ऐसे अद्भुत पल आते हैं, जब स्वयं महाकाल वासन्ती बयार बनकर मनुष्यों को अपना अहसास कराते हैं और तब हमारे वैयक्तिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन पर परम प्रभु की मधुर सुवास फैल जाती है, जबकि सामान्य समय में वह अपनी चेतना समेट लेते हैं और मनुष्य अपने अहंकार की शक्ति या अशक्ति से काम करने के लिए छोड़ दिए जाते हैं। इन विशिष्ट पलों में थोड़ी-सी भी साधना महान परिणाम उत्पन्न करती है, जबकि सामान्य समय में थोड़ा-सा परिणाम उत्पन्न करने के लिए भी वर्षों और जन्मों तक कठोर तप करना पड़ता है।
नववर्ष 1999 का हर पल ऐसा ही अद्भुत एवं विशिष्ट है, तभी अध्यात्म-चेतना के ध्रुव केन्द्र देवात्मा हिमालय से इसे प्रखर साधना वर्ष के रूप में मनाए जाने का निर्देश अवतरित हुआ है। भगवान महाकाल की रोमांचकारी लीलाएँ इस समूचे वर्ष में देखी जा सकेगी। इस वर्ष के हर पल में नवयुग के आगमन की पग ध्वनि तीव्र से तीव्रतर होती जाएगी।
धन्य हैं, वे जो प्रखर साधना वर्ष 1999 का महात्म्य आत्मसात् करने के लिए प्रतिपल तत्पर हैं। इस साधना वर्ष में धो डालें अपनी अन्तरात्मा से समस्त आत्मप्रवंचना, ढोंग और थोथी आत्मप्रशंसा की वृत्ति को, ताकि सीधे देख सकें अपनी मार्गदर्शक गुरुसत्ता को और सुन सकें उस वाणी को जो सतत् पुकार रही है। इस वर्ष के विशिष्ट पलों में हटा दें अपनी सारी कुटिलता को जो पहले हमें परमपूज्य गुरुदेव की दृष्टि और आदर्श की ज्योति से विमुख किए हुए थी क्योंकि यह कुटिलता यदि अब भी बनी रही तो इस वर्ष की विषमताओं के प्रहारों से कोई भी बच सकेगा। यदि किसी तरह बच भी गया तो भी महाकाल का कालदण्ड उसे उसकी दुष्प्रवृत्तियों का दण्ड देकर ही रहेगा। यह महान वर्ष एक बवण्डर, एक तूफान की तरह से शक्ति के बल पर खड़ा रह सकता है, हम सबके लिए ही नहीं, समस्त मानवता के लिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच बनेगी। समस्त उनकी शक्ति से कार्य कर सकें।
इसमें भागीदार प्रत्येक साधक के लिए यही महान सन्देश है-
वह अग्नि वह सूर्य वह समुद्र बन जाओ। महाकाल की बनो महत्ता युगाकाश पर छा जाओ॥
जाग्रत आत्माओं पर ऊर्ध्वगामी उल्लास की तरह उतरने वाले दैवी सन्देश का महापर्व वसन्त अब आ ही नहीं गया- चारों ओर छा भी चुका है। अपने परिवार के अधिकाँश व्यक्तियों को एक ही प्रकार की आन्तरिक अनुभूतियाँ हो रही हैं कि उन्हें मूर्च्छितों की तरह अस्त-व्यस्त स्थिति में नहीं पड़े रहना चाहिए, बल्कि ऐसी रीति-नीति अपनानी चाहिए जिसे जाग्रतों-जीवंतों एवं उत्कृष्ट साधकों के अनुरूप कहा जा सके।
लगता है कोई भीतर से उमड़ता-घुमड़ता है और बंदीगृह में पड़े रहने से इनकार करता है। बन्धनों से छूटकर महाकाल का यशस्वी सेवक-सहचर बनना चाहता है। यह कौन है? प्रतीत होता है कि यह अपना ही अन्तरात्मा है, जिसे बगैर युगधर्म निभाएँ-बिना तप-साधना की भट्टी में अपने को गलाए-तपाए किसी भी तरह चैन नहीं है। यह प्रक्रिया कितनी भी कष्टकर हो, पर इसे निभाए बिना इन दिनों रहा भी तो नहीं जाता।
इन दिनों युगनिर्माण परिवार के प्रायः सभी परिजनों की अन्तः भूमिका में ऐसी ही तीव्र उथल-पुथल मची हुई है। लगता है कोई समर्थसत्ता उन्हें झकझोर रही है और कह रही है कि अरुणोदय की इस पुण्यवेला में वही किया जाना चाहिए जो तपस्वी साधकों के लिए शोभनीय है। वह नहीं होते रहना चाहिए, जिसे मूर्च्छित और अविकसित मनोभूमि के पिछड़े व्यक्तित्व के लोग अपनाए रहते हैं। क्या करना चाहिए? इसका उत्तर अपने ही भीतर से प्रतिध्वनित होता है- परिवर्तन। ढर्रे का परित्याग और नववर्ष के साथ ही साधनापरायण नवजीवन का शुभारम्भ। यही वे हलचलें हैं जो इन दिनों हममें से अधिकाँश के अन्तःकरणों में उठ-उभर रही हैं। इन्हें आँखों से तो देखा नहीं जा सकता, परन्तु अन्तःकरण को विकल कर देने वाली इन हलचलों का महत्व प्रत्यक्ष घटनाक्रमों से कम नहीं अधिक ही है, क्योंकि अन्तर्जगत् की हलचल ही तो प्रकारान्तर से बाह्यजगत में घटनाओं का सृजन करती हैं।
जाग्रत आत्माओं के अंतर्जगत में भगवान महाकाल उन्हें तीन सन्देश दे रहे हैं। इन्हें गंगा, यमुना व सरस्वती का मिलन-संगम कहा जा सकता है। दैवी सन्देश देने वाले महापर्व वसन्त पर अवतरित होने वाली त्रिपदा गायत्री की इन्हें तीन प्रकाश किरणें जिनके आलोक में वर्तमान को समझ सकना और भविष्य का निर्माण कर सकना सम्भव हो सके।
नववर्ष 1999 का वसंत पर्व इस बार अपने परिवार के सभी स्वजनों को कुछ अनोखा, कुछ अनूठा सुनाने आया है। उन्हें उनके उत्तरदायित्वों का बोध कराने आया है। इन दिनों प्रक्रिया कुछ ऐसी चल पड़ी है कि महाकाल सोते अन्धकार से जाग्रत प्रकाश की ओर, मरण से अमृतत्व की ओर, असत से सत की ओर चल पड़ने के लिए अपने परिजन ही नहीं विश्व का हर विचारशील यह अनुभव करने लगा है कि परिवर्तन की घड़ी निकट आ पहुँची है, अब उसे अधिक समय तक टाला न जा सकेगा। कायाकल्प की वेला को ऐसे ही झुठला देने, टरका देने की छलना प्रयास तो बहुत करती है, पर उसकी दाल इस बार किसी भी तरह गलने वाली नहीं। सर्प भी अनुकूल ऋतु में केंचुली बदल लेता है। नरजीवन पर छाई हुई पशुवृत्तियों की केंचुली असंख्यों को इसी वर्ष उतारने के लिए विवश होना पड़ेगा।
नववर्ष के अनुरूप नवजीवन के लिए तीन दिव्य सन्देश हैं- (1) जीवन व्यवसाय में परमपूज्य गुरुदेव की साझेदारी को कारगर बनाया जाय।(2) साधना की प्रखरता को अन्य दैनिक आवश्यकताओं की ही तरह नित्यकर्म में सम्मिलित एवं संपर्क क्षेत्र में आने वाले परिजनों को भी इसके लिए प्रेरित किया जाय। (3) जीवन को इतना शानदार बनाया जाय, जिसमें आत्मसंतोष, ईश्वरीय अनुकम्पा और लोक श्रद्धा का समन्वित वरदान मिल सके।
भगवान सन्देश देकर अपनी अनुकम्पा पूर्ण कर देते हैं। इसी के उपरान्त मनुष्य का कर्तव्य आरम्भ होता है। दिव्य सन्देशों को स्वभाव-अभ्यास में उतारने के लिए जो पुरुषार्थ करना पड़ता है
इसी का नाम तप-साधना है। वैसे भी महाकाल ने इस वर्ष को प्रखर साधना वर्ष के रूप में मनाने का निर्देश दिया है। विभूतियाँ साधना से ही मिलती हैं। भगवान सीधे किसी पर अनुदानों-वरदानों की वर्षा नहीं करते। यदि वे ऐसा करें तो फिर मनुष्य बुरी तरह अकर्मण्य हो जाय। फिर पुरुषार्थ और पात्रता की कोई आवश्यकता ही न रहे और सर्वत्र भयंकर अंधेर मच जाय।
साहस की कसौटी पर ही प्रखरता की परख होती है। इन दिनों युगसेनानियों के अंतर्जगत में उभरती हुई इन भावसंवेदनाओं में नवयुग के अवतरण की प्रथम किरणों का दिव्य दर्शन सहज ही किया जा सकता है।
कलियुग में प्राण अन्नगत है। अतएव देहात्मबुद्धि-अहंबुद्धि मिटती नहीं। इसलिए कलियुग के लिए भक्तियोग ही उपयुक्त है। भक्तिपथ सीधा पथ है। हृदय से व्याकुल होकर उनके नाम का जप करो,
उनसे प्रार्थना करो। भगवान मिलेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।
रामकृष्ण परमहंस
गायत्री परिवार के परिजन जिस महान ज्ञान का अवगाहन चिरकाल से करते आ रहे हैं, उसे कार्य-रूप में परिणत करने का अवसर आ पहुँचा है। उत्थान के नाम पर जड़ता की ओर-सफलता के नाम पर सर्वनाश की ओर दौड़ी जाने वाली मानवजाति को इसी प्रकार दौड़ने नहीं दिया जा सकता। सामूहिक आत्महत्या के इस बेताल नृत्य को हम मूकदर्शक बनकर नहीं देख सकते। अपने देवपरिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनी विशिष्ट स्थिति का मूल्याँकन करना चाहिए और अपने को विशेष उद्देश्य को लेकर अवतरित हुआ मानना चाहिए।
वे मूर्च्छा में पड़े हुए अथवा दिवास्वप्न देखने वाले जड़मति लोगों को सचेत करने - उन्हें साधना के लिए प्रेरित करने की जिम्मेदारी सम्भालें। आँधी में उड़ते-फिरते रहने वाले पत्तों की तरह उन्हें निष्प्रयोजन इधर-उधर भटकना नहीं है, वरन् समुद्र में खड़े हुए प्रकाश स्तम्भों के समतुल्य बनना है, जो घोर अन्धकार में स्वयं चमकते रहते हैं और अपने प्रकाश से उधर से निकलने वाले जहाजों को डूबने से बचाते हैं। इस लक्ष्य को हमें अपने जीवनक्रम में, दृष्टिकोण में सम्मिलित करना चाहिए और तदनुरूप अपने तपस्वी जीवन की गतिविधियों का निर्धारण करना चाहिए।
यह समय जिसमें हम जी रहे हैं, इतिहास में अतीव मार्मिक है। इन दिनों मानवी-संस्कृति जीवन-मरण के दोराहे पर खड़ी है। लोग बुद्धिभ्रम में बेतरह उलझ गए हैं। व्यक्तिवादी अति संकीर्ण की निकृष्ट मनःस्थिति के दलदल में गरदन तक फँस गया है। जैसे बने वैसे स्वार्थसिद्धि की ललक ने उसे अति घिनौनी अपराधियों जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाए रहने का अभ्यस्त बना दिया है। अविचार और अनाचार का बोलबाला है। इस लोक प्रवाह ने सामाजिक वातावरण को विषाक्त बनाकर रख दिया है। स्नेह-सौजन्य के दर्शन अब कहीं कठिनाई से ही होते हैं। सज्जनता और सहृदयता अब कहने-सुनने की वस्तुएँ भर रह गयी हैं। अविश्वास और आशंका का साम्राज्य छाया हुआ है। आज का मित्र कल का शत्रु सिद्ध न होगा, इसका कोई भरोसा नहीं। मनुष्य की क्षुद्रता किस स्तर तक उभर आयी है, उसे देखते हुए लगता है कि मानवी सभ्यता क्रमशः इस धरती पर से उठती चली जा रही है।
यों शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय, विज्ञान आदि की इन दिनों भारी वृद्धि हुई हैं और अगणित सुख-साधन उपलब्ध हुए हैं, किन्तु दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों की वृद्धि और भी अधिक द्रुतगति से हुई हैं। इस दावानल में सर्वजनीन सुख-शान्ति नष्ट-भ्रष्ट होती चली जा रही है। बड़े छोटों को निगल जाने के लिए आतुर बैठें हैं। विश्वयुद्ध की विभीषिकाएँ दिन-दिन सघन होती चली जा रही हैं। आशंका यही बनी रहती है कि कहीं परमाणु बम इस सुन्दर भूलोक को भस्मसात् कर देने का निमित्त न बन जाय और मानवी-सभ्यता का सदा-सर्वदा के लिए अन्त न हो जाय।
व्यक्ति और समाज किस प्रकार विपन्न परिस्थितियों में घिरते चले जा रहे हैं, यह देखकर भय मिश्रित निराशा होती है। हम सचमुच ही जीवन-मरण के दोराहे पर खड़े हैं। एक ओर सर्वनाश अट्टहास कर रहा है, दूसरी और मानवता सहमी खड़ी है। मरण ने अपना सरंजाम पूरे ठाट-बाट से खड़ा कर लिया है। जीवन इस असमंजस में घिरा खड़ा है कि हमारा क्या होना है? हमारा अस्तित्व अगले दिन तक रहना है या उसके इतिश्री होने की घड़ी आ पहुँची। जिस राह पर व्यक्ति और समाज ने चलने की ठान ली है, वह अत्यन्त भयावह है। हर क्षेत्र की हर स्थिति उलझती चली जा रही है और गतिरोध ने आगे बढ़ने का रास्ता बन्द कर दिया है। विवेक किंकर्तव्यविमूढ़ होकर हत प्रभ बना खड़ा है। सूझ नहीं पड़ता आगे क्या होना है अथवा क्या किया जाना है?
समय की इस विषम वेला में जाग्रत आत्माओं का विशेष कर्तव्य है। गायत्री परिवार को इस आपत्तिकाल में अपनी विशेष भूमिका निभानी है। उन्हें सामान्य नरपामरों की तरह नहीं जीना है। अपनी प्रतिभा को उसी कीचड़ में नहीं सड़ाना है, जिसमें कि सर्वनाश के गर्त में गिरने वाली अन्धी भेड़ें दौड़ती हुई चली आ रही हैं। हमें अपनी विशिष्ट स्थिति का अनुभव बार-बार करना चाहिए। ऊँचा उठकर बार-बार सोचना चाहिए और ऐसा कुछ करना चाहिए, जिसमें तपस्वी जीवन के आदर्शों का निर्वाह होता हो। युग की उलझी हुई समस्याओं को सुलझाने में हमें कुछ आध्यात्मिक पुरुषार्थ तो करना ही होगा। अपनी जाग्रति का परिचय दिए बिना अब काम चलेगा नहीं। प्रहरी सोते रहेंगे तो दस्युओं के आतंक वाली अंधकार भरी निशा में कुछ भी हो सकता है और ऐसा हो सकता है, जिसका परिमार्जन करने का समय फिर कभी आए ही नहीं।
आत्मा, परमात्मा और कर्तव्य के प्रति हमारी जो जिम्मेदारियाँ हैं, उन्हें पूरा करने के लिए इस वर्ष से बढ़कर परीक्षा की घड़ियाँ फिर कभी आने वाली नहीं हैं। घटनाचक्र जिस क्रम से घूम रहा है, उसे यथावत चलने दिया गया तो चिरप्रयासों से उपार्जित मानव सभ्यता का अता-पता मिलना कठिन हो जाएगा-हम कितने ही उन्नतिशील कहे जाएँ-वस्तुतः नरपशु मात्र रह जाएँगे। स्नेह सौहार्द्र को, आदर्शवादिता को खोकर हम भले ही कुछ क्यों न बन जाएँ, मनुष्य कहलाने योग्य तो रह ही नहीं जाएँगे। वर्तमान वर्ष की उथल-पुथल पर आध्यात्मिक शक्तियों का नियंत्रण न रह सका तो इस व्यापक उच्छृंखलता का आना इतना भयावह होगा, जिसकी कल्पना मात्र से अन्तरात्मा रोमांचित हो जाती है।
यों मनुष्य मात्र का कर्तव्य है कि विश्वसंकट की इस घड़ी में अपने सामान्य क्रम में कठिनाई उत्पन्न करके भी सामूहिक सुरक्षा के आध्यात्मिक प्रयासों में भावनापूर्वक भाग लें। आखिरकार आपत्तिकाल की अग्निपरीक्षा का समय आने पर सभी को अपने विशेष कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। परन्तु गायत्री परिवार के सदस्यों की स्थिति अन्यों से कहीं भिन्न और कई गुना ऊँची है। उन्हें प्रयास पूर्वक मणिमुक्तकों की तरह संग्रह करके एवं अदृश्य सत्ता की इच्छानुसार एक बहुमूल्य माला की तरह पिरोया गया है। उसे युग अवतार के गले का हीरक हार बनना है। रावण युग की विकृतियों के समाधान के लिए रीछ-वानरों ने जो भूमिका सम्पादित की, कंस और दुर्योधन के अनाचार को निरस्त करने के लिए ग्वाल-बालों एवं पाण्डवों ने जो रीति-नीति अपनायी, ठीक वही हमें करना है। प्रश्न न्यून शक्ति का, स्वल्प योग्यता का, साधनों के अभाव का नहीं-महत्व भावनाओं के उभरते हुए स्तर का है। यदि हममें समय की विषमता से जूझने का उत्साह हो तो संगठित तप-साधना को अपनाकर हम इस सर्वनाशी प्रवाह को रोक सकते हैं, जो इन दिनों विश्व-मानव का भविष्य सदा के लिए अन्धकारमय बनाने के लिए आ खड़ा हुआ है।
गायत्री परिवार के हर सदस्य को यह अनुभव करना चाहिए कि वह स्वयं में एक असामान्य सत्ता है, असामान्य काल में असामान्य कर्तव्यों का पालन करने के लिए जन्मा है। उसने जिस उद्देश्य के लिए जन्म लिया है, वह घड़ी अब आ पहुँची है। इस महत्वपूर्ण समय में ऐतिहासिक उत्तर-दायित्व के निर्वाह के लिए व्यक्तिगत और पारिवारिक महत्त्वाकाँक्षाओं का उन्माद अब कुछ समय के लिए ढीला कर देना चाहिए। यह समय न धनी आदमी बनने का है और न बड़ा आदमी बनने का। यह तो तपस्वी जीवनयापन करने का पुण्य क्षण है। तप शक्ति से ही उस प्रवाह को रोका जा सकता है, जो बाढ़ की तरह उफनता चला आ रहा है। यदि इसे रोका न जा सका तो ऐसा विप्लव सामने आएगा कि बड़प्पन और सम्पन्नता नाम की चीजें ढूँढ़े न मिलेगी और यदि युग परिवर्तित हो गया तो हमें न सही हमारे उत्तराधिकारियों को वह स्थिति जरूर मिल जाएगी, जो आज के हमारे प्रयासों की अपेक्षा कहीं अधिक उच्चस्तर की होगी। हममें से प्रत्येक का परम पवित्र कर्तव्य है कि जिस गायत्री साधना के प्रति हमारा सहज रुझान है, उसके प्रति निष्ठा और वफादारी का परिचय हम दें।
प्रातः सायं के सन्ध्याकाल में हम साँसारिक काम-धाम छोड़कर कुछ देर के लिए गायत्री उपासना में अपने को लगाते हैं। इस युगसंध्या में भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं की आपाधापी पर नियंत्रण करके जीवित रहने भर के लिए आवश्यक निर्वाह की व्यवस्था बनाकर तप-साधना में स्वयं प्रवृत्त होने और अन्यों को इसके लिए प्रेरित करने की बात सोचनी चाहिए।
यह भूलना नहीं चाहिए कि यह वर्ष प्रखर साधना वर्ष है। अपने संगठन के हर स्तर पर साधनात्मक गतिविधियों को इस वर्ष विशेष रूप प्रमुखता देनी होगी। यदि हम सामूहिक तप की ओर उन्मुख और सक्रिय हो सकें तो व्यक्ति, समाज और विश्वहित में हम लोग बहुत काम कर सकते हैं। ‘मनुष्य में देवत्व और धरती पर स्वर्ग अवतरण’ के अभियान की अग्रिम पंक्ति में खड़ा होने का अवसर सामने है। अपने देवपरिवार के निष्ठावान् सदस्यों को निम्नस्तरीय गतिविधियों से इनकार करके साहसपूर्वक तप-साधना के लिए विश्वामित्र एवं दधिचि की भाँति ऐसे कदम बढ़ाने चाहिए, जिसके लिए उनका अवतरण इन विशिष्ट घड़ियों में विशेष रूप से हुआ है।
जब भगवान बुद्ध आत्मशान्ति की खोज में गृह त्याग कर निकले और आत्मा की प्राप्ति का मार्ग विभिन्न गुरुजनों से उन्होंने पूछा, किन्तु जिज्ञासा यथावत रही तो उनके अन्तः से ही आवाज आयी-तप से अपने भीतर प्रकाश उत्पन्न कर।”
तप-साधना से मैं स्वयं ही उस परम तत्व को जानूँगा और उसे प्राप्त करूँगा-यह संकल्प उन्होंने लिया और वे आत्मबोध को प्राप्त कर बुद्ध कहलाये तथा धर्म चक्र प्रवर्तन जैसे महान कार्य को संपन्न कर सके।
भिक्षुओं को दीक्षा दी जा रही थी। उनके नाम, गोत्र, वेश और स्थान बदले जा रहे थे। अभ्यास के परिवर्तन पर जोर दिया जा रहा था। कारण पूछने पर तथागत ने बताया-साँप जिन दिनों केंचुली से लदा रहता है, उन दिनों न उसे कुछ दीखता है और न ही दौड़ते भी बनता है। केंचुली उतरते ही यह दोनों कठिनाइयाँ चलीं जाती हैं। व्यक्ति का कुसंस्कारी ढर्रा ही उसकी आत्मिक प्रगति में सबसे बड़ा व्यवधान है। इसलिए दीक्षा के रूप में मनःस्थिति परिवर्तन के साथ-साथ परिस्थिति और आदत बदलने के लिए भी कहा जा रहा है।”
केशर की क्यारियों में आग लगी थी। कश्मीर धधक रहा था। ‘धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले इस भू-भाग में जीवन, नरक से भी बद्तर बना हुआ था। देश अभी हाल ही में आजाद हुआ था। अनेकों बलिदानों -यातनाओं के बाद आजादी तो मिल गयी थी, पर वह खंडित थी। बँटवारे से क्षत-विक्षत हो, लहूलुहान होने का भयावह दर्द कश्मीर के भोले-भाले निवासियों को झेलना पड़ रहा था। संसार में सबसे अधिक बर्बर और लड़ाकू समझे जाने वाले अफरी और मसूद जाति के कबायली भूखे भेड़ियों की तरह कश्मीरी अवाम पर टूट पड़े थे। पाकिस्तान की सशस्त्र सेनाएँ छद्मवेश में उनके पीछे थीं।
आक्रमणकारी आग के सागर की तरह उमड़ते-घुमड़ते बढ़ते चले आ रहे थे। रास्ते में पड़ने वाले गाँवों को आग के हवाले करके वे हिन्दुओं और सिक्खों को खोज-खोजकर काट रहे थे। उनकी बहू-बेटियों को, रावलपिण्डी और पेशावर के बाजारों में पशुओं की तरह नीलाम करने के लिए जबरदस्ती बन्दी बना रहे थे। जो देशभक्त मुसलमान हिन्दू और सिक्ख को अपना भाई मानकर उनकी रक्षा कर रहे थे, उन्हें भी तत्काल मौत के घाट उतार दिया जा रहा था। इस नरसंहार में बहुत से ईसाई और अंग्रेज भी मारे गए थे। इन बर्बर आक्रमणकारियों को जहाँ-तहाँ रोकने के प्रयास में परमवीर बिग्रेडियर राजेन्द्रसिंह, मेजर सोमनाथ शर्मा और लेफ्टिनेण्ट कर्नल रणजीत राय को अपनी जानें गँवानी पड़ीं। कस्बों, गाँवों और गलियों में आतंक का साम्राज्य था। कश्मीर के हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई सब लोग अपनी जमीन-जायदाद सारी सम्पत्ति छोड़कर सुरक्षित पहाड़ियों की ओर भागे जा रहे थे।
भारतीय जवानों की संख्या हमलावरों की तुलना में नगण्य थी, फिर भी वे लोग लुटेरों को रोकने के लिए प्राणपण से कोशिश कर रहे थे। प्रायः सभी मोर्चों पर एक-सी स्थिति बनी हुई थी। इन्हीं में से एक मोर्चे पर भारी हिमपात हो रहा था। सेना के ट्रक बर्फ के नीचे दफन हो गए थे। भयावह शीत-प्रदेशीय जाड़े की मार से अनभ्यस्त भारतीय सैनिक व्याकुल थे, परन्तु देश की रक्षा के लिए जान हथेली पर रखकर जूझ रहे थे। अचानक शत्रुओं ने भारतीय सेना की उस टुकड़ी पर भयंकर धावा बोला। भारतीय सैनिक बहुत कम थे और दुश्मन हजारों। थोड़े से सेना के जवान इस शस्त्र सज्जित भीड़ का कब तक सामना करते? परन्तु भारतीय जवानों ने यह प्रण कर रखा था कि वे अन्तिम सैनिक तक लड़ेंगे। भारतीय टुकड़ी का एक-एक जवान शत्रु के कई-कई सैनिकों कबायलियों को यमलोक पहुँचाता हुआ धराशायी हो गया। अन्त में उस टुकड़ी का केवल कमाण्डर बचा था। वह भी बुरी तरह घायल था, फिर भी किसी तरह शत्रुओं को आगे बढ़ने से रोके हुए था।
अचानक उधर से गाँव का एक आदमी निकला। साधारण-सी कश्मीरी वेश-भूषा में स्वयं को लपेटे था। उसका नाम रामचन्द्र था और वह जाति का धोबी था। घर-बार लुट जाने के कारण वह जिस किसी तरह अपनी जान बचाकर भागा जा रहा था गोलियों की तड़तड़ाहट और गोलों के धमाकों से वह चौकन्ना हो गया। उसने इन आवाजों से अनुमान कर लिया कि यहीं कहीं भयानक युद्ध चल रहा है। वह छिपते-छिपते जैसे-तैसे जान बचाकर जाने लगा कि मरणासन्न वीर सेनानायक की आवाज कानों में पड़ी-भैया मेरी सहायता करो। जल्दी मेरे पास आओ।
पता नहीं कैसी दैवी प्रेरणा हुई, अपनी जान बचाकर भागने वाला रामचन्द्र बिना सोचे-विचारे उस सैनिक और के पास से गुजरा। शत्रुओं की ओर से अभी भी गोलियाँ वर्षा की बूँदों की तरह आ रही थीं। मोर्टार और गोले दग रहे थे। राइफलें, मशीनगनें और ब्रेनगनें गरज रही थीं। कमाण्डर ने उस देवदूत से कहा-भैया अब मैं उठने में असमर्थ हूँ। तुम ही इन हथियारों को चलाकर शत्रुओं का सामना करो। आखिर तुम भी तो भारतमाता के लाल हो। हमारी सहायता के लिए हमारे और जवान आते ही होंगे। डरो मत, उठाओ-हथियार मैं तुम्हें हथियार चलाना बताता हूँ।
परन्तु हथियार चलाना बताने के पूर्व ही वह मूर्च्छित हो गया। अब तो रामचन्द्र के सामने विकट समस्या थी। शत्रु सैनिक भारतीय चौकी पर कब्जा करने के लिए जी-जान से कोशिश कर रहे थे। उन्हें किसी-न-किसी तरह रोकना अति आवश्यक था। परन्तु हाय, बेबस रामचन्द्र अब क्या करे? वह ठहरा एक साधारण आदमी, हथियार चलाना भला क्या जाने? इसके पहले उसने ऐसे हथियार देखे तक नहीं थे। राइफलें, ब्रेनगनें, मशीनगनें, मोर्टार, हथगोले, राकेट सब कुछ वहीं उपलब्ध थे, परन्तु इस संकट की घड़ी में वह अस्त्र चलाने की विद्या कहाँ से लाए? विद्या कोई चीज वस्तु तो है नहीं कि उसे बाज़ार से खरीद ले। वह तो साधना से प्राप्त होती है, अभ्यास से प्राप्त होती है, गुरु से सीखी जाती है। रामचन्द्र के पास साधना-अभ्यास-गुरु इन तीनों में से कोई नहीं था। गुरु जो हो सकता था, वह मूर्च्छित पड़ा था। उसके मुँह से एक असहाय आह-सी निकली-काश मुझे हथियार चलाना आता।
रामचन्द्र आस्तिक व्यक्ति था। मन्दिर में घंटों बैठकर पूजा-पाठ तो वह नहीं करता था, परन्तु आदिशक्ति जगन्माता पर उसकी अपार श्रद्धा थी। विशेष अवसरों पर वह वैष्णोदेवी का दर्शन करने जाया करता था। उसने सुन रखा था आदिशक्ति गायत्री ने दुर्गा, काली, वैष्णोदेवी के रूप में अपनी अभिव्यक्ति की है। संकट के समय वह उन्हीं का स्मरण करता था। विकल हृदय से किया गया यह स्मरण ही उसकी साधना थी।
आज भी वह, शत्रु संहारिणी माँ वैष्णोदेवी का ध्यान करते हुए होठों से बुदबुदाने लगा-हे माँ! हमारे देश पर असंख्य लुटेरे चढ़ आए हैं। वे हमारे देश की शान्तिप्रिय जनता की धन-सम्पत्ति और जिंदगी लूट रहे हैं। गाँव-गाँव उजाड़ दे रहे हैं। इनसे देशवासियों की रक्षा तुम्हीं कर सकती हो। माँ! तुम तो राक्षसों का संहार करने वाली हो, शेर पर सवारी करने वाली हो, सारी विद्याएँ तुम्हारा ही रूप हैं। माँ! मुझे ये सारे हथियार चलाना सिखा दो ना! मैं तुम्हारा अकिंचन पुत्र हूँ। अपने लिए नहीं, अपने देश के लाखों लोगों की रक्षा के लिए मैं यह विद्या माँग रहा हूँ। माँ मुझ पर और मेरे देश पर कृपा करो।
रामचन्द्र आर्त पुकार करता हुआ आँखें मूँदे बैठा था। अचानक एक ज्योति-सी चमकी और अन्तःकरण एक मधुर ध्वनि से गूँज उठा। उठ जा! मैं प्रसन्न हूँ। हथियार उठा। देर मत कर।
बस क्या था, रामचन्द्र उठ खड़ा हुआ। उसने दनादन मोर्टार दागना शुरू कर दिया। मशीनगनों से गोलियाँ बरसाने लगा। वह जिस हथियार को छूता, उसे
चलाने का ज्ञान अपने आप हो जाता। शत्रु उसकी मार से जहाँ का तहाँ रुक गया। उसका एक भी वार खाली नहीं जा रहा था। उसे लगा, जैसे दो नहीं, उसके दस हाथ हैं। देखते-देखते दुश्मनों की लाशें बिछ गयीं। परन्तु दुश्मन इतने से भागने वाले नहीं थे। चार-पाँच दुस्साहसी शत्रु धीरे-धीरे गुप्त रूप से उसकी ओर बढ़ रहे थे और अब तो काफी करीब आ गए थे। रामचन्द्र ने आदिशक्ति माँ की कृपा से उन्हें देख लिया। उसने तपाक से उन पर पाँच-पाँच छह ग्रेनेड फेंके। वे वहीं चित्त हो गए। शत्रुओं का धीरज टूट गया। उन्होंने सोचा कि इस भारतीय चौकी पर और लोग आ गए हैं। अब तो जान बचाकर भागने में ही भलाई है। अपनी घबराहट में मोर्चा छोड़कर वे भाग गए।
बहुत देर बाद आहत-अचेत कमाण्डर की चेतना लौटी। उसने देखा एक ग्रामीण धुँआधार गोलियाँ बरसा रहा है और शत्रु सिर पर पाँव रखकर भागे जा रहे हैं। थोड़ी ही देर में मोर्चा खाली हो गया।
दुश्मनों का कहीं अता-पता न रहा। रामचन्द्र ने देखा कि सेनानायक के शरीर में अभी प्राण हैं, उसकी आँखें खुलीं हैं। उसने तुरन्त उसे अपने कन्धे पर उठा लिया और तीन-चार मील दूर स्थित सैनिक अस्पताल में पहुँचा दिया। सेनानायक फिर से बेहोश हो गया था।
भारतीय वीरों की बहादुरी के कारण शत्रु अपने इरादों में सफल नहीं हुए। कश्मीर युद्ध समाप्त हो गया। रामचन्द्र जैसे बहादुर नागरिक को भारत सरकार ने पुरस्कृत करना उचित समझा। उसे महावीर चक्र प्रदान किया गया। उसने यह सम्मान माँ वैष्णोदेवी के चरणों में लाकर समर्पित कर दिया। आदिशक्ति जगन्माता की कृपा की यह अनूठी गाथा भारत सरकार द्वारा प्रकाशित द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘आपरेशन्स इन जे. एण्ड के. इन 1947-48’ में पढ़ी जा सकती है। माँ आदिशक्ति की कृपा से कुछ भी इस दुनिया में असंभव नहीं।
अत्रि ऋषि के आश्रम में ज्ञानचर्चा चल रही थी। एक जिज्ञासु ने कहा- भक्तजन भगवान का दर्शन पाने, उनके निकट पहुँचने का प्रयत्न करते हैं, फिर शबरी में ऐसी क्या विशेषता है, जिसके कारण भगवान न केवल उसके घर पहुँचे, वरन् मान बढ़ाने के लिए उसके जूठे बेर भी माँग-माँगकर खा लिये?
