जीवन को उन्मुक्त होकर संसार की लहरों में बहने दीजिए। कभी लहर आपसे होकर गुजरेगी, कभी आप लहरों पर उतर आएँगे। समुद्र की गोद में उसकी तरंगों से खेलने का साहस-आत्मविश्वास आप में जाग्रत होगा। जो अकेलेपन अथवा पानी में डूब जाने के भय से पानी में उतरता ही नहीं, जो इसी सोच-विचार में पड़ा रहता है कि क्या करूँ? कैसे करूँ? मैं मंजिल तक कैसे पहुँचूँगा? वह कुछ नहीं कर पाता, उसका विश्वास मर जाता है। किसी भी कार्य में लगने से असफल ही होते हैं, जिसके कारण उनका रहा-सहा विश्वास भी मर जाता है।
आत्मविश्वास की ज्योति प्रज्वलित करने के लिए उस कार्य में प्राणपण से जुट जाइए। जो आपको हितकर लगता है, जिसे आप अच्छा समझते हैं, उस काम को अपने जीवन का, स्वभाव का अभिन्न अंग बना लीजिए। इससे आपके विश्वास को बल मिलेगा। लेकिन इस मार्ग में खतरा है- वह है सफलता-असफलता में अपना सन्तुलन खो बैठना, इसके लिए आवश्यक है कि आप सफलता-असफलता को गौण मानकर उस कार्य को प्रधान मानें। कर्म की यह निरन्तर साधना ही आप में विश्वास का अविरल स्रोत खोज निकालेगी। अपने आपको भाग्यशाली-महत्वपूर्ण समझने वालों को संसार भी रास्ता देता है। यह भावना अपने हृदय में कूट-कूट कर भर लें कि आपको किसी महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही धरती पर भेजा गया है। आप अवश्य उस काम को करेंगे। इसी महान श्रद्धा के बल पर आप क्या से क्या बन सकते हैं। इसी तरह के किसी महान आदर्श को, मिशन को अपनी श्रद्धा का आधार बना लें। इस तरह की बलवती श्रद्धा आपके विश्वास को परिपुष्ट करेगी। विश्वास उनका मर जाता है, जिसके जीवन में कोई आदर्श नहीं, श्रद्धा का कोई आधार नहीं।
समाज की, संसार की, घर-परिवार पड़ोस की, राष्ट्र की, किसी महान कार्य की जो कोई भी जिम्मेदारियाँ आप पर आए उन्हें सहर्ष स्वीकार कीजिए। जिम्मेदारियों को अपने कन्धे पर उठाने का संकल्प ही विश्वास की साधना का आधा काम पूरा कर देता है। स्मरण रखिए, संसार में ऐसा कोई भी काम नहीं जिस आप न कर सकते हों। फिर जिम्मेदारियों से क्यों डरते हैं, क्यों झिझकते हैं? इसलिए जिम्मेदारियों की निभाना सीखिए। काम करने से ही अपनी कर्मठता, अपनी शक्तियों पर विश्वास होता है।
लोगों की आलोचना से तनिक भी विचलित हुए बिना कार्य करते रहना, निर्भय होकर अपने आदर्शों को क्रियान्वित करते चलना ही आपको शोभा देता है। जीवन का आशाभरा रंगीन चित्र अपनी कल्पनाओं के पटल पर बनाइए। ध्यान रखिए-आत्मविश्वास की साधना से सृष्टि का वैभव ही नहीं, स्रष्टा के प्रेम को भी पाया जा सकता है।
वह अपने समय का एक मशहूर मूर्तिकार था। उसके काम की सारे राज्य में प्रशंसा थी। पूरे राज्य में उसके समान मूर्ति बनाने वाला कोई नहीं था। उसकी मूर्तियाँ ऐसी जीवन्त होती थीं कि कई बार उन्हें देखकर ये धोखा हो जाता था कि यह मूर्ति है या कोई जिन्दा इन्सान। अपने काम से उसने बहुत धन व यश प्राप्त किया। हर ओर यही चर्चा होती कि धनराज के हाथों में साक्षात कला की देवी वास करती हैं।
उसका एक पुत्र था जिसका नाम शिवराज था। धनराज ने वृद्ध होते-होते शिवराज को शिल्पकला के सभी गुर और बारीकियाँ सिखा दीं। शिवराज भी बहुत कुशाग्र बुद्धि का नवयुवक था। उसने अपने पिता से मूर्तिकला की सारी शिक्षा मन लगाकर सीखी थी। अपनी लगन और मेहनत से उसने शिल्प के प्रायः सभी रहस्यों को आत्मसात् कर लिया था। इसी का परिणाम था कि थोड़े समय में ही उसने सम्पूर्ण राज्य में ही नहीं वरन् पूरे देश में अपने पिता से भी अधिक नाम, धन और यश प्राप्त कर लिया।
एक बार शिवराज ने अपने राज्य के महाराजा की मूर्ति बनाई। वह इतनी सुन्दर और जीवन्त थी कि जब राजा खुद उस मूर्ति के पास खड़ा हुआ तो औरों के लिए यह जानना मुश्किल हो गया कि कौन-सी मूर्ति है और कौन-सा राजा है। राजा स्वयं भी मूर्ति देखकर आश्चर्यचकित था। उसने उसकी कला से प्रभावित होकर उसे बहुत धन और सम्मान दिया।
वहाँ मौजूद उसके पिता ने भी अपने बेटे के हाथों बनाई उस मूर्ति को गौर से देखा। उसकी अनुभवी आँखों से उस मूर्ति में रह गयी एक त्रुटि छुपी नहीं रह सकी। राजमहल से लौटते समय उसने मूर्ति में रह गयी उस त्रुटि की तरफ अपने बेटे का ध्यान दिलवाया। शिवराज को यह बात बहुत बुरी लगी। उसे हमेशा ही अपने पिता की ये बात बुरी लगती थी। वह जब भी कोई मूर्ति बनाता तो उसके पिता उसमें कोई-न-कोई त्रुटि निकाल देते थे। हालाँकि शिवराज अपने पिता को जवाब में कुछ नहीं कहता था, मगर मन ही मन वह दुखी रहता था।
एक दिन उसने अपने मन में ये बात तय कर ली कि अब वो एक ऐसी मूर्ति बनाएगा, जिसमें उसके पिता कोई त्रुटि नहीं निकाल पाएँगे। काफी सोच-समझकर उसने इस काम के लिए एक योजना तैयार की।
योजना के अनुसार उसने अपने पिता से कहा कि उसे अपने किसी विशेष कार्य के लिए कुछ दिनों के लिए राज्य से बाहर जाना है। यह बहाना बनाकर वह अपने गाँव से चल दिया। गाँव से कुछ मील की दूरी पर एक पहाड़ था, जिसमें एक गुफा थी। शिवराज कुछ दिनों के लिए उस गुफा में गया।
लगातार छह महीने की मेहनत के बाद उसने माँ सरस्वती की एक शानदार और सुन्दर मूर्ति बनाई। इस मूर्ति को बनाने में उसने अपना तन-मन-धन और सारी कल्पना-शक्ति लगा दी थी। उसे इस बात का पूरा विश्वास हो गया कि अब उसके पिता इस मूर्ति में कोई त्रुटि नहीं निकाल पाएँगे। फिर उसने अपने एक मित्र की सहायता से गाँव में यह अफवाह फैला दी कि उसके मित्र को सपने में माँ सरस्वती ने दर्शन देकर यह कहा है कि पहाड़ की गुफा में उनकी एक भव्य मूर्ति है।
यह बात सुनकर सारा गाँव पहाड़ की उस गुफा में पहुँच गया। सभी लोग सुन्दर और भव्य मूर्ति को देखकर अचम्भित रह गए। गाँव वाले तो क्या स्वयं धनराज भी मूर्तिकला के इस बेजोड़ नमूने से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। उसकी प्रशंसा में उनके मुँह से निकल गया, ये है महान कला, किसी मूर्तिकार के जीवन की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति, वो कलाकार धन्य है, जिसने ये मूर्ति बनाई है।
पिता से अपनी कला की ऐसी जबरदस्त तारीफ सुनकर शिवराज गदगद हो गया। गर्व से उसने अपने पिता को बताया कि वही इस बेजोड़ मूर्ति को बनाने वाला मूर्तिकार है। पुत्र से यह जानकर धनराज को खुशी हुई, मगर कुछ पल बाद ही वो उदास हो गए। अचानक पिता को यों उदास होता देखकर शिवराज ने उनसे उनकी उदासी का कारण पूछा।
धनराज ने कहा, पुत्र! मैं इस बात से बेहद खुश हूँ कि ये तुम्हारे हाथों से बनी सर्वश्रेष्ठ कलाकृति है। मगर यह सोचकर उदास हूँ कि ये तुम्हारे जीवन की अन्तिम सर्वश्रेष्ठ कलाकृति है। अब शायद ही आगे तुम इससे बेहतर मूर्ति बना सको। शिवराज ने पिता से पूछा कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं?
तब धनराज ने कहा, पुत्र तुम हमेशा से एक अच्छे मूर्तिकार रहे हो और तुमने हमेशा अच्छी मूर्तियाँ बनायी हैं। मगर मैं तुम्हारी मूर्तियों में हर बार कोई-न-कोई गलती इस लिए निकालता रहा हूँ कि कहीं तुम अपनी कला से सन्तुष्ट नहीं हो जाओ और तुम्हारा निरन्तर विकास रुक नहीं जाए। मगर दुःख मुझे इस बात का है कि तुम मेरी भावना को समझ नहीं पाए, बल्कि दुःखी होते रहे, खीझते रहे, अपने आप को अपमानित महसूस करते रहे। तुम्हारी यह कलाकृति तुम्हारी उसी खीझ का परिणाम है और तुम इस कृति से सन्तुष्ट भी हो। पुत्र किसी भी साधक के जीवन में वो दिन उसकी साधना की मृत्यु का दिन होता है, जिस दिन वो स्वयं को निर्दोष एवं पूर्ण समझ लेता है। सतत् उन्नति एवं विकास के लिए ही साधु-सन्तों ने ‘निन्दक नियरे राखिए’ का सूत्र सुझाया है।
इतना कहकर धनराज वहाँ से चल दिया। मगर शिवराज उसी जगह पर मूर्तिवत् खड़ा रह गया। शायद अब उसे निन्दक नियरे राखिए सूत्र की महत्ता का बोध हो रहा था।
आमतौर पर मनुष्य की देखने-सुनने व समझने की इन्द्रिय-क्षमता प्रत्यक्ष जगत तक ही सीमित है। सामान्यक्रम में हम में से हर एक अपने आस-पास एवं वर्तमान को ही जानने की सामर्थ्य रखता है। परन्तु यदा-कदा जीवन में ऐसे संयोग आते हैं, जिनसे यह पता चलता है कि इन्सान के भीतर सामान्य से परे और भी बहुत कुछ है। उसमें ऐसी अलौकिक सामर्थ्य निहित है, जिससे वह प्रत्यक्ष एवं आभासित जगत से परे परोक्ष एवं अनागत भविष्य के गर्भ में झाँक सकता है। विख्यात विदुषी मार्ग्रेट ग्रे ने अपनी पुस्तक ‘रिटर्न फ्राॅम डेथ’ में ऐसे अनेक उदाहरणों को सँजोया है। उनके अनुसार ऐसी क्षमताएँ प्रायः उनमें देखी गयी हैं, जिन्हें मृत्यु के अनुभव से गुजरना पड़ा। उनकी शोध के अनुसार ऐसे अनुभव से गुजरने के बाद अनेकों व्यक्ति अतीन्द्रिय द्रष्टा बन गये। उनमें से कुछ अपने व दूसरे व्यक्तियों के सुदूर हो गए। तो कुछ ने समूची मानव-जाति के भविष्य को देखकर चिन्ताजन्य किन्तु अन्ततः आशा भरे उद्गार व्यक्त किए।
गर्भाशय हटाने के आप्रेशन के दौरान मृत्यु के अनुभव से गुजरी जेनीफर का कहना है कि मैं नहीं जानती कि यह सब कैसे हुआ? लेकिन इस अनुभव के बाद मैं अतीन्द्रिय द्रष्टा बन गयी हूँ। ऐसे ही पेट के बड़े आप्रेशन से गुजरी एक अन्य महिला ओलीबुल ने अपनी इस विलक्षण अनुभूति को बताते हुए कहा, मृत्यु के अनुभव के बाद मुझे कई बार भावी विकट परिस्थितियों का बोध हुआ और साथ ही दृढ़ता से यह भी लगा कि यह आवश्यक था। अब मैं भावी घटनाओं को देखने में सक्षम हूँ। जब यह होता हैं तो मुझे लगता है कि मैं किसी महत्तर शक्ति के घेरे में आ गयी हूँ।
चेरिंग क्रॉस हॉस्पिटल में एक अन्य महिला ने मार्ग्रेट को बतलाया कि एक सड़क दुर्घटना के बाद मेरे जीवन में कुछ विचित्रता आ गयी है। अब मैं जब थकी होती हूँ, तब भविष्य में घटित होने वाले दृश्यों को देख लेती हूँ, बाद में सच निकलते हैं। हाइपर- वेन्टीलेशन के आघात के कारण शरीर विलगाव का अनुभव कर चुकी मार्टिना ने बतलाया, इस अनुभव के बाद मुझे लगा कि मैं अतींद्रिय द्रष्टा बन गयी हूँ। यह मेरे साथ कई बार हुआ है। जैसे कि मैं अपने मित्र के बारे में सोचती हूँ। उसी क्षण घण्टी बजती है और उसी मित्र से बात होती है।
ऐसे ही कुछ लोगों में स्वचालित लेखन की क्षमता को विकसित होते देखा गया है। गम्भीर बीमारी के दौरान मृत्यु के अनुभव से गुजरे ई. टी. स्टर्डी ने बताया, मुझे पेंसिल व कागज का टुकड़ा उठाने के लिए कहा गया। मुझे लगा कि मैं किसी बड़ी शक्ति के प्रभाव में हूँ, जो मेरे माध्यम से लिख रही है। इस क्रम में मुझे जीवन की कई समस्याओं के समाधान दिए गए व कई भावी घटनाओं को स्पष्ट किया गया। यह सब मैं पहले नहीं कर सकता था। मेरुदण्ड में विषाणु संक्रमण के कारण मृत्यु के अनुभव से गुजरे एक अन्य व्यक्ति इगैरसोल ने बताया कि मेरे पास स्वचालित लेखन द्वारा लिखित तथ्यों का मोटा संग्रह है, जो मृत्यु के अनुभव के बाद शुरू हुआ था और अभी भी चल रहा है।
कई लोगों में इस तरह के अनुभव के बाद पूर्व दर्शन की क्षमता अनोखे ढंग से जाग्रत हो गयी। पेट के आप्रेशन के दौरान एक महिला कार्नेलिया के हृदय की धड़कन बन्द हो गयी। उस दौरान उसे बड़ा ही विलक्षण अनुभव हुआ। अपनी इस अनुभूति को व्यक्त करते हुए उसने बताया, मुझे यह कहा गया कि चल रहे कठिन क्षण कुछ शिक्षण देने के लिए हैं। परन्तु कुछ समय पश्चात सभी बाधाएँ दूर हो जाएँगी और मैं बिलकुल अलग तरह का जीवन जी रही हूँगी। यह सब वैसा ही निकला जैसा कि मैंने देखा था।
प्रसूतिकाल के दौरान मृत्यु के मुख से गुजरी एक महिला मेरीहेल ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, इस अनुभव के समय मुझे यह बोध था कि मैं घटित होने वाली चीजों को पहले से ही जानती थी। लेकिन बाद में कुछ अंश को ही याद रख पाई। मुझे बताया गया था कि जब भी मुझे आवश्यकता पड़ेगी मैं उन्हें याद कर पाऊँगी। तब से मैंने इसे सच पाया है। जब भी कुछ घटित होता है तो मुझे अहसास होता है कि मैं इसे पहले से ही जानती हूँ कि यह कैसे घटित होने वाला है।
इसी संदर्भ में ‘इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर डेथ स्टडीज’ के संस्थापक प्रोफेसर कैनेथरिंग द्वारा किए गए शोध-अनुसंधान बहुत महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार इंग्लैण्ड के एक गाँव का दस वर्षीय वेवल एक दुर्घटना के बाद हुए आप्रेशन के दौरान मृत्यु के अनुभव से गुजरा। उस समय उसने विचार-संप्रेषण द्वारा कुछ स्वेत वस्त्रधारी अलौकिक आत्माओं से बात-चीत की। आपरेशन के द्वारा उसे भविष्य में होने वाली घटनाओं की स्मृति थी। लेकिन तब उन पर उसे विश्वास नहीं था। लेकिन बाद में समय के साथ ये बातें सही निकलीं। इस क्रम में उसने पाँच विशेष स्मृतियों का उल्लेख किया है। इनमें प्रथम थी, २८ वर्ष में शादी का होना। दूसरी थी, दो बच्चों का होना। तीसरे में उसने नया घर देखा था। चौथी स्मृतियाँ दीवार के पीछे एक विचित्र चित्र की, जो उसे समझ में नहीं आया। बाद में यह ‘एअर हीटर’ निकला। उन दिनों इंग्लैण्ड में इसका प्रचलन नहीं था।
मृत्यु के अनुभव से गुजरे लोगों के भविष्य-दर्शन की क्षमता व्यक्तिगत स्तर तक ही सीमित रही हो, ऐसी बात नहीं है। कइयों में इसका विकास व्यापक एवं विराट स्तर पर हुआ है। उन्होंने अपनी अनुभूतियों में विश्व के भविष्य एवं मानवता का आगत देखा। प्रोफेसर कैनेथरिंग ने इस तरह के अनुभवों का संकलन प्रस्तुत किया है। जो वर्तमान विश्वव्यापी उथल-पुथल आगामी विषम स्थिति व अन्ततः उज्ज्वल भविष्य का दृश्य प्रस्तुत करता है।
इवान स्टीफेन ने अपनी अनुभूति को शब्दों में प्रस्तुत करते हुए लिखा है, मैं पृथ्वी के गर्भ में अवैध प्रयोग परीक्षणों को देख रहा हूँ। जिसके कारण विश्वभर में भूकम्पों की एक श्रृंखला शुरू हो रही है। मुझे लगता है कि ये लोग इसके सम्भावित खतरनाक परिणाम को जानते हैं, फिर भी ये प्रयोग कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि ये एक पागलपन के शिकंजे में हैं जो सबके लिए घातक एवं विनाशकारी है। भूकम्पीय गतिविधियाँ खतरनाक स्तर पर बढ़ रही हैं। इस क्रम में संयुक्त राज्य अमेरिका बड़ी भूकम्पीय समस्या में फँसने वाला है। मुझे यह भी समझ में आ रहा है कि यह सब इस समय चल रही विश्वव्यापी हिंसा एवं उथल-पुथल की प्रतिच्छाया है।
इसी तरह की अनुभूति को व्यक्त करते हुए रोजी मार्टिन कहती हैं, मैं ज्वालामुखी फूटने के कई दृश्य देख चुकी हूँ। मुझे बताया गया कि ये ज्वालामुखी पृथ्वी की धुरी में कुछ परिवर्तन के कारण हैं, जिनके साथ कई विश्वव्यापी घटनाएँ घटेगी। मैं हवाई में फटे ज्वालामुखी को, मृत्युकालीन अनुभव में देख चुकी हूँ। एक दिन टी. वी. में मैंने सेंटहेलेना का ज्वालामुखी फटते देखा, जिसे मैं पहले ही देख चुकी थी। इसी के साथ मैंने देखा कि ध्रुवों में परिवर्तन होने वाला है। मैं पृथ्वी को फैलते हुए व कराहते हुए देख रही हूँ। साथ ही एक नयी चेतना का जन्म होते दिखाई दे रहा है। मैंने यह भी देखा कि विश्व के इतिहास में ऐसा यदा-कदा ही होता है, जो कि विश्व को विकास के एक उच्चतर स्तर पर लाने के लिए आवश्यक होता है। देखते-देखते पृथ्वी की सतह पर परिवर्तन हो जायगा। सागर जमीन की तह से ऊपर उठेगी व सागर जल वर्तमान भूभाग पर छा जाएगा। इस बार बहुत सारे लोग मारे जाएँगे, लेकिन इस प्रक्रिया में धरती का परिशोधन हो जाएगा।
सिर में आयी गहरी चोट के कारण मृत्यु जैसी अचेतन अवस्था से गुजरे जोसेफ अलब्राइट को चमत्कारी अतीन्द्रिय अनुभूति हुई। उन्हीं के शब्दों में “मैंने कई क्षेत्रों को सूखा व अकाल के कारण प्रभावित होते स्पष्टतः देखा। अफ्रीका सबसे बुरी तरह से प्रभावित होगा। मैंने ऐसा कुछ एशियाई देशों में भी देखा। कई देशों में बहुत भयंकर सूखा पड़ेगा। अन्य क्षेत्रों में अप्राकृतिक भारी वर्षा के कारण बाढ़ और ज्वारीय लहरों से विनाश के दृश्य दिखेंगे। मौसम बहुत अनिश्चित हो जाएगा। मैं गर्मी के बीचों-बीच बर्फ गिरते देख रहा हूँ।”
अलब्राइट आगे कहते हैं- “धरती का अंधाधुन्ध दोहन, तेजाबी वर्षा व सागर एवं धरती में प्रदूषण के कारण खाद-पदार्थों की भयंकर कमी होगी। इस सबका कारण सामान्य मानवों का जीवन-स्तर बढ़ाने की कीमत पर अपने वैयक्तिक स्वार्थ के लिए अधिकाधिक धन-साधन संग्रह करना है। मैंने देखा कि यह संकीर्ण एवं स्वार्थी दृष्टिकोण कई लोगों की व्यापक तबाही के साथ उक्त व्यक्तियों को भी नष्ट कर रहा है। सूखे व बाढ़ के कारण खाद्य - संकट और गहरा हो रहा है। कीमतें बहुत बढ़ रही हैं। आर्थिक स्थिति पर बहुत दबाव पड़ रहा है। खाद्यसंकट एवं बिगड़ती आर्थिक स्थिति के साथ मैं सैन्यशक्ति को बहुत मजबूत होते देख रहा हूँ जो तनाव का कारण बन रही है।
इसी तरह का एक अनुभव विलियम जेम्स को भी हुआ। इसका शब्दचित्र प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया- मैं दंगों को देख रहा हूँ। दुनिया के लोग एक दूसरे पर घृणा के गोले बरसा रहे हैं। लोग बाहर निकलने से डर रहे हैं। अनियंत्रित भोगवाद ने लोगों को आध्यात्मिक पतन की ऐसी स्थिति में ला पटका है, जहाँ वे जीवन के खालीपन की पूर्ति के लिए कामवासना, जुआ, शराब, नशा और हिंसा की शरण ले रहे हैं, जो अंतिम विनाश की ओर दौड़ लगाते दिख रहे हैं। मैं पूरे विश्व के ऊपर एक धुँधला-विषाक्त कुहरा छाया देख रहा हूँ। इसे मैं भय की तरंगों के रूप में समझता हूँ। यहाँ-वहाँ से मैं प्रकाशित आत्माओं से प्रकाश की तरंगों को आते देख रहा हूँ, जो इस अंधकार का भेदन करने का प्रयास कर रहे हैं। मैंने देखा यह भय सामाजिक अव्यवस्था एवं हिंसा के कारण है, जो और बद्तर होता चला जा रहा है। लेकिन तभी मुझे सूर्य उपासकों के तप-तेज का एक पुँज दिखाता और देखते-देखते सारा वातावरण बदलने लगता। इस युगान्तरकारी परिवर्तन के फलस्वरूप लोग व्यापक स्तर पर सद्भाव एवं प्रेम से ओत-प्रोत होकर जीना सीख लेते हैं।
जीवन के विविध घटनाचक्रों, संयोग एवं मृत्यु के अनुभवों से गुजरे हुए व्यक्तियों की अनुभूतियाँ आश्चर्यजनक एवं अलौकिक तो हैं। साथ ही इस बात की सत्यता का प्रमाण हैं कि मानवी चेतना उतनी ही नहीं है, जितनी कि सामान्य जीवनक्रम में परिलक्षित होता है। इस सामान्य चेतना की पृष्ठभूमि में ऐसा बहुत कुछ है, जिसे यदि जाग्रत किया जा सके तो नर से नारायण बनना, मनुष्य से देवता में परिवर्तित होना मात्र कहावत नहीं, बल्कि जीवन का सर्वमान्य सत्य बन जाएगा। इस तरह की जाग्रति के लिए प्राचीन भारतीय ऋषियों ने एक समग्र विधि-विधान की खोज की है। जिसे अपनाकर सचेतन रीति से अपनी चेतना को परिष्कृत, परिशोधित एवं जाग्रत किया जा सकता है। यह जाग्रति यदि जीवन में आ सके, तो अपना मानव जीवन दिव्य, अलौकिक बनना एक सुनिश्चित तथ्य बन जाएगा।
प्रतिभा मनुष्य की आन्तरिक क्षमताओं की अभिव्यक्ति है। इन्सान की सारी उपलब्धियाँ इसी की देन हैं। जीवन एवं विश्व के व्यापक-विस्तार में आज हम जिस किसी वैभव एवं विभूतियों की चर्चा करते एवं कहते-सुनते हैं, वह सबका सब मानवीय प्रतिभा के विकास एवं परिष्कार को आयु से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन प्रतिभाओं के संदर्भ में यही अन्तिम सत्य नहीं है। कुछ बालकों की विलक्षण प्रतिभा सत्य के दूसरे आयाम की ओर भी सोचने के लिए विवश करती है।
मात्र पाँच वर्ष की आयु से गणित की अनेक गुत्थियों को सुलझाने वाले बालक तथागत तुलसी को ही लीजिए, जिसने मात्र नौ वर्ष पाँच माह की आयु में ६५ प्रतिशत अंक लेकर लेकर मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। यह अब तक समूचे विश्व में सबसे कम आयु में मैट्रिक पास करने वाला छात्र बन गया हैं। ऐसी करने के साथ ही तथागत तुलसी ने तापमान के केल्विन का रिकार्ड तोड़ दिया, जिन्होंने सन् १९३४ ई. में दस वर्ष चार माह की आयु में दसवीं परीक्षा पास की थी। गणित की जटिल गुत्थियों को चुटकी में हल करने वाले बालक तुलसी का दावा है कि ‘पाई’ का निश्चित एवं व्यावहारिक मान निकाल चुके हैं व क्वार्क से भी छोटे, सबसे छोटे परमाणविक कण की सिद्धान्त रूप में खोज चुके हैं। आवश्यक यंत्रों के उपलब्ध होने पर उनका दावा है कि भूकम्प को १५ दिन पूर्व घोषित कर सकते हैं।
तथागत की विलक्षण प्रतिभा के कारण उन्हें कम्प्यूटर बालक के नाम से जाना जाता है। सैकड़ों वर्ष आगे-पीछे की किसी भी तारीख को भारतीय पंचांग में बदलकर पलभर में बता देना उनके लिए बायें हाथ का खेल है। उनका कहना है कि सन् २... में फरवरी मास ३. दिन का होगा व मास का अन्तिम दिन बुधवार को पड़ेगा, जो वास्तव में ४.. वर्षों में होता है। साढ़े दस वर्षीय बालक तथागत ने अभी हाल में ही बी. एस. सी. के अन्तिम वर्ष की परीक्षा दी है। इतनी कम आयु में विज्ञान की स्नातक कक्षा में प्रवेश के लिए उन्हें पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा था। इससे पूर्व दसवीं की बोर्ड परीक्षा में शामिल होने की उन्हें अनुमति नहीं मिली थी, किन्तु दिल्ली उच्च न्यायालय ने बालक की विलक्षण प्रतिभा को देखते हुए हरी झण्डी दिखा दी थी। यह बालक तथागत बड़ा होकर पार्टिकल फिजिक्स में काम करना चाहता है व तुलीट्रान को यथार्थ रूप में सिद्ध करना चाहता है।
इसी तरह ‘कैथरीन वार्न्स’ ब्रिटेन की सबसे तेज दिमाग की लड़की है। इसकी आई. क्यू. १७. है, जो कि बड़े-बड़ों के लिए आश्चर्य का विषय है। मात्र तीन वर्ष नौ माह की अवस्था में उसे ब्रिटेन में सामान्य ज्ञान की परीक्षा लेने वाली अग्रणी संस्था ‘मैनसा’ ने अपनी सदस्यता दे दी है। यह बालिका अपने से दुगुनी आयु के बच्चों के लिए निर्धारित पुस्तकें पढ़ लेती है और ११ वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निर्धारित प्रश्नों को हल कर लेती है। वह सरल कम्प्यूटर प्रोग्राम भी लिख लेती है तथा बैले और रैप दोनों ही तरह के नृत्य कर सकती है। एक ही बार सुनने के बाद वह पियानो पर शिशु गीतों की धुनें निकाल सकती है। कैथेरीन ने ग्यारह सप्ताह की शिशु अवस्था में ही अपनी असाधारण क्षमताओं का परिचय देना शुरू कर दिया था। आठ माह की आयु में वह चलने लगी व अठारह महीने की होते-होते उसने बिलकुल स्पष्ट बोलना शुरू कर दिया था। छोटी-सी आयु में कैथेरीन ने अपने कैरियर सम्बन्धी निर्णय भी कर रखा है। उसका निश्चय है कि वह एक डॉक्टर और बैले नर्तकी बनेगी।
मात्र दो वर्ष ग्यारह महीने व तीन दिन की नन्हीं-सी कीर्ति निषाद को जब लोगों ने यमुना के गहरे पानी में डेढ़ किलोमीटर की दूरी तैरकर पर करते देखा तो सबके सब हतप्रभ रह गए। तेज हवा के झोंके एवं यमुना की लहरें भी उसके उत्साह को बाँध नहीं पाए। तेज-तर्रार मछली की तरह यमुना की छाती को चीरते हुए पार करने वाली कीर्ति ने गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराने का दावा पेश किया है। तैराकी के इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज कराने वाली नन्हीं कीर्ति अपनी उपलब्धि के संदर्भ में पूरी तरह से अनजान है। अभी वह ठीक से बोल भी नहीं पाती है।
कीर्ति की बड़ी बहिन तरुणा भी इससे पूर्व ३. मई, १९९५ में यमुना नदी पार करने का रिकार्ड बना चुकी है। तब वह मात्र ३ वर्ष तीन माह एवं चार दिन की थी। १९९५-९६ के लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड में उसका नाम दर्ज किया गया था।
भारत के ही पड़ोसी देश चीन के चार वर्षीय एक बालक ने सबसे लम्बी नदी याँग्ज में ३५. किलोमीटर तैरने के अपने निर्णय से सबको चौंका दिया है। डेंग्वा नामक बालक ने अपने इस एक माह लम्बे अभियान को जून के अन्त में शुरू किया है। डेंग्वा पूर्वी चीन के नान्जिंग शहर से नदी में उतरा है और उसकी तैराकी की मंजिल शंघाई है। उत्तर चीन के दलियान शहर में रहने वाले इस बालक का जन्म १२ अप्रैल, १९९४ को हुआ था और साढ़े तीन वर्ष की आयु में वह स्थानीय दलियान शीतकालीन तैराकी क्लब का सदस्य बन गया था।
अमेरिका में बसे भारतीय मूल के इंजीनियर मकसूद हक का १२ वर्षीय पुत्र आसिफ़ अपनी विलक्षण प्रतिभा के कारण चर्चा का विषय बना हुआ है। आसिफ़ स्नातक की डिग्री प्राप्त करने वाले विश्व के कम आयु के छात्रों में से एक है। दस वर्ष पूर्व ही पिता को अपने 'होनहार वीरवान के चिकने पात' दिख गए थे। मात्र दो वर्ष की नन्हीं-सी आयु में ही वह अपनी अम्मी के लिए खरीददारी की फेहरिश्त फटाफट तैयार कर लेता था।
आसिफ़ की दुनिया पढ़ाई-लिखाई तक ही सिमटी-सिकुड़ी नहीं है। वह कम्प्यूटर गेम्स में भी माहिर है। गोल्फ और बास्केट बॉल खेलने के अलावा उसे सिक्के इकट्ठे करने का भी शौक है। खाने में उसे मीठे व्यंजनों का बेहद शौक है। कार्टून शो देखना और फुटबॉल तथा बेसबॉल टीमों की गाहे-बगाहे हौसला अफ़जाई भी उसकी फितरत में शामिल है। तीन वर्ष की आयु में ही वह विश्वभर में मशहूर गम्भीर पत्रिका ‘रीडर डायजेस्ट' पढ़ने व समझने का कमाल दिखा चुका है। उससे दुनिया के किसी भी मामले में चर्चा छेड़ी जा सकती है। उससे देश के प्रशासन के बारे में पूछा जा सकता है। विश्व के विभिन्न देशों की समस्याओं की गम्भीर चर्चा करना एवं उस पर विशेषज्ञों की तरह टिप्पणी करना उसे अच्छा लगता है।
आसिफ़ की ही तरह ‘अर्ली एन्टेरन्स प्रोग्राम’ (ई. ई. पी.) के तहत स्नातक होने वाले १३ छात्रों में चार भारतीय हैं। १९८३ से शुरू हुए इस कार्यक्रम में अति प्रतिभाशाली छात्रों को सीधे विश्वविद्यालय में प्रवेश दिया जाता है। जिनमें कुछ तो मात्र ग्यारह वर्ष के ही होते हैं। पहले दो वर्ष परखकर तीसरे साल अन्य छात्रों की ही तरह उन्हें डिग्री दे दी जाती है। भारत की ही वीणा वेद को को जब ई. ई. पी. के तहत प्रवेश मिला था, तो वह मात्र ५ वर्ष की थी। नन्दन लॉड १२ वर्ष का छात्र था, जब उसने १. वीं कक्षा उत्तीर्ण की और ई. ई. पी. में प्रवेश किया था। इस समय वह जेनेटिक्स में शोध कर रहा है। इकोलॉजी व जेनेटिक्स में विशेषज्ञता रखने वाला प्रसाद मात्र १४ वर्ष का है और इस समय स्नातक के अन्तिम वर्ष में है।
भारत के ही एक प्रान्त बिहार के देवरिया गाँव के सात वर्षीय बालक सम्भव ने चार महीने पाँच दिन में सम्पूर्ण श्रीमद्भागवतगीता अठारहों अध्यायों के सभी ७.. श्लोक कंठस्थ कर लिए हैं। पतंजलि योगदर्शन को मात्र १५ दिनों में याद कर एक कीर्तिमान स्थापित किया है। इसके अतिरिक्त उसे रामचरित मानस के मंगलाचरण के श्लोकों सहित पूरी चौपाइयाँ याद हैं। श्रीमद्भागवतगीता के किसी अध्याय की श्लोक संख्या सुनकर वह धाराप्रवाह दुहरा सकता है। इतना ही नहीं वह गीता व योगदर्शन का विपरीत क्रम में भी पाठ कर सकता है।
सम्भव के पिता डॉ. ब्रह्मानन्द चतुर्वेदी संस्कृत के शिक्षक हैं। उन्हें अपने बेटे की विलक्षण स्मरण शक्ति का परिचय तब मिला जब वह मात्र साढ़े तीन वर्ष का था। एक दिन बालक घर की छत पर आए बन्दरों से घबराकर पिता की गोद में आ दुबका तो उन्होंने कहा कि हनुमान चालीसा का पाठ करने से बन्दर नहीं काटते। मात्र एक दिन बाद वह यह देखकर दंग रह गए कि सम्भव को अनुमान चालीस कंठस्थ हो चुका है और वह छत पर बैठा हुआ दुहरा रहा है, ताकि बन्दर न आए। बनारस शिशु विहार विद्यालय की दूसरी कक्षा का छात्र सम्भव स्कूल के उत्कृष्ट विद्यार्थियों में से है। विगत परीक्षाओं में ८५ प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाला यह बालक अपनी विलक्षण स्मरण-शक्ति के लिए सम्मानित किया जा चुका है। पिता के अनुसार सम्भव अपने समूचे पाठ्यक्रम को दो-तीन माह में पूरा कर लेता है और बाकी समय को अन्य रचनात्मक कार्यों में लगाता है।
सात वर्षीय बालक ‘शान पूनीवाला’ ने ‘गुजी काई कराटे’ में ब्लैक बेल्ट हासिल करके लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराया है। वह विश्व का सबसे कम आयु का ब्लैक बेल्टर है। तीन फुट के इस नन्हे कराटेबाज ने यह उपलब्धि चार वर्ष के गहन प्रशिक्षण के बाद हासिल की। मात्र दो वर्ष की आयु में शान ने कराटे का प्रशिक्षण लेना शुरू किया था। जिस आयु में बच्चे खिलौने से खेलते हैं, उस उम्र में शान कराटे के दाव-पेंच सीख रहा था, इसमें उसकी माँ हेलना की भूमिका प्रमुख रही।
सात वर्षीय शान को कराटे के लगभग ५... पेंच आते हैं, जो कि ब्लैक बेल्ट पाने के लिए एक कसौटी भी होती है। शान ने ९५ में मलेशिया में प्रथम एशिया - प्रशान्त गूजी काई कराटे’ प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। १९९६-९७ में पुणे में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में उसने भाग लिया था। ७ वर्ष की आयु में शान ने जब अपने कराटे कौशल से २.. किलो बर्फ की सिल्ली तोड़ दी व अपने पैरों एवं हाथों के वारों से प्रतिद्वंद्वियों को चित करना शुरू कर दिया, तो सभी हैरान रह गये। मुम्बई में प्रशिक्षण के दौरान एक प्रतियोगिता में जब पंजों के द्वारा उसने अपने काफी बड़े कराटे खिलाड़ियों को पराजित किया तो सबके सब दाँतों तले उँगली दबाकर रह गए।
अभी हाल में ही अमेरिका के शतरंज इतिहास में १. वर्षीय एक बालक ने अपना नाम सबसे युवा शतरंज खिलाड़ी के रूप में सुनहरे अक्षरों में अंकित करवा दिया। अमेरिका शतरंज परिषद ने शतरंज प्रतियोगिता के तहत हिलनारु बाकामोर को पहले दर्जे का शतरंज खिलाड़ी घोषित किया। इसी के साथ उसे सबसे कम उम्र के शतरंज मास्टर का खिताब दिया।
भारतीय मूल के बालक अम्बारी को विश्व के सबसे कम आयु के डॉक्टर होने का खिताब मिला है। विलक्षण बुद्धि का यह बालक तीन वर्ष की आयु में अमेरिका जा बसा था। प्राथमिक स्तर की परीक्षाएँ उसने एक वर्ष में दो-दो पास की। ग्यारह वर्ष की आयु में वह हाईस्कूल पास कर चुका था। फिर उसने माउण्ट सिनाई स्कूल ऑफ मेडिसिन में प्रवेश लिया और मात्र सत्रह वर्ष की आये में डॉक्टर की उपाधि प्राप्त की। इस तरह वह विश्व का सबसे छोटी आयु का चिकित्सक बन गया। हाईस्कूल के दौरान उसने एड्स जैसे गम्भीर विषय पर एक पुस्तक भी लिखी थी। इस पुस्तक को ‘अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा पुरस्कृत किया जा चुका है।
विश्वविद्यालय के स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश कर पाता है। लेकिन विश्व में ऐसा भी एक बालक हुआ है जिसने आठ वर्ष से भी कम आयु में विश्वविद्यालय में प्रवेश पाया। इस मेधावी छात्र का नाम- माइकेल टेन है। जिसने ७ वर्ष ग्यारह माह की आयु में न्यूजीलैण्ड के केन्टबरी विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश पाया था। रूस के प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं भौतिकविद् निकोलाई वोगेल्यवाप ने भी मात्र १. वर्ष की आयु में स्नातक स्तर की शिक्षा ग्रहण की थी।
पी-एच. डी. (डॉक्टर ऑफ फिलोसॉफी) शिक्षा जगत की एक उच्च उपलब्धि मानी जाती है, जिसे लोचाड के विलक्षण प्रतिभाशाली बालक कार्लवीटे ने सबसे कम आयु में पूरा करके विश्व कीर्तिमान बनाया है। मात्र १२ वर्ष की आयु में उसने गीसने विश्वविद्यालय से पी. एच. डी. की उपाधि प्राप्त कर ली थी। चर्चित रूसी गणितज्ञ सर्जीमार्गल्यान ने मास्को विश्वविद्यालय के गणित-भौतिक विभाग में मात्र सोलह वर्ष की आयु में ‘सोफोमोर’ के रूप में प्रवेश किया था। स्नातकोत्तर शिक्षा के दौरान मात्र डेढ़ वर्ष में अपनी थीसिस पूरा कर उन्होंने २. वर्ष की आयु में डॉक्ट्रेट की उपाधि अर्जित की।
नेपोलियन, मात्र १६ वर्ष की आयु में एक साधारण बहुभाषाविद् के रूप में चर्चित हो गए थे। उन्होंने केवल २. वर्ष की आयु में मिश्र की दुर्बोध चित्रलिपि का अर्थ निकालने में सफलता प्राप्त की। सबसे कम आयु में प्रोफेसर बनने का कीर्तिमान कोलीन मेक्यूरिन का है। १६९८ में जन्मे कोलीन १७१७ में मारिश्यल कॉलेज एवरदीन में गणित के प्राध्यापक बने, तब वे मात्र १९ वर्ष के थे। इन १७७८ में जन्मे हेनरी किलपोट्स तो मात्र १७ वर्ष ८. दिन की आयु में ही मोगारलिसन कॉलेज ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शिक्षक नियुक्त किए गए थे।
कला क्षेत्र में भी बाल प्रतिभाओं ने हर युग में अपनी विलक्षणता का परिचय दिया है। फिल्मों में श्रेष्ठ अभिनय के लिए बाल कलाकारों को पुरस्कार मिलना वैसे तो सामान्य-स्त्री बात है। लेकिन यदि किसी तीन वर्षीय बालिका को ऐसा पुरस्कार मिले तो बात आश्चर्यचकित कर देने वाली हो जाती है। विक्टोरीथिविसोल ऐसी ही विलक्षण अभिनय कुशलता की धनी बालिका है, जिसे वेनिस फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री घोषित किया गया। इस तीन वर्षीय बालिका ने फ्रेंच भाषा में बनी फिल्म ‘पोनेट’ में उत्कृष्ट अभिनय किया था।
इसी तरह वुल्फगेंग एर्मडस, मोजार्ट, फेज शूवर्ट, फेलिक्स मँडलसन-ये सभी विलक्षण संगीत प्रतिभाएँ १२ वर्ष की आयु से पूर्व ही संगीत रचना करने लगे थे। इनमें मोजार्ट की संगीत की प्रतिभा तो तीन वर्ष में ही प्रस्फुटित हो गयी थी। जोहन वेपमक हूमेल, फ्रेडरिक चोमिन और येहुदी मेनी मेंनुदीन ऐसी प्रतिभाओं में हैं, जिन्होंने ग्यारह वर्ष की आयु तक अपने सार्वजनिक संगीत समारोह कर डाले थे। ऐसे ही एंटोनिन डवरिक और रिचार्ड स्ट्रॉस जन्मजात विलक्षण प्रतिभासम्पन्न थे। विलक्षण रूसी चित्रकार कार्लकुलाव और अलेक्जेन्डर इवानाव ने कला अकादमी में मात्र ९ एवं ११ वर्ष की आयु में प्रवेश किया था।
वैज्ञानिक प्रतिभाओं में एडीसन किशोरावस्था तक कई आश्चर्यजनक खोजें कर चुका था। साइबरनेटिक विज्ञान के जनक नावेर्ट फिनर विज्ञान क्षेत्र के अनुसंधान में अपने बचपन से ही सक्रिय हो गए थे। पास्कल, लाइबिनित्ज और गॉस ने अपने शैशवकाल में बड़ों को अपनी गणितीय कुशलता से चमत्कृत कर दिया था।
भारत के सुप्रसिद्ध गणितज्ञ श्री रामानुजम जन्मजात विलक्षण प्रतिभा के धनी बालक थे। प्रसिद्ध अंग्रेज वैज्ञानिक जूलियस हक्सले ने इन्हें शताब्दी का सबसे बड़ा वैज्ञानिक घोषित किया था। मात्र तीसरी कक्षा में पढ़ते हुए उन्होंने बीजगणित का इंटरमीडिएट का पाठ्यक्रम समाप्त कर लिया था। चौथी कक्षा में त्रिकोणमिति के सारे कठिन प्रश्न हल कर डाले थे। मात्र १३ वर्ष की आयु में ज्या एवं कोज्या का विस्तार कर दिया था। उन्हीं दिनों भारत की मैथेमेटिक सोसाइटी की प्रसिद्ध पत्रिका में उन्होंने ६. प्रश्न दिये थे, जिनमें लगभग २. प्रश्न आज तक अनुत्तरित हैं।
विलक्षण प्रतिभाशालियों के ये उदाहरण पुरुषार्थ से प्रतिभा के सिद्धान्त को नहीं नकारते, बल्कि इसको और भी विस्तृत आयाम में देखने के लिए विवश करते हैं। पुरुषार्थ अमिट और अकाट्य है। यह कभी निष्फल नहीं होता। बाल-प्रतिभाएँ यह सिद्ध करती हैं कि उनमें पूर्वजन्म के पुरुषार्थ के संस्कार ही प्रतिफलित हो रहे हैं। प्रतिभा के बीज सभी में रहते हैं। इसके अंकुरण व विकास में घर का वातावरण, बड़ों का प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन खाद-पानी का काम करते हैं। अपनी लगन एवं निष्ठा इसे आगे पुष्पित-पल्लवित करती है। यदि किसी अवरोध की वजह से इस जन्म में किया गया पुरुषार्थ फलित नहीं हो सका तो निश्चित ही आगे सफल होगा। बचपन में असामान्य प्रतिभा से चमत्कार निश्चित ही उनके पूर्वजन्म के पुरुषार्थ की पुण्यराशि है, जो अब बाल्यावस्था में प्रकट होकर सभी को चमत्कृत कर रही है।
काम की तलाश में इधर-उधर धक्के खाने के बाद निराश होकर जब वह घर वापस लौटने लगा तो पीछे से आवाज आयी, ऐ भाई! यहाँ कोई मजदूर मिलेगा क्या?
उसने पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि एक झुकी हुई कमर वाला बूढ़ा तीन गठरियाँ उठाए हुए खड़ा है। उसने कहा, हाँ बोलो क्या काम है? मैं ही मजदूरी कर लूँगा।
मुझे रामगढ़ जाना है.........। दो गठरियाँ में उठा लूँगा, पर....मेरी तीसरी गठरी भारी है, इस गठरी को तुम रामगढ़ पहुँचा दो, मैं तुम्हें दो रुपये दूँगा। बोलो काम मंजूर है।
ठीक है। चलो ....आप बुजुर्ग हैं। आपकी इतनी मदद करना तो यूँ भी मैं अपना फर्ज समझता हूँ। इतना कहते हुए गठरी उठाकर अपने सिर पर रख ली। किन्तु गठरी रखते ही उसे इसके भारीपन का अहसास हुआ। उसने बूढ़े से कहा- ये गठरी तो काफी भारी लगती है।
हाँ..... इसमें एक-एक रुपये के सिक्के हैं। बूढ़े ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा।
उसने सुना तो सोचा, होंगे मुझे क्या? मुझे तो अपनी मजदूरी से मतलब है। ये सिक्के भला कितने दिन चलेंगे? तभी उसने देखा कि बूढ़ा उस पर नजर रखे हुए है। उसने सोचा कि ये बूढ़ा जरूर ये सोच रहा होगा, कहीं ये भाग तो नहीं जाएगा। पर मैं तो ऐसी बेईमानी और चोरी करने में विश्वास नहीं करता। मैं सिक्कों के लालच में फँसकर किसी के साथ बेईमानी नहीं करूँगा।
चलते-चलते आगे एक नदी आ गयी। वह तो नदी पार करने के लिए झट से पानी में उतर गया, पर बूढ़ा नदी के किनारे खड़ा रहा। उसने बूढ़े की ओर देखते हुए पूछा- क्या हुआ? आखिर रुक क्यों गए?
बूढ़ा आदमी हूँ। मेरी कमर ऊपर से झुकी हुई है। दो-दो गठरियों का बोझ नहीं उठा सकता.... कहीं मैं नदी में डूब ही न जाऊँ। तुम एक गठरी और उठा लो। मजदूरी की चिन्ता न करना, मैं तुम्हें एक रुपया और दे दूँगा।
ठीक है लाओ।
पर इसे लेकर कहीं तुम भाग तो नहीं जाओगे?
क्यों, भला मैं क्यों भागने लगा?
