मेरे पास युगों -युगों की धरोहर है, लेकिन यह सब तब तक व्यर्थ है, जब तक हम इसे युगानुरूप बनाकर इस समय हम इतिहास के उन महायुगों में से एक युग में है, जबकि मानवता भविष्य में छलांग लगा रही है हम संक्रमण काल के व्यक्तित्व है, जो इतिहास की नयी स्थिति में कार्यरत है, व्याकुलता के स्वर - निराशा के चिन्ह, जिन्हें हम समूचे विश्व में देख रहे है, वे जीवन के दृष्टिकोण में और व्यवहार में एक आमूल परिवर्तन की मांग कर रही है, जिससे की आदर्शों की गरिमा एवं मनुष्यत्व को पहचाना जा सके।
अगर हम अब तक चले आ रहे मृत रूपों को छोड़ने और नए आदर्शों वाली संस्था की रचना करने में सक्षम नहीं होते, तो हम समाप्त हो जायेंगे। हमने एक महान सभ्यता के निर्माण के लिए, उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर लिया है, लेकिन इसे नियंत्रित करने और सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त बुद्धि अर्जित नहीं की है। विचारों और सिद्धांतों के रूप में ही अपने व्यवहार में न ले आये, स्वयं आत्मसात न कर लें।
हमारी उपलब्धियां अगणित और गौरवास्पद हो सकती है। फिर भी हमें अधिक प्रखरता, साहस एवं अनुशासन की आवश्यकता है। अगर अपने आदर्शों एवं उद्देश्य के गौरव की रक्षा करनी हैं, तो अपने व्यक्तित्व का नवीनीकरण करना होगा। आदमी अपनी पहचान की, जीवन के अर्थ की और उस हार के महत्व की खोज कर रहा है जो उसे एक ऐसे यथार्थ का पल्ला पकड़ने से मिलती है, जो उसके हाथों टुकड़े टुकड़े हो जाता है, अपनी शक्ति एवं सम्ब्रधि के शिखर पर हम असुरक्षा के गहरे छणों का अनुभव कर रहे है, उतना पहले कभी नहीं, किया।
समर्थ सत्ता पर विश्वास आम इंसान को अनुशासित करने वाली शक्ति है। शायद इस विश्वास की कमी ही वर्तमान दुरवस्था के लिए उत्तरदाई है। आज हमें एक ऐसी आस्था की आवश्यकता है, जो विवेकशील हो, जिसे हम बौद्धिक निष्ठा और सौन्दर्यशास्त्रीय विश्वास के साथ अपना सके, एक बड़ी लचीली आस्था समूची मानव जाती की निष्ठा रखे, इसके इस या उस टुकड़े पर नहीं। एक ऐसी आस्था, जिसका पल्ला निरपेक्ष और प्रबुद्ध मस्तिष्क सम्मुख विनाश के समय भी पकड़े रहे सके।
वैशाली उन दिनों अपने आप को सौभाग्यशाली अनुभव कर रही थी। करती भी क्यों नहीं, महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों के भारी संघ के साथ वहां ठहरे हुए जो थे। अपार जनसमूह नित्यप्रति भगवान् तथागत के दर्शनों को लालायित रहता और उपदेशामृत पाकर धन्य अनुभव करता। नित्य की ही बहती आज भी दर्शनार्थियों का मेला लगा हुआ था। तभी बुद्धदेव के चरण स्पर्श करते हुए एक शिष्य ने जिज्ञासु भाव से उनकी तरफ देखा। महात्मा बुद्ध से शिष्य की जिज्ञासु भावना छिपी न रहे सकी। वे गदगद भाव से बोले -" तुम्हें कुछ कहना हैं निःसंकोच कहो. मैं तुम्हारी बातें सुनूंगा।"
शिष्य पुलक उठा। हाथ जोड़कर बोला- " मैं आपके पावन उपदेशों को घर -घर में प्रतिष्ठित करना चाहता हूं देव! इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए संसार का अविरल भ्रमण करना चाहता हूं, आपका आशीर्वाद पाने के लिए उपस्थित हुआ था प्रभु, आपकी सेवा में "महात्मा बुद्ध ने शिष्य की अंतर्भावना को प्रेमपूर्वक सुना और अनायास ही उनके मस्तिष्क में उपदेश को की अनेक मर्यादायें घूमने लग गयी कुछ क्षण वे विचार करते फिर शिष्य से पूछ बैठे -" वत्स! हमारा अपना संसार ही क्या, देश तक भी काफी विशाल है। उपदेश के लिए देशाटन में बड़ी परेशानियां सामने आएंगी। हो सकता है, लोग तुम्हारे विचारों से प्रभावित हो। किन्तु कुछ विरोधी लोग तुम पर तरह-तरह के झूठे लांछन लगाकर लोकनिंदा भी करने लगेंगे। बताओ, यह सब तुम्हें उस समय कैसा लगेगा?''
"मैं समझूंगा गुरुदेव की ये लोग बहुत ही भले मानस हैं, क्योंकि गालियां देकर मुझे क्रोधित नहीं कर रहे हैं"। शिष्य बोला।"पर मान लो वत्स! तुम्हें कुछ लोग ऐसे भी मिल सकते हैं, जो तुम्हें तुम्हारे मुंह पर ही कटु गालियां देने लगे। उस समय तुम्हारे ऊपर क्या बीतेगी?" अगले ही पल बुद्ध ने फिर शिष्य के समक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया।
"भगवान्! फिर भी मैं उन्होंने अपने अभियान को सफल बनाने में सहायक ही मानूंगा। क्योंकि वे मेरे ऊपर कीचड़ तो नहीं फेंक रहे है न।"
बुद्धदेव ने फिर पूछा- "मान लो यही स्थित आ जाय कि लोग तुम्हारी बात सुनने की अपेक्षा कीचड़ -मिट्टी फेंक कर तुम्हें उपदेश देने से रोके, तब तुम क्या करोगे?''
शिष्य बोल उठा - "भगवन्! मैं उन्होंने परोपकारी ही स्वीकार करूँगा, क्योंकि वे मुझे थप्पड़ नहीं मार रहे होंगे। क्या उनका यह अहसास मुझ पर कम होगा,?''
