पाये जाने वाले सात्विक, राजसिक, तामसिक जैसे तीन गुणों, तीन प्रवृत्तियों के प्रतीक-प्रतिनिधि है। इन्हीं तीन स्तरों में सभी चक्रों के गुण एवं विशेषताएँ सम्मिलित है। आश्चर्य की बात यह है कि मस्तिष्क की इन तीन परतों में मुख्य तंत्रिका रसायनों ‘डोपोमाइन’ तथा ‘सेरोटोनिन’ की मात्रा भी अलग-अलग होती है। यदि इन स्तरों का सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाए, तो यह संभव है कि योगियों द्वारा वर्णित अनुभवों और अनुसंधानों द्वारा उपलब्ध निष्कर्षों में बहुत बड़ी समानता दिखाई पड़े।
त्रिगुणात्मक मस्तिष्क के उक्त तीन स्तरों को क्रमशः रेप्टिलियन ब्रेन, मैमेलियन ब्रेन तथा नियोकँर्टिक्स कहा गया है। रेप्टिलियन ब्रेन में मेरुरज्जु सहित मस्तिष्क का निचला हिस्सा आता है। इसके अंतर्गत आत्मरक्षा, प्रजनन, हृदय नियंत्रण, रक्त-संचरण एवं श्वसन से संबंधित तंत्रिका संस्थान आते है। इस मस्तिष्कीय परत से आक्रामकता, सनक, उन्माद जैसी पाशविक प्रवृत्तियों व सामाजिक व्यवहार तथा परम्पराओं के प्रति आसक्ति जैसी वृत्तियों का नियंत्रण होता है। मैकलीन कहते हैं कि यह योगियों द्वारा वर्णित मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान चक्रों के विवरण से बहुत कुछ मिलता-जुलता है, कारण कि इस क्षेत्र के निष्णातों के अनुसार इन केन्द्रों द्वारा हमारी प्रमुख एवं मूलभूत पशु-प्रवृत्तियों यथा-आहार निद्रा एवं प्रजनन आदि का संचालन होता है तथा प्रेम, आनन्द, उत्साह एवं आत्म-सजगता जैसे मानवी गुणों का अभाव होता है। उपर्युक्त निम्न प्रवृत्तियों का संबंध हमारे चेतन एवं अचेतन मन से है।
अपने अध्ययन एवं अनुसंधान से मैकलीन एवं उनके सहकर्मी इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि अधिकाँश व्यक्ति आत्मोन्नति के दो बिलकुल आरंभिक सीढ़ियों-मूलाधार तथा स्वाधिष्ठान पर अवस्थान करते है। ऐसे व्यक्तियों के क्रिया–कलापों का स्तर यद्यपि उच्च केन्द्रों द्वारा परिवर्तित हो जाता है, फिर भी हमारा जीवन अधिकतर इन्हीं निम्न चक्रों द्वारा नियंत्रित एवं प्रभावित होता है और हम संकुचित सीमाओं में बँधे रहकर अपनी दिनचर्या किसी प्रकार पूरी करते रहते है।
उपर्युक्त तथ्य को सिद्ध करने के लिए मैककलन ने ‘हैम्सटर’ नामक जीव के नवजात शावक के प्रमस्तिष्क बाह्यक को मस्तिष्क से अलग कर दिया। शेष बच्चे भाग में मात्र आर. काँम्प्लेक्स तथा लिम्बिक सिस्टम रह गए। देखा गया कि इसके बावजूद भी हैम्सटर के बढ़ने की प्रक्रिया साधारण ही बन रही तथा उसमें किसी प्रकार की कोई रुकावट नहीं आई। प्रजनन कार्य यथावत चलता रहा तथा उसके दूसरे क्रिया−कलाप भी सामान्य ढंग से चलते रहे। आश्चर्य तो यह कि वह दृष्टि संबंधी केन्द्र काँटेक्स के बिना भी देख सकता था। पक्षियों पर भी वह प्रयोग दुहराया गया। उसके मस्तिष्क के आर. काँम्लेक्स को छोड़कर शेष सभी हिस्सों को नष्ट कर दिया गया। इतने पर भी उनकी दैनिक गतिविधियों में कोई विशेष अन्तर परिलक्षित नहीं हुआ। यह इस बात का प्रमाण है कि हमारे अधिकाँश क्रिया−कलाप मस्तिष्क के इन्हीं हिस्सों द्वारा संचालित और नियंत्रित है तथा मर्यादित जीवन पद्धति हेतु मस्तिष्क के अन्य हिस्सों का प्रयोग नाममात्र ही होता है। साधना विज्ञान की मान्यता भी ऐसी ही हैं योगीजन विज्ञान के इस निष्कर्ष से सहमत है कि शरीरस्थं उच्च केन्द्रों को बिरले ही सक्रिय कर पाते है और यदि वे सक्रिय हो भी गए, तो उन्हें सँभाल पाना उनके लिए संभव नहीं होता। यही कारण है कि योगी लोग साधना-तपश्चर्या द्वारा शरीर को पहले अनुकूल बनाने की सलाह देते है, ताकि उससे उत्पन्न ऊर्जा को ग्रहण-धारण किया जा सके।
योगी और विज्ञानी दोनों ही इस बात पर एकमत है कि साधारण मनुष्यों का अधिकाँश समय जीवन-निर्वाह ही व्यतीत होता है। बहुत थोड़े-से लोग ही यह समझ पाते है कि जीवन में करने और पाने के लिए और भी बहुत कुछ है। इसका कारण दोनों यही बताते है कि वे उन केन्द्रों से ऊँचा नहीं उठ पाते, जो जीवन की एकदम सामान्य गतिविधियों के लिए जिम्मेदार होते है।
मानवी मस्तिष्क के स्तनपायी भाग (मैमेलियन बे्रन) का नियंत्रण लिम्बिक संस्थान के जिम्मे होता है। यहाँ से भावना, स्मरणशक्ति, विनोदप्रियता, आनन्द, आश्चर्य, कल्पना, प्रेम जैसे तत्वों का नियंत्रण होता है। मैकलीन के अनुसार मस्तिष्क का यह भाग यदि क्षतिग्रस्त हो जाए, तो इससे मातृ सुलभ व्यवहार में कमी एवं खेल आदि में अरुचि हो जाती है।
यतियों के अनुचर क्रोध, भय, चिन्ता, क्षुधा, इच्छा, दया, करुणा, उत्फुल्लता, अपराध जैसे गुण मणिपूरित तथा अनाहत चक्रों की विशेषताएँ है। तंत्रिका शास्त्री इनका संबंध लिम्बिक संस्थान से जोड़ते है। इससे स्पष्ट है इन चक्रों का प्रतिनिधित्व मस्तिष्क का उक्त केन्द्र करता है। यदि इन विशिष्टताओं के मेरुरज्जु केन्द्र अथवा मस्तिष्कीय केन्द्र को उत्तेजित किया जा सके, तो उससे संबंधित विभिन्न शारीरिक, मानसिक एवं व्यावहारिक स्तर प्रभावित,मानसिक एवं व्यावहारिक स्तर प्रभावित होंगे। इससे भी चक्रों की वास्तविकता सिद्ध होती है।
मस्तिष्क का तीसरा और अन्तिम पक्ष नियोकँटेक्स है। यह सर्वाधिक विकसित भाग है। इसका संबंध मानवी बौद्धिकता तथा ज्ञान से है। उसके कार्यों के बोरी में विज्ञानवेत्ताओं का कहना है कि विचार, ्रणित, विश्लेषण, विवेक, सहज ज्ञान, रचनात्मकता, योजना, अनुमान, कला, वैज्ञानिक शोध एवं इसी प्रकार के दूसरे उच्च तथा विकसित मानवीय क्षमताओं के उपयोग का संबंध इसी मस्तिष्कीय खण्ड से है।
शोध-अध्ययनों से यह ज्ञात हुआ है कि मस्तिष्क के सामने का हिस्सा यदि क्षतिग्रस्त हो जाए, तो व्यक्ति भविष्य को योजनाएँ बनाने में अक्षम हो जाता है तथा उसमें स्वयं के प्रति सजगता भी बनी नहीं रह पाती। वे किसी कार्य अथवा क्रिया के परिणाम को नहीं सोच पाते। ऐसे व्यक्ति जड़ बुद्धि प्रकृति के लापरवाह होते है। उनमें कल्पना-शक्ति क्षीण हो जाती है तथा जीवन के प्रति नीरस-निरानन्द बन जाते है।
डेविडलोये ने अपने शोध पूर्ण निबन्ध ‘फोरसाइट सागा’ (ओमनी, सितम्बर, 1982) मके लिखते हैं कि मस्तिष्क का सामने वाला हिस्सा न सिर्फ पूर्वानुमान से संबंधित है, वरन् उसमें दूरदृष्टि की भी क्षमता मौजूद है। एक उदाहरण देकर इसे और स्पष्ट करते हुए वे कहते है कि मान लिया जाए कि सामने से कोई छतगति से गाड़ी आ रही है। ऐसी स्थिति में मस्तिष्क का सामने का हिस्सा दायें-बायें दोनों गोलार्धों को सावधान करती है वे उनसे उस विषय पर उपलब्ध समस्त जानकारी, सहमति अथवा असहमति की माँग करता है। इसके बाद ही व्यक्ति कोई अनुमान, निर्णय या निष्कर्ष निकाल सकता है। अपने अध्ययन में उनने एक विशेष बात यह देखी कि वैसे व्यक्ति, जिनके दोनों गोलार्धों सक्रिय थे, एक गोलार्द्ध प्रधान व्यक्तियों की तुलना में भविष्य संबंधी घटनाओं का अनुमान लगा सकने में अधिक सक्षम पाया गया। इस निष्कर्ष से साधना विज्ञजन के इस कथन की पुष्टि होती है कि उच्च आदर्शवादी जीवन, उत्कृष्ट क्रिया−कलाप एवं आन्तरिक क्षमताओं के विकास के लिए मानवीय प्रवृत्ति के दोनों पक्षों के मध्य संतुलन आवश्यक है।
योगियों ने विवेक, ज्ञान, अनुभूति, रचनात्मकता एवं अभिव्यक्ति संबंधी सम्पूर्ण गतिविधियों का केन्द्र आज्ञा एवं विशुद्धि चक्र का माना है। हम जानते है कि साधना-उपचारों का उद्देश्य मस्तिष्क के दोनों गोंलार्थ के बीच स्थित करना है। साधना-विज्ञान के जानकारों अनुसार आज्ञाचक्र ही सभी चक्रों का संचालक और नियन्ता है। इसी कारण से इसे ‘गुरुचक्र’ के नाम से भी साधना ग्रन्थों में यंत्र-तंत्र अभिहित किया गया है। शरीरविज्ञान के अनुसार लिम्बिक सिस्टम के ऊर्ध्व में पीनियल ग्रन्थि के ठीक सामने थैलमस स्थित है। मस्तिष्क के प्रमुख नियंत्रण केन्द्रों में से थैलमस एक है। यह हमारी इन्द्रियों एवं मोटर क्रियाशीलता इड़ा-पिंगला ललाट में स्थित दोनों इड़ा-पिंगला शामिल है, को नियंत्रित करता है। भावनाओं की अभिव्यक्ति तथा संगठन के लिए उत्तरदायी एवं अन्तःस्थानी ग्रन्थियों का नियंत्रणकर्ता हाइपोथैलमस एवं गति नियंत्रण में सहयोगी सेरीबेलम का भी लियमन थैलमस द्वारा होता है अर्थात् पीनियल ग्रन्थि द्वारा इन्द्रियों, विचारों, भावनाओं एवं क्रियाशीलता में समन्वय स्थापित होता है। कर्मेन्द्रियों के संपर्क में आने वाली वस्तुओं के तापमान, आकार-प्रकार इत्यादि निर्धारित करने एवं पीड़ा की अनुभूति में भी पीनियल ग्रन्थि का महत्वपूर्ण स्थान है। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि गतिविधियों, विशेषतया माँसपेशियों एवं जोड़ो के संकुचन-प्रसारण के नियंत्रण में भी इसका उल्लेखनीय योगदान है।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि पीनियल या थैलमिक हिस्सा ही आज्ञाचक्र के विवरण के अनुरूप है। यह वह स्थान है, जहाँ इड़ा की दोनों वृत्तियाँ-ज्ञानेन्द्रियाँ एवं भावनाएँ तथा पिंगला की दोनों वृत्तियाँ कर्मेन्द्रियों एवं बुद्धि दी जाने वाली ‘योग’ की परिभाषाओं एक-इड़ा और पिंगला का आज्ञाचक्र में मिलन है, जिसके फलस्वरूप स्नायुमण्डल में एक विस्फोट होता है। इस विस्फोट के परिणामस्वरूप दोनों मस्तिष्कीय गोलार्धों एवं लिम्बिक संस्थान के कई परिपथों को बहुत अधिक शक्ति मिलती है, जिससे वे सामान्य स्थिति से कहीं अधिक सक्रिय हो उठते है। यह उसी प्रकार है, जिस प्रकार हमारे स्नायु संस्थान का संबंध अचानक किसी उच्च वोल्टेज की विद्युत धारा से, जिसे योगीजन ‘सुषुम्ना’ कहते है, हो जाए।
योगियों के अनुसार अन्तर्ज्ञान एवं प्रत्यक्ष ज्ञान में भी आज्ञाचक्र का महत्वपूर्ण योगदान है। प्रत्यक्ष ज्ञान एवं इन्द्रिय सक्रियता का नियमन थैलमस हिस्से द्वारा होता है, जिससे जीवन की सूक्ष्मताओं का हमें अनुभव प्राप्त होता है। यदि ऐसा है, तो फिर योगपथ के अनुभवियों का यह दावा ठीक ही है कि साधना-अभ्यासों द्वारा इस क्षेत्र की संवेदना और शक्ति को जगाकर मनुष्य की सामान्य क्षमता को बढ़ाकर असामान्य किया जा सकता है। परिणाम यह होगा कि हम पदार्थ की सूक्ष्म भूमिका में उतरकर उसका निरीक्षण-परीक्षण कर सकेंगे अर्थात् हम भौतिक सीमाओं को तोड़कर अभौतिक संसार में प्रविष्ट कर सकेंगे।
साधना शास्त्र के अनुसार मूलाधार चक्र की अवस्थिति पेरेनियम में तथा दूसरे चक्र मेरुदण्ड में ऊपर की ओर सहस्रार तक स्थित है। सहस्रार मनुष्य के चरम विकास तथा चेतना की पराकाष्ठा है। आज्ञाचक्र वह केन्द्र है, जहाँ मनुष्य अपना अस्तित्व ब्रह्माण्ड से पृथक् अनुभव करता है। व्यष्टि और समष्टि चेतना का मिलन अथवा विश्वव्यापी चेतना का प्राकट्य स्थल-सहस्रार है तथा आज्ञाचक्र वह केन्द्र है, जहाँ आदेश ग्रहण किये जाते है।
तंत्रिका क्रिया-विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है मस्तिष्क में मेरुरज्जु शीर्श से पीनियल ग्रन्थि अथवा थैलमिक क्षेत्र तक ऊपर की ओर फैले हुए हिस्से में योगियों द्वारा बताये गए चक्रों के विवरणों से मिलते-जुलते केन्द्र है। यह कहा जा सकता है कि मस्तिष्क के वे सभी केन्द्र आज्ञाचक्र के अधीन है तथा उसी के द्वारा नियंत्रित भी। आज्ञाचक्र के अंतर्गत विकास के भिन्न-भिन्न स्तर है। जैसे-जैसे चक्रों का जागरण होता है, वैसे-ही वैसे चेतना का स्तर तथा आज्ञाचक्र की क्रियाशीलता भी प्रभावित होती है।
इस प्रकार साधना विज्ञान के रहस्य अब उस क्षेत्र में होने वाले शोध-अनुसंधानों से घटते-मिटते जा रहे हैं। कुछ समय पूर्व तक तर्कवादी विज्ञानी मस्तिष्क जिसका ‘भ्रम’ कहकर उपहास उड़ाते थे, आज वे ही साधना विज्ञान में वर्णित चक्रों, उपत्यिकाओं, भ्रमरों, प्राणों, मात्रिकाओं की महत्ता, सत्ता और वास्तविकता को समझने लगे है। इससे सर्वसाधारण के मस्तिष्क में छा असमंजस का कुहासा निश्चय ही दूर होगा और वह विश्वास पैदा होगा, जहाँ साधक की निर्द्वंद्व मनःस्थिति के अतिरिक्त और कुछ न हो।
ईरान और भारत का मैत्री सम्बन्ध नया नहीं, बहुत पुराना है। आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व भी दोनों के सार्थवाह, घुमन्तू व्यापारी, शान्ति मैवी के संदेशवाहक राजदूत एक-दूसरे के देश में जाकर अपनी कला और संस्कृति की सौहार्द बाँटते रहते थे। नरेश गण भी परस्पर-स्नेह-सौहार्द की वृद्धि के रूप में भेंटों-उपहारों का आदान-प्रदान करते थे। इस प्रकार राजाओं को ही नहीं, वहाँ के प्रजाजनों को भी देश-विदेश के कला-कौशल से परिचित होने का अवसर मिलता था। विश्व-बन्धुत्व के उपदेष्टा तीर्थंकर महावीर के वचनामृत का पान करने के उपरान्त मगध सम्राट बिंबसार ने तो इस प्रथा को चरमोत्कर्ष ही प्रदान कर दिया था।
उस दिन भी ईरान की राजसभा भरी हुई थी। भारत के महाराजाधिराज श्रेणिक बिम्बसार द्वारा भेजी हुई भेंट सभा में प्रदर्शित की जा रही थीं। अनेकों प्रकार में मणिरत्नों द्वारा निर्मित अलंकार, सुन्दर शुभ्र कौषेय वसन, कला के विविध उपकरण दर्शकों का मन अपनी श्रेष्ठता में बाँध रहे थे। उन्हीं उपहार वस्तुओं में एक वीतराग प्रतिमा भी थी। मूर्ति के परिचय पट पर कुछ शब्द अंकित थे। भाषा विशेषज्ञ ने उन्हें पढ़ा लिया था-युवराज कुमार आर्य को, मगध के मंत्री अभय कुमार की ओर से सस्नेह भेंट।
प्रतिमा युवराज को सौंप दी गयीं युवराज की आँखों के सम्मुख मगध के आमात्य अभय कुमार को श्रेष्ठ व्यक्तित्व प्रकट हो उठा।मित्र का स्नेह मूर्तिमान् हो गया। उसे अभय के साथ अपने साहचर्य की याद ताजा हो आयी। वह अपने विचारों की धारा में बहने लगा कुछ ही समय पूर्व उसका अभय कुमार से प्रत्यक्ष परिचय हुआ था। साथ-साथ रहकर दोनों ने पलाषकुट आश्रम में अपना शिक्षा काल व्यतीत किया था। वन-प्रान्त में भ्रमण करते हुए प्रकृति की छटा निहारी थी। तथ्यों का सूक्ष्म अवलोकन किया था। आज पुनः उस मित्र ने उसे भेजकर स्नेह के सूत्र में बाँध लिया।
और भेंट भी कैसी? विचारों का साकार प्रतीक। एक आदर्श। एक लक्ष्य। एक मौन संदेश। वह प्रतिमा को अपने साथ ले आया। अपने भवन में शयनागार के निकट एक सज्जित प्रकोष्ठ में, एक ऊँचे आसन पर उसने प्रतिमा को रख दिया। अब वह ज्यों ज्यों प्रतिमा को देखता मित्र की याद ताजा हो जाती उसकी प्रत्येक बात स्मरण हो आती उसके तर्क स्पष्ट होने लगते
राजकुमार आर्य दिन -रात में कई बार प्रतिमा को देखते घण्टों प्रतिमा के निकट बैठकर उसे अपलक निहारा करता वह जब -जब मूर्ति का सान्निध्य प्राप्त करता प्रतिमा उसे कुछ-न कुछ-सन्देश देती हुई दिखलाई पड़ती जैसे वह कुछ बोल रही हो जैसे वह अपने जीवन का वृत उद्घाटित कर रही हो विकासक्रम का इतिहास सामने रखकर उसके पृष्ठ उलट -पलट कर उसकी आस्था को स्थायी बना रही हो।
भारत के जीवन दर्शन के सम्बन्ध में उसे साथी अभय ने बहुत-सी बातें सुनायी थी। अर्हतों की गाथाएँ सुनाकर उनका मानव मात्र के कल्याण हेतु सक्रिय उपवकार वर्णन किया था। किस प्रकार बड़े - बड़े चक्रवर्ती सम्राट उनके युवराज पुत्र संसार सुख को क्षणभंगुर जान-मान कर जग से विरक्त हो अध्यात्म के पथ पर बढ़ जाते थे।निज देह की सुधि भूलकर प्रकृति-प्रकोपों को सहज निर्विकार भाव से हसन करने लग जाते थे।
वह प्रतिमा की ओर देखता तो पाता-यही है निर्विकार मुद्रा, जहाँ क्रोध नहीं-वैर-भाव नहीं-ईर्ष्या-छल-प्रपंच नहीं, घृणा का विद्रूप नहीं। कैसी सौम्यता। कैसी दिव्यता कैसी शान्ति। और कितना सौंदर्य। वह प्रतिमा के आदर्श की सामान्य जन-जीवन से तुलना करने लगता मानव-वैर -विरोध में अपनी शक्ति को नष्ट कर कैसी कृमि-कीटकों की जिन्दगी जी रहा है। छल-षड्यन्त्रं में अपने जीवन के अमूल्य क्षण को नष्ट करने वाले हिंसक सैनिक। सत्ता के मद में चूर आपा भूलकर दूसरे पर अपना आतंक जमाने का अभिलाषी प्रशासक वर्ग वर्तमान से सदा - सर्वदा असन्तुष्ट रहने हम सभी
। कभी वह अपने विषय में विचार करता। सोचने लगता ये अर्हता तीर्थंकर राजपुत्र हूं। इन्होंने जगत के जीवों की कल्याण कामना से राजवैभव ठुकराया, तपश्चर्या का मार्ग अपनाया, क्या मैं....?
अभीप्सा की तीव्रता बढ़ती गयीं अन्ततः थोड़े-से सेवकों के साथ तक्षशिला आ पहुँचा। तक्षशिला के विद्याकेन्द्र की कीर्ति उसने पहले ही सुन रखी थी। यहाँ वह साधारण शिक्षार्थी और जिज्ञासु की भाँति रहने लगा। उसने साथी-सैनिकों को वापस जाने का आदेश दिया। भारत -भ्रमण के बहाने वे यत्र-तत्र विचरण करने लगे। कुमार आर्य एक योग्य-गुरु की सेवा में रहकर ज्ञान-विज्ञान का अर्जन करने लगे। उन्होंने लौकिक विषयों की बारीकियाँ देखी-तर्क-वितर्क से उनका अन्वेषण करने का प्रयत्न किया, तो उन्हें लगा जैसे वह इसमें उलझकर रह जाएँगे, जबकि वह सुलझना चाहते थे, उलझना नहीं। यों लौकिक दृष्टिकोण एक काँटा था। उसे अध्यात्म के काँटे से वह निकालना चाहते थे। न वह पहले काँटे को पालना चाहते थे। और न ही पहले काँटे के साथ एक और काँटा पाँव में गढ़ाकर कोई नया प्रयोग करना चाहते थे। वह तो तर्क-जाल की बजाय आत्मानुभूति के साथ जीवनपथ पर आगे बढ़ने के इच्छुक थे। और उन्होंने ज्ञान का आश्रय छोड़कर तप का सहारा लिया। वह तपस्वियों की खोज में मारे-मारे फिरने लगे। उन्होंने कई प्रकार के विचारों से परिचय पाया। कहीं भक्ति को इतना अधिक महत्व दे दिया गया था कि व्यक्ति को एक कल्पित अदृश्य के हाथों का खिलौना मान लिया गया था। कही क्रिया-कृत्यों को इतना प्रधान कर दिया गया था कि लगता था मानव संवेदनशील प्राणी होने की बजाय एक यंत्र मात्र है। जो चाहता है कार्य करता है किन्तु अपने स्वयं के बाबत कुछ नहीं सोचता।
वह सब कुछ सुनते - समझते हुए आगे जाते। अन्तः उनकी भावना को वरदान मिल गया। वह इच्छित गुरु पा गए। गुरु के पास ज्ञान भी था ओर तप की पूजी भी। सबसे ऊँची वस्तु थी आत्मविश्वास। वे नर से नारायण बन जाने की बात सुनते थे। उसका व्यावहारिक क्रम बतलाते थे मोह-ममता की बाधाएँ और उन पर विजय की रीति स्पष्ट करते थे। इन्हीं ज्ञानी गुरु के चरणों में रम गए।
उन्हें अब न वस्त्रों से मोह रहा न भोजन में रुचि। गुरुदेव ने सारे नियम-संयम उन्हें समझा दिए, सिखा दिए। उन्हें पारस बना दिया कि वह आगे बढ़ जाएँ और लोहे को सोना बनाते रहें। भूल-भटके प्राणियों को सन्मार्ग दिखाते रहें। वह सोना तो पहले ही थे। अब तो पारस बन गए। पारस ही नहीं बने गुरु ने उन्हें पारस बनाने की कला भी सिखा दी कि वह अन्य व्यक्तियों को पारस बनाते चलें, जिससे पारस और स्वर्ण बनने-बनाने का क्रम अविराम-अनवरत जारी रहे। उनकी वाणी में सामर्थ्य आ गयी थी, विचारों में दृढ़ता आ गयी थी और काया उद्दीप्त हो उठी थी।
पहले के राजकुमार और अब के ऋषि आर्य आगे बढ़ते जा रहे थे, अकेले सर्वथा अकेले। किसी भी नगर के बाहर साधु आर्य ठहर जाते। जो उनके निकट बैठता, उसे वे शान्ति-सन्तोश का सन्देश सुनाते। भोजन का विकल्प उठने पर जो व्यक्ति श्रद्धा से सात्विक आहार दे देता उसे अस्वाद वृत्ति से ग्रहण कर लेते।
तपश्चर्या और भ्रमण के इस क्रम में वह वसन्तपुर के श्रेष्ठी श्रीदत्त के उद्यान में जा पहुँचे। यह उद्यान नगर के प्रमुख द्वार के निकट ही अवस्थित था। ऋषि आर्य उद्यान में जाकर ठहर गए। मध्याह्न में एक अश्वत्थं वृक्ष के नीचे बैठकर उन्होंने अपने अतीत का सिंहावलोकन किया। फिर वर्तमान के माध्यम से भविष्य पर विचार किया। स्व-पर-कल्याण की ध्वनि ही उन्हें दसों दिशाओं से आती सुनायी पड़ती रही। अपराह्न वेला में नित्य की भाँति वे ध्यान में लीन हो गए।
वसन्तपुर का नाम ही वसन्तपुर न था, वहाँ सभी ऋतुओं में मधुमास छाया रहता था। सुख-समृद्धि और रूप-यौवन के हरे-भरे उद्यान यत्र-तत्र सर्वत्र नगर का नाम सार्थक बनाने हेतु विद्यमान थे। श्रेष्ठी श्रीदत्त की पुत्री वसन्त की सन्ध्या समय नित्य ही सखी-सहेलियों के साथ उद्यान में आती थी। वैभव के स्वामी श्रीदत्त की एक मात्र पुत्री वसन्तश्री नगर की श्रीशोभा थीं उसे किसी वस्तु का अभाव नहीं था। दास-दासियों का एक झुण्ड-सा उसके आगे-पीछे चलता था।
उद्यान रक्षक ताजे-ताजे फूलों के हार उसके समक्ष प्रस्तुत करता। वह पुष्पहार से सजी अप्सरा की भाँति उद्यान में भ्रमण करती। सखियों सहित कृत्रिम निर्झर के समीप बैठती, कभी पुश्करियों में चरण डुबोकर किलोलें करती, सखियों पर जल-बिन्दु उछालती-हँसती-हँसती उनका हाथ पकड़ कर घूमती रहती।
वसन्तश्री ने बाल्यावस्था को पार करके किशोरावस्था में पग रख दिया था। उसके हृदय में अज्ञात रूप से एक उन्माद भर गया था। कौमार्य भी अब उसकी वय-सन्धि की दौड़ में पीछे छूट रहा था तथा यौवन सामने आकर अपना हाथ उठाकर उसे द्रुतगति से दौड़कर अपने अंक में छुप जाने का संकेत कर रहा था। उसे लगता था, जैसे उसके अंग-प्रत्यंग उसके स्वयं के वश में न रहकर यौवन के वशवर्ती हो रहे है।
ऋषि आर्य की आत्मा उत्तरोत्तर निर्मलता प्राप्त करती जा रही थी। सतत् साधना और तपश्चर्या के प्रभाव एक अलौकिक दीप्ति से उनका शरीर कान्तिमान हो रहा था। वे जब ध्यानस्थ होते, तब ऐसा विदित होता, जैसे संगमरमर की पाषाण प्रतिमा सामने रख दी गयी हो। आत्मा की सुन्दरता शरीर पर स्पष्ट होने लगती और एक अपूर्व आकर्षण उनके व्यक्तित्व में समाहित हो जाता तथा मुखश्री पर अद्भुत शान्ति विराजमान् हो जाती।
ऋषि ध्यानस्थ थे और श्रेष्ठी पुत्री वसन्तश्री उद्यान में भ्रमण कर रही थी। उसने दूर से देखा तो वह ठिठक गयी। सोचने लगी कि कल तक तो वह पाषाण प्रतिमा यहाँ नहीं थी क्या पिताश्री ने आज नवीन ही मंगायी है।वह निकट पहुँची तो विस्मय से अभिभूत हो उठी। प्रतिमा नहीं व्यक्ति। व्यक्ति इतना सुन्दर, इतना आकर्षक ऐसा रूप स्वरूप
। वह बहुत देर तक ऋषिराज की ओर निर्निमेष -अपलक निहारती रही। संखिया साथ थी। सभी थी सभी उसकी भाँति प्रमोन्म्रपन्त उद्दण्ड न थी। कुछ तो विशेष व्यवहार कुशल होने के कारण ही उसके पिता,द्वारा उसके पास छोड़े गयी थी। सखियों में से कुछ ने स्थिति का सूक्ष्म अध्ययन कर लिया। अन्ततः एक सखी नि शब्द वसन्त श्री के पास पहुँची और उसका हाथ पकड़कर उद्यान के अन्य भाग में ले गयी।
कुमारी सखियों के साथ पूर्ववत् उद्यान में विचरण करने लगी। किन्तु उद्यान में कुमारी वसन्त श्री का मात्र शरीर ही घूम रहा था। मन तो वह जहाज के पंछी की भाँति तपस्वी के रूप के आस - पास ही मँडराने छोड़ आयी थी। संखिया कुछ कहती तो वह जैसे कुछ सुनती ही न थी। सुनती भी तो समझती नहीं। बिना समझे ही हाँ- हूँ कर देती
उद्यान भ्रमण करते - करते काल बीतने लगे। उद्यान के वृक्ष अन्धकार के सुन्दर में डूबने लगे। सखियों सहित वसन्त श्री अपने भवन लौट आयी। भोजन करने बैठी तो उसे अस्चि हो गयी। शैया पर लेटी तो उसकी सजगता और चिन्तन के सातत्य को देखकर निद्रा दूर ही खड़ी रह गयी। उसे तो बस एक ही ध्यान था। एक ही कल्पना एक ही लक्ष्य -ऋषि युवक रूप
दूसरे दिन प्रातः ऋषि की आगमन चर्चा सुनकर नगर - निवास उनके दर्शनार्थ जाने लगे। ऋषि आर्य ने अध्यात्म की गूढ़ोक्ति उन्हें सुनायी - समझायी श्रोतागण धन्य-धन्य कह उठे
इस अल्पवय में ऐसे गुरु द्वारा गम्भीर ज्ञान का भंडार पा जाना उन्हें एक दिव्य चमत्कार ही जान पड़ा। उपदेश समाप्त हो गया था। श्रद्धा में बँधे - खिले से श्रोतागण उठाकर चलने लगे। ऋषि आहारचर्या को निकल पड़े।
रात - दिन की कठोर प्रतीक्षा के बाद तपस्वी के दर्शन की प्यासी वसन्तश्री सन्ध्या वेला में नित्य की भांति पुनः उद्यान में जा पहुँची। माली ने पुष्पहार उसे अर्पित किए। सखी - सहेलियों को भी दिए। कुमारी आगे बढ़ने लगी। वह मंत्रचालित सी ऋषि के निकट जा पहुँची ओर जब तक सखियां रोके तब तक पुष्पमाला उसने ऋषि के गले में डाल दी
ऋषि यथावत् ध्यानस्थ रहें। सखियां कुमारी को बलपूर्वक घसीट ले चली। इस प्रसंग की चर्चा एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे कानों में प्रसार पाने लगी। रात्रि तक सम्पूर्ण नगर में समाचार व्याप्त हो गया श्रेष्ठी पुत्री ने ऋषि के गले में वरमाला डाल दी है। यही एक वाक्य आबाल वृद्ध-वनिता की जिह्वा था। श्रेष्ठी स्वयं आश्चर्यचकित थे। वे सोचकर भी समझ न पाते कि अब उनका इस संदर्भ में क्या कर्तव्य है श्रेष्ठी श्रीदत्त पुत्री के समीप आए। उस के कृत्य की कठोर शब्दों में भर्त्सना की। कुमारी रोने लगी। श्रेष्ठी पत्नी ने इस समय दूरदर्शिता से काम लिया। वह पति का हाथ पकड़ कर एक ओर ले गयी। पति -पत्नी में परामर्श होने लगा। कुमारी कान लगाकर एक-एक शब्द सुन रही थी। जब श्रेष्ठी दम्पत्ति ने पुत्री के शीघ्र ही निकट भविष्य में पाणिग्रहण हेतु वर खोजने की बात चलायी तो वसन्त श्री आहत सर्पिणी की भाँति फुँकार उठी। वह खड़ी हो गयी और बोली - जीवन में परिणय एक बार ही होता है। मैं निर्जीव पण्य नहीं हूँ जो हाथों -हाथ बिकती फिरूंगी। जिसे मनोनीत कर लिया वही मेरा जीवन आराध्य हैं। समस्त लज्जा - संकोच दूर फेंककर कन्या ने स्पष्टीकरण का उचित अवसर हाथ से न जाने दिया। इसी में उसकी भावनाओं की सम्पूर्ण भविष्य की सुरक्षा भी निहित थी।
अब पति - पत्नी एकान्त में योजनाएँ बनाने लगे। प्रश्न था- ऋषि भला गृहस्थ जीवन में आना क्यों स्वीकार करेंगे? कुमारी के इस कृत्य की चर्चा से अवगत कौन-सा श्रेष्ठी सम्मानपूर्वक इसे अपनी पुत्रवधू बनाना स्वीकार करेगा। रात्रि को सभी सोये पर चैन किसी को न था। पिता -माता पुत्री अपने -अपने विचार व्यूह में इस प्रकार सिमटे हुए थे जैसे सर्प कुण्डली मारकर सिमट जाता है। किसी के पलक झपके ही नहीं कि बालरवि ने प्रातः काल की धूप श्रेष्ठी भवन पर बिखरे दी। प्रातः काल होते ही नगर -निवास उद्यान में एकत्रित होने लगे ऋषि की ध्यान समाधि भंग हो गयी। पुष्पहार निकट ही पड़ा था। उपेक्षित-सा मरे हुए सर्प जैसा और ऋषि राज विचारों में लीन थे। श्रेष्ठी श्री दत्त तभी समीप आकर उनके चरणों में गिर पड़ा। मुझे बचाओ स्वामी श्रेष्ठी ने जैसे करुण चीत्कार किया।
यह कैसे हो सकता है? ऋषि ने जैसे संक्षेप में ही अपनी अस्वीकृति का निर्णय सुना दिया। नगर के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। घटना अपूर्व थी। समस्या विषम हो गयी थी।
शत-प्रतिशत व्यक्तियों को श्रेष्ठी के साथ सहानुभूति थी। वे सभी उसी के पक्ष में उसी के दृष्टिकोण से सोच रहे थे परन्तु उनमें से ही कुछ व्यक्ति ऋषि की स्थिति के प्रति भी सहानुभूतिशील थे। वे चाहते थे कि ऋषि के प्रति अन्याय न हो जाए कोई अप्रिय प्रसंग न आ जा। अनहोनी को न्यायप्रिय व्यक्ति क्यों चाहेगा?