अत्रि ऋषि ने कहा- शबरी भक्त ही नहीं सन्त भी है। वह रात्रि में भजन और दिन में परमार्थ कर्मों में निरत रहती है। मातंग ऋषि के आश्रमवासियों के वेत्रवती नदी तक पहुँचने का कँटीला मार्ग उसी ने झाड़ियों से रहित किया और नित्य ही उस मार्ग की सफाई भी की। भगवान ऐसे भक्तों को सम्मान देने स्वयं उनके घर पहुँचते हैं।
वैष्णव सम्प्रदाय के आचार्य सन्त रामानुज को गुरु-मन्त्र देते हुए, उनके गुरु ने सावधान किया-मन्त्र को गोपनीय रखना। सन्त रामानुज मन्त्र जप के साथ ही विचार करने लगे-यह अमोघ मन्त्र मृत्युलोक की संजीवनी है। यह जन-जन की मुक्ति का साधन बन सकता है, तो गुप्त क्यों रहे? उन्होंने गुरु की अवज्ञा करके मन्त्र सभी को बता दिया। एक स्थान पर अपने शिष्य को सामूहिक पाठ करते हुए सुना, तो वे क्रुद्ध हो गए, “रामानुज, तूने गोपनीय मन्त्र को प्रकट कर पाप अर्जित किया है। तू नर्कगामी होगा।” रामानुज ने गुरु के चरण पकड़ लिए-देव जिन्हें मैंने मन्त्र बताया है, क्या वे भी नर्कगामी होंगे?” गुरु ने कहा-नहीं वे तो मृत्युलोक के आवागमन से मुक्त हो जायेंगे। उन्हें तो पुण्य लाभ ही होगा।”
रामानुज के मुख-मण्डल पर संतोष की आभा चमक उठी, “यदि इतने लोग मन्त्र के प्रभाव से मोक्ष प्राप्त करेंगे, तो मैं स्वयं के लिए शतयोनि में नरक-गमन स्वीकार कर लूँगा।” अपने शिष्य के यह वचन सुनकर गुरु मुग्ध हो उठे। उन्होंने कहा-ऐसी भावना रखने वाला तो स्वर्ग का सर्वोच्च अधिकारी ही होता है।”
समस्याओं के आध्यात्मिक समाधान के लिए सामूहिक प्रयास अनिवार्य हो जाते हैं। भौतिक क्षेत्र में तो ऐसा हो सकता है कि तोप का एक बड़ा गोला सौ गोलियों जितना काम कर दे, किन्तु अध्यात्म क्षेत्र में ऐसा सम्भव नहीं है। यहाँ तो एक बड़ी मशाल की तुलना में सौ दीपकों का महत्व अधिक माना जाता है। हालाँकि भौतिक क्षेत्र में भी छोटी-छोटी इकाइयाँ मिलकर एक बड़ी संरचना बनने की बात को सर्वथा नकारा नहीं जा सकता। रुई का एक गट्ठा मरोड़कर वैसा मजबूत रस्सा नहीं बनाया जा सकता जैसा कि पतले-पतले धागों के संयोग से बनता है। सभी को मालूम है, बड़े मकान की संरचना छोटी-छोटी ईंटों के मिलने से होती है। लघु कणों के सम्मिश्रण से ही पदार्थ बृहदाकार ग्रहण करते हैं। चक्रवात की तुलना में हवा के छोटे-छोटे झोंके सन्तुलन-सामंजस्य बनाए रखते हैं। समुद्र की शोभा और छोटी कही जाने वाली लहरों के सामूहिक प्रयास पर टिकी होती हैं।
सामयिक विषमताओं-विपन्नताओं के समाधान का स्वरूप जब भी बन पड़ेगा, वह सामूहिकता के बलबूते ही संभव होगा। ये विषमताएँ दिखती भर दृश्य हैं, किन्तु इनकी जड़े कहीं गहरे अदृश्य में है। सामान्य क्रम में व्यक्ति और समाज के सम्मुख प्रतिकूलताओं, कठिनाइयों व समस्याओं के समाधान, निराकरण और अभिवर्धन के कड़वे-मीठे उपचार करने और साधन जुटाने होते हैं। प्रताड़ना और सहायता अपना-अपना काम करती हैं, इतने पर भी परोक्ष वातावरण की अनुकूलता-प्रतिकूलता की सफलता-असफलता बहुत कुछ निर्भर रहती है। विज्ञजन उस सम्बन्ध में भी जरूरी ध्यान रखते हैं। फसल उगाने के लिए वर्षाऋतु की प्रतीक्षा करते हैं अथवा अन्य उपायों से खेत को नम रखने का प्रबन्ध करते हैं। परोक्ष के सम्बन्ध में उपेक्षा बरतने से काम चलता नहीं। साधनों की तरह पराक्रम का भी, परिस्थितियों की तरह भावनाओं का भी ध्यान रखना होता है। अदृश्य, दृश्य से किसी भी कीमत में कम महत्वपूर्ण नहीं है। आज की परिस्थितियों के सम्बन्ध में तो यह और भी अधिक आवश्यक है। युगपरिवर्तन जैसे व्यापक और विशद प्रयोजन में तो दृश्य से भी कहीं अधिक अदृश्य का योगदान रहता है।
इस अदृश्य परिशोधन की सामयिक आवश्यकता पूरी करने के लिए आदर्शवादी भावनाशीलों की संयुक्त तप-सामर्थ्य सदा अपेक्षित रही है। उसका कोई और विकल्प नहीं हो सकता है। सीता अवतरण के लिए ऋषियों का एक-एक बूँद रक्त संग्रह करके घड़ा भरा गया था, जिसे हल चलाते समय राजर्षि जनक ने खेत में पड़ा पाया था। यह प्रयोजन एक व्यक्ति का सिर काट कर रक्त से घड़ा भर लेने से पूरा नहीं हो सकता था। उससे प्राणवानों की संयुक्त शक्ति वाला उद्देश्य कभी पूरा नहीं हो सकता था। यही बात दुर्गा अवतरण के सम्बन्ध में भी है। सभी देवताओं की संयुक्त शक्ति से प्रजापति ने महाकाली की संरचना की थीं। इन्द्र-कुबेर जैसे एक-दो वरिष्ठों को मिला देने भर से वह कार्य पूरा नहीं हो सकता था।
एक प्रकृति की अनेक प्राणवान इकाइयों को एक लक्ष्य के लिए नियोजित कर देने पर कितनी प्रचण्ड शक्ति उत्पन्न होती है, उसे सभी विज्ञजन भली-भाँति जानते हैं। प्रजापति ने ऋषि रक्त की बूँद-बूँद संग्रह करके घड़ा भरने का इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए परामर्श दिया था। दुर्गावतरण में देवशक्तियों की थोड़ी-थोड़ी शक्ति का संग्रह करने का प्रबन्ध भी इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए किया गया था।
राम-लक्ष्मण में बल कम न था। समुद्र को सुखा देने वाले बाण के धनी राम, रावण को आसानी से मार सकते थे। पर्वत को उखाड़ने वाले हनुमान लंका को भी पानी में डुबा सकते थे, किन्तु यह पर्याप्त न समझा गया। व्यवस्था यह बनी कि अधिक संख्या में रीछ-वानरों की उमंगों का संचय करके समन्वित प्राणशक्ति का उद्भव किया जाय। यह महत्वपूर्ण कार्यों के लिए नीति निर्धारण भी है, साथ ही प्राणवानों की संयुक्त शक्ति से उत्पन्न होने वाली प्रचण्ड क्षमता का रहस्योद्घाटन भी। भगवान कृष्ण क्या नहीं कर सकते थे। जरासन्ध, कंस और शिशुपाल की तरह वे कौरवों से अकेले निपट सकते थे, पर महाभारत में उन्होंने बड़े प्रयत्न से सहयोग जुटाया था। इतना ही नहीं उन्होंने गोवर्धन तक ग्वाल-बालों की समन्वित शक्ति से उठा तो अकेले भी सकते थे।
परशुराम के एकाकी प्रयत्नों का नगण्य परिणाम देखते हुए महात्मा बुद्ध ने दूसरी नीति अपनायी-यों दोनों के सामने एक ही जैसी समस्या थी। बुद्ध भी भगवान थे। परशुराम तीन कला के तो बुद्ध बीस कला के। फरसा वे भी उठा सकते थे, पर वे महान एवं व्यापक प्रयोजनों के लिए प्राणवानों की संयुक्त शक्ति का प्रयोग करने के पक्ष में रहे और उन्होंने चीवरधारी परिव्राजक स्तर के नर-नारियों की एक समर्थ विश्ववाहिनी खड़ी की। विश्व के कोने-कोने इसी प्रकार हो सका। शंकराचार्य ने भी बाद के समय में सामूहिक पुरुषार्थ का मर्म समझते हुए भारतीय संस्कृति के विकास हेतु दशनामी विशाल संन्यासी समुदाय का गठन किया।
पुराने जमाने में राजाओं के मल्लयुद्धों में थोड़े-से लोग हार-जीत का फैसला कर लेते थे और राज्य बदल जाते थे। गाँधी जी और अँगरेजों के बीच मल्लयुद्ध नहीं रचा गया। जनजागरण, जन समर्थन और जनसहयोग की संयुक्त शक्ति को उभारा गया और उस तूफान के सामने सर्वसमर्थ समझी जाने वाली सत्ता भी टिक न सकी। गाँधी की जीत का रहस्य इतना ही है कि उन्होंने देश के मणिमुक्तकों, साहसियों को कोने-कोने से ढूँढ़ निकाला और उन्हें एकजुट करके इतना बड़ा शक्तिपुंज एकत्रित किया, जिसने द्वितीय विश्वयुद्ध में जीतने वाले ब्रिटिश साम्राज्य को बुरी तरह पछाड़ दिया।
अवांछनीयताओं से लोहा लेने के लिए ही नहीं सृजन प्रयोजनों के लिए भी संयुक्त प्राणशक्ति का समय-समय पर प्रयोग होता रहा है। भगवान बुद्ध के समय एक लड़की ने जन-जन की अन्तः उदारता जगाने का व्रत लिया और उस आधार पर दुर्भिक्ष पीड़ित बालकों की प्राण रक्षा का ऐतिहासिक कार्य कर दिखाया। समुद्र का पुल बाँधने में रीछ-वानरों के तनिक-तनिक से सहयोग से कितना काम बन पड़ा, यह सर्वविदित है। देवर्षि नारद जन-जागरण के लिए निरन्तर परिभ्रमण करते थे। सूत जी सैनिकों को स्थान-स्थान पर एकत्रित करके प्रयत्नरत होने का प्रशिक्षण देते थे। ऋषि प्रणीत तीर्थस्थानों और बुद्ध कालीन विहार-संघारामों में सदाशयता की संयुक्त शक्ति को एकत्रित एवं प्रशिक्षित किया जाता था। भूतकाल के महान इतिहास की, भारत की साँस्कृतिक गरिमा की पृष्ठभूमि इसी आधार पर विनिर्मित हो सकी।
साधना क्षेत्र में यों होती तो व्यक्तिगत एवं एकान्तिक साधनाएँ भी हैं, पर उनका लक्ष्य, प्रयोजन एवं लाभ कर्ता तक ही सीमित रहता है। सर्वजनीन समाधान एवं संवर्द्धन के लिए यदि कोई बड़ा कदम उठाने की आवश्यकता हुई है, तो सदा समन्वित सहयोगी प्रयत्नों की आवश्यकता समझी और पूरी की गई है। राजतन्त्र द्वारा राजसूय यज्ञ ऐसे ही प्रयोजनों के लिए आयोजित किये जाते थे। उन्हें समारोह-सम्मेलन सत्प्रयत्न की भी संज्ञा दी जा सकती है। जो काम विद्वानमण्डली, तपस्वी-परिकर एवं शासक वर्ग अपने सीमित पराक्रम से सम्पन्न नहीं कर सकता था, उसे मध्यवर्ती भावनाशीलों की संयुक्त साधना शक्ति से भली प्रकार सम्पन्न कर लिया जाता था।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही इस वर्ष वसंत पंचमी से प्रखर साधना वर्ष का शुभारम्भ किया गया है। दिव्यदर्शी आसानी से समझ सकते हैं कि इससे उत्पन्न शक्ति से सामयिक परिस्थितियों से निबटा जा सकता है। इसका समय और विधान तो बहुत बड़ा नहीं है, परंतु प्रभावशीलता व्यापक है। अपने देवपरिवार के परिजन प्रारम्भ से ही साधनापरायण रहे हैं। गायत्री महामंत्र के आधार पर की जाने वाली तप-साधना उनकी रुचि एवं अभ्यास बन चुकी है। इसी साधना प्रक्रिया को उन्हें अधिकाधिक व्यापक बनाना और सामूहिक रूप से करना है। देखने-सुनने में यह प्रयोग बहुत छोटा और महत्त्वहीन-सा लगता है, पर बात ऐसी नहीं है।
संयुक्त प्राणशक्ति के उद्भव के प्रयोग-परिणाम की प्रतिक्रिया निश्चित रूप से असाधारण होती है। समय, श्रम, लक्ष्य एवं उपक्रम के बिखराव से महत्वपूर्ण शक्ति स्रोत भी बँटे-बिखरे व विश्रृंखलित रहते हैं। बिखराव में सामर्थ्य का कितना बिखराव होता है, उसके केन्द्रीकरण से उत्पन्न चमत्कार कितने प्रचण्ड होते हैं, यह सत्य किसी से छिपा नहीं है। वर्तमान प्रखर साधना वर्ष में सम्पन्न किया जाने वाला सामूहिक तप-पुरुषार्थ बिखराव के एकीकरण वाला विराट परिणाम उत्पन्न करने वाला है। साधकों की संकल्प-शक्ति उनकी तप-ऊर्जा का एकत्रीकरण और उसका वर्तमान विभीषिकाओं के समाधान में उपयोग, यही है वह महत्वपूर्ण आधार, जिसके कारण साधना वर्ष में की जाने वाली सामूहिक साधना से उन परिणामों की आशा की गयी है, जो प्रस्तुत विपन्नता से विश्वव्यवस्था को उबार सकें।
यह वह समय था जब भारत के तत्त्वज्ञान का आलोक विश्व के कोने-कोने में फैला हुआ था। दूर देशों से यात्री आते और भारत से ज्ञान ले जाकर अपने देशवासियों का जीवन उन्नतिशील बनाते। इसी क्रम में लगभग दो हजार वर्ष पूर्व एक बौद्ध मतावलम्बी सन्त ज्ञानार्जन के लिये भारत आया। उसने अनेक विद्यापीठ और विश्वविद्यालयों में रहकर भारतीय दर्शन शास्त्र का अध्ययन पूरा करने के बाद वह अनेक दुर्लभ ग्रन्थों की पाण्डुलिपियाँ अपने साथ लेकर अपने देश चीन लौट चला। वह नाव द्वारा जलमार्ग से अपने देश को वापस जा रहा था। लगभग आधी यात्रा के बाद तूफान आ गया। नाव में पानी भर गया और वह बोझिल होकर बैठने लगी।
उस सन्त के साथ वाले भारतीय छात्र उस आसन्न अन्त के समय भी अधीर न होकर ज्ञानग्रन्थों तथा विद्वान अतिथि की रक्षा का उपाय सोचने लगे। पूछने पर मल्लाह ने बतलाया-यदि एक-आध को छोड़कर बाकी सब लोग नाव को रिक्त कर दे तो नाव पार लग सकती है। बस फिर क्या था, सारे छात्रों ने सिन्धु के अथाह जल में कूदकर आत्मबलिदान कर दिया।
समाज, देश और संस्कृति के ऐसे साधक ही जनमानस के सच्चे प्रेरणा स्रोत हैं। इनकी परमार्थनिष्ठा से ही समाज और संस्कृति सुविकसित होते, फूलते और फलते हैं।
युगऋषि द्वारा बारह वर्ष की युग-सन्धि की अवधि घोषित की गयी थी। 1988-89 से लेकर सन् 2000 तक की अवधि को सभी अध्यात्मविदों-परिस्थितियों का आकलन करने वाले वैज्ञानिकों ने परमपूज्य गुरुदेव के स्वर में स्वर मिलाकर इसे परिवर्तन की वेला के रूप में प्रतिपादित किया था। इन दिनों एक अच्छा समय आने की संकट भरी पूर्व वेला से हम गुजर रहे हैं। यहाँ तक कि 1999 से 2000 की अवधि में अणुयुद्ध और खण्ड-प्रलय जैसी विभीषिकाओं का सामना करने तक की बात कही गयी है। ऐसी परिस्थितियों में हमें महाकाल की महायोजना को तीव्रतम गति देकर क्रियान्वित करने हेतु तत्काल ही गतिशील होना चाहिए। सामूहिक अध्यात्मिक अनुष्ठानों का क्रम विराट गायत्री परिवार के अधिष्ठाता, कुलपति द्वारा सन् 1942 से सतत् चलाया जाता रहा है, जबकि ‘अखण्ड ज्योति ‘ पत्रिका अपनी शैशवावस्था के मात्र चौथे वर्ष में थी। इस बीच द्वितीय विश्वयुद्ध करी पराकाष्ठा का समय आया, अणुबम का विस्फोट नागासाकी व हिरोशिमा में हुआ, भारत को आजादी मिली, छिटपुट युद्ध चलते रहे, जिनमें कश्मीर का एक हिस्सा भारत से अलग हो गया, अष्टग्रही योग, चीन युद्ध, पाक के विरुद्ध दो युद्ध अमेरिका के स्काईलैब का अनियंत्रित हो जाने की प्रक्रिया भी हुई। सभी संदर्भों में सामूहिक प्रयोगों में सभी वर्गों एवं सम्प्रदायों के सभी भावनाशील सम्मिलित हुए तथा उसके सत्परिणाम भी देखे गए। इसी का अब अंतिम चरण आ पहुँचा है एवं हम एक सहस्राब्दी बदलने से युग बदलने से कुछ ही दिन दूर हैं।
प्रस्तुत प्रखर साधना वर्ष में, देश-विदेश में गायत्री परिवार के प्रायः पचास हजार से अधिक केन्द्रों पर प्रचण्ड आध्यात्मिक आन्दोलन चलाया जा रहा है। इसमें हर जाति, सम्प्रदाय, वर्ग के भावनाशील-विचारशील साधक भाग ले रहे हैं। यह भागीदारी मात्र एक वर्ष की नहीं है। इसे महापूर्णाहुति होने तक व उसके बाद न्यूनाधिक रूप में सतत् सन् 2001 के बाद भी चलते ही रहना है। तब तक चूँकि भागीदारी करने वालों की संख्या बढ़ती ही चली जायेगी, उनकी थोड़ी-सी साधना मात्र से वही शक्ति उत्पन्न होगी, जिसे इस साधना वर्ष में पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रस्तुत भागीदारी करने वालों के दो वर्ग हैं-(1) नैष्ठिक साधक या वरणी साधक (2) सहयोगी अथवा भागीदार साधक। जो भी इस क्रम में जुड़ रहे हैं, उनके लिए साधना का स्तर निर्धारित कर दिया गया है, जिसे उन्हें कम-से कम महापूर्णाहुति तक नियमित चलाना है। इस साधना से जुड़ने वाले और अन्यों को जोड़ने वालों को ईश्वरीय सुरक्षा कवच तथा प्रगति के अवसरों का पुण्य-लाभ अपनी साधना-भावना के अनुपात में निश्चित ही मिलना है।
दृष्टिकोण स्पष्ट रहना चाहिए कि इस वर्ष का हम सबका नारा एक ही है “सामूहिक साधना द्वारा सबको सद्बुद्धि-सबको उज्ज्वल भविष्य।” इसी उद्देश्य से प्रायः पचास से अधिक स्थानों पर प्रशिक्षण क्रम पूरे भारत भर में चलाया गया है। पश्चिमोत्तर, सुदूरपूर्व व दक्षिण के जो भाग छूट गए हैं, वहाँ यह क्रम आगामी दो माह में पूरा हो जाएगा। जहाँ-जहाँ प्रशिक्षण हुए हैं- वहाँ से संगठनात्मक ढाँचा साधना की धुरी पर पूरे प्रभावक्षेत्र को दृष्टिगत रख बनेगा एवं एक भी हिस्सा ऐसा न रहेगा, जहाँ यह सन्देश न पहुँच पाए। अभियान में एकरूपता तथा प्रखरता बनाए रखने के लिए साधना पद्धति को बड़ा सुगम बनाया गया है। इसमें हर स्तर के व्यक्ति सम्मिलित हो सकते हैं। नये साधक 10 मिनट की प्रार्थना से यह क्रमशः जीवन-साधना के स्तर तक पहुँच सकते हैं, जहाँ उन्हें व्यक्तित्व-परिष्कार का लक्ष्य सहज ही सिद्ध होता दृष्टिगोचर होने लगेगा। साधना के इस क्रम में हमारे देश की भाषा, क्षेत्र, शिक्षा का स्तर, जाति-संप्रदायगत विभिन्नता को देखते हुए कई स्तर बनाए गए हैं। जिन्हें जो सुलभ लगे-वे उससे जुड़ सकते हैं अथवा जुड़ने हेतु प्रेरित किए जा सकते हैं। ये इस प्रकार हैं-
(1) एकदम नये व्यक्तियों को जो किसी मंत्र या उपासना पद्धति से नहीं जुड़े हैं-पहले चरण में मात्र दस मिनट ईश्वर की प्रार्थना इस भाव से करें कि सभी अनिष्ट से बचें, सबको सद्बुद्धि मिले व सभी उज्ज्वल भविष्य तक पहुँचे। इसके लिए निम्नलिखित भाषा विभिन्न भाषाओं में अनुवाद कर, टाइप कराके, छपवाकर वितरित की जा सकती है, ताकि अशिक्षितों को भी याद कराया जा सके व अपनी भाषा का भाव भी उनके मन में बना रहें, यह प्रार्थना है- ‘हे प्रभु आप हम सबको सद्बुद्धि दें, उजला भविष्य दें। प्रभु! मैं सदैव अच्छा ही सोचूँ, अच्छे ही कर्म ही करूं।’ दुहराई जा सकती है व इस दौरान अपने इष्ट का अथवा सूर्य के उगते स्वरूप का ध्यान भी किया जा सकता है।
(2) जो लोग किसी भी इष्ट या मंत्र के सहारे नियमित उपासना करते हैं- यथा ॐ नमः शिवाय, हरे कृष्ण, हरे राम, जय श्री कृष्ण, जय श्री राम, नमो भगवते वासुदेवाय, शब्द कीर्तन, जैन धर्म की प्रार्थना, नमाज के समय की प्रार्थना अथवा बाइबिल की प्रार्थना-का भाव और जोड़ लें। भावविह्वल होकर दस पंद्रह मिनट निर्धारित समय पर नित्य प्रार्थना करें। यदि सहमत हो सकें तो इष्टमंत्र, नाम-जप के साथ ही गायत्री मंत्र, उसका भावार्थ अथवा मात्र पञ्चाक्षरी जप की एक माला जपने के लिए प्रेरित किया जाय।
(3) जो लोग गायत्री महामंत्र का उपयोग बिना किसी संकोच के कर सकते हैं, उन्हें नियमपूर्वक साधना के लिए प्रेरित, प्रशिक्षित, अभ्यस्त किया जाय। ध्यान यह रखा जाय कि माला की गिनती का महत्व कम है- भावविह्वल होकर उदीयमान सूर्य के तेज का ध्यान करते हुए मंत्रजाप किया जाय। इस क्रम में नियमितता रखी जाय। जो दीक्षित नहीं हैं वे सतत् जप कर सकते हैं। ध्यान चाहें तो अपने इष्ट का, गुरुसत्ता का अथवा हिमालय के शिखरों का भी कर सकते हैं। यदि यह जप परिवार के सभी सदस्य सामूहिक रूप से कर सकें, तो पंद्रह से तीस मिनट किसी भी परिवार-समूह के अंग के लिए निकालना मुश्किल नहीं है। परिणाम अति चमत्कारी होंगे। यदि सप्ताह में एक बार करना शक्य लगे, तो अवश्य करें।
नियमित जप करने वाले साधक षट्कर्म से लेकर सूर्यार्घ्य दान तक का क्रम, शक्ति-संचार की साधना का क्रम, संयम के प्रतीक के रूप में रविवार या गुरुवार का अस्वाद व्रत अथवा एक समय भोजन तथा दान-पुण्य के रूप में धर्म घट में एक मुट्ठी अन्नदान एवं ज्ञानघट (गुल्लक) में प्रतिदिन पच्चीस पैसे ज्ञानयज्ञ के लिए अर्पित करें अथवा बच्चों से कराएँ।
ऊपर एक सामान्य क्रम विभिन्न वर्गों के लिए दिया गया है। वरणी स्तर के साधकों को तीन माला भावपूर्वक एक आत्मकल्याण के लिए, एक विभीषिकाओं के निवारणार्थ करना चाहिए, साथ ही सप्ताह में रविवार के फलाहार-न्यूनतम आहार सहित उपवास एवं गुरुवार को अस्वाद भी करना चाहिए। सहयोगी साधक एक माला गायत्री मंत्र की नियमित करें अथवा दस मिनट सामूहिक साधना में भावपूर्वक उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना मौन बैठकर करें।
यह समग्र अभियान वैयक्तिक, पारिवारिक एवं सामुदायिक स्तर पर भारत व विश्व के कोने-कोने में आगामी दो वर्ष तक चलेगा। इसके अतिरिक्त हर गाँव, कस्बे-शहरों के मुहल्लों में प्रशिक्षित कार्यकर्ता ढाई दिवसीय साधनात्मक आयोजन संपन्न कराएँगे, जो किसी निर्धारित स्थान पर सामूहिक रूप से होंगे। सामूहिक जप में बड़ी शक्ति है। इसमें समूहमन जाग्रत होता है एवं समूहमन के जागरण से प्रचण्ड शक्ति का उद्भव होता है। इस पर विस्तार से इस अंक में प्रकाश डाला गया है।
10 फरवरी, 2000 को वसंत पंचमी पर्व है। साधना के सामूहिक आयोजनों के साथ-साथ गाँव-गाँव दीपयज्ञों से साधना वर्ष की पूर्णाहुति
स्मरण रहे- यह साधना की धुरी पर संगठन के पुनर्गठन-गायत्री परिवार के विराटतम रूप लेने का समय है। इन दो वर्षों में युगपरिवर्तन की प्रक्रिया को जिन्हें अपने चर्मचक्षुओं से मात्र देखना ही नहीं, उसमें अपनी भूमिका भी सुनिश्चित करनी हो, उसके लिए यही सबसे उचित समय है। इसके परिणाम कितने विलक्षण होंगे, यह भागीदारी करने वाले अपने निजी जीवन में पारिवारिक परिकर में एवं समाज-क्षेत्र में स्वयं परिलक्षित कर धन्य हो सकेंगे। सारी विश्व-वसुधा पर मँडरा रहे भयंकर बचाव के लिए दैवी सुरक्षा कवच तथा संभावित सुख-सौभाग्य के लिए दैवी अनुदानों से लाभ उठाने का यह अंतिम अवसर है। इसमें निज की तो सुरक्षा है ही समूह का हित भी साथ जुड़ा है। महाकाल के खण्डनर्तन कभी-कभी ही होते हैं। अगले दिनों त्रिपुरासुर के मर्दन की पुनरावृत्ति लोभ, व्यामोह और अहंकार के कालपाशों से मानवता को मुक्ति मिलने के रूप में होने जा रही है। ऐसे त्रिपुरारी महाकाल की जय-जयकार कर हम स्वयं को इस महायोजना का भागीदार बना सकें, इससे बड़ा सौभाग्य इस समय का कोई और नहीं हो सकता, न कभी भविष्य में होगा।
पचास स्थानों पर संपन्न साधना प्रशिक्षण की अवधि में दो पुस्तिकाओं का वितरण किया गया है, जिनमें इस समग्र महासाधना अभियान की जानकारी है। आम आदमी इसमें कैसे जुड़ सकता है एवं ढाई दिवसीय आयोजनों में क्या कुछ कहा जाना है- यह सब इनमें विस्तार से दिया गया है। अभी इन्हें हिन्दी व गुजराती में प्रकाशित किया गया है। बाद में इनके सभी भाषाओं-अंग्रेजी सहित प्रमुख भारतीय व आंचलिक तथा विदेशी भाषाओं में भी प्रकाशन हो, इसके लिए उत्साहित प्रेरित किया जा रहा है। क्षेत्रीय परिजन इस कार्य को हाथ में ले इन संदर्शिकाओं को जन-जन तक पहुँचाएँ, इससे बड़ा पुण्य कर्म कोई और नहीं हो सकता। ये पुस्तिकाएँ 16-16 पृष्ठ की हैं-नाम हैं-
(1) सबके लिए सद्बुद्धि, सबके लिए उज्ज्वल भविष्य हेतु एक महान आध्यात्मिक सामूहिक प्रयोग।
(2) प्रखर साधना वर्ष-अखण्ड जप प्रधान कार्यक्रमों की रूपरेखा एवं महापूर्णाहुति का प्रथम चरण आरंभ होगा। 24 दीपों की आहुति से आरंभ हुआ यह क्रम ब्लॉकों या कुछ कालोनियों के समुच्चय-टाउनशिप में 240 दीपों के यज्ञ से बढ़ता हुआ जिले या शहर स्तर पर चौबीस सौ दीपों के यज्ञ में बदलता चला जाएगा। छोटे प्रांतों में एक स्थान पर, बड़े प्रांतों में दो या तीन स्थानों पर 24000 दीपों के यज्ञ में आहुतियों के बाद महापूर्णाहुति संभवतः देवोत्थान एकादशी सन् 2000 से आरंभ होकर गीता जयंती 2000 तक चलेगी एवं यह शान्तिकुञ्ज हरिद्वार की कुंभ नगरी के प्रायः पचास मील की परिधि में सम्पन्न होगी। प्रत्येक प्रान्त की भागीदारी हेतु तिथियाँ निश्चित होंगी। विराट महायज्ञ में आहुतियाँ दे साधक लौटते जाएँगे।
अगले बैंच के साधक आते जाएँगे। विस्तार से परिजन इस महापूर्णाहुति की जानकारी समय-समय पर पाते रहेंगे।
आज कल्पना यह की जा रही है कि सारे विश्व को गायत्रीमय बनाया जाय। मानवी आस्थाओं में घुसी अवांछनीयताओं की जड़ों को निकाल बाहर कर उनके स्थान पर सद्विचार-सत्कर्म भावसंवेदनाओं की स्थापना के लिए जिस महाशक्ति की आवश्यकता पड़ रही है, उसी का अवतरण युग शक्ति गायत्री के रूप में हुआ है, यह असंदिग्ध है। आज दुर्भावनाओं का असुर मनुष्य-मनुष्य के मन में, उनकी आस्थाओं में आधिपत्य जमा बैठा है, ऐसे में प्रखरतम-सर्वव्यापी निराकार स्तर की सद्बुद्धि का अवतरण करने वाली सत्ता ही युग परिवर्तनकारी अवतारी-सत्ता का रूप ले सकती है। ऐसी महाशक्ति का प्रादुर्भाव व चतुर्दिक् हो रहा विस्तार इस युग की सबसे बड़ी अलौकिक घटना मानी जा सकती है।
यह एक जाना-माना तथ्य है कि वातावरण में मनुष्य ढलता और बनता है किंतु असत्य यह भी नहीं कि मनुष्य द्वारा भी वातावरण ढाले और बनाये जाते हैं, जिनसे चिरकाल तक प्रवाहित होते रहने वाले संस्कारों की, विचारों की विलक्षण फौज न जाने ब्रह्माण्ड के किस कोने से दौड़ती हुई आती और बादलों की तरह आच्छादित हो जाती है। गायत्री उपासना में असत से सत की ओर अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की, अज्ञान में ज्ञान की स्थापना की विलक्षण शक्ति है। एकाकी साधना द्वारा वह मात्र जपकर्ता को, साधक को लाभान्वित करती है, तो सामूहिक अनुष्ठानों द्वारा उससे सारा समाज, राष्ट्र एवं युग प्रभावित होता है, इस अकाट्य सत्य से कोई इनकार नहीं कर सकता। आज सारे समाज में अचिन्त्य चिन्तन के कारण दुर्मति-जन्य दुर्गति-नैतिक पतन, लिप्साओं की होड़ एवं क्षुद्र अहंकार रूपी विष जो समा गया है, उसे धोने के लिए गायत्री रूपी सद्ज्ञान एवं यज्ञरूपी सत्कर्म के साथ संस्कारों की पावन त्रिवेणी के विस्तार की क्रान्ति खड़ी करने की आवश्यकता इसीलिए सर्वाधिक पड़ रही है कि इससे कम में आध्यात्मिक वातावरण विनिर्मित होगा नहीं। वातावरण में प्रविष्ट की गयी श्रेष्ठ आस्थाएँ ही इस देश की नहीं, अपितु समूचे विश्व को उत्कृष्टता के प्रति निष्ठावान् बनाए रख सकेंगी। वातावरण का प्रभाव सभी भली-भाँति जानते हैं। किसी को श्मशान घाट लाकर खड़ा कर दिया जाय और बताया न जाय कि यह क्या है, तो अनायास भय उसे लगने लगता है। पशुओं को उनके मालिक दिनभर एक स्थान से दूसरे स्थान तक लाते ले जाते रहते हैं, किंतु जैसे ही उन्हें वधगृह की ओर ले जाया जाता है तो उन्हें भी भय से काँपते देखा जा सकता है। श्रवणकुमार जैसे पितृभक्त का मय दानव की भूमि से होकर गुजरते समय सूक्ष्म प्रकम्पनों से प्रभावित हो अपने माता-पिता को काँवर से उतारकर चलना व पुनः उस क्षेत्र से बाहर आकर प्रायश्चित करना, बताता है कि वातावरण में घुसे कुसंस्कार कितने प्रबल होते हैं? इसके विपरीत हिमालय रूपी तपोभूमि, ऋषि-महर्षियों की कर्मस्थली रहे स्थान, तीर्थ परिसर, आश्रम जहाँ सत्प्रवृत्तियों का निर्वाह अभी भी चल रहा हो तथा देवालयों में सूक्ष्म ‘वाइब्रेशन्स’ अति प्रबल-आस्थाएँ जगाने वाले होते हैं। हिमालय में सभी अवतारों ने, ऋषि-महर्षियों ने तप किया है, तभी तो उसे अध्यात्म चेतना का ध्रुव केन्द्र माना गया है। इन संस्कारों का ही प्रतिफल है कि तमाम आधुनिकताओं के प्रवेश के बावजूद आज भी इस प्रदेश में पहुँचने वालों में श्रद्धा और भक्ति-भावनाएँ उमड़ती देखी जाती हैं। वातावरण न केवल शारीरिक स्वास्थ्य, खान-पान वेशभूषा, रहन-सहन को प्रभावित करता है, अपितु उसके सूक्ष्म संस्कारों में मनुष्यों के विचारों और भावनाओं को बदल डालने की जबर्दस्त ताकत निहित होती है। आज से कई वर्ष पूर्व डॉ. ब्रॉनलर द्वारा लिखे एक शोध-प्रबन्ध ‘ब्रेन रेडिएशन' के अनुसार यदि किसी क्षेत्र के लोगों में एक ही तरह के विचारों में अटूट निष्ठा हो तो उनके मस्तिष्कों से निकलने वाले मस्तिष्कीय विकिरण की सघन तरंगों का अनुपात वहाँ बढ़ जाता है व वह चिरकाल तक बना रहता है। इसे पिछले दिनों ‘आयडियोस्फियर’ नाम भी दिया गया है। जब यह समष्टिगत होकर विराट मन का रूप लेता है, तो उस क्षेत्र के वातावरण को बड़े जबर्दस्त ढंग से प्रभावित कर वहाँ उसी प्रकार के प्रभामण्डल का निर्माण कर डालता है। प्रस्तुत ‘प्रखर साधना वर्ष’ में संस्कार-महोत्सवों कथा-आयोजनों के पश्चात् आरंभ किए गए साधना-महापुरुषार्थ में यही तथ्य मन में विचार कर बारह वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण को तीव्र गति दी गयी है। इससे वह विराट प्रभामण्डल बनेगा, ऐसा वातावरण बनेगा कि भारत की देवभूमि के संस्कार निश्चित ही जाग्रत होंगे एवं इसके तपोभूमि के रूप में, जाग्रततीर्थ के रूप में स्थापित हो जाने की भवितव्यता सत्य होती दिखाई पड़ने लगेगी।
ग्रामे-ग्रामे यज्ञ, गृहे-गृहे गायत्री उपासना’ के अभियान ने विगत पाँच वर्षों में तेजी से गति पकड़ी है एवं अनीति-अनाचार-अनास्था से विषाक्त होते चले जा रहे वातावरण को परिमार्जित कर और न बिगड़ने देने की दिशा में बहुत कुछ मदद की है। देव-संस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत संपन्न हुए अश्वमेध महायज्ञों की ऊर्जा को सितम्बर-अक्टूबर 1996 से लगातार चल रहे संस्कार महोत्सवों की श्रृंखला ने जन-जन तक पहुँचाया है व अगणित प्राणवानों की ऊर्जा को भली-भाँति मथा है। संस्कारों के प्रचलन-प्रभावशीलता में तेजी आयी है, उससे परिवार संस्था ही नहीं-समाजपरिकर भी प्रभावित हुआ है, पर इतना ही पर्याप्त नहीं है। जब अनास्था का असुर तेजी से पैर पसार रहा हो- भारतीय संस्कृति की मान्यताओं पर अन्तरिक्षीय जगत से लेकर पठन-पाठन तक के माध्यमों, इलेक्ट्रॉनिक व प्रिन्ट मीडिया द्वारा निरन्तर हमला जारी हो तो श्रेष्ठ वातावरण बनाये जाने के प्रयासों को द्रुतगति से क्रियान्वित ही नहीं करना होगा, लोगों को वे सर्वमान्य हो सकें, यह पुरुषार्थ भी करना होगा। जाति-सम्प्रदाय प्रचलनों, रीति-रिवाजों की भिन्नता वाले हमारे राष्ट्र व सारे विश्व में श्रेष्ठ आस्थाओं के प्रति लगन को एक महामारी की तरह फैलाने के लिए ही यह साधना रूपी महासमर आरंभ हुआ था व अंतिम दो वर्षों में उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के रूप में यह भूमि के चप्पे-चप्पे में फैलने जा रहा है।
सामूहिक रूप से कहीं संकीर्तन चल रहा हो, अखण्ड जप चल रहा हो, रामायण का परायण अथवा अनुष्ठान संपन्न हो रहा हो तो उसका प्रभाव बड़ा व्यापक देखा जाता है। एकाकी उपासना से आदमी का अपना बाह्यान्तर मात्र प्रभावित हो सकता है, अधिक-से-अधिक परिवारजन व पड़ोसी प्रभावित होते देखे जा सकते हैं, किन्तु जब इन प्रेरणाओं को व्यापक रूप से जनशक्ति तक प्रवाहित करना होता है, तो उन्हें सामूहिक रूप देना पड़ता है। गायत्री मंत्र के -धियो यो नः प्रचोदयात्’ में यही शक्ति छिपी पड़ी है- जिसे सामूहिकता के परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है। ‘धियः’ अर्थात् हमारी, प्रचोदयात्, अर्थात् बलात् श्रेष्ठता की ओर प्रवृत्त करना। जहाँ ‘नः’ है, वहाँ व्यक्ति से परे समष्टि का, विराट अहं का सामूहिकता का भाव आ जाता है। जब हम सामूहिकता अनुष्ठान करते हैं, तो इस ‘नः’ में प्रचण्ड शक्ति आ जाती है, क्योंकि कई प्राणवानों की ऊर्जा उसमें समन्वित हो जाती है एवं सारे वातावरण को आंदोलित कर देने की, इच्छित दिशा में मोड़ देने की शक्ति उस अनुष्ठान में पैदा हो जाती है। इसी परिप्रेक्ष्य में, प्रस्तुत साधना वर्ष में केन्द्रों के माध्यम से प्रायः चौबीस हजार से अधिक स्थानों पर एक साथ सामूहिक अखण्ड जप का वसंत पंचमी से शुभारम्भ व इसका प्रतिमाह होते चले जाने वाला संभावित विस्तार एक प्रचण्ड वातावरण बनाने वाला युगान्तरकारी प्रयास, माना जा सकता है। ऐसा प्रयास जिसकी तुलना विगत के किसी साधनात्मक पुरुषार्थ से नहीं की जा सकती।
युद्ध और संकट के समय प्रायः प्रत्येक राष्ट्र में सामूहिक प्रार्थनाएँ आयोजित की जाती हैं। ईसाई धर्म में रविवार को नियत समय पर सब एक साथ बैठकर ईश्वर को याद करते हैं। मुस्लिमों में नियत दिन, नियत समय पर सामूहिक नमाज के पीछे भी यही सिद्धान्त कार्य करता देखा जाता है। आज मानवजाति पर छाया संकट किसी विश्वयुद्ध से कम नहीं है। एक युग जाना है-दूसरा नया युग आना है। युगपरिवर्तन के लिए दुष्टता, असुरता, अधर्म और आडम्बरों से लड़ने के लिए जिस महान शक्ति की आवश्यकता हो सकती है, वह दुर्गा से कम नहीं हो सकती। दुर्गा शक्ति देवशक्तियों के संघबद्ध होने की, सामूहिकता की प्रतीक है। इस दृष्टि से गायत्री का सद्बुद्धि की प्रार्थना का उज्ज्वल भविष्य के अवतरण की याचना का विस्तार बड़े व्यापक क्षेत्र में होना अत्यावश्यक है। यही विचार कर प्रस्तुत साधना वर्ष की शुरुआत इस तरह की गयी है। इससे जो वातावरण विनिर्मित होगा, जो अन्तः क्राँति उठ खड़ी होगी, जो अन्तःकरणों में छाये अज्ञान, अंधकार व अशक्ति-अभाव को नष्ट-भ्रष्ट कर एक नयी शक्ति को उपार्जन करेगी। सृजन के पूर्व मानवीय सम्वेदनाओं का मार्ग प्रशस्त करने के लिए सारे वातावरण को गायत्रीमय बनाने के अतिरिक्त और कोई उपाय अब हैं नहीं।
शब्दशक्ति के विज्ञानसम्मत आधार यह बताते हैं कि इस महामंत्र के चौबीस अक्षर, चौबीस महान शक्तियों के मर्मस्थल बीज और शक्तिकोष हैं, जो सारे ब्रह्माण्ड में हलचल मचा देने की शक्ति रखते हैं। स्फोट प्रक्रिया द्वारा ये मानवी व्यक्तित्व में भी ऐसा चमत्कारी परिवर्तन लाते हैं कि चिंतन का प्रवाह भी बदलता देखा जाता है- सभी की मिल- मिल−जुलकर की गयी साधना एक विराट समूहमन का निर्माणाधीन ब्रह्माण्ड में एक नहीं लाखों मिसाइलों का काम करती है। अपने राष्ट्र ने गायत्री मंत्र की उपेक्षा करके अपना वर्चस्व खोया था एवं अब युगऋषि-अवतारी सत्ता के परम पुरुषार्थ से यह श्रेय भारत को ही मिलने जा रहा है कि सारे भारत ही नहीं, विश्वभर में इस मंत्र को चप्पे चप्पे में गूँजता-निनादित होता सुना जाएगा एवं इसी के आधार पर भारत पुनः जगद्गुरु के रूप में स्थापित होने की प्रक्रिया संपन्न करेगा। भारत चक्रवर्ती था- सारे विश्व का मार्गदर्शन करता था, अब चप्पे-चप्पे में साधना शक्ति के गायत्री मंत्र की प्रेरणाओं के समावेश से यह पुनः सारे विश्व का नेतृत्व करेगा, भारतभूमि, देवभूमि-तपोभूमि एक विराट तीर्थ बनेगी, इसमें रंचमात्र भी सन्देह न कर, निज को साधनात्मक पुरुषार्थ में नियोजित कर ही देना चाहिए।
अजपा जाप सुनि मन धरे। पाँचों इन्द्रिय निग्रह करे॥ ब्रह्म अग्नि में होमे काया। तास महादेव बंदे पाया॥ धन जोवन की करे न आस। चित्त न राखे कामिनि पास॥ नाद बिन्दु जाके घट जरै। ताकी सेवा पारवती करै॥
महायोगी गोरखनाथ के प्राण इन स्वरों में झर रहे थे। साधना की महिमा बताते हुए उनकी तन्मयता अद्भुत थी। बाण गंगा कुण्ड के पास एकत्रित हुआ साधक वृन्द उनके शब्दों को महामंत्र मानकर आत्मसात् कर रहा था। वह कह रहे थे- योगियों! साधना ही जीवन का सार है। देश आज पथभ्रष्ट हो रहा है। जन ही नहीं, जननेतृत्व भी भ्रष्टाचार की पाप-पंक में आकण्ठ डूब चुका है। उसे सुपथ पर लाने के लिए, पाप-पंक से उबारने के लिए प्रचण्ड आत्मबल-सम्पन्न साधकों की आवश्यकता है। तपस्वियों की प्रखर आत्मचेतना से ही राष्ट्रीय जीवन में फिर से नव-प्राण फूँके जा सकते हैं। इसीलिए अपनी साधना को और अधिक तीव्र एवं प्रचण्ड करो। महायोगी के ये स्वर संध्या की लालिमा के शान्त होने के साथ शनैः-शनैः शान्त होते गए। सारा वायुमण्डल एक अपूर्व मौन से भर गया।
संध्याकाल के इस उपदेश के पश्चात् धूनी पर गुरु गोरखनाथ व्याघ्रचर्म पर एक लंगोटी और गुदड़ी में ध्यानमग्न हो गए। उन्होंने रात भीगने पर प्राणायाम प्रारम्भ किया। इड़ा-पिंगला नाड़ियों की शक्ति को ध्यान एकाग्र कर उन्होंने पूरक और कुम्भक प्राणायामों से सुषुम्ना में डाला और मंद पड़ी चेतना या कुण्डलिनी को ऊर्ध्वमुख किया।
उनकी चित्-शक्ति बल खाती नागिन के सदृश फुँकार कर ऊपर उठी। मूलाधार चक्र में वह घूमती रही। तदनंतर योगी के संकल्प से वह ऊपर चली। गुरु मूलाधार को चतुर्दश पद्म के रूप में देखने लगे। चिति कमल में चार पल्लव दीखे और कुण्डलिनी शक्ति वज्रा, चित्रिनी, ब्रह्मनाड़ी और सुषुम्ना में रेंगने लगी। यह भूलोक था और इसका रंग रक्त का था। गोरक्ष ने सोचा, यही संसार है। संसारी मूलाधार से ऊपर उठ नहीं पाते। उनकी कुण्डलिनी इसी भूलोक के रागारुण जीवन के सुख-दुख में सिमटी रहती है।
गोरक्ष ने मूलाधार चक्र में चार कमलदलों से वं शं षं सं अक्षरों की ध्वनि सुनी और लं तत्व बीज का नाद सुना। उन्होंने ब्रह्मा और उनकी डाकिनी शक्ति को एक चतुष्कोण यंत्र से निकलते पाया और वह ब्रह्मा और उनकी शक्ति की अजपा जाप से वन्दना करते रहे।
गुरु गोरख ने पुनः पूरक प्राणायाम किया और देर तक कुम्भक में प्राणतत्त्व को सीधे रहे। अब कुण्डलिनी फुफकारती हुई ऊँचे चलीं और लिंग स्थल के स्वाधिष्ठान चक्र पर रम गई। यहाँ कमल के छह दल थे और उनका सिन्दूरी वर्ण था। यहाँ योगी ने बं से लं तक अक्षर पाए। यहाँ जल तत्व था, जो कभी स्थिर होता, कभी लहरें मारता। बं तत्व बीज का नाद गूँजता। तब विष्णुदेव अपनी राकिनी शक्ति के साथ दर्शन देने लगे। वे चन्द्राकार यंत्र में विराजे थे और उसी से निःसृत होते और लुप्त हो जाते। यहाँ मकर की पीठ पर बं बं का नाद आसीन था, जो अपने नीचे मूलाधार के ऐरावत हाथी के ऊपर अधर पर स्थित था।
गुरु ने विचारा कि यह स्वाधिष्ठान स्थल भी संसारी जीवों के लिए है। मूलाधार में ही सब पशु-जीव बंधे हुए हैं। यहाँ विलास है या फिर वैभव-शासन और सुख। नहीं, मेरी कुण्डलिनी यहाँ नहीं रुक सकती। यह तो पशु क्षेत्र हैं, यों यहाँ भी कुछ ऊँचाई है, पर निर्द्वन्द्वता नहीं है। है तो आखिर यहाँ भी भवद्वन्द्व ही।
गोरक्ष ने पुनः श्वास फेफड़ों में भरा और उसे रोककर चेतना की गति पर ध्यान जमाया। वह फुँकार कर पुनः ऊँचे चल पड़ी और फन फैलाए हुए, मार्ग के अवरोधों को भस्म करती हुई, राग और भावना की तरंगों पर तैरती हुई, लोलिका या लोभ उसकी अतृप्ति में क्रोध के पाश काटती हुई वह मणिपुर चक्र में पहुँचकर मस्त हो गयी।
यहाँ गोरक्ष को कुछ सन्तोष हुआ। उन्होंने उदर को सिकोड़कर नाभि को भीतर किया और नाभिस्थलीय चक्र में घूमती चैतन्य शक्ति का सानन्द साक्षात्कार करने लगे। यहाँ कमल के दस दल थे। वे नीलवर्ण के थे और उन पर डं से फं तक अक्षर चिह्नित थे। बीज में रं बीज तत्व था, जो ‘र’ के आकार में चलता हुआ निनादित था और अधोकाया को गूंजा रहा था। यह बीजमंत्र मेढ़े पर बैठा था, जो त्रिकोण यंत्र पर बज रहा था। यहाँ इस बीज मंत्र पर बज रहा था। यहाँ इस बीज मंत्र से बूढ़े रुद्र की रचना हो रही थी और वह लाकिनी देवी को बायें बिठाएँ ध्यान लीन थे। यहाँ नाभिचक्र में अग्नि प्रज्वलित थी। योगी का चित्त इस चिति की धधकती धूनी में चैन पा गया और देर तक वहीं उनका ध्यान विराम पाता रहा।
तब गोरखनाथ को इस चक्र की सीमा भी याद आयी। यहाँ रूप का राज्य है और जहाँ रूप है वहाँ आसक्ति की अग्नि है। मैं यहाँ अधिक काल तक रुक नहीं सकता। मेरा यह लक्ष्य नहीं है। यह तो पड़ाव मात्र है। यहाँ वासना छूटने लगती है, पर सूक्ष्म रूपासक्ति बनी रहती है।
गोरक्ष पुनः प्राणायाम से अनाहत चक्र में जा पहुँचे। उनकी चेतना ने फुफकारकर मणिपुर चक्र और हृदय स्थित चक्र की बाधाएँ पार कीं और उन्हें लगा कि अब वह साँसारिक खींचतान से आहत नहीं हो सकते। अब चेतना नीचे लौट नहीं सकती। अब आग का मार्ग निर्विघ्न हो गया। गोरक्ष ने वक्ष फुलाकर हृदय में भ्रमण करती आत्मा को आनन्द का अवसर दिया और वह मुग्ध होकर बारह दल वाले कमल की गंध लेने लगे। यहाँ अरुणिमा थी, भावनाओं का राज्य था। वायु यहाँ नाम तत्व था। वायु का आधिक्य ही तो पशु-जीवों के भाव सरोवर में अनवरत वृत्ति वीथियाँ उपजाता है। यहाँ उन्हें ‘यं’ बीज मंत्र एक हरणि पर बैठा मिला और उसके मध्य योगी ने ईशानरुद्र और काकिनी का युगल देखा। वह छह कोने वाले यंत्र में अपने को विलम्बित कर ‘यं’ का नाद सुनते रहे। पुनः अनुचिन्तन में गोरक्ष का ज्ञान उभरा कि यह हृदय स्थल भी वात प्रधान है। यह रसानुभूति तो कराता है, राग को क्षुब्ध कर भावोर्मियाँ उठाता है और अंशतः तटस्थता और अंशतः निर्मलता से - कला रस से चैतन्य को तन्मय कर देता है यहाँ चेतना-भाव के तरंगाघात से आनन्द में किलोलती है, किन्तु इसमें भी स्थूल जीवन का अवशेष है। यहाँ रागारुणता है, अनुराग की सत्यता है, एकनिष्ठता है, किन्तु रस उच्चतर मौन है, यह ब्रह्मानंद नहीं, उसका कनिष्ठ सहोदर ही तो है। उसमें आत्मा की झलक तो है, पर भावुकता की सीलन है यहाँ। यहाँ भाववात्य चक्र में अधिक रुकने वाला नहीं हूँ। भाव से ही तो यह भव है।
