सृष्टि की प्रवाहमान जीवनधारा में अनंत व्यक्ति जन्मते हैं, जीते हैं और बह जाते हैं। लेकिन इस अंतहीन इतिहास के पन्नों पर कुछ ऐसे व्यक्तित्व भी हैं, जिनके जीवन की स्याही कभी धुँधली नहीं पड़ती। वे सदा चमकते रहते हैं और वर्तमान से भी ज्यादा आने वाले कल के लिए सदैव अपना उजला प्रकाश बिखेरते रहेंगे। काल का प्रचंड प्रवाह जिनको बहा न सका, जिनके बीस-तीस वर्षों को हजार-हजार वर्ष भी ओझल व धूमिल न कर सके, उन व्यक्तियों की आदर्शोन्मुखी आस्था का ही यह सुफल है।
व्यष्टि में समष्टि है। समष्टि की समग्रता का अहसास व्यक्ति की अंतश्चेतना में होता है। इस अहसास में जीने वाले को यह सहज समझ होती है कि बटोरने की अपेक्षा छोड़ने का मूल्य है। जलाने की अपेक्षा जलने का मूल्य है। शासक की अपेक्षा अकिंचन का मूल्य है। ये मूल्य आज भी हैं, कल भी थे और कल भी रहेंगे। जिन्होंने मूल्यों का आस्थापूर्वक आचरण किया, वे इतिहासपुरुष बन गए। जिन्होंने केवल इन मूल्यों पर प्रवचन किए, आचरण नहीं किया, वे इतिहास के गर्त में समा गए।
हालाँकि बटोरना सहज नहीं है, जलाने में साहस की अपेक्षा है, शासक बनने के लिए प्रचुर चतुराई की जरूरत है; पर जिनमें यह साहस है, चातुर्य है, क्षमता है और इसके बावजूद जो बटोरते नहीं, जलाते नहीं, राज्य नहीं करते, मूल्यों का विश्वास उन्हीं में दीप्तिमान होता है। जिनमें क्षमता और साहस ही नहीं, उनमें मूल्यों का प्रकाश कहाँ से और कैसे प्रदीप्त होगा! उनमें कुलीनता का काला अँधेरा जो व्याप्त है।
मारने वाला वीर हो सकता है, लेकिन नहीं मारने वाला महावीर होता है। अपने हृदय की दृढ़ अहिंसा के साथ समस्त प्राणियों के प्रति सजल करुणा हो। मरने वाले तथा मारने वाले दोनों में समान प्राणों-अद्वैत का भाव हो, तभी इसकी सार्थकता है। लेकिन यदि मन में भय हो, स्वयं के प्राणों का व्यामोह एवं कायरता छाई हो, तब उसे अहिंसा का नाम देना आदर्श को पतनोन्मुखी बनाना है।
ऊँचे आदर्शों को खींचकर मन के कमजोर भावों को छुपाने तथा संतुष्ट करने के लिए उन्हें नीचा न किया जाए, यह अत्यंत आवश्यक है। हर क्षेत्र के अपने कुछ शाश्वत मूल्य हैं। अपनी महत्त्वाकाँक्षा तथा स्वार्थ की क्षुद्रता में उन मूल्यों का अवमूल्यन नहीं किया जाना चाहिए। मूल्यों के अवमूल्यन को इतिहास कभी क्षमा नहीं करता। इतिहासपुरुष बनने का गौरव तो सच्चे, सार्थक एवं शाश्वत मूल्यों के हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर चढ़ने से ही प्राप्त होता है।
चाहत हर एक की होती है कि वह सफल एवं सुखी जीवन जिए। लेकिन उपलब्ध सुविधा-साधनों व प्रयासों के बावजूद ज्यादातर लोग सफलता एवं प्रगति की दिशा में आगे नहीं बढ़ जाते। कई तो अनवरत श्रम में जुटे रहते हैं, जबकि कुछ प्रतिभाशाली एवं आकर्षक व्यक्तित्व से संपन्न होते है। इतना ही नहीं, ये अपने सशक्त तर्कों से दूसरों की समस्याओं एवं जिज्ञासाओं का समाधान भी करते हैं। लेकिन खुद के जीवन में अनेकों छोटी-छोटी समस्याओं से पीड़ित रहते हैं। इनके जीवन के अनुत्तरित सवालों की श्रृंखला बहुत लंबी होती है जो इन्हें पग-पग पर नोंचती-टोंचती रहती है। गहरे समाधान माँगती है। जब तक ये समाधान नहीं मिलते, जिंदगी विफलताओं के घने अवसाद से घिरी रहती है।
अमेरिकन मनीषी स्टीफन आर. कोवी ने अपनी पुस्तक ‘द सेवन टेक्टिस ऑफ हाइली इफेक्टिव प्युपल’ में इस घने अवसाद से उबरने की राह सुझाई है। उनके अनुसार मात्र व्यवहार एवं दृष्टिकोण पर आधारित उथले प्रयासों से जीवन की गंभीर समस्याओं का समाधान न सिद्ध हो सकेगा, क्योंकि यह तो समस्या का नहीं, वृक्ष के तनों एवं पत्तों का उपचार है, जबकि उद्देश्य रोग को जड़-मूल से उखाड़ फेंकना हैं। इसे वे चरित्र नीति कहते हैं। यह व्यक्तित्व के मौलिक स्तर पर परिवर्तन एवं सुधार की प्रक्रिया है। यह वैयक्तिक निर्भरता से अन्तर्वैयक्तिक निर्भरता का मार्ग दिखाती है। हालाँकि बिना वैयक्तिक प्रभावोत्पादकता के वह आत्मनिर्भरता विकसित नहीं होती जो कि प्रभावी अंतःनिर्भरता को अंजाम दे सके और यह निर्भरता जीवन की सफलता का अनिवार्य अंग है।
सफल जीवन के प्रथम चरण में वैयक्तिक आत्मनिर्भरता के विकास के लिए स्टीफन कोवी तीन आदतों को विकसित करने पर जोर देते हैं। इनमें से पहली है- आत्मजागरूकता। हो सकता है कि हम बचपन के गलत प्रशिक्षण या अपने परिवेश के विषैले प्रभाव के कारण दीन-हीन जिंदगी जी रहे हों। लेकिन स्वचेतना, कल्पनाशक्ति, अंतःप्रज्ञा व स्वतंत्र इच्छाशक्ति जैसी अंतर्निहित विशेषताओं के बूते अपनी जिंदगी को पूरे तौर पर बदल सकते हैं। अमेरिकन दार्शनिक संत हेनरी डेविड थोरो इसे सबसे बड़ा प्रोत्साहक तथ्य मानते थे कि मनुष्य अपने चेतन प्रयास द्वारा अपने जीवन को ऊँचा उठा सकता है।
यह एक निहायत आशावादी व सृजनात्मक रुख है। जो अपने दोष-दुर्गुणों असफलताओं व कमियों के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानता है और अपनी मनःस्थिति को सँभालते हुए परिस्थितियों के प्रभावों को निरस्त करने की अपनी क्षमता पर विश्वास रखता है; ऐसा व्यक्ति अपनी कमियों को स्वीकार करता है, इन्हें ठीक करता है व आवश्यक सबक लेता है। कमियों के प्रति हमारा रुख जिंदगी के अगले क्षण की गुणवत्ता को निर्धारित करता है। दूसरी ओर प्रतिक्रियावादी व्यक्ति अपनी कमियों, असफलताओं के लिए हमेशा दूसरों को ही दोषी मानता रहता है। उसका यही दुराग्रह उसे स्वयं को सुधारने-सँवारने से रोके रहता है। ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में प्रायः असफल ही रहता है।
अपने बारे में जागरूक होने का बेहतर तरीका यह है कि हम अपनी ऊर्जा व समय के उपयोग पर एक दृष्टि डालें। जागरूक लोग अपने भाव व विचारों से जुड़े क्षेत्रों में अपना ध्यान केंद्रित करते हैं, जबकि प्रतिक्रियावादी लोग दूसरों की बुराइयों पर, वातावरण एवं बाहरी समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जिन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता। इस कारण वे दोषारोपण, दूषित विचार व प्रतिक्रियावादी व्यवहार एवं भावों से पीड़ित रहते हैं। उनके जीवन में उत्पन्न भावनात्मक ऊर्जा उनके अपने प्रभावक्षेत्र को भी सिकोड़ लेती है जबकि जागरूक व्यक्ति अपने प्रभावक्षेत्र (अंतःकरण, मन-शरीर व परिवार) में ध्यान केंद्रित रखते हुए अपनी रचनात्मक ऊर्जा को क्रमशः बढ़ाते रहते हैं और धीरे-धीरे बाहर के क्षेत्रों में भी अपना प्रभाव जमाने लगते हैं। उनके लिए अपने सुधार एवं परिवर्तन का केंद्र अपना चरित्र होता है।
स्टीफन कोवी के अनुसार प्रभावोत्पादक जीवन का दूसरा सिद्धांत है- वैयक्तिक नेतृत्व का सिद्धांत। पहला सिद्धांत यह बताता है कि हम अपने जीवन के भाग्यविधाता स्वयं हैं। दूसरा सिद्धांत अपनी सृष्टि के सृजन के सूत्र स्पष्ट करता है। इसमें पहले हम आत्मजागरूकता व कल्पनाशक्ति के द्वारा स्वयं में निहित अव्यक्त क्षमता को देखते हैं। फिर अंतःचेतना द्वारा सार्वभौम सिद्धांतों के संपर्क में आते हैं। इन तीनों की सहायता से हम जीवन का एक नया अध्याय प्रारंभ करते हैं। दूसरे सिद्धांत के प्रयोग का सबसे प्रभावशाली तरीका यह है कि हम आत्ममंथन द्वारा जीवन के लक्ष्य को स्पष्ट रूप से देखें कि हम जीवन में क्या करना चाहते हैं व क्या बनना चाहते हैं?
श्री स्टीफन के अनुसार, यहाँ पहले यह जानना आवश्यक है कि हमारे जीवन का केंद्र क्या है? यह पत्नी, बच्चे, व्यवसाय, धर्म, ईश्वर आदि कुछ भी हो सकता है। यहाँ तक कि आप विशुद्ध आत्मकेन्द्रित हो सकते हैं, लेकिन इनसे प्रस्फुटित होने वाली सुरक्षा, सक्रियता, दिशा व गुणवत्ता का स्तर भी इन्हीं के स्तर के अनुरूप होगा। जीवन की स्थायी सफलता के लिए जीवन का केंद्र सार्वभौम सिद्धांतों को ही होना चाहिए, क्योंकि इन्हीं से उच्चतम मूल्यों का जन्म होता है। ये न तो परिवर्तनशील होते हैं, न ही कोई प्रतिक्रिया करते हैं और न ही परिस्थितियों या व्यक्ति, वस्तु पर निर्भर करते हैं।
प्रत्येक व्यक्ति में अंतःचेतना के रूप में एक अचूक सूचक विद्यमान है, जो कि स्वयं की अद्वितीय-विशेषता का बोध करवाता है। आत्मजागरूक व्यक्ति के रूप में हम जो बनना और करना चाहते हैं, उसको व्यक्त करके हम अपना वैयक्तिक संविधान लिख सकते हैं। यह एक दिन का कार्य नहीं है, बल्कि अनवरत स्वाध्याय, गहन आत्मविश्लेषण, वैचारिक अभिव्यक्ति द्वारा हम जीवन के उच्चतम मूल्यों पर आधारित जीवन के लक्ष्य का एक चित्र खींच सकते हैं। हम इसके अनुरूप इसे दैनिक, साप्ताहिक, वार्षिक व दीर्घकालिक खंडों में बाँट सकते हैं। इसके बाद ही इसे मूर्त रूप देने की- व्यवहार में परिणत करने की बारी आती है।
यह स्वप्रबंधन का तीसरा सिद्धांत है। इसमें स्वतंत्र इच्छाशक्ति का उपयोग करना पड़ता है। प्रभावी स्वप्रबंधन के लिए कार्य को महत्ता एवं अनिवार्यता के क्रम में विभाजित किया जाता है। ‘द कॉमन डिनोमिनेटर ऑफ सक्सेस’ के लेखक ई. एम. ग्रे अपने जीवनभर सफल व्यक्तियों के सर्वमान्य गुण की खोज करते रहे। उन्होंने पाया कि कठोर श्रम एवं अच्छे व्यावहारिक संबंध इस सूची में नहीं हैं। इन सबसे भी अधिक महत्त्वपूर्ण गुण है- कार्य को प्राथमिकता के आधार पर अंजाम देने की क्षमता। यह उसी अनुपात में पाया जाता है जितना कि हमारा सिद्धांत केंद्रित जीवन लक्ष्य स्पष्ट एवं प्रचंड हो।
कुछ कार्य महत्त्वपूर्ण होते हैं तो कुछ तात्कालिक रूप से अनिवार्य। बिना प्रभावी वैयक्तिक नेतृत्व अर्थात् लक्ष्य की स्पष्टता के बगैर हम सरलता से तात्कालिक किंतु गैर महत्त्वपूर्ण कामों में भटक जाते हैं, जबकि प्रभावशाली प्रबंधन में ध्यान महत्त्वपूर्ण कार्यों पर केंद्रित किया जाता है जो तात्कालिक दृष्टि से भी संतुलन बिठा सके। इस तरह क्रमशः अपने जीवन के प्रति गहरी आँतरिक जागरूकता, जीवन लक्ष्य का स्पष्टीकरण व इसका दैनिक जीवन में क्षण-प्रतिक्षण क्रियान्वयन करते हुए हम वैयक्तिक विजय ही हमें बाहरी-सार्वजनिक विजय के लिए तैयार करती है।
अन्तर्वैयक्तिक संबंधों की प्रगाढ़ता एवं प्रभावोत्पादकता का आधार स्टीफन के अनुसार व्यक्ति का इमोशनल बैंक अकाउंट’ हैं अर्थात् दूसरे को हम कितना अपने विश्वास में ले पाए हैं। इसमें वृद्धि के छह सूत्र इस तरह हैं- (1) सबसे पहले हमें दूसरे व्यक्ति की व उसकी आवश्यकताओं को समझना होगा (2)उसकी छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना होगा, जिससे उसे भावनात्मक चोट न पहुँचे (3) उसके साथ किए गए वायदों को निभाना (4) दूसरों की अपेक्षाओं की स्पष्ट जानकारी (5) वैयक्तिक प्रामाणिकता (6) अपनी गलती या दूसरे की भावनात्मक ठेस पर सच्चे हृदय से क्षमा याचना।
इस संदर्भ में बशर्ते प्रेम अपना चमत्कारिक प्रभाव दिखाता है। कोवी अन्तर्वैयक्तिक नेतृत्व के सिद्धांत कुछ ऐसे ढंग से व्यक्त करते हैं, जो दोनों पक्षों की जीत पर विश्वास रखता है। यह इस जीवन दर्शन पर आधारित है कि जीवन एक प्रतियोगिता के क्षेत्र से अधिक सहयोग का क्षेत्र है। सभी के लिए यहाँ पर्याप्त स्थान है। सभी को अपनी नैसर्गिक प्रकृति के अनुरूप अपनी अद्वितीय भूमिका निभानी है। यह दृष्टिकोण, एक तीसरे विकल्प में विश्वास रखता है जो दो व्यक्तियों की वैयक्तिक इच्छाओं से परे एक उच्चतर मार्ग प्रशस्त करवाता है।
इस सोच के पाँच आयाम हैं-सबसे पहला है व्यक्ति का चरित्र। चरित्र तीन चीजों से मिलकर बनता है। प्रथम-प्रामाणिकता दूसरा है-साहस और संवेदना, तर्क एवं भावना के बीच का संतुलन। तीसरा है- पर्याप्तता की मानसिकता, जो कि विकास एवं विकल्पों की अनंत सम्भावनाओं पर विश्वास रखती है। ऐसी ही चरित्र के आधार पर मधुर, विश्वसनीय संबंधों का निर्माण होता है। जिसके बल पर सहमतियाँ बनती हैं। इस सोच की सिद्धि के लिए साधन भी उसी पर आधारित होने चाहिए। यह मानसिकता ही सार्वजनिक नेतृत्व की पृष्ठभूमि तैयार करती है।
अगला सिद्धांत है- संवेदनशील संवाद का सूत्र। इसमें स्वयं को समझाते जाने से पूर्व दूसरे को समझने का प्रयास किया जाता है। इसमें कानों से शब्दों को सुनने के अतिरिक्त आँखों द्वारा दूसरे के व्यवहार को देखने के साथ हृदय द्वारा भावनाओं को अनुभव भी करना पड़ता है। इसमें दूसरों के दिलोदिमाग के साथ अपना सरोकार रहता है। यह अपने भावनात्मक बैंक-भण्डारण की चाभी भी है। यह दूसरों को भावनात्मक सुरक्षा भी देती है, लोगों की इससे विश्वसनीयता भी बढ़ती है। इसमें एक परेशानी भी है। जब तक अंदर से हम दृढ़तापूर्वक संगठित नहीं हैं। तब तक दूसरे के प्रबल भाव हमें असंतुलित भी कर सकते हैं। अतः पहले बताए गए सूत्रों के द्वारा अपने वैयक्तिक आधार को मजबूत करना आवश्यक है।
दूसरों को सलाह देने व समझाने से पूर्व उनको समझना भी जरूरी है। डॉक्टर रोगी को उपचार देने से पहले उसकी डायग्नोसिस करता है। गहरी समझ ही रचनात्मक समाधान के दरवाजे खोलती है। रचनात्मक दृष्टिकोण व संवेदनशील संवाद के बाद ही प्रभावशाली सहयोग की बारी आती है। इसे स्टीफन कोवी ‘साइनर्जी’ का नाम देते हैं। यह आत्मनिर्भर स्थिति में प्रभावोत्पादकता है। औरों के साथ रचनात्मक सृजन की क्रिया है। व्यक्ति की मौलिकता व विविधता को मूल्य देना इसका सार है। इसके अंतर्गत विघ्नताओं का मूल्याँकन होता है, उनका समाधान किया जाता है। इनकी अच्छाइयों के आधार पर निर्णय होता है व कमजोरियों को उपेक्षित किया जाता है। यह सिद्धांत केंद्रीय नेतृत्व का सार है। इसके अंतर्गत व्यक्ति के अंदर की महानतम शक्तियों का प्रकटीकरण होता है। यह सर्वाधिक उत्प्रेरक, सशक्त, रोमांचक व एकीकृत करने वाला पक्ष है। ऐसी रचनात्मक प्रक्रिया भयावह भी होती है कि क्योंकि व्यक्ति इस बात से अनभिज्ञ होता है कि आगे क्या होने वाला है? आगे कौन-सी चुनौतियाँ आएँगी? मार्ग कहाँ ले जाएगा? अगले क्षण के प्रति एक अनिश्चितता का भाव रहता है। अतः आँतरिक सुरक्षा के उच्चस्तरीय भाव की आवश्यकता रहती है।
यहाँ व्यक्ति को ‘बेसकैंप’ के सुखकर वातावरण को छोड़कर एकदम नए व अज्ञात क्षेत्र में चलना होता है। एक नया मार्ग, नई संभावना व नई सीमा प्रशस्त होती है। दूसरे भी इसका अनुसरण करते हैं। ऐसे में आप एक नवीन मार्ग के खोजी बन जाते हैं। यही बुद्ध के मध्यम मार्ग का सिद्धांत है। यह त्रिभुज की बीच की धार पर चलने का मार्ग है जिसमें इसके दोनों किनारों की अतिवादिता का त्याग करना होता है। साइनर्जी अर्थात् रचनात्मक सहयोग के लिए आदर्श तत्त्व होते हैं, उच्च भावनात्मक बैंक पूँजी, रचनात्मक सोच व दूसरों की संवेदनशील समझ।
स्टीफन आर. कोवी का सातवाँ सूत्र है- दैनिक पुनः नवीनीकरण का। इसकी तुलना वे आरे के दाँतों पर धार रखने-शान चढ़ाने से करते हैं। इस सूत्र के अंतर्गत हम अपनी अंतर्निहित क्षमताओं को पहले कहे गए छह सिद्धांतों के अंतर्गत नियमित रूप से नवीनीकरण करते हैं। यह हम अपने जीवन के मौलिक स्तर पर करते हैं, उदाहरण के लिए, शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक।
शरीर को हम पौष्टिक आहार, नियमित व्यायाम व पर्याप्त विश्राम द्वारा पुष्ट करते हैं। इस प्रक्रिया का परिणाम दीर्घकालीन तौर पर हम अपनी बढ़ी हुई कार्यक्षमता के रूप में देख सकते हैं। यह मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। सबसे बड़ी बात तो यह कि यह प्रयास आत्मजागरूकता को प्रोत्साहित करता है व स्वतंत्र इच्छाशक्ति का व्यायाम करवाता है।
शारीरिक नवीनीकरण के बाद आध्यात्मिक नवीनीकरण की बारी आती है। यह अपने मूलतत्त्व के प्रेरक, पोषक एवं संवर्धक स्रोत से संपर्क का तरीका है। ध्यान व प्रार्थना के नीरव क्षणों में हम अपने मूल्य व सिद्धांतों के केंद्र से संपर्क साध सकते हैं। महान् सुधारक मार्टिन लूथर किंग कार्य की व्यस्तता के बीच भी प्रार्थना के लिए कुछ समय अवश्य निकाल लेते थे। वे प्रार्थना को अपनी शक्ति का स्रोत मानते थे। आध्यात्मिक नेता डेविड ओ. मर्के के अनुसार, जीवन के महानतम युद्ध प्रतिदिन आत्मा के कमरे में लड़े जाते हैं। यह हम आँतरिक युद्ध जीत जाते हैं तो आत्मबोध की एक शीतल लहर समूचे अस्तित्व में व्याप्त हो जाएगी व बाह्य जीत स्वतः अनुसरित होगी।
शारीरिक व आध्यात्मिक नवीनीकरण के साथ ही जरूरी है मानसिक नवीनीकरण। इसमें महान् विचारकों के साहित्य के अध्ययन द्वारा हम अपने मानसिक दायरे को बढ़ा सकते हैं। लेखन भी मानसिकता की धार को सशक्त करने का एक सशक्त तरीका है। नियमित रूप से अपने अनुभवों, सीखों, विचारों व आत्मनिरीक्षण को लिखने से विचारों में स्पष्टता व गंभीरता आती है। जीवन लक्ष्य का चिंतन, मनन व अपनी साप्ताहिक-दैनिक योजना बनाना मन के अच्छे व्यायाम हैं।
स्टीफनकोवी शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक नवीनीकरण को नियमित रूप से एक घंटा प्रतिदिन नियोजित करने की सलाह देते हैं। ये हमारी वैयक्तिक जीते हैं। ये छोटी-छोटी सफलताएँ हमें जीवन की कठिनतम चुनौतियों के लिए तैयार करेंगी। नवीनीकरण का चौथा आयाम सामाजिक एवं भावनात्मक है। पहले कहे गए चौथे-पाँचवें छठे सूत्र इसी के अंतर्गत आते हैं। रचनात्मक सोच, संवेदनशील व्यवहार एवं रचनात्मक सहयोग प्रमुखतः भावनात्मक पक्ष से जुड़ें हैं। यदि हम बौद्धिक रूप से विकसित हैं, परंतु भावनात्मक रूप से पिछड़े हैं, तो हमारे आपसी संबंध वैचारिक मतभेद वाले लोगों के साथ असुरक्षित एवं अनिश्चित होंगे। इस आँतरिक सुरक्षा की खोज कहाँ से करें? स्टीफन भावनात्मक नवीनीकरण के अंतर्गत बताते हैं कि यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि दूसरे लोग हमारे बारे में क्या धारणा रखते हैं। यह बाह्य परिस्थितियों से भी नहीं होता। यह अपने ही अंदर से पनपता एवं उपजता है। दिलोदिमाग के सही ढाँचे से आता है। महानतम मूल्यों पर आधारित जीवन से आता है। चरित्रनिष्ठा, वैयक्तिक प्रगति एवं शाँति का यह सबसे मूलभूत स्रोत है।
नवीनीकरण की इस प्रक्रिया में जरूरी है कि इन सभी चारों पक्षों में संतुलन रखा जाए। किसी भी पक्ष को उपेक्षित रखना ठीक नहीं। इस तरह इन सातों सिद्धांतों व चारों आयामों का दैनिक अभ्यास एवं नवीनीकरण करने से हमें उन सभी अनुत्तरित सवालों के समाधान मिलने शुरू हो जाएँगे, जो हमारे जीवन की सर्वांगीण प्रगति एवं सुख-शाँति में बाधक बने हुए हैं।
स्टीफन कोवी के अनुसार, इन सातों सिद्धांतों का सार है- आत्मा की आवाज का अनुसरण। मैडम दी स्टाल के अनुसार, आत्मा की आवाज इतनी नाजुक होती है कि इसे दबाना सरल है, किंतु यह इतनी स्पष्ट भी होती है कि इसके बारे में गलती नहीं हो सकती। इस प्यारी-सी ध्वनि का अनुसरण करते हुए ऊपर कहे गए सात सिद्धांत अपने आप ही हमारे जीवन का अंग बन जाएँगे। यह काम भले ही कठिन लगे, लेकिन यदि हम जुटे रहें, तो टी. इमर्सन के शब्दों में “कार्य सरल हो जाएगा। इसलिए नहीं कि कार्य की प्रकृति बदल गई है, बल्कि हमारी कार्य करने की क्षमता बढ़ गई है।” हमारी अंतश्चेतना जितनी प्रबलतम होती जाएगी उसी अनुपात में हमारी स्वतंत्रता, सुरक्षा, शक्ति व ज्ञान भी बढ़ते जाएँगे व सर्वांगीण प्रगति का रास्ता स्वतः खुलता जाएगा और हर वह चाहत पूरी हो सकेगी, जिसके लिए हम बीते दिनों से प्रयत्नशील हैं।
तकनीकी प्रगति के आज के आधुनिक युग में प्रबंध व्यवस्था का भी आधुनिकीकरण हो गया है। औरों को अपने मार्गदर्शन में लेकर उनका प्रबंध (मैनेजमेण्ट) करने के पूर्व यह अत्यंत जरूरी है कि हम अपने आपको प्रभावी ढंग से प्रबंधित-सुव्यवस्थित करना सीख लें। परमपूज्य गुरुदेव ने 1989 में इस विषय पर दो पुस्तकें लिखी थीं ‘सभ्यता का शुभारंभ’ एवं ‘व्यवस्था बुद्धि की गरिमा।’ प्रस्तुत लेख में प्रख्यात लेखक स्टीफन कोवी के दिशा-दर्शन सिद्धांतों को परमपूज्य गुरुदेव के चिंतन के परिप्रेक्ष्य में युग नेतृत्व हेतु एक मार्गदर्शन है।
कबीर के बारे में कहा जाता है कि वे एक कवि थे; पर वास्तव में कबीर कोई व्यक्ति नहीं, एक दर्शन का नाम है। वे एक ऐसी चिंतन पद्धति हैं, जो ‘अणु में विभु’ और गागर में सागर’ समेटे हुए हैं। उनके पद और साक्षियाँ थोड़े में बहुत कुछ कहने की क्षमता रखती हैं, इसलिए वे विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण हैं।
अध्यात्म तत्त्वज्ञान उनका मुख्य विषय है। उसके गूढ़ रहस्यों का इन पदों में इतनी कुशलता से समावेश किया गया है कि निपुण और खोजी बुद्धि उतने में ही सब कुछ समझ जाती है, जबकि साधारण मस्तिष्क उसमें सामान्य तुकबंदी का ही संधान कर पाता है। अस्तु यहाँ बाहर-बाहर ढूँढ़ने की अपेक्षा गहराई में उतरने की जरूरत है। तभी कुछ सारगर्भित तथ्य हाथ लग सकता है, इससे कम में नहीं।
प्रस्तुत पद को देखें-
सुन्न मरै अजपा मरै, अनहद हू मरि जाए। राम सनेही ना मरै, कहै कबीर समुझाए॥
शब्द और अर्थ की दृष्टि से विचार करें, तो यह पद एकदम साधारण प्रतीत होता है; किंतु इसमें जो भाव-गांभीर्य है, वह असाधारण है। ज्ञानी सदा से कहते आए हैं कि दुनिया की कोई भी वस्तु चिरस्थायी नहीं। सब एक-न-एक दिन छूट जाती हैं। इसलिए व्यक्ति को धनार्जन नहीं, ज्ञानार्जन करना चाहिए, कारण वही अनश्वर और शाश्वत है। कबीर इससे भी एक कदम आगे बढ़कर कहते हैं कि ज्ञान, ध्यान, अनुभव- यह सब भी स्थिर नहीं। एक दिन यह भी छूटेंगे, मिटेंगे और बचे रह जाएँगे सिर्फ ज्ञानी, ध्यानात्, अनुभोक्ता। बाहर की संपत्ति छूट जाएगी- इसे तो सभी जानते हैं; पर भीतर की संपदा भी छूट जाती है- यह कबीर का कथन है। बात मर्म की है, अंतिम और सूक्ष्म है, अस्तु इसको समझ लेना चाहिए।
मन की दो अवस्थाएँ हैं- द्वैत और अद्वैत। जब भी कोई अनुभव होता है, वहाँ द्वैत पैदा हो जाता है। हम दो हो जाते हैं, अकेले नहीं रहते। हम और हमारा अनुभव- यह द्वैत स्थिति है। यहाँ भेद उत्पन्न हो गया। कबीर कहते हैं कि अंतिम सोपान तक पहुँचने के लिए इस भेद को त्यागना पड़ेगा। वहाँ एकाकी साधक ही रह जाएगा। उसकी अनुभूति, उसका आनंद कुछ भी साथ न जा सकेगा। ‘सुन्न मरै, अजपा मरै, अनहद हू मरि जाए’ - यह सब मरेंगे, केवल योगाभ्यासी बचा रह जाएगा। अतएव कबीर सावधान करते हुए कहते हैं कि अनुभूति को पकड़ा न जाए अन्यथा एक नवीन संसार निर्मित हो जाएगा। साधनापथ पर बढ़ने से पूर्व साधक की आसक्ति धन, पुत्र, पत्नी, मकान से थी। वह छोड़ी, तो दूसरे प्रकार की आसक्ति पैदा हो गई। यह आसक्ति ही संसार है। संसार जहाँ निर्मित होगा, वहीं मुसीबत पैदा होगी- ऐसा कबीर का मत है। इसलिए वे भीतर की उच्चस्तरीय आसक्ति को भी छोड़ने की सलाह देते हैं।
यहाँ इसका यह अर्थ नहीं कि ध्यान की, साधना की, समाधि की आवश्यकता ही नहीं है। कबीर स्पष्ट कहते हैं- ‘सुन्न मरै अजपा मरै, अनहद हू मरि जाए’ - शून्य न रहे, अजपा न रहे और यहाँ तक कि अनहद भी न रहे, वह भी मर जाए। अब प्रश्न यह है कि जो है ही नहीं, वह मरेगा क्या? मरने से पूर्व तो जीवन होना चाहिए, सत्ता होनी चाहिए। अस्तु, इनकी उपलब्धि नितांत आवश्यक है। पाने से पूर्व छोड़ने की बात नहीं सोची जा सकती, अतएव पहले हमें उन्हें पाना होगा। छोड़ने की बात तो सिर्फ इसलिए है कि साधक उससे जकड़ न जाए, अन्यथा यह सूक्ष्मतम अनुभव भी संसार बन जाएगा और वह पुनः जंजाल में उलझ जाएगा। यदि ऐसा हुआ, तो यही वह स्थिति होगी, जिसके लिए साधनाग्रंथों में योगभ्रष्टः शब्द इस्तेमाल हुआ है। योगभ्रष्टः अर्थात् योग के आत्यंतिक लक्ष्य से विमुख हो जाना, उसकी जो अंतिम सीढ़ी थी, उससे गिर जाना। एक कदम अभी भी शेष था। उसे और उठाने की जरूरत थी ताकि योग और समाधि भी छूट जाएँ। उस अंतिम चरण के लिए कबीर कहते हैं- अनहद हू मरि जाए’ अर्थात् जिसकी कोई हद नहीं, असीम-अनंत-यह अनुभव भी न रहे। कबीर के अनुसार यही वास्तविक योग है। इसे तनिक समझ लेना चाहिए।
दो के मिलन को ‘योग’ कहते हैं। यदि इनके बीच कोई तीसरा तत्त्व आ जाए, तो योग घटित नहीं होता। ‘अनुभव’ ऐसी ही दीवार है। यह योगाभ्यासी और परमात्मतत्त्व के बीच आ खड़ा होता है। वह कितना ही गहन क्यों न हो, फिर भी दोनों के बीच एक सूक्ष्म दूरी पैदा कर देता है या यों कहें कि अनुभूति दूरी के बिना संभव नहीं, तो अत्युक्ति न होगी। हम सामने वाले को देख सकते हैं और सामने वाला हमें देख सकता है, क्योंकि दोनों के बीच एक फासला है, लेकिन हम स्वयं को ही कैसे देख सकते हैं? देखने के लिए तो कुछ दूरी चाहिए। दर्पण में अपनी छवि देखते समय थोड़ा दूर खड़ा होना पड़ता है। यदि पास आकर दर्पण से चेहरा लगा लें, तो फिर स्वयं को देख पाना मुश्किल हो जाएगा। यदि फिर भी धुँधली-सी छाया दीखती है, तो इसका मतलब है कि आँख अभी दूर है। उसे दर्पण से बिलकुल सटा देने पर भी कदाचित् कुछ अस्पष्ट आकृति दीखती रहे, कारण कि दर्पण और दर्शक एकाकार नहीं हो सकते। अल्पतम दूरी बनी ही रहेगी; किंतु मनुष्य अपने गहनतम में परमात्मा से बिलकुल एक है। वहाँ दूरी की कोई गुँजाइश नहीं। इसीलिए तो ज्ञानियों का यह अनुभव है कि जब तक ‘मैं’ था, ‘उसका’ पता नहीं चला और जब ‘वह’ हुआ, तो मेरा पता नहीं, कारण कि दोनों अपनी आत्यंतिक गहराई में एक हैं। इस तादात्म्य के घटित होने में ‘अनुभव’ की जो अड़चन आ खड़ी होती है, कबीर उसे छोड़ने की सलाह देते हैं। कहते हैं कहीं ऐसा न हो कि समाधि तो लग जाए, पर समाधि सुख बना रहे; ध्यान लगा लें, पर उसके आनंद को छोड़ न पाएँ। नहीं, ऐसे काम नहीं चलेगा, अनासक्त होना ही पड़ेगा। इसके बिना पद का अंतिम चरण घटित नहीं हो सकेगा। ‘राम सनेही न मरै’ - ईश्वर-प्रेम की उपलब्धि अनासक्त होकर ही हो सकती है और यही एक ऐसा तत्त्व है, जो मरता या मिटता नहीं, क्योंकि यह अनुभव नहीं है। प्रेम और प्रेमी परस्पर घुले-मिले हैं, एक हैं। प्रेम के क्षण में प्रेम की प्रतीति नहीं होती। आनंद के क्षण में तो लगता है कि कुछ दिव्य घटित हो रहा है; पर प्रेम का पता कैसे चले? क्योंकि प्रेमी वहाँ होता नहीं, वह तो प्रेम ही हो जाता है।
इसे यों भी समझ सकते हैं कि व्यक्ति जब स्वस्थ होता है, तब उसे अपनी स्वस्थता का पता ही नहीं चलता, पता कैसे चले? क्योंकि स्वस्थता तो अनुभवजन्य है ही नहीं। अनुभव तो बीमारी का होता है। यदि संसार में व्याधि न हो, तो लोगों को अपने स्वास्थ्य का पता ही न चले। वे स्वस्थ रहेंगे, फिर भी उन्हें इसका भान न हो सकेगा। देह जब पूरी तरह स्वस्थ हो तो विदेह की अवस्था स्वतः ही सध जाती है, देह का स्मरण ही नहीं आता।
ऐसा ही ईश-प्रेम है। इसीलिए कबीर कहते हैं- ‘राम सनेही ना मरै’ यहाँ ‘राम सनेही’ का तात्पर्य रामभक्तों से नहीं है। कबीर साधारण भक्तों की बात नहीं कर रहे हैं। ‘राम सनेही’ तो कहने की एक शैली है, परमतत्त्व की ओर संकेत के लिए एक शब्द है। वास्तविक प्रेम में न तो कोई राम है, न कोई राम सनेही; न कोई भगवान् है, न कोई भक्त। राम वहीं प्रकट होते हैं, जहाँ यह द्वैत की दीवार मिट जाती है। उस क्षण जो सरित प्रवाह होता है, दोनों कुलों को स्पर्श करते हुए, वह है- राम स्नेह। वह कभी मरता नहीं, क्योंकि जो मर सकता था, वह सब मर गया। भक्त के पास अब विसर्जन के लिए कुछ नहीं है- न योग, न समाधि, न चमत्कार। वह बिलकुल खाली है। स्वयं को परमात्मा के चरणों में डाल दिया है; जीवित होते हुए भी महामृत्यु स्वीकार लेता है। जिसका अहंकार, मानापमान, पद, प्रतिष्ठा, गौरव, कामना, यश, सुख, दुःख सब कुछ मर चुका, वहाँ अब मरने को शेष क्या है? जिसने अपने आपे को ही मार डाला, ईश्वर में विलीन कर दिया, उसकी अब और मृत्यु क्या होगी? योगी मरता है, क्योंकि उसका आखिरी कदम अंत में उठता है। भक्त तो उसको शुरू में ही उठा लेता है, अतएव योगी के गिरने की संभावना अंत तक बनी रहती है। योगभ्रष्टः शब्द इसी कारण से है, जबकि ‘भक्तिभ्रष्ट’ शब्द देखने-सुनने में नहीं आता।
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को ‘वाणी का डिटेक्टर कहकर संबोधित किया है। यह अकारण नहीं है। उनकी अभिव्यक्ति सामर्थ्य और रहस्यवाद को सरल शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत करने का उनका ढंग अद्वितीय है। उन्हें व्यक्ति की तुलना में एक चिंतन पद्धति कहना अनुपयुक्त न होगा।
हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद से कहा-तुम भी मेरी तरह धन-संपत्ति अर्जित करो-मैं तुम्हारा पिता हूँ, मेरी हर बात तुम्हें माननी चाहिए।”
प्रह्लाद ने उत्तर दिया- “पिता के नाते आप मुझसे शारीरिक सेवा ले सकते हैं, पर आपकी अनुचित बातों का समर्थन करूं, यह मुझसे नहीं होगा।” उन्होंने अपार संकट सहे, पर अनौचित्य से कभी सहमत नहीं हुए। अंततः स्वयं भगवान् को उनकी रक्षार्थ आकर हिरण्यकश्यप का वध करना पड़ा। हर कुमार्गगामी-आतंकवादी का अंत इसी प्रकार हुआ है।
किसी समय एक जंगल में गधे रहते थे। पूरी आजादी से रहते, भरपेट खाते-पीते और मौज करते। एक लोमड़ी को मजाक सूझा। उसने मुँह लटका कर गधों से कहा-मैं चिंता से मरी जा रही हूँ और तुम इस तरह मौज कर रहे हो। पता नहीं कितना बड़ा संकट सिर पर आ पहुँचा है? गधों ने कहा-दीदी भला क्या हुआ, बात तो बताओ। लोमड़ी ने कहा-मैं अपने कानों से सुनकर और आँखों से देखकर आई हूँ। मछलियों ने एक सेना बना ली है और वे अब तुम्हारे ऊपर चढ़ाई वाली हैं। उनके सामने तुम्हारा ठहर सकना कैसे संभव होगा।
गधे असमंजस में पड़ गए। उनने सोचा व्यर्थ जान गँवाने से क्या लाभ? चलो कहीं अन्यत्र चलो। जंगल छोड़कर वे गाँव की ओर चल पड़े। इस प्रकार घबराए हुए गधों को देखकर गाँव के धोबी ने उनका खूब सत्कार किया अपने छप्पर में आश्रय दिया और गले में रस्सी डालकर खूँटे से बाँधते हुए कहा- डरने की जरा भी जरूरत नहीं। मछलियों से मैं निपट लूँगा। तुम मेरे बाड़े में निर्भयतापूर्वक रहो। केवल मेरा थोड़ा-सा बोझ ढोना पड़ा करेगा।
यह अज्ञान, भ्रांतियाँ ही आज जनमानस में संव्याप्त हैं। गधों की तरह परावलम्बी बनना जनसमुदाय को पसंद है। मूढ़मान्यताओं के बाड़े में बंद रहना वे अधिक पसंद करते हैं, पर उस बंधन को तोड़ निकलने में आनाकानी करते हैं।
मदनलाल एक व्यक्ति का नाम है। वह सर्वनाम भी हो सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उल्लेख करना है इसलिए संज्ञा का चुनाव करना पड़ा। सन् 1974 में उसने जीवन शुरू किया था। विवाह के बाद घर बसा, बच्चों ने जन्म लिया। परिवार में माता-पिता थे। साधनों के नाम पर एक रेडियो, टेपरिकार्डर, साइकिल और गुजारा करने के लिए ठीक-ठाक सी आमदनी थी। पत्नी घर सँभालती, सास-ससुर की सेवा करती। मदनलाल शाम को काम-धंधे से लौटकर बारी-बारी से माँ-बाप और पत्नी-बच्चों के पास बैठता। कभी सबके साथ इकट्ठे बैठना भी हो जाता। रेडियो पर विविध भारती के गीत बजते, हँसी-मजाक चलते, कभी-कभार सिनेमा भी देख आते। सोने से पहले नियमपूर्वक रात में माता-पिता की सेवा का क्रम भी चलता। कुल मिलाकर हँसी-खुशी से जिंदगी चल रही थी।
पच्चीस साल बाद मदनलाल वही नहीं रहा। आर्थिक स्थिति हजार गुना बेहतर हो गई। अच्छा-खासा मकान है, कार, स्कूटर आदि वाहनों से लैस घर में मनोरंजन के तमाम साधन हैं। ऑडियो सिस्टम से लेकर मल्टीविजन, होम थियेटर एवं वाशिंग मशीन तक सभी कुछ श्रम को कम ही क्या समाप्त करने वाली तमाम सुविधाएँ भी हैं। किसी बात की कमी नहीं। लेकिन मदनलाल बेहद दुखी है। छह महीने हो गए होंगे- घर के सदस्यों के साथ बैठकर खाना नहीं खाया। महीने-पंद्रह दिन में बेटे-बेटियों से आमना-सामना हो पाता है। पत्नी अपनी सहेलियों में व्यस्त रहती है। रात दस-ग्यारह बजे के आसपास दोनों आमने-सामने होते हैं, तो थककर चूर। एक-दूसरे के हाल-चाल पूछने लायक स्थिति भी नहीं रही।
माँ जीवित है। पिता करीब दस साल पहले सिधार गए। छह महीने पहले माँ बीमार हुई। महँगी चिकित्सा कराई। अत्याधुनिक अस्पताल में भरती कराया। दो महीने इलाज चला। माँ घर आ गई। देख-भाल के लिए तीन नौकरानियाँ रखी हैं। मदनलाल और उसकी पत्नी समय मिलता है तो दो-चार दिन में माँ के कमरे में जाते हैं और हाल-चाल पूछकर आ जाते हैं।
मदनलाल क्योंकि संपन्न हो गया; इसलिए परिवार के लोगों के लिए सुख-सुविधा के साधन मुहैया कर सकता है। फिर भी वह दुखी क्यों है? पूछने पर कहने लगा- हम लोगों की जिंदगी बिखर गई। घर, घर नहीं रहा। सराय हो गया। अपनी जरूरतों के लिए हम लोग यहाँ आते हैं और चले जाते हैं। किसी को दूसरे व्यक्ति से कोई वास्ता नहीं। आर्थिक दृष्टि से जिनकी हैसियत में बहुत-ज्यादा बदलाव नहीं आया, उनकी भी शिकायत है कि हमारा परिवार बिखर गया, जिंदगी बिखर गई, दुःख-दर्द में पूछ लेने का किसी के पास समय नहीं बचा। आखिर सब लोग कहाँ व्यस्त हो गए। किन चीजों ने सबको एक-दूसरे से अलग कर दिया।
मदनलाल की बहन है देवकी। कभी उसकी भाभी अर्थात् मदनलाल की पत्नी देवकी के बाल सँवारती थी, बहन भी अपने भावज का सिर सहलाती। अब दोनों ब्यूटी–पार्लर में जाती हैं और मनभावन श्रृंगार कराती हैं। तीज-त्योहार पर मिलती हैं। हैलो–हाय में बात निपट जाती है और फिर अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाती हैं। दोनों के संबंधों में न वह गरमाहट है और न ही आत्मीयता। एक-दूसरे के बारे में बातें भी करती हैं, तो वे निंदापरक ही ज्यादा होती हैं। कुशल-क्षेम या शुभानुषंसा जैसी कोई चर्चा नहीं उठती।
घर का मुखिया अब अपना बचपन याद करता है। तीन भाई और दो बहनों समेत कुल सात सदस्यों का परिवार था। पिता देर से घर लौटते। सोने से पहले एक-एक बच्चे के पास जाते। ठीक से सो रहे हैं या नहीं, किसी के हाथ-पाँव तो नहीं मुड़ रहे, सिरहाना ठीक से लगा है या नहीं, सरदी के दिनों में बच्चों ने ठीक से ओढ़ रखा है या नहीं आदि बातों का ध्यान रखते। अब उनके अपने बच्चों के लिए अलग कमरा है। कभी कभार जाकर देख लिया। बच्चे टीवी देखते या वीडियो गेम खेलते दिखाई देते हैं। चुपचाप वापस चले आते हैं। बच्चों से इतना ही संवाद रह गया।
संबंधों में यह सन्नाटा आधुनिक सभ्यता की देन है। यों सुविधा-साधन बढ़े हैं, लेना चाहें तो सेकेण्डों में एक-दूसरे के हाल-चाल ले सकते हैं लेकिन इतना अवकाश नहीं रहा। एक समय था जब समाधियों में चिट्ठी-पत्री चलती और इधर से पत्र लिखकर डाक में छोड़ते ही जवाब का इंतजार होने लगता। माँ-बेटी के, पिता-पुत्र के और भाई-भतीजों के पत्राचार में भी उत्तर की आतुर प्रतीक्षा रहती। हफ्तों तक गरमाहट बनी रहती थी। अब डाक-व्यवस्था की जगह टेलीफोन और फैक्स ने ले ली है। लेकिन वह आतुर प्रतीक्षा जाती रही। छठे-चौमासे आपस में कोई बात हो जाती है। इधर बात पूछी, उधर जवाब मिला। सेकेण्डों में संवाद बना और मिनटों में पूरा हो गया। इसके साथ ही जैसे दायित्व भी पूरे हो गए।
दूर नहीं सिर्फ पच्चीस साल पहले गर्मियों में प्याऊ लगती थी। लोग कुओं से पानी खींचकर मिट्टी से बने घड़ों में जमा करते और देशी तरीके से इसे ठंडा रखते थे। केवड़ा, गुलाब जैसी खुशबू भी पानी में छोड़ते। प्याऊ पर बैठा व्यक्ति गंगा सागर में भरकर जिस अपनेपन से पानी पिलाता था, वह पैंतीस-चालीस साल के व्यक्तियों को भी अच्छी तरह याद होगा। मेले-ठेलों में अब भी प्याऊ लगती है, लेकिन वहाँ पानी पीना शान के खिलाफ लगता है। प्लास्टिक की बोतल में ‘मिनरल वाटर’ के नाम से भरा अशुद्ध पानी अपने स्टेटस के अनुरूप लगता है। सड़क किनारे बने ढाबे और चाय की दुकानों पर बोतल में मिलने वाला पानी कितना ताजा और कितना साफ होता है, यह जाँचने-परखने की किसे फुरसत है। स्वास्थ्य सुविधा और प्रतिष्ठा के नाम पर आ बैठी पानी की बोतल ने प्याऊ की आत्मीय परंपरा को नष्ट-भ्रष्ट ही कर दिया।
घरों में लोग एक छत के नीचे या एक आश्रय में रहते हैं। बच्चों का समय टीवी, वीडियो गेम में बीतता है। बड़े इंटरनेट से खेलते रहते हैं। जी ऊब गया तो पार्टियों में व्यस्त जो जाते हैं। फाइव स्टार और फार्म हाउस संस्कृति ने आँखों को चमक-चौंध से इस तरह भर दिया है कि पारिवारिक संबंध औपचारिक स्तर तक ही रह गए हैं। पच्चीस साल पहले नाते-रिश्तेदारों के यहाँ आना-जाना कुछ दिन ठहरना और साथ-साथ किसी और शहर में घूमने के लिए निकलने का चलन था। उस समय विद्यार्थी रहे व्यक्तियों को ममेरे–फुफेरे भाई-बहनों की संगत आज भी याद होगी। गरमी की छुट्टियों में बेसब्री से इंतजार रहता और वे वापस जाते तो जैसे कलेजा निकलता-सा महसूस होता। अब हमउम्र बच्चे आ जाएँ, तो खिलौने छुपाने की चिंता रहती है। अव्वल तो छुट्टियों में आना-जाना ही कम होता है ब्याह-शादियों अथवा विशिष्ट अवसरों पर लोग जाते भी हैं, तो बच्चों को घर ही छोड़ जाते हैं। करीब की रिश्तेदारी में खास मौकों पर बच्चों को ले जाना हुआ तो रस्म व अदायगी के तौर पर दो-एक दिन रुकने के बाद वापस भागने की पड़ जाती है।
संबंधों में आई उदासी के लिए किसी एक प्रवृत्ति को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, तो वह उपभोग की संस्कृति है। पिछले पच्चीस सालों में उपभोक्तावाद ने निजी और पारिवारिक जीवन का नक्शा ही बदल दिया है। मध्यम और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों के पास आर्थिक साधन सीमित हैं। बाज़ार में उपभोग सामग्रियों की भरमार है। सभी चाहिए, फिर चलन यह भी है कि हर चीज का चार-पाँच साल में नया मॉडल आ जाता है। बाज़ार इन से भर पड़े हैं। कुछ समय पहले दस-पंद्रह हजार में खरीदी चीज बासी और पुरानी लगने लगती है। उसे बदलने और नया सामान लाने में ही घर की आर्थिक स्थिति खप जाती है। उन परिवारों में माता-पिता सगे-संबंधियों मित्र-परिचितों का यथोचित ध्यान रखने की गुँजाइश ही नहीं बचती। व्यक्ति सबसे बचने-सिमटने लगता है और अकेला रह जाता है। इतना अकेला कि उसका अपना परिवार भी बेगाना हो जाता है।
साधनसंपन्न परिवारों में रिश्तेदारों के लिए गुँजाइश तो है, लेकिन वहाँ आवभगत कम, आने वैभव का प्रदर्शन ज्यादा होता है। बड़े घरों में मुखिया से लेकर नौकर तक के चेहरे पर छाया रहने वाला दर्प स्वागत-सत्कार को रौबदार के अर्थ में बदल देता है। वहाँ पर्याप्त खातिरदारी होते हुए भी किसी के पास बैठने और आत्मीयतापरक पूछताछ का कोई समय नहीं रहता।
संबंध बराबरी के स्तर पर निभते हैं। यह स्तर-हैसियत के आधार पर नहीं, आत्मीयता और व्यवहार के आधार पर तय होता है। तथाकथित संपन्न और आधुनिक परिवारों में मेहमानों को स्वीकार तो किया जाता है, लेकिन अपने किसी अतिथि-संबंधी के शहर-कस्बे में जाना हो, तो उसके घर जाना ठीक नहीं समझते। इससे प्रतिष्ठा पर आँच आती महसूस होती है। इसलिए अपेक्षाकृत कम हैसियत वाले लोग भी उन घरों में आने-जाने से कतराते हैं। सब अपनी-अपनी खोखली दुनिया में व्यस्त हैं। उपभोक्ता मूल्यों से बन रही यह संस्कृति व्यक्ति को नितांत अकेला, असहाय और विपन्न बना रही है। इसके कारण और परिणामों पर भी सोचना चाहिए। विचार करना चाहिए कि इसका समाधान क्या हो सकता है। यदि अध्यात्म जीवन जीने की कला रोजमर्रा की जिंदगी में आ जाए तो भोग के साथ त्याग की प्रतिष्ठा कर बड़ा सुंदर जीवन जिया जा सकता है। इक्कीसवीं सदी के आगमन की वेला में, क्या किसी का मन नहीं करता कि ऐसी एक प्रयोगशाला जो आदमी को जीना सिखा रही है-शान्तिकुञ्ज गायत्री तीर्थ में जाकर रहें व इस विद्या-संजीवनी विद्या को भी सीखकर आएँ। आमंत्रण है सभी को इस तीर्थ का।
सुविधा-साधन बढ़े हैं, समृद्धि भी आई है, जीवन पहले से ज्यादा संपन्न है, फिर भी लोग हायतौबा क्यों मचाते हैं? पच्चीस साल पहले की तुलना में आज हजार गुना समर्थ होते हुए भी लोग उदास और अकेले क्यों हैं? संबंधों में आए सूनापन और सन्नाटे की वजह तलाशे तभी अकेलापन टूटेगा और समाधान की दिशा मिलेगी।
जीवन का, स्थिरता का कोई भरोसा नहीं। इसलिए यही उचित है कि फिर कभी की प्रतीक्षा किए बिना हम श्रेष्ठ कार्य अविलंब करें।
मानवी स्वास्थ्य संवर्द्धन के लिए प्रयास अगणित दिशाओं से चल रहे हैं। भाव संस्थान को यदि जड़, मन को तना एवं शरीर के विभिन्न संस्थानों को एक वृक्ष के पत्र-पल्लव कहा जाए, तो अत्युक्ति न होगी। जड़ की उपेक्षा होगी, तने पर सतत् प्रहार होंगे तो न उस वृक्ष पर पत्ते आएँगे, न फूल ही खिलेंगे। आज जड़ों की उपेक्षा हो रही है। भाव संस्थान, आस्था का केंद्र कुछ भी नाम इसे दे दिया जाए, ही रोगों का मूल कारण है। हमारी जीवनी शक्ति वहीं से कमजोर होती है व वहीं से उसके संवर्द्धन का राजमार्ग निकलता है। इस पक्ष पर विवेचन विस्तार से शोध संदर्भों के साथ इस लेख में है।
शरीर और मन के आपसी संबंध और भावदशा के अनुरूप ही हमारा स्वास्थ्य बनता-बिगड़ता रहता है। इस बात से अब वैज्ञानिक भी परिचित हो चुके हैं। अब वे अपने व्यापक अन्वेषणों-अनुसंधानों के आधार पर उपर्युक्त सत्य को स्पष्ट और पुष्ट कर रहे हैं। इस तरह के शोध-प्रयोगों के अंतर्गत मन की सृजनात्मक एवं ध्वंसात्मक दोनों तरह की भाव दशाओं के विभिन्न प्रभावों को परखा जा रहा है। क्रोध, आक्रामकता, अवसाद, उदासी, ग्लानि, निराशा, आवेशग्रस्तता, चिड़चिड़ापन, उद्विग्नता जैसे मनोभावों एवं शाँत, प्रसन्न, आशावादी, आत्मविश्वास, प्रेम, करुणायुक्त मनःस्थिति के प्रभावों पर हुए अनुसंधानों से पता चला है कि मन, शरीर के संरक्षिका-तंत्र (इम्यून सिस्टम) को प्रभावित करता है। अर्थात् व्यक्ति के विचार एवं मनोभाव उसके स्वास्थ्य, जीवटता एवं दीर्घायुष्य में अहम् भूमिका निभाते हैं।
