आखिर भयभीत क्यों हों? न तो इहलोक में, न परलोक में ही भय का कोई कारण है। सभी जीवों को आलोकित करता हुआ प्रेम का महाभाव विद्यमान है और उस प्रेम के लिये ईश्वर के अतिरिक्त और कोई दूसरा नाम नहीं है। ईश्वर तुमसे दूर नहीं है। वह देश की सीमा में बद्ध नहीं है, क्योंकि वह निराकार एवं अंतर्यामी को पूर्णतः उसके प्रति समर्पित कर दो। शुभ तथा अशुभ तु जो सर्वस्य समर्पित कर दो। कुछ भी बचा न रखो। इस प्रकार के सर्वस्य समर्पण के द्वारा तुम्हारा संपूर्ण चरित्र बन जायेगा। विचार बना जायेगा। विचार करो प्रेम कितना महान है। यह जीवन से भी बड़ा तथा मृत्यु से भी अधिक सशक्त है। ईश्वरप्राप्ति के सभी मार्गों में यह सर्वाधिक शीघ्रगामी है।
ज्ञान का पथ कठिन है। प्रेम का पथ सहज है। शिशु के समान सरल-निश्छल बनो। विश्वास और प्रेम रखो, तब तुम्हें कोई हानि नहीं होगी। धीर और आशावान् बनो, तब तुम सहज रूप से जीवन की सभी परिस्थितियों का सामना करने में समर्थ हो सकोगे। उदार हृदय बनो। क्षुद्र अहं तथा अनुदारता के सभी विचारों को निर्मल कर दो। पूर्ण विश्वास के साथ स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित कर दो। वे तुम्हारी सभी बातों को जानते है। उनके ज्ञान पर विश्वास करो। वे कितने पितृतुल्य हैं, सर्वोपरि वे कितने मातृतुल्य है। अनंत प्रभु अपनी अनन्तता में तुम्हारे दुख के सहभागी है। उनकी कृपा असीम है। यदि तुम हजार भूले करो तो भी प्रभु तुम्हें हजार बार क्षमा करेंगे। यदि दोष भी तुम पर आ पड़े तो वह दोष नहीं रह जायेगा। यदि तुम प्रभु से प्रेम करते हो। अत्यंत भयावह अनुभव भी तुम्हें तुम्हारे प्रेमास्पद प्रभु के सन्देशवाहक ही प्रतीत होंगे।
निश्चित ही प्रेम के द्वारा ही तुम ईश्वर को प्राप्त करोगे। क्या माँ सर्वदा प्रेममयी नहीं होती? वह अपना ईश्वर आत्मा का प्रेमी भी कुछ उसी प्रकार का है विश्वास करो! केवल प्रेमपूर्ण विश्वास करें!! फिर तुम्हारे लिए सब कुछ ठीक हो जायेगी। तुमसे जो भूलें हो गयी है, उसने तनिक भी भयभीत न होओ। मनुष्य बना- सच्चे अर्थों में मनुष्य-वह मनुष्य जिसके पास प्रेम से लबालब भरा हुआ हृदय है। जीवन का साहसपूर्वक सामना करो। जो भी हो उसे होने दो। प्रभु प्रेम की शक्ति से ही तुम शक्तिशाली बन सकते हो। स्मरण रखें कि तुम्हारे पास अनंत शक्ति है। तुम्हारे परम प्रेमास्पद प्रभु स्वयं तुम्हारे साथ। फिर तुम्हें क्या हो सकता है? प्रभु प्रेम के इस पथ पर निर्भीक हो बढ़े चलो, सबकुछ वह स्वतः होता चला जायेगा। तुम्हारे लिए परम कल्याणकारी एवं प्रीतिकर है।
न जाने क्यों, वह भगवान के नाममात्र से ही भड़क उठता था। यहाँ तक कि किसी आस्तिक से बात करना भी वह गुनाह समझता था। एक बार उसके गाँव में एक बड़ महात्मा प्रवचन देने के लिये आए। पूरा गाँव उनका प्रवचन सुनने के लिए उमड़ पड़ा। कई दिनों तक महात्मा जी का प्रवचन चलता रहा। मगर उसने उधर जाना तक उचित न समझा।
एक दिन वह संध्या के समय अपने खेत से लौट रहा था, सभी प्रवचन दे रहे महात्मा जी का स्वर उसके कानों से टकराया, “ अगर तम जीवन में सफल होना चाहते हो तो मन में कुछ न कुछ दृढ़ संकल्प कर लो और पूर्ण निष्ठा से उसे पूरा करने में लगे रहो। एक न एक दिन तुम्हें उसका सुफल जरूर मिलेगा।
न चाहते हुए भी आखिर यह बात उसके कानों टकरा ही गयी। उसने इस बात को भूल जाना चाहा, लेकिन जब रात में सोया तो रह- रहकर महात्मा जी के कहे शब्द उसके दिमाग में गूँजने लगे। लाख कोशिश करके भी वह उनसे अपना पीछा नहीं छुड़ा पाया। आखिर थक-हारकर उसने इस कथन की सत्यता को परखने का निश्चय किया। लेकिन वह क्या दृढ़ संकल्प करें? उसने ऐसी बात सोचनी चाही जिससे कभी भी कोई प्रतिफल न मिलने वाला हो। उसका मंतव्य सिर्फ इतना था कि किसी भी तरह महात्मा जी का कथन असत्य सिद्ध हो जाए।
काफी सोच विचार में उलझे रहने के बाद उसका ध्यान अपने घर के सामने रहे वाले कुम्हार पर गया। उसने संकल्प किया वह प्रतिदिन कुम्हार का मुँह देखे बिना भोजन नहीं करेगा। अवनी इस सोच पर वह मन ही मन खूब हँसा, क्योंकि वह जानता था कि इसका किसी तरह कोई भी सुफल नहीं मिल सकता है। अगले ही दिन से उसने अपने संकल्प पर अमल करना शुरू कर दिया। अब वह अंधेर में ही उठकर अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठ जाता जब कुम्हार उठकर बाहर आता जाता तो वह उसका मुँह देख लेता, फिर अपने काम में लग जाता। कभी-कभी ऐसे भी अवसर आते, जब कुम्हार बाहर चला जाता तो उसके एक दो दिन तक उपवास करना पड़ता। लेकिन न तो वह इससे विचलित हुआ और नहीं उसने अपने संकल्प की भनक कुम्हार अथवा अपने किसी परिवार जन को लगने दी।
धीरे धीरे छह महीने बीत गए। किंतु उसे कुछ भी लाभ न हुआ। फिर भी अपने संकल्प पर अटल एवं अडिग रहा। उसे पर तो नास्तिकता का भूत सवार था। कुछ भी करके वह महात्मा जी की बात झूठी साबित करना चाहता था। एक दिन उसकी नींद देर से खुली। तब तक कुम्हार मिट्टी लेने के लिए गाँव के बाहर खदान में चला गया था। जब उसे इसका पता चला तो वह भी घूमते-घूमते उधर जा निकला ताकि कुम्हार का मुँह देख ले।
उसने थोड़ी खड़े होकर कुम्हार को देखा। वह मिट्टी खोदने में तल्लीन था। अतः वह चुपचाप वापस चल पड़ा उधर मिट्टी खोदते-खोदते कुम्हार के सामने सोने की चार ईंटें निकल आयीं। उसने गरदन उठाकर चारों तरफ देखा कि कोई उसे देख तो नहीं रहा है। तभी उसकी नजर कुछ दूर तेज कदमों से जाते उस पर पड़ी। उसने अपनी घबराहट पर नियंत्रण किया और उसे पुकारा अरे भाई शिवराम किधर से आ रहे हो और कहाँ जा रहे हो? और कहा जा रहे हो? वह किधर से आया था, पूछकर कुम्हार तसल्ली कर लेना चाहता था।
उसने रुककर जवाब दिया, “ बस इधर ही आया था। जो देखना था सो देख लिया। अब वापस घर जा रहा हूँ।” उसके कहने का तो मतलब था कि उसने कुम्हार का मुँह देख लिया था। लेकिन कुम्हार घबरा गया। उसे पक्का विश्वास था कि उसने सोना देख लिया है। कहीं उसने रियासत के राजा से शिकायत कर दी तो हाथ आयी लक्ष्मी निकल जायेगा। उसने तुरंत कुछ निर्णय किया और उससे बोला “अरे भाई शिवराम देख लिया है तो तुम भी आधा ले जाओ। लेकिन राज से शिकायत न करना”
उसने सोचा कि कुम्हार मजाक कर रहा है। वह मना करते हुए चल पड़ा। अब तो कुम्हार एकदम घबरा गया। उसने दौड़कर उसे पकड़ लिया और हाथ जोड़ते हुए बोला, भाई तुम्हें आधा ले जाने क्या हर्ज है?” अब तो वह थोड़ा चकराया। कुम्हार उसे अपने साथ खदान में ले गया। वहाँ सोने की ईंटें पड़ी देखकर वह सारा माजरा समझ गया उसने चुपचाप चार में दो ईंटें उठा ली। ईंटें उठाते समय महात्मा जी के वाक्य की महिमा समझ में आ रही थी। वहां से लौट कर उसने वह सारा सोना गाँव वालों के हित में लगा दिया। इसी के साथ उसने शेष जीवन कठोर तप एवं भगवद्भक्ति में लगान का निश्चय किया। संकल्प के इसी प्रभाव के कारण अब उसे लो नास्तिक नहीं परम आस्तिक, महान तपस्वी महात्मा शिवराम के नाम से जनने लगे थे।
प्रेम आनंद की अभिव्यक्ति है। प्रेम ही जीवन का यथार्थ नियामक है। जीवन और जगत का विकास इसी आधार पर संभव हो सका है। हर क्षेत्र में इसकी विशिष्टता को स्वीकारा एवं अनुभव किया जाता है। धर्म, विज्ञान मनोविज्ञान, एवं समाजशास्त्र आदि के सभी विशेषज्ञों ने प्रेम को अपने अनुरूप परिभाषित किया है। एक ओर जहाँ अध्यात्मवेत्ताओं ने प्रेम को भावना, संवेदना एवं करुणा का विकास माना है तो वही दूसरी ओर वैज्ञानिकों ने इसे जैविक रसायन का अद्भुत चमत्कार कहा है। जो भी हो, प्रेम मानव-जीवन का अनिवार्य एवं अपरिहार्य अंग तो है ही।
मेधा एवं भावना के शीर्षासन युगपुरुष स्वामी विवेकानन्द ने प्रेम तत्व की इस तरह अभिव्यक्ति दी है- “ वह कौन-सी वस्तु है, जो अणुओं को लाकर अणुओं से मिलाती है, परमाणुओं को परमाणुओं से मिलाती है। बड़े बड़े ग्रहों को आपस में एक दूसरे की ओर आकृष्ट करती है। पुरुष को स्त्री की ओर, स्त्री को पुरुष की ओर, मनुष्य को मनुष्य की ओर, पशुओं को पशुओं की ओर, मानो समस्त संसार को एक केन्द्र की ओर, खींचती हो। यह वही वस्तु है, जिसे प्रेम कहते है। प्रेम से बढ़कर सुख या आनंद की कल्पना नहीं की जा सकती है।
पर इस प्रेम का शब्द अर्थ भिन्न है। प्रेम शब्द यथार्थ अर्थ समझना बहुत कठिन है। इसका अर्थ संसार का साधारण स्वार्थमय प्रेम नहीं है। जो भावना पूर्णतया निस्वार्थ हो वही प्रेम है। उसे दैवीय भावना की भी संज्ञा दी जा सकती है। प्रेम में सदैव आदर्श का चरमोत्कर्ष है। जब कोई सौदागरी छोड़ देता है और समस्त भय को दूर भगा देता है, तब वह ऐसा अनुभव करने लगता है कि प्रेम सर्वमान्य आदर्श है। प्रेम मनुष्य और मनुष्य के बीच भेद नहीं उत्पन्न करता। समग्र विश्व को प्रेम अपने घर जैसा बना लेता है। प्रेम अपने घर जैसा बना लेता है। प्रेम में किसी प्रकार का भय नहीं रहता है। प्रेम ही जीवन है। यही जीवन का एक मात्र नियम है। जिसमें प्रेम नहीं है वह जी भी नहीं सकता। शुद्ध प्रेम का कोई उद्देश्य नहीं होता,। उसका कोई स्वार्थ नहीं होता। जहाँ प्रेम है वही विस्तार है। और जहाँ स्वार्थ है वही संकोच है। अतः यह सुनिश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि प्रेम ही जीवन का सर्वोच्च विधान है। जो प्रेम करता है वही जीवित है जो स्वार्थी है वही मृतक है। अतः प्रेम-प्रेम के निमित्त है, क्योंकि यह जीवन का वैसा ही एकमात्र विधान है, जैसे जीवन के लिए श्वास लेना। निष्काम प्रेम-निष्काम कर्म इत्यादि का यही रहस्य है।
प्रेम से अलौकिक शक्ति मिलती है। प्रेम से भक्ति उत्पन्न होती है। प्रेम ही ज्ञानदाता है और प्रेम ही मुक्ति की ओर ले जाता है यही निश्चय ही उपासना है इसे कुछ यूँ भी कह सकते हैं कि प्रेम क्षणभंगुर मानवीय शरीर में ईश्वर की उपासना है प्रेम की अवस्था को प्राप्त करना ही सिद्धावस्था है प्रेम कभी निष्फल नहीं होता। प्रेम का पुरस्कार स्वयं प्रेम ही है, कुछ और नहीं। यही वह तत्व है जो यही वह अमृत का प्याला है, जिसे पीने से इस संचार रूपी व्याधि का नाश हो जाता है। मनुष्य ईश्वरोन्मुखी हो जाता है और 'मैं मनुष्य हूँ’ यह तक भूल जाता है। प्रेम कोई पुरस्कार नहीं चाहता। प्रेम सर्वदा प्रेम के लिए होता है। भक्त इसलिये प्रेम करता, है क्योंकि वह बिना प्रेम किए रह नहीं सकता। प्रेम प्रश्न नहीं करता। वह भिखारी नहीं होता। प्रेम पहला चिन्ह है, कुछ न माँगना और सर्वस्य अर्पित करना। यह है सभी तरह की अध्यात्मिक उपासनाओं का सारभूत तत्व। श्री अरविन्द ने अपनी बँगला रचना ’वासवदता’ में कहा है, “प्रतिदान न होने पर भी प्रेम तो स्वयं ही पर्याप्त मधुर है। “ ब्रह्मलीन मनीषी स्वामी शिवानन्द का कहना है, “ प्रेम ही विश्व को रूपांतरित करने में सक्षम है।” इसीलिए शिरडी के महान संत साँई बाबा ने प्रेम का प्रतीक बनने के लिए प्रेरित किया है। संत तरुवर के अनुसार प्रेम पुष्प से भी कही अधिक मृदुल व कोमल होता है। दूसरी ओर खलील-जिब्रान ने अपना अनुभव कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया है। जीवन दो चीजों का नाम है, एक जमी हुई नदी और दूसरी धधकती हुई ज्वाला। धधकती हुयी ज्वाला ही प्रेम है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने कहा- प्रेम कभी दावा नहीं करता, वह हमेशा ही देता रहता है। प्रेम हमेशा ही कष्ट सहता है। न कभी झुँझलाता है, न बदला लेता है। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के मतानुसार जो आदमी मृत्यु को जीत सकता है। या जीत लेता है। वही प्रेम को मस्तक पर धारण कर लेता है। प्रेम का नाम है, जीवन विसर्जन की आकांक्षा। शिरा-शिरा में रक्त के प्रत्येक कण में, हड्डी-हड्डी में जो दिन-रात विचरण करता रहा है, वही प्रेम। प्रेम कर्कश में परिवर्तित कर देता है। पापी को पुण्यवान बनाता है, और अंधकार को ज्योतिर्मय कर देता है।
प्रख्यात कवि जय शंकर प्रसाद ने प्रेम को मानव हृदय की मौलिक भावना कहा है। उनके अनुसार प्रेम शिशु से सरल हृदयों में निवास करने वाला तत्व है। प्राकृतिक चेतना को अपनी अन्तश्चेतना से तदाकार करने वाले महान कवि सुमित्रानन्दन पन्त ने उल्लेख किया है कि प्रेम ही मानव जीवन सार है। अंग्रेज कवि शेली की मान्यता है कि प्रेम तो सदा ही मधुर होता है। चाहे दिया जाये चाहे लिया जाये। प्रेम तो प्रकाश के सामने सर्वविद् है। उसका परिचय स्वर कभी उबाने वाला नहीं होता है। एक अन्य आँग्ल कवि विलियम ब्लैक ने प्रेम की भावाभिव्यक्ति इस प्रकार दी है। प्रेम अपनी प्रसन्नता को लक्ष्य नहीं बनाता है और न ही अपनी कोई चिंता करता है। अपितु दूसरों को सुख देता है तथा नरक के नैराश्य में भी स्वर्ग की रचना कर लेता है। जॉन डाँन ने प्रेम को अनश्वर माना है। तो एलबर्ट हव्बार्ड ने प्रेम को शक्ति वर्धक औषधि घोषित किया है। मानव कभी लाँगफेलो के अनुसार प्रेम स्वयं समर्पण करता है। उसे खरीदा नहीं जाता है।
प्रेम मानवीय अन्तःकरण की सतत् विकासशील अवस्था है। इसकी पहली लहर भावुकता के रूप में देखी जा सकती है जो अपने विकास के दौरान करुणा की नदी बनाकर प्रेम की महासागर में विलीन हो जाती है। भावुकता में आत्मा की कसक भरी पुकार उभरती और विलीन होती रहती है लेकिन संवेदना बनकर इस स्थायित्व मिल जाता है। संवेदना, भावुकता की विकसित अवस्था है। इसकी पहचान है -संकीर्णता बिखरी और 'मैं पन’ खो गया है। संवेदनशीलता विकसित स्वरूप है। भावना। कसक के स्थायित्व के साथ इसमें एक नयी चीज आती है। संबंधों का शारीरिक धरातल से ऊपर उठकर जीवात्मा से स्तर पर विकसित हो जाना जो भावना बनकर पनपती है और कृतज्ञता बनकर पनपती है कृतज्ञता बनकर उफनती है। भावना का विस्तार समष्टि में हो जाता है तब वह करुणा में बदल जाती है। यह आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना का प्रकाश है। करुणा जब अपनी व्यापकता में सघन शान्ति अविराम प्रसन्नता एवं गहरी एकात्मकता को जन्म देती है। जब उसे प्रेम करते है प्रेम का विकास भाव विकास का चरमोत्कर्ष है। अब तक इस प्रेम रस का रसास्वादन राधा, चैतन्य एवं रामकृष्ण ही कर पाये है। पश्चात् दृष्टिकोण इतना व्यापक एवं गहन नहीं है। फिर भी उन्होंने इस अद्भुत एवं अनिवार्य रहस्य को स्वीकारा है। ‘एनोटॉमी ऑफ लग’ के प्रसिद्ध लेखक एलन फिसर के अनुसार प्रेम मानवीय विकास का महत्वपूर्ण तत्व है। इसके द्वारा मनुष्य अपनी आंतरिक भावनाओं को अभिव्यक्ति देता है। 15 फरवरी 1913 की टाइम’ पत्रिका में 'व्हाट इज लव’ शीर्षक से छपे एक लेख में प्रेम को सुन्दर-सुकोमल एवं सृजनशील तत्व के रूप में दर्शाया गया है। विज्ञानवेत्ताओं के अनुसार यह अनुवांशिक लक्षणों को भी परिवर्तित कर सकता है। साइको बायोलॉजिस्ट वाल्स का कहना है कि प्रेम का उद्गम मानव जाति के जन्म के साथ ही हुआ है। इनके अनुसार प्रेम विचारों की अपेक्षा भावना को अधिक महत्व देता है। हर व्यक्ति प्रेम की चाहत रखता है और प्रत्युत्तर में इसी की आकांक्षा रखता है। कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक मार्कगोलस्टन ने स्पष्ट कहा है कि प्रेम की परिपक्वता व्यक्ति को उसके विकास के चरम शिखर तक पहुँचा देती है। क्योंकि वह मन की सुनहली कल्पनाओं के साथ यथार्थ जीवन की कठोरता को भी देखता है।
एंथोनीवाल्स ने अपनी विख्यात कृति ‘द साइंस ऑफ लव’ में नहे और प्यार के दौरान शारीरिक हार्मोनों की क्रियाविधि एवं उसके संचालन व नियमन का उल्लेख किया है। इनके अनुसार प्रेमभाव का संचालन मस्तिष्क के हाइपोथेलेमस भाँग से होता है। हाइपोथेलेमस भाँग से होता है। हाइपोथेलेमस प्रेमजन्य समस्त इच्छाओं एवं अभिरुचियों का केन्द्र माना जाता है। जब व्यक्ति किसी से प्रेम करता है। या आकर्षित होता है, तो उस समय मन एवं हृदय उल्लास तथा उत्साह से भर उठता है। इसी समय शरीर में डोपामीन नारएपीनेफ्रीन तथा फिनाइल एथिलामइन का साव बढ़ जाता है। प्रेम की आकुलता-विकलता की तीव्रता के साथ फिनायल एथिलामाइन का उत्सर्जन बढ़ता है। इससे मस्तिष्क जागरूक एवं शरीर क्रियाशील हो उठता है। व्यक्ति असामान्य भाव प्रदर्शित करने लगता है। वैज्ञानिक इसे उन्माद या पागलपन नहीं मानते वरन् इन रसायनों का चमत्कार मानते है। फिनायल एथिलामाइन का उत्सर्जन बढ़ता है इससे मस्तिष्क जागरूक एवं शरीर क्रियाशील हो उठता है। व्यक्ति असामान्य भाव प्रदर्शित करने लगता है। वैज्ञानिक इसे उन्माद या पागलपन नहीं मानते वरन् इन रसायनों का चमत्कार मानते है। फिनाइल एथिलामाइन स्नेह और प्यार की अभिव्यक्ति में वृद्धि करता है। यह प्रक्रिया दीर्घावधि तक बने रहने पर शरीर में स्वाभाविक रूप से एम्टामइन जैसे डोपामीन एवं नारएपीनेफ्रीन नाम हारमोन्स का उत्सर्जन होने लगता है। जीवन प्रसन्नता एवं आनन्द से आप्लावित रहता है।
पीयूष ग्रन्थि भी इसमें अपना इसमें अपना योगदान प्रस्तुत करती है। यह एड्रीनल ग्रंथि को उत्तेजित कर देती है। इसके फलस्वरूप दिल की धड़कन बढ़ जाती है तथा रक्त संचार में तीव्रता बढ़ जाती है। नाड़ी की गति सामान्य गति 70 से से बढ़कर 100 धड़कन प्रति मिनट हो जाती है। इस अवस्था में नसों के किनारे एंडार्फिन नामक रसायन का स्राव प्रारंभ हो जाता है। जो समस्त त्वचा में फैलकर उसे अत्यंत संवेदनशील कर देता है। शारीरिक सौंदर्य में अभिवृद्धि होती है। टेक्सास विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के प्राध्यापक लारी किसटन्सन ने स्पष्ट किया है कि प्रेमी को भूख कम लगती है, इनके अनुसार प्रेमी के शरीर में एडे्रेनेलीन हार्मोन का स्तर ऊँचा रहता है। यही भूख कम करने के लिए जिम्मेदार है। मनोविज्ञानियों के अनुसार अति प्रसन्नता एवं किसी व्यक्ति से प्रेम भावना घनीभूत हो जाने से भी भूख कम लगती है- ‘मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी अमेरिका’ के एक वैज्ञानिक डॉ. जुडिथ बर्टमान ने कहा है कि कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन मस्तिष्क को सेरेटोनिन बनाने के लिये उत्प्रेरित करता है। आधा घंटे पश्चात् भोजन को पचने की अवस्था में यह रसायन तनाव दूर कर मन को शाँत एवं प्रफुल्ल रखता है। भावनात्मक रूप से अशाँत व्यक्ति या सामान्य व्यक्ति आवश्यकता से अधिक भोजन करता है। इस कारण ऐसे लोग ज्यादा मोटे होते है। प्रेम भावनात्मक पोषण प्रदान करने है। इसलिए जुडिथ के अनुसार प्रेमी युगल अपेक्षाकृत कम मोटे होते है। जो भी हो प्रेम एक अद्भुत रसायन का नाम है। यह एक ऐसा नशा है जिसे पी लेने के बाद मनुष्य सब कुछ भूल जाता है केवल वह इष्ट रूपी प्रेमी को याद करता है।
प्रेम की क्षमता अपरिमित एवं शक्ति असीम होती है। प्रेम का यह प्रभाव 17 वीं शताब्दी में तुलिपामानिया नामक हालैंड की एक जनजाति में देख गया। यह पूरी जाति अपने कर्तव्य, व्यवसाय एवं परिवार से असीम प्रेम करती थी। इस जाति का प्रत्येक व्यक्ति अटूट निष्ठावान् एवं शांतिप्रियता के रूप में जाना जाता था। इसी परिप्रेक्ष्य में नेवदा यूनिवर्सिटी के तूलेन विश्वविद्यालय के लास वेगास एवं एडवर्ड फिशन ने एक सर्वेक्षण किया। इस सर्वेक्षण के अनुसार 166 जातियों में से 147 जातियों की संस्कृति में प्रेम, दया व सद्भाव का परिवेश पाया गया। इन 147 जातियों की सभ्यता व संस्कृति स्नेह, प्रेम एवं सेवा पर आधारित होने के कारण इनका विकास अन्य जातियों की अपेक्षा अधिक हुआ। इन लोगों में त्याग की भावना अधिक बलवती होती है। जो प्रेम का ही एक लक्षण है। प्रेम चाहे किसी व्यक्ति से हो या समाज से, यह अपना जादुई प्रभाव दिखाए बिना नहीं रहता जिसकी परिणति समृद्धि शाँति एवं आत्मशान्ति के रूप में होती है।
प्रेम का यह भाव यदि वस्तु व्यक्ति से ऊपर उठकर प्रभु समर्पित हो तो वह अनंत, असीम और अनिवर्चनीय हो जाता है। प्रेम आत्मा की आवाज है, एक कसक है, उसे सतत् अपने इष्ट व लक्ष्य के प्रति एकाकार एवं तदाकार कर देगा चाहिए प्रेम के इन महनीय भावों से युक्त ओत−प्रोत, ऐसा जीवन ही सार्थक है, धन्य है।
तालाब में कम और तट पर गुलाब-दो फूल खिल रहे थे। दोनों बड़े लुभावने प्रतीत हो रहे थे। गुलाब के फूल ने अकड़कर कमल के फूल से कहा- मित्र तुम बड़े भले ही हो किन्तु सुगन्ध मेरी ही लोगों को आकर्षित करती है।
कमल ने कहा- भाई गुलाब बुरा मत मानो! हम दोनों एक ही उद्देश्य से है। आप सुगन्ध बिखेरते है और प्रकृति ने सौंदर्य मुझे प्रदान किया है। दोनों मिलकर जो काम कर रहे है, वह एक नहीं कर सकता था।
गुलाब अपने प्रदर्शन पर लज्जित हो गया और कमल दुगुने उत्साह से सौंदर्य बिखेरने लगा।
एक साधु नदी तट पर बैठा हुआ माला जप रहा था। पास बैठे एक ब्राह्मण ने जप का कारण पूछा तो उसने बताया स्वर्ग प्राप्ति के लिए। ब्राह्मण भी साधु के पास ही बैठ गया। वह एक एक मुट्ठी बालू नदी में डालने लगा। पूछने पर बताया कि नदी का पुल बनाऊँगा। उस पर होकर पार जाऊँगा। साधु ने कहा- मित्र पुल इस प्रकार नहीं बनता उसके लिए इंजीनियर, श्रमिक, समान एवं आवश्यक धन जुटाना पड़ेगा। बालू डालने भर से पुल नहीं बँध सकता। उलटकर ब्राह्मण बोला-मंत्र माला जपने से स्वर्ग कैसे मिल जाएगा। उसके लिए संयम ज्ञान एवं परमार्थ जैसे पुण्य भी तो करने पड़ेंगे।
साधु ने अपनी भूल समझी और कर्मयोगी बन गया।
दोनों पड़ोसियों के बालक आपस में उलझ पड़ खेल में छीना झपटी, मारा मारी हो गई दोनों ने अपने माता पिता से फरियाद की। उनकी शिकायत पर दोनों के अभिभावक भी लड़ पड़े। वर्षों पुरानी मित्रता में दरार पड़ गई। बोल चाल, मिलना जुलना, एक दूसरे के यहाँ आना जाना बंद हो गया। किन्तु दूसरे दिन देखा दोनों बालक आपस में मिलकर साथ-साथ खेलने में लगे है। न उनमें मनोमालिन्य है, न शिकवा गिला।
चित्तौड़ के दुर्ग पर गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चढ़ाई कर दी। किले को चारों ओर से घेर लिया गया शत्रुओं की तोपें किले पर गोले बरसा रही थी। शत्रुसेना का दबाव दुर्ग पर दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा था। चित्तौड़ के किले की रक्षा का भार राचल बाघसिंह पर था। अपने एवं साथी शूरवीरों के असाधारण रणकौशल के बावजूद उन्हें अब चित्तौड़ की रक्षा की उम्मीद नहीं थी। बड़ ही निराश मन से वह महारानी कर्मवती के पास पहुँचें महारानी को उन्होंने लड़ाई की ताजा जानकारी दी।
“ महारानी साहिबा, चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा करना अब मुमकिन नहीं है। बाघसिंह ने बताया “शत्रुओं की तोपों के गोलों को हमारी तलवारों कब तक रोक पाएँगी। दुर्गा पर आज नहीं तो कल शत्रुओं की सेना का कब्जा होने वाला है। चित्तौड़ की रक्षा तो होनी ही चाहिए” उसके बाद बाघसिंह रुक गए।
तोप रुके नहीं और बिना संकोच कहे। “ कर्मवती ने थोड़ा संचित होते हुए किन्तु दृढ़ स्वर में कहा।
बाघसिंह बोले महारानी साहिबा अब हमारे लिए बस एक ही रास्ता। राजपूत सैनिक तो केसरिया बाना पहन आखिरी लड़ाई लड़े और राजपूत स्त्रियाँ जौहर करें, फिर जैसा आपका हुक्म।
कर्मवती कुछ देर तक विचार मग्नता की स्थिति में रही। काफी देर के इस सोच विचार के बाद वह गंभीरता से बोली “रावल जी! आप ठीक ही कहे हैं। अब हमारे सामने दूसरा उपाय भी क्या है? चित्तौड़ की रक्षा न सही मान मर्यादा की रक्षा तो करनी होगी। आप हुक्म जारी कर दें और जौहर के लिये लकड़ी, घी और तेल का इंतजाम करें।”
रानी जवाहर बाई वही पास ही खड़ी थी। वह कर्मवती के दूर के रिश्ते में चचेरी बहन लगती थी॥ वह कर्मवती के साथ ही रहती थी। इस बातचीत को सुनकर वह बोली “ बाई जी सा! मैं जौहर नहीं करूंगी। "क्यूँ जौहर की ज्वाला से डर लगता है क्या"? कर्मवती ने पूछा।
जवाहर बाई ने जवाब दिया- “बाई जी सा! ज्वाला से तो मेरा तन बदन जल ही रहा है। मेरी रगों में भी वही खून है जो आपकी रगों में बह रहा हैं क्षत्रिय बालाओं को डर कैसा?
