जीवन एक संग्राम है, जिसमें हर मोर्चे पर उसी सावधानी से लड़ना होता, है जैसे कि कोई स्वल्प साधनसंपन्न सेनापति शत्रु की विशाल सेना का मुकाबला करने के लिये तनिक-भी प्रमाद किये बिना आत्मरक्षा के लिये पुरुषार्थ करता है। गीता को इसी आध्यात्मिक परिस्थिति की भूमिका कहा जा सकता है। पाँडव पाँच थे किंतु उनका आदर्श ऊँचा था। कौरव सौ थे किन्तु उनका मनोरथ निकृष्ट था। दोनों एक ही घर में पले और बड़े हुए थे। इसलिए निकटवर्ती संबंधी भी थे। अर्जुन लड़ाई से बचना चाहता था और अनीति का वर्चस्व सहन कर लेना चाहता था। भगवान ने उसे उद्बोधित किया और कहा-लड़ाई के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। असुरता को परास्त किए बिना देवत्व का अस्तित्व ही संभव न होगा। असुरता विजयी होगी तो सारे संसार का नाश होगा। इसलिए अपना ही नहीं, समस्त संसार के हित का भी ध्यान रखते हुए असुरता से लड़ना चाहिए। भगवान के आदेश को शिरोधार्य कर अर्जुन लड़ा और विजयी हुआ। यही गीता की पृष्ठभूमि है।
गीता काल का महाभारत अभी भी समाप्त नहीं हुआ। हमारे भीतर कुविचार रूप कौरव अभी भी अपनी दृष्टता का परिचय देते रहते हैं। दुर्योधन और दुःशासन के उपद्रव आए दिन खड़े रहते हैं। मानवीय श्रेष्ठताओं की द्रौपदी वस्त्रविहीन होकर लज्जा से मरती रहती है। इन परिस्थितियों में भी जो अर्जुन लड़ने को तैयार न हो, उसे क्या कहा जाए? भगवान ने इसी मनोभूमि के पुरुषों को नपुंसक, कायर, ढोंगी आदि उनके कटु शब्द कहकर धिक्कार था हममें से वे सब जो अपने बाह्य एवं आँतरिक शत्रुओं के विरुद्ध संघर्ष करने से कतराते हैं, वस्तुतः ऐसे ही व्यक्ति धिक्कारने योग्य हैं।
जो लोग अपनी जिन्दगी को चैन और शाँति से काट लेने की बात सोचते हैं, वस्तुतः वे बहुत भोले हैं। संघर्ष के बाद विजयी होने के पश्चात् ही शाँति मिल सकती है। जीवन-निर्माण का धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र के रूप में हुआ है। यहाँ दोनों सेनाएँ एक-दूसरे के सम्मुख अड़ी खड़ी हैं। देवासुर संग्राम का बिगुल यहीं बज रहा है। ऐसी स्थिति में किसी योद्धा को लड़ने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं मिल सकता। सावधान सेनापति की तरह हमें भी अपने अंतर-बाह्य दोनों क्षेत्रों में मजबूत मोर्चाबंदी करनी चाहिए। गाँडीव पर प्रत्यंचा चढ़ाने और पाँचजन्य बजाने के सिवाय और किसी प्रकार हमारा उद्धार नहीं।
लोग उसे एक गंदे, उपेक्षित और हास्यास्पद लड़के के रूप में जानते थे। एक दिन उसने बताया कि बादशाह को उसकी जरूरत है। इस पर लोग हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए। भला बादशाह इस निकम्मे लड़के का क्या करेंगे?
उसके माता-पिता बेहद गरीब किसान थे। जीवनयापन के लिए उन्हें मुँह-अँधेरे उठकर काम शुरू करना पड़ता था और शाम ढलने तक वे काम में जुटे रहते थे। रॉबर्ट निक्सन उनका इकलौता बेटा था। शक्ल-सूरत से वह निरा मूर्ख नजर आता था, जिस पर वह दिन भर उलटी-सीधी शरारतें करता घूमता। चेशायर नगर के ब्रिज हाउस क्षेत्र में उसे इसी रूप में जाना जाता था। जब उसे पढ़ने के लिए स्कूल में दाखिल कराया गया तो कुछ ही दिनों में शिक्षकों के साथ-साथ उसके माता-पिता भी समझ गए कि वह निरा घामड़ है। अतः उसे स्कूल से हटाकर खेत में ही काम पर लगा दिया गया।
सन् 1485 की बात है, बोसपर्थ के रणक्षेत्र में ब्रिटेन का भाग्य दाँव पर लगा हुआ था। रिचमाँड के अर्ल हेनरी के नेतृत्व में राजा रिचर्ड की सेना को आगे बढ़ने से रोक दिया गया था और वह रणक्षेत्र से मीलों दूर रह गई थी। इसी जगह पर एक खेत में मूर्ख समझा जाने वाला यह रॉबर्ट निक्सन हल चला रहा था। अचानक वह हल की नोंक से बने गड्ढे को देखकर रुक गया। उसने उस गड्ढे को लकड़ी से खोद डाला। फिर सिर नीचा किए उसके सामने खड़ा हो गया। उसके बाद अचानक वह हवा में हाथ हिला-हिलाकर और उछल-उछलकर चिल्लाने लगा। खेत के निरीक्षक ने उसे देखा और तुरन्त उसके पास पहुँचा, ताकि इस प्रकार वक्त बरबाद करने से रोके और काम करने का आदेश दे।
लेकिन वह उससे कुछ दूर ही रुक गया। उसने देखा, रॉबर्ट पागलों जैसी हरकतें कर रहा है। उसकी आँखें आश्चर्यजनक रूप से फटी हुई है। उसके एक हाथ में हल खींचने वाले जानवर का हाँकने के लिए चाबुक था। उसने वह चाबुक हवा में लहराया और चीखा, वह है रिचर्ड!...वह!......वह!....अब। फिर वह कुछ पल रुककर बोला-उठो हेनरी! अपने शस्त्रास्त्रों सहित उठो! बाधा पार करो युद्ध जीत लिया लिया गया है” फिर वह वहाँ कुछ देर के लिए जड़वत् खड़ा हो गया फिर मुस्कराने लगा। जब उसकी नजर खेत के निरीक्षक पर पड़ी जो उससे कुछ ही दूर पर खड़ा उसकी हरकतें देख रहा था। उसने निरीक्षक से कहा- “युद्ध समाप्त हो गया है। हेनरी की विजय हुई है।” इतना कहकर वह इस प्रकार अपने काम में लग गया जैसे कुछ हुआ ही न हो।
इसके बाद तो रॉबर्ट निक्सन ने अनेक भविष्यवाणियाँ कीं और वे सभी सच साबित हुई हैं। उसने बताया कि खेतों के मालिक अर्थात् उसके स्वामी के परिवार के एक सदस्य की मृत्यु नजदीक के एक गाँव में होने वाले अग्निकांड में हो जाएगी। यह भविष्यवाणी पूर्णतः सही सिद्ध हुई। एक बार उसने बताया कि दो सप्ताह के बाद भयानक तूफान आएगा और हेनरी तथा रिचर्ड बोसपर्थ के मैदान में युद्ध करेंगे। फिर उसने बताया कि इस युद्ध में रिचर्ड की पराजय हो जाएगी। इस भविष्यवाणी के दो ही दिनों बाद सूचना मिली कि हेनरी सप्तम सिंहासनारूढ़ हो रहे हैं। लेकिन इस संदेश को लेकर जो लोग गाँव आए थे, वे यह देखकर आश्चर्य में पड़ गए कि गाँव के लोग इस समाचार के बारे में पहले से ही जानते हैं और उन्हें इसकी पूर्व सूचना देने वाला व्यक्ति रॉबर्ट निक्सन है।
उड़ते-उड़ते यह खबर सम्राट हेनरी के कानों तक पहुँची कि ‘ओवर’ नामक गाँव में एक विचित्र व्यक्ति ईश्वरीय शक्तियों के माध्यम से जानकारी प्राप्त करता है और गाँव के लोग उसकी विचित्र घोषणाओं पर आश्चर्यचकित है। उसने गाँव के लोगों को बताया कि राजमहल के कुछ लोग उसे लेने के लिए आ रहे हैं और राजमहल में उसे भूख के कारण मरने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। आखिर वह दिन आ गया, जब सम्राट ने सचमुच ही उसे बुलावा भेजा।
जब रॉबर्ट निक्सन राजमहल में पहुँचा तो उसने देखा कि सम्राट हेनरी उसे शक के नजर से देख रहे हैं। वह सोचने लगा कि बेकार ही उसे बुलावा भेजा। हेनरी ने उसकी परीक्षा के लिए अपनी अँगूठी छिपा ली और पूछा बताओ मेरी अंगूठी कहाँ है? रॉबर्ट निक्सन ने एक बार हेनरी की ओर घर कर देखा और फिर बोला- “महोदय, अँगूठी कहीं खोई नहीं है। जिसने इसे छिपाया हुआ है, वही इसका पता भी पूछ रहा है।”
निक्सन का उत्तर सुनकर सम्राट को प्रसन्नता हुई। उन्होंने आदेश दिया कि इस लड़के के साथ चौबीस घंटे एक मुंशी रहना चाहिए, जो इसकी भविष्यवाणियों को लेखा-जोखा रखेगा। तदनुसार मुंशी नियुक्त किया गया और एक अपनी ही भविष्यवाणी के अनुसार वह राजमहल में समय पर भोजन न मिलने के कारण भूख से मर गया। रॉबर्ट निक्सन की भविष्यवाणियों के लेख-जोखे के अनुसार सन् 2000 के आस-पास विश्वव्यापी सामरिक उपद्रव होंगे तथा अनेक प्रलयंकारी प्राकृतिक प्रकोप होंगे। धीरे-धीरे इक्कीसवीं सदी में दुनिया शाँति एवं समृद्धि की ओर गतिशील होगी। भारतवर्ष अपनी आध्यात्मिक क्षमताओं के द्वारा समूचे विश्व का नेतृत्व करेगा और मानवता एक नए ‘एफ ऑफ टूथ’ का सौभाग्य प्राप्त करेगी।
स्वप्न क्या हैं? लंबे समय से इस पर शोध-अनुसंधान होते रहें पर अभी तक इस बात के अकाट्य प्रमाण नहीं मिले हैं कि यह रात्रि का भटकाव मात्र नहीं, लोकान्तर यात्रा भी है।
मनः शास्त्रियों का कथन है कि स्वप्न मनुष्य मात्र का एक साधारण स्वप्न मनुष्य मात्र का एक साधारण अनुभव है। उसमें जो चित्र-विचित्र दृश्य, अनूठे स्थल एवं अदृश्य दर्शन होते हैं, वह यथार्थ में कोई वास्तविक लोक की अनुभूति नहीं, मन की कल्पना भर है। यह संभव है कि उसमें जो वस्तु दिखाई पड़े, वे सामान्य जगत से एकदम भिन्न, अज्ञात और अपरिचित जैसे हों। यह भी शक्य है कि हम रहने वाले किसी देश के हों और स्वप्न में निवास किसी और देश में करते प्रतीत हों। संक्षेप में, जो घटनाएँ दुनिया में असंभव और पहुँच से बाहर हो सकती हैं, स्वप्न में वे सब घटित हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक बातें ऐसी होती हैं, जिनका आधार संसार में नहीं है।
जब से मनुष्य की सृष्टि हुई, तभी से मानव मन में स्वप्न के संस्कार प्रविष्ट हुए। तभी से विचार मूर्त रूप धारण करते रहे। संस्कारों से कल्पना तथा कल्पना से स्वप्नों का ताना-बाना विनिर्मित हुआ। जिस प्रकार अनादिकाल से जन्म-मरण का चक्र चलता रहा, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को सुषुप्तावस्था में तभी से सपने का ज्ञान होता रहा।
जाग्रत अवस्था में हम जो-जो दृश्य देखते हैं, उनकी आकृतियाँ हमारे मानस-पटल पर अंकित हो जाती हैं। वे रेखाएँ कई बार अत्यंत क्षीण होती हैं और कुछ समय पश्चात् विनष्ट हो जाती हैं, किन्तु कभी-कभी ये मनः चित्र इतने सबल होते है कि सरलता से मिट नहीं पाते। यह भेद मन की आसक्ति के अनुसार होता है। जिन तत्वों में मन की विशेष रुचि है, जिसमें वह रमण करता है, जिन जिन चीजों का हमें अधिक शौक है, उनकी रेखाएँ मानस पटल पर गहरी अंकित होती है और जीवनपर्यन्त बनी रहती हैं। इसी से स्वप्नावस्था में हमें वे दृश्य दृष्टिगोचर होते है, जो बचपन में हमने देखे थे।
किन्तु सपनों का एक अन्य कारण नींद के समय की परिस्थितियाँ, वातावरण तथा स्थान भी हैं। मानसिक दृश्यों को यह भी वैसी ही सहजता है और सरलता से गढ़ते-बनाते हैं, जैसी कि पूर्व स्मृतियाँ। आधुनिक मनोविज्ञान ने स्वप्न के इस पक्ष पर पर्याप्त प्रकाश डाला और कहा कि सोते समय शरीर में जिस प्रकार की उत्तेजना उत्पन्न होती है, स्वप्न भी तदनुरूप होते हैं। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति सुन्दर-स्वच्छ वस्त्र पहनकर साफ बिस्तर पर स्वच्छ हवादार कमरे में सोता है, तो स्वप्न प्रायः अच्छे दिखलाई देते हैं। इसके विपरीत जब हम किसी गंदे, बदबूदार कमरे में सोते हैं, तो अक्सर स्वप्न अप्रिय आते हैं। अधिक कसे हुए या चुभने वाले कपड़ों का बड़ा भयंकर प्रभाव पड़ता है। ऐसे व्यक्ति को स्वप्न में यह अनुभव हो सकता है जैसे वह काँटों में फेंक दिया गया हो, शरीर में कील ठोंककर प्राण लिए जा रहे हैं। इत्यादि। जो वस्त्र अधिक कसा हुआ होगा, वह अंग ऐसा मालूम पड़ेगा, जैसे उसे काटा जा रहा हो या काटने का उपक्रम चल रहा हो, जबकि खिड़की रहित बंद कमरे में सोने से गैसचैंबर में पड़े होने, दम घुटने अथवा स्वयं का गला घोटे जाने जैसे कटु अनुभव हो सकते हैं।
ये मनोवैज्ञानिकों द्वारा गहन अध्ययन और विश्लेषण के उपरान्त निकाले गए निष्कर्ष हैं। जे.जे.मायर ने अपनी पुस्तक ‘माइंड एंड मैटर’ में ऐसे अनेक स्वप्नों का उल्लेख किया है, जिसमें उनका निमित्त विशुद्ध रूप से शारीरिक था।
ऐसे ही एक स्वप्न की चर्चा करते हुए वे लिखते हैं कि मारिया नामक एक स्त्री को एक बार यह स्वप्न दिखा जैसे कोई उसके गले को जोर से दबा रहा हो। उसने चिल्लाने की कोशिश की, पर चीख न निकली। भयंकर यंत्रणा जैसी स्थिति में नींद में वह इधर-उधर हिलती-डुलती रही, किन्तु उस त्रास से मुक्ति न पा सकी। अचानक वह उठ बैठी, तो देखती है कि उसके गले का आभूषण वस्त्रों में फँसकर श्वसन क्रिया में अड़चन पैदा कर रहा है। वह यह देखकर हैरान रह गई कि इस प्रकार का बाह्य कारक भी स्वप्न में गला घोटने जैसा दृश्य उपस्थित कर सकता है।
एक अन्य स्वप्न में एंसल बाउर्ने नामक एक व्यक्ति को स्वप्न दिखा कि कोई उसका दांया पाँव काट रहा है। वह इससे बचाव के लिए जद्दोजहद करने लगा। सामने वाला व्यक्ति अधिक मजबूत था, इसलिए वह बाउर्ने पर भारी पड़ रहा था। फिर भी उसने प्रयास में कोई कभी न की। जोर लगाकर दायें पैर को इतना तेज झटका दिया कि वह उससे मुक्त हो गया, लेकिन इसके साथ ही उसकी वह टाँग पलंग के पायताने से जा टकरायी। वह दर्द से तड़प उठा। इसके बाद उसकी नींद खुल गई। उसने देखा कि उसका उक्त पाँव बिलकुल ठीक है, सिर्फ उसमें तलवे से घुटने तक पट्टी बंधी हुई है। अब उसे याद आया कि सोने से पूर्व उसके पैर में तेज दर्द हो रहा था। उससे राहत पाने के लिए उसने वह पट्टी बाँध ली थी, जिससे उसे आराम भी मिला था, पर बाद में उसको खोलना भूल गया और उसे नींद आ गई। कसकर लिपटी पट्टी के लिए मन ने एक काल्पनिक दृश्य गढ़ा और उसके कटने की जीवंत प्रतिमा उपस्थित की।
अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि वाह्य ध्वनियाँ निद्रा में व्यवधान पैदा करती हैं। व्यक्ति जहाँ पर सो रहा हो, यदि वह शाँत-एकांत स्थान हो, तो नींद प्रायः बिना किसी व्यतिरेक के पूरी हो जाती है, किन्तु वहाँ कोलाहल हो रहा है, संगीत बज रहा हो, तीक्ष्ण और कर्णकटु ध्वनियाँ उत्पन्न हो रही हों, तो नींद में एक विक्षेप पैदा होता है और ध्वनिभेद के हिसाब से सपने आने लगते हैं। ध्वनि कर्कश हो, तो सपने बुरे दिखलाई पड़ते हैं, लेकिन सुमधुर संगीत बज रहा है तो सपने बड़े मधुर और मीठे होते हैं। अनुसंधानों के दौरान यह भी देखा गया है कि सोते हुओं से कही गई बातें स्वप्न बनकर प्रकट होती हैं। इस आधार पर विज्ञानवेत्ता अब यह दावा करने लगे हैं कि इस प्रक्रिया द्वारा उच्छृंखल आचरण और बुरे व्यवहार को आसानी से बदला और सुधारा जा सकता है। वे कहते है। कि यदि किसी की बुरी आदतें बदलनी हों, तो निद्रावस्था में उसे ऐसे संकेत और सुझाव देने चाहिए, जो उसके चरित्र- सुधार में अभीष्ट हों। इसके लिए व्यक्ति को उसके सिरहाने बैठना चाहिए और उन-उन शब्दों और वाक्यों को बार-बार दुहराना चाहिए, जिन्हें उसके व्यक्तित्व में प्रवेश कराना हो। ऐसा करने पर उसका अव्यक्त मन उसे ग्रहण करने लगता है, किंतु इसके लिए केवल यांत्रिक प्रक्रिया भर पर्याप्त नहीं है। पूर्ण श्रद्धा और विश्वासपूर्वक अपनाया गया उपक्रम ही प्रभावकारी सिद्ध होता है। अनास्थापूर्वक एवं कठोरता से कहे गए वचनों का कोई असर नहीं पड़ता है। यह वास्तव में उस प्रक्रिया का ही विपर्यय है, जिसमें मनोवेत्ता यह कहते हैं कि स्वप्न वस्तुतः दमित इच्छाओं का परिणाम है। उनके अनुसार जो अभिलाषाएँ अपूर्ण और अतृप्त रह जाती हैं, वे अचेतन मन में दबी पड़ी रहती हैं और नींद के दौरान नानाप्रकार के रूपाकार ग्रहण कर प्रकट- होती रहती है। मनः चेतना चूँकि विराट न का ही एक हिस्सा है, अतः सोए हुए व्यक्ति के समक्ष जब कोई सुझाव या संकेत दिया जाता है, तो अप्रकट मन उसे तरह-तरह के दृश्यों के रूप में संजोने लगता और बाद में वह उसका अंग बन जाता है। इससे उसका व्यक्तित्व प्रभावित और परिवर्तित होने लगता है। इस दृष्टि से स्वप्न देखना बुरा नहीं, अच्छा ही है।
सुषुप्तावस्था में शरीर को मिलने वाले कष्ट विविध प्रकार के सपनों में परिणत हो जाते हैं। ऐसा पाया गया है कि यदि सोते हुए व्यक्ति को सुई चुभोयी जाए, तो स्वप्न में उसे भाले चुभते हुए दीख सकते हैं। यदि गरमी लग रही हो, तो ऐसा अनुभव हो सकता है, जैसे भट्टी में तपाया जा रहा हो। जब पलंग झोलदार एवं ढीला हो, तो ऐसा मालूम पड़ सकता है, मानो ऊपर पेड़ से लटकाया गया हो। सोते समय यदि ठंड मालूम पड़े, तो ऐसा प्रतीत होगा जैसे हिमालय की चोटी पर पड़े हुए बर्फ में गलाया जा रहा हो या ठंडे पानी की समुद्र में गोते लगा रहे हों। मुँह पर पानी के छींटे देेने से बरसात का भ्रम हो सकता है। कोई सुगंधित वस्तु निकट होने से पुष्पोद्यान में टहलने की प्रतीति संभव है। इसी प्रकार किसी चिकनी वस्तु पर हाथ पड़ने से साँप की अनुभूति हो सकती है।
जिस प्रकार बाह्य उद्दीपनों से मन तरह-तरह के तदनुरूप चित्र गढ़ लेता है, उसी प्रकार अब स्वप्न-चित्रों के आधार पर मनोवेत्ता उसके पीछे के तथ्य, रोग निमित्त कारण एवं भविष्य में घटने वाली घटनाओं का अनुमान लगाने लगे हैं।
मूर्धन्य मनः शास्त्री जे.जे. जिलेस्पी ने अपने ग्रंथ ‘दि ड्रीम पॉवर’ में स्वप्न विश्लेषण के आधार पर कारणों की तह तक पहुँचने की कोशिश की है। इस क्रम में ऐसे कितने ही सपनों का उन्होंने ऐसे कितने ही सपनों का उन्होंने ऐसा सटीक अनुमान लगाया, जो बाद में सत्य साबित हुए।
एक स्वप्न का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं कि वेरा जाजुलिक नामक एक महिला अक्सर यह स्वप्न देखती थी कि वह अपने दाँत पत्थर से तोड़ रही है। बार-बार एक ही स्वप्न देखने से वह भयभीत ही उठी और निकट भविष्य में किसी अनिष्ट की आशंका का अनुमान लगाने लगी। जब वह इसके विश्लेषण के लिए लेखक के पास पहुँची, तो उसने उसके गहन मनोविश्लेषण के आधार पर अनुमान लगाया कि असावधानी वश कोई ऐसी दुर्घटना हो सकती है, जिसमें अंग-भंग हो जाए और शायद वह इतना गंभीर हो कि उक्त अंग को काटना पड़े। लगभग दो महीने बाद जब वह स्नान कर रही थी, तो फिसल गई, जिससे बायें पैर की हड्डी चकनाचूर हो गई, जिसके कारण अंत में उसे काटना पड़ गया। इस प्रकार वह स्वप्न-विश्लेषण पूर्वानुमान के रूप में अंततः सही प्रमाणित हुआ।
ऐसे भविष्य सूचक स्वप्नों के अतिरिक्त कितने ही स्वप्न ऐसे होते हैं, जिनमें व्यक्ति सोते हुए में ही स्वप्न ही प्रतिक्रिया स्वरूप ऐसी भूलें कर बैठता है, जो अत्यन्त दुखदायी होती हैं और जिनके लिए बाद में पछताना पड़ता या मौत को गले लगाना पड़ता है।
बात उन दिनों की है, जब अमेरिका में स्वतंत्रता के लिये युद्ध चल रहा था। दिन भार सिपाहियों को लड़ना पड़ता था। शत्रु कब आ जाए और कब उनका काम तमाम हो जाए, यह भय प्रत्येक को अस्थिर एवं विक्षुब्ध रखता था। इसी युद्ध की एक रात्रि में मेलिंग टिब्लेरी नामक एक सैनिक को स्वप्न हुआ कि शत्रु पक्ष का एक सिपाही उसका पीछा कर रहा है। वह भाग रहा है। भागते-भागते वह एक स्थान पर आ गया, जहाँ सामने एक नदी बह रही थी। वह भाग न सका। अतः उसने नींद में अपने तकिए के नीचे से रिवाल्वर निकाला और एकदम शत्रु पर फायर कर दिया। उसे ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे निशाना ठीक लगा हो रिवाल्वर की आवाज से नींद खुली, जो रिवाल्वर की आवाज से नींद खुली, तो उसे ज्ञात हुआ कि उसने सोती हुई अपनी स्त्री को मार डाला है और वह पलंग पर तड़प रही है। उसके होश उड़ गए। अन्य कोई मार्ग न देख उसने स्वयं भी आत्महत्या कर ली।
ऐसे ही एक अन्य स्वप्न में मोरिस हाल्बवाच नामक एक फ्राँसीसी को, जो कि ट्रेन में सवार पेरिस जा रहा था, स्वप्न दिखाई पड़ा कि गाड़ी प्लेटफार्म पर खड़ी है एवं यात्रीगण उतर रहे हैं। उसने देखा कि एक व्यक्ति उसका कीमती सामानों से भरा सूटकेस उठाकर ले जा रहा है। भीड़-भाड़ अधिक थी, इसलिए वह जल्दी उतर नहीं सका। उसने छलाँग लगाई और उसे धर दबोचा एवं ताबड़तोड़ कई शक्तिशाली घूँसे जड़ दिए। तभी उसका सिर ट्रेन की दीवार से टकरा गया। वह पीड़ा से कराह उठा। उसकी आँखें खुली, तो देखा कि उसने बगल की सीट पर सोए व्यक्ति को मार मारकर लहू-लुहान कर दिया है। उसका सूटकेस यथास्थान सुरक्षित पड़ा हुआ है। उसे गलती की अहसास हुआ और उससे क्षमा याचना करने लगा। यात्रियों ने पकड़कर उसे पुलिस के हवाले कर दिया।
स्वप्न न तो अतींद्रिय अनुभूति जैसी कोई अवस्था है, न लोकान्तर गमन जैसी बात। सच तो यह है कि ये अवचेतन मन के सृजन हैं। इनमें सदैव कोई तथ्य होता है, यह बात असत्य है। हाँ, कई बार भविष्य सूचक दृश्य इनके माध्यम से अवश्य अभिव्यक्त हो जाते हैं। इन्हें यदि छोड़ दिया जाए, तो यह सिर्फ मन की उड़ान भर है, किन्तु इनको नितांत निरर्थक भी नहीं कहा जा सकता। सपने को यदि नियमित रूप से लिपिबद्ध किया जाता रहे, तो उससे आदमी के व्यक्तित्व के बारे में काफी कुछ अंदाज लगाया जा सकता है और यह जाना जा सकता है कि उसकी इच्छाएँ, आकांक्षाएँ, भावनाएँ, आस्थाएँ और मान्यताएँ कैसी हैं? उन्हें शोधित-परिष्कृत कर व्यक्तित्व को गढ़ा-ढाला जा सकता है। इस दृष्टि से स्वप्न उपयोगी हैं और महत्वपूर्ण भी-ऐसा मनोविज्ञान के आचार्यों का मत है।
राष्ट्र की सुरक्षा
हमारे सामने राष्ट्र की सुरक्षा का प्रश्न खड़ा हुआ है। उसे हल करने के लिए प्रगति और शक्ति चाहिए। इन दोनों का आधार है- भावनाओं का जागरण। साधन-सामग्री भी बढ़नी चाहिए, पर इसका सदुपयोग तो भावनाओं पर ही निर्भर है। सबल राष्ट्र की रचना के लिए उसके नागरिकों का सबल होना आवश्यक है। स्वास्थ्य, धन, विद्या, संगठन, शस्त्र आदि के माध्यम से राष्ट्र बलवान बनते हैं, पर इनकी उपलब्धि के लिए प्रखर मनोबल अनिवार्य है। हम इस मूलभूत तथ्य की उपेक्षा न करें। जनमानस की प्रसुप्त उत्कृष्ट भावनाओं को जगाने का प्रयत्न करें तो उसे आधार पर जाग्रत हुई शक्ति हमारी ही नहीं, सारी मनुष्य जाति की अगणित समस्याओं को हल कर सकती है। सुरक्षा समस्या को हल करना तो उस जनजाग्रति के लिए नितांत सरल और सहज है।
-राष्ट्र समर्थ और सशक्त कैसे बने (वांग्मय क्रः 64 पृ. 1.2)
नेरंजरा नदी के तट पर प्रसन्न मुख आसीन भगवान बुद्ध को देखने गई सुजाता बड़ी विस्मित हो रही थी कि यह सात दिन तक एक ही आसन पर कैसे बैठे रहे? तभी सामने से एक शव लिए जाते हुए कुछ व्यक्ति दिखाई दिये। उस शव को देखते ही भगवान बुद्ध हँसने लगे।
सुजाता से प्रश्न किया- “योगिराज! कल तो आप शव को देखकर दुखी हो जाते थे, आज वह दुख कहाँ चला गया?”
भगवान बुद्ध ने कहा-बालिके सुख-दुख मनुष्य की कल्पना मात्रा है। कल तक जड़ वस्तुओं में आसक्ति होने के कारण यह भय था कि कहीं यह न छूट जाए, वह न बिछुड़ जाए। यह भय ही दुख का कारण था, आज मैंने जान लिया कि जो जड़ है, उसका तो गुण ही परिवर्तनशील है, पर जिसके लिए दुख करते हैं वह तो न परिवर्तनशील है, न नाशवान्। अब तू ही बता-जो सनातन वस्तु पा ले, उसे नाशवान् वस्तुओं का क्या दुख?”
आत्मावलम्बन की उपेक्षा व्यक्ति को कहाँ-से-कहाँ पहुँचा देती है? इसके कई उदाहरण देखने में मिलते हैं। सद्गति का लक्ष्य समीप होते हुए भी वे अपने इस परम पुरुषार्थ ही अवहेलना कर पतन के गर्त में भी जा पहुँचते हैं। अहंकार की उत्पत्ति व उसका उद्धत प्रदर्शन इसी आत्मतत्त्व की उपेक्षा की फलश्रुति हैं।
अगस्त का महीना हर साल आता है और दूसरे महीनों की तरह ही बीत जाता है। सदा की तरह इस बार भी बीत जाएगा, किन्तु यह दूसरे महीनों जैसा केवल एक महीना नहीं है। यह महीना आता है, तो अपने साथ अनेक स्मृतियाँ भी लाता है। कुछ सुखद, कुछ दुखद, कुछ कटु, कुछ मधुर, कुछ पराक्रम की, कुछ पराजय की, कुछ खोने की तो कुछ गवाने की। इसी महीने में नौ अगस्त 1942 का क्राँति दिवस भी आता है, तो पंद्रह अगस्त के रूप में स्वतंत्रता का आनन्द दिवस और राष्ट्र विभाजन का दुखदायी प्रसंग भी। देश के महान क्राँतिकारी, भविष्य द्रष्टा और ऋषि श्री अरविन्द का जन्म मास भी यही है। इसी महीने की पंद्रह तारीख को उनका जन्म हुआ था। आजादी के इस महान योद्धा ने केवल भौतिक दासता से मुक्ति की लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि मानव चेतना को उसके चरम विकास तक ले जाकर अभौतिक और आध्यात्मिक प्रकाश में चिरंतन सत्य का साक्षात्कार करने-कराने के लिए साधना भी की। देशवासियों को उनके समग्र राष्ट्रीय कर्तव्य का बोध कराया था।
परंतु आज यह सब विस्मृतप्राय है। आज से प्रायः बावन साल पहले हमने विश्व के सबसे लंबे संघर्ष के बाद देश को विदेशी परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कराया था और साथ ही एक स्वावलंबी, स्वतंत्र एवं समृद्ध भारत का सपना देखा था, जिसमें किसी की आँखों में पीड़ा अभाव के आँसू न रहेगी, अन्याय शोषण के कुचक्र से सब मुक्त होंगे और अपने संपूर्ण स्वराज्य, पूर्ण स्वतंत्रता के आदर्श को साकार करेंगे। आधी सदी से दो साल अधिक बीत जाने के बाद भी देश आज जिस मोड़ पर खड़ा है, उसकी तस्वीर काफी भयावह है। विकास के नाम पर विषमता की खाई और गहरी हो गई है। आर्थिक स्वावलंबन तो कोसों दूर है। राजनीति सेवा की बजाय स्वार्थसिद्धि एवं शोषण का पर्याय बनी हुई है। भ्रष्टाचार तो जैसे समूची व्यवस्था का स्वीकृत अंग बन गया है। चहुँओर असहिष्णुता, जातीय विद्वेष, सांप्रदायिक हिंसा, अलगाववाद एवं अराजकता का साम्राज्य संव्याप्त है। नैतिकता-आदर्श सिद्धांत एवं जीवन मूल्यों के प्रति घोर उपेक्षा का भाव पनपा है। वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन में पतन की नए-नए प्रतिमान स्थापित हुए हैं। उदारीकरण के साथ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन एवं बढ़ते पाश्चात्य प्रभाव ने पतन-पराभव को परावलम्बनता के शिकंजे को और कस दिया है।
जनता को अधिकतम भागीदारी व हित-सुरक्षा एवं कल्याण के उद्देश्य से अपनायी गई लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत हम कहने के लिए विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने का गर्व कर सकते हैं, किन्तु इसका बढ़ता हुआ आँतरिक खोखलापन इसकी यथार्थता पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। 52 वर्षों में उपलब्धियों के नाम पर उद्योग, कला, साहित्य, सिनेमा, विज्ञान आदि विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियों के आँकड़े प्रस्तुत किये जा सकते हैं। परिवर्तनकारी कारकों में पिछड़ी जाति, दलित शक्ति का उभार, महिला शक्ति का जागरण आदि को स्वस्थ सामाजिक परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है। खुली अर्थनीति, तेजी से बढ़ते मध्यवर्ग के आधार पर आर्थिक मजबूती की बातें की जा सकती हैं, किन्तु गहराई से देखने पर स्थिति मूल रूप से चिंतनीय एवं भयावह बनी हुई हैं।
लोकतंत्र से जुड़ी सभी प्रणालियों का पलड़ा बहुत तेजी से बाहुबल धनबल संपन्न वर्ग के पक्ष में झुक गया है। जिस न्यायिक सक्रियता को हम उपलब्धि के बतौर मान सकते हैं, वह वास्तव में नव ताकतवर तबकों के एक दूसरे के प्रतिशोध लेने की प्रक्रिया के तहत हुआ है। सामान्यजन से इसका कोई ताल्लुक नहीं है। गरीबों के लिए न्याय दुर्लभ हो गा है, क्योंकि न्याय चेतना आज सौदे बाजी का हिस्सा हो गई है, जिसे वह खरीद नहीं सकता। जो न्याय का दरवाजा खटखटाते हैं, उन्हें कितना न्याय मिल पाता है, यह इसी बात से जाना जा सकता है कि ढाई करोड़ मुकदमें तो ऐसे हैं, जो पच्चीस वर्ष से विचाराधीन हैं। जिस सामाजिक चेतना में न्याय-व्यवस्था का हिस्सा न हो, ऐसे लोकतंत्र का अस्तित्व विचारणीय है।
आज वास्तव में हमारे सबसे बड़े लोकतंत्र का ढाँचा भी खड़ा है, इसकी आत्मा विदा हो गई है। वर्तमान में इसमें निर्णायक भूमिका निभाने वाली शक्ति राजनीति लोकसेवा की बजाए सत्ता लोलुपता एवं स्वार्थ-सिद्धि का साधन भर रह गयी है। जनसेवा की भावना, नैतिक आदर्शों से लगाव आदि इतिहास के पन्नों या मंचों पर भाषण अथवा बीते युगों की बातें हो गई है। इसमें सच्चरित्र वाले लोगों का अकाल पड़ता जा रहा है। इसका स्वरूप इतना भ्रष्ट व गंदा हो गया है कि समझदार लोग इसमें आने से डरते हैं। इसे दूर से भी छूने को राजी नहीं हैं। आज की राजनीति झूठे आश्वासन, खोखले नारे, संकीर्ण स्वार्थों व संकल्प हीनता का पर्याय बन गई है और लोकतंत्र भीड़ तंत्र में बदल गया है, जिसमें विवेकशीलता, नैतिकता व सिद्धांत परायणता का स्थान छल-प्रपंच भ्रष्टाचार और अराजकता ने ले लिया है।
नौकरशाही अपनी अक्षमता, लालफीताशाही और टालू प्रवृत्ति के लिए चर्चित है। प्रशासनिक व्यवस्था के असली प्रशासक ने तो जनता के प्रति उत्तरदायी हैं और न ही विधायिका के प्रति। विकास-प्रगति के नाम पर समृद्धि का जो रुपहला चित्र खींचा जाता है वह मुट्ठी भर लोगों का है, जो प्रमुखतः नगरों-महानगरों का भारत हो। जबकि देश का प्रतिनिधित्व करने वाली असली भारत दूर-दराज के गाँवों में बसता है, जहाँ अभी पानी, बिजली, प्राथमिक स्वास्थ्य एवं शिक्षा का प्रकाश पहुँचना बाकी है। वहाँ तो अभी भी गरीबी अशिक्षा, कुपोषण, बीमारी, बेरोजगारी को बोलबाला है। देश का साठ प्रतिशत भाग अभी शिक्षा-साक्षरता के प्रकाश से वंचित है और चालीस प्रतिशत अभी गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन के लिए मजबूर है। गरीबी हटाओ के नाम पर जो बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाई जाती हैं, ज्यादातर धन एवं सामग्री बिचौलिए चट कर जाते हैं और अंततः विकास की योजनाएँ पिछड़ेपन पर आकर समाप्त हो जातीं हैं।
देश के नीति-निर्धारक एवं बुद्धिजीवी वर्ग में गाँवों के प्रति कोई विशेष संवेदना नहीं हैं। देश भर में छपने वाले 2300 समाचार पत्रों में मात्र 7 प्रतिशत खबरें हो गाँवों की दशा-दिशा एवं समस्याओं पर छपती है। असली भारत की घोर उपेक्षा की स्थिति में देश की स्वतंत्रता, विकास एवं प्रगति की कल्पना आधी-अधूरी ही रह जाती है। आर्थिक स्वतंत्रता के समय देखा गया था, वह कभी का आँखों से उड़ गया है। इसका स्पष्ट संकेत भारत का आर्थिक चुनौती भरे विश्व में हिस्सेदारी के प्रतिशत में देखा जा सकता है, जो कि बहुत मामूली सा है। स्वतंत्रता के बाद और औद्योगिक कृषि, वैज्ञानिक जैसे तमाम क्षेत्रों में विकास की बेहतर बुनियाद के बावजूद हम आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी नहीं हो पाए।
हमारी दैन्य-दरिद्रता की इस स्थिति को बरकरार रखने में हमारी आरामतलबी अकर्मण्यता का भी बड़ा हाथ है। संसार के सभी विकसित देश कार्य-संस्कृति के बल पर ही आगे बढ़े हैं। जापान-जर्मनी जैसे देशों ने हमारे साथ ही प्रगति की यात्रा प्रारंभ की थी और आज वे विश्व के सुदृढ़तम देशों में से हैं। जबकि द्वितीय विश्वयुद्ध में ये पूरी तरह से तबाह हो गए थे। अपनी लगन, अथक श्रम, अनावश्यक आवश्यक के प्रति अरुचि व दृढ़ संकल्प के आधार पर ही इन देशों ने राख के ढेर से अपने देश का पुनर्निर्माण किया।
अपने देश में कार्य-संस्कृति की जगह छुट्टी संस्कृति जोर पकड़ती जो रही है। इस समय देश में 22 सार्वजनिक अवकाश हैं। शनिवार व रविवार मिलाकर 104 अवकाश दिवस होते हैं। सार्वजनिक अवकाश के साथ-साथ हर राज्य में स्थानीय त्योहार और जयन्ती के अवसर पर 7-8 छुट्टियाँ अलग होती हैं। कुल मिलाकर 30 सार्वजनिक अवकाश दिवस हर राज्य में प्रतिवर्ष होते हैं। एक सरकारी कर्मचारी औसतन साढ़े चार माह अवकाश पर रहता है। आकस्मिक चिकित्सकीय, अवकाश यदाकदा होने वाले बंद हड़ताल एवं राष्ट्रीय शोक के अवसर इसमें और वृद्धि कर देते हैं। इस तरह छह-छह माह तक यहाँ छुट्टियाँ रहती हैं और शेष छह माह की काम होता है। इन बावन वर्षों में कार्य संस्कृति का विकास न होना “काम है हराम, काम से अधिक दाम” की विकृत सोच का पनपना राष्ट्रीय शर्म और दुर्भाग्य का विषय बन गया है।
आरामतलबी के साथ उपभोग की लालसा में इन दिनों बेतहाशा वृद्धि हो रही है। उदारीकरण के बाद यह भोगवादी प्रवाह और ज्यादा प्रबल हुआ है। टी.वी. फिल्मों एवं अन्य संचार माध्यमों में इसके अश्लील, कुत्सित एवं भोंडे प्रदर्शन के नंगे नाच की आँधी उमड़ पड़ी हैं, जिसके घातक प्रभाव से नर-नारी युवा बच्चे कोई भी नहीं बचा है। बढ़ती हिंसा, अपराध आत्महत्या बलात्कार की घटनाएँ बहुत कुछ इसी से प्रेरित एवं प्रभावित हैं। यहीं से बच्चों को हिंसा के बीच संस्कार के रूप में मिल रहे हैं। बहुसंख्यक युवक अपने साँस्कृतिक गौरव एवं राष्ट्रीय कर्तव्य के प्रति किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में हैं।
राष्ट्र के इस आँतरिक खोखलेपन का फायदा उठाने की फिराक विदेशी शक्तियों को हर हमेशा लगी रहती है। एक तरफ वे भोगवाद की लालसा की उत्तेजना पनपा कर भारतीय बाजारों पर बाजारों पर कब्जा करती जा रही है। दूसरी ओर वे राष्ट्रीय प्रतिभाओं को लोभ-लालच भरे आमंत्रण देकर उन्हें राष्ट्रमाता की सेवा से विमुख कर रही है। बात इतने तक ही सीमित नहीं है। विदेशी हथकंडों के अन्य पहलू भी हैं, जो कहीं अधिक घिनौने और अमानवीय हैं। आतंकवाद को प्रश्रय इसमें महत्वपूर्ण है। विकसित देशों के प्रश्रय से पनपने वाले पड़ोसी देश आतंकवादियों के द्वारा तोड़-फोड़ घुसपैठ, विस्फोट कराकर ही संतुष्ट नहीं होते, यहाँ की युवा पीढ़ी को गुमराह करने के लिए तरह-तरह के नशों का मकड़जाल भी फैलाते हैं।
राष्ट्रीय कर्तव्य के प्रति हमारी उदासीनता, उपेक्षा से पनपी हमारी आंतरिक अस्थिरता एवं दुर्बलता की स्थिति को परखकर विद्वेष ग्रस्त हो, हमारे छोटे-से पड़ोसी देश ने हमारी सीमाओं में सशस्त्र घुसपैठ कर हमारी स्वतंत्रता व गौरव की चुनौती दे डाली, जिसका सामना हमारे वीर सैनिक अप्रतिम शौर्य व दृढ़ता के साथ कर रहे हैं-विश्व की दुर्गमतम बर्फीली पहाड़ियों में घोर विषम स्थिति में, अपने प्राण हथेली पर रखकर दुश्मनों को खदेड़ रहे हैं और देश के आन-मान व स्वतंत्रता के प्रति हमें आश्वस्त कर रहे हैं। उनमें से हर एक के हृदय में यही ध्वनि गूँज रही है-
तन समर्पित मन समर्पित, रक्त का कण-कण समर्पित सोचता हूँ मातृ भू कुछ और भी दूँ।
इस दोहरे संकट के क्षणों, जब हमारे वीर जवान देश की रक्षा के लिए प्राणों की बाजों लगाकर मोर्चे पर डटे हुए हैं, हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य बनता है है कि हम राष्ट्रनिर्माण के आँतरिक मोर्चे पर उसी कर्मठता, साहस एवं आत्म बलिदानी समर्पण भाव से डटे। यही देश की खातिर पर मिट रहे वीर शहीदों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
ध्यान रहे, जब महाभारत का वक्त होता है तो अपने पराए की परिभाषा बदल जाती है। राष्ट्र की सुरक्षा, सत्य एवं सत्ता-स्वार्थ के बीच द्वंद्व और द्विविधा शुरू हो जाती है। युद्ध का आधार मूल्यनिष्ठा, सत्यनिष्ठा एवं जनहित होता है तो राष्ट्रधर्म की विजय निश्चित होती है। हमें अपने स्थान पर रहते हुए राष्ट्रीय कर्तव्य का यह अनोखा संग्राम लड़ना है। अपने सर्वस्व की आहुति देकर उन मूल्यों की सुरक्षा एवं प्रतिष्ठा करनी है, जो हमारी स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखें। आज के दौर में जो पलायनवादी होंगे जाति क्षेत्र के आधार पर जो राष्ट्र विरोधी गतिविधि अपनाने वालों को अपना समझेंगे-काल कृष्ण उन्हें क्षमा नहीं करेगा।
देश का निर्माण और राष्ट्र का विकास आलस्य से नहीं, सपनों के तानों–बानों से नहीं वरन् संकल्पों श्रम एवं साधन से होता है। आज के दौर में यही हमारा सर्वोपरि राष्ट्रीय कर्तव्य है। इसके लिए हम अपना एवं अपनों का सर्वस्व दे डालने के लिए तत्पर हो सकें, तो ईसा की इक्कीसवीं सदी के भारत का मानचित्र भारत की साँस्कृतिक चेतना और उसके सामाजिक स्वरूप का निर्धारण करेगा और साथ ही यह भी कि भारत भीख व दया पर आधारित दयनीय रूप में नहीं रहेगा, बल्कि इसकी स्वतंत्र चेतना एक परम तेजस्वी और आत्मगौरव से पूर्ण सबल-समर्थ राष्ट्र के रूप में स्वयं को प्रकट करेगी।
चमत्कार दुनिया देखेगी
जब आवेश की ऋतु आती है, तो जटायु जैसी जीर्ण-शीर्ण भी रावण जैसे महायोद्धा के साथ निर्भय होकर लड़ पड़ता है। गिलहरी श्रद्धामय श्रमदान देने लगती है और सर्वथा निर्धन शबरी अपने संचित बेरों के देने के लिए भावविभोर होती है। सुदामा को भी तो अपनी चावल की पोटली समर्पित करने में संकोच बाधक नहीं हुआ था। यह अदृश्य में लहराता दैवी प्रवाह है, जो नवसृजन के देवता की झोली में समयदान, अंशदान ही नहीं, अधिक साहस जुटाकर हरिश्चंद्र की तरह अपना राजपाट और निज का, स्त्री बच्चों का शरीर तक बेचने में आगा पीछा नहीं सोचता। दैवी-आवेश जिस पर भी आता है, उसे बढ़ चढ़कर आदर्शों के लिए समर्पण कर गुजरे बिना चैन नहीं पड़ता। यही है महाकाल की वह अदृश्य अग्निशिखा, जो चर्मचक्षुओं से तो नहीं देखी जा सकती है, पर हर जीवंत व्यक्ति से समय की पुकार कुछ महत्वपूर्ण पुरुषार्थ कराए बिना छोड़ने वाली नहीं हैं।
-राष्ट्र समर्थ सशक्त कैसे बने (वांग्मय क्र. 64 पृ. 1.40)
ऋषि धौम्य ने नवागत शिष्य आरुणि की प्रथम दिन ही कठोर परीक्षा ली। उसी दिन मूसलाधार बारिश हो रही थी। गुरु ने शिष्य से कहा-बेटा आरुणि! बारिश में कहीं खेत की मेंड़ टूट न गई हो। सब पानी निकल जायेगा। तुम जाओ और देखो तो जरा। मेंड़ टूट गई हो तो बाँध आना।