शिष्य के विनयशीलता पूर्ण उत्तर और आत्मविश्वास से बुद्धदेव प्रसन्न हो उठे। कुछ क्षण रुककर वे बोले - "वत्स, ऐसे निर्मम लोग भी तो मिल जायेंगे, जो तुम्हें थप्पड़ भी लगाने लगे, तो तुम क्या करोगे? शिष्य कम नहीं था। अपार धैर्य और विवेकशीलता अपने आप में समेटे हुए था, बोला -" पर भगवान्! मैं तो फिर भी उन्हें अपने लक्ष्य में सहायक स्वीकारता हुआ धन्यवाद ही अर्पित करूँगा। उनका उपकार मानूंगा की उन्होंने मुझे जान से नहीं मारा, जिन्दा छोड़ दिया है।''बुद्धदेव शिष्य का यह उत्तर सुनकर ठहाका लगाकर हँसे, बोले- " प्यारे वत्स! तुम कितने भोले हो? अरे तुम कैसे निश्चयपूर्वक यह कह सकते हो की ऐसे निर्मम और निष्ठुर लोग तुम्हें जीवित ही छोड़ देंगे। डाकू -लुटेरे तो इतने निर्मम होते हैं, पुत्र। की जरा भी आगा पीछा नहीं सोचते हैं। मान लो की तुम्हें किसी ने एक ही प्रहार में मार डाला, तो फिर तुम क्या करोगे?' '
शिष्य के विवेक और धैर्यशीलता ने अभी भी अपनी सीमा पार नहीं की थी। वह हाथ जोड़कर बोला -"देव! आपने यही अमरत्व तो हमें बतलाया है की संसार दुखों का सागर है, और जीवन -धारण करने में इसमें दुःख -ही-दुःख उठने पड़ेंगे। जब एक दिन हम सबको मरना ही है, तो फिर भगवन् मृत्यु से कैसा भय? मैं निश्चय ही उन डाकुओं का उपकार मानूंगा की वे मुझे, आपके उपदेशों का प्रचार करते हुए को जीवन से मुक्ति दिला रहे हैं।'' शिष्य के इस उत्तर से महात्मा बुद्ध बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना दाहिना हाथ उठाकर आशीर्वाद देते हुए कहा- "वत्स! उपदेशक की महानतम मर्यादाओं से अब तुम पूरी तरह परिचित हो गए हो। तुम उपदेश करने के अपने लक्ष्य में अवश्य सफल बनोगे। सच तो यह है वत्स, कि जो किसी को बुरा नहीं मानता है, बुरा नहीं स्वीकारता है, सबकी भलाई की चिंता में तन्मय रहता है वही दूसरों को उपदेश देने का अधिकारी भी है,। वत्स तुम उपदेश के लिए प्रव्रज्या करो, क्योंकि तुम उपदेश देने योग्य भी हो और उपदेशक पद की मर्यादाओं को समझने में सक्षम भी। शिष्य महात्मा बुद्ध के चरणों में प्रणाम कर निकल पड़ा अपने लक्ष्य की और। वतावन में वह "बुद्धं शरणं गच्छामि 'धम्मं शरणम् गच्छामि 'की गगन गुंजाती ध्वनी बिखेरता का रहा था।
अभ्यास की दृष्टि रही तो साधन काम आते हैं। अभ्यास की दृष्टि न रही तो उत्तम साधन भी निकम्मे हो जाते है। उत्तम साध्य के लिए उत्तम साधन भी होना चाहिये। सुगंध की प्राप्ति चंदनादि सुगंधित द्रव्यों से ही संभव है। घटिया तेल जलाकर हवन की सुगंध नहीं पैदा की जा सकती
ध्यान वह भाव दशा है . जिसमें एक ही वास्तु का ज्ञान होता है। ध्यान की दशा में ध्येय और ध्यान का भिन्न -भिन्न ज्ञान होता है, यह विशुद्ध रूप से एक अनुभूति है, जो इंद्रियातीत है। ध्यान की चरम परिणित समाधि में जाकर होती है। भारतीय संस्कृति में इसे आत्मिक लाभ एवं विकास के लिए प्रयोग किया जाता है। पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक इसे मानसिक एकाग्रता से सम्बन्धित करते है, तथा मन की विशिष्ट अवस्था मानते है, लेकिन यह ध्यान की प्रारम्भिक अवस्था है। इसकी विधेय एवं स्वरूप भले ही अलग अलग हो आज का विज्ञान भी ध्यान को प्रमाणिक सिद्ध कर इसके लाभों को उजागर करता है। ध्यान शब्द की व्युत्पत्ति 'ध्य" धातु से भाव में "लट" प्रत्यय लगाकर की जाती है। इसका अर्थ चिंतन अथवा इन्द्रियों की अंतः वृत्ति प्रवाह के रूप में किया जाता है। पतंजलि महाभाष्य की उक्ति के अनुसार, ध्यान को एकाग्रता से जोड़ा जाता है। श्री अरविन्द के अनुसार ध्यान उस स्थित को कहते है, जब अंतर्मन वस्तुओं को उनका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के लिए देखता है। एकाग्रता का तात्पर्य है - एक स्थान या एक वास्तु पर और सहेज एक अवस्था में चेतना को केन्द्रित करना। योग में एकाग्रता उसे कहते हैं, जब चेतना किसी विशेष स्थित जैसे शांति में अथवा क्रिया में या अभिप्षा, संकल्प आदि में तल्लीन होती है। इसी को मेडीटेशन कहते है। यह ध्यान का एक स्वरूप है। ध्यान की स्थिरता धारणा कहलाती है। धारणा में प्रथम बार चैतन्य शक्ति को अंतः हृदय की ओर उन्मुख किया जाता है। अवधि के नियतकाल को जो प्राप्त करती हैं वह धारणा कही जाती है। ध्येय से युक्त जिसका मन केवल उसी को ही देखता है दूसरे पदार्थों को नहीं उसे ध्यान की स्थित कहते हैं। ध्येय का चिंतन करते हुए जब मन ध्येय में ही निश्चल एवं विलीन हो जाता है, तो उसे तत्वचिंतक परमध्यान की संज्ञा देते है।
योग में किसी भी ब्रह्मा विषय पर चित्त की अवस्था को एक लम्बे समय तक बनाये रखने की क्रिया को अवधान कहते हैं। धारण में यह प्रवाह एक अभिष्ट दिशा की और बना रहता है। सामान्य अवस्था में खंडित रूप में होता है। अभ्यास द्वारा इसी को अखंड करने की प्रक्रिया को दयां कहा जाता है यह चित्त की एक विशेष अवस्था है। धारणा और ध्यान की जल एवं घर्त की एक तरल धारा में तुलना की जा सकती है जब एक्षित वास्तु पर ध्यान केन्द्रीय होता है तब संकल्पशक्ति क्रियाशील होती है ध्यान संकल्पशक्ति की अभिवृद्धि में सहायक होता है और संकल्पशक्ति ध्यान को सयामीत करती है। ये दोनों ही आपस में एक -दूसरे के पूरक है। संख्यदरसन के अनुसार राग की निवृत्ति हो जाना ही ध्यान है - "रोगफाती ध्यानम्।" पुराणों में भी इसका उल्लेख मिलता है। अग्निपुराण के अनुसार शांत मन से चिंतन करने को ध्यान कहते हैं ब्राह्मी भाव में निमग्न हो जाना भी ध्यान है। ध्येय में अवस्थित चित्त की एकाग्रता को ही ध्यान कहा जाता है
ध्ये चिन्तयाम ऋतो धातु विष्णुचिंता मुहुर्मुह अनक्षी प्नेत्न्मंसा ध्यान्मित्य भिधिय्ते ब्रह्मा स्म्स्किध्यान्म नाम्न्दस्य्ते
गरुड़पुराण में ब्रम्ह्चिंता के अर्थ में ध्यान का प्रयोग किया गया है।
ब्रम्ह्त्मचिंता ध्यानम् स्यधर्ण मनसो ध्रती। अहम ब्रमेत्य्वस्थन्म समधिब्रम्हान्म स्थिता।
विष्णु पुराण में भी इसी तरह ध्यान शब्द का प्रयोग किया गया है। जिस पर ध्यान किया जाता है। उसकी एकाग्रता को ही ध्यान की संज्ञा दी गयी है। इसमें ध्यान को ज्ञानशून्य अखंड वृत्ति प्रवाह बताया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, ज्ञान से ध्यान महत्वपूर्ण है तथा ध्यान द्वारा कर्मबंधन नष्ट हो जाता है। श्रुति का कथन है की ध्यान से प्रज्ञा की प्राप्ति होती है। यही श्रेष्ठ एवं उत्तम योग है। " अमेनानुमानेन ध्यानाभ्या -सरसेनच त्रिभा प्रकल्पयेत प्राज्ञं लभते योग्मुक्त्मम। " महाभारत में ध्यान को योगी का सर्वोच्च एवं परमबल घोषित किया गया है - एकाग्रता और प्राणायाम। प्राणायाम आदि छह साधनों से प्रत्याहार होता है और प्रत्याहार के द्वारा बारह प्रकार के धारणा की जाती है। भवेदिस्वर संगत्वम ध्यानम् दवादस्म धारणम। पूर्ण एकाग्रता से अपने इष्ट में आत्मभाव से समाहित होना भी ध्यान कहलाता है - समाहितेनमनसं चैतयांतवर्तिता। आत्मनो अभिष्ट देशनां ध्यानध्यन्याभी उच्चते। तंत्रसार में तीन प्रकार के ध्यान का उल्लेख मिलता है।