गोरखनाथ ने विशुद्धता के संकल्प से पुनः प्राणायाम में पूरक और कुम्भक से साक्षी आत्मतत्त्व का जाग्रत रखकर भी, उसी के एक आयाम को विशुद्धाख्य चक्र तक पहुँचाया और भोक्ता और द्रष्टा एक साथ बन गए। यहाँ कंठ में सोलह दलों वाला कमल खिल गया। अ से अः तक स्वराक्षर यहाँ कमल के दलों पर लिखे थे और हं तत्व बीज के नीचे के भाग पर सदाशिव और डाकिनी का युगल था। सदाशिव के पाँच मुख थे और उनकी शक्ति भी पंचमुखी थी। हं से नीचे शून्य-सा बन जाता है, उसी में सृष्टि की धनात्मक और ऋणात्मक शक्ति देव युगल के रूप में केन्द्रित थी। उससे योगी की काया में परस्पर विरोधी सत्ताओं की एकता का नाद झंकृत होने लगा। देवयुगल के नीचे हाथी खड़ा था, जो सूँड़ उठाए जैसे सत्य को तलाश रहा था।
यहाँ शब्द का आनन्द था, किंतु शब्द मायावी भी हो सकता है और मायाकारक भी। अतः योगी अधिक देर नहीं ठहर सका। उसे शब्द के भय ज्ञात थे और उसमें सदाशयता की सम्भावनाओं के साथ उसे शब्द स्थित कंठ चक्र में प्रपंच की आशंका सताने लगी। गुरु गोरक्ष वहाँ न रुककर अपनी अन्तरात्मा को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने लगे।
आज्ञाचक्र में अपने को ठेलकर गोरखनाथ गदगद हो गए। यहाँ भ्रूमध्य त्रिकुटी में उनका केन्द्रित चैतन्य ओंकार में रमा, जो नाद को वाहन बनाकर पदार्थ मात्र के भीतर गूँज रहा था। गोरक्ष ने सृष्टि रहस्य नादघोष में ही पाया। प्रपंच के मूल में नाद है और कुछ नहीं। नाद ओंकार रूप है, अतः ॐ से सारा जगत बना है। नाद ही पंचभूतों को रचता है या वह स्वयं आकाश, वायु अग्नि जल और पृथ्वी तत्वों में जड़ रूप धारण कर लेता है। यह नाद लिंगाकार है, अनन्त है और इसकी शक्ति हाकिनी है, जो बहुमुखी है। गोरख देर तक द्विदल कमल के श्वेत रंग में, शिवलिंग की व्यापकता पर विचारते रहे, किन्तु उन्हें उसका अन्त नहीं मिला। शिवलिंग लिंगाकार मंत्र में शिव रूप में उत्थित था और उसका प्रकाश विमर्श रूप योनि के साथ मिलकर, उसके संघर्ष से पदार्थों और प्राणियों को जन रहा था।
गोरक्ष का योग जग गया था। अतः उन्होंने इसी ओम् ध्वनि को सुनना शुरू किया और ब्रह्माण्डमय होकर वह संपूर्ण प्रपंच में अन्तःस्थित हो गए। उन्हें सर्वत्र सब कुछ भासने लगा। समूचे राष्ट्र का-समस्त मानव जाति का अतीत वर्तमान और भविष्य उनकी चेतना में प्रकाशित हो उठा-समस्त समस्याओं का एक हल-अध्यात्म यह दैवी सन्देश उनके अस्तित्व में गूँज उठा। साधना से प्राप्त आत्मबल ही राष्ट्रीय एवं मानवीय समस्याओं का कारगर समाधान है। गोरक्ष को इस स्वयं प्रकाशित ज्ञान से प्रसन्नता हुई। इसी के साथ उनका ध्यान सहस्रार चक्र की ओर उन्मुख हुआ।
उन्होंने पूरक प्राणायाम से साँस भरी और चेतना को त्रिकुटी से ऊपर ले गए। यहाँ बिन्दु पर परमब्रह्म परम शिव की अनुभूति हुई। अं से क्षं तक सभी अक्षर कमल की हजार पंखुड़ियों पर जगमगा रहे थे। निराकरण पूर्ण चन्द्र में शिव और शक्ति एकीभूत फिर पृथक् स्थित थे।
यहाँ नाद बिन्दु में, बिन्दु नाद में, शिव शक्ति में, शक्ति शिव में एक-एक हो रहे थे और पृथक् पृथक् से वे अपनी भूमिका में भी सक्रिय थे। गोरक्ष को बीच में परम सत्य और उनके आस-पास दो शक्तियाँ दिखाई पड़ीं जो एक शक्ति की दो बहिनें थीं। शिव के बिन्दु से शक्ति उच्छून होकर बीज से अंकुरित होती है। उसके दो दल ही शिव और शक्ति है। फिर वह सृष्टि का पौधा बढ़ता है और एक शिव बिन्दु से कितनी ही शाखाएँ और पल्लव फूटते हैं।
मनुष्य के मस्तिष्क में सहस्रार चक्र में जाकर अपने गन्तव्य पर पहुँचकर चेतना नाम रूपमय संसार से परे चली जाती है। यही निर्वाण है, परम शून्यता है, प्रलयानुभूति है, सृष्टि के पर्व की निस्पन्दता है। यहीं शान्ति है। शून्य में ही शान्ति मिल सकती है। चेतना में क्षोभ होते ही अशान्ति अनुभव होती है, किन्तु वह अपने क्षोभों को स्वयं देख सकती है। यही तो चैतन्य या ब्रह्म का चमत्कार है।
क्रमशः गोरखनाथ शून्यातीत हो गए। दिक्-काल नाम रूप सब अदृश्य हो गए। बूँद और समुद्र मिल गए।
यही उन्नयनावस्था है, बल्कि यह अवस्थातीत समाधि है, जिसमें कुछ भी पृथक् से अनुभव नहीं होता। तारी लग गयी। गडुए का पानी नदी में मिश्रित हो गया। अहम् का नमक घुल गया। स्व चेतना विस्मृत हो गयी। पिण्ड और ब्रह्माण्ड एक हो गए। गोरक्ष समाधिस्थ हो गए।
शिष्यों ने यह क्षण पहचान लिया और वे गुरु के शरीर की रक्षा के लिए घेरा डालकर बैठ गए। वह ‘नमः शिवाय, नमः नाथाय, नमः गोरक्षाय’ जपने लगे। उन्होंने धूनी को चेताया, पर इतना नहीं कि ताप से गुरु की समाधि भंग हो जाए। यद्यपि सब को समाधि से जागरण की प्रतीक्षा थी, ताकि वे सब गुरुदेव का बुद्ध अलौकिक मिला। दैवी स्वरों को सुनने की सभी में आतुरतामय प्रतीक्षा थी।
अरुणोदय के साथ ही महागुरु गोरक्ष की समाधि टूटी और उन्होंने ओम् का दीर्घ स्वर में उच्चारण किया। शिष्य दौड़े और उन्होंने धूनी को दहकाया। गुरु के मुखमण्डल पर अनोखी आभा थी। वह जन करुणा और देश की चिन्ता में विद्युत की तरह दीप्त हो-हो कर क्षार-क्षार हो रहे थे। पहले तो उन्होंने एक अश्रुपूर्ण हुंकार भरी और फिर इस त्वरा से शब्द निकालने लगे, जैसे उनके मुख से विस्फोट हों रहा हो। प्रत्येक शब्द अग्निपुँज की तरह निकलता था और सीधे मर्म को बेधता था। उसमें कोई चक्कर, कोई बाँकपन नहीं था, सब कुछ पारदर्शी और निर्मल था। प्रत्येक उच्चारण पर उजाला-सा फैलता और फिर धूनी की लपटों और सूर्य की रश्मियों के साथ एकाकार हो जाता।
वह कह रहे थे, शिष्यों! मैं भारत देश की कल्पना एक सम्पूर्ण महायोगी के रूप में करता हूँ। इस महायोगी का शीश कश्मीर है। दाहिने हाथ का कमण्डलु माला और भुजा में पड़ी शृंगी अंग-अंग उड़ीसा है। बायें हाथ में त्रिशूल उसके ऊपर स्थित डमरू और असि है, धनुष-बाण हैं, यही तो गुजरात, राजपूताना पंजाब और पश्चिमोत्तर के प्रदेश है। मध्य में देश का हृदय मन, बुद्धि और अभिनिवेश आत्मा और आत्मस्थ तत्व की तरह मध्यप्रदेश है। इस मध्यवर्ती स्थल में महाकाल के सहचर इस पुण्यभूमि की महा-आत्मा हैं। उनमें देश की सर्वोच्च चेतना के शिखर हैं। उन्होंने मानव को उच्चताएँ दी हैं, गम्भीरताएँ भी, रहस्यमय अनुभूतियों के महासागर रचे हैं। दिव्यता के अद्भुत प्रतिमान निर्मित हुए हैं। नये-नये चिन्तन, तर्क और ध्यान-धारणा के उच्च, विचित्र और विविध कीर्तिमान उपलब्ध हुए है। महादेश भारत के दक्षिण प्रान्त इस महायोगी के दिव्य चरण हैं, जिन्हें महासागर अनवरत धोता रहता है। मैं इस साधना भूमि की दुर्दशा नहीं सह सकता। गुरु गोरक्ष बोलते जा रहे थे।
भगवान महाकाल मुझमें ताण्डव कर रहे हैं। मुझमें लय नहीं प्रलय है। योगियों! मैं अपने तेज से धधक-धधक कर राख हो रहा हूँ। मैं राष्ट्र की चेतना को रागी-अनुरागी बीन बजाकर उन्मत्त नहीं करना चाहता। मैं उसे तप बल-आत्मबल के कालदण्ड से जगाना चाहता हूँ। वह साधना के डंडे के संकेत पर ऊपर उठे, प्रगति एवं समृद्धि के चक्रों को बेधती जाय। फुफकारती- फुफकारती वह राष्ट्रीय अस्तित्व की अग्नि, वह चिन्मय ऊर्जा, वह संकल्पशक्ति उज्ज्वल भविष्य के सहस्रार का भेदन कर दे और उच्चानुभूति के पीयूष को पीवे। आप सब इसके लिए बहुत कुछ कर सकते हैं।
गहनीनाथ एवं निवृत्तिनाथ समेत सभी साधकों का समुदाय अपने गुरु की ओर टकटकी बाँधे देख रहा था। मानो सभी को उनके स्पष्ट आदेश की प्रतीक्षा थी। अन्तर्ज्ञानी गुरु ने अपने शिष्यों का अभिप्राय समझ लिया। वह कहने लगे-साधकों भगवान महाकाल ने भारतभूमि को तपोभूमि में रूपान्तरित करने का निर्देश दिया है। उनका आदेश है कि सभी साधक अपने जैसे असंख्य साधक बनाएँ और साधना की महाज्वाला इतनी प्रचण्ड हो कि असुरता उसमें भस्म हो जाय। इस वर्ष हमें इसके लिए अपने सर्वस्व की आहुति देनी है। तुममें से प्रत्येक को ध्यान रखना है कि वर्तमान की साधना ही अपने देश के उज्ज्वल भविष्य को साकार करेगी।
गुरु के इस दैवी सन्देश ने साधकों का उत्साह शतगुणित कर दिया। वे सभी अपने-अपने क्षेत्रों में अलख जगाने के लिए तत्पर हो गए।
स्वामी विवेकानन्द अपने शिष्यों के साथ पैदल भ्रमण को निकले। निर्माणाधीन मंदिर के पास उनकी तीव्र दृष्टि तीन मजदूरों पर पड़ी। उन्होंने उत्सुकतापूर्वक पहले से पूछा-क्यों भाई, क्या कर रहे हो? “ उसने उत्तर दिया-गधे की तरह जुटे हुए हैं, देख नहीं रहे हो। दिन भर काम करने पर थोड़ा-बहुत मिल पाता है, पर इतने के लिये ठेकेदार मानों जान निकाल लेता है। “ यही प्रश्न दूसरे से करने पर वह बोला-मन्दिर बन रहा है। हमारी तो किस्मत में यही था कि मजूरी करें, सो कर रहे हैं।” तीसरे ने भावभरे हृदय से उत्तर दिया-भगवान का घर बन रहा है। मुझे तो प्रसन्नता है कि मेरी पसीने की बूँदें भी इसमें लग रही हैं। जो भी मिलता है, उसी में मुझे खुशी है। गुजारा भी चल जाता है और प्रभु का काम भी हुआ जा रहा है।”
स्वामीजी ने शिष्यों से कहा-यह अन्तर है, तीनों के काम करने के ढंग में। मन्दिर तीनों बना रहे हैं, पर एक गधे की तरह मजबूरी में, दूसरा यंत्रवत भाग्य के नाम पर दुहाई देता हुआ व तीसरा समर्पण भाव से काम में जुटा है। यही अन्तर इनके काम की गुणवत्ता में भी देखा जा सकता है। क्या कार्य किया जा रहा है, यह महत्वपूर्ण नहीं - उसे किस उद्देश्य से-किस भावना से किया जा रहा है, यह मायने रखता है।”
जहाँ श्रेष्ठ कार्य होते रहे हैं, जिन स्थानों की अर्वाचीन अथवा प्राचीन गतिविधियों को देखकर आदर्शवादी प्रेरणा प्राप्त होती है, उन स्थानों को तीर्थ कहते हैं। जिन दर्शनीय स्थानों की श्रद्धालुजन तीर्थयात्रा करते हैं, उन स्थानों एवं क्षेत्रों के साथ कोई ऐसा इतिहास अवश्य जुड़ा है, जो तप-साधना एवं सेवाभावना का स्वरूप प्रदर्शित करता है। प्रायः सभी तीर्थों में ऋषि-आश्रम रहे हैं, गुरुकुल-आरण्यक चले हैं और परमार्थ सम्बन्धी विविध-विधि कार्य होते रहे है॥ देवालयों के दर्शन एवं नदी-सरोवरों के स्नान तो लोचन लाभ लेने एवं नूतनता अवलोकन के लिए हैं। श्रद्धा और साधना की बात दूसरी है, वह हो तो मिट्टी के द्रोणाचार्य, पत्थर के गिरिधर गोपाल और गोबर के गणेश बन सकते हैं, लेकिन यह सब तो घर पर भी हो सकता है। तीर्थ-महिमा एवं गरिमा के साथ उन स्थानों की लोकोपयोगी विशेषताएँ, तप-साधना एवं धर्मधारणा का भी समावेश रहता है।
तीर्थस्थानों तक पहुँचने और लौटने के लिए लोकसेवा एवं धर्मप्रचार के निमित्त पदयात्राएँ की जाती थीं। तीर्थयात्री मार्ग में जनसंपर्क साधते और उलझनें सुलझाते थे। यह लोकमानस परिष्कार का दिव्य प्रयोजन वर्षा के मेघों और वसन्त के पुष्पों के समतुल्य माना जाता था, जिनके कारण उपयोगी वातावरण का सृजन होता था। यह साधना एवं ज्ञान प्रचार की सेवा-साधना ही तीर्थयात्रा की आत्मा थी। उच्चस्तरीय प्रेरणा उपलब्ध एवं उत्पन्न करना ही तीर्थतत्त्व की आत्मा मानी गयी है। प्राचीनकाल में तीर्थ ऐसे ही थे और तीर्थयात्रा के निश्चित उद्देश्य एवं कार्यक्रम साथ लेकर आगे बढ़ते थे।
तीर्थ स्थापना का उद्देश्य था कि समय-समय पर अपनी सुविधानुसार व्यक्ति आए और उस उपयुक्त वातावरण में तीर्थवास करके कायाकल्प का लाभ उठाए। इस कार्य में तीर्थ संचालक-ऋषि इन आगन्तुकों की भावभरी सेवा-सहायता करते थे। अपने स्नेह-सौजन्य अतिथि-सत्कार एवं भावभरे परामर्शों से तीर्थयात्री को निहाल कर देने वाले व्यक्तित्व ही जीवन्त तीर्थ कहलाते थे। प्राकृतिक सौंदर्य के नदी-सरोवर उत्साह भरने वाले स्थान भी तीर्थवास के लाभ में चार चाँद लगाते और सोने में सुगन्ध उत्पन्न करते थे। इतने पर भी मूलकेन्द्र तीर्थों के साधनास्थल ही होते थे। उनमें प्राप्त होने वाली प्रेरणा तथा वहाँ रहकर की जाने वाली साधना ही आगन्तुकों को पुण्य फल प्रदान करती थी।
तीर्थतंत्र के संचालकों की गतिविधियाँ तीन भागों में विभक्त थीं- (1) तीर्थवास के लिए आने वाले धर्म-प्रेमियों के लिए साधना एवं शिक्षण की समुचित व्यवस्था। इसे क्रमबद्ध साधना सत्र प्रक्रिया भी कह सकते हैं। (2) तीर्थ के समीपवर्ती क्षेत्र को एक मंडल बनाकर उसमें पुरोहितों का परिभ्रमण करना और उस परिधि में नियमित रूप से अध्यात्म चेतना उत्पन्न करते रहने का उत्तरदायित्व सँभालना। (3) समय-समय पर उन तीर्थों में स्वल्पकाल के लिए दूर-दूर से आते रहने की प्रेरणा देना। यह कार्य धर्म सम्मेलन के रूप में होता था।
यह समस्त गतिचक्र तीर्थों की धुरी पर परिभ्रमण करता रहता था। यों बार-बार स्थान बदलने से, नये प्रकार की नयी व्यवस्था जुटानी पड़ती है और नयी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, समय की अलग से सूचना भेजनी पड़ती है और स्थानीय परिस्थितियों से ताल-मेल बिठाकर उनका प्रबन्ध करने में विशेष सूझ-बूझ एवं विशेष तत्परता का परिचय देना पड़ता है, किन्तु अमुक तीर्थ में अमुक पर्व पर पहुँचने की बात निश्चित रहने पर नये आमंत्रण भेजने से लेकर नयी व्यवस्था बनाने तक सारे झंझट मिट जाते थे। जब तीर्थ उपरोक्त तीनों भूमिकाएँ निभाते रहे होंगे, तब उनके सुखद परिणाम किस प्रकार किस परिमाण में प्रस्तुत होते होंगे? इसका परिचय अभी भी पुरातन इतिहास की झाँकी देखने पर मिल जाता है।
पर यह अतीत की चर्चा है। यह तथ्य भी है और इतिहास भी। इसकी साक्षी प्रस्तुत तीर्थों में जाकर लकीर पीटने के रूप में चलने वाली प्रथा-परम्पराओं को देखने से मिल सकती है। यहाँ पर्यटकों की धकापेल रहती है। पुण्य-प्रयोजनों का कहीं अता-पता तक नहीं। इन परिस्थितियों में तीर्थ भावना को पुनर्जीवित करने के लिए सोचा यह गया है कि वर्तमान साधना वर्ष में भारत के प्रत्येक गाँव को एक छोटे तीर्थ के रूप में विकसित किया जाय। मातृभूमि के कण-कण में देवता का निवास है। गाँवों और झोपड़ों में भी। आवश्यकता इस बात की है कि उन पर छाया पिछड़ापन धो दिया जाए और सत्प्रवृत्तियों की प्रतिष्ठापना की जाए। इतने भर से वहाँ बहुत कुछ उत्साहवर्द्धक, प्रेरणाप्रद और आनन्ददायक मिल सकता है।
ग्राम तीर्थ योजना का उद्देश्य है- ग्रामोत्थान, ग्रामसेवा, ग्रामविकास। इस प्रखर साधना वर्ष में इस प्रचलन के लिए घोर प्रयत्न किया जाए और उस परिश्रम को ही ग्रामदेवता की पूजा माना जाए। यह तीर्थ स्थापना हुई, जिसे स्थानीय निवासी और बाहर के सेवाभावी साधक मिल-जुलकर पूरा कर सकते हैं।
हर गाँव को एक तीर्थ रूप में विकसित करने के लिए स्थानीय स्तर पर युग साधक तीर्थयात्रा टोली निकाल सकते हैं। इन दिनों पदयात्रा को साइकिल यात्रा के रूप में मान्यता दे दी गयी है। चार साइकिल सवारों का जत्था पीले वस्त्र धारण किए, गले में पीला झोला लटकाए प्रवास चक्र पर निकलें। यह प्रवास अपनी सुविधानुसार एक सप्ताह-दस दिन अथवा पन्द्रह दिन का हो सकता है। इस कार्यक्रम के लिए प्रातः टोली निकले और रास्ते के सहारे वाली दीवारों पर प्रखर साधना वर्ष के सन्देश लिखती चले।
रात्रि को जहाँ ठहरना निश्चित हो, वहाँ शंख-घड़ियालों की ध्वनि के साथ गाँव की परिक्रमा लगायी जाए और ऐलान किया जाए कि अमुक स्थान पर, अमुक समय पर तीर्थयात्री मण्डली के भजन-कीर्तन होंगे। सायंकाल जो समय साधना वर्ष का सन्देश देने से पूर्व मिले, उसमें अपना भोजन पका-खा लिया जाए। अपना राशन और पकाने के बर्तन साथ रहें। इसमें अपनी कमायी खाने का पुण्य मिलेगा और किसी पर आश्रित भी न रहना पड़ेगा।
एक दिन के इस कार्यक्रम में सुगम संगीत से उपस्थितजनों को आह्लादित करने के साथ उन्हें यह भी बता दिया जाएगा कि ग्रामीणजनों को तपस्वी साधक कैसे बनाया जा सकता है। उन्हें वर्तमान समय में तप-साधना की महिमा-महत्ता बताने के साथ ही प्रौढ़ शिक्षा, बाल संस्कारशाला, स्वच्छता, व्यायामशाला, घरेलू शाक-वाटिका परिवार नियोजन, नशाबन्दी, वृक्षारोपण आदि सत्प्रवृत्तियों की आवश्यकता बताते हुए यह कहा जाए कि इन सत्प्रवृत्तियों को मिल−जुलकर किस प्रकार कार्यान्वित किया जा सकता है और इन प्रयत्नों का कैसे भरपूर लाभ उठाया जा सकता है।
सम्भव हो तो सभा के अन्त में उत्साही प्रतिभा वाले लोगों की एक समिति बना दी जाए, जो नियमित रूप से समयदान, अंशदान देकर इन सत्प्रवृत्तियों को कार्यान्वित करने में जुटे। गाँव की एकता एवं पवित्रता की ध्वज-स्थापना अश्वत्थं वृक्ष या पंचवटी के रूप में दूसरे दिन प्रातःकाल की जाए। यह देवप्रतिमा उपयोगिता एवं भावना की दृष्टि से अतीव उपयोगी है। इसके इर्द-गिर्द यदि एक चबूतरा भी बन सके, तो उसे कितनी ही सत्प्रवृत्तियों को केन्द्र बनाया जा सकता है। आये दिन उसके समीप बैठकर कार्यक्रमों को सक्रिय बनाने सम्बन्धी विचार-विनिमय चलते रह सकते हैं। इस कार्यक्रम की सफलता तब समझी जाएगी, जब कम-से-कम एक नैष्ठिक सदस्य उस गाँव में बने और वहाँ नियमित साधना के साथ समयदान, अंशदान देते हुए झोला पुस्तकालय चलाने लगे। यह प्रक्रिया जहाँ भी अपनायी जाएगी, वहीं एक उपयोगी संगठन बढ़ने लगेगा और उसके प्रयास से गाँव की सर्वतोमुखी प्रगति का उपक्रम चल पड़ेगा। यही है तीर्थभावना-ग्रामतीर्थ की स्थापना।
साधना वर्ष का सन्देश यही है कि ग्रामे-ग्रामे गृहे-गृहे जने-जने मूर्च्छना को जाग्रति में बदला जाए। नवजागरण के इस पुण्य प्रभाव में ग्रामीण अंचल के धर्म बिन्दु को उपेक्षित नहीं छोड़ा जा सकता। मैले कपड़े धोए जा सकते हैं-टूटी वस्तुओं की मरम्मत हो सकती है, रोगी को स्वस्थ बनाया जा सकता है- तो कोई कारण नहीं कि तीर्थचेतना को निहित स्वार्थों एवं अन्ध-विश्वासों से मुक्त कराकर उसे गाँव-गाँव तक अपने पूर्व रूप में न पहुँचाया जा सके।
नचिकेता ने यमाचार्य से भगवान को जानने की इच्छा प्रकट की, तब यमाचार्य ने कहा-
देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुर न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व, मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम्॥ कठोपनिषद्
हे नचिकेता! इस सम्बन्ध में तो देवता भी सन्देहग्रस्त हैं, योग-विज्ञान अत्यन्त सूक्ष्म होने से शीघ्र समझ में नहीं आता। इस कठिनाई में न पड़कर तुम अन्य कोई वरदान माँग लो, मुझे दबाओ मत।
किन्तु जब नचिकेता ने भोग और साँसारिक सुखों को भी तृणवत, तुच्छ और क्षण-भंगुर मानने का साहस अभिव्यक्त किया, तो यमाचार्य सन्तुष्ट हुए। उन्होंने कहा-दृढ़निश्चय और कठिनाइयों से लड़ सकने का जिसमें साहस है, वही योगी हो सकता है।
यह कठिनाइयाँ इसलिए और भयंकर हैं, क्योंकि भगवान को प्राप्त करने में जो समर करना पड़ता है, वह अपने आपसे ही करना पड़ता है, अपनी इच्छाओं को ही मारना पड़ता है। इसलिए उसमें प्रवेश से पूर्व ही उसका तत्त्वज्ञान समझना आवश्यक है। समझ-बूझ के साथ उठाया गया कदम लाभदायक होता है। औंधे-सीधे चल पड़ने और थोड़ी ही दूर चलकर वह मार्ग छोड़ देने से तो योगविद्या का उपहास ही होता है। इसलिए अस्थिर व बालक-बुद्धि लोगों को नहीं, निष्ठावान् साधकों को ही योग-मार्ग पर आरूढ़ होने की आज्ञा दी जाती है।
यदि मनुष्य अपने मन में उठने वाली अनेक प्रकार की कामनाओं और वासनाओं को रोक लेता है और उनका प्रयोग इन्द्रियों की इच्छा से नहीं, अपनी इच्छा से उस तरह कर सकता है, जिस प्रकार सारथी रथ में जुते हुए घोड़ों को, तो वह निश्चय ही अपनी शक्तियों का ऊर्ध्वगामी विकास करके परमात्मा की उपलब्धि कर सकता हैं
देवत्व के प्रति प्रगाढ़ निष्ठा और सम्मान की भावना देवभूमि भारत की प्राचीन परम्परा है। देवत्व का अर्थ है- विश्वकल्याण की कामना। जो सबके हित में अपने हितों का होम कर दे, वह देवपुरुष है। ऐसे माननीय पुरुषों को सम्मान देना योग्य बात है। समाज को सुखी और समुन्नत बनाने की कला सिखाने वाले और उस संकल्प की पूर्ति के लिए जीवनदान देने वालों की जितनी पूजा की जाय, वह कम ही है। महान सेवा के लिए महान श्रद्धा व्यक्त होनी ही चाहिए, साथ ही होना चाहिए महती साधना का अनुकरण।
देवत्व के प्रति श्रद्धा और पारस्परिक सद्भावना के प्रतीक के रूप में ही देव मन्दिरों का निर्माण किया जाता है। सद्भावना का लोकजीवन की सम्पन्नता से घनिष्ठ सम्बन्ध है। सामाजिक आचरण में जब दुर्भावनाएँ, अनाचरण, व्यामोह, विक्षिप्तता पारस्परिक वैमनस्य तथा आध्यात्मिक विकृति पैदा हो जाती है, तो जन-जीवन में दुःख, क्षोभ और वैमनस्य उमड़ पड़ता है। आज का लोकजीवन इन आसुरी प्रभावों से पूर्णतया सराबोर है। इसी से लोक तान्त्रिक ढाँचा लड़खड़ाता हुआ नजर आता है। इस मूढ़ता का करण लोगों की आध्यात्मिक साधनाओं से विमुखता है। विवेक या विचारशक्ति की न्यूनता के कारण ही लोग अपने मूल लक्ष्य से भटकते हैं। देवमूर्तियाँ लोगों के सद्भाव को जाग्रत करने की अलौकिक शक्ति रखती हैं, किन्तु उनके पीछे यदि किसी महान साधनापरायण व्यक्तित्व का हाथ न रहा तो केवल प्रतीक से किसी प्रकार के बचाव की संभावना न की जानी चाहिए। यही भूल यहाँ हुई है, पर अब आगे इससे सबक लेना है।
मोहम्मद गजनबी ने सोमनाथ के मन्दिर पर आक्रमण किया था। सोमनाथ के साथ करोड़ों रुपये की जागीरें थीं। बड़े-बड़े सन्त-महात्मा वहाँ निवास करते थे, किन्तु मूर्तिवाद के नाम पर फैले आडम्बर के कारण वह स्थान लोगों की श्रद्धा बनाए रख सका। आलस्य, प्रमाद एवं निठल्लेपन की वजह से वहाँ आध्यात्मिक ऊर्जा की सघनता भी न बनी रह सकी। इस सबके अभाव में बेचारी मूर्ति कैसे प्रतिवाद करती? उसे तोड़कर मोहम्मद गजनबी हीरे-जवाहरातों के जखीरे भर ले गया। धन गया, यह इतनी दुःखद घटना नहीं, जितनी कि आस्थाओं पर आघात हुआ। यह हृदय छेदने वाली बात है। धर्म-अध्यात्म के प्रति जिन्हें थोड़ी-बहुत भी प्रीति होगी, उनके दिलों में इस प्रकार की कसक उठना स्वाभाविक है।
इसमें एक ही बात सीखने को मिलती है कि देवालय बनें, किन्तु उनके साथ साधनापरायण तपस्वी जीवन का भी शिलान्यास हो। मूर्तियाँ स्थापित हों, किन्तु सद्भावनाएँ जगाने वाली प्रवृत्तियाँ भी उनके साथ जोड़ी जाएँ। विचार एवं व्यवहार से शिक्षा में पूर्णता आती है। देवालय शरीर का काम करते हैं, सद्भावनाएँ जाग्रत करने वाली प्रवृत्तियाँ उनमें प्राण का काम करती हैं। देह और प्राण के सम्मिश्रण से चैतन्यता आती है। अकेली देह निर्जीव है। हम देवालयों के महत्त्व को जानते और मानते हैं, पर वे प्राणविहीन न हों।
इन दिनों देवमन्दिरों में दिखावट और ढोंग बनाकर लोगों की श्रद्धा और उनके विश्वास छीन लेने की जो चोरबाजारी चल रही है, उसे किस तरह दूर किया जाए, यह एक विकट समस्या है। अधार्मिक लोगों का अन्धश्रद्धा वालों के साथ जो व्यवहार चल रहा है- इसे दूर करना वर्तमान साधना वर्ष की सबसे पहली प्राथमिकता है। समाज में सौमनस्य, आध्यात्मिक उन्नयन और सदाचार जगाने की विवेकपूर्ण प्रवृत्तियाँ किस तरह जागरूक हों? इन समस्याओं का यदि तत्काल समाधान न किया गया तो देवभूमि भारत की आध्यात्मिकता निरन्तर खोखली होती चली जाएगी और जो धर्म के बचे-खुचे अंकुर शेष हैं, उन्हें भी नष्ट होने में देर न लगेगी।
अब यह तथ्य लोगों को समझ ही लेना चाहिए कि देवमन्दिरों के दर्शन का जो प्रयोजन लोग लेकर चलते हैं, वह वास्तव में सिद्ध नहीं होता। देव-स्थानों के दर्शन के बाद भी लोगों की नैतिकता का, तप-साधना का, व्यावहारिक अध्यात्म का विकास न हो तो कौन कह सकता है कि आपने देवत्व के दर्शन किए, इससे तो यही समझा जाएगा कि लोगों ने समय, श्रम और धन का अपव्यय ही किया है। इस जीवन में देवत्व को प्राप्त न कर सके तो कौन जाने मृत्यु के बाद कोई पारलौकिक सुख मिलेगा भी या नहीं। कोई भी विचारवान व्यक्ति इस बात पर विश्वास कर लेगा, ऐसा समझना कठिन है।
देवस्थानों का निर्माण लोगों में आध्यात्मिक प्रवृत्तियाँ, साधनात्मक संस्कार जाग्रत करने की दृष्टि से किया जाता है। इस क्रम में यही आशा की गयी थी कि तपस्वी साधकों का सत्संग लाभ लोगों को अधिक मिले, साथ ही स्वाध्याय-आध्यात्मिक संगठन आदि का अखण्ड यज्ञ देवालयों में चलता रहे। पर व्यवहार में आज यह सब नहीं रहा। लोग आते हैं, चन्दन-अक्षत-पुष्प-पाई-पैसा आदि की सस्ती भेंट चढ़ाकर अपनी अन्धश्रद्धा व्यक्त करके चले जाते हैं। उनके जीवन में किसी प्रकार का प्रकाश उत्पन्न नहीं होता। वही आसक्ति, वही वासना, क्रोध-मोह सबका सब वही। न पारिवारिक जीवन में किसी तरह का उल्लास आया, न गन्दी आदतें छूटी। अन्तःकरण में अच्छे संस्कार न बढ़ें और आप यह मान्यता बना बैठें कि परलोक में आपको स्वर्ग मिलेगा, तो इस पर कोई विश्वास न करेगा। आत्मबल, उत्सर्ग, संयम, त्याग और प्रखर साधना की प्रामाणिकता इस जीवन में न मिली तो इसे परमात्मा की अकृपा ही समझना चाहिए। इसके बिना जीवन में किसी तरह का कल्याण सम्भव नहीं है।
वर्तमान साधना वर्ष में जिस आध्यात्मिक ज्वार को लाने की कामना की गयी है, उसका आधार है- विवेक, जो आत्मज्ञान पैदा करता है। इस जीवन में आत्मज्ञान का सम्पादन न हो और परलोक में जीवन-मुक्ति का विश्वास करें, तो इसे हास्यास्पद ही माना जाएगा। आध्यात्मिक विकास मनुष्य के आत्मज्ञान और सत्प्रवृत्तियों के रूप में दिखाई देता है। इन्हीं के आधार पर देवजीवन की कल्पना व कामना की जाती है।
देवालयों का महत्त्व इसलिए नहीं होता कि उनमें परमात्मा की मूर्ति स्थापित होती है। प्रतिमा परमात्मा का प्रतीक मात्र है। अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए ईश्वर के बाह्य कलेवर को मूर्ति रूप में मान लेते हैं, किन्तु उसकी आत्मा तप-साधना में सन्निहित है। देवालय का अर्थ है- जहाँ तपस्वी देवपुरुषों का निवास हो। उनके सत्संग से ही परमात्मा के आन्तरिक कलेवर को प्राप्त करते हैं। इसी दृष्टि से देवस्थानों का महत्त्व होता है।
जड़ में भी परमात्मा का अस्तित्व मानने की अपूर्व श्रद्धा और देवालयों की भावनात्मक विशेषता के परिणाम-स्वरूप दर्शन करने वालों में जो संस्कारों की सूक्ष्म प्रतिक्रिया होती है, उसी से लोककल्याण का पथ-प्रशस्त होता है। अखिल विश्व में परमात्मा की व्याप्ति, भावनाओं की शुद्धि और जीवन की सफलता के लिए विवेकपूर्ण प्रवृत्तियों का संचालन हो तो ही देवालय देव को देवभूमि बना सकते हैं।
इस प्रखर साधना वर्ष में जो युगसाधक देवालयों को अपनी सक्रियता का केन्द्र बनाकर शिक्षा, सद्भावना और जीवन दिशा का प्रशिक्षण देने का उत्तरदायित्व वहन करें, उन्हीं से कुछ लोकोपकार की कामना की जा सकती है। देवालयों के माध्यम से चरित्र, प्रेम, मैत्री, करुणा, दया, मेधा, मनस्विता की शिक्षा देने का गुरुतर कार्य सँभलना साधना वर्ष की कसौटी भी है और इसके भागीदार साधकों की जिम्मेदारी थी। लोक-जीवन को साधनापरायण बनाना ही उनका उद्देश्य है। आध्यात्मिक भावनाओं का प्रसार और संस्कारों की प्रशस्ति का उत्तरदायित्व देवालयों का है। इन्हीं के आधार पर उनको इतना महत्वपूर्ण स्थान मिला है। इस वर्ष क्षेत्रीय स्तर पर इनको साधना केन्द्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, ताकि यह सर्वविदित हो सके कि आध्यात्मिक प्रशिक्षण एवं ब्रह्मकर्म के निर्वाह के कारण ही उनका महत्व सर्वोपरि है। इस गौरव को प्राप्त न कर सके तो देवालयों की महिमा महत्ता शून्यवत ही है।
स्मरण रहे, देवालयों ने ही भारत महादेश को देवभूमि का गौरव प्रदान किया था। आज इनके उत्कर्ष की पुनः आवश्यकता है। इस क्रम में हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि बाह्य कलेवर की अपेक्षा आन्तरिक भावनाओं की उपासना अधिक फलवती होती है। हमें पाषाण नहीं, देवत्व की आत्मा को मूर्ति-रूप में पूजना है। इतना कर सके तो समझा जा सकेगा कि साधना वर्ष का आयोजन सफल ही नहीं शानदार भी रहा। देवालयों को इस प्रखर साधना वर्ष में साधना केन्द्रों के रूप में विकसित करके ही भारत को पुनः देवभूमि का गौरव प्रदान किया जा सकता है।
मनुष्य जितना दीन-हीन स्वल्प शक्ति वाला कमजोर प्राणी है, यह प्रतिदिन के जीवन से पता चलता है। उसे पग-पग पर परिस्थितियों के आश्रित होना पड़ता है। कितने ही समय तो ऐसे आते हैं, जब औरों से सहयोग न मिले तो उसकी मृत्यु तक हो सकती है। इस तरह विचार करने से तो मनुष्य की लघुता का ही आभास होता है, किन्तु मनुष्य के पास एक ऐसी भी शक्ति है, जिसके सहारे वह लोक-परलोक की अनन्त सिद्धियों-सामर्थ्यों का स्वामी बनता है। यह है प्रार्थना की शक्ति, परमात्मा के प्रति अविचल श्रद्धा और अटूट विश्वास की शक्ति। मनुष्य प्रार्थना से अपने को बदलता है, शक्ति प्राप्त करता है और अपने भाग्य में परिवर्तन कर लेता है। विश्वासपूर्वक की गई प्रार्थना पर परमात्मा दौड़े चले आते हैं।
-उपासना समर्पण योग (वा0 क्र0 3) से
वाणी के अपव्यय को रोकना प्रत्येक मनीषी ने आवश्यक ही नहीं अनिवार्य बताया है। मनोविज्ञान वेत्ताओं का कहना है कि मौन से विचार-शक्ति बढ़ती है। जो व्यक्ति मौन रहते हैं, उनकी बुद्धि, अपेक्षाकृत अधिक स्थिर तथा सन्तुलित रहती है। सन्तुलित विचारों वाला हानि-लाभ हित-अहित के प्रसंगों पर बड़े धैर्यपूर्वक सोच-समझ सकता है। संकट या आपत्ति के समय मौन द्वारा प्रखर की हुई विचार-शक्ति बड़ी सहायक सिद्ध होती है।
-जीवन देवता की साधना-आराधना (वा0 क्र0 - 2) से
इस समय सारा विश्व परिवर्तन के तूफानी दौर से गुजर रहा है। इसमें एक ओर जहाँ विध्वंस की गगनचुम्बी लपटें सारी मानवजाति को झुलसा रही हैं, वही सृजन के शीतल झोंके भी जोर पकड़ रहे हैं, किन्तु अभी विध्वंस का ही पलड़ा भारी प्रतीत होता है, हालाँकि वह अपनी अन्तिम साँसें गिन रहा है और हारती बाजी को जीतने के लिए अपनी समूची शक्ति दाँव पर लगा रहा है। हम बीसवीं सदी के ही नहीं, दूसरी सहस्राब्दी के भी अन्तिम दौर से गुजर रहे हैं। प्रथम सहस्राब्दी के अन्तिम वर्ष भी भारी विपत्तियों एवं उथल-पुथल से भरे रहे थे। काल के इसी क्रम में वर्ष 1999 भी परिवर्तन की विशेष सम्भावनाओं के साथ आया है। ऐसा भविष्य के गर्भ से झाँकने वाली सारी विधाओं एवं उनके विशेषज्ञों का मत है।
युगपरिवर्तन आन्दोलन का ताना-बाना बुनने वाले महाकाल के अग्रदूत परमपूज्य गुरुदेव ने आज से 30 वर्ष पूर्व ही जनवरी, 1969 की अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों में ‘वसन्त पंचमी हमारा प्रधान पर्व’ शीर्षक से घोषणा की थी ‘अब से तीस वर्ष बाद युगपरिवर्तन का स्पष्ट स्वरूप अपनी झलक-झाँकी दिखाने लगेगा।’ उक्त भविष्यवाणी
1999 में होने वाली सम्भावित उथल-पुथल के संदर्भ में ही है। दिल्ली से प्रकाशित होने वाली ज्योतिष विद्या की मासिक पत्रिका ‘टाइम्स ऑफ एस्ट्रालॉजी’ ने अपनी ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर वर्ष 1999 के अद्भुत ग्रहयोग पर प्रकाश डाला है। सम्पादक महोदय के अनुसार यह ग्रहयोग वर्ष 1999 की वसन्त पंचमी से प्रारम्भ हो चुका है। पत्रिका के अनुसार संक्रमणकाल के इस दौर में ऐसा विध्वंस योग समूची मानवजाति को विश्वयुद्ध की आग में झोंक सकता है। परमाणु अस्त्रों से भरे विश्व में ऐसे युद्ध की सर्वसंहारक स्थिति को मात्र दैवी हस्तक्षेप ही किसी छोटी घटना के रूप में टाल सकता है।
एक अन्य ज्योतिर्विद् ने भी अपनी गणनाओं के आधार पर इस अद्भुत ग्रहयोग की पुष्टि की है। उनके अनुसार इस भयावह स्थिति का बीजारोपण 13 जनवरी, 1999 से ही हो चुका है। यह स्थिति 13 जनवरी, 1999 से लेकर 15 अगस्त, 2000 तक रहेगी, क्योंकि तब तक मंगल तुला राशि तथा शनि मेष राशि पर रहेंगे। यह महासंक्रमण काल 13 जनवरी, 1999 से 15 अगस्त, 2000 तक ही है।
इसके पश्चात् शान्ति का वातावरण बनेगा, जिसमें भारत मूर्धन्य रहेगा।
भारत के सुप्रसिद्ध ज्योतिष-विज्ञानी प्रो. बी.वी. रमण ने हाल ही में एक पुस्तक प्रकाशित की है ‘नो वर्ल्ड वार इन 2001 ए.डी.। उनका ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर कहना है कि पृथ्वी के नष्ट होने की संभावना यद्यपि कम नहीं है, फिर भी विश्व स्तर पर ऐसे आध्यात्मिक प्रयास होंगे, जो मानवता को तीसरे विश्वयुद्ध की आग से बचाए रखेंगे। लेखक का मानना है कि भविष्य में होने वाले युद्धों की सीमाएँ और संभावनाएँ खाड़ी युद्धों से अधिक नहीं होंगी। 28 मई, 2000 से ऐसी सम्भावनाओं की प्रबलता बढ़ेगी, जो विश्व शाँति, सद्भावना एवं एकता के किसी नए आयाम को जन्म दें। इस प्रकार इक्कीसवीं सदी का आरम्भ समूची दुनिया में शान्ति और सद्भावना का नया युग लेकर आएगा।
भारत के प्राचीन ऋषियों के भविष्य कथन सम्बन्धी अन्वेषणों-अनुसंधानों में भृगुसंहिता का स्थान अद्वितीय है। इसके विशेषज्ञों के अनुसार मेष राशि में शनि और बृहस्पति की युति पूरे विश्व इतिहास पर प्रभाव डालती है। यह ग्रहदशा 28 मई, 2000 को पड़ेगी। इसके बाद भारत अधिक ताकतवर होता जाएगा। भारत की कुण्डली में छठा स्थान गुप्त शक्तियों का है। इसी से पुनरुत्थान, नये फैसले और नए बदलाव होते हैं। आगामी कुछ वर्षों में ही देश के प्रशासन में आमूल-चूल रूप से क्रान्तिकारी बदलाव आएगा। पूरा देश किसी एक मिशन को लेकर काम करेगा, साथ ही प्राचीन भारतीय चिन्तन को बढ़ावा मिलेगा।
चर्चित कन्नड़ पत्रिका ‘तरंग’ में प्रकाशित भविष्यवाणी के अनुसार 7 मई, सन् 2000 को ब्रह्माण्ड के आठ ग्रहों के एक साथ मिलने की सम्भावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मिलन के परिणाम काफी व्यापक परिवर्तन लाने वाले होंगे। विश्व के प्रख्यात ज्योतिषविदों के अनुसार 8 मई, 2000 को एक अद्भुत एवं महत्वपूर्ण घटना घटना वाली है। ज्योतिषाचार्यों की मान्यता है कि उस दिन पृथ्वी के एक तरफ सभी ग्रह सीधे एक पंक्ति में आ जाएँगे। मंगल को छोड़कर सभी ग्रहों की एक ही राशि मेष में युति होगी। शुक्र के अतिरिक्त समस्त ग्रह सूर्य से अस्त होंगे। पाँच ग्रह एक ही नक्षत्र भरणी में स्थित हो रहे हैं। गुरु व शनि की दीप्तांश के भीतर ही युति होगी। सभी ग्रह राहु व केतु के रेखांश के भीतर आएँगे।
इन सभी ग्रहों के पृथ्वी के एक सीध में आ जाने से सबकी समन्वित गुरुत्वाकर्षण शक्ति से पृथ्वी के चुम्बकीय ध्रुव का स्थान परिवर्तन होने की सम्भावना बनती है। इसी दिन काल सर्प का योग विश्व को महापरिवर्तन की ओर मोड़ सकता है। 4 मई, 2000 को नीच के शनि की गुरु से युति दीप्तांश के अन्दर हो रही है। यह युति भारत में आध्यात्मिक क्षेत्र में एक बड़ी क्रान्ति का सृजन करेगी। इसके परिणामस्वरूप भारत विश्व का धार्मिक तथा आध्यात्मिक नेतृत्व करेगा। इस दिन मेष में सभी ग्रहों की युति शून्य अंश पर नहीं होने के बावजूद यह प्रभाव एक नये युग का सूत्रपात करेगा।
भविष्यवक्ता एडगर केसी ने बहुत पहले ही सन् 2000 के आस-पास विश्व के भौगोलिक परिवर्तन की भविष्यवाणी की थी। अमेरिकी भविष्यवक्ता रुथ माण्टगुमरी ने भी लिखा था कि सन् 2000 तक पृथ्वी की धुरी में बदलाव आने से सम्पूर्ण विश्व का वायुमण्डल एवं मौसम परिवर्तित हो सकता है। विश्व के प्रायः सभी भविष्यवक्ताओं ने एक स्वर से 1999 से 2000 के आस-पास युगपरिवर्तन की ध्वंस एवं सृजन की द्विपक्षीय प्रक्रिया के निर्णायक दौर की चर्चा की है, इनमें नोस्ट्राडेमस सबसे चर्चित नाम है।
15वीं शताब्दी में फ्राँस के महान भविष्यवक्ता नोस्ट्राडेमस ने आगामी 6000 वर्षों के सम्बन्ध में प्रायः 1000 भविष्यवाणियाँ की थीं, जो अब तक कालक्रम की कसौटी पर सत्य सिद्ध होती आ रही हैं। 20वीं शताब्दी का सर्वाधिक उल्लेख करने वाले इस महान भविष्यद्रष्टा ने लिखा है- 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में विज्ञान का विकास इतना अधिक हो जाएगा कि अधिकाँश दुनिया नास्तिक हो जाएगी। सामाजिक आचार-विचार कुंठित हो जाएँगे। चरित्र नाम की कोई चीज शेष नहीं रह जाएगी। घरों में नाममात्र को रहने वाले रह जाएँगे। अधिकाँश इधर-उधर घूमने वाले और गलियों में भोजन करने वाले हो जाएँगे।
प्रकृति को इतना क्रुद्ध कभी नहीं देखा जाएगा, जितना कि 20वी शताब्दी के अन्त में देखा जाएगा। जल के स्थान पर पृथ्वी, पृथ्वी के स्थान पर जलप्रलय जैसी स्थिति बनकर सामने आएगी। कहीं अतिवृष्टि, कहीं अनावृष्टि, तो कहीं ज्वालामुखी के भयंकर दृश्य प्रस्तुत होंगे। स्थान-स्थान पर सैनिक क्रांतियाँ होंगी। सन् 1999 में भारी उथल-पुथल होगी। इस अवधि में एक भयानक महायुद्ध की सम्भावना भी बनती है। इस संकट और चुनौती भरे कालखण्ड में एक नयी आध्यात्मिक चेतना का उदय होगा। इसके प्रभाव से संहार की संभावनाएँ समाप्त होंगी और नये युग का सूत्रपात होगा, जिसे नोस्ट्राडेमस ने ‘एज ऑफ ट्रुथ’ (सत्ययुग) का नाम दिया है। उनके अनुसार एण्टी क्राइस्ट अर्थात् मानवी दुर्बुद्धि से विश्व सभ्यता नष्ट नहीं होगी। अपनी काव्यात्मक भाषा में वे यह भी लिखते हैं कि 20वीं सदी के उपरान्त उस देश का वर्चस्व होगा, जिसकी सीमा तीन ओर से सागर से घिरी हुई है और जहाँ गुरुवार पवित्र दिन माना जाता है।
अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति संस्थान ‘गोल्डन पाथ’ की संस्थापिका श्रीमती आयरीन एक प्रामाणिक भविष्यवक्ता मानी जाती हैं। वे ध्यान की गहराइयों में भविष्य की सम्भावित घटना का दर्शन करती हैं। वे तृतीय विश्वयुद्ध की सुनिश्चित सम्भावना व्यक्त करते हुए कहती हैं - विनाश की तैयारी होते हुए भी महासत्ता विश्व-मानवता को बचा लेगी। इसके लिए समष्टिगत प्रयास भारत से आरम्भ होंगे। कनाडा की दिव्यदर्शी माल्माडी का कहना है- इस सदी के अन्तिम चरण में विश्व भर में भयंकर उथल-पुथल होगी। इसमें जहाँ जनसमुदाय को अतीव कष्ट सहने होंगे, वहीं इस विनाशलीला को उलट सकने वाली एक प्रचण्ड आध्यात्मिक आँधी भी चल पड़ेगी। ऐसे आध्यात्मिक तूफान का उद्गम मुझे भारत के हिमालय क्षेत्र से होता दिखाई दे रहा है।
विश्वविख्यात भविष्यवक्ता कीरो के अनुसार भी वर्ष 1999 समूचे विश्व के लिए महापरिवर्तन का संदेश लेकर आया है। उनके अनुसार एशिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश इस वर्ष उत्पात शुरू कर सकता है। उसका सामना करने के लिए रूस और अमेरिका को एक होना पड़ेगा। अरब राष्ट्रों सहित मुस्लिम बहुल देशों में आपसी रक्तपात और भीषण क्रान्तियाँ होंगी। इस महाभयंकर समय के बाद एक नये युग का सूत्रपात होगा। एक नयी सनातन सभ्यता का अभ्युदय होगा और सारे विश्व में इसका प्रसार होगा। यह सब 2000 ईसवी समाप्त होते-होते हो जाएगा।
अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न महिला मारिया वाल्डो ने अपनी पुस्तक ‘न्यू एज’ (नयी सदी) में उज्ज्वल भविष्य के आगमन पर प्रकाश डाला है। इस नये युग को उन्होंने ‘एक्वेरियन एज’ के नाम से संबोधित किया है। उनके अनुसार 20वीं सदी के अन्तिम कुछ वर्षों में एक ओर विध्वंसक गतिविधियाँ अपने चरम पर होंगी, वहीं दूसरी ओर सृजनात्मक शक्तियाँ भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर न केवल उस पर काबू पा लेंगी, वरन् नयी सृष्टि रचना में भी समर्थ होंगी। इस सबके बावजूद मारिया वाल्डो के अनुसार 20वीं सदी के अन्तिम दिनों में भी एक और बर्बर विश्वयुद्ध के छिड़ने की सम्भावना है, परन्तु कुछ आध्यात्मिक शक्तियों के पुरुषार्थ के फलस्वरूप इसे विफल कर दिया जाएगा। इस प्रयत्न को उन्होंने हरक्यूलियन एफर्ट्स की संज्ञा दी है। नये युग का सूत्रपात नयी सदी के आरम्भ होते ही आरम्भ हो जाएगा, जो क्रमशः पुष्पित-पल्लवित होता नजर आएगा। इस नयी स्थिति को मारिया ने गाँड्स किंग्डम अर्थात् दैवी राज्य का नाम दिया है।