यह एक ऐसा अवसर था, जिसमें बलप्रयोग की कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। आग्रह-स्नेह-तर्क-प्रमाणों और दृष्टान्तों के द्वारा ही साहूकार को मनाया जा सकता था। श्रेष्ठियों ने स्वर में नम्रता का भरपूर पुष्ट देकर बतलाया कि उनमें से कई व्यक्ति स्वयं स्वेच्छा से कुमारी को अपनी पुत्रवधू बनाने को आज भी तैयार है। किन्तु कुमारी अपनी हठ पर दृढ़ है कि मैंने तो ऋषिराज का वरण कर लिया है। पाणिग्रहण होगा, तो उन्हीं के साथ। यदि नहीं होगा, तो प्राणों का आत्मघात के द्वारा उच्छेद कर दूँगी।
ऋषि आर्य ने कुमारी वसन्तश्री के कथन को ध्यान से सुना फिर उसे पास बुलाने की आज्ञा दे दी। सखियां वसन्त श्री को ऋषि के समीप ले आयीं। कई रातें न सोने के कारण वसन्तश्री कुम्हलाएं कमल के पुष्प-सी लग रही
थी। मलिन होने पर भी उसकी सुन्दरता अपूर्व थी। ऋषि ने उसे सम्बोधित करते हुए कहा-देवी तुम्हें मेरे जिस सौंदर्य ने आकर्षित किया है वह तो यथार्थ की प्रतिच्छाया मात्र है। यदि तुम मुझे सचमुच ही पाना चाहती हों, तो उस यथार्थ को जानने और पाने का प्रयत्न करो।
ऋषि के इस कथन ने वसन्तश्री को चौका दिया। परन्तु वह अपने निर्णय पर दृढ़ थी। ऋषि ने उसे प्रबोध किया और अपने तपोबल से उसके अपने अन्तःकरण में आत्म सौंदर्य की झलक दिखा दी। श्रेष्ठी कन्या को अब मार्ग मिल गया। उस अब यह समझ में आ गया कि ऋषि आर्य का यथार्थ साहचर्य कैसे पाया जा सकता है। उसका तो जैसे जीवन ही बदल गया। उत्तरोत्तर तपस्या के द्वारा उसने अद्वय स्थिति प्राप्त की। अब वह अनगढ़ लोहे से पारस बन चुकी थी। ऋषि आर्य की तरह वह भी अपने तपःपूत विचारों से जन-जीवन में शान्ति एवं प्रसन्नता बिखरने लगी। ईरान और भारत में उपजे दो प्रसून अपने-अपने ढंग से अनूठी सुरभि फैलाने लगे।
सम्पदा मनुष्य की महत्वपूर्ण आवश्यकताओं में से एक है। उसे प्राप्त तो किया जाना चाहिए, पर जीवन का एकमात्र लक्ष्य उसकी उपलब्धि मान लेना ठीक नहीं। इससे आदमी की कितनी ही जरूरत अधूरी रह जाती है। वह उन कार्यों को पूरा नहीं कर पाता जो उससे भी अधिक अनिवार्य और जीवन को उन्नत बनाने वाले है। अस्तु वैभव की तुलना में आत्मिक विभूतियाँ को ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए और उन्हीं को प्राप्त करने का अधिकाधिक प्रयत्न करना चाहिए कारण कि स्थायी और स्थिर सम्पत्ति केवल वही है।
यह सत्य है कि लौकिक वैभव चिरस्थायी नहीं होता पर मिथ्या यह भी नहीं है कि उसे प्राप्त करने के लिए मनुष्य आज जिस पागलपन की हद को पार कर रहा है उसे अभूतपूर्व की कहना पड़ेगा। नीति-अनीति-उचित-अनुचित सही-गलत चाहे जिस भी तरीके से हस्तगत हो सके, उसको पा लेने के लिए लोग उन्मादग्रस्तों जैसे आचरण करते देखे जाते है। यह तक नहीं सोचते कि जो जीवन भगवान की ओर से श्रेष्ठ और सुन्दर बनने के लिए मिला है, उसे इतने निम्न उद्देश्य के लिए क्योंकर खपाया जाए? धन जीवन का निर्मित भर है सर्वस्व नहीं। जो इसे सब कुछ मानकर चलते और सर्वोपरि प्राप्तव्य में सम्मिलित रखते है, वे पाते कुछ नहीं, गँवाते बहुत कुछ है। ऐसे अगणित उदाहरण इतिहास के पृष्ठों में मिल जाएँगे, जो जीवन भर खजानों की खोज में लगे रहे। पर मिला कुछ नहीं। उलटे अभावग्रस्तता, खीज़ निराशा ही उनके पल्ले बँधी। यह बहुमूल्य समय यदि निजी जीवन के उत्कर्ष में लगा होता तो कम-से-कम संतोष और आनन्द तो मिलता व्यक्ति चरम लक्ष्य की ओर इंच भर सही अग्रसर तो होता पर ऐसा नहीं हो पाता है। कदाचित ऐसे ही व्यक्तियों के लिए यह कहा गया है-माया मिली राम।
दूसरी ओर कितने ऐसे भी स्थान है जो अपने गड़े धन के कारण कुख्यात है। लम्बे समय से उनको करतलगत करने के प्रयास और पुरुषार्थ होते रहे पर सफलता के नाम पर शून्य ही हाथ लगा। इतने पर भी वह अभियान रुके नहीं सनक स्तर पर बाद में भी जारी रहे।
उसी प्रकार की एक जगह ओकद्वीप का ‘मनीपिट’ है। मनीपिट अर्थात् धन का गड्ढा कहा जाता है कि इस गढ्ढे में धन की तलाश 18वीं सदी से आरंभ हुई। इसकी एक रोचक गाथा है सन् 1795 में सोलह वर्षीय डैनियल मक गिनिस अपने दो साथियों के साथ समुद्री यात्रा पर निकला। कई दिनों की यात्रा के बाद महोन की खाड़ी में एक छोटा-सा द्वीप दिखलाई पड़ा। वह उसे बड़ा रमणीक प्रतीत हुआ। उसने नाव किनारे लगायी और अपने मित्रों के साथ उसमें घूमने चला गया। देर तक वे वहाँ भ्रमण करते रहे। स्थान अत्यन्त सुरम्य था और चारों ओर से ओक वृक्षों से घिरा था। दो घण्टे पश्चात् जब वे लौट रहे थे, तो एक घेरे ने उन्हें आकर्षित किया। निकट पहुँचने पर पाया कि उस परिधि के बीच एक विशाल ओक पेड़ खड़ा है एवं उसके अगल-बगल के तरुवर गिरे पड़े है। वहाँ की भूमि कुछ उभरी हुई जान पड़ी। ऐसा मालूम पड़ता था मानो नीचे कुछ दबा हुआ हो। उत्सुकता चरम पर थी और व्याकुलता पल-लप बढ़ती जा रही थी कि आखिर यहाँ क्या हो सकता है? नाव से खनिज तथा खनन के अन्य उपकरण लाये गए और खुदाई शुरू कर दी गई। मिट्टी की लगभग तीन फुट मोटी पर्त हटाने पर उन्हें एक सुरंग दिखाई पड़ी, जिसमें नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई थी। आगे खोदने पर मिट्टी के कई स्तम्भ मिले। इन स्तम्भों में यहाँ-वहाँ ओक की डालियाँ धँसी हुई थी। उन डालियों को निकाला। बाद की खुदाई में उन्हें मिट्टी के अनेक चबूतरे मिले। इनमें से कुछ सिर्फ मिट्टी के बने थे, जबकि कइयों के अन्दर नारियल के रेशे भरे थे। इन सबको देखकर उन लोगों ने इतना तो अनुमान लगा लिया कि यह कोई साधारण स्थान नहीं है और इसका प्रयोग निश्चय ही किसी विशेष प्रयोजन के लिए होता होगा, पर वह क्या हो सकता? इसका निर्णय वे न कर सके।
तब तक कई दिन बीत चुके थे। उनने यहाँ के बारे में किंवदन्ती सुन रखी थी कि वह रहस्यमय गतिविधियों का अजीबो-गरीब क्षेत्र है। रात में वहाँ पर रंग-बिरंगी रोशनियां चमकती है, जो कोई इसका पता लगाने गया वह लौटकर दुबारा नहीं आया। यद्यपि इतने दिनों में उन लोगों ने इस प्रकार की कोई बात नहीं देखी फिर भी वे भयभीत हो रहे थे। तीनों ने और लोगों की सहायता लेने के लिए लौटने का निश्चय किया तथा एक दिन लौट पड़ें।
इसके उपरान्त करीब एक दशक बीत गया। डैनियल और उसके दोस्त अपनी-अपनी पढ़ाई में मस्त हो गए। पढ़ाई पूरी करके तीनों ने नौकरी कर ली। इस बीच उनकी मनीपिट की स्मृति एक बार फिर से उभर आई। अब वे अर्थ की दृष्टि से स्वावलम्बी हो चुके थे, अतः कुछ लोगों को साथ लेकर एक दिन पुनः वहाँ के लिए प्रस्थान कर गए।
खुदाई दूसरी बार फिर प्रारम्भ की गई। आगे के उत्खनन में अन्य अनेक चबूतरे मिले। कुछ में पत्थर भरे हुए थे जबकि शेष बालू के ढेर मात्र थे। कार्य करीब दो दशाब्दी तक लगातार चलता रहा। इस बीच कोई विशेष उपलब्धि न हुई। वे निराश हो गए। धन भी समाप्त हो रहा था अस्तु उत्खनन कार्य स्थगित करने का फैसला किया। जाते समय वे उस शिलालेख को साथ ले गए जो खुदाई के समय मिला था। उस पर अज्ञात भाषा में कुछ लिखा हुआ थे। और कई प्रकार के निशान बने हुए थे। तब उस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। 20वीं सदी के मध्य में जब उसे हैलीफैक्स में प्रदर्शन के लिए रखा गया तो एक प्रोफेसर की जिज्ञासा उसकी इबारत के प्रति बढ़ी। बहुत परिश्रम के बाद उसने अंकित संदेश को पढ़ने का दावा किया -दस फुट नीचे दो करोड़ पाउण्ड।
उक्त जानकारी के बाद खोज कार्य का एक बार पुनः श्रीगणेश हुआ। इस बार 40 वर्ष के लम्बे अंतराल के पश्चात् यह शुरू हुआ। अनेक लोगों ने धन पाने की लिप्सा में उस पर पानी की तरह पैसा बहाया पर परिणाम ढाक के तीन पात ही रहा।
सन् 1938 में एडविनहैमिल्टन ने वहां180 फुट गहरी खुदाई करवायी पर हाथ कुछ न लगा। इसमें जो सबसे बड़ी बाधा सामने आई वह थी गड्ढे का पानी से भर जाना। पानी के कारण आगे का कार्य जारी रख पाना उनके लिए मुश्किल हो गया और परेशान होकर उसे बन्द कर दिया। कई वर्ष बाद फ्रैक लीह नामक एक इंजीनियर ने रुके कार्य को आगे बढ़ाया पर दुर्भाग्यवश खनन कार्य के दौरान एक दुर्घटना घट गई जिससे तीन लोग मारे गए। कार्य पुनः रुक गया।चार वर्ष पश्चात् एक अमेरिकन भूगभ्र्षास्«ी राबर्ट गनफील्ड ने उसे शुरू करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया। उसने मनीपिट के समीप 80 फुट व्यास का 130 फुट गहरा कुआं खोदा पर यह प्रवास भी निष्फल रहा।बाद के कार्य में कुएं के पानी के कारण व्यवधान पड़ने लगा। फिर भी उसने हार नहीं मानी और शक्तिशाली पम्पों के द्वारा उसे उलीचकर कार्य को आगे बढ़ाया किन्तु पानी भरने की गति निकालने की गति निकालने की गति से अधिक तीव्र थी फलतः कुआँ भी खाली होने का नाम ही न लेता।ऐसी स्थिति में खनन कैसे हो? यह उसकी बुद्धि से परे था। विवश होकर उसे बन्द कर देना पड़ा। यह सन् 1967 की बात है
दस वर्ष पश्चात् कार्य को पुनः हाथ में लिया गया। इस बार उसे क्रियान्वित करने वाली संस्था टायटन अलाऐस नामक एक कम्पनी थी। उसने आधुनिक यंत्रों के सहारे 234 फुट गहरी खुदाई की तत्पश्चात उसमें टेलीविजन कैमरे के माध्यम से खोजबीन की गई।इससे उसके अन्दर तीन सन्दूक और एक कटा हुआ हाथ होने का पता चला। उक्त जानकारी के आधार पर उसमें गोताखोर उतारे गए पर वहाँ उन्हें न तो कोई बक्सा मिला न कटी बाँह दिखाई पड़ी। हारकर कम्पनी ने यह कहते हुए कार्य रोक दिया कि यहाँ छुपायें धन को प्राप्त कर पाना लगभग असंभव है। कारण कि यह कोई साधारण सम्पदा नहीं उससे रहस्यात्मक अलौकिक तत्व जुड़े हुए है जो उसे किसी अपात्र के हाथ पड़ने से रोकते है। उक्त कम्पनी की इस टिप्पणी के बावजूद ऐसे लोगों की कमी नहीं जो उस वैभव को लेकर तरह -तरह के मनसूबे न बाँधने हो और उसकी प्राप्ति के प्रयास न करते हो। संपत्ति किसे प्रिय नहीं है। विपन्नता की विपत्ति में कौन पड़ा रहना चाहता है हर कोई धनकुबेर बनने के सपने देखता है जब यह सुयोग गड़े खजाने के रूप में प्राप्त हो रहा हो तो भला उसे पाने कौन संवरण कर पाएगा
मनीपिट के साथ भी ऐसा ही होता रहा। उस सम्पदा की उपलब्धि के संदर्भ में ट्र्रायटन अलाऐस के निषेधात्मक विचार के बाद भी लोगों ने उस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया और अपने अपने प्रकार के प्रयास उसे हस्तगत करने के लिए करते रहे, अब भी जारी है। यह बात और है कि उनके भी नतीजे वही रहे जो औरों के थे।
इस अभियान में सभी के साथ एक ही कठिनाई सामने आई-गड्ढे का जलयुक्त हो जाना। ऐसा क्यों होता है? अब इसका कारण ढूँढ़ लिया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि सन् 1795 से पूर्व जिसने भी यहाँ खुदाई की होगी, उसने 100 फुट गहराई के बाद गढ्ढे और समुद्र के मध्य एक 500 फुट लम्बी सुरंग बना दी होगी, ताकि कोई भी व्यक्ति इस गहराई से आगे न बढ़ सके और खजाने के वास्तविक स्थान का पता न लगा सके।
अनेकों व्यक्तियों ने तब से लेकर अब तक इसकी ललक में अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय, श्रम और धन बर्बाद किया, फिर भी वे खाली हाथ ही रहे। यदि इतना सब कुछ आत्मिक सम्पदा करतलगत करने में लगा होता तो शायद उनका जीवन सफल और सार्थक बन गया होता पर सर्वसाधारण की जिन्दगी में धन का आकर्षण इतना प्रबल है कि उसके आगे सारे आदर्श, सिद्धान्त तथा प्रयोजन तुच्छ जान पड़ते है और उसकी प्राप्ति के निमित्त लोग वह सब करने को प्रस्तुत हो जाते है जिन्हें आचारशास्त्र में निशिद्ध घोषित किया गया है। सम्पदा का महत्व सर्वविदित है। भौतिक जीवन में उसकी उपेक्षा तो नहीं की जा सकती पर उस हेतु सनक स्तर का आचरण भी स्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। एकांगी प्रयास मनुष्य को अधूरा और अपूर्ण रखता है। धन के साथ गुणों का समन्वय न हो, तो जीवन में संतुलन-समीकरण नहीं आ पाएगा। ऐसी स्थिति में व्यक्ति या तो व्यसनी, दुर्गुणी, व्यभिचारी बन जाएगा अथवा अतिवादी व्यवहार अपनाएगा। इसलिए अध्यात्म तत्त्वज्ञान में भौतिक सम्पत्ति की तुलना में आत्मिक विभूति को अधिक श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण बतलाया गया है एवं उसी की प्राप्ति पर बल दिया गया है।
जब कोई मनुष्य अपने आपको अद्वितीय व्यक्ति समझने लगता है और अपने आपको चरित्र में सबसे श्रेष्ठ मानने लगता है तब उसका आध्यात्मिक पतन होता है
सुल्तान निजामुद्दीन मध्य भारत का सुल्तान था। जो भी उसके पास आता खाली हाथ नहीं लौटता था। इस दरियादिली के साथ उसमें दाता होने का अहं भी कूट-कूट कर भरा था। माँगने वाले उसकी प्रशंसा में कहा करते थे,
“जिसको नहीं दे भगवान,उसे देता है सुल्तान।” अपनी झूठी प्रशंसा से प्रसन्न होकर वह माँगने वालों को इतना धन देता था कि उन्हें दुबारा न माँगना पड़े।
मध्य भारत में उन्हीं दिनों एक साधु बाबा थे। सभी उन्हें बाबा मस्तराम कहकर पुकारते थे। बाबा रोज भिक्षा माँगने निकलते थे। कुछ लोगों ने बाबा मस्तराम से कहा-बाबा रोज-रोज भिक्षा माँगने का चक्कर खत्म करो। एक दिन जाकर सुल्तान से माँग लो। बस आपको सिर्फ उसके द्वार पर पहुँच कर इतना ही तो पुकारना है, जिसको नहीं दे भगवान उसे देता है सुल्तान।
स्वभाव से फक्कड़ बाबा यह सुनकर जोर से हँस पड़े और कहने लगे-पागल है वह। लगता है उसे अपने पर भारी घमण्ड हो गया है। भला वह है कौन किसी को देने वाला। अरे जिसे न दे भगवान, उसे क्या देगा सुल्तान।
बाबा की बात धीरे-धीरे सुल्तान तक पहुँच गयी थी। उनकी बातें सुल्तान को अच्छी नहीं लगी। उसे लगा जैसे बाबा मस्तराम उसका मखौल उड़ा रहे है। आखिरकार सुल्तान में एक योजना बनायीं।
योजना के अनुसार सुल्तान ने गाँव वाले का वेश बनाया। बैलगाड़ी में तरबूज भरे और उधर जाकर बैठ गया, जिधर से बाबा मस्तराम भी माँगने जाया करते थे। थोड़ी देर में बाबा मस्तराम भिक्षा लेने निकले। जब वे तरबूज वाले के पास पहुँचे तो उसने आदर सहित बाबा को छाँटकर अच्छा-सा तरबूज भिक्षा में दे दिया।
बाबा तरबूज को लेकर वापस लौट चले। उन्होंने तरबूज एक तरफ रखा और भजन-पूजन में बैठ गए। कुछ देर में एक राहगीर विश्राम के लिए बाबा की झोपड़ी में आ गया।
संयोगवश राहगीर के पास भी एक तरबूज था। लेकिन उसका तरबूज बाबा के तरबूज से बहुत छोटा था। बाबा के तरबूज को देखकर वह मन-ही-मन सोच रहा था, काश। इतना बड़ा तरबूज मेरे पास होता। मैं ठहरा परिवार वाला। इस छोटे-से तरबूज से किस तरह काम चलेगा, वैसे भी इतने बड़े तरबूज का साधु बाबा क्यों करेंगे?
राहगीर तो यह सोच ही रहा था बाबा उसके मन की बात जान गए थे। सो बोले-भाई यह तरबूज मुझे दे दो। यह सुनकर राहगीर चौका। बोला-नहीं बाबा भला मैं आपका तरबूज कैसे ले सकता हूँ।
बाबा मस्तराम ने हँसते हुए कहा-संकोच नहीं करो, बेटा। मैं तो अकेला फक्कड़ हूँ। तुम बाल-बच्चे वाले हो? इसे तुम ले जाओगे तो बच्चों सहित मजे से खाओगे। मेरा काम तो छोटे वाले तरबूज से भी चल जाएगा। बाबा के इतना कहने पर उसने तरबूज लेना मंजूर कर लिया। तरबूज को लेकर अपने घर चला गया।
भोजन के समय बाबा ने तरबूज काटा। तरबूज बहुत मीठा था बाबा के लिए पर्याप्त था कुछ देर में राहगीर भी अपने घर पहुँच गया। इतना बड़ा और अच्छा तरबूज देखकर घर के सभी सदस्य प्रसन्न थे। सबके सब तरबूज खाने बैठे। तरबूज को चाकू से काटा गया। मगर अन्दर से तरबूज को देखकर वे हैरान रह गए।
तरबूज में हीरे-मोती-जवाहरात छिपे हुए थे। इतनी दौलत तो उन्होंने कभी देखी भी नहीं थीं जब उन्होंने तरबूज को ध्यान से देखा, तो समझ गए कि सफाई पूर्वक तरबूज को खोखला कर उसमें धन भर दिया गया था। हालाँकि उन लोगों की तरबूज खाने की इच्छा पूरी नहीं हुई थी पर वे प्रसन्न थे। आखिर एक गरीब परिवार को एकाएक इतना धन मिल गया था। वे इसे साधु बाबा की कृपा मान रहे थे।
दूसरे दिन मस्तराम बाबा फिर भिक्षा माँगते हुए उस तरबूज वाले की तरफ चले गए। बाबा की भीख माँगते देखकर वह चौका। उसने बाबा से कहा-लगता है आपको भीख माँगने की आदत ही पड़ चुकी अन्यथा इतना धन मिलने के बाद भी कोई भीख माँगता है?
कौन-सा धन? बाबा ने हैरानी से पूछा।
वही धन, जो मैंने तुम्हें कल दिया था कल तुमने मुझे तरबूज अवश्य दिया था, पर कोई धन नहीं।
अपना असली परिचय देते हुए सुल्तान ने कहा-मैंने कल जो तरबूज दिया था उसमें बेशुमार दौलत थी। इतनी दौलत कि जीवन भर
खर्चा करो, तो भी समाप्त नहीं। होती। मैं आज इसीलिए बैठा हूँ कि तुम अब भी भिक्षा माँगते हो क्या, यह जान सकूँ।
बाबा मस्तराम सब कुछ जान चुके थे। वे हँसते हुए सुल्तान से बोले-जिसे नहीं दे भगवान उसे क्या देगा सुल्तान मन में घमण्ड नहीं लाओ सुल्तान-देने वाला ईश्वर है। सुल्तान की क्या हस्ती जो उसकी मर्जी के बिना किसी को कुछ दे दे। यदि तम देते हो तो ईश्वर की मर्जी से ही देते हो। यह कहते हुए बाबा मस्तराम ने तरबूज बदलने वाली सम्पूर्ण घटना कह सुनायी। वे बोले कि धन तरबूज में भरकर मेरे माध्यम से राहगीर को देने के लिए ईश्वर का आदेश था। सो तुमने पूरा लिया।
सुल्तान समझ गया कि उसने कितना बड़ा भ्रम पाल रखा है। उसे समझ में आ गया कि कर्ता एकमात्र भगवान ही है, कर्म के माध्यम भले ही अनेकों हों।
महाराजा वीरसेन धर्मभीरु होने के साथ ही अन्धविश्वासी भी थे। उन्होंने अपने दरबार में अनेक ज्योतिषी रखे थे। उनमें से एक प्रमुख ज्योतिषी भी थे, जिन्हें राजज्योतिषी की उपाधि प्राप्त थी।
राजा वीरसेन को उनकी विद्या पर पूरा भरोसा था। राजज्योतिषी जो काम कहते,महाराज वही करते। एक दिन वीरसेन का मन शिकार पर जाने का हुआ,लेकिन ज्योतिषी से पूछे बगैर तो उनका जाना असम्भव था। उन्होंने तुरन्त सेवक भेजकर ज्योतिषी महाराज को बुलवाया।
ज्योतिषी जी के आने पर राजा ने कहा-महाराज मेरी इच्छा शिकार खेलने की है। इस बारे में आपकी क्या सलाह है? ज्योतिषी जी देर तक अंगुलियों पर कुछ गिनते रहे, फिर बोले-महाराज-आप खुशी-खुशी शिकार पर जा सकते है। ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार आपको किसी तरह की परेशानी नहीं होगी।
ज्योतिषी की बात सुनकर राजा साथियों सहित अपने-अपने घोड़ों पर सवार होकर जंगल की ओर चल पड़े।
राज्य की सीमा पर स्थित जंगल में महाराज वीरसेन अपनी सेना के साथ पहुँच गए। वहाँ थोड़ी दूरी पर एक झोपड़ी भी थी। झोपड़ी के बाहर एक कुम्हार बैठा चाक पर बर्तन बना रहा था। राजा अपनी सेना के साथ कुम्हार की झोपड़ी के सामने पहुँच गया। प्रणाम करने के बाद राजा को बैठाने के लिए कुम्हार चारपाई ले आया। घड़े में साफ पानी भरकर उसने सबको पिलाया। सबको पानी पिलाने के बाद वह राजा के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और विनम्रता से पूछा-महाराज आपसे एक बात कहना चाहता हूँ।
कहो। राजा ने कहा।
आपको देखकर लगता है कि आप शिकार के लिए निकले है।
तुम सच कह रहे हो। मैं अपनी सेना के साथ शिकार पर निकला हूँ। महाराज। आप मेरा कहना माने तो यहाँ आगे मत जाइए। जाने पर आप मुश्किल में फँस सकते है।
राजा ने कहा, क्या पागलों जैसी बातें करता है। मुश्किल किस बात की होगी। हमारे राजज्योतिषी ने कहा है कि आप बिना किसी चिन्ता के शिकार पर जाइए। किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होगी और तुम कह रहे हो कि आगे जाने पर मैं मुश्किल में फँस जाऊँगा।
राजा की इस बात पर कुम्हार सहम गया। फिर भी वह डरते-डरते बोला-महाराज थोड़ी देर बाद बहुत तेज बरसात होने वाली है साथ ही तूफान भी बहुत तेज आएगा। इस स्थिति में इस घने जंगल में आप परेशान हो जाएँगे।
राजा क्रोधित हो उठा। गुस्से में बोला, तू मुझे सिखाने आया है। मेरे राजज्योतिषी ने जो कहा है। वह झूठ है। और तू अपढ़ कुम्हार जो कह रहा है वह सत्य है। जा तू अपना काम रहा है वह सत्य है। जा तू अपना काम कर, मैं शिकार पर जाऊँगा।
राजा की बात सुनकर कुम्हार निराश हो गया। राजा अपनी सेना के साथ जंगल की ओर शिकार के लिए चल पड़ा। बीच जंगल में पहुँचने पर काले-काले बादल आसमान में घिर आए। जंगल में अँधेरा छा गया। बहुत तेज हवा चलने लगी। आकाश में बिजली की चमक के साथ तेज बारिश शुरू हो गयी। अफरा-तफरी मच गई समूचे जंगल में। जानवरों की चीख-पुकार उस बियाबान जंगल में चारों तरफ से सुनायी पड़ने लगी। राजा अपनी सेना के साथ उस जंगल में फँस गया था। तेज हवा चलने से पेड़-पौधें टूटकर गिर रहे थे। सभी को डर लगने लगा। हर कोई सोच रहा था यदि कुम्हार का कहना मान लिया होता तो यह मुश्किल न आती।
तूफान शान्त हुआ, राजा निराश होकर सेना के साथ महल की ओर लौट पड़ा। राजा ने महल में पहुँचते ही राजज्योतिषी को बुलाया। राजज्योतिषी को राजा ने खूब खरी-खोटी सुनायी। इसी के साथ उसको नौकरी से निकाल दिया। उसके बाद राजा ने उस अनपढ़ कुम्हार को लाने के लिए सिपाही भेज दिया।
राजा ने कुम्हार का सम्मान करते हुए उसे राजज्योतिषी के आसन पर बैठने का आदेश दिया। गरीब अपढ़ कुम्हार अपना इस तरह सम्मान देखकर घबरा गया डरते हुए वह बोला महाराज मैं अपढ़ गरीब कुम्हार हूँ। मुझे ज्योतिषी के बारे में एक अक्षर भी नहीं मालूम। मैं भला आपको क्या सलाह दूँगा?