“ तो फिर क्या बात है?” कर्मवती ने पूछा। “बात यह है बाई जी सा कि जब मरना ही है तो शत्रुओं से डर क्यों, शत्रु से लड़कर ही क्यों न मरा जाए।” जवाहर बाई ने कहा। “ क्या कहर रही हो? कर्मवती के कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। “बाई जी सा आपने दा जी सा (पिता) से मैंने तलवार बाजी और घुड़सवारी सीखी है।” जवाहर बाई ने बताया। मैं जौहर करना नहीं शौर्य दिखाना चाहती हूँ। इस लड़ाई में मेरी बहुत सी सहेलियाँ भी भाग लेगी”
बाघसिंह ने शंका की - यह तो ठीक है रानी साहिबा! अगर आप लड़ती हुयी शत्रुओं के आगे हाथों में पड़ गयी और उन्होंने।”
रावल जी हम पर भरोसा करें। नारी के शौर्य एवं तेज पर इस तरह शंका करना उचित नहीं।” अपनी बात पूरी करते करते जवाहर बाई का चेहरा तमतमा उठा।” इस राजपूत नारियाँ अपनी इज्जत रखना बखूबी जानती है। ऐसी हालत में हम जहर से बुझी कटार छाती में घोंप लेगी।”
बाघसिंह की शंका दूर हो गयी। कर्मवती ने प्यार से जवाहर बाई का माथा चूमा। उन्होंने उन्होंने आज्ञा दी एवं आशीष भी। देखते देखते बहुत सी नारियाँ मर्दाने वेश में जवाहर बाई के साथ हो ली।
सुबह किले का फाटक खोल दिया गया। राजपूतों ने केसरिया बाना पहना। वे हर हर महादेव कहते हुए शत्रुओं पर टूट पड़ी। उधर जवाहर बाई की टुकड़ी भी ‘जय महाकाली। जय भवानी!! कहती हुई शत्रुओं का सफाया करती हुई आगे बढ़ने लगी।
शत्रुसेना में खलबली मच गई। शत्रुओं के पास राजपूतों की तुलना में बहुत बड़ी सेना भी थी। आखिर में राजपूत इस लड़ाई में मारे गये। जवाहर बाई भी असाधारण शौर्य दिखाते हुए घायल हुई। इसके बाद अनेक आक्रमणों की बौछारों ने उन्हें वीरगति दी। विजेता बहादुरशाह जफर को जब यह पता चल कि उनकी सेना को तहस नहस एक राजपूत वीर बाला ने किया है तो वह भी नारी के शौर्य एवं तेज के समक्ष मस्तक नवाए बिना न रह सका।
पुराने समय की बात है। एक महात्मा को किसी जघन्य अपराध में पकड़ लिया गया व उन्हें दोषी मान दोष स्वीकारने के लिए यातनाएँ दी गई। महात्मा थे बिलकुल निर्दोष। चुपचाप मार सहते गए, अंततः उन्हें छोड़ दिया गया।
एक सज्जन यह दृश्य देख रहे थे। उन्होंने पूछा-गज़ब है, आप इतने दुर्बल व कृषकाय इतनी यातना कैसे सह गए? महात्मा बोलो- विपत्ति सहने के लिए शरीर की नहीं, आत्मा की शक्ति होनी चाहिए।
प्राचीन काल ज्ञान विज्ञान की दृष्टि से कितना समृद्ध था, इसका अनुमान तब के सुविकसित यंत्र उपकरणों एवं वास्तुशास्त्र से संबंधित अद्भुत निर्माणों से लगाया जा सकता है। आज तो उनकी हम बस कल्पना ही कर सकते है। यथार्थतः ज्ञान और विज्ञान को समझने में तो शायद सदियों लगा जाएँ।
आर्ष उल्लेखों से ऐसा ज्ञात होता है कि प्राचीन समय के दो मूर्धन्य वैज्ञानिकों-वास्तु विदों में त्वष्टा एवं मय अग्रगण्य थे। त्वष्टा एवं मय अग्रगण्य थे। अर्थात् विश्वकर्मा देवों के विज्ञानवेत्ता थे। और तरह तरह के आश्चर्यचकित करने वाले शोध अनुसंधानों सदा संलग्न रहते थे,। जबकि मय, विश्वकर्मा के प्रतिद्वंद्वी और असुरों की सहायता में निरत रहते थे। उनके उपकरण देवों पर विजय प्राप्ति हे दानवों के लिए होते थे। या तो विश्वकर्मा को संपूर्ण सृष्टि का रचयिता माना गया है। (विश्वकर्मन नमस्तेऽस्तु विशत्मन् विश्वसंभव) महाभारत शान्ति पर्व 47/75 किन्तु वे चिरपुरातन विधा वास्तु शास्त्र के प्रथम उपदेष्टा एवं प्रवर्तक आचार्य के रूप में अधिक विख्यात है। राजा भोजकृत ‘ समराँगण सूत्रधार के तीसरे अध्याय प्रश्नध्याय में खगोल विज्ञान मनोविज्ञान एवं शिल्प शास्त्र से संबंधित उन 60 प्रश्नों का वर्ण है।, जिसे विश्वकर्मा के ज्येष्ठ पुत्र जय अथवा सन्निवेश ने अपने पिता से पूछा था। ऐसे कहा जाता है कि उनका साठ प्रश्नों में उपर्युक्त सभी विधाओं विशेषकर शिल्पशास्त्र के संपूर्ण रहस्यों का समावेश है, जिनके विस्तृत उत्तर देकर त्वष्टा ने उन विधाओं का हस्तांतरण अपने पुत्र को किया था। बाद में इन्हीं जय ने वास्तुविज्ञान का विश्वविद्यालय स्थापित कर विधा को सर्वसुलभ ऋग्वेद के दशम मण्डल के 71 वाँ और 72 मुक्त विश्वकर्मा मुक्त है। ये भी अद्भुत बात है कि इन मुक्तकों के द्रष्टा और स्तोत्र भी विश्वकर्मा ही है। ऐसा अन्य सूक्तों नहीं देखा में नहीं देखा गया। ऋग्वेद (1/75/1) में उन्हें अत्यन्त निपुण मेधा संपन्न, कुशल शिल्पी कहा गया है। जो थोड़े समय में दिव्य शस्त्रास्त्रों के निर्माण में पारंगत है। चित्रकला, वास्तुकला, भित्तिकला के भी वे ज्ञाता है। तथा इनके प्रवर्तक आचार्य भी। वे कितने बड़े एवं निष्णात विज्ञानवेत्ता थे इसकी एक हल्की झाँकी ऋग्वेद एक मंत्र में करायी गई है उसमें कहा गया है- बाशीमेको विभर्ति हस्त आयासीमंतदेवेष निध्रुवविः। भाष्यकारों के अनुसार यहाँ आयोमय वाशी कोई बहुद्देशीय और बहुकार्यक्षम कुल्हाड़ा जैसा उपकरण है, जो उनके हाथ में सदा मौजूद रहता है। इससे वे शत्रुसंहार एवं संपूर्ण अपरा विद्या के संपादन का उभयपक्षीय प्रयोजन साथ-साथ पूरा करते हैं संभवतः इस हस्त कौशल के कारण ही उन्हें सुपाणि जैसा संज्ञा दी गई है। विश्वकर्मा शिल्प शास्त्र मयमतम् यह तकनीकी ज्ञान और विज्ञान के दो अद्वितीय ग्रंथ है। एक में त्वष्टा के शिल्प विद्या का वर्णन है तो दूसरे में मयकूज आविष्कारों का उल्लेख। इन ग्रन्थों को पढ़कर यह जाना जा सकता है कि पदार्थ विज्ञान के यह आदि पुरोधा कितने सूक्ष्म और उच्चस्तरीय ज्ञानसम्पन्न थे। दोनों ने ऐसे ऐसे यंत्र-उपकरणों का निर्माण किया था, जिन्हें चमत्कार से कम नहीं कहा जा सकता। इन्हीं में एक पुष्पक विमान यह विमान बहुत अद्भूतं था। पुष्पों और लताओं से निर्मित इस विमान की यह विशेषता थी कि वह आवश्यकतानुसार फैल और सिकुड़ सकता था। समय आपने पर वह व्यक्ति के बैठने जितना छोटा हो जाता था और जरूरत पड़ने पर विस्तृत होकर पूरे नगर को अपने अंदर समेट सकता था। इसकी रचना ब्रह्म के निर्देश पर विश्वकर्मा ने कुबेर ने कुबेर के लिये की थी। कुबेर उस जमाने में बहुत बड़े धनिक और गन्धर्वों के राजा थे उनकी राजधानी अलकनन्दा के उद्गम स्थल के निकट अलकापुरी में थी। रावण की दृष्टि जब कुबेर के इस अनूठे आकाशचारी यंत्र पर पड़ी तो उसने आक्रमण कर उसको छीन लिया रावण के पतन के बाद विभीषण ने उसे भगवान राम को सौंप दिया। सम्पूर्ण सेना उसी विमान सवार होकर आकाश मार्ग से अयोध्या आई थी कुछ समय तक निजी प्रयोजनों के लिए उसका इस्तेमाल करने के उपरान्त भगवान ने कुबेर को लौटा दिया।
यों तो यह किसी कल्पनाशील लेखक की काल्पनिक उड़ान सी लगती है।, पर आर्ष वांग्मय में उसके अनेक अस्त्र-आयुधों का उल्लेख है। जिसे आज के विकसित विज्ञान के युग में भी यथार्थ के धरातल पर उतार पाने की बात से दूर उसे सिद्धान्त रूप में स्वीकार कर पाने में भी कठिनाई महसूस हो रही है। इसका यह मतलब नहीं कि तब के सारे उल्लेख कोरी कल्पना मात्र है। आज से पाँच सौ वर्षों पूर्व आज के वैमानिकी यंत्रों को कल्पना कदाचित किसी की होगी। यदि उस समय का कोई व्यक्ति संप्रति जीवित होता है तो यह दुनिया और उसकी वैज्ञानिक प्रगति उसके लिये बहुत बड़ा अजूबा प्रतीत होती है। इतने पर भी आँखों से दिखाई पड़ने वाले सच को नकारा तो नहीं जा सकता है। कुछ ऐसा ही असमंजस वर्तमान मनुष्यों के समक्ष पुराविज्ञान के संदर्भ में उपस्थित हुआ है। उससे न तो दिव्य पुराउपकरणों को ठीक ठीक स्वीकारते बन पड़ रहा है, न नकारते। स्थिति बड़ी दुविधापूर्ण है। फिर भी विज्ञान संबंधी वर्तमान अनुसंधान और विकास में इस बात के संकेत मिल रहे है कि अपरवित्या के उस उत्कर्ष काल में संभव ऐसे दिव्य उपकरण अस्तित्व में रहे हो। जो वर्तमान ज्ञान परिधि से परे है।
पिछले दिनों अमेरिका ने टाँम केट नामक एक ऐसा वायुयान बनाया है जिसे प्राचीन पुष्पक विमान का अर्वाचीन संस्करण कह सकते है। अर्थात् उसमें संकुचन और प्रसार जैसी दोनों ही क्षमताएँ है। वह दो सीटों वाले वायुयान जितना छोटा भी हो सकता है। और इतना बड़ भी पूरा शहर समा जायें और महीनों ऊपर उड़ता रहे। सौर ऊर्जा और परमाणु शक्ति चलित विमान अमेरिका बना चुका है। अन्तर्ग्रही शटल की बात अब पुरानी पड़ चुकी है। इन सारे निर्माणों से ऐसा प्रतीत होता है कि पुष्पक विमान और सौर ऊर्जा और वनस्पति चेतना से चलित कोई यान रहा होगा। वनस्पति ऊर्जा का मूल स्रोत और सौर ऊर्जा भी है। इसलिये लता पुष्पों से निर्मित उस विमान में आक्सीजन और वातानुकूलक जैसी आवश्यकताओं की पूर्ति वनस्पतियों से होती होगी। जबकि उड्डयन का मूल प्रयोजन सौर ऊर्जा से पूरा होता होगा। ऐसे ही एक अन्य विलक्षण यंत्र का आविष्कार विश्वकर्मा ने किया था। लता यंत्र नामक यह उपकरण शत्रुओं अथवा अपराधियों को जकड़ने के काम आता था। वामन पुराण में में एक मिथक है। कि विश्वकर्मा की पुत्री चित्रगन्धा और राजा सूरत एक दूसरे को चाहते थे और परस्पर विवाह करने के इच्छुक थे। लेकिन त्वष्टा ने इसकी अनुमति नहीं दी। तब चित्रागन्धा मुनि ऋतध्वज के पास पहुँची और पिता के क्रोध की चर्चा करते हुए समस्या के हल के लिये मनुहार किया। ऋग्ध्वज तपस्वी और वाक्-सिद्ध थे। उनने विश्वकर्मा को वानर (वनवासी) बनने के श्राप दिया। पुत्री अत्याचार का शायद या सामाजिक दण्ड था। कि उन्हें नगर त्याग कर जंगल की शरण लेनी पड़ी। विश्वकर्मा भी इस अन्याय का बदला लिये बिना न रह सके उनने उसके पुत्र जाबालि को लता यंत्र में जकड़ लिया बालक जाबालि जीवित वृक्षों की जटाओं में बंधा असहाय पड़ रहा है। चीख पुकार सुनकर ऋग्ध्वज उसकी सहायता करने को तत्पर हुए उस विद्या ने तनिक भी गति न होने के कारण उसकी कुछ भी मदद न कर सके। अन्ततः तत्कालीन चक्रवर्ती सम्राट इक्ष्वाकु के पास जाकर इसकी शिकायत की उन्होंने ने वृक्ष को काट डालने का आदेश दिया। फिर लताओं का शिकंजा कमजोर नहीं पड़ा। और बालक उससे बुरी तरह जकड़ा रहा। हार कर ऋग्ध्वज को समझौता करना पड़ा उसने अपने पुत्र बंधन मुक्ति के बदलें त्वष्टा के समक्ष शापमोचन का प्रस्ताव रखा। वे सहर्ष तैयार हो गये। इस प्रस्ताव दोनों अपनी समस्याओं से उबर सके। शोध कर्मी वैज्ञानिकों का कहना है कि त्वष्टा निःसन्देह वनस्पति शास्त्र के पारंगत रहे होंगे उन्होंने वनस्पति व्यवहार विज्ञान और वनस्पति चेतना शास्त्र संबंधी सूक्ष्म जानकारी होगी। वे यह भी जानते होंगे कि पौधों के सूख जाने पर उसकी चेतना को प्रदत्त जिम्मेदारी के निर्वहन के लिये कैसे सहमति किया जाये। इन्हीं सभी विशेषताओं का संयुक्त परिणाम लता यंत्र था। आज का विज्ञान इसे बकवास कहकर भले ही अपनी झुझलाहट निकाल ले पर इतने से सत्य बदल नहीं सकता। उक्त आख्यान में वर्णन आता है कि सृष्टि के आरंभ से पूर्व पृथ्वी जीवधारियों के निवास योग्य नहीं थीं। कही ऊँचे पहाड़ तो कही एक दम गहरी घाटियाँ। कही समुद्र तो कही विशाल विवर पृथ्वी सर्वत्र फैले पड़े थे इन्हें जीवन के अनुकूल बनाने के लिये ब्रह्म जी ने राजा पृथु को यह उत्तरदायित्व सौंपा वे आपने अपूर्व पराक्रम से उन्हें समतल बनाने लगे। इससे पृथ्वी को असहाय कष्ट पहुँच रहा था। इसके अतिरिक्त डर यह भी था कि इस प्रक्रिया द्वारा उसका सहज स्वाभाविक रूप कही बिगड़ न जाये व गौ का रूप धर कर ब्रह्मा जी के पास गुहार करने गयी। उसकी शिकायत थी कि सम्राट बर्बर ध्वंसात्मक तरीका अपना रहे है। शिकायत उचित समझ कर उन्होंने इस कार्य हेतु किसी ऐसे सुविज्ञ और विवेकवान आचार्य की सेवा लेनी चाही जो ऐसा करते समय जीवधारियों के सुख दुख सुविधा असुविधा, प्रकृति तथा पर्यावरण संतुलन एवं यहाँ तक की पृथ्वी को नैसर्गिक सुषमा को कोई हानि न पहुँचे। इन सब बातों को ध्यान में रख सके किंचित् उधेड़ बुन के उपरान्त उनका ध्यान त्वष्टा की ओर गया। वे त्रधशाचार्य (पदार्थ के ठोस तरह और गैस अवस्थाओं की तकनीक ज्ञाता) और शिल्प शास्त्र के आदि प्रवर्तक तो थे ही पृथ्वी को समुन्नत और सुविकसित बनाने में उनकी विशेषज्ञता काम आ सकती है। यह सोच कर ब्रह्मा ने उन्हें भी इन योजना में सम्मिलित कर लिया। पृथु का बल और विश्वकर्मा का कौशल जब एकाकार हेतु पृथ्वी पर सृष्टि संरचना संबंधी उपयुक्त वातावरण बना। पृथधोहन और शोषण के सिद्धान्त परी चल रहे थे। ध्वंस भी शामिल था। त्वष्टा ने अपेक्षा कृत नर्म और विवेक पूर्ण प्रणाली अपनायी उनने निर्माण कोषाधोहन पर बल दिया। उभयपक्षीय पद्धति थी। इसमें पृथ्वी और प्राकृतिक सुरक्षा का भी ध्यान रखा गया था और जीवन समृद्धि का भी इस लिये उनकी यह परम्परा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। जितनी पहले थी। और बाद में भी रहेगी। मानसार नामक ग्रन्थ के 43 वें अध्याय में ऐसे अनेक रथों का वर्णन है। जो वायुवेग से चल कर लक्ष्य तक पहुँचते थे। उनमें बैठा व्यक्ति बिना अधिक समय गवाँए गंतव्य तक पहुँच जाता था। इन सभी के निर्माता विश्वकर्मा थे। अर्जुन के नन्दी होशरथ की पुष्टि भी उनने की थी। व दूर दूर से सूचना संकेत भी ग्रहण करता और सहयोगी सेनापतियों के लिये मात्र पूर्ण सन्देश प्रेषित प्रसारित करता था। व सुविधा दूसरे रथों में नहीं थी। इसके अतिरिक्त अनेक नगरों और उसके सभा भवनों का निर्माण त्वष्टा ने किया था। इन्द्र की राजधानी अमरावती और उसके सुधर्मा सभा भवनों सम्पूर्ण द्वारिकापुरी एवं उसके श्रीकृष्ण सभा भवन धर्मराज युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थ नगरी एवं उसके सभागार की रचना विश्वकर्मा ने ही की थी। इसी सभा भवन में दुर्योधन ने जल को थल और थल को जल समझने की गलती की थी। और द्रौपदी के उपहास का पात्र बना। महाभारत युद्ध में पाँडवों ने जिन अस्त्र शस्त्रों का प्रयोग किया उसके सृजेता त्वष्टा थे। जबकि कौरवों के आयुधों का विकास असुर शिल्पी मय किया था। अक्षय पात्र और अक्षय तुणीर भी विश्वकर्मा के निर्माण थे। अक्षय पात्र सुस्वादु भोजन प्रदान करता था। उसमें भोजन की कभी कमी नहीं पड़ती थी। जबकि अक्षय तुणीर एक ऐसा तस्कर था। जिसमें बाण कभी समाप्त नहीं होते थे। पात्र के खाली होने से पूर्व भर जाने का विज्ञान क्या था। यह शोध का विषय है निश्चय ही इसके पीछे निर्माण आपूर्ति की कोई ऐसी उच्च स्तरीय टेक्नोलॉजी थी। जिसका आज हम सिर्फ अनुमान ही लगा सकते है। विष्णु का चक्र इन्द्र का वृज, शिव का त्रिशूल दुर्गा का भाला, इन सबके रचनात्मक त्वष्टा ही थे। त्रिकोण पर्वत पर स्थित कुबेर की लंका उन्हीं की कृति थी। बाद में जब उस पर असुर राज रावण ने अधिकार कर लिया तब असुर शिल्पी मय ने उसको अधिक भोगपूर्ण स्वर्ण लंका में परिवर्तित कर दिया।
यह त्वष्टा के निर्माण की चर्चा हुयी। प्राचीन काल के दूसरे विज्ञान के रता मय थे उनने भी एक से एक बढ़कर भवनों और आयुधों की सृष्टि की जिन दिनों यह दो मूर्धन्य विज्ञान विसारत अस्तित्व में थे उन दिनों देवों और दानवों में अक्सर युद्ध हुआ करता था। उससे सुरक्षा के लिये असुरों ने दानवों शिल्पी से कुछ विशिष्ट व्यवस्था का आग्रह किया। मय ने भगवान शंकर से सलाह कर तीन विशाल उपग्रहों का निर्माण किया यह आर्य भट्ट रोहिणी या इनसेट श्रेणी के उपग्रहों जितने छोटे नहीं थे इनका विस्तार मीलों में था और व्यवस्थित नगरों के रूप में बने थे। इन्हें त्रिपुर कहा जाता था। आकाश में ये पृथक् पृथक् रहते थे किन्तु आवश्यकता पड़ने परस्पर मिल भी जाते थे। इतना उच्च स्तरीय विज्ञान था। आज जिस प्रकार अंतरिक्ष यान आकाश में एक दूसरे से जुड़ जाते है और फिर अलग हो जाते है। वैसे ही ये मय कृत उपग्रह थे। ऐसा नियम था कि पुष्प नक्षत्र में ही इनका मिलन अंतरिक्ष में होता था। तब तीनों उपग्रहों की निवासी परस्पर विचारों का आदान प्रदान करते अथवा भावी रणनीति बनाते। जब तक यह पृथक् परिभ्रमण करते तब शत प्रतिशत अलग सुरक्षा की गारण्टी होती है। किन्तु मिलनकाल में विनाश का योग बलवती हो उठता था। कारण की उपग्रह द्वारा इसी मध्य खुलते थे। इनका परिक्रमा काल 26 दिनों का होता तब तक यह अंतरिक्ष में घूमते रहते या दूसरे ग्रह-नक्षत्रों की यात्रा करते यदा-कदा धरती पर उतर कर लूट मार करके सुरक्षित उड़ जाते 27 वे दिन कुछ नक्षत्र पर इनका मिलन होता उस दौरान लूट की संपत्ति का बटवारा होता। इस प्रकार जब दिनों दिन उनका अत्याचार बढ़ने लगा तो सभी परेशान हो उठे। अन्त में मयकृत इस संरचना को नष्ट करने की जिम्मेदारी विश्वकर्मा के कंधों पर डाली गयी उन्होंने ने एक ऐसे आकाशगामी रथ का निर्माण किया। जिससे मिसाइलों की तरह शक्तिशाली विध्वंसक बाण चलाये जा सकते हैं सृजन के पश्चात् भगवान शंकर को उस पर बिठाया और निवेदन किया उसे नक्षत्र के दौरान जब उपग्रहों के कपाट खुले तो तत्काल उन पर मिसाइलों-बाणों से हमला कर दें। लोककल्याण के निमित्त उन्होंने वैसा ही किया और मय के उन अद्भुत उपग्रहों को त्रिशूल से विनष्ट कर दिया, पर विज्ञान के उस निष्णात को मरने बचा लिया।
रूस और अमेरिका के छोटे-स्पेस स्टेशन अंतरिक्ष में आज भी प्रदक्षिणारत है। दोनों देशों के वैज्ञानिक उनमें समय समय पर जाकर प्रयोग परीक्षण सम्पन्न करते रहते है। पिछले दिनों दोनों स्टेशनों का परस्पर सफलतापूर्वक मिलन भी हुआ था, जिसके दौरान दोनों राष्ट्रों के वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों द्वारा उपजा ज्ञान का आदान प्रदान किया इसी से आज गाया जा सकता है कि आज हम वैज्ञानिक विकास की दृष्टि से जहाँ पर खड़े है, उस ऊँचाई और उत्कर्ष को हमारे पूर्व पहले ही प्राप्त कर चुके थे।
मय यंत्र विद के साथ-साथ महान आर्कीटेक्ट भी थे। भवन निर्माण की उनकी रचना शैली का विशद वर्णन ‘मयशिल्पम्’ नामक ग्रंथ में मौजूद है वे मध्य अमेरिका के वर्तमान मैक्सिको देश के मूल निवासी थे। उत्खनन के दौरान प्राप्त मय सभ्यता के अवशेष वहाँ अब भी विद्यमान है।, जिन्हें देखकर विशेषज्ञ दाँतों तले उँगली दबा लेते है। उनकी समझ में यह नहीं आता कि इतनी उच्चस्तरीय तकनीक का प्रयोग तब के जमाने में किस प्रकार बन पड़ा? महर्षि वाल्मीकि ने मय के इसी ज्ञान, कला और कौशल से अभिभूत होकर रामायण के करीब पचास अध्यायों में उनके निर्माणों और शिल्पदक्षता का चित्ताकर्षक वर्ण किया है। तुलसीदास ने तो उससे और आगे बढ़कर शब्द अभाव की बात कहते हुए अपनी असमर्थता प्रकट कर दी। “ अरनि ने जाइ बनाव”
मैक्सिको स्थित मय की भूल नगर आर्ष साहित्य में भागवती पूरी के नाम से विख्यात है। इसकी रचना स्वयं मय ने की थी।। कथा सरित्सागर में भी भागवती पूरी के उत्कर्ष, समृद्धि और सुन्दरता का अद्भुत वर्णन है। ऐसा उल्लेख मिलता है कि वहाँ के बाद मय आर्यावर्त में हिमालय की तराई में आकर बस गए। वहाँ उनने अपनी पत्नी हेमा के नाम विलक्षण हेमपुर नगरी बनायी और बसायी। हेमा की एक अत्यंत अंतरंग सखी स्पयंप्रभा नामक अप्सरा थी। मय ने उसके लिए किष्किंधा के निकट ऋक्ष्बिल नामक एक तिलस्मी भवन बनाया था ऐसा वर्णन आता है। तमिलनाडु में अब भी वह ऋक्ष्बिल गुफा मौजूद है। कहते है कि सीता खोज के दौरान स्पयंप्री ने इसी कंदरा के भूमिगत शार्टकट मार्ग से हनुमान और उनके सहयोगियों को लंका के समुद्र तट तक पहुँचाया था।
जल, विद्युत प्रकाश, वायु परमाणु शक्ति जैसी ऊर्जाओं उपयोग मय-विद्या की प्रमुख विशेषता थी। उन्होंने ही सर्वप्रथम ऊर्जा के पदार्थ में रूपांतरण का अपना मय सिद्धान्त प्रस्तुत किया। वे सूर्य सिद्धान्त के प्रणेता माने जाते है।
अब से डेढ़ हजार वर्ष पूर्व मध्य अमेरिकी देश मैक्सिको में मय सभ्यता अपने पूर्ण उत्कर्ष पर थी। यह सभ्यता भी कहते हैं। यह मय सभ्यता की ही एक शाखा थी। इनके निर्माणों में सौ-सौ टन के ग्रेनाइट शिलाखंड प्रयुक्त हुए है, जो आश्चर्यजनक है। दो शिलाखण्डों के मध्य की संधियों में किसी सीमेन्ट जैसी चीज के प्रयोग के कोई प्रमाण नहीं है। यह उनकी परिष्कृत टेक्नोलॉजी की साक्षी है। पहाड़ की तलहटी में मार्गों की विशिष्ट बनावट, खाइयों के ऊपर पुलों के अवशेष, विमानों के उड़ने और उतरने की हवाई पट्टियों यह दर्शाती है कि मय की ज्ञान विज्ञान संबंधी जानकारी अति उच्चस्तरीय थी। यहाँ यह स्पष्ट कर देना अनुपयुक्त न होगा कि काल और संरचना की दृष्टि से भारतीय मय सभ्यता और मैक्सिको मय सभ्यता एकदम अभिन्न थी।, अतः इन्हें दो पृथक् सभ्यता न कहकर एक ही परंपरा का अंग मानना अनुचित न होगा।
आधुनिकतम विज्ञान पुरातन ज्ञान के खंडहर पर खड़ा है। भग्नावशेष से भवन की भव्यता का अनुमान लगाना कठिन नहीं है। यह भी अटकल आसानी से लगायी जा सकती है कि जिस विद्या का प्रशस्ति गान युग गा रहा है, वह कितनी मुश्किलों से प्राप्त की गई होगी और उसके लिए उपदेष्टाओं को कितना दीर्घकालीन तप करना पड़ा होगा तप की पूँजी ही उत्कर्ष का आधार है। आज भी उसके द्वारा हम ज्ञान-विज्ञान के उस शिखर पर पहुँच सकते, जहाँ कभी पूर्व में प्रतिष्ठित थे, यह सुनिश्चित है।
प्रजातन्त्र जब असफल होता है। तो उसका स्थान तानाशाही लेती है। इस दुर्भाग्य का कारण है। दुर्बल सरकारें प्रजातन्त्र सफल सरकार वह है जो भय और गरीबी से जनता को बचा सके अन्यथा लोग सब्र खोकर बैठेंगे और ग्रह युद्ध जैसी स्थिति में तानाशाही उठ खड़ी होती है। प्रजा तन्त्र की सफलता ऐसी सशक्त सरकार पर निर्भर है जो जनता की रक्षा कर सके। ऐसी सरकार बना सकने के लिये सशक्त और सजगता का होना आवश्यक है। वस्तुतः जागृत जनता ही प्रजा तन्त्र सफल बनाती है और वही उसका लाभ लेती है।
दीपक का स्नेह समाप्त हो गया। रुई की बाती चहुँओर धीमा-धीमा प्रकाश छोड़ रही थी। अंतिम लौ तीव्रता से चमकी और शून्य में विलीन हो गयी।
बुझते दीपक के सम्मुख एक प्रश्न था- बंधु अभी तक तो तुम मंद-मंद जल रहे थे और अब एक साथ अपनी तीव्रतम लौ से वातावरण को आलोकित कर बुझ गए ऐसा क्या।
दीपक ने धर्म की वक्र रेखा बनाते हुए कहा-अंतिम समय भी मेरा प्रयास यह था कि संपूर्ण शक्ति लगाकर इतना प्रकाश फैलाता हूँ कि यदि अंधकार से कोई जीव भटक रहा हो तो उसे मार्ग दिखाई दे जाए।
चक्र संस्थान का सबसे निम्नतम चक्र ‘मूलाधार’ है। यह संस्कृत के ‘मूल’ और ‘आधार’ - दो शब्दों के मेल से बना है। मूल अर्थात् जड़ और आधार अर्थात् सहारा। इस प्रकार मूलाधार मानव अस्तित्व का मुख्य आधार हुआ। इससे संपूर्ण अस्तित्व का मूल प्रभावित होता है, इसलिए इसका नाम मूलाधार पड़ा।
साधना ग्रंथों में इसे कुण्डलिनी शक्ति का केन्द्र माना गया है। यही वह स्थान है, जहाँ उच्च आध्यात्मिक अनुभूतियों की समस्त संभावनाएँ निहित है। इसका प्रतीक एक कुँडलाकार सर्प है। जिसकी शक्ति प्रायः सुप्तावस्था में पड़ी रहती है। शक्ति संस्थान के इस मूल बिंदु से इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना नामक तीन प्रमुख नाड़ियाँ निकलती है, जो मेरुदंड मार्ग से आगे बढ़ते हुए आज्ञाचक्र तक पहुँचती है। कुण्डलिनी जब तक सोयी रहती है, तब तक निष्क्रिय अवस्था में यही पड़ी रहती है, किंतु जाग्रत होते ही सुषुम्ना के रास्ते समस्त चक्रों का वेधन करते हुए चरम अनुभूति केंद्र सहस्रार तक ऊर्ध्वगमन करती है। यही आत्मज्ञान का तल और स्थल है। अतएव कुण्डलिनी योग में मूलाधार चक्र के जागरण का विशेष महत्व है।
पुरुषों में यह लिंग और गुदा के मध्य स्थित है, जबकि स्त्रियों में गर्भ ग्रीवा के पिछले हिस्से में इसकी अवस्थिति बतायी गई है। इसका कोई क्षेत्र नहीं होता, अतः जागरण क्रम में ध्यान सीधे उसी बिन्दु पर टिकाना पड़ता है, जहाँ इसकी वास्तविक स्थिति है।
यह चार दलों वाला रक्तकमल है। इसके प्रत्येक दल में क्रमशः वं, शं, षं, सं, वर्ण सुनहरे अक्षरों में अंकित होते हैं। इसका यंत्र वर्गाकार और पीले रंग का है, जो पृथ्वी तत्व का प्रतीक है। वर्ग में आठ बर्छे हैं-चार वर्ग के कोनों में और शेष चार भुजाओं के मध्य में। ये सभी सुनहरे पीले हैं।
चक्र का वाहन हाथी है। इसके सात सूँड़ है। यह सप्तचक्र सप्तधातुओं की प्रतीक हैं। हाथी बलशाली पशु है। यह चक्र की शक्ति और गति दोनों को निरूपित करता है। उसकी गति मंथर है, जो इस स्तर की चेतना की चाल बतलाता है। वह विशाल शरीर वाला मजबूत जंतु है, जो यहाँ निहित शक्ति की प्रकृति का द्योतक है।
हाथी के ऊपर एक रक्तवर्णी उलटा त्रिकोण है। इसे उत्पादकता का सूचक माना जाता है। त्रिभुज के मध्य में एक धूम्रवर्ण का लिंग है, जिसके चारों ओर कुण्डलिनी शक्ति सर्पाकार रूप में साढ़े तीन फेरे लिपटी हुई है। तीन कुंडली सत् रज, तम की प्रतीक है। आधी कुंडली मानवी उत्कर्ष को इंगित करती है।
इसका बीजमंत्र ‘लं’ है, जो त्रिभुज के ठीक ऊपर है। इसके देव गणेश एवं देवशक्ति डाकिनी है। देवी डाकिनी चतुर्भुजी एवं लाल नेत्रों वाली है। उनमें अनेक सूर्यों का प्रकाश है तथा वे निर्मल बुद्धिवाहिनी है।
इस चक्र की तन्मात्रा सुगंध, ज्ञानेन्द्रिय नासिका तथा कर्मेन्द्रिय गुदा है। अतींद्रिय गंध का प्रादुर्भाव यही से होता है। इसका लोक भूः लोक तथा वायु अपान है। यह अन्नमय कोश से संबंधित है।
मनुष्य में जितनी भी तामसिक वृत्तियाँ। है- यह चक्र उनका निवास स्थल है। ईर्ष्या, द्वेष, संकीर्णता स्वार्थपरता, अपराधभाव, मनोग्रन्थि, दुष्टता, भ्रष्टता तथा कष्ट का केन्द्र मूलाधार चक्र ही है। जो इनसे ऊपर उठना चाहते हैं, उनके लिए मूलाधार का शोधन और जागरण आवश्यक है।
इस चक्र का संबंध कायिक रूप से कई संस्थानों से है। इनमें उत्सृज, मूत्रालय, यौन तथा प्रजनन प्रमुख है। साधारण दशा में मनुष्य क्या है? यदि इस पर विचार करें तो हम पाएँगे कि उसका व्यक्तित्व और जीवन इस निम्न चक्र की अभिव्यक्ति मात्र है। हर व्यक्ति की अपनी विशिष्ट जीवनशैली है। उसकी इच्छाएँ, आकांक्षाएँ और क्रिया−कलाप अपने ढंग के अलग होते हैं। व्यक्ति व्यक्ति में इस पृथकता और विशेषता का कारण उसका मूलाधार चक्र ही है। यही पर हमारे समस्त मानवेत्तर संस्कार और कर्म केंद्रित होते हैं। जीवन का विश्लेषण करते हुए फ्रायड ने कहा है कि मनुष्य का संपूर्ण जीवन यौन व्यक्तित्व से प्रभावित है। उनका यह कहना गलत नहीं है। दैनिक जीवन में व्यक्ति के रहन-सहन वस्त्र-विन्यास साज-सज्जा में कहीं न कहीं यौन सजगता परिलक्षित हो ही जाती है। ऐसा काम केन्द्र से संबंधित इस चक्र के कारण है।
मनोविश्लेषक तथा मनः चिकित्सक विक्षिप्तता, उन्माद, सनक आदि के कारण चाहे जो बताते हो, योग-आचार्यों की दृष्टि में यह मूलाधार चक्र में केंद्रीभूत शक्ति के अनुत्सर्जन का परिणाम है। वहाँ से शक्ति मुक्त नहीं हो पाने के कारण मस्तिष्क का तत्संबंधी केन्द्र प्रभावित होता है और संपूर्ण जीवन असंतुलित हो जाता है।
तन्त्रशास्त्र में मैथुन का प्रमुख स्थान है। वहाँ पंचमकारों में वह एक है। यह सत्य है। कि सामान्य जीवन में मनुष्य का संपूर्ण आपा यौन संतुष्टि एवं यौन कुंठा से प्रभावित है पर यह भी मिथ्या नहीं है कि मनुष्य की कामेच्छा यदि किसी भाँति समाप्त हो जाए, तो उसकी समग्र दृष्टि ही परिवर्तित हो जाएगी एवं जीवन की परिभाषा उसकी कुछ भिन्न होगी।
तंत्र में जिस काम-क्रिया का उल्लेख है, वह वास्तव में वासना पूर्ति का पर्याय नहीं, शक्ति के ऊर्ध्वीकरण का उपाय है। मैथुन के प्रति प्रायः तीन प्रकार की दृष्टि है। यह तीनों ही मन की भावदशा पर निर्भर है। अधिकाँश लोग इसे आनंद का साधन मात्र मानते हैं। कतिपय लोग प्रजनन हेतु इसका अभ्यास करते हैं, पर योगियों के लिए यह समाधि का एक महत्वपूर्ण सोपान है। वहाँ वह सामान्य काम-क्रीड़ा न होकर उच्चस्तरीय विज्ञान हो जाता है, जिसके माध्यम से वे काम-शक्ति का ऊर्ध्वारोहण कर दिव्य अनुभूतियाँ और आध्यात्मिक विभूतियाँ प्राप्त करते हैं। इसलिए सर्वसाधारण को इस क्रिया की महत्ता और उपयोगिता को समझते हुए ऐसा अवलंबन अपनाना चाहिए, जिससे संबंधित शक्ति संस्थान जाग सके। यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि गृहस्थ साधक को इसके लिए गृहस्थ जीवन त्यागने की आवश्यकता नहीं। जो महत्वपूर्ण है, वह यह कि यौन जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण उदात्त बने ताकि क्षणिक आनन्द के निमित्त व्यय होने वाली ऊर्जा का उच्चस्तरीय रूपांतरण संभव हो सके। यह भी जानने योग्य तथ्य है कि पति पत्नी में से यदि कोई एक योगी हो तो अपने साथी के आध्यात्मिक उत्कर्ष में वह काफी सहयोग कर सकता है। यौन जीवन के प्रति मनुष्य की जो सबसे बड़ी भूल है, वह यह कि वह स्वयं से ही इस निमित्त संघर्ष कर रहा है, जबकि होना यह चाहिए कि वह इसकी वास्तविकता को समझे और उसके अनुरूप आचरण करें। वह यौन जीवन को त्यागना तो चाहता है, पर अब तक ऐसा करने में सफल नहीं हो सका है। सफलता की गारण्टी तभी दी जा सकेगी, जब वह मूलाधार चक्र के परिमार्जन और जागरण की बात सोचे और उसे संपादित करें। इससे कम में ‘काम’ के प्रति उसकी भावनाओं और धारणाओं में बदलाव संभव नहीं, कारण कि मूलाधार के अपरिष्कृत स्थिति में पड़े रहने से उससे संबद्ध मस्तिष्क का हिस्सा भी तामसिक वृत्तियों का केन्द्र बना रहता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति चाहकर भी अपनी हेय और हीन गतिविधियों को त्याग नहीं सकेगा और पूर्व की तरह घिनौना जीवन जीने के लिए बाध्य होगा।
योगमार्ग के निष्णातों के अनुसार मूलाधार से सहस्रार तक प्राण का आवागमन तीन सूक्ष्म स्तर की नाड़ियों द्वारा होता है। मानसिक शक्ति का वाहक नाड़ी ‘इड़ा’ कहलाती है। यह मेरुदंड में बायीं ओर स्थित है। पिंगला प्राण-प्रवाह का मार्ग है। इसकी अवस्थिति दायीं ओर होती है। मध्य में सुषुम्ना का स्थान है इससे आध्यात्मिक शक्ति की ऊर्जा प्रवाहित होती है। जब इड़ा और पिंगला का प्रवाह पूरी तरह संतुलित होता है तब सुषुम्ना क्रियाशील होती और कुण्डलिनी शक्ति ऊपर की ओर बढ़ती है, पर ऐसी अवस्था यदा-कदा और अल्पकाल के लिए ही आती है, किंतु शक्ति जागरण हेतु इतना भी पर्याप्त है। ऐसा देखा गया है कि इस प्रकार के जागरण में उस तीव्रता का अभाव होता है, जो अन्य विधियों द्वारा जाग्रत होने पर दिखलाई पड़ता है। इसलिए इसमें कुण्डलिनी का उत्थान सहस्रार तक न होकर स्वाधिष्ठान या मणिपूरित चक्रों तक ही हो पाता है, वह भी स्थायी नहीं होता। अतएव सुयोग्य मार्गदर्शक इसके लिए प्राणायाम का का निर्देश करते, ताकि इड़ा और पिंगला का शुद्धिकरण होकर उनका शीघ्र संतुलन हो सके। एक बार जब यह संतुलन भली-भाँति स्थापित हो जाता है, तो मूलाधार में एक विस्फोट सा होता है। उसी के साथ कुण्डलिनी तीव्र गति से ऊपर उठती हुई तब तक निर्विघ्न बढ़ती चलती है, जब तक सहस्रार तक न पहुँच जाए।
विधिक प्रकार के अभ्यास और उपचारों द्वारा जब मूलाधार चक्र उद्दीप्त होकर जाग्रत होता है, तो बड़ी तीव्रतापूर्वक निम्नस्तरीय संस्कार चेतन स्तर पर उमड़ने घुमड़ने लगते हैं। यह ठीक वैसा ही है, जैसा ज्वालामुखी विस्फोट के बाद धरती के गर्भ में छिपे पड़े पदार्थ अचानक बाहर निकलने लगते हैं। इस स्थिति में दमित वासनाओं एवं भावनाओं का इतना प्रचंड प्रवाह उमड़ता है, जिसे साधक चाहकर भी नहीं रोक पाता निषेधात्मक चिंतन मस्तिष्क में हावी हो जाता और चिंतन तंत्र को इस कदर अपनी पकड़ में ले लेता है कि व्यक्ति एकदम असहाय अनुभव करने लगता। ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, प्रतिशोध का वेग रोके नहीं रुकता, जिससे साधक बुरी तरह चिड़चिड़ा और अस्थिर हो जाता है। उसके चिड़चिड़ेपन का हाल यह होता है कि एक छोटे से सवाल का जवाब भी वह सरलता और शालीनतापूर्वक नहीं दे पाता, जबकि अस्थिरता इतनी विकट होती है कि यदि अभी वह शाँत एकांत बैठा है तो अगले ही पल किसी से झगड़ा करता दिखाई देगा। एक दिन तो वह सबेरे आठ बजे तक सोता रहेगा, किंतु दूसरे
दिन प्रातः दो बजे उठकर काम करना शुरू कर देगा, कभी वह चीख-चीख कर बातें करेगा, तो कभी ऐसा प्रतीत होगा, मानो मौन धारण कर रखा हो। इस स्थिति में अक्सर साधक गाने का शौकीन दिखाई पड़ता है।
उक्त भूमिका में अवस्थान करने पर एक अनुभवी मार्गदर्शक की आवश्यकता पड़ती है, जो साधक को इस बारे में आश्वस्त कर सके कि यह भावनात्मक अस्त-व्यस्तता उसके अधःपतन का लक्षण नहीं वरन् विकास का चिन्ह है। ऐसे समय में साधक अक्सर भ्रमित हो जाते और कुछ से कुछ सोचने लगते हैं, तब जानकार गुरु ही उन्हें वास्तविकता से अवगत कराता और निश्चित रहने की सलाह देता है। वह उन्हें बताता है कि यथार्थ में यह विकार निष्कासन प्रक्रिया का परिणाम है। यदि विस्फोट न होता, तब भी विकारों का निर्गमन अवश्य होता, पर तब उसकी गति इतनी धीमी होती कि उसमें कई जन्म लग जाते।
मूलाधार चक्र का जागरण गुदा के चारों ओर खुजलाहट की संवेदना से प्रारंभ होता है, अनेक बार यह प्रतीति लिंग गुदा के मध्य के स्थान में अथवा काक्सिक्स क्षेत्र में गर्मी, भारीपन फड़कन के के रूप में होती है एवं घ्राणेंद्रिय इतनी अधिक संवेदनशील बन जाती है कि तीव्र गंध बर्दाश्त कर पाना संभव ही नहीं होता।
इस चक्र के जागरण के दौरान साधक को कितने ही प्रकार के अनुभव होते हैं, इनमें से प्रथम से प्रथम है - शरीर का जमीन से ऊपर उठना। व्यक्ति को ऐसा प्रतीत होता है, जैसे वह आकाश में तैर रहा हो और स्थूलशरीर जमीन पर पड़ा हो। तत्त्वतः यह कोई भ्रांति नहीं, यथार्थ है। शक्ति जागरण के क्रम में साधक का सूक्ष्मशरीर भौतिक देह से पृथक् होकर ऊपर उठने लगता है। इसी की अनुभूति इस रूप में होती है। इसे काया का शून्य में ऊपर उठना नहीं समझना चाहिए।
इसके अतिरिक्त कभी-कभी किसी-किसी को अनेक अतींद्रिय अनुभव होते हैं, उनमें अतींद्रिय दृष्टि और श्रवण शक्ति का विकास हो जाता है यदा-कदा यह अनुभूति होती है कि शक्ति सिर के ऊपरी भाग में आरोहण कर रही है, किंतु प्रायः बहुत थोड़ी-सी शक्ति ही इस प्रकार ऊपर चढ़ पाती है जबकि अधिकाँश मणिपूरित में ही अवरुद्ध पड़ी रहती है।
मूलाधार चक्र को जगाने के लिए साधना विज्ञान में कितने ही प्रकार के अभ्यास उपचार बताये गये हैं। इनमें मूलबंध, नाडीशोधन प्राणायाम चक्र का ध्यान तथा नासिकाग्र दृष्टि जिसे अगोचरी मुद्रा भी कहते हैं, प्रमुख हैं। इनका लगभग एक महीने तक अभ्यास करने से चक्र कमल प्रस्फुटित हो जाता है और साधक को वे सारे अनुभव होते है, जो चक्रों के लक्षणों में वर्णित है।
मूलाधार चक्र में ध्यान करने से साधक प्रखर वक्ता, मनुष्यों में श्रेष्ठ, सर्वविद्या विनोदी, आरोग्य आनंद चित काव्य और लेखन की सामर्थ्य आदि क्षमताएँ विकसित कर लेता है।
मूल आधार यदि सुदृढ़ हुआ तो ही उस पर मजबूत इमारत खड़ी की जा सकती है। चक्र संस्थान में मूलाधार की स्थिति कुछ ऐसी ही है। वहाँ कुण्डलिनी रूपी प्रचंड शक्ति का निवास है। मनुष्य यदि चाहे, तो इसके महान जागरण द्वारा अपने साधारण जीवन का दिव्य रूपांतरण कर सकता और इतना प्रखर एवं पराक्रमयुक्त बन सकता है, जिसकी उपमा ईश्वर से दी जा सके। यह पशु चेतना का भी केन्द्र है, जो इस बात का प्रति सावधान करता है कि यदि हमारा अंतर बलशाली न हुआ, तो पाशविकता के पाश में हम फँस सकते हैं। इसलिए इसका वाहन ऐरावत है, जो इस बात का प्रतीक है कि आदमी में हाथी की तरह मानसिक अधिष्ठाता होनी चाहिए, तभी वह पशु प्रवृत्तियों के जीवन में हावी होने से बच सकता और उन्हें पोषण एवं प्रश्रय दे सकता है। जिन्हें देववृत्तियाँ कहते हैं। कुण्डलिनी शक्ति के रूप में परिष्कृत मूलाधार वास्तव में इन्हीं देववृत्तियाँ का प्रतीक प्रतिनिधि और समुच्चय है, इसे भली-भाँति समझ लेना चाहिए।
उस परिमित और संकुचित स्वार्थ को त्याग देना चाहिए, जो सम्पूर्ण वस्तुओं को अपने लाभ ही के लिए चाहता है। सच्चा स्वार्थ परमार्थ ही हो सकता है।
पर्वतों से निकलकर बहने वाली सरिता की धारा ने अपनी सहेली दूसरी धारा से कहा-मैं तो इस भ्रमणशील और गतिमान जीवन से ऊब गई हूँ। एक पल को भी विराम नहीं, ऐसा जीवन किस काम का। अब आगे बढ़ने का मेरा इरादा नहीं है। आम्र का एक सघन कुँज देखकर वह उसके नीचे थम गई और वहीं रुक गई।
दूसरी धारा आगे बढ़ते गई और जाते-जाते कह गई तू रुक तो रही है, किन्तु याद रखना गतिशीलता में पावनता, स्वच्छता और जीवन है। यदि तेरे जीवन में अकर्मण्यता ने स्थान बना लिया तो तू स्वाभाविक गुणों से हाथ धो बैठेगी। पहली धारा ने अपनी सहधारा की बात पर उस समय तो ध्यान नहीं दिया और उसने एक सरोवर का रूप धारण कर दिया। जल के स्थिर हो जाने से जल में सड़ाँध उत्पन्न होने लगी और वह स्वच्छ जल पीने योग्य न रहा। ग्रामवासियों और जानवरों तक ने उसे त्याग दिया। तब से गतिशीलता और क्रियाशीलता का महत्व समझ में आया।
उन दिनों प्रथम विश्वयुद्ध जोरों पर था। भारत में अंग्रेजों का शासन था। अंग्रेजों को लड़ने के लिए लाखों सैनिकों की जरूरत थी। उन्होंने भारतीय राजाओं से सेना लेने का निश्चय किया। इस सिलसिले में उनका प्रतिनिधि जिसे रेजीडेंट कहा जाता था, जैसलमेर राज्य में आया। वह यहाँ के महाराजा जवाहर सिंह के नाम वायसराय का पत्र भी लाया था, जिसमें जैसलमेर की सेना को ब्रिटिश सेना में शामिल करने का अनुरोध था। ऐसे पत्र विनतीनुमा आदेश हुआ करते थे।
राजा ने रेजीडेंट का भव्य स्वागत किया। उसे विशेष रूप से बने मेहमानखाने में ठहराया गया। उसने वायसराय का पत्र राजा को दिया और अपने आने का कारण बताया। पत्र पढ़कर राजा चिंतित हो गए। उन्होंने रेजीडेंट को बताया कि जैसलमेर राज्य की कोई नियमित सेना नहीं है। वह अपने सैनिक उनकी सेवा में देने में असमर्थ हैं।