जबकि सामान्यक्रम में ध्यान को सगुण एवं निर्गुण अथवा स्वरूप व अरूप दो तरह के विभाजित करते है, पूर्ण चेतना (केंद्रीयक्षेत्र), धुंधली या अस्पष्ट चेतना (मध्यक्षेत्र), पूर्णता अचेतन वाला (ब्रह्मक्षेत्र )। इसकी गति एक अवस्था, दूसरी अवस्था में बड़ी तीव्र ढंग से होती है। विभिन्न विशेषज्ञों -मर्मज्ञों ने ध्यान की अलग अलग विधियां बताती हैं। ध्यान खुली या बंद आँखों से शांत या गाकर भी किया जा सकता है। जैनधर्मावलम्बी प्राणायाम द्वारा करते हैं। भावातीत ध्यान, शांत ध्यान की ओर संकेत करता है, जबकि इस्कान संप्रदाय के लोग गा-बजाकर ध्यान करते है। वैयक्तिक एवं सामूहिक ध्यान की अनेक विधियां भी है। शांत ध्यान तीन तरीके से किया जाता है - एकाग्रता, धारणा एवं मंत्रोच्चारण द्वारा। धारणा में किसी वस्तु मूर्ति या चित्र, रंग, पुष्प. अथवा दीपक की लौ पर ध्यान को केन्द्रित किया जाता है। एकाग्रता को थोड़ा कठिन माना जाता इसमें हिन्दू तथा बौद्धों ला सहस्रकमल, इस्लाम का ज्योतिर्मय चन्द्रमा, ईसाइयों का रहस्यमय गुलाब, यहूदियों का डेविड का तारा आदि पर ध्यान जमाया जाता है। यह विशुद्धारूप से चेतना के विकास को दर्शाता है। पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक ध्यान को क्षणिक अवस्था मानते है। ये इसे एकाग्रता से जोड़ते है। मैकडूगल ने अपने शोधग्रंथ ' आयूट लाइन ऑफ साइकोलॉजी'में ध्यान का वर्णन किया है और बताया है की इसमें मन की भूमिका प्रमुख होती है। उनके अनुसार यह सक्रियता का एक प्रतीक या चिह्न है। ध्यान का रुचि एवं इच्छा से गहरा सम्बन्ध मन जाता है। हालांकि दोनों की दृष्टिकोण भिन्न होते है इसलिए एम् . कालिन ने स्पष्ट किया है की रुचि गुप्त स्थान है जबकि ध्यान रुचि का क्रियात्मक पहलू है। आधुनिक मनोवैज्ञानिक में ध्यान को क्रिया के रूप में जाना जाता है। इसका तात्पर्य है -अपनी क्रिया को केन्द्रित करना।
ध्यान को एक ओर जहाँ प्रत्येक व्यक्ति से जोड़ा हटा है, वही दूसरी ओर प्राणियों के व्यवहार का आधारभूत लक्षण मन जाता है वुडवर्थ ने साइकोलॉजी ' में उल्लेख किया है -एक नेर्दिस्ट क्षण में अनेक प्राप्त क्रियाओं के प्रति समान रूप में प्रतिक्रिया करने की अपेक्षा मन कुछ चुनी हुई क्रियाओं के प्रति प्रतिक्रिया करता है। एक उत्तेजना या उत्तेजनाओं के एक समूह पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है और शेष की लगभग उपेक्षा कर देता है। दूसरे क्षण दूसरी उत्तेजना केंद्र में आ जाती है। वुडवर्थ के अनुसार, ध्यान का अर्थ है - किसी वस्तु को देखने या किसी अर्थ को करने के लिए सजग एवं क्रियाशील होना। इसी तरह इनके मतानुसार ध्यान के दो स्वरूप हो सकते है -क्षणिक और निरंतर। प्रारम्भ में ध्यान तो क्षणिक ही होता है, परन्तु इसमें मन को लगाये रहने से इसमें निरंतरता का संचार होता है।
सिडनी स्मिथ ने स्पष्ट किया है की अपने लक्ष्य के सामने शेष समस्त बातों को भूल जाना ही ध्यान है। योसेन मेरेडिथ ने इस विषय में कहा है जो आदमी जीवन में केवल एक चीज की खोज करता है, वह विश्वास कर सकता है की जीवन की समाप्ति से पूर्व उसे वह प्राप्त हो जायेगा। अंततः उसने इसे ही ध्यानप्रक्रिया से जोड़ा है। चार्ल्स डिकेन्स के अनुसार, ध्यान पर उपयोगी, हानि रहित, सुनिश्चित, लाभदायक प्रक्रिया है। स्वेटमार्डन में संकल्पशक्ति को केन्द्रित करने को एकाग्रता माना है। एकाग्रता पैदा हो जाने पर संसार का कोई भी काम अधूरा नहीं रह सकता।
ध्यान के विषय में पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक का मत तो कहीं-कहीं योग सिद्धांतों से बहुत कुछ मिलता-जुलता है। एस परिप्रेक्ष्य में अर्नेस्तुवुड का विचार है की ध्यान का प्रारंभ वहां होता है, जहाँ धारणा समाप्त होती है। धारणा का उद्देश्य होता है, मानसिक दृश्य के लघु क्षेत्र पर अवधान को केन्द्रित करना, जिससे की उस विषय पर चेतना का प्रकाश आधिक तीव्र हो सके। धारणा में दृश्य क्षेत्र का संकुचन होता है। ध्यान में उसका विस्तार होता है। अतएव ध्यान की सफलता में धारणा का विकास अंतर्निहित होता है। ध्यान आत्मिक रहस्य को अनावृत्त करता है। ध्यानावस्था में भौतिक एवं मानसिक कार्यक्षमता में वृद्धि हो जाती है। सुविख्यात बर्गसा का कथन है की ध्यान के विकास और विस्तार के लिए ब्रह्मा कर्मों को दबाना आवश्यक होता है। उसका यह मत सांख्ययोग मत के अतिनिकट है, जिसके अनुसार केवल आसन और शिथिलीकरण की सहायता से ध्यान को उसके साथ होने वाली क्रियाओं से प्रथक किया जा सकता है। एडगर किसी के अनुसार, ध्यान के द्वारा व्यक्ति के अंदर निहित सृजनशक्ति उभर आती है। यह शक्ति शारीरिक, मानसिक और आत्मिक पक्ष को समृद्ध एवं विकसित करती है। प्रख्यात तत्ववेत्ता हरिदाश चौधरी की मान्यता है की ध्यान एक ऐसी कला है, जो सुषुप्त शक्तियों को जाग्रत एवं क्रियाशील करती है। जान व्हाइट ने अपने बहुचर्चित पुस्तक "द मीटिंग ऑफ साइंस एंड स्पिरिट " में ध्यान को जीवन के लिए उपयोगी मानते हुए इसके विभिन्न प्रकार के लाभों का उल्लेख किया है। इनके अनुसार, ध्यान शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा आत्मिक स्तर पर लाभप्रद है। इसमें शारीरिक स्वास्थ्य बढ़ता है मानसिक तनाव, चिंता एवं हिंसावृत्ति में कमी आती है तथा आत्म-ज्ञान एवं आत्मविकास होता है। प्रयोगों से पता चला है की ध्यान द्वारा वैयक्तिक एवं पारिवारिक संबंधों में दृढ़ता आती है मानसिक रोगियों के अलावा ध्यान सभी लोगों के लिए उपयोगी सिद्ध होता है। माइकल मर्फी एवं स्टीवन डोनावन ने अपने प्रसिद्ध शोध ग्रन्थ ' द फिजिकल एण्ड साइकोलॉजीकल इफेक्ट्स ऑफ मेडीटेशन ' में इसमें अनेक प्रकार के प्रयोग बताये हैं। इनके अनुसार ध्यान अत्यंत गंभीर अनुभव है।
शारीरिक तौर पर ध्यान से मस्तिष्कीय तरंगें, हृदयगति, रक्क्तचाप, त्वचा की प्रतिरोधी क्षमता तथा अन्य शारीरिक क्रियाएं नियमित एवं नियंत्रित होती है।
यह जाग्रत हैपोमेताबलिक अवस्था है। मनोवैज्ञानिक ने ध्यान को 'रिलेक्स्द अटेन्सन 'कहा है। जॉनव्हाइट ने ध्यान के कुछ खास लाभ इस तरह गिनाये है -(१) दैनिक जीवन में शांति एवं स्वतंत्रता का बोध होना। (२) तनाव, थकान, उदासी आदि मनोविकारों में कमी।(३) मियादी दर्द जैसे -सिरदर्द, जोड़ों में दर्द आदि से मुक्ति। (४) अनिद्रा रोग में विशेष लाभप्रद। (५) असीम धैर्य एवं दूसरों के प्रति स्नेह और सहानुभूति में विस्तार। (६) परमात्मतत्त्व के प्रति श्रद्धा एवं विश्वास में वृद्धि।(७) सामाजिक जीवन में सेवा और सहयोग की मनोवृत्ति में बढ़ोत्तरी। जॉनव्हाइट द्वारा परिभाषित ध्यान में भारतीय योग में वर्णित ध्यान की छाप मिलती है। इन्होंने भी ध्यान को चेतना की विशिष्ट अवस्था मानते हुए इसका अंत समाधि में मन जाता है। तिब्बती लामा अंगारिका गोविन्द जो मूल रूप से जर्मन है का कहना है की ध्यान व्यक्ति को पूर्णता में तदाकार कर देता है। इसमें वैयक्तिक चेतना ब्राह्मीचेतना में एकाकार हो जाती है। ध्यान में क्षुद्र अहं का विलोप एवं विसर्जन हो जाता है। योगीराज श्री अरविन्द के अनुसार ध्यान के लिए उत्तम विषय सदा ही ब्रह्मा है और जिस भावना पर मन को केन्द्रित होना चाहिए, वह है की भगवान सब में है सब में भगवान में है और सब कुछ भगवान ही है। सर्व खल्विदं ब्रह्मा है। यही उच्चतम भावना है और इसमें सभी सत्य निहित है। ध्यान के समय एकांत और निर्जन स्थान में रहना तथा शरीर का शांत-स्थिर रहना सहायक होता है। इसके लिए सबसे पहली आवश्यकता आंतरिक अवस्था है। ध्यान की विघ्नों में मन की भाग -दौड़,विस्मृति, नींद, शारीरिक और स्नायविक अधीरता और चंचलता आदि है। इनके विरुद्ध साधक के संकल्प का द्वार खोलती है। दूसरी आवश्यक अवस्था है - आंतरिक चेतना से उठने वाले विचारों एवं भाव वेगों की पवित्रता,.ताकि बढ़ती रहे। इन दोनों अव्स्यक्ताओं को पूरा करने के पश्चात आन्तरिक चेतना जब ध्यान में निमग्न होती है . तब जीवन में प्रवृत्तियों एवं परिस्थितियों स्वयं ही साकार होने लगती है