भाई आजकल किसी का क्या भरोसा? फिर इसमें चाँदी के सिक्के जो हैं।
मैं आपको ऐसा चोर-बेईमान दीखता हूँ क्या? बेफिक्र रहें मैं चाँदी के सिक्कों के लालच में किसी को धोखा देने वालों में नहीं हूँ। लाइए, ये गठरी मुझे दे दीजिए।
दूसरी गठरी उठाकर उसने नदी पार कर ली। चाँदी के सिक्कों का लालच भी उसे डिगा नहीं पाया। थोड़ी दूर आगे चलने के बाद सामने पहाड़ी आ गयी।
वह धीरे - धीरे पहाड़ी पर चढ़ने लगा। पर बूढ़ा अभी तक नीचे ही रुका हुआ था। उसने कहा-आइए ना, फिर से रुक क्यों गए? बूढ़ा आदमी हूँ। ठीक से चल तो पाता नहीं हूँ। ऊपर से कमर पर एक गठरी का बोझ और, उसके भी ऊपर पहाड़ की दुर्गम चढ़ाई।
तो लाइए ये गठरी भी मुझे दे दीजिए बेशक और मजदूरी भी मत देना।
पर कैसे दे दूँ? इसमें तो सोने के सिक्के हैं और अगर तुम इन्हें लेकर भाग गए तो मैं बूढ़ा तुम्हारे पीछे भाग भी नहीं पाऊँगा।
कहा न मैं ऐसा आदमी नहीं हूँ। ईमानदारी के चक्कर में ही तो मुझे मजदूरी करनी पड़ रही है, वरना पहले मैं एक सेठजी के यहाँ मुनीम की नौकरी करता था। सेठजी मुझसे हिसाब में गड़बड़ करके लोगों को ठगने के लिए दबाव डालते थे। तब मैंने ऐसा करने से मना कर दिया और नौकरी छोड़कर चला आया। उसने यूँ अपना बड़प्पन जताने के लिए गप्प हाँकी।
पता नहीं तुम सच कह रहे हो या.....। खैर उठा लो ये सोने के सिक्कों वाली तीसरी गठरी भी। मैं धीरे-धीरे आता हूँ। तुम मुझसे पहले पहाड़ी पार कर लो, तो दूसरी तरफ नीचे रुककर मेरा इंतजार करना।
वह सोने के सिक्कों वाली गठरी उठाकर चल पड़ा। बूढ़ा बहुत पीछे रह गया था। उसके दिमाग में आया, अगर मैं भाग जाऊँ, तो ये बूढ़ा तो मुझे पकड़ नहीं सकता और मैं एक ही झटके में मालामाल हो जाऊँगा। मेरी पत्नी जो मुझे रोज कोसती रहती है, कितना खुश हो जाएगी? इतनी आसानी से मिलने वाली दौलत ठुकराना भी बेवकूफी है.........। एक ही झटके में धनवान हो जाऊँगा। पैसा होगा, तो इज्जत-ऐश-आराम सब कुछ मिलेगा मुझे........।
उसके दिल में लालच आ गया और बिना पीछे देखे भाग खड़ा हुआ। तीन-तीन भारी गठरियों का बोझ उठाए भागते-भागते उसकी साँस फूल गयी।
घर पहुँचकर उसने गठरियाँ खोल कर देखीं, तो अपना सिर पीटकर रह गया। गठरियों में सिक्कों जैसे बने हुए मिट्टी के ढेले ही थे। वह सोच में पड़ गया कि बूढ़े को इस तरह का नाटक करने की जरूरत ही क्या थी? तभी उसकी पत्नी को मिट्टी के सिक्कों के ढेर में से एक कागज मिला, जिस पर लिखा था, “यह नाटक इस राज्य के खजाने की सुरक्षा के लिए ईमानदार सुरक्षामंत्री खोजने के लिए किया गया। परीक्षा लेने वाला बूढ़ा और कोई नहीं स्वयं महाराजा ही थे। अगर तुम भाग न निकलते तो तुम्हें मंत्रीपद और मान-सम्मान सभी कुछ मिलता। पर............... “
हम सभी को सचेत रहना चाहिए, न जाने जीवन देवता कब हममें से किसकी परीक्षा ले ले। प्रलोभनों में न डिगकर सिद्धान्तों को पकड़े रखने में ही दूरदर्शिता है।
संसार में विज्ञान के विकास की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या इसके मूल में सिर्फ विश्व की भौतिक उन्नति ही कारणभूत है या कुछ और भी? अक्सर इस प्रकार के प्रश्न जिज्ञासुओं के मस्तिष्क को ज्वार-भाटे की तरह मथते रहते हैं, पर समाधान न मिल पाने के कारण उनकी उधेड़बुन ज्यों-की-त्यों बनी हुई है और वे यह निश्चय नहीं कर पा रहे हैं कि आस्थाओं, मान्यताओं, रूढ़ियों के परिवर्तन-परिष्कार में भी इसकी कोई भूमिका है क्या?
अन्तिम प्रश्न पर विचार करने से पूर्व तनिक इस विषय पर चिन्तन करना पड़ेगा कि वास्तव में विज्ञान है क्या? परिभाषा की दृष्टि से सोचें, तो किसी भी वस्तु के क्रमबद्ध और विवेकसम्मत ज्ञान को ‘विज्ञान’ कहते हैं। इसे इसकी समग्र और पूर्ण परिभाषा कही जा सकती है, कारण कि इसमें सूत्र रूप में वह सारी बातें सन्निहित हैं, जो इसकी समग्रता के लिए अभीष्ट और आवश्यक हों। इतने पर भी इन दिनों विज्ञान से प्रायः जिस विधा का अर्थ लगाया जाता है, वह है-तकनीकी या यांत्रिक ज्ञान। इसमें दो मत नहीं कि पदार्थ सत्ता के लगातार अन्वेषण और अनुसंधान के फलस्वरूप आज उसका वह स्वरूप ही सर्वसाधारण के सामने अधिक स्पष्ट और उजागर है, जिसे ‘मशीनी ज्ञान’ कहते हैं, तो फिर भी पदार्थ विज्ञान सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। स्थूल दुनिया के अंतर्गत पदार्थ से संबंधित जितने भी गोचर, अगोचर दृश्य एवं घटनाएँ हैं, उन सभी को उस विभाग में रखना पड़ेगा और उनका अध्ययन-विश्लेषण कर उस तह तक पहुँचना पड़ेगा, जहाँ साधारण सोच और साधारण बुद्धि पहुँच पाने में असमर्थ है। संक्षेप में यही है विज्ञान और वैज्ञानिक चिन्तन। इसकी कितनी ही शाखाएँ हैं। फिर प्रत्येक की पृथक-पृथक अनेक शाखा-प्रशाखाएँ हैं। इनमें से किसी से भी संबंधित वह प्रकरण विज्ञान की ही विषयवस्तु कहलायेगी। इस प्रकार इसे तर्क और तथ्यसम्मत दृष्टिकोण प्रस्तुत करने वाला प्रामाणिक कहा जा सकता है।
वाल्टर मरे अपनी पुस्तक ‘साइंस एण्ड सोसायटी’ में लिखते हैं कि सम्प्रति संसार में जिस प्रकार का भौतिक उत्कर्ष हुआ है और जितने सुविधा-साधन बढ़े हैं, उसका श्रेय निश्चित रूप से विज्ञान को जाता है, पर उसकी समाज के सिर्फ पदार्थपरक विकास तक ही सीमित नहीं माना जाना चाहिए, उससे विचारों में भी क्रान्ति आई और जनमानस में एक ऐसी सोच पैदा हुई, जिसे ‘वैज्ञानिक’ कहा जा सके। इस नये चिन्तन ने विकृत आस्थाओं पर कुठाराघात करना प्रारम्भ किया। परिणाम यह हुआ कि लम्बे समय से समाज में जड़ें जमाये रहने वाली अंधमान्यताएँ, कुप्रथाएँ और चित्र-विचित्र परम्पराएँ अस्तित्व बचाये रखने वाले ठोस आधार के अभाव में अपनी मौत मरने लगी।
परम्पराएँ और प्रथाएँ सदैव सामयिक आवश्यकताओं और तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए गढ़ी जाती है। इसी कारण से एक ही समय में अलग-अलग संस्कृतियों में पृथक-पृथक प्रचलन देखे जाते हैं। यह सनातन नहीं होते। समय के साथ-साथ बदले परिवेश में तदनुकूल परिवर्तन इनमें आवश्यक होता है। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो ओछी मान्यताओं और प्रतिगामी विचारों के कारण समाज की अवस्था पिछड़ों की-सी हो जाती है। वैज्ञानिक विचारधारा इसी हेय मनोदशा से समाज और संस्कृति को उबारकर उस स्थिति में पहुँचाती है, जिसे ‘प्रगतिशील’ कहा जा सके। विज्ञान को इसीलिए प्रगतिशीलता का पर्याय माना जाता और समझा जाता है कि वह हर प्रकार के बेतुके सिद्धान्तों और भौंड़ी अवधारणाओं को विवेकशीलता की तराजू पर तौलते हुए अमान्य कर देगा।
दुर्भाग्य की बात है कि जो विज्ञान अब तक व्यक्ति और समाज को आगे बढ़ाने एवं ऊँचा उठाने में प्रयत्नशील था, अब उसी से पिछड़ेपन को प्रश्रय एवं प्रोत्साहन मिलने लगा है। इसके कई उदाहरण हमारे समक्ष हैं।आज से कुछ वर्ष पूर्व आस्ट्रिया के जीव- वैज्ञानिक फ्रैंकसलोवे ने अमेरिकन एसोसिएशन फॉर द् एडवांसमेंट ऑफ साइंस’ नामक अमेरिकी संस्थान में अपनी एक अध्ययन रिपोर्ट भेजी। उसके द्वारा उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया था कि प्रथम संतान प्रतिभा की दृष्टि से साधारण होती है, जबकि बाद की संतानें अत्यन्त प्रतिभाशाली। सलोवे के इस सिद्धान्त के पीछे न तो कोई वैज्ञानिक तर्क था, न तथ्य। यह सिर्फ सर्वेक्षणों पर आधारित निष्कर्ष था। फिर उनके इस थ्योरी से विज्ञानजगत में तहलका मच गया, कारण कि यह अपने प्रकार का एकदम नवीन प्रतिपादन था। इसकी सत्यता जाँचने के लिए विश्व भर में अनेक अध्ययन हुए, पर एकाध को छोड़कर परिणाम जन्म-क्रम सिद्धान्त’ के बिलकुल विपरीत गया अनेक वर्षों तक इस क्षेत्र में लगातार अध्ययन करने के उपरान्त स्वीडन के दो मूर्धन्य मनःशास्त्रियों सीसाइलआर्नेस्ट एवं जूलियससंगस्ट ने एक पुस्तक लिखी, नाम था-बर्थ आर्डर’। इसमें उन्होंने इस बात का स्पष्ट खण्डन किया कि जन्मक्रम का प्रतिभा से कोई संबंध है। उन दोनों ने सलोवे जैसे प्रतिष्ठित विज्ञानवेत्ता द्वारा इस प्रकार का अवैज्ञानिक कथन करने पर आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि केवल जन्म के आगे-पीछे होने मात्र से कोई प्रतिभावान बन जाए और दूसरा बालक प्रतिभाहीन बना रहे, यह बात गले नहीं उतरती। शरीरविज्ञान में ऐसा कोई सिद्धान्त भी नहीं, जिससे इसकी पुष्टि होती हो। इस प्रकार उक्त मत निरस्त हो गया।
यह संसार विशाल है। इसमें अध्ययन द्वारा ऐसे कुछ उदाहरण मिलें भी कि बाद की संतति मेधावान् होती हैं, तो इसे किसी निश्चित नियम के अधीन नहीं रखा जा सकता, केवल संयोग ही कहा जा सकता है और न उसके आधार पर किसी मत की स्थापना की जा सकती है, क्योंकि खोजबीन से इसके विपरीत प्रमाण भी इकट्ठे किये जा सकते हैं। तब दूसरा पक्ष इससे ठीक उल्टी स्थापना करना चाहेगा। इससे विज्ञान सुस्थापित शास्त्र न रहकर उपहास बन जाएगा, कारण कि केवल सर्वेक्षणों पर आधारित ज्ञान को विज्ञान नहीं कहते हैं, उसके पीछे ठोस आधार और कारण होने चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों होता है? जब तक इस ‘क्यों’ का उत्तर नहीं मिलता, प्रतिपादन को वैज्ञानिक व्याख्या के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता।
पिछले दिनों विज्ञान क्षेत्र में इसी तरह का एक अन्य ऊटपटाँग दावा किया गया। प्रतिपादनकर्ता थे- डॉ. रैण्डी अनमिल। यह कोई सामान्य पढ़े-लिखे साधारण व्यक्ति नहीं, वरन् न्यू मैक्सिको विश्वविद्यालय में प्राणिशास्त्र के प्राध्यापक हैं। उनके अध्ययन-निष्कर्ष के अनुसार शरीर-सौष्ठव का बुद्धि से गहरा संबंध है। वे कहते हैं कि जो शरीर गठन और रूप-लावण्य की दृष्टि से जितना सुन्दर और आकर्षक होगा, उसकी बुद्धि उतनी ही कुशाग्र होगी। उक्त निष्कर्ष पर पहुँचने से पूर्व उनने कुछ लोगों की शरीर-संगठनों का अध्ययन किया। वे सभी उनकी अवधारणा में खरे उतरे। संयोग से उनने जिनका-जिनका अध्ययन किया, वे सब औसत बुद्धि से कुछ ऊँचे दर्जे के थे। बस, इसी आधार पर उन्होंने यह प्रतिपादन कर डाला कि संसार के सभी सौंदर्यसम्पन्न बुद्धिमान होते हैं। यदि वास्तव में ऐसी बात होती, तो दुनिया की समस्त सुन्दरियाँ मेधावान् होतीं, पर ढूँढ़ने पर अगणित ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे, जो उनके इस मत का खण्डन करते हैं। यहाँ ऐसी रूपसियों की कमी नहीं, जिनमें साधारण स्तर की भी बुद्धि का अभाव होता है और वे मन्दमति मानी जाती है। इसके विपरीत ऐसे लूले-लँगड़े तथा काने-कूबड़े भी देखे जाते हैं, जो मेधावान् ही नहीं, प्रज्ञावान भी होते हैं। विरजानन्द, सूरदास, अष्टावक्र आदि ऐसे ही नाम हैं। इस प्रकार थॉर्नबिल की प्रस्तुत विचारधारा अमान्य हो जाती है। उनका यह मत लंदन के ‘सण्डे टाइम्स’ नामक प्रतिष्ठित पत्र में कुछ दिन पूर्व प्रकाशित हुआ था।
बात यही समाप्त नहीं होती। अब विज्ञानवेत्ता लड़की-लड़के के जन्म के संबंध में भी ऐसे ही प्रतिगामी विचार प्रकट कर रहे हैं। ‘न्यू साइंटिस्ट’ नामक लोकप्रिय विज्ञान पत्रिका में विगत दिनों एक खबर छपी कि जिन लड़कियों को प्रथम संतान के रूप में बेटा चाहिए, उन्हें अपने से कई वर्ष बड़े पुरुष से शादी करनी चाहिए और जो पहली संतान बेटी चाहती हों, उनको अपने से कम उम्र या हमउम्र मर्द से विवाह करना चाहिए।
यह निष्कर्ष है इंग्लैण्ड के लीवरपूल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का। मूर्धन्य विज्ञानी जे. टी. मैनिंग और उनके सहयोगियों ने करीब ३.. दम्पत्तियों का अध्ययन किया, जिनमें दोनों प्रकार के जोड़े मौजूद थे, वैसे भी, जिनकी पत्नियाँ पति से उम्र में छोटी थीं और वैसे भी, जो या तो अपने पति से बड़ी थीं या समवयस्क। उनका कहना है कि इस सर्वेक्षण का जो परिणाम सामने आया, उसी आधार पर उपर्युक्त दावा किया गया हैं।
सचाई तो यह है कि इसे तथ्य नहीं, मात्र संयोग कहना चाहिए। यदि सैकड़े में पाँच-दस उदाहरण ऐसे मिल भी जाएँ, तो इतने से ही कोई स्थिर सिद्धान्त तो नहीं बन जाता। फिर भारत में तो जोड़ी बिठाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि वर, वधू से दो-चार साल बड़ा हो। इतने पर भी सहस्रों लोग ऐसे मिल जाएँगे, जिनके प्रथम संतति कन्या हुई हो। इतना ही नहीं, उनमें अनेक ऐसे लोग भी सम्मिलित होते हैं, जिनकी पहली ही नहीं, बाद की भी सारी संतानें लड़की होती हैं, आखिर क्यों? जबकि उम्र में आवश्यक अन्तर बना रहता है। इस सवाल का जवाब वैज्ञानिकों के पास नहीं है, न ही वे अपने उपर्युक्त प्रतिपादन के समर्थन में कोई विज्ञानसम्मत तथ्य प्रस्तुत कर सके कि आयु संबंधी कारण रज और वीर्य में आखिर किस स्तर का परिवर्तन क्यों और कैसे कर देता है कि उससे प्रथम संतान बालक के रूप में ही सामने आए? इसे अन्धमतवाद ही कहना चाहिए।
अंधमान्यताएँ दो स्तरों पर देखी जाती हैं- एक वह जो ग्रामीण स्तर पर अनपढ़ों आघ्र अज्ञों में दृष्टिगोचर होती हैं तथा दूसरी वे, जो तथाकथित बुद्धिजीवियों में दिखलाई पड़ती हैं। प्रथम स्थिति को तो सामान्य और स्वाभाविक माना भी जा सकता है, पर दूसरी अवस्था तो एकदम असहनीय है। इसे बौद्धिक रूढ़िवाद ही कहना पड़ेगा। मनुष्य विवेकशील होकर भी अविवेकियों की तरह आस्थाएँ और धारणाएँ अपनाये तो इसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है? विशेषकर आज जैसे प्रगतिशील और वैज्ञानिक युग में, जब मतमतान्तरों के प्रत्येक पहलू को विज्ञान की दृष्टि से जाँचा-परखा जाता हो और यह सुनिश्चित किया जाता हो कि वे कितने युगानुकूल हैं। यह दशा तब और असत्य हो जाती है, जब प्रतिपादनकर्ता स्वयं विज्ञान का प्रबल पक्षधर और प्रवक्ता हो।
अवैज्ञानिक कथनों से विज्ञान की विश्वसनीयता पर अंगुली उठती और संदेह पैदा होता है, लोग यह सोचने पर विवश होते हैं कि कहीं यह वैज्ञानिक अन्धवाद तो नहीं? लोकमानस लम्बे समय तक सामाजिक रूढ़ियों से ग्रसित रहा। अब यदि उसका स्वरूप और प्रतिपादक परिवर्तित हो पाए, तो इससे कोई विशेष अन्तर नहीं पड़ता। असत्य विद्वान् बोले या मूर्ख- इससे क्या फर्क पड़ने वाला है? मिथ्या तो सदा मिथ्या ही रहेगी। आज हम ऐसी ही वैज्ञानिक रूढ़ियों और भ्रान्तियों से घिरते चले जा रहे हैं। कहीं उसका यह रूढ़िवाद हमें युगों पीछे न धकेल दे, इससे हर एक को सचेत रहना चाहिए।
संयोग एक अद्भुत शब्द है, जिसमें विलक्षण भाव छुपे हुए हैं। जीवन में ऐसे संयोग अकस्मात् एवं अनायास आ जाते हैं कि उनके प्रभाव से समूची दिशाधारा ही बदल जाती है, परिस्थितियों में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाता है। कई बार संयोग कुछ इस तरह आ खड़े होते हैं कि उनकी परिणति आश्चर्यजनक एवं अद्भुत आविष्कार के रूप में होती है। विज्ञान जगत में भी ऐसे अनेकों घटनाक्रम सामने आए हैं जब संयोगों ने अद्भुत सृष्टि की है। वैज्ञानिकों का संसार आज अपने जिन आविष्कारों पर गर्व से फूला नहीं समाता, उनमें से अनेकों ऐसे हैं, जो सतत् किए जाने वाले शोध-अनुसंधान की देन न होकर संयोग का उपहार है।
पेनीसिलीन के जन्म की कहानी कुछ ऐसी ही है। फ्लेमिंग १९२८ में किसी विशेष अनुसंधान के लिए स्टेफिलोकोकाई नाम के जीवाणुओं की बस्तियाँ ऐसी तश्तरियों में बना रहे थे, जिनमें पोषक ऐगार नाम का जिलेटिन जैसा एक पदार्थ था। सामान्यतया ये तश्तरियाँ ढ़की रहती थीं। एक दिन प्रयोगशाला की खिड़कियाँ खुली रह गयीं, साथ ही एक तश्तरी का ढक्कन भी खुला रह गया। धूल के साथ वनस्पति प्रकृति का एक कण उड़कर इसके भीतर आ गया। कुछ दिनों के बाद फ्लेमिंग ने देखा कि एक तश्तरी में नीला-हरा फफूँद उग रहा है। सामान्यतया फफूँद लगे पदार्थ को खराब मानकर फेंक दिया जाता है। परन्तु फ्लेमिंग ने किसी कारणवश ऐसा नहीं किया। संयोग से उन्हें इस पर कुछ अधिक जानने का विचार मन में आया। वे यह देखकर आश्चर्यचकित थे कि फफूँद के चारों ओर का क्षेत्र स्वच्छ था और स्टेफिलोकोकाई बस्तियों की तरह पीला नहीं था। फफूँद का कोई विशेष गुण जीवाणुओं को विघटित करता जा रहा था और फफूँद के चारों ओर काफी दूर तक स्टेफिलोकोकाई की बस्तियाँ नष्ट हो रही थीं। उक्त फफूँद- फफूँदों के पेनी-सिलियम के परिवार की थी। यह फफूँद रस ही पेनीसिलीन का आविष्कार था, जिसके गुण व चमत्कारिक रोग-निवारक क्षमता से प्रायः सभी परिचित हैं।
एक्स-रे किरणों का आविष्कार भी एक संयोग के अंतर्गत हुआ। राण्टजन क्रूक्स नली के साथ प्रयोग कर रहे थे। क्रूक्स नली के दोनों सिरों पर दो धातु की पट्टिकाएँ एक ऋणाग्र और दूसरी धनाग्र लगी होती है, जिसका संबंध एक विद्युत परिपथ से होता है। इसमें विद्युत प्रवाहित करने पर नली में विभिन्न प्रकार की दीप्तियाँ भर जाती थीं। चूँकि दीप्तियाँ ऋणाग्र से आती प्रतीत होती थीं इसलिए उन्हें कैथोड किरणें कहा जाता था।
एक महत्वपूर्ण प्रयोग में रान्टजन ने नली पर काला गत्ता लपेट दिया, ताकि किरणें बगल से निकल न सकें। फिर उन्होंने प्रयोगशाला की बत्तियों को बुझाया और गत्ते के आवरण की जाँच के लिए विद्युत को प्रवाहित किया। ऋणाग्र किरणें एक अंश से दूर नहीं जा सकती थीं, अतः किसी किरण के दिखने की आशा रान्टजन को नहीं थी। लेकिन वे आश्चर्य से भर गए जब उन्होंने यह देखा कि नली से लगभग एक गज की दूरी पर स्थित उनकी मेज पर हरे रंग की तरंगें झिलमिला रही हैं। रान्टजन ने पर्दे को दीप्त करने वाली चीज के बारे में अधिक जानकारी के लिए कार्य प्रारम्भ किया। पर्दे और नली के बीच उन्होंने भिन्न-भिन्न पदार्थ रखे। लकड़ी और एल्युमिनियम से चमक कुछ धीमी पड़ गयी, परन्तु सीसे के टुकड़े ने चमक बिलकुल बन्द कर दी। एक दिन उन्होंने अनायास ही अपने हाथ को नली और प्रदीप्त पर्दे के बीच रख दिया। उन्हें पर्दे पर विचित्र छाया दिखी। ध्यान से देखने पर हाथ का नमूना उभरा। जिस किरण का आविष्कार हुआ था, वह हड्डियों एवं माँस की क्रमशः गहरी व हल्की छाया डाल रही थी। उन्होंने संयोग से हुए इस आविष्कार का नाम एक्स-किरणें रखा।
इसी तरह वस्त्र उद्योग में क्रान्ति लाने वाले कृत्रिम रंग की खोज भी अनायास संयोग से ही हुई। १८५६ से पहले वस्त्रों की रँगाई में पौधों और अन्य प्राकृतिक पदार्थों से प्राप्त रंगों को प्रयोग में लाया जाता था। उन दिनों ब्रिटेन के रॉयल कॉलेज और केमिस्ट्री का १८ वर्षीय छात्र विलियम हेनरी वर्किन कोलतार से सिंथेटिक कुनैन बनाने की दिशा में प्रयोगरत था। इस प्रयोग के तहत उसे गाढ़े रंग का पदार्थ प्राप्त हुआ। कुनैन तो एक रंगहीन, रवेदार पदार्थ होता है, फिर यह कौन-सा अजीबो-गरीब रसायन उसे प्राप्त हो गया? वर्किन हैरान था। अनायास ही उसे इसके कपड़ों का अद्भुत तीव्रता से रँगने के प्रधान गुण का पता चला और इस गाढ़े रंग के पदार्थ से उसने बैंगनी रंग के रवे बनाने में सफलता प्राप्त की। यही ‘एनिलीन पर्पल’ नाम का प्रथम रासायनिक रंग था, जिससे कि वस्त्रों की रँगाई शुरू हुई।
डी. डी. टी. की खोज आस्ट्रियन रसायनशास्त्री आयेमा जैडलर द्वारा १९७४ में अनायास हुई थी। लेकिन उस समय इसकी ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया, क्योंकि इसका विशेष उपयोग समझ में नहीं आ रहा था। इसके कीटनाशक गुणों पर संयोग से स्विट्जरलैंड के वैज्ञानिक पाल मूलर का ध्यान गया। इसके बाद तो कुछ ही वर्षों में डाईक्लोरो फिनाइल ट्राईक्लोरो ईथेन (डी. डी. टी.) विश्व की सर्वाधिक प्रचलित कीटाणुनाशक दवा बन गयी।
ड्राईक्लीनिंग की खोज की कहानी भी एक संयोग से जुड़ी हुई है। पेरिस के जीन वेप्टिस जॉली द्वारा जल्दबाजी में कैम्फीन नाम का ईंधन कपड़े में गिर गया। इसे भय था कि वस्त्र बर्बाद हो जाएगा। लेकिन वह देखकर हैरान था कि कपड़ा एकदम साफ हो गया था। बाद में १८५५ में जॉली ने विश्व की प्रथम ड्राईक्लीनिंग कम्पनी की स्थापना की।
विद्युत करेंट की खोज भी एक ऐसी ही घटना का परिणाम है। इटली के वैज्ञानिक लूगी गाल्वनी १८ वीं सदी में अपनी वोलोग्वा स्थित प्रयोगशाला में शोधकार्य कर रहे थे। जब उन्होंने संयोग से एक स्टील की छुरी से एक मेढ़क के पैर को छुआ, जो एक जस्ते की प्लेट पर बैठा था, तो मेढक के पैर ने झटका मारा। गाल्वनी ने सोचा कि उसने पशु विद्युत खोज ली है। परन्तु बाद में देश के अन्य वैज्ञानिक काउन्ट वोल्टा ने सिद्ध किया कि विद्युत का उत्पादन दो धातुओं से हो रहा था और यहीं से बैटरी के सिद्धान्त का प्रतिपादन हुआ।
सन् १७९६ में जॉन नेपामक ने माँ के धुलाई घर की सूची को एक मोम की पेंसिल से एक चुने के पत्थर पर उतार दिया। संयोग से इस पर पानी गिर गया, परन्तु आश्चर्य यह हुआ कि मोम वाला भाग गीला नहीं हुआ। इस पर उसे बोध हुआ कि इसी सिद्धान्त के आधार पर स्याही को कागज या कपड़े पर चयनात्मक रीति से स्थानान्तरित किया जा सकता है। यही प्रक्रिया विकसित होकर लिथोग्राफिक प्रिंटिंग में बदल गयी। प्रिंटिंग इतिहास में यह एक बड़ी घटना थी।
ट्रकों और भारी वाहनों में लगने वाले टायर का आविष्कार भी चार्ल्स गुड ईयर द्वारा यूँ ही संयोगवश ही हुआ था। गुड ईयर बहुत सालों से टायर के लिए प्रयुक्त होने वाली रबड़ की खोज की दिशा में प्रयत्नशील थे। लेकिन उन्हें बार-बार असफलता मिल रही थी। अन्ततः कई वर्षों के अथक श्रम के बाद रबड़ बनाने में सफलता तो मिली, किन्तु यह बहुत ही निम्न कोटी की रबड़ थी, इसमें कई कमियाँ थीं, गर्मी में यह गलकर नरम और चिपचिपा हो जाता था और सर्दी में सख्त एवं भंगुर। रबड़ की इन कमियों को दूर करने के लिए गुड ईयर दिन-रात एक कर रहा था।
१८३९ की एक रात को गुड ईयर ने रबड़ के घोल को गन्धक के साथ मिलाया। थके और उनींदे होने के कारण जल्दी में ही थोड़ी देर पहले बुझाए स्टोव के ऊपर रबड़ और गन्धक के मिश्रण को रखकर वह अपने घर सोने चला गया। प्रातः प्रयोगशाला में आकर जब उसने मिश्रण को देखा तो उसके पाँवों के नीचे धरती खिसक गयी। मिश्रण ने एक ठोस पिण्ड का रूप धारण कर लिया था। गुड ईयर को इससे बहुत सदमा पहुँचा। अपनी सारी मेहनत पर उसे पानी फिरता नजर आ रहा था। हताशा और क्रोध में भरकर उसने उस पिण्ड को उठाकर जमीन पर दे पटका। लेकिन यह क्या? पिण्ड जमीन से टकराकर ऊपर को उछला। खुशी के मारे गुड ईयर ने वहीं फर्श पर नाचना-कूदना शुरू कर दिया। उसके इतने वर्षों की मेहनत रंग लायी थी, क्योंकि उक्त पिण्ड टायरों में लगने वाला उन्नत किस्म के रबड़ में बदल चुका था।
ऐसी ही एक घटना १९१९ की है। डेनमार्क के प्रख्यात भौतिक विज्ञानी एच. सी. ओरस्टेड अपनी भौतिकी की कक्षा में छात्रों को विद्युतधारा सम्बन्धी कुछ प्रयोग करके दिखा रहे थे। धातु की एक तार में ओरस्टेड ने विद्युतधारा प्रवाहित की। कुछ दूरी पर ही प्रयोगशाला की मेज पर एक दिशासूचक यंत्र पड़ा था। धारा के तार में बहते ही कम्पास की सुई अचानक हिल उठी और इसके साथ ही ओरस्टेड के मस्तिष्कीय तन्तु भी झनझना उठे। संयोग से घटी इस घटना के साथ ही ओरस्टेड के मस्तिष्क में एक वैज्ञानिक सिद्धान्त का जन्म हुआ। धारा के चुम्बकीय प्रभाव के इस सिद्धान्त का भौतिक विज्ञान में बहुत महत्व है।
इसी तरह माइकल फैराडे भी कुछ प्रयोग कर रहे थे। ओरस्टेड विद्युत धारा प्रवाहित कर चुम्बकत्व का निर्माण करने में सफल हो चुके थे। लेकिन फैराडे इसके विपरीत चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा विद्युतधारा के निर्माण की सम्भावना को लेकर प्रयोग कर रहे थे। एक खोखले विद्युत कुचालक से बने बेलन के चारों ओर फैराडे ने एक गैल्वेनोमीटर को जोड़ा। फिर एक छड़ चुम्बक को परिपथ से कुछ दूरी पर रखकर फैराडे यह देखने का प्रयास करने लगे कि गैल्वेनोमीटर की सुई में कोई हलचल होती है या नहीं। मगर फैराडे को निराशा ही हाथ लगी। खीज़ से भरकर फैराडे ने चुम्बक को बेलन की तरफ जोर से उछाल दिया और तभी चमत्कार हो गया। गैल्वेनोमीटर की सुई अचानक हरकत कर उठी। इसी तरह विद्युत चुम्बकीय प्रेषण के सिद्धान्त की खोज हुई।
ट्रांसफर प्रिंटिंग की खोज भी कुछ इसी भाँति हुई है। लीवरपूल का नक्काश जॉन सेडलर खराब नक्काशियों को उसी अवस्था में अपने बच्चों को दे देता, जबकि कागज स्याही से अभी गीला ही होता था। बच्चे इस छाप को कागज से टूटे हुए मिट्टी के बर्तनों में हस्तांतरित कर मनबहलाव करते थे। संयोग से सेडलर की नजर बच्चों के इस काम पर गयी और उसने बहुत सारे प्रयोग किए। अन्ततः प्रिंटिंग को मिट्टी के बर्तनों में स्थानान्तरण की तकनीक को पूर्णता तक अंजाम दिया, जिसने मिट्टी के बर्तनों के डिजाइन में क्रान्ति ला दी।
फास्फोरस की खोज भी एक संयोगवश ही हुई। उन दिनों किमीयागर वास्तव में पारस पत्थर की खोज में थे, जिसके स्पर्श मात्र से ही लोहा सोना बन जाय। जर्मनी का एक व्यापारी हैंनिंगब्रॉड एक ऐसी चमत्कारी वस्तु की खोज में था, जो उसे रातोंरात अमीर बना दे। कई रसायनों को मिलाकर तरह-तरह के घोल उसने बनाए। इन्हीं प्रयोगों के तहत अनायास ही उसे एक बर्फ की तरह सफेद पदार्थ बनाने में सफलता मिली, जो तेजी से जलने वाला था और अंधेरे में चमकता था। यही फास्फोरस था।
अलबर्टहॉफमैन रसायनशास्त्र के क्षेत्र का एक जाना-पहचाना नाम है। संयोगवश हुए एक आविष्कार से ही स्वीडन के इस रसायनविद् को इतनी प्रसिद्धि मिली। १९३३ की गर्मियों का दिन था। हॉफमैन अपनी प्रयोगशाला में शोधकार्य में व्यस्त थे। एक तो भयंकर गर्मी और ऊपर से घोर परिश्रम। उसके माथे एवं चेहरे पर पसीना छलछला रहा था। जल्दी में हाथ से ही वह पसीने को बीच-बीच में पोंछ लेता। ऐसे में अनजाने में ही जिस रसायन के साथ हॉफमैन प्रयोगरत था, उसके कुछ रवे उसके होठों से चिपक गए। थकावट से चूर हॉफमैन थोड़ा विश्राम करने के लिए प्रयोगशाला में ही लगे अपने बिस्तर पर जा लेटे। लेटते ही उन्हें गहरी नींद आ गयी। नींद में अद्भुत एवं रंगीन किस्म के सपने कल्पना की दुनिया में हॉफमैन को सैर करा रहे थे। यह एल. एल. डी. का आविष्कार था। जो अत्यधिक नशीला पदार्थ होने के कारण कई जीवनरक्षक अमूल्य औषधियों में भी प्रयोग किया जाता है।
कई बार अनुसंधान-कार्य में अत्यधिक व्यस्त होने के कारण वैज्ञानिक लोग हाथ तक धोना भूल जाते हैं। ऐसा ही एक संयोग एक आविष्कार का कारण बना। फालबर्ग नाम का एक युवा रसायनविज्ञानी जॉन हॉकिन्स विश्वविद्यालय में कोलतार से निकले टॉलुइन नामक कार्बनिक यौगिक पर परीक्षण कर रहा था। लेकिन बार-बार प्रयत्न करने पर भी उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही थी। एक दिन प्रयोग करते-करते थकान और निराशा में भरकर वह प्रयोगशाला छोड़कर घर लौट आया। उसने अपनी पत्नी को खाना लाने के लिए कहा। पत्नी खाना लाई तो भूख से व्याकुल फालबर्ग ने बिना हाथ धोए ही खाना शुरू कर दिया। लेकिन यह क्या? फालबर्ग जिस भी चीज को मुँह में डालता, वही असाधारण रूप से मीठी लगती। उसे वैसे ही मीठी चीजों से चिढ़ थी। वह अपनी पत्नी पर बहुत नाराज हुआ। लेकिन उसकी पत्नी ने कसम खाकर कहा कि उसने भोजन में मीठा बिलकुल नहीं डाला। फालबर्ग सोच में पड़ गया। अचानक कोई विचार आने पर उसने अपनी उँगली चाटकर देखी। उँगली में उसे वही असाधारण मीठा स्वाद लगा। कुछ सोचकर वह उसी क्षण उल्टे पाँव प्रयोगशाला की ओर दौड़ा। प्रयोगशाला में रखे सभी रासायनिक पदार्थों का उसने बारी-बारी से निरीक्षण किया और अंत में उसे चीनी से भी ज्यादा मिठास का स्वाद उसे मिला। यही सैकरीन था, जो संयोग से फालबर्ग की खोज का विषय था।
नाइट्रोसैलुलोज नामक विस्फोटक पदार्थ की खोज भी एक संयोग के गर्म से ही हुई। घटना १९४५ की है। जर्मनी का रसायनविद् सी. एफ. सनवेइन अम्लों के साथ विभिन्न परीक्षण कर रहा था। अधिकांश समय सनवेइन घर पर ही काम करता था। उसकी पत्नी इस आदत से परेशान थी, क्योंकि वह उसकी रसोई को भी नहीं बख्शता था। वक्त-बेवक्त वहाँ भी घुसकर अपने प्रयोग शुरू कर देता। इस पर मजबूर होकर पत्नी ने सनवेइन के रसोई में घुसने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। लेकिन आदत से मजबूर सनवेइन मानने वाला कहाँ था। पत्नी के हाट-बाज़ार जाने पर मौका तलाश कर रसोई में घुस ही जाता।
एक दिन इसी तरह अपनी पत्नी की अनुपस्थिति में रसोईघर में घुसकर वह अपने प्रयोग-परीक्षण कर रहा था। काम के जल्दी-जल्दी निपटाने की हड़बड़ाहट में रसोई के खूँटे से टँगे पत्नी के गाउन के ऊपर रसायन की कुछ बूँदें जा गिरीं। यह देखकर सनवेइन घबरा गया व पास में ही जल रहे स्टोव की आँच में गाउन सुखाने लगा। गाउन तो खैर सूख गया, लेकिन उसके साथ-साथ गाउन के उस हिस्से का नामोनिशान मिट गया, जिस पर रसायन गिरा था। यह उसकी वैज्ञानिक बुद्धि के लिए सोच का विषय था। विचार करने पर उसके मस्तिष्क में वह रासायनिक क्रिया स्पष्ट हो गयी, जिसके तहत इस गाउन का हिस्सा गायब हो गया था। गाउन के सेलुलोज के साथ इस रासायनिक द्रव्य (नाइट्रिक एसिड) ने क्रिया कर नाइट्रोज सेलुलोज नामक एक विस्फोटक पदार्थ को जन्म दिया था। उस समय तक गनपाउडर नामक विस्फोटक का ही उपयोग किया जाता है। इसके बाद नाइट्रोसेलुलोज को एक विस्फोटक के रूप में उपयोग किया जाने लगा।
च्विंगम की खोज भी ऐसे ही संयोग से जुड़ी है। १९७. के पूर्वार्ध में अमेरिका का थामस व उसका स्कूली छात्र होरेतियो मेक्सिकन जंगल के चिकलवृक्ष के सूखे रस पर प्रयोग कर रहे थे, उद्देश्य था रबड़ का निर्माण। किन्तु जब वे दीर्घकालीन प्रयास के बाद भी असफल रहे तो एक दिन थके-हारे आलस में चिकल के टुकड़े को चबाने लगे। चबाते-चबाते वे इसके अद्भुत गुण से परिचित हुए। शीघ्र ही उन्होंने इससे चबाए जाने वाले च्विंगम का निर्माण किया। पहले अमेरिका में कई तरह के वृक्षों की गोंद व सुगंधित पैरािन मोम का उपयोग होता था। किन्तु २. वीं सदी के मध्य से चिकल गम ने इनका स्थान ले लिया।
संयोगवश हुई खोज का ही एक और उदाहरण है नॉनस्टिक कुकवेयर। इन बर्तनों में पकाने पर चीज उनके पेंदे से नहीं चिपकती। अमेरिकी कम्पनी ‘ह्यूपॉट से जुड़े रसायनज्ञ फ्लोरोकार्बन गैसों पर प्रयोग कर रहे थे। एक प्रयोग के दौरान प्लेंकेट को एक बेलननुमा उपकरण, जिसके अन्दर टेट्राफ्लोरो इथाइलीन गैस रखी थी उसमें एक मोम जैसे पदार्थ पाॅलीटेट्राफ्लोरो इथाइल निकला, यह टेपलाॅन नाम से जाना गया। जिसे न-चिपकने वाले बर्तनों को बनाने में प्रयुक्त किया जाता है।
संयोगों द्वारा की गयी आविष्कारों की अद्भुत सृष्टि की कथा रोचक होने के साथ यह भी बताती है कि संयोग का उपयोग भी वे कर पाते हैं, जिनके मन-मस्तिष्क जाग्रत होते हैं, जिनका पुरुषार्थ सक्रिय रहता है। अपने जीवन काल में यदि हम सतत्-सक्रिय सचेष्ट व जाग्रत रह सके, तो कोई-न-कोई संयोग आकर अवश्य ही हमारे अपने जीवन में भी अकल्पनीय उपलब्धि की सृष्टि कर सकता है।
मैं भी चलूँ, बादशाह सलामत अकबर से कुछ माँगू। अपनी तंगी दूर करूँ। सुना है कि वे हर एक फकीर की इज्जत करते हैं और भरपूर मदद करते हैं। जो भी उनके सामने हाथ फैलाता है, वह मुँह-माँगी मुराद पाता है, कभी खाली हाथ नहीं लौटता।
यह सोचकर बाबा फरीद शहंशाह अकबर से मिलने चल पड़े। उन्होंने अकबर की दरियादिली, सभी धर्मों के प्रति उसके आदर एवं गरीबों की मदद के अनेक किस्से सुने थे। अपने दीन-ए इलाही धर्म के कारण बादशाह अकबर फकीरों में भी बहुत लोकप्रिय था।
अनेक जरूरतमंद फकीर अपनी जरूरतों के लिए अकबर के पास बेझिझक पहुँच जाते और वहाँ से पूर्णतया सन्तुष्ट होकर वापस आते थे। इन्हीं फकीरों से बादशाह की दानिशमन्दी और दरियादिली की प्रशंसा सुनकर शेखबाबा फरीद ने भी सोचा, चलो मैं भी बादशाह से कुछ माँग लूँ।
शेखफरीद जिस समय बादशाह के पास पहुँचे, उस समय शहंशाह अकबर खुदा की इबादत कर रहे थे। वे ध्यानमग्न थे। आँखें मूँद कुछ सोच रहे थे। बाबा शेख फरीद इंतजार करते हुए दूर से ही अकबर की इबादत पर नजर लगाए रहे।
इबादत कर लेने के बाद जब अकबर अपने आसन पर से उठे, तो फरीद ने देखा कि वह हाथ फैलाकर अल्लाह से कुछ माँग रहे हैं, ऐ मेरे खुदा! ऐ परवर दिगार! ऐ मेरे मौला। मुझ पर रहम कर! ऐ दो जहाँ के मालिक! मुगल सल्तनत को गाँधार से लेकर दक्षिण तक सलामत रख। इसे और भी अधिक बढ़ा मेरी ताजपोशी महफूज रहे। मेरी झोली सदा भरी रहे। धन-संपत्ति कभी कम न हो। अकबर को हाथ ऊपर फैलाए परमात्मा से इस प्रकार की याचना करते देखकर शेखफरीद मुड़कर वापस जाने लगा। बादशाह अकबर उनकी बड़ी इज्जत करते थे। वे बड़े ही चिंतनशील एवं पहुँचे फकीर थे। ऐसे फकीर को अपने महल आया हुआ देखकर वे अपना अहोभाग्य समझ रहे थे। चुपचाप यों ही बिना कुछ बोले जाते देख उन्हें बड़ा दुःख हुआ। अकबर ने अत्यन्त विनय पूर्वक उनसे निवेदन किया।
हुजूर! आप यों ही चुपचाप क्यों चले जा रहे हैं? इबादत में लगे रहने की वजह से देर हो गयी। माफी चाहता हूँ। बन्दा अब खिदमत के लिए हाजिर है। हुक्म कीजिए।
पर शेख फरीद चुपचाप कुछ सोच रहे थे। मानो वे किसी अन्तर्द्वन्द्व के समाधान हेतु बड़ी गम्भीरता से आत्म-मंथन कर रहे हों। उनके मन में याचक और याचना में संघर्ष चल रहा था। आखिर किससे मदद माँगी जाए, किससे नहीं।
पूरे आदर सहित बादशाह ने फिर दोहराया-बन्दे को खिदमत का एक मौका जरूर दीजिए। आपका यहाँ पधारना मेरे लिए बड़े गौरव की बात है।
बादशाह की इन बातों को सुनकर भी बाबा चुप ही रहे। अब बादशाह ने यह सोचा कि ये शायद कम सुनते हों। इसलिए पुनः कुछ जोर देकर बोले- आपने मुझसे खिदमत के लिए कुछ फरमाया नहीं बाबा! क्या कोई गुनाह हो गया है मुझसे! गुस्ताख़ी माफ करें, कुछ तो माँगें?
बाबा जाते-जाते कुछ रुके। एक हल्की-सी मुसकराहट उनके चेहरे पर दिखाई दी।
अब बाबा कुछ सकुचाते हुए बोले- बादशाह सलामत मैं तो खुद आपसे कुछ माँगने ही आया था, पर आपको स्वयं माँगते देखकर मेरी अन्दर की आँखें खुल गयीं।
मैं कुछ समझा नहीं। बन्दा परवर कुछ साफतौर पर कहें।
आपको हाथ फैलाकर माँगते देखकर खुदा ने मेरे हृदय की आँखें खोल दी हैं।
क्या मतलब है?
आपको हाथ फैलाए देखकर मैं यह जान गया हूँ कि सारे जहाँ का मालिक तो वह खुदा है, जिससे आप भी हाथ फैलाकर कुछ माँग रहे थे?