रेजीडेंट हँसा। आप हमें बेवकूफ नहीं बना सकते। बिना सेना के कभी शासन नहीं चला करता महारावल साहब! आपको अपनी सेना हमें देनी ही होगी।
हमारी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि हम सेना का बोझ उठा सके इसलिए हम कुछ सिपाही रखते हैं, जिससे हमारा राजकाज चल सके, जनता में शाँति रखी जा सके- राजा ने उसे समझाते हुए कहा।
बिना सेना के देश की रक्षा कैसे हो सकती है? आप पर कोई हमला कर देगा तो आप क्या करेंगे? रेजीडेंट ने अविश्वास से कहा।
हमारी सेना हमारी जनता है। इसी के आत्मबल से हम हर तरह के खतरे का मुकाबला कर सकते हैं। हम पाँच-छह घंटे में अपनी सारी जन-सेना संगठित कर लेते हैं- महाराज ने उसे समझाया।
पर अंग्रेज रेजीडेंट जरा भी आश्वस्त नहीं हुआ। उसने कहा, ये सब कोरी बातें हैं। मैं बिना सेना लिए वापस नहीं जा सकता। आप मुझे अपनी सेना दे- चाहे वह आपकी नियमित सेना है या नहीं। वह आपके खजाने से वेतन पाती भी है या नहीं, हमें इससे मतलब नहीं है। मुझे अपने साथ यहाँ की आबादी के अनुसार पाँच हजार सैनिक तो ले ही जाने हैं।
महाराजा को लगा कि अब बातों से नहीं बन सकती है। कुछ करना ही पड़ेगा। उन्होंने कहा, ठीक है। कल सुबह आप मेरी सेना देख लेना। तभी आपको मेरी बातों पर विश्वास होगा। उसी दिन राजा ने अपने घुड़सवार, ऊँटसवार गाँव-गाँव में भेज दिए। पंद्रह से पैंतालीस वर्ष तक के सारे आदमी सूरज उगने से पहले-पहले जैसलमेर पहुँच जाए। जिसके पास जो भी हथियार है साथ लेता आए। घोड़ा ऊँट बैलगाड़ी जो भी वाहन उपलब्ध है, लेकर आए। आदेश हवा के साथ-साथ राज्य में फैल गया। खेत में, खलिहान में, चरागाह में, पत्थर ढोता, घास काटता, गड्ढे खोदता जो जहाँ था, जैसा था तुरंत शहर की तरफ रवाना हो गया। ऊँट, घोड़े बैल गाड़ियों के रेले-के-रेले राजधानी में इकट्ठे हुए।
अंग्रेज रेजीडेंट अपने शयनकक्ष में सोया हुआ था। उसे अपने कानों में ऊँट, घोड़े और बैलों की आवाजें, घंटियों की रुनझुन और आदमियों की हुंकारें सुनाई देने लगी। उसे लगा जैसे वह कोई सपना देख रहा है। पर धीरे-धीरे आवाजें तेज होने लगी। उसकी नींद उचट गयी। शोर बहुत तेज और कानफोड़ू था। वह अधीर हो गया। उठा और छत पर आ गया।
छत पर राजा पहले से ही बैठे थे। आइए अंग्रेज बहादुर। वह जैसे रेजीडेंट का इंतजार ही कर रहे थे। रेजीडेंट आँखें-फाड़-फाड़कर देख रहा था। दूर-बहुत दूर क्षितिज तक चारों दिशाओं में ऊँट, घोड़े, बैल, बैलगाड़ियों के हुजूम बैठे थे। धूल की परत आसमान तक छाई हुई थी। लोग कमर करे बंदूक, तीर कमान, तलवार, लाठियाँ लिए आ रहे थे। पशुओं का शोर आसमान को फाड़े दे रहा था।
ये है हमारी सेना। देखिए एक रात में ये सभी आ पहुँचे है। हम सबको हमारी मिट्टी से कितना मोह है। हमारी स्वतंत्रता पर जब भी आँच आती है, सारी जनता बलिदान के लिए तुरंत तैयार हो जाती है। जहाँ जनता उत्सर्ग के लिए तैयार हो तो कौन-सा खतरा टिक सकता है? महाराज ने गर्व से कहा।
रेजीडेंट आश्चर्यचकित हो देखता रहा। अपने देश के लिए कुर्बान होने वाले ऐसे वीरों को देखकर वह गदगद हो गया। सच है महाराजा साहब! जनसेना से बड़ी कोई सेना नहीं होती है। मैं आपकी बातों से पूरी तरह आश्वस्त हूँ। मैं विश्वास दिलाता हूँ कि हमारे तरफ से आप पर कोई दबाव नहीं दिया जाएगा। इनमें से जो भी ब्रिटिश आर्मी में शामिल होना चाहेगा, हम अपना सौभाग्य समझेंगे।
कुछ पल रुकने के बाद रेजीडेंट कहने लगा, इस अंचल की जनचेतना जिस दिन समूचे भारतवर्ष की राष्ट्रीय चेतना बन सकेगी, उस दिन कोई भी विदेशी ताकत इस देश को अपनी गिरफ्त में नहीं रख पाएगी। ऐसा जिस दिन भी होगा उसी दिन भारत देश समूचे विश्व का सिरमौर होगा।
भूकंप अर्थात् चरमराते-ढहते हुए मकान, टूटते हुए बाँध एवं पुल, बिखरती हुई सड़कें, धँसती हुई धरती, खंडहरों में बदलते गाँव एवं नगर, मलबे में दबे-मरे-अधमरे बदकिस्मत इनसान। निःसंदेह भूकंप समस्त प्राकृतिक आपदाओं में सबसे भीषण एवं भयावह है। यह ऊर्जा के तीव्र उत्सर्जन द्वारा उत्पन्न पृथ्वी का कंपन है। विज्ञानसेवा पृथ्वी में प्लेटो की असमान गतिशीलता, वृक्षों का असाधारण रूप से काटे जाना व प्राकृतिक असंतुलन को भूकंप का कारण मानते हैं। जो कुछ भी हो, पर इसकी वजह से अपार धन-जन की हानि होती है। इस शताब्दी में जिस क्रूरता से धरती का दोहन एवं शोषण किया गया है, उससे लगता है कि प्रकृति अपने भूकंप रूपी कालदण्ड से मनुष्य को अंतिम चेतावनी दे रही है।
प्राचीन भारतीय कालगणना के आधार पर पृथ्वी 1,17,21,41,100 वर्ष पुरानी मानी जाती है, जबकि भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग 450 करोड़ वर्ष आँकी गई है। वैज्ञानिक निष्कर्षों के अनुसार भूकंपों का इतिहास भी इतना ही पुराना है। अर्थात् पृथ्वी के उद्गम के साथ ही भूकंप का अस्तित्व सामने आया। भूकंप का प्रथम प्रामाणिक उल्लेख 373 ई॰ पूर्व ग्रीस से मिलता है। भारत में भूकंपों का सूचीबद्ध इतिहास 800 ई. के बाद से प्राप्त होता है। विश्व का अब तक का भीषणतम भूकंप 23 जनवरी 1556 ई॰ में चीन में आया था। इस त्रासदी में साढ़े चार लाख लोगों की जाने गई थी। भारत का भीषणतम भूकंप सन् 1937 में बंगाल में आया था।, जिसमें लगभग तीन लाख मनुष्य मौत के मुख में चले गये। वर्तमान शताब्दी का सबसे बड़ा भूकम्प भी चीन में ही 28 जुलाई 1976 में आया था। इसमें सात लाख से अधिक मौतें हुई थी।
मोटे तौर पर भूकंप दो तरह के होते है। एक वे जो धरती के अंदर ही टकराहट से उत्पन्न होते हैं और दूसरे धरती के अंदर गर्मी बढ़ जाने के कारण हुए विस्फोट से। अभी तक के स्थापित आधुनिकतम भूकंप सिद्धांतों में ‘प्लेट टेक्टोनिक’ को ही प्रामाणिक माना गया है। भूकंप समस्त प्राकृतिक प्रकोपों में सबसे भयावह आपदा है। जिसकी रोकथाम मानव द्वारा सम्भव नहीं। प्रतिवर्ष सैकड़ों भूकंपों के अलावा धरती एक दर्जन में अधिक बड़े और विनाशकारी भूकंपों द्वारा प्रकंपित होती है। इससे न केवल भू-दरारें उत्पन्न होती हैं। बल्कि भू-सतहें भी नष्ट हो जाती है महासागरों में उत्पन्न होने वाले भूचाल विशाल ज्वारीय तरंगें उत्पन्न करते हैं। जिसे भूकंपीसिंधु के नाम से जाना जाता है। ये तरंगें तीव्र गति से चलती हैं और निचले तटीय क्षेत्रों में बाढ़ की सी स्थिति उत्पन्न करती है।
इस भयावह प्राकृतिक आपदा के बारे में वैज्ञानिकों के विभिन्न मत हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस बेंगलूर के दो खगोलविदों के अनुसार पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति धीरे-धीरे चुक रही है। ब्रह्मांडीय प्रसार के कारण इस शक्ति में हास हो रहा है। विज्ञान वेत्ताओं ने बड़े ही आश्चर्यजनक ढंग से स्पष्ट किया है कि ज्यों-ज्यों पृथ्वी की उम्र बढ़ती गयी, नाभिकीय बल तो स्थिर रहा, मगर गुरुत्वाकर्षण बल निरंतर क्षीण होता चला गया। इससे धरती में कँपकँपाहट आने लगी है। इस परिप्रेक्ष्य में अमेरिकी नौ सेना वेधशाला के समय विभाग के अध्यक्ष डॉ. गेरनार विकलर ने उल्लेख किया है कि पिछले 25 वर्षों में पहली बार धरती की घूर्णन गति में तेजी आयी है। इस तीव्रता को सबसे पहले वर्ष 1955 में पाया गया। सन् 1999 एवं 2000 में इसकी तीव्रता में वृद्धि होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। इससे भूकंप की आशंका को बल मिला है।
विश्वस्तर पर वैज्ञानिकों की अवधारणा है कि धरती के साथ हो रही छेड़-छाड़ के कारण भी भूकंप की स्थिति आ रही है। वृक्षों की अंधाधुन्ध कटाई, भारी मात्रा में भूगर्भीय दोहन और जनसंख्या का बढ़ता दबाव धरती को अस्थिर एवं असंतुलित कर रहा है। भारत के 80 प्रतिशत सघन जंगल अब 8 प्रतिशत के अवशेष के रूप में अंतिम साँसें गिन रहे हैं। हटती हरी चादर से उधड़ी-नंगी होती धरती कराह उठी है। इसी कराह के परिणामस्वरूप भूकंप का परिदृश्य सामने है। इस संदर्भ में वाडिया भू-संस्थान के निदेशक डॉ. बी.सी. ठाकुर का कहना है कि अब तो हिमालयन भू-गर्भ क्षेत्र में भूकंप की घटनाएँ सामान्य बातें हो गयी है। भारतीय प्रायद्वीप के प्रतिवर्ष 5 सेंटीमीटर तिब्बत की ओर बढ़ने से भूकंप की संभावनाएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं। हिमालय पर्वत अति संवेदनशील हो उठा है, इसमें भी दो पट्टियाँ प्रमुख है, उत्तर की पट्टी-ग्रेट हिमालय एवं लोअर हिमालय। सक्रिय थ्रस्ट की वजह से भी हिमालय में भूकंप की स्थिति में तीव्रता आयी है।
वैज्ञानिकों के अनुसार चमोली में पिछले दिनों मार्च के अंत में आया भूकंप भारतीय प्लेट के तिब्बतीय प्लेट से टकराने से हुआ। ज्ञात हो कि अकेले बीसवीं सदी में हिमालय का यह क्षेत्र 8 विनाशकारी भूकंपों को झेल चुका है। भारतीय क्षेत्र की गतिशील प्लेट जब भी तिब्बत की प्लेट से टकराती है। या इसके नीचे घुसती है, तो संपूर्ण हिमालय क्षेत्र थरथरा उठता है। इस सिद्धांतानुसार धरती की बाहरी सात प्रमुख और कुछ छोटी प्लेट्स में बँटी हुई है। प्लेट्स 50 से 100 किलोमीटर मोटाई की होती है। ये प्लेट्स इतनी कठोर होती है कि न तो मुड़ सकती हैं और न ही टूटती हैं। ये तो बस टकराकर भूकंप को जन्म देती हैं।
इन प्लेटो में तरंगें होती हैं। धरती की सतह के नीचे या उसके आस-पास ऊर्जा के मुक्त होने से वह स्थान विशेष अथवा उसकी परतें तेजी से घड़ी के पेंडुलम की तरह दोलन करने लगती हैं। यही दोलन भूकंप का कारण है। कठोर चट्टानों में ये तरंगें तीव्रता से प्रवाहित होती हैं, परन्तु तरल चट्टानों में यह दर कम होती है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार उत्तर पूर्वी भारत में धरती की परत हर साल 5 सेंटीमीटर खिसक रही है। यह स्थिति भूकंप की संवेदनशीलता एवं संभावना को बढ़ाती है। तिब्बत जैसी स्थिर प्लेट को फुट और भारतीय चलायमान प्लेट को हैगिंग कहा जाता है। हैगिंग प्लेट पर लगातार दबाव पड़ता रहता है। यहाँ तक कि वह रबड़ की तरह मुड़ भी जाती हैं। कई दशकों के पश्चात् यह टूट भी जाती हैं। इसी के साथ सालों की एकत्रित ऊर्जा का बड़ा भाग तापीय क्रिया में बदलकर चट्टानों को गला डालता है। इस प्रकार ये प्लेटें चटकती, दरकती एवं टूटती रहती हैं। जिन स्थानों में ये प्लेटें जल्दी चटकती है, वहाँ हल्के भूकंप आते हैं। प्लेट्स के टूटन की दर तेजी से होना भयंकर एवं विप्लवी भूकंप को आमंत्रित करता है।
इस दिशा में नवीनतम अन्वेषण एवं अनुसंधान बताते हैं कि हिमालय की ऊपरी अग्रिम पंक्तियों की सतह में भू-चुम्बकीय तरंगें बेहद अनियमित हैं। दिल्ली हरिद्वार का पश्चिमी भाग अत्यंत विद्युत सुचालक है। तरंगों की अनियमितता भूकंप के प्रति तीव्र संवेदी है। इसी आधार पर हिमालय के महोदधि एवं रामनगर के बीच डेढ़ सौ किमी. दूरी पर तेरह केन्द्र चुने गए हैं। उत्तरी हिमालय के अंदर गुरुत्वाकर्षण दृश्यों का विश्लेषण करने से ज्ञात होता है कि या तो पूर्व-पश्चिम में तरंगों की असमानता है या फिर दिल्ली-हरिद्वार के आर-पार चट्टानों की संरचना में बदलाव है। इसी प्रकार शिवालिक पर्वतमाला से लेकर कुमाऊं हिमालय का क्षेत्र नियमित रूप से भीषण भूकंप की चपेट में है।
उत्तराखण्ड में पिछले दो सौ वर्षों में आए भूकंपों का इतिहास देखे तो सबसे अधिक तीव्रता वाला भूकंप 2 अक्टूबर, 1937 को देहरादून में तथा सबसे कम तीव्रता वाला 25 जुलाई, 1969 को नैनीताल में दर्ज किया गया। तीव्रता के आधार पर उत्तराखण्ड में आए भूकंपों का विवरण इस तरह है- 22 मई 1803 में उत्तरकाशी में आए भूकंप की तीव्रता रिएक्टर स्केल पर छह थी। 25 मई, 1916 में गंगोत्री में इसका परिमाण 7 था। लोहाघाट में 1831 से 35 के बीच चार भूकंप आए। वहाँ इसकी तीव्रता क्रमशः 25 दिसंबर 1931 को 5 रिएक्टर, 2 जुलाई 1832 में 6 रिएक्टर, 30 मई 1833 में 6 रिएक्टर तथा 14 मई 1835 में 7 थी। 14 फरवरी, 1851 में नैनीताल में आए भूकंप की तीव्रता 5 थी, जबकि वहीं पर 25 जुलाई, 1869 में इसकी तीव्रता 6 मापी गयी। 28 अक्टूबर 1916 में धारचूला में 7.5 स्केल का पहला भूकंप दर्ज किया गया। यही पर दूसरी बार छह तीव्रता का भूकंप 5 मार्च, 1935 को रिकार्ड हुआ। 2 अक्टूबर 1937 को यह केन्द्र फिर से एक बार देहरादून था, जहाँ इसका परिमाण 8 था।
हिमालय में आए भूकंपों के इस क्रम में 4 जून, 1945 में अल्मोड़ा में 6.5 रिएक्टर के भूकंप ने यहाँ दरारें पैदा कर दी। पुनः इसका केन्द्र धारचूला हो गया। यहाँ क्रमशः 28 दिसंबर 1956 में में 7.5, 24 दिसंबर, 1961 में 5.7, 26 सितंबर, 1964 में 5.8 तथा 6 अक्टूबर, 1964 में 5.3 परिमाण का आँका गया था। 27 जुलाई 1966 में कप कोट में 6.3 तीव्रता के भूकंप के पश्चात् प्रकृति ने फिर धारचूला की धरती को हिलाने का मन बनाया। वहाँ पर इसकी तीव्रता 28 अगस्त 1968 को 7 व 21 जुलाई 1980 को 6.5 परिमाण थी। 20 अक्टूबर, 1999 में उत्तरकाशी में 6.6 तीव्रता वाले भूकंप की दहशत को अभी तक भुलाया नहीं जा सका है।
अभी हाल ही में 27 मार्च 1999 में चमोली में मध्य रात्रि में आए विनाशकारी भूकंप से गढ़वाल क्षेत्र में मरने वालों की संख्या सैकड़ों को पार कर गयी। उत्तरकाशी में इनकी संख्या डेढ़ हजार के आस-पास थी। चमोली में आए भूकंप का असर 6.8 रहा और इसका केन्द्र धरती के अंदर 33 किलोमीटर था। उत्तरकाशी में आए भूकंप के केन्द्र 18 किलोमीटर अंदर था, इसीलिए वही तबाही अधिक हुई थी। हिमालय में औसतन 25 वर्षों में परिमाण 8 या अधिक का भूकंप आता है तथा प्रत्येक दो-तीन वर्षों में 6 से अधिक किंतु 8 से कम परिमाण का बड़ा भूकंप कभी भी आ सकता है।
स्थिर कटिबंधीय क्षेत्र जैसे भारतीय प्रायद्वीप में भूकंपीय संभावनाएँ मानी जाती रही हैं। किन्तु 1897 से 1997 क बीच रिएक्टर पैमाने पर 6 से 8.7 तीव्रता के 20 बड़े भूकंपों का भारत में दुरागमन हो चुका है। न्यूनतम संभावना वाले क्षेत्र महाराष्ट्र के कोयना क्षेत्र में सन् 1937 में तथा लातूर खंड में 1993 में आए विनाशकारी भूकंपों और इसी प्रकार 1997 में जबलपुर के भूकंप ने अनेकों प्रश्नों को जन्म दे दिया है। मुम्बई भी भूकंप से अछूता नहीं रहा। यहाँ मध्यम तीव्रता का सबसे बड़ा भूकंप सन् 1618 में आया था। इसमें लगभग दो हजार जाने गई। हाँ केवल बस्तर का क्षेत्र भूकंप शून्य क्षेत्र गिना जाता है। इस तरह भारत में मध्यम श्रेणी के भूकंप कही भी कभी भी तबाही मचा सकते हैं। भूकंप से बड़ी मात्रा में जन-धन की हानि होती है। एक भयंकर भूकंप में लगभग 200 किमी0 लम्बाई में भ्रंश फटता है। इससे 50 से 100 किमी0 तक तो बहुत क्षति होती है, लेकिन 400 किमी0 दूरी तक के भवन व दीवारें गिर सकती हैं। तरंगों की गति बढ़ने से भी दीवारें गिर जाती है। एक प्रतिशत गतिवर्द्धन से झटके महसूस होते हैं, जबकि 1999 में उत्तरकाशी के भूकंप में 30 गतिवर्द्धन था।
भूकंप की पूर्व सूचना दे पाना अभी भी संभव नहीं हो पाया है। परंतु इसकी पूर्व सूचना जानवरों और पशु-पक्षियों के व्यवहारों को देखकर जानी जा सकती है। इसका आभास जीव जगत को प्राप्त हो जाता है। भूकंप आने के तीन-चार दिन पहले दिल्ली सहित भूकंप से प्रभावित क्षेत्रों के मुर्गी फार्मों की मुर्गियों ने यकायक अंडे देने कम कर दिये थे। विशेषज्ञों के अनुसार भूकंप के हर झटके के पहले फार्म में अंडों के उत्पादन में अचानक कमी आने के रिकार्ड हैं। दिल्ली सरकार के पशुपालन विभाग के पूर्व निदेशक डॉ. एस.एस. दहिया ने इस तथ्य की पुष्टि की है। उनके मतानुसार मुर्गियों सहित अन्य जानवरों को भी बहुत पहले भूकंप आने का अंदेशा रहता है। यह उसी का प्रभाव है कि मुर्गियाँ कम अंडे देने लगती हैं।
अब तो पश्चिमी विज्ञानवेत्ता भी मानने लगे हैं कि पशु-पक्षी भूकंप के मामले में मशीन से भी ज्यादा संवेदनशील होते हैं। अमेरिका के वैज्ञानिक डेविड ब्राउन ने अपने नवीनतम लेख ‘अनयूजुअल एनिमल बिहैवियर एण्ड अर्थक्वेक प्रेडिक्शन्स’ को इंटरनेट में प्रकाशित किया है। इसमें उन्होंने भूकंप आने से पूर्व जीव-जंतुओं के व्यवहारों पर विस्तृत शोध के अनुसार भूकंप आने से पूर्व मधुमक्खी कुत्ता, कौए, कबूतर, मुर्गियाँ, कुछ नस्ल के साँप, मछलियों आदि पर ये प्रभाव परिलक्षित होते हैं। चिड़ियाघरों में घोड़ों, गाय, हिरण, भेड़, बकरी, चूहे आदि के व्यवहारों में भी असामान्यता देखी गयी है। इस अन्वेषण के आधार पर पता चला है कि मधुमक्खियाँ शहद के छत्ते छोड़कर भाग जाती हैं। समुद्र में गहरे तैरने वाली मछलियाँ किराने पर आ जाती हैं। साँप बिल से निकल आते हैं। भूकंप से पहले चुहिया इस सीमा तक आतंकित हो जाती है कि उसे आसानी से पकड़ा जा सकता है। पालतू कबूतर भूकंप की आशंका में अपने घोंसले में देर से पहुँचने लगते हैं। एक चिड़िया तो अपने बच्चों को गला घोटकर मार देती है। कौए भूकंप से पूर्व कबूतर की तरह समूह में काफी ऊँचे उड़ने लगते हैं। कौओं के व्यवहार पर किए गए अपने शोध के लिए बहुचर्चित नवीन खन्ना के अनुसार हर भूकंप से पहले कौए एक स्थान से दूसरे स्थान तक झटके में उड़ते हैं। भूकंप से पूर्व सुअर एक दूसरे को काटने दौड़ते हैं। अमेरिका एवं अन्य देशों के वैज्ञानिकों के मतानुसार पशु-पक्षी भूकंप की भविष्यवाणी करने में मानव निर्मित मशीनों से अधिक संवेदनशील होते हैं। अतः उनका प्रयोग इस प्राकृतिक आपदा से बचाव हेतु किया जा सकता है।
विवेकी इनसान भी ऐसी आपदाओं से स्वयं को बचा सकता है, यदि वह फिर से धरती को माता के समान पूजनीय मानकर - माता पृथ्वी ‘पुत्रोण्हं पृथिव्याँ’ की वैदिक रीति-नीति अपना ले। उसे समुचित संरक्षण एवं सहयोग प्रदान करें तो संभव है कि धरती माता अपने बच्चों की भूकंप रूपी प्रकोप से रक्षा करें। इसके लिए जरूरी है- प्रकृति एवं पर्यावरण को उचित संरक्षण प्रदान करना एवं धरती को फिर से हरियाली की चादर समर्पित करना। इसी मानवी प्रयास से इनसान भूकंप की भीषण त्रासदी से स्वयं को बचा सकता है।
आयुर्वेद के प्रणेता महर्षि चरक जब सब प्रकार की चिकित्सा पद्धति एवं औषधियों के निर्माण तथा सेवन विधि का विधान बना चुके तो उनके मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि मेरे द्वारा निर्मित औषधियों के विधान से जनता किस प्रकार लाभान्वित हो रही है, देखना चाहिए। वे साधारण ग्रामीण किसान का वेश बनाकर एक गाँव में पहुँचे जहाँ वैध्य निवास करते थे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने प्रश्न किया कि ऐसा कौन है जो रोगी नहीं होता? वैध्य ने उत्तर दिया- जो च्यवनप्राश का सेवन करता है। दूसरा बोला- चन्द्र-प्रभावटी खाने वाला सदा निरोग रहता है। तीसरा बोला- स्वर्णभस्म से किसी प्रकार का रोग नहीं होता। चौथा बोला लवणभास्कर चूर्ण सभी उदर विकारों में उपयोगी है। चारों की बात सुनकर चरक के मन में बहुत विक्षोभ उत्पन्न हुआ कि इस प्रकार औषधियों के बिना तो ये लोग स्वस्थ तो क्या जीवित भी न रह सकेंगे।
औषधि विज्ञान के निर्माण के पीछे यह मंतव्य कदापि नहीं था कि स्वस्थ रहने के लिए मानवजाति के लिए औषधि नितांत आवश्यक है। संयोग की बात उधर से एक ऋषि निकले। उन्होंने स्वस्थ रहने के लिए संयम तथा मिताहार और परिश्रम की बात कही। तब चरक ने अपना परिचय बतलाते हुए कहा कि आप ठीक ही कहते हैं। औषधियाँ तो रोग के लिए हैं। स्वस्थ रहने के लिए संयम, नियम और श्रम की अती आवश्यकता है।
विवाह सामाजिक संस्था की धुरी है। इसी केंद्र के ईद-गिर्द समाज की सारी विधि व्यवस्था, रीतिरिवाज, परंपराएँ घूमती रहती है। अपने देश में विवाह की अलग-अलग प्रथाएँ प्रचलित है। प्रायः यहाँ सभी अपने-अपने रीति-रिवाजों और धार्मिक परंपराओं के अनुरूप विवाह कार्य संपन्न करते हैं। दुनिया के अन्य देशों में भी बड़ी विचित्र प्रथाएँ देखने को मिलती है। बहुधा ये सारी विचित्र वैवाहिक परंपराएँ मूल जातियों या आदिवासियों के बीच में ही देखी जाती है। इन समुदायों में अभी भी ये विभिन्न विचित्र रीतिरिवाज किसी न किसी रूप में अपना अस्तित्व बनाए हुए है। इनमें से कई विवाह बड़े रोचक एवं अनोखे होते है।
विवाह की ये प्रथाएँ देश के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग ढंग से होती है। बिहार में यह बिरहारे तथा पैठू प्रथा, गुजराती भीलों में गोलन-घेडो बस्तर के गोड जाति के लोगों में घोटुल प्रथा’ आदि के रूप में प्रचलित है। पैठू प्रथा के अंतर्गत लड़कियों का प्रभाव प्रबल होता हे। लड़कियाँ जिस लड़के को पसंद करती है। बरात उसके घर में शादी से पूर्व ही रहने लगती है, फिर उनका विवाह किया जाता है। गुजरात में प्रचलित गोलग-घेडों के अनुसार होली के अवसर पर स्वयंवर का आयोजन किया जाता है। इसमें एक खंभे के ऊपरी सिरे पर थोड़ा-सा गुड़ और एक नारियल बाँध दिया जाता है। गाँव की सारी महिलाएँ एवं लड़कियाँ खंभे के चारों ओर नृत्य करती है। पुरुष वर्ग महिलाओं के चारों ओर एक दूसरा घेरा बनाकर नाचना शुरू करते है। जो बहादुर उस घेरे का तोड़कर उस खंभे में से गुड और नारियल को निकाल लाता है। उसे विजेता मान लिया जाता है। विजेता वहाँ उपस्थित महिलाओं में से किसी को भी अपनी पत्नी बना सकता है। किंतु इस खंभे तक पहुँचना बड़ा दुष्कर एवं मुश्किल कार्य होता है महिलाएँ उसको रोकने के लिए हर संभव प्रयास करती है। वे सब मिलकर झाडू से पीटना, बाल नोचना, पत्थर फेंकना, दाँतों से काटना आदि सभी कुछ करती है। यह विवाह समाज द्वारा स्वीकृत होता है।
उत्तरी गढ़वाल एवं कुमाऊं जिलों की भोटिया जनजाति में लड़कों को अपना जीवन साथी चुनने में पूरी स्वतंत्रता होती है। आपसी लेन-देन एवं अन्य कार्य सभी सामान्य ढंग से होते हैं। जब बारात लड़की वालों के घर आती है, लड़का बिना कोई रस्म अदा किए ही लड़की की डोली में बिठाकर अपने साथ ले जाने को उद्यत होता है इस अवसर पर लड़की और लड़के वालों में परस्पर युद्ध होता है, परंतु यह युद्ध नकली होता है। अंततः लड़की वालों की पराजय होती है एवं उसके पश्चात् विदाई होती है। एक डेढ़ सप्ताह के बाद दोनों परिवारों के बीच सुलह-समझौता होने के पश्चात् ही विवाह भोज का आयोजन किया जाता है एवं नाच-गाना होता है।
बंगाल और असम के ममनसिंह ग्वालपाडा और कामरुप जनपदों के गारो आदिवासी नरमुड शिकारी के रूप में जाने जाते हैं। इन जातियों का समाज मात सत्तात्मक होता है। इसमें कन्या पक्ष विवाह के लिए वरपक्ष की तलाश करता है। जिस लड़के के गले में खोपड़ियों की माला में सर्वाधिक खोपड़ियाँ दिखाई दे और वह बहुत ही भयानक हो, उसे ही वर के रूप में प्राथमिकता दी जाती है। वर का चयन जितना विचित्र होता है, उससे भी अद्भुत इनकी विवाह प्रथाएँ होती है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लगे जौनसार भाबर की खास जनजाति में विवाह कार्य इतना विचित्र नहीं होता जितना कि यहाँ की विविध प्राचीन मान्यताएँ है। विवाह में लड़की का चयन, बारात, मंत्रोच्चारण, फेरों आदि की रस्में पुरानी परिपाटी के अनुसार होती है। खस जनजाति की सबसे बड़ी विशेषता बहुपति प्रथा है। सामान्यतया यहाँ के परिवारों में जब किसी एक भाई की शादी हो जाती है तो शेष भाई भी उसे पत्नी मान लेते है। एक स्त्री सभी भाइयों की पत्नी समझी जाती है।
इसे द्रौपदी विवाह का नाम दिया जाता है। यहाँ की महिलाएँ द्रौपदी की देवी के रूप में मानती हैं एवं उसकी पूजा-अर्चना करती है। यहाँ शादी के दौरान खूब मदिरा सेवन करने की अनोखी परंपरा भी है।
सामान्य रूप से हिंदू परिवारों में लड़के-लड़कियों की कुंडली मिलाई जाती है। और मिल जाने पर विवाह तय होता है, परन्तु अपने देश के उत्तरी-पूर्वी सीमांत प्रदेश में खोग जाति में कुंडली मिलाने की प्रथा बड़ी विचित्र है। इस जाति में लड़के -लड़कियों को अपना जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता नहीं होती है। लड़के का पिता पुत्र के लिए वधू तलाशने जाता है। शादी की सहमति के पश्चात् समाज के अन्य प्रतिष्ठित लोगों को आमंत्रित किया जाता है। इसी के साथ लड़की पक्ष वाला मुर्गी एवं लड़के का पिता मुर्गा लेकर आता है। समाज का ओझा (पुजारी) मुर्गी एवं मुर्गे की जीभ काटकर उसके चिह्नों का मिलान करता है। यदि सब कुछ उपयुक्त होता है तो विवाह को शुभ मान कर स्वीकृति दे दी जाती है। शेष कार्य जातीय परंपराओं के अनुरूप किए जाते है।
गुजरात की अहीर जाति में साल में केवल एक बार शादी होती है। गुजरात में कच्छ के 40 गाँवों में 40 हजार अहीरों की आबादी है। यहाँ की परंपरा है कि बैसाख महीने की त्रयोदशी तिथि को ही विवाह के लिए शुभ माना जाता है। यहाँ की मान्यता है कि श्रीकृष्ण की बहिन सुभद्रा का विवाह अर्जुन के साथ बैसाख कृष्ण त्रयोदशी तिथि को ही हुआ था। यहाँ इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण के आशीर्वाद को फलित माना जाता है इसी मान्यता के कारण यहाँ के अहीर समाज में बैसाख की त्रयोदशी तिथि को सामूहिक विवाह किया जाता है। मंडप में अगणित जोड़े अपने विचित्र रस्मोरिवाज के साथ विवाह करते है। विवाह के इस शुभ अवसर पर स्त्रियों के समान पुरुष भी कान, गले और पैरों में भारी आभूषण पहनते है और हाथ में तलवार धारण करते है। विवाह में मंत्रों एवं श्लोकों का उच्चारण नहीं किया जाता, बल्कि अग्नि के चार फेरे लिए जाते है। घनिष्ठ परिजनों एवं सगे संबंधियों की मृत्यु के बावजूद इस तिथि को विवाह का कार्यक्रम स्थगित नहीं होता।
‘इनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन एंड एथिक्स’ के अनुसार विवाह कई प्रकार के होते है-सजातीय अन्तर्जातीय आदि। ब्रिटेन में प्राचीन समय में बहुपति प्रथा प्रचलित थी। एक महिला के दस से बारह पति हुआ करते थे। जिसमें से एक उसका स्वयं का भाई होता था। आयरलैण्ड में दहेज पति को देना पड़ता था। दहेज ससुर लेता है और उस संपत्ति पर इक्कीस साल तक अधिकार बनाए रखता है। आयरलैण्ड के इतिहास में राजा लिंसवट का विवाह उसकी अपनी ही माँ से करने का प्रमाण मिलता है। उसकी पत्नियों में दो सगी बहिनें भी शामिल थी। एफ.एल.ग्रिफिथ के अनुसार इजिप्ट की आकुरे जाति में भाई-बहिन के बीच विवाह परंपरा प्रचलित है।
डब्लू जे. बुड हाउस ने अपनी शोध में ग्रीक में विवाह का रोचक वर्णन किया है। वहाँ दुल्हन को कई प्रकार के रंगों से रंगा जाता है। दहेज में दुल्हन के साथ उसके सारे खिलौने, गुड़िया एवं अन्य प्रकार के श्रृंगार -प्रसाधनों को रखा जाता है, विदाई के समय दहेज की तय रकम को यदि नहीं चुकाया जा सका, तो शेष रकम को वर पक्ष ब्याज के साथ वसूलता है यहाँ पर पत्नी की सुरक्षा दहेज के आधार पर होती है। ईरानर में विवाह पूर्व चाँदी के सिक्के दिए जाते है। शादी एवं इसके उपरांत इन सिक्कों का विशेष योगदान होता है। यहाँ भी वर एवं कन्या दोनों को ही हल्दी लगाई जाती है।
एफ.डब्लू. कुशकर ने अपनी कृंति’ मैरज इन जापान’ में जापान और कोरिया में विवाह की परंपराओं एवं प्रचलनों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। यहाँ की तैहस्यो जाति में दूल्हा एवं दुल्हन को उपहारस्वरूप शराब दी जाती है। दूल्हा एवं दुल्हन दोनों ही एक दूसरे को नौ बार शराब पिलाते है। इसके पश्चात् भव्य भोज का कार्यक्रम चलता है। कोरिया में कन्या वर से बड़ी यहाँ बहुविवाह निषिद्ध माना जाता है। तलाक के छह माह पश्चात् ही यहाँ पुनर्विवाह हो जाता है।
मनीषी अब्राहम की ‘बुक ऑफ डिलाइट’ में जेविश विवाह का उद्धरण मिलता है। कन्या को तेरह साल तक मांगलिक मानकर विशेष ध्यान दिया जाता है। यहाँ विवाह के लिए कन्या का समर्थन आवश्यक माना जाता है। इसीलिए लड़की को खुश करने के लिए अनेकों उपक्रम किए जाते है। कभी -कभी तो बाकायदा उत्सव का वातावरण विनिर्मित किया जाता है,
जिससे विवाह के लिए लड़की का समर्थन प्राप्त किया जा सकें। इजराइल में अपने कुलदेवता को साक्षी मानकर सात आशीर्वाद दिए जाते है। यह आशीर्वाद गीतों के माध्यम से दिए जाते है, जो केवल महिलाएँ ही प्रदान करती है।
डब्ल्यू, बोर्डे फाउलर ने अपने शोधग्रंथ, 'रिलीजियस एक्सपीरियेन्स ऑफ द रोमन पीपल’ में रोम में होने वाले विवाह प्रचलनों का उल्लेख किया है रोम में मई माह को विवाह के लिए अपशकुन एवं जून के प्रथम सप्ताह को विवाह के लिए शुभ माना जाता है। दुल्हन को लाल या पीला मुकुट पहनाया जाता है। उसके बालों को मालादार चर गुच्छकों में सँवारा जाता है। जो संभवतः उनकी पुरातन संस्कृति का प्रतीक है। दुल्हन के बायें एवं वर के दायें हाथ को पवित्र बंधन से बाँधकर यज्ञनुमा वेदी या अन्य पवित्र स्थानों की परिक्रमा कराई जाती हैं। विदाई के समय दूल्हा दुल्हन को झटके के साथ खींचता है। इस रस्म के पश्चात् विवाह सम्पन्न होता है। विदाई के समय दुल्हन को चाँदी के तीन सिक्के दिए जाते है। इसमें से एक को अपने पति को, दूसरा यज्ञाग्नि को तथा तीसरा अपने स्वर्णिम भावी जीवन हेतु आकाश को समर्पित करती है। सीजर की माँ जूलिया और कैरीओलेन्स जैसी इतिहास प्रसिद्ध नारियाँ भी इसी परंपरा में पत्नी बनी थी।
जे. मेकाले के अनुसार स्लोवेक में कन्या को युद्ध से जीतकर लाया जाता था। यहाँ की जुगोस्लैव जाति में यह प्राचीन परंपरा भी कायम है। विवाह के समय यहाँ दो तरह की तैयारियाँ होती है-एक तो मंगल पाणिग्रहण की एवं दूसरी युद्ध की। जो जीतता है वही कन्या को वरमाला पहनाकर दुल्हन के रूप में पाता है। इस अवसर पर वर-वधू को खूब सजाया-सँवारा जाता है दुल्हन को ससुराल में छुपा दिया जाता है, जिसे सिर्फ दूल्हे को खोजने का अधिकार होता है। इसके बाद भावी संतान के प्रतीक के रूप में दुल्हन की गोद में एक छोटे-से बच्चे को रख दिया जाता है। दक्षिण रूस में इस अवसर पर दुल्हन की गोद में मुर्गी रखी जाती है। यहाँ दुल्हन को एक लम्बी -सी टोपी पहनायी जाती है। फिर दुल्हन अपने पति के हाथ एवं पैरों को बाँध देती है। इसके पश्चात् ही विवाह की रस्म पूरी होती है।
अम्ब्रन एवं उकीमास द्वीप समूह में विवाहोपरान्त लड़का, लड़की के अधिकार में होता है। लड़के को अपनी ससुराल में रहना पड़ता है और वह तब तक रहता है जब तक कि अपनी पत्नी का मूल्य ससुर को चुकता न कर दें। पत्नी की सारी संतानें उसके श्वसुर के ही अधिकार में होती है। सेराँग में कन्या विदाई के दौरान ही वर से दहेज वसूलने की प्रथा है। टोरेस में लड़की का पिता अपने दामाद से दहेज के रूप में उसकी होने वाली सभी संतानों को माँगता है।
कुछ भी हो, विवाह एक सामाजिक परंपरा है। इसके पीछे व्यक्ति, परिवार एवं समाज के विकास का मूल्य छिपा रहता है। अतः आपसी तालमेल एवं सामंजस्य द्वारा इस प्रथा- परंपरा का गौरव बनाए रखना चाहिए। विवाह में त्याग, संयम एवं सहिष्णुता का स्वरूप बने रहना चाहिए, जिससे जीवन सुखी, संपन्न एवं समृद्ध रह सकें।
आमंत्रण
मिशन के साहित्य संपादन (हिन्दी/अंग्रेजी/गुजराती) में जिन परिजनों की अभिरुचि हो एवं योग्यता प्राचार्य, प्रोफेसर, व्याख्याता स्तर की हो, न्यूनतम 3 माह का समयदान दे सकें, वे कृपया संपूर्ण विवरण (नाम -पता, आयु, योग्यता, पद -व्यवसाय, साहित्यिक अनुभव) सहित पत्र -व्यवहार करने का अनुग्रह करें।
आमतौर से सादगी का ब्राह्मणोचित जीवन लोगों को रास नहीं आता। सभी आलसी और विलासी रहना चाहते हैं। समय प्रवाह के सर्वथा विपरीत शाँतिकुँज रूपी शक्ति केंद्र के साथ जुड़े हुए और निजी जीवन में बढ़-चढ़कर आदर्श उपस्थिति करने वाले सद्गृहस्थ पर रहकर भी पुरातनकाल के ब्राह्मणों जैसी जीवनचर्या अपनाते है। जो गड़बड़ करते है, मार्गभ्रष्ट होते हैं, वे या तो हट जाते हैं या हटा दिए जाते हैं। जनसमुदाय ऐसे व्यक्तियों को किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं करता व लोकैषणा में उलझा व्यक्ति स्वयं अपने पैरों कुल्हाड़ी मारकर ग्लानि भरा भारभूत जीवन जीता देखा जा सकता है।
ईसा की लोककथाएँ-नीतिकथाएँ सर्वप्रचलित है। एक गुलाम कहे जाने वाले व्यक्ति ईसा के जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ एक घटनाक्रम से आया। ईसा जिस जमींदार का गुलाम था वह किसी दूसरे जमींदार से शर्त हार गया। अतः शर्त के अनुसार हारे हुए जमींदार को एक विचित्र सजा भुगतनी पड़ी। शराब के नशे में सजा भी बड़ी विचित्र सुनाई गई। समुद्र का पूरा पानी पीने की सजा शर्त हारने वाले जमींदार को मिली। भला आदमी के लिए यह कैसे संभव है? किंतु सनकियों और शराबियों के लिए तो कुछ भी कहकर अपनी प्रभुता स्थापित करने के घटनाक्रम इतिहास में कई है। ईसा ने अपने मालिक को परेशान देखकर कहा -यदि आज्ञा दें, तो मैं मुक्ति का उपाय बतलाता हूँ। जमींदार बोला कि यदि इससे यह पीछा छुड़ा दे तो ईसा को वह मुक्त कर देगा।
सायंकाल सभा आयोजित की गयी। सभी समुद्रतट पर पहुँचे। शर्त बतायी गयी व ईसा के मालिक को समुद्र में निरंतर गिर रही नदियों को थोड़े समय के लिए रोक दे तो हमारे मालिक निश्चित ही समुद्र का पानी आनन-फानन में पी जाएँगे। ईसा की यह चतुराई भरी बात सुनकर सभी ताकते रह गए। ईसा ने अपनी बात को नीतियुक्त बताते हुए समझाया-मानव जीवन भी इसी प्रकार है। जब तक मन की इच्छाओं की पूर्ति होती रहती है, तब तक वह आपाधापी में लगा रहता है। मन रूपी समुद्र में यदि वासनाओं की नदियों को न बहने दिया जाए तो वासनाएँ स्वतः तिरोहित हो जायेगी।
ईसा ने केवल मुक्त हो गए, वही से उनके अंदर के नीति कथाकार के रूप में उनका अवतार हुआ। आज विश्वभर में साहित्य में उनका महत्वपूर्ण स्थान है।
वह बिना हाथ हिलाए चीजों को इधर से उधर सरका देती थी। वैसे तो वह ग्रामीण महिला थी, पर नाक-नक्श उसके असाधारण थे। देखने वालों को लगता था कि वह सदा किसी न किसी अज्ञातशक्ति से अभिभूत रहती है। उसे कुछ अलौकिक शक्तियाँ भी प्राप्त थी। ये शक्तियाँ उसमें कब उभरी, उस बारे में उसके निकटस्थ जनों को तो क्या शायद उसे खुद भी कुछ नहीं पता था।
एक बार सेना के एक अधिकारी ने उससे अपने सम्माननीय अतिथियों के समक्ष कोई करिश्मा दिखाने का आग्रह किया। उसने जो प्रदर्शन किया उससे उस अधिकारी के तो पसीने ही छूट गए। बड़ी मुश्किल से लोगों की प्रार्थना पर उसने अपने प्रदर्शन को रोका। बेचारा सैन्य अधिकारी तब तक “जान बची तो लाखों पाए” की मनःस्थिति में आ चुका था।
उसका नाम था पैलाडिनो नीपोलिट। बचपन से वह न जाने कैसे अचानक अलौकिक कारनामे करने लगी। लोगों के कहने पर उसकी इस अलौकिकता से भयभीत माता-पिता ने अगणित टोने-टोटके भी करवाए पर परिणाम कुछ भी नहीं निकला। लोग उसके करिश्मों की चर्चा सुन-सुनकर हैरान और जर्मनी के प्रमुख वैज्ञानिकों ने अपनी जाँच-पड़ताल के बाद कहा कि उस पर कोई भूत-प्रेत का प्रकोप नहीं हैं, बल्कि उसके कारनामे अलौकिक सत्ता की सौगात है। उस दौर विशेष में वह किसी अज्ञात शक्ति से संचालित होती है।
वह जाने -अनजाने कुछ करती और कुछ विचित्र स्वतः घटित हो जाता। वैज्ञानिकों ने फिर शंकाएँ की। अतः 1892 में वैज्ञानिकों के एक समूह ने जिसमें प्रोफेसर शियापरेली, प्रो. ब्रीफेरियो, प्रो एम.अक्साकाँफ, प्रो. रिचँट तथा प्रो. लैम्ब्रासों शामिल थे, उसका परीक्षण किया। मिलान शहर में संपन्न हुए इन वैज्ञानिकों ने अपने परीक्षणों में यह पता लगाने की भी कोशिश की कि पैलाडिनो द्वारा किए जा रहें थे विलक्षण कारनामे क्या सर्वाधिक कष्टकारी स्थितियों में भी संभव है? इस परीक्षण के प्रदर्शन के दौरान लोगों को अलौकिक हाथ दिखाई पड़े। मेज़ तथा अन्य फर्नीचर तीन से चार फुट के अर्द्ध व्यास में हवा में तैर गए। अलौकिक आत्मा का आह्वान करने वाले एक यंत्र, जिसका भार मात्र सत्रह पौंड था, मैं भी परिवर्तन आया। कई तरह से जाँच -पड़ताल के बाद भी वैज्ञानिक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाए कि ऐसा क्योंकर सम्भव हुआ। हाँ, वह खुद इन विचित्रताओं पर आश्चर्यचकित रहती थी।
उसके चौंकाने वाले विचित्र करिश्मों की चर्चा थी। तभी एक अजीब घटना घटी। यह घटना सन् 1903 -04 की है। नेपल्स की ‘विला ला क्लोरिडएना’ नामक भव्य इमारत का मालिक एक उसका परिचित था। धनवान् होने के साथ ही वह समाज में भी काफी प्रतिष्ठित था। नाम था उसका मेजर अलेक्जेन्डर हेनरी डेविस। उसके यहाँ उन दिनों कुछ विशिष्ट मेहमान रहा करते थे। कुछ अल्पकाल के लिए आते, कुछ लम्बे समय तक ठहरते।
एक दिन उसने सभी को रविवार के अवकाश के मूड में पाकर पूछा, मैं चाहता हूँ कि आप सबका शानदार मनोरंजन करूं। बताइए आप लोग किस तरह का कार्यक्रम पसंद करेंगे? बातचीत के इस क्रम में कई तरह के प्रस्ताव आए। कुछ का समर्थन हुआ और कुछ का विरोध भी। अंततः एक ने कहा, मेजर डेविस! कम लोगों ने पैलाडिनो की अलौकिक शक्ति के बारे में सुना है। हम सहज विश्वास ही नहीं कर पाते उनकी सच्चाई पर। क्या आप हमें पैलाडिनो के करतब दिखलाकर धन्य करना चाहेंगे? बड़ा मनोरंजक होगा वह कार्यक्रम।
मेजर डेविस ने कहा, यदि वे नगर में उपलब्ध हुई और उनका कोई कार्यक्रम पूर्व निर्धारित नहीं है तो हम प्रयत्न कर देखते है और उसने झट से एक बग्घी उसे लाने के लिए भेज दी। कोई आधे-पौन घंटे के बाद पैलाडिनो मेजर के भवन पर आ गयी।
जब वे लोग पैलाडिनो का इंतजार कर रहे थे, तब एक भव्य हाल की खिड़की से नेपल्स खाड़ी का सुंदर दृश्य निहारते हुए अलौकिक शक्तियों के कारनामों पर अपने अपने अनुभव सुना रहें थे। जैसे ही पैलाडिनो के आगमन की सूचना उनको मिली, उन सबने उस तरफ देखा। लोग चकित थे। यह तो बड़ी साधारण-सी शक्ल एवं सामान्य-सी लगने वाली महिला है। इसमें भला क्या अलौकिक शक्ति होगी?