“ एक लड़के ने एक बहुत धनी आदमी को देखकर धनवान बनने का निश्चय कर किया। कई दिन तक वह कमाई में लगा रहा और कुछ पैसे भी कमा लिए। इसी बीच उसकी भेंट एक विद्वान से हुई। अब उसने विद्वान बनने का निश्चय किया और दूसरे ही दिन से कमाई धमाई छोड़कर पढ़ने में लग गया। अभी अक्षर अभ्यास ही सीख पाया था की उसकी भेंट एक संगीतज्ञ से हुई। उसे संगीत में अधिक अकर्षण दिखाई दिया, अथवा उसने उसी दिन से पढ़ाई बंद कर दी संगीत सीखने लगा।
काफी उम्र बीत गई। न वह धनी हो सका न विद्वान। न संगीत सीख पाया न नेता बन सका। तब उसे बड़ा दुःख हुआ एक दिन उसकी एक महात्मा से भेंट हुई। उसने अपने दुःख का कारण पूछा। महात्मा जी मुस्कुराकर बोले बेटा! दुनिया बड़ी चिकनी है, जहाँ जाओगे कोई-न-कोई आकर्षण दिखाई देगा। एक निश्चय कर लो और फिर जीते-जी उसी पर अमल करते रहो, तो तुम्हारी उन्नति अवश्य हो जायगी बार बार रुचि बदलते रहने से कोई भी उन्नति न कर पाओगे। युवक समझ गया और अपना एक उद्देश्य निश्चित कर उसी पर अभ्यास करने लगा।"
"एक जल -पूरित नदी कल -कल करती हुई आनन्द और उल्लास के साथ बही जा रही थी। उसके किनारे बड़े -बड़े सुन्दर नगर और उपनगर बसे हुए थे। इस सभी नगरों के निवासी विविध प्रकार से उसके जल का उपयोग करके अपने दैनिक जीवन को सफल बनाते रहते थे।
पर्वतों से टकराकर नदी का पानी जहाँ ऊपर से नीचे गिरता था, वहां एक विशाल विद्युत केंद्र बनाया गया था, जहाँ बिजली का उत्पादन होकर उसमें अनेक प्रकार के यांत्रिक और औद्योगिक कार्यों का संचालन किया जा रहा था।
आगे चलकर ऐसी नदी से कुछ नहरें निकाली गई थी। कही नावों से इसमें व्यापार करके अपनी जीविका चला रहे थे।
ऐसा था इस नदी का जीवन। आदि से अनंत तक अपने अंग-प्रत्यंग से औरों का भला करती हुई जब इस प्रकार वेग से समुद्राभिमुख बही चली जा रही थी, तब एक ठहरी हुई जोहड़ ने, जिसका पानी प्रवाह हीन होने के कारण दुर्गन्ध युक्त हो गया था, इस नदी से कहा -
"बहिन, बताओ अपने इस दिन-रात के बहते हुए जीवन में आखिर तुम्हें किस बात का अनुभव होता है,जो तुम निरंतर कल कल करती हुई किलोलें किया करती हो? मुझे क्यों नहीं देखती, जो एक जगह ठहरकर अपने जीवन को प्रगति और प्रवाह से दूर करके, स्थिर होकर यहाँ पड़ी पड़ी आराम के साथ अपने दिन गुजार रही हूं"।
नदी ने जोहड़ से कहा -"प्रगति और प्रवाह का पथ अपनाने से ही मेरा अभ्यंतर स्वच्छ और निर्मल बना हुआ है और इसलिए मेरी हर बूंद का सदुपयोग किया जाता है प्रगति और प्रवाह हीन होने के कारण ही तुम गंदगी का आगार बनी हुई हो। और औरों के उपयोग में न आने वाले तुम्हारे जीवन का इस दुनिया में अधिक अस्तित्व नहीं है। "
गौतमी का उद्दाम प्रवाह अपने साथ बहुत कुछ बहाए ले जा रहा था। पुलिनों की नयनाभिराम हरियाली वातावरण को सम्मोहक बनाये हुए थी। इसी हरितिमा के सान्निध्य में कुछ दूर पर था वन्यलता, वल्लरियों से अच्छादित एक आश्रम, निकट ही कुछ फलदायी पदोप की क्रमविहीन पंक्ति फैली थी। साथ ही नदी तट पर स्वेत -सिकता के छोटे छोटे टीले प्रहरियों की भांति खड़े थे। पास ही दो हरिण शावक आश्रम द्वार पर विचर रहे थे। लता मंडप में पक्षियों का कलरव प्रतिध्वनित थे। परन्तु एकाकी मुनि इस प्रकार शांत बैठे तह, मानों न उन्हें सुघर पखेरू दिखाई पड़ रहे हैं और न ही उनकी सुमधुर बोलियों सुनाई पड़ रही हो। सामने कुछ दूर पर मछुओं की नावें छप छप करती हुई गुजर जाती परन्तु मुनि का ध्यान सदा ही अविचलित बना रहता। बसंत का आगमन उनके आश्रम को नानाविधि फूलों से सजाकर चला जाता, पिकी कूकती रहती, शिखी अपने जीवन -साथी की खोज में दौड़ लगाती रहती, पर मुनि मानों कुछ देखते ही नहीं शायद उन्हें देखकर भी मुनि के मन में केवल दया का ही भाव जगता हो, पर प्रत्यक्ष वे निर्विकार ही रहते। उस समय भी जब वे किसी मगसावक का माथा सहलाते हुए मौन खड़े रहते। जाने कितने वर्ष बीतने को आए .कोई कभी इस आश्रम में न आया। नितांत एकाकी निस्संग जीवन। एक ऐसा वातावरण, जिसे कभी किसी ने स्पर्श करके मलिन न किया हो। उसका ऐसा प्रभाव की पवन भी मंदगति से वहां प्रवेश करता की मुनि की एकाग्रता न भंग हो जाय, कही बाधा न पड़ सके उनके चिंतन -मनन में। यदा -कदा कोई मृग शावक मुनि से सटकर बैठ जाता, शायद वह इसी बहाने हद्पुर्वक मुनि का लाड़ -दुलार पा लेना चाहता थे पर अंततः विफल प्रयासी हो, उसे पुलिनों की ओर चले जाना पड़ता। मुनि स्नानार्थ नदी की ओर बढ़ते . तो आश्रम का कोई - न-कोई शुक समूह उनके साथ ही मंडराता चलता, उन्हें भला एक निस्पृह मुनि से क्या भय हो सकता था। उस दिन ब्रह्ममुहूर्त "ओम् विशवनी देव सबितुर दुरितानि ... " का धीर -गंभीर स्वर आश्रम में एक विचित्र वातावरण की सृष्टि कर रहा था। मुनि अभी नेत्र निमीलित किये ध्यानावस्थित थे। प्रभात होने में कुछ देर थी अभी। और जब दूर सरिता की सतह पर सविता आए, तो आज सहसा उस एकांत आश्रम में एक आश्चर्य सजीव हो उठा, जिसे दिखने ही हरिण चौकड़ी लगा गए, पक्षी उड़कर भाग चले, क्योंकि नवागंतुक को पहचानने में वे सर्वथा असमर्थ थे। पर मुनि की ध्यान-समाधी ज्यों-की त्यों रही। वे भला उधर क्यों देखने लगे। आज पहली बार उस आश्रम का आँगन नारी शरीर की संगति पाकर रोमांचित हो उठा था। उसकी सघन श्यामल केशराशि लिपटी में आपेश सर्वत्र सुगंधी प्रसारित कर रही थी। भयभीत हरिणी से चकित -स्तंभित खड़ी थी वह।
कौन हो तुम? अब तक मुनि आसन से उठ चुके थे।
मैं प्रम्लोचा, जो अपने जीवन की दिशा भूल चुकी है और भटकते भटकते आपके चरणों में आ पहुंची है। ... शायद यह भी एक नियति का ही संकेत है देवि! की आपके दर्शन कर सकी मैं अभागिन ...आगंतुक नारी के स्वर में मोह मूर्तमान हो उठा और एक प्रबल रागात्मक भाव से ओत प्रोत हो उठी प्रभात वेला।
पल -क्षण नहीं वर्ष बीते। प्रम्लोचे! कमण्डलु देना तो ... शायद मुनि को बहुत जल्दी थी किसी बात की। देखकर प्रम्लोचा चौक उठी। बोली -कुवेला में कहा चलूं? यह सूर्यास्त का समय था। ओह!जल्दी करो प्रम्लोचे!यह कुवेला कैसे हो गयी? यह तो संध्यादि पवित्र कर्मों के करने की पुण्यवेला है -सुनती हो प्रम्लोचे / कहते -कहते वे द्वार की ओर चल पड़े -ओर प्रम्लोचा चकित, स्तंभित-सी उनका मुख ताकने लगी, जो असंख्य अँधेरी -उजेली रातें उसके साथ बिता चूका था और उसके आने के बाद से भूलकर भी संध्या -अग्निहोत्र के लिए कभी व्याकुल नहीं हुआ था।
संध्या / इतना ही कह सकी वह। हां देवि! यह तो नित्यकर्म है मेरा ... पर इतने वर्षों तक क्या आप भूले ही रहे?