आरुणि तत्काल उठा। सचमुच खेत की मेंड़ टूट गई थी। पानी का बहाव तेज था। सब उपाय कर देखे, परंतु मेंड़ रुकी नहीं। अब कोई उपाय न देख आरुणि स्वयं उस स्थान पर लेट गया। इस प्रकार पानी के रोके रहने में उसे सफलता मिल गई।
बहुत रात बीतने तक भी वह वहीं लेटा रहा। आश्रम न लौटा तो ऋषि को चिंता हुई। वे उसे खोजने खेत पर चल दिए। देखा तो छात्र पानी को रोके मेंड़ के पास बेहोश पड़ा है। देखते ही गुरु की आँखें भी आई। उन्होंने शिष्य को कंधे पर उठाया तथा आश्रम की ओर चल दिए।
उपचार-परिचर्या के बाद आरुणि ठीक हुआ तो ऋषि ने अपने तपोबल के प्रभाव से उसे जीवन विद्या में पारंगत बना दिया।
शिष्य उपमन्यु को गायें चराते हुए अध्ययन करते रहने की आज्ञा दी। पर उसके भोजन का कुछ प्रबंध न किया और देखना चाहा कि देखें वह किस प्रकार अपना काम चलाता है। छात्र भिक्षा माँगकर भोजन करने लगा। वह भी न मिलने पर गौवों का दूध दुहकर अपना काम चलाने लगा।
धौम्य ने कहा-बेटा उपमन्यु! छात्र के लिए उचित है कि आश्रम के नियमों का पालन करें और गुरु की आज्ञा बिना कोई कार्य न करें। छात्र ने अपनी भूल स्वीकार की और कहा-भविष्य में भूखा रहना तो बात क्या है, प्राण जाने का अवसर आने पर भी आश्रम की व्यवस्था का पालन करूँगा। उसने कई दिन निराहार होकर बहुत दुर्बल हो जाने तक अपनी इस निष्ठा की संपदा कमा कर वह महान बना।
चेतना के विस्तार का सर्वसुलभ एवं सुगम उपाय क्या हो? इस सम्बन्ध में मनुष्य अति आरम्भ काल से ही सोचता-विचारता रहा है। वैदिक युग में सोचता-विचारता रहा है। वैदिक युग में सोमरस को इसका सरल विकल्प माना जाता था, जबकि वर्तमान समय में इसके लिए अनेक प्रकार के मादक द्रव्यों का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि मन सामान्य दशा से असाधारण अनुभूतियों के आयाम में पहुँच सके।
यहाँ विचारणीय प्रश्न यह है कि एल.एस.डी, स्तर के नशीले पदार्थ चेतना के विस्तार में सहायक है क्या? एवं इस अवस्था में मन जो कुछ अनुभव करता है, उसे क्या विस्तृत चेतना का परिमाण मान लिया जाये? योगविद्या के आचार्यों के मत है कि चेतना का विस्तार विशुद्ध रूप से एक एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। इस चरित्र, चिंतन, व्यवहार में पवित्रता और शुचिता के बिना उपलब्ध नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त वह रंग-बिरंगी सुखद प्रतीतियों तक ही सीमित नहीं, अतींद्रिय सामर्थ्य की महत्वपूर्ण आधार भी है। नशे की अर्धमूर्छा-अर्द्ध-तंद्रा स्थिति में जो कुछ भी अनुभव होते हैं, उसे इंद्रियातीत नहीं, इंद्रियजन्य कहना चाहिए। वह मन-मस्तिष्क का क्रिया व्यापार है, उसका कोई अतींद्रिय आधार नहीं।
चेतना के रहस्यमय स्तरों को प्राप्त करने की दिशा में मादक द्रव्यों का प्रयोग प्रारम्भ से ही विवाद का विषय रहा है और इस बारे में अक्सर यह सवाल उठाया जाता रहा है कि इससे होने वाले अनुभव वास्तविक ध्यान के अनुभव कहे जा सकते हैं क्या? तर्क शील लोगों का इस सम्बन्ध में कहना है कि भले ही ये अनुभव यथार्थ स्तर के न हों, पर उनसे उस तल की एक झाँकी तो प्राप्त की ही जा सकती है। जिससे कि तात्त्विक अनुभूति का अनुमान लगाया जा सके। यह अध्यात्म मार्ग के जिज्ञासुओं के लिए उपयोग सिद्ध हो सकता है। उनका यह कथन योगाभ्यासियों को अंधकूप में धकेलने के समान है, जहाँ से वे फिर कभी निकल ही न सके।
पदार्थ चेतना को प्रभावित करता है-यह सत्य है किन्तु वह उसके स्तर को ऊँचा उठाता है-इसमें कोई तथ्य नहीं। जो ऐसा नहीं मानते, वे वस्तुतः स्वयं भ्रमित हैं और दूसरों को दिग्भ्रांत करते हैं, अन्यथा यदि चेतना के उत्थान और विस्तार का इतना ही सरल तरीका रहा होता, तो योगी-यतियों को इतनी कष्टसाध्य प्रक्रिया से होकर गुजरने और तपपूर्ण जीवन बिताने के क्या आवश्यकता थी? फिर वे एल.एस.डी. की कुछ खुराक लेकर दिव्य अनुभूतियाँ न प्राप्त कर लेते! सच तो यह है कि ऐसे द्रव्य आत्मोन्नति के मार्ग में बाधक है। वास्तविक योगी इनके सेवन के प्रति इस पथ के पथिकों को सदैव सावधान करते और जागरूक रहने के लिए निर्देश करते हैं।
चेतना-विस्तारक तत्व के रूप में मादक द्रव्यों के सेवन की शुरुआत तब हुई, जब द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व और पश्चात् यूरोपीय समाज की अवस्था अत्यन्त दयनीय थी। सोच में उभरती आक्रामकता और गिरते मानवीय मूल्यों के कारण तत्कालीन समाज के प्रहरियों को यह चिंता सताने लगी कि कहीं ऐसा न हो कि संपूर्ण सभ्यता ही पतन के भयावह गर्त में समा जाए। इसके लिए बहुत सोच-विचारकर उन्होंने एल.एस.डी. समेत कुछ ऐसे नशीले पदार्थों की खोज की, जो सेवनकर्ता की मनोदशा में वाँछित परिवर्तन लाकर उन्हें अवांछनीय गतिविधियों से विमुख कर सकें। ऐसा करने के पीछे उनका उद्देश्य समाज को नशाखोर बनाना नहीं था। वे यह चाहते थे कि चाहे जैसे भी हो, वर्तमान दुरावस्था से समाज की चेतना के स्तर को ऊँचा उठाया जाए। इस क्रम में एल.एस.डी. अमेरिकी और यूरोपीय समाज में लोकप्रिय तो हुई, पर शीघ्र ही लोग उससे ऊबने लगे। इसका यह मतलब नहीं कि वह अपने प्रयोजन में विफल रही। उसने जनमानस में एक अद्भुत आनंद का संचार निश्चय ही किया, लेकिन आगे की रिक्तता की पूर्ति वह न कर सकी, जबकि समाज चेतना की और अधिक विकसित तथा स्थायी अवस्था की अनुभूति करना चाहता था। यहीं से उनका ध्यान उन पौर्वात्य ध्यान-परंपराओं की ओर गया, जो बौद्ध ताओ एवं योग पद्धतियों के रूप में प्रचलन में थीं। अनेक पाश्चात्य विद्वान उसके बाद भारत आए और यहाँ के योगियों के संपर्क में आकर ऐसे अद्भुत अनुभव प्राप्त किए, जो उनके लिए आश्चर्यजनक थे। इन विद्वानों में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के प्राध्यापक डॉ. रिचर्ड एलबर्ट (बाबा रामदास) का नाम उल्लेखनीय है।
वे अपने संस्मरण में लिखते हैं कि एक बार वह एक भारतीय महात्मा के संपर्क में आए। उन्होंने उन महात्मा को एल.एस.डी. की काफी बड़ी मात्रा खिलायी, किंतु इसका कोई असर उन पर नहीं हुआ। यह देखकर वे अचंभित रह गए। वह महात्मा एक उच्चस्तरीय योगी थे और चेतना के उस आयाम में स्थित थे, जहाँ मादक द्रव्यों के सेवन द्वारा नहीं पहुँचा जा सकता है। इसके बाद वे अमेरिका लौट गए और नशीले पदार्थों के विकल्प के रूप में चेतना की उच्चतर अवस्थाओं की प्राप्ति हेतु योग का व्यवस्थित ढंग से प्रचार प्रारम्भ किया।
धार्मिक कर्मकाण्डों एवं आयोजनों में चेतना की परिवर्तित अवस्था को प्राप्त करने के लिए अनादिकाल से नशीले द्रव्यों का प्रयोग होता रहा है। आर्ष साहित्य में सोम नामक पौधे की यत्र-तत्र चर्चा हुई है। ऐसा उल्लेख मिलता है कि सोमरस के पान से दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं। इसलिए तब इसकी पूजा की जाती थी। आज तो हम इसका उपयोग ही नहीं, पहचान भी खो बैठे हैं। अमेरिका, रूस आदि देशों में कुकुरमुत्ता, नागफनी, धतूरा आदि द्रव्यों का इस्तेमाल इस दौरान होता था।
पुराने जमाने में यूनान के डायोनिसस संप्रदाय के अनुयायी शराब एवं कुछ मादक प्रभाव उत्पन्न करने वाली बूटियों से एक ऐसी नशीली सुगंध का निर्माण करते थे, जिसके बारे में विश्वास था कि वह उन्हें शरीर से पृथक् होने तथा ईश्वरीय शक्ति से आवेशित होने में मदद करती थी।
साइबेरिया की शमनिक जन-जातियों में प्रेतात्माओं से संपर्क करने के लिए नशीले द्रव्यों का सेवन आम है। इसके लिए यहाँ के तुँगस शमन कबीले के लोग कई प्रकार की मादक जड़ी-बूटियों को जलाकर उनका धूम्र लेते और मद्यपान करते हैं। उनकी मान्यता है कि अर्धचेतना की स्थिति में अशरीरी आत्माओं से संपर्क शीघ्र सधता है। आनन्द की भावदशा प्राप्त करने के लिए तिब्बत के शमन ‘जूनीपर’ नामक नशे का प्रयोग करते हैं।
विश्व भर की तिलस्मी परंपराओं में भी कहीं-कहीं चेतना की परिवर्तित अवस्था प्राप्त करने के लिए ऐसे पदार्थों का सेवन सामान्य है। ब्राजील के नृतत्ववेत्ता कारलोस केस्टानिडाने अपनी रचना ‘दि टीचिंग’ ऑफ जाँन जुआ-ए याक्वी वे ऑफ नॉलेज’ में इस बात का उल्लेख किया है कि किस प्रकार उन्हें मैक्सिकन जादुई परंपरा में दीक्षित होने के बाद पराभौतिक क्षमता अर्जित करने के लिए धतूरे आदि का प्रयोग सीखना पड़ा था। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियों के सेवन की चर्चा भी की है, जिनका एकमात्र उद्देश्य अतींद्रिय सामर्थ्य विकसित करना था। याक्वी पंथ में ऐसी मान्यता है कि प्रारम्भिक अवस्था में ऐसी वस्तुओं के उपयोग से बाद में चेतना के विकास में सहायता मिलती है।
यों तो योग परंपरा में उच्च चेतनात्मक स्थिति प्राप्त करने के लिए जिन पाँच माध्यमों का उल्लेख मिलता है, उनमें से एक औषधि भी है, पर यह औषधि आज के गाँजा, भाँग, शराब, एल.एस.डी. जैसे साधारण मादक द्रव्य नहीं थे। वे दिव्य औषधियाँ थीं। आज तो उनका ज्ञान, पहचान और प्रयोग सब कुछ विलुप्त हो चुका है। ऐसे में सामान्य नशे का सेवन कर उस परंपरा की लकीर पीटना और उससे इंद्रियातीत अनुभूति की बात करना भ्रामक नहीं तो और क्या है? यह सच है कि ऐसे कुछ उदाहरण मौजूद हैं, जिनमें चाय-कॉफी जैसे साधारण पदार्थों के प्रयोग से चेतनात्मक परिवर्तन महसूस किया गया और उस दिशा में ऐसे कठिन-कठिन सवाल हल किये गये, जो साधारण अवस्था में असंभव स्तर के प्रतीत होते थे, किन्तु इन्हें सामान्य घटना नहीं, अपवाद कहना चाहिए। ऐसे ही एक अपवाद फ्राँस के प्रख्यात गणितज्ञ पायन केयर थे। उन्हें कॉफी पीने की आदत नहीं थी। ऐसा कहा जाता है कि जब वे इसे पी लेते, तो चेतना की एक ऐसी अवस्था में प्रवेश कर जाते थे, जैसी निद्रा के पूर्व होती है। तब उन्होंने ऐसे सूत्र और समीकरण खोजे तथा हल किए, जो सामान्य चेतना की अवस्था में संभव नहीं थे- ऐसा उनका स्वयं का मत है। किंतु ऐसे इक्के दुक्के उदाहरणों को सर्वसाधारण पर तो घटित नहीं किया जा सकता। इससे ऐसा भी कोई संकेत नहीं मिलता कि कॉफी जैसे औसत पदार्थ से हर एक में उक्त प्रकार का परिवर्तन होता ही है। ऐसे में इन्हें अपवाद कहना ज्यादा उचित है। अपवाद कहीं-कहीं और कभी-कभी ही घटित होते हैं, इसलिए वे सामान्य श्रेणी में नहीं आते। अतएव चेतना विस्तारक द्रव्य के रूप में इनकी गणना अमान्य हो जाती है।
नशीले पदार्थों का शरीर और मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभावों के सम्बन्ध में पिछले दिनों गहन अध्ययन हुआ है। शरीरशास्त्रियों का कहना है कि इनसे सुस्ती, आलस्य, अवसाद, अकर्मण्यता, उदासी जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती है। अधिक लेने पर मृत्यु का भी खतरा बना रहता है। इस आधार पर उन्हें दो श्रेणियों में विभक्त किया गया है। क्लोरोफार्म, ईथर, अल्कोहल, नाइट्रस आक्साइड तथा संपूर्ण शामक औषधियाँ-ये मस्तिष्क की गतिविधियों को बाधित करतीं तथा संपूर्ण तंत्रिका को लकवाग्रस्त बनाती हैं। इनका प्रयाग प्रायः गंभीर स्थिति में ही सर्वसाधारण के लिए वाँछनीय माना गया है। यों मदिरा जैसे द्रव्य का कम मात्रा में प्रयोग से व्यक्ति दिन प्रतिदिन के तनावों और दुखों से मुक्त रहते हुए सक्रियता बढ़ाना चाहता है, पर इसके नियमित सेवन से शरीर और मस्तिष्क पर घातक असर पड़ता और उनकी कार्यक्षमता घटती है। इन दिनों लोगों की निर्भरता इस पर बढ़ी है। वे कुछ विलक्षण अनुभव के लिए इसका इस्तेमाल नहीं करते, वरन् जीवन की वास्तविकताओं से पलायन कर चिंता-मुक्त होने के लिए इसका प्रयाग करते हैं। यह वर्तमान समाज के लिए एक खतरे की घंटी है।
दूसरे वर्ग में चरस, गाँजा, भाँग, एस.एस.डी., मेस्कालिन तथा साइलोसिविन जैसे उन द्रव्यों को रखा गया है, जिनसे मूर्च्छा तो नहीं आती, पर एक मस्ती जैसी स्थिति हमेशा बनी रहती है। कदाचित इसी को चेतना का विस्तार मान लिया गया, पर यथार्थता ऐसी नहीं है। तंत्रिकाविज्ञान का अभिमत है कि ऐसे पदार्थों से संपूर्ण स्नायु संस्थान अल्प अंशों में अपनी सजगता खो बैठता है। यह चेतना का प्रसार नहीं, उसकी प्रखरता कुंद होने की प्रक्रिया भर है। इसके कारण बाह्य स्थिति-परिस्थिति से बेखबर व्यक्ति आनन्द जैसी अवस्था का अनुभव करने लगता और यह भ्रम पाल बैठता है कि वह चेतना की किसी उच्चतर भूमिका का स्पर्श करने लगा है। यदि ऐसे अनुभवों को सामान्य चेतना के प्रकाश में देखे, तो वे वास्तविकता से परे निरर्थक तथा बेतुके प्रतीत होंगे ओर ऐसा मालूम पड़ेगा, मानो यह किसी सनकी का अनर्गल प्रलाप है।
विलियम जेम्स इस संदर्भ में अपने ग्रंथ ‘दि वेरायटीज ऑफ रिलिजियस एक्सपिरियेंसेस’ में क्रिस्टोफर मेथ्यू का उदाहरण प्रस्तुत करते है। मेथ्यू का उदाहरण प्रस्तुत करते है। मेथ्यू अपने ऐसे ही एक अनुभव का बखान करते हुए कहता है-मुझे हर वस्तु के अंतिम सत्य की पूरी जानकारी प्राप्त हो चुकी, मैं ज्ञानसम्पन्न सर्वज्ञ हो गया। मैं अपने चिकित्सक के पास गया तथा उससे इसकी चर्चा की। उसने मुझसे मेरे अनुभव के बारे में पूछा। मैंने कहा कि वह सब कुछ केवल हरे रंग के प्रकाश जैसा था।”
इसे किसी स्वस्थ का नहीं, अर्धविक्षिप्त जैसा अनुभव कहना चाहिए। इसमें व्यक्ति अपना आत्म-नियंत्रण खो बैठता और ऐसी बहकी-बहकी बातें करता है, जिसका सत्य-तथ्य से शायद ही कोई वास्ता ही। तत्त्ववेत्ता इस स्थिति को खतरनाक बताते और कहते है कि यदि ऐसे पदार्थों का अप्रतिहत प्रयोग जारी रहा, तो मनुष्य के जीवन में एक आध्यात्मिक रिक्तता पैदा हो सकती है। अवसाद और उदासी इस हद तक बढ़ सकती है। कि वह जिंदगी से निराश हो जाए। समाज और संसार के नीरस होने और उमंग-उत्साह के मर जाने से जीवन का अर्थ और उद्देश्य लगभग समाप्त हो जाता है। यही है आत्मपरायण की स्थिति। इस दशा में व्यक्ति स्वयं के प्रति या तो बिलकुल लापरवाह हो जाता और किसी प्रकार जीवन की गाड़ी खींचता -घसीटता रहता है अथवा अपने आप को खत्म कर डालता है।
इसलिए ऐसे द्रव्यों के सेवन के प्रति सावधान करते हुए रॉबर्ट एस.डी. राँप अपनी कृति ‘दि मास्टर गेम’ में लिखते है कि जो लोग इन रसायनों का बिना सोचे-समझे प्रयोग करते है, वे अपने विकास की संभावनाओं का गला घोंट देते है। उनके आत्मोत्कर्ष का अंकुर सूख जाता है और आदमी ऐसे चौराहे पर आ खड़ा होता है, जहाँ से से वह अपने ही पतन-प्रवाह को मूकदर्शक की तरह देखता रह सकें।
सच तो यह है कि चेतनात्मक विकास के लिए किसी द्रव्य की नहीं, आध्यात्मिक अनुशासन को आवश्यकता है। यदि व्यक्ति ईश्वरपरायण होकर रहें और नीति-निष्ठा तथा ईमानदारी पूर्वक जीवनयापन करें, तो उसे उस आनंद से अनेकों गुना अधिक संतोष और आनंद की प्राप्ति होगी, जिसकी खोज वह मादक पदार्थों में करता है इसलिए ध्यान ही इनका वास्तविक विकल्प हो सकता है, नशा नहीं। चेतना का सही अर्थों में विकास और विस्तार इसी के माध्यम से शक्य है। सामान्य जीवन में भी यह उतना ही प्रभावकारी है, जितना उच्चस्तरीय साधना की स्थिति में। ध्यान के क्षेत्र में पिछले दिनों के अनुसंधानों का निष्कर्ष यह है कि नियमित रूप से इसका अभ्यास करने से जीवन की समस्याओं से पलायन करने के लिए मादक द्रव्यों के सेवन की इच्छा ही समाप्त हो जाती है। इसके अतिरिक्त शरीर और मन पर पड़ने वाले प्रभाव मादक द्रव्यों के असर से बिलकुल भिन्न है। अन्वेषणों से यह विदित हुआ है कि ध्यान की फलश्रुति व्यक्ति में सदा मानसिक एकाग्रता, बौद्धिक कुशलता तथा शारीरिक दक्षता के रूप में सामने आती है, जबकि नशीले पदार्थों से सुस्ती, आलस्य, अवसाद के साथ-साथ शरीर-मन को क्षमताओं में ह्रास और बिखराव होता है। इसके जो अनुभव है, वह इंद्रियजन्य, अस्थायी, बहिरंग तथा सतही होते है। इसके विपरीत ध्यान हमें अन्तर्यात्रा पर ले जाता है। वह हमें अपने शुद्ध स्वरूप की दर्शन-झाँकी कराता और बताता है कि व्यक्ति यदि उस तल पर स्थायी रूप से प्रतिष्ठित हो सकें, तो वह अंदर की दुनिया इतनी अद्भुत, अनुपम और अवर्णनीय आनंद की होगी कि उसके आगे बाह्य संसार एकदम नीरस और और उबाऊ प्रतीत होगा। ध्यान से व्यक्ति में आत्मनियंत्रण की क्षमता विकसित होती है, जबकि नशा उसे हर प्रकार से अनियंत्रित बना देता है। इसके प्रयोग की अनुमति स्वास्थ्य शास्त्री सिर्फ विशेष परिस्थितियों में ही देते है। व्यक्ति यदि बीमार हो, असह्य कष्ट पा रहा हो, तो राहत पहुँचाने की दृष्टि से इन पदार्थों का सामयिक प्रयोग अनुचित नहीं, किन्तु जब ये तथाकथित चेतना विस्तारक सामान्य उपयोग की वस्तु बन जाएँ और गम गलत करने के निमित्त प्रयुक्त होने लगें, तो इसे अशुभ संकेत माना जाना चाहिए। जो शुभ न हो, वह सात्विक परिणाम कैसे उत्पन्न कर सकता है? जिसके कण-कण में तामसिकता धुली हो, उससे अभीष्ट फल की आशा कैसे की जा सकती है? वह तो विचारों में आक्रामकता और भावनाओं में अपवित्रता ही उत्पन्न करेगा।
मादक द्रव्य मूर्च्छना पैदा करते है। उनसे न तो चेतना का ऊर्ध्वारोहण होता है, न कोई विशिष्ट आध्यात्मिक अनुभूति। बाह्य सजगता में कमी के कारण इस प्रकार की भ्रांति हो सकती है, पर नशा उतरते ही जल्द ही वह टूट भी जाती है। इसलिए यह अवधारणा पूरी तरह निरस्त हो जाती है कि नशीले पदार्थ हमें असाधारण भूमिका में ले जाते और अलौकिक अनुभव कराते है।
विश्रवा के यहाँ एक कुरूप संतान ने जन्म लिया। बेडौल आकार का होने के कारण सभी उसकी हँसी उड़ाते। उसे लोगों की मूर्खता पर बड़ा क्षोभ हुआ। ‘कुबेर’ नामक इस पुरुषार्थी ने अपनी हँसी अपने ही घर से उड़ते देख ठान ली कि यह मानव समुदाय को यह बताकर रहेगा कि सभी को प्राप्त मनुष्य जीवन रूपी संपदा का सदुपयोग कर महान से महान बना जा सकता है। शरीरगत सुंदरता नहीं अपितु गुण रूपी संपदा महत्वपूर्ण है एवं उसे ही अर्जित किया जाना चाहिए, यह सोचकर उसे अपनी योग्यता बढ़ाने के लिए कठोर तप किया। अपनी लगन से उसने पिता व बाबा को भी इस साधना में सम्मिलित कर लिया देवताओं ने उन्हें अपना धनाधीश लोकपाल बनाया और वे अलकापुरी में राज करने लगें।
कबीर रहस्यवादी कवि थे। उनने अपनी साखियों में जितने सरल शब्दों का इस्तेमाल किया है, उतने ही गहन और गंभीर उनके भाव है। वे प्रतीक पद्धति के भी प्रवर्तक कवि माने जाते है। उनके दोहों में रहस्यवाद और प्रतीकवाद का जैसा समन्वय हुआ है, वह अद्भुत और अद्वितीय है। उन्हें सहज शब्दावली द्वारा गहरे भाव-संप्रेषण का विशेषज्ञ कवि माना जाता है।
गागर में सागर समाएँ होने की कहावत प्रसिद्ध है। कबीर ने वही किया है विराट को छोटे-छोटे शब्दों में उड़ेला है। साधारण बोलचाल के शब्द है पर बड़े विलक्षण अर्थ सँजोए हुए है। सुनकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो सब कुछ परिचित है, शब्द और अर्थ जाने-पहचाने है। इस आधार पर जब उसका मतलब निकाला जाता है, तो आश्चर्य होता है कि जितने महान कवि उतना ही साधारण अर्थ! पर बात ऐसी है नहीं, उसमें जो गहराई दी गई है, वह असाधारण है। ऐसा ही एक पद है-
लिखालिखी को है नहीं, देखा-देखी बात-दूल्हा-दुलहन मिल गए, फीकी पड़ी बरात॥
सामान्य दृष्टि से इस पर विचार करें, तो इतना ही अर्थ होगा कि विवाह समारोह में जब वर-वधू का मिलन हो जाता है, अर्थात् परिणय जब संपन्न हो जाता है, तो बारात की शोभा समाप्त हो जाती है। फिर उसकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाती-यह कोई लिखने की नहीं, देखने की बात है। सामान्य संदर्भ में इस पद का इतना ही अर्थ हो सकता है, लेकिन जब गहरे में उतरते हैं तो उसमें बहुत बड़ा रहस्य छुपा पाते है।
अर्थ की तरह ज्ञान भी सामान्य और विशेष ही हो सकता है। जब दुनिया की किसी वस्तु के बारे में चर्चा करते है, तो वह मात्र बाहरी ज्ञान होता है। हम उसके सिर्फ बाहर-बाहर चक्कर काटते है। जिस प्रकार मंदिर में देव- विग्रह की लोग परिक्रमा करते और उसमें परमात्मा की प्रतीति करते है, वैसा ही यह आरोपित ज्ञान है। उसके वास्तविक सत्ता की अनुभूति तो तभी होगी, जब उसके गहन अंतराल में उतरकर उसके प्राण को, चेतना को स्पर्श किया जाए। इसके बिना समस्त जानकारी सतही होगी। सागर को जानना हो तो ऊपरी दृष्टि निक्षेप भर पर्याप्त नहीं होगा। उससे तो अवलोकक को इतना भर ज्ञात हो सकेगा कि उसमें जो ऊर्मियाँ है, वह किस प्रकार से, कितनी गति से, कैसे आ-जा रही है, किन्तु सागर संबंधी जानकारी सिर्फ इतनी हो तो नहीं है। वास्तविक ज्ञान और यथार्थ पहचान तो वह अपने भीतर की गहराई में समेटे हुए है। इसलिए सागर को समझने का एक ही तरीका है कि उसमें डुबकी लगायी जाए। इस डुबकी में भी एक अड़चन है, कारण कि वास्तविक डुबकी तो अपने में और सिर्फ अपने में ही लगायी जा सकती है। दूसरे में चाहे कितनी ही लगाएँ, उसकी आत्मा को स्पर्श न कर पाएँगे। जिस निमज्जन में चेतना के तल तक न पहुँच पाएँ, वह ज्ञान अवास्तविक होगा। वास्तविक अनुभव या ज्ञान सिर्फ अपना ही हो सकता है, दूसरे का नहीं। अतः गुरजिएफ ने ठीक ही कहा है कि आत्मज्ञान ही एकमात्र ज्ञान है, शेष सब जानकारी है। इस जानकारी को प्राप्त करने के तो पुस्तक, शिक्षक, यंत्र और कितने ही बाहरी माध्यम है, किंतु जो यह अवलंबन असहाय और असम साबित हो, वहाँ उपाय क्या हो? इनका उत्तर कबीर उपर्युक्त पद में देते है।
“लिखालिखी की है नहीं देखादेखी बात”। वे कहते है कि वह जो आत्मज्ञान है, वह पढ़ने लिखने की वस्तु नहीं, उससे आत्मज्ञानी नहीं हुआ जा सकता जब तक कि उसे स्वरूप देखा या अनुभव न किया जाए। कब जब यह लिख रहे थे, तो का पाँडित्य का गढ़ था। चारों और ज्ञान चर्चा की ही अनुगूँज थी। कोई वेद पारंगत, कोई उपनिषद् के ज्ञाता, व दर्शन में निपुण, तो कोई पुराण व्याख्याता। इस प्रकार वहाँ के जन मानस में ज्ञान की घुट्टी धुली हुई वे कबीर को अज्ञानी समझते थे, उनकी दृष्टि से सही था। पंडित ज्ञानी है, तो निश्चय ही कबीर आता है कारण कि उन्हें वाक्पटुता आती, उनमें वाक्चातुर्य नहीं है। अपनी बात बिना किसी लाग -लपेट सीधे-सादे ढंग से कह देते है। विज्ञजनों! यह जिस तत्व की आप कर रहें है, वह कहने की नहीं, अंत की चीज है इतने मात्र से वे ‘अज्ञ संज्ञा पा जाते है, पर इससे विश्व करने वाले तथाकथित पंडित -ज्ञान का हाल क्या है? उनका ज्ञान कैसा यह भी देखें। वे आत्मा की, अमरता बात तो बढ़-चढ़कर करते है, लेकिन मौत को सामने पाकर रोते, चीखते चिल्लाते है मृत्यु के स्मरण से अमरता खो जाती है,
इन दिनों महाविनाश और महासृजन आमने-समाने खड़े है इनमें से एक का चयन सामूहिक मानवीचेतना को करना ही पड़ेगा। उस चेतना को, जिसका प्रतिनिधित्व जाग्रत और वरिष्ठ प्रतिभा करती रही है। ऐसी प्रतिभाएँ जो प्रामाणिकता एवं प्रखरता से सुसम्पन्न हो उन्हीं को युग समन्वय का निर्णायक भी कहा जा सकता है।
क्योंकि उसे जानी तो नहीं, पढ़ी थी, देखो तो नहीं, सुनी थी। वह अपना बोध नहीं, किसी और का अनुभव था। इसलिए कबीर कहते है कि इस लिखालिखी के ज्ञान से काम चलने वाला नहीं, वह देखादेखी जैसा प्रत्यक्ष होना चाहिए। यदि लिख-पढ़ लेने मात्र से ही समस्त ज्ञान उपलब्ध हो जाता, तो फिर तप को, ध्यान की, साधना की क्या उपादेयता रह जाती? फिर तो सब कुछ अत्यंत सरलतापूर्वक संपन्न हो जाता। तब कोई अंधा भी पढ़ सुनकर प्रकाश हस्तगत कर लेता, पर यह संभव है क्या? नहीं। मनुष्य ने प्रकाश के संबंध में जो कुछ खोजे की है, वह सब कुछ यदि वह अपने मस्तिष्क में भर ले, उसकी संपूर्ण भौतिकी समझ ले, उत्पत्ति संबंधी सारी प्रक्रिया जान ले, तो इस पर भी क्या उसकी आँखें प्रकाश की एक क्षीण किरण भी उपलब्ध कर सकेगी कि वह दो कदम चल सके? उत्तर सदा नहीं में देना पड़ेगा।
तो फिर उपाय क्या है? कबीर कहते है-देखादेखी बात।” इससे कम में काम चलने वाला नहीं। आँखें खोलनी ही पड़ेगी। बाहर की वस्तुओं को देखने के लिए बाहर की आँखें है। उसी प्रकार भीतर के प्रकाश को देखने के लिए भीतरी नेत्र है। योग का यह अंतिम अनुसंधान है कि जितनी क्षमताएँ बाहर है, उससे किसी भी प्रकार कम अंदर नहीं अपितु ज्यादा ही है, कारण कि हर चीज के दो पहलू होते है। दूसरा पहल-अदृश्य पहलू पहले की तुलना में कम महत्वपूर्ण है, सो बात नहीं। वह भी उतना ही आवश्यक और उपयोगी है, अस्तु जब हम नेत्रों से बाहरी संसार को देखते है, तो उसका मतलब स्पष्ट है कि इसका दूसरा छोर और किनारा भी होना चाहिए। वह आँख भी होनी चाहिए, जिससे अंतर्जगत् को देखा जा सके। कान बाहर के शब्द सुनते है, तो वे कर्ण भी जरूर होंगे, जिससे अंतरात्मा की आवाज सुनी जा सकें। हाथ का काम स्पर्श करना है, तो निश्चय ही अंतस् में भी स्पर्श की यह सामर्थ्य होगा जिससे हम स्वयं का अनुभव-स्पर्श कर सकें, अन्यथा बात बड़ी विचित्र मालूम पड़ेगी कि हम औरों का तो अनुभव कर लेते है। अपना अनुभव नहीं कर सकते। सारी दुनिया को देख लेते है, स्वयं को नहीं देख पाते। बाहर के कोलाहल तो सुन सकते है, किन्तु अंदर का अनहद नाद नहीं सुनाई पड़ता।
कबीर कहते है कि इसके लिए अंदर की सूक्ष्म इंद्रियों को जगाना पड़ेगा, जो सीधे भीतर की और खुलती है, तभी अंतर्जगत् का दर्शन-स्पर्श संभव है अंतस् में तो कोई शास्त्र है नहीं कि उसे पढ़ लें, कोई वेद-कुरान नहीं कि उसे जानकर भीतर के संसार को जान लें। वहाँ तो सिर्फ आत्मा है, जो पढ़ने या जानने की वस्तु नहीं देखने की, अनुभव करने की चीज है। जब आँतरिक नेत्र भीतर के उस परमतत्व आत्मा को देख लेते हैं, तो कबीर उस घटना को ‘देखादेखी बात’ कहकर वर्णित करते है। लिखालिखी-यह बाह्य संसार की घटना है वहाँ इतने से भी बात बन जाती है, शब्द और शास्त्र से काम चल जाता है जीवन-नौका को खेने के लिए इतना भर पर्याप्त है, लेकिन भीतरी जगत में इनका कोई अर्थ नहीं। वहाँ यह निरर्थक और निष्प्रयोजन है। उसके लिए इन्हें त्यागना पड़ेगा। इसका यह मतलब नहीं कि शास्त्र बेकार है। उसमें उन्हीं के वचन है, जिनने उस परमतत्व को प्रत्यक्ष किया था, किंतु अब तो वे उपदेश और शब्द मात्र है दर्शन और अनुभव तो द्रष्टा के पास हो रह जाते है, शब्द के साथ तो वे आते नहीं। इसलिए उन्हें अब छोड़ना पड़ेगा। यही दर्शन और अनुभूति की और पहला कदम है।
‘दूल्हा दुल्हन मिल गए, फीकी पड़ी बरात’। पद का यह अंतिम चरण अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रतीक की भाषा में कहा गया है। दूल्हा परमात्मा का प्रतीक है और दुलहन आत्मा का। दूल्हा जब बारात लेकर आता है तब बारात बड़ी महत्वपूर्ण होती है, किंतु दूल्हा-दुलहन के मिल जाने के बाद विवाह हो जाने के पश्चात् फिर बारात की कौन चिंता करते है। बारात की प्रासंगिकता तभी तक है, जब तक शादी न हुई हो, वरमाला न डली हो, गठबंधन न हुआ हों।
कबीर कहते है कि शास्त्र और शब्द ऐसी बारात की तरह है। जब आत्मा-परमात्मा का मिलन हो गया, मनुष्य आत्मज्ञ हो गया, तो फिर वेद-पुराण में क्या रखा है? सब बेकार है।
इनकी उपादेयता तभी तक है, जब तक दुलहन अर्थात् आत्मा के द्वार तक न पहुँचे थे। वहाँ तक यह पहुँचा दें, तो पर्याप्त है, बारात का काम कर दें, काफी है। इसके बाद तो बात ही समाप्त हो जाती है। व्यक्ति पार कर गया, फिर नदी-नाव की कौन चिंता करता है पुल से गुजर गए, फिर उसे कौन स्मरण रखता है इसलिए कबीर प्रतीक की भाषा बोलते हुए कहते है-दूल्हा दुल्हन मिल गए, फीकी पड़ी बरात।
कबीर लोककवि है। उनके पदों की यह विशिष्टता है कि वे जीवन के सामान्य प्रसंगों के माध्यम से इतनी गंभीर बात कह देते है, जो सभी के लिए सहज बोधगम्य हो। वे स्वयं में सार्वकालिक-सार्वदेशिक सत्य सँजोए हुए है, अतएव उनकी प्रासंगिकता अब भी यथावत बनी हुई है। हमें उसका स्मरण रखना चाहिए।
आचारः प्रथमों धर्मो, नृणां श्रेयस्करो महान-मनुस्मृति
उत्तम आचार ही सबसे पहला धर्म है और मनुष्यों के लिए महान कल्याणकारी है।
(गतांक से जारी)
भारतीय संस्कृति में भवन निर्माण से पूर्व किसी शुभ मुहूर्त में वास्तु पूजन, भूमिपूजन, भूमि शोधन, शिलान्यास आदि शुभ कार्य दैवी-अनुग्रह प्राप्त करने के साथ ही सूर्य सहित समस्त ग्रह-नक्षत्रों,राशि समूहों एवं प्रकृति के पड़ने वाले प्रभावों को अनुकूल बचाने, प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए किए जाते है। नवनिर्माण यह उद्देश्य सामने रखकर किए जाते है कि बनकर तैयार होने के पश्चात् वह मकान निवास करने वालों के लिए मंगलमय एवं विघ्न-बाधा रहित हो, सुख -शान्तिदायक हो एवं प्रगति का कारण बनें। घर में कलह-क्लेश न हो, पारिवारिक सौमनस्यता एवं पारस्परिक स्नेह-सद्भाव बना रहें, व्यक्ति स्वस्थ एवं दीर्घजीवी हो। संतति सुख, आर्थिक उन्नति, सामाजिक मान-प्रतिष्ठा में अभिवृद्धि आदि बातें सार्थक निर्माण का परिचालक मानी जाती है।
मूर्धन्य वास्तु विद्या विशारदों का कहना है कि वास्तुशास्त्र के नियमों को ध्यान में रखकर यदि भवन निर्माण किए जाएँ, तो आपाधापी भरे इस युग में भी अशान्ति, तनाव, अभाव ऋणग्रस्तता, असफलता एवं दिवालिया होने जैसी दुखदायी परिस्थितियों से बच जा सकता है। रहने, सोने, खाने-पीने उठने-बैठने के कक्ष, अध्ययन कक्ष, पूजा स्थल, दुकान, क्लीनिक, व्यापारिक प्रतिष्ठान आदि का निर्माण साज-सज्जा व्यवस्था में नियमानुसार हेर-फेर करके वह सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है, जिस कल्पना को साकार करने के लिए भवन निर्माण किया या उद्योग -व्यवसाय आरंभ किया जाता है।
इस संदर्भ में वास्तुशास्त्रकार विश्वकर्मा कहते है कि जिस भूखंड में भवन निर्माण करना है, सर्वप्रथम उसके सोलह भाग करके शुभाशुभ दिशाओं का ध्यान रखते हुए नक्शा बनाना तथा कमरों का निर्माण करना चाहिए। भारतीय संस्कृति को उनकी अनुपम देन विश्वकर्मा प्रकाश के द्वितीय अध्याय में इस संबंध में विस्तृत उल्लेखनीय है यथा-
ईशान्यो देवतागेहं पूर्वस्यां स्ननामंदिरम्। आग्नेयां पाकसदनं भांडारागारमुत्तरे॥
आग्नेयपूर्वयोर्मध्येद धिमन्थनमंदिरम्। अग्निप्रेतेशायोर्मध्ये आज्यगेहं प्रशस्यते॥
याम्यनैऋतयोर्मध्ये पुरीषत्याग मंदिरम्। नैऋत्याम्बुपयोर्मध्ये विद्याभ्यासस्पमंदिरम्॥
पश्चिमनिलयोर्मध्ये रोदनाथ गृहमस्मृतम्। वायव्योत्तरर्मध्ये रतिगेहं प्रशस्यते॥
उत्तरेशनयोर्मध्ये औषार्थन्तुकारयेत्। नैऋत्यां सूतिकागेंह नृपाणां भूमिमिच्छताम्॥
अर्थात् उत्तर -पूरब के मध्य ईशान कोण में मंदिर, देवालय या पूजा कक्ष, पूरब दिशा में स्नानगृह, दक्षिण और पूरब के मध्य आग्नेय कोण में रसोईघर, उत्तर दिशा में भंडार कक्ष (स्टोर रूम) एवं कोष का निर्माण करना चाहिए। आग्नेय कोण और पूरब दिशा के बीच दूध-दही मथने का कक्ष, आग्नेय कोण और दक्षिण दिशा के मध्य धृतादि का कक्ष श्रेष्ठ माना गया है। दक्षिण दिशा और नैऋत्य कोण के मध्य शौचालय एवं नैऋत्य कोण तथा पश्चिम दिशा के मध्य में अध्ययन कक्ष बनाना चाहिए। पश्चिम दिशा और वायव्य कोण के बीच में रुदन कक्ष (पारिवारिक गोष्ठी कक्ष) तथा वायव्य और उत्तर दिशा के मध्य में दाम्पत्य गृह बनाना चाहिए। उत्तर दिशा और ईशान कोण के मध्य में औषधालय -क्लीनिक, नैऋत्य कोण में प्रसूतिकक्ष बनाना चाहिए।
इसी तरह भोजन-कक्ष यानी डायनिंग हाल-पश्चिम दिशा में, शयन कक्ष दक्षिण दिशा में, स्वागत कक्ष- ड्राइंगरूम ईशान कोण में, पशुशाला धान्य गृह वायव्य कोण में, पशुशाला एवं धान्य गृह वायव्य कोण में, शस्त्रागार नैऋत्य कोण में बनाना चाहिए। कार पार्किंग या गैराज भी वायव्य दिशा में बनाना उपयुक्त रहता है। इसके लिए आग्नेय कोण का भी प्रयोग कर सकते हैं, किन्तु ईशान कोण में गैराज सर्वथा वर्जित है। कुआँ, पानी की टंकी आदि। का निर्माण पूरब, पश्चिम, उत्तर व ईशान कोण में किया जा सकता है।
इस तरह भौगोलिक स्थितियों-दिशाओं को ध्यान में रखकर जो भवन या घर बनाए जाते है, वे सभी निवासकर्ताओं के लिए सुख -संतोष एवं सत्परिणाम प्रदान करते है। मनमाने ढंग से -अशास्त्रीय विधि से बने मकान कलह-क्लेश जन-धन-हानि दुख दारिद्रय, अदालतबाजी, रुग्णता एवं सर्वनाश का कारण भी बनते है। ग्रह-नक्षत्रों के प्रभाव में परिवर्तन कर सकना भले ही मनुष्य के हाथ में न हों, किंतु वास्तु-विद्या के अनुसार अपने आच्छादन का निर्माण कर सकना, अशुभ फलदायक घरों-मकानों में थोड़ा-बहुत हेर-फेर करके अपने अनुकूल बना लेना सर्वथा अपने हाथ में है।
ज्योतिष शास्त्रों में ग्रह-नक्षत्रों की चाल व दशा को महत्वपूर्ण एवं प्रभावी माना जाता है जबकि वास्तु विद्या में दिशा को महत्ता मिली हुई है। कहा गया है। कि दशा से दिशा प्रभावित नहीं होती, किंतु दिशा से दशा प्रभावित होती है और इसके द्वारा उस प्रभाव को बदला भी जा सकता है। अतः वास्तु नियमों को ध्यान में रखते हुए जो निर्माण किए जाते है, वे सुख, समृद्धि एवं शांति का कारण बनते है। प्रतिकूल दिशा में निर्माण करने से वही भवन कष्टदायी हो जाते है। विश्वकर्मा प्रकाश के अनुसार प्रत्येक भूखंड का, भवन का और यहाँ तक कि प्रत्येक कमरे का ईशान कोण अर्थात् उत्तर और पूर्व के मध्य का भाग या कोना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ईश्वर का निवासस्थान मानते हुए इस दिशा में “ईशान्यांदेवतागेह” का शास्त्रनिर्देश किया गया है अर्थात् ईशान दिशा में इष्ट देवता का मंदिर, देवालय, पूजा स्थल या पूजा कक्ष बनाना चाहिए।
सूर्य पूरब से उदित होता है, अतः उसकी जीवनदायिनी प्राण ऊर्जा से भरपूर लाभ उठाने के लिए पूर्वोत्तर दिशा में पूजा कक्ष या देव मंदिर का होना अनिवार्य है। प्राचीनकाल के ऋषि-मनीषी इस तथ्य से भली-भाँति परिचित थे। यही कारण है कि प्रायः सभी प्राचीन तीर्थस्थान, मंदिर या देवालय पूरब या ईशान दिशा में ऐसे प्राकृतिक एवं मनोरम जगहों में विनिर्मित है, जहाँ सूर्य और पृथ्वी के ऊर्जा केन्द्रों का सम्मिलन होता है। विज्ञानवेत्ता जानते है कि सूर्य और पृथ्वी का आपस में घनिष्ठ संबंध है। सूर्य के ताप एवं प्रकाश-रश्मियों के प्रभाव से ही धरती पर अगणित परिवर्तन होते रहते है। वास्तुशास्त्र के उद्भव का कारण भी इन दोनों का आपसी संबंध है। वास्तु चक्र में जिन देवताओं को परिकल्पित व प्रतिष्ठित किया जाता है, वस्तुतः वे सूर्य किरणों में समाहित शक्ति सत्ताएँ ही है।
हमारा देश धर्मप्राण देश है। आध्यात्मिक ऊर्जा यहाँ के कण-कण में समाविष्ट है। यहाँ वास्तु को धार्मिक कृत्यों से जोड़कर रखा गया है, ताकि उस माध्यम से हम ईश्वर से संबंध स्थापित करके लौकिक एवं पारलौकिक सुखों का -आनंद का लाभ उठा सकें इस संदर्भ में आंध्र प्रदेश के मूर्धन्य वास्तुवेता श्री गौरु तिरूपति रेड्डी अपनी कृति -”वास्तु संदेश’ में कहते है कि विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त अग्नि, वायु जल, आकाश आदि नैसर्गिक शक्तियों-पंचमहाभूतों को अपने घर के अनुकूल बनाना ही जाननात और तदनुरूप भवन निर्माण करना ही बुद्धिमानों को अभीष्ट है। उनके अनुसार बद्री, केदार आदि उत्तराखण्ड के देवालय, मथुरा -वृन्दावन के प्राचीन मंदिर एवं दक्षिण भारत के पुरी एवं तिरूपति बालाजी आदि देव स्थानों की स्थापना वास्तुशास्त्र के अनुसार की गई है, जिनके कारण उनके आकर्षण एवं वैभव देखते ही बनते हैं वस्तुतः वास्तु नियमों के अनुसार निर्मित देवालय, पूजा स्थल एक प्रकार से ब्रह्मांडीय ऊर्जा के केन्द्र होते हैं, इसीलिए प्रत्येक निर्माण में एक कोना पूजा स्थल के रूप में विकसित करने का विधान है।
वास्तुशास्त्र के अनुसार देवालय, उपासना स्थल या पूजा कक्ष भवन का प्रमुख अंग है। इसे ईशान कोण में स्थापित किया जाता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि सूर्य पूरब से उदित होता है। शास्त्रों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है, साथ ही इसे आरोग्य का देवता माना गया है। पूर्वाभिमुखी पूजाकक्ष में जब व्यक्ति उपासना करता है, तो उसका मुँह पूर्व की ओर होता है। इससे प्रातःकालीन उदीयमान सविता देवता की -सूर्य की स्वर्णिम किरणों का लाभ साधक को मिलता है। हमारी काया के उत्तरी ध्रुव अर्थात् मस्तिष्क में सहस्रार चक्र, आज्ञाचक्र एवं ब्रह्मरंध्र जैसे कई सूक्ष्म शक्ति केंद्र है, जिनका संबंध सूर्य से स्थापित हो जाने पर वे जाग्रत होने लगते है। और अतींद्रिय क्षमताएँ एवं ऋद्धि-सिद्धियाँ हस्तगत होने लगती है। ओजस -तेजस एवं वर्चस का स्रोत सूर्य ही है। इसीलिए प्रतिमाओं का मुख पूरब, पश्चिम या दक्षिण की ओर होता है ताकि उपासना करने वाले व्यक्ति का मुँह सदैव पूरब, पश्चिम या उत्तर दिशा की ओर रहे और वह सूर्य की जीवनदायिनी प्राण-ऊर्जा से लाभान्वित होता रहें। ज्ञान प्राप्ति के लिए उत्तर दिशा में उत्तराभिमुख धन-संपदा हेतु पूर्व दिशा में पूर्वाभिमुख एवं सुख-शांति हेतु पश्चिम दिशा में पश्चिमाभिमुखी होकर पूजा उपासना करने का विधान शास्त्रों में बताया गया है।