1999 के कुछ ऐसे ही संक्रान्ति दलों का उल्लेख मिश्र के पिरामिडों में भी अंकित है। प्रख्यात खगोलशास्त्री डेविड डे विडसन ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेट पिरामिड इट्स डिवाइन मैसेज’ में इन भविष्यवाणियों का निष्कर्ष करते हुए लिखा है कि सन् 2000 तक का समय व्यापक उथल-पुथल भरा रहेगा। इस बीच तेज रफ्तार, सुविधाओं तथा आराम के अनोखे साधनों में अपनी नैतिकता तथा सामाजिक जिम्मेदारियाँ भुलाकर आपा-धापी में लगे लोगों का बोलबाला रहेगा। प्राकृतिक आपदाएँ कहर बरसायेंगी। मौसम आश्चर्यजनक ढंग से बदलेगा। प्रकृति इनसान पर रहम न करेगी। इसी अवधि में तृतीय विश्वयुद्ध की सम्भावना भी है। एक बार तो ऐसा लगने लगेगा मानो समूची मानवजाति के खत्म होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। यह उथल-पुथल सन् 2000 तक चलती रहेगी। इसके बाद नये मानवधर्म का उदय होगा। यह आध्यात्मिक युग होगा। इस दौर का रहनुमा एक सन्त पुरुष होगा। उसकी तप-साधना के परिणामस्वरूप पूरी मानवजाति लम्बे समय तक सुख भोगेगी।
युगपरिवर्तन एवं इसमें युग निर्माण आन्दोलन की अहम् भूमिका के संदर्भ में परमपूज्य गुरुदेव अगस्त, 1966 की अखण्ड ज्योति के पृष्ठ 43 में लिखते हैं, “अगले 34 वर्ष काफी कष्ट भरे हैं। प्रसव पीड़ा की तरह सभी को बड़ी कठिनाइयाँ उठानी पड़ेंगी। महँगाई, अनावृष्टि, बीमारियाँ, दुर्घटनाएँ, आन्तरिक कलह आदि विविध-विधि विग्रह-उपद्रव सामने आते रहेंगे और उनसे जनसाधारण को नित-नई मुसीबतें सहनी पड़ेंगी। दुष्टता भरे दुष्कर्म बढ़ते रहेंगे, फलस्वरूप आतंक-अनाचार के दुःखद दुष्परिणाम सामने आते रहेंगे, वर्तमान जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा इन्हीं विपत्तियों में नष्ट हो जाएगा। अखण्ड ज्योति के किशोर पाठक नोट कर लें कि 34 वर्ष के बाद की दुनिया आज की तुलना में हर दृष्टि से बदली हुई होगी। उस समय युगपरिवर्तन के दृश्य खुली आँखों से देखे जा सकेंगे। अभी तो सूक्ष्मजगत में उनका बीजारोपण मात्र हो रहा है।”
पूज्य गुरुदेव का यह दिव्य कथन अपने 34 वर्ष की पूर्णता की ओर अग्रसर है। विनाश और सृजन का तुमुल संघर्ष हम सबकी आँखों के सामने है। विनाश को रौंदने और नवसृजन को पुष्पित-पल्लवित करने के लिए महाकाल ने इन्हीं दिनों प्रखर साधना वर्ष के आयोजन की प्रेरणा दी है। इन दिनों की जाने वाली तप-साधना का मूल्य और महत्व असाधारण है। अद्भुत ग्रहयोग में किए जाने वाले इस अनूठे पुरुषार्थ के परिणाम इक्कीसवीं सदी में सुनिश्चित तौर पर उज्ज्वल भविष्य के रूप में सामने आएँगे।
मनुष्य जीवन दिव्यसत्ता की एक बहुमूल्य धरोहर है, जिसे सौंपते समय उसकी सत्पात्रता पर विश्वास किया जाता है। मनुष्य के साथ यह पक्षपात नहीं है, वरन् ऊँचे अनुदान देने के लिए यह प्रयोग-परीक्षण है। अन्य जीवधारी शरीर भर की बात सोचते और क्रिया करते हैं, किन्तु मनुष्य को सृष्टा का उत्तराधिकारी युवराज होने के नाते अनेकानेक कर्तव्य और उत्तरदायित्व निबाहने पड़ते हैं।
-जीवन देवता की साधना-आराधना (वा. क्र. 2) से
कठिनाइयों से डरकर यदि हिम्मत हार बैठा जाय तो बात दूसरी है अन्यथा प्राणधारी की अदम्य जीवनेच्छा इतनी प्रबल है कि वह बुरी-से-बुरी परिस्थितियों में जीवित ही नहीं-फलता-फूलता भी रह सकता है।
उत्तरी ध्रुव पर ऐस्किमो नामक मनुष्य जाति चिरकाल से रहती है। वहाँ घोर शीत रहता है। सदा बर्फ जमी रहती है। कृषि तथा वनस्पतियों की कोई सम्भावना नहीं। सामान्य मनुष्यों को उपलब्ध होने वाले साधनों में से कोई नहीं, फिर भी वे जीवित हैं। जीवित ही नहीं परिपुष्ट भी हैं। परिपुष्ट ही नहीं सुखी भी हैं। हम अपने को जितना सुखी मानते हैं, वे उससे कम नहीं कुछ अधिक ही सुखी अपने को मानते हैं और सन्तोषपूर्वक जीवन-यापन करते हैं। जरा-सी ठण्ड हमें परेशान कर देती है, पर एस्किमो घोर शीत में आजीवन रहकर भी शीत से प्रभावित नहीं होते।
-प्रसुप्ति से जाग्रति की ओर (वा. क्र. 7) से
सामान्य जीवन में भी कार्य करते समय बोलने और मौन रहने का अन्तर समझा जा सकता है। किसी काम को करते समय यदि बात भी करते रहा जाय तो मनोयोग उस कार्य में पूरी तरह जुट नहीं पाता। कारण कि बात करते रहने से वह एकाग्रता और दक्षता नहीं आ पाती जिसके द्वारा अधिक कुशलता तथा दक्षता से कार्य किया जा सके। बातूनी व्यक्ति का काम भली-भाँति सम्पन्न नहीं हो पाता।
बातूनी आदत जब स्वभाव का अंग बन जाती है, तो महत्त्वहीन बातों में काफी समय और चिन्तन नष्ट होता है, क्योंकि उस प्रसंग को अविवेकपूर्ण और अतिश्योक्ति पूर्ण बनाने में ही सारी विचार-शक्ति बुद्धि लग जाती है, जबकि मौन से एक स्वाभाविक ही गम्भीरता भी होती है। अतः लोकव्यवहार में भी मौन अथवा मितभाषी व्यक्तित्व को प्रभावपूर्ण बना देता है।
वरुण नदी के तट पर विरुपाक्ष का आवास था। वह जाति से ही नहीं, गुण-कर्म-स्वभाव से भी ब्राह्मण था। तपस्या और सदाचार उसकी अक्षय सम्पत्ति थे। कर्तव्यपरायणता, नीति-निष्ठापूर्वक जीवनयापन करते हुए यदा-कदा उसके अन्तरमन में यह इच्छा अत्यन्त बलवती हो उठती कि रमणीक वनों एवं उद्यानों का भ्रमण किया जाय। एक दिन उसके घर पर एक ऐसा अतिथि आया, जो तंत्र महाविद्या का अभूतपूर्व ज्ञाता था। अपनी साधना के प्रभाव एवं सामर्थ्य से वह प्रतिदिन हजारों योजन चला जाता था।
ब्राह्मण विरुपाक्ष ने उस महासिद्ध अतिथि का बड़ा सत्कार किया। बातचीत के प्रसंग में उस सिद्ध महापुरुष ने अनेकों वन-पर्वत नगर, राष्ट्र, नद, नदियों एवं तीर्थों की विस्मयजनक चर्चा कीं यह सुनकर ब्राह्मण युवक को बड़ा अचरज हुआ। उसने कहा मेरी भी इस शस्य-श्यामला वसुन्धरा को देखने की अदम्य लालसा है। यह सुनकर उदारचित्त तंत्रविद्या के ज्ञाता आगन्तुक सिद्ध ने उसे पाँव में लगाने के लिए एक लेप दिया। जिसे लगाकर वह हिमालय पर्वत को देखने के लिए चल पड़ा। महासिद्ध के कथनानुसार विरुपाक्ष को आधे दिन में एक हजार योजन जाना तथा शेष आधे दिन में पुनः लौट आना था।
संकल्प को क्रियाशील होते देर न लगी। वह हिमालय के शिखर पर जा पहुँचा। हिमालय की रमणीय मोहकता ने उसे बरबस सम्मोहित कर लिया। वह वहाँ की पर्वतीय भूमि पर पैदल ही विचरने का लोभ संवरण नहीं कर सका। बर्फ पर चलने के कारण उसके पैरों पर लगा तांत्रिक लेप घुल गया। इससे उसकी तीव्र गति कुण्ठित हो गयी। परन्तु अभी उसे इसका पता न चला। जैसे ही उसका विचार हुआ कि वापस घर चले, उसे पता चला कि उसकी तीव्र गति कुण्ठित हो चुकी है। वह सोचने लगा- यह तो मेरे ऊपर भयानक संकट आ गया। ऐसे समय में किसी तपस्वी या सिद्ध-महात्मा का दर्शन हो जाता तो वे कदाचित मेरे घर पहुँचने का कोई उपाय बतला देते। इसी समय उसके सामने सुवर्णा नाम की अप्सरा आयी।
उस युवा ब्राह्मण को मादक नजरों से देखते हुए सुवर्णा बोली- महाभाग! यह एक अत्यन्त रमणीक स्थान है। स्वर्ग भी यहाँ से अधिक रमणीक नहीं है। इसीलिए हम लोग स्वर्ग को छोड़कर यहीं रहते हैं। आपने मेरे मन को हर लिया है। मैं आपको सुन्दर वस्त्र, आभूषण, भोजन, अंगराग आदि दूँगी। आप यहीं रहिए। यहाँ रहने से कभी बुढ़ापा नहीं आएगा। यह यौवन को पुष्ट करने वाली देवभूमि है।
हतप्रभ एवं विक्षुब्ध विरुपाक्ष बोल उठा- ‘तपोभूमि में भोग की लालसा’ ऐसा करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती।
परन्तु सुवर्णा के मन में कुछ और ही था। उसने कहा- ब्राह्मण! तप का उद्देश्य आखिर कामनापूर्ति ही तो है। श्रेष्ठतम तपस्वी भी देवलोक जाकर स्वर्गीय सुखों का ही तो भोग करते हैं। वैसे भी जो आठ आत्म गुण बताए गए हैं उनमें दया ही प्रधान है। आश्चर्य है तुम धर्म पालक बनकर भी उसकी अवहेलना कैसे कर रहे हो। आर्य! मेरी तुम पर कुछ ऐसी प्रीति उत्पन्न हो गयी है कि इसे सच मानो अब तुमसे अलग मैं जी न सकूँगी। अब तो तुम कृपाकर मुझ पर प्रसन्न हो जाओ।
विरुपाक्ष सुवर्णा के तीक्ष्ण तर्कों से व्यथित हो गया। उसने कहा- हे देवलोक निवासिनी! तप का उद्देश्य कामनापूर्ति नहीं, अन्तःकरण की निर्मलता की प्राप्ति है। श्रेष्ठतम तपस्वी कभी भी स्वर्गीय सुखों के भोग के इच्छुक नहीं होते, बल्कि वे तो सदा ही लोकहित करते हुए आत्महित में निरत रहते हैं। यदि सचमुच तुम्हारी मुझमें प्रीति हो तो मुझे शीघ्र ही कोई ऐसा उपाय बतलाओ, जिससे मैं तत्काल घर पहुँच जाऊँ! अप्सरा इस प्रश्न के उत्तर में मौन हो गयी।
तब उस ब्राह्मण युवक ने अपनी अन्तरात्मा की समस्त श्रद्धा निवेदित करते हुए आकाशस्थ सूर्यदेव को प्रणाम करते हुए कहा- हे परमदेव! आप ही समस्त कर्मों की सिद्धि के कारण हैं। आपकी तृप्ति से ही देवता वृष्टि करते हैं और अन्नादि वृद्धि में कारण बनते हैं। हे भगवान सविता! यदि गायत्री साधना का मैंने किसी भी काल में परित्याग न किया हो तो आज घर पहुँचकर ही सायं संध्योपासना सम्पन्न करु।
ब्राह्मण की इस अद्भुत निष्ठा से सूर्यदेव प्रसन्न हो गए। सूर्य तेज के एक अंश ने उसके अन्दर प्रवेश किया, साथ ही एक अलौकिक अन्तर्वाणी उसकी आत्मा में गूँज उठी- वत्स सदाचारपूर्वक की गयी गायत्री साधना से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं। तुम अपने सदाचार में अडिग और अटल हो, इसलिए तुम्हें वह सब कुछ मिलेगा, जो तुम्हें अभीष्ट है। इस दिव्य सन्देश के साथ ही उस अप्सरा के देखते-देखते ब्राह्मण युवक विरुपाक्ष उटज गाँव स्थित अपने घर पहुँच गए। घर पहुँचकर उन्होंने संध्योपासना करते हुए गायत्री जप पूर्ण किया। आज उसे अनुभव हो रहा था कि गायत्री साधना की सफलता का रहस्य सदाचार में निहित है।
धरती की व्यवस्था सँभालने का उत्तरदायित्व स्रष्टा ने मनुष्य को सौंपा है, साथ ही उसे इतना समर्थ शरीर तन्त्र भी दिया है कि वह न केवल जीवधारियों के लिए सुख-शान्ति बनाए रहे वरन् ब्रह्माण्ड में संव्याप्त अदृश्य शक्तियों को भी अनुकूल रहने के लिए सहमत रख सके। अपने इस उत्तरदायित्व में व्यतिरेक करके जब मनुष्य अनाचार, पापाचार और उद्दण्डता बरतता है- चिन्तन को भ्रष्ट और आचरण को दुष्ट बनाता है, तो उसकी प्रतिक्रिया अदृश्य जगत का सन्तुलन बिगाड़ती है और विपत्तियों का विक्षोभ उत्पन्न करती है। दैवी-प्रकोप प्रत्यक्ष में लगते तो ऐसे हैं मानों अदृश्य द्वारा मनमानी की जा रही है, किन्तु अदृश्य और अप्रत्यक्ष को जो जानते हैं, उनका स्पष्ट मत है कि पानी में पत्थर फेंकने और छींटे उठाने की जिम्मेदारी उन लड़कों की है, जो तालाब के एक कोने पर बैठे शरारत करते रहते हैं। जल अकारण उछलने लगे और अपने जलचर परिवार के लिए संकट उत्पन्न करे, ऐसी बात है नहीं, प्रतीत भले ही होती हो।
इस वर्ष 1999 में आने वाले प्राकृतिक प्रकोपों, राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक हलचलों की आशंका से सभी चिन्तित हैं। भय अकारण है या सकारण, इसका अन्वेषण करने पर कितने ही तथ्य सामने आते हैं और अशुभ सम्भावना की पुष्टि करते हैं। परमाणु विस्फोटों के कारण बढ़ता हुआ विकिरण, विषाक्त ईंधन से उत्पन्न वायु प्रदूषण, पृथ्वी के इर्द-गिर्द चक्कर काट रहे प्रायः 5000 उपग्रहों के कारण सुरक्षा परतों में विक्षोभ, ऊर्जा के बढ़ते उपयोग से गर्मी का बढ़ना और उसके कारण हिम प्रदेशों का असन्तुलित रीति से पिघलना, भूगर्भ से खनिज सम्पदा निचोड़ लेने पर उसका खोखला एवं ठण्डा होते जाना आदि कितने ही कारण हैं, जो धरती के भीतरी, सतही और बाहरी वातावरण में विक्षोभ उत्पन्न करते देखे जा सकते हैं। इन्हें मनुष्य के साथ उद्धत छेड़खानी कह सकते हैं। छेड़ने पर तो चींटी भी काटती है, फिर नियति क्यों चूकने लगी।
अध्यात्म विज्ञान का प्रतिपादन है कि प्रकृति ही सब कुछ नहीं है। उससे भी ऊपर एक चेतन सत्ता है, जिसको ‘नियति’ कहते हैं। दिव्यदर्शी इस नियति को ही प्रधानता देते हैं और प्रकृति तथा मानवीय जीवन के सन्तुलन को बनाने-बिगाड़ने में इसी को उत्तरदायी मानते हैं। उनका कहना है कि प्रकृति से भौतिक छेड़खानी करने पर दैवी प्रकोप का बरसना एक पक्ष तो है, पर वही सब कुछ नहीं है। उससे भी बड़ी बात है मानवी-चिन्तन और चरित्र से उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रिया, जो प्रकृति की नियामक सत्ता ‘नियति’ पर प्रभाव डालती है। अनाचरण से नियति की अन्तरात्मा क्षुब्ध होती है, फलतः उसका प्रकृति कलेवर भी आक्रोश का, आवेश का परिचय देता है। दैवी-प्रकोपों के मूल में जितना दोष प्रकृति व्यवस्था को उद्धत रूप से छेड़खानी करने का है, उससे भी अधिक भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट-आचरण का आश्रय लेने वाली मानवीय निकृष्टता का है। नियति उसी से रुष्ट होती है और उसी के फलस्वरूप दृश्य एवं अदृश्य विपत्तियाँ, समस्याएँ तथा विभीषिकाएँ उभरती व त्रास देती हैं।
अन्तरिक्ष विज्ञानी इन दिनों सौर-मण्डल तथा उससे ऊपर के ब्रह्माण्ड क्षेत्र का पर्यवेक्षण करते हैं, तो कहते हैं पृथ्वी के लिए वर्ष 1999 व 2000 के पूर्वार्द्ध की परिस्थितियाँ संकटों से भरी हैं। संकट का यह प्रवाह सन् 2000 ई॰ तक चलने वाला है। सभी जानते हैं कि पृथ्वी की अपनी निज की जितनी शक्ति और सम्पदा है, उसे उससे कहीं अधिक अनुदान लेकर अपना गुजारा करना पड़ता है। सौर ऊर्जा उसका प्राण है। इसके अतिरिक्त अन्य ग्रहों से आने वाले ब्रह्माण्डीय अनुदान उसे उपलब्ध होते हैं। ऊपर के वातावरण की छलनी में छनकर ध्रुवों के माध्यम से जो सम्पदा धरती को प्राप्त होती है, उसी से उसका गौरव एवं वैभव इस स्तर तक पहुँचा है। ऐसी परिस्थितियाँ न हों तो वह भी सौरमण्डल के अन्य सदस्यों, उदाहरण के लिए-बुध की तरह आगबबूला होकर, प्लूटो की तरह हिम पिण्ड बनकर, शुक्र की तरह विषाक्त, बादलों की तरह आच्छादित रहकर, निस्तब्ध श्मशान की तरह अन्तरिक्ष के एक कोने में पड़ी अपने दुर्भाग्य का रोना रो रही होती।
अन्तरिक्ष विज्ञानी अपनी गहरी जाँच-पड़ताल से पृथ्वी और अन्तरिक्ष के मध्य चले आ रहे आदान-प्रदान में विक्षेप-व्यवधान होना देखते हैं। उन दिनों उभरने वाली अन्तरिक्षीय हलचलें जो और कुछ नहीं, मनुष्य के ही पापाचार एवं अनाचार की प्रतिक्रिया हैं-अपनी चपेट में धरतीवासियों को त्रास देंगी। उन्मादी, रोगी, अपराधी स्वयं तो कष्ट सहते ही हैं, उनके स्वजन-सम्बन्धी भी तरह-तरह के कष्ट और ताने सहते हैं। कुछ इसी तरह अन्तरिक्षीय- हलचलों की प्रक्रिया अनाचारियों एवं पापियों को तो दण्डित करेगी ही, सामान्यजन भी उससे बच न सकेंगे।
अन्तरिक्ष विज्ञानियों के साथ फलित ज्योतिषी भी अपने ढंग से इस सम्बन्ध में प्रतिक्रियाएँ व्यक्त करते हैं। दोनों के कारण पृथक् होने पर भी निष्कर्ष एक ही हैं। इस वर्ष की विभीषिकाओं का भविष्य कथन दोनों ही करते हैं। भविष्य कथन की बात चल पड़े तो यहीं यह भी समझ लेना चाहिए कि सूक्ष्मदर्शी, अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न ऐसे लोग भी इस धरती पर कभी-कभी देखने को मिलते हैं, जिनमें अदृश्य दर्शन की क्षमता है। ऐसे लोगों की जो अनुभूतियाँ होती हैं, उनमें ग्रहगणित नहीं, दिव्यदर्शन की अद्भुत विशेषता ही कारणभूत होती है। इनकी भविष्यवाणियों में कदाचित ही कभी कोई असम्बद्ध बैठती हो। ऐसे लोगों की एक श्रृंखला है, जिनमें कई जीवित हैं, कई दिवंगत हो चुके। इनने अपने भविष्य कथन में प्रधानतया दो तथ्य प्रस्तुत किए हैं- इन दिनों मानवीय पापों की प्रतिक्रिया स्वरूप अवांछनीयता एवं विपत्तियों का बढ़ना और कुछ समय उपरान्त स्वर्गीय सुख-शान्ति का सृजन होना।
आखिर दुखद परिस्थितियों का काल क्या होगा और सुखद संभावनाएँ कब उत्पन्न होंगी? इस संदर्भ में सूक्ष्मदर्शियों के कथन लगभग एक ही अवधि तक अपने निष्कर्षों को केन्द्रित करते हैं। सन् 1999 का यह विकराल प्रवाह सन् 2000 तक चलेगा। इस अवधि तक के समय को अधिक कष्टकारक पाया जाएगा और 2000 के बाद की परिस्थितियों में सन्तोष की साँस लेने और उज्ज्वल भविष्य के सम्बन्ध में आश्वस्त होने का अवसर मिलेगा।
उपर्युक्त पर्यवेक्षण से जिस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है वह है इस वर्ष एवं अगले वर्ष की अशुभ आशंकाएँ, परन्तु इससे किसी को भी आतंकित या भयभीत होने की आवश्यकता नहीं हैं। ऐसी हड़बड़ी तो विपत्ति को और भी कई गुना बढ़ा सकती है। कठिन समय का एक ही तकाजा है- धैर्य और साहस बनाए रखना, मनोबल न गिरने देना, साथ ही आशंकाओं को निरस्त करने वाले प्रयासों का निर्धारण करके उनकी पूर्ति में जुट जाना। हमारे लिए यही उचित है कि भौतिक एवं आत्मिक स्तर पर ऐसा प्रबल पुरुषार्थ सँजोये, जिससे रुष्ट नियति को मना लेने और क्रुद्ध प्रकृति को शान्त करने का अवसर मिले। रोग अपनी जगह है और उपचार अपनी जगह। पापों की प्रतिक्रिया स्वरूप विपत्तियाँ अपनी जगह हैं और दैवी पुरुषार्थ से सामूहिक पापों का प्रक्षालन अपनी जगह। विषम वेला में यही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है कि आतंकित होने की मनःस्थिति उत्पन्न न होने दी जाय, साथ ही प्रचण्ड पुरुषार्थ को सँजोकर असम्भव को सम्भव बनाया जाय। इस वर्ष की विपत्ति का परोक्ष वरदान यही हो सकता है कि वह हम सबके अन्दर आत्मिक पराक्रम व जुझारू साहस उभारे। ध्वंस को सृजन से ही निरस्त किया जा सकता है। आग को पानी से ही बुझाया जा सकता है।
यह तथ्य सभी को ध्यान रखना चाहिए कि अन्तरिक्षीय शक्तियाँ जिस प्रकार पृथ्वी को, उसकी परिस्थितियों को तथा प्राणियों को प्रभावित करती हैं, ठीक उसी प्रकार प्राणवान आत्माएँ अपनी आत्मशक्ति से प्रकृति और नियति को प्रभावित और परिवर्तित करने में समर्थ हो सकती हैं। मनुष्य एक ऐसा यन्त्र है जिसमें वे सभी यन्त्र फिट हैं, जो प्रकृति को प्रभावित एवं परिवर्तित कर सकें।
भावी अशुभ सम्भावनाओं को निरस्त करने के लिए ही वर्तमान वर्ष में साधना वर्ष का आयोजन किया गया है। यह पूर्णतया सुनिश्चित है कि वर्तमान साधना वर्ष में किए जाने वाले दैवी पुरुषार्थ से ही सामूहिक पापों का प्रक्षालन सम्भव होगा। इस वर्ष की जाने वाली साधना के दैवी पराक्रम हेतु अपने देव परिजनों को उसी तत्परता से कटिबद्ध होना चाहिए, जैसे कि बंगला देश की गड़बड़ी, चीनी-आक्रमण पाकिस्तानी हमला, स्काईलैब आदि की विपत्तियों के निवारण हेतु सफलतापूर्वक निरत हो चुके हैं। अबकी बार आशंकाएँ बड़ी हैं, इसलिए हमारे सुरक्षा प्रयास भी बढ़े-चढ़े होने चाहिए। उसी का प्रारूप इस वसन्त पर्व पर प्रस्तुत किया गया है और उसमें परिपूर्ण सहयोग देने के लिए समस्त देवपरिजनों को आमंत्रित किया गया है।
तीर्थंकर महावीर साधना में लीन थे। पास ही मैदान में एक ग्वाला अपने बैल चरा रहा था। उसे किसी आवश्यक कार्य से गाँव में जाना था। उसने सोचा पास में बाबा बैठे हैं, यह बीच-बीच में बैल देख लिया करेंगे, तब तक मैं घर से लौट ही आऊँगा।
महावीर ध्यानस्थ थे। बैन चरते-चरते दूर निकल गये। ग्वाला लौटकर आया तो महावीर पर बहुत नाराज हुआ और उसने रस्सी के एक टुकड़े से उनकी पिटाई शुरू कर दी। उनके शरीर पर इस निर्मम प्रहार से कई निशान पड़ गये।
देवराज इन्द्र से ग्वाला की यह ताड़ना न देखी गई। उन्होंने तीर्थंकर से आकर प्रार्थना की- भगवन्! यह ग्वाला अज्ञानी है- आपके अलौकिक महात्म्य से पूरी तरह अनभिज्ञ है। मेरी इच्छा सदैव आपके साथ रहने की है, ताकि आने वाले कष्टों का निवारण करता रहूँ। आप मुझे सतत् सेवा में उपस्थित रहने की आज्ञा दीजिये।
महावीर ने जो उत्तर दिया, वह जैन साहित्य की अमूल्य निधि है और निराश व्यक्तियों को सैकड़ों वर्षों से प्रेरणा देता रहा है-स्ववीर्येणैव गच्छन्ति जिनेन्द्रा परमा गतिम्।”
किसी दूसरे के सहारे रहकर अथवा दूसरे के पुरुषार्थ के भरोसे बैठकर आज तक कोई आत्मबोध लाभ प्राप्त नहीं कर सका। अपने पुरुषार्थ से ही अपना निर्माण किया जा सकता है। अपने भाग्य को बनाने वाले कोई दूसरा नहीं वरन् उसका पुरुषार्थ ही होता है। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए पुरुषार्थ का स्थान ही सर्वोपरि है।
सूर्य को सृष्टि का प्राण कहा गया है। अपने आधिभौतिक, आदि-दैविक व आध्यात्मिक तीनों ही रूपों में यह समस्त जीवधारियों, वृक्ष-वनस्पतियों ब्रह्माण्डीय हलचलों को प्रभावित करता है। सौर शक्ति की उपासना भारतीय अध्यात्म के मूल मर्म के रूप में आदिकाल से रही है, इसीलिए वेदों में ऋषिगणों द्वारा कहा जाता रहा है- मही देवस्य सवितुः परिष्टुति- महान है सविता देवता रूपी व्यापक तेज की अभ्यर्थना-स्तुति जो रचयिता है- मानव मात्र का पोषक है, वही सविता है। प्रसविता शब्द इसी कारण इसके लिए प्रयुक्त होता है अर्थात् मानवमात्र का पालन-पोषण करने वाला। सूर्यदेव की उपासना को भारतीय संस्कृति में इसी कारण अति महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता रहा है। अक्षय शक्ति के स्रोत परमदेव सविता के बारे में जानने-उनकी महत्ता समझने के उपरान्त यह महत्वपूर्ण है कि उनसे संबंध जोड़ने के सूत्रों को हृदयंगम किया जाय। संबंध न जुड़ने व बने रहने से ही आज की आस्था संकट की विभीषिका पैदा हुई, यदि यह कहा जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी। प्रस्तुत प्रखर साधना वर्ष में सविता देव के तेज के ध्यान के साथ सद्बुद्धि की प्रार्थना-उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ भावनापरक ध्यान इसी कारण अति महत्वपूर्ण बताया गया है।
‘गायत्री महामंत्र’ सविता देवता से संबंधों को जोड़ने, प्रगाढ़ कर उनकी शक्ति को अपने अंदर आकर्षित कर संग्रहित करने हेतु संपन्न शोध प्रयासों का, ऋषि सत्ताओं के भागीरथी पुरुषार्थ का निचोड़ है। इस छंद के मंत्र शिरोमणि होने एवं वैदिक वांग्मय में इसे सर्वश्रेष्ठ मंत्र घोषित किए जाने के पीछे यही कारण है। गायत्री महामंत्र में शब्दों का गुँथन कुछ इस वैज्ञानिक विधि से हुआ है कि उसके जप से साधक की अन्तःचेतना में सविता देवता के तेज-भर्ग के समाविष्ट होने से प्रसुप्त सूक्ष्म संस्थानों में जाग्रति आती है, जमे सभी कषाय-कल्मष घुलते चले जाते हैं। सौर-चेतना का अविरल प्रवाह अस्तित्व के कण-कण में प्रवाहित होने लगता है। असामान्य चमत्कारी सामर्थ्य उत्पन्न करने वाला साधनात्मक पुरुषार्थ है यह।
सूर्य का-सविता देवता का प्रातः के उदीयमान स्वर्णिम सूर्य के तेज का ध्यान जब गायत्री मंत्र के जाप से किया जाता है, तो व्यष्टि के समष्टि से एकात्म होने की ग्राहय विधा भी परिपूर्ण ढंग से सम्पादित होती है। परमपूज्य गुरुदेव के सभी प्रयोग जो स्वयं पर व समग्र गायत्री परिवार पर संपन्न हुए- इसी सविता देवता की उपासना- अभ्यर्थना पर केन्द्रित रहे। इसी ने विराट गायत्री परिवार का सृजन किया, इसी ने युगनिर्माण की आधारशिला रखी और वही युगपरिवर्तन का अगले दिनों निमित्त बनने जा रहा है। सविता-अमृतत्व का स्रोत है। इसकी उपासना साधक के जीवन में प्राणशक्ति का संचय करने में मदद करती है- मन में उल्लास तरंगित करती और आत्मा को उसके अमृत स्वरूप का बोध कराती है। इसीलिए इसकी साधना के विज्ञान को मधुविद्या कहा गया है। छान्दोग्य उपनिषद् के प्रथम खण्ड के प्रथम बारह श्लोकों में इसका विस्तृत विवरण पढ़ा जा सकता है। आज जो प्राणशक्ति का ह्रास तेजी से होता जा रहा है, उसमें यदि किसी का सहारा है, तो मात्र सविता साधना का- जिसकी शक्ति के संदोहन से मानवमात्र को चिरयौवन की-देवताओं के समकक्ष अमरत्व की प्राप्ति हो सकती है।
‘गायत्री’- इस एक शब्द में पंचभौतिक प्राण एवं मनःशक्ति का समग्र रूप आ जाता है। भौतिक क्लेशों-प्रपंचों से मुक्ति दिलाने हेतु इसका माहात्म्य शास्त्रों में वर्णित है। इस गायत्री के आविर्भाव के बारे में जब भी ऋषिगणों से मार्गदर्शन माँगा जाता है, तो उपनिषद्कार कहते हैं-देवात्मशक्ति स्वगुणे निगूढ़ः अर्थात् देवमाया या इन्द्र शक्ति ही वह सत्ता है, जो विश्व गायत्री अर्थात् आद्यशक्ति के विभिन्न रूपों में विकसित होती है। यह देवमाया या इन्द्रशक्ति कौन है? इसका उत्तर भी उपनिषद् देता है- ‘तस्य दृष्यः शतादषः’ अर्थात् सूर्य ही वह इंद्र है, जिसकी हजारों किरणें हैं- प्राणशक्ति से भरी रश्मियाँ हैं। वस्तुतः हमारे ऋषिगण सूर्य को एक ‘विराट पुरुष’ की संज्ञा प्रदान करते हैं, जो एक व्यापक क्षेत्र में क्रियाशील रहता है- लगभग ऐसे ही जैसे कि एक विचारशील मनुष्य। वह सोच-विचार भी कर सकता है, विकल और क्षुब्ध भी हो सकता है, दण्ड और पुरस्कार भी दे सकता है। पूर्णतः चैतन्यता से भरीपूरी सत्ता है सविता रूपी विराट पुरुष की। गायत्री पर जब हम विश्वास कर श्रद्धापूर्वक जप करते हैं, तो हम वस्तुतः उस विराट पुरुष की शक्तियों को अपने अंदर अवशोषित करते हैं। जिस तरह बड़े बिजलीघर से संपर्क स्थापित कर छोटे बिजलीघर भी प्रकाशित हो जाते हैं- विराट पुरुष से गायत्री जप द्वारा- उसके भावार्थ का ध्यान करने वाला- सद्बुद्धि की प्रार्थना करने वाला भी उसी तरह प्रकाशवान-ओजवान होता चला जाता है, लाभान्वित होता है।
हम मनुष्य को ‘माइक्रोकाँस्म’ व्यष्टि के रूप में छोटी गायत्री का प्रकाशपुँज मान सकते हैं एवं सूर्य को एक ‘मेक्रोकाँस्म’ समष्टि के रूप में बड़ी गायत्री। छोटी गायत्री को जब विराट गायत्री के साथ जोड़ दिया जाता है, तो वह भी उसी शक्ति-संपन्नता को अनुभव करती है, जो विराट पुरुष सविता में कूट-कूटकर भरी पड़ी है। गायत्री के विराट स्वरूप को पा जाने पर साधक उतनी ही क्षमता वाला हो सकता है, जितनी कि सूर्य भगवान की क्षमता है। ऐसी साधना को ही सिद्धिदात्री साधना कहा जाता है। यही सर्वोच्च उपलब्धि भी है।
अब वैज्ञानिक भी यह मानने लगे हैं कि सूर्य संवेदना का सघन पुँज है। ‘सोलर फ्लेयर्स’ (सौरलपटों) के रूप में सूर्य में जो भी हलचलें दिखाई पड़ती है, वे वस्तुतः विकलता-क्षोभ-प्रसन्नता और क्रोध जैसी भावनाओं के उस विराट पुरुष के स्थूल स्पन्दन हैं। जिस तरह विचारों का प्रभाव मानव शरीर पर पड़ता है, उसी प्रकार यह विकलताएँ भी प्रकृति में भारी हलचलें उत्पन्न करती रहती हैं। विकलता की स्थिति में सूर्य विशेष प्रकार के सूक्ष्मकणों और किरणों के अम्बार छोड़ता है, जो करोड़ों मील दूर तक के वातावरण को प्रभावित करते हैं। विद्युत-चुम्बकीय क्षेत्रों में तूफान उठने लगता है। पृथ्वी पर इनका प्रभाव अत्यधिक गर्मी, हिमपात, ओले, अनावृष्टि, बाढ़, वर्षा, झंझावात आदि के रूप में पड़ता है। इतना ही नहीं राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं भावनात्मक स्तर पर भी बड़े व्यापक प्रभाव देखे गए हैं। विगत चार वर्षों (1995) से सतत् ऐसे सौर चुम्बकीय तूफानों की सूर्य की विकलता के करण माने बाढ़-सी आ रही है एवं वही दैवी प्रकोपों, विभीषिकाओं का निमित्त कारण बनी है, यह कहा जा सकता है।
सूर्य की इस मनोमय क्रान्ति से युगपरिवर्तन की वेला में सारी जगती प्रभावित होगी एवं व्यक्तियों के मन एवं परिस्थितियाँ इसके प्रभाव से गड़बड़ा सकती हैं, फिर भी यह मानकर चलना चाहिए कि है यह सब साधनात्मक पुरुषार्थ प्रखर करने के लिए ही। विश्व की भौगोलिक एवं वातावरण पर इससे कितने ही बड़े और भयंकर परिवर्तन क्यों न हों, भारतीय संस्कृति को इससे संरक्षण मिलेगा, क्योंकि ‘गायत्री’ इसके रोम-रोम में संव्याप्त है। भारतीय संस्कृति के अभ्युत्थान के मूल में उन विराट पुरुष की इच्छा ही काम कर रही है, चाहे हम वैज्ञानिक विधि-विधानों से मानें अथवा श्रद्धापूर्वक।
ऋग्वेद की ऋचा कहती है- ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषष्च’ अर्थात् सूर्य ही चर और अचर विश्व-सभी की आत्मा व रक्षक है। श्री अरविंद ने ‘वेद रहस्य’ में लिखा है- वैदिक ऋषियों का सूर्य सत्य का अधिपति है, आलोक प्रदाता है, रचयिता है- ‘सविता’ के रूप में एवं पुष्टिदाता है ‘पूषा’ के रूप में। उसकी किरणें अंतर्ज्ञान की तथा प्रकाशपूर्ण विवेक की अतिमानसिक क्रियाओं की द्योतक हैं। वस्तुतः सूर्य धरती पर जीवन के प्रकटीकरण के प्रतीक हैं- जीवन का अर्थ ही सूर्योदय का वर्णन करना है। पष्येम नु सूर्यमुच्चरन्तम्। इन सब प्रतिपादनों से, सूर्योपासना ही क्यों? इस विराट पुरुष की सभी धर्म-सम्प्रदायों के लिए निर्विवाद उपासना पद्धति का निर्धारण क्यों? इन प्रश्नों का उत्तर भी बड़ा स्पष्ट मिला जाता है।
फारसी-अरबी में सूर्य को ‘आफताब’ कहते हैं। इस्लाम में सूर्य को ‘इल्म अहकाय अनन जूम’ का केन्द्र माना गया है अर्थात् सूर्य इच्छाशक्ति को बढ़ाने वाली चैतन्य सत्ता के प्रतीक हैं। अल्लामा इकबाल ने आफताब की स्तुति के रूप में गायत्री मंत्र का बड़ा सुन्दर अनुवाद उर्दू में किया है। ईसाई धर्म में रविवार का दिन पवित्र घोषित कर इस दिन प्रभु की आराधना, दान दिये जाने को पवित्र फलदायी बताया गया है। यह
बात अलग है कि कालान्तर में उसका स्वरूप कर्मकाण्डी मात्र बन गया। किंतु प्रयास करने पर सूर्योपासना के लिए सभी वर्गों-संप्रदायों-जाति-धर्मों को सहमत किया जा सकता है, किया जाना चाहिए, तब ही तो सब के लिए युगपरिवर्तन-उज्ज्वल भविष्य के अवतरण की बात सोची जा सकती है।
प्रस्तुत युगसंधि महापुरश्चरण विराट समूह द्वारा आराधना के रूप में संपन्न हो रहा है। प्राणविद्या के आचार्यों का कथन है कि आज समाज में छाया प्राणशक्ति का संकट निश्चित ही गायत्री महाशक्ति की, सूर्य को केन्द्र मानकर की गई साधना से दूर हो सकता है। श्रुति कहती है- ‘तेजो वै गायत्री’, फिर ताण्ड्योपनिषद् कहता है- ज्योतिर्वै गायत्री छन्दसाम् अर्थात् गायत्री एक प्रकार का तेज है, जो प्रकाश और ऊष्मा के रूप में विश्व का मूल है। सूर्य गायत्री तेज का सबसे बड़ा भण्डार है और विश्व के निर्माण में सबसे बड़ा कारण भी। शास्त्रकार यह भी कहते हैं कि म नहीं सविता है। अर्थात् जब मन और सूर्य देव का साधना के माध्यम से तादात्म्य किया जाता है, तो सूर्य की ‘भर्ग’ शक्ति मनुष्य के अन्तःकरण में प्रविष्ट हो सामंजस्य स्थापित करती है। असत् का निष्कासन और सुसंस्कारों का विकास करती है। यही तो युगपरिवर्तन की धुरी है। इक्कीसवीं सदी में सूर्य ही सबका आराध्य होगा-वही उज्ज्वल भविष्य का अवतरण हम सबके लिए करेगा।
बुद्ध का अन्तिम दिन था। आनन्द छाती पीटकर रोने लगा और बोला ”प्रभु आप तो जा रहे हैं मेरा क्या होगा?” बुद्ध ने कहा-आनन्द! पागल मत बनो। मुझसे पहले कितने ही बुद्ध हो गये और मेरे बाद अनेकों होंगे। यह सिलसिला कभी समाप्त नहीं होगा। यदि तू सीखने में कुशल है, तो किसी से भी सीख लेगा। तू चालीस वर्ष तक मेरे साथ रहा, तू कहता है कि मुझे ज्ञान नहीं हुआ। मैं जा रहा हूँ, उस दिन कह रहा है कि अब क्या होगा? यदि चालीस साल में तुझे ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ, तो चालीस जन्मों में भी तेरी क्या समझ में आयेगा? हो सकता है मेरे होने के कारण तेरी सीखने की क्षमता क्षीण हो गयी हो। तू समझता था कि गुरु मिल गये, सब कुछ मिल गया। मिलना ही पर्याप्त नहीं, तुझे भी बदलने की जरूरत थी, बनने की जरूरत थी। संभव है मेरे न रहने पर तू बुद्धत्व को प्राप्त हो।” इतना कहकर बुद्ध ने अन्तिम साँस ली। ऐसा ही हुआ। कहते हैं कि आनन्द को बुद्ध के जाने के बाद ही परमज्ञान उपलब्ध हो सका।
1- युगद्रष्टा का जीवन-दर्शन
गायत्री परिवार के अधिष्ठाता वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने गायत्री महामंत्र की स्वयं साधना किस प्रकार की तथा किस तरह से गायत्री महामंत्र को विश्व स्तर तक प्रतिष्ठापित किया, इसके लिए आप पढ़ना चाहेंगे-
आचार्यजी की जीवन साधना के अंतरंग पक्ष, उनके दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ, चमत्कारों से भरा जीवनक्रम।
बीज का गलकर वटवृक्ष बनने की प्रक्रिया, 15 वर्ष की आयु में गुरुसत्ता से साक्षत्कार, किशोरावस्था के हृदयस्पर्शी प्रसंग।
स्वतंत्रता संग्राम में सत्याग्रही के रूप में ‘श्रीराम मत्त’ का योगदान, ‘सैनिक’ पत्र के माध्यम से उनकी काव्य रचना।
चौबीस-चौबीस लाख के चौबीस महापुरश्चरणों की पूर्णाहुति, गायत्री तपोभूमि की स्थापना, प्रथम सहस्रकुण्डीय महायज्ञ।
आर्ष साहित्य का नवसृजन, नारी जागरण अभियान, जीवन-निर्माण संबंधी सत्रों का संचालन।
मथुरा से विदाई, उनका अज्ञातवास, हिमालय यात्राएँ।
आचार्य जी के बहुआयामी व्यक्तित्व के अनछुए अगणित पहलू, युगव्यास का साहित्य दर्शन, वांग्मय विषयवस्तु।
2- जीवन देवता की साधना-आराधना
मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। जीवन-साधना का दर्शन यदि ठीक तरह से समझ में आ जाय व सही प्रयोग का अभ्यास बन जाय तो मनुष्य अनेकानेक उपलब्धियाँ सहज ही इसी जीवन में पा सकता है। कृपया पढ़े-
जीवन साधना-आराधना चेतना का उदात्तीकरण। आत्मशोधन, आदतों का परिशोधन, सविता की ध्यान-धारण
चिंतन-पद्धति आरोग्य, प्राणशक्ति, चरित्र, इच्छाशक्ति।
‘स्व’ का विकास, वसुधैव कुटुम्बकम्, शिष्टता और शालीनता।
निकृष्टता से उबरें, महानता वरण करें।
जीवन साधना-चौदह सूत्र; आत्मपरिष्कार, परब्रह्म की प्राप्ति।
व्यक्ति, परिवार एवं समाज का निर्माण, आत्मोत्कर्ष में बाधाएँ।
शक्ति संचय के सूत्र, शक्ति का अपव्यय कैसे रोकें?
जीवन-लक्ष्य चेतना को प्रखर-परिष्कृत बनाना।
मानव जीवन एक कल्पवृक्ष, वाक्शक्ति-दिव्य विभूति।
श्रद्धा की सामर्थ्य, ब्रह्मविद्या, सिद्धि के सिद्धांत।
अमृत, पारस और कल्पवृक्ष की प्राप्ति।
लोक आराधना की आवश्यकता और उसका स्वरूप-सेवाधर्म
उपासना-समर्पण योग
जीवन की अन्यान्य आवश्यकताओं की तरह ही उपासना भी आत्मा की एक अनिवार्य आवश्यकता है। निष्काम भाव से की गई उपासना भगवत् अनुकंपा का पात्र बनाती है। इसमें पढ़ें और पाएँ-
उपासना एक अनिवार्य आवश्यकता, उपासना फलवती कैसे हो? उपासना करें तो इस तरह। उपासना के साथ भावना भी।
उपासना की महत्ता एवं विधि-व्यवस्था-षट्कर्म के उद्देश्य, प्रतीक पूजा का औचित्य, जप और ध्यान का विज्ञान।
विशिष्ट उपासना अर्थात् ईश्वर के पास बैठना, जीवन-शोधन
ब्रह्मसंध्या और उसके मंत्र, उपासना संबंधी भ्रांतियों का निवारण।
ब्रह्मप्राप्ति की साधना, योग और तप का तत्त्वज्ञान।
पात्रता का विकास, पात्रता के अनुरूप ही अनुदान। सूक्ष्म वातावरण का परिशोधन सामूहिक उपासना द्वारा।
महाप्रज्ञा का युगशक्ति के रूप में अरुणोदय।
समर्थ बनें-समर्थों का आश्रय लें। दीक्षा की प्रक्रिया, व्यवस्था।
गायत्री उपासना द्वारा मनुष्य जीवन की सार्थकता।
आत्मा की अनंत शक्ति, आत्म-कल्याण का राजमार्ग।
4-साधना पद्धतियों का ज्ञान और विज्ञान
योगदर्शन एक विशुद्ध विज्ञान है। पतंजलि ऋषि ने योग-विज्ञान के आठ अंग बताये हैं। इस साधना-विज्ञान के सभी पक्षों पर विस्तार से इस खण्ड में विवेचन हुआ है।
योगः कर्मसु कौशलम्, योग का उद्देश्य-चित्तवृत्ति का निरोध।
योग द्वारा आत्मसाक्षात्कार, क्रियायोग, बहिरंग-अंतरंग योग।
योगसाधना के चमत्कारी परिणाम, पात्रता संबंधी अनुशासन।
याग बाजीगरी नहीं उच्चस्तरीय पुरुषार्थ, हठयोग लाभदायक भी, हानिकारक भी।
योग संबंधी भ्रांतियों से उबरें, योग और मेडीटेशन का कौतुक।
विदेशों में योग प्रचार बचकाना खिलवाड़ न बनाया जाय।
योग के प्रति विश्व का आकर्षण और हमारा दायित्व।
महर्षि अरविन्द का पूर्णयोग, पातंजलि योग का तत्त्वदर्शन।
यम और नियम, दमन अपने आपे का, अपरिग्रही जीवन।
गृहस्थ में तपश्चर्या का विधान, विवाहित जीवन-मर्यादाएँ सुसंतति का उपहार। जिह्वा के संयम से स्वास्थ्य-सिद्धि
मरणं बिन्दु पातेन जीवनं बिंदु धारणात्-संयमी आत्मजयी।
प्राणशक्ति संवर्द्धन हेतु शुद्ध और सात्विक भोजन।
अष्टांग योग-उपयोगी आसन, श्रम-विश्राम का संतुलन।
पूज्यवर ने अपने सभी मानसपुत्रों, अनुयायियों के लिए मार्गदर्शन एवं विरासत में जो कुछ लिखा है- वह अलभ्य ज्ञानामृत (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वांग्मय सत्तर खण्डों में) अपने घर में स्थापित करना ही चाहिए। यदि आपको भगवान ने सम्पन्नता दी है, तो ज्ञानदान कर पुण्य अर्जित करें। विशिष्ट अवसरों एवं पूर्वजों की स्मृति में पूज्यवर का वांग्मय विद्यालयों, पुस्तकालयों में स्थापित कराएँ। आपका यह ज्ञानदान आने वाली पीढ़ियों तक को सन्मार्ग पर चलाएगा, जो भी इसे पढ़ेगा धन्य होगा।
5-साधना से सिद्धि-1
साधना से सिद्धि प्राप्त होती है। अपनी चंचल चित्तवृत्तियों को साध लेना ही साधना है। इसमें मन का संयम और कषाय-कल्मषों से मुक्ति आवश्यक है-
व्यक्तित्व सुसंस्कारित बनें, साधना विज्ञान की पृष्ठभूमि।
साधना से सिद्धि का मर्म, साधना-समर बनाम जीवन-संग्राम
अंतःकरण चतुष्टय और साधना विज्ञान।
साधना से आत्मिक प्रखरता, संकल्प-शक्ति की अभिवृद्धि।
ईश्वर प्राप्ति के वेदोक्त साधन, साध्य-साधना-साधक
ईश्वरं प्राप्ति के वेदोक्त साधन, साध्य-साधना-साधक
साधनाएँ फलीभूत क्यों नहीं होती, निष्काम साधना।
हिमालय की छाया, गंगा की गोद में ब्रह्मवर्चस साधना।
सफल साधना हेतु उपयुक्त वातावरण, गुरु निर्देश से साधना।
खाद्य पदार्थों की कारण-शक्ति उपवास साधना, आहार-शुद्धि लोक लोकांतरों की यात्रा।
साधना से सूक्ष्म शरीर का विकास-विस्तार
छाया पुरुष मात्र दिवा स्वप्न नहीं-एक सत्य।
अमर आत्माओं का रहस्य, तिब्बत के लामा योगी, हवा में महल, आधी रात में सूर्य, एक शरीर यहाँ भी-वहाँ भी।
6-साधना से सिद्धि-2
मानव-जीवन असंख्य सम्भावनाओं से भरा-पूरा है, पर यह लाभ तब ही मिलता है जब इसे ठीक तरह से सँवारा जाय, संभाला जाय। यह ज्ञान और योग से सम्भव है, पढ़ें-
निर्विकार आत्मा, माता का सूक्ष्म स्वरूप, साधना और सिद्धि।
सत्पात्र पर ही दैवी अनुदान। भिन्न-भिन्न प्रकार की दीक्षाएँ।
योग-प्रसुप्त से जागृति का उच्चस्तरीय विज्ञान।
साधना में बाधक-संचित दुष्कर्म, पाप प्रायश्चित के तप-व्रत; इंद्रियाँ आत्मा की शत्रु नहीं सेवक।
स्थूल से अधिक शक्ति सूक्ष्म में, आनंद और उल्लास का अजस्र निर्झर कारण शरीर, उसकी दिव्य विभूतियाँ।
स्थूल शरीर पर ध्वनि प्रयोग, स्थूल और सूक्ष्म शरीर का समन्वय।
ब्रह्मवर्चस की योगाभ्यास साधना-ध्यान-धारणा नादानुसंधान, अंतःत्राटक, प्राणयोग, मुद्रासिद्धि।
अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय कोषों के जागरण का व्यावहारिक स्वरूप।
सूक्ष्म शरीर की सक्रियता शक्तिचालिनी, शिथिलीकरण तथा खेचरीमुद्रा से।
7-प्रसुप्ति से जागृति की ओर
साधना-संयम उपासना और भविष्य-निर्माण की आराधना, इन तीन पक्षों पर टिका हुआ है जागृति का विज्ञान। इसमें व्यक्तित्व को परिष्कृत कर ऊर्ध्वगमन की प्रक्रिया योग त्रयी द्वारा सम्पन्न की जा सकती है, पढ़-
चांद्रायण साधना, प्रायश्चित का अति महत्वपूर्ण पथ क्षतिपूर्ति।
हम निष्पाप बनें, अगला जन्म पछतावा न बने।
प्राण प्रत्यावर्तन, कल्प साधना, व्यक्तित्व परिष्कार।
गायत्री योग साधना-प्रणव अथवा ब्रह्मयोग, कुण्डलिनी, षट्चक्रों का जागरण, आत्मोत्कर्ष का राजमार्ग-तप-तितिक्षा
स्वरयोग से दिव्यज्ञान, वीर्य रक्षक प्राणायाम, मौन व्रत, सारस्वत योग।
आत्म जागरण, आत्म निरीक्षण, रस-गंध-स्पर्श साधना।
सत्य योग, श्रमयोग, पर्यवेक्षण योग की साधना।
सीस दिये जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान।
दिव्य शक्तियों के हस्तांतरण की प्रक्रिया-शक्तिपात।
8-ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?
