सतोगुणी आहार से साधक अपने अन्नमय कोश को जाग्रत कर सकते है।
* नियमित प्राणायाम की प्रक्रिया संपादन करने से प्राणमय कोश जाग्रत होता है।
* मन को एकाग्र-तल्लीन कर चेतन मन को शाँति देने वाला कोई भी उपाय मनोमय कोश को जाग्रत करता है।
* ध्यान व जप की गहराइयों में विज्ञानमय कोशिकीय संसिद्धिं होती है।
गायत्री तत्व के साक्षात्कार -आनंदमय कोश के जागरण की परम तत्व की उपलब्धि की स्थिति है।
-परमपूज्य गुरुदेव
सम्पूर्ण संसार एक होकर विरोध करने के लिए खड़ा हो जाय, फिर भी हम अपने शुद्ध स्वरूप को नहीं भूलें। स्वयं के मन को शान्त और बुद्धि को निर्मल बनाए रखें। कितनी ही विकट और भयानक स्थिति हो, हम उसमें आनन्द से रहे।
हम स्वयं को भीड़ में क्यों खो जाने दें? ईश्वर के- ईश्वरत्व के आगे भी हमारी आत्मा की प्रखरता क्यों घटे? ईश्वरीय क्षमताएँ उसमें प्रतिबिम्बित होकर उसे और प्रखर क्यों न बना दें? हमारे व्यक्तित्व का अस्तित्व हमारा अपना स्वप्न हैं उसमें अन्य किसी का हस्तक्षेप क्यों हो? अपना स्वरूप निर्धारण तथा उसके अनुरूप लक्षणों के विकास की स्वतन्त्र क्षमता हममें विकसित होनी ही चाहिए। संसार की भली ‘बुरी गतिविधियों को उसके विकास में बाधक क्यों बनने दिया जाए?
हम अपनी सम्मति प्रकट करते समय केवल सत्य और न्याय को देखकर चलें। किसी के आदर-तिरस्कार की हमें परवाह न हो। हम केवल अपने आत्म-विकास और आत्म-सन्तुलन पर दृष्टि रखें। मनुष्यों के समाज में, देवताओं की सभा में, राक्षसों के संग्राम में भी हम अपनी स्वतन्त्रता व्यक्तित्व के लिए दृढ़ ओर संघर्षशील रहे। यदि किसी असत्य को सारा संसार सत्य घोषित करता हो, तो भी हम जन-समुदाय की चिन्ता न कर सत्य को सत्य और असत्य को असत्य ही कहें। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि हम औरों की सम्मति का सम्मान न करें। उचित परामर्श और सुझाव भले ही वे किसी शत्रु अथवा विपक्षी के द्वारा ही क्यों न दिए गए हों, उन्हें सम्मानपूर्वक अपनाना विकासशील व्यक्तित्व का एक महान गुण है।
अपने मन और बुद्धि को आवेश और मनोवृत्तियों की चंचलता से भंग न होने दें। प्रत्येक निर्णय गुण-दोष को देखकर, सत् -असत् को ध्यान में रखकर, विवेक की कसौटी पर कसकर ही करें। हर एक के अच्छे-से-अच्छे स्वरूप को ढूँढ़ निकालने की यथाशक्ति चेष्टा ही उत्कृष्ट व्यक्तित्व की पहचान है। जो हमारे विरोधी हैं, उनके भी सद्गुणों और सदुद्देश्यों का आदर करना अपना कर्तव्य है। परन्तु हम जिसे सत्य और न्याय-संगत मानें उसका समर्थन और प्रचार करने में स्वयं को पूर्ण स्वतन्त्र तथा सदा निर्भय बनाए रखें।
दूसरों की सेवा करना परमार्थ है। पर यह सेवा हम किसी को दिखाने के लिए नहीं बल्कि आत्म-भाव के विकास से प्रेरित होकर करें, अन्तःकरण की स्वाभाविक भूख न दब सकने वाली हूक को सन्तुष्ट करने के लिए करें। फिर हमें इस कार्य में कष्ट क्यों अनुभव होगा, जबकि हमारे लिए यही साधना है- निजत्व के निखार की साधना। तब फिर हम क्यों झिझकें, क्यों संकोच करें, क्यों सोच-विचार में समय गँवाए, इसके लिए हमें बाहरी साधन तो चाहिए नहीं, सब कुछ अन्तःकरण की गहराइयों से ही तो निकालना है। तो दें चिन्तन को विराम और प्रारम्भ करें ‘निजत्व के निखार की अनूठी साधना।
अवन्ती नरेश भोज सायं-भ्रमण करते हुए गहन वन में पहुँचे। उस समय सूर्यास्त में थोड़ा ही समय बाकी था। सूर्य की स्वर्णिम रश्मियाँ वृक्षों के पत्तों को सुनहरे रंग में रंग रही थी। इस सुनहरी आभा से महाराजाधिराज भोज का शरीर भी रह-रहकर दमक उठता। एकाकी भ्रमण कर रहे महाराजा ने सामने से आते हुए लकड़हारे को देखा। उसके सिर पर लकड़ियों का भारी गट्ठर था। देह से पसीना चूँ रहा था, कपड़े फटे-पुराने व मैले-कुचैले थे। ऐसा लग रहा था, जैसे उसने कई दिनों से स्नान नहीं किया हो। फिर भी उसके चेहरे पर तेज था। स्वस्थ व सुडौल शरीर उसकी परिश्रमशीलता को प्रकट कर रहा था। राजा भोज ने उसे ध्यान से देखा, किन्तु उसके मुख से ऐसा लगा जैसे उसने उन्हें देखा ही न हो। अपनी मस्ती में झूमता हुआ वह व्यक्ति अपने घर की ओर बढ़ा जा रहा था। उसकी इस मस्ती को देखकर महाराज को बहुत विस्मय हुआ। उन्होंने लकड़हारे का मार्ग रोका और पूछा-तुम कौन हो?
लकड़हारा अपने रास्ते पर चलता हुआ आनन्दमग्न हो बोल उठा-मैं महाराजाधिराज हूँ। क्या तुम मुझे नहीं जानते? और अपनी बात की प्रतिक्रिया जाने बिना वह आगे कदम बढ़ाने लगा।
महाराज भोज के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। वह सोचने लगे-वाह कैसा अद्भुत व्यक्ति है, जो अवन्ती नरेश के सामने भी अपने को निश्चिन्तता से महाराजा कहता है। भोज उसके मार्ग के ठीक बीच में खड़े हो गए और विस्मय के साथ बोले-यदि तुम महाराजाधिराज हो, तो बतलाओ तुम्हारी आय क्या है? अल्हड़ से लकड़हारे ने कहा-प्रतिदिन छह टके।
अब तो भोज का आश्चर्य और भी बढ़ गया। वह सोचने लगे, प्रतिदिन लाखों स्वर्ण मुद्राओं की आय के बावजूद भी मुझे शान्ति नहीं है और यह छह टके में भी स्वयं को महाराजाधिराज कहता है। उन्होंने अगला प्रश्न किया-तो बतलाओ, तुम्हारे खर्च का क्या हिसाब है? यदि तुम महाराजाधिराज हो तो खर्च की भी व्यवस्था होगी? उसका ब्यौरा भी तो बतलाओ।
लकड़हारे ने भारी बोझ को नीचे गिरा दिया और ताल ठोक कर खड़ा हो गया। उसने कहा-मेरे छह टके का लेखा-जोखा भी बहुत व्यवस्थित है। मैं प्रतिदिन एक टका अपने बोहरे को, एक टका अपने आसामी को, एक टका मंत्री को तथा एक टका खजाने को देता हूँ। केवल एक टका अतिथि-सत्कार में व्यय करता हूँ।
आश्चर्य ने और अधिक आश्चर्य को उभार दिया। राजा भोज ने उससे सवाल किया-तुम्हारा वोहरा कौन है?
लकड़हारे ने सहजता से उत्तर दिया-मेरे माता-पिता उन्होंने खून-पसीना एक करके मेरा भरण-पोषण किया था। आखिर इसीलिए कि बुढ़ापे में मैं उनकी सेवा करूँगा। बोहरा आसामी को इसी आशा में ही तो ऋण देता है कि समय पर ब्याज सहित मूल राशि भी लौट आएगी।
तुम्हारे आसामी कौन है? राजा ने कुछ तेज स्वर में पूछा।
लकड़हारे ने उसी मस्ती में कहा-मेरे पुत्र तथा पुत्रियाँ। अभी वे कमा नहीं सकते। अतः उनके भरण-पोषण का सारा दायित्व मेरे ऊपर है। बड़े होकर वे मेरे ऋण को चुकायेंगे।
राजा भोज ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा-बहुत सुन्दर। परन्तु तुम्हारा मंत्री कौन है?
मन्त्री का कार्य होता है- मंत्रणा देना, सुख-दुःख में साथ देना तथा उदासी व चिन्ता के समय धैर्य बँधाना।
सर्वतोभावेन समर्पित होकर रहना। ऐसा व्यक्ति सहधर्मिणी के अतिरिक्त दूसरा कौन हो सकता? लकड़हारा दूसरा तत्काल उत्तर देते हुए स्पष्ट किया-मेरी पत्नी ही मेरी मंत्री है।
राजा भोज का अगला प्रश्न था-तुम्हारे पास खजाना भी है?
लकड़हारे ने बीच में ही बात को काटते हुए कहा-क्यों नहीं? खजाने के बिना भी भला किसी का काम चलता है? मेरा एक टका नियमित इसमें जाता है, ताकि आड़े वक्त पर काम आए। उसने अपने कथन को चालू रखते हुए कहा- एक टका मैं अपने शरीर पर भी खर्च करता हूँ। भूख-प्यास व शीत ताप आदि के निवारण के लिए अन्न तथा वस्त्र आदि की मुझे भी अपेक्षा होती है। अतिथि सत्कार भी मेरा परम धर्म है। मैं उसे कभी नहीं भूलता हूँ। क्यों? समझे मेरा सारा लेखा-जोखा
लकड़हारे ने घूर कर राजा भोज को देखा और कहा-क्यों मैं हूँ न महाराजाधिराज? तुमने नाहक मेरा समय बर्बाद कर दिया। उसने लकड़ियों का गट्ठर उठाया और अपने घर की ओर प्रस्थान करने लगा।
लकड़हारे की चाल में वही मस्ती थी, उसके मुख पर आनन्द की अनोखी आभा थी। उसने यह जानने की रत्ती भर चिन्ता नहीं की कि वह जिस व्यक्ति से बात कर रहा है, वह आखिर है कौन?
महाराज भोज के पाँव भी अपने राजमहल की ओर मुड़ चले। चलते-चलते वह सोच रहे थे, जो व्यक्ति परिश्रम से कमाता है, आय से अधिक व्यय नहीं करता। एक-एक पैसे का व्यवस्थित हिसाब रखता है, वही सुखी है। ठीक ही तो कह रहा था यह लकड़हारा-जो निश्चिन्तता से जीता है, व्यवस्था में रहता है, चिन्ता को नहीं ओढ़ता-सही मायने में वही महाराजाधिराज है।
मैं कौन हूँ, किसका हूँ? यह प्रश्न ऐसे है जिनको उपेक्षित, बिना हल किया हुआ छोड़ दिया जाय तो वह लापरवाही बहुत महँगी पड़ती है। जीवन का सारा आनन्द ही चला जाता है। आनन्द ही नहीं चला जाता, वरन् इस उलझी हुई गुत्थी में उलझकर मनुष्य ऐसी जिन्दगी जीने के उलझकर मनुष्य ऐसी जिन्दगी जीने के लिए विवश होता है, जिसे नीरस और भारभूत ही कहा जा सके।
अपने आपको शरीर मान लेने से साँसारिक सुख-दुःख, हानि-लाभ मान-अपमान हमें बुरी तरह उद्विग्न, उद्वेलित करते है और हर परिस्थिति, आशंका एवं असंतोष से भरी रहती है। जो कुछ उपार्जन किया था उसका हर्ष रत्ती भर होता है और उसके साथ जुड़ी हुई विषमताओं का चिन्तन पहाड़ भर। जिसमें हर्ष स्वल्प और विषाद अपरिमित हो ऐसी जिन्दगी जीकर कौन अपने आपको सौभाग्यशाली मानेगा?
किंतु अपने संबंध में सही ढंग से सोचने की विधि हाथ लग जाये तो देखते-देखते जादू की तरह असन्तोष और उद्वेग की स्थिति सन्तोष और उल्लास से भर जाती है। आगे और पीछे जो अन्धकार दीख रहा है, उसे प्रकाश में परिणित होते देर नहीं लगती। इसी स्थिति को आत्म-ज्ञान कहते है। इसे एक प्रकार का आन्तरिक काया-कल्प ही कहना चाहिए। सुना है किन्हीं दिव्य विधियों से वृद्ध और जीर्ण शरीर को नवयौवन की स्थिति में बदला जा सकना सम्भव है। उस विधि को कायाकल्प कहें तो शारीरिक काया-कल्प के उदाहरण और प्रयोग इन दिनों प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ते, पर आत्मिक कायाकल्प हर किसी के लिए सम्भव है। आज ही, अभी ही वह स्थिति प्राप्त की जा सकती है, जिसके आधार पर गरीबी को अमीरी में, दुर्भाग्य को सौभाग्य में, शत्रुओं को मित्रों में, आशंकाओं को उल्लास में परिवर्तित किया जा सके। इस अन्धकार को प्रकाश में परिणत करने वाली प्रक्रिया को आत्म-बोध कहते है। यह आत्म-बोध कोई दैवी वरदान, जादू या चमत्कार नहीं है, सिर्फ उस मान्यता और श्रद्धा का नाम है जो अपने स्वरूप को सही रूप में समझने का अवसर देती है और इतनी सामर्थ्य प्रदान करती है कि पिछले ढर्रे को बदलकर नये सिरे से वस्तुस्थिति के अनुरूप सोचने और करने की पद्धति को अपनाया, कार्यान्वित किया जा सके।
आत्मबोध, आत्मोत्थान, आत्म-साक्षात्कार-जीवन का सबसे बड़ा लाभ हैं इससे बड़ी उपलब्धि इस मनुष्य के लिए और और कोई दूसरी हो ही नहीं सकती। मैं क्या हूँ? कौन हूँ किस लिये हूँ इस तथ्य को समझ लेने के बाद यह भी अनुभूति होने लगती है कि उपकरण, औजार एवं पदार्थों का उपयोग-उपभोग, संबंध-स्नेह की सीमा कितनी रहनी चाहिए, इस सीमा का स्वरूप और निर्धारण जब भी, जो भी कर लेगा वह दिव्य-जीवन जियेगा, सुख-शान्ति से ओत-प्रोत रहेगा और सर्वत्र धरती के देवताओं की तरह महामानवों की तरह हर किसी के अन्तरंग पर श्रद्धा भरा शासन करेगा।
मैं क्या हूँ? इस प्रश्न का उत्तर -शरीर हूँ, के रूप में ही हमारी अन्तः मान्यता देती है, सो परिवर्तनशील प्रकृति के साथ जुड़ी हुई परिवर्तनीय प्रतिक्रियाएँ देह के साथ भी जुड़ी ही रहेगी। संबंधित प्रथा भी बदलेंगे ही और जिनके साथ स्नेह -सम्बन्ध है उनमें भी भौतिक कारणों से अन्तर आयेगा ही। रात और दिन की तरह प्रिय-अप्रिय द्वन्द्वों का फेर चलता ही रहेगा और उसको क्षण-क्षण में प्रिय-अप्रिय अनुभव होते ही रहेंगे। दृष्टिकोण में निषेधात्मक तत्व अधिक होने से एक और भूल होती रहेगी कि शरीर को संसार द्वारा जो सुख-सुविधाएँ मिल रही है, उन्हें देखना, समझना और मोद मनाना सम्भव न हो सकेगा, इसके विपरीत जो अभाव है वे ही आँखों के आगे खड़े रहेंगे। इस स्थिति में किसी सुसम्पन्न व्यक्ति के लिए भी यह सम्भव नहीं कि वह सुख-शान्ति का अनुभव कर सके।
आमतौर से हर व्यक्ति यही प्रयास करता है कि दूसरे लोग उसे बड़ा, सुखी या सम्पन्न समझें। इसी का ढाँचा खड़ा करने में उसकी सारी शक्ति लगी रहती है। सारे प्रयास इसी परिधि के इर्द-गिर्द घूमते रहते है। वस्त्र, आभूषण, श्रृंगार, ठाट-बाट डिग्री, पद आदि के बड़प्पन प्रदर्शित करने वाले आवरण बड़ी कठिनाई से जमा किये जाते है और उसी संचय में सारा समय, श्रम एवं मनोयोग खप जाता है। दूसरे लोग अपनी ही समस्याओं में उलझे होते हैं, उन्हें किसी की अमीरी, गरीबी का मूल्याँकन करने में क्या रुचि हो सकती है, पर हर व्यक्ति समझता यही है कि सब का सारा ध्यान मेरे ही ऊपर केन्द्रित है और यह मनोवैज्ञानिक भूल मनुष्य को उस निरर्थक क्रिया-कलाप और चिंतन में लगाये रहती है, जिसे तात्त्विक दृष्टि से पूर्णतया निरर्थक कहा जा सके। किसी ने कुछ देर के लिए हमें साधन-सम्पन्न, अमीर, बड़ा आदमी जान या मान भी लिया तो अपना प्रयोजन सधा और क्या उसे लाभ हुआ?
आत्मबोध न होने से मनुष्य की महत्त्वाकाँक्षाएँ, चेष्टाएँ योजनाएँ, गति-विधियाँ एक प्रकार से निरर्थक कामों में लगी रहती है और बहुमूल्य मानव-जीवन रहती है और बहुमूल्य मानव-जीवन ऐसे ही उन विडम्बनाओं में गल जाता है, जो सुख-साधन भौतिक-जीवन में उपलब्ध थे उनको भी गलत दृष्टिकोण के कारण समझा और सराहा नहीं जाता। स्त्री, सन्तान, शरीर, शिक्षा, सहायक, साधन जो कुछ भी मिले हुए है, उनके मूल्य, महत्व को भी यदि समझने की चेष्टा की जाय- इनसे मिलने वाली सहायता-सुविधा का लेखा-जोखा लिया जाय तो भी हर व्यक्ति को अपनी स्थिति बहुत हद तक हर्ष-संतोष से भरी हुई प्रतीत हो सकती है। पर इस दुर्भाग्य को क्या कहा जाय, जिसके अनुसार केवल अभाव और छिद्र ही दिखाई पड़ते है। आंतरिक दुर्बलता, आशंका, अविश्वास, अवरोध, द्वेष -घृणा के रूप में फुफकारती और वातावरण को विषाक्त करती रहती है। सो उन्हीं विडम्बनाओं में उलझा हुआ, विभीषिकाओं में उलझा हुआ, विभीषिकाओं में संत्रस्त, आशंकाओं से उद्विग्न-मनुष्य अन्तर्दाह की आग में हर क्षण जलता हुआ नारकीय जीवन जीता है। यह सब आत्मबोध न होने का ही परिणाम है।
मैं क्या हूँ? इसका उत्तर अपने अब तक के चले आ रहे ढर्रे वाले अभ्यास के अनुरूप नहीं वरन् तत्व-चिन्तन के आधार पर देना चाहिए। दूसरे लोग क्या कहते है- क्या सोचते है और क्या करते है- इससे भी हमें प्रभावित नहीं होना चाहिए। निस्संदेह वातावरण अन्धकार भरा है। प्राचीनकाल में सतयुगी व्यक्तित्व, कर्तृत्व और वातावरण-शुद्ध चिन्तन में सहायता करता था। उससे प्रभावित हर नागरिक को सही दिशा मिलती थी। आज सब कुछ उल्टा है। यदि आज वस्तुस्थिति समझने के लिए लोग क्या कहते हैं और क्या करते है? इसे आधार बनाया जाय तो निश्चित रूप से हमें अवांछनीय निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा और अनुचित रीति-नीति अपनाने के लिए विवश होना पड़ेगा।
आत्म-बोध की पहली सीढ़ी यह है कि लोकचिंतन की अवांछनीयता को समझा जाय और अपनी अब तक की ढर्रे पर लुढ़कती हुई मान्यताओं के औचित्य को अस्वीकार किया जाय। काया-कल्प में पुराना शरीर छोड़ना पड़ता है और नया ग्रहण करना पड़ता है। विवाह होने पर वधू पितृ-गृह छोड़ती है, साथ ही अब तक का स्वभाव-अभ्यास उस नव- विवाहिता को पति के घर में जाकर नये स्वजनों से घनिष्ठता बढ़ानी पड़ती है और ससुराल की विधि-व्यवस्था में अपने को ढालना होता है। ठीक ऐसा ही परिवर्तन आन्तरिक काया-कल्प के अवसर पर करना पड़ता है। आत्मबोध एक प्रकार को वरण करना है। इसके लिए क्रान्तिकारी कदम उठा सकने वाले साहस की जरूरत पड़ती है। ढर्रे में राई-रत्ती अन्तर करने से काम नहीं चलता। यह पढ़ने और सुनने की नहीं सर्वतोमुखी परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक लोक को छोड़कर दूसरे लोक में जाने, एक शरीर त्याग कर दूसरे शरीर में प्रवेश करने जैसी इस प्रक्रिया को जो कोई सम्पन्न कर सके, उसे ही आत्मज्ञानी कहा जाएगा। आत्म-बोध और आत्म-साक्षात्कार इसी स्थिति का नाम है। ब्रह्मं-सम्बन्ध आत्म-दर्शन दीक्षा-लाभ, चक्षु-उन्मीलन दिव्य-जागरण इसी को कहते है। यह छलाँग जो लगा सके उसे इस दुस्साहस का परिणाम दूसरे परिलक्षित होगा। अपने को तत्काल नरक में से निकलकर स्वर्ग में अवस्थित अनुभव करेगा। मैं क्या हूँ? इस प्रश्न का समाधान, इतना बड़ा लाभ है कि उस पर समस्त संसार की समग्र सम्पदाओं को निछावर किया जा सकता है।
व्यक्ति जब अपने को ईश्वर का परम-पवित्र अविनाशी अंश समझता है, आत्मा के रूप में अनुभव करता है और शरीर को एक उपकरण भर स्वीकार करता है, तो उसे अपनी पिछली मान्यताओं, आकांक्षाओं, योजनाओं और गतिविधियों में आमूल-चूल परिवर्तन करने की आवश्यकता अनुभव होती है। संबंधित वस्तुएँ संग्रह करके निरर्थक मोह बढ़ाने के लिए नहीं, वरन् सदुपयोग भर के लिए अपने पास एकत्रित हुई है, यह निष्ठा जब जमती है तो फिर लोभ और मोह में परले सिरे की मूर्खता ही दिखाई देती है। सम्पदा प्रकृति का ही एक रूप है। यह अनादिकाल से चली आ रही है और अनन्तकाल तक चली जाएगी। जो सोना अपने पास आज है, वह सृष्टि के जन्मकाल से ही इस संसार में विद्यमान था। उस पर लाखों व्यक्ति कुछ-कुछ देर के लिए अपना अधिकार बनाते चले आ रहे है। प्रलयकाल तक वह सोना बना रहेगा और उस पर करोड़ों व्यक्ति अपना अधिकार जमाते चले जाएँगे। जमीन, जायदाद, वस्तुएँ आदि सृष्टि के साथ जन्मीं और उसके रहने तक इस दुनिया में बनी रहेंगी, कुछ समय के लिए वे अपने साथ संयोगवश जुड़ गई तो उन्हें अपनी मान बैठना, उनके रहने तक इस दुनिया में बनी रहेंगी, कुछ समय के लिए वे अपने साथ संयोगवश जुड़ गई तो उन्हें अपनी मान बैठना, उनके संग्रह का लोभ करना कैसे उचित ठहराया जा सकता है? पदार्थों का मोह जिस शरीर के साथ जुड़ा हुआ है, वह शरीर ही कल-परसों जाने की तैयारी में बैठा है फिर पदार्थों का सम्पदा-साधनों का लोभ किसलिए?
उपलब्ध सम्पत्ति का सदुपयोग ही सब से बड़ी बुद्धिमत्ता है, उसकी जमाखोरी में कोई समझदारी नहीं। उपार्जन को श्रेष्ठ प्रयोजनों में लगाना चाहिए। बेटे-पोतों के लिए उत्तराधिकार का ताना-बाना बुनना सदुपयोग नहीं है। अपने साथ मोह-बन्धनों में बँधे हुए चन्द व्यक्तियों को अपने श्रम का सार-उपार्जन सौंप दिया जाय और वे उस हराम की कमाई पर गुलछर्रे उड़ाए, इस विडम्बना में क्या औचित्य है? श्रम-उपार्जन खाकर ही कोई व्यक्ति उसका लाभ लेता है, हराम की कमाई तो हर किसी को गलाती है। आत्मवादी की सुनिश्चित मान्यता यही हो सकती है। जिसकी समझ में यह तथ्य आ गया उसे नये सिरे से अपनी सम्पत्ति के बारे में चिंतन करना पड़ेगा और आश्रित, असमर्थ परिजनों की उचित व्यवस्था के अतिरिक्त जो कुछ उसके पास बच जाता है, उसे लोक-मंगल के लिए नियोजित करने का ही निर्णय करना पड़ता है। आत्म-बोध के साथ यदि इस स्तर का दुस्साहस जुड़ा हुआ न होता उसे बकवादी का बाल-विनोद ही कहा जाएगा। असंख्यों व्यक्ति, स्वाध्याय -सत्संग के नाम पर धर्म और अध्यात्म की लम्बी-चौड़ी बकवास करते और सुनते रहते है, जो चिन्तन-जीवन को प्रभावित न कर सके उसे मनोविनोद के अतिरिक्त और क्या कहा-समझा जा सकता है।
परिवार के रूप में जुड़े हुए कुछ व्यक्ति ही अपने है? अपना प्यार उन्हीं तक सीमित रहना चाहिए, उन्हीं तक अपनी सारी महत्त्वाकाँक्षाएँ सीमित कर लेनी चाहिए-यह रीति-नीति उससे बन ही नहीं पड़ेगी, जो अपने को आत्मा मानेगा। आत्म-ज्ञान का प्रकाश आते ही दृष्टिकोण में उस विशालता का समावेश होता है जिसके अनुसार वसुधैव कुटुम्बकम् मानने से कम में किसी भी प्रकार संतोष नहीं हो सकता।
भगवान के उद्यान के रूप में संबंधित परिवार को कर्तव्यनिष्ठ माली की तरह सींचना-सँजोना बिलकुल अलग बात है और बेटे-पोतों के लिए मरते-खपते रहना अलग बात, बाहर से देखने में यह अन्तर भले ही दिखाई न पड़े, पर दृष्टिकोण की कसौटी पर रखने पर जमीन-आसमान जितना अन्तर मिलेगा। मोहग्रस्त मनुष्य अपने कुटुम्बियों की सुविधा-सम्पदा बढ़ाने और इच्छा पूरी करने की धुन में उचित -अनुचित, आवश्यक-अनावश्यक का भेद भूल जाता है और घरवालों की इच्छा तथा खुशी के लिए वह व्यवस्था भी जुटाता है, जो न आवश्यक है न उपयुक्त। मोह-ग्रस्त के पास विवेक रह ही नहीं सकता।
परिष्कृत दृष्टि से कुटुम्बियों को समुन्नत, सुसंस्कारी, सुविकसित बनाने के कर्तव्य को ही ध्यान में रखकर पारिवारिक विधि-व्यवस्था निर्धारित की जाती है। उसने यह नहीं सोचा कि कौन राजी रहा, कौन नाराज हुआ। चतुर माली अपनी दृष्टि से पौधों को काटता-छाँटता निराता- गोड़ता है, पौधों की मर्जी से नहीं। विवेकवान गृहपति केवल एक ही दृष्टि रखता है कि परिवार को सुसंस्कारी और सुविकसित बनाने के लिए जो कठोर कर्तव्य पालने चाहिए, उनका पालन अपनी ओर से किया जा रहा है या नहीं। परिजनों की इच्छाओं का नहीं, उनके हितसाधन का ही उसे ध्यान रहता है। आत्म-बोध के साथ परिवार के प्रति इसी दृष्टिकोण के अनुरूप आवश्यक हेर-फेर करना पड़ता है तभी वह मोह छोड़ता है और प्यार करता हैं प्यार के आधार पर की गई परिवार सेवा उसके स्वयं के लिए और समस्त परिवार के लिए परम-मंगलमय सिद्ध होती है।
अपने शरीर के बारे में भी आत्म-बोध के प्रकाश में नई रीति-नीति ही अपनानी पड़ती है, आत्मा की भूख मात्र मानना पड़ता है, आत्मा की भूख के लिए शरीर से काम लेने और शरीर की लिप्सा के लिए आत्मा को पतन के गर्त में डालने की दृष्टि में जमीन-आसमान जितना अन्तर है। शरीर और मन को मैं मान बैठने पर इन्द्रियों की वासनाएँ और मन की तृष्णायें ही जीवनोद्देश्य बन जाती है और उन्हीं की पूर्ति में निरन्तर लगा रहना पड़ता है। पर जब वह मान्यता हट जाती है अपने को आत्मा स्वीकार कर लिया जाता है, तो मन को बलात् उस चिन्तन में नियोजित किया जाता है, जिससे आत्म-कल्याण हो और अपने को आत्मा स्वीकार कर लिया जाता है, तो मन की बलात् उस चिन्तन में नियोजित किया जाता है, जिससे आत्म-कल्याण हो और शरीर से वह कार्य कराये जाते है, जो आत्मा का गौरव बढ़ाते हों, उसका भविष्य उज्ज्वल बनाते हैं।
आत्म-बोध एक श्रद्धा है। आत्म-साक्षात्कार एक दर्शन है, जिसे यदि सच्चाई के साथ हृदयंगम किया जाय तो दृष्टिकोण ही नहीं बदलता वरन् क्रिया-कलाप भी बदल जाता है। इस परिवर्तन को ही आत्मिक कायाकल्प कहते है। यह जिस क्षण भी सम्भव हो जाय उसी दिन अपने में भारी शान्ति, संतोष, उल्लास और उत्साह दृष्टिगोचर होता है और लगता है मानो नरक से निकलकर स्वर्ग में आ गये।
महाभारत युद्ध चल रहा था। अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण थे। जैसे ही अर्जुन का बाण छूटता, कर्ण का रथ कोसों दूर चला जाता। जब कर्ण का बाण छूटता तो अर्जुन का रथ सात कदम पीछे चला जाता। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के शौर्य की प्रशंसा के स्थान पर कर्ण के लिए हर बार कहा कि कितना वीर है यह कर्ण? जो उस रथ को सात कदम पीछे धकेल देता है। अर्जुन बड़े परेशान हुए। असमंजस की स्थिति में पूछ बैठे कि हे वासुदेव! यह पक्षपात क्यों? मेरे पराक्रम की आप प्रशंसा करते नहीं एवं मात्र सात कदम पीछे धकेल देने वाले कर्ण को बारम्बार वाहवाही देते है।
श्रीकृष्ण बोले-अर्जुन तुम जानते नहीं। तुम्हारे रथ में महावीर हनुमान एवं स्वयं मैं वासुदेव कृष्ण विराजमान् हूँ। यदि हम दोनों न होते तो तुम्हारे रथ का अभी अस्तित्व भी नहीं होता। इस रथ को सात कदम भी पीछे हटा देना कर्ण के महाबली होने का परिचायक हैं। अर्जुन को यह सुनकर अपनी क्षुद्रता पर ग्लानि भी हुई।
इस तथ्य को अर्जुन और भी अच्छी तरह सब समझ पाए जब युद्ध समाप्त हुआ। प्रत्येक दिन अर्जुन जब युद्ध से लौटते श्रीकृष्ण पहले उतरते, फिर सारथी धर्म के नाते अर्जुन को उतारते। अंतिम दिन वे बोले-अर्जुन! तुम पहले उतरो रथ से व थोड़ी दूरी तक जाओ। भगवान के उतरते ही घोड़ा सहित रथ भस्म हो गया। अर्जुन आश्चर्यचकित थे। भगवान बोले-पार्थ! तुम्हारा रथ तो कभी का भस्म हो चुका था। भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य व कर्ण के दिव्यास्त्रों से यह कभी का नष्ट हो चुका था। मेरे-स्रष्टा के संकल्प ने इसे युद्ध समापन तक जीवित रखा था। अपनी विजय पर गर्वोन्नत अर्जुन के लिए गीता श्रवण के बाद इससे बढ़कर और क्या उपदेश हो सकता था कि सब कुछ भगवान का किया हुआ है। वह तो निमित्त मात्र था। काश हमारे अंदर का अर्जुन इसे समझ पायें।
महर्षि व्यास के पाँव पथ पर बढ़ रहे थे। उनकी भावमुद्रा में ईश्वरीय तेज प्रदीप्त था। चलते-चलते उनके पाँवों से एक कीड़ा आ टकराया। उन्होंने लगभग चौंकते हुए देखा, रास्ते में एक कीड़ा बड़े वेग से भागा जा रहा था। महर्षि सभी जीवों की गति एवं भाषा के मर्मज्ञ थे। उन्होंने दयावश कीड़े की बोली में ही उससे इस प्रकार भागने का कारण पूछा। विश्ववन्द्य मुनिवर! कोई बहुत बड़ी बैलगाड़ी इधर ही चली आ रही है। कहीं यह आकर मुझे कुचल न डाले, इसलिए तेजी से भागा जा रहा हूँ।
क्षुद्र योनि में पड़े उस कीड़े का देह के प्रति मोह देखकर महर्षि तनिक चकित हुए, फिर उन्होंने उससे अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हुए कहा-कीट तुम तो तिर्यक् योनि में पड़े हुए हो। तुम्हारे लिए तो मर जाना ही सौभाग्य हैं मनुष्य यदि मृत्यु से डरे तो उचित है, पर तुम कीट को इस शरीर के छूटने का इतना भय क्यों हैं? इस पर कीड़े ने कहा- महर्षि मुझे मृत्यु से किसी प्रकार का भय नहीं है। भय इस बात का है कि इस कुत्सित कीट योनि से भी अधम दूसरी लाखों योनियाँ है। मैं कही मर कर उन योनियों में न चला जाऊँ।
व्यास जी ने कहा-कीट तुम भय न करो। मैं जब तक तुम्हें ब्राह्मण शरीर में न पहुँचा दूँगा, तब तक सभी योनियों से शीघ्र ही छुटकारा दिलाता रहूँगा, व्यास जी के यों कहने पर वह कीड़ा पुनः मार्ग में लौट आया और बैलगाड़ी के पहिए के नीचे दबकर उसने प्राण त्याग दिए। तत्पश्चात वह कौए, सियार आदि योनियों में जब-जब उत्पन्न हुआ, तब-तब व्यास जी ने जाकर उसके पूर्व जन्म का स्मरण करा दिया। इस तरह वह क्रमशः शाही, गोह, मृग, पक्षी, चाण्डाल, शूद्र और वैश्य की योनियों में जन्म लेता हुआ क्षत्रिय जाति में उत्पन्न हुआ। उसमें भी भगवान व्यास ने उसे दर्शन दिया।
वह प्रजापालन रूप धर्म का आचरण करते हुए थोड़े ही दिनों में शरीर त्यागकर ब्राह्मण योनि में उत्पन्न हुआ। जब वह पाँच वर्ष का हुआ, तभी व्यासदेव ने आकर उसके कानों में सारस्वत मंत्र का उपदेश कर दिया। उसके प्रभाव से बिना पढ़े ही उसे सम्पूर्ण वेद, शास्त्र और धर्म का स्मरण हो आया। इसी के साथ भगवान व्यासदेव ने उसे आज्ञा दी कि वह कार्तिकेय के क्षेत्र में जाकर नन्दभद्र को आश्वासन दें। नन्दभद्र को यह शंका थी कि पापी मनुष्य भी सुखी क्यों देखे जाते है।
इसी क्लेश से घबराकर वे बहूदक तीर्थ पर तप कर रहे थे। नन्दभद्र की शंका का समाधान करते हुए इस सिद्ध सारस्वत बालक ने कहा-पापी मनुष्य क्यों सुखी रहते है? यह तो बड़ा स्पष्ट है। जिन्होंने पूर्व जनम में तामस भाव से दान किया है, उन्होंने इस जन्म में उसी दान का फल प्राप्त किया है, परंतु तामस भाव से जो धर्म किया जाता है, उसके फलस्वरूप लोगों का धर्म के प्रति अनुराग नहीं होता और फलतः वे ही पापी सुखी देखे जाते है।
ऐसे मनुष्य पुण्यफल को भोग कर अपने तामसिक भाव के कारण नरक में ही जाते है, इसमें सन्देह नहीं है। इस विषय में मार्कण्डेय जी की कही ये बातें सर्वदा ध्यान में रखी जानी चाहिए-एक मनुष्य ऐसा है, जिसके लिए इस लोक में सुख का भोग सुलभ है, परंतु परलोक में नहीं। दूसरा ऐसा है जिसके लिए परलोक में सुख का भोग सुलभ है, किंतु इस लोक में नहीं। तीसरा ऐसा है, जो इस लोक और परलोक दोनों ही जगह सुख प्राप्त करता है और चौथा ऐसा है, जिसे न यहाँ सुख है और न परलोक में ही। पूर्व पुण्य भोगते हुए सुख में भूला हुआ जो व्यक्ति नूतन पुण्य का उपार्जन नहीं करता, उस मंदबुद्धि और भाग्य ही मानव को प्राप्त हुआ वह सुख केवल इसी लोक में रहेगा।
जिसका पूर्वजन्म उपार्जित पुण्य तो नहीं है, किंतु वह तपस्या करके नए पुण्य का उपार्जन कर रहा है, उस बुद्धिमान को परलोक में अवश्य ही विशाल सुख का भाग उपस्थित होगा, इसमें रंचमात्र भी सन्देह नहीं। जिसका पहले का किया हुआ पुण्य वर्तमान में सुखद हो रहा है ओर जो जप द्वारा नूतन पुण्य का उपार्जन भी कर रहा है, ऐसा बुद्धिमान तो कोई-कोई ही होता है, उसे इहलोक और परलोक दोनों में ही सुख मिलता है। जिसका पहले का भी पुण्य नहीं है और जो भी पुण्य का उपार्जन नहीं करता, ऐसे मनुष्य को न परलोक में ही।
इस प्रकार नन्दभद्र का समाधान करते हुए उस बालक ने अपना वृत्तान्त भी बतलाया। तत्पश्चात् वह सात दिनों तक निराहार रहकर सूर्य महामन्त्र का जप करता रहा और वहीं बहूदक तीर्थ में ही उसने उस शरीर को भी छोड़ दिया। नन्दभद्र ने विधिपूर्वक उसके दाह-संस्कार की व्यवस्था की। उसकी अस्थियाँ वहीं सागर में डाल दी गयीं। और दूसरे जन्म में वही बालक मैत्रेय नाम के श्रेष्ठ महर्षि के रूप में विख्यात हुआ।
शरीर से भी अधिक शक्तिशाली और सामर्थ्यवान् है मनोबल। यह मनोबल दुर्बल से दुर्बल काया को मृत्युंजय बना देता है।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
कम्प्यूटर क्या है? यों तो इसकी कितनी ही प्रकार की व्याख्याएँ संभव है, पर जो सर्वाधिक सरल और सहज है, वह यह कि मानवी मस्तिष्क का यह एक कृत्रिम विकल्प है, जो न सिर्फ बौद्धिक चिन्तन करता है, वरन् मन और भावनाओं के तल को भी स्पर्श करने की योग्यता रखता है। अतएव अब इसे केवल मस्तिष्क नहीं, मन, मस्तिष्क और हृदय की मानसिक क्षमता, चिंतन-चेतना एवं भाव-संवेदना की त्रिधा भूमिका निभाने वाला यंत्र कहना अधिक समीचीन होगा।
शरीरशास्त्रियों के अनुसार मानवी मस्तिष्क में लगभग 10 अरब तंत्रिका कोशिकाएँ है। इनमें से प्रत्येक में असीम संभावनाएँ विद्यमान है। वर्तमान मनुष्य ने अपनी मस्तिष्कीय क्षमता के मात्र 7 प्रतिशत भाग का ही उपयोग किया है, शेष 93 प्रतिशत हिस्सा प्रसुप्त स्थिति में पड़ा हुआ है। इस खण्ड का अनुसंधान -अन्वेषण योगमार्ग के अधीन है। जब इसका सम्पूर्ण जागरण होता है, तब विदित होता है कि जितना साधारण इसे समझा गया था, उसने हजारों गुना अधिक सामर्थ्यवान है।
कम्प्यूटर में तंत्रिका कोशिकाओं की तरह करोड़ों सिलिकन चिप्स है, जिनमें अपरिमित जानकारियाँ बन्द होती है। इन जानकारियों का जब सम्पूर्ण उपयोग होता है, तब वह मन की सामर्थ्य के आस-पास आ जाता है और ऐसे एवं इतने अनछुए पहलुओं का ज्ञान उपलब्ध कराता है, जो सामान्य दशा में संभव नहीं, जिसे परिष्कृत मस्तिष्क ही उपलब्ध करा सकता है। मौसम संबंधी भविष्यवाणी करना, जन्मतिथि के आधार पर व्यक्ति के आगत-विगत की जानकारी देना, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए प्रहरी का काम करना और दुश्मनों के आक्रमण की पूर्व सूचना देना, कम्प्यूटर युक्त फोन से घर से बात कराने के लिए कहते ही घर का नम्बर मिला देना, वायुमण्डल उड़ाना, डाक ले जाना, ई-मेल जासूसी उपग्रह द्वारा दूसरे देशों की जासूसी करना, तथ्यों के अध्ययन-विश्लेषण के आधार पर निष्कर्ष प्रस्तुत करना आदि ऐसे कार्य है, जिसे यदि काई आदमी सम्पन्न कर रहा होता, तो उसे साथ-साथ मन की क्षमताओं का भी प्रयोग करना पड़ता, कारण कि मौसम संबंधी भविष्यवाणी, आक्रमण की पूर्व सूचना, व्यक्तिगत जीवन का भूत-भविष्य आदि ऐसे प्रसंग है, जिन्हें केवल बौद्धिक आधार पर जान पाना असंभव हैं इसके लिए अतीन्द्रिय स्तर की सामर्थ्य भी चाहिए। यह कार्य जब कोई यंत्र करता है, तो यह कहा जा सकता है कि उसने मानवी मन की सीमाओं का स्पर्श किया है।
इतना ही नहीं, कम्प्यूटरों ने अब मृत्युविषयक तथ्य के अतीन्द्रिय पक्ष पर भी अपने निर्णय-निष्कर्ष देने प्रारंभ कर दिये है। शरीर मरणधर्मा है। जिसने जन्म लिया है, वह मरेगा भी। कई बार मौत लम्बे समय तक रुग्ण जीवन बिताने के बाद होती है। यह अवस्था बहुत ही पीड़ादायक है। कैंसर, एड्स जैसी बीमारियों का कोई उपचार भी नहीं। ऐसी स्थिति में रोगी को उक्त कष्ट से मुक्ति पाने के लिए मरण की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। वह कब आएगी, कहना कठिन है। इस दशा से मरीजों को छुटकारा दिलाने के लिए वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के शरीरशास्त्री डॉ. विलियम क्रास ने एक योजना बनायी, जिसके अंतर्गत सन् 1992 से 1994 के बीच लगभग एक दर्जन अलग-अलग प्रकार के करीब 4 हजार रोगियों का समग्र और सूक्ष्म परीक्षण किया गया। परीक्षणों के प्रतिदिन के विवरण कम्प्यूटरों में भरे गए। ये ऐसे मरीज थे, जिनके जीवित बचे रहने की अवधि अधिकतम 6 मास आँकी गई थी। जिस दिन से बीमार, अस्पताल में भर्ती हुए, उस दिन से उनके रक्त, रक्त-रसायन मलमूत्र, हृदय, फेफड़े, स्मरणशक्ति, यकृत एवं उसके रक्तस्राव, शारीरिक तापमान, मस्तिष्कीय तरंगें, ई. सी. जी. जी. एस आर. जैसे बारीक ब्यौरा का प्रति सप्ताह कम्प्यूटर गहन अध्ययन और विश्लेषण करते। इस आधार पर वे यह भविष्यवाणी करने लगे कि कौन-से मरीज बचेंगे और किसकी मौत हो जाएगी। यह साधारण बात नहीं है। इसे वास्तव में मानवी मन की सामर्थ्य का यांत्रिक प्रयोग ही कहना पड़ेगा। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि इसमें मन और बुद्धि दोनों प्रकार की शक्तियों का समन्वय हुआ है।
मनीषियों का कथन है कि समय से पूर्व मृत्यु की जानकारी हानिकारक सिद्ध हो सकती है। भगवान ने शायद इसीलिए आम लोगों के लिए उनके प्रारब्ध, भाग्य, पूर्वजन्म, मृत्यु जैसे प्रसंगों को अविज्ञात बनाये रखा है। सामान्य स्थिति वाली अपरिपक्व मनोदशा में यदि यह सब आदमी को ज्ञात हो जाए, तो स्वयं को सँभाल पाना उसके लिए कठिन होगा। ऐसी अवस्था में या तो वह विक्षिप्त हो जाएगा या अप्रिय प्रसंगों के समय से पहले ज्ञात हो जाने के कारण उसे बर्दाश्त न कर पाएगा और मौत को गले लगा लेना।
आत्मसाक्षात्कार की दशा में मनुष्य का चित जब एकदम शुद्ध -पवित्र हो जाता है और सत्य को स्वीकार की क्षमता जब उसमें आ जाती है, तो वे रहस्य प्रसंग स्वयमेव परिभाषित होने लगते है, जिन्हें देख-समझकर भी वह दर्शक की भाँति तटस्थ बना रहता है- न तो उनसे दुःखी होता है, न प्रसन्न। यही ऐसे सत्य को जानने-समझने की स्वाभाविक अवस्था है।