पूजाकक्ष के संबंध में जो नियम किसी बड़े भूखंड पर निर्मित होने वाले विशालकाय भवनों पर लागू होते हैं, वही नियम छोटे निर्माणों, यहाँ तक कि एक दो कमरों वाले मकान पर भी लागू होते हैं जिनके पास एक ही कमरा है, इस एक कक्षीय कमरे में भी उत्तर-पूरब का कोना अर्थात् ईशान कोण को पूजा-स्थल के रूप में विकसित करके पूजा उपासना करनी चाहिए। इस कोने के पूरब उत्तर वाली दीवाल के सहारे एक छोटी चौकी पर या दीवाल में आला बनाकर अपने इष्टदेव या आराध्य का चित्र या मूर्ति स्थापित कर उपासना करनी चाहिए। भारी समान रखकर या चबूतरा बनाकर इस कोने का अनावश्यक भार नहीं बढ़ाना चाहिए।
बनाकर इस कोने का अनावश्यक भार नहीं बढ़ाना चाहिए। इससे लाभ के स्थान पर हानि होती है। उपासना की दृष्टि से श्रेष्ठतम स्थिति वह मानी गई है, जिसमें इष्टदेवता का मुख पश्चिम की ओर एवं साधक का मुख पूरब की ओर होता है। इससे मन की एकाग्रता सधती है, स्वास्थ्य ठीक रहता है तथा साधना की सफलता मिलने में देर नहीं लगती। गायत्री महाशक्ति के सच्चे उपासक इस तथ्य से भली-भाँति परिचित है।
यहाँ इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि धर-परिवार में एक ही पूजा -कक्ष या उपासना-स्थल रहें। पारिवारिक एकता के लिए यह बहुत आवश्यक है। एक पूजा-कक्ष होने पर परिवार में एकता, समरसता एवं स्नेह-सद्भाव बना रहता है। अनेक पूजा -कक्ष होने पर उनका अवमूल्यन होने लगता है। और वे अपनी पवित्रता गँवा बैठते है। इसी तरह अपने पूजा -गृह में अनेक प्रकार के देवी-देवताओं के चित्र आदि नहीं रखने या टाँगने चाहिए, अन्यथा कालांतर में वे मात्र सजावटी वस्तु बनकर रह जाते है। ईशान कोण सुख शाँति, समृद्धि एवं प्रगति प्रदान करने वाली दिशा है अतः इसे सदैव स्वच्छ एवं पवित्र रखना चाहिए। इस दिशा में भूलकर भी भारी सामान, आलमारी टेबल आदि, यहाँ तक कि लाठी, डंडा, झाडू आदि कुछ भी नहीं रखना चाहिए अन्यथा शारीरिक व मानसिक आधि-व्याधियाँ जैसे तनाव व बीमारियाँ घेर रहेगी। आर्थिक संकट बना रहेगा। इसलिए इस कोने को स्वच्छ पवित्र व खाली रखना चाहिए, चाहे वह अपने सोने का कमरा ही क्यों न हो।
किंतु पाठकों को एक तथ्य यह ध्यान रखना चाहिए कि सारी परिस्थितियों के बिगड़ने का कारण मात्र धर का निर्माण ही नहीं है। अपनी विषम परिस्थितियाँ के लिए हम स्वयं भी उत्तरदायी हो सकते है। अतः पहले कारण स्वयं में तलाशना चाहिए। यदि घर पूर्व निर्मित हों-सरकार द्वारा हाउसिंग स्कीम में प्रदत्त हो अथवा आवास के रूप में किराए पर दिए गए हो, उनमें अनावश्यक धन लगाकर अव्यय करने की कोई आवश्यकता नहीं, जितना संभव हो सके, यत्किंचित् सुधार मात्र से जितना वास्तु का पालन हो सकें, करना चाहिए। ऋषियों की प्रत्येक विद्या को तरह वास्तु में भी शोधन-उपचार का प्रावधान है। उस उपचार में क्या किया जाना है, यह आगामी क्रम में बताया जायेगा। दूसरे-जहाँ खूब आध्यात्मिक तपश्चर्या हुई हो, जहाँ निरंतर श्रेष्ठ चिंतन करने वाले व्यक्ति साथ रहते हों, जिस स्थान को किसी महामानव ने अपनी पदरज से पवित्र किया हो-वह स्वतः एक देवालय बन जाता है उस पर कोई विधि नियम लागू नहीं होता। अतः इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए नवीन निर्माण के पूर्व इस लेखमाला में वर्णित विवरण को लागू किया जाए, तो कोई असमंजस किसी भी प्रकार का पाठकों -परिजनों को न होगा। यह टिप्पणी मात्र उन सभी जिज्ञासाओं का समाधान करने के लिए उद्धत की गई है, जो सहज ही किसी के मन में उठ सकती है।
विपत्ति से लड़िए
कहते है कि ‘विपत्ति अकेले नहीं आती। वह अपने साथ और भी अनेकों मुसीबतें लिए आती है।’ कारण स्पष्ट है कि प्रतिकूलता से घबराया हुआ मनुष्य यह सोच नहीं पाता कि अब उसे क्या करना चाहिए। साधारण कठिनाइयों से पार होने में ही काफी धैर्य, सूझबूझ और दूरदर्शिता की आवश्यकता पड़ती है, फिर कुछ अधिक परेशानी की बात हो, तब और भी अधिक सही मानसिक संतुलन अभीष्ट होता है यह न रहे तो विपत्तिग्रस्त मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ होकर प्रायः वह करने लगता है, जो न करना चाहिए था। फलस्वरूप विपत्ति की नई शाखाएँ फूट पड़ती हैं और कठिनाई का नया दौर आरंभ हो जाता है। अतः विपत्तियों से निपटने के लिए संतुलन कभी नहीं खोना चाहिए, बल्कि चौगुने साहस तथा धैर्य के साथ उसमें जुटे रहना चाहिए।
एक लकड़हारा जंगल से लकड़ी काटकर किसी प्रकार दुख और कष्ट सहते हुए, अपने दिन व्यतीत करता था। एक दिन वह जंगल में पतली-पतली लकड़ी सिर पर ला रहा था कि अकस्मात् कोई मनुष्य उसी रास्ते में जाते-जाते उसे पुकार कर बोला-बच्चा आगे बढ़ जा। दूसरे दिन वह लकड़हारा उस मनुष्य की बात याद कर कुछ दूर आगे बढ़ा तो मोटी-मोटी लकड़ियों का जंगल उसको दीख पड़ा। उस दिन उससे जहाँ तक बना, लकड़ी काट लाया और बाज़ार में बेचकर उसके पहले दिन से अधिक पैसा कमाया। तीसरे दिन फिर मन में विचार करने लगा-उस महात्मा ने तो मुझे आगे बढ़ जाने को कहा था। भला आज और थोड़ा आगे बढ़कर देखूँ।’ यह सोचकर वह आगे बढ़ गया और उसे एक चंदन का वन दिखाई पड़ा। उस दिन उसने चंदन की लकड़ी बेचकर बहुत रुपये कमाये। दूसरे दिन उसने फिर मन में विचार किया कि मुझे तो उन्होंने आगे ही जाने को कहा है, यह विचार कर और आगे जाकर उस दिन उसने ताँबे की खान पाई। वह यही पर न रुककर प्रतिदिन आगे ही बढ़ता गया और क्रमशः चाँदी, सोने और हीरे की खान पाकर बड़ा धनवान् हो गया। धर्म मार्ग में भी इसी प्रकार होता है।
आत्मिक क्षेत्र से आदमी को कभी भी रुकना नहीं चाहिए। उस साधु ने जो आगे बढ़ने की शिक्षा दो थी, उसका मर्म था-रुक मत, चलता जा, जब तक गंतव्य तक न पहुँच जाए। अपने अंदर झाँक व तब तक आत्मावलोकन -विश्लेषण -मनन कर, जब तक प्रगति की राह न दिखाई पड़े। थोड़ी-बहुत ज्योति आदि का दर्शन कर यह मत समझो कि तुम्हें सिद्धि मिल गई, मोक्ष प्राप्त हो गया।”
इस संबंध में संत का कथन सही है-
कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूंढ़े वन माँहि। ऐसे घट -घट राम है, दुनिया नाहि॥
तेरा साई तुझी में, पुहुपन में है वास। कस्तूरी का हिरण ज्यों, फिर फिर ढूँढ़त घास
आत्मावलम्बी, किसी अनुग्रह -वरदान की प्रतीक्षा नहीं करते -न ही याचना, वरन् प्रगति का पथ स्वयं बनाते हैं, अपनी सहायता आप करते हैं।
शताब्दियों की पराधीनता, आत्मविस्मृति और निद्रा के बाद नारी चेतना अंततः जाग उठी है और उत्तरोत्तर प्रगति के नए पग बढ़ा रही है, जो मानव समाज के उज्ज्वल भविष्य का शुभ संकेत है। पश्चिम में उग्र पुरुष विरोधी रूप में उभरा अपनी स्वतंत्रता एवं अधिकारों का उद्घोषक नारी मुक्ति संघर्ष अब मानवीय मूल्यों के व्यापक मुद्दों को समेटते हुए अपने प्रगतिपथ पर अग्रसर है। नारी जागरण की इस लहर से विश्व के पिछड़े देश भी अछूते नहीं हैं। अंतर्राष्ट्रीय महिला संगठन के अंतर्गत विश्वभर के सभी देश हर साल छह मार्च को महिला जागरण दिवस मनाने का सार्थक उपक्रम करते हैं। भारत में 11वीं सदी के अंतिम दशकों में सामाजिक एवं साँस्कृतिक पुनर्जागरण से प्रारंभ नारी जाग्रति का दौर स्वतंत्रता प्राप्ति व उसके बाद अब तक एक लंबी यात्रा तय कर चुका है। वस्तुतः 20वीं सदी के प्रथमार्द्ध को नारी जाग्रति एवं उत्तरार्द्ध को नारी-प्रगति का काल कहा जा सकता है।
इसी के परिणामस्वरूप नारी आज घर की बंद चारदीवारी के बाहर खुली हवा में साँस ले पा रही है। शिक्षा स्वावलंबन के महत्वपूर्ण पाठ पढ़ते हुए अपने अधिकारों एवं स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत है और जीवन के हर क्षेत्र में पदार्पण कर रही है। शिक्षण-चिकित्सा से लेकर प्रशासन-राजनीति व उद्योग व्यवसाय, वकालत से लेकर पर्वतारोहण सैन्य सुरक्षा जैसे चुनौती भरे एवं पुरुषों के एकाधिकार वाले क्षेत्र कोई भी उससे अछूते नहीं रहे। प्रगति की इस दौड़ में कही-कही तो वह पुरुष से भी दो कदम आगे बढ़ चली है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह अब अपने उस गौरवशाली पद पर प्रतिष्ठित होकर ही दम लेगी, जहाँ उसे कभी मनुष्य में देवत्व का जागरण कर धरती पर स्वर्गोपम वातावरण के सृजन का सौभाग्य प्राप्त था। तब साँस्कृतिक चेतना की संवाहक होने के कारण ही वह देवी के रूप में पूजित एवं वंदित थी। उन दिनों का समाज भी ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्यते तत्र देवता’ का उद्घोष कर रहा था।
कालक्रम में अवसान के क्षणों में जब अपनी गौरव-गरिमा विस्मृत हुई तो समाज भी घोर-घने अंधकार में जकड़ता चला गया। नारी चेतना के लोभ के साथ ही राष्ट्र-समाज का जड़ता के घोर तमस् में पड़ जाना और विदेशी शासकों की लंबी पराधीनता इसका स्वाभाविक किंतु दुखद पहलू है। अब फिर से समय ने करवट ली है और नारी जाग्रति का दौर शुरू हुआ। जाग्रति के साथ सुगति की दिशा में अग्रसर नारी के पग समाज, संस्कृति और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य को आशान्वित करते प्रतीत होते हैं। किन्तु इस अवस्था में भ्रम की मृग-मरीचिका भटकाव के घुमावदार मोड़, पतन के खाई-खंदक भी कम नहीं हैं, जो कि उसके जागरण, मुक्ति व स्वतंत्रता, प्रगति के आदर्श एवं दिशा पर सवालिया निशान लगाते हैं। इन चुनौतियों से जूझे बिना, इनका समुचित समाधान किए बिना उसके संघर्ष एवं प्रगति के मायने अधूरे बने रहेंगे।
भटकाव का प्रथम मोड़ है - अपनी मौलिक साँस्कृतिक गरिमा को भुलाकर पाश्चात्य अंधानुकरण की प्रवृत्ति जिसके अंतर्गत नारी-पुरुष से प्रतिद्वंद्विता एवं संघर्ष का आक्रामक रुख अख़्तियार कर अपने अधिकारों के प्रति अत्यधिक सचेत है किन्तु कर्तव्य के प्रति उदासीन। परिणाम आपसी कटुता, विवाद एवं अशान्ति के रूप में सामने है। इसी के कारण संयुक्त परिवार के बिखराव के बाद आजकल परिवारों में भी दरारें पड़ने लगी हैं। बढ़ते पारिवारिक कलह, तलाक, हिंसा, अपराध एवं आत्महत्याओं की घटनाएँ इसकी घातकता के गंभीर संकेत दे रहे हैं। इसमें नारी ही प्रधानतया दोषी है- कहना न्यायसंगत तो नहीं होगा, परन्तु समानता अधिकार का अत्याग्रह एवं कर्तव्य विमुखता इसका एक बड़ा कारण अवश्य है।
पश्चिम में तो इस मानसिकता के चलते परिवार एवं विवाह संस्थाओं की धज्जियां उड़ चुकी है। इस समय यूरोप में दो करोड़ दंपत्ति तलाकशुदा जीवन जी रहे हैं। जिनके 70 लाख बच्चे अनाथों का सा जीवन जीने के लिए विवश हैं। अमेरिका में यह उक्ति प्रचलित है कि वहाँ शादी एवं तलाक में करवट बदलने से अधिक समय नहीं लगता। वैयक्तिक एवं पारिवारिक सामाजिक जीवन में इसके घातक दुष्परिणामों को देखते हुए अमेरिका में स्वयं को नारीवादी न कहलाने वाली महिलाओं की संख्या में तीव्रता से बढ़ोत्तरी हो रही है। 1989 में जिनकी संख्या 58 प्रतिशत थी, आज वे 70 फीसदी से भी अधिक बढ़ चुकी है।
वास्तव में पश्चिमी महिलाओं के उग्र पुरुष विरोधी रवैये की जड़े गहरी हैं। वहाँ की संस्कृति एवं दर्शन ने नारी को पुरुष से सदैव हीन माना है और उसे अमानवीय एवं पाशविक यंत्रणाओं को सहने के लिए मजबूर किया है। उनके धर्मग्रन्थों में उसे शैतान की कृति माना है, जो सृष्टि में ईश्वर की एकमात्र प्रतिकृति पुरुष को नष्ट करने, स्वर्ग से पृथ्वी पर धकेलने का कारण थी। पृथ्वी पर प्रथम पाप एवं अपराध उसी ने किया। वर्तमान पोप जाँन पाँल के अनुसार स्त्रियाँ पुरोहित नहीं हो सकती, क्योंकि उनमें शारीरिक समानता नहीं होती। इन्हीं धारणाओं के चलते वह सदैव उपेक्षित ही नहीं घोर यंत्रणा, जुगुप्सित प्रताड़ना और वंचना की शिकार रही।
वहाँ 5वीं सदी से लेकर 20 वीं सदी कि शुरुआत तक तो यही चर्चा का विषय बना रहा कि नारी मानव है भी या नहीं। शताब्दियों के पाशविक दमन एवं यातनाओं के कारण ही पश्चिम की नारी अभी भी आत्मदैन्य, आत्मधिक्कार के तहत कभी फैशन के नाम पर स्वयं को निर्वस्त्र करती है, कभी डायटिंग के नाम पर स्वयं को भूखा मारती है। पुरुष के साथ बराबरी के नाम पर उसका व्यवहार कभी अमर्यादित तो कभी विवेक की सीमा पार कर जाता है। उसके शरीर मन व अस्तित्व पर अत्याचार घोर दमन व यातना के इतने नासूर है कि उसका पुरुष विरोधी स्वरूप स्वतंत्रता एवं अधिकारों के लिए आक्रामक संघर्ष बड़ा ही स्वाभाविक जान पड़ता है, किंतु अब वह भी अपने कर्तव्यविमुख एकांगी संघर्ष के दुष्परिणामों से परिचित होकर उसे और अधिक मानवीय रूप देने को तत्पर है। इसी करण वहाँ नारी आंदोलन अब अधिकार व बराबरी की माँगों से ऊपर उठकर विकास से भागीदारी नीति निर्धारण में भागीदारी, स्वास्थ्य, शिक्षा, समाज, कल्याण, शोषण, मुक्ति, हिंसा मुक्त समाज और युद्धरहित विश्व जैसे मानवीय पक्षों को समेट रहा है।
पश्चिम से सर्वथा भिन्न हमारे यहाँ के साँस्कृतिक एवं दार्शनिक मूल में नारी का गौरवपूर्ण एवं पुरुष से श्रेष्ठतर स्थान रहा है। मध्ययुगीन अंधेर काल के अतिरिक्त सदैव ही नारी के प्रति बराबरी एवं सम्मान का भाव रहा है। भारतीय वांग्मय में बल न स्त्री पर है न पुरुष पर, वह तो इन सबसे परे है। यहाँ तो आदिकाल से ही भगवान को देवी रूप में, माता के रूप में पूजा गया है। अर्द्धनारीश्वर जैसी परिकल्पना भी कही अन्यत्र नहीं ही मिलेगी। इसका वैज्ञानिक आधार भी स्वयं में परिपुष्ट है। भारतीय दर्शन में प्रकृति पुरुष इन दोनों तत्वों को सृष्टि का आधार माना है, केवल पुरुष को नहीं। दोनों तत्व परस्पर सहयोगी एवं पूरक है। दोनों ही एक-दूसरे के बिना अधूरे है। इस दृष्टि से समाज में नारी को दोयम दर्जा देने का कोई दार्शनिक आधार नहीं मिलता हमारे प्राचीनकाल में था भी नहीं। स्त्री यहाँ ऋषिका थी और पुरोहित भी। घर परिवार में वह गृह स्वामिनी के रूप में गृहिणी, पुरुष की अभिन्न सहचरी के रूप में अर्द्धांगिनी, गृह की श्री समृद्धि के रूप में गृहलक्ष्मी आदि अलंकारों से सुशोभित थी। कोई भी अनुष्ठान, अभियान एवं कर्म उसके बिना पूरा नहीं माना जाता था।
नारी प्रगति के वर्तमान चरण में पुरुष उसके सही दिशा में बढ़ते कदमों को गति व सहयोग न दे ऐसा कोई कारण नहीं है। 11वीं सदी के अंतिम दशकों में नारी को शताब्दियों के पारिवारिक प्रतिरोधों से मुक्त करवाने का बीड़ा राजाराममोहनराय, स्वामी दयानंद स्वामी विवेकानन्द जैसे उदारचेता सुधारकों एवं संस्कृति पुरुषों ने ही उठाया था। रवीन्द्रनाथ टैगोर, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, प्रेमचंद्र प्रसाद पंत, निराला, जैसे साहित्यकारों ने ‘नारी हो स्वतंत्र नारी जैसे नर’ की उद्घोषणा की थी। नारी को शक्ति और तेज की साक्षात प्रतिमा कहकर नारी जागरण का संदेश दिया था। नर-नारी के समान अधिकार की घोषणा करते हुए युगद्रष्टा कवि प्रसाद ने कहा था।
“तुम भूल गए पुरुषत्व मोह में कुछ सत्ता है नारी की समरसता है संबंध बनी, अधिकार और अधिकारी की।”
इन्हीं प्रयासों को गति दी थी, डॉ. कर्वे और महात्मा गाँधी जैसे मनस्वियों ने, जिसके परिणामस्वरूप हजारों महिलाएँ राष्ट्रीय स्वतंत्रता के अभियान में कूद पड़ी।
इक्कीसवीं सदी की नारी को समाज-नियंता बनने के लिए अपने अधिकार माँगने की नहीं, अर्जित करने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में आरक्षण की बैसाखियाँ उसे प्राथमिक चरणों में सहारा हो सकती है, किन्तु अधिक दूर तक नहीं ले जा सकती। अर्जित अधिकार ही उसका वास्तविक सहारा एवं संपत्ति होगी। जिसे कोई छीन नहीं सकता। अर्जित तेज के आगे हर किसी को झुकना पड़ता है। किन्तु अधिकारों के संघर्ष में पुरुष से बराबरी के नाम पर स्त्रियोचित गुणों एवं कर्तव्यों का बलिदान उचित नहीं है। वह ममता वात्सल्य उदारता, सहिष्णुता जैसे नारी सुलभ गुणों के कारण ही पुरुषों की सहयोगिनी ही नहीं उसकी जीवनदायिनी एवं प्रेरणाशक्ति सिद्ध हुई है। इन्हीं विशेषताओं के कारण ही उसका दर्जा पुरुषों की तुलना में श्रेष्ठ सिद्ध होता है। इसी उदात्त गुणकारी नारी के विषय में काययिनीकार प्रसाद यह कहने के लिए विवश हुए थे कि -
नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नभ पद तल में पीयूष स्रोत-सी बहा करो, जीवन के सुँदर सममतल में।
नारीमुक्ति के नाम पर उच्छृंखलता को स्वतंत्रता का पर्याय मान बैठना व स्त्रियोचित मर्यादाओं एवं आदर्शों को ताक पर रखकर उन्मुक्त आचरण करना भ्रम की मृगमरीचिका में भटकाव का दूसरा मोड़ है। आधुनिकता के नाम पर जिस पाश्चात्य सभ्यता के पीछे वह आँखें मूँदकर भाग रही है, वह कितनी खतरनाक सिद्ध हो सकती है, यह तभी ज्ञात होता है जब जारी किसी हादसे का शिकार होती है। स्वतंत्रता, नारीमुक्ति का यह अर्थ नहीं कि वह विवेक की सारी सीमाएँ तोड़कर ऐसे आगे बढ़ें कि उसका समूचा जीवन ही अंधकारमय हो जाए।
भौतिकता प्रधान इस युग में सौंदर्य की परिभाषा भी शरीर तक ही सिमट कर रह गयी है, जिसे भुनाने में बाजारू व्यवस्था कोई कसर नहीं छोड़ रही है। विज्ञापनों में इसके अश्लील एवं उत्तेजक व्यवसाय के अच्छे-खासे दर्शन किए जा सकते हैं। टी.वी. फिल्म व अन्य संचार माध्यम भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। नारी को मात्र एक भोग्य वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
यह सब युवा पीढ़ी एवं मासूम मस्तिष्कों पर किन संस्कारों की छाप डाल रहे हैं व जीवन में किस तरह का जहर घोल रहे हैं, इसकी कल्पना कंपा देने वाली है। नई पीढ़ी को गढ़ने वाली, उसकी श्रेष्ठ संस्कार देने वाली, नारी किस तरह अपनी स्वतंत्रता मुक्ति के नाम पर उसकी जड़ों पर कुठाराघात करने वाली की भूमिका में आ गई है, इसे देखकर गहरी पीड़ा होती है। नारी को इस रूप में प्रस्तुत करने में पुरुष के अपने स्वार्थ हो सकते हैं, किन्तु यह सब बिना नारी समझौते के संभव नहीं है।
आज नारी-स्वतंत्रता के नाम पर उच्छृंखलता को स्वतंत्रता मान बैठने और अपनी देह को अधिकाधिक उत्तेजक रूप में प्रस्तुत करने एवं स्वयं को बोल्ड मानने की पाश्चात्य धारणा प्रबल है। नारी-गरिमा का यह कुत्सित एवं घातक प्रचलन तथाकथित प्रगतिशील समाज में अधिक देखा जा सकता है। यद्यपि कस्बे, गाँव-देहात भी इससे अछूते नहीं रह पाए है। इसी हवा के चलते आज युवतियों के आदर्श हॉलीवुड-बॉलीवुड की कलानेत्रियों एवं फैशन मॉडलों के दायरे में ही जा सिमटे हैं। झाँसी की रानी, सिस्टर निवेदिता जैसे आदर्शों को तो उन्होंने पिछड़ेपन एवं हीनता का पर्याय मान लिया है।
इस कुप्रचलन ने नारीसुलभ संस्कारों की जड़ों पर बुरी तरह से कुठाराघात किया है। वहीं इससे विवाह एवं परिवार संस्था भी चरमराई है। आज दाम्पत्य जीवन अविश्वास, कलह एवं अशान्ति की नरकाग्नि में झुलस रहा है। नई पीढ़ी असुरक्षित एवं भ्रमित है। इससे उबरने का उपाय यही है कि नारी भोगवादी संस्कृति के कुचक्र से मुक्त हो। स्वतंत्रता की जो अनमोल निधि उसे वर्षों के घोर संघर्ष के बाद मिली है, उसे पाश्चात्य अंधानुकरण के नाम पर दाँव पर नहीं लगाया जाना चाहिए। इस अमूल्य धरोहर को सहेज कर रखना ही उचित है। अपनी स्त्रियोचित मर्यादा एवं गरिमा के अंतर्गत उसे अपनी संस्कृतिवाही चेतना में ही उसे स्वयं की पहचान खोजनी होगी। तभी विवाह संस्था की पवित्रता एवं परिवार संस्था की गरिमा बनी रह सकेगी।
अपनी प्रगति के साथ जाग्रत नारी को लाखों पिछड़ी बहिनों को भी साथ लेकर चलना होगा। उनके दुख-दर्द को बाँटकर उन्हें भी प्रगति की राह पर चलना सिखाना होगा। उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा के प्रति जागरूक करना होगा। आर्थिक स्वावलंबन का पाठ पढ़ाना होगा। यदि प्रगति की दिशा में अग्रसर जाग्रत नारी इतना कर पाई तभी उसकी स्वतंत्रता मुक्ति एवं अधिकारों का संघर्ष सीधा उस लक्ष्य का संधान करेगा। जो नियति ने उसके लिए सुरक्षित रखा है। यही पर प्रतिष्ठित होकर उसे 21वीं सदी में परिवार एवं समाज ही नहीं समूची मानवजाति की निर्मात्री, भाग्यविधात्री का महिमामय दायित्व निभाना है।
आद्यशंकराचार्य का एक विदुषी महिला भारती से शास्त्रार्थ हुआ। धर्म-दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान आचार्य शंकर अन्य विषयों में तो जीत गए, किंतु एक विषय में उनका अनुभव न होने से शास्त्रार्थ प्रक्रिया को बीच में ही रोकना पड़ा। तत्काल तैयारी न होने से उन्होंने इसके लिए समय माँगा। विषय था- ‘कामशास्त्र’। विदुषी महिला जानबूझकर इस पर अड़ी हुई थी कि इस विषय पर भी अपनी पूर्ण मर्यादा में शास्त्रार्थ किया जाए।
आद्यशंकराचार्य ने इस अवधि में परकाया प्रवेश सिद्धि का प्रयोग कर मृत राजा के शरीर में प्रवेश किया और गृहस्थ जीवन संबंधी यौन विज्ञान का अनुभव अर्जित किया। जब नियत अवधि पूरी हुई तो उन्होंने राजा की काया में से अपना सूक्ष्मशरीर निकाल कर स्थूल काया में प्रवेश कर लिया। तदुपरान्त शास्त्रार्थ हुआ एवं अर्जित अनुभवों के आधार पर, अपने तर्कसंगत प्रतिपादनों के कारण आचार्य शंकर विजयी घोषित किए गए। यह सूक्ष्मीकरण साधना की सिद्धि का ही एक अंग है। योगविद्या में निष्णात व्यक्ति अपनी चेतनसत्ता को स्थूलकाया से कभी भी अलग व संबद्ध कर सकते है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं।
भूतों की सत्ता और वास्तविकता के संबंध में अब तक जो शोध अनुसंधान हुए हैं, उनसे यह बात निर्विवाद रूप से सत्य सिद्ध हो गई है कि मरने के उपरांत भी मनुष्य के अस्तित्व का सर्वथा लीप नहीं हो जाता। वह तब भी बना रहता और पुनः पुनः जन्म धारण करता है। मरने और जन्मने के इस मध्यवर्ती अंतराल में कुछ जीवात्माएं भटकती रहती और तरह तरह के उपद्रव करती है। यही भूत हैं।
प्रेतों के संबंध में अब तक जो घटनाएँ देखने-सुनने में आई हैं, उनमें से अधिकाँश रोमांचकारी एवं भयोत्पादक होती है। कई बार तो सामने वाला इनसे इतनी बुरी तरह भयाक्रान्त होता है कि पागल होने से लेकर मृत्यु तक की घटनाएँ घटती देखी जाती है। इसमें प्रेत की उतनी भूमिका नहीं जितनी स्वयं के हीन मनोबल की होता है। अधिकतर मामलों में दुर्घटना भयवश घटती है।
आए दिन इस प्रकार के प्रसंग प्रकाश में आते रहते हैं। एक घटना स्पेन की है। कोरडोबा शहर के निकट बेलमेज के समीप के एक गाँव में एक वृद्ध महिला रहती थी। एक दिन वह अपने चार वर्षीय पौत्र के साथ अपने भोजनालय में कुछ कर रही थी। इतने में लड़के की तेज चीख निकल गई। वृद्ध ने चौंकते हुए उसकी ओर देखा और करण जानना चाहा। भयभीत बालक ने अंगुली के इशारे से फर्श की ओर संकेत किया। दृष्टि वहाँ पड़ते ही वह बुढ़िया भी डर गई। गुलाबी ईंटों से बने फर्श में एक दुखी और संतप्त चेहरे की आकृति झाँक रही थी। पहले तो उसने इसे आँखों का भ्रम माना, पर बार-बार आँखें मलने पर भी जब वह ज्यों की त्यों बनी रही, तो सोचा कि शायद चलने फिरने से रगड़वश मुखाकृति जैसा आकार उभर आया हो। उसने उसे घिसकर मिटाना चाहा, किंतु उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब देखा कि रगड़ने से मिटने के स्थान पर चेहरा और अधिक सुस्पष्ट होता गया। उसमें विवाद और उदासी की रेखाएँ और गहराती चली गई। अब वह अंदर से बुरी तरह डर गई और कुछ अनहोनी की आशंका से तत्काल वहाँ से बाहर निकल गई। मकान मालिक को सूचित कर अविलम्ब बुलवाया गया। संपूर्ण वृत्तांत सुनने के बाद उसने ईंटों का फर्श उखड़वाकर कंक्रीट का फर्श बनवा दिया। चार दिन में वह बनकर तैयार हो गया। वृद्धा अब निश्चित थी कि उस अप्रिय प्रसंग से मुक्ति मिली, लेकिन तभी तीन सप्ताह भी नहीं बीते थे कि वह विपदा पुनः आ धमकी। इस बार भिन्न मुखाकृति थी। स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना दी गई। उन्होंने वहाँ की जमीन खुदवाई, तो एक मध्ययुगीन कब्र के अवशेष मिले। अब रसोईघर के सम्पूर्ण फर्श पर एक के बाद दूसरी और फिर समूह में आकृतियाँ उभरने लगी। इसके पश्चात् उसे ताला लगाकर सील कर दिया गया। अब दूसरे कमरे में चार अन्य आकृतियाँ उभरी। पड़ताल कर्ताओं ने तब कुछ अति संवेदनशील माइक्रोफोन वहाँ लगाए। यह जानकर उन्हें अचंभा हुआ कि यंत्रों ने कुछ ऐसी कर्णातीत ध्वनियाँ रिकार्ड की है, जिनमें तड़पनयुक्त विलाप के साथ-साथ अजनबी भाषा में वार्तालाप भी थे। कुछ दिन उपरांत उनका यह उपद्रव आश्चर्य जनक ढंग से शाँत हो गया। वे जिस प्रकार अकस्मात् प्रकट हुई थी, वैसे ही अचानक गायब भी हो गई, किन्तु यह अब तक नहीं जाना जा सका कि इसके पीछे उनका प्रयोजन क्या था?
सूरा स्थिति रोमन राजदूत प्लीनी ने अपने अभिलेखों में एथेंस स्थित एक ऐसे भुतहे मकान की चर्चा की है, जो प्रेत के उत्पातों के लिए कुख्यात था। प्रसिद्ध रोमन दार्शनिक एथेनोडोरस ने भी अपनी रचनाओं में यत्र-तत्र उसका उल्लेख किया है। वे स्वयं भी उसके उपद्रवों को देख चुके थे। एक बार जब वे उस मकान में गए, तो देखा कि एक प्रेत भारी-भरकम जंजीर खींच रहा है। थोड़ी देर उसे इधर-उधर खींचने के पश्चात् वह आँगन में एक स्थान पर आकर खड़ा हो गया। इसके उपरांत देखते-देखते अदृश्य हो गया। उस स्थान की उन्होंने पहचान कर ली और अगले दिन वहाँ खुदाई करवायी। खुदाई में जंजीरों में जकड़ा एक कंकाल मिला। उसका धार्मिक रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार कर देने के बाद फिर वह प्रेत वहाँ कभी नहीं दिखाई पड़ा। कदाचित उसकी मुक्ति हो गई हो।
लंदन टावर, जो कि सदियों से अगणित रक्तपात का साक्षी रहा है, वह भी प्रेतों के कारनामों से अछूता नहीं है। वहाँ जिस महिला का प्रेत अधिकतर देखा जाता है, वह है -एनी बोलेन का। एनी हेनरी अष्टम की पत्नी थी, जो लंदन के इसी दुर्ग में कैद कर ली गई थी और बाद में वही सन् 1836 में उसे फाँसी दे दी गई। तब से अब तक वह समय समय पर कभी लंदन दुर्ग में, तो कभी संट पीटर एड विक्युलर के प्रार्थनालय में दिखाई पड़ती है। उल्लेखनीय है कि उसकी कब्र यहीं पर है। संभवतः वह अभी भी भटक ही रही है। अभी विगत कुछ वर्ष पूर्व की ही एक घटना है। एक रात प्रार्थनालय का पहरेदार वहाँ एक तीव्र प्रकाश देखकर चौंक पड़ा। कारण जानने के लिए जब उसने कमरे की खिड़की से बाहर निहारा, तो दंग रह गया। उस प्रकाश में एक जुलूस वहाँ से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था, जिसका नेतृत्व स्वयं एनी कर रही थी। कुछ क्षण बाद दृश्य तिरोहित हो गया। अब न तो वहाँ कोई रोशनी थी, न भीड़ ही। प्रार्थनालय ने निविड़ अंधकार व्याप्त था।
एक अन्य अवसर पर वह लंदन दुर्ग में दिखाई पड़ी। यह 1864 की बात है। एक रात वहाँ का संतरी पहरा देते हुए मूर्च्छित हो गया, उस पर आरोप यह लगा कि वह सुरक्षा ड्यूटी के दौरान सो जाता है। उसका कोर्टमार्शल हो गया। उसमें अपनी ओर से सफाई देते हुए कहा कि वह वास्तव में सोया नहीं, बेहोश हो गया था। इसके पश्चात् उसने रात्रि का संपूर्ण वृत्तांत कह सुनाया। उसका कहना था कि पहरा देते समय उसने एक श्वेत वस्त्रधारी आकृति देखी। वह किले में इधर-उधर घूम रही थी। उसने एक अनूठे ढंग की टोपी पहन रखी थी। विचित्र बात यह थी कि उस टोपी के नीचे उसका सिर गायब था। पहले तो उसने उसे ललकारा, पर आकृति पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह यथावत घूमती रही। संतरी ने कई आवाजें लगाई, लेकिन हर बार उस ओर से अपेक्षा होते वह उसके समीप पहुँचा और संगीन उसके शरीर में अंदर तक घुसा दिया। इसके साथ ही एक लपलपाती ज्वाला उसकी ओर तेजी से बढ़ी। फिर उसे कुछ भी ज्ञात नहीं कि क्या हुआ। वह संज्ञाशून्य बनकर गिर पड़ा। अधिकारियों ने जब देखा, तब वह इसी स्थिति में पड़ा हुआ था। दूसरी रात उसके इस कथन की जाँच की गई, जिसमें वह सत्य साबित हुआ और उसे बरी कर दिया गया।
कई अवसरों पर एनी अपने बचपन के नाँरफाँर स्थित मकान में भी उपस्थित हो जाती थी। उसे जब-जब वहाँ देखा गया, तब-तब वह एक भूतही गाड़ी में सवार थी। अनेक बार लंदन टावर में अभियुक्तों के फाँसी के दौरान भी वह अपनी विद्यमानता दर्शा जाती। अंतिम बार उसको बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में देखा गया।
मार्टिन दुर्ग से भी कुछ इसी प्रकार के प्रसंग जुड़े हुए हैं। एडवर्ड स्वीफ्टे वहाँ के आभूषण कक्ष का रक्षक था। वह परिवार सहित मार्टिन टावर में ही रहता था। एक बार बज वे लोग भोजन कर रहे थे, तो खाने की मेज़ के ऊपर काँच की एक मोटी नली मंडराती दिखलाई पड़ी। उसमें नीला-श्वेत द्रव भरा हुआ था। एडवर्ड ने जब उसे पकड़ने की कोशिश की, तो हाथ से छिटककर वह दूर जा गिरा और फर्श से टकराकर चकनाचूर हो गया। अंदर का द्रव जमीन पर फैलकर उसे नीली बना दिया। एडवर्ड कुर्सी से उठकर जब वहाँ पहुँचा, तो वह ठगा सा रह गया। वहाँ न तो काँच का कोई टुकड़ा था न कोई रंगीन द्रव। वह इसे आँखों का भ्रम भी मानने को तैयार नहीं, कारण कि धोखा किसी एक को हो सकता है, पूरे परिवार को नहीं। अंततः उसे भूत का उपद्रव मान लिया गया, जो अक्सर वहाँ होता रहता था।
कुछ दिन बाद एक अन्त संतरी ने देखा कि जवाहरात कक्ष में बगल के कमरे से एक भालू चला आ रहा है। वह अभी दरवाजे के करीब ही था कि पहरेदार उस पर झपटा और अपना संगीन दे मारा, पर उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उसने देखा कि उसकी संगीन दरवाजे की लकड़ी से जा टकराई और वहाँ कुछ भी नहीं है। अभी वह इसी उधेड़बुन में था कि एक जो का अट्टहास सुनायी पड़ा। वह बुरी तरह घबरा गया और डरकर बाहर की ओर भागा। थोड़ी देर में सब कुछ सामान्य हो गया।
ऐसे ही एक अनुभव का उल्लेख करते हुए ब्रिटेन के नेशनल लेबोरेट्री ऑफ साइकिकल रिसर्च के संस्थापक एवं प्रेत प्रसंगों के अनुसंधानकर्ता हैरी प्राइस कहते है कि एक बार वे अपनी टीम के साथ प्रयोगशाला में प्रवेश कर रहे थे, तो उन्होंने वहाँ के तापमान में अत्यधिक गिरावट महसूस की। नापने पर ज्ञात हुआ कि अंदर का तापमान बाहर से दस डिग्री कम था। यह बहुत ही आश्चर्यजनक और हैरानी वाली बात थी, कारण कि कमरे के भीतर का तापक्रम हमेशा बाहर की तुलना में कुछ ज्यादा ही होता है, किन्तु यहाँ तो बात बिलकुल उलटी थी। वे इस बारे में अभी विचार कर ही रहे थे कि प्रयोगशाला में अगरबत्ती जलने जैसी खुशबू आने लगी। इसके साथ ही पत्थरों और साबुन की टिकियाओं की बौछार शुरू हो गई। पुस्तकें इधर से उधर स्वतः होने लगी। आए दिन होने वाले इस प्रकार के उत्पातों से परेशान होकर हैरी प्राइस ने एक दिन एक सयाने को बुलाया। वह उपद्रव शाँत करने के लिए अपना ताँत्रिक उपचार कर ही रहा था कि एक पत्थर उसके सिर पर आकर लगा। खून का फव्वारा फूट पड़ा और वह अपना कर्मकाँड अधूरा छोड़कर ही वहाँ से चला गया।
लंदन के भूतहे इतिहास में 50, बर्कले स्क्वायर का मकान सबसे दुर्भाग्यशाली सिद्ध हुआ है, कारण कि वहाँ ठहरने वालों में से अधिकाँश की या तो मौत हो गई या फिर वे पागल हो गए, इसलिए वहाँ के उपद्रवों के बारे में कुछ ठीक-ठीक नहीं जाना जा सका है। अब तक केवल एक ही व्यक्ति वहाँ से सुरक्षित निकल सका, वह है-रॉबर्ट मार्टन। वह अपना लोमहर्षक अनुभव सुनाते हुए कहता है कि उस रात जब वह और उसका मित्र एडवर्ड ब्लेडेन उक्त मकान की ऊपरी मंजिल के एक कमरे में पहुँचे तब सब कुछ सामान्य था। मकान चूँकि बिकाऊ और खाली था, अतः उन्होंने ऊपरी मंजिल का उक्त कमरा, जो कि तनिक साफ-सुथरा था, उसमें अपने बिस्तर लगा लिए। मार्टिन अधिक थका हुआ था, अस्तु जल्द ही उसे नींद आ गई, पर वहाँ की असामान्य गतिविधियों के कारण एडवर्डग की नींद न आ सकी। इसी बीच अपने कमरे की ओर आते हुए कुछ अज्ञात कदमों की आहट उसे सुनाई पड़ी। वह भयभीत हो गया और मार्टिन को जगाया। थोड़ी ही देर में धीरे से कमरे का दरवाजा खुला और उसमें एक विचित्र आकृति अंदर आती दिखाई पड़ी। दोनों चीख पड़े और बाहर भागने का प्रयास करने लगे। मार्टिन उसे धक्का देकर बाहर निकल गया, पर एडवर्ड कदाचित उसकी पकड़ में आ गया और भाग न सका। जल्द ही जब मार्टिन एक पुलिस वाले के साथ वहाँ आया, तो एडवर्ड की मौत हो चुकी थी। शरीर क्षत-विक्षत अवस्था में पड़ा था और गर्दन टूटी हुई थी। दोनों ने मिलकर सारे कमरों की छानबीन की, पर वहाँ कोई भी नहीं मिला।
प्रेत कई बार परोपकारी प्रवृत्ति वाले भी होते है और सताने की जगह लोगों की सहायता करते हैं। ऐसी ही एक घटना टेली सैवेलेस के साथ घटी। वह एक टी.वी. कलाकार था। एक रात्रि न्यूयार्क के लाँग आइलैण्ड नामक ग्रामीण क्षेत्र से गुजर रहा था कि गाड़ी का पेट्रोल समाप्त हो गया। तब रात का तीसरा प्रहर खत्म हो रहा था। वह एक किलोमीटर दूर पेट्रोल पम्प की ओर बढ़ ही रहा था कि किसी ने पीछे से आवाज लगाई कि उस लिफ्ट तो नहीं चाहिए? मुड़कर देखा तो पास ही एक फोर्ड कार खड़ी थी। वह उसमें बैठ गया। गाड़ी वाले ने उसे पेट्रोल पंप तक छोड़ दिया और कुछ पैसे भी दिए, ताकि पेट्रोल खरीद सके। पैसा लौटाने के लिए उसने उसका पता ले लिया। कुछ दिन बाद जब सैवेलेस ने उक्त पते पर फोन किया, तो दूसरी ओर एक महिला मिली। हैरी एगेनिस नामधारी उक्त व्यक्ति के बारे में जब उससे पूछताछ की, तो उसने कहा कि वह मेरे पति हैं, किन्तु अब वे इस दुनिया में नहीं रहे। तीन वर्ष पूर्व उनका देहांत हो चुका है। बाद में उस कागज के टुकड़े को भी सैवेलेस ने उसकी पत्नी को दिखाया, जिसमें एगेनिस ने स्वयं अपना पता लिखा था। उसकी पत्नी ने स्वीकार किया कि यह उसके पति की ही लिखावट है। जब पोशाक की चर्चा की, तो उसने बताया कि इसी ड्रेस में उन्हें दफनाया गया था। यह सुनकर सैवेलेस को रोमांच हो आया कि उसकी भेंट एक प्रेत से हुई थी। इस प्रकार की कितनी ही घटनाओं का वर्णन नीजेल ब्लंडेन ने अपनी रचना ‘दि वर्ल्डस ग्रेटेस्ट मिस्ट्रीज’ में किया है।
प्रेत वास्तव में भटकती आत्माएँ हैं। जो इच्छाएँ और कामनाएँ मनुष्य जीवित रहते पूरी नहीं कर पाता, वह मरणोत्तर जीवन में पूर्ण करने का प्रयास करता और इसी क्रम में भटकता रहता है। यदि हम स्वल्प में संतोष करें और आनंदपूर्वक जीवन जीना सीख लें, तो शायद हमारा मरणोत्तर जीवन सुधर जाए - ऐसा परलोक विद्या के आचार्यों का कथन है।
आदर्शों का मूल्य
आदर्शों के लिए हमारे मनीषियों ने एक अनूठा शब्द खोजा है - जीवन मूल्य, अर्थात् जीवन ही जिसका मूल्य है। उसके महत्व की कल्पना या तुलना इससे कम में की ही नहीं जा सकती। मनुष्य को सबसे बढ़कर जीवन ही प्रिय है। चाहे करोड़ों रुपया हो पर जीवन संकट में पड़ा हो तो उसे बचाने के लिए सारी संपत्ति ही नहीं विद्या, अधिकार, ज्ञान, परिवार, पत्नी, बच्चे, समाज सब कुछ जीवन की तुलना में गौण लगता है और यह विस्मय-विमुग्ध कर देने वाली बात है कि जिस जीवन की तुलना में सब कुछ तुच्छ है, वह जीवन आदर्शों के लिए बलि चढ़ा देना श्लाघनीय समझा गया है। यही है हमारी संस्कृति की धरोहर-आदर्शों की पराकाष्ठा।
-राष्ट्र समर्थ और सशक्त कैसे बने
सिनाई पहाड़ी पर चलते हुए हजरत मूसा एक कुँज में बड़ा प्रकाशवान तेज देखकर बड़े चकित हुए। क्योंकि उस ज्वाला से कुँज अत्यंत प्रकाशित हो रही थी परन्तु जलती न थी। हजरत उस झाड़ी के निकट पहुँचे और विनयपूर्वक पूछा कि “ए चमकने वाले! तुम कौन हो?” उस प्रकाश ने उत्तर दिया कि- मैं हूँ, जो कुछ हूँ, वास्तव में मैं ही हूँ। तुम्हारा विशुद्ध आत्मा ही मैं हूँ।”
हजरत मूसा को यह दिव्य अनुभूति ठीक ही हुई। संसार जैसा कुछ है, हमारा अपना प्रतिबिंब ही है। जो कुछ है - वास्तव में अपनापन ही है। जैसा कुछ अपने अंदर है वैसा बाहर भी देखा जा सकता है।
आत्मा प्रकाशवान है, तेजस्वी है, ज्वलनशील है, फिर भी यह झाड़ी देह और आत्मा के गुण से युक्त नहीं है। देह से बुराई-भलाई दोनों है, आत्मा इसके अंदर रहते हुए भी इससे परे है। आत्मा का वह प्रकाश प्रज्वलित है तो भी यह झाड़ी जलती नहीं। आत्मा के जो सद्गुण है वे शरीर में नहीं पाए जाते। आत्मा पवित्र है, उसकी प्रेरणा भी पवित्र ही होती है, परन्तु शरीर में तो वासनाएँ भी रहती हैं।
