मौन साधना की गहराइयों में एक अनुभूति मुखर हो उठी।ईश्वर से प्रतिध्वनि होकर आवाज आई। उसने कहा, “अहो! एक ऐसा प्रेम है जो सभी को अपने में समा लेता है॥, मृत्यु से महान है, जो सीमा नहीं जानता, जो सर्वत्र, जो मृत्यु की उपस्थित में हैं तथा केवल भावसंवेदना है। मैं वही प्रेम हूँ। वह प्रेम जो अनिवर्चनीय मधुरता है, जो सभी वेदनाओं का, सभी भावों का स्वागत करता है।, जो सभी प्रकार की उदासीनता को दूर करता है। मैं वही प्रेम हूँ।”
“अहो! यह एक सर्वग्राही सौंदर्य है। यह सौंदर्य सुगन्धित ऊष्मा तथा अरुणिमसंध्या में स्फुटित होता है। पक्षी के कलरव और बाघ की गर्जना में भी यही विद्यमान है, तूफान और शाँति में यही सौंदर्य विद्यमान है। किन्तु इन सबसे अतीत है। ये सब इनके पहलू है। मैं सौंदर्य हूँ। मैं ही आकर्षण हूँ तथा आनंद भी मेरा ही स्वरूप है।”
‘अहो! एक जीवन है, जो प्रेम है, आनन्द है। मैं वही जीवन हूँ। उस जीवन में मुझे कोई सीमित नहीं कर सकता, परिमित नहीं कर सकता। वही अनन्त जीवन है।, वही शाश्वत जीवन है और वही जीवन मैं ही हूँ। उसका स्वभाव शाँति है और मैं स्वयँ शाँति है -मौन की गहन गहराइयों में उपजी शाँति मैं समग्रता की कहरी कलह नहीं है, त्वरित आवागमन नहीं मैं वही जीवन हूँ। सूर्य और तारे इसे धारण नहीं कर सकते। इस ज्योति से और अधिक प्रकाशवान और कोई ज्योति नहीं है यह स्वयँ ही प्रकाशित है। मैं ही जीवन हूँ तथा तुम मुझमें और मैं तुममें हूँ।”
“मैं सभी भ्रान्तियों के मध्य में एक ही सत्य दिखता है॥ यह दृश्य सत्य में हूँ।काल के गर्भ में उत्पन्न होकर सभी रूपधारियों में मैं ही धारण करता हूँ। मैं काल का भी जन्म स्थान हूँ। इसलिए शाश्वत हूँ तथा जीव, तू वही है जो मुझमें है- वही अंतरात्मा। इसलिए उठो जागो और सभी बंधनों को छिन्न भिन्न कर दो, तुम भी जाग्रत आत्मा हो। उठो! उठो! और जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाय रुको मत। लक्ष्य जो कि प्रेम है, जो मुक्त आत्मा का आनन्द है, शाश्वत ज्ञान है।”
पंडित रामशणजी बहुत ही सज्जन पुरुष थे। पंडिताई के साथ साथ शास्त्रों का अध्ययन करते थे तथा वार्ताएँ भी करते रहते परंतु पंडित जी ज्यों स्वयं को मार्ग से परे पाते। यह तो मार्ग ही ऐसा है। पास हैं तो इतना कि अपने भीतर ही है और दूर है तो इतना कि विश्व में ‘नेति नेति’ कहते फिरो। पंडित जी भक्तों को कथा से समय समझते कि भाइयों मन बड़ा चंचल है। इसे वश में करो। संसार के रिश्ते स्वार्थी हैं। प्रभु भजन करो। पर पंडित जी मन में समझाते थे कि वे किताबी ज्ञान का वाचन मात्र कर रहे हैं। स्वयं में तो वे अभी भी कोरे हैं और जब तक व अमृतवर्षा स्वयं के भीतर नहीं हो जाती, तब तक यह उपदेश देना व्यर्थ है, निष्फल है,धन कमाने का निरा एक क्षुद्र स्वार्थ साधन मात्र है। अब तो बोलने के पहले तोलने लगे और फलतः अनुभव जब स्वयं के पास ही नहीं है फिर औरों को उपदेश देना कितना सार्थक है वे मौत तो हो गए, पर उन्हें रातभर नींद नहीं आती। बार बार मन में उठना शास्त्र झूठे नहीं हो सकते। फिर कहाँ गड़बड़ है वे एक दिन घर से बाहर निकल पड़े। वे यह समझते थे कि तीर्थों में भी कुछ नहीं है। तो सब जगह फिर तीर्थों के आडंबर से क्या मिलता है? कि से सुन रखा था कि एक महात्मा इधर जंगल में रहते है और प्रचार प्रसार से मुक्त है। कोई आए या जाए, उन्हें कोई सरोकार नहीं। गायत्री मंत्र का जप प्रभु का गुणगान ही उनका कार्य है।
अतः पण्डित जी अपनी पुस्तकें घर पर छोड़कर उधर चल पड़े। वे वहाँ पहुँच गये और महात्मा को प्रणाम कर बैठ गये।महात्मा अपनी सहज मुद्रा में बैठे थे। पण्डित जी काफी देर मौन बने रहे। वे एक टक महात्मा जी को निहार रहे थे।
“ पोथियों में कुछ नहीं धरा है। अनुभव किये बिना सब बेकार है।”महात्मा जी धीरे से बोल।
पंडित जी के हृदय बल्लियाँ उछल रही थी। मन की बात सुनकर गदगद हो गये। रोमाँच हो आया।बोले- महात्मन्! आपने सही कहा है। मैंने जीवन भर उपदेश दिया, परन्तु स्वयँ कोरा ही कोरा रहा। जीवन व्यर्थ जा रहा है।मनुष्य का सच्चा सुख ही उसकी प्राप्ति है। ईश्वर की अनुकम्पा व अनुभूति में ही शाँति है। यदि मानव जीवन में शाँति नहीं है तो यह सब व्यर्थ है।”
“ परन्तु यह शाँति दूर दूर भागती जाती है। जितना मनुष्य शाँति का प्रयास कर है उतना ही असफल हो जाता है। आप कोई सहज मार्ग बताइये ताकि उस प्रभु की कृपा प्राप्त हो सकें।”पंडित जी अब जिज्ञासे बन गये थे।
“पंडित जी इस मार्ग में हिसाब किताब नहीं चलता। यहाँ तो प्रेम और समर्पण चाहिए।” महात्मा जी इतना बोलकर चुप हो गये।
“ परन्तु यह कैसे पता चले कि प्रेम हो गया? “ पंडित जी बोल।
इस बार महात्मा जी जोर से हँसते हुए बोले-” ठीक! तुम सब समझते हो और मुझसे पूछते अपनी पत्नी से प्रेम करते हो या नहीं। इसकी क्या कोई विधि है? सब कुछ सहज है। पत्नी की हर वस्तु से प्रेम है। उसकी बुराई अच्छाई सब कुछ अपनी है। वही गति वहाँ की है। जब प्रेमी की हर बात में हर कार्य में अच्छाई ही अच्छाई दिखने लग जाए तो समझ लीजिए कि प्रेम हो गया।”
“महात्मन! यह तो आप ने सत्य कहा है, पर यह मन काबू में नहीं रहता है।”
“मन काबू में नहीं है, तो विजय की कल्पना भी दूर है। मन पर नियंत्रण होना चाहिए न कि उसका नियंत्रण आप पर हो।” वे थोड़ा रुके और फिर बोले-” सिकन्दर का नाम तो सुना होगा। वह जब भारत में आया तो वहाँ युद्ध में हाथियों का प्रयोग होता था। जब वह युद्ध के लिए कूच करने लगा; तो उसे हाथी पेश किया गया। ऊपर चढ़कर उसने कहा लगाम कहाँ है?लोगों ने कहा- इसके लिए अंकुश का प्रयोग होता है और वह महावत के पास है।
यह सुनकर वह हाथी से कूद पड़ा और बोला- ऐसी सवारी पर मैं नहीं बैठता, जिस पर मेरा नियंत्रण न हो। उसने घोड़ा सँभाला और उस पर बैठ गया। लगाम उसके हाथ में थी।
तात्पर्य यह कि मन अपने वश में रखो। मन को स्वयँ पर हावी मत होने दो, फिर देखो कि सत्ता कही आपके समीप ही है।सच्चा आनन्द आपके भीतर ही है।” महात्मा जी के कथन को पंडित जी समझ गये और गदगद हो गये। वे समझ गये कि कोरा किताबी काम आनन्द नहीं देता। वह तो एक साधन मात्र है, साध्य नहीं।
यथा दीपों निवातस्थौ न्ोड्ढते सोपमा स्मृता। युजतो योगमात्मनः।
“ जिस प्रकार वायु रहित स्थान में स्थित दीपक चलायमान नहीं होता, वैसी ही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की कही गयी है।”
यों तो ‘समय ‘ एक सम्पूर्ण इकाई हैं उसका विभाजन संभव नहीं। वस्तु की तरह दो टुकड़ों में खण्ड नहीं किया जा सकता, कारण है कि वह एक सतत् प्रवाह है। समुद्र की विशाल जल राशि को खण्डित कर पाना मनुष्य के बूते की बात नहीं। उसी प्रकार काल प्रवाह अविभाज्य है, किन्तु सुविधानुसार उसे तीन भागो में बाँट दिया गया है। जो घटनाएँ अभी अभी घटित हुई है या हो रही है, उस भाग को वर्तमान मान लिया जाता है। जो घट चुकी उन्हें भूत की संज्ञा दे दी जाती है और जो घटनाक्रम अभी भविष्य के गर्भ में है एवं आने वाले काम में घटने वाले है।, उस हिस्से को भविष्य कहा जाता है।
उक्त विभाजन वस्तुतः घटनाओं के सापेक्ष है। मनुष्य यदि तनिक इससे ऊपर उठकर विचार करे तो, मालूम पड़ेगा कि घटनावलियां तो सदा ही घटती चली आई है। अनादि से आरम्भ होकर अनंतकाल तक वे चलती रहेगी। इस प्रकार उसका भी एक अविच्छिन्न प्रवाह है। समय चूँकि सूक्ष्म है, अतः आम प्रचलन में घटना प्रवाह को काल अभिव्यक्ति का सरल माध्यम मान लिया जाता है। जो घटनाएँ घट चुकी है वे कभी वर्तमान थी। इस दृष्टि से विचार किया जाय तो विदित होगा कि यहाँ सर्वत्र वर्तमान ही वर्तमान है।अवलोकन चूँकि एक केन्द्र बिन्दु खड़ा होकर इस पर विचार करता है, असतफ वह काल को खंड खंड में बाँट देता है। यदि वह बिन्दु स्थिर न होकर चलायमान हो, तब उसे प्रतीत होगा कि वास्तव में वह भूत भविष्य जैसा कुछ भी नहीं है, सब कुछ वर्तमान है। इसे दूसरे ढंग से यों समझ सकते हैं कि यदि किसी की दृष्टि इतनी विशाल, विस्तृत और व्यापक हो जाय तो उसके आगे कुछ भी अगोचर और अदृश्य न रहे, तो उससे प्रतीत होगा कि समस्त घटनावलियों उसके सामने ही घटित हो रही है। ऐसे में महावर्तमान के अतिरिक्त किसी भूत भविष्य की कोई गुँजाइश नहीं रहती। यह महावर्तमान की घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में है। किसी प्रकार इससे ऊपर उठना संभव हो सके, तो काल एक प्रवाह के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, पर तब काल बोध कठिन हो जायेगा। यह अनुभूति असाधारण स्थिति और अवस्था में ही शक्य है। साधारण दिशा में तो हमें इसके तीन खंडमानकर ही चलना पड़ेगा।अब यह है कि सरलता के लिए यदि इसके तीन भाग स्वीकार भी किया जाएँ तो क्या सामान्य मनुष्य के लिए इन काल खंडों में प्रवेश संभव है? विज्ञान इसका उत्तर हाँ में देता है और कहता है कि समय में अनेक आयाम है। जब किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा स्थान से संबंधित समय के उच्च आयाम में व्यक्ति अनायास या प्रयासपूर्वक पहुँचता है।, तो वह उस व्यक्ति वस्तु अथवा स्थान में संबंधित भूत और भविष्य की बातें जान लेता है। दूसरे शब्दों में कहें तो व्यक्ति अतीत एवं भविष्य के गर्भ में प्रवेश कर जाता है। ऐसा इसलिए कि समय भूत वर्तमान और भविष्य के एक रैखिक क्रम में स्थित है। विज्ञान मनोवेत्ता के अनुसार समय का यह एक आयाम हुआ अपनी दूसरी भूमिका में भूत, वर्तमान और भविष्य साथ साथ रहते है। वैज्ञानिकों का इस संबंध में सुनिश्चित मत है कि इन अविज्ञात स्तरों तक न आयामों द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है, जो हमें सुविज्ञात है अर्थात् लम्बाई,ऊँचाई और गहराई। इन तक एक प्रारम्भिक बिन्दु द्वारा पहुँचा जा सकता है- एक ऐसा बिन्दु जिसमें स्थान तो हो, पर आयाम नहीं। इसे निम्न प्रकार से भी समझा जा सकता है। मान लिया कोई कणिका आकाश में गतिशील है, तो यह कणिका एक रेखा का निर्माण करेगी, जिसका एक मात्र आयाम होगा-लंबाई। यदि इस प्रकार कोई रेखा आकाश से गुजारी जाए तो उससे लम्बाई और चौड़ाई का दो आयामीय तक विनिर्मित होगा। यदि ऐसे किसी तल को पुनः आकाश में परिभ्रमण कराया जाय, तो जिस आकृति की संरचना होती है, उसके लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई-तीन आयाम होंगे। कार्य उसके विपरीत ही सम्पन्न होगा। गति यदि उलटी कर दी जाय तो त्रिआयामी भूमिका से पुनः प्रारम्भिक बिन्दु तक पहुँचा जा सकता है विशेषज्ञों का कहना है कि किसी ऐसे वस्तु को, इसके तीन आयाम हो, अनुप्रस्थ काट काटी जाए तो उससे दो आयाम वाला तल प्राप्त किया जा सकता है फिर इस तल के अनुप्रस्थ काट से आयाम युक्त रेखा प्राप्त होगी। यदि आगे पुनः उसे अनुप्रस्थ के रूप में काटा जाय, तो जिस बिन्दु की उपलब्धि होगी, वह सर्वदा आयाम रहित कण मात्र ही होगा। यह कण क्या है और यह कैसे प्राप्त हुआ? इस पर यदि गहराई से विचार किया जाय तो इस निष्कर्ष पर सरलता से पहुँचा जा सकता है कि तीन डायमेंशनो वाला पदार्थ किसी चार आयामों वाली वस्तु की अनुप्रस्थ काट है जब ऐसी किसी त्रिआयामी वस्तु की एक विशिष्ट तरीके से, विशिष्ट दिशा में भ्रमण शील किया जाए, तो वह एक चार आयामों वाला पदार्थ का निमार्ण करेगी। यहाँ पर प्रश्न उठता है कि किस प्रकार की वस्तु होगी, जिसकी अनुप्रस्थ काट में तीन डायमेंशन हो किन्तु उसे किसी विशिष्ट दिशा में चलाया जाए कि उससे चार प्रकार की भूमिकाओं का निर्माण हो? क्योंकि आगे-पीछे, ऊपर-नीचे, दाँये-बाँये -इस प्रकार की गतियाँ के केवल वृहद आकृति का सृजन करती है। किसी नये आयाम का नहीं। इसके उत्तर में वैज्ञानिक कहते है कि चूँकि समयावधि एक नवीन भूमिका है, अतः तीन आयामों वाले पदार्थ का चौथा आयाम इसे माना जा सकता है।दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक त्रिआयामी पदार्थ चार आयामों वाला होता है और ऐसी सभी वस्तुओं को विवेकसंगत परिभाषा यही हो सकती है कि उनके दृश्य तीन ही आयाम है-लम्बाई, चौड़ाई और गहराई, जबकि समयावधि का चतुर्थ आयाम अदृश्य स्तर का बना रहता है। तो क्या इस तरह की अवस्था और वस्तु संभव है? विशेषज्ञ इसका उत्तर हाँ में देते हुए कहते है कि यह शक्य तो है पर केवल परिकल्पना स्तर पर ही, क्योंकि वास्तव में बिन्दु रेखा और तत्व का यथार्थ अस्तित्व सदा उसी रूप में बना नहीं रहता। किसी लाइन के जब वह गत्यात्मक अवस्था में आ जाय तो लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई से संबंधित हो सकता है। जैसा कि किसी तल के गतिमान बनाने पर लम्बाई, चौड़ाई के साथ साथ उसकी मोटाई भी आ उपस्थित होती है।पर यह सवाल शेष रह जाता है कि ऐसे किसी द्रव की गति क्या हो कि वह चतुर्थ आयाम वाले तत्व को जन्म दे? वैज्ञानिकों का इस संदर्भ में विचार है कि जब किसी वर्गाकार तल की ऊंचे आयाम में चलाया जाता है, तो उससे धन की उत्पत्ति होती है॥ ऐसे ही यदि उक्त धन को समय के आयाम में गति दी जाए तो उस आकृति का जन्म होगा, वह एक चार डायमेंशन वाली संरचना होगी। यहाँ समय के आयाम की गति का तात्पर्य भलीभाँति समझा लेना आवश्यक है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि इसका अर्थ यह अनुभव दिशा की गति में है, न कि पार्श्व, उर्ध्व औरा अधोगतियों से। शंकालु हृदय में वहाँ यह संदेश पैदा हो सकता है कि कई ज्ञात गतियाँ है और अविज्ञात गतियों की संभावना विज्ञान जगत में प्रकट की जाती है। उदाहरण के लिए एक तो वह वेग हो सकता है, जो हर प्राणी और पदार्थ को पृथ्वी से मिलता है इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप से वेगरहित होने के बावजूद वेगवान कहा जाता है। यह प्रच्छन्न गति है। इस तरह यह मानने में हर्ज नहीं है कि त्रिआयामी दृश्य एक यथार्थ वस्तु की कल्पना रूप में गति रहित अनुप्रस्थ काट है।, जिसका चौथा आयाम अवधि, पृथ्वी की उस दैनिक गति से अविच्छिन्न रूप में संलग्न है जो हर पृथ्वी वासी पदार्थ और प्राणी को उक्त ग्रह से मिलती रहती है। इसके अतिरिक्त अन्य गतिविधियाँ है- पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण गति, सूर्य द्वारा किसी महासूर्य की परिक्रमा गति एवं अपनी आकाश गंगा द्वारा किसी अविज्ञान केन्द्र को प्रदक्षिणा गति। चूँकि प्रत्येक दृष्ट पदार्थ पर वह गतियाँ साथ साथ क्रियाशील है अतः यह कहा जा सकता है कि कि उन सभी को उक्त सारे आयाम उपलब्ध है। यह तो और है कि सामान्य स्थिति में उनकी अनुभूति नहीं हो पाती पर इतने से ही सत्य और तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है। इतना स्वीकार कर लेने के उपरान्त इस यथार्थ को मान लेने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। कि उपयुक्त गतियों और आयामों को समय के परिप्रेक्ष्य में जाना, समझा और अनुभव किया जा सकता है चूँकि समय संदर्भ के अतिरिक्त इनकी अनुभूति का और कोई उपाय नहीं। अस्तु इन सबको सरलता के लिए’समय ‘ का आयाम कहा जाता है। यहाँ यह जिज्ञासा हो जाती है कि अवधि यदि समय का एक पक्ष है, तो उसके दूसरे अन्य पहलू क्या होंगे? इस में इस संबंध में विषय के निष्णात विभिन्न प्रकार की संभावनाओं में से जिन संभव्यताओं के बारे में बताते है, वे है दृश्य-अदृश्य एवं परिवर्तन तथा पुनरावृत्ति की घटनाएँ।
वैज्ञानिकों का कहना है कि समय के अगणित पहलुओं में से मात्र अवधि ही ऐसा पक्ष है, जो मानवी इंद्रियों का ग्राहय है।जब किसी वस्तु के संबंध में यह कहा जाता है तो उसका अभिप्राय हुआ कि हमें अकस्मात अपने अस्तित्व का पता चला। ऐसे ही किसी के तिरोभाव से उसकी अस्तित्व हीनता को बोध होता है। किन्तु जनम -मरण की मध्यावस्था इन्द्रियगम्य नहीं है॥ इसे इंद्रियों द्वारा जाना नहीं जा सकता। तो मात्र समयावधि परिप्रेक्ष्य ही वह संभव है। इसी प्रकार परिवर्तन भी देखा नहीं जा सकता। जो दिखाई पड़ता है वह परिवर्तन का समुच्चय होता है। सूर्योदय, सूर्यास्त, ऋतुओं का गुजरना, पौधों और बच्चो का बढ़ना आदि ऐसी घटनाएँ है जिन्हें हम देख नहीं पाते किन्तु वे घटित होती ही है इसलिए हमें परिकाल्पनिक माना जाता है और ऐसा स्वीकार किया जाता है कि समय के किसी अन्य आयाम में इनका वास्तविक अस्तित्व है, वैसे ही जैसे किसी परिकाल्पनिक त्रिआयामी वस्तु की यथार्थता सत्ता अवधि के आयाम में होती है अर्थात् उसी डायमेंशन में वह इंद्रियग्राह्य बन जाती है। इस दृष्टि से समय और उसके आयामों की महत्ता काफी बढ़ जाती है।यदि किसी व्यक्ति की इन आयामों में गति हो तो उसके लिए यह संभव हो जाता है कि जो सामान्य स्थिति और परिस्थिति में सर्वसाधारण के लिए असंभव स्तर का बना रहता है। फिर उसके लिए काल की विभाजन भित्ति समाप्त हो जाती है और सब कुछ वर्तमान बन जाता है अर्थात् वह किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा स्थान संबंधित चाहे किसी काल खंड में अप्रतिहत प्रवेश कर उससे संबंधित जानकारी उसी उससे उतनी ही आसानी से अर्जित की जा सकती है, जैसे की कोई व्यैिक्त अपने सम्मुख अपनी चीज के बारे में सरलता पूर्वक ज्ञानार्जन कर लेता है। किंतु वह शक्य इसी अवस्था में है।, जब चेतना अत्यंत परिष्कृत स्तर की हो। अपरिष्कृत चेतना तो हमें भौतिक पदार्थों की भी सही सही जानकारी कदाचित नहीं दे पाती है। विज्ञान जगत में जो निर्णय निष्कर्ष निकाले जाते है, उनमें अगर मगर की संभावना बनी रहती है। ऐसे में यह कैसे संभव है कि कि समय के जिस विगत और अनागत वाले हिस्से को जानने का कोई प्रत्यक्ष आधार न हो, उसे मात्र बौद्धिक कवायद के द्वारा जाना जाय। इससे कम में तो चौराहों के बाजीगर ही सर्वज्ञ होने का दावा कर सकते है और भूत भविष्य बता सकते है।, दूसरे नहीं। यही अध्यात्म की भूमिका आरम्भ हो सकती है ऋत में जो स्थित हो उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहा गया है। यह वह उच्चस्तरीय आयाम है जहाँ मनुष्य चेतना जगत की गहराइयों में जाकर अनेकानेक मणिमुक्तक ढूंढ़कर ला सकता है। साधना विधान इसी जगत में प्रवेश की कुँजी हमें देता है। प्रज्ञा का जागरण होने, चेतना के महासागर में प्रवेश होने पर जो आत्मोपलब्धियाँ होती है, उनकी मात्र अनुभूतियाँ ही की जा सकती है। हम इसी स्तर पर पहुँचने का प्रयास तो करें।
एक गाँव में एक नास्तिक रहता था ओर एक महान आस्तिक भी। सारा गाँव उससे परेशान था, क्योंकि वह नास्तिक अपने तर्क प्रस्तुत करता कि ईश्वर नहीं है।, तो लोग कहते यह ठीक है लेकिन आस्तिक उसके तर्कों की धज्जियाँ उड़ाकर रख देता और ऐसे ऐसे तर्क, तथ्य, प्रमाण प्रस्तुत करता कि जिससे लगता कि कण कण में भगवान व्याप्त है। उनके बिना पत्ता भी नहीं हिलता। गांव के लोग कहते कि यह भी ठीक है। किसी एक निश्चय पर पहुँचने के लिए गाँव के लोगों ने दोनों में वाद विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया। वाद -विवाद, खंडन–मंडन रात भर चला।एक दूसरे ने बढ़–चढ़कर तर्क प्रस्तुत किये। परिणाम बड़ा चमत्कारी निकला। सुबह होते होते घोर नास्तिक आस्तिक हो चुका था। किन्तु गाँव वालों की परेशानी ज्यों की त्यों बनी रही। संसार में न जाने कब से ईश्वर के संबंध में परस्पर विरोधी बातें कही जाती रही है। लोग वाद विवाद शास्त्रार्थ के वितंडावाद में उलझे रहते है। किन्तु विवेकशील, बुद्धिमान ओर चतुर वे है, जो इस प्रकार के बहस विवादों में नहीं उलझते और सतत् रचनात्मक चिंतन और कार्यों में लगे रहते है।
कुछ समय पहले वृन्दावन एक परमसिद्ध महात्मा थे। नाम तो उनका था-महात्मा रामदास, परन्तु वे लकड़ी की लँगोटी धारण करते थे। इसी कारण काठिया बाबा के नाम से प्रसिद्ध थे।
काठिया बाबा ने अपनी सफलता का वर्णन इन शब्दों में किया-विद्या पाने के बाद मैं गुरु के पास से अपने घर वापस आया तब सर्वप्रथम मुझे गायत्री मंत्र सिद्ध करने की इच्छा हुई। हमारे बगीचे के पास एक वट का वृक्ष था। उसी के नीचे शापोद्धार कवच आदि विधि विधान के साथ गायत्री मंत्र का जप, अनुष्ठान आरम्भ किया। 75 हजार मंत्र जप करने के बाद आकाशवाणी हुई-बेटा! शेष जप ज्वालामुखी जाकर कर तुझे सिद्धि मिलेगी। आकाशवाणी के स्वाभाविक ही मुझ पर उल्लास उमड़ा। आनन्दित भाव से मैं ज्वालामुखी की ओर चला, साथ में मेरा समवय भतीजा था। हमारे यहाँ से ज्वालामुखी 35 -40 मील दूर थी। मार्ग में मुझे एक तेज पुँज महात्मा मिले। उनके प्रति मेरे मन में आकर्षण हुआ और मैंने उनसे वैराग्य की दीक्षा ली, दीक्षा लेने से मेरे भतीजे ने मना किया, मैंने उसकी नहीं मानी। तब वह लौटकर गाँव गया और पिता जी को ले आया। मुझे संन्यासी देखकर पिता जी दुखी हुए। वे मुझे पुनः संसारी बनने का आग्रह करने लगे। डराया भी, जब उनके सारे प्रयास विफल हो गये तब वे मुझे मेरे गुरु से कहकर गाँव ले गये। वहाँ वृक्ष के नीचे मैंने आसन लगाया और साधना शुरू की। रात्रि में आकाश मण्डल को भेदकर गायत्री देवी प्रकट हुई और बोली वत्स! मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ वर माँग। मैंने साष्टाँग प्रणाम कर कहा माँ! मैं तेरा वैराग्य ले चुका हूँ, अब कोई कामना नहीं। बस आप प्रसन्न रहे यही विनम्र प्रार्थना है ‘एवमस्तु ‘कहकर देवी अंतर्ध्यान हो गयी। गायत्री की सिद्धि प्राप्त कर लेने पर काठिया बाबा को कुछ पाना बाकी न रहा वे आप्तकाम हो गये, उन्हें दूर दृष्टि प्राप्त हो गयी थी। द्रव्य का अभाव उनके यहाँ कभी नहीं रहा। उनकी लकड़ी की लँगोटी को देख कर सभी लोग आश्चर्य में डूब जाते थे। सेवक लोग समझते थे कि बाबा जी ने सोने की मोहरें इकट्ठी की है, उन्हें छिपाने के लिए यह लकड़ी की लँगोटी बनवायी है।लोभ लालच में पड़कर उनके सेवकों ने उन्हें तीन बार दो -दो तोला जहर दिया, तब भी उन पर विशेष असर उस जहर का न हुआ। तब लोगों ने उनकी शक्ति का अनुभव किया। उनका आत्मतेज प्रचण्ड था, उनके सामने पहुँचने वाला अभिभूत हो जाता था।
श्रीमद्भागवत् गीता के दसवें अध्याय के छब्बीसवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने वृक्षों की महत्ता करा प्रतिपादन करते हुए उसे अपना ही स्वरूप निरूपित किया है और कहा है-”अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्” अर्थात् मैं सब वृक्षों में अश्वत्थ पीपल हूँ। गीता 15-1 में एक ही अश्वत्थ की चर्चा की गयी है। और विश्व ब्रह्माँड की को इसकी उपमा दी गयी है। यही कारण है कि प्राचीन काल में भारतीय मानस में पीपल या अश्वत्थ वृक्ष के प्रति अगाध श्रद्धा है। इसे देवताओं की तरह पूजा और सार्वजनिक देवालयों में रोपा जाता है। लोगों को ऐसा विश्वास है कि इसमें देवताओं का निवास है इसलिए इसे देवसदन भी कहा जाता है। अथर्ववेद 6/4/3/,19/39/6 में मंत्र- “ अश्वत्थो देवसदनः” के अनुसार भी पीपल वृक्ष देवों के रहने का स्थान है। गीतकार में जिस पीपल वृक्ष को ईश्वरीय विभूतियों से युक्त बनाया है, वह अपने देश के कोने कोने में पाया जाता है।समय बदलने पर मान्यताएँ भले ही बदली हो, किन्तु भारतीय संस्कृति में पीपल के प्रति आस्था ज्यों की त्यों बनी है। मौर्यकाल में प्रत्येक ग्राम और जनपद में देवस्थानों पर पीपल वृक्ष रोपकर उसके नीचे चबूतरा अथवा ‘थान ‘ अवश्य बनवाया जाता था और उसकी पूजा भी की जाती थी। वैसे ‘थान ‘ आज भी गाँव में पाये और पूजे जाते है। बौद्ध, जैन और वैष्णव परम्परा में पीपल पूजा लोक आस्था के रूप में प्रचलित है। प्रायः इन सभी के मूर्ति-शिल्पों में पीपल उपासना के उदाहरण मिलते हैं। आज भी इस वृक्ष के प्रति लोगों में इतनी आस्था है कि इसे काटना, जलाना धार्मिक अपराध माना जाता है। मात्र हवन के लिए समिधा के रूप में तथा पीपल को जलाने में सकी लकड़ी प्रयुक्त की जाती है। अश्वत्थ अर्थात् पीपल वृक्ष को ज्ञानवृक्ष और ब्रह्मवृक्ष कहा गया है। सूर्य प्रकाश में विशेष रूप से संश्लेषण करने के कारण इसे सौर वृक्ष भी कहते है। प्राचीन काल में आर्यजाति शत्रुओं के विनाश के लिए पीपल को अपना विशेष आराध्य मानकर पूजती थी। शास्त्रों एवं पुराणों में इस वृक्ष के देवस्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है-
“मूलतःब्रह्मरुपाय मध्यतो विष्णुरुपिणे। अग्रतः शिवरुपाय अश्वत्थाय नमोनमः।”
अन्यत्र भी इसी प्रकार का उल्लेख मिलता है। यथा-
मूलं ब्रह्म त्वचो विष्णुः शाखा शाखा महेश्वरःः। पत्राणि देवता सर्वा वृक्षराज नमोऽस्तुते।
तात्पर्य यह है कि वृक्षों में सर्वश्रेष्ठ और पवित्र है, इसलिए ऋषि -मनीषियों ने इसको पूजन योग्य समझा। आज भी जन विश्वास है कि इसकी पूजा करने से सर्वमनोरथ पूरे होते है और भूत बाधा तथा अन्य किसी प्रकार के अनिष्ट का भय नहीं रहता है और खोटे ग्रहों की शाँति होती है और सुख सौभाग्य प्राप्त होता है। हड़प्पा और सिंध सभ्यता में भी पीपल पूजा का विशेष महत्व रहा है। माँगलिक कार्यों में और राजकीय मुद्राओं पर भी पीपल वृक्ष के अंशों का अंकन मिलता है। सृष्टिप्रक्रिया में सहायक होने से इसकी विशेषताओं और औषधीय गुणों को आयुर्वेदशास्त्रों में विशेष रूप से उजागर किया गया है। भारत में पीपल को अनेक नामों से जाना जाता है। जैसे अश्वत्थ, पिप्पल, नागबंधु, गजाशन, बोधितरु, चैत्य वृक्ष, देवात्मा पीपल, पीपर, आदि। अंग्रेजी में इसे सैक्रेड फिग् ट्री कहते है। इसका वानस्पतिक नाम - इकस रिलिकजआँसा’ है। औषधीय गुणों कारण पीपल के वृक्ष को ‘कल्पवृक्ष ‘ की संज्ञा दी गयी है। इसके पंचाँग अर्थात् छाल, पत्ते, फल -बीज, दूध, जटा और कीपले तथा लाख प्रायः सभी प्रकार के रोगों तथा आधि व्याधियों के शमन के काम आते थे। वेदों में पीपल को अमृततुल्य माना गया है। सर्वाधिक आक्सीजन निस्सृत करने के कारण ही प्राणवायु का भण्डार कहा जाता है। आज के प्रदूषण युक्त वातावरण में इस वृक्ष की उपयोगिता और भी अधिक बढ़ जाती है। सर्वाधिक आक्सीजन का सृजन और विषैली गैसों का आत्मसात करने की इसमें अकृत क्षमता है। भू-रक्षण, भू-स्खलन तथा भूमि कटाव को रोकने के लिए यह पेड़ बहुत सहायक है। यदि वृक्षारोपण में इसके महत्व को समझा जाय और अधिकाधिक संख्या में लगाने को प्राथमिकता दी जा सके, तो औषधि की कमी व पर्यावरण संरक्षण दोनों की सहज ही पूर्ति हो सकती है।
सुकरात मरने लगे तो किसी ने पूछा कि आप घबरा तो नहीं रहे?सुकरात ने कहा घबराना काहे का। जैसा आस्तिक कहते है कि आत्मा है, तो घबराने की कोई जरूरत ही नहीं और यदि नास्तिक ठीक है कि आत्मा मर जाती है पर जन्मती ही नहीं, तो फिर झंझट मिटी। फिर घबराने वाला ही न रहेगा। इसलिए मेरे तो दोनों हाथों में लड्डू हैं। मैं निश्चिन्त हूँ। मुझे भरोसा है। घबराते वे है जिसे किसी की बात पर न भरोसा हो, न विश्वास , उन्हीं की नैया डगमगाती है।
था तो वह शहरी व्यक्ति दिल्ली का निवासी किन्तु शहर के भोगभरे वातावरण से वह हमेशा दूर रहता था। आजीविका से वह दर्जी था। अपनी कला में जबरदस्त महारत हासिल थी।उसके हाथ की उंगलियों में भारी चमत्कार था। परन्तु उसे भगवान मेँ लगन थी। संसार के मध्य वह जी रहा था, रोजगार भी करता था किन्तु उसके हृदय में भक्ति की लौ जली रहती थी। वह उसी में मग्न रहता था। प्रभु भक्ति की झटपटाहट कई बार इतनी तीव्र हो जाती कि उसके हाथों का सुई-डोरा जैसा का तैसा रह जाता और वह कार्य करने में विवश हो जाता। हरि के ध्यान में वह ऐसा डूब जाता कि उसे अपने देह तक की सुध नहीं रहती। वह परम आनन्द की समाधि में खो जाता था। इस परमेष्ठी दर्जी को एक बार दिल्ली के बादशाह का बुलावा आया। प्रख्यात दर्जी के रूप में गिनती थी। उसकी प्रशंसा राज दरबार तक पहुँच चुकी थी। बादशाह का बुलावा आना कोई आश्चर्य की बात न थी। बादशाह ने उससे कहा-”दर्जी देखो इस कीमती कपड़े को, इस इत्र में महकती रुई को। इन सब को ले जाओ और हमारे लिए दो सुन्दर तकिये बना लाओ।” “जैसी आज्ञा।” परमेष्ठी ने शाही आदेश सुन लिया और सारा सामान बटोर कर रखने लगा। “तुम्हारी कारीगरी में कोई कच्चाई नहीं रहनी चाहिए। तुम जो पारिश्रमिक माँगोगे मिलेगा।” बादशाह ने पुनः प्रोत्साहित करते हुए सावधान किया। जब लोगों ने यह बात जानी तो परमेष्ठी बादशाह के कीमती कपड़े बना रहा है, तो तो लोग उसकी कुशल कला को देखने के लिए उसके घर आने लगे। कुछ ने तो सलाह भी दे डाली-”भगत! काम खूब ध्यान से करना। बादशाह दिल से बहुत उदार है। प्रसन्न हुआ तो तुम्हें जीवन भर के लिए निहाल कर देगा।” परमेष्ठी भगत सबकी कही बातें सुन रहा था, पर भगवान जैसा सुझाते उसका हाथ वैसा चल रहा था। फल की आशा वह नहीं करता था। उसके होठों पर हरि का नाम रहता था। कर्मरत रहने में ही जिसकी भावना है, वह परमेष्ठी लोगों का बिना मतलब उपदेश सुनकर थोड़ा क्षुब्ध हो उठता था। इतने दिनों में वह तकिया बना चुका था। उसे देख कर लोग उसकी क्लास की प्रशंसा करते हुए कहते थे-वाह भगत वाह। तुम्हारे हाथों में कितनी सुन्दर कला है,धन्य हो तुम। थोड़े दिनों में दूसरा तकिया भी बन गया। दोनों तकिया सामने रखे थे, उनकी शोभा का अवलोकन कर, उसकी कला को देख स्वयँ सर्जनकार मुग्ध हो रहा था। आंखों को चौंधिया देने वाला प्रकाश तकिये में सिले जवाहरातों में फैल रहा था। सुगंधित रुई की सुवास से सारा कमरा महक रहा था। सुन्दर दृश्य और मीठी सुवास मानव को अपने प्रियजनों का स्मरण करा देती है। प्रियजनों की आकाँक्षा जगाती है। कलाकार तो हरिभक्त था, उसे हरि के सिवा दूसरा कौन प्रिय हो सकता था। तकिये की शोभा और मीठे सुवास के के कारण उसके शरीर पर को ई अनजाना प्रभाव होने लगा और कुछ ही पलों में वह भावविभोर हो कर प्रभु के ध्यान में डूब गया। “सुनो! काम पूरा हो गया तो तकिया बादशाह को पहुँचा दो।” पत्नी विमला ने भक्त को स्मरण कराया परन्तु किसने सुना? हरिचरण में जिसका चित्त रमा हो, उसे जगत व्यवहार की बातें कम ही सुनाई में देती है।”यह कीमती वस्तु अधिक दिन तक रहे ठीक नहीं है। उसे बादशाह को दे आओ। “ पत्नी ने सच्ची बात कही थी। परन्तु पति ने कोई उत्तर नहीं दिया था। पत्नी पति को बराबर समझाती रही, इसमें कुछ दिन यों ही बीत गये। उस दिन प्रभू की लीला का स्मरण करते हुए उसका चित्त सीधे जगन्नाथ पुरी पहुँच चुका था। रथयात्रा का दिन था। श्रीजगन्नाथ जी रथ में विराजमान होकर पुरी में भ्रमण कर रहे थे और प्रभु के दर्शनों के लिए भक्तगण टूटे पड़े रहे थे। भिन्न- भिन्न
देशों के, भिन्न- भिन्न जाति के, भिन्न भाषा के बोलने वाले यात्री उस दिन वहाँ एकत्रित हुए थे। परम कृपालु परमात्मा के दर्शन के लिए भक्ति रस में डूबे लाखों लोगों का समुदाय जमा हुआ था। दिल्ली में बैठ परमेष्ठी दैवी कृपा से इस दृश्य को अपनी आंखों से देख रहा था। उसके हर्ष पर पार नहीं था। भगवान की मंगलमूर्ति उसके समक्ष मुस्कुरा रही थी। परमेष्ठी उसे देख देखकर कृतार्थ हो रहा था। इस समय प्रभु के लिए बिछाया गया वस्त्र किसी कारण से थोड़ा फटा था। सेवकजन नया बिछावन लाने के लिए दौड़ रहे थे। परमेष्ठी के अंतर में प्रेरणा हुई, उसने पास में पड़े तकिये को उठाकर भावभीने स्वर में कहा-प्रभु इसे स्वीकार करें। परमेष्ठी ने तकिया फेंका और कृपानिधि प्रभु ने तकिया स्वीकार कर लिया। परमेष्ठी के हर्ष का पार नहीं रहा। वह उन्मत्त बन नाचने लगा।आखिर उसका दिया हुआ तकिया प्रभु ने स्वीकार कर लिया था। संतोष और तृप्ति का आवेश उसके ऊपर मँडरा रहा था। प्रभु कार विराजित रथ तो आगे बढ़ता गया और मानवनेदनी भी उस रथ के पीछे परमेष्ठी की दृष्टि से ओझल हो गयी।आवेग उतर गया और भक्त परमेष्ठी जब सुध में आया, तब वह स्तब्ध रह गया। वह अपने घर में ही था। महाप्रभु जगन्नाथ की मूर्ति, वह रथ यात्रा, वह मानववृंद,इन सके के बीच मानो वह एक स्वप्न था। परन्तु आश्चर्य की सीमा तो यह थी कि आंखों के सामने एक ही तकिया रखा था, तब दूसरा कहाँ गया?उसने उसे पूरे घर के कोने में तलाश किया, परन्तु वह एक ही था। उसका हृदय भक्त का हृदय था। उस भक्त हृदय में गहरी श्रद्धा थीं वह श्रद्धा मकान की दीवारों के बीच पुकार उठी परमेष्ठी। उस तकिये को तो प्रभु श्री हरि ने स्वयँ स्वीकार कर लिया है-यह तेरा अहोभाग्य है। लेकिन मानवी हृदय उसे भीतर ही भीतर डंक भी दे रहा था। यह तकिया तो बादशाह का था, तेरी मिलकियत की वस्तु नहीं थी। तेरी इच्छानुसार उसे दूसरे को देने का तुझे क्या अधिकार था? इतने में किसी ने बाहर से चिल्लाकर पुकार कर पूछा-”हे भाई दर्जी! तकिये तैयार हुए?बादशाह तकिया माँगा रहे है।” “हाँ हाँ! तैयार है, आओ “ और एक तकिया को साथ लेकर परमेष्ठी सिपाही के साथ दरबार में जा पहुँचा। “बादशाह सलामत के हुजूर में पेश किया है। बादशाह तकिये की कारीगरी देखकर बहुत खुश हुआ, बोला-”वाह दर्जी वाह! तुम्हारा कमाल।” अगले ही क्षण बादशाह ने परमेष्ठी की ओर देखते हुए पूछा-” मैंने दो तकिये बनाने को तुमसे कहा था। दूसरा तकिया कहाँ है।” परमेष्ठी नीचे की ओर झुककर नम्रता से बोला-” हुजूर दूसरा तकिया मैंने बनाया था, परन्तु एक तकिये को तो स्वयँ भगवान को नीलांचलनाथ जी ने स्वीकार कर लिया।” “कौन नीलाँचलनाथ?” बादशाह को तैश आ गया। “ नीलाँचलनाथ श्री जगन्नाथ! मेरे प्रभु जन जन के प्रभु।” बादशाह सुनकर अट्ठहास करने लगा दर्जी। तुम्हारा दिमाग तो सही सलामत है न?” ‘जी में सच सच बतला रहा हूँ।’ “ तूने उस तकिये को जगन्नाथ जी को अर्पित कर दिया और उसने उस तकिये को स्वीकार कर लिया?” बादशाह ने गम्भीर होकर पूछा-”जी हुजूर।”
“दिल्ली में रहकर तूने उस तकिये को अर्पित किया और सीधे पुरी में बसे भगवान जगन्नाथ ने उसे स्वीकार कर लिया? “
“जी हाँ! भगवान नीलाँचलनाथ तो अखिल विश्व के नाथ है। सर्वशक्ति मान है। आप इसे असंभव क्यों समझ रहे है।” भक्त ने स्पष्टता की। बादशाह के दिमाग का पारा लगातार ऊपर चढ़ता था।”ऐ दर्जी तू हमें बेवकूफ मत समझ। पागलों सरीखी बातें बन्द कर और दूसरा तकिया लाकर दें।” “ जो घटना घटी थी उसे मैंने आप से निवेदन कर दिया।” परमेष्ठी ने हाथ जोड़कर निवेदन किया।” दूसरा तकिया मेरे पास नहीं है, मैं आपके सामने हाजिर हूँ, जो सजा देंगे भोगूँगा।
परमेष्ठी की बात बादशाह को कपोल कल्पित लगी। वह गरज उठा।” इस दर्जी को जेल में डाल दो। खाना पीना नहीं देना।वह कालकोठरी में भूखा सड़े मरे।” भगवान के अतिरिक्त रक्षकों ने परमेष्ठी को पकड़कर दरोगा को सौंपा और दरोगा ने उसे जेल की अंधियारी कोठरी में बन्द कर दिया। जिस भक्त प्राणी का मन प्रभु के चरणों में रमा हुआ है। उसे जेल अथवा महल के सुख दुख की परवाह नहीं होती॥ भक्त उस धरती पर कही भी रहे, चाहे वह नदी तट पर रम्यस्थल हो अथवा श्मशान की भयानक भूमि, आम का व नहीं अथवा बालू की धधकती रेत। वह तो कही भी आसन लगाकर प्रभू का स्मरण कर सकता है। परमेष्ठी को काल कोठरी मिली, उसे ही उसने प्रभु का मंदिर माना और आसन लगाकर ही हरि का कीर्तन करने लगा-”शरण एक प्रभु तारो रे, शरण एक प्रभु तारो रें।” जेल के चौकीदार तो कुछ देर तक ही इस दर्जी की भक्ति पर हँसे, परन्तु उनका हँसना देर तक चला नहीं। उन्होंने दुख से डर कतार बनते उसे नहीं देखा था। प्रत्येक संयोग को वह अपने प्रभु की लीला मान रहा था। वहाँ काल कोठरी में भी वह भजन कर रहा था, वहाँ न भोजन था न पानी। प्रकाश की एक क्षीणरेखा तक नहीं थी। वहाँ कब दिन होता था कब रात वहाँ उसे पता तक नहीं चलता था।भक्त को इसकी आवश्यकता भी न थी। वह तो सब कुछ उस प्रभु की लीला मानकर संतुष्ट था, लेकिन जो सुख -दुख,यश-अपयश जीवन मृत्यु की चिंता छोड़कर केवल भगवान को ही याद करता है, परमकारुणिक प्रभु भला उसे कैसे भूले।
सकते है, कोई दुख परमेष्ठी दर्जी को दुखी नहीं कर पाया, परन्तु उसका दुख स्वयँ भगवान को दुखी करने लगा। जब वह दुख स्वयँ भगवान से सहन नहीं हुआ तो वे अपने रूप में उसे मिटाने चले आए। उस समय दिल्ली का बादशाह सोये सोये अनुभव करने लगा कि वह भयंकर दुःख भोग रहा है। ऐसी भयानक यातनायें चारों तरफ से उस पर प्रहार कर रही है। इन प्रहार से बचने के लिए वह चीखने चिल्लाने लगा। इसी चीख पुकार से वह जाग गया।जागने पर शरीर का प्रत्येक अंग काँप रहा था। वह जोर जोर से हाँफ रहा था। बादशाह की चिल्लाहट सुनकर बेगम भी जाग गई, नौकर दौड़ आए। रक्षकगण शस्त्र लिए वहाँ आ पहुँचे। सब पूछने लगे क्या हुआ?क्या बात है? बादशाह तब भी काँप रहा था। तभी उसे एक प्रहरी ने सूचित किया।”बादशाह सलामत। कल से कालकोठरी कैदी दर्जी का दरवाजा खुला है। ताला टूटा पड़ा है। कैदा के हाथ की हथकड़ी और पाँव की बेड़ी भी टूटी पड़ी है।” “ और कैदी कहाँ है?” “कैदी तो कभी हँसता है और कभी रोता है, वही ध्यानमग्न बैठा है।” बादशाह आश्चर्य पूर्वक सारी बातें ध्यानपूर्वक सुनता रहा। अन्य उपस्थित लोग एक दूसरे का मुँह ताक रहे थे। आश्चर्य करा स्वयँ जायजा लेने के लिए बादशाह स्वयँ जेलखाने की ओर चल पड़ा। थोड़ा ही आगे बढ़ने पर उसे अपनी चोटी का दर्द में कमी का अहसास हुआ।जैसे जैसे वह काल कोठरी की ओर बढ़ता जाता, उसकी पीड़ा कम होती जाती। अब तो जैसे वह सारी हकीकत समझ गया और शीघ्रता से उस भक्त दर्जी के चरणों में लोट गया। उसने कहा- ” ऐ अल्लाह के बन्दे! मुझे माफ कर दे, मुझे माफ कर दें।” भक्त तो उस समय अपने आराध्य श्रीहरि के मंगलमय रूप का साक्षात दर्शन कर रहा था।वह अमृत का घूँट पी रहा था। “भक्तराज आंखें खोलो।” प्रभु का स्पर्श पा जाने के बाद तो परमेष्ठी के शरीर में अजीब क्राँति चमक रही थी। बादशाह और साथ आये दरबारी जन भक्त के शरीर पर फूटती किरण से इस परिवर्तन को देख रहे थे।बड़ी मुश्किल से भक्त ने आंखें खोली। उसने चारों ओर देखा दिल्लीश्वर उसके चारणों में लोट रहा था। भक्त परमेष्ठी यह देख कर एकाएक घबराकर खड़ा हो गया। सहसा बीते कल का वाक्य उसके होठों से फिसलकर बाहर निकल पड़ा-”बादशाह सलामत! मैं सच कह रहा हूँ। एक तकिया मैंने श्री जगन्नाथ प्रभु को भेंट किया था।”