कम्प्यूटर ने जीवन -मृत्यु संबंधी भविष्यवाणी कर प्रायः उस स्तर को प्राप्त कर लिया है, जहाँ सामान्य आदमी असाधारण हो जाता है। इसके लिए उसे विभिन्न प्रकार की साधनाओं की लम्बी प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता है, तब जाकर उसमें अतीन्द्रिय ज्ञान का उदय होता है। अब जब वैसी विभूतियाँ उपकरणों के माध्यम से अभिव्यक्त होने लगें, तो इसे पदार्थसत्ता का मानवीचेतना पर आँशिक विजय ही कहनी पड़ेगी। यह विजय भाषा या वाणीतल पर भी देखी जा सकती है।
भाषाशास्त्र में वाणी के चार तल चार, स्तर बताये गए है। इसका प्रथम स्तर ‘वैखरी ‘ है। दैनिक जीवन में हम इसी का प्रयोग करते है। सर्वसामान्य के लिए विचार-विनिमय का यही प्रमुख माध्यम है। इसके अतिरिक्त शेष तीनों वाणियों को शब्द की बैसाखी नहीं चाहिए। वे शब्द से अतीत है। ‘मध्यमा’ भाव-भंगिमाएँ मुद्रा और संकेतों के द्वारा प्रकट होती है। ‘पश्यन्ति’ वाणी प्राण से निकलने और मस्तिष्क में विचार-प्रवाह के रूप में घुमड़ने वाली चिन्तन -चेतना को कहते है। चौथी वाणी ‘परा’ है। यह अन्तःकरण या अन्तरात्मा से निस्सृत होती और सम्पूर्ण वातावरण को सात्विकता से ओत−प्रोत रखती है। इस भाषा की अभिव्यक्ति ध्यान है और समाधि उसका चरमोत्कर्ष।
वाणी की ही तरह यांत्रिक मस्तिष्क (कम्प्यूटर) की भाषा के भी चार आयाम गिनाये गए है, जिसमें सामान्य ज्ञान संबंधी जानकारी होती है। जब वह मनुष्यों की तरह भावपूर्ण कविताएँ और प्रेरक चित्रांकन करने लगे, तो इसे उसका मध्यमा तल कहा जा सकता है। पश्यन्ति वह भूमिका है, जिसमें वह सामान्य मानवीचेतना के स्तर से ऊँचा उठकर काम करता और डाले गए तथ्यों आँकड़ों के आधार पर ऐसे प्रसंगों के बारे में बताता है, जिसे चेतना की साधारण भूमिका में रहकर बता पाना आदमी के लिए शक्य नहीं। परा तल को यदि कम्प्यूटर प्राप्त कर सका, तो सामने वाले के मन में क्या खिचड़ी पक रही है, उसके विचार-तरंगों को पकड़कर वह बता पाने में समर्थ होगा, इतना ही नहीं, तब वह मानव और प्रकृति के कितने ही रहस्यमय पक्षों को भी खोल सकेगा, जिसे अभी मात्र दिव्यद्रष्टा, योगी, यति ही जान पाने में सक्षम है। यदि ऐसा हुआ, तो सिद्ध-संतों और परिष्कृत यंत्रों में कोई विशेष अन्तर नहीं रह जाएगा।
इन दिनों जिस पीढ़ी के कम्प्यूटर कार्यरत है, वे अब वैखरी और मध्यमा स्तर को पार कर पश्यन्ति तल पर प्रतिष्ठित होने जा रहे है। पिछले दिनों स्टीवन होल्ट्जमैन ने एक पुस्तक लिखी, नाम था- ‘डिजिटल मंत्राज’। इसे मेसाचुसेट्स के ‘इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने छापी है। इसमें वे लिखते है कि शब्द के दो पहलू है-अर्थमूलक और संवेदनात्मक। उनके अनुसार कम्प्यूटर अर्थमूलकता के आगे जाए, तो कहाँ जाए? निश्चय ही इस स्थिति में वह शब्द के संवेदनात्मक स्तर को छुएगा। पदार्थसत्ता द्वारा मानवीसंवेदना के स्पर्श को साधारण नहीं, असाधारण माना जाना चाहिए। कम्प्यूटर श्रेणी के उपकरण दो ही प्रकार से संवेदना तल तक पहुँच सकते है। यह है-काव्यकला और चित्रकला। काव्यशास्त्रियों ने एक आदर्श कवि के गुणों की चर्चा करते हुए लिखा है कि उसमें अनुभूतिपरक ज्ञान होना नितान्त आवश्यक है। इसके अतिरिक्त काव्यशास्त्र, पिंगलशास्त्र, दर्शनशास्त्र, योग-विज्ञान खगोलशास्त्र, इतिहास, भूगोल एवं आयुर्विज्ञान जैसे विषयों की भी समझ होनी चाहिए। वर्तमान कवि इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते; किन्तु यदि यह समस्त जानकारी कम्प्यूटर में भर दी जाए, तो वह मध्यमा और पश्यन्ति तल पर अधिष्ठित हो उच्चस्तरीय ज्ञान की श्रेष्ठता ही कहनी पड़ेगी।
कम्प्यूटर के शब्द विज्ञान के संदर्भ में स्टीवन होल्ट्जमैन जब मूर्धन्य भाषाशास्त्री फर्डीनाण्ड दि साँस्यू एवं नाँम चाँमस्की के व्याकरणों का अध्ययन कर रहे थे, तो अचानक ही यह रहस्य उनके हाथ आया कि इन सबसे प्रख्यात वैयाकरण महर्षि पाणिनि विरचित व्याकरण -ग्रन्थ अष्टाध्यायी मौजूद है। उसके सूत्रों ने कम्प्यूटर के भाषाशास्त्र को इतना उच्चस्तरीय बनाया है कि अब वह एक अभिनव भूमिका में आरुढ होकर उसे एक नूतन आयाम प्रदान कर रहा है।
सम्प्रति होल्ट्जमैन कम्प्यूटर के इस पश्यन्ति तल को आधार बनाकर इस बात का अध्ययन कर रहे है कि सृष्टि की समस्त अव्यवस्थाओं के बीच भी कोई तालमेल और व्यवस्थाओं के बीच भी कोई तालमेल और व्यवस्था है क्या? कारण कि वर्षों पूर्व केआँस-मेकिंग ऑफ न्यू साइंस’ के रचनाकार ने विभिन्न प्रकार के तर्कों और प्रमाणों के आधार यह सिद्ध किया था कि यहाँ अव्यवस्था कुछ भी नहीं, सर्वत्र क्रम है और व्यवस्था भी। लम्बे अनुसंधान के उपरान्त अब वे भी लगभग उसी निष्कर्ष पर पहुँचते है कि इस दृश्य जगत की अपनी एक व्यवस्था और व्याकरण है, जिसे कम्प्यूटर की सहायता से जाना, समझा और पढ़ा जा सकता है। ऐसा यदि संभव हुआ, तो मनुष्य को लम्बी साधना प्रक्रियाओं से गुजर कर चेतना के पश्यन्ति और परा तल तक पहुँचने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी और उस प्रयोजन को उच्चस्तरीय एवं परिष्कृत कम्प्यूटरों के माध्यम से पूरा किया जा सकेगा।
कम्प्यूटर यों तो एक यंत्र है; पर उसने चेतना के क्षेत्र में प्रवेश कर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि स्वयं को दुनिया का कर्ता-धर्ता मानने वाले मनुष्य को अब यह अहंमन्यता त्याग देनी चाहिए कि वह इस धरित्री का सर्वोपरि और सर्वसमर्थ प्राणी है। इस नवीन भूमिका में पदार्पण कर यंत्र यदि मनुष्य को शालीनता, सुसंस्कारिता, निरभिमानिता सहकारिता, श्रेष्ठ एवं गौरव का अनुभव-वरदान कहना चाहिए और मनुष्य का सौभाग्य भी।
शरीर के किसी भाग पर आघात पहुँचाता है तो उसकी प्रतिक्रिया से शरीर का रोम-रोम काँप उठता है। मन पर मस्तिष्क भी उद्विग्न और बेचैन हो उठते है। समूचा ध्यान शारीरिक पीड़ा पर केन्द्रित हो जाता है। मनः संस्थान असन्तुलित हो तो शरीर भी स्वस्थ एवं निरोग नहीं रह पाता। शरीर के सभी अवयव -मनः संस्थान परस्पर एक-दूसरे की स्थिति से प्रभावित होते है। यह शरीर को चैतन्यता एवं एकता के प्रमाण है। दृश्य और अदृश्य प्रकृति-समूचा है, जिसके सभी घटक परस्पर एक-दूसरे से जुड़े हुए है। इसके एक सिरे पर जो कुछ भी घटित होता है, तो अन्यान्य स्थानों पर उसकी प्रतिक्रिया परिलक्षित होती है।
इस तथ्य को प्रतिपादित करने एवं रहस्योद्घाटन करने का जो विज्ञान भारत में प्राचीनकाल से प्रचलित था, उसे ज्योतिष विज्ञान के नाम से जाना जाता है। इसका लक्ष्य था- अन्तर्ग्रही सम्बन्धों की वैज्ञानिक विवेचना करना तथा एक-दूसरे पर पड़ने वाले प्रभावों से अवगत कराना। फलतः इस विद्या के सहारे पृथ्वी से इतर ग्रह-नक्षत्रों के अनुदानों से लाभ उठा सकना एवं दुष्प्रभावों से बचाव कर पाना सुलभ था, जो आज विकसित भौतिक विज्ञान द्वारा भी सम्भव नहीं है। कालान्तर में यह उसका स्थान फलित ज्योतिष की मूढ़-मान्यताओं एवं भ्रान्तियों ने लिया, जिसे देखकर विज्ञजनों द्वारा इस विद्या की उपेक्षा हुई।
इसके बावजूद भी विज्ञान ने जब से प्रौढ़ता की ओर कदम रखा है, उसका ध्यान अन्तरिक्ष की खोजबीन की ओर आकर्षित हुआ है। साथ ही ग्रह-नक्षत्रों, सौर-मण्डल की गतिविधियों, आपसी सम्बन्धों एवं परस्पर एक-दूसरे पर पड़ने वाले प्रभावों को जानने के लिए छुटपुट प्रयास भी चल रहे है। प्रकारान्तर से भौतिक विज्ञान अब उन्हीं निष्कर्षों पर पहुँच रहा है, जिन पर सदियों पूर्व तत्त्ववेत्ता ऋषि, जो ज्योतिर्विज्ञान के मर्मज्ञ भी थे, पहुँच चुके थे।
ज्योतिर्विज्ञान के आचार्यों ने सौर-मण्डल के ग्रह-नक्षत्रों को देवशक्तियों के रूप में प्रतिष्ठापित किया था। नौ ग्रहों की नौ देवताओं के रूप में प्रतिष्ठापना की गई है। ज्योतिर्विज्ञान की यह मान्यता सदियों से चली आ रही है कि सौरमण्डल का अधिपति सूर्य मात्र अग्नि का धधकता पिण्ड ही नहीं है, अपितु जीवन प्राण ओर सक्रिय अग्नि का पुँज है, जो प्रतिपल अपने सौर-मण्डल के सदस्यों को अपनी गति-विधियों से प्रभावित करता है। न केवल सूर्य बल्कि मंगल, बृहस्पति, बुध आदि भी पृथ्वी के वातावरण को प्रभावित करते है।
इस तथ्य को विश्व के प्रसिद्ध भौतिकविद् भी स्वीकार करने लगे हैं कि सौर-मण्डल की गतिविधियाँ पृथ्वी के वातावरण एवं जैविक परिस्थितियों पर प्रभाव डालती है। यूगोस्लाविया के नाभिकीय भौतिकविद् प्रो. स्टीवन डेडीजर’ जैसे विद्वानों का कहना है कि विज्ञान को अपनी अन्तरिक्षीय खोज की सफलता के लिए प्राचीन ज्योतिर्विज्ञान का अवलम्बन लेना होगा। प्राकृतिक घटनाओं की अभी भी कितनी ही गुत्थियाँ ऐसी हैं, जिनको सुलझा पाने में आज का विकसित विज्ञान भी असमर्थ है। आधुनिक विज्ञान अन्तरिक्ष एवं सबन्यूक्लियर क्षेत्र के में अपनी शानदार सफलता के बावजूद भी ब्रह्माण्ड सम्बन्धी घटनाओं की व्याख्या कर पाने में अपनी अक्षमता व्यक्त कर रहा है, क्योंकि इसका क्षेत्र सीमित है। इसके विपरीत ज्योतिष विज्ञान का ब्रह्माण्डीय ज्ञान अंतरिक्षीय रहस्यों का उद्घाटन करने में पूर्णतया सक्षम है।
भौतिक विज्ञान के सिद्धान्तानुसार सभी पदार्थकण इस ब्रह्माण्ड में एक दूसरे के सापेक्ष गतिशील है। वे अपना स्थान भी परिवर्तित करते रहते है। फलतः जिस पर्यावरण में वे गतिशील रहते है, वह बदलता रहता है और एक अविच्छिन्न ब्रह्माण्डीय श्रृंखला में बँधे होने के कारण कणों का संदोह विशेष प्रभाव उत्पन्न करता है, जो अन्यान्य ग्रहों तथा पृथ्वी, चर-अचर पदार्थों एवं खगोलीय पिण्डों को प्रभावित करता है। इस तथ्य से परिचित होते हुए भी विज्ञान ग्रह-नक्षत्रों की गति, स्थिति और प्रभावों की स्पष्ट जानकारी देने में असमर्थ है। उपर्युक्त टिप्पणी देते हुए भौतिकविद् स्टीवन डेडीजर का कहना है कि समग्र जानकारियों के लिए ज्योतिर्विज्ञान के विलुप्त ज्ञान को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।
प्रख्यात आस्ट्रियाई वैज्ञानिक एरनेस्ट मैक का मत है कि ब्रह्माण्ड के अनंत कण एक-दूसरे से जुड़े हुए है तथा उनमें घना सम्बन्ध है। सौर लपटें जो कि ग्रहों की निकटता एवं चन्द्रमा की गति से किसी न किसी प्रकार सम्बन्धित हैं, पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के व्यतिरेक उत्पन्न करती है। ग्रहीयोग पृथ्वी एवं जैविकी चुम्बकीय पर अपना प्रभाव डालते है। ग्रहों के असन्तुलन से उत्पन्न होने वाली चुम्बकीय आँधी प्रकृति प्रकोपों एवं पृथ्वी के जीवधारियों में अनेकों प्रकार के मानसिक एवं नर्वस सिस्टम के रोग उत्पन्न करती है। भू-चुम्बकत्व में होने वाले हेर-फेर से मानवी आचरण और स्वभाव भी अछूता नहीं रहता है।
रूस के वैज्ञानिक चीनेवस्की ने इस क्षेत्र में लम्बे समय तक खोजबीन करने के उपरान्त महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले है। उनका कहना है-सौरमण्डल की हलचलों से पृथ्वी के वातावरण एवं घटनाक्रमों का घना सम्बन्ध है। हर ग्यारहवें वर्ष सूर्य में आणविक विस्फोट होता है। इन वर्षों में पृथ्वी पर युद्ध और क्रान्तियाँ जन्म लेती है। प्रकृति प्रकोप एवं महामारियाँ बढ़ती है। अभी 1999 व 2000 का समय भी ऐसा ही बताया गया है।
जियोजारजी गिआरडी नामक वैज्ञानिक ने ज्योतिर्विज्ञान से प्रेरणा लेकर विज्ञान की एक नवीन शाखा को जनम दिया-ब्रह्माण्ड रसायनशास्त्र। गिआरडी का कहना है कि समूचा ब्रह्माण्ड एक शरीर है, इसका कोई भी घटक अलग नहीं वरन् संयुक्त रूप से एकात्म है। इसलिए कोई भी ग्रह-तारा-पिण्ड कितना भी दूर क्यों न हो, पृथ्वी के जीवन को प्रभावित करता हैं
प्रो. ब्राउन का मत है कि पृथ्वी सौर-मण्डल का ही एक सदस्य है और चन्द्रमा उसका ही एक उपग्रह। वैज्ञानिक दृष्टि से पृथ्वी और चन्द्र की उत्पत्ति सूर्य से हुई है। न केवल चन्द्र और सूर्य वरन् मंगल, बृहस्पति, शुक्र और शनि की गतियाँ भी पृथ्वी को प्रभावित करती है। उन्होंने अन्तर्ग्रही प्रभावों को समानुभूति नाम दिया है।
अहमदाबाद भौतिक अनुसंधान शाला के दो वैज्ञानिकों प्रो. के. आर. रामनाथन् और डॉ. एस. अनन्तकृष्णन् ने यह घोषणा की है कि पृथ्वी सौर मण्डल की अभिन्न घटक है। आकाशीय पिण्डों के स्पन्दन धरती को भी व्यापक रूप से प्रभावित करते है। अपनी एक खोज में इन वैज्ञानिकों ने पाया कि वायुमण्डल के ‘डी’ क्षेत्र में शक्तिशाली एक्स-किरणों के स्रोत स्कोर्पिओं-11 के गुजरने से वनस्पति एवं जीव जगत की हलचलें बढ़ जाती तथा उनका हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
परमाणु शक्ति आयोग के भूतपूर्व अध्यक्ष और विश्व-विख्यात भौतिकविद् डॉ. साराभाई ने विभिन्न देशों से आये वैज्ञानिकों की एक गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए कहा कि सूर्य के अतिरिक्त भी अन्य आकाशीय पिण्डों का प्रेक्षीय प्रभाव धरती पर आता है। यदि ज्योतिर्विज्ञान के सूत्रों को ढूँढ़ा जा सके और अन्तरिक्षीय ज्ञान में प्रयुक्त किया जा सके तो अनेक महत्वपूर्ण जानकारियाँ हाथ लग सकती है।
रूसी वैज्ञानिक ब्लादीमोर देस्यातोब ने इस सम्बन्ध में व्यापक शोधकार्य किया है। उनका कहना है कि पृथ्वी पर समय-समय पर आने वाले चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता या फ्रीक्वेंसी बदलना आकाशीय पिण्डों के ऊर्जा प्रवाह के परिणाम है। अपनी आरम्भिक खोजों में ब्लादीमोर ने यह पाया कि जब सूर्य पर एक विशेष प्रकार के ज्वाला प्रकोप (फ्लेयर) फूटते है, तो धरती पर प्रचण्ड चुम्बकीय तूफान आते है, जिनसे प्रभावित तो सभी होते है, पर कमजोर मनः स्थिति वाले व्यक्तियों पर उनकी प्रतिक्रिया अत्यधिक दिखाई पड़ती है। आत्महत्याएँ, हत्याएँ एवं असन्तुलन के फलस्वरूप सड़क दुर्घटनाएँ अधिक होती है। इसी आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि मस्तिष्कीय क्रिया-क्षमता का मूलभूत स्रोत, अल्फा-एनर्जी धरती के चुम्बकीय क्षेत्र से जुड़ा हुआ है और भू-चुम्बकत्व का सीधा सम्बन्ध आकाशीय पिण्डों से है। इसलिए मानवी जीवन अन्तरिक्षीय घटनाक्रमों एवं शक्तियों से विलक्षण रूप से सम्बन्धित है। अस्तु. अंतरिक्ष में पैदा होने वाली हर हलचल पृथ्वी, मानवी प्रकृति, मन, बुद्धि एवं चेतना को प्रभावित करती है।
प्रसिद्ध खगोल शास्त्री पास्कल का कहना है कि सूर्य और चन्द्रमा के द्वारा आरोपित सशक्त खिंचाव से सभी परिचित हैं, जो समुद्रों में ज्वार-भाटे उत्पन्न करते है। ये जीवधारियों पर भी अपना प्रभाव छोड़ते है। पास्कल के अनुसार समस्त जीवधारी कम्पायमान समष्टिगत ऊर्जा के एक विशाल समुद्र में निवास करते है, फिर विभिन्न ग्रहों से उत्सर्जित होने वाली ऊर्जा तरंगों से अप्रभावित कैसे रह सकते है। भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में यह तथ्य सप्रमाण पुष्ट होता चला जा रहा है। पृथ्वी पर विद्यमान जीवन का अन्तरिक्ष के ग्रह-नक्षत्रों से अति घनिष्ठ सम्बन्ध है और अविज्ञात होते हुए भी सूक्ष्म आदान-प्रदान का क्रम चलता रहता है।
प्रौढ़ता को प्राप्त करता हुआ विज्ञान अब उन्हीं निष्कर्षों पर पहुँच रहा है, जिन पर सदियों पूर्व भारतीय तत्त्ववेत्ता ज्योतिर्विद् पहुँच चुके थे। समूचा ब्रह्माण्ड एक चैतन्य शरीर है, जिसका प्रत्येक स्पन्दन हर घटक को प्रभावित करता है, जिसमें पृथ्वी और सम्बन्धित वातावरण, वनस्पति एवं जीवधारी भी सम्मिलित है। प्राचीनकाल में ज्योतिष विज्ञान इसी दिशा में अनुसंधान करने प्रमाण जुटाने और अन्तर्ग्रही तथ्यों की खोजबीन करने में सचेष्ट था, जिसकी अनेकानेक उपलब्धियों से समय-समय पर मानवजाति लाभान्वित होती रहती थी। विज्ञान का ध्यान इस ओर आकृष्ट हुआ और अन्तर्ग्रही टोह लेने का सिलसिला आरम्भ हुआ है, यह शुभ चिन्ह है। फिर भी ज्योतिर्विज्ञान के बिना अन्तरिक्षीय खोज -बीन करने में विज्ञान उतना सक्षम नहीं है। इस दिशा में प्राचीन भारतीय ज्ञान सहायक सिद्ध हो सकता है। इस विषय पर भारतीय प्राचीन ज्योतिर्विदों ने गहन अनुसंधान किए एवं निष्कर्ष निकाले है। आर्य भट्ट का ज्योतिष सिद्धान्त, कालक्रियापाद, गोलपाद, सूर्य सिद्धान्त और उस पर नारदेव, ब्रह्मगुप्त के संशोधन, परिवर्धन, भास्कर स्वामी का महाभास्करीय आदि दुर्लभ और अमूल्य ग्रन्थ अनेकानेक रहस्यों एवं निष्कर्षों से भरे पड़े है। ज्योतिष सिद्धान्त पुस्तक के प्रथम पाद में ज्योतिष सिद्धान्त पुस्तक के प्रथम पाद में अंकगणित, बीजगणित और रेखागणित के सिद्धान्त समझाए गये है। मात्र तीस श्लोकों में दशमलव वर्ग, क्षेत्रफल, घनमूल, त्रिभुजाकार शंकु का घनफल निकालने जैसे महत्वपूर्ण विषयों की जानकारी सूत्र रूप आबद्ध है। कालक्रियापाद में खगोलशास्त्र का विशद वर्णन है। इसी तरह उसका अन्तिम पाद 50 श्लोकों का अध्याय ‘गोलपाद’ अपने में ज्योतिष विज्ञान के महत्वपूर्ण रहस्यों पर प्रकाश डालता है। अपने पंच सैद्धान्तिक में बाराहमिहिर ने पोलिश, रोमक, वशिष्ठ, सौर और पितामह नामक पाँच ज्योतिर्सिद्धान्तों का वर्णन किया है, जो ज्योतिर्विज्ञान पर विस्तृत प्रकाश डालते है। ज्योतिर्विज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए अतीत के महान ज्योतिर्विदों द्वारा संग्रहित किया गया वह ज्ञान पथ प्रदर्शन कर सकता है।
सृष्टि के आदिकाल में विविधता कुछ भी न थी- न पृथ्वी, न पहाड़, जल, थल, नभ, तारे, विद्युत, वृक्ष, फल-फूल खेत आदि कुछ भी न था, जो कुछ इन स्थूल आँखों से देखा जा सकता है। एक परमात्मा ही तत्व रूप में सर्वत्र व्याप्त था। उस विश्वव्यापी सत्ता ने दृष्टि सृजन की इच्छा से जप किया। तप से अण्ड की उत्पत्ति और उस अण्ड से ही शरीर के विभिन्न अवयवों का विकास हुआ ऐसा ऐतरेय उपनिषद् में बताया गया है।
सृजन की इस मूल प्रक्रिया का वर्णन करते हुए उपनिषद्कार आगे बताते है क -”परमात्मा ने अपनी प्राण-देह से देवताओं को उत्पन्न किया। वे सब देवता समुद्र में आ गिरे। फिर उनमें भूख उत्पन्न हुई; उनने परमात्मा से कहा-हमारे लिए ऐसे शरीर का निर्माण करें, जिसमें रहकर हम अन्न आदि खा सकें।’ परमात्मा ने उन्हें गाय, घोड़ा आदि शरीर दिखाये; पर देवताओं को वे पसन्द न आए। अंत में उन्हें मनुष्य शरीर दिखाया, वह देवताओं को पसन्द आ गया और उसमें प्रवेश कर गए। अग्नि वाणी बनकर मुख में, वायु प्राण बनकर नासिका में और सूर्य चक्षु बनकर नेत्र गोलकों में प्रविष्ट हुआ। दिशाएँ स्रोत बनकर कानों में घुसी। औषधियों ने रोम बनकर त्वचा में वास-स्थान बनाया। चन्द्रमा मन बनकर हृदय में स्थित हुआ। मृत्यु अपान बनकर नाभि में और जल रेत बनकर उपस्थ में स्थित हो गया। परमात्मा ने तब क्षुधा और प्यास को भी सब देवताओं के अंशों में बाँट दिया और वे ही हवि ग्रहण करने लगीं। तदनंतर परमेश्वर ने जल को तपाया और अन्न की उत्पत्ति जल को तपाया और अन्न की उत्पत्ति की। अन्न को केवल अपान वायु ही ग्रहण कर सकी और उसी के द्वारा प्रत्येक देवता को वाँछित हव्य मिलने लगा।”
“अब परमात्मा ने विचार किया कि इन्द्रियों में बैठे हुए देवताओं ने अपने-अपने विषय ग्रहण कर लिये, तो फिर इनके लिए मैं कौन हुआ? यदि मैं न हुआ, तो फिर देवताओं की शक्ति का नियंत्रण कौन करेगा? तब परमेश्वर ने मनुष्य की मूर्धा को चीरकर देह में प्रवेश किया। यह द्वार ‘विहित’ कहलाता है और उसे प्राप्त करने वाला आनन्द का स्वामी बनता है। उस परमात्मा के तीन आश्रम हैं- हृदय ब्रह्मधाम और ब्रह्माण्ड। देवताओं को जब भोग से भी तृप्ति नहीं हुई, तब उनके विचार में आया कि यहाँ कौन मूल है? तब उन्होंने परमेश्वर की पहचाना और उनके दर्शन प्राप्त किये।
इस प्रकार शरीर में स्थित इन देव-शक्तियों के गर्भ में रहकर ऋषियों ने जाना कि ज्ञान-शक्ति आदेश-शक्ति विज्ञान, मेधा, दृष्टि, धैर्य, बुद्धि, मनन-शक्ति स्मृति, संकल्प, वेग, मनोरथ, कामना, भोग, प्राणशक्ति आदि सभी उस परमात्मा की सत्ता का ज्ञान कराने वाले है। जो परमात्मा को जान लेता है, वह इस लोक से उठकर स्वर्गलोक में ब्रह्म के साथ दिव्य भोगों को पाता है। वह ज्ञानी अमृतत्व को प्राप्त होता है।
ऐतरेय उपनिषद् के मंत्रों में मनुष्य जीवन की उत्पत्ति, विकास और उसके विज्ञान के ऐसे गूढ़ रहस्य छिपे हुए है, जिन्हें जान लेने वाला सचमुच महान ऐश्वर्य का स्वामी बन सकता है। मनुष्य शरीर देवशक्तियों का आश्रम है। देवशक्तियाँ समस्त गुणों वाली, ब्रह्माण्ड में सन्निहित शक्तियों की स्रोत कही जा सकती है, उनके इस शरीर में विद्यमान होने से मनुष्य के अभावग्रस्त और असमर्थ होने का कोई कारण नहीं है। परमात्मा की उपस्थिति के कारण तो वह स्वयं ब्रह्मरूप ही है, किन्तु अज्ञानतावश, वह उन शक्तियों को पहचानता नहीं और ऐसे कर्म करता है, जिससे उन देवशक्तियों का वरदान मिलने की अपेक्षा दुःख-दारिद्र्य ही हाथ लगता है। मनुष्य अनन्त शक्तियों और साधनों से सम्पन्न होकर भी पग-पग पर रोग, शोक, पीड़ा, कष्ट, बीमारी, दुर्बलता का शिकार होता रहता है। शरीर के प्रति आसक्ति के कारण वह दीन-हीन स्थिति में पड़ा रहता है।
भारतीय दर्शन के इन उच्चादर्शों को अब लोग अनर्गल और असंगत बातें कहकर टालते हैं, किन्तु पृथ्वी पर जीवन-विकास के वर्तमान सिद्धान्त, जो विद्यालयों में पढ़ाये जाते है और जो विज्ञान के मुख्य सूत्र है, उन्हें यदि तथ्य की कसौटी पर देखें, तो यह पायेंगे कि वे न तो बुद्धि -संगत है और न ही जीवन के आदि स्रोत को प्रभावित कर पाते है। विश्व-व्यवस्था की तरह पूर्ण पुरुष का प्रादुर्भाव भी ईश्वर की रहस्यपूर्ण क्रिया है।
पहली मान्यता यह थी कि मनुष्य का विकास अमीबा से हुआ है। अमीबा एककोशिकीय प्राणी है, अतः यह कहा गया कि एककोशीय जीव ने ही अंत में बहुकोशिकीय जीव के रूप अपने आपको परिणत किया। किन्तु जब मनुष्य शरीर के कोशों का अध्ययन किया गया, तो जीवन विकास की अनेक नई बातें सामने आयी और विज्ञान का एक वर्ग यह मानने लगा कि अमीबा मनुष्य की विकास-श्रृंखला का मूल घटक नहीं हो सकता। यदि ऐसा होता, तो मनुष्य शरीर के सूक्ष्मकोश जो स्वयं प्रोटोप्लाज्म से बने होते है, निकालकर एक स्वतंत्र जीव बना दिया जाना संभव होता, जबकि नये बालक का जनम गर्भाधान की विलक्षण प्रक्रिया से सम्पन्न होता है।
19 वीं और 20 वीं शताब्दी में इस संबंध में व्यापक खोजे हुई; पर वे सब अपनी-अपनी तरह से एकांगी हल ही प्रस्तुत करती है। वैज्ञानिक चेतना के अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूप का तो अध्ययन कर सके है; किंतु उसका विश्वव्यापी शक्ति के साथ कोई सामंजस्य नहीं बिठा सके। यदि मनुष्य अमीबा से मछली, मछली से सुअर, सुअर से बन्दर, बन्दर से गोरिल्ला और गोरिल्ला से वर्तमान मनुष्य रूप में आया होता, तो विकास की इस गति को आगे बढ़ते जाना चाहिए था और उस मूल प्रक्रिया को भी चलते रहना चाहिए था एवं हमें लाखों वर्ष मनुष्य योनि से आगे बढ़कर किसी और प्रकार की शरीर आकृति में बदल जाना चाहिए था। हम इतनी लम्बी अवधि तक मनुष्य ही क्यों बने रहते है? किन्तु उलटा हो यह रहा है कि धरती पर जितने भी जीवित प्राणी है, उनकी शक्तियाँ घटती ही जा रहीं है। मनुष्य भी इसका अपवाद नहीं। इससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि विकास की अपेक्षा जीव, विनाश की दिशा में चल रहे है। इसलिए विकास की यह थ्योरी गले नहीं उतरती।
चेतना यदि रसायन की देन होती, तो उसे प्रयोगशाला में बना लिया गया होता। मनुष्य के विकल्प के रूप में अब जो यंत्रमानव बन रहे है, तब इनकी जगह सीधे मानव शरीर को कारखाने में तैयार कर लिया जाता। मनुष्य -देह में जो भावना-विज्ञान छुपा हुआ है, उससे स्पष्ट है कि मनुष्य की उत्पत्ति भी उतनी ही रहस्यपूर्ण है, जितनी उसकी आन्तरिक शक्तियाँ। भौतिक शरीर तैयार हो भी जाए, तो उसमें भावनाएँ कैसे डाली जाएँ?
अब हम अपने प्राचीन दर्शन की ओर लौटते है, जिसमें परमात्मा की इच्छा से अण्ड का निर्माण, अण्ड का निर्माण, अण्ड से अनेक अवयवों का विकास और उसमें देवताओं की, परमात्मा की प्रतिष्ठा हुई। सूर्य और चन्द्रमा आदि का वर्तमान स्वरूप कुछ भी हो, पर उनका निर्माण एकाएक नहीं हुआ है। विकास या विघटन स्थूल और सूक्ष्म दोनों स्तरों पर चलता है, किन्तु उनका आदि-आविर्भाव किसी पराशक्ति की ही महान चमत्कार हो सकता है-इस बात को अब शरीर विज्ञान के पण्डित भी मानने लगे है। ऑकल्ट एनोटॉमी के प्रसिद्ध विद्वान एलनलियो ने अपनी रचना ‘इण्टरकम्यून्यन ऑफ मैन विद दि काँसमस’ में उपर्युक्त भारतीय दर्शन का समर्थन करते हुए लिखा है। कि यदि हम इतने बुद्धिमान होते कि विश्व व्यवस्था को अच्छी तरह समझ लेते, तो यह देखते कि सूर्य-चन्द्र एवं अन्य ग्रहों का शरीर के समस्त अवयवों एवं उनके कार्यों पर कितना हस्तक्षेप है।
'दि माइक्रोकोस्म वरसस दि मैक्रोकोसम’ नामक अपने ग्रन्थ में डॉ. जे. आर. हर्बर्ट ने शरीर की जटिल प्रक्रियाओं का विस्तृत अध्ययन करने के बाद लिखा है कि यह बड़े आश्चर्य की बात है कि सारी-की-सारी प्राकृतिक कला और ज्ञान नक्षत्रों द्वारा मनुष्य समाज को मिला है। सारे बुद्धिजीवी प्राणी नक्षत्रों के ही शिष्य हैं। वे उनकी प्रगति में सहायक सिद्ध होते है। ऑकल्टएनोटॉमी यह मानती है कि मनुष्य के दो शरीर है-एक पंचतत्वों से विनिर्मित है स्थूल, दूसरा सूक्ष्म है, जो नक्षत्रों (यहाँ इसकी संगति ऐतरेय उपनिषद् में वर्णित देवशक्तियों से बैठ जाती है ) से बना हुआ है एवं उन्हीं की शक्ति से कार्य करता है।
हमारे शरीर का स्थूल भाग जो दृश्य और स्पृश्य है, पृथ्वी से बना है। यह कितने आश्चर्य की बात है कि अन्य लोकों में तथा चन्द्रमा, सूर्य, बुध, बृहस्पति आदि में जो ठोस तत्व है, वह पृथ्वी की देन है। पृथ्वी भी अपने अणुओं को उसी प्रकार बिखेरती रहती है। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार अपनी-अपनी शक्तिधाराओं द्वारा नक्षत्रों ने पृथ्वी को आच्छादित कर रखा है, पृथ्वी भी सभी नक्षत्रों पर छायी हुई है। सब अन्योऽन्याश्रित है।
इस जटिल प्रक्रिया को मनुष्य की मस्तिष्क प्रणाली को समझकर अनुभव किया जा सकता है। मस्तिष्क कोश दो पर्तों का बना होता है- सफेद एवं भूरा तत्व। सफेद तत्व नसें बनाता है और भूरा नसों में गैग्लियन। गैग्लियन में न्यूक्लियस वाली नसें पायी जाती है, जो प्रोटोप्लाज्म के भीतर तक धँसी होती है और फास्फोरस तत्व वाली होती है। फास्फोरस अग्नि तत्व है और वह जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। शरीर में अग्नि की मन्दता ही अपच, अजीर्णता, कान्तिहीनता, दुर्बलता और रोगों का कारण होती है। अग्नि न हो, तो मनुष्य निर्बल और कमजोर पड़ जाए। यह अग्नि तत्व सूर्य नक्षत्र का अदृश्य भाग ही है। फास्फोरस तत्व शरीर में आहार प्रक्रिया पर उतना आधारित नहीं है, जितना कि मस्तिष्क की उत्थान प्रक्रिया से। भौतिक विज्ञान अभी केवल स्थूल संरचना को देखता है, किन्तु भौतिक विज्ञान और मेटाफिजिक्स संयुक्त रूप से यह समझ सकेंगे कि ब्रह्माण्डव्यापी ऊर्जा शारीरिक तत्वों में कैसे बदलती है और उसे शक्ति के साथ ही बुद्धि, मेधा, प्रज्ञा प्रदान करती है।
एक आम का वृक्ष लगाये, उसे पर्याप्त खाद-पानी दें, किन्तु उस पर सूर्य का प्रत्यक्ष प्रकाश न पड़े तो उस वृक्ष में फूल और मीठे फल उपलब्ध नहीं किये जा सकेंगे, क्योंकि खटाई, मिठाई, रंग यह सब सूर्य की रश्मियों से ही ग्रहण किये जाते है। तात्पर्य यह कि पृथ्वी में पाया जाने वाला अस्वाद भाग भी उसका अपना नहीं है। वह सब कुछ ब्रह्माण्ड में कहीं सूक्ष्म रूप में विद्यमान है और यदि कोई उस विज्ञान को सीधे-साधे समझ ले, तो वह मनुष्य किसी भी स्थान पर, किसी भी क्षण मनचाहे कितना भी तत्व या पदार्थ अपने लिए आकर्षित कर सकता है।
आर्षग्रन्थों में गौ नाम सूर्यप्राण का है। उससे मिलकर यह पृथ्वी प्राण आस्वाद योग्य रस बनाता है। इसलिए जो भी आस्वाद वस्तुएँ है, जब उन पर सूर्य का सीधा हस्तक्षेप है, तब मनुष्य शरीर का तो कहना ही क्या! हम तो सूर्य के बिना चल-फिर भी नहीं सकते।
भिन्न-भिन्न तत्व जलने पर अलग-अलग प्रकार का प्रकाश उत्सर्जित करते है। ये प्रकाश साधारणतया आँखों से देखने पर एक-से प्रतीत हो सकते है, परंतु इन प्रकाशों का विक्षेपण (डिस्पर्शन) करके यदि इनका वर्णक्रम अध्ययन किया जाए, तो पता चलता है कि प्रत्येक प्रकार के प्रकाश के वर्णक्रम में एक विशिष्टता होगी और वह दूसरे प्रकार के प्रकाश से भिन्न होगी। उदाहरणार्थ- सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम के लवणों से निकलने वाले प्रकाश लगभग एक जैसे होते है, किंतु इनका वर्णक्रम भिन्न होता है।
इन विशेषताओं का अध्ययन करके तत्व का ज्ञान हुए बिना यह बताया जा सकता है कि प्रकाश कौन-से तत्व से आ रहा है। इतना ही नहीं, वरन् एक से अधिक तत्वों के मिश्रण को जलाकर और मिश्रित प्रकाश के वर्णक्रम का अध्ययन करके यह बता सकना संभव है कि मिश्रण में कौन-कौन से तत्व विद्यमान है।
अब इस विश्लेषण का दूसरी तरह से अध्ययन करें, तो हम निश्चित ही इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि प्रकाश जिस तरह पदार्थों की ज्वलन शक्ति है, उसी प्रकार उसमें स्थूल पदार्थों के अणु भी है। पदार्थ से प्रकाश और प्रकाश से पदार्थों का परिवर्तन-यह एक चक्र है और इसी सिद्धान्त पर शरीर में स्थूल को हम पदार्थ रूप में देखें, तो चेतना प्रकाश ही होगी और प्रकाश चूँकि मिट्टी (पृथ्वी) के अणु की देन नहीं तथा वह भिन्न-भिन्न प्रकृति का होता है, इसलिए भिन्न प्रकृतियाँ निस्संदेह आकाश के भिन्न-भिन्न नक्षत्रों (देवताओं) के प्राण या प्रकाश-प्रवाह कहे जाएँगे। तभी आकाश-स्थित देवताओं की शरीर में विद्यमानता सिद्ध होगी।
शरीर में हाथ-पाँव रक्त, माँस, मज्जा को स्थूल पदार्थों की रासायनिक क्रिया कह सकते है। मन, बुद्धि, प्राण, इच्छा, ज्ञान-इन सूक्ष्म गुणों को पदार्थ नहीं कह सकते, जबकि मनुष्य का जीवन इन्हीं से सधा हुआ हैं आदमी जिस दिन मर जाता है लाश बनी रहती है, तो भी वह गति नहीं कर सकता। गति और क्रियाशीलता प्रकाश का गुण है, भले ही वह किसी भी आकृति -प्रकृति का क्यों न हो। यदि अन्न से ही मन, प्राण, बुद्धि, चित्त, अहंकार का निर्माण होता है, तो यह उसके स्थूल दृश्य न होकर केन्द्रक ही होगा और वह केन्द्रक आच्छादित आकाश के किसी नक्षत्र द्वारा आकर्षित शक्ति कण ही हो सकते है, जो शरीर में पहुँचकर अपना-अपना स्थान ग्रहण करते है। मन को चन्द्रमा की तेजस् शक्ति कहते है। चन्द्रमा किस प्रकार वनस्पति और वनस्पति ही मन का निर्माण करती है- इस संबंध में पहले ही बताया जा चुका है। यह वह निष्कर्ष है, जिसे वैज्ञानिक जान चुके है। अन्य देवताओं की स्थिति शरीर में कहाँ और किस प्रकार है-यह तब पता चलेगा, जब विज्ञान का प्रवेश मस्तिष्क से फैलने वाले नाड़ी-जाल और उनके भीतर की रहस्यमय प्रक्रिया में होगा। अभी तक जितना भी समझा जा सका है, वह अति गंभीर और भारतीय दर्शन की ही पुष्टि करने वाला है।
मस्तिष्क का अध्ययन करने वाले डॉक्टर और वैज्ञानिक यह मानते है कि शरीर में दो प्रकार की नसों का जाल बिछा हुआ है- सिम्पैथेटिक एवं पैरा-सिम्पैथेटिक नसें। सिम्पैथेटिक-यह शरीरगत भाग की नसें है। उनसे पाचनक्रिया चलती है। खाद्य से शक्ति चूषण और रक्त परिभ्रमण का कार्य भी यही नसें करती है। ग्रन्थियों से होने वाले स्राव को यह नसें ही नियंत्रित करती है। शरीर की टूट-फूट को जोड़ना और मल-मूत्र बाहर निकालने में इन नसों का ही योगदान रहता है। जब मस्तिष्क की सुषुम्ना प्रणाली की नसें विश्राम करती है, तब यही सिम्पैथेटिक प्रणाली टूट-फूट जोड़ती, माँस और अन्य शरीर कोशों में जो क्षति हुई होती है, उसे सुधारती रहती है।
इन नसों के मूल स्रोत और शक्ति का पता लगाते हुए शरीरशास्त्री जब मस्तिष्क में पहुँचे,तो उन्होंने पाया कि नसें मात्र इच्छा प्रवाह है और आगे चलकर वे जटिल और स्थूल रूप ले लेती है, इसलिए शरीरशास्त्रियों का एक वर्ग मनोविज्ञान का समर्थक हो गया और यह मानने एवं कहने लगा कि मनुष्य अपनी इच्छाओं को स्वस्थ, पवित्र एवं सृजनात्मक बनाकर अपने स्वास्थ्य को स्थिर रख सकता है। अधोगामी विचारों और कुप्रवृत्तियों से अपने आपको बचाकर अपना स्वास्थ्य भी बचाये रख सकता है।
मनोविज्ञान का यह सिद्धान्त जितना विकसित हुआ, उतनी ही महत्वपूर्ण मन और मानवीय चेतना के गुणों संबंधी बातें सामने आयी। शरीर विज्ञानी अब यह भी मानते है कि इच्छाशक्ति धाराओं और रंगों के रूप में मस्तिष्क प्रणाली के कोषों में बहती देखी जा सकती है।
शरीर, हृदय या मन के कष्ट मस्तिष्क को प्रभावित करते है, इसलिए जब तक मस्तिष्क की शक्तियों का पता नहीं चलता, तब तक इच्छाएँ और भावनाएँ भी मनुष्य को सुख एवं आत्मिक शान्ति प्रदान नहीं कर सकतीं जब वैज्ञानिक यह मानने लगे है। कि मस्तिष्क आध्यात्मिक ब्रह्माण्ड से प्रभावित है और जीवन सुधार के लिए उसकी जानकारी नितान्त आवश्यक है।
मस्तिष्क के इस भाग को ‘अवचेतन मन’ कहते है और वह जिन नसों से शेष शरीर के साथ संबंध स्थापित करता है, उन्हें पैरा-सिम्पैथेटिक नसें कहते है। यह जिन कोशों से बना है, वह रेशों के कुँज ही जान पड़ते हैं, वही शरीर की तन्मात्राएँ ग्रहण करते है और सुषुम्ना प्रवाह से लेकर रीढ़ की हड्डी के सारे भाग में छाये रहते है। हृदय स्थित मन से यह संबंध स्थापित कर उसे शक्ति देते है। यदि मन को विकसित कर दिया जाए और सुषुम्ना प्रवाह में निवास करने वाली इन शक्तिधाराओं को ऊर्ध्वगामी बना लिया जाए, तो मनुष्य आकाश स्थित अदृश्य शक्तियों की महत्वपूर्ण और आश्चर्यजनक जानकारियाँ एवं रहस्य प्राप्त कर सकता है। देवताओं का संबंध भी इस प्रणाली से है। इसे ही द्वार’ कह सकते है। अभी उसकी विस्तृत जानकारी नहीं हो पायी है, पर यदि विज्ञान किसी तरह इसे नियंत्रित कर सका, तो अन्तरिक्षीय ज्ञान अत्यन्त सुलभ हो जाने की संभावना है।
अंगिरा के पुत्र सुमेध जब युवा हुए तो उनके मन में एक निश्चय जाग्रत हुआ। उन्होंने निश्चय किया, “ मैं जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त होकर रहूँगा।” अपने प्रश्न के समाधान के लिए उन्हें अन्यत्र जाने की जरूरत ही नहीं थी। सुमेध अपने प्रश्न का उत्तर पाने के लिए अपने पिताश्री अंगिरा के सामने उपस्थित हुए।
पुत्र को एक विशेष मुद्रा में उपस्थित देखकर अंगिरा ने पूछा-बेटे अभी यहाँ उपस्थित होने का कारण बताओ “पिताश्री, मेरे मन में एक प्रश्न बहुत दिनों से उमड़-घुमड़ रहा है कि इस संसार -सागर से कैसे पार हुआ जा सकता है?”