आत्मा यथार्थ में पवित्र है। यदि वह पवित्र न होता तो कोई देहधारी इस संसार में सिद्ध, महात्मा या अवतार न हो सकता। यह विश्वास करो कि अपना वास्तविक अस्तित्व-अहम् पवित्र है। जो मलीनताएँ हैं वे शरीर की हैं और शरीर को जैसे छोड़ा जा सकता है, उसी प्रकार इन मलीनताओं का भी परित्याग किया जा सकता है।
जीवन की भाग-दौड़ में हताश-निराश एवं थका मानव इतना भ्रमित एवं परेशान पहले कभी नहीं दिखा। अपनी उलझनों के चक्रव्यूह में फँसकर स्वास्थ्य, निरोगिता एवं यौवन-उल्लास उसके लिए सपने की चीजें बन गई हैं। अब हर सुख पाने के लिए टॉनिकों और औषधियों की दुनिया में भटका करता है। उसकी यह भटकन बहुत कुछ कस्तूरी मृग की तरह है, जो उसे हास्यरूपी अमूल्य निधि एवं अचूक टानिक सुझायी ही नहीं देता, जिसे ईश्वर ने उसको सहज ही प्रचुर मात्रा में उपलब्ध करा रखा है।
स्विट्जरलैंड में आयोजित ‘इंटरनेशनल काँग्रेस ऑफ ह्यूमर’ में प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार पचास के दशक में आम इनसान 18 मिनट प्रतिदिन हँसता था। जीवनस्तर में उल्लेखनीय सुधार के बावजूद 90 के दशक में यह समय सिमटकर मात्र 6 मिनट शेष रह गया है, जबकि पचास का दशक भीषण आर्थिक मंदी के लिए माना जाता है। जर्मन मनोचिकित्सक डॉ. माइकल टिटन के अनुसार, आज हम ऐसे समाज में रह रहे हैं, जो उपलब्धि व सफलता को अत्यधिक महत्व देता है और जब व्यक्ति इन स्तरों को हासिल करने में असफल हो जाता है व स्वयं की कल्पना के इस मानदण्डों पर खरा नहीं उतरता, तो वह शर्म, हताश व अवसाद का शिकार हो जाता है। लोगों को हँसने का कोई का कारण समझ नहीं आता, यहाँ तक कि कठिन समय में वह स्वयं पर भी नहीं हँस पाता।
हास्य को सदा से ही शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का प्रमुख साधन माना गया है। विद्वान हजरत सुलेमान ने तो इसे रामबाण औषधि की संज्ञा दी है। उनके शब्दों में- “यदि मुख पर हास्य और हृदय में उल्लास है, तो स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव रामबाण औषधि की तरह पड़ता है।” इसी बात की पुष्टि में डॉ. ओलीवर बैंडल होम्ज कहते हैं कि हास्य या उल्लास प्राकृतिक औषधियों का महासागर है।
अंग्रेजी में कहावत है कि प्रतिदिन केवल तीन बार खिलखिलाकर हँसने से मनुष्य न तो रोगी होता और न उसे किसी डॉक्टर की जरूरत पड़ती है। आयुर्वेद व मनोविज्ञान का स्वर्ण सिद्धांत है कि चिंता, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष आदि विषाक्त मनोभावों से हमारे शरीर में जो विष की उत्पत्ति होती रहती है, हास्य उसका परिशोधक है। सही मायने में हास्य से बढ़कर बलवर्धक और उत्साहप्रद कोई अन्य रसायन हो ही नहीं सकता।
जोरों से हँसने पर वक्षस्थल पर एक-के-बाद एक कई झटके लगते हैं। प्रत्येक झटके के साथ रक्तवाहिनी नलिकाओं का रक्त हृदय तक पहुँचने के पहले मार्ग में कई जगह रुकता है। यही कारण है कि देर तक हँसते रहने से मनुष्य का चेहरा थोड़ा-बहुत लाल हो जाता है। हास्यप्रक्रिया के बीच-बीच जो श्वासोच्छवास प्रक्रिया होती है, उसके कारण फेफड़ों के बाहर साफ हवा पहुँचती है और दूषित वायु बाहर निकलती है।
हँसने से भोजन शीघ्र पचता है। जो व्यक्ति भोजन करते समय रोता है उसकी भूख कम हो जाती है। और पाचनक्रिया निष्क्रिय हो जाती है। हँसते हुए भोजन करने से जठराग्नि प्रदीप्त होती है तथा रस, रक्त, माँस, मज्जा, चर्बी, अस्थि एवं वीर्य की वृद्धि होती है।
हास्य की चिकित्सकीय उपयोगिता पर वैज्ञानिक दृष्टि की कहानी मात्र दो दशक पुरानी है। ‘साइकोलॉजी टुडे’ में निकले शोध-पत्र के अनुसार 80 के दशक में हास्य के स्वास्थ्यवर्द्धक प्रभाव की ओर वैज्ञानिकों की नजर गई और 90 के दशक में इसकी चिकित्सकीय उपयोगिता असंदिग्ध रूप से स्पष्ट हो सकी। लॉफिंगथेरेपी के आविष्कार का श्रेय एक अमेरिकन पत्रकार नारमन काजिन को जाता है। हँसने से स्वास्थ्य में सुधार होता है। यह विचार उन्होंने अपनी पुस्तक ‘एनाटमी ऑफ इलनेस’ में प्रतिपादित किया है। उनकी स्वयं की रीढ़ की हड्डी में ऐसी बीमारी थी, जिसका उपचार विज्ञान जगत के पास नहीं था। उन्हें असहनीय पीड़ा होती थी, जिससे ध्यान बँटाने के लिए टी.वी. पर हास्य कार्यक्रम देखते और ठहाके लगाते। कुछ दिनों में वे यह देखकर चकित थे कि दर्द पूर्णतया गायब हो गया है। इस प्रकार उन्होंने चिकित्सा जगत को अपने आविष्कार का परिचय दिया। उन्होंने बताया कि जोर-जोर से हँसने पर शरीर में एंडोर्फिन नामक रसायन का स्तर बढ़ जाता है, जो सबसे अच्छे दर्द-निवारकों में है। यही नहीं इससे मस्तिष्क में पर्याप्त मात्रा में रक्त संचार होता है, जिससे न्यूरोट्राँसमीटर की मात्रा बढ़ती है। इससे मन प्रसन्न रहता है, स्मरणशक्ति बढ़ती है। यही नहीं मधुमेह, रक्तचाप, दमा व चर्मरोग आदि बीमारियाँ दूर हो जाती हैं।
विभिन्न अनुसंधानों के बाद वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला है कि हँसने से मस्तिष्क को उत्प्रेरणा मिलती है, जिससे वहाँ एपीनेफ्रेन, नोरेपाइनफ्रीन और डोपामाइन जैसे हार्मोन पैदा होते हैं। ये हार्मोन शरीर के लिए स्वास्थ्यवर्धक हैं और दर्द को कम करके वात रोगों व एलर्जी जैसे रोगों से मुक्ति दिलाते हैं। चिकित्सकों का कहना है कि हँसना एक उत्तम व्यायाम है। प्रतिदिन चार-पाँच किमी दौड़ने से जो व्यायाम होता है और उससे जो शारीरिक क्षमता बढ़ती है, उतनी ही हँसने से बढ़ती है। हँसने से स्नायुओं को स्वतः व्यायाम करने का अवसर मिलता है, जिससे शारीरिक व मानसिक तनाव दूर होता है।
यूरोपियन वेल्यूज ग्रुप द्वारा बीस यूरोपीय देशों में किए गए सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटेन के निवासी सर्वाधिक स्वस्थ एवं प्रसन्न रहते हैं। उनके उत्तम स्वास्थ्य का यही राज है कि वे हँसने- हँसाने में औरों की अपेक्षा अधिक समय लगाते हैं। ब्रिटिश चिकित्सा विभाग के शोध-संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार मनुष्य के स्वभाव और उसकी भावनाओं का सर्दी-जुकाम से गहरा रिश्ता है। मानसिक तनाव की स्थिति में शरीर में स्टेराइड नामक तत्व बनने लगता है, जिससे जीवनीशक्ति नष्ट होने लगती है और शरीर पर रोगाणु आसानी से हावी होने लगते हैं। संस्थान के विशेषज्ञों का परामर्श है कि जो व्यक्ति नजला, सर्दी जुकाम व दमा से बचना चाहते हैं, वे तनाव से बचें। अभिव्यक्ति के लिए जी खोलकर हँसे। हँसी से इन रोगों से बच सकते हैं और स्वस्थ रह सकते हैं।
स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिसिन स्कूल के डॉ. विलियम क्रे का मत है कि जो लोग हँसते-हँसाते नहीं हैं, वे अपेक्षाकृत कहीं जल्दी और गंभीर रूप से बीमार पड़ते हैं। डॉ. क्रे. के अनुसार, हँसने से शरीर के अंदर समूचे तंत्र में ऐसी हलचल होती है, जो एंडोक्राइन प्रक्रिया को सुचारु कर देती है। इससे रोग पास नहीं फटकने पाते। हँसी से मन की गाठें आसानी से खुल जाती हैं और चेहरे पर क्राँति आ जाती है।
न्यूयार्क बेबी हॉस्पिटल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. स्टव औषधि उपचार के साथ जोकर बनकर बच्चों को हँसाने का भी काम करते हैं। उनका कहना है कि यदि हम रोगी की जीवन की रक्षा नहीं कर सकते, तो उसे हँसाकर व खुश रखकर उसके जीवन की अवधि तो कुछ बढ़ा ही सकते हैं। डॉ. ब्रेक द्वारा हास्यचिकित्सा के बीच रोगियों के रक्त की जाँच की गई, जिसमें आश्चर्यजनक परिवर्तन पाए गए। रोगियों में रोग के कीटाणुओं से लड़ने वाले सफेद रक्त कणिकाओं की संख्या बढ़ी हुई मिली। इसके अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल की मात्रा में कमी पाई गयी।
कैलीफोर्निया स्टेट विश्वविद्यालय के नर्सिंग विभाग के डॉ. राबिंसन पिछले 20 वर्षों से हास्य चिकित्सा पर काम कर रहे हैं। वह कहते हैं कि जब हम हँसते हैं, तो हमारा तनाव, गुस्सा व संकोच सब दूर होते हैं। हँसी मनुष्य को जीवन जीने की दृष्टि देती है। हमने देखा है कि आप्रेशन के लिए जा रहे रोगी को यदि हम हँसाते हैं, तो उसमें दर्द को सहने की क्षमता बढ़ जाती है।
स्वास्थ्य संस्था ‘हार्टकेयर फाँडेशन’ के अध्यक्ष डॉ. कर्नल के. एल. चोपड़ा अपनी पुस्तक ‘योर लाइफ इज इन योर हैंड’ में अपने विचार प्रस्तुत करते हैं कि हँसी से हमारे सकारात्मक भाव और विचार जन्म लेते हैं। ऐसे रसायनों की उत्पत्ति होती है, जो न केवल दर्द सहने की क्षमता को बढ़ाते हैं, बल्कि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं, उनका कहना है कि कृत्रिम तौर पर हँसने से भी शरीर को प्राकृतिक हँसी जैसा ही स्वास्थ्य लाभ मिलता है, क्योंकि हमारा मस्तिष्क कृत्रिम हँसी को भी प्राकृतिक हँसी के रूप में ग्रहण करता है।
हँसी के लाभ को नए सिरे से महत्व देने में भारतीय डॉक्टर मदन कटारिया का नाम भी उल्लेखनीय है। मुम्बई के डॉक्टर कटारिया ने तीन वर्ष पूर्व अपने चार मित्रों के सहयोग से हँसोड़ क्लब बनाया था। आज इस अजीबो-गरीब थेरेपी में लोग इतनी दिलचस्पी ले रहे हैं कि अब तक लगभग 150 हंसोड़ क्लब खुल चुके हैं और इसका विस्तार भारत के बाहर अन्य देशों में भी हो रहा है। फ्राँस और जर्मनी के लोग भी हँसोड़ क्लब बनाने की राह पर हैं। पिछले दिनों स्विट्जरलैंड और अमेरिका के दो सम्मेलनों में डॉ. कटारिया के प्रयासों को खूब सराहा गया।
हँसी के व्यायाम पैकेज देने वाले वे विश्व के संभवतः प्रथम व्यक्ति हैं। उनका मानना है कि हम भारतीय बड़े सीरियस किस्म के लोग हैं। हमें हँसना पसन्द नहीं है। हम तो सिर्फ मुसकराते हैं। हम एक-दूसरे के समीप से गुजर जाते हैं, किंतु अभिवादन करना हमें गवारा नहीं है। ऐसा लगता है कि अंग्रेजों की हुकूमत के आतंक से अभी हम मुक्त नहीं हो सके हैं। उनके अनुसार अपनी हीन भावना से मुक्त होने के लिए हँसने से बढ़कर अन्य कोई औषधि नहीं है।
डॉ. कटारिया ने लगभग 30 प्रकार के हास्य व्यायाम ईजाद किए हैं। उनका मानना है कि इनसे शरीर के विभिन्न अंग-अवयवों का व्यायाम होता है। उनमें सिंह हास्य है, जिसमें मुँह फाड़कर दाँत निकलने पड़ते हैं। इससे मुँह की माँसपेशियों को लाभ पहुँचता है। इसी प्रकार कपोत हास में मुँह बंद कर कबूतर की तरह गुटरगूँ की ध्वनि निकालनी पड़ती है। हिंडोल हास में झूले की सी आवाज निकालकर हँसना होता है।
हँसने-हँसाने के अद्भुत प्रभाव को देखते हुए व्यावसायिक जगत में भी इससे लाभान्वित होने के गंभीर प्रयास चल रहे हैं। अमेरिका में कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में ह्यूमर कंसलटेंट के पद बनाए जा रहे हैं। ये कर्मचारियों के लिए हँसी-खुशी का वातावरण तो बना ही रहे हैं, अधिकारियों को भी कामकाज में इसके महत्व को समझा रहे हैं। इसके अनुसार कर्मचारियों की कार्यक्षमता बढ़ाने में हँसी-मजाक का बेहतर उपयोग सम्भव है।
साहित्यकार बर्नार्डशा ने एक स्थान पर सही ही लिखा है कि “हँसी की पृष्ठभूमि पर ही स्वास्थ्य एवं यौवन के प्रसून खिलते हैं। यौवन को तरोताजा बनाए रखने के लिए आप भी खूब हँसिए।” फिर भला हम क्यों उदास हो? क्यों न आज और अभी एक जोरदार ठहाके की गूँज में अपनी सारी चिंता अवसाद को उड़ा फेंके। हास्य ही तो जीवन जीने का रहस्य है। इसे जाने ही नहीं अपनाए भी।
परमात्मा की आकांक्षा ‘एकोऽहं बहुस्याम’ जिस दिन पूरी हुई, कहते हैं, उसका स्मरण ‘श्रावणी पर्व’ के रूप में मनाने का क्रम चला आ रहा है। अपनी विभूतियों को संतोष न हुआ, उन्हें विकसित-वितरित करने का संकल्प हुआ। उसके चिंतन के केन्द्र में- नाभिक से संकल्प जाग्रत हुआ- वही कर्मबेल के रूप में बढ़ा-विकसित हुआ। यही विष्णु की नाभि से कमलनाल निकलने का आलंकारिक प्रसंग है। कमलबेल से वैभव एवं घटनाक्रमों को पंखुड़ियाँ फूट पड़ती है। कमल की व्याख्या इसी रूप में की जा सकती है। इसी कमल के पराग का भ्रमण है- प्रजापति, जिसकी प्रजा के रूप में सृष्टि का विस्तार होता चला गया। परमात्मा की वह संकल्प और विकास की प्रवृत्ति जीवात्मा में भी है। उसे भी उसी प्रक्रिया पर चलना होता है।
सृष्टि का सृजन हुआ, उसमें दो तत्व प्रयुक्त हुए (1) ज्ञान, (2) कर्म। उन दोनों के सम्मिश्रण से सूक्ष्म चेतना संकल्प शक्ति स्थूल, वैभव में परिणत हो गई और इस संसार का विशाल कलेवर बनकर खड़ा हो गया। उस वैभव को अनेक धाराएँ, उसके अनेक स्वरूप ऋद्धि, यश-आनन्द-उल्लास के रूप में प्रकट हुए और सृष्टि के अंग-उपाँग बनते चले गए।
ज्ञान और कर्म के आधार पर ही मानवीय गरिमा का विकास हुआ। इन्हें जो जितना परिष्कृत और प्रखर बनाता चलता है, उसकी प्रगति पूर्णता की दिशा में उतनी ही अधिक तीव्र गति से होती है। इस तथ्य को भारतीय मनीषियों ने भली प्रकार समझा तथा जनसाधारण को भी उस दिशा में सोचते रहने के लिए, सतर्क रहने के लिए भावनात्मक व्यवस्था बनाई। भारतीय संस्कृति में इन दोनों तथ्यों को सतत् स्मरण में रखने के लिए दो प्रतीक चिन्ह हर श्रेयपथ के पथिक को अपने साथ रखने की नीति बनाई गयी। ये प्रतीक है- (1) शिखा (2) यज्ञोपवीत। ये दोनों ज्ञान और कर्म के ही प्रतीक हैं।
ज्ञान की प्रतीक शिखा ध्वजा रूप में शरीर मंदिर के उच्चतम भाग सिर पर फहराती रहती है तथा कर्म का प्रतीक यज्ञोपवीत शरीर को चारों ओर से लपेटे रहता है। शिखा-स्थापन तथा यज्ञोपवीत धारण जीवन के उन आदि उद्गम ज्ञान और कर्म को, जो आज तक भी अपनी उपयोगिता यथावत बनाए हुए है, परिष्कृत बनाए रखने की प्रेरणा के लिए भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। श्रावणी पर्व इन्हीं दोनों के प्रतीकों का महत्व समझने के लिए आता है।
श्रावणी पर्व पर आत्मा की मूल वृत्ति की संतुष्टि के क्रम में जो व्यवधान आते हैं, उन्हें हटाने तथा व्यवस्थित क्रम को समझकर उस पर आगे बढ़ाने की प्रक्रिया चलाई जाती है। पिछले दिनों जो गलत क्रम चल पड़ा, उसको समझे-स्वीकार किए बिना उसको दूर कैसे किया जा सकता है तथा उससे विरत हुए बिना सही दिशा में उत्साहपूर्ण गति कैसे संभव होगी? इसके लिए प्रायश्चित संकल्प करते हैं-पिछली अवांछनीयता से विरत होने के लिए प्रायश्चित विधान पूरा करते हैं। उस दिन नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं। शिखा-सिंचन करते हैं। यह उन दोनों का वार्षिक संस्कार है। राष्ट्रीय पर्व पर ध्वज का विशेष अभिवादन किया जाता है। उसी प्रकार शिक्षा-सिंचन और यज्ञोपवीत नवीनीकरण का क्रम श्रावणी पर्व पर निर्धारित रूप से किया जाता है। यह दो प्रकाश स्तंभ उपेक्षा के गर्त में न पड़े रह जाए, इसलिए इनका निरीक्षण- विश्लेषण आदि करना अति आवश्यक है।
इस अवसर पर वेद-पूजन तथा ऋषि पूजन भी किया जाता है। वेद आदि ज्ञान है। उसके प्रति आदरभाव बनाए रखना चाहिए। ऋषि उस दिव्य ज्ञान को सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप व्यवहार्य कर्म में उतारने के लिए प्रबल पुरुषार्थ तय करने वाले विवेकी और साहसिक व्यक्तित्व है। उनके प्रति सम्मान का भाव जाग्रत हुए बिना उन पर आचरण हमारे लिए सम्भव कैसे होगा?
रक्षाबंधन और वृक्षारोपण का विधान भी इस पर्व के साथ जुड़ा हुआ है। राष्ट्रीय सुरक्षा और साँस्कृतिक संरक्षण का उत्तरदायित्व निभाना भारत देश के नागरिकों का अनिवार्य कर्तव्य है। इस प्रतीक के रूप में रक्षा-सूत्र बाँधा जाता है। उत्पादक श्रम, लोकमंगल की आस्थाओं का अभिवर्द्धन-पोषण आदि का प्रतीक वृक्षारोपण है।
कर्मकाण्ड का विस्तार आयोजन के स्वरूप के अनुसार किया जाना चाहिए साधनात्मक स्तर पर लोग एकत्र होकर सामूहिक आयोजन करें तो प्रायश्चित्त स्नान, पंचगव्य सेवन, तर्पण, आदि अनेक विधान कराने में कोई अड़चन नहीं है। यदि लोकशिक्षणात्मक स्तर का सामूहिक आयोजन है तो उसकी रूपरेखा भिन्न प्रकार से बनाई जानी चाहिए। उस प्रकार के आयोजनों में स्नान आदि के प्रकरण संभव नहीं, यदि वे शामिल किए जाएँगे तो लोकशिक्षण की व्यवस्था नहीं बनेगी। व्यक्तिगत या पारिवारिक स्तर के आयोजनों में आवश्यक समझे तो स्नान आदि के प्रकरण जोड़े जा सकते हैं। अन्यथा उन्हें करना कोई अनिवार्य नहीं है।
श्रावणी के सामूहिक आयोजन में भगवान विष्णु का चित्र, जिसमें उनकी नाभि से उत्पन्न कमल पर प्रजापति विराजमान् हैं, स्थापित करें। उसी का षोडशोपचार पूजन पुरुष सूक्त से किया जाए। सार्वजनिक रूप से उक्त कृत्य (1) शिखा-सिंचन (2) यज्ञोपवीत पूजन एवं धारण (3) हेमाद्रि संकल्प (4) वेद एवं ऋषि पूजन, (5) रक्षाबंधन, (6) वृक्षारोपण आदि आदि किए जाए। चंदन मिश्रित सुगंधित जल से शिखा भिगोयी जाए। यज्ञोपवीत में देव आह्वान और पूजन के बाद उसे धारण किया जाए। जो भी शरीरगत, मानसिक, सामाजिक पाप गतवर्ष बन पड़े हों, उन्हें हेमाद्रि संकल्प के साथ स्मरण किया जाए तथा पुनः न होने देने की शपथ ली जाए। पिछली भूलों से समाज की हुई क्षतिपूर्ति के लिए लोकमंगल की दिशा में कुछ विशेष अनुदान प्रस्तुत करने का निर्णय किया जाए, ताकि पापों के मुकाबले पुण्य खड़ा होकर उसकी भरपाई कर सके। वेद की पुस्तक तथा ऋषियों की प्रतीक चावलों की ढेरी या कुशों पर पुष्प-चंदन की श्रद्धांजलि चढ़ाई जाए।
रक्षाबंधन सूत्र (कलावा) को पुरोहित या बहिनें सबकी कलाइयों पर बाँधें। देश समाज और संस्कृति की रक्षा के लिए यह एक चुनौती एवं प्रेरणा का प्रतीक सूत्र है। इसे इसी भावना के साथ स्वीकार-अंगीकृत किया जाए। वृक्षारोपण किसी प्रतिष्ठित या वयोवृद्ध व्यक्ति से प्रतीक के रूप में कराया जाना चाहिए। इसके लिए कुछ अधिक नहीं तो तुलसी का पौधा लिया जा सकता है। साथ ही उपस्थित जनसमुदाय को प्रेरणा दी जाए कि इस पर्व पर अधिक नहीं तो कम-से-कम एक वृक्ष आरोपित करके उसे देख-रेख पूर्वक जीवित रखा जाए। पौधा लगा देने मात्र की लकीर पीटना उचित नहीं, इसके साथ पालन-पोषण की भी जिम्मेदारी जुड़ी है। घर-घर तुलसी अभियान भी चलाया जा सकता है।
प्रवचनों के माध्यम से अथवा कर्मकाण्ड की व्याख्या करते हुए आज के राष्ट्रीय एवं सामाजिक-साँस्कृतिक सत्यों को भावपूर्ण ढंग से समझाया बताया जाना चाहिए। इसी के साथ शिक्षा सम्बन्धी बात, यज्ञोपवीत के नौ धागों, उसके साथ जुड़े उत्तरदायित्वों का बोध कराया जा सकता है। यहाँ यह बात विशेष रूप से स्पष्ट करनी होगी कि पाप कर्मों का प्रायश्चित छुटपुट स्नान पर्यटन जैसे कृत्यों से नहीं बल्कि समाज की क्षतिपूर्ति के लिए दिये जाने वाले अनुदानों से होता है। अमीरी नहीं, महानता का चयन ही बुद्धिमत्तापूर्ण है। यह बात किसी आदर्श प्रेमी ऋषि अथवा महापुरुष एवं भ्रष्ट वैभवशाली की तुलना करके समझाई जा सकती है। रक्षाबंधन के प्रसंग में देश-धर्म-संस्कृति-रक्षण की बात से लेकर नारी-समाज के प्रति अपना दृष्टिकोण शुद्ध करने की अनेक बातें कही जा सकती है।
अपने-अपने क्षेत्र की परिस्थितियों एवं मौसम की रूपरेखा के मुताबिक़ कार्यक्रम का संयोजन एवं क्रियान्वयन करना चाहिए। इस वर्ष श्रावणी पर्व मनाते वक्त यह ध्यान रहे कि वर्तमान राष्ट्रीय परिस्थितियों में इसका महत्व पहले से कई गुना अधिक हो गया है। बहिनों की राखी ही भाइयों के शौर्य, तेज एवं बलिदानी भावनाओं का उद्रेक करती है। इस बार यह उद्रेक कुछ ऐसा उठे कि राष्ट्रीय स्वाभिमान का महासूर्य चमक उठे। यह चमक ऐसी हो कि भारत की ओर कलुषित दृष्टि से देखने वालों के नेत्र ज्योतिविहीन हो जाए।
डॉक्टर सर टामस रो ने बादशाह शाहजहाँ की लड़की का इलाज किया और इसके प्रत्युपकार में शाहजहाँ ने मनचाहा इनाम माँगने के लिए कहा। सर टाँमर रो ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए कुछ न माँगकर इंग्लैंड से आने वाले माल पर से चुंगी हटाने की माँग की, जो स्वीकार कर ली गई। इससे इनाम माँगने वाले का व्यक्तिगत लाभ तो कुछ न हुआ, पर उनके देश से बिना चुंगी चुकाए वह माल भारत में सस्ता बिकने लगा, उससे उनके देश का व्यापार बढ़ा और वे इस देश पर अपना राजनैतिक वर्चस्व जमा सकने योग्य सामर्थ्यवान हो गए। इंग्लैंड मालामाल और शक्तिवान हो गया। सर टामस रो अपने देश का सच्चा और अच्छा नागरिक था। उसने अपने लाभ को पीछे रखकर पूरे समाज का हित चाहा और किया। अवश्य ही उसने सोचा होगा कि कोई जमीन-जायदाद अथवा धन-संपदा माँग लेने पर केवल एक उसका ही जीवन सुखी हो सकता है, जिसको कुछ दिन भोगने के बाद उसे छोड़ना ही पड़ेगा और यदि वह किसी सार्वजनिक हित की माँग करता है, तो उससे उसके सम्पूर्ण समाज को लाभ होगा तथा अपने पूरे समाज के साथ वह भी तो सुखी होगा। कितना दिव्य और कितना दूरदर्शी विचार था उसका। उसके व्यक्तिगत सुख के उस त्याग ने उसके सारे देश को सुखी एवं सम्पन्न बना दिया। किसी अच्छे और सच्चे नागरिक का यही तो लक्षण होता है कि वह अपने संकीर्ण लाभ का त्याग कर जन-हित की दृष्टि से सोचना और आचरण करता है। धन्य हैं ऐसे जन हितैषी मनुष्य।
प्रकृति संतुलन का एक सुसम्बद्ध चक्र है। मनुष्य और पशु-पक्षी वनस्पतियाँ खाकर जीते हैं। वनस्पतियों में कीड़े भी लगते हैं और अपना गुजारा करते हैं। कीड़े-मकोड़ों को पक्षी खाते हैं। पक्षियों की संख्या बढ़ती है तो उन्हें बाज़ आदि शिकारी पक्षी अपना शिकार बना लेते हैं। पशु बढ़ते हैं तो उन्हें सिंह, व्याघ्र आदि ठिकाने लगा देते हैं। इस प्रकार एक संतुलित क्रम की सुसम्बद्ध श्रृंखला चलती रहती है।
एक मनुष्य ही है जो इस श्रृंखला को तोड़ने पर उतारू है और यही कारण है कि उसकी समस्या भी उलझती जाती है। पशु-पक्षियों को मारकर खान और वनस्पतियों में लगने वाले कीड़ों से परेशान होकर उन्हें मारने के लिए विषैली औषधियों का छिड़काव करना यह बुद्धिमान मनुष्य की मूर्खता है। इससे गुत्थियाँ सुलझने के स्थान पर उलटी उलझ ही जाती है।
सर्वेक्षण कर्ता वैज्ञानिकों के अनुसार समूचे विश्व में अब तक जीव-जन्तुओं एवं वृक्ष-वनस्पतियों की 1,6000000 जातियाँ ज्ञात की जा चुकी है। इनकी कुल संख्या पाँच करोड़ से दस करोड़ तक आँकी गई है। प्रकृति संतुलन के लिए छोटे जीवाणु से लेकर मनुष्य तक तथा एल्गी-कवक से लेकर वृक्ष वनस्पतियों तक का अपना महत्व है। वनों के कटते रहने, जंगल की जमीन को कृषि योग्य बनाने, आग लगाकर जंगलों की सफाई करने तथा खेतों में विविध प्रकार की कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करने से प्रतिवर्ष असंख्य जीवधारी एवं वनस्पतियाँ नष्ट हो जाती हैं।
मानवी स्वाद लोलुपता एवं स्वार्थपरता के कारण समुद्री मछलियाँ, सील, व्हेल, सी-एलीफैंट वालरस, सी-लायंस हाथी, गेंडे़, कस्तूरी मृग, शुतुरमुर्ग आदि प्राणियों की संख्या अंगुलियों पर गिनने योग्य शेष बची है। मनुष्य अपनी उदरपूर्ति एवं स्वार्थपूर्ति के लिए अनादिकाल से निरीह प्राणियों का शिकार करता और प्रकृति संतुलन को बिगाड़ने का प्रयत्न करता आया है।
पिछले दिनों सन् 1938 में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार अमेरिका में बहुतायत से पाए जाने वाले सारस पक्षी की संख्या घटकर मात्र चौदह रह गई थी। इसी तरह कैलीफोर्निया के कोस्टल माउंटेन क्षेत्र में पाए जाने वाले गीध अब नाममात्र के बचे हैं, जिनकी संख्या साठ है। किर्टलैंड की बार्वेलर नामक छोटी चिड़िया जंगल में लगाई गई आग के कारण उसकी भेंट चढ़ गई और लगभग इनकी पूरी जाति हीह विनष्ट हो गई। इसके बाद यह क्रम रुका नहीं वरन् बढ़ता ही गया।
कीट-पतंगों पर जीवन-निर्वाह करने वाले 90 प्रतिशत योरोपीय पक्षी डी.डी.टी. जैसी कीटनाशक दवाओं के प्रभाव से विलुप्त हो चुके है। इसी तरह पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे बड़े स्तनधारी जलचर व्हेल की प्रजाति को निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए मानव ने लगभग विलुप्त होने की स्थिति तक पहुँच दिया है वालरस, सी-एलीफैट सील और सी-लायंस जैसे अधिसंख्य प्राणी मनुष्य की क्रूरता के शिकार हुए हैं। वर्तमान समय में प्रशांत महासागर में इनकी संख्या लगभग तीस हजार है। प्रतिवर्ष इनमें से सात हजार वालरस मात्र मनुष्य की शान शौकत बढ़ाने के लिए- ‘आइवरी टक्स’ के लिये मारे जाते हैं। वालरस की कुल प्रजनन क्षमता पाँच हजार प्रतिवर्ष से अधिक नहीं है। जबकि इनकी संख्या में प्रतिवर्ष दो हजार की कमी होती है।
इसी तरह गेंडों की संख्या तेजी से घटती जा रही है। इस समय संसार भर में लगभग बीस हजार की संख्या में गेंडे हैं। सुमात्रा में पाए जाने वाले छोटी प्रजाति के गेंडों की संख्या मात्रा सौ रह गई है। इसी तरह जावा में पाये जाने वाले एक सींग वाले गेंडों की संख्या लगभग साठ, उत्तरी क्षेत्र में पाँच सौ से एक हजार के बीच तथा दक्षिणी क्षेत्रों में सुरक्षित गेंडों की संख्या तीन हजार है। दक्षिण अफ्रीका में पाये जाने वाले काले गेंडे प्रायः 90 प्रतिशत मारे जा चुके हैं। अपने देश में भी अब इनकी संख्या एक हजार से अधिक नहीं है।
विभिन्न सर्वेक्षणों के आधार पर यह तथ्य सामने आया है कि प्रतिवर्ष जीवों की एक से लेकर सौ जातियाँ विलुप्त होती हैं। यदि यहीं क्रम रहा तो अगली चौथाई शताब्दी तक विलुप्त होने वाले जीवों की संख्या सौ प्रजातियाँ प्रतिदिन हो जायेंगी।
अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि वनों के कटते जाने से संपूर्ण विश्व को प्रकृति-प्रकोप का भाजन बनना पड़ रहा है। जिस तीव्र गति से जंगलों का सफाया होता जा रहा है, लगभग उसी गति से तथाकथित सभ्यता के उत्कर्ष पर पहुँचने का दंभ भरने वाले मानव समुदाय को दम भी घुटने लगा है। अकेले अमेरिका में सन 1970 में वनों का घने जंगलों का क्षेत्रफल 7,54,000,000 एकड़ था, वहाँ आठ वर्ष के भीतर सन् 1978 में यह क्षेत्रफल सिमट कर 7,40,00000 एकड़ रह गया। तब से यह निरंतर सिकुड़ता ही जा रहा है। इस तरह प्रत्येक माह मेसाचुसेट्स के क्षेत्रफल के बराबर संपूर्ण धरती पर जंगलों का सफाया होता रहता है। इमारती लकड़ी की खपत के कारण दक्षिण पूरब एशिया के देशों में प्रतिवर्ष 15,000 वर्ग किलोमीटर ट्राँपिकल जंगल उजाड़ दिये जाते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कारणों से 200,000 वर्ग किलोमीटर जंगल प्रतिवर्ष वनस्पति विहीन कर दिये जाने हैं। भारत भी इस संकट से अछूता नहीं बचा है। बढ़ती आबादी के कारण अधिकाँश जंगल उजाड़ दिये गये है। हरे-भरे वनों की जगह गगनचुम्बी इमारतें और उगलती औद्योगिक इकाइयाँ खड़ी होती जा रही है।
जीवन-धारण करने वाले प्रत्येक प्राणी का जीवनकाल एक निश्चित आयु तक सीमित है, जिसे उस जीव का लाक्षणिक जीवनकाल कहते हैं। बहुत से कीट पतंगे कुछ घंटों से लेकर कुछ सप्ताह तक जीवित रहते हैं। कछुए जैसे सरीसृप कई सौ वर्षों तक अपने जीवन-संकट खींचते रहते हैं। स्तनधारी जीवों समें हाथी की उम्र 70 से 100 वर्ष, कुत्ते की 10-30 वर्ष, गाय की 20-25 वर्ष, घोड़े की 20-30 वर्ष और चूहे की 3 वर्ष तक होती है। बहुत से पक्षी अधिक दिनों तक जीवित रहते हैं। बाज़, उल्लू और तोते 50 वर्ष से लेकर 100 वर्ष तक जीवित रहते है। रानी चींटी 12 से 15 वर्ष तक जीवित रहती है। खंडित शरीर वाले जीवधारियों का जीवनकाल बहुत काम होता है।
जीव-जगत और वनस्पति जगत का आपस में अन्योऽन्याश्रित संबंध है। ये एक दूसरे के पूरक एवं सहयोगी हैं। वनस्पति जगत प्राणियों के निवास, भोजन, आक्सीजन, आच्छादन, आदि से लेकर सभी तरह की जीवन संबंधी आवश्यकताएँ उपलब्ध कराता है। जीवाणु-बैक्टीरिया एवं फन्जाई-फफूँद जैसी छोटी जैव इकाइयाँ सूखे-गिरे पत्तों, लकड़ियों इत्यादि तथा मृतक जीवधारियों के शारीरिक पदार्थों को तोड़कर नई संरचना में भाग लेने योग्य सरलतम यौगिकों में बदल देते हैं। एक अच्छी वनस्थली की जमीन के प्रतिघन डेसीमीटर क्षेत्र में लगभग एक अरब एल्गी और प्रोटोजोआ, 30,000, थ्रेडवम्स, 500 रोटीफर, 1000 स्प्रिंगटेल्स, 1500 माइट्स या भुनगे, 100 कीट-पतंगे विशेषकर लार्वा, छोटी मकड़ियाँ और मिलीपीड्स, 50 ब्रिस्टलवर्म्स तथा 2 केंचुए पाए जाते है। औद्योगीकरण के अनुदानों के पीछे आज हम इतना पागल हो गए हैं कि भूलकर भी वातावरण की विषाक्तता पर ध्यान नहीं देते हैं। इसी तरह कीटनाशक रसायनों का अविवेकपूर्ण अंधाधुन्ध छिड़काव न केवल मिट्टी एवं जल को प्रदूषित करता है वरन् कृषि एवं पैदावार बढ़ाने वाले उपर्युक्त प्रकार के अधिसंख्य जीवों का अस्तित्व मिटा देता है।
अपने देश में साठ हजार मैट्रिक टन से अधिक कीटनाशक दवाओं का प्रयोग प्रतिवर्ष किया जाता है। ये रासायनिक पदार्थ तो मलेरा तथा फाइलेरियरा जैसे रोगों की रोकथाम में सफलता प्राप्त कर चुके हैं, किन्तु ये स्वयं विषाक्त हैं। इनमें से कुछ तो प्रकृति में जैविक कारणों से आसानी से विघटित नहीं होते है। फलतः वे सब मिलकर वातावरण को प्रदूषित करते हैं। यह प्रदूषण कार्य तो नियमित रूप से चलता रहता है जिससे भोजन, वायु और पानी पर इसका प्रभाव पड़ता है। जीव-जगत पर भूत और वर्तमान, दोनों कालों में होने वाले प्रदूषण के प्रभाव को सुनिश्चित पैमाने द्वारा आसानी से निर्धारित किया जाता है। डी0डी0टी0 एवं एच0सी0एच॰ जैसे विनाशक पदार्थों की उपस्थिति भारत, चीन और मैक्सिको आदि देशों की महिलाओं के दूध तक में बहुत अधिक मात्रा में पाया जाने लगा है। अहमदाबाद के वैज्ञानिकों ने माताओं के दूध में इसका स्तर 1.1 मिलीग्राम प्रति किलों मापा है, जो नवजात शिशुओं के लिए बहुत ही हानिकारक है।
वस्तुतः रासायनिक छिड़काव के द्वारा विषैले तत्वों से हम अन्न-फल एवं शाकों को तर कर देते हैं, जिसे वे अपने अंदर जब्त कर लेते हैं। आहार के साथ ही यह विष मनुष्य के पेट में पहुँचाता है और पचकर हड्डी, रक्त, मज्जा, माँस, वसा आदि को दूषित करके अनेकानेक रोगों की उत्पत्ति करता है। इन रोगों में कैंसर प्रमुख है तथा यह बच्चों में भी प्रचुर मात्रा में दिखाई पड़ता है। यह रासायनिक विष गर्भवती महिलाओं के गर्भ को प्रभावित करता है, परिणाम-स्वरूप अपंग, विकलांग व मंदबुद्धि बच्चे पैदा होते हैं। सुप्रसिद्ध जीव विज्ञानी एलिस जेरार्ड ने अपने अध्ययन अनुसंधान में बताया है कि रसायनों के अत्यधिक एवं अंधाधुन्ध प्रयोग की आज प्राकृतिक साधनों को नष्ट कर रहे हैं। बच्चों ने इससे पूर्व कभी दूषित पानी नहीं पिया तथा कभी उनके फेफड़ों में दूषित हवा नहीं भरी, जैसा कि अब हो रहा है। मानव शिशु गर्भ के अन्दर तथा बाहर माँ के दूध के साथ-साथ इन जहरीले रसायनों को पीने को विवश है।
कृषि पैदावार बढ़ाना उचित भी है और आवश्यक भी, परन्तु यह विषय से सींचकर नहीं की जानी चाहिए। अधिक उपज बढ़ाकर हम सबका पेट तो भर सकते हैं, परन्तु स्वास्थ्य को चौपट कर लेना भी बुद्धिमानी नहीं है। पक्षियों से अन्न बचाने और फसल नष्ट करने वाले कृमि-कीटकों को विषैले रसायन छिड़ककर नष्ट करने का दुहरा लाभ उठाने के फेर में मनुष्य ने समाधान तो एक भी गुत्थी का नहीं किया, उलटे ऐसे संकट खड़े कर लिए, जो उसके सामने कितनी ही नहीं समस्याएँ प्रस्तुत कर रहे हैं।
आशा का संबल
भविष्य की आशंकाओं से चिंतित और आतंकित कभी नहीं होना चाहिए। आज की अपेक्षा कल और भी अच्छी परिस्थितियों की आशा करना, यही वह संबल है जिसके आधार पर प्रगति के पथ पर मनुष्य सीधा चलता रह सकता है। जो निराश हो गया, जिसकी हिम्मत टूट गई, जिसकी आशा का दीपक बुझ गया, जिसे अपना भविष्य अंधकारमय दिखता रहता है, वह तो मृतक के समान है। जिंदगी उसके लिए भार बन जाएँगी और वह काटे नहीं कटेगी। यह दुनिया कायरों और डरपोकों के लिए नहीं, साहसी और शूरवीरों के लिए बनी है। हमें साहसी और निर्भीक होकर ही जीना चाहिए।
-अखण्ड ज्योति, दिसम्बर, 1962
बिंदु विसर्ग को संक्षेप में ‘बिंदु’ कहा जाता है। बिन्दु का अर्थ ‘बूँद’ है। विर्ग माने ‘गिरना’। इस प्रकार बिंदु विसर्ग का तात्पर्य ‘बूँद का गिरना’ हुआ। यहाँ बिंदु का मतलब वीर्य नहीं, अमृत है। उच्चस्तरीय साधनाओं के दौरान जब मस्तिष्क से यह झरता है, तो ऐसी दिव्य मादकता का आभास होता है, जिसे साधारण नहीं, असाधारण कहना चाहिए।
बिंदु की स्थिति सिर के ऊपरी हिस्से में उस स्थान पर है, जहाँ हिंदू परंपरा में शिखा रखी जाती है। शिखा को कसकर बाँधने और गाँठ लगाने का विधान हैं ऐसा करने से उक्त स्थान में तनाव और खिंचवा आता है, जिससे बिंदु के प्रति सजगता बनी रहती है।
तांत्रिक मतानुसार मस्तिष्क के ऊपरी कार्टेक्स में एक छोटा सा गड्ढा है, जहाँ अत्यल्प मात्रा में स्राव भरा रहता है। इस स्राव मध्य द्वीप के सदृश की एक बिंदु संरचना हैं इसे ही बिन्दु विसर्ग कहा गया है।
शरीरशास्त्रियों ने मस्तिष्क के भीतर इस प्रकार की किसी सूक्ष्म संरचना की अब तक पुष्टि तो नहीं की है, किन्तु इतना सुनिश्चित है कि इस दिशा में होने वाले शोध-अनुसंधान उतने ही रोचक और लाभकारी होंगे, जितना कि पीनियल ग्रंथि और आज्ञाचक्र के मध्य संबंध स्थापित करने वाला अध्ययन। चूँकि यह अत्यंत सूक्ष्म संरचना है, अतः सह सम्भव है कि मस्तिष्कीय कतरव्योंत के दौरान वह नष्ट हो जाए और उसकी उपस्थिति सिद्ध न हो सके। ऐसे ही बिंदु द्वारा स्रवित उस अत्यल्प तरल पदार्थ की चीड़-फाड़ के पश्चात् निकाल पाना और उसका विश्लेषण कर पाना कठिन होगा, कारण कि मृत्यु के उपरान्त ग्रंथीय और तंत्रिकीय स्राव समाप्त हो जाते हैं। ऐसे में उसके स्थूल अस्तित्व से एकदम इनकार कर देना उचित न होगा।
तांत्रिक ग्रंथों में बिंदु को पूर्णचंद्र तथा अर्द्धचंद्र के रूप में दर्शाया गया है। पूर्णचंद्र अमृत की अति सूक्ष्म बूँद का तथा अर्द्धचंद्र चंद्रमा की कला का द्योतक है। यह अर्द्धचंद्र इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि बिंदु का चंद्रमा की कलाओं से उसी प्रकार अत्यंत निकट का संबंध है, जिस प्रकार अत्यन्त निकट का संबंध है, जिस प्रकार मनुष्य अंतः स्रावी ग्रंथियाँ, भावनात्मक तथा मानसिक उतार-चढ़ाव योग के गहन अभ्यास से क्रमिक रूप से बढ़ती हुई सहस्रार की अनंतता का अनुभव उसी प्रकार किया जा सकता है, जिस प्रकार शुल्क पक्ष में चंद्रमा धीरे-धीरे बढ़ते हुए पूर्णिमा के दिन पूर्ण हो जाता हैं ऐसे ही बिंदु के पीछे सहस्रार भी शनैः शनैः उद्घाटित होने लगता है। रात्रिकालीन विस्तृत आकाश की पृष्ठभूमि में बिंदु की अभिव्यक्त किया जाता है। यह इस बात का द्योतक है कि सहस्रार भी इस आकाश की तरह व्यापक तथा विस्तृत है, किन्तु अहंभाव के रहते सहस्रार का संपूर्ण अनुभव कर पाना संभव नहीं।
बिंदु विसर्ग सातवें लोक ‘सत्यम्’ तथा आनंदमय कोश से संबंधित है। ऐसा समझा जाता है कि जब बिंदु विसर्ग का जागरण होता है, तो वहाँ से अनेक प्रकार के नाद की उत्पत्ति होती है, जिसका चरमोत्कर्ष ॐ नाद के विकास के रूप में होता है। इस स्थिति में साधक को ॐ वर्ण के ऊपर स्थित बिंदु तथा अर्द्धचन्द्र से सृष्टि के सभी स्रोत निकलते हुए दिखलाई देने लगते हैं।
साधना-ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि बिंदु से एक प्रकार का रस स्राव होता है, जिसका संचयन नासा ग्रसनी के पीछे कोमल तालु के ऊपर एक छोटे से गड्ढे में होता है। यह केन्द्र ‘ललना चक्र’ कहलाता है। विशुद्धि चक्र से इसका निकट का संबंध है। दोनों के बीच पारस्परिक संबंध तभी स्थापित हो पाता है, जब विशुद्धि चक्र जाग्रत अवस्था में होता है। ऐसी दशा में ललना से स्रवित द्रव विशुद्धि चक्र द्वारा पूर्णतः अवशोषित हो जाता है। यहाँ उक्त रस की प्रकृति अमृतोपम जैसी होती है और साधक को चिर यौवन प्रदान करती है, किन्तु तब विशुद्धि केंद्र अक्रियाशील स्थिति में रहता है, तब ललना से यह द्रव सीधे मणिपूरित चक्र तक पहुँच जाता है और उसके द्वारा आत्मसात् कर लिया जाता है। यह स्थिति विषतुल्य होती है। ऐसी दशा में शरीर कोशिकाओं का क्षय प्रारम्भ हो जाता है और शीघ्र बुढ़ापा आ धमकता है। इसीलिए ललना को उत्तेजित करने से पूर्व विशुद्धि चक्र का जागरण अनिवार्य माना गया है।