राजा बोला, अरे तुम्हें बहुत ज्ञान है। मैंने तुम्हारा कहना नहीं माना तभी तो जंगम में जाकर मुश्किल में फँस गया। यदि तुम्हारा कहना मान लिया होता तो मुझे जरा भी कष्ट नहीं होता। इसलिए तुम्हें आज से अपना राजज्योतिषी नियुक्त करता हूँ।
कुम्हार अब तक राजा की मनोवृत्ति से परिचय पा चुका था। उसने सोचते हुए कहा, लेकिन महाराज आँधी और तूफान की बात तो मैंने गधे से जानी थी। महाराज,जब बरसात, तूफान आते है तो मेरा गधा अपने दोनों कान खड़े कर देता है। गर्दन ऊपर की ओर उठाकर ढींचों-ढींचों की आवाज निकालता है। उस दिन भी उसने ऐसा ही किया था और मैंने आपको सूचना दे दी थी।
अब राजा वीरसेन के चमत्कृत होने की बारी थी। जबकि कुम्हार कहे जा रहा था, महाराज बेवकूफ समझा जाने वाला जानवर भी प्रकृति एवं परिस्थितियों के संकेतों को समझता है, जबकि हम इनसान होकर भी गूढ़ समस्याओं से जकड़े होने की वजह से इन्हें समरु नहीं पाते। विवेक मनुष्य की जीवन-ज्योति है। जो इसका इस्तेमाल करना जान सके। उसे किसी ज्योतिष की जरूरत नहीं। कुम्हार की इन बातों में महाराज वीरसेन को जीवन के प्रकाश अनुभव होने लगा था।
‘परोपकारायमिदं षरीरम्’
भारतीय धर्म-संस्कृति में परोपकार की बड़ी महिमा बताई गई है।
परोपकार का आशय है किसी का भला करना अथवा हित करना। मानव समाज एक-दूसरे की सहायता पर ही निर्भर है। जीवन धारण करने से लेकर जीवनयापन और समापन तक मनुष्यों को परस्पर सहयोग और सहायता की आवश्यकता पड़ती है। इसके अभाव में जीवन चल सकना सम्भव नहीं।
किन्तु इस प्रकार की समाजव्यापी सहायता और सहयोग को परोपकार नहीं कहा जा सकता। यह तो जीवन-निर्वाह की एक सार्वजनिक व्यवस्था है। इस सेवा और सहायता का आधार विनियम है। इसमें एक मनुष्य एक तरह से सहयोग करता है तो दूसरी तरह से उसका बदला पाता है। परोपकार का आधार त्याग एवं उत्सर्ग होता है। किसी की,की हुई किसी भलाई का जब किसी प्रकार का कोई मूल्य अथवा बदला नहीं लिया जाता तो वह सुकृत परोपकार कहा जा सकता है। इसी प्रकार के उपकार का आध्यात्मिक महत्व होता है और इसी का भारतीय धर्म-संस्कृति बखान किया गया है। परोपकार के बहुत से प्रकार और बहुत से रूप हो सकते है जिन्हें प्रथम द्वितीय और तृतीय श्रेणी में बाँटा भी जा सकता है। इस विभाजन को समझने के लिए तृतीय श्रेणी से चलिए।
तृतीय श्रेणी का परोपकार वह होता है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति का सामयिक हित होता है। जैसे किसी भूखे को भोजन करा देना, किसी रोगी अथवा आहत को अस्पताल पहुँचा देना, किसी याचक को पैसा दे देना, शीत पीड़ित को वस्त्र अथवा खोये को उसके गन्तव्य स्थान तक पहुँचा देने की सहायता कर देना आदि तृतीय श्रेणी परोपकार होता है। तृतीय श्रेणी के इन उपकारों से किसी का कोई सामयिक हित ही हो सकता है उसका कोई स्थायी हित नहीं होता ओर न इस प्रकार का उपकार किसी के जीवन को स्थिरता प्रदान कर सकता है। जिस उपकार से किसी को किसी के जीवन को स्थिरता प्रदान कर सकता है। जिस उपकार से किसी को जीवन विकास में जितनी कम सहायता मिलती है वह उतनी ही सामान्य कोटि का उपकार माना जाता है।
द्वितीय श्रेणी के परोपकार उनको कहा जा सकता है जिनसे किसी का दूरगामी हित होता है। जैसे किसी की नौकरी लगवा देना रोजगार में निःस्वार्थ सहायता करा देना किसी को घातक रोगों से मुक्ति दिला देना। किन्हीं व्यक्तियों अथवा परिवारों का वैमनस्य मिटा देना, किसी को निराशा अथवा निरुत्साह के अंधकार से निकाल देना अथवा किन्हीं की स्थायी शत्रुता को मिटा देना आदि सत्कर्म द्वितीय श्रेणी के परोपकार माने गये है।
द्वितीय श्रेणी के इन उपकारों से निश्चय ही किन्हीं को दूरगामी लाभ तो होता है तथापि जीवन-समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं होता। एक अवधि के बाद उपकृत के जीवन में पुनः उसी प्रकार की समस्याएँ उठ सकती है और और उसके लिए पुनः किसी उपकारी की आवश्यकता हो सकती है। द्वितीय श्रेणी के उपकारों से किसी को दूरगामी लाभ तो हो सकता है,किन्तु समस्याओं का स्थायी हल नहीं होता।
जिन उपकारों से मनुष्य का स्थायी हित होता है व अपने जीवन के विकास और उसकी समस्याओं का हल करने की क्षमता पाता है वह उपकार प्रथम श्रेणी का माना जाएगा। मनुष्य को इस योग्य बनने में सहायता देना कि उसे किसी पर निर्भर न रहना पड़े किसी का आश्रय न देखना पड़े और किसी का सहारा लेकर न खड़ा होना पड़े निस्सन्देह प्रथम श्रेणी के परोपकार है। इस श्रेणी में वे सारे उपकार आ जाते है जिनसे किसी में जीवन जीने की योग्यताओं का विकास होता है।
किसी को शिक्षा देना अथवा किसी को कोई रोजगार करा देना निश्चय ही प्रथम श्रेणी का परोपकार है। किन्तु यह धन-साध्य परोपकार है। ऐसे उपकारों का पुण्य ले सकना सब के सामर्थ्य की बात नहीं है। वही तो साधन-सम्पन्न तथा धनवान् व्यक्ति ही कर सकते है। किन्तु परोपकार का पुण्य सबके लिए वाँछनीय है और सभी क्यों न चाहतें। प्रथम श्रेणी का परोपकार करना। ऊँचे से ऊँचा परोपकार सबको ही करना चाहिए क्योंकि इसके बिना जीवन को उच्च गति नहीं मिलती।
अब प्रश्न यह है कि जो सामान्य व्यक्ति है जो साधन-सम्पन्न और धनवान् ही है तो वे क्या जीवन भर प्रथम श्रेणी का परोपकार कर सकने से वंचित ही रह जाएँगे? नहीं ऐसा नहीं। उपर्युक्त उपकारों के अतिरिक्त प्रथम श्रेणी के उपकारों के और भी प्रकार है, जिनका निर्वाह कोई भी सामान्य-से-सामान्य व्यक्ति कर सकता है। वे उपकार है ज्ञान-दान और गुण अथवा चरित्र निर्माण।
किसी को ज्ञान-दान करने के लिए किसी को धन अथवा साधनों की आवश्यकता नहीं रहती। आवश्यकता रहती है केवल इस बात की कि उपकारभावी व्यक्ति प्रयत्नपूर्वक स्वतः भी ज्ञान संचय करता रहे। भारतीय ऋषि-मुनियों के पास न कभी साधनों की प्रचुरता रही और न धन की,तथापि वे समाज के सर्वश्रेष्ठ उपकारी माने जाते है। संसार में सबसे अधिक सम्मान उनको मिला। अपने जीवनकाल में तो उनकी पूजा होती ही रही, आज हजारों वर्ष बीत जाने पर भी जन-मानस में उनका वही स्थान बना हुआ है।
भारतीय ऋषि-मुनियों को सर्वश्रेष्ठ उपकारी माने जाने का एकमात्र कारण यही है कि उन्होंने अज्ञान के अंधकार में भटकती हुई मानवता को ज्ञान का आलोक दिया। समाज के प्रति उनका यह बहुत बड़ा उपकार था। ज्ञान का आलोक पाया हुआ मनुष्य संसार के सारे सुखी कर पाता है। ज्ञान के आधार पर वह अपनी सारी समस्याएँ और कठिनाइयाँ स्वयं हल कर लिया करता है। इसके लिए उसे किसी का मुखोपक्षी नहीं बनना पड़ता और न किसी का सहारा खोजना पड़ता है। इसीलिए ज्ञान-दान को प्रथम श्रेणी का उपकार माना गया है।
ज्ञान-दान से बढ़कर संसार में कोई दान नहीं। जिसे यह प्राप्त होता है उसका जीवन कृतार्थ हो जाता है। धन अथवा साधन देकर किसी का उतना उपकार नहीं किया जा सकता, जितना कि ज्ञान देकर। किसी से धन की सहायता पाकर कोई मनुष्य माना कि अपना विकास कर सकता है रोजगार बढ़ा सकता है तब भी ज्ञान के अभाव में धन उसको वह वाँछित सुख नहीं दे सकता जिसकी मानव जीवन में अपेक्षा की जाती है। वह सुख-वह शाश्वत सुख तो केवल ज्ञान से ही प्राप्त हो सकता है जिसको पाकर आत्मा संतुष्ट हो पाती है। कोई व्यक्ति जीवन में कितनी ही उन्नति क्यों न कर ले किन्तु जब तक उसकी आत्मा को सुख-चैन नहीं मिलेगा उसका कल्याण न होगा-वह एक अभाव और अशाँति से निरंतर व्यग्र बना रहेगा।
इतना ही क्यों, अज्ञान की दशा में उसका धन और उसका भौतिक विकास अन्ततः उसके पतन का कारण बन जाएगा। ज्ञानहीन धनाढ्यता की दशा में संसार के नाशकारी भोग-विलास और विषय-वासना की अनुचित वृत्तियाँ मनुष्य पर अपना घेरा डाल देती है। उसमें इच्छाओं और तृष्णाओं का जंजाल उत्पन्न कर देती है। धन की सहायता की अपेक्षा ज्ञान की सहायता कहीं श्रेष्ठ है। भारतीय ऋषि-मुनियों ने मानव-समाज की यही तो सहायता की है जिसके लिए वे आज भी पूज्य बने हुए है और युग-युग तक मानवता उनका उपकार मानती रहेगी।
लेकिन वे आदरणीय मनीषी संसार का यह उपकार कर तभी सके है, जब उन्होंने पहले प्रचण्ड साधना द्वारा स्वतः ज्ञान का भण्डार एकत्र किया था। यों ही वे कुछ थोड़ी-सी पुस्तकें पढ़कर ही ज्ञानी नहीं बन बैठे थे। उन्होंने जीवन का अधिकाँश भाग अध्ययन मनन और चिंतन में लगाया। संयम और साधना द्वारा अपना विवेक परिपक्व किया था और अपने ज्ञान-भण्डार को अनुभव की तुला पर तौलकर प्रामाणिक बना लिया था और तब इतनी साधना करने के बाद वे समाज को ज्ञान-दान के योग्य हो पाये थे। उन्होंने उस ज्ञान के बल पर मानवता के प्रति सर्वश्रेष्ठ उपकार किया जिसके लिए वे तब भी पूजित रहे, आज भी है और आगे भी पूजनीय बने रहेंगे ज्ञानोपकार से बढ़कर संसार का कोई अन्य परोपकार है ही नहीं।
ज्ञान-दान से मनुष्य का सर्वांगीण अक्षय और स्थायी लाभ होता है। ऋषियों के दिए उस मूलभूत ज्ञान को ही आधार बनाकर मनुष्यता तब से अब तक विकास करती चली आ रही है। यदि उन पूर्व पुरुषों ने यही उपकार न किया होता और केवल अर्थ की साधना ही दिखाई होती केवल वही साधन खोजकर दिए होते, जिनसे शारीरिक भोगों की ही सुविधा हो सकी होती तो शायद मनुष्य अब तक मानव-पशु की अवस्था में ही होता। न तो उसे आत्मा का ज्ञान हो पाता और न ईश्वर का परिचय। शरीर ही उसकी आत्मा होती और शरीर ही परमात्मा जिसकी तृप्ति करते रहना ही उसकी पूजा होती। वह आज की तरह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को क्रम-क्रम से प्राप्त कर सकने का मार्ग न पाता। आज की सुन्दर सभ्यता, आनन्दमयी संस्कृति और कल्याणकारी धर्म, जिसके कारण हम मनुष्य संसार के सर्वश्रेष्ठ प्राणी बने है उन ऋषि-मुनियों का वह उपकार ही है जिसको उन्होंने ज्ञान-दान के रूप में हम पर किया है। ज्ञान-दान संसार का सर्वश्रेष्ठ उपकार है।
गुण अथवा चरित्र विकास भी प्रथम श्रेणी के उपकार माने गये है। यह भी ज्ञान-दान के अंतर्गत ही आते है। जो दिया हुआ ज्ञान मनुष्य को गुणी अथवा चरित्रवान नहीं बना सकता वह या तो ज्ञान नहीं है अथवा उसका देने वाला स्वयं चरित्रवान नहीं अन्यथा गुण एवं चरित्र तो ज्ञान के अनिवार्य अनुबन्ध है। ज्ञान के साथ उनका आ जाना अपरिहार्य होता है।
संसार का सर्वश्रेष्ठ उपकार करने के लिए मनुष्य को स्वयं ज्ञानी, गुणी तथा चरित्रवान बनना चाहिए और इन विशेषताओं को बिना किसी स्वार्थ अथवा लोभ के समाज में वितरित करना चाहिए। किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि जो सर्वश्रेष्ठ उपकार कर सकने की परिस्थिति में नहीं है, वह उपकार के कार्यों की ओर से विमुख अथवा उदासीन हो जाए। जो प्रथम श्रेणी का उपकार नहीं कर सकता उसको द्वितीय तृतीय श्रेणी का ही उपकार करते रहना चाहिए। समाज के जीवन और संसार के विकास के लिए परोपकार की प्रवृत्तियाँ बहुत आवश्यक है, वह चलती ही रहनी चाहिए-इससे लोकहित भी होगा और आत्म-कल्याण भी।
हमारी कोई सुनता नहीं, कहते-कहते थक गए, पर सुनने वाले कोई सुनते नहीं अर्थात् उन पर कुछ असर ही नहीं होता-मेरी राय में इसमें सुनने वाले से अधिक दोष कहने वाले का है। कहने वाले करना नहीं जानते। वे अपनी ओर देखें। आत निरीक्षण कार्य की शून्यता की साक्षी दे देगा। वचन की सफलता का सारा दारोमदार कर्मशीलता में है। आप चाहे बोलें नहीं, थोड़ा ही बोले पर कार्य में जुट जाइए। आप थोड़े ही दिनों में देखेंगे कि लोग बिना कहे आपकी ओर खिंचे आ रहे है। अतः कहिए कम, करिए अधिक।
पिछले दिनों ऐसा समय भी है जबकि धर्म को जादू-टोने या अन्धविश्वासों का घर बना दिया गया। लोग देवी-देवताओं की भूत-पलीतों की, मान्यताओं के साथ धर्म का सम्बन्ध जोड़ते रहे हैं और धार्मिक कर्मकाण्डों का इसलिए प्रयोग करते रहे है कि उनके माध्यम से किन्हीं अदृश्य और रहस्यमयी सत्ताओं को प्रलोभित या वशवर्ती करके उनसे वे सहायताएँ प्राप्त की जाएँ जिनकी हमारे दैनिक जीवन में आवश्यकता रहती है जिन्हें हम आसानी से पूरा कर नहीं पाते।
धर्म के साथ देवी-देवताओं का एक विशाल कलेवर इसीलिए जुड़ा हुआ है उनकी प्रसन्नता के लिए बहुत श्रम-साध्य एवं व्यय साध्य प्रतीकों का ढाँचा इसीलिए खड़ा किया गया है कि उन तथाकथित परोक्ष सत्ताओं की अनुकूलता का समुचित लाभ प्राप्त किया जा सकें इस प्रवृत्ति ने अगणित स्वभाव और स्वरूप के देवताओं का सृजन किया। धर्माधिकारी नेताओं ने अपने को उन देवताओं को वशवर्ती करने वाले मन्त्रों का ज्ञाता और अधिकारी बताया जिनके द्वारा स्वल्प प्रयत्न से अभीष्ट मनोरथ सहज ही सिद्ध होते है। चूँकि धर्माधिकारी बनना अति सरल और उसका लाभ अपरिमित था इसलिए अपनी प्रभुता को अग्रणी बनाने के लिए अपने-अपने अलग-अलग पंच चलाये और उस भिन्नता का पक्ष समर्थन करने के लिए पूर्व-परम्पराओं में कुछ ऐसे फेरबदल किये कि जिससे लोगों को उस नये धर्म के प्रति अधिक आकर्षण उत्पन्न हो सके। सम्प्रदायों के भेद-प्रभेद बढ़ने और उनकी शाखा-प्रशाखा फूटने के कारणों में प्रायः यही मानवीय दुर्बलता काम करती रही है। जिस प्रक्रिया का मूल प्रयोजन ऊँचा न हो उसके परिणाम अच्छे हो ही नहीं सकते। सम्प्रदाय-सम्प्रदाय के बीच दीवार ही खड़ी नहीं की गई वरन् इतनी कटुता भी भर दी गई कि एक धर्मानुयायी ने दूसरे धर्मानुयायी को पथभ्रष्ट, भ्रान्त, दुष्ट, शत्रु और यहाँ तक कि उसे वध करने योग्य करार दे दिया। इतिहास के कितने ही रक्तरंजित पृष्ठ इसी दुर्भाग्यपूर्ण धर्मावेश से भरे पड़े है जिनके कारण अगणित व्यक्तियों को कष्टकारक अपार यन्त्रणाएँ इसलिए दी गई कि वे लोग किसी दूसरे धर्म-सम्प्रदाय पर विश्वास करते थे इस तथाकथित धर्म मान्यता ने न जाने कितना विखंडन फैलाया और कितनों को ऐसे अकारण उत्पीड़न का शिकार बनाया जिसका वास्तव में कोई कारण या आधार नहीं था।
इन दुर्भाग्यपूर्ण धर्म विकृतियों को देखते हुए विचारशील लोगों में यदि धर्म के प्रति अश्रद्धा और खीज़ उत्पन्न हुई हो तो उसे अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। आज धर्म -प्रेमी और संकीर्णतावादी दोनों को एक ही अर्थ में लिया जाता है। कर्मकाण्डों के माध्यम से बड़ी -बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त करने के स्वप्न देखने वालों को यदि अन्धविश्वासी कहा जाने लगे और उनका उपहास किया जाने लगे तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।
विचारणीय प्रश्न यह है। कि क्या वास्तव में धर्म का प्रयोजन यही है जो आजकल फैला दिखाई पड़ता है। गहराई तक खोजने -समझने से विदित होता है कि वर्तमान में चारों ओर छितरे पड़े धर्म-कलेवरों की मूल धर्म भावना में काफी अन्तर है। वस्तुतः धर्म का मूल स्वरूप इतना आवश्यक एवं उपयोगी है कि यदि उसे व्यक्तिगत जीवन तथा समाज व्यवस्था की रीढ़ कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।
धर्म शब्द का अर्थ है -धारणा यहाँ धारणा से तात्पर्य उन आदर्शों की अन्तरंग में प्रतिष्ठापना से है जो व्यक्ति और समाज को श्रेष्ठता और सद्भावना की दिशा में प्रेरित करते हैं। धर्म का दूसरा अर्थ-अभ्युदय और निश्रेय अर्थात् उन गतिविधियों को अपनाया जाना जो कल्याण एवं प्रगति का शालीनता युक्त पथ प्रशस्त कर सकने वाली आस्था हो स्मृतिकारों ने धर्म को कर्तव्यपालन के अर्थ में लिया है। कर्तव्य से तात्पर्य उन उत्तरदायित्व से है जो निजी तथा सामाजिक जीवन में सौम्य सामंजस्य बनाये रखने की दृष्टि से किया जाय और जिससे स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ का अधिकार की अपेक्षा कर्तव्य पर ज्यादा ध्यान दिया जाय।इन अर्थों के प्रकाश में निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है। कि धर्म की मूल प्रेरक व्यक्ति को सदाचारी संयमशील सद्भावना - सम्पन्न एवं समाजनिष्ठ बनाये रखने की है। वस्तुतः यह प्रेरणाएँ ही वे आधारशिला है जिन पर व्यक्ति की समर्थता एवं समाज की सुव्यवस्था पूर्णतया निर्भर है।
कहा जाता है कि आसुरी और दैवी तत्वों के शैतान और भगवान के यम और सत के सम्मिश्रण से मनुष्य की रचना हुई है। उसमें श्रेष्ठता भी पर्याप्त हैं निकृष्टता भी कम नहीं जब श्रेष्ठता का उभार आता है तो व्यक्ति संत सज्जन महामानव भू -सुर एवं नर-नारायण जैसा दीखता हैं पर जब निकृष्टता उफनती है तो उसकी दुष्प्रवृत्तियाँ इतनी भयावह हो उठती है कि पशु और पिशाच भी उससे बहुत पीछे रहें जाते है। इन उफानों का संतुलन एवं नियंत्रण बनाये रखने के लिए अन्तः करण में जिस निष्ठा अंकुश की आवश्यकता पड़ती है उसी नियामक तत्त्वदर्शन के आस्था - शिलारोपण के दृष्टिकोण को धर्म कहा जा सकता है। आन्तरिक आस्था के अतिरिक्त मनुष्य जैसे अद्भुत बुद्धि एवं विलक्षण सूझ-बूझ वाले प्राणी को और किसी तरह कुमार्ग से बचने ओर सन्मार्ग पर प्रेरित करने के लिए अन्य कोई आधार हो ही नहीं सकता कानून दण्ड लोक -निन्दा आदि से बच निकलने के लिए उसके पास इतनी पगडंडियाँ मौजूद है तथा निकलने रहती है कि अनीति से रोका जा सकना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हैं। असुरता के उफान को रोकने और देवत्व की अभिलाषा को प्रोत्साहित करने के लिए जिस सर्वतोमुखी भावनात्मक निष्ठा को धर्म -धारण को तत्त्वदर्शी और महामनीषियों ने गढ़ा है निस्सन्देह उन्होंने विश्व -मानव की महान सेवा की है।
विश्वव्यवस्था का क्रम - संचालन ठीक तरह चलता रहे और व्यक्ति अपनी नैतिक मर्यादाओं का उल्लंघन न करने पावे इस प्रयोजन के लिए विनिर्मित की गई धर्म की मूल मान्यताएँ निस्संदेह हमारे लिए नितान्त उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है धर्म की दार्शनिक व्याख्या में नैतिक एवं सामाजिक उत्कृष्टता की भावनाओं और प्रवृत्तियाँ का ही समावेश है और उन्हें कोई सम्प्रदाय झुठला नहीं सका है मतमतान्तरों के अंतर्गत आने वाले क्रिया -कृत्यों अथवा रीति -रिवाजों में कितना ही अन्तर क्यों न ही -नैतिक मूल्यों के बारे में प्रायः सर्वत्र एकरूपता पाई जाती है सत्य प्रेम न्याय संयम दया उदारता सहिष्णुता सज्जनता निर्मलता जैसे सद्गुणों को धर्म की आत्मा कह सकते है।सम्प्रदाय व्यवस्थाओं को तो उनका वस्त्र -परिधान मात्र कहा जा सकता है। इन आवरणों पर अधिक ध्यान न दिया जाय -विशेषतया उन सन्दर्भों को नजरअंदाज कर दिया जाय जो अनैतिकता के अतिरिक्त केवल बाह्य मान्यताओं के कारण दूसरों के प्रति कठोर असहिष्णुता बनना सिखाती है उसी प्रकार अदृश्य शक्तियाँ -देवी -देवताओं की मनौती चुनौती को भी व्यक्ति गत रुचि की बात मान लिया ओर उस पर सैद्धान्तिक रूप से कुछ झंझट न खड़ा किया जाय तो सम्प्रदाय के विषैले विकृत अंश से बचा जा सकता है और उसके उपयोगी अंश से लाभान्वित हुआ जा सकता है
आज की परिस्थितियाँ में धर्म तत्व की मूल -भावनाओं के अभिवर्द्धन और परिपोषण की जितनी अधिक आवश्यकता है उतनी पहले कभी नहीं रही बौद्धिक ‘आर्थिक और वैज्ञानिक विकास के कारण जिन सुविधा -साधनों की वृद्धि हुई है उनने मनुष्य को अधिक लालची अधिक विलासी और साथ ही अधिक धूर्त बना दिया है फलस्वरूप कम काम करने अधिक लाभ उठाने और नीति अनीति का विचार किये बिना जैसे भी स्वार्थ सिद्ध होता है पूरा कर लेने की हविस बेतरह जाग पड़ी है धर्म का न रहने से यह दुष्प्रवृत्तियाँ इतनी अधिक पनपी कि उन्हें अब एक परम्परा एवं सहज स्वाभाविक माना जाने लगा हैं अपराधों के प्रति शासकीय नियन्त्रण एक तो वैसे ही प्रजातन्त्र में बहुत ढीला होता है अपराधियों को दण्ड -प्रतिशोध के भय से भी मुक्ति मिला गई है ऐसी दशा में जबकि सामाजिक और शासकीय प्रतिबंध बुरी तरह ढीले हो तो बढ़ती हुई अवांछनीयता को कौन रोके? दुष्प्रवृत्तियाँ से नष्ट होने वाली मानवीय प्रतिष्ठा एवं सम्पदा को रचनात्मक दिशा में कौन नियोजित करे? यदि में कुछ न किया जा सका तो दुष्प्रवृत्तियाँ व्यक्ति समाज शासन और अन्तर्राष्ट्रीय धूर्तता और संहारक अस्त्रों की घुड़दौड़ एक दिन मनुष्य जाति को सामूहिक आत्मा -हत्या के लिए विवश कर सकती है।
अन्धकार मय भविष्य की इन आशंका भरी संभावनाओं के बीच एक ही प्रकाश की किरण शेष रह जाती है कि धर्म -बुद्धि को धर्मवृत्ति को फिर से सजग और समर्थ बनाया जाय जनमानस में उन मूल्यों के प्रति निष्ठा उत्पन्न की जाय जो मानवीय गरिमा एवं श्रेष्ठता के मूलभूत आधार है।जन - आकांक्षाओं में सुख -साधनों की सत्ता - अधिकार की आतंक और अहंकार की जिस उद्धतता ने अधिकार जमा लिया है उसका परिमार्जन करके यदि आत्मा-गौरव के लिए आदर्श चरित्र की आवश्यकता का भाव जगाया जाय तो ही दिशा -परिवर्तन की आशा की जा सकती है यह परिवर्तन ही सर्वग्राही विनाश के पथ पर दौड़ती चली जा रही है। दुनिया को बचा सकने में समर्थ हो सकता है कहना न होगा कि धर्म श्रद्धा के पुनरुत्थान बिना यह प्रयोजन पूरा हो सकने और कोई उचित राह दिखाई नहीं पड़ती दूसरी राह उस अधिनायकवाद की है जिससे व्यक्तिगत स्वाधीनताओं का अन्त करके मनुष्य को सोचने से दूर मात्र कार्य कर्ता लौह मशीन के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाना है वह स्थिति तो आज की विडम्बना भरी दुर्दशा से भी अधिक भयावह सिद्ध होगी। अधिनायकवादी सर्वतोमुखी पराधीनता तो ऐसी है जिससे एक बार फँस जाने पर त्राण पाना अशक्य नहीं तो भावनाशील और विचारशील लोगों में से कोई भी पसन्द न करेगा।
मानवीय अन्तःकरणों में कुमार्गगामिता और उसकी प्रतिक्रिया -विद्वेष से ऐसी आग जला करती है जिससे वैयक्तिक जीवन का आनन्द -उल्लास एक प्रकार से नष्ट होता चला जा रहा है साधन-सम्पन्न होते हुए भी सुख -शान्ति की झलक किसी के जीवन में नहीं है सर्वत्र अशान्ति उद्वेग और असंतोष की ही आग सुलगती और धुएँ जैसी घटना पैदा करती दिखाई देती है सामाजिक जीवन में अपराध अनाचार छल असहयोग एवं अविश्वास की बाढ़-सी आ रही है और फलस्वरूप पग -पग पर विग्रह और रागद्वेष के ज्वालामुखी फुट रहे हैं। न व्यक्ति को सुख है न समाज में शान्ति नारकीय विद्रूपता इस संसार को अपंग ओर कुरूप बनाने पर तुली हुई है। इन परिस्थितियाँ में एक ही रास्ता शेष रह जाता है कि धर्म भावनाओं को पुह अमानवीय अन्तःकरणों में गहन श्रद्धा के रूप में पुनः प्रतिष्ठापित किया जाय और प्राचीनकाल जैसी धर्मपरायणता को वापस लाने के लिए भागीरथ प्रयत्न किया जाए। हमें धर्म की रक्षा के लिए कटिबद्ध होने चाहिए ताकि धर्म हमारी रक्षा करने में समर्थ सिद्ध हो सके।
स्वर्ग और नरक नाम के कोई नगर, ग्राम देश या स्थान कही भी नहीं है। सौरमण्डल के ग्रह-उपग्रहों को खोज लिया गया है। इस निखिल ब्रह्माण्ड के तारकों, महासूर्यों और आकाश गंगाओं की अद्यावधि जानकारियों में अब तक ऐसे किसी लोक के अस्तित्व की सम्भावना नहीं दीखती जैसी कि विविध धर्म-सम्प्रदायों में उनका अपने-अपने ढंग से उल्लेख किया है।
तब क्या स्वर्ग-आकार मात्र कल्पना भर है। कर्मों के फल प्राप्त करने के लिए कोई माध्यम नहीं है क्या? जिन कर्मों का फल इस जन्म में नहीं मिल सका उनके लिए ईश्वर के दरबार में कोई व्यवस्था नहीं है क्या? सद्गति और दुर्गति का कोई माध्यम न हो तो फिर शुभ कर्म और अशुभ कर्म करने वालों को तदनुरूप प्रतिफल कैसे मिलेगा? आदि अनेक प्रश्न उभर कर आते है और यह असमंजस उत्पन्न करते है कि यदि स्वर्ग-नरक का अस्तित्व था ही नहीं, तो धर्म-संस्थापकों ने इतना बड़ा उनका कलेवर रचकर खड़ा क्यों कर दिया?
हम जानना चाहिए कि स्वर्ग-नरक दोनों का अस्तित्व है और उनके माध्यम से शुभ-अशुभ कर्मों के फल मिलने की समुचित व्यवस्था मौजूद है। अन्तर केवल स्थान विशेष को है। सन्देहास्पद बात केवल इतनी भर है कि उनके लिए कही कोई नियत ग्राम या स्थान है या नहीं।
इहलोक हमारा प्रत्यक्ष क्रिया-कलाप और परलोक हमारा भावनात्मक दृष्टिकोण है। इन दोनों ही लोकों में कर्मफल मिलने की समुचित व्यवस्था मौजूद है। उसका निर्माण स्वसंचालित प्रक्रिया के आधार पर हुआ है। किसी बाहरी शक्ति के हस्तक्षेप की उसमें आवश्यकता नहीं है। यही व्यावहारिक भी था और तर्क संगत भी। एक छोटे से मुकदमें का फैसला कराने में कितने वकील, गवाह, जज, पुलिस आदि कार्यकर्ता लगते है। कितने कागज, सबूत इकट्ठे होते है और जेल-व्यवस्था के लिए कितने उपकरण इकट्ठे करने पड़ते है। मनुष्य जीवन में क्षण-क्षण पर भले-बुरे कर्म बनते है। एक दिन में ही उनके दण्ड-पुरस्कार की सैकड़ों फाइलें बन सकती है। जीवनभर में तो वे असंख्यों हो जाएँगी। फिर 600 करोड़ों से अधिक मनुष्य इस धरती पर मौजूद है। उन सबका लेखा-जोखा रखना और दण्ड-पुरस्कार का विधान बनाना इतना बड़ा हो जाएगा कि उसके लिए मनुष्य लोक से अधिक कर्मचारी लग जाएँगे। अस्तु अन्य सत्ता के माध्यम से दण्ड-पुरस्कार की व्यवस्था एक प्रकार से कठिन ही नहीं असम्भव भी है।
मनुष्य को जहाँ इच्छापूर्वक भले-बुरे कर्म करने की स्वतन्त्रता मिली है वहाँ उसकी प्रतिक्रिया उत्पन्न करने और परिणाम प्रस्तुत करने की स्वसंचालित समस्त सृष्टि में यही हो रहा है, बीज जमीन में बोया जाता है। खाद, पानी मिलते ही वह अंकुरित होता है और पौधा वृक्ष बनने लगता है। ईश्वर सर्वत्र समाया हुआ है, इसलिये यह कार्य ईश्वर करता है, यों कहने में भी हर्ज नहीं है। पर ईश्वर भी इतना झंझट कहाँ तक सिर पर लादता? उसने स्वसंचालित प्रक्रिया बनाकर अपना कर्मफल सम्बन्धी प्रयोजन सरल कर लिया है।
चक्की में ऊपर से अनाज डालते है नीचे आटा निकलता जाता है। कोल्हू में ऊपर से सरसों डालते ही तेल टपकने लगता है। मोटर में मीटर लगा रहता है और वह बताता रहता है। कि कितने मील चल लिए। यह स्वसंचालित मशीनों का जमाना है। बड़े-बड़े प्रिंटिंग प्रेस घण्टे में हजारों कागज इसी आधार पर छापते है। एक बार मशीन चला दी फिर सारा काम अपने आप वे मशीनें करती रहती है। इधर कच्चा माल डाला जाता रहता है उधर से तैयार बनकर निकलता रहता है।
कर्मफल की प्रक्रिया भी इसी तरह की है। बुरे कर्म के दुखद परिणाम जिन्हें नरक कहते है निश्चित रूप से मिलते है और भले कर्मों का सत्परिणाम जिन्हें स्वर्ग कहा जाता है मिलना भी उतना ही सुनिश्चित है। यह स्वसंचालित ढंग से होता रहता है। शरीर अपने कर्मफल की व्यवस्था स्वयं कर लेता है। बैठे रहिए, तोंद बढ़ जाएगी और चलना-फिरना कठिन। अपच, दिल की धड़कन आदि कितने ही कष्टकर रोग घेर लेंगे। श्रम करना धर्म है और हरामखोरी, पसीना न बहाना अधर्म। शारीरिक पाप किया बैठे रहने का उसका फल मोटापे के साथ जुड़े हुए कष्टों के रूप में सामने आ गया। अधिक खाया-पेट में दर्द, रात भर जगे-सिर में दर्द, नशा पिया-बदहजमी-जहर खाया-मौत स्नान करने में आलस-बदबू-जुए खाज। नियमित व्यायाम-पहलवान-पथ्य परहेज-निरोगता यह दण्ड-पुरस्कार की व्यवस्था शरीर अपने आप ही किसी बाहरी हस्तक्षेप के बिना स्वतः ही कर लेता है। कर्म करने की अपनी इच्छा-फल देने की उस स्वसंचालित ईश्वरीय सत्ता की इच्छा। दोनों का अन्योऽन्याश्रित सम्बन्ध है। कर्म कर लें उसके फल से बचे रहें यह नहीं हो सकता।
आलसी दरिद्री रहते है, प्रमादी के लिए प्रगति के द्वार बन्द हो जाते है। क्रोधी शत्रुओं से घिर जाता है, धूर्त मित्रों से वंचित हो जाता है बेईमान के सहयोगी बिछड़ जाते है उद्दण्ड को घृणा मिलती है अपव्ययी ऋणी बनता है यह दण्ड -व्यवस्था हर किसी को पग- पग पर अनुभव होती है और श्रेष्ठ कर्म करते हुए मनुष्य सम्माननीय यशस्वी सहयोग, सम्पन्न, समृद्ध सफल बनता है और उन्नति के उच्च शिखर पर जा पहुँचता है। स्वयं सुखी रहता है और दूसरों को सुखी बनाता है। यह कर्मफल की स्वर्ग-नरक प्रक्रिया निरन्तर सामने रहती है। पापी दुष्ट दुरात्मा राजदण्ड भुगतते हैं घृणास्पद बनते है और स्नेह-सहयोग से वंचित होकर मरघट के प्रेत पिशाच बने एकाकी घूमते है। यह घृणित जीवन नरक नहीं है तो क्या है? सेवाभावी सद्गुणी सन्त सज्जन धरती के देवता समझे जाते है और मरने के बाद भी वन्दनीय श्रद्धास्पद ही बने रहते है। उनकी यशगाथाएँ अनेकों को प्रेरणा भरा प्रकाश देती रहती है। इसे स्वर्ग प्राप्ति न कहें तो और क्या कहें? सम्मानास्पद श्रद्धा पात्र सज्जन और प्रामाणिक किसी व्यक्ति को माना जाय इससे बढ़कर सौभाग्य और सन्तोष की बात और क्या हो सकती है। इस प्रकार के कर्मफल प्राप्त करते रहने की, स्वर्ग-नरक जैसी प्रक्रिया हम निरन्तर फलित होती देखते रहते हैं।
कई व्यक्ति दूसरों को धोखा देकर अपनी वस्तुस्थिति छिपा लेने में प्रवीण बन जाते है और इस प्रकार पापकर्म करते हुए दूसरों द्वारा मिलने वाले दण्ड से बच निकलने की तरकीब निकालते है। यह चतुराई आजकल बहुत चल पड़ी है। इससे कुछ लाभ तो है, पर हानि उससे कही अधिक है। लाभ यह है कि सरकार की पकड़ में न आने पर राजदण्ड से बच जाते है। पाप प्रकट न हो तो दूसरों के द्वारा घृणा, निन्दा एवं विलगता से होने वाली हानि बच जाती है। पर इसमें जो छिपाव का ताना-बाना बुनना पड़ता है, वह अन्तरमन में एक विचित्र प्रकार की घुटन पैदा करता है। अन्तरमन की बनावट ऐसी है कि वह इस घुटन को पचा नहीं सकती।
हवा भरे गुब्बारे का पानी में जितने जोर से डुबाते है अवसर मिलते ही वह उसी वेग से उछलकर ऊपर आ जाता है। छिपे हुए पाप शारीरिक व्याधि और मानसिक आधि बनकर समय-कुसमय ऐसी बुरी तरह फूटते है कि चिकित्सा उपचार काम नहीं करते।
यह पाप शरीर और मन को कष्ट देने तक ही सीमित नहीं रहते वरन् अन्तरिक्ष में अनेक अदृश्य विपत्तियों का सृजन करते रहते है। पत्थर के कोयले की अँगीठी को कितने ही व्यक्ति ठण्ड से बचने के लिए कमरे में बन्द करके रख लेते है। तत्काल ठण्ड से तो बचत दीखती है, पर वहाँ की वायु में ऐसा विष भर जाता है जिससे सोते-सोते ही उनकी मौत हो जाती है। शरीर में चोट नहीं लगी बुखार आया नहीं मस्तिष्क की नस फटी नहीं सब कुछ ज्यों का त्यों, मौत का कुछ कारण मोटी आँख से दिखाई नहीं पड़ता। पर जानकार जानते है कि अँगीठी ने वायु में विष घोल दिया और वही मौत का कारण बना। ऐसे कितने ही अज्ञात प्रत्यक्ष कारण अनायास ही विपत्ति बनकर सामने आ जाते है, जिनका अपने तात्कालिक क्रिया-कलाप से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं दीखता। इसी प्रकार कई बार सुविधा-सफलताएँ भी मिल जाती है जिनके लिए उचित श्रम और प्रयत्न नहीं किया गया होता। यह असंगत अवरोध और अनुदान-दैव इच्छा एवं भाग्य का खेल बनकर सामने आते है। उनका प्रत्यक्ष कारण नहीं दीखता, पर परोक्ष कारण वह स्वसंचालित प्रक्रिया ही होती है, जिसने अपने कर्मों के फल अनुसार अन्तरिक्ष में धीरे-धीरे वातावरण बनाया और वह भले-बुरे अप्रत्याशित अवसर सामने आकर खड़े हो गये।