“पुत्र!नाना अनर्थ रूपी संसार सागर से पार होने का एक ही उपाय है, सर्व त्याग!” महर्षि के इन वचनों में मानो स्वानुभूति सत्य की उद्घोषणा थी।
पिता का उपदेश सुनकर सुमेध ने सादर प्रणिपात किया और वन की ओर प्रस्थान किया।
महर्षि अंगिरा को पुत्र के वन गमन से कोई खेद नहीं हुआ, न कोई शोक हुआ और न कोई चिन्ता। पुत्र अच्छी और सच्ची राह पर जा रहा हो तो उससे किसी विचारवान पिता को प्रसन्नता ही हुआ करती है।
सुमेध को पितृगृह से गए आठ वर्ष बीत गए। कितना ही बड़ा ज्ञानी-विज्ञानी हो, लेकिन पिता के रूप में पुत्र की कुशलता जानने की इच्छा तो होती ही है। महर्षि जानना चाहते थे कि सुमेध इस समय किस दशा में है।
अंगिरा अपने पुत्र सुमेध का हाल-समाचार जानने के लिए तपोवन पहुँचे। पिता को सामने उपस्थित देखकर सुमेध अत्यन्त प्रसन्न हो गए। उन्होंने पिता को प्रणाम किया, उनकी अभ्यर्थना की और कहा-भगवान्! सर्व त्याग किए मुझे आठ वर्ष से कुछ अधिक ही हो गए, किन्तु मुझे अभी तक शान्ति नहीं मिली।”
महर्षि ने आदेश के स्वर में कहा-पुत्र सभी का त्यागी करो।” इतना कहकर वह अदृश्य हो गए। उनके अदृश्य होने पर सुमेध ने अपने शरीर पर से वल्कल भी उतार दिए। अब वह बिलकुल दिगम्बर-अवधूत बन गए। उन्होंने हिमालय स्थित वह आश्रम भी छोड़ दिया। धूप, शीत या वर्षा से बचने के लिए अब वे गुफा में भी नहीं जाते। एक स्थान पर वह नहीं रहते। उन अवधूत का अब न कोई आश्रय था, न आश्रम। अब वह क्षीणकाय हो गए थे।
सब कुछ छोड़ देने के बावजूद भी व्यक्ति का मन शांत नहीं होता। शान्ति का सम्बन्ध तो मन से है, वस्तु से नहीं। वस्तु दुखदायी भी हो सकती है और सुखदायी भी। सुख और दुख वस्तु में नहीं है, वह तो मन में है। सब कुछ छोड़ देने के बाद भी यदि लगता है कि मन शान्त नहीं हुआ तो निश्चित ही उसमें कोई फाँस फँसी रह गयी है।
इस तरह तीन वर्ष और बीत गए। महर्षि अंगिरा एक दिन फिर से सुमेध के सामने आए। इस बार उन्होंने पुत्र का स्नेहमय आलिंगन किया। सुमेध ने पिता से कहा-भगवान् मैंने आश्रम, वल्कल, कमण्डलु आदि सबका त्याग कर दिया है, किन्तु आत्मतत्त्व का ज्ञान मुझे अब तक नहीं हुआ है।”
महर्षि अंगिरा बोले-पुत्र चित ही सब कुछ है, तुम उस चित का ही त्याग करो। चित का त्याग ही सर्व त्याग कहा जाता है।”
महर्षि, सुमेध को उद्बोधित कर चले गए। सुमेध बैठकर सोचने लगे कि चित है क्या? और इसका त्याग कैसे किया जाय? बहुत सोचने-विचारने पर भी जब उन्हें चित का पता जाने की सोची। वे पिता से मिलने उनके आश्रम पहुँचे। प्रणाम के अनन्तर उन्होंने अपने मन को व्याकुल करने वाला प्रश्न पूछा-भगवन् आपने चित त्याग की बात कही थी, लेकिन चित है क्या? मुझे इसके स्वरूप के बारे में समझाइए।
महर्षि ने कहा-आयुष्मान् चित और कुछ नहीं, अपने अहंकार से लिपटे हुए संस्कार ही चित है। देह के प्रति जो अहंभाव है, यही त्याज्य है।” सुमेध के सामने एक समस्या और उलझ गयी। उन्होंने फिर पूछा-इस अहंकार का त्याग कैसे हो सकता है? मुझे तो यह असम्भव लगता है।”
अंगिरा हँस पड़े और बोले-पुत्र! अहंकार का त्याग तो एक सुकोमल पुष्प को मसल देने की अपेक्षा भी सुगम है। इस त्याग में कोई क्लेश है ही नहीं। जो वस्तु अज्ञान से उत्पन्न होती है, वह ज्ञान होने पर स्वतः नष्ट हो जाती है। एक ही चेतनसत्ता सर्वत्र व्याप्त है। उस साक्षी के अपरिचय के कारण देह में मोहवश अहंभाव हुआ है। साक्षी का परिचय होने पर स्वतः नष्ट हो जाएगा। जैसे रस्सी में सर्प की प्रतीति होती है, उसी प्रकार यह समस्त प्रपंच एक ही चेतनसत्ता में प्रतीत हो रहा है, वस्तुतः इसकी कोई सत्ता नहीं है। एक आदि-अनन्त-चैतन्य मात्र ही सत्य है। “
“एक ही चिन्मात्र सत्ता में यह दृश्यों क्यों हैं, कैसे हैं, इसका क्या स्वरूप है, यह बात अनिवर्चनीय है। क्योंकि जो वस्तु है ही नहीं, केवल भ्रम से प्रतीत हो रही है, उसका विवेचन सम्भव नहीं है। इस भ्रम में सदा सब समय निर्विकार रूप से जो अहं का ज्ञान है, वह अहं देह नहीं है, मन नहीं है। हे वत्स! देह में अहंभाव को त्याग का जो सबकी आधारभूत चितसत्ता है, ब्रह्म है, वही मैं हूँ। ऐसा निश्चय करो।”
महर्षि अंगिरा ने इस प्रकार सुमेध को उद्बोधित कर उसकी जिज्ञासा का समाधान कर दिया। सुमेध को उद्बोधित कर उसकी जिज्ञासा का समाधान कर दिया। सुमेध ने सम्पूर्ण अंतःकरण से पिता द्वारा दिए गए प्रकाश को ग्रहण किया। उनकी अहंता (अहंभाव) और ममता नष्ट हो गयी और वे शुद्ध आत्मतत्त्व में स्थित हो गए।
बर्र एक छोटा-सा जीव लगता है, बड़ी मधुमक्खी का भी शरीर पौन इंच से बड़ा नहीं होता, पर कभी छेड़ दिया जाए तो इनकी भयंकरता देखते ही बनती है। इसी प्रकार मनुष्य की चित-वृत्तियाँ जिनका सामान्य अवस्था में न तो कोई स्वत्व दिखाई देता है, न मूल्य न महत्व, पर जब इन्हीं को कुचला और नियन्त्रण में रखने का अभ्यास किया जाता है, तब इनकी भयंकरता देखते ही बनती है। राक्षसी सुरसा की तरह अनेक रूप बनाने में पटु यह चित्तवृत्तियाँ मनुष्य को लुभाती ही नहीं, डराती और धमकाती भी है। निर्बल मन और अस्थिर बुद्धि के व्यक्ति उनकी एक ही झपेट में ठण्डे होकर योगाभ्यास छोड़ बैठते है और इस तरह आत्मानुभूति की इच्छा मन की मन में में ही रह जाती है।
अर्जुन जैसे महारथी को भी यही कहना पड़ा था-
चंचल हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्। तस्यां निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥
हे भगवान्! यह मन बड़ा चंचल है, मस्तिष्क को मथ डालता है। यह बहुत दृढ़, शक्तिशाली है, इसीलिए इसको वश में करना बहुत कठिन है। किन्तु योगाचार्यों का मत है कि यह कठिनाइयाँ कुछ ही दिन की होती है। यदि अभ्यास बन्द न किया जाये तो यही मन एक दिन सर्वोत्तम समीपस्थ मित्र की भाँति अनुकूल आचरण करने वाला हो जाता है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन की बात स्वीकार करते हुए कहा था-निःसन्देह अर्जुन! मन बड़ा चंचल है, पर निरंतर अभ्यास से वह भी वश में आ जाता है। योग एक लंबी अवधि का अभ्यास है। जो देर तक उसमें स्थिर रह सकता है, वहीं अंतिम सिद्धि तक पहुँच सकता है, यह पहले ही मन में बिठा लेने की बात है।
चित्तवृत्तियों के निरोध के दो उपाय है-पहला मनोवैज्ञानिक, दूसरा वैज्ञानिक। प्रथम प्रकार के सभी उपाय मानसिक है, उनमें अपने मन को ही इस बात के लिये राजी किया जाता है कि वह अपने आप संसार की क्षण-भंगुरता अनुभव करे और इस बात की जिज्ञासा जाग्रत करे कि हम वस्तुतः है क्या, मनुष्य शरीर में हम किस तरह फँसे पड़े है, किस तरह उससे मुक्ति और पूर्ण आनन्द, जिसके लिये हमारी चाह अनवरत है, प्राप्त हो सकती है।
योगदर्शन पाद 1, सूत्र 12 में बताया है- “अभ्यासवैराग्याभ्यान्तन्निरोधः।” अर्थात् निरन्तर वैराग्य का अभ्यास करने से मन की पार्थिव वृत्ति बदल जाती है। इसी बात को भगवान कृष्ण ने “अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।” निरन्तर वैराग्य का अभ्यास करने से मन की वृत्तियाँ धीरे-धीरे वश में आने लगती है।
दूसरा उपाय है- “ईश्वर प्रणि धानाद्वा” (योग 1/23) अर्थात् अपने आपको परमात्मा में मिलाने का अभ्यास करने से मन की प्रवृत्तियाँ ऊर्ध्वगामी होने लगती है।
यहाँ दी जा रही साधनावधि का प्रतिदिन थोड़ी देर तक अभ्यास करने से अपना वैराग्य और ईश्वरप्राप्ति का भाव दृढ़ होता है, यह अभ्यास कोई भी अपनी सुविधानुसार कर सकता है। जानकारी के लिये दो अभ्यास नीचे दिये जा रहे है।
किसी समतल और एकांत स्थान में कोई वस्त्र बिछाकर सीधे चित लेट जाइए, दोनों पाँव सीधे और मिलाकर रखने चाहिए, दोनों हाथ छाती के ऊपर रखिये, अब शरीर को पूर्ण निश्चेष्ट करके बिलकुल शिथिल छोड़ दीजिये। ऐसा जान पड़े जैसे प्राण, शरीर से निकलकर प्रकाश के एक गोले की तरह हवा में स्थिर हो गया है ओर शरीर मृत अवस्था में बेकार पड़ा है, अब एक-एक अंग की ओर ध्यान दीजिए-कल तक यही आँखें अच्छी-अच्छी वस्तुएँ देखने का हठ करती थीं, अब क्यों नहीं देखतीं और यह मुख जो बढ़िया-बढ़िया खाने को माँगता था-कैसा बेकार पड़ा है।
नाक,आँख, मुख, कण्ठ, छाती, हाथ-पैर आदि घृणित अंगों को बार-बार देखिये, जिनमें कफ़, थूक, मल-मूत्र के अतिरिक्त कुछ भी तो नहीं रह गया है। यथार्थ वस्तु जो कि आत्मचेतना थी, वह तो अभी भी मेरे ही साथ है, क्या मैंने इस शरीर के लिये ही अपने इस प्रकाश शरीर को, आत्मा को भुला दिया था? अब तक इसी शरीर के लिये जो पाप कर रहा था, वह क्या उचित था? ऐसे ही प्रश्न उठाने चाहिए, जिससे साँसारिक भाव नष्ट हो और मन यह मानने को विवश हो कि हम अब तक भूल में थे- “मनुष्य का यथार्थ जीवन-शरीर नहीं आत्मा है।”
किसी शान्त,एकान्त स्थान में कुश आदि कोई पवित्र आसन बिछाकर बैठिए। आसन समतल स्थान पर होना चाहिए। शरीर, सिर एवं ग्रीवा का सीधा रखकर अधखुले नेत्रों से नासिका के अगले भाग को देखे। दृष्टि और मन को दूसरी ओर नहीं जाने देना चाहिए। यदि जाता है तो उसे बार-बार अपने मूल अभ्यास को याद दिलाकर एकाग्र करना चाहिए।
जब मन शान्त हो तब ऐसा ध्यान करें कि मैं प्रकाश के एक कण, तारा या जुगनू की तरह हूँ और नीले आकाश में घूम रहा हूँ। सूर्य की तरह का उससे भी हजारों गुना बड़ा और तेज चमक वाला एक प्रकाश पिण्ड आकाश में दिखाई दे रहा है, उसी की किरणें फूटकर निखिल ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो रही है। हजारों सूर्य उसके आस-पास चक्कर काट रहे है। मैं जो अभी तक एक लघु प्रकाश कण के रूप में अशक्त, अज्ञानग्रस्त और सीमाबद्ध पड़ा था, अब धीरे-धीरे उस परम प्रकाश पुँज में हवन हो रहा हम, अब मैं। रह ही नहीं गया। या तो करोड़ों कोस के विस्तार वाला गहरा नीला आकाश है या फिर वहीं दिव्य प्रकाश, जिसमें घुलकर मैं अपने आपको सर्वव्यापी, सर्वदर्शी सर्वज्ञ और सर्वसमर्थ अनुभव कर रहा हूँ।
ये दो अभ्यास वैराग्य और ईश्वरप्राप्ति की कामना को बढ़ाने में बहुत सहायक हो सकते है। अपनी सुविधानुसार कोई भी स्त्री-पुरुष इन साधनाओं का अभ्यास कर सकता है।
उपर्युक्त दो अभ्यास महत्वपूर्ण है, इनसे मनोनिग्रह में सहायता मिल सकती है, पर इतने से ही वश में आ जाय यह कोई आवश्यक नहीं। हम आज जिस स्थिति में है, वह कई जन्मों का विकसित रूप है, मनुष्य के पूर्वजन्मों के पाप और वासनाओं के संस्कार जो मन में कई पर्तों में जमे होते है, वे बार-बार उन्हीं वासनाओं की ओर घसीटते है, इसलिये साधक की वृत्तियाँ कभी भी उद्दीप्त हो उठती है। उसके लिये वैज्ञानिक विधियाँ काम में लाई जाती है। शरीर और मन की अन्तरंग सफाई यौगिक क्रियाओं से की जाती है, तब निर्मलता आती है, इसलिये आत्म-निर्मलता आती है, इसलिये आत्मसाक्षात्कार की इच्छा रखने वाले किसी भी साधक के लिये यह आवश्यक हो जाता है कि वह अष्टांग योग का अभ्यास करता हुआ, आत्मा का विकास परमात्मा की ओर करे। ये आठ अंग क्रमशः (1) यम, (2) नियम (3) आसन (4) प्राणायाम (5) प्रत्याहार (6) धारण (7) ध्यान और (8) समाधि है। इनका अभ्यास करने से कठिन मलिनता भी नष्ट हो जाती है और निर्मल ज्ञान- प्रकाश एवं विवेक-बुद्धि की वृद्धि होती है। योगियों के पास दिखाई देने वाली कई सिद्धियाँ और चमत्कार जैसी दीखने वाली अनुभूतियाँ भी इन्हीं आठ अंगों में उत्तरोत्तर अभ्यास और विकास द्वारा उपलब्ध होती है, पर उनका कुल लाभ आत्मा या ईश्वर की प्राप्ति ही है, इसलिये किसी को भी चमत्कार और सिद्धियों की ओर मन न लगाकर केवल आत्म-कल्याण का ही विचार करना चाहिए।
इन आठ अंगों की संक्षिप्त जानकारी योग-साधक के लिये आवश्यक है। (1) यम कहते है-असत्य को मारना। हमारे जीवन में झूठ-फरेब अनायास आदि का समावेश सत्य के प्रति अनास्था का फल है। असत्यशील व्यक्ति ही परमार्थ से गिरते हैं, इसलिये ऐसे क्षणों में अपने आपको दबाकर-बचाकर रखना यम कहलाता है। उसके लिये प्रारम्भिक अभ्यास किसी एक व्रत से करना चाहिए, उदाहरण के लिए, अधिक न बोलना, झूठ न बोलना, किये हुए उपकार की न भूलना, किसी से ईर्ष्या न करना आदि ऐसा कोई एक संकल्प लें, जब उसका अच्छी प्रकार अभ्यास हो जाय, तब दूसरा, इस तरह करते हुए, सभी असत्य आचरण छोड़ने से यम सिद्धि होती है।
नियम उसका पूरक अंग है, अर्थात् बुराई के परित्याग के साथ अच्छाई या किसी सत्य का अनुशीलन नियम कहलाता है। उससे बुरे संस्कारों के स्थान पर श्रेष्ठ सद्गुणों की प्रतिष्ठा होती है।
आसन-देर तक निश्चल होकर बैठने को आसन कहते है, पर ऐसा तभी हो सकता है, जब शरीर का प्रत्येक अंग स्वस्थ हो। स्वास्थ्य के लिये जितने भी उपाय डॉक्टरों, वैद्यों और वैज्ञानिकों ने खोजे है, वह सब बाह्य है और अपूर्ण जानकारी वाले है। योगाचार्यों ने देखा कि शरीर में ही भगवान ने वह सब शक्तियाँ और सामग्रियाँ पहले से ही रखी है, जिनका यथोचित उपयोग करके कोई भी व्यक्ति पूर्णतया स्वस्थ व निरोग रह सकता है। आसन उन स्थानों को जो शरीर के मर्म और विशेष महत्व के है, खोलने और लाभ लेने की वैज्ञानिक विधा है। 84 प्रकार के आसन शरीर को सुगठित और शक्तिशाली ही नहीं, शुद्ध और रोगमुक्त भी करते है। जिनके अभ्यास से रोगी व्यक्ति भी औषधोपचार की भाँति स्वास्थ्य लाभ कर सकते है।
प्राणायाम का सम्बन्ध केवल श्वास खींचने, रोकने और श्वास छोड़ने भर से नहीं है वरन् शरीर की सम्पूर्ण चेष्टाओं का नियन्त्रण भी प्राणायाम से ही होता है। छींक, जम्हाई, अँगड़ाई, आँखों का मिचकना, थूक का बार-बार निगलना, लघुशंका ऐसी क्रियाएँ शरीर में स्वतः उत्पन्न होती है। ये न तो मनुष्य का इच्छा से ही होती है और न ही सामान्य मनुष्य इन पर नियन्त्रण रख सकता है। ये शरीर के विभिन्न प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान आदि वायु के गुण-धर्म हैं, उनकी जानकारी होने और नियन्त्रण करने का सारा विज्ञान प्राणायाम कहलाता है। जीवित अवस्था में ही सूक्ष्म शरीर से बाहर निकल आना, दूरगमन, दूरानुभूति, परकाया प्रवेश आदि सब प्राणायाम के ही चमत्कार हैं, पर यह सब पीछे की बातें है। प्रारम्भ में इसका उपयोग मनोनिग्रह के लिये है, उससे मन की निर्मलता बढ़ती है, जिससे मन अपने आप शाँत और प्रफुल्ल बनने लगता है।
मन को बाह्य विषयों से रोकने के लिये प्रत्याहार करना पड़ता है। मन वस्तुतः और कुछ नहीं, अन्न का ही सूक्ष्म संस्कार है। अन्न ही रस-रक्त माँस-मज्जा अस्थि-वीर्य आदि बनता हुआ, मन, बुद्धि, चित, अहंकार आदि सूक्ष्म शक्तियों, अन्तः करण चतुष्टय के रूप में परिलक्षित होता है। यदि हम अपना आहार शुद्ध कर लें तो यह स्वाभाविक है कि अपना अन्तः करण चतुष्टय भी शुद्ध हो जाये। खारी गन्ने का गुड़ खारी बनता है, उसी प्रकार दूषित ही होगा। मन को शुद्ध और पवित्र ही होगा। मन को शुद्ध और पवित्र ही होगा। मन को शुद्ध और पवित्र रखने के लिये शुद्ध आहार आवश्यक है, यह सारी जानकारी प्रत्याहार के अंतर्गत आती है।
धारण कहते है, मन को किसी एक स्थान या देश में स्थिर करने को। प्रकाश के बारे में कहा जाता है कि उसका एक कण एक सेकेण्ड में 186000 मील चलता है, किन्तु मन की गति के बारे में वैज्ञानिक आज तक हजार कोशिशों के बावजूद भी नहीं जान पाये। मन के चलने की कक्षा का भी पता नहीं चल पाया। पर वह एक अति समर्थ शक्ति, यह सभी जान गये है। उससे कोई लाभ इसीलिये नहीं ले पाते, क्योंकि वह बहुत अधिक चंचल है, स्थिर रहना उसका स्वभाव नहीं। धारणा रोककर विश्लेषण कराना उसी तरह सिखाते है, जैसे मदारी बन्दर को, सरकस वाला शेर को। धारण से मन को एक स्थान पर रोकने का अभ्यास करते है।
ध्यान भी धारण की ही स्थिति है, पर उसमें इन्द्रियों की चेष्टाएँ चाहे वह सूक्ष्म ही क्यों न हो, समाप्त हो जाती है, इसलिये मन औरों के मन की, पदार्थों की, दूसरे किसी की भी हो रही बात-चीत आदि की जानकारी हजारों मील दूर बैठा होने पर भी ले लेने में समर्थ होने लगता है। दूरश्रवण, दूरदर्शन, भविष्यज्ञान आदि ध्यान की ही सिद्धियाँ है।
और इस तरह जब ध्यान पूर्णतया निश्चेष्ट होकर केवल मात्र अतीन्द्रिय सुख में ही स्थिर हो जाय वह अवस्था समाधि कहलाती है। इसके लिये कोई अभ्यास नहीं करना पड़ता। उपर्युक्त सातों अवस्थाओं से पकी हुई स्थिति ही समाधि है, इस अवस्था में पहुँचा हुआ योगी अपने शरीर में ही विराट ब्रह्म के दर्शन करता है। ‘सदासार स्तोत्र’ में जगद्गुरु शंकराचार्य ने उसी का वर्णन करते हुए लिखा है-
देहों देवालयों प्रोक्तो देही देवो निरंजन। अर्चितं सर्वभावेन स्वानुभूत्या विराजते॥
अर्थात् उचित प्रकार से योगाभ्यास और परमार्थ करने से इसी शरीर में ही निरंजन परमात्मा के दर्शन होते है।
यह योग संसार में हर किसी के लिये सुलभ हैं। ऊँच-नीच, स्त्री-पुरुष जाति-पाँति का कोई भेद नहीं-
ब्राह्मण क्षत्रिय विशाँ शूद्राणाँ च पावनम्, शाँतये कर्मणामन्य द्योगान्नस्ति विभुक्तये।
युवा वृद्धोऽतिवृद्धो वा व्याधिष्ठो दुर्बलोऽपिवा, अभ्यासात्सिद्धिमापनोति सर्व योगेष्वतंद्रितः-हठयोग प्रदीपिका
अर्थात्-ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र व स्त्री योग का अधिकार सब को है। युवक हो या वृद्ध और जिनका शरीर बहुत ही जीर्ण हो गया हो, जो बीमार, रोगी तथा इन्द्रियों की दुर्बलता से ग्रस्त हैं,वे भी योग का अभ्यास कर सकते है। यह सभी को सिद्धि, शाँति और मुक्ति देने वाला मार्ग है। इससे बड़ा अन्य कोई साधन आत्मिक प्रसन्नता की प्राप्ति के लिये संसार में है नहीं।
वैशाली महानगरी आज दुल्हन की भाँति सजी थी। सर्वत्र हर्ष-उल्लास का वातावरण था। राज्य महोत्सव मनाने के लिए यह सब तैयारियाँ हुई थी। बाल-वृद्ध नर-नारी सभी महोत्सव में भाग लेने के लिए राजमहल के समीप प्रांगण में एकत्रित हुए थे। राज्य नर्तकी का नृत्य आरम्भ हुआ। नृत्य की मस्ती में धीरे-धीरे राजा और प्रजा सभी डूबते जा रहे थे।
अचानक महल में लगे विशाल घण्टे की आवाज ने सबका ध्यान तोड़ा। पर यह क्या? घण्टा तो निरंतर बजता ही जा रहा था। राज-परम्परा के अनुसार घण्टे का निरन्तर बजना आने वाले संकट का परिचायक था, जिसका अर्थ होता था कि शत्रु ने राज्य पर आक्रमण कर दिया है। नृत्य अपने-आप थम गया और देखते ही देखते युद्ध की रणभेरी वातावरण में गूँजने लगी। पर शत्रु की विशाल सेना और पूर्व तैयारी न होने से वैशाली के सैनिकों के पैर उखड़ने लगे। राजा को बन्दी बना लिया गया। शत्रु सेना वैशाली नगर पर कहर ढाती निरंतर आगे बढ़ रही थी। बाल -वृद्ध, नर-नारियों की हत्या एवं लूट पाट से वातावरण चीत्कार कर उठा।
नगर नायक महायायन कभी अपनी शूरता के लिए विख्यात था। पर आज तो वह भी अपने को असमर्थ पर रहा था। वृद्धावस्था के कारण उसका अपना शरीर भी साथ नहीं दे रहा था। तो क्या हमारी आँखों के सामने ही शत्रु को सामने देखते ही वह बोल पड़ा-इन मासूमों पर अत्याचार बन्द करो।”
शत्रु सेनानायक को न जाने क्या सूझी, उसने महायायन के समक्ष एक विचित्र शर्त रखी। तुम जितनी देर सामने बह रही नदी में डूबे रहोगे, हमारी सेना लूट-पाट एवं हत्या बन्द रखेगी। शर्त स्वीकार कर अविलम्ब वृद्ध महायायन नदी में कूद पड़ा। वचनबद्ध शत्रु सेनानायक ने सेना को तब तक के लिए लूटपाट एवं संहार बन्द रखने को कहा जब तक कि वृद्ध का सिर पानी के बाहर न दिखायी पड़े। विशाल सेना, सेनाध्यक्ष के नेतृत्व में महायायन के बाहर निकलने की प्रतीक्षा बेचैनी से कर रही थी। प्रातः से दोपहर हुई और फिर शाम होने को आई, पर वृद्ध महायायन पानी में डूबा और डूबा ही रहा। सेनानायक को आश्चर्य हुआ। उसने गोताखोरों को वृद्ध का पता लगाने को कहा। लम्बी खोज-बीन के बाद नदी की गहराई में महायान का मृत शरीर चट्टान से लिपटा पाया गया। उसने दोनों हाथों से चट्टान को मजबूती से पकड़े ही दम तोड़ दिया था। इस अनुपम त्याग एवं बलिदान को देखकर शत्रु सेनानायक का हृदय भी द्रवित हो उठा। मानवता के इस पुजारी के समक्ष अपनी हार स्वीकारते हुए उसने सैनिकों को लूट की वस्तुओं को वापस देने तथा अपने राज्य की ओर वापस लौटने का आदेश दे दिया।
वह नाम का ही धनीराम नहीं पैसे से भी पर्याप्त धनी था। पूरे रतनगढ़ रियासत में सेठ धनीराम की धाक थी। इसकी वजह मात्र धन-दौलत नहीं वह सद्गुण-सम्पत्ति भी थी, जो उसने सारी उम्र कमायी और बड़ी उदारतापूर्वक औरों को बाँटी थी। उसे यदा-कदा चिन्ता हो आती तो सिर्फ एक बात की कि उसके कोई सन्तान तो है नहीं, इतनी अपार सम्पदा का उसके मरने के बाद क्या होगा?
एक दिन नगर के बाहर वाले शिव मन्दिर में एक सन्त आए। सन्त गुणभद्र महान तपस्वी होने के साथ प्रज्ञावान भी थे। उनका अन्तःकरण तो जैसे मानवीय भावनाओं का विशाल महासागर था। यही कारण था कि हर कोई उनका सान्निध्य पाने के लिए लालायित रहता था। सेठ धनीराम भी इन सन्त के दर्शन करने के लिए गए। उन्होंने धन की पर्याप्त बड़ी गठरी सन्त के सामने रखकर कहा-यह धन मैं आपको इसलिए दे रहा हूँ कि आप इसे किसी अच्छी काम में लगा दें। किन्तु अच्छे काम में लगा दें। किन्तु सन्त ने धन लेने से इनकार कर दिया। धनीराम के अधिक आग्रह करने पर सन्त ने कहा कि तुम्हीं इस धन को मेरी ओर से किसी अच्छे काम में लगा दो। परन्तु ध्यान रहे कि धन समान रूप से सबके काम आना चाहिए। किसी जाति, धर्म अथवा व्यक्ति के प्रति किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
सेठ धनीराम और उनकी पत्नी ईश्वर के परमभक्त थे। वह नित्य ही कुछ समय भगवान की पूजा-पाठ व संध्यावंदन में व्यतीत करते थे। इसलिए उन्होंने सोचा कि इस धन से क्यों न भगवान का एक मन्दिर बनवा दिया जाय।
कुछ दिनों बाद मन्दिर बनकर तैयार हो गया। मूर्ति -स्थापना के बाद मन्दिर के द्वार सबके दर्शनार्थ खोल दिए गए। लेकिन मन्दिर में उच्च व मध्यम वर्ग के हिन्दुओं के अलावा न तो अछूत लोग आए और न मुसलमान, जैन व बौद्ध आदि ही आए यह देखकर धनीराम ने सोचा कि मन्दिर सब जातियों के लिए समान रूप से उपयोगी नहीं है, इसलिए उन्होंने मन्दिर को हटाकर वहाँ एक स्कूल बनवा दिया। स्कूल में वैश्य, राजपूत आदि उच्च जाति के बालकों के अलावा सिख, जैन, बौद्ध, आदि धर्म और जातियों के बालक भी पढ़ने आते थे, किंतु मुसलमान वहाँ अपने बच्चों को भेजना अच्छा नहीं समझते थे। अतः धनीराम ने स्कूल को हटाकर वहाँ एक मस्जिद बनवा दी। अब उसमें मुसलमान तो आने लगे, लेकिन हिन्दुओं ने आना लगे, लेकिन हिन्दुओं ने आना छोड़ दिया। अछूत, जैन, बौद्ध, सिख न मन्दिर में आते थे, न मस्जिद में आए।
इस बात से सेठ धनीराम को काफी दुःख हुआ। वह सोचने लगे कि सन्त गुणभद्र ने तो कहा था कि धन समन रूप से सबके काम में आना चाहिए, पर ऐसा काम क्या हो सकता था? इस उधेड़बुन में वह निरन्तर डूबे रहते। अन्त में बहुत सोच-विचार के बाद उन्होंने मस्जिद को तोड़कर उसकी जगह एक अस्पताल बनवा दिया।
उन दिनों वहाँ मुसलमानों का ही राज था। अतः मुस्लिम समाज के कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों और मुल्ला-मौलवियों ने मस्जिद तोड़े जाने की शिकायत रियासत के नवाब से की। शिकायत सुनकर नवाब बहुत नाराज हुआ। उसने धनीराम को दरबार में बुलाकर डाँटते हुए उसका कारण पूछा।
धनीराम ने कहा-मैंने यह सोचकर कि सब लोग एक साथ बैठकर ईश्वर की सेवा-पूजा कर सकें, एक मन्दिर बनवाया। किंतु उसमें हिन्दुओं के अलावा दूसरी कौम के लोग नहीं आते थे। इसलिए मैंने मन्दिर को हटाकर वहाँ स्कूल बनवा दिया, ताकि सभी जाति और धर्म के लोग एक-साथ बैठकर पढ़-लिखकर विद्वान और सुनागरिक बन सके। इसमें और सब जातियों और धर्म के लोग तो आते थे, पर न जाने क्यों मुस्लिम समाज के बच्चे नहीं आते थे। इसलिए मैंने स्कूल को हटाकर वहाँ पर मस्जिद बनवा दी। लेकिन वहाँ हिंदुओं, ईसाइयों ने आना बन्द कर दिया। इसलिए अब मैंने मस्जिद की जगह अस्पताल बनवा दिया है। अब इसमें हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, जैन, बौद्ध, और अछूत आदि सभी जातियों तथा धर्मों के लोग प्रसन्नतापूर्वक आते है। यहाँ के लोग प्रसन्नतापूर्वक आते है। यहाँ आकर कोई किसी से जाति-पाँति धर्म-सम्प्रदाय आदि नहीं पूछता। डॉक्टर, कम्पाउण्डर तथा नर्स आदि भी किसी से जाति या धर्म नहीं पूछते और सबको समान भाव से उपचार देते है। यहाँ आकर सब लोग जाति या धर्म से ऊपर उठकर ‘मानव’ बन जाते है।
जिस प्रकार माली एक फूल को धागे में पिरोकर उनकी माला बनाता है, उसी प्रकार मैंने भी अब कौमों और धर्मों के आदमियों को अस्पताल रूपी धागे में पिरोकर उनको एक जगह इकट्ठा किया तथा एक दूसरे से जोड़ दिया है।
अब हुजूर, आप ही न्यास कीजिए कि मैंने किसके दिल को दुखाया है और किसके दिल को तोड़ा है।
नवाब, धनीराम की बात सुनकर खामोशी के साथ उसके मुँह को देखते हुए सोचने लगा-सभी धर्मों का सार सेवा ही तो है। प्रेमपूर्ण हृदय से सभी की समान भाव से सेवा करके सेठ धनीराम ने तो हर मजहब का समान रूप से सम्मान ही किया है। नवाब को इस तरह चुप देखकर शिकायत करने वाले दकियानूसी कट्टर लोग वहाँ से खिसक गए।
अध्यात्म-विज्ञान का सारा ढाँचा इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। मनुष्य अपने उच्चस्तर से अपनी दुर्बलताओं के कारण ही अधःपतित होता है और दुख, क्लेश भरा नरक भोगता है। मनुष्य को इस विश्व के साथ सम्पर्क बनाकर समानुभूति प्राप्त करने के तीन उपकरण मिले हुए है। यदि वह उनका ठीक तरह उपयोग जान सके तो उसे पग-पग पर यह अनुभव हो कि यह संसार कितना सुन्दर हो कि यह संसार कितना सुन्दर और जीवन कितना मधुर है। इन तीन उपकरणों के नाम है- अन्तरात्मा मन, इन्द्रिय समूह।
इन्द्रियों की बनावट ऐसी अद्भुत है कि दैनिक जीवन की सामान्य प्रक्रिया में ही उन्हें पग-पग पर असाधारण सरसता अनुभव होती है। पेट भरने के लिए भोजन करना स्वाभाविक है। भगवान की कैसी महिमा है कि उसने दैनिक जीवन की शरीर यात्रा भर की नितान्त स्वाभाविक प्रक्रिया को कितना सरस बना दिया है। उपयुक्त भोजन करते हुए जीव को कितना रस मिलता है और चित को उस अनुभूति से कैसी प्रसन्नता होती है।
आँख का साधारण काम है वस्तुओं को देखना ताकि हमारी जीवन-यात्रा ठीक तरह चलती रह सके। पर आँखों में कितनी अद्भुत विशेषता भर दी है कि वह रूप, सौंदर्य, कौतुक, कुतूहल जैसी रसभरी अनुभूतियाँ ग्रहण करके चित को प्रफुल्लित बनाती है। संसार में उत्पादन, परिपुष्टि, विनाश का क्रम नितान्त स्वाभाविक है। मध्यवर्ती स्थिति में हर चीज तरुण होती है और सुन्दर लगती है। क्या पुष्प, क्या मनुष्य हर किसी को तीनों स्थितियों में होकर गुजरना पड़ता है मध्यकाल सौंदर्यप्रधान लगता है। वस्तुतः यह तीनों ही स्थितियाँ अपने क्रम, अपने स्थान और अपने समय पर सुन्दर है। पर आँखों को सुन्दर-असुन्दर का भेद करके मध्य स्थिति को सुन्दर समझने की कुछ अद्भुत विशेषता मिली हैं। फलस्वरूप जो कुछ उभरता हुआ विकसित, परिपुष्ट दीखता है सो सुन्दर लगता है। सुन्दर-असुन्दर का तात्त्विक दृष्टि से यहाँ कुछ भी अस्तित्व नहीं है। पर हमारी अद्भुत आँखें ही है जो अपनी सौंदर्यानुभूति वाली विशेषता के कारण हमारे दैनिक जीवन से सौंदर्य वाला भाग देखतीं आनन्द अनुभव करतीं, उल्लसित और पुलकित होती है तथा चित को प्रसन्न करती है।
इसी प्रकार जननेन्द्रिय की प्रक्रिया है। प्रजनन मक्खी-मच्छरों कीट-पतंगों बीज-अंकुरों में भी चलता रहता है। यह सृष्टि का सरल स्वाभाविक क्रम है, पर हमारी जननेन्द्रिय में कैसा अजीब उल्लास सराबोर कर दिया है कि संभोग के क्षण ही नहीं-उसकी कल्पना भी मन के कोने-कोने में सिहरन, पुलकन, उमंग और आतुरता भर देती है। तत्त्वतः बात कुछ भी नहीं है। दो शरीरों के दो अवयवों का स्पर्श-इसमें क्या अनोखापन है? क्या अद्भुतता है? क्या उपलब्धि है? फिर स्पर्श का कुछ प्रभाव हो भी तो उसकी कल्पना से किस प्रकार, क्यों, किसलिए चित को बेचैन करने वाली ललक पैदा होनी चाहिए? बात कुछ भी नहीं है। जननेन्द्रिय की बनावट में एक अद्भुत प्रकार की सरसता का समावेश मात्र है, जो हमें सामान्य स्वाभाविक दाम्पत्य जीवन के वास्तविक या काल्पनिक प्रत्यक्ष और परोक्ष क्षेत्र में एक विचित्र प्रकार की रसानुभूति उत्पन्न करके, जीने भर के लिए प्रयुक्त हो सकने वाले जीवन को निरन्तर उमंगों से भरता रहता हैं
ऊपर जीभ, आँख और जननेन्द्रिय की चर्चा हुई, कान और नाक के बारे में भी इसी प्रकार समझना चाहिए। इन्द्रिय समूह अपने रसानुभूति की विलक्षणता इसलिए धारण किये हुए है। कि सरस, स्वाभाविक, सामान्य जीवनक्रम ऐसे ही नीरस ढर्रे का जीने भर के लिए ला हुआ प्रतीत न हो वरन् उसमें हर घड़ी उत्साह, उल्लास, हर, आनन्द बना रहे उसे उपलब्ध करते रहने के लिए जीवन की उपयोगिता, सार्थकता और सरसता का भान होता रहे। इन्द्रिय समूह हमें इसी प्रयोजन के लिए उपलब्ध है। यदि उनका उचित, संयमित, विवेकपूर्ण, व्यवस्थापूर्वक उपयोग किया जा सके, तो हमारा भौतिक-साँसारिक जीवन पग-पग पर सरसता, आनन्द उपलब्ध करता रह सकता है।
दूसरा उपकरण मन इसलिए मिला है कि संसार में जो कुछ चेतन है, उसके साथ अपनी चेतना का स्पर्श करके और भी ऊँचे स्तर की आनन्दानुभूति प्राप्त करे। इन्द्रियाँ जड़ शरीर से सम्बन्धित है। जड़ पदार्थों को स्पर्श करके उस संसर्ग का सुख लूटती है। जड़ का जड़ से स्पर्श भी कितना सुखद हो सकता है, इस विचित्रता का अनुभव हमें इन्द्रियों के माध्यम से होता है। चेतन का चेतन के साथ, जीवधारी का जीवधारी के साथ स्पर्श-संपर्क होने से मित्रता, ममता, मोह, स्नेह, सद्भाव, घनिष्ठता, दया, करुणा, मुदिता जैसी अनुभूतियाँ होती है। प्रतिकूल परिस्थितियों में द्वेष, घृणा जैसे भाव भी उत्पन्न होते हैं, पर उनका अस्तित्व है इसीलिए कि मित्रता के वातावरण में सम्पर्क, संसर्ग का आनन्द बिखरता रहे यदि अन्धकार न हो तो प्रकाश की विशेषता ही नष्ट हो जाय। वस्तुतः मन की बनावट दूसरों के सम्पर्क, सहयोग स्नेहभावों के आदान-प्रदान का सुख प्राप्त करने में है। मेले-ठेलों में, सभा-सम्मेलनों में जाने की इच्छा इसीलिए उठती है। उन जन संकुल स्थानों से व्यक्तियों की घनिष्ठता न सही समीपता का अदृश्य सुख तो अनायास मिलता ही है।
चूँकि इन्द्रिय सुख और जन-सम्पर्क की घनिष्ठता में सहायक एक और नया माध्यम सभ्यता के विकास के साथ-साथ बनकर खड़ा हो गया है, इसलिए अब प्रिय वह भी लगने लगा है-इस तीसरे मनुष्यकृत आकर्षण तत्व का नाम है-धन जिसमें स्वभावतः कोई आकर्षण नहीं। इसमें इन्द्रिय समूह या मन को पुलकित करने वाली कोई सीधी क्षमता नहीं है। धातु के सिक्के या कागज के टुकड़े भला आदमी के लिए प्रत्यक्षतः क्यों आकर्षक हो सकते है? पर चूँकि वर्तमान समाज व्यवस्था के अनुसार धन के द्वारा इन्द्रिय सुख के साधन प्राप्त होते है, मैत्री भी सम्भव होती है, इसलिए धन भी प्रकारान्तर रूप से मन का प्रिय विषय बन गया। अस्तु, धन की गणना भी सुखदायक माध्यमों से जोड़ ली गई है।
तीन शरीर को जीवात्मा धारण किये हुए है। तीनों की तीन रसानुभूतियाँ है। ऊपर दो की चर्चा हो चुकी। स्थूल शरीर की सरसता-इन्द्रियसमूह के साथ जुड़ी हुई है। आहार, निद्रा, भय, मैथुन जैसे सुख इन्द्रियों द्वारा ही मिलते है। सूक्ष्मशरीर का प्रतीक मन है। मन का सरसता मैत्री पर, जनसम्पर्क पर अवलम्बित है। परिवार मोह से लेकर समाज-सम्बन्ध नेतृत्व, सम्मिलन, उत्सव-सम्बन्ध नेतृत्व, सम्मिलन, उत्सव-आयोजन जैसे सम्पर्क परक अवसर मन को सुख देते है। घटित होने वाली घटनाओं को अपने ऊपर घटित होने की सूक्ष्म संवेदना उत्पन्न करके वह समाज की अनेक हलचलों से भी अपने बाँध लेता है और उन घटनाक्रमों में खट्टी-मीठी अनुभूतियाँ उपलब्ध करता है। उपन्यास, सिनेमा, अख़बार, रेडियो आदि मन को इसी आधार पर आकर्षित करते और प्रिय लगते है।
तीसरा रसानुभूति उपकरण है-अन्तरात्मा उसका कार्यक्षेत्र कारण शरीर है। उसमें उत्कृष्टता, उत्कर्ष, प्रगति, गौरव की प्रवृत्ति रहती है,जो उच्च भावनाओं के माध्यम से चरितार्थ होती है। मनुष्य की श्रेष्ठता और सन्मार्गगामिता प्रखर होती रहे, इसके लिए उसमें भी एक रसानुभूति विद्यमान है- उसका नाम है वर्चस्व, यश, कामना, नेतृत्व, गौरव-प्रदर्शन उस आकांक्षा से प्रेरित होकर मनुष्य अगणित प्रकार की सफलताएँ प्राप्त करता है, ताकि वह स्वयं दूसरों की तुलना में अपने श्रेष्ठ, पुरुषार्थी,पराक्रमी, बुद्धिमान अनुभव करके सुख प्राप्त करे और दूसरे लोग भी उसकी विशेषताओं, विभूतियों से प्रभावित होकर उसे यश, मान प्रदान करें।
संक्षेप में यह मनुष्य के तीन शरीरों की तीन रसानुभूतियों की चर्चा हुई। हमारी अगणित योजनाएँ, इच्छा, आकांक्षाएँ-गतिविधियाँ इन्हीं तीन मूल प्रवृत्तियों के इर्द-गिर्द घूमती है।
भूल मनुष्य की तब आरम्भ होती है, जब वह इन तीनों रसानुभूतियों को अमर्यादित होकर-अनावश्यक मात्रा में अति शीघ्र,बिना उचित मूल्य चुकाये प्राप्त करने के लिए आकुल-आतुर हो उठता है और लूट-खसोट की मनोवृत्ति अपनाकर अवांछनीय गतिविधियाँ अपना लेता है। विग्रह इसी से उत्पन्न होता है। पाप का कारण यही उतावली है। जीवन में अव्यवस्था और अस्त–व्यस्तता इसी से उत्पन्न होती है। पतन इसी भूल का परिणाम हैं अपराधी, दुष्ट और घृणित बनने का कारण उन उपलब्धियों के लिए अनुचित मार्ग को अपनाना ही है। उतावला व्यक्ति आतुरता में विवेक खो बैठता है और औचित्य को भूलकर बहुत जल्दी-अधिक मात्रा में उपर्युक्त सुखों को पाने के लिए असन्तुष्ट होकर एक प्रकार से उच्छृंखल हो उठता है। यह अमर्यादित स्थिति उसके लिए विपत्ति बनकर सामने आती है। सरल-स्वाभाविक रीति से जो शान्तिपूर्वक मिल रहा था-मिलता रह सकता था, वह भी हाथ से चला जाता है और शारीरिक रोग, मानसिक उद्वेग, सामाजिक तिरस्कार, आर्थिक अभाव आत्मिक शान्ति के संकटों से घिरा हुआ जीवन नरक बन जाता है। अधिक के लिए उतावला मनुष्य सरल-स्वाभाविक को भी खोकर उलटा शोक-संताप कष्ट-क्लेश एवं अभाव-दारिद्र्य में फँस जाता है। आमतौर से मनुष्य यह भूल करते है। इसी भूल को माया, अज्ञान, अविद्या नामों से पुकारते है। यह भूल ही ईश्वरप्रदत्त पग-पग पर मिलती रहने वाली सरसता से वंचित करती है और इसी के कारण जीवन ऊँचा उठने के स्थान पर नीचे गिरता है।
अध्यात्म विद्या का उद्देश्य मनुष्य के चिन्तन और कर्तृत्व को अमर्यादित न होने देने, अवांछनीयता न अपनाने के लिए आवश्यक विवेक और साहस उत्पन्न करना है। मनुष्य अपने अस्तित्व को, लक्ष्य को, व्यवहार को सही तरह समझे। सही मार्ग को अपनाकर सही परिणाम उपलब्ध करते हुए, प्रगति के पथ पर निरन्तर आगे बढ़ता चले। अपूर्णता से पूर्णता में विकसित हो। यही मार्गदर्शन करना-इसका व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करना, आत्मविद्या का मूल प्रयोजन है।
स्थूलशरीर का ठीक तरह उपयोग कैसे किया जाय? इन्द्रियसमूह को व्यवस्थित और सन्तुलित कैसे रखा जाय? पारस्परिक सम्बन्धों में औचित्य की, मर्यादा की रक्षा करते हुए अधिकाधिक स्नेह-सद्भाव कैसे प्राप्त किया जाय? आत्मोत्कर्ष की प्रगति और श्रेष्ठता की स्थिति कैसे प्राप्त हो? इन सब प्रश्नों का समाधान ढूँढ़ने के लिए आत्मविज्ञान की ही सहायता लेनी पड़ती है। अन्तरात्मा, मन और इन्द्रिय समूह का प्रयोजन और उपभोग इसी विज्ञान के आधार पर जाना जा सकता है। साँसारिक वस्तुओं का समुचित उपयोग कर सकने की जितनी अधिक और जितनी सही जानकारी होगी, उतनी भौतिक जीवन में सुविधा होगी पर जो जितना अनजान होगा वह उतना ही अभावग्रस्त, आपत्तिग्रस्त और असफल रहेगा। ठीक इसी प्रकार सुखी, सन्तुष्ट और समुन्नत जीवन जीने के लिए आत्मविज्ञान की सही जानकारी का होना आवश्यक है। इसके बिना हमारा चेतन तत्व खिन्न, पतित और दुर्गति की स्थिति में ही पड़ा रहेगा।
प्रायः लोग सुख-शान्ति की तलाश करते हुए जंगलों, पर्वतों, एकान्त स्थलों, तीर्थस्थानों, मन्दिरों आदि में भ्रमण किया करते है। इतने पर भी आत्मा की प्यास नहीं बुझाती और वह स्थायी शान्तिपूर्ण स्थिति प्राप्त करने के लिए सदा तरसती रहती है। उक्त स्थानों में जब तक निवास है, तब तक उसके वातावरण के अनुरूप स्थूल और क्षणिक शाँति की झाँकी भले ही हो जाय, पर पूर्ण शान्ति नहीं मिल सकती। कारण यह है कि संसार का प्रत्येक परमाणु गतिशील, परिवर्तनशील और चंचल है। स्थूल जगत का कोई भी पदार्थ या अणु-परमाणु स्थिर नहीं, शान्त नहीं और जो वस्तु स्वयं ही शान्त नहीं वह दूसरों को शान्ति कहाँ दे सकेगी? स्थिर वस्तु एक ही है और वह है आत्मा। इसलिए आत्मा में ही शान्ति है। जब हम आत्मपरायण होते है, अपने अन्तराल में झाँकते और वहीं रमण करते हैं तो स्थिर शान्ति के दर्शन करते है, जिनसे अनन्त विश्राम उपलब्ध होता है। मौन व्रत की साधना ही वह उपाय-उपचार है, जिसके द्वारा हम अन्तराल की गहराई में प्रविष्ट कर सकते है और स्थायी सुख-शाँति का स्रोत प्राप्त कर सकते है।
साँसारिक दृष्टि से भी और आत्मिक दृष्टि से भी मौन एक महत्वपूर्ण साधन है। यह वह साधना है, जो चित्तवृत्तियों को बिखरने से बचाती है। चुप रहने से वाणी के साथ व्यय होने वाली मस्तिष्कीय शक्तियों की क्षति होने से बचत होती है। यह बचत आत्मचिंतन में लगा दी जाय तो शान्ति के उस स्रोत तक पहुँच हो सकती है, जो हमारी अशान्तियों को हटाकर सुखद, शीतल और स्निग्ध शान्ति का आश्वासन देती है। इस प्रकार के विश्वास के उपरान्त नवीन चैतन्यता, स्फूर्ति और जीवनीशक्ति प्राप्त होती है, जो कार्यक्षमता, सूक्ष्मदर्शिता और प्रतिभा को कई गुना बढ़ा देती है।
जिस प्रकार शोरगुल वाले कोलाहलपूर्ण वातावरण में हम पास के शब्द भी नहीं सुन पाते, किन्तु निस्तब्ध वातावरण में दूर-दूर की ध्वनियाँ भी आसानी से सुनी जा सकती है, उसी प्रकार अशान्त, उद्विग्न मन अन्तरात्मा की आवाज नहीं सुन पाता। दिव्यलोकों से हमारे लिए जो दिव्य आध्यात्मिक संदेश आते है, उन्हें सुनने के लिए मौन होने की आवश्यकता पड़ती है। आत्मा के प्रति परमात्मा की जो सन्देश-ध्वनियाँ है, उन्हें मन और वाणी से मौन होकर ही सुना जा सकता है। यह एक दैवी रेडियो है। चुप रहकर अन्तर्मुखी होकर ही साधक परमात्मा के प्रकाश को ग्रहण कर सकता है। साँसारिक कोलाहलों में मन को हटाकर जब हम अन्तरात्मा की सुई परमात्मा के केन्द्र पर सटा देते है तो ईश्वरीय वाणी सुनाई पड़ने लगती है। जो कुछ सुनने लायक है, वह मौन के दैवी रेडियो के माध्यम द्वारा जाना और सुना जा सकता है। जो व्यक्ति हर घड़ी लपलप जीभ चलाता रहता है, दुनिया भर की अगड़म-बगड़म बकता रहता है,उसके लिए अन्तर्मुखी होने और मौन के दैवी लाभ को प्राप्त करना कठिन है।
कितने ही व्यक्तियों की ऐसी आदत होती है। कि उनसे चुप नहीं रहा जाता। हर वक्त उनकी जीभ कतरनी की तरह चलती रहती है। कोई कहने योग्य आवश्यक बात हो या न हो, उन्हें कुछ न कुछ कहे बिना चैन नहीं पड़ता। ऐसे लोग यह नहीं समझते कि शब्द साथ हमारी कितनी विद्युतशक्ति, जीवनीशक्ति एवं प्राणशक्ति मिली रहती है। वाणी के साथ-साथ हमारी संचित शक्तियों का भी क्षरण होता है। यह एक तथ्य है कि वाणी के द्वारा शत्रुओं को मित्र और मित्रों को शत्रु बनाया जा सकता है। किसी के शब्दों में रस बरसता है, अमृत झरता है, तो किसी की जीभ चलती है तो द्वेष, कलह, घृणा-विग्रह ही उत्पन्न करती है। इससे प्रकट है कि हमारे भीतरी तत्व वाणी के साथ सम्मिश्रित होते है। वाणी जब निकलती है तो अपने साथ हमारी प्राणशक्ति को भी लपेट लाती है। उसे यदि अकारण, अनुपयुक्तता में खर्च किया जाय तो न केवल हमारी प्राणशक्ति नष्ट होगी, वरन् बकवास की एक दूषित आदत भी हमारे पीछे पड़ जाएगी।
शास्त्रों में जिह्वा को इन्द्रियों की गणना में एक नहीं दो माना गया है। वही वाक् शक्ति भी है और वही स्वादेन्द्रिय रसना भी। इसका शासन समूचे व्यक्तित्व एवं सम्पर्क परिकर पर छाया रहता है। लौकिक एवं आध्यात्मिक साधनाओं की सफलता-असफलता का बहुत कुछ आधार इसकी सुसंस्कारिता पर निर्भर करता है। इसे सुसंस्कृत बनाना जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ समझा जा सकता है। यदि यह बन पड़े तो जन नेतृत्व से लेकर शासन-सत्ता पर अधिकार करने, परायों को अपना बना लेने में सफलता मिलती है। यह कार्य कठिन भी है और सरल भी। कठिन इसलिए कि आदत और अभ्यास कई बार उसे अनगढ़ बना देते हैं, तब उसे काबू में लाना कठिन पड़ता है चटोरापन सवार हो तो समझना चाहिए कि स्वास्थ्य चौपट हुआ। कटुवचन बोलने, निन्दा-चुगली करने, बहकाने बरगलाने, डींग हाँकने जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ यदि जिह्वा में रम चलें तो समझना चाहिए कि मित्र परिकर समाप्त हुआ।
जिह्वा का कार्यक्षेत्र लौकिक भी है और पारलौकिक भी। लोकव्यवहार में यह सबसे बड़ी क्षमता है। अध्यात्म में सत्संग, विचार विनिमय, जीभ से ही सम्पन्न होते है। इन्हें मनन, चिंतन का प्रतीक मानना चाहिए। ईश्वर-प्रार्थना भजन-कीर्तन प्रवचन, मंत्रजप आदि जीभ से ही होते है। यदि जीभ का परिशोधन हो चुका है, तो उपर्युक्त सभी कार्य ठीक प्रकार बने पड़ेंगे और अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करेंगे। यदि जिह्वा कुधान्य खाने और कुसंस्कारिता के दुर्गुणों की अभ्यस्त है, तो फिर समझना चाहिए कि साधना-प्रयोजन के लिए जिह्वा के माध्यम से जो कुछ किया गया है, वह सभी निरर्थक चला जाएगा।
अध्यात्म क्षेत्र में वाक्–सिद्धि का प्रयोजन भी मौनव्रत का अभ्यास करने से ही बन पड़ता है। निरन्तर बोलते रहने से वाणी की प्रभाव क्षमता क्षीण होती है।इसलिए विज्ञजन सोच-समझकर सीमित और अर्थपूर्ण शब्द कहते है। उनका थोड़ा-सा कथन भी घंटों बकवास करने की तुलना में कहीं अधिक कारगर सिद्ध होता है। महात्मा गाँधी अपना अधिक समय मौन में बिताते थे। उनके पास समय का बड़ा अभाव रहता था, तो भी वे सप्ताह में एक दिन मौनव्रत के लिए अवश्य निकाल लेते थे। महत्वपूर्ण राजनैतिक वार्ताओं में भी वे उतना ही बोलते थे, जितना बोले बिना काम नहीं चलता था। उनका कहना था, कि मौन से मुझे बड़ा विश्राम मिलता है ओर कार्य करने के लिए नयी ताजगी का अनुभव होता है। उनके अनुसार, मौन एक ईश्वरीय अनुकंपा है, मौन के समय मुझे आन्तरिक आनन्द मिलता है।
एक बार ऋषि भाष्कलि ने अपने आचार्य से प्रश्न किया कि भगवन् ब्रह्म को कैसे प्राप्त किया जा सकता है? आचार्य ने कोई उत्तर न दिया। भाष्कलि ने सात बार यह प्रश्न पूछा, पर आचार्य सातों बार चुप रहे। अंत में उनने कहा- भद्र! मैं बार बार उत्तर दे रहा हूँ, पर तू समझता ही नहीं। उस ब्रह्म को वाणी से कहा-सुना नहीं जा सकता, उसे तो मौन होकर ही समझा, और प्राप्त किया जा सकता है।
यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि मौनव्रत की साधना के साथ यदि मनोवृत्तियों को आत्मचिन्तन में लगा दिया जाय तो आध्यात्मिक आनन्द का एक निर्झर झरने लगता है, जिसके रसास्वादन की अनुभूति भुक्तभोगी ही जानते है। अरुणाचल के महान संत महर्षि रमण के बारे में विख्यात है कि वे सदैव मौन रहते थे और मौन रहते हुए भी निकट आने वालों की शंकाओं का समाधान करते थे। उनकी सिद्धावस्था असंदिग्ध एवं अद्वितीय थी। उनके अनुसार भाषण से व्यक्तियों का बिना उनका सुधार किये कुछ घंटे मनोरंजन हो सकता है, जबकि मौन स्थायी वस्तु है तथा मानवता के लिए कल्याणकारी है। मौन एक तरह का अनन्त भाषण हैं प्राचीनकाल के ऋषि अपने शिष्यों को मौन द्वारा ही उपदेश किया करते थे। इस अकेली मौन साधना से वे सब सिद्धियाँ मिल सकती है, जो अन्य कठिन योग-साधनाओं से मिल सकती है।
योगशास्त्रों में वाणी चार तरह की बतायी गयी है-परा पश्यन्ति, मध्यमा और वैखरी वाणी। इनमें से परावाणी नाभि में, पश्यन्ति वाणी हृदय में, मध्यमा वाणी कंठ में ओर बैखरी वाणी मुँह में निवास करती है। शब्द की उत्पत्ति परावाणी में होता है। शब्द की उत्पत्ति परावाणी में होती है, परन्तु जब शब्द स्थूल रूप धारण करता है, तब मुँह में स्थित बैखरी वाणी द्वारा बाहर निकलता है। इनमें से परा और पश्यन्ति वाणियाँ सूक्ष्म तथा मध्यमा और बैखरी स्थूल है। मन में जो संकल्प उठते है, जो सोच-विचार ऊहा-पोह तर्क-वितर्क आयोजन-वियोजन होते है, उनमें सूक्ष्म वाणी का प्रयोग होते है, उनमें सूक्ष्म वाणी का प्रयोग होता है। फुसफुसाहट युक्त अस्पष्ट वाणी कंठ से तथा स्पष्ट ध्वनि वाली वाणी जिह्वा से उत्पन्न होती है। इन चारों ही वाणियों का हमें संयम एवं सदुपयोग करना चाहिए।
जिह्वा खोलने से पहले, शब्दोच्चार करने से पहले यह विचार करना चाहिए कि जो बात हम कहने जा रहे हैं, वह किसी के लाभ के लिए कही जा रहे हैं, चह किसी के लाभ के लिए कहीं जा रही है या नहीं? कितने विस्तार से कहानी चाहिए? इन दोनों प्रश्नों को सामने रखकर जो वार्तालाप किया जाता है, वह भी मौन की श्रेणी में ही गिना जाता है। लोकहित की, परमार्थ की दृष्टि से जो कुछ कहा जाता है, वह मौन ही है।
मन और शरीर दोनों को मिलाकर ही एक पूर्ण मौन बनता है। जो एकांगी हो, वह अधूरा है। जबान से चुप रहना, मन में विचार-तरंगों का तूफान चलाते प्रकट करना आदि तो अधूरा मौन ही कहा जाएगा। मौन व्रत-धारियों का ही दूसरा नाम मुनि है। मुनि से जीवनीशक्ति दूर नहीं होती। उनके भीतर दिव्य शक्तियों का निवास होता है। कहा भी गया है-” मुनिमौन परोभवेत्” अर्थात्-मौनव्रत में ही मुनि की प्रतिष्ठा है।
मौनव्रत दो प्रकार का होता है। पहला-वाणी से और दूसरा मन से। इन्हें ही क्रमशः बहिर्मौन एवं अन्तर्मौन कहते है। वाणी को वश में रखना, कम बोलना, नहीं बोलना, जरूरत के अनुसार शब्दोच्चार करना आदि वाणी के मौन कहे जाते है। मन को स्थिर रखना, मन में बुरे विचार नहीं लाना, अनात्म विचारों को हटाकर आत्मतत्त्व का, अध्यात्म-विचार करना, बाह्य सुख की इच्छा से मुक्त होकर अंतर्गुहा में स्थित आत्मा में रमण करना, आन्तरिक सुख में मस्त रहना और मत को, इन्द्रियों को आत्मा के वश में रखना मन का मौनव्रत या आन्तरिक मौन कहलाता है। शक्ति के साधकों को मौन होना चाहिए। संसार में जितने भी संत-महात्मा ऋषि-मनीषी हुए है, वे प्रायः सभी मितभाषी थे। मितभाषण को शास्त्रकारों ने मौन कहा है। जो भाषण किसी के लाभ, हित या कल्याण के उद्देश्य से किया जाता है, वह मौन है। उतना ही बोलना चाहिए, जितना बोलना आवश्यक है। शेष समय में चुप रहना चाहिए।
आत्मोत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ने के लिए, अशान्ति-उद्विग्नता से पिण्ड छुड़ाकर स्थायी सुख-शान्ति पाने के लिए हर साधक को मौन साधना की ओर बढ़ना चाहिए। मौनव्रत के विश्राम काल में साधक को इतना अवसर मिल जाता है। कि वह अपने पिछले अनगढ़ विचारों को आदतों को सुधार सके और भावी कार्यकाल में उसे योजनाबद्ध तरीके से नियोजित कर सके।
पति के अल्पायु में ही चल बसने से उसने अपना जीवन जप-तप-व्रत एवं ध्यान में ही लगा दिया था। वह तपोमयी बनकर अपना वैधव्य संयम से व्यतीत करने लगी और सत्कर्मों में लीन होकर सदा परमात्मा का स्मरण करती रहती। इसी कर्मठता पड़ गया। यह नाम इतना प्रचलित एवं प्रसिद्ध हुआ कि सभी लोग उसका मूल नाम ही भूल गए।
राजस्थान के बागर गाँव के निवासी विप्र पुरुषोत्तमदास की वह इकलौती पुत्री थी। पिता ने उत्साह के साथ अपनी पुत्री का विवाह किया। विवाह होने पर वह ससुराल गई। उस समय उसके हृदय में अनेक आशाएँ थी और थी पतिसेवा की अनोखी लगन। परंतु विधाता का विधान कुछ भिन्न ही था। क्रूर काल के प्रहर से कर्मठीबाई के पति का शीघ्र ही देहांत हो गया। परिवार में हाहाकार मच गया। उस पर तो मानों यह वज्रपात ही था। इस घटना से वह इतना विक्षिप्त हो गयी कि वह अपना मार्ग ही निश्चित नहीं कर पा रही थीं। उसको सुदीर्घ वैधव्य जीवन व्यतीत करना था। उसका अपार सौंदर्य आज उसका शत्रु बन गया। ऐसे में उसने आध्यात्मिक साधनाओं का आश्रय लिया और जीवन को तपोमय बनाकर कठोर तपस्या आरम्भ कर दी।
शुरुआत में तो उसने ससुराल में ही साधना प्रारम्भ की। परन्तु ससुराल में सभी स्वजनों के काल-कवलित हो जाने की वजह से उसने पीहर में पिता का आश्रय लिया। दुर्भाग्यवश यहाँ भी एक-एक करके सब चल बसे। भगवान की ऐसी लीला का भेद कर्मठीबाई नहीं समझ पायी। अन्त में सन्त हरिदास जी ने उसे समझाया कि भगवान श्रीकृष्ण अनाथों के नाथ है और निराधारों के आधार हैं। तू उन पर विश्वास रखकर उनकी भक्ति कर। सब ठीक होगा।
सन्त हरिदास के वचनों से कर्मठीबाई का साहस बँधा। वह तप, संयम एवं व्रत में लीन रहकर निर्मल जीवन व्यतीत करने लगी। उसके सौन्दर्य के साथ तप मिश्रित हो जाने से भक्तिमती कर्मठीबाई का जीवन अत्यन्त प्रभावशाली बन गया। संत हरिदास के स्वर्गवासी बनने के बाद वह श्रीवन में जाकर निवास करने लगी और महाप्रभु हित हरिवंश जी की शिष्या बन गयी। उन्होंने यहाँ एक कुटिया में भगवान श्रीकृष्ण की सुमनोहर मूर्ति स्थापित की और नित्य निरन्तर उनकी भक्ति में मग्न रहने लगी। यहाँ वह नित्य श्रीमद भागवत् का पाठ करती और सत्संग करती।
कर्मठीबाई के लिए उनका रूप लावण्य शत्रु बन गया। अनेकों लोग उन्हें तरह-तरह से सताने लगे। उस समय दिल्ली में शहंशाह अकबर का शासन था। उनके आदेश से मथुरा में हसन बेग की एक उच्च अधिकारी के रूप में नियुक्ति हो गयी। एक बार जब वह श्रीवन आया तब उसने स्नान करती हुई नवयुवती कर्मठीबाई को देखा। उसके रूप-लावण्य को देखते ही वह अपनी सुध-बुध भुला बैठा। उसका मन हाथ में नहीं रहा। उसने गुप्तचरों से पता लगवाया तो उसे ज्ञात हुआ कि वह एक बाल-विधवा ब्राह्मणी है। उसके ससुराल और पीहर में कोई नहीं होने से वह श्रीवन में रहती है। यह सुनकर वह अत्यन्त प्रसन्न हो गया और उसे अपने चंगुल में फँसाने के लिए प्रयत्न करने लगा।
हसन बेग ने इस कार्य के लिए दो दुष्ट स्त्रियों को प्रलोभन देकर अपने वश में किया। धन के लोभ में वे आकर इस कार्य में जुट गई। येन-केन-प्रकारेण कर्मठीबाई को फँसाने के लिए वे उसके साथ मिलने-जुलने लगीं।
उन दुष्ट स्त्रियों ने कर्मठीबाई को अपने जाल में फँसाने के लिए साध्वी महिलाओं का वेश धारण किया और वे दोनों उनके निवास स्थान पर आई। हाथ जोड़कर उन दोनों ने ‘जय श्रीकृष्ण ‘ कहकर कर्मठीबाई का अभिवादन किया। कर्मठीबाई तो सात्विक नारी थी। उन्होंने इन दोनों को साध्वी जानकर आसन दिया और पूछा आप दोनों कहाँ से आ रही है?