मेजर डेविस ने आगे बढ़कर उनका स्वागत करते हुए उनकी अलौकिक शक्ति की खिल्ली उड़ाने जैसे अंदाज में कहा-मैडम पैलाडिनो आप तो अलौकिक शक्ति की स्वामिनी है। सुना है, कितना ही भारी फर्नीचर हो, उसे बिना छुए ही चलायमान करने की शक्ति आप में है।
पैलाडिनो में अहंकार तो जैसे था ही नहीं। वह तो खुद ही अपनी इस तरह की शक्ति से डरी सहमी रहती थी। बोली-मैं कोई करिश्मा दिखला पाने का वायदा तो नहीं करती मेजर, लेकिन भरसक कोशिश करूंगी कि आप लोगों का मनोरंजन हो सकें।
हाँ मैडम कीजिए। हम सब आपकी विलक्षण शक्ति का प्रदर्शन अपनी आँखों से देखने को छटपटा रहें है। उन मेहमानों में से एक ने अपनी उत्सुकता जताते हुए कहा।
पैलाडिनो उस हॉल के बीचों-बीच आई। उसका मुँह थोड़ा-सा खुला हुआ था। होठों ही होठों में वह कुछ बुदबुदा रही थी या कोई प्रार्थना-मंत्र बोल रही थी, कहा नहीं जा सकता था, पर उस समय उसके होठ हिल रहें थे। लगता था कि वह म नहीं मन परमात्मा को स्मरण कर रही थी। इसी बीच उसकी निगाह उस बड़ी संगमरमर की मेज़ पर टिक गई, जो उसके सामने रखी थी। उसने अपने दोनों हाथ उसकी दिशा में बढ़ाए। देखते ही देखते उसकी भाव-भंगिमाएँ बदलने लगी। चेहरे पर एक के बाद एक भाव आते-जाते वह उसी तरह बुदबुदाती रही। कुछ क्षण पहले सहमी -सहमी सी भयभीत लगने वालों वह महिला अब तनकर खड़ी थी। लग रहा था कि वह साहस की जीवंत प्रतिमा है। उसके नेत्रों में एक खास तरह की चमक उभर उठी, चेहरा दीप्त हो उठा।
और उसके बाद एक अजीब प्रसंग उपस्थित हुआ। दिन-दहाड़े तेज रोशनी में सबने आँखें मलते हुए गौर से देखा कि उसके हाथों से निकलकर दो लंबी लकीरें मेज़ तक तक जा पहुँची। जैसे हो उन दो सफेद शक्ति की लकीरों ने उस संगमरमर की भारी-भरकम मेज़ का स्पर्श किया, वैसे ही वह मेज़ कमरे में तेजी से चलने लगी। लोग आँखें फाड़े देख रहे थे कि पहले तो मेज़ इधर-उधर हिली–डुली, अंततः उसका रुख डेविस की तरफ हो गया। वह मेज़ मेजर डेविस की तरफ जा पहुँची। मेजर भय के मारे थर-थर काँप उठा। दर्शक वर्ग हैरत में खड़ा था।
दूसरी तरफ पैलाडिनो कमरे के मध्य उसी जगह स्थित थी। लोगों को तब लगने लगा था कि वह जीवित स्त्री नहीं कोई बुत है। उसके हाथों की लकीरें मेज़ को छूने को बेचैन सी लगी। उसकी आँखों की चमक अब धुँधला रही थी। उसमें शून्यता का भाव उभर उठा था। लग रहा था कि उस सारे घटनाक्रम से उसका कुछ लेना-देना नहीं है।
जबकि वह मेज़ तेज गति से मेजर डेविस की तरफ बढ़ती जा रही थी। मेजर के मुँह में कीमती सिगार था, वह छूटकर गिर पड़ा। भय-रोमांच हँसी के क्षणों में उलझा वह मेजर थर-थर काँप रहा था।
और सभी लोग चीख उठे-संगमरमर की भारी मेज़ का सिरा मेजर डेविस के सीने तक पहुँच गया? वह पूरी ताकत से उसे पीछे धकेलने लगा, लेकिन मेज़ पीछे नहीं खिसकी। मेजर आसानी से हार मानने वाली जीव नहीं था। वह डटकर उसे धकेलता रहा, लेकिन उसे जरा-सी भी सफलता नहीं मिली। थककर वह सहायता के लिए चीखा। क्योंकि मेज़ और दीवार के बीच वह फँस चुका था। मेहमानों की भीड़ ने मेज़ को पीछे खीचना चाहा, पर कुछ भी नतीजा नहीं निकला। पैलाडिनो की मुद्रा अब ओर भयावह हो चुकी थी। मेजर डेविस को लग रहा था कि अब उसका आखिरी क्षण आ गया है, तभी दर्शकों में से एक-दो ने पैलाडिनो के चरणों में गिरकर कहा-दैवी पैलाडिनो! अब मेजर पर रहम कीजिए। अपनी अलौकिक शक्ति से मेज़ को पीछे बुलाइए, अन्यथा.....................
आपका आग्रह है तो .....................कहकर पैलाडिनो ने होठ बंद कर लिए। हाथों से निकलने वाली वे श्वेत लकीरें देखते-ही देखते गायब हो गयी। मेजर डेविस पसीना पोछते-पोछते पैलाडिनो का आभार व्यक्त करने लगा कि उसकी कृपा से ही वह जिंदा रह सका।
अब पैलाडिनो सहज हो सबसे बातें करने लगी। हाथ से निकलती वे अद्भुत लकीरें चर्चा का विषय रही, पर मेजर डेविस की हालत देखने लायक थी। सभी दर्शक पैलाडिनो के प्रति आभार व्यक्त करते हुए सोच रहे थे कि मनुष्य में कितनी रहस्यमयी सामर्थ्य है। मनुष्य उतना ही नहीं है जितना कि वह दिखाई देता है, बल्कि दिखाई देने वाली सामर्थ्य से कही हजार गुना अधिक वह अंतर्निहित सामर्थ्य है, जो अलौकिक-अदृश्य होने के साथ अद्भुत हैं। जरूरत है तो सिर्फ इसके जागरण की। इसका जागरण ही साधारण मानव की महामानव में बदल देता है।
नेहरू जी को पुस्तकों से बहुत प्रेम था। वे पुस्तकों की इतनी देख-भाल और साज-सँभाल रखते थे कि वे वर्षों नई सी बनी रहती थी। एक एक बार लखनऊ में वे अपने मित्र मोहनलाल सक्सेना के यहाँ ठहरे। स्वभाव के अनुसार उनकी नजर उनकी पुस्तकों की अलमारी पर गई। अलमारी में पुस्तकें बहुत अस्त-व्यस्त उल्टी-सीधी पड़ी देखकर उन्हें बड़ी वेदना हुई और वे उनकी धूल झाड़ पोंछकर उन्हें व्यवस्थित करने लगें।
जब मोहनलाल वापस आए, तो उनसे कहा-क्यों भाई मोहनलाल! तुम जब अपने घर की पूजा की मूर्तियों, तस्वीरों को साफ कर सकते हो, तो पुस्तकों को क्यों नहीं करते? यदि मूर्तियाँ और तस्वीर तुम्हें मार्गदर्शन दे सकती है, तो पुस्तकों को भी जीवंत प्रतिमा से कम नहीं समझा जाना चाहिए। मित्र से कही गयी जवाहर लाल जी की यह चुभती हुई उक्ति हम सब के लिए है, जो पुस्तकों की कद्र नहीं करते।
आषाढ़, श्रावण ओर यहाँ तक कि भाद्रपद भी बीतने को चला, पर जल की एक बूँद भी न गिरी। जेठ कब का गुजर चुका था, किंतु उसकी तपन अब भी शेष थी। अन्न के कोठार खाली हो रहें थे। सूखे कंठ को तर करने के लिए न जल था, न उत्तप्त गर्मी से राहत पाने के लिए किंचित् ठंडा पानी। कुएँ, बावड़ी, नदी-नाले सब सूखे पड़े थे। उस पर अन्न का अभाव मानों कोढ़ में खाज उत्पन्न कर रहा था। इतनी विकट स्थिति? ऑफ! सर्वत्र हाहाकार मच रहा था, इसका उपाय क्या हो? इससे कैसे निपटा जाएँ? बुद्धि निरुपाय हो रही थी। समाधान के उसके सारे अस्त्र चुक चुके थे। इस तरकश में में कोई अजेय ब्रह्मास्त्र भी तो न था कि इस विषम परिस्थिति का मुकाबला किया जा सकें। हाय! तो क्या धरती जनशून्य बन जायेगी। मनुष्य के बीज किसी मनु के पास सुरक्षित न रह पाएँगे। वर्षों की कठोर साधना से उपजी यह सभ्यता क्या देखते -देखते समाप्त हो जाएगी। मनीषा संत्रस्त हो रही थी। भूख से बिलखते शिशु, बिलबिलाते किशोर, निराहार तप का कठोर व्रत लिए युवक और तड़पते प्राण त्यागते वृद्ध वातावरण को और भी अधिक सघन वेदना से भर रहे थे। सबों के चेहरों पर मुर्दनी छायी हुई थी। मरघट की नीरवता घरों को और अधिक विकराल बना रही थी। रह-रहकर होने वाला नौनिहालों का क्रंदन श्मशान में हुआ हुआ करते सियारों की अनुभूति कराता था। सर्वत्र गम के ही घटाटोप थे।
महर्षि अंगिरा भी इससे सर्वथा अछूते न थे। अपनी एकांत कुटिया में बैठे गहन चिंतन में निमग्न इसी विषय पर सोच रहे थे हर पल उनके चेहरे के भाव बदल जाते, जिससे ऐसा प्रतीत होता कि ऋषि भी प्रस्तुत संकट के प्रति उतने ही चिंतित है जितना कि जन-सामान्य कभी कभी उनके मन में विचार उठते -तू क्यों वृथा परेशानी मोल ले रहा है? किंतु दूसरे ही पल इसके विपरीत विचारधारा हुँकारती सुनाई पड़ती -तो तू क्या मूकदर्शक बना रहेगा? तेरी अंतरात्मा तुझे धिक्कारती क्यों नहीं? समाज के सामने इतनी गंभीर समस्या आ उपस्थित हुई है और तू अपनी ध्यान -साधना के पीछे -अपने स्वार्थ एवं अपनी उन्नति के पीछे भाग रहा है। अपनी निज की उन्नति के पीछे। नहीं! इस तुच्छ प्रयोजन के लिए तू समाज से मुँह नहीं मोड़ सकता। तू समाज का अंग है, उसके प्रति अपने कर्तव्यों की उपेक्षा नहीं कर सकता। अपने दायित्वों को तिलाञ्जलि नहीं दे सकता। इस संकट को घड़ी में समस्या का हल ढूँढ़ना ही तेरी सबसे बड़ी साधना एवं जीवन का सर्वोपरि लक्ष्य है।
इन विपरीत विचार तरंगों से महर्षि तिलमिला उठे। बेचैनी उनके चेहरे पर स्पष्ट झाँकने लगी। निर्णय करने की बुद्धि जाती रही। वे दुविधा में ही पड़ें थे कि अंतरात्मा की आवाज गूँजी, तुम्हारा असमंजस अभी तक गया नहीं, उठो ओर समाधान की बात सोचो।
इस बार महर्षि के चेहरे में दृढ़ता झलक रही थी, कदाचित कर्तव्यबोध हो गया था। हाँ, बात ऐसी ही थी। एक बार पुनः उनके मुखमंडल के भाव तीव्रता से परिवर्तित होने लगें। पर इस बार निराकरण के प्रति चिंतित होने के कारण या किसी अन्य ऊहापोह के कारण नहीं। सहसा उनकी आँखों में चमक पैदा हुई। मन में विचार आया कि इस संकट का समाधान तभी हो सकता है, यदि वरुण देवता की पूजा-आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया जा सके। बस फिर क्या था? वे जंगल छोड़कर आबादी वाले क्षेत्र में जा पहुँचे। सब लोग उन्हें अपने बीच पाकर प्रसन्न हो उठें। सोचा, निश्चय ही कोई समाधान लेकर ही महर्षि उपस्थित हुए हैं।
महर्षि अंगिरा ने वही दूसरे दिन एक विशाल सभा के आयोजन की घोषणा की। अगले दिन लोग नियत समय व स्थान पर एकत्रित हो गए। उद्बोधन शुरू हुआ।
"आत्मीयजनों! वर्तमान विपदा निश्चय ही अत्यंत गंभीर है। पर ऐसा भी नहीं है कि जिसका कोई हल ही न हो। एक हल अवश्य है, जिससे इस विषम परिस्थिति को टाला जा सकता है, किंतु इसमें एक अड़चन है”। इतना कहकर महर्षि अंगिरा कुछ रुक गए सभा मंडप से आवाजें आने लगी-महाभाग वह कैसी बाधा है? हम उसे दूर करने में कोई कसर नहीं उठा रखेंगे। आप आज्ञा करें”
ऋषिवाणी पुनः सुखरित हुई-समाधान कुछ जटिल है और उत्सर्ग की माँग करता है। बोलिए-आपमें से कौन है जो नरमेध यज्ञ की बलिवेदी पर चढ़ने के लिए तैयार है?”
मंडप में सन्नाटा छाया रहा। महर्षि को कोई उत्तर न मिला। थोड़ी देर इंतजार के बाद महर्षि की आवाज फिर गूँजी।
“ठीक है, तो संकट का हल मैं अपनी आहुति देकर ही करूँगा। आप में से कोई आगे आकर मुझे राजमंडप की वेदी में यूप से बाँधे और बलि चढ़ाकर इस आहुति प्रक्रिया को संपन्न करें”।
रुकिए देव! सभा मंडप के मध्य से एक किशोर की वाणी उभरी “मैं अपना बलिदान करने को तैयार है।”
महर्षि अंगिरा चौंके। दृष्टि आवाज की ओर अनायास ही उठ गई। देखा तो एक चौदह वर्ष का बालक बड़े गर्व से उनकी ओर चला आ रहा है। महर्षि के सम्मुख उसने हाथ जोड़ लिए और यूप में कसने का आग्रह करने लगा। महर्षि ने उस पर एक प्रेम भरा दृष्टि निक्षेप किया और मुस्कराकर बोले-नहीं वत्स! इस कार्य के लिए हम उपयुक्त है, तुम अभी बालक हो। यदि ऐसा हुआ, तो बाद की पीढ़ियाँ यह कहते हुए हमें कोसेगी कि ऋषि ने अपने प्राणों की रक्षा के लिए एक बालक का वध कर दिया।”
इतना सुनना था कि किशोर खिलखिलाकर हँस पड़ा। कहा-आप मुझे बालक समझ रहे है, आर्य। ठीक है, यह तो आपके अधिकारक्षेत्र में है। वय से कद-काठी से आप ऐसा मान सकते है, किंतु स्वल्प आयु के कारण ही दया का पात्र घोषित होना ओर गौरव से वंचित रह जाना, यह मुझे स्वीकार नहीं है। मुझे उम्मीद है कि आप अष्टावक्र एवं अभिमन्यु के प्रसंग को भूले नहीं होंगे। कद उनके अवश्य किशोरी जैसे थे, पर चेतना शूरवीरों की थी और शूरवीरों की आयु नहीं देखी जाती।”बालक उसी गर्व से आगे बोलने लगा-मैं उन्हीं अष्टावक्र एवं अभिमन्यु का अंशधर हूँ, उत्तराधिकारी हूँ। महाभाग! मेरी धमनियों में उन्हीं का रुधिर प्रवाहित हो रहा है। सीने में आर्यों का सा साहस और दिल में देव-पुत्रों जैसी उमंग है। मुझे स्वयं में गर्व अनुभव होगा, यदि समाज के किसी काम आ सकूँ। आप जीवित रहेंगे तो ऐसी विपत्तियों में समाज को मार्गदर्शन मिलता रहेगा। मेरा क्या है, एक उर्त्तक न रहा तो दूसरे पैदा हो जायेंगे, किंतु आपकी अपूर्णीय क्षति समाज कैसे बर्दाश्त करेगा? तनिक विचारिए तो सही। अस्तु सहर्ष मुझे स्वीकार करें। मुहूर्त निकला जा रहा है। अब विलंब न करे देव!
विवश होकर महर्षि अंगिरा बालक उत्तंक को लेकर आगे बढ़ गए और यत्र मंडप के यूप से बाँध दिया। एक अधेड़ व्यक्ति ने खड्ग उठाया ही था कि आकाश में तीव्र गड़गड़ाहट हुई और चकाचौंध करने वाली बिजली कौंधी। उपस्थित लोगों ने सिर उठाया तो खुशी से नाच उठे। देखते-देखते घनघोर वर्षा होने लगी। बालक उत्तंक की परीक्षा पूर्ण हुई वरुण देव ने इसके आत्मत्याग से प्रसन्न होकर इतनी वर्षा की जितनी कई वर्षों से नहीं हुई थी। सर्वत्र बालक उत्तंक की जय जयकार होने लगी। जेठ के आतप के बाद जब बरसात की रिमझिम फुहार बनकर बरसती है तो मनुष्य ही नहीं, पशु पक्षी भी झूम उठते है। संप्रति वातावरण भी कुछ ऐसा ही हो रहा था। मानो उत्तंक के आत्मोत्सर्ग के महत्व के चुंबकत्व में भगवत्कृपा ने आकृष्ट होकर वृष्टि का रूप ले लिया हो।
उत्तंक स्वयं भी आत्मोत्सर्ग के इस महत्व के परिणाम से विभोर हो उठा। उसने बड़े ही कृतज्ञभाव से महर्षि के सम्मुख विनम्र निवेदन किया-देव त्याग के इस महत्व से मैं अभिभूत हूँ अपना शेष जीवन भी आपकी ही भांति तप और त्याग में लगाना चाहता हूँ। इंद्रियों के भोग, जीवन की लालसाएँ अब मेरी प्राप्य नहीं रही। त्याग ही जीवन का अमृत है, यह मैंने जान लिया है और सचमुच बालक उत्तंक महात्मा उत्तंक बनकर त्याग का प्रतीक बन गए। उनके महनीय त्याग ने उन्हें शुनःक्षेप स्तर का इतिहास पुरुष बना दिया।
राजा ने प्राणों से प्रिय अपने राजकुमार को एक जाने माने संत को सौंपा। कहा कि हमें पूरा विश्वास है कि आप इसे समस्त विद्याओं में प्रवीण -पारंगत कर सच्चे उत्तराधिकारी के रूप में लौटायेंगे। पाँच वर्ष की अवधि तय की गयी। इसके बाद राजकुमार को वापस लौटाने का निर्धारण हुआ।
पाँच वर्ष बीत गए। एक बार भी राजा को राजकुमार से मिलने की अनुमति नहीं थी। अंततः संत राजकुमार को लेकर राजदरबार में लोटे। राजकुमार के सिर पर गूदड़ों की गठरी लदी थी, कुली जैसी पोशाक थी। राजा यह दृश्य देखकर हैरान रह गया। बोला कि हमने राजकुमार को कुली -कबाड़ी बनने तो आपके पास नहीं भेजा था। इतने में राजा को अभिवादन न करते देख संत ने एक बेंत राजकुमार की पीठ पर जमा दी। राजकुमार की चीख निकल गई। राजा बोले-बस महाराज जी हो गयी शिक्षा। अब आप इसे हमें सौंप दे।” मंत्रीगण व उपस्थित सभा सदस्य बोल उठे-आपको दिखाई नहीं देता, यही राजकुमार कल राजा बनेगा। चमड़ी उधड़वा देगा।” महात्मा तुरंत बोल उठे-आज शाम तक यह राजकुमार नहीं मेरा शिष्य है। इसकी शिक्षा-दीक्षा शाम को पूरी होगी फिर यह जो भी करेगा, इसकी शिक्षा दीक्षा जो मैंने पाँच वर्षों में दी है, इस पर निर्भर करेगा।”
अपने राजकुमार के प्रति व्यवहार का स्पष्टीकरण देते हुए संत बोले -कष्ट कठिनाइयों, मान -अपमान, भले-बुरे, ऊँच-नीच कठिन-सरल अपने पराये का ज्ञान अनुभव राजकुमार को नहीं हुआ तो फिर वह प्रजा का दुख कैसे समझेगा? प्रजावत्सल कैसे बनेगा? न्याय कैसे कर पाएगा?
यही राजकुमार अपने गुरु के हाथों गढ़कर एक सफल न्यायप्रिय ‘शिखिध्वज’ नामक राजा के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
पुरुषोत्तम मास की नवमी तिथि, 23 मई 99 शनिवार की पावन दिन। शाँतिकुँज के अट्ठाईस वर्षीय इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय और जुड़ गया, जब गुरुसत्ता की सूक्ष्म उपस्थिति में संतों के सान्निध्य में देश विदेश से आए प्रायः तीस हजार से भी अधिक कार्यकर्ताओं द्वारा विस्तार योजना के अंतर्गत खरीदे गए दिल्ली-ऋषिकेश रोड स्थित नए परिसर में विश्वविद्यालय स्तर के देवसंस्कृति शिक्षण एवं शोध संस्थान का भूमिपूजन-नींवस्थापन कार्यक्रम संपन्न हुआ। जो भी परिजन अखण्ड ज्योति के माध्यम से गायत्री परिवार से जुड़े है, सभी शाँतिकुँज के क्रमशः विस्तार होकर आज की स्थिति के प्राप्त स्वरूप को जानते है, समझते है। महाकाल के स्तर की योजना ही गोवर्धन बाँधने, सेतुबंधनं विनिर्मित होकर तैयार होकर तैयार होने के रूप में यह विलक्षण सरंजाम प्रस्तुत करती रही है। मानवी-पुरुषार्थ इसमें बड़ा-छोटा व नगण्य-सा प्रतीत होता है।
प्रस्तुत कार्यक्रम जिस अलौकिकता एवं भव्यता के साथ संपन्न हुआ, उससे उपस्थित सभी को विश्वास हो गया कि हर रचनात्मक कार्य जो आज की वेला में हाथ में लिया गया है, न केवल राष्ट्र की एक महती आवश्यकता को पूरी करेगा, दैवी -सत्ताएँ भी सदा संरक्षण देती रहेगी। एक विलक्षण अनुभूति उपस्थित सभी परिजनों-विशिष्ट अतिथियों व दर्शनार्थियों को हुई। राजतंत्र धर्मतंत्र एवं प्रचारतंत्र (मीडिया) के समर्थ-सशक्त प्रतिनिधियों की भागीदारी से यह आयोजन एक विशिष्टता को प्राप्त हो संस्था की गरिमा की कई गुना बढ़ गया। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा स्थापित युगतीर्थ आँवलखेड़ा, गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं सप्तर्षियों की तपःस्थली शाँतिकुँज हरिद्वार परंपरा से से प्रायः पाँच ही पर्व वर्षों से मनाए जाते रहें है। वसंत पंचमी (गुरुसत्ता का आध्यात्मिक जन्मदिवस), चैत्र एवं शारदेय नवरात्रि, गायत्री जयंती एवं शारदेय नवरात्रि, गायत्री जयंती एवं गुरुपूर्णिमा। विगत पाँच वर्षों से भाद्रपद पूर्णिमा महालय प्रारंभ की तिथि पर परम वंदनीया माताजी का महाप्रयाण दिवस भी शक्ति दिवस के रूप में मनाया जाता है। परमपूज्य गुरुदेव का महाप्रयाण तो हुआ ही गायत्री जयंती-गंगादशहरा की पुण्य तिथि को था। इसी कड़ी में इस वर्ष के अधिकमास की ज्येष्ठ शुक्ल नवमी तिथि भी जुड़ गयी, जिस दिन तीनों ही केंद्रों के प्रतिनिधियों, सुदूर से आए विशिष्ट कार्यकर्तागणों ने, नारी शक्ति एवं प्रज्ञा मण्डलों के प्रतिनिधिगणों ने इस पूजनक्रम में भाग ले, इसे एक अविस्मरणीय क्षण बना दिया।
दिनाँक 22 एवं 23 मई की तिथि, नए बनने वाले भवनों के वास्तुनिर्माण की डिजाइन तय हो जाने के पश्चात् कार्य संचालन मंडल द्वारा सुनिश्चित की गयी थी। अप्रैल माह के द्वितीय सप्ताह में इस कार्य का प्रारंभिक चरण पूरा हुआ, जब सुप्रसिद्ध आर्कीटेक्ट श्री चंद्रकांत भाई पटेल (मुम्बई) एवं प्रारम्भ से शाँतिकुँज के सभी भवनों की आधारशिला से उन्हें पूर्णता तक पहुँचाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले नागपुर के हमारे वरिष्ठ परिजन आर्कीटेक्ट श्री शरद पारधी जी ने विश्वविद्यालय स्तर के पाँच वर्ष में बनकर तैयार होने वाले देवसंस्कृति के प्रचार-प्रसार शोध एवं शिक्षण के संस्थान का वास्तुशिल्प वैसा ही बनाकर प्रस्तुत किया जैसा कि परमपूज्य गुरुदेव की सत्ता चाहती थी। श्री चंद्रकाँत भाई पटेल ने स्टॉक एक्सवचेंज टॉवर (मुम्बई) के अतिरिक्त कई विशाल भवनों का निर्माण किया है एवं शाँतिकुँज के इस अभियान से विगत पैंतीस वर्षों से जुड़े हुए है। उनने श्री शरद पारधी जी एवं केंद्र के निर्माण विभाग के सहयोग-समन्वय के आधार पर इस पूरी योजना को पूरा करने हेतु अपनी स्वीकृति दी एवं इस प्रकार शीघ्रातिशीघ्र शुभारंभ करने की दृष्टि से 22,23 मई की तिथि सुनिश्चित कर दी गयी। समय कम था। सभी को सूचना न दी जा सकी रिजर्वेशन न मिलने व गर्मी की छुट्टियों की भीड़ आदि की मजबूरियों के कारण कई परिजन पहुँच न सके, फिर भी जनसैलाब दिनों दिन उमड़ता ही चला गया एवं ऐसा लगा कि गायत्री जयंती पर्व से प्रायः एक माह पूर्व उसी स्तर का का एक आयोजन हो रहा है।
निर्धारण यह किया गया कि धर्मतंत्र के प्रतिनिधि के रूप में राष्ट्र भर में मान्यता प्राप्त 126 वर्षीय संत वीतराग श्री कल्याणदेव जी महाराज, निवृत्तमान शंकराचार्य एवं भारतमाता मंदिर के संस्थापक -समन्वय परिवार के प्रमुख महामंडलेश्वर श्री सत्यमित्रानंद जी महाराज, राष्ट्र के सबसे बड़े जूना अखाड़ा के पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर, प्रभुप्रेमी संघ अम्बाला के संस्थापक श्री अवधेशानंद जी महाराज एवं परमार्थ निकेतन ऋषिकेश के वर्तमान प्रमुख-हिन्दू विश्वकोष के स्वप्नद्रष्टा मुनि श्री चिदानंद जी सरस्वती महाराज की पावन उपस्थिति में प्रारंभिक पूजन देव कन्याओं द्वारा हो गये एवं पुष्पाञ्जलि अर्पण सभी सन्तों व तन्त्रों के प्रतिनिधियों द्वारा होने के साथ ही प्रथम भवन भाषा एवं भाषा एवं धर्म विद्यालय का निर्माणकार्य आरम्भ कर दिया जाय। नालंदा एवं तक्षशिला विश्व विद्यालय परंपरा में स्थापित होने जा रहे ‘अध्यात्म विधा के प्रशिक्षण को संकल्पित कर इस संस्था द्वारा देव संस्कृति के निर्धारणों को राष्ट्र ही नहीं, विश्व के कोने कोने में पहुँचाने वाले निष्णात लोक नायकों का एक वर्षीय प्रशिक्षण होना है। इस कार्य को वरीयता देते हुए शुभारम्भ यही से किया गया। मात्र धर्मतंत्र ही नहीं, दैनिक जागरण समूह के वर्तमान प्रमुख सांसद सुप्रसिद्ध पत्रकार एवं लेखक श्री नरेन्द्र मोहन जी भी दोनों दिन आश्रम परिसर में ही रहे एवं अपने उद्बोधन क्षरा परिजनों का मार्गदर्शन किये। राजतंत्र के प्रतिनिधि के रूप में उ.प्र. के पर्यावरण मंत्री एवं हरिद्वार जिले के प्रभारी श्री विवेक कुमार सिंह एवं राज्य की श्रममंत्री श्रीमती प्रभा द्विवेदी सहित क्षेत्र के तमाम वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे। स्थानीय पत्रकार परिजनों के अतिरिक्त, लखनऊ, दिल्ली व आस पास के नगरों के सभी पत्रकार इस पावन बेला में उपस्थित थे। गायत्री तपोभूमि के व्यवस्थापक पंडित लीलापत जी शर्मा के प्रतिनिधि के रूप में श्री द्वारिकाप्रसाद जी चैतन्य श्री प्रमोद कुमार शर्मा एवं श्री रमेश चन्द्र पराशर जी उपस्थित हुए। आँवलखेड़ा व अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा के प्रतिनिधि भी मौजूद थे।
पूर्व संध्या की बेला में आस पास के प्रायः सौ किलोमीटर की परिधि तक के विभिन्न क्षेत्रों के हजारों परिजन बसों, ट्रैक्टर, ट्रॉलियों से जुलूस बनाकर एक विशाल वाहन रैली के रूप में नगर में प्रविष्ट हुए। सुदूर क्षेत्र के परिजनों का आवागमन दो दिन पूर्व में ही होना आरंभ हो गया था। दिल्ली से दैनिक जागरण समूह के प्रमुख श्री नरेन्द्रमोहन जी अक्षरा शाम शाँतिकुँज पधारे एवं उन्होंने देवसंस्कृति पर एक विराट प्रदर्शनी का मुख परिसर में उद्घाटन किया। इसमें भारतीय संस्कृति के मुख्य निर्धारणों से लेकर कैसे यह विश्वव्यापी बनने जा रही है एवं इसमें शाँतिकुँज के विराट तंत्र का क्या योगदान है। इस विषय को वर्तमान में प्रवचन भवन के दोनों ओर बड़ी आकर्षक प्रदर्शनी का निर्माण कर प्रदर्शित किया गया है। राष्ट्र के गौरवमय अतीत से लेकर भविष्य में ऋषिपरंपरा के पुनर्जीवन का कार्य कैसे इस विराट स्थापना द्वारा होने जा रहा है।, इसे देखकर कोई भी ऋषियुग्म की उज्ज्वल भविष्य की स्थापना की संकल्प को मूर्तिमान् होता अनुभव कर सकता है। संध्या वेला में 6:30 से 8:30 तक श्री नरेन्द्र जी, श्री विवेक कुमार सिंह (पर्यावरण मंत्री उ.प्र.) तथा केन्द्रीय प्रतिनिधि वीरेश्वर उपाध्याय जी ने उपस्थित हजारों प्रतिनिधियों को संबोधित किया। तीनों के उद्बोधन का सार संक्षेप एक ही था कि आज की नैतिक मूल्यों के पराभव की स्थिति का सुधार जीवनविद्या के इस आलोक केन्द्र की स्थापना एवं शाँतिकुँज के नित्य विराट होते चले जा रहे है। अभियान के माध्यम से ही होगा।
दिनाँक 23 मई रविवार को प्रातः तीन बजे ही आश्रम की दिनचर्या आरंभ हो गयी। प्रातः कालीन प्रार्थना ध्यान आदि के बाद शाँतिकुँज विस्तार -नूतन परिसर) दोनों स्थानों पर यज्ञशाला में यज्ञ संस्कार आदि का क्रम चला। यह यज्ञ दोनों स्थानों पर नित्य की तरह ब्रह्मवादिनी कार्यकर्ता बहिनों द्वारा संपन्न कराया गया।
नारी शक्ति ही इस पूरे कार्यक्रम में अग्रणी रही इक्कीसवीं सदी को परमपूज्य गुरुदेव ने ‘नारी सदी” घोषित किया है। इस भवितव्यता का आभास उपस्थिति परिजनों को हुआ जब प्रातः कालीन यज्ञ से लेकर मंचीय संगीत, पूजन वाले यजमान से लेकर यज्ञीय की ही उपस्थिति सबने देखी। कार्यक्रम का शुभारम्भ ठीक सात बजे प्रातः महामंडलेश्वर श्री सत्यमित्रानंद जी गिरि द्वारा ध्वजारोहण के माध्यम से हुआ। धर्म की पताका हिमालय की छाया व गंगा की गोद में स्थित सप्तर्षियों की इस भूमि में लहराने लगी एवं मातृ वंदना के साथ मंचीय कार्यक्रम आरंभ हुआ। मंत्र पर शुक्रताल मुजफ्फरनगर के वयोवृद्ध-ज्ञानवृद्ध वीतराग पं. श्री कल्याणदेव जी महाराज मुख्य अतिथि के रूप में विराजमान् थे। उनके द्वारा दीप प्रज्ज्वलन हुआ। मातृवंदना के मध्य ही सभी अतिथि मंचासीन हो चुके थे। शाँतिकुँज व गायत्री तपोभूमि मथुरा के प्रतिनिधि भी मंच पर मौजूद थे।
126 वर्षीय श्री कल्याणदेव जी महाराज उन विरली विभूतियों में से हैं, जिन्होंने स्वामी विवेकानंद के साथ परिव्रज्या की है। प्रायः दो सौ साठ से अधिक शिक्षण संस्थाओं के संस्थापक श्री कल्याणदेव जी परमपूज्य गुरुदेव की दृष्टि में ब्राह्मणत्व की जीवित जाग्रत प्रतिमा है। नारी शिक्षा हेतु ढेरों कॉलेज, इंटर कॉलेज आपने मुजफ्फरनगर-मेरठ सहारनपुर के ग्रामीण अंचल में स्थापित किए है। कई पाँलीटेकनीक आपके आशीर्वाद से बने है। एवं करोड़ों अरबों के भवनों का सुसंचालन आपके मार्गदर्शन में पश्चिमी उत्तरप्रदेश में चल रहा है। परमपूज्य गुरुदेव के गायत्री एवं यज्ञ को जन जन तक पहुँचाने के अभियान के आप समर्थक एवं प्रशंसक है। शाँतिकुँज के स्थापनाकाल के पूर्व से ही ऋषियुग्म से भली-भाँति परिचित वीतराग वयोवृद्ध संत प्रथम महापूर्णाहुति में आँवलखेड़ा भी पधारे थे एवं वर्तमान संचालन मंडल पर भी समय समय पर स्नेह-अनुदानों की वर्ष करते रहते है। अपनी सहज ममत्व भरी वाणी में प्रवचन देते हुए स्वामी जी ने कहा कि “ सन् 1897 में मैं स्वामी विवेकानंद के साथ गाँव गाँव घूमा। उन्होंने मुझसे एक ही बात कही कि भारत गाँवों में बसा है, इसलिये तुम गाँवों को स्वावलंबी, शिक्षित, संस्कारी बनाने का कार्य करना। मैं तब से गाँवों में ही घूमता हूँ। किसानों की रोटी खाता हूँ। देवसंस्कृति के विश्वविद्यालयीन स्वरूप में प्रतिष्ठित होने जा रही स्थापना के सारे स्वरूप को उन्होंने दैवीय योजना नाम देकर अपना परिपूर्ण आशीर्वाद प्रदान किया। स्वामी जी ने कहा कि शिक्षा विद्या का सार्थक समन्वय आचार्य जी के इस पावन गुरुकुल- आरण्यक में देखने को मिलता है। आज इसी की देश को सर्वाधिक आवश्यकता है।
उससे पूर्व स्वागत भाषण में इस पत्रिका के संपादक ने इस विराट योजना का प्रारूप संतगणों, उपस्थित परिजनों एवं मीडिया के प्रतिनिधियों के समक्ष रखा। उन्होंने बताया कि सन् 1964 में परमपूज्य गुरुदेव ने मेरे स्वप्नों का विश्वविद्यालय शीर्षक से एक लेख लिखा था, उसी को मूर्तरूप यहाँ दिया जा रहा है। परमपूज्य गुरुदेव साधना; स्वास्थ्य, शिक्षा एवं स्वावलंबन इन चार विधाओं पर आधारित अकादमी के रूप में शाँति कुँज को विकसित करना चाहते थे इसी की प्रतीक स्थापना शाँतिकुँज के वर्तमान परिसर में नालंदा-तक्षशिला भवन के रूप में समाधिस्थल के सामने की गई थी। सन् 1990 में महाप्रयाण से पूर्व उन्होंने कहा था कि विद्या-विस्तार का एक विराट तंत्र अगले दिनों बनेगा और शाँतिकुँज का सन 2000 व उसके बाद कई गुना विस्तार होगा। साधना प्रशिक्षण के माध्यम से सभी धर्मों की मान्यताओं उपासना पद्धतियों, का सभी भाषाओं (भारत व विश्व की ) का प्रशिक्षण क्रम वर्तमान शिक्षण संस्थान में चलना है, इसे विस्तार से उन्होंने बताया। वर्तमान शाँतिकुँज परिसर साधना प्रधान श्रद्धा प्रधान केंद्र होगा एवं अकादमी स्तर की यह स्थापना मूलतः शिक्षण प्रधान होगी। विधा के अंतर्गत प्रशिक्षित संस्कृति संदेश वाहक राष्ट्र व विश्व के कोने-कोने में भेजे जायेंगे। स्वास्थ्य विधा के अंतर्गत आयुर्वेद का विज्ञानसम्मत अति आधुनिक शोध केंद्र एवं बेयर-फुटेड डॉक्टरों का प्रशिक्षण स्थल तथा शिक्षा विधा के अंतर्गत सारे राष्ट्र की शिक्षण पद्धति को नया रूप देने शिक्षकों को मूल्य आधारित संस्कार युक्त शिक्षा के प्रशिक्षण केंद्र के रूप में विकसित किया जाना है। स्वावलंबन विधा के अंतर्गत गौ-केंद्रित अर्थव्यवस्था को गतिशील करने के लिये प्रायः दो सौ प्रकार के ग्रामोद्योगों के प्रशिक्षण का क्रम बनाया जाएगा। प्रवासी भारतीयों, उनके बच्चों एवं भारत के कार्यकर्ताओं के बच्चों के भी प्रबंधन विधा से लेकर संस्कृति प्रधान शिक्षण यहाँ चलेंगे ऐसा उन्होंने बताया। पूर्ण विकसित रूप में पाँच वर्ष में सक्रिय हो जाने वाली यह अकादमी बिना किसी सरकारी अनुदान के लोक श्रद्धा व अंशदान के आधार पर चलेगी एवं प्रतिवर्ष 10000 लोकनायक स्तर के कार्यकर्ताओं के निर्माण का लक्ष्य रखा गया हैं, यह जानकारी सभी परिजनों को मिली।
इस अवसर पर 1962 से विश्वभर में परिव्रज्या कर देव-संस्कृति का विस्तार करते रहने वाले पूर्व शंकराचार्य श्री सत्यमित्रानंद गिरि जी ने इस स्थापना को अपना आशीर्वाद दिया एवं अपनी ओर से गुरुपूर्णिमा राशि का एक अंश प्रारंभिक चरण में सवालक्ष रुपये की राशि देने की घोषणा की उन्होंने पूज्यवर की सतयुग की वापसी की परिकल्पना को इस संस्थान के निर्माण से साकार रूप लेने की बात कही। जूना पीठाधीश्वर श्री अवधेशानंद जी ने कहा कि भारत की “वसुधैव कुटुंबकम्" की अवधारणा को यह विश्वविद्यालय स्थापना साकार करेगी, ऐसा उनका विश्वास है। विश्व जब आज ग्लोबल विजेज बन रहा है पाश्चात्य लोग भारत को एक बाज़ार के रूप में ही देखते है जबकि विश्वशान्ति का संदेश ऐसे ही केंद्रों से निस्सृत होगा। मुनि श्री चिदानंद सरस्वती जी ने इक्कीसवीं सदी की ज्ञान गंगोत्री से निकले सृजन प्रवार को देख अपनी प्रसन्नता व्यक्त की श्री नरेन्द्र मोहन जी, जो प्रखर चिंतक व लेखक हैं ने कहा कि चरित्र निर्माण का विश्व बंधुत्व की भावना के विकास का पुनीत प्रयोजन इस माध्यम से पूरण होने जा रहा है यह जानकर प्रसन्नता है।
परमपूज्य गुरुदेव परम वंदनीया माताजी का संदेश संस्था प्रमुख श्रीमती शैलबाला पण्ड्या के मुख से निस्सृत हुआ। राष्ट्र संत मनीषीगणों की उपस्थित इस समारोह में शाँतिकुँज रूपी प्रेम की कुटिया में देखकर एवं उनके आर्षवचन पाकर उन्होंने विश्वास व्यक्ति किया कि हम ऋषियुग का स्वप्न पूरा करके रहेंगे। अपने उद्बोधन के पूर्व प्रस्तुत किए गए एक प्रेरणा गीत की व्याख्या।
स्वरूप भाव-भरे शब्दों में उनने कहा कि यह क्षेत्र के कार्यकर्ताओं का समर्पण एवं परिश्रम ही है कि आज यह विराट स्थापना होने जा रही है। यह जय-जयकार हर खपने वाले कार्यकर्ता की है।
श्री द्वारिका प्रसार जी चैतन्य ने जो कि आदरणीय पंडित जी के साथ गायत्री तपोभूमि मथुरा से विचारक्रांति अभियान की व्यवस्था का कार्य देख रहे है, इस अवसर पर कहा कि ज्ञान यज्ञ का पुनीत कार्य इस संस्थान अकादमी द्वारा होगा व घर-घर तक युगऋषि के विचार पहुँचेंगे, जो कि आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने आदरणीय पंडित जी का आशीर्वाद भी उपस्थित बीस हजार परिजनों तक संचारित किया।
इस कार्यक्रम में राज्य की श्रम मंत्री श्रीमती प्रभा द्विवेदी के हाथों श्रीमती मायावती की प्रथम पुण्यतिथि पर उनके काव्य संकलन के प्रथम पुष्प समर्पण का विमोचन किया गया। इस पुष्पमाला में बारह पुस्तकें केंद्र द्वारा प्रकाशित की जाएँगी। पर्यावरण मंत्री व जिला प्रभारी श्री विवेक कुमार सिंह ने क्राँति का शंखनाद नामक ऑडियो कैसेट सीरीज की दी कैसेट का विमोचन किया। आदरणीय पंडित जी द्वारा चयनित गीतों को धुनों में बाँधा है- शाँतिकुँज के गायकों ने एवं इ.एम.डी. विभाग ने इसका कलेवर बनाया है।
भूमिपूजन समारोह प्रातः 7 बजे से 11 बजे तक चला। संतों के मंच पर विराजने व ब्रह्मवादिनी कार्यकर्ता बहिनों द्वारा वंदना प्रस्तुत करते समय एक विलक्षण वातावरण बन गया जब धीमी-धीमी फुहारों ने सारे क्षेत्र का अभिसिंचन कर डाला। परिजन पंडाल से बाहर भी दूर-दूर तक बैठे थे। मंच संचालकों को लगा कि कहीं वर्षा तेज हुई तो बड़ी कठिनाई जा सकती है। किंतु मात्र 5 मिनट के लिए स्वामी श्री सत्यमित्रानंद जी के शब्दों में स्रष्टा के विराट पंचमात्रा से पवित्रीकरण हुआ व आशीर्वाद ऊपर से बरसा। इसके पश्चात् मौसम अनुकूल ही बना रहा।