मैं कबूल करता हूँ।” बादशाह ने दोनों कान पकड़ा और बोला-”औलिया पुरुष! तुम्हारी बात सच है पर अब मुझे माफी दो।” “माफी!” भक्त परमेष्ठी आश्चर्य चकित होकर दो पग पीछे हट गया। “ आपका कोई दोष नहीं है।भूल तारे मेरी ही थीं आपकी ही वस्तु मैंने प्रभु को अर्पित कर दी।”
“अरे संतपुरुष। मैं तो आपके दर्शन पाकर धन्य हुआ। इसी तरह भक्त परमेष्ठी दर्जी की सजा से मुक्त हो कर घर लौटा, परन्तु स्वागत जयनाद से वह तंग हो गया। उसकी प्रभू भक्ति में खलल महसूस होने लगी। उसने दिल्ली छोड़ देने का निश्चय किया। राजा द्वारा सम्मान और लोगों द्वारा वाह वाही ये सब लचकती सीढ़ियाँ है,भक्त ठीक प्रकार से इस सीढ़ी पर स्थित नहीं रह सकता है ओर अपना ध्येय बनाये रखे, इसके लिए उसे एकान्त स्थान चाहिए॥ प्रभु भक्ति में कोई अंतराल न आने पाये, इसके लिए भक्त दिल्ली छोड़कर दूसरी जगह जाकर बस गया। उसे वहाँ कोई उसे अपने जानने वाला नहीं था और इस प्रकार के एकान्त स्थल में उसने प्रभु स्मरण करते हुए जीवनपर्यंत भक्ति की ज्योति जलाये रखी।
मुर्गा बाँग देता है और सूरज उगता है। एक व्यक्ति को विश्वास हो गया कि सूरज उगता है तो मुर्गे की बाँग से। एक दिन उस आदमी का झगड़ा हो गया गाँव वालों से।उसने कहा याद रखना यदि मैं अपने मुर्गे को लेकर गाँव से चला जाऊँगा तो सूरज न उगेगा तुम्हारे गाँव में।बैठे रहना अंधेरे में। वह मुर्गा लेकर दूसरे गाँव चला गया।दूसरे दिन तड़के मुर्गे ने बाँग दी और सूरज निकला इस गाँव में। उस आदमी ने कहा अब पीटते होंगे सिर उस गाँव के लोग।मुझसे बिगड़कर व्यर्थ ही अंधकार की मुसीबत मोल ले ली। उसे भ्रम था कि जहाँ मुर्गा बाँग देता है वही सूरज निकलता है। अच्छे अच्छों को भ्रम हो जाता है कि उनके बिना काम नहीं चल सकता।भगवान की लीला बड़ी विलक्षण है।
एक गरीब-सा दिखने वाला व्यक्ति सराय में ठहरा। मैले कुचैले वस्त्र देखकर सराय के व्यवस्थापक ने कोने में एक कमरा दे दिया। नौकरों ने भी उससे बिछावन के बारे में बातें पूछी न गरम पानी, न साबुन जैसा कि अन्यों के लिए प्रबंध करते थे वैसा कुछ नहीं किया- यह सोचकर कि उससे क्या मिलने वाला है। प्रातः जब वह चलने लगा तो उसने नौकरों को उपहार स्वरूप दस-दस मुद्राएँ भेंट की। यह देखकर बेचारे अवाक् रह गये। उतना तो अमीर आगन्तुक भी सेवा सुश्रूषा करने पर नहीं करते।वह आदमी तो सबको मात कर गया, बिना सेवा के वह इतना दे गया। उस रात वे सो नहीं सके। बार बार यही याद आता रहा-बड़ी भूल हो गयी। यदि उसकी सेवा अमीर आगंतुकों की भाँति की गयी होती तो पता नहीं वह क्या और कुछ देता। महीने भर बाद वही गरीब उस सराय में ठहरा। अबकी बार प्रारम्भ से ही उसका स्वागत किया गया। नहाने- धोने, खाने -पीने, की व्यवस्थित व्यवस्था की गई।प्रातः जाते समय सब इसी आशा में थे कि आज बड़ी पुरस्कार राशि मिलने वाली है। किन्तु उसने जेब में हाथ डाला और सबके हाथ में एक-एक पैसा रखता गया। अबकी बार सबको बड़ी हैरानी हुई, यह जरूर कोई सनकी है। लोगों ने पूछा जब आपकी उपेक्षा की गयी तब आप ने बड़ी राशि पुरस्कार में दी, अब सेवा करने पर एक पैसा। वह बोला- मैं कोई पागल हूँ, जो ऐसी भूल करूंगा। यह एक पैसा पहले ठहरने का पुरस्कार है और जो पहले दी थी उसे अब की मानकर चले। नौकर आज रात को भी नहीं सो सके, क्योंकि व्यक्ति उपेक्षाएँ, आशाएँ बाँध कर जीता है। कुछ न करने पर यदि बड़ा पुरस्कार मिल जाय, तो खुशी के कारण नींद गायब और यदि उचित करने पर उचित पुरस्कार न मिले तो दुख से नींद गायब।
मातृत्व सृजंता की सजल संवेदना का परिचय दिया है। उनमें केवल कोमलता ही नहीं, बलिइन की दृढ़ता भी है। अपने इन्हीं गुणों के कारण माताएँ परिवार तथा समाज की धुरी बनी रही है। भारत की देव संस्कृति में भी माता सदा से ही पूजनीय-वंदनीय रही है। समाज में उसे प्रतिष्ठित एवं सम्मानीय दृष्टिकोण से देखे जाने की परम्परा है। संतानोत्पत्ति उसकी सबसे गरिमामयी विशेषता है। वह प्रकृति की सबसे अनोखी और अद्भुत कृति है। वेदव्यास ने महाभारत में शाँतिपर्व में माता की महत्ता का कुछ इस तरह वर्णन किया है-
नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः। नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रिय।रारानारान
अर्थात् माता के तुल्य कोई छाया नहीं है। माता के समान कोई सहारा नहीं हैं। माता के सदृश्य कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय नहीं है।”
स्वामी विवेकानन्द की अनन्य शिष्या भगिनी निवेदिता ने 22 अक्टूबर 1900 ने लन्दन में अपने एक भाषण में माता के प्रति उद्बोधन करते हुए कहा था-माता शब्द एक अनन्ततट है, जिसके बन्दरगाह पर सभी आत्माओं को आश्रय मिलता है। भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के अमर सेनानी सुभाषचन्द्र बोस ने इस लिए कहा था कि मनुष्य अपने जीवन में एक स्थान ऐसा चाहता है, जहां तर्क विचार और विवेचना न रहे, रहे केवल श्रद्धा।” संभवतः इसी कारण माँ का सृजन हुआ होगा। स्वामी रामतीर्थ ने भी माता को वरेण्य मानते हुए स्वीकारा है कि माताएँ ही संसार को उठा सकती है। माताएँ ही देश को उठा और गिरा सकती है॥ माताएँ ही प्रकृति में ज्वार में उतार व चढ़ाव ला सकती है। महामानव सदा ही श्रेष्ठ माताओं की संतान हुआ है। मैक्सिमगोर्की के अनुसार माताएँ ही भविष्य के विषय में सार्थक विचार कर सकती है, क्योंकि वे अपनी संतानों के भविष्य को जन्म देती है।
माता शब्द को अमृतत्व का द्योतक है। यशवंत दिनकर पेढ़रकर ने माता की स्तुति करते हुए वर्णन किया है-हे माँ! तुममें ही कामधेनु की सामर्थ्य है। तुम मंगलमय हो तपस्वियों का अद्वैत हो। तुममें सागर की गम्भीरता और पृथ्वी की उदारता है। तुम्हारे नेत्रों में शान्त चन्द्रमा का तेज है और हृदय में मेघमालाओं का वात्सल्य है। हे माँ! इन समस्त गुणों का वास तुममें है। महान उपन्यासकार प्रेमचन्द्र ने अपने उपन्यास गोदान में लिखा है कि माता के प्रति ऐसी अभिव्यक्ति दी है -’जो नारी केवल माता ही नहीं है और उसके उपरान्त वह जो कुछ भी है वह सब मातृत्व का उपक्रम मात्र है। मातृत्व संसार की सबसे बड़ी साधना, सबसे बड़ी तपस्या, सबसे बड़ा त्याग और सबसे महान विजय है। प्रेमचन्द्र ने आगे उल्लेख किया है -एक शब्द में मैं उसे लय कहूँगा, जीवन का व्यक्तित्व का और नारीत्व का। रामकुमार वर्मा के अनुसार, माता के हृदय से बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है। जननी की शक्ति संसार में सबसे महान हैं। डॉ. लक्ष्मीनारायण मिश्र ने माता शब्द में निहित भावों को इस तरह अपने शब्दों में पिरोया है-नारी शक्ति से ही पुरुष को विजयी मिलती है और फिर जहाँ माता की प्रेरणा काम करें, वहाँ असाध्य और असंभव कुछ नहीं है। माता की इन्हीं विभूतियों एवं विशेषताओं के कारण उसकी कोख से समाज का
उदय हुआ और बाद में मानव समाज का क्रमशः प्रगति आघ्र विस्तार बढ़ता गया। युगों के अंतराल के बाद कृषि युग का प्रादुर्भाव हुआ। इस युग में काम का बँटवारा हुआ। स्त्रियाँ पहले कई क्षेत्रों में आगे रहती थी। खेती की वजह से उन्हें अनाज भण्डारण, सुरक्षा, पशुपालन आदि का उत्तरदायित्व है घर के बाहर कृषि का सारा काम पुरुषों ने सम्भाला।
में प्रतिदिन में अपने घर का कार्य करता है एवं रात्रि के समय ससुराल में निवास करता है। कई साल बाद पति-पत्नी का संबंध सामान्य रहने पर इनको अलग घर बसाने का अधिकार होता है।
इन जातियों में सभी पुरुष दामाद के रूप में घर से विदा हो जाते हैं। परिवार के सबसे छोटी बेटी परिवार के धार्मिक अनुष्ठानों को पूरा करती है। अपनी माता का अंतिम संस्कार भी वही करती है। पी.आर.टी. गर्टन के अनुसार, छोटी बेटी के अधिकार में खानदानी जेवरात और घर का बड़ा हिस्सा आता है। वही संपूर्ण सम्पत्ति की संरक्षिका होती हैं। हालाँकि वह इसे अपनी बहिनों की अनुमति के बिना बेच नहीं सकती हैं किसी अन्य विपरीत परिस्थिति में सारा प्रभाग बड़ी बहिन को मिल जाता है। तत्पश्चात यह उसकी छोटी बेटी को हस्ताँतरित होता है। छोटी बहिन की मृत्यु हो जाने पर इस संपत्ति को दूसरी छोटी बहिन को हस्तांतरित कर दिया जाता है। छोटी बहिन की अपनी बेटी न होने की स्थिति में भी उससे बड़ी बहिन का इसका अधिकार मिलता है।
बड़ी बहन को इसे न सौंपने का कारण है- उसकी शादी का जल्दी हो जाना जिससे मातृसत्तात्मक व्यवस्था में व्यतिक्रम आ जाता है वहाँ पति का न तो बँटवारा होता है और न किसी का एकाधिकार। महिलाएं इसका संचालन और नियमन करती हैं। इस जाति की महिलाओं में अच्छी व्यवस्था-बुद्धि होती है। ये पुरुषों का सम्मान करती हैं। समाज एवं परिवार में महिलाओं का वर्चस्व होने के बावजूद पुरुषों को उनके अनुरूप कार्य का उत्तरदायित्व सौंपा जाता हैं। इन महिलाओं के लिए पति अनन्य सहयोगी होता है।
गारो जनजातियों में भी मातृत्व आधार पर ही वंश परंपराएं चलती हैं इनमें संपत्ति की वारिस पूरी तरह से महिलाएँ ही होती है इसका हस्ताँतरण महिलाओं को ही किया जाता है। पुरुष केवल संरक्षक होता है। माता-पिता अपनी किसी एक लड़की का वारिस के रूप में चुनाव करते है। सामान्यतया बड़ी लड़की के अलावा किसी अन्य लड़की को यह जिम्मेदारी सौंपी जाती हैं लड़की के अभाव में किसी अन्य बहिन या बहिन की रिश्तेदारों में से उनकी लड़की को ही गोद लिया जाता है। लड़कों को गोद लेने की प्रथा नहीं हैं पति मर्यादा के अनुकूल अपनी पत्नी की संपत्ति का उपयोग करता हैं पति को पत्नी के मामले में सीमित अधिकार प्राप्त होते हैं, जबकि पत्नी को असीमित अधिकार मिलते हैं इन परिस्थितियों में भी यहाँ की पारिवारिक स्थिति सुदृढ़ एवं सामाजिक सौहार्द्रता की भावना प्रबल होती हैं।
मंगलूर में मातृ समाज अभी भी सुखी एवं समृद्ध माना जाता हैं इनकी प्राचीन कथाओं के अनुसार राजा अनालपाण्डी को उनकी बहिनों से अपरिमित सहयोग प्राप्त हुआ था। इसी कारा राजा ने समाज व परिवार के समस्त दायित्व अपनी बहिनों को सौंप दिए थे। मान्यता है कि तभी से परिवार में बहिनों को ये अधिकार मिले हुए है। इनमें विवाहोपराँत लड़का अपनी ससुराल में बस जाता हैं समाज में बच्चों की पहचान व नाम उनकी माता के अनुसार अनुरूप होते हैं। अतः वंश-परंपरा माता के नाम से चलती है।
केरल के नायर परिवार में भी लगभग इसी तरह के नियम एवं मानदंड हैं। नायर परिवार’तारपाड़’ के नाम से जाना जाता हैं इसमें लड़की के बेटे -बेटी ही रहती हैं। लड़कों की संतानें इसमें शामिल नहीं होतीं। संपत्ति अविभाजित रहती हैं इसमें स्त्री-पुरुष सभी का समान अधिकार होता है। संपत्ति का संरक्षक स्त्री का भाई होता है। इसे कार्यवान के नाम से जाना जाता हैं जब जब तारपाड़ को छोटे परिवारों में विभक्त कर दिया जाता है, तो वह परिवार तखाजी कहलाता हैं इसमें केवल महिलाओं के ही वंशज होते हैं।
के.एम. कपाडिया के अनुसार, केरल के कई भागों में आज भी कई समाजों में महिलाओं का वर्चस्व कायम हैं मालाबार के ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी पति,पत्नी के घर जाकर रहता हैं इनके पितृप्रधान समाज में बच्चों का नाम उनकी माता के नाम से जाना जाता हैं
विदेशों में भी कई स्थानों में मातृसत्तात्मक समाज का प्रचलन देखा जाता है। दक्षिण कोरोलिना में एवं मेरीलैंड में महिलाओं को विशेषाधिकार प्राप्त हैं वहाँ प्रायः सभी क्षेत्रों में महिलाओं का वर्चस्व है। इन स्थानों में तलाक निषिद्ध हैं जॉर्ज ए. बर्टन ने ‘एस्केच ऑफ सेमेटिक आँरिजन्स, सोशियल एण्ड रिलीजन्स में मातृसत्तात्मक समाज का विशेष रूप से उल्लेख मिलता हैं सेमेटिक जातियों में एक पत्नी प्रथा प्रचलित है। इनके समाज में नारी का स्थान रिमा र्पू होता हैं इतिहास प्रसिद्ध रानी वरमाजा लुगाण्डा के राजा की एकमात्र पत्नी थी। इसी कारा यहाँ का समाज नारी के इर्द-गिर्द घरूमता हैं महिलाएँ महत्वपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम एवं अधिकृत होती हैं हिब्रू जातियों में महिलाओं को व्यापक और विस्तृत अधिकार प्राप्त हुआ हैं जे.सी. हटन ने ‘ अबीसीनिया एण्ड इट्स पीपुल’ में नारी प्रभुत्व समाज का विवरण दिया हैं समाज के सभी धार्मिक, सामाजिक व अन्यान्य कार्यों में इनका योगदान महत्वपूर्ण होता हैं।
पुरुष प्रधान समाज प्रायः बड़ा ही आक्रामक एवं कठोर होता हैं इसकी इन्हीं जटिलताओं ने समाज में बिखराव व टकराहट की स्थिति उत्पन्न की है। इसके बदले मातृसत्तात्मक समाज भावना प्रधान होता हैं इसका परिवेश अधिक कोमल, सौहार्दपूर्ण व नियंत्रित होता है। इनमें पराक्रम होता हैं, तो सेवा की कोमल भावना भी माता की संप्रभुता होने के कारण सामाजिक आधार सुदृढ़ एवं भावपूर्ण होता हैं कल आने वाली इक्कीसवीं सदी नारी को उसका यही गौरव एवं वर्चस्व वापस कर दे तो किसी को हैरत में नहीं पड़ना चाहिए।
ध्यान न एक कसरत है, न मानसिक व्यायाम। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।, जो चित्तवृत्तियों का परिष्कार करते ही सहज ही होने लगती हैं ‘ योगा’ शब्द से जुड़ जाने के कारण एवं उसके बहिरंग पक्ष की ही अधिक चर्चा होती रहने की वजह से ‘ध्यान’ को भी एक एक्सरसाइज बना दिया गया, जिसने बड़ी भ्रांतियां फैलायी हैं ध्यान का अर्थ है-व्यष्टि का समष्टि से समन्वय स्थापित करने हेतु संपादित एक योगाभ्यास। विचारों की सृजनात्मक शक्ति का आश्रय ले, उन्हें बार-बार आमंत्रित कर अपने व्यक्तित्व को उनका स्नान कराके बार-बार उसे सुदृढ़ बनाने का प्रयास ही ध्यान का लक्ष्य होना चाहिए।
ध्यान एक ऐसी विद्या है, जिसकी आवश्यकता हमें दैनंदिन जीवन में पड़ती है, लौकिक भी, आध्यात्मिक क्षेत्र में भी। इसे जितना सशक्त बनाया जा सके उतना ही यह उपयोगी सिद्ध होता है। जिस उद्देश्य के लिए मनुष्य को यह जीवन मिला था- उसे सिद्धि के चरमलक्ष्य तक, पूर्णता तक पहुँचाने के लिए ही ध्यान जरूरी हैं जीवन का लक्ष्य पूर्णता-ईश्वरीय स्तर की ही हो सकती है। भगवान का स्वरूप, गुण- कर्म, स्वभाव कैसा है- हम इसके जैसे बनें, इसकी ध्यान प्रतिमा विनिर्मित की जाती और फिर इसके साथ समीपता, एकता, तादात्म्य स्थापित करते हुए उसी स्तर का बनने के लिए वैसे ही विचार आमंत्रित कर, क्रियारूप में उतारने का प्रयास किया जाता हैं ध्यान प्रक्रिया का प्रारम्भ भटकाव के स्वेच्छाचार से मन को हटाकर एक नियत निर्धारित दिशा में लगाने के अभ्यास से होता हैं इसके लिए कोई प्रतीक चाहिए। साकार ध्यान इसीलिए सभी प्रारंभिक साधकों के लिए श्रेष्ठ हैं, क्योंकि उसमें सहारा मिल जाता है- चंचल-स्वेच्छाचारी मन को भटकाव से रोकने के लिए। विगत अंक में इसी शीर्षक से दिए लेख में ध्यान की कई विधियों की, साकार ध्यान कैसे किया जाए, इस संबंध में विशेष चर्चा की गई थी। उस क्रम में सूर्य, दीपक, हिमालय, इष्ट का ध्यान, दर्पण साधना एवं सोऽहम् साधना के विषय में विस्तार से बताया गया था। उसी क्रम को यहाँ आगे बढ़ाया जा रहा है।
सूर्य के ध्यान को इस संधि वेला में विशिष्ट महत्व दिया गया है, विशेषतः इसलिए कि गायत्री का देवता सविता है एवं युगशक्ति गायत्री ही सद्बुद्धि के अवतरण के माध्यम से नवयुग की प्रतिष्ठापना करेगी। उदीयमान स्वर्णिम सूर्य का ध्यान युगतीर्थ शांतिकुंज हरिद्वार में परमपूज्य गुरुदेव के निर्देशों के माध्यम से प्रतिदिन प्रातः काल संपन्न होता हैं इससे भावचेतना को सौरचेतना के आध्यात्मिक तेज के साथ जो कि अतिमानसिक ज्योति है- एकाकार होने का अवसर मिलता है। बुद्धि को प्रखर बनाने- मेधावान बनो के लिए यह एक सर्वश्रेष्ठ ध्यान हैं अंतर्त्राटक - बहिर्त्राटक के साइकल्स के माध्यम से बिन्दुयोग की साधना जलते दीपक के माध्यम से की जा सकती हैं यह ध्यान मध्याह्न वेला में- युगतीर्थ में संपन्न होता हैं दीपक की ज्योति आज्ञाचक्र को एवं उसके माध्यम से सारे सूक्ष्म जगत को प्रकाशवान, ऊर्जावान बना रही है, बार-बार यह ध्यान किए जाने से अनेकानेक ऋद्धि-सिद्धियों के द्वारा खुलते चले जाते हैं हिमालय जीता-जागता चैतन्यसत्ता का पुँज हैं हिमालय से आने वाली शक्ति धाराएँ शरीर के कण-कण को ऊर्जावान व तपते मन को शाँत बना रही हैं, ऐसा ध्यान बार-बार करने से ऋषियों की चेतना से तादात्म्य होने का अवसर मिलता हैं इनके नए विचार सृष्टि के गर्भ से जन्म लेकर चिंतन पटल पर आते हैं।
इष्ट का ध्यान गुरुसत्ता के रूप में किया जा सकता है एवं अपनी आराध्य भगवत् सत्ता का भी। भगवान गुणों का आदर्शों का समुच्चय है। भगवान के गुणों को धारण कर हम भी ईंधन के आग में डाले जाने की तरह वैसे ही प्रखर-ज्योतिवान बनते चले जा रहे हैं- वे ही गुण हमारे अन्दर आते जा रहे हैं- यह भावना प्रतिपल प्रबल बनायी जाती हैं जिसका जो इष्ट हो, वह उसका ध्यान कर सकता हैं सत्प्रवृत्तियों को ही प्रतीक के रूप में ईश्वरीय प्रतिमा या चित्रों के रूप में उनके स्मारक या चिन्हों के रूप में निरूपित किया गया है। इसीलिए जब इष्ट का ध्यान किया जाता है, तो इन सत्प्रवृत्तियों पर ही ध्यान केंद्रित किया जाता हैं दर्पण साधना वस्तुतः आत्मबोध की साधना है। दर्पण में जब भी दृश्यमान हैं वह तो मात्र हाड़-माँस का पिंड हैं, जिसे एक दिन भस्मीभूत बन जाना है। फिर इसे सजाने का इतना प्रयास क्यों? सुंदर, आकर्षक तो भीत वालों को जिन्हें विचारणा- आकांक्षाओं का केंद्र मन एवं भावसंवेदना की गंगोत्री अंतःकरण कहते हैं, बनाया जाना चाहिए उनके लिए कभी प्रयास होता नहीं इसीलिए मात्र शरीर तक मनुष्य सीमित होकर रह जाता है। कारण व सूक्ष्मशरीर के परिष्कार के लिए दर्पण- साधना श्रेष्ठतम हैं, क्योंकि यह सीधे वेदाँत के सच्चिदानंदोऽहम् की अवधारणा तक साधक को ले जाती है। सोऽहम् का साधना जिसमें श्वास पर नियमन किया जाता है एवं अजपा जप भी साथ चलता है, एक प्रकार के अद्वैत की ही साधना हैं इन सभी साधनाओं के सत्परिणाम अनेक रूपों में साधक को मिलते हैं।
साधना की और भी कई विधियाँ हैं जिसमें एक महत्वपूर्ण नादयोग शब्दब्रह्म की इस साधना में भाँति-भाँति के वाद्ययंत्रों, धुनों, रागों, मंत्रों के माध्यम से अपने कर्णेन्द्रियों के द्वारा मन को तन्मय-तल्लीन करने का अभ्यास किया जाता हैं सितार, वीणा, बाँसुरी की धुन पर बजे रागों के विशिष्ट प्रभाव मनः संस्थान एवं सूक्ष्म चक्र उपत्यिकाओं पर पड़ते हैं ऋषिगणों ने प्रातः से रात्रि तक एवं रात्रि से प्रातः तक प्रत्येक प्रहर के लिए विभिन्न रागों का प्रावधान रखा हैं जो राग उस वेला के लिए निर्धारित है उसका अभ्यास करने पर ध्यान न केवल लाभ देता है, तुरंत लग भी जाता हैं उच्चरित मंत्रों, घंटे, घड़ियाल की ध्वनियों, समुद्री लहरों के थपेड़ों पर भी ध्यान लगाया जा सकता है। इंद्रिय माध्यम बन जाती है चित्तवृत्तियों के निरोध की। धीरे-धीरे यह सध जाने पर मौन एकाँत में बैठने पर बाहर का शोर कम अपने अन्दर के राग रागिनियों के स्वर सुनाई पड़ने लगे हैं नवद्धारों की इस देह में रक्तवाही संस्थान से लेकर अन्यान्य संस्थानों में जो चौबीस घंटे क्रिया−कलाप चल रहे हैं, उनसे उत्पन्न स्वर दिव्य ध्वनियों के रूप में अंतःइंद्रियों को सुनाई देने लगते हैं क्रमशः परिमार्जन-परिष्कार होते -होते यह स्थिति आती है कि अनहदनाद भी अंदर से सुनाई देने लगता हैं, कभी मंदिर की घंटियाँ घाटियों में हो रही गुँजन, प्रणवनाद-(कार आदि से लेकर ऋषिगणों द्वारा किया गया सामगान मंत्रोच्चार भी सुनाई पड़ने लगता है। यह सूक्ष्मतम की पकड़ की सिद्धि तक पहुँचने वाला ध्यान एकाग्रता की चरम पराकाष्ठा पर सिद्ध हो पाता हैं।
एक और ध्यान का तरीका है- मस्तक पटल पर भावचित्र के रूप में ओंकार की आकृति बनाना। बार-बार ओंकार की आकृति खींचते-खीचते वही दिखाई देता है और मन का भटकाव रुककर भीतर प्रवेश करने की, अपनी आत्मसत्ता का साक्षात्कार करने की स्थिति आने लगती हैं यह अभ्यास से ही सध पाता हैं, किन्तु प्रयास किये जाने पर पता लगता है कि यह सबसे सरल ध्यान हैं इसी कड़ी के अन्दर प्रवेश कर विभिन्न चक्रों का सुषुम्नानाड़ी के साथ चल रही सूर्य चंद्रनाड़ी का भी ध्यान किया जा सकता है। इसके लिए काल्पनिक चित्र बनाकर आज्ञाचक्र को साधकर वहाँ से अंदर प्रवेश कर क्रमशः नीचे तक यात्रा की जाती हैं एवं विभिन्न चक्रों का, उनके रंगों का ध्यान कर भेदन किया जाता हैं एक समर्थ संरक्षक के मार्गदर्शन में किया गया यह ध्यान साधक को योग की गहराइयों तक ले जाता है।
विभिन्न वर्णों का ध्यान भी मन को साधने व कई प्रकार के मनोविकारों के शमन के लिए ठीक हैं नीले-हलके हरे-गुलाबी रंग का ध्यान मन को जहाँ
शाँत करता है वहाँ पीले रंग का ध्यान उल्लास-वैराग्य की भावना को पुष्पित पल्लवित करता हैं अवसाद ग्रस्त मनः स्थिति में गहरे लाल बैंगनी आदि रंगों का ध्यान कराया जाता है। इससे शीघ्र ही उबरकर आने का अवसर मिलता व उत्साह-प्रफुल्लता का संचार होता है। वर्णों की तरह ही गंधों का भी ध्यान कर मन को एकाग्र किया जा सकता है। सूफी लोबान जलाकर अपने लिंबिक सिस्टम-हिप्पोकेम्पस को जगाते व सीधे दिव्यदर्शन कर सकने की स्थिति में पहुँच जाते हैं। यज्ञ धूम्र से लेकर सभी प्रकार की सुगंधों में बड़ी दिव्यशक्ति है, तुरंत स्नायुकोषों को जगरकी एंडसर्फीन नामक हारमोन्स के उत्सर्जन की साथ ही मनःसंस्थान के जागरण की स्थिति प्राप्त होती है। खेचरी मुद्रा में जीभ तालू से लगाकर भगवान को रसप्रवाह के रूप में अवतरित किया जाता है। भावना की जाती है कि हमारा मस्तिष्क शिव का कैलाश है, विष्णु का क्षीरसागर है, ब्रह्मा का सहस्रदल कमल है। रस रूप में-आनंद रूप में, ईश्वरीय चेतना के प्रवाह की अनुभूति इसी सहस्रार केंद्र से की जा सकती है। इन सबको विस्तार से न देकर यहाँ मात्र इशारा किया गया है। जिन्हें जो ध्यान ठीक लगे, वह इसका विस्तार वाङ्मय के खण्ड ‘4 (साधना पद्धतियों का ज्ञान और विज्ञान) एवं 10 (गायत्री साधना का गुह्य विवेचन) से पढ़कर तदनुसार अभ्यास कर सकते हैं।
एक अंतिम ध्यान युगचेतना से अनुप्राणित हो अखंड दीपक का दर्शन कर, गुरुसत्ता के आशीर्वाद से शक्ति लेकर वापस गंगादर्शन कर लौटने का भी किया जा सकता है। परमपूज्य गुरुदेव ने सूक्ष्मीकरण साधना के पश्चात सभी साधकों को इस ध्यान के विषय में प्रेरित किया था व शक्ति−संचार हेतु इसे सर्वश्रेष्ठ बताया था। जो भी विधि हमें ठीक लगे, हम उसे ग्रहण कर अपने आपको ध्यान का अभ्यास कराएँ, तो निश्चित ही इसके परिणाम आज की विषम विभीषिकाओं से भरी परिस्थितियों में बड़े विलक्षण संभावनाओं से भरे-पूरे हमें हस्तगत होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं।
एक बार साम्यवादी विचारधारा के पाश्चात्य विद्वान महात्मा गाँधी के पास जाकर बोले- “महात्मा जी! जब संसार में इतना छल-कपट, अशांति और खून–खराबा चल रहा है, तब भी आप धर्म की बात करते हैं। बुराइयाँ और रक्तपात जितनी तेजी से बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए धर्म निहायत बेकार चीज है।”
बापू ने कहा- “महोदय! जरा सोचिए तो सही कि जब धर्म की मान्यता रहते हुए लोग इतनी अशांति फैलाए हुए हैं, तो उसके न रहने पर यह कल्पना सहज ही की जा सकती है कि तब संसार की क्या दशा होगी?” इस पर उन सज्जन से कोई जवाब देते न बन पड़ा।
संगीत आत्मा का स्वर है। गायन आत्मा की कला है। गायन आत्मा की कला है। इतना ही नहीं, यह परमात्मोपासना का दिव्य माध्यम है। शुद्ध एवं पवित्र संगीत में प्रचंड क्षमता भरी होती है। यह तन-मन को झंकृत कर उसमें आशा, उत्साह एवं उमंग की नूतन धाराएँ संचरित करता है। इससे साँस्कृतिक चेतना, सामाजिक समरसता एवं वैयक्तिक सद्भावना एवं संवेदना जाग्रत होती है। आज के वैज्ञानिक युग में ‘म्यूजिकल थेरेपी’ द्वारा उपचार प्रक्रिया बड़ी तेजी से चल पड़ी है। मनोवैज्ञानिक इसे तनाव एवं अवसार के समाधान हेतु प्रस्तुत करते हैं। इसीलिए तो गीताकार ने “वेदानाँ सामवेदोऽस्मि” कहकर इसकी महत्ता प्रतिपादित की है।
शब्दब्रह्म है। लय इसकी आत्मा है और उसे ही नाद कहते हैं। नाद का व्यक्त रूप आहदनाद है। आहद और अनहद नाद की संधि में ही सामवेद का स्वर स्फुरित हुआ। गंधर्ववेद सामवेद का उपवेद है, इसलिए आहद होते हुए भी उसमें अनाहद का स्वर सन्निहित है। संगीत की सुरधारा सामगान के दिव्यदर्शियों से लेकर देवर्षि नारद तक एवं हरिदास और तानसेन से लेकर प्रचलित गीतों तक प्रवाहित हुई है। संगीत में अपूर्व सम्मोहक शक्ति है, इसीलिए तो हिरन और साँप भी दौड़े चले आते हैं। तानसेन के दीपक-राग से दीप जल उठता था और आसमान में छितराए बादल जुड़कर मेघ-मल्हार के स्वर में सुर देने लगते थे। संगीत की इसी विशेषता के कारण जेम्स वाट्सन ने संगीत को पाषाण हृदय को मोम बनाने वाली जादुईशक्ति माना है। शास्त्रीय संगीत के सम्मोहन से मुग्ध होकर महात्मा गाँधी ने कहा था, संगीत आत्मा के ताप को शांत एवं शीतल कर सकता है। यह आत्मा की मलीनता को धोकर पवित्र कर देता है।
आज संगीत के दो रूप मिलते हैं,शास्त्रीय संगीत एवं सुगम संगीत। गीत के चार अंग माने जाते हैं- स्वर, पद, लय और मार्ग। संगीत रत्नाकर में नाद को बाईस श्रुतियों में विभाजित किया गया है। ये श्रुतियाँ कान से अनुभव की जाने वाली विशिष्ट शक्तियां हैं। संगत की इन शक्तियों का प्रभाव स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों रूपों में देखा जा सकता है। म्यूजिक थेरेपी का सिद्धाँत इसी पर आधारित है। सच्चिदानंद वात्स्यायन ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय कला दृष्टि’ में संगीत को संस्कृति की पहचान एवं अभिज्ञान कहा है। इनके अनुसार संगीत साँस्कृतिक विचारधारा को अत्यंत प्रभावित करता है। अगर संगीत बदले, तो यह इस बात का संकेत होगा कि संस्कृति बदल गई है। अगर संगीत नहीं बदला है तो इसका मतलब है कि कहीं मर्म में हम भी नहीं बदले हैं।
पाश्चात्य जगत के विद्वानों ने भी संगीत को सामाजिक चेतना की प्रेरकशक्ति के रूप में निरूपित किया है। मार्क्स के अनुसार, यह सामाजिक एवं साँस्कृतिक स्वर को झंकृत करता है। संगीत से व्यक्ति ही नहीं समस्त समुदाय पर असर पड़ता है। चार्ल्सरोजेन ने स्पष्ट रूप से स्वीकारा है कि संगीत समाज में सौंदर्य एवं नैतिकता का प्रतिनिधित्व करता है। व्यक्ति और समाज का परिचय वहाँ के प्रचलित संगीत के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। मार्क्सस्लोबिन ने अपनी चर्चित रचना ‘सब कल्चर साउंड’ में संगीत के साँस्कृतिक पहलुओं का रोचक वर्णन किया है। इनके अनुसार संगीत व्यक्ति में गत्यात्मक भाव उत्पन्न करता है तथा निष्क्रियता को सक्रियता में परिवर्तित कर देता है। संगीत रूपी सुपर कल्चर से व्यक्ति, परिवार, आयु, वर्ग एवं जाति सभी प्रभावित होते हैं। इसकी सुरलहरी सीधे व्यक्ति की अंतर संवेदना को स्पर्श कर उसे एक नए लोक में पहुँचा देती है। संगीत के सुर-सागर में मानव की सभी इच्छाएँ, आकाँक्षाएँ, एकाकार होकर आनंद की अनुभूति प्राप्त करती है। इस तरह संगीत जहाँ व्यक्ति के अंतःकरण को झकझोरता है, वहीं उसे सामाजिक परिवेश से भी जोड़ता है।
यह तो मानव मन की वह सुरीली अभिव्यक्ति है, जो संस्कृति के स्वरों में फूटती है। जॉनमिलर चेर्नफ ने उल्लेख किया है कि अफ्रीका का संगीत साँस्कृतिक गतिविधियों की देन है। यहाँ वे व्यक्ति अपने साँप्रदायिक सद्भाव और सामंजस्य को और अधिक सुहृद करने के लिए विभिन्न प्रकार के संगीत का सृजन करते हैं। इनके गीतों में, प्रचलित परंपरा की छाप मिलती है। ये आनंद और सस्ती के लिए इसे गाते हैं। संभवतः लोकसंगीत के पीछे यही भाव छिपा है। इस विषय पर फिलिप वी. वोलमैन ने और भी स्पष्ट करते हुए लिखा है कि अफ्रीका का संगीत आज के आधुनिक परिवेश में बदलता जा रहा है। जाहिर है इससे वहाँ की संस्कृति भी प्रभावित हो रही है। संगीत में इस तरह का बदलाव पीढ़ी-दर-पीढ़ी होता है, परंतु उसका मूलभाव, अनुभव, सत्य एवं सार्वभौमिकता का प्रभाव यथावत बना रहता है।
कोगन और और सैण्डो के संगीत सर्वेक्षण से पता चलता है कि पाश्चात्य जगत में पाँप संस्कृति से क्लासिकल म्यूजिक की ओर अभिरुचि बढ़ी है। आज के पाँपस्टारो के बदले पोस्ट माडर्न संगीतकार जैसे लारी एंडरसन डेविड बर्न और ब्रॉयनइनो आदि फिर से प्रचलित होते जा रहे हैं। अठारहवीं सदी में पाश्चात्य जगत का संगीत आज के रुझान से संबंधित माना जा रहा है। इन दिनों वह सत्य उभरकर आया है कि संगीत वर्गभेद की सीमाओं को भेदकर व्यक्ति के अनुभव एवं अनुभूति को प्रभावित करता है। इससे बिखरता हुआ समाज एकता की ओर उन्मुख होता प्रतीत होता है। वर्तमान डिजिटल युग में संगीत परिशुद्ध रूप से मानसिक हो गया है। आज का तनावग्रस्त समाज संगीत को तनावमुक्ति के साधन के रूप में देखता है।
वाटरमैन क्रिस्टोफर ने योरुबा संगीत एवं जूजू संगीत का अध्ययन करने के पश्चात बतलाया है कि यह व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ा देता है। इस संगीत से कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि जूजू संगीत ने नाइजीरिया के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, व्यावहारिक एवं भाषागत क्षेत्र के परिदृश्य को परिवर्तित कर दिया है। गाँव, शहर, शिक्षित, अशिक्षित सभी लोग इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहे। नाइजीरिया का यह स्वर अमेरिका में भी सुनाई देने लगा है। पॉलगिलराय ने कहा है कि संगीत में जादुई क्षमता होती है, यह व्यक्ति को किसी ओर मोड़ सकता है। इनके अनुसार श्रेष्ठ संगीत व्यक्ति को तनाव एवं संघर्ष से जूझने की क्षमता प्रदान करता है। यह उमंग एवं उत्साह को बढ़ाता है, समाज के अंदर की गहरी खाई को पाटने का प्रयत्न करता है। इन दिनों दक्षिण अफ्रीका की बहुत सारी संगीत धुनों ने पाश्चात्य जगत पर अपना प्रभाव जमा लिया है। सन् 1960 में एक संगीत क्लब में ब्रॉयन जैक्सन ने कहा था- “संगीत मानवी चेतना को ऊर्ध्वमुखी करने का सुँदर एवं सरल साधन है।” संगीत के इस जादुई चमत्कार से इजराइल भी सराबोर है।
संगीत की सुरलहरी अंग-अंग में थिरकन भर देती है। नृत्य से भी इसका अटूट संबंध है। पाश्चात्य संगीत में इन दोनों का सम्मिश्रण मिलता है। भारतीय कला में संगीत एवं नृत्य का संबंध होने के बावजूद ये दोनों भिन्न विधाएँ हैं। स्टुअर्ट हाल ने अपने शोधग्रंथ ‘कल्चरल आइडेन्टिटी’ में उल्लेख किया है कि संगीत से मानवीय चेतना एकाकार हो जाती है और वह उन सुरलहरियों के संग बरबस थिरकने लगता है। आगे इन्होंने स्पष्ट किया है कि संगीत का प्रभाव त्वरित होता है। इससे सामूहिक चेतना भी प्रभावित होती है। परिणामस्वरूप किसी गतिविशेष से सारा समाज लहराने लगता है। इस तरह श्रेष्ठ एवं भावपूर्ण संगीत सामाजिक एवं साँस्कृतिक स्वर को बदलने की क्षमता रखता है। उन्नीसवीं सदी में चैम्बर म्यूजिक तथा अफ्रीका एवं अमेरिका में ‘इंडियन म्यूजिक इन फेलेसिटी’ में भारतीय संगीत की विशेषता का विस्तार से वर्णन किया है। इन्होंने भारतीय संगीत को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ संगीत बताया है। इनके अनुसार गीतों के सरगम में दिव्यता का भाव रहता है, जो व्यक्ति के आँतरिक भावों को सक्रिय एवं जाग्रत करता है। इस मामले में केवल शास्त्रीय गायन ही समर्थ है। इसमें गूढ़ दर्शन छिपा हुआ है। हेलन मेयर स्वयं भी भारतीय गीतों से अभिभूत थे। उन्होंने एक स्थान पर स्पष्ट किया है कि भारत का सामान्य-सा लोकसंगीत किसी भी रेप, पाँप आदि गीतों से श्रेयस्कर है। इन गीतों में ताल, लय और छंद व्यक्ति के भावों को झंकृत करता है और उसे दिव्य अनुभूति रसास्वादन कराता है।
नाद के आत्मानुभूति शास्त्र को अब आधुनिक विज्ञान की क्वाँटम भौतिकी, जीवविज्ञान एवं ध्वनिविज्ञान की शाखाएं भी बड़ी तेजी से अपनाती जा रही हैं। आधुनिक ध्वनिविज्ञान ने अब अश्रव्य तरंगों जैसे अल्ट्रासोनिक एवं सुपरसोनिक तरंगों का पता लगा लिया है, जिस पर किसी भी शब्द, नाद या संगीत की तरंगें रिकॉर्ड हो सकती हैं। संगीत के माध्यम से उपचार संबंधी प्रयोग तीव्रता से किया जाने लगा है। आयुर्वेद में जहाँ मंत्रोपचार का विस्तृत वर्णन मिलता है, वहीं शास्त्रीय संगीत एक गूढ़ विज्ञान है। स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव अक्षुण्ण है। इस तथ्य को यूनानी शास्त्र, फारसी
एवं हिब्रू के अनेक स्वास्थ्य ग्रंथ स्वीकार करते हैं। इन ग्रंथों में संगीत के माध्यम से नींद, पाचन एवं रक्तदाब आदि के उपचार वर्णित हैं। स्वास्थ्य एवं सरगम के बीच संबंध की नींव इस शताब्दी के मध्य में पड़ी। आजकल तो म्यूजिक थेरेपी से रोगों का उपचार काफी प्रचलित होने लगा है। प्रोफेसर रेहलाँक ने पदार्थ को ऊर्जा का एक रूप मानते हुए इनके तरंगों एवं कम्पनों की व्याख्या की है। हर पदार्थ तरंग की एक विशेष आवृत्ति होती है। यह आवृत्ति ही व्यक्ति पर अच्छा या बुरा प्रभाव डालती है। भावपूर्ण गीतों की आवृत्ति व्यक्ति को संवेदना से ओत−प्रोत कर देती है, तो देषभक्तिपूर्ण
गीतों से नसें फड़कने लगती है, यह सब उन विशिष्ट तरंगों का कमाल है। मुनरों, माउण्ट लक्सिन, कनिंघम आदि शरीर-विज्ञानियों ने स्पष्ट किया है कि संगीत मानसिक एवं भावनात्मक स्तर पर भी अपनी छाप छोड़ता है। प्रो. एल्विन और डॉ. ब्राडी के अनुसार संगीत का असर मस्तिष्क स्थित ‘लिंबिक सिस्टम’ पर पड़ता है, जिसका संबंध आनंद, उत्साह एवं उमंग से होता है। उनके अनुसार संगीत की स्वर-लहरियों से भावनात्मक अनुभूति उद्दीप्त हो जाती है।
संगीत-चिकित्सा का मुख्य कार्य है-स्नायुसमूह के प्राण को प्रोत्साहित करना। इससे मांसपेशियां सक्रिय हो उठती हैं। संगीत में विद्यमान सूक्ष्म ध्वनि-तरंगें मनोदशा पर गहरा असर डालती है। इसके इस गुण के कारण ही इसे वैज्ञानिक-चिकित्सापद्धति के रूप में विकसित किया जा रहा है। शास्त्रीय संगीत से लेकर बाख, बलूज, मोजार्ट, जाज, राँक, रेप तक सभी तन-मन पर अपना जादुई प्रभाव छोड़ते हैं। इसीलिए चिकित्सक ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से लेकर अब तक संगीतोपचार का प्रयोग करते चले आ रहे हैं। हालाँकि बीच में इसकी कड़ियाँ लुप्त हो गयीं थी, जो अब आधुनिक विज्ञान ने पुनर्जीवित कर दी हैं। राग रिसर्च सेंटर चेन्नई ने शास्त्रीय रागों पर रोगोपचार की विधि खोज निकाली है, इनके अनुसार प्रत्येक राग का प्रभाव भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है। राग आनंद-भैरवी हाइपरटेंशन को कम करता है। इसी तरह राग शंकरमरणम् मानसिक रोगियों को राहत पहुँचाता है। रागसेंटर के प्रमुख के. विद्यानाथन का कहना है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत में चमत्कारिक शक्ति भरी पड़ी है। आवश्यकता है, तो इसकी समुचित जानकारी एवं प्रयोग की।
राग रिसर्च सेंटर में रागशंकरमरणम् का प्रयोग करने के लिए 90 भावनात्मक तनाव के रोगियों को लिया गया। इनको तीन समूहों में बाँटा गया। प्रथम समूह को 20 मिनट तक प्रतिदिन दो बार दो सप्ताह तक शंकरमरणम् राग सुनाया गया। दूसरे वर्ग को इसी अवधि में संगीत की फिल्म दिखाई गयी। तीसरे वर्ग को ऐसे ही छोड़ दिया गया। प्रयोगोपराँत जब इन रोगियों का स्वास्थ्य-परीक्षण किया गया तो प्रथम वर्ग के 30 में से 22 रोगियों का तनाव घट गया था, जबकि दूसरे वर्ग के मात्र आठ रोगी ही कम तनावग्रस्त पाए गए। तीसरा दल ही इस मामले में अप्रभावित रहा। अपने देश के प्रसिद्ध केंद्र ‘नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एण्ड न्यूरोसाइंस बैंगलोर’ में भी संगीत द्वारा उपचार की
प्रक्रिया चलाई जा रही है। यहीं के साइकिएट्री प्रोफेसर डॉ. बी. एन. मंजुला की मान्यता है कि संगीत थेरेपी साइकोसिस की अपेक्षा न्यूरोसिस में अधिक लाभकारी होती है। डॉ. मंजुला ने आगे स्पष्ट किया है कि गुनगुनाने से भी अवसाद में कमी आती है। भावपूर्ण एवं मोहक गीत एंक्जाइटीन्यूरोसिस को दूर करते हैं। जबकि मानिया में तीव्र संगीत की आवश्यकता महसूस की जाती है। डॉ. राल्फ स्पीजे ने जर्मनी के पेन क्लीनिक में 90 हजार रोगियों पर संगीत का प्रयोग किया है। इसमें इन्हें 69 प्रतिशत सफलता मिली है। प्रयोग की
इस सफलता को देखकर वहाँ न्यूरोलॉजिस्टों ने संगीत उपचार को वैज्ञानिक चमत्कार कहा है।
न्यूरोलॉजिस्टों के अनुसार मस्तिष्क के दायें भाग से सम्बन्धित है। संगीत के सुरों में पिट्यूटरी ग्रन्थि एण्डोफीन हार्मोन्स का स्राव होता है। श्रेष्ठ संगीत के सुरों में मैटाकोला और एण्ड्रेलीन का स्तर कम हो। इससे बढ़ी हृदय गति रक्त दाब तथा संगठित फैटी एसिड लैक्टेट नामक विष का स्तर घटा है। अच्छा संगीत सुनने से माइग्रेन तनाव कम हो जाता है। अर्ध वाहनीय मस्तिष्क सीफ्रोनिया एवं हिस्टीरिया के रोगियों पर इसका आश्चर्यजनक प्रभाव होता है। संगीत का सर्वाकिधक अंतर्मुखी व्यक्तियों पर होता है। म्यूजिक थेरेपी प्रसव पीड़ा में अत्यधिक लाभ लाती है। इसके माध्यम से उदर व नेत्र एवं हृदय रोग पर तत्काल प्रभाव पड़ता है। साउंड थेरेपी विशेषज्ञों के बिना किसी रुधिर स्राव के मोतियाबिन्द का सफल आप्रेशन किया है। ध्वनि विशेषज्ञों ने ओरोटोन नामक एक ध्वनि यंत्र आविष्कृत किया है। सप्तस्वरों के साथ रंग भी उत्सर्जित करता है इन सब स्वरों की तरंगें व विशिष्ट रंगों के साथ व्यक्ति तन-मन पर विशिष्ट प्रभाव डालता है। रोगपरक व्यक्ति को आवश्यकतानुसार इन रंगों एवं स्वर का संगीत सुनाया जाता है।