बहिन! हम दोनों बहिनें है। उनमें से एक अपने स्वर को अत्यधिक मधुर बनाकर कहने लगीं-हम वैसे तो उज्जैन की निवासी है, पर आत्मशान्ति के लिए वृन्दावन में निवास कर रही है। भगवान श्रीकृष्ण के गुणगान में ही हमें अपना जीवन व्यतीत करना है। कुटिया में बैठी-बैठी थक जाने के कारण वृन्दावन में निवास करने वाले संतों के साथ सत्संग करती है। आज प्रातः आपका नाम सुनकर आपके दर्शनार्थ उपस्थित हुई हैं।
कर्मठीबाई ने गदगद होकर कहा, आप दोनों से मिलकर मन में प्रसन्नता हुई। जब-जब समय मिले, तब-तब आप दोनों आती रहना आपके सत्संग से मुझे भी आनन्द आएगा।
इस तरह कर्मठीबाई के साथ इनकी घनिष्ठता हो गईं। एक दिन वे दोनों तनिक विलम्ब से आई। कर्मठीबाई ने विलम्ब से आने का कारण पूछा तो वे बोलीं-आज प्रातः एक सन्त आ गए थे। उनका आतिथ्य करने में समय लग गया। सन्त सचमुच ही दर्शन करने योग्य है।
तब मैं भी उनका दर्शन करना चाहूँगी। उसने बड़ी ही सहजता से कहा।
अवश्य, इस समय तो वे आराम कर रहे होंगे। आप मध्याह्न के पश्चात् तीन बजे आना। तीन बजे से पाँच बजे तक महात्मा जी से सत्संग करेंगी। अत्यन्त आनन्द होगा।
अच्छा तो मैं ठीक तीन बजे आपकी कुटिया पर पहुँच जाऊँगी। कर्मठीबाई ने कहा।
वे दोनों कुटिल स्त्रियाँ अपना पाँसा सीधा पड़ने के कारण प्रसन्न होती हुई हसन बेग के पास पहुँची और उसे सारा वृत्तांत बता दिया। आज तीन बजे कर्मठीबाई हमारी कुटिया में छिप जाएँ। जब वह आएगी, तब उसे भीतर बिठाकर हम दोनों बाहर निकलकर बाहर से कुटिया का द्वार बन्द कर देंगी।
योजना सुनकर हसन बेग बाग-बाग हो गया। वह शीघ्र आकर कुटिल स्त्रियों की कुटिया में छिप गया। समय होने पर कर्मठीबाई वहाँ आई। उन्होंने पूछा बहिन सन्त कहाँ है?
तनिक बैठो बहिन! उनमें से एक ने धूर्ततापूर्ण कहा-महात्मा जी अभी आ रहे है। आप इस आसन पर बैठों, मैं देख आती हूँ कि वे अभी तक क्यों नहीं आए?
कर्मठीबाई आसन पर बैठ गयी। महात्मा जी को बुला लाने के बहाने वह धूर्त स्त्री बाहर गयी और बाहर जाकर उसने द्वार बन्द कर दिया। कर्मठीबाई अभी तक इस सारे षड्यंत्र से पूर्णतया अनभिज्ञ थी। द्वार बन्द होते ही नर-पिशाच उनकी ओर बढ़ा। फिर तो वह सारी बातें समझ गयी कि यह तो उसे फँसाने के लिए रचा गया एक षड्यन्त्र है। भागने के लिए उन्होंने चारों ओर दृष्टि डाली तो द्वार बन्द था। बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं था। कर्मठीबाई घबराकर भगवान से प्रार्थना करने लगी, हे अन्तर्यामी दीन-दुखियों के रक्षक प्रभु! आज मेरी लज्जा आपके हाथ है। मुझ असीम अबला की रक्षा करो भगवन्।
हसन बेग कामान्ध बनकर उनके निकट आकर खड़ा हो गया। वह उनकी ओर एकबारगी झपटा हुआ बोला, मैं तुझे बनाकर सुख से रखूँगा। तू मुझसे दूर मत जा।
कर्मठीबाई ने उस नराधम को कहा, तू मुझसे दूर रह। जब तक मेरी देह में प्राण है, तब तक तो मेरा स्पर्श तक नहीं कर सकेगा। मैं तपस्विनी हूँ। तू मेरे शाप से जलकर भस्म हो जाएगा।
हसन बेग यह सुनकर ठठाकर हँसा और पैशाचिक क्रूरता के साथ कहने लगा, तुझे यहाँ बचाने वाला कोई नहीं है। तू क्यों अपना यौवन तपाकर नष्ट करने पर तुली है?
नराधम!तू मुझे छोड़ दे। यदि तूने आगे बढ़ने का प्रयास किया तो मैं शेरनी की तरह तुझ पर टूट पड़ूंगी।
कर्मठीबाई का विकराल रूप देखकर हसन बेग तनिक चौंका, पर कामान्धता से विवश उसने उसे पकड़ने के लिए अपने हाथ बढ़ाए कि इतने में उसे कर्मठी के बदले सचमुच ही एक सिंह दिखाई दिया। सिंह की भयानक दहाड़ सुनकर उसकी काम-वासना काफूर हो गयी। वह काँपने लगा। सिंह से बचने के लिए उसने भागने का प्रयास किया, परन्तु द्वार तो बाहर से बन्द था। भयभीत बना वह चिल्लाता रहा-खोलो-द्वार खोलो, पर कौन सुनता वे दोनों धूर्त महिलाएँ तो द्वार बन्द करके दूर चली गयी थीं। द्वार नहीं खुलने के कारण हसन बेग ने पीछे मुड़कर देखा तो एक भयानक सिंह उसकी ओर झपटने के लिए तत्पर खड़ा था। सिंह को अपनी ओर झपटने का मुद्रा में देखकर हसन बेग अचेत हो गया। कुछ समय के बाद वे दोनों धूर्त महिलाएँ कुटिया के समीप आयी। उन्होंने द्वार खोला तो हसन बेग को भीतर अचेत पड़ा देखा, परन्तु वहाँ कर्मठीबाई दिखाई नहीं दी।
कुछ क्षणों के बाद हसन बेग होश में आया। उसने भयभीत नजर से चारों ओर देखा ओर उन दुष्ट महिलाओं से कहा, मुझे यहाँ से दूर ले जाओ अन्यथा सिंह मुझे चीरकर खा जाएगा। हसन बेग ने काँपते हुए समस्त वृत्तांत उन्हें कह सुनाया।
कर्मठीबाई तो अपने भजन में व्यस्त भी। उसने किसी से बदला लेने की भावना नहीं रखी। हसन बेग अपने किए पर पश्चाताप करता हुआ उनके पास आया और क्षमा याचना करने लगा।
उदार हृदय कर्मठीबाई ने उसे क्षमा कर दिया और कहा, आज तक भगवान ने किसी भक्त की लाज नहीं जाने दी। वे भला मेरी लाज भंग होती हुई कैसे देख सकते थे? भगवान अपने भक्तों को अनेक रूपों में बचाते है, कोई उन्हें पुकार कर तो देखें।
हसन बेग ने प्रायश्चित करते हुए अपार धनराशि उन्हें अर्पित करनी चाही। पर उन्होंने उक्त धनराशि सन्तों की सेवा में व्यय करने का निर्देश देते हुए कहा- भक्त का सर्वस्व तो उसके भगवान ही होते है। उसे धन अथवा यश से क्या प्रयोजन?
“यह समय पराक्रम और पौरुष का है, शौर्य और साहस का है। इस विषम वेला में युग के अर्जुनों के हाथों से गाण्डीव क्यों छूटे जा रहे है, उनके मुख क्यों सूख रहे है। पसीने क्यों छूट रहे है? सिद्धान्तवाद क्या कथा-गाथा जैसा कोई विनोद-मनोरंजन है, जिसकी यथार्थता परखी जाने का कभी कोई अवसर ही न आए? कृष्ण झुँझला पड़े थे। कथनी और करनी के मध्य इतना असाधारण व्यतिरेक उन्हें सहन नहीं हुआ और वे भौंहें तरेर कर बोले-अभागे! इस विषम वेला में यह कृपणता तेरे मन-मस्तिष्क पर किस प्रकार चढ़ बैठी? अंतरिक्ष से आज का महाकाल युग के गाण्डीवधारियों से लगभग उसी भाषा में प्रश्न पूछता और उत्तर माँगता है। “
-परमपूज्य गुरुदेव (अप्रैल 1982 अखण्ड ज्योति सम्पादकीय)
स्वामी रामतीर्थ कहते थे-धरती को हिलाने के लिए धरती से बाहर खड़े होने की आवश्यकता नहीं है, आवश्यकता है- आत्मा की शक्ति को जानने-जगाने की। इस उक्ति में आत्मशक्ति की उस महत्ता का प्रतिपादन किया गया है, जिसका दूसरा नाम आत्म-विश्वास है। इसका साक्षात्कार करके कोई भी व्यक्ति अपने परिवार में तथा अपने में आशातीत परिवर्तन कर सकता है। विवेकानन्द, बुद्ध, ईसा, सुकरात और गाँधी की प्रचण्ड आत्मशक्ति ने युग के प्रवाह को मोड़ दिया। विगत स्वतन्त्रता संग्राम में महात्मा गाँधी ने सशक्त ब्रिटिश साम्राज्य की नींव उखाड़ दी। उन्होंने अपनी दृढ़ संकल्प शक्ति तथा आत्म-विश्वास के सहारे अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर विवश किया। स्वामी विवेकानन्द एवं रामतीर्थ जब संन्यासी का वेश धारण कर अमेरिका गये तो उपहास के पात्र बने, किन्तु बाद में उन्होंने अपने आत्म-विश्वास के सहारे विश्व को जो कुछ दिया वह अद्वितीय हैं
आत्म-विश्वास के समक्ष विश्व की बड़ी-से-बड़ी शक्ति झुकती है और भविष्य में भी झुकती रहेगी। इसी आत्म-विश्वास के सहारे आत्मा और परमात्मा के बीच तादात्म्य उत्पन्न होता है तथा अजस्र शक्ति के स्रोत का द्वार खुल जाता है। कठिन परिस्थितियों एवं हजारों विपत्तियों के बीच भी मनुष्य आत्म-विश्वास के सहारे आगे बढ़ता जाता है तथा अपनी मंजिल पर पहुँच कर रहता है।
मानवजाति की उन्नति के इतिहास में महापुरुषों के आत्म-विश्वास का असीम योगदान रहा हैं भौतिक दृष्टि से तात्कालिक असफलताओं को शिरोधार्य करते हुए भी उन्होंने विश्वास न छोड़ा और अभीष्ट सफलता प्राप्त की। आत्म-विश्वास का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान हैं लौकिक एवं अलौकिक सफलताओं का आधार यहीं हैं इसके सहारे निराशा में भी आशा की झलक दीखती है। दुःख में भी सुख का आभास होता है। इससे बड़े-से-बड़े कार्य सम्पन्न किए जा सकते है और किए गये है। चीन की दीवार, पिरामिड, पनामा नहर एवं दुर्गम पर्वतों पर विनिर्मित सड़कें व भवन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देते है।
वस्तुतः समस्त शारीरिक और मानसिक शक्तियों का आधार आत्म-विश्वास ही है। इसके अभाव में अन्य सारी शक्तियाँ सुप्तावस्था में पड़ी रहती है। जैसे ही आत्मा-विश्वास जाग्रत होता है, अन्य शक्तियाँ भी उठ खड़ी होती हैं और आत्म-विश्वास के सहारे असम्भव समझे जाने वाले कार्य भी आसानी से पूरे हो जाते है।
वैयक्तिक जीवन में भी आत्म-विश्वास ही सम्पूर्ण सफलताओं का आधार है। विश्वास के अभाव में ही श्रेष्ठतम उपलब्धियों से लोग वंचित रह जाते है। असफलताओं का कारण है- अपनी क्षमता को न पहचान पाना और अपने को अयोग्य समझना जब तक अपने को अयोग्य, हीन, असमर्थ समझा जाएगा, तब तक सौभाग्य एवं सफलता का द्वार बन्द ही रहेगा।
व्यक्ति जब अपने अन्दर छिपी हुई शक्तियों के स्रोत को जान लेता है तो वह भी देवतुल्य बन जाता है। विश्वास के जाग्रत होते ही आत्मा में छुपी हुई शक्तियाँ प्रस्फुटित हो उठती है। हमारे अन्दर के श्रेष्ठ विचार महत्वपूर्ण कार्य के रूप में परिणत हो जाते है। इसके विपरीत अपने प्रति अविश्वास से तो शक्ति के स्रोत सूख जाते है और लोग भण्डार के होते हुए भी दीन तथा दरिद्र ही बने रहते है।
अपने विषय में जैसी मान्यता बनायी जाती है, लोगों द्वारा भी वैसा ही व्यवहार किया जाता है। जो व्यक्ति अपने को मिट्टी समझता है, अवश्य कुचला जाता है। धूलन पर सभी पाँव रखते है, किन्तु अंगारों पर कोई नहीं रखता। जो व्यक्ति कठिनतम कार्यों को भी अपने करने योग्य समझते है, अपनी शक्ति पर विश्वास करते है, वे चारों ओर अपने अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कर लेते है। जिस क्षण व्यक्ति दृढ़तापूर्वक किसी कार्य को सम्पन्न करने का निश्चय कर लेता है, तो समझना चाहिए आधा कार्य पहले ही पूर्ण हो गया। दुर्बल प्रकृति के व्यक्ति शेख-चिल्ली के समान कोरी कल्पनाएँ मात्र किया करते है, किन्तु मनस्वी व्यक्ति अपने संकल्पों को कार्यरूप में परिणत कर दिखते है।
विराट वृक्ष की शक्ति छोटे-से बीज में छुपी रहती है। यही बीज खेत में पड़कर उपयोगी खाद-पानी प्राप्त करके बड़े वृक्ष के रूप में प्रस्फुटित होता है, उसी प्रकार मनुष्य के अन्दर भी समस्त संभावनाएँ एवं शक्तियाँ बीज रूप में छुपी हुई है, जिनको विवेक के जल से अभिसिंचित कर तथा श्रेष्ठ विचारों की उर्वरा खाद देकर जाग्रत किया जा सकता हैं यदि व्यक्ति अपने अन्दर की अमूल्य शक्ति एवं सामर्थ्य को जान लेने में सफल हो जाय तो वह सामान्य से असामान्य और असामान्य से महान हो सकता है।
मनुष्यों की संगठित शक्ति यदि श्रेष्ठ मार्ग पर चल पड़े तो विश्व का काया-कल्प ही कर सकती है। शक्ति के उदित होते ही सम्भव हो जाते है, जिनको पूर्ण हुए देखकर आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता।
मानव जीवन ईश्वर का दिया हुआ सर्वोपरि उपहार है। इसका महत्व एवं गरिमा तभी है जब व्यक्ति इन पंगु विचारों को अपने मन में स्थान न दे। उनसे शक्ति का प्रवाह बन्द हो जाता है। ईश्वरीय अनुदान एवं दी हुई शक्ति का महत्व जीवन के सदुपयोग में है। अपने को उठाना तथा दूसरों को भी ऊँचा उठाने में सहयोग करने में ही मानव जीवन की सार्थकता है।
जब तक हम किसी कार्य में अपनी समस्त शक्तियाँ लग नहीं पाते, मन एकाग्र नहीं करते, तब तक वह कार्य पूर्ण नहीं हो सकता। कार्य जितना कठिन है, उसके लिए उतने ही दृढ़ विश्वास एवं योगी की तरह तन्मय होकर निरन्तर प्रयत्न की आवश्यकता होती है। ईश्वरीय सत्ता भी उन्हीं की सहायता करती है जो स्वयं प्रयत्नशील है।
आत्म-विश्वास सत्त परिश्रम एवं दृढ़ निश्चय के समक्ष कुछ भी असम्भव नहीं है। इन्हीं गुणों के प्रकाश में ऐतिहासिक कार्य संसार में सम्पन्न हुए है। विद्वानों, महापुरुषों, धर्म-प्रवर्तकों योद्धाओं, सृजेताओं, शोधकर्ताओं के ज्वलन्त उदाहरण इस बात के साक्षी है कि उन्होंने आत्म-विश्वास के आधार पर क्या नहीं कर दिखाया?
छोटी-छोटी बैटरियों की शक्ति शीघ्र ही समाप्त हो जाती है, किन्तु जिन बत्तियों का सम्बन्ध पॉवर हाउस से होता है, वे निरन्तर जलती रहती है आत्म-विश्वास वह संपर्क माध्यम है जिसके सहारे अकूत शक्ति के भण्डार परमात्मा के साथ सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने विचारों को कार्यरूप में परिणत करे। स्वार्थ से दूर रहकर अपनी दृष्टि का विकास करे। सद्गुणों को धारण कर इसी जीवन में गौरवान्वित एवं सम्मानास्पद बना जा सकता है। आत्म-विश्वास आत्मगौरव को विकसित करता है और अपने अनुरूप मनःस्थिति एवं परिस्थिति बनाकर रहता है। भूमि की उर्वरता और बीज की सशक्तता मिलकर जिस अंकुर को उगाते है, उसमें अपनी निज की सशक्तता भरी रहती है और उसके सहारे पौधा, झाड़ तथा वृक्ष बनने में बहुत दिन लगते है। एक दिन का अंकुर ही विकासक्रम पर ठीक प्रकार चलते हुए फूलों फलों से लदा, सघन छाया और विशाल कलेवर वाला वृक्ष बन जाता है। विकास का यही क्रम उन पर भी लागू होता है। वे न तो हेय परिस्थितियों में पड़े रह सकते है और न सामान्यजनों जैसा निर्वाह-उपार्जन तक सीमित जीवन जी पाते है। यही है आत्मविश्वास का चमत्कार एवं उसकी महती सामर्थ्य।
देवासुर संग्राम समाप्त हुआ। विजय देवताओं के हाथ लगी। इन्द्र की सभास्थली में सभी देवतागण अपने -अपने पराक्रम की चर्चा कर मन में फूले नहीं समा रहे थे। देवताओं के बढ़ते हुए अहंकार को शक्तियों के अधिष्ठाता भगवान सुन रहे थे। अहंकार पतन और पराभव का कारण है। समय रहते उस पर अंकुश लगना चाहिए। यह सोचकर वे तेजस्वी दीप्तिमान महायक्ष के शरीर में देवसभा के द्वार पर प्रकट हुए। कोलाहल बन्द हो गया, शान्ति छा गई।
आगे बढ़कर अग्निदेव ने सभा भवन का दरवाजा खोला और आगन्तुक से प्रश्न किया-आप कौन हैं? यहाँ आने का अनुग्रह कैसे किया? प्रश्न का बिना उत्तर दिए तेजस्वी व्यक्ति ने प्रतिप्रश्न किया-तू कौन है?
अग्नि ने अहंकार मिश्रित स्वर में अपना परिचय दिया-मैं जातवेदा अग्नि हूँ। हर वस्तु को पलभर में जला देता हूँ आगन्तुक ने एक तिनका सामने रखा और अग्नि से उसे जलाने को कहा। अग्नि को लगा जैसे किसी ने सारी शक्ति निचोड़ ली हो। वे अपने को निष्प्राण और निस्तेज अनुभव कर रहे थे। फिर भी जलाने का उपक्रम किया, पर असफल रहे। निराश और उदास होकर वहीं भूमि पर बैठ गये।
दरवाजे पर अग्नि को गये अधिक देरी हो चुकी थी। पवनदेव वस्तुस्थिति का अवलोकन करने पहुँचे। भूमि पर निस्तेज अवस्था में अग्नि को बैठे देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ। सामने सूर्य की भाँति तेजस्वी अतिथि से उन्होंने पूछा, महाभाग आपका परिचय? अतिथि ने उलटकर वही प्रश्न पवनदेव से भी किया। पवन ने कहा-मुझे वेगवान मातरिश्वा कहते है। मैं बहता हूँ और अपने प्रवाह में बहुतों का बहा ले जाता हूँ। आगन्तुक के अधरों पर मन्द मुसकान तैर गई। उसने वही तिनका पवन के सामने रखकर उसे उड़ाने के लिए कहा। मातरिश्वा ने अथक प्रयत्न किया पर तिनका चट्टान की भाँति अड़ा रहा। टस से मस नहीं हुआ। हारे-थके पवन भी सिर झुकाकर जातवेदा के निकट बैठ गये।
अग्नि और पवन के वापस न लौटने पर देवगणों की चिन्ता बढ़ी। सभी वरिष्ठ देवता स्थिति को जानने के लिए द्वार पर पहुँचे। पवन और अग्नि को सिर झुकाये बैठे देखकर सभी आतंकित हो उठे। वरुण और अन्तरिक्ष ने परिचय पूछा तो आगन्तुक ने वह पद्धति दुहराई। अपना परिचय दिये बिना उनसे उलटकर प्रश्न पूछे। एक ने कहा मैं गीला कर देने वाला वरुण और दूसरे ने कहा- मुझे सबको उदरस्थ करने वाला अन्तरिक्ष कहते है। दोनों के सामने तिनका पड़ा था, पर न तो वे उसे गीला कर सके और न ही उदरस्थ कर सके। विवश होकर उन्हें भी अपने देव बन्धुओं की बगल में बैठ जाना पड़ा।
स्तब्धता को भंग करते हुए तेजस्वी पुरुष ने स्वयं अपना परिचय दिया-मुझे सर्वशक्तिमान ब्रह्म कहते है। आत्मबल के रूप में मुझे जाना जाता है। मेरे तेज से ही शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। सभी शक्तियों का अधिष्ठाता हूँ। मेरी सत्ता से ही जड़-चेतना में हलचल और चैतन्यता पायी जाती है। देवताओं! पंचतत्वों से बने कलेवरों और उपकरणों की प्रशंसा न करो। ब्रह्म ही बल है। ब्रह्म तेजस् ही विजयी होता है, अस्तु, प्रशंसा करनी हो तो उसी की करो। महत्ता उसी की समझो। आराधना उसी की करो। देवताओं का मिथ्या अहंकार समाप्त हुआ। तब से वे आत्मबल की आराधना में संलग्न हो गये।
षट्चक्रों में आज्ञाचक्र का स्थान सर्वोपरि है। उसे सर्वप्रमुख इसीलिए माना गया है कि ध्यान चाहे अन्तः या बाह्य किसी भी केन्द्रबिन्दु पर एकाग्र किया जाए, वह तल्लीनता के स्तर के अनुसार कम-ज्यादा अवश्य प्रभावित होता है, इस कारण साधना-अभ्यासों में चक्र-जागरण के क्रम में सबसे पहले उसे जागने का विधान हैं।
इसे गुरुचक्र भी कहते है। ज्योतिष में आज्ञाचक्र बृहस्पति का केन्द्र है। इसे गुरु का प्रतीक-प्रतिनिधि माना गया है। बृहस्पति देवताओं के गुरु है, अस्तु, साधना ग्रन्थों में इसे गुरुचक्र के नाम से अभिहित किया गया है। इसका आज्ञाचक्र नाम क्रियामूलक है। आज्ञा का अर्थ ‘आदेश’ होता है। आदेश हमेशा स्वामी या नियन्ता की ओर से आता है। इस दृष्टि से यह सम्पूर्ण चक्रसंस्थान का नियंत्रणकर्ता हुआ।
इसका एक नाम ज्ञान या दिव्य चक्षु है। गोचर ज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण आधार स्थूल नेत्र हैं इनसे भौतिक जगत की आकृति, प्रकृति और स्वरूप का दिग्दर्शन किया जा सकता है, किंतु जो सूक्ष्मजगत या नतः प्रकृति है, उसको जान पाना इनकी सामर्थ्य से परे है। इस गहराई में उतर पाने की क्षमता सिर्फ दिव्य चक्षु में है। चूँकि इसके माध्यम से व्यक्ति चेतना के सूक्ष्म तथा अतीन्द्रिय आयाम में पहुँचता है, इसलिए इसको अलौकिक या अतीन्द्रिय नेत्र भी कहा जाता है।
शंकरजी का सबसे प्रसिद्ध नाम ’तृतीय नेत्र’ है। शंकर एवं दुर्गा की प्रतिमाओं में इस तीसरे नेत्र का चित्रण अक्सर किया जाता है। इसके पीछे एक उच्चस्तरीय तत्त्वदर्शन है। तीसरी आँख अर्थात् दूरदर्शिता। प्रायः लोग अदूरदर्शी होते है। तनिक-से लाभ के लिए अवांछनीय कार्य करते और मर्यादाएँ तोड़ते है, फलस्वरूप उसके चिरकाल तक कष्ट देने वाले दुष्परिणाम भुगतते है। दूरदर्शिता मनुष्य को किसान, विद्यार्थी, माली, पहलवान, व्यापारी आदि के समान बुद्धिमान बनाती है, जो आरंभ में तो कष्ट सहते है, पर पीछे महत्वपूर्ण लाभ उठाते है। यह दूरदर्शिता यदि किसी को उपलब्ध हो सके; तो वह जीवन-सम्पदा का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की योजना बनाएगा और इस सुरदुर्लभ अवसर का समुचित लाभ उठाकर धन्य बनेगा।
शंकरजी के तीसरे नेत्र के पीछे कथा है उसके अनुसार एक बार उन्हें काम-विकार ने पथभ्रष्ट करने का प्रयत्न किया था। उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोला और उस विकार को जलाकर भस्म कर दिया। इस अलंकार का भावार्थ इतना ही है कि अदूरदर्शिता के कारण जो बात बड़ी आकर्षक एवं लुभावनी लगती है, वही विवेकशीलता की कसौटी पर कसने से विषतुल्य हानिकारक लग सकती है। जब किसी बात की, वस्तु की हानि स्पष्ट हो जाए, तो उसके प्रति घृणा का उभरना और परित्याग करना स्वाभाविक है। जिस प्रकार शिवजी ने कामदेव को तृतीय नेत्र के सहारे जलाकर अपने ऊपर बरसने वाली विपत्ति से छुटकारा पा लिया था, उसी प्रकार जिस किसी को भी यह दूरदर्शिता प्राप्त होगी, वह अवांछनीय आकर्षणों से आत्मरक्षा करके उज्ज्वल भविष्य की संरचना कर सकेगा। आमतौर पर यह तृतीय नेत्र बन्द प्रसुप्त रहता है, उसका जागरण एवं उन्मीलन करना ही साधना-उपचार का उद्देश्य है।
साधना-विज्ञान के आचार्यों का मत है कि आज्ञाचक्र का जो स्थान है, वहाँ इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना नामक तीन प्रमुख नाड़ियाँ मिलती है तथा एक प्रवाह के रूप में चेतना के सर्वोच्च केन्द्र सहस्रार तक पहुँचती है। यह मिलन त्रिवेणी संगम की तरह है। संगम की महिमा का बखान करते हुए शास्त्रों में कहा गया है। कि जो इसमें अवगाहन करते है, उनका कायाकल्प हो जाता है, वे बाहर से भले ही ज्यों-के-त्यों दीखें, उनका अन्तर्गत पूरी तरह परिवर्तित होता है।
आज्ञाचक्र में जब ध्यान को एकाग्र किया जाता है, तो तीन बड़ी शक्तियों के मिलन के फलस्वरूप व्यक्तिगत चेतना का रूपान्तरण विश्वचेतना में हो जाता है।
यह सच है कि अन्य चक्रों के उद्दीपन और जागरण से भी उच्चस्तरीय अनुभूतियाँ होती है, किन्तु विश्वचेतना में व्यष्टिचेतना का विलय-विसर्जन नहीं होता। तब हमेशा अनुभूतियों के साथ-साथ साधक को अपने आपे का भान बना रहता है। यह प्रगति-मार्ग में बहुत बड़ा अवरोध है। जब तक इसे गला नहीं लिया जाता, तब तक इड़ा,पिंगला, सुषुम्ना का पारस्परिक मिलन संभव नहीं। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि जब इनका संगम होता है, तो अहंभाव का लोप हो जाता है, वैयक्तिक चेतना व्यापक और विस्तृत बनती तथा वह विश्वव्यापी चेतना के साथ तदाकार हो जाती है। ऐसी स्थिति में साधक का अस्तित्व-बोध पूर्णतया समाप्त हो जाता है। इसका यह अर्थ नहीं कि व्यक्ति संज्ञाशून्य हो जाता है। केवल इतना होता है कि जो चेतना पहले एक सीमित दायरे में सीमाबद्ध थी, वह उस परिधि को तोड़ देती और द्वैत दशा से अद्वैत भाव में अवस्थान करने लगती है। यही है व्यक्तिगत चेतना का विलुप्त होना। आज्ञाचक्र के जागरण के बिना यह शक्य नहीं।
आज्ञाचक्र का स्थान यों तो भ्रूमध्य माना गया है; पर इसकी वास्तविक स्थिति दोनों भौंहों के मध्यवर्ती स्थान के ठीक पीछे रीढ़ की हड्डी के एकदम ऊपर मेरुरज्जु और मस्तिष्क के संधि स्थल के करीब है। शुरू में इसके यथार्थ स्थान का पता लगा पाना मुश्किल होता है। इसलिए प्रारंभिक साधक उसके क्षेत्रम् पर ध्यान केन्द्रित करते है। यह ‘क्षेत्रम्’ और कुछ नहीं वरन् चक्रों को निरूपित करने वाले प्रतीक-प्रतिनिधि है। इन्हें चक्रों के उद्दीपन-बिन्दु का प्रतिबिम्ब कहा जा सकता है। मूलाधार को छोड़कर प्रायः हर चक्र का अपना एक चक्र क्षेत्रम् होता है। ये दोनों केन्द्र (वास्तविक चक्र एवं चक्र क्षेत्रम्) एक -दूसरे के एकदम सीध में तथा नाड़ियों के माध्यम से परस्पर सम्बद्ध होते है। अन्तर सिर्फ इतना होता है कि क्षेत्रम् शरीर के सामने वाले हिस्से में स्थित होते है। जबकि चक्रों की अवस्थिति शरीर के पृष्ठ में मेरुरज्जु एवं मस्तिष्क में है। द्वक्षेत्रम् पर ध्यान करने से एक संवेदनात्मक अनुभूति होती है, जो नाड़ियों के माध्यम से चक्रों तक पहुँचती और फिर मस्तिष्क की ओर आगे बढ़ जाती है।
आज्ञाचक्र का क्षेत्रम् मस्तक में उस स्थान पर है, जहाँ लोग तिलक, चन्दन या कुमकुम लगाते तथा स्त्रियाँ जहाँ बिन्दी अथवा सिन्दूर का टीका प्रयोग करती है। वास्तव में इस परम्परा के पीछे भी आज्ञाचक्र को उत्तेजित-जाग्रत करने का ही प्रयोजन निहित है।सिन्दूर पारे का उत्पाद है। उसे जब बिन्दी के रूप में माथे पर लगाया जाता है, तो भ्रूमध्य स्थित नाड़ी में उत्तेजना होने लगती है।यह ठीक उसी प्रकार की होती है, जैसी आज्ञाचक्र पर ध्यान के दौरान तिलक, चन्दन द्वारा चेतन-अचेतन रूप से आज्ञाचक्र के प्रति सजगता बनाये रखी जाती है, इसलिए इन्हें केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक चिन्ह ही नहीं माना जाना चाहिए, अपितु आत्मसत्ता के विज्ञानवेत्ता, सूक्ष्मदर्शी योगियों द्वारा अन्वेषित ऐसा आधार समझा जाना चाहिए, जो अपेक्षणीय प्रयोजन पूरे करते हों।
आज्ञाचक्र की संगति शरीरशास्त्री आप्टिकल कायजमा, पिट्यूटरी एवं पीनियल ग्रन्थियों के साथ बिठाते है। यह ग्रन्थियाँ के साथ बिठाते है। यह ग्रन्थियाँ भ्रूमध्य की सीध में मस्तिष्क में है। इनसे स्रवित होने वाले हारमोन स्राव समस्त शरीर के अति महत्वपूर्ण मर्मस्थलों को प्रभावित करते है, अन्यान्य ग्रन्थियों के स्रावों पर भी नियंत्रण करते है। इनकी विकसित एवं अविकसित स्थिति का पूरे व्यक्तित्व पर भला-बुरा प्रभाव पड़ता है। सामान्यतया इन रहस्यमयी ग्रन्थियों और उनके उत्पादनों को अतिमहत्त्वपूर्ण मानते हुए भी मानवी नियंत्रण के बाहर समझा जाता है। ऐसा कोई उपाय अभी हाथ नहीं लगा है कि इन ग्रन्थियों की स्थिति को सँभाला-सुधारा जा सके। यदि वैसा उपाय हाथ लगा होता, तो सचमुच ही मनुष्य को अपने हाथों, अपना व्यक्तित्व, भाग्य और भविष्य बनाने की कुँजी हाथ लग जाती।
कुछ अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार पीनियल और पिट्यूटरी ग्रन्थियाँ चक्र संस्थान के दो अलग-अलग चक्रों का प्रतिनिधित्व करती है। उनका कहना है। कि आज्ञाचक्र और पीनियल ग्रन्थि दोनों एक ही है, जबकि पिट्यूटरी ग्रंथि सहस्रार है। पीनियल और पिट्यूटरी ग्रन्थियों की ही तरह आज्ञाचक्र और शून्यचक्र (सहस्रार) में भी निकट का संबंध है। ऐसा समझा जाता है कि आज्ञाचक्र शून्यचक्र तक पहुँचने का एक मार्ग है। इस मार्ग में यदि किसी प्रकार की कोई अड़चन न आई तो सहस्रार का जागरण सरल हो जाता है और इस मार्ग में यदि किसी प्रकार की कोई अड़चन न आई तो सहस्रार का जागरण सरल हो जाता है और इस उन्नयन से होने वाली अनुभूतियों को सँभाल पाना आज्ञाचक्र जागरण के बाद सुगम होता है।
पीनियल ग्रन्थि को अंतःस्रावी संस्थान का नियन्ता (मास्टर ग्लैण्ड) कहा गया है। अन्य ग्रन्थियों के साथ-साथ पिट्यूटरी पर भी वह बन्ध की तरह चढ़ा होता है एवं उसकी बागडोर अपने हाथ रखता है। ऐसा देखा गया है कि 10-12 वर्ष की आयु से पीनियल का रस-स्राव आरंभ हो जाता है। इसके पश्चात् पिट्यूटरी क्रियाशील हो जाती है, जिसमें शेष अन्य ग्रन्थियों का क्षरण प्रारम्भ हो जाता है और रक्त में विभिन्न प्रकार के हारमोन आ-आकर मिलने लगते है। इससे आदमी में यौन भावना, क्रूरता, कठोरता, करुणा, उदारता, दया, प्रेम, घृणा, द्वेष जैसी भली-बुरी भाव−संवेदनाओं का उदय होने लगता है और व्यक्तित्व में साँसारिकता हावी होती जाती है, मनुष्य आध्यात्मिक अनुशासनों की अवहेलना करने लगता है एवं आध्यात्मिक जीवन से शनैः-शनैः दूर होता जाता है।
तत्त्ववेत्ताओं के अनुसार आज्ञाचक्र का मन से गहरा संबंध है। हमें अंतः दर्शन, स्वप्न या आध्यात्मिक अनुभूतियों के दौरान जो कुछ भी दिखलाई पड़ता है, उसका आधार यही है। मानसिक सजगता के लिए भी यहीं जिम्मेदार है। उठते, बैठते कार्य करते समय यदि व्यक्ति सजग नहीं है। तो इसका तात्पर्य यह है कि उसका आज्ञाचक्र निष्क्रिय दशा में है। उसकी क्रियाशीलता के साथ-साथ आदमी की तत्परता और जागरूकता बढ़ने लगती है।
लौकिक ज्ञान के लिए सामान्यता इन्द्रियों की सहायता देनी पड़ती है, लेकिन असाधारण दशा में इनके बिना भी जानकारी संभव है। ऐसा दिव्य चक्षु के जागरण से होता है। ज्ञान के भौतिक तरीके में इन्द्रियों द्वारा जो कुछ संदेश ग्रहण किया जाता है, उसे सीधे मस्तिष्क में सम्प्रेषित कर दिया जाता है। वहाँ उसका अध्ययन, वर्गीकरण और विश्लेषण होता है, तब हूँ यह विदित हो पाता है कि जो कुछ देखा जा सुना गया वह क्या था। दूसरा तरीका अतीन्द्रिय है। इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है।
आकाश मेघमालाओं से घिरा हुआ हो और बीच-बीच में बिजली कौंध रही हो, तो कोई भी व्यक्ति आसानी से यह अनुमान लगा सकता है कि वर्षा होने वाली है। यह इन्द्रिय ज्ञान हुआ। इसके विपरीत यदि बिलकुल आसमान साफ हो फिर भी कोई यह कहे कि बरसात अवश्य होगी और तीन घंटे बाद होगी, तो इसका एक ही अर्थ है कि उसकी अन्तःप्रज्ञा विकसित है। और आज्ञाचक्र उद्बुद्ध स्थिति में है।
यह एक ऐसा केन्द्र है, जिसके विकास के बाद व्यक्ति मन और शरीर स्तर पर घटने वाली घटनाओं एवं साँसारिक प्रसंगों के द्रष्टा भाव से देखा रहता है और जिन घटनाक्रमों से सर्वसाधारण लोग विचलित हो उठते है, वैसे प्रसंगों में भी वह तटस्थ बना रहता है। इस स्थिति में चित की चंचलता समाप्त हो जाती है, बुद्धि में पवित्रता और शुचिता का उदय होता है, आसक्ति का अवशेष तक नहीं रहता, संकल्पशक्ति अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है तथा सत्संकल्प पूरे होने लगते है, व्यक्ति में अतीन्द्रिय अनुभूतियों और सिद्धियों का चमत्कार प्रकट होने लगता है, उसके शाप-वरदान फलित होने लगते है; वाणी में ओज, मुखमण्डल पर तेज और आँखों में चमक विराजने लगती है। इनके अतिरिक्त अन्य अनेक प्रकार की विशेषताएँ साधक में प्रकट और प्रत्यक्ष होती दिखाई पड़ती है।