ध्वंसात्मक भावों में क्रोध को स्वास्थ्य एवं आरोग्य की दृष्टि से सबसे घातक पाया गया है। ‘नार्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी’ के डॉ. जॉन बेयाफुट ने गंभीर हृदय रोग से पीड़ित व्यक्तियों के परीक्षण के आधार पर पाया कि उनमें धमनी अवरोध की स्थिति उनके स्वभाव में क्रोध की मात्रा के अनुरूप कम व अधिक थी। इसी तरह ‘ड्यूक यूनिवर्सिटी’ के डॉ. रेडफोर्ड विलियम ने 2000 फैक्टरी मजदूरों की जाँच की, जिन्हें 25 वर्ष पूर्व स्वास्थ्य-परीक्षण के दौरान क्रोध व आक्रामकता के लिए भी जाँचा गया था। इनमें से जिनका क्रोधस्तर बहुत निम्न था, उनमें अब तक मात्र दस प्रतिशत मृत थे और जिनका क्रोध उच्चतर था, उनमें से तीस प्रतिशत हृदय रोग, कैंसर व अन्य रोगों के कारण मर चुके थे।
डॉ. विलियम ने अपने एक अन्य अध्ययन में इस बात की भी पुष्टि की है कि क्रोध त्वरित मृत्यु का एक सशक्त कारण है। विलियम ने पचास के दशक में एक विद्यार्थी समूह का परीक्षण किया था कि कौन कितना क्रोध करता है। बीस वर्ष बाद पुनः परीक्षण करने पर पता चला कि क्रोध के निम्न स्तर वालों में मात्र तीन मृत थे। इनमें से ज्यादातर तो पचास वर्ष की आयु से पूर्व ही चल बसे। डॉ. विलियम ने शीघ्र मृत्यु का कारण बनने वाले क्रोध का सूक्ष्मता से अध्ययन किया है और इसे चरणों में स्पष्ट किया है। इनमें सर्वप्रथम- दोषदर्शितापूर्ण दृष्टिकोण, जिसके कारण व्यक्ति के मन में दूसरों के प्रति निषेधात्मक एवं संशयात्मक विचार पनपते रहते हैं और वह दूसरों के कारण अज्ञात भय एवं खतरों से घिरा रहता है। दूसरा, इनके मस्तिष्क में विद्वेषपूर्ण विचार हावी रहते हैं और व्यक्ति क्रोध की भावना से सतत् आक्रान्त रहता है। तीसरा, जब यह क्रोध का भाव क्रिया में बदलता है, तो लोगों पर बरसने, अधीरतापूर्ण व्यवहार, आक्रामक कृत्य जैसे कई रूपों में प्रकट होता है।
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के शोधकर्ताओं ने गंभीर हृदय-घात के 72 घंटे पूर्व सबसे प्रमुख मनोभाव की खोज के निष्कर्ष में क्रोध को ही पाया। एक बार हृदयाघात होने के बाद रोगी के लिए क्रोध घातक बन जाता है। जिन्हें एक बार हृदयाघात हो चुका है, उन पर क्रोध का एक दौरा हृदय की ‘पंपिंग क्षमता’ को सात प्रतिशत से भी अधिक घटा देता है। इस गिरावट को चिकित्सक हृदय के रक्तप्रवाह में एक खतरनाक स्थिति मानते हैं। येल मेडिकल स्कूल, स्टेनफोर्ड की एक शोध के अनुसार, जिन्हें हृदयाघात का प्रथम दौरा पड़ चुका है और जो आसानी से क्रोधावेश में आ जाते हैं, उनकी मृत्यु की संभावना दो से तीन गुना तक बढ़ जाती है।
स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाली दूसरी मनःस्थिति अवसाद की है, जिसके अंतर्गत उदासी, उत्साहहीनता आदि भाव आते हैं। रोगों के प्रारंभिक कारण के बजाय अवसाद को गंभीर रोगों में सुधार के दौरान एक गंभीर बाधा के रूप में देखा गया है। उदाहरण के तौर पर, स्तन कैंसर से पीड़ित महिलाओं में जो अवसादग्रस्त थीं, उनमें प्राकृतिक ‘किलर’ कोशिकाएँ सबसे कम थीं। इन कोशिकाओं का काम कैंसर से लड़ना होता है। इनकी कमी के परिणामस्वरूप शरीर के विभिन्न भागों में ट्यूमर का विस्तार अधिक तीव्र गति से होता है।
‘माउंट सिनाई मेडिकल स्कूल, न्यूयार्क’ के मनोचिकित्सकों ने कुछ ऐसे बुजुर्ग लोगों के अवसाद स्तर का मापन किया, जिनके कूल्हे दुर्घटनाओं में क्षतिग्रस्त हो चुके थे। इस गंभीर चोट में दुबारा चल-फिर सकने की आशा कुछ कम ही होती है। इसके बावजूद अवसादरहित बुजुर्ग अन्य अवसादग्रस्त बुजुर्गों की तुलना में नौ गुना अधिक संख्या में पूर्ववत् स्थिति में आ गए थे। इस तरह अवसाद को हड्डियों के उपचार में एक गंभीर बाधा के रूप में पाया गया।
मिनीसोटा यूनिवर्सिटी में सौ व्यक्तियों की हड्डियों की मज्जा प्रतिरोपण सर्जरी की गई। इनमें अवसादग्रस्त 33 व्यक्तियों में से 12 प्रथम वर्ष में ही मृत पाए गए, जबकि बाकी 87 व्यक्तियों में से 34 दो वर्ष बाद भी जीवित थे। हृदयाघात से बचे रोगियों के उपचार में भी अवसाद को बाधक पाया गया है। मांट्रियल यूनिवर्सिटी में प्रथम हृदयाघात से पीड़ित रोगियों में अवसादग्रस्त रोगियों के मरने की दर पाँच गुना अधिक थी।
उद्विग्नता एवं तनाव से भी स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित होते देखा गया है। इस संदर्भ में बंदरों के एक समूह पर रोचक प्रयोग किया गया। इस प्रयोग के तहत पाँच बंदरों को एक पिंजरे में बंद किया गया। बंदर स्वभाव से ही एक मुखिया की छत्रछाया में रहना पसंद करते हैं। जिसका चुनाव वे आपस में लड़-झगड़कर शक्ति परीक्षण द्वारा कर लेते हैं। एक बार मुखिया चुने जाने के बाद फिर सभी शान्तिपूर्वक रहते हैं। हर माह शोधकर्ता दो बंदरों को पिंजरे से बाहर निकालते व दे नए बंदरों को इसमें भरती करवाते। अर्थात् हर माह बंदरों को अपना मुखिया चुनने के लिए लड़ना पड़ता था। यह प्रयोग एक वर्ष तक चलता रहा। एक अन्य पिंजरे में पाँच बंदर बिना किसी परिवर्तन के रखे गए। लड़ने वाले बंदरों को धमनी अवरोध की समस्या से पीड़ित पाया गया और इसमें मुखिया बंदर की स्थिति सबसे बद्तर थी, क्योंकि उसे इस एक वर्ष में सबसे अधिक लड़ना पड़ा। दूसरे समूह के बंदरों की स्थिति सामान्य थी।
इसी तरह थ्री माईल आयसलैंड के परमाणु संयंत्र के समीप रह रहे समूह का अध्ययन किया गया। इसके समीप रहने वाले तनावग्रस्त लोगों के रक्त नमूनों में टी. सेल और बी. सेल (जीवनी शक्ति के लिए उत्तरदायी कोष) की संख्या सामान्य पड़ोसियों की तुलना में कम थी। देखा गया कि भय व चिंता संरक्षिका तंत्र को दुर्बल बनाते हैं। ओहियो यूनिवर्सिटी के चिकित्सा विज्ञान के छात्रों का प्रमुख परीक्षा के दौरान परीक्षण किया गया, जब वे परीक्षा की गंभीर तनाव भरी स्थिति से गुजर रहे थे। इस दौर में उनके टी. सेल और बी. सेल में बहुत गिरावट देखी गई और उनमें सरदी व फ्लू से संक्रमण की स्थिति भी उच्चतर थी।
भावों के दमन का भी स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर काफी व्यापक कार्य हुआ है। हार्वड़ के शोधविज्ञानी गैरी स्वार्टज के अनुसार ऐसी दशा में अस्थमा, उच्च रक्तचाप व सरदी आदि की संभावना अधिक रहती है। स्तन कैंसर वाली महिलाओं में ऐसी दशा में ट्यूमर पुनः विकसित होने की संभावना अधिक पाई गई। कुल मिलाकर भावों का दमन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पाया गया। इसके विपरीत शाँत व प्रसन्न मनःस्थिति तथा ध्यान की प्रसन्न एवं गंभीर स्थिति में किए गए शोध-परीक्षणों से स्पष्ट हुआ कि यह अवस्था स्वास्थ्य एवं जीवटता के सर्वथा उपयुक्त होती है। ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के जिस परीक्षण में परीक्षा के दौरान तनाव के कारण टी. सेल व बी. सेल में गिरावट हुई थी, ध्यान करने पर इनमें वृद्धि पाई गई। ध्यान जितना गहरा व गंभीर था, उसका प्रभाव उतना ही सशक्त देखा गया।
एक अन्य प्रयोग के तहत हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में व्यक्तियों के जीवन वृत्तांत के परीक्षण द्वारा उनको आशावादी व निराशावादी दो वर्गों में विभाजित किया गया। स्कूल छोड़ने के तीस वर्ष बाद पुनः इन लोगों के स्वास्थ्य-चार्ट का अध्ययन किया गया। आशावादी व्यक्तियों की अपेक्षा निराशावादी अधिक गंभीर रोगों एवं स्वास्थ्य समस्याओं से आक्रान्त थे। ऐसे ही मिशिगन यूनिवर्सिटी में बाईपास सर्जरी से गुजरे रोगियों के मनोवैज्ञानिक अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि आशावादी लोगों में सर्जरी के दौरान श्रम समस्याएँ आईं व उनको स्वास्थ्य-लाभ भी शीघ्र हुआ।
आत्मविश्वासपूर्ण मनःस्थिति को भी स्वास्थ्य के अनुकूल पाया गया है। आत्मविश्वास सामान्यतः परिस्थिति पर अपने नियंत्रण के भाव का परिचायक है, जिसमें व्यक्ति को लगता है कि वस्तुएँ उसके नियंत्रण में हैं। कुछ व्यवसायों के लोगों में यह नियंत्रण की भावना बहुत कम होती है, जैसे कि एक ड्राइवर का कार्य समय सीमा में बँधे होने के कारण उसे समय के अंदर निश्चित स्थान पर पहुँचना होता है, किंतु इस दौरान तमाम घटनाएँ घटित हो सकती हैं, जिन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता। ऐसी व्यावसायिक स्थिति में उच्च रक्तचाप व अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ तीन गुना अधिक पाई जाती हैं।
ऐसे ही बुजुर्गों के नर्सिंग होम में जहाँ नियम-अनुशासन कठोर होते हैं, प्रायः महसूस किया जाता है कि उनका अपने जीवन पर, उसके निर्धारण पर नियंत्रण बहुत कम होता है। येल मेडिकल स्कूल के कुछ मनोचिकित्सकों ने ऐसे ही चार नर्सिंग होम के संचालकों को मनाकर यहाँ रह रहे बुजुर्गों के एक समूह को निर्णय लेने में अधिक स्वतंत्रता दे दी, जिसके अंतर्गत खाने-पीने आगन्तुकों से मिलने आदि की पर्याप्त छूट थी और साथ ही प्रत्येक को देख-भाल के लिए एक-एक छोटा पौधा भी दिया गया। एक वर्ष के अंदर इस समूह की मृत्यु-दर अन्य बुजुर्गों की तुलना में घटकर आधी रह गई थी।
मित्रता एवं सामाजिकता द्वारा मिलने वाले भावनात्मक संरक्षण का भी स्वास्थ्य पर पड़ने वाले लाभकारी प्रभावों को दृष्टिगत रख अध्ययन किया गया है। कुछ शोधकर्ता, जो परीक्षा के दौरान विद्यार्थियों पर पड़ने वाले तनाव के प्रभाव का परीक्षण कर रहे थे, उन्होंने देखा कि जो विद्यार्थी सबसे एकाकी थे, उनमें सबसे अधिक कम प्राकृतिक ‘किलर’ कोशिकाएँ थीं। स्तन कैंसर से पीड़ित महिलाओं में जिनको सर्वाधिक सामाजिक सहयोग व संरक्षण उपलब्ध था, उनमें अन्यों की तुलना में 30 प्रतिशत से अधिक प्राकृतिक ‘किलर’ कोशिकाएँ थीं।
इसी विषय पर यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया में 5000 व्यक्तियों का साक्षात्कार लिया गया, जिसमें उनका ध्यान रखनेवाले अच्छे मित्रों, उनके समूह, नागरिक संस्थाओं, चर्च, सामूहिक संभागों में भागीदारी, बच्चों के स्कूल में उनके सरोकार की चर्चा की गई। नौ वर्षों बाद बहुत कम मित्र वाले उपर्युक्त व्यक्तियों में अन्यों की अपेक्षा दो गुना अधिक मृत पाए गए। कई अन्य अध्ययनों में भी सामाजिकता के गुण एवं भाव संरक्षण का मृत्युदर से संबंध को पुष्ट किया जा चुका है।
शोध-परीक्षणों से यह भी स्पष्ट हुआ है कि भावनात्मक आदान-प्रदान तनाव के प्रभाव को निरस्त करने का कारगर उपाय है। दस वर्ष पूर्व स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के डॉ. डेविड स्टिगल ने स्तन कैंसर से गंभीर रूप से प्रभावित महिलाओं पर प्रयोग किए। एक समूह का सामान्य उपचार चलता रहा, जबकि दूसरे समूह का सामान्य उपचार के साथ सप्ताह में एक बार सामूहिक चिकित्सा का क्रम भी एक वर्ष तक चलता रहा वे इस दौरान आपस में कैंसर के बारे में अपनी भावनाओं को व्यक्त करतीं व इससे परिवार पर पड़ने वाले प्रभाव और अपने सुख-दुःखों की चर्चा करतीं। इस तरह शीघ्र ही ये महिलाएँ परस्पर भावनात्मक घनिष्ठता में बँधती चली गईं। साथ ही उन्होंने दर्द निवारण की स्व-सम्मोहन तकनीक भी सीखी। शोधकर्ताओं ने अगले दस वर्षों में दोनों समूहों की मृत्यु दर का अध्ययन किया, जिसमें दो-तीन वर्ष बाद अंतर दिखना शुरू हो गया था। सामूहिक चिकित्सा वाले समूह की मृत्यु दर कम हो रही थी, जो दूसरे समूह की तुलना में दस वर्ष में दो गुना कम हो गई थी।
ऐसा ही अध्ययन बंदरों पर भी किया गया। एक बंदर को पिंजरे में बंद करके उसे तीव्र रोशनी एवं उच्च ध्वनि के प्रभाव में लाया गया। उसमें भय व तनाव के कारण उत्पन्न होने वाले हारमोन कार्टिसाल की जाँच की गई। जब एक और बंदर पिंजरे में बंद किया गया, तो हारमोन की मात्रा आधी कम हो गई थी। किंतु पाँच बंदरों को एक साथ पिंजरे में रखने पर प्रकाश व ध्वनि का उन पर कोई प्रभाव नहीं देखा गया। ऐसे ही खरगोशों पर हृदयरोग में धमनी अवरोध पर अध्ययन किया गया, पिंजरे में बंद खरगोशों की अपेक्षा स्नेहपूर्ण से सिंचित पालतू खरगोशों में यह अवरोध बहुत कम था।
हार्वर्ड के शोधकर्ताओं ने प्रसन्नता के क्षणों में स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की जाँच की। कॉमेडी फिल्म देख रहे व्यक्तियों में कार्टिसाल हारमोन की मात्रा को गिरा हुआ पाया गया व प्राकृतिक ‘किलर’ कोशिकाओं को बढ़ा हुआ पाया गया। 36 स्तन कैंसर से पीड़ित महिलाओं में सात वर्ष बाद जो मृत पाई गईं, उनके पाँच वर्ष पूर्व किए गए मनोवैज्ञानिक परीक्षण की जाँच से पता चला कि मरने व न मरने वाली महिलाओं में एकमात्र भावनात्मक अंतर जीवन में प्रसन्नता का भाव था।
दया, प्रेम व सद्भाव से भरी मनःस्थिति भी स्वास्थ्य के लिए सर्वथा उपयुक्त पाई गई है। हार्वर्ड के डॉक्टर मैक्लीनेड ने कुछ लोगों पर मदर टेरेसा की रोगियों एवं पीड़ितों की सेवा करती हुई फिल्म देखते समय प्रयोग किए। ऐसे व्यक्तियों में कुछ देर तक टी. सेल में वृद्धि दर्ज की गई। उनमें से जिन्होंने दूसरे लोगों द्वारा अपने प्रति किए गए उपकारों के प्रति कृतज्ञतापूर्वक ध्यान-चिंतन किया, उनमें टी. सेल की वृद्धि दीर्घकाल तक देखी गई। इसके विपरीत नाजी-जर्मनी की अत्याचार एवं क्रूरता भरी फिल्मों का प्रभाव सर्वथा प्रतिकूल देखा गया।
इस तरह व्यक्ति की भावनात्मक परिस्थिति का उसके स्वास्थ्य, निरोगिता एवं दीर्घायुष्य से घनिष्ठ संबंध आज का चिकित्सा विज्ञान भी अपने प्रयोगों द्वारा सिद्ध कर रहा है। आज उन्नत चिकित्सा एवं बढ़ती सुविधाओं के बावजूद बढ़ रही बीमारियाँ एवं स्वास्थ्य की समस्याएँ आश्चर्य का विषय नहीं हैं, क्योंकि उपचार शारीरिक लक्षणों को रोग मानकर किया जा रहा है, जबकि रोगों के कारण व उपचार मन की गहराइयों में छिपे हुए हैं। निषेधात्मक चिंतन व विकृत जीवनशैली द्वारा दूषित एवं आक्रान्त इस स्थिति को विधेयात्मक चिंतन, आशावादी दृष्टिकोण व उदात्त भावों द्वारा सुधार कर हम स्थायी स्वास्थ्य लाभ एवं आरोग्य पा सकते हैं।
दुष्ट परिस्थितियों की तरह बंदर भी बड़े दुष्ट होते हैं। एक बार स्वामी विवेकानंद काशी में किसी जगह जा रहे थे। उस स्थान पर बहुत से बंदर रहते थे, जो आने-जाने वालों को अकारण ही तंग करने में बड़े विख्यात थे।
उनके साथ उन्होंने वही किया। स्वामी जी का रास्ते से गुजरना अच्छा न लगा। वे चिल्लाकर उनकी ओर दौड़े और पैरों में काटने लगे। उनसे छुटकारा पाना असंभव प्रतीत हुआ। वे तेजी से भागे, पर जितना भागते बंदर भी उतना दौड़ते और काटते। तभी एक अपरिचित स्वर सुनाई दिया-भागो मत सामना करो।” बस वे खड़े हो गए और ऐसी जोर की डाँट लगाई कि एक घुड़की में ही बंदर भाग खड़े हुए।
जीवन में जो कुछ भयानक है, उसका हमें साहसपूर्वक सामना करना पड़ेगा। परिस्थितियों से भागना कायरता है, कायर पुरुष कभी विजयी नहीं होगा। भय, कष्ट और अज्ञान का जब हम सामना करने को तैयार होंगे तभी वे हमारे सामने से भागेंगे।
यदि गायत्री जप में तीन बातें रहें- मंत्र का उच्चारण गंभीरतापूर्वक नियमित गति से हो- मंत्र की मधुरता का सतत् आस्वादन लिया जाता रहे और साथ-साथ अर्थ का भी चिंतन चले, तो फिर किसी दृढ़योग या लययोग की आवश्यकता नहीं है। केवल जप से ही पूर्णता प्राप्त हो जाती है। मंत्रार्थ के चिंतन का तात्पर्य है- इष्ट देवता का जो स्वरूप अपने चित्त में हो, ईश्वर का सद्गुणों के रूप में चिंतन। पढ़े, इस कथानक में गायत्री पज के मर्म के विषय में।
“भला इस तरह भी कहीं जप होता है? धीर-गंभीर भाव से अर्थ का अनुसंधान करते हुए हृदय की गहराइयों से एक-एक अक्षर का उच्चारण करो। उसके साथ एक हो जाओ। क्या तुम बेगार भरने के लिए जप-संख्या पूरी करते हो?” वे एक स्वर में इतना बोल गए और उसका सिर पकड़ कर हिला दिया। उसने चौंककर देखा तो एक दीर्घकाय दृढ़ शरीर वाले गौर वर्ण के तेजस्वी महात्मा आँखों के सामने खड़े हैं। स्वास्थ्य, शक्ति, तेज, ज्ञान, मेधा, अलौकिकता और सर्वोपरि सबके परे होने की प्रभाएँ उनसे छिटक रही हैं। उसने माला वहीं छोड़ दी, सिर से उनके चरणों का स्पर्श किया और जिस चौकी पर बैठकर वह जप कर रहा था, उस पर उन्हें बिठा दिया और वह स्वयं उनके चरणों के पास जमीन पर बैठ गया।
ये देवपुरुष उसके अपरिचित नहीं थे। उसने पहले-पहल तब देखा था, जब उसकी अवस्था पाँच वर्ष की भी नहीं रही होगी। ये कभी-कभी उसके बाबा के पास आया करते थे। इनके दिए हुए पेड़े के प्रसाद को वह भूला नहीं था। उनके सुप्रसन्न गौर मुखमंडल पर एक ऐसी आकर्षक ज्योति जगमगाती रहती थी, जिसे एक बार देख लेने पर दिल में गहरी छाप पड़ जाती थी। सुगठित देह, लोगों से कम मिलना-जुलना और अपनी कुटी में रहकर एकांत साधना करना- यही उनके जीवन की विशेषताएँ थीं। बीच में कुछ महीनों के लिए वे हिमालय चले जाते थे और बाकी महीनों में उसके गाँव से दो मील की दूरी पर एक विशाल वटवृक्ष की छाया में बनी हुई छोटी-सी कुटिया में रहते थे। वह न जाने कितनी बार उनसे मिला था, पर आज की तरह नहीं। आज तो तीन बजे रात को जब वह अपनी जप-संख्या पूरी करने के लिए जल्दी-जल्दी माला फेर रहा था, तभी अचानक इनके दर्शन हुए और जप के बारे में कुछ बातें कहकर वह छोटी-सी चौकी पर बैठ गए। वे देवपुरुष मौन थे, उनके चरणों की ओर देखता हुआ वह भी चुप था। इसी प्रकार तकरीबन बीस-तीस मिनट तो बीत ही गए होंगे।
तभी अपना मौन भंग करते हुए उन महापुरुष ने कहा-मुझे इस समय यहाँ देखकर अचरज में डूबने की कोई बात नहीं। मैंने सुना कि इधर तुम उपनिषद् एवं ब्रह्मसूत्र आदि पढ़ने लगे हो और परमात्मा की ओर भी तुम्हारी कुछ प्रवृत्ति है, तो मन में आया- चलें, जरा देख आएँ कि तुम्हारे क्या हाल-चाल हैं। इतना सबेरे आने का कारण यह था कि मनुष्यों की वास्तविक प्रवृत्ति जानने के लिए यही समय सबसे अधिक उपयुक्त है। किसी मनुष्य की आँतरिक प्रवृत्ति जाननी हो तो यह देखना चाहिए कि वह क्या करता हुआ सोता है और क्या करता हुआ जगता है। ये दोनों ही अवस्थाएँ मनुष्य को उसकी रुचि और प्रवृत्ति के समीप रखती हैं। तुम्हें जप करते हुए देखकर मुझे गहरी प्रसन्नता हुई। तुम्हारी शुभेच्छा एवं तत्परता सराहनीय, प्रशंसनीय है। परंतु इसमें थोड़े संशोधन की आवश्यकता है।
उसने जानना चाहा कि क्या-क्या सुधार-संशोधन होने चाहिए, परंतु उन्होंने उस समय उसके सवाल को टालते हुए कहा- “चलो अभी तो गंगा जी चलें। शुद्ध प्रभाती हवा के सेवन से शरीर और मन में एक नवीन स्फूर्ति का प्रवाह होने लगता है, हृदय में प्रसन्नता का संचार होता है और देह का व्यायाम भी हो जाता है। इसलिए गंगा जी चला जाए। गंगास्नान तो होगा ही, सुबह-सुबह का भ्रमण भी हो जाएगा।” वे आगे-आगे चले और उसने उनका अनुसरण किया।
गंगा जी के प्रति उसका सदा से आकर्षण था। गंगा जी का किनारा, उसके तट के वृक्ष, गंगा की विशाल जलराशि में अठखेलियाँ करती जल की तरंगें। उसके मन में एक बार नहीं, अगणित बार ऐसी इच्छा होती थी कि गंगातट पर रहने को मिले। नित्य गंगाजल का पान करने का सौभाग्य मिले और रजत-सी चमकती नवनीत-सी सुकोमल बालुका पर मुक्त मन से क्रीड़ा होती रहे। जब वह उन महापुरुष के पीछे-पीछे चला, तब भी उसके मन में यही कल्पना थी कि आज इनके साथ अच्छी तरह से गंगास्नान करूँगा। इनसे जप और ध्यान की विधि सीखूँगा। लेकिन रास्ते में न तो महात्मा जी बोले और न वह। दोनों ही मौन रहे, परंतु गंगा जी भला दूर ही कितनी थी। बस थोड़ा ही फासला था। बात-की-बात में दोनों लोग वहाँ पहुँच गए। स्नान-संध्या-तर्पण आदि नित्यकर्मों से निबटकर वहीं विशाल वटवृक्ष के नीचे वे लोग बैठ गए।
उन देवपुरुष का रुख देखकर उसने उनसे पूछा-भगवन्! जप करने में यदि संख्या पूर्ति का ध्यान न रखें तो कैसे काम चले? क्या जल्दी-से-जल्द अधिक-से-अधिक मंत्र जप कर ले, यह उत्तम नहीं है?” वह बोले-उत्तम क्यों नहीं है। गायत्री मंत्र चाहे जैसे जपा जाए, उत्तम ही है। परंतु मंत्र-जप के साथ यदि भाव का संयोग हो, प्राणों का संयोग हो और रस लेते हुए मंत्र जप किया जाए, तो इसका फल पग-पग पर मिलता है। एक-एक मंत्र का उच्चारण अपरिमित आनंद देना वाला होता हैं केवल मंत्रोच्चारण सफल तो होता है, परंतु कुछ विलंब से।”
“देखो, तुम्हें मैं साफ-साफ बतलाता हूँ।” वे महापुरुष बोलने लगे-साधारणतया मंत्र-जप वाक् इंद्रियों का काम है। वाक् इंद्रिय एक कर्मेन्द्रिय है। इसका संचालन प्राणशक्ति के द्वारा होता है। वाक् इंद्रिय से जप करने का अर्थ है, प्राणों के साथ उसको एक कर देना। यदि जप उस स्वर से होता है, तो प्राणों की गति भी नियमित रूप धारण कर लेती है। अटपटे-अनमने-बेढंगे तरीके से टूटी-उखड़ी साँसों के साथ पाँच-सात बार गायत्री मंत्र कहें जाने की अपेक्षा एक बार लय के साथ गायत्री मंत्र कहना उत्तम है। गंभीरता के साथ- ( भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। इस प्रकार जप करने में प्राणायाम की अलग आवश्यकता नहीं होती।”
“इतना ही नहीं, क्रिया शक्ति पर नियंत्रण होने के कारण आसन स्वतः सिद्ध हो जाता है। यहाँ तक तो स्थूल बात हुई। जप केवल कर्मेन्द्रिय से ही नहीं होता। अन्य इंद्रियों की अपेक्षा वाक् इंद्रिय की एक विशेषता यह है कि वाक्इंद्रिय के साथ एक ज्ञान इंद्रिय जिसको रसना कहते हैं, वह भी रहती है। ज्यादातर लोग तो वाक् इंद्रिय से ही जप करते हैं, उसमें रसेंद्रिय का उपयोग नहीं करते। उपयोग करने की तो बात ही क्या, उसका स्वरूप ही नहीं जानते। रसना का काम है रस लेना। वाक् इंद्रिय से गायत्री मंत्र का उच्चारण हो और रसना उसका रस ले। प्रत्येक मंत्र की मधुरता का आस्वादन करो। यह परिणाम में नहीं, वर्तमान में भी सुखद है।”
“इस प्रकार रस की धारण करने से प्रत्याहार की अलग आवश्यकता नहीं होती, ज्ञानेन्द्रिय और मन का एकत्व हो जाता है। नियमित गति से वाक् इंद्रिय प्राण में लय हो जाती है। रस लेने से ज्ञानेन्द्रिय मन में लय हो जाती है। इस समय यदि मंत्रार्थ का चिंतन-अनुसंधान रहा तो यह कहने की जरूरत नहीं कि इस चिंतन में प्राण और मन दोनों एक हो जाएँगे। प्राण और मन का एकत्व ही तो सुषुम्ना का संचार है और यही पहले ध्यान की एवं पीछे समाधि की अवस्था है। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि जप में तीन बातें रहें, मंत्र का उच्चारण गंभीरतापूर्वक नियमित गति से, मंत्र की मधुरता का आस्वादन हो और मंत्र के अर्थ का चिंतन हो तो किसी भी हठयोग या लययोग की आवश्यकता नहीं है। केवल जप से ही पूर्णता प्राप्त हो जाती है। एक बात और, मंत्रार्थ चिंतन का यह तात्पर्य नहीं है कि उसके शब्दों का अलग-अलग अर्थ जान लिया जाए। मंत्र का एकमात्र अर्थ है, इष्ट देवता। उनका जो स्वरूप अपने चित्त में हो, उसका चिंतन ही मंत्रार्थ चिंतन है।”
घर लौटने पर उसने देवपुरुष के आदेशानुसार जप करना प्रारंभ किया। स्थिर आसन से बैठकर, अपनी पूरी शक्ति लगाकर वह मंत्र का उच्चारण करता, परंतु उसके होंठ हिलते न थे। वह गायत्री मंत्र का जप तो करता, परंतु यह क्रिया प्राणों की शक्ति से ही संपन्न होती। पूरा मन जप में ही लगा रहता। रसेंद्रिय स्वाद भी लेती।
जब गायत्री मंत्र का जप करते हुए उसका मन एकाग्र हो जाता अर्थात् और किसी तरफ जाना छोड़कर जप में ही पूरी तरह से लग जाता, तब उसे ऐसा मालूम होता जैसे कि वह शरीर है ही नहीं। शरीर जितना बड़ा ही एक ज्योतिपुञ्ज है वह। केवल घन प्रकाश, जिसकी आकृति उसके शरीर जैसी ही थी, उसके मन के सामने रहती। यदि कभी उससे बाहर दृष्टि जाती तो यह प्रकाश शरीर भी एक हलके प्रकाश से घिरा हुआ दिखता। तात्पर्य यह कि उसका मन अब किसी पार्थिव अथवा जलीय पदार्थ को देखता ही न था। केवल तेजस् अनुभव करता था। इस तेजोमय शरीर के अंदर-ही-अंदर गायत्री मंत्र का उच्चारण होता रहता और ऐसा मालूम होता कि ज्योति की धारा ऊर्ध्वगामिनी हो रही है। यह उसकी स्वयं की भावना न थी, क्योंकि वह तो इस प्रकार की समस्त भावनाओं को भूलकर केवल जप में लगा होता। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि यह मन्त्राक्षरों के स्पन्दनों का ही फल था।
यह प्रकाश की धारा ऊर्ध्वमुख प्रवाहित होकर मस्तक में केंद्रित होने लगी। अवश्य ही कई महीनों के अभ्यास के बाद ऐसा मालूम होने लगा था। कभी-कभी तो ऐसा मालूम होता कि यदि सहस्र-सहस्र सूर्य इकट्ठे कर लिए जाएँ, तो भी इस मस्तक स्थित प्रकाश की तुलना में नहीं आ सकते। परंतु उस प्रकाश के केंद्र में कुछ क्रिया होती-सी दिखाई पड़ती और पूरी शक्ति से गायत्री मंत्र का जप पूर्ववत् होता रहता। अब उसकी यह इच्छा नहीं होती थी कि जगत् के किसी आवश्यक कार्य के लिए वह अपनी आँखें खोले। परंतु जब कभी वह आँखें खोलता था तो बाहर भी उसे प्रकाश-ही-प्रकाश दिखाई पड़ता था। कुछ क्षणों के बाद बाहर की विभिन्नताएँ दिखाई भी पड़ती तो रह-रहकर उसके अंदर प्रकाश की एक रेखा चमक जाती थी। प्रायः उस समय भी बिना किसी चेष्टा के उसके अंदर जप होता रहता था और कभी-कभी तो बाहर की वस्तुओं में भी जप होता हुआ दिखता था, मानो पृथ्वी का एक-एक कण गायत्री मंत्र कह रहा हो।
थोड़े ही दिनों के अभ्यास से ऐसा मालूम होने लगा कि मस्तक में दीख पड़ने वाला प्रकाश मानो चैतन्य हो गया है। सूर्य के समान उस प्रकाश में जो कि चंद्रमा से भी शीतल था, एक कमल की तरह ज्योति आती और चमक कर छिप जाती। कभी उन आदिशक्ति का मुकुट दिख जाता, कभी चरणकमलों की नवज्योति इस प्रकार चमक जाती कि वह महान् प्रकाश भी निष्प्रभ हो जाता, मानो घने अंधकार में बिजली चमक गई हो। अब उसका ध्यान प्रकाश की ओर नहीं जाता, वह तो रूखा मालूम होता। उसका संपूर्ण अंतःकरण तो आदिशक्ति माँ गायत्री के दर्शन के लिए आतुर रहा करता। एक क्षण भी युग-सा मालूम होता। परंतु जिस समय वेदना असह्य हो जाती, उस समय वह ज्योति अवश्य ही एक बार नाच जाती थी। इस अनुभूति के समय गायत्री मंत्र की धारा कभी बंद नहीं होती थी। जप और ध्यान से एक अनिवर्चनीय रस अस्तित्व के अंतराल से अबाध गति से झर रहा होता था।
एक दिन जब वह गंगास्नान करके लौट रहा था, रास्ते में वृक्षों के घने झुरमुट को देखकर उसे इच्छा हुई कि वहाँ जाए और वह एक छोटे वृक्ष के नीचे बैठ गया। जाड़े के दिन थे। उतने सबेरे वहाँ कौन आता? एकांत इतना था कि वायुमंडल की सन-सन आवाज आ रही थी। उसने स्वस्तिकासन में बैठकर हाथों को गोद में रखा और आँखें बंद करके गायत्री मंत्र की ध्वनि पर तनिक जोर लगाया। परंतु यह क्या? पलकें बंद रहना नहीं चाहती थीं। एक शक्तिमान् प्रकाश पलकों की दीवार लाँघकर आँखों के तारों में घुसा जा रहा था। वह अपनी सारी कोशिश के बावजूद आँखों को बंद करने में असमर्थ था।
आँखें खुलीं तो देखा न वहाँ जंगल है, न वह वृक्ष है, जिसके नीचे वह बैठा था और जिसकी स्मृति अभी ताजी थी। बस चारों ओर एक घना प्रकाश फैला था और उसके बीच में वह ज्यों-का-त्यों स्वस्तिकासन में बैठा हुआ था। फिर आँखें बंद करने का प्रयास किया, परंतु पलकें टस से मस नहीं हुईं। विवश होकर उसने सामने देखा- आदिशक्ति माँ गायत्री पृथ्वी से करीब एक हाथ ऊपर खड़ी मुस्करा रही थीं। बड़ी मोहक छवि थी उन वेदमाता की। उनका स्वरूप प्रकाशित तो इतना था मानो सविता देव स्वयं ही उनके रूप में सिमट आए हों। हाँ, इस प्रकाश में अपूर्व शीतलता थी।
उन्होंने अपना मौन तोड़ा, उसके कानों में अमृत की धारा प्रवाहित होने लगी। वे जगन्माता वात्सल्यपूर्ण स्वर में कहने लगीं- “मैं ही सूर्य हूँ, मैं ही गायत्री हूँ। तुम मुझे स्पर्श करना चाहते हो केवल इस समय, केवल इस रूप के साथ। यह संपूर्ण जगत् जिसमें तुम हो, जिसे तुम देखते हो, यह मेरी लीलाभूमि है। इसके कण-कण में मेरी ही शक्ति की क्रीड़ा है। तुम इन्हें स्थूल-सूक्ष्म अथवा कारण के रूप में देखते हो, यह तुम्हारा दृष्टिकोण है। तुम मुझको जगत् क्यों समझ रहे हो। यह सब सविता देव एवं मेरे स्वरूप की क्रीड़ा है। मैं ही सविता का प्राण हूँ, सविता देव मेरा ही अधिष्ठान है। जिसे जगत् के लोग उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट के रूप में देखते हैं, उसके भीतर, उसके गुह्यतम प्रदेश में, जहाँ उनकी आँखें नहीं पहुँच पातीं। वहाँ मेरी ही अनादि और अनंत रसमयी, मधुमयी, काव्यमयी, एकरस शक्ति क्रीड़ा हो रही है।” इसी के साथ जगन्माता चुप हो गईं।
उसकी आँखें जिस ओर जाती थीं, चारों ओर सविता देव के घनीभूत पुँज के रूप में माँ गायत्री ही नजर आती थीं। अपना शरीर, जगत्, एक-एक संकल्प और संपूर्ण वृत्तियाँ उन्हीं की लीला से परिपूर्ण हो रही थीं। न जाने कितनी देर तक वह यही सब देखता रहा। अंत में वह ज्यों ही भावभरे हृदय से ‘माँ’ कहते हुए उन लीलामयी आदिशक्ति के चरणों का स्पर्श करने के लिए झुका तो स्पर्श करते-न करते देखा कि वह उसी जंगल में उसी वृक्ष के नीचे बैठा है और उसके रोम-रोम से गायत्री मंत्र की गंभीर ध्वनि निकल रही है। जब उसकी आँखों ने चकित होकर कुछ दूर तक देखा तो सामने से ही देवपुरुष हाथों में कमण्डलु लिए चले आ रहे हैं। उनके होठों पर एक अपूर्व मुसकान थी।
लोगों को जो उपदेश देना है उसे पहले अपने जीवन में उतार लो। जीवन का स्वरूप हजार प्रवचनों से बढ़कर प्रभावी होता है।
‘सर्वेंट्स ऑफ पीपुल्स’ संस्था के सभापति लाला लाजपतराय का देहावसान हो गया था। गाँधी जी उस स्थान की पूर्ति करना चाहते थे, पर कम आजीविका में योग्य व्यक्ति कहाँ से मिले? कौन अपना सुख-वैभव त्यागकर जीवन समर्पित करे, यह एक बहुत बड़ा प्रश्न था। खबर टंडन जी को मिली। वे अपना तेरह सौ मासिक का बैंक मैनेजर का पद त्याग कर मात्र निर्वाह योग्य आजीविका में कार्य करना स्वीकार कर आ गए। गाँधी ने पूछा-इस पद को त्याग कर एक बहुत बड़ी हानि का आपको कोई दुःख नहीं है क्या?” राजर्षि बोले-बापू! लोकमंगल के लिए अपरिग्रही जीवन जीना ही नहीं यदि आप शरीर उत्सर्ग हेतु आदेश देंगे तो वह भी स्वीकार्य होगा।” सर्वविदित है कि बापू के समकालीन सहयोगियों में जो श्रद्धा-सम्मान टंडन जी को मिला, वह अन्य किसी को नहीं।
स्वामी विवेकानंद ने योग सीखने आई एक युवती से कहा था कि तुम्हें इस मार्ग पर गतिशील होने में कई जन्म लगेंगे। वह युवती कक्षा में आकर बैठी ही थी और बैठने के बाद सिर्फ इतना ही पूछ पाई थी कि मुझे सिद्धि प्राप्त करने में कितना समय लगेगा? कितने महीनों में मैं साधना पूरी कर सकूँगी? स्वामी जी ने इस प्रश्न का उत्तर दिया था। कारण भी तुरंत बता दिया कि कक्षा में प्रवेश करने से पहले तुमने अपने जूते इस तरह उतारे, जैसे उन्हें फेंक रही हो। कुरसी की बाँह लगभग मरोड़ते हुए अंदाज में खींची और उस पर धमककर बैठ गईं। फिर बैठे-बैठे ही इसे मेज़ के पास घसीटते हुए से खींचा और व्यवस्थित किया। एक मिनट के इस व्यवहार में स्वामी जी ने न हड़बड़ी को कारण बताया और न ही फूहड़ता को। युवती ने पूछा भी नहीं था और जो कारण स्वामी जी ने बताया, वह सभी साधकों को समझना अभीष्ट है। उन्होंने कहा कि हम जिन वस्तुओं को काम में लाते हैं, जो हमारी जीवन यात्रा और स्थिति में सहायक हैं और जो हमारे व्यक्तित्व के ही एक अंग हैं, उनके प्रति क्रूरता हमारी चेतना का स्तर दर्शाती है। दैनन्दिन जीवन में काम आने वाली वस्तुओं, व्यक्तियों और प्राणियों के प्रति भी मन में संवेदना नहीं है।, तो विराट् अस्तित्व से किसी व्यक्ति का तादात्म्य कैसे जुड़ सकता है? अपने आसपास के जगत् के प्रति जो संवेदनशील नहीं है, वह परमात्मा के प्रति कैसे खुल सकता है, जो वस्तुतः अपने आसपास का ही विराट् फैलाव है।
संवेदना व्यक्ति को विराट् के प्रति खोलती है। उसे ग्रहणशील बनाती है। यह संवेदना ही है, जो दूसरों के दुःख-दर्द से विचलित होती है और उनके निवारण में तत्पर। अपनी चेतना के विस्तार को भी संवेदना कह सकते हैं। चेतना का पहला विस्तार मनुष्य का अपना शरीर है। शरीर के किसी भी अंग में पीड़ा उठती है, तो लगता है कि पूरी काया पीड़ित है। हाथ की अंगुली में दर्द हो, तो आँखें देखती हैं, मस्तिष्क सक्रिय होता है, बुद्धि उपाय खोजती है, पाँव भागदौड़ करते हैं, मुँह से उसके लिए चर्चा होती है, वाणी विमर्श में लग जाती है, कुल मिलाकर पूरा व्यक्तित्व अपने पूरे अस्तित्व के साथ सक्रिय हो जाता है।
विस्तार का अगला चरण परिवार तक फैलता है। घर-परिवार के सदस्यों के दुःख-कष्ट अपने शरीर के ही किसी भाग में उत्पन्न पीड़ा की तरह ही संतप्त करते हैं। उसी आवेग और तत्परता से उनके निवारण के उपाय भी चलते है। मानवीय चेतना परिवार के बाद बहुत हुआ, तो संबंधियों और मित्रों तक आकर ठहर जाती है। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि इस सीमा पर आकर सिमट जाती है।
अपने अथवा अपने आसपास के लोगों के दुःख-कष्ट से व्यथित होने और उन्हें दूर कर लेने तक चुप नहीं बैठने को संवेदना का एक सीमित पक्ष ही कहेंगे। यह निरोध स्तर का है। व्यक्ति में जब यह जागता है, तो वह कष्ट-क्लेश को रोकने का प्रयत्न करता है। संवेदना का विधेयात्मक स्वरूप निरोध से कई गुना महत्त्वपूर्ण और सूक्ष्म है। किसी के पाँव में गड़ा हुआ काँटा निकालने और मरहम-पट्टी करने को निरोध श्रेणी का मान सकते हैं। इसी प्रक्रिया का विधेय स्तर काँटा चुभने वाली स्थिति ही नहीं आने देने की सावधानी है। हर उस तरह का व्यवहार संवेदना है, जिसमें सबके प्रति सम्मान और सदाशयता का भाव व्यक्त होता है।
स्वामी चिन्मयानंद ने लिखा है कि संवेदनशील व्यक्ति जड़ वस्तुओं के प्रति भी इस तरह व्यवहार करता है जैसे वे उसके अति आत्मीय स्वजन हों। न केवल आत्मीय स्वजन हों, बल्कि उसके अपने ही शरीर का एक हिस्सा है। यों जड़ और प्रमादी चित्त वाले लोग अपने शरीर से भी ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे वह कूड़ा-कबाड़ हो। वे बैठेंगे तो इस तरह जैसे कोई बोझ उतारकर फेंक रहे हों। खड़े होंगे तो इस झटके से कि हाथ-पाँव लचक गए हों, बोलेंगे तो इतने कर्कश स्वर में कि गला ही दर्द करने लगे और देखेंगे तो त्यौरियाँ चढ़ाकर। उनकी प्रत्येक गतिविधि तनाव और ऊब से भरी होती है।
गलत रहन-सहन अनियमित आहार-विहार भी शरीर के प्रति संवेदनहीन होने का ही परिचायक है। सभी जानते हैं कि खानपान की गलत आदतें स्वास्थ्य को चौपट कर देती हैं। फिर भी लोग जब चाहें जिस ढंग से खाते-पीते रहते हैं और बीमारियों को निमंत्रित करते हैं। यह शरीर के प्रति क्रूरता बरतना ही हुआ। लेकिन संवेदना को समझने के लिए इतनी बारीकी में जाना जरूरी नहीं है। सिर्फ इतना ही पर्याप्त है कि अपने शरीर और अस्तित्व के प्रति हम जितने सजग रहते हैं, उतने ही अपने आसपास के जगत् के प्रति भी हों। एक कदम उठाते हुए भी यह सावधानी रहती है कि पाँव जोर से धरती पर नहीं गिरे। चलने या शरीर से कोई हरकत करते हुए सभी दिशाओं से बचाने की चेष्टा अनायास ही होती रहती है। कोई अंतर्दृष्टि आने वाले या संभावित खतरों को लगातार तोड़ती रहती है। संवेदना जाग जाए, तो अपने आसपास के अस्तित्व से भी इसी स्तर का सजग-सहृदय व्यवहार होने लगता है।
स्वामी विवेकानंद की परंपरा में आचार्यों ने संवेदना जगाने के व्यावहारिक उपाय सुझाए हैं। सिर्फ महिमा गाते रहने से ही काम नहीं चलता। हमें सजग रहना चाहिए और सहृदय होना चाहिए। यह?ध्यान रखना भी जरूरी है कि संवेदना का विकास कैसे किया जाए। यह भाव हृदय का विषय है। संवेदना के जाप मात्र से यह उत्पन्न नहीं हो जाता। इसे जगाने के लिए कुछ निश्चित अभ्यास भी अनिवार्य हैं।
अंतर्जगत् की सभी वृत्तियाँ व्यवहार से ही पहचानी जाती हैं। भीतर करुणा हो, तो आँखों में तरलता और आचरण में सेवा-सत्कार प्रकट होने लगते हैं। भीतर ईर्ष्या, द्वेष हो तो आँखों में छल और व्यवहार में दूसरों की टाँग खिंचाई करने वाली हरकतें आती हैं। साधकों के लिए कठिनाई यह है कि व्यक्त होने वाला आचरण यदि भीतर बैठी और पल रही वृत्तियों से नियंत्रित है, तो उस वृत्ति को कैसे बदले? न चाहते हुए भी क्रोध आ ही जाता है, अनजाने ही दूसरों का अपमान हो जाता है, उनके प्रति अपशब्द निकलने लगते हैं, चित्त क्षुब्ध होने लगता है।
संवेदना जगाने के अभ्यासक्रम में विलोम गति का मार्ग अपनाया जाता है। आचरण अभ्यंतर वृत्ति का व्यक्त रूप है। वृत्ति को व्यक्त नहीं होने दें, अथवा किसी को निशाना नहीं बनाएँ, तो समाधान संभव है। आचरण अंदर की वृत्ति को बाहर लाता है, अभिव्यक्ति का माध्यम बनता है। उस पर नियंत्रण वापस भीतर ले जाएगा, अभिव्यक्ति की निरोधात्मक वृत्ति को शाँत करेगा। अग्नि लौ के रूप में प्रकट होती है और आक्सीजन का आहार लेती है। आक्सीजन नहीं मिली, तो लौ बुझ जाती है। वृत्तियों पर नियंत्रण पाना हो, तो उन्हें आचरण का आहार नहीं मिलना चाहिए।
संवेदना हृदय की सबसे कोमल वृत्ति है। जड़ता और क्रूर भाव इससे विपरीत हैं। व्यवहार में यदि किसी के प्रति क्रूर और कठोर न हुआ जाए, तो संवेदना का उद्भव सुनिश्चित है। आरंभ यहाँ से किया जाता है कि किसी के प्रति कठोरता का भाव आए, तो उसे व्यक्त नहीं किया जाए। भीतर जो भी भाव आए उसे आकाश में उछाल दें। किसी को कोसने का मन करे, तो अच्छा यही है कि मुँह से अपशब्द निकले ही नहीं। यदि इतना नियंत्रण न रहे तो कम-से-कम इतना ही कर लिया जाए कि संबंधित व्यक्ति के सामने कुछ न कहकर मन-ही-मन आकाश की ओर देखते हुए ही जो कहना हो, कह दें। गाली देने का मन हो तो वह भी आकाश में ही उछाल दें। मनोविद मनते हैं कि इस अभ्यास से ऐसी वृत्तियों से मुक्ति मिलती है। क्रूर-कठोरता का भाव तिरोहित होता है और उसके स्थान पर कोमलता विकसित होने लगती है।
कठोरता से छुटकारे का प्रथम चरण उसे व्यवहार में नहीं आने देना है। यह अभ्यास चलता रहे, साथ में अगला चरण अपने आसपास के जगत् से कोमल संबंध विकसित करने के रूप में है। योगी आनंद भिक्षु ने इसके लिए छोटे-छोटे सूत्र दिए हैं। उनके अनुसार “जब तुम चलो तो पहले दस कदम यह भाव जाग्रत रखते हुए चलो कि तुम्हारे पाँव से पृथ्वी को आघात न लगे। शुरू में दस कदम भी इस भाव को जाग्रत् रखते हुए चलो कि तुम्हारे पाँव से पृथ्वी को आघात न लगे। शुरू में दस कदम भी इस भाव को जाग्रत् रखते हुए चल सकें, तो आगे की यात्रा आसान होगी।
सनातन धर्म की परंपरा में यह अभ्यास दिनचर्या के आरंभ से ही कराया जाता है। सुबह बिस्तर से उठते ही साधक पहले पृथ्वी से क्षमा माँगता है कि मैं आपके ऊपर पाँव रख रहा हूँ। हे माँ! मुझे इस अपराध के लिए क्षमा करना। पृथ्वी के प्रति यह भाव त्यक्त करते हुए श्लोक भी है और जो लोग इस अनुशासन का पालन करते हैं, वे पृथ्वी को सचमुच माँ मानकर अपने हृदय को धन्य बनाते हैं।
योगी आनंद भिक्षु ने दूसरा अभ्यास यह बताया है कि जब तुम पानी पीओ तो आहिस्ता-आहिस्ता घूँट भरो। मन-ही-मन यह भाव रखो कि तुम्हारे दाँतों से पानी को चोट न लगे और तुम्हारा कंठ उस जल को अनावश्यक रूप से न दबाए, बल्कि उसे गले से नीचे उतरने में भावभरा सहयोग दे।
तीसरा अभ्यास वाणी से संबंधित है। दूसरों के प्रति हमारा व्यवहार सत्तर प्रतिशत वाणी से ही संपन्न होता है। अभ्यास में सिर्फ यह ध्यान रखना है कि बोलते समय शब्दों के चयन और स्वरों के निर्धारण पर ज्यादा ध्यान दें। दिनभर में एक घंटे का समय इस अभ्यास के लिए दें। शेष समय संयत और मधुर वचन बोलने पर कितना ही ध्यान दें, लेकिन इस अवधि में सब कुछ भूल जाना है। सिर्फ यह भाव जगाएँ रखना है कि जिस किसी के संपर्क में आ रहे हैं, उससे बातचीत तो हो रही है, लेकिन बात करते हुए शब्द नहीं कहे जा रहे, कुछ उपहार दिया जा रहा है। वह उपहार मंदिर से लिए प्रसाद की तरह है, कोमल पुरुष की तरह है, किसी दुखी और रुग्ण व्यक्ति के प्रति व्यक्त की गई सहानुभूति की तरह है। कुशलक्षेम पूछें, तो यह मानकर चलें कि वह पूछ- परख मात्र कंठ से नहीं आई है, बल्कि हम अपने आपको एक पुस्तक की तरह खोल रहे हैं। यों समझें कि संपर्क में आने वाले व्यक्ति के लिए आराम से बैठने की जगह बना रहे हैं। एक घंटे का यह अभ्यास सिद्ध होने के बाद बढ़ाया जा सकता है और धीरे-धीरे पूरे दिन तक बढ़ाया जा सकता है।
चौथा अभ्यास देखने की क्रिया से जुड़ा है। जब हम किसी को देखते हैं, तो वह निरपेक्ष और कोरा देखना ही नहीं होता। उस क्रिया के साथ राग, आकर्षण, ईर्ष्या, तिरस्कार, विषाद, दया आदि के विविध भाव भी प्रक्षेपित होते हैं। इस अभ्यास के लिए आधा घंटा समय पर्याप्त है। करना सिर्फ इतना है कि अपने प्रियपात्र को याद करें। जिसे सबसे ज्यादा चाहते हैं, उसका ध्यान करे। वह इष्ट-आराध्य भी हो सकता है, माता-पिता भी हो सकते हैं, संतान भी हो सकती है और पत्नी या प्रेयसी भी हो सकती है। ध्यान रहे जितने भी लोगों के संपर्क में आना पड़ता है, सभी प्रियपात्र नहीं होते। कोई एक संबंध को याद करें और उसके प्रति जैसे भाव उमड़ते हैं, उन्हें अनुभव करते हुए अभ्यास की अवधि में पूरे समय उनको ही आँखों में बसाए रखें। प्रियतम पात्र को देखते ही आँखों में जैसी तरलता आ जाती है, उसे आमंत्रित करें और संपर्क में आने वाले व्यक्ति को निहारें, वस्तुओं को देखें।
पाँचवें अभ्यास में गंध को माध्यम बनाया जा सकता है। किसी बगीचे में जाएँ और वहाँ लगे फूलों को निहारें। निहारते हुए किसी क्षण इच्छा जग सकती है कि यह फूल तोड़कर अपने पास रख लिया जाए। जिस क्षण यह इच्छा जगे, उसी क्षण फूल की तरफ हाथ बढ़ाएँ और उसे दुलार कर हाथ वापस खींच ले। फूल को दुलारते समय समझें कि अबोध शिशु को स्नेह से सहला रहे हैं। बगीचे में रहने के दौरान सिर्फ फूलों की गंध अनुभव करें। उस अनुभूति से चित्त में उल्लास उमड़ता हुआ प्रतीत होगा। इस अभ्यास के लिए भी आधा घंटा समय पर्याप्त होगा। इस अभ्यास के लिए भी आधा घंटा समय पर्याप्त है।
पाँचों अभ्यास एक साथ चल सकते हैं। अलग-अलग भी किए जा सकते हैं। कोई एक अभ्यास नियत अवधि से ज्यादा समय तक भी किया जा सकता है। योगी विज्ञान भिक्षु ने इन अभ्यासों की तुलना फल का छिलका उतारने से की है। किसी भी भाग से उतारना शुरू करें, छिलका निकालने के बाद फल अपने रस और माधुर्य के साथ प्रकट हो जाता हैं। संवेदना सभी के भीतर विद्यमान है। उसे प्रकट करने के लिए थोड़ा जागरूकता भर आवश्यक है।