जिस चेतना शक्ति से यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड संव्याप्त है- उस परमशक्ति को हम ईश्वर कहते हैं। वह शक्ति स्वयं सर्वसमर्थ है तथा अजर और अमर है। इस ईश्वर का क्या साक्षात्कार सम्भव है? इस गूढ़ रहस्य को समझने के लिए आप पढ़ें-
सर्वोत्कृष्ट दर्शन-आस्तिकवाद आत्मा परमात्मा का संबंध।
ब्राह्मी चेतना, परमात्म सत्ता का विलक्षण प्रमाण।
आत्म समर्पण द्वारा प्रभु प्राप्ति, अधर्म की जननी-नास्तिकता
ईश्वर और उसका अस्तित्व, उसका साक्षात्कार; कामनाओं की पूर्ति या निवृत्ति; प्रतीकोपासना का मनोविज्ञान।
जप की अवधि में दस निषेध; ज्ञान-कर्म और भक्ति।
प्रकाश की ओर ही चलें, युग साधना का अभिनव निर्धारण।
ईश्वर विश्वास क्यों? किसलिए? अपनी तुच्छता भी जानें।
ईश्वर है या नहीं? ईश्वरवाद का विश्लेषण।
श्रेय और प्रेय पथ के परिणाम, निष्काम भक्ति में दुहरा लाभ।
नास्तिक भी उपासना करें, पूजा एवं ध्यान योग का मर्म।
विवाद से परे ईश्वर का अस्तित्व, उसका नियंत्रण न तोड़े।
ईश्वर प्राप्ति का सच्चा मार्ग, ईश्वर और उसकी अनुभूति।
भक्तियोग का व्यवहारिक स्वरूप।
प्रखर साधना वर्ष का शुभारम्भ एक ऐसा अवसर है, जिसे अद्भुत-अभूतपूर्व कहा जा सकता है। शायद भविष्य में भी इसकी पुनरावृत्ति कभी न हो। इन दिनों विज्ञान ने सुविस्तृत संसार को किसी गली-मुहल्ले की तरह निकटवर्ती बना दिया है। व्यक्ति और समाज की समस्याएँ आपस में गुँथ गयी हैं। साथ मरने-साथ जीने जैसा माहौल बन गया है। इसलिए समस्याओं और समाधानों की खोज नये किन्तु व्यापक दृष्टिकोण से करनी होगी। अपने मतलब-से-मतलब रखने का आदिमकालीन सोच अब चल न सकेगा। अब तो सब कुछ सामूहिक प्रयास के बलबूते ही सम्भव है।
इन दिनों महाविनाश एवं महासृजन आमने-सामने खड़े हैं। इनमें से एक का चयन सामूहिक मानवी चेतना को ही करना पड़ेगा। उस चेतना को, जिसका प्रतिनिधित्व तपस्वी एवं साधना सम्पन्न प्रतिभाएँ करती रही हैं। ऐसी प्रतिभाएँ जो तप-साधना की सुप्रखरता से सुसम्पन्न हों, उन्हीं को युगपरिवर्तन का नियामक कहा जा सकता है।
विस्फोटक गति से बढ़ती जनसंख्या, खाद्य और खनिज पदार्थों से निरन्तर होती जा रही कमी, बढ़ता हुआ वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण आणविक विकिरण, वनों का अत्यधिक कटाव, धरती की उपजाऊ परतों का क्षरण और रासायनिक भरमार से उसकी उर्वरता का समापन, बढ़ते शहर-घटते गाँव, औद्योगीकरण के कारण बढ़ती बेरोजगारी, नशेबाजी, व्यभिचार जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ, लोभ, मोह, विलास प्रदर्शन से भरी-पूरी संकीर्ण स्वार्थपरता, कुप्रचलनों के प्रति दुराग्रह जैसी अनेक समस्याएँ इन दिनों तूफानी गति से उभर रही हैं। उनकी बढ़ती तूफानी दिशाधारा मानवी गरिमा को अपने प्रवाह में बहा ले जा सकती है और महाप्रलय के दृश्य उपस्थित कर सकती है। धरती का बढ़ता तापमान, जलप्रलय, हिमप्रलय, प्रचंड-तपन भुखमरी, सूखा, महामारी जैसे स्तर के संकट उत्पन्न कर सकते हैं, जिससे मानवीसत्ता और सभ्यता का अता-पता भी न चले।
विश्वयुद्ध का संकट भी अभी टला नहीं है। एक ओर अगणित सर्वभक्षी विभीषिकाएँ इस सुन्दर विश्व उद्यान को तहस-नहस करने पर तुली हुई हैं, वहीं आशा की उषाकाल जैसी उज्ज्वल भविष्य की एक क्षीण किरण नवोदय का संकेत भी दे रही है। ऐसी विषम परिस्थितियों में विनाश का दमन और विकास का अभ्युदय करने हेतु महाकाल की नियामक चेतना अवतरित होती रही है। यदा-यदा हि धर्मस्य’ वाली उक्ति में इस युग में घटित होने वाली सम्भावना का आश्वासन भी है। सृष्टिकर्ता अपनी इस अनुपम कलाकृति धरती, मानवीसत्ता और उसकी महत्ता का सर्वथा विनाश न होने देने का चमत्कारी सरंजाम जुटाता रहा है। इस बार वैसा न हो, वैसी निराशा किसी को भी न अपनानी चाहिए। उज्ज्वल भविष्य का नाम ही इक्कीसवीं सदी से आरंभ होने वाला सृजन पर्व है।
महाकाल का अवतरण साधना सम्पन्न तपस्वी आत्माओं की आदर्शवादी अन्तःचेतना में ही प्रकट और प्रखर होता है। व्यापक समाधान उसी तूफानी उभार के आधार पर संभव है। उज्ज्वल भविष्य के अवतरण का श्रेय अग्रगामी वरिष्ठ साधकों को मिले, यह स्वाभाविक है, पर वस्तुतः अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। तप-साधना की संयुक्त शक्ति ही उज्ज्वल भविष्य के अवतरण जैसे महान कार्य सम्पन्न करती है। अवतार की दार्शनिकता इसी केन्द्र में खोजी जा सकती है। देवताओं की संयुक्त दिव्य शक्ति से दुर्गावतार हुआ था। ऋषियों के रक्त-संचय से सीता का उद्भव और असुरता का दमन सम्भव हुआ था। राम के रीछ-वानर कृष्ण के ग्वाल-बाल बुद्ध के भिक्षु, गाँधी के सत्याग्रही इसी प्रकार की भूमिकाएँ सम्पन्न करते हुए असम्भव को सम्भव बनाते रहे हैं। प्रखर साधना वर्ष में वही पुरुषार्थ आत्मिक स्तर पर सम्पन्न होने जा रहा है।
विनाश के दमन और विकास के सृजन के इस आपत्तिकाल में महाकाल ने तपस्वी साधकों को सहयोगी-सहभागी बनाने के लिए साधना वर्ष का आमंत्रण भेजा है। प्रमादी और कुसंस्कारी इसे अनदेखी-अनसुनी करके उपेक्षा भी बरत सकते हैं, पर जिनके भीतर आदर्शों की उत्कृष्टता, दूरदर्शी विवेकशीलता विद्यमान है, वे समय चूक कर सदा पछताते रहने की भूल नहीं कर सकते।
महत्वपूर्ण अवसरों की अवमानना करने वाले ही अभागे कहलाते हैं। साहसी जन तो सहज सम्भावना में भागीदार बनने के लिए पाण्डवों जैसी सूझ-बूझ का परिचय देते हैं।
यह युगवेदना की घड़ी है। एक ओर असह्य वेदना, दूसरी ओर उज्ज्वल भविष्य के महालाभ का सुयोग। रात्रि के अवसान पर तमिस्रा धीरे-धीरे धीमी हो जाती है। दूसरी ओर ब्रह्ममुहूर्त की अवचेतना ऊर्जा और आभा बनकर अरुणोदय की तैयारी में जुटती है। जिनकी उमंगें मरी नहीं हैं, वे प्रातःकाल में जग पड़ते हैं। रात्रि वाली रीति-नीति बदलते और प्रभातकालीन नये क्रिया-कलापों नये उत्तरदायित्वों का वहन करते हैं।
प्रखर साधना वर्ष में ऐसे मणि-मुक्तकों की तलाश हो रही है, जिनका सुगठित हार युगचेतना की महाशक्ति के गले में पहनाया जा सके। ऐसे महासाधकों की तलाश युग-निमन्त्रण पहुँचाकर की जा रही है। जो जीवन्त होंगे-करवट बदलने में उठ खड़े होंगे और संकट काल में शौर्य प्रदर्शित करने वाले सेनापतियों की तरह अपने को विजय श्री वरण करने वाले महावीर के रूप में प्रस्तुत करेंगे। कृपण और कायर ही कर्तव्य की पुकार सुनकर काँपते-घबराते और किसी कोतर में अपना मुँह छिपाने की विडम्बना रचते हैं। एक दिन मरते तो वे भी हैं, पर खेद-पश्चाताप की कलंक-कालिमा सिर पर लादे हुए।
महाविनाश की विभीषिकाएँ अपनी मौत मरेंगी। अरुणोदय अगले ही क्षणों जाज्वल्यमान दिवाकर की तरह साकार होगा। यह सम्भावना सुनिश्चित है। देखना इतना भर है कि उज्ज्वल भविष्य के इस अवतरण काल में तपस्वी की भूमिका सम्पादन करने के लिए श्रेय कौन पाता है? किसके कदम समय रहते श्रेयपथ पर आगे बढ़ते हैं।
तपस्वी आत्माएँ इस अवसर पर अपना दायित्व सँभालें; इसीलिए उन्हें खदानों में छिपे मुक्तकों की तरह प्रयत्नपूर्वक खोजा जा रहा है- जगाया और बुलाया जा रहा है। इस ढूँढ़-खोज के लिए दीपयज्ञों की पुनीत ज्वाला जलाई गयी है। अंधकार में खोई हुई वस्तुओं को प्रकाश जलाकर ही खोजा-उठाया जाता है। जन-जन को झकझोरने वाली चेतना के सुविस्तृत और सुनिश्चित अभियान की तरह ही साधना वर्ष के महाभियान को चलाया जा रहा है। धार्मिकता के भावनात्मक वातावरण में ऐसी ढूँढ़-खोज सहज ही बन भी पड़ती है। देव आरती में बच्चे तो पाई-पैसा चढ़ाकर भी मन बहला लेते हैं, पर प्रतिभाओं को तो छोटी नाली की तरह गंगा-नर्मदा जैसी दिव्य धारा में अपने को
समर्पित ही करना पड़ता है। कृपण और कायर तो सड़ी कीचड़ में जन्मने वाले कृमि कीटकों की तरह उपजते और उसी नरक में विलय हो जाते हैं।
प्रखर साधना वर्ष की अलौकिक आभा में ज्योतिर्मय आत्माएँ उभरती, झिलमिलाती दीख पड़ेंगी और अपनी उपयुक्त जगह ग्रहण करेंगी- ऐसी आशा की गई है। महाकाल का यह शंखनाद निष्फल नहीं जा सकता। इसे सुनकर मूर्च्छितों-प्रसुप्तों में भी चेतना का संचार होगा। जो सर्वथा मर चुके हैं, उनकी बात दूसरी है।
सर्वप्रथम आगे आने वाले तपस्वी साधकों को व्रतधारी प्रज्ञापुत्र कहा जाएगा। वे उपासना-साधना-आराधना के आधार पर आत्मपरिष्कार करेंगे, धार पैनी करेंगे और इतनी अंतःक्षमता अर्जित करेंगे, जिसके आधार पर उनसे कुछ महत्वपूर्ण कार्य करते बन पड़े।
‘सतयुग की वापसी- उज्ज्वल भविष्य का अवतरण’ इसी महापुरुषार्थ के बलबूते सम्भव होगा। जिन दिनों मनुष्य में देवत्व का उदय ओर धरती पर स्वर्ग का अवतरण प्रत्यक्ष दिख पड़ता था, उन दिनों चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की उत्कृष्टता ही इस प्रकार की सुखद परिस्थितियाँ उत्पन्न कर रही थी। हँसती-हँसाती खिलती-खिलाती उठती-उठाती जिन्दगी इसी आधार पर बितायी जा सकती है। स्वयं पार उतरना और असंख्यों को अपनी नाव पर बिठाकर पर कराना इसी आधार पर सम्भव हो सकता है। कभी इस देवभूमि में सतयुग था, तब समस्त संसार उसका लाभ उठाता था। अब इस प्रखर साधना वर्ष में किए जाने वाले महापुरुषार्थ से उस पुण्य प्रक्रिया का पुनर्जीवन सम्भव होने जा रहा है। इसी सुनिश्चित सम्भावना का नाम है- उज्ज्वल भविष्य का अवतरण।
नये संसार का निर्माण सर्वमान की अपेक्षा किसी भिन्न प्रकार के साधनों और तत्वों से ही होगा। इस समय बाहरी चीजों का ही ज्यादा महत्व है, जबकि नये युग में आन्तरिक शक्तियों की ही प्रधानता होगी। बहिरंग पर अधिक ध्यान न देकर अब हमें अपनी आत्मिक शक्तियों के विकास में लगना चाहिए, ताकि नये युग में उसके अनुकूल स्वयं को प्रस्तुत कर सकें, उसके उपयुक्त बन सकें।
श्री अरविन्द
भगवान बुद्ध एक रात्रि प्रवचन कर रहे थे। प्रवचन सुनने के लिए बैठा हुआ व्यक्ति बार-बार नींद के झोंके ले रहा था। तथागत ने उस ऊँघते हुए व्यक्ति को कहा- वत्स सोते हो। नहीं भगवन्- हड़बड़ाकर ऊँघते हुए व्यक्ति ने कहा। प्रवचन पूर्ववत् चालू हो गया और उक्त श्रोता भी पहले की तरह ऊँघने लगा। भगवान बुद्ध ने तीन-चार बार उसे जगाया, परन्तु वह ‘नहीं भगवन्’ कहता और फिर सो जाता। अन्तिम बार तथागत ने पूछा-वत्स जीवित हो! नहीं भगवन्! सदा की तरह उत्तर दिया श्रोता ने। श्रोताओं में हँसी की लहर दौड़ गयी। भगवान बुद्ध भी मुसकराये, फिर गम्भीर होकर बोले- वत्स निद्रा में तुमसे सही उत्तर निकल गया। जो निद्रा में है, वह मृतक समान है। जब तक हम विवेक और प्रज्ञा में नहीं जागते हैं, तब तक हम मृतक के ही समान हैं।
जिनके मन में साधक समुदाय में पायी जाने वाली आत्मकल्याण और लोकमंगल की ज्योति विराजमान् है, उनके लिए सदा की भाँति अभी दैवी-प्रकाश का अनुग्रह उपलब्ध करना सरल है। अड़चन तो दैत्य ही उत्पन्न करते हैं, जिन्हें तृष्णा और लिप्सा के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। जिनकी साधना उच्च उद्देश्यों के निमित्त है- उन्हें पात्रता के अनुरूप दिव्य-अनुदानों को प्राप्त करते रहने में कोई बाध नहीं पड़ती। शुभ प्रसंगों पर देवताओं द्वारा पुष्पवृष्टि होने के उल्लेख कथा-पुराणों में आते रहते है॥ इस अलंकारिक वर्णन में इसी तथ्य को उजागर किया गया है कि सत्प्रयोजनों में दिव्यसत्ता की सहानुभूति ही नहीं, अनुकम्पा और सहायता भी मिलती है। यदि ऐसा न रहा होता तो विपन्न परिस्थितियों में जन्मों और असंख्य अवरोधों से घिरे रहने पर महापुरुषों को उच्चस्तरीय सफलताएँ प्राप्त कर सकना किस तरह सम्भव हो सका होता?
यह नवयुग की सन्धिवेला का अन्तिम चरण है। इसमें आकुलता भक्तों को कम और भगवान को अधिक है। आमतौर से वोटर ही चुने प्रतिनिधियों से अपना कुछ काम कराने के लिए उनका द्वार खटखटाते रहते हैं। सामान्य समय में यही चलता रहता है, किन्तु चुनाव के दिनों में स्थिति ठीक उल्टी हो जाती है, तब खड़े हुए उम्मीदवार ही वोटरों के दरवाजों पर चक्कर काटते हैं और सहायता प्राप्त करने के लिए बहुत कुछ कहते और करते देखे जाते हैं। इन दिनों परिस्थिति ऐसी ही है, जिसमें निराकार भगवान को साकार मनुष्यों की सहायता तलाश करनी पड़ रही है। बिजली की सामर्थ्य सर्वविदित है, पर उसे भी अपनी सामर्थ्य का परिचय देने के लिए बल्ब, पंखा, हीटर, मोटर आदि उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। लम्बे सफर जल्दी पूरे करने हों तो द्रुतगामी वाहन तलाश करने होते हैं। महाकाल की समर्थता में सन्देह नहीं, पर सदा की भाँति इस समय भी उसे प्रत्यक्ष परिवर्तन कर सकने के लिए तपस्वी साधकों की जरूरत पड़ रही है।
राम ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचे थे और हनुमान-सुग्रीव को सहयोग देने के लिए- सहमत करने के लिए मनाते रहे थे। अर्जुन ने जब महाभारत लड़ने में आनाकानी दिखाई थी, तो कृष्ण समझाने से लेकर नाराज होने तक और अन्ततः उनका रथ चलाने की शर्त पर समझौता कर पाए थे। श्री रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द के घर पर चक्कर काटे थे और साथ देने के लिए कई तरह के अनुदान देने का वादा करते रहे थे। वे तब तक पीछे ही लगे रहे जब तक कि स्वामी विवेकानन्द उनके सहयोगी नहीं बन गए। चन्द्रगुप्त चाणक्य को ढूँढ़ने नहीं गए थे, बल्कि चाणक्य ने ही उन्हें ढूँढ़ा था। समर्थ और शिवाजी के सम्बन्ध में भी यही बात है।
इसी प्रकार के अनेक घटनाक्रम और भी मौजूद हैं, जिनमें विशेष अवसरों पर विशेष अवसरों पर विशेष आवश्यकता की पूर्ति के लिए दिव्यसत्ता जाग्रत आत्माओं को तलाश करने और उनका सहयोग पाने के लिए प्रयत्नरत रही है। आमतौर से ऐसा नहीं होता। सामान्य समय में साधकों को ही समर्थों का मनुहार करना पड़ता है। भगवान अकारण भक्तों के दरवाजों पर नहीं पहुँचते। समदर्शी को न किसी से मोह होता है न द्वेष। न उन पर निन्दा का असर पड़ता है न प्रशंसा का। भगवत्कृपास्वरूप दैवी प्रकाश का एक ही सुनिश्चित उद्देश्य है-सत्प्रयोजनों में सहयोग पाने के लिए माध्यम उपलब्ध करना। निराकार होने के कारण उन्हें आकारधारी मनुष्यों की सहायता जुटानी पड़ती है।
स्रष्टा ने इस धरती को अपनी सर्वोत्कृष्ट कलाकृति के रूप में विनिर्मित किया है। ऐसा सुन्दर ग्रह इस ब्रह्माण्ड में और कोई नहीं। मनुष्य को जब उसने गढ़ा है, तो उसमें अपनी समस्त विशेषताएँ बीज रूप में भर दी हैं। धरती और मनुष्य से स्रष्टा को असाधारण प्यार है, इसलिए उनके पराभव का संकट जब कभी खड़ा होता है, तो वे स्वयं दौड़ते चले आते हैं और सन्तुलन बनाये रखने का अपना यदा-यदा हि धर्मस्य’ वाला आश्वासन पूरा करते हैं। चेतना को कृत्य करने के लिए शरीर की आवश्यकता पड़ती है। इसकी पूर्ति वे तपस्वी आत्माओं का सहयोग प्राप्त करके पूर्ण करते हैं। अवतारों के सहयोगी अपनी तुच्छ-सी सहायता का इतना बड़ा उपहार प्राप्त करते रहे हैं, जितना सामान्य रूप से बहुत कुछ कर गुजरने पर भी सम्भव नहीं था।
यों दिव्यलोक से अवतरण मात्र अदृश्य प्रवाह का होता है। उसे युगान्तरीय चेतना जैसी किसी अदृश्य हलचल के नाम से जाना जा सकता है। पर आँधी का परिचय तो पत्तों के हिलने और धूलिकणों के उड़ने जैसी दृश्य घटनाओं से ही मिलता है। युगान्तरीय चेतना साधकों का वरण करती है और उन्हीं के माध्यम से अपना प्रयोजन पूर्ण करती है। ऐसे साधकों-तपस्वियों का सौभाग्य अनन्तकाल तक सराहा जाता है। वर्ष 1999 में भी ऐसा ही सुयोग सामने है, उसमें साधकों के लिए अनुपम अनुदानों का सुअवसर अनायास ही प्रस्तुत है, किन्तु उसके साथ सदा की तरह अभी भी पुण्य-प्रयोजनों के लिए अनुदानों का उपयोग करने की शर्त जुड़ी है। जो दूसरों की जेब काटकर अपनी मौज-मस्ती का ताना-बाना बुनते रहते हैं, उनके लिए तो यह सुयोग भी सन्तोषप्रद सिद्ध न हो सकेगा। साधक समुदाय में प्रवेश करने की प्रमाणिक पात्रता तो उदात्त चरित्र, उदार व्यवहार के सहारे ही विकसित होगी।
वर्तमान साधना वर्ष में नैष्ठिकों को विशिष्ट स्तर के और सामान्य साधकों को सामान्य स्तर के अनुदान मिल रहे हैं। प्रयास और परिश्रम की तुलना में यह उपलब्धि भी इतनी बड़ी है, जिसे चन्दन के निकट उगे पेड़ों और पारस का स्पर्श करने वाले लौह-खण्डों को मिलने वाले अनायास सौभाग्य के समतुल्य समझा जा सकता है। सूर्य के उदय होने पर उसके प्रकाश क्षेत्र में आने वाले सभी प्राणी ओर पदार्थ गर्मी प्राप्त करते हैं। वर्षा के समय खुले में जा खड़े होने पर किसी को भी गीले होने का अवसर मिल जाता है। इसमें प्रयास स्वल्प और लाभ असाधारण हैं। जब चाहें, जहाँ चाहें वहीं सूर्य की ऊर्जा-वर्षा की तरलता का लाभ नहीं मिलता। इस साधना वर्ष को भी दैवी प्रकाश एवं अनुग्रह प्राप्त करने का एक विशिष्ट अवसर माना जा सकता है।
इस साधना पर्व पर ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए आत्मिक पुरुषार्थ करने और श्रेय पाने वालों की ढूँढ़-खोज चल रही है। इस खोज-बीन में एक मौलिक विशेषता है। सरकारी नियुक्ति तन्त्र अपनी आवश्यकता के अनुरूप छाँट कर लेने के उपरान्त शेष को दो टूक मनाही कर देते हैं। प्रस्तुत दैवी-आमन्त्रण में ऐसा नहीं है। इसमें सर्वथा निराश किसी को भी नहीं किया जाएगा। जो जितने का, जिस स्तर का अधिकारी है, उसे उतना तो दिया ही जाएगा। इस साधना आयोजन में भागीदार होने वाला कोई भी खाली हाथ नहीं रहने पाएगा।
देवात्मा हिमालय के आध्यात्मिक ध्रुव केन्द्र से इस प्रखर साधना वर्ष के दिनों में एक विशिष्ट प्राण प्रवाह रेडियो प्रसारण की तरह, वर्षा-मानसून की तरह उमड़ता रहेगा। उससे लाभान्वित होने के लिए सभी जागरूकों को साधना करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। साधना आयोजन में जो बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाएँगे, उनका साहस एवं उत्तरदायित्व अधिक होने के कारण उन्हें अनुदान भी इसी स्तर के मिलेंगे। किन्तु जो उतना साहस न जुटा सकेंगे, उन्हें भी पात्रता के अनुरूप हल्के स्तर के उपहार पाने का अवसर मिलेगा। वर्षा में बड़ा तालाब और सरोवर अगाध जलराशि एकत्रित कर लेते हैं, किन्तु खाली रह जाने की शिकायत छोटे गढ्ढों और पोखरों को भी नहीं रहती। उन दिनों गणना उनकी भी सौभाग्यशालियों और उपलब्ध कर्ताओं में ही होती है।
अकाल पड़ने पर कुआँ खोदने आदि के लिए, तकाबी बाँटने के लिए सरकारी अफसर स्वयं गाँव-गाँव घूमते हैं। इतना ही नहीं, खोदने की सुविधा और जानकारी देते हुए प्रयत्नरत होने के लिए किसानों की खुशामद भी करते हैं। यों प्रत्यक्ष लाभ किसानों का ही है। पीने का पानी और सिंचाई का साधन मिलने से राहत उन्हीं को मिलती है, फिर भी सरकार जानती है कि समर्थ किसानों पर ही देश की खुशहाली निर्भर है। इसलिए तकाबी लेने और कुएँ खोदते देखकर उन्हें भी कम प्रसन्नता नहीं होती। प्रखर साधना वर्ष में हिमालय की दिव्यशक्तियों जो अनुदान वितरण कर रही हैं, वे कई प्रकार की हैं और उनकी गरिमा का स्तर भी क्रमशः बढ़ा-चढ़ा है, जो उन्हें प्राप्त करेगा। साधना वर्ष के कार्यक्रमों में भागीदार होने वाले लोगों के पैरों में गति और हाथों में प्रगति के सूत्र थमाने वाले अनुदान देने का निश्चय स्वयं भगवान महाकाल का है। इस सुविधा का लाभ प्रत्येक भागीदार साधक को मिलेगा। इस प्रखर साधना वर्ष का असाधारण उपहार समझा जाना चाहिए और उससे लाभान्वित होने का परिजनों में से प्रत्येक को प्रयत्न करना चाहिए। इस आत्म श्रेय एवं दैवी प्रकाश अनुदान का दुहरा लाभ प्राप्त करने वाले अपने सौभाग्य कली सराहना पीढ़ी-दर-पीढ़ी किए बिना न रह सकेंगे।
संत तुकाराम जन्मजात शूद्र थे। उनका ईश्वरभक्ति करना तथा भक्ति गीत लिखना तात्कालिक सवर्ण पंडितों की दृष्टि में अनुचित ही नहीं- एक अपराध था।
एक निकटवर्ती पंडित श्री रामेश्वर भट्ट ने उन्हें बुलाया और कहा कि तुम्हें शूद्र होने के नाते यह सब कुछ नहीं करना चाहिए। न ईश्वरभक्ति, न भजन-कीर्तन और न अभंगों की रचना।”
तुकाराम अत्यन्त ही सरल स्वभाव के- आवश्यकता से अधिक नर्म तथा बहुत ही सीधे-सादे व्यक्ति थे। उन्होंने रामेश्वर भट्ट की बात स्वीकार कर ली और पूछा-किन्तु जो अभंग रचे जा चुके हैं- उनका क्या होगा?” तब उस हृदयहीन पंडित ने कहा-उन्हें नदी में बहा दो।”
अनासक्त योगी-तुकाराम ने सचमुच ही अपने अभंगों की पोथी इन्द्रियाणि में प्रवाहित कर दी। उस दबाव में वे ऐसा कर तो गये, पर मन इतना मर्माहत हो गया कि वे विट्ठल मंदी के सामने तेरह दिन तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए पड़े रहे और सोचते रहे ”मेरी भक्ति में ही कहीं कोई त्रुटि है, जो भगवान मुझसे प्रतिकूल हो गये हैं।”
दुःखी मन की पुकार-जो सच्चे मन व सत्य के प्रकाश से उद्भासित हो-कभी खाली नहीं जाती। तेरहवें दिन तुकाराम को स्वप्न हुआ कि “पोथियाँ नदी किनारे पड़ी हैं-जाकर उठा ला।” तब उनके स्वप्न का हाल सुनकर उनके भक्त गण जयघोष करते हुए गये और पोथियाँ किनारे पर से उठा लाये।
साधना वर्ष के समस्त क्रिया-कलापों का गम्भीर अध्ययन-पर्यवेक्षण करने पर इसे सूक्ष्मजगत के परिशोधन और जनमानस के परिष्कार का बहुमूल्य प्रयोग माना जा सकता है। गायत्री साधना का अपना एक सूक्ष्म विज्ञान है। उसके तत्त्वज्ञान और विधिविधान में ऐसे तत्व विद्यमान हैं, जो सूक्ष्मजगत के अदृश्य वातावरण में देवत्व की मात्रा बढ़ाते हैं। उससे सर्वजनीन सुख-शान्ति में अदृश्य सहायता मिलती है। इस वर्ष के साधनात्मक कार्यक्रमों एवं साथ ही जुड़े अग्निहोत्र से वायुशोधन की उपयोगिता अपने स्थान पर है, पर वास्तविकता दूसरी ही है। वायुशोधन की अपेक्षा वातावरण का निर्माण इसका प्रमुख प्रयोजन है। गायत्री मंत्र का भावभरा जप-विश्व चेतना में पवित्रता के तत्व भरने वाले दिव्य कम्पन करता है। इसके अलावा भी इस वर्ष अपनाए जाने वाले साधना आयोजन में ऐसे-ऐसे अनेक आधारों का समन्वय है, जिनका सम्मिलित प्रभाव वातावरण में ऐसे उपयोगी तत्वों का समावेश करता है, जो अविज्ञात रूप से विश्व कल्याण की भूमिका सम्पन्न कर सके।
आज तो प्रदूषण की विभीषिका पर ही चर्चा होती है। अणु विकिरण से विषाक्तता, कोलाहल की प्रतिक्रिया पर ही चिन्ता व्यक्त की
जाती है। तत्व दर्शी मनीषियों को सूक्ष्म-वातावरण की चिन्ता इससे भी अधिक रहती है, वे जानते हैं कि वातावरण का प्रवाह मानवी तूफानों से भी अधिक सशक्त होता है। वातावरण के साँचे में व्यक्तियों का समूह खिलौने की तरह ढलता चला जाता है। अनेक देशों की, क्षेत्रों की परिस्थितियाँ, प्रथाएँ और मान्यताएँ, रुचियाँ और संस्कृतियाँ भिन्न-भिन्न हैं। उनमें जो संतानें जन्म लेती हैं, वे वातावरण के प्रभाव से उसी प्रकार की मनोवृत्ति-प्रकृति अपनाती चली जाती हैं। उनके चिन्तन, स्वभाव और क्रिया-कलाप लगभग वैसे ही होते हैं, जैसे कि उस प्रदेश में रहने वाले लोगों के। समय का प्रभाव, युग का प्रवाह इसी को कहते हैं। सर्दी-गर्मी का मौसम बदलने पर प्राणियों के, वनस्पतियों के तथा पदार्थों के रंग-ढंग ही बदल जाते हैं। इनकी गतिविधियों में ऋतु के अनुकूल बहुत कुछ परिवर्तन होते हैं।
विज्ञानवेत्ता जानते हैं कि पृथ्वी पर जो कुछ विद्यमान है और उत्पन्न-उपलब्ध होता है, वह सब अनायास नहीं है और न उन सबको मानवी उपार्जन कह सकते हैं। यहाँ ऐसा बहुत कुछ होता है, जिनमें मनुष्य का नहीं सूक्ष्म शक्तियों का हाथ होता है। सूर्य पर दिखने वाले धब्बे उसकी स्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं। उस परिवर्तन का पृथ्वी पर भारी असर पड़ता है। उनसे पदार्थों की स्थिति और प्राणियों की परिस्थिति में आश्चर्यजनक हेर-फेर होते हैं। विकिरण, चुम्बकीय तूफान, अन्धड़, चक्रवात किस प्रकार सामान्य परिस्थितियों को असामान्य बनाते हैं, यह सभी जानते हैं। अन्तरिक्षीय अदृश्य शक्ति वर्षा से कई बार धरती पर हिमयुग आए हैं। जलप्लावन, समुद्री-परिवर्तन और खण्डप्रलय के दृश्य उपस्थित हुए हैं। भविष्य में पृथ्वी के पदार्थों अथवा प्राणियों, मनुष्यों की स्थिति में जो असाधारण परिवर्तन होने वाला है, उसका निमित्त कारण सामान्य घटनाक्रमों में नहीं वरन् अन्तरिक्षीय अदृश्य हलचलों में ही पाया जा सकता है।
यों व्यक्ति अपने निजी जीवन में सर्वथा स्वतन्त्र और सशक्त है। इतना होते हुए भी विशाल ब्रह्माण्ड में गतिशील हलचलों और परिस्थितियों में उसका स्थान नगण्य है। सिर पर खड़े, पानी से लदे बादल तक को वह बरसा नहीं सकता। मौत-बुढ़ापे को रोकने तक में असमर्थ है। परिस्थितियों पर उसका अधिकार नगण्य है। प्रवाहों में वह अपना यत्किंचित् बचाव ही कर पाता है। सर्दी उसके बूते रुकती नहीं, कपड़े लादकर, आग ताप कर आत्मरक्षा भर में आँशिक सफलता पा लेता है।
यहाँ एक सवाल यह पैदा होता है कि क्या मनुष्य वातावरण के सामने सर्वथा असहाय-असमर्थ है? इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि सूक्ष्म प्रवाहों को प्रभावित करने, बदलने और अनुकूल करने की मानवी चेतना में समर्थता विद्यमान है। जीव ईश्वर का अंश है। मानवी चेतना, ब्रह्माण्डव्यापी चेतना का एक भाग है। अंश में अंशी की सारी विशेषताएँ मूल रूप से विद्यमान रहती हैं, यह पूर्णतः सत्य तथ्य है।
जड़ प्रकृति का वैभव-विस्तार बहुत है। फिर भी उस पर नियंत्रण चेतना का ही है। शरीर का अस्तित्व एवं क्रिया−कलाप तभी तक है, जब तक कि उसमें प्राणसत्ता काम करती है। प्रकृति ब्रह्म की छाया मात्र है। ब्रह्म-जगत ही वास्तविक जगत है। प्रकृति-जगत की जड़ता पर चेतना की ब्रह्म-सत्ता का ही नियंत्रण है। विकसित जीवात्मा ब्रह्म जगत से अपने को सम्बद्ध ही नहीं करती, वरन् उसके साथ एकाकार होकर इतनी सक्षम भी बन जाती है कि प्रकृति प्रवाह में आवश्यक हेर-फेर कर सके, वातावरण की प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल सके।
चेतना के संघात से वातावरण में वाँछित परिवर्तन किए जाने सम्भव हैं। अदृश्य जगत में कई बार ऐसी प्रेरणाएँ उभरती हैं, जिनके आँधी-तूफानों में मनुष्यों के मस्तिष्क पत्तों और जिनको की तरह उड़ने लगते हैं। युद्धोन्माद ऐसे ही उभरते हैं। उन दिनों अधिकाँश लोग लड़ने की आवश्यकता अनुभव करते और उसके लिए उतारू दिखते हैं। एक अजीब-सा आवेश छाया रहता है। न कहने की आवश्यकता पड़ती है, न समझाने की। हवा में तेजी और गर्मी ही कुछ ऐसी होती है, जिसके कारण सामान्य मस्तिष्क एक प्रकार से सम्मोहक स्थिति में रहता और प्रवाह में बहता दिखाई पड़ता है। समय-समय पर अनेकानेक सूक्ष्म प्रवाह अपने-अपने स्तर पर उभरते रहे हैं और असंख्य मस्तिष्कों को बहा ले जाने में आँधी-तूफान का काम करते रहे हैं। अदृश्य और सूक्ष्म वातावरण के तथ्य तथा रहस्य को जो लोग जानते हैं, व समझते हैं कि इस प्रकार के प्रवाह कितने सामर्थ्यवान होते हैं, उनकी तूफानी शक्ति की तुलना संसार की किसी और शक्ति से नहीं हो सकती।
प्रखर साधना वर्ष के आयोजन का एक पक्ष व्यक्तित्व परिष्कार, समाज-निष्ठा के प्रशिक्षण का है। चरित्रनिष्ठा और समाजनिष्ठा की गरिमा और उपयोगिता को इस साधना वर्ष के अनुबन्धों- अनुशास्त्रों में ढूँढ़ा-खोजा सीखा-समझाया जा सकता है। इस कसौटी पर कसने पर इसे ऐसा श्रद्धासिक्त उपचार कह सकते हैं, जिसके माध्यम से उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व का धर्म शिक्षण सुलभ बनता है। साधना वर्ष के अनुशासनों की उपयोगिता का जितना माहात्म्य कहा जाय, उतना ही कम है।
लेकिन इस पक्ष से कहीं अधिक महत्वपूर्ण
और समर्थ इसको दूसरा पक्ष है, जिसके द्वारा सूक्ष्म वातावरण में आवश्यक गर्मी और तेजी पैदा की जाती है। साथ ही दृश्यजगत में वह आधारभूमि तैयार करनी है, जिस पर अदृश्य शक्तियाँ क्रियाशील हो सकें। सूक्ष्म प्रवाह के सहयोगी बनने से अभीष्ट प्रयोजन में सफलता प्राप्त करने की सम्भावना सुनिश्चित हो जाती है। हवा का रुख पीठ पीछे से हो तो जलयानों के लिए, वातावरण के अनुकूलन के लिए, कुछ ऐसे ही प्रचण्ड प्रयास किए जाते हैं। साधना वर्ष का आयोजन इसी प्रयोजन के लिए सम्पन्न किया जा रहा दिव्य प्रयोग है।
विशिष्ट आध्यात्मिक उपचारों की प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न करके वातावरण में व्यापक फेर-बदल की जानी है। प्रखर प्रतिभाएँ अपनी प्राणशक्ति से युग को बदलती हैं। अवतारी महामानव समय के प्रवाह को उलटते हैं। ठीक इसी प्रकार साधना वर्ष के प्रयोग से पैदा हुई चेतनात्मक प्रचण्ड ऊर्जा सूक्ष्मजगत को परिष्कृत करके उसे इस योग्य बना देगी कि सुख-शान्ति की परिस्थितियाँ उत्पन्न होने लगें और उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ दैवी अनुग्रह की तरह उमड़ती, उभरती चली जाएँ। साधना वर्ष के आयोजन का जो महाप्रयोग इन दिनों किया जा रहा है, उसे मूलतः सूक्ष्मजगत के वातावरण के परिशोधन की प्रक्रिया ही समझा जाना चाहिए। जिससे परा प्रकृति को द्रवित कर मनोवाँछित प्रतिफल प्राप्त किए जा सकेंगे।
इसे ऐतिहासिक प्रयत्नों के पुनरावर्तन के रूप में भी अनुभव किया जा सकता है। इसके द्वारा अन्तरिक्ष में प्रदूषण, क्रन्दन और विनाश की विषाक्तता परिशोधित हो सकेगी। सूक्ष्म जगत को असाधारण रूप से प्रभावित परिमार्जित करने वाले इस महा-अभियान का वैदिक ऋषियों-सतयुग के महामनीषियों के मार्गदर्शन का अनुगमन ही कहा जाएगा। इसके द्वारा सत्प्रवृत्तियों का अनुपात जिस क्रम से घटती चली जाएँगी। विघातक तत्वों का सहज निराकरण होता चला जाएगा और युगक्रान्ति का उद्देश्य सुगमतापूर्वक पूरा हो सकेगा।
आनन्द ने पूछा- भगवन्! आप प्रव्रज्या हेतु विश्वभर में दूत भेज रहे हैं, पर उनके पास साधन तो है ही नहीं। वे कैसे रहेंगे, किस प्रकार धर्म-धारणा का प्रसार कर पाएँगे- यह प्रश्न मेरे मन में अभी भी विद्यमान है?