तन्त्रशास्त्र में आज्ञाचक्र को ‘शिव ग्रन्थि’ कहा गया है। यह आत्मविकास के मार्ग में प्रकट होने वाली आत्मिक विभूतियों पर तिजोरी के ताले की तरह है। साधक सिद्धियों के प्रति जब तक मोह भंग नहीं होता, तब तक यह ग्रन्थि प्रगति के आगे के पथ को अवरुद्ध बनाये रहती है, इसलिए आज्ञाचक्र से शून्यचक्र (सहस्रार) तक की विकास-यात्रा काफी कठिन होती है। जो साधक सिद्धियों के भ्रम-जंजाल में उलझ जाते है, उनके लिए चेतना के सर्वोच्च शिखर तक पहुँच पाना संभव नहीं होता, इसीलिए साधनाकाल के आरंभिक दिनों से ही योगाभ्यासियों को आकर्षणों के प्रति तीव्र वैराग्य, अनासक्ति और निर्लिप्तता का परिचय देते हुए कठोर आत्मसंयम का अभ्यास करना पड़ता है।
आज्ञाचक्र का प्रतीक दो पंखुड़ियों वाला कमल है। साधना ग्रन्थों में इसके पीला, हल्का भूरा तथा स्लेटी कई रंग बताये गए है। इसके बीजमंत्र ‘हं’ और ‘क्षं’ है, जो क्रमशः बायीं एवं दायीं पंखुड़ियों पर अंकित है। ये चमकीले श्वेत रंग के होते है। इनमें से एक चन्द्रमा अथवा इड़ा नाड़ी का एवं दूसरा सूर्य या पिंगला नाड़ी का प्रतीक है।
कमल के भीतर एक वृत होता है, जो शून्य का प्रतीक है। वृत्त के अन्दर एक त्रिकोण है, जो शक्ति की सृजनात्मकता तथा प्रकटीकरण का प्रतिनिधित्व करता है। त्रिकोण के एक सिरे पर एक काला शिवलिंगम् है। यह साधक के सूक्ष्मशरीर को निरूपित करता है। लिंगम् का रंग साधक के विकास और पवित्रता भेद के हिसाब से भिन्न-भिन्न हो सकता है।
विकास की प्रारंभिक अवस्था में लिंगम् धूम्रवर्णी होता है। यह बार-बार ध्यान में आता और जाता रहता है। गहरे ध्यान में जब मन की चंचलता एकदम शान्त हो जाती है, तो लिंगम् का रंग काला दिखाई देता है। इस पर ध्यान एकाग्र करने से प्रकाशमान ज्योतिर्लिंगम् प्रकट होता है।
शिवलिंगम् के ऊपर बीजमंत्र ‘ॐ’ है। शिव आज्ञाचक्र के देवता है। इसकी अधिष्ठात्री देवी ‘हाकिनी’ है। इसके छह मुख हैं, जो चन्द्रमाओं की तरह शीतल-स्निग्ध प्रतीत होते है। आज्ञाचक्र की यह सूक्ष्म संरचना और आकृति मनगढ़न्त अनुभव की गई सच्चाई है। प्रत्येक चक्र की पृथक् -पृथक् तन्मात्रा, ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ होती है। आज्ञाचक्र के लिए मन ही इन तीनों भूमिकाओं को निबाहता है। यहाँ मन को सूक्ष्म आधारों से ज्ञान और संकेत प्राप्त होते है। यह आधार वह इन्द्रियों नहीं होती, जो अन्य चक्रों के लिए सूचनाओं के स्रोत है।
आज्ञाचक्र के जागरण के समय का अनुभव बताते हुए तत्त्वदर्शी आत्मवेत्ता कहते है कि यह लगभग वैसा ही होता है, जैसा चरस, गाँजा, भाँग या एल.एस.डी. जैसे रसायनों के सेवन से प्राप्त होता है, पूर्ण जाग्रत स्थिति में जब भ्रूमध्य पर ध्यान एकाग्र किया जाता है, तो वहाँ दीपशिखा की भाँति एक ज्योति दिखाई पड़ती है। गहरे ध्यान में उतरने पर दो पंखुड़ियों वाली उसकी वास्तविक आकृति उभरने लगती है। इस चक्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अलग-अलग चक्रों पर ध्यान करने जो पृथक्-पृथक् अनुभूतियाँ होती है, वह सब इस एक ही चक्र पर ध्यान के अभ्यास द्वारा अनुभव की जा सकती है।
आज्ञाचक्र के जागरण के बाद शेष चक्रों के उन्नयन के लिए दो प्रकार के क्रम अपनाये जाते है। एक में आज्ञाक्रम के उपरान्त विशुद्धि, अनाहत, मणिपूरित -इस क्रम में बढ़ते हुए मूलाधार तक पहुँचना पड़ता है, जबकि दूसरे में आज्ञाचक्र के बाद मूलाधार से शुरुआत कर ऊपर की ओर बढ़ते हुए स्वाधिष्ठान, मणिपूरित, अनाहत होकर विशुद्धि तक पहुँचते है। इन दोनों में से किसी को भी रुचि और सुविधा के अनुसार अपनाया जा सकता है, पर दोनों ही क्रमों में आज्ञाचक्र का प्रथम जागरण अनिवार्य है, अन्यथा दूसरे चक्रों के विकास से उत्पन्न हुई शक्ति को सँभाल पाना कठिन होगा।
आज्ञाचक्र जगाने के यों तो त्राटक शाम्भवी, मुद्रा अनुलोम-विलोम प्राणायाम आदि कितने ही तरीके है; पर पवित्र जीवन और शुद्ध आचरण के बिना यह सब साधना-उपचार समयक्षेप करने वाले कवायद भर बनकर रह जाते है। ऐश्वर्य को पा के लिए स्वयं को अनश्वर के समकक्ष साबित करना पड़ता है। इससे कम में आत्मिक विभूतियाँ न तो किसी को मिली है, न मिलने वाली है।
चेतनात्मक विकास में आज्ञाचक्र को सहस्रार से पूर्व का महत्वपूर्ण पड़ाव माना गया हैं उसकी महत्ता और उपयोगिता इसलिए भी बढ़ जाती है कि उसे चरम विकास का द्वार कहते है। योगविद्या के अनुभवियों ने आज्ञाचक्र को हिमालय कहा है, तो सहस्रार को सुमेरु की संज्ञा दी है हिमालय गए बिना सुमेरु तक पहुँचने की कल्पना करना निरर्थक ही नहीं, निरुद्देश्य भी है। ऐसे में चक्रसंस्थान के अंतर्गत आज्ञाचक्र को सर्वाधिक महत्वपूर्ण शक्ति-केन्द्र की उपमा देना अनुचित नहीं, उचित ही है।
धन्नाजाट गाँव में ढोर चराने वाला एक साधारण -सा व्यक्ति था। पढ़ा-लिखा था नहीं। जितना कुछ आता था उससे अपनी जीवनचर्या किसी तरह चला लेता था। मन्दिर के महन्त जी ने उसे अपने मंदिर की गौओं को चराने हेतु नौकरी पर रख लिया। बदले में खाने के लिए थोड़ा आटा मिल जाता व मंदिर का प्रसाद। वर्ष में एक बार कपड़े आदि भी चढ़ावे में से मिल जाते थे। एकादशी आयी। महंत जी ने कहा-देख धन्ना! तुझे जो आटा देते है उसके टिक्कड़ बनाना, पर खाना भोग लगाकर। ठाकुरजी को भोग अर्पित करके ही भोजन करना दिनभर जल पीकर रहना फिर भोग चढ़ा देना। धन्नाजाट ने 3 पाव के तीन टिक्कड़ सेके। ठाकुरजी का आह्वान करके भोग लगा दिया। रात्रि तक प्रतीक्षा करता रहा कि ठाकुर जी आएँ, भोजन लें तो हम खायें। शाम बीत गयी, रात्रि आ गयी। सरल हृदय भक्त ने सोचा कि कोई अपनी ही कमी रही होगी एवं टिक्कड़ नहीं में विसर्जित कर पानी पीकर वापस आ गया।
पंद्रह दिन बार फिर एकादशी आयी। महंतजी फिर बोले-देख ध्यान करके भोग लगाकर फिर आहार ग्रहण करना। आज फिर एकादशी का व्रत है। सोचने लगा धन्ना कि पंद्रह दिन पहले तो भूखे मरे थे। यह जल्दी-जल्दी एकादशी क्यों आती हैं? इस बार भी उसने दिनभर पानी पीकर गुजार दिया। शाम को भोग लगाया। टिक्कड़ वैसे ही रखे रहे-ठाकुर जी आए ही नहीं। इस बार भी नदी में डाल दिए। तीसरी बार फिर एकादशी व्रत आया। बोला धन्ना-ठाकुर जी खाते तो है नहीं, हम तो भूखे रह जाते है। महंत जी ने कहा हम लगाते है तो खा लेते हैं। तू भी भोग लगाकर खा ले। वह शब्द का मर्म तो नहीं समझ पाया। इतना समझ में आया कि महंत जी भगवान जी की खिलाकर ही खाते है। एक हम ही अभागे है। दिन भर प्रतीक्षा करता रहा- जब रात्रि होने को आई तो विकल होकर इस भाव से कि हमसे ठाकुरजी रूठे हुए हैं-भोग हमारा स्वीकार नहीं करते-आत्महत्या का भाव मन में रख तालाब में डूबने हेतु उद्यत हुआ। जैसे ही डूबते को था-उसने देखा कि जैसी तस्वीर बालकृष्ण की मोरपंखधारी रूप में महन्त जी के यहाँ है, वैसी ही शक्ल के कृष्ण-कन्हैया उसे उठाकर किनारे ला रहे है। बैठे कृष्ण-कन्हैया एवं प्रेम से भोजन किया। दो टिक्कड़ खा गये एवं तीसरे का एक टुकड़ा प्रेमपूर्वक धन्ना को खिला दिया। प्रसन्न मन से भले ही भूख ही सही-धन्ना वापस मंदिर आ गया।
अगली एकादशी फिर आ गयी। धन्ना बोला-महंत जी! इस बार आटा ज्यादा देना। कन्हैया को भोग लगाते है तो हमारे लिए बचता। महंत जी ने सोचा श्रम थोड़ा ज्यादा ही करता है। भूख लगती है। उनने डेढ़ सेर आटा दिया। कृष्ण भगवान इस बार राधाजी के साथ पधारे। भोग लगाया गया- प्रेम से खाया गया। भगवान बोले-इस बार आटा ज्यादा लाना। हम सारे ग्वाल-बालों-सखाओं के साथ आयेंगे। धन्ना परेशान हो गया। 10-12 दिन निकल गए। एकादशी का दिन फिर आ गया। धन्ना महंत जी से बाला-इस बार एकादशी पर हमें मत भेजना। भगवान भोग तो स्वीकार कर लेते है पर आते है पूरी फौज के साथ, हम तो भूखे रह जाते है। महंत जी को शंका हुई कि कहीं यह आटा बेच तो नहीं देता। उनने अधिक आटा दे दिया व जाने को कहा। फिर छिपकर उसका पीछा किया। उस दिन उसने टिक्कड़ बनाए-सारी फौज ब्रज से आयी थी। प्रेम से उसने खिलाए। महंत जी को कुछ नहीं दिख रहा था- मात्र इतना दिख रहा था कि टिक्कड़ गायब हो रहे है। खाने वाला कोई नहीं दिखा। बोले-धन्ना! कौन रोटी खा रहा है? धन्ना बोला- ठाकुरजी और कौन? महंत जी बोले-पर हमें तो कुछ नहीं दिख रहा। अरे धन्ना! ठाकुर जी वास्तव में भोग थोड़े ही लेते है। हम तो उनकी मूर्ति के सामने थाल रख देते है। उसके बाद भोजन ग्रहण कर लेते है। यह तो कोई प्रेतलीला है। तू भाग चल यहाँ से। धन्ना बोला-अरे महंत जी, आज तक आप हमसे झूठ ही बोलते रहे। तस्वीर को, मूर्ति को दिखाकर खुद खाते रहे व हमें भूखा रख पर हम तो साक्षात कन्हैया को भोजन करा रहे है। हमें समझ में नहीं आता, आपको क्यों नहीं दिखाई दे रहे।
धन्ना ने भगवान से शिकायत की कि आप महंत जी को क्यों नहीं दर्शन दे रहे। उन्हीं की बदौलत तो हम रोटी खाते है। आप कृपया इन्हें भी दर्शन दे। भगवान ने धन्ना से कहा- महंत में भाव की सरलता नहीं है। वे साधना-तपश्चर्या करे तो ही हम दर्शन देंगे। इतना कहकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए।
धन्ना जाट की यह कथा हमें भक्ति का मर्म सिखाती है। भगवान सरलता से, कपट रहित जीवन जीने से मिलते है। एक सामान्य-सा व्यक्ति भी चाहे तो भगवत्सत्ता का साक्षात्कार अपनी ईश्वरोन्मुखी भावनाओं व सरल निष्कपट जीवनचर्या के बल पर कर सकता है। पर वे ज्ञानी-तार्किक-विद्वान महंतों-बड़े-बड़े दिग्गजों के लिए सदैव दूर है। भगवान की भक्ति बुद्धि के कुचक्रों के जाल बुनने वालों के द्वारा, मात्र कर्मकाण्ड में लीन बहिरंग का दिखावा करने वालों के द्वारा संभव नहीं होता। यदि हमें मंत्रजप नहीं आता, कर्मकाण्डों की रटन हमें नहीं आती किंतु हृदय में आकुलता है-भावों की विकलता है-पाने की अभीप्सा है। एवं अंतरंग में निर्मलता है, तो लक्ष्यसिद्धि में जरा भी विलम्ब नहीं। लक्ष्यसिद्धि में जरा भी विलम्ब नहीं। श्रीरामचरितमानस में इसी तथ्य को नवधा भक्ति के अंतर्गत ‘नवम सरल सब सन छल हीना’ नाम से भगवान श्री राम ने भक्त शबरी के समक्ष प्रस्तुत किया है।
प्राचीन भारत की सर्वतोमुखी प्रगति का विवरण-परिचय जब पढ़ते-सुनते है, तब इस बात का आश्चर्य होता है कि उन दिनों जबकि साधनों का भारी अभाव था, किस आधार पर लोग इतने आगे बढ़ सके होंगे-ऊँचे उठ सके होंगे। उन दिनों मशीनों का आविष्कार नहीं हुआ था। बिजली, भाप जैसे शक्ति स्रोत भी हाथ में नहीं आये थे। यात्रा के लिए न सड़कें थीं, न पुल, न आज जैसे वाहन। शिक्षा संस्थाएँ भी गाँव-गाँव कहाँ थीं? प्रेस न होने से हस्तलिखित पुस्तकें जिस-तिस के पास टेलीफोन, रेडियो जैसी सुविधा का अभाव था। नहरें, बाँधे, विद्युत, कूप जैसे सिंचाई के साधन भी नहीं थे। सुरक्षा के लिए भुजबल पर ही निर्भर रहना पड़ता था। तीर, तलवार जैसे वे ही अस्त्र-शस्त्र थे, जिन्हें कोई बलिष्ठ व्यक्ति ही उठा, चला सकता था। बन्दूक, तोप, बम, मशीनगन, डायनामाइट मिसाइलें जैसी तकनीकी सैन्य-सज्जा भी उन दिनों कहाँ थी? साधनों की दृष्टि से निस्सन्देह पुरातनकाल बहुत पिछड़ा हुआ था फिर भी प्रगति का इतना उच्चस्तर जिसे देखकर दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है, किसी रहस्यमय आधार पर ही सम्भव हुआ होगा।
उन दिनों अपना देश स्वर्ण-सम्पदाओं का स्वामी था। कोलम्बस इस सोने की चिड़िया को तलाश करने निकला था। यहाँ पहुँचने का सीधा, सरल रास्ता तलाश कर रहा था, पर वह जा पहुँचा अमेरिका। योरोपीय जातियाँ भारत से जो पाना चाहती थीं, वह उन्हें अमेरिका महाद्वीप से मिल गया। इससे पहले का इतिहास बताता है कि यहाँ के निवासियों ने विश्व के कोने-कोने तक जाकर कृषि, उद्योग, शिल्प, चिकित्सा, शिक्षा आदि के वे आधार सिखाये, जिनके आधार पर अर्थ -उपार्जन एवं सुविधा-साधनों का अभिवर्द्धन सम्भव हो सके। साथ ही न्याय, शासन, सामाजिकता, धर्म आदि की उन पद्धतियों का ज्ञान कराया, जिनके सहारे सुख-शान्ति के साथ जिया जा सके। शासन-सूत्र के संचालन का बोध समस्त संसार को कराने के कारण भारत चक्रवर्ती कहलाया। उसके कारण विश्व में सम्पन्नता का उदय हुआ, इसलिए वह स्वर्ण सम्पदाओं का अधिपति माना गया। ज्ञान-विज्ञान की अनेकानेक धाराओं से सुदूर देशों को अवगत कराने के कारण उसे जगद्गुरु का श्रद्धासिक्त सम्मान दिया गया। अपनी अगणित दिव्य विशेषताओं के कारण भारतवासी समस्त संसार में देव कहलाते थे। बृहत्तर भारत की जन-गणना 33 कोटि थी। भारत-भूमि को देवभूमि कहा जाता था। वह प्रत्येक दृष्टि से ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ थी। उसमें रहने वालों को पृथ्वी के देवता कहा जाता था। 33 कोटि भूसुरों की निवास-स्थली ‘भारतमाता’ मानव जाति के लिए परमपावनी तीर्थभूमि थी। इस धरती का दर्शन करने जो आ पाते थे, वे अपने को धन्य मानते थे।
आज के अनेकानेक सुविधा-साधनों के करतलगत होते हुए भी मनुष्य का वैयक्तिक और सामूहिक जीवन दिन-दिन जटिल और विपन्न होता चला जाता है। जबकि प्राचीनकाल में नगण्य साधनों से इस देश के निवासी न केवल स्वयं सुख-शान्ति से रहते थे-समुन्नत स्तर तक जा पहुँचे थे, वरन् विश्व के कोने-कोने में जाकर प्रगति और समृद्धि की हरीतिमा उगाते थे। इसका कारण क्या हो सकता है? इस गम्भीरता पूर्वक विचार करने से एक ही बात उभर कर आती है कि उन दिनों मानवी व्यक्तित्व को ऐसे जीवन-यन्त्र के रूप में विकसित किया गया था, जिसमें आदर्शवादिता और परमार्थ-परायणता कूट-कूटकर भरी हुई थी। उसे भावना-शील बनाया गया था। साहस और पराक्रम उनमें हिलोरें लेता था। निकृष्टता और क्षुद्रता से उसे घोर घृणा थी। इस प्रकार के व्यक्तित्व असाधारण रूप से शक्तिशाली होते है। महामानवों की सामर्थ्य की तुलना विशालकाय ओर प्रचंड शक्तिशाली यंत्रों से भी नहीं क जा सकती। वे सोने के पर्वत से भी अधिक मूल्यवान होते है। वे जिधर भी बढ़ते हैं-तूफान उठाते है। वे जहाँ भी पैर रखते है- उसे पूरा करते रहते है। मनस्वी और तपस्वी मनुष्य से बढ़कर और कोई ऊँचा शक्तिस्रोत इस धरती पर है ही नहीं। जब ऐ नररत्न घर-घर पर है ही नहीं। जब ऐसे नररत्न घर-घर में उत्पन्न होते होंगे, तो सहज ही इस देश की भूमि स्वर्गादपि गरीयसी रही होगी और वे जहाँ भी गये होंगे, वहाँ सुख-शान्ति और समृद्धि का वसन्त लहलहाया होगा।
यदि साधनों की उन्नति को सुख-शान्ति का माध्यम मानें तो आज हम भूतकाल की तुलना में हर दृष्टि से आगे होना चाहिए था। आज के अर्थशास्त्री प्रायः यह रट लगाते है कि धन का अभाव पतन का हेतु है और संपत्ति होने पर उन्नति होती है। साम्यवादी दार्शनिक निरन्तर इसी तर्क को दुहराते है, वे पतन को गरीबों से जोड़ते है और प्रगति के लिए अधिकाधिक सुविधा-साधनों के संवर्द्धन पर जोर देते है। यदि यह बात सही रही होती तो अमेरिका जैसे धनी एवं साधन-सम्पन्न देशों के नागरिक देवोपम जीवन जी रही होते, पर वास्तविकता इससे सर्वथा विपरीत है। वे अपनी आन्तरिक विशेषताएँ बेतरह गँवाकर हर दृष्टि से खोखले होते चले जा रहे है। निर्धनता से बड़ी महँगी पड़ रही है- उन्हें वह सम्पन्नता। यदि धन ही प्रगति का कारण रहा होता तो कोपीन धारी पर्णकुटीरों में रहने वाले ऋषियों से अधिक कोई दुखी न होता और सम्पन्न लोगों में सन्तोष देखने को मिलता। अस्तु, यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि प्राचीनकाल की सम्पन्नता-उत्थान का कारण रही होगी और आज निर्धनता के कारण हम सब पवनोन्मुख हो रहे है।
इसी प्रकार यह कहना भी गलत है कि चरित्र-निष्ठा का मार्गदर्शन न मिलने से लोग पतनोन्मुख होते है। प्राचीनकाल में प्रेस नहीं था- हस्तलिखित पुस्तकें जिस-तिस के पास थी और उनका मूल्य अधिक था। हर कोई उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता था। शिक्षा का प्रसार भी उतना नहीं था। अब हर स्तर का साहित्य पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। यह ठीक है कि पतनोन्मुख साहित्य आँधी-तूफान की तरह बढ़ा है, पर इनकार इस बात से भी नहीं किया जा सकता कि प्रेरक-साहित्य का सर्वथा अभाव नहीं, जो चाहे उसे भी प्रचुर मात्रा में प्राप्त कर सकता है। यही बात उपदेशकों के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। कला-मंच पर कब्जा करके पतन ने निर्लज्ज स्वेच्छाचार का खुलकर समर्थन किया और उसके फलस्वरूप जनमानस में विनाशकारी दुष्प्रवृत्तियों को आश्रय मिला है, यह एक नग्न सत्य और स्पष्ट तथ्य है। पर यह कहते भी नहीं बनता कि सदुपदेश देने वाली वाणी सर्वथा मौन है। सभा-सम्मेलनों में आये दिन सदाचरण के पक्ष में बहुत कुछ कहा जाता रहता है। रेडियो से भी कितने ही प्रेरक प्रवचन प्रसारित होते रहते है। कथा-प्रवचनों को नगण्य नहीं ठहराया जा सकता। यदि रुचि हो तो ऐसे प्रेरक प्रसंग भी पर्याप्त मात्रा में सुनने को मिलते रह सकते हैं- जो सज्जनता की राह पर चलने की प्रेरणा दे सकते है।
लेखनी और वाणी को व्यक्ति निर्माण का माध्यम माना जाता है। यह सही भी है, यह दोनों माध्यम मनुष्य के मस्तिष्क को झकझोरते है और उसे दिशा प्रदान करते है इनकी शक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता। इतने पर भी यह प्रश्न तो यथास्थान बना ही रहता है कि जब आज लेखनी करने में सर्वथा मौन नहीं हुई है, तो फिर जनसमाज का स्तर इस द्रुतगति से पतनोन्मुख होता क्यों चला जा रहा है?
इस प्रश्न का समाधान एक ही है कि मनुष्य के मस्तिष्क भर को लेखनी तथा वाणी प्रभावित करती है, उसका अन्तः करण स्पर्श करने की शक्ति महामानवों में ही होती है। जन-मानस को ऊँचा उठाने में, व्यक्तित्वों को परिष्कृत बनाने में केवल वे ही समर्थ होते है। आज उनकी ही भारी कमी पड़ रही है। आज उनकी ही भारी कमी पड़ रही है। भौतिक प्रयोजनों के संदर्भ में लेखनी और वाणी का महत्व असंदिग्ध है। स्कूल-कालेजों का समस्त प्रशिक्षण इन्हीं दो माध्यमों से चल रहा है। तर्क, तथ्य और प्रमाण प्रस्तुत करके पिछले विचारों को सुधारने और नई मान्यताएँ बनाने का अवसर मिलता है। ऐसा मस्तिष्क को झकझोरने वाला बहुत कुछ क्रिया−कलाप लेखनी और वाणी ही सम्पन्न करती है। विचार-शक्ति का अपना स्थान है और अपना महत्व। उसकी शक्ति उपयोगिता और आवश्यकता से कोई कैसे इनकार करेगा?
किंतु जहाँ तक व्यक्तियों को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालने की आवश्यकता का प्रश्न है, वहाँ यही तथ्य सामने आ खड़ा होगा आदर्शों को अपने जीवन में उतारने वाले व्यक्ति ही दूसरों के अनुकरण की, अनुगमन की प्रेरणा देकर उन्हें ऊँचा उठा सकने में, आगे बढ़ा सकने में समर्थ हो सकते है। प्राचीनकाल में यह प्रयोजन साधु संस्था पूरा करती थीं। उसके सदस्य सर्व-साधारण के सामने यह आदर्श प्रस्तुत करते थे कि परमार्थ-परायण जीवन न तो कष्टकर है, न असुविधाजनक न असम्भव, न अव्यावहारिक वरन् थोड़ी शारीरिक असुविधा सहने पर जो मानसिक एवं आत्मिक लाभ मिलता है, वह इतना बहुमूल्य है कि उसे प्राप्त करने के लिए यत्किंचित् असुविधा उठाना बाल-विनोद जैसा तुच्छ समझा जा सकता है। सन्त आदर्शवादी जीवन जीते थे। उनके प्रति जन-मानस में जो सहज श्रद्धा उमड़ती थी, वह उन महामानवों द्वारा दी गई उत्कृष्टतावादी प्रेरणाओं को आत्मसात् करने की पृष्ठभूमि बनाती थी। लोग उनके उपदेशों को मखौल नहीं मानते थे, मनोरंजन के लिए नहीं सुनते थे और न वक्तृत्व कला के आधार पर निन्दा-प्रशंसा करते थे, वरन् आदर्शवादी महामानवों के वचन, शास्त्र मन्तव्यों की तरह, श्रुति प्रतिपादन की तरह हृदयंगम किये जाते थे। प्रवचन आप्त-वचन होते थे, उनका अनुसरण करने में हर व्यक्ति को अपना परम कल्याण प्रतीत होता था। यह साधु संस्था ही थी, जिसने जन मानस को आदर्शवादिता की प्रेरणाओं से प्रभावित करने और उत्कृष्टता की राह पर चलने के लिए बाध्य कर दिया था। जन्मजात पतनोन्मुख नर-पशु की दुष्प्रवृत्तियों को देवोपम उत्कृष्टता में बदलने का श्रेय भारत की साधु-संस्था को ही दिया जा सकता है। उसने पशु को देवता में बदला। यही है, वह रहस्य जिसके कारण इस देश के प्रत्येक नागरिक का व्यक्तित्व उच्चतम स्तर तक विकसित हुआ और उसने न केवल अपने देश को, वरन् समस्त विश्व को सतयुगी सुख-शान्ति का रसास्वादन कराया।
साधु-संस्था के दो वर्ग थे, एक गृहस्थ अर्थात् ब्राह्मण-एक सीमित क्षेत्र में रहकर वहाँ का पौरोहित्य धर्म नेतृत्व करने वाले। दूसरे विरक्त-जिन्हें परिव्राजक रहकर सुदूर क्षेत्रों की यात्राएँ करनी होती थी और अपना ब्राह्मण आर साधु दोनों ही साधु -संस्था के परस्पर पूरक अंग थे। दोनों के कार्यक्रम में थोड़ा अन्तर था, पर लक्ष्य पूर्णरूपेण एक ही था-लोकमानस को उत्कृष्टतम बनाये रहने के लिए अपने ढंग से अथक एवं अनवरत रूप से उत्कृष्ट प्रयास करना। प्राचीनकाल में यह साधु-संस्था उच्चतर पर पहुँची हुई थी, उसी ने जनसाधारण के व्यक्तियों को ऊँचा उठाया था और उस उत्कर्ष के आधार पर ही वह सब सम्भव होता रहा, जिसका हम आज भी गर्वोन्नत मस्तिष्क से स्मरण करते है।
कबीरदास अपने समय के महान दार्शनिक और द्रष्टा पुरुष थे। उन्होंने अपने पदों द्वारा जहाँ एक ओर सामाजिक कुप्रथाओं पर कुठाराघात किया है, वहीं दूसरी ओर उनमें इतने गंभीर भावों का समावेश किया है कि उन्हें यदि ठीक-ठीक समझा जा सके, तो व्यक्ति के भीतर महान क्रान्ति घटित हो सकती है।
ऐसे ही एक पद में वे कहते है-
“गूँगा हूवा बावला बहरा हूवा कान। पाऊँथैं पंगुल भया, सतगुरु मार्या बान।”
सामान्य संदर्भ में इसका इतना ही अर्थ हो सकता है कि जो गूँगा था, वह बोलने लगा; जो लँगड़ा था, वह चलने लगा- ऐसा गुरु का चमत्कार है; किन्तु इतना साधारण अर्थ कबीर के पदों का नहीं हो सकता। इसमें निश्चय ही कोई गंभीर भाव छुपा हुआ है। जब इसकी दार्शनिक विवेचना की जाती है, तब स्पष्ट हो जाता है कि कवि का संकेत किस ओर है। वास्तव में कबीर पहले एक दार्शनिक विवेचना की जाती है, तब स्पष्ट हो जाता है कि कवि का संकेत किस ओर है। वास्तव में कबीर पहले एक दार्शनिक है, फिर कवि। इसलिए दर्शन का भरपूर प्रयोग उनने अपने पदों में किया है।
प्रस्तुत पद में गुरु की महिमा का बखान करते हुए वे कहते है कि जब तक उनका सहयोग, संरक्षण और मार्गदर्शन नहीं मिलता, तब तक व्यक्ति नानाप्रकार के बन्धनों में बँधा रहता है। उसे पाशमुक्त करने वाला व्यक्ति गुरु की महत्ता आध्यात्मिक जीवन में गुरु की महत्ता असाधारण हैं। वहीं है, जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलता है, बन्धनों से मुक्ति दिलाता है एवं परतंत्रता से स्वतंत्रता की ओर छलाँग लगाने की प्रेरणा देता है। यह सब यदि न हो, तो मनुष्य कारावास के कैदियों की तरह तड़पता-छटपटाता रहेगा, किन्तु यह भी सच है कि उक्त बन्धन यदि जन्म-जन्मान्तरों जितना दीर्घकालीन हुआ, तो फिर मनुष्य को, बन्दी को वह स्थिति सुखकर प्रतीत होने लगती है एवं वह उसी अवस्था में रस अनुभव करने लगता है। यह विचित्र मानवी स्वभाव है।
आज से लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व फ्राँस के क्रान्तिकारियों ने फ्राँस स्थित बैस्टील का किला तोड़ दिया। उसमें वहाँ के जघन्य अपराधी थे। ऐसे ही अपराधियों के लिए वह कारागृह बना भी था। उसमें कई लोग चालीस वर्ष से बन्द थे, तो कई पचास वर्ष से। किसी-किसी की तो मृत्यु भी वहीं हो गई। वह बाहर की दुनिया कारावास के बाद देख भी नहीं सकें अँधेरी कोठरियों में रहते-रहते वे उसके इतने अभ्यस्त बन गए कि जब उस किले को तोड़ा गया और उन्हें मुक्त किया गया, तो बाहर निकलकर वे बहुत कष्ट और दुःख अनुभव करने लगे। उनकी आँखें प्रकाश के समक्ष चौंधियाने लगी, उनकी आँखें प्रकाश के समक्ष चौंधियाने लगी, उनमें रोशनी बर्दाश्त करने क क्षमता न रही। वे असह्य कष्ट अनुभव करने लगे।
साँसारिकता में लिप्त व्यक्ति की स्थिति भी ऐसी ही है। वह उसमें इस कदर डूब जाता है कि अपना सर्वस्व उसी को मान बैठता है। इससे पृथक् होने की कल्पना से ही दुःख और विषाद की अनुभूति करने लगता। कारण एक ही है कि वह पदार्थ को जीवन का अभिन्न अंग मानने लगता और सुख-दुख की तलाश उसी में करता है, जबकि सच्चाई इसके विपरीत हैं आनन्द भीतर की वस्तु है, उसे बाहरी वस्तुओं से जोड़ना उचित नहीं। यह मूर्च्छना की स्थिति है, जिसमें व्यक्ति आनन्द के अजस्र स्रोत आत्मचेतना को भुलाकर पदार्थसत्ता की महत्ता को सर्वोपरि स्वीकार लेता है। इस दशा से उबारना गुरु का काम है।
इसलिए कबीर कहते है-गूँगा हूवा बावला, बहरा हूवा कान। अर्थात् सर्वसाधारण के अन्दर कुछ है, जो बिलकुल गूँगा है। सद्गुरु के सम्पर्क में आकर उसकी मूकता अचानक मुखर हो उठती है, वह बोलने लगती है। उसे शब्द मिल जाते है, वह निनादित होने लगती है।
यह निनाद किसका है? मुखरता किसकी है? अध्यात्म विद्या के आचार्यों का कथन है कि इसे हृदय की, अंतःकरण की वाणी माना जाना चाहिए, जब तक वह अपरिष्कृत अवस्था में पड़ा रहता है, तब तक उसकी वाणी उसका नाद सुनाई नहीं पड़ता, किन्तु परिष्कार प्रक्रिया से गुजर कर जब वह पूर्णतया प्रखर होता है, जो वहाँ का अनहद नाद स्वयमेव सुनाई पड़ने लगता है और उसकी मूकता समाप्त हो जाती है।
कबीर कहते है कि मनुष्य का जो अंग सर्वसाधारण स्थिति में बोलता और विचारता है, सार उसमें नहीं है। वह तो एक प्रकार से अनर्गल प्रलाप है। उसकी तुलना विक्षिप्त के उन्माद से की जा सकती है। भौतिक दृष्टि से उसका भले ही महत्व हो, पर आध्यात्मिक जगत में हृदय की चर्चा होती है, जबकि भौतिक दुनिया मन के इर्द-गिर्द घूमती है। एक में हृदय का शासन है, तो दूसरा मन द्वारा शासित है। जहाँ मन का शासन है, वहाँ मलीनता अवश्य होगी। भौतिक संसार में इसी कारण से अनय, अत्याचार, पापाचार, दुराचार जैसी कितनी ही अवांछनीयताएँ संव्याप्त होती है, जबकि आध्यात्मिक संसार में हृदय का क्रिया-व्यापार होता है, इस कारण से वह इनसे मुक्त है।
रामकृष्ण कहा करते थे कि चील कितनी ही ऊपर आकाश में उड़ती रहे, फिर भी उसकी दृष्टि धरती पर पड़े मृत जानवर पर ही लगी रहती है। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि उसका शरीर उत्तुंग ऊँचाइयों पर उड़ रहा है, पर मन फिर भी जमीन पर अटका रहता है, माँस के लोथड़े तलाशता रहता है। यह मन का स्वभाव ही है। उसे क्षुद्रता में -अधोगामी बनने में रस आता है। इसलिए मनीषियों का कथन है कि मन यदि ईश्वर -चिन्तन में निमग्न भी है, तो वह अपनी वासना पूर्ति का हिसाब-किताब उसके सामने प्रस्तुत करेगा और वही माँगेगा, जिसमें उसकी भौतिक संतुष्टि हो। उसकी यह माँग-चील के माँस के टुकड़े की तुलना में किसी भी कीमत जा सकती।
कबीर का कथन है कि जब सद्गुरु रूपी पारस का सान्निध्य प्राप्त होता है, तो अन्दर का वह हिस्सा बोलना प्रारंभ करता है, जो अब तक मौन था या यों कहें कि जिसे बोलने का मौका था या यों कहें कि जिसे बोलने का मौका ही नहीं दिया गया। यदि एक स्वस्थ आदमी की किसी पागल से मुलाकात हो जाए, तो यह निश्चित है कि वह उसे बोलने का अवसर न देगा। वह फूहड़ प्रलाप ही करता रहेगा और स्वस्थ व्यक्ति को उसकी बकवास सुनने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर दो हिस्से हैं- प्रलापी और शान्त, पागल और स्वस्थ, असभ्य और सभ्य, क्षुद्र एवं दिव्य। मनुष्य का असभ्य या क्षुद्र हिस्सा उसका मन है और हृदय उसका दिव्य भाग है। मन उस पर इस कदर हावी है कि वह बोल ही नहीं पाता, बोलना चाहता है, अपनी दिव्यता प्रकाशित करने को उत्सुक है, पर उसके लिए कोई अवसर ही नहीं है, जबकि केन्द्र वही है। मन तो परिधि है। संसार के क्रिया -व्यापार में उसकी आवश्यकता पड़ सकती है, लेकिन सत्य की शोध में अमृत-यात्रा में, ईश्वर-अनुसंधान में, मन से काम न चलेगा। वहाँ ‘हृदय’ चाहिए।
अब प्रश्न है कि यह हृदय व्यक्ति को कैसे मिले? उसे मुखर कौन बनाये और उसमें वाणी का संचार कैसे हो? रक्त-माँस का हृदय तो हर एक के पास है, पर यहाँ उस लप-डप करते माँस पिण्ड की चर्चा नहीं हो रही हो, जिसमें ममत्व की हिलोरें उठ रही हों, जहाँ प्रेम का शाश्वत साम्राज्य हो, जो सहयोग और सहकार के लिए मचल उठता हो, जहाँ पर-स्व में परिवर्तित हो जाता हो-ऐसे हृदय का विकास कैसे हो?