कितने वर्ष? मुनि आज स्वयं अपने पर चकित हो रहे थे। विगत वर्षों का हिसाब हो न लगा सकूँगी मैं ... हाँ इस नए वर्ष के जो छह मास ओर तीन दिन व्यतीत होने जा रहे है, उन दिनों की मुझे भी याद है की आप संध्या समय कभी भी आश्रम के बहार नहीं गए...? ठीक ही कहा था उसने।
पर मुनि की मोहनिद्रा अब तक टूट चुकी थी। उनका वैराग्य फिर से प्रज्वलित हो उठा था। उनकी गति में अब कोई बाधा सफल नहीं हो सकती थी। यहां तक की दूसरे दिन प्रम्लोचा को आश्रम छोड़ देना पड़ा। आज हम भी कहते हैं की वह संध्या सचमुच ही कणव मुनि को जगाने आयी थी की "जागो! कालरात्रि निकट है और तुम्हें ईश्वर के समीप लौटना है, वही तुम्हारा वास्तविक घर है। " उसके बाद मुनि कभी भी ग्रस्त नहीं हुए।
"ईर्ष्या वह कलि नागिन है, जो समस्त पृथ्वी मंडल में जहरीली फुफकारें छोड़ रही हैं। यह गलतफहमी की एक गर्म हवा है जो शरीर के अन्दर लू की तरह चलती है ओर मानसिक शक्तियों को झुलसाकर राख बना देती है।"
लोकों की मान्यता ओर परिकल्पना चाहे जितनी रहस्यमय हो अब इसे स्वीकारना ही होगा की दृश्य जगत से परे भी अनेक दुनिया है जहाँ मनुष्यों के तरह के ही लोग रहते है। उनकी अपनी सभ्यता और संस्कृति है : वे अपने प्रकार का जीवन जीते है। समय -समय पर प्रकाश में आने वाली घटनायें उसकी पुष्टि करती है।
प्रसंग उन दिनों का है,जब इंग्लैण्ड में हेनरी द्वितीय का शासन था। एक दिन हरी त्वचा वाले दो भाई -बहिन 'मेरी डी उलिपट्स ' नामक स्थान पर एक छिद्र से बाहर आए। उनके हाथ -पैर मनुष्यों जैसे अवश्य थे,पर चमड़ी का रंग गहरा हरा था।वे विचित्र प्रकार की पोशाक पहने था। वस्त्र किस पदार्थ का बना था, यह नहीं जाना जा सका। जब वे सुराख से बाहर आए, तो बड़ी देर तक आश्चर्यचकित हो मैदान में इधर उधर घूमते रहे। अंततः किसानों से उन्हें पकड़ लिया और वहां के एक संभ्रांत सज्जन रिचर्ड डी, कैल्नी के घर ले आए। कई महीनों के उपरांत उनका वर्ण बदल गया। वे सामान्य मनुष्यों के रंग के हो गए। इसी बीच रोगवश भाई की मृत्यु हो गई। बहिन जीवित रही और पृथ्वीवासी व्यक्ति की तरह विवाहित जीवन बिताती रही।
वे पृथ्वीलोक में किस प्रकार पहुंच गए? जब इस बारे में लड़की से प्रश्न किया गया, तो उसका कहना था की वे एक दिन भेड़ चराते हुए एक गुफाद्वार पर पहुंच गए। उससे अत्यंत मधुर ध्वनी आ रही थी। उसका संधान करने के लिए वे बड़ी देर तक उस मांद में घूमते रहे और अंततः इस लोक में पहुंच गए। लड़की का कहना था की इस जगत में आने के उपरांत वे बहुत समय तक यहाँ वहां फीते रहे। जब ऊब गए, तो पुनः अपने लोक में लोट जाने की इच्छा हुई। उन्होंने गुफा -द्वार खोजना प्रारम्भ किया, पर सफल न हो सके और ग्रामवासियों द्वारा पकड़ लिए गए।
उनका जगत क्या यही जैसा है? इस संबंध में उसने बताया की नहीं, वहां न तो यहाँ जैसी गर्मी है, न प्रकाश। उसे प्रकाशित करने वाला कोई सूर्य भी वहां नहीं है, फिर भी वहां अंधकार नहीं है। चांदनी जैसा एक मद्धिम शीतल प्रकाश वहां सदैव विद्यमान रहता है। वह स्वयं को संत मार्टिन की राज्य का बताया करती थी और यह भी की उसे पता नहीं उक्त लोक किस ओर है। वह प्रायः कहा करती की उसके अपने विश्व के निकट ही यहाँ जैसा प्रकाशवान एक अन्य लोक है : पर दोनों के बीच एक विशाल अगम्य नदी है। प्रस्तुत घटना का उल्लेख तत्कालीन समय के इंग्लैंड के प्रख्यात संत विलियम ऑफ न्युवर्ग ने अपने कृति "हिस्टोरिय रेरम एगिलकैरम 'में विस्तारपूर्वक किया है।
इस प्रकार की घटना क्यों एवं कैसे होती है, उसकी विवेचना करते हुए वैज्ञानिक कहते हैं की ऐसा दो विष्वों के मध्य की दीवार पर किसी छिद्र की उपस्थिति के कारण होता है। दुर्भाग्य से यदि कोई व्यक्ति उस सुरंग के द्वार पर पहुंच जाए, तो वह उससे खींचकर किसी अन्य लोक में चला जायगा, जहाँ से उसकी वापसी की संभावना नगण्य जितनी होगी, पर यदि किसी प्रकार यह संभव हुआ भी, तो उस व्यक्ति की स्थित वैसी ही होगी, जैसी स्मृतलुप्त व्यक्ति की अर्थात् वह घटना से पूर्व, मध्य और पश्चात् की सारी बातें भूल चूका होगा।
दूसरी संभाव्यता की चर्चा करते हुए विज्ञानवेत्ता कहते हैं की दुर्भाग्य ग्रस्त के लिए बाहर आने का एक अन्य तरीका यह हो सकता है की वह अतीन्द्रिय शक्तिसंपन्न हो। इस सामर्थ्य की द्वारा वह दो लोकों के मध्यवर्ती भित्ति में एक मानसिक आघात लगाकर दरवाजा उसी प्रकार खोलने में समर्थ हो सकेगा, जिस प्रकार चाभी ताले को एक झटके के साथ खोल लेती है। यदि झटके के साथ कोई ऐसी विभूति अनजाने में अथवा असावधानी-वश कभी दिक्काल के भंवर में फंसी भी तो वह उसी तरह उससे सुरक्षित बाहर आ जाएगी, जैसे गोताखोर समुद्र से :किन्तु इसके लिए उस द्वार को ढूंढ़ निकलना आवश्यक होगा . जिसके द्वारा वह उस दूसरे लोक में पहुंच गया। यदि इसमें वह विफल रहा तो उससे बाहर निकलने में किसी प्रकार सफल न हो सकेगा।
सम्प्रति ऐसी घटनाओं की व्याख्या वैज्ञानिक ब्लैकहोलों के आधार पर करते हैं। उनका अभिमत है की उपस्थित ही तर्कसंगत और मान्य हो सकती है इसमें कम में इसकी वैज्ञानिक मीमांसा संभव नहीं। अपनी धरती पर अब तक इस तरह के दो ब्लैक होल्स ढूंढ़े जा चुके हैं। इनमें से एक फ्लोरिडा, कोस्टरिका और वारमूडा के बीच वारमूडा त्रिकोण है, जबकि दूसरे की खोज इसी दशक के प्रारम्भ में पिछले दिनों सन १९९० में हुई। जापान, ताइवान तथा गुगआन के मध्य स्थित यह त्रिभुज 'ड्रेगंस त्रैएग्नल नाम से विख्यात है।