लगभग चालीस मिनट का भूमिपूजन कर्मकाण्ड नालंदा तक्षशिला विश्वविद्यालयीन भवन के प्रथम स्तंभ वाले क्षेत्र में बनाये गये एक 8़/8 फीट के गड्ढे में हुआ, जिसमें नीचे तक जाने की सीढ़ियाँ बनी थी। निर्माण विभाग के इंजीनियर्स द्वारा कुशलता से निर्मित व सज्जित इस पावनस्थल पर पाँच प्रतिनिधि यजमान देव कन्याओं द्वारा पूजन किया गया। भावनात्मक भागीदारी सभी की रही।
मुहूर्त संपन्न होने के बाद सभी संतगणों, शासनतंत्र के प्रतिनिधिगणों पत्रकार बंधुओं, शाँतिकुँज संचालन मंडल के सभी सदस्यों- आमंत्रित अतिथियों एवं कार्यकर्ता भाइयों व बहिनों ने जो महाराष्ट्र, बंगाल, उड़ीसा व सुदूर गुजरात सभी ओर से आए थे, अपनी पुष्पाञ्जलि अर्पित की। इस निर्माण में भरपूर सहयोग-साधन समय व साधना के माध्यम से देने हेतु स्वयं को संकल्पित किया। स्टार टीवी एवं दूरदर्शन के द्वारा पूरे कार्यक्रम की वीडियो रिकार्डिंग भी की गयी तथा इसे अगले दिन राष्ट्रीय चैनल पर दिखाया गया। विभिन्न चैनल इस विश्वविद्यालयीन स्थापना पर एक पूरा कार्यक्रम तैयार कर रही है जो सारे भारत व विश्व में प्रसारित किया जाएगा।
संघ शक्ति में अप्रतिम सामर्थ्य है। रीछ-वानरों के समन्वित सहयोग से श्रीराम ने सेतुबंध तैयार कर रावण से लड़ाई की एवं सीताजी को वापस लाए। गायत्री परिवार हर उस व्यक्ति का अपना निजी परिवार व शाँतिकुँज उसका अपना घर है, जिसके मन में संस्कृति के प्रति टीस है- कसक है। गिरते नैतिक मूल्यों के, पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव में आ रही वर्तमान मानव जाति को अध्यात्म - भारतीय संस्कृति का दिग्दर्शन ही उबार सकता है, इसमें किसी को संशय नहीं होना चाहिये विषम समय में जिस विराट से कल्पना को वैदिक धर्म की विश्वभर में पुनः स्थापना करने के निमित्त साकार करने का बीड़ा शाँतिकुँज ने उठाया है उसके लिए भगीरथ शुनःक्षेप, कमारजीवन महेंद्र, संघमित्रा, हर्षवर्धन, अशोक, राज्यश्री, भामाशाह, विवेकानंद एवं निवेदिता कहीं-न-कहीं से उठकर आएँगे एवं इस कार्य को पूरा अंजाम देंगे- ऐसा पक्का विश्वास है।
जब तक यह काय कलेवर अच्छी दशा में है, जब तक वृद्धावस्था का आक्रमण नहीं हुआ है, जब तक इंद्रियों की शक्ति दुर्बल नहीं पड़ी है, तभी तक मनुष्य को आत्म कल्याण की साधना कर लेनी चाहिए अन्यथा जब मरण सामने आ खड़ा होगा और शक्ति चुक जाएगी तो आग लगने पर कुआँ खोदने की तरह उस निरर्थक प्रयत्न से क्या प्रयोजन सिद्ध होगा।
एक कुष्ठी भिक्षा माँग रहा था। उधर से जो कोई निकलता, कुष्ठी अपना हाथ फैलाकर कहता, जो दे उसका भी भला और न दे उसका भी भला। पाश्चात्य वेशभूषा से सज्जित एक युवक ने दो पैसे का सिक्का उसके हाथ पर डालते हुए पूछा - क्यों भाई! तुम्हारा पूरा शरीर गला जा रहा है। हाथ और पैर की अंगुलियाँ तक अब ऐसी नहीं रही जो कुछ कार्य कर सको। फिर इस कष्ट का जीवन जीने से क्या लाभ। यह तो जीवित अवस्था में भी लाश ढोने जैसी स्थिति है।
कुष्ठी ने कहा- मित्र! तुम बात तो ठीक कहते हो और कभी कभी मेरे मन में भी इस प्रकार का प्रश्न उठता है, पर मुझे ऐसा लगता है कि ईश्वर इसलिए जीवित रखे हुए है कि लोग कम-से-कम मुझे देखकर यह समझ सकें कि मूर्ख, इस संसार में कभी तू भी मेरे जैसा हो सकता है, अतः इस संसार में काया की सुंदरता का घमंड करने से कोई लाभ नहीं है।
मनुष्य के जीवन पर न केवल आस-पास के वातावरण का परिवेश का प्रभाव पड़ता है, वरन् जमीन के उस भूखंड का और उस बने हमारे मकान का भवन का भी असर पड़ता है। प्राचीनकाल के ऋषि - मनीषी इस तथ्य से भली−भाँति परिचित थे। इसलिए उन्होंने भवन निर्माण की कला को वास्तुविज्ञान के साथ जोड़कर रखा और चार उपवेदों में से स्थापत्य वेद नामक स्वतंत्र उपवेद की रचना हुई। इस स्थापत्य विद्या के आधार पर ही हमारे प्राचीन मंदिरों एवं अन्य अनेक ऐतिहासिक भवनों की रचना हुई जिनमें से अधिकाँश अभी भी इसकी साक्षी दे रहे है। ऐसे निर्माणों में प्रवेश करने पर व्यक्ति को स्वयं अपरिमित सुख-शाँति का अनुभव होता है। इन जगहों पर पहुँचने और कुछ समय व्यतीत करने के लिए मन सदैव लालायित रहता है।
भारतीय संस्कृति में भवन निर्माण कला को एक धार्मिक कृत्य माना गया है और उसे मनुष्य जीवन के पुरुषार्थ चतुष्टय से जोड़कर रखा गया है। वृहद्वास्तुमाला में भवननिर्माण के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुये कहा गया है-
स्त्रीपुत्रादिकभो आरण्य जननं धर्मार्थकाम पुरम। जन्तूनामयनं सुखास्यदमिदं शीताम्बु धर्माहम्॥
अर्थात् स्त्री, पुत्र आदि सुख और धर्म, अर्थ, काम को देने वाला, पशुओं, गाय, बैल, घोड़ा आदि के सुख स्थान शीत वायु, धूप आदि कष्टों को दूर करने वाला ही घर है।
वास्तु विद्या विशारदों का कहना है कि यदि घर का-भवन का निर्माण प्राचीन वास्तुशास्त्र के अनुसार किया जा सके, तो गृहस्वामी को उसमें रहने वाले सदस्यों का आए दिन जो पारिवारिक, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक आदि कष्ट - कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती है, उनसे सहज ही छुटकारा पाया जा सकता हैं विश्वकर्मा प्रकाश के अनुसार, पृथ्वी कण-कण में वास्तुदेवता पूर्वोत्तर दिशा में मुख करके लेटे हुये है’- पूर्वोत्तरमुखों वास्तु पुरुषः परिकल्पितः। अतः उन्हें प्रसन्न करके शास्त्रोक्त विधि से भवन निर्माण करने एवं इसमें निवास करने पर व्यक्ति सुखी रह सकता है। और प्रगति कर सकता है। देवपूजन में वास्तुदेवता का भी पूजन करने का विधान है। इसके पीछे छिपा हुआ यही भाव रहस्य है कि प्राकृतिक पंचतत्त्वों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, एवं आकाश आदि को आधार मानकर उनमें समाहित प्राकृतिक गुणों से, शक्तियों से अधिकाधिक सामंजस्य स्थापित किया जाए।
वास्तुशास्त्र स्थापत्य कला का अतिप्राचीन शास्त्र है। इसका शाब्दिक अर्थ है- वह शास्त्र, जिसमें आवास या गृह निर्माण से संबंधित नियमों का समावेश हो, वास्तुशास्त्र कहलाता है। वास्तु शब्द संस्कृत के वस धातु से बना है जिसका अर्थ है- निवास, वास स्थान, आवास आदि। यह मानव आदि के निवासस्थान का परिचायक है। अमरकोष के अनुसार-
“गृहरचना वच्छिन्नभूमेः।
अर्थात् गृहरचना के योग्य अविच्छिन्न भूमि को वास्तु कहते हैं। हलायुधकोष में इसे परिभाषित करते हुए कहा गया है-
वास्तु संक्षेपतो वक्ष्ये गृहादौ विघ्ननाशनम। ईषानकोणादारभ्य होकाशीतिपदे त्यजेत॥
अर्थात् संक्षेप में वास्तु ईशान आदि कोण से प्रारंभ होकर भवन निर्माण की वह कला है जो घर को विघ्न−बाधाओं, प्राकृतिक उत्पातों से बचाती है। वास्तुकला के अधिष्ठाता देवता को वास्तु पुरुष या वास्तु देवता कहते है। यही वास्तु पुरुष काल पुरुष अपने विश्वव्यापी रूप में पूर्वोत्तर की ओर अर्थात् ईशान कोण की ओर मुख करके लेटे हुए है। यही कारण है कि अधिकाँश भवन का निर्माण ईशान आदि कोण से आरंभ किया जाता है।
वास्तु विद्या के अनुसार गृह - भवन निर्माण करने का उद्देश्य ही यह है कि उसमें निवास करने वाले व्यक्तियों पारिवारिक सदस्यों के लिए वह शुभकारक, सुख-शान्तिदायक धन-धान्य ऐश्वर्य एवं कीर्ति को बढ़ाने वाला हो। इसीलिए मकान बनाने से पूर्व यह देखा जाता है कि जिस भूखंड पर भवन या घर बनाया जा रहा है, वह घर भू स्वामी या गृहस्वामी के लिये सभी प्रकार से मंगलदायी, संतान सुख देने वाला, धन-संपदा बढ़ाने वाला होना चाहिए। इसके पश्चात् इस बात का ध्यान रखा जाता है कि भवन के विभिन्न अंग कहाँ और किस दिशा में हो, उदाहरण स्वरूप घर में पूजाकक्ष कहाँ हो शयन कक्ष किस दिशा में हो? रसोई कहाँ हो? स्वागत अध्ययनकक्ष भण्डारगृह कहाँ हो? जल का स्थान किस दिशा में हो? शौचालय कहाँ हो? औषधालय, दुकान व कार्यालय किस ओर हो? घर में कितने दरवाजे हों और किधर हो? घर की आँतरिक व बाह्य साज-सज्जा कैसी हो? भवन के आस-पास कौन से पेड़ पौधे लगाना शुभदायक होता है और कौन-सा हानिकारक या अमंगलदायक? धूप, प्रकाश, व हवा का निर्बाध आवागमन किस प्रकार और किस दिशा से होना चाहिये राजमार्ग-सड़क किस दिशा में और कहा होना चाहिये, आदि बातों का वास्तुविद्या में विशेष ध्यान रखा जाता है। लेकिन आधुनिक भवन-
निर्माण तकनीक- आर्किटेक्चर में आवश्यकता एवं सुविधा को प्रमुखता दी जाने लगी है।, यही कारण है कि अकूत धन संपदा खर्च करके आलीशान भवन व बहुमंजिले इमारतें खड़ी तो कर ली जाती है, परंतु उनमें निवास करने एवं काम करने वाले व्यक्ति सदैव तनावग्रस्त एवं व्याधिग्रस्त बने रहते है। उल्टे सीधे तरीकों से अर्थोपार्जन तो इस तरह के भवनों में हो सकता है, किंतु निवासकर्ता को स्थायी सुख शाँति नहीं मिल सकती।
यों तो वास्तुशास्त्र के अनेकों पक्ष हैं जिनका आरंभ गृहनिर्माण में प्रयुक्त होने वाले भूखंड के आकार-प्रकार लंबाई-चौड़ाई ढलान मिट्टी के प्रकार व रंग एवं गंध आस-पास के पेड़ पौधें, जलाशय, पर्वत, नदी की समीपता दूरी आदि से होता है। नाम, राशि, शुभ ग्रह नक्षत्र, आय, विचार, दिशा निर्धारण, बेध, भूमि परीक्षण आदि का निर्धारण भवन बनाने से पहले ही किया जाता है। चयनित भूखंड को वास्तुशास्त्र में गृहपिंड कहा जाता है। यह कई प्रकार के होते है जिनमें से वर्गाकार या आयताकार भूखंड को अधिक शुभदायक माना जाता है। त्रिभुजाकार, चक्राकार, शकटाकार - बैलगाड़ी के समान, सिंहमुखी, विषमबाहु, अंडाकार व नागफनी के आकार के भूखंडों की गणना दोषयुक्त गृहपिंडों में की जाती हैं इस तरह के भूखंडों पर निर्मित भवनों में निवास करने वाले लोग बहुत कम फलते -फूलते देखे गये हैं। इसके साथ ही यह भी देखा जाता हैं कि उक्त भूखंड का ढलान किस ओर है। यदि यह ढलान उत्तर या पूरब की ओर है, तो उस जमीन को धन-धान्य देने वाली माना जाता है। दक्षिण पश्चिम की ओर ढलान युक्त जमीन को कम महत्व दिया जाता है। इसी तरह कछुए की तरह बीम में ऊँची और चारों ओर नीची जमीन को भी अच्छा माना जाता है। गजपृष्ठ अर्थात् हाथी पीठ की तरह दक्षिण-पश्चिम नैऋत्य एवं वायव्य दिशा में ऊँचाई वाली जमीन भी गृहस्वामी के लिए शुभदायक कही गयी है। ऊसर, बंजर एवं दलदली जमीन का प्रतिकूल प्रभाव निवासकर्ता पर पड़े बिना नहीं रहता। इसलिए वास्तु विद्या विशारद ऐसे भूखंडों पर मकान बनाने की सलाह नहीं देते है।
भोजकृत समराँगण सूत्रधार के अनुसार अनंत अंतरिक्ष से सतत् प्रवाहित हो रही सूक्ष्म अंतरिक्षीय तरंगों एवं अदृश्य ब्रह्मांडीय शक्तियों से मनुष्य, उसका आवास - घर एवं समूची सृष्टि प्रभावित होती है। मनुष्य इन ऊर्जा तरंगों से अधिक से अधिक लाभ उठा सकें, अदृश्य शक्तियों से तादात्म्य स्थापित कर स्वस्थ, सुखी और समुन्नत बन सकें, मानसिक शाँति प्राप्त कर सकें, यही वास्तुविद्या का उद्देश्य है। यदि हम इन वास्तुनियमों के अनुसार अपना आवास व रहन-सहन ढाल लें अथवा घरों में भवनों में तदनुरूप थोड़ा-बहुत परिवर्तन कर लें तो अपने जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन ला सकते है और यह परिवर्तन हमें सफलता के उच्चतम शिखर तक पहुँचा सकता है।
गृहनिर्माण में जमीन का निर्धारण कर लेने के पश्चात् दिशा का निर्धारण करना पड़ता है कि उक्त भूखंड में कौन-सा कक्ष अर्थात् कमरा किस दिशा में पड़ेगा। दिशायें हैं उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम तथा इनके अतिरिक्त चारों कोण अर्थात् ईशान कोण, आग्नेय कोण, नैऋत्य कोण और वायव्य कोण। गृहनिर्माण के समय इस बात की भी सावधानी बरती जाती है कि किस दिशा में किस देवता की प्रसन्नता हेतु कितनी जगह छोड़ी जाये नारद संहिता में कहा भी गया है कि पूर्व दिशा के स्वामी सूर्य, ईशान कोण के गुरु, उत्तर दिशा के बुध वायव्य कोण के चंद्रमा, पश्चिम दिशा के शनि, दक्षिण दिशा के मंगल और आग्नेय कोण के स्वामी शुक्र आदि है। अतः इनकी प्रकृति की अनुकूलता को ध्यान में रखते हुये ही निर्माणकार्य किया जाना चाहिये। शास्त्रानुसार गृह के पूर्व में अधिक खुला स्थान चाहिये। उत्तर दिशा में उससे कम एवं नैऋत्य दिशा में मामूली सी जगह छोड़नी चाहिये। अन्य दिशाओं में उनसे भी कम या न के बराबर खाली जगह छोड़ने का प्रावधान है। इन नियमों का पालन करने पर गृह निर्माता को निर्माण के वह सब लाभ मिलते हैं,जिस उद्देश्य को लेकर वह मकान बनाता है। ऐसा कहा गया है कि ऐसे घरों में सदा लक्ष्मी का वास रहता है और सुख-शाँति का आगार बन जाता है।
साहसी जीवन में एक बार मरते है, पर कायरों को आए दिन आत्महनन करते हुए मरना पड़ता है।
एक धनी व्यक्ति संत रैदास से बहुत प्रभावित था। उनके प्रति मन में विशेष अनुराग भी था। उनकी गरीबी देखकर उसने उन्हें चाँदी के पचास सिक्के दिए और बोला जरूरत हो तो और बताना। रैदास ने उस धनिक को बहुत समझाया कि वे मुफ्त में किसी का कुछ ग्रहण नहीं करते। किंतु धनिक अपने आग्रह पर डटा रहा और रुपये छोड़कर चला गया।
संत रैदास उठे और उन्होंने वह पोटली उठाकर छप्पर में खोंस दी। कुछ समय बीतने पर फिर वही साहूकार उनके पास आकर बोला-महाराज यदि वे रुपये खर्च हो गये हों तो और ले लीजिए। रैदास ने छप्पर की ओर इशारा किया। बोले - मेरी मेहनत से कमाया गया धन ही मेरे लिए पर्याप्त है। तुम्हारी अमानत को खर्च करने का अवसर ही नहीं आया। उसने देखा पोटली जैसी की-तैसी धरी है। रैदास ने हँसते हुए कहा- भाई सादगी से रहा जाए और संयम बरता जाए, तो ये दो हाथ इतना कमा लेते है कि कमी पड़ती ही नहीं और दूसरों की मदद लेने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती।
कौरव शिविर में भारी उदासी छायी हुई थी, जबकि पाँडव शिविर में आनंदोत्सव की तरंगें उमंग रही थी। आज अर्जुन ने कर्ण को पराजित किया था। रक्त और धूल से लथपथ वह महान योद्धा कुरुक्षेत्र में अपनी अंतिम साँसें गिन रहा था और अर्जुन विजयोल्लास के अतिरेक में सोच रहे थे कि आज यदि केशव का आग्रह न रहता तो कर्ण को इतनी आसानी से आहत नहीं किया जा सकता था। सोचते - सोचते एक बार उनका मन ग्लानि से भर उठा। उनकी स्मृति में कुरुक्षेत्र का वह दृश्य सजीव हो उठा।
कर्ण के रथ का पहिया भूमि में धँस गया था, अतः वह प्रत्यंचा पर चढ़ा हुआ बाण उतारकर रथ से कूद पड़ा। अर्जुन ने यह देखकर कि वह भूमि से पहिया निकालने के प्रयास में मेरी ओर से निश्चित है, अपना बाण तुणीरगत कर लिया था। भला आपदग्रस्त निःशस्त्र शत्रु को कैसे करते वह?
क्यों, रुक क्यों गए? सहसा केशव की तीक्ष्ण दृष्टि उनकी ओर घूमी और वे उनके गंभीर स्वर का मर्म समझकर कुंठित हो रहे।
श्रीकृष्ण ने अश्वों की वल्गा कसकर अपने विशाल वक्ष तक खींच ली, फिर अर्जुन की ओर मुड़कर सभिप्राय स्थिर दृष्टि से ताकने लगे कि वह क्या कहते हैं?
यह तो धरती में धँसा रथ का पहिया निकाल रहा है, कैसे प्रहार करूं?
अर्जुन के इन शब्दों में एक निरीह विवशता थी।
सखे, यही तो अवसर है........ गाण्डीव उठाओ! श्रीकृष्ण व्यस्त भाव से बोले।
अवसर? मधुसूदन! यह तो अधर्म होगा ............... धर्मयुद्ध नहीं, पातक लगेगा? अर्जुन ने कहा ही अंततः।
कैसा पातक? कैसा अधर्म? अर्जुन! यह महाभारत इन दुर्योधनों दुःशासनों के संहार के लिए ही तो चल रहा है। इसमें उनके सहायक-समर्थक कर्ण जैसे योद्धा भी जूझेंगें ही, द्रोण जैसे आचार्य भी नहीं बचे और न भीष्म प्रभृति ऊर्ध्ववर्ती महात्मा- क्योंकि वे सब पापात्मा दुर्योधन के अन्न की दुहाई देते हैं और किसी न किसी रूप में उसके पक्ष में लिपटे रहना चाहते है और जब तक ये सब जीवित हैं, दुर्योधन को कौन मारेगा? अतः अर्जुन तुम इस समय कर्ण का पहिया न देखो, शर संधान करो।
परंतु माधव! मेरा मन नहीं मानता..................।
नहीं मानता? वाह रे ममतालू! आज तुम धर्माधर्म की मीमांसा में बाण उतार बैठे हो परंतु विचार तो करो कि उस दिन जब पाँचाली भरी सभा में नग्न की जा रही थी, तब इस कर्ण का धर्म कहाँ खो गया था।? और जब अकेले अभिमन्यु को छल से निःशस्त्र कर सात-सात महारथी एक साथ प्रहार कर रहे थे तब इसका धर्मविचार कहाँ चला गया था, क्योंकि उस दिन तेरे पुत्रहंताओं में एक यह कर्ण भी तो था?
केशव के शब्दों की धार से अर्जुन का हृदय तिलमिला उठा। उसके समक्ष हृदयबेधी चीत्कारों से कौरव सभा को कंपित करती द्रौपदी की विपन्न मूर्ति साकार हो उठी, फिर आहत अभिमन्यु अपने घावों से अजस्र रक्त बहाता मानों ठीक सामने आकर यह कहता हुआ खड़ा हो गया कि छल से मेरे शस्त्र रखवा लिए इन लोगों ने। कहा- आओ पुत्र हमारे वक्ष से लग जाओ। तुम्हारे जैसा वीर पुत्र पाकर हम फूले नहीं समाते...............
परंतु मेरे शस्त्र रखते ही पितृव्य कर्ण आदि महारथियों ने मुझ पर शस्त्र वर्षा प्रारंभ कर दी........ और तब अर्जुन को लगा कि मानों उसके कानों में किसी ने जलता हुआ सीसा भर दिया। ओह! अभागा मरते-मरते भी वह इन पामरों को पितृव्य (चाचा) कहता गया, परंतु इन्होंने किंचित् न्याय न बरता उसके साथ। उसकी हत्या ही करनी थी तो उसकी अंतिम इच्छा तो पूरी कर देते। बालक था अभी एक बार उसको शस्त्र तो वापस कर देते और अर्जुन के नेत्र अंगार से दहक उठे। हृदय में प्रतिकार की ज्वाला धधक उठी।
खून! खून! उसके रोम-रोम ने माँग की।
रक्त का बदला रक्त! दिशाओं से पुकार उठी। अब रक्त के सिवा कुछ और नहीं! लगा भगवती महाकाली अपना खाली खप्पर लिये नीलगगन में चीत्कार भर रही हैं।
और अर्जुन ने सामने देखा कि कर्ण का पहिया अभी भी भूमि से निकल नहीं पाया है। एक बार फिर से उनकी दृष्टि केशव की नेत्रज्योति से टकराई और उन्होंने उनकी आँखों में पढ़ा कि वे मानो निरंतर कहती जा रही है।
अर्जुन! यही अवसर है, मार दे मार दे.......... और दूसरे ही क्षण गाण्डीव से छूटे बाणों से विद्व कर्ण धराशायी हो गया। पाँडव सेना विजयानंद कर उठी। कौरवों के विकृत स्याह पड़ गए।
वही कर्ण आज लाशों से पटे कुरुक्षेत्र में मरणासन्न पड़ा था, भला उससे अर्जुन को सहानुभूति क्यों हो?
सोचते -सोचते क्षणिक ग्लानि के स्थान पर अपरिमित आक्रोश उभर आया।
भीम, सहदेवादि पाँडव आनंदोत्सव मना रहे थे, परंतु जब अर्जुन केशव के शिविर में गये तो पाया कि वे प्रसन्न नहीं है। किसी कारण से उनकी मुखश्री म्लान दिख रही है। दृढ़बद्ध ओष्ठपुट शुष्क हैं और तेजपूर्ण आयत नेत्रों में विषाद की छाया गाढ़ी हो उठी है।
जनार्दन! आज के दिन आप आनंदित क्यों नहीं?
हाँ पार्थ! मैं सत्य ही प्रसन्न नहीं हो पा रहा ......................।
कारण मधुसूदन? अर्जुन को आश्चर्य हुआ उनका शिथिल स्वर सुनकर।
देश का एक महादानी शीघ्र ही संसार से उठ जाएगा ................।
ओह कर्ण की बात कहते हैं। ऐसी क्या विशेषता है उसमें? संपन्न भारत मही में एक से एक दानवीर पड़ें हैं .................।
चलो अर्जुन! बिना अपनी आँखों से देखे तुम्हें जीवन भर इसका विश्वास न होगा ............।
और छद्मवेश में कुरुक्षेत्र की ओर बढ़े।
संध्या की उदास छाया धरती पर उतर आयी थी। पक्षी घर लौट रहे थे। और श्वान - शूकरादि जंतु मानव-कंकालों से उलझे पड़े थे। कोई किसी लाश से पूरी अँतड़ी खींचकर खाने में तन्मय था तो किसी मुण्ड की आँख नोंचने में संलग्न था।
अनेक घायलों और लाशों के बची महायोद्धा कर्ण आहत पड़ा था। बाणों से उसका संपूर्ण शरीर छिन्न-विच्छिन्न हो रहा था। कई स्थानों से माँस कटकर इधर-उधर छितर रहा था। मुख पर भी रक्त जमकर काला पड़ गया था। पैरों से वह खड़ा नहीं हो सकता था- एक हाथ भी बेकार हो गया था। उसका स्वर्ण शिरस्त्राण रक्त में डूबा पड़ा था। छद्मवेशी कृष्ण और अर्जुन धीरे-धीरे चलकर उनके निकट पहुँचे।
सद्विदों को मेरा प्रणाम स्वीकार हो। आगतों को देखते ही कर्ण व्यग्र हो उठा था। परंतु अपनी विवश व्यग्रता में केवल वह अपना एक हाथ उठाकर और थोड़ा-सा हिल–डुलकर ही रह गया था। उसकी मुखाकृति से भास हुआ कि खड़े होकर स्वागत न कर पाने का क्षोभ व्यथा बनकर उसके रक्तरंजित मुख पर छा गया है।
उसका विनय अर्जुन को आज जाने क्यों अद्भुत लगा, नितांत नवीन। तो इतना विनयी था यह, वह सोचने लगा।
क्या सेवा करूं इस युद्धभूमि में इस श्मशान में, आप आज्ञा दें कि मरते-मरते भी यह कर्ण आनंदित होता चले ........................।
कुछ नहीं तुम कष्ट न करो। संकट में हो ..................... हम कुछ नहीं चाहते और कृष्णरूपी विप्र ने ऐसा भाव दिखाया कि मानों वे आए तो भिक्षा के लिए ही थे, परंतु कर्ण की दशा देखकर वे वैसे ही वापस जा रहे हैं।
आगतों ने एक पग प्रत्यावर्तन के लिए बढ़ाया ही था कि कर्ण विचलित हो उठा। एक व्यथासिक्त स्वर गूंजा -
ठहरिये, इस प्रकार खाली हाथ वापस न जाइये .............कहकर वह घिसटकर एक पत्थर के टुकड़े के निकट पहुँचा और उस पत्थर से अपने आगे के दो स्वर्ण मंडित दाँत तोड़ डाले। फिर उनका स्वर्ण निकालकर हथेली में रखकर भाव गद्गद् स्वर में बोला-
भगवन्! इस स्वर्ण को स्वीकार करें और अपने इस सेवक को यह संतोष-लाभ प्रदान करें कि जीवन की इस अंतिम बेला में कर्ण, की जीवन संया में उसके सामने से आप खाली हाथ नहीं लौट सके।
लाओ कर्ण! तुम्हारा यह इतना-सा स्वर्ण दान, तुम्हारी परोपकारवृत्ति आने वाले समय में युगों-युगों तक सराही जाएगी, बड़े-बड़े दानी तुमसे ईर्ष्या करेंगे, इतिहास की धरोहर बन जाएगा तुम्हारा यह दान ...................।
और अर्जुन ने देखा कि गीतागायक जगद्गुरु कृष्ण का धीर-गंभीर स्वर भारी हो उठा है, जैसे उनके कंठ में कहीं कुछ अटक रहा हो और आनंद-पुलकित कर्ण के नेत्रों में इस क्षण जो आँसू छलछला आए थे, वे यथोचित दान न दे सकने की विवशता के भले रहे हों परंतु उनमें गहरा आत्मसंतोष था, दानवृत्ति का परमसंतोष।
यज्ञोपवीत, शिखा और तुलसी में से आप किसे सबसे अधिक महत्व देते हैं- एक व्यक्ति ने महामना मदनमोहन मालवीय जी से प्रश्न किया। मालवीय जी बोले- यह तो ऐसे ही हुआ जैसे कोई कहे कि तीन चाँदी के रुपयों में से कौन सा रुपया अच्छा है? अच्छे तीनों ही हैं, पर मैं यह समझता हूँ कि यदि एक तुलसी के महत्व को ही समझ लिया जाये, तो शेष दो की महत्ता लोग स्वतः समझ जायेंगे, क्योंकि तुलसी निर्मल बुद्धि और सजल श्रद्धा का विकास करती है।
महात्मा भगवानदीन की आयु लगभग 5 वर्ष की थी। उनकी माँ ने दुकान से चार पैसे के बादाम लाने को भेजा। इस समय दुकान पर बहुत भीड़ थी। दुकानदार ने पैसे लिए और बादाम पुड़िया में बाँधे और भगवानदीन के हाथ में थमा दिये।
घर आकर जब भगवानदीन ने माँ के हाथ में थैली थमाई तो माँ नाराज होकर बोली- चार पैसे के इतने अधिक बादाम और तू भी ले आया। वापस जा और दुकानदार से कहना- लगता है भूलवश उसने अधिक दे दिए हैं।
भगवानदीन फिर दौड़कर दुकान पर पहुँचे और बोले - चाचा यह लो अपनी पुड़िया। मैंने चार पैसे के बादाम माँगें थे। माँ कहती है- ये ज्यादा लगते हैं। बादाम की पुड़िया लेते हुये दुकानदार बोला - बेटे तुमने तो मेरी चिंता और बढ़ा दी। कहीं ऐसा न हुआ हो कि मैं चार आने वाले ग्राहक को चार पैसे के बादाम दे गया होऊं।
बालक भगवानदीन के कोमल मन पर इस बात का ऐसा प्रभाव पड़ा कि उस दिन से वे ईमानदारी का महत्व समझ गये।
आहार के अनेकानेक पक्षों पर विगत अंक में चर्चा की जा चुकी हैं। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में ग्रहण किया जाने वाला भोजन सप्तधातुओं का निमार्ण करता है। रस, रक्त, माँस मेद अस्थि, मज्जा, शुक्र के रूप में क्रमशः धातुओं का पोषण करते हुए निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका होने के नाते आहार का महत्व आयुर्वेद में अत्यधिक माना गया है। पथ्य-अपथ्य का विमर्श करते हुए भी आयुर्वेद के विद्वान रोग से बचने एवं हो जाने पर ठीक होने के लिए औषधियों के साथ-साथ आहार पर सर्वाधिक जोर देते हैं। यूँ आहार-निद्रा ब्रह्मचर्य रूपी त्रय उपस्तंभ तथा बात, कफ़, पित्त रूपी त्रिदोष की साम्यावस्था ही सप्तधातुओं के निर्माण की मूल कारक मानी गई है। फिर भी इन सभी में आहार को सबसे ऊपर माना गया हैं जहाँ एलोपैथी में औषधि के साथ कुछ भी खाते रहने कोई संयम-नियम का पालन न करने की सलाह दी जाती है, वहाँ आयुर्वेद आहार को भी चिकित्सा का एक घटक मानते हुए यथोचित निर्देश विभिन्न विकारों के लिए देता है।
आहार-विधि - चरक सूत्र के अनुसार कूल छह मुख्य पत्यापथ्य घटक हैं, जिनका ध्यान रखा जाना चाहिये। ये हैं-
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अर्थात् चरक ने मात्रा (भोजन कितना लिया जाये), काल (किस समय लिया जाये) क्रिया (किस पद्धति से बनकर तैयार हुआ है।), भूमि (किस देश-स्थान पर पैदा हुआ है।), देह (संरचना कैसी है।) दोष ( उनकी आँतरिक संघटना में कोई त्रुटि) को मुख्य घटक माना है। इन घटकों के प्रभाव से पथ्य (ली जाने योग्य भोज्यपदार्थ) भी अपथ्य सिद्ध हो सकता है। भोजन सिद्धि प्राप्त करने के लिये चरक का निर्देश है कि कुछ पदार्थ जो स्वभाव से ही अपथ्य होते है, उनके अतिरिक्त अन्य औषधीय-अन्न-शाकादि पदार्थों का उपयुक्त श्लोकानुसार कालादि मात्रा आदि का विचार करके प्रयोग किया जाना चाहिये।
आहार सेवन विधि चरक संहिता विमान स्थान में आठ प्रकार की आहार सेवन विधि संबंधी भावों का उल्लेख आता है। ये आठों भव अष्टविध आहार विधि विशेषायतन कहलाते हैं शुभाशुभ फलदायक हैं तथा एक दूसरे के पूरक हैं उनके नाम इस प्रकार हैं।
(1) प्रकृति (नेचुरल क्वालिटी) (2) करण संस्कार (तैयार करने की विधि) (3) संयोग (काँबिनेशन) (4) राशि मात्रा-क्वान्टिटी (5) देश ( स्थान विशेष की परिस्थितियाँ) (6) काल (आहार ग्रहण का समय) (7) उपयोग संस्था (उपयोग करने की विधि) (8) उपभोक्ता (उपयोग करने वाला)।
स्वाभाविक गुण युक्त द्रव्यों में जो संस्कार किया जाता है उसे करण कहते है। द्रव्यों में दूसरे गुणों को जल अग्नि संयोग, मंथन, भावना तथा विभिन्न पात्रों में रखकर समाविष्ट किया जाता है। इस प्रकार यह आहार निर्माण सेवन का उपक्रम पूर्णतः विज्ञान सम्मत ही नहीं - अति सूक्ष्म एक प्रक्रिया भी है।
आहार के प्रकार-
आचार्य सुश्रुत ने एक श्लोक में आहार के विभिन्न प्रकारों का द्वादशशन विचार, के नाम से उल्लेख किया है। श्लोक इस प्रकार है-
अत ऊर्ध्व द्वादशाशन प्रतिचारान् वक्षयामः तत्र शीतोष्ण स्निग्ध रुक्ष द्रवशुष्कैक कालिक द्विकालिक औषधियुक्त मात्राहीन दोष प्रशमन वृत्यर्थाः॥
इस श्लोक के भावार्थ के अनुसार कुल बारह प्रकार के आहारों का उनके गुण के अनुसार वर्णन तथा इन आहार भेदों को किन -किन अवस्था में दिया जाना चाहिए, यह निरूपण ऋषिश्रेष्ठ सुश्रुत द्वारा इस प्रकार किया गया है-
शीत
तृष्णा, उष्णता, दाह तथा रक्तपित्त से व्यथित, पीड़ित विषसेवन से मूर्च्छित, अतिकामसेवन से क्षीण हुए व्यक्ति में शीत आहार उपयुक्त है।
उष्ण
कफ़ एवं वातरोग से पीड़ित, विरेचन किए हुए स्नेहपान किए व्यक्तियों में उष्ण आहार उपयुक्त है।
स्निग्ध
वात व्याधि से पीड़ित, वातज प्रकृति वाले, रुक्ष शरीर वाले अतिकामसेवन से क्षीण तथा व्यायाम बाहुल्य वाले व्यक्ति के लिये स्निग्धाहार उपयुक्त है।
रुक्ष
मेदस्वी, स्निग्ध देह वाले कफ़ प्रकृति वाले व्यक्ति को रुक्ष आहार दिया जाना चाहिए।
द्रव
शुष्क शरीर वाले तृष्णा से पीड़ित व्यक्ति, दुर्बल काया वाले रोगियों को द्रव आहार दिया जाना ही उपयुक्त है।
शुष्क
कुष्ठ, विसर्ग, वृण तथा प्रमेह पीड़ित व्यक्तियों को शुष्क आहार दिया जाना चाहिये।
एक कालिक
यह आहार का क्रम दुर्बल व्यक्ति के लिए अग्निवर्धक हेतु होना चाहिये।
द्विकालिक
यह आहार क्रम सामान्य स्वस्थ व्यक्ति का होता है।
औषधि युक्त
जो व्यक्ति औषधि लेने में असमंजस रखे अथवा कुरुचि के कारण न ले, उसे आहार के साथ औषधि देना चाहिये।
मात्राहीन
मंदाग्नि युक्त रुग्ण व्यक्ति को हीन मात्रा में आहार दिया जाना चाहिये।
प्रशमनकारक
प्रत्येक ऋतु में यथा दोषवृद्वि अनुसार उनके शमन हेतु आहार दिया जाना चाहिये यथा - वर्षा ऋतु में वात दोष की शाँति हेतु मधुर अम्ल-उष्णादि गुण युक्त आहार का प्रयोग।
वृत्ति प्रयोजक
जो स्वस्थ स्थिति में हैं जिनकी धातुएँ सम अवस्था में हैं धातु साम्य हेतु आहार इस क्रम में दिया जाता हैं।
अपथ्य आहार
इसे वैरोधिक आहार भी कहते है। यह रोग करने में सहायक एवं रोगी होने पर चिकित्सा चलती रहने पर भी ठीक न हो पाने का मूल कारण आयुर्वेद सिद्धांतानुसार माना गया है। विज्ञजनों के अनुसार अन्न जहाँ एक ओर शरीर निर्माण का मूल हेतु एवं प्राणवत माना गया हैं, वहीं दूसरी ओर अन्न को रोग का कारण तथा विष भी कहा गया है। जब अन्न का युक्तिपूर्वक सेवन किया जाता है, तो वह शरीर का पोषणकर्ता, प्राणपालक बनता है। जब कभी भी अयुक्तियुक्त अन्न सेवन होता है तब वह विष के समान कार्य करता है। चरक संहिता के सूत्र स्थान के अनुसार जो आहार या औषधि दोषों को अपने स्थान से उभार दे, किंतु शरीर से उनको बाहर न निकाले उसे विरोधी आहार या अपथ्य कहते है।
चरक संहित के अनुसार निम्न लिखित भावों को विरुद्वाहार का कारण गया है-
देश विरुद्ध
जंगली देश या मरुभूमि में रुक्ष और देश में स्निग्ध, शीतलगुण युक्त औषधियों का सेवन देश विरुद्ध कहा गया है।
काल विरुद्ध - जाड़े के दिनों में शीतल, ग्रीष्म में कटु-उष्ण आहार का सेवन काल विरुद्ध होता है।
अग्नि विरुद्ध
जठराग्नि रहते हुए उसके अनुसार आहार न मिले तो वह अग्नि विरुद्ध होता है।
मात्रा विरुद्ध
मधु और घी समभाग मिलाकर खाने से इसे मात्रा विरुद्ध बतलाया गया है।
सात्म्य विरुद्ध
जिस व्यक्ति को कटु रस और उष्ण वीर्य आहार प्रकृति के अनुकूल हो गया है, ऐसे व्यक्ति के लिए मधुर रस व शीत वीर्य आहार सात्म्य विरुद्ध कहलाता है।
दोष विरुद्ध
वात, पित्त, कफ़ इन दोषों के समान गुण वाले और अभस विरुद्ध आहार औषधि और कर्म का सर्वत्र अभ्यास वातादि दोष के विरुद्ध कहा जाता है।
संस्कार विरुद्ध
ताम्र आदि के पात्रों में दुग्ध पकाना विषतुल्य माना गया है। भोजन भी ऐसे पात्रों में पकाने से वह परिणाम में विष की भाँति हो जाता है।
वीर्य विरुद्ध
शीत वीर्य द्रव्य के साथ उष्ण वीर्य द्रव्यों को लेना वीर्य विरुद्ध है।
कोष्ठ विरुद्ध
मृदु कोष्ठ वाले को तीव्र रेचक औषधि देना इस प्रकार के अपथ्य में आता हैं।
स्वास्थ्य विरुद्ध
अधिक विश्राम करने वाले व्यक्ति को कफकारक आहार यदि दिया जाता है तो वह इस वर्ग में आता हैं।
क्रम विरुद्ध
व्यक्ति यदि बिना मल-मूत्र त्याग किए या बिना भूख लगे ही भोजन करे तो इसे क्रम विरुद्ध कहते है।
उपचार विरुद्ध
व्यक्ति यदि घृत आदि स्नेहों को पीकर शीतल आहार, औषधि और जल ग्रहण करता है, तो उसे उपचार विरुद्ध कहते है।
पाक विरुद्ध
दूषित और अनुचित ईंधन से आहार को पकाना अथवा अधपका - जला हुआ अन्न लेना पाक विरुद्ध कहलाता है।
संयोग विरुद्ध
अम्ल रस को दुग्ध के साथ सेवन करना संयोग विरुद्ध है।
बारह प्रकार के आहार - चरक संहिता आहार प्रकरण पर बड़े विस्तार से विमर्श करते हुए उनका बारह वर्गों में विभाजन किया गया है। इनके माध्यम से ही तत्कालीन द्रव्यों के स्वरूप का वर्णन निम्नलिखित श्लोक द्वारा किया गया है। आधुनिक समय में उपलब्ध आहार द्रव्यों का भी विवेकानुसार इन वर्गों में समावेश किया जा सकता है।
श्लोक इस प्रकार है।
शूकधान्यं शमीधान्यं समातीतं प्रशस्यते। पुराणं प्रायशो रुक्षं प्रयेणाभिनवं गुरु॥
यद्यदागच्छति क्षिप्रं ततल्ल्घुतरं स्मृतम। पुराणमामं संक्लिष्टं क्रिमिव्यालहिमातपैः॥
अदेशाकालजं क्लिन्नं