कबीर इसका इसका उत्तर देते हुए कहते है-सतगुरु मारया बान। अर्थात् गुरु की प्रेरणा, मार्गदर्शन, सान्निध्य और श्रद्धा से संभव है और उस कार्य से शक्य है, जिसे पूरा करने का दायित्व शिष्य के कंधों पर सौंपा है। इन्हें पाने और करने में यदि वह सफल हुआ, तो कबीर का उपलब्ध कर पाने में समर्थ होगा, जो वाणी सम्पन्न हो।
अब यदि हृदय मिल गया और उसे वाणी भी मिल गई, तो काम काफी आसान हो जाता है, उसे सुनना भर शेष रहता है। कान तो है ही, लेकिन अड़चन तने पर भी पूरी तरह समाप्त नहीं होती। हम भीतर की आवाज को नहीं सुन पाते, कारण कि जिस कान से उसे सुनने का प्रयास करते है, वह संसार के लिए तो उपयुक्त है, ध्यान के लिए नहीं। इसके लिए कोई ओर कान चाहिए, सुनने के लिए कोई और विधि एवं शैली चाहिए।
वह क्या हो? यह एक भिन्न तरीका है, जब पूरा व्यक्तित्व ही कान हो जाता है-बहरा हूवा कान। रोम-रोम और श्वास-श्वास जो बहरे पड़ गए है, वह कान की तरह ग्रहण और संवेदनशील बन जाएँ। नहीं, ऐसे काम नहीं चलेगा। उस विराट को सुनना ही हो तो पूरा कान ही हो जाना पड़ेगा। अर्थात् समग्र व्यक्तित्व को इतना शिष्ट और उत्कृष्ट बनाना पड़ेगा कि व्यष्टि और समष्टि चेतना में कोई फर्क ही न रह जाए। ऐसी स्थिति में शब्द ब्रह्म की अनुभूति कर पाना सरल ही नहीं, संभव भी बन जाता है। महावीर ने श्रावक की परिभाषा करते हुए यही कहा है कि जिसका समग्र व्यक्तित्व कान हो जाए, वही सच्चा श्रावक है। उसी प्रकार जिसका पूरा व्यक्तित्व आँख हो जाए, वह द्रष्टा है। जिसका पूरा व्यक्तित्व हृदय की पुलकन बन जाए, वह प्रेमी है निस्वार्थ और निर्विकार प्रेम इससे कम में संभव नहीं। इसलिए हमें अखण्ड बनना पड़ेगा, खण्ड-खण्ड से काम न चलेगा। इतना यदि हो सका, तो फिर शिष्य की अपंगता जाती रहेगी। अतएव कबीर कहते है-पाऊँ थैं पंगुल भया अर्थात् अब तक जो हिस्सा पक्षाघात की तरह पंगु बना हुआ, हिल-डुल न सकता था, वह अचानक चलने लगता है। यहाँ किसी चमत्कार की बात नहीं की गई है, अपितु आत्मजागरण की ओर इशारा किया गया है।
सतगुरु मारया बान। पर का यह अन्तिम चरण अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह बाण क्या है? कोई साधारण धनुर्विद्या नहीं। सद्गुरु का ध्यान तो सदा निशाने पर, लक्ष्य पर, शिष्य पर ही लगा रहता है, पर कठिनाई यह है कि यदि लक्ष्य या शिष्य राजी न हुआ तो बाण चूक जाता है। अस्तु, तीर मारना यहाँ उतना सारगर्भित नहीं है, जितना उसे ग्रहण करना शिष्य में यदि श्रद्धा का चुम्बकत्व हो, तो बाण चाहे किसी भी अलक्षित दिशा में फेंक दिया जाए, वह शिष्य तक पहुँच जाएगा। उसे वह अपनी प्रबल श्रद्धा द्वारा खींच बुलाएगा। इसीलिए विशेषता और महत्ता यहाँ शिष्य की है। गुरु का तो हमेशा से प्रयास उसे ऊँचा उठाने का होता है, लेकिन शिष्य का सहयोग न मिले, तो उपर्युक्त पद चरितार्थ न हो सकेगा।
हम सच्चे शिष्य बनें-अध्यात्म का सम्पूर्ण सार इसी में है। हमारे अन्दर गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण कितना है? यह तो अंतरंग पक्ष है, पर इसका एक हल्का-सा अनुमान उस कर्तव्यनिष्ठा और उच्च आदर्शों के प्रति प्रेम से लगाया जा सकता है, जो जीवनभर हमें बताया और सिखाया गया। यदि निज के अन्तराल में इसकी थोड़ी भी झलक-झाँकी मिले, तभी यह समझा जाना चाहिए कि कबीर के उपर्युक्त पर के तत्त्वदर्शन को हम आत्मसात् कर सके और शिष्यत्व की कसौटी पर खरे उतर सके, अन्यथा नहीं।
कोई दृष्टि दोष ऐसा भी होता है, जिसमें बड़ी वस्तु छोटी अथवा छोटी-बड़ी दिखाई पड़ती है। कहते है कि हाथी की आँखें आकार की तुलना में छोटी होती है, इसलिए सामने से गुजरने वाले छोटी होती है
इसलिए सामने से गुजरने वाले छोटे जीव-जन्तु भी बड़े लगते है। आदमी को भी वह अपने बराबर मानता है, इसलिए डरकर उसके वशवर्ती हो जाता है।
मनुष्यों की आँखों में तो उतनी गड़बड़ नहीं होती, पर उसके सोचने-समझने के तरीके में, दृष्टिकोण में ऐसा मतिभ्रम पाया जाता है कि सामने प्रस्तुत समस्याओं और कठिनाइयों को उनकी वास्तविकता से कहीं अधिक समझ बैठता है। साथ ही दूसरी गलती यह करता ह। कि प्रतिकूलताओं से निपटने की अपनी सामर्थ्य को भूल जाता है या नगण्य मान बैठता है। ऐसी दशा में जो भी कठिनाइयाँ, प्रतिकूलताएँ सामने होती है, उन्हें वह बढ़ा-चढ़कर देखता है और समाधान के बारे में अविश्वस्त, अनिश्चित एवं आतंकित रहने के कारण भीतर ही-भीतर घुटने लगता है। वास्तविकता कठिनाइयाँ जितनी होती है, उससे में भी दिमाग दौड़ता है और अच्छा-खासा कल्पना लोक सामने ला खड़ा करता हैं।
शेखचिल्ली ने तेल को यथास्थान पहुँचाने के एक घण्टे की अवधि में शाही संभावनाएँ गढ़कर खडत्रर कर ली थी। और दिवास्वप्न देखने वालों में प्रख्यात हो गया था। डरावनी कल्पनाएँ करवाना और भी सरल हैं रस्सी का साँप, झाड़ी का भूत बनने की निरर्थक आशंकाएँ उनकी मनगढ़न्त करने वाले को कितना त्रास देती हैं, यह सभी जानते है। ज्योतिषी लोग हाथ देखकर कुण्डली देखकर अशुभ-अनिष्टों को सिर पर मंडराता हुआ बताते है और भोले विश्वासी की नींद हराम कर देते है। इसी धन्धे में वे लोग गुलछर्रे उड़ाते है और संपर्क में वे आने वाले किसी भी व्यक्ति को भयभीत कर देते है। यह कल्पनाओं का ही चमत्कार है, जिनके पीछे वास्तविकताएँ नहीं के बराबर होती है फिर जहाँ थोड़े बहुत तथ्य भी हो, वहाँ तिल का ताड़ बनना क्या मुश्किल है। शनि या राहु-केतु की दशा होने पर विश्वास करने वाले सामने प्रस्तुत काम में असफलता मिलने और कहीं से संकट टूट पड़ने की ही आशंका करते रहते है। फलतः दिल में दिन में बेचैनी छाई रहती है ओर रात को नींद नहीं आती। इन परिस्थितियों में मानसिक तन्त्र उत्तेजित-उद्विग्न रहने लगता है धीरे-धीरे निषेधात्मक चिन्तन की आदत परिपक्व हो जाती है और अपने लिए, परिवार के लिए व्यवसाय के लिए परिवार के लिए, व्यवसाय के लिए संकट की सम्भावना चारों ओर दिखाई पड़ती है और लगता है कि मित्र सम्बन्धी दगा देने जा रहे है या अफसर द्वेष मानते है और नीचा दिखाने वाले है। कल्पना को अशुभ चिन्तन के साथ जोड़ भर दिया जाय तो इसे राई का पर्वत बनाने में कितनी देर लगती है।
ऐसे लोग सदा शंका से शंकित रहते है। मन उद्विग्न रहता है और उस उद्विग्नता का परिणाम फिर शरीर को भुगतना पड़ता हैं शरीर का नियामक मन हैं उसकी स्थिति डाँवाडोल हो तो ऐसे लक्षण उभरने लगते है, जिनसे प्रतीत होता है। कि भयानक रोगों ने आ घेरा और मौत का शिकंजा अब नजदीक आया। रक्तचाप, दिल की धड़कन, बहुमूत्र, सिर का भारीपन, अनिद्रा, पीठ का दर्द, अपच, दमा आदि रोगों को तनावजन्य माना जाता है। डॉक्टरों के पास इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है। सामयिक समाधान के लिए वे तत्काल तो कोई नशीली गोलियाँ दे देते है, जिससे रोगी कली चिन्तन धारा में व्यतिरेक उत्पन्न हो जाए। इससे तात्कालिक राहत भी मिलती है। पर जैसे ही नशा उतरता है, विस्मृति दूर हो जाती है और आदत के अनुसार विपत्ति भरी कल्पनाएँ सिर के इर्द-गिर्द नाचने लगती है और उनका प्रभाव शरीर के असत-व्यस्त करने वाली रोग-श्रृंखला के रूप में अपना त्रास दिखाने लगता है।
उद्विग्नता देखने में छोटा, किन्तु परिणाम में भयानकता की दृष्टि से बड़ा रोग है। यह कुछ दिन लगातार बनी रहे तो उत्तेजना के दबाव से भीतरी अवयवों को अशक्त बना जाते है और वे अपना काम ठीक तरह कर नहीं पाते। इस व्यक्तिक्रम के कारण रोगों की घुड़-दौड़ चल पड़ती है। जब तक एक को समेटते है, तब तक दूसरे का प्रकोप सामने आ धमकता हैं शरीरगत आहार-विहार की गड़बड़ी से उत्पन्न होने वाले रोग, पथ्य, परिचर्या और चिकित्सा के द्वारा आसानी से काबू में आ जाते है।, पर जिनकी जड़े मस्तिष्क में है, जो अशुभ चिन्तन और भय-आशंका के कारण उत्पन्न हुए है, उनकी जड़ मनः क्षेत्र में होती है और उनके अंकुर शरीर में फूटते ही रहते है। एक से निपटने नहीं पाते कि दूसरे की उत्पत्ति एवं अभिवृद्धि अपना कमाल दिखाने लगती है। जड़ हरी रहने पर पत्तों को तोड़ते रहने से कोई काम नहीं चलता। मस्तिष्कीय विकृति शारीरिक रुग्णता से मिलकर एक-एक मिलकर ग्यारह होने का उदाहरण बनता है। संक्षेप में यही है तनाव की महाव्याधि, जिससे एक तिहाई लोग ग्रसित पाये जाते है। चिकित्सा काम देती नहीं। कभी किसी अंग में कभी किसी में उपजने-उभरने वाली रुग्णता डाकिन की तरह पीछे लग लेती है, तो रक्त माँस को चूसकर मनुष्य को हड्डियों का ढाँचा बना देती है और अन्ततः उसे अकाल मृत्यु के मुँह में घसीट ले जाती है।
तनाव यों चिकित्सकों के रजिस्टरों में दर्ज होने वाले रोगियों में से अधिकाँश में पाया जाता है और वे इसी मर्ज की चित्र-विचित्र औषधियाँ देकर धन्धा चलाते रहे है। ज्योतिषियों के लिए ग्रहदशा की प्रतिकूलता का यह प्रत्यक्ष प्रमाण है। शान्ति के लिए किए जाने वाले अनुष्ठानों के नाम पर वे मोटी दक्षिणाएँ इसी आधार पर बटोरते है। घर भर चिन्तित रहता है और मित्र-हितैषियों में से हर कोई इस दुर्भाग्य पर आँसू बहाता है।
किन्तु यह रोग कुकल्पनाओं का उत्पादन है। उसका उद्गम छिद्र बन्द न किया जाय तो पानी रिसता, फैलता और बहता ही रहेगा। सही सोचने का तरीका यह है। कि मनुष्य के पुरुषार्थ, साधन एवं सहयोगी समुदाय की सम्मिलित क्षमता ऐसी है, जो किसी भी आपत्ति का सामना कर सकती है। आपत्तियों में आधी से अधिक कुकल्पनाएँ डरपोक स्वभाव की उत्पत्ति है। उन्हें अपनी विधेयात्मक क्षमताओं की स्मरण करते हुए बात की बात में बाहर भगाया जा सकता हैं जो शेष रह जाती है उनके साथ लड़ने की रणनीति बनाकर निरस्त किया और मार भगाया जा सकता हैं इसके बाद जो बचती है, वे बहुत स्वल्प मात्रा में रहती है। वे बनी भी रहें तो भी मनुष्य इतनी मजबूत धातुओं का बना हुआ है कि उनका वजन मनुष्य जिस प्रकार सुविधाओं, लाभों और सफलताओं को पाकर यथावत बना रहता है, उसी प्रकार थोड़ी-बहुत छोटी-मोटी कठिनाइयों से जूझने में ही मिलता है। लड़ाकू जुझारू सैनिक ही अपनी प्रतिभा का परिचय देकर पदोन्नति प्राप्त करते और सेनापति बनते है। मुसीबतें एक प्रकार की अग्निपरीक्षा है, जो हर किसी के व्यक्तित्व को निखारती और परिपक्व बनाती है। चतुरता बढ़ाने और कौशल निखारने के लिए संकटों से लोहा लेने के अतिरिक्त और कोई सुनिश्चित उपाय है नहीं।
तनाव की स्थिति सामने आने पर अपनी चिकित्सा आप करनी चाहिए। देखना चाहिए कि किन चिन्ताओं का भार सिर पर लदा है। जो दिखाई पड़े उनके बारे में नया परीक्षण यह करना चाहिए कि ये काल्पनिक भी तो हो है कि जो अनुमान लगाया गया है, वह सही ही हो। बरसात में कई बार काली घटाएँ उठती है ओर तेज हवा के आ धमकने पर ऐसा क्यों न माना जाय कि जिन कुकल्पनाओं से अपना मन भयभीत है, वे अवास्तविक ही सिद्ध होंगी। फिर यह भी सोचना चाहिए कि कुछ अपनी भी तो क्षमताएँ है। भगवान ने हमें भी तो सामर्थ्य दी है। सामर्थ्यवानों का इतिहास है कि उनने विपन्न परिस्थितियों में भी टक्कर मारी ओर उलटे को उलटकर सीधा कर दिया हम क्या वैसा नहीं कर सकते हैं अपनी क्षमताओं को भूले रहने के कारण ही लोग आपत्तियों में पिस जाने और उनका सामना न कर पाने की बात सोचते है। किन्तु जब सीना तानकर, कमर कसकर जूझने का निश्चय किया जाय तो प्रतीत होगा कि मनुष्य की सामर्थ्य संसार की हर कठिनाई से बड़ी है। हनुमान सोचते थे कि समुद्र पार करना कठिन है, पर जब जामवन्त ने उनकी क्षमता का स्मरण दिलाया तो वे लंका एक छलाँग लगाकर या तैर कर जा पहुँचने में सफल हो गये।
मनुष्य की सामर्थ्य असीम हैं वह कोलम्बस की तरह सुदूर देश तक नौका खेकर अमेरिका की तलाश कर सका और फिर असंख्यों को वहाँ पहुँचकर बसने और सुसम्पन्न बनने का द्वार खुल गया। साधनों में सबसे बड़ा साधन मनुष्य का मनोबल है, उसे प्रसुप्ति से जाग्रति की स्थिति में यदि लाया जा सके तो वह दूसरा कुम्भकरण सिद्ध हो सकता हैं। संसार के शूरवीरों की सफलताएँ उनके साधनों पर नहीं साहस पर निर्भर रही है। इसकी साक्षी में नेपोलियन जैसों की जीवनगाथाएँ प्रस्तुत की जा सकती है। गाँधी और बुद्ध जैसे दुर्बलकाय मनुष्यों ने अपने समय की विपन्न परिस्थितियों का एक प्रकार से काया कल्प-ही कर दिखाया था।
यह भली-भाँति समझ लिया जाना चाहिए कि रोग शरीरगत दिखाई पड़ता हो एवं यदि तनाव के लक्षण हो एवं यदि तनाव के लक्षण शरीर में दिखाई पड़ रहे हों तो उसके लिए चिंतन पद्धति एवं आहार-विहार में सुधार-परिवर्तन कर लेने से बहुत बड़ा प्रयोजन सिद्ध हो जाता है। भोजन भी सौम्य-सात्विक वस्तुएँ भूख के साथ तालमेल बिठाते हुए खाया जाय। स्वच्छता और नियमितता को सतर्कतापूर्वक अपनाया जाए और हँसते-हँसाते, हल्का-फुल्का जीवन जीने का अभ्यास किया जाय, तो तनावजन्य व्यथाओं से निश्चयपूर्वक छुटकारा पाया जा सकता हैं
लाड़-प्यार में उसे सब ‘रतन’ कहकर पुकारते थे। वैसे उसका नाम था रतनकुमारी। जैसलमेर के राजा राजसिंह की वह इकलौती सन्तान थीं। जैसा नाम वैसा ही गुण। वह बचपन से ही साहसी, समझदार और निर्भीक थी। बालपन से ही उसने शास्त्र शिक्षा के साथ शस्त्र शिक्षा का भी अभ्यास किया था। बचपन के वे पल पलक झपकते ही बीत गये। सुख का काल बीतने में क्या पता चलता है। छोटी-सी ‘रतन’ बड़ी हो गयी। राणा राजसिंह को चिन्ता ने घेर लिया। एक दिन उन्होंने राजपुरोहित को बुलाकर कहा-ब्राह्मण देवता! अब रतन सयानी हो गयी हैं उसके लिए उपयुक्त वर खोज लाइए।
जो आज्ञा महाराज! इतना कहकर पुरोहित जी चले गए।
राणा राजसिंह को एक ओर पुत्री के विवाह की चिन्ता घेरे हुए थी, दूसरी ओर दिल्ली का बादशाह औरंगजेब अपनी विशाल सेना सहित जैसलमेर पर आक्रमण कर उसे जीतने के लिए दिल्ली से प्रस्थान कर चुका था। वह जैसलमेर से कुल पाँच कोस ही दूर रह गया था कि राणा राजसिंह को युद्ध की चुनौती मिली।
बादशाह की चुनौती मिलते ही राजसिंह ने तुरन्त ही मंत्रीपरिषद और मुख्य सभासदों की बैठक आमंत्रित कर स्थिति पर विचार किया। अंत में उन सब लोगों ने निर्णय किया कि राणा जो स्वयं अपने विश्वासी सरदारों के साथ दुर्ग छोड़कर बाहर निकल जाएँ, और छापामार गोरिल्लापद्धति अपनाकर यवन सेना को हैरान व परेशान करें। कारण कि बादशाह औरंगजेब की विशाल वाहिनी के समक्ष हम मुट्ठी भर राजपूत आमने-सामने कत तक टिक पाएँगे। यवन सेना दुर्ग को घेर लेगी तो दुर्ग वासी बिना मौत मारे जाएँगे।
प्रश्न उपस्थित हुआ कि दुर्ग की रक्षा का भार किसे सौंपा जाए? राणा के कोई पुत्र नहीं था। सेनापति इतना बहादुर और क्षमता वाला नहीं था कि उसका भरोसा किया जा सकें। क्या किया जाए? एक गम्भीर सवाल था। राणा राजसिंह चिन्ता में पड़ गए। उनके मुख की दीप्ति विलीन हो गयी। उन्होंने सरदारों-सामंतों को सम्बोधित करते हुए कहा-जो वीर प्रतिज्ञा करे कि मैं अंतिम श्वास तक दुर्ग की रक्षा करूँगा, मैं उसके भरोसे यह दुर्ग सौंपकर युद्ध हेतु मैदान में जाना चाहता हूँ। राणा के आह्वान पर सभी सामन्त मौन रहे। सबका मस्तक नीचे की ओर झुक गया। एक भी सरदार उत्तरदायित्व लेने आगे नहीं आया। यह देखकर जैसलमेर नरेश राजसिंह क्रोधित हो उठे, वह बोले-क्या जैसलमेर नरेश राजसिंह क्रोधित हो उठे, वह बोले-क्या जैसलमेर शूरवीरों से खाली है।? यहाँ ऐसा कोई भी शूरवीर नहीं है, जो दुर्ग की रक्षा का भार ग्रहण कर सके।
सोने की थाली में पान का बीड़ा रखकर स्वयं राणा उसे एक-एक सरदार के सामने ले गए। वह कहते जा रहे थे- हैं कोई अपनी माँ का सपूत? आज समय है अपनी वीरता के प्रदर्शन का, अपना दायित्व निभाने का? माँ के आँचल की लाज रखने का! लेकिन राणा की ये चुनौतियों बेअसर रहीं। किसी ने अपनी दृष्टि ऊपर नहीं उठाई। उनके होंठ भगवान की प्रार्थना के लिए फड़के और वे हारे-थके से जाकर अपने राज-सिंहासन पर बैठ गए।
सेनापति राणा के सम्मुख आया और बोला-महाराज आप यह बीड़ा मुझे दे दें। राणा ने बुझे मन से कहा- मुझे यह बीड़ा किसी को तो देना ही है। परन्तु मुझे इस बात का दुःख है कि क्या जैसलमेर का पानी इतना अधिक निस्तेज हो गया है कि मेरे सरदारों का ऊष्ण रक्त भी ठण्डा हो गया। यह कहते हुए वह क्रोध और भावावेश में थर-थर काँपने लगे। उन्होंने निःश्वास छोड़ते हुए पुनः कहा-धिक्कार है जैसलमेर के शूरो-सामंतों को।
वह आगे कुछ और कहते, इतने में विद्युत वेग से राजकुमारी रतन वहाँ आ पहुँची। उसके हाथ में चमकती तलवार और कंधों पर धनुष और तरकश था। सभी सरदार निर्निष दृष्टि से राजकुमारी रतन को देखते रह गए। रतन ने राणा राजसिंह की चरणरज माथे से लगाते हुए कहा- आप ऐसे कातर वचन न कहें पिताश्री! आप निश्चिन्त होकर युद्ध के लिए प्रस्थान करें। दुर्ग की रक्षा का उत्तरदायित्व मुझे सौंपे। मैं शरीर के रक्त की आखिरी बूँद तक अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु अर्पित रहूँगी। जब तक मेरे लिए शरीर में प्राण रहेंगे, तब तक किसी शत्रु की मजाल नहीं है, जो वह जैसलमेर के दुर्ग में पाँव रख सके।
अपनी लाड़ली कन्या की यह वीर वाणी सुनकर राणा गदगद हो गए। उनके नेत्रों में हर्ष के आँसू उमड़ आए। अपनी पुत्री को शाबाशी देते हुए वह बोले-शाबाश बेटी! परन्तु ऐसा कैसे हो सकता है? मैं तो तुम्हारे हाथों में मेंहदी रचाने के लिए लालायित हूँ, वे रक्त से रंगे जाएँ, इसकी तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता हूँ।
रतन ने अपनी खुली तलवार की चमक निहारी तत्पश्चात सरदारों के निस्तेज तत्पश्चात सरदारों के निस्तेज मुख की ओर देखते हुए बोली-पिताजी नारी के साहस और शौर्य को आप कम करके न आँके। नारी आदिशक्ति माँ भवानी का अभिन्न अंश है। आप मुझ पर विश्वास करें। आप के नाम को मैं कलंक नहीं लगने दूँगी। आप निश्चिंत मन से दुर्ग की रक्षा का भार मुझे सौंपें।
रतन पुनः बोली-पिताजी अबला कही जाने वाली नारी प्रसंग उपस्थित होने पर सबला भी बन जाती है। आज मैं यह प्रतिज्ञा लेती हूँ कि जिस समय तक मेरे ऊपर दुर्ग की रक्षा का दायित्व रहेगा, तब तक मैं अविवाहित रहूँगी। मैं दुर्ग रूपी धरोहर की रक्षा का उत्तरदायित्व आपको पुनः सौंपूँगी अथवा अपनी जन्मभूमि की रक्षा में अपने शरीर का बलिदान दे दूँगी।
लाचार होकर राणा राजसिंह ने दुर्ग की रक्षा का भार अपनी बेटी रतन को सौंप दिया। अन्य सरदारों-सामंतों में भी इससे नया उत्साह उत्पन्न हुआ।
बादशाह औरंगजेब की सेना के साथ मुट्ठी भर राजपूतों ने बहादुरी के साथ युद्ध किया। उन्होंने यवन सैनिकों का भारी संख्या में संहार किया और उन्हें विजयी नहीं बनने दिया। बादशाह की फौज दुर्ग पर अधिकार करने के लिए आगे बढ़ी, परन्तु जैसलमेर का दुर्ग बहुत मजबूत था। उसके सारे द्वार राजकुमारी रतन कुमारी के आदेश से बन्द कर दिए गये थे। दुर्ग के सारे द्वारों के ऊपर के बुर्जों पर अनुभवी एवं विश्वासी सैनिकों की नियुक्ति की गयी थी, ताकि वे दुश्मन की किसी चाल या लालच में न आ सकें। इन वीर सैनिकों के लिए दुश्मनों की चाकरी की तुलना में स्वतन्त्रता हेतु बलिदान होना अधिक मूल्यवान था।
दुर्ग पर घेरा मुगल सेना को काफी समय बीत चुका था। परन्तु दुर्ग का एक कंकड़ भी टस से मस नहीं किया जा सका था। अपनी असफलता का अनुभव कर शाही सिपहसालार ने विचार किया कि जब बल से काम ही हो रहा है, तो छल का आश्रय लिया जाय। उसने जैसलमेर के एक राजपूत सैनिक को भारी लालच देकर अपने पक्ष में मिलाना चाहा। किंतु वह सैनिक देशभक्त था। उसने सारी बातें राजकुमारी को बता दीं।
राजकुमारी रतन को भी यवन सेनापति के साथ एक नई चाल चलने की इच्छा हुई। चालबाज़ को चालबाजी से ही परास्त करना चाहिए। उसने उस राजपूत सैनिक की सूचना के अनुसार तैयारी प्रारम्भ कर दी।
सायंकाल का समय था। दुर्ग के चारों ओर से यवन सेना लुके-छिपे ढंग से आगे बढ़ रही थी। मानो रतन को इस आक्रमण की कोई सूचना ही नहीं, ऐसा दर्शाते हुए उसने सेना के बढ़ने का कोई प्रतिकार नहीं किया। मुगल सैनिक किले तक पहुँच गए। वे दुर्ग की दीवार पर चढ़ने लगे। जब वे आधी दूर तक चढ़ आए, तब रतन ने अपने वीर सैनिकों को उन पर आक्रमण का आदेश दिया। तुरन्त ही दुर्ग की बुर्जियों से बाणों की वर्षा होने लगी। उबलते तेल की तीक्ष्ण धार से उनको जलाया जाने लगा। इस अचानक प्रतिकार से यवन सैनिकों में भारी भय व्याप्त हो गया। वे जान बचाने के लिए भागने लगे। अपनी इस बुरी हार से मुगल सेनापति को भारी धक्का लगा। वह सोचने लगा कि यदि उसकी इस असफलता की समूचा बादशाह को मिली, तो उसकी खैर नहीं।
सेनापति ने दूसरा कपट जाल बिछाया। उसने एक द्वार रक्षक को अपने पक्ष में मिलाने के लिए भारी मात्रा में सोना देते हुए लालच दिया कि तुम्हें यह कार्य होते ही दस गुना सोना दूँगा। परंतु रक्षक भी मातृभूमि का अनन्य भक्त था। उसने सेनापति से प्राप्त स्वर्ण रतन के समक्ष रखकर सारी बातें बतला दीं।
चूड़ावत जी! आपकी देश-भक्ति के लिए मैं आपका धन्यवाद करती हूँ। राजकुमारी रतन रतन उससे कहने लगी- हम लोगों के पास इस समय भारी अर्थसंकट है। इसलिए आप यवन सेनापति से भारी मात्रा में सोना प्राप्त करें। उसे गरज है इसलिए वह आपकी माँग मानेगा। उससे कहें कि वह अपने 50 सैनिकों को लेकर आए।
परन्तु.......। द्वार रक्षक के मन में संदेह उभरा। किंतु वह आगे कुछ कहता, इससे पहले ही रतन ने उसे समझाते हुए कहा- चूड़ावत जी! आप हिम्मत न हारें। अपने दुर्ग के नीचे वाले भाग में भूलभुलैया है। आप जैसे भी सम्भव हो उन्हें बहकाकर वहाँ पहुँचा दें। द्वाररक्षक राजकुमारी का अभिप्राय समझकर मुसकाता और वहाँ से चल दिया।
इधर रतन पूर्ण सावधान थी। उसने अपने सैनिकों को आदेश दे रखा था कि यवन सेनापति जैसे ही अपने सैनिकों के साथ दुर्ग के भूल-भुलैया में प्रवेश करे, वैसे ही तुम लोग प्रवेश द्वार बाहर से बन्द कर देना।
यवन सेनापति मन-ही-मन अनेकों दिवास्वप्न देखता हुआ दुर्ग की ओर बढ़ा, दुर्ग का द्वार खुला था। उसने द्वाररक्षक की माँग के अनुसार सोना तथा धन आदि दिया और कहा राजपूत वीर, तुम्हारी इस सेवा के बदले में बादशाह तुम्हें मालामाल कर देंगे। द्वाररक्षक ने भी कुछ ऐसे भाव प्रदर्शित किए मानो वह बहुत खुश हुआ हो। दुर्ग के गुप्तमार्ग में प्रवेश करते ही द्वाररक्षक ने अपनी मशाल बुझा दी।
अँधेरे में यवन सेनापति को यथार्थ का भान हुआ। उसने सारे प्रयास कर डाले, परन्तु वहाँ का एक शब्द भी दीवारों के बाहर नहीं गया।
दूसरी तरफ राणा राजसिंह ने भी पीछे से यवनों के ऊपर छापा मारा। भारी संख्या में मुगल सैनिक मारे गए। बादशाह औरंगजेब ने लाचार होकर महाराणा से सन्धि की। इकरारनामें पर दस्तखत हुए। यवन सेना कलंकित मुख लेकर विदा हुई।
विजयी महाराणा ने दुर्ग में प्रवेश किया। उनका स्वागत करने के लिए राजकुमारी रतन पूजा की थाली लेकर सामने आयी। महाराणा ने अपनी वीर पुत्री को गले से लगाया और भरे कंठ से बोले-मेरी रतन! जिस देश में तुम्हारी जैसी वीर पुत्रियाँ है, वह देश कभी भी गुलामी नहीं भोगेगा। बेटी तुम्हें देखकर आज हमें अनुभव हुआ- नारी केवल गृह की शोभा ही नहीं, वह देश और समाज की संरक्षक भी है। महाराणा के इस स्वर के साथ ही सरदारों ने भी राजकुमारी की जयनाद किया। भारत की नारी की गरिमा की जय-जयकार से आकाश गुँजित हो गया।
एण्डले, फ्राँस में एक ऐसा विशाल पत्थर है, जो छोटे-से आधार पर नाचते लट्टू की सी स्थिति में खड़ा है। इसे देखने पर ऐसा लगता है, जैसे यह किसी विद्युत चुम्बकीय शक्ति के प्रभाव से टिका हो। वैज्ञानिकों ने वहाँ ऐसे किसी बल की सम्भावना की सूक्ष्मता से जाँच-परख की, परखे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके। विचित्र बात यह है कि वह मौसम सम्बन्धी भविष्यवाणी भी करता है। मौसम साफ रहेगा, तो वह अपनी उसी धुरी पर चुपचाप खड़ा रहेगा, किन्तु यदि मौसम खराब होने वाला हो, तो इसकी सूचना वह धीरे-धीरे हिल-डुल कर देता है। विशेषज्ञ इस बात से हैरान है कि इस स्थिति में उसका सन्तुलन क्यों नहीं बिगड़ता।
इसी प्रकार स्कॉटलैंड के डंकल्स नामक स्थान पर 14 फुट लम्बा, 7 फुट चौड़ा तथा 5 फुट ऊँचा एक पत्थर तीन छोटे-छोटे आधारों पर इस तरह स्थिर है, जैसे कोई विशालकाय कछुआ विश्राम कर रहा हो। पुरातत्व-वेत्ताओं का कहना है कि यह शिलाखंड विगत बीस लाख वर्षों से इसी स्थिति में पड़ा हुआ है, जबकि इस कालखण्ड में आँधी-तूफान से अगणित पहाड़ ध्वस्त हो गया।
आयरलैण्ड के कार्क नगर में ‘ब्लानी’ नामक एक ऐसा पत्थर है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे चूमने वाले में वाक्पटुता की अद्भुत क्षमता का विकास हो जाता है। प्रतिवर्ष मात्र इस पत्थर को चूमने के उद्देश्य से हजारों व्यक्ति दूर-दूर से यहाँ आते है।
वृक्ष-वनस्पतियों की दुनिया भी कोई कम विचित्र नहीं हैं कुछ पेड़ तो सामान्य आकार से इतने अधिक मोटे हो जाते है कि उनमें घर बनाया जा सके और कुछ पादप जगत के सारे नियमों को तोड़ते हुए विज्ञान के समक्ष उसे समझने के लिए चुनौती प्रस्तुत करते है। नारमैण्डी, फ्राँस में एक विशालकाय ओक वृक्ष है, जिसकी आयु हजार वर्ष बतायी जाती है। इसके तने की दानवी मोटाई को देखकर एक अंग्रेज के मन में विचार आया कि क्यों न इसमें गिरजाघर बनाया जाय, ताकि अधिकाँश लोग इस वृक्ष के बारे में जान सकें। इसी उद्देश्य को लेकर उसने तने को खोखला बनाकर एक दो मंजिला चर्च बनाया, जो 1896 से लेकर अब तक ज्यों-का -त्यों बना हुआ है।
इण्डोनेशिया के सुमात्रा द्वीप और अमेरिका के चिली देश में एक ऐसा पेड़ है, जो सदा आँसू बहाता रहता है। दिन भर में यह इतना रोता है कि उसके आँसू से एक छोटा गड्ढा भर जाता है।
ध्रुव प्रदेशों के बारे में कहा जाता है कि वहाँ एक साथ कई-कई सूर्य, कई-कई चन्द्रमा उदित होते है। सूर्य भी वहाँ हरे रंग का होता है। इसके अतिरिक्त दूर की वस्तुएँ हवा में लटकती दिखाई पड़ती है। छोटे टीले पहाड़ जितने बड़े प्रतीत होते है। यथार्थ में ऐसा होता तो नहीं है पर किरणों की वक्रता के कारण पर्यवेक्षक को यह दृष्टिभ्रम हो जाता है।
प्रकृति में कई बार इसी प्रकार की ऐसी घटनाएँ घटती है, ऐसा कुछ देखने को मिलता है, जिनकी समीक्षा में मात्र यही कहना पड़ता है कि प्रकृति भी कितनी सुगढ़ और श्रेष्ठ कलाकार है, जो स्वयं भी समय और नियमितता की इतनी पाबंद है, जितना मनुष्य भी नहीं।
अमेरिका के केंटुकी प्रान्त में मैमथ नाम की एक ऐसी गुफा है, जिसे प्रकृति ने अपने सुन्दर और सधे हाथों से निर्मित किया है। सुन्दर डिजाइनों से युक्त खम्भे और बड़े-बड़े कमरे कोई 200 मील क्षेत्र में फैले हुए है। इसका सबसे आश्चर्यजनक भाग इसकी गगनचुम्बी दीवारें है। जो कार्य किसी कुशल इंजीनियर से हो सकता है, उसे प्रकृति ने स्वतः कर दिखाया, सहसा इस पर विश्वास नहीं होता, पर यह सत्य है कि उसे प्रकृति ने बनाया है।
न्यूजीलैण्ड का वैरामों केव अपनी अनूठी कलाकृति के लिए प्रसिद्ध है। चूने के पत्थरों वाली इस गुफा में ऐसी प्रतिमाएँ-ऐसी रचनाएँ है, जैसे बड़े हॉल में कोई सम्मेलन हो रहा हो, कहीं एक परिवार बैठा हो। अँधेरी गुफा के अन्दर एक विशेष प्रकार के कीड़ों द्वारा प्रकाशित तारामण्डल को देखने हजारों लोग जाते है एवं प्रकृति के इस अद्भुत करिश्मे का आनन्द लेते है।
संसार में अगणित ऐसे स्थान है जहाँ भू-गर्भ से अधिक ताप व दबाव के कारण धरती को फोड़कर फव्वारे निकल पड़ते है और गर्म गीजर्स का
रूप धारण कर लेते है। यह गीजर्स स्वयं में एक विचित्रता के लिए होते है, वह यह कि वे लगभग एक घण्टे के अन्तर से बराबर छूटते रहते है और इस तरह यह सिद्ध करते है कि प्रकृति को समय और नियमितता का भी ज्ञान है। न्यूजीलैण्ड का टोटोरआ शहर ‘सल्फर सिटी’ के नाम से प्रख्यात है। सल्फरयुक्त 50 फीट ऊँचे उबलते फव्वारे यहाँ सहज ही देखे जा सकते है। कई ऐसे स्थान हैं, जहाँ कीचड़ भी उबलता रहता है। यहाँ सल्फर की मात्रा अधिक होने के कारण चर्मरोगी स्नान करते एवं रोगमुक्त हो जाते है। इस क्षेत्र में गरम वाष्प भी निकलती है। जिसे एकत्रित कर बिजली बनाई जाती है। इस थर्मल वेली में ‘वेराकेई जियोथर्मल पॉवर डेवलपमेंट’ नामक कम्पनी बिजली बनाती है।
प्राचीनकाल में ऐसे अनेक अखण्ड दीपकों के प्रमाण मिले है, जो सैकड़ों वर्षों से जलते आ रहे थे। मूर्धन्य इतिहासवेत्ता कैमडन ने खुदाई में मिले ऐसे अनेक जलते दीपकों का वर्णन अपनी पुस्तक में किया है। सेंट आबस्टाइन ने अपनी संस्मरण पुस्तक में लिखा है कि वीनस देवी के मन्दिर में एक ऐसा दीपक था, जिस पर तेज हवा और वर्षा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। पुरातत्व विभाग ने सन् 1840 में स्पेन के कुतर्ण क्षेत्र में एक कब्र की खुदाई के वक्त ऐसा ही जलता दीपक प्राप्त किया था। विशेषज्ञों का मत था कि यह कई सौ वर्षों से जलता चला आ रहा है। इटली के नसीदा द्वीप में खेत की जुताई के समय एक किसान की एक कब मिली। जब उसे खोदा गया तो काँच के बक्से में बन्द एक अखण्ड ज्योति मिली, जो लम्बे काल से उसी में बन्द जल रही थी।
आयुष्य बढ़ने के साथ-साथ काले बाल सफेद हो जाते है-यह शरीर तंत्र का सामान्य नियम है, किंतु चीन के एक 18 वर्षीय कृषक के बाल विगत दस वर्षों में पहले काले से श्वेत हुए, फिर श्वेत से श्याम और अब पुनः एक बार काले से सफेद हो गये हैं
सन् 1883 में इटली के सैनब्रूनो क्षेत्र में एक विचित्र भूकम्पयुक्त विस्फोट हुआ। इसमें अगणित इमारतें टूटी और विस्फोट ने नगर के प्रधान मठ के प्रार्थनाकक्ष को चाक पर चढ़े बर्तन की तरह घुमा दिया और बिना किसी क्षति पहुँचाये दूसरी जगह ज्यों-का-त्यों खड़ा कर दिया, जबकि मठ का अन्य भाग टूटकर विस्मार हो गया।
इसी देश के टोरोण्टो शहर के समीप समुद्र में एक सफेद रंग के पानी का फुहारा फूटता है। इसका पानी मीठा है। खारे समुद्र में मीठे पानी का फुहारा फूटना किस प्राकृतिक विचित्रता का परिणाम है, यह अभी जाना नहीं जा सका है।
ब्राजील के एक नगर वैलेस डोपारा पर दोपहर को 2 से 4 तक पूरे दो घंटे नियमित रूप से वर्षा होती है। इसमें व्यतिरेक कदाचित ही कभी होता है। उस क्षेत्र के निवासी इन दो घण्टों में मध्याह्न अवकाश मनाते है।
उपर्युक्त घटनाक्रम एक विचित्रताएँ, मात्र वाक्विलास या मनोरंजन के लिये नहीं वर्णित की गयी। वैज्ञानिक कहते है। कि हरे पदार्थ को कोई जन्म देने वाला पदार्थ एवं घटनाक्रम का कोई-न-कोई कारण अवश्य होता है। यही बात अध्यात्मवादी भी कहते है, आप्तवचनों-वेदान्तमतों के अनुसार यहाँ सब कुछ सोद्देश्य है। कुछ भी अकारण नहीं है। इन प्रतिपादनों के अनुसार इन अपवाद स्वरूप घटने वाले प्रसंगों के मूल में भी कोई सत्ता होनी चाहिए। वह कौन-सी सत्ता होनी चाहिए। वह कौन-सी सत्ता है, कैसे यह सब इस रूप में सम्पन्न हो जाता है? यह ऊहापोह वैज्ञानिकों के लिए उसने छोड़ रखा है। क्या ये मात्र संयोग है? अथवा कभी -कभी होने वाले अपवाद है? उत्तर वैज्ञानिकों को देना है।
एक भैंस थी- बड़ी उपद्रवी। रस्सा तुड़ाकर भाग जाती थी और जिस खेत में घुस जाती उसी को कुचल कर रख देती। पकड़ने वालों की भी वह अच्छी खबर लेती। एक दिन तो वह ऐसी हो गयी कि किसी की पकड़ में नहीं आ रही थी।
हैरान लोगों के बीच से एक साहसी लड़का निकला। सिर पर उसने हरी घास का गट्ठर रख लिया और उपद्रवी भैंस की तरह सहज स्वभाव से आगे चलता चला गया। ललचाई भैंस घास खाने के लिए आगे बढ़ी। लड़के ने उसके आगे गट्ठा डाल दिया और मौका मिलते ही उछलकर उसकी पीठ पर जा बैठा। डंडे से पीटते हुए वह उसे बाड़े में ले आया।
लोगों ने जाना कि आवेश भरे प्रतिरोध से भी बढ़कर उपद्रवी तत्वों को काबू में लाने के लिए कई बार दूरदर्शी नीतिमत्ता अधिक कार्य करती है।
कीनाराम के गुरु थे कालूराम। कीनाराम बनारस में गंगातट पर जप–साधना कर रहे थे। वहीं कालूराम से मुलाकात हुई। साधनाक्षेत्र में बड़ी उच्चस्थिति में उनने कालूराम को पाया। भाँति-भाँति की परीक्षाएँ ली। फिर दीक्षा दी एवं सभी सिद्धियाँ उन्हें दे दीं। कीनाराम के पास पहले से भी काफी सिद्धियाँ थी। उस जखीरे को उनने पहले खाली किया। उनका मत था कि पूर्व सिद्धियों का अहं छोड़कर वे प्रगति कर सकते थे। यही हुआ। दोहा प्रसिद्ध है-
कीना कीना सब कहें कालू कहे न कोय। कालू कीना एक भये राम करे सो होय॥
एक दिन कीनाराम ने देखा एक मजदूर के बेटे को जमींदार के जमींदार के कारिदें उठाकर ले जा रहे है। उनने टोका। पता लगा कि लगान नहीं दे पा रहे थे। जमींदार के पास जाकर उनने कहा कि इसे छोड़ो। जमींदार ने कहा कि लगान आप दे दें। जहाँ वे खड़े थे- वहीं से उनने जमींदार से खोदने के लिए कहा। सारा धन जितना जरूरी था, वहीं से मिल गया। लड़का मुक्त हो गया। माता-पिता ने उसे कीनाराम को भेंट कर दिया। यही उनका पहला शिष्य था-नाम था बीजाराम।
विज्ञान की एक नयी शाख विकसित हो रही है, जो मरणासन्न व्यक्तियों का अध्ययन करती है। क्या इन व्यक्तियों को मृत्यु का भय होता है? निकटतर आ रही मृत्यु के बारे में बोध होने पर इन व्यक्तियों को कैसा महसूस होता है? मृत्यु सम्बन्धी ऐसे तथ्यों का अध्ययन करने वाले इस वान को ‘थेनाटालाँजी’ कहते है।
पश्चिमी जर्मनी के एक डॉक्टर लोथर विट्जल ने मरणासन्न मरीजों से उनकी मृत्यु के 24 घण्टे पूर्व बातचीत की। उन्होंने पाया कि जैसे-जैसे मृत्यु आती है, मरणासन्न व्यक्तियों में उसका भय मिटता जाता हैं बीमारी की वृद्धि के साथ-साथ ऐसे व्यक्तियों की धार्मिक आस्था दृढ़ होती चली जाती है और चिन्ताएँ कम होती जाती है।
मेसाचुसेट्स मेडिकल सोसाइटी’ के बोस्टन निवासी डॉ. मूर रसेल फ्लेचर ने 35 वर्षों तक गहन अन्वेषण करने के पश्चात् तथ्यों को ‘ट्रिटाइज ऑन सस्पेण्डेड-एनीमेशन नामक ग्रन्थ में लिपिबद्ध किया है, जिसमें मरने के उपरान्त फिरे जी उठे लोगों के अनुभव है। डॉ. फ्लेचर ने अपनी इसी पुस्तक में गार्थाइर शहर निवासी श्रीमती जॉन टी. डी. ब्लैक के बयान के अनुसार लिखा है कि वे तीन दिन तक मृतावस्था में पड़ी रही थी। डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया, किन्तु घरवालों ने किसी कारणवश नहीं दफनाया। तीन दिन बाद वे जी उठीं। पूछने पर उन्होंने बताया कि वे ऐसे लोक में पहुँच गयीं, जिसे परीलोक कहा जा सके। वहाँ बहुत-सी आत्माएँ प्रसन्नचित्त रह आसमान में बिना परों के ही उड़ती मालूम होती थी।
डॉ. रेमण्डमूडी ने बड़े प्रयत्नपूर्वक किये गये अपने शोध का प्रकाशन ‘लाइफ आफ्टर लाइफ’ नामक ग्रन्थ में किया है, जिसका विषय है-पुनर्जीवन व मृत्यु के मध्यांतर काल का अनुभव। इस ग्रन्थ में 150 घटनाओं के बीच अनेक घटनाएँ ऐसी है, जिसमें सम्बद्ध व्यक्ति ने बताया कि उनके मस्तिष्क में सनसनाहट-सी लगी और मक्खियों के भिनभिनाने जैसी गुंजन सुनाई पड़ी। इसके बाद सब कुछ ठण्डा लगा और सुध-बुध समाप्त हो गयी। दूसरे व्यक्ति का अनुभव था कि मानों उसे किसी अन्धकारपूर्ण खड्डे में गिरा दिया गया हो और वह नीचे की दिशा में तेजी से डूबता जा रहा हो।
सत्य की शोध में चेतना के सिद्धान्त का कम महत्वपूर्ण स्थान नहीं है-इस निष्कर्ष पर पहुँचे सर ओलीवरलॉज, विलियमक्रूक्स जैसे वैज्ञानिकों ने इस तथ्य को मुक्त कण्ठ से स्वीकारा है। उनका मत है कि चेतना पदार्थों के संघात का प्रतिफल मात्र नहीं, अपितु उससे भिन्न स्वतन्त्र सत्तावान है, जो शरीर के विनष्ट हो जाने पर भी विद्यमान रहती है। इस तथ्य के प्रमाण में उन्होंने कई मृतात्माओं का सहयोगपरक आह्वान किया था ओर सहयोगपरक आह्वान किया था और सहयोग प्रदान किया।
‘फ्राण्टियर के लेखक एडवर्ड सी रेण्डेल ने ऐसी ही एक दिवंगत आत्मा के अनुभवों को निम्न शब्दों में व्यक्त किया है- मरने के बाद अपने को चारों ओर से स्वजन-सम्बन्धियों से घिरा हुआ पाया। पहले-पहल तो अपने आप को ऊपर उठते हुए देखा, फिर धीरे-धीरे नीचे आ गया। एक शरीर बिस्तर पर पड़ा था तो दूसरा मैं खड़ा था। शारीरिक वेदनाएँ समाप्त हो गयी थी। जो आत्माएँ मुझे लेने आयी थीं उन्होंने मुझसे चलने को कहा। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि मैं मर चुका हूँ।
मूर्धन्य मनोविज्ञानी कार्लजुँग ने अपने निजी मरणोत्तर जीवन का वृत्तांत स्वलिखित ‘मैमोरीज ड्रीम्स रिफ्लेक्सन ‘ में लिखा है। सन् 1944 में उन्हें दिल का दौरा पड़ा। डॉक्टर उन्हें मरणासन्न स्थिति में अनुभव कर रहे थे और आक्सीजन के सहारे बचाने का प्रयत्न कर रहे थे। उसी समय जुँग ने अनुभव किया कि वे हजारों मील ऊपर उड़ गये और अधर में लटके हुए है। इतने हल्के है कि किसी भी दिशा में इच्छानुसार जा सकते है। ऊपर से ही उन्होंने जेरूसलम नगर का दृश्य तथा और भी बहुत-सी चीजें देखी। उन्हें लगा वे अब पहले की अपेक्षा बहुत बदल गये है। बहुत देर की स्थिति में रहने के बाद उन्हें अपने पुराने शरीर में रहने के बाद उन्हें अपने पुराने शरीर में पुनः लौटना पड़ा। जुँग ने लिखा है, मरणोत्तर जीवन की इस अलौकिक अनुभूति ने मेरे समस्त संशय समाप्त कर दिये और यह समझा दिया कि मरने के बाद क्या होता है?
परामनोवैज्ञानिक डॉ. किंग हृरल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘दी इम्माँर्टल सोल’ में मृत्यु से वापस लौटे व्यक्तियों की अनेकों घटनाओं को उल्लिखित किया है।
ओन्टोरियों (कनाडा) में कोस्टल क्षेत्र के मानव सम्पदा निर्देशक हर्वग्रिफिन को सन् 1974 में तीन बार हृदय के दौरे पड़े। डॉक्टरों द्वारा कई बार मृत घोषित किये जाने पर भी कुछ मिनटों बाद पुनर्जीवित हो उठते थे। ग्रिफिन ने मरणोत्तर जीवन की अनुभूतियों का विश्लेषण करते हुए बताया है कि “प्रत्येक मृत्यु के उपरान्त के अनुभवों में मैं अपने को तेज प्रकाश से घिरा पाया। वह प्रकाश मेरी ओर बढ़ रहा था। मेरे और प्रकाश के बीच एक काली छाया थी, जो अपने को समुद्र तट पर खड़ा एक भ्रूण सा महसूस कर रहा था, जिस पर सूर्य की तेज रोशनी के समान प्रकाश था। वह प्रकाश मेरी ओर बढ़ ही रहा था कि अचानक एक जाना-पहचाना चेहरा प्रकट हुआ जो स्लेटी रंग का सूट पहने हुये था। उसने निडर भाव से कहा-आ जाओ, सब ठीक है। अचानक मेरे सीने पर तेज आघात हुआ। आवाज मेरे सीने पर तेज आघात हुआ। आवाज भी सुनाई दी।’ क्या मैं बिजली के झटके दूँ। ‘दूसरी ओर से आवाज आयी-नहीं अभी नहीं! इसकी आयु अभी पूरी नहीं हुई। इसे जिन्दा रहना चाहिए।” इसके बाद मैं अस्पताल में पड़े अपने शरीर में वापस पहुँच गया।”
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अगस्त सन् 1994 को एक फौजी अफसर की घटना मित्र राज्य गजेटियर में प्रकाशित है। ऑफिसर सकाइट कार द्वारा जा रहा था, तभी जर्मन एण्टी टैंक ने उस पर सीधा प्रहार किया। उसकी कार में भी विस्फोट हुआ, मैं 20 फुट दूर जा गिरा। ऐसा लगा, मैं। दो भागों में विभक्त हो गया मेरा एक शरीर नीचे जमीन में पड़ा तड़प रहा है, उसके कपड़ों में आग लगी है, दूसरा ऊपर आकाश में हवा की तरह तैर रहा है। वहाँ से सड़क पार की वस्तु, युद्ध का दृश्य, झाड़ियाँ, जलती कार -मैं सब कुछ देख रहा था। तभी अन्तः प्रेरणा उठी कि तड़फड़ाने से कुछ लाभ नहीं, शरीर को मिट्टी से रगड़ दो ताकि आग बुझ जाये। शरीर ने ऐसा ही किया। वह लुढ़क कर बगल की नम खाड़ी में जा गिरा, आग बुझ गयी। फिर मैं वापस उसी शरीर में आ गया। अब मुझे शरीर की पीड़ा का पुनः भान होने लगा जबकि थोड़ी देर पूर्व यही दृश्य मैं मात्र दर्शक बना देख रहा था।
मोनेरो रिसर्च इन्स्टीट्यूट वर्जीनिया के राबर्ट ए. मोनोरे ने मरणोत्तर जीवन पर आयोजित एक सम्मेलन में लगभग एक हजार व्यक्तियों के मरणोपरान्त अनुभवों से सम्प्रेषण अवगत कराया। उन्होंने स्वयं दूसरी दुनिया में प्रवेश करने तथा एक अत्यन्त विकसित सभ्यता से संपर्क साधने, उससे वार्तालाप करने की विस्मयकारी घटना को प्रस्तुत किया। अपने रोमांचकारी अनुभवों को उनने पुस्तक, ‘जर्नीज आउट ऑफ दी बाड़ी ‘ में भी प्रतिपादित किया है, जिसके अंतर्गत उनने बाल्यकाल से ही ऐसे परोक्ष अनुभवों से सम्बन्धित घटनाओं का जिक्र किया है।
मनोविज्ञान के व्याख्याता डॉ. उन्ड्रियाँज केरियोस ओसिस का उदाहरण प्रस्तुत किया, जिनने लगभग एक हजार शरीर से परे के अनुभवों को प्रमाणित किया है। इन सबों में यह अनुभव व्यक्त किया गया-मृत्यु के बाद वे शरीर के बाहर निकले, ऊपर को उड़ें, मृतक सम्बन्धियों का आगमन हुआ आदि। इस बात की पुष्टि स्विट्जरलैंड के एक शिल्पकार -हरीफनजैंकोविच की इस उद्घोषणा से होती है कि जो दुर्घटनाग्रस्त होने से मृत्यु के शिकार हुए वे हाँस्पीटल में पुनः जीवित हो उठे। कुछेक लोगों द्वारा श्वेत दिव्य प्रकाश तथा सम्बन्धियों द्वारा आशीर्वचन का अनुभव व्यक्त किया पाया गया है। कुछ ने तो यह भी कहा कि मरणोपरान्त हमने शान्ति व प्रसन्नता का किया, परन्तु शरीर में प्रविष्ट होते ही पुनः कष्ट -सा अनुभव होने लगा।
अमेरिका के जॉन अलेक्जेन्डर ने भी मृत्यु उपरान्त जीवन बात को सत्य बतलाया हैं उनने यह भी कहा कि अपूर्ण इच्छाओं के कारण व्यक्ति मृत्यु के बाद भी कष्ट का अनुभव करता है तथा उसे अन्धकार के वातावरण में रहना पड़ता है। इसके विपरीत संतोषी स्वभाव के सज्जन व्यक्ति चिर आनन्द की अनुभूति लेते रहते है। जॉन अलेक्जेन्डर ने अपनी पुस्तक ‘घोस्ट ‘ में अबाहिम लिंकन के भूत शरीर को अमेरिका के हृइट में चलने, दरवाजा खटखटाने तथा तत्कालीन राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत होने के घटना को संकलित किया है। राष्ट्रपति रुजवेल्ट प्रायः लिंकन के दुःखी चेहरे को देखने तथा सभी कमरों में टहलने का अनुभव व्यक्त करते थे। ऐसा दृश्य यूनाइटेड स्टेट्स के जन आन्दोलन के समय तक देखा जाता रहा।
नीदरलैण्ड की रानी विथहेलमिनिया एक बार ‘रोज यम’ में ठहरी थी। रात को अचानक दरवाजा खटखटाने की आवाज हुई। उन्होंने दरवाजा खोला, परन्तु लिंकन को प्रत्यक्ष रूप में खड़े देखकर भयाक्रान्त हो गई। विंस्टन चर्चिल भी लिंकन के कमरे में जब भी सोते तो रात में लिंकन को भी वहाँ उपस्थित पाते थे।
डॉ. मोनेरो ने इस रहस्यात्मक तथ्य के ऊपर विशेष अध्ययन करने हेतु एक सिगनल जेनरेटर’ का विकास किया है, जिसके द्वारा शरीर से आत्मा के पृथक् होते समय शरीर में होने वाली धड़कनों की ध्वनि की रिकार्ड किया जा सकता है तथा इस आधार पर विशेष अध्ययन आरम्भ किया जा सकता है। अभी इस दिशा में अन्वेषण चल रहे है।
पुनर्जन्म प्रकरण में अगले जन्मों में पिछले जन्म से मिलती-जुलती प्रकृति एवं परिस्थिति प्राप्त होती है, ऐसा भी देखा गया है। कई बार तो कुछ व्यक्ति ऐसे होते है जिन्हें पूर्ववर्ती लोगों की ‘ट्रू कॉपी’ कहा जा सके। ऐसी परिस्थितियों को भी पुनर्जन्म के रूप में स्मरण किया जाता है।
सुकरात को जहर दिये जाने के समय उनके सभी सम्बन्धी वहाँ आँसू बहा रहे थे। बिना किसी कुप्रभाव के उनके मुख-मण्डल पर प्रसन्नता, प्रफुल्लता और भी अधिक परिलक्षित हो रही थी। ऐसा लगता था कि किसी प्रियजन से मिलने की उमंगें उठ रही हो। पास में खड़े शिष्यों ने जब इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा-मैं मृत्यु से साक्षात्कार करना चाहता हूँ और यह जानना चाहता हूँ कि मृत्यु के बाद हमारा अस्तित्व रहता है या नहीं। मृत्यु जीवन का अंत है अथवा एक सामान्य जीवनक्रम।” सुकरात को निर्धारित समय पर विष देते समय सभी दर्शकों के नेत्र सजल हो उठे। उन्होंने उपस्थित जनसमूह को सम्बोधित करते हुए कहा-मेरे शरीर के सभी अवयव गतिहीन हो चुके है, लेकिन मेरा अस्तित्व पूर्ववत् ही है। जीवन की वास्तविकता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि मृत्यु जीवन का अन्त नहीं, एक अविरल प्रवाह है। जीवन की सत्ता मरणोपरान्त भी बनी रहती है। “
उनके श्यामकर्ण अश्व की छापों से निर्जन वनप्रान्तर गूँज उठा। उस दिन भी वे नित्य की भाँति वनविहार के लिए निकल थे। वन में पहुँचे तो वहाँ वृक्ष के ऊपर एक पक्षी अत्यन्त कर्कश स्वर में बोलने लगा। उन्हें उसकी यह कर्कश ध्वनि अच्छी नहीं लगी। इन कर्कश स्वरों ने उनके सुप्त पड़े राज्याभिमान को जगा दिया। एक पल में वे प्रकृति प्रेमी इनसान से कौशाम्बी के राजाधिराज शूरसेन में बदल गए। उन्होंने इस पक्षी के कर्कश स्वरों को अपनी यात्रा में अपशकुन मानकर उस पर बाण छोड़ दिया। बाण के लगते ही वह पक्षी छटपटाता हुआ वृक्ष की टहनी से नीचे गिर पड़ा। महाराज उसके पास पहुँचे। पक्षी बाण के तीव्र प्रहार से छटपटा रहा था। उसे तीव्र वेदना हो रही थी। उसको तड़फता देखकर कौशाम्बी नरेश की हृदय पसीज उठा। उन्हें अपने व्यर्थ अभिमान पर पश्चाताप होने लगा।
वह पश्चाताप करते हुए आगे बढ़े, तो कुछ दूरी पर उन्होंने एक मुनिवर को ध्यान करते देखा। वह मुनि के पास पहुँचे और घोड़े से उतरकर उन्हें प्रणाम किया। ध्यान समाप्ति के बाद मुनिवर ने राजा को दया-धर्म का महत्व समझाया। उन्हें एक निरपराध पक्षी को मारने का पश्चाताप तो हो ही रहा था। मुनि के उपदेश ने उनकी भावना को और भी जाग्रत कर दिया। उन्होंने सोचा कि जीवन में शान्ति तो मुनि के बताए मार्ग पर चलने से प्राप्त हो सकती है। यह सोचकर उन्होंने राज्य का परित्याग करके प्रव्रज्या ग्रहण कर ली।
कौशाम्बी नरेश शूरसेन दीक्षा लेने के बाद महामुनि कौशाम्बी बन गए। मुनि बनने के बाद उन्होंने अध्ययन शुरू कर दिया। वे अल्प समय में अनेक शास्त्रों के ज्ञाता बन गए। तीव्र तपस्या के कारण उन्हें तेजोलेश्या की प्राप्ति हो गयी। ज्ञानी और तपस्वी मुनि जिज्ञासुओं को उपदेश देते हुए विचरने लगे।
पक्षी मरकर भील बना। एक बार राजर्षि कौशल्य किसी वन में भ्रमण करते हुए जा रहे थे। मार्ग में वह भील मिला। मुनि को देखते ही पूर्व जन्म के वैर के कारण उसका रोष जाग पड़ा। उसने मुनि को पकड़कर उन्हें पीटना शुरू कर दिया। कुछ समय तक तो मुनि उसके प्रहारों को धैर्यपूर्वक सहते रहे, परन्तु यह धैर्य स्थायी न रह सका। मुनिवर ने विचार किया- यह दुष्ट तो लाठी पर लाठी मार रहा है। मैंने तो इसका कोई नुकसान नहीं किया। यह अकारण ही मेरे प्राण लेना चाहता है। मुनि का क्षात्र तेज जाग उठा। वे अपने मुनि-धर्म को भूल गए। क्रोध के आवेग में मुनि ने तेजोलेश्या उस पर छोड़ दी। एक क्षण में भील जलकर उसी वन में सिंह के रूप उत्पन्न हो गया।
महामुनि कौश्ल्य भ्रमण करते हुए उसी वन में पुनः पहुँचे। उस सिंह की मार्ग में मुनि से भेंट हो गयी। मुनि को देखते ही वह आगबबूला हो उन पर टूट पड़ा। महामुनि ने अपना बचाव करने के लिए उस पर तेजोलेश्या का प्रयोग किया। मुनि के इस तप-तेज से झुलस कर सिंह वहीं राख का ढेर हो गया।
सिंह का जीवन मरकर हाथी की योनि में जन्मा। हाथी बड़ा हुआ और उसी वन में घूमने लगा। एक बार फिर मुनिवर कौशल्या वन भ्रमण करते हुए उसी स्थान पर पहुँचे और एक वृक्ष के नीचे ध्यान करने लगे। हाथी उधर से निकला। उसकी दृष्टि ध्यानस्थ मुनिवर पर पड़ी। पूर्वजन्म के वैर के कारण हाथी उन्मत्त हो मुनि पर झपट पड़ा हाथी की चिंघाड़ सुनते ही मुनिवर कौशल्य का ध्यान भंग हो गया। उन्होंने भयानक गर्जना कर दौड़ते आ रहें गजराज पर अपनी तेजोलेश्या छोड़ दी। तब शक्ति के प्रभाव से हाथी राख के ढेर में बदल गया।
हाथी मरकर साँड़ बना। वह साँड़ वन में घूम रहा था कि राजर्षि कौशल्य उसे फिर मिले। वैर के संस्कार गाढ़ से गाढ़तर होते जा रहे थे। साँड़ ने मुनि को सींगों से चीर डालने के लिए दौड़ लगायी, तो मुनि ने तुरन्त अपने का बचाया और तत्काल अपनी तेजोलेश्या का शस्त्र सम्भाला और उसे वहीं राख के ढेर में बदल दिया।
साँड़ मरकर सर्प की योनि में पैदा हुआ। संयोगवश सर्प की फिर मुनिवर से भेंट हो गयी। मुनि को देखते ही वह भयंकर फुफकार करते हुए उनकी ओर दौड़ा कि तभी मुनि ने फिर तेजोलेश्या से उसे वहीं समाप्त कर दिया।
सर्प मरकर एक ब्राह्मण के घर जन्मा। ब्राह्मण पढ़-लिखकर विद्वान हो गया। महर्षि कौशल्या भ्रमण करते हुए उसी ब्राह्मण के गाँव में पहुँचे और ग्रामवासियों के बीच उपदेश सुनाने लगे। मुनि के प्रभावशाली प्रवचन से सारा गाँव उनका प्रशंसक बन गया। किन्तु यह ब्राह्मण पूर्व जनम के द्वेषवश मुनिवर कौशल्य की सबके सामने निन्दा करने लगा। उन पर मनगढ़न्त दोष मढ़कर उन्हें लोगों के बीच अपमानित करता रहा। मुनि ने सहनशीलता का खूब परिचय दिया। मुनि की सहनशीलता से
उस ब्राह्मण का उत्साह बढ़ गया और वह उनकी भरपूर निन्दा करने लगा। एक बार मुनिवर कौशल्य गाँव वालों के बीच प्रवचन सुना रहे थे, ब्राह्मण युवक भी वहाँ उपस्थित हो गया। प्रवचन के बीच में वह मुनिधर्म की इतनी कटुनिन्दा करने लगा कि मुनिवर की सहनशीलता समाप्त होने लगी। उन्होंने सोचा कि यह मेरी सहिष्णुता का अनुचित फायदा उठा रहा है। इसको सजा मिलनी ही चाहिए। यही सोचते हुए उन्होंने फिर से तेजोलेश्या का अचूक अस्त्र उस पर छोड़ दिया और सभा के बीच में ही उसे भस्म कर डाला। लोगों के समझाने पर मरते-मरते ब्राह्मण में मन में शुद्ध विचार आ गए। विचारों की शुद्धता के कारण वह अगले जनम में वाराणसी नगरी में ‘महाबाहु’ नाम का राजा बना।
राजा महाबाहु एक बार अपने महल के झरोखे में बैठे हुए नगर का निरीक्षण कर रहे थे। उसी समय वही मुनिश्रेष्ठ राजपथ से गुजर रहे थे। उन पर दृष्टि पड़ते ही राजा के मन में आया कि इस मुनि को मैंने पहले भी कहीं देखा है? यह सोचते-सोचते उसे अपने पिछले सात जन्मों का स्मरण हो आया। इन सात जन्मों में वह किस प्रकार एक मुनि के द्वारा बार-बार भस्म किया गया, यह सोचकर उसके मन को बड़ा आघात लगा। वह विचार करने लगा- यह सब क्रोध का ही दुष्परिणाम है। क्रोध मनुष्य को पशु बना देता है और वह पशुवत् व्यवहार करने लगता है। स्वयं को दूसरों की दृष्टि में पतित बना देता है। क्रोध और ग्लानि से सद्भावनाएँ विकृत हो जाती है। पूर्वजन्मों में क्रोध के कारण ही मैं मुनि पर आक्रमण करता रहा और मुनि कषाय के वशीभूत होकर मुझे मार डालते रहे। अब मुझे बैर की लंबी परम्परा को समाप्त कर देना चाहिए। बैर बैर कभी शान्त नहीं होता। अबैर से ही बैर शान्त नहीं होता। अबैर से ही बैर शान्त होता हैं चिन्तन करता हुआ राजा उठा और उसने अपने सेवकों द्वारा मुनि का पता लगवाया, किन्तु उनका कहीं पता नहीं लगा। अंत में राजा ने श्लोक का एक चरण बनाकर नगर में यह उद्घोषणा करवाई कि जो भी इस श्लोक के दूसरे चरण को पूरा कर देगा, उसे एक लक्ष स्वर्णमुद्राएँ दी जाएँगी।
इनाम की घोषणा सुनकर हर व्यक्ति उस श्लोक के दूसरे चरण की पूर्ति करता और उसे राजा को सुनाता किन्तु राजा को उससे सन्तोष नहीं होता। प्रत्येक के मुख पर श्लोक की ही चर्चा थी। दुकानों में मित्रों के बीच, घरों में, मन्दिरों में-यही नहीं जहाँ भी दो-चार दस-बीस आदमी इकट्ठा होते, श्लोक के दूसरे चरण की पूर्ति की चर्चा करते।
इन्हीं महर्षि कौश्ल्य भ्रमण करते हुए वाराणसी पधारे। नगर के बाहर वह एक उद्यान में ठहरे। इधर से एक किसान जा रहा था, जो अपनी धुन में उस आधे श्लोक को ऊँची आवाज में गा रहा था-
“विहगः शबरः सिंहों, द्वीपी संढः फणी द्विजः।”
मुनिवर श्लोक सुनते ही विचार-मग्न हो गए। उन्हें अतीत की सारी घटनाएँ एक याद आने लगी। क्रोधवश किए दुष्कृत्यों का उन्हें भी अत्यन्त पश्चात्ताप होने लगा। उन्होंने सोचा कि मैं। तो मुनि था, मुनि तो अपने शत्रु के प्रति भी मित्रभाव रखते है। मैंने संसार के बंधनों का अन्त करने के लिए ही प्रव्रज्या ली थी। किन्तु कषायवश मैंने साँसारिक बन्धन बढ़ाए ही। जब तक मेरे मन में राग-द्वेष की परिणति रहेगी, तब तक मेरा उद्धार नहीं हो सकता।
मुनि ने तत्काल किसान को अपने पास बुलाया और उस आधे श्लोक की पूर्ति करके कहा-जाओ यह आधा श्लोक तुम राजा को सुनाना। तुम्हें अवश्य इनाम मिलेगा। मुनि ने श्लोक पूरा किया-
ये नामी निहताः कोपात्, सकथं भविता ह हा॥
अर्थात् हनत! जिसने उन सबको क्रोधवश मार डाला, अब भविष्य में उसका क्या होगा?