उपयुक्त घटना -प्रसंग में उस अलौकिक बालिका ने अपने वृत्तांत में एक लम्बी सुरंग से बहुत दूर चलने के उपरांत पृथ्वीलोक में निकलने की बात कही थी। विज्ञानं विशारद भी ब्लैकहोल में फंसे ही अनुमान लगाते हैं। मूर्धन्य भौतिकीविद् और गणितज्ञ प्रो. ज्ञान टेलर अपनी कृति 'ब्लैक होल -दी एंड ऑफ दी यूनिवर्स ' में लिखते है की श्याम -विवर के अंदर खिचाव इतना भीषण होता है की उसमें स्पेस पतली लम्बी गर्दन की शक्ल ग्रहण कर सकती है, जिसका दूसरा सिरा किसी अन्य जगत से जुड़ा हो। वे कहते हैं की यदि सचमुच ऐसा होता है ओर ब्लैकहोल के भीतर का व्यक्ति सुरक्षित बचा रहता है, तो वह उसे संकरी गली के माध्यम से किसी बिलकुल ही प्रथक विश्व में पहुंच जायेगा, वहां जीवित रहने पर भी वह किसी भी परिष्कृत यन्त्र से अपने लोक से सम्पर्क स्थापित करने में असफल रहेगा। ऐसी स्थित में वह अपना यान पुनः श्याम विवर में इस आशा के साथ प्रविष्ट करा सकता है की वह फिर इसके माध्यम से अपने लोक में पहुंच जायेगा :किन्तु उसका इस प्रकार का हर प्रयास निरर्थक साबित होगा और प्रत्येक प्रयत्न उसे हर बार एक नई दुनिया में पहुंचा देगा। इस प्रकार वह अपने मूल जगत में पहुंचने में कदाचित कभी भी सफल न हो सके।
यह ब्रह्मांडव्यापी श्याम विवर की चर्चा हुई। पृथ्वी -स्थित ब्लैकहोलों की संबंध में वैज्ञानिक एक दल का विश्वास है कि इस प्रकार के अनेक छोटे ब्लैकहोल्स इसके स्थल भाग में स्थित हो सकते हैं पर किन्हीं कारणों से उनके मुंह बंद रहते हैं और यदा -कदा ही खुलते हैं :किन्तु जब खुलते है तो उसी प्रकार की घटनायें देखने -सुनने को मिलती है,जैसा की ऊपर वर्णित है। इनके मुख कभी कभी ही क्यों खुलते है? इस सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने के लिए वैज्ञानिक अब पृथ्वी स्थित अपनी प्रयोगशाला में छोटे आकार के श्याम विवर विनिर्मित करने का प्रयास कर रहे है, ताकि उनकी प्रकृति के बारे में गहराई से अध्ययन ओर अनुसंधान किये जा सके। यदि ऐसा हुआ, तो फिर लोकांतर-यात्रा बिना किसी कठिनाई के शक्य हो सकेगी ओर व्यक्ति इच्छानुसार किसी भी लोक की यात्रा,किसी भी समय सुविधानुसार कर सकेगा।
प्राचीन समय में इस प्रकार की यात्रायें हुआ करती थी, इसका उल्लेख शास्त्रों में यत्र -तत्र मौजूद है, अब यह असंभव और अविश्वसनीय स्तर की इसलिए प्रतीत होती है, कि इन दिनों अध्यात्म तत्वज्ञान पाखंड बनकर रह गया है ओर आत्मविद्या चौराहों की बाजीगरी समझी जाने लगी है। लोग न तो कष्ट साध्य तपश्चर्या करने की तत्पर है न अध्यात्मिक अनुशासन को जीवन में उतारने को उद्यत। सब कुछ तूर्त–फूर्त में हस्तगत कर लेने को उतावले है। इतनी उच्चस्तरीय विद्या भला इतनी आसानी से कैसे उपलब्ध की जा सकती है,। ऐसे में प्रपंची धूर्तता अपनाते ओर सीधे -सरल लोगों की ठगना प्रारम्भ करते है। जो ठगे जाते है, उनकी आस्था धर्म -अध्यात्म से उठने लगती है वे गुह्य विद्या की चमत्कारी को धोखा की अतिरिक्त कुछ नहीं मानते। आज का अविश्वास इसी की परिणित है। इसका यह मतलब नहीं की धर्मग्रंथों में वर्णित सब कुछ कपोल -कल्पना मात्र है। यथार्थ तो यह है की बौद्धिक अनुमानों से आत्मा की गहराई का आकलन कर पाना संभव नहीं, जबकि आज उसकी नाप-तोल का आधार यही है।
गुह्यविद्या के प्रति सरल विश्वास न पनप पाने का एक कारण यह भी है।
किन्तु इतने से ही सत्य -तथ्य बदल तो नहीं सकते। लोकांतर भ्रमण ऐसा ही एक यथार्थ है, जो भूतकाल पात्र आज भी इसे निष्पक्ष कर सकते है ओर भविष्य में भी उसके संपादन बनी रहेगी। महाभारत के वनपर्व में कहोड़ मुनि द्वारा ऐसी ही एक लोकांतर यात्रा सम्पादित करने का वृत्तांत आता है जिसमें समुद्री मार्ग से वरुण लोक जाकर वहां उनके यज्ञायोजन करवाने और फिर सकुशल पृथ्वीलोक पर वापस लोट आने का उल्लेख करते हैं।
इसे कोई मिथक नहीं,एक सुविकसित विज्ञान माना जाना चाहिए। इससे इस बात की भी पुष्टि हो जाती है कि लोकों की मान्यता कोई शास्त्रीय अवधारण न होकर, एक वास्तविकता है। इसे हम जितनी जल्दी स्वीकारना कर सके, उतना ही अच्छा है।
"मिथिला नगरी के महानंद परिव्राजक ने जीवन के तीन -पन कठिन तपश्चर्या में बिताये। जप तप, आसन, प्राणायाम, स्वास्थ्य, योग, कीर्तन, मार्जन करते करते असंख्य सिद्धियां करतलगत कर ली। असाधारण क्षमता का लाभ पाने लगे। सैकड़ों व्यक्ति प्रतिदिन आश्रम पहुंचने ओर श्रीचरणों में सिर रखकर महासुख अनुभव करते।
किन्तु मुनि का अंतःकरण स्थिर न था। सिद्धियों ने उनकी त्राण तो बढ़ा दी, पर वह शांति, वह स्थिरता न मिली जिसके लिए मुनि ने घर,परिवार ओर स्नेही -संबंधियों का साथ छोड़ा था।
एक दिन महानंद ऐसी दुःख से भरे अपनी कुटिया से निकले। एक गांव की ओर चल पड़े। शुरू की चौखट में पहुंचे थे की किसी के कराहने का स्वर सुनाई दिया। कोई बीमार था, देखने वाला कोई न था बड़ी पीड़ा बढ़ गई थी। उस व्यक्ति की दर्दभरी कराह मुनि के हृदय में उतर गई। उन्होंने बीमार की रात बार सेवा की। दवा दी पैर दाबे बिस्तर बदले, टट्टी और पेशाब धोया। चौथे पहर जब उसे नींद आई, मुनि आश्रम लोटे। आज न उन्होंने संध्या की, न प्राणायाम ओर निदिध्यासन भी नहीं किया, किन्तु तो भी उनके अंत करण में अपूर्व शांति. स्थिर उत्फुल्लता, अबाध सुख निर्झर की भांति झर रहा था। मुनि अनायास कहे उठे - हाय रे मैं कितना अभागा रहा, जो चार -पन यों ही बिता दिए मुझे मालूम होता की परमात्मा का प्यासा था तो क्यों इतना समय व्यर्थ जाता?"