समय लग सकता है। आज का फल आज न मिलने से व्यक्ति भ्रम में पड़ सकता है और यह सोच सकता कि बुरे कर्म के दण्ड से बचे गये या भला कर्म निष्फल चला गया पर वस्तुतः ऐसा होता कभी नहीं। तुरन्त या कालान्तर में इसका रहस्य अज्ञात होने के कारण प्रत्यक्षवादी उतावले अनास्थावान् हो उठते हैं, पर यदि धैर्य रखा जाय तो प्रतीत होगा कि इसी जन्म में अथवा अगले जन्म में प्रत्येक कर्म का भला-बुरा परिणाम मिलना सुनिश्चित है।
उसी व्यवस्था-क्रम पर तो यह विश्व टिका हुआ है, यदि यह असंदिग्ध हो जाये तो फिर ऐसा अन्धेर फैले ऐसी अराजकता उपज कि कही कुछ सँभलना -सँभालना सम्भव न हो सके। फिर न कोई पाप से डर और न पुण्य का झंझट। दृष्टिकोण अपने आप में चित्त की प्रसन्नता -अप्रसन्नता सन्तोष -असन्तोष शान्ति -अशान्ति बनकर पग -पग पर फलित होता रहता है। सत्कर्म करने पर मन में अनायास ही सन्तोष और उल्लास उठता रहता है किसी कष्ट पीड़ित की सहायता अपना काम हर्ज करके यदि कर दी जाय तो भीतर एक परम सात्विक हलका और शीतल मलयज पवन जैसा आनन्द उठता अनुभव होगा। इसके विपरीत यदि चोरी ठगी अनीति बरतकर किसी को क्षति पहुँचाई गई होगी तो भीतर ही भीतर कोई खटमल पिस्सू की तरह काट रहा होगा और आत्मसन्तोष और आत्मधिक्कार अन्तः करण को बलिष्ठ और दुर्बल बनाते है और इसी आधार पर प्रगति के अगणित मार्ग खुलते और अवरुद्ध होते है। पापी का अन्तरात्मा दिन-दिन दुर्बल होता जाता है, दूसरों पर से ही नहीं, अपने पर से भी उसका विश्वास उठ जाता है।
अपने स्वल्प-उपार्जन से सादगी का जीवन जीते हुए सन्तुष्ट रहे, चरित्र उज्ज्वल रखे और दूसरों के प्रति स्नेह -सहयोग भरा दृष्टिकोण रखे, उसे निरन्तर अपने भीतर एक अमृत जैसी निर्झरिणी कल-कल ध्वानि से प्रवाहित होती हुई अनुभव होगी और लगेगा कि भावना क्षेत्र में स्वर्गीय सुषमा ही प्रादुर्भूत हो रही है।
मरने के बाद भी भले-बुरे कर्मों के दण्ड कितने ही प्रकार से मिलते होंगे। दो जन्मों के बीच सुखद और कष्टकर स्थिति रहती होगी, अगले जन्म उत्कृष्ट या निकृष्ट मिलते होंगे। स्वर्ग-नरक का स्थान भाव नगर ही सही, प्रतिफल की व्यवस्था मरणोत्तर जीवन में तत्काल भी रहती होगी। पर इस जन्म में तत्काल भी भले बुरे परिणाम मिलते रहते हैं और स्वर्ग-नरक की स्वसंचालित प्रक्रिया भी हमें नियन्त्रण में रहने और विवेकपूर्ण रीति-नीति अपनाने के लिए बाध्य करती रहती है।
समय की माँग के अनुरूप दो दबाव इन दिनों निरन्तर बढ़ते जा रहे है। एक व्यापक अवांछनीयताओं से जूझना और उन्हें परास्त करना। दूसरा है नवयुग की सृजन व्यवस्था को कार्यान्वित करने की समर्थता। निजी और छोटे क्षेत्र में भी यह दोनों कार्य अति कठिन पड़ा करते है फिर जहाँ समूचे देश समाज या विश्व का प्रश्न है वहां तो कठिनाई का अनुपात असाधारण रूप से बढ़ा-चढ़ा होना चाहिए।
प्रतिभा की निजी जीवन के विकास में भी निरन्तर आवश्यकता पड़ती है और अवरोधों क निरस्त करने में भी। जो आगे बढ़े, ऊँचे उठे है, उन्हें यह दोनों ही सरंजाम जुटाने पड़े है उत्कर्ष की सूझ-बूझ और कठिनाइयों से लड़ सकने की हिम्मत। इन दोनों के बिना उन्नतिशील जीवन जी सकना संभव ही नहीं होता। फिर सामुदायिक-सार्वजनिक क्षेत्र में सुव्यवस्था बनाने के लिए तो और भी अधिक प्रखरता चाहिए।
मनुष्यों की आकृति-प्रकृति तो एक जैसी होती है, पर उनके स्तरों में भारी भिन्नता पाई जाती है। हीन स्तर के लोग परावलम्बी होते है। वे आँखें बन्द करके दूसरों के पीछे चलते है। औचित्य कहाँ है, इसकी विवेचना-बुद्धि उनमें नहीं के बराबर होती है। वे साधनों के लिए मार्गदर्शन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते है। यहाँ तक कि जीवनोपयोगी साधन तक अपनी स्वतंत्र चेतना के बलबूते जुटा नहीं पाते। उनके उत्थान-पतन का निमित्त कारण दूसरे ही बने रहते है। यह परजीवी वर्ग ही मनुष्यों में बहुलता के साथ पाया जाता है। अनुकरण और आश्रय ही उनके स्वभाव का अंग बनकर रहता है। निजी निर्धारण वे कदाचित ही कभी कर पाते है यह हीन वर्ग है। दूसरा वर्ग है जो समझदार होते हुए भी संकीर्ण स्वार्थपरता से घिरा रहता है। योग्यता और तत्परता जैसी विशेषताएँ होते हुए भी वे उन्हें मात्र लोभ, मोह और अहंकार की पूर्ति के लिए ही नियोजित किए रहते है। उनकी नीति अपने मतलब से मतलब रखने की होती है। आदर्श उन्हें प्रभावित नहीं करते। कृपणता और कायरता के दबाव से वे पुण्य-परमार्थ की बात तो सोच ही नहीं पाते। अवसर मिलने पर अनुचित कर बैठने से भी नहीं चूकते। महत्व न मिलने पर वे अनर्थ भी कर बैठते है। गूलर के भुनगे जैसी स्वकेंद्रित जिन्दगी ही जी पाते हैं। बुद्धिमान और धनवान् होते हुए भी इन लोगों को निर्वाह भर में समर्थ प्रजाजन ही कहा जाता है। वे जिस-तिस प्रकार जी तो लेते हैं, पर श्रेय-सम्मान जैसी किसी मानवोचित उपलब्धि के साथ उनका कोई संबंध ही नहीं जुड़ता। उन्हें जनसंख्या का एक घटक भर माना जाता है। फिर भी दीन-हीनों की तरह परावलम्बी या भारभूत नहीं होते। उनकी गणना व्यक्तित्व की दृष्टि से अपंग अविकसित और असहायों में नहीं होती। कम-से-कम अपना बोझ तो उठा लेते है।
तीसरा वर्ग प्रतिभाशालियों का है। वे भौतिक क्षेत्र में कार्यरत रहते है, तो अनेक व्यवस्थाएँ बनाते है। अनुशासन में रहते और अनुबंधों से बँधे रहते है। अपनी नाव अपने बलबूते खेते है और उसमें बिठाकर अन्य कितनों को ही पार करते है। बड़ी योजनाएँ बनाते और चलाते है। कारखानों के व्यवस्थापक और शासनाध्यक्ष प्रायः इन्हीं विशेषताओं से सम्पन्न होते है। जिनने महत्वपूर्ण सफलताएँ पाई, उपलब्धियाँ हस्तगत की, प्रतिस्पर्धाएँ जीती, उनमें ऐसी ही मौलिक सूझ-बूझ होती है। बोलचाल की भाषा में उन्हें ही प्रतिभावान कहते है। अपने वर्ग का नेतृत्व भी वही करते है। गुत्थियाँ सुलझाते और सफलताओं का पथ प्रशस्त करते है। मित्र और शत्रु सभी उनका लोहा मानते है। मरुस्थल में उद्यान खड़े करने जैसे चमत्कार भी उन्हीं से बन पड़ते है। भौतिक प्रगति का उन्हें ही यदि विशेष श्रेय दिया जाय तो अत्युक्ति न होगी। सूझ-बूझ के धनी एक साथ अनेक पक्षों पर दृष्टि रख सकने की क्षमता भी तो उन्हीं में होती है। समय सब के पा सीमित है। कुछ लोग उस ऐसे ही दैनिक ढर्रे के कार्यों में गुजार देते है पर कुछ ऐसे भी होते है है जो एक ही समय में एक ही शरीर मस्तिष्क से अनेकों ताने-बाने बुनते और अनेकों जाल-जंजाल सुलझाते है सफलता और प्रशंसा उनके आगे-पीछे फिरती है। अपने क्षेत्र, समुदाय या देश की प्रगति ऐसे सुव्यवस्थित प्रतिभावानों पर ही निर्भर रहती है।
सबसे ऊँची श्रेणी देवमानवों की है जिन्हें महापुरुष भी कहते है। प्रतिभा तो उनमें भरपूर होती है लेकर लोक-मंगल के उच्चस्तरीय प्रयोजनों में नियोजित करते है। निजी आवश्यकताओं और महत्त्वाकाँक्षाओं को घटाते है ताकि बचे हुए शक्ति भण्डार का परमार्थ में नियोजित कर सकें। समाज के उत्थान और सामयिक समस्याओं के समाधान को श्रेय उन्हें ही जाता है। किसी देश की सच्ची सम्पदा वे ही समझे जाते है। अपने कार्यक्षेत्र को नन्दनवन जैसा सुवासित करते है। वे जहाँ बादलों की तरह बरसते है वही मखमली हरीतिमा का फर्श बिछा देते है। वे बसन्त की तरह अवतरित होते है। अपने प्रभाव से वृक्ष-पादपों को सुगंधित, सुरभित पुष्पों से लाद देते है। वातावरण में ऐसी उमंगें भरते है, जिससे कोयलें कूकने भौंरे गूँजने और मोर नाचने लगे। बसन्त ऋतु के आगमन पर हर किसी में उल्लास भरी मस्ती मुखर होती है। हर जगह बसन्तोत्सव मनाए जाते है। हर क्षण दिखने, सुनाई देने वाला हंसारूढ़ शारदा का मृदुल सितार वादन अन्तरिक्ष में गुँजित होते हुए अनुभव करते और आनन्द विभोर होते है।
बड़े कामों को बड़े शक्ति केन्द्र ही सम्पन्न कर सकते है। दल-दल में फँसे हाथी का हाथी ही खींचकर पार करते है। पटरी से उतरे इंजिन को समर्थ केन ही उठाकर यथास्थान रखती है। उफनते समुद्र में से नाव खे लाना साहसी नाविकों से ही बन पड़ता है। समाज और संसार की बड़ी समस्याओं को हल करने के लिए ऐसे ही वरिष्ठ प्रतिभावानों की आवश्यकता पड़ती है। पुल, बाँध, महल, किले जैसे निर्माण में मूर्धन्य इंजीनियरों की आवश्यकता पड़ती है। पेचीदा गुत्थियों को सुलझना किन्हीं मेधावियों से ही बन पड़ता है। प्रतिभाएँ वस्तुतः ऐसी सम्पदाएँ है जिनसे न केवल प्रतिभाशाली स्वयं भरपूर श्रेय अर्जित करते है वरन् अपने क्षेत्र, समुदाय और देश की अति विकट दीखने वाली उलझनों को भी सुलझाने में सफल होते है। इसी कारण भावनावश ऐसे लोगों को देवदूत तक कहते है। आड़े समय में इन उच्चस्तरीय प्रतिभाओं की ही आवश्यकता होती है। उन्हीं को खोजा उभारा और खरादा जाता है। विश्व के इतिहास में ऐसे ही महामानवों की यशगाथा स्वर्णिम अक्षरों में लिखी मिलती है।
वर्तमान समय विश्व इतिहास में अद्भुत एवं अभूतपूर्व स्तर का है। इसमें एक ओर महाविनाश प्रलयंकर तूफान अपनी प्रचण्डता का परिचय दे रहा है,तो दूसरी ओर सतयुगी नवनिर्माण की उमंगें भी उछल रही है। विनाश और विकास एक दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी है तो भी उनका एक ही समय में अपनी-अपनी दिशा में चल सकना संभव है।
इन दिनों आकाश में सघन तमिस्रा का साम्राज्य है, तो दूसरी ओर ब्रह्ममुहूर्त का आभास भी प्राची में उदीयमान होता दीख पड़ता है। इन दोनों के समन्वय को देखते हुए ही अपना समय युगसंधि का समय माना गया है। ऐसे अवसरों पर किन्हीं प्रखर प्राणवानों को ही अपनी सही भूमिका निभानी पड़ती है।
त्रेता में एक ओर रावण का आसुरी आतंक छाया हुआ था। दूसरी ओर रामराज्य वाले सतयुग की वापसी अपनी प्रतिज्ञा का परिचय देने के लिए मचल रही थी। इस विचित्रता को देखकर को देखकर सामान्यजन भयभीत थे। राम के साथ लड़ने के लिए उन दिनों के किसी राजा की शासकीय सेनाएँ आगे बढ़कर नहीं आई। फिर भी हनुमान, अंगद के नेतृत्व में रीछ-वानरों की मंडली जान हथेली पर रखकर आगे आई और समुद्र सेतु बाँधने, पर्वत उखाड़ने, लंका उनके सहयोग को भावभरे शब्दों में भूरि-भूरि सराहा। इस सहायक समुदाय में गीध, गिलहरी, केवट, शबरी जैसे अल्प सामर्थ्यवानों का भी सदा सराहें जाने योग्य सहयोग सम्मिलित रहा। महाभारत के समय भी ऐसी ही विपन्नता थी। एक ओर कौरवों की अगणित संख्या वाली सुशिक्षित और समर्थ सेना थी दूसरी ओर पाण्डवों का छोटा-सा अशक्त दीखने वाला समुदाय फिर भी वृद्ध लड़ा गया। भगवान ने सारथी की भूमिका निबाही और अर्जुन ने गाण्डीव के तीर चलाए। जीत शक्ति की नहीं सत्य की, नीति की, धर्म की हुई। इन उदाहरणों में गोवर्धन उठाने में ग्वाल-बालों का सहयोग भी सम्मिलित है। बुद्ध की भिक्षु मण्डली और गाँधी की सत्याग्रही सेना भी इसी तथ्य का स्मरण दिलाती है। प्रतिभा ने नेतृत्व सँभाला तो सहायकों की कमी नहीं रही। संसार के हर कोने से हर समय में ऐसे चमत्कारी घटनाक्रम प्रकट होते है, जिनसे स्पष्ट होता है कि सत्य की शक्ति अजेय है। उच्चस्तरीय प्रतिभाएँ उसे गंगावतरण काल के जैसे प्रयोजनों में और परशुराम जैसे के ध्वंस प्रयोजनों में प्रयुक्त करती रही है।
ठन दिनों व्यक्तिगत समस्याओं का शिकंजा भी कम कसा हुआ नहीं है आर्थिक, सामाजिक, मानसिक क्षेत्रों पर छाई हुई विभीषिकाएँ सर्वसाधारण को चैन से जी सकने का अवसर नहीं दे रही है। इससे भी बढ़कर सार्वजनिक समस्याएँ है। संसार के सामने कितनी ही चुनौतियाँ है। बढ़ती हुई गरीबी, बेकारी, प्रदूषण,जनसंख्या वृद्धि परमाणु विकिरण, युद्धोन्माद का बढ़ता दबाव, अन्तरिक्ष क्षेत्र पर धूमकेतु की तरह अपनी विकरालता का परिचय दे रहा है। हिमप्रलय-जल-प्रलय-दुर्भिक्ष-भूकम्पों आदि के माध्यम से प्रकृति अपने प्रकोप का परिचय दे रही हैं प्रकृति अपने प्रकोप का परिचय दे रही है। मनुष्य की बौद्धिक भ्रष्टता और व्यावहारिक दुष्टता से वह बहुत कुपित है। भविष्यवक्ता इन दिनों की विनाश-विभीषिका की संभावना की जानकारी अनेक स्तरों पर देते रहे है। दीखता है कि वह महाविनाश कही अगले दिनों घटित ही तो होने नहीं जा रहा है।
पक्ष दूसरा भी है। इक्कीसवीं सदी की ऐसी सुखद संभावनाएँ है, जिन्हें सतयुग की वापसी कहा जा सके। इन दोनों ही प्रयोजनों में मानवी भूमिका का समावेश होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इस कार्य को मूर्धन्य प्रतिभाएँ ही सम्पन्न कर सकेंगी। ईश्वर धर्म के संरक्षण और अधर्म के विनाश का काम तो करते है। पर अदृश्य प्रेरणा का परिवहन तो शरीरधारी महामानव ही करते है।
आज उन्हीं की खोज है। उन्हीं को आकुल-व्याकुल होकर ढूँढ़ा जा रहा है। दीन-हीन और पेट-प्रजनन में निरत तो असंख्य प्रजाजन सर्वत्र बिखेर पड़े है। पर वे तो अपने ही भार से दबे है अपनी ही लाश ढो रहे है। युग-परिवर्तन जैसे सृजन और ध्वंस के महान प्रयोजन की पूर्ति के लिए प्राणवानों की आवश्यकता है। गोताखोर उन्हीं को इस खारे समुद्र में से मणि-मुक्तकों की तरह ढूँढ़ निकालने में लगे हुए है।
अक्टूबर 1988 अखण्ड ज्योति में प्रकाशित
दूध में मक्खन घुला तो होता है पर उसे अलग निकालने के लिये उबालने मथने जैसे कई कार्य सम्पन्न करने पड़ते है। प्राणवान प्रतिभाओं की इन दिनों अतिशय आवश्यकता पड़ रही है। जो कि इन समुद्र मन्थन जैसे युगसन्धि पर्व में अपनी महती भूमिका निभा सके अनिष्टकर अनर्थ से मानवीय गरिमा को विनष्ट होने से बचा सकें उज्ज्वल भविष्य की संरचना में ऐसा प्रचण्ड पुरुषार्थ प्रदर्शित कर सकें जैसे गंगावतरण के संदर्भ में मनस्वी भगीरथ द्वारा सम्पन्न किया गया था।
इन दिनों यह ढूँढ़ खोज ही बड़ा काम है। सीता को वापस लाने के लिये वानर समुदाय दसों दिशाओं में खोजने निकला था। समुद्र में उतरकर मणि मुक्तक खोजे जाते है। कोयल की खदानों में से खोजने वाले हीरे ढूँढ़ निकालते हैं धातुओं की खदानें इसी प्रकार धरती को खोद खोद कर ढूँढ़ी जाती है। दिव्य औषधियों के सघन वन प्रदेशों में खोजना पड़ता है। वैज्ञानिक प्रकृति के रहस्यों को खोज लेने भर का काम करते है। हाड़ माँस की काया में से देवत्व उदय साधना द्वारा गहरी खोज करते हुये ही सम्भव होना है महाप्राणों की इन दिनों इसी कारण भारी खोज हो रही है। उनके बिना युगसन्धि का महाप्रयोजन पूरा भी तो नहीं हो सकेगा। छोटी-सी बात सोंचे तो व्यक्ति की सामयिक एवं क्षेत्रीय समस्याओं का निराकरण भी वातावरण बदले बिना संभव नहीं हो सकता। संसार के अति निजी हो जाने से गुत्थियाँ भी वैयक्तिक न रहकर सामूहिक हो गयी है। उनका निराकरण व्यक्ति को कुछ ले देकर नहीं हो सकता। चेचक की फुंसियों पर पट्टी कहाँ बाँधते है? स्थायी उपचार तो रक्तशोधन की प्रक्रिया से ही बन पड़ता है।
प्रस्तुत चिंतन और प्रचलन में इतनी अधिक विकृतियों का समावेश हो गया है। कि उन्हें औचित्य एवं विवेक से सर्वथा प्रतिकूल माना जा सकता है। अस्वस्थता उद्विग्नता आक्रामकता निष्ठुरता स्वार्थान्धता संकीर्णता उद्दण्डता का बड़ों और छोटों में अपने अपने ढंग का बाहुल्य है। लगता है मानवी मर्यादाओं और वर्जनाओं की प्रतिबद्धता से इनकार कर दिया गया है। फलतः व्यक्ति का अनेकानेक संकटों और समाज का चित्र विचित्र समस्याओं का सामना करना पड़ता है। न कोई सुखी दीखता है न सन्तुष्ट। अभाव ओर बाहुल्य अपने अपने ढंग की विपत्तियाँ खड़ी कर रहे है।
इन सबसे जूझने के लिये एक सुविस्तृत मोर्चे बन्दी करनी होगी सामान्यजन तो अपनी निजी आवश्यकताओं उलझनों तक का समाधान नहीं कर पाते। फिर व्यापक बनी हर क्षेत्र में समाई विपन्नताओं से जूझने के लिये उनसे क्या कुछ बन पड़ेगा? इस कठिन कार्य को सम्पन्न करने के लिये विशिष्टतायुक्त प्रतिभाएँ चाहिये। बड़े युद्धों को जीतना वरिष्ठ सेनानायकों द्वारा अपनाई गयी रणनीति और सूझ बूझ के सहारे ही सम्पन्न हो पाता है। सामान्य लठैत साधनों के अभाव में सुविस्तृत क्षेत्र की सीमा सुरक्षा का दायित्व नहीं उठा सकते। यही बात बड़े सृजनों के सम्बन्ध में भी है। ताजमहल जैसी इमारत बनाने चीन की दीवार खड़ी करने के लिये वरिष्ठ लोगों की वस्तुस्थिति के साथ तालमेल बिठाकर चलने वाली नीति ही सफल होती है। उनके लिये आवश्यक साधन एवं सहयोग जुटाना भी हँसी खेल नहीं होता। बड़ी योजनाएँ बड़ी प्रतिभाएँ ही बनाती है। वे ही उतने भारी भरकम दायित्व उठाती है। बड़े प्रयास बड़ी शक्ति के सहारे ही सम्पन्न होते है छोटे तो समर्थन भर देते है।
इन दिनों दो कार्य प्रमुख है। विपन्नता से जूझना ओर उन्हें निरस्त करना। साथ ही नवसृजन की ऐसी आधारशिला रखना जिससे अगले ही दिनों सम्पन्नता बुद्धिमत्ता कुशलता और समर्थता का सुहावना माहौल बन पड़े। इक्कीसवीं सदी को दूरदर्शी लोग सर्वतोमुखी प्रगति की सम्भावनाओं से भरीपूरी मानते है। उस अवधि में सतयुग की वापसी पर विश्वास करते है। इस मान्यता के अनेकों कारण भी है। उनमें से एक यह है कि इन्हीं दिनों समर्थ प्रतिभाओं का सृजन उन्नयन और प्रखरीकरण तेजी से हो रहा है। सम्भवतः अदृश्य शक्ति का जो समय समय पर आड़े समय में बिगड़ता सन्तुलन संभालने के लिये अपने वर्चस्व का प्रकटीकरण करती रही है। कहना न होना कि तेजस्वी प्रतिभाएँ ही भौतिक समृद्धि बढ़ाने प्रगति का वातावरण उत्पन्न करने और अंधकार भरे वर्तमान को उज्ज्वल भविष्य में परिणत करने का श्रेय सम्पादित करती रही है। उन्हें ही किसी देश समाज एवं युग की वास्तविक शक्ति एवं सम्पदा माना जाता है। स्पष्ट है कि वे उदीयमान वातावरण में ही उगती और फलित होती है। वर्षा में हरीतिमा और वसन्त में सुषमा का प्राकट्य होता हैं प्रतिभाएँ अनायास ही नहीं बरस पड़ती न वे उद्भिजों की तरह उग पड़ती है। उन्हें प्रयत्नपूर्वक खोजा उभारा और खरीदा जाता है इसके लिये आवश्यक एवं उपयुक्त वातावरण का सृजन किया जाता है।
इन दिनों ऐसा ही कुछ चल रहा है। असन्तुलन को सन्तुलन में बदलने के लिये महाकाल की कोई बड़ी योजना बन रही है। उसे मूर्त रूप देने के लिये दो छोटे किन्तु अतिमहत्त्वपूर्ण कार्यक्रम सामने आये हैं कि आदर्शवादी सहायकों में उमंगों का उभरना और एक परिसर एक सूत्र में सम्बद्ध होना साथ ही कुछ नियमित एवं सृजनात्मक गतिविधियों को आरम्भ करना जो सद्विचारों को सत्कार्यों में परिणत कर सकने की भूमिका बना सके। दूसरा कार्य यह कि अनीति विरोधी मोर्चा खड़ा किया जायें उसे एक प्रयास से आरम्भ करके विशाल विकराल बनाया जाय। एक चिंगारी दावानल बनती है। छोटे बीज से वृक्ष बनते है। ध्वंस एवं सृजन दोनों को यही उपक्रम हैं एक कदम शालीनता के सृजन का दूसरा अनीति के दमन का सत्प्रवृत्ति संवर्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के दो मोर्चों पर दुधारी तलवार से दो स्तर की रीति नीति अपनाना। यही है वह अग्रगम्य जिस पर कदम कदम बढ़ाते हुये नवयुग का अवतरण संभव हो सकता है। उज्ज्वल भविष्य के सर्वतोमुखी प्रगति एवं चिरस्थायी शान्ति के लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। इसी स्थिति में पहुँचने पर सत्यमेव जयते का उद्घोष प्रचण्ड प्यासों का मार्ग पूरा करते हुये अपनी यथार्थता का परिचय दे सकता है।
इस महाजागरण से ही प्रतिभाओं की मूर्च्छना भागेगी। वे अंगड़ाई लेती हुई लम्बी मूर्छा छुड़ाने और दिनमान की ऊर्जा प्रेरणा से कार्यक्षेत्र में अपने पौरुष का परिचय देती हुई दृष्टिगोचर होगी। इस भवितव्यता को हम सब इन्हीं आँखों से अपने ही सामने मूर्तिमान् होते हुये देखेंगे।
प्रयत्नपूर्वक खदानों से हीरे खोज तो लिये जाते है पर उन्हें चमकदार बहुमूल्य और हार में शोभायमान स्थान पाने के लिये खरीदना अनिवार्य रूप से आवश्यक होता है धातुएँ अनेक बार के अग्नि संस्कार से ही संजीवनी जैसे रसायनों के रूप में परिणत होती है। पहलवान अखाड़े लम्बा अभ्यास करने के उपरान्त ही दंगल में विजयश्री वरण करते है। तैराकी जीतने वाले चिरकाल तक अभ्यासरत रहते है। सोना तपाने के उपरान्त ही चमकदार बनता है। शिल्पी और कलाकार अपने विषय में प्रवीण पारंगत बनने के लिये लम्बे समय तक अभ्यासरत रहते है। पत्थरों पर घिसे जाने के उपरान्त ही हथियार औजारों की धार में तीक्ष्णता आती है। प्रतिभाओं का प्रशिक्षण और परिवर्धन आदर्शवादी गतिविधियों में बढ़ चढ़कर भूमिका निभाने के उपरान्त ही सम्भव हो पाता है। इस तथ्य के अनुरूप जहाँ प्रतिभाओं को खोजा जा रहा है वहाँ उनकी प्रखरता निखारने के लिये ऐसे कार्यों में जुटाया भी जा रहा है जिनके कारण उनका ओजस तेजस और वर्चस जाज्वल्यमान हो सके। विश्वमित्र ने दशरथ पुत्रों को युगसृजन प्रयोजन के लिये उपयुक्त समय पर उनकी तेजस्विता उभारने के लिये यज्ञ की रक्षा करने और असुरों से जूझने का काम ही सौंपा था। हनुमान अर्जुन आदि ने ऐसी ही अग्निपरीक्षाओं से गुजरते हुये असाधारण गौरव पाया था। इससे बच कर किसी पर भी महानता आकाश से नहीं बरसी है। पराक्रम से जी चुराने वाले तो कृपणों प्रमादियों की तरह मात्र हाथ ही मलते रहते है।
इन दिनों जन्मान्तरों से संचित सुसंस्कारों वाली प्रतिभाएँ खोज निकाली गई है। उन्हें युगचेतना के साथ जोड़ा गया है। इन्हें नवसृजन साहित्य के माध्यम से पुष्प वाटिका में मधु मक्खियों की तरह दिव्य सुगन्ध ने आमंत्रित किया है और उसी परिकर में छत्ता बनकर रहने के लिये सहमत किया है। प्रज्ञा परिवार को इसी रूप में दिखा समझा और आँका जा सकता है।
प्रज्ञा परिजनों का युग सृजन का लक्ष्य लेकर अवतरित हुई दिव्य आत्माओं का समुदाय का जा सकता है। वे अन्तरात्मा का अमृत पिलाने वाले युगसाहित्य का रसास्वादन करते रहे हे। मिशन की पत्रिकाएँ नियमित रूप से पढ़ते रहे है। युगचेतना की भावभरी प्रेरणा का यथासंभव अनुसरण भी करते रहे हे। उनके अब तक के योगदान को परमार्थ पुरुषार्थ को मुक्त कण्ठ से सराहा जा सकता है। पर बड़े प्रयोजनों के लिये इतना ही तो पर्याप्त नहीं समय की बढ़ती माँग को देखते हुये बड़े कदम भी तो उठाने पड़ेंगे। बच्चों का छोटा-सा पुरुषार्थ भी अभिभावकों द्वारा भली भांति सराहा जाता है पर युवा होने पर बचपन की पुनरावृत्तियाँ करते रहने भर से कौन यशस्वी बनता है।
प्रियजनों के पिछले योगदान का मूल्याँकन घटाया नहीं जा रहा है पर इतने भर से काम तो नहीं चलता बात तो नहीं बनती महाकाल की अभिनव चुनौती स्वीकारने के लिये उतने पर ही सन्तोश नहीं किया जा सकता जो पिछले दिनों हो चुका है यह लम्बा संग्राम है संभवतः प्रस्तुत परिजनों के जीवनभर चलते रहने वाला। इक्कीसवीं सदी आरम्भ होने में अभी 10 वर्ष से भी अधिक समय षेंश हैं इस युग सन्धिवेला में तो हम सबको उस स्तर की तप−साधना में संलग्न रहना है जिसे भगीरथ ने अपनाया और धरती पर स्वर्गस्थ गंगा अवतरण संभव कर दिखाया था। महामानवों के जीवन में कहीं कोई विराम नहीं होता। वे निरन्तर अनवरत गति से शरीर छूटने तक चलते ही जाते है। इतने पर भी लक्ष्य पूरा न होने पर जन्म जन्मान्तरों तक उसी प्रयास में निरत रहने का संकल्प संजोये रहते है इसी परम्परा का निर्वाह उन्हें भी करना है जिन्हें अपनी प्रतिभा निखारनी और निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र में ऐसी उपलब्धियाँ कमानी हो जिन्हें प्रेरणाप्रद अनुकरणीय अभिनन्दनीय एवं अविस्मरणीय कहा जा सके।
कमल पुष्प सामान्य तालाब में उगने भी अपनी पहचान अलग बनाते और दूर से देखने वालों के मन में भी अपनी प्रफुल्लता की प्रतिक्रिया उत्पन्न करते है। अपना स्वरूप एवं स्तर ऐसा ही होना चाहिये।
जनसाधारण के बीच प्रतिभाशाली अलग से चमकते है जैसे पत्तों व काँटों के बीच फूल जैसे तारों के बीच चन्द्रमा। यह जन्मजात उपलब्धि नहीं और न किसी का दिया हुआ वरदान। इसे भाग्यवश मिला हुआ आकस्मिक संयोग सुयोग भी नहीं कहा जा सकता। यह स्वउपार्जित सम्पदा है। इस कार्य में दूसरे कुछ सहायक तो हो सकते है पर प्रधानता अपने ही प्रबल प्रयास की रहती है।
धन आता है और चला जाता है। रूप यौवन भी सामयिक है। उसका संबंध चढ़ते खून से हैं किशोर और तरुण ही सुन्दर दीखते है इसके बाद ढलान आरम्भ होते ही अवयवों में कठोरता और चेहरे रुक्षता की हवाइयाँ उड़ने लगती ही। विद्या उतनी ही स्मरण रहती है जितनी कि व्यवहार में काम आती है मित्र सहयोगी संबंधी सहायकों के मन बदलते रहते है। आवश्यक नहीं कि उनकी घनिष्ठता सदा एक सी बनी रहे। अधिकार भी चिरस्थायी नहीं है। समर्थन घटते ही वे दूसरे के हाथों चले जाते है वयोवृद्धों की उत्पादन की परिश्रम की क्षमता घट जाती है ऐसी दशा में उन्हें निरुपयोगी मानकर उपेक्षा अवज्ञा बरती जाने लगती है। आयु वृद्धि के साथ साथ स्मरण शक्ति ओर स्फूर्ति भी जवाब देने लगती है ऐसी दशा में तब कोई बड़ी योजना बनाना और उसे चलना पूरी करके दिखाना भी वश से बाहर हो जाता है यह सब मरण से पूर्व के लक्षण ही है। जीवनीशक्ति का भण्डार धीरे धीरे चुकाता है और वह अन्ततः जवाब दे जाता है।
विकासोन्मुख शरीर चढ़ते खून और परिपक्व व्यक्तित्व वाले दिनों में ही रहता है उसे भले ही कोई आलस प्रमाद में गुजार दे भले ही कोई लिप्सा लालसा की वेदी पर विसर्जित कर दे। कोई कोई तो उन दिनों भी अतिवादी उद्दण्डता दिखाने से नहीं चूकते। यह सब शक्तियों और संभावनाओं के भाण्डागार मनुष्य जीवन के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। दूरदर्शी वे है जो विभूतियों में सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा को मानते है और उसके सम्पादन हेतु प्राणपण से प्रयत्न करते है क्योंकि वही हर स्थिति में साथ रहती है अपनी तथा दूसरी की गुत्थियाँ सुलझाती है और जन्म जन्मान्तरों तक साथ रहकर क्रमशः अधिकाधिक ऊँचे स्तर वाली परिस्थितियों का निर्माण करती रहती है। इस उपार्जन के लिये किये गये प्रयत्नों को ही हर दृष्टि से सराहा और स्वर्ण सम्पदा की तरह किसी भी बाज़ार में भुनाया जा सकता है। भौतिक प्रगति में भी उसी के चमत्कार दीखते है और आदर्शवादी परमार्थ अपनाने पर हस्तगत होने वाली महानता को भी उसी के सहारे विकसित परिष्कृत होते हुये देख जा सकता है।
प्रतिभा परिष्कार के कुछ मूलभूत सिद्धान्त है। उन्हें सभी को समझने हृदयंगम करने का प्रयत्न करना चाहिये जो समुन्नत सुसंस्कृत एवं चाहिये जो समुन्नत सुसंस्कृत एवं यशस्वी सफल जीवन जीने के लिये इच्छुक है।
प्रथम सिद्धान्त अथवा आधार है क्षमताओं का अभिवर्द्धन उनके लिये निरन्तर तत्परता का तन्मयता का सुनियोजन। आलस्य प्रमाद से बचकर सदा जागरूक और स्फूर्तिवान् बने रहना। एक एक क्षण को बहुमूल्य मानकर उन्हें सदुद्देश्यों के लिये सुनियोजित रखने के लिये योजनाबद्ध आकलन यही है व मनः स्थिति जिसे महाजागरण कहते है आमतौर से लोग अर्द्ध−तंद्रा की स्थिति में जिन्दगी को दर्द की तरह जीते है। निर्वाह साधन पालने भर से उन्हें संतोष हो जाता है। वे भाव तरंगें उठती ही नहीं जो आज की तुलना में कल को अधिक परिष्कृत बनाने के लिये लालायित रहती और प्रयत्नरत होती है। प्रतिभा के उपासक इस दलदल से उबरते है और अपने को व्यवस्थित करके बिखरती रहने वाली क्षमताओं को बचाकर उन्हें मूल्यवान पूँजी की तरह एकत्रित करते हैं। जो हस्तगत है उसका श्रेष्ठतम उपयोग करते है। यही है कल्पवृक्ष का उत्पादन एवं उसका उद्देश्यपूर्ण सदुपयोग क्रियान्वयन।
दूसरा चरण है अपने व्यक्तित्व को चुम्बकीय आकर्षक एवं विश्वस्त स्तर का विकसित करना। यह मनुष्यत्व के साथ जुड़ने वाला प्राथमिक गुण है। इसके लिये अपना रहन सहन ऐसा बनाना पड़ता है जैसा जागरूक जिम्मेदार और सज्जनता सम्पन्नों का होना चाहिये। शरीर और मन को स्वच्छ रखना तो आवश्यक है ही शिष्टाचार का निर्वाह और वाणी में मधुरता का गहरा पुट लगाये रहना भी आवश्यक है। इसके लिये अपनी नम्रता का परिचय देना और दूसरों को सम्मान देना आवश्यक हैं। उसे वे ही कर पाते हैं जो दूसरों के गुण देखकर उनसे प्रेरणा ग्रहण करते रहते है साथ ही अपनी त्रुटियों को खोजते एवं उनके निष्कासन परिष्कार में लगे रहते है। ओछे व्यक्ति अपने संबंध में शेखी बघारते और दूसरों के दोष गिनाते रहते है। उसी जंजाल में उनका चिन्तन और वर्चस्व घटता और समाप्त होता रहता है।
प्रतिभावानों के होठों पर मंद मुसकान देखी जाती है इसी आधार पर यह जाना जाता है कि वे अपने आप में सन्तुष्ट और प्रसन्न हैं दूसरे भी ऐसे ही लोगों का सहारा ताकते और साथ देते है। खीजते और खिजाते रहने वालों को दूर से ही नमस्कार करके कन्नी काटने को जी करता है। जिन्हें अपना सही
मूल्याँकन कराना है वे प्रकार की भूलें नहीं करते। यदि वे आदत में सम्मिलित हो गई हो तो उन्हें बुहार फेंकने की मुस्तैदी दिखाते है।
तीसरा चरण है सुव्यवस्था। अस्त व्यस्त स्थिति में प्रचुर साधन रहते हुये भी लोग असफल रहते और उपहासास्पद बनते है। प्रतिभाएँ क्षण क्षण में अपने कार्यों और नियोजनों की समीक्षा करती रहती है और उन्हें सही बनाने के लिये जो हेर फेर करना आवश्यक होता है उसे बिना हिचक तत्परतापूर्वक करती है। जड़ता हठवादिता के शिकंजे में जकड़ने का उन्हें तनिक भी आग्रह नहीं होता। वे जानते है कि प्रगतिशीलों को सदा परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति बनानी और चलते ढर्रे में आवश्यक सुधार लाने की चेष्टा करनी पड़ती है। सुव्यवस्था इसी प्रकार बन पड़ती है जो अपने समय का श्रम साधनों का विचारों का परिवार परिकर का सुनियोजन कर सकता है ओर उन्हें सही दिशा दे सकने में समर्थ हो सकता है उसी को इस योग्य समझा जाता है कि वह कोई बड़ी या अतिरिक्त जिम्मेदारी को वहन कर सके। किन्हीं बढ़ी चढ़ी महत्त्वाकाँक्षाओं को सजाने से पूर्व यह प्रमाण देना पड़ता है कि व्यक्तित्व परिकर एवं क्रिया–कलापों में किस सीमा तक व्यवस्था बुद्धि का उपयोग किया गया और कितना सफल समुन्नत दिखाया गया।