अत्यंत आशाजनक परिणाम प्रस्तुत कर रहा है। म्यूनिख के ग्रास के ग्रास हैडर्न अस्पताल में वैज्ञानिकों ने पाया है कि कीमोथेरेपी के दौरान संगीत सुनने से कैंसर रोगियों का डर कम होता है। रूसी अनुसंधानकर्ता कुद्रयावल्सेव ने अपने शोध के आधार पर बताया है कि संगीत की तरंगें अंतःस्रावी ग्रंथियों को सक्रिय कर देती है। इसी तरह रसायनशास्त्रियों ने तो ध्वनिरसायन नामक विज्ञान की एक नई शाखा का विकास किया है। इसके माध्यम से संगीत के मधुर, कर्कश एवं कोलाहल मुक्त स्वरों का परीक्षण किया जाता है। बताया गया है कि अच्छे गीतों की तरंगें अधिक प्रभावशाली होती हैं। िग्सटन यूनिवर्सिटी के म्यूजिक एवं साइकिएट्री प्रोफेसर पाल राबर्टसन का कहना है कि संगीत से मस्तिष्क का बड़ा गहरा संबंध है। इन्होंने संगीत को मस्तिष्क के न्यूरॉन की अभिव्यक्ति कहा है। इसी तथ्य को डॉ. एन्थेनीस्टार ने ‘म्यूजिक एण्ड माइण्ड’ में लिखा है कि जब व्यक्ति भावुक होता है, तो स्वतः ही गीत गुनगुनाने लगता है। इससे मस्तिष्क का बायाँ हेमिस्फीयर सक्रिय होता है। भावपूर्ण गीत मस्तिष्कीय स्नायुकोषों को को सक्रिय एवं मजबूत करते हैं।
विज्ञान की प्रसिद्ध पत्रिका ‘न्यू साइंटिस्ट’ पत्रिका के शोधपत्र में संगीत को मानसिक विकास का सर्वोत्कृष्ट माध्यम माना है। विशेषज्ञों के अनुसार इससे बच्चों के बौद्धिक विकास एवं तार्किक क्षमता में वृद्धि होती है। पीडमेंट अस्पताल जार्जिया के डॉक्टर फेड स्वार्ज ने जन्म पूर्व या जन्मोत्तर शिशुओं के लिए गर्भाशय संगीत आविष्कृत किया है। इनके अनुसार गर्भाशय के अंदर 80 से 95 डेसीबल के बराबर ध्वनि उत्पन्न होती है, तो किसी मंदिर के अंदर हो रहे संकीर्तन की ध्वनि के स्तर के बराबर होती है। इस संगीत का परिणाम जानने के लिए स्वार्ज ने सर्वप्रथम अपने ही बच्चों पर इसका प्रयोग किया। इस संगीत को सुनकर बच्चे शीघ्र सो जाते हैं। इसके पश्चात समय से पूर्व जन्मे 17 बच्चों को इसे सुनाया गया। प्रयोगोपराँत प्राप्त निष्कर्ष चौंकाने वाला था। इससे बच्चों की थकान दूर हो गयी। वे पहले से अधिकांश हो गए और अपेक्षाकृत अधिक देर तक सोए। बच्चों की साँसों की दर में वृद्धि हुई तथा रक्तचाप एवं हृदय की धड़कनों की दर घटी। यह इनके विकास में बहुत सहायक सिद्ध हुआ है।
प्रोफेसर हरिषर्मा तथा उनके सहयोगी काफमैन एवं एलन एल. स्टीफन के अनुसंधान से पता चलता है कि और अच्छे गीतों से जहाँ लाभ होते हैं, वहीं कर्णकटु गीतों से नुकसान भी हो सकता है। इनके अनुसार रॉक संगीत से हृदय एवं कैंसर आदि रोगों को बढ़ावा मिल सकता है। लेकाशयर हॉस्पिटल तथा महर्षि आयुर्वेद फाउंडेशन के संयुक्त प्रयासों द्वारा सामवेद के गायन मंत्र ब्लैक एण्ड ब्लैक संगीत का तुलनात्मक अध्ययन अध्ययन किया गया। इस शोध निष्कर्ष ने पश्चिमी जगत के वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी। ब्लैक संगीत मस्तिष्क, स्तन, आंतें, फेफड़े और त्वचा की कैंसर कोशिकाओं में 25 प्रतिशत की वृद्धि कर देता है। जबकि सामवेद का गायन ठीक इसके विपरीत 65 रोगों में 25 प्रतिशत की कमी करता है एवं मन में उमंग एवं शांति लाता है। कर्णकटु संगीत म्यूजिकोजेनिक मिर्गी के लिए जानलेवा सिद्ध हो सकता है। न्यूयार्क में स्थित में स्थित माउण्ट सिनाय अस्पताल के डॉ. जान डायमंड की मान्यता है कि तेज एवं हाईबीट के संगीत स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डालते हैं, जबकि लो बीट एवं अच्छे गीत शरीर एवं मन पर हर तरह से लाभप्रद होते हैं।
कुछ भी हो, यह एक निर्विवाद सच है कि संगीत इनसान के लिए दैवीय वरदान है। इसका सदा श्रेष्ठ साधन के रूप में सदुपयोग करना चाहिए। इससे अनेक सामाजिक, साँस्कृतिक एवं वैयक्तिक लाभ प्राप्त हो सकते हैं। हमें ऐसे संगीत का चुनाव करना चाहिए, जिससे मानसिक कुँठा एवं उत्तेजना न बढ़ सके एवं आशा, उत्साह एवं उमंग में अभिवृद्धि हो। सदैव भावपूर्ण एवं सुँदर गीतों का यचन करना ही श्रेयस्कर है, यही शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का परिचायक है।
गायत्री परिवार स्वार्थी, कायर एवं संकीर्ण लोगों में अपनी गणना नहीं करा सकता। उसके सामने एक उद्देश्य एवं लक्ष्य है, वह है-बुराइयों के उन्मूलन एवं अच्छाइयों के अभिवर्द्धन का सत्प्रयत्न। हममें से प्रत्येक को इस समुद्रमंथन के समय देवपक्ष को सबल बनाने के लिए भागीदार होना पड़ेगा।
युगपरिवर्तन की वेला में हममें से प्रत्येक का कुछ कर्तव्य है और उस कर्तव्य की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। धर्म और अधर्म के महायुद्ध को दर्शक बनकर देखते नहीं रहा जाना चाहिए। अपनी सामर्थ्यानुसार कुछ तो करें। यदि आज की विषम परिस्थितियों में भी हम बिगाड़ को रोकने के लिए कुछ नहीं करते, तो आगामी पीढ़ियाँ हमारी इस निष्क्रियता को क्षमा नहीं करेंगी। इस महाभारत के मध्य में खड़ा हुआ अब कोई अर्जुन कमजोरी की बात नहीं कर सकेगा। उसे गाँडीव उठाना ही होगा और अधर्म के संहार और धर्म स्थापना के लिए जूझना ही होगा।-अखण्ड ज्योति (फरवरी, 1962)
बुझता हुआ दीपक पूरी लौ उठाता है। रात्रि के अंतिम चरण में अँधेरा सबसे अधिक गहरा होता है। हारता जुआरी दूना दुस्साहस दिखाता है। ‘मरता क्या न करता’ वाली उथ्कत ऐसे ही समय पर चरितार्थ होती है। वैसा ही इन दिनों ीी हो रहा है। नीति और अनीति के बीच इन दिनों घमासान युद्ध हो रहा है। कुहराम और धकापेल का ऐसा माहौल है, जिसमें सूझ नहीं पड़ता कि आखिर हो क्या रहा है? इस आँखमिचौनी में, धूप-छाँव में किसे पता चल रहा है कि हो क्या रहा है? कौन जीता और हार कौन रहा है? इतने पर भी जो अदृश्य को देख सकते हैं, वे सुनिश्चित आधारों के सहारे विश्वास करते हैं कि सृजन ही जीतेगा। विजय सत्य की ही होनी है। उज्ज्वल भविष्य का दिनमान उदय होकर ही रहना है और आँखों को धोखे में डालने वाला तम सुनिश्चित रूप से मिटना है।-
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य (वांग्मय ग्रंथ क्र. 29, पृष्ठ, 1.98)
सृजेता ने सृष्टि की रचना में अपना अनुपम कौशल सँजोया है। यहाँ बहुत कुछ ऐसा है, जिसे निहार कर मानवी-बुद्धि आश्चर्य चकित हो नतमस्तक हो जाए। सृष्टि के महाशिल्पी कीस अद्भुत रचना में रहस्य भी कम नहीं हैं। यहाँ होने वाली अगणित रहस्यमयी घटनाएँ सृष्टि के रचनाकार के प्रति अंतःकरण में पील-पल श्रद्धा एवं भक्ति के भाव उमंगती-पनपाती रहती हैं ऐसी ही एक घटना सन् 1921 की है। 24 वर्षीय ब्रिटिश युवक जॉन हेनरी लेनको एक विद्युतीय तूफान का विचित्र अनुभव हुआ उसने विद्युत के पीले गोले को अपने सनानगृह में प्रवेश करते देखा। यह गोला उसके पैरों के चारों और चक्कर लगाता हुआ वाशबेसिन में कूट गया व बिना कोई ध्यान किए विलुप्त हो गया। इस विद्युतीय गोलों ने किसी तरह खुली खिड़की में लगे जालीदार पर्दे से प्रवेश किया था। इससे न तो गोले के आकार में कोई परिवर्तन आया और न ही जाली को कोई क्षति पहुँची। इसके बारे में यही आश्चर्यजनक बात नहीं है, इसने वाशबेसिन की निकास नली में लगे रबड़ के ढक्कन की स्टील चैन को दो खंडों में पिघला दिया था सारी घटना कुछ ही सेकेंडों में घटित हुई थी। युवक सोचता ही रह गया कि गोला आखिर कहाँ लुप्त हो गया?
एक सप्ताह बाद पुनः उसी कमरे में वैसी ही एक और विद्युतीय तूफान की घटना घटी। एक गोला खिड़की को बिना पिघलाए अंदर आया और हेनरी लेन के पैरों का चक्कर काटने लगा। फिर वह नहाने के टब में कूट गया व निकास नली में ले रबड़ के ढक्कन की स्टील को पिघला कर दो खंडों में तो़ गया। उपर्युक्त घटनाओं का विशेषज्ञों ने जब विश्लेषण किया तो उसके पीछे कोई भी तथ्य समझ नहीं पाए। घटना के विद्युतीय गोले तड़ित से सर्वथा भिन्न थे, क्योंकि इनकी गति धीमी थी व ये सुचालकों से भी अप्रभावित रहे। इन्होंने मनुष्यों को किसी तरह की खति नहीं पहुँचाई। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि ये अपनी स्वतंत्र इच्छा द्वारा संचालित थे।
इसी तरह के जिन विद्युत गोलों की घटनाओं का उल्लेख किंसेंट ग्रडीस ने अपनी पुस्तक मिस्टीरियस फायर्स एण्ड लाइट’ में किया है,उनकी स्वतंत्र इच्छाशक्ति थी वे ये मनुष्यों के प्रति सद्भावपूर्ण थे। एक जगह एक क्रुद्ध गोले ने धक्का मारकर दरवाजा खोला था। अन्यत्र विद्युतीय गोला एक वृक्ष की चोटी पर स्थिर हो गया था और फिर धीरे-धीरे एक टहनी से दूसरी पर नीचे उतरने लगा। अंततः खलिहान से होता हुआ धर के दरवाजे की ओर आगे बढ़ा वहाँ खेल रहे दो बालकों ने जब उसे गेंद समझ कर ठोकर मारी, तो यह कर्णभेदी ध्वनि के साथ फट गया। किसी भी बालक को कोई क्षति नहीं पहुँची, लेकिन बाड़े में बँधे हुए दो पशु घायल हो गए। इसी तरह की एक घटना दक्षिण पश्चिमी फ्राँस के एक गाँव में घटी। जलता हुआ एक गोला चिमनी से नीचे उतरा व कमरे में बैठी एक महिला व तीन बच्चों के बीच में से होता हुआ पास वाली रसोई में घुस गया। रास्ते में सने एक बच्चे के पैर का स्पर्श भी किया, लेकिन उसे किसी भी तरह कोई नुकसान नहीं पहुँचा। अंततः यह एक अस्तबल में घुस गया व एक सुअर को स्पर्श करता हुआ विलुप्त हो गया। लेकिन समसें सुअर मारा गया। एक अन्य घटना क्लेरन स्विट्जरलैंड की है। इसका वर्ण 1 जुलाई, 1880 की ‘नेचर’ पत्रिका में किया गया था। एक भयानक गर्जना ने क्लेरन के घरों को जड़ से हिला दिया। उसी समय कब्रिस्तान के समीप एक चैरी के वृक्ष पर बिजली गिरी। पास के आँगन में काम कर रहे अंगूर की खेती करने वाले किसानों ने देखा कि कोई विद्युतीय द्रव एक छोटी-सी बच्ची के साथ खेल रहा है। वह बच्ची सकी चादर में लिपट गयी हैं यह देखकर किसान डर के मारे भाग खड़े हुए। चैरी वृक्ष से 250 कदम की दूरी पर कब्रिस्तान में छः-सात व्यक्ति काम कर रहे थे। वे भी इस विद्युतीय प्रवाह की लपेट में आ गए। उन्हें लगा कि जैसे उनके चेहरे पर ओले बरस रहे हों। घटना से प्रभावित बच्ची, अंगूर की खेती करने वाले किसान व अन्य व्यक्तियों में से किसी को कोई क्षति नहीं पहुँची। लेकिन चैरी का वृक्ष क्षत-विक्षत हो गया था। ण्यस लगता था कि जैसे कि किसी डायनामाइट द्वारा इस पर विस्फोट किया गया हों।
ये तो हुई, मनुष्य के शुभचिंतक रहस्यमय गोलों एवं विद्युतीय प्रवाह की घटनाएँ। इसके विपरीत इनसानों को नुकसान पहुँचाने वाले गोलों की घटनाएँ भी देखी गयी। घटना जब स्वच्छ आकाश के नीचे घटी हो तो आश्चर्य और अधिक बढ़ जाता है। ऐसी ही एक घटना 10 मई, 1961 की है। इंग्लैण्ड के रिचाउ वोंट अपनी कार में बैठे घर की ओर जा रहे थे। रात का समय था। अचानक रिचार्ड ने घने कोहरे में जलती आग की एक गेंद को देखा, जो व्यास में तीन फुट के लगभग थी। यह तेजी से पैंतालीस डिग्री के कोण पर सीधे कार की ओर बढ़ रही थी। यह चमकीली गेंदाकार के टकराकर फट गई। रिचार्ड शीघ्रता से बाहर कूद पड़े। जब उन्होंने खिड़की को छुआ तो उसे इतना गर्म पाया कि हाथ तुरंत हटाना पड़ा। स्थानीय वैज्ञानिकों ने इस प्रकरण की जाँच पड़ताल की, लेकिन वे कुछ भी बतलाने में असमर्थ रहे। बादल रहित आसमान के नीचे घटी इस घटना से सभी हतप्रभ थे।
इसी तरह की एक घटना इंग्लैंड के एक कस्बे में 29 मई 1938 को घटी, जब साफ आसमान से एक उग्र ज्वलनशील वस्तु पृथ्वी पर गिरी व नौ व्यक्तियों को जला दिया। ऐसे ही 29 अप्रैल 196 के दिन मैसाचयूसेट्स के एक खेत में जलता हुआ बास्केटबॉल के आकार का गोला गिरा था, जिसने घास के ढेर में आग लगा दी थी। विशेषज्ञों के अनुसार यह कोई प्राकृतिक घटना नहीं थी।
गर्मी के दिनों में बाँस के सूखे झुरमुटों में आपसी रगड़ के कारण आग लगने की घटनाएं तो समझ में आती हैं, लेकिन यदि मनुष्य बिना किसी बाह्य उत्प्रेरक के स्वतः ही जलकर राख हो जाए तो? ऐसी ही एक घटना है फ्लोरिडा की। इसका विस्तृत विवरण सितंबर 1969 की साइंस मंथली ‘मेटिरियोलाजिकल’ पत्रिका में आया था घटना की नायिका थी श्रीमती मेरी हार्डी रोजर, 170 पौण्ड की इस महिला को उसके कमरे में राख के ढेर के रूप में पाया गया। अवशेष के रूप में मात्र रीढ़ की हड्डी से चिपका गुर्दा, खोपड़ी, कुहनी व काला जूता पहने एक पैर ही बचा था। आश्चर्यजनक बात यह थी कि चार फट वर्ग से बाहर कुछ भी नहीं जला था। न ही कोई लपटें उठी थी। घटना की जाँच पड़ताल करने वाले जासूस एवं अग्निविशेषज्ञ कोई भी संभावित परिणाम बतलाने में असमर्थ रहे।
ऐसे ही एक घटना होनोलूलू द्वीप की एक महिला मिसेसज वर्जीना के साथ 7 दिसंबर, 1958 को घटी। इसकी गवाही देने वाली थी उनकी दंडासन 75 वर्षीय यंग सिकविम। इनके अनुसार मिसेज वर्जीनिया अचानक नीली आग की लपटों से घिर गयी। जब तक यंगसिक कुछ कर पाती मिसेज वर्जीनिया राख में बदल गयी। इसी तरह डॉ. जेडरविंग बेंटली अपने मकान के तहखाने में 15 जून 1966 की रात्रि 9 बजे के लगभग राख के रूप में पाए गए। इसके सर्वप्रथम दर्शक गवाह थे डॉ. गासनेल, जो अपने बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण सलाह लेने आए थे। आश्चर्यजनक बात यह थी कि डॉ. जेडरविंग की एक आधी आँग व घुटने के जोड़ नहीं जले थे। घटना के संदर्भ में एक अन्य विशेषज्ञ डॉ. ग्रेनोवल का कथन था कि मानव शरीर को राख में बदलने के लिए कम से कम 2200 डिग्री फारेनहाइट का तापमान 50 मिनट तक देना आवश्यक हो जाता है। किंतु घर में अधिकतम 500 डिग्री ही हो पाता है। एक अध्ययन
के अनुसार’ आटोकंबशन’ की अब तक इस तरह की 200 से अधिक घटनाएँ घट चुकी हैं।
चक्रवात की घटनाएँ भी यदाकदा होती रहती हैं, जो पेड़-पौधों से लेकर मकानों तक को उखाड़कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पटक देते हैं, लेकिन बवंडर यदि आग उगलने लगे तो? घटना 1869 के गर्मी के दिनों की है। एक अति उष्ण चक्रवात, एडशार्म के खेते में,, एटालैण्ड के पाँच मील दूर पास के जंगल से होता हुआ आया। यह साथ में छोटी टहनियों व पत्तों को भी अपनी चपेट में ले आया था। इनको जलाते हुए लपटों के साथ यह पाँच मील प्रति घंटे की गति से आगे बढ़ रहा था। इसके रूप की विकरालता भी भयंकर होती जा रही थी। मार्ग में यह तीन घेड़ों को भी अपनी चपेट में ले चुका था। इसी के साथ वह चक्रवात हरे जंगल में जा घुसा। जंगल की हरी पत्तियों को झुलसाते हुए बवंडर ने अचानक अपना रुख बदल दिया। अब यह सीधा नदी के ऊपर बढ़ रहा था। साथ में भाप के स्तंभ को उठाता हुआ ऊपर बादलों को छोड़ रहा था। लगभग आधे मील के बाद यह अंत में लुप्त हो गया। लगभग 200 लोगों ने इस अद्भुत घटना को देखा। ऐसी बात नहीं कि ये घटनाएँ मात्र विदेश में ही घटती हैं अपने यहाँ नहीं। अपने यहाँ के टनाक्रमों का ब्यौरा विधिपूर्वक रखा जाए, तो ऐसेअजूबे यहाँ भी कोई कम नहीं हैं, विदेश में इन्हें प्रामाणिक ढंग से संकलित करने का एक क्रम बना हुआ है।
क्रोध में आग उगलने की कहावत तो सुनी जाती है, लेकिन इनसानों की जगह पर्वत जैसी जड़ संरचना भी यदि एक दूसरे पर आग के गोले दागने लगे तो कैसा लगेगा? ऐसी ही आश्चर्यजनक किंतु सत्य घटनाओं का उल्लेख- भू-वेत्ता एल्सवर्थ हंटिगटन ने जुलाई 1900 में ‘वेटर रिव्यू’ मासिक में किया। वे भू-सर्वेक्षण के लिए पर्वतीय क्षेत्र में गए थे। स्थानीय लोगों से उन्होंने सुना कि यूकरेट्स नदी के आरपार फेक्लूजेक पर्वत व जिओरेट पर्वत वर्ष में कई बार आग के गोले बरसाते हैं। हंटिगटन महोदय को पहले तो विश्वास नहीं हुआ। लेकिन जब यही बात उन्होंने 10-12 व्यक्तियों से 40 मील के क्षेत्र में अलग- अलग स्थानों पर सुनी तो उन्होंने इसकी स्वयं परीक्षा करने की ठानी। एक दिन सच्चाई को अपनी आँखों से देखकर वह प्रकृति के इस अनोखे आश्चर्य को देखकर हैरत में पड़ गए। वह कहने पर विवश हुए कि इस तरह की रहस्यमयी घटनाओं को देख-सुनकर जहाँ रोमाँच होता है, वहीं इस सत्य का बोध भी होता है कि मानवीय बुद्धि की सर्वज्ञता का क्रम निराधार है। अभी उसे बहुत कुछ जाना शेष है।
अपने अनन्य आत्मीय प्रज्ञापरिजनों में से प्रत्येक के नाम हमारी यही वसीयत और विरासत है कि हमारे जीवन से कुछ सीखें। कदमों की यथार्थता खोजे। सफलता जाँचें और जिससे जितना बन पड़े, अनुकरण का, अनुगमन का प्रयास करें। यह नफे का सौदा है।, घटे का नहीं।
-परमपूज्य गुरुदेव-
विश्व में अनेकों धर्म-संप्रदाय प्रचलित है। हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, ताओ, कन्फ्यूशियस, जैन, बौद्ध, यहूदी आदि विभिन्न नामों से प्रचलित इन धर्म-संप्रदायों पर दृष्टिपात करने से यही पता चलता है। कि उनके बाह्य स्वरूप एवं क्रिया-कृत्यों में जमीन आसमान जितना अंतर है। क्रिया-कृत्यों में यह अंतर होना उचित है, उनकी छाप उन पर पड़ना स्वाभाविक है। मनीषी, अवतारी, महामानवों ने देश, काल व परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए श्रेष्ठता-संवर्द्धन एवं निकृष्टता-निवारण के लिए, जो सिद्धाँत एवं आचार-शास्त्र विनिर्मित किये, कालाँतर में वे ही धर्म-संप्रदायों के नाम से जाने-पहचाने लगे। इस कारण उनके बाह्य कलेवर में विविधता होना स्वाभाविक है। फिर भी जहाँ तक मौलिक सिद्धाँतों की बात है, वह सभी धर्मों में एक ही है। सभी ने एक चेतनासत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित करना मानव का अंतिम लक्ष्य स्वीकार किया है। यह वह सार्वभौम तत्व है, जो मानव समुदाय ही नहीं, समस्त प्राणियों को एकता के सूत्र में पिरोये हुए है।
सभी धर्मों का एक ही उद्देश्य है-पशुता पर नियंत्रण और देवत्व का विकास। यदि नीर-क्षीर विवेक-बुद्धि को अपनाया जाए, तो धार्मिक विभेदों के बीच एकता का यह सारतत्व पर्याप्त मात्रा में मिलेगा। धार्मिक, साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक सिद्धाँतों का निर्माण उच्च उद्देश्यों को लेकर ही किया गया है। यद्यपि देश काल-परिस्थिति के अनुसार उनमें कुछ ऐसे कारण हो सकते हैं, जिन्हें आज की परिस्थितियों में अनुपयुक्त समझा जाता है। ऐसी स्थिति में कई विधि-निषेध परिवर्तनीय बन जाते हैं।
समय-समय पर प्रत्येक देश में ऐसे संत-सुधारक, अध्यात्मवेत्ता, महामनीषी हुए हैं, जिन्होंने प्राचीन मौलिक, आदर्शमूलक उद्देश्यों-जो परिस्थिति में परिवर्तन आने से जनमानस के उत्पीड़न का कारण बन गए या अवाँछनीय प्रतीयमान हो रहे थे, उसे दूर करने के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया। वे धर्म-विद्रोही नहीं, अपितु धर्मसुधारक थे। संस्थापित रूढ़िवादी धर्माध्यक्षों ने संकीर्ण स्वार्थपरता के वशीभूत हो इन्हें धर्मद्रोही बताकर इनकी प्रताड़ना करने में भी कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखा है। बुद्ध, ईसा, महावीर, पैगंबर मोहम्मद, आचार्य शंकर, कबीर, मीरा, तुलसी, अल गझाली, र्जन संत-एकहार्ट, एविला की संत टेरेजा, ज्योर्ज फोक्स, फ्राँस के बरनाडिटी आदि को कितने कष्ट झेलने पड़े हैं, सर्वविदित है। त्याग, तपश्चर्या,बलिदान, सेवा-परोपकार की कष्टसाध्य प्रक्रिया को अपनाने में ऐसे महापुरुष आनंद संतोष व गर्व का अनुभव करते हैं। यह समष्टिमन का परिचायक है। सुगठित चरित्रनिष्ठा, मनस्विता, दूरदर्शिता, प्रगतिशीलता, तत्परता एवं साहसिकता, सुव्यवस्था के रूप में समष्टिमन की प्रौढ़ता का ही दिग्दर्शन होता है।
सुप्रसिद्ध विद्वान आदम क्ले ने अपनी कृति ‘मिस्टिक एण्ड मिलिटंट’ में कहा है कि धर्म व अध्यात्म निष्क्रियता नहीं सिखाता और न जो कुछ हो रहा है उसे देखते, सहते और करते रहने की प्रेरणा देता है। शाँति का अर्थ चुप बैठे रहना नहीं है। कर्तव्य और प्रगति की ओर से मुँह मोड़ लेने का अध्यात्मदर्शन के साथ संबंध जोड़ना ब्रह्मविद्या के महानतत्व पर लाँछन लगाना है। भेड़ें मिमियाती भर हैं, असत्य नहीं बोलतीं। खरगोश किसी की हिंसा नहीं करते, पर उन्हें न तो सत्यवादी कहते हैं और न अहिंसा-साधक। अंधे, बहरे, गूँगे न अशुभ देखते हैं, न अशुभ सुनते हैं, पर उन्हें ‘मुनि’ नहीं कहा जाता। गहन निद्रा की स्थिति में अशुभ क्रिया नहीं होती, तो क्या उसे पुण्यार्जन का समय कहा जा सकता है? वस्तुतः धर्म व अध्यात्म की प्रेरणा लौकिक और पारलौकिक सुख-सिद्धि के लिए कठोर श्रम एवं मनोयोग को नियोजित करना है। अशुभ आचारों को निरस्त करने के लिए घोर पुरुषार्थ करना पड़ता है। धार्मिकता-आध्यात्मिकता को उसी से जुड़ा हुआ मानना चाहिए। मानवी इतिहास इस बात का साक्षी है कि समय-समय पर सामने आने वाली विकृतियों, अवाँछनीयताओं का सामना करने और उन्हें निरस्त करने के लिए आवश्यक सूझ-बूझ का परिचय दिया जाता रहा है।
कार्लजुँग का कहना है कि जब तक धर्म के शुद्ध और अशुद्ध पक्षों का वर्गीकरण नहीं किया जाएगा, तब तक उसके पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ कहा जाता रहेगा। उसकी संतुलित विवेचना भी न हो सकेगी और न इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकेगा कि धर्म की उपयोगिता में कितना तथ्य है। यही कारण है कि कार्लमार्क्स जैसे विद्वान धर्म को ‘भावुकता का ज्वार’ मात्र समझ बैठते हैं। मनोवेत्ता फ्रायड ने भी अपनी पुस्तक ‘दफ्तर धर्म अवाँछनीय है। उसने तो यहाँ तक कहा है कि धर्म एक प्रकार की व्यापक दिमागी बीमारी है। वस्तुतः यह भूल इसीलिए हुई है कि धर्म की अनुभूति का आधार मात्र भावना नहीं, वह प्रज्ञा है जिसमें भावना एवं विवेक दोनों का ही अद्भुत सम्मिश्रण है। प्रज्ञा भावुकता नहीं है।
मूर्धन्य मनोवेत्ता विलियमजैम्स के अनुसार उलटे-सीधे कर्मकाँडों तथा प्रथा-प्रचलनों को अलग रखकर देखा जाए, तो धर्म विशुद्ध रूप से नीतिशास्त्र है। उसमें समाहित नागरिकशास्त्र और है। उसमें समाहित नागरिकशास्त्र और समाजशास्त्र के अस्तित्व को इनकार करना ऐसा है जैसे सीप-घोंघों को समुद्र-संपदा मान बैठना भूल है। आगे वे कहते हैं कि धर्म के मूल तत्वों को भूलकर जो स्थानीय ढोंगियों में खो जाते हैं, वह ही धर्म बदनाम करते है। पूर्वजों के कुछ आचरण और निर्देश अपने समय में ठीक समझे और कहे जाते हों, पर बदली हुई परिस्थितियों में उनका यथावत बने रहना विवेकसम्मत नहीं है। वास्तव में धर्म का मूलतत्व, दर्शन ही है। उसके आचरण में अंतर होते रहते हैं। यदि तत्व को भुलाकर किसी समय के धर्माचरण को ही मुख्य मान लिया जाए अथवा अमुक धर्मप्रवर्तक की उक्तियाँ अथवा गति-विधियों को सनातन मान लिया जाए, तो फिर धर्म प्रतिगामी ही बन जाएगा और कालाँतर में विकृत होकर विग्रह ही उत्पन्न करेगा।
मनोवेत्ताओं के अनुसार चेतन मन की परतों के नीचे दो और मन हैं-अतींद्रिय मन और समष्टिगत मन-समष्टिगत मन विश्वात्मा कह सकते हैं। चेतन मन के स्वरूप और स्वभाव से सभी लोग परिचित हैं। उसे सुयोग बनाने के लिए अध्ययन, अनुभव, परामर्श आदि को अपनाया जाता है। अचेतन मन की गरिमा और उसमें सन्निहित अकूत संभावनाओं का पता लगाने के लिए मनःशास्त्री जितने गहरे उतरते जाते हैं, उतना ही यह अनुभव करते हैं कि इस रत्नागार में छिपी बहुमूल्य संपदा इतनी अपार और असीम है, जिसकी कल्पना तक करना कठिन हैं।
अतींद्रिय मन वे समस्त संभावनाएं विद्यमान हैं जिनका योगी, तपस्वी तथा सिद्धपुरुषों के चमत्कारों एवं सिद्धि-साधनों के संदर्भ में वर्णन किया जाता है। समष्टिगत मन अर्थात् विश्वात्मा प्राणिमात्र में जो एक ही दिव्य ज्योति विभिन्न रंग-रूपों और आकार-प्रकारों में जल रही है, इसका दर्शन करता है। सामूहिक सद्भावना, प्रेम आदि जैसी उच्च सद्प्रवृत्तियाँ इस स्तर के प्रस्फुरण से विकसित होती है। अतींद्रिय और समष्टि मन की अंतःस्फुरणाओं के प्रभाव से ही धार्मिक व्यक्ति ऋषि, द्रष्टा, तत्वज्ञानी, देवदूत आदि बनता है। समष्टि मन का प्रभाव ही समाजसेवा, लोकमंगल, चरित्र-निर्माण के रूप में देखा जाता है। इसे ही धर्म का सच्चा स्वरूप माना जा सकता है, जिसे कर्तव्य-परायणता के रूप में परिभाषित किया गया है। ऐसी कर्तव्यपरायणता जो मनुष्य को व्यक्तिगत संकीर्ण दायरे से निकालती तथा समष्टि की ओर चलने, उससे बँधने की प्रेरणा देती है। सचमुच ही गंभीरता एवं सूक्ष्मदृष्टि से विचार किया जाए, तो स्पष्ट होगा कि धर्म के मूल में वही प्रेरणाएँ परोक्ष रूप से उद्भासित होती हैं। आचरण की श्रेष्ठता, विचारों की उत्कृष्टता तथा भावनाओं की पवित्रता ही धर्म का व्यावहारिक लक्ष्य है। यही अपनी चरमसीमा पर पहुँचकर उन अलौकिक अनुभूतियों का मार्ग प्रशस्त करता है, जिसे मनोवेत्ता अतींद्रिय मन और समष्टिमन की अचल गहराइयों में झाँकते दृष्टिगोचर होते हैं और तत्ववेत्ता ईश्वरानुभूति के रूप में अंतस्तल में अनुभूत करते हैं।
वस्तुतः अपने विराट स्वरूप में धर्म उतना ही व्यापक है जितना कि यह विश्व। जीवन का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं जो धर्म के अंतर्गत न आता हो। ऐसी कोई भी विद्या नहीं है, जहाँ धार्मिकता, कर्तव्यपरायणता उच्चस्तरीय आदर्शवादिता की आवश्यकता न हो। चाहे वह राजतंत्र हो, अर्थतंत्र हो अथवा समाजतंत्र, नीतिमत्ता, कर्तव्यपरायणता, अनुशासन, सहकार के बिना व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक किसी भी जीवन की आधारशिला सुदृढ़ नहीं बनी रह सकती। धर्म को अभी कारण समाज के स्थायित्व की धुरी कहा गया है, जिसके धारण किए जाने से समाज की-सारे समूह की रक्षा होती है, धर्म अपने शाश्वत रूप में हर समय के लिए, हर समाज के लिए अनिवार्य है, प्रगति का मूल आधार है। उसकी अवमानना-उपेक्षा कभी भी नहीं की जानी चाहिए।
जिसने यह संसार बनाया है, उसने यह अंकुश भी हाथ में रखा है कि जब मर्यादा उल्लंघन चरम सीमा तक पहुँच जाए और लोग विवेक खोकर अनाचार अपनाने पर ही उतारू हो जाएँ, तो उनकी खोज-खबर ली जाए, काबू में लाने के लिए कठोरता भी अपनायी जाए। उलटी चाल चलने वाले को कड़ाई अपनाकर सीधा चलने के लिए बाधित किया जाए। इन दिनों ऐसा ही हो रहा है। प्रस्तुत विपत्तियों को देखते हुए लोगों को यह समझने के लिए बाधित किया जा रहा है कि सही रीति का परित्याग करने पर उन्हें कितनी विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। 600 करोड़ व्यक्तियों के लिए जहाँ स्रष्टा ने ने समुचित साधन जुटाने की दया दिखाई है, वहाँ उन्हें यह भी करना पड़ा है कि उनके किए के लिए समुचित दंड व्यवस्था भी विद्यमान हो। सर्वविदित है कि ऐसे कृत्य को निर्दयतापूर्ण ही कहा जाएगा, पर व्यवस्था तो व्यवस्था ठहरी। इन दिनों बारीकी से देखने पर यह भलीभाँति समझा जा सकता है कि पिछले दिनों जो अनाचार अपनाया जाता रहा है, उनकी प्रतिक्रिया कितनी कटु और भयंकर हुई है।-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य (वांग्मय ग्रंथ क्र. 29 पृष्ठ 13)
सर आर्थर सी क्लार्क एक विश्वविख्यात अंतरिक्ष वैज्ञानिक और दूरद्रष्टा रहे हैं। उन्होंने विज्ञानसम्मत भविष्यविज्ञान की विधा फ्यूचरालॉजी पर कई किताबें लिखीं हैं। अपनी एक पुस्तक ‘सेंचरी सिण्ड्रोम’ का उल्लेख करते हुए पिछले दिनों कोलंबो में हुए एक विश्वस्तरीय एशियाई इलेक्ट्रानिक्स यूनियन (ए. ई. यू.) के सोलहवें सम्मेलन को संबोधित करते हुये उन्होंने कहा कि वे पहले भी अपनी पुस्तक में लिख चुके हैं वह अब भी यही कहते हैं कि कुछ अंतरिक्षीय घटनाक्रम ऐसे घट रहे हैं कि आगामी दो वर्ष बड़ी कठिनाई से कटेंगे। 1999 के विषय में उनका कहना है कि मौसम की विभीषिकाओं से प्रायः सारे विश्व को प्रभावित होना पड़ सकता है-साथ ही विश्वमानस को भारी अराजकता-अनिश्चितता के दौर से भी गुजरना पड़ सकता है। सम्मेलन में उनने यह कहा कि सन् 2000 ‘नाराज सूर्य का वर्ष’ होगा एवं इसकी षुरुवात अगस्त, 1999 में आ रहे खग्रास सूर्यग्रहण से हो जाएगी। इस भविष्यवाणी का आधार वे अंतरिक्षीय उपग्रहों से आ रहे आँकड़ों के साथ-साथ यह भी बताते हैं कि सन् 2000 में सूर्य के ग्यारहवें चक्कर का ग्यारहवाँ वर्ष होगा। सूर्य की गर्मी से वातावरण काफी गर्म हो जाएगा, जिससे हिमखंडों के पिघलने से जलप्रलय होने तक की संभावनाएं हैं।
श्री क्लार्क का मतह कि सौरकलंकों की बाढ़ एवं सौरज्वालाओं के प्रभाव से दुनिया भर में भारी तबाही व नुकसान हो सकता है एवं प्रलयंकारी दैवी-विभीषिकाओं के लिए सन् 2000 को ऐतिहासिक माना जाए। वे 1998 में सारे विश्व में ‘अलनीनो’ ‘लनीना’, के प्रभावों से हुए मौसम की बड़े व्यापक स्तर पर तापमान में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी को, विशेषतर ठण्डे माने जाने वाले यूरोपीय-कनाडा-अमेरिका के क्षेत्रों में, एक चेतावनी वाला चिह्न मानते हुए कहते हैं कि मनुष्य को इससे सबक लेना चाहिए। उपग्रहों के अध्ययन व अपनी अंतर्प्रज्ञा का विज्ञान से सुनियोजन कर भवितव्यता का आकलन करने वाले श्री क्लार्क ने 1999 में प्रकाशित अपनी उपर्युक्त पुस्तक में पहले ही ‘मिलेनियम बग’ का संकेत कर दिया था-यह यहाँ उल्लेखनीय है। ‘बायूट के’ नाम से चिर−परिचित समस्या पर प्रायः छह सौ अरब डॉलर खर्च होने जा रहे हैं एवं अभी तक समाधान नहीं मिला है कि कम्प्यूटर जनवरी, 2000 को काम करना बंद कर देंगे, तो क्या होगा? श्री क्लार्क का कहना है कि जब उन्होंने चेताया था, तभी से काम आरंभ हो गया होता तो काफी खर्च बचाकर समाधान खोजा सकता था।
श्री क्लार्क की उपर्युक्त भविष्यवाणी को यदि ‘नोस्ट्राडेमस 1999’ जिसके लेखक श्री स्टीफेन पाँलस हैं व जिनकी 1999 में संभावित विभीषिकाओं के संबंध में चर्चा विगत अंक में ‘कहीं हम महाविनाश की ओर तो नहीं बढ़ रहे।’ पृष्ठ 7, 8 अखण्ड ज्योति मार्च, 1999 शीर्षक लेख में की गयी थी, को सामने रखकर अध्ययन करें, तो लगता है कि इस महान भविष्यद्रष्टा ने तो यह आकलन आज से चार सौ वर्ष पूर्व ही कर लिया था। नोस्ट्राडेमस ने भी इन विभीषिकाओं की चर्चा सूर्य व अंतरिक्षीय परिस्थितियों से जोड़कर ही की है। नोस्ट्राडेमस पर बड़ा विषद अध्ययन कर सारी परिस्थितियों का आकलन कर अपना षोधप्रबंध लिखने वाले स्टीफेन पाँलस का कहना है कि भगवान करे वह न हो जो नोस्ट्राडेमस ने 1999 व सन् 2000 के लिए लिखा है। अगस्त 99 में आ रहा रहा सूर्यग्रहण सामान्य क्रम की तरह गुजर जाए, कोई उल्का आकर पृथ्वी से न टकराये एवं विश्वभर का पर्यावरण जो तेजी से बिगड़ा है, सुधर जाए। आशावादी स्तर पर सोचते हुए वे लिखते हैं कि भोज्यपदार्थों में खाद्यान्न-में हो रही तेती से कमी, समाज में बढ़ती हिंसा, तृतीय विश्व के देशों में युद्धोन्माद की प्रक्रिया का देखा जाना, अणु-आयुधों की भरमार, ग्रीनहाउस प्रभाव, पर्यावरण में विषैली गैसों का बढ़ते जाना, अमर्यादित प्रजनन से जनसंख्या विस्फोट, नैतिक पतन एवं राष्ट्रीय स्तर पर शासनतंत्रों की प्रायः सारे विश्व में असफलता क्या कम विभीषिकाएँ हैं, जिनसे हमें नहीं डरना चाहिए। कुछ भी हो लेखक की चिंता अपने स्तर पर सही हैं व जिस तरह नोस्ट्राडेमस की भविष्यवाणियों के साथ पिछली 4 शताब्दियों के घटनाक्रम जुड़े हैं, आगामी डेढ़-दो वर्षों का समय कुछ सही नहीं है-बड़ी अशुभ सींवनाओं-अप्रत्याशित घटनाक्रम से भरा हुआ प्रतीत होता है।
पुनः नोस्ट्राडेमस’ के बारे में और बताना चाहेंगे जो 1917 में प्रकाशित हुई थी। इसके लेखक हैं डेविड ओवासन। सेंचुरी बुक्स, लंदन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के कई संस्करण छप चुके हैं मात्र विगत डेढ़ वर्ष में। इससे ज्ञात होता है कि विश्वमानस आगत की भवितव्यता के विषय में कितना चिंतित है व जानने की जिज्ञासा रखता है। इस पुस्तक में कम्प्यूटर तकनीकी का सहारा लेकर पहली बार सारी भविष्यवाणियों का प्रमाणीकरण करने का प्रयास किया गया है। जहाँ इस पुस्तक में 1600 से 1900 तक की सारी भविष्यवाणियों का विज्ञान-सम्मत विश्लेषण है, वहीं पर इस दिव्यद्रष्टा मनीषी की सन् 2000 व इसके बाद की संभावित घटनाओं पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया है। नोस्ट्राडेमस ने ग्रह-नक्षत्रों की, बृहस्पति व शनि की युति को सदी के प्रारंभ व अंत दोनों में पहले से पढ़कर अपने क्वाट्रेन 9/83 में इनसे जुड़े घटनाओं का विवरण अपने काव्य में किया है। उनके अनुसार जुलाई, 1999 से आरंभ होने वाले घटनाक्रम मई सन् 2000 तक चलेंगे एवं इनमें काफी तबाही होने की संभावना है। क्वाट्रेन 10/72 जो कि सर्वप्रसिद्ध है, में जुलाई, 99 में किसी अप्रत्याशित अंतरिक्षीय घटनाक्रम से धरती के प्रभावित होने का वर्णन है। यदि फ्रेंच में लिखी इस कविता की चतुष्पदी का अनुवाद किया जाए, तो कुछ इस प्रकार होगा-
समझ पाया हूँ - यह नये युग के अवतरण की वेला में, जिसमें दुर्बुद्धि और सद्बुद्धि के समर्थक विचारों में पारस्परिक युद्ध होगा, इस सीमा तक कि सींवतः महाविनाश समीप ही दिखने लगे, तब सद्बुद्धि के समर्थक विचारों की विजय होगी- भोगवाद के समर्थक नष्ट होंगे एवं चारों ओर सतयुग का प्रकाश फैल जाएगा, जिसकी अवधि वे सन् 2242 तक की बताते हैं। हो सकता है कि 1999 व 2000 की इस अवधि में कुछ रक्तपात भी हो, पारस्परिक तनाव भी चरम सीमा पर हो एवं यह वैश्विक स्तर पर हो तब भी जो कुछ होगा वह चौथी पंक्ति के अनुसार एक डेढ़ वर्ष में ही ठीक हो जाएगा, मात्र व्यक्ति को अपने विचारों को अंतरिक्षीय दुर्बुद्धि प्रधान विचारों के प्रभामंडल से बचाए रखना है एवं इसीसे वे उस महाविनाश की चपेट में आने से बच पाएँगे। इसके बाद अच्छा भविष्य आने वाला है एवं यह विशिष्ट युति आयी ही समस्त सभ्यताओं को एक कर संस्कृत बनाने, ऐसा समीक्षक श्री ओवासन का मंतव्य है।
प्रस्तुत चतुष्पदी जिसका ऊपर उल्लेख किया गया, फ्रेंच मूल में एक शब्द है, जो सबसे अंत में आया हैं- ‘बोनहेर’। इसमें बोन का अर्थ है शुभ-सद्भाव जगाने वाला तथा हेर का अर्थ है समय का देवता अर्थात् महाकाल।
चतुष्पदी में नोस्ट्राडेमस ने लिखा है कि शुभ सद्भाव जगाने वाला महाकाल जो समय पर शासन करता है-ही इस परिवर्तन को अंजाम देता है।
कितना सटीक विवेचन एक भविष्यवक्ता ने किया आज की परिस्थितियों का। आज जब सारा विश्व एक ऐसे मुहाने पर आ खड़ा हुआ है जहाँ महाविनाश सुनिश्चित दीखता है, मानवकृत कुबुद्धिजन्य प्रयासों से, भोगवादी लिप्सा से, सब दैवी विभीषिकाओं से-तब कलियुग का देवता महाकाल-महारुद्र-भगवान शिव ही विचारों को बदलने का कार्य करेंगे। परमपूज्य गुरुदेव ने यह तथ्य अपनी अखण्ड ज्योति पत्रिका में आज से प्रायः बत्तीस वर्ष पूर्व 1967 में ही लिख दिया था। जब उन्होंने महाकाल की युग-परिवर्तन प्रक्रिया के विस्तृत चरणों की घोषणा की थी। जब कोई परिवर्तन की बात नहीं सोच सकता था, तब उन्होंने लिखा था- “महाप्रलय करोड़ों वर्ष बाद होती है, पर युगपरिवर्तन के अवसर पर खंडप्रलय जैसा एक भयानक विस्फोट प्रायः होता रहता है। यह महाकाल के खंड नर्तन हैं, यों इन्हें भी ताँडव नृत्य ही कहा जाता है। संयम और नम्रता का पाठ पढ़कर सज्जनोचित प्रवृत्तियाँ मनुष्य अपनाए, ऐसा दिन वे लाने ही वाले हैं। वह शुभ दिन शीघ्र लाने वाले त्रिपुरारि-महाकाल आपकी जय हो! विजय हो।”
हम निश्चित रूप से इन दिनों विषम परिस्थितियों के बीच रह रहे हैं। पौराणिक विवेचन के अनुसार इसे असुरता के हाथों देवत्व का पराभव होना कहा जा सकता है। कभी हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यप, वृत्तासुर, भस्मासुर आदि ने आतंक उत्पन्न किए थे और देवताओं को खदेड़ दिया था। आलंकारिक रूप से किया गया वह वर्णन आज की परिस्थितियों के साथ पूरी तरह तालमेल खाता है। रावण और कंस कल की परिस्थितियों के साथ आज के वातावरण की तुलना करते हैं, तो पुनरावृत्ति स्पष्ट परिलक्षित होती है। इन दिनों शासक वर्ग का ही आतंक था, पर आज तो राजा-रंग, धनी-निर्धन, शिक्षित-अशिक्षित सभी एक राह पर चल रहे हैं। छद्म और अनाचार ही सबका इष्टदेव बन चला है। नीति और मर्यादा का पक्ष दिनों-दिन दुर्बल होता जाता है। उपाय दो ही हैं-एक यह कि शुतुरमुर्ग की तरह आँखें बंद करके भवितव्यता के सामने सिर झुका दिया जाए, जो होना है उसे होने दिया जाए। दूसरा यह कि जो सामर्थ्य के अंतर्गत है, उसे करने में कुछ न उठा रखा जाए। -पं. श्रीराम शर्मा आचार्य (वाङ्मय ‘क्र. 28 पृष्ठ 1.14)
राजा भोज का दरबार लगा हुआ था। कवि, गायक, सभासद, राजगुरु सभी अपने-अपने स्थान पर आसीन थे। भरी सभा में राजा ने सभासदों के सामने प्रश्न उछाला- “ज्ञान का विशेष निवास कहाँ?” प्रश्न सुनने वाले सब-के-सब राजाश्रित थे। वे जिस किसी तरह महाराज को प्रसन्न रखना चाहते थे। सो उन्होंने चापलूसी भरा जवाब दिया-”ज्ञान का चिरस्थान राजदरबार, महल और हवेलियाँ हैं। यहीं ज्ञान का निवास है। गरीबों के पास न तो बुद्धि है और न ही धन।”
ज्ञान की इस चर्चा को सुनकर दरबार की सजावट करने वाले माली ने राजा से निवेदन किया-”अन्नदाता, मेरी तो सारी उम्र बीत गयी, पर मैंने तो कोई ज्ञान की बगीची या स्थान न तो आँखों से देखा है और न कानों से सुना है। हाँ, अगर आपको प्रकृति की लीला देखनी हो तो मेरी बगीची पर पधारिए।”
महाराज के क्षणभर के लिए कुछ सोचा और तत्काल माघ पंडित को साथ ले उसकी बगीची देखने चल दिए। उज्जैन से दस मील दूर उस बगीची के निरीक्षण के समय उन्होंने माली को अपने साथ चलने से मना कर दिया। राजा अकेले वहाँ घूमते रहे और अंत में लौटते समय रास्ता भूल गए। वहीं कहीं गेंजू के खेत के पास उन्हें एक बुढ़िया मिली। धवलकेश, शरीर झुका हुआ, हिलते हाथ-पैर, डगमग करती गर्दन। वह चिड़ियों से अपने खेत की रखवाली कर रही थी।
राजा और माघ पंडित ने बुढ़िया को राम-राम किया। तत्पश्चात उन्होंने हाथ के इशारे से बुढ़िया से पूछा-”माँ, यह रास्ता कहाँ जाता है?”