तथागत कह उठे- भदन्त! ये दूत एक विशिष्ट सम्पत्ति अपने साथ लेकर जा रहे हैं, जो ईश्वरप्रदत्त है। अपनी इन्द्रिय, समय, विचार शक्ति रूपी विभूतियों के माध्यम से ये पुरुषार्थ द्वारा जहाँ जाएँगे, जनसहयोग, साधन, सम्पदा तथा श्रद्धा अर्जित कर लेंगे और विश्व भर में विचारक्रान्ति के अग्रदूतों के रूप में फैल जाएँगे। यथार्थ सम्पदा वही है, जा ये ले जा रहे है- बाकी तो इनकी परिणति है।
आज हम देखते हैं कि बुद्ध के ये साधनहीन परिव्राजक किस प्रकार दिग्दिगन्त में व्याप्त हो गये तथा साधन-वैभव की दृष्टि से भारत से भी अधिक उच्चकोटि के बिहार-संघाराम-बौद्ध स्तूप विदेशों में हैं तथा विस्तार की दृष्टि से यहाँ की तुलना में चीन, जापान, कम्बोडिया व सुदूरपूर्व तक बौद्ध धर्म की ही प्रधानता देखी जा सकती है।
प्रार्थना विश्वास की प्रतिध्वनि है। रथ के पहियों में जितना अधिक भार होता है, उतना ही गहरा निशान वे धरती में बना देते हैं। प्रार्थना की रेखाएँ लक्ष्य तक दौड़ी जाती हैं और मनोवाँछित सफलता खींच लाती हैं। विश्वास जितना उत्कृष्ट होगा, परिणाम भी उतने ही सत्वर और प्रभावशाली होंगे।
प्रार्थना आत्मा की आध्यात्मिक भूख है। शरीर की भूख अन्न से मिटती है, इससे शरीर को शक्ति मिलती है। उसी तरह आत्मा की आकुलता को मिटाने और उसमें बल भर की सत्य-साधना परमात्मा की ध्यान-आराधना ही है।
मिथिलाँचल में प्रवेश करते ही आचार्यश्री के मुखमण्डल पर हमेशा छायी रहने वाली अलौकिक दीप्ति और भी अधिक सघन हो गयी। कुछ ऐसा लग रहा था, माने आचार्य इस समूचे अंचल में सूक्ष्मरूप से व्याप्त विदेह राजा जनक की ज्ञानचेतना एवं जगन्माता सीता के दिव्य वात्सल्य की प्रखर अनुभूति में निमग्न हो गए हों। उनके साथ शिष्य वर्ग था, जिसने अपनी आँखों से आचार्य की चमत्कार भरी घटनाएँ देखी थीं। मार्ग में अब तक जो भी राजा महाराजा या विद्वान-मण्डली मिली थी, सभी ने उनके श्रीचरणों में अपनी भावभरी श्रद्धा निवेदित की थी। जिन शिष्यों ने निकट संपर्क में रहकर आचार्य की घोर तपस्या, अगाध विद्वत्ता का अनुभव किया था, वे भगवत्पाद शंकराचार्य की चमत्कार भरी कहानियाँ सुनाकर सहयात्रियों को मुग्ध करते चले आ रहे थे। सारे मिथिलाँचल में आचार्य शंकर की जय-जयकार हो रही थी।
आचार्य के दिव्य व्यक्तित्व से निकलते अलौकिक तेज से जन-जन मुग्ध था। वे दैनिक चर्या, रहन-सहन खान-पान पूजन-शयन में शास्त्रानुकूल नियमों का इस तरह पालन करते कि कभी कोई भी व्यतिक्रम नहीं हो पाता। प्रातःकाल एक प्रहर रात रहे, उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त हो शीतल जल से स्नान करते। इसके बाद संध्या पूजन के अनन्तर ध्यान में निमग्न हो जाते। सूर्योदय होते-होते शिष्य वर्ग नित्य क्रिया से निवृत्त हो इनके पास पहुँच जाता। आचार्य कभी शय्या पर शयन नहीं करते, भूमि पर थोड़े-से पुआल बिछाकर एक सामान्य चादर के द्वारा रात्रि बिता लेते। शीत और ग्रीष्म का उन पर कोई प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता, किन्तु अपने सहयात्रियों की सुविधा का पूरा ध्यान रखते। समृद्ध व्यक्तियों, राजा-महाराजाओं के सहयोग से यह यात्री दल निरन्तर सुविधापूर्वक यात्रा करता आया था। आचार्य दिन में केवल एक बार भिक्षा करते। चलते-चलते मार्ग के समीप जो भी गाँव मिल जाता, उसमें किसी एक घर से भिक्षा माँगकर क्षुधा तृप्त कर लेते, किन्तु शिष्यगण तथा अन्य यात्री अपनी-अपनी आवश्यकता के अनुसार भोजन की व्यवस्था बना लेते। मध्याह्न में थोड़ा विश्राम करके सब पुनः आगे बढ़ जाते।
आज भगवत्पाद आचार्य मिथिलाँचल के अत्यन्त रमणीक स्थान सहरसा में ठहरे थे। छोटा होने के बावजूद यह नगर सम्मोहक एवं तीर्थ-चेतना की तरंगों से आप्लावित था। यहाँ से करीब चौदह मील दूर कन्दरा अपने सूर्य मन्दिर के लिए विख्यात था। गायत्री महामंत्र के आराध्य देवता सविता की ऐसी भुवन मोहिनी छवि शायद ही कहीं अन्यत्र मिले। यहाँ से कुछ ही दूर जिसे इन दिनों सिमरी बख्तियारपुर कहते हैं, वहाँ से 5 मील दक्षिण में कोपरिया के पास कात्यायनी का स्थान सुशोभित था। माँ सती की यहाँ दायीं भुजा गिरी थी, तभी से यह स्थान आदिशक्ति की सघन चेतना एवं करुणा का केन्द्र बना हुआ था।
आचार्य के निवास स्थल से करीब 25-30 मील पूर्व में पतरघट नगर में पतरहट्टा विश्वविद्यालय अवस्थित था। इसकी शोभा और गरिमा उन दिनों नालन्दा एवं तक्षशिला से भी कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी थी। इस विश्वविद्यालय के छात्रों एवं आचार्यों ने भी आचार्यश्री की तपस्या एवं विद्वता के बारे में सुन रखा था, सो वे भी बड़ी संख्या में भगवत्पाद शंकराचार्य को प्रणाम करने के लिए आने लगे थे। सभी की एक ही आकांक्षा थी कि उन्हें भी आचार्य की दिव्यवाणी सुनने का सौभाग्य मिले।
आचार्यश्री के पड़ाव से करीब चालीस मील दूर विराट गाँव था। इतिहास विश्रुत है कि यही स्थान कभी महाभारतकालीन महाराज विराट की राजधानी था। यहाँ पर भगवती चण्डिका का भव्य मन्दिर अवस्थित था, जिसके बारे में लोगों ने अनेक जनश्रुतियाँ आचार्यवर को सुनायी। इसके पास ही कीचक का टीला है। लोकोक्ति है कि यहीं पाँडवों ने अपना डेरा डाला था। स्थानीय लोगों का मानना था कि राजा विराट के साले कीचक द्वारा द्रौपदी के साथ दुर्व्यवहार करने पर भीम ने उसे मार गिराया था। वही स्थान ‘कीचक का टीला’ के नाम से विख्यात है। सहरसा के पास ही बनगाँव से उत्तर दिशा में देवणडीह नामक गाँव के बारे में आचार्यश्री को वहाँ के जनसमुदाय ने बतलाया। यहाँ कई एकड़ जमीन में जंगलों से भरा हुआ एक ऊँचा डीह है। डीह के उत्तरी भाग में स्थित बाणेष्वर महादेव का मन्दिर जितना भव्य एवं दिव्य था, उतना ही रहस्यमय भी। बनगाँव से करीब दस मील दूर पश्चिम में कोशी नदी के किनारे कारु खिरहरी का स्थान था। ग्रामीणजन इस स्थान पर जानवरों के बच्चे देने की खुशी में श्रद्धा स्वरूप दूध चढ़ाते हैं। यहाँ हर समय खीर पकती रहती है, जिसे लोग प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं। यहाँ के बारे में लोकमान्यता थी कि कारु खिरहरी के नाम से मनौतियाँ माँगने पर अस्वस्थ जानवर भर निश्चित रूप से स्वस्थ हो जाते हैं।
मिथिला अंचल के इस क्षेत्र के बारे में आचार्यश्री ने बहुत कुछ जाना और बहुत कुछ सुना। जनसमुदाय द्वारा इस स्थान और आस-पास के स्थानों की महिमा-महत्ता को सुनते-सुनते भगवत्पाद आचार्य कहीं अतीत में खो गए। उनके मानस चक्षुओं के सामने महाविरागी-परम साधक अद्भुत कर्मयोगी महाराज जनक का जीवन स्पष्ट होने लगा। वे सोचने लगे- भरतखण्ड को आज ऐसे ही साधकों की आवश्यकता है, जो विश्वामित्र, याज्ञवल्क्य जैसे महासिद्धों की कृपा, करुणा एवं तेजस्विता को अपने में मूर्त कर सकें। साधनापरायण होकर औरों को भी अपने ही जैसा साधक बना सकें। आचार्य शंकर न जाने कब तक अपने इन मनोभावों में खोए रहते कि इतने में ही एक तेजस्वी तरुण ने उन्हें प्रणाम करते हुए उनके ध्यान को यथार्थ की ओर आकर्षित किया। यह वही तरुण था, जिसने आचार्यश्री के भोजन एवं निवास की व्यवस्था की थी। आचार्य इसकी अध्यात्म साधना के प्रति अपूर्व श्रद्धा से आह्लादित थे। उनकी सोच थी कि राष्ट्र का युवा यदि साधना में अभिरुचि रखे- तपस्वी एवं मनीषी बने, तो फिर भारतवर्ष को विश्वगुरु बनते देर नहीं लगेगी।
उन्होंने आगन्तुक युवक की ओर प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा। आशय समझ कर युवक ने कहना शुरू किया- कल आप महिष्मती (महिषी) की ओर प्रस्थान करने वाले हैं, आचार्य प्रवर! यदि आपका अनुग्रह एवं आदेश हो तो मैं भी आपके साथ चलूँ। महिष्मती यहाँ से 17 मील दूर अवस्थित था। कुमारिल भट्ट के मेधावी शिष्य मण्डनमिश्र का निवासस्थान होने के कारण यह स्थान समूचे देश में विख्यात हो चला था। आचार्यश्री मण्डन मिश्र के नाम से जाने जाने वाले पं. विश्वरूप से मिलने के विशेष उद्देश्य से ही मिथिलाँचल पधारे थे। विश्वरूप की पत्नी देवी भारती भी अपूर्व विदुषी थी। जनसामान्य तो उन्हें विद्या एवं कला कला की देवी भगवती सरस्वती के रूप में मानता एवं सम्मान करता था। वे दम्पत्ति इस समूचे क्षेत्र का गौरव थे। आचार्यश्री का विचार था कि यदि महान प्रतिभा के धनी ये दोनों उच्च साधक बन सके तो समूचे राष्ट्र में आध्यात्मिक साधना का वातावरण पैदा किया जा सकता है।
इनके आवास तक पहुँचने के लिए किसी-न-किसी क्षेत्रीय जन की आवश्यकता तो थी ही, सो आचार्य प्रवर ने प्रसन्नतापूर्वक स्वीकृति देते हुए कहा- तुम मेरे साथ चल सकते हो अरुण। इन शब्दों के साथ ही वे पुनः अपने भाव राज्य में निमग्न होने लगे- मनुष्य दुःखी है, किन्तु वह उसका स्वभाव और रूप नहीं जानता। समाज, धर्म, लोक-सबकी मर्यादा है, किन्तु सबसे ऊपर व्यक्ति की मर्यादा है। यदि व्यक्ति सुधर जाएगा तो सब कुछ सुधर जाएगा। आचार्यश्री को अपने भाव राज्य में विलीन होते देख युवा साधक अरुण ने उनसे प्रणाम करते हुए विदा ली। सभी को अगले दिन की प्रतीक्षा थी।
प्रातः होते ही सभी उनके पास आ जुटे। भगवत्पाद शंकराचार्य के नेत्रों में असीम करुणा जाग उठी। एक दिव्यरागिणी के समान आकाश में ऊषा उदित हुई। वह उठ खड़े हुए। वह ऐसे भव्य ज्योतित गौरव थे, जैसे सहस्रों शताब्दियों का जय-जयकार पुञ्जीभूत होकर साकार करुणा, दया और क्षमा बनकर खड़ा हो गया हो। यह दर्शन की क्षुद्र सीमाओं में बँधने वाला नहीं, वरन् उससे भी ऊपर मनुष्यत्व का उन्नत व्यक्तित्व था, जो अपने लिए नहीं दूसरों के लिए जीवित रहना चाहता था। यह था वह व्यक्ति, जिसने ईश्वर को सर्वव्यापी परम चेतना के रूप में निराकार एवं सद्गुणों के समुच्चय के रूप साकार- दोनों ही स्वरूप में अनुभव किया था। जिसने अध्यात्म के शीर्ष पर पहुँचकर सोचा था-लोक की आर्तावस्था को मैं दूर करूँगा। उन्हें वासना के महापंक से निकालकर आत्मबल सम्पन्न साधक के रूप में गढूँगा।
वह धीरे-धीरे चल पड़े। उनके पाँव धीर-गम्भीर गति से उठने लगे। आचार्यश्री के पाँव माने पृथ्वी की धूलि में इस क्षणिक जीवन की पर्तों पर अमरता का जीवित संदेश लिखने के लिए बढ़ चले थे। यात्रा अविराम रही और वे अपने शिष्यों एवं युवा साधक अरुण के साथ महिष्मती आ पहुँचे। प्रातः नित्य-नियम के अनुसार पूजा-अर्चन एवं ध्यान के उपरान्त मंडनमिश्र के निवासस्थान की खोज करते हुए चले गए। खोजते-खोजते मध्याह्न वेला आ गयी।
आचार्य के शिष्य पद्मपाद ने एक पनघट पर खड़ी पनिहारिनों को देखकर पूछा कि मंडनमिश्र के घर का मार्ग कौन है? एक परिहास प्रिय पनिहारिन मुसकराते हुए बोली- क्यों युवा संन्यासी क्या आप परदेश से आ रहे हैं? इस देश में भला ऐसा कौन है जो पंडित समाज को मंडित करने वाले उस मंडनमिश्र को नहीं जानता, जिनके द्वार पर पिंजरों में बैठी सारिकाएँ जगत के नित्य और अनित्य अथवा अनित्यानित्य होने के प्रश्न पर निरन्तर विचार करती रहती हैं। आपको स्वतः ‘प्रमाणं परतः प्रमाणं’ पर विवाद करने वाली सारिकाएँ जहाँ दिखाई पड़ें, समझ लीजिए वही मण्डनमिश्र का विशाल राजप्रासाद है।
पद्मपाद ने आचार्य के समीप पहुँचकर जब पनिहारिनों का वृत्तान्त कहा तो वे किंचित् मुस्कराए और अपनी भव्यगति से उस ओर चल पड़े जिधर मण्डनमिश्र का आवास था। आवास के द्वार पर पहुँचकर आचार्यश्री ने द्वारपाल से मण्डनमिश्र से मिलने की इच्छा जतायी। काफी देर के बाद पं. मण्डनमिश्र द्वार पर आए। उनके मुख पर मनीषी की तेजस्विता नहीं अपितु विद्वान होने का गर्व था। यद्यपि देवी भारती के चेहरे पर विदुषी होने की सहज सौम्यता थी। आचार्यश्री के नेत्रों से निकलने वाली करुणा की धारा ने मंडनमिश्र के दर्प को धूमिल कर दिया। इसी के साथ आचार्य बोले-पंडित प्रवर! मैं आपके साथ विचार-विमर्श के लिए उपस्थित हुआ हूँ। आचार्य कुमारिल भट्ट ने मुझे इसी उद्देश्य से यहाँ भेजा है। यदि आपको मेरे विचार स्वीकार हों, तो आप राष्ट्रहित में मुझे सहयोग दीजिए।
परन्तु हमारे विचार-विमर्श का निर्णायक कौन होगा? मंडनमिश्र ने जानना चाहा। तब आचार्य शंकर ने हँसते हुए मण्डनमिश्र से कहा- सरस्वती स्वरूपा आपकी पत्नी देवीभारती यहाँ विद्यमान हैं। उनसे अधिक योग्य निर्णायक भला कौन मिलेगा? आचार्य की इस अद्भुत उदारता एवं हृदय की अभूतपूर्व विशालता ने उन दोनों को मुग्ध कर दिया।
परन्तु भारती के सामने एक विकट समस्या खड़ी हो गयी। वह मन में सोचने लगी कि मैं निर्णय किस तरह दे पाऊँगी? यदि पति देव की पराजय होती है तो उन्हें परिव्राजक बनकर आचार्य प्रवर का सहयोग करना पड़ेगा। यदि आचार्य शंकर विजयी नहीं होते तो उन्हें गृहस्थ धर्म में आना पड़ेगा। ये दोनों स्थितियाँ किसी के लिए भी कल्याणकारी न होंगी। आचार्य देवी भारती की समस्या समझ गए। वह भारती को आश्वस्त करते हुए बोले- देवी भारती! ईश्वर में विश्वास रखकर जो कार्य किया जाता है, उसका परिणाम सबके लिए कल्याणकारी होता है। तुम क्यों व्यर्थ चिन्ता कर रही हो? मंगलमय प्रभु सब प्रकार मंगल ही करेंगे।
अगले दिन अरुणोदय के साथ ही शास्त्रार्थ की अपूर्व घड़ी आ गयी। एक ओर आचार्य शंकर थे, जिनकी रगों में राष्ट्र की पीड़ा प्राण-प्रवाह एवं रक्तप्रवाह बनकर प्रवाहित थी। उनका हृदय देश के निवासियों की पीड़ा एवं दुर्दशा से कातर था। उनमें अहं का लेश भी न था। दूसरी ओर महापण्डित मण्डनमिश्र थे, जो वैभववान् विद्वान होते हुए भी स्वकेंद्रित थे। उनका हृदय धड़कता तो था, पर इन धड़कनों में भारत की व्यथा नहीं, वैभव का स्पन्दन था। मस्तिष्क में तर्क तो थे, पर उनका सत्य के प्रति आग्रह नहीं, स्वयं के पांडित्य का गर्वपूर्ण प्रदर्शन था।
शास्त्रों का प्रयोजन क्या है पंडित प्रवर? आचार्य ने स्नेहिल मुसकान के साथ अपना प्रश्न किया।
‘जीवन नीति का निर्धारण।’ मंडनमिश्र ने संक्षिप्त उत्तर दिया।
और महापंडित आप जानते हैं, जीवन-नीति के नियम युग के अनुरूप निर्धारित होते हैं। शाश्वत तो जीवन लक्ष्य होता है। जीवन नीति तो देश-समाज-परिस्थितियों के अनुरूप, बदलते युग के अनुसार ही होती है। इसका निर्वाह ही युगधर्म है। युगधर्म की व्यापकता में स्वधर्म स्वयमेव समाहित हो जाता है।
आज के युग की परिस्थितियों से आप परिचित हैं पंडित प्रवर! देशवासी अपनी चेतना खोते जा रहे हैं। जाति, धर्म के नाम पर विग्रह-विद्वेष का दावानल धधक रहा है। जन सुप्त है और जननेतृत्व दिशाविहीन। समूचा राष्ट्र आर्थिक एवं बौद्धिक रूप से कंगाल होता जा रहा है। विदेशी शक्तियाँ महाग्राह की तरह राष्ट्रीय अस्तित्व को निगल जाने के लिए प्रयासरत हैं। ऐसे समय में एकमात्र युगधर्म हो सकता है-राष्ट्रीय चेतना का जागरण। यह केवल आत्मसाधना से ही सम्भव है, क्योंकि आत्मसाधना ही राष्ट्रवासियों को उनका खोया चरित्र देगी, उनमें साहस एवं विश्वास का संचार करेगी। उन्हें देवत्व का गौरव वापस दिलाएगी।
आचार्य के शब्दों का आधार बौद्धिक तर्कजाल नहीं, उनके अंतर्मन की पीड़ा थी, जिसने मंडनमिश्र को उद्वेलित कर दिया। आज उनके तर्क भावनाओं के महासागर में तिनकों की तरह बह गए। लेकिन अभी से आचार्य का शिष्यत्व स्वीकार कर पाते कि अगले दिन देवी भारती ने गृहस्थ धर्म सम्बन्धी जिज्ञासाएँ आचार्य के सम्मुख रखीं।
बड़े ही शान्तभाव से भगवत्पाद आचार्य ने उन्हें समझाया-देवी! पति-पत्नी होने का अर्थ मात्र दैहिक मिलन तक सीमित नहीं है, बल्कि विशिष्ट उद्देश्य के लिए आत्मा के विस्तार में शाश्वत-मिलन है। तुम महापंडित की अर्द्धांगिनी हो, अब उनकी आत्मा की अभिन्न सहचरी बनो। इस देश की नारियाँ सदियों से दलित एवं उत्पीड़ित हैं। शताब्दियों से उन्हें मानवीय अधिकारों से वंचित रखा गया है। पुरुष का जन्म देने वाली उसे पालन-पोषण करने के साथ-शिक्षा एवं संस्कार देने वाली नारी उसी के हाथों प्रताड़ित है। क्या इसकी पीड़ा से तुम्हारा हृदय कभी विह्वल नहीं होता?
आचार्य के भावभरे कथन ने देवी भारती के वैदूर्य को भावसंवेदना के महासागर में निमग्न कर दिया। वह पूछने लगी- हमें क्या करना होगा- आचार्य देव।
राष्ट्र की शक्ति नारी को आदिशक्ति की साधना का मर्म समझाना होगा। उसे गायत्री महामंत्र की साधना में दीक्षित करना होगा। गायत्री साधना एवं गायत्री महामंत्र के तत्त्वदर्शन से ही उन्हें अपने स्वरूप एवं शक्ति का भान होगा।
देवी भारती एवं महापण्डित मंडनमिश्र दोनों ही आचार्यश्री के चरणों में नत हो गए। आचार्यप्रवर कह रहे थे-
वाक् वैखरी, शब्दझरी, शास्त्र व्याख्यान कौषलम्। सतु वैदुष्यामे वैदुष्ये न तु मुक्तये॥
अर्थात् शास्त्रों की तर्कपूर्ण सम्मोहक व्याख्या विद्वानों की विद्वता तो बढ़ा सकती है, परन्तु किसी को भवबन्धन से मुक्त नहीं कर सकती। यह तो साधना से ही सम्भव है।
आचार्यश्री के इस अलौकिक उपदेश ने समूचे मिथिलाँचल में गायत्री साधना का ज्वार ला दिया। भगवत्पाद आचार्य स्वयं भी इस पावन भूमि में खड़े होकर गदगद स्वर में कह रहे थे- यहाँ आकर मेरी झोली भर गयी। महादेवी सीता की पुण्यभूमि ने मुझे मण्डनमिश्र जैसा तेजस्वी परिव्राजक दिया है- जो अब से श्रीमतं सुरेष्वराचार्य के नाम से देश विख्यात होंगे। इनकी साधना एवं तपस्या से समूची भारतभूमि गौरवान्वित होगी। ऐसा ही हुआ।
प्रखर साधना वर्ष के सरंजाम-आयोजन की निश्चित परिणति राष्ट्र और विश्व-मानवता का उज्ज्वल भविष्य है। वही उज्ज्वल भविष्य जिसके चित्रांकन में निरत विश्व मनीषा ने अनेकों मोहक चित्र प्रस्तुत किए हैं। आध्यात्मिक, साँस्कृतिक, सामाजिक, राजनैतिक पहलुओं के अनुरूप प्रत्येक का अपना सौंदर्य है। अन्तर्दृष्टि के बल पर प्रकाश युगीन सामाजिक संरचना, व्यवस्था-प्रणालियों आदि का जीवन्त चित्रण कर रही कल्पना की तुलिका एक एक ठहराव-सा अनुभव कर रही है। कौन होंगे वे व्यक्ति, जिनके ऊपर भावी समाज के नेतृत्व का भार होगा? सही माने में संरचना व व्यवस्था-प्रणालियाँ तो कलेवर मात्र हैं, प्राण तो वे व्यक्ति ही हैं, जिनके रहने तक कायकलेवर अपना सौंदर्य बरकरार रखता है। इनके जर्जरित होते ही अच्छी-से-अच्छी संरचना अपना अस्तित्व गँवा बैठती है।
मानवीय इतिहास की पोथी उलट-पुलट कर देखें तो यह तथ्य कहीं अधिक मुखर होकर अपना स्पष्टीकरण देता है। कबीले-यूथों के सामुदायिक निवास से राजतन्त्र, लोकतन्त्र, साम्यवाद, समाजवाद के उत्थान और अवसान की गहराइयों में यही स्वर गूँजते हैं। यथार्थ में कोई भी प्रणाली या विधि-व्यवस्था उतनी खराब नहीं होती, जितनी कि हम सब समझ बैठते हैं। यदि राजतन्त्र का नेतृत्व करने वाले विक्रमादित्य और चन्द्रगुप्त सदृश व्यक्ति हों, जिन्होंने अपने समूचे जीवन का उद्देश्य एकमात्र जनकल्याण मान रखा हो, तो शायद राजतन्त्र अभी भी अपनी सामयिकता सिद्ध कर सके। इसी प्रकार लोकतन्त्र की बागडोर जनहित में आधी धोती पहनने वाले गाँधी के हाथ में हो तो रामराज्य अभी भी अपनी अभिव्यक्ति किए बिना न रुके। यही बात अन्य प्रणालियों के बारे में भी सत्य है।
ऐसे में हो सकता है, यह सवाल किसी के मन को परेशान करने लगे कि यदि व्यक्ति की इतनी महत्ता है, कर्णधार इतने अधिक उपादेय हैं, तब फिर प्रणालियों में यह उलट-फेर क्यों? क्या नयी प्रणालियों को जन्म देने वालों की अकल गड़बड़ थी? इन प्रश्नों के जवाब में यही कहा जा सकता है कि व्यवस्था की अपनी उपादेयता है। इनकी संरचना में फेर-बदल करने वाले भी असंदिग्ध रूप से बुद्धिमान थे। इतने पर भी नेतृत्व करने वाले व्यक्तियों का महत्त्व कम नहीं हो जाता। बदलते समय के अनुरूप व्यवस्था की संरचना में फेर-बदल सिर्फ इसलिए करना पड़ता है, ताकि इसकी सहायता से मानव महासागर में खोए, उपेक्षित पड़े, सुयोग्य-प्रतिभाशाली चरित्रवान नररत्नों को उभारा जा सके। इन्हें अपना नेतृत्व सौंपकर तत्कालीन समाज चैन की साँस ले सके। कोई भी प्रणाली जब अपना दायित्व निभा सकने में अक्षम होने लगती है, नीतिज्ञ उसे बदल डालने के लिए नई स्थानापन्न प्रणाली की ढूँढ़-खोज में लग जाते हैं।
प्रकारान्तर से यह ढूँढ़-खोज नेतृत्व सँभाल सकने योग्य व्यक्तियों की होती है; उसका स्वरूप और प्रक्रिया भले ही कुछ और हो। स्वाभाविक है, इसे जानने की लालसा बहुतों में जगे। हर कोई यह जानना चाहे कि वह कौन-सी योग्यता है, जो मनुष्य को इस योग्य बनाती है। विशेषकर जिसका सम्पादन-अनुशीलन करके हममें से कोई भावी समाज की नौका का कर्णधार बन सकने योग्य बन सके।
सही भी है, संसार के सभी महत्वपूर्ण कार्यों के लिए एक विशेष योग्यता और शक्ति की आवश्यकता होती है। अनेक व्यक्ति कुछ महत्वपूर्ण करने की आकांक्षा तो करते हैं, पर उनको करने के लिए जिस क्षमता एवं शक्ति की जरूरत होती है, उसे सम्पादित नहीं करते, फलस्वरूप उन्हें सफलता से वंचित ही रहना पड़ता है। जिनने भी कोई बड़ा पुरुषार्थ किया है, बड़ी विजय प्राप्त की है, उन्होंने तात्कालिक परिस्थितियों से ही सब कुछ प्राप्त नहीं किया, अपितु उनकी पूर्व तैयारी ही उस सफलता का कारण रही है।
‘मैन, मॉरल एण्ड सोसाइटी’ के रचनाकार ब्रिटिश, मनीषी जे0सी0 फ्ल्यूगेज सदाशयता, सद्व्यवहार, संगठन-शक्ति चरित्रनिष्ठा और सामाजिक हितों के लिए समर्पित बुद्धि को नेतृत्व की योग्यता मानते हैं। उनके अनुसार चरित्र ही वह प्राण है, जो व्यक्ति और समाज दोनों को ओजस्विता प्रदान करता है। सिद्धान्तकार लैम्ब्रेट की दृष्टि से सोचें तो अगले दिनों समाज का जो स्वरूप बनेगा, उसके अनुसार नेतृत्व की योग्यता के लिए महज चरित्रनिष्ठा काफी नहीं-बल्कि चाहिए तपःशक्ति। उनके अनुसार भाव प्रधान समाज के नेतृत्व हेतु पूर्ण व्यक्ति चाहिए। पूर्ण व्यक्ति का तात्पर्य है- वे जिनका व्यक्तित्व तप-साधना के साँचे में ढला है।
इतिहासवेत्ता राधाकुमुद मुखर्जी की रचना ‘मैन एण्ड थाट इन एंषिएण्ट इण्डिया’ के अनुसार पूर्वकाल में लाखों वर्षों तक सतयुग की सुख-शान्ति भरी परिस्थितियाँ इस संसार में रही हैं। इसका कारण एक ही रहा है कि उस समय के लोकनायक-मार्गदर्शक आत्मशक्ति से सम्पन्न रहे और केवल वाणी से नहीं, बल्कि अपनी आत्मिक महानता की किरणें फेंककर लोकमानस को प्रभावित करते रहे। मस्तिष्क की वाणी मस्तिष्क तक पहुँचाती है और आत्मा की आत्मा तक। कोई सुशिक्षित व्यक्ति अपनी ज्ञान-शक्ति का काम सुनने वालों की जानकारी बढ़ाने के लिए दे सकता है, पर अन्तःकरण में जमी हुई आस्था में हेर-फेर करने का कार्य ज्ञान से नहीं, तपःशक्ति से सम्पन्न होना सम्भव हो सकता है। प्राचीनकाल के लोकनायक ऋषि-मुनि इस तथ्य को भली-भाँति जानते थे। इसीलिए वे दूसरों को उपदेश देने, उनकी बाह्य सेवा करने में जितना समय खर्च करते थे, उतना ही प्रयत्न स्वयं के जीवन को सँवारने, तप के साँचे में ढालने के निमित्त करते थे। तप-साधना से ही वह ऊर्जा मिलती है, जिसकी प्रेरणा से किसी के मन पर जमी बुराइयों को आकर्षक कुसंस्कारों को हटाकर अच्छाइयों के कष्टसाध्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जा सके।
प्राचीन इतिहास की ही भाँति पिछले दो हजार वर्षों में भी इसी आधार पर जनमानस का सुधार एवं परिष्कार सम्भव होता रहा है। भगवान बुद्ध के मन में अपने तथा संसार के दुःखों के निवारण की लालसा जगी। इसकी लिए उन्होंने पच्चीस वर्ष की आयु से मोह बन्धनों को तोड़कर बीस वर्ष तक लगाता आत्मनिर्माण की साधना की। पैंतालीस वर्ष की आयु में उनका व्यक्तित्व लोकनायक के रूप में उभरा। भगवान महावीर ने अपनी आयु का तीन-चौथाई भाग तप में और एक चौथाई भाग जननेतृत्व में लगाया। इन दोनों महापुरुषों ने उपदेशों की बौछार उतनी नहीं की, जितने आज के सामान्य उपदेशक कर लेते हैं। तब भी उनका प्रभाव पड़ा और आज भी संसार की एक-चौथाई जनता उनके मार्गदर्शन पर आस्था रखती है।
समस्त विवादों से परे तप-साधना की एक ही सार्वभौमिक परिभाषा है, स्वयं के जीवन की समस्त खोटों को निकाल फेंकना। साथ ही अध्यात्म के उन प्रयोगों का दैनन्दिन जीवन में समावेश करना जो व्यक्तित्व की अन्तःशक्तियों को जगाते हैं। आदि गुरु शंकराचार्य ने बीस वर्ष की ऐसी ही तपश्चर्या के बलबूते अपने समय के मार्गदर्शन का दायित्व सँभाला। गुरु गोविन्दसिंह ने लोकमत नामक स्थान में तप-प्राण बटोरा, उसी को बिखेरकर स्वयं को युग निर्माता के रूप में प्रतिष्ठित कर सके। छत्रपति शिवाजी का व्यक्तित्व गढ़ने वाले समर्थ रामदास ने तप कौशल से स्वयं को साँचा बना डाला था। संवत् 1924 के कुम्भ में स्वामी दयानन्द को हरिद्वार प्रवास के दौरान कोरी वाणी फीकी मालूम पड़ी। इस न्यूनता की पूर्णता के लिए उन्होंने हिमालय में कठोर तप को ही साधना बनाया।
श्री रामकृष्ण परमहंस ने पचास वर्ष तक की आयु में विशुद्ध तीस वर्ष तप-साधना में लगाए। योगी अरविन्द घोष, महर्षि रमण, स्वामी रामतीर्थ की तपश्चर्या प्रसिद्ध है। वैष्णव आचार्यों में से रामानुज, मघ्व, निम्बार्क आदि ने जितना ज्ञान संचय किया, उतनी ही तप-साधना की। संसार के अन्य महापुरुष जिन्होंने लोगों को उच्च भूमिका की ओर बढ़ाया, निश्चित रूप से तपस्वी साधक थे। पैगम्बर मुहम्मद ने पच्चीसवें वर्ष में साधना की ओर कदम बढ़ाया और चालीस साल तक उसी में लगे रहे। महात्मा ईसा के जीवन के छत्तीस वर्ष तपश्चर्या में लगे। यहूदी धर्म के यहोबा और पारसी धर्म के देवदूत जरथुस्त्र की दीर्घकालीन तप-साधनाएँ प्रसिद्ध हैं।
मानवीय जीवनक्रम में आदि काल से लेकर अब तक एक ही तथ्य समय-समय पर स्पष्ट होता रहा है कि अध्यात्म ही लोकजीवन को सच्चा नेतृत्व दे सकने में समर्थ हो सकता है। इक्कीसवीं सदी के नये समाज में ओछे-हलके वाचाल व्यक्तियों के लिए कोई स्थान न रहेगा। फिर नेतृत्व जैसे महान कार्य के लिए इन जैसों के बारे में सोचना ही ठीक नहीं। यह महान कार्य महान आत्माएँ ही कर सकेंगी और महान आत्माओं के अनेक गुणों में प्रमुख एक तप-साधना भी है, जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। साधनारत का प्रयोजन ऐसे ही तपस्वियों को आगे लाना और उन्हें लोक नेतृत्व के लिए तैयार करना है।
राजा विक्रमादित्य एक बार जंगल में आखेट के लिए निकले। वे घने जंगल में भटक गये। साथी भी कहीं मार्ग में छूट गये। निविड़ वन में प्यास के कारण राजा का दम घुटने लगा। कहीं पानी दिखाई नहीं दे रहा था। सामने एक पर्णकुटी पर दृष्टि पड़ी। किसी तरह कुटी तक राजा पहुँचे। भीतर देखा तो एक साधु समाधिमग्न थे। इतने में राजा मूर्च्छित होकर गिर पड़े।
मूर्च्छा दूर हुई तो महाराजा विक्रमादित्य ने देखा वहीं सन्त उसका मुँह धो रहे हैं तथा पंखा झल रहे हैं। होश में आते ही सन्त ने राजा को पानी पिलाया। विस्मयवश राजा ने पूछा-आपने मेरे लिए समाधि क्यों भंग की, अपनी उपासना क्यों बन्द कर दी? सन्त मधुर वाणी में बोले- वत्स! भगवान की इच्छा है कि उनके संसार में कोई दुःखी न रहे। उनकी इच्छा की पूर्ति आवश्यक है। दूसरों की सेवा से ही उपासना सफल होती है।
समय आ गया है, जबकि हमें वासना और साधना में से एक को वरण करने के लिए सुनिश्चित फैसला कर लेना चाहिए। अंतर्जगत में देवासुर संग्राम चिरकाल से चलता आ रहा है। अब कोई ऐसा दैवी-अवतरण होना चाहिए, जिससे इस अन्तर्द्वन्द्व के कारण उत्पन्न महाविनाश का अन्त हो सके। हमारे भीतर दो प्रबल तत्व बैठे हैं। एक देवता दूसरा असुर। इस संसार का सृजन ही अन्धकार और प्रकाश के, पतन और उत्थान के, दुःख और सुख के तत्वों से हुआ है। एक से जूझने और दूसरे को अपनाने के लिए जो प्रयत्न करना पड़ता है, उसी के सहारे चेतना और गतिशीलता निखरती है। प्रगति के पथ पर यही दो चरण बढ़ाते हुए लक्ष्य तक पहुँचना सम्भव होता है। इस जड़-चेतन के, तम और सत के, दैत्य और देव के सृजन में स्रष्टा का जो भी प्रयोजन रहा हो-स्थिति वही है। मनुष्य के सामने श्रेय और प्रेय के दो मार्ग सदा से खुले रहे हैं। अपने भाग्य का निर्माता वह इसी कारण कहा गया है कि इन दोनों में से एक का चयन करके वह अपने लिए उत्थान और पतन का पथ प्रशस्त कर सकता है।
मानवी बुद्धि की परीक्षा उसकी दूरदर्शिता और अदूरदर्शिता की कसौटी पर कसी जाती है। एक तात्कालिक प्रलोभन और सदा के लिए विनाश का मार्ग है। दूसरा वह है, जिसमें पहले तो कठिनाइयाँ स्वीकार करनी पड़ती हैं, बाद में चिरस्थायी सुख-शान्ति की व्यवस्था बनती है। जाल में फँसने वाले पक्षी और काँटे में गला फँसाने वाली मछली जैसे जीव अदूरदर्शिता अपनाते हैं। तत्काल के सरल और प्रचुर दिखने वाले प्रयोजन के लिए इतने आतुर हो जाते हैं कि दुष्परिणामों की बात सोच ही नहीं सकते। चाशनी को देखकर टूट पड़ने वाली मक्खी की भी यही दुर्गति होती है। उपभोग की आतुरता में लोग अपना पैसा, स्वास्थ्य, सम्मान, सन्तोष और भविष्य बुरी तरह बिगाड़ते हैं। उन्हें यह दिखाई ही नहीं पड़ता कि सदुद्देश्य अपनाकर श्रेष्ठता की दिशा में चलने वाले आरम्भ में तो कुछ घाटा उठाते, किन्तु अन्ततः प्रगति के उच्च शिखर पर जा पहुँचते हैं।
दोनों ही मार्ग हर विवेकशील के आगे खुले हुए हैं। एक प्रेय का-दूसरा श्रेय का, एक वासना का-दूसरा साधना का, एक मूर्खता का- दूसरा दूरदर्शिता का, एक पतन का- दूसरा उत्थान का; इन दोनों में से एक का चयन करने की चुनौती इन दिनों हर जाग्रत आत्मा के सामने अपेक्षाकृत अधिक मुखर हो सामने आ खड़ी हुई है। दोनों ओर लाभ दिखते हैं और हानि भी। मन भ्रमता-भटकता रहता है। कभी एक को अपनाने की बात सोचता है, कभी दूसरे को। कभी एक को पकड़ता है, कभी दूसरे को। कभी एक छोड़ता है, कभी दूसरे को। इस असमंजस भरी मनःस्थिति को ही देवासुर संग्राम कहा गया है। इसी को अन्तर्द्वन्द्व कहते हैं। जब तक यह स्थिति बनी रहेगी, तब तक कोई चैन से न बैठ सकेगा। अंतर्जगत में चलते रहने के कारण चीत्कार और हाहाकार छाया रहता है। इस स्थिति के रहते किसी को और कुछ भले ही मिल जाय, शान्ति और सन्तोष के दर्शन हो ही नहीं सकेंगे।
इस देवासुर संग्राम का अन्त सामान्य बुद्धि के सहारे नहीं हो सकता। क्योंकि दोनों पक्ष अपनी-अपनी सामर्थ्य और विशेषता के कारण पूर्ण प्रबल हैं। इनमें से किसी की भी क्षमता कम नहीं, कोई हारने वाला नहीं। कभी एक हारेगा, कभी दूसरा। कभी एक की जीत होगी, कभी दूसरे की। विग्रह का अन्त तो तप-साधना के परिणामस्वरूप अवतरित होने वाली भगवत्कृपा ही करती है। पौराणिक गाथाओं में इसी प्रसंग के अनेकों आख्यान हैं। देवासुर संग्रामों के अन्त तभी होते रहे हैं, जब भगवान की शक्ति ने किसी-न-किसी रूप में प्रकट होकर अपना-अपना चमत्कार दिखाया है। इन कथानकों में एक ही तथ्य स्पष्ट है कि श्रेय और प्रेय की खींचतान का अन्त ऋतम्भरा-प्रज्ञा दूरदर्शी विवेकशीलता, साधना के लिए साहस कर सकने वाली प्रखरता के आधार पर ही होता है। जब तक अन्तरात्मा की धरती पर प्रखर तप-साधना के फलस्वरूप अवतरित होने वाली भगवत्कृपा सक्रिय न होगी, तब तक अन्तर्द्वन्द्व से भरी अशान्त मनः स्थिति में विक्षोभ उभरते ही रहेंगे।
युगनिर्माण परिवार के प्रत्येक परिजन के अन्तःकरण में इन दिनों ऐसा ही देवासुर संग्राम प्रचण्ड होता चला जा रहा है। इसे कोई भी दिव्य-चक्षु सम्पन्न व्यक्ति अपनी और अपने पास वाली जाग्रत आत्मा की अन्तःस्थिति का पर्यवेक्षण करके सहज ही देख सकता है। बाह्य जीवन के विग्रह, विद्वेष, झंझट कितने कष्टकारक, कितने चिन्ताजनक, कितने विक्षोभयुक्त होते हैं, इसे हर कोई जानता है। जिनने कभी भी अन्तर्द्वन्द्व का अनुभव किया है कि इससे अधिक उद्विग्नता एवं अशान्ति और कुछ हो नहीं सकती, वे देवासुर संग्राम के दिनों की परिस्थितियों का वर्णन जब पौराणिक आख्यानों में पढ़ते हैं, तो उसकी रोमांचकारी भयानकता सामने आ खड़ी होती है। इसी का एक रूप देखना हो तो जाग्रत आत्माओं के अंतःक्षेत्र में चलने वाले अन्तर्द्वन्द्व की स्थिति का अनुमान लगा लेना चाहिए।
वर्तमान के पल बड़े ही विचित्र हैं। एक ओर भगवान महाकाल अपनी भुजाएँ पसारे, गोदी में चढ़ाने का-छाती से लगाने का आह्वान कर रहे हैं। दूसरी ओर लोभ और मोह के बन्धन हाथों में हथकड़ी, पैरों में बेड़ी की तरह बँधे हैं। अहंता कमर में पड़े रस्सों की तरह जकड़े बैठी है। पीछे लौटें, जहाँ-के-तहाँ रुके पड़े रहें या फिर आगे बढ़ें? ये प्रश्न ऐसे हैं जो अपना समाधान आज ही चाहते हैं। अनिर्णीत स्थिति का असमंजस जाग्रत आत्माओं के लिए क्रमशः असहज ही बनता जाता है। समय आ गया है कि इस महती सामयिक समस्या का कोई समाधान खोज ही लिया जाय। उपेक्षा करते रहने से समय बीतता जाएगा और यह सुरदुर्लभ अवसर सदा के लिए हाथ से चला जाएगा, जो आज सही रीति से समाधान बन जाने पर अभी भी उज्ज्वल भविष्य की संरचना कर सकता है। जो बीत गया वह बहुत था, पर जो शेष रहा है यह भी इतना है कि इसकी बर्बादी यदि रोकी जा सके, जीवनक्रम की वर्तमान दिशाधारा बदली जा सके तो बचे हुए दिनों में भी स्वयं पार होने और दूसरों को अपनी नाव में बिठाकर पार कर सकने की परिस्थिति बन सकती है।
अपने देवपरिवार में सम्मिलित जाग्रत आत्माएँ अपने को फिर से मूर्च्छित कर सकने में सफल न हो सकेंगी। तप-साधना ही उनके लिए एकमात्र मार्ग है। शरीर बढ़ जाने पर फिर शिशु शरीर पा सकना या छोटे कपड़े पहनकर गुजारा कर सकना सम्भव नहीं। असुरता को देर तक सहन करना और देवत्व को देर तक टकराते रहना न तो उनके लिए सम्भव है और न शोभनीय। इससे आत्मा की, परमात्मा की और युगधर्म की अवमानना ही होती रहेगी। ओछा जीवन जीते रहने पर भी चैन से रहा नहीं जा सकेगा।
अच्छा है महेश्वर महाकाल को अपने अन्तःकरण के आँगन में क्रीड़ा का अवसर दें। देवत्व का समर्थन करें और इस प्रखर साधना वर्ष में ऐसे महातप का निश्चय करें, जिसके आधार पर जाग्रत आत्माओं में, देवमानवों जैसी जीवन नीति निर्धारित की जा सके। यह निर्धारण ही पर्याप्त नहीं-इसे क्रियान्वित करने के लिए सत्संकल्प और उत्साह भी चाहिए। इसी उमंग भरे उभार को व्यक्तिगत जीवन की भगवान के साथ साझेदारी के रूप में माना जा सकता है।
वैसे भी जिन्हें अपनी निज की, अपने परिवार की, देश-समाज की विश्व मानव की और प्राणिमात्र की कुछ ठोस सेवा करने की इच्छा हो, तो उन्हें तप-साधना में प्रवृत्त हो ही जाना चाहिए, क्योंकि इसी के द्वारा व्यापक रूप से मनःक्षेत्र में भरी हुई वह गन्दगी साफ होगी, जिसकी सड़ाँध से विभिन्न जातियों के विषाणु उत्पन्न होते हैं और एक-से-एक भयंकर महामारियों का सृजन करते हैं। हर विषाणु मारने की अपेक्षा हर रोगी का अलग इलाज करने की योजना बनाने से पहले हमें तप-साधना के रूप में स्वच्छता का, असुरता के प्रतिरोध का व्यापक अभियान चलाना चाहिए, ताकि महामारी के उद्गम स्रोत पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सके।
इस प्रखर साधना वर्ष की शुरुआत के साथ ही युगपरिवर्तन की, जनमानस के भावनात्मक नवनिर्माण की घड़ी और भी अधिक निकट आ पहुँची है। अरुणोदय का, ऊषा का आलोक प्राची के समीप न सही दूर दिखाई पड़ने लगा है। ऐसे अवसर पर अनिर्णय अन्तर्द्वन्द्व को मिटा देना ही उचित है। हम जहाँ भी, जिस भी स्थिति में हैं, वहीं यह निश्चय-निर्णय करें कि इस ब्रह्ममुहूर्त में आलस्य-प्रमाद के गर्त में पड़े न रहेंगे। कमर बाँधकर आगे बढ़ेंगे और कर्तव्यों की पुकार को शिरोधार्य करते हुए शूरवीरों जैसा दुस्साहस जुटाएँगे। इस अवसर पर हमें विश्वामित्र, दधिचि एवं अगत्स्य जैसी तप-साधना का परिचय देना होगा, अन्यथा सफलता संदिग्ध बनी रहेगी।
जाग्रत आत्माओं से कहना यही है कि वे अपने आन्तरिक देवासुर संग्राम को देखें और उसके समाधान के लिए सद्विवेक से, सत्साहस से साधना का- तपश्चर्या का सम्बल लें। यदि ऐसा हो सके तो इसी देवपरिवार की असंख्य प्रतिभाएँ युगदेवता के चरणों में अपनी छोटी या बड़ी भावभरी आत्माहुति प्रस्तुत कर सकती हैं। महाकाल ने इसी की माँग की है। जाग्रत आत्माओं में से हर एक की असाधारण भूमिका इस संदर्भ में हो सकती है। अबकी बार का वसन्त पर्व जाग्रत आत्माओं के लिए यही संदेश लेकर आया है।
आचार्य महीधर एक बार बीमार पड़े। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की- मुझे अच्छा होने का वर दो। दूसरे दिन उनकी बीमारी अच्छी हो गई। कुछ दिन बाद वे फिर बीमार पड़े। वे उस रात्रि को भगवान से मात्र अपने आरोग्य की प्रार्थना करते रहे। उन्हें नींद आई तो लगा भगवान स्वयं आ उपस्थित हुए। बोले- अष्वलोमा के पास जा। उपचार करा। भेजा था, मेरा कुछ काम करेगा पर उलटे तू मुझसे ही माँगने लगा।
आचार्य महीधर को बड़ी ग्लानि हुई। जो काम एक वैद्य कर सकता है, उसके लिये भी भगवान? उन्होंने क्षुद्रता छोड़ी और उसी दिन से वेद-भाष्य का श्रीगणेश कर दिया। परमात्मा की उपासना के साथ कामनाएँ जोड़ना ओछापन है। सच्चे सन्त उससे अपने आपको सदैव बचाकर रखते हैं, यही उनकी महानता की पहचान होती है।
‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’- आध्यात्मिक साधना का मूल मंत्र है। अंधकार में भ्रम होना स्वाभाविक ही है। जिस प्रकार अँधेरे में वस्तुस्थिति का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं हो पाता-पास रखी हुई चीज का स्वरूप यथावत दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार अज्ञान के अँधेरे में दोष की स्थिति, विषय आदि का ठीक आभास नहीं होता। वस्तुस्थिति के ठीक ज्ञान के अभाव में कुछ-का-कुछ सूझने और होने लगता है। विचार और उससे प्रेरित कार्य के गलत हो जाने पर मनुष्य का विपत्ति, संकट अथवा भ्रम में पड़कर अपनी हानि कर लेना सहज स्वाभाविक है। आज के समाज में फैली हुई बुराइयों, पतनोन्मुखी प्रवृत्तियों का कारण यही है। यही वह वजह है, जिसके कारण हम सभी सर्वनाशी ग्रहयोग की चपेट में आ गए हैं।
ज्ञान के अभाव में जनसाधारण भ्रान्तिपूर्ण एवं निराधार बातों को उसी प्रकार सच समझ लेता है, जिस प्रकार हिरन मरु-मरीचिका में जल का विश्वास कर लेता है और निरर्थक ही उसके पीछे दौड़-दौड़ कर जान तक गँवा देता है। अज्ञान का परिणाम बड़ा ही अनर्थकारी होता है। इसी वजह से समाज में अनेकों विकृतियाँ फैल जाती हैं। स्वार्थी लोग किसी अन्धपरम्परा को चलाकर जनता में यह भय उत्पन्न कर देते हैं कि यदि वे उक्त परम्परा अथवा प्रथा को नहीं मानेंगे तो उन्हें पाप लगेगा, जिसके फलस्वरूप उन्हें लोक में अनर्थ और परलोक में दुर्गति का भागीदार बनना पड़ेगा। अज्ञानी लोग ‘भय से प्रीति’ होने के सिद्धान्तानुसार उक्त प्रथा-परम्परा में विश्वास एवं आस्था करने लगते हैं और तब उसकी हानि देखते हुए भी अज्ञान एवं आशंका के कारण उसे छोड़ने को तैयार नहीं होते। देखा यही जाता है कि मनुष्य आँखों देखी हानि अथवा संकट से उतना नहीं डरता जितना कि अनागत आशंका से। अज्ञानजन्य भ्रम-जंजाल में फँसे हुए मनुष्य का दीन-दुखी रहना स्वाभाविक ही है।