पाँच सप्ताह तक कोई भी या पाँचों अभ्यास निभा लेने के बाद जगत् के प्रति दृष्टि बदल जाती है, जो लोग संपर्क में आते हैं वे अति आत्मीय प्रतीत होने लगते हैं। उनका रूखा व्यवहार भी सही लगता है। उनके प्रति शिकायतें समाप्त हो जाती हैं ओर अहित चाहने वालों के प्रति भी मन में दुआएँ बरसने लगती हैं। संवेदना के अभ्यास में यह छूट भी है कि व्यवहार जगत् में कोई कठिनाई बढ़ती दिखाई दे तो अभ्यास छोड़ा जा सकता है। जिन लोगों ने ये प्रयोग किए हैं, उनके अनुभव हैं कि संवेदना जागने के बाद जीवन अधिक शाँत, सुव्यवस्थित और सरल होता चला जाता है। व्यक्तित्व से संगीत बजने लगता है। पाँच सप्ताह का अभ्यास पूरा कर लेने के बाद चेतना जिस स्थिति में पहुँच जाती है, उसमें संवेदना के लिए अलग से अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वह स्वभाव का एक अंग बन जाती है। अभ्यास सिद्ध हो जाने पर फिर उसके लिए अलग से समय नहीं देना पड़ता। लेकिन किसी को निराशा मिले, अभ्यास व्यर्थ हुआ प्रतीत हो, तो भी इस क्रम को आगे जारी रखा जा सके, तो यह अभ्यास व्यर्थ नहीं जाएगा। पूजे जाने पर पत्थर भी भगवान् बन जाते और आशीर्वाद देते, कामनाएँ पूरी करते हैं। भीतर विद्यमान् शक्ति के निर्झर को मुक्त प्रवाह में बहने देने की साधना निश्चित ही फलवती होगी, उसके शुभ परिणाम होंगे, यह विश्वास सुदृढ़ बनाया जा सकता है।
स्वामी विवेकानंद की परंपरा में आचार्यों ने संवेदना जगाने के व्यावहारिक उपाय सुझाए हैं। सिर्फ महिमा गाते रहने से ही काम नहीं चलता कि सजग रहना चाहिए और सहृदय होना चाहिए। यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि संवेदना का विकास कैसे किया जाए। यह भाव हृदय का विषय है। संवेदना के जाप मात्र से यह उत्पन्न नहीं हो जाता। उसे जगाने के लिए कुछ निश्चित अभ्यास भी अनिवार्य हैं।
प्रजापति ब्रह्मा ने वृक्ष बनाए, वनस्पति बनाई, छोटे-छोटे जीव-जंतु बनाए, बड़े-बड़े जीवधारी बनाए, पशु और पक्षी बनाए और जब देखा कि इनमें से एक भी सृष्टि को व्यवस्थित रख सकने में समर्थ नहीं, हर जीव खुदगर्ज साबित हुआ, तब विधाता ने संपूर्ण प्रतिभा और ज्ञानसम्पन्न मनुष्य का निर्माण किया। मनुष्य को अपने समान क्षमतावान् देखकर विधाता चिंता दूर हुई, सृष्टि की व्यवस्था मनुष्य को सौंपकर वे अपनी थकावट मिटाने के लिए शयन करने लगे।
एक हजार वर्ष की नींद टूटी तो विधाता ने देखा, द्वार पर जीव-जंतुओं की भारी भीड़ जमा है। विधाता को जगाने और अपनी शिकायत पेश करने के लिए सब दरवाजा खटखटा रहे थे, नारे लगा रहे थे। चकित विधाता दरवाजा खोलकर बाहर निकले और जीव-जंतुओं से उनके दुःख का कारण पूछा। जीवों के प्रमुख प्रतिनिधियों ने बताया-भगवन् आपने मनुष्य को बनाया था सृष्टि की व्यवस्था के लिए, पर यह तो हम सबको ही सताए और नष्ट किए डाल रहा है।
सृष्टि का सौंदर्य नष्ट होता देखकर विधाता बहुत चिंतित हुए और बोले-बच्चों दुःख न करो! मनुष्य ने अपनी सद्बुद्धि को दुर्बुद्धि में बदलकर आप लोगों का उतना अहित नहीं किया, जितना अपना पतन किया है। जाओ कुछ दिन और प्रतीक्षा करो, एक दिन उसकी यह दुर्बुद्धि ही उसे पशुवत् जीवन में ले जाएगी, तब वह स्वयं ही अनुभव करेगा कि यदि-हम भी पशुओं की तरह ही जीवन जीते हैं, तो मनुष्य शरीर पाने का क्या लाभ?’ यह ज्ञान ही उसे पश्चाताप और सुधार की प्रेरणा देगा, तभी सुख-शाँति स्थापित होगी। वह स्वयं ही गिरा है तथा उठेगा भी स्वयं ही।’
देवालयों-उपासनागृहों की आस्तिकता संवर्द्धन से लेकर समाज में लोकोपयोगी प्रवृत्तियों के संचालन तक एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण स्थापना है ये आस्था के केंद्र। क्यों इन्हें यह महत्व मिला एवं समय के साथ बढ़ते नैतिक अवमूल्यन के फलस्वरूप आज उनका स्वरूप क्या है? कैसे उनके मूलभूत आधार को जीवंत कर इन स्थापनाओं से प्रेरणा ली जा सकती है? पढ़ें इस संबंध में।
भारत ही नहीं, दुनिया के सभी धर्मों में अपने-अपने आराधना केंद्रों को भव्य, सुसज्जित, व्यवस्थित और समृद्ध बनाने के प्रयत्न किए गए हैं। इन केंद्रों से संबंधित धर्म-संप्रदाय या विश्वास के अनुयायियों को तृप्ति मिलती रही है। यही कारण है कि प्रत्येक अनुयायी अपने इष्ट-केंद्र के लिए कुछ-न-कुछ सहयोग, दान या सेवा प्रस्तुत करता रहता है। देखा तो यहाँ तक गया है कि अपने पास जो भी श्रेष्ठ और मूल्यवान् है, उसे समर्पित करने की होड़ भी लगती रही है। यह उत्साह बिना विशेष लाभ हुए नहीं जागता। लोग किसी संस्था या व्यक्ति को दस रुपये दान में देने से पहले दस बार सोचते-परखते हैं कि संबंधित व्यक्ति या संस्था अधिकारी है अथवा नहीं। पहले यह विचार भी आता है कि जिसके लिए यह आर्थिक सहयोग प्रस्तुत किया जा रहा है, उससे हमें क्या लाभ हुआ और भविष्य में क्या लाभ होगा? पूजा गृहों, आराधना केंद्रों या देवस्थानों के लिए बहुमूल्य और श्रेष्ठ वस्तुएँ समर्पित की जाती हैं, तो वहाँ भी यही नियम या मानदंड काम करता है। वहाँ किसी भी प्रकार का निर्धारण न करते हुए चेतन-अचेतन रूप से यही प्रक्रिया चलती रहती है कि उस आराधना केंद्र ने लोकमंगल के क्षेत्र में कितना कुछ किया है।
विभिन्न धर्मों में आराधना केंद्रों का स्वरूप प्रायः एक समान रहता है। भवन और स्थान की सज्जा के अलावा पूजा-उपासना की जगह, वेदी, दिशा, मूर्ति या प्रतीकों के स्वरूप में आमतौर पर एकरूपता रहती है। भारतीय धर्म-परंपरा में ही अंतर रहता है। उसे अंतर न कहकर वैशिष्ट्य ही कहा जाना चाहिए। साधक का अपनी श्रद्धा भावना और आवश्यकता के अनुरूप प्रतीक चुनने की स्वतंत्रता सिर्फ भारतीय धर्म में ही उपलब्ध है। किसी भी प्रतीक, स्वरूप, इष्ट और स्थान को मानें, सबके लिए मार्ग और उपाय भारतीय धर्म-संस्कृति में उपलब्ध हैं।
अपने देश में निवास, प्रतिष्ठान, व्यावसायिक केंद्र और कार्यालय से भी ज्यादा महत्व मंदिरों को दिया गया है। इष्ट-आराध्य के अनुसार अलग-अलग मंदिर हैं। स्वतंत्रता उन लोगों के लिए भी है, जो मंदिरों और उनमें विराजित विग्रहों की आलोचना करते हैं, लेकिन उनसे आग्रह भी है कि बैर-विरोध त्यागें और उन लोगों के मन में अश्रद्धा उत्पन्न न करें, जो प्रतीकों के बिना आगे नहीं बढ़ सकें। परमसत्ता के सूक्ष्म स्वरूप को ग्रहण कर आगे बढ़ने वाले मेधावी साधक भी बहुत हैं, लेकिन उनकी संख्या, प्रतीक और उनके लिए बने मंदिरों पर ही निर्भर रहने वालों की तुलना में बहुत कम है। खुले आकाश तले शून्य का ध्यान करके भी हजारों ने निर्वाण प्राप्त किया है, लेकिन मूर्ति और मंदिर के सहारे आगे बढ़ने वालों की संख्या करोड़ों में होगी।
देव-संस्कृति में मंदिरों का प्रावधान व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकता को ध्यान में रखकर किया गया है जब कोई व्यवस्था व्यापक रूप से की जाती है, तो वह सामान्य लोगों के लिए ही होती है। भारत के गाँव-गाँव में मंदिर हैं। सामान्य अर्थों में मंदिरों का निर्माण वहाँ रहने वाले लोगों के निवास की तुलना में श्रेष्ठ ही होता है। सैकड़ों गाँव है, जहाँ मिट्टी के घर बने हुए हैं, एक भी घर पक्का नहीं है, लेकिन मंदिर पक्का बना हुआ है। सामान्य लोग जिस तरह का भोजन करते हैं, उससे अच्छा भोग-प्रसाद भगवान् को चढ़ाया जाता है। मंदिरों को इतना महत्व इसलिए दिया जाता है कि वे व्यक्ति की आँतरिक अभीप्सा को तृप्त करते हैं- वहाँ पड़े रहने वाले खालीपन को भरते हैं।
उच्चकोटि के साधक बिना किसी माध्यम या प्रतिष्ठान के आत्मिक जगत में बहुत ऊपर तक जा सकते हैं, लेकिन सामान्य साधकों के लिए मंदिर और प्रतीक ही उपाय हैं। यह कहना बहुत सरल है कि ईश्वर निराकार और सर्वव्यापी है, उसके लिए मंदिर या देवस्थान जाने की जरूरत नहीं। वह सभी जगह व्याप्त है तो इस क्षण हम जहाँ हैं, वहाँ भी वह मौजूद है? आपत्ति का निराकरण करते हुए स्वामी रामतीर्थ ने लिखा है कि भगवान् निस्संदेह प्रत्येक वस्तु, प्राणी और स्थान में व्याप्त है। कहा जा सकता है कि यह सिद्धांत चरितार्थ हो जाता है क्या? अगर हम समझते हैं कि परमात्मा सर्वव्यापी है, वह सब कुछ देखता है तो क्या हम किसी को धोखा नहीं देते, सबके प्रति सही और प्रामाणिक व्यवहार करते हैं, तो ठीक है वरना कहे गए सिद्धांत कोई अर्थ नहीं रखते। क्या किसी को सचमुच यह
अनुभव हुआ है कि ईश्वर निराकार और सर्वव्यापी है, तो उसे मंदिर जाने की कोई जरूरत नहीं है? तब उसका चरित्र और चिंतन भी उसी स्तर का होना चाहिए अन्यथा प्रतीक और प्रतिष्ठान का आश्रय लेना परम आवश्यक है।
अध्यात्मविद् मनीषियों की दीर्घकाल तक की गई साधना और उससे हुए अनुभवों के निचोड़ से मंदिरों का विज्ञान निकला है। मंदिरों के शिल्प और कर्मकाण्ड पर शास्त्र लिखे गए हैं। ‘समराँगण सूत्र, ‘ ‘आलय विज्ञान’ ‘वास्तुशास्त्र’, आदि ग्रंथों में शिल्प और उसके प्रभाव की चर्चा है। उनके सार-संक्षेप की चर्चा करें तो यह कि मंदिर का स्वरूप और व्यवस्था, दोनों ही व्यक्ति को अंतर्जगत् में -उत्कर्ष की दिशा में ले जाने के लिए है।
वास्तुकला की दृष्टि से मंदिर का स्वरूप आसन लगाकर बैठे एक साधक की तरह है। सतह से ऊपर तक, पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक वह मनुष्य-शरीर का ही प्रतीक है; एक ऐसा मनुष्य-शरीर जो आसन लगाकर बैठा है और जिसमें सिर, हृदय, ग्रीवा, रीढ़, उदर आदि सभी कुछ है। मंदिर में भी शिखर होता है, गोपुर, मंडप, अंतःपुर, गर्भगृह होते हैं। इन अंगों के अलावा छोटे-बड़े सभी अंग-अवयव होते हैं। शरीर में हृदय है, वहाँ भगवान का निवास है। मंदिर के बिलकुल भीतर जाकर एक गर्भगृह होता है, इसे हृदय प्रदेश भी कहते हैं, जहाँ इष्टदेव विराजते हैं।
दक्षिण भारत के मंदिरों में गर्भगृह को सादा-सरल रखा जाता है। बाहरी बनावट बहुत भव्य, विशाल और जगमग करती हुई होती है, लेकिन जहाँ विग्रह बिठाया जाता है, वहाँ अँधेरा रहता हैं। बिजली तो दूर, दिए की रोशनी तक नहीं होती। श्रद्धालु वेदी के पास जाते हैं तो पुजारी कपूर जलाकर थोड़ी सी रोशनी करते हैं। मद्धिम-सी रोशनी से देव प्रतिमा के दर्शन होते हैं। इस व्यवस्था का शिल्प शास्त्रीय महत्व तो यह है कि देव प्रतिमा चकाचौंध करने वाले प्रकाश से आलोकित नहीं होनी चाहिए। तेज रोशनी से प्रतिमा तो पूरी तरह प्रकाशित हो जाती है, लेकिन श्रद्धालु का चित्त एकाग्र नहीं होता, विग्रह में स्थिर नहीं होने पर मन भटकता रहता है। कपूर का प्रकाश शान्तिदायक और पवित्र होता है।
गर्भगृह में जगमग रोशनी नहीं करने और विग्रह को दूर से ही देखने का विधान है। इस व्यवस्था के आध्यात्मिक अर्थ भी हैं, उनके अनुसार गर्भगृह में बहुत अँधेरा रखने का संदेश है कि परमात्मा हमारे हृदय में ही आसिन है (हृदयेश अर्जुन तिष्ठति” गीताकार के अनुसार )। वह अविद्या के अंधकार से आच्छादित है। उस आच्छादन को ज्ञान का शीतल आलोक ही हटा सकता है। स्मरण रहे, तीव्र प्रकाश वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप को अतिरंजित करता है। वह आक्रामक भी होता है। उसके कारण विग्रह प्रकाशित तो होता है, लेकिन आवेश-उत्तेजना का भाव भी जन्म लेता है। शीतल, मध्यम और शाँत प्रकाश ही अंतस् में स्थित ईश्वर या इष्ट के दर्शन कराता है। उपनिषद् के ऋषि प्रार्थना भी करते हैं कि हे प्रभु करो और अपने स्वरूप को ढाँप लेने वाले तीव्र प्रकाश को समेट लो। वह प्रकाश हमें आपके स्वरूप के दर्शन नहीं करने देता। ईशावास्यं उपनिषद् के ऋषि की इस प्रार्थना पर पश्चिम के विद्वानों ने प्रश्नचिह्न लगाए हैं। उनके अनुसार अंधकार परमात्मा को आवृत्त कर लेता है, यहाँ तक तो ठीक है प्रकाश उनके स्वरूप को कैसे ढाँप लेता है? ऋषि की प्रार्थना है कि “हे सबका भरण-पोषण करने वाले परमेश्वर! आपका सत्यस्वरूप श्रीमुख प्रकाश के पात्र से ढका हुआ है। उस पात्र को हटा लीजिए और स्वयं को प्रकट होने दीजिए।” ईशावास्योपनिषद्-श्लोक क्र. 15)
मंदिर के गर्भगृह में तेल का दीपक जलाना निषिद्ध है। दीपक सिर्फ घी के ही जलाए जाते हैं। इसका कारण भी प्रकाश को शीतल रखना है। शीतल प्रकाश को चाँदनी से समझा जा सकता है। सूर्य का प्रकाश तप्त करता है; जबकि चंद्रमा से शीतलता मिलती है। तेल का दीपक तीव्र प्रकाश तो नहीं देता लेकिन उसकी आभा तमस् लिए रहती है। इसीलिए लोक देवताओं और अशरीरी शक्तियों की आराधना तेल के दीपक से की जाती है। मंदिरों में इनकी वर्जना का उद्देश्य कम-से-कम आवेश उत्पन्न होने देना है। मानवीय चेतना अविद्या-अंधकार से आच्छादित है। उसे दूर करने के लिए घी या कपूर का शीतल प्रकाश ही उद्बोधित करता है। कपूर सुगंध का घना रूप है। जलने के बाद उसका कोई अवशेष राख के रूप में नहीं बचता, वह सुगंध के रूप में चारों तरफ फैल जाता है। संस्कृत में सुगंध के लिए ‘वास’ शब्द प्रचलित है। यह पद चित्त की समस्त विरोधी वृत्तियों और संस्कारों को इंगित करता है। कपूर जलाने की प्रक्रिया उन्हें अपने इष्ट की ओर मोड़कर जीवन को सार्थक बनाती है।
आरती के बाद थाली में रखा हुआ दीपक मंदिर में उपस्थित जनों के सामने ले जाया जाता है। वहाँ आए श्रद्धालु अपनी दोनों हथेलियों को लौ के ऊपर ले जाने का उपक्रम करते हैं, फिर हथेलियों को अपनी आँखों से छुआते हैं। आँखें वस्तुतः शरीर की सबसे संवेदनशील इंद्रिय हैं। वे प्रभाव ग्रहण भी करती हैं और उत्पन्न भी। दीपक की लौ का ताप जब आँखों से छुआया जाता है तो आरती उत्कृष्ट प्रक्रिया, उसका सूक्ष्म प्रभाव और वहाँ मौजूद श्रद्धालुओं के भाव आरती लेने के क्रम में अपने भीतर प्रवेश करते हैं। स्वामी तेजोमयानंद (चिन्मय मिशन) ने इस प्रक्रिया का अध्यात्म भाव यह बताया है कि इस तरह हम आरती के माध्यम से आए प्रकाश को अपने नेत्रों के सम्मुख हमेशा रखना चाहते हैं। जिस प्रकाश ने अपने इष्ट के विग्रह का दर्शन कराया, वह अंतर्जगत् में प्रवेश कर वहाँ बैठे परमात्मा को भी आलोकित करे, यह प्रार्थना उसके मूल में होती है।
आरती की थाली में रखे गए पैसे परमात्मा को निमित्त बनाकर अपनाई गई उदारता का संदेश देते हैं। मंदिरों में इन दिनों जो भी होता हो, उनका निर्माण और व्यवस्था लोककल्याण की गतिविधियाँ चलाने के निमित्त ही होता है। मंदिरों में नृत्य, संगीत, कला, साहित्य और सेवा की गतिविधियाँ अबाध चलती रही हैं, वरन् इन्होंने मंदिर परिसर में सबसे ज्यादा प्रश्रय पाया। विद्वानों, प्रतिभाओं और कलाकारों को प्रश्रय देने में मंदिर, राज्य और व्यवसाय जगत् से बहुत आगे रहे हैं। आरती के थाल में पैसे रखने की प्रक्रिया कला-संस्कृति और कल्याणकारक प्रवृत्तियों में योगदान का ही प्रतीक है। संदेश यह है कि अपनी कमाई का एक अंश समाज के लिए भी सुरक्षित रखना चाहिए।
प्रसाद वितरण आरती और देवपूजा का समापन सूचक दिव्य-कर्म है। प्रसाद में कुछ मीठे व्यंजन या फल बाँटे जाते हैं। वे पवित्रता, प्रसन्नता, हर्ष और शाँति की भावना लिए होते हैं। प्रसाद शब्द का मूल अर्थ प्रसन्नता है। यह पूजा-आरती की परिणति है। दिव्य अथवा आध्यात्मिक वातावरण में किए गए कर्मों या कार्यों का प्रभाव एकाकी प्रयत्नों की तुलना में कई गुना ज्यादा होता है। संदेश तो यह है ही कि अपने इष्ट या मंदिर के अधिष्ठाता देव के हृदय के साथ जुड़ना चाहिए। यह योग जीवन में माधुर्य और आनंद रस की सृष्टि करता है।
अध्यात्म विज्ञान के साथ लोक-शिक्षण की आवश्यकता पूरी करना भी मंदिरों का प्रमुख कार्य रहा है। इन दिनों यह कार्य लगभग बंद हो चला है। पूजा-पाठ के बाद भजन कीर्तन से लेकर गपबाजी तक, सभी काम होते हैं, लोक-शिक्षण और संस्कार की प्रक्रिया भर नहीं चलती। इस प्रक्रिया को फिर शुरू करना चाहिए। सुलझे विचारों के वक्ता यदि नहीं मिलें तो स्वाध्याय की प्रक्रिया चलानी चाहिए। वक्ता का सुलझे विचारों वाला होना ही पर्याप्त नहीं है, उसकी मान्यताएँ उसके आचरण में भी झलकनी चाहिए, व्यक्तित्व कम-से-कम औसत से तो ऊपर हो। इतना हो सके तो मंदिर पुनः जीवंत और जाग्रत् हो सकें। समाज ने उन्हें ‘वरेण्य’ और श्रेष्ठ बनाया है, जिनके लिए समय, श्रम, साधन निकालना ही चाहिए। वे वरेण्य और श्रेष्ठ बने रहें, इसके लिए हमें जीवंत और जाग्रत् भी होना चाहिए।
आत्मज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि है- यह बोध हो जाना कि हम अपने आप में सर्वसमर्थ शक्तिमान् सत्ता हैं व अपना भविष्य स्वयं बना सकते हैं। स्रष्टा का यही तो सबसे बड़ा अनुदान है। पुरुषार्थी और आत्मबल-संपन्न व्यक्ति भाग्य के भरोसे बैठे नहीं रहते। वे हमेशा अपने चिंतन और प्रयासों को उत्कृष्टता से जोड़कर अपनी परिस्थितियाँ हों व बिना श्रम-प्रयास के सब अनुकूल होता चला जाए।
शास्त्रों में लिखा है-
कलिः शयानों भवति संजिहानुस्तु द्वापरः। उत्तिष्ठन्त्रेता भवति कृत संपद्यते चरन्॥ चरैवेति, चरैवेति॥
अर्थात्-सोते रहना ही कलियुग है, जागरणोपराँत जम्हाई लेना द्वापर है, उठ पड़ना ही त्रेता है, उठकर अपने लक्ष्य के लिए गतिशील हो जाना ही सतयुग है। अतएव लक्ष्य प्राप्ति के लिए चलते रहो, आगे बढ़ते रहो।
राजा जनक अपनी साज-सज्ज के साथ मिथिलापुरी के राजपथ पर होकर गुजर रहे थे। उनकी सुविधा के लिए सारा रास्ता पथिकों से शून्य बनाने में राजकर्मचारी लगे थे। राजा की शोभा यात्रा निकल जाने तक यात्रियों को अपने आवश्यक काम छोड़कर जहाँ-तहाँ रुका रहना पड़ रहा था।
अष्टावक्र को हटाया गया तो उन्होंने हटने से इनकार कर दिया और कहा-प्रजाजनों के आवश्यक कार्यों को रोककर अपनी सुविधा का प्रबंध करना राजा के लिए उचित नहीं। राजा अनीति करे, तो ब्राह्मण का कर्तव्य है कि उसे रोके और समझाए। सो आप राज्याधिकारीगण राजा तक मेरा संदेश पहुँचाएँ और कहें कि अष्टावक्र ने अनुपयुक्त आदेश मानने से इनकार कर दिया है। वे हटेंगे नहीं और राजपथ पर ही चलेंगे।
राज्याधिकारी कुपित हुए और अष्टावक्र को बंदी बनाकर राजा के पास ले पहुँचें। जनक ने सारा किस्सा सुना तो वे बहुत प्रभावित हुए और कहा-ऐसे निर्भीक ब्राह्मण राष्ट्र की सच्ची संपत्ति हैं। उन्हें दंड नहीं सम्मान दिया जाना चाहिए।
राजा जनक ने अष्टावक्र से क्षमा माँगी और कहा-मूर्खतापूर्ण आज्ञा राजा की ही क्यों न हो, तिरस्कार के योग्य है। आपकी निर्भीकता ने हमें अपनी गलती समझने और सुधारने का अवसर दिया। आज से आप राजगुरु रहेंगे और इसी निर्भीकता से सदा न्याय पक्ष का समर्थन करते रहने की कृपा करेंगे। उन्होंने प्रार्थना स्वीकार कर जनहित हेतु राजगुरु का पद स्वीकार कर लिया।
शरीर तो माता-पिता के रज -वीर्य से बना है। उन्हीं के संरक्षण में बालक का पालन पोषण होता है और उसे शिक्षा-दीक्षा मिलती है। दिखाई देने वाले इन उत्तरदायित्वों की पूर्ति के लिए ही सुसंस्कारी व्यक्ति माता-पिता के प्रति श्रद्धासिक्त भाव से कृतज्ञ रहते हैं। असमर्थ और अशक्त स्थिति में पालन-पोषण करने और शिक्षा-दीक्षा दिलाकर योग्य बनाने जैसे मोटे कार्यों के लिए ही यदि कृतज्ञ हुआ जा सकता है, तो उसे परमपिता के प्रति कितना कृतज्ञ होना चाहिए, जिसका संरक्षण हर पल उपलब्ध रहता है और जिसके अनुदानों से मनुष्य का रोम-रोम उपकृत होता है।
मानवीय कलेवर भ्रूण जैसी अत्यधिक कोमल और संवेदनशील स्थिति में माता के गर्भ में जन्म लेता है। उसे यों ही खुला छोड़ दिया जाए, तो वह अपनी कोमलता और अत्यधिक संवेदनशीलता के कारण वैसे ही नष्ट हो गया होता, जैसे खुली वायु और धूप में कीट -पतंगे नष्ट हो जाते हैं। उसे वायु, ताप और अन्य प्राकृतिक परिस्थितियाँ ही नष्ट कर डालतीं। लेकिन परमात्मा ने उसके लिए गर्भाशय के रूप में एक ऐसा वातानुकूलित एवं सर्वसुविधासंपन्न निवास तैयार किया, जो भ्रूण के लिए सभी प्रकार से अनुकूल है।
भ्रूण अपनी कोमलता और संवेदनशीलता के कारण इस योग्य नहीं होता कि उसका विकास खुले में हो सके। इसलिए चारों ओर से बंद कोठरी-गर्भाशय में ही उसके विकास की समस्त सुविधाएँ उचित मात्रा में मिलती रहती हैं। जन्म के पूर्व ही उसके लिए माँ के दूध जैसा संतुलित आहार उपलब्ध कराकर परमात्मा ने कितनी करुणा दर्शाई है। जन्म लेने के बाद असहाय और असमर्थ शिशु के लिए न केवल भौतिक सहायताएँ ही आवश्यक थी, वरन् उसके लिए भावनात्मक सुविधाएँ भी जरूरी थीं। वे समस्त सुविधाएँ शिशु को कुटुंब में, समाज में, समुदाय में मिल जाती हैं। इस तरह जीवसत्ता परिपक्व रूप में सामने आ जाती है।
जन्म से पूर्व ही संरक्षण, विकास और पोषण की इतनी सुंदर सुव्यवस्था प्राप्त होने के बाद भी यह कितने आश्चर्य की बात है कि दूसरों के सहारे बढ़ा और विकसित हुआ मनुष्य न केवल सामाजिक कर्तव्यों के प्रति कृतघ्नता का परिचय देने लगता है, अपितु अपने परम पिता को-अपनी मूलसत्ता को ही भुला बैठता है। इस विस्मरण या कृतघ्नता से भी वह कारुणिक सत्ता सुप्रसन्न नहीं होती, वरन् अपने अनुदानों का क्रम जारी रखती है। वह दयालु पिता अपने शिशु के यौवन में प्रवेश करते ही उसकी ममता, स्नेह-सहयोग की आकांक्षा और जीवनसाथी की आवश्यकता पूरी करने के लिए उपयुक्त व्यवस्था करता है। कहना न होगा कि ईश्वर की कृपा से ही नारी को नर में और नर को नारी में अपनी पूर्णता प्राप्त करने की सुविधा प्राप्त हुई। इतना ही नहीं, विजातीय तत्वों के आक्रमण से उत्पन्न क्षमता और प्रतिकूलताओं से अपने अस्तित्व की रक्षा की जन्मजात सुविधाएँ भी परमेश्वर की कृपा से ही प्राप्त हुई। मनुष्य में रोगों से लड़ने की शक्ति उसके रक्तकणों में, शारीरिक अवयवों की सुरक्षा उसकी त्वचा के द्वारा, देखने के लिए आँखें, सुनने के लिए कान और विचार करने के लिए उन्नत मस्तिष्क जैसी सुंदर मशीन उसी परमात्मा की देन है। आज तक इतनी सारी विशेषताओं से संपन्न कोई यंत्र न तो कोई बना सका और आगे भी कोई बना पाएगा-इसमें संदेह ही है, जो हर परिस्थिति से जूझने, मुड़ने, लचकने या सँभालने में सक्षम हो।
आँख जैसी रेटिना, कान जैसा परदा, गुर्दे सरीखा सफाई उपकरण, हृदय जैसा पोषण संस्थान और पाँव जैसा सुंदर वाहक बनाने वाली सत्ता कितनी बुद्धिमान् होगी इसकी तुलना न तो किसी इंजीनियर से की जा सकती है, न ही किसी डॉक्टर से। वह प्रत्येक कला-कौशल का ज्ञाता, सर्वनिष्णात, सर्वप्रभुतासंपन्न और सर्वशक्तिमान केवल परमात्मा ही हो सकता है। इससे कम मानना न सिर्फ उस परमेश्वर की अवमानना होगी, वरन् यह एक प्रकार से स्वयं कर आत्मघात भी होगा।
यह तो शरीर के रूप में जीवात्मा को प्राप्त हुए एक दुर्ग भर की चर्चा हुई। यदि इस दुर्ग की रचना प्रक्रिया को देखा जाए, तो और भी विस्मय-विमुग्ध रह जाना पड़ता है। इस दुर्ग का निर्माण बहुत ही छोटे-छोटे घटकों से हुआ है, ठीक वैसे ही जैसे एक मकान का निर्माण ईंटों से होता है। कहा जा सकता है कि शरीर में तो हड्डी, रक्त, माँसपेशियाँ, हृदय, मस्तिष्क आदि बहुत-से-अंग-अवयव होते हैं, लेकिन मकान में भी तो फर्श,दीवार, अलमारियाँ, मेहराब आदि होते हैं। इन सबका निर्माण जिस प्रकार ईंटों से होता है, उसी प्रकार मनुष्य शरीर का निर्माण छोटे-छोटे काष्ठों से मिलकर होता है। ये कोष्ठ इतने सूक्ष्म और छोटे होते हैं कि उन्हें आँखों से नहीं देखा जा सकता। वे सिर्फ सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा ही देखे जा सकते हैं। अरबों, खरबों की संख्या में विद्यमान् इन काष्ठों की यह विशेषता ही कहनी चाहिए कि ये समय-समय पर ये अपना नवीनीकरण करते रहते हैं और जो कोष्ठ वृद्ध, अक्षम और निष्क्रिय हो जाते हैं। वे उनके उस मृत आवरण को उतार फेंकते एवं पलभर की भी देरी किए बिना वे उनका उत्तरदायित्वों सँभाल लेते हैं।
रक्त के रूप में ईश्वर ने शरीर को एक चौकस सुरक्षा तंत्र भी उपलब्ध कराया है। करोड़ों की संख्या में उसमें विद्यमान् श्वेत रक्त कणिकाएँ मिलिटरी-पुलिस की भूमिका निभाती हैं। वे सजग प्रहरी की तरह हमेशा अपने कार्य में मुस्तैद रहते हैं। जब भी कोई विषाणु काय-प्रणाली पर हमला बोलकर उसकी क्रिया−कलाप को बाधित करना चाहता है, तो वे तत्काल सक्रिय होकर उसे निरस्त करते और क्रिया प्रणाली की सुव्यवस्था को सुचारु ढंग से बनाए रखने की गारण्टी देती हैं। इस प्रकार की सुरक्षा-व्यवस्था किस देश-समाज में हो सकती है? यह परमात्मा की ही कृपा और उसी की अनुकंपा है कि शरीर दुर्ग के रूप में जीवात्मा को रहने के लिए इतना सुंदर, सुसज्जित और सुरक्षित आवास मिला है।
फिर भी ईश्वर के अनुदान यहीं आकर समाप्त नहीं हो जाते। उसने अग्नि में चिनगारी, पदार्थ में परमाणु और सूर्य में किरणों की तरह मनुष्य की अंतर्गुहा में स्वयं बैठाकर उसे प्रतिपल आत्मोत्कर्ष की प्रेरणा देने का दायित्वपूर्ण कार्य संभाला है। गलत मार्ग पर चलने से पहले ही वह रुकने के लिए प्रेरित करता है; पर मनुष्य अंतःकरण की उस पुकार को सुनकर भी अनसुनी करता और स्वेच्छाचारिता बरतता है, तो उसका दंड रोग, शोक, क्लेश, कलह तथा मानसिक संताप के रूप में भुगतता रहता है और माया से मूढ़ बना भ्रमजाल में पड़कर जीवन के बहुमूल्य क्षण मिट्टी के मोल नष्ट करता रहता है। इससे बड़ी मूढ़ता और क्या होगी?
ईश्वरीय सत्ता की अंतरंग गुहा में विद्यमानता को प्रमाणित करते हुए हर्बर्ट स्पेंसर ने कहा है कि ईश्वर एक विराट् शक्ति है और प्राणिमात्र के प्रति वात्सल्य भाव से पूरित है, क्योंकि वह समय-समय पर डरा-धमकाकर पुण्यफल का प्रलोभन देकर मनुष्य को बुराइयों से बचाती तथा अच्छाइयों के प्रति प्रोत्साहित करती है। राज्य के नियमों को हम इसलिए मानते हैं कि न मानने पर राजदंड का भय उत्पन्न होता है, जबकि हम उनका पालन करने या न करने के लिए स्वतंत्र रहते हैं। यह भय हृदय में विराजमान् परमात्मा द्वारा ही बजाई गई खतरे की घंटी होती है। जो इसे सुनकर सतर्क हो जाता है, उसका कल्याण होता है। न सुनने वाले का तो अमंगल निश्चित है ही।
जन्म के पूर्व से लेकर जीवन सत्ता के अस्तित्व में आने परिपक्व होने, क्रियाशील और समर्थ बनने तक परमात्मा जीव को गोदी में खिलाता, आपदाओं से उसकी सुरक्षा करता और समझदार हो जाने पर गलतियाँ न करने के लिए समझाता एवं डराता तक है। इतनी करुणावान सत्ता का संरक्षण, अभिभावकत्व उपलब्ध होते हुए भी जो व्यक्ति पतन के गर्त में गिरते हैं, उनसे ज्यादा अभागा कौन होगा?
बुद्ध पाटन नगर में पहुँचे। वे एक ऐसे मुहल्ले में ठहरे, जो दुष्ट-दुराचारियों के लिए कुख्यात था। नगर के प्रतिष्ठित लोग बुद्ध के दर्शनों को पहुँचे तो उन्होंने आश्चर्य से पूछा- भला इतने बड़े नगर में आपको सज्जनों के साथ रहने की जगह न मिली जो आपने इनके बीच रहना पसंद किया? हँसते हुए बुद्ध ने पूछा-वैद्य मरीजों को देखने जाता है या चंगे लोगों को? ईश्वर का पुत्र पीड़ितों और पतितों की सेवा के लिए आया है। उसका स्थान उन्हीं के बीच तो होगा।
बाबा राघव दास उन दिनों गाँव-गाँव घूमकर लोगों को स्वच्छता का महत्व बता रहे थे। ग्रामीणों की अस्वच्छता के कारण कितने ही गाँव महामारियों की चपेट में आ गए। वे अपने साथियों के साथ पहुँचे। उन्होंने ग्रामीणों से संपर्क करना प्रारंभ कर दिया। वे उन लोगों की सफाई का महत्व बताते और नियमित रूप से उस क्षेत्र में सफाई का कार्य भी स्वयं करते। सभी गलियों में झाड़ू लगाते तो कभी मैले-कुचैले नौनिहालों को स्नान कराते और गंदे कपड़े धोते।
सप्ताह दो सप्ताह की कौन कहे, बाबा राघवदास को महीनों निकल गए, पर चिकने घड़ों पर जैसे कोई असर ही नहीं। वहाँ के ग्रामीणों की प्रवृत्ति में कोई खास अंतर दिखाई न दे रहा था। एक दिन एक कार्यकर्ता अवसर देखकर उनसे पूछ ही बैठा -”आपको इन व्यक्तियों की सेवा करते महीनों बीत गए, पर कोई परिणाम दिखाई नहीं देता। मुझे तो यहाँ के लोग पूरे गँवार ही दिखाई देते हैं। ये अज्ञानी व्यक्ति अपने स्वभाव को तनिक भी बदलने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।”
बाबा बोल उठे-बस भाई, इतने में ही घबरा गये। जिस ग्रामीण जनता को हमने अज्ञान के अंधकार में वर्षों भटकाए रखा, उनकी उपेक्षा की, उनकी निःस्वार्थ भाव से धैर्यपूर्वक सेवा करने पर उनमें स्वच्छता का संस्कार अवश्य पैदा होगा। “ यही हुआ। एक वर्ष के अंदर वे उस तथा आस-पास के सौ गाँवों को अपना कार्यक्षेत्र बनाकर उन्हें सुसंस्कारी बना सकने में सफल हुए।
मनुष्य का अपना एक औसत आकार-प्रकार और भार है। न्यूनाधिक अंतर के साथ सभी इसी दर्जे में आते हैं; किंतु कुछ समुदाय ऐसे भी हैं, जो अपनी दैत्याकृति के कारण असाधारण कहलाते और अद्भुत समझे जाते हैं। ये समूह यत्र-तत्र ही देखे जाते हैं।
ऐसा ही एक वर्ग कभी पैटागोनिया में था। अर्जेन्टीना और चिली के दक्षिणी भाग में रियों नीग्रो एवं मैजेलन जलडमरूमध्य के बीच स्थित यह भूभाग तीन शताब्दियों तक यात्रियों के कौतुक-कुतूहल का विषय बना रहा। जून 1520 में जब मैलेजन और उसके साथी इस रास्ते से गुजर रहे थे, तो अर्जेन्टीना के पोर्टसैन जूलियन समुद्र तट पर उन्होंने एक भीमकाय मनुष्य को देखा। उसकी विशाल आकृति से वे आश्चर्यचकित रह गए। पिगाफेटा नामक मैलेजन के एक साथी नाविक के अनुसार वह इतना लंबा था कि साधारण लोग मुश्किल से उसकी कमर तक आ सकते थे। उसकी आवाज साँड़ जैसी कर्कश थी। जल्द ही उसके और साथी वहाँ एकत्रित हो गए। वे सभी बृहद् आकार के थे। मैजेलन के साथ यात्रा कर रहे प्रसिद्ध स्पेनी इतिहासज्ञ हरेरा का कहना था कि उक्त समुदाय का सबसे नाटा व्यक्ति स्पेनवासियों से कहीं अधिक लंबा और तन्दुरुस्त था। एक विशेष युक्ति द्वारा स्पेनी नाविक उनमें से चार को पकड़ने में सफल हो गए; पर दुर्भाग्यवश दो उनकी कैद से किसी प्रकार निकल भागे, जबकि शेष दो की रास्ते में मौत हो गई। इस तरह दैत्याकार मानवों का प्रमाण उपलब्ध कराने की उनकी इच्छा पूरी न हो सकी।
इसके उपरांत ड्रेक के नेतृत्व में एक दूसरा दल सन् 1578 में पोर्टसैन जूलियन पहुँचा। उसके नाविकों ने भी वहाँ विशाल कलेवर वाले मनुष्य देखे। उनसे उनकी मुठभेड़ भी हुई, जिसमें ड्रेक के दो साथी मारे गए। ड्रेक ने उनकी अनुमानित लंबाई लगभग साढ़े सात फुट बताई।
इसके पश्चात् सन् 1580 में एक अन्य अभियान दल मैलेजन जलडमरूमध्य से होकर गुजर रहा था। इसके कप्तान थे-पेड्रो सारमियेंटो। जब उनका बेड़ा जलडमरूमध्य से कुछ आगे बढ़ा, तो सबने समुद्र तट पर एक विशाल झुंड देखा, मानो वे उनकी अगवानी के लिए खड़े हों। उस समूह के सभी व्यक्ति असाधारण रूप से लंबे-तगड़े थे, जैसे वे किसी अन्य ग्रह के निवासी हों।
टाँम हर्नांडीस ने साथी नाविकों के साथ मैलेजन में लगभग एक वर्ष गुजारा। यह सन् 1584 की बात है। वहाँ के स्थानीय निवासियों के संबंध में उन्होंने भी इस तथ्य को स्वीकारा है कि वहाँ के लोग सामान्य मनुष्यों से भिन्न आकार-प्रकार वाले हैं।
एंथोनी क्वीनेट ने सन् 1592 में पैटागोनिया की दूसरी बार यात्रा की। उसने वहाँ के निवासियों को 10 फुट का दैत्याकार शरीर वाला बताया है। उसका कहना था कि वह पोर्ट डिजायर में कुछ मृत देहों को नाप-तौलकर यह दावा कर रहा है। सिबाल्ड डी. विर्ट द्वारा भी उसके इस दावे की पुष्टि होती है। उसने सन् 1598 में मैजेलन की यात्रा की थी। एक अन्य पर्यटक जोरिस स्पीलबर्जन 1615 में उस मार्ग से गुजरा था। उसके नाविकों ने एक समीपवर्ती टापू में दो शव पाए थे जिसमें से एक साधारण लंबाई का था, जबकि दूसरा सामान्य से करीब ढाई फुट अधिक लंबा था।
जैकब ली मेयर और विल्हेल्म साउटेन ने भी दिसंबर 1615 में उस क्षेत्र में भीमकाय लोगों के देखे जाने की बात कही है। ली मेयर ने अपने संस्मरण में इस बात का उल्लेख करते हुए लिखा है कि ऐसा लगता है, मानो पैटागोनिया का संपूर्ण क्षेत्र ही विशाल कलेवर वाले लोगों से आबाद है। कई स्थानों पर उन्होंने इस प्रकार के कई झुंड देखे। उसमें नर-नारी दोनों की ही ऊँचाई असाधारण थी।
यह वह कालखण्ड था, जिसमें यात्रियों में से लगभग सभी का पैटागोनिया के दैत्याकार मानवों से आमना-सामना हुआ। इससे आगे के करीब 85 वर्षों का कालखण्ड ऐसा रहा, जिसमें संयोगवश पर्यटक उन्हें नहीं देख सके। इसलिए उन्होंने इसकी पुष्टि नहीं की। ऐसे पर्यटकों में सर जॉन
नरबोरो से लेकर जॉन विंटर, डी जींस आदि प्रमुख हैं, किंतु उसी अवधि में हैरिंगटन एवं करमैन नामक दो फ्राँसीसी जहाजों के यात्रियों ने पजेसन की खाड़ी में विशाल कलेवर वाले मनुष्यों के देखे जाने का दावा किया है-एक अवसर पर छह, दूसरे में सात तथा एक अन्य मौके पर उनका बृहद् समुदाय दिखाई पड़ा। इनमें लगभग आधे सामान्य आकार-प्रकार के थे और आधे वृहदाकार। एक अन्य यात्री फ्रेजियर के अनुसार दक्षिणी पैटागोनिया के दूरवर्ती इलाके में एक ऐसा वनवासी समुदाय है, जिसकी औसत ऊँचाई 9 से 10 फुट तक होती है। आँलिवर वान नुर्ट की भी ऐसी ही मान्यता थी।
सन् 1764 में कमोडोर बायरन के उस क्षेत्र की यात्रा के उपरांत यह सुनिश्चित रूप से स्थापित हो गया कि वहाँ दैत्याकार मनुष्यों का अस्तित्व है। 21 दिसंबर, 1764 को बायरन का जलयान ‘डोलाफिन’ जब पैटागोनिया के सी. विरजिंस नामक क्षेत्र में लंगर डाल रहा था, तभी नाविकों को कुछ घुड़सवार दिखलाई पड़े। उन सभी ने हाथ हिला-हिलाकर उन्हें समुद्र किनारे आने का इशारा किया। इसके बाद बायरन अपने कुछ सशस्त्र साथियों के साथ जहाज से उतरकर समुद्र तट पर आए। वहाँ उनका सामना एक भीमकाय मनुष्य से हुआ। शायद वह उस समूह का नेता था, जो कुछ दूरी पर था। इसमें लगभग पाँच सौ लोग थे। बायरन लिखते हैं कि वह व्यक्ति देखने में कथा-कहानियों वाला दैत्य-सा प्रतीत हो रहा था। उसके कंधे पर किसी जंगली जंतु का चर्म था। उसकी लंबाई सात फुट से किसी भी प्रकार कम नहीं था। जैसे ही उसकी विशाल मूर्ति सामने आई, उन दोनों ने एक-दूसरे का अभिवादन किया, फिर वे उसके पीछे-पीछे समूह की ओर चल पड़े। वे वास्तव में दैत्य कहलाने योग्य थे। उन्हें लंबे मनुष्य की तुलना में दैत्याकार कहना अत्युक्तिपूर्ण न होगा, कारण कि लंबे व्यक्तियों में लंबाई तो होती है पर उस अनुपात में माँसलता और मजबूती नहीं होती, अतएव वे साधारण से प्रतीत होते हैं, जबकि पैटागोनिया के लोग लंबाई के हिसाब से मजबूत और माँसल थे, अतः वे देखने में बड़े भयावह लगते थे। उनमें से सबसे नाटा व्यक्ति बायरन और उनके साथियों से (जिनमें से अधिकाँश छह फुट थे) कम-से-कम चार इंच लंबा और हृष्ट-पुष्ट था।
बायरन के एक अधिकारी सी. क्लर्क इसी घटना का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि उनमें से कई निश्चित रूप से आठ फुट के थे। बायरन की लंबाई छह फुट दो इंच थी। पंजे के बल खड़े होकर ही वे कइयों के सिर के शीर्ष का स्पर्श कर सकें, जबकि अनेक उनसे भी लंबे थे, जिनका शीर्ष स्पर्श करने में वे असफल रहे। महिलाओं की लंबाई अनुमानतः साढ़े सात से आठ फुट के बीच होगी।
इस यात्रा के दो वर्ष पश्चात् सन् 1766 में वैलिस और कारटरेट ने सी. विरजिन की यात्रा की। उन्होंने जो नाप बताई, वह बायरन के अनुमान से भिन्न और कम थी; किंतु फिर भी वे साधारण से अधिक लंबे थे। उनके पास ऊँचाई नापने वाली दो छड़ें थी। उनसे जब समूह के सबसे लंबे व्यक्ति को नापा गया तो वह छह फुट सात इंच निकला। कई छह फुट पाँच इंच से लेकर छह फुट तक के थे; लेकिन अधिकाँश की लंबाई पाँच फुट 10 इंच से लेकर छह फुट तक के बीच थी।
बायरन और वैलिस के विवरणों में भिन्नता के संबंध में स्वयं वैलिस लिखते हैं कि बायरन ने जो विवरण प्रस्तुत किए हैं; वह गलत हैं-ऐसा मानना उचित न होगा। यह संभव है कि उनका आमना-सामना उस क्षेत्र के किसी ऐसे समुदाय से हुआ हो, जो सबसे लंबा शारीरिक गठन वाला हो। वैसे भी जहाँ के निवासियों की औसत लंबाई छह फुट के करीब हो, वहाँ सात-साढ़े सात फुट तक के व्यक्तियों का पाया जाना आश्चर्यजनक नहीं है।
सन् 1766 में ही एक अन्य नाविक डकलस गायट ने सी. विरजिस के पश्चिमी छोर की यात्रा की थी। जहाज के एक अधिकारी ने जब वहाँ के स्थानीय लोगों के एक समूह में से सबसे छोटे व्यक्ति की लंबाई नापी, तो वह छह फुट का था। शेष सभी बहुत लंबे थे।
सन् 1773 में तब उपलब्ध संपूर्ण साक्ष्यों का निचोड़ प्रस्तुत करते हुए हाँक्सवर्थ ने कहा कि जलडमरूमध्य के दोनों ओर के अपेक्षाकृत स्थायी रूप से बसे हुए कबीलों के लोग प्रायः सामान्य कद-काठी के हैं, जबकि असामान्य देहयष्टि वाला समुदाय एंडिस पर्वत के पश्चिमी छोर पर एवं अंदर वन में रहता है तथा जलडमरूमध्य के किनारे पर यदा ‘-कदा ही आता है।
डार्विन अपनी पुस्तक ‘वोयेज ऑफ दि बीगल’ में लिखते हैं कि उन लोगों ने पैटागोनिया की यात्रा के दौरान ग्रेगरी अंतरीप में स्थानीय दैत्याकार लोगों को न सिर्फ देखा था, वरन् बातें भी की थीं। उनका व्यवहार अत्यंत स्नेहपूर्ण था। वे कहते हैं कि वे वास्तव में देखने में जितने लंबे लगते थे, उतने थे नहीं, फिर भी औसतन छह फुट के थे। महिलाएँ भी पुरुषों की तरह समान रूप से लंबी थीं। वे निश्चित रूप से दुनिया की लंबी प्रजाति वाले लोग हैं।
जेम्स बाउर्ने ने वहाँ की यात्रा सन् 1849 में की थी। अपनी पुस्तक ‘दि पैटागोनिया जाइंट’ में वे लिखते हैं कि काय-कलेवर की दृष्टि से निश्चय ही वे बृहद् थे। प्रथम दृष्टि में ऐसा लगता था मानों सचमुच हम किसी दैत्य के आगे खड़े हैं संसार में जितनी ज्ञात जातियाँ हैं, उनमें आकार-प्रकार की दृष्टि से यह सर्वोपरि है; किंतु उनका सही-सही विवरण दे पाना कठिन है। उनकी वास्तविक लंबाई कितनी थी? इस संबंध में उनने अपनी लंबाई को ही मानक के रूप में इस्तेमाल किया। वे स्वयं 5 फुट 10 इंच लंबे थे। जब वे उनकी लंबाई का अनुमान लगाने हेतु उनके निकट खड़े हुए, तो वे उनके कंधे से लगभग चार इंच छोटे आकार के थे, फिर भी बाउर्ने से वे लंबे थे। कुछ उनसे भी अधिक लंबे थे, कदाचित सात फुट के निकट हों।
इस प्रकार भिन्न-भिन्न समय के घुमंतू पर्यटकों ने पैटागोनियावासियों के संबंध में लगभग एक सा निष्कर्ष प्रस्तुत किया है कि वे सभी असाधारण आकार-प्रकार वाले लोग हैं। लंबाई संबंधी ब्यौरे में न्यूनाधिक अंतर स्वाभाविक है, कारण कि अधिकाँश का आधार अनुमान था। फिर भी इस आधार पर जो आकलन दिया गया; उसे न मानने का कोई कारण नहीं, क्योंकि विश्व के कई हिस्सों में उस आकार-प्रकार के लोग अब भी पाए जाते हैं। औसत जापानी पहलवान काफी दीर्घ शरीर वाले होते हैं। कई बार उनकी लंबाई 7 फुट से भी अधिक होती है और देह का विस्तार भी उसी अनुपात में होता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य की कोई दीर्घाकृति प्रजाति के पाए जाने के संबंध में आश्चर्य क्योंकर होना चाहिए? विशेषज्ञों के अनुसार दक्षिणी पैटागोनिया का बहुत बड़ा इलाका अब भी अविज्ञात है। वे इस सुदीर्घ प्रजाति को उसी क्षेत्र से संबंधित बताते हैं।
मनुष्य दीर्घाकृति वाला हो- यह अच्छी बात हैं; पर उसका अंतःकरण भी उतने ही अंशों में सुविस्तृत और सुविकसित होना चाहिए, तभी इस देह की सार्थकता है। विराट् मन बृहद् शरीर में न हो, तो एक प्रकार से भारभूत ही प्रतीत होगा और कितनी ही प्रकार की कठिनाइयाँ उत्पन्न करेगा। इसके विपरीत देहाकृति यदि साधारण हो; पर अंतराल अनंत आकाश की तरह विस्तीर्ण, तो वह मनुष्य अभिनंदनीय-अभिवन्दनीय है, कारण कि इस जगत् में देहयष्टि की तुलना में दिव्यता अधिक महत्वपूर्ण है। आज सारे भारत व विश्व में देहयष्टि को माँसल-पुष्ट बनाने तो वह मनुष्य अभिनंदनीय-अभिवन्दनीय है, कारण कि इस जगत् में देहयष्टि की तुलना में दिव्यता अधिक महत्वपूर्ण है। आज सारे भारत व विश्व में देहयष्टि को माँसल-पुष्ट बनाने -वैसा दीखने के प्रयास चल रहे हैं, पर क्या इससे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य अंदर से भी बड़ा बन रहा है? नहीं वहाँ तो बौनापन ही दिखाई देता है। हमें अपने अंतरंग को विशाल बनाने का प्रयास करना चाहिए।
लैटिन अमेरिका देशों के एक जलडमरूमध्य के बीच स्थित एक प्रजाति के विषय में पाया गया है कि उनके शरीर भीमकाय होते हैं। प्रमाण कई हैं, पर उन्हें, उनकी नस्ल को जीवित नहीं बचाया जा सका है। अफ्रीका में मसाई कबीले के पुरुष न्यूनतम सात फीट ऊँचाई के होते हैं। पुराणों में श्री बलराम (श्रीकृष्ण जी के बड़े भाई) के विषय में भी ऐसा ही अभिमत मिलता है। अंतरंग को विशाल बनाने का प्रयास चले, तो उस कुतूहल को यथार्थता का रूप भी दिया जा सकता है, जिसमें देहयष्टि को माँसल व पुष्ट बनाने का पुरुषार्थ चलता है। हम बहिरंग नहीं अंतरंग को महत्व दें, तो ही सार्थकता है।
स्व. श्री चिमनलाल सीतलचवाड़ उन दिनों बम्बई विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त नहीं हुए थे, किसी और उच्च पद पर थे। एक मामले में बचने के लिए एक व्यक्ति उनके पास आया और एक लाख रुपये बतौर रिश्वत देने लगा, किंतु सर सीतलवाड़ ने उसे अस्वीकार कर दिया। तब वह व्यक्ति बोला-समझ लीजिए साहब! आपको एक लाख रुपया देने वाला और कोई दूसरा नहीं मिलेगा। सर सीतलवाड़ हँसे और बोले-नहीं भाई देने वाले तो बहुत मिलेंगे, पर इतनी बड़ी रकम मुफ्त में लेने से इनकार करने वाला कोई नहीं मिलेगा।
संत पुरंदर की निर्लोभता एवं तपश्चर्या की चर्चा विजयनगर के महाराज कृष्णदेवराय ने बहुत सुनी थी, पर उन्हें सहसा विश्वास नहीं होता था कि क्या ऐसा भी संभव है? क्या व्यक्ति स्वयं विद्वान होते तथा साधनों के सहज उपलब्ध रहते हुए भी उन्हें ठुकरा दे और लोकसेवी का जीवन जिए? गृहस्थ जीवन और लोकसेवा ऐसी गरीबी में कैसे साथ-साथ निभ सकते हैं?