साधना विज्ञान में ललना को उद्दीप्त करने के कई उपाय बताए गए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण खेचरी मुद्रा है। यह कुण्डलिनी योग में अपनायी गयी खेचरी मुद्रा की तरह सरल नहीं होती, अपितु इसमें जीभ के निचले जुड़े हुए हिस्से को धीरे-धीरे अभ्यास पूर्वक आगे बढ़ाकर जिह्वा को गाय के थन की तरह दोहन करते हुए लंबा करना पड़ता है। इस क्रम में जब वह इतनी लंबी हो जाए कि जीभ की ऊपर की ओर मोड़ने और तालू से चिपकने से वह नासिका मार्ग को स्पर्श करने लगे, तो समझना चाहिए कि प्रयोजन पूरा हो गया। इस प्रक्रिया में वायुमार्ग पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है और बिंदु से विशुद्धि में झरने वाला द्रव संपूर्ण शरीर में फैल जाता है। इससे शरीर को पर्याप्त शक्ति और स्फूर्ति मिलती है एवं शरीर की चयापचय क्रिया एकदम मंद पड़ जाती है। ऐसी स्थिति में जीवित रहने के लिए वायु या आहार की आवश्यकता नहीं रह जाती और व्यक्ति इनके बिना भी लंबे समय तक आसानी से जिंदा रह सकता है।
घटना आज से लगभग दो दशक पूर्व की है। एक श्रीमतं ने काशी शहर की आबादी से कुछ हटकर उत्तर की ओर जमीन की एक प्लॉट खरीदा और उसमें मकान बनवाने के उद्देश्य से नींव की खुदाई प्रारम्भ करवाई। प्लाँट के पूरबी कोने में जब खुदाई हो रही थी, तो खुदाई उपकरण अचानक जमीन के अन्दर धंसते उपकरण अचानक जमीन के अन्दर धंसते चले गये। मजदूरों ने सोचा कि शायद चूहे का कोई बिल होगा, इसलिए ऐसा हुआ। मिट्टी हटाई, तो वहाँ बालों का गुच्छा-सा दिखाई पड़ा, जिसे देख वे चौंक पड़े। जिज्ञासा हुई कि आखिर यह है क्या? अब उन्होंने अतिरिक्त सतर्कता बरतते हुए सावधानीपूर्वक मिट्टी हटानी प्रारम्भ की। कुछ समय पश्चात् केशों का वह गुच्छा विशाल जटा-जुट के रूप में सामने आया। वे समझ गये कि कोई महात्मा यहाँ समाधिस्थ हैं। धीरे-धीरे करके उनके चारों ओर की मिट्टी हटाई गई। इससे महात्मा का सिर स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ने लगा। मालिक नजदीक के ही एक मित्र के घर पर थे। उन्हें अविलम्ब सूचना दी गई। वे आये। श्रमिकों से उनकी बातचीत हो ही रही थी कि अब क्या किया जाए कि इतने में ही महात्मा की समाधि भंग हो गई। उनकी आँखें खुलीं तो सर्वप्रथम उन्होंने चारों ओर देखा और वहाँ खोदने का कारण पूछा इसे बाद गंगाजल की माँग की। मालिक ने तुरंत एक व्यक्ति की ताँगे से भेजा। गंगा वहाँ से लगभग पाँच मील दूर थी। जल आने में विलंब होते देखकर महात्मा जी ने कारण पूछा, तो बताया गया कि पाँच मील जाने और पाँच मील आने में कम से कम एक घंटा तो लगेगा ही। यह सुनकर उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि क्या गंगा इतनी दूर चली गई। कदाचित जिस समय उन्होंने समाधि लगाई होगी, उस समय वह स्थान गंगा का तट रहा होगा। इतने वर्षों बाद गंगा खिसककर इतनी दूर चली गई। इस दीर्घकाल में वे बिना कुछ खाए-पिए और साँस लिए जीवित बने रहे, ऐसा उस बिंदु स्राव के कारण ही संभव हो सका-यह साधना शास्त्र के मर्मज्ञों का कथन है। कहते हैं कि गंगाजल पीने के पश्चात् उक्त महात्मा ने स्वयं को पूर्ववत् मिट्टी से ढंग देने का निर्देश दिया। जमीन के मालिक ने वैसा ही किया और निर्माण कार्य रोक दिया। प्रस्तुत घटना भारत के सिद्ध एवं महान योगी ग्रंथ में आँशिक रूप में ही वर्णित है।
संपूर्ण मानव प्रगति काल के इतिहास में बिंदु की शक्ति अभी तक रहस्यात्मक ही बनी हुई है। इसे सृष्टि का मूल माना गया है। तंत्र में प्रत्येक बिन्दु शक्ति का केन्द्र है। यह शक्ति स्थायी चेतना के आधार की अभिव्यक्ति है। शास्त्रों में बिन्दु को वह आदिस्रोत माना गया है, जहाँ से सभी पदार्थों का प्रकटीकरण और अंततः जिसमें अभी का लय हो जाता है। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी आदि सभी उसी की निष्पत्तियाँ हैं।
बिंदु में ब्रह्माण्ड की अनंत क्षमताओं का विकास निहित है। यहीं सृष्टि की समग्र रूपरेखा छिपी रहती है। वहाँ पर विकास का तात्पर्य है-वह अनुभवातीत प्रक्रिया, जिसका संबंध अस्तित्व की संपूर्ण प्रणाली से है।
इस प्रकार मस्तिष्क के भीतर और बाहर के केन्द्र बिन्दुओं में परस्पर संगीत बैठ जाती है। दोनों ही अपार संभावनाओं से युक्त हैं। मस्तिष्क के जिस बिंदु का ललना चक्र से संबंध है, उस चक्र में नासा छिद्रों से होकर कुछ नाड़ियाँ गुजरती हैं, लेकिन न तो ललना, न बिंदु जागरण के केन्द्र हैं। जब विशुद्धि का जागरण होता है, तब साथ-साथ ललना तथा बिन्दु का भी स्वयमेव जागरण हो जाता है, इसलिए साधना-विज्ञान में ललना तथा बिन्दु को पृथक् से जगाने का कोई विधान या उपचार नहीं है।
बिंदु अनंत संभावनाओं को संजोए हुए है। वह चाहे पदार्थ कण के रूप में हो, रज वीर्य या मस्तिष्कीय स्राव के रूप में, उसमें ऐसी क्षमता और सामर्थ्य है कि उसे गागर में सागर भरने जैसी उपमा दी जा सकती है। इसलिए बिंदु विसर्ग की साधना प्रकारांतर से उस शक्ति के एक अंश का अनावरण और उद्घाटन ही है, जिससे यह सम्पूर्ण सृष्टि उद्भूत है। हमें इस भली-भाँति समझ लेना चाहिए।
एक हृष्ट-पुष्ट और बलिष्ठ शरीर का स्वामी नवयुवक किसी काम से कचहरी में गया। पढ़ने-लिखने में यह कोरा था। इसलिए उसे मुंशी के पास जाना पड़ा। मुंशी के पास जाकर वह बोला-भई मेरी अर्जी लिख दो, जरा जल्दी है।
अर्जी लिखने के लिए और भी लोग खड़े थे। सो मुंशी ने कहा-लाइन से लग जाओ, नंबर आने पर अर्जी लिख देंगे।
दोपहर बाद दो बजे कहीं उसका नंबर आया। इतनी देर में वह खड़ा-खड़ा थककर चूर हो गया। रह-रहकर उसे यह अनुभव हो रहा था कि शारीरिक दृष्टि से समर्थ और बलवान होते हुए भी वह बौद्धिक दृष्टि से परावलम्बी ही है।
उस दिन से उसने स्वास्थ्य साधना के साथ-साथ ज्ञान-साधना पर भी ध्यान देना आरम्भ किया। दिन-रात एक करके उसने अपनी बौद्धिक क्षमता बढ़ायी। उसी का परिणाम था कि एक दिन व बिहार प्राँत का स्वायत्त मंत्री बना। उन्हें आज भी लोग गणेश दत्त सिंह के नाम से जानते हैं।
शौर्य और साहस मनुष्य-जीवन के भूषण है। उन्हें यदि विकसित कर लिया गया, तो पग-पग पर आने वाली विपत्तियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकना न सिर्फ शक्य हो जाएगा, वरन् वैसे समय में भयभीत होने और धैर्य खोने से होने वाली असाधारण क्षति से बचा जा सकना सरल-संभव हो जाएगा।
आए दिन घटने वाली घटनाएँ इस बात की साक्षी हैं कि मुसीबतें वीरों के लिए सहज सामान्य और कायरों के लिए पहाड़ के समतुल्य साबित होती हैं। ऐसा ही एक प्रसंग कनाडा के दो युवाओं के साथ घटित हुआ। मैल्कम एस्पीलैप्स 19 वर्ष का युवा पर्वतारोही था तथा वार्व बैंक 18 वर्षीया युवती थी। दोनों ब्रिटिश कोलम्बिया ग्लेशियर के राष्ट्रीय उद्यान स्थित 2050 मीटर ऊँचे दर्रे को पार करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने 1971 के अक्टूबर मास का चयन किया। गरमी की समाप्ति हो चुकी थी। वे गरम मौसम के उत्पन्न हुई शारीरिक निष्क्रियता और मानसिक नीरसता को पर्वतारोहण के साहसिक कार्य द्वारा समाप्त करना चाहते थे।
एक प्रातः अभियान के लिए वे निकल पड़े। शिखर पर पहुँचने तक आरोहण कार्य निर्विघ्न चलता रहा, किन्तु अचानक वे वहाँ के बर्फीले तूफान में फँस गए। विवश होकर रात्रि उन्हें पार्क के एक छोटे कमरे में बितानी पड़ी।
अगले दिन सुबह भी मौसम यथावत बना रहा। दोनों उसके सुधरने का इंतजार करने लगे। समय बिताने के लिए उनके पास बात करने के अतिरिक्त और कोई दूसरा साधन था नहीं, अस्तु वे उसी प्रकार मन बहलाते रहे।
उनकी मित्रता मात्र दो महीने पुरानी थी। वे एक होटल में नौकरी करते थे। उसी दौरान उन्हें एक दूसरे की अभिरुचियों, आदतों एवं स्वभावों की जानकारी मिली। दोनों ही पर्वतारोहण के शौकीन थे। होटल कार्य से छुट्टी पाकर अपना अधिकाँश समय पर्वत शिखरों पर ही बिताते थे।
दोपहर हो चुकी थी। बर्फ गिरना अब बंद हो गया था। दोनों ने बर्फ पर फिसलने वाले अपने-अपने जुते पहने, सामान उठाया तथा खाई में नीचे की ओर फिसलने लगे। घाटी का मार्ग टेढ़ा-मेढ़ा तथा लंबा था। आधी दूरी उन्होंने फिसल कर मात्र एक घंटे में पार कर ली। इसके पश्चात् वे कुछ रुककर एक बर्फीले टीले को देखने लगे। सूर्य की चमकीली टीले को देखने लगे। सूर्य की चमकीली धूप में वह चाँदी की भाँति चमक रहा था। अब तक भगवान अंशुमाली काफी प्रखर हो चुके थे। इसके कारण मैल्कम और वार्व को गरमी का अहसास होने लगा। उन्होंने अपने-अपने कोट उतारे और सामने बहते झरने के शीतल जल से अठखेलियाँ करने लगे।
जब आगे की यात्रा आरम्भ की, तो थोड़ी दूर पर मैल्कम ने दो रीछ शावक देखे। वह कुछ ठिठका, फिर शोर मचाते हुए अपनी दूरबीन निकाल ली और यह देखने का प्रयास करने लगा कि मादा रीछ कहीं निकट तो नहीं है। लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर वह दिखाई पड़ी। उन्हें देखकर वह जोर से गुर्रायी, फिर झाड़ियों में अदृश्य हो गई।
मैल्कम क्षण भर को रुका, सोचने लगा-अब क्या किया जाये? यदि उससे आमना -सामना हो गया, तो किस प्रकार की रणनीति अपनायी जाए और अपना बचाव कैसे किया जाए? यही सोचते हुए वह आगे बढ़ने लगा। बहुत सोच विचार कर उसने निर्णय लिया कि यहाँ फाइट और फ्लाइट (भागो या मुकाबला करो) में से सिर्फ फाइट अर्थात् मुकाबला करो की स्थिति ही प्रभावी सिद्ध हो सकती है, कारण कि हिमयुक्त मार्ग पर भाग सकना संभव नहीं है। ऐसा सोचकर उसने कमर में बंधा अपना चाकू टटोला, तत्पश्चात क्षिप्र कदमों से चलने लगा। अभी वह ज्यादा दूर नहीं गया था कि झाड़ी से निकलकर मादा रीछ ने उस पर आक्रमण कर दिया। इस समय तक उसने स्वयं को परिस्थिति के अनुरूप ढाल लिया था, अतः आक्रमण से घबराया नहीं। झपट्टे के साथ वह एकदम से बैठ गया, किन्तु उसके पंजे के वार ने उसको संज्ञाशून्य बना दिया। रीछ उस पर आक्रमण करता उसके पूर्व ही उसने वार्व को बर्फ के टीले की ओर धकेल दिया, अतएव वह उस प्रथम हमले से बच गई।
मैल्कम को जब होश आया, तो ज्ञात हुआ कि भालू ने उसे अपने मजबूत पंजों के आघात से उसे लगभग तीन मीटर दूर उठा फेंका है। अब तक भालू ने वार्व को तलाश लिया था। वह बर्फ में औंधे मुँह स्थिर पड़ी थी। उसे मालूम था कि निश्चल पड़े रहना ही भालू से बचने का एकमात्र तरीका है। वह उसे ही अपनाए हुए थी। मादा भालू उसके गर्दन के पीछे खड़ी गुर्रा रही थी। मैल्कम ने जब यह दृश्य देखा तो घबरा गया, सोचा शायद, अब अगला हमला वह वार्व पर करने जा रही है। वह उठा, अपने कमर की पेटी से शिकार करने वाला चाकू निकाला एवं हल्ला करते हुए आक्रमण कर दिया। चाकू का वार गर्दन पर हुआ था। खाल को चीरते हुए वह अन्दर तक धँस गया। तुरंत ही उसको बाहर निकाला और विद्युत की गति से दूसरा हमला किया। रीछ की गर्दन से खून का फुहारा फूट पड़ा। वह दर्द से कराह उठी। उसने तेजी से गर्दन घुमाई और मैल्कम की ओर झपट्टा मारा। उससे उसकी कलाई घायल हो गई तथा सिर के बाल त्वचा सहित नकली बाल की टोपी की तरह अलग हो गए। वह बार-बार झपट्टा मार रही थी और मैल्कम बराबर उससे बचने का प्रयास कर रहा था। इस क्रम में वह बुरी तरह घायल हो गया। उसका चेहरा लहूलुहान हो रहा था। भालू एक बार फिर उसकी ओर लपकी। उसने स्वयं को थोड़ा तिरछा करते हुए मुक्के का एक भरपूर प्रहार उसकी नाक पर किया, पर इससे रीछ तनिक भी विचलित नहीं हुई और अपना आक्रमण अभियान जारी रखा। मैल्कम ने डटकर उसका मुकाबला किया, लेकिन अब वह काफी थक चुका था। संघर्ष की सामर्थ्य शेष नहीं थी। मृत्यु निकट समझकर संघर्ष टालना ही उसे उचित प्रतीत हुआ। बाकी ऊर्जा को वह गँवाना नहीं चाहता था, अतएव मृत्यु का बहाना करते हुए जमीन पर गिर पड़ा और शाँत हो गया। मादा रीछ ने जब उससे निश्चेष्ट शरीर को भूमि पर देखा, तो अंतिम बार प्रहार किया, उसके ऊपर मिट्टी डाली, टहनियाँ उछाली। इनके द्वारा वह यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि क्या वास्तव में ही मैल्कम की मौत हो गई? जब कोई हलचल न हुई तो वह वहाँ से चली गई।
मैल्कम खाई में आधा अन्दर आधा बाहर पड़ा हुआ था। उसकी कलाई में असह्य दर्द हो रहा था। किसी प्रकार वह खंदक से बाहर निकला और धीमे स्वर में वार्व को पुकारा। प्रत्युत्तर में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। वार्व इस बात से डरी हुई थी कि कहीं रीछ फिर न आ धमके। उसने सिर उठाकर आस-पास देखा, फिर मैल्कम को दशार किया कि वह उसकी सहायतार्थ पहुँच रही है।
मैल्कम वहीं लेटा रहा। उसकी कलाई टूट गई थी। घुटने में भी गम्भीर चोट थी। आगे के दाँत उखड़ गये थे। एक आँख चेहरे के रक्त स्राव के कारण चिपक कर बंद हो गई थी, जिसे वह यदा-कदा हाथ से खोल लेता था। चेहरे पर उधड़ी त्वचा लटक रही थी, जो दृश्य को काफी भयावह बना रही थी।
उसने थैले से एक कपड़ा निकाला और चेहरे की त्वचा को अपने स्थान पर रखते हुए पट्टी बाँध ली। इस बीच वार्व पीछे की सड़क से भागते हुए विश्रामगृह की ओर दौड़ी। वह सहायता के लिए चीख रही थी। गुहार सुनकर कई लोग दौड़ आए, जिनमें मैल्कम का मित्र वार्डन कोर्डो भी था। नैड क्लो नामक चिकित्सक ने आकर सर्वप्रथम उसके चेहरे तथा पेटों पर भली-भाँति पट्टियाँ बाँधी। इसके बाद हैलिकाप्टर माध्यम से उसे रेविलस्टोक के कवीन विक्टोरिया अस्पताल भेज दिया गया। वहाँ वह दीर्घकालीन चिकित्सा के उपरान्त ठीक हो सका। उसके चेहरे और नाक पर अनेक बार त्वचा प्रत्यारोपण किया गया। इसके पश्चात् ही उसकी शक्ल पूर्ववत् हो सकी। फिर भी कुछ दाग-धब्बे शेष रह गए। बाद में वार्व ने उससे शादी कर ली।
आज वे दोनों कनाडा, वैंकुवर में रहते हैं। मैल्कम एक रेस्तराँ चलाता है, जबकि वार्व किसी कार्यालय में कार्यरत है। जब प्रेम वास्तविक और आँतरिक होता है तब वह बाह्य लावण्य को नहीं देखता, वरन् यह सोचता है कि जिन आदर्शों पर इसकी नींव पड़ी है, उसका अनुपालन हो पा रहा है या नहीं? सच्चा प्रेम शरीर के प्रति नहीं, उत्कृष्ट व्यक्तित्व और उदात्त चिंतन के प्रति होना चाहिए। वार्व ने इसी का उदाहरण प्रस्तुत किया।
मैल्कम की साहसिक भिड़ंत के कारण उसे अनेक पुरस्कार मिले। रॉयल ह्यूमन सोसायटी, लंदन ने उसकी वीरता के लिए ‘स्टेनहोप गोल्ड मेडल’ प्रदान किया। इसके अतिरिक्त रॉयल कैनेडियन ह्यूमन एसोसिएशन ने वीरता पुरस्कार तथा कार्नेगी हीरो फंड कमीशन ने कार्नेगी वीरता पुरस्कार प्रदान किए।
शौर्य और पराक्रम महानता के सहचर है। कायरता मनुष्य को शोभा नहीं देती। जो धैर्य और साहस के साथ विपरीत परिस्थितियों में भी मनोबल को बनाए रखते हैं, विपत्तियों पर विजय वे ही प्राप्त कर पाते हैं। डरपोक तो पग-पग पर पराजित होते और जीवन में अनेक बार मरते हैं।
मराठा सरदार राघोबा पेशवा पर अपने भतीजे ही हत्या का अभियोग था। जिस न्यायालय में उसका निर्णय होने वाला था, उसके न्यायाधीश श्री रामशास्त्री थे। श्री शास्त्री सत्यनिष्ठा के लिए दूर-दूर तक विख्यात थे, इसलिए राघोबा को भय था, कहीं उसे सजा न मिल जाए।
राघोबा की धर्मपत्नी को एक उपाय सूझा। उन्होंने श्री रामशास्त्री को भोज दिया और इस विचार से उनकी खूब आवभगत की कि उससे प्रभावित होकर श्री शास्त्री उनके पक्ष में ही निर्णय देंगे। बात-बात में उन्होंने इस बात की चर्चा ही छेड़ दी तो न्यायनिष्ठ श्री रामशास्त्री ने कहा-न्याय की दृष्टि से तो सरदार को प्राण दंड मिलना ही चाहिए। राघोबा की पत्नी उनकी इस निर्भयता से प्रभावित तो हुई, पर उन्होंने कहा-इस तरह का निर्णय देने का परिणाम जानते हैं आप क्या होगा? हम जिंदा ही आपकी जीभ कटवा लेंगे और किसी गड्ढे में गड़वा देंगे?
बिना उत्तेजित हुए श्री शास्त्री ने उत्तर दिया यह आप कर सकती हैं, पर उससे मुझे कोई दुख नहीं होगा, गलत निर्णय देने की अपेक्षा तो जीभय क्या सिर काट लिया जाना ही अच्छा है। अंततः विजय न्याय की ही हुई।
आपका स्वास्थ्य आयुर्वेद के मतानुसार
आयुर्वेद के आहार पक्ष से जुड़ा एक बड़ा महत्वपूर्ण प्रसंग है। चरक संहिता के लेखक पुनर्वसु से कुछ वैद्यों ने पूछा-कोऽरुक अर्थात् रोगी कौन नहीं है? एक वैद्य ने उत्तर दिया-जो च्यवनप्राश खता है। एक ने कहा-जो लवण भास्कर व त्रिफला नियमित लेता है, एक ने कहा-जो चंद्रप्रभावटी खाता है। तब स्वस्थ रहने का आधारभूत सिद्धांत वाग्भट्ट ने समझाया। उत्तम स्वास्थ का रहस्य है- हितभुक, मितभुक, ऋतभुक। हितभुक अर्थात् ऐसी वस्तुएँ ग्रहण की जाए जो हितकारी हों, केवल स्वाद के लिए न हों। मितभुक अर्थात् अच्छी पुष्टिदायक वस्तुएँ ग्रहण की जाए पर थोड़ी खाए। ऋतभुक अर्थात् अच्छी वस्तुएँ खाए थोड़ी खाए, पर ध्यान यह रखा जाए कि वे उत्तम कमाई से पैदा की गयी हों- अनीतिपूर्वक उपार्जित की गयी न हों।
उपर्युक्त आहार संबंधी दृष्टांत यद्यपि सर्वविदित है फिर भी कितने हैं जो इन पक्षों पर ध्यान न दे पाते हैं। यही कारण है कि अधिकाँश आज की जीवनशैली में आए परिवर्तन से हुए रोगों के मूल कारण में आहार ही प्रधान है। विगत अंक में चरक संहिता में बताए गए आहार वर्गों की चर्चा संक्षेप में की गयी थी। अब यहाँ थोड़ा विस्तार में चलते हैं-
(1) अन्न वर्ग (शूक्र धान्य या सिरियल्स)
चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, जौ, मक्का, आदि प्रमुख रूप में अन्न, अनाज या शूकधान्य माने गए हैं, जिनका हमारे देश में आहार के रूप में प्रयोग होता है। ये हमारे आहार में ऊर्जा के प्रमुख स्रोत हैं। इन अन्न वर्ग के द्रव्यों में मुख्य घटक कार्बोहाइड्रेट ही होता है। प्रोटीन्स प्रायः छह से बारह प्रतिशत तक पाए जाते हैं। अति आवश्यक अमीनो अम्ल ही प्रोटीन्स का निर्माण करते हैं एवं इनकी शुक्र धान्य में अल्पता ही होगी है। अन्न वर्ग में खनिज लवण (मिनरल्स) भी कम मात्रा में ही होते हैं। इनकी ऊपर सतह पर विटामिन बी समूह पाया जाता है। एक वर्ष पुराने तक अन्न का सेवन किया जाता है।
(2) शमीधान्य वर्ग (शिम्बी वर्ग या लेग्यूम एवं पल्सेज)
इन द्रव्यों से दालें बनती हैं। सभी प्रकार की दालें प्रोटीन्स की दृष्टि से संपन्न होती है। चना, मूँग, अरहर, उड़द, राजमा, सोयाबीन आदि इसी वर्ग में आते हैं। शाकाहारियों के लिए प्रमुखतः प्रोटीन का स्रोत यही आहार वर्ग है एवं किसी भी माँसाहारी पदार्थ की तुलना में यह प्रोटीन श्रेयस्कर व अधिक गुणवत्ता वाला है।
(3)कन्दमूल वर्ग (टयूबंर्स एवं रुट्स)
आलू, शकरकंद, जिमीकंद, अरबी, शलजम, गाजर तथा मूली आदि प्रमुख खाद्य पदार्थ कंद मूल वर्ग में ही आते हैं। ये कार्बोज (कार्बोहाइड्रेट) बहुत होते हैं एवं कैलोरीज के प्रमुख स्रोत हैं। यही कैलोरीज शरीर को ऊर्जा प्रदान कर चयापचय प्रक्रिया को गतिशील करती है। अन्न के स्थान पर भी इन्हें प्रयुक्त किया जा सकता है। ऋषि मुनियों का भोजन फलाहार रूप में इसी स्रोत से आता था।
(4) फल वर्ग (फ्रूट्स आदि)
फलों में विटामिन्स, खनिज लवण, प्राकृतिक शर्करा-कार्बोज पर्याप्त मात्रा में होते हैं। आमलको, बिल्व, केला, खजूर, अंजीर, पपीता, जामुन, संतरा, मौसमी, अमरूद, आम, अनार, सेब आदि सामान्यतः सब ओर पाए जाने वाले फल हैं, जो औषधि प्रधान गुण भी रखते हैं एवं खाद्य फल के रूप में भी हैं। इनमें कुछ तो मूलतः रसायन जैसे गुण वाले हैं। खुमानी, अंगूर, अनानास, स्ट्रॉबेरी आदि फल भी अब भारत में बहुतायत में उपलब्ध हैं। जिनकी सामर्थ्य हो वे इनका भी सेवन कर सकते हैं। फल सदा पके हुए ही लिए जाने चाहिए। सड़े-गले फल नहीं खाए जाने चाहिए। आजकल कोल्ड स्टोरेज का जमाना है। साथ ही आम, केला, अंगूर आदि फलों को कार्बोइड नामक रसायन से पकाया जाता है, जो शरीर के लिए विष समान है। अतः इनके स्थान पर हरी शाक-सब्जियों का सेवन करना या दूसरे फलों का सेवन करना अधिक उपर्युक्त है।
(5) शाक वर्ग (वेजिटेबिल्स)
आहार के सर्वाधिक महत्वपूर्ण ये घटक खनिज लवणों तथा विटामिनों की आपूर्ति के प्रमुख स्रोत हैं। करेला, बैंगन, तोरई, भिंडी, गोभी, टमाटर, खीरा, सेम, चौलाई आदि शाक वर्गीय पदार्थों का नियमित आहार में रहना बड़ा हितकारी है। ऋतु विपरीत में उत्पन्न शाकों का सेवन आयुर्वेद के अनुसार वर्जनीय है।
(6) हरित वर्ग (ग्रीन लीफी वेजिटेबल्स)- इनमें प्रमुख रूप से पालक, मेथी, मटर, कुल्फा, धान्यक पत्र, मूलक पत्र, पोदीना, धनिया आदि आहाराँश में प्रयोग किये जाते हैं। इनमें खनिज लवण तथा विटामिन सी व ई आदि जीवनीय तत्व प्रचुरता से पाए जाते हैं।
(7) शुष्क फल तथा तिलहन (ड्रायफ्रुट्स व आइल सीड्स)- काजू, पिस्ता, बादाम, अख़रोट, चिरौंजी, नारियल, मूँगफली आदि नट वर्ग के पदार्थों का प्रायः इनमें उपयोग होता है। ये प्रोटीन बहुल तो होते ही हैं। इनमें स्नेहद्रव्य जो अन्दर के लुब्रीकेशन व वसा पूर्ति के लिए अनिवार्य हैं, प्रचुर मात्रा में होते हैं। तिल, सरसों आदि तिलहन भी खाद्य पदार्थ हैं।
(8) इक्षुवर्ग (शर्करा प्रधान)
चीनी, गुड़, खाँड़, ग्लूकोज युक्त पदार्थ इक्षुवर्ग में माने गए हैं। इनका प्रयोग मधुर खाद्य के नाते किया जाता है। इनमें शतप्रतिशत कार्बोज होता है जो ऊर्जा उत्पादन का प्रमुखतम एवं उत्तम स्रोत है।
(9) अम्बुवर्ग
इसमें जल प्रधान सभी पदार्थ आते हैं। वैसे तो यह काया पूर्णतः जल प्रधान है। जल के रूप में यदि हम पानी पीकर अपनी प्यास बुझाते हैं, तो विभिन्न शरबत-फलों के रस द्वारा शरीर के महत्वपूर्ण घटकों के लिए अनिवार्य तत्वों की पूर्ति भी करते हैं तरबूज जैसे फल इसी वर्ग में आते हैं, जिनमें 90 प्रतिशत से अधिक जल ही होता है।
(10) गोरस वर्ग (मिल्क प्रोडक्ट्स)
दूध, दही, पनीर, छाछ (तक्र) आदि इस वर्ग में आते हैं। इसे दिव्य आहार माना गया है। कई व्यक्ति इसी का कल्प भी करते देखे गए हैं। इसमें गौ दुग्ध की महिमा अपरम्पार बताई गई है। दही अनेकों गुणों से भरपूर खाद्य है। पनीर व उससे बने पदार्थ भी सर्वोपयोगी हैं। तक्र को तो अमरत्व देने वाले रसायन की संज्ञा दी गयी है। आज के युग में जब कृत्रिम यूरिया मिश्रित दूध की चारों ओर बहुतायत है-ध्यान रखा जाना चाहिए कि कहीं विष का सेवन तो दूध के नाम पर नहीं हो रहा है। दूध को औटाकर बनाए गए खाद्य पदार्थ स्वाद में तो अच्छे लग सकते हैं, किन्तु पौष्टिकता की दृष्टि से आज की जीवनशैली वाले व्यक्ति के लिए न लेने योग्य ही हैं।
(11) स्नेह वर्ग (आँइल्स व फैट्स)
मक्खन, घृत, वनस्पति घृत तथा कृत्रिम वानस्पतिक तैल आदि स्नेह वर्गीय पदार्थ आहार के प्रमुख अंग माने गए हैं। इस वर्ग के पदार्थ कैलोरीज (ऊर्जा) के प्रमुखतम स्रोत हैं। एक ग्राम पदार्थ से नौ कैलोरीज मिलती है। इनमें विटामिन ए.डी.ई.व के आदि उपस्थित बताए जाते हैं। इनका ज्यादा मात्रा में सेवन करना शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य दोनों की के लिए हानिकारक है। अतः आवश्यकतानुसार उचित मात्रा में ही इनका प्रयोग होना चाहिए।
(12) कृतान्न वर्ग तथा आहार यौगिक
इस वर्ग में कुक्ड फूड (पकाया हुआ भोजन) तथा आहार यौगिकों को लिया गया है। आयुर्वेद इस वर्ग की व्याख्या अलग से करता है क्योंकि ऊपर बताए सभी वर्ग स्वयं में स्वतंत्र हैं। पकने पर गुणधर्म बदल जाते हैं एवं इनके यौगिक बन जाने पर मिल-जुलकर उनका प्रभाव हमारे पाचन व विभिन्न संस्थानों पर पड़ता है। आज इस वर्ग के विशेषज्ञों का बाहुल्य ही चारों ओर दिखाई देता है। पाक कला के विशेषज्ञों ने कृत्रिम जीवन-पद्धति के इस युग में स्वाद के नाम पर इस वर्ग का भरपूर दुरुपयोग किया व लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया है। आज के फास्ट फूड, पिजा आदि ऐसी चीजें हैं, जिनने सर्वाधिक नुकसान पहुँचाया है।
ऊपर वर्णित आहार-वर्गों की व्याख्या के बाद अब कुछ सूत्रों के अनुसार आहार-विज्ञान का आयुर्वेद सम्मत पक्ष समझे। ये सूत्र हैं-आहार में क्या खाए, कितना खाए, कब खाए, क्यों खाए, कैसे खाए?
क्या खाएं
सदैव हितकारी पदार्थों का सेवन करना चाहिए। जिनके सेवन से शरीर में विषाक्तता बढ़े जैसे शराब, चाय, काफी, पान, तंबाकू, अंडे, माँस-मछली आदि, इनका सेवन कदापि न करें। जीवनोपयोगी पदार्थों को आहार में अवश्य लें, यथा-गेहूँ चावल, मक्का, बाजरा, दालें, मक्खन, हरी सब्जियाँ आदि। भोजन सदैव ताजा लें। हो सके तो अंकुरित अन्न को प्रधानता दें। मूँग, चना, मूँगफली, तिल, गेहूँ आदि को अंकुरित कर उनका नियमित सेवन किया जा सकता है।
कितना खाएं
”मिताशाी स्यात” अर्थात् थोड़ी मात्रा में लें। खाद्य पदार्थ कितने ही पौष्टिक व स्वास्थ्यवर्द्धक क्यों न हो, हानिकारक ही सिद्ध होते हैं, यदि मात्रा का ध्यान न रखा जाए। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के अनुसार मात्र आधा पेट भरें, इतना ही आहार लेना चाहिए, शेष एक चौथाई हवा के लिए एवं बचा हुआ जल के लिए छोड़ देना चाहिए। तभी पाचन ठीक से होता रहा सकता है। इतना अधिक न खाया जाय कि भोजन डकार के साथ बाहर आ जाए और इतना कम भी न हो कि शरीर को पोषण ही न मिले। शारीरिक रम करने वालों को पर्याप्त प्रोटीन, शर्करा व चिकनाई की आवश्यकता होती है। आध्यात्मिक तप व मानसिक कार्य करने वालों को सुपाच्य उबली सब्जियाँ, रोटी, दलिया, दुग्ध, मीठे फल आदि पर्याप्त पोषण दे सकते हैं।
कब खायें
अग्निहोत्र की तरह भोजन दो ही समय करना चाहिए। प्रथम भोजन प्रातः काल 8 से 12 बजे के बीच तथा सायंकाल का 7 बजे से पूर्व कर लेना ही आयुर्वेद ने हितकारी बताया है। अपने भोजन का संयम निश्चित कर लेने एवं उचित मात्रा में नियमित लेने से शरीर में वह समय से पच जाता है एवं आज के भाँति-भाँति के रोग भी नहीं होते। आज अधिकाँश घरों में टी.वी. के सामने बैठकर देर रात्रि 12 बजे तक भोजन किया जाता है। इसे पाचन के लिये न्यूनतम 8 से 11 घंटे चाहिए। यह न पच पाने के कारण अधिकाँश व्यक्ति रोगी समय की इस विषमता में ही आहार ग्रहण न कर पाने के कारण होते देखे जा रहे हैं। बिना भूख लगे आहार न लिया जाए। तेज जलती अग्नि में ही समिधाएँ डाली जाती हैं। धुँआ निकलती, सुलगती अग्नि में समय-समय पर थोड़ी-थोड़ी समिधा डालने से तो धुँआ ही निकलेगा।
क्यों खाएं
अपने शरीर को स्वस्थ, निरोग, बलवान बनाने के लिए। “शरीर को भगवान का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करना” हमारे युग-निर्माण सत्संकल्प का प्रथम सूत्र है। भोजन स्वस्थ व जीवित रहकर भगवान का काम करने के लिए लिया जाता है, न कि खाने के लिये जिया जाता है। आज उल्टा ही हो रहा है।
कैसे खांए? भोजन इस प्रकार ग्रहण किया जाए जिससे कि जठराग्नि को कम-से-कम श्रम करना पड़े। दाँतों से हर ग्रास को अधिकाधिक चबाया जाए, तब तक जब तक कि वह पतला होकर लार ‘सेलाइवा’ के एंजाइम्स के साथ मिलकर घूँट के रूप में गले के नीचे सहज रूप में उतरने योग्य न बन जाए। आयुर्वेद कहता है, भोजन को पीना चाहिए एवं पानी को खाना चाहिए। भोजन ऐसा हो जिसे देखकर मन हर्षित व प्रफुल्लित हो। भोजन की थाली सामने आते ही उसे पूजा के प्रसाद की तरह ग्रहण किया जाए। भोजन के साथ अधिक पानी न लिया जाए। हो सके तो भोजन से एक घंटे पूर्व एक गिलास जल ले लें। भोजन के दौरान अधिक-से-अधिक चौथाई से आधार गिलास जल ही घूँट-घूँट में लिया जाए। फिर भोजन के एक घंटे बाद ही जल पीना प्रारंभ किया जाए। ऐसा करने से भोजन जल्दी पच जाता है।
वर्षा ऋतु में आहार का क्रम-
उपर्युक्त कुछ सामान्य प्रसंगों की चर्चा के पश्चात् इस अंक में कुछ सामयिक पक्षों का विवेचन भी कर रहे हैं। यथा-वर्षा ऋतु में आहार क्या हो? वर्षा ऋतु से सूर्य दक्षिणायन होने लगता है। ऋतु क्रम में विसर्ग काल के नाम से परिचित यह अवधि स्वास्थ्य की दृष्टि से बड़ी लाभकारी मानी गई है। गर्मी में संचित वायु का प्रकोप इसी वर्षा काल में देखने को मिलता है, साथ ही इस ऋतु में पित्त का संचय हो भी देखा जाता है। प्रकुपित हुई वायु जठराग्नि को मंद कर देती है। इसी कारण भोजन पचने में बड़ा विलंब होता है तथा पेट में भारीपन, बदहजमी, गैस की शिकायत देखने को मिलती है। यह ऋतु विदाहकारक एवं वातवर्द्धक भी होती है।
उपर्युक्त आयुर्वेदोक्त मतों की देखते हुए हलका व सुपाच्य भोजन इस ऋतु में लिया जाना चाहिए। गरिष्ठ-शीघ्र न पचने वाले भोजन से सदैव बचा जाना चाहिए अन्यथा पेट के विकार हो सकते हैं। आजकल पानी कहीं शुद्ध उपलब्ध नहीं है। जल के संक्रमण से होने वाली व्याधियों से बचने के लिए न केवल जल उबालकर पिया जाए, सभी सब्जियाँ गर्म पानी से धोकर ही प्रयुक्त की जाए। वात वृद्धि की संभावना देखते हुए मधुर, अम्ल एवं लवण रस प्रधान आहार का सेवन इस ऋतु में हितकर है। भोजन के साथ अदरक का सेवन, तुरई, लौकी, परवल, भिंडी, मूँग की दाल का प्रयोग किया जा सकता है। देसी मीठा आम उपलब्ध हो तो ही लें। जामुन, केला, मौसमी फल प्रयोग किये जाए। भुनी हुई मक्का व उसके व्यंजन इस मौसम में प्रयुक्त होते हैं। श्रावण में दुग्ध तथा भादो में छाछ (तक्र) का प्रयोग आयुर्वेद ने निषिद्ध बताया है। इसीलिए इस काल में दही का प्रयोग नहीं करते। वर्षा ऋतु के प्रमुख रोग वायरल बुखार, मलेरिया, टाइफ़ाइड, आत्रशोथ, पीलिया, कंजक्टी वाइटिस एवं त्वचा पर फंगसल आक्रमण आदि हैं। इन सभी से बचाव का प्रयास किया जाना चाहिए एवं जहाँ तक संभव हो, वनौषधियों का सेवन ही किया जाना चाहिए, ताकि स्वाभाविक रूप में स्वस्थ हो, ऋतु संधि जो इसके बाद आनी है, का सामना किया जा सके। मध्यावधि ठीक से निकल गयी तो पूरी शरद, शिशिर, हेमन्त तो निश्चित रूप से स्वास्थ्यवर्धक वाली ऋतुएं हैं। वर्षा ऋतु का माहात्म्य न केवल कवियों- प्रकृति प्रेमियों के लिए है अपितु अध्यात्मविदों, ऋषिगणों के लिए भी अत्यधिक है, इसी कारण इस अवधि के आहार-विहार को बड़ा महत्व से वर्णित किया जाता रहा है।
क्रमशः
श्री रामकृष्ण के शिष्य थे- नाग महाशय। पेशे से चिकित्सक-अंदर से संन्यासी-वैसे गृहस्थ। गंगा किनारे एक बाबा जी व चेले को अपने गुरु श्री रामकृष्ण को गाली देते सुना तो तैश में आ गए। बलवान थे। पहले मारने को तैयार हो गए। फिर सोचा-यह गलत है। प्रार्थना की-प्रभु आप में शक्ति है। उनके मन में भी श्रद्धा का संचार कर दो। सोचा यदि मेरी भक्ति सच्ची है तो ये शीघ्र ही रामकृष्ण के भक्त बन जाए। शाम होते-होते वे दोनों आकर रामकृष्ण के चरणों में गिर गए। क्षमा माँगने लगे। भक्तवत्सल प्रभु रामकृष्ण ने उन्हें क्षमा कर दिया।
एक दिन परमहंस ने आँवला माँगा। आँवले का मौसम नहीं था। नाग महाशय ने कहा-गुरु की इच्छा जगी है, जो जरूर कहीं-न-कहीं आँवले होंगे। जंगल में एक पेड़ के नीचे ताजे आँवले रखे मिले। उठाकर ले आए। रामकृष्ण बोले-मुझे मालूम था-तू ही लेकर आएगा। तेरा विश्वास सच्चा है।
49- शिक्षा एवं विद्या
शिक्षा व्यक्ति को ज्ञान ही नहीं देती अपितु, वह व्यक्ति को एक सुयोग्य नागरिक भी बनाती है। शिक्षा और विद्या में व्यावहारिक रूप में अंतर भी है। यह अंतर क्या है, यह इन बातों को समझे बिना मालूम नहीं हो सकता-
शिक्षा का अपेक्षित स्वरूप-बौद्धिक प्रगति।
शिक्षा ऐसी जो समस्याएँ सुलझाए।
कठिनाइयों की पाठशाला में साहस का प्रशिक्षण।
शिक्षा संवर्द्धन-तथ्य का पुनर्जीवन।
गुरु की गरिमा, महत्ता एवं जिम्मेदारी।
छात्रों के विकास में घर और विद्यालय की भूमिका।
शिक्षण का लक्ष्य सोए को जगाना।
सारा बोझ सरकार पर ही न डालें।
बाल शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा व नारी शिक्षा।
महिलाओं की तथा पुरुषों की स्वावलंबन शिक्षा।
50- महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग-1
किसी भी राष्ट्र के उन्नयन में उस राष्ट्र में उस राष्ट्र के महापुरुषों का योगदान रहता है। विश्व की उन्नति और प्रगति में ऐसे ही महापुरुषों का विविध रूप में योगदान रहा है। विश्व के महापुरुषों के उल्लेखनीय परिचय में हैं-
भगवान परशुराम, महात्मा बुद्ध, भगवान महावीर।
सम्राट अशोक, महाभिक्षु महेन्द्र, कन्फ्यूशियस।
सेवायोगी-स्वामी रामकृष्ण परमहंस।
धार्मिक नवचेतना के उन्नायक संत-महात्मा
संत रैदास, संत ज्ञानेश्वर, महर्षि अरविंद।
महर्षि रमण, स्वामी रामतीर्थ, पौहारी बाबा।
संत गुरु तेगबहादुर, गुरुगोविन्द सिंह, संत कबीर।
स्वामी सहजानन्द, गुरुजी, स्वामी सोमदत्त गिरि।
ईशा के शिष्य वेरियर एल्विन, ओवोपियर।
प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक-सिद्ध नागार्जुन।
51-महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग-2
संसार में ऐसे अनेक महापुरुष हुए हैं, जो अत्यंत साधारण स्थिति के परिवार में जन्मे थे, किन्तु उन्होंने अपने महान कार्यों से विश्व के करोड़ों लोगों को अपने विविध और विशिष्ट सेवाओं से लाभ पहुँचाया था। ऐसे महापुरुषों के सम्बन्ध में जाने-
मूर्तिमान् शौर्य शिवाजी, महाराणा प्रताप, हरसिंह।
लौहपुरुष सरदार पटेल, लाला लाजपत राय।
साहसी मेजर शैतान सिंह, हुतात्मा गणेशशंकर विद्यार्थी।
वंदेमातरम् के मंत्रद्रष्टा बंकिमचंद्र।
अनाथ बालक से राष्ट्रनिर्माता बना चंद्रगुप्त मौर्य।
लुटेरे गजनबी का मानमर्दन करने वाले राजा संग्रामराज।
स्वतंत्रता सेनानी-नाना साहब पेशवा।
52- विश्व-वसुधा जिनकी सदा ऋणी रहेगी।
मानवी चिन्तन-चेतना को जगाने में, उसे सुनिश्चित दिशा और गति प्रदान करने में जिन महामानवों ने योगदान प्रदान किया है, उनमें प्रेरक महामानव हैं-
विश्वव्यापी विचारक्रांति के जन्मदाता-महामनीषी कल्लट।
नीति कथाओं के अमर लेखक विष्णु शर्मा।
उपाधियों से परे श्री सातवलेकर।
महापंडित राहुल साँकृत्यायन।
नेत्रहीन कर्मयोगी-श्री बैजनाथ दुबे।
कविता कानन के पारिजात, महाकवि कालिदास।
लोकमानस के परिष्कार-तुलसीदास
महान साहित्य साधक-मुंशी प्रेमचन्द्र।
नोबुल पुरस्कार के प्रवर्तक-अल्फ्रेड नोबुल।
53- धर्मतत्त्व का दर्शन और मर्म
विभिन्न संप्रदायों में धर्म का अर्थ और दर्शन भिन्न-भिन्न प्रकार से दिया गया है। इन्हें समझने के लिए उस धर्म से जुड़े समाज को भी समझना आवश्यक है। धर्म का वास्तविक मर्म है-नीतिमत्ता और शालीनता। धर्म को समझने के लिए ये भी जानें-
धर्मधारणा हर दृष्टि से उपयोगी।
धर्म साध्य है तो विज्ञान साधन।
धर्मप्रधान ‘अर्थ’ हो कल्याणकारी है।
शुष्कज्ञान ही नहीं धर्म भी आवश्यक।
धर्मयुद्ध महान तप।
नीर-क्षीर की विवेक-बुद्धि अपनाए।
सत्य के प्रकाश को हृदयंगम करें।
बिना सद्ज्ञान के अधूरा है भौतिक विज्ञान।
अधिक प्राप्ति हेतु अल्प का त्याग।
संयत बरतें सुखी रहें।
मानवी गरिमा के प्रति आस्था।
54- मनुष्य में देवत्व का उदय
मनुष्य का अंतः करण ही वध धर्मक्षेत्र हैं, जिसमें आसुरी और देवी-प्रवृत्तियों के मध्य सदैव संघर्ष चलता रहता है। मनुष्य इस संघर्ष में किस प्रकार देवत्व प्राप्त कर सकता है, इसके लिए यह जानना आवश्यक है-
जीवन ः ईश्वर का एक अनुपम अनुदान।
बाह्यजगत अंतर्जगत का प्रतिबिंब।
भूल सुधारने का ठीक यही समय।
देवासुर संग्राम हमारे दैनिक जीवन में।
सुसंतति के सम्बन्ध में वैज्ञानिक प्रयोग-जेनेटिक इंजीनियरिंग।
वंशानुक्रम निर्धारण हेतु उत्तरदायी अविज्ञात चेतन शक्ति।
नरपशु नहीं, देवमानवों की पीढ़ी जन्मे।
मनुष्य गिरा हुआ देवता या उठा हुआ पशु।
चेतना का उदात्तीकरण।
व्यक्तित्व की अनगढ़ता मिटाते आध्यात्मिक उपचार।
55- दृश्य जगत की अदृश्य पहेलियाँ
यह संसार दो भागों में बंटा हुआ है। एक भाग इंद्रियगम्य है, दूसरा इंद्रियातीत। ऐसी बहुत-सी बातें हैं, जिन्हें समझने और जानने मनुष्य असमर्थ रहा है। हमारे चिंतन को झकझोरती बातें हैं-
अणु में विभु-गागर में सागर।
परा और अपरा प्रकृति।
जड़ के भीतर विवेकवान चेतन।
समर्थ सशक्त जीवनी-शक्ति
सर्प से न भयभीत हों, न उसके जैसा चने।
दृश्य जगत की अदृश्य पहेलियाँ।
आत्मचेतना का विकास वृक्ष-वनस्पतियों में।
चेतना का सहज स्वभाव-स्नेह-सहयोग
56- ईश्वर-विश्वास और उसकी फलश्रुतियाँ
इस संसार का एक सर्वसक्षम एवं सर्वसमर्थ नियंता अवश्य है, उसे हम नाम कुछ भी दें। भारतीय मानस इसी परमशक्ति को ईश्वर मानता है। हमें ईश्वर से जुड़े इन प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक है-
आस्तिकवाद का विज्ञानसम्मत आधार।
आस्तिक बनाम नास्तिक, अद्वैतवाद या सर्वेश्वरवाद।
परमात्मा का अस्तित्व और अनुग्रह।
परमेश्वर का निराकार व साकार स्वरूप।
विज्ञान भी स्वीकारता है अब परब्रह्म की सत्ता को।
ब्रह्मसत्य जगन्माया-अलबर्ट आइंस्टीन की दृष्टि में।
विश्वब्रह्माण्ड में ओत-प्रोत ब्रह्मसत्ता।
हम हाइड्रोजन गैस जैसे हलके रहे।
भूल-भटक कर भेंट हुई भगवान से।
भगवान से सफाई किस बात की माँगे।
ईश्वर से अपने लिए क्या माँगे?