अकबर के अंतःकरण की हिलोरों को भाँपकर शेखफरीद कहने लगे शहंशाह अकबर! मैं यह महसूस करता हूँ कि मैं वह बदकिस्मत फकीर हूँ, जो एक मंगते के आगे हाथ फैलाने आया हूँ। लानत है मुझ जैसे मंगते पर। मैं सोचता हूँ कि जिस इन्सान के पास खुद ही नहीं है, वह भला मुझे क्या देगा? कैसे वह अपने को सत्ता-धन-संपत्ति एवं रुतबे से अलग कर सकेगा। मनुष्य की अन्दरूनी गरीबी का ख्याल कर मैंने आपसे कुछ माँगना उचित नहीं समझा। धन जरूरी है, पर उसका आगमन ईमानदारी, सन्तोष और अपने बाजुओं की मेहनत पर टिका होना चाहिए। तभी तनाव कम होगा और देने वाले तथा लेने वाले को शान्ति मिलेगी, सुकून मिलेगा।
बादशाह अकबर! हिंसा, अन्याय, दिखावा, क्रोध और लालच से आया हुआ पैसा न तुम्हें शान्ति देगा, न मुझे ही और न ही तुम्हारी आगे आने वाली पीढ़ियों को ही ताकत दे सकेगा। देने वाला तो बस एक खुदा ही है। उसी से कुछ माँगना उचित रहेगा।
बाबा फरीद बिना कुछ माँगे ही वापस चले गए। शहंशाह अकबर का गर्व धूलि-धूसरित हो रहा था।
तंत्रिकाविज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण शोधों ने यह प्रमाणित कर दिया है कि मस्तिष्क की दो स्तर की भूमिकाएँ हैं- एक वह, जो दिव्यज्ञान तथा अनुभूतियों को जगाने-उभारने से संबंधित है। इसे उसका ‘परा’ पक्ष कह सकते हैं। दूसरा पहलू ‘अपरा’ के नाम से जाना जाता है। इसमें भौतिक स्तर की जानकारियाँ, बुद्धि, स्मृति तर्क, विचार आदि सम्मिलित हैं। अध्यात्म विज्ञान बहुत पहले से इस तथ्य को स्वीकारता रहा है। अब पदार्थ विज्ञान भी उसी निष्कर्ष के निकट पहुँचता जा रहा है।
सर्वविदित है कि मस्तिष्क के, दायें-बायें दो हिस्से-दो गोलार्ध हैं। उसका दांया भाग शरीर के बायें हिस्से को नियंत्रित करता है, जबकि बायाँ खण्ड काया के दाहिने पार्श्व को। अनुसंधानों से यह ज्ञात हुआ है कि मस्तिष्क के दोनों हिस्से स्वतंत्र रूप से चेतना के दो विपरीत, किन्तु एक-दूसरे के पूरक आयामों का संचालन करते हैं। कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के तंत्रिकाशास्त्री रोजरस्पेरी एवं सहयोगियों ने जब मिर्गी के कुछ गंभीर मामलों के अन्तिम उपचार के रूप में अपने रोगियों के मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों के सम्बन्ध-सूत्र को विच्छेद कर दिया, तो न सिर्फ रोगी ठीक हुए, वरन् कई चौंकाने वाले तथ्य प्रकाश में आये। इससे मस्तिष्क के कार्य करने संबंधी अनेक महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलीं तथा योग-विज्ञान के दृष्टिकोण की पुष्टि हुई। अध्यात्म-विज्ञान एवं अन्वेषणों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मनुष्य की सक्रियता के दो भिन्न माध्यम हैं। मस्तिष्क के परिपथ इड़ा और पिंगला, चेतना या ज्ञान तथा क्रिया अथवा शारीरिक शक्ति पर आधारित है एवं इनका तंत्रिकातंत्र के सभी तीन प्रमुख स्तरों से संबंध है। केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र इन सबमें प्रमुख है। इसमें मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु सम्मिलित है।
साधना-विज्ञान के आचार्यों का मत है कि नाड़ियों एवं चक्रों का अस्तित्व केन्द्रीय स्नायु संस्थान के अंतर्गत मेरु- रज्जु एवं मस्तिष्क में है। यदि विभिन्न साधना-विधानों द्वारा इनकी शुद्धि करके एवं शक्तिशाली बनाकर इन्हें सही रूप से परस्पर जोड़ा जा सके, तो शरीर एवं मन दोनों का कायाकल्प संभव है। शरीर एवं मन की जटिल क्रिया -प्रणाली इड़ा, पिंगला एवं सुषुम्ना -इन तीन आधारभूत शक्तियों के बल पर क्रियाशील रहती है। यह जानने के बाद अब यह समझना सरल होगा कि अधिकांश साधना- उपचारों में इड़ा, पिंगला के प्रवाह में संतुलन एवं इनके उतार-चढ़ावों के प्रति सजगता-वृद्धि को इतना महत्व क्यों दिया जाता है। साधनाविज्ञानियों के अनुसार शारीरिक स्तर पर मस्तिष्क का दांया हिस्सा इड़ा नाड़ी तथा बायाँ हिस्सा पिंगला नाड़ी से सम्बद्ध है। स्पेरी, माइर्स, गजेनिगा, बोगेन प्रभृति शोधकर्ताओं ने लम्बे काल के अध्ययन-अनुसंधान के उपरान्त यह पता लगाया है कि मस्तिष्क का बायाँ हिस्सा बुद्धि विचार, तर्क, वाणीं, विश्लेषण आदि के लिए जिम्मेदार है, जबकि दायें भाग का संबंध ज्ञान, अनुभूति, पवित्रता, शान्ति जैसे तत्वों से है। योगशास्त्र के ज्ञाता भी पिंगला की प्रकृति स्थूल बुद्धिपरक एवं इड़ा की सूक्ष्मज्ञान और अनुभूतिपरक बताते हैं। इस दृष्टि से विचार करने पर विदित होता है कि ज्ञान और विज्ञान पक्ष अलग-अलग मार्गों से चलकर एक ही बिन्दु पर पहुँचते हैं।
डिपार्टमेण्ट ऑफ बिहेवियरल न्यूरोलॉजी, यूनिस केनेडी सेण्टर फॉर मेण्टल रिटार्डेशन, वाल्थाम, मेसाचुसेटस के न्यूरोबायोलॉजिस्ट तथा न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट मार्शल किंसबोर्न ने अपनी शोध (‘सैड हेमिस्फीयर, हैप्पी हेमिस्फीयर’ मई १९८१, साइकोलॉजी टुडे) से प्रमाणित किया है कि मस्तिष्क की भावनात्मक क्रियाशीलता के दो प्रमुख आधार हैं। यह आधार उनके अपने ही दो गोलार्ध है।
उक्त अनुसंधान से विदित हुआ है कि प्रसन्नता एवं सकारात्मक विचारों का संचालन बायें गोलार्ध से होता है। कई मौकों पर देखा गया है कि मस्तिष्क के दायें गोलार्ध के क्षतिग्रस्त हो जाने पर प्रायः रोगी मलिन व्यक्तित्व, असंतुलन, क्रोध, अपराधी- भाव एवं निराशा जैसी मनःस्थिति से ग्रसित हो जाता है। इसके विपरीत बायें गोलार्ध के क्षतिग्रस्त होने पर व्यक्ति प्रसन्न तथा मस्त दीखते हैं। सामान्य अवस्था में मस्तिष्क के गोलार्ध बारी-बारी से क्रियाशील रहते हैं, किन्तु चरम अवस्था में नहीं पहुँच पाते, जैसा कि मस्तिष्क के क्षतिग्रस्त होने पर होता है, पर फिर भी यदि हम संतुलित एवं स्वस्थ नहीं हैं, तो गोलार्ध के कार्यकाल परिवर्तन का प्रभाव दुःखद हो सकता है। किंसबोर्न का विचार है कि मस्तिष्क की ये दो वृत्तियाँ हमारी पसंद (पिंगला) एवं नापसंद (इड़ा) से संबंधित है। हमारी पसंद के कार्य बायें मस्तिष्क द्वारा सम्पन्न होते हैं। वह उन पर विचारता है, तदुपरान्त उस वस्तु अथवा स्थिति विशेष तक पहुँचने का प्रयत्न करता है। हमारे सक्रिय पक्ष अर्थात् बहिर्मुखी पिंगला नाड़ी के बारे में सामान्य धारणा यही है। जो परिस्थितियाँ हमें अच्छी नहीं लगती, उनसे हम बचना चाहते हैं। यह स्थिति हमारे लिए कहीं अधिक कठिन होती है, जिसे दिमाग के उस दायें खण्ड द्वारा सम्पादित किया जाता है। जिसका संबंध हमारी ग्रहणशीलता, अन्तर्मुखता तथा इड़ा से है।
मस्तिष्क की इन दोनों प्रणालियों में संतुलन आवश्यक होता है। यदि ऐसा न हुआ, तो व्यक्तित्व अनगढ़ और अस्त-व्यस्त हो जाएगा। योगमार्ग के मर्मज्ञों का मत है कि सर्वोच्च स्तर पर क्रियाशीलता सुषुम्ना के कार्यरत होने तथा मानव-तत्वों एवं क्षमताओं के अधिकतम विस्तार के लिए नाड़ियों में सामंजस्य नितान्त जरूरी है। दुर्भाग्यवश इस प्रकार के संतुलित व्यक्तित्वों की संख्या वर्तमान समय में एकदम न्यून है। अधिकांश लोग इड़ा के सूक्ष्म अन्तर्ज्ञान एवं अनुभव पक्ष की अपेक्षा पिंगला अर्थात् पूर्णतः बहिर्मुखी भौतिक एवं तकनीकी पक्ष की ही ओर आकर्षित रहते हैं। ऐसी विसंगतियों से सामान्य जीवन पर क्या असर पड़ता हैं, इसका वैज्ञानिक अध्ययन पिछले दिनों किया गया।
हार्वर्डगार्डनर एवं सहयोगियों ने ऐसे व्यक्तियों का अध्ययन किया, जिनका दांया मस्तिष्क (इड़ा पक्ष) गम्भीर रूप से क्षतिग्रस्त था। उनने देख कि ऐसे लोगों में आवश्यक औसत समझ भी नहीं थी। अर्थात् वे किसी यांत्रिक मस्तिष्क युक्त रोबोट की भाँति थे। अध्ययन के दौरान यह भी देखा गया कि दिमाग के दोनों गोलार्धों के सक्रिय रहने पर ही हम किसी वाक्य के भावार्थ को भली-भाँति समझ सकते है, किसी भावना को शब्द प्रदान कर सकते हैं अथवा आमोद-प्रमोद का वास्तविक आनन्द-लाभ ले सकते हैं।
एक उदाहरण द्वारा इसे और अच्छी तरह समझा जा सकता है। यदि कोई कहे कि उस पर आसमान टूटा पड़ा, तो ऐसा व्यक्ति; जिसका दाहिना भाग क्षतिग्रस्त हैं, वाक्य में निहित भाव को न समझकर शब्दार्थ में उलझ जाएगा और प्रश्न करेगा कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? कारण कि आसमान टूटने वाली वस्तु तो हैं नहीं। विशेषज्ञ बताते हैं कि यह स्थिति इसलिए उत्पन्न होती हैं, क्योंकि वे प्रत्यक्ष को तो देखते हैं, पर उसका विश्लेषण और व्याख्या नहीं कर पाते। स्पष्ट हैं- दांया मस्तिष्क, जिसे योगियों ने इड़ा अथवा ग्रहणशील मन कहाँ हैं, आपसी सम्बन्धों एवं सम्पूर्ण वस्तुस्थिति के मूल्याँकन तथा समझदारी के लिए जिम्मेदार हैं
यह दाहिने मस्तिष्क का सामान्य और लौकिक पक्ष हुआ। अनुसंधानों से इस तथ्य की भी पुष्टि हुई है कि यह भाग अन्तर्ज्ञान एवं आध्यात्मिक अनुभूतियों का भी केन्द्र हैं। पेन्सिल-वानिया मेडिकल स्कूल यूनिवर्सिटी के मनोचिकित्सा प्रभाग के प्राध्यापक इजिन डी. आकली एवं एम. ब्लैक (ब्रेन फ्लैश- द् फिजियोलॉजी ऑफ इन्सपीरेशन अगस्त १९८२. साइंस डायजेस्ट) के अनुसार क्षतिग्रस्त संबंधी शोध बताती हैं कि मस्तिष्क के इस हिस्से में चेतना को उच्चतर आयामों में ले जाने वाला क्षेत्र मौजूद हैं। अध्यात्म विज्ञान की भी ऐसी ही मान्यता हैं कि मस्तिष्क आत्मचेतना और परमात्मचेतना का समागम स्थल हैं। उन्होंने ईश्वर की अनुभूति व्यक्त करने वाली एक गणितीय व्याख्या दी है, जिसमें व्यक्ति संसार के साथ पूर्ण तादात्म्य का अनुभव करते हुए वास्तविकता को समझ सकता हैं। उसे प्रतीत होता है कि मानो यह मस्तिष्क के दायें सुप्त क्षेत्र ‘पैराइटल आक्सीपिटल’ का उत्पादन हो, जो किसी तरह मस्तिष्क के क्रिया-कलापों पर नियंत्रण करने लगता हैं। समय रुका हुआ प्रतीत होता है। एकत्व तथा अद्वैत की दिव्य अनुभूति होती हैं।
वैज्ञानिक द्वय कहते हैं कि चेतना की उच्च भूमिकाओं में पहुँचना मस्तिष्क की सुषुप्ति को हटाये-मिटाये बिना संभव नहीं। योगियों का भी ऐसा ही मत हैं। इसके लिए वे अचेतन का परिवर्धन-परिष्कार आवश्यक बताते और कहते हैं कि इस हेतु इड़ा-पिंगला अर्थात् मस्तिष्क के दोनों भागों पर नियमन-नियन्त्रण स्थापित करना पड़ेगा। योग-विज्ञान में इसके लिए ‘स्वर योग’ की एक सुनिश्चित प्रक्रिया है अर्थात् श्वसन क्रिया को नियंत्रित कर मस्तिष्क पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। अब इसकी पुष्टि पदार्थ ने भी कर दी हैं। वैज्ञानिक इसे स्वीकारने लगे हैं कि मस्तिष्क और साँस का परस्पर गहरा संबंध है।
डलहौजी यूनिवर्सिटी, नोवास्कोटिया के मनोवैज्ञानिक रेमण्डक्लीन एवं रोजेनआर्मिटेज द्वारा किये गये एक अध्ययन से पता चला है कि बायें तथा दायें मस्तिष्क के कार्यों में ९. से १.. मिनट के अन्दर परिवर्तन होते रहते हैं। जिन व्यक्तियों पर उक्त अध्ययन किया जा रहा था, वे ९. मिनट तक उन कार्यों को कुशलतापूर्वक करते देखे गये, जो दायें दिमाग से संबंधित थे और अगले ९. मिनट तक उन कार्यों को, जो बायें भाग से सम्बद्ध थे। इस अध्ययन की अनेक आवृत्तियों के पश्चात् वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ९. मिनट के इस चक्र का श्वसन से गहरा संबंध है।
शॉक इन्स्टीट्यूट फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज, अमेरिका के वैज्ञानिकों डेविड शनहाफ एवं खालसा ने अपने अध्ययनों में पाया है कि सामान्य श्वसन प्रक्रिया द्वारा भी आवश्यकतानुसार मस्तिष्क के गोलार्ध की क्रियाशीलता परिवर्तित की जा सकती है। वे कहते हैं कि जब हम किसी एक नासिकाछिद्र से साँस ले रहे होते हैं, तो उस समय उसके विपरीत भाग का गोलार्ध सक्रिय होता है। यह एक अतीव महत्वपूर्ण तथ्य है। यही कारण है कि साधना प्रतिक्रियाओं में प्राणायाम के दौरान बायीं नासिका से गहरी साँस लेने और दायीं से छोड़ने का विधान है। ऐसा करने से मस्तिष्क का दांया अथवा आध्यात्मिक भाग जाग्रत होने लगता है और इसके साथ ही बायें अथवा भौतिक जीवन से गहन संबंध रखने वाले मस्तिष्क खण्ड की सक्रियता मन्द पड़ने लगती है। इस प्रकार उक्त अध्ययन से प्राणायाम की उपादेयता और वैज्ञानिकता सिद्ध हो जाती है। इसके अतिरिक्त ई. ई. जी. द्वारा मस्तिष्क से उत्पन्न अल्फा, बीटा, थीटा, और डेल्टा तरंगों में से किसी की भी प्रमुखता की स्थिति में श्वसन एवं मस्तिष्क गोलार्धों के मध्य एक सुनिश्चित संबंध की सूचना मिलती है।
साधना मार्ग के पथिकों के अनुसार अस्वस्थता की दशा में गोलार्धों की सक्रियता में व्यक्तिक्रम पैदा हो जाता है और उसकी लयात्मकता समाप्त हो जाती है। उनके अनुसार जब दुःखी (पिंगला) एवं प्रसन्न (इड़ा) गोलार्धों में एक निश्चित समय तक संतुलन बना रहता है, तो चेतना की एक दिव्य अवस्था का अनुभव होता है। साधना विज्ञान की भाषा में कहें, तो इसे यों भी कह सकते हैं कि जब इड़ा और पिंगला नाड़ी अर्थात् नासिका के दोनों स्वर साथ-साथ क्रियाशील हो उठती है। ऐसे समय में व्यक्ति की प्रकृति अन्तर्मुखी हो जाती है, शुभ कार्यों एवं श्रेष्ठ चिन्तन की ओर रुझान बढ़ जाता है, मन बार-बार ईश्वर की ओर उन्मुख होने लगता है एवं व्यक्ति स्वयं को एक असाधारण, आनन्ददायक तथा उदात्त मनोदशा में अनुभव करता है।
किन्तु सामान्य आदमी के साथ अक्सर ऐसा देखा जाता है कि वह कार्यवश या स्वभाववश अपने किसी एक ही गोलार्ध का प्रयोग कर पाता हैं। उदाहरण के लिए किसी गणित के प्रोफेसर, कम्प्यूटर आपरेटर अथवा नीतिनिर्धारक को लिया जा सकता है। ऐसे सभी कार्यों में बायें मस्तिष्क का ही उपयोग होता है। उसका दांया भाग अनुपयोगी पड़ा रहता है। लम्बे समय तक यह अवस्था यदि बनी रहे, तो अनुपयोगी हिस्से की क्षमता घटने लगती है। यह स्थिति यदि दिमाग के दायें खण्ड के साथ प्रस्तुत हुई हो, तो आदमी का आध्यात्मिक जीवन चौपट हो जाता है, उसकी रुचि और रुझान इस ओर से एकदम हट जाती और वह विशुद्ध भौतिकवादी बन जाता है, जो खतरनाक है।
सहज ज्ञान, इलहाम या अन्तः- स्फुरणा आध्यात्मिक जीवन के कुछ महत्वपूर्ण घटनाक्रम हैं। जिसके अन्तःकरण में यह घटित होते हैं, उसके जीवन की जटिल-से जटिल समस्याओं का समाधान पलक झपकते हो जाता है। कुछ मिली सेकेण्ड से भी कम समय में समाधानकारक ऐसा चित्र अन्तराल में उभरता है, जो उसकी मुश्किलों को तत्काल हल कर देता है। यह तभी संभव है, जब दांया मस्तिष्क क्रियाशील एवं जाग्रत हो तथा व्यक्ति का जीवन पवित्र हो। असंयम, आलस्य, उन्माद, तनाव, व्यग्रता, तामसिक आहार, दृष्टिदोष, छिद्रान्वेषण, भ्रष्ट-चिन्तन एवं दुष्ट-आचरण यह सभी अन्तःस्फुरणा के विकास में बाधक हैं तथा दाहिने गोलार्ध की क्षमता को खुद बनाते हैं।
शरीर-संरचना विज्ञान और शरीर-क्रिया विज्ञान ने अब इस तथ्य को एकदम सुस्पष्ट कर दिया है कि मस्तिष्क का सम्बन्ध केवल नासिका से ही नहीं, वरन् शरीर के सभी अवयवों से है। योगी इसे हजारों वर्षों से जानते थे। वे ध्यानगत अनुभव में शक्ति के प्रवाह को नाड़ियों द्वारा मस्तिष्क तथा सम्पूर्ण शरीर में प्रवाहित होते अनुभव करते एवं अपने अस्तित्व के कहीं अधिक सूक्ष्म स्तरों को ग्रहण करने में समर्थ थे, कारण कि उन्होंने ऐसी विधा विकसित की थी कि उसके माध्यम से संवेदना की शक्ति को अपरिमित रूप से बढ़ाया जा सके। इसके अतिरिक्त इनके द्वारा वे नाड़ियों, मस्तिष्क तथा सभी शारीरिक क्रियाओं पर नियंत्रण रख सकते थे।
साधना-विज्ञान में मुद्राएँ और त्राटक-ध्यान ऐसे साधना उपचार हैं, जो इड़ा और पिंगला को संतुलित करके आज्ञाचक्र का जागरण करते हैं। यदि यह सत्य है और साधना-मार्ग के अन्वेषकों द्वारा बतलाई गई नाड़ियों का मस्तिष्क के भीतर अस्तित्व है, तो इसका मतलब यह हुआ कि उक्त साधनाओं द्वारा मस्तिष्क के भीतर अस्तित्व है, तो इसका मतलब यह हुआ कि उक्त साधनाओं द्वारा मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों का संतुलन संभव है। मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों पर हुए अनुसंधान इस तथ्य को सिद्ध करते हैं। किंसबोर्न अपने ‘सैड-हेमिस्फीयर, हैपी-हेमिस्फीयर’ नामक शोध-निबन्ध में इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि हमारे दृष्टिक्षेत्र की बायीं ओर दीखने वाले दृश्य और बायें कान कान से सुनाई पड़ने वाली ध्वनियाँ - दोनों जब दाहिने मस्तिष्क तक पहुँचते हैं, तो मस्तिष्क उनके प्रति उतना ग्रहण - शील नहीं होता, जिता कि विपरीत अवस्था होने पर। ऐसे ही इस बात की भी पुष्टि शोधों द्वारा हुई है कि जब व्यक्ति उदास होता है, तो उसकी दृष्टि सामान्यतः बायीं ओर रहती हैं और दायीं मस्तिष्क को प्रभावित करती है, जबकि प्रसन्नता की दशा में ठीक इसका उलटा होता है।
यह शोध - निष्कर्ष दृष्टि और मस्तिष्क के मध्य से संबंध को सुस्थापित करता तथा इस बात को प्रमाणित करता है कि मुद्रा (शाँभवी) और त्राटक मस्तिष्क के दोनों भागों की सक्रियता के बीच संतुलन स्थापित करते हैं। इसका स्पष्ट कारण है - शाम्भवी में दृष्टि को भ्रूमध्य में टिकाया जाता है। तथा त्राटक में सामने की ओर। उक्त क्रियाओं के अभ्यास से दौरान मस्तक-मध्य एक दबाव का अनुभव किया जा सकता है। यह दबाव और कुछ नहीं, आज्ञाचक्र की क्रियाशीलता और जागरण का प्रमाण है। ऐसा पाया गया है कि इससे इड़ा - पिंगला दोनों नाड़ियाँ प्रभावित होती हैं।
इस संसार में पदार्थों के दो स्तर- दो पक्ष हैं - एक स्थूल, दूसरा सूक्ष्म। वस्तुओं के दृश्य पहलू सामान्य स्तर की साधारण गतिविधियाँ की सम्पन्न कर पाते हैं, जबकि उनका अदृश्य पक्ष इतना शक्तिशाली और सामर्थ्यवान होता है कि उससे कल्पनातीत संभावनाएँ साकार ही जा सकती है। मानवी मस्तिष्क के संबंध में यही बात है। साधना विज्ञान इस तथ्य का प्रतिपादन लम्बे समय से करता आ रहा है। मस्तिष्कीय शोधों से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर अब शरीरशास्त्र भी इस सच्चाई को स्वीकारने लगा है कि मस्तिष्क बुद्धि, प्रतिभा, ज्ञान कौशल जैसी भौतिक विभूतियों का केन्द्र भर नहीं, इसमें अनेकों गुना क्षमतावान, ऐश्वर्य का उद्गम स्थल भी है।
वह प्राध्यापक थे, प्रफुल्ल नाम था उनका। कभी किसी ने उन्हें दुःखी, निराश अथवा उदास नहीं देखा। एक मधुर मुस्कान हमेशा उनके अधरों पर खिली रहती थी। यही मुसकान उनके नाम को सत्य और सार्थक सिद्ध करती थी। कोई समझ भी नहीं सकता था कि इतने दुःख कोई कैसे हृदय में छुपाए रखता है।
वर्षों पहले जब जगदीश चन्द्र ने उन्हें पहली बार देखा था, तभी से वे उसे अपने प्रेरणास्रोत लगे। वे अपनी माँ के साथ पास वाले मकान में किराए पर रहने लगे थे। प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्राध्यापक थे। जगदीश प्राध्यापक प्रफुल्ल राय को ‘प्रफुल्ल दा’ कहकर पुकारता था। उसने उन्हें हर काम में माहिर पाया था। तबला, तानपूरा, वायलिन वे बहुत ही अच्छा बजाते थे। उनके बनाए चित्र बहुत ही सुन्दर और सजीव होते थे। सबसे बड़ी बात- वे कविताएँ बहुत अच्छी लिखते थे, जो अक्सर उन दिनों की बंगला और अंग्रेजी पत्रिकाओं में प्रकाशित होती थी।
उनकी माँ अधिकांशतः बीमार रहती थीं। इसलिए कई बार वे ही खाना पकाते थे। खाना पकाना भी उनके लिए कला-साधना से कम न था। वनस्पतिशास्त्र के प्राध्यापक का यह कलाबोध अतीव उत्कृष्ट था। उनके संगीत की मधुरता, चित्रकारी का सौंदर्य, कविता की कोमल भावनाएँ, जैसे उनके बनाए भोजन में विविध रस बनकर समा जाती।
एक दिन बातों ही बातों में उनकी माँ ने जगदीश चन्द्र को बताया कि प्रफुल्ल दा को कैन्सर है। जगदीश के लिए यह बड़ा दुःखद समाचार था। पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ कि हमेशा खिलखिलाते रहने वाले प्रफुल्ल दा और मौत के बीच अन्तर इतना कम है। सब कुछ जानते हुए वे हमेशा प्रसन्न रहते। कभी किसी को दुःखी पाते तो तन-मन-धन से उसका कष्ट दूर करने का प्रयास करते।
कॉलेज के गरीब छात्र जो पढ़ाई की फीस देने में असमर्थ थे, प्रफुल्ल दा अपनी तरफ से उनकी फीस चुका देते। किसी को दुःखी देखना उन्हें सहन नहीं था। रोज शाम को मुहल्ले के सारे बच्चे उनके पास पढ़ने के लिए आ जाते। प्रफुल्ल दा बहुत स्नेह से उन्हें पढ़ाते थे, बिलकुल निःशुल्क। वह बहुत जीवट के आदमी थे। उनका व्यक्तित्व अतिशीघ्र सभी को प्रभावित कर लेता था। कोई उनसे नाराज रह ही नहीं सकता था।
एक दिन की बात है प्रफुल्ल दा कॉलेज जा रहे थे। दो बच्चे गुब्बारे उड़ाते हुए सड़क पार कर रहे थे। सामने से आ रही मोटर पर उनका ध्यान न था। तभी प्रफुल्ल दा का ध्यान अचानक उस ओर गया। लेकिन तब तक कार बहुत पास आ चुकी थी। उन्होंने कलाबाजी खाकर दोनों बच्चों को किनारे कर दिया, पर वे स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख सके। कार उनका पाँव कुचलती हुई चली गयी।
कुछ लोगों ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया। उनकी जिन्दगी बचाने के लिए उनका एक पैर काटा जाना जरूरी था। अतः डॉक्टरों ने उसे काट दिया।
जगदीश को जब इस घटना की सूचना मिली, जब वह भागा-भागा अस्पताल पहुँचा। उसने देखा प्रफुल्ल दा के मुख पर दुःख के नहीं सन्तोष के चिन्ह थे। उन्हें अपने पाँव काटे जाने का उतना दुःख न था, जितनी दो बच्चों को बचा लेने की खुशी। और जब उनके घाव भर गए तो सभी ने उन्हें बैसाखी से चलते देखा। जगदीश तो यह देखकर रोने लगा, मगर प्रफुल्ल दा ने उसे सीने से लगाकर सान्त्वना दी। जिनके लिए उसका मन दुःखी था वे ही उसे सान्त्वना दे रहे थे। यह देखकर वह हैरत में था।
धीरे-धीरे जगदीश को इसका भी अहसास होने लगा कि प्रफुल्ल दा की बीमारी बढ़ने लगी है। दवाइयाँ अब बेअसर हो रही थीं। जगदीश को भय लगने लगा था। रोग बढ़ रहा था। जब-तब खाँसते-खाँसते खून की उल्टियाँ भी हो जाती थीं।
एक दिन प्रफुल्ल दा ने जगदीश को अपने पास बुलाया। जब वह पहुँचा तो वे उसे अपना वायलिन देने लगे। मना करने पर बोले, रख लो। तुम्हें तो पता ही है मुझे अब इसे बजाने का समय नहीं मिलता और फिर मुझे जल्दी से अपना कविता-संग्रह भी पूरा करना है। खाँसते हुए उन्होंने अपनी बात पूरी की।
जगदीश ने प्रफुल्ल दा से ही वायलिन बजाना सीखा था। उसने कभी भी उनकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया, सो वायलिन ले आया। इसके बाद उसने उन्हें हमेशा कविता-संग्रह पूरा करते पाया।
हर वक्त अपने काम में वह लगे रहते। यद्यपि खाँसते-खाँसते उनका दम फूलने लगा था। इन दिनों उनकी माँ प्रफुल्ल दा के सामने कम ही आती थी। उनसे उनकी यह हालत देखी नहीं जाती। इसी बीच घड़ी ने शाम के छह बजा दिए। जगदीश पास बैठा काम कर रहा था। अचानक प्रफुल्ल दा बोले-ए-क-गिला-स-पानी-तो-ला जगदीश भागा-भागा पानी लेने गया, लेकिन जब लौटकर आया, तब तक प्रफुल्ल दा अपनी अंतिम निद्रा में जा चुके थे।
“नहीं............।” जगदीश की चीख घुटकर रह गयी। अब कुछ भी शेष नहीं था। परंतु उनके होठों पर मुसकान थी। एक अपूर्व मुसकान।
जगदीश की नजर उनकी लिखी आखिरी पंक्तियों पर पड़ी। लिखा था-
जीवन के दुःख से घबराकर, अपने मन को क्यों मुरझाए। धूप-छाँव तो प्रतिपल-प्रतिक्षण-आओ हम केवल मुसकाएँ।
ये पंक्तियाँ जगदीश के जीवन की अमर प्रेरणा बन गयीं। इन्हीं को आत्मसात् करके वह विश्व के महान वैज्ञानिक डॉ. जगदीश चन्द्र बसु बने।
वाराणसी जाने की तीव्र ललक उसे उद्वेलित किए थी। आध्यात्मिक जिज्ञासाएँ, साधु-सन्तों का संग और ऐसी ही न जाने कितनी कल्पना तरंगों का ज्वार उसके किशोर मन में हलचल मचाए था। उसने सकुचाते हुए अपने पिता बाबू भगवती चरण घोष से वाराणसी जाने की अनुमति माँगी। भगवती बाबू रेलवे में उच्च पदाधिकारी थे। इस कारण उनके पारिवारिक जनों के लिए प्रथम श्रेणी के पास पर यात्रा करना अति सुलभ था। शायद यही कारण था कि घोष महाशय अपने बच्चों के परिभ्रमण में प्रायः बाधा नहीं डालते थे।
आज भी अनुरोध स्वीकृत हो गया। उन्होंने उसे अपने पास बुलाकर बनारस तक आने-जाने का एक रेलवे पास, कुछ रुपये के नोट और दो पत्र देते हुए कहा- मुझे वाराणसी के अपने एक मित्र केदारनाथ बाबू को एक कार्य के विषय में प्रस्ताव भेजना है। दुर्भाग्यवश मैं उनका पता भूल गया हूँ। परन्तु मुझे विश्वास है कि हम दोनों के मित्र स्वामी प्रणवानन्द की सहायता से तुम यह पत्र उन तक पहुँचा सकोगे। स्वामीजी मेरे गुरुभाई हैं और उन्होंने एक अति उच्च आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त कर जी है। उनके सत्संग से तुम्हारी जिज्ञासाओं का भी समुचित समाधान हो जाएगा। यह दूसरी चिट्ठी तुम्हारे लिए परिचय पत्र का काम करेगी।
अपने पिताजी की अनुमति के साथ ही किशोरवय के मुकुन्द की प्रसन्नता का पारावार न रहा। वह उत्साह के साथ अपनी यात्रा के लिए निकल पड़ा। बनारस पहुँचते ही उसके कदम स्वामी प्रणवानन्द के घर की ओर बढ़ चले। सामने का द्वार खुला हुआ था। वह तो तल्ले पर स्थित एक लम्बे हॉल सदृश कमरे में जा पहुँचा। कुछ स्थूलकाय कोपीन धारण किए हुए स्वामीजी एक ऊँची चौकी पर पद्मासन पर बैठे हुए थे। उनका सिर एवं झुर्रियों रहित चेहरा मुंडाया हुआ चिकना था और होठों पर मोहक मुसकान खेल रही थी। मुकुन्द के अनधिकार प्रवेश का संकोच दूर करने के लिए एक चिर-परिचित मित्र की भाँति उसका सत्कार करते हुए वे बोल उठे, कहो बाबा, सब आनन्द तो है। स्वागत के उनके ये शब्द बाल-सुलभ हार्दिक स्नेह से निःसृत थे। मुकुन्द ने झुककर उनका चरणस्पर्श किया।
क्या आप ही स्वामी प्रणवानन्द जी हैं? उन्होंने सिर हिलाकर ‘हाँ’ कहा। और जब तक मुकुन्द अपनी जेब से अपने पिताजी की चिट्ठी निकाले, इसके पहले ही उन्होंने प्रतिप्रश्न किया, क्या तुम भगवती बाबू के पुत्र हो? आश्चर्यचकित होते हुए मुकुन्द ने उनको अपना परिचयपत्र दिया, हालाँकि अब उसकी आवश्यकता नहीं रह गयी थी।
स्वामीजी ने एक बार फिर अपनी अतीन्द्रिय दृष्टिशक्ति से मुकुन्द को आश्चर्यचकित करते हुए कहा- मैं तुम्हारे लिए केदारनाथ बाबू को अवश्य ही ढूँढ़ निकालूँगा। तत्पश्चात उन्होंने पत्र पर एक नजर डाली और मुकुन्द के पिताजी के प्रति कई प्रेम भरे उद्गार व्यक्त करते हुए वे बोल उठे- देखो मुझे दो पेन्शन मिलती है। एक तो तुम्हारी पिताजी की सिफारिश से मिलती है, जिनके अधीन मैं कभी रेलवे ऑफिस में काम करता था। दूसरी पेन्शन परमपिता परमेश्वर के अनुग्रह से मिलती है, जिसके लिए शुद्ध अन्तःकरण से मैंने जीवन में सांसारिक कर्तव्यों को समाप्त कर दिया है।
उनकी यह टिप्पणी मुकुन्द के लिए अत्यन्त दुर्बोध थी। उसने थोड़ी हैरानी व्यक्त करते हुए पूछा - स्वामीजी, आपको परमपिता से कौन-सी पेन्शन मिलती है? क्या वे आपकी गोद में धन गिराते हैं?
वे हँस पड़े, पेन्शन से मेरा अभिप्राय है - अगाध शान्ति, मेरे अनेक वर्षों की गम्भीर ध्यान-धारणा का पुरस्कार, मुझे अब धन की कोई लालसा नहीं। मेरी थोड़ी-सी सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति समुचित रूप से हो जाती है। इस दूसरी पेन्शन का महत्व तुम बाद में समझ जाओगे।
हठात् वार्तालाप बन्द कर स्वामी जी गम्भीर और निश्चल हो गए। किसी रहस्यमय भाव ने उन्हें आवृत कर लिया। प्रारम्भ में तो उनकी आँखें अत्यन्त चमक उठी। जैसे वे किसी आकर्षक वस्तु को देख रह हों। परन्तु बाद में वे मन्द हो गयीं। मुकुन्द उनके इस अचानक मौन से कुछ व्याकुल-सा हो उठा। उन्होंने अभी तक उसे यह नहीं बताया था कि आखिर वह अपने पिताजी के मित्र से कैसे मिल सकेगा। तनिक बेचैन होकर उनसे शून्य कमरे में चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। परन्तु वहाँ तो उन दोनों के अतिरिक्त और कोई न था। उसकी निरुद्देश्य दृष्टि चौकी के नीचे रखी स्वामीजी की लकड़ी की खड़ाऊँ पर पड़ी।
तभी स्वामीजी एक मधुर-मन्द स्मिथ के साथ कहने लगे-छोटे महाशय, चिन्ता मत करो। जिन केदारबाबू से तुम्हें मिलना है, वे आधे घण्टे में यहाँ तुम्हारे पास पहुँच जाएँगे। लगता है योगिवर उसके मन का अध्ययन कर रहे थे। यह असाधारण कार्य उनके लिए कुछ कठिन न था।
उन्होंने पुनः गहन मौन धारण कर लिया। जब अपनी कलाई घड़ी से मुकुन्द को पता चला कि तीस मिनट बीत चुके हैं। तब स्वामीजी स्वयं जाग गए।
उन्होंने कहा - ऐसा लगता है कि केदारबाबू दरवाजे के निकट पहुँच गए हैं। तभी मुकुन्द ने सीढ़ी के ऊपर किसी के आने की आहट सुनी। अचानक मुकुन्द के मन में अविश्वास का एक अद्भुत भाव उदित हो उठा। वह विस्मित-सा सोचने लगा कि कोई सन्देश भेजे बिना ही मेरे पिताजी के मित्र यहाँ बिना किसी दूत की सहायता के बुला लेना कैसे सम्भव हुआ? मेरे यहाँ आने के बाद तो स्वामीजी ने मेरे अतिरिक्त अन्य किसी से बात तक नहीं की थी।
अपनी इन बातों की उधेड़ - बुन में वह अनौपचारिक ढंग से कमरे से निकलकर सीढ़ियाँ उतरा। आधे रास्ते में ही एक क्षीणकाय, गौरवर्ण और माध्यम कद के व्यक्ति से उसकी भेंट हुई। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि आगंतुक सज्जन बहुत शीघ्रता में थे।
उत्कण्ठा भरे स्वर में उसने पूछा- क्या आप ही केदारबाबू हैं?
हाँ, भगवती बाबू के पुत्र तुम ही हो ना, जो मुझसे मिलने के लिए यहाँ प्रतीक्षा कर रहे रहो? वे मित्रतापूर्ण ढंग से मुस्कुराए।
उसने निवेदन किया- जी हाँ, परन्तु महाशय मुझे एक बात तो बताइए, आप यहाँ आए कैसे? उनकी अबोध्य उपस्थिति से उसे विस्मय हो रहा था।
वह कहने लगे- आज सब कुछ अद्भुत ही दिखाई दे रहा है। लगभग एक घण्टा पहले में गंगास्नान कर ही चुका था कि स्वामी प्रणवानन्द मेरे पास पहुँचे। मैं नहीं बता सकता कि उस समय मेरे गंगातट पर होने का पता उन्हें कैसे चला? प्रणवानन्द जी ने बताया कि भगवती का लड़का मेरे कमरे में आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। कृपया आप मेरे साथ चलेंगे? मैंने खुशी से स्वीकृति दे दी। हम लोग हाथ में हाथ डालकर चलने लगे, किंतु खड़ाऊँ पहने होने पर भी स्वामीजी आश्चर्यजनक ढंग से मुझे पीछे छोड़कर आगे निकल गए, हालाँकि मैं मजबूत जूते पहने हुए था।
प्रणवानन्द जी ने अकस्मात् रुककर मुझसे पूछा - मेेेरे घर पहुँचने में आपको कितना समय लगेगा?
मैंने उन्हें बताया - लगभग आधे घण्टे में मैं वहाँ पहुँचा जाऊँगा।
एक रहस्यमय दृष्टि से मेरी ओर देखते हुए स्वामीजी ने मुझसे कहा - इस क्षण मुझे कुछ और काम है। मैं आपको पीछे छोड़ जा रहा हूँ। आप मेरे घर पहुँचिए, जहाँ भगवती बाबू का पुत्र और मैं दोनों ही आपकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।
मैं उनसे कुछ कह सकूँ, इसके पहले ही तेजी से मेरे पास से निकल गए और भीड़ में अदृश्य हो गए। जितनी तेजी से बन पड़ा, उतनी तेजी से चलकर मैं यहाँ पहुँचा हूँ।
केदारबाबू के इस कथन से वह और भी हतबुद्धि हो गया। उसने उनसे पूछा कि वे स्वामीजी को कितने समय से जानते हैं।
उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष कई बार भेंट हुई थी, पर इधर हाल में कभी भेंट नहीं हुई। आज स्नानघाट पर पुनः उन्हें देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई।
मुकुन्द ने उनसे कहा, मैं अपने कानों पर विश्वास नहीं कर पा रहा हूँ। क्या मेरा सिर फिर गया है? आपने उनको दिव्यदर्शन में देखा था या प्रत्यक्ष देखा था? क्या आपने सचमुच ही उनके हाथों का स्पर्श किया था और उनकी पगध्वनि सुनी थी। इस बार केदारबाबू जरा क्रोधित से होकर बोले - मैं नहीं जानता, तुम क्या कहना चाहते हो। मैं तुमसे झूठ नहीं बोल रहा हूँ। क्या यह बात तुम्हारी समझ में नहीं आती कि केवल स्वामीजी के द्वारा ही मुझे यह पता लग सकता था कि तुम यहाँ मेरी प्रतीक्षा कर रहे हो।
लगभग एक घण्टा पहले जब मैं यहाँ पहुँचा तब से अब तक एक पल के लिए भी स्वामी प्रणवानन्द जी न कहीं गए और न मेरी आँखों से ओझल हुए। मुकुन्द ने केदारबाबू को सारी कथा बता दी।
उनकी आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गयीं। उनके मुख से ये शब्द फूट पड़े - क्या हम लोग इस भौतिक युग में निवास कर रहे हैं या स्वप्न देख रहे हैं? मैंने तो अपने जीवन में ऐसी अलौकिक घटना देख पाने की कभी आशा तक नहीं की थी। मैं तो यही समझता था कि स्वामीजी एकदम सामान्य व्यक्ति हैं, परन्तु अब देख रहा हूँ कि वे एक अन्य शरीर भी धारण कर सकते हैं और उसके द्वार काम भी कर सकते हैं। इसी बातचीत के साथ उन दोनों के एक साथ ही स्वामीजी के कमरे में प्रवेश किया। केदारबाबू ने चौकी के नीचे पड़ी खड़ाऊँ की ओर इंगित किया - देखा, घाट पर स्वामीजी यही खड़ाऊँ पहने हुए थे। उन्होंने फुसफुसाकर कहा - जैसा कि अभी मैं देख रहा हूँ, ये वही कोपीन भी धारण किए हुए थे।
जैसे ही केदारबाबू ने स्वामीजी के पास जाकर उनके चरणों में शीश नवाया, स्वामीजी ने उनकी ओर देखते हुए विनोदपूर्ण हास्य के साथ कहा-इतने स्तम्भित क्यों हो? प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष जगत के बीच सूक्ष्म एकता का सम्बन्ध सच्चे योगियों से छिपा नहीं। मैं यहीं से क्षमतामात्र में सुदूर किसी स्थान में जाकर लोगों से मिलकर उनसे वार्तालाप करके वापस लौट सकता हूँ। इसमें स्थूल परिस्थितियाँ तनिक भी बाधक नहीं हो सकतीं।
स्वामीजी के इस कथन पर मुकुन्द का जिज्ञासु मन और अधिक तीव्रता से उत्सुक हो उठा। स्वामीजी ने इसी की ओर आत्मजाग्रति दृष्टि से देखते हुए कहा - गुरुकृपा से सब सम्भव है। गुरु नर-देह में साक्षात ईश्वर होते हैं। मैंने अध्यात्म विद्या के रहस्यों का ज्ञान अपने गुरुदेव श्री लाहिड़ी महाशय की कृपा से ही प्राप्त किया है।
स्वामी प्रणवानन्द आगे बोले - तुमने जो अनुभव किया, वह अध्यात्म विद्या की एक छोटी-सी झलक भर थी। गुरुकृपा से और भी बहुत कुछ मुझे सुलभ है। स्वामीजी की इन बातों से किशोरवय के मुकुन्द के मन में अध्यात्म का अंकुरित बीज पल्लवित हो उठा। यही बालक मुकुन्द भविष्य में स्वामी योगानन्द के नाम से विश्वविख्यात हुए। उन्होंने ‘योगा द् सत्संग सोसाइटी' की स्थापना की, जिसके द्वारा आज अनेकानेक आध्यात्मिक जिज्ञासुओं का समाधान हो रहा है, जिनकी लिखी ‘आटोबायोग्राफी ऑफ योगी’ चिर प्रचलित हैं।
मन को ही योगशास्त्रों में बन्धन और मुक्ति का कारण बताया गया है। इसकी क्षमता का आकलन नहीं किया जा सकता। इसकी तुलना में आज तक इतनी तीव्र गति से दौड़ने वाली कोई मशीन ईजाद नहीं हुई है। यदि मन को परिष्कृत कर उसे वश में किया जा सके-नियंत्रित किया जा सके, तो मनुष्य हजारों मील दूर बैठे हुए किन्हीं दो व्यक्तियों की बातचीत को ऐसे सुन सकता है जैसे वह अपनी बगल में बैठ बातचीत कर रहे हैं। वे ऐसे दिखाई देने लगते हैं, जैसे अपनी उनसे एक फुट की भी दूरी नहीं है। यही नहीं हजारों मील दूर बैठे हुए व्यक्ति के मन की भी बातें जानी जा सकती हैं कि उसके मन में इस समय क्या हलचलें चल रही हैं। इसी तरह प्रकृति के गर्भ में चल रही उठा-पटक को भी स्पष्ट रूप से देखा समझा जा सकता है और यह जाना जा सकता है कि भविष्य में क्या खिचड़ी पकने वाली है। दिव्यदर्शन, दूरदर्शन, दूरश्रवण आदि कई सिद्धियाँ - अतींद्रिय क्षमताएँ निग्रहित मन की ही देन होती हैं। महर्षि पतंजलि ने योग का लक्षण बताते हुए कहा है - “योगश्चित्तवृत्ति निरोधः” अर्थात् चित्त की वृत्तियों को रोक रहना योग है। मन को वशवर्ती बना लेने वाला योगसिद्ध पुरुष ब्रह्मप्राप्ति का वह अनिवर्चनीय सुख प्राप्त कर सकता है, जिसको पाने के बाद दुनिया के समस्त सुख-साधन तुच्छ जान पड़ते है, सारहीन दिखाई देने लगते हैं।
योग कुण्डल्योपनिषद् में ब्रह्माजी ने योगविद्या का प्राकट्य किया है। द्वितीय अध्याय की प्रथम पाँच ऋचाओं में उन्होंने मन को ही ईश्वरप्राप्ति का मुख्य साधन बताते हुए कहा है - मनुष्य कामनाओं से ग्रसित होकर विषयाकाँक्षी होता है। विषय में पड़कर कामनाएँ घटती नहीं, अपितु बढ़ती ही रहती हैं। इस तरह से मन की शक्ति विश्रृंखलित होती और केवल भौतिक-लौकिक कार्यों में ही नष्ट होती रहती हैं। इसलिए शुद्ध परमात्मभाव की प्राप्ति के लिए विषय और कामना - दोनों का त्याग करना और आत्मा में ध्यान लगाना आवश्यक है। जो अपने हित की कल्याण की इच्छा रखता है, उसे विषय-वासनाओं में इस शक्ति को नष्ट नहीं करना चाहिए और शक्ति में प्रवेश कर उसी में स्थित रहना चाहिए। मन द्वारा मन को देखकर और समझ कर उसका त्याग करना ही परमपद है। उत्पत्ति और स्थिति का प्रधान बिन्दु मन ही है। आगे के मंत्रों में मन द्वारा षट्चक्रों के बेधन का विस्तृत विधान भी मिलता है। ‘पंचकोशी साधना’ इसे ही कहते हैं। इसके लाभ अनन्त हैं, पर पूर्व में मनोनिग्रह और उस शक्ति को आत्मा में नियोजित करना अत्यावश्यक है।
मानव -मन की अद्भुत और अविश्वनीय शक्तियाँ कई प्रकार से सिद्ध हो चुकी है। मन में वह क्षमता है कि मात्र कल्पनाशक्ति से समय और अन्तरिक्ष पर विजय प्राप्त कर चेतन को अचेतन से पृथक कर सकता है।
रैबी एलिजा नामक लिथुयानिया निवासी एक व्यक्ति के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उसे विचित्र मानसिक क्षमता प्राप्त थी, पर उस पर उसका नियंत्रण न होने के कारण वह शक्ति भी जीवन में कुछ काम न आयी। उसने अपने जीवन में दो हजार से अधिक पुस्तकों को एक बार पढ़कर याद कर लिया था। कोई भी पुस्तक, लेकर किसी भी पन्ने को खोलकर पूछने पर वह उसके एक-एक अक्षर को दोहरा देता था। उसका मस्तिष्क सदैव क्रियाशील रहता था, इसलिए पुस्तकालय के बाद भी उसे अपने हाथ में पुस्तक रखनी पड़ती थी। दूसरे कार्यों से चित हटते ही वह पुस्तक पढ़ने लगे जाता था।
इसी तरह प्रशा में जर्मनी के राजा की एक लाइब्रेरी थी जिसका लाइब्रेरियन था मैथुरिन बेसिरे। बेसिरे की आवाज सम्बन्धी याददाश्त विलक्षण थी। वह जिस किसी भी व्यक्ति को शब्दोच्चार को एक बार सुन लेता था, उसे अक्षरशः ज्यों-के-त्यों उसी की शब्दावली में दोहरा देता था। एक बार उसकी परीक्षा के लिए बारह देशों के राजदूत पहुँचे और उन्होंने अपनी भाषा में बारह वाक्य कहे। जब वे चुप हो गये तो बेसिरे ने बारहों भाषाओं के सभी वाक्य ज्यों-के-त्यों दोहरा दिए। वह एक बार में ही कई व्यक्तियों की आवाज सुनता रहता था और आश्चर्य यह था कि सबकी बात उसे अक्षरशः याद हो जाती थी। ऐसी ही विलक्षण प्रतिभा फ्राँस के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ लिआन गैम्बाटा और रिचार्ड पोरसन नामक ग्रीक विद्वान को भी उपलब्ध थी।
अमेरिका के अलबामा राज्य के गाड्स डेन नगर के पास एक गाँव में रहने वाले फ्रैंकरेन्स नामक दसवीं कक्षा के एक छात्र की विलक्षण प्रतिभा को देखकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी हैरान थे। उसकी विशेषता यह थी कि वह अपने साथी के कुछ भी बोलने के साथ ही हू-ब-हू वही शब्द उसी लहजे में और बिना एक क्षण का विलम्ब किये उसके अक्षरों - से - अक्षरों की ताल बैठाते हुए मानों उसके मन में भी उस समय वहीं भाव उठ रहे हों, जो वह दूसरा साथी व्यक्त कर रहा था, बोलने लगता था।
उक्त घटनाओं को देखते हुए भारतीय लोग दर्शन की ओर सहज ही ध्यान आकर्षित हो जाता है और मानना पड़ता है कि ‘मन’- जो कि एक व्यापक शक्ति है, यदि उसे एकाग्र किया और उस पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सके तो मनुष्य इस तरह की न जाने कितनी ही अतीन्द्रिय क्षमताएँ अपने आप में विकसित कर सकता है, जो दूसरों को चमत्कार-सी लगें। दूसरों के मन की बात तत्काल जान लेना भी उसका लाभ है - इसका रहस्य समझाते हुए योग - वशिष्ठ ४-२१-५६-५७ में महर्षि वशिष्ठ कहते हैं -
दृढ़भावनया चेतो यद्यथा भावयत्यलम्। तत्तफंल तदाकरं तावत्कार्ल प्रपश्यति॥
अर्थात् हे राजन! यह मन दृढ़ भावना वाला होकर जैसी कल्पना करता है, उसको उसी आकार में उतने समय तक और उसी प्रकार का फल देने वाला अनुभव होता है।
फ्रैंकरेन्स नामक जिस छात्र का ऊपर की पंक्तियों में वर्णन किया गया है, उसने न तो कोई योगाभ्यास किया था और न ही उसे मन की एकाग्रता के भारतीय तत्त्वदर्शन का ही ज्ञान था, परन्तु उसे जो कुछ प्राप्त हुआ, उसे पूर्व जन्मों की साधना का संस्कार ही कहा जा सकता है। पर यह एक बात निर्विवाद है कि सन् सत्तर के दशक में वह अपनी मानसिक एकाग्रता और स्मरणशक्ति के लिख विख्यात रहा है। एक बार किसी दर्शक ने कह दिया कि रेन्स बोलने वालों के होठों की हरकत से बोले जाने वाले शब्द का अनुमान करके उच्चारण करता है। यद्यपि वह बोलने वाले के इतना साथ-साथ बोलता है कि अनुमान की कल्पना ही नहीं की जा सकती, फिर भी उसने तब से अपना मुँह उल्टी दिशा में करके बोलना प्रारम्भ कर दिया। अतीन्द्रिय क्षमताओं की जाँच करने वाले कई विशेषज्ञ और मनोवैज्ञानिक उसका परीक्षण करने के उपरान्त भी यह निष्कर्ष नहीं निकाल पाये कि इसका रहस्य क्या है। स्वयं फ्रैंक रेन्स भी यह नहीं जानता था कि उसकी दृढ़ एकाग्रता का कारण क्या है?