अपने मंत्री व्यासराय की सहायता से उन्होंने संत की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने संत को परोक्ष कहलवाया कि वे अपनी भिक्षा राजभवन से ले लिया करें। भिक्षा में दिए जाने वाले चावलों में उन्होंने रत्न-हीरे मिला दिए। नित्य उन्हें इसी प्रकार प्रसन्नभाव से आते देख उन्हें शंका हुई, अपने मंत्री से बोले-आइए जिन संत की निस्पृहता की बड़ी प्रशंसा सुनी थी, उन्हें घर चलकर परखें।” वहाँ पहुँचें तो विचित्र दृश्य देखा। सादगी भरा जीवन जी रहे संत व उनकी पत्नी में परस्पर संवाद चल रहा था। पत्नी हीरे आदि बीनकर अलग रखती जाती थी व कहती जा रही थी-आजकल आप न जाने कहाँ से भिक्षा लाते हैं इन चावलों में तो कंकड़-पत्थर भरे पड़े हैं।” इतना कहकर छद्मवेषधारी राजा और मंत्री के सामने ही उन्हें वे कचरे के ढेर में फेंक आईं। राजा के आश्चर्य व्यक्त करने पर बोली -”पहले हम भी यही सोचते थे कि हीरे मोती हैं, पर जबसे भक्ति का पथ अपनाया, लोकसेवा की ओर कदम बढ़ाया तो निर्वाह योग्य ब्राह्मणोचित आजीविका से ही काम चल जाता है। अब इस बाह्य संपदा का मूल्य हमारे लिए तो हीरों के नहीं कंकड़ -पत्थर के बराबर ही है।
स्वतंत्र विवेक-बुद्धि ही है जो व्यक्ति को दो मार्गों आत्मिक प्रगति तथा भौतिक समृद्धि के चयन, अनुपयोग, दुष्प्रयोग सदुपयोग के माध्यम से स्वर्ग व नरक के दृश्य इसी जीवन में दिखाती है व उसका भविष्य निर्धारित करती है।
स्वर योग शरीर क्रियाओं को संतुलित और स्थिर रखने की एक प्राचीन विधा है। इससे स्वस्थता को अक्षुण्ण बनाए रखना सरल -संभव हो जाता है। योग के आचार्यों के अनुस्वार यह एक विशुद्ध विज्ञान है, जो यह बतलाता है कि निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त भौतिक शक्तियों से मानव शरीर किस प्रकार प्रभावित होता है। सूर्य, चंद्र अथवा अन्यान्य ग्रहों की सूक्ष्म रश्मियों द्वारा शरीरगत परमाणुओं में किस प्रकार की हलचल उत्पन्न होती है। काया की जब जैसी स्थिति हो, तब उससे वैसा ही काम लेना चाहिए-यही स्वर योग का गढ़ रहस्य है। इतना होते हुए भी यह मनुष्य की सृजन शक्ति में हस्तक्षेप नहीं करता, वरन् उसे प्रोत्साहित ही करता है।
स्वरशास्त्र के अनुसार प्राण के आवागमन के मार्गों को नाड़ी कहते हैं। शरीर में ऐसी नाड़ियों की संख्या 72000 है। इनको नसें न समझना चाहिए। यह प्राणचेतना प्रवाहित होने के सूक्ष्मतम पथ हैं नाभि में इस प्रकार की नाड़ियों का एक गुच्छक है। इसमें इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, गाँधारी, हस्तिजिह्वा, पूषा यशस्विनी, अलंबुसा, कुहू तथा शंखिनी नामक दस नाड़ियाँ हैं। यह वहाँ से निकलकर देह के विभिन्न हिस्सों में चली जाती हैं। इनमें से प्रथम तीन को प्रमुख माना गया हैं। स्वर योग में इड़ा को चंद्र नाड़ी या चंद्र स्वर भी कहते हैं। यह बायें नथुने में है पिंगला को सूर्य नाड़ी अथवा सूर्य कहा गया है। यह दायें नथुने में है। सुषुम्ना को ‘वायु’ कहते हैं जो दोनों नथुनों के मध्य स्थित है। जिस प्रकार संसार में सूर्य और चंद्र नियमित रूप से अपना-अपना कार्य नियमित रूप से करती हैं। शेष अन्य नाड़ियाँ भी भिन्न-भिन्न अंगों में प्राण संचार का कार्य करती हैं। गाँधार नाक में, हस्तिजिह्वा दाहिनी आँख में, पूषा दायें कान में, यशस्विनी बायें कान में, अलंबुसा मुख में, कुहू लिंग प्रदेश में और शंखिनी गुदा में जाती है।
हठयोग में नाभिकंद अर्थात् कुण्डलिनी का स्थान गुदा से लिंग प्रदेश की ओर दो अंगुल हटकर मूलाधार चक्र में माना गया है। स्वर योग में वह स्थिति माननीय न होगी। स्वर योग शरीर शास्त्र से संबंध रखता है और शरीर की नाभि गुदामूल में नहीं, वरन् उदर मध्य ही हो सकती हैं। इसीलिए यहाँ नाभिप्रदेश का तात्पर्य उदर भाग मानना ही ठीक है। श्वास क्रिया का प्रत्यक्ष संबंध उदर से ही है।
योग विज्ञान इस बात पर जोर देता है कि मनुष्य को नाभि तक पूरी साँस लेनी चाहिए। वह प्राणवायु का स्थान फेफड़ों को नहीं, नाभि को मानता है। गहन अनुसंधान के पश्चात् अब शरीरशास्त्री भी इस बात को स्वीकारते हैं कि वायु को फेफड़ों में भरने मात्र से ही श्वास का काम पूरा नहीं हो जाता। उसका उपयुक्त तरीका यह है कि उससे पेड़ू तक पेट सिकुड़ता और फैलता रहे एवं डायफ्राम का भी साथ-साथ संचालन हो। तात्पर्य यह कि श्वास का प्रभाव नाभि तक पहुँचना जरूरी है। इसके बिना स्वास्थ्य लड़खड़ाने का खतरा बना रहता है। इसीलिए सामान्य श्वास को योग विज्ञान में अधूरी क्रिया माना गया है। इससे जीवन की प्रगति रुकी रह जाती है। इसकी पूर्ति के लिए योग के आचार्यों ने प्राणायाम जैसे अभ्यासों का विकास किया। इसका इतना ही अर्थ है कि प्राणवायु नाभि तक पहुँचें और वहाँ से निकलने वाली दसों नाड़ियों में प्राण का प्रवाह उचित मात्रा में हो। आधुनिक शरीरशास्त्री योगशास्त्र में वर्णित इन नाड़ियों को, चीर-फाड़कर देह में ढूँढ़ने का प्रयास करते और नहीं मिलने पर उस पर अविश्वास करते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि ये रक्त संचार से संबंधित रक्तवाहिनी नहीं, वरन् प्राण संचार से जुड़े हुए अत्यंत सूक्ष्म मार्ग हैं, जिन्हें यंत्रों से नहीं, सूक्ष्म दृष्टि से ही देख पाना संभव है।
स्वर विज्ञान पर सतर्क दृष्टि रखने वाले जानते हैं कि नासिका स्वर नियमित अंतराल में बदलते रहते और थोड़े ही क्षण के लिए साथ-साथ चलते हैं। यही सुषुम्ना नाड़ी की गतिशील अवस्था हैं। शेष समय में इड़ा-पिंगला बारी-बारी से चलती हैं। जो क्रमशः बायें-दायें नासिका स्वर द्वारा निरूपित होती हैं। इनका प्रवाह प्रायः हर घंटे में बदलता रहता है। जिस प्रकार समुद्र की लहरों पर सूर्य और चंद्र का प्रभाव पड़ता है, उसी प्रकार नासास्वरों को भी वे प्रभावित करते हैं। शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को सूर्योदय के समय इड़ा नाड़ी अर्थात् बायाँ स्वर चलना प्रारंभ हो जाता है, जबकि कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को अरुणोदय काल में पिंगला नाड़ी या दांया स्वर चलता है। उक्त नियमानुसार स्वरों का बदलना शारीरिक -मानसिक स्वस्थता की निशानी है। इसमें किसी प्रकार का व्यतिक्रम यह सूचित करता है कि सब कुछ निर्विघ्न और नैसर्गिक रूप में नहीं चल रहा है। यह असामान्य अवस्था और रोग की स्थिति है।
किंतु इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए कि पंद्रह दिन तक बिलकुल एक-सी गति से ही स्वर चलेगा। चंद्र-सूर्य की गतियों और रश्मियों का प्रभाव उसमें परिवर्तन पैदा करता है। अस्तु, शुक्लपक्ष की प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा पूर्णिमा-इन तिथियों में सूर्योदय के समय इड़ा नाड़ी या चंद्र स्वर चलना चाहिए एवं शेष चतुर्थी, पंचमी षष्ठी, दशमी, एकादशी तथा द्वादशी को इस काल में सूर्य स्वर चलना प्राकृतिक, शुभ और स्वास्थ्यकारी माना गया है। इसी प्रकार कृष्णपक्ष में हर तीन दिन सूर्योदय के समय एक निश्चित स्वर ही चलना चाहिए-यह नैसर्गिक नियम है।
सूर्य-चंद्र के अतिरिक्त अन्य ग्रहों का भी प्रभाव स्वरों पर असर डालता है। तदनुसार कुछ वारों में उनमें विशिष्ट परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। चंद्र (सोम), बुध, गुरु और शुक्र इन चारों में और विशेषकर शुक्लपक्ष में बायाँ स्वर चलना शुभ और स्वास्थ्यकर है, जबकि रवि, मंगल एवं शनि को कृष्णपक्ष में दाहिनी नाड़ी चलना उत्तम है। रविवार को सूर्योदय पर सूर्य नाड़ी और सोमवार को चंद्र नाड़ी चलना आरोग्यवर्धक माना गया है। आकाश स्थित प्रधान ग्रहों का प्रभाव उनकी अपनी तथा पृथ्वी की चाल के अनुसार भूमंडल पर आता है। अपनी धुरी पर घूमने के अतिरिक्त एक निर्धारित मार्ग से पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा के लिए भी चलती रहती है। इस मार्ग में प्रधान ग्रहों की कुछ महत्वपूर्ण किरणें प्रायः एक के बाद एक स्पष्ट रूप से आगे आती हैं। अन्य दिनों में वे किरणें अन्य ग्रहों की आड़ में रुक जाती हैं। खगोल विद्या के इस अत्यंत सूक्ष्म तत्त्वज्ञान को समझते हुए प्राचीन आचार्यों ने वारों के नाम उनके अधिपति ग्रहों की प्रमुखता के आधार पर रखे थे। सूर्य और चंद्र नाड़ियों पर शुक्ल एवं कृष्णपक्ष की धन-ऋण विद्युत एवं वारों के अधिपति ग्रहों का जो प्रभाव स्वरों पर होता है, वह प्रातःकाल देखा जा सकता है। उपर्युक्त दिनों में स्वरों एवं नाड़ियों की भिन्नता दृष्टिगोचर होने का कारण मनुष्य शरीर पर पड़ने वाले अन्य ग्रहों का सूर्य-चंद्र युक्त प्रभाव ही है। जो ग्रह सूर्य से समता रखते हैं, वे सूर्य स्वर को और जो चंद्र से समता रखते है, वे चंद्र स्वर को प्रभावित-उत्तेजित करते हैं।
सर्वविदित है कि चंद्रमा का गुण शाँत-शीतल एवं सूर्य का उष्ण है। शीतलता से स्थिरता गंभीरता, विवेक प्रभृति गुण उत्पन्न होते हैं और उष्णता से तेज शौर्य, चंचलता, उत्साह, क्रियाशीलता, बल आदि गुणों का आविर्भाव होता है। मनुष्य को साँसारिक जीवन में शांतिपूर्ण और शौर्य एवं साहसपूर्ण दोनों प्रकार के काम करने पड़ते हैं। किसी भी कार्य का अंतिम परिणाम उसके आरंभ पर निर्भर हैं। इसलिए विवेकी पुरुष अपने कामों को प्रारंभ करते समय यह भली-भाँति सोच-विचार लेते हैं कि हमारे शरीर और मन की स्वाभाविक स्थिति इस प्रकार के काम करने के अनुकूल है या नहीं? एक विद्यार्थी को रात्रि में उस समय पाठ याद करने के लिए दिया जाए, जब उसकी स्वाभाविक स्थिति निद्रा चाहती है, तो वह पाठ को अच्छी तरह याद न कर सकेगा। यदि वही पाठ उसे प्रातःकाल की अनुकूल स्थिति में दिया जाए, तो आसानी से सफलता मिल जाएगी। ध्यान, भजन, चिंतन मनन, पूजन के लिए एकांत की आवश्यकता है; किंतु उत्साह भरने और युद्ध में प्रवृत्त होने के लिए उत्तेजक वातावरण की जरूरत पड़ती है। ऐसी उचित स्थितियों में किए हुए कार्य अवश्य फलीभूत होते हैं। इसी आधार पर स्वरयोगियों ने निर्देश किया है कि विवेकपूर्ण और स्थायी कार्य चंद्र स्वर में किए जाने चाहिए। अध्ययन, मनन, चिंतन, उपासना, योगाभ्यास, शोध, अनुसंधान, विज्ञान आदि ऐसे कार्य हैं, जिनमें अधिक गंभीरता और बुद्धिपूर्वक कार्य करने की जरूरत है। इसलिए इनका आरंभ भी ऐसे ही समय में होना चाहिए, जब शरीर के सूक्ष्म कोष चंद्रमा की शीतलता को ग्रहण कर रहें हों।
इसके विपरीत उत्तेजक और आवेश एवं जोश के साथ करने पर जो कार्य ठीक होते हैं, उनके लिए सूर्य स्वर उत्तम कहा गया है। अपराध, अन्याय, अत्याचार, परिश्रम रतिकर्म, ध्वंस, हत्या आदि कार्यों में दुस्साहस की आवश्यकता पड़ती है। यह पिंगला नाड़ी से ही उपलब्ध हों सकता है। यहाँ इन वर्जनाओं का समर्थन या निषेध नहीं है। शास्त्रकार ने तो एक वैज्ञानिक की तरह विश्लेषण कर दिया है कि ऐसे कार्य उस वक्त अच्छे होंगे, जब सूर्य की उष्णता के प्रभाव से जीवन-तत्व उत्तेजित हो रहा हो। शाँत और शीतल मस्तिष्क से यह क्रूर और कठोर कर्म कोई भली प्रकार कैसे संपन्न कर सकेगा?
इन दो नाड़ियों के अतिरिक्त अल्पकाल के लिए तीसरी नाड़ी-सुषुम्ना भी क्रियाशील होती है। इस समय दायें-बायें स्वर दोनों साथ-साथ सक्रिय होते हैं। तब प्रायः शरीर संधि अवस्था में होता है। यह संध्याकाल है। दिन के उदय और अस्त को भी संध्याकाल कहते हैं। इस समय जन्म या मरण काल के समान पारलौकिक भावनाएँ मनुष्य में जाग्रत होती हैं और संसार की ओर से विरक्ति, उदासीनता एवं अरुचि होने लगती है। स्वर की संध्या से भी मनुष्य का चित्त साँसारिक कार्यों से कुछ उदासीन हो जाता है और अपने वर्तमान अनुचित कार्यों से कुछ उदासीन हो जाता है और अपने वर्तमान अनुचित कार्यों पर पश्चाताप स्वरूप खिन्नता प्रकट करता हुआ कुछ आत्मचिंतन की ओर झुकता है। यह क्रिया बहुत ही सूक्ष्म होती है और थोड़े समय के लिए आती है। इसलिए हम अच्छी तरह पहचान भी नहीं पाते। यदि इस समय परमार्थ चिंतन और ईश्वराधना का अभ्यास किया जाए तो निस्संदेह उसमें बहुत उन्नति हो सकती है; किंतु साँसारिक कार्यों के लिए यह स्थिति उपयुक्त नहीं, अतएव सुषुम्ना स्वर में आरंभ होने वाले कार्यों का परिणाम अच्छा नहीं होता। वे अक्सर अधूरे या असफल रह जाते हैं। सुषुम्ना की दशा में मानसिक विकार दब जाते हैं और गहरे आत्मिक भाव का थोड़ा -बहुत उदय होता है, अस्तु इस समय में दिए हुए शाप-वरदान अधिकाँश फलीभूत होते हैं, कारण कि उन भावनाओं के साथ आत्मतत्त्व का बहुत कुछ सम्मिश्रण होता है।
कई बार एक ही स्वर लंबे समय तक लगातार चलता रहता है। यह ठीक नहीं। दाहिने या सूर्य स्वर के साथ यदि यह स्थिति आती है, तो इससे शारीरिक उष्णता बढ़ते जाने के कारण जीवन तत्व सूखने लगता है। फलतः कमजोरी आती एवं कार्यक्षमता घटती जाती है; आलस्य, अनुत्साह बढ़ने लगता तथा आयु क्षीण होने लगती है। इसके विपरीत बायें स्वर के लगातार चलते रहने से उसके शीतल होने के कारण शारीरिक स्वस्थता अवश्य प्रभावित होती है। ऐसी दशा में स्वर संतुलन के प्रति जागरूक और सचेष्ट रहना चाहिए और विकारग्रस्त स्वर को ठीक करने का प्रयास करना चाहिए।
अस्थायी रूप से स्वर बदलने के कितने ही तरीके है, जिनमें कुछ निम्न हैं-जिस स्वर को चलाना हो, उसके विपरीत करवट बदलकर थोड़ी देर उस अवस्था में लेटे रहने से स्वर बदल जाता है।
जो स्वर चल रहा हो, उस ओर काँख में हथेली को थोड़ी देर दबाए रखने से स्वर परिवर्तित हो जाएगा।
चलित स्वर में स्वच्छ रुई पतले स्वच्छ कपड़े में लपेटकर उसकी गोली रखने से स्वर बदलता है।
स्वर परिवर्तन के यह तात्कालिक उपाय हैं। रोगग्रस्त स्वर संभव है कि इन पद्धतियों से बदलकर थोड़ी देर पश्चात् पुनः पुराने क्रम में आ जाए। ऐसी दशा में विकार को दुरुस्त करने के लिए योगशास्त्र में कुछ प्रभावशाली तरीके बताए गए हैं, जिनके नियमित अभ्यास से स्वर संतुलन स्थापित हो जाता है। इनमें शाँभवी मुद्रा और त्राटक प्रमुख है। शाँभवी मुद्रा अधिक प्रभावी तकनीकी है और संतुलन शीघ्रतापूर्वक आता है। इसके अतिरिक्त प्राणचिकित्सा के अंतर्गत श्वासोच्छवास भी एक कारगर तरीका है, जिसके द्वारा स्वर विकार दूर किया जा सकता है।
श्वास का लंबा-छोटा होना भी सुनिश्चित लाभ-हानि का द्योतक है। स्वस्थ साँस का साधारण माप शास्त्रों में 12 अंगुल बताया गया है। इससे अधिक लंबी हानिकारक तथा छोटी लाभप्रद है। सोते समय इसकी लंबाई 30 अंगुल हो जाती है। इसलिए 6-7 घंटे से अधिक सोना अच्छा नहीं। भोजन के समय इसका नाप 20 अंगुल हो जाता है। अतएव बार-बार भोजन करना भी उचित नहीं। इससे लंबे समय तक लंबी साँस चलने से आयु घटती है। बीमारियों में इसकी लंबाई काफी अधिक बढ़ जाती है, जिसके कारण प्राण का क्षरण होने लगता है और दुर्बलता बढ़ने लगती है।
प्राणियों के साँस की संख्या भी जीवन की लघुता और दीर्घता को दर्शाती है। मनुष्य दिन-रात में प्रायः 216000 श्वास लेता है। इससे कम साँस लेने वाले प्राणी उसी अनुपात में दीर्घजीवी होते हैं। प्रति मिनट आदमी की साँस गति 13 है और उसकी उम्र 100 वर्ष। खरगोश प्रति मिनट 38 बार एवं आयु 8 वर्ष। कुत्ता 29 बार, वय 12 वर्ष। साँप 8 बार, उम्र 1000 वर्ष। कछुआ 5 बार, जीवन 2000 वर्ष।
प्राणायाम के अभ्यासी अपनी श्वसन गति को नियंत्रित कर लेते हैं, इसलिए वे दीर्घजीवी होते हैं। इसके अतिरिक्त गहरी साँस लेना, कमर सीधी रखकर बैठना एवं अचिंतनीय चिंतन से बचे रहना भी ऐसे कारक है, जो स्वास्थ्य संवर्द्धन और दीर्घजीवन को सुनिश्चित करते हैं। नाभि तक गहरी साँस लेने से एक प्रकार का कुँभक होता और श्वास संख्या घट जाती है। मेरुदंड के भीतर एक जीवन तत्व प्रवाहित होता है, जो सुषुम्ना को बलवान बनाता और मस्तिष्क को परिपुष्ट रखता है। कमर झुकाकर बैठने से इस प्रवाह में गतिरोध पैदा होता है। अचिंत्य चिंतन से साँस की गति तीव्र हो जाती है जो उम्र घटने का प्रधान कारण है।
स्वर शास्त्र के आचार्यों का मत है कि सोते समय चित्त लेटने से सुषुम्ना प्रवाह अवरुद्ध होने का खतरा रहता है। इसमें अशुभ तथा भयानक स्वप्न दिखाई पड़ते हैं। इसीलिए भोजनोपरान्त प्रथम बायें, फिर दायें करवट लेटना चाहिए।
शीतलता से अग्नि मंद पड़ जाती है और उष्णता से तीव्र होती है। यह प्रभाव हमारी जठराग्नि पर भी पड़ता है। सूर्य स्वर में पाचनशक्ति उद्दीप्त रहती है, अतएव उसी स्वर में भोजन करना उत्तम है तथा भोजन के पश्चात् भी कुछ समय उसी स्वर को सक्रिय रखना चाहिए। इससे पाचनक्रिया अच्छी प्रकार हो जाती है।
इस प्रकार स्वर विज्ञान के मर्म और महत्व को समझकर कोई भी व्यक्ति अपनी स्वस्थता को लंबे समय तक बनाए रख पाने में सफल हो सकता है। प्रकृति की मनुष्य को यह अनुपम देन है। इसका समुचित लाभ उठाया जाना चाहिए।
अर्जुन ने भगवान से नाता जोड़ा, पर वह मजबूत तभी हो सका जब उसने अपनी संकीर्ण स्वार्थपरता पर अंकुश लगाया। भीतर से दीन-दयनीय और कृपण कायरों की तरह बना हुआ अर्जुन रथ पर बैठा, गाण्डीव हाथ में लिए यह सोच ही नहीं पा रहा था कि मैं क्या करूँ? महाभारत का उद्देश्य भाइयों के झगड़े-टंटे का निबटाना नहीं था वरन् सामंतवादी बिखराव के कारण भारत के स्तर व भविष्य निरंतर चिंताजनक बनते जाने की जटिल समस्या का दूरगामी समाधान प्रस्तुत करना था। कृष्ण का उद्बोधन इसी निमित्त था। एक बार व्यामोह मिटा तो फिर अनीति पर विजय के रूप में ही उसकी परिणति हुई। अर्जुन स्वयं अपना, विश्वमानव का हित साध सकने में सफल हुआ, साथ ही अपनी मुक्ति का पथ भी उसने प्रशस्त कर लिया।
मंत्रों में शक्ति है। यह एक निर्विवाद सत्य है। उन्हें ठीक से साधा जाए, तो सूखा आसमान बरस उठता है और निर्जीव काया गति करने लगती है। निजी प्रयोजनों के लिए मंत्र शक्ति के प्रयोग कितने ही लोगों ने किए होंगे। सामूहिक प्रयोगों का स्वरूप अलग है। उनसे निजी जीवन में हो सकता है थोड़े कम लाभ हों, लेकिन सामूहिक स्तर पर होने वाले लाभ इतने अपरिमित हैं कि एक बार निजी लाभों को कुरबान भी किया जा सकता है।
व्यक्तिगत स्तर पर उच्च आत्मिक लक्ष्य प्राप्त करना हो तो उसके लिए एकांत में किए जाने वाले जप-तप अनुष्ठान ही सही हैं। आत्मसाक्षात्कार और ऋद्धि-सिद्धि जैसे प्रयोजन निजी पुरुषार्थ से ही पूरे होते हैं। लेकिन सामूहिक लक्ष्य प्राप्त करना हो, समष्टि का कल्याण, समाज का उत्कर्ष और व्यापक विपदाओं का निवारण करना हो, तो आध्यात्मिक प्रयत्नों में भी सामूहिक प्रयत्न किए जाते हैं। सामूहिक प्रार्थना, अनुष्ठान महायज्ञ और युगसंधि महापुरश्चरण जैसे प्रयास समाज और विश्व को ध्यान में रखकर ही किए जाते हैं।
छोटी-मोटी निजी स्तर, की विपत्तियाँ पुरुषार्थ से दूर हो जाती हैं। उनके लिए बहुत ज्यादा बल जुटाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
लेकिन विपत्ति बड़ी हो, सूखा, महामारी, युद्ध विग्रह जैसे उपद्रव खड़े हो रहे हों तो समाज की सोई हुई शक्ति का आह्वान करना होता है। विराट् शक्ति को जगाना पड़ता है। यह चर्चा मंत्र-साधना के निजी-एकान्तिक साधना का, जप-तप का अपना महत्व है। उससे व्यक्ति का अपना आत्मबल सशक्त होता है। सामूहिक जप-तप समाज के आत्मतत्त्व को पुष्ट बनाता है। उसे आधार देता है, जिस पर दीन हीन दिखाई देने वाले लोग भी खड़े रह और निर्वाह कर सकते हैं।
मंत्रों में शक्ति है। यह निर्विवाद है। उन्हें ठीक से साधा जाए, तो सूखा आसमान बरस उठता है और निर्जीव काया गति करने, साँस लेने लगती है। अपने आत्मविकास के लिए उनकी साधना का स्वरूप अलग है। जब उन्हें सामूहिक स्तर पर साधा जाता है, तो परिणाम निजी प्रयत्नों की तुलना में कुछ भिन्न और विराट् स्तर के ही होते हैं। इनमें संकीर्ण दृष्टि से व्यक्ति की थोड़ी निजी हानि भी हो सकती है, कुछ लाभों से वंचित रहना पड़ सकता है। इसके विपरीत कुछ ऐसे लाभ भी मिलते हैं जो निजी स्तर पर वर्षों तक किए जाने वाले प्रयत्नों से भी नहीं मिल सकते।
सामूहिक जप वातावरण को अपने कंपनों से आच्छादित कर देता है। अकेले की गई मंत्र-साधना साधक के अपने इर्द-गिर्द सूक्ष्म कवच बनाती है। उसी स्तर के कंपन आकर्षित करती है। सामूहिक जप अथवा एक ही समय में विभिन्न स्थानों पर रहते हुए भी एक ही मंत्र का किया गया जप पूरे वातावरण को घेरने लगता है। वह आच्छादन पूरे वातावरण की ही रक्षा करता है, जितने क्षेत्र में जप किया जा रहा है, उतने क्षेत्र में सघन-विरल कंपन वह जगाता है। उतने परिवेश को अनुकूल मोड़ देता है और आवश्यक परिवर्तन लाता है। उसे एक व्यक्ति की पुकार का बल और हजारों लोगों के एक साथ पुकारने के प्रभाव से भी जाना जा सकता है।
सामूहिक जप के प्रभाव को वर्षा के उदाहरण से भी समझा जा सकता है। प्यास लगती है, तो व्यक्तिगत प्रयत्नों से लीटर-आधा लीटर पानी जुटाया जा सकता है। वह बहुत आसान है और कहीं भी रहते हुए यह व्यवस्था की जा सकती है। लेकिन पानी का व्यापक अभाव हो, धरती तप रही हो, तो वर्षा ही तृप्त करती है। इसके लिए बादलों का उठना, उड़ते हुए सूखे क्षेत्र तक उनका आना और बरसना जरूरी है। सामूहिक जप का प्रभाव बादलों के उठने और उपयुक्त स्थान पर बरसने की तरह समझाया गया है।
संध्या उपासना में गायत्री मंत्र का जप किया जाता है। गायत्री मंत्र भारतीय परंपरा का परम उपास्य मंत्र है। हजारों वर्षों से ऋषि-मुनि और साधक श्रेणी के लोग इसे जपते रहे हैं। सामान्य गृहस्थ भी जो नियमित उपासना नहीं कर पाते, उनकी आस्था भी नहीं हो फिर भी कर्मकाण्ड की औपचारिकता करते हैं, तो गायत्री का आश्रय लेते हैं। अब तक कितने ही लोगों ने गायत्री मंत्र का कुल मिलाकर कितना जप किया होगा, इसका हिसाब लगाना कठिन है। हिसाब लगाना तो दूर ही बात है, इसकी कल्पना करना भी कठिन है। हजारों-करोड़ों लोगों ने दस-पंद्रह वर्ष से लेकर साठ -सत्तर वर्ष तक प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जप किया होगा। उस जप का प्रभाव सूक्ष्म आकाश में संव्याप्त है।
युगसंधि महापुरश्चरण साधना के अंतर्गत इन दिनों जितना सामूहिक जप किया जा रहा है, वह हजारों वर्षों से किए गए जप-प्रभाव के साथ संयुक्त होता है। प्रभाव के उस महासागर से जुड़कर महापुरश्चरण साधना भी हजार-लाख गुना फलदायी हो रही है। उसके फल और प्रभाव को इन दिनों चल रही उथल-पुथल के रूप में देखा जाना चाहिए। कुछ दैवी आपदाएँ चिंतित भी करती हैं। उन्हें विरेचन, संवेदन जैसे चिकित्सा कार्यों के रूप में देखना चाहिए और आश्वस्त रहना चाहिए कि स्थायी प्रभाव शुभ ही होगा।
सामूहिक साधनाओं का एक प्रभाव यह भी होता है कि उनसे निर्दोष -नासमझ लोगों का हित भी सधता है। चौके में बनाया भोजन स्वयं के और परिवार के लिए ही खप जाता है। बहुत हुआ तो एकाध व्यक्ति को और खिलाया जा सकता है। लेकिन बहुत से लोग मिलकर विपुल सामग्री से भोजन तैयार करते हैं, तो वह लंगर या अन्न क्षेत्र जैसी व्यवस्था हो जाती है। दस-बीस लोगों द्वारा किया गया वह प्रयत्न सैकड़ों लोगों को तृप्त कर सकता है। सामूहिक साधनाएँ भी उसमें लगे साधकों की तुलना में कई लोगों को लाभ पहुँचाती है, उनकी आध्यात्मिक क्षुधा को तृप्त करती हैं।
जिन जातियों अथवा समाजों ने संगठित प्रयत्न किए और लौकिक क्षेत्र में ऐतिहासिक सफलताएँ प्राप्त कीं, उन्होंने सामूहिक उपासना को महत्व दिया है। मुसलमानों द्वारा शुक्रवार के दिन तथा ईद आदि अवसरों पर सामूहिक नमाज, ईसाइयों द्वारा रविवार को चर्च में सामूहिक प्रार्थना, बौद्धों का संघ ध्यान, सूफियों की नृत्य साधना जैसे कई उदाहरण हैं वैदिक परंपरा में यज्ञभाग भी सामूहिक उपासना का ही एक प्रकार है। अश्वमेध, राजसूय, वाजपेयी जैसे विशाल यज्ञ सूक्ष्मजगत में व्याप्त ‘तेज’ और ‘ओज’ को आकर्षित करने के उपक्रम ही थे। सामूहिक प्रयत्नों से ब्रह्मतेज को अभीप्सा के साथ पुकारते हुए उसे धारण करने योग्य भावभूमि भी तैयार की जाती थी। इस क्रम करे मेध के आह्वान और खेती के लिए जमीन तैयार करने की दोनों प्रक्रियाओं का एक साथ चलना कहा जा सकता है।
यज्ञ-महायज्ञों के अलावा ऋषि आश्रमों में वेद पाठ, सामूहिक जप, अनुष्ठान आदि कृत्य भी चलते थे। उपासना के लिए सूर्य के उदय और अस्त होने का ऐसा समय निर्धारित था कि एक ही समय जप और अर्घ्य की शर्त स्वतः पूरी हो जाती थी। किसी भी जप-तप से पहले संकल्प करना ही पड़ता है। निजी उत्कर्ष अथवा आत्मकल्याण के लिए ‘मयोत्पाददुरित क्षम पूर्वकम्’ और कार्यक्रमों के लिए ‘विजयार्थ’ ‘संतान लाभार्थ’ सामूहिक कल्याण के लिए ‘राष्ट्ररक्षार्थ विश्वकल्याण’ जैसी भावनाओं को व्यक्त किया जाता है। संकल्प में उद्देश्य जोड़ने का नियम पूरा करना ही होता है। उसके बिना जप-तप अधूरा समझा जाता है।
एक ही समय में एक ही उद्देश्य के लिए की गई उपासना सामूहिक जप की श्रेणी में आती है। उसका प्रभाव भारत के गौरवमय अतीत के दिनों में देखा गया। भारतीय मान्यता के अनुसार हमारी यह सृष्टि लाखों वर्ष पुरानी है। वैदिक परंपरा अनादि है। इतिहास के विद्वान इस प्रतिपादन को नहीं मानते। उनके अनुसार वैदिक सभ्यता-संस्कृति ढाई से तीन हजार वर्ष ईसा पूर्व विकसित हुई। ईसा की ग्यारहवीं सदी तक भारत ने वैभव और स्वाभिमान का युग देखा। पतन -पराभव का युग इसके बाद ही आरंभ होता है। ईसा के ढाई हजार वर्ष पहले से ग्यारह सौ वर्ष बाद तक साढ़े तीन हजार वर्ष का समय गर्व और गौरव के साथ याद किया जाता है। इन दिनों साधना-स्वाध्याय और सामाजिक संस्कार के प्रयोग नियमित चलते रहते थे। कहना न होगा कि भारत की गौरव-गरिमा को स्थिर रखने में शुद्ध आध्यात्मिक स्तर के प्रयत्नों का योगदान विलक्षण ही था। उसे आधारभूत श्रेणी का ही मानना होगा।
सामान्य लक्ष्य एकाकी प्रयत्नों से प्राप्त किए जा सकते हैं। छोटा-मोटा निर्माण करना है, तो एकाध व्यक्ति ही उसे संपन्न कर लेता है। थोड़े बड़े निर्माण करने हों तो कुछ ज्यादा लोगों को मिलकर प्रयत्न करने होते हैं जैसे भवन बनाना या बड़े आयोजनों की व्यवस्था करना। लेकिन महान् लक्ष्य प्राप्त करना हो, तो उसके लिए हजारों लोगों को संघर्ष करना पड़ता है। समाज में व्यापक परिवर्तन के लिए अथवा अत्याचारी-आततायी सत्ता को उलटने के लिए बड़ी संख्या में लोगों को अपना समय एवं साधन झोंकना पड़ता है, महत्त्वाकाँक्षाओं को तिलाञ्जलि देनी पड़ती है। सूक्ष्मजगत् में व्यापक हेर-फेर करने के लिए भी सामूहिक स्तर पर ही साधना -उपासना करनी होती है। हजारों साधकों को उसके लिए श्रम, संकल्प और संयम जुटाना पड़ता है। जुटते रहे हैं।
गुरुगोविन्द चमकौर किले में आक्रमणकारियों से मोर्चा लेने के लिए सेना एकत्र कर रहे थे। किले में शरण लेते समय उनके दोनों पुत्र जोरावर व फतहसिंह पीछे छूट गए। सरहिंद से आए दो दूत गुरु गुरुगोविन्द सिंह को समाचार सुना रहे थे-बड़ी मुगल सेना चमकौर दुर्ग पर आक्रमण करने चल पड़ी है-इतना बोलकर वे चुप हो गए और रो पड़े। गुरु जी ने पूछा-आगे बताओ। रुक क्यों गए? जोरावर व फतहसिंह का क्या हुआ? कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्होंने विधर्मी को समर्पण कर दिया हो, लोभ में आकर उनका धर्म स्वीकार कर लिया हो?”