आधा श्लोक याद करके किसान सजा के पास पहुँचा और श्लोक की पूर्ति सुनायी। श्लोक की पूर्ति सुनते ही राजा आश्चर्यचकित रह गया। वह जिस व्यक्ति से मिलना चाहता था, उसी व्यक्ति ने यह श्लोक की पूर्ति की राजा ने किसान को एक लाख स्वर्ण मुद्रा देते हुए कहा- सच बताओ, यह श्लोक किसने बनाया है? किसान ने क्षमायाचना करते हुए कहा-महाराज! एक मुनिश्रेष्ठ ने, जो इस समय नगर के बाहर उद्यान में ठहरे हुए है, उन्होंने ही इस चरण की पूर्ति की हैं
राजा तत्काल उठा और मुनि के पास पहुँच गया। मुनि को वन्दन कर वह अपने अपराध की क्षमायाचना करने लगा। मुनि को भी अपने दुष्कृत्यों का पश्चाताप हो रहा था। उन्होंने राजा से क्षमायाचना की। दोनों ने कषाय-कल्मष को धोकर मा का आदान-प्रदान कर अपने हृदय को निर्मल बनाया और जन्म-जनम की बैर परम्परा को समाप्त कर दिया।
स्वर्ग और नरक मनुष्य के आगे पीछे रहते हैं और सदा साथ-साथ चलते है। आगे स्वर्ग है, पीछे नरक। जब मनुष्य आगे की ओर अर्थात् उच्चता, महानता और श्रेष्ठता के प्रकाश-पूर्ण सत्पथ पर चलता है तो उसका हर एक कदम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करता हुआ पड़ता है। इसके विपरीत जब मनुष्य पीठ पीछे की ओर अर्थात् नीचता के, पाप के, मलीनता के निकृष्ट अंधकार के गर्त में फिसलता है तो उसका हर एक कदम भयंकर नरक में धँसता जाता है।
प्रार्थना ईश्वर के बहाने अपने आप से ही की जाती है। ईश्वर सर्वव्यापी ओर परमदयालु है, उसे हर किसी की आवश्यकता तथा इच्छा की जानकारी है। वह परमपिता ओर परमदयालु होने के नाते हमारे मनोरथ पूरे भी करना चाहता है। कोई सामान्य स्तर का सामान्य दयालु पिता भी अपने बच्चों की इच्छा -आवश्यकता पूरी करने के लिए उत्सुक एवं तत्पर रहता हैं फिर उत्सुक एवं तत्पर रहता है। फिर परमपिता और परमदयालु होने पर वह क्यों हमारी आवश्यकता को जानेगा नहीं। वह कहने पर ही हमारी बात जाने और प्रार्थना करने पर ही कठिनाई को समझे, यह तो ईश्वर के स्तर को गिराने वाली बात हुई। जब वह कीड़े-मकोड़ों और पशु-पक्षियों की अयाचित आवश्यकता भी पूरी करता है, तब अपने परमप्रिय युवराज मनुष्य का ध्यान क्यों न रखेगा? वस्तुतः प्रार्थना का अर्थ याचना है ही नहीं। याचना अपने आप में हेय है, क्योंकि उसमें दीनता, असमर्थता और परावलम्बन की प्रवृत्ति जुड़ी हुई है, जो आत्मा का गौरव बढ़ाती नहीं घटाती ही हैं चाहे व्यक्ति के सामने हाथ पसारा जाय भगवान के सामने झोली फैलाई जाय बात एक ही है। चाहे चोरी किसी मनुष्य के घर में जाय, चाहे भगवान के घर-मन्दिर में, बुरी बात तो बुरी ही रहेगी। स्वावलम्बन और स्वाभिमान को आघात पहुँचाने वाली प्रक्रिया, चाहे उसका नाम प्रार्थना ही क्यों न हो, मनुष्य जैसे समर्थ तत्व के लिये शोभा नहीं देती।
वस्तुतः प्रार्थना का प्रयोजन अपने आत्मा को ही परमात्मा का प्रतीक मानकर स्वयं को समझाना है कि वह इसका पात्र बने कि आवश्यक विभूतियाँ उसे उसकी योग्यता के अनुरूप सहज ही मिल सकें। यह अपने मन की खुशामद है। मन को मनाना है। आपे को बुहारना है आत्म -जागरण है। आत्मा से प्रार्थना द्वारा कहा जाता है, हे शक्तिपुंज! तू जाग्रत क्यों नहीं होता? अपने गुण, कर्म, स्वभाव को प्रगति के पथ पर अग्रसर क्यों नहीं करता? तू सँभल जाय तो सारी दुनिया सँभल जाय। तू निर्मल बने तो सारे संसार की निर्मलता खिंचती हुई अपने आप चली आये। अपनी सामर्थ्य का विकास करने में तत्पर और उपलब्धियों का सदुपयोग करने में संलग्न हो जाय तो दीन-हीन अभावग्रस्तों की पंक्ति में क्यों बैठना पड़े। फिर समर्थ और दानी देवताओं से अपना स्थान नीचा क्यों रहे।
प्रार्थना के माध्यम से हम विश्वव्यापी महानता के साथ अपना घनिष्ठ सम्पर्क स्थापित करते आदर्शों को भगवान की दिव्य अभिव्यक्ति के रूप में अनुभव करते हैं और उसके साथ जुड़ जाने की भावविह्वलता को सजग करते हैं तमसाच्छन्न मनोभूमि में अज्ञान और आलस्य ने जड़ जमा ली है। आत्मविस्मृति ने अपनी स्वरूप एवं स्तर ही हेय बना लिया है। जीवन में संव्याप्त इस कुत्सा और कुण्ठा का निराकरण करने के लिये अपने प्रसुप्त अंतःकरण से प्रार्थना की जाय कि यदि तन्द्रा और मूर्छा छोड़कर तू सजग हो जाय और मनुष्य को जो सोचना चाहिए वह सोचने लगे, जो करना चाहिए वह सोचने लगे, जो करना चाहिए सो करने लगे तो अपना बेड़ा ही पार जाये अन्तः ज्योति की एक किरण आ पड़े तो पग-पग पर ठोकर लगने के निमित्त बने हुए इस अन्धकार से छुटकारा ही मिल जाय, जिसने शोक-संताप की विडम्बनाओं को सब ओर से आवृत कर रखा है।
परमेश्वर यों साक्षी, दृष्टा, नियामक, उत्पादक, संचालक सब कुछ है, पर उसके जिस अंश की हम उपासना, प्रार्थना करते है, वह सर्वात्मा एवं पवित्रात्मा ही समझा जाना चाहिए। व्यक्तिगत परिधि को संकीर्ण रखने और पेट तथा प्रजनन के लिए ही सीमाबद्ध रखने वाली वासना-तृष्णा भरी मूढ़ता को ही माया कहते है। इस भवबन्धन से, मोह-ममता से छुड़ाकर आत्म-विस्तार के क्षेत्र को व्यापक बना लेना ही आत्मोद्धार है। इसी को आत्म-साक्षात्कार कहते है। प्रार्थना में अपने उच्च आत्म-स्तर से, परमात्मा से यही प्रार्थना की जाती है कि वह अनुग्रह करे और प्रकाश की ऐसी किरण प्रदान करें जिससे सर्वत्र दीख पड़ने वाला अन्धकार-दिव्य प्रकाश के रूप में परिणत हो सके।
लघुता को विशालता में, तुच्छता को महानता में समर्पित कर देने की उत्कण्ठा का नाम प्रार्थना है। नर को नारायण-पुरुष को पुरुषोत्तम बनाने का संकल्प प्रार्थना कहलाता हैं। आत्मा का आबद्ध करने वाली संकीर्णता जब विशाल -व्यापक बनकर परमात्मा के रूप में प्रकट होती है, तब समझना चाहिए प्रार्थना का प्रभाव दीख पड़ा, नर-पशु के स्तर से ऊँचा उठकर जब मनुष्य देवत्व की ओर अग्रसर होने लगे तो उसे प्रार्थना की गहराई का प्रतीक और चमत्कार माना जा सकता है आत्म-समर्पण को प्रार्थना का आवश्यक अंग माना गाया हैं। किसी के होकर ही हम किसी से कुछ प्राप्त कर सकते हैं अपने को समर्पण करना ही ईश्वर की प्रसन्नता का एकमात्र तरीका है। ‘शरणागति ‘ भक्ति का प्रधान लक्षण माना गया हैं गीता में भगवान ने आश्वासन दिया है कि जा सच्चे मन से मेरी शरण में आता है, उनके योगक्षेमं की, सुख -शांति और प्रगति की जिम्मेदारी मैं उठाता हूँ। सच्चे मन और झूठे मन की शरणागति का अन्तर स्पष्ट हैं प्रार्थना के समय तन, मन, धन सब कुछ भगवान के चरणों में समर्पित करने की लच्छेदार भाषा का उपयोग करना और जब वैसा करने का अवसर आवे तो पल्ला झाड़कर अलग हो जाना झूठे मन की प्रार्थना है। आज इसी का फैशन हैं झूठे मन से की गई प्रार्थना ईश्वर को ठगने-बहकाने के लिए होती है। समर्पण -शरणागति जैसे दिव्य स्तर का जो अर्थ समझता होगा वह इतना भी जानता होगा कि उसका तात्पर्य अपनी लिप्साओं को भगवान की इच्छाओं में परिणति कर देने, गतिविधियों को तृष्णा, वासना के चंगुल से छुड़ाकर ईश्वर की इच्छानुसार उत्कृष्ट विचारणा तथा आदर्शवादी क्रियापद्धति से अपने वर्तमान ढाँचे की बदलना ही होता हैं जो इसके लिए तैयार होकर समर्पण शरणागति की बात करें, उसी को सच्चे मन से प्रार्थना करने वाला कहा जाएगा।
प्रार्थना में यही कामना जुड़ी रहनी चाहिए कि परमात्मा हमें इस लायक बनाये कि उसके सच्चे भक्त, अनुयायी एवं पुत्र कहला सकने का गौरव प्राप्त करें। परमेश्वर हमें वह शक्ति प्रदान करे, जिसके आधार पर भय और प्रलोभन से मुक्त होकर विवेकसम्मत कर्तव्य -पथ पर साहस-पूर्वक चल सकें और इस मार्ग में जो भी अवरोध आवें उनकी उपेक्षा करने में अटल रह सकें। कर्मों के फल अनिवार्य है। अपने प्रारब्ध-भोग जब उपस्थित हों तो उन्हें धैर्यपूर्वक सह सकने और प्रगति के लिए परम पुरुषार्थ करते हुए कभी निराश न होने वाली मनःस्थिति बनाये रह सकें। भगवान हमारे मन को ऐसा निर्मल बना दें कि कुकर्म की ओर प्रवृत्ति ही उत्पन्न न हो और हो भी तो उसे चरितार्थ होने का अवसर न मिल पाये। मनुष्य-जीवन की सफलता के लिए गतिशील रहने की पैरों में शक्ति बनी रहे, ऐसी उच्चस्तरीय प्रार्थना को ही सच्ची प्रार्थना के रूप में पुकारा जा सकता है, जिसमें धन, संतान, स्वास्थ्य, सफलता आदि की याचना की गई हो और जिसमें अपने पुरुषार्थ -कर्तव्य के अभिवर्द्धन का स्मरण न हो, ऐसी प्रार्थना को याचना मात्र कहा जाएगा। ऐसी याचनाओं का सफल होना प्रायः संदिग्ध ही रहता हैं
परामनोविज्ञानवेत्ता डॉ. एमेली केडी ने लिखा है प्रार्थना, मात्र ईश्वर को धन्यवाद देने या उससे कुछ याचना करने की प्रक्रिया का नाम नहीं है वरन् यह व मनः स्थिति है, जिससे व्यक्ति शंका और संदेहों के जंजाल में से निकलकर श्रद्धा की भूमिका में प्रवेश करता है। अहंकार को खोकर समर्पण की नम्रता स्वीकार करना और उद्धत मनोविकारों को ठुकराकर परमेश्वर का नेतृत्व स्वीकार करने का नाम प्रार्थना है, जिसमें यह संकल्प भी जुड़ा रहता है कि भावी जीवन परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार पवित्र और परमार्थी बनाकर जिया जाएगा। ऐसी गहन अंतस्तल से निकली हुई प्रार्थना, जिसमें आत्म-परिवर्तन की आस्था जुड़ी हुई हो भगवान का सिंहासन हिला देती है। ऐसी प्रार्थना के परिणाम ऐसे अद्भुत होते है, जिन्हें चमत्कार कहने में कुछ हर्ज नहीं है।
चिकित्साशास्त्र पर नोबेल पुरस्कार विजेता एवं फ्राँस के लियोविश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. कैरल ने अपनी प्रत्येक सफलता के पीछे ईश्वर की अनुकम्पा को छिपा हुआ देखा हैं वे कहते थे- तुच्छ मानव-प्राणी उन्नति के उस स्तर पर नहीं पहुँच सकता जहाँ साधारण लोग आमतौर से नहीं पहुँचते। इन विशिष्ट साधन, विशिष्ट परिस्थितियों ओर विशेष सूझबूझ के पीछे उन्होंने सदा परमेश्वर का दिव्य सहयोग झाँकता देख उन्होंने अपनी चिकित्सापद्धति के साथ औषधियों से अधिक प्रार्थना को महत्व दिया। वे हर रोगी से कहते थे, सच्चे मन से प्रार्थना करो, अपनी भूलों के लिए पश्चाताप और भविष्य में निर्मल जीवन जीने की प्रणता के साथ यदि प्रार्थना करोगे तो वह जरूर सुनी जाएगी। सच्चा इलाज तो पश्चाताप है और ईश्वर चरणों में अपना समर्पण, जो सा कर सकेगा वह शारीरिक ही नहीं, आन्तरिक रोगों से भी छुटकारा पा लेगा।
महात्मा गाँधी ने अपने एक मित्र को लिखा था-राम नाम मेरे लिए जीवन अवलम्बन है, जो हर विपत्ति से पार कराता हैं जब तुम्हारी वासनाएँ तुम पर सवार हो तो नम्रता पूर्वक भगवान को सहायता के लिए पुकारों, तुम्हें सहायता मिलेगी।”
जब मन दुर्बल हो रहा हो, मनोविकार बढ़ रहे हो और लगता हो कि पैर अब फिसला-तब फिसला, तो सच्चे मन से प्रभु को पुकारना चाहिए। गज को ग्राह के चंगुल से छुड़ाने वाले भगवान-पतन से परित्राण पाने के लिए व्याकुल आर्त भक्त की पुकार अनसुनी नहीं करते है और उस मनोगत के रूप में अन्तःकरण में उतरते है, जिसे गरुड़ कह सकते है और जो पतनोन्मुख दुष्प्रवृत्तियों के सर्पों के उदरस्थ करते रहने का अभ्यासी हैं
भगवान को आत्म-समर्पण करने की स्थिति में जीव कहता है- तस्यैवाहम् (मैं उसी का हूँ) तवैवाहम् (मैं तो तेरा ही हूँ) यह कहते-कहते उसी में इतना तन्मय हो जाता है, इतना घुल−मिल जाता है कि अपने आप को विसर्जन, विस्मरण ही कर बैठता है और अपने का परमात्मा का स्वरूप ही समझने लगता हैं तब वह कहता है। त्वमेवाहम् (मैं तो तू ही हूँ) शिवोऽहम् (मैं ही शिव हूँ) ब्रह्मास्मि (मैं ही ब्रह्म हूँ)।
भगवान को अपने में और अपने को भगवान में समाए होने के अनुभूति की जब इतनी प्रबलता उत्पन्न हो जाय कि उसे कार्यरूप में परिणत किये बिना रह ही न सकें, तो समझना चाहिए कि समर्पण का भाव सचमुच सजग हो उठा। ऐसी शरणागति व्यक्ति को द्रुतगति से देवत्व की ओर अग्रसर करती है और यह गतिशीलता इतनी प्रभावकारी होती है कि भगवान को अपनी समस्त दिव्यता समेत भक्त के चरणों में शरणागत होना पड़ता है। यों बड़ा तो भगवान ही है, पर जहाँ तक प्रार्थना, समर्पण और शरणागति की साधनात्मक प्रक्रिया का सम्बन्ध है, इस क्षेत्र में भक्त को बड़ा ओर भगवान को छोटा माना जाएगा, क्योंकि अकसर भक्त के संकेतों पर भगवान को चलते हुए देखा गया हैं
उसके दुर्बल,जर्जर बूढ़े हाथों से पानी खींचने की रस्सी फिसल और पानी से भरी बाल्टी धम्म से कुएँ में जा पड़ी। उसने निर्बलता की एक गर्म आह भरी-या अल्लाह! आज यह मनहूस दिन भी देखना पड़ रहा है, जब प्यास से तालू सूख रहा है। इस लम्बी कैद और सुनसान जेलखाने में, इस बुढ़ापे और कमजोरी में, इस तपती दोपहरी में मुझे पानी तक पिलाने वाला कोई नहीं है। जिस हिन्दुस्तान के शहंशाह के आराम तथा खिदमत के लिए हाथ जोड़े गुलामों और बन्दियों की भीड़-की-भीड़ रहती थी, वही आज अकेला निरुपाय खुद कैदखाने में प्यास बुझाने के लिए पानी खींचने जैसे मामूली काम को भी नहीं कर पा रहा है। यह कैसी विवशता है।
थका हुआ लाचार प्यासा, वह एक कोने में जाकर बैठ गया। उसकी काया अब पीले पत्ते की तरह जीर्ण-शीर्ण हो चुकी थी। अपनी इस शारीरिक कमजोरी, निराशा और मानसिक परेशानी से वह बेहतर घबराया हुआ था। उसके अन्दर कहीं कुछ शीशे की तरह टूट-दरक रहा था।
रह-रहकर उसे अपने बीते दिन याद आने लगे। वह पूरे हिन्दुस्तान में दक्षिण तक फैली हुई हुकूमत का एकछत्र शहंशाह था। उसने बहुत दिनों तक एक बड़ी सल्तनत पर मनचाही हुकूमत की थी। वह बड़ा शौकीन तबियत, कलाप्रेमी और एक महान वास्तुशिल्पी था। उसने अपने युग की बेहतरीन इमारतों के रूप में अद्वितीय वास्तुशिल्प की अविस्मरणीय कलाकृतियाँ हिन्दुस्तान को दी थी। दुनिया भर में जाना जाने वाला आगरा का ताजमहल और दिल्ली का लाल किला उसके उत्कृष्ट कला- प्रेम के ही निशान कहे जाते है। इतनी बड़ी सल्तनत का मालिक, ऐसी आलीशान इमारतों का निर्माता आज एक बद्तर कैदखाने में पानी पीने का असह्य कष्ट पा रहा था। सैकड़ों गुलामों एवं बंदियों से हमेशा घिरा रहने वाला बादशाहे-हिन्द शाहजहाँ आज बिना किसी सहायक के अकेला था। जीवन की संध्या में निराशा और आत्महीनता की भावनाओं ने आज उसे और निर्बल बना दिया था। वह नकारात्मक चिन्तन से व्यग्र था। अपने पुत्रौ को धिक्कार रहा था। उनकी कृतघ्नता से संतप्त हो घोर पश्चाताप कर रहा था। आज की परिस्थितियों को अपने पुराने गुनाहों की सजा मानकर अशान्त था। इस पश्चाताप और अशान्ति के कारण क्लान्त मन हो बिलकुल किंकर्तव्यविमूढ़-सा निढाल पड़ा था।
हीनता के बोध के साथ-साथ इनसान के मन में तरह-तरह के काल्पनिक भय की भावनाएं प्रवेश कर जाती है। जिस वयस्क सन्तान का बर्ताव अपने वृद्ध माता-पिता के साथ अच्छा नहीं होता, जिन्हें बात−बात में अपमानित और तिरस्कृत किया जाता हैं, जिनका वातावरण संवेदनापूर्ण नहीं होता उन्हें चारों ओर से भय-निराशा और आशंकाएँ आ घरेती है। जिनके बच्चे क्रोधी अनुशासनहीन, चंचलचित एवं कठोर स्वभाव के होते है, वे भय और निराशा से सदा पीड़ित रहते है भय का कीड़ा जहाँ एक बार मन के भीतर घुसा फिर वह रक्तबीज की तरह अपना वंश बढ़ाता चला जाता है।
बेचारे शाहजहाँ के जीवन के अंतिम दिन एक भयभीत निःसहाय कैदी की तरह कट रहे थे। इनसान अपने बुरे कर्मों की सजा इसी जनम में पा लेता है। अपने राज्य की रखा के लिए तथा सत्त साम्राज्य विस्तार की महत्त्वाकाँक्षा के कारण वह विरोधियों को बुरी तरह दबाता आया था। आज उसी के पुत्र औरंगजेब ने उसे बंदीगृह में डालकर हिन्दुस्तान की हुकूमत अपने हाथों में ले ली थी। उसे मारने के लिए जेलखाने में कैद किया गया था। पुत्र के विश्वासघात एवं दुर्व्यवहार से वह बेबस, क्रुद्ध और नितान्त व्यथित था।
आज उसके पास न वे शाही ऐशोआराम थे, न सैकड़ों -हजारों दास-दासियाँ। उसे सर्व अनपेक्षित तथा अकल्पनीय जिन्दगी व्यतीत करनी पड़ रही थी। वह एकदम अकेला था। उसके इर्द -गिर्द न तो तारीफ करने वाले-मुँहलगे अफसरों का जमघट था और न कोई उसका खिदमतगार ही पास में था। अब वह नमाज अदा करते हुए खुदा की इबादत करते हुए जिस किसी तरह अपने मन को सान्त्वना देने में व्यस्त रहता था। फिर भी न जाने क्या उसे किसी भी तरह से मनः शान्ति नहीं मिल पा रही थी।
वे गर्मियों के दिन थे। दोपहर का तवे जैसा तपता गर्म मौसम। शाहजहाँ के पास रखा हुआ घड़े का पानी समाप्त हो चुका था। उसे समय बहुत प्यास लगी थी, किन्तु उस समय उसके पास पानी खींचकर कुएँ से निकालने वाला कोई सहायक नहीं था। वह बिलकुल अकेला था, बिलकुल ही अकेला।
अन्ततः विवश हो अपने कमजोर बूढ़े शरीर की परवाह किए बिना वह खुद कैदखाने के कुएँ में डालकर पानी खींचने लगा। पानी से भरकर बाल्टी भारी हो गयी। जिन नाजुक हाथों ने हमेशा फूल ही छुए हों, कलम ही पकड़ी हो, राजदण्ड ही सम्हाला हो, अपराधियों की ओर उँगली दिखाकर सजाएँ ही दी हों, शहंशाह के उन नाजुक हाथों में कुएँ से निकलते हुए पानी की भरी बाल्टी कैसे सम्हल सकती थी।
आखिरकार बूढ़े शाहजहाँ के हाथों से रस्सी फिसल गयी। भार के कारण नियन्त्रण न रहा, बाल्टी गिरी साथ ही उसके सिर में चक्कर भी आ गया। थककर हताश हो वे हारे हुए सेनापति की तरह बेबस होकर वहीं बैठ गए। आँखों के आगे अँधेरा के आगे अँधेरा-सा छा गया।
यूँ तो हमेशा ही शहंशाह नमाज पढ़ता था और खुदा को याद करता था। लेकिन अब तक तो यह मात्र औपचारिक बात भर थी। पर आज इन बेबसी के क्षणों में निराशा शाहजहाँ की आत्मा जाग्रत हो उठी। उसके मन में एक ज्योति-सी जली। वह उसकी ईश्वर के प्रति सच्ची आस्था की मशाल थी। लगा जैसे दोनों जहाँ के मालिक स्वयं उसकी सहायता के लिए आ गए हो। उसके मुँह से ये शब्द निकले-ऐ परवरदिगार! खुदा करीम! आज तूने देखा मैं इस जेलखाने के कुएँ से पानी खींचने जैसे मामूली काम के लायक भी न रहा। नन्हें बच्चे की तरह अपनी प्यास तक नहीं बुझा पा रहा हूँ। मैं यह महसूस करता हूँ कि दुनिया में शायद ही कोई आदमी मुझ जैसा अभागा, कमजोर, अशक्त और निःसहाय होगा। मैं कितना नादान बुद्धिहीन अल्पज्ञ हूँ -यह मैं आज अनुभव कर रहा हूँ। दरअसल मैं तो किसी भी लायक नहीं हूँ। न ही बीती हुई शाही जिन्दगी में किसी योग्य रहा था।
फिर भी ऐ मेरे मालिक! दुनिया के सिरजनहार! नालायक आदमी को आपने इतने लम्बे अर्से तक हिन्दुस्तान जैसे बड़े मुल्क का बादशाह बनाए रखा-मैं सालों साल तक सफलतापूर्वक हुकूमत चलाता रहा इन सब पर कृपा-दया के लिए तुझे लाख -लाख शुक्रिया। आज में गिरी हुई हालात में हूँ, ऐ दुनिया के पिता! तू हमें कुछ भी दें, सुख-दुख हर्ष-विवाद आनन्द-तकलीफ, किसी तरह का इम्तहान ले, जो चाहे फैसला दे, मैं हर सूरतेहाल में तेरा एहसानमंद हूँ। जिन्दगी के हर कदम पर मुझे तेरा ही सहारा है। आज तू मेरे मन में रोशनी और आत्मा में शक्ति दे रहा है। तेरी यह दिव्य-शक्ति मुझमें जाग उठी है। मैं सब कुछ सहूँगा। तुम्हारी दिव्य प्रेरक शक्ति मुझे सम्बल प्रदान कर रही है। अब मुझे अकेलेपन का एहसास भी नहीं हो रहा है, क्योंकि तू तो मेरे साथ ही है।
खुदा की इबादत करते -करते बूढ़े शाहजहाँ को अपने अन्दर से एक ताकत मिली। यह जिस्मानी नहीं रुहानी ताकत थी। उसका तनाव कम हो गया। उसके अपने ही अन्तरमन में साहस, हिम्मत और सहनशीलता का सूर्य चमक उठा। उसने बड़े ही आत्मविश्वास कहा-ऐ खुदा! सब कुछ खोकर भी मेरे पास तेरी रहमत का दिया हुआ बेशकीमती खजाना है। तेरा नूर मेरी रूह में हैं यह ताकत अब सदा मेरे ही पास रहने वाली है। तेरी सहायता से तो मैं अब बड़ी से-बड़ी विपत्ति धैयपूर्वक सहन कर सकता हूँ।
ऐ अल्लाह! अब तू मेरे साथ है। मैं हमेशा-हमेशा के लिए नकारात्मक चिन्तन छोड़ता हूँ। तुम्हारा दिया हुआ आशावादी दृष्टिकोण अपनाता हूँ। तू सबका दाता है। मेरा पिता है। मुझे प्यार करता है। अब मैं अपने जीवन की सब स्थितियों एवं लोगों के दिखावटी स्वार्थ को परख चुका हूँ। अब मैं सिर्फ उन यादों को ही अपने मन में रखूँगा, जिनमें मुझे खुशी मिलती हैं तेरे दिए हुए आत्मिक आनन्द को ज्यादा-से ज्यादा अपनाने के लिए कोशिशमन्द रहूँगा। मैं जान गया हूँ कि जीवन में कुछ परेशानियाँ तो इम्तहान लेने के लिए आती ही है। उनमें बचा नहीं जा सकता। उन कठोर समस्याओं से धैर्यपूर्वक जूझना ही होगा। उन्हें हँसते−हँसते सहन करना ही होगा। अब मैं अपनी उन परेशानियों को वीरता से सहन करने को तैयार हूँ। मुझे अपने कर्म में फिर नए सिरे, नए साहस और धैर्य से लग जाना चाहिए।
वृद्ध शहंशाह ने एक बार फिर से नए उत्साह से बाल्टी खींचनी शुरू कर दी। सर्वेश्वर की असीम प्रेरणा शक्ति से परम आसित् खुदाबन्द के नेक बन्दे उस बादशाह का चेहरा चमक रहा था। जहाँ के मालिक के प्रति सकारात्मक भावना, उसके सम्बल के अटूट विश्वास से स्वतः स्फूर्त नव ऊर्जा के कारण शाहजहाँ का ललाट प्रदीप्त हो उठा था।
आकस्मिक विपत्ति का सिर पर अड़ना मनुष्य के लिए सचमुच बड़ा दुखदायी हैं इससे उसकी बड़ी हानि होती है, किन्तु उस विपत्ति की हानि से अनेकों गुनी हानि करने वाला एक और कारण है, वह है विपत्ति में घबराहट। विपरीत कहीं जाने वाली मूल घटना चाहे वह है विपत्ति में घबराहट। विपत्ति कही जाने वाली मूल घटना चाहे वह कैसी ही बड़ी क्यों न हो, किसी का अत्यधिक अनिष्ट नहीं कर सकती, परन्तु विपत्ति की घबराहट ऐसी दुष्टा पिशाचिनी है कि वह जिसके पीछे पड़ती है। उसके गले से खून की प्यासी जोंक की तरह चिपक जाती है और जब तक उस मनुष्य को पूर्णतया निःसत्य नहीं कर देती, तक तक उसका पीछा नहीं छोड़ती।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
कष्ट और कठिनाई का व्यवधान उन्नति की दिशा में मौजूद रहता हैं ऐसी एक भी सफलता नहीं है, जा कठिनाइयों से संघर्ष किये बिना ही प्राप्त हो जाती है। जीवन के महत्वपूर्ण मार्ग विघ्न-बाधाओं से सदा ही भरे रहते है। यदि परमात्मा ने सफलता का कठिनाई के साथ गठबंधन न किया होता, उसे सर्वसुलभ बना दिया होता तो मनुष्य जाति का वह सबसे बड़ा दुर्भाग्य हो। तब सरलता से मिली हुई सफलता बिलकुल नीरस एवं उपेक्षणीय हो जातीं जो वस्तु जितनी कठिनता से जितना खर्च करके मिलती है, वह उतनी ही आनंददायक होती है।
-पं. श्री राम शर्मा आचार्य
(जनवरी, 1969 में गायत्री तपोभूमि में दिया गया प्रवचन)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो! आपने केवल अपने बेटे के लिए कमाया है, भले ही वह दो कौड़ी का हो। आपने केवल उसी के लिए जीना सीखा हैं मित्रो, हमारा जीवन किस काम के लिए खर्च हो गया। केवल मुट्ठीभर पत्थरों के लिए। हमने कभी भी सोचा नहीं कि हमें किस प्रकार जीना चाहिए। तो गुरु जी हमारी कमाई का क्या होगा? आपकी कमाई बेटे को मिलने वाली है, साले को मिलने वाली है, जमाई को मिलने वाली हैं आपने अपनी बीबी को तबाह कर डाला। अरे आप चाहते तो उसका ऊँचा उठा सकते थे। भगवान ने आपको मनुष्य का शरीर दिया था। जिस दिन उसने आपको बनाया था, उसके लम्बे-लम्बे ख्वाब थे, उम्मीदें थी। आपने सब पर पानी फेर दिया।
मित्रो! भगवान बहुत ज्यादा थक गया हैं उसकी इच्छा है कि हमारे प्रिय बेटे मनुष्य, यदि इस दुनिया को सुन्दर बनाते तो मजा आ जाता। भगवान को सगी और सहयोगी की आवश्यकता थी। इसलिए भगवान ने आपको बनाया था। भगवान के पास गीली मिट्टी थी। उसने कुम्हार के तरीके से उस मिट्टी को इस प्रकार लम्बा कर दिया कि साँप बन गया। गोल–मटोल कर दिया तो कछुआ बन गया, मेढ़क बन गये। परंतु जिस दिन भगवान ने आपको बनाया तो उन्हें पसीना आ गया। उनका बहुत सारा समय बीत गया। इसके पीछे दुनिया को सुन्दर बनाने का उनका उद्देश्य था। एक-एक कण शरीर का, जिसमें मस्तिष्क, हृदय,आँखें आदि सभी अंग बने। आज तक ऐसी बेमिसाल चीज दुनिया में नहीं बनी है जैसा कि मनुष्य का शरीर है। जब हम हिमालय गये तो नन्दनवन का फोटो खींचकर लाये। लम्बाई-चौड़ाई थी, परन्तु गहराई का पता नहीं लगा सका, तथा जो फोटो खींचा था तो वह पीले रंग का आया था। उसे देखकर मैंने सोचा कि यह कैसे हो सकता है फोटो का रंग तो इस प्रकार का नहीं होना चाहिए। वह तो मखमली था। मैंने उसे उठाकर फेंक दिया। यह सब लेंस का कमाल था।
मित्रो, हमारी आँखें कितने सुंदर लेंस की बनी है, इसका जवाब इस दुनिया में नहीं है। यह वास्तविक फोटो खींच लेती हैं इतना बेशकीमती शरीर तथा भगवान का ऐसा अनुदान किसी प्राणी को नहीं मिला है। इतनी उदारता भगवान ने क्यों बरती? यह प्रश्न आपके सामने हैं आपको विचार करना चाहिए कि भगवान ने ऐसा पक्षपात क्यों किया? अगर अन्य प्राणियों में सोचने का, विचार करने का माद्दा रहा होता, तो वे भगवान के सामने उपस्थित हो जाते तथा अपनी फरियाद सुनाकर आपको जेल भिजवा देते। परंतु उनमें यह माद्दा नहीं, अतः वे बेचारे क्या करे। परन्तु आपको तो विचार करना चाहिए। इस मामले में भगवान को अगर कोर्ट में बुलाया जाता तो वह काँपता हुआ आता। जब उससे इस बाबत पूछा जाता तो वह कहता हक मनुष्य को हमने विशेष चीजें इसलिए नहीं दीं कि वह फिजूलखर्ची करे मौज मस्ती उड़ाए। हमने तो इस दुनिया को सुन्दर बनाने के लिए, उसे सजाने-सँवारने के लिए बनाया था। यह हमारा बड़ा बेटा है, राजकुमार हैं हमने इस कारण से उसे राजगद्दी दे दी थी ओर सारी जिम्मेदारी सौंपी थी। यह इसलिए दिया था कि वह मेरा सहयोग करेगा। हमने बहुत बड़ा ख्वाब देखा था, इसके बारे में कि यह हमारा बड़ा बच्चा है, वरिष्ठ राजकुमार है जो इस दुनिया को सुन्दर बनाता हुआ चला जाएगा।
परन्तु उस अभागे को, बेहूदा को मैं क्या कहूँ जो घूमघाम कर वहीं आ गया जहाँ से चला था। वह कुत्ते की योनि से, बन्दर की योनि से, सुअर की योनि से आया था और निम्नकोटि के चिन्तन विचार होने के कारण फिर से उसी योनि में चला गया। उसे निम्न कोटि के प्राणियों की तरह ही अब भी पेट तथा प्रजनन की बात याद है, बाकी चीजें तो वह भूल-सा ही गया। उस अभागे को यह समझ में नहीं आया कि जब भगवान ने बन्दर के लिए, अन्य प्राणियों के लिए पेट भरने की व्यवस्था की है, तो क्या उसके प्रियपुत्र मनुष्य को वह रोटी का प्रबन्ध नहीं करेगा? परन्तु हाय रे! अभागे मनुष्य-वह इसकी कीमत नहीं जान सका। वह अपने उद्देश्य को भूल गया तथा यह कहने लगा कि मैं अपनी अकल से कमाऊँगा, बहुत अर्जन करूँगा, मौज से इसी में वह खपता रहा।
मित्रो! उसका हीरे एवं मोती जैसा दिमाग इसी में घूमता रहा, आगे-पीछे होता रहा। उस अभागे ने बर्बाद कर लिया, अपने आपको। साथियों घोड़ा, हाथी, भैंस आदि जानवर मनुष्य से ज्यादा खाते है और उनका पेट भर जाता है। परन्तु इस अभागे मनुष्य का पेट भाई से, बाप से, बीबी से भी नहीं भरता हैं हाय रे! अभागा यह मनुष्य, पेट की खातिर बर्बाद हो गया। भगवान ने हमसे कहा कि क्या कहूँ- आचार्य जी, हम तो बहुत चिन्तित है। हमने उन्हें पानी पिलाया और कहा कि आप जाइये एवं चिन्तित मत होइए। आपके पास तो चौरासी लाख योनि वाले प्राणियों की अनेकों शिकायतें आ चुकी है। आप जाइये, अब हम इन्हें ठीक करेंगे। मनुष्य के पास बुद्धिबल है।, उसे हम ठीक करेंगे। इस दुनिया में खुशी आनन्द,उल्लास का वातावरण पैदा करेंगे। अभी तो वह पेट-प्रजनन में लगा है। मैं पूछता हूँ कि तेरे पास धर्म, संस्कृति कहा है? तू कभी इसके बारे में सोचता है क्या? अरे तूने इतने सारे बच्चे पैदा कर दिये। क्या उनको पढ़ाने के लिए, विकास के लिए, ऊँचा उठाने के लिए तूने कोई व्यवस्था की है? नहीं। तो फिर इतने बच्चे क्यों पैदा कर लिए? इसे नासमझी के अतिरिक्त और क्या कहा जया?