निग्रहित मन की क्षमता असीम है। एक बार स्वामी विवेकानन्द हैदराबाद गये। वहाँ एक ब्राह्मण रहता था, जिसके सम्बन्ध में उन्होंने सुना था कि वह व्यक्ति न जाने कहाँ से अनेक वस्तुएँ उत्पन्न कर देता है। वह उच्च खानदान का और शहर का नामी व्यापारी था। विवेकानन्द उसके पास गये और अपने चमत्कार दिखाने को कहा। उन दिनों वह बीमार था। उसने एक शर्त रखी कि अगर पहले आप हमारे सिर पर हाथ रख देंगे तो हमारा बुखार दूर हो जाएगा और तब मैं चमत्कार दिखा सकूँगा। स्वामीजी ने शर्त स्वीकार कर ली।
उस व्यक्ति ने अपना मात्र अधोवस्त्र को छोड़कर सभी कपड़े उतार दिये। अब उसे केवल एक कम्बल ओढ़ने को दिया गया। शीत के दिन थे और भी अनेक लोग एकत्र हो गये। उसने कम्बल ओढ़ा और एक कोने में बैठ गया।
इसके बाद उसने कहा - आप लोगों को जो कुछ चाहिए, वह लिखकर दीजिए। सबने कुछ लिख-लिखकर दिया। स्वामी विवेकानन्द ने भी उन फलों के नाम लिखकर दिए, जो उस प्रदेश में पैदा ही नहीं होते थे। किन्तु आश्चर्य कि उसने कम्बल में से अंगूर के गुच्छे तथा सन्तरे इतनी अधिक मात्रा में निकाल कर दिए कि उनका जीवन उस मनुष्य के जीवन से दो गुना हो गया। उन फलों का स्वाद सबने लिया। उसने जो पुष्प निकाल कर दिए थे, उनमें से प्रत्येक पुष्प बढ़िया खिला हुआ था, पंखुड़ियों पर सबेरे के ओसकण विद्यमान थे, न कोई खण्डित फूल था, न मुरझाया और न टूटा।
इस घटना पर अपनी सम्मति व्यक्त करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा - लोग इसे जादू मानते हैं, चमत्कार कहते हैं, किन्तु मैं ऐसा नहीं मानता। यह सत्य का ही प्रदर्शन था। जो है ही नहीं, उसकी छाया कहाँ से आ सकती है, इसलिये यह माया नहीं थी। वे आगे कहते हैं कि यह मन की अनन्त शक्तियों का प्रमाण है कि हम मन से जो चाहें उत्पन्न कर सकते हैं। मन के भीतर सारी सृष्टि की समृद्धि और सम्पत्ति है। शर्त यही है कि हम मन से काम लें। अनियंत्रित मन अपना भी बुरा करता है और संसार का भी। हैदराबाद का यह ब्राह्मण मन से तो काम लेता है, परन्तु यह नहीं जानता कि जिस मन से वह काम ले रहा है वह भी भ्रान्त है, इसलिए वह चमत्कार की दुनिया तक ही सीमित रह गया। अपने अन्दर के ईश्वर को वह व्यक्त नहीं कर पाया।
प्रायः लोग मैस्मरेज्म व हिप्नोटिज्म जैसी विद्याएँ सीखकर छोटे-मोटे मानसिक चमत्कार दिखाते और लोगों की दृष्टि में अपने को प्रभावशाली प्रदर्शित करने का प्रयत्न करते हैं, परन्तु इससे न तो उनका अपना भला होता है और न ही दूसरों का कुछ उपकार होता है। पाश्चात्य मनोवेत्ता और भौतिक - विज्ञानी भी अब मन की क्षमता के अतीन्द्रिय सामर्थ्य को स्वीकार करने लगे हैं। विश्व के अनेक देशों में इस संदर्भ में गहन अनुसंधान भी हो रहे हैं। वे जिसे आश्चर्य की दृष्टि से देखते और अतीन्द्रिय क्षमता, चमत्कार एवं गुप्त विद्या मानते हैं, उसे भारतीय ऋषियों योगियों ने मन की शक्ति का छोटा-सा चमत्कार माना है, जो आकर्षक तो लगता है, किन्तु आत्मकल्याण में बाधक है। मनोनिग्रह - एकाग्रता का लक्ष्य आत्मा का वेधन करना है, जिसे प्राप्त कर मनुष्य जीवनमुक्त और स्वर्ग का अधिकारी बनता है।
श्री रामोत्तरतानीयोपनिषत् में मनोमय शक्ति का विवेचन करते हुए बताया गया है कि भौंहों और नासिका की जहाँ सन्धि है, वहीं स्वर्ग तथा उससे भी उच्च परमधाम का सन्धि स्थान है, वहीं अविमुक्त है। ब्रह्मज्ञानीजन इसी सन्धि की संध्या रूप में साधना करते हैं। जो साधक इस प्रकार जानने वाला है कि अव्यक्त ब्रह्म का स्थान अविमुक्त क्षेत्र आदि भौतिक स्थान है और भौंहों तथा नासिका का संधि स्थान ही आध्यात्मिक काशी है, यहीं मन का ध्यान किया जाता है, वहीं ज्ञानी यथार्थ ज्ञानोपदेश में समर्थ हो सकता है। यही सबसे बड़ा तीर्थ और देवताओं के लिए भी पवित्र है, यही परमात्मा प्राप्ति का स्थल है। यहाँ से जब प्राणी की प्राण-चेतना निकलती है, तो अमृतत्व की प्राप्ति होती है। मनोमय शक्ति की यही साधना सही अर्थों में अभीष्ट भी है मुक्ति प्रदाता भी।
सौंदर्य की कसौटी क्या हो? शारीरिक दृष्टि से सौंदर्यसम्पन्न होना ही क्या उसका वास्तविक पैमाना है? यदि हाँ, तो उस रूप का क्या प्रयोजन, जो आकर्षक होकर भी अनाकर्षक कार्य करें? सुन्दर होकर असुन्दर और अवांछनीय उद्देश्यों में निरत रहने वालों को भला रूपवान् कैसे कहा जा सकता है? यथार्थ सौंदर्य आन्तरिक होना चाहिए।
विवेकानन्द कहा करते थे कि व्यक्ति का चिन्तन उसके अन्तःकरण का दर्पण है। उसके द्वारा अभ्यन्तर की झलक-झाँकी प्रस्तुत की जा सकती है- यह शत-प्रतिशत सच है। सौंदर्यबोध वास्तव में और कुछ नहीं, अन्तस् की अभिव्यक्ति है। इससे सामने वाले के उस दृष्टिकोण का पता चलता है, जिससे वह वस्तुओं, व्यक्तियों, स्थानों तथा प्रकृति में सुन्दरता की तलाश करता है। आँखें तो उसे देखने का उपकरण मात्र हैं। यदि हृदय पवित्र और उदात्त हुआ, तो वह असुन्दर वस्तुओं में भी सौंदर्य ढूँढ़ निकालेगा; बुरे लोगों और अपावन वृत्तियों से भी कुछ-न-कुछ अपने उपयुक्त ग्रहण कर लेगा; किन्तु वही यदि हेय स्तर का हुआ, तो सुन्दरता में भी उसे कहीं-न-कहीं कोई-न-कोई खोट अवश्य नजर आएगा। इसको वास्तव में सापेक्ष दृष्टि कहनी चाहिए। वस्तु, व्यक्ति, स्थान चाहे कितने ही पावन क्यों न हों, दृष्टिभेद-के हिसाब से वह पवित्र एवं आकर्षक भी हो सकते हैं तथा अनाकर्षक भी। इसलिए हमें अपने अन्तर का ऐसा विकास करना चाहिए, जिससे हममें गुणग्राहकता की वृत्ति आ सके, अच्छे को अच्छा कह और देख सकें एवं अपनाने का प्रयत्न करें तथा बुरे से परहेज कर सकें। यही है सौंदर्य का यथार्थ पैमाना। इसी आधार पर सुन्दर-असुन्दर व्यक्तियों की परख की जानी चाहिए।
पर विडम्बना यह है कि आज हम मनुष्य की वास्तविक सुन्दरता उसके शील-स्वभाव को न मानकर शारीरिक रूप-विन्यास को मानने लगे हैं। जो बाहर से जितना आकर्षक, उसे उतना ही रूपवान और खराब शक्ल-सूरत वालों को 'कुरूप' कहा जाता है, जबकि यह निर्धारण गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर होना चाहिए, ईमानदारों, कर्तव्यपरायणों को सर्वाधिक सौंदर्य सम्पन्न माना जाना चाहिए, लेकिन आजकल तो इनको प्रतिगामी मानने की परम्परा-सी चल पड़ी है। भौतिक दुनिया में उनका उपहास उड़ाया जाता और कहा जाता है कि प्रगति ऐसे सम्भव नहीं। उन्हें इस बात का आमन्त्रण दिया जाता है कि यदि धनवान बनना हो और सुविधा-साधन जुटाने हों, तो ईमानदारी त्याग कर बेईमान बनना पड़ेगा और कर्तव्यनिष्ठा भी छोड़नी पड़ेगी। यह है आज की तथाकथित उन्नति का मानदण्ड और समाज के चरित्र का आदर्श। जो विनीत और सरल है, जिनकी वाणी मृदुल है उन्हें डरपोक बताया जाता और उद्दण्डों को साहसी कह कर पुकारा जाता है। यह कैसी उलटबाँसी? जो विनयशील और मृदुभाषी हो, वह कायर ही होगा-यह आवश्यक नहीं। कहते हैं, जो जलाशय जितना शान्त और स्थिर होता है, वह उतना ही गहरा होगा। व्यक्ति के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है। मृदुभाषी सहिष्णु और धैर्यवान होते हैं। वे बात-बात पर आपा नहीं खोते। इसका अर्थ कदापि नहीं कि वे भयभीत होकर ऐसा कर रहे हैं। सहनशीलता, ईमानदार, मधुवाणी, शिष्ट आचार-यह सब ऐसे सद्गुण हैं, जो व्यक्तित्व में चार चाँद लगाते और उसे आकर्षक बनाते हैं। ऐसे व्यक्ति ही सही अर्थों में सौंदर्य सम्पन्न कहे जाने के वास्तविक अधिकारी हैं। यदि रूप की दृष्टि से वे साधारण या कुरूप भी हों तो भी अपनी इन विभूतियों के कारण वे लोकप्रिय बनते और सम्मान पाते देखे जाते है। दूसरी ओर उन लोगों का समुदाय है, जो बाहरी चमक -दमक बढ़ाने में ऐसे संलग्न रहते हैं, मानों इसके बिना उनका काम चलने वाला ही नहीं। इसमें जितना समय, श्रम और धन खर्चा जाता है, उसे यदि सामूहिक रूप से कहीं अन्यत्र लगाया गया होता, तो उतने से ही एक अच्छा रचनात्मक आन्दोलन चलाया जा सकता था, पर उस मानसिकता को क्या कहा जाय, जो भ्रम को ही सत्य समझ बैठी हों? यह सच है कि कृत्रिम उपचारों से थोड़े समय के लिए अपनी काया को लुभावना बनाया जा सकता है, पर उसे चिरकाल तक स्थिर तो नहीं रखा जा सकता? आयु ढलने के साथ-साथ खूबसूरती मारी जाती है। इसके अतिरिक्त सुन्दरता बढ़ाने वाले उपचारों में खतरे भी कम नहीं है।
पिछले दिनों तक स्त्रियाँ अपने मोटापे को घटाने के लिए शरीर से चर्बी को कृत्रिम उपायों द्वारा खिंचवा लिया करती थीं। ‘लिपोसक्शन’ नामक यह प्रक्रिया इतनी कष्टकारक और खतरनाक होती थी कि कितनी ही महिलाओं की जान तक चली जाती। अब उसी जगह दूसरा उपाय अपनाया जाने लगा है। इन दिनों लड़कियों से लेकर महिलाओं तक ऐसी गोलियों का सहारा ले रही हैं, जिनके बारे में मान्यताएँ हैं कि वे चर्बी घटाती हैं। यद्यपि उनके गम्भीर पासर्व प्रभाव भी उपेक्षणीय नहीं है और चिकित्सक इस बात की बराबर चेतावनी देते हैं कि उन्हें लेना खतरनाक हो सकता है, इसके बावजूद उक्त दवाओं का वे निःसंकोच सेवन करती हैं। नतीजा यह होता है कि थोड़ी ही समय में उनके दुष्परिणाम सामने आने लगते हैं। अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि इनके नियमित सेवन से लड़कियों में जो लक्षण प्रकट होते हैं, अनिद्रा, स्मृति-लोक भूख का न लगना सुस्ती, अकर्मण्यता, एकाग्रता का अभाव आदि प्रमुख हैं; किन्तु इनके अतिरिक्त किन्हीं-किन्हीं में उन्मादग्रस्तता, दायित्वों के प्रति लापरवाही जैसे चिन्ह भी प्रत्यक्ष होते देखे गए हैं। चिकित्सकों का मत है कि यदि इनका प्रयोग कोई गर्भवती महिला प्रारम्भ करे तो विकलाँग सन्तान सुनिश्चित है। वे यह भी बताते हैं कि सेवनकर्ता इससे अवसाद जैसी स्थिति में पहुँच सकती हैं।
इतने खतरे उठाकर शरीर के वजन को कुछ कम कर भी लिया गया, तो इसे समझदारी नहीं कहा जा सकता। इस कीमत पर नयनाभिराम दीखने का प्रयास किस काम का, जो शरीर और मन को बीमार कर दे? इसे बुद्धि-विपर्यय के अतिरिक्त और क्या कहा जाए, कोई साधारण सोच वाला भी इस बात को नहीं स्वीकार कर सकता कि अस्वस्थ होकर भी सुन्दर दिखा जा सकता है। जब चेहरे पर मुर्दनी छायी हो, देह में सक्रियता और तत्परता का अभाव हो, तो उस मनहूसियत को सौंदर्य की संज्ञा भला कौन देगा? अर्थात् दोनों में से कोई भी तरीका निरापद नहीं। एक ओर कुआँ है, तो दूसरी ओर खाई; एक प्रयोक्ता को सचमुच में मुर्दा बना देता है, तो दूसरा उसे ‘जिन्दे मुर्दे’ की-सी दशा में पहुँचा देता है। इसलिए यह धारणा अब हमें बदलनी पड़ेगी कि चेहरे को आकर्षक और शरीर को सुगठित बना लेने भर से व्यक्ति सुन्दर बन जाता है। सुन्दरता की यह परिभाषा एकाँगी और अपूर्ण है।
विगत वर्ष शरीर-सौष्ठव के प्रति लोक धारणा जानने के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण किया गया। इससे जो निष्कर्ष सामने आया, वह चौंकाने वाला था। महिलाओं में ९. प्रतिशत और पुरुषों में ७५ प्रतिशत लोग ऐसे पाये गए, जो अपनी देहयष्टि और रूप-लावण्य से असंतुष्ट थे। ऐसा ही एक अध्ययन साइकोलॉजी टुडे’ पत्रिका के पाठकों के मध्य जून, १९९७ में किया गया। उसके चार हजार पाठकों से इस संबंध में विचार आमंत्रित किये गए कि वे अपनी शरीर-संगठन के बारे में किस प्रकार का मत रखते हैं। इनमें ५६ प्रतिशत नारियों और ४३ प्रतिशत नरों को अपने रूप-रंग और कद-काठी से गहरा असंतोष था। नारियों में इसके अनेक पहलू थे, यथा बढ़े हुए नितम्ब बढ़ा हुआ पेट, मोटापा, पीन पयोधर का अभाव, त्वचा का श्यामल वर्ण, अनाकर्षक मुखमण्डल आदि, जबकि मर्दों में सिर के बाल और बढ़ी हुई तोंद चिन्ता के मुख्य कारण देखे गए।
अमेरिकी मनःशास्त्री मारिया हचिन्सन अपनी कृति ‘ट्रांस्फोर्मिंग बॉडी इमेज’ में मनुष्य की सौंदर्य संबंधी समस्याओं का विश्लेषण करते हुए लिखती हैं कि उनमें से अधिकांश समस्याएँ अत्युक्तिपूर्ण चिन्तन का फल होती हैं। जब इस प्रकार के विचार मानवी मस्तिष्क में घर कर जाते हैं, तो फिर वह मान्यता बनकर काँटे की तरह चुभने और संताप पहुँचाने लगते हैं, जिसकी फलश्रुति मनोवैज्ञानिक परेशानियों के रूप में सामने आती है। मनःशास्त्र की भाषा में उसे ‘बॉडी डिस्मोरफिक डिसआर्डर’ अर्थात् बी. डी. डी. कहते हैं।
अमेरिका के बटलर अस्पताल के देहयष्टि कार्यक्रम की निर्देशिका एवं मूर्धन्य मनोवेत्ता राइट्स कैथरीन ए. फिलिप्स अपनी पुस्तक द् ब्रोकेन मिरर अंडरस्टेंडिंग एण्ड ट्रीटिंग बॉडी डिस्मोरफिक डिसआर्डर’ में लिखती हैं कि उपचार चाहे किसी भी प्रकार का क्यों न किया जाए, देह-लालित्य को बढ़ा पाना संभव नहीं। उलटे इस प्रकार का हर प्रयास और जटिलताएँ पैदा करता है। अस्तु, नारी समुदाय को इस भ्रान्त धारणा से बाहर आना चाहिए और उस शरीर-गठन पर संतोष करना चाहिए, जो प्रकृति-प्रदत्त है।
विशेषज्ञों का कथन है कि जो अपने कायिक भौंड़ेपन को क्षुधा नियमन द्वारा नियंत्रित करना चाहता हैं, वे वास्तव में अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ करती हैं, कारण कि बार-बार वजन के घटने-बढ़ने से अस्थि-संरचना पर उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और वे छिद्रयुक्त हो जाती हैं। वैज्ञानिक शब्दावली में इसे ‘आस्ट्रिरयोपोरोसिस’ कहते हैं।
सौंदर्य-शास्त्र के आचार्यों का अभिमत है कि जिस सौंदर्य की तलाश मनुष्य को अपने विकास के आरंभिक दिनों से है, वह वास्तव में कहीं अन्यत्र नहीं, उसके अपने ही अन्दर है। बाहर जो कुछ भी दिखलाई पड़ता है, वह उसी का विस्तार है। शाश्वत और सनातन भी वहीं है। बाह्य सुषमा तो क्षणभंगुर है। इसे दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो ऐसा भी कह सकते हैं कि “एकै साधे सब सधे” अर्थात् अपने अन्तराल को यदि समुन्नत-सुसंस्कृत और सौंदर्यशील बना लिया जाए तो बाहरी विद्रूपताएँ उसके आगे टिक नहीं सकेंगी। सम्पूर्ण संसार तब सरस-सुन्दर नजर आएगा और जिस तरह प्रकाश के समक्ष अन्धकार की सत्ता समाप्त हो जाती है, उसी प्रकार दृष्टिकोण के परिवर्तन के साथ सारा जगत हमें परिवर्तित और सुरम्य प्रतीत होगा। इसके लिए केवल प्रयास का स्थान बदलना पड़ेगा। उसे बाहर से भीतर लाना होगा, ताकि जो कुछ अब तक बाहर चलता रहा, वह सब अन्दर सम्पन्न हो सके। जितना समय, साधन और पुरुषार्थ शरीर को शोभावान और कान्तिवान बनाने के लिए नियोजित होता है, उसका एक तिहाई हिस्सा भी यदि अंतरंग को गलाने गढ़ने, सजाने-सँवारने में लग सके, तो मनुष्य न सिर्फ एक अद्वितीय प्राणी बन जाएगा, वरन् अप्रतिम सौंदर्य का स्वामी भी कहलायेगा।
सौंदर्य क्या है? आदमी की अपनी ही अभिव्यक्ति। किसी विद्वान ने ठीक ही कहा है कि अन्दर की अभिव्यंजना बदल जाने से सौंदर्यबोध भी बदल जाता है। मनुष्य की मूलसत्ता इतनी आकर्षक और आनन्ददायक है कि उससे आधिक सुन्दर और सुखद वस्तु की कल्पना की ही नहीं जा सकती फिर क्या कारण है कि हम उसकी खोज न करके उस रूप-रस में उलझे हुए हैं, जो अशाश्वत और नश्वर है? उत्तर एक ही है- संस्कारजन्य अनगढ़ता। इसे मिटाकर ही हम सच्चे अर्थों में सही सौंदर्यवान बन सकते हैं, इससे कम में नहीं।
गायत्री महामंत्र का वर्णन करते हुए ऋषियों ने उसे ‘तारक मंत्र’ बताया है और कहा है कि जो उसकी शरण पकड़ेगा, उसे भवबन्धनों से, भवसागर से, नरक से उबारने में देर न लगेगी। यह महाशक्ति उसे डूबने से बचा लगी और पार उतरने का उपक्रम बना देगी। शंख स्मृति में उल्लेख है-
गाय़न्न्या परवं नास्ति दिवेचेह च पावनम्। हस्तत्राणप्रदा देवी पतताँ नरकार्णवे॥
अर्थात् नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़कर बचाने वाली गायत्री के समान पवित्र करने वाली वस्तु इस पृथ्वी तथा स्वर्ग में और कोई नहीं है। आगे भी कहा गया है-
शत्रुतो न भयं तस्य दस्युतो क्वान राजतः। न शस्त्रानल तो यौधा कदाचित्संभविष्यति॥
अर्थात् न उसे शत्रुओं का भय रहता है, न डाकुओं का, न राजा का, न हथियार का, न अग्नि का- वह सब प्रकार के भयों से निर्भय हो जाता है।
वस्तुतः गायत्री को तारक मंत्र इसलिए कहा गया है कि यह मनुष्य में सन्निहित प्राणतत्त्व का अभिवर्द्धन, उन्नयन करता है, जैसा कि गायत्री मंत्र के शब्दार्थ से ही प्रकट है। ‘गय’ अर्थात् प्राण। ‘त्री’ अर्थात् त्राण करने वाली। जो प्राणों का परित्राण, उद्धार, संरक्षण करे- वह गायत्री। मंत्र शब्द का अर्थ है- ‘मनन’ - विद्या, विज्ञान, विचार जिसका करने से ‘त्राण’ हो, प्राणों की रक्षा हो। गायत्री मंत्र अर्थात् प्राणों का संरक्षण-परित्राण करने की विद्या। साधना-ग्रंथों में तारक मंत्र के नाम से इसका उल्लेख इसलिए भी हुआ है कि यह भवसागर से तैराकर पार करा देने वाला है। ‘तारक’ अर्थात् पार करा देने वाला। गहरे जलप्रवाह को पार करके निकल जाने को, डूबते हुए को बचा लेने को तारना कहते हैं। यह भवसागर ऐसा ही है जिसमें अधिकांश लोग डूबते हैं, तैरते तो कोई विरले ही हैं। जिस साधना से तरना संभव हो सके उसे ‘तारक’ कहा जाएगा। गायत्री महामंत्र में यह सामर्थ्य है, उसी से उसे ‘तारक मंत्र’ कहा जाता है।
प्रायः देखा जाता है कि इस संसार में अधिसंख्य व्यक्ति जीवित अवस्था में ही नरक की यातनाएँ सहते हुए ही समय बिताते हैं। आन्तरिक दुर्बलताओं, भौतिक प्रलोभनों के कारण सभी महत्वपूर्ण सफलताओं से वंचित रहते है। नरक क्या है? गयी-गुजरी आध्यात्मिक एवं भौतिक परिस्थितियों, मनःस्थितियों में पड़े रहना - जकड़े रहना, मानव जीवन में मिल सकने वाले उल्लास, आनन्द से वंचित रहना, मनोविकारों और उनकी दुखद प्रतिक्रियाओं के विविध-विधि कष्ट-क्लेश सहते रहना - यही तो नरक है। इस स्थिति से वही व्यक्ति छुटकारा पा सकता है जो प्राणवान होगा। प्राणतत्त्व का सम्पादन-अभिवर्द्धन करना ही इस स्थिति से छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय है। व्यक्तित्व की समग्र तेजस्विता का आधार यह प्राण ही है।
गायत्री महामंत्र में इसी प्रक्रिया का समस्त तत्त्वज्ञान सम्मिलित है। जो विधिवत उसका आश्रय ग्रहण करता है, उसे तत्काल अपने में समग्र जीवनीशक्ति का अभिवर्द्धन होता हुआ दृष्टिगोचर होता है। जितना ही प्रकाश बढ़ता है, उतना ही अन्धकार दूर होता है। इसी प्रकार आन्तरिक समर्थता बढ़ने के साथ-साथ जीवन को दुख-दारिद्र्य का घर और संसार को भवसागर के रूप में दिखाने वाले नारकीय वातावरण का भी अन्त होने लगता है।
गायत्री को तारक मंत्र इसीलिए कहा गया है कि वह साधक को नरक से उबार सकता है। कष्टकर और खेदजनक परिस्थितियों से पार कर सकता है। जिनको आन्तरिक दुर्बलताओं ने घेर रखा है, उनके लिए पग-पग पर दुख-दारिद्रय भरा नरक ही प्रस्तुत रहता है। विश्व में उन्हें कुछ भी आकर्षक एवं आनन्द दिखाई नहीं पड़ता। अपनी ही तृष्णाएँ, अपनी वासनाएँ बन्धन बनकर रोम-रोम को जकड़े रहती हैं और बन्दी जीवन की यातनाएँ सहन करते रहने को बाध्य करती है। चूँकि यह परिस्थितियाँ हमारी अपनी विनिर्मित की हुई होती हैं। दुर्बलताओं का प्रतिरोध न करके हमने स्वयं ही उन्हें अपने ऊपर शासन करने के लिए आमंत्रित किया होता है। अतः इस विधान का- स्थिति का उत्तरदायित्व भी अपने ही ऊपर है। जब हम मानवोचित पुरुषार्थ अपनाकर प्राण-प्रतिष्ठा के लिए तत्पर होते हैं, गायत्री उपासना का आश्रय लेते हैं, तो इन विपत्तियों से सहज ही छुटकारा मिल जाता है। डूबने वाली स्थिति बदल जाती है और हम तैरकर पार होने लगते हैं।
गायत्री उपासना का माहात्म्य बताते हुए शास्त्र कहते हैं - जपता जुह्नता चैव विनिपाते न विद्यते।” अर्थात् गायत्री जप और हवन करते रहने वाले का कभी पतन नहीं होता।
“सैषा प्रसन्ना वरदा नृणाँ भवति मुक्तये।”
अर्थात् वे भगवती गायत्री प्रसन्न होकर मनुष्यों को संसार सागर से मुक्त कर देती हैं।
दैनिक साधना, नित्य संध्याकर्म आदि में गायत्री मंत्र जप का साधारण विधान है। विशेष प्रयोजनों के लिए सकाम-निष्काम सजीव-निर्जीव अनुष्ठान एवं पुरश्चरण किये जाते हैं। यह सामान्य क्रम कहलाता है। इससे ऊँचे स्तर की साधना दो भागों में विभक्त है। एक को कहते हैं - ध्यान-धारणा और दूसरे भाग को कहते हैं- प्राण-प्रक्रिया इन्हीं दोनों का अवलम्बन कर साधक उच्च आध्यात्मिक भूमिका में विकसित होता है।
ध्यान-धारणा में भावना का प्राधान्य है। चित को एकाग्र, तन्मय एवं प्रेम-भावना से परिपूर्ण करके इष्टदेव के साथ एकात्मभाव, अद्वैत, विलय की स्थिति उत्पन्न करने में अन्तःकरण का-आत्मभाव का विकास होता है। लघुता - विभुता में परिणत होती है। पुरुष पुरुषोत्तम बनता है और नर से नारायण बनने का अवसर आ जाता है। आत्मसाक्षात्कार और ईश्वरदर्शन इसी स्थिति में होता है। सीमितता जब असीम में परिणत हो जाती है, छोटी सीमा में केन्द्रित ममत्व जब ‘वसुधैव कुटुम्बकम् का रूप धारण कर लेता है, तब अहंता मिटती है और निरहकृत व्यापकता में, पूर्णता में परिणत होने लगती है। इसी मार्ग पर चलते हुए जीव ब्रह्म बन जाता है। जब सब अपने लगने लगते हैं, तभी से समान प्रेम होता है, तो परमेश्वर का जड़-चेतन में सर्वत्र अपनी ही विशुद्ध आत्मा का परमात्मा का दर्शन होता हे। इसी ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त करने पर जीवनोद्देश्य पूर्ण हो जाता है। उसी भूमिका को आत्मसाक्षात्कार, ब्रह्मनिर्वाण, सच्चिदानन्द सुख, निर्विकल्प समाधि कहते हैं। इसी में जीव सब बंधनों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक परमपद का मोक्ष का अधिकार बनता है।
इस स्थिति को प्राप्त करने से पूर्व साधक को गायत्री की प्राण-प्रक्रिया की भूमिका से होकर गुजरना पड़ता है। सामान्य दैनिक साधना एवं सकाम पुरश्चरणों से आगे बढ़कर ध्यान-धारणा की उच्च भूमिका में प्रवेश करने से पूर्व एक मध्यवर्ती साधन के रूप में इस प्राण-प्रक्रिया का अपनाना भी अनिवार्य रूप से आवश्यक हो जाता है। आत्मिक भूमिका में प्रवेश करना शत्रुओं के चक्रव्यूह - किले को भेदने की तरह कठिन है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर रूपी षडरिपु इस कल्याण मार्ग को रोके बैठे रहते हैं। वासना और तृष्णा की दो पिशाचिनियाँ मनुष्य को दुराचारिणी वेश्या की तरह प्रलोभन-आकर्षण के सारे साज-सामान जुटाये बैठी रहती है। इस जंजाल में ही जीवात्मा को जन्म से मृत्यु तक बन्धनबद्ध होकर तड़पना पड़ता है। नरक के यह आठ दूत सामान्य स्तर के मनुष्य को - जीवात्मा को अपने चंगुल में ही दबोचे बैठे रहते हैं। वासना और तृष्णा रूप जादूगरनियाँ उस नट-मर्कट की तरह नचाती रहती है। षडरिपु-मनोविकार मित्र, बनकर, सगे-सम्बन्धी बनकर साथ-साथ छद्मवेश में रहते हैं और हर घड़ी शत्रुओं की करतूत करके जीव का लोक-परलोक बिगाड़ते रहते हैं। काम क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर की अंगुलियों के इशारे पर जीव नाचता रहता है। वे जो चाहते हैं सो कराते हैं, जिधर इच्छा होती है उधर भगाते हैं।
इस विडम्बना में फँसा हुआ असहाय मनुष्य आत्मकल्याण की बात ध्यान में आने पर भी कुछ कर नहीं पाता। श्रेय-साधन के लिए उसे न एक मिनट की फुरसत मिलती है और न एक पाई-पैसा खर्च करने की लोभ आज्ञा देता है। आत्मा को अपनी इच्छा-आकांक्षा दबाते -कुचलते, रोते - कलपते दिन बिताने पड़ते हैं। और एक-ढक करके यह बहुमूल्य मानव-जीवन यों ही नष्ट - भ्रष्ट समाप्त हो जाता है। तब अन्तकाल तक केवल दुर्गति और पश्चाताप का उत्पीड़न सहने, नारकीय कष्ट भोगने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं रह जाता है।
मनुष्यों में से अधिकांश को इसी स्तर का जीवन काटना पड़ता है। इससे उबरने के लिए अन्धी दुनिया की भेड़चाल से प्रतिकूल दिशा में चलना पड़ता है। इसके लिए आवश्यक साहस चाहिए। दुनिया अपने को मूर्ख बताये तो उसकी समझ को उपहास मानकर अपना पथ आप निर्धारित करने की क्षमता और दृढ़ता किसी विरले में ही होती है। यह मनस्विता और तेजस्विता, लगन और श्रद्धा जब तक अपने में न हो तब तक आत्मकल्याण के मार्ग पर देर तक और दूत तक नहीं चला जा सकता। श्रेयपथ पर किसी आवेश, उत्साह में थोड़ी दूर तक चले भी तो आलस्य, प्रमाद उसे अस्त-व्यस्त कर देते हैं। छोटी-मोटी कठिनाइयों के अवरोध समाने आ खड़े होते हैं। तथाकथित मित्र-परिजनों के स्वार्थ में राई-रत्ती कमी आती है तो वे भी लाल-पीले होते हैं। कई तो मूर्ख-सनकी पागल बताते और उपहास करते हैं। इन अड़चनों से मन ढीला पड़ जाता है और जो कुछ छोड़ा-सा साधनाक्रम का शुभारम्भ किया था, वह संकल्पशक्ति की दुर्बलता मानसिक शिथिलता के कारण थोड़े ही दिन में समाप्त हो जाता है।
इस परिस्थिति से निपटे बिना बाज तक कोई श्रेयार्थी आत्मोत्कर्ष के मार्ग पर आगे बढ़ नहीं सका। इसलिए इस अनिवार्य आवश्यकता की पूर्ति के लिए वह आन्तरिक साहस, आत्मबल एकत्रित करना ही पड़ता है। जो इन समस्त विघ्न-बाधाओं को परास्त करता हुआ, अंगद के पैर की तरह अपने निश्चय पर दृढ़ बने रहने में सहायता कर सके। यह आत्मबल-यह आन्तरिक साहस। प्राणशक्ति पर आधारित है। इसलिए साधक को ‘प्राण प्रक्रिया’ द्वारा अभीष्ट मनोबल, आन्तरिक दृढ़ता एवं अविच्छिन्न श्रद्धा का सम्पादन - संवर्धन करना पड़ता है। इसके लिए आवश्यक प्रयत्न करने का नाम ही ‘प्राण प्रक्रिया’ है।
आत्मोत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ने वाले साधक को अपने सामने आने वाली कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। आहार-विहार राजसी न हरने से शरीर में भी कुछ दुर्बलता आती है। उसकी पूर्ति प्राणबल से ही करनी पड़ती है। अभावग्रस्त, एकाकी, कष्टसाध्य, दूसरों से अपेक्षित जीवन खलता है और मन में उद्विग्नता उत्पन्न होती है। इसके समाधान के लिए भी प्राणबल चाहिए। फिर श्रेयार्थी का हृदय बड़ा कोमल हो जाता है। दूसरों का कष्ट देखकर मक्खन की तरह सहज ही पिघल जाता है। दया और करुणा से द्रवीभूत अन्तःकरण पीड़ित व्यक्ति की कुछ सहायता करना ही चाहता है।
भौतिक दृष्टि से दूसरों की सहायता धनी लोग कर सकते हैं, परन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से किसी की सहायता कर सकना प्राणधन से सम्पन्न लोगों के लिए, सिद्धपुरुषों के लिए आत्मिक शक्ति से सुसम्पन्न व्यक्ति के लिए ही संभव होता है। यह पूँजी केवल प्राणबल के आधार पर ही संग्रह की जा सकती है।
गायत्री की प्राण-प्रक्रिया वह वैज्ञानिक पद्धति है, जो साधक ही उपर्युक्त कठिनाइयों का हल और आवश्यकता की पूर्ति का साधन प्रस्तुत करती है। समर्थ साधक ही अपनी आन्तरिक क्षमता के द्वारा इस कठिन मार्ग पर देर तक अन्त तक चलता रह सकता है। इसलिए एक आवश्यक साधन को माध्यम समझते हुए श्रेयार्थी की प्राणशक्ति सम्पादित करने की साधना-पद्धति को अपनाना पड़ता है। इसी विधि-व्यवस्था का नाम प्राण-प्रक्रिया है।
इस अनन्त विश्व - ब्रह्माण्ड में समुद्र में भरी हुई अगाध जलराशि की तरह सूक्ष्म रूप में वह अपेक्षित प्राणशक्ति भरी पड़ी है। आकाश में वायु, ईथर, प्लाज्मा, विद्युत, परमाणु जैसी भौतिक शक्तियाँ भरी पड़ी है, जिसकी पुष्टि आधुनिक अनुसंधानकर्ता भौतिक-विज्ञानियों ने भली प्रकार कर दी है। इसी प्रकार अध्यात्म विद्या के ज्ञाताओं, तत्त्वदर्शियों को यह पता है कि इस निखिल ब्रह्माण्ड में एक प्रचण्ड प्राणशक्ति व्याप्त है, जिसे अध्यात्म की भाषा में ‘ब्रह्म ऊष्मा’ और विज्ञान की भाषा में ‘लेटेन्ट हीट’ कहते हैं। इसी के प्रभाव और प्रकाश से संसार की विविध प्रकार की हलचलें और गतिविधियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। परमाणु के इलेक्ट्रॉन, प्रोटोन, न्यूट्रॉन जैसे सूक्ष्म भाग इसी ऊष्मा से अपनी धुरी और कक्ष पर द्रुतगति से घूमते हैं। ग्रह-गोलकों की गतिशीलता का यही कारण है। वृक्ष - वनस्पतियों एवं जीव-जन्तुओं में सजीवता इसी प्रभाव से परिलक्षित होती है।
यह विश्वव्यापी प्राणशक्ति जहाँ जितनी अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाती है, वहाँ उतनी ही सजीवता दिखाई देने लगती है। मनुष्य में इस प्राणतत्त्व का बाहुल्य ही उसे अन्य प्राणियों से अधिक विचारवान, बुद्धिमान, गुणवान, सामर्थ्यवान एवं सुसभ्य-सुसंस्कृत बना सका है। इस महान शक्तिपुञ्ज का प्रकृति - प्रदत्त उपयोग करने तक ही सीमित रहा जाए, तो केवल शरीरयात्रा ही संभव हो सकती है और अधिकांश नरपशुओं की तरह केवल सामान्य जीवन ही जिया जा सकता है। पर यदि उसे प्राण-प्रक्रिया के माध्यम से अधिक मात्रा में बढ़ाया जा सके तो गयी - गुजरी स्थिति से ऊँचे उठकर उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँच सकना संभव हो सकता है।
गायत्री शब्द के अक्षरों का अर्थ-प्राण की संरक्षक अभिवर्धनी शक्ति है। यह महामंत्र उस महत्त्व प्राण की मात्रा साधक में बढ़ाता चलता है। जिस प्राणी में जितना आध्यात्मिक चुम्बकत्व है, वह उतनी ही अधिक मात्रा में इस महाप्राण को अपनी ओर आकर्षित कर उसे संग्रह कर सकता है। इस चुम्बकत्व का अभीष्ट मात्रा में उत्पादन गायत्री महाशक्ति की उपासना से होता है। गायत्री का सविता देवता उस प्राण का प्रचण्ड पुँज अपने में धारण किये हुए है। जिन्होंने इस महाशक्ति का आश्रय-सान्निध्य लाभ किया है, उनमें प्राणशक्ति की मात्रा दिन-दिन बढ़ती चली गयी है और वे इतना आत्मबल सम्पादित कर सके हैं। जिसके आधार पर बाह्य और आन्तरिक जीवन की समस्त आवश्यकताओं का समाधान किया जा सके।
प्राण-प्रक्रिया के साधना - विधानों को प्राणायाम कहते हैं। यों साधारणतया साँस को गहराई तक खींचने का ‘पूरक’ रोके रहने का ‘अंतः कुंभक पूरी तरह साँस बाहर निकालने को ‘रेचक’ और कुछ देर बिना श्वास के रहने का बाह्य कुंभक कहते हैं। इन चार स्तरों में बँटी हुई श्वासोच्छवास प्रक्रिया प्रक्रिया को प्राणायाम कहा जाता है। दैनिक साधन-उपासना के नित्य-कर्मों में इसी पद्धति का प्रयोग होता है, पर इतने मात्र से ही प्राणायाम को सीमाबद्ध नहीं मान लेना चाहिए। उसके प्रख्यात चौरासी प्रकार हैं। इसके अतिरिक्त भी अन्य ऐसे प्राण विधान हैं, जिनके माध्यम से शरीर के सूक्ष्म प्राणसंस्थानों, षट्चक्रों का जागरण होता है, वे विश्वव्यापी प्राणशक्ति के साथ जोड़ने और उस संपर्क से अपने को अत्याधिक दिव्यसामर्थ्य सम्पन्न बनाने में समर्थ होते हैं।
मोटे तौर पर प्राणायाम श्वास - उच्छ्वास की एक व्यायाम पद्धति है, जिससे फेफड़े मजबूत होते, रक्त संचार की व्यवस्था सुधारने होते, रक्त संचार की व्यवस्था सुधारने से समग्र आरोग्य एवं दीर्घजीवन का लाभ मिलता है। शरीरविज्ञान के अनुसार हमारे दोनों फेफड़े श्वास को अपने भीतर भरने के लिए यंत्र हैं, जिनमें भरी हुई वायु समस्त शरीर में पहुँचकर आक्सीजन प्रदान करती है और विभिन्न अवयवों से उत्पन्न हुई निकाल बाहर करती है। यह क्रिया ठीक तरह से होते रहने से फेफड़े मजबूत बनते हैं और रक्तशुद्धि का क्रम ठीक तरह चलता रहता है। पर देखा गया है कि लोग गहरी साँस न लेकर उथली, आधी-अधूरी श्वास-प्रश्वास से ही काम चलाते हैं, जिससे फेफड़ों का लगभग एक चौथाई भाग की काम करता है, शेष तीन-चौथाई भाग की काम करता है, शेष तीन - चौथाई भाग लगभग निष्क्रिय पड़ा रहता है। शहद की मक्खी के छत्ते की तरह फेफड़ों में प्रायः सात करोड़ तीस लाख स्पंज जैसी एल्व्योलाई - कोष्ठक होते हैं। साधारण हल्की साँस लेने पर उनमें से लगभग दो करोड़ में ही प्राणवायु पहुँचती है। शेष साढ़े पाँच करोड़ कोष्ठकों का कोई उपयोग न होने के कारण वे निष्क्रिय पड़े रहते हैं। इस निष्क्रिय पड़े हुए भाग में जड़ता और गंदगी जमने लगती है, परिणामस्वरूप टी. बी. ब्रोंकाइटिस, खाँसी, प्लूरिसी जैसी घातक बीमारियों के विषाणु अपना अड्डा जमा लेते हैं। फेफड़ों की कार्य पद्धति का अधूरापन रक्त-शुद्धि पर प्रभाव डालता है, जिससे हृदय कमजोर पड़ता है और अकाल मृत्यु का कोई न कोई बहाना सामने आ खड़ा होता है। आँकड़े बताते हैं कि प्रतिवर्ष हजारों लोग प्रायः फेफड़े और हृदय की बीमारी के कारण ही मरते हैं। इसका प्रमुख कारण पूरी और गहरी साँस का न लेना ही है।
गहरी श्वास-प्रश्वास लेने की साधारण प्राणायाम प्रक्रिया को फेफड़ों का अच्छा व्यायाम कहा जा सकता है। उससे स्वास्थ्य - सुधार और दीर्घजीवन की संभावना निश्चित रूप से बढ़ती है। विभिन्न रोगों का निवारण केवल विशेष प्रकार के प्राणायामों द्वारा किया जा सकता है। प्राण पद्धति अपने आप में एक सर्वांगपूर्ण आरोग्य संवर्द्धन एवं रोग निवारण की समग्र पद्धति है। किन्तु स्वास्थ्य-संवर्द्धन ही तो प्राणायाम का मुख्य उद्देश्य नहीं है। यह तो एक छोटा-सा प्रारम्भिक लाभ मात्र है। उसका वास्तविक लाभ तो मानसिक एवं आध्यात्मिक होता तो मानसिक एवं आध्यात्मिक होता है। कामुकता, क्रोध, चिन्ता, निराशा, भय, उद्वेग, आवेश जैसे मनोविकारों का शमन निर्धारित प्राणायामों द्वारा आसानी से किया जा सकता है। मस्तिष्क की क्षमता बढ़ाने, स्मरणशक्ति, कुशाग्रता, सूझ-बूझ दूरदर्शिता, सूक्ष्म निरीक्षण, धारणा प्रज्ञा, मेधा आदि मानसिक क्षमताओं - विशेषताओं का अभिवर्द्धन प्राणायाम द्वारा किया जा सकता है। चंचल मन का निरोध एवं एकाग्रता-सम्पादन में भी इस प्रक्रिया की बढ़ी-चढ़ी भूमिका है। आन्तरिक मलीनता-कुसंस्कारों को धोने, शुद्ध करने में और अन्तःकरण में सतोगुणी सत्प्रवृत्तियों में अभिवर्द्धन का आध्यात्मिक प्रयोजन भी प्राणायाम से सिद्ध होता है। षट्चक्र बेधन, कुण्डलिनी जागरण एवं शरीर तथा मन में प्रसुप्त पड़े हुए अनेक सूक्ष्म शक्ति-संस्थानों का उन्नयन प्राण की प्रयोग प्रक्रियाओं पर ही निर्भर है। इनका विज्ञान तथा विधान अपने आप में एक सर्वांगपूर्ण शास्त्र है। प्राचीनकाल के तत्त्ववेत्ता ऋषि-मनीषी इस विधा को भली-भाँति जानते थे और विश्वव्यापी प्राणतत्त्व को अपने अन्दर अभीष्ट मात्रा में धारण कर उन विभूतियों को प्राप्त करते थे, जो ऋद्धि - सिद्धियों के नाम से विख्यात हैं।
यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि गहरी श्वास को खींचना और छोड़ना तो मात्र ‘डीप ब्रीदिंग’ भर है। यह तो आरम्भिक प्रक्रिया भर है। आगे चलकर उसके अनेक प्रयोग और प्रकार बन जाते हैं। चौरासी प्रकार के प्राणायामों के विधान एक से एक विलक्षण प्रकार के हैं। फिर कितने ही उनमें से मानसिक और आध्यात्मिक ही हैं जिनमें साँस खींचने और छोड़ने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है। उनमें प्राणशक्ति का आकर्षण और विकर्षण ही प्रधान रहता है। प्राण का संचय होने से समाधि लगती है। और मनुष्य काल को वश में करके मनचाही अवधि तक जीवित रह सकता है। वह चाहे तब सरलता से प्राण त्याग कर सकता है और महाभारत के भीष्म पितामह की तरह इच्छामृत्यु का वरण कर सकता है। शरीर और मन प्राण की शक्ति से चलते हैं। प्राण पर नियंत्रण करने की विधि जानने वाला अपने शरीर और मन की प्रत्येक क्रिया पर नियंत्रण रख सकने की क्षमता से सुसम्पन्न हो जाता है। इस प्रकार के सभी विधिविधान प्राणायाम विद्या के अंतर्गत आते हैं। साँस खींचने - छोड़ने वाला रेचक - पूरक कुंभक विधान तो उस महाप्राण विद्या का सबसे आरम्भ का एक हल्का-फुल्का शुभारम्भ मात्र है।
गायत्री प्राण विद्या है। प्राण के साधन से हम शरीर, मन और आत्मा की दृष्टि से परिपुष्ट और समुन्नत बनते हैं। यह विकासक्रम हमारी अपूर्णताओं को क्रमशः दूर करते हुए पूर्णताओं से लाभान्वित करता है और हम अपनी सम्पूर्ण अपूर्णताओं से छुटकारा पाकर पूर्णता प्राप्ति का जीवन लक्ष्य प्राप्त कर सकने में सफल हो जाते हैं
गायत्री उपासना का मध्यवर्ती मार्ग है - प्राणशक्ति का संरक्षण - संवर्द्धन। इससे वह समर्थता आती है, जिसके बल पर ध्यान-धारणा में सफलता प्राप्त की जा सके। प्राणशक्ति के मूल्य पर ही संसार की विभिन्न भौतिक सम्पदाएँ देव आध्यात्मिक विभूतियाँ प्राप्त की जा सकती है। इसी के द्वारा आत्मकल्याण का, आत्मोत्कर्ष का जीवनोद्देश्य प्राप्त होता है। उसी के द्वारा बन्धन से मुक्ति का मोक्ष का परम पुरुषार्थ सफलतापूर्वक सम्पन्न होता है। समग्र सफलता के लिए समग्र बलिष्ठता सम्पादित करनी पड़ती है और यह प्रयोजन गायत्री की प्राणमय कोष की समर्थता संपादन करने वाली साधन के द्वारा ही पूरा होता है। साधना के उच्च सोपानों पर आगे बढ़ने के इच्छुक हर साधक को इस प्रक्रिया को जानना व अपनाना ही चाहिए।
अध्यात्मशास्त्र कहते हैं कि जीव जिस ब्रह्म से परमात्मचेतना से प्रादुर्भूत हुआ है, वह उसी के पास लौट जाने के लिए प्रयत्न कर रहा है और देर - सबेर में अपने उद्गम तक जा पहुँचने का लक्ष्य प्राप्त कर लेगा। अध्यात्म का यही सिद्धान्त विश्व-ब्रह्माण्ड में संव्याप्त सम्पूर्ण ग्रह-गोलकों पर पूर्णतया लागू होता है। विज्ञान कहता है कि सभी ग्रह-नक्षत्र एक महाअणु के विस्फोट के बिखराव मात्र है। जड़ कहे जाने वाले पदार्थ की मूल सत्ता परमाणुओं के रूप में अपनी धुरी पर - कक्षा में तथा अग्रगामी क्रम से निरन्तर आगे ही बढ़ने का प्रयत्न कर रही है। ग्रह-नक्षत्र अपने केन्द्रीय तारकों, की तारक-महातारकों की परिक्रमा कर रहे हैं। इतना ही नहीं वे सब इस निखिल आकाश में फैलते भी जा रहे हैं। भौतिक शास्त्री कहते है कि यह फैलाव गोलाई का परिभ्रमण कर अपने स्थान में लौट आने के सिद्धान्त का अनुगमन करेगा और जहाँ से चला था, वहाँ जाकर सुस्तायेगा, चाहे इसमें कितना ही समय क्यों न लगे।
यही तथ्य जीवात्मा के साथ भी जुड़ा हुआ है। जीवात्मा चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करता रहता है। इस परिभ्रमण - परिचय को पूरा करने के उपरान्त वह फिर मनुष्य योनि को प्राप्त करता है। मनुष्य को यह विशेष अवसर मिला हुआ है कि वह चाहे तो साधना-पुरुषार्थ के बल पर इस परिक्रमापथ के कुचक्र को तोड़कर अपने उद्गम केन्द्र परमात्मा में लीन-लय हो सकता है।
एक ही परमात्मसत्ता के एक से अनेक बनने, एक ही ब्रह्माण्ड से अनेक पिण्ड-अण्डों की, ग्रह-नक्षत्रों से लेकर अणु-परमाणुओं की उत्पत्ति को न केवल अध्यात्म मानता है, वरन् विज्ञान भी उसी बात को स्वीकार करता है।
अनुसंधानकर्ता, अन्तरिक्ष विद्या-विशारदों ने निहारिकाओं, तारामंडलों और ग्रह-उपग्रहों के बारे में कई प्रकार के निष्कर्ष और प्रतिपादन प्रस्तुत किये हैं। दार्शनिक काण्ट, वैज्ञानिक न्यूटन, चैम्बरलिन, मोल्टन, जेम्सजीन्स जैफरे, हाॅएल आदि के सिद्धान्तों का थोड़ा हेर-फेर के साथ निष्कर्ष यह है कि सृष्टि के आदि में एक तारे से दो तारे हुए। उन दो तारकों की आपसी खींचतान एवं लड़-झगड़ के कारण उनके खण्ड-उपखण्ड होते चले गये। वे घूमे, सिकुड़े, सघन हुए, हलचलों में उतरे और ग्रह-उपग्रहों का विशाल ग्रह - परिवार बनकर खड़ा हो गया।