यही, कारण है कि साधनापथ के मार्गदर्शक ऋषियों ने अन्धकार से ज्योतिपथ पर चलने का सन्देश दिया है। भारत का समूचा अध्यात्म-दर्शन ज्ञानप्राप्ति के उपायों का प्रतिपादक है। अज्ञानी व्यक्ति को शास्त्रकारों ने अन्धे की उपमा दी है। जिस प्रकार बाह्य नेत्रों के नष्ट हो जाने से मनुष्य भौतिक जगत का स्वरूप जानने में असमर्थ रहता है, उसी प्रकार ज्ञान के अभाव में बौद्धिक अथवा विचार जगत की नियमित जानकारी नहीं हो पाती। बाह्यजगत के समान मनुष्य का एक आत्मिक जगत भी है, जहाँ ज्ञान के अभाव में वैसा ही अँधेरा रहता है, जैसे कि आँखों के अभाव में यह संसार।
अन्धकार से प्रकाश और अज्ञान से ज्ञान की ओर जाना ही आध्यात्मिक साधना का प्रमुख उद्देश्य माना गया है। जिस प्रकार आलस्यवश दीपक न जलाकर अन्धकार में पड़े रहने वाले व्यक्ति को मूर्ख कहा जाएगा, उसी प्रकार प्रमादवश अज्ञान दूर कर ज्ञान न पाने के लिए प्रयत्न करने वाले को भी मूर्ख ही कहा जाएगा। भारतवर्ष की महिमा प्रकारान्तर से तप और स्वाध्याय की ही महिमा है। यहाँ की संस्कृति सदा से अपने अनुयायियों को विवेकशील बनने का सन्देश देती रही है, मूढ़ अथवा अन्धविश्वासी बनने का नहीं।
ज्ञानवान अथवा विवेकशील बनने के लिए मनुष्य को अपने मन-मस्तिष्क को साफ-सुथरा बनाना होगा। उसका परिष्कार करना होगा। जिस खेत में कंकड़-पत्थर तथा खर-पतवार भरा होगा, उसमें अन्न के दाने कभी भी अंकुरित नहीं हो सकते। वे तब ही अंकुरित होंगे, जब खेत से झाड़-झंखाड़ और कूड़ा-करकट साफ करके दाने बोए जाएँगे। हमारे मन-मस्तिष्क में इसी जन्म की ही नहीं, जन्म-जन्मान्तरों की विकृतियाँ भी रहती हैं न जाने कितने कुविचार-कुवृत्तियाँ एवं मूढ़मान्यताएँ हमारे मन-मस्तिष्क को घेरे रहती हैं। ज्ञान पाने अथवा विवेक जाग्रत करने के लिए आवश्यक है कि पहले हम अपने विचारों एवं संस्कारों को परिष्कृत करें। परिष्कृत विचार एवं संस्कार के अभाव में ज्ञान के लिए की हुई साधना निष्फल ही चली जाएगी।
विचार एवं संस्कार परिष्कार के लिए अमोघ उपाय स्वाध्याय एवं तप ही है। विचारों में संक्रमण एवं ग्रहणशीलता रहती है। जब मनुष्य स्वाध्याय में निरन्तर संलग्न रहता है, तब उसको अपने विचारों द्वारा विद्वानों-मनीषियों ऋषियों-महर्षियों के विचारों के बीच से बार-बार गुजरना पड़ता है। ग्रन्थों में लिखे विचार अविचल एवं स्थिर होते हैं। उनके प्रभावित होने अथवा बदलने का प्रश्न ही नहीं उठता। स्वाभाविक है कि अध्ययनकर्ता के ही विचार प्रभाव ग्रहण करते हैं। जिस प्रकार के विचारों की पुस्तक पढ़ी जाएगी, अध्येता के विचार उसी प्रकार ढलने लगेंगे। इसीलिए अध्ययन के साथ यह भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया है कि अध्येता उन्हीं ग्रन्थों का अध्ययन करें, जो प्रामाणिक एवं आत्मोन्मुखी हों।
विचार-परिष्कार अथवा ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से पढ़ने वालों को एकमात्र जीवन निर्माण सम्बन्धी साहित्य का ही अध्ययन करना चाहिए। उन्हें निठल्ले एवं निकम्मे लोगों की तरह निम्न मनोरथ वाले उपन्यास, कहानी, नाटक आदि नहीं पढ़ना चाहिए। अश्लील, अनैतिक, वासनापूर्ण अथवा जासूसी आदि से भरे उपन्यास पढ़ने से लाभ तो कुछ नहीं ही होना है, उल्टे हानि ही बहुत अधिक होती है। अनुपयुक्त साहित्य पढ़ने से विचारों की वह थोड़ी-बहुत उदात्तता भी चली जाएगी, जो उनमें रही होगी। स्वाध्याय का तात्पर्य सत्यं, शिवं, सुंदरम् साहित्य पढ़ने से है। सद्विचारों तथा सदुद्देश्य से पूर्ण साहित्य ही पढ़ने योग्य होता है, साथ ही इसमें शाश्वत मूल्यों को, देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप परिभाषित भी होना चाहिए। इन गुणों से भरपूर एवं सभी कसौटियों पर खरा उतरने वाला अपना युगसाहित्य ही है।
इसके विपरीत अनुपयुक्त एवं अवांछनीय साहित्य का पठन-पाठन विचारों को इस सीमा तक दूषित कर देता है कि फिर उनका पूर्ण परिष्कार एक गम्भीर समस्या बन जाएगा। आत्मोद्धारक ज्ञान प्राप्त करने के जिज्ञासु व्यक्तियों को तो सत्साहित्य एवं युगसाहित्य के सिवाय किसी दूसरे अवांछनीय साहित्य को हाथ भी न लगाना चाहिए। सच्ची बात तो यह है कि अनुपयुक्त, अवांछनीय एवं निम्न श्रेणी के मनोरंजनार्थ किए गए ‘लिपि लेखन’ को साहित्य कहा ही नहीं जाना चाहिए। यह तो साहित्य के नाम लिखा गया कूड़ा-करकट होता है, जिसे समाज के हित-अहित से मतलब न रखने वाले कुछ स्वार्थी लेखक उसी प्रकार लिखकर पैसा कमाते हैं, जिस प्रकार कोई भ्रष्टाचारी खाने-पीने की चीजों में अवांछनीय चीजें मिलाकर लाभ कमाते हैं। व्यवसायी, भ्रष्टाचारी जहाँ राष्ट्र का शारीरिक स्वास्थ्य नष्ट करते हैं, वहीं अशिव लेखक राष्ट्र का मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक स्वास्थ्य नष्ट करते हैं। मनुष्य की यह आध्यात्मिक क्षति शारीरिक क्षति की अपेक्षा कहीं अधिक भयंकर एवं असहनीय होती है।
साधना वर्ष का आयोजन राष्ट्रीय एवं मानवीय जीवन में एक आत्म-स्फूर्ति आध्यात्मिक चेतना का संचार करता है। इसमें संस्कारों के परिष्कार के लिए तप की प्रक्रियाएँ तो हैं ही, साथ ही स्वाध्याय रूपी गम्भीर प्रयोग भी हैं। अपने देवपरिवार के स्वजनों से इस सम्बन्ध में कतिपय महत्वपूर्ण अपेक्षाएँ भी की गयी है। इनमें से सर्वप्रथम यह है, परिजन-दैवी सन्देश देने वाली पत्रिका अखण्ड ज्योति एवं युगनिर्माण योजना मासिक को व्यापक बनाएँ। साधना वर्ष में कोई भी निष्ठावान् साधक ऐसा नहीं होना चाहिए, जिसने अपने जैसे पाँच नये निष्ठावान् अखण्ड ज्योति के सदस्य नहीं बनाए हों। पत्रिकाओं के पठन-पाठन के साथ युगऋषि के सम्पूर्ण वांग्मय के विस्तार का अगला चरण भी अपने परिजनों को निभाना चाहिए। सम्पूर्ण वांग्मय एवं अखण्ड ज्योति का नियमित स्वाध्याय साधना वर्ष के साधकों का अनिवार्य अनुबन्ध है, ऐसा सुनिश्चित मानना चाहिए।
ध्यान रखना चाहिए कि स्वाध्याय के बिना विचार-परिष्कार नहीं, विचार-परिष्कार के बिना विवेक और विवेक के बिना ज्ञान नहीं। जहाँ ज्ञान नहीं वहाँ अन्धकार होना स्वाभाविक है और अँधेरा-जीवन में शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार के भयों को उत्पन्न करने वाला है, जबकि प्रखर साधन वर्ष का प्रधान एवं मूलभूत प्रयोजन इस गहन और जटिल अन्धकार को दूर करना ही है। इस वर्ष का सर्वकालिक महामंत्र- तमसो मा ज्योतिर्गमय ही है, जिसकी साधना तप एवं स्वाध्याय का मिला-जुला सुयोग ही है।
“यह महाक्रान्ति की वेला है, युग-परिवर्तन की भी। अशुभ की दिशा से शुभ की ओर प्रयाण चल रहा है। प्रवाह बह रहा है। तूफान की दिशा और गति को देखते हुए अनुमान लगाया जा सकता है कि वस्तुओं को किस दिशा में धकेला और बढ़ाया जाता है। नदी के प्रवाह में गिरे हुए झंखाड़ बहाव की दिशा में ही बहते चले जाते हैं। तूफानों की जो दिशा होती है, उसी में तिनके-पत्ते और धूलिकण उड़ते चले जाते हैं। महाक्रान्ति सदा सृजन और संतुलन के निमित्त उभरती है। पतन और पराभव की विडम्बनाएँ तो कुसंस्कारी वातावरण आये दिन रचाती रहती है। पेड़ पर लगा हुआ फल नीचे की ओर गिरता है। पानी भी ढलान की ओर बहकर निचाई की ओर चलता जाता है, किंतु असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए जब महाक्रान्तियाँ उभरती हैं, तो उसका प्रभाव-परिणाम ऊर्ध्वगमन, उत्कर्ष और अभ्युदय ही होता है। इसलिए उन्हें ईश्वरेच्छा या भगवान का अवतार भी कहा जाता है। उस उभार को देखते हुए यह सहज विश्वास किया जा सकता है कि भविष्य उज्ज्वल है। हम सब शान्ति और प्रगति का लक्ष्य पाने की दिशा में चल रहे हैं। प्राप्त करके भी रहेंगे।”
प्रस्तुत पंक्तियाँ 1989 की जून माह की अखण्ड-ज्योति से उद्धृत हैं। युगऋषि के चिन्तन से स्पष्ट जाना जा सकता है कि कितना स्पष्ट भविष्य का नक्शा उनके समक्ष रहा होगा।
बीसवीं सदी का अंत एवं इक्कीसवीं सदी का शुभारम्भ एक ऐसी वेला में आया है, जिसे क्रांतियों की पराकाष्ठा का समय कहा जा सकता है। औद्योगिक क्रान्ति, आर्थिक क्रान्ति, वैज्ञानिक क्रान्तियाँ विगत दो सौ वर्षों में युग की काया पलट कर देने वाली मानी जाती रही हैं। आज से दो सौ वर्ष पूर्व का मानव यदि कालप्रवाह में चलकर एकाएक आ जाय तो वह हतप्रभ होकर रह जाएगा कि वह जिस दुनिया को छोड़कर गया था, वह तो यह नहीं है। विज्ञान ने अभूतपूर्व प्रगति की है एवं मानवी-सभ्यता को विकास के नये आयाम दिए हैं। उद्योग क्षेत्र में हुई क्रान्ति ने जहाँ मानवमात्र के लिए श्रम के बदले पूँजी को जुटाया, वहीं साम्यवाद के रूप में एक समता के सिद्धान्त को भी जन्म दिया। यह बात भिन्न है कि वह साम्यवाद आज पूँजीवाद-प्रत्यक्षवादी भौतिकवाद की हवा में लेनिन व मार्क्स के जाने के साथ ही लुप्तप्राय-सा हो गया है, फिर भी एक क्रान्ति तो समाज के आर्थिक चिन्तन में हुई ही। इतना सब होते हुए भी आज यदि एक महाक्रान्ति की आवश्यकता अनुभव की जा रही है, तो उसे युगपरिवर्तन के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता मानते हुए भली-भाँति समझना व उसका एक अंग बनकर जीना ही सभी के लिए वरेण्य माना जाना चाहिए।
आज छह सौ करोड़ की आबादी वाली विश्ववसुधा बड़ी विषमताओं से भरी परिस्थितियों में जकड़ी दिखाई देती है। साधन व सम्पन्नता दोनों बढ़े हैं, किंतु साथ ही अभाव भी। मनुष्य बढ़ते उपभोगवाद की नीति के कारण शरीर-मन दोनों ही दृष्टि से तेजी से दुर्बल व रुग्ण-अशक्त होता चला जा रहा है। जानकारी बढ़ाने के साधन, मस्तिष्कीय विकास के अगणित तरीके विकसित हुए हैं, फिर भी आधी-से-अधिक जनशक्ति निरक्षर-अनगढ़ स्थिति में दिखाई देती है। संतोष व शान्ति, मानसिक प्रसन्नता-प्रफुल्लता का मानो अकाल-सा आ गया है। हर व्यक्ति तनावग्रस्त दिखाई पड़ता है। असुरक्षा व एकाकीपन का भार इतना लद रहा है कि जिन्दगी भारी लाश की तरह ढोनी पड़ रही है। हताशाओं, आत्महत्याओं का दौर बढ़ रहा है। बाहर से चतुर दीखने वाले किंतु अंदर से खोखले-उथले व्यक्तियों की संख्या विगत पचास वर्षों में तेजी से बढ़ी है। पारिवारिक सौजन्य-स्नेह भी समाप्तप्राय सा लगता है। यौन-आकर्षण ही दाम्पत्य जीवन का एकमात्र आधार नजर आता है। विवाहेत्तर संबंध, पारिवारिक कलह एवं बच्चों में बढ़ती अपराधों की संख्या एक विभीषिका समान दिखाई देती है। दहेज के लिए विवाह, बहुओं को जलाया जाना-सताया जाना, विवाह-शादियों में अनाप-शनाप व्यय, फैशन-परस्ती फिजूलखर्ची इस परिमाण में बढ़ गए लगते हैं कि माने अब भौतिकता का कहीं कोई स्थान ही नहीं रह गया। अविवाहित कन्याओं की समस्या आज भी इक्कीसवीं सदी के आगमन की वेला में यथावत है। मनुष्य आधुनिक तो हुआ है, परंतु उसकी सोच और अधिक जातिवादी, सम्प्रदायवादी अर्थप्रधान, ऊँच-नीचवादी होती चली गयी है। अंधविश्वास, सामाजिक कुरीतियाँ, मूढ़मान्यताएँ-लगता है पुनः बाढ़ के रूप में आती चली जा रही हैं व इस सदी के पूर्व के सारे आंदोलन निरर्थक से नजर आ रहे हैं। शासन पूरी तरह शोषण, बेईमानी, अराजकता भरे तंत्र पर टिका कुचक्र का षड्यंत्र मचाता दीखता है। पूरी स्थिति देखकर लगता है कि सृजन से ध्वंस की गति तीव्र है एवं मानवजाति के दिवालिया होने का संकट आ खड़ा है।
महाक्रान्तियाँ ऐसी ही वेला में होती हैं। जब मनुष्य का बाहुल्य थक जाय और विनाश की आशंकाएँ बलवती होने लगें, तो प्रवाह को उलटने का पुरुषार्थ जिस महाकाली के माध्यम से होता है, उसी को महाक्रान्ति कहा गया है। ऐसे घटनाक्रम सूक्ष्मजगत के- परोक्ष में पहले घट जाते हैं, प्रत्यक्ष जगत में वे बाद में दृष्टिगोचर होते हैं। प्रस्तुत साधना वर्ष में जब मानवी आध्यात्मिक पुरुषार्थ की प्रखरता चरम सीमा पर है, इस महाक्रान्ति को घटित होते सभी के द्वारा चर्मचक्षुओं से देखा जा सकेगा। परमपूज्य गुरुदेव ने नवयुग का आगमन तीन आधारों पर सुनिश्चित बताया है। वे हैं-मनुष्य के चिन्तन, चरित्र व व्यवहार में आमूलचूल परिवर्तनं चिन्तन प्रक्रिया में परिवर्तन को विचार क्रान्ति, चरित्र में बदलाव को नैतिक क्राँति एवं व्यवहारी में आए हेर-फेर को सामाजिक क्रान्ति नाम उन्होंने दिया था। जब तक इन तीन मूलभूत आधारों पर समग्र परिवर्तन की बात नहीं सोची जाती- युगपरिवर्तन संभव नहीं हो सकता। हिंसा से या रैली निकालने से यह बदलाव व्यापक स्तर पर न अब तक लाया जा सका है, न कभी भविष्य में लाया जा सकेगा। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा आरंभ किए गए सारे क्रिया-कलाप इसी आध्यात्मिक महाक्रान्ति की धुरी पर खड़े देखे जा सकते हैं। जब भी हम क्रान्ति के विषय में सोचें, हमें युगदेवता-आराध्य सत्ता के चिन्तन के साथ अपनी संगति जोड़कर बड़े व्यापक परिप्रेक्ष्य में इस पर चिन्तन कर इस साधना वर्ष में असली जामा पहनाने का प्रयास कर नवयुग के अभ्युदय की बात सोचनी चाहिए। इसमें जो भी कुछ संघर्ष है- वह सारा विचारों का विचारों से ही है। ऐसे पुरुषार्थ में सदा से ही देवत्व की विजय होती रही है, अतः हमें साधनात्मक वातावरण बनाने भर की आवश्यकता है- क्राँति के बीज ऐसी पृष्ठभूमि में सहज ही पुष्पित-पल्लवित होते चलेंगे।
रचनात्मक स्तर पर जिन तीन क्राँतियों की चर्चा होती है, उनके क्रियाशील होने की चर्चा परमपूज्य गुरुदेव ने व्यक्ति के तीन स्तरों पर की है। पूर्व की अखण्ड ज्योति एवं युगनिर्माण योजना पत्रिकाओं का अनुशीलन करने पर वे इस प्रकार हैं-
(1) स्वस्थ शरीर के निर्माण हेतु-स्वास्थ्य संवर्द्धन की क्रान्ति जिसमें आहार-विहार से लेकर आचार-विचार की बात बतायी गयी है। इस राष्ट्र ही नहीं-सारे विश्व को समग्र स्वास्थ्य देने हेतु आयुर्वेद के पुनर्जीवन-वनौषधियों से स्वास्थ्य संवर्द्धन, शाकाहार की क्रान्तिकारी प्रक्रिया का विस्तार एवं मनोविकारों के शमन हेतु आध्यात्मिक उपचार उसी के अंतर्गत आते हैं।
(2) स्वच्छ मन के निर्माण हेतु-आस्तिकता संवर्द्धन की क्रान्ति की चर्चा की गयी है। आस्थाओं को सबल-परिष्कृत उपासनात्मक उपचार के द्वारा ही किया जा सकता है। चिंतन में पवित्रता का समावेश किए जाने के लिए साधनात्मक प्रयास इंद्रिय, समय, अर्थ व विचार चारों स्तर पर संयम किए जाने के माध्यम से संपादित होने चाहिए। आध्यात्मिक चिंतन ही स्वच्छ मन का जन्मदाता माना जाना चाहिए। अपने-अपने इष्ट के प्रति समर्पण भाव जब राष्ट्र देवता के प्रति समर्पण में रूपान्तरित होता है, तो ऐसा मन समष्टि के साथ मिलकर एक विराट-समूह मन का निर्माण करता है जिसमें परिवर्तन हेतु अनिवार्य क्राँतिकारी शक्ति होती है।
(3) सभ्य समाज के निर्माण हेतु- नारी जागरण की धुरी पर समाज का अभिनव निर्माण। नारी शक्ति समाज की आधी से अधिक जनशक्ति ही नहीं है, आज का समाज असभ्य हुआ ही है नारी शक्ति- भावसंवेदना को धारण करने वाली शक्ति की अवमानना से। नारी जागरण का अर्थ है- समाज का नेतृत्व भावसंवेदना के माध्यम से संचालित होना, परिवारों में सुसंस्कारिता का जागरण होना एवं मानव के चिन्तन में शुचिता- पवित्रता का समावेश होना। इक्कीसवीं सदी मातृशक्ति की सदी है। इसे पुनः स्थापित करने हेतु ही इस रचनात्मक क्राँति का- युगनिर्माण योजना, अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा सूत्र-संचालन किया जा रहा है।
महाक्रान्ति का दूसरा चरण सुधारात्मक-संघर्षात्मक है। स्मरण रहे, यह संघर्ष वैचारिक स्तर पर आरंभ होता है, तब ही यह ऐसा वातावरण बनाता है, जिसमें नवसृजन की तरंगें हिलोरें लेने लगती हैं। इसमें चार चरण परमपूज्य गुरुदेव ने बताए हैं- (1) साधना के आधार पर-दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन- यह वस्तुतः अपने आप से लड़ा जाने वाला एक समर-संग्राम है। साधक स्तर के व्यक्तित्वों का सृजन होगा तो व्यक्तिगत स्तर से लेकर-पारिवारिक एवं सामाजिक स्तर पर संव्याप्त दुष्प्रवृत्तियाँ स्वतः समाप्त होती चली जाएँगी एवं ईमानदारी, सृजनशीलता, कर्मठता जैसी सत्प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलेगा। साधना आज समाजीकरण के स्तर पर पहुँचनी चाहिए एवं असुरता को प्रश्रय देने वाली सारी वृत्तियों के विरुद्ध वातावरण बनना चाहिए। साधना का अर्थ है- अपने आप को साध लेना- रिंग मास्टर के हन्टर की तरह बार-बार उन वृत्तियों पर अंकुश लगाना जो उच्छृंखल हो समाज के संतुलन को बिगाड़ती हैं। इसी का दूसरा पक्ष है- विचारों में श्रेष्ठता का समावेश कर उनका समाज के नवनिर्माण हेतु नियोजन। व्यक्ति के स्तर पर आरंभ यह साधना समाज के विराट स्तर तक पहुँचती हुई बड़े व्यापक आंदोलन-व्यक्तिनिर्माण से समाज-निर्माण-युगनिर्माण में बदल जाती है।
(2) स्वाध्याय- दूसरा चरण है, जिसके आधार पर वैचारिक क्राँति द्वारा उन सभी कुरीतियों से जूझने का ज्ञानयज्ञ चल रहा है, जिनका उन्मूलन किए बिना समाज निर्माण संभव नहीं। कुरीति उन्मूलन आंदोलन को युग-निर्माण योजना द्वारा इसी धुरी पर खड़ा किया गया है, विवेक जाग्रत तब हो जब पतन-निवारण में सहायता करने वाले स्वाध्याय का प्रचलन बढ़े। आज स्वाध्याय चाहे वह साहित्य के रूप में हो अथवा टेलीविजन चैनलों के माध्यम से- मनोरंजन का रूप ले चुका है स्वाध्याय, आत्मनिर्माण से लेकर लोकमंगल के लिए हो- चाहे श्रेष्ठ विचारों के विस्तार हेतु माध्यम कोई भी प्रयुक्त किया जाय। यदि विवेक स्थिर रहा तो समाज से कुप्रचलन-अंधमान्यताएँ रूढ़िवादी रीति-रिवाज-धर्म के नाम पर चलने वाली कुरीतियों का स्वतः अंत हो जाएगा।
(3)संयम- तीसरा चरण है, जिसके द्वारा व्यसन मुक्ति आंदोलन को संघर्षपरक रूप दिया गया है। आत्मसंयम के अभाव में ही व्यक्ति नशों की गिरफ्त में आ जाता है। मनुष्य का शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य आज खोखला हुआ है- तम्बाकू, शराब, मादक हेरोइन जैसे द्रव्यों, पान-गुटका नशीली दवाओं के प्रचलन से। अकेले शराब ने ही न जाने कितने परिवार उजाड़े हैं व राष्ट्र का अरबों का नुकसान किया है। अपराधों से अराजकता बढ़ी है सो अलग। संयम के प्रचलन को बढ़ावा देकर देव दक्षिणा क्रम में व्यसन मुक्ति आंदोलन को इस प्रखर साधना वर्ष में प्रचण्ड गति दी जानी चाहिए।
(4)सेवा- वह चौथा चरण है, जिसके द्वारा आज की सर्वश्रेष्ठ समाज देवता की आराधना संभव है। आज की सेवा नियोजित होनी चाहिए, विवाहोन्माद की असुरता से प्रतिरोध करने वाले आँकलन के रूप में। विवाह संस्कार एक पावन पुनीत कृत्य है, जिसमें दो आत्माओं का आध्यात्मिक मिलन होना चाहिए। इसे एक पैशाचिक कृत्य बना दिया गया है- नेग के नाम पर, दहेज के नाम पर, फैशन-खूबसूरती के नाम पर खूब शोषण होता है। अनाप-शनाप पैसा बहाकर यह संस्कार मात्र भारत में ही संपन्न होता है। राष्ट्र को दरिद्र व बेईमान होने का मूल कारण खर्चीली शादियाँ ही हैं। आज की सर्वश्रेष्ठ सेवा यही है कि दहेज रूपी असुर से जूझने वाले साधक श्रेष्ठ खड़े हों। स्वयं न दहेज लेने, न देने की शपथ लें। जहाँ ऐसा प्रचलन हो, वहाँ असहयोग-सत्याग्रह आदि के द्वारा वातावरण बनाने में मदद करें।
इस प्रखर साधना वर्ष में स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन, सभ्य समाज द्वारा तीन रचनात्मक क्रान्तियाँ तथा साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा रूपी चार बातों द्वारा संघर्षात्मक-सुधारात्मक क्रान्तियों में भागीदारी हर साधक को करनी चाहिए।
जन्म देकर माता निवृत्त नहीं हो जाती वरन् उत्तरदायित्व प्रकारान्तर से यथावत बना रहता है। गर्भस्थ भ्रूण को वह नाल तन्तु के माध्यम से रस-रक्त पहुँचाती थी, अब वह प्रक्रिया स्तनपान द्वारा चलती है। रक्त का ही समानान्तर प्रतिनिधि दूध होता है। माता की छाती से निकलने वाले दूध में मातृसत्ता का प्रायः समग्र प्रतिनिधित्व सन्निहित रहता है। जननी के शरीर में जो रासायनिक सम्पदा है और चेतना में जो ज्ञान-गरिमा है, उसका सार तत्व माता अपने वक्षस्थल से निःसृत दुग्ध के माध्यम से बालक को पिलाकर सींचती है। यह अनुदान नवजात शिशु को तब तक अनवरत रूप से मिलता रहता है, जब तक कि उसका पाचन-तन्त्र अन्य खाद्य सामग्री ग्रहण करने और पचाने में समर्थ नहीं हो जाता।
यह सूक्ष्म प्रक्रिया की बात हुई, स्थूल प्रक्रिया भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। लालन-पालन भरण-पोषण से सम्बन्धित अगणित एवं विविध-विधि क्रिया-कलाप उसे निरन्तर पूरे करते रहने पड़ते हैं। उसकी ममता और सतर्कता ही अबोध शिशु को जीवित रखने और सुव्यवस्थित रीति से विकसित होने का अवसर देती है। स्पष्ट है कि स्नेह, सुरक्षा और सुव्यवस्था का समुचित प्रबन्ध न हो तो बालक के लिए निरोग एवं दीर्घजीवी रह सकना प्रायः अशक्य ही रहेगा मानव शिशु जन्मजात रूप से परावलम्बी होता है। उसे पग-पग पर माता की सहायता विशेष रूप से और पिता आदि अभिभावकों की साधारण रीति से निरन्तर अपेक्षित रहती है।
अध्यात्म जगत में यही भूमिका शिष्य के प्रति गुरु निर्वाह करता है। पौधा भले ही भूमि से, खाद-पानी और प्रकाश से बढ़ता-पलता हो, पर माली की भूमिका उसके जीवन विकास में कम नहीं होती। शीत-आतप से बचाने, समयानुसार खाद-पानी के साधन जुटाने, पशुओं द्वारा उदरस्थ कर लिए जाने से बचाने, काट-छाँटकर सुन्दर-शोभायमान बनाने में माली की भूमिका इतनी महत्त्वपूर्ण होती है कि उसके बिना अति कठोर स्तर के पेड़-पौधे ही स्वावलम्बी हो सकते हैं। काट-छाँट के बिना वे भी जंगली स्तर के ही रहेंगे। क्रमबद्ध शोभा-सौरभ तो उनमें कदाचित ही रह पाये। व्यक्तित्व को समग्र रूप से विकसित और व्यवस्थित बनाने में गुरु की भूमिका भी कुशल माली जैसी ही होती है। वैदिक काल में अपने देश का हर नागरिक देवोपम जीवन जीता था। यहाँ का हर नागरिक भू-देव कहलाता था। भारतभूमि तैंतीस कोटि देवताओं की देव नागरिकों की स्वर्गादपि गरीयसी क्रीड़ास्थली थी। इसका अधिकाँश श्रेय उन गुरुओं का, जो अपने तप-प्राण शिष्यों में उड़ेलते रहते थे। महत्ता उन शिष्यों की भी कम नहीं-जिनमें सद्गुरु की शक्ति धारण करने की पात्रता थी।
यही कारण है कि प्राचीनकाल में गुरु की गरिमा अत्यधिक उच्चस्तर की थी। उसे गुरुब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुरेव महेश्वर गुरुरेव परब्रह्म........... के पद पर श्रद्धापूर्वक आसीन किया जाता था और गुरु-गोविन्द को प्राथमिकता देने वाले भावनाशील श्रद्धालु गुरु-गौरव को प्राथमिकता देते थे। इसका आधार भी है और कारण भी। नरकीटक को-नरपशु को नारायण एवं पुरुषोत्तम स्थिति तक पहुँचा देने का योजनाबद्ध प्रयास करने वाला, अणु को विभु संज्ञा प्रदान करने वाला, आत्मा को परमात्मा के सदृश बना सकने वाला कलाकार मानवी कल्पना को जिस भी सम्मान से सम्मानित किया जाय कम है।
गुरु ऐसा ही कलाकार है, जो तप-साधना की अति कष्टसाध्य प्रक्रिया अपनाकर अपने को ऐसी प्रचण्ड अग्नि के रूप में विकसित करता है, जिसके संपर्क में आने वाला सहज ही तत्सम बन जाय। इसके लिए उसे आत्मनिग्रह की, आत्म संवर्द्धन की अग्निपरीक्षा में होकर जन्म-जन्मान्तर तक आत्मशोधन करना पड़ता है। तब कहीं वह इस स्थिति में बनता है कि अपना बहुमूल्य संचित तप-प्राण परम निस्वार्थ भाव से अधिकारी शिष्य को प्रदान करके उसे अपनी क्षमता का गौरव उपलब्ध करा सके।
यहाँ चर्चा उस सद्गुरु की, की जा रही है, जो कीट-भृंग का उदाहरण प्रस्तुत कर सकने में समर्थ है। जलती अग्नि में जो वस्तु डाली जाती है, वह जल्दी या देर से उसी के सदृश अग्निरूप हो जाती है। यही परमगुरु का कौशल-अनुदान है। यही वह महाप्रयोग है, जिससे सद्गुरु से अभिन्नता की दिव्य अनुभूति का रसास्वादन मिलता है। निश्चित ही इसके लिए आत्मबल-सम्पन्न गुरु चाहिए, साथ ही शिष्य के लिए आत्मोत्सर्ग का माता जैसा प्रबल वात्सल्य भी होना चाहिए। विद्वता या व्याख्यानबाजी मात्र से यह कार्य नहीं हो सकता। इसके लिए प्रचंड तप-साधना द्वारा उपार्जित आत्मबल सम्पदा की प्रचुर पूँजी का प्रचुर संग्रह आवश्यक है।
युगपरिवर्तन की इस पुण्य वेला में अभीष्ट प्रयोजनों की पूर्ति के लिए ऐसी आत्मबल सम्पन्न विभूतियों की आवश्यकता पड़ेगी, जो भौतिक साधनों से नहीं अपने आत्मबल से जनमानस के विपन्न-प्रवाह को उलट सकने का साहस कर सकें। यह कार्य न तो व्यायामशालाएँ, पाठशालाएँ पूरा कर सकती हैं और न शस्त्रसज्जा से, अर्थसाधनों से पूरा हो सकता है। इसके लिए ऐसे अग्रगामी लोकनायकों की आवश्यकता अनुभव की जा रही है, जो मनस्वी और तपस्वी बनने में अपना गर्व-गौरव अनुभव करें और
जिनकी महत्त्वाकाँक्षाएँ भौतिक बड़प्पन से हटकर आत्मिक महत्ता पर केन्द्रीभूत हो सकें। भौतिक लाभों के लिए लालायित, लोभ-मोह के बन्धनों में जो बुरी तरह आबद्ध हैं, उनके लिए यह मार्ग नहीं है।
मनुष्य में देवत्व के उदय एवं धरती पर स्वर्ग के अवतरण की यह पुण्य घड़ी है। इसमें महामानवों को महत्वपूर्ण भूमिका निबाहनी ही पड़ेगी। वे इस साधनापथ पर अग्रगामी बनेंगे और असंख्यों को अपने पीछे अनुगमन की प्रेरणा देंगे। इतिहास के आकाश में ऐसे ही समर्पित शिष्य उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह अनन्तकाल तक चमकते हैं। इन्हीं का निर्माण परमपूज्य गुरुदेव को इन दिनों अभीष्ट है। महाकाल ने इस महाप्रयोग के लिए उन्हीं का आह्वान किया है। युग की आत्मा ने उन्हीं को पुकारा है। ऐसी जीवात्माएँ हम सब के बीच इन दिनों भी मौजूद हैं। दुर्भाग्य ने उन पर मलीनता का आवरण आच्छादित कर दिया है। अन्धकार में वे अपना कर्तव्य देख-समझ नहीं पा रहे हैं और साहसिकता के अभाव में उस दिशा में कदम बढ़ा नहीं पा रहे हैं, जिसके लिए उनमें समुचित पात्रता पहले से ही मौजूद है।
शान्तिकुञ्ज द्वारा इस वसन्त पर्व से प्रारम्भ किए गए प्रखर साधना वर्ष का यही प्रयोजन है। इसे भूतकालीन ऋषि प्रक्रिया की पुनरावृत्ति कहा जा सकता है, जिसमें आत्मसम्पदा से सम्पन्न महर्षि अपने शिष्यों को ऊँचा उठाते और आगे बढ़ाते थे। शरीर को जन्म देने वाली माता जिस प्रकार अपना उत्कृष्ट जीवन रस निचोड़ कर नगण्य से भ्रूण कमल को एक समर्थ मानव बनाती है, ठीक उसी प्रकार का उत्तरदायित्व व्यक्ति की आत्मिक प्रगति में समर्थ सद्गुरु वहन करते हैं। यह प्रक्रिया एक अनोखे जुड़ाव एवं अद्भुत अभिन्नता की रसानुभूति प्रदान करती है। साधना वर्ष में भागीदार होने
वाले साधक इसे अनुभव किए बिना न रहेंगे।
परमपूज्य गुरुदेव अपनी उपार्जित प्रचण्ड तपःशक्ति का महत्वपूर्ण अंश इस वर्ष अपने आत्मीय साधकों में वितरित करेंगे, साथ ही इस बीजारोपण से उत्पन्न अंकुर को भविष्य में भी सींचने-सँभालने का प्रयास करेंगे। माता के गर्भ में बालक लगभग एक वर्ष ही रहता है- प्रखर साधना वर्ष की उपाधि कुछ उसी प्रकार की है। गर्भस्थ शिशु को माता से जिस तरह का अनुदान मिलता है, उससे हल्का नहीं वरन् कुछ भारी ही यहाँ से भी मिलेगा।
प्रसव के उपरान्त माता नवजात शिशु के प्रति अपने कर्तव्य का अन्त नहीं मान लेती वरन् उसके द्वारा उत्पन्न की गयी मलीनता और अव्यवस्था को साफ करती-सँभालती रहती है, साथ ही उसके परिष्कार-परिपोषण के साधन जुटाती रहती है। साधना वर्ष के माध्यम से विनिर्मित शिशु साधकों का भी परमपूज्य गुरुदेव की कारण सत्ता इसी प्रकार का ध्यान रखेगी- यह अतिरिक्त रूप से कहने की आवश्यकता नहीं है।
इतना महान अनुदान प्राप्त करने वाले साधना वर्ष के प्रतिभागियों को हर दृष्टि से सौभाग्यशाली ही माना जाएगा। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि जिन्हें इस स्तर की भागीदारी मिले, उनका भी कुछ दायित्व है। पात्रता विकसित करने के लिए उन्हें साधना वर्ष के सभी अनुबन्धों का निष्ठापूर्वक पालन करना पड़ेगा। इस साधना वर्ष के महाप्रयोग में भागीदार बनने वालों को निश्चित ही परम पूज्य गुरुदेव से अभिन्नता की दिव्य अनुभूति मिले बिना न रहेगी।
एक सन्त दस शिष्यों समेत सघन वन में रहते थे। एक रात्रि को उनने एक विशेष साधना कराई। शिष्यों को पंक्तिबद्ध होकर ध्यान करने के लिए बिठा दिया।
रात्रि के तीसरे प्रहर गुरु ने धीमे से आवाज दी- राम! राम उठा, गुरु ने उसे चुपके से दुर्लभ सिद्धि प्रदान की। अब दूसरे की बारी आई। पुकारा-श्याम! पर श्याम तो सो रहा था। इस बार भी राम ही आया और दूसरी सिद्धि भी लेकर चला गया।
शेष सभी शिष्य सो रहे थे। गुरु को उस दिन दस सिद्धियाँ देनी थीं। सोते को जगाने का निषेध था। दसों बार राम ही आया और एक-एक करके दसों सिद्धियाँ प्राप्त करके कृतकृत्य हो गया। सोने वाले दूसरे दिन जागे और अपनी भूल पर पछताने लगे।
निराकार सत्ता की- महाकाल की प्रेरणा इसी प्रकार हम सबको टटोलती है। जो जाग्रत होते हैं, वह ही उस प्रेरणा को समझ पाते हैं-शक्ति पाकर सामर्थ्यवान बनते तथा सारे वातावरण को बदल कर रख देते हैं।
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो! साधना की सफलता आन्तरिक पवित्रता-प्रखरता पर निर्भर करती है। वेदमंत्रों के उच्चारण का फल केवल अंतरंग को पवित्र करने से ही मिलता है। राजा दशरथ के यहाँ जब पुत्रेष्टि यज्ञ की बात चली थी, तो गुरु वशिष्ठ ने कहा था कि हमारे सौ बच्चे हो गये हैं। अतः हमारे द्वारा मंत्र पढ़ने से कोई लाभ नहीं होगा। संयम का पालन नहीं होगा, आहार-विहार ठीक नहीं होगा, तो वेदमंत्र का कोई लाभ नहीं हो सकेगा। ऋषियों में एक शृंगी ऋषि थे। उनकी संयम साधना, आहार-विहार साधना अनूठी थी। महिलाओं के सम्बन्ध में उन्हें कुछ भी पता नहीं था। वे जंगल में पले थे। आहार-विहार ठीक होने के कारण उनका अन्नमय कोष परिशोधित था। मनोमय कोष पवित्र था। अतः उस विशेष आयोजन के लिए शृंगी ऋषि को बुलाया गया था। उनके मुख से उच्चरित वेदमंत्रों के द्वारा यज्ञ होने पर दशरथ जी के यहाँ भगवान के रूप में चार बालक पैदा हुए। भगवान राम, भगवान भरत, भगवान लक्ष्मण, भगवान शत्रुघ्न पैदा हुए। ये कहाँ से पैदा हुए? ये मंत्रों से पैदा हुए। उसे किसने बोला था? शृंगी ऋषि ने बोला था।
मित्रो! आहार-विहार के सम्बन्ध में परिष्कृत होने के लिए आपको भी तैयार होना चाहिए। हम ब्रह्मवर्चस की साधना में आपको यही कराएँगे तथा आपको मजबूर करेंगे कि आप अपने आहार-विहार को ठीक करें। हम आपकी सात्विकता पर जोर देंगे। अगर आपको अमुक चीज ठीक नहीं लगेगी तो इसके लिए आपको ठोस प्रयास करना होगा तथा उसके लिए तैयार होना होगा। जब हम आपको ब्रह्मवर्चस की साधना कराएँगे तो आपको एक भिगोना दे दिया जाएगा और कहा जाएगा कि आप यहाँ से संस्कारवान अनाज लें और अपना सात्विक आहार स्वयं तैयार करें। इसमें खिचड़ी, दलिया बनाकर खा लीजिए। पहले जमाने में संत-महात्मा इसी प्रकार भिक्षा लेकर आते थे और अपना भोजन स्वयं बनाकर खा लेते थे। आपको भी उसी प्रकार करना चाहिए। हम आपको यहाँ पर जायकेदार चीजें नहीं देंगे, वरन् हम आपका जायका खराब करेंगे, उस आदत को सुधारेंगे जिसने आपको असंयमी बना दिया है।
साधना-उपासना की पहली सीढ़ी सात्विकता है। अतः आपको यह ध्यान रखना होगा कि आप चाहे यहाँ रहें अथवा कहीं भी रहें, आपको इसी प्रकार सात्विक अन्न-आहार का प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार अगर आप करेंगे तो आपको पता चलेगा कि सात्विक आहार का भजन-पूजन पर, साधना-उपासना पर क्या प्रभाव पड़ता है। हमने चौबीस साल तक जौ की रोटी एवं छाछ का सेवन किया है। इस बीच न नमक खाया है, न शक्कर। आप पूछते हैं कि गुरुजी आपने कौन-सा बीजमंत्र लगाया है? हमने अपनी साधना में केवल सात्विक आहार का सेवन किया है। पूजा-उपासना के पहले, भजन के पहले हमें अपने मस्तिष्क एवं शरीर को सात्विक बनाना होगा, ताकि भगवान हमारे शरीर में उपस्थित हो सकें और हमारे मस्तिष्क में प्रेरणा दे सकें। इसके लिए हमें सात्विक आहार का सेवन करना होगा।
मित्रो! हमें न केवल अपने पेट को, वरन् जीभ को भी नियंत्रित करना होगा। इसके द्वारा ही आदमी के भीतर बैठा हुआ देवत्व जाग्रत होता है तथा मनुष्य प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने लगता है। अपनी जीभ के ऊपर हमें बड़ी सावधानी से ध्यान देना होगा। फिर ध्यान देना होगा कि हम जो बोलते हैं, उसका प्रभाव पड़ता है कि नहीं। हम गिरे हुए तो नहीं हैं? हमारे द्वारा किसी को दुख तो नहीं हो रहा है? इस प्रकार के विचार अपने भीतर पनपने के लिए हमें अपने अन्नमय शरीर को ठीक करना होगा। इसमें अन्न तथा जल दोनों चीजें सम्मिलित हैं। वातावरण का प्रभाव भी पड़ता है। अन्न के साथ इन चीजों को भी ठीक करना होगा।
दूसरा शरीर हमारा प्राणमय कोष है। हमारे शरीर में एक मैग्नेट काम करता है, जो अंतरिक्ष की चीजों को खींचता रहता है तथा उसे प्राणवान बनाता रहता है। आप जानते हैं कि जहाँ वृक्ष होते हैं, वहाँ बादल खिंचते हुए चले आते हैं। उसी प्रकार जहाँ कहीं भी श्रेष्ठता होगी, हमारा प्राणमय कोष उसे खींचता रहता है। पिछले दिनों लीबिया में सारे पेड़ काट दिये गये तो वहाँ का सारा क्षेत्र रेगिस्तान में बदल गया। बादलों ने वहाँ बरसना बन्द कर दिया। इस घटना के बाद वहाँ की जनता को, सरकार को पेड़ लगाने पड़े। धीरे-धीरे अब थोड़ी-बहुत बारिश हो जाती है। इसी प्रकार प्राणमय कोष, जिसे हम मैग्नेट कहते हैं, वह श्रेष्ठ चीजों को, जो हमारी जीवात्मा की खुराक हैं, को खींचता रहता है। इस मैग्नेट को हम साहस कहते हैं। इस साहस के माध्यम से बड़ी-बड़ी चीजें आती-जाती श्रेष्ठता की ओर बढ़ते चले जाते हैं।
इस प्राणमय कोष को जब मनुष्य जाग्रत कर लेता है, तो उसके अन्दर चमत्कार उत्पन्न हो जाता है। नैपोलियन बोनापार्ट का जब प्राणमय कोष जाग्रत हो गया था, उसके भीतर का साहस जब जाग गया था तो वह आल्पस पर्वत को पार कर गया था। गाँधीजी ने जब इस शरीर को जगा लिया तो अंग्रेज हमारे देश से भाग खड़े हुए। वह गाँधी के प्राणमय कोष का चमत्कार था। यह असली ताकत हमारे प्राणवान प्राणमय कोष का चमत्कार है। आपको अपने इस प्राणमय कोष को जाग्रत करना होगा। आपको हिम्मत-साहस की शक्ति को जाग्रत करना होगा।
बेटे, हिम्मत की शक्ति बहुत महान है। इसके द्वारा आप सभी चीजें प्राप्त कर सकते हैं। लव-कुश ने इसी के द्वारा हनुमान, लक्ष्मण तथा अन्य वीरों को हरा दिया था। यह उनकी। शरीर में कोई ताकत नहीं होती। असली ताकत तो अन्दर होती है। मनुष्य की वास्तविक ताकत उसकी प्राणों की ताकत है, हिम्मत की ताकत है। शरीर की ताकत से कुछ नहीं होता है। जो भी गाँधी जी के पास जाता था, वह उनका हो जाता था। सरदार पटेल, नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जो भी उनके पास गये, उनकी आँखों के वशीभूत हो गये। वह गाँधी जी की शक्ति नहीं थी, वरन् उनके प्राणमय कोष की शक्ति थी। यह उनकी हिम्मत थी एवं साहस था।
मित्रो, आपको भी तपस्वी बनने के लिए, साधक बनने के लिए अपने प्राणमय कोष को ताकतवर बनाना होगा। पिछले दिन हम आपको बतला रहे थे कि आपको तपस्वी जीवन जीने के लिए, साहसी बनाने के लिए हम आपको प्राणवान बनाएँगे। जिस प्रकार जीभ को कण्ट्रोल करने के लिए अन्नमय कोष को ठीक करना पड़ता है, उसी प्रकार अपने आप से लोहा लेने के लिए आपको तपस्वी होना होगा। शरीर पग-पग पर न जाने क्या-क्या माँगता रहता है, उसे कण्ट्रोल करना होगा। अब आपको शरीर से यह कहना होगा कि अब तक हमने तेरी बात मानी, अब तुझे मेरी बात माननी होगी। इस प्रकार प्राण पर नियंत्रण हो जाने पर हम प्राण शरीर के द्वारा एक मैग्नेट पैदा करेंगे, जो इस शरीर में चमत्कार उत्पन्न कर देगा।
मित्रो, हमें अपने मन को भी नियंत्रित करना होगा। उस पर कण्ट्रोल करना होगा। जिस प्रकार रिंग मास्टर चाबुक लेकर अपने जानवरों को कंट्रोल करता है, आपको भी अपने मन को उसी प्रकार कण्ट्रोल करना होगा। आपको अपनी सारी इन्द्रियों को नियंत्रित करना होगा। उनको अपने वश में करना होगा। बेटे, इसी का नाम तप है, जिसे हम आपको बतलाना चाहते हैं। हम आपको तपस्वी बनाने का प्रयत्न करेंगे। अगर आप तपस्वी बन जाएँगे तो इसी जिन्दगी में आप उन सारी चीजों को प्राप्त कर लेंगे जिनकी आपको आवश्यकता है। स्वामी दयानन्द जब अपने गुरु के आदेश पर जनजागरण के लिए निकले तो उनकी वाणी सुनने को कोई तैयार नहीं हुआ। तब वे तप करने चले गये और उसके बाद उनकी वाणी में निखार आया और वे आर्यसमाज के बहुत बड़े प्रवर्तक हुए।
मित्रो, हमारी वाणी में शक्ति है किन्तु वह ऐसे ही नहीं आयी है। हमने भी अपने गुरु के आदेश पर चौबीस साल तक तप किया था। महात्मा आनन्द स्वामी की बातों को लोग मानें, इसलिए उन्होंने भी बरारी में तप किया था। जब गाँव के लोगों को पता लगा कि एक महात्मा तप कर रहे हैं, भजन कर रहे हैं, तो उनके लिए भोजन की व्यवस्था बना दी। वे जब तप करके निकले तो एक विशेष ऊर्जा उन्हें प्राप्त थी। स्वामी दयानन्द ने जहाँ तप किया था, वहाँ तीन नदियाँ आकर मिलती हैं। उस अवधि में उन्होंने केवल एक समय भोजन किया। वे तीन साल तक लगातार तप करते रहे और उसके बाद इतनी शक्ति लेकर आये कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। उन्होंने काफी काम भी किया। आर्यसमाज की जगह-जगह स्थापना की तथा निरन्तर दौरा करते रहे। यह प्राणों की शक्ति थी। हम आपके भीतर भी उसी प्रकार की शक्ति पैदा करना चाहते हैं, जिससे कि आप उभरकर आगे आयें। आप जितना बर्दाश्त कर सकते हैं, हमारा कहना है कि आप उतना ही तपस्वी जीवनयापन करने के लिए तैयार रहें। चांद्रायण व्रत से लेकर जो भी आप कर सकते हैं, उसे अवश्य करें।
साधना में तप-तितिक्षा की अपनी महत्ता है। ब्रह्मवर्चस की साधना के अंतर्गत यह निश्चय आपको करना होगा कि आप अस्वाद व्रत से लेकर क्या-क्या कर सकते हैं तथा अपनी कमजोरियों से किस प्रकार लड़ सकते हैं। तपस्वी जीवन जीने के लिए आप कितनी तप-तितिक्षा कर सकते है? यह निश्चय आपको करना है। आपको यह निश्चय करना है कि इसका स्वरूप कितना बड़ा, छोटा या मध्यम हो सकता है। बच्चों के लिए तप-साधना क्या हो सकती है? ब्रह्मवर्चस् के माध्यम से हम आपको यह सब बतलाने वाले हैं कि पंचकोशी साधना क्या होती है? इसका पंचमुखी गायत्री से क्या संबंध होता है?