राजा के इन प्रश्न को सुनकर बुढ़िया मुसकराई। फिर बोली- “बेटा यह रास्ता तो जहाँ-तहाँ ही रहेगा, पर इस पर चलने वाले मुसाफिर अवश्य ही जाते हैं। पर तुम कौन हो?”
उन्होंने कहा- “माँ हम तो बटोही हैं।”
हिलती गर्दन को थोड़ा और हिलाकर अस्वीकार के स्वर में बुढ़िया ने कहा-”नहीं राह के बटोही तो दो दूसरे हैं।” माघ पंडित को बुढ़िया की इस बात पर अचरज हुआ। उसने अपनी शंका के समाधान के लिए पूछा- “माँ, वे कौन हैं?
“एक चाँद और दूसरा सूरज। वे रात-दिन चलते हैं। पलभर के लिए भी नहीं रुकते। बटोही तो ये हैं, पर तुम कौन हो? “हम तो मेहमान हैं।” उन्होंने जवाब दिया। “ नहीं, मेहमान तो दो दूसरे हैं। एक धन और दूसरा यौवन। धन और यौवन को जाते समय नहीं लगता। मेहमान तो यह हैं। पर तुम बताओ, तुम हो कौन?”
“माँ हम तो परदेशी हैं?”“नहीं परदेशी तो दो दूसरे हैं।” वृद्धा ने गंभीरतापूर्वक कहा-”एक जीव और दूसरा पवन। जीव नौ नाड़ी और बहत्तर कोठों में समाया है, पर दिखता नहीं। पवन के ऊपर की यह शरीर निर्भर है। पर बेटा तुम कौन हो?” “माँ हम तो छैल-भँवर हैं?” बुढ़िया ने उसी लहजे में नकारते हुए कहा-”मुझे तो तुम छैल–भँवर नजर नहीं आते। एक छैल-भँवर अन्न है तो दूसरा पानी। इन दोनों के गले उतरने पर ही मस्ती सूझती है। दो दिन भी अगर ये न मिलें, तो सब मस्ती गायब हो जाती है। तुम छैल-भँवर किस प्रकार हो?”
इस पर उन्होंने कहा-”हम तो निर्बल हैं।” इस पर बुढ़िया ने कहा-”नहीं, तुम तो निर्बल नहीं दिखते। निर्बल तो दूसरे ही हैं। एक भेड़ और दूसरा भिखारी। भेड़ न तो किसी को सताती है और न किसी पर वार करती है। मारने पर भी कुछ नहीं करती। भिखारी को सभी दुत्कारते हैं, उसका किसी से कुछ बस नहीं चलता। निर्बल तो वे हैं। बेटा सच बताओ तुम कौन हो?”
राजा को बुढ़िया की बातों में आनंद आ रहा था। वह उसका ज्ञान परखने के लिए बोला-”माँ हम तो ठग हैं।” वह बोली-”ठग तो ठाकुर और साहूकार दोनों हैं। ठाकुर दूसरों से बेगार लता है और मुफ्त में माल उड़ाता है। साहूकार एक का इक्कीस बनाता है। दो-दो खाते लिखता है और साहूकार कहलाता है। दुनिया में इन दोनों से बड़ा ठग कौन है। ठगाई भी करते हैं और बड़े भी कहलाते हैं। पर तुम कौन हो?”
“माँ, हम तो चोर हैं।” “चोर भी तुम नहीं हो। एक चोर तो है गुरु और दूसरा वैद्य। एक अज्ञान चुराता है, तो दूसरा शरीर की बीमारी। धन और वस्तु की चोरी करने वाला चोर थोड़े ही कहलाता है। मुझे क्यों सताते हो? बताओ बेटा तुम कौन हो?”
“माँ, हम तो जिद्दी हैं।” “अरे बेटा तुम क्या जिद करोगे? जिद्दी तो दो दूसरे ही हैं। एक नख और दूसरा केश। नाखुन और बालों को कितना ही काटो तो भी ये तो बढ़ेंगे ही। क्या तुम इनकी तरह जिद निभा सकते हो। बेटा! थ्जद निभाना कोई सरल काम नहीं है।” “माँ हम तो मतवाले हैं।” “भक्त और ज्ञानी इन मतवालों को देखा है कभी?”-वृद्धा ने दृढ़ता से कहा-”ये दोनों आठों पहर भक्ति और ज्ञान के नशे में डूबे रहते हैं। पीने पर नशा चढ़े और थोड़ी देर में उतर जाए ये नशे में नशा थोड़े ही है। बिना पिए नशा चढ़े और जिंदगी भर न उतरे, वह सच्चा नशा है। तुम इनमें से कौन से मतवाले हो?”
“माँ, तुम मान लो कि हम झूठे हैं।” “झूठे भी तुम नहीं। एक झूठा तो है संत और दूसरा नास्तिक। संत कहता है-मैं भगवान का भेद जानता हूँ और नास्तिक कहता है-भगवान है ही नहीं। मेरे ख्याल से तो इनसे झूठा दुनिया में दूसरा नहीं। झूठा होते हुए भी सच्चे कहलाते हैं, ये ही तो असली झूठे हैं तुम न तो झूठ जानते हो, न सच। मेरे से क्यों मजाक कर रहे हो? सच बताओ बेटा तुम कौन हो?”
राजा ने सोचा इस बार शायद वृद्धा मान जाएगी। खुद ही हमें मजाकिया बता रही है, फिर किसलिए मना करेगी। उसने कहा-”माँ, हम तो मजाकिया है।” बुढ़िया ने फिर उसी लहजे में नकारते हुए कहा-”मजाकिया तो दो दूसरे ही हैं। एक रूप और दूसरी शक्ति। दोनों ही अतुल मजाक करके बुढ़ापे में जम जाते हैं। यह दंतहीन मुख, सलवटें भरा विकृत चेहरा, दुहरी कमर, यह क्या कम मजाक है। भरी जवानी में सोचते हैं कि हम आकाश को मुट्ठी में भर लेंगे, पर वृद्धावस्था में मुँह की मक्खी भी नहीं उड़ती। मेरा हुलिया देखकर क्या तुम्हें पता नहीं चलता कि इन मजाकियों ने मेरे साथ क्या गुजारी है?”
बुढ़िया तो किसी बात में कम नहीं पड़ती। आज वे दोनों उज्जैन का मार्ग तो भूले सो भूले, मानो ज्ञान और विद्या के सभी रास्ते भी भूल गए। वर्षों का घमंड क्षणभर में उतर गया। राजा को विचारमग्न देख माघ पंडित ने कहा-”हम तो ज्ञानी हैं।” यह बात सुनते ही बुढ़िया ने बायें हाथ से माथे पर छज्जा-सा बनाते हुए कहा, “तुम ज्ञानियों की सूरत तो देखूँ।” बारी-बारी से दोनों को देखने के बाद वह बोली-”ज्ञान तो तुम्हारे से कोसों दूर पर भी नहीं। पर बेटा, इसमें तुम्हारा दोष नहीं। ज्ञानी आज तक इस दुनिया में विरले जन्मे हैं और मिलते नहीं। हथेली में रोम मिलें तो ही मनुष्यों की दुनिया में ज्ञानी मिलें।
बुढ़िया की इतनी बातें सुनकर भी राजा और माघ पंडित को गुस्सा नहीं आया। उन्होंने कहा “माँ, हम तो सहनशील हैं।”
कोई बात मानने के लिए तो मानो बुढ़िया का जन्म ही नहीं हुआ था। उसने कहा-”ना, तुम्हें सहनशील कौन कहता है। सहनशील तो दो दूसरे हैं। एक धरती दूसरा वृद्ध। धरती पापी-अधर्मी सभी का भार ढोती है। उसकी छाती को फोड़कर बीज डालो तो भी वह बीजों का विनाश न करके अन्न से कोठियाँ भरती हैं। कलेजे में गहरे-गहरे गड्ढे खोदने पर भी वह मीठा पानी और हीरे-मोती जैसे अमूल्य खजाने सौंपती है और वृक्ष का पत्थर मारो तो वह मीठे फल देता है, तुम्हारे लिए छाया करता है। सहनशील ये हैं। तुम्हारी बातों-ही-बातों में मेरी तो खेत की रखवाली ही बिखर गयी। चिड़ियों ने बहुत-सा खेत उजाड़ डाला।”
गोफण का एक पटाखा छोड़कर बुढ़िया फिर से उनके सामने आ गयी। इस बार राजा ने कहा-”माँ, हम तो शीतल हैं।” वृद्धा ने रहस्यमयी मुसकान बिखेरते हुए कहा, “ना, शीतल तो दूसरे हैं। एक अग्नि और दूसरा ताप।” बुढ़िया के मुँह से यह उलटी ही बात सुनकर दोनों चित्रलिखे से रह गए। बुढ़िया ने उनको सचेत करते हुए कहा-”यों कब तक अचरज करते रहोगे। तुमने अभी जाना ही क्या है। तुम्हें अभी बहुत कुछ समझना है, बहुत कुछ जानना है। हाँ तो मैं क्या कह रही थी कि दुनिया में शीतल वस्तुएँ दो हैं। एक अग्नि दूसरा ताप। अग्नि पेट की ज्वाला शांत करती है और धूप बेशुमार धान उगाकर दुनिया की दाह को दाह को हिमवत् करती है। शीतल नाम तो इनका है, तुम कौन हो?”
साधु के अलावा इतनी बातें कौन सह सकता है? यह सोचकर राजा ने कहा-”माँ, हम तो साधु हैं।” पर बुढ़िया माने जब, उसने कहा-”एक संतोषी और दूसरा अनजान साधु तो ये हैं। जिस मनुष्य को दुनिया में किसी बात का लोभ नहीं, न धन का, न यश का, न वैभव का, न मान का वह साधु है। पूरा ज्ञानी मनुष्य ही इस तरह का संतोषी हो सकता है या फिर निपट अनजानफ साँझ होने को आयी, लेकिन तुमने मेरी मामूली-सी बात का जवाब नहीं दिया।”
अब तो बुढ़िया के सामने हार मानने में ही भलाई है। यह सोच माघपंडित ने कहा”माँ, हम तो निपट मूर्ख हैं।”
यह बात सुनते ही बुढ़िया ने स्वीकृतिसूचक गर्दन हिलाई। कहा “इतनी देर मगजमारी करने के पश्चात अब तुमने सच्ची बात बतायी। दुनिया में मूर्ख केवल दो ही हैं। एक तो राजा और दूसरा दरबारी पंडित। बिना किसी गुण और बुद्धि के राजा अपने आपको ईश्वर के बराबर मानता है और राजा के इस सफेद झूठ को दरबारी पंडित ज्ञान के थोथे हवाले देकर सत्य साबित करने की चेष्टा करता है। मूर्खों की यही तो असली पहचान है कि सर्वथा अयोग्य होते हुए भी स्वयं को श्रेष्ठ मानना और लोभ की खातिर छोटे को बड़ा कहकर दिखाना।”
फिर वह राजा की तरफ देखकर कहने लगी, “तुम तो राजा भोज और यह है माघपंडित। मुझे क्यों घास चरा रहे हो। मैंने राजदरबार में मुफ्त का माल खाकर अपनी जिंदगी व्यर्थ थोड़े ही गँवाई है। मैं अपनी ही आँखों से देखती
हूँ और अपने ही कानों से सुनती हूँ। राजसत्ता के आश्रित दूसरों की आँखों से देखते हैं, दूसरों की बुद्धि से सुनते हैं। जो श्रमशील हैं, चिंतनशील हैं, उन्हें मूर्ख होना सुहाता नहीं। यह मूढ़ता तो निकम्मों के लिए ही ठीक है।”
यह सुनने पर माघ पंडित को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा-”ये सब तो धोखे की अटकलबाजियाँ हैं। मैं सवाल पूछूँ और तुम इसका सही जवाब दो, तो पता चले कि तुम ज्ञानी हो।”
पंडित की यह बात सुनते ही बुढ़िया को हँसी आ गयी। हँसते हुए ही वह बोली- “मुझे ज्ञान से कमाना ही क्या है। मैं तो अपने हाल में मस्त हूँ। अपने ज्ञान को तो वे बखानते हैं, जिनको कुछ पूछना तो पूछ ले। मुझे पता होगा तो बता दूँगी नहीं तो मना कर दूँगी। बेचारा छोटा-सा नटखट मनुष्य अनंत ब्रह्माँड को कितना नाप सकेगा। जानने की भ्राँति उसे अवश्य हो सकती है।”
माघ पंडित ने खूब सोच-विचार कर पूछा-”अच्छा ये बताओ, आकाश से ऊँची चीज क्या है?”
प्रश्न सुनते ही वृद्धा हँस पड़ी। बोली-”खोदा पहाड़ निकली चुहिया। इतना माथा खपाने के बाद भी अंत में यह सवाल पूछा, जिसका जवाब देने में भी लाज आती है। मैं अपनी पोती को बुलाती हूँ ऐसी पहेलियाँ उससे पूछना।” खेत के पार मेड़ पर एक जगह छाया थी। बुढ़िया ने हाथों के कंगन को ऊँचे चढ़ाकर मुँह के चारों ओर घेरा बनाकर जोर से दो-तीन आवाजें दीं। थोड़ी देर में एक छोटी-सी लड़की उछलती-कूदती अपनी दादी के पास आ गयी। वह अजनबी व्यक्तियों की तरफ टुकुर-टुकुर देखने लगी।
राजा भोज उस छोटी-सी पड़की को देखकर सोचने लगे कि उज्जैन का मार्ग तो वे चाहे जिससे पूछकर मालूम कर लेंगे, पर ज्ञान का मार्ग कब और कैसे पता चलेगा। इतने दिन ज्ञान और विद्या के जिन निर्बाध खुले राजपथों पर वह अभिमान के साथ सीना ताने अप्रतिहत गति से सरपट भागे जा रहे थे, वे सभी राजपथ तो अज्ञान की सँकरी और धुँधली पगडंडियाँ मात्र निकले।
बुढ़िया माघ पंडित की तरफ देखकर बोली-”मैं तो इतनी देर में तेरा प्रश्न भूल गयी, इससे फिर पूछना।”
माघ पंडित ने बुढ़िया की पोती की तरफ देखकर पूछा, “बता बेटी आकाश से ऊँची चीज इस दुनिया में क्या है?” बच्ची ने अपने माथे पर हाथ धरकर कहा-”आकाश से ऊँचा यह माथा है। आकाश तो सबको दीखता है, पर यह कब दिखता है? इससे माथा ऊँचा हुआ कि नहीं।”
माघ पंडित ने दूसरा सवाल किया, “पाताल से गहरा क्या है?” बच्ची ने जवाब दिया-”पाताल से गहरा है पेट। दोनों समय भरो, फिर भी खाली का खाली।” “गुड़ से मीठी चीज क्या है? “गुड़ से मीठी जीभ है।” लड़की ने बिना क्षणभर की देर किए बोल दिया।
माघ पंडित फिर सवाल पूछने वाला था कि राजा ने रोक दिया। कहा- “अब ज्यादा मूर्खता दिखाने से कुछ फायदा नहीं। आज हम लोग उज्जैन का मार्ग तो भूल गए, पर दूसरा मार्ग मिल गया है।” राजा ने धीरे से वृद्धा को कहा-”माँ अब तो हमें मार्ग बता दो।” वृद्धा ने कहा- “बेटा दुनिया में मार्ग केवल दो हैं। एक सच का और दूसरा प्रेम का। इनको नहीं भूलोगे तो कहीं भी नहीं अटकोगे।”
उसके बाद वृद्धा उनके साथ काफी दूर तक गयी और मार्ग बताकर कहा- “इस रास्ते चले जाओ, किधर भी मुड़ने की जरूरत नहीं। सीधे उज्जैन पहुँच जाओगे। राजा और माघ पंडित दोनों ही राजपथ पर यह सोचते हुए बढ़ रहे थे कि ज्ञान का यथार्थ स्थान जिज्ञासा है। सच्चे ज्ञानी कहीं भी, किसी भी स्थान में हो सकते हैं।
महर्षि रमण के आश्रम के समीपवर्ती गाँव में एक अध्यापक रहते थे। एक बार अपने कौटुम्बिक जीवन से अत्याधिक क्षुब्ध होकर आत्महत्या करने की बात सोचने लगे। किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले उन्होंने महर्षि की सम्मति जाननी चाही और पहुँच गए उनके आश्रम। महर्षि रमण आश्रमवासियों के भोजन के लिए पत्तलें बना रहे थे। दिव्यद्रष्टा ऋषि ने अध्यापक महोदय के आने का अभिप्राय समझ लिया था। प्रणाम करने के उपराँत अध्यापक बोले-भगवन्! आप इन पत्तलों को इतने परिश्रम के साथ बना रहे हैं और आश्रमवासी इनमें खाना खाकर फेंक देंगे।
महर्षि मुसकराते हुये बोले-सो तो ठीक है, वस्तु का पूर्ण उपयोग हो जाने पर उसे फेंक देना बुरा नहीं, बुरा तो तब है जब उसे अच्छी अवस्था में ही खराब करके फेंक दिया जाए। अध्यापक महोदय को महर्षि का मर्मस्पर्शी अभिप्राय समझ में आ गया और उन्होंने आत्महत्या करने का इरादा छोड़ दिया।
धनपति का जितना धन बढ़ता जाता, वह उतना ही अधिक कंजूस होता। उसकी कंजूसी में परिवार के लोग भी सहयोग करते। धनपति का इकलौता बेटा बीमार पड़ा, तो वैद्य-डॉक्टरों पर उसके रोग का कोई निदान न हो सका। गाँव के समझदार लोगों ने सेठ को सलाह दी कि वह दान-पुण्य करें, तो शायद लड़का ठीक हो जाए। गाँव के पुरोहित ने उसे गुप्तदान करने की बात कही। जिससे प्रदर्शन भी न हो और अहं को भी प्रोत्साहन न मिले। सेठजी की पत्नी ने गाँव की बूढ़ी ब्राह्मणी को अनाज में कुछ सोना छिपाकर दे दिया। ब्राह्मणी सहज भाव से पोटली बाँधकर घर को जाने लगी। इतने में सेठ ने सोचा कि अब दान तो हो ही गया। उसने अपना नौकर भेजकर वह अनाज दूगनी राशि देकर खरीद लेने को कहा।
बेचारी बुढ़िया को क्या पता था कि इसमें अनाज में कुछ स्वर्ण मुद्राएँ भी हो सकती हैं। उसने दूने पैसों के लालच में वह अनाज नौकर के हाथों बेच दिया, नौकर ने सेठ के पास जाकर जमा करा दिया। इस तरह दान की औपचारिकता कंजूस धनपति द्वारा पूरी कर दी गई। कृपणता यदि वृत्ति में बनी रहेगी, तो किसी भले कृत्य के लिए उत्साह बन पड़ना संभव नहीं है।
प्रायश्चित प्रकरण मेंषास्त्रकारों ने जहाँ अनेक विधि-विधानों का वर्णन किया है, वहाँ देश, काल एवं पात्र की परिस्थितियों का ध्यान रखने का भी निर्देश दिया है। जैसे कृच्छ चाँद्रायणव्रत की कुछ बातें ऐसी हैं जो आज की स्थिति में सर्वसाधारण के लिए उपयुक्त नहीं है। षोडश संस्कारों में कई ऐसे हैं जो आज की परिस्थितियों को देखते हुए युगानुकूल नहीं रहे। युगऋषि ने इसीलिए उनमें से दस की देशकाल के अनुरूप संपन्न होने का प्रावधान बनाया। देश-काल के अनुसार पारंपरिक प्रचलनों में भी फेर-बदल होना चाहिए। चाँद्रायण के क्रम में भी पूरे भोजन में जितने ग्रासों की सीमा नियत है, उतने मात्र से गुजारा भी कठिन है। जप तथा होम, दान आदि का जो विस्तृत वर्णन है।, उतना भी सबसे नहीं निभ सकता। इसलिए वर्तमान परिस्थितियों में मृदु चाँद्रायण व्रत ही सर्वसाधारण के लिए उपयोगी हो सकता है।
मृदु चाँद्रायण व्रत सरल होते हुए भी परिणाम की दृष्टि से कम महत्वपूर्ण नहीं है। शारीरिक कष्ट उतना ही उठाया जाना चाहिए, जितने से स्वास्थ्य का संतुलन बिगड़ने की आशंका उत्पन्न न हो जाय। ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ अर्थात् ‘करना तो अत्यंत कठिन ही करना’ की नीति ठीक नहीं। औचित्य मध्यम मार्ग का ही है। मध्यम मार्ग का अनुसरण करने से सत्कर्मों की ओर मनुष्य की प्रवृत्ति सहज ही बनी रहती है, वहीं कठोरता या अतिवादिता अपना लेने पर उत्साह ठंडा होते ही व्यक्ति दिग्भ्राँतों की तरह आचरण करने लगता है। यही कारण है कि बौद्धधर्म में मध्यम मार्ग की ही प्रतिष्ठा मानी जाती है। साधारण जीवन का तारतम्य न बिगड़ने देते हुए जो शुभकर्म बन पड़ें, वे उत्साहवर्द्धक रहते हैं और उस मार्ग पर चलने का साहस बना रहता है। चाँद्रायणव्रत के आशाजनक लाभों को देखते हुए मन उसे करना तो चाहता है, पर विधान की कठोरता को देखते हुए वैसा साहस नहीं होता। ऐसी दशा में मृदु चाँद्रायण का मध्यम मार्ग अपनाना सभी के लिए उपयुक्त रहेगा।
मृदु चाँद्रायणव्रत किसी भी महीने की पूर्णिमा से आरंभ करके अगली पूर्णिमा को समाप्त करना चाहिए। यों तो इसके लिए मार्गशीर्ष और माघ के अतिरिक्त ज्येष्ठ, श्रावण, अश्विन विशेष शुभ माने गये हैं, परंतु निषेध किसी भी किसी भी महीने का नहीं है।
आहार-निर्धारण के संबंध में शास्त्रों में लिखा है कि साधक का पूर्ण आहार जितना हो, उसका एक आहार-पिंड बनाना चाहिए। पूर्णिमा के दिन वह पूरा पिंड खाया जाए। फिर कृष्णपक्ष में चंद्रमा की एक-एक कला जिस प्रकार घटती है, उसी प्रकार एक अंश घटाते चलना चाहिए। पूर्ण पिंड को तोलकर उसका चौदहवाँ अंश प्रतिदिन घटाते रहा जाय। इस प्रकार घटाते-घटाते कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को एक अंशमात्र लिया जाय और अमावस्या को पूर्ण निराहार रहा जाय।
शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को भी निराहार रहना चाहिए। चंद्रमा अमावस्या और प्रतिपदा को-दो दिन दिखाई नहीं पड़ता, इसलिए दोनों दिन आहार न लेने का विधान है। फिर जिस क्रम से एक-एक चौदहवाँ अंश घटाया गया था, उसी प्रकार शुक्लपक्ष में चंद्रमा की कलाओं की तरह भोजन भी बढ़ाते रहा जाय। कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के दिन जितना आहार लिया था, उतना ही दौज को लिया जाए और जितना कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को लिया गया था, उतना शुक्लपक्ष की तीज को। इस प्रकार पूर्णिमा का उतने ही पूरे आहार तक पहुँच जाना चाहिए, जितना कि आरंभ करते समय पिछले मास की पूर्णिमा को लिया गया था।
प्रायः किन्हीं-किन्हीं महीने में तिथियाँ घट या बढ़ जाती हैं। ऐसी स्थिति में पंचाँग में देखकर उसी क्रम से आहार के अंशों को भी घटा या बढ़ा लेना चाहिए। यदि किसी पक्ष में एक तिथि बढ़े तो चौदह के स्थान पर पंद्रहवें अंश को घटाने या बढ़ाने का क्रम रखना चाहिए और यदि एक तिथि घट जाय तो तेरह का क्रम घटाना या बढ़ाना उचित है। चंद्रमा की कलाओं पर इस व्रत का आधार रहने से आहार के घटाने या बढ़ाने का क्रम भी उन्हीं के अनुसार बदलना पड़ता है।
आहार के लिए ‘पिंड’ शब्द प्रयोग होने से ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीनकाल में खिचड़ी, दलिया, सत्तू या ऐसी ही कोई चीज पकाकर उसका एक गोला बना लिया जाता होगा और उस गोले का भार-प्रतिदिन घटाया-बढ़ाया जाता रहता होगा। इससे यह भी प्रतीत होता है कि आहार में भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुएँ न रहती होंगी। एक या कई वस्तुओं को मिलाकर एक ही जगह पका लिया जाता होगा। इस व्यवस्था में अनेक खाद्य पदार्थों के द्वारा अनेक स्वाद प्राप्त करने वाली स्वाद-लोलुपता का निषेध है। अनेक प्रकार की वस्तुएँ एक समय में खाना वैज्ञानिक दृष्टि से भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाता है। यह प्रथा तो केवल जिह्वा की लोलुपता पूरी करने के लिए ही चली है। चूँकि चाँद्रायणव्रत में स्वास्थ्य-सुधार और स्वाद-लोलुपता पर नियंत्रण का इंद्रियसंयम भी जुड़ा हुआ है, इसलिए आहारपिंड की व्यवस्था का महत्व भी सहज ही समझ में आ जाता है।
‘पिंड’ शब्द से एक और बात भी प्रकट होती है कि आहार एक बार ही लिया जाए। यदि दोनों समय लेने का विधान रहा होता तो चौदह के स्थान पर अट्ठाइस भागों में पूर्ण भोजन को विभाजित करने की व्यवस्था रही होती।
उपर्युक्त व्यवस्था की भावना को ध्यान में रखते हुए आज की परिस्थितियों में कुछ ढील भी रखी जा सकती है। पिंड न बनाकर भले ही रोटी-शाक, दाल-भात जैसी वस्तुएँ अलग-अलग बना ली जाएँ, पर उनकी संख्या दो ही रहे तो उत्तम है। अधिक वस्तुओं का भोजन में होना आहार संबंधी विलासिता है। इसमें रजोगुण या तमोगुण की प्रधानता हो जाती है। आहार में खाद्य-पदार्थों की संख्या जितनी कम रहेगी, उतना ही सात्विक माना जाएगा। संयमी संत-महात्मा भिक्षा में कई प्रकार की वस्तुएँ भिन्न-भिन्न घरों से प्राप्त करते हैं, तो उन्हें मिलाकर इकट्ठा कर लेते हैं, ताकि जिह्वा की लोलुपता को पनपने का अवसर न मिले। चाँद्रायणव्रत करने वालों को इतना नियम रखना ही चाहिए कि आहार में दो प्रकार की वस्तुओं से अधिक संख्या न हो। मिर्च-मसाले छोड़ देना ही उचित है। अस्वाद व्रत पालन करते हुए नमक और शक्कर छोड़कर अलौना भोजन बन पड़े तो सर्वोत्तम है, अन्यथा नमक काम में ले सकते हैं। सेंधा नमक सात्विक माना गया है। मिर्च के बिना काम न चले तो कालीमिर्च अदरक या सोंठ ली जा सकती है। आँवला या नीबू की खटाई ग्रहण की गयी है। अन्य खटाई वर्जित हैं। हींग, लालमिर्च और गरम मसाले सर्वथा त्याज्य हैं। हल्दी, जीरा, धनिया इन तीन का निषेध नहीं है।
आरंभ करते समय पूर्णिमा को लिए गये एक समय के भोजन का ही चौदहवाँ अंश घटाना पड़ता है। इस प्रकार दिनभर के भोजन का आधा अंश तो पहले ही कम हो जाता है और शेष आधे में भी प्रतिदिन कमी होती चलती है। इतना कठिन अल्पाहार एक महीने तक चलाने में दुर्बल स्वभाव या शरीर वाले व्यक्ति घबराते हैं। इसलिए मध्यम मार्ग यह हो सकता है कि सायंकाल को भी थोड़ा दही, शाक का रस या फलों का रस-इनमें से कोई एक चीज ले जी जाया करे। इससे भूख भी असहनीय न रहेगी और शरीर भी अधिक दुर्बल न होगा। इसी प्रकार प्रातःकाल भी इन्हीं में से कोई एक पेय पदार्थ लिया जा सकता है। नीबू और शहद मिला हुआ पानी आवश्यकतानुसार दिन में कई बार भी लिया जा सकता है। अन्नाहार दोपहर को एक बार घट-बढ़ के क्रम से ही लेना चाहिए।
आहार को घटाने और बढ़ाने का यह क्रम मानसिक और आत्मिक पवित्रता की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही पेट के पाचन यंत्रों-पाचन प्रणाली को विश्राम देकर उनकी नष्ट हुई शक्तियों को पुनः सजीव बनाने के लिए भी उपयोगी सिद्ध होता है। पर आहार की न्यूनाधिक मात्रा ही चाँद्रायणव्रत नहीं है। इसका मूल उद्देश्य अंतःकरण पर चढ़े हुए मल-आवरण और विक्षेपों का समाधान तथा किये हुए पापों का प्रायश्चित करना भी है। आँतरिक पवित्रता की अभिवृद्धि के लिए ही चाँद्रायणव्रत किये जाते हैं। शारीरिक लाभ तो एक गौण बात है।
गायत्री की उच्चस्तरीय साधनाओं जैसे-गायत्री महापुरश्चरण, पंचकोश अनावरण, कुँडलिनी जागरण आदि में इन्हें आरंभ करने से पूर्व कायिक-मानसिक परिशोधन का विधान है। इसमें भी साधना से पूर्व तीस दिन तक चाँद्रायणव्रत करना पड़ता है, फिर साधना की-पुरश्चरण की शुरुआत होती है। इसलिए मृदु चाँद्रायणव्रत काल के एक महीने में सवालक्ष गायत्री अनुष्ठान का एक नियमित कार्यक्रम बना लेने से ‘सोने में सुगंध’ की उक्ति चरितार्थ होती है। इससे शारीरिक कायाकल्प के साथ-साथ आँतरिक कायाकल्प का सुयोग भी बैठ जाता है। तीस दिनों में सवालक्ष गायत्री का जप-अनुष्ठान करने के लिए प्रतिदिन 42 माला जप करना पड़ता है। उसमें प्रायः चार घंटे लगते हैं। प्रातःकाल ढाई-तीन घंटे और सायंकाल एक-डेढ़ घंटा लगाने से यह उपासना आसानी से पूर्ण हो जाती है।
ब्रह्मचर्य, भूमिशयन या तख्त पर सोना, अपने शरीर की सेवा स्वयं करना, कपड़े धोना आदि कार्य स्वयं करने चाहिए। भोजन पकाने में अपना अभ्यास न हो तो माता या पत्नी से सहायता ली जा सकती है, परंतु चाहे जिस-तिस के हाथ का बना हुआ भोजन भी उन दिनों
नहीं करना चाहिए। क्योंकि पकाने वाले व्यक्ति के संस्कार यदि अच्छे न हुए तो उसका प्रभाव अपनी मनोभूमि पर पड़ेगा और व्रत का जो लाभ मिलना चाहिए, वह न मिलेगा। दूसरों की शारीरिक सेवा लेना तो वैसे भी उन दिनों वर्जित रहता है। चमड़े का उपयोग भी वर्जित रहता है। क्योंकि आजकल निन्यानवे प्रतिशत चमड़ा पशुहत्या करके ही उपलब्ध किया जाता है और उसका उपयोग करने वाले के सिर पर भी कुछ हत्या का आसुरी प्रभाव पड़ता ही है। लकड़ी, रबड़-प्लास्टिक या कपड़े के जूते इस व्रत-काल में प्रयोग करने चाहिए।
अच्छा तो यही रहता है कि घर के साधारण वातावरण को छोड़कर किसी साधना के उपयुक्त दिव्य, पवित्र स्थान, प्राणवान, जीवंत तीर्थस्थल में यह व्रत किया जाय। वह स्थान आध्यात्मिक भावनाओं एवं तपश्चर्या की प्राणऊर्जा से ओत−प्रोत व परिपूर्ण होना चाहिए, अपनी दिनचर्या उन दिनों मौन, आत्मचिंतन, मनन, ध्यान, स्वाध्याय, सत्संग जैसे कार्यक्रमों में व्यस्त रहे। मनोभूमि पर विक्षोभजनक प्रभाव उत्पन्न न हो, तो ही व्रत का पूरा लाभ मिलता है। व्यावसायिक कार्यों में प्रायः झूठ, चोरी, कर्तव्य में ढील, राग-द्वेष, लोभ, तृष्णा, क्रोध, वासना जैसे दोषों का समावेश बना रहता है। इसलिए अच्छा यही है कि चाँद्रायण के उपयुक्त स्थान तलाश किया जाय और उन दिनों छुट्टी लेकर आध्यात्मिक जीवन का लाभ लिया जाय। इस संबंध में परिजनों के लिए गायत्री तीर्थ, शांतिकुंज सर्वाधिक उपयुक्त पड़ेगा।
जिनके लिए यह संभव न हो वे साधारण कार्यक्रम चलाते हुए घर पर भी चाँद्रायणव्रत कर सकते हैं। पर प्रयत्न ऐसा ही करना चाहिए कि अपना मन अधिक समय तक सात्विक विचारधारा में ही व्यस्त रहे। पापकर्म कम-से-कम बन पड़े। क्रोध और क्षोभ के अवसर कम-से-कम आवें। चित्त की शांति और मन की समस्वरता नष्ट न होने पावे। दैनिक जीवन में दान, सेवा, परोपकार, स्वाध्याय, मौन आदि शुभ कर्मों के लिए कुछ-न-कुछ अवसर साधारण दैनिक कार्यक्रम चलाते हुए भी निकाल ही लेना चाहिए।
गायत्री अनुष्ठान तो चाँद्रायणव्रत का एक अनिवार्य अंग है। मृदु अनुष्ठान करने से अंतःकरण में सात्विकता एवं आत्मबल की असाधारण वृद्धि होती देखी गयी है। इस एक महीने की अवधि में मनोभूमि में आशाजनक परिवर्तन होता है। कुविचारों और कुकर्मों की ओर मन में घृणा उत्पन्न होती है और भविष्य में शुद्ध एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने की भावना स्वयमेव जाग्रत होने लगती है। पिछले किये हुए पापों के प्रति आत्मग्लानि और प्रायश्चित की आकाँक्षा जाग्रत होने से मनुष्य की अंतरात्मा अपने को धिक्कारती है और जो उस रूप में ज्यों-की-त्यों न सही, किसी दूसरी प्रकार से पूर्ण करने की योजना बनाती है। शरीर से कष्ट सहकर उपवास करना, मन से आत्मनिरीक्षण करते हुये अपनी भूलों को ढूँढ़ना, हटाना और जो अशुभ अब तक बन पड़ा है, उसकी क्षतिपूर्ति के लिए किन्हीं पुण्यकर्मों का आयोजन करना-यही चाँद्रायणव्रत का मूल आधार है। यदि आधार स्थिर रहे तो चाँद्रायणव्रत का पूरा-पूरा लाभ साधक को मिल सकता है, भले ही आहार तथा आकार संबंधी विषयों में थोड़ी ढील भी रखी जाय। वृहद या कृच्छ-चाँद्रायण का विधान कठिन और मृदु चाँद्रायण का सुगम है। आज की स्थिति में मृदु चांद्रायण ही सहज सुगम है। इसमें भी यदि भावनात्मक उत्कृष्टता बन रहे, तो प्रतिफल मिलने में कोई संदेह नहीं है।
वर्धमान महावीर के शिष्यों में चर्चा चल रही थी कि मनुष्य के अधःपतन का क्या कारण है? किसी ने कामवासना बताया तो किसी ने लोभ, तो किसी ने अहंकार। आखिर वे शंका-समाधान करने के लिए महावीर के पास आए। महावीर ने शिष्यों से पूछा-पहले यह बताओ कि मेरे पास एक अच्छा बढ़िया कमण्डलु है जिसमें पर्याप्त मात्रा में जल समा सकता है। यदि उसे नदी में छोड़ा जाए, तो क्या वह डूबेगा?
कदापि नहीं। शिष्यों ने एक स्वर से जवाब दिया।
और यदि उसमें एक छिद्र हो जावे तो?
तब तो डूबेगा ही।
यदि दायीं ओर हो तो?