भगवान ने कहा कि मैंने इसे बहुत प्यार से पैदा किया, पाला, बड़ा किया कि शायद यह मेरे काम आयेगा। मेरी सहयोगी बनेगा तो इस संसार को सुन्दर बनाएगा, परन्तु इसने तो हमारी सारी-की-सारी इच्छाओं पर पानी दिया हैं यह वहीं जा पहुँचा है, जहाँ अन्य चौरासी लाख योनियों के प्राणी रहते है। इसने भगवान की नाक में दम कर रखा है। हमने भगवान से कहा- हे प्रभु! इसे बार माफ कर दीजिए। अगर किसी को आगे इनसान बनाना तो उसे ठोंक -बजाकर देख लेना। हमने भगवान से प्रार्थना की कि भगवान! पहले उससे पूछ लेना कि क्या वह कोई सेठ बनने जा रहा है या बच्चा पैदा करने जा रहा है? पहले यह पूछ लेना फिर उसे इनसान का जन्मा देना। अगर मनुष्य का जन्म चाहिए तो दो रुपये के कागज पर हस्ताक्षर करा लेना और बता देना कि अमुक-अमुक लक्ष्य है। अगर उसे मंजूर हो तो जीवन देना, वरन् नहीं देना। अगर चाहिए तो जाओ, अन्यथा तुम बन्दर, कुत्ते की योनि में जाओ। तुम्हारे लिए मनुष्य का जीवन जीना तथा पाना संभव नहीं है। हमने भगवान से कहा और उन्होंने स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा कि हमें जिनका दिमाग, विचार, कार्य जानवरों जैसा दिखाई पड़ेगा, उन्हें हम मनुष्य का जन्म नहीं देंगे।
मित्रो, यह सच्चाई नहीं है। आप भगवान के बड़े बेटे है। आप उनके बेटे है जो बड़ा उदार, दयालु, कृपा का सागर तथा सर्वसम्पन्न हैं भगवान अपने लिए क्या चाहता है? क्या खाता है।? वह केवल दूसरों के लिए जिन्दा रहता है, आपको यह सोचना चाहिए तथा अपना जीवनक्रम बदलने का प्रयास करना चाहिए। आप तो केवल लक्ष्मी का मंत्र सीखना चाहते हैं आप कहते है। कि गुरुजी यह क्या कर रहे है? मित्रों, आप चौरासी लाख योनियों का शरीर देखिये आप अच्छे कर्म नहीं करेंगे तो आपको गधे की योनि स्वीकार करनी पड़ेगी। आप पर ईंट लादी जाएँगी। वजन के मारे पीछे का पैर जख्मी हो जाएगा। पैर लड़खड़ाने लगेंगे। आप कहेंगे कि आचार्य जी हम तो मन्नूलाला सेठ है। हम इस योनि में कैसे जाएँगे? आपने अच्छा कर्म नहीं किया तो आपको घुसना ही होगा।
मित्रों! आपको अपनी मूर्खता पर विचार करना चाहिए। आप बेकार की समस्याओं-बेसिर-पैर की समस्याओं में उलझे है। आपका दिमाग इस उलझन में पड़ रहता है। आपका जीवन बर्बाद हो रहा है ओर आप चुप बैठे रहते है। हम आपको धन्यवाद देने वाले थे, परंतु नहीं देना चाहते। आपको अभी 125 रुपये मिल रहे थे, पर आप 350 रुपये की नौकरी चाहते हैं यह बेकार की बातें है। आपको जब 125 रुपये खर्च करना नहीं आता तो 350 रुपये कैसे खर्च करेंगे। बेकार की बातें बन्द कीजिए। अगर आप आचार्य जी का आशीर्वाद ले जाते तथा अपने जीवन को महान बना लेते तो हम और आप दोनों धन्य हो जाते।
मित्रों! हमने शानदार जिन्दगी जी हैं तथा प्रसन्नता के साथ विदा होने को बैठे है कि हम भगवान को सही उत्तर देंगे। परन्तु आप भगवान को क्या जवाब देंगे। आप तो अपनी जिन्दगी भर रोते रहे एवं मरने के समय भी रोते रहेंगे। हमारा जीवन तालाब की तर हों गया हैं हमारा आधार कमजोर है। अगर अभी हमें लकवा हो जाये तो हम कहीं के नहीं रह जाएँगे। हमारा तालाब सूख जाएगा तो फिर क्या होगा? हमारी उन्नति का आधार समाप्त हो गया है। हमारे पास ज्ञान है, परन्तु हमारे मस्तिष्क का चिंतन खराब है, तो वह किसी तरह उपयोगी नहीं। हमारे पास सम्पत्ति है, परन्तु कुछ उलटा हो जाये, अकाल पड़ जाये, आग लग जाये, तूफान आ जायें तो हमारी सारी सम्पत्ति स्वाहा हो सकती है। जिसके प्रति हमारा अहंकार है, लोभ है, मोह है, वह बेकार हो जाएगा।
तालाब के ऊपर खेती का क्या भरोसा है। खेती कुएं के पास के बन्धे के ऊपर ठीक होती है जहाँ कुछ- न-कुछ अवश्य पैदा हो जाया करता हैं वह हरा-भरा रहता है तथा पानी की चिन्ता उसे नहीं होती है। हमारा भी इस तरह का ही चिन्तन है कि हमें भी मजबूत सहारा पकड़ना चाहिए, जिसमें कि हम भी हरे-भरे रह सकें इस तरह का सहारा हमारे लिए भगवान से बढ़कर और कोई नहीं है, जो हमें सदैव हरा-भरा रख सकता है। इसमें जिन्दगी की उन्नति का सारा-का-सारा मार्ग खुला हुआ है। यह एक अज्ञात शक्ति है, जिसके इशारे पर सारा संसार चल रहा है।
आप तो बेटे के नशे में है। हाय बेटा-हाय बेटा चिल्लाते रहते है। एक बार हमारे पास मध्यप्रदेश के एक सज्जन आये थे। उनके दूसरे नम्बर के बेटे की शादी तो हो गयी, पर नौकरी नहीं लगी थी। वह मक्कार था, श्रम करना नहीं चाहता था। उसने अपने बाप से कहा कि आपने पैदा किया है तो खिलाइये, पैसा दीजिए, नहीं तो हम जान से मार देंगे। बेचारे डर के मारे भागकर हमारे पास आये एवं कहा कि हम दो-तीन माह तक नहीं जाएँगे। छुट्टी ले लेंगे एवं यहाँ छिपे रहेंगे। उन्होंने कहा कि गुरुजी अगर उसका कोई पूछने आ जाये तो यह मत कहना कि हम यहाँ है। मित्रो, उनके मन में बेटे के प्रति जो ख्वाब था, वह चूर-चूर हो गया था। आप भी बेटे के पीछे पागल रहते है। रात-दिन बेटा बेटा करते रहते है। हमारा एक और दूसरा ख्वाब यह होता है कि हम यह बन जाएँगे, वह बन परन्तु एक आँधी आती है और हमारे सब ख्वाब समाप्त हो जाते है। हमने इतना कमजोर आधार बना दिया है कि हमें दिन में हँसना पड़ेगा तथा रात में रोना पड़ेगा। इस प्रकार हम अपनी हँसती जिन्दगी इसी प्रकार रोते हुए खत्म कर देंगे।
लेकिन मित्रो! एक और सहारा है, अगर आप उसे पकड़ लेंगे तो आपका जीवन कुछ बन सकता हैं वह सहारा भगवान का है। आप कहेंगे कि हम तो रोज शंकर जी के मंदिर जाते है। पूजा-पाठ करते है, परन्तु शंकरजी हमारी कोई मदद नहीं करते है। सावन के महीने में हमने बेलपत्र चढ़ाया, पानी का मटका लगा, परन्तु भगवान शंकर भगवान की कृपा प्राप्त करने के आपको बड़ा कदम उठाना होगा।
मित्रो! बड़े कार्यों के लिए बड़ा कदम, जोखिम भरा कदम उठाना पड़ता है, तब लाभ प्राप्त होता है शंकरजी वरदान दिया था-रावण को, भस्मासुर को तथा शंकर जी ने वरदान दिया था परशुराम को, परन्तु उनके व्यवहार एवं कार्य करने के ढंग के कारण रावण एवं भस्मासुर को मारना पड़ा। अगर आपकी विचारधारा ठीक होगी और आप भगवान का अनुदान-वरदान प्राप्त करके इस संसार का कुछ अच्छा करना चाहते है, तो आपको भगवान का हर प्रकार का सहयोग मिलेगा। बल एवं धन के आधार पर मनुष्य बलवान नहीं हो सकता हैं हमको अपने विकास के लिए मजबूत आधार ढूँढ़ना होगा। वह मजबूत आधार केवल भगवान हैं भगवान का सहारा लेने के बाद हमारे पास क्या कमी रहेगी? हमें उनका प्यार-अनुदान प्राप्त करके अपना आध्यात्मिक विकास करने का प्रयास करना चाहिए। भगवान के पास अनन्त सुख के भंडार भरे पड़े है। उनके एक मित्र थे सुदामा, वे गरीबी का जीवन जी रहे थे। लोगों ने कहा कि आपकी भगवान से मुलाकात है। आप इस प्रकार क्यों हैं? सुदामा जी भगवान के पास गये, भगवान ने अपने मित्र का निहाल कर दिया।
गुरुनानक को उनके पिता ने नाराज होकर बीस हजार रुपये व्यापार करने को दिये और कहा- जा व्यापार द्वारा अपना जीवन निर्वाह कर। गुरुनानक देव संत थे, उन्होंने बीस रुपये की हींग खरीदी ओर वहाँ आये, जहाँ पर संतों का एक भण्डार चल रहा था। उस समय दाल बन रही थी। उसमें हींग का छोंक लगा दिया तथा सभी के आगे दाल परोस दी। सभी उपस्थित लोगों ने प्रेम से भोजन किया तथा प्रसन्न हुए। प्रातःकाल जब नानक घर पहुँचे तो उनके पिता काफी नाराज थे उन्होंने पूछा कि पैसों का क्या किया? नानकजी ने सारी बात बता दी तथा यह कहा कि पिता जी! हमने ऐसा व्यापार किया हैं जो भविष्य में हजार गुना होकर वापस होगा। आज वास्तव में गुरुनानक साहेब की याद में स्वर्णमंदिर अमृतसर में विद्यमान है, जो करोड़ों-अरबों का है। मित्रों, यह भगवान के साथ व्यापार करने का लाभ है। हमने विचार किया वह कैसा मंदिर है। करोड़ों का कौन-सा मन्दिर है, जिसमें गुरुनानक सोये हुए है। मित्रों, यह महत्व है भगवान के साथ जुड़ने का, उससे सम्बन्ध करने का।
मित्रो, कश्मीर में हजरत मोहम्मद साहब का पवित्र बाल एक शीशी में रखा हैं जहाँ मोहम्मद साहब का बाल रखा हैं अगर आज गुरुनानक देव, मोहम्मद साहब आ जायें तथा इतना बड़ा मूल्यवान मकान देख लें तो उनको आश्चर्य होगा। मित्रो, यह आध्यात्मिकता का मूल्य है। भगवान से सम्बन्ध बनाने के बाद आदमी कितना मूल्यवान हो जाता है, यह विचार करने का विषय हैं वह बहुत कीमती हो जाता है। नानक, विवेकानंद, मोहम्मद साहब महान हो गये। भगवान से सम्बन्ध हो जाने पर आदमी का वजन और मूल्य दोनों बढ़ जाते हैं
अगर एक औरत की शादी एक सेठजी के साथ होती है और दुर्भाग्य से उसके पति का देहांत हो जाता है, तो दूसरे दिन से ही वह सेठानी उसकी सारी जमीन -जायदाद की मालकिन बन जाती है। यही होता है भक्त का भगवान से सम्बन्ध जोड़ने पर। डॉक्टर की पत्नी डॉक्टरनी, वकील की पत्नी वकीलनी, पंडित की पत्नी पंडितानी बन जाती है, चाहें वह पांचवीं क्लास हो धर्मपत्नी बनकर आप से सम्बन्ध जोड़ने पर वह पति की सारी सम्पत्ति की मालकिन बन जाती है, उसी प्रकार भगवान से सम्बन्ध जोड़ने पर होता हैं आपको यहाँ हमने इसलिए बुलाया है कि आपका ब्याह भगवान से करा दे। इसके लिए आपको हमने अनुष्ठान प्रारम्भ कराया है। यह अनुष्ठान आपके विवाह के समय हल्दी लगाने तथा बाल सँवरने, वस्त्र आदि से सजाने के बराबर हैं हम आत्मा का परमात्मा से मिलन कराना चाहते है। यह बाजीगरी है। हम आपका संबंध भगवान से कराना चाहते हैं, ताकि आपका सम्बन्ध मालदार आदमी से हो जायें। मालदार आदमी के साथ सम्बन्ध भगवान से कराना चाहते है, ताकि आपका सम्बन्ध मालदार आदमी से हो जाये। मालदार आदमी के साथ सम्बन्ध बना लेने से आदमी को हर समय फायदा रहता है
मित्रो, किसी का सम्बन्ध मालदार आदमी से होता है। ओर वह उसके यहाँ काम करता है, तो उसे सेठ जी कुछ लाने को भेजते है तथा सौ रुपये देते है। वह अस्सी रुपये का समान लाता है तथा बीस रुपये अपने पॉकेट में रख लेता हैं सेठजी उससे पूछते भी नहीं हैं इस प्रकार छोटे-छोटे कामों में वह पैसा इकट्ठा करता जाता है और मालदार के साथ मालदार हो जाता हैं उसकी बीबी कहती है कि हमारे घर में बाबू की तनख्वाह से क्या होगा, अगर रोज न कमाये। यह है मालदार आदमी से जुड़ने पर भौतिक लाभ। भगवान से जुड़ने पर भौतिक लाभ। भगवान से जुड़ने पर हमें क्या-क्या लाभ मिलते है, यह आप जुड़कर स्वयं देखे।
मित्रो! मालदार आदमी के पास नौकरी करने पर पैसों के लिए चालाकी, बेईमानी करनी पड़ती है तो आप पैसा कमाते है, परन्तु हम ऐसे मालदार आदमी से जिसका नाम भगवान है, उसके यहाँ आपकी नौकरी लगाना चाहते है, जिसके पास आपको सारी चीजें प्राप्त होती रहेंगी। उसके लिए आपको चालाकी या बेईमानी करने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ेगी। हम चाहते है कि आपको भगवान की गोद में रख दे। गोद में रहने वाला व्यक्ति घाटे में नहीं रहता है। बाप कमाता रहता है बेटा खाता रहता है।
बेटे, हम भी आपको बाँटते रहते है, आशीर्वाद देते रहते है कि आपका कष्ट दूर हो जाये। आपकी मनोकामना पूर्ण हो जाये। आज आप कमजोर है, हो सकता है कि कल आप कमजोर है, हो सकता है कि कल आप मजबूत हो जायें तथा भगवान का काम कर सके। आप यह सोचते है कि दो साल के बाद गुरु जी चले जाएँगे तथा हमें तपोभूमि या फिर हरिद्वार जाने के क्या मिलेगा? आप इधर-उधर बगलें झाँकने लगते है तथा साँई बाबा के पास चले जाते है। वहाँ जाने के बाद हनुमान जी के पास, करौली वाली माँ के पास जाते है, इधर−उधर भटकते रहते है। जिन्दगी भर आप खाली हाथ रहते है। मित्रो, इधर-उधर आप भटकते न रहे, आप भगवान का पल्ला पकड़ लीजिए। तथा अपने जीवन को पार कर लीजिए।
मित्रो, हमारी मुलाकात किसी एम.पी. एम.एल.ए या मिनिस्टर से होती है या उससे जान-पहचान, साँठ-गाँठ होती है, तो हमारी समस्या तथा हमारी मुसीबतें दूर होती हो जाती है। अगर हमारा सम्बन्ध भगवान से हो तो फिर क्या कहना कहना? मध्यप्रदेश के पूर्व मंत्री हमारे पास आये और यह कहा कि गुरुजी हमें एक दिन के लिए ही मुख्यमंत्री बना दीजिए। वे दो-ढाई घण्टे तक हमारे पास बैठे रहे। भगवान की कृपा से तुक्का लग गया और वे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन गये। मित्रों यह क्या बात है? हमारी जान-पहचान किससे है? हमारी जान-पहचान भगवान से है।
आदमी की पहचान बड़े आदमी से होने पर काम बन जाता है। एक बार ऐसा ही हुआ कि एक पंडित जी थे। पंडित जी ने एक दुकानदार के पास पाँच सौ रुपये रख दिये। उन्होंने सोचा कि जब बच्ची की शादी होगी तो पैसा ले लेंगे। थोड़े दिनों के बाद जब बच्ची सयानी हो गयी तो पंडित जी उस दुकानदार के पास गये उसने नकार दिया कि आपने कब हमें पैसा दिया था। उसने पंडित जी से कहा कि क्या हमने कुछ लिखकर दिया हैं पंडित जी इस हरकत से परेशान हो गये और चिन्ता में डूब गये। थोड़े दिन के बाद उन्हें याद आया कि क्यों न राजा से इस बारे में शिकायत कर दें ताकि वे कुछ फैसला कर दें एवं मेरा पैसा कन्या के विवाह के लिए मिल जाये। वे राजा के पास पहुँचे तथा अपनी फरियाद सुनाई। राजा ने कहा-कल हमारी सवारी निकलेंगी, तुम लालाजी की दुकान के पास खड़े रहना। राजा की सवारी निकली। सभी लोगों ने फूलमालाएँ पहनाई, किसी ने आरती उतारी। पंडित जी लालाजी की दुकान के पास खड़े थे। राजा ने कहा-गुरुजी आप यहाँ कैसे, आप तो हमारे गुरु है? आइये इस बग्घी में बैठ जाइये। लालाजी यह सब देख रहे थे। उन्होंने आरती उतारी, सवारी आगे बढ़ गयी। थोड़ी दूर चलने के बाद राजा ने पंडित जी को उतार दिया और यह कहा कि पंडित जी हमने आपका काम कर दिया। अब आगे आपका भाग्य।
उधर लालाजी यह सब देखकर हैरान थे कि पंडित जी की तो राजा से अच्छी साँठ-गाँठ है। कहीं वे हमारा कबाड़ा न करा दे। लालाजी ने अपने मुनीम को पंडित जी को ढूँढ़कर लाने को कहा-पंडित जी एक पेड़ के नीचे बैठकर कुछ विचार कर रहें थे मुनीम जी आदर के साथ उन्हें अपने साथ में ले गये। लाला जी ने प्रणाम किया और बोले-पंडित जी हमने काफी श्रम किया तथा पुराने खाते को देखा तो पाया कि हमारे खाते में आपका पाँच सौ रुपये जमा हैं पंडित जी दस साल में मय ब्याज के बारह हजार रुपये हों गये। पंडित जी आपकी बेटी हमारी बेटी है अतः एक हजार रुपये आप हमारी तरफ से ले जाइये तथा उसे लड़की की शादी में लगा देना इस प्रकार लालाजी ने पंडित जी को तरह हजार रुपये देकर प्रेम के साथ विदा किया।
मित्रों, यह हम क्या कह रहे थे? यह बतला रहे थे कि आप भी अगर इस दुनिया के राजा, जिसका नाम भगवान है, अगर अपना सम्बन्ध उससे जोड़ लें तो आपकी कोई समस्या, कठिनाई नहीं रहेंगी। आपको कोई तंग भी नहीं करेगा। आपके साथ अन्याय भी कोई नहीं कर सकता। पाँच फुट वाला आदमी जब भगवान से जुड़ गया तो मित्रो, वही आदमी महात्मा बन गया। उस आदमी का नाम महात्मा गाँधी हो गया, जिसको देखकर अंग्रेज डरते थे और यह कहते थे कि यह जादूगर है। इससे बचकर रहो। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री उससे डरते थे और यह कहते थे कि यह ‘बम’ हैं उनने अपने सभी मंत्रियों से गाँधीजी से नजर न मिलाने की हिदायत दे रखी थी। वह काला गाँधी नहीं, वरन् वह गाँधी था जो भगवान से जुड़ गया था और वह उसी का चमत्कारी। वह चालाकी या अक्ल वाला गाँधी नहीं था, बल्कि भगवान का सहयोगी गाँधी था। इन शक्तियों को आप भी भगवान के पास बैठकर पा सकते है। अपने को महान बना सकते हैं। अगर आप अपने आप को तैयार कर लें तो सब कुछ प्राप्त कर सकते है तथा संत, महामानव स्तर तक पहुँच सकते है।
मित्रो, सूर्य की रोशनी इस धरती पर पड़ती तो है, परन्तु है यह हमारी आँखों का चमत्कार। अगर आँखें न रहती तो म यह विभिन्न तरह के रंग कैसे देखते तथा आनन्द अनुभव कैसे करते? आँख का सूर्य अगर ठीक हो तो यह आपको
रामायण, भागवत् पढ़ा सकता है। अगर आपको बुखार आ जाये तथा तबियत खराब हो जाए तो आप ठीक से नहीं खा सकते है।यह बात आपको सोचनी चाहिए। एक महिला थी। उसके मरने का समय हो गया। उसे पकौड़ी, नीबू का आचार, रबड़ी दी गयी, परन्तु उसका मुँह कड़वा था। उसे सब चीजें मिट्टी के समान लगी। अगर आपकी अक्ल खराब हो जाए तो इस दुनिया की सारी सम्पत्ति आपको किसी काम की नहीं दिखायी पड़ेगी। यह क्या है? जिसके कारण आप दुनिया के सारे आनन्द ले रहे है? चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ राजकुमार की तरह रह रहे है। यह है भगवान की अनुकम्पा, भगवान की कृपा, जो निरन्तर आपके ऊपर बरस रही है। हमें यह महसूस करना चाहिए कि भगवान हमारे सारे अंग-अंग में, सारे रोम-रोम में समाया हुआ है तथा उसकी शक्ति हमारे अन्दर समायी हुई है। वह हमें महान बना रहा है, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है। हमारा कायाकल्प कर रहा है, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ा रहा है। हमारा कायाकल्प कर रहा हैं। अगर इतना आप कर सकें तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आप धन्य हो जाएँगे।
साथियों! हमारी काया के भीतर ऐसे सेल भरे पड़े है, जिसमें हीरे-मोती सोना-जवाहरात पड़े है। अगर आप उसे जगा लें तो मालामाल हो सकते है। आप पारस, कल्पवृक्ष हो सकते है। आपका सम्पर्क जिस किसी से होगा, उसको आप धन्य करते चले जाएँगे। आपका विकास होता चला जाएगा। हमें अपनी हर उँगली प्यारी हैं भगवान को भी हर प्राणी प्यारा है। वह सबका बराबर ध्यान रखता हैं भगवान अपने हर अंग को सुन्दर और सुडौल देखना चाहता है। भगवान के ऊपर पक्षपात का दोष नहीं लगाया जा सकता हैं वह सबको बराबर देता है, परन्तु मनुष्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव, श्रम, आलस्य के कारण पिछड़ जाता है। अगर आपकी पात्रता हो तो आप अपनी प्रगति के लिए न जाने कहाँ-कहाँ घूमते है, किस-किसको गुरु बनाते फिरते है। हम भी तेरह से पंद्रह वर्ष की उम्र तक इसी चक्कर में पड़े रहे तथा तमाशा देखते रहे। हमने भी बहुत पैसा फेंका है, मात्र यह बाजीगरी देखने के लिए।
मित्रो! इन दो सालों में हमने हिन्दुस्तान के किसी भी सिद्धपुरुष, महात्मा, योगी को नहीं छोड़ा जो आज बाजीगर की तरह नाम बतलाते है तथा सोना बनाते है। अगर आप चाहें तो हम उनका नाम आपको बतला सकते है। एक बार हमने एक सिद्धपुरुष की बात सुनी तथा उसके लिए हमने बहुत बड़ा जोखिम उठाया, प्राणों की बाजी लगा दी। वो सिद्धपुरुष घने जंगल की एक गुफा में रहते थे लोगों ने बतलाया कि वे सबका नाम-पता तथा भूत-भविष्य वर्तमान सब कुछ बता देते है। हम पहुँच गये, उनके पास। बाबा ने सब बतलाया। हमें दाल में कुछ काला नजर आया।हमने उसे बतला दिया कि यह बेकार आदमी है। इसके चेले धन्धा करते है। हमने अध्यापक से कहा कि आप सब नाम-पते आदि गलत–सलत बताना। उसने चेलों से अपना नाम-पता सब गलत बतला दिया। दूसरे दिन महात्मा जी मिले तो उन्होंने भी वैसा ही बतलाया। अध्यापक तथा हम दोनों ये सब देखकर मुस्करा पड़े। यह उन चेलों ने देख लिया था। हमने किसी प्रकार धोती-कुर्ता समेटा और तौलिया लपेटकर दीर्घशंका का बहाना बनाकर वहाँ से भाग लिए। जाना था पूरब की ओर ओर पश्चिम की ओर निकल गये। किसी प्रकार प्राण बचाकर तीन दिन तक जंगल में भटकने के बाद अपने स्थान पर पहुँचे।
साथियों! हमने उस गुरू को भी देखा है, जो पंद्रह वर्ष की उम्र पूरी होने पर वसंत पंचमी के दिन हमारे पास आया था। उसने हमारे तीन जन्मों का दृश्य हमें दिखाया और हमें गायत्री उपासना में लगाया, जिसे चौबीस साल तक विधि-विधानपूर्वक किया। हमने अपने गुरुदेव से एक प्रश्न पूछा कि पूज्यवर हमारी एक शंका है। आप बतलाये कि गुरुओं की खोज में लोग छुट्टी लेते हैं, मेडिकल लीव लेते हैं, घर-बार छोड़ते है, तब जाकर शायद किसी कोने में कोई सच्चा गुरु मिलता है, परन्तु आप तो स्वयं हमारे पास चलें आये, यह क्या बात है? पूज्यवर ने बतलाया -बेटे! धरती क्या बादलों के पास जाती है या बादल स्वयं उसके पास आते है धरती पर? हमने कहा ’बादल स्वयं आते है एवं धरती पर बरस जाते है। बादलों को चलना पड़ता है। बादल स्वयं बरसते रहते है। उन्होंने कहा कि आकाश में बादलों की तरह सिद्धपुरुषों की भी कमी नहीं है, जो बादलों की तरह बरसने के लिए सुपात्र की खोज करते रहते है। दिव्य आत्माओं की वे तलाश करते रहते हैं।
मित्रों! आपने देखा होगा कि जब इस धरती पर मरी हुई लाश, कुत्ते आदि पड़े रहते है तो गीध, कौए, चील स्वयं आ जाते है तथा उसे नोंच-नोंच कर खा जाते है। उसी प्रकार भगवान, दिव्यपुरुष, संत भी ऊपर से तलाश करते है कि इस धरती पर कौन दिव्यपुरुष है, जिसे भगवान, गुरु संत की कृपा, वरदान, आशीर्वाद की आवश्यकता हैं और वहां वहाँ पर पहुँचकर सारा काम करते है। वे देखते है कि कौन दया के पात्र है। हम बद्रीनाथ, रामेश्वर जाते है, किन्तु वे भी हमारे पास आते है एवं हमारी परख करके चले जाते है। केवट की भक्ति, श्रद्धा महान थी। उसे देखकर भगवान राम स्वयं उसके पास आये और दर्शन दिया केवट रामचन्द्र जी के पास नहीं गया था। शबरी के पास रामचन्द्र स्वयं आये थे। शबरी नहीं गयी थी। श्रीकृष्ण गोपियों के पास गये थे तथा उन्हें प्यार दिया था। गोपियाँ नहीं गई थी। मित्रों! उसी प्रकार पात्रता देखकर गुरु शिष्य के पास आता है तथा उसे धन्य कर जाता हैं अगर वास्तव में पात्रता हो तो ऋद्धि-सिद्धियाँ पायी जा सकती है तथा निहाल हुआ जा सकता है।
भगवान के यहाँ अनन्त वैभव, कृपा अनुदान भरा पड़ता है। वह केवल ऐसे आदमी को मिलता है, जिनकी पात्रता है। एक बार हम पोरबन्दर-गुजरात गये थे और वहाँ गाँधीजी का जन्मस्थान देखा था। वह छोटा था। तब वहाँ छोटा-सा मकान था। परन्तु भगवान तो मालदार है। उसने गाँधी जी को धन्य कर दिया। आज वहाँ करोड़ों का स्मारक बना हुआ है। भगवान आते है। तो मनुष्य के सोचने का, विचार करने का, कार्य का ढंग बदल जाता हैं उसकी आवाज बदल जाती है। उसे सारे लोगों के प्रति श्रद्धा-निष्ठा हो जाती हैं वह दूसरों को प्यार देता है, दूसरों के दुखों को देखकर द्रवित होता है। गाँधी जी के अन्दर भगवान आये और जो भी आवाज उनने दी उसे पूरा होते देखा गया। भगवान की खुशामद करने से कोई काम नहीं चलेगा। पात्रता ही महान तत्व हैं जिसमें पात्रता होती है, सरकार उसे फिर बुला लेती है। उसको काम देती हैं प्रेम महाविद्यालय के प्रिंसिपल नब्बे वर्ष के होने के आये, परन्तु गवर्नमेंट ने उन्हें नहीं छोड़ा। हर साल उन्हें नया पद मिल जाता।
मित्रो! प्रतिभाओं की माँग, योग्यता की माँग, गुणों की माँग हर जगह होती है। हमारा भी यही उद्देश्य है कि आप आगे बढ़। हम चाहते है कि आपके अन्दर भी वे चीजें आ जाएँ, भगवान आ जाएँ तथा आपका विकास हो जाय। इसीलिए हमने आपका ब्याह भगवान से कराने का निश्चय किया है। परन्तु मित्रो, अगर कन्या अस्वस्थ हो, बीमार हो, कमजोर हो तो उसका विवाह अच्छे लड़के के साथ कैसे हो सकता है। उसी प्रकार आपकी पात्रता कमजोर हो तो भगवान कैसे आपकी अपनायेगा? कैसे स्नेह प्यार देगा? अगर राजकुमार से विवाह करना हो तो लड़की भी ठीक होनी चाहिए। अगर आप कोढ़ी है तो अच्छी लड़की आपको नहीं लेगी। आप अपाहिज है तो भगवान के साथ ब्याह नहीं कर सकते है। स्वस्थ, निरोग शरीर, स्वच्छ पवित्र मन की आवश्यकता है भगवान से ब्याह करने के लिए।
स्वच्छ मन, स्वस्थ, निरोग शरीर बनाने के लिए आपको यहाँ बुलाया गया है, ताकि आप भगवान से जुड़ सके। आपको हम गायत्री महापुरश्चरण करा रहे है। हमें प्रसन्नता है कि आप बहुत प्रातःकाल ही उठकर पूजा, ध्यान, जप प्राणायाम में लग जाते है। यह सब देखकर हमें खुशी होती है अगर आप इन करने वाले कर्मकाण्डों से कुछ प्रेरणा ले सकें तथा अपनी पात्रता का विकास कर सकें, अपने को जीवन्त बना सके, तो आप यकीन रखें कि आपका विवाह भगवान से हो जाएगा तथा आपके पास सारी ऋद्धि-सिद्धियाँ वैभव स्वतः आ जाएँगे, जिनके लिए आप रातदिन परेशान रहते है।
मित्रो! एक लड़की थी। उसका रिश्ता तय हो गया। उसकी गोद में एक नारियल भी लड़के वालों ने दे दिया था। बाद में लड़के वालों ने मना कर दिया। लड़की ने कमर कसी और लाठी लेकर उस गाँव में पहुँच गयी। उसने कहा कि अरे विवाह कर नहीं तो लाठी के सामने आ जा। मामला पंचायत तक पहुँचा। लड़की ने कहा कि इसने ही शादी पक्की की, नारियल भी दिया ओर अब ना कर रहा है। पंचायत ने फैसला किया कि विवाह इसी लड़की के साथ होगा।
मित्रो! हमने भी आपका विवाह भगवान से कराने का निश्चय किया है। आप भी उस लड़की की तरह दृढ़ निश्चय करके अपनी पात्रता को विकसित करके भगवान को प्राप्त करें। आपकी परेशानी दूर हो जाएगी। हम भगवान के पास होकर आये है। उनके पास ढेरों हीरे की अँगूठी -जवाहरात, बाल-बच्चे है, जिसे चाहे उठाकर ले आओ। मित्रो! यह विवाह किसी प्रकार घाटे का सौदा नहीं है। आप इसे निभाना। इसमें हमें प्रसन्नता होगी।
आज की बात समाप्त।
ॐ शान्ति!
सफलता का मार्ग खतरों का मार्ग है। जिसमें खतरों से लड़ने का साहस और संघर्ष में पड़ने का चाव हो, उसे ही सिद्धि के पग पर कदम बढ़ाना चाहिए। जो खतरों से डरते है, जिन्हें कष्ट सहने से भय लगता है, कठोर परिश्रम करना जिन्हें नहीं आता, उन्हें अपने जीवन को उन्नतिशील बनो की कल्पना नहीं करनी चाहिए। अदम्य उत्साह, अटूट साहस, अविचल धैर्य, निरन्तर परिश्रम ओर खतरों से लड़ने वाला पुरुषार्थ ही किसी की जीवन सफल बना सकता हैं
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
हाथ पुष्प के समीप पहुँचा तो उसने पूछा- इस सघन समीपता का उद्देश्य क्या है बन्धु?
उत्तर देते हुए हाथ बोला-तुम्हारे ऊपर उपकार करने आया हूँ देवता के समीप तुम्हें पहुँचाने का विचार है।
पुष्प उदास हो गया। उसने कहा- देवता तक तो सौभाग्यशाली फूल पहुँच ही जाते है। इन निरीह तितलियों और मधुमक्खियों के काम ही आता रहता और जहाँ जन्मा वही खाद बनकर गल जाता तो मेरे लिए अधिक संतोष की बात होगी।
सूक्ष्मजगत के परिशोधन एवं भविष्य को उज्ज्वल बनाने हेतु एक दिव्य उपासनाक्रम के रूप में, मनुष्य में देवत्व उपासनाक्रम के रूप में, मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव बनाने के लिए सामूहिक महासाधना के नियोजन के रूप में एक दिव्य महापुरश्चरण सन्निकट का आश्विन नवरात्र से शाँतिकुँज में आरंभ किया गया है। नाम है ‘युगसंधि महापुरश्चरण ‘। शाँतिकुँज हरिद्वार से संचालित यह पुण्य आयोजन सारे भारत व विश्व में सन् 2000 तक चलता रहेगा, इक्कीसवीं सदी के आरंभ के साथ ही उसकी पूर्णाहुति होगी, जिसे साधना के अनुरूप ही इतना बड़ा कहा जा सकेगा कि उसी तुलना अब तक के किसी भी विशालतम समागत से भी न की जा सकें ‘ परमपूज्य गुरुदेव द्वारा ये पंक्तियाँ आज से 10 वर्ष 4 माह पूर्व अक्टूबर, 1988 की अखण्ड ज्योति में लिखी गयी थी। युगसंधि की विषम वेला में उनने इस साधना को प्रत्येक के लिए अनिवार्य बताते हुए उसके भागीदारों की संख्या समापन होते-होते प्रायः चौबीस करोड़ से भी अधिक होने की बात कही थी।
अगला अंक ‘साधना वर्ष विशेषांक ‘ के रूप में
दस वर्ष बीतकर ग्यारहवाँ वर्ष लग गया। अब मुश्किल से बारह माह का समय बाकी है, जब हम एक विषमताओं से भरे वर्ष का समापन कर एक शताब्दी ही नहीं, एक सहस्राब्दी को पार कर नयी सहस्राब्दी में प्रवेश कर जाएँगे। निश्चित ही प्रस्तुत अवधि भारी उलटफेरों, अप्रत्याशित परिवर्तनों व उथल-पुथल से भरी होगी। इसी कारण इस वर्ष की वसंत पंचमी सन् 1999 (22 जनवरी ) से बसंत पंचमी सन् 2000 (10 फरवरी तक) की अवधि को प्रखर साधना वर्ष घोषित किया गया है। इस अवधि में राष्ट्र ही नहीं, विश्व के कोने-कोने में, चप्पे-चप्पे में गायत्री के अखण्ड जप के रूप में उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के रूप में विराट साधना-पुरुषार्थ सम्पन्न होगा एवं इस पूरे साधना -पराक्रम का समापन एक विराट महापूर्णाहुति के माध्यम से संपन्न होगा जिनने प्रथम महापूर्णाहुति जो आराध्य गुरुसत्ता की जन्मस्थली आँवलखेड़ा में नवम्बर 1995 में सम्पन्न हुई, देखी है, वे जानते है कि कितनी बड़ी जनशक्ति उस समय एकजुट हुई थी व उनने आगामी पाँच वर्षों में मिशन के प्रकाश को विश्वभर में फैलाने के लिए स्वयं को संकल्पित किया था। तब से मिशन ओर अधिक विस्तृत हुआ हैं व आगामी दो वर्षों में इसमें अनेकानेक वर्गों के समाविष्ट होने की संभावनाएँ है। ऐसी स्थिति में कल्पना की जा सकती है कि इस महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति जिसकी उपमा परमपूज्य गुरुदेव ने किसी और समागम से न करते हुए इस भारतभूमि के कोने-कोने से संपन्न किए जाने की बात लिखी है, कितनी विराटतम होगी। इसे निश्चित ही उज्ज्वल भविष्य से भरे सतयुग की स्वागत -अगवानी वाला एक आयोजन सारे विश्वभर में माना जाएगा।
पाठक -परिजन विगत अंक में साधना विशेषांक के माध्यम से जान चुके है कि किस रूप हमें साधना के विभिन्न आयामों को अपने जीवन में, परिवार-परिकर में एवं राष्ट्रीय जीवन में, समाहित कर एक श्रेष्ठ साधक बनना है। राष्ट्र को समर्थ एवं सशक्त बनाने वाली इस युगसाधना के लिए परमपूज्य गुरुदेव -श्री अरविन्द व रमण महर्षि की परम्परा में ही निरन्तर तप करते रहे एवं सभी को साधना में निरत होने की प्रेरणा सत्त देते रहे। चरित्रहीन, अराजकता एवं अधः पतन के अंधकार भरे युग में जी रहे मानव -पुरुषार्थ ही। त्याग-उत्सर्ग बलिदान की परम्पराएँ जब समाप्त हो गयी हों, भोग-विलास ही चारों ओर संव्याप्त हो-साधक परम्परा पुनः जिन्दा कर उनकी संख्या द्रुतगति से बढ़ाना ही आज का युगधर्म हैं राष्ट्रीय चरित्र का विकास इसी धुरी पर होगा एवं यही भारतवासियों के आत्मबल में वृद्धि करेगा। यह आत्मबल का विकास संयम को साधने से व योग को जीवन के हर पक्ष में उतारने पर ही संभव हैं अपने देश को जगद्गुरु इसी तपोबल की निधि के आधार पर कहा जाता था। जब से तप की वह निधि कम होती चली गयी- जड़ें खोखली होती चली गयीं एवं हम गुलामी के शिकार हो अंधकार युग में चले गए।
आज की स्थिति कुछ ऐसी ही है। शहरीकरण तेजी से हुआ, साधनों की होड़ भी बढ़ी है। सीमेन्ट -कंक्रीटीकरण के कारण हरे जंगलों का तेजी से विनाश हुआ है व जीवनशैली पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण कर वैसी ही ढलती चली अंधानुकरण कर वैसी ही ढलती चली गयी हैं साधनों को ने की दौड़ने मनुष्य के मन की शाँति छीन ली है एवं प्रायः सभी को तनाव से ग्रसित अशक्त-बीमार देखा जा सकता है। जब तक समग्र योग के रूप में उपासना-भक्तियोग साधना-ज्ञानयोग एवं आराधना-कर्मयोग हमारे जीवन में समाविष्ट नहीं होती, स्थिति और भी विषम ही होती चली जाएगी एवं सुख -चैन दूभर ही रहेगा। परमपूज्य गुरुदेव जो राष्ट्र की स्वतंत्रता के प्रत्यक्ष साक्षी रहे, इस तथ्य को जानते थे कि सदियों से गुलाम रहा यह देश जब अंकुश हटने पर उदारीकरण की हवा लगेगी तो गड़बड़ा सकता हैं इसीलिए उनने राष्ट्र को समर्थ-समृद्ध व सशक्त बनाने के लिए राष्ट्र के नागरिकों को एक श्रेष्ठ साधक के रूप में निखरने हेतु अनेकानेक उपचारों का प्रावधान किया, गायत्री को सार्वजनीन बनाया एवं यज्ञीय तत्त्वदर्शन के विश्वभर में विस्तार द्वारा सत्कर्म व पर्यावरण -संशोधन की प्रक्रिया को परिपूर्णता तक पहुँचाया। प्रस्तुत साधना महापुरश्चरण राष्ट्र के साँस्कृतिक पुनर्जागरण हेतु अनिवार्य माना जा सकता है व समय की विषमता से जूझने हेतु एक आध्यात्मिक महापुरुषार्थ भी। यह भी एक प्रसन्नता की ही बात मानी जानी चाहिए कि इस प्रखर साधना पराक्रम के शुरुआती दीप प्रज्ज्वलन के रूप में पिछले दिनों गायत्रीतीर्थ शाँतिकुँज हरिद्वार में एक अन्तर्राष्ट्रीय योगसम्मेलन भी सफलता-पूर्वक आयोजित हो कर इस उपक्रम का शानदार शुभारम्भ हो चुका है।
यह अन्तर्राष्ट्रीय योग सम्मेलन विवेकानन्द केंद्र बैंगलोर के पारस्परिक समन्वय के आधार पर शान्तिकुञ्ज परिसर में 13 से 18 दिसम्बर, 1998 की तारीखों में प्री–कांफ्रेंस के रूप में तथा 19, 20 दिसम्बर को मुख्य कांफ्रेंस या सम्मेलन के रूप आयोजित हुआ। यह तथ्य भली-भाँति समझ जाना चाहिए कि प्रस्तुत वेला जो युगसंधि की है, श्रेष्ठ कार्यों में जुटी संस्थाओं के समन्वित रूप में कार्य करने की संगति - करण की है। इसी उद्देश्य को दृष्टिगत रख समान उद्देश्यों के लिए काम कर रही संस्थाओं से गायत्री परिवार सतत् सम्पर्क कर समन्वय स्थापित करता रहा है। इसी कड़ी में विवेकानन्द केन्द्र (वी. के. योगाज) के एवं शाँतिकुँज के सम्मिलित तत्त्वावधान में गंगा-कावेरी के, उत्तर-दक्षिण के, हिमालय-हिंद महासागर के मिलनक्रम के रूप में राष्ट्रीय एकता को केन्द्रबिन्दु में रखकर यह आयोजन बड़ी सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इसमें भारत व विदेश के योग वेदान्त -दर्शन, योग-चिकित्सा से लेकर प्रबंध व्यवस्था से जुड़े विभिन्न विद्वानों ने भाग लिया। कन्याकुमारी स्थित विवेकानन्द केन्द्र के बैंगलोर प्रतिष्ठान के पदाधिकारियों सहित भारत के पूर्व से पश्चिम छोर तक व उत्तर से दक्षिण छोर तक व उत्तर से दक्षिण छोर तक के कई योग−साधकों ने उसमें भागीदारी की। छह दिन तक चली प्री–कांफ्रेंस में बच्चों के व्यक्तित्व परिष्कार व योग से सर्वांगीण विकास से लेकर -योगथेरेपी, योगथेरेपी प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण, तनाव प्रबन्ध, उपनिषद् व चेतना-डीप इकोलॉजी -विज्ञान वेदान्त का समन्वय -शोध अनुसंधान की तकनीकों आदि विषयों पर समानांतर पाँच हॉलों में वर्कशॉप चलती रही। योग ओलम्पियाड के रूप में ‘हिमालय’ नामक प्रतिस्पर्धाओं का आयोजन इसकी एक विशिष्ट भागों से आए बालक-बालिकाओं तथा बरेली, उड़ीसा-मुँगेर व अजमेर के छात्र-छात्राओं में प्रतिस्पर्द्धा हुई एवं समापन के दिन स्वामी कल्याणदेव जी महाराज के हाथों पुरस्कार वितरण हुआ। 125 वर्ष की आयु के स्वामी जी जो स्वामी विवेकानन्द का 1892 में दर्शन कर उनके साथ पैदल यात्रा कर चुके है एवं गायत्री परिवार की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं, से बढ़कर और कौन श्रेष्ठ पात्र इस कार्य के लिए हो सकता था।
योग-सम्मेलन तो संपन्न हो एक महत्वपूर्ण संदेश सबके लिए छोड़ गया हैं दैनन्दिन जीवन में योग की कर्मठता को, स्वस्थ समर्थ बनाने वाली विधा को अब गाँव-गाँव, घर-घर तक पहुँचाना हैं यह साधना वर्ष इस दिशा में निश्चित ही महत्वपूर्ण स्थापनाएँ करेगा। बिना साधना के योगस्थ होना संभव नहीं। जीवन-दर्शन जब तक योगी स्तर की नहीं बनेगा, कोई भी साधना सफल नहीं मानी जा सकती। गायत्री अपने में परिपूर्ण योग हैं यदि महाशक्ति त्रिपदा के तीनों सूत्रों को भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग के रूप में आत्मसात् कर जीवन वैसा बना लिया जाय तो राष्ट्र का कायाकल्प बहुत दूर नहीं। इस सम्मेलन में सभी ने इस तथ्य पर जोर देते हुए साधना वर्ष को अपने प्रखरतम रूप में उसी प्रचण्ड भाव से हर हिस्से में, दक्षिण के भी कोने-कोने में, पूर्वोत्तर व पश्चिमोत्तर भारत के भी चप्पे-चप्पे में मनाए जाने का संदेश ग्रहण व सम्प्रेषित किया है। ये इसी रूप में सम्पन्न होगा भी, इसमें किसी भी प्रकार का संदेह नहीं है।
दिसंबर वर्ष के साधना अंक का जिनने स्वाध्याय किया है, उन्हें पूरक के रूप में फरवरी 99 का साधना वर्ष विशेषांक पढ़ने को मिलेगा। इस पूरे अंक को इसी उद्देश्य विशेष के लिए तैयार किया गया है कि साधना-वर्ष किस रूप में, किस स्तर पर सभी वर्गों द्वारा मनाया जाना चाहिए।
प्रस्तुत ‘ साधना वर्ष विशेषांक एक विलक्षण वसंत पर्व की पूर्व वेला में दैवी संदेश के रूप में लिखा गया हैं। जैसा कि बहुत से परिजन जानते हैं, आज से प्रायः तीस वर्ष पूर्व 1969 में परमपूज्य गुरुदेव ने एक ऐतिहासिक युगांतरकारी घटना के माध्यम से परिवर्तन आने की भविष्यवाणी इसी वसंत के दिन के लिए व्यक्त की थी। इस वर्ष भी वसंत पर्व 22 जनवरी को था। इस वर्ष भी यह 22 जनवरी को ही आ रहा हैं साधना वर्ष विशेषांक तो वसन्तपर्व सम्पन्न हो जाने के बाद ही सबके पास पहुँचेगा, किंतु तब तक स्थान-स्थान पर अखण्ड जप प्रधान उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के साधना प्रधान आयोजन संपन्न होने लगेंगे। यह ऐतिहासिक वेला में है, जिसमें मिशन ही नहीं, सारा विश्व एक विलक्षण मोड़ से गुजरेगा।
इस ‘साधना वर्ष विशेषांक में परमपूज्य गुरुदेव की भावी योजनाओं सहित यह समग्र प्रारूप होगा कि कैसे भारतभूमि को तपोभूमि बनाने का उपक्रम शाँतिकुँज के माध्यम से संचालित होने जा रहा है। अंतरिक्ष में जो परिवर्तन संभावित है- उनसे क्या- क्या हो सकता है एवं इस महान साधना से सूक्ष्मजगत का परिशोधन कैसे होगा, इस विस्तार के साथ दैवी पुरुषार्थ से सामूहिक पापों के प्रक्षालन की प्रक्रिया भी स्पष्ट की जाएगी।
भावी युग का नेतृत्व साधकों को ही करना होगा, इस संदेश के विस्तार के साथ साधनावर्ष की अनूठी संक्रान्तियों का युगानुकूल प्रस्तुतीकरण भी इस विशेषांक में होगा। निश्चित ही प्रखर प्रचण्ड तप−साधना के साथ अभूतपूर्व क्राँति परिवर्तनों से भरी इस वेला में इस अंक का स्वाध्याय सभी को वह लाभ प्रदान करेगा, जिसकी कि महाकाल को अपेक्षा है। इस विशेषांक को अधिकाधिक व्यक्तियों तक पहुँचाने -पढ़ाने का पुण्य कितना होगा, यह लिखने की नहीं स्वयं समझने-आत्मसात् करने का प्रसंग है।
महाकाल का घोंसला शाँतिकुँज विगत वर्ष महाशिवरात्रि की वेला में ही एक अतिविस्तृत परिसर के रूप ढाई गुना बड़ा रूप ले चुका है, यह समाचार सभी को विदित हैं प्रस्तुत परिसर को नवयुग की गंगोत्री के रूप में, भविष्य का युग कैसा होगा, इसके मॉडल के रूप में विकसित किया जा रहा है, यह जानकारी हम परिजनों को समय-समय पर देते रहे है। विश्वामित्र ऋषि की तपस्थली के रूप में इस युग के द्रष्टा परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी पूर्व की तपस्थली का जब चयन किया था, तब उसके एक छोटे संस्करण का ही निर्माण हुआ था। आज तो यह प्राचीन तीर्थों, आरण्यकों, देवालयों, आश्रमों, गुरुकुलों की परम्परा की स्मृति दिलाने वाले एक समन्वित संस्करण के रूप में इतना विराट रूप ले चुका है कि सभी इसे एक दैवी पुरुषार्थ ही मानते है। मत्स्यावतार की तरह बढ़ते जा रहे करोड़ों व्यक्तियों, गायत्री साधकों के इस मुख्यालय को श्रद्धा के केन्द्रबिन्दु के रूप में विकसित किया गया था। संजीवनी साधना-सत्रों के शिविरार्थी- गणों को शाँति से साधना करने के निमित्त ही इसे बनाया गया था। परंतु आज इसी परिसर में सभी तरह की रचनात्मक, संगठनात्मक, सुधारात्मक गतिविधियाँ भी संचालित हो रही है। नयी भूमि के क्रय किये के बाद साधनाकेन्द्र इसी को बनाए रख शेष सारी गतिविधियों नए विस्तार में विकेन्द्रित किये जाने की बात सूत्र−संचालक सत्ता के सभी प्रतिनिधियों ने एकमत से स्वीकार की हैं
नया स्थान जो लिया गया है, पीछे गढ़वाल हिमालय की गिरि श्रृंखलाओं का छाया में सघन आम्रकुँजों से घिरा हुआ, दिल्ली-ऋषिकेश राजमार्ग पर हैं अभी तो प्रायः पच्चीस एकड़ का एक छोटा-सा भाग ही लिया गया है, किंतु भविष्य की संभावनाओं व कार्य के बढ़ते स्वरूप का देखते हुए आसपास के क्षेत्र को भी इसमें जोड़कर योजनाओं को मूर्तरूप देने की बात मन में आ रही हैं यह स्थान वर्तमान शाँतिकुँज से प्रायः 2 फर्लांग की दूरी पर ऋषिकेश की ओर है। कोलाहल से दूर वृक्षों की झुरमुटी सघनता से घिरा यह स्थान विश्व-विद्यालय स्तर की स्थापना के लिए एक आदर्श स्थान है। यही चिन्तन दृष्टिगत रख ऋषियुग्म की इच्छानुसार इसे नालन्दा तक्षशिला स्तर का, विश्व स्तर का प्रशिक्षण केन्द्र बनाए जाने की निश्चय हुआ हैं नक्शे बन रहे है- सभी शीर्ष स्तर के आर्कीटेक्टों भवन निर्माताओं से संपर्क जारी है तथा इसी फरवरी में निर्माणकार्य के द्रुतगामी रूप से आरम्भ होने की संभावनाएँ है।
इस शाँतिकुँज विस्तार में जो-जो विधाएँ प्रमुख रूप में ली गयी है व जो निर्माण प्रथम वरीयता पर हाथ में लिए जा रहे है, वे इस प्रकार है-
आयुर्वेद के जन-जन तक विस्तार व विज्ञानसम्मत प्रस्तुतीकरण हेतु एक आधुनिकतम शोध-संस्थान का अभिनव निर्माण यहाँ किया जाना है। आज आयुर्वेद ही जन स्वास्थ्य को वे संजीवनी औषधियाँ दे सकता है, जिनकी मानवजाति को तलाश है।लगभग खोखले ही चुके मानव समुदाय को यदि कहीं से निजात मिल सकती है, तो वह वनौषधि विज्ञान एवं आयुर्वेद की शास्त्रसम्मत सभी विधाओं के पुनर्जीवन से, उनके प्रामाणिक प्रस्तुतीकरण से। एक ऐसे ही शोध संस्थान की स्थापना कर मानवमात्र के लिए सुखी हो सकने वाली दिव्य औषधियों के निर्माण का, उनके द्वारा चिकित्सा का प्रशिक्षण तंत्र बेयर फुटेड डॉक्टर्स (नंगे पैर चिकित्सकों) द्वारा गाँव-गाँव, घर-घर तक विस्तार का क्रम यहाँ विकसित किया जाना है। इस संबंध में प्रारंभिक चर्चाएँ पूरी कर विस्तृत प्रारूप बना लिया गया है। 2. अध्यात्म के प्रगतिशील स्वरूप का लोकशिक्षण हेतु नियोजन परमपूज्य गुरुदेव का अभिनव प्रयोग रहा हैं ऐसे धर्म-संस्कृति के कुमारजीव, महेन्द्र, संघमित्रा स्तर के परिव्राजक शिक्षित कर विभिन्न भाषाओं, धर्म-संप्रदायों वाले क्षेत्रों में भेजकर भारतीय धर्म का विज्ञान सम्मत विस्तार इस नए केन्द्र से किया जाना हैं ऐसे पाँच सौ से अधिक प्रशिक्षित परिव्राजक प्रतिवर्ष यहाँ से क्षेत्रों में भेजे जा सकें, ऐसी योजना बनी है। धर्म-संस्कृति के एक सर्वांगीण विश्वविद्यालय के रूप में इस विधा को विकसित किया जा रहा है। 3. ग्राम प्रधान राष्ट्र का अधिक विकास ग्रामोत्थान व गौवंश के विकास की धुरी पर होगा, तभी यह राष्ट्र सारे विश्व का नेतृत्व कर सकने की स्थिति में आएगा, यह निश्चित है। इसी आधार पर गौकेन्द्रित अर्थव्यवस्था-कृषि तकनीकी एवं मानव संसाधनों का विकास दृष्टि में रख यहाँ स्वावलम्बन व ग्रामीण विकास की विधा का एक पूरा वैशिष्ट्य भरा केन्द्र विकसित हो रहा है। सारे भारतवर्ष के विभिन्न जिलों में गौशालाओं की स्थापना, वनौषधियों के स्मृति उपवनों के निर्माण तथा ग्रामीण रोजगार प्रधान स्वावलम्बन केन्द्रों का मार्गदर्शन यहाँ से होगा। शाँतिकुँज का समग्र प्रशिक्षण इसी विधा से जुड़कर कार्य करेगा। प्रारम्भिक स्तर पर एक गौशाला का निर्माण यहाँ हो चुका है, जिसमें 24 गौएँ आ चुकी है। 4. अंतिम विधा है सार्थक -विद्या से समन्वित शिक्षा के विस्तार हेतु एक प्रशिक्षण केन्द्र जो डीम्ड यूनिवर्सिटी के रूप विकसित होगा। अभी जो शिक्षापद्धति है, उसके चलते बेरोजगारों की फौज तैयार हो रही ही, दूसरी ओर निरक्षर बढ़ते जा रहे है। शाँतिकुँज उन योजनाओं को इस विधा के माध्यम से क्रियान्वित करेगा, जिससे भारत ही नहीं सारे विश्व की विभिन्न भाषाओं में प्रशिक्षण आरंभ हो, सुसंस्कारिता प्रधान एक राष्ट्र, एक संस्कृति, एक विराट कुटुम्ब के रूप में विकसित हो रही मानवी सभ्यता को पुनर्जीवन मिल सके, यह प्रशिक्षण-शिक्षण विज्ञान की सारी विधाओं को देवसंस्कृति के आधारों पर पुनः प्रतिष्ठित करेगा।
प्राकृतिक सुरम्य वातावरण में निर्मित हो रहे इस परिसर का नवयुग का इक्कीसवीं सदी के सतयुग का एक छोटा संस्करण कहा जाए तो कोई अत्युक्ति नहीं है। प्रायः एक अरब रुपये की लागत से होने जा रहे इस निर्माण में जहाँ प्रतिभाओं की, विशेषज्ञों की आवश्यकता है।, वहाँ उन श्रीमन्तों उदारमनाओं की भी जिनके बलबूते ही इतना बड़ा असंभव समझा जाने वाली भागीरथी कार्य हाथ में लिया गया है। परमपूज्य गुरुदेव की तरह ही हमारी आशाओं को भी जीवित रखने वाले भामाशाह, जमनालाल बजाज व अंशदान देने वाली गिलहरियाँ अभी भी कही-न-कही विश्वभर में- भारतभूमि में मौजूद है, यह विश्वास प्रतिदिन दृढ़ होता चला जा रहा है।
*समाप्त*