दूतों ने रोते-रोते कहा- “नहीं गुरु जी! ऐसा न कहे। नवाब ने उन्हें धर्म न त्यागने व सेना के रहस्य न बताने के कारण जिंदा दीवार में चिनवा दिया है और वे सहर्ष बलि हो गए। यह समाचार सुनकर आपकी माता ने कमरे से कूदकर अपनी जान दे दी।” गुरु जी का मस्तक गर्व से ऊँचा हो गया। वे बोले-वे दोनों सच्चे धर्मवीर थे।”
सभ्यता के आरंभ से अब तक मनुष्य -जाति ने कई प्रयोग किए कि विकास और सुरक्षा का क्रम व्यवस्थित चलता रहे।। प्रायः सभी प्रयोग महँगे साबित हुए हैं और अंततः विफल भी। राजनीति का प्रयोग भी विफल रहा। यों इससे उम्मीद तो कभी नहीं थी, लेकिन विभिन्न युगों में इसने विभिन्न कलेवर बदले कि शायद नया स्वरूप कुछ कर दिखाए। बीसवीं सदी का अंत आने तक अंतिम प्रयोग भी पूरी तरह विफल रहा। क्या होगा भविष्य की राजनीति का चेहरा? धर्मतंत्र जैसा है, उसी रूप में वह क्या राजनीति का विकल्प बन सकेगा।
मनुष्य जाति का दो हजार साल का इतिहास विभिन्न प्रयोगों और व्यवस्थाओं का विवरण है। शासनतंत्र के विभिन्न तंत्र के विभिन्न रूप से इस अवधि में आए और विफल रहे। विफलता का कारण उनका आधार ही गलत होना है। आधार यह था कि मनुष्य मूलतः पशु है। पाशविक संस्कारों और प्रवृत्तियों से धीरे-धीरे उठते हुए वह सामाजिक हुआ। अपने अलावा दूसरों के अस्तित्व को भी स्वीकार करने लगा। यह आस्था इसमें दृढ़ होती गई कि अपने अलावा दूसरों को भी जगत् में रहने और उन्नति करने का अधिकार है।
फिर भी दूसरों का स्वत्व छीनने, कमजोर को दबाने और अपनी प्रभुता कायम रखने की उसकी आकांक्षा में पर्याप्त सुधार नहीं आया। पाशविक संस्कार अभी भी कायम हैं और हमेशा शक्तिशाली कमजोर को दबाएगा ही-बड़ी मछली छोटी मछली को निगलेगी ही। इस प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिए शासनतंत्र की कल्पना की गई। ऐसे लोगों को मान्यता और आवश्यक अधिकार मिले, जो कमजोरों की रक्षा कर सकें, उनके स्वत्व को छिन जाने से रोक सकें। राजनीति के विद्यार्थी मानते हैं कि राज्य की कल्पना का विकास इसी आधार पर हुआ। कुछ समर्थ लोगों को इसलिए विशेष अधिकार दिए गए कि वे असमर्थों की रक्षा कर सकें। मनुष्य को पशु मानकर रची गई शासन-व्यवस्था में भी तो शक्तिशाली लोगों को ही वर्चस्व मिला। जब सिद्धांत ही यह है कि शक्तिशाली अपने से दुर्बल लोगों को दबाकर ही रह सकता है तो उससे असमर्थों की रक्षा के लिए तो उसे पोषण और अभिवर्द्धन में कहाँ से लगाया जा सकता है।
राजनीति विज्ञान के पंडित मानते हैं कि इसलिए सत्ता और नियंत्रण को आधार बनाकर रचा गया हर ढाँचा बेकार साबित हुआ। उस प्रयास को वे जूतों के फीते पकड़कर अपने आपको ऊपर उठाने जैसी चेष्टा के समान मानते हैं। अपने ही पाँव में पहने जूतों के फीते ऊपर खींचेंगे तो फीते टूटेंगे या खुद गिरेंगे। फ्राँसीसी विचारक अबे डुबाँय ने विश्व संस्कृति के इतिहास की समीक्षा करते हुए लिखा है कि राजनीति फेल हुई। वह मनुष्य को बाहर से सँभालती है और तोड़-फोड़ करती है। इक्कीसवीं सदी में मनुष्य को नए प्रयोगों के बारे में सोचना होगा; न केवल सोचना होगा, बल्कि उसके विकल्प भी तलाश करने पड़ेंगे।
क्या होगा विकल्प? डुबाँय लिखते हैं कि विश्व इतिहास की समीक्षा करें तो पाएँगे कि सत्ता और राज्य के शिखर पर बैठे किसी भी व्यक्ति ने मानवीय सभ्यता का उत्कर्ष नहीं किया है। दस ऐसे नाम चुनना चाहें, जिनसे मनुष्यता गौरवान्वित हुई है तो उनमें एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो राजनीति से जुड़ा हो। जिन दस विभूतियों के नाम गिनाए गए हैं, वे इस प्रकार है- सुकरात, गौतम बुद्ध, ईसा, वात्स्यायन, पतंजलि, आर्कमिडीज, मार्टिन लूथर, कन्फ्यूशियस, कार्लमार्क्स और अलबर्ट आइंस्टीन। इस सूची में नामों को लेकर मतभेद हो सकते हैं। कुछ नाम हटाए और जोड़े जा सकते हैं लेकिन लेखक का दावा है कि कोई भी चक्रवर्ती सम्राट, दिग्विजयी और महानतम शासक भी इनमें किसी नाम का स्थान नहीं ले सकता।
नाम इतिहास से चुने गए हैं इसलिए भी आपत्ति हो सकती है कि राम और कृष्ण जैसी विभूतियों को शामिल नहीं किया गया। इस विवाद में जाए बगैर सारतत्त्व यह निकलता है कि धर्म संस्कृति और दर्शन का क्षेत्र ही है, जिसने मनुष्य को आँतरिक समृद्धि दी। विकासवाद के सिद्धांत को मानें तो आदिमानव से विकसित होते हुए मनुष्य इक्कीसवीं सदी में समता-बंधुत्व-न्याय की आस्था सँजोए पहुँच रहा है। इस यात्रा को मनुष्य का परिष्कार मानें तो श्रेय धर्म और अध्यात्म को ही देना होगा।
यद्यपि धर्म के नाम पर भी बहुत क्रूरता और हिंसा हुई है। मध्यकाल में पश्चिमी देशों में चले क्रूसेड -धर्मयुद्ध और नरसंहार इतिहास में कलंक की तरह अंकित हैं। ये संघर्ष ईसा से करीब दो सौ साल पहले शुरू हो गए थे। रोम, यूनान, मिस्र आदि सभ्यताओं में धार्मिक विश्वासों के आधार पर लोगों को जिंदा जला देने और गाँव-के-गाँव उजाड़ देने के उदाहरण मिलते हैं। भारतीय मनीषा मानती रही है कि धर्म व्यक्ति का आँतरिक पक्ष सँभालता है और राज्य बाहरी पक्ष। यों धर्म की संपूर्ण परिभाषा आँतरिक और बाह्य दोनों ही पक्षों को संतुलित -समन्वित रूप से सँभालने की है, लेकिन पश्चिमी संदर्भ में देखें तो राज्य भौतिक पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है।
ईसाइयों के उदय के साथ धर्मतंत्र का जो ढाँचा विकसित हुआ, वह अभ्यंतर को सँभालने के स्थान पर राजसत्ता का प्रतिद्वंद्वी बनकर ज्यादा उभरा। उसी का परिणाम है कि धर्म-पुरोहितों और शासकों में आए दिन टकराव होने लगे। जिस विजय-अभियान को क्रूसेड के नाम से जाना जाता है, वह कुछ और नहीं, इसी टकराव की एक परिणति है। राजतंत्र ने धर्म-पुरोहितों को अपनी ओर मिलाकर लोक-समाज को कसने में, अपनी पकड़ मजबूत करने की मंशा साधी। धर्मतंत्र ने इस उपयोग से अपनी सामर्थ्य को पहचाना और वह भी सत्ता में दावेदार बनने लगा। जिस धर्म को हिंसा, क्लेश और विनाश का रूप बताया जाता है वह इसके प्रतिफल है, धर्मधारणा का दोष नहीं।
जेहाद के नाम पर अपने राज्य का विस्तार करने की उठा-पटक और ध्वंस लीला के विवरण भी इतिहास में बिखरे पड़ें हैं। इस्लाम के नाम पर राजसत्ता के विस्तार का खेल इतनी नृशंसता से चला है कि एक समय तो यह धर्म विश्वास ही विस्तारवाद का पर्याय समझा जाने लगा। इस्लाम के तत्त्वदर्शन और साधना विधान को व्यापक विस्तार देने में सूफी संतों ने अनर्थक प्रयत्न किए। उनके माध्यम से इस्लामी दर्शन भारतवर्ष में सातवीं -आठवीं शताब्दी में ही आ गया था, लेकिन ग्यारहवीं शताब्दी के बाद उसके नाम पर तलवारों की आँधियाँ भारत की तरफ बहीं। उन्होंने ही सूफी योगदान को अतल गहराइयों में डूबो दिया।
धर्म के राजनीतिक उपयोग का एक स्वरूप इन दिनों साम्प्रदायिकता के रूप में दिखाई देता है। स्वतंत्रता आंदोलन के सफलता तक पहुँचने तक धर्म के माध्यम से वैमनस्य का विष फैलाने की जो रणनीति चली है। वह भारत, पाकिस्तान और बाँग्लादेश समेत कई यूरोपीय देशों के लिए भी समस्या बनी हुई है। भारतीय उपमहाद्वीप में वह हिंदू-मुस्लिम समस्या के रूप में है तो यूरोपीय देशों में यहूदी -ईसाई, कैथोलिक प्रोटेस्टेण्ट, बौद्ध-ताओ बौद्ध-ईसाई आदि उन्मादों के रूप में है। महाकवि रामधारी सिंह दिनकर ने इस स्थिति को अमृत में हलाहल घोलने के रूप में समझाया है। पोषण करने वाले दूध में घुला नशा देखने में बुरा भी नहीं लगता और अपना विष भी फैलाता रहता है। सांप्रदायिक उन्माद को धर्म में राजनीति का विष घोलने की तरह ही समझा जा सकता है।
इक्कीसवीं सदी में जिस धर्म चेतना को राजनीति का विकल्प बनकर उभरने की आशा की जाती है, उसकी कल्पना मौजूदा स्थितियों को ध्यान में रखकर नहीं की जा सकती। इन दिनों राजनीति का ही वर्चस्व है; यद्यपि वह समाप्त हो रहा है, जर्जर हो चुका है और ढहने की स्थिति में है। उसे ध्यान में रखकर विकल्प सोचेंगे तो खंडहर हुई इमारतों में आकर डेरा जमा लेने वाले चमगादड़ों, साँप, बिच्छुओं और भूत-प्रेतों जैसा माहौल ही बनता दिखाई देगा। स्वस्थ विकास -स्वच्छ वातावरण और इमारत के नए स्वरूप की कल्पना के साथ ही उभरना चाहिए।
धार्मिक चेतना-संपन्न वातावरण का अर्थ यह नहीं है कि चारों ओर हरिनाम का कीर्तन सुनाई दे अथवा भजन -ध्यान की प्रक्रियाएँ अनवरत चलने लगे, वह सब तो इन दिनों भी हो रहा है। बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों और गाँव-बस्तियों तक में कथा-कीर्तन, सत्संग-प्रवचन के प्रचुर आयोजन चलते हैं। एक शहर में कोई कार्यक्रम होता है तो दूरदराज से लोग आकर वहाँ डेरा जमा लेते हैं। उनमें ज्यादातर की भागीदारी सुनने, चर्चा करने तक ही सीमित रहती है। शुभ परिवर्तन गिने-चुने लोगों के जीवन में ही आता है। जिनके जीवन में वह परिवर्तन आ जाता है, वे दोबारा आयोजन के गोरखधंधे में उलझने भी नहीं जाते। इस तरह के आयोजनों से कोई विकल्प मिलने या दिशाधारा दिखाई देने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। आयोजनों में इकट्ठी होने वाली भीड़ सिर्फ इस बात का संकेत है कि राजनीति से लोग आशाभरी दृष्टि से देखने लगे हैं। यहाँ से निराश होने की स्थिति में न सभ्यता कहीं टिकेगी और न ही संस्कृति बचेगी।
धर्म आस्था का विषय है। इसकी समझ कितनी ही स्थूल और ग्रहणशीलता कितनी ही कम हो, तो भी व्यक्ति दूसरों की बलि चढ़ाकर अपना स्वार्थ साधने की बात नहीं सोचता। किसी के लिए कुछ करने की इच्छा जाग्रत होती है तो उपकार के स्तर की ही प्रवृत्ति होती है। धर्म की यह सरल-सी पहचान है। इसी के लिए महाभारतकार ने पूरा वृत्तांत लिखने के बाद कहा था कि मैं हाथ उठाकर कहता हूँ, लेकिन मेरी बात कोई नहीं सुनता। बात यह है कि धर्म से ही अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि होती है, फिर भी लोग इसका सेवन क्यों नहीं करते? जिस युग में इस तथ्य को जिस उत्साह के साथ सुना, समझा और जीवन में उतारा गया, उस युग में सुख-सौमनस्य उतना ही सजीव और मुखर हुआ है।
अगले दिनों धर्म भावना ही व्यक्ति और समाज की समस्त प्रवृत्तियों की नियामक, प्रेरक और आधार बनने जा रही है। उसका स्वरूप राजनीति में सत्पुरुषों के प्रवेश और वर्चस्व बढ़ने के रूप में दिखाई देगा। अभी राजनीति ऐसी प्रतिभाओं को आकर्षित नहीं कर पाई है; क्योंकि जिस तरह के लोगों का प्रभुत्व है, उनके लिए ऐसी प्रतिभाएँ बाधक सिद्ध होती हैं। समाज और राज्य का नियमन करने वाले लोगों के प्रति तिरस्कार की भावना नहीं रखी जाए, तो उनमें संघटन, जोड़-तोड़ और तालमेल बिठाने के साथ जूझते रहने जैसे कुछ गुण भी तो होते हैं। इन गुणों के आधार पर ही वे सफल होते देखे जाते हैं।
कठिनाई यह है कि सफल होने के बाद, सत्ता के शिखर अथवा किसी ऊँचाई तक पहुँच जाने के बाद उनके पास वह क्षमता नहीं होती, जिससे शुभ में प्रवृत्त हो सकें। इस किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में ही अनर्थ और विपर्यय होने लगता है। अब अनर्थ-अनय इतना बढ़ गया है कि संगठन को विघटन और जोड़-तोड़ के आधार पर चलाया नहीं जा सकता। उसमें इतनी शक्ति भी नहीं है कि वह विकल्प बनने जा रही किसी भी प्रवृत्ति को रोक-टोक सके। सत्ता की होड़ लगाने वालों में न जीवनीशक्ति बची है और न ही लोग उनसे इतनी प्रीति रखते हैं कि उनका बोझ ढोते रह सकें।
सत्ता किन लोगों अथवा प्रवृत्तियों के हाथ में जाने वाली है? राजनीति का विकल्प क्या होगा? दंड और प्रलोभन से जीवित रहने वाली राजशक्ति कब तक जीवित रहेगी? आदि प्रश्नों का उत्तर एक ही है- धर्मचेतना पर आधारित रचनात्मक प्रवृत्तियों का उभार। अगले दिनों मनुष्य को बुराइयों का घर मानने और भूख, वासना, अहंभाव से ही प्रेरित समझने वाली मान्यता बदलने वाली है। यह सोच भी बदलेगा कि मनुष्य में पाशविक-पैशाचिक प्रवृत्तियों का ही बोलबाला है और उसे दमन या प्रलोभन से ही रोका जा सकता है।
भारतीय मान्यता यह है कि मनुष्य परमात्मा का ही अंश है। उसमें सत्त्व, रज और तम, तीनों प्रवृत्तियों का मेल है। अधिसंख्य प्राणी तम और रज से ही प्रेरित होते हैं। मनुष्य सत्त्व और रज प्रधान है। इस कारण सृष्टि में उसकी स्थिति विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण है। प्रमाद और असावधानी उसे पतन की दिशा में ले जाती है। इससे बचाने के लिए राजधर्म की, राजसत्ता की, राजनीति की आवश्यकता है। दूसरी सभ्यताओं और धर्मकथाओं में शासन का उद्देश्य मनुष्य को दंड देने और इच्छित दिशा में चलाने के लिए किया गया है। भारतीय मान्यता इन सबसे हटकर है। यहाँ पहले शासक महाराज पृथु ने कृषि को व्यवस्थित करने से शासन आरंभ किया। यह संकेत है कि भारतीय परंपरा की दृष्टि से शासन का उद्देश्य विकास ओर व्यवस्था को गति देना है। भविष्य में इसी तरह की प्रवृत्तियाँ राजनीति को नियंत्रित करने वाली हैं। विभिन्न क्षेत्रों में रचनात्मक कार्य करा रहे लोग अपना संकोच छोड़कर आगे आएँगे। उनकी उपस्थिति अवांछनीय, अयोग्य और दिशाहीन लोगों को अलग कर देगी।
धर्मभावना से अनुप्राणित होने का अर्थ हैं-अपने कर्तव्यं-कर्म के प्रति सजगता। योग्यता और अपने कर्म के प्रति निष्ठा भी इसमें समाहित है। धर्मभावना से अनुप्राणित राजनीति अथवा शासन-व्यवस्था का स्वरूप क्या होगा, इस संबंध में स्पष्ट कह सकना कठिन है। दस-पाँच साल चलने वाले प्रयोग और उनके निष्कर्ष ही भविष्य का स्वरूप निर्धारित करेंगे। अब तक के अनुभवों से इतना तो समझा ही जा सकता है कि लोगों को वर्ग, संप्रदाय, जाति व क्षेत्र में बाँटकर चलने वाली राजनीति के दिन लद गए। राजनीति में आने वाले लोगों की अपनी छबि, निष्ठा और चरित्र उन्हें विश्वसनीय बनाते हैं। यह विस्तृत अध्ययन का विषय है। सार यही है कि नारे, भावावेश, संगठन और आश्वासन के दिन लग रहे हैं। कुछ ही समय में यह भी दिखाई देगा कि योग्य व्यक्ति के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ा है- यह भी कि जिनकी भावना शुद्ध है अथवा नीयत साफ है और जो राजनीति को व्यवसाय नहीं, कर्तृत्वं और धर्म मानकर अपना रहे हैं, उन्हें प्रतिष्ठा मिल रही है। यह स्थिति पेशेवर राजनीतिज्ञों के लिए खतरे की घंटी है तो सेवा मानकर इस क्षेत्र में आने वाली रचनात्मक प्रतिभाओं के लिए स्वागत-सद्भाव का आश्वासन।
बगदाद के शासक ने जितना कर सकता था धन-संपत्ति जमा की। उसके लिए वह प्रजा पर तरह-तरह के अन्याय और अत्याचार भी करता था। उससे प्रजा बड़ी दुःखी थी। एक दिन गुरुनानक घूमते-घूमते बगदाद जा पहुँचे। शाही महल के सामने ही वह कंकड़ों का छोटा-सा ढेर जमा करके उन्हीं के पास बैठ गए। किसी ने नानक के ने की सूचना दी। राजा स्वयं वहाँ पहुँचा। कंकड़ों का ढेर देखते ही उसने पूछा-महाराज आपने यह कंकड़ किसलिए इकट्ठे किए हैं।” गुरुनानक ने शीघ्र उत्तर दिया-महाराज इन्हें प्रलय के दिन ईश्वर को उपहार में दूँगा।”
सम्राट् जो से हँसा और बोला-अरे नानक! मैंने तो सुना था तू बड़ा ज्ञानी है, पर तुझे इतना भी पता नहीं कि प्रलय के दिन रूहें अपने साथ कंकड़ तो क्या सुई-धागा भी नहीं ले जा सकतीं।”
गुरुनानक ने चुटकी ली- “मालूम नहीं महोदय, पर मैं आया इसी उद्देश्य से हूँ कि और तो नहीं पर शायद आप प्रजा को लूटकर जो धन इकट्ठा कर रहे हैं, उसे अपने साथ ले जाएँगे तो उनके साथ ही यह कंकड़ भी चले जाएँगे?” राजा समझ गया, इसके आगे प्रजा का उत्पीड़न बंद कर उनकी सेवा में जुट गया।
अग्नि को ऋग्वेद में पुरोहित कहा गया है और यजनकर्ताओं को दैवी गुणों की रत्नराशि उपलब्ध होने का आश्वासन दिलाया गया है। ऋग्वेद का पहला मंत्र है- ॐ अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्। इस पुरोहित की बहुमूल्य पाँव शिक्षाएँ हैं- (1) अग्नि जब तक ज्वलंत रहती है तब तक वह गरम और प्रकाशमान रहती है। मनुष्य को भी प्रतिभावान् और कर्तव्यपरायण बनकर रहना चाहिए। (2) अग्नि की लौ सदा ऊपर रहती है। मनुष्य को भी उच्चस्तरीय, ऊर्ध्वगामी स्तर की क्रिया-प्रक्रिया अपनानी चाहिए। (3) अग्नि मंत्र में जो कुछ यजन किया जाता है, वह वायुभूत बनकर व्यापक बना दिया जाता है। हमें भी अपने साधनों को लोकहित में नियोजित रखे रहना चाहिए। (4)अग्नि अपने निज के लिए बचाकर नहीं रखती। हमें भी संग्रही, लालची, स्वार्थी न होकर मिल-बाँटकर खाने की आदत डालनी चाहिए। (5) यज्ञ का अवशेष भस्म के रूप में ही रह जाता है। हमें भी ध्यान रखना चाहिए कि इस सुंदर व्यक्तित्व का अवशेष मुट्ठी भर भस्म के रूप में बचने वाला है, इसलिए इसका सदा श्रेष्ठतम सदुपयोग ही करना चाहिए। यज्ञाग्नि मुख से शब्दों द्वारा नहीं बोलती, पर उसकी उपर्युक्त गतिविधियों को देखकर सहज ही जाना जा सकता है कि यह दिव्य पुरोहित हमारे लिए अपनी मौन भाषा में क्या संदेश और संकेत प्रस्तुत करता है।
गायत्री को भारतीय संस्कृति की जननी और यज्ञ को भारतीय धर्म का पिता माना गया है। गायत्री के चौबीस अक्षरों में सद्ज्ञान, सद्भाव और सत्कर्म की प्रेरणा है। यज्ञ में पुरुषार्थ, सेवा, संयम और दूरदर्शी विवेक अपनाने की शिक्षा है। गायत्री यज्ञ द्वारा इन्हीं सद्भावनाओं के अनुरूप चिंतन, चरित्र और व्यवहार को ढालने की प्रेरणा मिलती है। भारतीय परंपरा के अनुरूप सभी पर्व-त्योहार एवं षोडश संस्कार किसी-न-किसी रूप में यज्ञकृत्य के साथ जुड़े हुए हैं। विवाह अग्नि की साक्षी में होते हैं। अंत्येष्टि में शरीर चिता रूपी यज्ञ में होमा जाता है। नवान्न पककर जब आता है, तब उसे सर्वप्रथम यज्ञ भगवान् को अर्पित किया जाता है। इसी को होली या नववर्ष-यज्ञ कहा जाता है। ‘होला’ कच्चे अन्न को कहते हैं। उसी से ‘होली’ शब्द बना है। विवाह में दो आत्माओं का मिलन यज्ञ रूपी ‘बेल्डिंग’ क्रिया द्वारा ही संपन्न किया जाता है।
‘यज्ञ’ शब्द संस्कृति की ‘यज्’ धातु से बना हुआ है, जिसका अर्थ होता है- (1) दान (2) देवपूजन (3) संगतिकरण। इनका भावार्थ है कि (1) हम दानशील बनें। दूसरों की सेवा-सहायता में कृपणता न बरतें। अपना निर्वाह न्यूनतम में करें और बचत को लोकमंगल के लिए नियोजित करें। (2) देवपूजन का अर्थ है- दिव्य सत्प्रवृत्तियों के परिपोषण के लिए सामर्थ्य भर प्रयत्न करें। (3) संगतिकरण का तात्पर्य है- मिल-जुलकर संघबद्ध होकर रहें। एक-दूसरे के काम आएँ और मिल-जुलकर प्रगति पथ पर अग्रसर हों।
इस यज्ञ के शब्दार्थ की व्यावहारिक जीवन में अवधारणा की जानी चाहिए। जीवन को यज्ञ रूप बनाया जाना चाहिए। वह पवित्र, प्रामाणिक और प्रखर होकर रहे। यज्ञ के निकट बैठकर हमें यही शिक्षाएँ हृदयंगम करनी चाहिए। इन्हीं तथ्यों की व्याख्या-विवेचना करते हुए अग्निहोत्र के साथ-साथ ज्ञानयज्ञ की, प्रवचन-प्रशिक्षण की भी व्यवस्था करनी चाहिए।
संक्षेप में यज्ञ प्रयोजन की चार दिशाधाराएँ मानी जा सकती हैं। इन्हें- (1) समझदारी (2) ईमानदारी (3) जिम्मेदारी और (4) बहादुरी भी समझा जा सकता है। व्यक्ति और समाज में इन विभूतियों का जितना अभिवर्द्धन होगा, उतनी ही उसकी संपन्नता, सुसंस्कारिता, समर्थता और विशिष्टता निखरेगी।
यज्ञ स्वल्प व्यय एवं स्वल्प श्रम में सृष्टि के समस्त जीवधारियों का हितसाधन करता है। अग्निहोत्र में जो जड़ी-बूटियाँ तथा घृत आदि होमी जाते हैं, वे अदृश्य तो हो जाते हैं, पर नष्ट नहीं होते। सूक्ष्म बनकर वायु में मिल जाती हैं और जिनको भी उस प्राणवायु में साँस लेने का अवसर मिलता है, उन सभी को यजनकर्ताओं की ओर से प्रीतिभोज दिया गया समझा जा सकता है। इससे मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी और वनस्पति वर्ग भी लाभान्वित होता है। इस परोपकार का पुण्यलाभ यजनकर्त्ताओं को मिलता है और वे अंतरंग एवं बहिरंग क्षेत्रों में सब प्रकार फलते-फूलते हैं।
वस्तुतः यज्ञ एक बहुमुखी प्रक्रिया है। इसके कुछ भाग विशुद्ध आध्यात्मिक हैं। मनुस्मृति में उल्लेख है कि “यज्ञ और महायज्ञ के माध्यम से मनुष्य ब्राह्मण बनता है।” इस प्रकार के यज्ञों में मनुष्य को आहार-विहार एवं गुण, कर्म, स्वभाव को इस ढाँचे में ढालना पड़ता है, जिससे वह ऋषिकल्प आचरण एवं चिंतन में संलग्न रहे- गायत्री पुरश्चरण एवं यज्ञ का कार्यक्रम विधिवत् बनाए रहे।
यज्ञ का विशिष्ट विज्ञान है। उसके आधार पर अनेक दिव्य शक्तियाँ, ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त की जाती हैं। विशेष आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए, विशेष संकट निवारण के लिए एवं विशेष शक्तियाँ अर्जित करने के लिए विशिष्ट विधि-विधानों सहित विशेष यज्ञ किए जाते हैं। उनके विधि-विधान भी भिन्न-भिन्न हैं। मार्कंडेय पुराण में इस संदर्भ में अनेक विवरण और वर्णन प्राप्त होते हैं। या के द्वारा न केवल लौकिक सुख-संपदा वरन् आध्यात्मिक संपदा की भी प्राप्ति होती है।
मार्कंडेय पुराण के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न के पास इंद्रनीलमणि द्वारा निर्मित एक बड़ी ही मूल्यवान् प्रतिमा थी। उसके खो जाने पर राजा को बड़ा दुःख हुआ। दुःखी होकर वह मृत्यु की गोद में जाने लगा तो विद्वानों ने इस दुःख से निवृत्ति पाने के लिए एक बड़ा यज्ञ करने की सलाह दी। यज्ञ के फलस्वरूप राजा को वह खोई हुई मणि अनायास ही प्राप्त हो गई
असुरों से परास्त होने पर देवताओं की आत्मरक्षा करने के जब-जब प्रसंग आए हैं, तब-तब यज्ञ रूपी ब्रह्मास्त्र का ही सहारा लेना पड़ा है। देवताओं की विपत्ति निवारण करने में सदा यज्ञ ही सहायक हुआ है।
एक समय असुर प्रबल हो गए। पूर्ण विश्व को जीतकर स्वर्ग पर भी उन्होंने अपना अधिकार जमा लिया। दैत्यराज ने अपना राज्य स्थायी रखने की इच्छा की और इस हेतु वह इंद्र के पास गया तथा पूछा-हमारा राज्य कैसे स्थिर रहे? इंद्र ने सरल भाव से उन्हें यज्ञ करने का उपाय बताया। असुर यज्ञ-परायण हो गए। वे यज्ञ करके शक्ति के अधिकारी बन बैठे और अजेय हो गए। विश्व में असुरों का ही राज्य दिखाई देना लगा। देवता निर्बल पड़ गए।
देवताओं ने भगवान् से प्रार्थना की। भगवान् ने असुरों के पास ऐसे-ऐसे दूत भेजे जो असुरों को यज्ञ न करने की सलाह दें। उन छद्म दूतों ने बड़ा प्रभावशाली वेश बनाकर असुरों से कहा-अरे! तुम यह पाप क्यों करते हो, यज्ञ में हिंसा होती है। दैत्यों को दूतों का यह परामर्श उचित लगा और उन्होंने अपना जीवन अयज्ञमय बना लिया, जिससे वे तेजहीन हो गए। देवताओं ने उन यज्ञहीन दैत्यों को पराजित करके स्वर्ग का राज्य वापस ले लिया।
इसी तरह स्वयंभू मन्वंतर कल्प के प्रथम मन्वंतर में देवता अनाहार से क्षीण हो रहे थे। देवों के दुर्बल होने से जगत् भी नष्ट होने लगा। तीन लोक, चौदह भुवन इस अवस्था में व्याकुलता को प्राप्त हो रहे थे। देवताओं ने इस विषम परिस्थिति से त्राण पाने के लिए भगवान् से प्रार्थना की। भगवान् तो सदैव से दीनों-आर्तों की पुकार सुनने वाले हैं। वे महर्षि रुचि की पत्नी आकूति से प्रकट हुए। उन्होंने अग्निहोत्र की स्थापना की। उन्हीं के नाम से अग्निहोत्र यज्ञ कहा जाने लगा। यज्ञ से देवों को भोजन प्राप्त हुआ। शक्ति प्राप्त हुई और वे विजय प्राप्त करके संसार का कल्याण करने में समर्थ हो गए।
यज्ञों द्वारा सदा सात्विक शक्ति तो उत्पन्न होती ही है; मनुष्य का कल्याण और उत्कर्ष करने वाला सतोगुणी वातावरण तो बनता ही है, साथ ही ऐसे तत्त्व भी यज्ञ द्वारा उत्पन्न होते हैं, जो शत्रुता, संकट और विरोध का सामना करने में पर्याप्त रूप से समर्थ होते हैं। विपत्ति में पड़ा हुआ मनुष्य विपत्ति-निवारण के लिए उग्र, प्रचंड एवं महाघोर शक्ति को भी यज्ञ द्वारा उत्पन्न कर सकता है। जन्मेजय का सर्पयज्ञ इसका एक श्रेष्ठ उदाहरण हैं-
राजा परीक्षित को जब तक्षक नाग ने डस कर स्वर्गवासी बना दिया तो उनके पुत्र जन्मेजय ने सर्पों को नष्ट कर देने के लिए सर्पयज्ञ आरंभ किया। यज्ञीय मंत्रों में वह शक्ति है, जो किसी बलवान्-से-बलवान् को भी खींच ला सकती है। सर्पयज्ञ का यही उद्देश्य था कि मंत्रों द्वारा खींच-खींचकर सर्पों को यज्ञ कुँड की अग्नि में भस्म कर दिया जाए।
यज्ञ आरंभ हो गया। ऋत्विक् काले वस्त्र पहनकर लाल-लाल आँखों वाले होकर प्रज्वलित अग्नि में मंत्रों के साथ सर्पों का आह्वान करने लगे। दूर-दूर से लाखों, करोड़ों एवं अरबों की संख्या में सर्पगण विवश होकर उस प्रचंड यज्ञाग्नि में स्वाहा हो गए।
तक्षक ने जब यह सुना कि राजा जन्मेजय सर्पयज्ञ में दीक्षित हुए हैं तो वह भागकर इंद्र की शरण में चला गया। यह ज्ञात होने पर जन्मेजय ने ब्राह्मणों से कहा कि हे ब्राह्मणो! यदि इंद्र की शरण में भी तक्षक पहुँच गया है तो भी उसे इंद्र के साथ-साथ यज्ञ की अग्नि में आहुति दे डालो।
ऐसा ही हुआ। जैसे ही तक्षक के नाम के साथ इंद्र के नाम मंत्र पढ़कर अग्नि में आहुति डाली गई, इंद्र सहित तक्षक व्याकुल दशा में आकाश में दिखाई देने लगा।
इस विपन्न अवस्था के बीच ऋषिकुमार आस्तीक ने बहुत ही महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने जन्मेजय को प्रसन्न करके सर्पयज्ञ बंद करने का वरदान लिया। इससे यज्ञ और यज्ञीय मंत्रों की शक्ति की प्रत्यक्ष बलवत्ता दर्शन के साथ ही इंद्र तथा तक्षक सहित शेष बचे हुए सर्पों के प्राणों की रक्षा भी हो गई।
शास्त्रों में देवशक्तियों एवं परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के लिए जितने भी साधन आदि याज्ञिक क्षेत्र में गिनाए गए हैं, उनमें यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है। यज्ञ से देवता प्रसन्न होते हैं और अभीष्ट परिणाम प्रदान करते हैं। गीता के तीसरे अध्याय के ग्यारहवें-बारहवें श्लोक में इस संदर्भ में स्पष्ट उल्लेख है- ‘देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।’ अर्थात् तुम लोग यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे तुम्हें उन्नत करेंगे और बिना माँगे ही इच्छित भोग अर्थात् सुख-संपदा प्रदान करते रहेंगे। इसी में आगे कहा गया है- ‘यज्ञाह्णवति पर्जन्यो” अर्थात् यज्ञ से ही प्राणपर्जन्य की वर्षा होती है। प्राण पर्जन्य का तात्पर्य सामान्य दृष्टि से ही नहीं है वरन् उस प्राणतत्त्व से है, जिसके आधार पर हम श्वास लेते, पोषण प्राप्त करते, स्वस्थ रहते और दीर्घायुष्य प्राप्त करते हैं।
किसी बड़ी आपत्ति का निवारण करने के लिए अथवा किसी बड़े प्रयोजन की सफलता के लिए भी अनेक विधि-विधानों से सुसम्बद्ध यज्ञ किए जाते हैं। शारीरिक, मानसिक रोग-निवारण एवं आरोग्यसंवर्द्धन भी यज्ञ द्वारा संपन्न होता है। यज्ञ की रोग-निरोधक क्षमता असीम है। उससे प्रभावित शरीरों पर सहज ही रोगों के आक्रमण नहीं होते। यदि कोई रोगी हो तो उसे पञ्चोपचार द्वारा जल्दी ही अच्छा किया जा सकता है। चूर्ण, गोली, सिरप, इंजेक्शन आदि के माध्यम से सेवन की गई औषधियाँ देर से अपना फल दिखाती हैं, किंतु वायुभूत औषधियाँ साँस के साथ शरीर में प्रवेश करतीं और समस्ता अवयवों में रक्त के साथ फैल जाती हैं। इस प्रकार उस प्रयोग का लाभ अधिक होता है और जल्दी भी। यज्ञ को एक ऐसी सर्वांगपूर्ण चिकित्सा पद्धति समझा जा सकता है, जिससे न केवल शारीरिक, वरन् मानसिक क्षेत्र की दुर्बलताएँ, दुष्प्रवृत्तियाँ भी दूर होती हैं।
दुर्गंधित, विषाक्त, प्रदूषण युक्त वायु का परिशोधन यज्ञ की सुगंधित वायु द्वारा किया जा सकता है। जिस प्रकार वृक्षों द्वारा वायु प्रदूषण का निवारण होता है, उसी प्रकार यज्ञ की सुगंधित वायु भी उसका परिशोधन करती है। शुद्ध वायु के लाभों से तो सभी अवगत हैं। यज्ञधूम्र आकाश में फैलकर प्राणपर्जन्य का सृजन करता है, जिससे पोषक वर्षा होती है। उस जल का उपयोग करने वाले मनुष्य सहित समस्त प्राणी तथा वनस्पति वर्ग को समुन्नत होने का अवसर मिलता है।
इतने कम प्रयास एवं कम खर्च में ऊपर वर्णित लाभों के अतिरिक्त अन्य कितने ही अधिक लाभ पहुँचाने वाला प्रयोग कदाचित् ही कोई दूसरा हो। इसीलिए शास्त्रकारों ने यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म’ कहा है। यज्ञ सान्निध्य से व्यक्तित्व में दैवी गुणों का समावेश होता है। इसी आधार पर मनु भगवान् ने यज्ञ को ब्राह्मणत्व का आधार माना है।
रेडियो केंद्रों में उच्चरित हुए शब्द विद्युत तरंगों के सम्मिश्रण से समूचे आकाश में फैल जाते हैं और वे कहीं भी सुने जा सकते हैं। उसी प्रकार यज्ञ प्रक्रिया के साथ जिन वेद मंत्रों का उच्चारण होता है, वे समूचे वातावरण में फैल जाते हैं और जन-जन के अंतराल से उसी प्रकार टकराते हैं, जिस प्रकार से उठी तरंग ट्रांजिस्टर से टकराकर उच्चरित शब्दों को स्पष्ट रूप से सुनाती है। साधारण रीति से बोले गए मंत्रों की तुलना में यदि इन्हें यज्ञाग्नि रूपी बिजली के साथ समन्वित कर दिया जाता है, तो इनका प्रभाव और भी अधिक बढ़ जाता है; अधिक सत्परिणाम उत्पन्न करता है। जिन्हें मंत्र शक्ति में विश्वास है, वे इसमें इतना और जोड़ लें कि यज्ञ प्रक्रिया के साथ जुड़ जाने पर वे और भी अधिक शक्तिशाली बन जाते हैं-अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव दिखाते हैं-दैवी अनुदान जैसे सिद्ध होते हैं।
इन दिनों वातावरण और वायुमंडल, दोनों में ही प्रदूषण की मात्रा अत्यधिक बढ़ गई है। इससे प्रकृति रुष्ट है। आए दिन दुर्भिक्ष, महामारी, बाढ़, तूफान, भूकंप आदि के प्रकोप सामने आते रहते हैं। इस असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए- रूठी प्रकृतिस्थ मनाने के लिए यज्ञ एक भावभरा मनुहार है। ऐसे दिव्य अनुष्ठानों का अंतरिक्ष के परिशोधन एवं संवर्द्धन में अच्छा योगदान रहता है।
लंका के असुर मारे जाने पर भी उनका प्रभाव सूक्ष्म वातावरण में बना रहा और असुरता अपने अस्तित्व का परिचय देती रही। इसका निराकरण भगवान् राम ने दस अश्वमेध यज्ञों द्वारा किया था। कंस एवं कौरवों आदि द्वारा उत्पन्न किए गए अनाचार, उनके महाभारत में नष्ट हो जाने पर भी सूक्ष्मजगत् में बने रहे। इसका निराकरण भगवान् कृष्ण के तत्त्वावधान में राजसूय यज्ञ द्वारा किया गया था। पिछले दो विश्वयुद्ध और आए दिन जहाँ-तहाँ होते रहने वाले छोटे-बड़े आक्रमणों द्वारा भी अंतरिक्ष की स्थिति असंतुलित होती है। इसका समाधान करने के लिए इन दिनों यज्ञ आयोजनों की विशेष आवश्यकता है।
थोड़े ही दिनों में नया युग आ रहा है। पिछला जरा-जीर्ण युग विदाई लेने जा रहा है। इस संधिकाल को सार्थक बनाने के लिए हम यज्ञीय धर्मकृत्यों द्वारा दोनों प्रयोजनों को सार्थक बना सकते हैं। इसे युग-परिवर्तन का संतुलन बिठाने वाला समय की माँग को पूरा करने वाला एक सशक्त आध्यात्मिक प्रयोग कहा जा सकता है। इसका व्यापक एवं गहरा चिरस्थायी प्रभाव पड़ता है।
नहुष को पुण्यफल के बदले में इंद्रासन प्राप्त हुआ। वे स्वर्ग में राज्य करने लगे। ऐश्वर्य और सत्ता का मद जिन्हें न आवे ऐसे कोई बिरले ही होते हैं। नहुष भी सत्तामद से प्रभावित हुए बिना न रह सके, उनकी दृष्टि रूपवती इन्द्राणी पर पड़ी। वे उसे अपने अंतःपुर में लाने की विचारणा करने लगे। प्रस्ताव उन्होंने इन्द्राणी के पास भेज ही तो दिया।
इन्द्राणी बहुत दुःखी हुईं। राजाज्ञा के विरुद्ध खड़े होने का साहस उसने अपने में न पाया तो एक दूसरी चतुरता बरती। नहुष के पास उसने संदेश भिजवाया कि वह ऋषियों को पालकी में जोते और उस पर चढ़कर मेरे पास आएँ तो प्रस्ताव स्वीकार कर लूँगी। आतुर नहुष ने अविलंब वैसी व्यवस्था की। ऋषि पकड़ बुलाए, उन्हें पालकी में जोता गया, उन पर चढ़ा हुआ राजा जल्दी-जल्दी चलने की प्रेरणा करने लगा।
दुर्बलकाय ऋषि दूर तक इतना भार लेकर तेज चलने में समर्थ न हो सके। अपमान और उत्पीड़न से वे क्षुब्ध हो उठे। एक ने कुपित होकर शाप दे ही तो डाला-दुष्ट! तू स्वर्ग से पतित होकर, पुनः धरती पर जा गिर।” शाप सार्थक हुआ। नहुष स्वर्ग से पतित होकर मृत्युलोक में दीन-हीन की तरह विचरण करने लगे।
हवा के झोंकों से झूमते घने छायादार वृक्ष, उनसे गले मिलती लताएँ प्रकृति का श्रृंगार ही नहीं, जीवन का अजस्र स्रोत भी हैं। यही वह तथ्य है, जिसकी वजह से वनों के प्रति प्यार व श्रद्धा भारतीय संस्कृति की संवेदनशील परंपरा रही हैं विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ माने जाने वाले ऋग्वेद में यह साफ-साफ उल्लेख है कि प्राचीन भारत के लोग वनदेवी की उपासना किया करते थे। मानवीय जीवन को सबसे पहली व्यवस्था देने वाले मनु महाराज ने अपनी स्मृति में वन संपदा को नष्ट करने वालों के लिए कठोर दंड विधान बनाया था। अथर्ववेद में वनों को समस्त सुख-संपदा का स्रोत कहा गया है। यही क्यों ऋग्वैदिक महर्षियों से लेकर शास्त्र, पुराण, उपनिषद्, रामायण आदि के प्रणेता ऋषिगणों ने आरण्यकों का आश्रय लेकर ही इस देवदुर्लभ ज्ञान को लिपिबद्ध किया था। मत्स्यपुराण में तो वनों की महत्ता प्रतिपादित करते हुए कहा गया है- दषकूपसमावापी, दषवापीसमोह्रदः, दषह्रद समःपुत्रो दषपुत्रसमो द्रुमः यानि कि दस कुएँ खोदने का पुण्य एक तालाब बनवाने के बराबर, दस तालाबों के निर्माण का पुण्य एक झील बनवाने के बराबर और दस झीलों के बनवाने में उतना ही पुण्य प्राप्त होता है, जितना कि एक गुणवान् पुत्र प्राप्त करने में तथा दस गुणवान् पुत्रों का यश उतना ही होता है, जितना कि एक वृक्ष लगाने का।
लेकिन आज तो बात कुछ दूसरी है, परिस्थितियाँ सर्वथा विपरीत हैं। वनों के प्रति प्यार व श्रद्धा चिह्न-पूजा मात्र होकर रह गई है। अब इनसान वनों के दोहन के साथ-साथ उनके समूल नाश पर उतारू हो गया है। किसी ने इस बात के लिए गंभीरतापूर्वक प्रयास नहीं किया कि चाहे प्रगति कुछ कम कर लें, पर हमारी अमूल्य वन संपदा नष्ट होने से बच जाए। संरक्षण-नियम तो लागू हुए, पर साथ ही वनों का नाश भी दुगुना-तिगुना हो गया। सर्वाधिक चिंता तो तब होती है, जब वन विनाश के समाचार उन संवेदनशील क्षेत्रों से मिलते हैं, जहाँ वनों के संरक्षण पर विशेष जोर देना चाहिए था। इस जरूरत को सरकारी रिपोर्ट भी स्वीकार करती है।
कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गोवा व गुजरात में फैले पश्चिमी घाट क्षेत्र को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व की 18 जैव विविधता की दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में चुना गया है। पर पिछले कुछ सालों के वन विनाश को देखते हुए यहाँ के विख्यात पर्यावरण विशेषज्ञ एस. सी. नायर कहते हैं, वनों की तबाही के कारण पश्चिमी घाट का जीवन छिन गया है या छीना जा रहा है। इस क्षेत्र में स्थित कर्नाटक का कोडारु जिला अपनी वन संपदा के लिए विख्यात रहा है, पर यहाँ के वनों की समृद्धि से भी अधिक चर्चित यहाँ वन विनाश के चर्चे हो गए हैं। एक सरकारी स्तर पर नियुक्त समिति के अनुसार अवैध दृष्टि से हुई लकड़ी की बिक्री से एक दशक में सरकार को अरबों रुपये की हानि हुई है। इस समिति के अध्यक्ष मेलप्पारेड्डी का कहना है कि यह जिला अब पर्यावरणीय दिवालियेपन के कगार पर जा पहुँचा है।
इसी तरह के आरोप मेघालय गारोहिल्स जिले के अवैध कटाव के बारे में लगाए गए हैं। एक जाँच आयोग ने हाल में ही प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 1991 के बाद के सालों में अवैध कटाई से सरकार को लगभग 228 करोड़ की क्षति उठानी पड़ी। मध्यप्रदेश देश का एकमात्र ऐसा राज्य है, जहाँ सर्वाधिक संरक्षित वन क्षेत्र है। देश के संपूर्ण वन क्षेत्र का 23 प्रतिशत भाग मध्यप्रदेश में है। लगभग 4 लाख 42 हजार वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल में फैले इस प्रदेश का 15 हजार 6 सौ वर्ग कि.मी. का इलाका घने जंगलों से आच्छादित है। इन जंगलों में बेशकीमती 60 करोड़ घनमीटर लकड़ी और 50 लाख टन बाँस हैं। तेंदू पत्ता, कत्था, गोंद, हर्रा, चिरौंजी इत्यादि प्रचुर मात्रा में प्राप्त होते हैं, लेकिन विगत कुछ सालों से वन विनाश की इन जंगलों पर ऐसी कुदृष्टि पड़ी है कि अब प्रदेश में कुल क्षेत्रफल का मात्र 20 प्रतिशत वन रह गया है।
देवभूमि उत्तराखण्ड की प्राकृतिक वन संपदा में चीड़ के वनों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। शंकुधारी प्रजाति की श्रृंखला के ये वन उत्तराखण्ड के मध्य हिमालय क्षेत्र में लगभग 5,000 वर्ग कि.मी. में फैले हुए हैं। इस प्रकार 51.12 वर्ग कि.मी. क्षेत्र वाले संपूर्ण उत्तराखण्ड के 66.99 प्रतिशत भूभाग को अपनी हरीतिमा से आच्छादित करने वाले 34249.1 वर्ग कि.मी. में फैले संपूर्ण वनक्षेत्र का लगभग 14.60 प्रतिशत भाग चीड़ वनों से ढका है। मध्य हिमालय क्षेत्र में 1000 मीटर से लगभग 1700 मीटर की ऊँचाई तक फैले ये चीड़वन अपने अलौकिक प्राकृतिक सौंदर्य के कारण विश्वविख्यात तो हैं ही, अपनी बहुआयामी उपयोगिता के कारण उत्तराखण्ड की आर्थिकी को भी एक सुदृढ़ आधार प्रदान करते हैं।
इन वनों से प्रतिवर्ष अनुमानित 407988 घनमीटर काष्ठ व 316473 घनमीटर जलाऊ लकड़ी प्राप्त होती है। इस संपूर्ण उत्पादन का ज्यादातर भाग चीड़वनों से ही प्राप्त होता है। हर साल इन्हीं चीड़वनों से 1 लाख क्लिंटन लीसा निकाला जाता है, जो तारपीन तेल, बूट पालिश, धूप, रबर, कपूर, मुहर लगाने की लाख, कीटनाशक दवाओं, अनेक प्रकार की स्याही बनाने तथा कागज व कपड़ा चमकीला करने में प्रयोग की जाती है। इन चीड़वनों को उत्तराखण्ड की रीढ़ कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी, परंतु ये वन भी अब मानवीय लिप्सा की भेंट चढ़ते जा रहे हैं।
समुद्रतटीय वन विशेषकर मैनग्रोव, समुद्रीय तूफानों के वेग को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। तट का कटाव रोकने व तटीय भूमि की क्षारीयता नियंत्रित करने में भी इनका विशेष महत्त्व है। इसके बावजूद इन वनों का विनाश रोज नए-नए बहाने बनाकर किया जा रहा है। वन विनाश का एक बड़ा कारण जहाँ अवैध कटाव या तस्करी है, वहीं इसके लिए बड़े बाँध या खनन जैसी परियोजनाएँ भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। ऐसी अनेक परियोजनाएँ बहुमूल्य प्राकृतिक वन–संपदा को डुबोने में कारगर साबित हुई हैं। उत्तर-पूर्वी राज्यों में उमिथम परियोजना व लोकटक परियोजना के कारण शीशम व सखुआ के विशाल वृक्षों की शृंखलाएँ विनाश के कगार पर हैं। इसी तरह मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु तथा कर्नाटक में टिहरी, औरंगा, नर्मदा, बाणसागर, रिहंद आदि परियोजनाओं के कारण वहाँ के सागौन, शीशम, महुआ व बाँस के जंगल नष्ट हो रहे हैं। कर्नाटक की कोजेट्र्रिक्स परियोजना को अरब सागर के किनारे जिस क्षेत्र में लागू करने का प्रावधान है, वह क्षेत्र अपनी सुंदर वन–संपदा व जैवीय विविधता के कारण अद्वितीय है। इस योजना को कार्यान्वित करने से यह सब तो नष्ट होगा ही, हजारों किसान व मछुआरे भी बेघर हो जाएँगे।
खनन की अनेक परियोजनाओं से भी वन विनाश होता रहा है। वनसंरक्षण के प्रति उपेक्षा के कारण उन वन क्षेत्रों की व्यर्थ क्षति हो जाती है, जिन्हें खनन करते हुए भी बचाया जा सकता है। कई बार अल्पकालीन आर्थिक लाभ के लिए इस तथ्य को सर्वथा अनदेखा कर दिया जाता है कि ये प्राकृतिक वन कितने विविध तरह के और स्थायी लाभ देते हैं।
कृषि और पशुपालन अपने देश की मुख्य आजीविका है। वन उत्तम चरागाहों का काम करते हैं। सूखे और बाढ़ का भी दीर्घकालिक समाधान इन्हीं से मिलता है। वन-विभाग द्वारा किए गए सर्वेक्षणों से यह बात पूरी तरह से सिद्ध हो चुकी है कि वृक्षों की अधिकता के कारण जलप्रवाह धीमा हो जाता है, जिससे बाढ़ आने की संभावना कम हो जाती है। इसी प्रकार सघन वन वर्षा को आकर्षित करते हैं, जिससे सूखा पड़ने की संभावना क्षीण हो जाती है।
सामयिक जरूरत वनों की महत्ता को सही ढंग से पहचानने की है। इसके अभाव के कारण ही आकर्षक नारे, आंदोलनकारी, पर्यावरणविद् और सरकारी नीतियाँ मिल−जुलकर भी जनमानस को यह समझाने में असफलप्राय हैं कि व नहीं हम सबके जीवन स्रोत हैं। इनको काटने का अर्थ है- अपनी जीवन रेखा को काटना जरूरत इस बात की है कि स्थानीय लोगों के सहयोग से वनसंरक्षण के काम को प्रभावी ढंग से किया जाए; क्योंकि प्रदूषित वायु का शोषण व प्राणवायु प्रदान करने वाले ये व नहीं प्रदूषण से जर्जर विश्व में एकमात्र आशा की किरण हैं।
काकभुसुण्डि जी के मन में एक बार यह जानने की इच्छा हुई कि क्या संसार में ऐसा भी कोई दीर्घजीवी व्यक्ति है, जो विद्वान् भी हो, पर उसे आत्मज्ञान न हुआ हो? इस बात का पता लगाने के लिए वे महर्षि वशिष्ठ से आज्ञा लेकर निकल पड़े।
ग्राम ढूँढ़ा, नगर ढूँढ़े, वन और कंदराओं की खाक छानी, तब कहीं जाकर विद्याधर नाम के ब्राह्मण से भेंट हुई, पूछने पर मालूम हुआ कि उनकी आयु चार कल्प की हो चुकी है और उन्होंने वेद-शास्त्रों का परिपूर्ण अध्ययन किया है। शास्त्रों के श्लोक उन्हें ऐसे कंठस्थ थे, जैसे तोते को राम-नाम किसी भी शंका का समाधान वे मजे से कर देते थे।
काकभुसुण्डि जी को उनसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई, किंतु उन्हें बड़ा आश्चर्य यह था कि इतने विद्वान् होने पर भी विद्याधर को लोग आत्मज्ञानी क्यों नहीं कहते।
यह जानने के लिए काकभुसुण्डि जी चुपचाप विद्याधर के पीछे घूमने लगे। विद्याधर एक दिन नीलगिरि पर्वत पर वन-विहार का आनंद ले रहे थे, तभी उन्हें कंवद की राजकन्या आती दिखाई दी, नारी के सौंदर्य से विमोहित विद्याधर प्रकृति के उन्मुक्त आनंद को भूल गए, कामावेश ने उन्हें इस तरह दीन कर दिया, जैसे मणिहीन सर्प। वे राजकन्या के पीछे इस तरह चल पड़े जैसे मृत पशु की हड्डियाँ चाटने के लिए कुत्ता। उस समय उन्हें न शास्त्र का ज्ञान रहा, न पुराण का। राजकन्या की उपेक्षा से भी उन्हें बोध नहीं हुआ। वे उसके पीछे लगे चले गए, सिपाहियों ने समझा, यह कोई विक्षिप्त व्यक्ति है, इसलिए उन्हें पकड़कर बंदीगृह में डाल दिया।
कारागृह में पड़े विद्याधर से काकभुसुण्डि ने पूछा-मुनिवर आप इतने विद्वान् होकर भी यह नहीं समझ सके कि आसक्ति ही आत्मज्ञान का बंधन है। यदि आप कामासक्त न होते तो आज यह दुर्दशा क्यों होती।” यह सुनते ही विद्याधर के ज्ञान नेत्र खुल गए और उन्हें आत्मज्ञान हो गया।
वातावरण का निर्माण विचारों के अनुरूप होता है- इसे सभी जानते हैं। मस्तिष्क से निकलने वाला विचार प्रवाह यदि निकृष्ट स्तर का हुआ, तो वह अपने से दुर्बल मनःचेतना वाले पर हावी होता जाता है। इस प्रकार संपूर्ण वातावरण में ऐसी क्षुद्रता घुल जाती है कि जो कोई भी वहाँ आता है, प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। इसे चिंतन की सूक्ष्म शक्ति कहते हैं।