दायीं ओर हो या बायीं ओर! छिद्र कहीं भी हो, पानी उसमें प्रवेश करेगा ही और वह डूब जाएगा।
महावीर बोले-तो बस जान लो कि मानव जीवन भी उस कमंडलु के समान ही है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, मत्सर आदि सभी दुर्गुण उसे डुबाने के निमित्त कारण हो सकते हैं-किसी में कोई भेदभाव नहीं, प्रत्येक अपना-अपना असर करता है। इसलिए हमें सजग रहना चाहिए कि कहीं हमारे जीवन रूपी कमंडलु में कोई छिद्र तो नहीं हो रहा है।
एक संत थे बड़े निस्पृह, सदाचारी एवं लोकसेवी। जीवन भर निस्वार्थ भाव से दूसरों की भलाई में लगे रहते। विचरण करते हुए देवताओं की टोली उनकी कुटिया के समीप से निकली। संत साधनारत थे। साधना से उठे, देखा देवगण खड़े हैं। आदर सम्मान किया, आसन दिया। देवतागण बोले-आपके लोकहितार्थ किए गए कार्यों को देखकर हमें प्रसन्नता हुई। आप जो चाहें वरदान माँग लें। संत विस्मय से बोले-सब तो है मेरे पास। कोई इच्छा भी नहीं है, जो माँगा जाए। देवगण एक स्वर में बोले-आप को माँगना ही पड़ेगा अन्यथा हमारा बड़ा अपमान होगा। संत बड़े असमंजस में पड़े कि कोई तो इच्छा शेष नहीं है माँगे तो क्या माँगे, बड़े विनीत भाव से बोले-आप सर्वज्ञ हैं, स्वयं समर्थ हैं, आप ही अपनी इच्छा से दे दें मुझे स्वीकार होगा। देवता बोले-तुम दूसरों का कल्याण करो! संत बोले- क्षमा करें देव! यह दुष्कर कार्य मुझ से न बन पड़ेगा। देवता बोले-इसमें दुष्कर क्या है? संत बोले-मैंने आज तक किसी को दूसरा समझा ही नहीं सभी तो मेरे अपने हैं। फिर दूसरों का कल्याण कैसे बन पड़ेगा? देवतागण एक दूसरे को देखने लगे कि संतों के बारे में बहुत सुना था आज वास्तविक संत के दर्शन हो गये। देवताओं ने संत की कठिनाई समझकर अपने वरदान में संशोधन किया। अच्छा आप जहाँ से भी निकलेंगे और जिस पर भी आपकी परछाई पड़ेगी उस उसका कल्याण होता चला जाएगा। संत ने बड़े विनम्र भाव से प्रार्थना की-हे देवगण! यदि एक कृपा और कर दें, तो बड़ा उपकार होगा। मेरी छाया से किसका कल्याण हुआ कितनों का उद्धार हुआ, इसका भान मुझे न होने पाए, अन्यथा मेरा अहंकार मुझे ले डूबेगा। देवतागण संत के विनम्र भाव सुनकर नतमस्तक हो गए।
कल्याण सदा ऐसे ही संतों के द्वारा संभव है।
चक्र जागरण क्रम में ‘अनाहत चक्र’ का तीसरा स्थान है। अनाहत का अर्थ ‘बिना आहत या आघात’ होता है। चूँकि यह बिना आघात या घर्षण किये उत्पन्न होने वाली ध्वनि का केंद्र है, अस्तु इसे अनाहत चक्र कहते हैं। इसकी कायिक अवस्थिति वक्षस्थल के ठीक पीछे मेरुदंड में है। इसका क्षेत्र हृदय है। इस हृदय को सीने में लप-डप करने वाला शारीरिक हृदय नहीं समझना चाहिए। यहाँ इसका अर्थ आध्यात्मिक हृदय से है, जो उदर के ठीक ऊपर दोनों ओर की पसलियों के संधिस्थल पर स्थित है।
साधना ग्रंथों में इस चक्र के कई रंग अरुण, नीला, बंधुका के फूल की तरह बताये गए हैं। इसके बारह दल हैं। प्रत्येक में ‘कं’ से लेकर ‘ठं’ तक बारह अक्षर सिंदूरी वर्ण में अंकित हैं। इसका भीतरी भाग, जो प्रायः चक्र का यंत्र कहलाता है, षट्कोणीय है। गुह्य विज्ञान के अनुसार इसकी संरचना उलटे-सीधे दो त्रिकोणों के मिलन से होती है। यह शिव और शक्ति का तथा सीधा ‘शिव’ का प्रतिनिधित्व करता है। इसका वाहन हिरन है। बीज मंत्र ‘यं’ है। इसके देव ‘ईषा’ हैं तथा देवी ‘काकिनी’, जो पीतवर्णी हैं। इनके तीन आँखें तथा चार हाथ हैं। ये सौभाग्य तथा आनंद का प्रतीक हैं। चक्र का तत्व वायु हैं, जो यंत्र के षट्कोणीय क्षेत्र द्वारा निरूपित होता है।
कमल के केन्द्र में एक अन्य छोटा त्रिभुज है। यह जीवात्मा का प्रतीक है। इसमें एक अखंड-ज्योति का निवास है। कतिपय ताँत्रिक ग्रंथों में त्रिकोण के भीतर एक स्वर्ण रंग का शिवलिंग अवस्थित बताया गया है। इसे ‘बाना लिंग’ कहते हैं। अनाहत चक्र में कल्पवृक्ष है। यह वक्र के द्वादश दल वाले कमल के नीचे एक अन्य रक्तवर्णी कमल के भीतर है। साधना-विज्ञान के आचार्यों का मत है कि शक्तिसंस्थान में स्थित उक्त कल्पतरु का ही ध्यान करना चाहिए। इससे साधक की कामनाएँ पूर्ण होती हैं।
इस संस्थान का लोक ‘महः’ है, तन्मात्रा ‘स्पर्श’, ज्ञानेंद्रिय ‘त्वचा’ तथा कर्मेंद्रिय ‘हाथ’ है। प्रत्येक चक्र के मस्तिष्क के तत्संबंधी केंद्र भी सक्रिय हो उठते हैं। किसी व्यक्ति का अनाहत चक्र जब क्रियाशील बनता है तो प्रकार की अतींद्रिय विभूतियों के अतिरिक्त साधक में विज्ञान, कला, संगीत, लेखन, कविता जैसी कितनी ही रचनात्मक प्रवृत्तियाँ परिलक्षित होने लगती हैं। यह इस चक्र के भौतिक गुण हैं। इनकी अतींद्रिय विशेषताएं वे हैं, जिनके अंतर्गत योगाभ्यासी दिव्य-क्षमताएँ अर्जित करता है। अनाहत चक्र के जागरण से व्यक्ति का जब उक्त मस्तिष्कीय केंद्र उद्दीप्त होता है, तो एक दिव्यप्रेम का उन्मेष होता है, जो उसमें परदुखकातरता, परमार्थपरायणता, करुणा उदारता जैसे गुणों के विकास में सहायक होता है। इसके कारण वह विराट ब्रह्म से इस कदर स्नेह करने लगता है, मानो वह उसके शरीर का अभिन्न अंग हो, उसका कष्ट उसके मन-प्राण को बुरी तरह झकझोरता है। इसके लिए वह सहयोग-सहकार करने के लिए सदा तत्पर रहता है। यों तो ऐसे सेवाभावी दुनिया में अनेक मिल जाएँगे, दोनों के कार्यों में एकरूपता और समानता भी खूब दिखलाई पड़ती है, इतने पर भी उनके भावों में जमीन-आसमान जितना अंतर होता है। आध्यात्मिक करुणा से उपजा सहयोग किसी प्रकार के प्रतिदान की अपेक्षा नहीं रखता, जबकि मानवी सहृदयता से बन पड़ा सहकार सदैव अपने पीछे प्रतिदान की एक हलकी
आकाँक्षा संजोये रहता है। सेठ-साहूकारों द्वारा किये जाने वाले दान-धर्म में इसी की प्रतिच्छाया विद्यमान होती है। उनका यह कार्य निःस्वार्थ नहीं होता। वे दान के बदले में पुण्य कमाने की इच्छा रखते हैं। यदि किसी कंगाल को अन्न-वस्त्र का दान करते हैं, जिसे देखकर उनका अंतःकरण पीड़ित होता और छटपटाता है, अपितु इसलिए कि वे अपने दुष्कर्मों के कुफल को इससे पाटना चाहते हैं। यह भाव आध्यात्मिक नहीं, साँसारिक है। इसे निःस्वार्थ प्रेम नहीं कह सकते। इसको स्वार्थपूर्ण सहकार कहना पड़ेगा। भले ही स्वार्थ कितना ही उच्चस्तरीय क्यों न हो, वह कहलायेगा साँसारिक ही, किंतु जब अनाहतचक्र का जागरण होता है, तो इस स्तर की संवेदना विकसित होती है, जहाँ स्वार्थ घुलकर दिव्यकरुणा में रूपांतरित हो जाता है। जब इस स्तर की करुणा से काई क्रिया संपन्न होती है, तो इसको निर्विकार, निरपेक्ष एवं आध्यात्मिक कहना पड़ेगा। महात्मा बुद्ध का करुणाभाव इसी स्तर का था।
साधना-विज्ञान के मर्मज्ञों का कथन है कि अनाहत-चक्र को ध्यान-साधना के अतिरिक्त साहित्य, संगीत जैसी भौतिक विधाओं द्वारा भी प्रभावित-उत्तेजित किया जा सकता है, तो साधक में एक नये विचार और दृष्टिकोण का प्रसव होता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति की चिंतनप्रणाली और कार्यशैली पूरी तरह परिवर्तित हो जाती है। साधक के लिए यह चेतना के एक नये तल में अवस्थान है।
अनाहत-चक्र को भक्तियोग द्वारा भी सक्रिय किया जा सकता है। यह चक्र-जागरण का सबसे सरल और निर्दोष तरीका है। इसमें भक्ति गुरु के प्रति भी हो सकती है अथवा अपने इष्ट आराध्य के प्रति भी। दोनों ही विधियाँ अहंभाव के विनाश में सहायक हैं। जब इनके द्वारा अहमान्यता का पूर्णतया नाश होता है, तभी वास्तविक भक्ति और प्रेम का उदय होता है। इसे दूसरे प्रकार से यों भी कहा जा सकता है। इसे दूसरे प्रकार से यों भी कहा जा सकता है कि जब व्यक्ति अनाहत-चक्र में स्थित होता है, तो उसका स्वार्थ और अहंकार इस स्तर की चेतना द्वारा प्रेम और भक्ति में परिवर्तित हो जाता है। इसीलिए इस चक्र का जागरण केवल व्यक्तिगत उत्कर्ष के लिए ही नहीं, परिवार एवं समाज से जुड़े उसके विकास की दृष्टि से भी अति महत्वपूर्ण है। इससे परिवार में एकता, समता और संतुलन के भाव-विकास में काफी योगदान मिला है। नारी इस उद्भव की धुरी है। उसमें भावसंवेदनाएँ अत्यन्त बढ़ी-चढ़ी होती हैं, इसीलिए अनाहत-चक्र का जागरण उसमें शीघ्रतापूर्वक होता है। नर में चूँकि वह कोमलता नहीं होती और भाव- संवेदनाओं पर विवेक-बुद्धि हावी होती हैं, कारण कि उनके लिए इसका विकास अपेक्षाकृत अधिक सरल और सहज होता है, जबकि स्त्रियों के लिए यह अनुकूल स्थिति अनाहत-चक्र के साथ बनती है, अस्तु उन्हें इसी के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित किया जाता है।
तंत्रग्रंथों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि अनाहत स्तर पर पहुँचकर व्यक्ति की संपूर्ण मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इस भावना के मूल में एक कल्पवृक्ष है, जो सारी इच्छा-आकाँक्षाओं को पूरा करता है। यह वास्तव में परिष्कृत चेतना का आलंकारिक वर्णन है। इस दशा में मनोकामनाएँ पूरी हो जाती है, पर कल्पनाएं भी अधूरी नहीं रहतीं। यदि वे अपरिष्कृत स्तर की ओछी हुई, तो विनाश के सरंजाम जुटा रहा है। इसलिए अनाहत स्तर की चेतना को कल्पतरु द्वारा निरूपित किया गया है और यह समझाने की कोशिश की गई है कि इस अवस्था में भावनाएँ यदि संयमित नहीं हुई तो वह उत्थान के साथ-साथ पतन की भी निमित्त बन सकती हैं।
कथा है कि एक बार एक राहगीर किसी पेड़ के नीचे विश्राम कर रहा था। वह अत्यंत थका और प्यासा था, सोचने लगा आस-पास कोई शीतल निर्झर होता, तो उसकी प्यास बुझ सकती थी। इतना सोचते ही पीछे से उसे कल-कल ध्वनि सुनाई पड़ी। वह चौंका, झरना देख प्रफुल्लित हुआ और अपनी प्यास बुझाई। अब उसे भूख सताने लगी। कुछ खाने की इच्छा हुई, तो सामने भोजन आ गया। भोजन कर लेने के पश्चात् दिनभर की थकान के कारण नींद आने लगी। वह सोना चाह रहा था, तभी देखा कि वहाँ आरामदायक बिस्तर लग गया है। उसमें वह सो गया। शाम को जब सोकर उठा, तो अँधेरा घिर चुका था। उसे भय सताने लगा कि कहीं कोई शेर न आ जाए और उसे खा न जाए। ऐसा ही हुआ शेर प्रकट हुआ। और उसे अपना ग्रास बना लिया।
प्रस्तुत आख्यान साधक जीवन पर शत-प्रतिशत घटित होता है। यह इस बात के लिए सचेत करता है कि साधना की उच्चस्तरीय अवस्था में भावनाओं पर नियंत्रण और अंकुश न रहा, तो साधक के लिए यह अत्यंत दुखदायी और हानिकारक सिद्ध हो सकता है। यदि अनाहत स्तर पर चेतना पूर्णरूपेण विकसित हो जाए; भय, आशंका सताती रहें, तो वैसी ही प्रतिकूल परिस्थितियाँ बनती चली जायेंगी, जैसी कि उसने कल्पना की थी। ऐसी दशा में साधक का पतन सुनिश्चित है। यदि ऐसा हुआ, तो चेतना पुनः अनाहत से स्वाधिष्ठान जैसे निम्नस्तरों की ओर वापस चली जाएगी। अनाहत जैसे उच्च केंद्रों से एक बार यदि चेतना का अधःपतन हुआ, तो दूसरी बार उसका उठना बहुत मुश्किल है। इसीलिए अनाहत का वाहन हिरन है, ताकि साधक चौकन्ने हिरन की-सी सतर्कता बरते और हर क्रिया-प्रतिक्रिया के प्रति सावधान रहे।
इस आयाम में अधिष्ठान करने वाले साधक को संशयात्मक विचारों के प्रति हमेशा जागरूक रहना चाहिए। उसे ऐसे विचार मन में कदापि नहीं लाने चाहिए, जो आसुरी हों। उदाहरण के लिए, यदि किसी को सिरदर्द रहता हो और वह यह सोचने लगे कि उसे ब्रेनट्यूमर हो गया है अथवा पेट दर्द की स्थिति में एपेण्डीसाइटिस या वृक्क की पथरी का अनुमान-आकलन करने लगे, तो उससे गंभीर समस्याएँ पैदा हो सकती हैं तथा उसका उन-उन रोगों से
आक्रांत हो जाना संभव है। इसी प्रकार दूसरों संबंधित दुविधामूलक विचारों के प्रति सावधान रहना चाहिए, यथा-’कहीं ऐसा न हो कि वह व्यक्ति मेरी जान का दुश्मन बन जाए’, ‘उसका लड़का बहुत बीमार है, शायद न बचें’, ‘मेरा मित्र कल श्रीनगर से लौटने वाला था, कहीं ऐसा तो नहीं कि आतंकवाद की चपेट में आ गया हो’, वह बहुत निराश है, डर है कि आत्महत्या न कर बैठे’ आदि-आदि। जागरण के इस काल में किसी भी प्रकार का विचार मन में उठते ही वह फलित होने लगता है। कुँडलिनी जब तक सुप्तावस्था में रहती है, तब तक ऐसे विचार मन में उठते ही फलित होने लगता है। कुँडलिनी जब तक सुप्तावस्था में रहती है तब तक ऐसे विचार शक्तिहीन होते हैं, उसके अनाहत-चक्र तक उत्थित होते ही ये फलदायी बन जाते हैं और मूर्तिमान होने लगते हैं। यही कारण है कि इस अवस्था को तलवार की धार पर चलने के समान बताया गया है, जहाँ तनिक भी असावधानी से कुछ-से-कुछ हो सकता है।
संगति, स्वाध्याय और वातावरण यह तीन साधनाकाल के महत्वपूर्ण पाथेय हैं। यदि ये उच्चस्तरी नहीं हुए, तो साधक का पतन आवष्यींवी है। जब वह अनाहत-चक्र की अवस्था से होकर गुजरता है, तो ऐसे समय में से दृढ़ इच्छाशक्ति एवं विश्वास से भरपूर होना चाहिए तथा अपना अधिकांश समय ऐसे व्यक्तियों, पुस्तकों एवं वातावरण के संपर्क में बिताना चाहिए, जो उसके आत्मविश्वास को विकसित करने अथवा उसे मजबूत बनाने में सहायक हों। मन को इतना बलवान बनाना चाहिए कि वह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी चट्टान की तरह अडिग रहे। इन सब कसौटियों में खरा उतरने पर ही साधक इस अवस्था को सफलतापूर्वक पार करता और आगे की प्रगति करता है।
योग के आचार्यों ने अनाहत-स्तर पर पहुँचने के कुछ लक्षण बताये हैं। यदि ये लक्षण साधक के जीवन में परिलक्षित होने लगें तो समझना चाहिए कि योगाभ्यासी अनाहत की भूमिका में प्रतिष्ठित हो चुका है। यदि उसके विचार बहुधा सत्य सिद्ध होने लगें, परिस्थितियां चाहे कितनी ही विपरीत क्यों न हों, तो यह इस बात का प्रमाण है कि अब चिंतन में आमूल-चूल परिवर्तन का अवसर आ गया तथा अगली भूमिका में प्रवेश करने का समय भी। इस दशा में अपनी चिंतन-प्रक्रिया पर गहरी नजर रखने की आवश्यकता है। जब ऐसा अनिवार्य रूप से महसूस होने लगे, तो यह समझ लेना चाहिए कि अनाहत-स्तर की चेतना को वह प्राप्त कर चुका है।
इस आयाम में पहुँचकर व्यक्ति भाग्य और प्रारब्ध पर विजय प्राप्त कर लेता और जीवन को अपनी इच्छानुसार जी सकता है। यहीं पर उसे अपने अंदर की उस सामर्थ्य का ज्ञान होता है कि अब वह भाग्य के अधीन नहीं, वरन् भाग्य ही उसके अनुगत है और उसे अपने हिसाब से पूरी तरह मोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। यह आकाश में कुछ फेंकने की तरह है। यदि किसी पदार्थ को इस गति से इतना ऊँचा फेंका जा सके कि वह धरती की आकर्षण-शक्ति वाली परिधि से बाहर निकल जाए, तो इसे पृथ्वी अपनी चुँबकीय शक्ति के बल पर पुनः वापस नहीं खींच सकेगी। यह ठीक उसी प्रकार की घटना होगी, जैसे किसी रॉकेट को अत्यंत द्रुतवेग से इस प्रकार प्रक्षेपित किया जाता है कि वह अपने इस ग्रह के आकर्षण बल को निरस्त करता हुआ ऊँचा उठे और आगे बढ़ जाए। ऐसे ही अनाहत में चेतना का स्तर इतना ऊँचा उठ जाता है कि साधक को अपने प्रारब्ध के वशवर्ती होकर नहीं जीना पड़ता, अपितु अपनी इच्छानुसार जीवनयापन करने के लिए स्वतंत्र हो जाता है। इस आयाम में साधक योगी बन जाता है, कारण कि तब चेतना पूर्णरूपेण योगमय होती है तथा उसके निर्णय बाहरी दुनिया या विश्वास पर आधारित न होकर पूर्णतया अपनी चेतना-शक्ति पर अवलंबित होते हैं।
चक्रवेधन की साधना करने के लिए अनेक ग्रन्थों में अनेक मार्ग बताये गए हैं। इसी प्रकार गुरु-परम्परा से चली आने वाली साधनाएँ भी विविध प्रकार की हैं। इन सभी मार्गों से उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है, सफलता मिल सकती है, पर शर्त यह है कि उसे पूर्ण विश्वास, श्रद्धा, निष्ठा और उचित मार्गदर्शक के संरक्षण में किया जाए।
अन्य साधनाओं की चर्चा और तुलना करके उनकी आलोचना-प्रत्यालोचना करना यहाँ अभिष्ट नहीं है। इन पंक्तियों में एक ऐसी सुगम साधना पाठकों के समक्ष उपस्थित की जा रही है, जिसके द्वारा गायत्री महाशक्ति की साधना से चक्र-जागरण बड़ी सुविधापूर्वक हो सकता है और अन्य साधनाओं में आने वाली असाधारण कठिनाइयों एवं खतरों से स्वतंत्र रहा जा सकता है।
प्रातःकाल शुद्धशरीर और स्वस्थ चित्त से सावधान होकर पद्मासन में बैठें, तत्पश्चात ब्रह्मसंध्या के आरंभिक पंचकर्मों की क्रिया को पवित्रीकरण, आचमन, शिखाबंधन, प्राणायाम एवं न्यास करने के बाद गायत्री के एक सौ आठ मंत्रों की माला जपिए।
ब्रह्मसंध्या कर चुकने के बाद मस्तिष्क के मध्यभाग त्रिकुटी (एक रेखा एक कान से दूसरे कान तक खींची जाए और दूसरी रेखा दोनों भौंहों के मध्य में से मस्तिष्क के मध्य तक खींची जाए, तो दोनों का मिलन जहाँ होता है, उस स्थान को ‘त्रिकुटी’ कहते हैं।), में वेदमाता गायत्री का ज्योतिस्वरूप ध्यान करना चाहिए। मन को उसके मध्य में-ज्योतिर्लिंग के मध्य में इस प्रकार अवस्थित करना चाहिए जैसे लुहार अपने लोहे को गर्म करने के लिए भट्टी में डाल देता है और जब वह लाल हो जाता है, तब उसे बाहर निकालकर ठोकता-पीटता और अभीष्ट वस्तु बनाता है। त्रिकुटी स्थित गायत्री ज्योति में मन को कुछ देर तक अवस्थित रखने से मन स्वयं भी तेजस्वरूप हो जाता है, तब उसे आज्ञाचक्र के स्थान में लाना चाहिए। ब्रह्मनाड़ी मेरुदण्ड से आगे बढ़कर त्रिकुटी में होती हुई सहस्रार को गईं है। इस ब्रह्मनाड़ी की पोली नली में दीप्तिमान मन को प्रवेश कराके आज्ञाचक्र में ले जाया जाता है। वहाँ वाँछित समय तक उसे उद्दीप्त-जाग्रत करने के उपराँत क्रमशः नीचे की ओर बढ़ते हुए अनाहत चक्र तक पहुँचना पड़ता है। वही क्रिया पूर्ववत फिर दुहरायी जाती है। आवश्यक अवधि तक वहाँ स्थिरता करने पर वे सब अनुभव होते हैं, जो चक्रों के लक्षणों में वर्णित है। मन को चक्र के दलों का, अक्षरों का? तत्व का, बीज का, देवशक्ति का, यंत्र का, लोक का, वाहन का गुण-रंग अनुभव होता है। आरंभ में अनुभव अधूरे होते हैं। धीरे-धीरे चक्र के कुछ स्पष्ट, कुछ अस्पष्ट और कुछ विकृत अनुभव परिलक्षित होते हैं। क्रमशः वे अधिक स्पष्ट हो जाते हैं। प्रायः एक महीने में चक्रकमल प्रस्फुटित हो जाता है, तब वहाँ से आगे बढ़ना पड़ता है। विधि यही है-मार्ग वही।
अनाहत-चक्र के जागरणकाल में अक्सर ऐसे चिन्ह प्रकट होते हैं, जिनको भ्रमवश रोग का लक्षण मान लिया जाता है, पर वास्तव में यह जागरण की प्रतिक्रिया मात्र होती है, कोई रोग नहीं। ऐसे समय में प्रायः छाती में दर्द हो सकता है एवं हृदय की धड़कन बढ़ सकती है। व्यक्ति की नींद भी घट जाती है; लेकिन वह बीमार अनुभव नहीं करता। उसकी क्रियाशीलता और स्वस्थता बढ़ी-बढ़ी दिखाई पड़ती है। अनेक प्रकार की सूक्ष्म अतींद्रिय ध्वनियाँ इस काल में सुनाई पड़ सकती है।
इस दिव्यजागरण से कितनी ही दिव्यक्षमताएँ साधक में विकसित हो जाती हैं। अतींद्रिय दृष्ट, अतींद्रिय श्रवण, दूसरों के मान के भाव या विचार जान जाना, स्पर्श-चिकित्सा की क्षमता अर्जित कर लेना, मनोगतिज सामर्थ्य आ जाना आदि इस चेतनात्मक आयाम की मुख्य सिद्धियाँ हैं।
अनाहत स्तर की चेतना दूसरों को आहत करने की अनुमति नहीं देती। उसकी यह माँग है कि जिस प्रकार हम स्वयं अनाहत बने रहने की आकाँक्षा पालते हैं, उसी प्रकार दूसरों के संबंध में भी सोचें। अपने गुण, कर्म, स्वभाव का ऐसा विकास करें, जिससे न सिर्फ इस दर्शन को बल मिले, वरन् हम यथार्थ रूप में उस भूमिका में प्रतिष्ठित भी हो सकें। इससे कम में इस तल को साधना संभव नहीं, ऐसा साधना विज्ञान के आचार्यों का मत है।
एक संत ने अपने संस्मरण में लिखा है कि उन्होंने अपने सब पाप, अपराध बुरे कर्म, अचिन्त्य छोड़ दिए और सब प्रकार की अनीति से अपने को बचा लिया, तब उन्हें लगने लगा कि अब उसमें गुण-ही-गुण बचे हैं। किंतु यह बचा? अब उन्हें लगने लगा कि उन्हें गुणों का अहंकार हो गया है। अब तो बेचैनी और बढ़ गई। यह अहंकार ही तो सब पापों का मूल है। यदि यही न छूटा तो न जाने क्या दुर्दशा होगी। यह भलाई नया कारागृह बनकर जीवन में खड़ी हो गई।
ध्यान रहे बुरे आदमी के पास अहंकार दीन होता है, किंतु भले आदमी का अहंकार सबल होता है। इसीलिए बुरे आदमी की बुराइयां बाहर होती हैं किंतु भले आदमी की बुराई भीतर छिपी रहती है, जो अधिक घातक सिद्ध होती है।
किया-महाराज मैं कितने ही वर्षों से सेवा, पूजा आराधना, उपासना में लगा हूँ। सरल, सादा जीवन भी जी रहा हूँ, पूजा, आराधना, उपासना में लगा हूँ। सरल, जीवन भी जी रहा हूँ, किंतु मुझे ऐसा कभी लगता ही नहीं कि मुझ पर कुछ भगवान की विशेष कृपा हो रही है। भक्त की निराशा देखकर रामकृष्ण मुस्कराए। उन्होंने खेतों में काम कर रहे किसानों की ओर संकेत किया ओर बोल-किसान दो तरह के होते हैं, जिन्हें खेतों में काम करना सहज भला लगाता है, उन्हें नफा-नुकसान से कोई तात्पर्य नहीं, उन्हें खेती करनी है। एक वे भी किसान हैं, जो लाभ-हानि सामने रखकर खेती करते हैं। लाभ होता है, तो खुश होते हैं। हानि होने पर मुँह लटका लेते हैं। शिष्य महापुरुष का संकेत समझ चुका था और आशा की नवीन-किरण उसके दिल में उग रही थी। संदेह दूर हो रहा था।
दो मित्र गुरु की तलाश में निकले। एक संत के पास पहुँचे और निवेदन किया कि उन्हें सत्य की खोज है, कोई रास्ता बताएँ। वह संत चुपचाप बैठा रहा। जैसे उसने सुना ही न हो। एक मित्र ने सोचा। इस आदमी से क्या मिलेगा। यह तो बहरा मालूम देता है, अन्यथा निपट अहंकारी है। हम सत्य की खोज में इतनी दूर से आए हैं और यह आदमी अकड़कर बैठा है, ध्यान भी नहीं देता। जैसे हम कोई कीड़े-मकोड़े हैं, किंतु दूसरे मित्र ने कुछ इस तरह सोचा शायद हमसे ही कोई भूल हो गई हो। पूछने का ढंग ही अनुचित हो। शायद सत्य की जिज्ञासा प्रकट करने का ढंग ही दूसरा हो या हमने अधीरता और उतावलापन ही बरता हो। दोनों विदा हो गए। जिसने सोचा कि संत अहंकारी है। वह वर्षों बाद भी वैसा ही बना रहा। किंतु जिसने अपनी भूल पर खेद व्यक्त किया। वह आदमी बदलता चला गया। नम्र बनता चला गया। शिष्ट बनता चला गया।
दूसरा मित्र वर्षों बाद महात्मा के पास गया और बोला-आपने बढ़ी कृपा की जो उस आप मुझ से नहीं बोले और आपके न बोलने का मैंने यही अनुमान लगाया कि शायद हम उतने शिष्ट न हों, नम्र न हों। जिससे आपने हमें योग्य न समझा हो। निश्चय ही मेरी पात्रता उस समय कम थी। मैंने उस दिन से अपने को पात्र बनाने का प्रयत्न किया और मैं अब आपको धन्यवाद करने आया हूँ कि आपने बड़ी कृपा की, जो आप नहीं बोले अन्यथा आपका मैं पात्र न बन पाता।
17-प्राणशक्ति एक दिव्य विभूति
समस्त संसार में वायु, आकाश, प्रकाश, ईथर, प्लाज्मा की सजीव प्राणशक्ति समायी हुई है। प्राणशक्ति एक बहुमूल्य विभूति है। यह वीति सबके शरीर में पाँच प्राण, पंचदेवों के रूप में विद्यमान है। इन्हें जानने के लिए हम जानें-
मानवी विद्युत, प्राणशक्ति, तेजोवलय, चुम्बकीयशक्ति।
अपने प्रभामण्डल द्वारा पढ़ा जाएगा मनुष्य।
मन ही मित्र, मन ही शत्रु, महाप्राण बने।
पराप्रकृति, प्राणतत्व, श्वास-प्रक्रिया।
गुप्त बातों को जाना, महामानवों से लिपटी प्राण-सत्ता।
आत्मसत्ता में प्राणसत्ता, तेजोवलय-आत्मबल।
पेड़-पौधों में भी मनुष्य स्तर का विद्युत।
देह पिंजर-प्राणाग्नि का पुँज,शरीर-बिजलीघर।
जैव चुम्बकत्व में निहित शक्ति-सामर्थ्य, पाँच-प्राण।
बायोलॉजिकल प्लाज्मा बॉडी।
प्राणवान बनने की प्रक्रिया, प्राण-चिकित्सा।
अतीन्द्रियशक्ति का उद्भव और विकास।
18-चमत्कारी विशेषताओं से भरा मानवी मस्तिष्क
मनुष्य का शरीर अपने आप में एक अजूबा है। इसमें मनुष्य के मस्तिष्क की क्षमता तो अद्भुत है। इस मस्तिष्क से मानव ने एक-से-एक बढ़कर संसार में ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त की हैं। मस्तिष्क की विशेषताओं को जानने के लिए पठनीय है-
मानवी मस्तिष्क-प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष।
शरीर के खोखले में प्रखर मस्तिष्क।
मस्तिष्कीय क्षमताएँ जगाने हेतु विज्ञानवेत्ताओं के प्रयास।
मानव मस्तिष्क का विलक्षण रसायनशास्त्र।
अंतःस्रावी ग्रंथियाँ, हारमोन नियंत्रण।
पीनियल ग्रंथि-रहस्यों की पिटारी, स्मरणशक्ति।
लिंग परिवर्तन क्यों? कैसे? मानवेत्तर प्राणियों में भी।
काया के घट-घट में छिपी विलक्षण सामर्थ्य।
प्रतिभा जागरण, इकलौती संतान प्रतिभाशाली होती है।
मानवी मस्तिष्क-जादुई पिटारा, हमारे वश में शरीर चेतना।?
बढ़ती आयु के साथ मेधा और प्रखर होती है।
आध्यात्मिक उपचार आत्म तत्व की परिष्कृति।
19-शब्दब्रह्म नादब्रह्म
प्राचीन भारतीय शास्त्रों में शब्दब्रह्म और नादब्रह्म को सदैव ही महत्व दिया जाता रहा है। आधुनिक विज्ञान ने भी शब्द और नाद की सूक्ष्मशक्ति को स्वीकार किया है। बताया है, इनसे अनेक लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं। इस ज्ञान के लिए हम पढ़ें-
शब्दब्रह्म शब्दतत्व की शक्ति।
सात्विक शब्दों की सामर्थ्य बुरे शब्दों से बीमारियाँ।
शब्दयोग-श्रवणशक्ति की दिव्य क्षमता।
शब्द शक्ति से रोगों की चिकित्सा।
वैदिक स्वर प्रक्रिया-सामगान, भाव विज्ञान एवं गायन।
मंत्रशक्ति का रहस्य, जप का महत्व-वैज्ञानिक आधार।
याँत्रिकी का सुव्यवस्थित सुनियोजन।
शाप-वरदान का दैवी उपक्रम।
मेजरकार्लडिक को साधु का शाप।
मंत्र शक्ति के उद्गम-जिह्वा और हृदय।
नादब्रह्म- ॐ की सामर्थ्य, संगीत महाशक्ति।
20-व्यक्तित्व विकास हेतु उच्चस्तरीय साधनाएँ
मनुष्य ने ज्ञान के द्वारा इस संसार में अनूठी सफलताएँ प्राप्त की हैं। मनुष्य ने अपने व्यक्तित्व के विकास हेतु जीवन में अनेक उच्चस्तरीय साधनाएँ की हैं और उनका अद्भुत लाभ उठाया है। हम भी ये लाभ उठा सकते हैं यदि, समझ लें-
आसन, मुद्रा बंध, साधन-पथ, प्राणायाम के लाभ।
खेचरी मुद्रा की प्रक्रिया और उपलब्धि, सोमरसपान।
शक्तिचालिनी मुद्रा, प्राणायाम विज्ञान।
साँस लेने की ठीक विधि।
महिलाओं के लिए उपयोगी कुछ प्राणायाम।
प्राणायाम से जुड़ी वर्ण-चिकित्सा, रक्तचालन अभ्यास।
उज्जायी, भस्त्रिका, सूर्यभेदी, शीतली, भ्रामरी, प्लावनी, नाड़ीशोधन प्राणायाम।
कुण्डलिनी जागरण, स्वर शोधन, तत्व शोधन
पूज्यवर ने अपने सभी मानसपुत्रों, अनुयायियों के लिए मार्गदर्शन एवं विरासत में जो कुछ लिखा है-वह अलभ्य ज्ञानामृत (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय सत्तर खण्डों में) अपने घर में स्थापित करना ही चाहिए। यदि आपको भगवान ने सम्पन्नता दी है, तो ज्ञानदान कर पुण्य अर्जित करें। विशिष्ट अवसरों एवं पूर्वजों की स्मृति में पूज्यवर का वाङ्मय विद्यालयों, पुस्तकालयों में स्थापित कराएँ। आपका यह ज्ञानदान अपने वाली पीढ़ियों तक को सन्मार्ग पर चलाएगा, जो भी इसे पढ़ेगा धन्य होगा।
21-अपरिमित सम्भावनाओं का आगार मानवी व्यक्तित्व
सफलता का आदत है, जीवन का अमृत।
दूसरे की सुनिये, दूसरों को देखकर प्रसन्न होइए।
चेहरे के सौंदर्य का स्रोत मन में छिपा है।
मधुरता-जीवन का नवनीत, जीवन का उद्देश्य।
जीवन संग्राम में विजयी कैसे हों?
मैं क्या हूँ अमर हो तुम, अमरत्व को पहचानो।
जीवन की श्रेष्ठता और उसका सदुपयोग।
त्याग से जीवनमुक्ति, पूर्णता की प्रार्थना।
आस्तिकता का तत्वदर्शन।
संपन्नता के चार आधार, योगशक्तियों का उद्गम
प्रधानता आत्मा को दें, मन को नहीं।
आत्मा की अनंत सामर्थ्य, हम निष्पाप बनें।
22-चेतन, अचेतन एवं सुपर चेतन मन
मनुष्य अपनी अद्भुत और रहस्यमय शारीरिक रचना को समझकर यदि, अपने जीवन की रीति-नीति बनाकर चले तो चह अपने व्यक्तित्व को ऋद्धि-सिद्ध संपन्न बना सकता है। मनुष्यजीवन में चेतन अचेतन और सुपर चेतन मन का क्या महत्व है, इसके लिए हम जानें-
विचारप्रवाहों से विनिर्मित प्रखर व्यक्तित्व।
चिंतन की धारा बदलें विचार-विज्ञान का समझें।
आत्मविश्वास की महती शक्ति−सामर्थ्य।
विचारविभ्रम के दुष्परिणाम, सुलझे विचार-सुख का द्वार।
लाख छिपायें, अन्दर के भाव छिप नहीं सकते।
शरीर मन के नियंत्रण पर चलता है, मन का गुप्त रेडियो
प्रसन्नता संपन्नता पर नीर नहीं।
तन कर खड़े रहो, जीत तुम्हारी है।
प्रिय-अप्रिय का मनोविज्ञान, आत्महीनता की महाव्याधि।
आधुनिक मनोविज्ञान का उपनयन संस्कार।
अचेतन का परिवर्धन-परिष्कार।
23-विज्ञान और अध्यात्म परस्पर पूरक
प्रकृति-जगत के अनेक ऐसे तत्व हैं, जिनका विज्ञान अभी तक समुचित ज्ञान प्राप्त नहीं कर सका है। विज्ञान का क्षेत्र जहाँ समाप्त होता है, वहीं अध्यात्म प्रारंभ होता है। एक तरह से विज्ञान और अध्यात्म दोनों परस्पर एक-दूसरे के पूरक हैं।
सौर मण्डल-बुध,शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति,शनि, यूरेनस, नेपच्यून, प्लूटो।
सूर्य को नाचते सत्तर हजार ने देखा।
विश्वब्रह्मांड की संक्षिप्त जन्म-कुण्डली।
आसार बताते हैं कि हिमयुग आने वाला है।
मंगल ग्रह की दुर्दशा से सबक लें।
धरती की चुंबकीयशक्ति से खिलवाड़ न करें।
डाकिया पत्र लाया, क्रेव निहारिका से।
धरती और सूरज मरने की तैयारी कर रहे हैं।
मूल्य प्रति खण्ड 125/-व सत्तर खण्डों का सेट रु. 7000/-मात्र
24- भविष्य का वैज्ञानिक धर्म धर्म
भविष्य का वही धर्म प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा, जो यथार्थवादी चिन्तन, और चिंतन का अवलम्बन और मर्यादाओं का परिपालन करने पर खरा सिद्ध होगा। इस भावी की विचारणीय बातें हैं-
समस्त दुःखों का कारण अज्ञान, सुख का स्रोत-आत्मा।
ईश्वर ज्वाला है और आत्मा चिनगारी।
समर्थ सत्ता को खोजें, हम विश्वात्मा के घटक।
सूक्ष्म जगत, प्रकृति और पुरुष के रूप में।
अणु में ही उलझे न रहें, विभु बनें।
तब, जब ज्वालामुखी फूटते हैं, विराट की एक झाँकी।
नित्य निरंतर परिवर्तनशील यह सृष्टि।
बिन्दु में सिंधु समाया, पशु-पक्षियों पर मुकदमे।
हमें आस्तिक बनाते हैं, प्रकृति के ये अपवाद।
दुनिया की आश्चर्यजनक इमारतें-आश्चर्यजनक दृष्टिकोण।
धरती पर चेतना अंतरिक्ष से उतरी, अंतर्जगत के संदेश।
वरुण देवता की अनुपम, अद्भुत सत्ता
क्रमशः.......