हमारे मन के भीतर चमत्कारी शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। मन के अन्दर से अनेकों तरंगें निकलती हैं, जो बाहर आकर फैल जाती हैं। उसे अगर हम नियंत्रित कर लें तो मजा आ जाएगा। तब हम एक प्राणवान व्यक्ति बन सकते हैं। मन शक्ति का पुँज है। अगर उसे नियंत्रित कर लें तो हम सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं। अभी तक हम विज्ञान द्वारा इसके केवल सात प्रतिशत भाग की ही जानकारी प्राप्त कर सके हैं, शेष तिरानबे प्रतिशत की जानकारी प्राप्त करना अभी बाकी है। इसे ‘जादू का पिटारा’ कह सकते हैं। यह हमारा मस्तिष्क भानुमती का पिटारा है। अगर इसके बिखराव को हम नियंत्रित कर सके तो एक बहुत बड़ी शक्ति हम प्राप्त कर सकते हैं। अनेक दिशाओं में भागने वाले मन को अगर हम नियंत्रित कर सके तो हम अंगद, हनुमान तथा भीम की तरह सामर्थ्यवान हो सकते हैं। भगीरथ किस प्रकार अपने मन को नियंत्रित एवं नियोजित करके हिमालय में फैली गंगा को धरती पर लाये थे, यह सभी जानते हैं। वे एक सफल इंजीनियर थे, जो अपने मस्तिष्क को नियंत्रित करके इस प्रकार की योजना को चरितार्थ करने में सफल हुए थे। अनेक दिशाओं में बिखरी अपने मस्तिष्क की शक्ति को अगर हम नियंत्रित कर सके तो हम भगीरथ के तरीके से महान शक्तिशाली बन सकते हैं।
अतः आप अपने मस्तिष्क से बेकार की बातों को निकाल दीजिए, फिर आप वैज्ञानिक, संत, महामानव बन सकते हैं। दूसरी दिशा में यानी निगेटिव दिशा में अगर इसे लगा दें, तो फिर एक नम्बर का डाकू, जेब-कतरा भी बन सकते हैं। सर्कस में लड़कियाँ मन को एकाग्र कर लेती हैं, तो चमत्कार दिखा देती हैं। अगर हम अपने मन के बिखराव को रोक सकें तो वह सारा-का-सारा लाभ प्राप्त कर सकते हैं, जिसकी हमें आवश्यकता है। मस्तिष्क जितना शक्तिशाली यंत्र शरीर में और कोई नहीं है।
वास्तव में उसी मनुष्य का भविष्य अच्छा है, जो एक दिशा में चल सकता है। जिसका लक्ष्य एक हो तथा वह हमेशा उसी की पूर्ति में लगा हुआ हो। द्रौपदी की शादी के समय स्वयंवर रचा गया। स्वयंवर की शर्त के अनुसार मछली की आँख में तीर मारना था। अनेकों को पानी में मछली की पूँछ तथा सिर दिखाई पड़ रहा था। अर्जुन से जब लोगों ने पूछा कि है। उस समय हमारे मस्तिष्क में एक विशेष हलचल होती रहती है। उस वक्त अगर आप हमारे बगल से भी निकल जाएँ तो हमें पता नहीं चलेगा कि आप कब आये और कब चले गये। यही एकाग्रता है, जिसके द्वारा मनुष्य को सफलता मिलती है। एकाग्रता एक दिशा का, एक धारा का नाम है। स्वामी विवेकानन्द जब प्रथम बार अमेरिका गये तब लोगों ने उन्हें ‘जीरो’ अर्थात् शून्य के सम्बन्ध में बोलने के लिए पन्द्रह मिनट का समय दिया। वे पूर्णरूपेण एकाग्रता के साथ इस विषय पर बोलते गये। पन्द्रह मिनट बोलने के बाद पन्द्रह मिनट पुनः उनको बोलने के लिए कहा गया। मित्रो! 'मेडीटेशन' इसी का नाम है। आदमी किसी काम में पूर्ण तन्मयता के साथ यदि जुट जाए तो उसी में सफलता प्राप्त कर सकता है। उसे ऋद्धियाँ सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं।
मित्रो! किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए हमें एकाग्रता के बारे में भी सोचना होगा। अभी हमारा जीवन अस्त-व्यस्त है। अगर हमने अपने जीवन में एकाग्रता का अभ्यास किया होता, तो हमारे जीवन की सारी समस्याओं का हल हो गया होता तथा हम प्रगति के रास्ते पर बढ़ रहे होते। जमीन का भौतिक जीवन में भी कम महत्व नहीं है। नागपुर का संतरा, बंगाल का चन्दन वहाँ के जमीन के हिसाब से महत्व रखता है।
स्थूल का उतना महत्व नहीं, जितना सूक्ष्म का है। गाँधी जी का शरीर बाहर से बहुत कमजोर लगता था, परन्तु उनके अन्दर वाला सूक्ष्मशरीर इतना अधिक मजबूत था कि उसके द्वारा उन्होंने आश्चर्यजनक कार्य कर डाले। अष्टावक्र ऋषि बाहर से देखने में काले-कलूटे एवं टेढ़े-मेढ़े थे, परन्तु उनका भीतर का शरीर इतना महत्वपूर्ण था कि उनके ज्ञान एवं कार्य को देखकर विदेह कहे जानेवाले राजा जनक जैसे विद्वान भी आश्चर्यचकित हो जाते थे।
मित्रो! हम चाहते थे कि आप भी अपने भीतर वाली जमीन अर्थात् शरीर को जगा सकते तो मजा आ जाता। अगर आप इसका विकास नहीं कर सके और मात्र भौतिक शरीर का, भौतिक पदार्थों का ही ध्यान रखेंगे, तो हमें यह कहने में जरा भी संकोच नहीं होगा कि आप कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकेंगे। अगर आप केवल भौतिक शरीर का ही ध्यान रखते हैं, तो हम आपको अध्यात्मवादी नहीं कह सकते हैं। भले ही आप चाहे चालीसा का पाठ करते हैं या रामायण का पाठ करते हैं, उससे हमारा कोई मतलब नहीं है। आप अगर अध्यात्मवादी हैं और आपको अगर कुछ प्राप्त करना है तो आपको अपने भीतर वाले हिस्से को जगाना होगा, क्योंकि मनुष्य की शक्ति-सामर्थ्य ऋषि-तत्व ऋद्धि-सिद्धि जो भी है, वह उसके अन्दर ही है, जिसके लिए मनुष्य को साधनाएँ करनी पड़ती हैं। अन्दर एटम बम की शक्ति भरी पड़ी है, जिसे आपको जगाना और नियोजित करना भर है।
साथियों, मैं यह कह रहा था कि जीवात्मा की शक्ति बहिरंग में नहीं, अन्तरंग में है। वास्तव में हम केवल बाहर की चीजें ही देख पाते हैं। अन्दर की चीजें हम नहीं देख पाते। इस कारण से उसका महत्व हमें नहीं मालूम पड़ता है। अगर हम भीतर की चीजों का पता लगा सकें तथा उसे जाग्रत करने का प्रयास कर सकें, तो हमारे जीवन का कायाकल्प हो सकता है। आध्यात्मिकता का शिक्षण हमने प्रारंभ से देने का प्रयास किया है तथा लोगों को बतलाने का प्रयास किया है कि आप अपने आपको पहचानिए तथा उसके विकास के लिए प्रयास कीजिए। “आत्मा वाऽरेज्ञातव्य श्रोतव्य ध्यातव्य” यही वास्तविकता है। अपने आपको जाने, पहचानो तथा इसे जाग्रत करने का प्रयास करो, ताकि तुम महान हो सको- निहाल हो सको। हमारे भीतर ऋद्धि-सिद्धियों का, शक्तियों का जखीरा भरा है, उसके बारे में अगर जान सके तो मजा आ जाएगा।
मित्रो! हमने सुना है कि कोशिकाओं के भीतर ‘जीन्स’ होते हैं, जो शरीर निर्माण से लेकर मनुष्य की सारी गतिविधियों का नियंत्रण-संचालन करते हैं और उसे निहाल कर देते हैं। आत्मा भी अन्तरंग वाला ‘जीन’ है, जो जाग्रत हो जाने पर आदमी को निहाल कर देता है। हमारा ऊपर वाला शरीर जो हमें दिखाई पड़ता है, वह हमारा स्थूलशरीर है। जिस प्रकार हम कपड़ा पहने हुए हैं, ठीक उसी प्रकार इस काया आपको क्या दिखलाई पड़ रहा है? उसने कहा कि मछली की आँख एवं तीर की नोंक। अंत में विजयी अर्जुन ही हुए।
मित्रो, जिनके जीवन का एक लक्ष्य होता है, सफलता उनको ही प्राप्त होती है। एकाग्रता सबसे बड़ी चीज है। वैज्ञानिक की एक दिशा होती है, एक लक्ष्य होता है। जब हम लेख लिखते हैं तो हमारी एकाग्रता होती का जो ऊपरी स्वरूप है, वह स्थूलशरीर है। हम बाकी शरीरों के बारे में जानते हैं या नहीं, यह नहीं कह सकते, परन्तु सूक्ष्मशरीर के बारे में यह जानते हैं कि यह सपने के समय बाहर आ जाता है। इस तरह हम अंदाजा लगा लेते हैं कि हमारे अन्दर बहुत बड़ी शक्ति है, जो हमारे शरीर से बाहर निकल जाती है और इस प्रकार का सपना दिखा जाती है।
सूक्ष्मशरीर को देखा नहीं जा सकता है। जिस तरह से हम बिजली को नहीं देख सकते हैं, उसी तरह से हमारे दिमाग में विद्यमान अदृश्य इलेक्ट्रिसिटी का महत्व कम नहीं है। इसी प्रकार पाँच प्राणों से बना हुआ हमारा सूक्ष्मशरीर भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अपना स्थूलशरीर जो हमें बाहर से दिखाई देता है और जो खाता-पीता है, टट्टी-पेशाब करता है, राग-द्वेष करता है, उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि सूक्ष्मशरीर। अगर हम अन्दर वाले इस शरीर को विकसित कर लें तो हम शक्तिशाली हो सकते हैं। यह मनुष्य का भीतर वाला माद्दा है, जो अध्यात्म का बहुत ही महत्वपूर्ण माद्दा है, हिस्सा है। यही संसार को प्रभावित करता है और चमत्कार दिखलाता है। इसे हम 'सूक्ष्मशरीर' कहते हैं। यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। एक हमारी फिजिकल बॉडी है, जो हमें बाहर से दिखलाई पड़ती है, जिसे हम स्थूलशरीर कहते हैं। उसके बाद हमारा सूक्ष्मशरीर है, जो बहुत ही शक्तिशाली एवं महत्वपूर्ण है।
अगर हम अपने खानदान के बारे में जान लें तो हमें अपने बारे में पूरी जानकारी मिल जाती है। उसी प्रकार हमारे अन्दर एक से बढ़कर एक शक्तिशाली शरीर भरा पड़ा है, कोष भरे पड़े हैं, जखीरा भरा पड़ा है। अगर उसे हम जान सके तो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति बन सकते हैं। वास्तव में मनुष्य को इसी वास्तविक सम्पदा के बारे में जानकारी होनी चाहिए। हम जो पाँच देवताओं की उपासना करते हैं, वह वस्तुतः अपने भीतर की, व्यक्तित्व के विकास की उपासना है। हमें न तो भगवान के सामने नाक रगड़ने की आवश्यकता है और न पूजा करने की आवश्यकता है। बिजली के बारे में जिनको जानकारी होती है वे घर में बैठे रहकर उसके बटन दबाते रहते हैं, जिससे घर के पंखे चलते रहते हैं, बल्ब जलते रहते हैं। अतः उस बिजली के बारे में भी आपको सही जानकारी होनी चाहिए।
मित्रो! आपको हम यह बतलाना चाहते हैं कि हम भगवान की उपासना छोड़कर अगर अपने व्यक्तित्व का विकास करने का प्रयास करें, अपने आप का सुधार करने का प्रयास करें तो यह जीवन स्वर्गमय हो सकता है तथा हम सारी चीजें प्राप्त कर सकते हैं। उस परिस्थिति में मनुष्य देवता बन जाता है, पैगम्बर बन जाता है। यह कार्य अपने आपको परिष्कृत करने से ही संभव होता है। अध्यात्म खुशामद करने का, नाक रगड़ने का नाम नहीं है। वास्तव में इसके लिए मनुष्य को तपाने की आवश्यकता है। तपाने से सोना तथा लोहा साफ हो जाता है। तपाने से पानी स्टीम-भाप बन जाता है। आप को भी तप करने की आवश्यकता है, इसके लिए आपको छोटे-छोटे सिद्धान्तों का परिपालन करने, अभ्यास में उतारने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, अस्वाद व्रत रखने का प्रयास करें। आप नमक एवं शक्कर का त्याग करें। अगर जीभ पर कण्ट्रोल कर लिया तो आप सब चीजें प्राप्त कर सकते हैं। यह बहुत ही खराब है, सबको परेशान करती है। जीभ पर कण्ट्रोल करना स्वास्थ्य के लिए भी हितकर है।
इसी तरह वाणी पर संयम रखें। बोलने से पहले यह सोचें कि हम जो कुछ बोलने जा रहे हैं, सामने वाले पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा। आपको इसके लिए मौन धारण करने की आवश्यकता है। कम-से-कम प्रतिदिन दो घंटे के लिए मौन रहने का प्रयास करें। आप इसे सुबह या शाम ही रखें, पर रखें अवश्य। इससे वाणी में तेजस्विता आती है। वाक्युद्ध न हो, इसके लिए भी मौन व्रत का पालन करने की आवश्यकता है। आहार का भी संयम होना चाहिए और वाणी का भी।
वाणी-संयम के साथ अन्य इंद्रिय-संयम भी जुड़े हुए हैं। इसके लिए ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। वस्तुतः इसका खण्डन मनुष्य के विचारों के कारण होता है। मन में अगर कुविचार आ रहे हैं, तो उसके विपरीत उलटे विचार करना शुरू कर दें। अगर कामवासना के विचार आते तो भीष्म पितामह, हनुमान आदि को याद करें। उनकी कहानी पढ़ें। इस प्रकार सकारात्मक चिन्तन से अपने विचारों को बदला जा सकता है। बुरे विचारों को बदला जा सकता है। बुरे विचारों को हटाकर उसके स्थान पर दूसरे सुन्दर विचारों को अपने मन में स्थान दीजिए। इस प्रकार पवित्र-निर्मल बनकर उस महान शक्ति को अपव्यय होने से रोकें, जो कि जीवन की एक महत्वपूर्ण शक्ति है। ब्रह्मचर्य एक महान तप है।
पैसों का अपव्यय न करें। आप जो पैसा खर्च करते हैं, उसको बड़े ही संयमी भाव से खर्च करें। खर्च करने से पहले हजार बार सोचें कि क्या इस चीज की वास्तव में आवश्यकता है या नहीं? क्या इसके बिना काम नहीं चल सकता? इस तरह पैसे पर नियंत्रण रखा जा सकता है और अपव्यय से भी बचा जा सकता है।
समय का संयम सबसे महत्वपूर्ण तप है। इस संसार में जो भी महापुरुष हुए हैं, उन्होंने अपने समय को, काल को पाटी से बाँधकर रखा था। आप टाइम टेबल बनाकर काम करें। अपने विचारों को कण्ट्रोल करना सीखें। इस संसार में जो भी व्यक्ति सफल हुए हैं, उन्होंने अपने विचारों को नियंत्रित रखा है। जिस काम को करना अनिवार्य है, उसे अवश्य पूरा करें। इससे भी आपको लाभ ही होगा।
इस प्रकार की छोटी-छोटी तप-साधना ब्रह्मवर्चस् की साधना, प्रज्ञायोग की साधना के द्वारा आप अपने विचारों को, अपने अंतरंग को अधिक शुद्ध एवं पवित्र बना सकते हैं तथा जीवन के- प्रगति के सोपान को पार कर सकते हैं। आज की बात समाप्त।॥ ( शान्तिः॥
मनुष्य जीवन का यदि कोई दर्शन न हो, उसके साथ आस्थाएँ, मान्यताएँ और किन्हीं सिद्धान्तों का समावेश न हो, तो वह एक जानवर मात्र रह जाता है।
- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
स्वामी विरजानन्द अपनी कुटिया में ध्यानस्थ थे। इसी बीच बाहर आहट हुई। मूलशंकर (बाद में स्वामी दयानन्द) बाहर खड़े थे। अन्दर से आवाज आई-कौन है? बाहर से उत्तर था-मैं कौन हूँ, यही तो जानने आया हूँ। विरजानन्द ने कहा-आओ! कब से तेरा इन्तजार था। प्रज्ञाचक्षु संपन्न गुरु ने ऐसे जिज्ञासु साधक को अन्दर बुला लिया और यही वह पल था जब स्वामी दयानन्द का जन्म हुआ। गुरु ने उनकी हर तरह से परीक्षा ली, आत्मबोध कराया और फिर निर्देश दिया कि समाज में व्याप्त अनाचार, कुरीतियों, धर्म के नाम पर छाये आडम्बरों को मिटाने अकेले निकल जाओ। गुरु की शक्ति लेकर शिष्य चल पड़ा और धीरे-धीरे दयानन्द सारे समाज पर छा गए।
सगर वंश में जन्मे भगीरथ ने जब पितरों को नरक की अग्नि में जलते देखा तो बहुत दुखी हुए। परित्राण हेतु उन्होंने तप किया- स्वार्थसिद्धि के लिए नहीं, परमार्थ-प्रयोजन के लिए। अगणित विघ्न-बाधाओं का सामना करते हुए चिरकाल तक उन्होंने अपनी साधना जारी रखी। कालान्तर में यह पुरुषार्थ सफल हुआ और स्वर्ग में रहने वाली गंगा पृथ्वी पर आने को सहमत हो गयीं। अपने तप से उन्होंने वह कठिन कार्य सम्भव बना दिया।
अज्ञानग्रस्त संसार में स्वर्गीय ज्ञानगंगा का अवतरण, अनाचार-अविवेक के दावानल में जलते अगणित मानवपुत्रों का उद्धार ऐसे ही पुरुषार्थी साधकों द्वारा सम्भव हो पाता है।
गोपियों ने एक बार बाँसुरी से पूछा- सुभगे! तुम्हें कृष्ण स्वयं हर समय होठों से लगाये रहते हैं और हम सब उनकी कृपा पाने के लिए बहुत प्रयत्न करते हैं, परन्तु सफल नहीं होते, जबकि तुम बिना प्रयत्न किये ही उनके अधरों पर रहती हो।
बिना प्रयत्न किये नहीं गोपियों! मुरली बोली-मैंने भी प्रयत्न किया है। जानती हो मुझे मुरली बनने के लिए अपना मूल अस्तित्व ही खो देना पड़ा है।
गोपियों को तब समझ में आई। बाँसुरी अपने आप में खाली थी। उसमें स्वयं का कोई स्वर नहीं गूँजता था, बजाने वाले के ही स्वर बोलते थे। बाँसुरी को देखकर कोई यह नहीं कह सकता था कि यह कभी बाँस रह चुकी है, क्योंकि न तो उसके कोई गाँठ थी और न कोई अवरोध। गोपियों को भगवान का प्यार पाने का अनूठा सूत्र मिल गया था।
माघ का महीना, शुक्लपक्ष की पंचमी, दिन शुक्रवार। वसन्त जीवन और जगत के कण-कण में अपनी अलौकिक चेतनता का संचार कर रहा था। वह भी अपने कक्ष में साधनारत था। ब्रह्ममुहूर्त में उसकी आत्मचेतना-ब्राह्मीचेतना की ओर उन्मुख थी। परमपूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों की भक्ति के प्रभाव से उसकी समस्त भ्रान्ति नष्ट हो गयी और उसके चैतन्य में सर्वमयता स्थिर हो गई। जो बाहर हो रहा था, वह भीतर होता हुआ प्रतीत होने लगा। अहम् और इदम् के मध्य जो आच्छादन था, दूर हो गया। साधक के कण-प्रतिकण में, अणु-परमाणु में जो अव्यक्त नाद है, वह सुनायी पड़ने लगा।
वह अपनी अन्तःचेतना में इस वसन्त पंचमी की विशिष्टता और अनूठेपन को अनुभव कर रहा था। उसे वह वसन्त भी स्मरण था, जब उसकी चेतना के तन्तु युग प्रत्यावर्तन करने वाली महाशक्ति से जुड़े थे। आज से तेरह वर्ष पूर्व के वे क्षण भी अविस्मरणीय एवं अद्भुत थे। दैवी चेतना साकार रूप से सक्रिय थी। महेश्वर महाकाल अपनी अभिन्न शक्ति देवी भगवती के साथ युग-परिवर्तन के सरंजाम जुटा रहे थे। उसने इन दोनों का स्थूल सान्निध्य और साहचर्य पाया था। इन तेरह वर्षों में घटनाक्रमों न अपने अनेक रूप बदले-नए-नए रंग दिखाए, परीक्षा के अनेकों उपक्रम हुए पर वह अविचलित रहा। तेरह वर्षों में वह स्वयं भी अनेक तरह से पूजा-उपासना साधना तथा आराधना में लीन रहा। यह सब मन तथा हृदय को अच्छा भी लगता रहा, परन्तु ऐसी मनःस्थिति कभी नहीं बन पायी, जैसी कि आप बनी।
समर्पण की गहराइयों में ध्यान स्वयं ही सघन और स्वयं प्रकाशित हो उठता है। उसकी चेतना भी कुछ ऐसी ही अनुभूति में निमग्न हो रही थी। उसकी चेतना में पर्वत ऊपर उठने लगे, तुषार से ढके श्रृंग उसके चिदाकाश में सभाएँ करते, उनसे हिम पिघल-पिघल कर नदी-नालों झरनों और हिमनदों में परिवर्तित होता। ध्यान की इन गहराइयों में उसे काल की प्रत्येक धड़कन साफ सुनायी पड़ने लगी।
तभी उसने आज्ञाचक्र से दृष्टि संधान कर अपनी गुरुचेतना के सम्मुख उपस्थित हो अपनी वेदना निवेदित करने का निश्चय किया। इस संकल्प के उदय होते ही अन्तर्दृष्टि के सामने दृश्य परिवर्तित होने लगा। सृष्टि की रहस्यमयी प्रक्रियाओं के आभास अब मन्द पड़ने लगे और स्पष्ट होने लगे शुभ्र-धवल दुर्गम हिम शिखर। इन हिमशिखरों के मध्य उसने देवों एवं ऋषियों से वन्दित गुरुदेव एवं माताजी के युगल रूप को देखा। प्रणाम निवेदित करते हुए उसकी आत्मा में ऋषियुग्म की चेतना झंकृत हो उठी- मैं सर्वदा तुम्हारे पास हूँ। जब तुम्हारे पापों के जाल तुम्हें कसने लगें तथा गहन अंधकार में कष्ट पा रहे हों, तब यह ध्यान रखो कि वहाँ भी मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे महापराधों के कष्टों को भोगने में सहभागी हूँ। तुम्हारी अन्तरात्मा के कार्यों को भली-भाँति जानने के कारण मैं तुम्हारी अन्तरात्मा के सम्बन्ध में सजग हूँ। मैं जो सर्वव्यापी हूँ, उससे तुम कुछ भी नहीं छिपा सकते, अपने गोपनीय विचारों का अत्यल्प अंश भी नहीं। मैं तुममें हूँ।
आओ आज महापर्व वसन्त के पुण्य क्षणों में मेरे हृदय से अपना हृदय मिला लो, उसे अपना बना लो। तब सब ठीक हो जाएगा। तुम्हारे हृदय-गुहा की छाया और शान्ति में हम दोनों का निवास है। अब जाओ संसार में रहते हुए उस कर्तव्य के प्रति समर्पित हो जाओ, जो मैंने तुम्हें सौंपा है। मेरी वाणी का इतना प्रचार करो जितना व्यापक कि आत्मा है। हम दोनों का समन्वित प्रेम तथा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है। जब ये शब्द समाप्त हुए, तब उसने समझ लिया कि यही उसके लिए परमपूज्य गुरुदेव का वसन्त पंचमी पर दिया गया दिव्य संदेश था, जिसने उसके सभी पापों को धो दिया। उसकी अन्तर्दृष्टि के सामने माताजी अपनी मन्द मुसकान और आँसू भरे नेत्रों के साथ सामने थी। मानो वे कह रही थीं- मेरे वात्सल्य भरे आँचल की छाया सदा सर्वदा तुम्हारे सिर पर है। मैं गुरुदेव से अलग नहीं हूँ। उनकी बातों को ही तू मेरी बातें मान।
साधना से उठने के बाद भी उस साधक की भावदशा बड़ी विलक्षण बनी रही। अब तो जैसे गुरुकार्य ही उसके जीवन का ध्येय था।
मानवी काया में वास करने वाले व्यक्ति सन्त, सुधारक और शहीद नाम से जाने जाते हैं। सन्त अपनी सज्जनता से मानव जीवन के सदुपयोग का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। सुधारकों को जनजीवन पर छाये भ्रष्ट चिन्तन व दुष्टाचरण के साथ जूझने का प्रबल पराक्रम करना होता है। शहीद का अर्थ है- ‘स्व’ का ‘पर’ के लिये समग्र समर्पण। इसे ही समर्पण-शरणागति कहते हैं। स्वार्थ का परमार्थ में उत्सर्ग करने से तात्पर्य है-लोभ-व्यामोह और अह के बन्धनों को काट फेंकना, दायरा व्यापक बनाकर लोक प्रवाह से अलग स्वयं को धर्म-संस्कृति के पुनरुद्धार हेतु नियोजित कर देना।
-परमपूज्य गुरुदेव
वसन्त पर्व अब मात्र अखण्ड ज्योति परिवार ही नहीं, समग्र विश्व गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए प्रकाश-पर्व प्रेरणा-पर्व बन गया है। इसे न केवल मिशन के सूत्र-संचालक का, उनकी बहुमुखी जनकल्याणकारी प्रवृत्तियों का जन्मदिन माना जाता रहा व उसी दृष्टि से मनाया जाता रहा है, बल्कि इस परिवार का प्रत्येक घटक अपने भावनात्मक उत्कर्ष का अभिनव पर्व भी इसे मानता और मनाता है। इस वर्ष का वसन्त पर्व भी ऐसी ही ऐतिहासिक वेला में सारे भारत व विश्व में मनाया गया। युगान्तरकारी दिव्य प्रेरणाएँ जिस दिन धरती पर बरसती हैं, उसके विषय में परिवार के संस्थापक-कुलपति आज से
हर नैष्ठिक साधक-संगठन को व्यक्तिगत दायित्वों का वितरण तीस वर्ष पूर्व अपनी लेखनी से अपनों से अपनी बात के क्रम में लिख गए थे कि यह युगपरिवर्तन के स्वरूप को स्पष्ट करने वाला ऐतिहासिक वसन्त होगा। मात्र संयोग ही नहीं है कि 1969 में भी 22 जनवरी को वसन्त पंचमी थी व 1999 की इस संधिवेला में भी 22 जनवरी को ही वसन्त पर्व आया। दृष्टा स्तर की अवतारी सत्ताएँ भविष्य के गर्भ में झाँक कर पूर्व से ही वे सभी घोषणाएँ कर जाती हैं, जिनकी प्रतीक्षा सारा संसार कर रहा होता है। उस समय संभवतः कई परिजन इस घोषणा को समझ नहीं पाए होंगे, किंतु अब क्रमशः सभी को सभी कुछ स्पष्ट दृष्टिगोचर होता चला जा रहा है। सतयुग की संभावना अब कोरी कल्पना नहीं समझी जा रही, वरन् नवनिर्माण के बहुमुखी प्रयास जिस तेजी से अग्रगामी हो रहे हैं, उन्हें देखते हुए यह माना जा रहा है कि धरती पर स्वर्ग का अवतरण और मनुष्य में देवत्व का उदय अगले दिनों एक मूर्तिमान् तथ्य बनकर प्रस्तुत होगा।
प्रस्तुत वसन्त पर्व से अखिल विश्व गायत्री परिवार के द्वारा प्रखर साधना वर्ष की शुरुआत की गयी है। 22 जनवरी, 1999 से आरंभ हुआ यह उपक्रम 10 फरवरी, 2000(वसंत पंचमी) तक चलता रहेगा। इस वसन्त की ही पावन वेला में एक साथ प्रायः चौबीस हजार स्थानों से एक साथ अखण्ड गायत्री जप-उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना का शुभारम्भ होना अपने आप में एक इतनी युग परिवर्तनकारी घटना है, जिसके परिणाम आने वाले दो वर्षों में सभी परिजन अपने उन्हीं चर्मचक्षुओं से देख सकेंगे। ढाई दिवसीय अखण्ड जप प्रधान साधनात्मक आयोजनों की श्रृंखला इस वसन्त से सारे भारत व विश्व के सभी केन्द्रों से आरंभ हो गयी। इसी के विषय में साधना प्रशिक्षण हेतु प्रायः 48 स्थानों का चयन कर यह प्रक्रिया एक दिसंबर, 1998 से आरंभ की गयी थी। विराट गायत्री परिवार रूपी संगठन की साधना की धुरी पर स्थापना हेतु एक अभूतपूर्व पुरुषार्थ इस प्रकार प्रायः एक लाख संकल्पित कार्यकर्ताओं के शिक्षण के रूप में वसंत की पूर्व वेला तक संपन्न हो चुका है। प्रायः पचास से अधिक स्थानों पर यह प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न हुआ है एवं औसतन भागीदारी प्रत्येक स्थान पर दो से तीन हजार संकल्पित समयदानी साधक स्तर के नैष्ठिकों की रही है। इस प्रकार इस विराट मंथन से प्रायः एक लाख से अधिक साधक-संगठन-कर्ताओं के माध्यम से साधना वर्ष का शुभारम्भ होना युगसंधि महापुरश्चरण के अंतिम चरण की एक महत्वपूर्ण घटना कही जा सकती है। एक प्रकार से यह नवयुग की गंगोत्री द्वारा संगठन के निमित्त हर नैष्ठिक कार्यकर्ता को विकेन्द्रित कर दी गयी व्यक्तिगत जिम्मेदारी है, जिसे उसे साधनात्मक स्तर पर अपने निजी जीवन में व आराधनात्मक स्तर पर समाज परिकर में संपन्न करना है।
परमपूज्य गुरुदेव का कथन था कि चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस वर्ष के चौबीस महापुरश्चरणों का उनका तप तो एक जमा पूँजी के रूप में ‘फिक्स्डडिपॉजिट’ की तरह सुरक्षित रखा है। इसे उनकी सूक्ष्म व कारण सत्ता द्वारा युगपरिवर्तन के निमित्त ही नियोजित किया जाना है। घर में बड़ों को चिन्ता रहती है, अतः बचत करते रहते हैं व संतानों के लिए सुरक्षित निधि रख जाते हैं। यही बच्चों के विवाह, बन रहे निर्माणों आदि में काम आती है। लगभग उसी स्तर की चिंता इस परिवार के कुलपति, संरक्षक, अभिभावक परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी को रही होगी। इसी कारण वे अपने जप की जमा-पूँजी का तप अभी तक सुरक्षित रख उसका पुण्य युग-परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण व भारी जिम्मेदारी वाले कार्य हेतु नियोजित कर गए। शाँतिकुँज-गायत्री तपोभूमि के निर्माणों से लेकर सारे भारत व विश्व में फैले विराट विश्व गायत्री परिवार का जो विस्तार है, वह तो गुरुसत्ता के दैनन्दिन तप एवं उनके द्वारा आरंभ किये गए साधना महापुरश्चरणों की ऊर्जा का प्रतिफल ही कहा जा सकता है। जब गोवर्धन उठाया जा रहा था, तब भी श्रीकृष्ण ने सभी ग्वाल-बालों की लाठी अपनी छोटी उँगली के साथ-साथ लगवायी थी। सभी समझ रहे थे कि गोवर्धन उनकी लाठी पर टिका है, किंतु उन्हें कृष्ण-कन्हैया ने अहसास करा दिया कि यह वस्तुतः टिका भागवत् संकल्प पर ही है, वे तो मात्र श्रेय के अधिकारी बन रहे हैं। ठीक इसी तरह प्रस्तुत पुरुषार्थ में हम सबको साधक स्तर की वरीयता दिलाने हेतु, सुपात्र बनाने, श्रेय दिलाने यह भागवत् मुहूर्त आया है। युग-परिवर्तन का कार्य तो महाभारत में कौरवों को मारने की तरह भगवान श्रीकृष्ण ने पहले ही संपन्न कर दिया है- जो भी कुछ निर्माण होना है- उसके लिए विराट तप का पुण्य पूर्व से ही नियोजित है, हमें तो मात्र श्रेय भर लेना है। यदि इसमें भी कृपणता बरत गए तो फिर हमसे बड़ा अभागा कोई नहीं होगा।
परमपूज्य गुरुदेव ने अखण्ड ज्योति जुलाई 1989 में लिखा है- “मनुष्य की अपनी विचारणा, क्षमता, लगन, हिम्मत, उमंग और पुरुषार्थ परायणता की महत्ता भी कम नहीं। इन मानसिक विभूतियों के जुड़ जाने पर उसकी सामान्य दीखने वाली क्रिया-प्रक्रिया भी असामान्य स्तर की बन जाती है और दैवी विभूतियों के समकक्ष कार्य करने लगती है। फिर भी उनकी समय-सीमा निर्धारित है और सफलता का भी एक मापदण्ड है। किंतु यदि अदृश्य प्रगति प्रवाह की इच्छाशक्ति उसके साथ जुड़ जाय तो परिवर्तन इतनी तेजी के साथ होता है कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। सहस्राब्दियों में बन पड़ने वाले काम दशाब्दियों में, वर्षों-महीनों में सम्पन्न होने लगते हैं। यह अदृश्य उपक्रम अनायास ही नहीं, किसी विशेष योजना एवं प्रेरणा के अंतर्गत होता है। उसके पीछे अव्यवस्था को हटाकर व्यवस्था बनाने का लक्ष्य ही सन्निहित रहता है।”
वे आगे लिखते हैं-इक्कीसवीं सदी की शुभ संभावनाएँ हरी दूब की तरह अपनी उगती पत्तियों में दीख पड़ने के स्तर तक पहुँच रही हैं। प्रतिभा परिष्कार की सामयिक आवश्यकता लोगों द्वारा स्वेच्छापूर्वक अपनाये जाने में आनाकानी करने पर भी वसन्त ऋतु के पुष्प-पल्लवों की तरह अनायास ही अपने वैभव का परिचय देती दीखती है। भगीरथ की, सप्तऋषियों की, बुद्ध, शंकर, दयानन्द, विवेकानन्द, गाँधी, विनोबा की कथाएँ अब कभी प्रत्यक्ष बनकर सामने आ सकेंगी या नहीं, इस शंका-आशंका से ग्रसित होते हुए भी नियति की परिवर्तन-प्रत्यावर्तन की क्षमता का समापन हो जाने जैसा विश्वास नहीं किया जा सकता।
इसमें ज्वार-भाटों के उतार-चढ़ाव अपने कीर्तिमान स्थापित करने के लिए आतुर हो रहे हैं। इस पर अविश्वासियों को भी विश्वास करने हेतु बाधित होना पड़ेगा। प्रत्यक्ष को असंभव मानते रहने की हठधर्मिता कितने दिन टिक सकेगी?” (अखण्ड ज्योति जुलाई, 1989 पृ. 58-59)
ऊपर वर्णित पंक्तियाँ स्वयं सब कुछ स्पष्ट कह रही है। हम आज जिस स्थिति में आ खड़े हुए हैं, यह विश्व-वसुधा के भाग्य को नए सिरे से लिखे जाने की घड़ी कही जा सकती है। ऐसे में कोई भी पाठक-परिजन यदि इस सुयोग से वंचित रहे तो उसे एक विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। स्वयं को एक श्रेष्ठ साधक के रूप में विनिर्मित कर अपनी संगठन क्षमता का संवर्द्धन कर अधिक-से-अधिक व्यक्तियों को युगसाधना से जोड़ना इस समय का महानतम युगधर्म कहा जा सकता है। ऐसे विषम समय में और सभी कार्य एक तरफ रख मात्र महाकाल की इच्छानुसार ही अपनी इच्छा-आकांक्षाओं का नियोजन किया जाना चाहिए। यह समय जीवन-साधना द्वारा अपनी आत्मशक्ति को बढ़ाने हेतु तो नियोजित होना ही चाहिए। अपने साथ अधिक-से-अधिक परिजनों को सुरक्षा महाकवच के नीचे लेने हेतु लगना चाहिए। युगशक्ति के प्रवाह से जुड़े रहने की योगसाधना व शक्ति प्रवाह को सार्थक उद्देश्यों में नियोजित करते रहने की तप साधना हम सबको सतत् करते रहना चाहिए। प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में वरिष्ठ स्तर के सभी साधकों की 11 माला गायत्री जप अथवा प्रातः-मध्याह्न-सायं तीनों समय में न्यूनतम पंद्रह-पंद्रह मिनट की त्रिकाल संध्या करते रहने की, पूज्यवर की चेतना से सहभागिता करने का उपक्रम इस वेला में विशिष्ट शक्ति का संचार करेगा। यदि इतना संभव न बन पड़े तो प्रातः आधा घंटा व सायं आधा घण्टा जप, उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना, सविता देवता या हिमालय की चेतना का ध्यान एवं पंद्रह मिनट से आधा घण्टा नियमित प्रतिदिन स्वाध्याय यह अवश्य करना चाहिए। जप व ध्यान के साथ मिलन प्राणायाम द्वारा विश्वप्राण के साथ एकात्म होने के भाव का क्रम भी रोज चलाया जा सकता है। (कृपया विस्तार हेतु ‘प्रज्ञा अभियान’ पाक्षिक दिनाँक 16 जनवरी, 1999 का पृष्ठ 2 देखें)
ऊपर शाँतिकुँज द्वारा घोषित साधना वर्ष हेतु विशिष्ट पुरुषार्थ उनके लिए बताया गया है, जिन्हें संगठनकर्ता-युगसृजेता-युगनायक जैसे गंभीर दायित्व अपने कंधों पर अगले दिनों लेने हैं। भारत में शहरों-कस्बों के मुहल्ले मिलाकर प्रायः 7 लाख गाँव हैं। यदि एक-एक सृजन सैनिक सात-सात की जिम्मेदारी ऊपर लेकर न्यूनतम दस अपने सहयोगी साधक तैयार करता है, तो पूरे भारत के चप्पे-चप्पे को गायत्रीमय-साधनासिद्धि बनाया जा सकता है। सृजन सैनिक जिनने कुछ विशिष्ट कर दिखाने का दायित्व अपने ऊपर लिया है- अब इस पुरुषार्थ को संपन्न करने हेतु तत्पर हो जाएँ तो इस प्रखर साधना वर्ष में वह सब स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगेगा जिसे सतयुग-नवयुग की प्रथम किरण के नाम से युगऋषि ने संबोधित किया।
महाकाल की हुंकारें जो दिशाओं को प्रतिध्वनित कर रही हैं, उन्हें अनसुना कैसे किया जाय? युगचेतना के प्रभात पर्व पर उदीयमान सविता के आलोक को किस प्रकार भुलाया जाय? युग-अवतरण की संभावना गंगावतरण क तरह अद्भुत तो है, पर साथ ही इस तथ्य से भी इनकार कैसे किया जाय कि जो कभी चरितार्थ हो चुका है, वह फिर अपनी पुनरावृत्ति करने में असमर्थ ही रह जाएगा? युग-संधि की वर्तमान वेला ऐसी ही उथल-पुथल से भरी हुई है।
युगसंधि महापुरश्चरण आज से प्रायः साढ़े दस वर्ष पूर्व आश्विन नवरात्रि की वेला में जब एक बारह वर्षीय अनुष्ठान के रूप में आरंभ हुआ था, तब सत्र संचालक सत्ता ने एक लाख सृजनशिल्पी मानवता के चरणों पर अर्पित करने का संकल्प लिया था। इस निमित्त यह निर्देश दिया गया था कि प्राणवान परिजन इस अवधि में वर्ष में न्यूनतम एक बार शाँतिकुँज आकर नौ दिवसीय सत्रों में भागीदारी करें-आवश्यक ऊर्जा अनुदान लेकर कार्यक्षेत्र में लौटें। परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा था कि जले हुए दीपक ही दूसरों को जला पाने में समर्थ हो सकते हैं। इसके लिए अनिवार्य है कि साधना रूपी घृत की नियमित रूप से पूर्ति होती रहे। यह क्रम तब से नियमित चलता रहा है। इस बीच देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत साधना-पुरुषार्थ और प्रखर हुआ- एक अर्द्ध महापूर्णाहुति आँवलखेड़ा (आगरा) में सम्पन्न हुई और अब द्वितीय अंतिम महापूर्णाहुति की वेला आ पहुँची। अब तो बचे हुए समय का, विशेषकर इस प्रखर साधना वर्ष का एक-एक क्षण मूल्यवान है।
इस प्रखर साधना वर्ष में वर्ष भर सारे भारतवर्ष व विश्व के सत्तर देशों की प्रायः एक हजार शाखाओं में ढाई दिवसीय साधना आयोजनों की श्रृंखला चलेगी। जब सारी विश्ववसुधा का चप्पा-चप्पा साधना की शक्ति से स्पन्दित हो रहा हो तो नवयुग की गंगोत्री का पुरुषार्थ तो और भी विशिष्ट होना चाहिए, जहाँ से सारा चिन्तन-मार्गदर्शन-राष्ट्रव्यापी संगठनात्मक पुनर्गठन का सूत्र-संचालन-नियमन चल रहा हो, वहाँ तो यह प्रक्रिया और अधिक गतिशील-सक्रिय-जीवन्त नजर आनी चाहिए। इस वर्ष के शिविरों में शाँतिकुँज में आने वाले परिजनों को कुछ विशिष्ट उपलब्धि होनी चाहिए एवं यह विशिष्ट साधनात्मक ऊर्जा के परिमाण में हो, यही अभी की, समय की सबसे बड़ी माँग है।
इस वर्ष 21 जनवरी (वसंत पंचमी की पूर्व संध्या) से ही शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ, जहाँ नित्य चौबीस करोड़ गायत्री मंत्र का जाप सतत् चलता रहा है, में प्रातः की आरती 5:30 से शाम की आरती 5:30 तक अखण्ड जप का शुभारंभ कर दिया गया है। यहाँ रहने वाले साधक-कार्यकर्ताओं से लेकर क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं तक- सभी के लिए इसमें न्यूनाधिक भागीदारी अनिवार्य कर दी गयी है। युगऋषि की अंतिम बीस वर्षों में रही कार्यस्थली विश्वामित्र ऋषि की तपःस्थली-गंगा की गोद, हिमालय की छाया में स्थित इस सिद्धपीठ गायत्रीतीर्थ
संधिवेला में विशिष्ट साधना सत्रों की श्रृंखला चलेगी
में इस अखण्ड जप में प्रतिदिन मात्र एक घण्टा जप कर लेना भी इतनी कुछ शक्ति देगा जो नौ दिवसीय गायत्री अनुष्ठान के समकक्ष ठहरे। इसी के साथ प्रातः के आधा घंटा उगते सूर्य के ध्यान के साथ परमपूज्य गुरुदेव के निर्देशों के साथ भाव-विभोर हो जाप, मध्याह्न संध्या में पंद्रह मिनट (पौने दे से दो तक) ज्योति अवतरण की साधना तथा शाम को पंद्रह मिनट (छह से सवा छह) नादयोग की साधना पहले की तरह और भी प्रखर-परिमार्जित रूप में संपन्न होती रहेगी। इस अवधि में वर्ष भर गुरुवार का आँशिक व्रत भी सामूहिक तप के रूप में गायत्रीतीर्थ में चलेगा, जिसमें साधक मात्र एक समय आहार लेंगे। सत्रों में भी प्रतिदिन एक समय मात्र अमृताशन का क्रम चलेगा। यह प्रक्रिया अभी तो इस वसन्त से आगामी वसन्त तक के लिए निर्धारित की गयी है, किंतु यह क्रम 2001 के वसंत 29 जनवरी तक भी चल सकता है।
कुम्हार अपने कच्चे बर्तनों को सुखाकर एकत्र करता और आवे में एक साथ पकाता है। इसी प्रक्रिया का स्वरूप शाँतिकुँज की शिविर व्यवस्था में किये गए इस परिमार्जन-परिशोधन में देखा जा सकता है। यह प्रक्रिया युगपरिवर्तन के, नवसृजन के परिप्रेक्ष्य में और तीव्र गति पकड़े, इसीलिए यह क्रम यहाँ आरंभ किया गया है।
फरवरी माह में सत्रों का क्रम यथावत 1 से 9, 11 से 19 व 21 से 28 तारीखों में चलता रहेगा। मार्च माह में भी 1 से 9, 11 से 19 व 18 से 25- अंतिम चैत्र नवरात्रि का विशिष्ट सत्र, इस प्रकार तीन सत्र चलेंगे। किंतु इसके तुरंत बाद 27 मार्च से पाँच दिवसीय सत्रों की श्रृंखला आरंभ हो जाएगी, जो गुरुपूर्णिमा 28 जुलाई के समापन तक चलती रहेगी। अधिक-से-अधिक व्यक्तियों को गायत्रीतीर्थ में आने, सत्रों में भागीदारी करने का अवसर मिले, इसीलिए कुल पच्चीस पाँच-दिवसीय सत्रों का विशेष प्रावधान इस वर्ष रखा गया है। ये 27 मार्च से 31 मार्च, 1 से 5 अप्रैल से लेकर 26 से 30 जुलाई तक चलते रहेंगे। अप्रैल, मई, जून, जुलाई माह में प्रत्येक में ये 1 से 5, 6 से 10, 11 से 15, 16 से 20, 21 से 25, 26 से 30 इन तारीखों में चलते रहेंगे। प्रत्येक सत्र में पूर्व संध्या को पहुँचना होगा। अंतिम दिन विदाई का व आने वाले सत्र के स्वागत के लिए होगा। उज्ज्वल भविष्य की साधना से अधिक-से-अधिक परिजनों को जोड़ने के लिए यह विशिष्ट क्रम व सत्रों का प्रावधान रखा गया है। मात्र साधक स्तर के कार्यकर्ताओं के लिए ये विशिष्ट संधिवेला साधना सत्र हैं। पूर्व की तरह ही अनगढ़-कुसंस्कारी बीमार, वयोवृद्धों अशक्तों एवं छोटे बच्चों को साथ लेकर आने की मनाही है। जो इस विशिष्ट श्रृंखला में भागीदारी करना चाहते हों, वे अभी से पत्राचार कर स्थान सुरक्षित करा लें।
*समाप्त*