पूज्यवर ने अपनी सभी मानस पुत्रों, अनुयाइयों के लिए मार्गदर्शन एवं विरासत में जो कुछ लिख है- वह अलभ्य ज्ञानामृत (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वांग्मय सत्तर खंडों में) अपने घर में स्थापित करना ही चाहिए। यदि आपको भगवान ने संपन्नता दी है, तो ज्ञानदान, कर पुण्य अर्जित करें। विशिष्ट अवसरों एवं पूर्वजों की स्मृति में पूज्यवर का वांग्मय विद्यालयों, पुस्तकालयों में स्थापित कराए। आपका यह ज्ञानदान आने वाली पीढ़ियों तक को सन्मार्ग पर चलाएगा, जो भी इसे पढ़ेगा धन्य होगा।
समुद्र-मंथन में चौदह रत्न निकले, पर उनमें सर्वप्रथम दो निकले-एक हलाहल विष, तदुपरान्त मद्य। हलाहल देखने में अत्यंत आकर्षक, नील वर्ण था। मद्य होंठ तक पहुँचते पहुँचते उन्मत्त, विक्षिप्त कर देने वाला। फिर भी उसकी ललक ऐसी थी कि जिसको एक बार स्वाद लग जाता है, फिर छूटने का नाम ही नहीं लेता। इस प्रथम उपलब्धि को पाने के लिए देव दानव दोनों ही आतुर थे। पर प्रजापति ने दोनों को ही यह समझाने का प्रयत्न किया कि यह देखने और चखने में आकर्षक लगते हुए थी अंततः विनाश उत्पन्न करने वाला है। शिवजी ने हलाहल तो अपने कंठ में धारण कर लिया पर मद्य के लिए आतुर दैत्यों ने हठपूर्वक उसको गटक लिया। फलतः उनकी सामर्थ्य उद्धत प्रयोजनों में लगी और पतन- पराभव का कारण बनी।
लोकसेवा के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले के संबंध में जन-साधारण की श्रद्धा उमड़ती है। परमार्थ की साहसिकता अपनाने वाले पर सम्मान बरसता है। उसकी प्रशंसा होती है प्रशंसा भी एक संपदा है। संपदाओं की उपयोगिता तो है पर उनके पीछे एक ऐसा आवेश भी रहता है, जो हजम न हो सके तो लाभ के स्थान पर विनाश ही उत्पन्न करता है। धन हजम न हो तो दुर्व्यसन उत्पन्न करेगा। बुद्धि हजम न हो तो कुचक्र, षड्यंत्र रचेगी। बल हजम न हो तो उद्दंडता के रूप में प्रकट होगा। हजम न होने पर अमृत भी विष बन जाता है। यश हजम न हो तो ऐसा अहंकार बनता है जिसकी तुष्टि के लिए लोकसेवी को अपना चिंतन-चरित्र व्यक्तित्व एवं भविष्य हेय स्तर का बनाकर उतना पतित बनना पड़ता है, जितना कि सेवा सर्वथा दूर रहने वाले सामान्य श्रमिक भी नहीं गिरते। लोकसेवियों में से अधिकाँश को अपने व्यक्तित्व और सेवा क्षेत्र में ऐसे विग्रह उत्पन्न करते देखा जाता है, जिसे दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ही कहा जा सकता है और सोचना पड़ता है कि यदि यश हजम कर सकने में असमर्थ लोग, लोकसेवा के क्षेत्र में न आया करें तो वे अपनी ओर समाज की अधिक सेवा कर सकते है।
मनुष्य को पतन-पराभव के गर्त में गिरा देने वाली तीन दुष्प्रवृत्तियाँ है वासना तृष्णा और अहंता। शिश्नोदर परायण नरपशु वासना-तृष्णा के लोभ में जकड़े रहकर किसी प्रकार कोल्हू के बैल की तरह नियतिचक्र में परिभ्रमण करते हुए दिन गुजार लेते हैं। पर अहंता को चैन कहाँ? वह सारी प्रशंसा, सारा बड़प्पन सारे अधिकार अपने ही हाथ में रखना चाहती है। दूसरे की साझेदारी उसे सहन नहीं। इसी विडंबना ने सर्वाधिक विग्रह उत्पन्न किए हैं। लगता तो यह है कि लालच के कारण अपराध होते हैं, पर वास्तविकता यह है कि अहंता ही जहाँ-तहाँ टकराती ओर प्रतिशोध से लेकर आक्रमण, अपहरण, उत्पीड़न के विविध अनाचार उत्पन्न करती है। अन्याय के अवरोध तो कहने भर की बात है, वह तो जहाँ-तहाँ जब-तह ही दृष्टिगोचर होते हैं। वास्तविकता यह है कि सामंतवादी अनाचारों का कारण भी यही है, वहाँ अहंता ही उद्धत बनी और टकराई है। अनाचारों का इतिहास पढ़ने से प्रतीत होता है कि अभाव या अन्याय के विरुद्ध नहीं अधिकाँश विग्रह और युद्ध मूर्धन्य लोगों ने अहंता की परितृप्ति के लिए खड़े किए हैं। कंस, रावण, हिरण्यकश्यप, वृत्तासुर, सहस्रबाहु, नेपोलियन, चंगेजखान जैसे बर्बर लोगों ने जो रक्तपात किए उनके पीछे उनकी दर्प तुष्टि के अतिरिक्त और कोई कारण नहीं था।
यह चर्चा इन पंक्तियों में इसलिए की जा रही है कि युगशिल्पियों के द्वारा आरम्भिक उत्साह में जो कार्य अपनाया जा रहा है, उसमें लोकमंगल का परमार्थ प्रयोजन दृष्टव्य होने के कारण श्रेय, सम्मान एवं यश तो स्वभावतः मिलना ही है। यह पचे नहीं और उद्धत हो चले तो पागल हाथी की तरह अपना, साथियों का तथा उस संगठन का विनाश करेगा, जिसके नीचे बैठकर अपनी स्थिति बनाई है। हाथी पागल होता है, तो अपनों पर ही टूटता है। इसी प्रकार लोकेषणा जब पागल होती है, तो सर्वप्रथम वह साथियों को मूर्ख, छोटा अनुपयुक्त दुष्ट सिद्ध करने का प्रयत्न करती है, ताकि तुलनात्मक दृष्टि से वह अपनी विशिष्टता सिद्ध कर सके। समान साथियों में मिल−जुलकर रहने में महत्त्वाकाँक्षी का अपना वर्चस्व कहाँ उभरता है इसलिए उसे साथी पेड़ पादपों का सफाया करना पड़ता है ताकि समूचे खेत में एक अकेला ही कल्पवृक्ष होने की शेखी बघार सके।
दृष्टि पसारकर अपने चारों और लोकेषणा का नग्न नृत्य देखा जा सकता है राजनैतिक पार्टियों में होते रहने वाले अंतर्कलह, सिद्धांतों की दुहाई भले ही देते रहें, पर वस्तुतः वे व्यक्तियों की महत्त्वाकाँक्षा के निमित्त ही होते है। कितनी ही उपयोगी संस्थाएँ पदलोलुपों ने परस्पर टकराकर अपने ही हाथों शिथिल या समाप्त कर दीं। कौरव-पाँडवों से लेकर यादव कुल के लड़खपकर समाप्त हो जाने के पीछे लालच छोटा और दर्प को बड़ा कारण पाया जाएगा। धर्म-संप्रदायों के जो खंड-खंड होते चले गए है, उनके प्रचलनकर्ताओं में सुधारक कम और श्रेयलोलुप अधिक रहे हैं। चुनावों के समय या बाद में जो विग्रह दृष्टिगोचर होते है, प्रतिशोध के नाम पर अनर्थ होते हैं, उसमें औचित्य कम और दर्प का नंगा नाच अधिक देखा जा सकता है। सास-बहू की लड़ाई में विडंबना उछलती दृष्टिगोचर होती है। पतियों का पत्नियों को आतंकित करने में यही तथ्य प्रमुख होता है।
बात इस संदर्भ में चल रही है कि युगशिल्पियों का सप्त महाव्रतों को अपनाने हेतु इसलिए निर्देशन किया गया है कि उनका व्यक्तित्व उभरे और उस आधार पर आत्मबल बढ़ाते हुए अधिक उच्चस्तरीय सेवा साधना कर सकने में समर्थ हो सकें। यदि उनका पालन किया समर्थ हो सकें। यदि उनका पालन किया गया और लोकेषणा से उत्पन्न विष का नियमित रूप से निष्कासन न किया गया तो वही दुर्गति होगी जो भोजन न करने तथा मल- विसर्जन में उपेक्षा बरतने पर प्राण संकट के रूप में उत्पन्न होती है। लोकसेवी को जनता सम्मान देती है, वह वस्तुतः उस सेवा धर्म की पुण्य परंपरा का सूत्र-संचालक तंत्र का सम्मान है। सत्प्रयोजनों के लिए लोक श्रद्धा बनी रहे, मात्र इसी एक प्रयोजन के लिए सम्मान के प्रकटीकरण की प्रथा चली है गलती यह होती है कि सेवा भावी उसे अपनी व्यक्तिगत योग्यता का प्रतिफल मानते है। अहंकार में डूब जाते हैं और फिर उसे अपना अधिकार समझने लगते है। जहाँ उसमें कमी होती है वहाँ अप्रसन्न होते हैं। अधिक पाने के लिए आतुर रहते हैं। बँटवारा होने के कारण साथियों को हटाने या गिराने का प्रयत्न करते है। ऐसे ही हथकंडे अधिक मात्रा में सम्मान पाने के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं। इस आपाधापी में कौर कितना सफल हुआ, यह तो ईश्वर ही जाने, पर यह आँख पसार कर सर्वत्र देखा जा सकता है कि यश-लोलुपता पद-लोलुपता अहमन्यता किसी से छिपाए नहीं छिपती। उभर कर ऊपर आती और बदले में घृणा, तिरस्कार पनपने लगता है। अनौचित्य के प्रति तिरस्कार का यह भाव सर्वप्रथम साथियों से आरंभ होता है। चर्चा आगे बढ़ती है और यश-लोलुप के विरुद्ध असंतोष, तिरस्कार का विस्तार क्रमशः अधिक बड़े क्षेत्र में होता चला जाता है। यह है वह प्रतिक्रिया, जिसके कारण यशलोलुप तिरस्कार के भोजन बनते और जिस श्रेय-सम्मान के अपनी सेवा-साधना के कारण अधिकारी थे, उससे भी वंचित होते चले जाते है।
बड़प्पन हर क्षेत्र में महंगा पड़ता है। धन, विद्या, सौंदर्य पद आदि के क्षेत्रों में अपने को बड़ा सिद्ध करना चाहते हैं, उन्हें तरह-तरह के आडम्बर खड़े करके यह प्रकट करना होता है कि उनके पास ये विशेषताएँ हैं। लोग उसे देखें समझें और सराहें। फैशन, ठाट-बाट जैसे खर्चीले सरंजाम इसी विज्ञापन बाजी के लिए किए जाते है, ताकि देखने वाले की आँखें उन पर जाएँ। यही अनाचरण यश लोलुपों को भी अपनाना पड़ता है। वे किसी न किसी बहाने अपनी शक्ल बार-बार लोगों को दिखाना चाहते है, आडम्बर रचने पड़ते है, जिसमें उनकी प्रमुखता सिद्ध होती हो। स्टेज पर उठने-बैठने का औचित्य या आमंत्रण न होने पर भी वहाँ जा धमकते है, ऐसी जगह अकारण खड़े होते है। जहाँ लोग उनकी शक्ल देखें और वे किसी महत्वपूर्ण ड्यूटी पर जम हुए प्रतीत हों तो अपना नाम, फोटो छपाने के लिए आतुर रहना, किसी कार्य में दान दिया हो उसकी चर्चा स्वयं करने, दूसरों से कराने का रास्ता खोजना, दान राशि के पत्थर जड़वाना जैसी बचकानी हरकतें करने वाले प्रयत्न तो यशस्वी बनने का करते हैं, पर उनकी क्षुद्रता अनायास ही प्रकट होती जाती है। फलतः वे उलटे घृणा तिरस्कार के पात्र बनते हैं। यश के साथ परोक्ष रूप से धन लूटने की भी संभावना जुड़ी रहती है। कितने ही इसका लाभ उठाते भी हैं, किन्तु स्पष्ट है कि ऐसे हथकंडे अपनाने वाले आँतरिक दृष्टि से पतित होते चले जाते हैं। फलतः वे सेवा के क्षेत्र में अन्यत्र की अपेक्षा और अधिक घाटे में रहते हैं। तिरस्कृत, उपेक्षित, बहिष्कृत की स्थिति में पहुँचते हुए अनेक तथाकथित नेता ऐसे पाए जा सकते हैं, जो येन-केन प्रकारेण सम्मानजनक स्थान तक जा बैठने में तो सफल हो जाते हैं पर संपर्क क्षेत्र में सघन श्रद्धा से क्रमशः अधिकाधिक वंचित होते चले जाते है।
यह अहंता के परिपोषण का प्रतिफल है, जिसे लोकसेवी अनजाने ही अपनाने लगते है। स्मरण रखा जाए यह घुड़दौड़ अत्यंत महँगी, घाटे की और मूर्खतापूर्ण है। सड़क पर नंगा नाच नाचकर भी लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है पर इससे कुछ बनता नहीं। जिस प्रकार बड़प्पन पाने के लिए उद्धत प्रदर्शन करने वाले नट, विदूषक समझे जाते हैं। उसी प्रकार यशलिप्सा भी व्यंग-उपहास-तिरस्कार का कारण बनती है। सामने कोई कहे भले ही नहीं, पर इस तथ्य को थोड़ा-सा पर्यवेक्षण करने पर सरलतापूर्वक चरितार्थ होते देखा जा सकता है कि प्रमुखता सिद्ध करने के लिए चित्र-विचित्र स्वाँग बनाने वाले, नाटक में मुखौटे, परिधान पहनकर कभी राजा, कभी ऋषि बनने वालों की तरह अपनी अवास्तविकता का ढिंढोरा स्वयं पीटते फिरते है। उसमें उन्हें श्रम, समय धन और चातुर्य का निरर्थक अपव्यय करना पड़ता है। मूर्ख या चमचे इर्द-गिर्द करके, उनके बीच रंगे सियार द्वारा वनराज बनने का ढकोसला भर खड़ा किया जा सकता है, पर उससे मिलता क्या है? परोक्ष व्यंग, उपहास अपने साथ जा गहरी अवज्ञा छिपाये रहते है? उससे लोक सेवक, विदूषक स्तर का बनकर रह जाता है। इस दुर्मति-जन्य दुर्गति का यदि पूर्वाभास रहे तो लोकसेवा के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले आरम्भ से ही सजग रहें और खिलवाड़ रचने की अपेक्षा सतर्क रहने का कार्य चुनें। विज्ञापनबाजी से बचकर नम्रताजन्य स्नेह-सौजन्य अपनाने वाले वस्तुतः अधिक श्रेयाधिकारी बनते हैं। यश लिप्सा भी छाया की भाँति है। उसके पीछे दौड़ने वाले असफल रहते और खीज़, पश्चात्ताप के अतिरिक्त और कुछ पाते नहीं। इनकी अपेक्षा वे कहीं नफे में रहते है, तो श्रेय दूसरों को बाँटते हैं, स्वयं पीछे रहते है विनम्र स्वयंसेवक की तरह जिन्हें अपनी श्रम-साधना परमार्थपरायणता के आधार पर मिलने वाले आत्मसंतोष को ही पर्याप्त मानने की विवेक दृष्टि रहती है, वे अनचाहा यश पाते हैं। उन्हें वह गहरा स्नेह-सद्भाव प्राप्त होता है, जिसके साथ साथियों परिचितों का विश्वास और सहयोग प्रचुर मात्रा में जुड़ा रहता है। दूरदर्शिता इसी में है कि लोकसेवी सच्चे मन से यश, पद-लोलुपता अहंता छोड़ें। विनम्रता अपनाएँ। दूसरों को आगे रख कर स्वयं पीछे रहें। अपना बखान स्थगित करें। अपना चेहरा चमकाए नहीं वरन् उस तरह रहे जैसे कि सादा जीवन उच्च विचार के सिद्धांत में आस्था रखने वाले अपने दृष्टिकोण, चरित्र-व्यवहार में अधिकाधिक शालीनता भरते और महानता के उच्च पद पर अपनी विशेषता के कारण पहुँचते है।
(अगस्त 1949 की अखण्ड ज्योति का अग्रलेख)
श्रावण सुदी पूर्णमासी की श्रावणी का त्योहार आता है यह ज्ञान का पर्व है। सद्ज्ञान, विद्या, बुद्धि, विवेक और विधान हमारी संस्कृति में रखा गया है। इसलिए इसे ब्रह्म पर्व भी कहते है। वेद का आरंभ इस त्योहार से हुआ माना जाता है। इस दिन से लेकर भाद्रपद बदी सप्तमी तक एक सप्ताह वेदप्रचार की प्रथा चिरकाल से प्रचलित है। प्राचीनकाल में इस पर्व के अवसर पर गुरुकुलों में नए छात्र प्रवेश लेते थे। जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ, उन्हें यज्ञोपवीत दिए जाते थे। गुरु शिष्य के परम पवित्र एवं अत्यंत आवश्यक संबंधों की स्थापना इस दिन होती थी। वेदमंत्रों से अभिमंत्रित किया रक्षा-सूत्र आचार्यगण अपने शिष्य के हाथों में बाँधते थे। यह सूत्र उनकी रक्षा करता था और उन्हें धर्म प्रतिज्ञा के बंधन में बाँधता था बहने अपने भाइयों के हाथ में राखी बाँधकर या भुजरियाँ (गेहूँ या जौ के बढ़े हुए अंकुर) देकर यह याद दिलाती थीं कि बहिनों की रक्षा के लिए उनका कर्तव्य क्या है? भाई इसके बदले में उन्हें आश्वासन के रूप में कुछ उपहार देते थे, मानो यह संदेश दे रहे हों कि हम बहिनों पर नारी जाति पर कोई विपत्ति आएगी तो प्राण देकर भी उसका निवारण करेंगे।
श्रावणी के दिन ही नए लता पुष्प वाले वृक्ष आदि लगाकर संसार की शोभा-समृद्धि बढ़ाने का प्रयत्न किया जाता था। प्राचीनकाल में श्रावणी पर्व का यह जो महत्व था, आज एक चिन्ह पूजा मात्र रह गया है। इस श्रावणी पर्व की ऐसी दुर्दशा होना खेदजनक है। हमें अपने पूज्य पूर्वजों द्वारा बड़े गंभीर सोच विचार के साथ बनाए हुए इस त्योहार के महत्व को समझना होगा और उनसे लाभ उठाना होगा तभी हम अपने साँस्कृतिक गौरव को पुनः प्राप्त कर सकेंगे ओर अज्ञान निशा का तम मिटा सकेंगे। श्रावणी के कई संदेश है।
श्रावणी को वेद पूजा होती है। वेद का अर्थ है- धर्मपूर्ण ज्ञान। चारों वेदों में जितना ज्ञान भरा पड़ा है वह सब धर्मपूर्ण है। उसको समझने और अपनाने से जीवन सब प्रकार से सुख शाँति से भर जाता है-धर्म अर्थ काम, मोक्ष चारों जीवन फलों की प्राप्ति होती है। मनुष्य शरीर यों तो बहुत ही तुच्छ है। उसके हाड़-माँस की बाज़ार में कीमत पौने पंद्रह आने से अधिक नहीं है इससे तो पशुओं का शरीर कहीं अधिक कीमती है मनुष्य सब प्राणियों में शिरोमणि अपने मस्तिष्क के कारण है। मस्तिष्क के द्वारा ही वह असुर या देवता, दरिद्र या धनपति, तिरस्कृत या पूजनीय रोगी या बलवान बनाता है। इसलिए ज्ञानबल को सबसे ऊँचा स्थान दिया गया है। इस ज्ञान के, बुद्धि तथा मस्तिष्क के परिमार्जन के लिए ही वेद की पूजा की जाती है। वेदों के मंत्र सद्ज्ञान के भंडार है। उनके पढ़ने-सुनने समझने और आचरण करने से सद्ज्ञान-प्रकाश बढ़ता है। वेदपूजा से ज्ञान की महत्ता प्रतिष्ठा और उपयोगिता को मनुष्य समझता है और उसकी श्रद्धा सद्ज्ञान में बढ़ती है, इसीलिए श्रावणी पर्व के अवसर पर वेद पूजा का विधान है।
यज्ञोपवीत में नौ तार होते हैं। ये नौ सूत, नौ गुणों के प्रतीक है। तीन लड़ों से प्रत्येक में तीन तार होते हैं। ये तीन लड़े जीवन के तीन प्रधान भागों का संदेश देती है- आत्मिक, बौद्धिक, लौकिक या साँसारिक। यही यज्ञोपवीत की तीन लड़ें हैं इनमें से हरेक में जो तीन तीन तार हैं, उनका तात्पर्य उन तीन-तीन गुणों से है, जो इस प्रत्येक क्षेत्र के अंतर्गत होते है। आत्मिक क्षेत्र की तीन संपत्तियाँ है- विवेक-पवित्रता-शाँति बौद्धिक क्षेत्र की तीन संपत्तियाँ है साहस, स्थिरता, कर्तव्यनिष्ठा। साँसारिक क्षेत्र की तीन संपत्तियाँ है- स्वास्थ्य, धन, सहयोग। इस प्रकार ये नौ गुण मनुष्य के लिए अत्यावश्यक हैं। जिसमें ये नौ गुण नहीं हैं या इन्हें प्राप्त करने की इच्छा व कोशिश भी नहीं करता वह शूद्र है। जन्म से सभी नासमझ, पशुतुल्य होते हैं किन्तु बड़े होने पर इन तीन क्षेत्रों का विकास करने एवं प्रत्येक क्षेत्र में तीन गुण प्राप्त करने का महत्व समझ में आता है। इस प्रकार उनकी प्राप्ति करने के लिए प्रारम्भ किए गए प्रयास तीव्र होने लगते है। यही दूसरा जन्म है- द्विजत्व है। इस द्विजत्व की-नौ गुणों के विकास की जिम्मेदारी कंधे पर सदा धारण किए रहने को चिन्ह स्वरूप जनेऊ-यज्ञोपवीत पहना जाता है।
श्रावणी के दिन पुराना यज्ञोपवीत बदलकर नया धारण करते हैं अर्थात् उस जिम्मेदारी को नए सिरे से स्मरण करते है। वे द पूजा के साथ यज्ञोपवीत धारण करने का तात्पर्य यही है कि हम ऐसे ज्ञान को ग्रहण करें, जिससे मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक इन परम पुनीत नौ दिव्य संपदाओं की प्राप्ति हो सकें। जिनका पहले यज्ञोपवीत संस्कार रूप से श्रावणी पर्व पर सामूहिक रूप से श्रावणी पर्व पर यज्ञोपवीत लेना चाहिए।
रक्षाबंधन का मूल उद्देश्य है- गुरुजनों से आशीर्वाद प्राप्त करना। माता पिता गुरु तथा इनके समकक्ष और भी जो गुरुजन है उनकी पूजा, प्रतिष्ठा, वंदना करना गुरुपूजा कहलाती है। बड़ों के पास जाकर नम्रतापूर्वक उनके प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव प्रकट करना, जो भूलें हुई हैं उनके लिए क्षमा माँगना कृपा रखने एवं आशीर्वाद देने की प्रार्थना करना-यह रक्षाबंधन का मूल संदेश है। इस प्रार्थना के प्रत्युत्तर में गुरुजन अपने सहज वात्सल्य से प्रेरित होकर प्रार्थी को आशीर्वाद देते हैं और अपने आशीर्वाद का प्रतीक एक रक्षा-सूत्र उसके दाहिने हाथ में बाँधने है। यह रक्षा सूत्र हाथ का काता हुआ हल्दी रोली या केशर से रंगा हुआ होना चाहिए। गुरुजनों को अपने हाथ से सूत कातकर यह राखी बनाना चाहिए, जिससे गाँधीजी का प्रिय चक्र सुदर्शन चरखा चलाना वे भूलने न पाएँ और पवित्रतम भावनाओं के साथ वे स्वयं ही रक्षा-सूत्र तैयार करें।
बहिनें भाइयों को राखी बाँधती है अर्थात् स्मरण दिलाती है कि उनका उत्तरदायित्व केवल अपने ही बाल बच्चों की रक्षा तक सीमित नहीं है, वरन् बहिनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उनकी है। जा जाति अपनी नारियों के कष्टों को दूर करने का उन्हें सब प्रकार सुखी बनाने का, उनकी ओर कुदृष्टि करने वालों को मजा चखाने का कर्तव्यपालन नहीं करती, वह जाति नष्ट हो जाती है, उसमें वर्णसंकर पैदा होते है और पारिवारिक सुख-शाँति मिटकर कपट-क्लेश और द्वेष का साम्राज्य छा जाता है। इसलिए बहिनों की रक्षा के रक्षा के लिए राखी बाँधी जाती है। यहाँ बहिनें समस्त नारी जाति का प्रतिनिधित्व करती है और भाइयों को पुरुष समुदाय को- कर्तव्य बंधन में बाँधती है। किसी अत्याचारी द्वारा बलात् किसी नारी पर इसलिए अत्याचार न होने पाए चूँकि व नारी है- अबला है- अशक्त है - अन्यायी से बदला नहीं ले सकती। तुम्हारा (पुरुषों का) बल हर अबला की न्यायोचित सहायता के लिए ढाल बने, यही राखी की चुनौती है।
भुजरियों (गेहूँ या जौ के बढ़े हुए अंकुर) का आरोपण और उनकी पूजा वृक्षारोपण महोत्सव की चिन्ह पूजा है। श्रावणी के अवसर पर वनौषधियों का आरोपण किया जाता है। हरीतिमा के रूप में वनस्पतियों का उत्पादन संसार की कितनी बड़ी सेवा इस जितना विचार किया जाए, उतना ही महत्व प्रकट होता है वायु में फैले विषैले तत्वों को वृक्ष आहार रूप में ग्रहण करते है और बदले में प्राणप्रद वायु (आक्सीजन) हमें प्रदान करते है। वैज्ञानिक बताते है कि वर्षा वहीं अधिक होती है, जहाँ वृक्ष अधिक होते है, जिस क्षेत्र में वृक्ष कम होते चले जाते हैं वहाँ वर्षा का अनुपात भी कम होता चला जाता है पत्तियों की खाद से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। वृक्षों की लकड़ी दैनिक जीवन की आवश्यक वस्तु है। वृक्षों की छाया में अनेक प्राणी आराम पाते है उनके फलों में प्राण पोषक विटामिन तत्व होते है, जो स्वास्थ्य-रक्षा के लिए आवश्यक हैं। फलों की सुगंध और सौंदर्य नेत्र और मस्तिष्क को शीतलता पहुँचते हैं। जड़ी बूटियाँ तो एक प्रकार से अमृत के समान हैं। कितनी ही कठिन बीमारियों का उपचार उनसे संभव हो जाता है। सघन वृक्षों के प्रदेशों में रहने वाले मनुष्य अधिक स्वस्थ, शांतचित्त और दीर्घजीवी होते हैं यह बात भली प्रकार सिद्ध हो चुकी है।
इन सब बातों का ध्यान रखते हुए श्रावणी के पुण्य पर्व पर वृक्षारोपण यज्ञ का माहात्म्य माना जाता है। खेतों पर, मेड़ों पर, खाली भूमि पर बंजर में, घर में, द्वार पर जहाँ भी सुविधा-जनक स्थान मिल सके, वहाँ फलदार वृक्ष लताएं औषधियाँ, तरकारियाँ बोनी चाहिए या उनकी पौधें लगा देनी चाहिए। वर्षा ऋतु का समय इसके लिए अत्यंत सुविधाजनक होता है। स्त्रियाँ अधिक नहीं कर सकतीं तो घर में छोटे मिट्टी के गमलों में छोटे-छोटे पौधे-तुलसी आदि बो सकती है।
श्रावणी पर्व पाँच तथ्यों का संदेश प्रतिवर्ष हमारे लिए लाता है। इन पर यदि हम आचरण करें तो यह पूर्व हमारे लिए सब प्रकार मंगलमय हो सकता है।
समयदान हेतु महाकाल का आमंत्रण
परमपूज्य गुरुदेव के कहा-हमारे विचार, क्राँति के बीज हैं ये युगपरिवर्तन करने में समर्थ है। यदि आप हिम्मत करके कदम बढ़ाए हमारे साथ, तो बात बन जाएगी॥ महाकाल अपनी शर्तों पर आपको आमंत्रण दे रहा है। हमारे साहित्य को घर-घर पहुँचाए, यह साहित्य लोगों के विचारों में परिवर्तन लाएगा और इक्कीसवीं लोगों के विचारों में परिवर्तन लाएगा और इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य लाने का श्रेय आपको मिल जाएगा।
पूज्यवर रचित वाङ्मय, जो उनका मूर्तिमान् स्वरूप है, घर-घर पहुँचे इसके लिए यदि आप दो मास का समयदान दे सकते है, तो निम्न जानकारियों सहित आवेदन भेजें। टोलियाँ 1 अक्टूबर 99, 1 दिसम्बर 99, 1 फरवरी 2000, 1 अप्रैल 2000, 1 जून 2000 से निकलेंगी।
जानकारियाँ-नाम-पता फोन नं., आयु, शिक्षा पद व्यवसाय, आप पर कौन-कौन आश्रित है? गायत्री परिवार से कब जुड़े? समयदान की अवधि का विवरण दें।
व्यवस्थापक, अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
युग गीता के अंतर्गत विगत दो अंकों में श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के विषाद योग प्रकरण की चर्चा हो चुकी है। अर्जुन जैसे समर्थ को असहाय बनाने वाले व्यामोह पर श्रीकृष्ण की प्रतिक्रिया अब दूसरे अध्याय में आती है जिसे ‘सांख्ययोग’ नाम से वर्णित किया गया है। अर्जुन के असमंजस का वर्णन करते हुए परमपूज्य गुरुदेव ने अप्रैल, 1972 की अखण्ड ज्योति में लिखा था कि यह व्यामोह कुसंस्कार है, भवबंधन है, दुर्विचार है या मकड़ी का जाला, कुछ समझ में नहीं आता। यह समय पराक्रम और पौरुष का है, शौर्य और साहस का है। इस विषम वेला में युग के अर्जुनों के गाण्डीव क्यों हाथ से छूटते चले जा रहे है? उनके मुख क्यों सूख रहे है? पसीने क्यों छूट रहे है? सिद्धान्तवाद क्या कथा-गाथा जैसा कोई मनोरंजन है, जिसकी यथार्थता परखे जाने का कोई समय नहीं आएगा? कृष्ण झुंझला पड़े थे कथनी और करनी के बीच इतना असाधारण व्यतिरेक उन्हें सहन नहीं हुआ। गुस्से में आकर बोले- हे अभागे! इस विषम वेला में हय कृपणता तेरे मन में कैसे आ गई? यही प्रकरण अब दूसरे अध्याय में आता है यहाँ अर्जुन मात्र से गुरुदेव के शब्दों में ‘अंतरिक्ष से आज का महाकाल युग के गाण्डीवधारियों से लगभग इसी भाषा में प्रश्न पूछता और उत्तर माँगता है-यह हम सभी के लिए है।
साँख्ययोग के प्रस्तुतीकरण के पूर्व यह जान लेना चाहिए कि गीता का यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण अध्याय है। कई विद्वज्जनों-मनीषियों को प्रिय यह अध्याय क्लिष्ट भी है। बहत्तर श्लोकों में जो चर्चा है, उसमें शिष्यत्व के उभार से लेकर देहातीत आत्मा के भान, देह से स्वधर्म आचरण एवं स्थितप्रज्ञ इन चार पक्षों की व्यक्ति निर्माण के व्याख्यापरक इस प्रतिपादन को।
द्वितीय अध्याय की शुरुआत ही श्रीकृष्ण की अर्जुन को लताड़ से आरंभ होती है। वे कहते है-
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्ट मस्वर्ग्य मकीर्ति कर मर्जुन॥2॥
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्वयुपपद्यते क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप॥3॥
अर्थात् “हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है। इसलिए हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो। तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हृदय नहीं जान पड़ती। हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा”
यह समझने की बात है कि भगवान इस गीता रूपी उपनिषद् में पहली बार यहीं से, इन्हीं दो श्लोकों के माध्यम से अपना बोलना आरंभ करते है। इसके पूर्व अर्जुन के कहने पर उन्होंने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाकर खड़ा भर दिया था। दोनों ही श्लोक बड़े मार्के के है। किसी भी योद्धा के लिए ये शब्द बड़े चुभने वाले है। क्लीव कायर नपुंसक कहा जाना किसी भी वीर-योद्धा को सहन नहीं हो सकता। अर्जुन के पौरुष को चुनौती देते हुए उसे उत्तेजित करने के लिए भगवान कृष्ण सबसे बड़ी चोट उसे लगाते हुए उलाहना दे रहे है। जाग्रत आत्मा के स्तर के व्यक्ति अर्जुन को तमस् की ओर जाता देख परमात्मसत्ता विकल हो उठती है। वे उसे श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण के विषय में याद दिलाते है व उसके वर्तमान व्यवहार को अपकीर्ति की ओर ले जाने वाला बताते हैं। इस प्रकार वे अपने सखा-मित्र अर्जुन को अंदर से बाहर तक उद्वेलित भी कर देते है।
उपर्युक्त दो श्लोकों के जवाब में अर्जुन पुनः भीष्म पितामह गुरु द्रोण की दुहाई देकर स्वयं को रणभूमि में युद्ध करने से बचाना चाहता है। सातवें श्लोक में सब कुछ अपने आराध्य के हाथों में सौंपकर वह शिष्य भाव को प्राप्त हो जाता है इन चार-पाँच श्लोकों के प्रारम्भ में अर्जुन ने ढाल के रूप में भीष्म व द्रोणाचार्य के नाम का प्रयोग किया है वह कहता है- ‘वे दोनों ही पूजनीय है। मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड़ूं अर्जुन श्रीकृष्ण से कहता है आप ज्ञानी है, महापुरुष है, हमें आपकी गाली तक स्वीकार है, परंतु हम अपनों को नहीं मार सकते। इस समय अर्जुन द्वंद्व की स्थिति में है। एक तरफ गुरुजनों के प्रति मोह है और दूसरी ओर श्रीकृष्ण की लताड़ व युद्ध का आहृन कहता है कि इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न खाना कल्याणकारक समझता हूँ, क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और काम रूपी भोगों को ही तो भोगूंगा।
सारे तर्क इसके इस पराकाष्ठा पर पहुँच गए हैं कि भिक्षा के अन्न की बात कहने लगता है- युद्ध के कारण रक्त से सने पदार्थ वाली बात कहकर श्रीकृष्ण को उतनी ही उत्तेजक भाषा में उत्तर देने की कोशिश कर रहा है, जितना उन्होंने उलाहने की गहरी चोट देकर उससे प्रारंभ में कहा था यह ळाी कह देता है। कि हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करने न करने में से कौन-सा श्रेष्ठ है अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे ओर जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे मुकाबले में खड़े है।
अर्जुन की यह मनः स्थिति समझने योग्य है। सिद्धांतों की भाषा वह कह रहा है गुरु को मारना ठीक बात नहीं है यह भी योगेश्वर श्रीकृष्ण का वह समझा रहा है, पंडितों जैसी बातें कह रहा है। किन्तु पंडितों जैसा उसका आचरण नहीं है। तमोगुण की पराकाष्ठा मोह में होती है। मोह का एक चरम स्वरूप परमपूज्य गुरुदेव ने बताया है निद्रा। सारी दुनिया छोड़कर सो जाइए। आलस्य, प्रमाद और मोहनिद्रा-सभी एक ही दुर्गुण के रूप हैं। जिस अर्जुन को निद्रा जीने वाला कहते हैं-गुडाकेश जिसका शाब्दिक अर्थ भी यही है (गुडाक यानि निद्रा ईश अर्थात् स्वामी) वही अर्जुन स्वयं मोहनिद्रा में चला गया है। परमपूज्य गुरुदेव कहते थे कि जाग्रत आत्माओं को जब हम मोहनिद्रा में डूबा देखते हैं तो उन पर तरस भी आता है व आक्रोश भी होता है। आजीवन पोतों के साथ खेलना परिवार की सीमाओं तक ही स्वयं को बाँधे रखना-समाज के विषय में कभी न सोचना, यह आज के युग की सबसे बड़ी विडंबना है। उपर्युक्त चिंतन यदि अर्जुन पर युगधर्म की परिप्रेक्ष्य में लागू करें तो लगता है कि इस समय इसकी स्थिति यही है किन्तु यही स्थिति उसे क्रमशः समर्पण की स्थिति में ले जाती है। गीता के इस अध्याय के सातवें श्लोक में ही वह कह बैठता है-
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृज्छामि त्वां धर्मसम्मूढ़चेताः। यज्छेयः स्यानिन्श्चितं बूहि तन्में, शिष्यस्तेडहं शाधि माँ त्वाँ प्रपन्नम्॥
अर्थात् कायरता रूपी दोष से उपहत स्वभाव वाले तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए, क्योंकि में आपका शिष्य हूँ इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए।
गीता वस्तुतः गुरु शिष्य संवाद के रूप में यही से आरंभ होती है। पहली बार अर्जुन के मुँह से निकला है ‘शिष्यस्तेडहं’ मैं आपका शिष्य हूँ। यह स्थिति आना ही शिष्य के लिए कल्याणकारी घड़ी आने के समान हैं जब तक यह स्थिति नहीं आती शिष्य अपने ही अहंकार में डूबा बैठा अपनी प्रतिभा पर आत्म मुग्ध होता रहता है। मैं पढ़ा-लिखा हूँ- मैं दानी हूँ-गुरु के लिए इतना मैंने दान किया- मैं जीवनदानी हूँ। जब यह सब भूलकर यह बात मन में आती है कि मैं आपका शिष्य हूँ-आपकी शरण आया हूँ जो मेरे लिए कल्याणकारी हो, वही शिक्षा दीजिए, तो गुरु सशरीर हो या न हो, सूक्ष्म, से भी ऐसे ही प्रेरणाएँ भेजता है कि वे निश्चित ही कल्याणकारी होती हैं एवं उसका सच्चा मार्गदर्शन करती हैं।
ऐसा कहा जाता है कि असली गीता दूसरे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक से ही आरंभ होती है, क्योंकि भगवान गुरुभाव में योगस्थ होकर वे अर्जन रूपी शिष्य को, जो हम आप कोई भी हो सकते है, साँख्ययोग की शिक्षा देते है। साँख्य का अर्थ है- ज्ञान का सिद्धांत परक पक्ष व्यवहार में लाने की शिक्षा देने वाला योग। साँख्ययोग के विषय में कइयों की भ्रांतियुक्त मान्यताएँ है कि यह संन्यासियों के लिए वैरागियों के लिए है, किन्तु वास्तविकता यह है कि यह जीवन विज्ञान की आधारशिला है-योग की इमारत साँख्य पर ही रखी गई है। साँख्ययोग बताता है कि हमें अपने अंदर की विभूतियों को कैसे जाग्रत करना चाहिए कैसे ईश्वर को सही रूप में समझ उसका अस्तित्व हमें स्वीकार करना चाहिए एवं कैसे सामान्य जीवन जीते हम ही हम स्थितप्रज्ञ की भाँति, परमहंस की भाँति जीवन बिता सकते है। यह योग हर अवस्था में हम व्यक्ति पर युवा विद्यार्थी गृहिणी सद्गृहस्थ, जिज्ञासु-साधक सभी पर लागू होता है। इस कारण गीता में इस अध्याय का बड़ा माहात्म्य बताया गया है।
यहाँ यह प्रसंग गुरु-शिष्य के मध्य होने से एवं प्रथम वार्तालाप की दृष्टि से बड़े महत्व का है। प्रत्येक गुरु शिष्य को तीन ही बातें बता सकता है-पहला कर्तव्य क्या है दूसरा कर्तव्य करते हुए ईश्वर में विलय हो जाना ही श्रेयस्कर है एवं तीसरा स्वयं का प्रमाण प्रस्तुत कर गुरु यह बताता है कि एक आदर्श व्यक्ति का मॉडल कैसा होता है स्थितप्रज्ञ कैसा होता है। इसे इस प्रकार से भी विभाजित कर सकते हैं-
देहातीत आत्मा का भान-जिसकी बारहवें श्लोक में व्याख्या आयी है, करते हुए यह जानना कि कर्तव्य क्या है। देह से ऊपर चलकर आत्मा को समझने का हम प्रयास करें।
देह से स्वधर्म आचरण-कर्तव्य को करके उसके पार जाना। कर्म को करके उसके पार जाना। कर्म करते हुए नैर्ष्कमण्यता की स्थिति में जाना। इसकी व्याख्या इकतीसवें श्लोक एवं उसके बात आई है।
स्थितप्रज्ञ की व्याख्या
जो आत्मा को जान जाता है उससे ऊपर पहुँचा जाता है, उसका जीवन कैसा होता है। यही पर स्थितप्रज्ञ के लक्षण भगवान ने पचपनवें श्लोक से अंत तक बताए है।
इस प्रकार इन तीन विभाजनों में अर्जुन रूपी शिष्य को गुरु श्रीकृष्ण का वह संदेश है, जो युगों - युगों से मानव समुदाय का जिज्ञासु साधकों का मार्गदर्शन करता रहा है।
अर्जुन का धर्म यह नहीं है कि वह भिक्षा माँगकर निर्वाह कर ले। अर्जुन यदि अज्ञातवास भी गया है तो भिक्षा नहीं माँगी है उसने पुरुषार्थ ही किया है। क्षात्रधर्म का पालन करने वाला व्यक्ति अर्जुन यदि भिक्षा माँगकर जीने की बात कहता है तो अर्जुन को लताड़ एवं साँख्ययोग के रूप में वास्तविकता का, स्वधर्म आचरण का तथा देहातीत आत्मा की अनुभूति का ज्ञान मात्र योगेश्वर कृष्ण ही दे सकते हैं। यहाँ अर्जुन को शिष्य मानते हुए गुरु के रूप में श्रीकृष्ण की स्थिति समझना बहुत जरूरी है। यहाँ गुरु के रूप में भगवान स्वयं मौजूद हैं।
“स्वयं भगवान हमारे गुरु- परम सौभाग्य हमारा है यह गीत हम गुनगुनाते हैं। यदि इसे वर्तमान स्थिति में अपने जीवन पर लागू करके देखें तो गीता का यह प्रसंग भली-भाँति समझ में आ सकेगा। गुरु के रूप में चमत्कारी व्यक्ति को तो स्वीकार कर लेते हैं लोग किन्तु जिसने सद्गुरु के रूप में भगवान के रूप स्वीकार किया है ऐसे गिने चुने है। अर्जन के जीवन की यह सबसे बड़ी घटना है कि वह शिष्यस्तेडहं शाधि माँ त्वाँ प्रपन्नम् के रूप में भगवान को सद्गुरु के रूप में स्वीकार कर लेता है व कहता है कि क्योंकि मैं आपका शिष्य है कि इसलिए शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए।”
परमपूज्य गुरुदेव के जीवन में भी उनके द्वारा जलाए दीप में से सूक्ष्म शरीरधारी मार्ग दर्शक सत्ता हिमालय से आकर प्रकट हुई व उन्हें उनके गुरु के रूप में अपना परिचय दिया। स्वयं पूज्यवर ने लिखा है- प्रातः क उपासना चल रही थी वसंत पर्व का दिन था। ब्रह्ममुहूर्त में कोठरी में ही सामने प्रकाशपुँज के दर्शन हुए। आँखें मल कर देखा कि कहीं कोई भ्रम तो नहीं।...........प्रकाश के मध्य में से एक योगी का सूक्ष्म शरीर उभरा, सूक्ष्म इसलिए कि छवि तो दीख पड़ी पर वह प्रकाशपुँज के मध्य अधर में लटकी हुई थी। यह कौन है? आश्चर्य ..................वे बोले यह तुम्हारा दिव्य जन्म है। तुम्हारे विगत जन्मों की तरह इस जन्म में भी हम सहायक रहेंगे और इस शरीर से वह कराएँगे जो समय की दृष्टि से आवश्यक हैं। सूक्ष्म शरीरधारी होकर जो काम नहीं करा सकते- वह तुमसे कराएँगे.........समर्पण ने उसी दिन प्रकाशपुँज देवात्मा को कर दिया और उन्हीं को न केवल मार्गदर्शक वरन् भगवान के समतुल्य माना। इस संबंध निर्वाह को प्रायः साठ वर्ष से अधिक होने को आते हैं ( तब, सन 1974 में) बिना कोई तर्क बुद्धि लडात्राए बिना कुछ नननच किए, उन्हीं के इशारे पर एक ही मार्ग पर गतिशीलता होती रही हे। उस दिन उन्होंने हमारा समूचा जीवनक्रम किस प्रकार चलना चाहिए, इसका स्वरूप व विवरण बताया। बताया ही नहीं, स्वयं लगाम हाथ में लेकर चलाया थी। चलाया ही नहीं हर प्रयास को सफल भी बनाया।
हमारी वसीयत और विरासत,
उपर्युक्त प्रसंग सद्गुरु की प्राप्ति क संदर्भ में बताया गया ताकि हम सभी प्रेरणा ले सकें-गीता के दूसरे अध्याय क इस प्रसंग से। जो व्यक्ति बुद्धि नहीं भावनाओं के तल पर जीता है, उसका समर्पण समग्र होता है एवं उसके आत्मिक विकास की अनंत संभावनाएँ होती है। हम स्वयं अपने गुरु के प्रति समर्पण को इस परिस्थिति को सामने रख परखने का प्रयास करें। अर्जुन कहता है कि मैं अपने दिलों दिमाग पर छाई सम्मूढ़ता किंकर्तव्यविमूढ़ता से इस तनाव से मुक्ति पाने के लिए अब आपकी शरण में शिष्य बनकर आना चाहता हूँ। अब डोर श्रीकृष्ण के हाथों सौंपने में ही कल्याण है, यह समझ गया है, अर्जुन। इसी कारण इस श्लोक में उसका शरणागत भाव तीव्रतम वेग से उभरकर आया है।