यह शक्ति स्वयं में भली-बुरी नहीं होती। वह तो मनुष्य पर निर्भर है कि वह उसका किस प्रकार उपयोग करे। बिजली के नंगे तारों को छू लेने से भयंकर झटका लगता है और मृत्यु तक का खतरा सामने आ खड़ा होता है, किंतु उन्हीं को विद्युत उपकरणों से संबद्ध कर देने पर पंखे की ठंडी हवा खाने, रेडियो द्वारा संगीत सुनने, टी.वी. पर दृश्य देखने जैसी तमाम सुविधाएँ उपलब्ध होने लगती हैं। इसमें विशेषता बिजली की नहीं, उस बुद्धि की है, जिसने उसे उपयोगी यंत्रों से जोड़ा।
चिंतनशीलता हर व्यक्ति में है, लेकिन वही जब किसी मनीषी की मेधा से निस्सृत होती है, तो श्रेष्ठ ग्रंथों का आकार लेती है और आसपास के वातावरण को इतना ओजस्वी तथा ऊर्जायुक्त बना देती है कि सात्विक मस्तिष्कों में इसका परिणाम श्रेष्ठ चिंतन और सन्मार्गगामी के रूप में तत्काल सामने आता है; दुर्बुद्धिग्रस्तों की बात और है, जहाँ चिंतन की शक्ति का न तो कोई मूल्य है, न महत्त्व। इसलिए वे हमेशा दुरभिसंधियाँ रचने में निरत रहते और वातावरण को विषाक्त करते हैं यही कारण है कि आज हर ओर आपाधापी और अराजकता जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। आक्रमण-प्रत्याक्रमण और घात-प्रतिघात की प्रवृत्ति ने चिंतन को जहाँ हेय बनाया है, वहीं आचरण में दुष्टता और और आक्रामकता बढ़ी है। आज सभी इस बात से चिंतित हैं कि मनुष्य-मनुष्य के बीच बढ़ती कटुता को कैसे रोका जाए एवं विचारतंत्र में घुस पड़ी अवांछनीयता को घटाया-मिटाया कैसे जाए? पारस्परिक स्नेह-सद्भाव बढ़ाने एवं जीवन को सुखी-समुन्नत बनाने का उपाय क्या हो? यह आज के ऐसे ज्वलंत प्रश्न हैं जिन पर मनीषीगण समय-समय पर विचार करते रहे हैं।
पिछले दिनों कनाडा में एक सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें संसार भर के मूर्द्धन्य विचारकों और दार्शनिकों ने हिस्सा लिया था। मानवी प्रगति की समीक्षा करते हुए ब्रिटिश वैज्ञानिक एवं दार्शनिक प्रो. जॉन डब्ल्यू. बाँकर ने कहा कि हमारी वैज्ञानिक उपलब्धियाँ तो अभूतपूर्व एवं अत्यंत विशाल है; किंतु इसके साथ ही हमारे विचारतंत्र में घुस पड़ी संकीर्ण स्वार्थपरता ने हमें कहीं का नहीं रहने दिया। सर्वत्र लूट-खसोट मची है। इसके दुष्परिणामों से उत्पन्न खतरे को रोक पाने में हम अक्षम-असमर्थ साबित हो रहे हैं। निरंतर बढ़ रहा विचार प्रदूषण मानवी अस्तित्व के लिए एक संकट बनता जा रहा है। मस्तिष्क से निस्सृत होने वाली विचार-तरंगों के संबंध में इस बात पर जोर दिया गया कि यदि मानवजाति को अपना अस्तित्व बनाए रखना है, तो उसे अपने विचारों में क्राँतिकारी परिवर्तन लाना होगा। भौतिकवादी विचारधारा ने इन दिनों ऐसे संकट खड़े किए हैं, जिसने मनुष्य जाति को महामरण के कगार पर पहुँचा दिया है। जब तक इस विचार प्रक्रिया में कोई महत्त्वपूर्ण बदलाव नहीं आता, तब तक मनुष्य जाति का भविष्य और अस्तित्व खतरे में ही पड़ा रहेगा।
लिवरपुल यूनिवर्सिटी के मानसिक स्वास्थ्य प्रभाग के प्रो. जोसेफ स्लेड का कहना था कि प्रस्तुत समय की विचारणा प्रक्रिया के सामान्य संचालन में मनुष्य-मनुष्य के प्रति एवं पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता का अभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा है। उनका मत है कि मस्तिष्क की सामान्य प्रक्रिया के इस दोष को मात्र विचार परिष्कार द्वारा ही दूर किया जा सकता है और तभी एक आदर्श मानवतावादी ‘इकोलॉजी’ विकसित हो सकती है। मात्र इस परिशोधित विचार प्रक्रिया के माध्यम से ही हम उस स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं, जहाँ ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ एवं ‘वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना चरितार्थ होती है।
इस संबंध में लेसली कॉलेज, कैम्ब्रिज के शाँन मैकनिफ कहते हैं कि हमारी अंतश्चेतना पर सुखवाद और भोगवाद के आक्रमण ने आज सभी को स्वार्थी बना दिया है, जिसके कारण सर्वत्र अपने हित चिंतन की ही बात सोची जाने लगी हैं। उसकी पूर्ति के लिए उचित-अनुचित हर तरह के तरीके अपनाए जाते हैं। इस मनोवृत्ति को उन्होंने ‘हैंडसम डेविल’ का नाम दिया है। इस निषेधात्मक विचार प्रक्रिया को अपनाने के कारण न केवल भोगवादियों को संत्रस्त रहना पड़ रहा है, वरन् परोक्ष रूप से उसका प्रभाव समूची मानवजाति पर पड़ रहा है। दार्शनिकों ने इस प्रवृत्ति को ‘हैडोनिज्म’ कहा है, जिसके कारण मनुष्य मादक पदार्थों के सेवन से लेकर परपीड़न, कामुकता, अपराधों, मनोरोगों और आत्महत्या तक की और अग्रसर होता जाता है। उनके अनुसार यह दुष्प्रवृत्तियाँ स्वयं के अंदर से तो प्रस्फुटित होती ही हैं, साथ ही दूसरों द्वारा छोड़े गए हेय विचार तरंगों से भी प्रभाव एवं उत्तेजना ग्रहण करती हैं। मनुष्य को अस्त-व्यस्त करके रख देने वाला यह विचार प्रवाह जब सामाजिक जीवन में प्रवेश पा जाता है, तो वह एक प्रकार से ‘सोशियोजेनिक मॉनीटर’ का रूप धारण कर लेता है, जिसकी परिणति भयावह होती है। संसार जिस गति से गतिशील है, मानवी चिंतन उससे दूने वेग से पतनोन्मुख होता जा रहा है। उत्कृष्टता का पक्षधर वातावरण विनिर्मित होता कहीं दीख नहीं पड़ता। ऐसे में समाज के पुरोधाओं का चिंतित होना स्वाभाविक है।
इस दशा में उलटे को उलटकर सीधा कौन करे? समाज को विधेयात्मक दिशा कैसे मिले? इसका उत्तर देते हुए वाजन कहते हैं कि भोगवादी वातावरण का निर्माण जिन मस्तिष्कों ने किया है, उन्हीं का यह भी कर्तृत्व बनता है कि वे अब उस दिशा में प्रयास करें, जिससे कि जनमानस में श्रेष्ठता और वातावरण में उत्कृष्टता का समावेश हो सके, कारण कि पवित्र चिंतन ही प्रखर वातावरण का निर्माण करता है।
प्रसिद्ध दार्शनिक एवं वैज्ञानिक रॉबर्ट बोसनेक का इस संबंध में मत है कि जिस प्रकार किसी एक परमाणु के विखंडित होने पर भारी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती और समूचे वातावरण में संव्याप्त होती चली जाती है, वैसी ही मनुष्य के अंतराल की भी स्थिति है। हृदय से सद्भावना का अजस्र स्रोत यदि फूट पड़े, तो उससे सूर्य के सदृश ऊर्जा-भंडार का ऐसा प्रवाह चल पड़ेगा, जो हृदय और मस्तिष्कों को झकझोरकर रख दे। इसे अंतस् से निःसृत उस ‘साइक्लोट्रॉन’ ऊर्जा की विशेषता ही कहनी चाहिए, जो हमारी आस्थाओं-मान्यताओं इच्छाओं-आकांक्षाओं कल्पनाओं-भावनाओं को सृजनात्मक दिशा देती है। उनके अनुसार, विश्व-ब्रह्माण्ड में जिस प्रकार एक प्रचंड विद्युत चुंबकीय शक्ति क्रियाशील है और आकर्षण-विकर्षण के अपने नियमानुसार कार्यरत रहकर अनंत आकाश में चक्कर काट रहे ग्रह-गोलकों एवं तारागणों के गुरुत्वाकर्षण को नियंत्रित किए हुए है, ठीक उसी प्रकार मानवी मस्तिष्क से उत्पन्न विचार प्रवाह का संतुलन अथवा असंतुलन उसके स्वयं के तथा वातावरण के भले-बुरे निर्माण में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सच तो यह है कि मस्तिष्क-चुंबकत्व प्रकृति के चुंबकीय नियम से बहुत कुछ मिलता-जुलता है। चुंबक लौह कणों को जिस प्रकार अपनी ओर खींच लेता है, मस्तिष्क भी लगभग वही प्रक्रिया अपनाता है। समानधर्मी विचारों से तो वह प्रभावित होता ही है, विधर्मी सशक्त विचारप्रवाह भी उसे अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है। इससे बचाने के लिए उदात्त चिंतन, श्रेष्ठ सान्निध्य और उत्कृष्ट अध्ययन में स्वयं को बराबर संलग्न रखना ही उपयुक्त उपाय बताया गया है, ताकि मस्तिष्क से निकलने वाली विचार तरंगें विचार मंडल के समानधर्मी तरंगों को अपनी ओर आकर्षित कर स्वयं को अधिकाधिक समर्थ-सशक्त बना सके।
सरोवर में पत्थर का कोई टुकड़ा फेंका जाए, तो लहरें उठकर एक गोलाकार वृत्त बना लेती हैं। यदि पृथक्-पृथक् आकार के दो टुकड़े कुछ दूरी पर एक साथ फेंके जाएँ, तो उनके द्वारा विनिर्मित लहरों में विशेष अंतर दीखेगा और भारी टुकड़े की लहरें छोटी वाली लहरों पर हावी हो जाएँगी। मानवी विचारतंत्र पर भी यही तथ्य पूर्णरूपेण लागू होता है। मनुष्य के उत्कृष्ट चिंतन की ऊर्जा तरंगें अपेक्षाकृत अधिक सबल और सशक्त होती हैं। आज इनका पोषण, अभिवर्द्धन एवं उत्सर्जन ही समग्र प्रगति, सुखद वातावरण एवं उज्ज्वल भविष्य के लिए अभीष्ट है।
एक रोगी राजवैद्य शार्गंधर के समक्ष अपनी कष्ट गाथा सुना रहा था। अपच, बेचैनी, अनिद्रा, दुर्बलता जैसे अनेकों कष्ट व उपचार में ढेरों राशि नष्ट कर कोई लाभ न मिलने के कारण ही वह राजवैद्य शार्गंधर के पास आया था। वैद्यराज ने उसे संयम युक्त जीवन जीने व आहार-विहार के नियमों का पालन करने को कहा। रोगी बोला-यह सब तो कर चुका हूँ। आप तो मुझे कोई औषधि दीजिए, ताकि मैं कमजोरी पर नियंत्रण पा सकूँ। पौष्टिक आहार आदि भी बता सकें, तो लूँगा, पर आप मुझे फिर वैसा ही समर्थ बना दीजिए।” वैद्यराज बोले-वत्स तुमने संयम अपनाया होता तो मेरे पास आने की स्थिति ही नहीं आती। तुमने जीवनरस ही नहीं, जीवन की सामर्थ्य एवं धन-सम्पदा भी इसी कारण खोई है। बाह्योपचारों से, पौष्टिक आहार आदि से ही स्वस्थ बना जा सका होता तो विलासी-समर्थों में कोई भी मधुमेह-अपच आदि का रोगी न होता। मूल करण तुम्हारे अंदर है, बाहर नहीं। पहले अपने छिद्र बंद करो, अमृत का संचय करो और फिर देखो वह शरीर निर्माण में किस प्रकार जुट जाएगा।” रोगी ने सही दृष्टि पाई और जीवन को नए साँचे में ढाला-अपने बहिरंग व अंतरंग की अपव्यय वृत्तियों पर रोकथाम की और कुछ ही माह में स्वस्थ-समर्थ हो गया।
धारावाहिक लेखमाला (गतांक से आगे)
कहावत है कि गृहकलह का आरंभ तथा अंत रसोई में ही होता है। वस्तुतः यह तथ्य भी है कि घर का संतुलन रसोईकक्ष के माहौल तथा परिस्थिति पर निर्भर करता है। व्यक्ति के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य एवं पारिवारिक सौमनस्य का तानाबाना रसोईकक्ष में ही बुना जाता है। अन्न का मन पर पड़ने वाले प्रभाव या ‘जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन’ की उक्ति जहाँ एक सच्चाई है, वहीं इसमें इतनी बात और जोड़ लेनी चाहिए कि भोजन किस मनःस्थिति एवं परिस्थिति में तथा किस दिशा में बनाया गया है। इसका भला-बुरा प्रभाव भी खाने वाले पर पड़े बिना नहीं रहता। घर की सुख-शाँति एवं समृद्धि का बहुत कुछ संबंध रसोईकक्ष से जुड़ा हुआ है।
इसीलिए वास्तुशास्त्र में भवन निर्माण में रसोईघर को सबसे अधिक महत्त्व दिया गया है। इस कक्ष के निर्माण के लिए आग्नेयकोण अर्थात् पूरब और दक्षिण के मध्य भाग को सर्वाधिक उपयुक्त माना गया है। इन दिशाओं के बारे में विवरण चित्रांकन द्वारा विगत अंक में दिया जा चुका है। आग्नेयकोण शास्त्रों के अनुसार धन-धान्य रूपी लक्ष्मी का स्थान है। अतः उस दिशा में लाल रंग के तेजोमय प्रकाश का प्रक्षेपित होना गृह निर्माता या उस भवन में निवास करने वालों के लिए शुभदायक माना जाता है, इसीलिए इस दिशा में चूल्हे में चौबीस घंटे अखंड अग्नि या दीपक जलाए रखने की प्राचीन भारतीय परंपरा रही है। इससे वास्तु संबंधी त्रुटियों एवं दोषों का परिमार्जन हो जाता है और निवासकर्त्ता सुख-शान्तिमय जीवन व्यतीत करते हैं।
कहा जा चुका है कि भवन के दक्षिण-पूरब दिशा अर्थात् आग्नेयकोण में किचन यानी रसोईघर तथा पश्चिम दिशा में ‘डाइनिंग हाल' अर्थात् भोजनकक्ष का निर्माण करना चाहिए। इससे एक ओर जहाँ स्वादिष्ट भोजन प्राप्त होता है, वहीं दूसरी ओर पारिवारिक सदस्यों का मन-मस्तिष्क संतुलित रहता है और वे स्वस्थ बने रहते हैं तथा प्रगति करते हैं। इस संदर्भ में वास्तुविद्या विशारदों ने कहा भी है- “पाकशाला अग्निकोणे स्यात्सुस्वादुभोजनाप्तये” अर्थात् दक्षिण-पूर्व दिशा में रसोईघर बनाने से स्वादिष्ट भोजन प्राप्त होता है। मनमाने ढंग से रसोई घर जिस-तिस दिशा में निर्मित करा लेने से शारीरिक-मानसिक परेशानियों, आर्थिक संकटों एवं पारिवारिक कलह-क्लेशों का सामना करना पड़ता है।
वास्तुवेत्ताओं के अनुसार उत्तर दिशा या उत्तर-पूरब पश्चिम दिशा एवं नैऋत्य कोण अथवा दक्षिण दिशा के मध्य में रसोई कक्ष का निर्माण नहीं करना चाहिए। अगर कोई विकल्प न हो तो पूरब दिशा या पश्चिमी वायव्य कोण में रसोईघर बनाया जा सकता है। चीनी वास्तुविद्या 'फेन सुई’ के अनुसार दक्षिण दिशा अग्नितत्त्व का एवं पूरब दिशा काष्ठतत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है। अतः रसोईकक्ष मुख्य भवन के आग्नेयकोण या पूरब दिशा में बनाना चाहिए। लकड़ी आग जलाने में प्रयुक्त होती है, इसलिए आग्नेय कोण इसके लिए सबसे उपयुक्त स्थान है।
देखा गया है कि जिन भवनों में प्रवेशद्वार पूरब और दक्षिण दिशा में होते हैं, उनमें रसोईकक्ष का निर्माण आग्नेयकोण में करना कठिन होता है। ऐसी दशा में रसोई को उत्तर-पश्चिम अर्थात् वायव्य कोण में बनाया जा सकता है। इसमें गैस पट्टी-स्लैब उत्तर दिशा की दीवार को छोड़ते हुए दक्षिण-पूर्वी किनारे की ओर बनाने से वास्तुनियमों का उल्लंघन नहीं होता है। उत्तर या पश्चिम दिशा की ओर द्वार वाले घरों में रसोई का निर्माण आग्नेयकोण में आसानी से हो जाता है। यदि किन्हीं विशेष कारणों से ईशान कोण में स्थित कमरे में ही विवशतावश रसोई बनाना पड़े, तो गैसपट्टी का निर्माण आग्नेयकोण में करके काम चलाया जा सकता है। इसमें सिंक को पूरब में रखकर ईशान कोने को खाली छोड़ देना चाहिए। इसका उपयोग पानी रखने के लिए किया जा सकता है।
वास्तुशास्त्र के अनुसार ईशानकोण में रसोईकक्ष का निर्माण करने से भयंकर दुष्परिणाम सामने आते हैं कारण, ईशानकोण जलकूप की दिशा है, अतः पानी और आग साथ-साथ नहीं रह सकते। यदि ऐसा किया जाता है तो मानसिक तनाव, अनावश्यक चिंता तथा आर्थिक हानि का कारण बनता है। इससे मन में व परिवार में अशान्ति बनी रहती है; साथ ही वंश-वृद्धि प्रभावित होती है। इसी तरह उत्तर दिशा कुबेर का स्थान है, जो धन के देवता है। इस दिशा में ताप अर्थात् अग्नि का रहना अनिष्टकारक होता है। इसलिए इस दिशा में रसोई का निर्माण करना वर्जित हैं पूरब दिशा में रसोई बनाने से स्वास्थ्य-संकट दक्षिण में अशान्ति व तनाव, नैऋत्यकोण में बनाने से बीमारी, पारिवारिक कलह, अवसाद, पश्चिम दिशा में बनने से गृहकलह होती है। भवन के आरंभ में भी रसोईकक्ष बनाना अहितकर होता है। इससे घर-परिवार में बिना किसी कारण से ही अशान्ति बनी रहेगी और अप्रत्याशित दुर्घटनाएँ घटित होती रहेंगी। इन परिस्थितियों से बचने के लिए ही आग्नेयकोण को एवं विकल्प के रूप में वायव्यकोण को रसोई के लिए उत्तम माना गया है; क्योंकि वायु का अग्नि से सीधा संबंध है और वायव्यकोण वायु की दिशा है।
किसी भी व्यक्ति का चूल्हा देखकर उसकी संपन्नता-विपन्नता का पता लगाया जा सकता है। चूल्हे को वित्तीय स्थिति का प्रतीक माना गया है। इसलिए वास्तुवेत्ता इस ओर अधिक ध्यान देते हैं। उनके मतानुसार रसोईघर में चूल्हा, गैस स्टोव आदि को कहाँ रखा जाए और कहाँ नहीं, यह बात अधिक महत्त्व रखती है। चूल्हा चाहे लकड़ी-कोयले से जलने वाला हो या फिर गैस से जलने वाला गैस बर्नर, उसे रसोईकक्ष में इस प्रकार रखा जाना चाहिए, जिससे खाना बनाने वाले का मुँह दरवाजे की ओर न पड़े। यह तो हो सकता है कि रसोई में काम करने वाला व्यक्ति घर में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों को देख सके, उनकी जानकारी रख सके, किंतु बाहरी व्यक्ति की नजर उस पर नहीं पड़नी चाहिए। प्रवेश द्वार के सामने रसोईकक्ष शुभ नहीं माना जाता है।
चूल्हे या स्टोव, बर्नर को सिंक अथवा फ्रीज के बगल में नहीं रखना चाहिए। इसी तरह पानी की टंकी, कलश, घड़ा आदि भी चूल्हे के सामने नहीं होने चाहिए। इससे स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है और परिवार में लड़ाई-झगड़ा होता रहता है। कारण आग और पानी परस्पर विरोधी तत्त्व हैं। इनमें आपस में बैर हैं। अतः रसोईघर में दोनों को आमने-सामने रखने पर पारिवारिक संघर्ष को बढ़ावा मिलना स्वाभाविक है। रसोई में जलपात्र का उपयुक्त स्थान उत्तर-पूरब ईशान कोण है। अतः इसे उसी दिशा में रखना चाहिए। गैसबर्नर, हीटर या स्टोव, चूल्हा आदि को रसोईकक्ष के बीचों-बीच रखना अशुभ माना जाता है। इन्हें दीवार से तीन-चार इंच दूर हटाकर रखना चाहिए। जहाँ तक हो सके, चूल्हे को खिड़की के नीचे न रखा जाए। इससे खिड़की के अंदर बाहर से आने वाली धूल आदि के कारण भोजन की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
रसोईकक्ष में गैससिलेंडर या अन्य भारी सामान दक्षिण में रखना चाहिए। यदि रसोईकक्ष पश्चिम वायव्य दिशा में है तो गैससिलेंडर पश्चिम दिशा के मध्य में रखना उचित रहता है। खाली एवं अतिरिक्त गैससिलेंडर आदि नैऋत्य कोण में रखे जाते हैं। इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि गैस सिलेंडर को स्लैब के नीचे गैस चूल्हे से जोड़कर इस प्रकार रखा जाए, जिससे गैस चालू करते या बंद करते समय रेगुलेटर की ‘नाँब’ घुमाने के लिए पर्याप्त जगह रहे। गैस ट्यूब स्टेंडर्ड कंपनी का होना चाहिए और समय-समय पर उसे बदलते रहना चाहिए। गैस चूल्हा स्लैब पर आग्नेय क्षेत्र के पूरब में रखना चाहिए। यदि एक से अधिक गैस कनेक्शन हों, तो मुख्य गैस चूल्हे को, जो अधिकतर प्रयुक्त होता है, उसे आग्नेय क्षेत्र के पूरब में तथा अन्य गैस चूल्हें को जा कभी-कभी ही काम में लाए जाते हैं, आग्नेय क्षेत्र के दक्षिण में रखना चाहिए।
वास्तुनियमों के अनुसार, अगर रसोई दक्षिण पूरब में है और गैसबर्नर या स्टोव आदि पूर्वी दीवार की तरफ रखे गए हैं, तो स्वभावतः खाना बनाने वाले का मुँह पूरब की ओर रहेगा। इस दिशा में मुँह करके पकाया गया भोज्यपदार्थ स्वाद एवं सेहत दोनों ही दृष्टि से उत्तम माना जाता है। इसी तरह यदि रसोईघर उत्तर-पश्चिम अर्थात् वायव्यकोण में है, तो उसके भी परिणाम अच्छे प्राप्त होते हैं। अगर उक्त दोनों ही व्यवस्थाएँ न बन पड़े तो दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके भी भोजन बनाया जा सकता है। उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर मुँह करके खाना पकाना अच्छा समझा जाता। चीन में रसोई से संबंधित गैस, अँगीठी, स्टोव, कुकर आदि को बहुत महत्त्व दिया जाता है। वहाँ अन्न को भाग्य का प्रतीक माना जाता है। भोजन के साथ व्यक्ति की भावनाएँ, व्यवहार एवं स्वास्थ्य भी जुड़ा होता है। चीनियों की मान्यता है कि भोजन बनाने वाली महिला या पुरुष की पीठ अगर दरवाजे की ओर है तो इससे गृहस्वामी को स्वास्थ्य एवं आर्थिक हानि उठानी पड़ती है।
रसोईकक्ष की आँतरिक संरचना एवं साज-सज्जा भी अपना प्रभाव दिखाए बिना नहीं रहती। अतः वास्तुनियमों के अनुसार गृहनिर्माण में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि इस कक्ष में हाथ धोने का वाँशबेसिन, बरतन धोने का सिंक, नल, पीने के पानी की टंकी या घड़ा, फ्रीज, मिक्सी, बिजली के अन्य उपकरण, दूध, दही आदि रखने की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। इसी तरह बरतन रखने के रैक, आलमारी, टाँड़ आदि की व्यवस्था, खिड़की, दरवाजे, एक्जास्टफैन, खाद्य वस्तुओं का भण्डारण आदि किस जगह पर करना उचित है, इन तमाम बातों को ध्यान में रखने से परेशानियों से सहज ही छुटकारा मिल जाता है।
समूचा भवन भले ही वास्तुनियमों के अनुसार क्यों न बना हो, किंतु इस प्रकार की छोटी-सी आँतरिक संरचनात्मक भूल भी सारे घर-परिवार का वातावरण बिगाड़कर रख देती है। उदाहरण के लिए सिंक, वाँशबेसिन, कपड़ा धोने या बरतन साफ करने का स्थान यदि रसोईघर से सटकर आग्नेय दिशा में है, तो इससे परेशानियाँ पैदा होती रहेंगी। आग और पानी, दोनों साथ-साथ नहीं रह सकते। इसी तरह अगर रसोई में चूल्हे के ऊपर या नीचे अथवा समानांतर में या चूल्हे के सामने पानी का कलश या घड़ा रखा जाए तो निश्चित रूप से पारिवारिक वातावरण कलहपूर्ण बना रहेगा। इन स्थानों पर रखे गए बरतन का पानी पीने वाले गर्म मिजाज के बन जाते हैं, फलतः परस्पर लड़ते-झगड़ते रहते हैं।
वास्तुशास्त्र के अनुसार जल का स्थान ईशानकोण, उत्तर-पूरब या पश्चिम दिशा में तो हो सकता है, किंतु आग्नेय कोण-अग्निस्थान में किसी भी प्रकार से नहीं हो सकता। अगर आग्नेयकोण, नैऋत्यकोण, दक्षिण दिशा या घर के मध्य में जल स्थान जैसे कुआँ, बोरिंग, जल की टंकी, घड़े आदि स्थापित किए जाएँगे तो अनेक प्रकार के संकटों, विघ्न-बाधाओं का सामना करना पड़ेगा। अतः रसोईकक्ष अगर आग्नेयकोण में स्थित है तो सिंक, वाँशबेसिन, पानी का नल आदि ईशान क्षेत्र में पूरब की ओर ही रखना चाहिए, लेकिन ठीक ईशान कोण में नहीं होना चाहिए। इन्हें उत्तर दिशा में भी बनाया जा सकता है। पश्चिम या पश्चिम वायव्य दिशा में स्थित रसोईकक्ष में गैसपट्टी पर लगा हुआ सिंक तथा पानी का नल आदि वायव्य क्षेत्र के पश्चिम में होना चाहिए।
रसोईघर से बहने वाले जल की निकासी के लिए दक्षिण दिशा या पश्चिम दिशा या नैऋत्य कोण की तरफ नालियों की व्यवस्था की जा सकती है। साफ-स्वच्छ पानी के भण्डारण के लिए यदि छोटे टैंक आदि बनाने की आवश्यकता हो तो उसे ईशान कोण में बनाना श्रेष्ठ माना जाता है। पीने का पानी भी इसी दिशा में रखा जाता है। यदि ऐसी व्यवस्था न बन पड़े तो पीने का पानी उत्तर दिशा में भी रखा जा सकता है।
(आगामी अंक में जारी)
भगवद्गीता के संबंध में आम धारणा है कि यह संन्यासियों और बैरागियों का ग्रंथ है। विचारवान और अध्ययनशील व्यक्ति के लिए यह ज्ञान, वैराग्य और कर्म का मार्ग सिखाने वाला शास्त्र है। वे इसका नियमित अध्ययन करते हैं। बार-बार पढ़ते हैं और चिंतन-मनन से नई-नई भावनाएँ उठती अनुभव करते हैं। इसके बावजूद यह सही है कि गीता वैराग्य अथवा वीतराग भाव को जन्म देती है। संसार के प्रति उपराम करती है। अभिभावक अपने बच्चों को गीता पढ़ने से इसीलिए रोकते हैं।
एक अध्ययन के अनुसार किशोर उम्र में ही संन्यास की ओर उन्मुख होने वाले 80 प्रतिशत साधु-महात्माओं के लिए गीता ही प्रेरक रही है। कुछ समीक्षा इस धारणा को सिरे से ही खारिज करते हैं कि गीता वैराग्य भाव को जन्म देती है। उनका तर्क होता है कि श्रीकृष्ण से यह उपदेश सुनने के बाद अर्जुन वैराग्य से विमुख होकर कर्म और युद्ध में प्रवृत्त हो गया था। युद्ध में अपने सगे-संबंधियों को सामने खड़ा देखकर अर्जुन कहने लगा था कि हे कृष्ण! मुझे न विजय चाहिए, न राज्य चाहिए और न ही सूख चाहिए। हमें राज्य से, सुख-भोग से यहाँ तक कि जीवित रहकर भी क्या करना है। (गीता 1/32) आचार्य मधुसूदन सरस्वती गीता पर अपनी टीका में लिखते हैं कि अर्जुन इसके बाद संन्यासी होने लगा था। श्रीकृष्ण के उपदेश ने उसे संन्यास से विमुख और युद्ध में प्रवृत्त किया।
जो शास्त्र संन्यासी को योद्धा बना सकता है, वह दुनियादार व्यक्ति को वैरागी कैसे बनाएगा? इस तर्क में बल है, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि गीता का सपाट अध्ययन व्यक्ति को संसार और कर्म के प्रति उदासीन बनाता है। कारण यह है कि गीता के उच्चकोटि के सिद्धांत और गूढ़ प्रतिपादन उपयुक्त साधकों के चित्त को ही उत्कर्ष की दिशा में प्रेरित करते हैं। सामान्य लोगों के मन-शरीर नश्वर है, आत्मा अविनाशी है, वह अजर-अमर है उसे न भूख-प्यास लगती है और न जरा-मृत्यु का भय होता है’ आदि उपदेश पकड़ लेते हैं। जिन्हें इनके सहारे अपनी अकर्मण्यता को आधार देना होता है, वे लोग इन सिद्धांतों को दोहराते रहते हैं। कम पढ़े-लिखे या अध्ययन-मनन से कोई संबंध नहीं रखने वाले साधु बाबा भी इसी आशय के श्लोकों के उद्धरण देते और वैसी ही व्याख्या करते रहते हैं।
डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार गीता सिर्फ अध्ययन या व्याख्यान का विषय नहीं है। इसे लिखने का उद्देश्य भी यह नहीं है। यह साधकों के लिए लिखा गया ग्रंथ है। एक विशिष्ट मार्ग पर चलने वाले साधकों का ही नहीं, सभी धर्म-संप्रदायों के अनुयायियों का मार्गदर्शन करता है। कुछ विद्वानों की राय में गीता का संपूर्ण उपदेश युद्ध के मैदान में ही नहीं दिया गया। दूसरे अध्याय के कुछ श्लोक ही श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहे होंगे, जिनमें आत्मा के अजर-अमर और शरीर के मरणधर्मा होने की बात कही गई है। मनुष्य के निमित्त मात्र होने और जो कुछ भी हो रहा है, वह परमात्मा के द्वारा ही संपन्न होने के उपदेश भी उन विद्वानों की राय में युद्ध के मैदान में दिए होंगे। बस इससे ज्यादा वहाँ न कहने का समय था और न ही मनःस्थिति। इन विद्वानों की राय में
ध्यान-भक्ति-समर्पण दैवी और आसुरी संपदा तथा तीनों गुणों के विवेचन बाद में जोड़े गए। परमात्मा के विराट् रूप और विभूति योग जैसे प्रसंग भी कवि कल्पना से निकले होंगे।
इन विद्वानों की राय में दम लगता है, लेकिन दूसरे रहस्यदर्शी विद्वान् मानते हैं कि गीता का उपदेश बोलकर नहीं दिया गया। सात सौ श्लोकों के इस काव्य का स्पष्ट उच्चारण के साथ वाचन करने में ही ढाई से तीन घंटे लगते हैं। महाभारत युद्ध जब शुरू हुआ होगा और मार्गशीर्ष शुक्ल-11 को दोनों पक्षों की सेनाएँ सामने खड़ी हुई होंगी, तो एक प्रहर तक चलने वाला यह उपदेश संभव ही नहीं रहा होगा। इन विद्वानों की राय में गीता जिस रूप में आज विद्यमान है, वह उसी रूप में उपदिष्ट हुई। उन्हीं के अनुसार उपदेश का स्वरूप वैखरी वाणी में न होकर परावाणी में हुआ होगा। उपदेश के लिए इस स्तर के माध्यम में समय का बंधन नहीं होता। एक सेकेंड में हजारों पृष्ठों की सामग्री सम्प्रेषित की जा सकती है। स्वप्न दृश्यों में कुछ ही क्षणों में वर्षों का समय बीत जाता है, पूरी उम्र गुजर जाती है। स्मृति कौंधती है, तो कुछ ही क्षणों में इसी जन्म के नहीं जन्मान्तरों के दृश्य घूम जाते हैं। परावाणी की संप्रेषण सामर्थ्य को इन उदाहरणों से समझा जा सकता है।
श्रीकृष्ण परात्पर ब्रह्म के सगुण स्वरूप अवतार हैं। परंपरा मानती है कि वे कुछ भी करने में समर्थ हैं। चाहते तो वे अर्जुन का मन संकल्प मात्र से बदल सकते थे। लेकिन इससे साधकों के लिए आवश्यक मार्गदर्शन गीता शास्त्र के रूप में उपलब्ध नहीं होता। गीता का वाचिक उपदेश इसी उद्देश्य के लिए है। गीता का बौद्धिक विश्लेषण करने वाले विद्वान् भी मानते हैं कि इसमें विभिन्न दार्शनिक और धार्मिक विचार विविध रूपों में व्यक्त कर एक जगह मिलाए गए हैं। परस्पर विरोधी दीखने वाले अनेक विश्वासों को सीधे-सादे ढंग से एक जगह गूँथ दिया गया है। उससे इतना ही हुआ है कि सभी साधनामार्ग एक जगह उपलब्ध हो गए। व्यक्ति को आत्मिक कल्याण का मार्ग ढूँढ़ने के लिए जगह-जगह भटकने की जरूरत नहीं रही।
गीता का स्वरूप प्रत्येक अध्याय में दी गई पुस्तिका से प्रकट होता है। पुस्तिका क्रम में दिए गए वाक्य का अर्थ है भगवद्गीता उपनिषद् में जो कि ब्रह्मविद्या, योगशास्त्र और श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद है, अमुक नाम का अध्याय पूरा हुआ। ब्रह्मविद्या ज्ञानमार्ग का द्योतक है, योगशास्त्र कर्म का और भगवान् द्वारा गाया गीत होने के कारण भक्ति का। तीनों मार्गों की विशेषता निरूपित करते हुए डॉ. राधाकृष्णन ने अपनी टीका में लिखा है कि पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचने के ये तीन मार्ग तीन प्रकार के व्यक्तियों की आवश्यकता पूरी करते हैं। इन मार्गों को संक्षेप में वास्तविकता का ज्ञान, भगवान् की उपासना और भक्ति तथा अपने संकल्प को दिव्य प्रयोजन के अधीन कर देना है। तीनों मार्गों में अंतर सैद्धांतिक, भावनात्मक और व्यावहारिक पक्ष पर बल देते हुए किया गया है। मनुष्य विभिन्न प्रकार के होते हैं, यथा-चिंतनशील भावुक और सक्रिय। तीनों के लिए क्रमशः ज्ञान, भक्ति और कर्म है। ये विभाजन स्थूल हैं। एकान्तिक रूप से कोई भी व्यक्ति इनमें से किसी एक प्रकार का नहीं होता। अतः ये ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों मिल जाते है। परमात्मा अपने आप में सत्-चित् और आनंद अर्थात् वास्तविक, सत्य और परम आनंदमय है। जो लोग ज्ञान की खोज करते हैं, उनके लिए वह शाश्वत प्रकाश है। मध्याह्न के सूर्य की भाँति उज्ज्वल और देदीप्यमान जिसमें अंधकार का नाम भी नहीं है। जो पुण्य पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उनके लिए वह शाश्वत पवित्रता है और भावुक प्रकृति वाले लोगों के लिए वह शाश्वत प्रेम और पवित्रता का सौंदर्य है।
गीता को अपनी प्रकाशपूर्ण प्रेरणाओं के कारण वैश्विक ग्रंथ की मान्यता मिली। सर्वाधिक पढ़े जाने और प्रचारित हुए ग्रंथों में बाइबिल का नाम सबसे पहले आता है। ईसाई धर्म के प्रतिनिधि धर्मशास्त्र को संसार की सभी भाषाओं में अनूदित करने और दुनिया के कोने-कोने में फैलाने के लिए ईसाइयों का समूचा तंत्र लग गया। उसे राजसत्ता और व्यापार-व्यवसाय का भी भरपूर सहयोग-समर्थन मिला। गीता के लिए इस तरह के कोई संगठित प्रयत्न नहीं हुए। इस शताब्दी में गीता प्रेस गोरखपुर और अंतर्राष्ट्रीय श्रीकृष्ण भावनामय संघ (इस्कान) ने इस दिशा में जरूर कुछ प्रयत्न किए। इन संगठनों के बावजूद अपने विषय और वैशिष्ट्य के कारण भगवद्गीता के अठहत्तर भाषाओं में 220 से ज्यादा अनुवाद और व्याख्यान हुए।
विभिन्न परंपराओं पर प्रभाव की दृष्टि से गीता सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। शताब्दियों पहले यह ग्रंथ चीन और जापान में विद्वानों में लोकप्रिय हो गया था। बाद में पश्चिमी देशों में भी फैला। बौद्धधर्म की महायान शाखा के दो प्रमुख ग्रंथों ‘महायान श्रद्धा उत्पत्ति’ और ‘सर्द्धम पुंडरीक पर गीता का स्पष्ट प्रभाव है। जर्मन धर्म के प्रसिद्ध विद्वान् जे. डब्ल्यू. होअर के अनुसार यह ग्रंथ न केवल गंभीर अंतर्दृष्टि देता है, बल्कि धर्म के आँतरिक और लौकिक स्वरूप के भी परिभाषित करता है। उनके अनुसार एक अकेले इसी शास्त्र का अध्ययन जर्मन धर्म की मूल प्रकृति से भली-भाँति परिचित करा देता है। प्रसिद्ध दार्शनिक एल्डुअस हक्सले के अनुसार गीता शाश्वत दर्शन का निरूपण करने वाले सभी ग्रंथों में सर्वांग संपूर्ण और सार रूप है। यह न केवल भारतीयों के लिए बल्कि सभी धर्म, संप्रदायों के अनुयायियों के लिए उपयोगी और स्थायी मूल्य रखता है।
भारतीय धर्म के लाखों अनुयायी प्रतिदिन गीता के कम-से-कम एक अध्याय का पाठ करते हैं। बहुत लोग इससे ज्यादा अंश भी पढ़ते और पढ़े गए अंशों के अर्थ-भाव का मनन करते हैं। पूरे ग्रंथ को कंठस्थ कर लेने वालों की संख्या भी बहुत बड़ी है। पाठ करने और याद रखने का अपने आप में विशेष महत्त्व नहीं है, लेकिन इतना अभ्यास करने वालों का जीवन भी कुछ विशेषता लिए हुए होता है। महात्मा गाँधी कहा करते थे कि गीता का अध्ययन करने वालों को विषाद बहुत कम सताता है। उनके अपने शब्दों में, “गीता संपूर्ण वैदिक शिक्षाओं के तत्त्व का सार है। इसका ज्ञान सारी मानवीय महत्त्वाकाँक्षाओं को सिद्ध करने वाला है। मुझे गीता से बड़ी सांत्वना मिलती है। जब कभी निराश होता हूँ, तो गीता की शरण लेता हूँ। मुझे इसमें कोई-न-कोई श्लोक ऐसा मिल ही जाता है, जिससे मैं विपत्तियों में भी मुस्कराने लगता हूँ।”
ऊर्जा और प्रेरणा से लबालब भरा होने पर भी अभिभावक अपने बच्चों को इसे पढ़ने से क्यों रोकते हैं? गीता में लोगों को उदासीनता और पलायन के भाव क्यों झाँकते दिखाई देते है? शास्त्रकार ने इसका उत्तर दिया है। उसके अनुसार सिर्फ वही व्यक्ति इस शास्त्र से लाभ उठा सकते हैं, जो अनुशासित हैं, प्रेम और श्रद्धा से भरे हुए हैं तथा जिनमें सेवा करने की प्रबल इच्छा है। उनके अलावा जो भी इस शास्त्र का अध्ययन करेंगे वे या तो दिग्भ्रांत होंगे अथवा श्रीकृष्ण के इन उपदेशों में दोष देखने लगेंगे।
अध्ययन-मनन ही नहीं, श्रद्धा से पाठ करना भी साधक का कल्याण करता है। स्वामी चिन्मयानंद गीता के एक श्लोक की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि वे लोग भी प्रशंसनीय हैं, जो इसका सतही पाठ भी करते हैं, धीरे-धीरे वे शास्त्र की पावन गहराइयों में खिंचे चले जाते हैं। ऐसा पाठक अनजाने ही आत्मदेव की तीर्थयात्रा पर चल पड़ता है और स्वाभाविक ही वह आत्मविकास की यात्रा पर निकल पड़ता है। गता का विषय सुनना और पढ़ना ही पर्याप्त नहीं है, उसके साथ व्यक्तित्व का सुगठित होना भी आवश्यक है। उस गठन में श्रद्धा भाव भी आवश्यक है और दोष दृष्टि का अभाव भी आवश्यक है।
सामान्य पुस्तकों या ग्रंथों को पढ़ने-समझने के लिए भी खास किस्म की मनःस्थिति और समझ जरूरी होती है। राजनीति की समझ और रुचि रखने वाला विद्यार्थी बिन तैयारी के विज्ञान विषय नहीं समझ सकता। कविता में रुचि रखने वालों को अर्थशास्त्र की पुस्तकें नीरस और उबाऊ लग सकती हैं। कृषि पंडित के लिए चिकित्साशास्त्र की स्तरीय पुस्तक लगभग व्यर्थ ही होगी। किसी भी शास्त्र या परंपरा को ग्रहण करने में इन बारीकियों का ध्यान रखना अधिकार विवेक कहते हैं। भगवद्गीता के संबंध में भी अधिकार का महत्त्व है। उसके अनुसार श्रद्धा और संयम ही साधक को शास्त्र के मर्म तक पहुँचाते और वह लाभ पहुँचाते हैं, जिसकी तुलना में दुनिया का कोई वैभव मुकाबले में नहीं टिकता।
संसार को स्वर्ग और मनुष्य को देवोपम बनाने के लिए, वर्तमान दुर्गति के दलदल से निकलने के लिए ज्ञानसाधना में अनवरत रूप से संलग्न रहने की आवश्यकता है। भूत और वर्तमान की तुलना करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि ज्ञान के बिना उज्ज्वल भविष्य का और कोई मार्ग नहीं।
-पं श्रीराम शर्मा आचार्य
हयवंशी सम्राट् कार्तवीर्य विंध्य प्रदेश को जीतकर, मित्र राजाओं और विजयी सेना सहित स्वदेश लौट रहे थे। प्रथम विराम उन्होंने नर्मदा तट पर महर्षि जमदग्नि के आश्रम में किया। विजय के अहंकार में डूबे कार्तवीर्य उस समय राजसी वैभव से पूर्णतः अलंकृत थे। अपराह्न वे चलने को समुद्यत हुए तो महर्षि ने शिष्टाचारवश स्वयं उपस्थित होकर कहा- राजन् आप लोग थके हैं, आज रात यहीं विश्राम करें।
सम्राट् हँस पड़े, बोले- तपोनिधि! आपका आग्रह तो ठीक है, पर हमारे साथ इतनी विशाल सेना और आपकी विपन्न स्थिति दोनों में सामंजस्य कैसा?
महर्षि उनके अहंकार को ताड़ गए। उन्होंने कहा- तात! आप उसकी चिंता न करें, तपस्वी का धन भगवान् है, भगवान् तो सारे संसार को खिलाता है, आपकी सेना है ही कितनी।
कार्तवीर्य ठहर गए। दृश्य बदला। दूसरे ही क्षण आश्रम ने अपना रूप बदला। मंदार, करवीर, यूथिका, लोध्र, कुँद, चंपक आदि नानाप्रकार के फूलों से सुसज्जित हो गया आश्रम। भोज्य, भक्ष्य, पेय, लेह्य तथा चोष्य सभी प्रकार के सुस्वाद युक्त व्यंजन, हर अतिथि के लिए राजमहलों को भी कान्तिहीन करने वाले सुंदर भवन और राजसी वेश धारण किए परिचारक। यह सब देखकर कार्तवीर्य स्तब्ध रह गए। उन्हें सहसा विश्वास नहीं हुआ कि यह सब कोई सम्मोहन है अथवा स्वप्न या सचमुच ही महर्षि की योगसिद्धि।
विशाल सेना आतिथ्य पाकर कृतकृत्य हुई। कल तक कार्तवीर्य की प्रशंसा के स्वर गूँज रहे थे, पर आज हर व्यक्ति के मुख में गुणानुवाद था, महर्षि की ब्राह्मी शक्ति का। स्वयं महाराज कह रहे थे- भगवन्! आज क्षात्रबल, ब्रह्मबल के सम्मुख हार मानता है और श्रद्धावनत शीश झुकाता है।
लोकसेवा का क्षेत्र आज की परिस्थितियों में एक समीक्षक दृष्टि की अपेक्षा रखता है। “स्वे स्वे आचरेण षिक्षयेत्” की भारतीय संस्कृति की शिक्षा के अनुसार कभी लोक शिक्षक अपने आचरण से जनमानस का मार्गदर्शन करते थे। कैसा हो ऐसे लोकसेवी का व्यक्तित्व, जो मात्र गाल बजाता, वाहवाही लूटता, वैसा चोला पहनकर घूमता है, अपने अंतरंग के परिष्कार पर तनिक भी ध्यान नहीं देता, यह जानना समाजसेवा के क्षेत्र में उतरने वाले हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। “कथनी करनी भिन्न जहाँ है, धर्म नहीं पाखण्ड वहाँ है” सूत्र हमें देने वाले हमारे परमपूज्य गुरुदेव का मार्गदर्शन पढ़ें-धारावाहिक इस लेखमाला में।
जीवनयापन और जीवन की रीति-नीति को आदर्शों के अनुरूप ढालने के लिए, लोकसेवी की गरिमा को सुरक्षित और स्थिर रखने के लिए अपने गुण-कर्म-स्वभाव के परिष्कार की आवश्यकता पड़ती है। इस संबंध में समग्र रूपरेखा निश्चित नहीं की जा सकती, परंतु कुछ मोटी बातों को समझ लिया जाए और उन्हें अभ्यास में शामिल कर लिया जाए, तो लोकसेवी का व्यक्तित्व उच्च आदर्शों के अनुरूप ढलने लगता है। लोकसेवी का व्यक्तित्व भी इतना उत्कृष्ट और जीवंत होना चाहिए कि जो भी उसके संपर्क में आए, वह उससे प्रभावित हुए बिना न रहे।
सेवापरक क्रिया–कलापों का अभीष्ट प्रभाव करने वाले उन गुणों का अभाव रहता है, जिनकी तुलना पारस से की जाती है और उनके संस्पर्श से ही क्षुद्र व्यक्ति नर से नारायण, पशु से मानव और निम्न से उच्च श्रेणी का व्यक्ति बनने लगता है। अपने विचार अच्छे ढंग से प्रतिपादित कर, लच्छेदार वक्तव्यों द्वारा लोगों को कुछ देर के लिए चमत्कृत तो किया जा सकता है, परंतु उसका स्थाई प्रभाव नहीं पड़ता। स्थायी प्रभाव के लिए तो व्यक्ति को स्वयं अपने में चरित्रबल भी उत्पन्न करना पड़ता है। एक प्रसिद्ध विचारक का कथन है-विचारों में तो सभी आदर्शवादी होते हैं। योग्य-अयोग्य का ज्ञान या पुण्य-पाप की अनुभूति तो मूर्ख और पापी को भी होती है, किंतु व्यावहारिक जीवन में हम उसे भूल जाते हैं। धर्म को जानते हुए भी उसमें प्रवृत्त नहीं होते और अधर्म को जानते हुए भी उससे निवृत्त नहीं होते।” दुर्योधन ने यही बात भगवान् कृष्ण से तब कही थी जब वे शाँति दूत बनकर गए थे। अर्थात् धर्म-अधर्म का विवेक सभी को रहता है, सभी उन बातों को जानते हैं। लोकसेवी भी यदि उन्हीं बातों की कोरी चर्चा करते हुए घूमें, तो कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। इसलिए लोकसेवी को अपने व्यक्तित्व के माध्यम से सर्वसाधारण की स्थिति को शिक्षित करना चाहिए।
सेवा और व्यक्तिगत जीवन को अलग-अलग कर देखने वालों को समझना चाहिए कि लोकसेवा उनकी साधना है, व्यवसाय नहीं। सेवा को व्यवसाय के रूप में अपनाने वालों की बात और हैं कर्मचारी, नौकर, अधिकारी वर्ग भी जनसेवक की गणना में आते हैं, पर जनसेवा के प्रति न उनमें टीस होती है, न लगन। जिन्होंने सेवा को ही अपना पाथेय चुना है, उन लोकसेवी कार्यकर्ताओं को तो सेवा का स्तर साधना की तरह ही रखना चाहिए।
अपना व्यक्तिगत जीवन यदि निकृष्ट रहा, तो सेवा-साधना के प्रयासों कोई प्रभाव नहीं होगा। स्वामी रामतीर्थ का यह वचन है- “लोकसेवियों को याद रखना चाहिए कि सामाजिक कार्यकर्ता की वाणी ही नहीं उसका पूरा व्यक्तित्व ही बोलता है और वाणी की अपेक्षा उसका व्यक्तित्व सुना जाता है।” वाणी और कर्म जब मिल जाते हैं, तो व्यक्तित्व प्रखर बन जाता हैं लोकसेवी ही नहीं अन्य प्रकृति के व्यक्तियों का भी तभी प्रभाव होता है, जबकि उनके विचार और कर्म एक हों। एक वेश्या की वाणी ही सफल नहीं होती, उसके कर्म भी उसी स्तर के होते हैं। मानसिक वासना मनुष्य मन की कमजोरी है, इसलिए वह व्यभिचार की ओर आकर्षित होता है। लेकिन शराबी में भी प्रभावित करने की यही क्षमता रहती है। वह भी अपने विचार और कर्म के द्वारा अपने साथियों को प्रभावित करता है तथा उन्हें भी मद्यपान का व्यसन डाल देता है।
लोकसेवी के विचार और उसके क्रिया–कलापों में समानता हो तो उसका व्यक्तित्व भी इतना प्रभावशाली बन सकता है कि वह अपने सेवाक्षेत्र में अभीष्ट परिणाम प्राप्त कर सके। आरंभ में अपने आचरण और विचारों को पूर्णतः एकात्म कर लेना, एकदम चरित्र को आदर्श बना लेना भी आसान नहीं है, पर इसका यह अर्थ नहीं है कि इसके बहाने विचार और व्यवहार में साम्य स्थापित करने की बात नजरअंदाज की जाती रहे। इनमें स्तर का अंतर हो सकता है, लेकिन दिशा भिन्न नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, लोकसेवी खर्चीले और दान-दहेज वाले विवाहों का विरोध करता है। लोगों को अपनी सामर्थ्य से अधिक खरच न करने की प्रेरणा देता है। उसके घर में कभी विवाह हो रहा हो और परिवार काफी बड़ा हो, तो थोड़ी धूमधाम तो रहेगी, पर इसके लिए खूब ठाट-बाट और शान-शौकत का प्रदर्शन किया जाए, यह सर्वथा अनुचित है। कोई कार्यकर्ता दूसरों को सादगी से रहने और मितव्ययी जीवन व्यतीत करने की शिक्षा देता है तथा स्वयं अपने जीवनस्तर को तथाकथित रूप से उच्च बनाए रहता है, तो इसका प्रभाव कुछ नहीं होगा।
इसीलिए प्राचीनकाल से अब तक लोकसेवियों की यह परंपरा रही है कि आवश्यकताएँ कम-से-कम रखी जाएँ। आवश्यकताओं का विस्तार किया जाए, तो उनका अंत नहीं है। सुविधाएँ कितनी ही बढ़ाई जाएँ, कोई भी सुविधा अनावश्यक नहीं जँचती। रहने के लिए वैसे साधारण से मकान में गुजारा हो सकता है, परंतु उसमें तमाम सुविधाएँ आवश्यक प्रतीत होंगी। गरमी के कारण जी को बड़ी बेचैनी होती है, कूलर चाहिए, एयरकंडीशनर कमरे चाहिए। कूलर के द्वारा गरमी से तो बचा जा सकता है, पर एयरकंडीशनर व्यवस्था नहीं होगी, तो सर्दियों में क्या करेंगे? ऐसा इंतजाम चाहिए, जिससे सर्दियों में भी गरम रखा जा सकता हो। जो भी सुविधाएँ होती हैं, आवश्यकताओं का प्रतिबंधित रूप से औचित्य ढूँढ़ा जाए, तो सभी जरूरी लगेंगी। लोकसेवी को इस संबंध में औसत और न्यूनतम का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। उन्हें कम करते चला जाए, तो हम देखेंगे कि हमारी आवश्यकताएँ कितनी कम हैं। एक सामान्य व्यक्ति को खाने के लिए पौष्टिक आहार, पहनने के लिए वस्त्र और रहने के लिए मकान उपलब्ध हो, साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य का प्रबंध हो, तो समझना चाहिए कि इतने साधन हमारे लिए पर्याप्त हैं।