योगशास्त्र की मान्यताओं के अनुसार शरीर में अनेक मर्मस्थल ऐसे होते हैं, जिनमें बड़ी विलक्षण शक्तियां विद्यमान होती हैं। शरीर-स्वास्थ्य और मनोदशा पर इनका अनुकूल प्रभाव पड़ता है। सामान्य स्तर का व्यायाम इन्हें प्रभावित नहीं कर पाता। इसीलिए शारीरिक, मानसिक व्याधि-व्याधियों के निवारण एवं समर्थता-साधना का आश्रय लिया जाता है। आत्मोत्कर्ष एवं अतींद्रिय क्षमताओं के विकास में योगसाधना का असाधारण महत्व है।
आधुनिक चिकित्सा के विविध क्षेत्रों में असाधारण प्रगति के बावजूद भी आज शारीरिक एवं मानसिक रोगियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। निरोग एवं दीर्घजीवन प्रदान करने के अनेकानेक अनुसंधान व प्रयोग-परीक्षण विश्वस्तर पर सर्वत्र किए जा रहे हैं, किंतु इस संदर्भ में कोई सर्वसुलभ व सर्वमान्य सूत्र अभी तक नहीं ढूँढ़ा जा सका है। प्राचीनकाल से ही भारतीय योगविद्या-विशारदों ने इस संदर्भ में गहन खोजें की थीं और आसन, प्राणायाम, बंध-मुद्रा एवं ध्यान के द्वारा न केवल रोग-निवारण में सफल हुए थे, वरन् दीर्घायुष्य व आत्मोत्थान का सूत्र भी प्रदान किया था। पाश्चात्य देशों में भी अब इस संबंध में गहन अनुसंधान चल रहे हैं ओर अनुसंधानकर्ताओं को सफलता भी मिल रही है। रूस के सुप्रसिद्ध चिकित्साविज्ञानी डॉ. ब्लादिमिर डेडीडेको ने दमे के कई मरीजों को रोग-मुक्त करके इस संबंध में असाधारण सफलता पाई है। उनका कहना है कि योगासन और प्राणायाम की नियमित साधना से रोग जल्दी ठीक होता है।
मधुमेह रोग के उपचार में आसन-प्राणायाम चिकित्सा को अत्यंत प्रभावी पाया गया है। इन यौगिक क्रियाओं को नियमित रूप से करने पर रक्तशुद्धि होती है और साथ ही कोलेस्टरोल जैसे विषाक्त तत्व की मात्रा भी घटती है। प्रयोग-परीक्षणों में पाया गया है कि तीन महीने की समयावधि में ही रक्त-शर्करा की मात्रा घटने लगती है। प्राणायाम की विभिन्न प्रकार की विधियों में प्राणाकर्षण, नाड़ीशोधन और सूर्यवेधन प्राणायाम को प्रमुखता दी जाती है। पिछले दिनों इस तरह के प्रयोग जीवाजी विश्वविद्यालय में अस्सी लोगों पर किए गए। परीक्षणोपराँत जो निष्कर्ष सामने आए, उसके अनुसार आसन-प्राणायाम की संयुक्त प्रक्रिया के नियमित पैंतालीस मिनट तक चलते रहने के कारण रक्त-शर्करा एवं कोलेस्टरोल में कुछ ही दिनों में अप्रत्याशित रूप से कमी आती है और रोगी स्वस्थ एवं हल्कापन महसूस करता है। प्राणविद्या का मूलभूत उद्देश्य सविता देवता के-सूर्य के प्राण को अभीष्ट परिमाण में ग्रहण करके शरीर में धारण करना है। जीवन का आधार मानी जाने वाली ऑक्सीजन वायु सूर्य से प्राणरूप प्रक्रिया के साथ सम्मिश्रित होकर प्रस्तुत ‘ऑक्सीजन’ बन जाती है। सूर्यवेधन-प्राणाकर्षण प्राणायाम द्वारा दोनों ध्रुवों पर बरसने वाली सूर्यशक्ति में सन्निहित प्राणधारा को वाँछित मात्रा में आकर्षित करके उनके द्वारा शारीरिक एवं मानसिक क्षमताएँ सुगमतापूर्वक अर्जित की जा सकती हैं।
योगशास्त्रों में विविध प्रकार के आसनों और प्राणायामों का विस्तृत वर्णन किया गया है और उनकी आवश्यकता-उपयोगिता को समझने तथा इन्हें दैनिक जीवन में सम्मिलित करने पर बल दिया गया है। इस संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय योग चिकित्सा एवं अनुसंधान केन्द्र बैंगलोर के अनुसंधानकर्ताओं ने गहन अनुसंधान किया है और निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए कहा है कि योग चिकित्सा द्वारा अस्थमा, मधुमेह, उच्चरक्तचाप, मिर्गी और उन्माद जैसी प्राणघातक बीमारियों से सरलतापूर्वक बचा जा सकता है। इस संस्थान द्वारा अब तक हजारों रोगियों का इस विधि द्वारा उपचार किया जा चुका है, जिसमें रोगी को कोई औषधि न देकर, आहार-विहार की संयमशीलता है। यह एक तथ्य है कि बैठे-बैठे-ठाले रहने की स्थिति में प्रायः आदमी उथली साँस लेता है, जिससे पूरे फेफड़ों का श्रम भलीभाँति नहीं हो पाता। फलतः रोगाणुओं को प्रवेश करने और पनपने का मौका मिल जाता है। प्राणायाम प्रक्रिया में गहरी-लम्बी एवं लयबद्ध साँस लेने की विधि-व्यवस्था है, जिसके कारण फेफड़ों में भर पूर प्राणवायु का संचार एवं संचयन होता है परिणामस्वरूप दमा, क्षय, खाँसी आदि रोगों संभावना नहीं रहती।
योगविज्ञान के अनुसार नियमित योगसाधनाएँ यथा-आसन, प्राणायाम, बंध, मुद्रा व ध्यान आदि करने के कितने ही सत्परिणाम देखकर जर्मनी के कई वैज्ञानिकों ने भी गहन अनुसंधान किया है। उन्होंने पाया है कि इन प्रक्रियाओं का दैहिक ही नहीं मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ता है, जिसका प्रतिफल शारीरिक स्वस्थता के साथ ही मानसिक स्थिरता एवं शांति के रूप में सामने आता है। विज्ञान की भाषा में इसे ‘अल्फास्टेट’ की संज्ञा दी गयी है।
इस संदर्भ में अपने देश में भी पिछले दिनों अनेकानेक प्रयोग-परीक्षण हुए हैं। मूर्धन्य वैज्ञानिक आनंद एवं चिन्ना ने सर्वप्रथम यौगिक प्रक्रियाओं के मन और शरीरगत प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन व विश्लेषण किया। परीक्षण ऐसे व्यक्तियों पर किए गए, जिन्होंने योगाभ्यास द्वारा अपने समस्त आटोनॉमिक तंत्रिका तंत्र यथा-श्वसन, कार्डियोवाँस्कुलर तंत्र व मोटाबोलिक दर पर नियंत्रण कर लिया था। वे अपने हृदय की धड़कन-दर को घटाकर चार-पाँच धड़कन प्रतिमिनट कर लेते थे। अध्ययन में पाया गया कि ऐसे व्यक्तियों के मस्तिष्क से यौगिक क्रियाओं की स्थिति में हर वक्त ‘अल्फा’ तरंगें निकलती हैं। इसी बीच कभी-कभी ‘बीटा’ तरंगें भी देखी गयीं। श्वसन दर भी घटकर प्रतिमिनट 5-6 थी। आटोनॉमिक तंत्रिकातंत्र पर इस ऐच्छिक नियंत्रण से चयापचय दर भी अत्यंत न्यूनतम स्तर पर पहुँचाने में वे सफल रहे।
इसी प्रकार का अध्ययन-अनुसंधान डॉ. कोठारी व उनके सहयोगियों ने ऐसे योगियों पर किए, जो जमीन के अंदर कई दिनों तक पड़े रहे। चारों ओर से बंद जमीन के अंदर बने गड्ढे में स्थित इन व्यक्तियों के परीक्षण से जो निष्कर्ष सामने आये, उसके अनुसार ऐसी दशा में शारीरिक क्रियाएँ ऐसी सुषुप्ति की स्थिति में चली जाती हैं, जैसी कि शीतनिष्क्रियता की स्थिति में अन्य जीवधारियों की शरीर की समस्त फिजियोलॉजिकल क्रियाएँ अपरिवर्तित व सामान्य पायी गयीं।
योगासन व प्राणायाम द्वारा जहाँ शरीर और प्राण पर नियंत्रण सधता और उनकी क्षमता बढ़ती है, वहीं ध्यान-साधना द्वारा मानसिक क्रिया-व्यापार पर नियंत्रण साधता है। ध्यान का शरीरगत क्रियाओं पर पड़ने वाले प्रभाव का विस्तृत अध्ययन प्रसिद्ध विज्ञानवेत्ता एच. आर. वैलेस एवं सहकर्मियों ने किया। पाया गया कि ध्यान करने वाले व्यक्ति में न सिर्फ ध्यान के दौरान, वरन् ध्यान के बाद भी उनके चयापचय व शरीर-रसायन में महत्वपूर्ण परिवर्तन आता है।
अनुसंधानकर्ताओं का निष्कर्ष है कि इन योगाभ्यासों के दौरान साधक अपने मस्तिष्क के लिम्बिक और हाइपोथेलेमस भाग पर सेरेब्रल कार्टेक्स का नियंत्रण स्थापित कर लेता है। फलतः वह अपनी इच्छा के आधार पर समस्त अनैच्छिक शारीरिक-क्रियाओं एवं विभिन्न प्रकार की मानसिक क्रियाओं को वशवर्ती कर लेता है।
सुविख्यात विज्ञानी मिलर ने आँतरिक अंगों एवं ग्रंथियों पर यौगिक क्रियाओं का नियंत्रण प्रदर्शित करने के लिए अनेक प्रयोग किए। एक प्रयोग-परीक्षण में उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ कुछ चूहों की ऐच्छिक मांसपेशियों को निष्क्रिय बना दिया। इसके बाद मस्तिष्क के आनंदोत्पादक केंद्र को इलेक्ट्रोड के माध्यम से उद्दीप्त किया गया। तत्पश्चात इनमें से कुछ चूहों को अपने हृदय की धड़कन को कम करने का प्रशिक्षण दिया गया एवं कुछ को धड़कन तेज करने का। कुछ दिनों के पश्चात उनमें से कुछ चूहे योग जैसी क्रियाएँ करते देखे जाने लगे। वे एक तरफ की कान की रक्तवाहिनियों की तुलना में अधिक फैलाना स्वतः सीख गये थे। इस प्रकार बायोफीडबैक पद्धति के माध्यम से चूहों ने अपने आटोनॉमिक तंत्रिका तंत्र पर ऐच्छिक नियंत्रण प्राप्त कर लिया था। इसी प्रयोग को वैलेस ने बिल्लियों पर दुहराया। यहाँ भी वही परिणाम प्राप्त हुए। इसी प्रकार का अध्ययन ई.ई.जी. के माध्यम से मनुष्यों पर एक जापानी वैज्ञानिक कामिया द्वारा किया गया। इस प्रयोग-परीक्षण का उद्देश्य यह जानना था कि ध्यान प्रशिक्षण द्वारा व्यक्ति अपनी विभिन्न प्रकार की मस्तिष्कीय रिद्मों-लयों का बनना व तिरोहित होना किस सीमा तक पहचान सकता है। कुछ दिनों के प्रशिक्षण के बाद परिणाम विस्मयकारी पाया गया। देखा गया कि अल्फा रिद्म की दृष्टि से ध्यान द्वारा उत्पन्न स्थिति अन्य चेतनात्मक स्थितियों जैसे-जाग्रति, निद्रा, स्वप्न एवं सम्मोहन तथा ऑटोसजेशन से स्पष्ट रूप से भिन्न है। व्यक्ति के शारीरिक फिजियोलॉजी में ये महत्वपूर्ण परिवर्तन इस बात का संकेत करते हैं कि ध्यान की यह अवस्था चिकित्सा क्षेत्र में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
इस संबंध में हरबर्ट बेन्सन एवं उनके सहकर्मियों ने जब नियमित ध्यान प्रयोग उच्चरक्तचाप के मरीजों पर किया जो सिस्टोलिक एवं डायस्टोलिक दबाव में स्पष्ट कमी आँकी गयी। इसी तरह डॉ. चिन्ना आनंद एवं बलदेव सिंह न चार साधकों पर ध्यान प्रक्रिया का ई. ई. जी. द्वारा विशद् अध्ययन किया। समाधि की स्थिति में चार साधकों में से दो को दृश्य और श्रव्य के माध्यमों से उद्दीप्त किया गया, जबकि अन्य दो को चार डिग्री से. गे्र. तक ठंडे जल में उनके हाथ 45 से 55 मिनट तक डुबाये रखने जैसी कष्टकारक स्थिति में रखा गया। इतने पर भी उनमें स्थायी रूप से हर वक्त विद्यमान मस्तिष्कीय अल्फा पैटर्न को परिवर्तित नहीं किया जा सका। ई.ई.जी. द्वारा किए गए मापन में अल्फा तरंगों के आयाम बढ़े हुए पाये गये। योगाभ्यास का शरीर-फिजियोलॉजी एवं बॉडी केमिस्ट्री पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका विषद अध्ययन-विष्षण ‘योगरिसर्च सेण्टर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी’ में भी किया गया और उत्साहवर्धक परिणाम पाए गए। इसी प्रकार के शोधकार्य विवेकानंद केंद्र बैंगलोर एवं ब्रह्मवर्चस शोध-संस्थान शांतिकुंज हरिद्वार में भी सफलतापूर्वक संपन्न हुए हैं।
वस्तुतः योग का उच्चस्तरीय उद्देश्य आत्मविकास करना है। स्वास्थ्य संवर्द्धन तो योगाभ्यास का एक छोटा-सा पक्ष मात्र है। इतने पर भी पुरातनकाल के बताए हुए योगाभ्यासों के विधि-विधान ज्यों-के-त्यों काम में लाने पर भी उसका वैसा लाभ साधकों को नहीं मिलता, जैसा कि मिलना चाहिए। कारण के विषय में खोजकर्ताओं ने बताया है कि साधकों की मनोभावना उस लक्ष्य के निकट तक नहीं पहुँच पाती, जैसी कि मिलना चाहिए। कारण के विषय में खोजकर्ताओं ने बताया है कि साधकों की मनोभावना उस लक्ष्य के निकट तक नहीं पहुँच पाती, जैसी कि योगी की होनी चाहिए। आत्मशोधन, परमार्थपरायण एवं समर्पण का उद्देश्य न रहने पर योगाभ्यास एक शारीरिक यात्रा मात्र रह जाता है और आत्मा की दृष्टि से ऊँचाई उत्पन्न करने में सहायक सिद्ध नहीं होता।
उस दिन आचार्य सुहस्ती का पदार्पण कौशांबी नगरी में हुआ था। स्थान की कमी के कारण आचार्य का शिष्य-समुदाय भिन्न-भिन्न स्थानों पर रुका। कौशांबी में उस समय भीषण दुष्काल की स्थिति थी। इनसान दाने-दाने के मोहताज हो गए थे। किसी को भी भरपेट भोजन प्राप्त करना दुष्कर हो गया था, परंतु ऐसी स्थिति में भी साधु-संतों के प्रति अत्यधिक भक्ति के कारण लोग अपनी आवश्यकताओं को दबाकर उन्हें यथेष्ट भिक्षा दे दिया करते थे।
कौशांबी पहुँचने के दो-तीन दिन बाद आचार्य सुहस्ती के शिष्य भिक्षा के लिए एक श्रेष्ठी के घर पहुँचे। उनके पीछे-पीछे एक भिखारी भी चल रहा था। उसने साधुजनों के पात्रों में श्रेष्ठी के द्वारा दी गयी स्वादिष्ट भोजन सामग्री को देखा। ये साधु भरपेट भोजन करने के बाद उपाश्रय को लौट रहे थे। अभी भी उनके पास कुछ भोजन साथ था। वह भिखारी भी उनके पीछे-पीछे चलने लगा। उसने इन साधुओं से अपनी क्षुधा की तीव्रता के कारण भोजन माँगा। साधु बोले-”गुरु के आदेश के बिना हम कोई कार्य नहीं कर सकते, अतः हमारे गृहीत आहार में से हम तुमको कुछ नहीं दे सकते।” साधुओं के साथ-साथ वह भिखारी भी उपाश्रय तक पीछे चला गया। आचार्य सुहस्ती से भिखारी हमसे भोजन की याचना करता है।”
महाप्रज्ञा सुहस्ती विशिष्ट ज्ञानी थे। उन्होंने भिखारी पर गहरी नजर डाली व अपने ज्ञानयोग से जाना कि यह दीनहीन दिखने वाला व्यक्ति भावी जन्मों में धर्मप्रधान शासन का अतिशय विस्तार करने वाला होगा और धर्म-संघ को भी अनूठा संबल प्रदान करेगा। अध्यात्मवेत्ता एवं परमकारुणिक आर्य सुहस्ती ने अपने मधुर स्वरों में उपस्थित दयापात्र रंक को संबोधित करते हुए कहा, “मुनि जीवन स्वीकार करने पर तुम्हें हम भोजन दे सकते हैं। साधु द्वारा याचित भोजन में से गृहस्थ को देना मर्यादा विहित नहीं है।”
घोर अन्नाभाव में मृत्यु का आलिंगन करने की अपेक्षा मुनि जीवन की कठोर संयमचर्या का पालन करना उस भिखारी को श्रेयस्कर लगा और वह मुनि बनने के लिए तत्काल संपूर्ण प्रगाढ़ता के साथ सहमत हो गया।
परोपकारपरायण आर्य सुहस्ती ने उसे दीक्षा दे दी। कई दिनों की भूख से बेहाल भिखारी को पहली बार पर्याप्त भोजन मिला था। उसको आहार-मर्यादा का विवेक नहीं रहा। मात्रा का अतिक्रमण करने के कारण जरूरत से अधिक आहार कर लेने के कारण श्वास-वायु का संचार करना कठिन हो गया और वह भिखारी अपने दीक्षा दिन की प्रथम रात्रि में ही काल-धर्म को प्राप्त हो गया। आर्य सुहस्ती ने उसके इस विशिष्ट भविष्य को पहले ही देख लिया था। वह भिखारी बना साधु काल-धर्म को प्राप्त होकर मगध सम्राट अशोक के पौत्र यानि कुणाल पुत्र संप्रति के रूप जन्मा।
राजकुमार संप्रति एक दिन राज-प्रसाद के वातायन में बैठा था। तभी उसने साधु वृंद से परिवृत्त आचार्य सुहस्ती को राजपथ पर चलते देखा। ध्यान से देखने पर आर्य सुहस्ती उसे अपने परिचित से लगे। विशेष ध्यान केंद्रित करने पर उसे अपना पूर्वजन्म स्पष्ट-सा होने लगा। इसी के साथ वह महल से नीचे उतरा और विनयपूर्वक वंदन करते हुए आचार्य से पूछा-”गुरुदेव! आपने मुझे पहचाना।” परमज्ञानी आर्य सुहस्ती ने उसकी ओर कुछ पलों तक गंभीर दृष्टि से देखा और सब कुछ सविस्तार बता दिया।
संप्रति ने प्रणत होकर निवेदन किया, “भगवन्! डस भिखारी के जन्म में यदि आप मुझे शरण में नहीं लेते तो आज मेरी क्या दशा होती? आप मेरे महाउपकारी हैं। पूर्वजन्म में आप मेरे गुरु के रूप में स्वीकार करता हूँ। मुझे आप अपना धर्मपुत्र मानकर कर्तव्यशिक्षा देकर अनुगृहीत करें और प्रसन्नमना मुझे किसी विशिष्ट कार्य का आदेश दें, जिसे संपादित कर मैं उऋण हो सकूँ।
संप्रति के इस कथन पर आचार्य सुहस्ती मुस्कराए, फिर कुछ पलों तक मौन रहने के बाद कहने लगे, “राजकुमार! अब तुमने स्वयं अपने अनुभव से जान लिया है कि धर्मधारणा और आध्यात्मिक उपासना-साधना का क्या महत्व एवं मूल्य है? इसके क्षणिक स्पर्श एवं एक लघु अंश को ग्रहण करके ही तुम भिखारी से राजा बन सके हो। अब तुम चारों ओर धर्म की ज्योति का प्रकाश फैलाओ, ताकि इसकी आभा एवं प्रकाश से सभी के जीवन का अँधेरा दूर हो सके।”
आचार्य सुहस्ती से यह बोधि प्राप्त कर संप्रति सम्यकत्व गुणधारी प्रभावी साधक बना तथा उसने धर्म की अनेकविधि सेवा की।
रंगों की अपनी निराली दुनिया है। हर व्यक्ति का अपना मनपसंद रंग होता है। जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका एवं विशिष्ट प्रभाव है। अब तो चिकित्सा एवं मनोविज्ञान के क्षेत्रों में भी रंगों का प्रयोग किया जाने लगा है। मनपसंद रंग जहाँ मानवीय विकारों को दूर कर मन में शांति, प्रसन्नता आदि अनेक भावों को जाग्रत करता है, वहीं बेमेल रंग के प्रभाव घातक सिद्ध हो सकते हैं। निश्चित रूप से व्यक्ति की मनःस्थिति पर रंगों के गहरे और सीधे प्रभाव घातक सिद्ध हो सकते हैं। निश्चित रूप से व्यक्ति की मनःस्थिति पर रंगों के गहरे और सीधे प्रभाव पड़ते हैं। इससे मनुष्य की कार्यक्षमता भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहती। रंगों की पसंद के आधार पर मानवीय प्रकृति का समग्र एवं सार्थक विश्लेषण संभव है। इस आधार पर इन्हें व्यक्तित्व की परछाई के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।
किसी भी तरह से जानना चाहे, परिणाम यही निकलेगा कि रंगों की धार्मिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक महत्ता अक्षुण्ण है। वास्तविकता यही है कि इनका मनुष्य जीवन के साथ अटूट संबंध है। प्रकृति तो हमेशा से ही अपने को सब कहीं सुँदर एवं मनोहारी रंगों के माध्यम से अभिव्यक्त करती रही है। व्यक्ति और समाज ही नहीं, राष्ट्र भी इनसे प्रभावित होते हैं। अपने देश में ‘भगवा’ रंग एक विशेष जीवनपद्धति का परिचायक रहा है। मिश्र, यूनान और रोम के लोग अपने देवताओं को एक विशिष्ट रंग के माध्यम से पूजते थे। मिश्र के लोग लाल रंग को विशेष महत्व देते हैं। चीन में प्रेमीयुगल एक-दूसरे के प्रति आकर्षण पैदा करने के लिए रंगों का विशेष ध्यान रखते हैं। चीनी लड़कियाँ इसमें कुशल होती हैं। वे अपने साथी को आकर्षित करने के लिए रंगों के प्रभाव का उपयोग करती हैं।
रंगों का वैज्ञानिक विश्लेषण बड़ा रोचक है। विज्ञान तो रंग के अस्तित्व को ही नहीं मानता है। वान के अनुसार रंग प्रकाश-तरंगों के आधार पर ही विनिर्मित होते हैं। अतएव रंग एवं प्रकाश-तरंग में अन्योन्याश्रित संबंध है। सभी रंगों का अभाव काला एवं सबका मिश्रण श्वेत रंग है। चिकित्सा क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की फ्रीक्वेंसी वाली प्रकाश किरणों से विशिष्ट रंग का निर्माण किया जाता है एवं विशेष तकनीक द्वारा रोगोपचार किया जाता है। इसका उपयोग माँस-पेशियों की पीड़ा दूर करने, नेत्र का इलाज करने आदि में बहुतायत रूप से किया जा रहा है। नीला प्रकाश पेट के कैंसर में, आँखों के रोगों और स्त्रियों के गुप्त रोगों के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है। लाल प्रकाश रक्तवृद्धि तथा जिगर तथा दिल की बीमारी के लिए एवं बैंगनी प्रकाश गंजापन दूर करने में काम लिया जाता रहा है।
रंग-परीक्षण शारीरिक रोग के साथ ही मानसिक विकास को दूर करने में सहायक होता है। शरीर की त्वचा का रंग देखकर रोगों की पहचान हो सकती है। नीली और बैंगनी त्वचा रक्त में ऑक्सीजन की कमी को दर्शाती है। इस प्रकार का व्यक्ति हृदय एवं फेफड़े के रोग से ग्रसित होता है। अत्यधिक लाल त्वचा बताती है कि ऑक्सीजन का विषाक्त प्रहार शरीर पर हो चुका है। पीली त्वचा v+6 द्योतक है। रंगों के इस परीक्षण द्वारा रोगों की पूर्व अवस्था का पता लगाकर इनके निवारण हेतु आवश्यक उपाय किया जा सकता है। इतना ही नहीं रंगों का हमारे अवचेतन मस्तिष्क एवं मनोभावों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। दिल्ली में हुए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि काले रंग की गाड़ियाँ दूसरे रंग की गाड़ियों की अपेक्षा अधिक दुर्घटनाग्रस्त होती है। इसी प्रकार की एक रिपोर्ट स्वीडन के रंग विशेषज्ञ सिगवर्ड विवर्ग भी दी थी। लगभग 31000 मोटर दुर्घटनाओं के अध्ययन के पश्चात वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि दुर्घटनाग्रस्त कारों में काले रंग की कारों की संख्या 33.4 प्रतिशत थी।
प्रकृति में जितने भी रंग हैं वे चूर्ण, द्रव, तैलीय और वाष्पित रूप में उपलब्ध हैं। अब तो हर रंग की प्रतिकृति तैयार कर ली गयी है। इस प्रकार रंगों की संख्या लाखों में पहुँच गई है। वैसे मुख्य रूप से मूल रंग तीन ही हैं। परंतु विज्ञानवेत्ता प्रकृति में आठ रंगों का विवरण देते हैं। सूर्य-किरणों में सात रंगों का सम्मिश्रण होता है। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण रंग लाल है। लाल रंग उग्रपेम, उग्र विचार एवं तीव्र भावुकता का प्रतीक है। इससे शक्ति और स्फूर्ति प्राप्त होती है। यह रंग पसंद करने वाले व्यक्ति अनुकूल परिणाम तथा सफलता प्राप्ति में विश्वास रखते हैं। संघर्षों से जूझना, चुनौतियों को स्वीकारना, नेतृत्व करना,शोध एवं अन्वेषण की मनोवृत्ति लाल रंग की पसंद से जुड़ी है। ऐसे व्यक्ति अपने विषय में जागरूक एवं स्वतंत्र निर्णय लेने वाले होते हैं। अपनी इच्छाशक्ति का सामना अपने बलबूते करने के पक्षधर होते हैं। जो व्यक्ति लाल रंग को अपने जीवन में सर्वाधिक प्राथमिकता प्रदान करते हैं, उनमें सामूहिक नेतृत्व, सृजनशीलता, विकासोन्मुखता आदि गुणों की बहुलता होती है।
लाल रंग नाड़ी को गति प्रदान करता हैं स्वैच्छिक मांसपेशियों, जननेंद्रियों पर इस रंग का आधिपत्य माना जाता है। यह रंग सर्दी की बीमारियों के लिए फायदेमंद होता है एवं उन्हें ऊष्मा प्रदान करता है। चर्म रोगों के लिए यह लाभकारी है। जन्मजात उदासीनता और परिवेष्जनित कुँठा एवं निराशा से पीड़ित व्यक्तियों को यह रंग मानसिक ऊर्जा प्रदान करता है। इस रंग को अपनाने से शारीरिक दुर्बलता एवं हृदय संबंधी विकास आदि दोषों का भी निराकरण होता है। आजकल तो कलरडिस्क का प्रचलन चल पड़ा है, जिससे क्रोमोलेंस के माध्यम से प्रतिबिंबित किरणों द्वारा प्रत्येक बीमारी को ठीक करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस विधि से लाल रंग का प्रयोग काफी उपयोगी सिद्ध हो रहा है।
नीला रंग शांत, शुद्ध, सात्विक, स्नेह एवं वैराग्य का द्योतक माना जाता है। यह रंग कहीं-कहीं तामसिक विचारों के रूप में भी प्रदर्शित होता है। वैसे सामान्यतया इस रंग में सत्य, प्रेम, त्याग, समर्पण, अनुराग, गहराई, विश्वास आदि भाव निहित हैं। यह जीवन के स्थिर मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है। गहरे नीले रंग को शांति की पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। इस रंग को अपने जीवन में प्राथमिकता देने वाले व्यक्तियों में विचारों एवं भावनाओं का अच्छा संबंध एवं विकास होता है। इस रंग से रीढ़ की हड्डी, आमाशय अथवा किसी भी अंग का प्रदाह शांत होता है। यह रंग व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकता जैसे, शारीरिक विश्राँति मानसिक संतुष्टि आदि की पूर्ति करता है। इस रंग की कमी से व्यक्तित्व में विश्वास, सद्भावना एवं सहयोग की वृतित में कमी आती है।
हरा रंग बौद्धिक क्षमताओं को सक्रिय कर मानसिकशांति प्रदान करता है। हालाँकि गहरे हरे रंग को शक, ईर्ष्या, द्वेष व क्रियाशीलता से जोड़ा जाता है। हरा रंग अगर मटमैला हो जाए, तो मन के विचारों को दूषित कर देता है। इसी वजह से इसे द्वैत रंग यानि दो विचारों वाला रंग कहा गया है। विश्राम व थकान, ताजगी एवं चंचलता, स्फूर्ति और आराम दोनों का अद्भुत संगम इस रंग में देखा जा सकता है। यह रंग महत्वाकाँक्षी भाव को जनम देता है। ऐसा व्यक्ति चाहता है कि समाज में उसका विशिष्ट स्थान हो। संघर्षों, विरोधों व प्रतिरोधों के बावजूद वह अपने लक्ष्यप्राप्ति हेतु प्रयत्नशील रहता है। चिकित्सीय दृष्टि से इस रंग को पसंद करने वालों को प्रायः गैस्ट्रिक अल्सर तथा पाचन संबंधी अनेकानेक बीमारियों की संभावना बनी रहती है। यद्यपि हरा रंग चर्मरोगों, शारीरिक जख्मों एवं मानसिक अवसाद में आश्चर्यजनक ढंग से आराम पहुँचाता है। इसकी कमी उद्विग्नता एवं अशांति को बढ़ावा देती है। कभी-कभी तो इसकी कमी से शारीरिक दुर्बलता पैदा हो जाती है। ऐसे व्यक्ति पर छिद्रान्वेषी और दूसरों की आलोचना जैसे मनोविकार से ग्रसित हो जाते हैं। कई व्यक्तियों में इसका प्रभाव का भाव भर देता है, जिससे व्यक्तियों में हीनता घर कर जाती है।
पीला रंग प्रकृति में सूर्य के प्रकाश के रूप में दृष्टिगोचर होता है। यह रंग आकाँक्षाओं की पूर्ति हेतु किए गए श्रम का संकेतक है। जहाँ हरे रंग में समृद्धि है वहीं पीले रंग में विश्राम। इस रंग की भावनात्मक संतुष्टि चंचल व संवेगी आशाओं में समाहित है। लक्ष्यसिद्धि की अदम्य इच्छा एवं तीव्र वैचारिक क्षमता इस रंग के प्रभाव से प्राप्त होती है। इस रंग को पसंद करने वाले व्यक्तियों में सुख-शांति की इच्छा प्रबल होती है। ये सूक्ष्मदृष्टि संपन्न एवं जागरूक होते हैं। स्वभाव से मिलनसार तथा हर परिस्थिति में अपने में अपने अनुकूल समाधान तलाशने में माहिर होते हैं। पीला रंग यकृत के सभी रोगों को नियंत्रित करता है। यह महिलाओं के लिए भी लाभकारी होता है। हालाँकि पीला रंग शुद्ध रूप में ही अपने गुणों का प्रभाव डालता है अन्यथा यह निष्ठुरता, कायरता तथा दुर्बुद्धिजन्य मनोरोगों को जन्म देता है।
बैंगनी रंग लाल व नीले दो मौलिक रंगों का मिश्रण है। यह अतिभावुकता का द्योतक है। अतः भावुक व्यक्ति इस असंतोष आदि भावों को जीता जा सकता है। रंग चिकित्सकों की मान्यता है कि महिलाएँ गर्भावस्था के दौरान बैंगनी रंग के प्रति विशेष लगाव महसूस करती हैं। यह लगाव उन महिलाओं में अधिक होता है, जो भावनात्मक दृष्टिकोण से स्वयं सुरक्षित अनुभव करती हैं। भूरा रंग एकता की भावना, ईमानदारी, अच्छाई, भलाई एवं उच्च भावना के साथ सहयोग का भाव जगाता है। चिकित्सा के क्षेत्र में भूरे रंग को अच्छा नहीं माना जाता है। यह रंग रक्त विकार, दुर्दशा एवं अस्वस्थता का संकेत करता है। गहरे भूरे रंग को अत्यधिक पसंद करने वाले लोग शारीरिक रूप से अस्वस्थ पाए जाते हैं। धूसर, मटमैला रंग गंभीरता, विनम्रता, सौजन्यता तथा लज्जा के साथ-साथ कर्मठ क्रियाशीलता का प्रतीक है, परंतु इस रंग की सबसे बड़ी विशेषता है कि बाहरी उत्प्रेरक के अभाव में यह निर्बल हो जाता है।
श्वेत रंग में शांत स्वभाव, सादगी, उच्चविचार, तेजस्विता और सात्विकता आदि उत्कृष्ट गुण समाहित होते हैं। इस रंग में सभी सातों रंगों का सम्मिश्रण होता है, अतः यह अत्यंत लाभप्रद होता है। सफेद कपड़े पहनकर प्रातःकाल धूप में टहलने से सर्दी-जुकाम में फायदा होता है, काला रंग शोक का द्योतक है। यह शोक-दुख जैसे भावों को जगाने वाला, पलायनवादी, स्वार्थी आत्मकेंद्रित एवं अंतर्मुखी बनाता है। यह रंग निराशा एवं पतन को भी दर्शाता है। यह विस्तार एवं विकास के एकदम विपरीत है। यद्यपि इस रंग को अन्य अच्छे और स्वच्छ रंगों से मिला देने पर यह व्यवहार-कुशलता का रूप अपना लेता है।
जर्मनी के विख्यात डॉक्टर मैक्सलूषर ने अपनी पुस्तक ‘द लूषर कलर टेस्ट’ में रंगों के विभिन्न गुणों एवं प्रभावों का विस्तृत वर्णन किया है। उनके अनुसार नीला रंग पूर्णषाँति का, हरा राजसी ठाठ और निरंकुश प्रवृत्ति का, लाल शक्ति और स्फूर्ति का तथा पीला संतुष्टि की भावना का द्योतक है। उनका कहना है कि जीवन को सरस एवं सुँदर बनाने के लिए मनोनुकूल एवं उत्तम रंगों का चयन करना चाहिए। जेरी रोड्स और स्यूथेम ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द कलर्स ऑफ योर माइंड’ में भी रंगों के प्रभाव का उल्लेख किया है। इनके अनुसार विभिन्न रंगों से प्रभावित होने वाले सामाजिक व्यक्तित्व का समूह भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है। गहरे नीले और गहरे लाल रंग को पसंद करने वालों में इंजीनियर, बैंक क्लर्क, प्रयोगशाला कर्मचारी, एकाउंटेंट आदि आते हैं। हल्के नीले एवं हल्के लाल रंग को सेल्समैन, शिक्षक, नर्स एवं सामाजिक कार्यकर्ता पसंद करते हैं।
हल्के लाल और गहरे लाल रंग का चुनाव करने वालों में कलाकार, संगीतकार, गहरे लाल रंग का चुनाव करने वालों में कलाकार, संगीतकार, डॉक्टर, माली आर्कीटेक्ट, रिपोर्टर, बायोग्राफर, पुलिस एवं वकील आते हैं। हल्के लाल एवं गहरे रंग को विज्ञापन कॉपीराइटर, बैरिस्टर, पत्रकार तथा उपन्यासकार पसंद करते हैं। मार्केटिंग मैनेजर, कंपनी डायरेक्टर एवं कवि हल्के हरे और हल्के लाल रंग को प्राथमिकता देते हैं। इस प्रकार उपर्युक्त रंगों का सम्मिश्रण अधिक प्रभावी एवं लाभप्रद देखा गया। इन रंगों के बीच एक मनोवैज्ञानिक संतुलन पैदा होता है। एक अन्य परीक्षण में बेमेल रंगों का सम्मिश्रण लिया गया तथा इसका सर्वेक्षण किया गया। ये रंग हैं, गहरा नीला एवं गहरा हरा, हल्का नीला एवं हल्का हरा, गहरा लाल तथा गहरा हरा, गहरा लीला तथा हल्का हरा। समाज के 90 प्रतिशत लोगों ने उसके सम्मिश्रण को नापसंद कर दिया। भलीप्रकार प्रयोग-परीक्षण करने पर यह निष्कर्ष निकला कि एक निश्चित रंगों का और सही अनुपात में किया गया मिश्रण ही मन को प्रभावित कर सकता है अन्यथा बेमेल रंग मानसिक रूप से कष्टप्रद ही साबित होते हैं। रंगों का चयन भी एक प्रकार की कला है।
ध्वनि प्रदूषण को रोकने में भी रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। इस ओर सोवियत ध्वनि विशेषज्ञों ने गहनशोध-अनुसंधान किया है। उनके अनुसार विभिन्न रंगों के ध्वनि-अवरोधक गुणों में विशेष अंतर परिलक्षित होता है-हल्का हरा एवं नीला रंग ध्वनि के सबसे उपयुक्त अवरोधक हैं। अत्यधिक प्रदूषण वाले क्षेत्रों के पास वाले कमरों को हल्के हरे और हल्के नीले रंग से पुतवाकर काफी राहत महसूस की गई। रंगों के प्रभाव दृश्य के अलावा सूक्ष्म भी हैं। इनका विश्लेषण यदि सही ढंग से किया जा सके, तो जीवन के विविध क्षेत्रों में वरदान साबित हो सकते हैं। सही और उपयुक्त रंगों का निर्धारण अनेक मनोरोगों से मुक्ति दिला सकता है। अतः जीवन को सुखी, स्वस्थ, शांत और प्रसन्न रखने के लिए मनपसंद रंगों का चुनाव करना चाहिए।
जो हमारे आँख से ओझल होने पर स्नेह-सहयोग न मिल सकने की बात सोचते हैं, उन्हें सूक्ष्म का-परोक्ष का भी महत्व समझना चाहिए। शरीर प्रत्यक्ष और प्राण परोक्ष है, तो भी हम प्राण् का सान्निध्य अनुभव करते और उसी के सहारे जीवित तक रहते हैं। हम सब जिस सुदृढ़ श्रृंखला में मजबूती के साथ बाँधे गए हैं, वह ऐसी नहीं है कि कच्चे धागे की तरह जरा-सा आघात लगते ही बिखर जाए। ऐसी तो स्वार्थियों की मित्रता होती है। अपना और परिजनों का मध्यवर्ती रिश्ता आदर्शों और उद्देश्यों पर अवलंबित है। वे जब तक यथास्थान बने रहेंगे तब तक किसी को भी निकटता या दूरी के कारण किसी प्रकार की गड़बड़ी होने की आशंका नहीं करनी चाहिए।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य (वाङ्मय-28, पृष्ठ 1.28)
किसी युगशिल्पी को क्या, कब, कैसे, कहाँ और क्या करना है, यह निर्धारण व्यक्ति की योग्यता और स्थानीय आवश्यकता को देखते हुए सामान्य सूझबूझ के आधार पर किया जा सकता है। रेत में चावल मिल जाने पर उन्हें एक-एक करके बीनना पड़ता है और कचरे तथा अनाज को अलग करने का श्रमसाध्य, समयसाध्य उलझन भरा काम करना पड़ता है। गुड़ और गोबर एक में मिल जाने पर भी ऐसी ही कठिनाई पैदा होती है। इन दिनों विचारों और क्रिया–कलापों में उचित-अनुचित का असाधारण गड्ड-मड्ड हो गया है। सूझ नहीं पड़ता कि प्रचलन में किन विचारों और किन कार्यों को मान्यता दी जाए और किसे निरस्त-बहिष्कृत किया जाए। उचित और अनुचित में संशोधन का नाम ही विचार-क्राँति है। जो कुछ कहा-सुना और किया जा रहा है, उस सब पर नए सिरे से कसौटी लगाये जाने की आवश्यकता है। जो विवेकयुक्त है उसका निर्धारण नये सिरे से किया जाना है, क्योंकि प्रस्तुत अगणित समस्याओं का एकमात्र कारण उचित के स्थान पर अनुचित का आ विराजना ही है। उन्हें यथास्थान प्रतिष्ठित करने के लिए अस्त-व्यस्त को नये सिरे से यथास्थान जमाना पड़ेगा।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य (वाङ्मय ग्रंथ क्र. 28, पृष्ठ-7.31)
नाम था उसका फकीरचंद, परंतु धन का उसके पास कोई अभाव नहीं था। धन के साथ उनका मन भी निर्मल था। कुछ अंश इसमें से वे सदा ही लोगों की सहायतार्थ खर्च करते रहते थे। किसी संत ने उनसे एक बार कहा था-”सेठ, सबकी सहायता किया कर। प्रभु तेरी सहायता करते रहेंगे।” तभी से वह दानी हो गया था-परोपकारी बन गया था।
संत की बात भी मिथ्या नहीं हुई। वह जितना देता, उससे अधिक पाने लगा। यह क्रम वर्षों तक चलता रहा। सेठानी भी उनके कार्य में हाथ बँटाती थी। सुखपूर्वक समय व्यतीत हो रहा था।
एक बार सेठजी व्यापारिक कार्य से बाहर कहीं गए थे। वह एक गाँव में पहुँचे। गाँव के निवासी उनको अच्छी तरह जानते थे। उनकी सहायता प्राप्त करने में वहाँ के लोग किसी भी तरह पीछे नहीं थे। उन क्षणों में सेठजी यात्रा की थकान से परेशान थे। भूख भी उन्हें व्याकुल कर रही थी और वे अपने मुँह से कुछ भी कह नहीं पा रहे थे और गाँव वालों ने भी उनसे कुछ नहीं पूछा। सेठजी को आशा थी कि गाँव वाले उनकी आवभगत में पलकें बिछा देंगे, परंतु वे लोग ऐसा नहीं कर सके।
सेठजी घर लौटे, तो इस बार वे काफी उद्विग्न, परेशान थे। बार-बार यह प्रश्न उनके दिमाग को मथता रहा कि मैं सदा सबकी सहायता करता हूँ और वे सहायता प्राप्त करने वाले थोड़ा-सा भी अहसान नहीं मानते! यह कैसी स्थिति है? उनका अशांत मन उत्तरोत्तर छटपटाने लगा।
दैवयोग से वही संत फिर उस गाँव से गुजरे। गाँव के बाहर तालाब के किनारे वट-वृक्ष के नीचे डेरा डाला। उनके शिष्य भी साथ थे। फकीरचंद का भी खबर लगी कि वही संत गाँव में पधारे हैं, जिन्होंने उसे दूसरों की सहायता करने के लिए कहा था।
सेठ बेचैन तो था ही, तत्काल संत के दर्शनार्थ जा पहुँचा। संत शांत मुद्रा में बैठे थे। ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी। तालाब का निर्मल जल हिलोरें ले रहा था। वातावरण शांत था। सेठ ने जाकर नमस्कार किया और एक तरफ खिन्न मन से बैठ गया।
“कैसे हो सेठजी? संत ने बात प्रारंभ करते हुए कहा।
“आपकी कृपा है, महाराज।” सेठ नम्रतापूर्वक बोला।
“फिर चेहरा मलिन कैसे दिखाई पड़ रहा है। कोई कष्ट आ पड़ा है क्या?
“नहीं महाराज! वैसे ही मन कुछ दिनों उद्विग्न रहने लगा है। बार-बार उसे समझाता हूँ, पर फिर भी बात बनती नहीं।” इसी के साथ सेठ ने सहायता करने से लेकर अहसान नहीं मानने तक की संपूर्ण व्यथा ही कह डाली और बोला-महाराज! यह दुनिया अहसान–फरामोश क्यों है? यही प्रश्न मेरे अंतर में हर-हमेशा कुलबुलाता रहता है और यही मेरी खिन्नता का कारण है। सेठ ने अपने अंतर्मन की पीड़ा अभिव्यक्त कर दी।
संत मुसकरा दिए। फिर मेघमंद्र स्वर में बोले-सेठजी एक बगीचे में बहुत-सी अंगूर की बेलें लगी हुई थीं। उनमें मीठे-मीठे अंगूर भी लगते थे। लोग उन्हें तोड़ लेते और और खाकर चले जाते। यही क्रम सालों-साल तक चलता रहा। एक दिन एक बेल दूसरी बेल से बोली, वर्षों से हम सबको अंगूर बाँट रही हैं। लोग स्वाद से खाते हैं और चले जाते हैं, न कोई धन्यवाद ही देता है, ऐसा क्यों है? हम कैसी अभागिने हैं?
यह वार्ता एक बुद्धिमान व्यक्ति सुन रहा था। उसने पास से गुजरे रहे एक संत से यह प्रश्न दुहराया। संत बेलों के पास आये और बोले-अंगूर पैदा करना तुम्हारी मजबूरी है और मजबूरी का फायदा उठाना लोगों की आदत है। इसमें अहसान मानने की क्या बात है?