जीवन में प्रत्येक व्यक्ति आगे बढ़ता है, सफलता प्राप्त करना चाहता है और यह मनुष्य जीवन की विकास यात्रा का सहज एवं स्वाभाविक प्रेरक तत्व भी है। सफलता की दिशा में किए गए प्रयास के बावजूद देखा जाता है की असाधारण योग्यता, प्रतिभा, शिक्षा एवं साधनों वाले व्यक्ति भी जीवन में स्वयं को असफल प्रायः अनुभव करते हैं जबकि सामान्य -सी परिस्थितियों में जन्मे सामान्य शिक्षा एवं प्रतिभा वाले व्यक्ति भी सफल जीवन की ज्योतिर्मय आभा उनके चेहरे पर स्पष्ट झलकती रहती है।
इन दोनों तरह के व्यक्तियों का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर इस रहस्य का उद्घाटन हो जाता है की सफलता का सबसे बड़ा महत्वपूर्ण तत्व है, अध्यवसाय की व्रती। इसी के करण एक व्यक्ति अपने समस्त अभाव व व्यक्तिगत न्यूनताओं के बावजूद अपने लक्ष्य को सिद्ध करने के प्रयास में डटे रहते है, जबकि दूसरे थोड़ी ही असफलताओं के बाद ही मैदान छोड़कर भाग निकलते है। एक चीनी कहावत है की उस व्यक्ति के लिए कुछ भी कठिन नहीं है, जिसमें अध्यवसाय की व्रती है। कठिन -से - कठिन परिस्थितियों के बावजूद ऐसे व्यक्ति बार बार प्रयास करते है व लक्ष्य की और आगे बढ़ते जाते है।
मनीषी टी .एन. बंक सलन के अनुसार, सामान्य प्रतिभा एवं असामान्य अध्यवसाय द्वारा सब कुछ हासिल किया जा सकता है। जिन्हें हम असामान्य प्रतिभासंपन्न या "जीनियस 'कहते हैं वे और कुछ नहीं अथक एवं अनवरत अध्यवसाय का ही तो परिणाम है। एडीसन का प्रख्यात कथन इस सन्दर्भ में पर्याप्त प्रकाश डालता है की असाधारण प्रतिभासंपन्न मात्र एक प्रतिशत जन्मजात होते हैं शेष निन्यानवे प्रतिशत की उनकी अध्यवसाय व्रती गढ़ती -ढलती, बनाती एवं तैयार करती है। वैसे भी जन्मजात प्रतिभा अध्यवसाय एवं कठिन परिश्रम का सहारा लेकर ही मूर्ति होती है। अध्यवसाय की यह वृत्ति विकसित की जा सकती है। सुविख्यात मनोवैज्ञानिक नेपोलियन हिल इसके विकास के चार अवस्थायें या चार चरण बताते हैं। इनमें से प्रथम है - लक्ष्य का निश्चित होना एवं उसको सिद्ध करने की प्रखर व प्रबलतम इच्छा का होना द्वितीय है - लक्ष्य सिध्य लो निश्चित योजना व उस दिशा में अनवरत प्रयास। तृतीय चरण है -लक्ष्य में बाधक निराशाजनक विचार, संकल्प व व्यक्तियों से सावधानी एवं चतुर्थ है - लक्ष्य शिध्य में सहायक व्यक्तियों का सान्निध्य।
अध्यवसाय की सफलता के लिए लक्ष्य के निश्चित होना प्रथम एवं अनिवार्य शर्त है लक्ष्यहीन व्यक्ति पेंडुलम की तरह इधर-उधर डोलता रहता है, लेकिन पहुंचता की नहीं। लक्ष्य की निश्चित होने के बाद ही प्रयास में वह गति आती नहीं, जो लक्ष्यबेध की ओर ले जाय। लक्ष्य जितना रुचिकर उद्यत व लुभावना होगा, उसकी पूर्ति में समायोजित विचार भाव व क्रिया की शक्ति भी उतनी है एकाग्रचित्त होगी। इसके अभाव में प्रयास का उथलापन व शक्तियों का बिखराव आधिक दूरी तक नहीं ले जा सकता। 'द मास्टर की टू रीचिंग' में नेपोलियनहिल लिखते हैं की यह हमारी मानव सभ्यता का दुर्भाग्य है की ९८ प्रतिशत व्यक्ति बिना किसी लक्ष्य का जीवन जीते हैं। ये जब कोई निश्चित प्रयास करते भी है,. तो कुछ क्षणिक व अस्थाई असफलताओं के बाद अपना प्रयास ही छोड़ देते हैं वे असफल जीवन जीते हैं।
लक्ष्य के निश्चित होने की बाद उसको मूर्त रूप देने की व्यवहारिक योजना बनाना अध्यवसाय के विकास का अगला चरण है, जिसे हम सतत् क्रियान्वित कर सकते है, योजना अपनी सामर्थ्य का यथार्थ आकलन करते हुए बनाई जाए, तो ही शुभ एवं औचित्यपूर्ण होगी, अन्यथा अपनी क्षमता से बाहर की दिवास्वप्नी योजना प्रथम चरण में ही पथिक की हिम्मत तोड़ देती है। आगे बढ़ने का सारा उत्साह ही ठंडा पड़ जाता है, प्रत्येक कदम उत्साह के साथ बढ़ते जायँ इसके लिए आवश्यक है कि प्रारम्भ में छोटे-छोटे कदम बढ़ाये जांय। छोटी छोटी योजनायें बनाकर उन्हें सफलतापूर्वक क्रियान्वित काया जाय। छोटी छोटी सफलताओं का मार्ग प्रशस्त करेगा।
लक्ष्य के निश्चित होने व योजना तथा कार्य पद्धति के निर्धारण के बाद अध्यावसाय के विकास का सबसे महत्वपूर्ण चरण है, मार्ग की बाधाओं के बावजूद डेट रहने का। बाहर से प्रतिकूल परिस्थितियों के थपेड़े व अन्दर के ध्वंसात्मक, निराशावादी विचार प्रगति की दिशा में बढ़ रहे चरणों को रोककर सफलता की आशा पर पानी फेर सकते है। ऐसे में पुनः नए सिरे से प्रयास करने का साहस करना होगा। इस सन्दर्भ को एक प्रेरणादायी समरण से समझा जा सकता है पनामा नाहर की खुदाई चल रही थी। यह कार्य संकल्प के धनी मेजर जनरल गोथाइल की देख रेख में चल रहा था। नहर आधी ही खुद पायी थी की अचानक एक विशाल भूखण्ड टूटकर गिर पड़ा व नहर मिट्टी के मलवे से भर गई। कई माह के कार्य की क्षति हुई। जनरल के सहायक ने उदासी भरे हताश शब्दों में कहा -"अब क्या करे?' गोथाइल ने दृढ़ स्वर से कहा -"पूरे उत्साह से खुदाई दोबारा शुरू करो।' ऐसा की किया गया सफलता प्राप्त हुई।प्रतिकूल परिस्थितियों की विषम घड़ी में यदि व्यक्ति हिम्मत न हरे व प्रयास करता रहे - तो इससे उबरने का मार्ग मिल ही जाता है। हाथ पर हाथ धरे रहने से तो अपनी दुर्गति ही सुनिश्चित होती है एक वृद्ध नाविक से पूछा गया की यदि कोई व्यक्ति नाव से गिर पड़े तो क्या वह पानी में डूब जाएगा? नाविक का जबाब था-"नहीं!कोई पानी में गिरने से डूबता नहीं। डूबता तो वह पानी में खड़ा रहने से है।
अनवरत असफलताओं के बावजूद बार-बार प्रयास करने का साहस अध्यवसाय का सार है और इस साहस का रहस्य असफलता के गर्भ में छिपे सफलता के संदेश को समझने में छिपा है जिसे समझने हुए साधारण परिवेश में जन्मे अभावग्रस्त व्यक्ति भी सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए। एडीसन ऐसे ही एक उदाहरण है। एक दिन मन्द बुद्धि एडीसन ने स्कूल से निकले जाने के बाद सड़कों पर अखबार बेचते हुए अपना जीवन सुरू किया और सतत् अध्यवसाय के बल पर विज्ञान क्षेत्र के महानतम अन्वेषी बन गया। एडीसन के सहयोगी ने एडीसन को रात के दो बजे मुस्कराते हुए देखा। सहायक ने सोचा कि अवश्य ही आज उन्हें वर्षों पुरानी गुत्थी का समाधान मिल गया है। लेकिन एडीसन का यह प्रयास असफल रहा प्रसन्नता तो उन्हें इस असफल प्रयास में छिपे सन्देश को पाने की थी, क्योंकि अब वह नए ढंग से अपना सार्थक प्रयास आरम्भ कर सकते थे।