नरेंद्रनाथ के जीवन में दो बार ऐसे क्षण आए, अब उन्होंने अपने भावी गुरु -अपने आराध्य ठाकुर को देख लिया किन्तु सद्गुरु के रूप में स्वीकार नहीं कर पाए। एक बार तब जब रामचंद्रदत्त के यहाँ ठाकुर के उद्बोधन के समय गीत गाया था व उनके हाथों मिठाई भी खाई थी। दूसरी बार तब जब अपने प्रोफेसर हैस्टी के माध्यम से उनकी जानकारी मिली व उन्हें देख भी आए। तब भी साधारण मानव ही समझा था उन्हें। गए तब, जब भगवान के दर्शन की आकुलता-व्याकुलता ने इतना ज्यादा बेचैन कर दिया कि घर बैठे रहा नहीं गया तब जाकर प्रश्न पूछकर जवाब मिलने पर कि भगवान कैसा होता है व कैसे देखा जाता है - उन्होंने यह पहचाना था कि ये गुरु मेरे हैं। एक पागल सा व्यक्ति परमहंस है, यह उस दिन समझ में आया था उन्हें। सद्गुरु के रूप में भगवान को वरण करना एक बहुत बड़ी असामान्य घटना है, हर किसी के जीवन की। गुरु को हम ज्ञानी संत अभिभावक, संबंधी समाज सुधारक अथवा चमत्कारी पुरुष के रूप में भगवान को वरण करना एक बहुत बड़ी असामान्य घटना है हर किसी के जीवन की। गुरु को हम ज्ञानी संत अभिभावक, संबंधी समाज सुधारक अथवा चमत्कारी पुरुष के रूप में मान बैठते है, परंतु गुरु के रूप में सद्गुरु का वरण कर उसकी शरणागत नहीं जाते। जिस दिन यह हो जाता है, उसी दिन से क्राँति का शुभारंभ हो जाता है कहा गया है।
वंदे बोधमयं नित्यं गुरुंशकररूपिणम्।
गुरु शंकर का स्वरूप है-महाकाल है। हम उस गुरु रूपी शंकर रूपी परम चेतना के एक कण बन जायें नित्य उसकी वंदना करें तो हम भी उसकी अनुकंपा के अधिकारी बन सकते है। बिना उस परम चेतना का अंश बने- आत्मसंताप की स्थिति में पहुँचे हमारा कल्याण नहीं है। इस श्लोक की व्याख्या इस बड़े परिप्रेक्ष्य में समझना इसी कारण बड़ा महत्वपूर्ण है कि इसमें शिष्य बनकर सब कुछ पा लेने के सूत्र छिपे पड़े हैं अर्जुन (7/12) कह रहा है-
यच्छेयः स्यान्निश्चतं बूहि तन्मे। शिष्यस्तेडहं शाधि माँ त्वाँ प्रपन्नम्॥
अर्थात्- “जो भी साधन मेरे लिए निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए, क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए। गीता का पाठ करना आसान है पर गीता के मर्म को समझना और गीता को दुग्ध की तरह (सुधीर्भेक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्) अमृत मानकर और भी मुश्किल काम है। यदि हम प्रस्तुत श्लोक को समझ कर अपना ही आत्मावलोकन कर सकें कि हमारी उमंगों, अकुलाहट अभीप्सा प्राप्त करने की उत्कंठा में कोई कमी तो नहीं आ गई तो हम शिष्य के नाते अदृश्य सूक्ष्म रूप में विद्यमान गुरुसत्ता से वह सब कुछ पा सकेंगे जो एक आदर्श शिष्य को मिलना चाहिए। “इक्कीसवीं सर्दी उज्ज्वल भविष्य” हमारे गुरु का नारा है व हमें का नारा है व हमें उस पर यदि पूरा विश्वास है तो हमें परेशान तनिक भी नहीं होता चाहिए एवं अपने पुरुषार्थ में कोई भी कमी नहीं करते हुए उसे लाने हेतु आज ही तत्पर भी हो जाना चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव ने कहा था कि जो शान्तिकुञ्ज में रहने वाले कार्यकर्ता हैं, यदि सन 2000 तक भी मेरे साथ गाड़ी खींच ले गए, जो बाहर हैं, वे मेरे विचारों से जुड़े रह कर प्रचार प्रसार करते रहें तो उनका निश्चित ही कल्याण हो जाएगा। सन 1967 की अखंड ज्योति पत्रिका के संपादकीय एवं 1970 में दिए गए प्रवचनों से लेकर 1973-1974 की अखण्ड ज्योति में यह आश्वासन पाया जा सकता है।
गुरु के प्रति वेदना जागे तो इसी स्तर की जो अर्जुन में उत्पन्न हुई जो कबीरदास में पैदा हुई, जो नरेंद्रनाथ व मूलशंकर में पैदा हुई एवं उन्हें क्रमशः स्वामी विवेकानंद एवं महर्षि दयानंद बना गयी। परमपूज्य गुरुदेव ने स्थान स्थान पर अपने गुरु के प्रति इसी वेदना को उजागर किया है। उनके लिखे एक एक वाक्य में समर्पण है। हमारी वसीयत और विरासत में पूज्यवर लिखते है कि शिष्य का जन्म होता युग धर्म के अनुरूप सौंपे गए दायित्वों को निभाने क लिए युगधर्म की अपनी महत्ता है। उसे समय की पुकार समझकर अन्य आवश्यक कार्यों को भी छोड़कर उसी प्रकार दौड़ पड़ना चाहिए जैसे कि अग्निकांड होने पर पानी लेकर दौड़ना पड़ता है और अन्य सभी आवश्यक कार्य छोड़ने पड़ते है। इसी युगधर्म की चर्चा श्रीकृष्ण अपने इस अति महत्वपूर्ण प्रसंग में कर रहे है। शिष्य एक कदम आगे बढ़ाता है तो गुरु दस कदम आगे बढ़कर उसे अपने गले से लगा लेता है। संपूर्ण गीता का मर्म प्रस्तुत प्रसंग में छिपा पड़ा है। इस अंक में अभी इतना ही। अगले अंक में परिजन पढ़ेंगे अर्जुन के कथन का उत्तर योगेश्वर श्री कृष्ण से। आठवें श्लोक में ही अर्जुन ने अपनी शरणागति भाव के प्रकटीकरण के बाद कहा है कि मुझे ऐसी शिक्षा दीजिए जो मेरी इंद्रियों के सुखाने वाले शोक को भी दूर कर सके।” इस शोक को दूर करने हेतु जो भी कुछ उपदेश वासुदेव ने दिया है, वह साँख्ययोग आगामी अंक में।
प्रतिभाओं को आमंत्रण
परमपूज्य गुरुदेव रचित वाङ्मय के 70 खण्डों के प्रकाशन के बाद शेष 38 खण्डों का संपादन-प्रकाशन होना है साथ ही सभी 108 ग्रंथों का गुजराती तथा अंग्रेजी संस्करण प्रकाशित किया जाना है। इस मिशन के साहित्य संपादन में जिन परिजनों की अभिरुचि हो तथा योग्यता प्राचार्य, प्रोफेसर, व्याख्याता स्तर की हो एवं समर्पण भाव से निम्न क्षेत्रों में से किसी में लगभग एक दो वर्ष तक का समयदान दे सकते हो, कृपया संपर्क करें।
(क) अंग्रेजी अनुवाद। : अन्य विवरण के साथ हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद का अनुभव प्रूफ रीडिंग अनुभव एवं अगस्त मास की अखण्ड ज्योति पत्रिका पृष्ठ क्रमांक 44, 46, 47 का अनुवाद भी संलग्न करें।
(ख) गुजराती अनुवाद : अन्य विवरण के साथ हिन्दी से गुजराती अनुवाद का अनुभव प्रुफ रीडिंग अनुभव एवं अगस्त मास की अखण्ड ज्योति पत्रिका पृष्ठ क्रमांक 44, 46, 47 का अनुवाद भी संलग्न करें।
(ग) जिन परिजनों की हिन्दी संपादन प्रूफ रीडिंग आदि में अभिरुचि हो, उसके अनुभव का उल्लेख करते हुए अन्य विवरण के साथ संलग्न करें।
वाँछित अन्य विवरण-नाम पता फोन नं. आयु पारिवारिक उत्तरदायित्व, योग्यता स्वास्थ्य पद / व्यवसाय कार्य-अनुभव समयदान की अवधि, गायत्री परिवार से जुड़ने का वर्ष।
संपर्क सूत्र अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
परमपूज्य गुरुदेव का यह श्रावणी संदेश बड़ा मार्मिक एवं सामयिक है। आज मानव जाति जिन परिस्थितियों से जूझ रही है-संगठनात्मक स्तर पर जो हलचलें राष्ट्र भर में दिखाई देती है, उनमें यदि किसी को-शासनतंत्र को भी आशा है तो गायत्री परिवार से ही। परमपूज्य गुरुदेव ने सूक्ष्मीकरण अवधि के प्रथम वर्ष में अपनी हीरक जयंती की घोषणा की थी। यह 1984 में मनायी गयी थी। उसी की पूर्व वेला में गुरुदक्षिणा के रूप में उन्होंने दस हजार हीरों की जीवनदानी नररत्नों की माला पहनने की बात कहीं थी। उसके बाद प्रायः पंद्रह वर्ष बीतने को आते हैं। क्या हम जब भी उनकी इस आकांक्षा को पूरा नहीं कर सकेंगे? क्या अभी भी अपने पारिवारिक दायित्वों के पूरा हो जाने पर भी कई प्रकार के बहाने बताकर बचते रहेंगे? देवसंस्कृति के विश्वविद्यालय स्तर की स्थापना की पूर्व वेला में आवश्यकता है ऐसे प्राणवानों की, जो गुरु की पीड़ा को समझ सकें। पढ़े अमृतवाणी।
गायत्री मंत्र हमारे साथ बोलें ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो! आज रक्षा बंधन का सामूहिक पर्व है यह संकल्प का पर्व है, कर्तव्य-निर्धारण का पर्व है। आज हमारे ध्यान के दो केंद्र है-एक तो भगवान जो हमें धक्का देता रहता है और आगे बढ़ाता रहता है। दूसरा भगवान-आप लोग हैं, जो हमारे कंधे से कंधा मिलाकर चलते है। एक भगवान निराकार है तथा दूसरा साकार है आप साकार भगवान है जो हमारे कदम से कदम मिलाकर चलते है। हमारी बातों को मानते है तथा श्रम करते हमारे क्रिया–कलापों में शामिल रहते है। आज हमारी इच्छा हुई कि आपसे अपने मन की बातें, जी की बातें करूँ। तो महाराज जी आप अपना कुशल समाचार बताएँ।
मित्रो! हमारे ऊपर भगवान की छाया है और जब तक वह बनी रहेगी, हमारा कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। स्वास्थ्य हमारा ठीक है थोड़े दिन पहले एक पगले व्यक्ति द्वारा वार करने के कारण कुछ चोट लग गयी थी, अब वह ठीक हैं। सेहत हमारी ठीक है और कुछ कमी रह जाएगी। तो आप लोग कदम बढ़ा देंगे तो वह भी पूरी हो जाएगी। हमने अब तक बहुत काम किया है।अभी हमारे सामने तो आपको पता नहीं चलता है, परंतु बाद में पता चलेगा कि हमने काफी काम किया है हमने पेपर बाजी भी नहीं, विज्ञापन भी नहीं किया और भी कुछ नहीं किया, परन्तु फिर भी हमने इतना काम कर लिया जितना किसी संस्था ने नहीं किया। न केवल हिंदुस्तान में वरन् उसके बाहर भी बहुत काम किया है। हमने ठोस काम किया है।
मित्रो! हम से मतलब आप सबके द्वारा है। आप हमारे मित्र है, सहयोगी है। हम एवं आपने मिलकर बहुत कड़ा काम किया है एकाकी भगवान के लिए भी यह संभव नहीं था। गाँधी जी ने भी अकेले स्वतंत्रता संग्राम नहीं लड़ा था। उनके साथ भी एक सत्याग्रही सेना थी। उसके माध्यम से ही आंदोलन चलाया तथा अँगरेजों को इस देश से खदेड़ बाहर किया एवं भारत को आजाद कराया। भगवान बुद्ध के लिए भी अकेले धर्मचक्र प्रवर्तन संभव नहीं था उन्होंने एक लाख परिव्राजक बनाए ओर उनके माध्यम से उन्होंने विचारों को जन जन तक पहुँचाया। विनोबा ने भूदान का कार्य भी अनेक सर्वोदयी कार्यकर्ताओं के सहयोग से किया था।
भगवान राम ने समुद्र को पाटने एवं रावण पर विजय प्राप्त करने का कार्य क्या अकेला ही किया था? नहीं उसे उन्होंने हनुमान अंगद नल-नील आदि बानर एवं भालुओं के सहयोग से पूरा किया था भगवान कृष्ण ने महाभारत यानी ग्रेटर इंडिया का कार्य क्या स्वयं अकेले किया था? नहीं यह संभव नहीं थी। तो क्या गोवर्धन उन्होंने स्वयं उठा लिया था? नहीं, यह भी संभव नहीं था। यह सब कार्य उन्होंने ग्वाल-बालों के सहयोग से पूरा किया।
जगत की परंपरा को जाग्रत एवं जीवंत बनाए रखने के लिए हमने भी एक संगठन बनाया। आप हमारे साथी एवं सहयोगी हैं आपको हमने बहुत मुश्किल से ढूँढ़ा है। आपने तो सोचा होगा कि हम पत्रिका के ग्राहक बन गए और गुरुजी के हो गए। नहीं बेटे हमने आपको हिलाया है झकझोरा है प्रेरणा दी है, तब आप आए है। आपको हमने बुलाया है। हमने आपके पहले जन्म की बात पर विचार किया, जिसमें देखा कि इनमें संस्कार है। जो भगवान का काम के सकते हैं, उन्हें हमने जगाया है। बहुत से बाबा जी आते हैं। और न जाने क्या क्या बातें बतला जाते है। और न जाने क्या-क्या बातें बतला जाते हैं। उनकी बातों को कोई सुनता भी नहीं है परंतु हमारे बारे में आपने हमारी बातों को ध्यान से सुना, हृदय में धारणा किया। इसके साथ ही उसे क्रिया में परिणत करने के लिए भी अपना समय, श्रम व अक्ल लगाने के लिए तैयार हो गए और लगा रहे हैं। यह बहुत प्रसन्नता की बात है। यह हमारे प्रयास के साथ ही साथ आपके पूर्व जन्म के संस्कार की ही फल है।
मित्रो! शेर का एक बच्चा भेड़ों के बीच में चला गया था और अपने स्वरूप को भूल गया था जब एक शेर ने उसे उसकी छाया दिखाई और उसका स्वरूप दिखलाया तो वह जाग्रत हो गया। हम एवं आप दोनों सिंह हैं भेड़ वह होता है जो चौबीस घंटे पेट और प्रजनन की बात करता है केवल अपनी औलाद की बात सोचता है। आप इससे आगे है। आपके सहयोग से ही यह मिशन आगे बढ़ पाया है हमने आपको ढूँढ़ निकाला है। और मोतियों को चुन-चुनकर इकट्ठा किया है। मोती इसी तरह सड़क पर नहीं पड़ा था जो हमने केवल चुन लिया है। हमने काफी आपकी बड़ी मुश्किल से जोड़ पाए है हम आपको हमसे जुड़ा कहा चाहिए।
साथियो! आजकल हम सूक्ष्मीकरण साधना में है। उसके समाधान के लिए हमें बड़ा काम करना है आगे खुशहाली लाने के लिए हमें प्रयास करना है। यह प्रयास भगीरथ का गंगा अवतरण एवं दधीचि की हड्डी से वज्र बनाने से कम नहीं है जो असुरता को समाप्त करने के लिए आवश्यक है। हमारा प्रयास उसी स्तर का है। इस महान कार्य को जब हम कर रहे है तो आपको हमारा सहयोगी एवं सहभागी अवश्य बनना चाहिए। आपको बनाना ही पड़ेगा, चाहे आप मन से कें या बिना मन से।
आपको इसमें क्या करना पड़ेगा? हमने आपको दो काम बतलाए थे। आपको हमने आपको दो काम बतलाए थे। आपको हमने एक बात यह कही थी कि सूर्योदय के समय एक माला गायत्री महामंत्र का जप आपको अवश्य करना चाहिए, ताकि हमारे इस महापुरश्चरण को-इस योजना को बल मिले। दूसरा हमने आपको यह कहा था कि आपको जब हमसे बेतार का तार लगा लें। सूर्योदय के एक घंटे पहले से सूर्योदय के एक घंटे बाद तक जब आप हमारा चिंतन करेंगे तो आपको हमारा संदेश मार्गदर्शन एवं सहयोग मिलेगा। इसके अलावा हम आपसे और क्या चाहेंगे। आप हमारे बच्चे है, हम जो कर रहे है। वह आप करें यही हमारी इच्छा है। हम जिस परंपरा चले है, आपको भी उसी पर चलना चाहिए।
मित्रो, हमने ऋषि परंपरा को ग्रहण किया है हमने साधु-ब्राह्मण का संत का जीवन ग्रहण किया है आपको भी वही ग्रहण करना चाहिए। संत वह तो दुनिया को हिला दे। गाँधी रामकृष्ण परमहंस विवेकानंद संत थे, जिन्होंने दुनिया को हिला दिया था। आपको भी वैसा ही बनने का प्रयास करना चाहिए। ब्राह्मण अपरिग्रही होता है तथा संत सेवाभावी होता है आपको इन दोनों परंपराओं को कायम रखना चाहिए। हमने यही रास्ता अपनाया है। आप से जितना संभव हो, इसी परंपरा को अपनाने का प्रयास करें। आप अपनी निजी महत्त्वाकाँक्षा कम होनी चाहिए। आपकी इच्छा कम होनी चाहिए। हिन्दुस्तान के आम नागरिक की तरह आपका जीवन होना चाहिए। आपको अपने परिवार को ज्यादा नहीं बढ़ाना चाहिए। जो है, उनमें से प्रत्येक सदस्य को स्वावलंबी बनाने का प्रयास करें। इससे आपको व उनको दोनों को प्रसन्नता होगी। यदि आप ऐसा कर सकेंगे। तो ही हमारे साथ चल चल सकेंगे।
अभी तो आप इस समय हमारे साथ जब उत्साह आता है तो चलने लगते हैं ओर जब उत्साह कम हो जाता है तो मगर की तरह पानी में जा बैठते है। यह पानी के बुलबुले की तरह से काम करना क्या कोई शान की बात है? अगर चलना है तो फिर चलना ही है, रुकना नहीं। यही शान की बात होगी। हमारे गुरु ने हमारी शान रखी, हम आपकी शान रखेंगे। आप हमारी जिंदगी को देखिए, गाँधी जी की जिंदगी को देखिए, अन्य संतों की जिन्दगी को देखिए, अन्य संतों की जिंदगी को देखिए, जिन्होंने जो संकल्प लिया जो लक्ष्य बनाया उसके लिए जीवन के अंत तक डटे रहे। बीच-बीच में वह भागे नहीं है। अगर बीच-बीच में वह व्यक्ति भागेगा तो वह वापस कैसे आएगा? महापुरुष आखिरी दम तक अपने उद्देश्य पर डटे रहे, संकल्प पर अडिग रहे अपने स्थान पर बने रहे। वे बीच में भागे नहीं है। अगर बीच में भागोगे तो काम कैसे बनेगा? इससे बड़ी मुसीबत होगी। अगर कोई बैल मारने आएगा तो आप गोबर करने लगेंगे, तो काम कैसे चलेगा? आपको उत्साह आता है, उमंग आती है तो आप काम करते है और जब आपकी हवा निकल जाती है तो आप चुपचाप हो जाते हैं। इससे काम कैसे चलेगा? अगर किसी काम को कीजिए तो पूरा कीजिए। थोड़ा-सा काम करने से क्या फायदा?
मित्रो! हमने तो हमेशा अर्जुन की तरह तीर की नोंक तथा चिड़िया की आँखें ही देखी है। हमेशा हमें अपना लक्ष्य दिखलाई पड़ा है। आपको भी जितना बन पड़े, त्याग करना चाहिए परन्तु बीच में काम बंद करके भागना ठीक नहीं है। ढीला-पोला होने में फायदा नहीं है। शानदार आदमी एकनिष्ठ रहते है, एक जैसे रहते है। आपसे भी जितना बने, मिशन के लिए त्याग करें महाकाल के लिए त्याग करें। हमारा एक ही निवेदन है कि नवयुग लाने के लिए जनमानस का परिष्कार करना है। इसके लिए आपको बढ़ चढ़कर काम करना है। आपको मुस्तैदी का जीवन जीना चाहिए। आप वैसा बैल न बनें जो रास्ते में बैठ जाता है। आप एक निष्ठा से एक श्रद्धा से काम करें तथा लगें रहें। इससे आपका हमारा तथा मिशन तीनों का कल्याण है। हमने अपना सारा जीवन एक लक्ष्य के लिए नियोजित किया है, आप भी अपने सारे जीवन को एक लक्ष्य के लिए नियोजित कीजिए।
एक बात और आप से कहनी है कि अब मिशन की रजत जयंती होने वाली है। अब हम पचहत्तर साल के हो गए। अरे हम तो जब से यह सृष्टि बनी है तभी से काम कर रहे है और जब तक यह रहेगी, हमें काम करना है। हमारी मुक्ति नहीं होगी। इस संसार में जब तक सभी आदमी मुक्ति नहीं पा लेंगे, हमें मुक्ति की अभिलाषा नहीं है। इस दुनिया के सभी आदमी जब मुक्ति पा लेंगे तो हम सबसे आखिरी आदमी होंगे जो मुक्ति की अभिलाषा रखेंगे।
मित्रो! ये हीरक जयंती क्या बात है? जब आदमी पचहत्तर वर्ष का हो जाता है तो यह जयंती मनाई जाती है। जाता है साल में शताब्दी मनाई जाती है। अब हमारा यह स्थूल शरीर विद्रोह कर रहा है हम बहुत दिन जिएँगे नहीं, यह हमारी कामना नहीं है। अब हम सूक्ष्म एवं कारण शरीर में रहकर काम करना चाहते है अब हम पाँच कोषों से पाँच शरीरों से पाँच मोर्चों पर लड़ेंगे। हीरक जयंती वसंत पंचमी से शुरू हुआ है और अगले वर्ष तक यह मनाया जाएगा। हमारे पास ढेरों पत्र आए है कि गुरु जी हम आपका जुलूस निकालेंगे, प्रदर्शनी लगाएँगे। इसी तरह न जाने क्या-क्या पत्र आए है। हमने विचार किया कि हमें इस जयंती वर्ष में क्या करना चाहिए? हम यानी हमारे मिशन का विस्तार कैसे हो? जन चेतना को कैसे जगाया जाए?
हमने जुलूस आदि के लिए लोगों को मना कर दिया। इस धूम धड़ाका से कोई लाभ नहीं होगा। हमने एक सौ आठ व एक हजार आठ कुण्डीय तक यज्ञ किए, जो शानदार थे, लेकिन देखा कि उसके दो साल बाद लोग उसे भूल गए। इस तरह इस धूम धड़ाके से कोई लाभ नहीं होता है। अब उससे मेरा मन भर गया है अभी हम इन्हें नहीं मनाना चाहते। आपको हमारी बात मानना चाहिए। आगे जब जरूरी होगा, हम बता देंगे। अगर आप हमारी इच्छा के अनुसार मनाना चाहते हैं तो हमारी एक इच्छा रह गयी है। क्या रह गई है? फूल माला हमने ढेरों मन पहन लिए है। अब हमें जेवर पहनने की इच्छा है। हमारे पास ढेरों आदमी है। हमारा मन है कि अब हम कदम से कदम मिलाकर चलने वालों की ही माला पहनें। हमने गायत्री शक्तिपीठें बनाई थी। उस काम से भी अब मेरा मन भर गया है। अब केवल मंदिर बनकर रह गए है वहाँ जाग्रति की जनजागरण की कोई बात नहीं है। वहाँ एक देवी बैठी है, जिसकी सुबह शाम आरती हो जाती है। हो सकता है अगले दिनों रचनात्मक क्रिया−कलाप चलें उनका भी कायाकल्प हो, पर अभी तो सब देखकर हमें बहुत दुख होता है कि जनता के बहुत सारे पैसों को बर्बाद कर दिया गया व परिणाम स्वल्प ही हाथ आया।
हमारा मन है कि हमारे पास दस हजार ऐसे व्यक्ति हों जिनकी हम माला पहनें, जो हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर चलें। हमारी व उनकी एक आवाज हो, एक आवाज हो, एक ओर बढ़ते रहें। लगातार मिलकर लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें। उन्हें किसी बात का डर या भय न हो। इस वर्ष हमारी इच्छा दस हजार हीरे का हार पहनने की है। अगर कोई व्यक्ति मरता है या फाँसी पर चढ़ाया जाता है तो उसकी एक इच्छा होती है जो पूरी की जाती है। जैसे किसी की इच्छा होती है कि हम मिठाई खाएँ तथा सिगरेट पिए तो उसकी इच्छा पूरी कर दी जाती है। हमारा भी मन है कि इस वर्ष हम दस हजार हीरों का हार पहनकर शहर में निकलें। जब हमारा जुलूस निकलें तो जनता यह समझे कि यह बहुत मालदार आदमी है। बहुत शानदार आदमी है, वजनदार आदमी है।
बेटे, आज मैं कबीर की तरह से पहेली कह बैठा। यहाँ दस हजार हीरों से मेरा मतलब है कि इस हजार ऐसे साथी हो जाए जो नियमित रूप से हमारे कार्य अर्थात् मिशन के लिए समयदान दे सकें। पैसे की इच्छा नहीं है। इसका मतलब यह है कि हमारे हाथ-पाँव मजबूत हो जाए। हाथ पाँव से हमारा मतलब आपसे है। आप हमारे चलते फिरते हाड़-माँस के शक्तिपीठ बन जाए। हमने जो उम्मीद शक्तिपीठों से लगाई थी, वह आप स्वयं पूरा करना शुरू कर दें। हमें ज्ञानरथ के लिए नौकर नहीं चाहिए। हमें इसके लिए आपका समयदान चाहिए। विवेकानन्द गाँधी विनोबा का काम स्वयं उन्होंने किया। इसी तरह यह काम आपको करने होंगे। आपके पास चौबीस घंटे है। आठ घंटे काम के लिए सात घंटे सोने के लिए पाँच घंटे नित्य काम के लिए रख लें तो भी नित्य काम के लिए रख लें तो भी आपके पास चार घंटे बचते है। आपको नियमित रूप से चार घंटे नित्य मिशन के लिए समाज के लिए, भगवान के लिए देना चाहिए।
समयदान आज की अनिवार्य आवश्यकता है। इसके लिए आपको समय निकालना ही चाहिए। मान लीजिए अगर आप बीमार हो जाए तो आपका समय बचेगा कि नहीं? आप यह समझे कि आप चार घंटे नित्य बीमार हो जाते है। आप कहेंगे कि गुरुजी हम किस काम के लिए समय दें जैसा कि मैंने कहा है कि जनजाग्रति के लिए और किसके लिए गुरु जी को पंखा झलने के लिए पैर दबाने के लिए बेटे हमें तो जनजाग्रति के लिए समय चाहिए। आप समय की माँग को पूरा की जिए। इस माँग से हमारा कान फटा जा रहा है, दिमाग पर बोझ-सा धरा है यह कार्य अकेले से पूरा नहीं हो सकता है। इस कार्य अकेले से पूरा आपसे समयदान चाहता हूँ। आप हमारे हाथ पैर बनें सहायक बनें। हमारा साहित्य घर-घर पहुँचाकर क्राँति कर दें। आपके चार घंटे से कम में तो बन ही नहीं सकता। अगर इतना बने तो फिर आप वही हल्ला गुल्ला करने वाले, जुलूस निकालने वाले बने रहें।
हरिश्चंद्र ने विश्वामित्र से एकलव्य ने द्रोणाचार्य से शिवाजी ने समर्थ गुरु रामदास से विवेकानन्द ने रामकृष्ण परमहंस से दीक्षा ली थी तथा गुरुदक्षिणा चुकायी थी। आपको भी गुरु-दक्षिणा के रूप में समय देना चाहिए। जनजाग्रति के लिए आपका समयदान हीरे-मोतियों से, जवाहरात से भी बढ़कर है। इससे कम में युगपरिवर्तन का लक्ष्य पूरा नहीं होगा। आप हमारे बेटे हैं, साथी-सहयोगी हैं। आपसे यही अपेक्षा है, आशा है।
ॐ शान्ति
गायत्री परिवार रूपी अखिल विश्वव्यापी संगठन गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा जी आचार्य के जीवनक्रम पर जब भी विस्तार से नूतन शोधें होंगी, बहुत से सामान्यजनों को जानकारी होगी कि कितना बहु-आयामी जीवन उन्होंने जिया है। अभी प्रायः पंद्रह शोधग्रंथ उनके जीवन पर, चिंतन व कर्तव्य पर लिखे जा चुके, किन्तु जिसका व्यक्तित्व हिमालय समान विराट हो, उसे कैसे शब्दों में बाँधा जा सकता है। वे एक विराट परिवार के मुखिया भी थे, संत भी थे, एक संगठन एक व्यवस्थापक, एक दार्शनिक, एक द्रष्टा एवं एक महान लेखक-साहित्यकार भी। अखण्ड ज्योति पत्रिका जीता-जागता वह दर्पण है, जिसके माध्यम से परमपूज्य गुरुदेव की प्राणचेतना को स्पंदन लेते देखा जा सकता है। उनके व्यक्तित्व के और भी कई रूप हैं, परंतु इस मिशन का जन्म जिस आधार पर हुआ- जिसके बलबूते पाला-पोसा जाकर वह बढ़ता चला गया और आज के 6 से लेकर 9 करोड़ परिजनों वाले विराट रूप तक पहुँच गया है, उसका आधार हैं उनकी संवेदना से भरी जीवन लेखनी। उसी से न केवल उन्होंने लेख लिखें वे पतियाँ भी लिखी जो लाखों व्यक्तियों के जीवन परिवर्तन का आधार बन गई, उन्हें संगठन से जोड़ कर उनसे कुछ ऐसा कराती चली गई कि संगठन का ढाँचा बनता चला गया। संगठन ढेरों बनते है, आज खड़े होते हैं कल बिखर जाते है। राजनीतिक पार्टी के कितने धड़े होते जाते हैं, वे भी मिलता-जुलता नाम रख एक नया संगठन खड़ा कर लेते है, पर उनका अस्तित्व बबूलों की तरह होता है। समय के प्रवाह में तिरोहित होने के लिए उन्हें अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। जिनके दिमाग में राजनीतिक है- कूटनीति है, वे तो कुकुरमुत्तों की तरह चार-पाँच अधिक से-अधिक पच्चीस तीस व्यक्तियों की एक पार्टी बना लेते है, पर जैसे ही उनके निजी स्वार्थ टकराते है, -बहवःय. नेतारः ‘ की तरह उनके ढाँचे लड़खड़ा जाते है। किंतु परमपूज्य गुरुदेव द्वारा स्थापित विराट गायत्री परिवार इस नींव पर खड़ा हुआ है, जिनकी सिंचाई आत्मीयता-सघन ममत्व रूपी शांतिप्रदाता जल से हुई हैं। जो प्यार- आत्मीयता उन्होंने अपनी लेखनी से अखण्ड ज्योति द्वारा निजी स्तर पर पत्रों द्वारा तथा तथा व्यक्तिगत संपर्क में आने वालों को अपने जादू भरे स्नेहिल स्पर्श से परिजनों को बाँटी, वही इस संगठन की समर्थता का मूल आधार है। आज जो क्षेत्र में कार्य कर रहे एक सक्रिय प्राणवान कार्यकर्ता हैं अथवा केन्द्रीय प्रतिनिधि के रूप में सक्रिय समयदानी- सभी ने घूँटी को पिया है। वह प्राण-सुधा है, जिसने युग-परिवर्तन लाने वाले ऐसे मिशन की आधार-भूत स्थापना की है।
जब से तेरह वर्ष की आयु में 1963 में हमने उन्हें पहली देखा तब से उनकी दिनचर्या के कायल हो गए थे। प्रातः जब मिलने का क्रम होता तब लेखन भी चल रहा होता था एवं व्यावहारिक जगत की सभी समस्याओं का समाधान भी। जैसे ही डाक आती वे तुरत स्वयं सारे पत्र खोलने- उनका वर्गीकरण करते एवं फिर जवाब लिखना आरम्भ कर देते। कुछ व्यवस्था परक कार्य ऐसे होते थे जिनमें पत्रिका के चंदे अथवा यज्ञायोजन संबंधी जिज्ञासाएँ होती थीं, उनका जवाब तुरंत नोट करा देते। पर ऐसे कई सौभाग्यशाली है जिन्हें उनके पास व पत्र आज भी निधि के रूप में विद्यमान हैं। ऐसे ही कुछ पत्रों की चर्चा इन लेखमाला में हम करेंगे।
अजमेर नया बाज़ार के श्री मोहनराज भंडारी बताते हैं कि उन्हें पूज्यवर मित्रवत पत्र पत्र लिखते थे। उनको लिखा 1.12.47 का एक पत्र है, जिसमें वे लिखते हैं-तुम्हारा प्रेम ऐसा है, जिसे भुला देना किसी वज्रहृदय के लिए भी कठोर है। काम में बहुत अधिक व्यस्त रहने कारण अपनी ओर से पत्र भेजने का अवसर नहीं मिल पाता, तो भी भेजे हुए पत्रों का उत्तर डाक डाक रूप में न देने में हम भूल नहीं करते। “यह जवाब उनके उस उलाहने के उत्तर में था, जो उन्होंने 4-5 दिन से प्यार भरी पाती न मिलने पर दिया था। वैसे पत्र नियमित मिल रहे थे, परंतु वे अपेक्षा रख रहे थे कि उनकी अस्वस्थता का उल्लेख करते हुए पत्र तुरंत कोई क्यों नहीं आया? किन्तु उनके बीमार होते ही तीसरे दिन इसी पत्र का आना व उसमें यह भी लिखा होना कि “भगवान तुम्हें सदा स्वस्थ एवं समृद्ध रखे ऐसी हमारी आंतरिक कामना है” यह बताता है कि बेतार के तार तरह संदेश पहुँचाता था व भक्त अपेक्षा रखता था कि याद कर लिया, अब तो पत्र आ जाए।
अभी-अभी हम गुरुपूर्णिमा मना चुके हैं। इस पर्व पर हमने अपनी गुरुसत्ता के प्रति निष्ठा को और भी प्रखर बनाने का संकल्प लिया होगा। किन्तु गुरुभक्ति होती क्या है, यह पूज्यवर के इस पत्र से जाना जा सकता है। अपने 1.07.42 के पत्र में एक आत्मीय को वे लिखते है-” गुरु भक्ति ईश्वर- भक्ति का ही एक प्रारंभिक और सरल रूप है। वह प्रेम भी ईश्वर को ही पहुँचाता है। जैसे पत्थर की प्रतिमा का पूजन करने से उस पूजा का श्रेय प्रतिमा एक सीमित नहीं रहता और सीधा ईश्वर तक पहुँचता है। इसी प्रकार गुरुभक्ति भी किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं है। वह भी सीधी ईश्वर तक ही पहुँचती है। आपके दो वे स्वप्न सही है।” कितनी स्पष्ट व्याख्या है। किसी को भी जरा भी मन में असमंजस किसी को भी जरा भी मन में असमंजस न लाकर गुरु शंकर रूपिणम्’ वाले तथ्य को स्मरण रखना चाहिए। बिना ननुनच किए बस उन्हीं को समर्पित जीवन जीना चाहिए। उपलब्धियां सभी समर्पण की ही देने हैं। किसी परिजन के मन में राम व कृष्णा में से किसी एक को ही आराध्य मानने का आग्रह था। इस सम्बन्ध में वे पत्र भी लिखा करते थे। उनके पत्र का जवाब सामान्यतया यह भी जा सकता था कि आप पुस्तिका का अध्ययन करें ‘ अखण्ड ज्योति’ पत्रिका पढ़ें किन्तु नहीं। पूज्यवर ने श्री धर्मपालसिंह को 4 जनवरी, 46 को लिखें अपने इस पत्र में सारा निचोड़ कुछ ही पंक्तियों में डालकर न केवल उनका असमंजस मिटाया, उन्हें एक सक्रिय समर्पित कार्यकर्ता भी बना दिया। वे लिखते हैं- ईश्वर भक्ति के संबंध में आपका विचार ही हमें अधिक उचित प्रतीत होता है। राम और कृष्ण यद्यपि ऐतिहासिक पुरुष भी हुए हैं, पर उनका इष्टदेव स्वरूप भिन्न हैं। व्यक्ति आदर्श हो सकते हैं ईश्वर नहीं। ईश्वरीय सत्ता वाले राम या कृष्ण की अंतःकरण में धारणा करनी चाहिए। ऐतिहासिक राम कृष्ण के चत्रियों में कुछ दोष भी हो सकते हैं। उनको ध्यानप्रतिमा राम की हम घाटे में रहेंगे। ध्यानप्रतिमा राम की या आपकी इच्छानुसार कृष्ण की, दिव्यगुणों से संपन्न ही होनी चाहिए। मानवीय दोषों व पूर्वाग्रहों का उनके साथ समन्वय कर देने से उलझनें बढ़ जाती है।
परमपूज्य गुरुदेव एक ही आदर्श नियत करने की जो सलाह उन्हें दी वह न केवल उन्हें रास आ गई, उनके जीवन में एक मोड़ लेकर आई। उनकी आध्यात्मिक प्रगति उसके बाद और सरल होती चली गई। यह पूछे जाने पर कि किसी जीवित व्यक्ति को इष्ट बनाया जा सकता है या नहीं गुरुदेव लिखते हैं कि “ कोई जीवित मनुष्य इष्टदेव नहीं हो सकता, क्योंकि आगे चलकर वह भ्रष्ट साबित हो तो अपनी धारणा भी निष्फल चली जाती है। ‘8 कितना सही-सशक्त तर्क सम्मत समाधान हैं। देखा जा सकता है।
अपने असाधारण महामानव स्वरूप को छिपाकर सामान्य परिवारजन जैसा व्यवहार करते रहना, साथ ही अनुदान भी लुटाना यह पूज्यवर के जीवन में देखा जा सकता है। माया वर्मा हमारे मिशन की अग्रणी कवयित्री रही है। अभी विगत वर्ष ही उनका निधन हुआ है उनकी स्मृति में एक काव्य संकलन विगत 23 मई को गायत्री कुँज में लोकार्पित किया गया था। वे स्वयं अपने विषय में बताती थी, भावविभोर हो जाती थीं। हमें सामीप्य पाने का अवसर ग्वालियर में अध्ययनरत होने के कारण मिलता रहा वे बताती थीं कि वे जो भी कुछ हैं, पूज्यवर की वजह से ही हैं। उनका स्वास्थ्य गुरुदेव से मिलने से पूर्व ऐसा था जिसे देखकर कोई कह नहीं सकता था कि वह अधिक दिन जी पाएँगी। उन्हें सतत् मिर्गी के दौर आते थे। कई -कई दिनों तक बेहोशी के दौरे भी आते थे। किन्तु पारस का स्पर्श पाते ही लौहखंड स्वर्ण हो गया एवं उसके अन्दर का सौंदर्य काव्य रूप में फूट पड़ा। 2.12.67 को लिखे एक पत्र में वे प्रिय पत्री माया, का संबोधन देते हुए लिखते हैं,-” हमारा स्वास्थ्य ठीक है। वह अपने काबू में है। किसी दूसरे का संकट अपने ऊपर लेकर उसका बोझ हलका किया है। इसी की बीमारी थी। प्रयोजन पूरा होने पर हमारा कष्ट भी ठीक हो गया।” जिसे जीवनदान दिया था- उसे वे बता रहे थे कि उसी की तरह किसी और के कष्ट को, उन्होंने अपने ऊपर लेकर ठीक किया था। यह घटना ‘अखण्ड ज्योति’ में पहले भी छप चुकी है व चर्चित है। कि जयपुर की एक सुविख्यात कर्मठ कार्यकर्ता बहिन के मृत्युदायी संकट को पूज्यवर ने अपने ऊपर उक ‘ रिनल स्टोन’ की तकलीफ के रूप में लेकर उन्हें प्रत्यक्ष जीवनदान दिया था उसी का संदर्भ संकेत मात्र में अपनी मानसपुत्रों को दिया था।
हमने अपनी आँखों से देखा है दिल्ली के श्री शिवशंकर जी व उनके भाइयों व गुरुदेव के मध्य हुए वार्तालाप में ऐसे ही एक चमत्कार को। शिवशंकर जी के भाई प्रेम नाथ जी सुना रहे थे कि किस तरह वे एक दिन पूर्व ताँगे से गिर से गिर गए व उसका पहिया उनकी जाँघों पर से निकल गया, पर गुरुदेव को स्मरण कर लिया एवं कहीं खरोंच तक नहीं आयी। घटना के एक दिन बाद की ही बात है। गुरुदेव बोले- ‘8 तुझे तो कुछ नहीं हुआ, पर यहाँ देख”- इतना कहकर उन्होंने धोती उठाकर जाँघ वाला हिस्सा दिखाया। पूरा लाल हो रहा था, मानो किसी ने बुरी तरह कुचल दिया हों। उन्होंने कहा कि तेरे याद करते ही संकट टल गया था। हत लगाने के लिए ट्यूब लेने दौड़े, पर तब तक अवतारी सत्ता को माया कि हमारे पहुँचने तक वह चिन्ह वहाँ था ही नहीं। बार-बार आँखें मलीं, सोचा कि क्या रामकृष्ण परमहंस व संत ज्ञानेश्वर वाली घटनाएँ आज भी घट सकती है?
इतना कुछ है कि कई ग्रंथ कम पड़ जाएँ, उस गुरुसत्ता के अनुदानों का वर्णन करते करते। पत्रों के माध्यम से प्रमाण सहित ऐसे ही प्रसंगों की चर्चा हम आगे भी करते रहेंगे। अभी तो उस दैवीसत्ता को नमन करते हुए विराम देते है।
एक कोयल एक कौआ अपनी-अपनी पूँछ की प्रशंसा करते हुए लड़ रहे थे। कोयल अपनी पूँछ को बाण की नोक की तरह बताकर कौए को धिक्कार रही थी। वह सुनकर कौआ बोला कि तेरी पूँछ केवल वसंत ऋतु में ही भली लगती है। लेकिन मेरी पूँछ गर्मी, जाड़ा और बरसात सब में एक सी रहकर मेरी रक्षा करती है।
असमय में अपने काम आ जाए, वही वास्तविक धन है। क्षणभर ठहरने वाली संपत्ति किस काम की? चाहे, थोड़ी ही क्यों न हो, सदा अपने पास रहने वाली संपत्ति ही उत्तम संपत्ति है।
जिस समय ये पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं, भारत की सीमा पर दुश्मन की छल भरी घुसपैठ से हमारे रणबाँकुरे पंद्रह हजार से अठारह हजार फीट की ऊँचाई पर डटकर मोर्चा ले रहे है। नगाधिराज हिमालय जो इस बृहत्तर भारत का मुकुट है, कभी तपश्चर्या की स्थली था, उसकी बर्फीली चोटियाँ इस भारतभूमि का श्रृंगार करती थीं। आज वे रक्तरंजित है। एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत विघटनकारी ताकते जुटी हुई हैं। स्वर्ग जैसे हमारे कश्मीर क्षेत्र में अतिक्रमण करने को, न केवल वे भारत सीमा में प्रवेश कर हमारे योद्धा सैनिकों को धोखे से मारने का पाप कर चुकी है जेहाद के नाम पर उन्होंने युद्धोन्माद को चरम परिणति पर पहुँचा दिया है। कारगिल, दरास बटालिया, सियाचिन, लेह आदि क्षेत्रों से हमारे विघटित चीन व पाक में बाँटे आधे-अधूरे कश्मीर व लद्दाख क्षेत्र की उत्तरी सीमाओं की रक्षा की जाती है। हमारे सीमाओं की रक्षा की जाती है। हमारे नागरिक व सैनिक इन चोटियों से लगे राष्ट्रीय राजमार्ग एक से श्रीनगर से लेह की यात्रा करते हैं, इसी से पर्यटक भी जाते है। व रसद तथा खाद्य आदि भी इसी मार्ग से जाती हैं इसी मार्ग राजमार्ग पर विगत कई वर्षों से पाकिस्तान हमले करता रहा हैं। ताकि इस क्षेत्र के नागरिक पलायन कर जाएँ। किन्तु हमारे सैनिकों ने बहादुरी के साथ लड़कर प्रायः उन सभी स्थानों को मुक्त कराने में सफलता पाई हैं, जो हमारी नियंत्रण सीमारेखा के भीतर दुश्मन के अवैध कब्जे में थे।
जब भारत-पाक दोनों विगत वर्ष ही परमाणु बमों का परीक्षण कर चुकें हों, तब आशंका होती है। कि कहीं यह स्थिति नियंत्रण से बाहर हो एक विनाशकारी व विध्वंसकारी महायुद्ध में संभवतः तीसरे विश्वयुद्ध स्वाभाविक है क्योंकि भविष्यवक्ताओं के पूर्व कथन भी कुछ ऐसे ही बात कहते आए है। साधनाकाल का एक बड़ा ही महत्वपूर्ण मोड़ है यह। ऐसे में दक्षिण एशिया का प्रस्तुत महायुद्ध अब मात्र छिटपुट छापामार लड़ाई तक ही सीमित नहीं रह गया हैं। इसका भावी स्वरूप एवं विश्व समुदाय पर इसके परिणाम निश्चित ही अति महत्वपूर्ण होंगे, यह भली−भाँति समझ लिया जाना चाहिए।
युद्धोन्माद का वातावरण जब भी बनता है, यह प्रगति की दिशा में अग्रसर विश्वभर के मानव समुदाय के लिए न केवल एक अवरोध का काम करता, एक अनिश्चितता, आशंका तनावभरी सामूहिक मन स्थिति को भी जन्म देता है। इसी सदी के आरम्भ से हम सब युद्ध झेलते रहे हैं- छोटे या बड़े। प्रथम विश्वयुद्ध (1914.18) से लेकर खाड़ी युद्ध (1990.91) तक ग्यारह युद्धों में करीब तीन लाख अरब रुपये स्वाहा हो चुके हैं। इसमें दो विश्वयुद्धों में खर्च राशि प्रायः दो लाख अरब रुपये है। इस बीच विश्वभर में हुए आंतरिक छिटपुट स्तर के झगड़ों आदि में करीब साज हजार अरब रुपयों को होली जल चुकी है। इस विशाल हानि को देखते हुए सोचना चाहिए कि क्या वास्तव में युद्ध जरूरी है?