वेशभूषा के बाद मुख्य रूप से आती है लोकसेवी की आहार व्यवस्था। सेवा-साधना में प्रवृत्त कार्यकर्ताओं को अपनी आहार व्यवस्था सादगीपूर्ण और औसत स्तर की ही रखनी चाहिए। इससे एक तो स्वास्थ्य की सुरक्षा हो जाती है, दूसरे लोगों पर उसका प्रभाव भी पड़ता है। भोजन के संबंध में कुछ व्रत भी लिए जा सकते हैं। घर में रहते हुए तो सादा भोजन सभी करते हैं, पर लोकसेवी बाहर जनसंपर्क या सेवाकार्यों के लिए निकलता है, तो लोग सम्मान और श्रद्धा के वशीभूत होकर कई तरह की स्वादिष्ट वस्तुओं की व्यवस्था करते हैं। उनकी सद्भावना को उपेक्षित न करते हुए भी इस बात का ध्यान रखा जाए कि हमारा चटोरापन न बढ़ जाए। इसके लिए लोगों को पहले से बता दिया जाए कि हम लोग सादा भोजन ही करेंगे। इसके लिए कोई विशेष व्यवस्था न की जाए, तो अच्छा रहता है। आतिथ्य करने वाले व्यक्ति तो अतिथि की व्यवस्था अतिथि की तरह करते हैं। इसलिए विशेष व्यवस्था भी की जाती है, लेकिन अतिथि स्वयं जब सामान्य व्यवस्था का आग्रह करता है, तो उससे पूरे परिवार में अतिथि के प्रति आत्मीयता और पारिवारिकता की भावना उद्भूत हो जाती है।
स्वाद लिप्सा से बचाव तो अपने आप में ही एक सद्गुण है, जिसकी गणना संयम-साधना में होती है, इसके लिए एक नियम बनाकर चला जाए। जैसे रोटी के साथ एक लगावन साग ही खाएँगे या एक ही दाल खाएँगे। थाली में भोज्य पदार्थों की संख्या दो या तीन से अधिक नहीं होने देंगे। बाहर के क्षेत्रों में सेवाकार्य करने निकलने पर लोग श्रद्धा और स्नेह के वशीभूत होकर कुछ-न-कुछ चीजें बनाकर खिलाने के लिए आते हैं। यहाँ यह धर्मसंकट भी उत्पन्न होता है कि यदि उन्हें लेने से एकदम इनकार कर दिया जा, तो उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचती है और ले लिया जाए, तो व्रत टूटता है, मर्यादा भंग होती है। ऐसी स्थिति में लाई गई वस्तुओं का नाममात्र अंश लिया जा सकता है। जिस स्नेह भाव से आतिथ्य रूप में आहार प्रस्तुत किया गया था, उसकी सराहना की जानी चाहिए।
खानपान की तरह ही लोकसेवी को और दूसरी बातों में भी इतना सतर्क रहना चाहिए कि उन्हें असुविधा हो रही है ऐसा किसी को आभास ही न हो। अपनी आदतों को इतना लचीला बना लिया जाए कि हर परिस्थिति में, हर स्थान पर किसी प्रकार की असुविधा न लगे। जैसे बहुत से व्यक्तियों को रात में सोने से पूर्व या दिन में किसी खास समय दूध पीने की आदत है। इस अभ्यास विशेष को बाहर रहते हुए स्थगित कर दिया जाए, यही ठीक है।
दिनचर्या में स्वावलंबन, नियमितता और अनुशासन भी लोकसेवी की एक मर्यादा है। स्वावलंबन, नियमितता और अनुशासन मनुष्य के व्यक्तित्व को संवारता तथा उसे उज्ज्वल बनाता है। स्वावलंबन का अर्थ है, अपने काम अपने हाथ से ही किए जाएँ। घर में हों अथवा बाहर, इन गुणों को अपने स्वभाव में सम्मिलित करना कोई कठिन कार्य नहीं है। परिवार में रहते हुए भी जहाँ तक हो सके अपने काम अपने हाथ से ही किए जाने चाहिए। अपने हाथ से कपड़े धोने, स्वयं हजामत बनाने और दूसरे जरूरी काम भी स्वयं ही करने जैसे काम स्थूल दृष्टि से किसी के लिए भले ही महत्त्व न रखते हों, पर इससे व्यक्तित्व में स्वावलंबन की जो सद्वृत्तियाँ आती है, वह व्यक्तित्व को प्रखर बनाती है।
बाहर सेवा के लिए निकलते समय लोकसेवियों को चाहिए कि वे अभीष्ट कार्य स्वयं संपन्न करने के लिए आगे बढ़ें। आमतौर पर होता यह है कि लोकसेवी स्वयं कोई कार्य करने की उपेक्षा सेवकों को उसके लिए निर्देश देते हैं और उनसे यह अपेक्षा करते हैं- जैसा वे चाहते हैं वैसा ही कार्य वे कर लेंगे। जैसे श्रमदान या स्वच्छता संवर्द्धन का कार्य करना है। इसके लिए कार्यकर्ता गाँव में गए और वहाँ के निवासियों को सफाई का महत्त्व तथा श्रमदान की आवश्यकता समझाने लग। केवल समझाने पर ही कोई तैयार हो जाएगा, यह तो अपेक्षा नहीं की जा सकती। ठोस परिणाम के लिए श्रमदान से गंदगी निवारण का कार्यक्रम भी बनाना पड़ेगा। उसका व्यावहारिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने पर कुछ उत्साही लोग तैयार हो सकते हैं। उन्हें साथ लेकर सफाई के लिए निकल पड़ें और स्वयं उसमें भाग नहीं लिया, तो लोगों पर उसका जरा भी प्रभाव न होगा। लोग समझेंगे कि हमारे ऊपर हुक्म चलाया जा रहा है और उससे कार्य के प्रति महत्त्वबोध भी कम होगा तथा लोकसेवी के प्रति श्रद्धा भी घटेगी। ऐसे समय में उचित यही रहता है कि लोकसेवी स्वयं पहले उस काम में जुट जाए और लोगों को सहयोग देने लगे। स्मरण रखना चाहिए कि लोकसेवी अपने आप को विशिष्ट व्यक्ति कदापि व्यक्त न करें। जनसाधारण से उनके व्यक्तित्व का स्तर ऊँचा है अवश्य, पर उसे स्वयं अपनी ओर से विज्ञापित नहीं करना चाहिए।
लोकसेवी को निरहंकार, स्वावलंबी होने के साथ-साथ निर्लोभी भी होना चाहिए। यह लोभ ही है, जिसके वशीभूत होकर अनेकों व्यक्ति सार्वजनिक संपत्ति का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। लोकसेवी को ऐसे सार्वजनिक कार्यों का नेतृत्व भी करना पड़ सकता है, जिनमें कि आर्थिक साधन जुटाए जाते हैं और लोकसेवी को उनका उत्तरदायित्व सँभालना पड़ता है। ऐसी स्थिति में लोकसेवी को अपनी प्रामाणिकता रखनी चाहिए। प्रामाणिकता साबित करने भर से काम नहीं चल सकता। सिद्ध तो झूठा भी किया जा सकता है। लोकसेवी को अपनी ईमानदारी और प्रामाणिकता के प्रति सघन निष्ठा रखनी चाहिए। लोगों को उस संबंध में कोई संदेह न रहे, इसके लिए धन के हिसाब-किताब से लेकर उपयुक्त कार्यों में खर्च करने तक सभी बातें सार्वजनिक रूप से प्रकाशित की जाएँ। यदि किसी बड़ी संस्था के लिए कार्य किया जा रहा है, तो उसके प्रति उत्तरदायी रहने का कर्तृत्व निबाहा जाए, वहाँ व्यक्तिगत रूप से भी कुछ दिया जाए जैसे मार्ग व्यय आदि के लिए, तो उसे भी संस्था को दिया गया समझें और उसके एक-एक पैसे का हिसाब दें।
धन संबंधी प्रामाणिकता के बाद चरित्र संबंधी प्रामाणिकता को भी समान महत्त्व दिया जाए। लोगों की निगाह इस संबंध में बड़ी बारीक होती है और वे चारित्रिक मर्यादाओं को धन संबंधी मर्यादाओं से भी अधिक महत्त्व देते हैं। इसलिए लोकसेवी यदि पुरुष है तो स्त्रियों के प्रति और स्त्री है, तो पुरुषों के प्रति अपनी-अपनी दृष्टि को पवित्र रखना चाहिए। पुरुषों को व्यवहार में मर्यादा का अधिक ध्यान रखना चाहिए। पुरुष कार्यकर्ता स्त्रियों के साथ एकांत में तो चर्चा नहीं ही करें, सबके सामने भी उनसे अनावश्यक बातें न कह। जो कार्य पुरुष ही कर सकते हैं, उनके लिए महिलाओं को उनके निर्धारित कार्य करने दिए जाएँ और पुरुष अपने नियत काम करें। इसमें व्यतिक्रम न आने देना चाहिए, साथ ही स्त्रियों से बार-बार संपर्क को भी टालना चाहिए। जरूरी बातें एक ही बार में समझा देनी चाहिए। बार-बार उनसे संपर्क करने में लोगों की दृष्टि उस ओर जाती है और बुरी भावना न होते हुए भी लोग टीका-टिप्पणी करने लगते है।
आज की स्थिति में सेवाकार्यों तथा उसमें प्रवृत्त होने वाले सेवावृत्ति वाले लोगों की भारी, आवश्यकता अनुभव होती है। यदि उसकी पूर्ति की जा सके, तो निश्चित रूप से समाज में सुखद परिस्थितियाँ पैदा करना जरा भी कठिन न रहेगा। किंतु यह होगा तभी जब लोग सेवाधर्म का महत्त्व समझें। उसके अनुरूप अपने दृष्टिकोण, व्यक्तित्व एवं व्यवहार को ढालें तथा साहसपूर्वक उल्लसित होकर उस मार्ग पर चल पड़ें। सेवा के महत्त्व के साथ-साथ उसके लिए आवश्यक मनोभूमि एवं व्यक्तित्व बनाने का क्रम चल पड़े, तो इस मार्ग पर सफलताओं के ढेर लगते चलेंगे तथा सर्वसाधारण में भी उस दिशा में चलने का उत्साह जागेगा।
युगशिल्पियों से यही अपेक्षा की जाती है कि सेवा का महत्त्व समझकर जो भी व्यक्ति आएँ, वे ऐसा व्यक्तित्व बनाने में सक्षम हों कि उनका भी गौरव बढ़े तथा समाज का भी हितसाधन हो। इन सूत्रों को जीवन में उतारने वाले कभी भी मार्ग से भटकेंगे नहीं, वे युग नेतृत्व का यश-गौरव प्राप्त करके रहेंगे।
हनुमान सदा से सुग्रीव के सहयोगी थे, पर जब बालि ने सुग्रीव की संपदा एवं गृहिणी का अपहरण किया तो हनुमान प्रतिरोध में कोई पुरुषार्थ न दिखा सके। इससे प्रतीत होता है कि उस अवसर पर सुग्रीव की तरह हनुमान ने भी अपने को असमर्थ पाया होगा और जान बचाकर कहीं खोह-कंदरा का आश्रय लेने में ही भला देखा होगा, पर वे जब प्राण हथेली पर रख राजकाज के परमार्थ-प्रयोजनों में संलग्न हुए तो पर्वत उठाने, समुद्र लाँघने, अशोक उद्यान उजाड़ने, लंका जलाने जैसे असंभव पराक्रम दिखाने लगे। सुग्रीव पत्नी को रोकने में सर्वथा असमर्थ रहने पर भी अन्य देश में- समुद्र पार बसे अभेद्य दुर्ग को बेधकर वे सीता को मुक्त कराने में सफल हो गए।
(गतांक से आगे)
मित्रो! फिर यह हलचल कौन पैदा करता है? नया जमाना कौन लाता है? एक हवा आती है। ठीक है गुरुजी कहते हैं कि एक हवा आती है। नहीं बेटे, अकेले में गुरुजी के कहने से कोई फायदा नहीं है। वास्तव में जब इस एक ही बात को असंख्य व्यक्ति कहते हैं, उसका समर्थन करते हैं कि हाँ ऐसा होना चाहिए, तब इस बात को- आवाज हलक को ‘नक्कारे खुदा समझो।’ जब हलक से आवाज निकलती है, तो वह नक्कारे खुदा है। जब हम कहते हैं कि ‘हम नया जमाना लाएँगे।’ ‘हम इस संसार में पुनः स्वर्ग की स्थापना करेंगे’ तो यह कौन कहता है- मैं? नहीं, हम कहते हैं। हम और आप सब मिल करके-जमाने को मिला करके एक हवा है, एक दिशा है। ये कौन है? ये भगवान् हैं। जब कभी एक ठिकाने पर ये हवा पैदा होती है, जिन आदर्शों को पैदा करने के लिए यह आँधी-तूफान पैदा होता है, हलचलें पैदा होती हैं, तो आप समझ सकते हैं कि इसके पीछे भगवान् की हवा है। भगवान् की प्रेरणा काम कर रही है। भगवान् का अवतार काम कर रहा है। इसी को मैं अवतार मानता हूँ।
क्या व्यक्ति के रूप में भी भगवान् का अवतार होता है? चलिए अब मैं आपकी बात का भी समर्थन करने को तैयार हूँ कि व्यक्ति के रूप में अवतार होता है। साकार रूप में भगवान् होता है। आप निराकार की बात पर ज्यादा विश्वास नहीं करते। अतः मैं आपको साकार की बात बताऊँगा कि कैसे भगवान् लीलाएँ करने आते हैं। व्यक्ति आता है। आप भगवान् की कथाएँ तो सुनते हैं, पर गहरे में क्यों नहीं जाते? भगवान् की सारी की सारी लीलाएँ, कथा-गाथाएँ इस बात पर टिकी हुई हैं कि भगवान् एक है। यह बात अलग है कि उसने लोकशिक्षण का तरीका क्या अख़्तियार किया। जब कभी भगवान् के अवतार होते हैं, तो प्रत्येक बार वह आचरण से जन-जन को शिक्षा और प्रेरणा देते हैं। लोकशिक्षण का यही सबसे जानदार और सबसे सफल तरीका है।
मित्रो! लोगों के सामने बकवास करने की अपेक्षा, लोगों को उपदेश सुनाने या कथा सुनाने की अपेक्षा यह ज्यादा अच्छा है कि आपने लोगों के सामने जो उपदेश दिए हैं, उसे स्वयं के जीवन में उतारकर बताएँ कि हमने इस तरीके से जीवन जिया है। दुनिया में सबसे ज्यादा प्रभावशाली तरीका यही है। इससे बढ़िया और बेहतरीन तरीका और कोई है ही नहीं। आप इस तरीके से चलिए जिसे देखकर के लोग सोच सकें कि जो सिद्धान्त आप कहना चाहते हैं, समझना चाहते हैं, वे आपके रोम-रोम में इस कदर समा गए हैं कि आप इस तरह का रास्ता अख़्तियार किए बिना जिंदा नहीं रह सकते। अगर आप इतना ज्यादा विश्वास लिए हुए बैठे हैं, तो आपके विचार आपकी वाणी से और आपके आचरण से टपकने चाहिए।
चलिए मैं तो यह भी कहता हूँ कि बिना वाणी के भी लोकशिक्षण किया जा सकता है। बहुत से लोगों न अपनी जबान को बंद कर दिया था, लेकिन उनकी आस्थाएँ, उनकी निष्ठाएँ और जिंदगी का स्वरूप इतना शानदार और जबरदस्त था कि उन्होंने नई हवाएँ बना दीं, नई फिजाएँ पैदा कर दी और न जाने दुनिया में कितनी हलचलें पैदा कर दीं। आदमी के समझाने का तरीका, सुझाने का तरीका, गुरु होने का तरीका वो है कि जबान से हमने लंबे-चौड़े व्याख्यान सुनाएँ हैं, कथाएँ सुनाई हैं, उनकी अपेक्षा अपनी जिंदगी का एक नमूना पेश करें।
भगवान् कृष्ण हों या भगवान् राम अथवा और कोई अवतार, उन्होंने लोकशिक्षण को जो तरीका अख़्तियार किया है, वह उनकी जिंदगी जीने कस एक ढंग था। वह उनके काम करने की एक शैली थी। इस शैली के द्वारा उन्होंने लोगों से कहा कि आप स्वयं निश्चय कीजिए और उन सिद्धांतों को ढूँढ़िए, जिसके लिए हमें जन्म लेना पड़ा और जिसके लिए निरंतर कष्ट सहने पड़े। भगवान् कृष्ण की लीलाएँ, जो हमारे लिए और आपके के लिए बिलकुल सामयिक हैं, आधुनिक हैं, अति उत्तम और अति प्राचीनतम भी हैं, वे हमको बताती है कि सिद्धांतों को जीवन में कैसे उतारें। उन सिद्धांतों को अपनाए बिना कोई महापुरुष रहा नहीं। उन सिद्धांतों को आपके मन में प्रवेश कराने के लिए भगवान् ने लीलाएँ दिखाई-क्रीड़ाएं कीं।
भगवान् श्रीकृष्ण की लीलाएँ क्या हैं? कृष्ण भगवान् जेलखाने में पैदा हुए, जो चारों तरफ से बंद था, जिसमें उनके माता-पिता बंद थे। जंजीरों से जकड़े हुए थे। उस स्थिति में एक बालक पैदा हुआ। सब ओर से घिरा हुआ जब बालक पैदा हुआ, तो उसके अंदर संकल्प की शक्ति थी। बालक यह संकल्प लेकर आया कि मुझे इन बंधनों से मुक्त होना है, और लोगों को बंधनों से मुक्त करना है। परिस्थितियाँ कितनी विपरीत और विषम थीं, लेकिन वे किस तरह से टूटती चली गईं- कच्चे धागे की तरह से।
भगवान् श्रीकृष्ण के बारे में हम किताबों में पढ़ते हैं कि उनके जन्मकाल में जेलखाने से बाहर निकलने के लिए परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं थीं। फिर भी भगवान् के संकल्प से सारे पहरेदार सो गए। सभी दरवाजे खुल गए, जंजीरें टूट गई और पिता उस बच्चे को लेकर सुरक्षित रखने के लिए चल पड़ें। भादो की घनघोर अँधेरी रात थी। जिस तरह आज की रात बादल छाए हुए हैं, पानी बरस रहा है, गंगा में बाढ़ आई हुई है, कुछ ऐसा ही दृश्य उस समय रहा होगा। जमना में बाढ़ आई हुई थी। चारों ओर अँधेरा छाया हुआ था। कोई रास्ता सूझ नहीं रहा था। प्रकाश कहीं था नहीं। लेकिन प्रकाश देने वाली एक ज्योति, जो इनसान के भीतर जला करती है और सहारा देती रहती है, जो मझधार में से पार निकालती रहती है। हमें मझधार में दूसरे लोग पार नहीं निकालते हैं। हमारी अंतर्ज्योति ही हमको पार निकालती है। उन विषम परिस्थितियों में भी वासुदेव श्रीकृष्ण को टोकरी में लिए हुए आगे बढ़ते चले गए और वहाँ जा पहुँचे जहाँ नंद-यशोदा का घर था। वहाँ उस बच्चे के रहने का इंतजाम कर दिया।
मित्रो! यह घटना हमें क्या सिखाती है? यह हमें सिखाती है कि इनसान संकल्प तो करके देखे, निश्चय तो करके देखें, विश्वास तो करके देख फिर हमसे कहे। आप यह तजुर्बा करके लाइए, फिर आपको कीं जाने की जरूरत नहीं पड़ती। आप आगे बढ़ते हुए चले जाएँगे और आपको सफलता मिलती हुई चली जाएगी। आदमी की हिम्मत के अलावा दुनिया में और कोई शक्ति नहीं है, जो उसे पार लगा सके। आदमी की ताकत हो सकती है, लहरों की अपनी ताकत हो सकती है, समुद्र की अपनी ताकत हो सकती है, लेकिन इनसान के विकल्प के आगे कोई और ताकत नहीं है।
यही सब आदमी को सिखाने के लिए भगवान् ने अवतार लिया था। बेटे! अपने भीतर वाले का कमजोर मत होने दीजिए। भीतर वाले को मजबूत बनाइए। भीतर वाले को कमजोर बना देंगे, तो आप गिर जाएँगे। भीतर वाले को साहस के सहारे उठाएँगे, तो आप आगे बढ़ेंगे और दूसरा आदमी सहायता करने के लिए आएगा। अगर आप अपने को पीछे हटायेंगे तो लोग आपसे पहले ही दूर हट जाएँगे। यह नसीहत कृष्ण भगवान् ने अपने जन्म के पहले दिन से ही आरंभ कर दी थी। उनके पिताजी ने भी यही बात बताई थी कि यदि परिस्थितियाँ अनुकूल रहती हैं, तो ठीक है, अन्यथा साहस और संकल्प के सहारे उन पर विजय पाई जा सकती है। अगर आपका उद्देश्य ऊँचा है और आपके अंदर साहस का अभाव नहीं है, तो परिस्थितियाँ आपके प्रतिकूल हो ही नहीं सकतीं। अगर आपका उद्देश्य नीचा है और आपके अंदर साहस का अभाव है, तो फिर आप गिरे या मरे ही समझना चाहिए। बेटे यदि आपका उद्देश्य ऊँचा है, साहस आपका ऊँचा है, तो आपका सहायता देने के लिए सारी देवशक्तियाँ आगे आएँगी, चाहे कितना ही आपके मार्ग में अवरोध क्यों न हो। सारी सहायता आपको मिलती चली जाएगी।
आज जन्माष्टमी के दिन यह है शिक्षण नंबर एक, जो भगवान् श्रीकृष्ण ने, उनके पिता ने अपनी घटना के द्वारा, अपने क्रिया−कलाप के द्वारा हमको दिया। हम और आप तो बकवास करना जानते हैं और व्याख्यान करना जानते है लेकिन भगवान् ने जो उदाहरण प्रस्तुत किया, वह कितना शानदार है। देवकी इतना नहीं कर सकती थी, वासुदेव भी इतना नहीं कर सकते थे कि कंस का मुकाबला करें और उसे मार डालें। वे सामर्थ्यवान् नहीं थे, शक्तिवान नहीं थे, विद्वान् नहीं थे नेता नहीं थे, लेकिन साहसी थे। किन्हीं अच्छे कामों के लिए आप भी साहसी बन सकते हैं। रीछ-वानरों के तरीके से अच्छे कामों में सहायता कर सकते हैं।
रीछ और बंदर रावण को नहीं मार सकते थे, पर लंका पर जाने के लिए समुद्र पर पुल तो बना सकते थे। गिलहरी ज्यादा काम नहीं कर सकती थी, लेकिन समुद्र में मिट्टी तो डाल सकती थी। ठीक है, जा आदमी जिस हैसियत में रहता है, उससे आगे बढ़कर दूसरा काम नहीं कर सकता, वह अगली पंक्ति में नहीं खड़ा हो सकता, लेकिन अच्छे कामों में सहायता तो कर सकता है। गाय चराने वाले ग्वाले मामूली आदमी थे। उन्होंने कहा- ठीक है हम ज्यादा तो नहीं कर सकते, लेकिन भगवान का उद्देश्य पूरा करने के लिए उनकी सहायता तो कर ही सकते हैं। गोवर्धन उठाने में अपनी लाठी का सहारा तो दे ही सकते हैं। अगर आप प्रेरणा लेना चाहें तो आप इनसे प्रेरणा व श्रद्धा ले सकते हैं।
भागवत् की कहानी कही जा रही है और लोगों द्वारा सुनी जा रही है। कहते हैं इसको सुनने से बड़ा भारी पुण्य मिलता है। बेटे! कहानी कहने और सुनने भर से कोई पुण्य नहीं हो सकता। पुण्य केवल उस स्थिति में होगा जब आप उससे प्रेरणा ग्रहण करेंगे, जीवन में उतारेंगे, प्रवेश करने देंगे और उसे बाहर अपने क्रियाकृत्यों में, व्यवहार में प्रकट होने देंगे। इससे कम में कोई पुण्य नहीं हो सकता। इसलिए मित्रों! भगवान्, भगवान् की क्रीड़ाएं, लीलाएँ हमको दिशाएँ देती हैं, शिक्षण देती हैं। संघर्षों से लोहा लेना सिखाती हैं।
मित्रो! संघर्षों से आदमी समर्थ होता है। संघर्षों से आदमी की श्रद्धा निखरती है। गुरु जी! संघर्ष आते हैं, तो हमारे ऊपर बड़ी मुसीबत आती है। तो बेटा, मुसीबत के बिना कोई भी आदमी दुनिया में बड़ा नहीं हुआ, तीखा नहीं हुआ, कामयाब नहीं हुआ। नहीं साहब, मुसीबत दूर कीजिए। मुसीबत हम जरूर कम कर देंगे, लेकिन साथ-साथ यह शाप भी देंगे कि तू मंदबुद्धि हो जो, फालतू हो जा, निकम्मा हो जा, कीड़ा-मकोड़ा हो जा। महाराज जी आप ये क्या कहते हैं? बेटे, ये तो साथ-साथ होगा, क्योंकि जा आदमी आराम की जिंदगी, चैन की जिंदगी, मानसिक चिंता रहित जिंदगी जिएगा, वह निकम्मा हो जाएगा, बेकार हो जाएगा। उसकी योग्यताएँ, प्रतिभाएँ, इच्छाएँ समाप्त हो जाएँगी ओर वह किसी काम का नहीं रहेगा, मुरदा बन जाएगा।
मित्रो! मनुष्य हमेशा से संघर्षों से घिरा पड़ा है। जो आदमी अपनी जिंदगी में संघर्षों में मुकाबला नहीं करते, वे जिंदगी का आनंद नहीं ले सकते। जो आदमी जरा भी श्रम नहीं करता, वह नींद का आनंद नहीं ले सकता। गहरी नींद का आनंद सिर्फ उस आदमी के हिस्से में आया है, जिसने कड़ी मशक्कत की है। हल जोतने वाला किसान दोपहर में आराम से बगीचे में जाकर हाथ का तकिया बनाकर खर्राटे भरता है और अपनी नींद पूरी कर लेता है। उसे आरामतलबों की तरह नींद के इंजेक्शन की कोई जरूरत नहीं पड़ती। रोज की गहरी नींद उनके हिस्से में आई है, दाल-रोटी उनके हिस्से में आई है, जिन्होंने कड़ी मशक्कत की है, जिन्होंने मेहनत की है। जिन्हें यही पता नहीं है कि जीवन संघर्ष क्या होता है, कठिनाइयाँ क्या होती हैं, उनका भी कोई जीवन है।
साथियो, कठिनाइयाँ आदमी को निखारने के लिए, उभारते के लिए बेहद आवश्यक है। चाकू पर तब तक धार नहीं रखी जा सकती, जब तक कि उसे पत्थर पर घिसा नहीं जाएगा। इसके बिना पैनापन, तीखापन नहीं आ सकता। चाकू की धार नहीं निकल सकती। मित्रों! मुसीबतें हमारी सबसे बड़ी मित्र हैं और सबसे बड़ी सुधारक-अध्यापक हैं, जो हमारी सारी-की-सारी कमजोरियों को चूर-चूर कर डालती हैं और हमारे भीतर को, बहादुरी का माद्दा पैदा करती हैं। कठिनाइयाँ हमें संघर्ष करना सिखाती हैं। और न जाने क्या-क्या सिखाती हैं। यह इतनी बड़ी पाठशाला है इसमें से होकर आदमी प्रतिभावान् निकलता है, नया जीवन लेकर निकलता है और जिन्होंने आराम की जिंदगी जी, हराम की जिंदगी जी, वे मिट्टी के होकर के रहे हैं, कीड़े होकर के रहे हैं। अमीरों के बच्चों को आप देख सकते हैं। अमीरी में पले हुए बच्चों का सत्यानाश हो गया। जो बच्चे गरीबी में पैदा हुए, कठिनाइयों में पैदा हुए, वे हीरे के तरीके से चमकते हुए निकले, तलवार के तरीके से दनदनाते हुए निकले।
मित्रो! भगवान् ने इसीलिए कहा कि मुसीबतों घबड़ाना मत। कठिनाइयों से भागो मत, उनसे कुछ सीखने की कोशिश करो। कठिनाइयों से जूझने के लिए भीतर से हलचल होनी चाहिए। भगवान् श्रीकृष्ण का प्रारंभिक जीवन यही सिखाता है कि आदमी को यदि भगवान् बनना है, महान बनना है, तो उसे कठिनाइयों के आलिंगन करना चाहिए। कठिनाइयों को जानबूझकर चैलेंज करना चाहिए। तपश्चर्या को मतलब ही होता है- कठिनाइयों को जानबूझकर अपनाना और यह अभ्यास करना कि हम मुसीबत में हैं। मुसीबत हमें सबसे पहले बहादुरी के साथ संयम करना सिखाती है। तप आदमी न जाने क्या से क्या बना देता है।
संपत्ति, अमीरी आदमी को दुर्व्यसनी बनाती है, अनाचारी और दुराचारी बनाती है तथा असंख्य बुराइयाँ लेकर आती है। ऐयाशी आदमी को गलाती है और उसे हजम कर जाती है। आदमी को गलत रास्ते पर ले जाती है। यह दौलत की लाभ-हानियाँ हैं और कठिनाइयाँ? कठिनाइयों में जहाँ मुसीबतें उठानी पड़ती हैं, असंख्य दिक्कतें आती हैं, वहीं मनुष्य अपनी भट्टी में गलाकर कुंदन भी बनाती है। तो मित्रो भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी जिंदगी से यही सिखाया है कि कठिनाइयों से भागो मत। कठिनाइयों का मुकाबला करो। कठिनाई आदमी की क्षमता को निखारती हैं। ये इम्तहान है, मनुष्य के लिए कि उसने सिद्धांतों के लिए कितना कष्ट सहा। इसी के आधार पर हम फेल और पास होते हैं। इसके अतिरिक्त और कोई कसौटी नहीं है। कसौटी एक ही है कि सिद्धांतों के लिए उसने क्या किया, कौन-सी मुसीबतें उठाई। जिसने ऐसा नहीं किया, जिसके जीवन में कोई प्यार नहीं, कोई सेवा नहीं, कोई बलिदान नहीं, कोई परिश्रम नहीं है, उसे हम महापुरुष नहीं कह सकते हैं। धिक्कार है ऐसे जीवन को।
मित्रो! महापुरुषों को अपने जीवन में अनेकों कठिनाइयाँ झेलनी पड़ी हैं, इम्तहान देना पड़ा है। भगवान् कृष्ण को सारी जिंदगी लड़ना पड़ा है। उन्हें मारने के लिए कौन-कौन आए? कालिया नाग आया, पूतना आई, कंस आया और न जाने कितने असुर आए। उनकी जिंदगी में कितने ही असुर जबरदस्ती मारने आए जबकि व अपनी गली में, घर में ग्वाल-बालों के साथ खेलते-विचरते रहते थे। वस्तुतः जो आदमी मौत के साथ जद्दोजेहद कर सकते है, कठिनाइयों के साथ लड़ सकते हैं, उनका यश चारों ओर फैलता है। जो मुसीबतों के लिए-कठिनाइयों के लिए तैयार रहते हैं, उनकी हिम्मत निखरती जाती है। हिम्मत के बिना सफलता के पहाड़ पर चढ़ना किसी के लिए भी संभव नहीं है।
भगवान् के जीवन की और कितनी ही सरस लीलाएँ मालूम पड़ती हैं। शुष्क जीवन, रूखा जीवन, नीरस जीवन कभी भी फलीभूत नहीं हो सकता। हँसने-हँसाने वाले जीवन में, हलकी-फुलकी जिंदगी में सरसता भरी रहती है ओर वह आप ही खिलती हुई चली जाती है। हँसी-खुशी की जिंदगी अगर आपकी है तो आप हँसोगे, खिलखिलाएँगे, गाना गाएँगे और नहीं तो मुँह फुलाये बैठे रहेंगे और जिंदगी भर ये शिकायत-वा शिकायत करते रहेंगे। ये कमी है, वो कमी है- का रोना रोते रहेंगे।
मित्रो! जो आदमी हँसता हुआ, खिलखिलाता हुआ रहता है, उसके चारों ओर खुशियाँ छाई रहती हैं। हँसने-हँसाने वाले खुद भी खिलखिलाते रहते हैं और दूसरों को भी हँसाते रहते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण को देखिए-हँसने वाले भगवान् हँसाने वाले भगवान्, रास करने वाले भगवान्, नाचने वाले भगवान् बाँसुरी बजाने वाले भगवान्, साहित्यकार और कलाकार भगवान्, संगीत से प्रेम करने वाले भगवान्, अरे आप इनसे कुछ तो सीखें और अपनी सारी जिंदगी को हलका बनाकर जिएँ। सारी जिंदगी हर समय मुँह फुलाकर रहने से जिंदगी नहीं नहीं जा सकती। इस तरह से आप खुद भी नाखुश रहेंगे और रोकर जिएँगे। शिकायतों पर जिएँगे, तो आप मर जाएँगे। जिंदगी इतनी भारी हो जाएगी कि उसे फिर से ठीक नहीं कर पाएँगे। उसके नीचे आप दब जाएँगे, कुचल जाएँगे। अगर आप लंबी उम्र तक जिंदा और स्वस्थ रहना चाहते हैं, तब आप हँसने-हँसाने की भी कला सीखें। अगर आपका हँसना आता है, तो समझिए कि जिंदगी के राज को आप समझते हैं।
साथियो! हँसी के लिए-हँसने-हँसाने के लिए ढेरों चीज हमारे पास हैं। आपके पास हर चीज नहीं है, तो आप चिड़चिड़ाते हुए, शिकायत करते हुए बहुमूल्य जीवन को यों बरबाद कर देंगे? क्या आपको निखिल आकाश हँसता हुआ दिखाई नहीं देता। अगर आप कवि हृदय हैं, सरस हृदय हैं, तो आपको सब कुछ हँसता हुआ दिखाई पड़ सकता है। आकाश में बादल आते हैं, घुमड़ते हुए-बरसते हुए दिखाई पड़ते हैं, क्या आप इनका आनंद नहीं ले सकते? नदियाँ कल-कल करती हुई बहती हैं, क्या आप इनका आनंद नहीं ले सकते? आपको इनका आनंद लेना चाहिए और आप का कलाकार होना चाहिए। जिंदगी जीने की कला का आपको समझना चाहिए। जिंदगी में आनंद के अनुभव होने चाहिए। जीवन में हँसने का समय होना चाहिए, हँसाने का समय होना चाहिए।
भगवान् का हम कलाकार कहते हैं। श्रीकृष्ण भगवान् ने रासलीला के माध्यम से हल्की-फुलकी जिंदगी, हँसने-हँसाने वाली जिंदगी की कला सिखाई। रासलीला गाने की विद्या है, नृत्य की विद्या है। नहीं साहब! श्रीकृष्ण भगवान् ने तो हँसने-हँसाने की विद्या बहुत छोटेपन में सीखी थी, हम तो उम्र में बड़े हो गए हैं। नहीं बेटे, बड़ी उम्र के हों तो क्या, योगी हों तो क्या, तपस्वी हों तो क्या, ज्ञानी हों तो क्या, महात्मा हों तो क्या? हँसना आपको भी आना चाहिए, हँसाना आपको भी आना चाहिए। गाँधी जी के नजदीक मुझे बहुत दिन रहने का मौका मिला। शुरू में वे जिस कोठी में रहते थे, उससे मैं दूर रहता था, तो मुझे बार-बार उनके हँसने की आवाज आती थी। उन दासता के दिनों वे इतने गंभीर विषयों पर बातें करते थे जैसे कि जाड़े की समस्या, वेश्याओं की समस्या, अन्याय सामाजिक समस्या, करोड़ों लोगों के भाग्य निर्माण की समस्या- इतनी समस्याओं के बीच भी मैंने उनको हँसते हुए देखा। हमारे-आपके पास तो यह भी समस्या है- बेटे की और पैसे की। देश, समाज और संस्कृति को तो आप जानते भी हैं कि उनके प्रति भी आपका कुछ उत्तरदायित्व है। लेकिन मैंने गाँधी जी को इन तमाम समस्याओं के बाद भी हँसते हुए देखा है। एक बार उनसे पूछा कि बापू एक बात तो बताइए कि आप इतने गंभीर रहते हैं, इतनी चिंताओं से घिरे रहते हैं, इतने गंभीर विषय आपके पास हैं। इतनी असफलताएँ आपके पास आती हैं, इतनी समस्याओं का समाधान सुझाते हैं, पर इस कदर आप हँसते कैसे हैं?
गाँधी जी ने कहा- “मैं इसीलिए एक सही जिंदगी जी पा रहा हूँ। मेरे जिंदा रहने का और कोई तरीका नहीं। अगर मैं खुश नहीं तो मेरी मौत, मेरी हँसी नहीं तो मेरी मौत समझो। मित्रों! जिसके चेहरे पर हँसी नहीं आती है, उसे बस मेरा ही समझो। श्रीकृष्ण भगवान् ने वह कला सिखाई, जिसका हम जिंदगी का प्राण कह सकते हैं, जीवन कह सकते हैं। ‘रास’ इसी का नाम है। नहीं साहब, इसमें तो बहुत रंगदारी है? नहीं बेटे, इसमें स्वाभाविकता है, शालीनता है। आप महाभारत पढ़ लीजिए, भागवत् पढ़ लीजिए, जिस समय तक उन्होंने रासलीला की है, तब उनकी उम्र दस साल की थी। दसवें साल तक सब रासलीला बंद हो गयी थी। सात साल की उम्र से प्रारंभ हुई थी और दस साल की उम्र में सब रासलीला खत्म हो गई थी। दस साल से ज्यादा में कोई रासलीला नहीं खेली गई। उसमें कामुकता नहीं थी, ब्याह-शादी की कोई बात नहीं थी।
तब उसमें क्या बात थी? उसमें था हर्षमय-आनंदमय जीवन, उसमें कन्हैया ने चाहा कि छोटे-छोटे बच्चे हों, साथ-साथ घुल-मिल कर हँसे-खेलें स्त्री-पुरुष के बीच शालीनता का क्या फर्क होना चाहिए, शील ओर आचरण का क्या फर्क होना चाहिए, यह जाने। अगर एक दूसरे को अलग कर देंगे, काट देंगे, तो फिर आर किस तरह से जिएँगे। माँ-बेटे साथ-साथ नहीं रहेंगे, तो किसके साथ नहीं रहेंगे? बाप-बेटी भाई-बहन साथ-साथ नहीं रहेंगी। बेटी बाप की गोदी में नहीं जाएगी, क्योंकि वह स्त्री है और ये पुरुष है। दोनों को अलग कीजिए, छूने मत दीजिए। औरत को इस कोने में बैठाइए और मर्द को उस कोने में बैठाइए। अरे भाई, ये कहाँ का न्याय है? स्त्री और पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर काम करें, गाड़ी के दो पहियों के तरीके से काम करें, तो ही जीवन में आनंद है। प्रगति है। आज भी हमारे यहाँ रिवाज है कि मर्द औरत को नहीं देखने पाए और औरत मर्द को। वह घूँघट मारकर घर में रहे और पुरुष बाहर रहे। साथ-साथ नहीं चल पाएँ। ये भी कोई बात है।
मित्रो! श्रीकृष्ण भगवान् ने उस जमाने में लड़के-लड़कियों की एक सेना पैदा कर और उसे एक दिशा दी। उन्होंने कहा कि लड़के और लड़कियों में अंतर करने से क्या होगा। हम और आप सब बच्चे हैं। स्त्री और पुरुष में क्या फर्क हो है? स्त्रियों को मूँछें नहीं आती और मर्द को मूँछें आती हैं? मूँछ आने से क्या फर्क हो गया? स्त्रियाँ मूँछें लगा ले तब? तब फिर वे मर्द हो जाएँगी और पुरुष मूँछ हटा लें तो वे औरत हो जाएँगे। अरे महाराज जी ये क्या कहते हैं? हाँ बेटा, यही फर्क है। उस जमाने का पुरुषवादी समाज, परस्त्रीगामी समाज, जिसमें पाप और अनाचार का बंधन नहीं लगाया गया था, केवल स्त्री-पुरुष को अलग रखने की व्यवस्था की गई थी। जहाँ शील आँखों में रहता है, उस पर ध्यान नहीं दिया गया था, केवल शारीरिक बंधन से शील की रक्षा करने की कोशिश की गई थी, श्रीकृष्ण भगवान् ने उसे तोड़ने की कोशिश की।
भगवान् श्रीकृष्ण का जीवन सिद्धांतों का जीवन था, आदर्शों का जीवन था। उनकी सारी लीलाएँ सिद्धांतों और आदर्शों को प्रख्यात करने वाले जीवन से ओत−प्रोत थीं। भगवान् राम की लीलाएँ इसके आगे चली जाती हैं। उनके जीवन में एक कमी रह गई थी। क्या कमी रह गई थी? लोगों के साथ शराफत करने का वास्ता, जो उन्होंने पढ़ा था। उनके पिताजी बड़े शरीफ थे। उन्होंने आज्ञा दी कि आपको वनवास चले जाना चाहिए। रामचंद्र जी ने कहा- ठीक है ऐसे धर्मपरायण शालीन पिता यदि आज्ञा देते हैं और हमको वनवास जाने का मौका मिलता है, तो हमें चले जाना चाहिए। भरत जैसा भाई यदि राजपाट सँभाल लेता है, तो वह और अच्छी तरह से चलेगा। उसमें कोई कमी नहीं आने वाली है। प्रेमभाव भी बना रहेगा, मुझे शान्ति मिलेगी। अतः मैं वनवास चला जाता हूँ, तो हर्ज की क्या बात है। इस सिद्धांत को लेकर उन्होंने राजगद्दी भरत के हवाले कर दी और बाप का कहना मान लिया।
मित्रो! बात चल रही थी श्रीकृष्ण भगवान की। कृष्ण भगवान् का रास्ता दूसरा था। रामावतार में जो अभाव रह गया था, जो कमी रह गई थी, जो अपूर्णता रह गई थी, वह उन्होंने पूरी की। इस बात से फायदा यह हुआ यदि शरीफों से वास्ता न पड़े तब, खराब क्या करना चाहिए? खराब लोगों से वास्ता न पड़े तब, खराब भाई हो तब, खराब मामा हो तब, खराब रिश्तेदार हों तब, क्या करना चाहिए? तब के लिए श्रीकृष्ण भगवान् ने नया रास्ता खोला। इसमें विकल्प हैं। इसमें शरीफों के साथ शराफत से पेश आइए। जहाँ पर न्याय की बात कही जा रही है, उचित बात कही जा रही है, इनसाफ की बात कही जा रही है, वहाँ पर आप समता रखिए और उनको मानिए और आप नुकसान उठाइए। लेकिन अगर आपको गलत बात कही जा रही है, सिद्धांतों की विरोधी बात कही जा रही है, तो आप इनकार कीजिए और उससे लड़िए और यदि जरूरत पड़े, तो उनका मुकाबला कीजिए और मारिए।
कंस श्रीकृष्ण भगवान् के रिश्ते में मामा लगता था। लेकिन वह अत्याचारी और आततायी था, अतः उन्होंने यह नहीं देखा कि रिश्ते में कंस हमारा कौन होता हैं। उन्होंने न केवल स्वयं ऐसा किया वरन् अर्जुन से भी कहा कि रिश्तेदार वो हैं, जो सही रास्ते पर चलते हैं। सही रास्ते पर चलने वालों सम्मान करना चाहिए, उनकी आज्ञा माननी चाहिए, उनका कहना मानना चाहिए। उनके साथ-साथ चलना चाहिए। लेकिन अगर हमको कोई गलत बात सिखाई जाती है, तो उसे मानने से इनकार कर देना चाहिए। ये परंपरा कितने युगों से चली आ रही है कि पिता का कहना मानना चाहिए। लेकिन अगर कोई गलत बात मानने के लिए कही जाती है तब? तब पिता का कहना प्रधान नहीं है। तब कहना चाहिए कि मैं गलत बात नहीं मानूँगा। गलत बात कहता है और पिता बनता है। गलत बात कहने वाला व्यक्ति पिता नहीं हो सकता। नहीं बेटे, हम तो तेरे पिताजी हैं और तेरे दहेज में पच्चीस हजार रुपये लेंगे। देख तुझे मेरी आज्ञा माननी होगी। देख श्रवणकुमार ने अपने पिता की आज्ञा मानी थी श्रवणकुमार ने जिनकी आज्ञा मानी थी, वो ऋषि थे। भीष्म पितामह ने जिनकी आज्ञा मानी थी, वे शाँतनु थे और राम ने जिनकी आज्ञा मानी थी, वो दशरथ थे। तू तो काम करता है चाँडाल के, बात करता है कसाई और हुक्म देता है। हमसे बात मनवायेगा। हम नहीं मानेंगे, चला है बाप बनने।
मित्रो! कृष्ण भगवान् की दिशाएँ और शिक्षाएँ यही थी कि कोई हमारा रिश्तेदार नहीं है। हमारा रिश्तेदार सिर्फ एक है और उसका नाम है-धर्म हमारा रिश्तेदार एक है और उसकी नाम है- कर्तृत्व। आप ठीक उसी रास्ते पर चलते हैं, तो हम आपके साथ हैं और आपके हिमायती हैं। बाप के साथ हैं, रिश्तेदार के साथ हैं। अगर आप गलत रास्ते पर चलते हैं, तो आप रिश्ते में हमारे कोई नहीं होते। हम आपकी बात को नहीं मानेंगे और आपको उजाड़कर रख देंगे।
मित्रो! ये हैं श्रीकृष्ण भगवान् के जीवन की गाथाएँ, जो राम के जीवन की विरोधी नहीं हैं, वरन् पूरक हैं। राम के अवतार में जो कमी रह गई थी, उसे कृष्ण अवतार में पूरा किया। राम का वास्ता अच्छे आदमियों से ही पड़ता रहा। अच्छे संबंधी मिलते रहे। उन्हें सुमंत मिले तो अच्छे, कौशल्या मिलीं तो अच्छी, लक्ष्मण मिले तो अच्छे। उन्हें सब शरीफ ही मिलते गए। अगर शरीफ आदमी न मिलते तो क्या करते? तब श्रीकृष्ण ने जो लीला दिखाई, वही वे करते। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि तू लड़ चाहे तेरे गुरु हों या कोई भी क्यों न हों। गुरु हैं, तो क्या हुआ? भाई हैं, तो क्या हुआ? मामा हैं तो क्या हुआ? कोई भी क्यों न हों, जब गलत काम करते हैं तो हमारे कोई नहीं सब विरोधी हैं। भगवान् ने यह शिक्षण अपने विरोधी मामा से लोहा लेकर के दिया।
भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी सारी जिंदगी बादलों के तरीके से जी। उन्होंने कहा- हमारा कोई गाँव नहीं है। सारा गाँव हमारा है। जहाँ कहीं भी हमारी जरूरत होगी, हम वहाँ पर जाएँगे। वे कहाँ पैदा हुए? वे मथुरा में पैदा हुए, फिर गोकुल में बसे, वहाँ गाय चराई। उज्जैन में पढ़ाई-लिखाई की। दिल्ली में कुरुक्षेत्र में लड़ाई-झगड़े में भाग लिया और फिर न जाने कहाँ-कहाँ मारे-मारे फिरते रहे। आखिर में कहाँ चले गए? आखिर में द्वारिका चले गए। आपके ऊपर तो होम सिकनेस हावी हो गई है, जो घर से आपको निकलने नहीं देती। अरे साहब! घर से बाहर कैसे निकलें, हमें तो घरवालों की याद आती है, हमारा पोता याद करता होगा, पोती याद करती होगी। हम अपने घर से बाहर नहीं जाएँगे, गाँव में ही हवन कर लेंगे। सौ कुण्डीय यज्ञ तो हमारे गाँव में ही होगा। मंदिर बनेगा तो हमारे गाँव में ही बनेगा। अस्पताल बनेगा तो हमारे गाँव में बनेगा। गाँव-गाँव रट लगाता रहता है। श्रीकृष्ण भगवान् ने इस मान्यता को समाप्त किया और कहा कि सारे गाँव हमारे हैं। हर जगह हमारी जन्मभूमि है। वे दो बार मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, हिमांचल प्रदेश चले गए, दिल्ली गए। वे सब प्रदेशों में गए बादलों के तरीके से।
मित्रो! सिस्टर निवेदित, एनीबेसेंट कहाँ पैदा हुई? योरोप में पैदा हुई। उन्होंने देखा कि हिंदुस्तान में महिलाओं की स्थिति गिरी हुई है। महिलाओं की जो ऊँची स्थिति योरोप में है, वही हमको यहाँ करना है। यहाँ क्या करेंगे? जहाँ हमारी जरूरत होगी, वहाँ चले जाएँगे। सिस्टर निवेदित हिंदुस्तान आ गई, एनीबेसेंट हिंदुस्तान में आ गई, उनके यहाँ कुछ कमी नहीं थी, लेकिन हिंदुस्तान में उन्होंने अपनी-अपनी जिंदगियाँ खत्म कर दी। हिंदुस्तान की मिट्टी में उनकी हस्ती तबाह हो गई। इसी तरह गाँधी जी पोरबंदर में पैदा हुए और कहाँ चले गए? साबरमती चले गए। जब तक स्वराज नहीं मिला, आजादी नहीं मिली वे दर-दर भटकते फिरे, गाँव-गाँव घूमते फिरे। महापुरुषों की कोई जन्मभूमि नहीं होती, कोई गाँव नहीं होता, वरन् सारा संसार ही उनका अपना घर होता है- शेष अगले अंक में
प्रतिभाओं को आमंत्रण
परमपूज्य गुरुदेव रचित वाङ्मय के 70 खंडों के प्रकाशन के बाद शेष 38 खंडों का संपादन-प्रकाशन होना है, साथ ही सभी 107 ग्रंथों का गुजराती तथा अंग्रेजी संस्करण प्रकाशित किया जाना है। इस मिशन के साहित्य संपादन में जिन परिजनों की अभिरुचि हो तथा योग्यता प्राचार्य, प्रोफेसर, व्याख्याता स्तर की हो एवं समर्पण भाव से निम्न क्षेत्रों में से किसी में लगभग एक-दो वर्ष तक का समयदान दे सकते हों, कृपया संपर्क करें।
(क) अंग्रेजी अनुवाद
अन्य विवरण के साथ हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद का अनुभव, प्रूफ रीडिंग अनुभव एवं अगस्त मास की अखण्ड ज्योति पत्रिका पृष्ठ क्रमांक 55,56,57 का अनुवाद भी संलग्न करें।
(ख) गुजराती अनुवाद
अन्य विवरण के साथ हिंदी से गुजराती अनुवाद का अनुभव, प्रूफ रीडिंग अनुभव एवं अगस्त मास की अखण्ड ज्योति पत्रिका पृष्ठ क्रमांक 55,56,57 का अनुवाद भी संलग्न करें।
वाँछित अन्य विवरण- नाम, पता, फोन नं, आयु, पारिवारिक उत्तरदायित्व, योग्यता, स्वास्थ्य, पता/व्यवसाय, कार्य-अनुभव समयदान की अवधि, गायत्री परिवार से जुड़ने का वर्ष।
संपर्क सूत्र अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
आन्ध्र प्राँत बना तो उसके मुख्यमंत्री टी. प्रकाशन बनाए गए। तब वे 84 वर्ष के थे। टी. प्रकाशन ने गरीबी के दिन देखे थे। पिता की मृत्यु पहले ही हो गयी थी। उनकी माता एक छोटा होटल चलाकर परिवार का पालन करती। टी. प्रकाशन ने अपनी माँ के स्वावलंबन प्रधान जीवन से ही शिक्षा ली, पुरुषार्थ से वकालत पास की और इंग्लैंड जाकर बैरिस्टर बनकर आए। अपनी आजीविका का एक बड़ा भाग वे पिछड़ लोगों की सहायता में लगाते रहे।
स्वतंत्रता आंदोलन में उन्होंने अग्रिम पंक्ति में भाग लिया। दैनिक ‘स्वराज्य’ सफलतापूर्वक चलाया। जेल जाते रही और अनेकों में इसके लिए प्राण फूँकते रहे। उनके महामानव बनने के मूल में थे-माँ द्वारा बाल्यकाल में डाले गए संस्कार।”
(गीता के द्वितीय अध्याय के ‘स्थितप्रज्ञ’ की युगानुकूल विवेचना)
विगत अंक में श्रीमद्भगवद्गीता के सांख्ययोग (द्वितीय अध्याय) की युगानुकूल विवेचनाएँ के अंतर्गत परिजनों ने ‘ स्थितप्रज्ञ के विषय में कुछ प्रारंभिक विवेचना पढ़ी। बताया गया कि योगेश्वर कृष्ण बड़े मार्मिक ढंग से एक गंभीर विषय को अपने शिष्य अर्जुन को समझाने का प्रयास कर रहें हैं। वे कहते हैं कि जो आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल वह पुरुष स्थितप्रज्ञ कहलाता है। (आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्टदोच्यते- श्लोक 55 का उत्तरार्द्ध)। जो अपनी समस्त कामनाओं को त्याग दे- बुद्धि की अस्थिरता पर नियमन कर स्वयं को परमात्म चेतना में अधिष्ठित कर रहे, वही स्थितप्रज्ञ है। श्लोक 55 से श्लोक 59 तक के पाँच श्लोकों की ही बड़ी विशद व्याख्या स्थितप्रज्ञ के परिप्रेक्ष्य में विगत अंक में की गई थी। उदाहरण कछुए को देकर भगवान् अपने शिष्य को समझाते हैं कि मनुष्य सभी इन्द्रियों के विषयों के विषयों से इंद्रियों को जब पूरी तरह हटा लेता है, जैसे कि कछुआ अपने सारे अंगों को सब ओर से समेट लेता है, तब बुद्धि स्थिर कही जाती है। इससे कम में नहीं। जब तक बाहर के इंद्रिय रस से मन को हटाकर ‘रसो वै सः ‘ वाली परमात्मसत्ता में स्थिर नहीं किया जाता, तब तक व्यक्ति की बुद्धि स्थिर नहीं है- वह प्रज्ञावान नहीं है। प्रज्ञा जिसकी प्रतिष्ठित हो वही तो स्थितप्रज्ञ है। इसी प्रसंग को इस अंक में आगे दूसरे अध्याय के 59 वें श्लोक की संक्षिप्त व्याख्या से आगे चलते हुए पढ़ें।
भगवान् श्रीकृष्ण गीता के दूसरे अध्याय में अर्जुन की जिज्ञासा (श्लोक 54) के उत्तर में उसे कहते हैं-
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥ (2/59)
अर्थात् इंद्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उसमें रहने वाले आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है।
यह व्याख्या बड़ी ही महत्वपूर्ण है। हमें विषयों के प्रति आसक्ति को अंदर से बड़ी कठोरता के साथ निकालना होगा। काया से कोई भी कड़ा तप किया जा सकता है, पर यदि मन उन विषयों में आसक्त है, तो वह तप भी निरर्थक है। हम अपना नियंत्रण इंद्रियों पर करें। इसके लिए हमें इस प्रक्रिया को बड़े गहरे तक ले जाना होगा- मन-बुद्धि-चित्त से भी गहरे अहं के शुद्ध भाव तक जहाँ परमात्म चेतना का निवास है। ऐसा हो जाए, तो फिर मन अश्लील चिंतन में न लिप्त हो उस दृश्य के वास्तविक सौंदर्य की ओर जाएगा, जो परमात्मा का स्वरूप है। तब शारीरिक के साथ मानसिक संयम भी साधता चला जाएगा। भगवान् कहते हैं कि स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्म चेतना का साक्षात्कार कर पूर्णतः निकल जाती है- वह उससे निवृत्ति पा लेता है।
यदि आसक्ति नष्ट न हो तो क्या होगा? भगवान् कहते हैं कि यह आसक्ति ही ‘ एडीक्शन ‘ है। यह आसक्ति बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात् हर लेती है, क्योंकि ये इंद्रियाँ प्रथम स्वभाव वाली होती हैं, इसी आशय का श्लोक है।
स्तते हृपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ठंद्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥ (2/60)
जहाँ आत्मसंयम नहीं है, वहाँ किसी भी सद्गुण के विकास की - व्यक्ति के परिष्कार की तनिक भी संभावना नहीं है। असंयमी व्यक्ति को न किसी प्रकार की शिक्षा रुचिकर लगती है और न वह अपना साँस्कृतिक विकास चाहता है। विषयों के पीछे भाग रहा कामी मन अपने प्रबल पुरुषार्थ द्वारा निर्मित देवमंदिर (यह मानवी काया) को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है। बुद्धिमान् प्रतीत होने वाला व्यक्ति भी विषयों के उन्मादकारी आकर्षणों से मोहित होकर मूर्खतापूर्ण कार्य करने लगता है। फिर कम योग्यता या बुद्धि वाले व्यक्ति का तो कहना ही क्या?