सेठ का हृदय पिघल गया। वह सारी बात समझ गया था। उसके नयन बरस पड़े। वह कुछ भी नहीं बोल पा रहा था।
तब संत आगे बोले-गीता में भगवान कृष्ण ने भी तो यही कहा था- सच्चा कर्म वही है जिसमें, नहीं छिपी हो फल की चाह। सच्चा धर्म वही है जिसमें, रहे निरंतर एक प्रवाह॥
अतः तुम अपने पथ पर अग्रसर रहो। यह चिंता क्यों करते हो कि लोग तुम्हारे इस कार्य को महत्व देते हैं या नहीं। संत की बात सुनकर सेठजी का मन अब स्वस्थ, प्रसन्न और निर्मल बन गया था। उसके अंतर में निष्काम कर्म एवं परोपकार की महत्ता बैठ गयी थी।
युगपरिवर्तन की घड़ी तेजी से निकट आती चली जा रही है। यह समय प्रसवपीड़ा के हैं, अग्निपरीक्षा के हैं। इनमें सबसे अधिक परीक्षा उन समर्थ आत्माओं की होगी, जो संस्कार-संपन्न समझी जाती हैं, उन्हें अपना जीवन क्रम ऐसा ढालना होगा, जिसको देखकर दूसरे भी वैसा ही अनुकरण कर सकें। चरित्र की शिक्षा वाणी से नहीं, अपना आदर्श प्रस्तुत करके ही दी जा सकती है। सो जिनमें भी मानवीय गरिमा और दैवी महानता के जितने अंश विद्यमान है, उन्हें उसी अनुपात से अपने दुस्साहसपूर्ण कर्तव्य को विश्वमानव के सम्मुख प्रस्तुत करने के लिए दृढ़तापूर्वक अग्रसर होना चाहिए। यही युग देवता की पुकार और यही हमारा अनुरोध-आग्रह है।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य (वाङ्मय ग्रंथ क्र. 28, पृष्ठ-6.78)
आयुर्वेद एक विज्ञानसम्मत चिकित्साशास्त्र होने के साथ-साथ संपूर्ण जीवन विज्ञान भी है, जो प्राचीन-काल से इस देश में मानवजीवन को अधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक रूप से आरोग्य प्रदान करना आ रहा है। चिकित्साविज्ञान के रूप में आयुर्वेद की जड़ें कितनी गहरी फैली हुई हैं, उतनी किसी अन्य चिकित्साविज्ञान की नहीं हैं। वस्तुतः सच कहा जाए तो आयुर्वेद एवं यशस्वी बनाने वाला शास्त्र है। यह चिकित्सापद्धति मानवजीवन की सर्वविध समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करती है।
आज के परिप्रेक्ष्य में आयुर्वेद की भूमिका महत्वपूर्ण है, क्योंकि आयुर्वेद सभी देशों की चिकित्सापद्धतियों में अग्रणी तथा सबसे जीवंत पद्धति है। आयुर्वेद की परिभाषा से हमें यह ज्ञात होता है-
हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानव ततव यत्रोक्तमायुर्वेदः सउच्यते॥
अर्थात् जिस ग्रंथ में हितायु, अहितायु, सुखायु एवं दुखायु इन चारों प्रकार की आयु के लिए हित (पथ्य), अहित (अपथ्य), इस आयु का मान (प्रमाण और अप्रमाण) तथा आयु का स्वरूप बताया गया हो, उसे आयुर्वेद कहते हैं।
आयुर्वेद का मूल उद्देश्य यदि जानने का प्रयास करते हैं, तो शास्त्र कहता है-”स्वस्थस्य स्वास्थरक्षणमा-तुरस्य विकार प्रषमनंच।” अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य का प्रशमन करना ही आयुर्वेद का मूल उद्देश्य है। आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति के लक्षण हैं-समदोषः समाग्निष्च समधातुमल क्रियः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥
जिस पुरुष के दोष, धातुमल तथा अग्निव्यापार सम हों अर्थात् सामान्य (विकास-रहित) हों तथा जिसकी इंद्रियाँ, मन तथा आत्मा प्रसन्न हों, वहीं स्वस्थ है। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि कितनी सर्वांगपूर्ण दृष्टि हमारे ऋषिगणों की इस विधा के पीछे रही है।
आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ इन तीनों का बड़ा महत्व है। इनकी साम्यावस्था में व्यक्ति निरोग रहता है और इसमें दोष उत्पन्न हो जाने से रस, धातु आदि का निर्माण ठीक से नहीं हो पाता तथा मल का निष्कासन पूर्ण रूप से नहीं हो पाता, जिससे रोग उत्पन्न हो जाता है। दिनचर्या, रात्रिचर्या एवं ऋतुचर्या के नियमों का विधिवत पालन करने से व्यक्ति निरोग रहता है। वर्तमान समय में अस्त-व्यस्त दिनचर्या, रात्रिचर्या एवं ऋतु के अनुसार आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य आदि के नियमों का ठीक तरीके पालन न करने से अनेकानेक रोग उत्पन्न हो रहे हैं।
सर्वप्रथम दिनचर्या को लें। दिनचर्या के अंतर्गत ब्रह्ममुहूर्त में उठना, आत्मबोध की साधना, पृथ्वी माँ को नमस्कार, ऊषापान, शौच, दंतधावन, अभ्यंग (तैल मालिश) प्रातःभ्रमण, व्यायाम, क्षौरकर्म, स्नान, वस्त्रधारण, संध्योपासना, स्वाध्याय, भोजन आदि कर्म आते हैं।
दिनचर्या या ‘डेलीरूटीन’ ऋषियों की दृष्टि में क्या हो, इसे समझने का प्रयास करें।
ब्रह्मे मुहूर्ते हृयुत्तिष्ठेज्जीर्णां निरुपयन रक्षार्थ मायुषः स्वस्थो।”(अ.सू. 3)
ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत स्वस्थो रक्षार्थमायुषः॥ (भा. प्र. 1/24)
स्वस्थ मनुष्य आयु की रक्षा के लिए रात के भोजन के पचने न पचने का विचार करता हुआ ब्रह्ममुहूर्त में उठे।
महर्षि मनु ने कहा है- ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थांचानुचिंतयेत। कायक्लेषाँष्च तन्मूलान्वेदतत्तवार्थमेव च॥ (मनु. 4/92)
प्रत्येक मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठकर धर्म और अर्थ का चिंतन करना तथा शरीर के रोग और उनके कारणों का विचार करना एवं वेद के रहस्यों का भी विचार-चिंतन करना चाहिए।
आज प्रचलन है-देर रात्रि तक भोजन करने का, टेलीविजन फिल्में देखने का। ऐसे में सुबह कौन जल्दी उठता है, पर रोगों से दूर रह प्रसन्नता पानी है, तो इस क्रम को बदलना ही होगा। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में शय्या अवश्य छोड़ देनी चाहिए। चौबीस घंटों में ब्रह्ममुहूर्त ही सर्वश्रेष्ठ है। मानवजीवन बड़े भाग्य से प्राप्त होता है। इसका प्रत्येक क्षण बहुमूल्य है, यह मानते हुए “हर दिन नया जन्म” का भाव लेकर दिनभर के जीवनक्रम निर्धारण करना चाहिए
प्रातःकाल सूर्योदय के साथ ही कमल खिल जाते हैं, पक्षी मधुर गान करने लगते हैं, समीर मंद-मंद गति से बहने लगता है। सृष्टि में एक नवजीवन, नवचेतन-स्फूर्ति दिखाई देने लगती है। ऐसे सुअवसर की उपेक्षा तो नादानी ही कही जाएगी। शारीरिक स्वास्थ्य-मन बुद्धि, आत्मा के बहुमुखी विकास-सभी की दृष्टि से ब्रह्म-मुहूर्त में उठना चाहिए। इस समय प्रकृति मुक्तहस्त से स्वास्थ्य, प्रसन्नता, मेधा-बुद्धि एवं आत्मिक अनुदानों की वर्षा करती है।
आयुर्वेद के ग्रंथों में एक कथन आता है-
वर्णकीर्ति मति लक्ष्मीं स्वास्थ्य मायुष्च विंदति। ब्राह्मो मुहूर्ते संजाग्राच्छियं व पंकजं यथा॥
अर्थात् प्रातः उठने से सौंदर्य, यश, बुद्धि, धन-धान्य, स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है, शरीर कमल के समान खिल जाता है। प्रातः उठकर ईश्वर-चिंतन व आत्मबोध की साधना के साथ हमें जन्म देने वाली पृथ्वी माँ को नमस्कार करना चाहिए
आत्मबोध की साधना प्रातः जागरण के साथ ही संपन्न की जाती है। रात्रि में नींद आते ही यह दृश्यजगत समाप्त हो जाता है। मनुष्य स्वप्न-सुषुप्ति के किसी अन्य जगत में रहता है। इस जगत में पड़े हुए स्थूलशरीर से उसका संपर्क नाममात्र का कामचलाऊ भर रह जाता है। जागते ही चेतना का शरीर से सघन संपर्क बनता है, यही नये जन्म जैसी स्थिति है।
जागते ही पालथी मारकर बैठ जाएँ, ठंडक हो तो वस्त्र ओढ़े रहें। दोनों हाथ गोदी में रखें, सर्वप्रथम लंबी श्वास लें, नीलवर्ण प्रकाश का ध्यान करें। नाक से ही श्वास छोड़ें, दूसरी श्वास में पीले प्रकाश का ध्यान करते हुए पूर्ववत क्रिया दोहराएँ। तीसरी बार फिर रक्तवर्ण प्रकाश का ध्यान करते हुए गहरी श्वास छोड़ दें। स्वस्थ-प्रसन्नचित्त हो अनुभव करें कि परमात्मा ने कृपा करके हमें आज नया जन्म दिया है। इसकी अवधि पुनः निद्रा की गोद में जाने तक की है। दाता की दृष्टि हम पर है कि हम उनके पुत्र उसकी दी विभूतियों का-इस जीवन का कैसा उपयोग कर रहे हैं।
इसके पश्चात् पृथ्वी माँ को नमस्कार किया जाता है। भाव इस समय मातृभूमि के प्रति गौरव का व उनके गुणों को धारण करने का हो। श्लोक है-
समुद्र मेखले देवि पर्वतस्न मंडले। विष्णु पत्नीं नमस्तुभ्यं पादर्स्पष क्षमस्व मे॥
मेखला (तागड़ी) की तरह सब ओर समुद्र से घिरी हुई, पर्वत रूपी स्तनों से सुशोभित, विष्णु पत्नी-पृथ्वी माता आपको नमस्कार है। मुझे पैरों से स्पर्श करने की धृष्टता के लिए (आप पर पैर रखकर मैं अपनी जीवन-यात्रा आरंभ कर रहा हूँ) मुझे आप क्षमा करें।
दिनचर्या में इसके पश्चात ऊषापान का क्रम आता है। ऊषापान शौच जाने से पूर्व ही किया जाना चाहिए। आयुर्वेद में ऊषापान का विधान है। कहा है-”प्रातः उठकर नित्य जो ऊषापान करता है, निज शरीर को स्वस्थ बना रोगों से अपनी रक्षा करता है।” ऊषापान में शीतल जल का ही सेवन करना सर्वोत्तम है। दुर्भाग्य से आज भारतवर्ष में अधिकांश व्यक्तियों की ‘बेड टी’ अथवा काफी पीने की आदत पड़ गयी है, जो कि हमारे स्वास्थ्य के नियमों के प्रतिकूल है एवं किसी दृष्टि से भी हितकारी नहीं। शीतल जल हमारे दाँतों के लिए भी लाभकारी है तथा पाचन-संस्थान को बल प्रदान करता है। हमारे अंदर की पाचकाग्नि शीतल वस्तु को तो उष्ण बना लेती है परंतु उष्ण पदार्थ को अंदर ठंडा करने की कोई प्रक्रिया नहीं है। अत्यधिक उष्ण पदार्थ लेने से तो हमारे मुख अन्ननली आदि में विद्यमान नाजुक झिल्लियाँ जल जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप वर्ण बन सकते हैं, जो अधिक दिन बने रहने से कैंसर का रूप धारण कर लेते हैं।
शीतल जल के सेवन से रात्रि के भोजन के कारण पैदा बेवजह बदहजमी व अपच भी ठीक हो जाती है। भावप्रकाश में लिखा है-
स्वितुः समुदय काले प्रसृति सलिलस्य विवेदष्टौ। श्रोग जरा परिमुक्तो जीवेद वत्सरषतं साग्रम।
अर्थात् “सूर्योदय के समय जो व्यक्ति प्रतिदिन आठ अंजलि जलपान करता है, वह रोग से मुक्त हो जाता है। बुढ़ापा उसके पास नहीं आता और वह सौ वर्ष से अधिक आयु प्राप्त करता है।” वस्तुतः ऋषियुग में ऐसा ही होता भी होगा।
ऊषापान से मल की अच्छी तरह शुद्धि होती है। शरीर व मन में उत्साह की वृद्धि होती है तथा वीर्य संबंधी रोग दूर हो जाते हैं। नित्य सेवन करने से काम विकार, शारीरिक उष्णता, बवासीर, उदर रोग, विबंध, सिर-दर्द, नेत्र विकार दूर हो जाते हैं।
यह जल यदि मुख के बजाय नासिका से पीने का अभ्यास कर सकें, तो अति उत्तम है। प्रतिदिन एक पाव जल नासिका से पीने से अति उत्तम है। प्रतिदिन एक पाव जल नासिका से पीने से अत्यधिक लाभ होता है। नासिका द्वारा जलपान के गुणों का वर्णन करते हुए आयुर्वेद के ग्रंथों में कहा है-
विगत घन निषीथे प्रातरुत्थाय नित्यम्, पिवति खलु नरो यो घ्राणरन्ध्रेण वारि। स भवति मति पूर्णष्च क्षुषाः ताक्ष्यतुल्यों, वलि पलित विहीना सर्वरोगेर्विमुक्तः।
अर्थात् “ रात्रि का अंधकार दूर हो जाने पर जो मनुष्य प्रातः उठकर नासिका द्वारा जलपान करता है, वह बुद्धिमान बन जाता है, उसकी नेत्रज्योति तेज हो जाती है, उसके बाल असमय में श्वेत नहीं होते तथा संपूर्ण रोगों से मुक्त रहता है।” नासिका से जलपान करने वालों को शीतकाल में गुनगुना उष्ण करके पानी की ठंडक छुड़ा लेनी चाहिए।
ऊषापान के पश्चात् दिनचर्या के क्रम में शौच की बारी आती है। सुश्रुत लिखते हैं-
आयुष्यमुषसि प्रोक्तं मलादीनाँ विसर्जनम्।
प्रातःकाल सूर्योदय के पूर्व मल-त्याग करना दीर्घायु प्रदान करता है। शौच में बैठने की भारतीय विधि ही सर्वोत्तम है। सही समय पर मल-विसर्जन का जो लोग ध्यान नहीं रखते, उनके शरीर में विकार-संग्रह होकर, रोग उत्पन्न होने लगते हैं। प्रतिदिन प्रत्येक व्यक्ति को दो बार शौच अवश्य जाना चाहिए, प्रातः आत्मबोध साधना के बाद तथा सायंकाल एक बार। बहुत से लोग मल-मूत्रों के वेगों को रोक लेते हैं, ऐसा करना शरीर के लिए बहुत हानिकारक है, इससे रोग उत्पन्न होते हैं।
बहुत से लोगों को प्रातः शौच साफ नहीं होता अथवा प्रातः दो या तीन बार जाना पड़ता है। जिन लोगों को कब्ज रहता है, उन्हें नियमित व्यायाम तथा आँतों को ठीक रखने के लिए योगासन करना लाभदायक है। भोजन में मोटे आटे की चोकर सहित रोटी एवं हरी सब्जी का अधिक प्रयोग करना चाहिए। दाल (सदैव छिलके वाली) तथा अंकुरित अन्न का प्रयोग करने से कब्ज नहीं रहता।
यदि फिर भी कब्ज रहता है, तो उनको नियमित ऊषापान करना लाभकारी होगा। कब्ज को दूर करने के लिए सप्ताह में एक दिन एनीमा का प्रयोग भी किया जा सकता है अथवा रात्रि को सोने से पूर्व हरीतकी चूर्ण एक चम्मच अथवा त्रिफला चूर्ण एक चम्मच उष्ण जल के साथ लेने से भी शौच साफ हो जाता है। शौच के बार आकर हाथ-पैर-मुख धोना चाहिए। ऐसा करने से शुचिता के अतिरिक्त थकावट दूर होती है और नेत्रज्योति बढ़ती है।
दिनचर्या में ‘दंतधावन’ को बड़ा महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। ऋषिगण जानते थे कि बीमारी की जड़ें इस नियम की उपेक्षा-अवहेलना में ही छिपी हैं। दाँतों की उपमा मोतियों से दी जाती है। मोतियों का सौंदर्य, उनकी चमक-दमक आभा एवं लावण्य अपनी ओर आकर्षित करते हैं। दाँत शरीर के निर्माता और रक्षक रूपी द्वार पर स्थित हैं। दाँतों के स्वस्थ रहने पर शरीर स्वस्थ रहता है। दाँतों के बिना मुख की शोभा एवं सुँदरता विलीन होकर व्यक्ति सौंदर्यविहीन हो जाता है। दाँत हमारे शरीर में पैदा होने के कुछ माह बाद आते हैं और खान-पान, सफाई, स्वच्छता का पूरा ध्यान न रखने से असमय में खराब हो जाते हैं। दाँत और मसूड़ों के रोग ठीक से दाँतों की सफाई न होने के कारण ही उत्पन्न होते हैं। दाँतों को स्वस्थ बनाये रखने के लिए कुछ नियमों का पालन किया जाना आवश्यक है। यदि प्रतिदिन हम दाँतों का ध्यान रखें, तो दाँतों के हिलने और गिरने का प्रश्न ही नहीं उठता।
हमारे प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों ने दातुन की बहुत ही प्रशंसा की है। दातुन प्रयोग में लाने के लिए नीम, बबूल, सिहोरा, खदिर, कनेर, महुआ, अर्जुन, बादाम, अकरंदा आदि को अच्छा माना जाता है। मौलश्री की दातुन करने से दाँत दृढ़ होते चले जाते हैं। शास्त्र कहता है-
अवेक्ष्यर्तुंच दोषं च रसं वीर्य च योजयते। कषायं मधुरं तिक्तं कटुकं प्रातरुत्थितः॥
निम्बष्च तिक्तके श्रेष्ठः कषाये खदिरस्तथा। मधूको मधुरे श्रेष्ठः करन्जः कटुके तथा॥ (सु. चि. अ. 24)
सर्वदा कृत, दोष, रस और वीर्य को देखकर कसैली, मीठी तीती, कड़वी यथोचित दंतुवन करनी चाहिए। तीती में नीम, कसैली में खदिर, मधुर में महुआ और कड़वी में कर×ञ की दंतुवन श्रेष्ठ है। दाँत मोती के समान सुँदर तथा वज्र के तुल्य दृढ़ हो जाते हैं।
सुश्रुत के अनुसार, कड़वे वृक्षों में नीम, कसैले में खैर, मीठे में कनेर की दातुन करना अच्छा है। नीम के दातुन से कीड़े नहीं लगते, मुख की दुर्गंध दाँतों का मैल और कफ का नाश हो जाता है।
दातुन करना भी एक कला है। दातुन सदैव बैठकर करनी चाहिए। दातुन करते समय लोगों से बातचीत करना व इधर-उधर थूकना रहना अच्छा नहीं है। दातुन बारह अंगुल लंबी कनिष्ठिका उँगली के समान मोटी होनी चाहिए। दाँतों से बचाकर अच्छी तरह कूँची बना लेवें, कूँची से ऊपर-नीचे दाँतों की सफाई करने के बाद दातुन को धोकर बीच से फाड़ लेना चाहिए एवं इसी से जिह्वा के पिछले हिस्से में जमा मैल की सफाई की जानी चाहिए। इसके बाद दाहिने हाथ के अँगूठे से ताले में घर्षण करने से तालू की सफाई हो जाती है। जिह्वा तथा तालू की सफाई का महत्व उतना ही है, जितना दाँतों और मसूड़ों का। जिàवानिर्लेखनं रौप्यं सौवर्णं वार्क्षमेव च।
तन्मलापहरंषस्तं मुदुष्लक्षणं दषाड्.ग्लम॥
अर्थात् “जीभ के मैल को दूर करने वाली जीभ-छोलनी चाँदी, सोना या लकड़ी की टेढ़ी, मुलायम, चिकनी और दस अँगुल लंबी होना चाहिए।” जिन लोगों को दातुन उपलब्ध न हो, वे मंजन और पेस्ट का प्रयोग कर सकते हैं, पर करें उसी तरह जैसे दातुन की जाती है। मात्र जिह्वा पूजा न हो।
मंजन में प्रयुक्त होने वाली कई औषधियाँ हैं, जैसे सेंधा नमक व सरसों को तेल, सोंठ और नौसादर, मौल श्री की छाल का चूर्ण, जायफल चूर्ण, अमरूद की हरी पत्ती का चूर्ण, त्रिफला चूर्ण आदि। मंजन सदैव बीच वाली उँगली (मध्यमा) से ही करना चाहिए। ब्रुश को नीचे-ऊपर की दिशा में चलाना चाहिए। पेस्ट करने वाले व्यक्ति स्टील की बनी जीभी से जिह्वा की सफाई कर सकते हैं। दाँतों से जितनी बार कुछ खाया-पीया जाए उतनी बार दाँतों की सफाई उँगली से करनी चाहिए। कभी-कभी दाँतों के मध्य में अन्न के कण फँस जाते हैं, उसे नीम की सींक से, टूथ प्रिक की सहायता से निकालकर अच्छी तरह कुल्ला करना चाहिए। रात्रि को सोने से पूर्व अधिकांश लोगों को दुग्ध पीकर साने का अभ्यास है, दुग्ध पीकर दाँतों की सफाई न करने से दाँतों में कीड़े लग जाते हैं। अतः सोने से पहले दाँतों की सफाई दातुन या ब्रुश आदि से नियमित होती रहे, तो नीरोगता वरदान रूप में मिलती है।
पुत्र ने पिता से पूछा- वृक्ष को शंकर भगवान की उपमा क्यों दी जाती है पिताजी? पिता ने कहा-बेटा समुद्रमंथन हुआ तो उसमें से विष भी निकला, जब उसे किसी ने ग्रहण नहीं किया, तो शंकर जी ने पीकर मानवता की रक्षा की। शंकर जी ने तो ऐसा एक बार ही किया, पर धरती के जितने भी जीवधारी अपनी गंदी साँस का जहर निकालते हैं, बेचारे वृक्ष उसे पीकर बदले में स्वच्छ ऑक्सीजन देते हैं। जिससे उनका जीवन सुरक्षित बना रहता है। पुत्र बोला- फिर तो वृक्ष महाशंकर हुए पिताजी।
शहर से कुछ दूरी पर एक बस्ती थी। एक घर में बूढ़ा पिता, उसकी वृद्धा पत्नी तथा दो पुत्र और एक पुत्री केवल पाँच व्यक्ति रहते थे। लड़की बूढ़े की सबसे छोटी संतान थी। उसके पास खेत-खलिहान कुछ भी न था, न ही आय का कोई विशेष साधन था। वह पशुओं के व्यापार में दलाली का काम करता था। कभी कुछ पैसा मिल जाता, कभी नहीं। घर के अन्य लोग जंगल से लकड़ियाँ काटकर शहर में बेचने चले जाते। उसी से घर में खाने-पीने का गुजारा चलता।
ऐसी दशा में पति-पत्नी का संतान पर कोई नियंत्रण नहीं रहा। बच्चे पढ़-लिख भी नहीं सके। वे बहुत बिगड़ गए। निर्धनता और झगड़ालूपन के कारण उनकी शादी भी न हो सकी। बूढ़ा व्यक्ति बड़ी चिंता में रहने लगा। उसे सबसे अधिक चिंता तो पुत्री की शादी की थी। वह सोचने लगा कि कहीं से थोड़ा साधन मिल जाए तो वह लड़की के हाथ पीले कर दे। लड़की के भाइयों ने कुटिलतापूर्वक सोचा कि हम किसी तरह बहिन की शादी किसी अमीर घर के इकलौते लड़के से कर दें और बाद में किसी बहाने बहिन से कहकर उसके पति को मरवा डालें। इससे हमें बहुत-सा धन मिलेगा। तब हम बहिन की शादी भी दूसरी जगह कर देंगे। और स्वयं भी शादी करके आराम से जीवन व्यतीत करेंगे।
एक-दो माह भागदौड़ करने के पश्चात उन्हें एक धनिक व्यक्ति मिल गया। भाईयों ने पैंतीस वर्ष के एक पड़ोसी को अपना बहनोई बनाया और उससे दो हजार रुपया ले लिया। उन्होंने बहिन की शादी कर दी और विदा करते हुए समझा दिया कि वह शीघ्र ही किसी तरह पति का काम तमाम कर दे। बहिन विदा हो ससुराल चली गयी। उन लोगों में यही रीति थी कि विवाह के दूसरे या तीसरे दिन लड़की उसका पति माँ-बाप और सास-ससुर से मिलने वापस आते हैं। इसलिए शादी के तीसरे दिन उनकी बहिन पति को साथ लेकर मायके के लिए चल पड़ी। रास्ते में उसने प्यास का बहाना बनाकर पति से कहा-”आप तो घोड़े की तरह दौड़कर चल रहे हैं। मैं तो थक गई हूँ। प्यास भी बड़ी जोर से लगी है। चलो उस कुएं पर चलकर बैठते हैं।”
प्ति, पत्नी की कुटिल चाल से अपरिचित था। पति ने पानी खींचने के लिए कुआं पर रखा बर्तन कुएं में डाला। पत्नी ने पानी खींचते पति को जोर से धक्का मारा। बेचारा पति धक्का खाकर कुएं में जा गिरा। मरा हुआ समझकर वह सिर पर पैर रखकर मायके भाग गयी। ससुराल से सारा सोना-चाँदी, रुपया-पैसा वह पहले ही अपने साथ बाँध लायी थी। उसे अकेला आया हुआ देखकर भाई बहुत प्रसन्न हुए।
मरने वाले से बचाने वाला बड़ा है। उसी की कृपा थी कि कुएं में गिरा व्यक्ति तैरना जानता था। वह काफी समय तक कुएं में तैरता रहा। इसके पश्चात उसकी आवाज सुनकर राह जाते प्यासे राहियों ने उसे बाहर निकाला। उसने कपडऋ़ सुखाए और ससुराल को चल पड़ा। जब वह शाम के समय ससुराल पहुँचा तो उसकी पत्नी-दोनों साले उसे जीवित देखकर हैराल रह गए। पति ने ऐसा प्रकट किया कि जैसे वह पाँव फिसलने से स्वयं ही कुएं में गिरा हो। उसकी पत्नी के मन का भय दूर हो गया। पति ने अगले दिन पत्नी को ससुराल से विदा कराया और वापस घर ले आया। उसने पत्नी पर मन का शक किसी भी तरह प्रकट नहीं होने दिया। समय के साथ उसका पति के साथ प्रेम-लगाव बढ़ता ही गया। कई साल बीत गए। उसके दो लड़के भी हो गए। पति-पत्नी का जीवन संताल की प्रेम ममता में दूध-पानी जैसा मिलकर एकाकार हो गया। पिछली बातों को वे लगभग दोनों भूल बैठे।
दोनों पुत्र जवान हो गए। पति-पत्नी ने बड़े चाव से उनका विवाह किया। उन दोनों के बच्चे पैदा हुए। पति-पत्नी अपने भरे-पूरे परिवार को देखते तो बड़े खुश और संतुष्ट होते। इस सबके लिए वह भगवान का बहुत कृतज्ञ था। वह अब प्रतिदिन सुबह ही नहा-धो लेता और घंटों ईश्वर की पूजा-उपासना करता रहता। वह पूजा करते समय राम-राम मंत्र का उच्चारण करता। उसकी बड़ी पुत्रवधू जब इस मंत्र को सुनती तो उसे बड़ा आश्चर्य होता। उसने एक दिन ससुर से पूछा-पिताजी! आप राम नाम का इतना जाप क्यों करते हैं? उसने बताया-बहू! भगवान से बड़ी शक्ति उनके नाम में है। भगवान ने स्वयं आकर तो किसी एक-आध को ही बचाया होगा, परंतु उनका नाम तो नित्यप्रति लाखों-करोड़ों का उद्धार करता रहता है। रामनाम में असीम शक्ति है। इसने न केवल मेरी जान बचायी है, मुझे क्रोध, झगड़ा, गाली-गलौज, अशांति और न जाने कितनी ही बुराइयों से बचाया है। रामनाम जपने का अर्थ है कि कभी किसी की बुराई को न उछालना। जीवन सदा शांति में बीतेगा। उसकी पत्नी ने सुना व ऐसे पति का साहचर्य पाकर उसने अपने आपको बड़ा भाग्यशाली माना। कैसे वह पतिहंता होते हुए क्षमा कर दी गयी। यह सोच-सोचकर आँसू बहने लगे।
रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा में केशव चंद्रसेन ने एक लेख छपवाया। रामकृष्ण परमहंस को जब यह बात मालूम हुई तो वे बहुत नाराज हुए और बोले-”हमें यश की अपेक्षा चरित्र को निर्मल बनाने की बात सोचनी चाहिए। चरित्रवान और नैतिक पुरुषों का यश तो फूलों की सुगंध की तरह फैलता है।
बग-बगीचों में जब पुष्प खिलते हैं तो तितलियों, मधुमक्खियों, भारों के समूह-के-समूह मकरंद-पान के लिए इस डाल से उस डाल पर उड़ते हुए नजर आते हैं। इसी तरह जब फसल पकती है तो चिड़ियों के झुँड उसका सफाया करने के लिए टूटते हैं, तो चमगादड़ों और तोतों के समूह उन्हें कुतर डालने में कोई कसर नहीं छोड़ते। ऐसा ही कुछ इन दिनों भी हो रहा है। नवयुग के आगमन में अब बहुत देर नहीं है। फसल में दाने पड़ चुके हैं। फल गदरा रहे हैं। इनके पकने भर की देर है। ऐसा अवसर पाकर यदि विनाशकारी शक्तियां ‘मरता क्या न करता’ की नीति अपनाकर बचने की लड़ाई लड़े तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। जिस प्रकार हारा जुआरी दूने जोश में बढ़-चढ़ कर दाँव लगाता है, कुछ ऐसा ही इन दिनों आसुरी शक्तियां कर गुजरने पर उतारू हैं। प्रत्यक्ष रूप से लगता भी यही है कि असुरता ने कुछ ऐसा ही ताना-बाना बुहा है, परंतु दिव्यदर्शी जानते हैं कि ध्वंस के पीछे सृजन की सुस्पष्ट रूपरेखा तैयार है।
यों तो ध्वंस का इतिहास लंबा है और भयंकर भी। यहाँ इसी सहस्राब्दी में दस हजार के लगभग छोटे-बड़े युद्ध हुए हैं, जिनमें जन-धन की अपार क्षति हुई है। इसी शताब्दी में दो विश्वयुद्धों का रोमाँचकारी वृत्ताँत है। आक्रमण, प्रत्याक्रमणों, कत्लेआमों का लेखा-जोखा ऐसा रहा है जो कुछेक सत्ताधारियों द्वारा समूची जनता को कुचल-मसल कर रख देने की दुदुंभी बजाता है। प्रकृति प्रकोपों का तो कहना ही क्या? लंबा इतिहास जो सामान्य प्रलयों, जलप्रलयों, हिमप्रलयों से भरा पड़ा है, उसकी खोजबीन की जाए, तो भी इस सहस्राब्दी में हुए दुर्भिक्ष-अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकंपों, ज्वालामुखी विस्फोटों, महामारियों के प्रकोप ऐसे हैं, जो बताते हैं कि विनाश की शक्तियां मानवी अस्तित्व और सृजन की चुनौतियाँ देने में समर्थ हैं। इतने पर भी पर्यवेक्षण करने पर निष्कर्ष यही निकला है कि ध्वंस उल्कापातों की तरह अपनी चमक समेटते हुए अंतरिक्ष में तिरोहित होते गये। जीवित मात्र सृजन ही रहा है। प्रतिद्वन्द्विताएँ, प्रतिकूलताएँ असंख्यों सामने आती रही हैं, पर मनुष्य की अदम्य सत्ता ने उन्हें परास्त करके छोड़ा है और सृजन का रथ अपने गतिचक्र को यथावत बनाये रहा है।
पुरातात्त्विक खोजें बताती हैं कि प्राचीन सभ्यताओं के खंडहरों की बहुत बड़ी श्रृंखला अभी भी यत्र-तत्र बिखरी हुई देखी जा सकती है। उनका अपना ऐतिहासिक महत्व हो सकता है, पर अनवरत गति से चलते रहने वाले सृजन का अपना महत्व है। सृजन ही है, जिसने विशाल नगर बसाने, उद्योग खड़े करने और बढ़-चढ़कर सुविधा-स्रोत जुटाने में हार नहीं मानी है। मरण की भयंकरता से इनकार नहीं किया जा सकता, पर वह नवजीवन की संभावना से अधिक बढ़-चढ़कर नहीं हो सकता। मरने वालों से जन्मने वाले अधिक होते रहे हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में बम गिरने के बाद मृत समझे जाने वाले जापान ने कुछ ही दशाब्दियों में इतना वैभव अर्जित कर लिया है, जो विनाश पूर्व वाली स्थिति से कहीं अधिक बढ़-चढ़कर है।
सामंतवादी अंधकार युग के पास यों सीमितशक्ति थीं, तो भी अपने प्रभाव क्षेत्र में अनौचित्य को प्रश्रय देने में कोई कोर-कसर नहीं रखी। नैतिक और सामाजिक क्षेत्र में दुष्प्रचलनों का सिलसिला उस मध्यकाल से ही चल पड़ा था, जो पिछली दो-तीन दशाब्दियों में अपने अनुरूप खाद-पानी पाकर और भी परिपुष्ट हो गया। बहुत दिनों से बढ़ता-पकता फोड़ा जब नासूर बनने लगता है और उसका जहर सारे शरीर में फैलने लगता है, तो फिर ची-फाड़ के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रहता। ठीक इसी तरह इन दिनों समाज में गहराई तक प्रवेश कर गई बुराइयाँ, कुरीतियाँ, असमानताएँ, भ्रष्टाचार, अनाचार आदि का मूलोच्छेदन भी इसी स्तर पर बन सकता है। संभावना है कि प्रकृति अपने ढंग से दंड विधान बनाती भी रह सकती है। स्पष्ट है कि आचरणकर्ता ही नहीं मूकदर्शक बने रहने वाले भी अपराधी ठहराये जाते है। रिश्वत लेने वाले ही नहीं, देने वाले भी अपराधकर्म में साझीदार माने जाते हैं। अनौचित्य चलता रहा और जो अपने मतलब-से-मतलब रखकर जो चल रहा था उसके भी तो गेहूँ के साथ घुन के पिस जाने का उदाहरण बनना पड़ेगा। सूखे के साथ जुड़ा हुआ गीता ईंधन भी भट्टी में जल जाता है। वे निरपराधी नहीं हैं, जो अनीति के चलते उसका प्रतिरोध करने का साहस जुटाने, सज्जनों की संगठित शक्ति उभारने में कोताही बरतते हैं। अगले दिनों कठिनाइयों और विपत्तियों का दौर बना रहने का यह भी एक कारण है। ऐसी दशा में उथल-पुथल भी अपेक्षित रहेगी ही। सृजनचेतना सड़े-गले कूड़े- कचरे को बुहार फेंकने को आतुर दिखती है। जिनके पास तनिक भी विवेक-बुद्धि है वे उसे जानते हैं, समझते भी हैं और सृजेता का साथ देने को समुद्यत भी रहते हैं।
राम-लक्ष्मण को लंबे समय तक वनवास भोगना पड़ा, कारण कि वे उज्ज्वल भविष्य के नवनिर्माण का नियोजन कर रहे थे। पाँडवों को सीमित भारत को महाभारत के रूप में विकसित करना था। उन्हें भी अज्ञातवास में रहना पड़ा। आसुरी आतंक के स्थान पर राम-लक्ष्मण को समय तक वनवास भोगना पड़ा, कारण कि वे उज्ज्वल भविष्य के नवनिर्माण का नियोजन कर रहे थे। पाँडवों को सीमित भारत को महाभारत के रूप में विकसित करना था। उन्हें भी अज्ञातवास में रहना पड़ा। आसुरी आतंक के स्थान पर राम को सतयुगी वातावरण बनाना था। इसलिए उन्हें अभीष्ट समर्थन प्राप्त करने के लिए कठोर वनवास में कष्टसाध्य, अतिकठिन जीवन जीना पड़ा। यह आवश्यक भी था, क्यों कि बिखरी हुई समर्थता को एकजुट होने और प्रतिभा का आक्रोश उभरने का इसके बिना माहौल ही न बनता। जिन्हें बड़ा भारवहन करना था, उन्हें अपने कंधे और भुजदंड भी मजबूत बनाने थे। यह सब सरलता के सहारे नहीं, कठिनाइयों की अग्निपरीक्षा में होकर गुजरने पर ही संभव था। वहीं हुआ भी। इस अप्रिय लगने वाली प्रक्रिया के पीछे स्रष्टा की सुनियोजित विधि-व्यवस्था काम कर रही थी। अपने समय में युगसंधि की अवधि को परीक्षा की घड़ी में होकर गुजरना होगा अर्थात् अगले दो-तीन वर्ष इसी प्रकार गुजारने होंगे, जिसमें पग-पग पर कठिनाइयों से निपटना पड़े और पल-पल में जागरूक सृजनचेतना का परिचय देना पड़े।
भूमि जोतना देखने में खेत में ऊबड़-खाबड़ उत्पन्न करने वाला कार्य लगता है, पर इसके बिना उस क्षेत्र को हरीतिमा से लहलहाता भी तो नहीं बनाया जा सकता। कटते-छँटते रहने वाले पौधे ही उद्यान की शोभा बढ़ाते और अपनी आकर्षकता से दर्शकों का मन मोहते हैं। संसार के महामानवों में कदाचित ही कोई ऐसे हुए हों, जो मखमली गद्दों पर बैठे-बैठे ही ऐतिहासिक पराक्रम का परिचय दे सके हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों किन-किन को कितने कष्ट भुगतने पड़े, संपत्ति गँवाने से लेकर फाँसी के फंदे चूमने के लिए साहसपूर्वक कदम बढ़ाने पड़े; उसी बलिदान की उपलब्धि देश की आजादी के रूप में सामने आयी थी। अन्य देशों में राजनैतिक, सामाजिक गुलामी की जंजीरें ऐसे ही कष्टसाध्य साहस की पैनीधार वाली छैनी से कटी हैं। अब मानवी गरिमा को लंका की अशोक-वाटिका से वापस लाने की चुनौती है। उसमें संलग्न प्रयत्नशीलों को सरलतापूर्वक यह सब जुट जाने वाला नहीं है। ‘करो या मरो’ की रीति-नीति अपनाकर ही आसन्न विपत्तियों विकृतियों से निपटा और विजयश्री का वरण किया जा सकता है।
यह निराशा की, भयभीत होने जैसी कोई बात नहीं है। यह तो दीन-हीनों का कापुरुषों का स्वभाव होता है कि वे प्रतिकूलता की बात सुनते ही धैर्य खो बैठते हैं और हक्का-बक्का होकर न सोचने लायक सोचते और न करने योग्य करने लगते हैं। धैर्यवान, साहसी और विवेकशीलों की रीति-नीति दूसरी ही होती है। वे विपक्ष या आक्राँता से निपटने, प्रतिकूलताओं का सामना करने और अपने पराक्रम को वरिष्ठ स्तर का सिद्ध करने के लिए समर्थ एवं सक्षम ही नहीं रहते, वरन् ऐसे अवसरों की तलाश में भी रहते हैं। पहलवान आगे बढ़कर यह पता लगाते रहते हैं कि दंगल-आयोजन कब और कहाँ होगा? ऊँची नियुक्तियों के लिए होने वाली प्रतिस्पर्द्धाओं के लिए उत्सुक लोग स्वयं ढूँढ़-खोज करते और उनमें अपनी समर्थता का परिचय देने के लिए उत्सुक रहते हैं। हो सकता है कि दीन-हीनों की संख्या अधिक हो, पर ऐसे लोगों की भी कमी नहीं, जो फायरब्रिगेडों की तरह अग्निकाँड की सूचना मिलते ही उस जोखिम से जूझते हैं, जो सामान्यजनों को भयभीत करती और दूर बने रहने को विवश करती है। दस्युदल के एकत्रित होने के समाचार पाकर बहादुर पुलिस कर्मचारी दनदनाते हुए उन्हें जा दबोचते हैं। भले ही उनमें से कुछ को इस मुकाबले में जान का जोखिम ही क्यों न उठाना पड़े। बाढ़ के समय डूबने वालों को उबारने के लिए नाविकों-गोताखोरों की भूमिका देखते ही बनती है। साधनहीन तैराक भी ऐसे अवसरों पर मुँह छिपाये नहीं बैठते, वरन् अथाह सागर में कूदकर डूबने वालों को बचाते हैं।
इस संभावना को नकारा नहीं जा सकता कि युगसंधि के अंतिम चरण अगले दिन अनुमानित या अप्रत्याशित कठिनाइयों से भरे होंगे। उनका सामना करने के लिए आवश्यक साहस बटोरने और उसे परिपक्व करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। यह कार्य आत्मबल के सहारे ही बन सकता है। प्रस्तुत साधना वर्ष में यही सारा ताना-बाना बुना गया है। साधना-पुरुषार्थ को ठीक उसी प्रकार प्रयास समझा जा सकता है, जिस तरह उच्च शिक्षालयों में एन-सी.सी. जैसी ट्रेनिंग इसलिए दी जाती है कि समय आने पर सुयोग्य सैनिकों की कमी न पड़े। सामाजिक गड़बड़ियों से निपटने के लिए स्काउट-गाइडों से लेकर स्वयंसेवी दलों तक के अनेक संगठन भी प्रशिक्षण प्राप्त करते और समय आने पर अपने स्तर की सराहनीय भूमिका निभाते हैं।
आवश्यक नहीं कि कुयोग आकर ही रहे और उनसे निपटने की आवश्यकता पड़े ही, पर जहाँ तनिक भी वैसी संभावना हो, वहाँ उसके लिए पूर्व प्रबंध तो किया ही जाता है। चौकीदारों की नियुक्ति इसीलिए बनती है। सेना का विशालकाय ढाँचा इसीलिए खड़ा किया जाता है कि समय असमर्थताजन्य क्षति न उठानी पड़े। लोग दुर्घटनाओं का बीमा भी अशुभ की आशंका को ध्यान में रखते हुए ही कराते हैं। अगले दिनों प्रकृति के प्रकोप आ सकते हैं, वस्तुओं के अभाव पड़ सकते हैं। बढ़ती जनसंख्या प्रगति की सभी योजनाओं को निरस्त करके पहले से भी अधिक पिछड़ापन ला सकती है। उभरती गुँडागर्दी संगठित होकर शांति और स्थिरता को चुनौती दे सकती है। अनास्था संकट से ग्रसित मानव समुदाय ऐसी अवाँछनीय गतिविधियाँ अपना सकता है, जिसमें तात्कालिक लाभ की अदूरदर्शिता पारस्परिक स्नेह-सद्भाव को चुनौती देने लगे। जातिभेद, वर्णभेद, संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद आदि की आड़ में फूट और विग्रह की शक्तियां लोकमानस को इस प्रकार भ्रमित कर सकती हैं कि लोग अपने हाथों अपना ही अनर्थ सँजोने लगें। नशेबाजी की बढ़ोत्तरी इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण है, जिसके सहारे समझदारों से लेकर नासमझ तक धीमी आत्महत्या करने में लगे हुए हैं। प्रचार माध्यमों जैसे-अखबार, पत्र-पत्रिकाएँ, टेलीविजन, रेडियो, सिनेमा, इंटरनेट जैसे माध्यम लोकमानस को किसे दशा में धकेलने में तत्पर है। असहिष्णुता और अपराधी प्रवृत्ति की छूत भी ऐसी है, जो एक दूसरे को लगती है और सुव्यवस्था को बुरी तरह चरमरा देती है। इस तरह के तमाम उमड़ते हुए अंधड़ और घटाटोप को देखते हुए समय रहते सुरक्षा का प्रबंध किया ही जाना चाहिए।
इसके लिए विचारवान व भावनाशीलों के समुदाय को ढूँढ़-ढूँढ़ कर इस कुशलता से एक सूत्र में पिरोना चाहिए कि उनके द्वारा साधनात्मक पुरुषार्थ से निर्मित कवच को बेध सकना दुर्दांतों के लिए भी संभव न हो। महत्वपूर्ण प्रगति के लिए इससे कम उत्साह और साहस से कम में काम नहीं चलता, जो विपत्ति से जूझने के लिए अपनायी जाती है बड़े काम युद्ध स्तर पर ही आरंभ किये और निपटाये जाते हैं। बात एक ही है प्रचंड आत्मशक्ति का उत्पादन ही अनौचित्य से निपटने में समर्थ हो सकेगा, यह एक सुनिश्चित तथ्य है। सत्य की तरह देवत्व भी अजेय है। ध्वंस और सृजन के द्विविध मोर्चे पर जूझती हुई यह शक्ति उस लक्ष्य तक निश्चित रूप से पहुँचकर रहेगी, जिसे ‘इक्कीसवीं सदी उज्ज्वलभविष्य’ सतयुग की वापसी” धरती पर स्वर्ग का अवतरण एवं मनुष्य में देवत्व का उदय’ आदि नामों प्रतिपादित, निरूपित एवं प्रचारित किया गया है।
आयु के अंतिम प्रहर में सम्राट को होश आया कि उन्होंने कभी यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि जीवन का उद्देश्य क्या है? उन्होंने राज्य भर के बुद्धिजीवियों, विचारकों, दार्शनिकों को आमंत्रित किया कि वे जीवन के उद्देश्यों के बारे में अपने विचार बतावें। विद्वानों ने सुना तो देश-देशांतर से ऊँटों पर, बैलगाड़ियों में भर-भरकर शास्त्र लाने लगे। महल में शास्त्रों का ढेर लगा दिया गया। राजा बोले-अब मेरे पास इतना समय कहाँ है कि इतने शास्त्र पढ़ सकूँ और जीवन का अर्थ खोज सकूँ। आप ही कृपाकर संक्षेप में बताइए कि जीवन का सही उद्देश्य क्या है? शास्त्रार्थ होता, बहसें चलती किंतु एकमत होकर विद्वान किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाते थे। राजा ने सूचित कराया-आयु अब बहुत थोड़ी बची है, जो बताना हो शीघ्रता करें। उन्हें अशक्तता घेरे चली आ रही थी और चारपाई पकड़ चुके थे।
विद्वानों में से एक आया और राजा साहब से बोला-हम सबका एक मत है कि जीवन का सही उद्देश्य है-सत्कर्म। राजा ने संतोष की साँस ली कि देर से ही सही समझ तो लिया जीवन का सही उद्देश्य क्या था। सत्कर्म ही वे पंख हैं, जिनके सहारे मनुष्य स्वर्ग तक की ऊँची उड़ान उड़ सकता है।
मगध देश के राजा श्रेणिक एक बार भ्रमण हेतु राजप्रसाद से बाहर निकले। उन्होंने देखा कि एक साधु नदी तट पर बैठे पूजा-पाठ में निमग्न हैं। वे साधु महाराज के पास गए और बोले कि आप इतनी अल्पायु में घर से निकल पड़े हैं। आपका चेहरा तप से दीप्तिमान हो रहा है। आप कौन हैं? कहाँ रहते हैं? साधु ने उत्तर दिया-मैं एक अनाथ, असहाय हूँ। किंतु इस उत्तर से राजा संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने पूछा कि मुझ से कुछ न छिपाए। सच-सच बताइए। यदि आप अनाथ भी हैं, तो मैं आपका संरक्षक हूँ। मेरे राज्य में कोई अनाथ और असहाय नहीं है। महात्मा ने कहा राजा भले ही आप विपुल संपत्ति के स्वामी हैं। हाथी, घोड़े, सैनिक, राज्यकोष, राजमहल सब कुछ है, फिर भी आप किसी-न किसी मामले में असहाय और अनाथ हैं ही। किंतु राजा मानने को तैयार न था। तब साधु ने आप-बीती बात कह सुनाई- मैं कौशांबी नगर के नगर सेठ धनराज का पुत्र हूँ। मुझे आँखों के रोग ने घेर लिया। समस्त उपचार कराए गये। वैद्य, राजवैद्य सभी परेशान तथा हैरान थे। धन-संपदा-मित्र, परिवार, सगे-संबंधी मेरे रोग में कोई सहायक न बन सके। ऐश्वर्य कुछ काम न आ सकता तो मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया गया। बस मैं भी प्रभु से प्रार्थना करने लगा। अंततः जिसने मुझे जन्म दिया था, वही भगवान काम आया और मैं रोगमुक्त हो गया। बस तब से ही मैं उसके स्मरण, ध्यान और काम में लगा रहता हूँ। सेवा-पूजा के बाद बचे समय को असक्त, रोगी, असहाय, निर्बलों, अभावग्रस्तों की सेवा में लगाकर व्यतीत करता हूँ। राजा की आँखें खुलीं और सोचने लगा साधु की बात सच है। वह भगवान ही समर्थ हैं-सबकी सहायता कर पाने में।
अप्रैल, 1949 की अखण्ड ज्योति के अग्रलेख के कुछ अंश
संसार में सबसे गौरवास्पद वस्तु ‘बुद्धि’ है। बुद्धिबल की अधिकता से ही मनुष्य का बड़प्पन कूता जाता है। जब हम अपने प्राचीन इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं तो हमें विद्यावानों की ईमानदारी की निर्मल झाँकी दिखती है। जो जितना ही ज्ञानसंपन्न बना है, वह उतना ही त्यागी भी बना है। ठीक है, जो वृक्ष फलों से जितना लदता है, वह उतना ही झुक जाता है। विद्या के भार से झुके हुए ब्राह्मण लोकसेवा के लिए अपना मस्तक झुका देते हैं और एक अकिंचन किंकर की तरह समाजहित के लिए जीवन व्यतीत करते हैं। ऋषियों का मुनियों, ब्राह्मणों का, ज्ञानियों का, विवेकवानों का जीवन सदा ही त्यागमय होता है। संग्रह को पाप समझना, केवल उतनी ही चीजें रखना जो तात्कालिक आवश्यकता के लिए बहुत जरूरी है, उनकी नीति रही है। पीपल वृक्ष के छोटे फलों को खाकर गुजारा करने वाले ऋषि का नाम पिप्पलाद पड़ जाता है। खेतों में गिरे दाने-कण-कण को बीनकर काम चलाने वाले महर्षि को ‘कणाद’ कहकर पुकारते हैं। एक बड़े साम्राज्य के महामंत्री होने पर भी महर्षि चाणक्य अपनी कुटिया में ही निवास करते हैं और ब्राह्मणोचित सादगी के साथ त्यागपूर्ण जीवन बिताते हैं।
विद्यावानों-ब्राह्मणों ने सदा से अपने लिए अपनी शक्तियों का न्यूनतम भाग खर्च किया है और शेष योग्यताओं को, बचे हुए सारे समय को जनता के लिए, देश के लिए समाज के लिए, धर्म के लिए, परमात्मा के लिए लगाया है। तभी तो यह भारतभूमि देवभूमि बन सकी थी। तभी तो वैदिक संस्कृति की ध्वजा आकाश में फहराती थी। तभी तो चक्रवर्ती आर्य साम्राज्य था, तभी तो हमारे घरों पर सोने के कलश रखे रहते थे और मोतियों के चौक पुरते थे। ब्राह्मणों के तप-त्याग का फल सारा राष्ट्र भोगता था।
उस स्वर्णयुग की धुरी थी-विद्यावान-विवेकवान ब्राह्मण। अमुक वंश में जन्म लेने मात्र से कोई ब्राह्मण नहीं होता। हाँ, ब्राह्मण वही है, जिसके पास विद्या-बुद्धि की पूँजी है। तथाकथित विद्या के धनी आज कम नहीं हैं। हमारे कॉलेज, यूनीवर्सिटियां प्रतिवर्ष सहस्रों स्नातक तैयार करती है। सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं व निजी अध्यवसाय प्रयत्नों से भी कितने ही मनुष्य बुद्धिबल प्राप्त करते हैं, परंतु विद्या के बदले प्राप्त हुआ मर्यादित धन, उन अमर्यादित तृष्णाओं और बढ़ी हुई आवश्यकताओं के मुकाबले में कम ही पड़ता है और वे अपने को गरीब अनुभव करते हैं। एक विडंबना यह भी कि जो अपनी प्रचंड तर्कशक्ति से लोगों को प्रभावित कर सकते थे, वे वकील बनकर गवाहों को मुवक्किलों को झूठे बयान लिखाने में अपनी चतुरता खर्च कर रहे हैं। जो डॉक्टर निरोग रहने के नियमों पर चलने के लिए रोगी को तैयार कर सकते थे, वे कहाँ आज अपने दायित्व पूरे कर पाते हैं? आज गुरु तो समाप्त हो गए, वेतनभोगी मास्टर रह गए हैं, जिनके स्टूडेण्ट उनके सामने ही मुँहजोरी करते रहते हैं। आयोद धौम्य जैसे गुरु ही नहीं तो गुरु की आज्ञा-पालन के लिए प्राणों की बाजी लगा देने वाले आरुणि और उपमन्यु जैसे छात्र कहाँ से आएँ?
दान पर जीवननिर्वाह करने वाले व्यक्तियों में से ऐसे लोकसेवक उँगली पर गिनने लायक मिलेंगे, जो दान प्राप्त करने के फलस्वरूप स्वभावतः कंधे पर आने वाली लोकसेवा की जिम्मेदारी को पूरा करते हैं। मुफ्त का माल और बिना का माल और बिना सेवा के सम्मान प्राप्त करने के फलस्वरूप उनमें नानाप्रकार के दोष-दुर्गुण उत्पन्न हो चल हैं। आलस्य, ठगी, याचकता की निर्लज्जता, अहंकार, मिथ्या-विश्वासों का प्रसार करके अपने लाभ की वृद्धि करना, नैतिकता का पतन, हीनता की भावना, दुर्व्यसन, दम्भ-पाखंड आदि से वे दिन-दिन अधिक ग्रस्त होते चले जा रहे हैं। ये दूसरों की पैतृकता को, मनुष्यता को ऊँचा उठाने में किस प्रकार समर्थ हो सकते हैं?