चौथा व अंतिम सूत्र है अग्रगम्य नेतृत्व। यह उत्साह साहस और आत्म विश्वास का प्रतीक है। साधारण जन आत्महीनता से ग्रसित एवं झिझक संकोच अनिश्चय एवं साहसहीनता की मनः स्थिति में पड़े पाये जाते है वे उचित कार्यों के लिये भी कदम बढ़ाने का साहस नहीं कर पाते। अधिक से अधिक इतना ही सोचते हैं कि कोई आगे बढ़े तो उसके पीछे चलने लगे। उचित अनुचित का अन्तर तो बहुत लोग जानते हैं पर इतना साहस नहीं संजों पाते कि जो उचित है उसी को अपनाते हुये अग्रगमन का कदम उठाये। ऐसे लोग उचित निष्कर्ष निकाल लेने पर भी उस मार्ग का अवलम्बन नहीं कर पाते। उसे अनुपयुक्त मानते हुये भी उस परिधि से एक कदम आगे भी नहीं रख पाते। ऐसों के बीच उन्हीं को मनस्वी माना जाता है जो उचित के प्रति अटूट आस्था रखें और जो करना चाहिये उसे अन्यों का समर्थन सहमति न मिलने पर भी एकाकी कर दिखायें इसे दूध गरम करते ही मलाई के तैरकर ऊपर आ जाने के समकक्ष समझा जा सकता है।
प्रतिभाएँ अपने अग्रगमन की क्षमता का एकाकी बढ़कर प्रमाण प्रस्तुत करती है। फिर सर्वत्र उनकी मनस्विता का लोहा माना जाने लगता है। दूसरे लोग भी उनका अनुकरण करते है जिनकी जिम्मेदारियाँ भारी है वे ऐसे ही लोगों को तलाश करती रहती है। प्रामाणिकता की परख होने पर सब ओर से एक से एक बढ़कर भारी भरकम जिम्मेदारियों उनके ऊपर आग्रहपूर्वक डाली जाने लगती है वे उन्हें बिना अचकचाये स्वीकार करते और जो कार्य कंधे पर लिया गया है उसे सर्वांगपूर्ण ढंग से सम्पन्न कर दिखाते है।
दूरदर्शी विवेकवान अपनी श्रेष्ठता को विकसित करते है और अपने आदर्शवादी क्रिया–कलापों के आधार पर प्रामाणिक माने जाते और विश्वस्त बनते है। जिनने उच्चस्तरीय सफलतायें पाई उनका अनुकरण करते और सहयोग देते असंख्यों देखे जाते हैं इसलिये प्रतिभा की महासिद्धि की साधना करने वाले अपने चरित्र की प्रामाणिकता को हर हालत में बनाये रहते है भले ही उसके लिये अभावग्रस्त स्थिति में रहना पड़े और तात्कालिक मिल सकने वाली सफलता से वंचित रहना पड़े।
प्रतिभा तत्संबंधी सिद्धान्तों का मनन चिन्तन करते रहने भर से हस्तगत नहीं होती। उनको नहीं होती। उनको स्वभाव का अंग बनाना पड़ता है। चिन्तन चरित्र और व्यवहार में उन्हें भली प्रकार समाविष्ट करना पड़ता है। यह कार्य प्रत्यक्ष क्रियान्वयन के बिना संभव नहीं होता। विचार वे ही प्रौढ़ एवं प्रखर होते है। जो क्रिया में उतरते रहते हैं। डायनेमो घूमता है तो बैटरी चार्ज होती है। विचारों और कार्यों के समन्वय से ही व्यक्तित्व का स्तर बनता है और उसी आधार पर सफलता के क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण गौरव हस्तगत होता है। यह ही वह हुण्डी है जिसे किसी भी हाथों हाथ भुनाया जा सकता है। बड़े काम कर गुजरने वाले जन्मजात विभूतियाँ साथ लेकर कदाचित ही कोई आते है।हर किसी को यह उपलब्धि अपने मनोयोग और प्रचण्ड प्रयास के आधार पर ही हस्तगत करनी होती है। साँसारिक दृष्टि से प्रत्यक्ष दीख पड़ने वाले बड़े कार्य भी ऐसे ही लोगों ने संपन्न किये है। बहुमुखी सफलताओं का श्रेय उन्हीं पर बरसा हैं ऐसे ही लोग समाज को स्थिरता देते और अवांछनीय उलटे प्रचलनों को उलटकर ठीक कर दिखाते हैं समय का कायाकल्प करते वातावरण में नवजीवन का प्राण−प्रवाह भरते ऐसे ही लोगों का देखा जाता है।
प्रतिभा परिवर्धन का प्रशिक्षण देने वाले कोई स्कूल कॉलेज कहीं नहीं है। इसके लिए निर्धारित सिद्धान्तों को व्यवहार में उतारने के लिये अवसर और वातावरण स्वयं तलाशना पड़ता है। उस प्रकार के अवसर कहीं एक जगह एकत्रित नहीं मिलते उन्हें दाने बीनने वाले की तरह झोली में भरना पड़ता है। पर इन दिनों एक ऐसा सुयोग सामने है जिसके साथ संबंध सूत्र जोड़ने पर हर किसी को वह सुयोग हस्तगत हो सकता है जिसके सहारे प्रतिभा सम्पादन का सौभाग्य अनायास ही हस्तगत हो सके। ऐसे सुयोग कभी कभी ही सामने आते है। हनुमान ने समय पहचाना और वे थोड़े ही समय पहचाना और वे थोड़े ही समय समुद्र लाँघने पर्वत उखाड़ने और लंका को मटियामेट बनाने का श्रेय प्राप्त कर सके। इसे समय की पहचान ही कहना चाहिये यदि उस सुयोग का लाभ उठाना उनसे न बन पड़ता तो सुग्रीव सेवक वानर रहकर ही उन्हें भी दिन गुजारने पड़ते।
गाँधी युग में जो सत्याग्रही उभर कर आए वे स्वतंत्रता सेनानी कहलाये। यशस्वी बने ताम्रपत्र पेन्शन और आवागमन के मुफ्त पास प्राप्त करने के लाभों से गौरवान्वित हुये। जा उनमें वरिष्ठ और विशिष्ट थे। वे देश का शासन का सूत्र संचालन करने वाले मूर्धन्य बने। बापू के संपर्क में रहे नेहरू पटेल जैसे अनेकों रत्न ऐसे है जिनके स्मारकों को नमन किया जाता है। इतिहास के पृष्ठों पर यशोगाथा पढ़कर भाव विभोर हुआ जाता है यह उनकी प्रचण्ड प्रतिभा का ही प्रतिफल था यदि वे संकीर्ण स्वार्थपरायणों की तरह अपने मतलब से ही मतलब रखते तो मात्र कुछ सुख साधनों से मन बहला पाते। प्रकाश स्तम्भ बनने के सुयोग सौभाग्य से तो उन्हें वंचित ही रहना पड़ता। जो उन दिनों कृपणता धारण किये रहे,उन्हें अग्रगामियों के साथ अपनी तुलना करते हुए पश्चाताप ही होता है और माया मिली न राम वाली अपनी मूर्खता पर पश्चाताप ही करते रहते है। पर बीता हुआ समय पुनः लौटता कहाँ है? देर से जागने वाले पर हाथ ही मलते रहते हैं।
बुद्ध गाँधी दयानन्द विवेकानन्द विनोबा जैसों की महान उपलब्धियाँ स्मरण करके हर विचारशील का अन्तःकरण उमगता है कि यदि उन्हें भी ऐसा ही श्रेय मिल सका होता तो कितना अच्छा होता। उस अवसर को गँवाकर वे जिस ललक लिप्सा की पूर्ति का दिवा स्वप्न देखते रहते है उसे भी कौन साकार कर पाता है। मनुष्य बूढ़ा हो जाता है पर तृष्णा मरते समय तक प्रौढ़ ही बनी रहती है। शेख चिल्लियों का समुदाय कुबेर जैसा धनाढ्य और इन्द्र जैसा प्रतापी बनने के सपने देखता रहता है। पर अब निष्कर्ष की वेला में मात्र इतना ही प्रतीत होता है कि कोल्हू के बैल की तरह पिलते और पिसते हुये समय बीत गया श्मशान के भूत पलीत की तरह डरते और डराते रहने के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगा।
भाग्यवान वे है जिनने आदर्शों के साथ अपना रिश्ता जोड़ा। महानता का मार्ग अपनाया और ऐसा कुछ कर दिखाया जिसका अनुकरण करते हुये असंख्यों को गौरव गरिमा का लक्ष्य प्रदान करने वाला ऊर्जा भरा प्रकाश उपलब्ध होता रहे। मूर्खता और बुद्धिमत्ता के लिये इसी चौराहे पर सही निर्णय करने का अवसर है वैसा सुयोग भी इन्हीं दिनों है जिसका लाभ भगीरथ और अर्जुन ने अपनी उदात्त साहसिकता के बदले खरीदा था।
यह युगसंधि का प्रभात पर्व ऐसा है जिसमें महाकाल को प्राणवान प्रतिभाओं की असाधारण आवश्यकता पड़ रही है। दैवी प्रयोजन महामानवों के माध्यम से ही क्रियान्वित होते है। अदृश्य शक्तियाँ तो उनमें प्रेरणा भर भरती है। यह व्यक्ति का स्वतंत्र निर्धारण होता है कि उन्हें अपनाए या ठुकराए कृष्ण ने अर्जुन को कहा था कि दुष्ट कौरव तो पहले से ही मरे पड़े है मैंने उनका पहले ही तेज हरण कर लिया है तुझे तो धर्मयुद्ध में निरत होकर मात्र श्रेय भर अपने गले धारण करना है। वस्तुतः युग की विकृतियों का शमन होना ही है। नवसृजन का ऐसा महायज्ञ जाज्वल्यमान होना है जिससे आगामी लम्बे समय तक सुख शान्ति और प्रगति का वातावरण बना रहे। एकता और समता को मान्यता मिले। ध्वंस का स्थान सृजन ग्रहण करे और चेतन तथा भौतिक शक्तियों का नियोजन मात्र सत्प्रयोजनों के निमित्त होता रहे। इसी उज्ज्वल भविष्य को सतयुग की वापसी नाम दिया गया है अनीति की असुरता का दमन देवताओं की सामूहिक शक्ति संघशक्ति दुर्गा के अवतरण से संभव हुआ था। लगभग उसी पुरातन प्रक्रिया का प्रत्यावर्तन नये सिरे से नये रूप में इन दिनों सम्पन्न होने जा रहे है। उस प्रवाह में सम्मिलित होने वाले सामान्य पत्तों की तरह हल्के होते हुये भी सरिता की धाराओं पर सवार होकर बिना कुछ विशेष प्रयास के ही महानता के महासमुद्र में जो मिलने में सफल हो सकेंगे
अपने काम में किसी से कुछ पाने के लिये कही जाना एक बात है और किसी समर्थ सत्ता द्वारा अपने सहायक के रूप में बुलाया जाने पर वहाँ पहुँचना सर्वथा दूसरी बात है पहली में एक पक्ष की दीनता और दूसरे पक्ष की स्वाभाविक उपेक्षा रहती है पर आमंत्रण देकर बुलाये गये अतिथि को लेने स्टेशन पर माला लेकर पहुँचा और सम्मानपूर्वक ठहराया जाता है उसके वार्तालाप को भी प्रमुखता दी जाती है और ऐसा आधार खड़ा किया जाता है कि आमंत्रित को निमंत्रण का उद्देश्य समझने और उसमें सहभागी बनने की प्रतिक्रिया उत्पन्न हो।महाकाल द्वारा प्रज्ञापरिजनों को भेजे गये आमंत्रण को इसी रूप में देखा समझा जाना चाहिये।
राम स्वयं ऋष्यमूक पर्वत पर गये थे और सुग्रीव हनुमान को सहयोग हेतु सहमत कर लौटे थे। रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द के घर जाकर उन्हें देव संस्कृति के पुनरुद्धार में संलग्न होने के लिये सहमत किया था। अर्जुन को स्वयं भगवान कृष्ण ने समझाने से लेकर धमकाने तक की नीति अपना कर युद्धरत होने के लिये बाधित किया था। समर्थ ओर शिवा के चाणक्य और चन्द्रगुप्त के बीच भी ऐसा ही घटनाक्रम बना था गाँधी ने अपने चुम्बकत्व से उस समय विनोबा ठक्कर बाप व जमनालाल बजाज जवाहर पटेल मौलाना आजाद
जैसा मूर्धन्य आत्माओं को महान प्रयोजन के लिये निरत किया था। साथ ही उन्हें आवश्यक शक्ति और सफलता प्रदान करने के लिये ये भी आवश्यक तारतम्य बिठाया था। जिन्हें पारंगत दृष्टि प्राप्त है वे देख सकते है कि महाकाल ने अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुये प्राणवानों के सामने गिड़गिड़ाने का उपक्रम नहीं किया है वरन् सुनिश्चित संभावना में भागीदार बनकर अजस्र सौभाग्य प्रदान करने के लिए चुना है। इस भगीरथ की तरह बरसने वाले वरदान की उपेक्षा अवमानना करना किन्हीं अदूरदर्शी हतभागियों से बन पड़ेगा। लोभ मोह के बन्धन तो अनादि और अनन्त हैं। उनके कुचक्र में फँसे ओर बंधे रहने के लिए तो हीन स्तर के प्राणी भी स्वतंत्र है फिर मनुष्य अपनी गरिमा भरे भविष्य को यदि उसी तुच्छता पर तैयार करने का हठ करे तो उसे किस प्रकार समझदारों की पंक्ति में बिठाया जा सकेगा।
व्यक्ति और समाज अब इस कदर गुँथ गये है कि दोनों का पारस्परिक तालमेल पानी और मछली जैसा अविच्छिन्न हो गया है। कोई निजी उन्नति से निजी सुविधा सम्पादन भर से सुखी नहीं रह सकता। सम्बद्ध वातावरण यदि विपन्न है तो किसी सज्जन की भी शाँति सुरक्षित नहीं रह सकती। एक घर में अग्निकांड होने पर पड़ोस तथा गाँव मोहल्ले के सभी धर विशेष तक सीमित नहीं रहती। गुण्डागर्दी एक जगह पनपेगी तो समूचे क्षेत्र में विग्रह खड़ा करने का निमित्त कारण बनेगी। बढ़ी हुई जनसंख्या और आधुनिक प्रगति के फलस्वरूप अब निजी जीवन को सही बना लेने भर से काम चलने वाला है नहीं इसलिये जनमानस के गिरे हुये स्तर को उभारना प्रकारान्तर से अपनी और अपने परिकर की सुरक्षा करना है। इन दिनों सामूहिकता एक प्रकार से और अनिवार्य हो गयी है। अपने मतलब से मतलब रखने की नीति अपनाने वाले यह नहीं समझते कि गूलर के एक फल पर आँच आने पर उसके भीतर रहने वाले सभी भुनगे अपनी जान गँवा बैठते है। समुन्नत समाज के घटक ही संव्याप्त वातावरण से प्रभावित होते और सुखी रहते है।
प्रतिभा सम्पादन के लिये विशेषतया उच्चस्तरीय वातावरण में रहना उत्कृष्ट सोचना और आदर्शवादी क्रिया–कलापों में निरत रहना चाहिये। निजी सुधार एवं अभ्युदय भी इसके बिना नहीं हो सकता। अपना स्थिति लोकसेवी उदारचेता और सद्गुणी रखे बिना किसी को शारीरिक बनावट मात्र से प्रभावशाली होने का अवसर नहीं मिल सकता। सद्गुणों का बाहुल्य एवं अभ्यास ही किसी को इस योग्य बनाता है कि वह अन्यायों का सम्मान एवं सहयोग अर्जित कर सके। इसी सफलता के आधार पर किसी की प्रतिभा और गरिमा का वास्तविक मूल्याँकन हो सकता है।
आवश्यक है कि संकीर्ण स्वार्थपरता की पूर्ति में ही अपनी समूची क्षमताएँ न खपा दी जाए। इसमें जितना लाभ दिखाई पड़ता है उसकी तुलना में घाटा अधिक हैं व्यापक स्तर का सर्वजनीन स्वार्थ ही परमार्थ है। परमार्थपरायण अपना निज का हितसाधन तो निश्चित रूप से करते है साथ ही चन्दन वृक्ष की तरह निकटवर्ती लोगों को भी गरिमा प्रदान करते है प्रतिभा सम्पादन के लिये जिस पाठशाला में पढ़े बिना काम नहीं चलता वह है सेवा साधना
पिछड़े और पीड़ितों की प्रत्यक्ष सहायता भर से अनेक लोग संतुष्ट हो जाते है। वे यह नहीं सोचते कि दृष्टिकोण और चरित्र का घटियापन ही समस्त अभावों और संकटों का प्रमुख कारण है। जिन्हें सेवाधर्म अपनाना हो और वस्तुस्थिति की गहराई तक जाना हो उन्हें लोकमानस के परिष्कार के सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के लिये अपनी सामर्थ्य भर प्रयत्न करना चाहिये। ऐसे सेवाभावी जहाँ पुण्य परमार्थ से जुड़ी हुई अनेकानेक उपलब्धियाँ हस्तगत करते है वहाँ सुनिश्चित रूप से प्रतिभा परिवर्धन में भी सफल होते है कहना न होगा कि उच्चस्तरीय सेवा साधना में दो ही तत्व प्रमुख है एक सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन दूसरा दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन। इन दो
प्रयासों को अपनाने के लिये अपने समय और साधनों का एक नियमित अंश निरन्तर नियोजित करते रहने का महत्व समझा जाना चाहिये।
इस योगदान को नित्य कर्म में सम्मिलित करना चाहिये। शारीरिक स्थिरता के लिये भोजन जुटाना और निकलने वाले मलों की सफाई करते रहना आवश्यक है। उसी प्रकार चेतना में उत्कृष्टता भरने के लिये लोकमंगल का वातावरण बनाने के लिये सदाशयता बढ़ाने और अवांछनीयता हटाने के लिये तत्परता का परिचय देना चाहिये। इसके लिये समयदान और अंश दान की न्यून मर्यादा निश्चित करनी ही चाहिये और जो व्रत धारण किया है उसका निर्वाह करते रहने हेतु अपनी श्रद्धा निष्ठा एवं मनस्विता का परिचय देना चाहिये। इसे प्रतिभा परिवर्धन की अनिवार्य फीस मानकर चलना चाहिये।
युग की प्रबलतम माँग को देखते हुये इस संदर्भ में दो निर्धारण आरंभ में अपनाये गये है बाद में बहुत कुछ करना होगा पर प्रथम चरण में उदारचेता सज्जनों को खोजना उन्हें एक सूत्र में पिरोना साथ ही उन्हें भी सत्प्रयोजनों लगाये रहना इसी प्रक्रिया को सतयुग की वापसी नाम दिया गया है प्रचलित अनेकानेक अवांछनीयताओं में जिसे हटाने को प्राथमिकता दी गई है उसका नाम है विवाह विकृतियों का उन्मूलन।
यह दोनों देखने में साधारण कार्य प्रतीत होते है पर वस्तुतः इन दोनों के साथ इतनी बड़ी संभावनाएँ जुड़ी हुई है कि उनके फलित होने पर प्रयासरत व्यक्तियों का निजी गौरव ही नहीं बढ़ेगा वरन् समूचे समाज का अतिशय कल्याण भी होगा।ऐसा कल्याण जिसे युगपरिवर्तन अथवा वातावरण का कायाकल्प होने जैसा प्रत्यक्ष देखा जा सके।
कसाई के खूँटे से बंधा हुआ बकरा तब तक घास खाता और मस्ती करता है तब तक उसकी गरदन कड़क्के में फँसा नहीं दी जाती। पिंजड़े में घुसते समय तक चूहे भी सह कहाँ सोच पाते है कि अगले ही क्षण उन पर क्या बीतने वाली है। अदूरदर्शिता को एक अभिशाप ही कहना चाहिए, तो तात्कालिक लाभ के ही सब कुछ मानती है और यह सोच नहीं पाती कि जो किया जा रहा है, उसका कुछ अनिष्टकर परिणाम तो नहीं होने जा रहा है। पिछली कुछ शताब्दियों से एक पर नहीं, समुदाय के विशिष्ट माने जाने वाले वर्ग पर ऐसा उन्माद चढ़ा है, जिसमें एक सोने का अण्डा रोज़ देने वाली मुर्गी का पेट चीरकर एक ही दिन में सारे अण्डे निकाल लेने और देखते-देखते धन कुबेर बन जाने की ललक ही चरितार्थ होती देखी जा सकती है।
इसी शताब्दी में दो बड़े विश्वयुद्ध हुए हैं और सैकड़ों स्थानीय क्षेत्रीय। इनके कारण बताने में बहाने जो भी बनाये जाते रहे हो, कटु अनुभवों के बाद भी समझदारी वापस कहाँ लौट रही है? मिल जुलकर रहने और मिल बाँटकर खाने लिए समर्थता कहाँ सहमत हो रही है? उसने आक्रमण की नीति अभी भी छोड़ी नहीं है। एक से एक भयंकर प्रलयंकर अस्त्र धड़ाधड़ बनते चले जा रहे है। वे इतने अधिक जमा हो गये है। कि कोई पगला इस बारूद में एक चिनगारी फेंक दे तो इस धरातल का सारा वैभव आतिशबाजी की तरह जलकर भस्म हो सकता है। संसार के अधिकाँश लोगों को अभावग्रस्त एवं पिछड़ेपन की स्थिति में रहना पड़ रहा है, पर सब सब बन कैसे पड़े? समझदारी तो वापस लौटने का नाम ही नहीं लेती। छिटपुट आक्रमण भी कहाँ कुछ कम भयंकर इससे भी विद्वेष की विषाक्तता दिनोंदिन बढ़ रही है।
अणु शक्ति का नया उद्भव अगले दिनों क्या कुछ करने जा रहा है, इसका अनुमान लगाने से ही दिल दहलने लगता है। जापान पर गिरे दो छोटे बमों का दृश्य ऐसा है जिसे मनुष्य कभी भुला न सकेगा। वैज्ञानिक कहते हैं कि अब तक जितना रेडियोधर्मी विकिरण फैल चुका है और जितना खतरनाक कचरा जमा हो चुका है, उससे भुगतना भी टेढ़ी खीर है। फिर इस उपक्रम के चलते आगे क्या कुछ होकर रहेगा, उसकी तो कल्पना भी दहला देती है।
विज्ञान का अर्थ क्षेत्र में प्रवेश हुआ तो उसने औद्योगीकरण के सब्जबाग दिखाये। विशालकाय कारखाने लगे। सुविधा की दृष्टि से उनके लिए बड़े शहर चुने गये। एक ओर शहर गाँव से उमड़ते जन प्रवाह का बोझ सहन नहीं कर पा रहे है। उनकी स्वास्थ्य, सफाई, आवास समस्या बुरी तरह चरमरा रही है। इच्छा होते हुए भी विकास की दिशा में वे उतना कुछ नहीं कर पा रहे हैं जितना कि सुयोग्य प्रतिभाओं द्वारा वहाँ बसे रहने पर हो सकता था। प्रगति की आकांक्षा कितनी ही बढ़ी-चढ़ी क्यों न हो, तो अवगति से तो पहले पल्लू छूटे? प्रदूषण अपने समय की ऐसी समस्या है, जिसे औद्योगीकरण की, अतिशय सुविधा पाने की अदम्य लालसा का प्रतिफल ही कहा जा सकता है। फिर भी अन्यत्र घटित होने वाले प्रभावों से एक जगह बैठा रहने वाला सुरक्षित भी कहाँ रह पाता है? सदी, गर्मी, वर्षा के कारण जो भी हो, उनका मूल सिलसिला जहाँ से भी चलता हो, पर उसका प्रभाव तो हर किसी पर पड़ता है। वातावरण के साथ छेड़खानी का परिणाम वैसा ही हो सकता है। जैसा कि बर्र के छत्ते में हाथ डालने का।
ऊर्जा का अतिशय उपयोग और बढ़ते प्रदूषण के दबाव से अंतरिक्षीय तापमान बढ़ रहा है। उसने ध्रुवों के पिघल जाने और समुद्र में भयंकर बाढ़ आने से जलप्रलय की चेतावनी समय से पहले ही भेज दी है। यह सब प्रकृति के साथ अनावश्यक छेड़खानी करने कर प्रतिक्रिया भर है।
कोढ़ में खाज की तरह बढ़ती आबादी की अपनी अलग समस्या है, जिस अकेली को ही प्रकृति रूपी शेरनी की पूँछ मरोड़ने से कम भयंकर नहीं समझा जा सकता। ऐसी दशा में बहुप्रजनन का बाँध टूटे तो आश्चर्य ही क्या? इन दिनों जनसंख्या की अभिवृद्धि वैसा ही संकट बनकर सामने आई है, जैसा कि विज्ञान ने उद्योगों के साथ साझेदारी गाँठ कर विपत्ति के बादल खड़े किए है।
बढ़ती जनसंख्या व उद्योगों से निवास, कृषि, ईंधन आदि से जुड़ी समस्याएँ भी बढ़ी और वन वृक्ष बुरी तरह कटते चले आ रहे है। इससे वायु शोधन की प्रक्रिया तो रुकी ही है, साथ ही भू क्षरण की नई विपत्ति सामने आई है। जो सर्वनाश की पूर्व भूमिका के रूप में प्रस्तुत होते और पुरानी फसल को काटकर नये सिरे से जोतने की आवश्यकता बताकर नई सृष्टि का सृजन करते है।
उपर्युक्त विपत्तियों प्रकृति के साथ दुराचरण करने की परिणतियाँ है। इससे भी बड़ी बात यह है कि
मनुष्य ने अपनी गरिमा को भुला दिया है। सम्मिलित कर लिया गया है। इतना ही नहीं, अनाचारी उच्छृंखलताओं को बरतते हुए लोग अपनी शेखी भी बघारते हैं और कुकृत्यों पर शर्माने के स्थान पर मूँछें ऐंठते देखे जाते है।
असंयम अपनाकर अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने का उन्माद न जाने लोगों ने क्या भलाई सोचकर अपना लिया है। फिर भी लोग उसे अपनाने के लिए इस बुरी तरह आतुर है, मानो मरते समय चींटी के पंख उग रहे हों।
चटोरेपन ने स्वास्थ्य खा लिया कामुकता ने मानसिक विशिष्टता को समाप्त कर दिया गरीबी के कारणों में मात्र आलस्य अकर्मण्यता ही नहीं अपव्यय भी एक बड़ा कारण बना हुआ है। ऐसे जीवनों को यदि प्रेत-पिशाच के स्तर का कहा जाए तो कुछ अत्युक्ति न होगी। नरक ढूँढ़ना हो तो उसे अपने ही इर्द गिर्द बहुलता के साथ फैला बिखरा देखा जा सकता है।
ये है। बढ़ती सभ्यता के अभिशाप, जिन्हें भौतिक क्षेत्र में असीम लिप्साओं ने और आत्मिक क्षेत्र में उस चिंतन न उत्पन्न किया है जो प्रत्यक्षवाद की दुहाई देता और मात्र आज के लाभ को देखता है। यही है वह महाव्याधि, जिससे व्यक्ति और समाज को किसी भी कीमत पर छुड़ाया जाना चाहिए। मात्र आत्मिकी ही यह चिकित्सा उपचार कर सकती है।
संसार में अनेक प्रकार के घटना क्रम घटित होते रहते, परिवर्धन और परिवर्तन का क्रम चलता रहता है। इनकी जानकारियाँ आँख, कान जैसी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा मस्तिष्क को मिलती रहती है। उसके समर्थन बिन न तो मन बहुत देर उछल-कूद कर सकता है और न शरीर असमंजस छोड़कर कुछ करने के लिए तत्पर होता है।
शरीर और मन दोनों को ही अन्तिम निर्णय के लिए बुद्धि के निर्धारणों की ही अपेक्षा रहती है यह बुद्धिमत्ता ही मनुष्य की अत्यधिक विशेषता है। गायत्री महामंत्र में आत्मा ने परमात्मा से एक ही प्रमुख प्रार्थना की है कि उसकी बुद्धि क्षमता को सदाशयता के साथ नियोजित कर दिया जाए। इतने भर से सर्वतोमुखी प्रगति का द्वारा खुल जाएगा।
जीवन के किस पक्ष को समग्र अभ्युदय का श्रेय दिया जाय और किसे अनर्थ करने के लिए दोषी ठहराया जाय। इसका विश्लेषण करने पर एक ही बिन्दु सामने आता है। प्रचलनों को व्यापक बनाने और वातावरण में उत्कृष्टता निष्कृष्टता के तत्व भरने के उसी की भूमिका को प्रमुख माना जा सकता है। उसी का स्तर गिरना व्यक्ति और समाज के अधःपतन का एकमात्र कारण है। पदार्थ और प्राणी उसी के संकेतों की प्रतीक्षा करते और और अपनी स्थिति बदलते रहते है।
इस तथ्य को समझ लेने के उपरान्त आज की समस्याओं के साथ जुड़ी हुई जटिलता पर विचार करने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि उसकी बुद्धिमत्ता का स्तर गिरा है। दूसरों का हित साधन भी जुड़ा है। शोषण, उत्पीड़न की रीति नीति अपनाना, लिप्सा, तृष्णा और अहंता के लिए आकुल व्याकुल हो जाना उससे कभी बन ही नहीं पड़ता।
वर्तमान अनुपयुक्त परिस्थितियों को देखते हुए उनका कारण ढूँढ़ते समय तात्कालिक कारण तो अनेक प्रतीत हो सकते और उसके निराकरण के उपाय भी अनेकानेक सोचे जा सकते है। उतने पर भी तथ्य जहाँ का तहाँ रहता है कि विपत्तियों के उत्पादन में दुर्बुद्धि की ही खुराफातें अपनी बाजीगरी चमत्कार संरचनाओं में लगा दिया है। भले उसे इसमें तात्कालिक लाभ का बढ़ा चढ़ा लालच प्रोत्साहित करता रहा है। भले ही उसे उस मदान्ध स्थिति में भावी दुष्परिणामों का भान न हुआ हो।
वस्तुस्थिति समझने और चिरस्थायी उपाय उपचार सोचने के लिए हमें तह तक उतरना होगा और उस उद्गम को खोजना होगा, पागल हाथी को सधे हुए बलिष्ठ हाथ ही जंजीरों से कसते और उसे सही तरह रहने के लिए बाधित करते है। होम्योपैथी वाले विष को विष से शमन करने का सिद्धान्त अपनाते हुए ही अपने प्रतिपादनों की सार्थकता सिद्ध करते है।
समझने और समझाने के लिए बहुत बड़ा क्षेत्र सामने खाली पड़ा है, जो इस प्रतीक्षा में बैठा है कि झाड़ झंखाड़ों को उखाड़कर यह सुरम्य उद्यान खड़ा कर सकने वाले कब और कहाँ से आये। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्र में घुसी अवांछनीयताओं को एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक बुहारना होगा।
विचारक्रांति ही अपने समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसी एक मास्टर चाबी से वे सभी ताले खुल सकते हैं, जिनमें सुखद संभावनाओं के मणि−माणिक तिजोरी बंद स्थिति में जकड़े पड़े है। यह धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में लड़े जाने वाले महाभारत की तुलना में अधिक व्यापक अधिक सूक्ष्म और अधिक महत्वपूर्ण है। महाविनाश की दौड़ती चली आ रही विभीषिका अपनी विजय दुन्दुभी बजाये या फिर विकास को धरती पर परमार्थ उतने जैसी सुलभता मिले, इसका निर्णय इन्हीं दिनों होना है।
गत शताब्दियों में मनुष्य ने विज्ञान के उद्धत दर्शन की सहायता पाकर अपने को एक-सा कुंद बना लिया है, मानो नशेबाज़ सड़क पर लाठियाँ घुमाने और गालियाँ बकने के लिए स्वतंत्र हो गया हो। यदि अहमन्यता मुखर होकर उचित ठहराने का दुराग्रह अपनाये तो उसे अनगढ़पन के अतिरिक्त और क्या कहा जाय? पिछले दिनों से यही होने लगा हैं। नीति और मर्यादा को तिलाञ्जलि देकर जो मिले उसी को हड़प जाने की वितृष्णा यदि अनर्थ करती चले तो उसे पुरातन असुरता की नये ढाँचे में नई आवृत्ति ही माना जाएगा।
पर यह सब सदा के जिए चलता तो नहीं रह सकता। आखिर इस सार का नियमन करने वाली कोई उच्चसत्ता भी तो है। वह न रही होती तो आकाश के ग्रह गोलक और पृथ्वी के जलाशय सभी मर्यादा तोड़कर कुछ भी कर गुजरे होते। किन्तु साथ ही यह भी है कि उस नीति निष्ठा का बुरी तरह ह्रास हुआ, जो सर्वतो मुखी स्वस्थता के लिए उत्तरदायी है। शरीर बीमार, मन बेजान और अधिक पाने यहाँ-वहाँ से बटोरने के लिए आतुर, हाहाकार। वस्तुतः यही है वह उपलब्धि, जो प्रस्तुत प्रगति के साथ-साथ ही बढ़ती चली आई है। उसने मनुष्य और मनुष्य के बीच अविश्वास की, दुर्भाव की, उपेक्षा की गहरी खाई खोद दी है। समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी में इतनी कमी पड़ी है कि उनके बिना सम्पन्नता होते हुए भी दीन-हीन की तरह रहना पड़ रहा है। मरघट में रहने वाले भूत-प्रेतों जैसा अनगढ़ जीवन जीना पड़ रहा है। अपच, अनिद्रा शरीर के एवं आवेश, अविश्वास मन के सहचर बनकर रह रहे हैं।
यह स्थिति अधिक दिनों तक नहीं रहने दी जा सकती अन्यथा व्यक्ति तनावग्रस्त रहकर टूट जाएगा, साथ ही उस सम्पदा का भी दुरुपयोग करके आत्मघात करेगा, जो अनीति अपनाकर कमाई गई है। सज्जा और अहंता आकर्षक तो हैं, पर उनमें ऐसा कोई सत्त्व है नहीं जो उल्लास, उत्साह, संतोष, आनन्द एवं गौरव-गर्व प्रदान कर सके। इसके अभाव में वह न केवल स्वयं विपन्न बनेगा वरन् अपने सम्पर्क क्षेत्र में भी विषाक्तता भर देगा। ऐसा जीना भी क्या, जो अन्यायों को खिन्नता की अर्द्धमृत स्थिति में धकेल दे।
यह भली−भाँति समझ लिया जाना चाहिए कि इन दिनों जो विपत्तियों-विभीषिकाओं के घटाटोप घिरे दिखाई देते हैं, वे कहीं आसमान से नहीं उतरे है, धरती फोड़कर भी नहीं उछले हैं। यह सब मनुष्य का ही बोया व बिखेरा हुआ है। शक्ति का दुरुपयोग भी हो सकता है और सदुपयोग भी। चाकू से कलम भी तराशी जा सकती है और किसी का प्राणान्त भी किया जा सकता है। यह सद्बुद्धि और दुर्बुद्धि के ही परस्पर विरोधी चमत्कार हैं। यहाँ करने और मरने की सनातन प्रक्रिया अनवरत रूप से चलती आ रही है। प्रकृति भी उसी आधार पर अपने तेवर बदलती रहती है। पतन और उत्थान के क्रम में वातावरण की प्रतिकूलता, अनुकूलता भी सहभागी होती है। पर उन सबका उद्गम मनुष्य का व्यक्तित्व एवं कर्त्तव्य ही है। स्रष्टा की कर्मफल व्यवस्था भी उसी आधार पर अपने को नियति बनाकर प्रकट करती है।
भूलें होती हैं, पर उनका सुधार-परिमार्जन भी होता रहता है। कपड़े मैले होते हैं, पर उनकी धुलाई होते रहने की क्रिया भी बन्द नहीं होती। ठोकरें लगती हैं पर उन चोटों का उपचार भी क्रियान्वित होता है। उनको भगाया भी जाता रहता है। पापों के प्रायश्चित की भी व्यवस्था है।
मनुष्य पर बहुत बार आवेशों के उन्माद आते हैं। इस दशा में वह ऐसे कृत्य कर डालता है जिनकी क्षतिपूर्ति बहुत दिनों में बड़ी कठिनाई से ही हो पाती है। क्रोध में पागल कई बार स्वजनों तक की हत्या कर डालते हैं। आवेश उतरने पर वे समझ पाते हैं कि उनने अपने ही हाथों अपना कितना बड़ा अनर्थ कर डाला। देखने वालों को लगता है कि अब इस क्षति की पूर्ति न हो सकेगा। पर वस्तुतः ऐसा नहीं होता। समय घावों को भरता रहता है। मरने वालों की संख्या नित्य ही बहुत बड़ी होती है। लगता है कि यही क्रिया चलती रही तो संसार सूना हो जाएगा। पर वस्तुतः वैसा होता नहीं। नये जन्मने वाले उस घाटे की भरपाई करते रहते हैं। अन्धड़ आते हैं, तूफान बहुत कुछ उखाड़-पछाड़ कर रख जाता है। चक्रवातों की करतल कितनी भयावह होती है, ओले, टिड्डी दल, चूहे, पक्षी फसल को बर्बाद करने में कुछ कोर-कसर नहीं छोड़ते, फिर भी ऐसी स्थिति नहीं आती है कि अन्न का सर्वथा अभाव हो जाए और लोग भूखे मर जाएँ। दुष्ट-दुरात्मा अपने कुकृत्यों में कोई कमी नहीं रहने देते, फिर भी नियति की व्यवस्था ऐसी है कि शान्ति और सज्जनता अपना अस्तित्व बनाए रह सके। भूकम्पों, ज्वालामुखियों, दुर्भिक्षों, बाढ़ों, महामारियों का अपना इतिहास है। उनके द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाला महाविनाश सुनने वालों तक के रोमांच खड़े कर देता है। फिर भी भूमि की समस्वरता समाप्त नहीं हुई है। विनाश की चुनौतियों को स्वीकार करने में विकास पूरी तरह समर्थ है। निराशाजन्य परिस्थितियों की विकरालता से सभी परिचित हैं। तमिस्रा की व्यापकता किसी से छिपी नहीं है, किन्तु आशा का आश्वासन देने वाली ऊषा अपने समय पर उदित होती रही है एवं परिवर्तन लाती रही है।
रात्रि के उपरान्त प्रभात आता है, अवांछनीयताओं का साम्राज्य देर तक टिकता नहीं। समय चक्र ऐसी परिस्थितियाँ भी लाता है, जिसमें विपन्नताओं से उबर सकना संभव हो सके। इक्कीसवीं सदी ऐसा ही संदेश लेकर आ रही है। उसे सर्वतोमुखी अभ्युदय का समय भी कह सकते हैं, सतयुग भी। इक्कीसवीं सदी इसी की प्रतीक बनकर आ रही है।
युगसंधि को द्वन्द्व और संघर्ष की अवधि कह सकते है। अब से लेकर बीसवीं सदी के अन्त तक ऐसी ही द्विधा छाई रहेगी। रात्रि के अन्तिम प्रहर में तमिस्रा अत्यधिक सघन हो जाती है। दीपक जब बुझता है तो ऊँची लौ दिखाता है। चींटी मरने को होती है, तब पंख उगाती है। मरते समय गहरी साँसें चलने लगती है। यही सब देखकर यह उक्ति बनी है कि मरता क्या न करता आत्मरक्षा के लिए कौन हाथ नहीं पीटता?