उपरोक्त श्लोक के अनुसार आहार वर्ग इस प्रकार है। शूक-धान्य वर्ग मक्का, बाजरा, आदि, शमी धान्य वर्ग सभी प्रकार की दालें शाक वर्ग सभी शाक पदार्थ फलवर्ग, समस्त फल, हरि वर्ग (हरे क्लोरोफल युक्त पदार्थ), गोरस वर्ग (दुग्ध पदार्थ), ईक्षु वर्ग ( गन्ना व उससे बनने वाले पदार्थ), कृतान्नवर्ग (पके हुए- आँच पर पकाए पदार्थ), आहार यौगिक वर्ग ( सभी प्रकार के पौष्टिक यौगिक), इसमें माँस व मधवर्ग को अध्यात्मिक दृष्टि से त्याज्य माना जाता हैं।
भोजन- आहार के इन वर्गों के बारे में विस्तार से अगले अंक में पाठक पढ़ सकेंगे ताकि वे चयन कर सकें कि किस स्थिति में कब उन्हें क्या भोज्य पदार्थ लेना है।
स्वामीराम एक बगीचे में टहल रहे थे। उनके साथ दो-चार शिष्य और भी थे। बगीचे की एक क्यारी के समीप आकर वे रुक गए। उस क्यारी में एक मुरझाया हुआ पौधा था, जिसे किसी बालक ने खींच दिया था शायद। वे उस पौधे की ओर इशारा करके अपने शिष्यों से बोले “राम ने कल संध्या को भी यह पौधा देखा था। लेकिन कल संध्या और आज संध्या में इसमें जीवन-मृत्यु का फर्क आ गया है।
“ कल संध्या तक इस पौधे में प्राण थे। इसकी जड़ें जमीन के भीतर थी और इसके पत्तों में जीवन था। यह हरा -भरा था और इसी से एक उल्लास, एक मुसकान फूटकर खेल रही थी। इसमें जीवन था और जब हवा चलती और यह हवा की लहर में हिलता तो इससे आनंद बहने लगता। इसके पूर्व भी राम कई बार इस पौधे के समीप से गुजरा है और उसके जीवन संगीत को अनुभव कर चुका है।
“ लेकिन आज हुआ यह है कि किसी ने इसे खींच दिया। इसकी जड़ें हिल गयी और इसकी साँसें टूट गयी। सारा खेल जड़ों का है। वे दीखती नहीं पर जीवन का सारा रहस्य उन्हीं में है। केवल पौधों की ही जड़ें नहीं होती मनुष्य की भी जड़ें होती है। मनुष्यता की भी जड़ें होती है। पौधे जमीन पर खड़े रहने से जीवित रह सकते है। पौधे की जड़ें जमीन से हटते ही पौधा सूख जाता है। मनुष्यता की जड़ें भी जमीन से हटते ही मनुष्य भी कुम्हला जाता हैं मनुष्यता सूख जाती है। - ठीक इस पौधे की तरह। “
“ मनुष्यता की जड़ें है आत्मा ओर उसकी जमीन है धर्म। आधुनिकता और बुद्धिवाद के इस युग में मनुष्य की आत्मा का संबंध धर्म से टूटता जा रहा हैं? इसलिये चारों ओर अशान्ति, कोलाहल तथा मृत्यु का तांडव देखने में आ रहा है। जब तक नई उखड़ती हुई जड़ों का उखड़ना नहीं रोका जाता तब तक इस चतुर्दिक् फैली हुई अशान्ति को रोकने का का कोई उपाय नहीं है। बुद्धिवादी लोग इस अशान्ति को दूर करने के लिए आज अपने ढंग से विचार करते है। परंतु उनके विचारों में भटकन है, क्योंकि इस समस्या के मूल कारण तक उनकी दृष्टि पहुँच ही नहीं पाती। उनके सोचे हुए उपाय उसी तरह के साबित हो रहे हैं, जैसे किसी पौधे को उखाड़कर जमीन से अलग कर पानी से सींचते रहना।”
“अतएव आवश्यक है कि मनुष्य की जड़ों को, मनुष्यता की आत्मा को धर्म की जमीन पर खड़ा होने दिया जाये तथा उसे सत्कार्यों, सत्प्रवृत्तियों का पानी दिया जाए। इसके साथ ही एक कुशल बागवान की तरह मनुष्यता में संभावित पनपने वाली दुष्प्रवृत्तियों को खरपतवार की तरह साफ किया जाए। यह काम उत्साही, धर्मनिष्ठ, विवेकवान तथा नीतिपरायण व्यक्ति ही कर सकते हैं।
41- जीवेम शरदः शतम्
विविध रोगों की जड़ हमारी जीवन-शैली का त्रुटिपूर्ण होने में हैं। हम बिना औषधि और चिकित्सा के किस प्रकार स्वस्थ रह सकते, इसके लिए हम पढ़ें :-
रोगों का कारण और निवारण।
बिना औषधि के कायाकल्प।
पंचतत्वों द्वारा संपूर्ण रोगों का निवारण।
प्राकृतिक चिकित्सा-उदर चर्मरोग, स्त्रीरोग, अन्य।
कब्ज की सरल चिकित्सा।
उपवास के चमत्कार।
जड़ी-बूटियों द्वारा स्वास्थ्य संरक्षण।
समस्त रोगों की एक औषधि-तुलसी
मसाला वाटिका से घरेलू उपचार।
आयुर्वेद की गौरव-गरिमा
कल्प चिकित्सा।
42- चिरयौवन एवं शाश्वत सौंदर्य
प्रत्येक व्यक्ति स्वस्थ और यौवनयुक्त रहना चाहता है। इसका एक ही उपाय है कि व्यक्ति प्रकृति की समरसता के अनुकूल जीवन जीने के प्रयत्न करे। इसके नियम और इसकी आवश्यक बातें पढ़ें और जाने-
चिरस्थायी यौवन-सौंदर्य का मूल स्रोत।
दीर्घजीवन के रहस्य, स्वच्छता।
जल्दी मरने की उतावली न करें।
असंयम बनाम आत्मघात, कब्ज से बचाव।
नैसर्गिक जीवन-आवश्यकता और उपयोगिता।
स्वास्थ्य रक्षा के सरल उपाय, व्यायाम।
श्वास लेने का सही तरीका।
सौंदर्य बढ़ाने के उपाय।
हम दुर्बल नहीं शक्तिशाली बनें।
संयम बनाम सफलता।
43- हमारी संस्कृति इतिहास के कीर्ति स्तम्भ
हमारी संस्कृति देवसंस्कृति कहलाती है। इसमें अनेक देवमानवों ने जन्म लिया है तथा दिव्य संस्कार ग्रहण किए हैं। ऐसे ही विश्ववंदनीय महापुरुषों से शिक्षा ग्रहण करें तथा जानें-
विश्ववंद्य-संत जिन्हें पाकर वसुधा धन्य हुई।
युगचेतना के सूत्रधार-स्वामी रामकृष्ण परमहंस।
नारी की महत्ता, महर्षि कर्वे का योगदान।
गौरक्षा के लिए उद्योग-धंधे
श्री अरविंद की योगप्रणाली।
स्त्री शिक्षा का प्रचार।
राष्ट्रसंघ के सदस्यों से विश्वशान्ति की अपील।
केशवानन्द तथा सहजानंद जी का समाज को योगदान।
44- मरकर भी उमर हो गये जो
महामानवों की जीवनी पढ़ने से जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान सहज ही मिल जाता है। साथ ही हमें आत्मिक एवं लौकिक प्रगति के लिए मार्ग-दर्शन भी मिल जाता है। इसके लिए पढ़े-
महान महिलाएँ- रानी दुर्गावती, अहिल्याबाई, लक्ष्मीबाई।
तत्त्वज्ञान की संदेशवाहिका-श्रीमती एनीबेसेंट।
मातृभूमि की सेविका-सरोजिनी नायडू, भगिनी निवेदिता, फ्लोरेंस नाइटिंगेल।
शौर्य और पराक्रम के कीर्ति स्तंभ-दुर्गादास महाराणा प्रताप।
पंजाब केसरी-लाला लाजपत राय, निर्भय सेनानी सरदार पटेल।
स्वातंत्र्य यज्ञ के हुतात्माः वीरसावरकर, सुभाषचन्द्र बोस।
पूज्यवर ने अपनी सभी मानसपुत्रों, अनुयाइयों के लिए मार्गदर्शन एवं विरासत में जो कुछ लिख है- वह अलभ्य ज्ञानामृत (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वांग्मय सत्तर खंडों में) अपने घर में स्थापित करना ही चाहिए। यदि आपको भगवान ने संपन्नता दी है, तो ज्ञानदान, कर पुण्य अर्जित करें। विशिष्ट अवसरों एवं पूर्वजों की स्मृति में पूज्यवर का वांग्मय विद्यालयों, पुस्तकालयों में स्थापित कराएँ। आपका यह ज्ञानदान आने वाली पीढ़ियों तक को सन्मार्ग पर चलाएगा, जो भी इसे पढ़ेगा धन्य होगा।
45-साँस्कृतिक चेतना के उन्नायक सेवाधर्म के उपासक
संस्कृति और राष्ट्र की रक्षा के लिए सेवाधर्म के सच्चे उपासकों ने किस प्रकार अपने को नियोजित किया, इसे सीखने के लिए इनका अवलोकन एवं स्वाध्याय आवश्यक है-
लोककल्याणव्रती महात्मा बुद्ध
अहिंसा एवं अपरिग्रह के प्रतीक - महावीर स्वामी।
मानवता के उपासक ईसामसीह।
वैदिक धर्म के पुनरुद्धारक जगद्गुरु शंकराचार्य।
व्यावहारिक अध्यात्म के शिल्पी संत कबीर।
प्राणिमात्र के समदर्शी संत नामदेव।
दलितों को गले लगाने वाले गुरुनानक देव।
धार्मिक नवचेतना के अवतार महाप्रभु चैतन्य।
सेवा-सहिष्णुता के उपासक संत तुकाराम।
भक्ति-शक्ति स्वरूप समर्थ गुरु रामदास।
भक्ति-शौर्य संपन्न गुरु गोविंद सिंह।
46- भव्य समाज का अभिनव निर्माण
समाज का सर्वतोमुखी विकास समाज की समता और उसकी एकता पर निर्भर है। समाज में व्याप्त अनेक भेद-प्रभेद और विरुप-विषम मान्यताओं को त्यागकर ही उसकी उन्नति होती है। इसके लिए हमें यह भी जानना होगा-
सभ्य समाज की अभिनव संरचना।
हमारी आध्यात्मिक क्राँति और प्रबुद्ध व्यक्ति।
नया संसार बसाएँगे, नया इंसान बनाएँगे।
प्रस्तुत विश्वसंकट में हमार कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व।
वर्गभेद एवं ऊँच नीच की समाप्ति।
रामायण में छुआछूत पर चिंतन।
एकता-समता की ओर, संघे शक्तिः कलौयुगे।
संगठन तो बनें पर सज्जनों के ही।
समग्र प्रगति सहयोग-सहकार पर निर्भर।
सहकारिता एक अमोघ शक्ति।
संगठन का मेरुदंड स्वयं बने।
47- यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता
हमारे देश में प्राचीन मान्यता रही है कि जिस परिवार में नारी को समुचित सम्मान मिलता है, वह परिवार सुनिश्चित रूप से फलता-फूलता है। यही स्थिति समाज के साथ भी है, किन्तु कुछ महान नारियों ने अपने समाज की विषम धारा के बदला है, इनमें हैं-
विश्व की महान क्राँतिकारी महिलाएँ।
क्राँति की अग्रदूत भारतीय वीराँगना।
सेवाधर्म की सिद्ध साधिकाएं।
भिखारिन छोगरिया बाई का दान।
समाजसेवी विदेशी नारियाँ-गोल्डामेयर क्लेरा बर्टन, अन्ना फ्रायड।
उदारमना महिलाएँ कमलादेवी चट्टोपाध्याय।
48- समाज का मेरुदण्ड सशक्त परिवार तंत्र
परिवार के प्रति यदि सच्ची आत्मीयता, शुभेच्छा, सद्भावना किसी के मन में है तो उसे क्रियान्वित करने का एकमात्र मार्ग यही है कि, परिवार के सदस्यों को सुसंस्कृत बनाया जाय। पर इसके कुछ नियम हैं, सिद्धांत हैं, जिन्हें जानना आवश्यक है-
समाज देवता का अनुपम उपहार-परिवार
पारिवारिक सुसंस्कारिता की प्रमुखता।
वातावरण का मनुष्य पर प्रभाव।
सुधार-परिवर्तन की सरल प्रक्रिया।
पथभ्रष्ट परिवार कैसे सुधरें?
बालनिर्माण में परिवार की भूमिका
संयुक्त परिवार एक आदर्श प्रणाली।
परिवार न तोड़े।
अधिक व्यय करने की हानियाँ।
एक अमेरिकन लेखक रॉबर्टसन ने सन 1818 में एक भयानक स्वप्न देखा। उसने देख कि अप्रैल का एक भयानक दिन है। 100 फुट लंबा और 70,000 टन भारी एक जलपोत है। नया बना हुआ यह विशाल जलयान, जिसमें 2250 यात्री यात्रा कर सकते है, अपनी प्रथम यात्रा के लिये तैयार है। बंदरगाह में उसकी प्रथम यात्रा के उपलब्ध में समारोह मनाया जा रहा है। चारों ओर झंडियां टंगी हुई है, झंडा लहरा रहा है। और बैंड बज रहे हैं। जहाज में चार लाल चिमनियाँ है। जहाज का नाम (टाइटन) स्पष्ट दिखाई दे रहा था। उसके अंत के दो अक्षर धुँधले थे।
जहाज जैसे ही रवाना हुआ, आकाश में बादल घिर आए, भौंपू बज उठे और जहाज अटलांटिक महासागर की छाती चीरता हुआ अमेरिका की ओर रवाना हुआ। स्वप्न के दूसरे भाग में राबर्टसन ने देखा कि जहाज के यात्री आनन्द मना रहे है, लेकिन किसी भावी विपत्ति की संभावना से आतंकित भी है। यह देखकर राबर्टसन भी स्वप्न में आशंकाकुल हुआ। उसने भरसक चाहा कि जहाज के कप्तान को जिसका नाम स्मिथ है, आने वाले खतरे से आगाह कर दे, लेकिन वह कर नहीं सका धीरे-धीरे वायु का प्रकोप बढ़ता गया। समुद्र क्षुब्ध हो उठा। मगर जहाज के संपन्न और धनी यात्री अपने आमोद-प्रमादे में लीन रहे। राबर्टसन को सपने लगा कि जहाज पर मूल्यवान चिन्ह या प्राचीन पुस्तकें है जहाज के साथ ही वे वस्तुएँ भी नष्ट हो जाएँगी।
राबर्टसन ने सपने में ही चिल्लाते हुए कप्तान से जहाज की गति कम करने का अनुरोध किया, पर कप्तान ने जैसे कुछ सुना नहीं। इतने में एक विशाल हिमखण्ड जहाज से आ टकराया और बड़े जोर से जहाज टूटने की आवाज आयी। इसी के साथ जहाज पर हाहाकार मच गया।
उसी समय राबर्टसन को आँखें खुल गयी उसकी शेष रात बड़ी बेचैनी में कटी। धीरे धीरे इस स्वप्न को देखें एक साल बीत गया। एक वर्ष पूर्व देखा हुआ स्वप्न उसके लिए एक उपन्यास का मामला बन गया। उसने ‘फ्यूटिलिटी’ नामा से एक उपन्यास लिख और बोस्टन के एक प्रकाशक के हाथ सौ डॉलर में बेच दिया। बात आई गयी हो गई। राबर्टसन को स्वप्न देखे चौदह वर्ष और उपन्यास लिख 13 वर्ष बीत गये। सन् 1912 में संसार यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गया कि इंग्लैण्ड में हृइट स्टान लाइन ने "टाइटैनिक" नामक एक विशाल जलपोत तैयार किया है। उसका वजन भी लगभग 70000 टन था। लंबाई 100 फुट थी और उस पर भी 2240 यात्री यात्रा कर सकते थे। उसे भी कोई तूफान डूबो नहीं सकता था। वह भी अपनी प्रथम यात्रा अटलांटिक महासागर से अमेरिका के लिए करने वाला था।
उपन्यासकार मोर्गनरॉबर्टसन ने जब यह समाचार समाचारपत्रों में पढ़ा तो उसे लगा कि यह तो कुछ परिचित-सा मामला है। अचानक उसे तेरह वर्ष पूर्व लिखे गये अपने उपन्यास ‘फ्यूटिलिटि’ उपन्यास की याद आयी। राबर्टसन के मुख से अचानक निकल गया है भगवान! क्या मेरे माध्यम से तूने इस दुर्घटना की पूर्व सूचना की थी? उसने व्याकुल होकर सोचा क्या मैं हृइट स्टान लाअन को चेतावनी दूँ? लेकिन मेरे पर कौन यकीन करेगा? लोग हंसेंगे।
14 अप्रैल 1926 की रात को इंग्लैंड के हृइट स्टार का विशाल जलपोत "टाइटैनिक" जो उस समय संसार का सबसे बड़ा और मजबूत जहाज था, अपनी पहली यात्रा पर न्यूयार्क के लिये रवाना हुआ। जहाज में 2200 व्यक्ति सवार थे। उसमें यूरोप और अमेरिका के अनेक प्रतिष्ठित और गणमान्य व्यक्ति थे। यह विशाल टाइटैनिक जहाज अपनी यात्रा के पाँचवें दिन जल में समाधिस्थ हो गया। आश्चर्यजनक बात यह कि ‘ टाइटैनिक' और उसके दुर्भाग्य का विवरण अक्षरशः वैसा ही था, जैसा कि ‘फ्यूटीलिटी’ उपन्यास में ‘टाइटन’ की स्वप्न कथा में था। यहाँ तक कि स्वप्न के जहाज का वजन लंबाई, और रंग भी टाइटैनिक के समान ही था। दोनों जहाजों में चार ही चिमनियाँ थी। सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह है कि दोनों जहाजों के कप्तान का नाम भी एक ही था। स्वप्न में देखे गए जहाज के नाम के अंग्रेजी के अंतिम दो अक्षर आई और सी धुँधले हो गए थे। दोनों जहाजों में जहाज का निर्माता जहाज पर यात्रा कर रहा था। स्वप्न और यथार्थ दोनों ही में निर्माता ने जलयान के साथ ही जल समाधि ली, दोनों जहाजों में लाइफ बोटे कम थी इसलिये दोनों जहाजों में केवल प्रभावशाली और सम्पन्न लोग ही बच सके। दोनों जहाजों में उमर खैयाम की रुबाइयों की एक बहूमूल्य प्रति भी जहाज के साथ नष्ट हो गयी।
राबर्टसन का देखा हुआ भयानक स्वप्न चौदह वर्ष बाद वैसे ही घटित हुआ, जैसा उसने देखा और बाद में अपने उपन्यास में लिखा था। इस प्रत्यक्ष घटनाक्रम के बाद कौन कह सकता है। कि स्वप्न हमें भविष्य का पूर्वाभास नहीं कराते है?
गीता का प्रथम अध्याय-उत्तरार्द्ध
इस लेखमाला के अंतर्गत श्रीमद्भागवत् गीता को परमपूज्य गुरुदेव के चिंतन के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का प्रयास किया रहा है। मई 19 के अंक से प्रारंभ हुई यह श्रृंखला समग्र गीता पर व्यवहारिक समीक्षा करती हुई क्रमशः चली रहेगी। विगत अंक में विषाद योग जो प्रथम अध्याय की धुरी है के पूर्वार्द्ध पक्ष पर चर्च की थी। कहा गया था कि कैसे गीता के श्लोकों के द्वारा वेदव्यास हमें बताते है कि हमें हर परिस्थिति पर सम्यक् विचार करना चाहिए पराक्रम-वीरता बलिष्ठता अपनी जगह है, परन्तु विवेक सम्मत चिंतन कर जीवन जीवन संग्राम में प्रवेश किया जाय तो कही किसी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं होगी धैर्य रखने वाले संकल्प के धनी एवं शौर्यभाव से भरे लोकनायकों की हमें अगले दिनों अधिकाधिक आवश्यकता होगी। ऐसे ही व्यक्ति सच्चा शिष्यत्व जाग्रत कर लोकशिक्षण से लेकर नवनिर्माण कर सकते है। यह सब लक्षण अर्जुन में दिखाई देते हैं। हमारे लिये एक आदर्श नायक के रूप में अर्जुन उभर कर आता है। इसी क्रम में को अब आगे बढ़ाते है,
प्रथम अध्याय की यह विशेषता है कि सेनाओं के योद्धाओं के परिचय के साथ उनकी मनःस्थिति का भली भाँति विश्लेषण कर दिया गया है। इसी के पश्चात् अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से जो उसके सारथी बने है। कहता है हे भगवन्! मुझे दोनों सेनाओं के मध्य ले चलिए सेनयोरुभयोर्मध्यें रथं स्थापय मेऽच्युत (21 वाँ श्लोक) ताकि जब तक कि मैं युद्धक्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं की भली प्रकार देख लूँ कि इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन किन के साथ युद्ध करना व्यापार में किन किन के साथ युद्ध करना योग्य है। तब तक इसे खड़ा ही रखिये। (22 श्लोक)
यह स्थिति से विषाद से पूर्व की है, जग प्रारंभिक टिप्पणी के अनुसार हर परिस्थिति पर सम्यक् विचार, संतुलित चिंतन की बात कही गयी थी। इस प्रारंभिक समीक्षा के बाद हम अर्जुन की मनःस्थिति देखने का प्रयास करते है। अर्जुन व दुर्योधन दोनों की तुलना करने का प्रयास करें तो हमें जानकारी मिलती है कि प्रारंभ में जहाँ दुर्योधन ने भीष्म पितामह एवं गुरु द्रोणाचार्य को वर्ण बताने के साथ व्यंग्य भी कसा है, यह भी परोक्ष रूप से कहने का प्रयास किया है कि वे कही ममत्ववश अपने शौर्य को भुला तो नहीं बैठे। उसकी इसी वृत्ति के कारण उसका शिष्यत्व ही नहीं, मनुष्यत्व भी जाग्रत नहीं हो पा रहा। पाँडवों में युधिष्ठिर है किंतु वे धर्मराज है। अकर्मण्य है। यदि वे चाहते तो महाभारत टल सकता था। जब विवाह के पश्चात् द्रौपदी के साथ पाँडवगण लौटे तो भीष्म पितामह ने राज्यपरिषद की बैठक बुलाई एवं कहा कि पांडु पुत्रों को राज्य दे दिया जाना चाहिए।
भीष्म के वाक्यों को कोई नकार नहीं सकता था, चुनौती दे सकता था। जब किसी भी तरफ से विरोध नहीं आ रहा था, तब युधिष्ठिर बीच में खड़े हो गए और कहने लगे कि आधे राज्य का अधिकार तो धृतराष्ट्र को भी है। बस उसी दिन महाभारत का बीजारोपण हो गया- इतिहास लिख दिया गया। विचार कुशल, व्यवहार कुशल न दुर्योधन है न युधिष्ठिर। मात्र अर्जुन ही ऐसा जो दोनों सेनाओं के बीच खड़ा हो सम्यक् विचार करने के लिए उद्यत हुआ है। देखा जाय तो यह सब भगवान की योजना के अनुसार ही है। उनकी इच्छा के बिना पत्ता भी हिल सकता। यही कारण है कि उन्होंने अर्जुन को उसके सगे-संबंधियों के सामने लाकर खड़ा कर दिया, उन्हीं समक्ष जिन्हें दुर्योधन अभी कुछ ही क्षणों पूर्व व्यंग्य मिश्रित वाणी में बहुत कुछ सुना चुका है।
सारथी योगीराज श्रीकृष्ण ने ज्यों ही रथ लाकर खड़ा किया तो सामने थे। भीष्म पितामह एवं द्रोणाचार्य। भीष्म को देखते ही अर्जुन को अपना बचपन याद आ गया। वे उनके पितामह थे। कभी वह कह उठते कि पिताजी तो भीष्म कहते मैं तेरे पिता का पिता हूँ। तेरा बाबा हूँ। तब अर्जुन उन्हें पितामह बाबा कहने लगे थे। ऐसे प्यार करने वाले ममत्व लुटाने वाले बाबा की गोंद में बैठने-उनकी दाढ़ी से खेलने का सौभाग्य मिला था अर्जुन को। हिमालय की तरह ऊँचे व्यक्तित्व वाले भीष्म ने पाँडवों-कौरवों को मिलाने के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया, सारा जीवन संघर्ष में लग गया- उन्हीं के अपनत्व ममत्व से भाव विभोर अर्जुन को यादें रुलाने लगी। जब यादें हमें रुलाने लगें, हमें बारबार आत्मचिंतन को विवश कर दें, मानना चाहिए कि यहाँ हमारे कषाय-कल्मषों के शोधन की घड़ी है। हम जब कभी भी परमपूज्य गुरुदेव, परम वंदनीय माता जी के निर्देशों का स्मरण करते है तो उनके अपनत्व ममत्व को याद कर कभी हमारा मन रोने को कहता है क्या। यदि हाँ तो यह एक शुभ चिन्ह है। यदि वही स्मरण कर हम अपना सतत् परिशोधन करते रहे तो गीता का यह उपदंश सार्थक हो सकता है। शिष्यत्व के जागरण के लिए इस स्थिति में जाना बड़ा अनिवार्य है।
अर्जुन ने सोचा कि मैं किन से लड़ रहा हूँ- वही बाबा जिनकी गोद में मैं खेला था, वही गुरुदेव जिनने एकलव्य को अँगूठा लेकर धनुर्धर मुझे बनाया। इतना सब सोचकर ही उसके मन में गहरा विषाद होता है। एडविन एर्नाल्ड ने एक पुस्तक लिखी है। 'लाइट ऑफ एशिया' जिसमें गौतम बुद्ध के सिद्धार्थ से बुद्ध बनने का पूरा विवरण है। सिद्धार्थ रोते हुए व्यक्ति के साथ चलने वाले लोगों को रोते हुए पहली बार देखते है तो पूछते है कि ये क्यों रो रहे है। तब सारथी जवाब देता है कि यादें ही रुलाती है। इस मृत व्यक्ति से जुड़ी स्मृतियाँ याद याद कर रोना आ रही है सभी को तब सिद्धार्थ कहते है कि ऐसी यादों को साथ रख रोते हुए जीवन काटने से क्या लाभ। क्या किसी ने जीवन-मुक्ति बंधन-मुक्ति की बात नहीं सोची बस यहाँ से उनका आत्मबोध जाग्रत हो जाता है व उनका रूपांतरण हो जाता है।
अर्जुन भी यादों में डूबा रणक्षेत्र में दोनों सेनाओं के बीच खड़ा भीष्म पितामह के स्नेह-द्रोणाचार्य के शिक्षण उनकी कुर्बानी के बारे में सोच रहा है। ये द्रोण है जिनने पुत्र अश्वत्थामा को ब्रह्मास्त्र दिलवाकर मानसपुत्र अर्जुन को को धनुर्विद्या में पारंगत कर ब्रह्मास्त्र की सिद्धि प्रदान की। भीष्म जो जीवन भर अविवाहित रहे, कठोर संयम का पालन जिनने किया। मात्र पाँडव पुत्रों के स्नेह संरक्षण देते रहे, बार-बार अर्जुन के स्मृतिपटल पर आ जाते हैं एवं वह व्यथित हो उठता है। गीता के 27 वें श्लोक के उत्तरार्द्ध और 28 वें -29 वें में वर्णन है-
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धुनवस्थातन् कृपया परयाविष्टों विषीदन्निदब्रवीत्। दृष्द्धेमं स्वजनं कुष्ण युयुतसुँ समुपस्थितम्॥ सीदन्ति मम गाणि सुखं व परिशुष्यति। वे पथुश्च शरीरे में रोहर्षश्च जायते।
अर्थात् उन उपस्थिति संपूर्ण बंधुओं को देखकर वे कुन्तीपुत्र अर्जुन अत्यंत करुणा से युक्त होकर शोक करते हुये यह वचन बोले - हे कृष्ण, युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजन समुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं। और मुख सुखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कंप एवं रोमांच हो रहा है।
विषाद ग्रस्त होकर विकल होकर अर्जुन के मुख से ये वचन निकलें विकल नहीं होता तो नरपिशाच की श्रेणी में आता, निष्ठुर और निर्दयी कहलाता। वह नरमानव है, देव मानव बनना चाहता है। शिष्यत्व जाग्रत कर महामानव बनना चाहता है। अर्जुन विचारवान है एवं निर्विचार स्थिति में जाने से पूर्व की स्थिति से गुर रहा है। विचारहीन मानव ही कभी अपने जीवन के उद्देश्य के बारे में सोच नहीं पाते, किन्तु अर्जुन तो इन सब स्थितियों से परे है, अतः उसका विषादग्रस्त होना स्वाभाविक है।
अगले श्लोक में अर्जुन अपनी स्थिति का और आगे वर्णन करते हुए कहता है कि है केशव! मेरे हाथ में गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है। इसलिये मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ। मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजन-समुदाय मारकर व भी देखता। न तो मैं विजय हूँ और न राज्य तथा सुखों को हम ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है, ऐसे से व जीवन से भी क्या लाभ।
(श्लोक 3, 31, 31)
मनोविज्ञान की कसौटी कसते हैं तो अर्जुन की यह स्थिति विलक्षण लगती है।। बार-बार की मार खाकर धर्मराज युधिष्ठिर नीति के कारण पीछे हटते रहने के कारण अर्जुन युद्ध आरंभ होने से अब तक तो पूरे पराक्रमी भाव से बात करते दिखाई देता है, किन्तु स्वजनों को साथ देखते ही वह व्याकुल हो उठता था इसलिये वह स्वधर्म को भूल, विलाप करने लगता। ऐसी स्थितियों में हम सबके जीवन में भी आती रही है। गुरुसत्ता हमें बारबार प्रतिकूलताएँ सामने खड़ी कर उनका महाभारत रचकर स्वधर्म की याद दिलाती रहती है।, किन्तु हम सोचते है कि हम लोकसेवा करने आए थे, यह हमें क्या करना पड़ रहा है। -अनीति से लड़ना पड़ रहा है। यही महाभारत है। एवं हमें किसी भी स्थिति में पीछे नहीं हटना है।
परमपूज्य गुरुदेव के लेखन में अर्जुन को हम एक आदर्श के रूप में, एक कार्यकर्ता लोक सेवी, के रूप में देखते हैं। उसने स्थान स्थान पर अर्जुन को एक मात्र बनाकर हम सबकी लक्ष्य करके लिखा है प्रज्ञा अभियान जो आज समाचार पत्र के रूप में 1980-81 में प्रकाशित हुआ करता था उसका अक्टूबर-नवम्बर 1981 संयुक्ताँक के रूप में प्रकाशित हुआ है। उसमें गुरुदेव ने लिखा है-गीता का अर्जुन कृष्ण संवाद द्वापर में हुआ था। पर परिस्थितियों को देखते हुए वह आज के लिए भी उतना ही उपयुक्त है। जितना उन दिनों कारगर सिद्ध हुआ था। परिस्थितियाँ आज भी उतनी ही विकट है, जितनी उन दिनों थी। भगवान सामंती अनाचार से अस्त-व्यस्त भारतीय समाज को न केवल एक केन्द्रीय सत्ता के अंतर्गत लाना चाहते थे, भारत को महाभारत विशाल भारत बनाना चाहते थे। इस प्रयोजन के लिए उनने धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र में न केवल युद्ध रचाया वरन् विचार विनियम के द्वारा रचनात्मक निर्णय के लिए एक विशाल महाभारत रूपी राजसूय यज्ञ का प्रबन्ध भी किया। इस प्रयोजन के लिए भगवान को एक समर्थ सहयोगी की आवश्यकता थी। इसके लिये उन्हें एक ही पात्र उचित दिखा। वह था अर्जुन। अर्जुन न तो परामर्श के साथ समाहित दूरगामी श्रेय सत्परिणाम को समझ पा रहा था और न उसके साथ जुड़ी सघन आत्मीयताजन्य उपलब्धियों की परिकल्पना कर पा रहा था। संकीर्ण सीमा बंध नहीं उसके मन मस्तिष्क पर छाए हुए थे। इसलिए वह निजी एवं तात्कालिक लाभ-हानि का लेखा जोखा सामने रखकर उस महान जिम्मेदारी से इनकार कर रहा था, जिसमें तात्कालिक लाभ कम तथा संदिग्ध प्रतीत हो रहा था। जिंदगी के दिन गुजारने के लिए उसे किसी प्रकार पेट भर लेने की बात के अलावा और कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था। भगवान ने अर्जुन के मन की दुर्बलता की समझा और उसके तर्कों को आदर्शवादी प्रतिपादनों के सहारे काटा।
अर्जुन की विषादग्रस्त मनःस्थिति परिचायक है एक ऐसे व्यक्ति की जिसके अंदर का शिष्यत्व प्रकट नहीं हो पाया क्योंकि श्रीकृष्ण गुरु रूप में उसे कभी नजर नहीं आए। नजदीक होना ही नहीं, गुरु की गुरुता को समझकर अपने अंदर की जड़ता को तोड़ना बड़ा जरूरी है। विषाद की जड़ता को तोड़ता है, जनम जन्मान्तरों के कुसंस्कारों को रगड़कर धोता है। श्री अरविन्द ने लिखा भी है कि कभी कभी जीवात्मा स्वयं को जागरण की स्थिति में लाने के लिए विषाद की स्थिति में लाती है। संभव है यही स्थिति अर्जुन की पैदा की गयी है।
हम सबके अन्दर भी कभी यह स्थिति पैदा हो जाती कि यह हम सब क्यों करें-क्रान्ति का कार्य-विचार क्रान्ति का कार्य करना है तो उसमें क्यों सीधे मोर्चे लगे। हम यह नहीं समझ पाते है कि हम निमित्त मात्र है एवं जो भी कार्य होना है उसे करने में हम मात्र युगधर्म ही निभाएँगे। अर्जुन की तरह यदि हमारे अंदर की जड़ता को भी तोड़ा जा सके। विषाद के द्वारा आत्मसंताप के द्वारा तो हमारे अंदर का सच्चा शिष्य उभरकर आगे आ सकता है। मेडिकल साइंस भी यही कहती है कि कभी-कभी रो लेना ज्यादा अच्छा है। परन्तु यदि यह प्रक्रिया भावोद्वेग न बने-हमें सुपात्र बनाकर प्रसन्न मनःस्थिति बैठे गुरु से विषादग्रस्त हम शिष्यों को मिला दे तो ही सार्थक है। विषद की हमारी मनःस्थिति में बैठा गुरु सुनता है। अर्जुन यहाँ प्रथम अध्याय के तैंतीसवें श्लोक से 46 श्लोक तक ही बात कह रहा है। हमें ऐसे राज्य से क्या लेना देना, ऐसे भोगो से हमें क्या मतलब और जीवन जीने से भी लाभ क्या है? खुद ही तर्क दे रहा है अपनी विषादग्रस्त स्थिति का श्रीकृष्ण को भी बोलने का मौका नहीं दे रहा। यह भी कहता है कि त्रैलोक्य का सुख भी मिल जाए तो मैं इन्हें मारना नहीं चाहता अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हैतोः किं नु महीकृते। कुल के नाश से लेकर स्त्रियों के दूषित होने, नरक का वास होने तक की शस्त्र सम्मत बातें भी वह कहे जा रहा है, यह जानते हुए भी सुन को रहा है, स्वयं वासुदेव श्रीकृष्ण भी कहता है कि यदि मुझ शस्त्र रहित को धृतराष्ट्र पुत्र मार भी डालें तो वह मरना मेरे लिए अधिक कल्याणकारक होगा। भिक्षा माँगकर निर्वाह करने के लिए तैयार अर्जुन के मन में विषाद की पराकाष्ठा वाला यह वैराग्य को तीन प्रकार का बताते थे। एक सचमुच का एक श्मशान वैराग्य सामयिक होता है-श्मशान वैराग्य मात्र श्मशान तक सीमित रहता है। चिता जलते ही दुनियादारी की बातें चालू हो जाती है। अर्जुन का वैराग्य भी सामयिक है।
लड़ाई के स्थान पर खड़ा है एवं सिद्धान्तों की बातें कर रहा है। श्रीकृष्ण जानते है, इसलिये प्रसन्न मन से सुन रहे है। एवं एक दूसरे अध्याय में उसे लताड़ लगाने के लिये तैयार है। अर्जुन की मनःस्थिति यदि हम देखें तो इसमें हमें विषाद के मध्य से एक क्रान्ति पैदा होती दिखाई देती है। इस स्थिति की व्याख्या ज्यापाल सात्र ने बड़े अच्छे ढंग से की है। वे अस्तित्ववादी थे। उनने लिखा है-ह्यूमेनिटी इज कन्डेक्टड टू बि में स्वतंत्र होना ही है) अस्तित्ववादियों के पास कृष्ण नहीं थे, इसलिये पश्चिम प्रगति नहीं कर पाया। दर्शन का क्षेत्र उनका अविकसित रहा। इस स्वतंत्रता के लिए किसी श्री कृष्ण की-अर्जुन की जरूरत पड़ती है। गीता में वही पूरी हुई है।
अर्जुन स्वजन परिजन एवं परायजन तीनों में अंतर करने में असमर्थ है इसलिये वह विषाद की, अवसाद की पराकाष्ठा पर जाकर एक स्वघोषित निर्णय ले लेता है। मैं युद्ध नहीं करूँगा। जब तक शिष्य पूरी तरह समर्पित नहीं होता। स्वयं निर्णय लेता रहता है। अपनी बात को सौ प्रतिशत सही मानता है। अर्जुन स्वजनों की परिभाषा करते हुए बार-बार अपने मोह व अपने तथाकथित शास्त्र ज्ञान को बीच में ला रहा है। जब तक यह मोह, ज्ञान गलेगा नहीं, शिष्य पैदा नहीं होगा। अर्जुन गाण्डीव त्याग कर रथ के पिछले भाग में बैठ जाना और कुछ नहीं, पलायनवाद है। यह कैसे हुआ कि एक वीर किन्तु भावनाशील व्यक्ति मोहसंकुल हो गया। विचारहीनता, मोहसंकुलता, अकर्मण्यता ये तीनों शिष्यत्व के मार्ग में बाधाएँ है। मोह करना ही तो श्रेष्ठता से आदर्शों से होना चाहिए न कि तथाकथित मरणधर्मा स्वजनों से नीति और अधर्म से नहीं गीता। के प्रथम अध्याय के इस मर्म को यदि हम समझने का प्रयास करें तो हमें ज्ञात होता हे कि सारा तत्व एक ही बात में छिपा है- हम समर्पित कर्मठ ज्ञानी बने तीनों योग इसमें छिपे है। कोरा ज्ञान तो अर्जुन ने बघार दिया पहले अध्याय में किन्तु उसमें तो तर्क है। वह अकर्मण्यता का परिचायक है। एवं समर्पण कोसों दूर है।
परमपूज्य गुरुदेव ने कहा कि तुम्हें अर्जुन बनकर श्रेय लेना हो तो लग जाओ काम में। नहीं करोगे तो कोई और कर लेगा। यदि हम काम नहीं भी करेंगे तो क्या इतना विराट दैवी अभियान आगे नहीं बढ़ेगा? हाँ काम तो बढ़ेगा, हम अर्जुन बनने से चूक जायेंगे परमपूज्य गुरुदेव अखण्ड ज्योति अप्रैल 1982 में लिखते है- आत्मसत्ता का वजन भारी, जिम्मेदारी बड़ी स्पष्ट की अपेक्षा ऊँची समय की गरिमा अनुपम इतना सब हो हुए भी वह क्षुद्रता कैसी जो अग्रदूतों की भूमिका निभाने में अवरोध बनकर आ गई समर्थ को असमर्थ बनाने वाला यह व्यामोह आखिर भवबंधन है। कुसंस्कार है। दुर्विपाक है या मकड़ी का जाला है। कुछ ठीक से समझ नहीं आता यह समय पराक्रम और पौरुष का है। शौर्य और साहस का है, इस विष वेला में युग के अर्जुनों के हाथों से गाण्डीव क्या छूटे जा रहे है। उनके मुख क्या सुख रहे है। पसीने क्या छूट रहे है। सिद्धान्त वाद क्या कथा-गाथा जैसा कोई विनोद मनोरंजन है- कृष्ण झुँझला पड़े थे।
जागरण की प्रक्रिया सांख्ययोग नामक दूसरे अध्याय में अगले अंक में पढ़ने से पूर्व समझ ले कि श्री कृष्ण देख रहे है। कि अर्जुन के संदेह सच्चे मन से वेदना व व्याकुलता की स्थिति में निकले है। आत्मसंताप से ही यह आत्म व्याकुलता पैदा हुई है। यह शिष्यत्व के विकसित होने का गुरु के पैदा होने का समय है आज का समय असाधारण समय है। हम सभी को उस मार्गदर्शन की अपेक्षा है जो कभी युग के अर्जुन को उसके भगवान गुरु के श्रीकृष्ण से मिला था। आज भी हम उसे युग गीता के परिप्रेक्ष्य में पा सकते है।
जर्मनी की महान विचारक रोजा लेक्जेम्बर से लोगों ने कहा कि उनके विरुद्ध समाचारपत्रों में जो कुछ असहनीय, अनर्गल छापा गया है, वे उसका प्रतिरोध-प्रतिवाद क्यूँ नहीं करती। इस तरह चुप बैठे रहने से तो लोगों के मनों में तरह -तरह शंकाएँ -कुशंकाएँ घुमड़ रही है।
रोज लेक्जेम्बर ने बड़ी नम्रता से उत्तर दिया कि जब वे छोटी थीं तब उनके पिता ने एक बात कही थी जिसे वे आज तक नहीं भूलती कि जो अकारण दूसरों के दोष देखता है और उँगली उठाने का यत्न करता है उसे ज्ञात ही नहीं होता कि दूसरों की ओर तो एक उँगली ही उठाई गई है, तीन उँगली स्वयं उसकी ओर रहकर संकेत कर रही है। कि पहले तू अपनी ओर तो देख, कही ये गलतियाँ ,ये दोष तेरे में तो नहीं।