युद्ध का मूल आधार घृणा है, गाँधी व गौतम बुद्ध के सिद्धांतों के विपरीत हिंसा हैं। बावजूद इस भयावह परिणति की जानकारी के मानव ने युद्ध का आज तक कोई भी विकल्प न विकसित किया है, न उसका कोई प्रयास ही किया न विकल्प की आवश्यकता को स्वीकार किया है। हम जिस समय में जी रहे है। उसमें युद्ध से बेखबर रह कंदराओं में बैठ जाना, तटस्थ रहने का प्रयास करना नितांत असंभव है। आज का यह युद्ध लड़ा तो कश्मीर की उत्तर की पहाड़ियों पर जा रहा है, पर प्रतिक्षण- प्रतिपल हम सब को प्रभावित कर रहा है। हर आने वाली खबर के साथ, जो टेलीविजन या रेडियो पर आती हैं, हर उस बुलावे के साथ जो सैनिकों को रणभूमि की तैयारी का आमंत्रण देती है, हर उस आहट के साथ जो अपने साथ खबर लिए आती है कि आज कितने रणबाँकुरे मोर्चे पर शहीद हो गए एवं हर उस वृत्तांत के साथ जो उन रणबाँकुरे परिवारों से जुड़ा अख़बार के पन्नों पर रंगा आता, हमारे हृदय को विदीर्ण करता चला जाता है। हम सभी प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में हमारा कर्तव्य क्या हों?
परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने वांग्मय क्र. 64 के पृष्ठ 5ण्65 पर लिखा है - क्या हमारे उचित होगा कि आक्रमणों को चुपचाप आँखें बन्द करके देखते रहें? अख़बार में खबरें मात्र पढ़ लेने से संतुष्ट हो जाएँ अथवा यह सोचे कि लड़ाई का काम फौजी सिपाहियों का है, वे जाने उनका काम जाने, हम क्या कर सकते हैं? ऐसा सोचता किसी भी प्रकार से उचित न होगा, क्योंकि अब युद्ध केवल सैनिकों के माध्यम से नहीं लड़े जाते। इस जमाने में गोला-बारूद से ही विजय प्राप्त नहीं होती वरन् युद्धरत देशों के हर नागरिक को लड़ाई में अपना योगदान देना होता है। इसी योगदान के ऊपर अंतिम हार-जीत निर्भर रहती है। देशभक्ति की भावनाओं से ओत−प्रोत नागरिक भी आज के जमाने में युद्ध मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों की तरह ही महत्वपूर्ण सिद्ध होते है।
इसी प्रकार पूज्यवर ने अपने अन्दर एक हिला देने वाली लेखनी से ‘ अखण्ड ज्योति’ (1962) के दिसम्बर अंक के पृष्ठ 51 पर लिखा था- “असत्य सदा हारता है। अन्याय की अंत में पराजय होती है। इतिहास साक्षी हैं कि अनेक नृशंस आततायी अपने-अपने समय में कुछ दिनों के लिए आतंक उत्पन्न कर सकें हैं, पर अंत में उनका पाप और अन्याय उन्हें ही खा गया है। दूसरे देशों पर आधिपत्य जमाने और शोषण करने की साम्राज्यवादी नीति में कोई सफल नहीं हो सकेगा। हिटलर, सिकंदर नेपोलियन कहाँ सफल हुए थे। राष्ट्र रक्षा के कार्यों में हममें से हर एक को एक मन होकर जुट जाना चाहिए। परस्पर विरोध उत्पन्न करने वाली चर्चाएँ इस समय बन्द रहनी चाहिए। इसी में देश व राष्ट्र का भविष्य उज्ज्वल है।
अपने समय में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में श्रीराम मत्त नाम से प्रख्यात परमपूज्य गुरुदेव का चीन युद्ध के समय राष्ट्र के नागरिकों के प्रति यह आह्वान बताता है कि धर्मतंत्र के पुरोधा होते हुए भी वे राष्ट्रधर्म के प्रति कितने सजग थे। उपर्युक्त दोनों उद्धरण ने केवल उन्हें एक युगद्रष्टा-राष्ट्र संत के रूप में स्थापित करते हैं इस समय युगधर्म क्या हैं इस संबन्ध में हमारा सही-सही मार्गदर्शक भी करते है।
आज जो भी प्रत्यक्ष जगत में घट रहा है। उसकी पृष्ठभूमि परोक्ष जगत में काफी पूर्व बन चुकी थी एवं सभी एक मत से यह अब स्वीकार कर रहे है। कि अदृश्य जगत की हलचलें ही स्थूल दृश्यमान जगत के सो क्रिया–कलापों का निर्धारण करती है प्रस्तुत समय विषम ही नहीं विषमतम हैं एवं संक्रमण काल की पराकाष्ठा का समय है। इस अवधि के कितनी ही उथल पुथल होने की संभावनाएँ है। समस्त विश्व को नया प्रकाश देने और सृजनात्मक प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने हेतु नियति द्वारा निर्धारित भारतवर्ष को इस संघर्ष से क्यों जूझना पड़ रहा है, यह जानना हो तो परोक्ष को व समय विषमता को समझना होगा। यही नहीं, इन दिनों सौर लपटों की बढ़ती प्रखरता एवं सौर−कलंकों की बाढ़ भी यही बताती है कि विश्व के लिए यह आगामी डेढ़ वर्ष की अवधि बड़ी निर्णायक सिद्ध होगी।
जो भी कुछ हो युद्ध की मानसिकता कोई बड़े सर्वनाश का रूप ले, इससे पूर्व एक सशक्त मुहिम चलाना पूरी दुनिया की जिम्मेदारी है। प्रश्न मात्र यह नहीं कि कारगिल की रक्षा होनी हैं, रक्षा पूरी की मनुष्य-जाति की होनी है। भारत की इस वर्तमान माहौल में विजय इस तथ्य पर निर्भर करती है कि वह युद्ध की पोषक मानसिकता और उस मानसिकता का फैलाव करने वाली प्रवृत्तियों के खिलाफ किस तरह अपनी रणनीति बनाता है।
युद्ध युद्ध है। यह एक मनुष्य के मन में दूसरे के प्रति, एक जाति के अंतस् में दूसरी जाति के प्रति, एक संप्रदाय के मन में दूसरे के प्रति तथा एक देश के मन में दूसरे देश के प्रति नफरत के रूप में बिना थमे सतत् जारी रहता है। यही युद्ध अंततः प्रत्यक्ष रूप में हथियारों के युद्ध के बदल जाता है। ये हथियार पुराने जमाने की, आमने सामने की लड़ाई की तरह नहीं आज कंप्यूटर चालित अत्याधुनिक यंत्रों द्वारा लड़े जाते है। जैविक वैचारिक एवं रासायनिक स्तर पर भी युद्ध अब होने लगे हैं। उद्देश्य यही होता है कि विजय किसी भी कीमत पर हो। पर्यावरण से लेकर लोकजीवन पर इसका क्या प्रभाव हो रहा है यह चिंता न हुक्मरानो को होती है, न तथाकथित महाशक्तियों को। परमाणु बम की नागासाकी-हिरोशिमा वाली विभीषिका के बावजूद आज हम उसी भवितव्यता के द्वार पर खड़े हैं कि कब कोई तानाशाह सिपहसालार, सेनापति अपने विवेक दे जिससे तबाही कुछ ही क्षणों में अंजाम लेती दीखने लगे। हमारे राष्ट्र ने परमाणु परीक्षण महाशक्तियों को चुनौती देने के किया था जो अपनी बपौती सारी विश्ववसुधा पर मानती थीं। किन्तु बदले में अपनी सारी जनता पर करोड़ों का कर्ज लादकर, उन्हें भूखा मरने छोड़कर हमारे दुश्मन राष्ट्र ने क्या सोचकर परीक्षण किया यह परिणाम निकालना कठिन नहीं होगा। भस्मासुर की तरह से सब कुछ मिटा देने को संकल्पित हमारा पड़ोसी राष्ट्र जिस तरह से वर्तमान छल युद्ध लड़ रहा है, इससे दिनोंदिन यह आशंका बढ़ती जा रही है कि बंदर के हाथ लगी तलवार कहीं चल न जाए।
इस युद्ध के दौरान कूटनीतिक दृष्टि से भारत ने एक विजय निश्चित हासिल की है कि उसने अपने पड़ोसी राष्ट्र को अलग-थलग कर एक प्रकार से उस पर मानसिक दबाव बना व बढ़ा दिया है किन्तु सारी महाशक्तियों की कथनी-में अन्तर इतना अधिक है कि यह उल्लास कब तक बना रहे, कुछ कहा नहीं जा सकता। इन्हीं दिनों जब सब राष्ट्रों के बयान पाकिस्तान को अपने कदम पीछे हटाने के लिए आ रहे थे, तभी उस महाशक्ति द्वारा आधुनिकतम पनडुब्बियाँ व विमानों का बेड़ा दिए जाने जा सकता है कि यह सौदा पूर्व से चला रहा था, उसकी परिणति अभी हुई है, पर क्या इसे दबाव डालने के लिए कुछ दिन आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था।
थोड़ा आँकड़ों की भाषा में देखें तो ज्ञात होता है कि (1) सारे विश्व का रक्षाव्यय तकरीबन प्रतिवर्ष चालीस हजार अरब रुपये है। इसमें से मष्य और दक्षिण एशिया का रक्षा व्यय आठ सौ तीस अरब रुपये प्रतिवर्ष है, जो कि लगभग 2 प्रतिशत के बराबर होता है। (2) जहाँ अमेरिका प्रति व्यक्ति 1018 मिलियन डॉलर खर्च करता है। वहाँ चीन लगभग तीस मिलियन डॉलर इजराइल 1917 फ्राँस 708 ब्रिटेन 611, सं अरब अमीरात 978 सउदी अरब 1071 रूस 434 पाकिस्तान 26 एवं भारत 13 मिलियन डॉलर प्रति व्यक्ति खर्च करते है। इससे पता लगता है कि हर देश की प्राथमिकताएँ क्या हैं। (3) दोनों विश्वयुद्धों के बाद सशस्त्र संघर्षों में 1945 से 1994 के बीच प्रायः दो करोड़ लोग मारे जा चुके है। यह संख्या प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध में मारी गई विराट जनहानि एवं विगत चार वर्षों में सर्बिया हर्जगोविना-कोसोवों गृहयुद्ध में मारे-विस्थापित व्यक्तियों के अतिरिक्त है। (4) महाशक्तियों की अर्थ व्यवस्था हथियारों की बिक्री पर प्रायः अस्सी प्रतिशत टिकी हुई है। इतनी भयावह जानकारी के बाद क्या यह माना जाए कि अब तीसरे विश्वयुद्ध की भूमिका बन रही है लगता यह है कि नियति यह चाहती है समस्त मानव समुदाय सबक ले एवं इस डेढ़ वर्ष की उथल-पुथल के बाद नई सदी में नई विश्वसभ्यता का नए सिरे से निर्माण करे। इसीलिए यह महाविनाशक युद्ध होने की संभावना नहीं के बराबर है। कश्मीर जो भारत का अविभाज्य अंग रहा है एवं जिनका एक भाग पाकिस्तान ने तो दूसरा अक्साई क्षेत्र चीन ने हड़प रखा है, किसी भी स्थिति में आजाद होकर अखण्ड भारत का एक अंग बनेगा एवं पड़ोसी राष्ट्र तीन टुकड़ों में विभाजित हो, बृहत्तर भारत का एक अंग बनेगा। यह भवितव्यता काफी पूर्व से लिखी जाती रही हैं, अब इसके साकार होने का समय आ गया है। कैसे यह होगा, यह सारा विश्व देखेगा पर भारत के मुकुटमणि से खिलवाड़ का यह दंड तो नियति के अनुसार पड़ोसी राष्ट्र को भुगतना ही होगा, क्योंकि यही महाकाल की भी इच्छा है।
युद्ध-युद्ध नहीं मिटते किंतु निश्चित ही धर्म के नाम पर जेहाद के नाम पर फैलाए उन्माद को मिटाया ही जाना चाहिए और इसके लिए युद्ध करना पड़े तो भारत को करना चाहिए। यह एक बड़ी प्रसन्नता की बात है कि ऐसे आड़े समय में सारे राष्ट्र ने एकजुटता दिखाई है। सभी संप्रदायों ने एक होकर-एक आवाज लगाई है कि हम किसी भी स्थिति में अपनी सीमा से खिलवाड़ नहीं होने देंगे। अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में अद्भुत शौर्य और पराक्रम का परिचय देते हुए भारतीय सेना के जवानों भारतीय सेना के जवानों ने लड़ाई लड़ी व आत्माहुति दी है, उससे सारा राष्ट्र अभूत है- नतमस्तक है। आज जहाँ देखें रेलों में जम्मू जा रहे सैनिकों का स्वागत हो रहा है, रक्तदान शिविरों की लहर-सी उमड़ पड़ी है ओर राष्ट्र के रिक्त होते कोष के लिए धन-संग्रह हो रहा है। कोई भूखा रहकर, व्रत रखकर राशि बचा रहा है तो कोई एक दिन के वेतन की राशि राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में दे रहा है।
युद्ध के दौरान घायल-विकलांग जनों के लिए न केवल सहानुभूति की लहर उमड़ी है- सरकारी, गैरसरकारी दोनों स्तर पर उनके लिए सहायता बढ़-चढ़कर आई है।
ये सभी शुभ लक्षण हैं। अब होना यह चाहिए कि युद्धकाल में जो उत्साह उमड़ा है, वह बबूले की तरह ठंडा न पड़े जाए। हम राष्ट्र एकता-अखण्डता के लिए सतत् प्रयासरत रहने के लिए संकल्पित हों कम से कम इस युगसंधि की वेला में एक संकल्प ले लें कि जब तक सारे विश्व शांति नहीं हो जाती, हम फिजूल-खर्ची विवाहों में दिखावा, अपव्यय दहेज रूपी दानव से दूर रहेंगे एवं सादगी भरे विवाहों का का प्रचलन कर बचत की राशि राष्ट्र - निर्माण में लगाएँगे। प्रतिदिन सौ से दो सौ करोड़ रुपये जिस राष्ट्र में अभी व्यय हो रहा है इन छोटे-छोटे संकल्पों से काफी कुछ मदद राष्ट्र के निर्माण व आर्थिक उन्नयन की दिशा में हो सकती है। हम जितना संवेदनशील सैनिकों व अन्य आश्रितों के प्रति हैं क्या युद्ध के समापन के बाद वैसे ही बने रह सकते हैं? यदि ऐसा हो सके तो वीर सैनिक सम्मानपूर्वक व आशाभरी अपेक्षाओं के साथ मोर्चा लेने जाते रह सकेंगे। यह इस लिए कहा जा रहा है कि जिन दिनों यह उत्साह का माहौल बना है, तभी अखबारों में देखने को मिलता है कि 1164 के कतिपय शहीद सैनिकों के आश्रित परिवारजन बड़ी विपरीत परिस्थितियों में अपना निर्वाह कर रहे हैं। क्योंकि आश्वासन पूरे नहीं हुए। हमें किसी भी सैनिक व शहीद के परिवार को उपेक्षित नहीं करना है, यह संकल्प सभी को प्रस्तुत श्रावणी पर लेना चाहिए। आध्यात्मिक मोर्चे पर हम सभी गायत्री मंत्र की एक माला विशिष्ट आहुतियों के साथ तथा साप्ताहिक दीपयज्ञ व अग्निहोत्र में विशिष्ट आहुतियों को (इसी अंकम उद्धत) देने का क्रम जारी रखें।
धन जन की तन-मन की सहायताएँ चारों ओर से जुटाए जाने पर राष्ट्र की पराक्रमी शक्ति प्रखरता को प्राप्त होती है और उसी के बल पर विजय की संभावना सुनिश्चित बनती है। देशभक्ति की परीक्षा के ये समय कभी-कभी आते हैं। जो इस समय में स्वार्थ और व्यामोह में पड़े रह जाएँगे वे अवसर चूक जाएँगे, राष्ट्रद्रोही कहलायेंगे और पीछे पश्चात्ताप ही हाथ लगेगा।
प्रस्तुत परिस्थितियों के लिए विशिष्ट आहुतियाँ
॥ सैन्य विजय- प्राप्त्यर्थं आहुतिः॥
कारगिल सीमा पर डटे अपने सैनिकों का मनोबल निरंतर ऊँचा रह, वे अपने प्रयास में सफल हों, शत्रुओं को शीघ्र परस्त करके उन्हें खदेड़ सके। इस निमित्त यह आहुति देवराज इन्द्र को समर्पित की जा रही है।
ॐ इन्द्रः सेनां मोहयतु,मरुतो घ्नन्तु ओजसा। च्क्षूंषि अग्निरादत्तं, पुनरेतु पराजिता, स्वाहा॥
इदं इन्द्राय इदं न मम।
॥हुतात्मलः शान्त्यर्थ आहुतिः॥
भारतीय सीमाओं के सजग प्रहरी, अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए, अपने प्राणों की आहुति देने वाले रणबाँकुरों की आत्मा की शाँति तथा उनके घर - परिवार के आत्मीयजनों को इस वज्राघात से राहत एवं सर्वत्र शान्ति विराजमान् हो- इस निमित्त यह आहुति समर्पित है॥
ॐ शन्नो मिश्रः शं वरुणः शन्नो भवर्त्वयमा। शन्त इन्द्रो बृहस्पतिः शन्नो विष्णुरुरुक्रमः स्वाहा॥
इदं हुतात्मनः शान्त्यर्थ इदं न मम॥
राष्ट्र की आज परिस्थितियों में हमारा युगधर्म क्या हो, इस संबंध में समय-समय पर परमपूज्य गुरुदेव द्वारा व्यक्त किए गए विचार पढ़ें संदर्भों के साथ।
राष्ट्रधर्म
कर्तव्य धर्मों में तीन प्रमुख माने गये है- वैयक्तिक धर्म समाज धर्म और राष्ट्रधर्म। वैयक्तिक धर्म व्यक्ति की सुख-सुविधा और विकास हेतु होता है। समाज धर्म में व्यक्ति और समाज की गति- प्रगति की बात सोची जाती है, जबकि राष्ट्रधर्म में व्यक्ति समाज और राष्ट्र तीनों की उन्नति निहित होती है। अतः सिर्फ। एक राष्ट्रधर्म के पालन से शेष दोनों धर्मों का निर्वाह स्वतः होता रहता है। इसलिए तीनों धर्मों में राष्ट्रधर्म-को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। अस्तु तन, मन, धन, श्रम, साधन, व्यवसाय, विचार, कला, विज्ञान और धर्म- अध्यात्म के प्रसार द्वारा राष्ट्रधर्म है। इसे आज का सबसे बड़ा धर्म कहा गया है। प्रस्तुत समय में इसका परिपालन और भी आवश्यक है।
जननी भूमि
मातृभूमि को जननी के समतुल्य माना गया है। जिस देश के हम नागरिक हैं, जिस धरती ने हमें जन्म दिया, साधन-सुविधाएँ दीं और मनुष्य कहलाते-योग्य बनाया, वह भूमि निश्चित ही माँ कहलाने योग्य है। तभी तो अपने देश को हम भारतमाता कहकर पुकारते है। माँ की मदद यदि शिशु को आरम्भ में न मिले तो क्या जीवित रह पायेगा? कदाचित रह भी जाए, तो रामू भेड़िये जैसा ही होगा। तात्पर्य यह कि नवजात शिशु से लेकर बड़ा वयस्क बनने तक में माता-पिता की जो भूमिका होती है, उससे इनकार नहीं किया जा सकता। इसमें भी प्रथम अनुदान शिशु को माँ से प्राप्त होता है, अतएव वह और भी श्रेष्ठ कहलाती है। यही बात मातृभूमि के संबंध में भी कही जा सकती है। मनुष्य जिस देश का नागरिक होता हैं, वही उसे प्रथम शिक्षा मिलती हैं। उसके निमार्ण में प्रगति, समृद्धि में उस राष्ट्र की ही साधन-संपदा काम आती है और उसी से वह एक सुयोग्य नागरिक बन पाता है इस दृष्टि से देखा जाए, तो जननी और जन्मभूमि की भूमिकाएँ समान होती हैं।
प्रत्येक सपूत को चुनौती
आज समय ने पुनः वही परिस्थितियाँ हमारे सामने पैदा कर दी है। वीरता और कायरता की प्रत्यक्ष चुनौती अनायास ही सामने आ खड़ी हुई है और हमें विवश कर दिया है कि किसी एक को चुन ले। पड़ोसी देश पाकिस्तान ने जो परोक्ष आक्रमण करके उसी मनोवृत्ति दुहराया है, जिससे प्रेरित होकर पिछड़ी शताब्दियों में आक्रमणकारी भारत हमले करते रहे है।
भारत माता पर होने वाले प्रत्यक्ष और परोक्ष आक्रमण उसके प्रत्येक सपूत के लिए एक चुनौती है माता के लिए पददलित एवं अपमानित होते देखकर भी जिसका खून न खौलता हो, जिसके मन में क्षोभ और प्रतिकार की भावनाएँ न उठती हों उसे मनुष्य शरीर में विचरण करने वाला नरपशु ही कहना चाहिए।
राष्ट्रीय ऋण से उऋण हों
मनुष्य जिस राष्ट्र भूमि की गोद में पलता, बढ़ता, विकास करता है, जिसकी संस्कृति से जीवन को सभ्य, सुसंस्कृत बनाता है, जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत जिसके अनेकानेक उपकारों अनुदानों से अनुगृहीत होता है व प्रगति करता है, उसे राष्ट्र के प्रति हमारा भी कर्तव्य होता है कि हम उसके उत्थान- विकास की बात सोचें और ऐसी रीति अपनाएँ, जिसमें उसका हितसाधन समाहित हो, तभी हम बच्चे अर्थों में उस राष्ट्र ऋण में उऋण हो सकते हैं, जो जीवन भर हम पर लदते रहते है। ऋण चाहे किसी भी प्रकार का हो, उसे चुकाने में ही कृतज्ञता मानी जाती है।
राष्ट्र की समृद्धि का आधार
राष्ट्र को समृद्ध और शक्तिशाली बनाने के लिए आदर्शवाद, नैतिकता, मानवता, परमार्थ, देशभक्ति एवं समाजनिष्ठा की भावनाओं की जाग्रति नितांत आवश्यक है। इसके अभाव में अन्य साधन- सामग्री चाहे कितने ही विपुल परिमाण में उपलब्ध क्यों न हों, हमारी आंतरिक दुर्बलता को दूर न कर सकेंगी। आदर्शहीन कपटी, भ्रष्ट दुराचारी, कायर और नस्वामी लोगों के हाथ में साधन, सामग्री लग जाए, तो इसके आधार पर उनकी बुराई ही अधिक बढ़ती है और उससे अहित ही अधिक होता है। इसलिए सुरक्षा और प्रगति के साधन जुटाते हुए इस बात का भी ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि मानव अंतः करण में सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों की भी अभिवृद्धि निरंतर होती रहे। देशभक्ति और बलिदान की भावनाओं से ओत−प्रोत नागरिक ही राष्ट्र ही रीढ़ है।
नियति तो परिवर्तन पर उतारू है, हम निमित्त मात्र बन जाएँ
एक सनसनीखेज खबर के रूप में आज चारों ओर नोस्ट्राडेमस की भविष्यवाणी की चर्चा है कि 1999 में निश्चित की तीसरा महायुद्ध विश्व स्तर पर होने की संभावना है, जिसमें दुनिया की प्रायः एक तिहाई से अधिक आबादी नष्ट हो जायेगी। फ्रेंच में काव्य के रूप में लिखी इन पंक्तियों का जितने व्यक्तियों ने जिस प्रकार अपनी-अपनी तरह से भाष्य कर पूर्वानुमान व्यक्त किया है, वह स्वयं में एक प्रमाण हैं। कई प्रकार की प्रतिक्रियाएँ भी इस संदर्भ में है। अनेक ज्योतिर्विदों का मत है कि 28 मई 200 में 9 जून 2000 तक का समय अवश्य ऐसा है, जब प्राकृतिक प्रकोपों से लेकर मौसम में बड़े व्यापक स्तर पर परिवर्तन की प्रतिक्रियाएँ देखी जाएँगी। इसे प्रलय तो नहीं कहा तो सकता, परन्तु कहना है कि यदि नोस्ट्राडेमस की भविष्यवाणी के परिप्रेक्ष्य में चिंतन किया जाए तो यह समय 1999 के प्रथम तिमाही वाले भाग से ही प्रारम्भ हो चुका हैं एवं संभवतः जुलाई 2000 तक रहेगा, जिसमें पूरे विश्व में कही भी, कभी भी कोई शांति से नहीं बैठ सकेगा।
फिर भी संकेत सभी ओर से यही मिल रहे हैं कि प्रस्तुत एक वर्ष की अवधि न केवल दक्षिण एशिया वरन् सारी विश्व वसुधा के लिए कष्टों से भरी है। हमारी सीमाएँ तात्कालिक रूप में भले ही सेनाओं द्वारा सुरक्षित कर ली जाएँ, परन्तु आक्रान्ता शांत बैठने वाले नहीं है। हिमालय के किस छोर से युग- परिवर्तन के केन्द्रबिन्दु भारत वर्ष पर कब हमला हो जाए, कुछ नहीं कहा कहा जा सकता। हमें पूर्वी व पश्चिमी तथा उत्तरी हर दिशा में स्थित अपने पड़ोसी राष्ट्रों से सावधान ही रहना होगा ताकि इस देश की एकता-अखण्डता को काई खतरा न पहुँचने पाये। ग्रह गणित के अनुसार भी आगामी दो वर्षों तक दो महाशक्तियों की वक्र दृष्टि हमारी सीमाओं पर है एवं ऐसे में हमें मात्र वर्तमान कतिपय सफलताओं से प्रफुल्लित न हो शाँति-अहिंसा की आड़ में संभावित हर षड्यंत्र से जूझने हेतु तैयार रहना चाहिए।
इस वर्ष प्राकृतिक आपदाएँ बड़े विकराल रूप में आएँगी- मात्र भारत ही नहीं, सारी विश्ववसुधा पर। रूस में पड़ रही भयंकर गर्मी, यूरोप में हो रही वर्षा, ल नीना ‘व’ अलनीनों के प्रभाव के विश्वव्यापी परिवर्तन क्या-क्या घटाटोप बरसा सकते हैं, इनकी कल्पना कर- करके खंडप्रलय का आभास होता है। पिछले दिनों वैज्ञानिकों ने संयुक्त राज्य अमेरिका के आकार की उक विशाल छतरी आयनोस्फियर की परत से नीचे हिंद महासागर के ऊपर अंटार्कटिक ध्रुव के समीप देखी है। यह बताया जा रहा है कि विषाक्त धुएँ से भरे ये बादल महानगरों से उत्सर्जित गैसों के कारण बने हैं एवं इनमें से- तिहाई विकसित कहे जाने वाले देशों से आया हैं। वैसे दोष दक्षिणी एशियाई देशों को दिया जा रहा हैं। किन्तु परिणाम अम्ल वर्षा व मौसम के असंतुलन से लेकर भिन्न भिन्न रूपों में सारे विश्व को झेलने पड़ सकता हैं एक अनुमान के अनुसार अमेरिका, यूरोप एवं सर्वाधिक प्रभाव देखा जाएगा, जिसमें समुद्री तूफान, अत्याधिक वर्षा भूस्खलन का नाम लिया जा रहा है।
युगसंधि की इन घड़ियों में विश्वव्यापी तनाव अभी आगामी दो वर्षों तक बने रहने की संभावनाओं के बारे में सभी ज्योतिर्विद् सहमत है। सभी किसी आणविक युद्ध की संभावना को नकारते है और बताते है कि यह पाकिस्तान के विखंडीकरण का समय है। एक भविष्यवक्ता के अनुसार सभी जिन उच्छृंखल हाथों से छापामार यु0 भाड़े के सैनिकों को झोंककर पाकिस्तान लड़ रहा है।, वे ही उसके विनाश के कारण बनेंगे। सिंध व पंजाब का एक बहुत बड़ा हिस्सा भारत में मिल जाएगा एवं एक छोटा टुकड़ा ईरान से तथा एक हिस्सा चीन से लगकर आज के पाकिस्तान के अस्तित्व को समाप्त कर देगा। यह सारा अंजाम 2004 तक हो जाएगा एवं इसके बाद वह स्वर्णिम युग आरंभ होगा, जो आगामी 90 वर्षों तक चलेगा, जिसमें भारत सारे विश्व का मार्गदर्शक होगा।
भविष्यवक्ता विजाँन दारुवाला बजाक है कि आगामी छह माह भूकंपों की विश्वव्यापी श्रृंखला, हवाई दुर्घटनाओं व मिसाइलों के हमलों से तबाही से भरे है। चीन अमेरिका व रूस के नेतृत्व में आमूलचूल परिवर्तन एवं भारतीय संस्कृत के आदर्श नेतृत्व की और सुझाव एक अजीबोगरीब प्रक्रिया के रूप में सारा विश्व देखेगा। पृथ्वी से परे विकसित अन्य सभ्यताएँ भी आगामी 2-3 वर्षों में हमसे सम्पर्क साधेगी एवं यह संबंध दिनोंदिन प्रगाढ़ होते जाएँगे। निश्चित ही उज्ज्वल भविष्य से भरी इक्कीसवीं सदी की पूर्व वेला में यह सब जो कुछ होने जा रहा है इसके द्रष्टा बनने का हम सभी को सौभाग्य मिलने जा रहा है।
आज से कुछ भी युद्धलिप्सा के घातक रूप के माध्यम से दिखाई दे रहा है वह भविष्य के समाज की रचना हेतु आधारभूमि गुरुदेव ने कहा था कि इसी संधिवेला में वह चिंतन उभरकर आएगा जो समूह चिंतन का रूप लेगा एवं विश्व सरकार, एक ही विश्व- व्यवस्था, एक ही आचार- संहिता, विभिन्नताओं के बावजूद एक ही संस्कृति के विकास के रूप में दिखाई देगा। कितने महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े है हम। सहज ही हमें अपने सौभाग्य का अहसास नहीं होता, किन्तु यह समय निश्चित ही विश्व इतिहास में एक युगांतरकारी अवधि वाला सिद्ध होगा, इतिहास अगले दिनों यह बताएगा।
एक विलक्षण संयोग यह भी है कि सूर्य पर उभरने वाले स्फोटों की श्रृंखला विगत तीन वर्षों से बढ़ोत्तरी पर है। सभी जानते है कि पृथ्वी की जलवायु का नियंत्रण सूर्य द्वारा होता है। इसलिए इन सौर−कलंकों का पृथ्वी के जीवन पर गम्भीर प्रभाव पड़ता है। सूर्य पर जब ये धब्बे अधिक संख्या में पड़ने लगते है, तो चुम्बकीय तूफान, रेडियो तरंगों के प्रसारता में अवरोध के अवसर बढ़ जाते है। सूर्यकलंकों के समय अग्निज्वालाएँ लाखों मील तक लपलपाती है। हर दृष्टि से इनका उभरना अशुभ माना जाता है। इन दिनों प्राकृतिक विपदाएँ तो कहर ढाती ही है, मानवी प्रकृति असाधारण रूप से प्रभावित होती है। ऐसे अवसरों पर समुद्री जलयानों, वायुयानों के बीच दुर्घटनाएँ छह गुनी बढ़ जाती है। दुर्भिक्ष सूखा, युद्धोन्माद में बढ़ोत्तरी तरह-तरह के रोग, बाढ़ तूफान भूकंप आदि दैवी आपदाओं से जन-धन की क्षति भी काफी होती है। अब जब संधिकाल की अंतिम वेला आ पहुँची तो इन सौर−कलंकों की संख्या सतत् बढ़ती ही जा रही है। अमेरिका वैज्ञानिकों ने सौरलपटों का फिल्माँकन कर यह निष्कर्ष निकाला है कि सूर्य इस समय बड़ा कुपित है एवं इसके प्रभाव समष्टिगत हो सकते है।
इन दिनों लगता तो यह है कि अदृश्य द्वारा मनमानी चल रही हैं किन्तु, आएगा जो समूह चिंतन का रूप लेगा एवं विश्व सरकार एक ही विश्व व्यवस्था, एक ही आचार- संहिता, विभिन्नताओं के बावजूद एक की संस्कृति के विकास के रूप में दिखाई देगा। कितने महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े है हम। सहज ही हमें अपने सौभाग्य का अहसास नहीं होता, किन्तु यह समय निश्चित ही विश्व इतिहास में एक युगांतरकारी अवधि वाला सिद्ध होगा, इतिहास अगले दिनों यह बताएगा।
एक विलक्षण संयोग यह भी है कि सूर्य पर उभरने वाले स्फोटों की श्रृंखला विगत तीन वर्षों से बढ़ोत्तरी पर है। सभी जानते है कि पृथ्वी की जलवायु का नियंत्रण सूर्य द्वारा होता है। इस लिए इन सौर−कलंकों का पृथ्वी के जीवन पर गम्भीर प्रभाव पड़ता है। सूर्य पर जब से धब्बे अधिक संख्या में पड़ने लगते हैं, तो चुम्बकीय तूफान, रेडियो तरंगों के प्रसारण में अवरोध, ध्रुवीय प्रकाशों की प्रखरता में बढ़ोत्तरी के अवसर बढ़ जाते है। सूर्यकलंकों के समय अग्निज्वालाएँ लाखों मील तक लपलपाती है। हर दृष्टि से इनका उभरना आरम्भ अशुभ माना जामा है। इन दिनों प्राकृतिक विपदाएँ तो कहर ढाती है, मानवी प्रकृति असाधारण रूप से प्रभावित होती है ऐसे अवसरों पर समुद्री जलयानों, वायुयानों के बीच दुर्घटनाएँ छह गुनी बढ़ जाती है, ऐसा वैज्ञानिकों का अध्ययन है। दुर्भिक्ष सूखा युद्धोन्माद में बढ़ोत्तरी, तरह-तरह के रोग बाढ़, तूफान भूकंप आदि दैवी आपदाओं से जन धन की क्षति भी काफी होती है। अब जब संधिकाल की अंतिम वेला पहुँची, तो इन सौर−कलंकों की संख्या सतत् बढ़ती ही जा रही है। अमेरिका वैज्ञानिक ने सौरलपटों का फिल्माँकन कर यह निष्कर्ष निकाला है कि सूर्य इस समय बड़ा कुपित है। एवं इसके प्रभाव समष्टिगत है। हो सकते है।
इन दिनों लगता तो यह है कि अदृश्य द्वारा मनमानी चल रही है, किन्तु वस्तुतः यह क्रिया को प्रतिक्रिया ही हैं, जो संभावनाओं के रूप में दिखाई दे रही है। दूसरी ओर प्राणवान आत्माएँ अपनी आत्मशक्ति से प्रकृति व नियति दोनों को प्रभावित परिवर्तित करने की क्षमता रखती है। यही गायत्री परिवार के उज्ज्वल भविष्य के चिंतन का मूल आधार है। सन् 1988 में जब बारह वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण आरम्भ हुआ था तब किस ने कल्पना की थी कि क्रमशः चौबीस करोड़ प्रतिवर्ष से बढ़कर चौबीस सौ ही नहीं चौबीस हजार करोड़ प्रतिवर्ष से बढ़कर चौबीस सौ नहीं, चौबीस हजार करोड़ गायत्री जाप प्रतिवर्ष होने लगेगा। किन्तु क्रमशः इस महापुरश्चरण में भाग लेने वालों की संख्या बढ़ती चली गयी है। एवं अब इस अवधि का अंत आते-आते बढ़ते हुए इस चरम शिखर पर पहुँच गई है कि अब हम आगामी वर्ष एक करोड़ प्राणवान परिजनों के माध्यम में विराट महापूर्णाहुति आयोजित करने जा रहे हैं। महापूर्णाहुति के लिए इससे श्रेष्ठ समय और क्या हो सकता है।
युगनिर्माण योजना को-गायत्री परिवार की युगांतर चेतना को परमपूज्य गुरुदेव ने समय की पुकार, जनमानस की गुहार दैवी इच्छा की प्रत्यक्ष प्रक्रिया का पर्याय बताया। उनका मत था कि संगठन का जन्म ही संधिकाल से विश्वमानवता को उबारकर सारी विश्ववसुधा का मार्गदर्शन करने के लिए हुआ है। उनके इस कथन पर पूरी श्रद्धा, अटूट निष्ठा बनाए रख हम सबके लिए यही उचित होगा कि भौतिक और आत्मिक स्तर पर ऐसा प्रबल पुरुषार्थ सँजोए जिनसे रुष्ट नियति को मना लेने और क्रुद्ध प्रकृति को शाँत करने का अवसर मिल सके। रोग अपनी जगह है-उपचार अपनी जगह। विपत्ति अपना काम करती है और रोकथाम के लिए बरते गए पुरुषार्थ का अपना महत्व है। विषम बेला में यही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है। कि आतंकित होने की मनः स्थिति उत्पन्न न होने दी जाए, साथ ही प्रचंड पुरुषार्थ को सँजोकर असंभव को संभव बनाया जाए। ध्वंस को सृजन से ही निरस्त किया जा सकता है। भौतिक स्तर पर हम जो पुरुषार्थ इन दिनों कर सकते है, वह है राष्ट्र की शक्ति का अपव्यय रोकने हेतु सामूहिक स्तर पर बल देना। सभी व्यक्ति न केवल निर्धारित समय की अपनी ड्यूटी देने का काम पूरा करें-राष्ट्र का उत्पादन बढ़ाने में जो भी कदम सहायक हो, वह उठाएँ। कोई भी कार्यालय क समय का उपयोग निजी प्रयोजनों के लिए न करें- अपनी ओर से कोई आलस्य व प्रमाद को भीतर प्रविष्ट न होने दें। कामचोरी को भीतर प्रविष्ट न होने दे। कामचोरी और हरामखोरी रोकना इस समय का युगधर्म हे। सामूहिक स्तर पर जहाँ अपव्यय हो उसे रोकना, भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध मुहिम छेड़ना मुनाफाखोरी व कालाबाजारी के विरुद्ध सत्याग्रह स्तर पर मोर्चा चलाना एक प्रकार से राष्ट्र-सेवा है। किसी को भी साम्प्रदायिकता के विष को फैलाने का अवसर न मिले, यह हम सभी को भली−भाँति ध्यान रखना है। किसी को भी साम्प्रदायिकता के विष को फैलाने का अवसर न मिले, यह हम सभी को भली−भाँति ध्यान रखना है। जितने भी सरकार के रचनात्मक कार्य है, उनमें हमें सहयोग देना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा कोष के लिए अधिकाधिक अंशदान देने का क्रम भी स्थान स्थान पर चले। सामूहिक स्तर पर रक्तदान के कैंप लगें, अभी आवश्यकता न हो तो भी अपना ग्रुप पता लगाकर पंजीयन करा लें ताकि अवसर आने पर उसका नियोजन हो सके। प्राकृतिक विपदाओं में जहाँ तक हो सके, राहत पहुँचाने का प्रयास होना चाहिए। सप्ताह में एक दिन हम राष्ट्र रक्षा के लिए उपवास रख-बचत का नियोजन पोस्ट ऑफिस की सेविंग्स व बैंक की सेविंग में कर सकते है, जिनके ब्याज से राष्ट्र को मदद मिलेगी। खर्चीली शादियों का न केवल विरोध उनका बहिष्कार भी किया जाना चाहिए। ऐसे विषम समय में जेवरों का त्याग कर अधिकाधिक सादगी का परिचय चाहिए। अन्न व शाक का उत्पादन बढ़ाना बंदूकें बनाने के समान है। देश को स्वदेशी आधारित बनाते हुए स्वावलंबी बनाना इस समय का एक परम पुनीत पुण्य है।
आत्मिक स्तर पर सृजन सैनिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे जागृतात्माओं के लिए निर्धारित विशिष्ट उपासना अभियान साधना, प्रखर साधना वर्ष की अपनी साधना के अतिरिक्त एक अतिरिक्त गायत्री मंत्र की माला इस धर्मयुद्ध रखा-अनुष्ठान विभीषिका निवारण के लिए करेंगे। विश्व शाँति की सामूहिक साधना तभी बन सकेगी, जब अधिकाधिक व्यक्ति एक ही समय, एक ही भावना से एकनिष्ठ होकर समष्टिगत शक्ति के उपार्जन की दृष्टि से उसे संपन्न करेंगे। एक अतिरिक्त माला जा कर रहे है। क्लीं बीजमंत्र के संपुट सहित जपें। ॐ भूर्भुवः स्वः क्लीं क्लीं क्लीं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् क्लीं क्लीं ॐ। इस मंत्र का जप करें। जप के साथ राष्ट्रीय समस्या समष्टिगत विपत्तियों के समाधान हेतु आध्यात्मिक ऊर्जा के जागरण और चहुँ ओर विस्तार का भाव बनाए। इस संबंध में प्रयोग के विशिष्ट पक्ष हेतु प्रज्ञा अभियान पाक्षिक का 14 जून 99 तथा 1 जुलाई 99 का अंक अवश्य देख लें। सांप्रदायिक सद्भाव के विस्तार हेतु एवं उज्ज्वल भविष्य के अवतरण की प्रार्थना में भी अधिकाधिक लोगों को साथ जुटाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
इसी के साथ-साथ कई परिजन जो नियमित अग्निहोत्र करते है अथवा साप्ताहिक दीपयज्ञ आयोजन संपन्न करते है। दो विशिष्ट आहुतियाँ अभी सामयिक परिस्थितियों के निवारण के निमित्त कम से कम सन् 2000 के अंत तक देते रहें। युद्ध प्रत्यक्षतः थम जाने पर भी अपना यह आध्यात्मिक पुरुषार्थ चलता रहे। ये आहुतियाँ हैं-
सैन्य निजय-प्राप्त्यर्थं आहुतिः॥
इन्द्रः सेनां मोहयतु, मरुतों घ्नन्तु ओजसा। चक्षूंषि अग्निरादत्तं, पुनरेतु पराजिता, स्वाहा॥ इदं इंद्राय इदं न मम।
हुतात्मनः शान्त्यर्थं आहुतिः॥
शन्नों मित्रः शं वरुणः शन्नों भवर्त्वयमा। शन्नडडन्दों बृहस्पतिः शन्नों विणुरुरुक्रमः स्वाहा॥ इदं हुतात्मनः शान्त्यर्थ इदं न मम
इन सभी के साथ भाव यही रहे कि हम सैन्य शक्ति के संवर्द्धन तथा हुतात्मा शहीदों की आत्मा की शाँति सद्गति हेतु प्रार्थना कर रहे हैं। यह नियमित यज्ञ के अतिरिक्त हो।
अपना ज्ञानयज्ञ का क्रम विद्या−विस्तार का क्रम इन सबके साथ नियमित चले, क्योंकि वही तो मिशन की धुरी है। परमपूज्य गुरुदेव की प्रेरणानुसार निर्धारित उपर्युक्त पुरुषार्थ में स्वयं संलग्न हो, यदि समस्त जाग्रत परिजनों का समुदाय मिल−जुलकर अवांछनीयताओं के विरुद्ध निर्णायक युद्ध छेड़ेगा और विश्वकर्मा की तरह नई दुनिया बनाकर खड़ी करेगा, तो गुरुवर के शब्दों में अंधे भी देखकर कह सकेंगे कि कोई चमत्कार हुआ।
राष्ट्रीय सुरक्षा कोष हेतु पहली किश्त प्रधानमंत्री को समर्पित
राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में गायत्री परिवार की ओर से रु 21लाख की पहली किश्त लेकर आदरणीय शैलबाला पंड्या तथा डॉ. प्रणव पंड्या 24 जून 1999 की संध्या को प्रधानमंत्री आवास पर दिल्ली पहुँचे। दिल्ली गायत्री परिवार के प्रतिनिधि श्री दिनेश कश्यप कैप्टन प्रशांत पटनायक, श्री सूरज प्रसाद शुक्ला सहित अन्य प्रमुख कार्यकर्ता भी उनके साथ थे।
माननीय प्रधानमंत्री जी ने गायत्री परिवार की इस सद्भावनापूर्ण भेंट पर आभार व्यक्त करते हुए कहा कि “राष्ट्र के नवनिर्माण एवं एकता, अखंडता के लिए जब धर्मतंत्र का प्रगतिशील प्रस्तुतीकरण करने वाली गायत्री परिवार जैसी संस्थाएँ तत्पर दिखायी देती है, तो विश्वास और भी दृढ़ होता है कि कोई भी बाहरी ताकत इस देश की साँस्कृतिक गरिमा एवं विविधता में एकता वाले स्वरूप को चोट नहीं पहुँचा सकतीं। गायत्री परिवार द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किए जा रहे रचनात्मक कार्यों से राष्ट्र सशक्त एवं मजबूत होगा।” उन्होंने वंदनीया माताजी के साथ बिताए गए क्षणों तथा उनके प्राप्त ममत्व का स्मरण करते हुए कहा- राष्ट्रसंत व स्वतंत्रता सेनानी पूज्य आचार्य जी ने गायत्री परिवार के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण का जो महान कार्य किया है, उसकी जितनी सराहना की जाए कम है।”
अपने करोड़ों की जनशक्ति वाले विराट गायत्री परिवार की ओर से प्रतिनिधियों द्वारा प्रधानमंत्री जी को आश्वासन दिया गया कि राष्ट्र को जब भी जिस भी प्रकार की आवश्यकता होगी, यह परिवार मदद सभी परिजन कारगिल मोर्चे पर लड़ रहे सैनिकों के लिए अनिवार्य सामग्री एवं राशि का संचय कर श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट के माध्यम से आपको उसके सुनियोजन हेतु अर्पित करते रहेंगे। अभी तुरंत का लक्ष्य सवा करोड़ रुपये अगली किश्त में जमा करने का संकल्प लिया गया है।
आज जरूरत है मानव को आध्यात्मिक उपचार की। संस्कार है एक मात्र औषधि व्याकुल संसार की॥
भोगवाद ने भौतिकता का मापदण्ड अपनाया है, मानवीय मूल्यों को हमने बिलकुल यहाँ भुलाया है,
समझ लिया साधन को सब किंतु साध्य को भूले हम, और मूर्खता को चतुराई समझ, बुद्धि पर फूले हम,
आज माँग है दृष्टिकोण में उसके तुरत सुधार की। संस्कार है एकमात्र औषधि व्याकुल संसार की॥
विद्या शिक्षा बनी, गुरु बस शिक्षक रहे, पढ़ाने में, और शिष्य की शक्ति लग गई ध्वंस-वृत्ति अपनाने में,
धन-अर्जन के लिए समर्पित हुए कर्म दिन-रातों में उच्छृंखलता दिखी युवा व्यवहार वेश बातों में,
चाल उलट देनी है अब तो उनके इस व्यवहार की। संस्कार है एकमात्र औषधि व्याकुल संसार की॥
संस्कार थे सुफल श्रेष्ठ ऋषियों के अनुसंधानों के सिद्ध रसायन थे उनके तप के दैवी अनुदानों के,
यहाँ मनोविज्ञान श्रेष्ठ जीवन का भाव जगाता था, व्यावहारिक अध्यात्म व्यक्तियों को उत्कृष्ट बनाता था,
आवश्यकता हुई पुनः उस दैवी आविष्कार की। संस्कार है एकमात्र औषधि व्याकुल संसार की॥
हम सबका दुर्भाग्य कि हमने भुला दिया संस्कारों को, आँख मूँद कर अपनाया हमने पाश्चात्य विचारों को,
इन सबका परिणाम दीखता पथ भूले इनसानों में, अनाचार-अन्याय हीनता हिंसा के दीवानों में,
अब ताक बची एक आस है उनके पुनरुद्धार की। संस्कार है एकमात्र औषधि व्याकुल संसार की॥
आओ, लें संकल्प कि फिर से संस्कार अपनाएँगे, ऋषिप्रणीत जीवन-शैली से प्रबल प्रेरणा पाएँगे,
श्रद्धा और विश्वास जगेगा, आस्तिकता लहराएगी, मानवता फिर एक विलक्षण जीवन का पथ पाएगी।
राह तजेगी दुनिया पतन-पराभव-पापाचार की। संस्कार है एकमात्र औषधि व्याकुल संसार की॥
*समाप्त*