इस संभावना को देखते हुए अदृश्य द्रष्टाओं ने रोमांचकारी भविष्यवाणियाँ की है, जो प्रायः इस युगसंधि पर लागू होती है। ईसाई धर्म में चौदहवीं सदी में कयामत तथा भविष्यपुराण में खण्ड-प्रलय की चर्चा है। अन्य पूर्वार्द्ध और पाश्चात्य दिव्यदर्शियों ने भी इसी स्तर की भविष्यवाणियाँ की हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि कुसमय का अन्त होते होते कहर बरसेगा। किन्तु इसके बाद ऐसा समय आयेगा जिसमें पिछले समस्त घाटे की पूर्ति हो जायगी ताकि गहरी खाई पाटकर समतल ही नहीं वरन् पुष्पोद्यान के रूप में भी छटा दिखाने लगे।
एक ही समय में दो काम हो सकते हैं। खेत की जुताई से खुदाई होती है, किन्तु साथ ही बुवाई का क्रम भी चलता है और देखते-देखते खेत पर हरियाली लहलहाने लगती है। इस भारी परिवर्तन में एक सप्ताह से भी कम समय लगता है। प्रसव वेदना में जहाँ प्रसूता को कष्ट सहना पड़ता है, वहाँ शिशु जन्म की खुशियाँ मनाने के सरंजाम भी साथ ही जुट जाते हैं। जराजीर्ण काया इधर मृत्यु का वरण करती है, उधर दूसरे जन्म का नया सुयोग भी बन जाता है। जुआरियों में से एक हार पर उदास होता है, तो दूसरा जीत पर मुसकाता है। खिलाड़ी और व्यापारी भी आपस में हारने-जीतने के परस्पर विरोधी अनुभव करते हैं। युगसंधि में, देवासुर संग्राम में विनाश और विकास का मल्लयुद्ध ठने, तो उसे नियति की विचित्रता ही कहना चाहिये। संध्याकाल में दिन और रात्रि दोनों का समन्वय देखा जा सकता है। प्रायश्चित करते समय जहाँ कठिनाई का सामना करना पड़ता है वहाँ भार उतर जाने और उज्ज्वल भविष्य की संभावना बनने की प्रसन्नता भी होती है। अशुभ की विदाई और शुभ की अगवानी का मिश्रित माहौल इन दिनों देखने को मिलेगा। एक ओर आपरेशन की छुरी-कैंची संभाली जाएगी, तो दूसरी ओर घाव सीने और मरहम-पट्टी के सरंजाम भी इकट्ठे होंगे। वधू को विदा करते समय जहाँ एक घर में आँसू टपकते हैं वहीं दूसरे घर गृहलक्ष्मी के आगमन पर सभी के चेहरे खिलते हैं। ऐसी ही द्विधा लेकर आ रही है युगसंधि की वेला। इन बारह वर्षों में ऐसे ही ज्वार-भाटे आते रहेंगे।
भ्रष्ट-चिंतन के कारण जो अनर्थ उपजे हैं, उन्हें कोई दावानल भस्मसात् करके रख दे, यह संभव है। ऐसा समय असाधारण रूप से कष्टकारक भी हो सकता है। विपत्तियाँ और बढ़ सकती हैं। संकट और भी अधिक गहरा सकते हैं, किन्तु साथ ही यह भी निश्चित है कि उज्ज्वल भविष्य का सृजन भी इन्हीं दिनों होगा। प्रतिभाएँ इन्हीं दिनों उभरेंगी और उनके द्वारा बहुमुखी सृजन की ऐसी योजनाएँ भी बनेंगी, जो चरितार्थ होने पर ऐसा बसंती वातावरण बना दें, जिसकी इक्कीसवीं सदी के रूप में आशा, अपेक्षा चिरकाल से की जाती रही है।
ऋतुभाव की प्रजनन को ध्यान में रखते हुए पक्षी नया घोंसला बनाने में जुट जाते हैं। वर्षा से कुछ समय पूर्व ही चींटियाँ अपने बिलों की सुरक्षा तथा आहार की दृष्टि से निश्चित हो जाती हैं। बसंत के आते ही मधुमक्खियों सक्रियता अत्यधिक बढ़ जाती है, जिससे ग्रीष्म के सूखे माहौल में उन्हें शहद की दृष्टि से अभाव का अनुभव न होने लगे। गर्भिणी महिलाएँ प्रसूतिकाल में बच्चों के लिए कपड़े पूर्व से ही जमा कर लेती हैं। बच्चा उत्पन्न होने के उपरान्त अभिभावक, उसके लालन-पालन से लेकर शिक्षा, विवाह, व्यवसाय आदि के लिए साधन जुटाना शुरू कर देते हैं। बीमारियों के फैलने का माहौल बनने पर लोग सुरक्षा के टीके पहले ही लगवा लेते हैं। यह सहज-स्वाभाविक दूरदर्शिता का परिणाम है, जिसमें संभावनाओं को बदलने का काम, पत्थर से सिर टकराने की बात छोड़कर सभी अपनी सुरक्षा और सुविधा की बात सोचने लगते हैं। समझदारी भी इसी में है।
अगली शताब्दी की संभावनाएँ अद्भुत, अनुपम और अभूतपूर्व है। वैज्ञानिक, बौद्धिक और औद्योगिक प्रगति के साथ-साथ ही उदार चेतना का अवमूल्यन भी इन्हीं दिनों हुआ है, जिसके कारण प्रगति के नाम पर जो कुछ हस्तगत हुआ है, उसका दुरुपयोग होने पर परिणाम उलटे रूप में ही सामने आये हैं। सुविधा-साधन अवश्य बढ़े हैं, पर उलझे मानस ने न केवल व्यक्तित्व का स्तर गिराया है, वरन् साधनों को इस बुरी तरह प्रयुक्त प्रयुक्त किया है कि पिछले पूर्वजों की सामान्य स्थिति की तुलना में हम कहीं अधिक समस्याओं में उलझे और विपत्तियों के घटाटोप में घिर गये हैं। दलदल में फँस जाने जैसी स्थिति अवश्य है, पर ऐसा नहीं हो सकता कि देवत्व से एक सीढ़ी नीचे ही समझा जाने वाला मनुष्य असहाय बनकर अपना सर्वनाश ही देखता रहे, समय रहते न चेते।
नवयुग में एकता और समता के दोनों सिद्धान्त हर व्यक्ति को इच्छा या अनिच्छा से अंगीकार करने पड़ेंगे, ऐसा मनीषियों, भविष्यद्रष्टाओं का अभिमत है। शासन और समाज को भी अपनी मान्यताएँ, व्यवस्थाएँ इसी प्रकार की बनानी पड़ेगी। प्रवाह और प्रचलन के अनुरूप अपने प्रवाह में आवश्यक परिवर्तन करने होंगे। अड़ंगेबाज तो हर भली-बुरी व्यवस्था में अपनी उद्दण्डता का परिचय देने के लिए कहीं-न-कहीं से आ टपकती है। जलते दीपक की लौ बुझाने के लिए पतंगों के दल उस पर टूट पड़ने से बाज़ नहीं आते, भले ही इस दुरभिसंधि में उन्हें अपने पंख जलाने और प्राण गँवाने पड़े। महाकाल के निर्धारण एवं अनुशासन के सामने कोई उद्दण्डता अवरोध बनकर अड़ेगा और व्यवधान बनकर रोकथाम करेगी, इसकी आशंका न की जाय तो ही ठीक है।
अगले नवयुग की, इक्कीसवीं सदी की सम्पूर्ण व्यवस्था एकता और समता के सिद्धान्तों पर निर्धारित होगी। हर क्षेत्र में, हर प्रसंग में उन्हीं का बोलबाला दृष्टिगोचर होगा। इस भवितव्यता के अनुरूप हम अभी से धीमी-धीमी तैयारियाँ शुरू कर दें तो यह अपने हित में होगा। ब्रह्ममुहूर्त में जागकर नित्यकर्म से निबट लेने वाले व्यक्ति सूर्योदय होते ही अपने क्रिया-कलापों में जुट जाते हैं, जबकि दिन चढ़े तक सोते रहने वाले कितने ही कामों में पिछड़ जाते हैं।
मूर्धन्य मनीषियों का कहना कि अगले दिनों एकता, एक व्यवस्था होगी। सभी लोग मिल-जुलकर रहने के लिए विवश होंगी। डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाने, ढाई ईंट की मस्जिद खड़ी करने का कोई उपहासास्पद खिलवाड़ नहीं करेगा। सभ्यता के बढ़ते चरणों में एकता ही सबकी आराध्य होगी। विलगाव का प्रदर्शन करने वाली बाल -खिलवाड़ देर तक अपनी अलग पहचान बनाये न रह सकेगी। बिखराव सहन न होगा। विलगाव को कहीं से भी समर्थन नहीं मिलेगा। संकीर्ण स्वार्थपरता और आपने मतलब रखने वाली क्षुद्रता किसी भी क्षेत्र में व्यवहारिक न होगी। मिल−जुलकर रहने पर ही शाँति, सुविधा और सुरक्षा, प्रगति की दिशा में बढ़ा जा सकेगा। वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श अब समाजवाद, समूहवाद-संगठन-एकीकरण का विधान बनकर समय के अनुरूप कार्यान्वित होगा। उसे सभी विज्ञजनों का समान समर्थन भी मिलेगा।
अगली दुनिया एकता का लक्ष्य स्वीकारने के लिए निश्चय कर चुकी है। अड़ंगेबाजी से निबटना ही शेष है। वे प्रवाह में बहने वाले पत्तों की तरह लहरों पर उछलते-कूदते कही-से-कही जा पहुँचेंगे। चक्रवात से टकराने की मूर्खता करने वाले तिनकों के अस्तित्व उस वायु भ्रमर में फँसकर अपना अस्तित्व तक गंवा बैठते हैं। एकता अब अपरिहार्य होकर रहेगी। जाति-पाँति के नाम पर, रंग, वर्ण और लिंग के आधार पर अलग-अलग कबीले बसाकर रहना आदिम काल में ही संभव था। अब के औचित्य को समर्थन देने वाले युग में नहीं।
संसार भर में एक ही जाति का अस्तित्व रहेगा। सुसंस्कृत-सभ्य मनुष्य जाति का। काले, पीले, सफेद, गेहुँआ आदि रंगों की चमड़ी होने से किसी को भी अपनी अलग बिरादरी बनाए रह सकता अब संभव न होगा। समझदारी के माहौल में मात्र न्याय ही जीवित रहेगा और औचित्य ही सराहा, अपनाया जाएगा। तूती उसी की बोलेगी।
धर्म-सम्प्रदायों के नाम पर, भाषा, जाति, प्रथा, क्षेत्र आदि के नाम पर जो कृत्रिम विभेद दीवारें गिर गई हैं वे लहरों की तरह अपना-अपना अलग प्रदर्शन भले ही करती रहें, पर वे सभी एक ही जलाशय की सामयिक हलचल भर मानी जाएँगी। पानी में उठने वाले बबूले थोड़ी देर उछलने-मचलने का कुतूहल दिखाते हैं। इसके बाद त्वरित ही उनका अथाह जलराशि में विलय-समापन हो जाता है। मनुष्य को अलगाव और बिखराव में बाँधने वाले प्रचलन इन दिनों कितने ही पुरातन, शास्त्र सम्मत अथवा संकीर्णता पर आधारित होने के कारण कितने ही प्रबल प्रतीत क्यों न होते हों, पर अगले तूफान में इन बालुई घर-घरौंदों में से एक का भी पता न चलेगा। मनुष्य जाति अभी इन दिनों एक भले ही न हो, पर अगले ही दिनों तो वह सुनिश्चित रूप से एक बनकर रहेगी।
धरातल एक देश बनकर रहेगा। देशों की कृत्रिम दीवारें खींचकर उसके टुकड़े बने रहना न तो व्यावहारिक रहेगा, न सुविधाजनक। इनके रहते शोषण, आक्रामकता, आपाधापी का माहौल बना ही रहेगा। देशभक्ति के नाम पर युद्ध छिड़ते रहेंगे और समर्थ दुर्बलों को पीसते रहेंगे। ‘जंगल का कानून-मत्स्य न्याय’ इस अप्राकृतिक विभाजन की व्यवस्था ने ही उत्पन्न किया है। हर क्षेत्र का नागरिक अपनी ही छोटी कोठरियों में रहने के लिए बाधित है। वहाँ यह सुविधा नहीं कि अपनी अनुकूलता वाले किसी भी क्षेत्र में बस सके।
कुछ देशों के पास अपार भूमि है, कुछ को बेतुकी घिचपिच में रहना पड़ता है। कुछ देशों ने अपने क्षेत्र की खनिज एवं प्राकृतिक सम्पदाओं पर अधिकार घोषित करके धन-कुबेर जैसी स्थित प्राप्त कर ली है और कुछ को असीम श्रम करने पर भी प्राकृतिक सम्पदा का लाभ न मिलने पर असहायों की तरह तरसते रहना पड़ता है। भगवान ने धरती को अपनी सभी पुत्रों के लिए समान सुविधा देने के लिए सृजा है। फिर कुछ देश अनुचित अधिकार को अपनी पिटारी में बंद कर देश को दाने-दाने के लिए तरसायें, यह विभाजन अन्यायपूर्ण होने के कारण देर तक टिकेगा नहीं। आज की दादागिरी आगे भी इसी प्रकार अपनी लाठी बजाती रहेगी, यह हो नहीं सकेगा। विश्व एक देश होगा और उस पर रहने वाले सभी मनुष्य ईश्वरप्रदत्त सभी साधनों को उपयोग एक पिता की संतान होने के नाते कर सकेंगे। परिश्रम और कौशल के आधार पर किसी को कुछ अधिक मिले वह दूसरी बात है। पर पैतृक सम्पदा पर तो सभी संतानों का समान अधिकार होना ही चाहिये। औचित्य होना चाहिए, ऐसा मनीषी ने घोषित किया है। न्याय युग में ऐसे ‘हो रहा है’ या ‘हो गया’ कहा जाएगा।
संसार की एक भाषा होनी चाहिये ताकि कहीं के निवासी अन्यत्र कही भी रहने वालों के साथ पड़ोसी की तरह बिना किसी कठिनाई के वार्तालाप कर सकें। आज तो समीपवर्ती क्षेत्रों के लोग भाषाई कठिनाई के कारण गूँगे-बहरों की तरह आपस में इशारे से बात करते हैं। कोई किस से अपने मन की बात कह सकने में असमर्थ है। पुस्तकों में छिपा अगाध ज्ञान इसी भाषाई क्षेत्रों में कैद होकर रह जाता है। अनुवाद और प्रकाशक की व्यवस्था अत्यन्त महँगी और अतीव कष्टसाध्य है। उसका लाभ सभी देश, भाषा के लोग समान रूप से नहीं उठा सकते। इस कारण किसी क्षेत्र में उभरा विश्व भर को प्रभावित करने वाला विचार भी उसी झलक-झाँकी प्राप्त कर सके, इन समस्त बाधाओं से निबटने के लिए हमें अपनी भाषा का व्यामोह छोड़ना होगा और हृदय की विशालता के साथ एक घटक के रूप में जुड़ जाने के लिए मानस और साहस जुटाना पड़ेगा। इस तथ्य को हमें समूची मानव जाति को एकता के केन्द्र पर केन्द्रित करने के लिए साहसिक तत्परता अपनाते हुए संभव कर दिखाना होगा।
धर्म-सम्प्रदायों की विभाजन रेखा भी ऐसी है, जो अपनी मान्यताओं को सच और दूसरों के प्रतिपादनों को झूठा सिद्ध करने में अपने बुद्धि-वैभव से शास्त्रार्थ, टकरावों के आ पड़ने पर
उतरती रही है। अस्त्र-शस्त्रों वाले युद्धों ने कितना विनाश किया है, उसका प्रत्यक्ष होने के नाते लेखा-जोखा लिया जा सकता है, अपनी धर्म मान्यता दूसरों पर थोपने के लिए कितना दबाव और कितना प्रलोभन, कितना पक्षपात और कितना अन्याय कामों में लगाया गया है, इसकी परोक्ष विवेचना किया जाना संभव हो तो प्रतीत होगा कि इस क्षेत्र के आक्रमण भी कम दुखदायी नहीं रहे है। आगे भी उसका इसी प्रकार परिपोषण और प्रचलन होता रहा तो विवाद, विनाश और विवाद घटेंगे नहीं बढ़ते ही रहेंगे। अनेकता में एकता खोज निकालने वाली दूरदर्शिता को सम्प्रदायवाद के क्षेत्र में भी प्रवेश करना चाहिए।
आरंभिक दिनों में सर्व-धर्म-समभाव सहिष्णुता बिना टकराये अपनी-अपनी मर्जी पर चलने की स्वतंत्रता अपनाए रहना ठीक है और काम चलाऊ नीति भी। अन्ततः विश्वमानव का एक ही मानव-धर्म होगा। उसके सिद्धान्त, चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के साथ जुड़ने वाली आदर्शवादिता पर अवलम्बित होंगे। मान्यताओं और परम्पराओं में से प्रत्येक को तर्क, तथ्य, प्रमाण परीक्षण एवं अनुभव की कसौटियों पर कसने के उपरान्त ही विश्व-धर्म की मान्यता मिलेगी। संक्षेप में उसे आदर्शवादी व्यक्तित्व और न्यायोचित निष्ठा पर अवलम्बित माना जाएगा। विश्वधर्म की बात आज भले ही सघन तमिस्रा में कठिन मालूम पड़ती हो, पर वह समय दूरी नहीं, जब एकता का सूर्य उगेगा और इस समय जो अदृश्य है, असंभव प्रतीत होता है, वह उस वेला में प्रत्यक्ष एवं प्रकाशवान होकर रहेगा। यही है आने वाली सतयुगी समाज व्यवस्था की कुछ झलकियाँ, जो हर आस्तिक को भविष्य के प्रति आशावान् बनाती है।
(दिसम्बर, 1988 अखण्ड ज्योति में प्रकाशित)
बढ़ते प्रदूषण एवं विकिरण, अमर्यादित प्रजनन, महामारियों, प्रकृति प्रकोपों जैसी विभीषिकाएँ को जो प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो रही है, एक संतुलित मनःस्थिति से देखा जाय तो प्रतीत होता है कि ये सभी विग्रह मनुष्य की, अपनी करनी से जन्मे हैं एवं इनकी प्रतिक्रिया अगले ही दिनों इस रूप में प्रकट होगी कि मनुष्यों का ही नहीं, अन्याय प्राणियों का रहना भी इस धरातल पर दूभर हो जाएगा। जब सर्वत्र विष-ही-विष का भरा-पूरा समुद्र हिलोरें ले रहा हो, तो उसके बीच प्राणि सत्ता का अस्तित्व किस प्रकार अक्षुण्ण बना रह सकेगा, यह विचारणीय प्रश्न है।
चेतना की शक्ति अपार है। उससे सृजन भी बन पड़ता है और महाविनाश का क्षण भी देखते-देखते सामने आ खड़ा हो सकता है। अद्यावधि प्रगति चेतनात्मक परिष्कार और विकास के ही आधार पर संभव हुई है। यदि वह उद्गम तंत्र लड़खड़ा गया तो फिर न केवल असहयोगजन्य बिखराव होगा, वरन् आक्रामकता के विस्तार की बाढ़ में मानवी सभ्यता के लिए ही नहीं सत्ता के लिए भी संकट खड़ा हो जाएगा। पतन के गर्त में गिरते-गिरते उस स्थिति तक पहुँचा जा सकता है, जहाँ से फिर कभी लौटना संभव न हो।
विज्ञान की एक धारा विकृत बुद्धिवाद बनकर सामने आयी है। उसने प्रत्यक्षवादी विचारधारा को भी कम उत्तेजित नहीं किया। प्रत्यक्षवादी अर्थात् तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ मान बैठने की धारणा। भले ही उसके कारण कुछ समय उपरान्त अनेक गुने संकटों को अति कष्टपूर्वक वहन करना पड़ा हो। दूरदर्शी विवेकशीलता को अमान्य ठहराने वाली, तुरन्त के लाभ को ही सब कुछ समझने वाली संकीर्ण स्वार्थपरता ही प्रत्यक्ष परायण बुद्धिवाद के रूप में एक नया तत्त्वदर्शन बनकर लोकचेतना को अपने वशवर्ती बनाने में सफल हुई है। इसकी क्रिया-प्रतिक्रिया और परिणति पग-पग प्रकट होती देखी जा सकती है। इस प्रत्यक्षवाद को वैज्ञानिक भौतिकवाद से किसी भी प्रकार कम भयंकर नहीं आँका जा सकता। वस्तुओं की अस्त-व्यस्तता मानव समाज को प्रभावित तो करती है, पर उतना नहीं जितना कि चिन्तन के गड़बड़ा जाने पर उद्विग्न कर डालने वाले घटाटोप उमड़ते हैं एवं अर्द्धविक्षिप्तता जैसी स्थिति सामने आ खड़ी होती है।
आदर्शों का निर्वाह और असीम सुखोपभोग की आतुर लालसा का उद्वेग एक स्थान पर एक साथ रह नहीं सकते। जहाँ एक रहेगा वहाँ दूसरे को पलायन करना पड़ेगा। अन्धकार और प्रकाश साथ-साथ रहने के लिए कहाँ सहमत होते होते हैं? विवशता का दबाव ही एक सीमा तक परस्पर एक-दूसरे को सहन कर पाता है। अनियंत्रित लिप्सा तात्कालिक लाभ के लिए बड़े-से-बड़ा अनर्थ करने में भी नहीं हिचकती। यहाँ तक कि आत्मघात तक उस उन्माद में अनदेखा बनकर रह जाता है। नशेबाजों की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक हर दृष्टि से कैसी दुर्दशा होती है, इसकी जानकारी प्रायः सभी को होती है। पर तत्काल मिलने वाली मस्ती को अपनाये बिना उस प्रकार के व्यसनियों से रहा नहीं जाता। दूर की बात कौन सोचे? परिणाम का अनुमान लगाने की फुर्सत किसे मिले? निषेध और विरोध अपनी लकीर पीटते रहते है, पर नशे के व्यवसाय एवं नशेबाजों के समुदाय में दिन-दूनी रात-चौगुनी वृद्धि होती जाती है। विवेक को तिलाञ्जलि देने के उपरान्त उन्माद की तृप्ति ही एकमात्र अवलम्बन बन जाती है। दूसरों को दुष्परिणाम भुगतते देखकर भी आवेशग्रस्तों की आँखें नहीं खुलती।
जीभ के चटोरेपन में हाथों हाथ स्वाद चखने का मजा आता है। इस प्रसंग में अत्यधिक मात्रा में अभक्ष्य उदरस्थ किये जाते हैं। अपच उसी का प्रतिफल है। वह अपच जो कुछ ही दिनों में पेट में सड़न भरी विषाक्तता उत्पन्न करके रक्तविकार से लेकर अनेकानेक रोगों का निमित्त कारण बनता है। कई बार तो दुष्परिणाम और भी जल्दी सामने आ खड़े होते हैं। उल्टी, दस्त, उदरशूल जैसी व्यथाएँ चटोरे लोगों को अक्सर हाथों हाथ ही देखी जाती हैं-भारी पेट लेकर चलना, काम करना, गहरी नींद सोना कठिन हो जाता हैं। फिर भी जिह्वा के स्वाद की ललक इतनी प्रचण्ड रहती है कि स्वाद के नाम पर विष भक्षण करना पड़े तो भी अपनी हरकत से बाज़ न आयें लोग प्रायः एक-चौथाई जिन्दगी इस चटोरेपन के कारण ही गँवा बैठते हैं। जितने दिन जीते हैं वे भी रुग्णता और दुर्बलता से आये दिन कराहते हुए ही ज्यों-त्यों करके गुजारते हैं।
कामुकता भी अपने ढंग का एक दूसरा उन्माद है, जिसकी चसक और ललक होश सँभालने से लेकर मरते दम तक पीछा नहीं छोड़ती। यह जीवनरस को निचोड़ते रहने के अतिरिक्त और कुछ नहीं। यह अपने ओजस की फुलझड़ी जलाकर चित्र-विचित्र तमाशा देखने के अतिरिक्त और कुछ नहीं। भगिनी, पुत्री जैसी पवित्रता तिरोहित हो जाती है और संसार भर की युवतियाँ मात्र ऐसी वेश्याएँ प्रतीत होती हैं, जो कल्पनाशीलों के लिए ही अपना समर्पण करने की प्रतीक्षा कर रही हों। इस ललक से यौनाचार से भी अधिक घातक और अहर्निश विषय ज्वर की तरह चढ़ा रहने वाला बुखार मानसिक दक्षता को खोखला करके ही रहता है। शरीर तो समय-कुसमय निचुड़ता ही रहता है। चरित्र की दृष्टि से भी आचरण नरपशुओं जैसे बन पड़ते हैं। इस अनर्थ को देखते हुए भी संयम बरतने की सूझ उभरती नहीं। वैयक्तिक और सामाजिक जीवन इसी कारण असह्य भार से दबता जाता है। राष्ट्रीय प्रगति तो बन ही कैसे पड़े, विकास के जितने साधन जुट पाते हैं, उनसे अनेक गुने अभ्यागत पहले ही हाथ पसारे अपनी माँगे व्यक्त करते हुए देखे जाते हैं।
मर्यादाओं और वर्जनाओं का अंकुश उतार फेंकने के उपरान्त गगनचुम्बी लिप्सा, लालसाओं, महत्त्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए एक ही मार्ग रह जाता है-अनाचार उसके असंख्यों आकार-प्रकार है। दुर्बल स्तर के व्यक्ति चोरी, उठाईगिरी, ठगी, जुआ, प्रपंच, पाखण्ड जैसे जाल-जंजाल रचते हैं। भिक्षा माँगने से लेकर विश्वासघात करने तक में नहीं चूकते, पर जो समर्थ हैं, उनके लिए तस्करी, डकैती, हत्या, गिरोहबन्दी दादागिरी करने के द्वार, खुले रहते हैं। वे आतंकवादी आक्रमणकारी बनने से लेकर अपहरण और हत्याकांड तक में कोई कसर नहीं रखते। पागल क्या नहीं करता? विवेक के पलायन कर जाने पर मनुष्य समझदार दीखते हुए भी वस्तुतः भावना क्षेत्र का उन्मादी ही कहा जा सकता है। तथ्यतः यह सब प्रत्यक्षवाद की तूती बोलना ही कहा जाएगा।
सामाजिकता, नागरिकता, नीति, निष्ठा, उदारता, न्यायशीलता और समाज-मर्यादा आदि सभी मानवी विशेषताओं को वस्तुतः शालीनता के ही विभिन्न पक्ष और प्रयोग के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। जब मनुष्य नितान्त स्वार्थपरायण हो जाय और वह क्षुद्रतम संकीर्णता अपना ले तो फिर मत्स्य न्याय अपनाना या उसका शिकार बनाना ही एकमात्र नियति रह जाती है। यह पशुओं से भी गई-गुजरी स्थिति है। वह ईश्वर से लेकर, समाज-शासन के तथाकथित अंकुशों को पूरी तरह अंगूठा दिखा सकता है। फिर अभी कुछ खामियाजा भी भुगतना पड़ा, तो निर्लज्जों का इतने में क्या बनता-बिगड़ता है?
यहीं हैं वे सब कारण, जिसके कारण न नीतिनिष्ठा बची है, न सामाजिक मर्यादा। धर्म-कर्तव्य जैसी बातें तो मनोविनोद की चर्चा भर बनकर रह गई हैं, उन्हें व्यवहार में उतारने की आवश्यकता कौन समझता है? स्पष्ट है कि इस स्तर की मनःस्थिति के रहते परिस्थितियाँ ऐसी रह ही नहीं सकती जिसमें सुख-चैन से रहा और रहने दिया जा सके।
शारीरिक रुग्णता, मानसिक उद्विग्नता, आर्थिक अभावग्रस्तता, पारिवारिक उच्छृंखलता, सामाजिक अराजकता के रहते आशंका, अनिश्चितता और आतंक का ही माहौल सर्वत्र छाया रह सकता है। जिस तिस बहाने उपद्रव और विग्रह उभरते ही रहेंगे। आपसी असहयोग बना रहे, आन्तरिक असंतोष भरा रहे तो बाहरी क्षेत्र की सुविधायें किसी का क्या हित साधन कर सकती है? समाचार सुनने का, पढ़ने का जब भी अवकाश मिलता है तो अनर्थों की तूफानी बाढ़-सी आई लगती है, संदेह होता है कि देव-निवास कहा जाना वाला धरातल कहीं भूत-प्रेतों की भयावह दुनिया में तो नहीं बदल गया। ऐसी दशा में शान्ति और प्रगति की योजनाएँ बनाना एक स्वप्न संसार गढ़ लेने के समतुल्य ही माना जाएगा।
ऐसे ही वातावरण की प्रतिक्रिया प्रकृति को कुपित करती है और ऐसी दैवी प्रकोप की झड़ी लगती है जिनके कारण पूरी तरह जीते रहना बन पड़े और सर्वथा मर जाना ही संभव हो। इसे साँस रोक देने वाली घुटन जैसी स्थिति कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। इन दिनों हम सब ऐसे ही माहौल में रह रहे है। जब तब इस संदर्भ में बड़े विस्फोट भी फूटते है तब चौंकते है कि यह अनर्थ हम सबको काल के गाल में झोंक दे।
भविष्य की विभीषिकाओं की अक्सर भविष्यवाणियाँ होती है, उनके पीछे विद्यमान कारणों में बढ़ता हुआ प्रदूषण, उद्भिजों जैसा प्रजनन सामाजिक सद्भावों का विघटन ही नहीं,एक अत्यन्त सबल कारण यह भी है कि मनुष्य ने अपने भावनात्मक, चिंतनपरक,चारित्रिक एवं उदार सहकारिता के अनुबंधों को तिलाञ्जलि देते हुये ऐसी संस्कृति अपना ली है जैसे बौद्धिक प्रत्यक्षवाद पर अवलम्बित मानवीसत्ता के हर पक्ष में घुस पड़ी अराजकता ही कहा जा सकता है।
पिछली दो शताब्दियों को विज्ञान के उदय अभिवर्द्धन और चमत्कार प्रस्तुत करने का अवसर कहा जा सकता है। प्रत्यक्षवाद द्वारा तत्त्वदर्शन को पीछे धकेले जाने का अवसर भी यही रहा। पचाने की क्षमता से अधिक साधन प्राप्त होने पर उत्पन्न उन्माद ऐसा ही कुछ करा डालता है जो विवेकशीलता की दृष्टि से नहीं किया जाना चाहिये। इधर प्रकृति के दरबार में किसी के साथ लिहाज नहीं करनी का फल भुगतना एक अनिवार्यता है जो होकर ही रहता है। यही क्रम चल भी रहा है।
विज्ञान ने औद्योगीकरण की दिशा में कदम बढ़ाया। विशालकाय कल कारखाने लगे। उत्पादन की मात्रा इतनी बढ़ी की उसे खपाने के लिये मंडियों की आवश्यकता पड़ी। इसका एक प्रभाव यह हुआ कि अविकसित देशों पर आधिपत्य जमाकर उन्हें कच्चा माल देने ओर बना माल खरीदने के लिये विवश किया गया। भारत पर अंग्रेजी शासन का यही प्रधान कारण था। औद्योगीकरण से सम्पन्न अन्य देशों ने जहाँ वश चला वहाँ पंजे गड़ाये। दूसरे समर्थ राष्ट्रों से यह आशातीत लाभ देखा न गया और वे आपस में लड़ पड़े।इन दो सौ वर्ष में छुटपुट युद्ध तो हजारों हुये, पर दो विश्वयुद्ध ऐसे हुये, जिन्हें अभूतपूर्व कहा जा सकता हैं इनमें जन धन की अपार क्षति हुई।
पिछले छोटे बड़े युद्धों के परिणाम देखकर भी तीसरे विश्वयुद्ध की हवस शान्त नहीं हुई है। युद्धोन्माद अणु आयुधों के अम्बार लगाने पर उतारू है। यदि युद्ध हुआ तो धरती तल पर शायद एक भी जीवधारी न बचेगा। यदि न हुआ तो भी आणुविक कचरे और विकिरण से ही जनसमाज के अर्द्धमृतक बनने जैसी स्थिति पैदा हो रही है। कि यह कथित प्रगति वर्तमान समुदाय और भावी पीढ़ी के निबटने लिये ऐसे संकट खड़े कर रही है जिनसे निबटना कठिन है और अगले दिनों तो पूरी तरह गतिरोध ही हो जायेगा।
प्रत्यक्षवाद ने तत्त्वदर्शन को झुठलाने में बड़ी हद तक सफलता पायी है। फलतः अनाचार अपराध इस तेजी से बढ़े है कि जनसाधारण अपने आपको असुरक्षित आशंकित आतंकित अनुभव कर रहा है। शोषण और छल की तेजी से बढ़ती हुई प्रवृत्ति कहीं एक दूसरे की चीरकर खा जाने की स्थिति तक न पहुँचा दे? स्नेह सौजन्य सहकार घटने तथा लिप्सा लालसाओं के अनियंत्रित होने पर इसके अतिरिक्त और हो ही क्या सकता है कि दैत्यों दानवों का युग फिर लौट आये?