घटना सन् 1914 की है वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडीसन की प्रयोगशाला और कारखाना धू-धू कर जल रहा था। उसकी लपटें आकाश छूने के लिए होड़ कर रही थी। एडीसन उन लपटों में अपनी आशाओं को जलता देख रहा था। पास ही उसका पुत्र खड़ा था। इस भयंकर अग्निकांड को देखकर स्तब्ध रह गया।
एडीसन ने कहा बेटे देखते क्या हो दौड़कर अपनी माँ को बुला लाओ फिर ऐसा दृश्य जीवन में देखने को नहीं मिलेगा। कुछ देर बाद उनकी पत्नी भी आ गई। उसने कहा बीस लाख डॉलर के कीमती यंत्र और आपके द्वारा जीवनभर की गई मेहनत सब अग्नि को समर्पित हो गई। अब क्या होगा।
पहले तो ईश्वर को धन्यवाद दो कि हम सबकी भूलें भी इसमें जलकर राख हो गई अब नए सिरे से कार्य आरंभ करेंगे प्रत्येक हानि के गर्भ में कुछ लाभ के अंश तो छिपे ही रहते है।आविष्कारक फिर अपनी आविष्कार साधना में जुट गया और अंत में सफलताएँ ही हाथ लगी। अदम्य साहस, धैर्य अटूट ईश्वरविश्वास, लग्न और निष्ठा के सहारे जीवन जीने वाले हिम्मत कभी नहीं हारते।
गुरुपूर्णिमा 23.07.86 परिजनों के नाम वीडियो सन्देश
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ भाइयो, बहनो! आज से लगभग पचास वर्ष पहले हमने गायत्री परिवार की स्थापना की थी और अखण्ड ज्योति पत्रिका निकालना शुरू किया था। बहुत लंबा समय हो गया। इस पचास साल में हमने क्या किया जिस तरीके से समुद्र में डुबकी लगाने वाली मोती ढूँढ़कर लाते है। हमने भी उसी तरीके संसार भर में डुबकी लगाई और यह देखा कि कौन से आदमी प्राणवान हैं, कौन जीवंत है? कौन ऐसे हैं जो आने वाले समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में समर्थ होंगे। यह हमने बहुत गंभीरता से तलाश किया। हिंदुस्तान में हमको काफी लोग मिले, क्योंकि यह ऋषियों की भूमि है, देवताओं की भूमि है। यहाँ हमारे चौबीस लाख के करीब गायत्री परिवार के मेंबर है। फिर हमने देखा कि केवल हिंदुस्तान तक ही हमें सीमित नहीं रहना चाहिए वरन् सारे संसार में निगाह डालनी चाहिए, सारे संसार में खोजबीन करनी चाहिए।
मित्रो! सारे संसार की खोज बीन की तो सबसे पहले प्रवासी भारतीयों को देखा, क्योंकि वे ऋषि भूमि की संतान हैं। उनको देखना, उनको समझना सुगम था। इसके अलावा वे लोग भी हैं, जो हिंदुस्तान के निवासी नहीं हैं, लेकिन संसार के निवासी तो हैं। उन सभी को देखा और देखकर सभी को हमने अपने कुटुंब में-अपने परिवार में एक माला के तरीके से गूँथ लिया। ये गुँथी हुई माला है। गायत्री परिवार क्या है? एक गुँथी हुई माला है। इसमें कौन-कौन हैं? इसमें मोती हैं, हीरे हैं, पन्ना हैं, जवाहरात हैं। इन सबको-एक-से-एक बढ़िया आदमी को जोड़ करके हमने रखा है। जिसमें से आप लोग हैं।
आपसे हमारा संपर्क कब से है? आपसे हमारे बहुत पुराने संपर्क हैं, जन्म-जन्मान्तरों के भी संपर्क हैं। क्योंकि जब हमने तलाश किया जो अपनी आध्यात्मिक शक्ति से तलाश किया कि कौन आदमी हमारे हैं, कौन हमसे संबंधित हैं, कौन हमार साथ जुड़े हुए हैं। हमने जब यह पता लगा लिया और अखण्ड ज्योति पत्रिका भेजी, चिट्ठियाँ भेजी तो मालूम पड़ा कि आप लोग गायत्री परिवार में शामिल हो गए हैं। कब हुए थे? आज से पचास साल पहले। पचास वर्ष के बाद में पीढ़ियाँ बदलती चली गयी। कुछ पुराने आदमियों का स्वर्गवास हो गया, कुछ नए बच्चे पैदा हो गए। कुछ पुराने आदमी चले गये। इस तरह से परंपरा ज्यों-की-त्यों बनी रही। हार ज्यों-का-त्यों रहा। यह मिशन ज्यों-का-त्यों रहा। उसमें कोई कमी नहीं आने पाई। आप लोग वही हैं जो बड़ा काम करने के लिए जिस तरह के आदमियों की जरूरत पड़ती है, ठीक उसी तरह से है।
साथियो! हिंदुस्तान में भगवान बुद्ध हुए थे, सरकार पटेल हुए थे, जवाहर लाल नेहरू हुए थे, सुभाषचंद्र बोस हुए थे और बहुत से आदमी हुए थे। इसी तरह से प्रभावशाली व्यक्तियों में से हिन्दुस्तान से बाहर भी हमने देखा कि इस तरह के कौन से आदमी है जो अपना मुल्क-अपना देश संभाल सकें, वहाँ जाग्रति पैदा कर सकें और लोगों को ऊँचा उठा सकें, आगे बढ़ा सकें। यही सब बातें हमने देखी और सबको एक सूत्र में बाँधकर रखा है। आप उसी श्रृंखला में बंधे हुए हैं।
भगवान राम जब लंका विजय के लिए और राम राज्य की स्थापना के लिए गये थे, तो उनके साथ चलने के लिए कोई भी तैयार नहीं हुआ क्योंकि रावण से लड़ाई करने के लिए कौन तैयार हो? कुम्भकरण से लड़ने के लिए कौन तैयार हो? कोई तैयार नहीं हुआ। रामचन्द्र जी के भाई भी आये थे सेना को लेकर, जनक जी भी आये थे सेना को लेकर, जिनकी बेटी सीता को रावण हरण करके ले गया था, परन्तु कोई भी साथ नहीं आया। कोई राजा महाराजा, कोई सैनिक सिपाही भी नहीं आया। मनुष्यों में से कोई तैयार नहीं हुआ। लेकिन रीछ-बंदर आगे आए। ये रीछ-बंदर कौन थे? वे देवता थे। इन देवताओं ने कहा कि भगवान! हम आपके साथ चलेंगे। उन्होंने अपना देवता का स्वरूप छोड़कर रीछ-बंदर का रूप बना लिया। देवताओं के रूप में आते तो उनको वाहन लाने पड़ते, अपने हथियार लाने पड़ते? फिर रामचंद्र जी की सेना में भर्ती कैसे होते यदि देवता बने रहते तो? अतः देवता नहीं, रीछ-बंदर बन गए। रीछ-बंदर बनकर उन्होंने वह काम किया जो भगवान का संकल्प था।
भगवान के दो संकल्प थे-एक तो यह कि जो दैत्य-राक्षस हैं और विध्वंस कर रहे हैं, उनको दिलाऊँगा। यह बात कैकेयी की समझ में आ गयी और मंथरा की भी समझ में आ गयी और उन दोनों ने ऐसा ही किया। इसी तरह कालनेमि ने सूर्पणखा को भी ऐसे ही बहका दिया। उससे यह कहा कि यहाँ के राक्षस काले है। इनके साथ में यदि तेरा ब्याह होगा तो काली संतान उत्पन्न होगी। दो गोरे लड़के आए हुए है, बड़े सुंदर राजकुमार है। चल तू हमारे साथ और उनसे कहना कि वे तेरे साथ ब्याह करके कर लें। रामचंद्रजी खट से तुझसे ब्याह कर लेंगे। अरे उनके पिता जी के भी तो तीन ब्याह हुए थे। उनकी सीताजी रही आएँगी और तू भी रही आएगी।
बस, वह बेचारी कालनेमि के बहकावे में आ गयी। उसकी कैसी मिट्टी पलीद हुई? मंथरा की कैसी मिट्टी पलीद हुई? कैकेयी की कैसी मिट्टी पलीद हुई? आपने पढ़ा होगा। इसी तरह तपस्वी कुम्भकरण ब्रह्माजी से यह वरदान माँगने को था कि मैं साल भर में एक दिन सोएँ और छह महीने जागूँ। लेकिन कालनेमि ने उसको इस तरह से पट्टी पढ़ा दी जिससे वह यह वरदान माँग बैठा कि वह छह महीने सोया करे और एक दिन जागा करें। वह रावण का विरोधी था। कालनेमि किसी को भी चैन से नहीं रहने देना चाहता था। उसका मन था कि कोई भी चेन से न रहने पाए। मारीच वरदान माँगता था कि मैं स्वर्ग जाऊँ। तप करने के बाद उसने स्वर्ग माँगा था। कालनेमि ने उसे भी पट्टी पढ़ाई कि तू यह माँग कि जब मैं चाहूँ तब मेरा शरीर सोने का हो जाए। सीताहरण के समय उसका शरीर सोने का हो गया। सोने का नहीं होता, मामूली मृग होता तो क्यों मारा जाता? लेकिन वह मारा गया।
मित्रो! यह कालनेमि इसी तरीके से किया करता है। बच्चों को चुरा ले जाने वाला कालनेमि अभी भी इस युग में सक्रिय है। मथुरा में संत-बाबा जी के रूप में ठग लोग आते है। और बच्चों को चुरा ले जाते है। बच्चों को जहर की मिठाई खिला देते है। इसी महीने 40-45 लोग मारे गए। संत बाबा जी का कपड़ा पहनकर कुछ लोगों ने व्यक्तियों को लड्डू खिलाकर बेहोश कर दिया और उनका माल लेकर भाग गए। आजकल कालनेमि की माया इस तरीके से भी चल रही है। शायद आपके यहाँ भी कोई कालनेमि जा पहुँचे, तो आप सावधान रहना। अपने प्रयास से -प्रयत्न से सावधान रहना। कही ऐसा मत करना कि अपनी मेहनत, अपना श्रम और अपना पैसा किसी ऐसे काम में लगा दें, जो किसी खास व्यक्ति के काम आए। वह न समाज के काम आए, न संस्था के काम आए, न मिशन के काम आए न जनता के काम आए, किसी काम नहीं आए वरन् व्यक्ति के काम आए।
आपके यहाँ ऐसी कितनी ही घटनाएँ है कि जो आदमी कल तक दो कौडी के थे, आज देखो उनके यहाँ क्या हाल हो रहे है? कैसे -कैसे बंगले बने हुए है? कैसी कैसी मोटरें आ रही है? करोड़ों रुपये कहाँ से इकट्ठा हो रहा है? आप अपने यहाँ देख लीजिए ना? निगाहें फैंकिए, आपको मालूम पड़ जाएगा कि पहले ये क्या थे और साल दो साल के भीतर क्या हो गए। इतने पर भी इनको संतोष नहीं होता तो मिशन को ही बदनाम करने पर तुल गए। अभी जो दो महीने पहले गुरु जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर पी-एच-डी-करते थे, वो ही है जो दो महीने बाद गालियाँ सुनाते है, चोर और बेईमान कहते है। नहीं बेटे, ये कभी भी विश्वास मत करना। अगर हम चोर और बेईमान होते तो जो हमारी पिताजी की दी हुई संपत्ति थी, वह सारी -की सारी संपत्ति हम अपने गाँव का हाईस्कूल बनवाने के लिए क्यों दे जाते? इसके अलावा जो कुछ भी रह गया, वह सारा-का-सारा हमने गायत्री तपोभूमि बनाने में दान कर दिया। पैसा हमारे पास इतना था कि अगर हमने उसको संभाल कर रखा होता तो सात पीढ़ी तक काम आता। जितनी किताबें हमने लिखी है, उन सबका कापीराइट हमारे पास होता तो लाखों रुपये महीने की आमदनी होती। लेकिन हम तो यही वही रोटी खाते है जो माताजी के चौके में सबके लिए बनती है इस संस्था के कपड़े पहनते है। इनके अलावा कानी–कौड़ी भी हमारे पास नहीं है।
बच्चो! आपको यही कहना है कि इस तरह की बातों से आप बहकना मत। हाथी अपनी राह सड़क पर चला जाता है और कुत्ते भौंकते रहते है भौंकने के बाद में जब वे थक जाते है, तो बैठ जाते है हाथी पर कोई असर नहीं पड़ता।उसको जैसा चलना चाहिए, जिस दिशा में चलना चाहिए, उसी गंभीरता से, उसी तरीके से चलता रहता है कुत्तों के ऊपर कोई ध्यान नहीं देता। सूरज के ऊपर कोई धूल फेंकता है, तो वह धूल उसी के ऊपर गिरेगी। इससे क्या सूरज गंदा हो जाएगा? सूरज मैला हो जाएगा? सूरज बदनाम हो जाएगा? नहीं, सूरज बदनाम नहीं हो सकता। सूरज बदनाम होगा तो अपने कामों से बदनाम होगा, किसी के करने से बदनाम नहीं हो सकता। अगर हम कभी बदनाम होंगे तो अपने कृत्यों से बदनाम होंगे। और कोई दूसरा हमें बदनाम नहीं कर सकता। अगर कोई हमको बदनाम कर रहा हो, शाँतिकुँज को बदनाम कर रहा हो, तो आपको उसको ओर जरा भी निगाह उठाने की जरूरत नहीं है। उससे क्या हम लड़ाई-झगड़ा करें? नहीं, उससे लड़ाई झगड़ा क्या करना है? झूठ के पाँव कहाँ होते है? झूठ जिंदा रहता है क्या? झूठ जिंदा नहीं रहता। झूठ अगर जिंदा रहता तो चोर और उचक्के और उठाईगीर अब तक करोड़पति हो गए होते। लेकिन वे ऐसा थोड़े दिन ही कर पाते हैं, ज्यादा दिन तक इनका मायाजाल नहीं चल पाता।
आप सबसे हमारा निवेदन है कि मिशन को मजबूत बनाने के लिए मिशन को सही रखने के लिए सही आदमियों को अपने आप में इकट्ठा रखिए और उनका मनोबल बढ़ाते रहिए, हिम्मत बढ़ाते रहिए। किसी आदमी के विरोध करने से उलटा-सीधा बकने से आप कभी भी उसके चक्कर में मत आइए। आपको कोई बात तलाश करनी हो तो आप यहाँ आ सकते हैं। यहाँ के रजिस्टर खुले पड़े हैं। हमारी जिंदगी खुली हुई है। हमारी जिन्दगी खुली किताब के तरीके से है। इसमें कोई पन्ना ऐसा नहीं है जिसको कोई आदमी यह अंगुली उठा सके कि इसमें काला धब्बा लगा हुआ है। न हमारी जिंदगी में काला धब्बा लगा हुआ है और न हमारे विचारों पर काला धब्बा लगा है। जिस किसी को सबको हम चैलेंज करते हैं कि कोई भी आदमी यहाँ आए और देखे कि यहाँ कोई दाग-धब्बे की बात तो नहीं है। यहाँ दाग धब्बे की बात आपको कभी नहीं मिलेगी। हमारा इतना 76 वर्ष का जीवन हो गया है। इसे हमने कबीर की तरीके से रखा है।
“दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यों-की त्यों धरि दीनी चदरिया।”
मित्रो! हमारा क्रिया -कृत्य ऐसा है जिसमें हमको भी घमंड है और आपको भी गर्व होना चाहिए, आपको भी प्रसन्न होना चाहिए, आपको भी संतोष होना चाहिए। संतोष और प्रसन्नता के साथ-साथ में आपको इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि आप किसी के भी बहकावे में न आवें। बल्कि पूरी हिम्मत के साथ में अपना पूरा जोश कायम रखते हुए अपने संगठन को कायम रखें। इस मिशन की गतिविधियों में ढील न आने दे वरन् और भी अच्छे तरीके से करें।
साथियो! अभी मैंने अपनी बात समाप्त कर दी थी, लेकिन कुछ बातें एकाएक याद आ गयी। वह यह कि किसी ने यह अफवाह फैला दी थी कि गुरु जी मर गए। किसी किसी ने तो मुण्डन भी करा लिया था। अभी हम मरे हैं क्या? नहीं बेटे, हम बिलकुल जिंदा है और अभी बहुत दिनों तक जिंदा रहेंगे। अगर हम मरेंगे भी तो पाँच गुने होकर काम करेंगे। अभी तो हमारा मरने का कोई सवाल ही नहीं। सन 2000 तक हम बराबर बने रहेंगे। जिस किसी ने यह अफवाह फैलाई हो और जिस किसी ने मुण्डन कराया हो, यह आप उसी से पूछना और उससे कहना कि गुरुजी को तो हम अपनी आँखों से देखकर आए हैं और उनका टेप सुनकर आये हैं। माता जी भी जिंदा हैं, हम भी जिंदा है, हमारा क्रिया कलाप भी जिंदा है और भी सब जिंदा है। किसी किसी ने यह अफवाह फैलाई है कि गुरुजी ने शाँतिकुँज अपने जमाई को दे दिया है। गायत्री परिवार अपने साढू को दे दिया। इन बेहूदी बातों के बारे में आप कभी विचार मत करना।
मित्रो! यह सार्वजनिक संस्था है। इसका एक ट्रस्ट बना हुआ है। सात आदमी इसके ट्रस्टी है। जब कभी एक आदमी नहीं रहेगा। तो उसके स्थान पर दूसरा आदमी नियुक्त हो जाएगा। किसी के बिना काम रुकेगा नहीं। यह कोई राजकुमार नहीं है, जो गद्दी पर लाकर के बैठाया जाए। यह कोई जमींदारी नहीं, दुकान नहीं, जिस पर लाकर किसी को बैठा दिया जाए। यह सार्वजनिक पारमार्थिक संस्था है। चार्टर अकाउंटेंट इसका हिसाब किताब चैक करते है। अगर हमारा उत्तराधिकारी कोई होगा तो वह समर्पित कार्यकर्ताओं की टीम ही होगी, व्यक्ति नहीं। गायत्री तपोभूमि की भी कोई होगी तो टीम होगी। वहाँ युगनिर्माण योजना ट्रस्ट है। इसका भी कोई उत्तराधिकारी हुआ तो टीम होगी। कोई व्यक्ति विशेष नहीं हो सकता। व्यक्ति विशेष के मरने से इस संस्था पर कोई असर नहीं पड़ता। व्यक्ति विशेष के चले जाने या न रहने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता, कोई बात नहीं बिगड़ती, क्योंकि इसको चलाने वाला भगवान है।
इसको चलाने वाले हमारे गुरु है। अब तक जितना काम बढ़ा है इसे आपने देखा है कि वह सौ गुना, हजार गुना हो चुका है। आगे भी हमारे रहते हुए भी और न रहते हुए भी यह काम हजार गुना होगा और सौगुना होगा- निरंतर बढ़ेगा सारे विश्व में बढ़ेगा। यह विश्वास दिलाना रह गया था, सो दुबारा टेप करा दिया।
गुरुपूर्णिमा का संदेश आपके लिए यही है आप सब लोग अच्छे रहें, सुखी रहें। आपके बच्चे सुखी रहें, आप फले-फूले आपकी उन्नति हो।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।
इन शब्दों के साथ हम अपनी बात समाप्त करते हैं।
युगसंधि की इस वेला में, जहाँ पके फोड़े के फटने और दुर्गंध भरा मवाद निकलने की संभावना है, वहाँ यह भी निश्चित है कि आपरेशन के बाद दर्द घटेगा, घाव भरेगा और संचित विकारों से छुटकारा मिलेगा।
परमपूज्य गुरुदेव अखण्ड ज्योति नवंबर, 1988
रेशम के कीड़े अपनी लार से अपना घर बनाते हैं और उसी में जकड़कर मरते रहते हैं, पर जो चतुर कीड़े होते हैं। वे उस लार से बने घर को काटकर बाहर निकल आते हैं और उड़ जाते हैं। मनुष्य अपने लिए बंधन आप अपने अज्ञान से खड़े करता है। उन्हीं में जकड़ा सड़ता-मरता रहता है। यदि वह चाहे तो विवेकरूपी मुख से उन्हें काट भी सकता है और रेशम के कीड़े की तरह बंधन से मुक्त भी हो सकता है।
युगतीर्थ शाँतिकुँज के माध्यम से नवसृजन अभियान को अधिक गतिशील एवं प्रभावी बनाने के क्रम में पूज्य गुरुदेव द्वारा कार्यकर्ताओं को अपने व्यक्तित्व में आवश्यक गुणों के विकास हेतु प्रेरणा दी गयी थी। उसी क्रम में उन्होंने यह निर्देश पत्रक जारी किया था।
प्रज्ञा परिजनों को आत्म कल्याण और लोकमंगल का दुहरा उत्तरदायित्व सँभालना है, इसमें उन्हें अपना व्यक्तित्व अपेक्षाकृत अधिक पवित्र, प्रखर एवं व्यवस्थित बनाना है, इसके लिए कुछ विशेष सद्गुणों को बढ़ाने के लिए अनवरत प्रयत्न करना चाहिए। जो समझना, अपनाना और बढ़ाना है वह इस प्रकार है-
(1) लक्ष्य और चिंतन
जीवन को ईश्वरप्रदत्त सर्वोपरि उपहार समझे और उसका उद्देश्य सृष्टा के विश्व-उद्यान को अधिकाधिक समुन्नत- सुसंस्कृत बनाना मानें। इस प्रयास में आत्मकल्याण और विश्व-कल्याण के दोनों उद्देश्य पूरे होते है।
बड़प्पन की महत्त्वाकाँक्षाओं को घटाएँ। महानता-प्राप्ति की उत्कंठा उभारें। वासना-तृष्णा के लोभ-मोह भवबंधनों में न जकड़े। सदुद्देश्यों के आकाश में सत्प्रवृत्तियों के पंख पसारे और जीवन-मुक्तों की तरह परमलक्ष्य की उपलब्धि के लिए उड़ चलें। पीछे मुड़कर न देखें। वर्तमान की सँभाले, भविष्य की सोचें।
ज्ञानयोगी की तरह सोचें कर्मयोगी की तरह पुरुषार्थ करें भक्तियोगी की तरह पुरुषार्थ करें, भक्तियोगी की तरह सहृदयता उभारें और उसे पतन-पराभव के निराकरण में नियोजित रखें।
प्रातः उठते ही एक दिन का जन्म, सोते ही एक रात का मरण सोचें और अवसर के श्रेष्ठतम सदुपयोग का भाव-भरा निर्धारण करें। महाप्रज्ञा के अवतरण में सहकर्मी बनें। प्रज्ञा अभियान में सम्मिलित रहें। हर दिन गायत्री मंत्र की न्यूनतम तीन माला का जप तथा सविता की ध्यान- धारण श्रद्धापूर्वक चलाएँ, उसमें व्यतिरेक न करें।
(2) श्रमशीलता
समय ही जीवन है। जिसने समय का जितना सदुपयोग किया वह उतना ही जी लिया इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए एक-एक क्षण को सुनियोजित विधि-व्यवस्था में श्रम निरत रखें। आलस्य-प्रमाद को पक्के शत्रु समझें और उन्हें पास न फटकने दें। इस संबंध में अपनी अभ्यस्त आदत को स्वयं सुधारें। पैनी नजर से देखो कि काम उदास मन से उपेक्षापूर्वक, मंदगति से तो नहीं हो रहा है? समुचित तत्परता और स्फूर्ति बरती गयी या नहीं? समय श्रम और परिपूर्ण मनोयोग से ही काम का स्वरूप निखरता और प्रयोजन पूर्ण होता है।
किसी काम को छोटा न मानें। हाथ में आए काम को ठीक समय पर सही रीति से, समूची योग्यता लगाकर करने को प्रतिष्ठा का प्रश्न मानकर चलें। खाली समय होने पर दूसरों द्वारा बताए जाने की प्रतीक्षा न करके स्वयं अपने लिए काम की तलाश करें। निजी या समीपवर्ती क्षेत्र से अव्यवस्था हटाने के रूप में वह कहीं भी प्रचुर मात्रा में मिल सकता है। प्रगति का एक ही मापदण्ड है- किसने अपने कार्यों में कितना उत्साह दिखाया और उछलकर आगे आया।
(3) सुव्यवस्था
सौंदर्य उपासक बनें। स्वच्छता, सादगी और सुरुचि का समावेश ही सौंदर्य है। अपने शरीर, वस्त्र बिस्तर, निवास एवं कार्यक्षेत्र पर इस संदर्भ में पैनी दृष्टि रखें कि कहीं गंदगी कुरूपता अस्त-व्यस्तता तो दिखाई नहीं पड़ रही है। जहाँ दीखे वहाँ फिर कभी के लिए टालने की अपेक्षा तुरंत सुधारने का प्रयत्न करें।
निजी कार्य क्षेत्र को सुंदर सुव्यवस्थित बनाने के अतिरिक्त साथियों को भी अपना मानें और उस परिकर को भी अधिक सुव्यवस्थित बनाने की बात सोचें। जो समझ में न आए, उसे विनय एवं सद्भावना पूर्वक कराए भी भूल बताने दोष लगाने व्यंग्य- उपहास करने पर तो सेवा-सहायता भी कटुता उत्पन्न करती है, यह ध्यान में रखकर ही साथियों से सुव्यवस्था में योगदान लें।
रात की जल्दी सोए प्रातः जल्दी उठें डायरी लिखें। अपने समय श्रम चिंतन धन एवं प्रभाव का समय के अनुपयोग दुरुपयोग एवं अव्यवस्था ढूँढ़े और उसे साहसपूर्वक सुधारें अभ्यस्त ढर्रे की समीक्षा करें और उसमें अधिकाधिक प्रगतिशीलता का समावेश करने के लिए प्रयत्नशील रहें।
ध्यान रखें! योजनाबद्ध काम करने प्रसंगों के हर पहलू पर विचार करने परिवर्तन सोचने जुटाने सहयोग पाने की व्यवस्था वृद्धि ही स्तर उठाती सम्मान दिलाती एवं सफल बनाती है।
(4) शिष्टता
दूसरों को सम्मान और अपना विनय-वचन व्यवहार में समन्वित रखने को शिष्टता कहते हैं। उस सत्प्रवृत्ति को अपने स्वभाव का अंग बनाए उच्छृंखलता न बरतें उसे अपनी गिरावट और दूसरों की अवहेलना द्वारा दुखद परिस्थितियाँ उत्पन्न करने वाली निकृष्टता समझें। यह दोष स्वभाव में घुस गया हो तो उसे कड़ी आत्मसमीक्षा करने के लिए संकल्पपूर्वक प्रयत्न करें। अभ्यासवश जब भी ऐसे प्रसंग बन पड़ें कान पकड़ने जैसी छोटी आत्मप्रताड़ना देकर प्रायश्चित करें।
मिलन और विदाई का शिष्टाचार न भूलें। चित प्रसन्न रखें और मंद मुसकान बनाए रहने की आदत डालें। न थकान प्रकट होने दें, न उदासी। कहें कम सुने अधिक। शेखी न बघारे। मैं के स्थान पर हम लोग शब्द का प्रयोग करें चापलूसी न करें पर सज्जनोचित सद्व्यवहार में कमी न पड़ने दें आवेश उत्तेजना कर्कशता, खीज़, झल्लाहट से दूर रहें। जो कहना है, शान्तचित्त और शालीन शब्दावली में कहें। गाती गलौज तक न उतरें रोष प्रकट न करने, सुधारने दबाने के ऐसे भी तरीके हैं, जिनमें अपनी शालीनता न गँवानी पड़े। उतावली में किसी निष्कर्ष पर न पहुँचें। तथ्य समझने का प्रयत्न करें और पक्ष विपक्ष की स्थिति को समझते हुए निर्णय पर पहुँचे।
नागरिक कर्तव्यों का पालन करें। सामाजिक नीति मर्यादा का ध्यान रखें। आलोचना से बचें, व्यंग्य उपहास निंदा चुगली के दुर्गुण न अपनाएँ जहाँ सुधार की आवश्यकता है वहाँ आत्मीयता का समावेश रखते हुए हानि-लाभ के पक्ष रखो और अनुरोध युक्त सुझाव भर प्रस्तुत करें।
(5) संयमशीलता
अपनी श्रम समय चिंतन धन एवं प्रतिभा के रूप में उपलब्ध क्षमताओं का महत्व समझें और उनके सदुपयोग से प्रगति पथ पर अग्रसर होने की बात सोचें इन विभूतियों का एक कण भी बर्बाद न होने दें। अपव्यय अपने ही उज्ज्वल भविष्य का विनाश है।
इंद्रिय संयम बरतें चटोरेपन से बचें और कामुक चिंतन की हानियाँ समझें। दिनचर्या बनाए और कठोरता पूर्वक पालन करें न श्रम से जी चुराएं न समय को प्रमाद में गँवाए। स्वाध्याय की आदत डालें आत्म-निर्माण की योजना बनाने के चिंतन मनन में मन को लगाए। कुविचार आते ही उनके प्रतिपक्षी सुविचारों की सेना उनके प्रतिपक्षी सुविचारों की सेना उनसे लड़ने के लिए खड़ी कर दें। नित्य हिसाब रखें किन्तु सत्प्रयोजनों में कृपणता भी न बरतें। संग्रही न बनें पर आमदनी से खर्च कम रखें कुछ बचत करें, उधार लेने की आदत न डालें। अपने प्रभाव का ऐसा उपयोग करें, जिससे संपर्क क्षेत्र की दुष्प्रवृत्तियाँ घटे और सत्प्रवृत्तियों का बीजारोपण और परिपोषण उभारे। सादा जीवन उच्च विचार को हर समय ध्यान में रखें। विलासिता की मूर्खता ओर ठाट-बाट की क्षुद्रता से इसलिए बचें कि उनसे अपना व्यक्तित्व गिरता है और अनुकरण करने वालों का पतन होता है।
अभ्यस्त कुसंस्कारों को खोजें और उन्हें संकल्पपूर्वक बुहार फेंके। इस संबंध में कठोरता बरतने, मन मारने और प्रतिकूलता सहने को ही तप कहते है। तप संयम से मनुष्य सच्चे अर्थों में शक्तिशाली बनता है।
(6) उदार आत्मीयता
आत्म-निर्माण की दृष्टि से अंतर्मुखी तो बनें, पर एकाकीपन का अभिशाप न अपनाए। हिलमिल का रहें। मिल जुलकर काम करें और ऐ घटक भर मानें और सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझें। अन्यों की अपेक्षा अपनों की प्रति आपा-धापी की संकीर्ण स्वार्थपरता न अपनाए। चिंतन और व्यवहार में पारिवारिकता के सिद्धान्तों का अधिकाधिक समावेश करें।
सामूहिकता के साथ जुड़ी हुई शक्ति और प्रगति को गम्भीरता पूर्वक समझें और विलगाव की अपेक्षा सम्मिलित सहयोग की व्यवस्था बनाए। पारस्परिक सहयोग का आदान प्रदान जितना भी बन पड़े, करते रहें किन्तु वह होना सदुद्देश्य के लिए ही चाहिए। कुचक्र रचना और षड्यंत्र करने वाले संगठन का सहयोग न अपनाएँ।
(7) प्रगल्भता
दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाएँ और उसी आधार पर नीति निर्धारित करें। प्रचलित ढर्रे में से नीति निर्धारित करें। प्रचलित ढर्रे में से उतना ही स्वीकार करें जो उचित हो। किन्तु लोकमत पर ध्यान न दें। किन्तु लोकमत पर ध्यान दें। जनसमूह का प्रचलित प्रवाह अवांछनीयता की ओर है उसके साथ न बहे। हर प्रसंग न्याय-नीति अपनाएँ और कौन क्या कहता है, उसकी उपेक्षा कर सकने का साहस जुटाए। एक आँख प्यार की दूसरी सुधार की रखें। औचित्य को समर्थन दें, साथ ही अनौचित्य से असहमत रहें और उसे सहयोग न दें, संभव हो तो विरोध भी करें और संघर्ष भी। यह नीति अपनों के साथ भी बरती जाए और दूसरों के साथ भी। मित्र या स्वजन होने पर भी उसकी अवांछनीयताओं में सहयोगी न बनें।
इन दिनों सामाजिक प्रचलनों में अनैतिकता, मूढ-मान्यता और अवांछनीयताओं की भरमार है। उलटे को उलटा करके सीधा करने की नीति अपनानी चाहिए। इसके लिए नैतिक, बौद्धिक का और सामाजिक क्राँति की आवश्यकता अनुभव करें और उसे पूरा करने में कुछ कसर उठा न रखें। आत्मसुधार में तपस्वी, परिवार-निर्माण में मनस्वी और सामाजिक परिवर्तन में तेजस्वी की भूमिका निबाहें! अनीति के वातावरण में मूक दर्शक बनकर न रहें। शौर्य-साहस के धनी बनें और अनीति-उन्मूलन तथा उत्कृष्टता-अभिवर्द्धन में प्रखर पराक्रम का परिचय दें।
जनसंपर्क के कुछ सामान्य अनुशासन
प्रज्ञा परिजनों में से जिन्हें भी लोकसेवा के क्षेत्र में प्रवेश करना है उन सभी को कुछ मर्यादाओं का ध्यान रखना चाहिए। सेवा कार्य जितना महत्वपूर्ण है, उससे भी अधिक लोक-सेवी की व्यक्तित्व की प्रखरता का मूल्य है। मिशन को लोकप्रिय बनाने में दूसरों को प्रभावित, परिवर्तित करने, सुधारने उभारने में प्रयासों का जितना प्रभाव होता है, उससे कहीं अधिक सफल लोकसेवी के चिंतन चरित्र, स्वभाव पर आधारित व्यक्तित्व का पड़ता है इस प्राथमिक आवश्यकता की पूर्ति प्रज्ञा अभियान के हर सदस्य-युगशिल्पी को पूरी करनी चाहिए-इस संदर्भ में मोटी मर्यादाएँ यह है-
चटोरेपन की आदत छोड़ें। किसी से घर जाकर-अपनी स्वादलिप्सा को प्रकट न होने दें।
महिलाओं से एकांत वार्ता न करें। जब उनसे कुछ कहना हो तो आँखें नीची रखकर वार्ता करें।
हिसाब शीशे की तरह साफ रखें। जहाँ से जो पैसा प्राप्त हो उसकी रसीद भिजवाएँ खर्च का प्राप्त हो उसकी रसीद भिजवाएँ, खर्च का हिसाब प्रमाण सहित नोट कराएँ।
वार्ता तथा व्यवहार में अपनी नम्रता तथा दूसरों के सम्मान का समुचित ध्यान रखें
वेश विन्यास में ब्राह्मणोचित सादगी रखें, विशेषतया केश-सज्जा तथा अन्य प्रकार की शृंगारिकता से बचें।
किसी गाँव में पद्यलोचन नाम का लड़का था। लोग उसे पदुआ कहकर पुकारते थे। इस गाँव में एक जीर्ण-शीर्ण सा मंदिर था। अंदर देवता का कोई विग्रह न था। मंदिर की दीवारों पर पीपल और अन्य प्रकार के पेड़-पौधे उग आए थे। मंदिर के भीतर चमगादड़ अड्डा जमाए बैठे थे। फर्श पर गर्द और चमगादड़ों की विष्ठा पड़ी रहती। मंदिर में लोगों का आवागमन नहीं था।
एक दिन संध्या के समय गाँव वालों ने शंख की आवाज सुनी कि मंदिर की तरफ कोई भौं-भौं शंख बला रहा है। गाँव वालों ने सोचा कि किसी ने देव-प्रतिष्ठा की होगी मंदिर की सफाई भी की होगी और संध्या होने पर आरती हो रही है। लड़के बूढ़े, औरत, मर्द सभी दौड़ते हुए मंदिर के सामने पहुँचे। सोचा- देवता के दर्शन करेंगे और आरती देखेंगे। उनमें से एक ने मंदिर का दरवाजा धीरे से खोला तो देखा कि पद्यलोचन बगल में खड़ा शंख बजा रहा है। देवता की प्रतिष्ठा हुई नहीं मंदिर में झाडू तक नहीं लगाया गया चमगादड़ों की विष्ठा पड़ी हुई है। तब गाँव वालों ने चिल्लाकर कहा-पहुआ तूने तो नाहक शंख फूँक फूँककर हुल्लड़ मचा रखा है तेरे मंदिर में माधव कहाँ? उसमें ग्यारह चमगादड़ रात दिन गश्त लगा रहे है।
उपयुक्त कथा को सुनाकर रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि हृदय मंदिर में माधव प्रतिष्ठा की इच्छा होने यदि ईश्वर का लाभ करना चाहो तो सिर्फ भौं-भौं शंख फूँकने से क्या होगा। पहले चित्त शुद्धि चाहिए। चमगादड़ की विष्ठा-अपवित्रता रहने से माधव वहाँ नहीं आ सकते। ग्यारह चमगादड़ का अर्थ है-ग्यारह इंद्रियाँ, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और मन। पहले माधव प्रतिष्ठा बाद में इच्छा हो तो लेक्चर देने का शौक पूरा कर लेना।
उद्यान में भ्रमण करते करते सहसा राजा विक्रमादित्य महाकवि कालिदास से बोले आप कितने प्रतिभाशाली है, मेधावी हैं पर भगवान ने आपका शरीर भी बुद्धि के अनुसार सुंदर क्यों नहीं बनाया? कुशल कालिदास राजा की गर्वोक्ति समझ गए। उस समय तो वे कुछ ने बोले। राजमहल में आकर उन्होंने दो पात्र मँगाए-एक मिट्टी का और एक सोने का। दोनों में जल भर दिया गया। कुछ देर बाद कालिदास ने पात्र का-विक्रमादित्य ने उत्तर दिया। तब मुसकराते हुए कालिदास बोले जिस प्रकार शीतलता पात्र के बाहरी आधार पर निर्भर नहीं है। उसी प्रकार प्रतिभा भी शरीर की आकृति पर निर्भर नहीं है। विद्वत्ता और महानता का संबंध शरीर से नहीं आत्मा से है।
जाग्रत तंद्रा में विभोर मनुष्य वास्तव में आधा मनुष्य है, अर्द्ध जीवित और अर्द्धमृतक मात्र उसे कह सकते है। जैसे शरीर के एक भाग को लकवा मार जाए और दूसरा भाग अच्छा रहे तो उससे क्या काम हो सकेगा? किसी आदमी का एक हाथ, एक पैर, एक कान, एक आँख नष्ट हो जाए तो उस बेचारे की क्या दुर्दशा होगी। इसी प्रकार जो अर्द्ध−तंद्रा में पड़ा रहता है, वह अधूरा मनुष्य जीवन-संग्राम में विजय प्राप्त करने वाला योद्धा नहीं बन सकता। लापरवाही एक मानसिक लकवा है, जिससे आधा मस्तिष्क लुंज-पुँज हो जाता हैं ऐसे मानसिक अपाहिज दरिद्रता के चिथड़े में लिपटे एक कोने में पड़े रहते है और जीवन के भार को किसी प्रकार गिरते-मरते ढोते रहते है। उन्नत, समृद्ध एवं संपन्न जीवन तो उनके लिए आकाश कुसुम की भाँति दुर्लभ है।
जीवन को धूलि में मिला देने वाला यह सत्यानाशी रोग, जब रोगी चाहे, जा सकता है। यह रोग ठहरता तभी तक है तब तक रोगी उसका विरोध नहीं करता और अपने में उसे ठहरने देता है, पर जब व विरोध करने और हटा देने हेतु उतारू हो जाता है तो फिर उसका ठहरना नहीं हो सकता। व्यभिचार दूसरे पक्ष के सहयोग पर निर्भर है। यदि पुरुष व्यभिचारी हो, पराई स्त्री उसके कार्य में सहयोग न दे तो व्यभिचार होना असंभव है। इसी प्रकार जाग्रत तंद्रा का घातक रो भी रोगी के सहयोग पर निर्भर है। जहाँ विरोध होगा, हटाने का प्रयास होगा, वहाँ उसका ठहरना नहीं हो सकता। यह रोग किसी को उसकी इच्छा के विरुद्ध उसका शिकार नहीं बना सकता। प्रकाश के अभाव का नाम ही अंधकार है। वैसे स्वतंत्र रूप से अंधकार है। वैसे स्वतंत्र रूप से अंधकार का कोई अस्तित्व नहीं इसी प्रकार लापरवाही भी स्वतंत्र चीज नहीं है। जागरूकता का अभाव ही लापरवाही है। जैसे स्नान करना या न करना, टहलने जाना न जाना अपने हाथ की बात है उसे प्रकार मन को जागरूक रखना या न रखना भी अपने हाथ की बात है। मन की उदासीनता रूपी बाधा को हटा दिया जाए तो हर एक व्यक्ति पूर्ण रूप से क्रिया कुशल और सफल मनोरथी हो सकता है।
जो व्यक्ति जागरूक बनना चाहता है, उसे प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि मैं जाग्रत जीवन व्यतीत करूँगा। आत्मगौरव की रखा के लिए अपने हर एक कार्य को सफल और सुंदर बनाने प्रयत्न करूँगा। जीवन के बहुमूल्य क्षणों का अत्यंत सावधानी के साथ सुव्यवस्थित ढंग से सदुपयोग करूँगा। यह प्रतिज्ञा जिह्वा के अग्रभाग से नहीं वरन् अंतः करण के गहनतम प्रदेश से की जाती चाहिए। लापरवाही से होने वाली भयंकर हानियों पर बहुत समय तक गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। जिन लोगों के लापरवाही के कारण जीवन दुर्दशाग्रस्त हो रहे है, उनकी दशा का सुविस्तृत चित्र कल्पनालोक में खींचना चाहिए और यदि उनमें यह दोष न रहा होता तो कितना आगे बढ़ गए।