सुँद-उपसुँद के कथानक, समुद्रमन्थन बाद भगवान विष्णु द्वारा कामी असुरों से अमृत की रक्षा के प्रसंग तथा भस्मासुर के आत्मघात से क्या हमें नहीं ज्ञात होता कि इंद्रियाँ कितने प्रबल वेग से मन को बलात् भ्रमित कर उसे नष्ट कर डालती है। किसी भी मंच से यह उपदेश माइक पर देना आसान है कि “ हमें अपनी इंद्रियों को वश में करना चाहिए”- “हे मानव तू संयमी बन!” परंतु वह विधि जो जीवन में उतर सके- जीवन कला का एक अंग बन व्यक्ति को यह योग सुगमता से साधना सिखा सके- मात्र गीता प्रबंध के इस स्थितप्रज्ञ प्रकरण में ही आई है। विनोबा ने अपनी पुस्तक स्थितप्रज्ञ-दर्शन में लिखा है कि गीता के इसी श्लोक (क्रमांक 60) के भावार्थ को एक श्लोक मनु ने भी लिखा है। मनु कहते हैं-
मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत्। बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वाँरमति कर्षति॥
अर्थात्- “ मनुष्य को चाहिए कि वह माता, बहन और अपनी लड़की के विषय में भी सावधान रहे, क्योंकि इंद्रियाँ बलवान् होती हैं और मौका पड़ने पर विद्वान को भी खींच ले जाती हैं।” मनु का यह विवेचन एक सामाजिक मर्यादा के अंतर्गत साधारण मनुष्य के लिए है, तो गीता का विवेचन आध्यात्मिक दृष्टि से एक पूर्ण पुरुष के लिए किया गया है। फिर भी यह आशय स्पष्ट है कि मनुष्य को अपने जरूरत से ज्यादा विश्वास नहीं रखना चाहिए। गीता कहती है कि एक साधक स्तर का व्यक्ति संभव है कि इंद्रियों को विषयों से हटा लें, पर वे मन पर हमला न कर दें, इसलिए उसे सूक्ष्म इंद्रियनिग्रह में निष्णात होना चाहिए। यह विनोबा का मत है।
आगे इकसठवें श्लोक में भगवान् कहते हैं-
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः। वशे हि यस्सेन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ (2/61)
अर्थात्- “इसीलिए हर साधक के लिए अभीष्ट है कि वह इन संपूर्ण इंद्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठें। क्योंकि जिन पुरुष की इंद्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है।”
योगेश्वर के अनुसार, एक ही समाधान है- एक ही तरीका है- अपनी संकल्पशक्ति से मन को बहिर्मुखी से अंतर्मुखी कर परमात्म चेतना में प्रतिष्ठित करें- इसके लिए ध्यान का आश्रय लें। भगवान कहते हैं- “ तानि सर्वाणि संयम्य “ अर्थात् उन सभी इन्द्रिय वासनाओं को संयम में कर स्थिर बुद्धि होकर मेरे ही पारायण हो जाओ। इसके अलावा और कोई विकल्प है नहीं। परमपूज्य गुरुदेव भी यही लिखते रहे हैं कि हम स्वयं को परमात्मचेतना-सविता देवता के पापनाशक भर्ग-तेज में अधिष्ठित करना सीखें। गायत्री का सतोगुणी ध्यान, जिसमें अंग-प्रत्यंग में देवी के सौंदर्य का ध्यान कर मातृभाव से उसके शक्ति स्रोत होने व उससे आत्मबल के सतत् संवर्द्धन की ‘जप के साथ ध्यान’ वाली प्रक्रिया में प्रार्थना की जाती है। भगवान् बार-बार यह कह रहे हैं - युक्त आसीत मत्परः” “ मन्मनाभव मद्भक्तों” - ऐसे निर्देश देते रहे हैं। मन को किसी रचनात्मक-उच्च लक्ष्य के साथ यदि जोड़ दिया जाए और प्रबल इच्छाशक्ति के साथ यह कार्य किया जाए, तो इन ‘ प्रमथन स्वभाव वाली’ इंद्रियों पर काबू पाया जा सकता है।
ऐसा जरूरी क्यों है? इसलिए कि निरंतर विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की इन विषयों में आसक्ति हो जाती है। “ ध्यायतो विषयान् पुँसः सड्डस्तेषूपजायते” (2/62 का पूर्वार्द्ध)। विचार विज्ञान के मर्मज्ञ हैं श्रीकृष्ण। इसीलिए वे एक मनोवैज्ञानिक तथ्य सामने रखते हैं कि विचारों का यह स्वभाव है कि वे अपने उद्गम स्थल की और बारंबार जाते हैं। मन से सजातीय विचारों का मानो निर्झर फूट पड़ता है। यदि यह सकारात्मक है, श्रेष्ठ विचारों का हैं तो ठीक हैं, किन्तु यदि यह निकृष्ट-निषेधात्मक-वासनात्मक विचारों का प्रवाह है, तो निश्चित ही विषयी पुरुष को वैसे ही विचारों के पुँज से घेर देगी। वैज्ञानिक भी ‘ आयडियोस्फियर’ की इस परिकल्पना को पूर्णतः विज्ञानसम्मत मानते हैं। ऋषिगण भी इसीलिए कहते आए हैं “आनाभद्रा क्रतवन्तो विश्वतः” संसार के विषयों के प्रति आसक्ति हमारे निरंतर विषय-चिंतन का ही परिणाम है। ज्यों-ज्यों यह बुद्धि को प्राप्त होती है, त्यों ही यह अपने प्रवाह के वेग में रागयुक्त पदार्थ की प्राप्ति हेतु भावना को उत्पन्न कर देती है। यह बात श्लोक के उत्तरार्द्ध में स्पष्ट है-
“सड्डात्संजायते कामः कामात्क्राधोऽभिजायते” (2/62) अर्थात् “
आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।”
भगवान् बारंबार स्पष्ट कह रहे हैं कि स्थितप्रज्ञ को पहचाने-जानने से पूर्व यह जान लेना अनिवार्य है कि ऐसी कौन-कौन सी बाधाएँ है, जो इस मार्ग में आती हैं।”जहाँ कामेच्छारूपी विचारों में सड़ाँध पैदा होती है वहाँ क्रोध रूपी दुर्गन्ध जन्म लेती है।” ( स्वामी चिन्मयानंद-मानवनिर्माण कला में)
ऐसा पुरुष इस तरह से अनेकानेक तरह से जाल में उलझकर विनाश को प्राप्त होता है। कामना और कामनापूर्ति के बीच जो एक भारी ‘गैप’ है, इसे यदि सत्संग द्वारा-सच्चिन्तन द्वारा भरा जा सके, तो ऐसी दुर्गति नहीं होगी। मन-ही-मन कुढ़ना, प्रकट में क्रोध करना, भयंकर गुस्से में आ जाना, ये सब बाधाएँ हैं स्थितप्रज्ञ के मार्ग की। ‘स्ट्रेस’ व मनोविकार इस कामना को दबाने से ही पैदा होते हैं। यदि हम कामना को भावना में रूपांतरित कर दें- दबाकर क्रोध में न बदलें, तो हम ‘स्ट्रेस’ तनाव से भी बच सकते हैं। अपनी ऊर्जा को नियोजित करता है। क्रोध व मन्यु में अन्तर है। यहाँ भगवान् कुढ़ने-कामना को दबाने से पैदा हुए क्रोध के जन्म लेने की प्रक्रिया की व्याख्या कर रहे हैं व कह रहे हैं कि यह क्रोध बड़ा ही विनाशकारी है। अगला श्लोक यही कहता है।
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्समृतिभ्रिमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणष्यति॥ (2-63
अर्थात्- “क्रोध से अत्यंत मूढ़भाव उत्पन्न हो जाता है- मूढ़भाव से स्मृति में भ्रम तथा उससे बुद्धि अर्थात् ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश होने पर यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है।”
यहाँ यह प्रसंग वासुदेव इसलिए कह रहे हैं कि अर्जुन की बुद्धि मोह में फँसी है व वे उसे उबारने के लिए प्रयासरत हैं। बुद्धिनाश कैसा होता है, इसकी याद भी वे परोक्षतः दिला रहे हैं- दुर्योधन के “जानामि धर्मं न च में प्रवृत्ति” वाली स्वीकारोक्ति से जहाँ उसने गुरुओं से भी- भीष्म पितामह से भी क्रोध भरे वचन कहकर अपने विनाश को स्वयं आमंत्रित किया है। वे कहते हैं कि क्रोध से मूढ़ता पैदा होती है। आदमी क्रोध से विद्वान नहीं कहलाता। कइयों को यही गलतफहमी है, जो क्रोध करे, अपने अधीनस्थों पर-धर्मपत्नी पर-बच्चों पर गुस्सा करे, उसी को रौब रहता है। बात यह नहीं हैं। क्रोध तो विनाश का मूल है। रास्ते में मूढ़ता के बाद स्मृतिनाश आता है। कि बात की स्मृति, इसकी कि हम ईश्वर के राजकुमार हैं। मानवी गरिमा के अनुरूप जीवन जीने आए हैं। हम यह भूल जाते जाते हैं कि हम भगवान् के युवराज हैं- उत्तराधिकारी हैं- वरिष्ठ हैं। हम यही भूल जाने के कारण नरपिशाच-नरपशु जैसा आचरण करने लगते हैं। स्मृतिनाश से हमारी ज्ञान शक्ति नष्ट हो जाती है एवं यह स्थिति आते ही आदमी गिरने लगता है। रावण को उदाहरण भली-भाँति इस परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है कि वह किस तरह अपनी कामनाओं में विघ्न पड़ने से क्रमशः पतन को प्राप्त होता चला गया, जबकि विद्वान था, पराक्रमी सिद्धपुरुष था, शंकर भगवान का वरदान प्राप्त तपस्वी था। बुद्धि के नाश से गिरने की प्रक्रिया को रोकना-मनुष्य को संभालकर ऊँचा उठना सिखाना ही अध्यात्म है। परमपूज्य गुरुदेव कहते थे कि गिरना सरल है। उठना कठिन है - इसलिए उन्होंने अध्यात्म को ‘जिंदगी का शीर्षासन ‘ कहा। जो इस शीर्षासन को सीख लेगा उसकी जिंदगी बन जाएगी। जीवन जीने की कला उसे आ जाएगी तथा वह अपने ऊपर अंकुश रखकर आसक्ति से दूर हटकर त्याग भरा जीवन जीना सीख लेगा। यही तो मानवनिर्माण कला है।
आद्य शंकराचार्य ने विवेक चूड़ामणि में कहा है कि साधक का पतन ऐसे होता है जैसे गेंद टप्पे खा-खाकर गिरती है। वह भी एक-एक सीढ़ी गिरता चला जाता है। बुद्धिनाश तब बचे जब यह स्मृति हो कि हम किसलिए इस धरती पर आए थे। धरती का श्रृंगार बढ़ाने-विश्वमानव की सेवा हेतु न कि इसे नष्ट करने-मानवमात्र को पीड़ा पहुँचाने। हम सभी यह स्मृति रखें कि हम सौभाग्यशाली है कि हम अनेक जन्मों से जुड़ें परमपूज्य गुरुदेव के शिष्य हैं। न जाने कितनी बार उनके विराट् अभियान में हम उनके भागीदार रहे हैं। देवसत्ताओं की तरह हमारी भूमिका रही है। कही हम उसे भूलकर ऐसे क्रिया–कलापों में तो नहीं लग रहे है, जिससे हम उत्थान के बदले विनाश को प्राप्त हों। इसीलिए बारंबार यह चिंतन आत्मावलोकन-अपने बारे में आपको ही स्मृति दिलाना बहुत जरूरी है।
मनुष्य की महानता उसकी विवेक शक्ति में ही है। उसके विकास का और पशुओं से उसकी श्रेष्ठता का मुख्य कारण उसकी विवेक शक्ति अर्थात् बुद्धि है, वह भी ऋतम्भरा स्तर की। जब यह कार्य करना बंद कर दे, तो उसका सर्वनाश सुनिश्चित है, यह मानना चाहिए। आसक्ति से कामना, कामना पूर्ति में बाधा आने पर क्रोध-क्रोध से मोह स्मृतिलोप एवं अंततः विवेकशक्ति का नाश, यह पूरा चक्र है। इसीलिए गीताकार बारंबार आत्मसंयम की महिमा बताता है।
यदि मनुष्य अपना अंतःकरण अपने अधीन कर ले (आत्मवश्यैर्विधेयात्मा)। अपनी विवेक-बुद्धि से काम लेकर आसक्ति से दूर रह कर्म करता रहे, तो उसके सभी दुःख समाप्त होते व उसकी बुद्धि परमात्मा में स्थिर हो जाती है- यह देखने के बाद विलोम भी देखें कि यदि हम अंतःकरण की प्रसन्नता चाहते हैं- दुःखों से निवृत्ति चाहते हैं, तो स्वयं को कामनाओं से - आसक्तियों पर नियंत्रण करना सिखाए। यही स्थितप्रज्ञ की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह सदैव शाँति में स्थित रहता है, कभी भी उसकी भावनाएँ कामनाओं में नहीं बदलती- इसीलिए उसे सुख की भी प्राप्त होती है। जो ऐसा नहीं होता, उसे सुख नहीं मिलता, यह भगवान् श्लोक क्रमांक 66 में समझाते हैं। अगला श्लोक उदाहरणों के साथ व्याख्या वाला है। कि मनुष्य को डुबोने के लिए इस भवसागर में पतन के गर्त में डालने के लिए कई नहीं, एक ही इंद्रिय पर्याप्त है। इस अति महत्वपूर्ण सड़सठवें श्लोक की व्याख्या युगगीता के अंतर्गत अगले अंक में
एक अनुरोध
संस्कार महोत्सवों-अश्वमेधों-विभिन्न क्षेत्रीय कार्यक्रमों में प्रकाशित स्मारिकाओं के संपादन में अपना योगदान देने वाले प्रतिभाशीलों से अनुरोध है कि वे अपने बायोडाटा- लिख लेखों की अवधि प्रतिलिपियाँ तथा संभावित समयदान की अवधि सहित विस्तृत विवरण निम्नलिखित पते पर भेजे। महापूर्णाहुति व उसके अनुयाज से संबंधित महत्वपूर्ण कार्यों के लिए प्रतिभाओं के समयदान की तुरंत आवश्यकता है॥ शान्तिकुञ्ज हरिद्वार 249411 लिफाफे पर ‘संपादन संदर्भ’ काने में अंकित कर दें
संपादक
( दिसंबर 1950 की अखण्ड ज्योति में प्रकाशित अग्रलेख)
गायत्री मंत्र सर्वोपरि मंत्र है। इससे बड़ा और कोई मंत्र नहीं है। जो काम संसार के किसी अन्य मंत्र से नहीं हो सकता, वह निश्चित रूप से गायत्री द्वारा हो सकता है। दक्षिणमार्गी योग-साधक वेदोक्त पद्धति से जिन-जिन कार्यों के लिए अन्य मंत्र सफलता प्राप्त करते हैं, वे सभी प्रयोजन गायत्री से पूरे हो सकते हैं। इसी प्रकार वाममार्गी तांत्रिक जो कार्य तंत्रप्रणाली से किसी अन्य मंत्र के आधार पर करते हैं वे सभी गायत्री मंत्र द्वारा किये जा सकते हैं। यह एक प्रचंड शक्ति है, जिस जिधर भी लगा दिया जाएँगे, उधर ही चमत्कारी सफलता प्राप्त कराएगी।
कार्यक्रमों के लिए, सकाम प्रयोजनों के लिए अनुष्ठान करना आवश्यक होता है। सवालक्ष का पूर्ण अनुष्ठान, चौबीस हजार का आँशिक अनुष्ठान अपनी-अपनी मर्यादा के अनुसार फल देते हैं। “जितना गुड़ डालो उतना मीठा” वाली कहावत इस क्षेत्र में भी चरितार्थ होती है। साधना और तपश्चर्या द्वारा जो आत्मबल संग्रह किया गया है, उसे जिस काम में भी खरच किया जाएगा, उसका प्रतिफल अवश्य मिलेगा। बंदूक उतनी उपयोगी सिद्ध होगी, जितने बढ़िया और अधिक कारतूस होंगे। गायत्री की प्रयोगविधि एक प्रकार की आध्यात्मिक बंदूक हैं। तपश्चर्या ओर द्वारा संग्रह की गई आत्मिक शक्तियाँ कारतूस की पेटी के समान हैं। दोनों के मिलने से ही निशाने पर मार गिराया जा सकता है। कोई व्यक्ति प्रयोगविधि जानता हो, पर उसके पास साधनाबल न हो, तो ऐसा परिणाम होगा जैसा खाली बंदूक का घोड़ा बार-बार चटकाकर कोई यह आशा करे कि अचूक निशाना लगेगा। इसी प्रकार जिनके पास तपोबल तो है, पर उसका काम्य प्रयोजन के लिए विधिवत् प्रयोग करना नहीं जानते, वे वैसे हैं जैसे कोई कारतूस की पोटली बाँधे फिरे और उन्हें हाथ से फेंक-फेंककर शत्रुओं की सेना का संहार करना चाहे, यह उपहासास्पद तरीके हैं।
आत्मबल संचय करने के लिए जितनी अधिक साधनाएँ की जाएँ उतना ही अच्छा है। पाँच प्रकार के साधक गायत्री सिद्ध समझे जाते हैं।
(1) लगातार बारह वर्ष तक कम-से-कम एक माला नित्य जप किया हो।
(2) गायत्री की ब्रह्मसंध्या को लगातार नौ वर्ष तक किया हो। (3) ब्रह्मचर्य पूर्वक पाँच वर्ष तक नित्य एक हजार मंत्र जपे हों। (4) चौबीस लक्ष गायत्री का अनुष्ठान किया हो। (5) एक वर्ष गायत्री प्रधान चिंतन के साथ तप किया हो।
जो व्यक्ति इन साधनाओं में से कम-से-कम एक या एक से अधिक का तप पूरा कर चुके हों, वे गायत्री मंत्र को कार्यक्रम में प्रयोग करके सफलता प्राप्त कर सकते हैं। चौबीस हजार वाले या सवालक्ष वाले अनुष्ठानों की पूँजी जिनके पास हैं वे भी अपनी-अपनी पूँजी के अनुसार एक सीमा तक सफल हो सकते हैं। कुछ खास प्रयोजनों के लिए गायत्री साधना के प्रयोग की विधियाँ इस प्रकार हैं-
रोगनिवारण
रोगी होने पर जिस स्थिति में भी हों, गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए। एक मंत्र समाप्त होने व दूसरा आरंभ होने के बीच मंत्र सरदी प्रधान रोगों में ‘ऐं’ गरमी प्रधान रोगों में -’एं’ तथा वात प्रधान रोगों में ‘हुँ’ बीजमंत्र का प्रयोग करना चाहिए। निरोग होने के लिए वृषभवाहिनी हरितवस्त्रा गायत्री का ध्यान करना चाहिए।
विषनिवारण
गायत्री मंत्र द्वारा पीपल वृक्ष की समिधाओं से विधिवत् हवन करके उसकी भस्म को सुरक्षित रख लें। अपनी नासिका को जो स्वर चल रहा हो, उसी ओर से हाथ से उसे अभिमंत्रित करें- बीच में ‘हुँ’ बीज मंत्र का संपुट लगावें तथा रक्तवर्णी अश्वारूढ़ा गायत्री का अध्यापन कर उस भस्म को विषैले कीड़े के काटे के स्थान पर चार मिनट मसल लें। पीड़ा में जादू के समान आराम होता है। सर्प के काटे के स्थान पर रक्त चंदन से किए हवन की भस्म मलनी चाहिए एवं अभिमंत्रित कर घृत पिलाना चाहिए।
बुद्धिवृद्धि
मंदबुद्धि, स्मरणशक्ति की कमी वाले लोग सूर्योदय के समय प्रथम किरणों को पानी से भीगे हुए मस्तक पर पड़ने दें। पूर्वाभिमुख हों, अधखुले नेत्रों से सूर्य को दर्शन करते हुए आरंभ में तीन बार ॐ का उच्चारण कर फिर गायत्री की एक माला नित्य जपें। बाद में दोनों हाथों का हथेली भाग सूर्य की ओर कर बारह मंत्र जप कर हथेलियों को रगड़ें व उन उष्ण हाथों को मुख, नाक, ग्रीवा, कर्ण, मस्तक सभी प्रकार फिराएँ।
इस प्रकार से राजकीय कार्यों में सफलता, दरिद्रता नाश, सुसंतति की प्राप्ति, शत्रुता संहार, दूसरों को प्रभावित करना, भूतबाधा की शाँति, दुःस्वप्नों के फलों का नाश आदि अनेकानेक प्रयोजनों में गायत्री मंत्र के विविध प्रयोग अति लाभदायक हैं।
श्रद्धा अर्थात् सद्भाव, प्रज्ञा अर्थात् सद्ज्ञान एवं निष्ठा अर्थात् सत्कर्म। तीनों का समन्वित स्वरूप ही व्यक्तित्व का निर्माण करता है।
पाती जब भी आती है, एक संदेशा लेकर आती है एवं आज के युग में भी जब मात्र एस.टी.डी., आय.एस.डी. पर बात कर मनुष्य संतुष्ट हो लिया करता है- पत्रों का अपनी जगह महत्त्व है। वही पाती यदि गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के स्तर की सत्ता की हो- नवप्राणों का संचार करने वाली हो, तो उसकी प्रतीक्षा तो होगी ही। हाँ, वह पाती है, जिसने अगणित व्यक्तियों के सोए अंतःकरणों को जगाकर उसने असामान्य कार्य करा लिया है। यह वह पाती है, जिसने एक विराट् गायत्री परिवार रूपी भवन की स्थापना हेतु नींव के पत्थर विनिर्मित करने में मदद की एवं यही वह पाती है, जिसने सिद्ध कर दिया कि संवेदना की धुरी पर ही एक संगठन विनिर्मित होता है।
परमपूज्य गुरुदेव के पत्रों का वाङ्मय जब क्रमशः वर्गीकरण के साथ प्रकाशित होगा, तब परिजन उसका रसास्वादन करेंगे ही। इस स्तंभ में तो हमारा प्रयास यही रहता है कि हम उसे लीला पुरुष के अवतारों जीवनक्रम का कुछ झलकियाँ उनके द्वारा समय-समय पर लिखे गए इन पत्रों की कतिपय पंक्तियों द्वारा दे सकें। विगत अंक में भी इस स्तंभ में कुछ पत्रों का जिक्र था। उनके माध्यम से परिजन क्या प्रेरणा लें, यह चर्चा थी। यहाँ भी हम कुछ ऐसे दुर्लभ पत्रों के उद्धरण दे रहें हैं।
15/6/43 का - मिशन की शैशवावस्था का एक पत्र श्री मोहनराज भंडारी (अजमेर) के नाम लिखा हमारे पास है। एक पोस्टकार्ड पर लिखा पत्रोत्तर मोहन जी की पत्र देरी से लिखने की शिकायत पर है। पूज्यवर लिखते हैं -’तुम हमें अपने छोटे भाई की तरह प्रिय हो और तुम्हारे ऊपर हम वैसे ही सच्चे हृदय से स्नेह करते हैं। कहीं कोई दुर्भाव मन में न लाया करा। प्रेम हृदयों में होता है। पत्र व्यवहार में देर-सबेर हो तो भी तुम हमारे बिलकुल निकट हो। तुम्हारा-हमारा प्रेमभाव इतना कमजोर नहीं है कि पत्र देर-सबेर के कारण उसमें कमी आ जावे।” कितनी छूने वाली भाषा है गुरुवर की। शिकवा-शिकायत को कितनी मिठास भरी संवेदना से दूर करने का प्रयास किया है एवं यही इस संगठन रूपी वृक्ष की जड़ों की मजबूती का कारण है।
ऐसी ही एक पत्र मित्रवत आत्मीयता के साथ पूज्यवर ने 19/4/1965 को बद्रीप्रसाद पहाड़िया को शिकायत भरे उलाहने के साथ लिखा था- “कभी आप हमारे अत्यंत निकटवर्ती आत्मीयजनों में से था। हम बड़ी-बड़ी आशाएँ आप से बाँधें रहते थे और सोचते थे पहाड़िया जी किसी दिन नररत्नों में एक होंगे और इतिहास के पृष्ठों पर उज्ज्वल नक्षत्र की तरह चमकेंगे। पर आप धीरे-धीरे शिथिल होते चले गए हैं। बेशक राजनीति में आपने काम अधिक किया है, पर जिस अत्यंत अनिवार्य कार्य की आप जैसे प्रतिभाशाली लोगों से अपेक्षा की जाती है, वह तो उपेक्षित पड़े हैं।”-” बाँदा की शिथिलता आपकी शिथिलता के रूप में हम देखते हैं। जिस दिन आप जाग्रत हो जाएँगे, उसी दिन बाँदा में नई स्फूर्ति प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होगी।” प्रस्तुत पत्र किसी व्याख्या का मोहताज नहीं है। अपना अनन्य आत्मीय मानकर पूज्यवर ने लिखा, पहाड़िया जी ने उसी गंभीरता से लिया व क्रमशः पूज्यवर के कार्यों में लग, पहले गायत्री तपोभूमि मथुरा व फिर 1971 में शान्तिकुञ्ज की स्थापना के समय से ही परमवंदनीया माताजी के बाद में पूज्यवर के संगी-साथी बन वे यही रहकर समर्पित जीवन जीते रहे। बड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ संभाली एवं बाद में यहीं पर 1993 में महाप्रयाण कर अपनी आराध्य सत्ता में विलीन हो गए। उच्चस्तरीय सत्ता थी, तभी तो पूज्यवर ने उन्हें लिखा था- “ आप पूर्वजन्म में हमारी आत्मा के एक भाग था। इस जीवन में भी यहाँ के सब कार्यों को कितनी आत्मीयता के साथ पूरा करते हैं, यह देखकर आत्मा गदगद हो जाती है। आपकी यह निष्ठा आपको पूर्णता तक पहुँचाने में बड़ी सहायक होगी। (3/2/1955)” इतना गहरा अपनापन था, इसीलिए तो अधिकारवश अपने ही एक अंग को सचेत किया गया था।
पत्रों के माध्यम से हमें अपनी आराध्यसत्ता के एक अति महत्वपूर्ण बहुआयामी स्वरूप का दिग्दर्शन होता है। हर पल जिनकी श्वास समाज को समर्पित थी, प्रत्येक को लिखा हर वाक्य लोकमंगल के लिए कुछ करने की प्रेरणा हेतु ही होता था। सोए को झकझोरना-जगाना जगे को उठाकर खड़ा कर देना व चलाकर तीव्र वेग से दौड़ाना यही तो महाकाल की रीति-नीति है, जो इस युग के इस योगेश्वर-महाकाल ने भी अपनाई।
पूर्व अंक में केशर बहन के नाम से हमने एक पत्र उद्धृत किया है। उन्हीं को पूज्यवर 16/2/67 को लिए एक पत्र में लिखते हैं “हम पत्र से नहीं भावना से तुम्हारा मार्गदर्शन बराबर करते रहते हैं। हम शरीर से दूर हैं, पर आत्मा की दृष्टि से तुम्हारे सबसे अधिक निकट है। तुम स्वयं भी इस तथ्य को अनुभव करती होंगी। गाय अपने बच्चे को दूध पिलाकर जिस प्रकार पुष्ट करती है वैसे ही तुम्हारी आत्मा को विकसित करने और ऊपर उठाने के लिए हम निरंतर प्रयत्न करते रहते हैं।” यह अनन्य भाव ही उन्हें न केवल केशर बहन बल्कि कच्छ, गुजरात व सौराष्ट्र के कई परिजनों को घनिष्ठतम संबंधों में जोड़ता चला गया।
कई बार परिजनों की भावना तो बड़ी प्रबल होती है, पर प्रयास उस दिशा में गतिशील नहीं हो पाते। वे पत्र लिखते एवं परमपूज्य गुरुदेव द्वारा इतना सुंदर समाधान पाते कि न केवल समाधान पाते कि न केवल समाधान निकल जाता- अंतरतम भी पुलकित हो जाता। 18/5/55 को श्री रामदास जी को लिखा पत्र इसका साक्षी हैं पूज्यवर लिखते हैं- “आपकी आत्मा-गृहस्थ बंधनों में छटपटाती हैं, सो हमें ज्ञान हैं। यह जो प्रारब्ध संचित कर लिए हैं सो तो भुगतने ही पड़ेंगे। यह ऋण चुकाने के साथ-साथ आप मुक्ति की ओर व्यवस्थित गति से बढ़ रहे हैं। हमारा आँतरिक सहयोग आपके साथ।” न केवल वस्तुस्थिति का आभास कराया गया है- आश्वासन भी साथ है कि हम सतत् आपके साथ हैं।
14/3/1953 को परमपूज्य गुरुदेव के हाथों लिखा एक पत्र जो मात्र 9 पंक्तियों का है- बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है। वे श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट के कानूनी सलाहकार रहे व पुराने ट्रस्टी श्री शिवशंकर जी को लिखते हैं- “ता. 12 की घटना की सूचना मिला। अपना लक्ष्य किस पर आक्रमण करना नहीं है। पर किसी के हमलों को निष्फल करने में हमें बहुत कठिनाई नहीं होती। आप सभी के संरक्षण की व्यवस्था ठीक से हमने बनाई है।” सीक्योरिटी व्यवस्था के आज के युग में दैवी चेतना आश्वासन देती है कि जो भी अप्रत्याशित घटने वाला था- उसे उनकी सूक्ष्म चेतना ने रोक दिया है। अपने अनन्य आत्मीय से जुड़ाव किस सीमा तक हो सकता है, यह समझा जा सकता है।
परमपूज्य गुरुदेव के पत्रों की सबसे बड़ी विशेषता है उनमें गुँथे भाव। इसीलिए उनके पत्रों को लोग छाती से लगाकर अभी तक रखे हुए हैं। दिव्य संभावनाएँ-परोक्ष संकेत-आध्यात्मिक मार्गदर्शन संबंधी पत्र भी समय आने पर हम पाठकों को पढ़ने को देंगे, परन्तु यहाँ उद्देश्य है उस करुणामयी सत्ता के मातृहृदय के दिग्दर्शन का जिसके माध्यम से उन्होंने लाखों व्यक्तियों के अंतःस्थल को स्पर्श किया, उनके जीवन को एक नई दिशा दी। वे सतत् अपने स्नेह की वर्षा बरसाते हुए- अनुदानों से परिजनों को निहाल करते रहे। यह तो दूसरे पक्ष का कर्तव्य था कि वह उनका क्या, कितना व कैसे नियोजन कर पाए।
21/1/1970 को उन्होंने उज्जैन की चंद्रा शर्मा जी को एक पत्र लिख- “तुम्हारा भावभरा पत्र पढ़कर वैसी ही प्रसन्नता हुई जैसे किसी पिता को अपनी छोटी बच्ची को गोदी में खिलाते समय होती है। तुम्हारी उच्च भावनाएँ और लोकमंगल के लिए उत्सर्ग करने की लगन हमारा रोम-रोम पुलकित कर देती है, तुम्हारा साहस और सत्प्रयत्न असंख्यों आत्माओं को नवजीवन और प्रकाश देगा। तुम अपना और असंख्य अनेकों का कल्याण कर सकने में समर्थ होंगी, ऐसा विश्वास है। अपनी भावनाएँ और क्रियाएँ बराबर अग्रसर करती रहना।” पत्र में एक अक्षर गहरी संवेदना की स्याही में डुबोकर उकेरा हुआ लगता है। साथ ही पूज्यवर का अपना आर्षवचन भी उसमें निहित है। जब भी कभी पूज्यवर का अपना आर्षवचन भी उसमें निहित है। जब भी कभी पूज्यवर के लेखन के उस पक्ष ‘पत्रलेखन’ पर विशद शोध होगी, निश्चित ही अनेकों शोध-अनुसंधानी यह विवेचना करेंगे कि शब्दों की प्रभावोत्पादकता को संवेदनासिक्त कर कैसे बहुवर्णित किया जा सकता है।
इसी तरह एक पत्र 11 मार्च 1953 का पूज्यवर ने अपने एक शिष्य को लिखा, जिसमें बड़ी स्पष्टता से उन्होंने अपने पूर्व में लिखे उद्बोधन की व्याख्या की थी। हर व्यक्ति अपने आप में मौलिक होता है, किंतु यदि वह आत्मसत्ता को विकसित कर ले तो किसी भी महापुरुष के समकक्ष अपने का बना सकता है। यह गहन अध्यवसाय-लगन-समर्पण पर निर्भर है कि उस दिशा में क्या व किस तरह का प्रयास हुआ। एक परिजन ने पूछा था कि आपने हमें विगत पत्र में लिखा था कि हमारे अंदर विवेकानंद की आत्मा है। तो वह कब सही रूप में सामने आएगी। बड़ा स्पष्ट उत्तर पूज्यवर ने उक्त तिथि में लिखे पत्र में दिया- “विवेकानंद वाले शब्द जब आप पर लागू होने की स्थिति आएगी, तब निश्चित रूप से आपको वैसा ही अवसर मिलता चला जाएगा। प्रयास आपको करना होगा। हमें आपके भविष्य और कल्याण का भली प्रकार ध्यान है।”
पत्रों के माध्यम से हम अपनी गुरुसत्ता के एक ऐसे स्वरूप की झाँकी पाते हैं, जिससे न केवल हमें उनके अंतरंग की कोमल सत्ता के अस्तित्व का आभास होता है, हम यह भी जानने में सक्षम हो पाते हैं कि किस विराट् अवतारी सत्ता से हम सब जुड़े रहें। यदि अनुदान तब भी न ले पाए, संबंधित किए जाने पर उसका एक प्रतिशत भी न बन पाए तो इसमें दोष हमारा ही है, दुर्भाग्य हमारा ही हैं
महत्वपूर्ण ज्ञातव्य
परमपूज्य गुरुदेव रचित साहित्य के महत्वपूर्ण अंशों-विशेष रूप से क्रान्तिधर्मी साहित्य व गायत्री उपासना के सभी प्रारंभिक साहित्य का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद करने की आवश्यकता तुरंत अनुभव की जा रही है। भारत की सभी भाषाओं सहित, विदेश की फ्रेंच-जर्मन-स्पेनिश-रशियन-जापान-इंग्लिश इन छह भाषाओं में अनुवाद होना व प्रकाशित होना है, ताकि महापूर्णाहुति वर्ष में यह क्राँतिकारी चिंतन जन-जन तक पहुँच सके। जिन परिजनों के अनुवाद को-एम्बेसी-कल्चरल सेंटर आदि स्तर पर संपर्क हों, वे ‘महापूर्णाहुति प्रकोष्ठ ‘ शान्तिकुञ्ज हरिद्वार से तुरंत संपर्क करें।
कितना ही कठोर तप कर कितनी ही महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ अर्जित की जाएँ, पर उनकी उपयोगिता तभी है, जब उसके द्वारा वैयक्तिक स्तर पर नहीं- समष्टिगत स्तर पर अधिकाधिक लोगों का हितसाधन हो सके। ऐसा कथन कि समुद्रमन्थन से अमृत कलश तो निकला पर वह धन्वन्तरि एवं देवताओं की निजी धरोहर बनकर रह गया। निकटवर्ती परिकर ने तो लाभ उठा लिया, पर अन्य लोकवासी विशाल जनसमुदाय के लिए उसका उपयोग तो दूर-उसका दर्शन भी दुर्लभ बना रहा। असहाय लोग आए दिन मरते रहे। कदाचित् वह अमृत सर्वसाधारण का मिल सका होता, ता वे भी देवताओं जैसी सुविधा प्राप्त करते और उसी स्तर का सुख-शाँति भरा जीवन जीते। पर दुर्भाग्य ही रहा कि मंथन से अमृत तो उपलब्ध हुआ, पर उसका लाभ एक छोटे परिवार को ही मिला। दोष संकीर्णता को भी दिया जा सकता है, जो देवताओं के साथ जुड़ी थी और वितरण प्रणाली का सुयोग न बन पाने की अस्त–व्यस्तता को कोसी भी जा सकता है। यह पौराणिक आख्यान कितना सही है एवं वास्तविकता के धरातल पर है- यह बात अलग है। चर्चा उस वृत्ति की चल रही है, जिसमें बहुमूल्य उपलब्धियाँ सार्वजनिक स्तर पर उपलब्ध नहीं हो पाती।
महापूर्णाहुति वर्ष में ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के पुण्य फल प्राप्ति का अलभ्य सौभाग्य प्राप्त करें
एक ओर अमृतघट-दूसरी ओर भाप एक एक छोटा सो समूह, जिसे मेघमाला नाम से संबोधित किया जा सकता है। बादलों के उस समुच्चय की निज की कोई संपदा नहीं, फिर भी उसकी वितरण प्रवृत्ति इस धरातल के असंख्यों प्राणियों-वृक्ष-वनस्पतियों-वनौषधियों का जीवन प्राण बनकर रहती हैं। बादलों का अस्तित्व क्षणिक होता है, स्वल्प-सा उनका जीवन होता है। व वर्षा होने के साथ ही अपना अस्तित्व भी खो बैठते हैं, फिर भी जल सिंचन हेतु उनकी अनुकंपा हेतु आकाश की ओर सभी टकटकी लगाए बैठे होते है हैं। अमृत कलश की निजी विशिष्टता कितनी ही क्यों न हो, वह सर्वसाधारण के काम नहीं आ सकता। इसीलिए उसकी ललक मात्र पैदा होकर रह जाती है। तुलनात्मक दृष्टि से देखें, तो बादलों की महिमा ऐसी है, जिसके लिए-जिनके अनुदानों के कारण समष्टि का एक-एक कण अपनी मौन कृतज्ञता व्यक्त करता दिखाई देता है।
प्रस्तुत प्रसंग इस संदर्भ में उद्धृत किया गया कि जो पाठ्य सामग्री अखण्ड ज्योति पत्रिका के पृष्ठों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचती है, यदि बादलों का आश्रय न पा सकी-अमृत कलश बनकर रैपरों में बद रखी रह गई तो अगणित लोग उस लाभ से वंचित रह जाएँगे, जो बादलों के बरसने से मिलता। अखण्ड ज्योति जो परमपूज्य गुरुदेव की प्राणचेतना की संवाहिका है, कितने ही सारगर्भित प्रतिपादनों के साथ विगत 62 वर्षों से अनवरत प्रकाशित हो रही है। छपने-कटिंग व रैपर में बंद होने के बाद उसे संबद्ध व्यक्तियों तक पहुँचाने की जिम्मेदारी ‘पोस्टमैन’ रूपी हमारी अग्रणी श्रेणी के उन परिजनों की है, जो सतत् इसी पुरुषार्थ में लगे रहकर उसे संबद्ध व्यक्तियों तक पहुँचाते हैं। पत्र की प्रतीक्षा में कई लोग पोस्टमैन की राह जोहते खड़े रहते हैं। उसे देखते ही, घर की ओर आते देखकर प्रतीक्षारत हृदय की कली खिल जाती है। उसे घर के एक सदस्य की तरह ही लोग मान देते हैं। अखण्ड ज्योति की प्रतीक्षा भी हर माह एी तरह कह जाती है।
‘अखण्ड ज्योति’ वह प्रचंड प्राण-प्रवाह है, जो जहाँ जाता है वहाँ शक्ति का संचार करता देखा जा सकता है। इसे मात्र छपे अक्षरों का पुलिंदा न मानकर शक्तिपुंज माना जाना चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी की सूक्ष्म चेतना इन पृष्ठों में प्रवाहित होती देखी जा सकती है। अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में लिपटी प्राणवान ऊर्जा और उसके द्वारा बन पड़ने वाली क्रिया-प्रक्रिया ‘हसतामलकवत्’ प्रत्यक्ष है। इसकी उपयोगिता एवं क्षमता को हर पारखी ने भूरि भूरि सराहा है। इसके प्रतिपादनों को तर्क, तथ्य और प्रमाणों के अंबार प्रस्तुत करते हुए कहीं भी कोई भी सिद्ध कर सकता है। इसे पारस की उपमा देते हुए परिजन कहते हैं कि जिस जिसको इसने छुआ, उसके कलुष-कल्मष घुलते चले गए हैं और ऐसा वैयक्तिक विकसित हुआ है, जिसे कायाकल्प की उपमा दी जा सके। यदि ऐसा न होता तो सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के दुहरे मोर्चे पर जो लाखों शूरवीर लड़ रहे हैं, उनका कहीं कोई अता-पता भी न होता। उज्ज्वल भविष्य का विश्वास जो आज जन-जन के मनों में जागता दीख पड़ रहा है, उसका बीजांकुर भी कहीं दृष्टिगोचर न होता। इस दिव्य ऊर्जा की गरिमा और क्षमता को हर कसौटी पर कसा और खरा पाया जा सकता है। जन-जन को देवमानव के रूप में विकसित करने की भागीरथी ललक को इसी युगचेतना के रूप में प्रज्वलित देखा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति मानवी चेतना के अंतराल में दृश्यमान होने वाला वह तत्व है, जिसे अध्यात्म की भाषा में श्रद्धा कहा गया है। जिसका जहाँ जितना उद्भव होता है, वहाँ उतना ही आदर्श के प्रति निष्ठा का परिचय मिलता है। उसी के सहारे पुण्य-परमार्थ बन पड़ता है। वही है जो उत्कृष्टता के प्रति समर्पित होती है ओर अगणित विघ्न-बाधाओं से जूझती-उलझती हुई अपने गंतव्य तक जा पहुँचती है।
अखण्ड ज्योति प्रतीक रूप में स्थापना है- खंडित न होने वाले, निरंतर जलने वाली ज्योति के रूप में दृश्यमान ‘अखण्ड दीपक’ के कलेवर की, जिसकी स्थापना 1926 में एक अखण्ड यज्ञ के रूप में की गई थी। तब से सतत् जल रहा यह अखण्ड दीपक शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में सतत् जाज्वल्यमान रह आगामी वर्ष अपने 75 वें वर्ष में प्रवेश करने जा रहा है। जिस प्रयोजन से अखण्ड दीपक के समक्ष चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरणों की श्रृंखला आरंभ की गई थी वह था विश्वमानव की वर्तमान चिंतन चेतना को उलटकर सीधा करना। इस ऊर्जाकेन्द्र को गुरुसत्ता ने अंतस् की पिटारी में न बंद कर जन-जन के अखण्ड ज्योति पत्रिका के रूप में बारह वर्ष के अन्दर 1937-38 में प्रस्तुत कर दिया गया। इस पत्रिका का भी तिरसठवाँ वर्ष आगामी माह से आरंभ होने जा रहा है। भली-भाँति समझा जा सकता है कि युगधर्म की महती आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ही अखण्ड ज्योति एक प्रतीक बनी, अनवरत जली एवं उसने समय की चुनौती को स्वीकार कर युगपरिवर्तन की आँधी को जन्म दिया।
अब तक गायत्री परिवार-प्रज्ञा अभियान-युगांतरीय चेतना-युगनिर्माण योजना के रूप में जो भी कुछ कार्य विस्तार बन पड़ा है उसमें अखण्ड ज्योति में सन्निहित प्रेरणाओं को जितना श्रेय दिया जा सकता है, उससे हजार गुना श्रेय उनको दिया जाना चाहिए, जो इस परिकर से जुड़े हैं और अपने श्रम सहयोग से अपने क्षेत्र में अपनी रुचि एवं सामर्थ्यानुसार नवसृजन के प्रयासों में लगें हैं। अखण्ड ज्योति यदि मस्तिष्क है तो पाठक परिजनों के रूप में फैला विशालकाय परिकर उसका कायकलेवर। दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे पर टिका है। अखण्ड ज्योति के माध्यम से पूज्यवर की योजनाएँ प्रेरणाएँ जन-जन तक पहुँचती हैं एवं पाठक-परिजनों के विशालकाय परिकर द्वारा संपन्न होती हैं।
जीवन विज्ञान की संजीवनी विद्या की सांगोपांग शिक्षा की आज कितनी आवश्यकता है, उतनी संभवतः पहले कभी नहीं थी। उसी दिशा में कहीं कोई प्रयास सार्थक रूप में चलता दिखाई नहीं देता। सहायकों का अभाव, पूँजी की कमी, अन्याय सेवाकार्यों की व्यस्तता में लेखन के लिए स्वल्प समय बच पाने जैसे अवरोधों के होते हुए भी परमपूज्य गुरुदेव ने जिस अखण्ड ज्योति को निरंतर प्रज्वलित रखा, कभी बुझने न दिया वह सतत् प्रकाशित हो प्रतिमास संजीवनी के रूप में परिजनों के पास पहुँचती हैं। योजनाबद्ध सत्साहित्य का सृजन अखण्ड ज्योति के प्रकाशपुँज की एक जाज्वल्यमान किरण है। इसका चमत्कारी प्रभाव युगों-युगों तक प्रकाश देता रहेगा-यह सुनिश्चित समझा जाना चाहिए।
अखण्ड ज्योति का कलेवर छपे कागजों के छोटे पैकेट जैसा लग सकता है, पर वास्तविकता यह है कि उसके पृष्ठों पर सूत्र-संचालक का, युगऋषि का दिव्यप्राण आदि से अंत तक घुला अनुभव किया जा सकता है अन्यथा मात्र सफेद कागज को काला करके न कहीं किसी न इतनी बड़ी युगसृजेताओं की सेवावाहिनी खड़ी की है और न इतने ऊँचे स्तर के इतनी बड़ी संख्या में सहायक-सहयोगी अनुयायी ही मिले हैं। देश के कोने-कोने में बिखरे प्रज्ञामंडल-स्वाध्याय मंडल-प्रज्ञासंस्थान हरिद्वार और मथुरा की संस्थाएँ जो कार्य करती दिखती हैं, उनके पीछे इन्हीं सहयोगियों का रीछ वानरों जैसा भी और अंगद-हनुमान-नल-नील जैसा पराक्रम एवं त्याग कार्य करता देखा जा सकता है। निश्चित ही यह अखण्ड ज्योति की प्राणचेतना का ही प्रभाव है कि उसने हम सबको एकजुट रख युगपरिवर्तन की प्रक्रिया में गतिशील बनाए रखा है। एक शब्द में यही कहा जा सकता है कि यह हिमालय के देवात्मा क्षेत्र में निवास करने वाली ऋषिचेतना का समन्वित अथवा उसके प्रतिनिधि रूप में ऋषियुग्म की सत्ता का सूक्ष्म सूत्र-संचालन है।
अखण्ड ज्योति 62 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो अब प्रायः छह लाख पाठकों तक हिंदी में छह लाख तक अन्यान्य भाषाओं में पहुँचती हैं। एक पाठक यदि पाँच को पढ़ाता है तो इस प्रकार यह प्रतिपादन साठ लाख व्यक्तियों तक पहुँचता हैं। आबादी में अनुपात की दृष्टि से यह भारत का 0.6 प्रतिशत ही हो पाता है। लक्ष्य युगपरिवर्तन है, जिसे वर्तमान विभीषिकाओं का आत्यंतिक समापन कर देने वाला सार्वभौम कायाकल्प भी कह सकते हैं। जिस प्रयोजन के लिए परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी की साधना स्वयंभू मनु और शतरूपा जैसी, वशिष्ठ-अरुंधती स्तर की चलती रही हो, वह निश्चित रूप से उनकी सूक्ष्म व कारणसत्ता के प्रभाव से पूरा होगा, यह विश्वास किया जाना चाहिए। अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचने के लिए यह अत्यंत अनिवार्य है कि अखण्ड ज्योति पत्रिका व उसके संगी-साथियों की वर्तमान संख्या में पाँच गुना वृद्धि हो। यदि एक परिजन-पाठक भी न्यूनतम पाँच व्यक्तियों को प्रेरित करें, तो इस लक्ष्य की प्राप्ति असंभव नहीं है।
वर्ष 2000-2001 में अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर महापूर्णाहुति प्रधान-नवयुग प्रधान प्रतिपादन ही प्रमुख होगा। इस ऐतिहासिक महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति इसी माह से आरंभ हो चुकी है। अब यह प्रायः डेढ़ वर्ष तक चलेगी। इस पूरी अवधि में चिंतन एक ही धुरी पर चलना है- राष्ट्र के नवोन्मेष के लिए भारतीय संस्कृति को विश्व संस्कृति बनाने के लिए उच्चस्तरीय प्रतिभाओं को उत्पादन-नियोजन कैसे हो। जन साधारण से लेकर चिंतक स्तर के-युग नेतृत्व देने वाले कार्यकर्ताओं का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन भी अब पत्रिका के पृष्ठों द्वारा ही होगा।
अखण्ड ज्योति अब बढ़े हुए कलेवर (68 पृष्ठ) में चार रंगीन पृष्ठों सहित आगामी माह से प्रकाशित होगी। बढ़े कलेवर में होने के बावजूद इसका मूल्य वही होगा- वार्षिक चंदा साठ रुपये, आजीवन सात सौ पचास रुपये तथा विदेश के लिए पाँच सौ प्रतिवर्ष। आज जितनी भी पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं, वे कागज व छपाई के बढ़े मूल्यों के कारण अपना अस्तित्व नहीं बचा पाती, मात्र विज्ञापन के पृष्ठ ही उन्हें सहारा देते हैं। अखण्ड ज्योति पत्रिका जिस पावन पुनीत उद्देश्य को लेकर प्रकाशित होती है, उसमें गायत्री तपोभूमि की स्थापना के बाद से ही संकल्पित हो इसने विज्ञापनों से स्वयं को दूर रखा है। पचास वर्ष से जो संकल्प निभाते रहा जा रहा है, उसे आगे भी निभाया जाएगा। यह तभी संभव है जब पत्रिका बड़ी संख्या में प्रकाशित हो- अधिकाधिक व्यक्तियों तक पहुँचे। उधार की भाषा में परिजन व्यवहार न करें एवं नित्य-नियमित इसका वितरण करते रहें, तो उस घाटे की पूर्ति हो सकती है, जो विज्ञापन न छपने से अखण्ड ज्योति संस्थान को होती है। इसीलिए बारंबार अनुरोध किया जा रहा है कि ग्राहक / पाठक-संख्या कम-से-कम पाँच गुनी कर देना हम सबका लक्ष्य बन जाए- यह संकल्प सन् 2000 के आगमन की वेला में सभी लें।
महापूर्णाहुति के पाँच चरण घोषित हो चुके। प्रथम चरण (पूर्वाभ्यास दीपयज्ञ) का अनुयाज यही है कि सभी पाठक 3 दिसंबर से 10 फरवरी 2000 तक की सत्तर दिन की अवधि में मिशन की सभी पत्रिकाओं अखण्ड ज्योति तथा युगनिर्माण योजना मासिक, प्रज्ञा अभियान ‘पाक्षिक’ तथा ‘युगशक्ति’ ‘गायत्री” (गुजराती, उड़िया, बंगला, इंग्लिश) की पाठक संख्या पाँच गुना कर साठ लाख लोगों तक पहुँचा दें। जब यही 10 व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जाएगी, तो छह करोड़ व्यक्तियों तक युगांतरीय चेतना को संदेश पहुँचेगा। सभी पत्रिकाएँ निर्धारित माह की प्रथम तारीख के आसपास समय मिलने लगें, यह प्रयास भी इस जनवरी से किया जाएगा। इसके साथ-साथ चौबीस पुस्तिकाओं का क्रान्तिधर्मी सेट भी घर-घर स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। ये पुस्तिकाएँ परमपूज्य गुरुदेव द्वारा 1989-90 में महाप्रयाण से एक वर्ष पूर्व लिखी गईं थी। इन चौबीस पुस्तिकाओं में नवयुग का समग्र संदेश कूट-कूटकर भरा है। जहाँ भी यह पहुँचेगा वहां विचारक्रांति की चिनगारी को दावानल बनाकर रहेगा।
महापूर्णाहुति की पावनवेला में विज्ञान और अध्यात्म के समन्वित प्रतिपादनों से लेकर भारतीय संस्कृति का युगानुकूल प्रस्तुतीकरण एवं सर्वसुगम साधना पद्धतियाँ से लेकर परमपूज्य गुरुदेव द्वारा समय-समय पद दिए गए नवीनतम सूत्रों का समावेश लिए नए कलेवर वाली अखण्ड ज्योति को घर-घर तक पहुँचाने का पुण्यपरमार्थ जा भी करेगा, वह बारह वर्षीय युगसंधि ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का पुण्यफल भी सहज ही प्राप्त करेगा, यह सुनिश्चित मानना चाहिए।
युगसंधि महापुरश्चरण महापूर्णाहुति
महापूर्णाहुति का प्रथम चरण इस पत्रिका के पाठक-परिजनों के पास पहुँचने तक पूरा हो चुका हो। “स्वस्थ शरीर-स्वच्छ मन” के साथ सबको सद्बुद्धि- सबके लिए उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना का संकल्प इस प्रथम चरण में जोड़ा गया था। अनुयाजक्रम 10 फरवरी 2000 वसंत पंचमी तक चलेगा, जिसमें मिशन की ‘अखण्ड ज्योति’ सहित सभी पत्रिकाओं की पाठक संख्या अब से पाँच गुना करने तथा कम से कम इतने ही घरों में चौबीस पुस्तिकाओं वाले क्रान्तिधर्मी साहित्य को स्थापित किया जाना है। इसके सेट शान्तिकुञ्ज हरिद्वार एवं अपने-अपने साधना प्रशिक्षण केंद्रों से प्राप्त किए जा सकते हैं।
द्वितीय चरण में वसंत पंचमी पर विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाओं द्वारा एक साथ सभी जगहों पर संपन्न दीपयज्ञों में संकल्प लिए जाएँगे। इस वसंत पर्व (10-2-2000) पर विचारक्रांति प्रधान अनुयाज की समीक्षा होगी तथा नगरव्यापी एक शोभायात्रा के बाद भव्य दीपयज्ञ में संकल्पों की घोषणा होगी कि किस प्रकार हम दो करोड़ प्रतिभाओं को नवसृजन के निमित्त नियोजित कर रहें हैं।
तृतीय चरण में दो कार्य एक साथ होंगे। बसंत पर्व 10 फरवरी 2000 से गायत्री जयंती 11 जून 2000 तक, स्थान-स्थान पर सघन मंथन करने वाली रथ यात्राओं का क्रम बन सकता है। इनके रूट्स व पूरा स्वरूप केंद्र में बन रहा है। दूसरा गाँव स्तर पर, ब्लॉक स्तर पर- जिला व संभाग स्तर पर प्रतिभाओं के समय-साधनदान के सुनिश्चित संकल्प प्रत्येक माह क्रमवार दीपयज्ञों के साथ। इसके जाग्रत व नवजाग्रत क्षेत्र का एक साथ मंथन होकर महापूर्णाहुति का संदेश सब तक पहुँचेगा। इन सबका समापन गायत्री जयंती 2000 (11 जून रविवार) को एक साथ प्रायः दो सौ चालीस केंद्रों द्वारा निर्धारित स्थलों पर दीपयज्ञ व प्रतिभाओं के संकल्प समारोह के साथ होगा।
चौथे व पाँचवें चरण में अभी तक का निर्धारण इस प्रकार है। पूरी वर्षाऋतु के दौरान महानगरों में अपने स्तर के व्यापक मंथन कार्यक्रम चलेंगे, वहाँ विभूति महायज्ञ की रणनीति कार्यक्षेत्र में कार्यकर्ता बनाते चलेंगे। भारत की राजधानी में एक विराट् सर्वधर्म-सर्व पंथ सम्मेलन प्रस्तावित है, जिसमें किसी बड़े स्टेडियम में विराट् मंच पर सभी विभूतियों को एक साथ सम्मानित भी किया जाएगा व युगनेतृत्व की दिशा में बोधपरक मार्गदर्शन होगा। यह शरदपूर्णिमा पर्व पर प्रस्तावित है। इसी के प्रायः एक माह बाद एक भव्य आयोजन शान्तिकुञ्ज हरिद्वार केंद्र में होना है, जिसकी संभावित तिथियाँ 7 नवम्बर देवोत्थान एकादशी से 11 नवम्बर कार्तिक पूर्णिमा तक। इन पाँच दिनों में द्रव्ययज्ञ, ज्ञानयज्ञ व विभूतियज्ञ का समागम होगा।
पाँचवें चरण में शान्तिकुञ्ज में पाँच दिवसीय प्रतिभा नियोजन सत्र (प्रतिमास छह) 15 नवम्बर से 2 अप्रैल रामनवमी 2001 तक चलेंगे, जिनमें संकल्पित प्रतिभाओं को सीमित संख्या में आमंत्रित किया जाएगा। इनके कार्यों का सुनियोजन कर 2011 (महाशताब्दी वर्ष) तक की क्षेत्रीय की रणनीति सौंपी जाएगी। अंतिम दो चरणों में कुछ परिवर्तन-संशोधन संभावित है।
अखण्ड-ज्योति दिसंबर 1987 में प्रकाशित)
मनुष्य का प्राण जिन भाव संवेदनाओं के साथ गुँथ जाता है, उसी के अनुरूप उसकी विचारणाएँ और गतिविधियाँ चल पड़ती हैं। उत्थान और पतन का यही रहस्य है।
अखण्ड ज्योति का एक ही लक्ष्य है कि व्यक्ति के अन्तःकरण का छूने वाला ऐसा तत्त्वदर्शन प्रस्तुत किया जाए जो व्यक्तित्वों के परिष्कार में सुनिश्चित रूप से सफल हो सके। इसके लिए जिन तर्कों, तथ्यों, प्रमाण-प्रतिपादनों की आवश्यकता है, उन्हें विश्वसाहित्य के महासागर में गहरे गोते लगाकर पाठकों के समक्ष पहुँचाया जाता है। इसका गम्भीरतापूर्वक अध्ययन-अवगाहन जिनने भी किया है, वे द्रुतगति से आगे बढ़े हैं, ऊँचे उठे हैं।
आवश्यकता इस बात की है कि इस आलोक को घर-घर में प्रकाश करने का अवसर मिले, उसके द्वारा जन-जन के मानस के प्रखरता, प्रतिभा, शालीनता और महानता से अनुप्राणित करने का अवसर मिले।
इस अग्रगमन का एक ही सरल तरीका है कि वर्तमान सदस्य न्यूनतम पाँच-पाँच नये ग्राहक और बना देने का संकल्प करें। इसके लिए अपने प्रभाव-क्षेत्र में संपर्क साधें, पत्रिकाएँ दिखाएँ और उनके प्रभाव-महत्व को विस्तार पूर्वक समझाने का प्रयत्न करें। इतना साहस कर गुजरने पर कोई भी पाठक पाँच नये सदस्य बना सकता है। इतने भर से मिशन का कार्यक्षेत्र अबकी अपेक्षा पाँच गुना अधिक बढ़ सकता है, जो मानवी गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखने और अधिकाधिक सशक्त बनाने में समर्थ है। विश्वकल्याण की दिशा में इतना प्रयत्न भी महान योगदान देता रह सकता है। पाठकों से इसके लिए आग्रह भरा अनुरोध किया जा रहा है।
श्रीराम शर्मा भगवती देवी शर्मा
*समाप्त*