संयम गया कामुकता को छूट मिली तो बहुप्रजनन स्वाभाविक है चक्रवृद्धि क्रम से बढ़ रही जनसंख्या की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिये साधन उस गति से बढ़ नहीं सकते। न तो पृथ्वी को रबड़ की तरह खींचकर बढ़ाया जा सकता है ओर न उत्पादन दिन दूना रात चौगुना हो सकता हैं। औद्योगीकरण के बढ़ते प्रदूषण ने हरीतिमा पर और भी गहरी चोट की है। हरीतिमा घटने से भूमिक्षरण रेगिस्तानों के विस्तार जैसी समस्याएँ विकराल हो रही है। पर्यावरण का असन्तुलन ऋतुचक्र को ही अस्त−व्यस्त किये दे रहा हैं जनसंख्या की बाढ़ न रुकने से विकास के लिये किये गये प्रयास विफल होते जा रहे है। इन सब का परिणाम क्या होगा? इसका अनुमान लगाते ही हर विचारशील का मन घबराने लगाते है।
किसी भी शक्ति अथवा साधन का दुरुपयोग बुरा होता है। मर्यादाएँ टूटी और वर्जनाओं का उल्लंघन द्रुत गति से हुआ तो उसके परिणाम भयावह ही हो सकते है। समस्याओं विभीषिकाओं विपत्तियों के घटाटोप बढ़ रहे है। पतन ओर पराभव का क्रम जिस तेजी से गति पकड़ रहा है उसे देखते हुये अगले दिनों की भयंकरता में कोई संदेह नहीं रह जाता है।
प्रत्यक्ष ही नहीं परोक्ष भी प्रदूषित
मनुष्य का चिन्तन चरित्र और व्यवहार व्यक्ति और समाज को तो प्रभावित करता ही है सूक्ष्म जगत भी उससे अछूता नहीं रह पाता। विकृत चिन्तन और भ्रष्ट चरित्र सूक्ष्म जगत के अदृश्य वातावरण को प्रदूषण से भर देते है। प्रकृति की सरल स्वाभाविकता बदल जाती है और वह रुष्ट होकर दैवी आपत्तियाँ बरसाने लगती है। इन दिनों अतिवृष्टि अनावृष्टि बाढ़ दुष्काल भूकम्प जैसी विपत्तियाँ बड़े क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है। शारीरिक ही नहीं मानसिक रोगों में भी भारी बढ़ोत्तरी हो रही है। मानवी सद्भावना में, व्यक्तित्व के स्तरों में बुरी तरह गिरावट आ रही है। इन सब के कारण वर्तमान जटिल और भविष्य धूमिल बनता जा रहा है। अनेक विसंगतियाँ जड़ें जमाती रही हैं। जो लोग इन परिस्थितियों में सुधार करने की स्थिति में है। उनमें भी इन कर्तव्यों के प्रति आवश्यक उत्साह नहीं है। सदुपयोग से वही शक्तियाँ सुख सुविधा सम्पन्न स्वर्गीय वातावरण बना सकती है। दुरुपयोग तो नरक के अलावा और कुछ बना ही नहीं सकता। अंतरिक्ष का बढ़ता हुआ तापमान ध्रुव प्रदेशों की बर्फ गलाकर जलप्रलय जैसी स्थिति बना सकता है। असंतुलन के दूसरे पक्ष के कारण हिमप्रलय की संभावनाएँ विज्ञजनों द्वारा व्यक्त की जा रही है। धरती के अन्तरिक्ष कवच ओजोन की पर्त क्षीण होकर फट गयी तो ब्रह्माण्डीय किरणें धरती के जीवन को भूतकाल का विषय बना सकती है। यह सब और कुछ नहीं मनुष्य की उनकी करतूतों की प्रतिक्रिया है जो पिछली दो शताब्दियों में उन्मादी उपक्रम अपनाकर महाविनाश को आमन्त्रण दे रही है।
परन्तु स्रष्टा ऐसा होने नहीं देगा उसने इस धरती को उसकी प्रकृति सम्पदा को मानवीसत्ता का बड़े मनोयोगपूर्वक संजोया है। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक अनेकों बार अनेकों प्रकार की विकट परिस्थितियाँ आयी है। उन्हें टालने वाले ने समय रहते टाला है और टालने दिशा में बहते प्रवाह को उलट कर सीधा किया है यदा यदा हि धर्मस्य.........वाला वचन समय समय पर पूरा होता रहा है। अब भी वह पूरा होकर रहेगा। इसलिये सतर्कता बरतते हुये भी निराश होने की आवश्यकता नहीं है। विनाश की विभीषिकाओं में सन्देह नहीं पर यह भी निश्चित है कि समय चक्र पूर्व स्थिति की और घूम गया है। पुरातन सतयुगी वातावरण का पुनर्निर्माण होकर रहेगा।
रात्रि जब समाप्त होती है, तो एक बार सघन अँधियारा छा जाता है। बुझते दीपक की लौ तेज हो जाती है। संव्याप्त असुरता भी याद अपने विनाश की वेला देखकर पूरी शक्ति के साथ आक्रमण करे तो आश्चर्य नहीं। प्राचीनकाल में असुरों को जब अपनी दुष्टता का समापन होता दिखा तो उन्होंने देवत्व पर सारी शक्ति झोंककर आक्रमण किया। हारा जुआरी एक बार साहस बटोरकर सब कुछ दाँव पर लगा देता है भले ही उसे वह सब गंवाना पड़े। युगसंधि में ऐसा ही हो तो आश्चर्य नहीं।
परिवर्तन की वेला युगसंधि युगसंधि प्रसव पीड़ा जैसा समय है। शिशु जन्म के समय जननी पर क्या बीतती है इसे सभी जानते है पर पुत्र रत्न को पाकर उसकी खुशी का ठिकाना भी नहीं रहता। फसल जिन दिनों पकने को होती है उन्हीं दिनों खेतों पर पक्षियों के झुण्ड टूटते है, युगसंधि की इस वेला में जहाँ पके फोड़े को फूटने और दुर्गन्ध भरा मवाद निकलने की संभावना है वहाँ यह भी निश्चित है कि आपरेशन के बाद दर्द घटेगा घाव भरेगा और संचित विकारों से छुटकारा मिलेगा। देवताओं की संयुक्त शक्ति से असुर निकंदिनी दुर्गा का अवतरण हुआ था। उन्हें संघशक्ति भी कहा जाता है। ऋषियों का रक्त संचय करके घड़ा भरा गया उससे सीता उत्पन्न हुई जिनने लंका की असुरता को नष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निबाही। समुद्र सेतु बनना दुदन्ति दानवों को निरस्त करना रामराज्य का सतयुगी माहौल बनाना रीछ वानरों की सेना द्वारा ही संभव हुआ। उस पुण्य प्रयोजन में गीध गिलहरी तक ने योगदान दिया। बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन ने संसार को हिलाया,यह पुरुषार्थ भिक्षु और भिक्षुणियों के समुदाय का ही था। गाँधी के सत्याग्रही ही खोयी हुई आजादी वापस लाने में समर्थ हुये। तिनके मिलकर रस्सी और धागों के मिलने से कपड़ा बनने की बात सभी का विदित है। युगसंधि के दुहरे मोर्चे पर लड़ना वरिष्ठ प्राणवानों के लिये ही संभव होगा। अनिष्टों को निरस्त करना और उज्ज्वल भविष्य को धरती पर स्वर्ग उतारने जैसा उदाहरण प्रस्तुत करना देवमानवों की संयुक्त शक्ति से ही संभव है। इसी उमंग को उमगाना अदृश्य भगवान का साकार रूप में अवतरण कहा जा सकता है।
युगसंधि बारह वर्ष की है। अब से लेकर सन् 2000 तक इक्कीसवीं सदी से नवयुग सतयुग आरम्भ होने की भविष्यवाणी अनेक अध्यात्मवादी एवं परिस्थितियों का आकलन करने वाले विज्ञानी एक स्वर में प्रतिपादित करते रहे है। इस कथन में भविष्यवक्ताओं ओर ज्योतिषविदों का भी प्रतिपादन सम्मिलित है। इक्कीसवीं सदी निश्चय ही उज्ज्वल भविष्य का संदेश लेकर आ रही है। पर हम सबको गुजरना पड़ेगा। इस बारह वर्ष की अवधि में जहाँ तक सृजन का शिलान्यास होगा वहाँ संचित अवांछनीयताओं के दुष्परिणामों से भी निबटना होगा। इसलिये इस अवधि को दुहरे उत्तरदायित्वों से लदा हुआ कहा गया है। इसमें वरिष्ठजनों को सहभागी बनाकर हनुमान और अर्जुन जैसी भूमिका निभानी होगी। परोक्ष प्रक्रिया भगवान की होगी, पर उसका श्रेय तो प्रबल पुरुषार्थ करने वालों को ही मिलेगा।
प्रियजनों की भूमिका
प्रयासों की तीन दिशाधाराएँ है- 1 लोकमंगल के लिये जो प्रत्यक्ष उपाय अपनाए जा रहे है उनसे सहयोग करना 2 विचारक्रान्ति को व्यापक बनाने की विशिष्ट भूमिका सम्पन्न करना। 3 सामूहिक अध्यात्म साधना से सूक्ष्म वातावरण संव्याप्त प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलना। प्रथम सोपान को राजतंत्र अर्थतन्त्र एवं स्वयं सेवी संस्थान पूरा कर रहे है तो भी उसमें यथाशक्ति सहयोग प्रज्ञापरिजनों को भी देना चाहिये।
शेष दो उपेक्षित कार्य ऐसे है जो युगशिल्पियों को विशेष रूप से अपने कंधे पर उठाने हैं। जनमानस का परिष्कार सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन एक ऐसा महत्वपूर्ण कार्य है जिसके सहारे उस दुर्बुद्धि से लोहा लिया जाना है, जो क्षमताओं का दुरुपयोग करने नारकीय परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के ले लेखनी वाणी और सद्भाव सम्पन्नों के संगठनों को सक्रिय किया जा रहा है अब उसमें ओर भी अधिक गति देने की आवश्यकता पड़ेगी। शाँतिकुँज में युग सृजेताओं की एक बहुत बड़ी संख्या इन्हीं प्रयोजनों की पूर्ति के लिए संगठित की जा रही है एक एक महीने के और नौ नौ दिन के प्रशिक्षण सत्र इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए किये जा रहे है। युगसाहित्य का सृजन और युग चेतना का आयोग वितरण करने वाले सत्संग आयोजनों का उद्देश्य यही है। दीप यज्ञों की श्रृंखला इसीलिये व्यापक बनाई जा रही है कि युगचेतना से लोकमानस को आन्दोलित किया जा सके और और जिनकी प्राणचेतना जीवन्त है उन्हें इस विषम वेला में कुछ पुरुषार्थ करने के लिये कटिबद्ध किया जा सके।
महापुरश्चरण
इसके अतिरिक्त तीसरा पक्ष है - सूक्ष्म जगत के परिशोधन एवं भविष्य को उज्ज्वल बनाने हेतु दिव्य उपासना। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव बनाने के लिये सामूहिक महासाधना का नियोजन। यह दिव्य पुरश्चरण सन्निकट की आश्विन नवरात्रि से शाँतिकुँज से आरम्भ किया गया है। नाम है युगसंधि महापुरश्चरण। शाँतिकुँज हरिद्वार में यह पुण्य आयोजन सन् 2000 तक चलता रहेगा। इक्कीसवीं सदी के आरम्भ के साथ ही इसकी पूर्णाहुति होगी। जिसे साधना के अनुरूप ही इतना बड़ा कहा जा सकेगा जिसकी तुलना अब तक के किसी विशालतम समापन से भी न की जा सके।
पाण्डव वनवास में बारह वर्ष साधनारत रहे। राम ने चौदह वर्षों में से बारह वर्ष तप प्रयोजन में ओर दो वर्ष असुर संहार में लगाए। पार्वती का भागीरथ का दधिचि का च्यवन का तप भी बारह वर्ष का रहा। बुद्ध अपने में दैवी शक्ति का अवतरण करने हेतु बारह वर्ष तक तप में रहे। शंकराचार्य और चाणक्य भी प्रायः इतने ही दिन साधनारत रहे। युग संधि के उभयपक्षीय प्रयोजन भी बारह वर्ष की नरदेवों की इतनी लम्बी साधना से ही पूर्ण होंगे।
प्रस्तुत साधना का केन्द्र शाँतिकुँज बन रहा है। जिनको उपासना की गरिमा पर विश्वास है उन सभी का आवाहन किया गया है कि इस अवधि में एक अनुष्ठान यहीं सम्पन्न करें और विराट सामूहिक जप यज्ञ के भागीदार बनने का श्रेय प्राप्त करें। आशा की जाती है कि निर्धारित अवधि में लाखों व्यक्ति इसके सहगामी बन सकेंगे। उद्देश्य तो युगपरिवर्तन के दोनों पक्षों को सम्पन्न कर सकने वाला दिव्य वातावरण बनाना है पर साथ ही यह बात भी है कि दूसरों के लिये मेंहदी पीसने वाले के अपने हाथ उससे पहले ही रच जाते है। साधक अपने लिये सुरक्षा कवच प्राप्त करने में प्रतीक परिष्कार से लाभान्वित होने से सफल हो सकते है। यदि उनके निष्ठा बीच में ही न डगमगा गई तो लक्ष्य तक पहुँचने के ले अनवरत प्रयत्न करने वालों का सेनापतियों जैसा श्रेय मिलेगा।
सूर्य की ध्यान धारणा
प्रस्तुत युगसाधना में अन्य क्रिया कलाप तो साधारण अनुष्ठानों की भाँति ही रहेंगे। पर एक बात विशिष्ट रहेगी सूर्योपस्थान भगवान सूर्य की निकटता उन्हें ही इस महान प्रक्रिया का अधिष्ठाता वरण किया गया है इसलिये जप गायत्री का पूजन गायत्री का करते हुये भी प्रातः काल उदय होते हुये स्वर्णिम आभा वाले सविता देव का ध्यान करते रहना होगा। ध्यान नहीं प्राण प्रत्यावर्तन का भाव समर्पण भी। साधक का प्राण सविता में प्रवेश करके वैसा ही लाल हो जाता है जैसा भट्टी में कुछ समय पड़ा रहने के उपरान्त सोना लाल हो जाता है। ईंधन को आग में डालने पर भी यही होता है। यह समर्पण हुआ। दूसरा भाग है सविता का साधक की सत्ता में अवतरण। जिस प्रकार किरणें धरती पर उतरती है और प्रभावक्षेत्र को ऊर्जा एवं आभा से भर देती है। उसी प्रकार साधक भी अनुभव करेगा कि सविता का ओजस तेजस वर्चस बरसता है और उपासनारत को अपने दिव्य अनुग्रह से ओत प्रोत कर देता है।
गहरी साँस लेते हुये सूर्य के अवतरण की ओर धीरे धीरे साँस छोड़ते हुये सूर्यार्घ्य दान की तरह सविता को आत्मा समर्पण करने की भावना करते रहना चाहिये।
इक्कीसवीं सदी में सूर्य तेजस् में भी अनुकूल परिवर्तन होगा और उसका प्रभाव समस्त वातावरण पर पड़ेगा। प्राणियों में भी क्षमता और चेतना विकसित होगी। ईंधन का विद्युत रोग नियंत्रण का समुद्र से पानी लाकर मेघ बरसाने वायुशोधन का काम तो सूर्य अभी भी करता है। सड़ी हुई दुर्गन्ध को मिटाने और विषाणुओं का हनन करने में उसके चमत्कार निरन्तर देखे जाते हैं शरीरों में विटामिन डी का उत्पादन स्रोत वहीं हैं अगले दिनों उसकी प्रखर चेतना क्षेत्र को भी अपने प्रभाव में लेगी। गिरों को उठाने और उठों को उछालने में जहाँ मानवी प्रयत्न काम करेंगे वहाँ उसे सफल संभव बनाने में सविता की अदृश्य भूमिका भी काम करेगी। आद्यशक्ति गायत्री का अधिष्ठाता भी तो सविता ही है। उसी के प्रतीक रूप में दीपक ज्योति को तथा अगरबत्ती को प्रतिष्ठित किया जाता है।
सूर्य योग के सम्बन्ध में सूर्य पुराण सूर्य उपनिषद् चाक्षुश्योपनिषद् आदि में बहुत कुछ कहा गया है सावित्री और सविता का अपने समय की आवश्यकता भली प्रकार पूरी कर सकेगा, ऐसा विश्वास किया जाता है। निराकरण उन्नयन के लिये जो भौतिक प्रयत्न चल रहे है उनमें से इस दिव्य साधना का समावेश हो जाने से लक्ष्य की पूर्ति में असाधारण योगदान मिलने की आशा है। इसलिये पुरश्चरण में गायत्री मंत्र और सूर्योपासना का महत्व दिया गया हैं दैनिक साधना की पूर्णाहुति महातेज की अभ्यर्थना होगी ऐसी जिसे अभूतपूर्व कहा जा सके।
शाँतिकुँज को केन्द्र यहाँ की परम्परागत विशेषताओं को ध्यान में रखते
हुये बनाया गया है। गंगा को गोद हिमालय की छाया सप्तऋषियों का तपस्थली जैसी पुरातन और गायत्री जप यज्ञ व गुरुकुल आरण्यक जैसी विशेषताओं के कारण वह एक प्रकार से असाधारण विशेषताओं से सम्पन्न हो चला है। घर गृहस्थी के वातावरण की अपेक्षा ऐसे दिव्य केन्द्र में रहकर साधना करने में कितनी अधिक विशेषता हो सकती है उसकी अनुमान कोई भी लगा सकता है। सभी इच्छुकों को अवसर मिल सके इस दृष्टि से नौ दिवसीय साधना सत्र बारह वर्ष तक चलते रहने का संकल्प प्रकट किया गया है। अन्तरिक्ष का विभाजन बारह राशियों में हुआ है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते हुये ठीक अपनी उसी स्थिति में बारह वर्ष में आती है। इस तथ्य को देखते हुए प्रस्तुत पुरश्चरण की अवधि बारह वर्ष रखी गयी है।
विस्तार विश्वव्यापी होगा
युगसंधि पुरश्चरण शाँतिकुँज में उद्भूत अवश्य हुआ हैं पर उसका विस्तार उद्गम तक ही सीमित न रहकर विश्वव्यापी बनेगा। कम से कम प्रज्ञा परिवार के तो सभी लोग उसमें भाग लेंगे ही। जो घर से बाहर नहीं जा सकते, अत्यधिक व्यस्त या प्रतिबंधित है वे अवकाश के किसी भी समय कम से कम दस मिनट मानसिक रूप से गायत्री का जप और ध्यान कर सकते है। मन में ही सूर्यार्घ्य देने की भावना की जा सकती है और शाँतिकुँज पहुँचकर म नहीं मन उस उद्गम की परिक्रमा लगाने की भी।
जहाँ प्रज्ञापीठें बनी है जहाँ प्रज्ञा मण्डल या महिला मण्डल बने हो गायत्री परिवार जीवन्त है वहाँ भी महापुरश्चरण की एक इकाई अपने यहाँ प्रतिष्ठित करनी चाहिये। हर रोज बन पड़ना कठिन रहे तो सप्ताह में एक दिन इसके लिये निश्चित किया जा सकता है रविवार यह सूर्य का दिन भी है। उस दिन किसी स्थान में अथवा बारी बारी आमंत्रित रखा जा सकता है।
सामूहिक गायत्री पाठ। दीप यज्ञ का प्रज्ज्वलन। पाँच दीपक एक माचिस अगरबत्ती की थालियों में सूर्य के रूप में स्थापना। आधा घण्टा मानसिक जप ध्यान युग संगीत का सहगान कीर्तन यन्मण्डलम् स्तोत्रों से सविता का स्तवन। इसके बाद झोला पुस्तकालय उपक्रम में सभी उपस्थितजनों को भागीदार बनाना। जिनके जितनों से संबंध हो वे उतनी पुस्तकें पढ़ाने के लिये मण्डल से ले जाये और अगले सप्ताह जब आवें तो अधिकाधिक शिक्षितों पढ़ाने और अशिक्षितों को सुनाने के उपरान्त वापस कर दें। यही है साप्ताहिक साधना का वह उपक्रम जिसमें दिव्य अवतरण तो प्रधान है ही पर साथ में जनमानस को परिष्कृत करने वाले ज्ञानयज्ञ का भी समावेश है। युगसंगीत और युगसाहित्य द्वारा आलोक वितरण यह दोनों कार्य इसी स्तर के है जिनके माध्यम से विचार क्रान्ति अभियान का भी विस्तार होता है।
पंच से पच्चीस बनने का प्रेरणा मंत्र किसी को भी भूलना नहीं चाहिये। इसी आधार पर तो अपना सीमित परिवार विश्वव्यापी बनेगा। साप्ताहिक आयोजनों में सम्मिलित होने वाले इस प्रयत्न में रहे कि अगले सप्ताह अपने प्रभावक्षेत्र से अधिक लोगों को लेकर चलें। उनकी निष्ठा बढ़े तो वे भी पाँच नये खोज निकाले और आयोजन के साथ जोड़े। इसी प्रयास के अंतर्गत प्रज्ञा मण्डलों और महिला मण्डलों का गठन एवं विस्तार होता चलेगा। संघशक्ति बनकर अगले दिनों कंधे पर आने वाले उत्तरदायित्वों का वहन कर सकेंगे, जो जीवन एवं समाज के हर क्षेत्र को असाधारण रूप से प्रभावित करेंगे।
जहाँ भी युग पुरश्चरण की उपरोक्त सामूहिक साधना का उपक्रम चले वहाँ से नये सम्मिलित होने वाले श्रद्धालुओं को एक बार एक अनुष्ठान शाँतिकुँज में जाकर पूरा करने के लिये कहा जाय। लौटने पर वे पूरा उत्साह लेकर लौटेंगे और बारह वर्ष तक सम्मिलित होते रहने के व्रत का निर्वाह करेंगे।
आयोजनों का खर्च चलाने के लिये सम्मिलित होने वाले साधकों के यहाँ बीस पैसे नित्य जमा करने के लिये ज्ञानघट स्थापित किये जायें। उसी संग्रहित राशि से साप्ताहिक आयोजन का खर्च चलता रहेगा। इस आपूर्ति की जिम्मेदारी साधकों को ही मिल जुलकर उठानी चाहिये। बड़े खर्च वाली आवश्यकताओं के लिये ही बाहर के लोगों के अनुदान स्वीकार किये जाये।
प्रचार उपकरणों के लिये लाउडस्पीकर टेपरिकार्डर प्रोजेक्टर आदि की आवश्यकता पड़ती है। इसमें लगभग दो हजार खर्च होते है। दीप यज्ञायोजन एवं ज्ञानरथ की स्थापना के लिये भी कुछ अतिरिक्त धन की आवश्यकता लिया जा सकता है। जो एकत्र हो और किस प्रकार खर्च किया गया उसका विवरण दान देने वालों को देते रहने से किसी को उँगली उठाने का अवसर नहीं मिलता।
युगसंधि पुरश्चरण के आरम्भिक वर्ष में युगचेतना का उदय दृष्टिगोचर करने वाले आदर्श वाक्यों के स्टीकर घर घर चिपकाने का आन्दोलन पूरे उत्साह के साथ चलाया जाना चाहिये। कोई दुकान कोई घर कोई दफ्तर कारखाना कोई वाहन ऐसा न बचे जहाँ आदर्श वाक्यों का अंकन दृष्टिगोचर न हो। देखने वाला को लगता है कि घर घर में स्थान स्थान पर युगचेतना की छवि उभरने लगी है। नवयुग की चेतना उभरने का परिचय स्टीकरों के माध्यम से मिले तो जन-जन को लगे कि आदर्शवादिता जड़ जमाने लगी। पतन या उत्थान के लिये प्रेरणाएँ ऐसे ही दृश्य वातावरण से बनती है।
गायत्री परिवार में जिनकी भी श्रद्धा है वे उपर्युक्त क्रिया कलाप को दिव्य साधना का प्रारम्भिक चरण मानें और उसे भावना पूर्वक अपनाए। इतना करने वाले उस अग्रगामी भूमिका को निभा सकेंगे, जिसके आधार पर महाविनाश को रोकना और महाविकास के सतयुगी वातावरण का नवनिर्माण संभव हो सके। बड़े कार्यों को बड़ी शक्तियाँ सम्पन्न करती है। उच्चस्तरीय बड़प्पन का सम्पादन करने के लिये राज मार्ग बनाना ही प्रस्तुत युगसंधि महापुरश्चरण का प्रमुख उद्देश्य है। इसमें सच्चे स्वार्थ और सच्चे परमार्थ का समन्वय है।
1971 के जून माह में विदाई की पूर्व वेला में गायत्री तपोभूमि, मथुरा में दिया गया प्रवचन
गायत्री मंत्र हमारे साथ साथ
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
देवियो! भाइयो!!
सुविधाओं से भरा जीवन कमजोर आदमी जीते रहते हैं। उन्हें समाज देश की चिन्ता नहीं होती है। मनुष्यों की अकल एवं विचार करने की दिशा ठीक की जा सकी तो कल्याण हो सकता है ऐसा हमने आपको बतलाया था। हमने आपसे कहा था। कि समाज की सेवा करने का लोकमंगल का कार्य करने का एक ही माध्यम है कि अध्यात्मवादी जीवन जिया जाय। आज चोरी अपराध को कैसे रोका जा सकता है? आज हर आदमी का ईमान खराब हो गया हैं। हर आदमी के पीछे अगर एक एक सिपाही भी लगा दिया जाए तो भी उसे रोका नहीं जा सकता है। वास्तव में कानून बनाकर तथा पुलिस की संख्या बढ़ाकर अपराध को क्या घटाया जा सकता है? मित्रों यह कदापि कम नहीं किया जा सकता है चाहे हम कितनी भी पुलिस या मिलिटरी लगा लें वकील पुलिस वाले बढ़ते चले जाएँगे तथा अपराधों की संख्या भी निरन्तर बढ़ती चली जाएगी।
मित्रों इसमें जब भी बदलाव आयेगा चाहे वह एक हजार वर्ष के बाद ही आये वह तभी सम्भव होगा जब मनुष्यों को बतलाया जाएगा कि अपने कर्मों के अनुसार ही मनुष्य को फल मिलता है। सर्वव्यापी एक भगवान है जो हर मनुष्य के कर्मों को देखता है तथा न्याय करता है यह अध्यात्म था जो हमने आपको इस शिविर में बतलाया था कि व्यक्तिनिर्माण के साथ समाज का भी निर्माण करना चाहिये तथा उसके विकास के लिये भी प्रयास करना चाहिये तभी मनुष्य के जीवन में सुख शान्ति आ सकती है। अध्यात्म का नाम चमत्कार नहीं है। चमत्कार तो बाजीगरी है। चालाकी है। इस खेल तमाशे का नाम अध्यात्म नहीं है। छोटे बच्चों को बहकाने का नाम अध्यात्म नहीं है। आप चमत्कार के बारे में सोचना बंद कर दीजिये तथा सही रूप से अध्यात्म को समझने प्रयास कीजिये। अध्यात्म का मतलब है हमारी गुण कर्म स्वभाव में बदलाव ऐसा अगर आप कर सकते है तो अपने आप चमत्कारी व्यक्ति बन सकते है। हम तो यहाँ तक कह सकते है कि आप पूजा−पाठ बन्द कर दीजिये परन्तु अपने व्यक्तित्व का परिष्कार कर लीजिए। आप देखेंगे कि जिस चमत्कार के पीछे आप भाग रहे है। वह आपके पीछे आता हुआ दिखायी पड़ेगा।
मित्रो गाँधी जी ने नित्य आधा घण्टा पूजा जप किया था परन्तु वे जीवन में चमत्कार दिखलाते चले गये। उनके आशीर्वाद से लोग बादशाहों के बादशाह बन गये। हमारे आशीर्वाद से भी वैसा ही हुआ है। गाँधीजी के आशीर्वाद से दो दो कौड़ी के लोग नेता बन गये। पं. जवाहर लाल और सरदार पटेल धन्य बन गये। गाँधी जी ने अंग्रेजों से कहा कि "क्विट इण्डिया"। वे अपना बिस्तर लेकर चले गये। उनकी बंदूक रखी रह गयी। गाँधी जी कौन थे? आधा घण्टा भजन पूजन करने वाले व्यक्ति। उन्हें समाधि आती थी? ध्यान प्राणायाम भी नहीं किया उन्होंने। एक भी चक्र बेधन नहीं किया था न ही अपनी कुण्डलिनी जगायी थी परन्तु उनके जीवन में चमत्कार होते चले गये थे। यह था उनके जीवन में व्यक्तित्व का परिष्कार जो उन्होंने किया था। अपने गुण कर्म स्वभाव के परिष्कार और आधा घण्टे नित्य के भजन से वे मालामाल हो गये। इस पूरे शिविर में हमने विभिन्न माध्यमों से आपको यह बतलाने का प्रयासों किया कि अध्यात्म क्या है तथा उसको आपके अन्दर उतारने का प्रयास किया। काश! आप अगर सही अध्यात्म को समझकर अध्यात्मवादी हो जाये तो मजा आ जाएगा।
मित्रो अगला समय बहुत शानदार आने वाला है दुनिया में से अनीति मिटने जा रही है कुरीतियाँ मिटने जा रही है डिप्लोमेटिक मेण्टेलिटी मिटने जा रही है। आप विश्वास करें या न करें परन्तु हमें अपनी आँखों से दिखायी पड़ रहा है कि एक नयी हवा आ रही है। नयी दुनिया बनती आ रही है। नये विश्व का निर्माण होने जा रहा है। उस नये युग में आध्यात्मिकता की नयी परिभाषा होगी तथा पुरानी परिभाषा मिट जाएगी। यह संतोषी माता की हवा उड़ती जा रही है तथा पता नहीं कहाँ जा रही हैं। मित्रों अब वह संतोषी माता आ रही है जिसमें मनुष्य को संतोष करना सिखाया जाएगा। भौतिक चीजों में जिसको संतोष आ जाय तो मजा आ जाएगा। ऐसा व्यक्ति अपनी प्रतिभा और धन को लोकमंगल में खर्च कर देगा तथा अध्यात्मवादी बन जाएगा। छाया की तरह से सुख उस अध्यात्मवादी के पीछे भागते फिरेंगे। वह अपने लिये नहीं खर्च करेगा। ऐसे ही व्यक्ति का जीवन धन्य होता चला जाता है उसकी प्रगति होती चली जाती है।
अध्यात्मवादी भीख माँगने वालों का नाम नहीं है। वह देने वालों का नाम है वह भगवान का अनुग्रह व एहसान माँगने वाला व्यक्ति नहीं है बल्कि परमात्मा उसके पीछे पीछे चलने लगता है तथा उसका जीवन धन्य कर देता है। परमात्मा उनकी सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करने को तैयार है। अपने अन्दर महत्वपूर्ण तथ्य जो छिपे पड़े है उन्हें जाग्रत करने का नाम अध्यात्म है। अध्यात्म आत्मशक्ति विकसित करने का नाम है। इनको मैं आपको इस शिविर में बतलाता रहा हूँ। आप से निवेदन करता रहा हूँ कि आप हमारी बातों को इस कान से सुनकर उस कान से मत निकाल दीजिये। हम वैखरी वाणी का भी उपयोग करते रहे हैं। भगवान यानि कि ब्रह्माजी भी चार मुख से बोलते रहे है। इंसान भी चार मुख से बोलते है। ये है वैखरी वाणी जिसे मैं एक घण्टे से बोल रहा हूँ। यह मनुष्यों के कानों में जाती है तथा मस्तिष्क से टकराती है। इस वाणी से हमने आपको अध्यात्म के सिद्धान्त को बतलाया तथा समझाया।
दूसरी मध्यमा वाणी है। यह भाव को उभारने का कम करती है। यह अन्तः करण को प्रभावित करती है। इसके प्रभाव से शेर एवं गाय एक घाट पर पानी पीते ही तीसरे है परावाणी। विचारों की वाणी को परावाणी कहते है चौथी है पश्यंति वाणी। पश्यंति वाणी आत्मा की वाणी होती है। यह आत्मा में घुस जाती है। नारद ने बाल्मिकी के हृदय में एक बात कहीं थी और वह प्रभावित हो गये। बुद्ध ने अपने हजारों शिष्यों को इसी प्रकार प्रभावित किया था। आप भी जब सोते रहते है तो हम आपके पास जाते है किसी के पैर के पास बैठ जाता हूँ तो किसी के सिर के पास बैठ जाता हूँ तो किसी के सिर के पास बैठकर उसका सिर सहलाता रहता हूँ। आपको पता चलता है कि नहीं यह मैं नहीं पूछ सकता हैं। आपको श्रद्धा जैसे जैसे बढ़ती जाएगी। आप अनुभव करते चले जाएँगे। हमारे गुरुदेव जब हमारे कमरे में आए और पश्यंति वाणी से क्या कहा यह तो हमें पता नहीं परन्तु वे हमें धन्य कर गये। अनुदान क्या क्या दिये यह तो मैं नहीं कह सकता परन्तु इस दुनिया से जाने के बाद जब हमारे जीवन का लिफाफा जो बन्द है वह जब खोला जाएगा। तो पता चलेगा कि हम कौन थे। तथा हमने इस दुनिया के लिये संस्कृति के लिये क्या क्या किया? हमें विश्वास है कि आप यहाँ से जाएँगे तथा हमारा प्रसाद लेकर जाएँगे तो वह आपके अपने जीवन में काम आएगा तथा आप धन्य होते हुये चले जाएँगे।
आप अध्यात्म के सिद्धान्त को अपनाए या न अपनाए परन्तु इस दुनिया में जो लोग रहते है उनके साथ मीठा व्यवहार करना उनके साथ प्रेम का व्यवहार करना। जिनको अपना दुश्मन बना लिया है उनको भी मित्र दोस्त बना लेना। इमर्सन कहते रहते थे कि हमें नरक में भेज दो हम वहाँ भी स्वर्ग बना लेंगे। व्यक्ति दुश्मन हमारे व्यवहार के कारण बन जाता है। आप अपने व्यवहार को ठीक करने का प्रयास करना तो धरती को स्वर्ग बनाया जा सकता है। अगर आपने अपनी भावना को परिष्कृत कर लिया तो मजा आ जायेगा। अगर आपकी वाणी में मिठास आ जाती है तो आपके लिये हर आदमी मित्र बन जाएगा।
एक बात हमने आपको ओर कही है कि आपको मेहनत करनी है। मशक्कत करनी है। धरती में जिस तरह लोहा ताँबा सोना भरा पड़ा है ऐसे ही हमारे भीतर भी बहुत-सी चीजें भरी पड़ी है। जमीन में हल जोते बिना बीज बोये बिना फसल कैसे प्राप्त हो सकती है? मेहनत मशक्कत करने के बाद ही सारी चीजों को प्राप्त किया जा सकता है। आपका अपने प्रति कठोर तथा दूसरों के लिये मुलायम बनना होगा। यह सिद्धान्त संयम का सिद्धान्त है।
चौथी बात हमने आपसे कहीं थी कि यह जलता हुआ जमाना हैं हर व्यक्ति जल रहा है। आपको इस जलते हुये समाज के ऊपर पानी डालने की आवश्यकता है यह है ऊँचे विचार की आवश्यकता। मित्रों हम यह पूछते कि बकरा खाने के बाद कोई बकरे की औलाद कहलायेगा या नहीं यह तो हमें बतलाना। हम पूछते है कि उसमें जो अवगुण है वह खाने वाले में आएँगे कि नहीं? आज सामाजिक मान्यता के बारे में खान पान के बारे में पड़ोसी के बारे में हर व्यक्ति की उलटी अकल हो गयी है। इससे आपका क्या बनने वाला है आपको यह ठीक करना होगा। समाज के लोगों के विचारों को ठीक करना होगा, उनकी भावनाओं में परिवर्तन लाना होगा।
मित्रो इतना ही नहीं पैसा खर्च करने में जीवन को महान बनाने के बारे में भी लोगों की उलटी अकल है। यदि सारे के सारे लोग इस तरह के होंगे, तो काम कैसे चलेगा? इन उलटी अकल वाले लोगों का नवनिर्माण करना होगा। उन्हें दिशा देनी होगी। उनके विचार ठीक करने होंगे। इस उलटे जमाने को सीधा करने के लिये आपको जो हमारा अनुदान मिल रहा है इस कार्य हेतु आप हमें सहयोग करिये। हमारे कंधे से कंधा मिलाकर चलने का प्रयास करेंगे, तो हमारा यह शिविर धन्य हो जाएगा। हम धन्य हो जाएँगे और आपका जीवन धन्य हो जाएगा। आने वाली पीढ़ियाँ आपको सदा याद रखेंगी।