एक वे हैं जो लापरवाही के कारण ऊँचे से नीचे गिरे, दूसरे वे है। जो जागरूकता के कारण नीचे से ऊँचे चढ़े है। इन दोनों प्रकार के मनुष्यों की आरंभिक और अंतिम अवस्था के अंतर को ध्यानपूर्वक देखने से पता चलता है कि सावधानी में कितनी महानता और असावधानी में कितनी भयंकरता भरी पड़ी है। इस महानता ओर भयंकरता को एक-एक करके अपने जीवन से संबद्ध होने की कल्पना करनी चाहिए और मस्तिष्क में एक छायाचित्र बनाना चाहिए कि यदि भूतकाल में मैंने असावधानी न बरती होती तो अब तक कितना आगे मेरी कितनी उत्तम दशा रही होती। अनेक उदाहरणों, तर्कों, प्रमाणों और कल्पनाओं के साथ मन के सामने रख चिंतन करने से भीतर से एक स्फुरणा उत्पन्न होती है। यदि वह स्फुरणा कायम रखी जा सके तो मनुष्य जागरूक बन सकता है।
जीवन को जाग्रत बनाने के लिए दो बातों की प्रधान रूप से आवश्यकता है। एक तो समय कार्य विभाजन, दूसरे अपने कार्यों में रुचि। प्रातः काल उठते ही दिनभर का कार्यक्रम बना लेना चाहिए एवं रात को सोते समय देखना चाहिए कि उस कार्यक्रम बना लेना चाहिए एवं रात को सोते समय देखना चाहिए कि उस कार्यक्रम पर अमल हुआ या नहीं। बहुत काम करना अच्छी बात है, पर को उत्तमता से पूरे मनोयोग से किया जाए। यदि आप जीवितों का जीवन जीना चाहते है तो जाग्रत रहिए, अपने हर काम को सावधानी और सतर्कता के साथ कीजिए। स्मरण रखिए जाग्रत मनुष्यों को ही जीवन फल मिलता है।
दिनाँक 13/3/90 परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के दस दिन बाद परम वंदनीया माताजी प्रवचन
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
हमारे आत्मीय परिजनों! आज से अस्सी वर्ष पूर्व एक मसीहा आया और वह हमें राह बतलाता हुआ चला गया, दिशा बतलाता हुआ चला गया, दिशा बतलाता हुआ चला गया उसने आवाज लगायी-ऐ दुनिया वालों! मरी आवाज को सुनने का तो जरा प्रयास करो। ऐ दुनिया वालो! मेरी आवाज को तो जरा अपने हृदय में धारण करो। यह वह पथ है जिस पर मैं चल रहा हूँ। यह दो हाथ से देता है तथा हजार हाथ से लेता है” उस मसीहा ने आवाज लगाकर कहा, घर घर जाकर कहा। हर व्यक्ति की ठोड़ी में हाथ लगाकर कहा। जो भी वह कर सकता था, उसने किया। कोई व्यक्ति दस बार भी जन्म ले ले तो भी अकेले इतना कार्य नहीं कर सकता है, जितना कि एक मसीहा ने अपनी एक जिंदगी में करके दिखा दिया। भगवान के प्रति, इष्ट के प्रति, आराध्य के प्रति, मार्गदर्शक के प्रति, गुरु के प्रति जिस व्यक्ति की श्रद्धा होती है, वह उसे आगे बढ़ाता हुआ चला जाता है। उसका विकास करता हुआ चला जाता है।
उस मसीहा के जो अस्सी ब्रह्म-कमल खिले, उसका प्रत्येक वर्ष बड़ा ही खुशबूदार तथा शानदार रहा है। वह सबको राह दिखाता हुआ, पुष्प बाँटता हुआ चला गया। उसने कहा कि ऐ दुनिया वालो! कभी तुमको पछताना पड़ेगा कि एक मसीहा आया था। उसने हमें अच्छी बातें बताने और अच्छी दिशाएँ देने का प्रयास किया था, परंतु हमारा दुर्भाग्य था कि हमने अपने कानों को बंद करके रखा था। हृदय के कपाट को बंद करके रखा था। स्वाँग तो बहुत किए, कपड़े को भी ऊपर से रंगा लिया, परंतु हृदय को न रंग पाए। यदि हृदय को रंगा होता तो क्या एक भी विवेकानंद अर्जुन शिवाजी नहीं निकलता? अरे! निकलना चाहिए था।
इस दुर्भाग्य के लिए क्या कहा जाए? इसे या तो अपना दुर्भाग्य कहें या उनकी नासमझी कहें। दोनों ही बातें कहनी होंगी। वह मसीहा हमेशा आप लोगों को पुकारता रहा और कहता रहा-उठों बेटे, समय तुम्हें पुकार रहा है। सारा राष्ट्र चीत्कार कर रहा है। बेटे तुम्हें आगे आना है। परंतु यह दुर्भाग्य है कि कोई भी ब्राह्मणों से वीरों से खाली नहीं होती है, परंतु कोई भी व्यक्ति छाती ठोक कर यह नहीं कह सकता कि पूज्य गुरुदेव! आपकी वाणी को हमने धारण किया है। अब हम आपके चरणों में समर्पित है। कोई भी यह नहीं कह सका कि आपके कदम जिस रहा पर चले है, हम भी उसी राह पर चलेंगे। आपने काँटों को फूल बनाया है, हम भी बनाएँगे। बेटे! तुम्हें नहीं मालूम कि उन्होंने किस प्रकार छाती से काँटों को चिपकाए रखा और स्वयं आगे बढ़ते रहे। उन्होंने कभी भी किसी की भी चिंता नहीं की, हमेशा प्रगति के पथ पर आगे ही बढ़ते रहे। तब स्वतंत्रता संग्राम के काम किए तो जोग उन्हें मसीहा लगें। किसानों का जिसने लगान माफ करवाया, वह अद्वितीय था। उनके एक मित्र बड़े भाई - कुछ भी कह लीजिए- श्री जगनप्रसाद रावत थे, जिनका वे बड़ा सम्मान करते। उन्हें भी हमेशा बड़ों को सम्मान देने की आदत थी। वे दिया भी करते थे। वास्तव में जो दूसरों को सम्मान देता है, वह स्वयं भी सम्मान पाता है।
एक फूल भगवान के चरणों में समर्पित होता है और एक फूल माला के रूप में चढ़ता हैं उसे कष्ट तो होता क्योंकि माला बनाने के लिए उसे सुई द्वारा पिरोया जाता है, तभी वह भगवान के गले का हार बन पाता है। उन्होंने यह दिखा दिया कि किस प्रकार फूलों का हार बनकर भगवान के गले में हम शोभायमान हो सकते हैं। भगवान ने उन्हें गोद में ले लिया। वास्तव में वह माँ धन्य है, जिसने ऐसे पुत्र का जन्म दिया। हमारी यही प्रार्थना है कि हे माँ! वास्तव में ऐसे ही पुत्रों को जन्म देना अन्यथा बंध्या रह जाना। इस धरती पर अगर माताएँ पुत्रों को जन्म दें तो ऐसे ही पुत्रों को दें।
वे स्वयं जीवनपर्यन्त काँटों के रास्तों पर चलते रहें, परंतु दूसरों को खुशियाँ बाँटते रहे और इसी तरह खुशियाँ बाँटते हुए धरती से विदा हो लिए। वे यह विश्वास दिलाते हुए चले गए कि बेटे तुम्हारे प्रत्येक दुख एवं कष्ट में हर समय हम तुम्हारे साथ है। तुम किसी बात की चिंता मत करना। उन्होंने हर व्यक्ति को अंगुली पकड़ कर कभी प्रताड़ना के द्वारा ऊँचा उठाया, आगे बढ़ाया। वे हमेशा व्यक्तियों को ऊँचा उठाते ही चले गए। हर व्यक्ति के आँसुओं को पोछते रहे।
बेटे! ऐसे मसीहा के साथ क्या गया? कुछ नहीं गया। वे तिलकर समाज देश संस्कृति विश्व के लिए, मिशन के लिए दीपक की तरह जलता हुआ चला गया, उसके साथ क्या गया? जो सारे विश्व के लोगों को प्रकाश बाँटता हुआ चला गया, जो बीच की तरह गलता हुआ चला गया। उसने कभी भी यह परवाह नहीं की कि मैं तिल- तिलकर समाज देश, संस्कृति विश्व के लिए मिशन के लिए दीपक की तरह जलता हुआ चला गया, उसके साथ क्या गया? जो सारे विश्व के लोगों को प्रकाश बाँटता हुआ चला गया जो बीच की तरह गलता हुआ चला गया। उसने कभी भी यह परवाह नहीं की कि मैं तिल-तिलकर गलता हुआ चला जा रहा हूँ। उसे यह परवाह नहीं थी कि मेरा क्या होगा? परन्तु खुशी थी इस तरह के काम से क्योंकि उनके द्वारा सारे विश्व का कल्याण जो हो रहा था। दीपक को जलने में खुशी होती है, क्योंकि उसका प्रकाश दूसरों तक पहुँचता है। यह बात कौन समझता है? सौभाग्यशाली विरले लोग ही इस प्रकार सोच पाते है। खुदगर्जी आदमी को आगे नहीं बढ़ने देती। परंतु उन्होंने कभी भी इस प्रकार की चीज को अपने आगे बढ़ाने के लिए वे गुरु थे और आगे भी रहेंगे।
बेटे! आप कह सकते हैं कि माताजी आपकी आँखों में अभी आँसू कैसे थे? आप इतनी विह्वल क्यों हो रही थी? मैं पूछती हूँ कि आप सब क्यों रो रहे थे? इस शरीर जिता मूल्यवान है उससे भी ज्यादा मूल्यवान आत्मा है। यह आत्मा सारे विश्व में समायी हुई है। यह जानते हुए भी जो मनुष्य के किसी शरीर के साथ लगाव रहता है वह कभी-न कभी अनायास ही याद आ जाता है। इसे कोई रो नहीं सकता। शिष्य, माँ, बहिन पत्नी-सबको वह अपने अपने ढंग से याद आएगा। पत्नी का वही आराध्य होता है गुरुजी हमसे अलग नहीं है। उन्होंने पहले भी कहा था कि मैं तुमसे जुदा नहीं हूँ। लेकिन इस अज्ञानता के लिए क्या कहूँ? पता नहीं यह हृदय इतना भावुक हो जाता है, वैसे ही हमारा भी हो जाता है।
बेटे! सामान्य महिलाओं की तरह से हमारा दिल भावुक नहीं होता क्योंकि हमारे अंदर एक संकल्प शक्ति काम कर रही है। यह संकल्प उनका ही है। यह तो नाचीज शरीर है हाथ पैर चलेंगे पर प्रेरणा तो उसी आराध्य की है। उसकी प्रेरणा आती हुई चली जाएगी और यह शरीर उछलता हुआ चला जाएगा क्योंकि हमारा सच्चा समर्पण है। अगर ऐसा आपका भी है, तो आपको भी तड़पन होनी चाहिए तथा उन कार्यों के लिए आपको भी आगे आना चाहिए जिसे वे अधूरा छोड़कर चले गए है। हमें उनकी योजना चले गए है। हमें उनकी योजना का पूरे विश्व में प्रचार प्रसार करना है। हमारे शरीर में जब तक रक्त की एक भी बूँद है, जीवन के अंतिम स्पंदन तक उनका ही काम करते जाएँगे।
बेटे! समर्पण के द्वारा मनुष्य को क्या-क्या मिलता है, यह मैं नहीं बतला सकती हूँ। इसके द्वारा मिलने वाली चीज के आगे दुनियावी चीज का कोई मूल्य नहीं होता है, लेकिन समर्पण पक्का होना चाहिए। यही जीवन में रंग लाता है। उन्होंने मुझे कहा था कि तुम माँ हो, अतः माँ का फर्ज निभाना, जिस तरह शारदामणि ने निभाया था। उन्होंने कहा था कि तुम पीड़ा था। निवारण के लिए काम करना, भावुक मत होना। बेटे! हमने अपनी भावुकता को पीछे धकेल दिया है, क्योंकि हमें उनका काम करना है। हमें शरीर के लिए रोना नहीं है वरन् इस मिशन के लिए, इस पेड़ के लिए काम करना है आचार्य जी ने जो यह पेड़ लगाया है उसे फलना-फूलना चाहिए। इसकी टहनियों को आगे बढ़ना चाहिए ओर इतना बढ़ना चाहिए कि वे सारे विश्व तक पहुँच जाएँ।
ढाई हजार वर्ष पहले भगवान बुद्ध आए थे और उन्होंने कार्य किया। इसके पश्चात् उनका अधूरा कार्य गुरु जी ने किया। अब उनका कार्य हमें करना है। उनके विचारों को सारे विश्व में फैला देना है। इस काम को यह शरीर करेगा तथा आप करेंगे। उनकी शक्ति आती चली जाएगी तथा हम और आप काम पूरा करते चले जाएँगे। आप कहेंगे कि माता जी आप चमत्कार वाली बात कैसे कर रही हूँ? नहीं बेटे! में यथार्थ बतला रही हूँ। बेटे! हजारों बच्चे जब यह कहते हैं कि माताजी रात में या सबेरे गुरुजी आए और यह कह गए। मैं तो कहती हूँ। बेटे, यह बेकार की बातें मत किया कर। शक्ति आती है प्रेरणा आती है तो इनसान के अंदर एक संकल्प बल का उभार आता है। एक चेतना आती है और वह कुछ करने के लिए आगे आना चाहती है।
बेटे! जब हमने उनको तिलक किया था, उन्हें विदा किया था, जब हमने किसी को नहीं बताए थे। पहला संकल्प हमने यह लिया था कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक श्रद्धांजलि समारोह करेंगे जो चार-पाँच दिन का होगा तथा शरद पूर्णिमा के अवसर पर होगा। सन् 1947 का जब यज्ञ हुआ था। तो उसकी घोषणा एक साल पूर्व की गयी थी। परंतु इतने विशाल कार्यक्रम की घोषणा केवल तीन माह पहले की जा रही है। माताजी! यह काम क्या पूरा हो जायेगा? बेटे, देखना यह कैसे होता है? संकल्पबल में बहुत शक्ति होती है और फिर जिसका यह कार्य है और फिर जिसका यह कार्य, वह स्वयं अपने स्तर पर करा लेगा। यह ईश्वरीय इच्छा है। जिसका ईश्वर सहायक हो, वह कार्य कैसे पूरा नहीं होगा? गुरुजी के सारे संकल्प पूरे हुए हैं।
दूसरा संकल्प यह लिया था कि एक भव्य स्मारक बनेगा। गुरुजी को प्राकृतिक दृश्यों से काफी लगाव था पेड़-पौधे नहर, जंगल, पशु-पक्षी से काफी प्रेम था। जिन्दगी में उन्होंने न कभी सिनेमा देखी, न कभी टी.वी. देखी। केवल समाचार 2-10 पर अवश्य सुनते थे, ताकि देश-विदेश की क्या समस्याएँ हैं, इनकी जानकारी मिल सके। इसके साथ ही वे यह सोचा करते थे कि हम बच्चों को क्या दिशा दें, ताकि वे राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को हल कर सकें। प्राकृतिक दृश्यों से उन्हें बहुत प्रेम था। अतः मेरा मन हुआ कि हमारे आराध्य का एक ऐसा स्मारक बने, जो अद्वितीय हो, जिसे लोग देखते ही रह जाए।
बच्चों ने कहा कि माताजी यह स्मारक कैसे बनेगा? अर्थ की व्यवस्था कैसे पूरी होगी? जो भगवान से जुड़े होते हैं, उनका काम अवश्य पूरा होता है। मीरा का गाँधी का कमा पूरा हो जाता है, तो हमारा भी काम पूरा हो जाएगा, क्योंकि हमने लोकमंगल के लिए किया है। गुरुजी ने अपने समय तथा कलम की उपासना लोकमंगल के लिए की है। उन्होंने समाज की उपासना भी कम नहीं की। बेटे! यह साधन कहीं से भी आएँगे। जिस भगवान ने यह प्रेरणा भेजी है, वह इसे अवश्य पूरा करेगा। अब जो संकल्प ले लिया है, उस ओर ही हमारे कदम बढ़ेंगे और उसे पूरा करके ही रहेंगे।
बेटे! आचार्य जी ने कहा था कि तुम हमारे अधूरे कार्य को पूरा करना तथा इन बच्चों को कलेजे से चिपकाकर रखना, ताकि इन बच्चों को बाप की याद खले नहीं, ये भटकें नहीं। हमने कहा था कि हम ऐसा नहीं होने देंगे। हम इन्हें अपने कलेजे से लगाए रहेंगे, जिस प्रकार मुर्गी अपने बच्चों को कलेजे से चिपकाए रखती है। हमार जो होगा, वह होता रहेगा, हम उसकी चिंता नहीं करेंगे। इनके लिए जो भी कर सकती हूँ, अवश्य करूंगी। इनको हिम्मत साहस दिलाऊँगी, प्रेरणा दूँगी। इनको आगे बढ़ने का साहस दूँगी। इनके प्यार में कमी न होने दूँगी तथा कभी-कभी आवश्यकता पड़ने पर धमकाने का भी प्रयास करूंगी। इसके बाद भी नहीं मानेंगे तो डंडे लगाऊंगी। आप लोग तो दाढ़ी-मूँछ वाले हैं, आपको मैं क्या मारूंगी, परन्तु हमारी बात भी इससे कम नहीं है।
बेटे! गुरुजी का विराट स्वरूप, जो सूक्ष्मीकरण में समा गया है, वह आप लोगों को चैन से सोने नहीं देंगे। वे जिंदगी भर न तो चैन से सोए हैं और न किसी को सोने देंगे। कायरों की जिंदगी उन्हें काफी खोलती रही हैं किसी को फालतू बैठे देखते थे तो उन्हें दुख होता था। वह कहा करते थे कि आपको सोलह घंटे काम करना चाहिए। आपके ऊपर देश, संस्कृति, भगवान और गुरु का भी तो कुछ ऋण है। क्या उसे चुकाने का प्रयास नहीं करना चाहिए? आपको अवश्य करना चाहिए।
आज समाज में जो विकृतियाँ फैली हैं, उन्हें हटाने के लिए आपके अंदर क्या कोई करुणा पैदा नहीं होती है? भगवान के भक्त के अन्दर तो करुणा पैदा होती है। वह द्रवित हो जाता है। एक छोटी-सी घटना उनके जीवनकाल की है। एक आदमी एक कबूतर को पकड़कर ले जा रहा था। उन्होंने पूछा कि इसका क्या करोगे? हम इसे भूनेंगे और खायेंगे। उन्होंने जेब में देखा एक अठन्नी पड़ी थी। उसे देते हुए कहा कि तुम इस कबूतर को उड़ा दो। यह कौन कह रहा था? यह करुणा कह रही थी। यह संवेदना कहा रही थी। बेटे! जब व्यक्ति के अंदर करुणा जाग्रत होती है, तो वह फौलाद का हो जाता है। वह अपने लिये नहीं सोचता, वरन् सारे विश्व के लिए सोचने लगता है। इस कार्य के लिए वह दृढ़ संकल्प होता हुआ चला जाता है। वह ब्राह्मण का जीवन जीता है। आपसे मेरा एक ही निवेदन है कि आप ब्राह्मण का जीवन जीते हुए पूज्य गुरुदेव के रास्ते पर चलें और उनके काम को पूरा करें।
पूज्य गुरुदेव ने यह भी कहा है कि तुम लोग संत का जीवन जीना। संत अपने लिए नहीं जीता है। वह दूसरों के कष्टों को हरता है। उसे शाँति प्रदान करता है। आप इसी प्रकार का जीवनयापन करना। वह भगवान से यह भी नहीं कहता है कि भगवान मेरे कष्ट को दूर करना, बल्कि वह परोपकार के लिए, दया के लिये हमेशा कष्ट उठाता रहता है। वह दूसरों को ऊँचा उठाने के लिये अपना जीवन दाँव पर लगा देता है। आपको भी जितना संभव हो दूसरों को ऊँचा उठाने में अपना समय, श्रम और अक्ल लगानी चाहिए। मैं तो यह कहना चाहती हूँ कि जिनके पास अपने गुजारे के लिए है, वे सारा जीवन विश्वकल्याण के लिए दे सकते हैं। जिनके पास नहीं है, वे उदरपूर्ति के बाद कम-से-कम समयदान, थोड़ा अंशदान तो कर ही सकते हैं। वह भी नहीं दे सकते तो, हमसे सब ले जाओ, कुछ भी नहीं दो। बेटे! भगवान बड़ा होशियार है, उसे कोई धोखा नहीं दे सकता है।
बेटे! गुरु-शिष्य एवं गुरु-चेला में बहुत फर्क होता है। बुद्ध का एक चेला था। एक राजा ने कहा कि इस बाँस के ऊपर सोने का एक कमंडल लटका है। उसे जो उतार कर लाएगा, उसे हम गुरु मान लेंगे और पर्याप्त गुरुदक्षिणा देंगे। बुद्ध का वह चेला, जो पहले नट कर रह चुका था, गया और कमंडल उतारकर ले आया। भगवान बुद्ध के पास पहुँचकर बोला-भगवान आज एक चमत्कार हो गया। क्या चमत्कार हो गया? उसने सारी घटना सुना दी। भगवान बुद्ध ने कहा कि अभी उसे फेंक आओ। तुम नट थे, इसलिए तुमने यह काम किया है। इसमें कोई चमत्कार नहीं है। कोई संत अपनी शक्ति का प्रदर्शन इस प्रकार नहीं कर सकता है। आपको इस प्रकार के चमत्कार के पीछे नहीं पड़ना चाहिए।
बेटे! आपके गुरुदेव ने कभी भी यह नहीं कहा कि गायत्री माता मेरे सपने में आयी थीं और ऐसा कहा था। यह बेकार की बातें हैं। उन्होंने भक्त का जीवन जीकर संसार को, समाज को दिखलाया और इसके साथ ही यह भी बतलाया- कि भक्त को जीवन में कितना वरदान-अनुदान मिलता है। आपने द्रौपदी, कृष्ण, परशुराम, विश्वमित्र आदि का नाम सुना है और उनके चमत्कार के बारे में पढ़ा भी है। परंतु उन्हें आपने देखा नहीं कि वे कैसे थे, लेकिन एक मसीहा को आपने देखा है, जिसने कभी भी अपने लिए नहीं सोचा, अपने लिए नहीं किया। केवल परमार्थ के बारे में ही उन्होंने सोचा एवं परमार्थ का ही कार्य किया। उन्हें कोई कमी नहीं हुई। उनके असंख्य बच्चे हो गये। उनका हर बच्चा हर शिष्य यह कहता है कि आप आदेश करें, हम नौकरी छोड़कर आने को तैयार हैं। परन्तु चेला? चेला यह कहता है कि लाओ गुरु जी जो भी है, वह हमें दे जाओ। उनका वश नहीं चलता है, वरन् खाल भी ले जाए। बेटे! चेले की एक कथा सुनाती हूँ।
एक मौलवी साहब थे, जो किसी गाँव में सेवा करते थे। उनका एक चेला था। जब मौलवी साहब हज को चले गए तो चेले का धंधा जोरों से चलने लगा। उसने सोचा कि अगर मौलवी साहब आ जाएँगे तो कुछ भी नहीं मिलेगा, क्या चाल चलनी चाहिए? उसने विचार किया और एक तरकीब निकाली। गाँव में प्रचार कर दिया कि मौलवी साहब हज से आ रहे हैं। उनके बालों में चमत्कार है। जो व्यक्ति उनसे बाल ले लेगा, उसका कायाकल्प हो जाएगा। बस क्या था- सभी लोग उनके बालों को नोचने लगे। आधी दाढ़ी खत्म हो गयी। मौलवी साहब जी परेशान थे, अतः रात को जब सब सो गए तो वे चुपके से निकल गए। उन्होंने सोचा कि अगर नहीं गये तो शेष आधी दाढ़ी भी लोग नोंच डालेंगे और जीना मुश्किल हो जाएगा।
अभी हम किसकी बात कह रहे थे? चेले की। शिष्य और चेले के अंतर को आप समझिए। चमत्कार पर मत जाइए। बेटे चमत्कार से कुछ नहीं होता है। पूज्य गुरुदेव का जीभ पर कंट्रोल था। उन्होंने कभी भी अभक्ष्य नहीं खाया। उनकी जिह्वा पर सरस्वती विराजमान् रहती थी। जो भी उन्होंने कहा, वह सदैव सत्य होता था। सन् 1985 में उन्होंने यह कहा था कि हमारे मार्गदर्शक ने केवल पाँच वर्ष का अनुदान दिया है। यह आप फरवरी 1985 की पत्रिका में पढ़ लीजिए। वे बराबर दिशा देते चले गए, लोगों की दिशा बदलते चले गए ताकि किसी को कष्ट न हो। उन्होंने शानदार जीवन जिया। एक सच्चे इनसान की, समाजसेवी की, देशभक्त की जिंदगी उन्होंने जी और एक संत-ऋषि के रूप में इस संसार से विदा ले ली। उनकी पावन स्मृति सदैव हमारे साथ रहेगी। आइए उनके स्वप्नों को पूरा करने की शपथ लें। आज इतना ही।
ॐ शाँति शांतिः शांतिः॥
दीपक की अपनी महिमा है, सो वह हर स्थिति में अक्षुण्ण रहेगी। कोई उसके प्रकाश में पूजा करें, भोजन बनाये अथवा चोरी, हत्या करें। यह कर्ता की इच्छा के ऊपर है। ईश्वर एक प्रकाश है। उससे शक्ति और बुद्धि मिलती है। इसका उपयोग भले यों बुरे काम में करना मनुष्य के अपने हाथ में है। पर कर्तव्य के फल से वह बच नहीं सकता।
एक दिन शैतान का जी जब अपने काम से ऊब गया, तो उसने तय किया कि वह अब संन्यास ले लेगा। फलतः उसने अपने गुलामों को बेचना शुरू कर दिया। बुराई, ईर्ष्या, कलह, दर्प सब एक कतार में खड़े हुए। शैतान के भक्त आते गए और उन्हें पहचानकर एक-एक कर खरीदते गये। पर एक ओर बहुत ही जीर्ण-शीर्ण कुरूप गुलाम खड़ा था, जिसे कोई पहचान नहीं पा रहा था। आश्चर्य की बात तो यह थी कि उसका मूल्य अन्य सभी गुलामों से बढ़कर था। अंततः एक ने साहस कर शैतान से पूछ ही लिया-यह कौन है?
ओह, यह? शैतान मुस्कराया-यह मेरा सर्वाधिक प्रिय और उपयोगी गुलाम है। बहुत कम ही व्यक्ति जानते हैं कि यह मेरे दाहिने हाथ सरीखा है। मैं इसके सहारे बड़ी आसानी से लोगों को अपने शिकंजे में कस लेता हूँ। नहीं पहचाना अभी भी? वह अट्टहास कर उठा-यह निरुत्साह है, निरुत्साह।
भारतीय संस्कृति का सबसे उत्तम व उज्ज्वल पक्ष है - गुरु-शिष्य के पारस्परिक संबंधों पर आधारित एक भावना प्रधान संस्था का रूप लिए ऐसी परंपरा, जिसने इस माध्यम से ही भारत को जगद्गुरु के रूप में स्थापित कर दिया। ये उपनिषद् ही थे, जिनमें एक ज्ञानी गुरु के समीप बैठकर जिज्ञासु शिष्य ने प्रतिपादन सुने व उन्हें क्रमबद्ध कर एक विलक्षण धरोहर का रूप दे दिया। उप+निषद शब्द से ही भासित होता है- पास बैठकर श्रवण करना - आत्मसात् करना। यम-नचिकेता के पारस्परिक संवादों के रूप में कठोपनिषद् की बल्लियों में पंचाग्नि विद्या की व्याख्या तो आती है किंतु यह गुरु-शिष्य परंपरा का एक विलक्षण उदाहरण है। "तत्त्वमसि श्वेतकेतो” - (तू ही वह चिदानंद ब्रह्म है, हे श्वेतकेतु) के माध्यम से आरुणी श्वेतकेतु के रूप में जीवनविद्या की व्याख्या करने, अज्ञान के आवरण को हटाने वाली गुरु परंपरा हमारे समक्ष आती है। हमारी संस्कृति की इस आदिकाल से चली आ रही परंपरा के बार-बार नमन करने का मन करता है क्योंकि इसी ने अध्यात्म तत्त्वज्ञान को दो आत्माओं के बीच परम पावन संबंधों के अस्तित्व को एवं देवसंस्कृति के उज्ज्वल भविष्य लाने वाली भवितव्यता को जीवित रखा है।
गुरुपूर्णिमा-व्यास पूर्णिमा के पावन प्रसंग पर जब हम गहन चिंतन इस पर्व के विषय में करते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि हमारी साँस्कृतिक विरासत के रूप में परमसत्ता के अनुदान के रूप में अपनी श्रद्धा आस्था को परिमार्जित कर आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ाने वाला त्योहार है यह। ‘गुरु बिन ज्ञान नहीं रे - नहीं रे’ गीत के माध्यम से जब यह पंक्ति कही जाती है - गुरु बिन जीवन ऐसा होता, जैसे प्राण नहीं रे, नहीं रे’ तो आभास होता है कि गुरु का सान्निध्य पाना - उनके आर्षवचन, सूक्ष्म संरक्षण को पाना कितना विलक्षण सौभाग्य है। आदिकाल से ही भारतवर्ष में यह परंपरा चली आयी है कि गुरु अपने ज्ञान द्वारा उचित पात्र समझे गए शिष्य पर पड़े अज्ञान-अविद्या के पर्दे को हटाएँ व उसका उँगली पकड़कर मार्गदर्शन करें। अज्ञान के अंधकार से ज्ञान का अंजन उसकी आँखों में लगाकर शिष्यों को जीवनमुक्त करें, यह दायित्व गुरु को ही सौंपा गया। जीवनविद्या के लुप्त होते चले जाने की आज की स्थिति में इस गुरु-शिष्य परंपरा के पुनः प्रतिष्ठित किए जाने की कितनी आवश्यकता है, इसे कोई भी समझ सकता है। जीवन मूल्यों के पतन से यदि आज कोई साँस्कृतिक व्यवस्था रोक सकती है, तो वह है समर्पण योग पर टिकी गुरु-शिष्य परंपरा।
गुरु कौन हो, कैसा हो, क्या उसकी विशेषताएँ हो, इस पर हमारे शास्त्र कहते हैं कि गुरु “ विशारद ब्रह्मनिष्ठं, श्रोत्रिय” होना चाहिए। श्रुतियों का शब्दब्रह्म ज्ञाता-निष्णात उनके तत्व को समझने वाला, आचरण की दृष्टि से श्रेष्ठ ब्राह्मण - ब्रह्म में निवास करने वाला तथा विशारद अर्थात् जो शिष्य को अपने संरक्षण में लेकर शक्तिपात करने की सामर्थ्य रखता हो, उसे ही सही अर्थों में गुरु मानना चाहिए। संत ज्ञानेश्वर ने गीता की भावार्थ दीपिका में लिखा है कि गुरु की दृष्टि जिस पर पड़ती है, वह होने को चाहे जीव हो, पर बराबरी महेश्वर श्री शिवशंकर की करने योग्य बन जाता है। आद्य शंकराचार्य ने गुरु को ऐसा पारस कहा है जो न केवल शिष्य को अपना निज का साम्य रूप व शक्ति दे देते हैं, उसे भी पारस समान बना देते हैं, ताकि वह जिस अनपढ़ लौह-खंड रूपी मनुष्य को स्पर्श करे-उसे सोना बना दे।
गुरु-शिष्य संबंध उच्चस्तरीय आध्यात्मिक संबंधों में माने गये हैं, जिनमें बड़ी पवित्रता है- निश्चलता है एवं समर्पण की पराकाष्ठा है। शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक एवं आत्मिक इन चार संबंधों में से मात्र अंतिम आत्मिक संबंध गुरु-शिष्य स्तर पर ही निभता है। गुरु की विशिष्टता क्या हो- सद्गुरु की पहचान कैसे हो- इसके बाद शिष्य कैसा हो, यह जानना भी जरूरी है। शिष्य के विषय में श्रुति कहती है कि उसे हाथ में समिधा लेकर विनम्र भाव से श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु ज्ञान रूपी विराट ज्योति के प्रतीक सद्गुरु के पास जाकर उनसे ज्ञान की याचना करनी चाहिए। समिधा चूँकि अग्नि पकड़ती है - प्रज्ज्वलनशील है- उसे भी स्वयं के कषाय-कल्मषों को जलाने के लिए अग्नि के पास जाने हेतु तत्पर रहना चाहिए। जिसने अपनी अहंकार रूपी सीलन मिटा दी, उसकी अग्नि धुँआ नहीं देगी-चमकीली ऊँची उठने वाली लौ रूप में ही निकलेगी। तप द्वारा जो स्वयं को सच्चा ब्राह्मण बना ले- वही सही रूप में समिधा लेकर गुरु के सान्निध्य में बैठने वाला उनकी अनुकंपा का पात्र बन सकता है।
मानवी चेतना का मर्मज्ञ गुरु शिष्य के चैतन्य जगत में भारी उलट फेर करने की शक्ति रखता है। समष्टि के हित के लिए एक सीधी नियुक्ति के रूप में परमात्मा का प्रतिनिधि बनकर गुरु आता है। एवं सच्चे शिष्यों को ढूँढ़कर उनका भली-भाँति परीक्षण कर, उन्हें शक्ति दे, उनमें संस्कृति के उत्कर्ष का कार्य करा, अपने दायित्व की पूर्ति करता है। ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस जो शिव-शक्ति के अवतार थे, ऐसे ही उद्देश्य को लेकर धरती पर आए थे। उनको अनेकानेक व्यक्ति मिले, साधक-जिज्ञासु मिले किंतु सच्चा शिष्य उनने पाया- नरेंद्रनाथ में। दर्शनशास्त्र में निष्णात, पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव से नास्तिक बने नरेंद्रनाथ के अंदर प्रसुप्त पड़े संस्कार को पहचाना ठाकुर ने। सप्तर्षियों में से एक सत्ता किसी उद्देश्य विशेष को लेकर अवतरित हुई है, यह आभास ठाकुर को हो चुका था व उनने कुम्हार की तरह गढ़ा नरेंद्रनाथ को, जो कई नाम बदलने के बाद विवेकानंद बने, शीर्ष स्थान पर पहुँचे एवं सारे विश्व में भारतीय संस्कृति की पताका फहराने में सफल हुए। स्वयं विवेकानंद कहा करते थे - मैं क्या करके जा रहा हूँ - यह काश कोई मेरे स्तर का व्यक्ति होता तो जान पाता व सबको बता पाता।” यह गुरु-शिष्य का उदाहरण तो विश्व-विख्यात है। न जाने कितनी समीक्षा पाकर जीवनियाँ संस्मरण इस गुरु शिष्य जोड़े पर लिखी जा चुकी है। बड़ा ही विलक्षण यह वृत्तांत है व विगत एक शतक से अगणितों को अध्यात्म क्षेत्र में प्रेरणा का संचार करता रहा है।
देखें तो विरजानंदजी के शिष्य मूलशंकर जो महर्षि दयानंद बने, इसी ऐतिहासिक परम्परा के अंतर्गत आते हैं। उनके माध्यम से ही आर्यसमाज की आधारशिला रखी गयी। वैदिक धर्म संस्कृति के प्रसार-समाज−सुधार की रचनात्मक धाराओं का विस्तार महर्षि के माध्यम से ही संपन्न हो पाया। इसी परंपरा में जिनके नाम आते हैं। वे हैं-जनार्दन पंत के शिष्य एकनाथ, निवृत्तिनाथ के शिष्य ज्ञानेश्वर गोविंदपाद के शिष्य आद्य शंकराचार्य, कालूराम के शिष्य कीनाराम, भगीरथ स्वामी के शिष्य तैलंग स्वामी, प्राणनाथ महाप्रभु के शिष्य छत्रसाल, समर्थ रामदास के शिष्य शिवाजी राव, चाणक्य के शिष्य चंद्रगुप्त, दादू के शिष्य रज्जब, पतंजलि के शिष्य पुष्पमित्र तथा विशुद्धानंद जी के शिष्य गोपीनाथ कविराज। ये कई उदाहरणों में से कुछ हैं, नहीं तो यह परंपरा तो बड़ी लंबी सूची में आएगी।
श्रद्धा की व्याख्या देवसंस्कृति के निर्धारणों में बड़ी तर्क सम्मत आती है। बिखरे मन को - चित्तवृत्तियों को समेटकर मन को एकाग्र बना लेना सर्वांगपूर्ण भाव से महानता की ओर मोड़ लेना ही हमारी संस्कृति के अनुसार श्रद्धा है। इस प्रक्रिया को आज का विज्ञान ‘इंटीग्रेटेड माइन्ड के रूप में प्रतिपादित करता है। इसी के माध्यम से उस समर्पण-विसर्जन विलय -तादात्म्य के विषय में कहा जाता है-जो शिष्य से गुरु के प्रति अपेक्षित है। इसी को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता (8-12) में इस प्रकार कहा है -
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवासिष्यसि मय्येव, अत ऊर्ध्वं न संशयः॥
अर्थात् हे अर्जुन! तुम मुझ में मन को लगा और मुझ में ही बुद्धि को लगा। इसके उपरांत तू मुझ में ही निवास करेगा, इसमें कुछ संशय नहीं है। जो भी गुरुसत्ता के चरणों में, उनके आदर्शों के प्रति समर्पित हो अपने मन व बुद्धि को लगा देता है, संशयों को मन से निकाल देता है, उसके जीवन की दिशाधारा ही बदल जाती है। उसका आध्यात्मिक कायाकल्प हो जाता है। जो देवत्व के अनुरूप न हो, वह किसी भी समर्पित शिष्य को सोचना भी नहीं चाहिए। इसी बात को श्री अरविंद ने कहा है- डू नथिंग ट्राय टु डू नथिंग व्हिच इज अनवर्दी टु डिवाइन।
आज गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व (28 जुलाई) पर हम सब यही चिंतन करें कि एक अच्छे शिष्य के नाते हमारे अपने समर्पण में कही कोई कमी तो नहीं। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं परम वंदनीया माता भगवती देवी जी ने बीज बोने एवं खाद-पानी जुटाने की व्यवस्था की। जिनकी अन्तर्भूमि में थोड़ी भी उर्वरता-सुसंस्कारिता थी, उन्हें अवसर मिला उनके अगाध स्नेह व साधना अनुदान पाने का। यह पर्व उन सभी शिष्यों के लिए आत्मचिंतन का पर्व है। इस शताब्दी की अंतिम गुरुपूर्णिमा, व्यास-पूर्णिमा पर हम सभी शपथ लें कि अपनी गुरुसत्ता की जन्म शताब्दी (2010-11) तक बिना कोई विकार मन में लाए बिना किसी विराम के अपनी श्रद्धा शाँतिकुँज के प्रति-आराध्य सत्ता के प्रति तनिक भी कम न होने देंगे। न किसी की होने देंगे, उज्ज्वल भविष्य लाने को उतारू महाकाल की सत्ता हमारी गुरुदक्षिणा के बदले हमें क्या कुछ नहीं देती रही है व क्योंकर नहीं देगी, यह विश्वास तो सभी को होना ही चाहिए।
एक जुलाहे ने भूत की सिद्धि की। भूत प्रकट हुआ तो उससे वरदान माँगा कि उसके दो शिर और चार हाथ हो जाएँ, ताकि वह अधिक काम कर सके और दुहरा वजन लादकर हाट को जा सके।
वरदान तो मिल गया, पर लोगों ने इस प्रकार के विचित्र आदमी को कुतूहल समझा और प्रेत-पिशाच का अनुमान लगाकर मार डाला।
महत्त्वाकाँक्षाएँ ऐसा ही दुख देती हैं। औसत नागरिक का स्तर अपनाकर ही सुखी रहा जा सकता है।
ज्योतिपुञ्ज की ही प्रतिमा है, यह मशाल सद्ज्ञान की। चाल नहीं चलने पायेगी, षड्यंत्री-अज्ञान की॥
सब प्रकाश-पुत्रों ने मिलकर, आगे बढ़कर थाम लिया-मिले-जुले अपने कंधों पर, 'ज्योति पुञ्ज' का काम लिया॥
सभी लगा देंगे इसके हित, बाजी अपने प्राण की। ‘ज्योति पुँज’ की ही प्रतिमा है, यह मशाल सद्ज्ञान की॥
स्वार्थ भाव को त्याग सभी अब बन बैठे हैं वैरागी। सबने अपनी तुच्छ कामना और अहंता है त्यागी॥
सब मिलकर के लाज रखेंगे, ज्योति पुँज की शान की। ‘ज्योति पुँज’ की ही प्रतिमा है, यह मशाल सद्ज्ञान की॥
जिस मशाल को ऋषि-युग्म ने अपना स्नेह पिलाया है। तिल–तिलकर अपने तप द्वारा, जिसको लाल बनाया है॥
उसकी शान न घटने देंगे, शपथ हमें दिनमान की। ‘ज्योति पुँज’ की ही प्रतिमा है, यह मशाल सद्ज्ञान की॥
कौन अभागा हाथ? स्वार्थवश, अरे! अलग हो पायेगा। पूरा ही कारवाँ, प्यार से मिल-जुलकर समझाएगा
साथ इसी के जुड़ी हुई है, बात सभी के मान की। ‘ज्योति पुँज’ की ही प्रतिमा है, यह मशाल सद्ज्ञान की॥
इस मशाल को लेकर हम सब, आगे बढ़ते जायेंगे। गुरुवर का आदेश निभाने, हर तम से टकरायेंगे॥
फिर देखो! धज्जियाँ उड़ेंगी, तम के तने वितान की। ‘ज्योति पुँज’ की ही प्रतिमा है, यह मशाल सद्ज्ञान की॥
फिर से आज शपथ लेते हैं, महाकाल के सैनानी। स्वार्थ सिद्धि में नहीं फँसेंगे, नहीं करेंगे मनमानी॥
वक्रदृष्टि हो गई अगर तो, राह नहीं फिर त्राण की। ‘ज्योति पुँज’ की ही प्रतिमा है, यह मशाल सद्ज्ञान की॥
मंगल विजय ‘विजय'
*समाप्त*