सौरमण्डल के ग्रहों का आकार, सूर्य से उनका अन्तर एवं उनके सूर्य का परिभ्रमण में लगने वाले समय का विवरण प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि अपने सूर्य जैसे लगभग पाँच सौ करोड़ ताराओं, सौरमण्डल तथा अकल्पनीय विस्तार वाले धूल तथा गैस वर्तुलों के मेघ मिलकर एक ‘आकाश गंगा’ बनती है। ऐसी दस करोड़ से अधिक आकाशगंगाओं तथा उनके मध्य के अकल्पनीय आकाश को एक 'ब्रह्माण्ड' कहा जाता है। यह ब्रह्माण्ड कितने हैं? इस प्रश्न के उत्तर में यही प्रश्न पूछा जा सकता है कि किसी रेगिस्तान में रेत के कण कितने है? मनुष्य की बुद्धि एवं कल्पना इस स्थान पर थक जाती है। इसलिए विज्ञान ने उसे अनन्त कहा है। अध्यात्मवाद ने इस समस्त रचना को ही नहीं, उसके स्वामी, नियन्ता, रक्षक को भी ‘अनन्त’ नाम से संबोधित किया है।
अनन्त अन्तरिक्ष में स्थित ग्रह-गोलकों की विशालता और उनकी परिभ्रमण कक्षा के विस्तार की कल्पना करने से पूर्व हमें अपने सौरमण्डल के प्रमुख अधिपति सूर्य पर दृष्टि डालनी चाहिए और देखना चाहिए कि असंख्य सौरमण्डलों में से छोटा-सा तारा अपना सूर्य-आदित्य कितना विशाल है और अपने साथ किन-किन बाल-परिवारों को लिए दिन-रात फिरता है।
मोटी दृष्टि से देखने में सूर्य, हैं, पर उनका यथार्थ स्वरूप एवं विस्तार विदित होने पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। पृथ्वी पर खड़े होकर देखने पर दिन में सूर्य और रात में चन्द्रमा दोनों ही लगभग एक से गोलाई के लगते हैं, पर इनमें अन्तर बहुत है। चन्द्रमा का व्यासमान २१६. मील है, जबकि सूर्य का घेरा ८,६४... मील का है। इस सूर्य के इर्द-गिर्द भी पीले गुलाबी रंग का एक वलय-सा दिखाई पड़ता है। १.-१५ हजार किलोमीटर की इस पट्टी को सूर्य का ‘क्रोमोस्फियर अर्थात् वर्णमण्डल कहते हैं। लगभग दस हजार डिग्री तापमान के इस क्षेत्र में कभी-कभी भयंकर और - ज्वालाएँ उछलती रहती हैं। इनकी ऊँचाई दस हजार किलोमीटर तक उभारती देखी गयी है।
अपनी धरती से १४.१८ करोड़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित १३,८४... कि. मी. व्यास वाले सूर्य की पूर्ण दृश्यमान सीमा ८७.५ लाख कि. मी. है। मंदाकिनी के केन्द्र से इसकी दूरी लगभग ३२... प्रकाशवर्ष है। प्रकाशवर्ष वह दूरी है जिसे प्रकाश शून्य में २९९,७९,२.५ कि. मी. प्रति सेकेण्ड अथवा १,८६,२६२ मील प्रति सेकेण्ड की गति के आधार पर सूर्य और पृथ्वी के बीच की औसत दूरी को तय करती है। यह वह दूरी है जो आजकल विज्ञानजगत में सौरमण्डल की दूरियों को सुनिश्चित करने के लिए स्थिर मुख्य इकाई के रूप में प्रयुक्त होती है। सूर्य और उसके पारिवारिक सदस्य-तारे सामान्यतया एक गोलाकार कक्ष में २५. - कि. मी. प्रति सेकेण्ड की औसत से मंदाकिनी के केन्द्र के चारों ओर परिभ्रमण करते हैं इन गति से केन्द्र के चारों ओर एक चक्कर पूरा करने में सूर्य को २५ करोड़ वर्ष लगते हैं। यह कालावधि ‘ब्रह्माण्ड वर्ष’ कहलाती है।
इस तरह सूर्य विराट की परिक्रमा ढाई सौ कि. मी. प्रति सेकेण्ड की दर से पच्चीस करोड़ वर्ष में पूरी करता है। वह स्वयं भी अपनी परिक्रमा कर अपने स्वत्व की रक्षा करता है, साथ ही विराट परमात्मा के प्रति अपनी निष्ठा की अभिव्यक्ति के लिए वह अपने समस्त सौरपरिवार के साथ दण्डवती परिक्रमा के लिए निकला हुआ है। वह अपनी धुरी का चक्कर २५ दिन ७ घण्टे और ४८ मिनट में लगाता चल रहा है। सौरमण्डल महासूर्य की परिक्रमा करते हुए ४,३२,... वर्ष पश्चात उसी स्थान पर लौटकर आता है। यदि उस पुराने समय की ग्रह गणना किसी के पास सही हो तो द्वितीय आवृत्ति में भी वह ज्यों की त्यों मिलेगी। इसमें तनिक-सा भी अन्तर नहीं होगा। वर्ष गणना का अभी पूर्णतया सही हिसाब नहीं बन सकता है। वर्ष और दिन की पूर्ण संगति न बैठने से कोई पंचाँग सर्वांगपूर्ण नहीं बन सकता। जो अन्तर पड़ता है, उसे सुधारने के लिए बार-बार घट-बढ़ करनी पड़ती है। फिर भी वह कमी पूरी नहीं होती और जितना समय बीतता जाता है, उतना ही पूर्व निर्मित ग्रह-गणित पिछड़ जाता है और नये सिरे से उसकी गणना ग्रहों की स्थिति देखकर सही करनी पड़ती है। सही खाँचा ४,३२,... वर्ष बाद ही बैठता है। इसलिए इस अवधि को एक युग माना गया है। वर्तमान युग की गणना भी इतने ही वर्ष के आधार पर कही गई है।
मनुष्य की सत्ता और महत्ता सूर्य के समान ही असीम है और जब तक पूर्णता को नहीं प्राप्त कर लेता है, तब तक वह चौरासी लाख योनियों में भटकता रहता है। फिर इस भटकाव में उसे युग-युगान्तर ही क्यों न लग लाएँ। जीवात्मा का वास्तविक विस्तार विश्व-ब्रह्माण्ड के ही समकक्ष है। व्यक्ति का काय-कलेवर सीमित हो सकता है, पर उसका प्रभाव-परिणाम असीम क्षेत्र को आच्छादित करता है। संपर्क में आने वाले प्राणी तथा पदार्थ तो प्रखर व्यक्तित्व की ऊर्जा से प्रभावित होते ही हैं, उनकी संकल्प-शक्ति एवं विचारधारा आकाश में प्रवाहित होकर असीम क्षेत्र पर अपना प्रभाव डालती है। इस तरह सूर्य की क्रिया-कलाप भी आत्म-सत्ता के समान ही है।
सूर्य के प्रकाश का हम बहुत छोटा अंश ही देख और समझ पाते हैं। अपनी पृथ्वी की ओर उसकी न्यूनतम किरणें ही आती हैं। वे बहुत अधिक मात्रा में तो अन्य दिशाओं में ही प्रवाहित होती रहती हैं। साम्बपुराण ६-५७-५८ में कहा गया है-
यथा प्रभाकरो दिपो गृहमध्ये व्यवस्थितः। पार्श्वेनोर्ध्वमधश्चैव तमो नाषयते समम्॥
तद्वत्सहस्त्रकिरणो ग्रहराजो जगत्पतिः। त्रीणि रश्मिशतान्यस्य भूर्लोकं द्योतयन्तिः॥
अर्थात् जिस प्रकार गृह के मध्य में जलता हुआ दीपक चारों ओर सम्पूर्ण घर को प्रकाशित करता रहता है, उसी प्रकार अखिल जगत के अधिपति सूर्य अपनी हजारों किरणों से ब्रह्माण्ड के ऊपर - नीचे के भागों को प्रकाशित करते हैं। सूर्य की ये सहस्र रश्मियाँ स्थायी प्रभाव वाली होती है। इन्हें तीनों भागों में बाँटा गया है ‘- (१) अमृता या वृद्धि सर्जना की चार सौ - इनके भी चार खण्ड चन्दना, साध्या, कतूना, अकूतना है। यह किरणें वर्षाकाल की हैं। (२) हिम सर्जना या चन्द्रा की तीन सौ किरणें जिनके भी दृश्या, मेध्या, बाह्या और ह्दिन्यः- यह चार भाग हैं। (३) तीसरी प्रकार की तीन सौर रश्मियाँ धर्म सर्जना या शुक्ला की हैं। इनके भी शुक्ला, कुहका, गावः, विश्वभृतः चार भाग हैं। इनमें पहली ४.. किरणें वर्षाकाल की, दूसरी ३.. किरणें शीतकाल की है। तीसरे प्रकार की ३.. किरणें ग्रीष्मोत्पादक हैं। इस तरह सूर्य की सब किरणें बारह महीनों से बँटी हुई एक वर्ष में ऋतुओं और जलवायु को बदलती हुई पृथ्वी और उसके निवासियों को प्रभावित करती रहती हैं।
सूर्य की उक्त हजार रश्मियों में सात मुख्य हैं। ये हैं (१) सुषुम्ना (२) सुरादना (३) उदन्वसु - संयद्वसु (४) विश्वकर्मा (५) उदावसु (६) विश्वरुचा - अखराट (७) हरिकेश। यह सातों रश्मियाँ ही समस्त ग्रह - नक्षत्र मण्डल की प्रतिष्ठापिका मानी गयी हैं। इनमें एक से छह तक क्रमशः चन्द्रमा, मंगल बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि का निर्माण व उनसे जुड़े हुए प्राणि अभ्युदय का कार्य सँभालती हैं। सातवीं ‘हरिकेश’ नाम सूर्य-रश्मि से आकाश के सम्पूर्ण नक्षत्र मण्डल का उद्भव माना गया है। शंकरभाष्य के अनुसार यह सूर्य-रश्मियाँ ही सम्पूर्ण प्राणियों की प्राणशक्ति का स्रोत हैं। वह दिव्य अमृत-रस से प्राणियों को जीवन प्रदान करती हैं। गायत्री त्रिष्टुप, जगती, अनुष्टुप, बृहती, पंक्ति, उष्णिक ये सप्त व्याहृतियाँ सूर्य की सात किरणों से उत्पन्न हुई हैं। इन्हीं के द्वारा ज्ञानचेतना उपलब्ध होती हैं।
जिस प्रकार धरती पर सूर्य के समस्त प्रकाश का एक बटा दस लाखवाँ भाग ही आता है। शेष जो भाग दूसरी दिशाओं में बिखरता रहता है, उसकी सीमा का हमें ज्ञान तक नहीं। उसी प्रकार परमात्मा का एक स्वल्प सामर्थ्य-अंश ही मनुष्य को - अपने भूलोक को मिला है। उसकी समग्र सत्ता जो अगणित ब्रह्माण्डों में बिखरी पड़ी है, वह इतनी असीम है कि उसे ठीक प्रकार सोच सकना भी अपने लघुकाय मस्तिष्क के लिए संभव नहीं। फिर भी अपनी सत्ता को जाना-समझा ही जा सकता है। अपने आत्मस्वरूप का यदि बोध हो सके तो प्रतीत होगा कि परमचेतना की एक छोटी किरण होते हुए भी मानवी सत्ता कितनी प्रचण्ड शक्तिसम्पन्न है। इस प्रचण्डता का स्वरूप और उपयोग यदि समझा जा सके तो पुरुष से पुरुषोत्तम, नर से नारायण बनने की संभावना मूर्तिमान् होकर सामने आ सकती है।
सृष्टि के कण-कण में रंगों का अद्भुत संसार बिखरा पड़ा है जो मनुष्य जीवन में रंग भरकर उसे सरस एवं जीवंत बनाए हुए हैं। प्रकृति के संवर्ग में ये रंग ही जिन्दगी में सतरंगी छटा-सा सृजन करते हैं। रंगों के अभाव में जीवन की कल्पना करने पर घोर अंधकार के सिवा और कुछ नहीं बचता। इस रंगों के रंगीन संसार की अपनी भाषा व अपना विज्ञान है, जिसे समझकर हम अपने व्यक्तित्व को सँवार सकते हैं। रंगों की अपनी प्रकृति व गुणधर्म है, जिसे यदि समुचित रीति-नीति से अपनाया जा सके तो अपने शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक जीवन को अधिक अवस्थित-सन्तुलित एवं पुष्ट बनाया जा सकता है।
रंगों का प्रकाश से अभिन्न सम्बन्ध है। इसमें भी सूर्य प्रकाश का बसे प्राकृतिक एवं विशुद्ध क्षेत्र है। सात रंग की सात किरणों का सृजेता होने की वजह से इसे सप्तरश्मि भी कहा गया है। प्रकाश सात रंगों से मिलकर बनता हैं। जिन्हें हम प्रिज़्म के माध्यम से देख सकते हैं। भौतिक विज्ञान में इसके लिए एक विशिष्ट शब्द है। ‘विबग्योर’, जो क्रमशः बैगनी, आसमानी, नीला, हरा, पीला, नारंगी और लाल रंग को प्रकट करता है। सत्य तो यह है कि किसी वस्तु का वास्तव में अपना कोई विशिष्ट रंग नहीं होता है। उसका रंग क्या होगा? यह उस पर पड़ने वाले प्रकाश के परावर्तन पर निर्भर करता है। जब किसी वस्तु पर प्रकाश की किरणें पड़ती है तो व उक्त वस्तु से परावर्तित होकर हमारी आँखों से टकराती है और हमें यह वस्तु दिखाई देती है। अब वस्तु का रंग इस बात पर निर्भर करता है कि वह प्रकाश में विद्यमान सात रंगों में से किस को अवशोषित करती है और किसको परावर्तित। जब वस्तु सभी रंगों को अवशोषित करती है तो वह काली दिखाई देती है। जब वह सभी रंगों को परावर्तित करे तो वह सफेद दिखाई देती है। जब वह किसी एक रंग को परावर्तित कर तो वैसे रंग की दिखाई पड़ती है।
इनमें से प्रत्येक रंग की अपनी अलग-अलग भाषा है। वे किसी विशेष गुणधर्म को प्रकट करते हैं व सभी की अपनी-अपनी प्रभावोत्पादक शक्ति होती है। ये रंग इनको पसन्द करने वाले व्यक्ति के व्यक्तित्व पर भी समुचित प्रकाश डालते हैं। उदाहरण के लिए, लाल रंग उग्रता का प्रतीक है। यह उग्र विचार, उग्र प्रेम एवं तीव्र भावुकता को व्यक्त करता है। यह रंग शौर्य, वीरता, संघर्ष एवं उत्साह को भी प्रकट करता है। प्राचीनकाल में सैन्य झण्डे और वस्त्र लाल रंग के होते थे। क्रान्तिकारी उग्र आन्दोलनों में भी लाल रंग के प्रतीक झण्डों का उपयोग अधिक हुआ करता है। इसी तरह तीव्र भावुकता व्यक्त करने के उद्देश्य से शादी-विवाह में दुल्हन को लाल रंग के वस्त्र पहनाए जाते हैं। लाल रंग को शुभ भी माना गया है। लाल रंग के प्रति लगाव रखने वाले व्यक्ति उग्र, महत्त्वाकाँक्षी व उत्साही होते हैं। साथ ही इनमें शीघ्र उत्तेजित होने व झगड़ालू प्रवृत्ति की भी सम्भावना बनी रहती है। वे दृढ़ता के साथ कार्य करने में विश्वास रखने वाले होते हैं। वे जो सोचते हैं व जो काम हाथ में लेते हैं, उसे पूरा करके ही दम लेते हैं।
नारंगी रंग को जीवनशक्ति, ऊर्जा, त्याग और बलिदान का प्रतीक माना गया है। यह वास्तव में लाल और पीले रंग के संयुक्त प्रभाव को प्रकट करने वाला है। इसीलिए इसे प्रफुल्लता, ताजगी, शक्ति, ऊर्जा और उत्साह का प्रतीक माना गया है। नारंगी रंग को पसन्द करने वाला व्यक्ति खुले दिमाग तथा तीक्ष्ण बुद्धि का स्वामी होता है। प्रत्येक कार्य पूरे मनोयोग से करता है। प्रायः आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी होता है। प्रायः लेखकों, कवियों तथा कल्पनाशीलों व विचारवानों को यह रंग पसन्द होता है। ऐसे व्यक्ति ज्यादातर स्वप्नद्रष्टा व जीवन के प्रति आशावान् होते हैं।
पीला रंग ज्ञान, आध्यात्मिकता व कुलीनता आदि को व्यक्त करता है। इस रंग को भी शुभ माना गया है। पर्व-त्योहार धार्मिक अनुष्ठान आदि में इसका उपयोग विशेष रूप से किया जाता है। किन्तु यदि पीला रंग साफ एवं स्वच्छ न होकर मैलापन लिये हो तो हृदय के उत्साह को मार देता है। पलायनवाद, कायरता व दुर्बुद्धि को भी जगाता है। पीले रंग के प्रति लगाव रखने वाले व्यक्ति की बुद्धि व स्मरणशक्ति तीव्र होती है। वे कड़ी मेहनत में विश्वास रखते हैं, साथ ही हँसमुख व मिलनसार होते हैं, परिस्थितियों से घबराते नहीं। प्रत्येक स्थिति के अनुसार ढलने की उनमें अद्भुत क्षमता होती है। ऐसे व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में आशावादी होते हैं।
हरे रंग को द्वैत रंग अर्थात् दो विचारों वाला रंग कहा गया है। हल्का हरा रंग बौद्धिक क्षमताओं को सक्रिय कर शान्ति देता है, जबकि हरा रंग यदि मैलापन लिए हो तो मन के विचारों को दूषित कर देता है। गहरे हरे रंग को शक, ईर्ष्या, द्वेष आदि से जोड़ा जाता है। विक्षोभ, थकान, ताजगी, चंचलता, स्फूर्ति व आराम दोनों का अद्भुत संगम इस रंग में देखा जाता है। यह रंग वातावरण को शान्त बनाने में सहायक होता है। जो लोग हरा रंग पसन्द करते हैं वे प्रकृति - प्रेमी होते हैं। वे प्रकृति के सान्निध्य में शान्ति व सुरक्षा की अनुभूति करते हैं।
नीला रंग एक आध्यात्मिक रंग है। यह शान्ति, सहिष्णुता, शुद्धता, सात्विक स्नेह और वैराग्य का प्रतीक है। यह गहराई, विशालता और अनवरत शान्ति को दर्शाता है। आसमान, सागर एवं शान्त झील के सान्निध्य में इस रंग की छटा निहार सकते हैं। इसको पसन्द करने वाले स्थिरचित्त और शान्तिप्रिय होते हैं, जीवन के किसी भी पहलू के प्रति गम्भीर दृष्टि रखते हैं, और किसी भी समस्या को शान्तिपूर्ण सुलझा लेते हैं। इनकी बुद्धि तीक्ष्ण व हृदय कोमल होता है। अपने हितों में ये समर्पित व ईमानदार होते हैं।
गहरा नीला रंग, हल्के नीले रंग के विपरीत प्रवृत्तियों को इंगित करता है। इस रंग के चितेरे को लगता है कि वह पूरे संसार में अकेला है। परिणामतः वह अपने में मग्न विलीन रहता है। उसे एकान्तवास प्रिय होता है। प्रायः उसमें आत्मविश्वास की कमी रहती है। बाहरी दुनिया, बाह्याडम्बरों एवं बनावटीपन से उसे घृणा होती है।
बैंगनी रंग रहस्यात्मक आचरण वालों को बेहद प्रिय होता है। इनके व्यवहार एवं स्वभाव में एक विचित्र-सी रहस्यात्मकता जुड़ी होती है। इन्हें शीघ्र पहचानना बड़ा कठिन होता है।
सफेद रंग शाँत स्वभाव, सादगी, विचारों की उच्चता, तेजस्विता और सात्विकता का प्रतीक है। इस रंग के प्रति लगाव वाले व्यक्तियों में जटिलता नहीं पायी जाती है। वे शान्त, सात्विक और स्पष्टवादी प्रवृत्ति के होते हैं। आदर्शवादी होते हैं। कभी उत्तेजित नहीं होते और लड़ाई-झगड़े से बचकर रहना चाहते हैं। धूसर, मटमैला रंग गम्भीरता, विनम्रता, सौजन्यता और लज्जा के साथ - साथ कर्मठ - क्रियाशीलता का प्रतीक है। किन्तु बाह्य उत्प्रेरक न मिले तो यह निर्बल रंग है। भूरा रंग एकता की भावना, ईमानदारी, अच्छाई, भलाई और उच्चभावना के साथ सहयोग का भाव जगाता है। इस रंग को पसन्द करने वाले व्यक्ति अपने मित्रों, परिवारजनों व कार्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित होते हैं। यह रंग स्थिरता और अच्छे व्यवहार का संकेत देता है।
काले रंग को भारतीय परम्परा में अशुभ रंग माना गया है। धार्मिक अनुष्ठानों में इसका प्रयोग वर्जित है। यह रंग शोक दुःख जैसे भाव जगाने वाला है। यह विस्तार व विकास के विपरीत है तथा संकीर्ण मनोवृत्ति का द्योतक है। यह रंग व्यक्ति को स्वार्थी, आत्मकेन्द्रित, पलायनवादी व अन्तर्मुखी बनाता है। साथ ही निराशा व पतन को दर्शाता है। यदि इसे अन्य अच्छे और स्वच्छ रंगों से मिला दिया जाए तो यह बेहद व्यवहारकुशल रूप अपना लेता है। इसे पसन्द करने वाले व्यक्ति दृढ़ निश्चयी होते हैं। साथ ही ये भावनारहित व निरंकुश होते हैं।
गुलाबी रंग सौम्य, सरल स्वभाव का द्योतक है। आयु अधिक होने पर भी ये बचपन को दर्शाता है। परिणाम स्वरूप इस रंग को पसंद करने वालों की हरकतें, आचार-विचार बच्चों जैसे होते हैं। फिरोजी रंग भावनात्मक रूप से स्थिरता प्रदान करने में सहायक है।
इन दिनों रंगों की प्रभावोत्पादक क्षमता पर व्यापक शोध प्रयास चल रहे हैं। जर्मनी के विख्यात मनीषी डॉ. मैक्समूलर ने रंगों पर गहन अध्ययन किया है। उन्होंने अपने निष्कर्ष ‘द लूशर कलर टेस्ट’ नामक पुस्तक में दिए हैं। उनके अनुसार नीला रंग पूर्ण शान्ति का, हरा राजसी ठाठ का और निरंकुश प्रकृति का, लाल रंग शक्ति और स्फूर्ति का तथा पीला रंग रंग सन्तुष्टि की भावना का द्योतक है। थियोमिक्वेल अपनी पुस्तक ‘हीलिंग विद कलर एण्ड लाइट’ में लिखते हैं कि हम रंगों से तीन स्तर पर प्रभावित होते हैं - शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक। शारीरिक स्तर पर लाल रंग का भाग शरीर को तनावग्रस्त करता है, जबकि नीला भाग शरीर को विश्राम देता है। मानसिक स्तर पर हमारी दृष्टि को प्रभावित करता है। जैसे कि एक लाल कमरा एक नीले कमरे की अपेक्षा छोटा दिखाई देता है। भावनात्मक स्तर पर रंग हमारे मनोभावों को प्रभावित करते हैं। लाल रंग उत्तेजना पैदा करता है तो नीला शाँतिदायक होता है।
व्यक्ति की मनःस्थिति पर रंगों के सीधे एवं गहरे प्रभाव को देखते हुए आज मनोविज्ञान के क्षेत्र में भी रंग चिकित्सा का प्रयोग हो रहा है। रंग मनोचिकित्सक तथा ‘कलर योर लाइफ’ को लेखिका डोरथी रुन का माना है कि नारंगी एवं हल्का पीला रंग व्यक्ति में नई आशा का संचार करते हैं तथा व्यक्ति के चिन्तन को अधिक स्पष्ट करते है। डोरथी का कहना है कि कई व्यक्ति केवल इसीलिए अधिक गलतियां करते हैं क्योंकि वे काले रंग का प्रयोग अधिक करते हैं। हालाँकि वे स्वीकार करती हैं कि आज फैशन में काले रंग का प्रचलन अधिक चल पड़ा है और इसे पहनने से कई व्यक्ति अधिक आकर्षक दिखते हैं। वे कहती हैं कि जो लोग काला रंग अधिक पसन्द करते हैं, वे अधिकतर किसी होते काम को रोकने वाले, दुःखी तथा दूसरों से अलग-थलग रहने वाले होते हैं।
विशिष्ट रंगों के प्रति लगाव व्यक्ति के व्यक्तित्व पर समुचित प्रकाश डालते हैं। अत्यधिक मिलनसार व सामाजिक व्यक्ति अपने कमरों को चटकीले रंगों से सजाते हैं व चमकीले रंग के वस्त्र पहनते हैं। जबकि शान्त एवं अन्तर्मुखी लोग भूरा, मटमैला या सफेद रंग पसन्द करते हैं। रंगों के गुण-धर्म व शरीर मनोभावों पर पड़ने वाले प्रभाव के अनुरूप आवश्यक सावधानी बरतकर हम इनका अधिक लाभ ले सकते हैं। जब कोई व्यक्ति आलस और सुस्ती महसूस कर रहा हो या बेहद निराश व हताश हो तो रंगों का अद्भुत प्रभाव आजमाकर स्वयं में स्फूर्ति व नव उत्साह का संचार कर सकता है। लाल रंग के कपड़े जीवन्तता व चुस्ती का अहसास देते हैं। सर्दी लगने पर लाल रंग के दस्ताने, जुराब व स्कार्फ गर्मी का अहसास दिलाते हैं। यदि गर्मी अधिक हो या फिर क्रोध आता हो तो इस रंग से बचना चाहिए। शयनकक्ष में नीले या फिरोजी जैसे शीतल रंगों का प्रयोग अधिक उपयुक्त रहता है। क्योंकि हाल रंग अनिद्रा को प्रोत्साहित करता है। इस तरह हम अपने स्वभाव, रुचि एवं आवश्यकता के अनुरूप रंगों का चयन कर स्वयं के जीवन में रंग भर सकते हैं व उसे अधिक सुखी व स्वस्थ बना सकते हैं।
गुरु गोविन्द सिंह जंगल में एक ऊँचे टीले पर बैठे थे। तभी जत्थेदार महासिंह ने आकर कहा - गुरुजी! पर गुरुजी तो जैसे आत्मलीन थे। उनकी दृष्टि किसी गहन विचारबिन्दु पर स्थिर हो रही थी। महासिंह के आगमन का आभास भी नहीं हो पाया उन्हें।
लेकिन महासिंह ने ससम्मान फिर से पुकारा गुरु जी!
गुरुजी ने एकबारगी चौंककर कहा - आओ महासिंह!
बोलो महासिंह! संकोच किसलिए? गुरुजी का स्वर शान्त होने के बावजूद उसमें छलकती वेदना मुखर थी। शायद उन्होंने महासिंह के मन का मर्म पा लिया था और उसके कारण वे दुर्निवार वेदना से आकुल हो उठे थे।
सामने खड़ा महासिंह गुरुजी के दृष्टितेज को सहन नहीं कर पाया। उसका मस्तक झुक गया। तभी गुरुजी ने धीमे स्वर में कहना शुरू किया - महासिंह ये दुःख हम लोगों ने स्वयं ही तो आमंत्रित किया है। क्या यह हमें विचलित कर देगा? खालसा, मेरा शिष्य दुःख विपदा से डिगेगा नहीं।
लेकिन गुरुजी! अब हम रह ही कितने गए हैं? एक-एक कर सभी तो चले गए छोड़कर। इसी से विचार आता है कि क्यों न शत्रु से सुलह कर लें? अच्छे दिन आने पर कभी फिर लड़ सकेंगे .....। महासिंह हिम्मत बाँधकर कहता गया।
महासिंह! यह तुम कर रहे हो। विपदा से विचलित हो रहे हो? कल दुनिया हमें क्या कहेगी। सुलह का विचार घातक है। विपत्ति की झंझा में हमें बढ़ना होगा। महासिंह! हमारा ध्येय हमारे सामने है और यह शुक्रतारे की तरह प्रकाशमान है।
लेकिन गुरुजी! हम शेष चालीस लोग अब शत्रु का कर ही क्या सकते हैं? इसलिए सुलह का विचार ही पक्का होता जाता है ................. औरों ने भी आखिरी तौर से तय करके मुझे भेजा है ................. और कहा है कि मैं आपसे अर्ज़ करूँ कि अब दुश्मन से सुलह कर ही लें, ताकि आगे हमें संगठित और सशक्त होने का मौका मिल सके।
महासिंह! इसमें फिर से संगठित होने की बात तो महज बहाना है - सच यह है कि संकटों से भागने की भावना ही इस विचार का आधार बन बैठी है। माना कि आज सिर्फ मैं हूँ और तुम चालीस भी साथ हो। इस स्थिति में तो यह विश्वास करके चलना होगा कि हमारा एक-एक खालसा सवालाख शत्रु सेना से युद्ध करेगा। पलायन का रास्ता नहीं पकड़ेगा।
गुरुजी! अब मेरे कहने का कोई असर उन सभी पर नहीं होने का।
गुरुजी गम्भीर हो गए। एक क्षण मौन रहकर बोले -
ठीक है महासिंह! जाओ हमारी तरफ से तुम्हें छूट है, लेकिन तुम और तुम्हारे उनतालीस साथी आज से अब स्वयं को शिष्य (सिख) नहीं कहेंगे।
महासिंह अपनी सैनिक टुकड़ी का जत्थेदार था। उसने अपने सहित चालीस खालसाओं का बेदावा लिखकर गुरुजी को दे दिया। चलते समय अभिवादन के लिए जब महासिंह ने गुरुजी की तरफ देखा तो उसकी आँखें भर आयी। उनकी गम्भीर मुद्रा बरबस अपनी तरफ महासिंह का हृदय खींचने लगी। महासिंह ने उधर बिना देखे ही अभिवादन किया, साथ ही उसके साथियों ने भी। और वे सब चलने लगे।
उस दिन मकर संक्रान्ति का पर्व था। माई मागों को जब इसकी सूचना मिली तो वे बेचैन हो उठीं। उन्हें याद आया कि आज की ही तरफ जब एक बार गुरुजी माछीपाड़ा के जंगल में जमीन पर एकाकी बैठे थे। कोई संगी-साथी वहाँ मौजूद न था। चारों बच्चे शहीद हो चुके थे। सेना छिन्न-विच्छिन्न हो गयी थी, तो गुरुजी ने किसी को उलाहना, उपालम्भ नहीं दिया था। उस दिन पूरे मन से उन्होंने अपने मित्र को पुकारा था। उस अदृष्ट मित्र को, जो घट-घट का वासी है।
उस वक्त घोर विपिन में इक्का दुक्का जंगली हिंस्र पशु भी गुरुजी के इर्द-गिर्द घूम रहे थे। गुरुजी पवन को सम्बोधित कर कह उठे थे - मित्र प्यारे नूँ हाल मुरीदा दाँ कैना ........।
अर्थात् हे पवन! तेरी गति सर्वत्र है। अतः मेरे उस महामित्र से, परमसखा से, प्रभु से उसके शिष्यों का सब समाचार कह देना....।
सोचते-सोचते माई माँगों अचानक किसी प्रबल शक्ति से प्रेरित हो उठ खड़ी हुई। कमर से रोज की तरह अपनी पैनी लघु खड्ग बाँधी और हाथ में दीर्घ यष्टिका लेकर बाहर चल दीं।
माई मागों तेज चाल से महासिंह के घर पहुँची। वह उस वक्त स्त्री बच्चे के बीच निश्चिन्त बैठा था - मानों अब उसे कुछ करना नहीं है। माई मागों एक क्षण उसे तीव्र आँखों से खड़ी घूरती रहीं। महासिंह उनकी इस दृष्टि से घबरा गया। पास आकर ‘मत्था टेका’ कहा और आदर अभिव्यक्ति में व्यस्त हो उठा। माई मागों फिर भी मौन रहीं।
माई का क्या हुक्म है? महासिंह पूछ रहा था।
माई मागों असीम उत्तेजना से चीत्कार कर उठीं - महासिंह! ओए जत्थेदार। तुसी .....तुसी, चूड़ियाँ पालो और कर (घर) बैठ। असी लड़ागियाँ .........। (अरे ओ जत्थेदार! तू चूड़ियाँ पहन ले और घर बैठ।) मैं लड़ने जाती हूँ। माई की मुखमुद्रा पर कुछ ऐसा तेज आ विराजा कि महासिंह हतबुद्धि अवाक् टुकुर-टुकुर खड़ा देखता रहा-फिर वह भी उत्तेजित हो उठा। उसे लगा कि कोई कह रहा है - महासिंह! जल्दी चल। गुरुजी पर मुसीबत आने वाली हैं। घर से निकल महासिंह, शस्त्र लेकर, साथी लेकर दौड़ चल उस दिशा में, जहाँ गुरुजी अकेले, बिना साथी-सहायक के घोर विपदा के बीच अडिग खड़े हैं .......।
इसी बीच महासिंह के कानों में माई मागों के शब्द पड़ें - महासिंह! तुम ने गुरुजी से दीक्षा ली। गुरुदीक्षा का यही अर्थ है - गुरु के काम के लिए मर मिटना। स्वयं को गुरु पर न्योछावर कर देना। अपने सर्वस्व को गुरु के चरणों पर बलिदान कर देना।
महासिंह की आँखों के समाने गुरुदीक्षा का दृश्य घूम रहा था। शर्मिन्दा होते हुए उसने कहा - नहीं माई! महासिंह कायर नहीं है - मैं भी चलता हूँ। और सच ही महासिंह अपनी लम्बी खड्ग, सुतीक्ष्ण भाला होकर - शिरस्त्राण तथा सैनिक परिवेश पहन कर फुर्ती से तैयार हो गया - बल्कि उसकी स्त्री ने, बहिन ने, माता ने इस तैयारी में दौड़ - दौड़ कर मदद की।
मकर संक्रान्ति की संध्या। खरदाना के ऊँचे टीले पर अकेले मोर्चेबन्दी करके गुरु गोविन्दसिंह शत्रुओं पर बाण वर्षा कर रहे थे। एक तरफ वे अकेले - दूसरी तरफ सैकड़ों मुगल सैनिक। मुगलों के तीर आ-आकर टीले की छाती में बेध रहे थे। और यह ऊँचा टीला मानों गुरुजी की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध था। किन्तु यह भी आशंका कम न थी कि थोड़ी ही देर में शत्रु सैनिक टीले को घेर लेंगे। अभी तक शत्रुओं को शायद ठीक से पता नहीं चल पाया था कि कितने सैनिक टीले पर मोर्चा बाँधे हुए हैं।
सहसा अघटन-घटना घटी इसी के अनुसार एक दूसरा ही दृश्य उपस्थित हो गया। टीले की ओर बढ़ रहे शत्रु-दल पर पीछे से किसी अन्य दल ने सवेग धावा कर दिया और गुरुजी ने आश्चर्यचकित होते हुए देखा कि दल प्राणों का भय त्यागकर विद्युत वेग से लड़ रहा है। तालाब तट पर एक-एक सैनिक अनेक शत्रुओं का संहार कर रहा है।
कौन हैं ये लोग? गुरुजी अनुमान नहीं लगा सके। कुछ तो टीले की ऊँचाई - कुछ पेड़ों का झुरमुट और दूरी भी थी। आगत दल के चेहरे स्पष्ट नहीं दिखाई दे रहे थे।
गुरुजी ने सरोवर की तरफ थोड़ा बढ़कर देखा, युद्ध खत्म हो गया था। शत्रुदल का संहार कर वह आगत अज्ञात टुकड़ी भी शहीद हो गयी, लेकिन उसके शहीद होते - होते शत्रु-दल भी भाग खड़ा हुआ।
सरोवर की जलराशि से छूता हुआ एक उच्छिन्न मस्तक पड़ा था। गुरुजी ने वह कटा हुआ सिर उठा ला। सिर रक्त और धूल से सन गया था। गुरुजी ने सरोवरजल से उसे स्वच्छ किया। वह चेहरा साफ-साफ दिखाई देने लगा। उन्हें एक साथ आश्चर्य, दुःख एवं आनन्द की अनुभूति हो आयी। यह सिर उन्हीं चालीस शिष्यों में से एक का था, जो बेदावा लिखकर दे गए थे।
गुरुगोविन्द सिंह ने एक-एक लाश का सिर जाँच कर रखकर उसके रक्तारक्त मुख को यों दुलराने, आलिंगन करने और चूमने लगे, मानों बहुत दिनों के बिछुड़े बेटों को पिता कलेजे से लगा रहा हो। आह! कितने प्यारे लग रहे थे वे सभी चेहरे, जो आज निहाल हो गए, देश की मिट्टी में मिल गए थे - हमेशा के लिए।
अरे! यह तो माई मागों है। आखिर उस बहादुर माँ की लाश भी गुरुजी जी के पहचान में आ ही गई। कई शत्रु सैनिक उसके इर्द-गिर्द कटे पड़ें थे। तो माई मागों भी लड़ने आयी थी? और अमित गौरव से, उद्दाम प्रेरणा से, प्रबल उत्साह एवं दुर्दम्य भावना से गुरुजी का रोम-रोम आप्यायित हो उठा।
गु...रु...जी.... सरोवर तट के लाशों के ढेर से एक टूटता स्वर सुनाई दिया।
माई मागों का रक्त से सना मस्तक अपने हाथों से धीरे से नीचे रखकर गुरुजी उधर ही बढ़ें। अरे यह तो जत्थेदार महासिंह लगता है। अभी प्राण शेष हैं। गुरुजी ने आश्चर्य और प्यार के अतिरेक में कहा, जत्थेदार महासिंह! आखिर तुम भी आ गए। मेरे प्यारे खालसा। गुरुजी ने उद्दामा से उसको आलिंगन में ले लिया।
महासिंह उठ नहीं सकता था, वह निढाल पड़ा रहा। तीर-तलवार और भाले के अगणित बार उस पर हो चुके थे। स्वयं उसके हाथों कटी पड़ी हुई अनेकों लाशों उसके पास ढेर थीं।
गुरुजी सरोवर तट से अपना कमरबन्द भिगोकर लाए। महासिंह के मुँह पर उसका जल बूँद-बूँद टपकाते रहें। क्षण भर के लिए शायद अन्तिम बार उस महावीर का मुख्य दिव्य तेज से उद्भासित हो उठा। सोच रहा था जत्थेदार महासिंह - क्या गुरुजी ने उसको क्षमा कर दिया है? बेदावा लिखकर गुरुजी को अकेला छोड़ जाने का जघन्य अपराध इस मृत्युबेला में भी उसका हृदय कचोट रहा था।
गु..............रु...................जी! महासिंह कुछ कहना चाहता था।
महासिंह! मेरे प्यारे सपूत। बोलो। महासिंह की आँखें भरी आयीं। गुरुजी ने उसका सिर थपथपाया, आँसू पोंछे। गुरुजी! हम लोग अपना प्रायश्चित करने आए थे। प्रभु वह बेदावा फाड़ दीजिए। यही मेरी आखिरी अरदास है।
हर शिष्य के लिए स्पृहणीय बन गयी, महासिंह की अन्तिम इच्छा। गुरुजी ने अपने अंगरखे से बेदावा का कागज निकाला और फाड़कर उसके छोटे-छोटे टुकड़ों को सरोवर-जल में फेंक दिया। महासिंह को लगा कि उसकी आत्मा का घाव भर गया। गुरुजी की गोद में ही उसने अनन्त पथ की यात्रा के लिए आँखें बन्द कर लीं।
शिष्यों के इस अनूठे प्रायश्चित ने गुरुजी को भाव-विह्वल कर दिया। उन्होंने उस दिन कहा - यह स्थान ४१ बलिदानियों के रक्त से पवित्र हो चुका है। यहाँ जो आएगा, जो इस सरोवर में स्नान करेगा, वह भी मुक्तिपथ का भागी होगा। उन्होंने मुक्त-सर के नाम से उस सरोवर को सम्बोधित किया। तब से आज तक जब-जब मकर संक्रान्ति आती है, मुक्त-सर में उन ४१ शहीदों की याद में मेला लगता है।
बेगम! अल्लाह का शुक्र है, हज की तैयारी पूरी हो चुकी है, बहुत कम इंसानों को हज शरीफ करने का मौका मिलता है। पठान युसूफ ने अपनी पत्नी से कहा।
दरअसल हम लोग बड़ी किस्मत वाले हैं, जो हज के लिए जा रहे हैं। क्या घर का सारा समान अच्छी तरह बाँध लिया है तुमने? देखो हमें हज में आठ महीने से भी ज्यादा वक्त लग सकता है। अपने इस शहर में गुंडे - चोर-गिरहकट भी बहुतेरे हैं।
पत्नी फातिमा बोली - मेरी एक उलझन है। समझ में नहीं आ रहा कि कैसे हल करूँ?
जिन्दगी भी किफायत से रहते-रहते मैंने मुसीबत के वक्त काम आने के लिए एक सौ अशर्फियाँ इकट्ठा कर ली हैं। सोच रही हूँ कि हज के लिए जाने से पहले उन्हें कैसे हिफाजत से रखा जाय?
यह तो बड़ा आसान है। युसूफ ने लगभग तनावमुक्त होकर कहा, लाओ ये अशर्फियाँ हम यहीं किसी साहूकार के यहाँ पूरी हिफाजत रहेगी। उनकी साख है। और लोग भी अपनी रकम उन्हीं के पास जमा कराते हैं।
मुझे इन साहूकारों पर यकीन नहीं है। फातिमा ने प्रतिवाद किया। इन लालची लोगों का क्या विश्वास? हम ठहरे सीधे-सीधे अल्लाह के बन्दे। साहूकारों के छंद–फंद से वाकिफ नहीं हैं।
मैं चाहती हूँ ये सौ अशर्फियाँ आप अपने पूरे इलाके में मशहूर ऊँचे सन्त तुकाराम जी के पास धरोहर के रूप में जमा करा आवें। उन पर मुझे पूरा यकीन है। उनके पास पूरी सुरक्षा होगी।
पठान व्यापारी ने यह सुझाव सुना तो चकित रह गया। क्या कहती है यह नासमझ औरत! भला किसी फकीर के पास भी रकम जमा की जाती हैं। ठीक है तुकाराम जी अल्लाह के नेक बन्दे हैं। वैरागी हैं। गृहस्थ होते हुए भी वह कभी के दुनिया के जंजाल, माया, मोह, ममता, लोभ-लालच वगैरह छोड़ चुके हैं। सन्त-महात्माओं और फकीरों को रुपये - पैसे की चौकीदारी से क्या वास्ता? उनके पास तो तन ढँकने तक को पूरे कपड़े तक नहीं। ठंड से बेचने के लिए लिहाज और कम्बल भी नहीं। पास एक पैसा नहीं, फिर भला वे सम्पत्ति की रक्षा करना क्या जानें? उस पठान व्यापारी ने अपनी पत्नी को तरह-तरह के तर्क पेश किए। फकीरों में धोखा लगने की बात कहीं, पर पत्नी ने एक न मानी। वह किसी साहूकार के पास सौ अशर्फियाँ रखने को राजी न हुई। लगातार सन्त तुकाराम के पास ही रकम रखने को कहती रही।
यही नहीं उसने तर्क पेश किया-से साहूकार तो लोभ-लालच के पुतले हैं। सारे दिन माया-मोह में लिपटे रहते हैं। ब्याज कमाते हैं, कितनों की ही रकम हड़प लेते हैं। पैसा लेकर मुकर जाते हैं या मुकदमेबाजी में फँसा लेते हैं। मैंने बहुतों को रोते-कलपते देखा है। मुझे इन ठग-साहूकारों पर कतई भरोसा नहीं।
फिर किसके पास इस रकम को रखना चाहती हो?
मैं नेक और पाक गरीब को इन अमीर साहूकारों से बेहतर समझती हूँ।
वह तो ठीक है, पर रुपया-पैसा लोभ-लालच में फँसा देता है।
पाक इन्सान को नहीं। वे तो तमाम दुनियादारी के लालच से मुक्त रहते हैं।
तुम्हारे सामने तो हम लाचार हैं बेगम! लिहाजा अब तुम्हीं तय करो कि किसके पास इन सौ अशर्फियों को रखा जाय।
सन्त तुकाराम जी अल्लाह के सच्चे बन्दे हैं। एक नेक और पाक इन्सान हैं। तमाम लालच-माया-मोह से परे हैं। ऐसे इन्सान के पास ही मैं अपनी सम्पत्ति रखना पसन्द करूँगी।
लेकिन उनसे पास तिजोरी तो क्या, कोई टूटा-फूटा सन्दूक भी नहीं है - फिर भला कैसे सम्पत्ति की रक्षा होगी? परन्तु पत्नी मानी नहीं। मैं तो सन्त तुकाराम के पास ही रकम रखना पसन्द करूँगी - यही जिद करती रही। विवश होकर पठान व्यापारी सन्त तुकाराम के झोंपड़े पर रकम जमा कराने पहुँचे ........।’
मेरा एक प्रार्थना है, सन्त जी?
कहो खान! क्या चाहते हो? कोई आध्यात्मिक समस्या हो तो जरूर मदद करूँगा। तुकाराम जी बोले।
नहीं, एक मामूली सांसारिक बात है। मेरी पत्नी ने ये सौ अशर्फियाँ हज जाने की वजह से आपके पास धरोहर के तौर पर सुरक्षित रखने के लिए भेजी हैं। वह किसी सेठ-साहूकार पर यकीन नहीं करती। उसे आप पर ही पूरा भरोसा है। आपसे मेरी प्रार्थना है कि यह रकम अमानत के तौर पर हमारे हज से लौट आने तक अपने पास रख लें।
तुकाराम आश्चर्य में पड़ गए। बड़ी विचित्र उलझन थी। पहली बार किसी ने अपनी जमा - पूँजी उनके पास सुरक्षित रखने के लिए दी थी। रख लें या इंकार कर दें? उनके मन में द्वन्द्व उत्पन्न हो गया।
वह असमंजस भरे स्वर में कहने लगे, मेरे पास न कोई बड़ी तिजोरी है, न ही कोई चौकीदार। न इस तरह की कोई कीमती रकम या सामान रखने के लिए सन्दूक या खास इन्तजाम! जिन्दगी में खुद अपने पास ही पैसे नहीं रखे, दूसरों की क्या हिफाजत करूँगा? आप कहीं और यह रकम रखें।
लेकिन पठान व्यापारी ने अशर्फियों की थैली उनके सामने रख दी। कहा, अब यह थैली आपको समर्पित है। मेरी बेगम को आपकी हिफाजत पर पूरा यकीन है। पुरजोर शब्दों में उसने इस थैली को आपके पास रख आने को कहा है। मैं बेबस हूँ। आप जो चाहे करें, मैं तो चला। यह पड़ी है।
अच्छा ठहरो! जब मेरे पास रखनी ही है तो एक काम करो खान साहब! वह सामने वाला एक ताल खाली पड़ा है। अल्लाह पर भरोसा रखकर उसके एक कोने में आप यह थैली रख दीजिए। जब आप आठ - नौ महीने में हज से वापस लौटेंगे तब आपको यह थैली यहीं ऐसे ही पड़ी मिल जायगी।
लिहाजा पठान व्यापारी ने अशर्फियों की थैली ताक में रख दी और वापस लौट आए।
वे अपनी पत्नी के साथ हज करने मक्का-मदीना की तरफ पानी के जहाज से रवाना हुए। उस जमाने में हज में नौ-दस महीने लग जाते थे। रास्ते में बड़ी-बड़ी तकलीफें भुगतनी पड़ती थीं। इसी बीच न जाने कितने ही हज यात्री असमय ही बीमार हो जन्नत पहुँच जाते थे। हज से सकुशल वापसी का कोई भरोसा नहीं था।
खुदा के बन्दे खान साहब अल्लाह को याद करते-करते सकुशल वापस लौटे। अब फिर से सांसारिक दाल-रोटी की फिक्र पड़ी। हज में काफी रकम खर्च हो चुकी थी। हाथ में कुछ न था।
वे सन्त तुकाराम की झोंपड़ी पर रकम लेने पहुँचे। दरवाजा खट-खटाया और उनसे प्रार्थना की, भगत जी नौ - दस महीने पहले मैं एक थैली आपके पास अमानत के तौर पर रख गया था। उसकी जरूरत हैं।
तुकाराम जी ने कहा - मुझे तो याद नहीं पड़ता। भगवान के नाम से ही फुरसत नहीं मिली। जहाँ तुमने अपनी थैली रखी हो, वहीं तलाश कर लो।
पठान युसूफ खान उसी आले की ओर गए। वहाँ धूल-ही-धूल भरी हुई थी और ऐसा प्रतीत होता था जैसे नौ-दस महीने से उसे किसी ने स्पर्श तक न किया हो। खान साहब ने धूल झाड़-पोंछ कर उसे साफ किया और बिना गिने ही अशर्फियों की थैली लेकर अपने घर वापस लौट आए।
घर का दरवाजा बन्द कर उन्होंने रकम को गिना। उन्हें अत्यन्त आश्चर्य हुआ कि गिनने के बाद उसमें पाँच अशर्फियाँ कम निकलीं। अब तो खान क्रोध से आग-बबूला हो गया। भाँति - भाँति के भ्रामक विचार उसके मन में उठने लगे। किसने चुराई ये अशर्फियाँ? कहाँ गयी? तुकाराम पर तो मेरी बेगम को बड़ा यकीन था। वे तो बड़े छुपे रुस्तम निकले।
बाहर से कैसे भोले-भाले भक्त लगते हैं। अपने चेलों की संख्या भी खूब बढ़ा-चढ़ा रखी है। कहते हैं हम फकीर है, भगवान के परमभक्त हैं। हमें रुपये - पैसे का लोभ- लालच नहीं है। लानत है ऐसे फकीरों पर, जो दूसरों को धोखा देते हैं। अपनी इन्हीं भावनाओं में बहकर क्रोधावेश में वह उनकी झोंपड़ी के सामने जा पहुँचे। सारे रास्ते भर उन्हें कोसते और गालियाँ देते आए थे।
पहले तो किसी को उसकी बातों पर विश्वास ही नहीं हुआ। लेकिन उसको रोता-पीटता-चिल्लाता देखकर धीरे-धीरे लोगों को सन्देह हो चला कि शायद वह सही ही हो। अचानक बीस-पच्चीस लोग क्रोध में भरे गालियाँ देते हुए झोंपड़ी के सामने पहुँचे। गालियों का गुबार निकलता रहा। विरोधियों को मौका मिला था। उन्होंने जी भर अपने मन का मैल उड़ेला। सन्त तुकाराम शान्तिपूर्वक सब गालियाँ पत्थर पर बरसती बूँदों की तरह सहते रहे।
उन्हें इस तरफ सहते देखकर लोगों का सन्देह विश्वास में बदल गया कि तुकाराम ने जरूर चोरी की है, तभी तो इस तरह सुन रहे हैं अन्यथा कुछ न कुछ प्रतिवाद अवश्य करते। सबने और जी भी गालियाँ दीं। खड़े होकर उन्हें कोसते रहे - भक्ति के नाम पर ढोंग किया है। लोगों की आँखों में धूल झोंकते हैं।
इधर पठान साहब जब घर लौटे तो उनकी पत्नी में उन्हें बड़ा लापरवाह और गैरजिम्मेदार बताते हुए कहा कि आप कमरे में अशर्फियों की थैली-खुली छोड़कर बिना कुछ कहे-सुने कहाँ चले गए? इस पर पठान व्यापारी ने पाँच अशर्फियाँ कम निकलने वाला सारा किस्सा पत्नी को कह सुनाया।
आश्चर्य! वहाँ पर अजीब नजारा छा गया। पत्नी उल्टे अपने पति पर बरस पड़ी -
आप बड़े जल्दबाज हैं। जज़बात में बिना सोचे - विचारे कुछ का कुछ कर बैठते हैं। भावुकता और क्रोध में अन्धे हो जाते हैं। भला मुझसे क्यों नहीं पूछा?