मित्रों! हम लम्बे कदम बढ़ाते हुए लम्बी मंजिल की ओर बढ़ते जा रहे है। आप भी अपना कदम उस ओर अवश्य बढ़ाना तथा हमारा सहयोग करना। गाँव में यह नियम होता है कि जब कोई मर जाता है या कोई भी काम होता है तो जो व्यक्ति वहाँ चलता है तथा पाँच कदम के बाद ही वह वापस होता है मित्रो कम से कम लोग भी हमारे साथ पाँच कदम तो चलने का प्रयास करना। जमाना बदल रहा है हमारे साथ जमाना उठ रहा है हमारे साथ। इसी तरह आप भी हमारे साथ। इसी तरह आप भी हमारे साथ चलना। कहीं ऐसा न हो कि आप चल तो रहे है इधर पर देख रहे है उधर! ऐसा कभी मत करना। हमारे कदम से कदम मिलाकर चलना, चाहे पाँच ही कदम क्यों न चलना, भले ही एक घण्टा हमारे साथ चलना।
हमने एक बात और कही थी आपसे कि आप अपनी कमाई का दस पैसा ही खर्च करना एक नये समाज के
नवनिर्माण के लिये परन्तु उसमें सक्रियता लाना तथा उसे निभाना। आज पच्चीस पैसे की चाय आती है। हमने समाज संस्कृति और देश के लिये आपसे केवल आधा प्याला चाय की माँग की है। वह तो आप अवश्य देना अगर समाज के लिये इतना कर सके तो हम समझेंगे कि आपने हमारे साथ एक कदम चलने का साहस किया, प्रयास किया।
मित्रो! जब आप सोये रहते है तो हम आपके पास बैठकर आपके कानों में चार बातें कहते हैं उसका शिक्षण दिया करते है ताकि आप आध्यात्मिकता के रास्ते पर आगे बढ़ सकें। आज आपको घर के लिये विदा कर रहे है आप अपने घर चले जाएँगे तथा हम भी यहाँ घर में बैठे रहेंगे। हमें और आपको एक दूसरे की याद अपने अपने घरों में आती रहेगी। दो बैलों की जोड़ी होती है, अगर एक बैर बीमार हो जाता है या कहीं चला जाता है तो दूसरा बैल काम नहीं करता है। वहां सारा दिन कोहराम मचाता रहता है न चारा खाता है न पानी पीता है उसकी आँखों में विछोह के आँसू होते है मित्रो हम बैलों से ज्यादा है कम नहीं यह ध्यान रखना। मित्रो हम आपके सगे सम्बन्धी है सगे सम्बन्धी वे नहीं है जो एक खून से पैदा होते है वरन् वे होते है जो एक रास्ते पर चलते है जिनके विचार एक होते है जिनके गुण वाले लोग है एक भावना वाले लोग है एक दिशा वाले लोग है मोहब्बत वाले लोग है। हमारे आपके बीच एक ऐसा प्यार ऐसी मोहब्बत है जो कभी भी खत्म होने वाली नहीं है। आप जब जा रहे है तो हमारा दिल टूट रहा है। हम आपके जन्मदाता माता पिता से भी ज्यादा मोहब्बत करते है ऐसा तो हम दावा नहीं कर सकते परन्तु आपके किसी भी मित्र से कम मोहब्बत नहीं करते दोस्त के पास
दोस्त आता है तो उसको खुशी होती है परन्तु जब विदा होता है तो उसकी आँखों में आँसू आ जाते है। यह हमारी एवं आपकी कमजोरी है। आप जब विदा होते है तो मेरा भी दिल दुखी हो जाता है। विदाई के क्षणों में बड़े बड़े संतों की भी यही हालत हो जाती हैं कबीरदास जब मरने लगे तो उन्होंने एक मर्म भरी बात कही थी- राम बुलावा भेजिया दिया कबीरा रोय।
जो सुख -प्रेमी संग में सो बैकुण्ठ न होय।
वास्तव में प्रेम ही इस संसार की सर्वोपरि उपलब्धि है।
मित्रो! जो व्यक्ति अपना होता है या जिसे जो अपना मानता है उसकी विदाई बहुत ही कष्टकारक होती है। इसे मनुष्य की कमजोरी कहें या प्रकृति का विधान कहें। इसमें आप भी है तथा हम भी है। हमारा दिल टूट रहा है और आपका दिल भी टूट रहा है- ऐसा हम महसूस कर रहे है। परन्तु क्या हम आपको छोड़ देंगे? यह कभी नहीं हो सकता। भूत जो होता है वह जैसे चाहता है उसके पीछे लगा रहता है हम भी आपके पीछे पीछे लगे रहेंगे। आपको छोड़ नहीं सकते। आप भी अनुभव करते रहेंगे कि आचार्य जी के भाषण बन्द हो गये, परन्तु प्रतिध्वनि आपके कानों में हमेशा गूँजती रहेगी। हम नारियल की तरह ऊपर से कठोर है परन्तु भीतर से मुलायम है जिसमें दूध भरा हुआ है। भगवान ने न जाने क्यों हमें मनुष्य बना दिया और हमारे मूँछ लगा दी अगर मूँछें निकाल दी जाये तो हमारा हृदय माता की तरह है माता का हृदय कितना कोमल होता है यह आप सभी जानते है। हमारा हृदय भी कोमल हैं। आप चले जाएँगे, परन्तु हम आपको बिछुड़ने नहीं देंगे। हम आपको छोड़ नहीं सकते। हम आपको सुखी सम्पन्न बनाना चाहते है महान बनाना चाहते है महान बनाते बनाते वहाँ तक पहुँचाना चाहते है जहाँ हमारे गुरु ने हमें पहुँचाया है।
मथुरा के विदाई समारोह के साथ ही हमारे प्रेम की प्रौढ़ता का शुभारम्भ हो रहा है। आप से हमारी मित्रता की शुरुआत है। यह जिन्दगी भर इसी प्रकार बनी रहेगी। हमारे ऊपर आप जैसे हजारों लोगों का स्नेह है। आपका प्यार जो हमें मिलता है उसी में हम डूबे रहते है। हम चाहते है कि इस स्नेह के आदान प्रदान का यह क्रम हमेशा बना रहे। हम बहुत सुखी है-आप लोगों का स्नेह पाकर -कभी कभी हम यह सोचते है कि आप के इस प्रेम का हम किस तरह से बदला चुकायेंगे। आप अपने घर से आये थे चिलचिलाती धूप में ठहरने की अच्छी व्यवस्था यहाँ कहाँ थी? पानी की व्यवस्था यहाँ कहाँ थी? भोजन की व्यवस्था भी ढंग से नहीं कर सके परन्तु एक चीज हमारे पास है और वही हमने आपको देने का प्रयास किया है। वह चीज है निस्वार्थ प्रेम यही निधि हमारे पास है जो हम आपको देते रहे है और हमेशा देते रहेंगे। हमारे प्रेम में आप यह कभी भी नहीं पाएँगे कि यह व्यक्ति किसी स्वार्थ के लिये आपसे प्रेम करता है। यह आदमी पैसा लेना चाहता है या और न जाने क्या चाहता है? मित्रो! हमें अपने प्यार पर विश्वास है, यही नहीं हम एवं आप न जाने कितने जन्मों से साथ साथ चलते आ रहे है। हम और आप जब तक नये जमाने को नहीं ला देते तब तक बिछुड़ने वाले नहीं है। अभी हमें सीता रूपी भारतीय संस्कृति को वापस लाना है, रावण को समाप्त करना है, समुद्र में पुल बाँधना है। आप लोग उस समय तक हमारे साथ रहेंगे। अभी आपको हम नहीं छोड़ेंगे तथा आप भी हमें नहीं छोड़ सकेंगे। आप जायें सुखी रहे समुन्नत बनें तथा आप भी हमें नहीं छोड़ सकेंगे। आप जाएँ सुखी रहें समुन्नत बनें तथा प्रगति करें।
सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कष्चित दुख माप्नुयात।
अकारण शरीर को सताने का नाम तप नहीं हैं। सताना तो किसी का भी बुरा है। फिर शरीर को व्यथित और संतप्त करने से क्या हितसाधन हो सकता है? तपस्या वह है जिसमें सत्यमय जीवन निर्धारित करने के कारण सीमित उपार्जन से निर्वाह करने की स्थिति में मितव्ययिता अपनानी पड़ती है।
प्रलयंकारी तूफान की प्रचण्डता एवं सतयुगी उमगे
हम सबके जीवन के इन क्षणों में आज और कल और अधिक व्यापक हो वर्तमान और भविष्य का ताना बाना पहन लिया है। मिलन वेला दशक और षती की न होकर दो सहस्राब्दियों की है। यही क्यों दो महायुग मिलने वाले है। ऐसे में मिलन मुहूर्त का गौरव असंख्य गुना बढ़ जाना स्वाभाविक है और सचमुच प्रस्तुत समय परिवर्तन का महापर्व बन चुका है। दृश्यजगत के स्पन्दन किसी अदृश्य महाशक्ति के संकेतों के अनुसार तीव्रतर तीव्रतम होते चले जा रहे है। परमपूज्य गुरुदेव के हाथों लिखी ये पंक्तियाँ मई 1989 की अखण्ड ज्योति पत्रिका से उद्धृत है। इनसे हमें एक अनुमान लगता है कि भविष्य के गर्भ में जाकर संभावित भवितव्यता का दर्शन कर उनने वह सब कुछ आज से 9 वर्ष लिख ही नहीं दिया था वरन् सभी परिजनों से उसी के निमित्त वसंत पंचमी 1989 से एक अभूतपूर्व युगसंधि गायत्री महापुरश्चरण भी आरम्भ करा दिया था।
प्रस्तुत समय की विषमता किसी से छिपी नहीं है। विगत दस वर्षों में समस्यायें बड़े व्यापक स्तर पर उभरी है एवं निरन्तर बढ़ती ही जा रही है। श्री अरविन्द ने ऐसे ही समय को भागवत् मुहूर्त की संज्ञा दी थी व कहा था कि परिवर्तन के ऐसे क्षण जब भी आते है बड़े विशिष्ट होते है, विशिष्ट स्तर पर उपचार की अपेक्षा रखते है। उनने मातृवाणी में लिखा है” अभागा है वह मनुष्य या राष्ट्र, जो भागवत् मुहूर्त के आने पर सोया रहे और उसके उपयोग के लिये दिया संजोकर न रखे और उसकी पुकार से कान बन्द कर ले।
इन्हीं सब सम्भावित परिस्थितियों को दृष्टिगत रख परमपूज्य गुरुदेव ने फरवरी 90 की अखण्ड ज्योति में लिखा अदृश्य वातावरण से भरे भौतिक एवं चेतनात्मक प्रदूषण से निपटने के लिये अध्यात्म स्तर का एक अतीव व्यापक युगसंधि महापुरश्चरण आरम्भ किया गया है। विश्वास किया गया है कि इस सामूहिक साधना में अगले ही दिनों करोड़ों सम्मिलित होंगे। एक ही प्रयोजन के लिये एक ही सूत्र में आबद्ध होकर एक ही दिन में एकरूपता वाली साधना चलती है तो उससे बिखराव वाली अस्त–व्यस्तता की तुलना में अनेक गुना सत्परिणाम हस्तगत होता है आगे वे इसी लेख में लिखते है यह साधना नहीं है वरन् उसका एक बड़ा भाग उन भागीदारी द्वारा सम्पन्न हो रहा है जो अपने अपने स्थानों पर रहकर भी उस प्रयोग को निर्धारित अनुशासन के साथ सम्पन्न कर रहे है। युगसंधि का मध्यान्तर उसकी रूपरेखा लेख से उद्धृत पृष्ठ 25 अखण्ड ज्योति फरवरी 90 पूज्यवर ने लिखा कि अदृश्य वातावरण में सूक्ष्मजगत छाई हुई प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल सकने में इस दिव्य साधना की अभूतपूर्व भूमिका प्रस्तुत होने की सम्भावना है।
यदि इस मिशन का इतिहास जो सन् 1926 से अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलन से आरम्भ हुआ उठाकर देखें तो शुरू से अंत साधनात्मक पुरुषार्थों द्वारा सूक्ष्मजगत का क्रुद्ध प्रकृति का सम्भावित विभीषिकाओं का शमन ही इसके मूल में दिखाई पड़ता हैं। मानों स्रष्टा ने यह विशिष्ट दायित्व उस मिशन को विशेष जिम्मेदारी के साथ सौंपा हो। परमपूज्य गुरुदेव के चौबीस चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण 1926 से आरम्भ होकर प्रायः 1952 के अंत तक चले। पूर्णाहुति अवश्य ज्येष्ठ सुदी सन् 2010 गायत्री जयन्ती सन् 1943 में सम्पन्न हुई किन्तु एकाकी नहीं। पूज्यवर ने सहस्रांशु गायत्री ब्रह्मयज्ञ में 125 करोड़ गायत्री का जप 125 लाख आहुतियों का हवन 125 हजार से अधिक व्यक्तियों की एक वर्ष तक भागीदारी कराके सम्पन्न कराया अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1952 में दिये गये सम्पादकीय के अनुसार। साथ में गायत्री मंत्र लेखन के लिये सवा करोड़ मंत्र लिखे जाने संकल्प भी वर्ष भर में पूरा करवाया जिसकी पूर्णाहुति गायत्री तपोभूमि की मन्दिर स्थापना व मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के रूप में सम्पन्न हुई कहने का आशय यह कि इस मिशन का जो बीज है आधारभूत पृष्ठभूमि है उसे समष्टि के हित के लिये समूह द्वारा की गयी साधना कहा जाय तो अत्युक्तिपूर्ण न होगा।
1942 में जब अखण्ड ज्योति को मात्र 4-5 वर्ष ही प्रकाशित होते हुये पूरे हुये थे- भारत छोड़ो आंदोलन राजनैतिक क्षितिज पर चल रहा था, तब पूज्यवर ने आध्यात्मिक धरातल पर कैसे अब 2000 विक्रम संवत् के आगमन के साथ सतयुग का आगमन होने जा रहा है यह समझाते हुये एक विशेषांक प्रकाशित किया था। गायत्री साधना के साथ साथ आजाद होने जा रहे भारत को ऋषियों की तपश्चर्या का बल कैसे मिलेगा यह प्रतिपादन करते हुये साधकों की शंकाओं का समाधान वे प्रत्येक अंक में करते थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के समापन एवं भारतवर्ष के विभाजन के समय उनने परिजनों से विशिष्ट साधनाएँ संपन्न कराई। ब्रह्माण्डीय ज्योतिष के ज्ञाता परमपूज्य गुरुदेव ने 1951 से 1958 तक सतत् गायत्री साधना व यज्ञों के भिन्न भिन्न प्रकारों की श्रृंखलायें चलायी एवं सूर्य शक्ति के नवयुग होते दोहन हेतु विशिष्ट 1008 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ का सफल संचालन मथुरा में 1958 की कार्तिक पूर्णिमा में आयोजन कर किया। गायत्री परिवार उसके बाद ही बृहत् रूप लेता चला गया। तुरन्त बाद पूज्यवर हिमालय की अज्ञातवास की कठोर तपश्चर्या पर चले गये, जहाँ से उनने साधक की डायरी के कुछ पृष्ठ भेजे जो बाद में सुनसान के सहचर के रूप में पुस्तकाकार में प्रकाशित हुए। इस विशेष साधना का लक्ष्य भी भारत पर चीन के हमले से संभावित खतरे की गम्भीरता को कम करना, अष्टग्रही योग को टालना एवं जन जन के मनोबल का संवर्द्धन करना था।1962 में आते ही उनने युगनिर्माण साधना आरम्भ की।
यह पंचकोशी साधना गायत्री की उच्चस्तरीय साधना के प्रशिक्षण के रूप में तीन वर्ष तक चलती रही। विशिष्ट तपश्चर्या के कल्पवास चांद्रायण के सत्र भी मथुरा में चले। 1962 में परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी रौद्र रूप लेती हुई अग्नि उगलने लगी थी दिसम्बर 1962 की अखण्ड ज्योति में पृष्ठ 50, 51 पृष्ठ पर लेख प्रकाशित हुआ- अग्निपरीक्षा की घड़ी में हमारा कर्तव्य। इसमें उनने धर्मयुद्ध की सफलता के लिये सभी से एक एक माला प्रतिदिन सम्पन्न करने को कहा। इसी वर्ष उनने श्री अरविन्द का उदाहरण देते हुये एक लेख में लिखा इस समय संसार में बड़ी बुरी से बुरी घटनाएँ घट रही है और मैं कहना चाहता हूँ कि अभी उससे भी कहीं अधिक बुरी परिस्थिति आना निश्चित है। पर इसमें घबराने की कोई बात नहीं वरन् मनुष्यों को यह समझना चाहिये कि इस प्रकार की घटनाओं का होना अनिवार्य है। इसी से एक नवीन और श्रेष्ठ संसार की रचना हो सकनी संभव है 1948 में लिखा गया श्री अरविन्द का एक पत्र कहने का आशय यह है कि पूज्य गुरुदेव तब से ही सभी को इस स्थिति के लिये तैयार कर रहे थे, जो सदी के अंत में संवत् 2055 से 2060 के बीच आने वाली थी। इसी के निमित्त सभी के साधना पराक्रम को बार बार और बढ़ाये जाने की बात वे सतत् लिखते रहे।
1967 में पूज्यवर ने युद्ध और अगले तीस वर्ष की संभावनाओं पर एक विशेषांक प्रकाशित किया, जुलाई माह का। इसमें उनने लिखा अगले दिन बहुत ही उलट पुलट से भरे है। उनमें ऐसी घटनाएँ घटेगी ऐसे परिवर्तन होंगे, जो हमें विचित्र भयावह एवं कष्टकर भले ही लगें हम नये संसार की अभिनव रचना के लिये वे आवश्यक है युगपरिवर्तन की बात लिखते हुये उसी विशेषांक में उनने महाकाल और उसकी युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का उल्लेख करते हुये आगामी तीस से पैंतीस वर्ष का समय अत्यधिक महत्वपूर्ण बताते हुये इसे विश्व के भाग्य परिवर्तन की एक विलक्षण घटना बताया।
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 67 के पृष्ठ 13 पर हमारी गुरुसत्ता ने लिखा वर्तमान विचारक्रान्ति महाकाल का तीसरा नेत्र ही है जो प्रचण्ड दावानल का रूप धारण कर अज्ञान युग की सारी विडम्बनाओं को भस्मसात् कर स्वस्थ और स्वच्छ दृष्टिकोण प्रदान करेगी। इन उपलब्धियों के बाद विश्वशान्ति के मार्ग में कोई कठिनाई शेष न रह जायेगी। इसी के बाद अखण्ड ज्योति के अक्टूबर नवम्बर दिसम्बर 1967 के अंक विशेषांकों के रूप में प्रकाशित हुए जिनमें भावी विभीषिकाएँ और उनका प्रयोजन महाकाल और उनका रौद्र रूप शिव का तृतीय नेत्र उन्मीलन दशावतार और इतिहास की पुनरावृत्ति जैसे शीर्षकों की लेखमालाएं थी। इन्हीं का संपादन करके महाकाल और उसकी युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसके कई संस्करण अब तक छप चुके है। क्राँतिकारी चिंतन अवतारी सत्ता का स्वरूप एवं हम सबके दायित्व बोध पर लिखे गये इन लेखों का एक एक वाक्य जलती हुई आग की चिनगारी के समान है बाद में वांग्मय में इन्हीं लेखों को वांग्मय कृ 29 में 1.1 से1.70 तक अनौचित्य का प्रतिकार शीर्षक से प्रकाशित कर एक स्थान पर उसी से संबंधित विषय के साथ उपलब्ध कर दिया गया है।
1965 से लेकर 1988 के अक्टूबर माह तक चाहे गायत्री तपोभूमि मथुरा में वे रहे हों अथवा गायत्री तीर्थ शाँतिकुँज हरिद्वार में वे समष्टि परिशोधनार्थ सूक्ष्म जगत के संशोधन हेतु स्वयं भी तप करते रहे अनेकों साधकों से कराते रहे ताकि साधना की शक्ति से निखरी हुई तप की सामर्थ्य युगपरिवर्तन में नियोजित हो सके। 1965 का भारत पाक युद्ध 1971 का बंगला देश की मुक्ति हेतु हुआ संग्राम 1968-69 में स्काईलैब के धरती पर आ गिरने से सम्भावित विभीषिका,1980-82 में जुपिटर इफेक्ट के कारण सम्भावित विपत्तियों के निराकरण हेतु विशिष्ट साधनाएँ सभी अखण्ड ज्योति पाठकों परिजनों से कराई जाती रही 1984 से 1986 तक सूक्ष्मीकरण साधना की विशिष्ट अवधि बीती जिसमें एक से पाँच बनने की पाँच वीरभद्रों के निर्माण की प्रक्रिया सम्पन्न हुई। 1987 में भारत भर में हुये राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों 108 कुण्डीय महायज्ञों के बाद 1988 में युगसंधि महापुरश्चरणों की घोषणा कर दी गयी जो कि बारहवर्षीय था व जिसकी पूर्णाहुति सन् 2000 में होनी थी इसी महापुरश्चरण के विषय में विस्तार से इस अंक में अन्यत्र प्रायः 24 पृष्ठों में सारी सामग्री एक ही स्थान पर पाठकों की जानकारी के लिये दी जा रही है। जो इस युगसंधि महापुरश्चरण में बाद में जुड़े अभी अभी जुड़े है वे इनके माध्यम से उस गम्भीरता को समझ सकेंगे जिसे दृष्टि में रख अब आगामी दो ढाई वर्षों के साधना पुरुषार्थ को और अधिक प्रखर बनाया जा रहा है।
आज सारा विश्व जिन समस्याओं से जूझ रहा है वे दस वर्ष पूर्व की परिस्थितियों से कहीं अधिक जटिल है। समस्त वैश्विक स्तर आज तनाव है छिटपुट युद्ध संघर्ष सारे विश्व में कही न कहीं सतत् चल रहे है। पारिवारिक विग्रह सामाजिक बिखराव चरम सीमा पर है। सूक्ष्मजगत चेतना का महासागर विष से भर गया है एवं प्रतिक्रिया स्वरूप रौद्र प्रकृति का स्वरूप चारों ओर महाप्रलय के रूप में दिखाई पड़ रहा है। समय समय पर ऐसी विपत्तियों का उपचार आध्यात्मिक शक्तियों के माध्यम से ही हुआ है। श्री अरविन्द व रमण महर्षि की तपश्चर्या इसका प्रमाण है। परमपूज्य गुरुदेव का तप व सद्विचारों के विस्तार की विचारक्रांति भी इसी निमित्त नियोजित हुई है। अब हम सब की बारी है कैसे यह गोवर्धन उठेगा इसका एक ही उत्तर है कि सबके सामूहिक साधना पुरुषार्थ से। इस समय हिमालय में भी एक नहीं प्रायः 88000 ऋषिकल्प स्तर की आत्माएँ तपश्चर्या कर रही है ताकि विश्व के भाग्योदय की वेला में कहीं कुछ अधिक बिगाड़ न हो सब कुछ ठीक से संपन्न हो जाये।
महापुरश्चरण के अन्तिम दो तीन वर्षों में गुजर रहे इस समय को चार भागों में बाँटकर साधना पुरुषार्थ प्रखरतम किये जाने व तदुपरान्त पूर्णाहुति संपन्न किये जाने की चर्चा विगत अंक में की थी। भगवत्−सत्ता के अवतरण हेतु हमारा अंतर्मन एक योग्य उपकरण बन सके,इसके लिये सभी को इस पुरुषार्थ में जुटना होगा। इस चार भागों में बंटे समय का प्रथम चरण परम वंदनीय माताजी की महाप्रयाण तिथि 6 सितम्बर 1998 से 30 सितम्बर 1998 की अवधि में संकल्प अवधि के रूप में पूरा होना था। 1 अक्टूबर 1998 विजयादशमी से 22 जनवरी 1999 वसन्तपर्व तक का समय द्वितीय चरण में सारे भारत व विश्व में साधना प्रशिक्षण अवधि के रूप में संपन्न होगा। आश्विन नवरात्रि की पावन वेला एवं विशिष्ट 24 दिवसीय साधनावधि में जो संकल्प लिये गये होंगे उन्हें इन 3 माह की अवधि में पकाया जाएगा व प्रशिक्षण द्वारा अनेकानेक साधकों की सहभागिता बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा। यह प्रशिक्षण अभी भारतवर्ष में 40 स्थानों पर सात दिवसीय सत्रों के रूप में आरम्भ हो रहा है जिनमें शाँतिकुँज के वरिष्ठ कार्यकर्ता स्वयं जाकर मार्गदर्शन देंगे एवं इस कार्य के विस्तार हेतु किये जाने वाले समयदान का नियोजन करेंगे। वसंत पंचमी 1999, 22 जनवरी से बसंत पंचमी 2000,10 फरवरी तक एक वर्ष की अवधि को विशिष्ट साधना वर्ष के रूप में सारे भारत व विश्व में मनाया जा रहा है। इस पूरे एक वर्ष में सारे विश्व में समूह चेतना के जागरण की प्रक्रिया सूक्ष्म स्तर पर एक करोड़ से अधिक साधकों द्वारा संपन्न होने वाले इस महापुरश्चरण महाअभियान के द्वारा होने जा रही है। आशा की जानी चाहिये कि इस अभिनव प्रयोग से जिसका निर्देश पूज्यवर अपने जीवन काल में दे गये थे, भविष्य की आसन्न विभीषिकाएँ निरस्त होगी एवं सतयुग की संभावनाएँ साकार करने वाला स्वरूप स्पष्ट होता चला जाएगा।
चतुर्थ चरण युगसंधि महापुरश्चरण की द्वितीय एवं अन्तिम महापूर्णाहुति के रूप में एक करोड़ साधकों द्वारा वसन्तपर्व से आरम्भ होने वाले पुरुषार्थ के रूप में सारे विश्वभर में संपन्न किया जायेगा। यह प्रक्रिया पूरे वर्ष भर चलेगी, स्थान स्थान पर होगी एवं अन्तिम प्रायः चौबीस से चालीस दिन का विराट आयोजन गायत्रीतीर्थ शाँतिकुँज हरिद्वार में संपन्न होकर समाप्त होगी। यह वस्तुतः नहीं एक शुरुआत भर है इक्कीसवीं सदी नवयुग की स्वर्णिम अवधि की। इस महापूर्णाहुति के विस्तृत स्वरूप को पारस्परिक विचार विनिमय से अभी निखारा जा रहा है ढाँचा बन गया है तूलिका से रंग भरना मात्र बाकी है अगले दो तीन अंकों में परिजन उसे विस्तार से जान सकेंगे। ज्ञातव्य है कि आगामी नवम्बर 1998 एवं जनवरी 1999 के ये दो अंक युगपरिवर्तन की वेला में साधना जैसे विषय पर आधारित होंगे प्रथम अंक में साधना का तत्त्वदर्शन मानवी प्रकृति सूक्ष्म संरचनाओं की जानकारी कुण्डलिनी षट्चक्र पर नवीनतम विस्तार के साथ साथ आज साधना क्यों वे किसलिए की जानी चाहिये इस विषय पर विराट् विवेचन होगा। दूसरे अंक में साधना की फलश्रुतियों 1999 की दुनिया कैसी होगी, 21 सदी में प्रवेश करते ही हमें क्या देखने को मिलने जा रहा है वैयक्तिक सामाजिक वैश्विक स्तर पर परिवर्तन कैसे होने जा रहा है इन विषयों पर प्रकाश डाला जायेगा। निश्चित ही कोई भी इनसे वंचित नहीं होना चाहेगा।
परमपूज्य गुरुदेव ने 1988 की अखण्ड ज्योति में एक स्थान पर लिखा है कुसमय का अंत होते होते कहर बरसने की वेला में हमारी साधना एक सुरक्षा कवच के रूप में ब्रह्मास्त्र के रूप में हम सबकी ढाल बन जाये एव हम सभी इक्कीसवीं सदी में बढ़ी ब्रह्मबल के साथ प्रवेश करें। कोई भी इस काफ़िले से बिछुड़ने न पाये।
नदी तट पर एक पण्डित जी रहते थे। एक दिन पण्डित जी को आत्मा के खोज की इच्छा हुई। धीरे धीरे ऐसा रंग चढ़ा कि वह दुनिया के कार्यों से विमुख होकर आत्मा की खोज में लग गये घर में कोई काम होता तो घर वालों को झिड़क देते। धीरे धीरे उन्हें अनुभव होने लगा कि उनका जीवन नरकमय होता जा रहा है एक दिन रात में पण्डित जी ध्यान में लीन थे कि उनकी आत्मा के अन्धकार में प्रकाश फैला और सुना पण्डित तुम गलत राह पर जा रहे हो जीवन कटुता से बढ़कर कोई बुराई नहीं है। आत्मा तो तुम्हारे अन्दर ही है उसे खोजने तुम बारह क्यों भटक रहे हो? जीवन में शांति सौम्यता और मधुर संबंध ही आत्मा के लक्षण है।
पूज्यवर ने अपनी सभी मानसपुत्रों, अनुयायियों के लिये मार्ग दर्शन एवं विरासत में जो कुछ लिखा वह अलभ्य ज्ञानामृत पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वांग्मय अपने घर में स्थापित करना ही चाहिये।
हमारे पिता हमारे गुरु हमसे क्या चाहते है उनकी आकांक्षा और सन्देश अपने पुत्रों के नाम पढ़िये वांग्मय में। उनकी बात को बिना सुने क्या उनके पुत्रों का चेन मिलेगा?
यदि आपको भगवान ने सम्पन्नता दी है तो ज्ञानदान कर पुण्य अर्जित करें। विशिष्ट अवसरों एवं पूर्वजों की स्मृति में पूज्यवर का वांग्मय विद्यालयों पुस्तकालयों में स्थापित कराये। आपका यह ज्ञानदान आने वाली पीढ़ियों तक को सन्मार्ग पर चलाएगा, जो भी इसे पढ़ेगा धन्य होगा। शास्त्रों में कहा है-
सर्वेशामेव दानानाँ ब्रह्मादानं विषिश्यते। वार्यत्र गोमहीवासस्तिलका त्रनसर्पिशाम्॥
जल अन्न गौ पृथ्वी वस्त्र तिल सुवर्ण और घी इन सबके दान में से ज्ञान का दान सबसे उत्तम है।
अन्नदानं महादानं विद्यादानं महत्तरम्। अन्नेन क्षणिका तृप्तिर्यावज्जीवं तु विद्यया॥
अन्नदान महादान है विद्यादान और बड़ा है। अन्न से क्षणिक तृप्ति होती है किन्तु विद्या से जीवनपर्यन्त तृप्ति होती है।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाग्ज्ञानयज्ञः परंतप। सर्व कर्माखिलाँ पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥
हे परंतप! द्रव्ययज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है क्योंकि जितने भी कर्म है वे सब ज्ञान में ही समाप्त है ज्ञानदान सर्वोपरि पुण्य है शुभ कार्य है।
जीवन दर्शन
1 युगद्रष्टा का जीवन दर्शन समग्र वांग्मय
68 पूज्यवर की अमृतवाणी-1
गायत्री कुण्डलिनी यज्ञ एवं संस्कार
9 गायत्री महाविद्या का तत्त्वदर्शन
10 गायत्री साधना का गुहा विवेचन
11 गायत्री साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार
12 गायत्री की दैनिक एवं विशिष्ट अनुष्ठानपरक साधनाएँ
13 गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उपलब्धियाँ
14 गायत्री साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि
15 सावित्री कुण्डलिनी एवं तत्र
25 यज्ञ का ज्ञान विज्ञान
26 यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया
33 षोडश संस्कार विवेचन
खण्ड
धर्म संस्कृति तथा तीर्थ
34 भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व
35 समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान
36 धर्मचक्र प्रवर्तन एवं लोकमानस का शिक्षण
37 तीर्थसेवन क्यों और कैसे?
धर्मतंत्र का दर्शन व मर्म
उपासना साधना एवं ईश्वर
2 जीवन देवता की साधना आराधना
3 उपासना समर्पण योग
4 साधना पद्धतियों का ज्ञान और विज्ञान
5 साधना से सिद्धि 1
साधना से सिद्धि
7 प्रसुप्ति से जाग्रत की ओर
8 ईश्वर कौन है? कहाँ है कैसा है?
19 शब्दब्रह्म नादब्रह्म
20 व्यक्तित्व विकास हेतु उच्चस्तरीय साधनाएँ
28 सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण
29 सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण 2
56 ईश्वर विश्वास और उसकी फलश्रुतियाँ
अवतार एवं उनसे प्रेरणा
30 मर्यादा पुरुषोत्तम राम
39 संस्कृति संजीवनी श्रीमद्भागवत एवं गीता
32 रामायण की प्रगतिशील प्रेरणाएँ
38 प्रज्ञोपनिषद
अध्यात्म का वैज्ञानिक विवेचन
4 साधना पद्धतियों का ज्ञान और विज्ञान
14 गायत्री साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि
19 शब्द ब्रह्मा
23 विज्ञान और अध्यात्म परस्पर पूरक
24 भविष्य का धर्म वैज्ञानिक धर्म
युग परिवर्तन एवं उज्ज्वल भविष्य
27 युग परिवर्तन कैसे और कब?
28 सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण 1
रहस्य मन तथा मस्तिष्क
16 मरणोत्तर जीवन तथ्य एवं सत्य
18 चमत्कारी विशेषताओं से भरा मानवी मस्तिष्क
21 अपरिमित संभावनाओं का आगार मानवी व्यक्तित्व
22 चेतन अचेतन एवं सुपर चेतन मन
55 दृश्य जगत की अदृश्य पहेलियाँ
स्वास्थ्य एवं चिकित्सा
17 प्राण शक्ति एक दिव्य विभूति
26 यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया
39 निरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र
चिकित्सा उपचार के विविध आयाम
41 जीवेम शरदः षतम
.42 चिरयौवन एवं शाश्वत सौंदर्य
जीवन चरित्र दृष्टान्त संस्मरण एवं सूक्तियाँ
43 हमारी संस्कृति इतिहास के कीर्ति स्तम्भ
44 मरकर भी अमर हो गये जो
45 साँस्कृतिक चेतना उन्नायक सेवाधर्म के उपासक
50 महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग 1
51 महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग 2
52 विश्व वसुधा जिनकी सदा ऋणी रहेगी 67 प्रेरणाप्रद दृष्टान्त
69 विचारसार एवं सूक्तियां
70 विचार सार एवं सूक्तियाँ 2
व्यक्तिनिर्माण समाज निर्माण एवं राष्ट्रनिर्माण
21 अपरिमित संभावनाओं का आगार मानवी व्यक्तित्व
46 भव्य समाज का अभिनव निर्माण
49 शिक्षा एवं विद्या
54 मनुष्य में देवत्व का उदय
57 आत्मोत्कर्ष का आधार ज्ञान
49 प्रतिगामिता का कुचक्र ऐसे टूटेगा
60 विवाहोन्माद समस्या और समाधान
64 राष्ट्र समर्थ और सशक्त कैसे बने?
65 सामाजिक नैतिक बौद्धिक क्रान्ति कैसे?
66 युगनिर्माण योजना दर्शन स्वरूप व कार्यक्रम
नारी जागरण एवं परिवार निर्माण
46 यत्र हस्यत् पूज्यंते रमन्तं तत्र देवता
48 समाज का मेरुदण्ड सशक्त परिवार तंत्र
61 गृहस्थ एक तपोवन
62 इक्कीसवीं सदी नारी सदी
63 हमारे बालक और बालिकाएँ
क्या आप उत्तराधिकार में केवल भौतिक धन सम्पन्न ही छोड़ जान पसन्द करेंगे या ऐसी ऐसी पारसमणि जिससे आपके उत्तराधिकारी लाभान्वित हो और हजारों को लाभान्वित करे।
परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने जीवनभर जो अपनी लेखनी से लिखा समय समय पर उनने अमृतवाणी के माध्यम से जो विचारों की अभिव्यक्ति की विचारसार व सूक्तियाँ लिख गये या अनायास कभी कह गये तथा पत्रों के माध्यम से जो अंतरंग र्स्वष जन-जन को दिया वह समय इस समय इस वांग्मय के खण्डों में है। मूल्य प्रति खण्ड 125 व सत्तर खण्डों का समर्पण सेट 7000
अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा 281003
फोन न. 0565-403940
*समाप्त*