प्रलोभन से बचकर गुजारे मात्र से काम चलाना और शेष समय तथाशक्तियों को जनता-जनार्दन की सेवा में समर्पित कर देना, यही ब्राह्मणत्व का सच्चा आदर्श है। यह त्याग ही सच्चा तप है। तपस्वी ब्राह्मणों की इसी तपश्चर्या के फलस्वरूप सारा देश, सारा समाज सुख-संपन्नता का लाभ उठाता था जिनके हृदय में दया है, ब्राह्मणोचित तप-त्याग की भावना है, वही सच्चे अर्थों में ब्राह्मण हैं। ऐसे ब्राह्मणों को गायत्री का एकमात्र संदेश यही है कि-”बुद्धि संसार का सर्वश्रेष्ठ तत्व है। वह तुम्हारे पास ईश्वरीय अमानत के रूप में है। उसे शक्ति भर प्रयत्न के साथ जनता-जनार्दन में वितरण करो। तुच्छ स्वार्थों से ऊपर उठो, अपने कर्त्तव्यों का पालन करो, अज्ञान-दुःख से संतप्तों को दुखी बनाने के लिए सद्ज्ञान रूपी अमृत का वितरण करो।’
‘भगवान का भजन करना श्रेष्ठ है, किंतु भजन का बहाना बनाकर सामाजिक और साँसारिक कर्तव्यों से विमुख होने की जो बात सोचते हैं, उन्हें समाज में निठल्ले, आलसी ढोंगी जैसे मर्माहत शब्द सुनने पड़ते हैं। लोकसेवी के दोनों हित सहकार और सेवा से सध जाते हैं। -प्रभु जगतबंधु
(उत्तरार्द्ध)
एक बार भगवान बुद्ध से पूछा गया कि आपको तो मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा? उन्होंने कहा-नहीं, मैं तो स्वर्ग जाने का अधिकारी तब होऊँगा, जब हर व्यक्ति स्वर्ग जाने का अधिकारी होगा, सब को सुख व शांति मिलेगी, सब सुखी होंगे, तब तक मैं अपनी बारी काटकर दूसरे व्यक्तियों को क्यू में लगाता रहूँगा। सबके बाद में ‘मैं’ अंतिम व्यक्ति होऊँगा और स्वर्ग जाने की ख्वाहिश करूंगा। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक मैं लोगों को आगे बढ़ाता हुआ चला जाऊँगा। मित्रो! बुद्ध की वह मनोभूमि, ऋषि-मुनियों की वह मनोभूमि, जिसमें उन्होंने कहा है-
नत्वहम् कामये राज्यं न सौख्यं न पुनर्भवं। क्मये दुखतप्तानाँ प्राणिनाम आर्तनाषनम्॥
तात्पर्य यह कि प्राणियों का आर्त और प्राणियों का दुख निवारण करने के लिए यदि हमें मौका मिल जाता है तो यह हमारे लिए वरदान है और यही हमारा सौभाग्य है।
एक बार कुँती से भगवान कृष्ण ने कहा कि हे कुँती! वरदान माँग। मैं अब जा रहा हूँ। मैं तो भगवान हूँ, तू जानती है क्या? कुँती ने कहा-मैं जानती हूँ कि आप भगवान हैं। मैं आपसे एक ही वरदान माँगती हूँ कि मुझे कष्टसाध्य जीवन दें, गरीब लोगों वाला जीवन जिऊँ ताकि मैं जान सकूँ कि गरीबी क्या होती है? उनकी कठिनाइयाँ क्या होती हैं? उनके कष्ट क्या होते हैं? यह सब मैं समझ सकूँ, ताकि उनकी सहायता कर सकूँ।
मित्रो! स्वर्ग, मनुष्य के देखने और सोचने के ढंग में-तरीके में है। यह किसी जगह विषष का नाम नहीं है। कम-से-कम स्वर्गलोक के उस जगह का पता लगा लिया गया है। चंद्रमा के बारे में जानकारी प्राप्त कर ली गयी है कि कभी-कभी वह इतना गरम हो जाता है कि अगर कोई धातु रख दी जाय तो वह भी पिघल जाएगी। रात में चंद्रमा इतना अधिक ठंडा हो जाता है कि यदि कोई चीज रख दी जाय तो वह बर्फ बनकर जम जाएगी। ऐसा गरीब चंद्रमा-जहाँ न पानी है, न हवा, वहाँ अगर आपको भेज दिया जाय तो आप कहेंगे कि गुरुजी आपने हमें कहाँ भेज दिया। हमें वापस बुला लीजिए। लोग चंद्रमा पर गये हैं, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि वहाँ ठहर सकें। वे केवल चंद मिनट चक्कर काटकर वापस आ गये हैं। इसी तरह शुक्रग्रह का पता लगा लिया गया है कि वहाँ कोयले का भंडार है। कार्बन गैस भरी पड़ी है। वहाँ आप बिल्कुल जिंदा नहीं रह सकते, वहाँ आपका दम घुट जायेगा।
कुछ लोगों का विश्वास है कि भगवान के पास जाने से स्वर्ग मिलता है। क्या वास्तव में स्वर्ग है? किसी ने देखा है स्वर्ग को? किसी ने देखा हो या नहीं, लेकिन मित्रों! मैंने स्वर्ग को देखा है और मैं चाहता हूँ कि आपको भी स्वर्ग दिखाऊँ। भगवान के पास जाने से दो चीजें मिलती हैं-पहला-’स्वर्ग’, दूसरा-’मुक्ति’। परंतु स्वर्ग केवल देखने वाले तरीके का नाम है। आप चाहें तो अपने में स्वर्ग का प्रयोग कर सकते हैं आप कृपा करके उन लोगों का एहसान देखना व मानना शुरू कीजिए, जिनके बोझ से आपका शरीर लदा हुआ है। आप कृपा करके उस बूढ़ी माँ को देखिये। वह कृपा की देवी है, दया की देवी है, जिसने नौ महीने आपको अपने पेट में रखा, रक्त निचोड़ा, अपनी हड्डी गला दीं। अपना सारा-का-सारा माँस निचोड़ करके हमारा एक पिंड बनाया। जब यह पिंड असहाय था तब और जमीन पर आने के बाद भी वह अपने लाल रक्त को सफेद दूध के रूप में पिलाती रही।
जब कोई व्यक्ति किसी को पचास सी.सी. खून दान दे देता है, तो जन्म भर एहसान करता है और कहता है-जब मरने के लिए बैठे थे तब हमने आपको खून दिया था, बचाने के लिए। लेकिन मित्रों! जिसने हजारों सी.सी. रक्त आपको दूध के रूप में पिला दिया हो, उसके एहसान का क्या ठिकाना? काश! कभी आपने उस माँ को एहसान की दृष्टि से देखा होता तो आपको मालूम होता कि देवता और कहीं नहीं हैं, कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है, देवता ‘माँ’ के रूप में आपके घर में ही है। क्या शारदा, सरस्वती को जानने की जरूरत है या लक्ष्मी को देखने के लिए आपको मुम्बई जाने की जरूरत है? नहीं, ‘माँ के रूप में’ लक्ष्मी आपके घर में बैठी हुई है। जहाँ आज हर आदमी मुआवजा चाहता है, बदला चाहता है वहाँ त्याग की देवी, तपश्चर्या की देवी, अनुदान की देवी-आपकी धर्मपत्नी अपने माता-पिता, भाई-बहिन, कुटुम्ब-परिवार को छोड़कर आती है और आपकी सेवा में दिन-रात लगी रहती है। आप जिस तरीके से उसे रखते रहे, वह उसी तरीके से रही और जीवनभर अपना सारा श्रम निचोड़ती रही। धर्मपत्नी अपना रूप और यौवन, अपनी भावनाएँ आपके ऊपर निचोड़ती रहती है, परंतु बदले में आपसे कुछ नहीं चाहती।
साथियों! त्याग और बलिदान का देवता आपके घर में बैठा है। उस त्याग और वरदान के देवता का नाम है-भगतसिंह। उस देवता का नाम है-महर्षि दधिचि। मित्रो! हमने महर्षि दधिचि के रूप में अपनी पत्नी को देखा है, जिन्होंने अपने जीवन का उत्सर्ग कर दिया मकसद के ऊपर। आपकी आँखों में ‘यदि कृतज्ञता के भाव आयें’, तब आपको यह करना होगा कि नारी के उत्थान के लिए आपको आगे आना होगा। आप जाते तो गायत्री माता के मंदिर में हैं, लेकिन औरत को लातों से मारते हैं। जब वह बेचारी दर्द व शर्म के मारे चिल्लाती है, तब आप उसके मुँह में कपड़ा ठूँस देते हैं। तब वह सिसक-सिसक कर रोती है। धिक्कार है ऐसे लोगों पर, जो ऐसे कुकर्म करते हैं। मन में यह भावना लेकर चले थे गायत्री माता को प्रसन्न करने, उनसे वरदान माँगने चले थे, ऐसे दुष्ट, पिशाच, नीच लोगों को धिक्कार है। ऐसे ही पापी लोग नरक में जाते हैं। ऐसे लोग जहाँ कहीं भी जाएँगे, नरक बना देंगे, घर में भी, बाहर भी वे लोग नरक बना देंगे। घर-बाहर, पृथ्वी-आकाश सारी जगह नरक बना देंगे। घर-बाहर, पृथ्वी-आकाश सारी जगह नरक ही विद्यमान रहेगा उनके लिए।
मित्रो! जो आँखें दुष्टता को देखती रहती हैं, दोष-दुर्गुणों को देखती हैं। जिनके भीतर कभी कोई संवेदना का भाव उत्पन्न नहीं होता। सारे जीवन में त्याग और सेवा के कृतज्ञता के भाव जब तक मनुष्य के जीवन में न आयें, तब तक स्वर्ग नहीं प्राप्त होता है। स्वर्ग अर्थात् कृतज्ञता के भाव। ये भाव जब जब हमारी आँखों व दिल में आ जाते हैं, तब हमें छोटी-छोटी चीजें देवता के रूप में दिखायी देती हैं। दूसरे लोग हमारे ऊपर हँसा करते हैं, कहते हैं ये हैं हिंदू। ये क्या पूजते हैं? पत्थर। ये क्या पूजते हैं? पीपल। ये क्या पूजते हैं? घूरा। बेवकूफ वे लोग हैं, नहीं, हम लोग उनसे ज्यादा बुद्धिमान हैं। महत्वपूर्ण यह है कि जिस जानदार या बेजान चीज ने हमारे ऊपर एहसान किया है, उनके चरणों पर हमारा मस्तक झुका रहता है। अगर वह बेजान है तो उससे हमें क्या मतलब। क्यों कि बेजान चक्की ही हमें अनाज पीस-पीसकर खिलाती है। जिस अन्न को हम ऐसे खा नहीं सकते थे, चबा नहीं सकते थे। उसको पीसकर हमारे खाने लायक बनाया। हमारे लिए पौष्टिक अन्न बनाया, जिसने हमारा पेट भरा? देवता चक्की नहीं, तो कौन है? जिसने बिना पारिश्रमिक माँगे अपना श्रम जारी रखा। हम उसकी पूजा न करें तो किसकी पूजा करें। वह पत्थर है अवश्य, लेकिन इनसानों से तो पत्थर अच्छा है। उन देवताओं से तो पत्थर अच्छा है, जो देवता बकरा खाने के बाद, भैंसा खाने के बाद इनसान की सहायता करने को तैयार हों। ऐसे दुष्ट कसाई देवताओं से अच्छा तो पत्थर देवता है, जो हमारे चक्की पीसने के काम में आ जाता है।
घूरा-जो कूड़ा का ढेर भरा हुआ पड़ा रहता है। जिसने गंदगी एक स्थान पर एकत्र कर ली और अपने आप को गला दिया। गलाने के बाद अपने आप को खाद बना डाला, जो कि खेतों में डाली जाती है। जिससे कि अन्न की पैदावार चावल, गेहूं, मक्का, जौ, फल, सब्जी आदि अधिक मात्रा में होते हैं अगर हम घूरे की पूजा नहीं करेंगे, तो किसकी पूजा करेंगे। ये बेजान घूरा है, बेजान चक्की है, पर हम तो बेजान नहीं हैं, हमें तो जान है। हर जानदार का फर्ज होता है कि जिन लोगों से हम सहायता लेते हैं और जिन लोगों की सेवाएँ प्राप्त की, उन सबके प्रति कृतज्ञता के भाव रखें। कृतज्ञता का भाव रखना मित्रों;केवल वैचारिक रूप से नहीं हो सकता। जिसके प्रति कृतज्ञता के भाव हैं, उसके प्रति कुछ प्रतिक्रिया-प्रतिध्वनि होती है। जैसे कुएं में जो आवाज देते हैं, उसकी प्रतिध्वनि होती है और वही आवाज गूँजकर हमें पुनः सुनायी देती है। यहाँ मथुरा में एक प्रसिद्ध जगह है। जिसे पोतराकुण्ड कहते हैं। यहाँ पंडे लोग अपने यजमानों को ले जाते हैं। वहाँ उनसे कहलवाते हैं कि- ‘यशोदा तेरा लाला जागै कि सोवै।’ इसमें अंतिम शब्द’ सौवे’ है। तालाब बहुत बड़ा है जिसमें से आवाज आती है ‘सोवै’। अगर ऐसे कह दे तो एक सेकेंड बाद जागै शब्द की प्रतिध्वनि आयेगी।
मित्रो! कृतज्ञता के भाव जो हमारे अंतरंग में जाकर के टकराते हैं, तो इस शरीर रूपी गुँबद से एक भाव उत्पन्न होता है, एक कल्पना उत्पन्न होती है, एक आकांक्षा होती है कि जिन लोगों ने हमें अनुदान दिये हैं, हमारी सेवा-सहायता की है, उन लोगों के प्रति हमारा कोई फर्ज नहीं है क्या? क्या उनके ऋणों से मुक्ति नहीं पायी जा सकती है? मनुष्य के मन में जिस दिन ये भाव उत्पन्न होते हैं, उस दिन उसे चारों ओर देवता दिखायी देते हैं। एक देवता वह अध्यापक दिखायी पड़ता है, जिसने प्राइमरी स्कूल में पढ़ाया था। जो रोज मुर्गा बनाता था और मार लगाता था, अगर मारता नहीं तो आज हम और आप गाय, भैंस, बैल चरा रहे होते। मारा तो क्या हुआ, मुर्गा बनाया तो क्या हुआ, पढ़ाया भी इसी तरीके से कि अच्छी डिवीजन आती रही और पास होता गया। धन्यवाद है उस गुरु को जिसने हमें पढ़ाया। कैसा प्यार भरा गुरु था वह जिसकी वजह से हमारे जीवन का सबसे स्वर्णिम समय बीता। छोटे-छोटे बालक, छोटे-छोटे स्कूलों में लम्बी-लम्बी जिंदगियाँ व्यतीत की, पर वैसा निर्मल और निश्चल प्रेम कहीं देखा हमने?
हमने आपको कोकाकोला पिला दिया और पान भी खिलाये, लेकिन इस खिलाने-पिलाने के पीछे भी एक चाल थी। आपकी बेटी की शादी है-साड़ी खरीद ले जाइये। कितने दाम की साड़ी है? अरे दाम का क्या सोचना, दाम तो बाद में भी मिल जाएँगे। आप साड़ी ले जाइये, अजी हमारे और आपके पिताजी दोस्त थे। कोकाकोला पिलाया था तब आपने मेरी जेब काट ली थी। हमने मित्रताएँ तो कर लीं, लेकिन स्वार्थ, छल-कपट और कामनाओं से भरी हुई। शतरंज की बिसात के तरीके से हमारी मित्रताएँ बनी रहीं। जब हमारा काम पूरा हुआ तो हमने इस तरीके से आंखें फेर लीं, जैसे पिंजरे से निकलने के बाद तोता फेर लेता है। मित्रता का अर्थ हमारे जीवन से चला गया और अन्तःकरण तलाश करता फिर रहा है कि हमें कोई मित्र मिल जाये। परंतु मित्र कहाँ से मिले? मित्र के बिना, सखा के बिना, साथी के बिना जीवन एकाकी प्रेत-पिशाच-सा मरघट में अकेले-अकेले बैठे रहते हैं, जिनका अपना कोई भी नहीं।
मित्रों! शिकार खेलने वाले जंगल-जंगल घूमते रहते हैं। जंगलों में रहने वाले जानते हैं कि एक्कड़ नाम का एक जानवर होता है। जो झुण्ड में से निकलकर अलग चला जाता है, वह एक्कड़ कहलाता है। एक्कड़ जानवर को हमेशा तलाश करता रहा। झुण्ड से बाहर कभी हिरन रहने लगता है, तो वह बड़ा ही खूँखार हो जाता है। जहाँ भी मौका मिलता है, सींग घुसेड़ देता है किसी भी जानवर में। एक्कड़ बड़ा ही भयानक होता है बड़ा ही खूँखार होता है, ऐसे ही अचानक हमला बोलता है। जंगल के सभी लोग जानते हैं कि इससे कैसे बचना चाहिए। इसी तरह जो व्यक्ति एक्कड़ के तरीके से रहते हैं, वे किसी को अपना सखा बना रहे हैं, किसी को मित्र बना रहे हैं, परंतु वस्तुतः उनका प्रेमी कोई भी नहीं। सब उनके लिए शतरंज की मोहरों के तरीके से हैं। जिनको यहाँ से उठाकर वहाँ रख देते हैं, जिससे गोटी लाल हो जाती है। अगर बात बन जाती है तो ठीक, अगर नहीं बनी तो उसको छोड़ देते हैं और दूसरी गोटी फिट करने की तिकड़म भिड़ाते रहते हैं।
मित्रों! हम याद करते हैं बचपन के उन लोगों की, जो कि ज्वार की रोटी लेकर आते थे और हम गेहूँ की रोटी ले जाया करते थे और आपस में मिल-बाँटकर खाते थे। ब्राह्मण, बनिया और नाई सभी साथ बैठे हुए खाते थे। तब न तो किसी को जाति का ध्यान था, न ही ऊँच-नीच का, कि कौन ब्राह्मण है, कौन बनिया है और कौन नाई है? बड़े हो गये तो जाति-बिरादरी के हमारे सामाजिक बंधनों से हमारा जीवन नष्ट-भ्रष्ट हो गया। बचपन में हमने नाई के लड़के के साथ जो रोटियाँ खायी थीं, याद आता है वह निश्चल प्रेम, कृतज्ञता का भावभरा जीवन। मित्रो, आकाँक्षा उत्पन्न होती है और निश्चल प्रेम याद आता है। मन करता है कि वैसा ही प्रेम भरा जीवन दुबारा मिल जाये। ऐसा मालूम होता है कि यह खूबसूरत दुनिया जो न जाने कितने हीरे-जवाहरातों से बनायी गयी है। छोटे बालक और अध्यापक जब याद आते है;जब हमको अपनी माँ याद आती है, जो हमको गोद में लिए फिरा करती थी, तब मालूम पड़ता है कि दुनिया कितनी खूबसूरत, प्यार से, आनन्द और उल्लास से भरी हुई है। हमको जब समाज का ज्ञान आता है तो मालूम पड़ता है कि न जाने हम कितने लोगों से शिक्षण पाते हुए चले गये। इतने लोग अपना ज्ञान हमारे पास रख गये।
मित्रों! आप एक गीता खरीद करके ले आते हैं, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण की लीला का ज्ञान, जो अर्जुन को मिला था, पढ़ते हैं। धन्य है वह गीता, धन्य हैं-प्रेस वाले, धन्य है वह छापाखाना वाला धन्य है वह कागज बनाने वाला टाटा मिल, जो कागज के रिम बनाता हुआ चला गया। धन्य है वह, जिसने छापने की मशीनें बनायी, जिससे हमें ढाई आने की गीता पढ़ने को मिल गयी। धन्यवाद उन सब लोगों को जिनने इतना बेहतरीन काम किया, जिसकी वजह से गीता जैसी पवित्र व धार्मिक पुस्तक पढ़ने को मिल गयी। गहराई से सोचता हूँ तो पता चलता है कि दुनिया में कितने बेहतरीन और खूबसूरत लोग रहते हैं हमको इन सबसे एक ही बात समझ में आती है कि दुनिया में चारों तरफ प्रेम और सौहार्द्र बिखरा हुआ है। मित्रो, यही अमृत है और इसकी लहरों में आप उड़ते हुए और सरकते हुए चल सकते हैं। स्वर्ग है मक्के की रोटी में, स्वर्ग है फटे कपड़ों में, स्वर्ग है गरीबी में। रेशमी वस्त्र तो अंगारे के समान लगते हैं। मिठाइयाँ जो आप मजे से स्वाद ले लेकर खाते हैं, उसमें जहर भरा हुआ है-पोटेशियम सायनाइड भरा हुआ है, जो कि आपका पेट फाड़ देगा। इसलिए आपने जो आकाँक्षा भौतिकता के रूप में गाड़ रखी है कि मकान आपको मिल जाएगा, चीजें आपको मिल जाएँगी तो आपको सुख-शांति मिल जाएगी-व्यर्थ है।
मित्रों! इससे आपके भीतर आकाँक्षाएँ, तृष्णाएँ बढ़ती हुई चली जाती हैं कि अमुक चीज हमारे पास कम है और यह चीज हमको चाहिए। परंतु उनका उपयोग करना हमको कहाँ आता है? फिर भी उसको हम जोड़ना शुरू कर देते हैं। उसे जोड़ते हुए मुसीबतें हमारे पास आती हैं। बच्चे कहते हैं माँ जी हमको यह चीज दोगी? कहती है नहीं। यह तो जमा करके रखा जाएगा। बहुत मुनाफा कमाया जाएगा। हमें वह कहानी याद आती है कि मधुमक्खी शहद जमा करती रही। एक दिन बंदर आया और छत्ता तोड़ करके चला गया। सारा-का-सारा शहद गिर पड़ा और सारी मक्खियाँ उसमें चिपककर मर गयी। हमको जितना लाभ मिलता है, उसका हमको सदुपयोग करना आता है क्या? नहीं, हमको धन का सदुपयोग करना आता नहीं। हमको इतना सुँदरशरीर मिला है, उसका प्रयोग करना, उपयोग करना आता है क्या? नहीं। हमको इतना अच्छा स्वास्थ्य मिला हुआ है, उसका हमने सही उपयोग किया नहीं, फिर हम किस मुँह से ईश्वर के पास माँगने के लिए जाते हैं कि हमारा अच्छा स्वास्थ्य बना दीजिए। आपको जो धन मिला है, उसका क्या आपने सही कामों में उपयोग किया? नहीं। फिर आप किस मुँह से भगवान के पास धन माँगने के लिए जाते हैं।
साथियों, आपको जो बुद्धि मिली है उसका आपने सही इस्तेमाल किया? नहीं फिर आप भगवान से बार-बार क्यों माँगते हैं? आपको इतनी विद्याबुद्धि मिली हुई थी कि आप दुनिया में शांति की धारा बहाते, उसको खूबसूरत बनाते, लेकिन आप तो संग्रह करने में लगे थे। जमा करने की बात सोचते रहे, स्वामी बनने की बात सोचते रहे, लेकिन आपके मन में उपयोग की बातें कहाँ आयीं? यदि उपयोग की बातें आपके मन में आतीं तो आप सोचते कि जितना आपको मिला है वह पर्याप्त है, बहुत है। अगर आप इन सबका अच्छी तरह से प्रयोग कर सके होते तो हम सोचते कि जितना भी आपके पास जो विद्या है, स्वास्थ्य है, जो धन है, इतने से ही सदुपयोग करके आप स्नेह-सौहार्द्र की धाराएँ बहा सकते हैं। फिर आनंद, उल्लास और संतोष आपके चारों ओर उमड़ता हुआ चला जा सकता है। कृतज्ञता आपके मन में उमड़ती हुई चली जा सकती है। पर इस्तेमाल करना हमको कहाँ आया?
मित्रों! उस स्वर्ग की कल्पना करना व्यर्थ है, जो कि मरने के बाद मिलता है। क्योंकि आपको यदि स्वर्ग भेज दिया जाए तो थोड़े ही दिनों में आप स्वर्ग को भी नरक बना देंगे। अपने देश के प्रमुख नेता काहिरा मिश्र के एक होटल में ठहराये गये थे। वहाँ का खाना उनको पसंद नहीं आया, तो उन्होंने नौकर से कहा कि स्टोव पर चाय बना दे तथा खाना पका दे। स्टोव के धुएँ से कमरे की एक-दो दीवार काली हो गयीं, तो उस होटल के मैनेजर ने कहा कि आपने हमारे कमरे की दीवारें गंदी कर दीं। उसने लंबा-चौड़ा बिल बनाकर उन नेता जी के पास भेजा और वह बिल उनको चुकाना पड़ा। यदि हम स्वर्ग नाम के स्थान पर जाएँ तो वहाँ भी चारों तरफ गंदगी फैला देंगे और वही जगह थोड़े दिनों बाद नरक जैसी लगेगी। वहाँ कूड़े का ढेर लग जाएगा, लोग गाँजा, चरस-शराब आदि का सेवन भी करेंगे। ये लोग कौन आ गये? ये भक्त आ गये, गायत्री स्तवन करने वाले आ गये। यहाँ लोग मंदिर के पीछे शौचालय की दीवारों पर पेशाब करते हैं। बुरे व गंदे लोग जहाँ भी जाते हैं, वहाँ स्वर्ग को भी नरक बना देते हैं।
कभी-कभी हमें अकेले देहरादून एक्सप्रेस से हरिद्वार जाना पड़ता है। ट्रेन की प्लेटों पर लिखा रहता है ‘बम्बई से देहरादून’ और जब हरिद्वार से मथुरा आना होता है ‘देहरादून से बम्बई’। इसका कारण जब हमने स्टेशन मास्टर से पूछा- तो उन्होंने बताया कि ये इन प्लेटों पर दोनों तरफ लिखा होता है। जब ट्रेन वापस जाती है तो प्लेटें पलट दी जाती हैं। विकृत दृष्टिकोण वाले लोगों को यदि स्वर्ग भेज दिया जाये तो थोड़े ही दिनों में वहाँ की पेंटिंग को भी बदल दिया जाएगा वहाँ का साइनबोर्ड बदल दिया जाएगा कि यह है-नरक । अच्छे दृष्टिकोण वाले लोग चाहे वे गरीबी में रहें, चाहे केवल मक्के की रोटी खाकर जीवित रहें, किसी भी तरीके से रहें, लेकिन वे लोग हर स्थिति में थोड़े ही दिनों में स्वर्ग पैदा कर सकते हैं।
एक संत इमरसन हुए हैं, जिन्होंने अँग्रेजी भाषा में आध्यात्मिक जीवन के ऊपर बहुत-सी किताबें लिखी हैं-उनका एक मंत्र है कि “मुझे नरक में भेज दो मैं उसे स्वर्ग बना दूँगा”। उनकी हर किताब के पहले पन्ने पर यही लिखा रहता है। किताब पहले पन्ने से शुरू होती है और हर किताब के पहले पन्ने पर लिखा है कि स्वर्ग कहीं होता नहीं है, बनाया जाता है, निर्मित किया जाता है। वह मनुष्य की आँखों में रहता है, भावनाओं में रहता है, अंतःकरण में रहता है। आध्यात्मिकता का अंतिम परिणाम यही है। मित्रों! स्वर्ग है-विचार करने का सही तरीका और चीजों का देखने का सही दृष्टिकोण। इसी का अँग्रेजी नाम है-फिलॉसफी और हिंदी में दर्शन। यदि दुनिया को सही ढंग से देखना शुरू करें, नये ढंग के साथ सोचना आरीं करें तो न जाने क्या देखने को मिलेगा और आप आगे बढ़ते हुए, ऊँचे उठते हुए चले जाएँगे। यही है ईश्वर को प्राप्त करने का, रिश्ता मजबूत बनाने का सीधा व सरल मार्ग। आज की बात समाप्त।
आज अज्ञानरूपी वृत्तासुर से सारा-का-सारा समाज ही अच्छादित है। जिनके कान हैं, वह समाज की पीड़ा और पतन की मर्मभेदी चीत्कार सुन सकते हैं तथा आँख वाले देख सकते हैं। यह समय व्यक्तिगत शौक-मौज का नहीं है। हम युगसंधि वेला में उपस्थित हैं। शीघ्र ही या तो हम सर्वनाश के गर्त में गिरेंगे या उन्नति के उच्च शिखर पर आरुढ़ होंगे। आज आवश्यकता है दधिचि जैसे आत्मदानियों की। शरीर तो नष्ट होगा ही, किंतु यदि अपने लक्ष्य को पूरा करने में नष्ट हो, तो ही इसकी सार्थकता है। पं. श्रीराम शर्मा आचार्य (वाङ्मय 31, पृष्ठ 5.38)
अच्छा होता यदि सघन अंधकार में भटकते हुए जीवन धर्म को कहीं से प्रकाश की एक किरण हस्तगत होने का सुयोग बनता और भ्राँतियों की भयानकता से उबरने का सुयोग प्राप्त हो पाता। अपने संबंध में विचार करने और जो बचा है, उसका सही सदुपयोग करके कुछ तो बना लेने का परामर्श प्राप्त होता; पर वह भी कहाँ बन पाता है। कदाचित कहीं से उपयोगी सुझाव उभरता है, तो उसे अनसुना कर दिया जाता है, प्रकाश की ओर से मुँह मोड़ लिया जाता है। इस दयनीय-दुर्मति और उसके साथ जुड़ी हुई दुर्गति का आकलन करने वाला विवेक ‘हा-हंत’ कहकर, पेट में घूँसा मारकर, मुँह को हाथों में छिपाकर किसी कोने में जा बैठता है। जहाँ लाभ को हानि और हानि को लाभ समझने की सनक ठंडे उन्माद की तरह सिर पर सवार हो रही हो, वहाँ कोई करे भी क्या? कहे भी क्या?
इतिहास की चाल बड़ी विलक्षण है। कभी-कभी ऐसा समय आता है कि तनिक से प्रयास से भी बड़े लाभ उठाने का अवसर लॉटरी खुलने की तरह हाथ लग पड़ता है। कभी ऐसा विलक्षण प्रवाह बहता है कि मानवी प्रयास-पुरुषार्थों का कोई मूल्य-महत्व नहीं रह जाता और परिस्थितियों का तूफानी अंधड़ ही सब कुछ उलट-पुलट कर रख देता है। समय की अपनी अनगढ़ता ऐसी विचित्र होती है, जिसमें ज्वार-भाटे जैसे उफान मनुष्यों की इच्छा और चेष्टा को ताक पर उठाकर रख देते हैं। आज की परिस्थितियों में यदि किसी को कालज्ञान की दूरदर्शिता मिली हो तो उसे यह समझने में तनिक भी कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि व्यक्तिगत भाग्योदय की तथा इतिहास-प्रवाह के अनुकूल होने की दृष्टि से यह समय ऐसा है जो अतिविशिष्ट है एवं इसका लाभ उठाया ही जाना चाहिए। जो इसे चूकेंगे, वे पछतायेंगे। समय मनुष्य की इच्छा या चेष्टा की प्रतीक्षा नहीं करता। वह आता है और बिजली की तरह कौंधकर अपना प्रभाव व प्रकाश दिखाकर चला जाता है। जो उसे पहचानते हैं, वे उसका सदुपयोग कर लेते हैं। दीर्घसूत्री-प्रमादी सदैव घाटे में ही रहते हैं, उन्हें अनंतकाल तक पछताना ही होता है।
साधारण समय और विशेष समय में, साधारण व्यक्ति और विशेष व्यक्ति में एक विशिष्ट अंतर होता है। साधारण की चाल धीमी होती है और विशिष्ट की तत्काल निर्णय लेने से लेकर सुनिश्चित प्रगति की दिशा में कदम उठाने तक की प्रक्रिया से जुड़ी होती है। धीरे-धीरे सोचने-विचारने, अनुकूल अवसर ढूंढ़ने, साथियों की सलाह मशविरा करने की बातें सोचने में ढेरों समय व्यर्थ चला जाता है और जो उत्कृष्टता का पक्षधर उत्साह उठा था, वह समय बीतते-बीतते ठंडा ही नहीं, समाप्त भी हो जाता है। असंख्यों तथाकथित सृजनात्मक दिशा में विचार करने वालों की आदर्शवादी योजनाएँ इसी प्रकार मटियामेट भी हुई हैं। इसके विपरीत जिन-जिन ने भी समय को पहचानने में अपनी तीखी सूझबूझ का परिचय दिया है, विजयश्री उनके हाथ लगी है। वे बिजली की तरह चमकते और तलवार की तरह टूट पड़ने का पुरुषार्थ करते रहे हैं। असमंजस उनके आड़े नहीं आया है। व्यापारी जैसा हानि-लाभ का हिसाब-किताब लगाने पर क्या मिलेगा, यदि यह किया जाए, ऐसी घट-जोड़ की फुरसत न उनके पास होती है, न वे ऐसी नीति को लेकर ही इस धरती पर आते हैं। उन्हें तो उदीयमान साहसियों की ही नीति अपनानी पड़ी है एवं इतिहास साक्षी है कि संसार के सारे महत्वपूर्ण परिवर्तन उसी वज्रप्रहार जैसी भावभरी साहसिकता के साथ ही संपन्न हुए हैं।
प्रस्तुत चर्चा युगसंधि की वेला में जिसे विशेष समय माना गया है, विशिष्ट व्यक्तियों, की विशिष्ट भूमिका को लेकर हो रही है। युग बदल रहा है एवं सारी धरती का भाग्य नए सिरे से लिखा जा रहा है। यदि इसे भली-भाँति समझ लिया गया है तो यह भी कहना और मानना चाहिए कि यह कार्य विशिष्टों-वरिष्ठों की अपनी निजी दिशाधारा बदलने के साथ ही आरीं होगा। इन्हीं को ‘प्रतिभा’ भी कहा गया। प्रतिभाएँ आगे बढ़ती हैं, तो ही अनुयायियों की कतार पीछे चलती है। प्रतिभाओं को दूसरे शब्दों में अंधड़ भी कहा जा सकता है। उनका वेग जिस दिशा में, जिस तेजी से बढ़ता है, उसी अनुपात से तिनकों-पत्तों से लेकर छप्परों और वृक्षों को उड़ते-लुढ़कते, भयंकर उत्पात मचाते देखा जाता है। जब भी जमाना गिरता या उठता है, पतनोन्मुख परिस्थितियाँ पैदा होती हैं विभीषिकाओं का दौर आता है एवं उनसे जूझने हेतु माहौल बनता है, तो सारा दायित्व उस समयविशेष की अग्रगामी प्रतिभाओं के सिर पर ही लदता है। उनका अग्रगमन असंख्यों में प्राण फूँकता है। उनका हाथ-पर-हाथ रखे बैठे रहना, कुछ न कर पाने की विवशता जाहिर करना समय का सबसे बड़ा दुर्भाग्य सिद्ध होता है। वे उठते हैं, तो आँधी के चक्रवाती आँदोलन जन्म लेने लगते हैं-अनेकों का सामान्य समझे जाने वाले व्यक्तियों का मनोबल भी उछलकर उनसे कुछ असामान्य करा लेता है। वे गिरते हैं तो आलों की तरह समूची फसल को सफाचट करके रख देते हैं। जो चुप बैठे रहते हैं, वे न तो शांतिप्रिय ही कहलाते हैं, न निरपेक्ष, न निरासक्त, न योगी। उन्हें आपत्तिकाल की यातनाएँ कभी क्षमा नहीं कर सकतीं।
प्रस्तुत समय आपत्तिकाल के रूप में बताया गया है एवं इसमें आपत्तिधर्म का ही पालन हर वरिष्ठ-विशिष्ट, प्रतिभाशाली वर्ग के द्वारा किया ही जाना चाहिए। वरिष्ठ वे, विशिष्ट वे जो अपनी समस्या का आप समाधान तो कर सकें ही, साथ ही बचे हुए पराक्रम का उपयोग दूसरों को उबारने में कर सकें। उस मांझी की तरह पुरुषार्थ कर सकें, जिसकी मांसपेशियां चप्पू को दोनों हाथों से पकड़ती हैं और नाव पर लदे हुओं को पार उतारने का विश्वासभरा अभयदान देती हैं। नदी के उस पार भीड़ खड़ी है, जिसे माँझी के रूप में एक देवदूत नजर आता है जो तूफान में भी उनको उस
परीक्षा की घड़ियाँ समीप आ पहुँची-सँभलने का अवसर है यह
पार पहुँचाने की सामर्थ्य रखता है। अतः माँझी स्तर की वरिष्ठता को विशिष्ट माना गया है, विशेषतः इस आपत्तिकाल में जहाँ भीड़ को समझ में नहीं आ रहा कि कैसे उस पार पहुँचा जाए।
प्रस्तुत प्रखर साधना वर्ष, जिस विषम वेला में आरंभ हो एक युग-पुरुषार्थ के रूप में सारे भारत व विश्व में संपन्न हो रहा है, वह कितनी असाधारण स्तर की है, इसे समझने में किसी को भी कुछ कठिनाई नहीं होनी चाहिए। प्रस्तुत युगसाधना न केवल दैवीविभीषिकाओं से निपटने के लिए युगऋषि द्वारा प्रस्तुत एक सामूहिक उपचार के रूप में संपन्न हो रही है, इसका एक विशिष्ट लक्ष्य है-वरिष्ठों में, जागृतात्माओं में वासंती पुलकन का संचार कर उनसे कुछ विशिष्ट, विशेषज्ञों के स्तर के कार्य संपन्न करा लेना, ताकि उज्ज्वल भविष्य से भरे इक्कीसवीं सदी (हिंदू पंचाँग के अनुसार युगाब्द बावनवी सदी) के समाज की मजबूत नींव रखी जा सके। अखंड-ज्योति परिजनों का समुदाय-प्रज्ञापरिवार युगसृजन के निमित्त जुटे अग्रगामी मूर्धन्य लोगों का एक सुसंस्कारी परिकर है। उसे युगचुनौती स्वीकार करनी ही होगी। किसी को भी यह सोचने का अवकाश नहीं होना चाहिए कि उसका वैभव कैसे बढ़े-कुटुम्ब कैसे फले-फूले, समृद्धि कैसे आए। आज न पदवीधारी बनने की आवश्यकता है, न बड़े आदमियों में, संपन्नों में गिनती किये जाने वालों की श्रेणी में आने के लिए चित्र-विचित्र उछल-कूद करने की। ओछे-बचकाने लोग ऐसी हरकतें करते तो कोई बात नहीं थीं, पर वरिष्ठों पर हेय स्तर का अवसाद चढ़ दौड़े तो यह तो विशिष्टता पर लगा एक कलंक ही कहा जाएगा।
मंजिल जब सामने हो-गुरुसत्ता द्वारा दिखा गया लक्ष्य सामने दिखाई पड़ रहा हो, संधिकाल का युगप्रभात अपने स्वर्णिम आगमन के शुभ संकेत दे रहा हो तो हम सभी का, जो परमपूज्य गुरुदेव द्वारा आरंभ किये गए गायत्री परिवार रूपी काफिले के एक सदस्य हैं, एक ही दायित्व है कि अपनी निष्ठा-अपनी विशिष्टता का गौरव बनाए रखें एवं वही करें जो इस समय की आवश्यकता है। बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण अब अपने अंतिम चरण में आ पहुँचा। जब भी ऐसे शुभकार्य अपने समापन की वेला में पहुँचते हैं, कुछ अभूतपूर्व पुरुषार्थ बड़े विराट व्यापक स्तर पर होना होता है, तब आसुरी सत्ताएँ भी विघ्न डालने में चूकती नहीं। यह युग-युग का इतिहास बताता है कि श्रेष्ठताओं से भरा समय ऐसे ही आसानी से नहीं आ गया। अवतारी महाशक्तियों तक को जब जूझना पड़ा है, अवरोधों से टकराना पड़ा है तो हम तो उस महाकाल की सत्ता के एक अंग-अवयव होने के नाते यह तो अपेक्षा रख ही सकते हैं कि उसका दशांश हमें भी झेलना पड़ सकता है। प्रस्तुत समय कुछ ऐसा ही है, जब मानवी दुर्बुद्धि क्या कुछ कर गुजरेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। अच्छे-अच्छों की ऐसे अवसरों पर बुद्धि पलटती देखी जाती है। भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा भी तो है कि मनुष्य अपने मन, वाणी और तन से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है, उसके प्रमुख कारणों में पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों के संस्कारों का परिपाक ही है, जिसे ‘दैव’ कहते हैं। ऐसे में कर्म सिद्धि तभी प्राप्त हो सकती है जब हम अपने आपको ईश्वरीय सत्ता-गुरुसत्ता के हाथों में निष्कामभाव से सौंप दें। अठारहवें अध्याय में सहजकर्म-नियतकर्म-स्व-धर्म-स्व-भावकर्म की व्याख्या के पश्चात वे अंत में कहते हैं कि “संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को त्यागकर केवल मुझ एक सर्वशक्तिमान सर्वाधार परमेश्वर की शरण में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा। तू शोक मत कर।” यदि हम गीता के इस मर्म को समझ सकें तो हमारे मुँह से अर्जुन की तरह निष्कर्ष रूप में एक ही वाक्य निकलेगा-स्थ्तिऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव (मैं संशयरहित होकर वही करूंगा, तो आपकी आज्ञा होगी)।
कोई भी विघ्न, चिंतन की विकृति, महत्वाकाँक्षा, आसुरी सत्ताओं द्वारा फैलाया गया दुष्प्रचार अब हमें लक्ष्य-प्राप्ति से रोक नहीं सकता, यह विश्वास इस साधनावर्ष में प्रतिफल-प्रतिक्षण दृढ़ करते रहा जाना चाहिए। बड़े-बड़े आयोजनों की होड़ समाप्त होने के बाद अब साधना की धुरी पर संगठन को सशक्त बनाने, अपने आपको प्रतिकूल समय के लिए सभी मोर्चों पर तैयार करने के लिए ही यह एक वर्ष की पूरी साधना का क्रम निर्धारित किया गया है। राष्ट्र ही नहीं, विश्व के कोने-कोने में, चप्पे-चप्पे में आस्तिकता के संस्कारों की नर्सरी उगानी-बढ़ानी व संभावित आक्रमणों से उसकी रक्षा करनी है। गायत्री, यज्ञ एवं संस्कारों की त्रिवेणी में
स्नान कर यह विश्व-वसुधा इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करे भी तो उज्ज्वल भविष्य का सवेरा निश्चित ही देख सकेगी। इसी के लिए हर कार्यकर्ता को एक ही लक्ष्य दिया गया है, आत्म-साधना जीवनसाधना-अपने आपको एक अनुशासित साधक के रूप में विकसित करना। इतना होने पर कोई भी झंझावात, कालनेमि की माया रूपी आँधी किसी मजबूत वृक्ष को हिला भी नहीं पाएँगी। साधक स्वयं बनना एवं औरों को को बनाना है। औरों को तभी साधना की प्रेरणा दे पाएँगे, जब स्वयं एक निष्ठावान साधक होंगे।
यह समय गुरुसत्ता के अनुदानों को जी भर कर लूटने का है। इसके लिए तीन शर्तें पूरी कर अपने को प्रमाणिक बना लेना ही हर व्यक्ति का लक्ष्य होना चाहिए। हर कार्यकर्ता के लिए निर्धारित ये तीन मानदण्ड हैं-हम जो भी करें, वह इष्ट को प्रिय लगे, गुरु के प्रति हम पूरी तरह से प्रमाणिक बनें एवं साथी सहचरों में आत्मीयता का संचार उससे हो सके। इष्ट अर्थात् भगवत्सत्ता को वही प्रिय लगता है, जो उनकी शर्तों के अनुसार देवमानव की रीति-नीति अपनाकर चलता है। भगवान को प्रिय है तो हमारे अहं का विसर्जन-आकाँक्षाओं का उसकी इच्छा में विलय परिपूर्ण समर्पण। हम जो भी करें साधक के भाव से-निष्काम कर्म के भाव से समर्पण भाव से करें। साधना की सफलता गायत्री महामंत्र के जप व विस्तार रूपी महापुरुषार्थ की परम सिद्धि-उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के सब धर्मावलंबियों द्वारा किए जाने से होने जा रहे सत्परिणामों की सुनिश्चितता तभी है, जब हमारे हर पल के चिंतन कर्म में ईश्वरीय सत्ता के प्रति समर्पण भाव होगा। भगवान महाकाल को प्रिय यह है कि हमारा दुष्चिंतन मिटे-दुर्मतिजन्य दुर्गति से हम बचें। जो उन्हें प्रिय हो वही हम करें भी। अचिंत्य चिंतन कदापि न करें।
गुरुसत्ता के प्रति प्रामाणिकता का अर्थ है-हर कसौटी पर स्वयं को कसना। यदि उपयुक्त प्रथमचरण उपासना है तो यह चरण साधना है। हमारी भौतिक महत्वाकांक्षाओं पर रोकथाम-चारों प्रकार के संयमों का परिपालन-जीवन के हर पहलू में गुरुसत्ता का अनुशासन-यही अब हमारा लक्ष्य होना चाहिए। इस क्षेत्र में जितनी रुकावट आएगी-साधनों की होड़ में रोकथाम लगेगी एवं ब्राह्मणोचित जीवन जीने की रीति-नीति जीवन का अंग बन जाएगी, उतना ही हम गुरुसत्ता की दृष्टि में प्रमाणिक बनेंगे। अंतिम चरण है आराधनापरक अर्थात् हम अपनी आत्मीयता के विस्तार से समाज के कितने बड़े परिवार को अपनी कर्मशैली में बाँध पाए हैं, अपने गुरुसत्ता के लक्ष्य के साथ जोड़ सकने में सफल हो पाए हैं। अपना रौब जमाने के स्थान पर हमारी भूमिका ‘तृणादपिषुनिचेन’ तिनके की तरह विनम्र बनने की दिशा में होनी चाहिए। इसके लिए हम जितना अपना प्रेम-आत्मीयता औरों को बाँटेंगे, उतना ही हमारा परिष्कार विस्तृत होता चला जाएगा। पारिवारिकता की अवधारणा जो परमपूज्य गुरुदेव माताजी ने उसे जीवनभर निभाया भी है।
समय विकट है, परिस्थितियाँ विषम हैं, चुनौतियाँ अनेकानेक हैं, विघ्न अनेकों हैं, परंतु यदि हमारा लक्ष्य स्पष्ट है तो आगामी वर्ष के चरमबिंदु तक पहुँचने तक हम तप की आग से निखरकर आए ऋषि की भूमिका में स्वयं को पाएंगे। जैसे-जैसे परीक्षा की घड़ियाँ आती जा रही हैं-देवसत्ताएँ कई प्रकार से हमें परखने का, हमारी प्रामाणिकता को कसौटी पर कसने का प्रयास कर रही हैं। नींव हमारी मजबूत होगी कर्म हमारे सही होंगे, निष्ठा गुरुसत्ता के आदर्शों पर अटूट होगी तो हम डिगेंगे नहीं, निश्चित ही उत्तीर्ण होकर इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करेंगे।
बहुत समय तक प्रयत्न करने पर भी गोपालचंद्र घोष को भावसमाधि न होती थी, जबकि अनेक साथी उन्हें समाधि के अनुभव सुनाते। एक दिन उन्होंने अपनी यह निराशा रामकृष्ण परमहंस के सम्मुख प्रकट की। सुनकर रामकृष्ण परमहंस ने कहा-इसमें कौन से दुख की बात है। भावसमाधि से ही सब कुछ हो जाता है, यह किसने बताया। भावसमाधि से भी बड़ी चीज है-सच्चा त्याग, परमात्मा में पूरी आस्था। तुम भी अपनी भावनाओं में विकास करो और नरेन्द्र की तरह भावसमाधि की चिंता किए बिना आस्था, श्रद्धा, निष्ठा और त्याग-भावना से कार्य में जुटे रहो। गोपालचंद्र घोष का भ्रम दूर हो गया। वे प्रसन्नतापूर्वक मनोविकास में तत्पर हो गए।
भक्त भगवान के मंदिर में जाकर नित्यप्रति मुक्ति के लिए प्रार्थना करता। भगवान की प्रार्थना सुनकर एक दिन प्रकट हो गए। भक्त से बोले-आज ही मुक्ति प्राप्त कर ले। भक्त घबरा गया, आज ही इसी क्षण। वह ऐसा सोच भी न सकता था। घबराकर बोला- दीनबंधु ठीक है। मुझे एक माह की मोहलत दे दें। बच्चे की शादी कर लूँ और उसे घर का भार सौंप दूँ। भगवान वायदे के अनुसार पुनः प्रकट हुए। बोले- भक्त शादी हो गई-अब भार सौंपो और मुक्त हो जाओ। भक्त ने सोचा कि यह बुरे फँसे। बोला नाती का मुँह और देख लूँ। एक साल की और माफी दे दें। भगवान फिर वायदे के अनुसार प्रकट हुए। भक्त घबराया और गिड़गिड़ाकर बोला-प्रभु क्षमा करें। आप बार-बार आने का कष्ट न करें, मैं स्वयं आपके पास उपस्थिति हो जाऊँगा। भगवान चले गए। भक्त की समझ में अपनी भूल आ गई कि बिना आसक्ति और मोह की निवृत्ति के मुक्ति माँगकर उसने गलती की। भगवान तो चाहते हैं कि मुक्त हों-श्रेयपथ पर आरुढ़ हों। किंतु जब तक मोह और लोभ, आसक्ति और कामनाएं जकड़े रहती हैं, इनसे छुटकारा पाए बिना मोक्ष-जीवन्मुक्ति असंभव है।