अरे हुआ क्या, साफ - साफ कहो?
सन्त तुकाराम नेक इन्सान और अत्यन्त पाक, खुदा के बन्दे हैं। वे अल्लाह के सच्चे नुमाइन्दे हैं।
तभी पाँच अशर्फियाँ चुराकर उन्होंने अपनी ईमानदारी नष्ट कर ली।
कतई नहीं।
वह कैसे? कुछ साफ करोगी या पहेलियाँ ही बुझाती रहोगी? पत्नी बोली, जब हम हज करने गए थे, तो मैंने पाँच अशर्फियाँ आड़े वक्त के लिए निकाल कर अपने पास रख ली थी और पिचानबे अशर्फियों को ही धरोहर के रूप में सन्त के पास रखा था। उन्होंने थैली में से कुछ नहीं निकाला है। ऐसे पाक इन्सान को बुरा-भला कहकर बड़ा पाप किया है। खुदा इसकी सजा आपको जरूर देगा।
अब क्या करूँ? गलती तो कर बैठा हूँ।
जल्दी जाओ और तुकाराम जी से माफी माँगो। वे सच्चे भक्त हैं। तुम्हें जरूर माफ कर देंगे। पाप को स्वीकार कर भविष्य में वैसा न करने का निश्चय ही प्रायश्चित है।
जब पठान युसूफ खान ने क्षमा याचना की तो सन्त तुकाराम ने उसे हृदय से लगा लिया और हँसते हुए बोले-क्या निन्दा, क्या स्तुति? सब कुछ तो सारे परमप्रिय प्रभु का ही प्रसाद है। सन्त तुकाराम ही इन बातों में उपस्थितजनों को भगवद्गीता के स्थितप्रज्ञ दर्शन की अनुभूति हो रही थी।
बंगाल के वीरभूमि जिले के अंतर्गत केन्दुबिल्व ग्राम में हरिपद नामक एक समाज सेवी हुआ है। जीविकोपार्जन के उपरान्त जितना समय बच जाता, उसको वह गरीबों और अभावग्रस्तों की सेवा-सहायता में लगाता। लोग अवसर कहते कि समाज-सेवा हरिपद के संस्कार में इस प्रकार घुली-मिली है, मानों वह इसी के लिए पैदा हुआ हो।
वह जैसा सरल था, वैसा ही ईमानदार भी। वह एकनिष्ठ भाव से मनोयोगपूर्वक अपने कार्य में लगा रहता। मालिक से यह बात छुपी न रही। उसके इसी गुण के कारण उदार व्यापारी उसे समय से दो घंटे पूर्व ही छोड़ देता। इसी समय का सदुपयोग वह सेवाकार्य में करता था।
वह जिस रास्ते से होकर आता-जाता उसमें प्रायः एक वृद्धा उसे साग बेचती दिखलाई पड़ जाती। एक दिन वह उधर से ही गुजर रहा था कि एक परिचित वहाँ खड़ा दिखाई पड़ा। वह साग खरीद रहा था। बातचीत के सिलसिले में हरिपद भी वहाँ रुक गया। बुढ़िया के पास एक ही बाट रखा था, वह थी पत्थर की। उसी से वह किसी को सेर भर तौल देती, किसी को पाँच सेर, तो किसी को आधा सेर। हरिपद को यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ। उसने इस संबंध में पूछताछ की, तो ज्ञात हुआ कि उसकी तौल हमेशा खरी उतरती है, आज तक कभी कोई शिकायत नहीं आयी। वह समझ गया कि यह मामूली पत्थर नहीं हो सकता। इसमें ईश्वर की साक्षात उपस्थिति निश्चित है। उसने बाँट को उठाया, सिर से लगाया और श्रद्धापूर्वक प्रणाम कर घर की ओर चल पड़ा।
वृद्धा हरिपद से परिचित थी और उसकी भक्तिभावना को भी जानती थी। बहुत दिनों से उसके मन में वृन्दावन जाने की ललक थी, पर पैसे का अभाव सदा उसमें अड़चन पैदा करता। उसके सारे स्वजन-संबंधी वहाँ की यात्रा कर चुके थे। एक वही थी, जो अब तक कृष्ण की उस लीलास्थली के दर्शन नहीं कर सकी थी। इससे उसका मन बार-बार कचोटता। वह सोचती, वह कितनी अभागिन है कि वहाँ जाने का सुयोग नहीं बन पा रहा है?
तभी उसे हरिपद की याद आयी। वह उसके बाँट के मूल्य और महत्व को समझता है - इसे वह भली-भाँति जानती थी। अस्तु, एक दिन प्रातः वह उसके घर पहुँची और अपने अद्भुत बाँट के बदले तीन सौ रुपये देने का आग्रह करने लगी। पूछने पर कहा कि अब वह जीवन के शेष दिन वृन्दावन में रहकर बिताना चाहती है।
हरिपद असमंजस में पड़ गया। उसकी स्थिति ‘रोज कुआँ खोदने और रोज पानी पीने, जैसी थी। आटा-चावल खरीदने के पश्चात् जो कुछ शेष बचता, उसे वह दरिद्रनारायण की सेवा में लगा देता। संचय की प्रवृत्ति थी नहीं, सो आज वृद्धा के उस प्रस्ताव ने उसे विचलित कर दिया। वह अभी सोच ही रहा था कि कैसे मदद की जाए, तभी पत्नी ने अपने स्वर्णाभूषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि इन्हें बेचकर आवश्यक धन प्राप्त करें।
बुढ़िया अपने बाँट को वहीं छोड़कर चली गई। हरिपद ने उसे अच्छी तरह धोया, उसकी पूजा - आरती की और काम पर चला गया। लौटते हुए वह फिर निर्धनों की उस बस्ती में गया और जितना कुछ बन सकता था, वह सब किया।
रात हुई। सब भाजन कर सो गये। हरिपद ने एक अद्भुत स्वप्न देखा। सामने एक दिव्य पुरुष खड़े हैं। उनका सम्पूर्ण शरीर तेजोद्दीप्त है और चेहरे पर मन्द-मन्द मुसकान। वे कह रहे थे - हरिपद तुम्हारी समाज-सेवा से हम बहुत खुश है। वास्तव में यह समाज और संसार हमारा ही विराट शरीर है। इसके लोग हमारे अंग-अवयव हैं। जो इनकी सेवा-सहायता करते हैं, वे प्रकारान्तर से हमारी ही सेवा करते हैं। वे प्रसन्न हो गये, तो समझ लेना हमारा आशीर्वाद-वरदान मिल गया और काया की छाया की तरह संग-संरक्षण भी। जो इसमें कृपणता बरतते और केवल पूजा - उपासना द्वारा ही हमारी प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील होते हैं, वे यथार्थ में समयक्षेप करते और खाली हाथ रहते हैं। भोजन-भोजन रटते रहने से पेट थोड़े ही भर जाता है। उसके साथ प्रयास और पुरुषार्थ भी जुड़े होने चाहिए। वास्तविक परिणाम तभी सामने आता है। जो सचमुच हमारी अनुकम्पा के आकांक्षी हैं, उन्हें इस विश्व वाटिका को सुन्दर, समुन्नत और सुव्यवस्थित बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए कि यह भगवान का कार्य है, इसे वे ही सम्पन्न करें। यह भी सच है कि हमारे दृष्टिनिक्षेप मात्र से पलभर में कुछ-का-कुछ हो सकता है। पर इस परिवर्तन का श्रेय हम अपने पुत्रों को देना चाहते हैं, स्वयं नेपथ्य में रहकर आगे उन्हें लाना चाहते हैं। प्रत्यक्ष भूमिका उनकी होगी, परोक्ष शक्ति हमारी, दृश्य प्रयास वे करेंगे, अदृश्य मार्गदर्शन हम देंगे श्रेय - सम्मान पाकर बड़भागी कहला सकें।
तुम लोकमंगल के काय में जुटे रहो। तुम्हारे लिए अदृश्य का यही निर्धारण है। वह ‘पत्थर’ साग वाली वृद्धा को वापस लौटा दो। यही बताने के लिए विशेष रूप से हम उपस्थित हुए हैं। इसे विस्मृत न करना।
आँखें खुली, तो प्रातः हो चुका था। हरिपद उठ बैठ और स्वप्न पर विचार करने लगा। उसके मानस-पटल पर वह दृश्य अभी भी वैसा ही जीवन्त बना हुआ था। कानों में एक-एक शब्द अब भी गूँज रहे थे। वह किंकर्तव्यविमूढ़ था। तभी पत्नी उधर आई। पति को गहन विचार - मंथन में डूबा देखकर कारण जानना चाहा। उसने सपने का सम्पूर्ण वृत्तान्त सुना दिया। उसे सुनकर पत्नी ने सलाह दी कि भगवान का जैसा आदेश है, वही करना चाहिए, इसी में हम सब का कल्याण है।
वास्तव में हरिपद को उस पत्थर से इतना गहन लगाव हो गया था कि वह उसे लौटाना नहीं चाहता था। इसी कारण असमंजस में था। पत्नी ने उसे बाहर निकाला। अब उसने निश्चय कर लिया कि बुढ़िया को उसे वापस कर देगा।
प्रातः स्नान एवं उपासनादि से निवृत्त होकर हरिपद वह बाँट लेकर वृद्धा के घर गया। वहाँ ज्ञात हुआ कि वह एक दिन पूर्व ही वृन्दावन के लिए प्रस्थान कर चुकी हैं। हार कर उसने उसे वहाँ से मीलों दूर बह रही गंगा में प्रवाहित कर दिया। विसर्जित करते समय भी उसका मन कचोट रहा था।
जब घर लौटा, तो उसकी बड़ी विचित्र दशा थी। वह उन्मना-सा आत्मलीन प्रतीत हो रहा था। पत्नी समझी कि शायद थकान के कारण तबियत खराब हो गई है, अतः’ कार्य पर जाने से रोक दिया।
दूसरे दिन कुछ स्वस्थ मालूम पड़ रहा था। वह कार्य पर गया और मालिक से कहकर नौकरी छोड़ दी। सहकर्मियों और मालिक ने बहुत मना किया पर उसने एक ही उत्तर दिया कि ईश्वर का ऐसा ही आदेश है। अब लोकसेवा ही हमारा एकमात्र लक्ष्य होगा। इतना कहकर वह वापस लौट गया। मालिक अत्यन्त सहृदय था। उसने सोचा अब इसकी गृहस्थी की गाड़ी किस प्रकार खिंचेगी? जमीन-जायदाद है नहीं। सो उसने सौ रुपया मासिक वेतन तय कर दिया। प्रतिमाह यह उसके घर पहुँचा दिया जाता। उक्त पैसे को हरिपद अपने परिवार में उतना ही खर्च करता, जितने से दो जून का रूखा-सूखा भोजन जुट जाए। शेष पैसों में से कुछ तो वह गरीबों को दैनिक आवश्यकताओं के निमित्त दे देता और बाकी जो बचता, उस यत्नपूर्वक जमा करता जाता। कुछ महीनों के उपरान्त जब काफी पैसे इकट्ठे हो गये, तो उसने उससे तीन चर्खे खरीदे और गाँव में जो सबसे दरिद्र थे, उन्हें दे दिये। रुई की भी व्यवस्था कर दी। अब दिनभर वे उससे सूत कातते और शाम को जुलाहे के यहाँ बेच आते। इससे उनकी उदरपूर्ति किसी प्रकार होने लगीं।
इसी प्रकार पैसे एकत्रित कर-करके हरिपद ने आस-पास के पूरे क्षेत्र में लोगों को चर्खे खरीद-खरीद कर दिये। इससे कंगालों को कुछ राहत मिली। हरिपद को वे भगवान की तरह मानते थे और हरिपद भी उनसे खूब स्नेह करता।
धीरे-धीरे उसकी आयु ढलने लगी। शरीर काफी दुर्बल हो गया। अब उससे पहले जितनी भागदौड़ करते नहीं बनती। फिर भी सामर्थ्य भर वह करता। कमजोर काया इसे बर्दाश्त नहीं कर सकी। एक दिन वह बीमार पड़ गया। आस-पास के सारे लोग इकट्ठे हो गये और उसकी सेवा - सुश्रूषा में जुट पड़ें, पर उसका अन्तिम समय उपस्थित हो गया था। इसका शायद उसे पूर्वाभास भी हो चुका था। उसने इसका संकेत देते हुए अपने अभिन्नजनों से कहा कि अब हमारी महायात्रा की वेला आ पहुँची है। कदाचित कल के बाद हम लोग न मिल सकें।
इतना कहकर वह मौन हो गया। आँखें बन्द कर ली। सभी के नेत्र अश्रुपूरित हो चले थे। कई फूट-फूटकर रोने लगें।
शाम हो गई थी, अतः दो लोगों को छोड़ शेष अपने-अपने घरों को चले गये। मई का महीना था। अस्तु, बिस्तर आँगन में लगाया गया। वहीं खाट पर सो रहे। जल्द ही उन्हें नींद आ गई।
वृद्धावस्था के कारण लगभग चार घंटे की निद्रा के बाद हरिपद की नींद टूट गई। आज न जाने क्या उसे फिर उस पाषाण पिण्ड की याद हो आई। भाव-विह्वलता के अतिरेक में आँखों से आँसू बहने लगे। यह खुशी और संतोष के अश्रु थे।
रात्रि का तीसरा प्रहर अपने अन्तिम चरण में था। हरिपद की विह्वलता ज्यों की त्यों बनी हुई थी, नेत्र बरस रहे थे और आँखें बन्द। उसे बाहर कुछ प्रकाश-सा प्रतीत हुआ। नयन खुले, तो वह हड़बड़ाकर उठ बैठा। समाने स्वयं योगेश्वर कृष्ण खड़े मुस्करा रहे है। उनके एक हाथ में वही पत्थर था। उसे देते हुए उनने कहा - यह लो तुम्हारी प्रिय वस्तु मैं ले आया हूँ, पर अब अधिक समय तक इसे न रख सकोगे। आज हम दोनों का महामिलन होगा।
इतना कहकर वे अन्तर्धान हो गये। प्रातः छह बजे के करीब हरिपद की साँसें उखड़ने-सी लगीं। उसने आँखें खोली, अपने चारों ओर खड़े लोगों को निहारा और फिर मूँद लीं, तो मुँदी की मुँदी ही रह गईं।
उसकी इहलीला समाप्त हो चुकी थी। आश्चर्य की बात कि जब उसने अपनी अन्तिम साँस ली, तभी खाट पर रखा वह पाषाण पिण्ड दो टुकड़ों में विभक्त हो गया। उससे एक दिव्य-ज्योति निकलकर कमरे में विलीन हो गई। भगवान का कथन सत्य निकला। दो सत्ताएँ परस्पर घुल-मिल गईं। हरिपद का वह भग्न मकान आज भी इसका साक्षी है।
उपासना की सार्थकता सेवा में है। उपासक यदि लोकसेवी न हुआ तो उसकी उपासना चिन्ह - पूजा मात्र बनकर रह जाती है कदाचित ही फलीभूत होती हो। उपासना और सेवा का समन्वित स्वरूप साधना से ही सार्थक है। जो इन्हें ठीक-ठीक अपनाते, वे इसी जन्म में स्वर्ग-मुक्ति का आनन्द-लाभ करते और परमपद पाते हैं।
प्रायः लोग योगाभ्यास की शुरुआत इस उद्देश्य से करते हैं कि उन्हें समाधि सुख का लाभ मिलने लगे और सिद्धियाँ-क्षमताएँ करतलगत हो जाएँ। पर देखा यही जाता है कि योग के कठिन नियमोपनियमों का पालन न कर पाने के कारण व्यक्ति को स्वास्थ्यलाभ का यत्किञ्चित् प्रतिफल तो मिलता है, किन्तु शक्तियों, चमत्कारी सिद्धियों के नाम पर निराशा ही हाथ लगती है। ऐसी स्थिति में योगवेत्ता मनीषियों ने एक सर्वोपयोगी एवं सर्वजनीन उपाय खोज निकाला है, जिसे योगनिद्रा कहा जाता है। योगनिद्रा का तात्पर्य है - चेतना का प्रवाह शरीर-निर्वाह की दिशा से हटाकर अन्तःक्षेत्र की ओर मोड़ देना। जिस तरह सूखे खेत में पानी भरने पर उसमें हरियाली उगने और फसल लहलहाने का उपक्रम आरम्भ होता है, उसी प्रकार इसके भी दो लाभ होते हैं - एक तो उच्चस्तरीय क्षमता का आविर्भाव, दूसरे निकृष्ट कुसंस्कारों का निराकरण दोनों कार्य एक साथ चलने लगते हैं।
योगनिद्रा मानसिक एवं आत्मिक विकास का अति उपयोगी प्रयोग है। इस प्रक्रिया में मनःसंस्थान को पूर्णतया शिथिल कर देना पड़ता है। यह एक तथ्य है कि प्रकृति प्रदत्त गहन निद्रा एवं शरीर के पूर्ण शिथिलीकरण के सहारे ही मनुष्य अपनी जीवनचर्या सम्पन्न करता और करता और अगले दिन के लिए कार्यकारी शक्ति प्राप्त करता है। निद्रा में व्यवधान पड़ने पर मनुष्य अशक्त एवं विक्षुब्ध दिखाई पड़ता है। नींद न आने की बीमारी लगातार चलती रही है, तो उसकी परिणति पागलपन में हो सकती है। जिन्हें गहरी निद्रा आती है, उनकी शारीरिक व मानसिक क्षमता भी बढ़ी-चढ़ी रहती है।
मनःसंस्थान की उच्चस्तरीय परतों को जाग्रत करने में योगनिद्रा का अपना विशेष महत्व है। यदि उसे उपलब्ध किया जा सके तो इस दिव्य संस्थान को अधिक स्वस्थ एवं अधिक समर्थ बनने एवं चमत्कारी सिद्धियाँ अर्जित करने का अवसर मिल सकता है।
मन की दो प्रमुख परतें है - एक सचेतन और दूसरी अचेतन। सचेतन मन ही सोच-विचार करता है और वही रात्रि को नींद में सोता है। अचेतन की कार्य-संचालन की समस्त स्वसंचालित गतिविधियों की व्यवस्था बनानी पड़ती है। श्वास-प्रश्वास आकुंचन-प्राकुंचन निमेष-उन्मेष जैसी क्रियाएँ निरन्तर चलती रहती हैं और उन्हीं के आधार पर शरीर का निर्वाह होता है। यह सब अचेतन की गतिविधियों पर निर्भर है। निद्रा के समय सचेतन के सो जाने पर भी अचेतन की गतिविधियों पर निर्भर है। निद्रा के समय सचेतन के सेज पर भी अचेतन मन क्रियाशील रहता है और स्वप्न देखने, करवट बदलने, खुर्राटे भरने, कपड़े ओढ़ने-बदलने जैसे कृत्य कराता रहता है।
प्रयत्नपूर्वक योगनिद्रा के माध्यम से यदि अचेतन को थोड़ा-सा अधिक समय तक हल्का या गहरा विश्राम दिया जा सके तो मानवी चेतना को बहुत राहत मिलती है। इस विश्राम में उसे थोड़ी-सी अवधि में ही नयी स्फूर्ति प्राप्त होती है साथ ही सचेतन के दबाव से दबे रहने वाले अन्तराल में भी अंकुरित - विकसित होने का अवसर भी मिलता है। अन्तराल का विकास ही प्रकारान्तर से आत्मशक्ति का उद्भव - अभिवर्द्धन कहा जा सकता है।
योगनिद्रा के छोटे-बड़े अनेक स्तर हैं। छोटे को ध्यान और बड़े स्तर को समाधि कहते हैं। यह निर्विकल्प संकल्परहित और संकल्पसहित सविकल्प दो स्तर की होती है। सविकल्प का परिणाम भौतिक और निर्विकल्प का आध्यात्मिक उपलब्धियों के रूप में सामने आता है। योगनिद्रा अल्पकालीन होती है ओर समाधि दीर्घकालीन। दोनों ही परिस्थितियों में मन को अधिक शान्त एवं निष्क्रिय बनाने का प्रयत्न किया जाता है।
ध्यानयोग के द्वारा इस स्थिति को प्राप्त किया जाता है। विचार एवं संकल्प पूर्णतया समाप्त तो नहीं हो सकते, पर उन्हें किसी एक केन्द्र पर नियोजित करके बिखराव के दबाव से मनःसंस्थान को मुक्त रखा जा सकता है। इतने से ही मनःक्षेत्र के जागरण एवं विकास में असाधारण योगदान मिलता है।
इस संदर्भ में पाश्चात्य देशों में जो अनुसंधान एवं प्रयोग किये जा रहे हैं, वस्तुतः सम्मोहन प्रक्रिया के अंतर्गत आते हैं। इसमें ऑटोसजेशन अर्थात्-स्वसंकेतों द्वारा आत्मविकास का और सम्मोहन द्वारा दूसरों को मूर्च्छित करके सुधार-उपचार का प्रयत्न किया जाता है। मेडीटेशन अर्थात् ध्यानयोग के नाम से अब यह सर्वसाधारण की जानकारी का विषय बनता जा रहा है। उसका उपयोग प्रायः शारीरिक और मानसिक रोगों के निवारणों में हो रहा है। प्राचीन काल के अध्यात्मवेत्ता उस प्रक्रिया को आत्मबल संवर्द्धन के लिए प्रयुक्त करते थे। उन दिनों चिकित्सा-उपचारों की आवश्यकता बहुत ही स्वल्प मात्रा में पड़ती थी। संयम और संतुलन के परिपालन से उन दिनों रोग कम ही होते थे। जो होते थे वे भी रक्त शुद्ध रहने के कारण सामान्य वनौषधियों के उपचार से ही अच्छे हो जाते थे।
उपर्युक्त वर्णित सचेतन और अचेतन नामक मानसिक परतों के अतिरिक्त इनसे ऊपर एक और दिव्य चेतना स्रोत, जहाँ चित्तशक्ति निवास करती है। मनोवेत्ता इसे अतिचेतन, सुपर चेतन कहते हैं। सुपर ईगो के रूप में इसी की विवेचना की जाती रही है। यह देवलोक, अतीन्द्रिय चेतना का केन्द्र एवं ऋद्धि-सिद्धियों का भण्डार माना गया है। इस क्षेत्र पर अधिकार प्राप्त कर लेने वाला अलौकिक, असाधारण अतिमानव एवं सिद्धपुरुष बन जाता है।
आसन से शरीर और प्राणायाम से प्राणचेतना का परिशोधन-परिष्कार होता है और वे परिपुष्ट - बलिष्ठ बनते हैं। किन्तु प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की चार स्वाभाविक चंचलता को निग्रहित करके एकाग्रता के केन्द्रबिन्दु पर रोके रखने के लिए हैं। इनमें जितनी सफलता मिलती जाती है, मन - मस्तिष्क शान्त और समाहित होता चला जाता है, साथ ही चित्तशक्ति का जागरण आरम्भ हो जाता है। मानवी संकल्पबल न केवल बाह्य प्रयोजनों में वरन् अपने शरीर की अनिवार्य गतिविधियों को इच्छानुसार नियंत्रित करने में सफल भी हो सकता है। योगनिद्रा द्वारा उपलब्ध समाधि स्थिति से कई प्रकार के लाभ उठाये जा सकते हैं। पहला प्रबुद्ध मस्तिष्क को गहरा विश्राम देकर उसे अधिक स्वस्थ, सक्रिय एवं प्रखर प्रतिभावान बनाया जा सकता है। दूसरा - अचेतन मस्तिष्क को जाग्रत करके उसकी अतीन्द्रिय क्षमता बढ़ाई जा सकती है और चमत्कारी सिद्धपुरुषों को देवभूमिका में पहुँचा जा सकता है। तीसरा-शरीर की गतिविधियाँ रोक सकने में समर्थ संकल्पबल की आग में संसार की कठिनाइयों को गलाया जा सकता है। जो कठिन है, उन्हें सरल बनाया जा सकता है और दूसरों को आध्यात्मिक योगदान देकर सुखी-समुन्नत बनाया जा सकता है। चौथा दीर्घजीवन का उद्देश्य पूरा करने के लिए कायाकल्प एवं परकाया प्रवेश जैसे अमृत को प्राप्त किया जा सकता है। भौतिक विज्ञान ने भी यह स्वीकार कर लिया है। कि यदि मनुष्य को चिर-निद्रा में सुलाया जा सके तो उसे रोगों और थकान के पंजों के छुड़ाकर नवजीवन प्रदान किया जा सकता है। शीतनिद्रा के रूप में समाधि से मिलती-जुलती एक विधि ढूँढ़ भी निकाली गयी है। अनुसंधानकर्ता सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डेल कारेण्टर के अनुसार मनुष्य को ठण्डा - हिमीकृत करके गहरी सुषुप्तावस्था में पहुँचा जा सकता है।
शीतनिद्रा के प्रयोग भौतिक हों या हिप्नोटिक स्तर के, मानसिक हों अथवा समाधि स्तर के आध्यात्मिक हों, हर स्थिति में सर्वतोमुखी विश्राम एवं शांत, एकाग्र समाधान की आवश्यकता अति महत्वपूर्ण समझी जाती रहेगी। उसे प्राप्त करके व्यक्ति अतीन्द्रिय शक्ति-सम्पादन के नये क्षेत्र में प्रवेश कर सकता है।
आपाधापी भरे इस युग में मनुष्य जिस आधि-व्याधि से सर्वाधिक त्रस्त है। वह है मानसिक तनाव। मानसिक तनाव एवं विक्षोभ के कारण व्यक्तित्व की अपार हानि होती है। यह उद्विग्नता और कुछ नहीं, समुचित विश्राम न मिलने की प्रक्रिया है। योगनिद्रा द्वारा यदि इस कुचक्र को तोड़ा जा सके तो मनःक्षेत्र को अभिनव परिपोषण मिल सकता है और उसकी सामान्य तथा असामान्य क्षमताओं का नये सिरे से विस्तार हो सकता है।
मनःक्षेत्र का बिखराव रोकने की प्रक्रिया ही ध्यानयोग है। इसके द्वारा सामर्थ्य की खपत में जो बचत होती है, उसका अधिकांश लाभ मस्तिष्क के उस क्षेत्र को मिलता है - जिसे ब्रह्मचक्र, ब्रह्मरंध्र, सहस्रार आदि नामों से पुकारते हैं। यह इस क्षेत्र में अवस्थित दो अति महत्वपूर्ण अंतःस्रावी ग्रंथियों की समन्वित प्रक्रिया के संबंध में एक रुचिकर वैज्ञानिक तथ्य है कि इस दौरान मस्तिष्क का सक्रिय भाग तुरन्त पीनियल एवं पिट्यूटरी ग्रंथियों से सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। ये दोनों ही स्थूल ग्रंथियाँ अध्यात्म की दृष्टि से बड़ी रहस्यमय हैं। दोनों ही ऐसे रस का स्राव करती हैं, जो हमारी चेतना के स्तर को प्रभावित करते हैं।
पीनियल ग्लैण्ड को दार्शनिकों, रहस्यवादियों ने तीसरा नेत्र ‘थर्ड आई’ एवं आत्मा का स्थान कहा है योग-विद्याविशारदों ने इसे ही पिट्यूटरी के साथ द्विदलीय आज्ञाचक्र के नाम से संबोधित किया है। षट्चक्रों में से यह एक है तथा आध्यात्मिक विकास हेतु महत्वपूर्ण ग्रंथि युग्म है। उच्चस्तरीय शक्तियों से सम्बन्ध जोड़ने में यह दोनों ही सहायक है। इनका पूर्ण जागरण हमारी चेतना को भावनात्मक और बौद्धिक स्तर से ऊपर उठाकर और अधिक सूक्ष्मजगत में ले जाता हैं
पिट्यूटरी ग्लैण्ड को तो शरीर का सम्राट कहा जा सकता हैं इस ग्रंथि में स्नायु तंत्र एवं हारमोन तंत्र की परस्पर प्रक्रिया से ही रसस्राव होता है। सारे शरीर की अन्य अंतःस्रावी ग्रंथियों व चयापचयी एवं भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को पिट्यूटरी प्रभावित करती है। यह अनन्त विस्तृत परमचेतना का प्रवेशद्वार है। इसे भौतिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्रों का मिलनबिन्दु माना गया है। ध्यान-साधना द्वारा इस ग्रन्थि को नियंत्रित-नियमित कर मनुष्य अपने स्थूल, सूक्ष्म एवं आत्मिक आवरणों का परिमार्जन कर सकता है, पूर्ण मानव बन सकता है।
जब भी कोई योगनिद्रा का अभ्यास करता है, प्रत्येक बार शक्तिप्रवाह ब्रेन सर्किटों के मध्य नये सम्बन्ध स्थापित करता है। मस्तिष्क के अन्धेरे निष्क्रिय क्षेत्र को प्रकाशित एवं सक्रिय करता है। यह हमारी चेतना को बाह्य जगत के, उसके सम्पूर्ण व्यवसाय से अलग करता है तथा उसकी अचेतन क्रियाओं को चेतन के नियंत्रण में लाता है।
योगनिद्रा में पूर्ण-शिथिलीकरण द्वारा शरीर और मन को शाँत एवं निश्चेष्ट कर दिया जाता है और अंतःक्षेत्र में ध्यान को केन्द्रित किया जाता है, जहाँ आत्मचेतना निवास करती हैं नित्य-नियमित अभ्यास द्वारा यह अवस्था थोड़े ही दिनों में आ जाती है कि साधक थोड़े-से प्रयत्न में ही गहरी योगनिद्रा में सो जाता है और उसे प्रकाशवान अंतर्ज्योति के दर्शन होने लगते हैं। इसका उपयोग रोगनिवारण से लेकर मानसिक व आत्मिक उत्कर्ष में किया जा सकता है। आज चिकित्सा क्षेत्र में योगनिद्रा का उपयोग शारीरिक एवं मानसिक रोगों की निवृत्ति के लिए किया जा रहा है। एवं सिद्धियों की कुँजी इस विधा से राहत दी जा रही है। जरा और गहरे जाकर इसका सुनियोजन करें तो सुपर चेतन की गहराइयों में प्रवेश किया जा सकता है।
मृत्यु जीवन का अन्त नहीं, वरन् मरने के बाद भी जीवन का अस्तित्व बना रहता है और वह पुनर्जन्म धारण करता है। भारतीय धर्मशास्त्रों में पग-पग पर इस तथ्य का प्रतिपादन किया गया है। श्रीमद् भगवद्गीता में बार-बार इस बात का उल्लेख किया गया है कि शरीर छोड़ना वस्त्र बदलने की तरह है। प्राणी को बार-बार जन्म लेना पड़ता है। शुभ कर्म करने वाले श्रेष्ठ लोक को सद्गति को - मोक्ष को प्राप्त करते हैं और दुष्कर्म करने वालों को नरक की दुर्गति भुगतनी पड़ती है।
पुनर्जन्म के संदर्भ में आधुनिक परामनोवैज्ञानिक अनुसंधानों ने भी अब ऐसे अनेकों प्रमाण एकत्रित किये हैं जिनसे मनुष्यों का पुनर्जन्म होने के प्रमाण मिलते हैं। ऐसे अन्वेषणों में प्रो. राइन की खोजे बहुत विस्तृत और प्रामाणिक मानी जाती है। इस दिशा में बहुत जाँच पड़ताल हुई और जो निष्कर्ष सामने आये, वे यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि आत्मा का अस्तित्व मरने के बाद भी बना रहता है और वह पुनर्जन्म धारण करती है। भारतीय संस्कृति में आत्मा की अमरता एवं पुनर्जन्म की सुनिश्चितता को आरम्भ से ही मान्यता प्राप्त है। किन्तु संसार के दो प्रमुख धर्मों-ईसाई और इस्लामी धर्मं के बारे में ऐसी बात नहीं हैं। इनमें मरणोत्तर जीवन का अस्तित्व तो माना जाता है, पर कहा जाता है कि वह प्रसुप्त स्थिति में बना रहता है। महाप्रलय होने के उपरान्त फिर कहीं नया जन्म मिलता है। इतने विलम्ब से पुनर्जन्म होने की बात तो न होने जैसे ही बन जाती है। ऐसी दशा में इन धर्मों के अनुयायियों के बारे में पुनर्जन्म न मानने जैसी मान्यताएँ है। किन्तु वैज्ञानिक, परामनोवैज्ञानिक अनुसंधानों एवं उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर अब लोगों की मान्यताएँ बदली है और नये सिरे से पुनर्जन्म के सम्बन्ध में जाँच - पड़ताल करने का उत्साह उमड़ा है।
ब्राजीलियन इन्स्टीट्यूट ऑफ सायकोबायोफिजिकल रिसर्च के अध्यक्ष डॉ. हरनानी एण्ड्रेड ने एक सौ से अधिक ऐसे छोटे बच्चों का सर्वेक्षण किया है, जो पुनर्जन्म की घटनाएँ इतनी सटीक जानकारी के साथ बताते थे, जो बताने की इनकी कतई क्षमता नहीं थी। उदाहरण स्वरूप कई पीढ़ियों से इटली में बसने वाला परिवार ब्राजील में आ बसा। इस परिवार की एक छोटी-सी बालिका थी - नाम था - सिलवीया। सिलवीया जब एक माह की थी, तभी से वह जब कभी हवाईजहाज ऊपर से उड़ता, तो भयग्रस्त होकर घंटों चुपचाप सहमी-सी पड़ी रहती। जब वह बोलने लायक हुई तो कभी-कभी ब्राजीलियन भाषा के अतिरिक्त इटालियन शब्दों का भी प्रयोग करने लगती। यद्यपि उस परिवार में और न ही कहीं पास-पड़ोस में उसने किसी को इटालियन भाषा बोलते सुना था। उसके इस व्यवहार से सभी विस्मित थे।
समय बीतता गया और सिलवीया तीन वर्ष की हो गयी। अपनी सहेलियों, मित्रों से जब वह बातचीत करती तो अपने को कहीं और देश की निवासी बताती, साथ ही विशेष रूप से एक इटालियन व्यक्ति-अफोन्सा दिनारी का नाम प्रायः तेली रहती थी। एक दिन जब उसकी चौथी साल गिरह थी, तब उसने इटली की राजधानी रोम का एक चित्र देखा। देखते ही वह बोल उठी - यह तो कैपिटल अर्थात् राजधानी है। यहाँ पर एक घर में मैं रहती थी। एक दिन जब उसकी चौथी साल गिरह थी, तब उसने इटली की राजधानी रोम का एक चित्र देखा। देखते ही वह बोल उठी - यह तो कैपिटल अर्थात् राजधानी है। यहाँ पर एक घर में मैं रहती थी। जिस स्कूल में मैं पढ़ती थी, उसके पास में पहाड़ियाँ हैं। मैं उन पहाड़ियों पर उछलती-कूदती थी। उस चित्र के नीचे केवल रोम और इटली - इतने ही अक्षर छपे थे, इतने पर भी उसने वहाँ की भौगोलिक स्थिति का स्पष्ट वर्णन किया।
एक अन्य अवसर पर उसने अपनी मृत्यु के सम्बन्ध में बताया कि एक दिन वह स्कूल में थी। एक मित्र उसकी ओर फाउन्टेन पेन जैसी कुछ चीज लेकर आ रहा था। अचानक उस वस्तु में एक भयंकर विस्फोट हुआ और हम दोनों ऊपर की ओर उड़ते गये। इस घटना की साक्षी उसकी दादी माँ ने इस दिन के पूरे घटनाक्रम को अपनी डायरी में नोट कर लिया था, जिसे सिलवीया के पुनर्जन्म की सत्यता की जाँच-पड़ताल कर रहे डॉ. हरनानी एन्ड्रेड को दिखाया गया। रोम में पता लगाया गया तो पाया गया कि एक पहाड़ी के पास एक स्कूल था, जहाँ दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान खिलौना समझकर पेन के आकार की विस्फोटक वस्तु हाथ में लेने से दो बच्चे की मृत्यु गयी थी। उनमें से एक बच्ची थी और दूसरा एक लड़का। सत्यता की परख करने के लिए जब सिलविया की दादी ने उससे प्रश्न किया कि उस घटना के बाद क्या हुआ, तो उसने बताया कि तब वह आपके पास आ गयी।
पहले पुनर्जन्म की घटनाओं के बारे में पाश्चात्य जगत में जो ऊहापोह थी, अब वह मिटने लगी है। विश्व के विभिन्न भागों में मूर्धन्य वैज्ञानिक इन घटनाओं को केवल कपोल - कल्पना बताकर टाल देने की अपेक्षा इन घटनाओं की गहरी छानबीन गंभीरता से करने लगे हैं।
‘मिस्ट्रीज ऑफ इनर सेल्फ’ नामक पुस्तक में स्टुअर्ट होलरायड ने इस तरह की अनेक घटनाओं का वर्णन किया है, जो पुनर्जन्म की सच्चाई को उजागर करती हैं। उसके अनुसार जर्मनी का मोजार्ट नामक पाँच वर्षीय बालक सर्वाधिक विलक्षण था। केवल पाँच वर्ष की आयु में ही वह अपने पिता वुल्फगौग अमेडीअस और बहिन नानेरी के साथ बहुत ही शानदार संगीत बजा लेता था। इतना ही नहीं, वह स्वयं इतना ही नहीं, वह स्वयं संगीत की रचना भी कर लेता था। ऐसे विलक्षण बच्चों की प्रतिभा का कारण मात्र इस जन्म का उपार्जन नहीं कहा जा सकता है। शरीर, की मृत्यु के साथ संग्रहित संस्कारों का भी अंत हो जाता है, इस पाश्चात्य मान्यता में अवश्य नहीं त्रुटि है, ऐसा अब मूर्धन्य विज्ञजनों व वैज्ञानिकों को भी मानने के लिए बाध्य होना पड़ा रहा है। वे स्वीकारने लगे हैं कि आनुवंशिक गुणों की भाँति ही सूक्ष्म संसार भी व्यक्ति के साथ जन्म - जन्मान्तर तक साथ चलते हैं और अवसर पाकर भले-बुरे रूपों प्रस्फुटित होते हैं।
एक अन्य घटना थोड़े परिवर्तन के साथ इसी तथ्य की ओर इशारा करती है। एक आंग्ल बालिका को बचपन से बार-बार यही स्वप्न आता था कि वह टहलते-टहलते एक चर्च के पास कब्रिस्तान तक पहुँचाती हैं, जहाँ कुछ घोड़े चरते हुए दिखाई देते हैं। किसी एक कब्र की ओर मानों उसे कोई बरबस खींच रहा है। बेबस वह उस तरफ खिंचती चली जाती है और वहाँ जाकर गिर पड़ती है। इस स्वप्न के बाद उसकी नींद खुल जाया करती थी। इस स्वप्न से भयभीत होकर उसने बारह वर्ष की उम्र में प्रख्यात ब्रिटिश लेखक जे. बी. प्रीस्टले को अपने स्वप्न के बारे में विस्तारपूर्वक एक पत्र द्वारा जानकारी दी। उन दिनों प्रीस्टले स्थान और समय का अतिक्रमण करने वाली इसी तरह की घटनाओं की छानबीन कर रहे थे।
इस पत्र - व्यवहार के कुछ महीनों बाद छुट्टियों में वह बालिका अपने एक रिश्तेदार के यहाँ जा रही थी। रास्ते में अचानक तेज आँधी चलने लगी, मेघ गर्जन होने लगा और बारिश होने लगी। वर्षा से बचने हेतु उसने पास के चर्च में शरण ली। वहाँ पहुँचने पर देखा कि जिस चर्च को वह स्वप्न में बार-बार देखती रहती है, यह वही चर्च था। पास में ही कब्रिस्तान था, जहाँ कुछ छुट्टल घोड़े चर था। एक कब्र की ओर जाने का उसका मन हुआ। उसे लगा जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने उसे खींचकर उस कब्र तक पहुँचा दिया हो। अवलोकन करने पर पाया कि उस कब्र पर जो वाक्य खुदा था, उसका तात्पर्य था - मृतक को २१ अप्रैल, १९३४ में दफनाया गया। वस्तुतः इसी तारीख को उस लड़की का जन्म भी हुआ था। कैसा अजीब संयोग था।
जे. बी. प्रीस्टले ने इस घटना का उल्लेख करते हुए अपनी पुस्तक में आगे लिखा है कि अपने जन्म के दिन ही पूर्व में उसकी मृत्यु हुई थी, उसी का स्वप्न बार-बार आता रहता है, इस बात की जानकारी होने के बाद उस लड़की को स्वप्न आना बंद हो गया। वस्तुतः छोटी आयु के बालक - बालिकाओं को आने वाले स्वप्न या स्मृतियाँ भूतकाल के संकेत होते हैं। जन्मजात विलक्षण क्षमताएँ अधिकतर बाल्यावस्था में ही दृष्टिगोचर होती है। यह निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए उनने लिखा है कि अधिकतर घटनाओं में आयुवृद्धि के साथ ही पूर्व जन्म की स्मृतियाँ विलुप्त हो जाती हैं और अचेतन मस्तिष्क के किसी एक कोने में जाकर जम जाती हैं विख्यात अमेरिकी परामनोविज्ञानी डॉ. विलियम पेनफील्ड ने इस संदर्भ में गहन खोजें की हैं और पाया है कि अचेतन मस्तिष्क ही पूर्व जन्म की स्मृतियों एवं भले-बुरे संस्कारों का भाण्डागार है। यदि किसी प्रकार इस परत को उधेड़ा या जाग्रत किया जा सके तो न केवल जन्म - जन्मान्तरों के रहस्यों को जाना जा सकता है, वरन् बुरे कुसंस्कारों से पिण्ड छुड़ाया और सुसंस्कारों को उभारा जा सकता है और सुसंस्कारों को उभारा जा सकता है और अतीन्द्रिय क्षमताओं का स्वामी बना जा सकता है।
सुप्रसिद्ध लेखक गोय प्लेफेर ने अपनी कृति ‘दी फलाइंग कार्ड’ में टिना नामक एक लड़की के पुनर्जन्म की घटना का वर्णन किया है। टिना साओपोलो पास के अशराकारा नामक गाँव में जन्मी थी। उसे बचपन से ही अपने पूर्व जन्म की बात याद थी। आजकल यह महिला जनहित के कार्य करने वाली एक कम्पनी में वकील है। बह बताती है कि पिछले जन्म में वह फ्राँस में अंजाला एवं जीन पेरीस नामक माता-पिता के यहाँ जन्मी थी, तब उसका नाम रखा गया था - एलेक्स अमादादो बरलोफ, उसके माता-पिता विची नामक नगर में निवास करते थे। जब वह ढाई वर्ष की थी तक उसके पिता उसे लेहार्व बन्दरगाह पर ले गये थे। जहाँ उसने कई बड़े-बड़े जहाज देखे थे, वहीं पर उसने तेजी से फ्रेंच भाषा सीख ली थी, लेकिन जर्मन भाषा के प्रति उसके मन में नफरत थी और आज भी है। इसका कारण बताते हुए वह कहती है कि दूसरे विश्वयुद्ध के समय एक जर्मन सैनिक द्वारा उसकी हत्या कर दी गयी थी। इसके प्रमाण में वह अपने शरीर पर बने दो काले धब्बों को दिखाती है, जो जन्मजात हैं। ये धब्बे प्रदर्शित करते हैं मानो उसके हृदय के आर-पार कोई बन्दूक की गोली निकल गयी हो।
पूर्व जन्म का स्मरण किन लोगों को रहता है। इस सम्बन्ध में ‘आत्मा की खोज’ विषय को लेकर विश्वभ्रमण करने और पुनर्जन्म सम्बन्धी ६.. से अधिक घटनाएँ एकत्रित करने वाले अमेरिका केक सुप्रसिद्ध विज्ञानवेत्ता डॉ. स्टीवेंसन का कहना है कि प्रायः नवोदित कोमल मस्तिष्क पर ही पूर्व जन्म की छाया अधिक स्पष्ट रहती है। यही कारण है कि तीन से पाँच वर्ष की आयु तक बच्चों द्वारा बताये गये पूर्व जन्म के घटनाक्रम अधिक प्रामाणिक सिद्ध होते हैं। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, वर्तमान जन्म की जानकारियाँ व संस्कार इतने अधिक मन−मस्तिष्क पर लद जाते हैं कि उस दबाव से पिछले जन्म के स्मरण विस्मृति के गर्त में गिरते चले जाते हैं और प्रयत्न करने पर भी हम उन्हें मानस - पटल पर उभार नहीं पाते। इसी तथ्य को और अधिक स्पष्ट समझाते हुए गीता ४/५ में कहा गया है-
बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेतथ परंतप॥
अर्थात् “हे अर्जुन! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत गये हैं। ईश्वर होकर मैं उन सबको जानता हूँ, परन्तु हे तरंतप! तू उसे नहीं जान सकता।”
उपासना देवी - देवताओं की की जाती है। स्वयं भगवान अथवा उनके समाज-परिवार के देवी-देवता ही आमतौर से जनसाधारण की उपासना के केन्द्र होते हैं विश्वास यह किया जाता है कि पूजा, अर्चा, जप, स्तुति दर्शन, प्रसाद आदि धर्मकृत्यों के माध्यम से भगवान अथवा देवताओं को प्रसन्न किया जा सकता है और जब वे प्रसन्न हो जाते हैं, तो उनसे इच्छानुसार वरदान प्राप्त करके अभीष्ट सुख-सुविधाओं से लाभान्वित हुआ जा सकता है।
यह मान्यता कई बार सही साबित होती है, कई बार गलत। प्राचीनकाल के इतिहास पुराण देखने से पता चलता है कि कितने ही साधकों और तपस्वियों ने कठिन उपासनाएँ करके अभिभूत शक्तियाँ-विभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। स्वयं भी इतने समर्थ हुए कि दूसरों को अपनी साधना का अंश देकर वरदान-आशीर्वाद से लाभान्वित कर सके। भारत ही नहीं, संसार भर का पुराण-साहित्य ऐसी ही घटनाओं से भरा पड़ा है, जिनमें चर्चा के प्रमुख पात्रों में से अधिकांश की सामर्थ्य और विशेषताएँ देवप्रदत्त थी। ऋषियों, तपस्वियों, सन्तों के जीवन चरित्रों में अधिकांश में ऐसे वर्णन मौजूद हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि उनमें कितनी ही अलौकिक विशेषताएँ थीं और उनने तप-साधना के द्वारा देवताओं से अथवा सीधे भगवान से पाया था। प्रामाणिक इतिहास में भी ऐसे अगणित प्रमाण विद्यमान हैं, जिनसे साधना के फलस्वरूप अनेक व्यक्तियों ने अपने व्यक्तित्वों में ऐसी विशेषताएँ उत्पन्न कीं जो सर्वसाधारण के लिए सम्भव या सुगम नहीं होतीं। अभी भी ऐसे व्यक्ति मौजूद हैं, जो उपर्युक्त तथ्य को अपने अद्भुत व्यक्तित्व या कर्तृत्व के द्वारा सही सिद्ध कर रहे हैं।
साथ-साथ यह भी देखने में आता है कि घर-बार छोड़कर पूरा समय देवाराधन में लगाये हुए व्यक्ति साधना आरम्भ करने के बाद और भी अधिक गई-गुजरी स्थिति में चल गये। न तो उनमें कोई प्रत्यक्ष विशेषता देखी गई, न आत्मिक महत्ता। न उन्हें सुख प्राप्त था, न शान्ति। स्वास्थ्य से लेकर सम्मान तक कोई भी सम्पदा उनके पास नहीं थी और विवेक से लेकर आत्मबल तक कोई प्रतिभा - विशेषता उपलब्ध हुई वरन् जिस स्थिति में उन्होंने वह उपासनात्मक प्रक्रिया अपनाई, पीछे उनकी स्थिति पर प्रकार बिगड़ती ही चली गई। भौतिक सुख-सम्पत्ति न सही, आत्मिक शान्ति और विभूति का प्रकाश मिला होता तो भी सन्तोष किया जा सकता था, पर वैसा भी कुछ वे प्राप्त न कर सके।
यह स्थिति स्वभावतः मन को असमंजस में डालती है। उसी प्रक्रिया का अवलम्बन करने से एक को लाभ एक हो हानि, ऐसा क्यों? एक को सिद्धि दूसरे के हाथ निराशा, यह किसलिए? कैसे? वहीं देवता, वहीं मंत्र, वही विधि, एक की फलित एक की निष्फल, इसका क्या कारण? यदि भगवान या देवता और उनकी उपासना अंध-विश्वास है, तो फिर इससे कितने ही लाभान्वित क्यों होते हैं? यदि सत्य है तो उससे कितनों को ही निराश क्यों होना पड़ता है। जल हर किसी की प्यास बुझाता है, सूरज हर किसी को गर्मी-रोशनी देता है, फिर देवता और उनके उपासना क्रम में परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएँ क्यों?
इस उलझन पर अनेक दृष्टियों से विचार करने के उपरान्त इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि देवता या मंत्रों में कितनी अलौकिकता दृष्टिगोचर होती है, उससे लाभान्वित हो सकने की पात्रता साधक में होना नितान्त आवश्यक है। मात्र उपासनात्मक कर्मकाण्डों की लकीर पीट लेना इस संदर्भ में सर्वथा अपर्याप्त हैं। तेज धार की तलवार में सिर काटने की क्षमता है, इसमें सन्देह नहीं, पर वह क्षमता सही सिद्ध हो, इसके लिए चलाने वाले का भुजबल, साहस एवं कौशल भी आवश्यक है। बिजली में सामर्थ्य की कमी नहीं, पर उससे लाभान्वित होने के लिए उसी प्रकार के यन्त्र चाहिए। यन्त्र - उपकरणों के अभाव में बिजली का उपयोग व्यर्थ ही नहीं होता, अनर्थ-मूलक भी बन जाता है।
स्वाति के जल से मोती वाली सीपें ही लाभान्वित होती हैं। अमृत उसी को जीवन दे सकता है, जिसका मुँह खुला हुआ हैं। प्रकाश का लाभ आँखों वाले ही उठा सकते हैं। इन पात्रताओं के अभाव में स्वाति का जल, अमृत अथवा प्रकाश कितना ही अधिक क्यों न हो, उससे लाभ नहीं उठाया जा सकता। ठीक वहीं बात देव-उपासना के सम्बन्ध में लागू होती है। घृत-सेवन का लाभ वही उठा सकता है, जिसकी पाचनक्रिया ठीक हो, देवता और मंत्रों का लाभ वे ही उठा पाते हैं, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को भीतर और बाहर से विचार और आचार से परिष्कृत बनाने की साधना कर ली है। औषधि का लाभ उन्हें ही मिलता है, जो बताये हुए अनुपात और पथ्य का भी ठीक तरह प्रयोग करते हैं। अतः पहले आत्म-उपासना फिर देव - उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मंत्र और देवता के, भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं, इससे पहले आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान ही नहीं देते फलतः उन्हें निराश ही होना पड़ता है। बादल कितना ही जल क्यों न बरसाए, उसमें से जिसके पास जितना बड़ा पात्र है, उसे उतना ही मिलेगा। निरंतर वर्षा होते रहने पर भी आँगन में रखे हुए पात्रों में उतना ही जल रह पाता है, जितनी उनमें जगह होती है। अपने भीतर जगह को बढ़ाये बिना कोई बरतन बादलों से बड़ी मात्रा में जल प्राप्त करने की आशा नहीं कर सकता, देवता और मंत्रों से लाभ उठाने के लिए भी पात्रता नितान्त आवश्यक है।
गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से, आचरण और चिंतन की दृष्टि से यदि मनुष्य उत्कृष्टता और आदर्शवादिता से अपने को सुसम्पन्न कर लें तो उनके कषाय-कल्मषों की कालिमा हट सकती है और अन्तःकरण तथा व्यक्तित्व शुद्ध, स्वच्छ, पवित्र एवं निर्मल बन सकता है। ऐसा व्यक्ति मंत्र, उपासना, तपश्चर्या का समुचित लाभ उठा सकता है और देवताओं के अनुग्रह का अधिकारी बन सकता है। जब तक यह पात्रता न हो तब तक उत्कृष्ट वरदान माँगने की दूरदर्शिता ही उत्पन्न होगी और साधना के पुरुषार्थ से कुछ भौतिक लाभ भले ही मिल जाएँ, देवत्व का एक कण भी उसे प्राप्त न होगा और आसुरी भूमिका पर कोई सिद्धि मिल भी जाए, तो अन्ततः उसके लिए घातक ही सिद्ध होगी। असुरों की साधना और उसके आधार पर मिली हुई सिद्धियों से उनका अन्ततः सर्वनाश ही उत्पन्न हुआ। अध्यात्म−विज्ञान का समुचित लाभ लेने के लिए साधक का अन्तःकरण एवं व्यक्तित्व कितना निर्मल होगा, उतनी ही उसकी उपासना सफल होगी। धुले हुए कपड़े पर रंग आसानी से चढ़ता है, मैले पर नहीं। स्वच्छ व्यक्तित्व सम्पन्न साधक किसी भी पूजा उपासना का आशाजनक लाभ सहज ही प्राप्त कर सकता है।
भगवान और देवता कहाँ हैं? किस स्थिति में हैं? उनकी शक्ति कितनी है? इस तथ्य का सही निष्कर्ष यह है कि यह दिव्य चेतनसत्ता निखिल विश्वब्रह्माण्ड में व्याप्त है और पग-पग पर उनके समक्ष जो अणु-गति जैसी व्यस्तता के कार्य प्रस्तुत हैं, उन्हें पुरा करने में संलग्न हैं। उनके समक्ष असंख्य कोटि प्राणियों की, जड़-चेतन की बहुमुखी गतिविधियों को सँभालने का विशाल काय काम पड़ा है, सो वे उसी में लगी रहती हैं एक व्यवस्थित नियम और क्रम उन्हें इन ग्रह-नक्षत्रों की तरह कार्य संलग्नक रखता है। व्यक्तिगत संपर्क में घनिष्ठता रखना और किसी की भावनाओं के उतार-चढ़ाव की बातों पर बहुत ध्यान देना उनके लिए समग्र रूप से सम्भव नहीं। वे ऐसा करती तो हैं, पर अपने एक अंश प्रतिनिधि के द्वारा। दिव्यसत्ताओं ने हर मनुष्य के भीतर उसके स्थूल-सूक्ष्म-कारण-शरीरों में अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश जैसे आवरणों में अपना एक-एक अंश स्थापित किया हुआ है और यह अंश प्रतिनिधि ही उन व्यक्ति की इकाई को देखता-सँभालता है। वरदान आदि की व्यवस्था इसी प्रतिनिधि द्वारा सम्पन्न होती है।
व्यक्ति की अपनी निष्ठा, श्रद्धा, भावना के अनुरूप ही यह देव अंश समर्थ बनते हैं। या दुर्बल रहते हैं। एक साधक की निष्ठा में गहनता और व्यक्तित्व में प्रखरता हो, तो उसका देवता समुचित पोषण पाकर अत्यन्त समर्थ दृष्टिगोचर होगा और साधक ही आशा-जनक सहायता करेगा। दूसरा साधक आत्मिक विशेषताओं से रहित हो तो उसके अंतरंग में अवस्थित देव अंश पोषण के अभाव में भूखा, रोगी, दुर्बल बनकर एक कोने में कराह रहा होगा। पूजा भी नकली दवा की तरह भावना-रहित होने से उस देवता को परिपुष्ट न बना सकेगी और वह विधिपूर्वक मंत्र-जप आदि करते हुए भी समुचित लाभ न उठा सकेगा।
विराट बाह्य कितना ही महान क्यों न हो, व्यक्ति की इकाई में वह उस प्राणी की परिस्थिति में पड़ा हुआ लगभग उससे थोड़ा ही अच्छा बनकर रह रहा होगा। अन्तरात्मा की पुकार निश्चित रूप से ईश्वर की वाणी है, पर वह हर अन्तःकरण में समान रूप में प्रबल नहीं होती। सज्जन के मस्तिष्क में मनोविकारों का एक झोंका घुस जाएँ, तो भी उसकी अन्तरात्मा प्रबल प्रतिकार के लिए उठेगी और उसे ऐसी बुरी तरह धिक्कारेगी कि पश्चाताप ही नहीं प्रायश्चित किये बिना भी चैन न पड़ेगा। इसके विपरीत दूसरा व्यक्ति जो निरन्तर क्रूर-कर्म ही करता रहता है, उनकी अन्तरात्मा यदाकदा बहुत हलका-सा प्रतिवाद ही करेगी और वह व्यक्ति उसे आसानी से उपेक्षित करता रहेगा। ईश्वर दोनों के हृदय में है। दोनों की अन्तरात्मा की प्रकृति एक-सी है दोनों ही अपना कर्तव्य निकालती हैं। पर दोनों की स्थिति सर्वथा भिन्न है। सज्जन ने सत्प्रवृत्तियों को पोषण देकर अपनी अन्तरात्मा को निर्मल बनाया है, उसकी प्रबलता कभी शाप-वरदान के चमत्कार भी प्रस्तुत कर सकती है। पर दूसरे ने अपनी आत्मा को निरन्तर पद-दलित करके, उसे भूखा रखकर दुर्बल बना रखा है, वह न तो प्रबल प्रतिरोध कर सकती है और न कभी उसके द्वारा ईश्वर की पुकार आदि की जाए, तो उसका कुछ प्रतिफल निकल सकता है।
सर्वव्यापी, साक्षी-द्रष्टा नियन्ता, कर्ता, हर्ता, सत-चित-आनन्द आदि विभूतियों से सम्पन्न विराट ब्रह्म है। देव-शक्तियाँ भी अपनी सीमित परिधि के अनुरूप निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त और निर्धारित प्रयोजनों में तत्पर हैं। उन विराट सत्ताओं की उपासना सम्भव नहीं। उपासना के लिए प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक छोटा-सा प्रतिनिधि उनका मौजूद है। साधक और तपस्वी अपनी निष्ठा के अनुरूप उसका पोषण करते, समर्थ बनाते और लाभ उठाते हैं। एक ग्वाले की गाय स्वस्थ-सुन्दर और बहुत दूध देती है। दूसरे की ठीक वैसी ही होने पर भी दुबली, रुग्ण है और कम दूध देती है। इसका कारण उन दोनों ग्वालों की गौ-सेवा में न्यूनाधिकता का होना ही है। अपने अंतरंग में अवस्थित देवता को अपनी आत्मनिष्ठा, पवित्रता आदि विशेषताओं के द्वारा समर्थ बनाया जाता है। इसके उपरान्त ही पूजा उपासना रूपी बाल्टी में दूध दुहने की बात बनती है।
रामकृष्ण परमहंस की काली ने विवेकानन्द को आत्मशक्ति से सम्पन्न बनाकर उन्हें महामानवों की पंक्ति में ला खड़ा किया। दूसरे तांत्रिक, अघोरी, कापालिक, ओझा उसी काली देवी से झाड़-फूँक के छुटपुट प्रयोजन ही पूरे कर पाते हैं। विराट महाकाली एक है। पर रामकृष्ण परमहंस के अन्तरंग में परिपोषित काली अंश की क्षमता उनके अनुरूप थी और ओझा - अघोरी लोगों की काली बहुत दुर्बल और ओछे किस्म की होती है। अर्जुन के कृष्ण की सामर्थ्य अलग थी। मीरा सूर के कृष्ण अलग थे और रामलीला करने वालों के पुजारियों के कृष्ण अलग हैं। आकृति - प्रतिमा दोनों की एक-सी हो सकती है, पर सामर्थ्य में असाधारण अन्तर होगा। यह अन्तर उन साधकों की आन्तरिक स्थिति के कारण विनिर्मित होता है।
इस तथ्य को हमें समझना ही होगा। न समझने से हमें असमंजस और भ्रम में पड़ना पड़ेगा, निराशा हाथ लगेगी और सम्भव है तब उपेक्षा ही नहीं नास्तिकता भी सामने आ खड़ी हो। उसी मंत्र और उसी विधान से एक व्यक्ति आश्चर्यजनक प्रतिफल प्राप्त करता है और ठीक उसी रीति-नीति को अपनाकर दूसरा व्यक्ति सर्वथा निराश - असफल रहता है। इसमें न विधि-विधान को दोष दिया जाना चाहिए और न देवता की निष्ठुरता या भाग्य को कोसा जाना चाहिए। तथ्य यही है कि हमने अपने इष्टदेव को इतना परिपुष्ट नहीं बनाया कि वे हमारी प्रार्थना के अनुरूप उठ खड़े होने और सहायता कर सकने में समर्थ होते। द्रौपदी के कृष्ण अलग थे, वे एक पुकार सुनते ही दौड़कर आये। हमारे कृष्ण अलग है वे लगभग लंघन में पड़े रोगी की तरह है। पुकार सुनने और सहायता के लिये खड़े होने की सामर्थ्य उनके हाथ-पैरों में है नहीं, फिर वे प्रार्थना का क्या उत्तर दें?
अध्यात्म विद्या के तत्त्वदर्शियों ने इस तथ्य को छिपाया नहीं है। उन्होंने सदा यह कहा है कि इस विराट ब्रह्म में जो कुछ दिव्य महान, पवित्र, प्रखर है उसका एक अंश हर व्यक्ति के भीतर विद्यमान है। जो चाहे उसे ठीक तरह सँजोने-सँभालने में लग सकता है और उन मणिमुक्तकों से अपने जीवन-भाण्डागार को भरापूरा कर सकता है। उपेक्षा करने अथवा दुर्गति करने से वे निरर्थक ही बनकर रह जाएँगे। हर किसी के मस्तिष्क में गणेश विद्यमान है, जो बुद्धि - विकास की साधना करके अपने गणेश को परिपुष्ट बना लेगा, वह विद्वान बनकर अनेक विभूतियों के वरदान प्राप्त करेगा। जो अपने गणेश की जड़ों में पानी नहीं देगा, उनके विनायक भगवान सूखे मूर्च्छित एक कोने में पड़े होंगे। लड्डू खीर खिलाने स्तोत्र पाठ करने पर भी वे कुछ सहायता न कर सकेंगे बुद्धिमान और विद्वान बन सकता सम्भव ने होगा। हर किसी की भुजाओं में हनुमान का निवास है। व्यायाम करने वाले संयमी, ब्रह्मचारी लोग बजरंगबली के भक्त प्रमाणित हो सकते हैं, पर जिनने अपने असंयमी और भ्रष्ट आचरण से हनुमान जी को पीड़ित - प्रताड़ित करने में कमी नहीं छोड़ी, उनका हनुमान चालीसा पाठ कुछ ज्यादा कारगर नहीं होगा, वे आरोग्य का वरदान अपने रुग्ण हनुमान से कैसे प्राप्त कर सकेंगे?
बालबुद्धि, उतावले और अदूरदर्शी लोग ही उपासना को जादूगरी, बाजीगरी जैसी कोई चीज मानकर चलते हैं। उनकी कल्पना किन्हीं ऐसे देवताओं की होती हैं जो स्तुति, जप, पूजा, प्रसाद के तनिक से प्रलोभन पर ललचाए जा सकते हैं। और उनसे इन नगण्य उपहारों के बदले मनचाहे लाभ उठाये जा सकते हैं। अधिकांश पूजा, उपासना में संलग्न लोगों की मनोभूमि इसी बच्चों जैसे स्तर की होती है। वे विधि-विधानों कर्मकाण्डों या उपहारों का ताना-बाना बुनते रहते हैं और उसी टंट घंट में अपना उल्लू सीधा करने की तरकीबें भिड़ाते रहते हैं तथाकथित भक्तों की मण्डली इसी स्तर की होती है। वे तिलक - छापे लगाकर अपनी शक्ति का प्रमाण भगवान के सामने प्रस्तुत करते हैं या प्रमाण भगवान के सामने प्रस्तुत करते हैं या कुछ और खेल खड़ा करके भगवान की आँखों में धूल झोंककर अपने असली स्वरूप को छिपाते हुए भक्त को मिलने वाले लाभ प्राप्त करना चाहते हैं। वस्तुतः न भगवान इतने भोले हैं न कोई देवता इतना सरल है, न कोई मंत्र ऐसा है जिसे कुछ बार जप-रटकर मनचाहा लाभ उठाया जा सके। उपासना का एक सर्वांगपूर्ण विज्ञान है। अध्यात्म विद्या को एक समग्र साइंस ही कहना चाहिए। उसके नियम और प्रयोजनों को समझ कर तदनुकूल चलने से ही लाभान्वित हुआ जा सकता है। यदि यह तथ्य लोगों ने समझा होता तो अध्यात्म मार्ग की देहरी पर पैर रखते ही पहला प्रयोग अपने अन्तरंग में मूर्छित, पददलित, विभुक्षित, मलिन पड़े हुए इष्टदेव को सँभालने - सँजोने का प्रयत्न किया होता। उन्हें समर्थ और बलवान बनाया होता। इस प्रथम प्रयोजन को पूरा करने के बाद मंत्र, जप, उपासना, पूजा स्तोत्र आदि का चमत्कार देखने का दूसरा कदम उठाया गया होता तो निस्सन्देह हर उपासक को आशाजनक सफलता मिली होती और किसी को भी निराश होने, अविश्वासी बनने या असमंजस में पड़ने का अवसर न आता।
एक व्यापारी ने बहुत धन कमाया। उसे अपने धन पर इतना गर्व था कि वह अपने घर के लोगों पर ऐंठा करता था। फल यह हुआ कि उसके लड़के भी उद्दण्ड और अहंकारी हो गये। पिता-पुत्रों में ही ठनने लगीं घर नरक बन गया।
उद्विग्न व्यापारी ने महात्मा बुद्ध की शरण ली और कहा - “भगवन्! मुझे इस नरक से मुक्ति दिलाइए, मैं भिक्षु होना चाहता हूँ।” तथागत ने उत्तर दिया - “भिक्षु बनने का अभी समय नहीं है। तात्! तुम जैसा संसार चाहते हो वैसा आचरण करो, तो घर में ही स्वर्ग के दर्शन कर सकोगे।”
व्यापारी घर लौट आया और विनम्रता बरतने लगा। उससे सारे घर के लोगों का हृदय - परिवर्तन हुआ। सुख शान्ति के दर्शन होने लगे।
डरावनी घटनाएँ पुस्तकों में पढ़ी जाएँ, तो उसका पाठक पर कोई विशेष असर नहीं पड़ता, पर वही घटनाक्रम सामने साकार हो रहे हों, तो मन मस्तिष्क पर इतना गम्भीर प्रभाव पड़ता हैं कि कई बार प्रत्यक्षदर्शियों की मौत तक हो जाती हैं। यह प्रत्यक्ष का प्रभाव हैं। दृश्य - भेद के हिसाब से यह प्रभाव अच्छा भी हो सकता हैं और बुरा भी।
अब इसी सिद्धान्त के आधार पर चलचित्रों द्वारा रोगियों के उपचार का एक अभिनव तरीका ढूँढ़ा गया हैं। इसे ‘मूवी थेरेपी’ कहते हैं। अमेरिका एक योरोप में इन दिनों इसकी धूम मची हुई हैं।
जिस प्रकार अन्य चिकित्सा पद्धतियों की पढ़ाई की सर्वत्र समुचित व्यवस्था हैं, वैसे ही इसकी पढ़ाई के कई केन्द्र विदेशों में स्थापित किये गए हैं। “ग्लासगो का कॉलेज ऑफ होलिस्टिक मेडिसिन” ऐसा ही एक संस्थान है। इसमें रोगी से संबंधित दो मुख्य बातें बतायी जाती है। प्रथम यह कि रोगी किस स्तर का बीमार है? इसकी पहचान करना तथा दूसरा, उसे कैसी और कितनी गंभीर फिल्में दिखाई जाएँ जो उसके मनः संस्थान पर अनुकूल प्रभाव डाल सके। रंग यदि गहरा हो, तो हलके रंग उसी में घुल-मिल जाते है, मूल वर्ण पर उससे शायद ही कोई अन्तर पड़ता हो। ऐसे ही मरीज यदि लम्बे समय से बीमार चल रहा हो, तो हलकी-फुलकी स्तर की मनोवैज्ञानिक फिल्में उसके मन की गहराई तक नहीं उतर पातीं और एक प्रकार से निष्प्रभावी सिद्ध होती है। इसलिए इस प्रणाली में उपर्युक्त फिल्म का सटीक निर्णय सर्वोपरि है। इसी पर रोगी की स्वस्थता अस्वस्थता टिकी होती है।
मूर्धन्य मनः चिकित्सक डॉ. गैरीसोलेमन ने मूवी-थेरेपी पर पिछले दिनों एक पुस्तक लिखी है, नाम है-ए मोशन पिक्चर प्रिसक्रिप्शन’। इस पुस्तक में लेखक ने करीब २.. फिल्मों को सूचीबद्ध किया है और विस्तारपूर्वक यह बताया है कि किस किस्म के मरीज को इनमें से कौन-सी फिल्म देखने की सलाह दी जाए। डॉ. सोलोमन अपने ८. प्रतिशत मरीजों का इलाज फिल्मों के द्वारा ही करते है। उनका मत है कि उक्त फिल्मों का सर्वाधिक चिकित्सकीय असर तभी होगा, जब व्यक्ति अकेले में निश्चय होकर उसे देखे। चंचल मनः स्थिति एवं सिनेमा हॉलों में उसका प्रभाव नगण्य होता है। इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि भीड़-भाड़ की दशा में रोगी अपने ध्यान को फिल्म पर पूरी तरह केन्द्रित नहीं कर पाते। इस प्रकार एकाग्रता के अभाव में उसकी प्रभावोत्पादकता निष्फल हो जाती है।
दृश्यों का मन पर पड़ने वाले प्रभावों से इंकार नहीं किया जा सकता। विश्वयुद्धों में भी इसके मनोवैज्ञानिक असर से काफी लाभ उठाया गया। कहते है कि प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी के ताबड़तोड़ हमलों के आगे ब्रिटेन एकदम असहाय अनुभव कर रहा था। सम्पूर्ण राष्ट्र निराश हो चुका था, ब्रिटेन की पराजय सुनिश्चित थी, तभी वहाँ तत्कालीन प्रधानमंत्री विन्सेण्ट चर्चिल ने एक नारा दिया-वी फॉर विक्ट्री। इस नारे को दृश्य-श्रव्य माध्यमों से खूब प्रचारित किया गया, जिसका जादुई असर तत्काल सामने आया। उसने सम्पूर्ण राष्ट्र के मनोबल और विश्वास को इस कदर बढ़ाया कि एक बार फिर वह तनकर खड़ा हो गया और सम्भावित हार जीत में बदल गईं
पिछले दिनों जापान में एक कार्टून फिल्म शो को देखकर ६.. बच्चे बीमार पड़ गए। इन सभी बच्चों को फिल्म देखने के बाद उलटी और मिर्गी के दौरे पड़ने लगें। हुआ यों कि लोकप्रिय कार्टून फिल्म ‘पाकेट मोन्स्टर’ के एक एपिसोड में एक बालक और एक कम्प्यूटर राक्षस को लड़ते हुए दिखाया गया था। दृश्य का अन्त श्वेत, लाल और नीले रंग की मिश्रित रोशनियों की चमक के साथ हुआ। यद्यपि हर रंग का विस्फोट लगभग एक सेकेण्ड का था, किन्तु लड़ाई का पूरा दृश्य करीब २. मिनट तक चला। इसके बाद ही बच्चे बीमार पड़ गए।
इसके कारणों की खो करने वाले विश्लेषणकर्ता मनःचिकित्सकों का कहना था कि दर्शकों की उम्र की दृष्टि से दृश्य इतना भयावह था कि बालकों का कोमल मन उसको सहजता से न ले सका और वे बीमार पड़ गए।
कहा जाता है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन की ‘बेरुत बंधक कांड’ से निपटने को लेकर जब काफी आलोचना हुई, तो उन्होंने रैम्बो - फर्स्ट ब्लड पार्ट - ११ नामक एक ऐसी फिल्म देखी, जिसने उनके ध्वस्त मनोबल को फिर से दुरुस्त कर दिया, वे आत्मविश्वास से भर उठे। बंधकों की रिहाई के बाद उनने देश के नाम संदेश में कहा - “अब मुझे पता चल गया है कि इस प्रकार के संकट के समय क्या करना चाहिए।”
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि किसी दृश्य का दर्शक पर कितना और कैसा असर पड़ेगा - यह दृश्य और दर्शक की मनःस्थिति पर निर्भर करता है। यदि व्यक्ति वयस्क हो, शरीर से खूब हट्टा - कट्टा हो, किन्तु भावुक एवं डरपोक प्रकृति वाला हो, तो हलके - हलके दृश्य भी उसके मन-मस्तिष्क को झकझोर कर रख देंगे। इसके विपरीत आयु भले ही कम हों। लेकिन मन चट्टान की तरह मजबूत हो, तो दृश्य का उस पर नगण्य जितना ही असर पड़ेगा।
‘मूवी थेरेपी’ यद्यपि सफल चिकित्सा पद्धति के रूप में सुस्थापित अभी नहीं की जा सकती, फिर भी एक संभावना बताती है कि मानवी मस्तिष्क को प्रभावी व रचनात्मक घटनाक्रमों से आदर्शों व दृढ़ संकल्पों की ओर भी मोड़ा जा सकता है। आज के साँस्कृतिक प्रदूषण से भरे युग में ऐसे चलचित्रों की सर्वाधिक आवश्यकता है।
कोलम्बिया विश्वविद्यालय के जीवविज्ञानी डॉ. एच. सिक्स ने अपने अनुसंधानों से यह निष्कर्ष निकाला है कि यदि शरीर को रासायनिक दोषों से और जटिल व्याधियों से मुक्त रखा जा सके तो मनुष्य आसानी से आठ सौ वर्ष जी सकता है। वे कहते हैं अधिक सक्रियता, दौड़-धूप उत्तेजना और गर्मी शरीर को संतप्त करके उसकी जीवनी-शक्ति के भण्डार को बेतरह खर्च करती है। यदि भीतरी अवयवों पर अतिरिक्त दबाव न पड़े और उन्हें स्वाभाविक - सरल रीति से काम करने दिया जाय तो वे इतने समर्थ रह सकते हैं कि क्षतिपूर्ति का क्रम आसानी से चलता रहे। नशेबाजी से लेकर वासना, क्रोध, चिन्ता आदि से आवेशों तक कितने ही ऐसे कारण है जो जितने अनावश्यक उससे ज्यादा हानिकारक हैं। शान्त, सरल, सन्तुष्ट और प्रसन्न जीवन जीने से निरर्थक उत्तेजना से बचा जा सकता है और जीवनी - शक्ति के क्षरण को बचाकर लम्बा जीवन जिया जा सकता है।
उत्तेजित आहार और उद्विग्न चिंतन स्नायु संस्थान को संतप्त करके मनुष्य को दुर्बल बनाता है और पूरी आयु भोगने से वंचित रखता है।
मानव शरीर का तापमान प्रायः १८.६ अंश फारेनहाइट होता है। इसे कम करके आधा अर्थात् ४१ किया जा सके, तो आयुष्य में आशातीत वृद्धि हो सकती है। और लगभग दो हजार वर्ष जिया जा सकता है। डॉक्टर लूवे की नई खोज यह है कि शरीर के जीवकोषों की क्षतिपूर्ति १८ तापमान रहने पर जिस क्रम से होती है - तापमान आधा होने हो सकती है। उससे आयुष्य का बढ़ना सुनिश्चित है। मृत्यु - जीवकोषों के समूचे क्षय को ही तो कहते हैं। जीवकोष पुराने मरते और नये जन्मते रहते हैं यह क्षति - पूर्ति जब तक होती रहेगी, मृत्यु की आशंका न रहेगी। दीर्घ-जीवन का मूल आधार यही हो सकता है कि जीव-कोषों में दुर्बलता न आने पाये, उनकी क्षति स्वल्प हो और नवीन कोषों के उत्पन्न होने के क्रम में शिथिलता न आने पाये। यह व्यवस्था बाह्य ताप और आन्तरिक सन्ताप को घटाकर की जा सकती है। और अबकी अपेक्षा कई गुनी अवधि तक जिया जा सकना सम्भव हो सकता है।
अमेरिका के रॉकफेलर इन्स्टीट्यूट के जीव-विज्ञान विभाग में पिछले लम्बे समय से जीवाणुओं की जीवनचर्या जानने का प्रयास चल रहा है। अमीबा और पैरामीशियम जीवाणुओं को उनका आहार तो पहुँचाया जाता रहा, पर दबाव पड़ने और नष्ट होने का अवसर न आने दिया गया। फलतः एक कोष ९.. पीढ़ियाँ जन्म दे चुका, पर उसका जीवन अक्षुण्ण बना रहा है। यदि आवश्यक सुविधाएँ मिल सकें, तो यह कोष और भी अधिक समय तक बिना क्षतिग्रस्त हुए जीवित रखे जा सकते हैं। ऐसी दशा में मनुष्य अति दीर्घकालीन आयुष्य प्राप्त कर सकता है और लगभग अमरता की स्थिति तक पहुँच सकता है।
भारतीय योगशास्त्र इस तथ्य को सदा से स्वीकार करता रहा है। सिद्ध पुरुष निराहार रहकर भी दीर्घजीवन प्राप्त करते रहे हैं - शास्त्रों का मत है कि “शीतकाल में मेढ़क कुछ भी नहीं खाते, साँप वायुसेवन करके रह जाते हैं। कछुए अंग छिपाये पड़े रहते हैं। योगी भी ऐसा कर सकते हैं।”
रीछ बर्फीले तूफानों के दिनों में अपनी माँद में जा छिपता और ऋतु - परिवर्तन होने पर ही आहार की तलाश में बाहर आता है। ऐसे ही उदाहरण अजगर आदि के भी है। इतना तो निश्चित है कि शीत की प्रधानता और विश्राम की बहुलता होने पर जीवकोषों का क्षय बन्द हो जाता है और उनकी क्षति-पूर्ति के लिए भूख आदि भी नहीं लगती।
स्वस्थ, परिपुष्ट और आयुष्यवान जीवन जीने के लिए आहार तालिकाओं को ढूँढ़ते रहना, पौष्टिक भोजन का ताना-बाना बुनते रहना और डॉक्टरों - कैमिस्टों के परामर्श को वेदवाक्य मानकर चलना ही काफी नहीं हैं, वरन् इसके लिए कुछ और अधिक गहराई में जाने की जरूरत पड़ेगी और उस मर्म को समझना पड़ेगा। जिससे ऊपर निरोग जीवन की आधार-शिला रखी हुई है।
यदि मात्र आहार और दवाओं पर स्वास्थ्य निर्भर रहा होता, तो कोई भी अमीर आदमी न तो कमजोर दिखाई पड़ता, न बीमार और न वह अधूरी आयु में ही काल-कवलित होता। उनके पास धन के प्रचुर साधन मौजूद हैं। कितनी ही कीमती चीजें कितनी ही अधिक मात्रा में उपलब्ध करने और खाने की उन्हें पूरी सुविधा है। वे चाहें तो सोना भी खाते रह सकते हैं। यदि आहार पर स्वास्थ्य निर्भर रहा होता तो ये साधन - सम्पन्न लोग बहुमूल्य डॉक्टरों द्वारा अनुमोदित, बढ़िया चीजें खाकर प्रचुर शरीर-सुख भोगते और निर्धन लोग जिनके लिए रूखा-सूखा खाकर भी पेट भरना कठिन पड़ता है, वे रुग्ण - दुर्बल दीखते। पर होता ठीक उल्टा है। टॉनिक, विटामिन, मिनरल, संतुलित आहार, पुष्टाई बेचने वाले दूसरों को बलवान, पहलवान बनाने का दावा करने वाले, औषधि विक्रेता और चिकित्सक ही नहीं, उन तथाकथित संजीवनी बूटियों को बनाने वाले तो अवश्य ही निरोग रहे होते, पर यदि इन्हीं लोगों को जाँचा जाए, तो डॉक्टर लोग तथा उनका परिवार अन्य मरीजों की अपेक्षा अच्छी स्थिति में नहीं मिलेंगे वरन् और भी अधिक दुर्दशाग्रस्त हो रहे होंगे।
यहाँ न पौष्टिक सन्तुलित आहार की निन्दा की जा रही हैं, न दवादारू को निरर्थक बताया जा रहा है। समय पर एक सीमा तक उनकी भी उपयोगिता हो सकती है, पर यह तथ्य हमें समझ ही लेना चाहिए कि स्वास्थ्य का आधार इतना उथला नहीं है। उसे बनाये रखने और बढ़ाने के लिए उन बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए, जो अन्तरंग जीवन से संबंधित हैं। वस्तुतः जो कुछ हम बाहर देखते है। वह अन्तःस्थिति की प्रतिक्रिया मात्र होती है।
अन्तःचेतना का जो स्तर होता है उसी के अनुरूप मन, मस्तिष्क, नाड़ी - संस्थान एवं अवयवों के क्रिया−कलाप का ढाँचा विनिर्मित होता है। और ढर्रा चलता है। आन्तरिक उद्वेग की ऊष्मा सारे ढाँचे को प्रभावित करती है और इतना ताप पैदा कर देती है, जिससे जीवन-तत्व भाड़ में भुनने वाले चने की तरह अपनी कोमलता और सरसता से वंचित होते रहें। मनोविकार एक प्रकार की ऐसी आग भीतर-ही-भीतर जलाये रखते हैं, जिससे स्वास्थ्य के लिए उत्तरदायी तत्व स्वतः ही विनष्ट होते चले जाएँ। इन्द्रिय भोगों की ललक और संग्रह स्वामित्व की ललक, इन्हें वासना और तृष्णा कहा जाता है, यह न बुझने वाली अग्निशिखाएँ जिनके भीतर जल रही होंगी, वे अपनी शान्ति और समस्वरता निरन्तर खोते चले जाएँगे।
जिन्हें चिन्ता, भय, क्रोध, असन्तोष, सवार रहते हैं, जो निराश और अवसादग्रस्त बैठे रहते हैं। ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिशोध, कपट और मत्सर की दुष्प्रवृत्तियाँ जिन पर सवार रहती हैं, उनका अन्तःकरण निरन्तर उद्विग्न रहता है। मन में तनिक भी सन्तोष - समाधान नहीं होता। यह उद्विग्नता सारी अन्तःस्थिति में ज्वार−भाटा उठाती और उसे बेतरह मथती रहती है, तो इस विषम स्थिति में ग्रस्त किसी भी व्यक्ति का स्वास्थ्य संतुलित नहीं रह सकता।
अत्यधिक श्रम, निरन्तर की उछल-कूद शक्तिकोशों का अनावश्यक क्षरण करती रहती है। आदमी दिन-दिन खोखला होता जाता है। अनियमित और अव्यवस्थित दिनचर्या का भी ऐसा ही कुप्रभाव पड़ता है। शरीर की स्थिरता रखने वाली अन्तरंग प्रणाली जब एक ढर्रे को अपना लेती हैं, तो सब कुछ ठीक से चलने लगता है। पर यदि हर दिन नई-नई दिनचर्या, क्रम-व्यवस्था और रीति -नीति बदलें तो उस स्थिति में भीतर भी कोई प्रणाली निर्धारित नहीं हो पाती और उस अव्यवस्था से पाचन प्रणाली से लेकर स्नायु संस्थान तक सभी में अनिश्चितता छाई रहती है। स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए नियमित और निर्धारित दिनचर्या आवश्यक है।
अनावश्यक ताप पैदा करने वाले मनोविकार, विक्षोभ एवं उद्देश्यों से बचने और शान्त - सन्तुलित, सन्तुष्ट और हँसी - खुशी का नियमित जीवन जीने का प्रयत्न करना चाहिए। आहार सीमित और समय पर हो। सादा और अनुत्तेजक साथ ही भूख से कम मात्रा में। ऐसी सावधानी बरतने से पेट में वह ताप उत्पन्न नहीं होता, जिसके कारण तीन-चौथाई मनुष्यों को अपनी जीवनीशक्ति से बुरी तरह हाथ धोना पड़ता है।
अन्तरंग में बढ़ी उत्तेजना श्वास-प्रश्वास की गति को तीव्र करती है। क्रोध की स्थिति में नाड़ी की, हृदय की गति बहुत बढ़ जाती है। कामसेवन के समय भी यह चाल बहुत तेज हो जाती है। बढ़े हुए श्वास आमतौर से जीव की शक्ति का क्षरण ही करते है। प्राणायाम-व्यायाम के द्वारा फेफड़ों की कसरत करके उन्हें परिपुष्ट रखने की प्रक्रिया उत्तम है, पर यह सीमित प्रयोजन के लिए, सीमित समय तक ही होना चाहिए। यदि अधिक समय शरीर को उत्तेजित स्थिति में रखा जाएगा और श्वास की गति बढ़ी रहे तो उसमें अनावश्यक ताप उत्पन्न होगा और उसका परिणाम अस्वस्थता बनकर सामने आएगा। मन की ही नहीं हमारे शरीर की स्थिति भी अधिकतर सन्तुलित ही रहनी चाहिए। स्वास्थ्य की स्थिरता के लिए इसका ध्यान रखा जाना भी आवश्यक है।
श्वास-प्रश्वास क्रिया के तीव्र और मन्द रहने का भी आयुष्य से संबन्ध है। जो जीव हाँफते रहते हैं, जिनके श्वास तेज चलते हैं, वे अधिक समय नहीं जीते। उनकी आयु जल्दी ही समाप्त हो जाती है। इसके अतिरिक्त जिनकी साँस मन्द चलता है, वे अधिक दिन जीवित रहते हैं। इस संदर्भ में कुछ प्राणियों की श्वास-प्रक्रिया की दर और आयुष्य की तालिका इस प्रकार है -
जीवन श्वास प्रतिमिनट आयु
कछुआ ५ १५.
साँप ७ १७.
हाथी १२ १..
मनुष्य १२ १..
घोड़ा १७ ७.
बिल्ली २४ १२
बकरी २४ १२
कुत्ता २६ १३
कबूतर ३६ ९
खरगोश ३२ ८
कितने ही सिद्धपुरुष अभी भी दीर्घजीवी पाये जाते हैं और उनकी आयु कई सौ वर्षों की प्रमाणित होती है। इसका एक ही कारण है, उनका शान्ति प्रदेश में निवास, मनःसंस्थान में शान्ति-सन्तुलन अनावश्यक श्रम संताप से बचत। वे अपना रहन-सहन ढाँचे में ढालते हैं और प्राणायाम विद्या द्वारा श्वास-प्रणाली पर नियन्त्रण स्थापित करके उसकी गति उतनी बना लेते हैं, जिससे जीवित रहने भर का काम तो चल जाए, पर अनावश्यक शक्ति क्षय की तनिक भी गुंजाइश न रहे।
सशक्त और दीर्घजीवी शारीरिक स्थिति बनाये रखने के लिए आहार - विहार के सन्तुलन का ध्यान रखने के अतिरिक्त इस तथ्य को भी स्मरण रखना चाहिए कि आन्तरिक शान्ति और समस्वरता का आरोग्य के साथ अविच्छिन्न संबंध है। मानसिक स्वास्थ्य को बनाये रखने पर ही शारीरिक स्वास्थ्य को सुरक्षित रखा जा सकता है।
मनोभाव सम्पूर्ण शरीर को प्रभावित करते हैं। क्रोध, आवेश भय, शोक, वियोग जैसे अवसरों पर नेत्र, होंठ, कपोल बिना बोले ही मनः स्थिति प्रकट कर देते हैं। भीतर जो कुछ उमड़ - घुमड़ रहा है, उसकी छाया चेहरे पर झाँकती रहती है। क्रोध में आँखें लाल हो जाती है, शरीर काँपता है। इससे स्पष्ट है। आन्तरिक भावनाओं का शरीर काँपता है। इससे स्पष्ट है - आन्तरिक भावनाओं का शरीर पर प्रभाव पड़ता है। भूख ओर नींद गायब हो जाती हैं। आवेशग्रस्त व्यक्ति का दिल जोरों से धड़कने लगता है, दम फूलता है, सिर चकराता है, गला सूखता है और प्यास बार-बार लगती हैं इससे स्पष्ट है कि मन की स्थिति का प्रभाव सारी देह पर पड़ता है, इस प्रभाव को यदि सूक्ष्म रूप में देखना हो तो उसे वाणी के साथ जुड़े हुए रहस्यमय कम्पनों के साथ आसानी से देखा - समझा जा सकता है।
यों ठग और धूर्त व्यक्ति मीठी बातें बना और प्रलोभन भरे आश्वासन देकर भोले लोगों को ठगने में भी सफल हो जाते हैं, पर वह प्रभाव केवल उन्हीं उथली मनःस्थिति के लोगों पर पड़ता है। जो केवल शब्दों के अर्थ भर को समझते हैं और प्रलोभन में बिना आगा-पीछा सोचे, यथार्थता का विश्लेषण किये बिना ही फिसल पड़ते हैं। ठगी के शिकार आमतौर से ऐसी बालबुद्धि के लोग ही होते हैं। जहाँ थोड़ी भी सतर्कता बरती जाए और यथार्थता ढूँढ़ने के लिए थोड़ा-सा भी तर्क वितर्क किया जाए तो वस्तुस्थिति सामने आ जाती है। और ठगी से बचा जा सकता है। यह व्यावहारिक ज्ञान की बात हुई आगे। चलकर यदि सूक्ष्मबुद्धि और प्रखर आत्मचेतना की कसौटी पर कसने की क्षमता विकसित कर ली जाए, तो किसी की भी वाणी सुनकर उसके साथ जुड़े हुए प्रभाव एवं व्यक्तित्व को आसानी से समझा जा सकता है।
वाणी में जानकारी का ही आदान-प्रदान नहीं होता। व्यक्तित्वों की विशेषताओं का भी परस्पर परिवर्तन होता है। सद्भावना सम्पन्न व्यक्ति भले ही किसी को उपदेश न दें, उनके साधारण शब्दोच्चार में भी जो मिठास, सौजन्य और सदुद्देश्य घुला रहता है, वह ऐसा हृदयस्पर्शी होता है कि सुनने वाले उससे बहुत कुछ प्राप्त करते जाते है। और वह ऐसा होता है, जिससे उद्वेगों के समाधान में भारी योगदान मिल सके। तो उत्कृष्ट स्तर के व्यक्तित्व बिना वाणी के भी अपने समीपवर्ती क्षेत्र को प्रभावित करते हैं। उनके नेत्रों को ज्योति एवं चेहरे पर बनने वाली भाव-भंगिमा एवं समस्त शरीर से निकलने वाली तेजोवलय ऊष्मा सहज ही अपना काम करती रहती है और सम्बद्ध वातावरण को प्रभावित करती है। इस प्रभावशीलता का अधिक प्रसारण वाणी द्वारा होता है। सद्भाव - सम्पन्न वाणी जिनके लिए बोली गई हैं, उन्हीं पर नहीं वरन् विराट ब्रह्माण्ड में सुविस्तृत होकर अपना प्रभाव जड़-चेतन पर छोड़ती है। इस दृष्टि से गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाए तो प्रतीत होगा कि कोई प्रत्यक्षतः कुछ अधिक काम रखते हुए न दिखाई पड़ने वाले व्यक्ति भी इस संसार में व्यापक क्षेत्र तक अपना प्रभाव छोड़ते हैं और यदि वे सद्भावना सम्पन्न हैं, तो वाणी मात्र से संसार की महती सेवा-सहायता करते हैं। इसके विपरीत दुर्भावनाग्रस्त मन अपनी वाणी रूपी तरकस से प्रहार करते हुए लोकमानस को क्षत-विक्षत करता है और संसार को भारी हानि पहुँचाता है। पानी में फेंका हुआ एक ढेला हजारों लहरें उत्पन्न करता है, इसी प्रकार शब्दोच्चारण के साथ अन्तरिक्ष में प्रवाहित होता हुआ व्यक्तित्व अपनी सुगन्ध दुर्गन्ध से व्यापक क्षेत्र को प्रभावित करता है।
कटु - कर्कश शब्दों के साथ जुड़ी हुई दुर्भावना सबसे पहली हानि वक्ता की ही करती है। उग्र मनःस्थिति का का सारा ढाँचा लड़खड़ाकर रख देती है। वाणी के साथ जब वह भूकम्प विस्फोट की तरह बाहर निकलती है, तो उससे बाहरी क्षेत्र ही धूल-धूम युक्त नहीं होता, वरन् वह विस्फोट स्थल भी क्षत-विक्षत होता है। क्रोधी ईर्ष्यालु, निन्दक, छिद्रान्वेषों, निराश पलायनवादी प्रकृति के मनुष्य दूसरों को भी चोट पहुँचाते हैं और खिन्न-उद्विग्न करते हैं, पर सबसे अधिक हानि वे अपनी ही करते हैं। दुर्भावग्रस्त मनःस्थिति वाले व्यक्ति को देर-सवेर में शारीरिक और मानसिक रोगों का शिकार बनना ही पड़ता है। कहना न होगा कि व्यक्ति अपने और अपने समीपवर्ती लोगों के लिए अभिशाप ही सिद्ध होता है।
पिछड़े वर्गों की उनकी अपनी त्रुटियों में गन्दगी और व्यसन ग्रस्तता को मुख्य माना जाता है, पर यदि गहराई से विचार किया जाए तो प्रतीत होगा कि गाली-गलौज कलह-तिरस्कार असभ्य और अस्त-व्यस्त शब्दोच्चारण भी उन्हें गई-गुजरी स्थिति में डाले रहने के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। बालकों के पर यह पारिवारिक वार्तालाप असाधारण प्रभाव डालता है और उन परिवारों की पीढ़ियाँ उसी स्तर की ढलती चली जाती हैं। दूरदर्शी लोगों व्यक्ति के विकास की विधि बताते हुए प्रथम चरण वाणी के परिष्कार को बताते हैं। सभ्यता और संस्कृति का प्रथम सोपान शिष्ट, सौम्य, संतुलित ओर सद्भाव संपन्न वाणी। के उच्चारण से ही आरम्भ होता है। असम्बद्ध और असंतुलित वचन बोलते वाले कभी सम्मानास्पद नहीं बन सकते, उन्हें ओछा, पिछड़ा और अनुत्तरदायी ही माना जाता रहेगा।
मनःस्थिति का चुम्बकत्व वाणी द्वारा अपना प्रभाव बाहरी क्षेत्र पर छोड़ता है और अपने स्तर के व्यक्ति तथा वातावरण को समेट कर सहज ही इर्द-गिर्द जमा करता रहता है। कुभाषी की आन्तरिक दक्षता कभी भी उसे सरस और उल्लास भरे जीवन आ आनन्द न लेने देगी। दुर्भावनाओं की प्रतिक्रिया विरोध, विग्रह, निन्दा, असहयोग, अविश्वास आदि के रूप में ही सामने आ सकती है और उनके कारण प्रगति - पथ में पग-पग पर अवरोध उत्पन्न हो सकते हैं।
उपनिषद् के ऋषि ने परब्रह्म के सम्मुख अपनी अतिमहत्त्वपूर्ण आकांक्षा व्यक्त करते हुए कहा है- ‘जिह्वा में मधुरता' मेरी वाणी मिठास से भरी हुई हो। सचमुच यदि कोई मधुर वचन बोलने का अभ्यास कर ले तो प्रगति पथ के अनेक अवरोधों का सहज ही समाधान हो सकता है। प्रशंसापरक और उत्साहवर्धक शब्द बोलकर यदि किसी में नवजीवन संचार किया जा सके, तो निस्संदेह यह सहायता बड़े-से-बड़े धन-सहयोग की अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान सिद्ध हो सकती है। खोये हुए आत्मविश्वास को यदि जगाया, जमाया और बढ़ाया जा सके तो इससे बढ़कर और कोई उपलब्धि नहीं सकती। सद्भाव सम्पन्न व्यक्ति अपने स्तर के अनुरूप ऐसे ही परामर्श देते हैं, जिन्हें यदि आँशिक रूप से भी समझा अपनाया जा सके, तो उत्कर्ष की दिशा में तेजी से बढ़ा जा सकता है।
ऋग्वेद में एक आर्षवचन आता है, जिसमें कहा गया है कि जहाँ वाणी छानकर बोली जाती हैं, वहाँ विभूतियाँ दौड़ती हुई चली आती हैं। जहाँ शहद रहता हैं, वहाँ मक्खियाँ सहज की खिंचती चली आती हैं। वाणी का यह प्रभाव होना चाहिए कि उच्चारणकर्ता के समीप सफलताओं का पर्वत इकट्ठा होता चला जाए। छानकर वाणी बोलने का अर्थ है - सोच समझ कर प्रभाव-परिणाम पर विचार करते हुए विवेक पूर्वक सदुद्देश्य युक्त बोलना। वस्तुतः ऐसा बोलना ही सार्थक है। कटु और विशेष युक्त भाषण से तो मौन रहा अथवा मूक होना अधिक उपयुक्त है।
भगवान ने कान दो दिये हैं। और जीभ एक। इसका अर्थ है - हम सुने अधिक बोले कम। भावार्थ यह है कि चिन्तन, मनन, स्वाध्याय और सत्संग के आधार पर सद्भावनाओं का समुचित संग्रह अपने भीतर जमा करें और उसमें से साररूप में सर्वोत्कृष्ट प्रतीत हो उसी को जिह्वा पर आने दें। जीभ में अमृत भी है और विष भी। विषपान करने वाले मुख के रास्ते ही उसे भीतर ले जाते हैं। दुर्भावग्रस्त, संस्कार रहित वाणी को भी विष ही कहा गया है। वह प्रथम अनर्थ वक्ता का ही करती है। उसकी गरिमा का हनन करती है और दूसरों की दृष्टि से उसका सम्मान गिरा देती है। किंतु यदि अमृत-वचन बोले जाएँ तो उसमें वक्ता को अपने आप में उल्लास का उभार दीखता है और समीपवर्ती लोग उसका रसास्वादन करके तृप्त होते हैं। विवेक, तथ्य और दूरदृष्टि एवं सदुद्देश्य के सम्मिश्रण के साथ किये गये शब्दों को सरस्वती कहा गया है। जिह्वा पर सरस्वती के आवर्तन का अलंकार यह संकेत करता हैं कि सज्जनता का बहुत कुछ परिचय उनकी मधुमयी वाणी से प्राप्त होता है।
कामकाजी बातों के अतिरिक्त जहाँ भावोत्तेजक एवं विचार-परिष्कार की दृष्टि से जो भी वार्तालाप किया जाता है, वह वस्तुतः जप का ही एक प्रकार है। जप का उद्देश्य है - अमुक शब्दावली को बारबार कहते रहने के फलस्वरूप मन्त्र में सन्निहित विचारधारा को हृदयंगम करना - परिपक्व बनाना। धर्मग्रन्थों का पाठ, भक्तिगीतों का गायन इसी दृष्टि से किया जाता है। वह प्रयोजन समय-समय पर विचार-विनिमय अथवा परामर्शपरक आदान-प्रदान से भी सम्भव हो सकता है। अपने और दूसरों की सद्भावनाओं को उभारने वाला, सत्प्रवृत्तियों को विकसित करने वाला शब्दोच्चार करने वाला व्यक्ति मौन-साधन एवं जप - उपासना का फल प्राप्त करता है। ऐसे अभिवचन उच्चारणकर्ता का भी कल्याण करते हैं, लोकमंगल का प्रयोजन भी उनसे बड़ी मात्रा में पूरा होता है।
सन्त विनोबा ने पंढ़रपुर सर्वोदय सम्मेलन के एक प्रवचन में वाणी की उपासना पर प्रकाश डालते हुए कहा था ................ मेरा बोलना जप के लिए है, प्रचार के लिए नहीं। जिन विचारों को बोलता हूँ, वे दृढ़ होते चले जाते हैं। .............जो किया है आप लोगों ने किया हैं, मैंने तो जप किया है। भूदान का जय किया तो भूदान मिला। सम्पत्ति दान का जप किया तो सम्पत्ति दान मिला। न तो मैं यज्ञ करता हूँ, न दान करता हूँ, न तप करता हूँ, मैं तो केवल जप ही करता हूँ और जप में मेरे सारे काम बन जाते हैं।
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निर्धर्षणच्देनततापताड़नैः॥
तथा चतुर्भिःपुरुषःपरीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥ चाणक्यनीति ५/२
घिसना, काटना, तपाना, पीटना, इन चार विधियों से जैसे सुवर्ण की परीक्षा होती है, उसी प्रकार दान, शील गुण और कर्म (आचरण) - इन चारों से पुरुष की परीक्षा होती है।
शतपथ ब्राह्मण की उक्ति है कि जनसमाज का मैल धोने वाला शब्द-प्रवाह की सारस्वत मंत्र है। सरस्वती के अनुग्रह से अनेकों सिद्धियाँ मिलती हैं, अष्टसिद्धि और नवऋद्धि की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के उपासनात्मक कर्म-काण्डों का अपना महत्व हैं, पर सर्वजनीन सारस्वत मन्त्र वह शब्दोच्चार है, जिसे सत्प्रयोजन के लिए सद्भावना विवेकशीलता और मधुरता सम्मिश्रित करके बोला गया हो। इस स्तर का भाषण चाहे वह स्वल्प शब्दों का ही क्यों न हो, सबके कल्याण की परम श्रेयस्कर प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है।
८-७-७४ कुम्भ के अवसर पर दिया गया प्रवचन - (जून, १९९८ की तीसरी व अंतिम किश्त)
मित्रो! लोगों की निष्ठाएँ ब्राह्मण के प्रति कम हो गई हैं और जो रही बची है, वह और खत्म हो जाएँगी। लोगों की निष्ठाएँ साधु पर से भी खत्म हो गई हैं और जो रही-सही बची हैं तो और खत्म हो जाएँगी। अबकी बार मुझे कुंभ के मेले में इतनी खुशी हुई कि मेरे बराबर कोई भी नहीं। कुंभ के मेले को देख करके मैं भाव-विभोर हो गया। एक बार मैं इलाहाबाद गया था, तो मैंने क्या देखा था? उसी साल ऐसा हुआ था कि रेलों के नीचे-पाँव के नीचे छह-सात सौ आदमी कुचलकर मर गये थे। उस साल भी मैं कुंभ में था। उसके बाद मैं गया नहीं। अबकी बार मैं यहाँ हूँ। अबकी बार तो मुझे बड़ी भारी प्रसन्नता है कि लोगों ने आने से इंकार कर दिया और यह सही काम किया। इस तरीके से जहाँ लोग इकट्ठे होते थे। सन्त और महात्मा इकट्ठे होते थे। सन्त और महात्मा इकट्ठे होने के बाद सम्मेलन करते थे और सम्मेलन करने के पश्चात वाजपेय यज्ञ करते थे इन मौकों के द्वारा यह किया करते थे कि किस तरह से हमको देश का निर्माण करना चाहिए। समाज की गुत्थियों को हल कैसे करना है और व्यक्ति की नैतिक कठिनाइयों का समाधान कैसे करना है? वे सारी-की-सारी शिक्षाओं को देने के लिए कुंभ में चले आते थे।
परन्तु अब देखा न आपने, क्या - क्या हो रहा है? कहीं रास हो रहा है, क्या हो रहा है? जनता को आकर्षित करने के लिए जैसे कठपुतली वाले तमाशा करने के लिए जो ढोंग किया करते हैं, वे इस तरीके से किया करते हैं। न कोई। सम्मेलन की बात है, इनके पास न कोई ज्ञात है, न कोई दिशा है, न विचार है। लोगों को घृणा होगी और होनी चाहिए। मुझे बहुत प्रसन्नता है कि लोगों में नफरत होती ची जा रही है और घृणा उत्पन्न होती चली जा रही है और बाबाजी के दर्शन करने से इंकार करता हुआ आदमी दिया जाता है। वे लोग अपने धर में कम्बल पहनकर सोते हैं और लिहाफ ओढ़कर सोते हैं और जब बाज़ार में होकर स्नान करने के लिए निकलते हैं, तो लंगोटी खोलकर निकलते हैं। मुझे बहुत शरम आती है। मुझे बहुत दुःख होता है। ठीक है, आप कपड़ों को उतारने वाले महात्मा हैं, तो आप जंगल में जाइये और वहाँ रहिए। वहाँ रहिए। वहाँ आप झोंपड़ी डालिए और गंगाजी में स्नान कीजिए। गाँव से आप बाहर रहिए। जहाँ हमारी लड़कियाँ घूमती हैं, जहाँ हमारी बेटियाँ घूमती हैं, जहाँ हमारी बहुएँ घूमती हैं, जहाँ हमारे बच्चे घूमते हैं, वहाँ आप मत जाइए। यदि आप नंगा बाबाजी हैं तो आप दुनिया को क्या संदेश देने चले हैं?
हरिद्वार में गंगा विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई हैं, परन्तु नहीं साहब, हम तो हर की पौड़ी में ही स्नान करेंगे। अरे बाबा, हरिद्वार की हर की पौड़ी भी तो किसी काम की नहीं है। यह तो हमारे लिए किसी ने खोदकर नहर निकाल दी है। यह तो एक नहर है। आप मालूम कर लीजिए हर की पौड़ी एक नहर है, या क्या? हर की पौड़ी तो गंगाजी हैं। गंगाजी तो हैं, पर खोदकर पाई गई हैं। गंगाजी में आपको नहाना है, तो आप वहाँ जाइये - नीलधारा पर नहाइये। यह गंगाजी नहीं है। यह मनुष्यों की बनाई हुई नहर हैं। नहीं साहब, हम तो ब्रह्मकुण्ड में नहायेंगे, हम तो यहीं नहाएँगे। हम तो ये करेंगे और हम तो नंगे होकर नहाएँगे। इस तरह के लोगों से इस कुम्भ में आने से इंकार कर दिया और भगवान से प्रार्थना करूँगा कि अगले वर्ष भी वे यहाँ न आयें। इसमें सफाई कर्मचारियों के अलावा, पुलिस वालों के अलावा और बाबाजियों के अलावा, तीसरा कोई जनता न आवें। तीन आदमी आ जाएँ। बस, काम बन जाएगा। लोग क्यों आने चाहिए और क्यों पैसा खराब करना चाहिए? इनको किस काम के लिए पैसा खराब करना चाहिए? छह तारीख को आप नहाएँगे तो बैकुंठ को जाएँगे। हर की पौड़ी के ब्रह्मकुण्ड में नहाकर के आप बैकुंठ को जाएँगे? यह बहम जिनके दिल के ऊपर सवार है, उनकी तादाद कम होनी चाहिए और उनकी तादाद खत्म होनी चाहिए, जिनको यह बहम हो गया है कि छह तारीख को न नहाने से बैकुंठ नहीं जाएँगे और हर की पौड़ी के कुंड पर नहा लेंगे तो सीधे बैकुंठ को जाएँगे और वहाँ सड़कों पर नहा लेंगे तो नरक को जाएँगे। इस तरह की मनोवृत्ति जितनी लोगों में कम होती चली जाएगी, धर्म की उतनी ही सेवा होती जाएगी।
इसलिए मित्रो क्यों हो गया? लोगों में पंडितों के प्रति, संतों के प्रति, साधुओं के प्रति, हरेक के प्रति अवज्ञा के भाव उत्पन्न हो गये हैं, और वे भाव हमारे पैदा किये हैं। हम पुनः आस्था की स्थापना करेंगे और किसकी? साधु के गौरव को हम फिर जिन्दा करेंगे, ब्राह्मण के गौरव को हम फिर जिन्दा करेंगे कि साधु और ब्राह्मण अपनी जिन्दगी किस तरीके से खपा देते थे। समाज के लिए समाज को ऊँचा उठाने के लिए और धर्म को ऊँचा उठाने के लिए। ऋषियों की निष्ठा को ऊँचा उठाने के लिए और विश्वासों को ऊँचा उठाने के लिए किस तरह से वे अपने आपके लिए तबाही मोल लेते थे और किस तरीके तरीके से गरीबी मोल लेते थे? किस तरीके से कष्ट उठाते थे? इसे हमको जिन्दा करना है। इसलिए आप पीला कपड़ा जरूर पहनना, जिससे कि लोगों को बहस करने का मौका मिले और आपको गालियाँ आपको खानी चाहिए, मैं तो कहता हूँ कि जिस आदमी को गालियाँ नहीं मिली, वह हमारा चेला नहीं हो सकता। गाँधीजी के शिष्य जितने भी, थे उनको गोलियाँ खानी पड़ी और आचार्य जी के चेलों को गालियाँ खानी पड़ी और आचार्य जी के चेलों को गालियाँ खानी चाहिए। गोलियाँ खाने को तैयार हो जाइये। नहीं साहब, गोली तो हम नहीं खाएँगे। ठीक है, आप गोली मत खाइये। तो क्या गाली खाएँ? गाली खाने से क्या एतराज है आपको? गाली तो खाइए ही।
आप पीले कपड़े पहन लेना और रेलगाड़ी के थर्डक्लास के डिब्बे में बैठ जाना हर आदमी गाली देगा आपको और कहेगा कि देखा बाबाजी बैठा हुआ है। यह देखो फोकट का माल खाने वाला बाबाजी बैठा हुआ है। यह हरामखोर बाबाजी बैठा हुआ, चालाक बाबाजी बैठा हुआ है, यह ढोंगी बाबाजी बैठा हुआ है। उन सबकी गाली आपको नहीं पड़नी चाहिए क्या? गाली आपको पड़नी चाहिए; क्योंकि लोगों ने इस तरीके से हमारे धर्म को, अध्यात्म को और भगवान को, ईश्वर को और सन्तवाद को बदनाम किया है। उसका प्रायश्चित हमें तो करना पड़ेगा ही। आखिर उनके वंश के तो हमीं लोग हैं ना? उनकी परम्परा के अनुयायी हमीं लोग तो हैं ना? उनकी औलाद तो हमीं लोग हैं ना? उनकी जिम्मेदारी हमीं लोग तो उठाने वाले हैं। ऋषियों के गौरव, ऋषियों के यश का लाभ हमीं लोग तो उठा सकते हैं, तो फिर हमारे जो मध्यकाल में ऋषि हुए हैं, उनके बदले की गाली कौन उठाएगा? गाली हमको खानी चाहिए। इसलिए पीला कपड़ा आप उतारना मत। जहाँ कहीं भी जाएँ वहाँ रंग का डिब्बा साथ लेकर जाएँ। यह मत कहना यहाँ तो रंग मिलता नहीं। यह हमारी शान है, यह हमारी इज्जत है। यह हमारी हर तरफ की साधु और ब्राह्मण की परम्परा- का उस समय की निशानी है, कुल की निशानी है। पीले कपड़े पहन करके जहाँ कहीं भी जाएँगे लोगों को मालूम पड़ेगा कि ये कौन है? ये उस मिशन के आदमी हैं, युगनिर्माण योजना के आदमी हैं, गायत्री परिवार के आदमी हैं। युगनिर्माण के आदमी कौन? जो संतों की परम्परा को जिन्दा रखने के लिए कमर बाँधकर खड़े हो गये, जो ब्राह्मण की परम्परा को जिन्दा रखने के लिए कमर कसकर खड़े हो गये हैं। जिन्होंने जीवन का यह व्रत लिया है कि हम श्रेष्ठ व्यक्तियों के तरीके से भले मनुष्यों के तरीके से - शरीफ आदमियों के तरीके से और अध्यात्मवादियों के तरीके से जिन्दगी यापन करेंगे। आपके बोलने की शैली, चलने की शैली और काम करने की शैली जब लोग देखेंगे तो समझेंगे कि साधु घृणा करने का पात्र नहीं है। साधु नफरत करने की निशानी नहीं है। साधु हरामखोर का नाम नहीं है। साधु फोकट में मुक्ति माँगने वाले का नाम नहीं है, बल्कि परिश्रम करके और कीमत चुकाकर जीवनयापन करने वाले का नाम है। स्वयं मुक्ति पाने के लिए नहीं, बल्कि बंधनों से सारे समाज को मुक्ति दिलाने वाले का नाम ही साधु है। ये बातें जब लोगों को मालूम पड़ेंगी तो परिभाषाएँ बदल जाएँगी, सोचने का तरीका बदल जाएगा। लोगों की आँखों में जो खून खौल रहा है, लोगों की आँखों में जो गुस्सा छाया हुआ है, वह खून खौलने वाली बात, गुस्सा छाने वाली बात से राहत मिलेगी।
मित्रो, अब ये जड़ें खत्म होने जा रही हैं और अध्यात्म बढ़ता हुआ चला जा रहा है। उसकी नींव मजबूत होने का फायदा फिर आपको मिल सकता है। आपको अपने इन्स्टीट्यूशन को मजबूत करने के लिए और मिशन की जानकारी अधिक-से-अधिक लोगों के कराने के लिए अपने इन पीले वस्त्रों को प्यार करना होगा। जब तक आपको मिशन में जाना है, क्षेत्रों में जाना है, जब तक इन पीले कपड़ों को उतारना मत।
अच्छे काम के लिए, अच्छा काम करने के लिए शरम की जरूरत नहीं है। आपको खराब काम, बुरे काम करने की जरूरत हो तो बात अलग है। अच्छा काम गाँधीजी ने शुरू किया था। तब चरखा को बुरा समझा जाता है। चरखा विधवाओं की निशानी समझा जाता था, लेकिन गाँधीजी ने जब से चरखा चलाना शुरू कर दिया, देशभक्तों की निशानी बन गई और वह काँग्रेस वालों की निशानी बन गई। हमें इस पीले कपड़े को चरखे की तरह समझना चाहिए। हम इसका गौरव बढ़ाएँगे और हम संत और महात्माओं की निष्ठा-आस्था को फिर मजबूत करेंगे, जो घटती चली जा रही है और हवा में गायब होती चली जा रही है। हमारे क्रिया-कलाप और हमारे वस्-दोनों का तालमेल मिला करके जब हम कार्यक्षेत्र में चलने के लिए तैयार होंगे, तो फिर क्यों हम उन परम्पराओं को जाग्रत करने में - जीवित करने में समर्थ न होंगे? जिसको ऋषियों ने हजारों और लाखों के खून से सींचकर के बनाया था, उसको जिन्दा रखा था।
आपको वहाँ जहाँ कहीं भी जाना है, एक आदर्श व्यक्ति की तरह से जाना है। आपको कन्याओं में भी काम करना पड़ेगा, आपको लड़कियों में भी काम करना पड़ेगा और महिलाओं में काम करना पड़ेगा। आप जहाँ कहीं भी जाएँ, दो बातों का ख्याल रखना। जहाँ कहीं भी आपको पैसे चढ़ाने का मौका आए, आरती का मौका आए, पूजा का मौका आए, कोई भी पैसा आता हो, वहाँ आप लेना मत। आप चाहें कि इकट्ठा दस हजार जेब में भरते जाएँ और कहें कि अरे साहब! ये पूजा की आरती में पैसे आये थे। ऐसा मत करना आप। यद्यपि यह सब करने का मौका मिलेगा। आप वहीं के लोगों को बुलाना और देखना कोई पैसे आते हैं, चढ़ावे में आते हैं, सामने रख जाते हैं। कोई चवन्नी चढ़ा जाती है। इस तरह पैसे का हिसाब बढ़ता चला जाएगा। इनको आप उस में रखना, जमा करना। आप पैसे के बारे में हाथ साफ रखना। आपको शाखा जो कुछ भी दें, वह किराये - भाड़े के रूप में कहीं भी जमा रखना। किराया आपको जो कुछ भी लेना हो, अपना खर्च वहीं से लेना। बाहर के लोगों से आप ये शिकायत न करना कि हमें साबुन की जरूरत है, कपड़े की जरूरत है और हमको वो वाली चीज चाहिए, हमको फलानि चीज चाहिए। कोई लाकर दे दे साबुन तो बात अलग है, लेकिन अगर आपको न दे तो आप अपने पैसे से ले लेना। नहीं तो वहीं के आदमी से माँग लेना, लेकिन वहाँ के लोगों को कोई दान-दक्षिणा का पैसा आप मंजूर मत करना।
आपको हमने संत बनाया है, लेकिन दान-दक्षिणा का पैसा वसूल करने का अधिकारी आपको नहीं बनाया है। व्यक्तिगत रूप से दान-दक्षिणा लेने का अधिकार बहुत थोड़े आदमियों को होता है। उन्हीं को होता है, जिनके पास अपनी कोई सम्पत्ति, अपना कोई धन नहीं होता। उस आदमी को भी दान-दक्षिणा लेने का अधिकार है। जिसने सारा जीवन समाज के लिए समर्पित कर दिया है और अपने घर की सम्पदा को पहले खत्म कर दिया है और अपने घर की सम्पदा के नाम पर उनके पास कोई पैसा जमा नहीं है। तब उस आदमी को हक हो जाता है। कि लोगों से अपने शरीर निर्वाह करने के लिए पैसा ले। शरीर के निर्वाह करने के लिए रोटी ले। आपको मालूम होगा - अखण्ड-ज्योति कार्यालय से गायत्री तपोभूमि प्रतिदिन दो बार आना-जाना होता था। भोजन अखण्ड-ज्योति जलाकर ही करते थे। यदि कभी तपोभूमि में देर तक रुकना पड़ता था, तो भोजन अखण्ड-ज्योति संस्थान से मँगा लेते थे और वहाँ बैठकर खाते थे। आपको मालूम है कि नहीं, हमें ज्ञात नहीं। हमारे पास जमीन थी, उस वक्त तक। इसीलिए जमीन जब तक हमारी थी, हमें क्या हक था कि हम अस्सी बीघे जमीन से अपना गुजारा न करें और गायत्री तपोभूमि के पैसे से हम कपड़े पहनें और रोटी लें। लोगों ने हमको धोतियाँ दी, कपड़े हमको दिए और कहा कि गुरुजी के लिए लाए हैं। गुरु-दक्षिणा में लाए हैं। आपके लाने के लिए बहुत धन्यवाद, बहुत एहसान। सारे के सारा बक्से में बन्द करते चले गये। सारे कपड़ों को तपोभूमि में भिजवा दिया। जहाँ कार्यकर्ता रहते थे, दूसरे लोग रहते थे, हरेक को हमने दे दिया। अच्छा भाई लो, किसकी धोती फट गई। हमारी फट गई धोती, इनको देना। इसके पास नहीं है। उसके पास नहीं है। अच्छा खोल दो बक्सा मेरा; क्योंकि वे अपना घर छोड़ करके आ गये थे। उनके पास जीविका नहीं थी। इसीलिए उन्हें खाने का अधिकार था। हमारा नहीं था अधिकार, हमने नहीं खाया। जब तक हम गायत्री तपोभूमि में रह हमने रोटी नहीं खाई, लेकिन जब हम अपनी अस्सी बीघे जमीन दे करके और भी हमारे पास जो कुछ था, दे करके खाली हाथ को करके आ गये, हम अपना केवल शरीर और वजन ले करके आ गये, तो हमने यह मंजूर कर लिया है और हम यहाँ शान्तिकुञ्ज के चौके में रोटी खाते हैं और कपड़े पहनते हैं।
मित्रो! दान-दक्षिणी की रोटी खाने का और कपड़े पहनने का अधिकार सिर्फ उस आदमी को है, जिसने अपनी व्यक्तिगत सम्पदा को समाप्त नहीं कर लेता। कहीं गया है ठीक है, मेहमान की तरह से रोटी खा ले बस। आपके पास पैसा आता है तो आप संस्था में जमा करना। पैसे के मामले में कहीं आप यह करके मत आना कि लोग आपके बारे में ये कहने लगें कि गुरुजी के चेले आपके पैसे के बारे में चोरी का भाव लेकर आते हैं, शिक्षा माँगने का भाव लेकर आते हैं। यह ख्याल ले करके मत आना। यह बदनामी है आपकी, हमारी और हमारे मिशन की।
एक और बात अपना करना मत। क्या मत करना? आपको हमने महिलाओं में, लड़कियों में मिला दिया है। हमने हवन-कुण्डों पर हवन करने के लिए लड़कियों को, स्त्रियों को शामिल करने की जिम्मेदारी उठा ली है। हमने एक बड़ा काम कर डाला। बड़ा दुस्साहस का काम कर डाला। आप समझते नहीं कितनी बड़ी जिम्मेदारी हमने उठा ली है। उस जिम्मेदारी की शरम रखना आपके जिम्मे हैं। लड़कियाँ आई है। सम्मान के साथ काम करेंगी। अमुक काम करेगी। लड़कियाँ आई हैं - अपने अपने कंधों पर सिर पर कलश के घड़े ले करके चलेंगी। आपके पास आएँगी और परिक्रमा लगायेंगी और जय बोलेंगी। कोई आपके लिए क्या कहेंगी और कोई हवन करने के लिए कहेंगी। आप हमेशा दो बातों का ध्यान रखना कि अकेले किसी लड़की से बात मत करना। जब कभी कोई अकेली लड़की, अकेली महिला आती हो तो चुप हो जाना और आवाज देकर दूसरों को बुला लेना। किसी मर्द को बुला लेना या किसी महिला को बुला लेना। अकेले बात मत करना कभी। कभी कोई अकेली स्त्री आये और आपसे कोई बात करना चाहती हो या अकेली बात करती हो तो आप कहना बहिन जी आप अपने बाप को, बहिन को लिवा लाइए और अपने भाई को लिवा लाइए। वह यहाँ आ करके बैठक जाएँ या फिर हम अपने बाबाजी को बुला लेते हैं। अकेली स्त्री से कभी भी बात मत करना। आप पर मैं यह प्रतिबन्ध लगाता हूँ। अकेले मत बात करना। किसी मर्द के बिना बात मत करना। यह प्रतिबन्ध नम्बर एक हुआ।
बन्धन नम्बर दो। कन्याओं से और लड़कियों से बात करते हुए आपको ईसाई मिशन वाली बात याद रखनी चाहिए। ‘नन’ जो होती हैं, ईसाई मिशन काम काम करती हैं। उनको ऐसी शिक्षा दे दी जाती है कि वे महिला में, महिला समाज में काम करती हैं मुर्दों में काम करती हैं, मुर्दों में काम करती हैं। उनको आपने देखा होगा। नर्सों के रूप में जो काम करती हैं, महिलाओं में काम करती हैं, उनको नर्स कहते हैं जो पादरी होती हैं, उनको नन कहते हैं। ननें टोपा-सा पहने रहती हैं। शायद कभी आपने देखा हो। ननों को शिक्षा दी जाती है। एक खास शिक्षा दी जाती हैं उनको कि कभी भी मर्दों से आँख से आँख मिलाकर बात नहीं करनी चाहिए। मर्दों के सामने बात करें तो काम की बात करें। समझाइए ये बात कीजिए, वो बात कीजिए पर आँख से आँख मत मिलाइये। आँखें नीची रख करके महिलाओं से आप भी बातें करें आपको भी यही शिक्षा दी जाती है। आपको भी ये शिक्षा दी जाती है कि महिला समाज में जहाँ कहीं भी आपको रहना पड़े आँख से आँख मिलाइए मत, आँखें नीची करके बात कीजिए। नीचे आँख करके बात करेंगे, तो आपका गौरव, आपका सम्मान, आपकी इज्जत बराबर बनी रहेगी। गम्भीर हो करके आप कीजिए बात। जोरों से कीजिए बात। दोस्तों से विशिष्ट बात मत कीजिए। जो भी कह रहे हैं, उसे जोर से कहिए। ऐसे कहिए मानों दूसरों को कम सुनाई पड़ता है। कम सुनने वाला आदमी कैसे बोलता है? सोचता है इन सबको कम सुनाई पड़ता है। धोती माँग दीजिए। अरे हमारे तो कान अच्छे हैं। आप ये समझ रहे हैं, महिला समाज में जब आपको काम करना पड़े तो आप क्या कहेंगे। आप यह समझाना कि हमारे कान बहरे हो गये हैं। जोर से कह लड़की क्या कहती है। जो कहना हो वह भी जोर-जोर से कहना। आप इन बातों को ध्यान रखना। ये बातें काम की हैं है तो राई की नोक की बराबर, लेकिन आप जहाँ कहीं भी जाएँगे, शालीन आदमी हो करके जाएँगे, श्रेष्ठ आदमी हो करके जाएँगे। आप अपनी संस्था के गौरव को अक्षुण्ण रखे में समर्थ हो सकेंगे।
अब मैं आपको यहाँ से भेजता हूँ। कहाँ भेजता हूँ? आपने अपनी कन्या के हाथ पीले कर दिए। मैंने किसके पीले हाथ कर दिए? आप लोगों के पीले हाथ किए हैं कपड़े मैंने पहना दिये हैं, पीले हाथ कर दिये हैं, अब आपकी जिम्मेदारी है अब आपका इम्तहान लिख जाने वाला है और आपकी यह परख होने वाली है कि ये जो बहू आई है, कैसी हैं और बहू को क्या-क्या बनाना आता है। रोटी बनानी आती है बहू को नहीं। बहू को पकौड़ी बनानी आती है कि नहीं। बहु को पकौड़ी बनानी आती है कि नहीं। उसके सास, ससुर बैठे हैं। अरे ये बहू आई है, बहू के हाथ से पूड़ी तो बनवाकर कर खिलवाओ, बहू के हाथ से कचौड़ी तो बनवाकर खिलवाओ। सब बैठे हुए हैं, सारा घर बैठा हुआ है और देखिए बहू की असली इज्जत को रखना आप अपनी ससुराल में।
याद रखिए आप वह नाम कमा करके आना कि लोग हमसे बार-बार यहीं कहे कि पिछली बार जिन मोहनलाल जी को आपने भेजा था, इस बार भी आप उन्हीं को भेजना गुरुजी। अबकी बार फिर हमने सम्मेलन किया है और हमारे लिए तो मोहनलाल जी को ही भेज दीजिए। बेटा, मोहनलाल जी की नहीं अबकी बार तो मक्खनलाल जी को भेजेंगे। पिछली बार तो मक्खनलाल जी को भेजा था। मोहनलाल जी से इक्कीस ही भेज रहे हैं। उन्नीस नहीं है। अरे गुरुजी, उन्हीं को भेज देते तो अच्छा रहता। लोग याद करें आपको, ऐसी आप निशानियाँ छोड़ करके आना। अपने स्वभाव की, अपने कर्म को, अपने गौरव की और अपनी विशेषताओं की। गौरव की बात छोड़ करके आये तो मित्रों, धन्य हो जाएगा आपका वानप्रस्थ, धन्य हो जाएगा हमारा ये शिविर। धन्य हो जाएँगे आपके वे क्रिया−कलाप, जिनके लिए सारे भारत वर्ष में भ्रमण करने के लिए, लोगों में भावना पैदा करने के लिए लोगों भावना पैदा करने के लिए, लोगों में भगवान के प्रति निष्ठा जगाने के लिए, अध्यात्मवाद की स्थापना करने के लिए, आत्मा का विकास करने के लिए, आत्मा का विकास करने के लिए और धार्मिकता की स्थापना करने के लिए आपको भेजते हैं। आपको इन्हीं तीन उद्देश्यों के लिए भेजते हैं। आप साधना करके आना और हमारी लाज रख के आना। आज की बात समाप्त हुई।
!! ओम् शान्ति!!
मिथिला नगरी के महानन्द परिव्राजक ने जीवन के तीन पहर कठिन तपश्चर्या में बिताये। जप, तप, आसन, प्राणायाम, स्वाध्याय, यज्ञ, कीर्तन, मार्जन, तर्पण करते-करते असंख्य सिद्धियाँ करतलगत कर लीं। असाधारण क्षमता वाले मुनि महानन्द की ख्याति चन्द्रमा के प्रकाश की तरह विकसित होने लगीं। सैकड़ों व्यक्ति उनकी सिद्धियों का लाभ उठाने लगे। किंतु मुनि का अन्तः कारण स्थिर न था। सिद्धियों ने उनकी तृष्णा तो बढ़ा दी, पर वह शान्ति, वह स्थिरता न मिली जिसके लिए मुनि ने घर-वार और स्नेहियों, संबंधियों का साथ छोड़ा था।
एक दिन महानन्द इसी दुःख से भरे अपनी कुटिया से निकले। एक गाँव की ओर चल पड़े। वे गाँव में पहुँचे ही थे कि किसी के कराहने का स्वर सुनाई दिया। कोई बीमार था, देखने वाला कोई न था, बड़ी पीड़ा बढ़ गई थी, उस व्यक्ति की दर्द भरी कराह मुनि के हृदय में उतर गई, उन्होंने बीमार की रात-भर सेवा की। दवा दी, पाँव दाबे, बिस्तर बदले, टट्टी और पेशाब धोया। चौथे पहर जब उसे नींद आई, मुनि आश्रम लौटे।
आज न उन्होंने संध्या की, न प्राणायाम और निदिध्यासन भी नहीं किया किंतु, तो भी उनके अन्तःकरण में अपूर्ण शान्ति, स्थिर उत्फुल्लता, अबाध सुख निर्झर की भाँति झर रहे थे। महानन्द को बोध हुआ कि तप-साधना द्वारा अर्जित क्षमता का सही उपयोग न हो पाने से मन अशान्त था और अपनी साधना का अगला चरण इसी को मानकर अविरल शान्ति पायी।
धर्मशीलों की संकल्पशक्ति का एकत्रीकरण एवं उसका सामयिक समस्याओं के समाधान के निमित्त सुनियोजन-यही है वह महत्वपूर्ण आधार, जिसके बलबूते परमपूज्य गुरुदेव ने अपेक्षा की कि युगसंधि महापुरश्चरण की समाप्ति का समय जब आएगा, तो विपन्नताओं से उबरने में मदद मिलेगी। आज की जो भी परिस्थितियाँ हमें दिखाई देती हैं, उनके मूल में परोक्ष जगत में हो रही हलचलों को देखा जाना चाहिए एवं उसी स्तर के प्रयासों में हमें एकजुट हो प्रयास करना चाहिए। दृश्यमान भली-बुरी परिस्थितियों का जब भी हम आकलन करते हैं, हम मात्र वहीं देखते हैं जो हमें सामने घटता दिखाई दे रहा हैं। हमें परोक्ष को प्रत्यक्ष से कम महत्वपूर्ण न मानकर उसे उतना ही महत्व देना चाहिए। युगपरिवर्तन जैसे व्यापक और विशद प्रयोजनों में तो प्रत्यक्ष से अधिक परोक्ष का योगदान माना गया है।
जड़ बनी रहें, किन्तु टहनी कटती रहें तो कुछ काम बनता नहीं। नयी कोपलें पुनः आ जाती हैं क्योंकि जड़ें विद्यमान है। असुरता की, अनास्था की जड़ें मिटाए बिना, अदृश्य का परिशोधन किए बिना नवयुग की आधारशिला रखी नहीं जा सकती। रामायण में हम जब रामचरित्र पढ़ते हैं, तो लगता है लंका का महायुद्ध जिसमें लंकादहन से लेकर में भयंकर रक्तपात हुआ था - अन्ततः श्रीराम को विजय का श्रेय मिला था - सीता वापस लौटी और राज्याभिषेक का उत्सव हुआ - सही सब रामायण में लिख है। इतने भर से ही परिस्थितियाँ जो तत्कालीन समाज की थी, ठीक हो गयी होंगी। किन्तु बात यहीं तक नहीं है। सभी तत्त्वदर्शियों - ऋषियों ने मिलकर तब निष्कर्ष निकाला था कि अदृश्य में संव्याप्त विषाक्तता ने लंका से लेकर चित्रकूट - पंचवटी तक अगणित असुरों को उपजाया व आतंक बढ़ाया था। उसका अदृश्य घटाटोप लंकाविजय के उपरान्त भी वैसा ही बना हुआ था। कुछ ही समय के बाद उसी दुखद घटनाक्रम की पुनरावृत्ति हो - कुछ के मर जाने पर रक्तबीज की तरह नये असुर उत्पन्न होने व उपद्रव खड़े करने की संभावनाएँ व्यक्त की गयी। अतः रामविजय को यहीं तक पर्याप्त न मानकर अदृश्य का परिशोधन भी सोचा गया। दस अश्वमेध यज्ञों की योजना बनी-साधना-पुरुषार्थ बड़े व्यापक स्तर पर सम्पन्न हुआ एवं माध्यम से परोक्ष का अनुकूलन साधा गया। तब जाकर रामराज्य की स्थापना संभव हो सकी। हमें भी आज की परिस्थितियों को इसी परिप्रेक्ष्य में समझकर तदनुसार युगसंधि महापुरश्चरण की भूमिका को - पूर्णाहुति के स्वरूप को आत्मसात् करना होगा।
उसी परम्परा को ऋषि - मुनियों ने स्थायी रूप देते हुए विशेष पर्वों- तीर्थों में धर्मानुष्ठान की तीन-तीन वर्ष के अन्तराल पर चार स्थानों पर महाकुम्भों के आयोजन की धर्मधारणा के विस्तार की व्यवस्था बनाई थी। बड़े और केन्द्रीय वाजपेय स्तर के यज्ञों को ऋषियों ने छोटे क्षेत्रीय और स्थानीय धर्म-समारोहों के रूप में बाँट दिया, ताकि समीपवर्ती धर्मप्रेमी उनके पहुँचकर अपनी आस्थाओं को सशक्त कर सकें। उसी परम्परा का जीर्णोद्धार परमपूज्य गुरुदेव के द्वारा आरम्भ किये गए छोटे-छोटे गायत्री महायज्ञ एवं उसके बाद स्थान-स्थान पर सम्पन्न ज्ञानयज्ञों - युगनिर्माण सम्मेलनों के रूप में किया गया। परमपूज्य गुरुदेव ने धर्मायोजनों को भावनात्मक, आध्यात्मिक, अदृश्य को प्रभावित करने वाले, प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने वाले धर्मानुष्ठान का रूप देकर साधना को सार्वभौम बना दिया। यही प्रज्ञा अभियान, युगनिर्माण योजना की अब तक की सफलताओं की मूल धुरी समझी जानी चाहिए। जनमानस का परिष्कार और अदृश्य जगत के अनुकूलन में जो योगदान दें, वह युगसाधना व धर्मशीलों का संगतिकरण सार्थक हैं - यही इस मिशन में चिन्तन का भावी निर्धारणों का मूल आधार बना। १९९. में परमपूज्य गुरुदेव के सूक्ष्म में विलीन हो विराट रूप लेने के बाद संपन्न २७ अश्वमेध महायज्ञ, प्रथम पूर्णाहुति आँवलखेड़ा एवं अभी-अभी न्यूजर्सी (यू. एस. ए.) में सम्पन्न वाजपेय यज्ञ की सफलता के मूल में उसी शक्ति को देखा जा सकता है, जिनसे लाखों - करोड़ों की मनःशक्ति का एकीकरण कर इस ब्रह्माण्ड में एक विलक्षण प्रयोग का बीजारोपण १९२६ में अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलन के माध्यम से किया था। समूह चेतना का जागरण इसी आधार पर संभव हो पाया है। एवं अब १९९८ का अंतिम उत्तरार्द्ध का भाग आते - आते हम सबकी महाकाल की युग - प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का स्वरूप स्पष्ट रूप से समझ में आ रहा है।
१९८९ की वसंत के आरम्भ बारह वर्षीय महापुरश्चरण का यह दसवाँ वर्ष है। मात्र दो वर्ष बाकी हैं। परमपूज्य गुरुदेव एवं शक्तिस्वरूपा माताजी के निर्देशानुसार की वसंत पर्व १९९९ से साधनावर्ष की शुरुआत होगी। यह एक वर्ष तक पूरे भारत व विश्व में सघन स्तर पर चलती रहेगी। वसंत पर्व २.. से महापूर्णाहुति का शुभारम्भ होना है। स्वरूप क्रमशः स्पष्ट होता चला जा रहा है। हमें अपने अंदर के साधक को जगाकर निखारने के लिए मात्र पंद्रह माह का समय मिला है। लक्ष्य समीप आते ही उत्साह चौगुना होने लगता है - गति तेज हो जाती है एवं लगता है कि साथियों की संख्या की क्रमशः बढ़ती जा रही हैं, क्योंकि प्रामाणिकता के साथ सफलता का अर्जन भी यह कार्य करता चलता है। गायत्री परिवार का विराट विस्तार कुछ इसी रूप में इस नाजुक मोड़ पर आकर खड़ा है। अपनी तैयारी हमें प्रस्तुत शारदेय नवरात्र (२१ से २९ सितम्बर) से इसी स्तर की करनी चाहिए कि हम एक श्रेष्ठ साधक बन गुरुसत्ता के इस महाअभियान के विराट महायज्ञ के एक अंग बन सकें।
साधनावर्ष की तैयारी के संबंध में इसीलिए अभी से सभी को कटिबद्ध होने का कहा जा रहा है। साधना का स्तर बढ़ाए बिना - प्रखरता का उपार्जन किए बिना उस महासमर की तैयारी नहीं हो सकती, जिसमें आगामी तीन - चार वर्षों में हम सभी को भागीदारी करनी है। साधना का अर्थ है - समर्पण जितना समग्र होगा, गुरुसत्ता की चेतना - सिद्धियों, शक्तियों को हम उतना ही व्यापक परिमाण में धारण भी कर सकेंगे - जीवन उतना तेजी से परिवर्तित भी होने लगेगा। परमपूज्य गुरुदेव इतिहास में ऐसे एक शीर्षपुरुष के रूप में स्वयं को स्थापित कर गए, जिनके माध्यम में जन-सामान्य को यह लगा कि साधारण जीवन जीने वाला भी एक श्रेष्ठ साधक - समष्टिगत चेतना के महाआंदोलन एक अंग बन सकता है। परमपूज्य गुरुदेव ने मानव इतिहास में पहली बार जीवन और साधना को एक रूप करके दिखा दिया। साधना को ‘जीवन जीने की कला’ नाम देकर उनने सार्वजनीन बनाया एवं लाखों हीरों को तराशकर उनके जीवन-स्तर को उठा दिया।
परमपूज्य गुरुदेव के अस्सी वर्षीय जीवन का निचोड़ देखे तो हमें उनके जीवन को साधूमानव बनाकर जीने वाले एक गृहस्थ के रूप में पाते हैं, जो लाखों लोगों के हृदयों पर अधिकार कर उनके आध्यात्मिक अभिभावक बनते चले गए। न वे कभी रामकृष्ण परमहंस की तरह बार-बार भावसमाधि में गए, न श्री अरविन्द की तरह एकांतप्रेमी योगी बने, न चैतन्य महाप्रभु की तरह उन पर कभी आवेश आया। परन्तु उनने जो प्रचण्ड साधनात्मक से दिखने वाले व्यक्तियों से जीवनसाधना संपन्न कराके दिखा दिया। वह अतुलनीय है। उनकी जीवन-साधना के विषय में उन्हीं ने अपनी आत्मकथा में लिखा है - “हमारी तपश्चर्या का प्रयोजन संसार के हर देश में, जन-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनेकानेक भागीदारों का सृजन करना है।” इसी पुस्तक में वे लिखते हैं - “नवनिर्माण के उदीयमान नेतृत्व के लिए पर्दे के पीछे हम आवश्यक शक्ति तथा परिस्थितियाँ उत्पन्न करेंगे।” आगे भी वे लिखते हैं “हम जिस अग्नि में अगले दिनों तपेंगे, उसकी गर्मी असंख्यों जाग्रत आत्माएँ अनुभव करेंगे। लोकसेवियों की एक ऐसी उत्कृष्ट चतुरंगिणी खड़ी कर देना, जो असंभव को संभव बना दे, नरक को स्वर्ग में परिणत कर दें, यह हमारे ज्वलन्त जीवन क्रम का अंतिम चमत्कार होगा।”
ऊपर के वाक्यों से जो आग निकली दिखाई देती है, उसकी तपन सभी अनुभव कर सकते हैं। हम सभी को यदि स्वयं को अनेक शिष्य होने की जाग्रत आत्मा के रूप में अनुभूति होती है, तो हमें भी स्वयं को उस चतुरंगिणी का एक अंग मानकर अपनी साधक के रूप में तैयारी प्रस्तुत नवरात्रि से और उत्कृष्ट स्तर की आरम्भ कर देना चाहिए। यह कैसे हो, कैसे बहुगुणित हो जन-जन तक साधना द्वारा आत्मशक्ति के उपार्जन का संदेश पहुँचे - इसका मार्गदर्शन अगले कुछ अंकों में परिजन पाठक पढ़ सकेंगे, किन्तु विस्तार से इसे दिसम्बर १९९८ एवं जनवरी १९९९ के साधना विशेषांकों में फलश्रुति के साथ पाएँगे। नवम्बर १९९८ से भारत के प्रायः चौबीस केन्द्रों से आरम्भ होने वाली साधना - प्रशिक्षण प्रक्रिया के संबंध में अलग अंक में तथा “प्रज्ञा अभियान पाक्षिक’ एवं ‘युगनिर्माण योजना’ मासिक में पाठक पढ़ सकेंगे।
हम सभी को समय की विषमता - संधिकाल की प्रसवपीड़ा का समय समीप आने की गम्भीरता एवं सामूहिक साधना के माध्यम से समष्टि मन के जागरण एवं अदृश्य जगत के अनुकूलन की प्रक्रिया को समझना एवं तदनुसार ही अपने जीवन की रीति-नीति का निर्धारण करना चाहिए। इसी में समझदारी हैं।
“अब हमारी भूमिका परोक्ष जगत में अधिक सक्रियता वाली होगी। गुरुसत्ता का आमंत्रण तीव्र पर तीव्र होता चला जाता है तथा एक ही स्वर हर श्वास के साथ मुखरित होता जा रहा है - युगपरिवर्तन के लिए और अधिक-और अधिक समर्पण - “प्रस्तुत पंक्तियाँ अगस्त 1994 की अखण्ड ज्योति के उस विशेष लेख से उद्धृत हैं, जो परमवंदनीया माताजी भावाभिव्यक्ति के रूप में उनके महाप्रयास (१९ सितम्बर १९९४ - महालय भाद्रपद पूर्णिमा) से पूर्व प्रकाशित हुआ था। परमवंदनीया माताजी, जिनके महाप्रयाण को आज चार वर्ष पूरे हुए हैं, सहज ही हमें ममत्व के उस महासागर की याद दिला देती हैं, जिसने इस मिशन को परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद हिमालय की ऊँचाइयों तक पहुँचा दिया। हम कभी भी भूल नहीं सकते उस माँ को, जिसने हमें अभिभावकों से भी बढ़कर उस स्तर का स्नेह दिया, जो जीवन - नौका को सहारा देता चला गया है।
युगनिर्माण योजना, गायत्री परिवार, प्रज्ञा अभियान का गौरवपूर्ण इतिहास इसके दो संस्थापकों - संरक्षकों परमपूज्य गुरुदेव, परमवंदनीया माताजी की जीवनधुरी के चारों ओर घूमता है। परमपूज्य गुरुदेव के दृश्यजीवन की बहुआयामी भूमिका को बहुतों ने देखा या पढ़ा है जीवन में अनुभूति की है। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा रचित वांग्मय-विराट साहित्य उनके जीवनदर्शन का एक प्रत्यक्ष प्रमाण है। किन्तु आज जब हम परमवंदनीया माताजी के महाप्रयाण दिवस पर चिंतन करते हैं, तो लगता है कि ‘शिव’ रूप में जन्मी महाकाल की सत्ता यदि हमारे गुरु रूप में हम सबके। बीच आयी तो शक्ति रूप में वहीं परमवंदनीया माताजी के रूप में हम सबको मिली। उनकी बहुआयामी जीवनगाथा समयानुसार एक विशाल ग्रन्थ के रूप में अवश्य प्रकाशित होगी, किन्तु आज जब हम उनकी स्मृति मन−मस्तिष्क में लात है, तो उनका संगठन को सींचने वाला अति अल्प आयु में ‘अखण्ड ज्योति’ जैसी पत्रिका के संपादन के भार को सँभालने वाला नारी जागरण आंदोलन को गति देकर चरम ऊँचाइयों तक पहुँचा देना वाला एवं आश्वमेधिक दिग्विजय अभियान के माध्यम से सारे विश्व में गायत्री व यज्ञ का संदेश फैला देने वाला जगदंबा वाला एक विराट स्वरूप उभरकर आने लगता है। परमपूज्य गुरुदेव को चौबीस महापुरश्चरणों की साधना की मध्यावधि में उनसे आकर जुड़ी माताजी ने कितने ही कष्ट सहकर न केवल अपने आराध्य के तप को चरमलक्ष्य तक पहुँचाने में मदद की स्वयं के जीवन को भी वैसा ही ढालकर एक साधिका स्वयं को बनाया, यह गुरु के प्रति समर्पण की एक ऐसी मिसाल है। जो हम सबके लिए सदैव प्रकाशस्तंभ बनी रहेगी।
अपने इसी लेख (अगस्त १४) में परमवंदनीया माताजी ने लिखा है - “कैसे भुलाऊँ मैं अपने साथ बिताए गए उन क्षणों को जिनमें उन्होंने न केवल मुझे असीम स्नेह दिया, वरन् करोड़ों पुत्रों की माता के सर्वोच्च शिखर पर पदासीन कर दिया।” जब तक अपना एक भी बालक दुखी है उसे दिलासा देने उसकी माँ उसके आस-पास ही कहीं विद्यमान है। उसके इतने बड़े है कि सारी जगती के दुःखीजनों को वह अपनी संरक्षण छाया में रख सकती है।”
उपर्युक्त संदर्भ मात्र कुछ अनुभूतियों की स्मृति दिलाने के लिए दिये गये, ताकि परिजनों को उस समर्पित साधिका के उस स्वरूप का भान हो सके, जो जगज्जननी के रूप में हर परिजन का कष्ट अपने ऊपर लेने को सतत् आतुर रहीं - अनेकानेक शारीरिक - मानसिक कष्ट सहकर भी जो जीवनभर अनुदान लुटाती रहीं। आज जब हम युग संधिकाल की भयावह प्रसवपीड़ा के अंतिम क्षणों से गुजर रहे है तो हमें सहज ही परमवंदनीया माताजी का यह आश्वासन और भी संबल देता है। कि वे सूक्ष्मरूप में गुरुसत्ता के साथ मिलकर हमारी हर वेदना को जानती भी है एवं समर्पण की शर्त पर उसे हरने को कृतसंकल्प भी हैं।
हम भावुक तो हैं, पर भावनाशील नहीं। हम परिजन तो हैं, पर समर्पण में कही कमी है। हम उनसे जुड़े हुए तो हैं, पर उनके बताए राजमार्ग पर चलने के बजाय कभी-कभी डगमगा जाते हैं। परमवंदनीया माताजी का प्यार तो पाया है, पर संभवतः हम उसे नित्य स्मरण नहीं कर पाते। यदि यह महाप्रयाण दिवस हमारी संकल्पशक्ति को प्रचण्ड गति दे - हमें एक विनम्र साधक बना दें, तो हमें समझना चाहिए कि हममें व गुरुसत्ता के बीच आदान-प्रदान के क्रम में कहीं कुछ प्रवाह अवरुद्ध हुआ था, वह अब ठीक होकर जीवनक्रम सही दिशा में चल पड़ा है। यह संदेश सभी के लिए है हर कार्यकर्ता के लिए, पाठक के लिए परिजन के लिए, उनसे अनुदान पा चुके छोटे-बड़े हर व्यक्ति के लिए। परमवंदनीया माताजी के वात्सल्य भाव का पयपान कर उनकी शक्ति को ग्रहण करने वाले हम सभी को आज का शक्तिदिवस संकल्प - साधना दिवस यही एक प्रेरणा दे रहा है कि हम गुरुसत्ता के आदर्शों के प्रति अपने समर्पण को और भी अधिक प्रगाढ़ बनाएँ। इस वर्ष यह महाप्रयाण दिवस है तो छह सितम्बर भाद्रपद पूर्णिमा के दिन, परन्तु मेरे भारतवर्ष व विश्व में इसे भाद्रपद पूर्णिमा से नवरात्रि समापन के बाद विजयादशमी तक शक्तिपर्व के रूप में मानना चाहिए। इस चौबीस दिन की अवधि में जो भी श्रेष्ठ संकल्प मन में पैदा हों, उन्हें साकार करने, खाद-पानी देकर मजबूत बनाने का विचार किया जाना चाहिए। तभी तो मात्र कर्मकाण्ड स्तर पर हमीं अपनी गुरुसत्ता की गरिमा के अनुरूप हम यह शक्ति दिवस चिरस्मरणीय बना सकेंगे।
*समाप्त*