प्रयास करने का, लेकिन अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से, क्योंकि प्रत्येक असफलता हमें अधिक समझदार बनाती है, यदि हम इससे सीख लेने के लिए तैयार हैं, बजाय की असफलता का रोना-रोने, दूसरे को दोष देने, खीझने व निराशा होने के। असफलता हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती- यदि हम इससे सीख लेने के लिए तैयार हैं। असफलता के गर्त में पड़े रहने का एक करण यह भी नहीं कि हम इसके लिए दूसरों को दोष देते रहते हैं। यह सफलता के मार्ग का वह भारी अवरोध है, जिससे हमें सतत् सावधान रहना होगा। एल्मर जी. लैटर मैन ने इस सन्दर्भ में अपना मत व्यक्त करते हुए कहा है की एक व्यक्ति कई बार फिसल सकता है किन्तु यह असफलता तब तक नहीं होगी जब तक की वह यह न कहे की मुझे किसी दूसरे ने गिराया है। दोष बाहर दिख सकता है, लेकिन तटस्थ होकर सतर्कतापूर्वक निरिक्षण करने पर हमें अंदर ही प्रधान करण मिल जायेगा,
जिसे हम अनदेखा करने की भूल करते रहते है।
असफलता आने पर इससे घबराते व भागने की वृत्ति भी उतर सकती है लेकिन इससे सफलता का प्रयोजन सिद्ध होने वाला नहीं है। जॉर्ज बर्नार्डशा के अनुसार, जो युद्ध से भागता है उसे, अगले दिन फिर से युद्ध लड़ना होगा। यही बात जीवन की असफलताओं पर भी लागू होती है। भागने के सार्थकता इतनी भर हो सकती है की हम एकांत में जाकर अधिक शक्ति सम्पादन करें, ताकि अगले मोर्चे पर अधिक दम-खम से जूझ सके।
प्रत्येक असफलता को पलायन की बजाए एक चुनौती के रूप में स्वीकारना ही श्रेयस्कर है। तभी हम अगला प्रयास अधिक उत्साह के साथ कर सकते हैं। सुविख्यात चिन्तक स्वेटमॉर्डन कहते हैं कि यदि हम जितना नीचे गिरे हैं, उसमें दुगुनी छलांग लगाने का दृढ़ निश्चय का चुके हैं, तो फिर हमारी असफलता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। उसे गंभीरता से मत लीजिए होने पर अपने समूचे व्यक्तित्व को ही असफल मान बैठने के निराशावादी विचार से सावधान रहना चाहिये। क्षणिक असफलता को व्यक्तित्व से जोड़कर आत्महीनता की ग्रंथि को पालना एक भ्रामक धारणा है।
असफलता के बारे में इसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। यह मन की एक कल्पना मात्र है। हेनरीफोर्ड के अनुसार वह 'पुल्लिंग ' योर ओंन स्त्रिग्ज के सुविख्यात लेखक डॉ. डब्लू डब्लू . डायर के अनुसार, यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि असफलता एक धारणा मात्र है की अमुक विचार कैसे किया जाना चाहिए था। उनके अनुसार,असफलता मानसिक दृष्टिकोण की उपज है, मानसिक क्षमता की नहीं। संक्षेप में यह एक प्रतिक्रिया भर है, जिसका स्वरूप जीवन को असफलता का वाटरलू बनाता है या सफलता की विजयभूमि।
जीवन का विकास वास्तव में सतत् पूर्णता की ओर गतिशील है। अधिक प्रगति व सफलता उसकी स्थिति है असफलता के भ्रामक विचार में उलझ कर इसे नीचे की ओर धकेलना विशुद्धतः हमारा विकृत सोच है। 'इंडिविजुअल साइकोलॉजी'के जनक अल्फ्रेडएडलर के अनुसार,जीवन निरंतर विजय,सफलता व पूर्णता के उच्चस्तर सोपानों की ओर बढ़ता है। उसे असफलता की ओर नहीं मोड़ा जा सकता। सारा रूप में कोई भी कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती,जब तक की हम उससे सबक लेते है और आगे बढ़ने का प्रयास करते है।
इस तरह जो अपनी समस्त अपूर्णताओं व बाह्य प्रतिकूलताओं के बावजूद अपने अभिष्ट लक्ष्य की ओर अध्यवसाय द्वारा अभिमंत्रित, सुनियोजित पग के साथ आगे बढ़ते हैं, वे अपने जीवन की सफलता व सार्थकता को सुनिश्चित करते हैं। इस संदर्भ में एक छोटा-सा प्रसंग विचारणीय है बसंत के अन्तिम दिनों में तूफानी ठण्ड के दिन एक धोंधा चेर्री के वृक्ष पर मंथर गति से चढ़ रहा था। पास के वृक्ष में बैठी चिड़िया इसकी मूर्खता पर हँस रही थी। वह उस पर मज़ाक करते हुए बोली की तू इतना भी नहीं जानता की वृक्ष कोई फल नहीं है। तू व्यर्थ में ही श्रम कर रहा है। घोंघे ने बिना रुके ही उत्तर दिया की बहिन आप ठीक कहती है, लेकिन जब तक फल लग चुके होंगे।
नन्हे जीव का यह दृष्टांत अध्यवसाय के भावों को विकसित करने की प्रेरणा देता है। यदि हमारे हृदय अपने लक्ष्य के प्रति अगाध श्रद्धा एवं विश्वास है एवं उसको सिद्ध करने के लिए हम प्रत्येक मूल्य चुकाने के लिए तैयार है,तो मार्ग की असफलताएं एवं सामयिक पतन भी आवश्यक शिक्षा देते हुए हमारी सफलता का मार्ग प्रशस्त करेंगे। फिर तो समस्त अभाव, अपूर्णता, दुर्बलता व प्रतिभा की कमी के बावजूद हमारी अंतिम सफलता उतनी ही सुनिश्चित होगी, जितना की लम्बी रात्रि के बाद उगने वाला अरुणिम सूर्य।
"एक महात्मा के पास तीन मित्र गुरु -दीक्षा लेने गये तीनों ने बड़े भक्तिभाव से प्रणाम करके अपनी जिज्ञासा प्रकट की। महात्मा ने उनको शिष्य बनाने से पूर्व पात्रता की परीक्षा कर लेने के मंतव्य से पूछा,'बताओ कान और आंख में कितना अंतर है?"
एक ने उत्तर दिया -"केवल पांच अंगुल का भगवन्।" महात्मा ने उसे एक ओर खड़ा करके दूसरे से उत्तर के लिए कहा। दूसरे से उत्तर दिया - "
महाराज आंख देखती है और कान सुनते है, इसलिए किसी बात की प्रमाणिकता के विषय में आंख का महत्त्व अधिक है।" महात्मा ने उसको भी एक ओर खड़ा करके तीसरे से उत्तर देने के लिए कहा। तीसरे ने निवेदन किया -" भगवन्,!कान का महत्त्व आंख से अधिक है। आंख केवल लौकिक एवं दृश्यमान जगत,को ही देख पाती है, किन्तु कान को पारलौकिक एवं पारमार्थिक विषय का पान करने का सौभाग्य प्राप्त है।' महात्मा ने तीसरे को अपने पास रोक लिया। पहले दोनों को कर्म एवं उपासना का उपदेश देकर अपनी विचारणा शक्ति बढ़ाने के लिए, बिदा का दिया। क्योंकि उनके सोचने के सीमा ब्रह्मतत्त्व की परिधि में अभी प्रवेश का सकने योग्य सूक्ष्म बनी न थी। "
एक बार वशिष्ठ जी विश्वामित्र ऋषि के आश्रम में गए। उन्होंने बड़ा स्वागत-सत्कार और आतिथ्य किया। कुछ दिन उन्होंने बड़े आदरपूर्वक अपने पास रखा। जब वशिष्ठ जी चलने लगे तो विश्वमित्र ने उन्हें एक हजार वर्ष की अपनी तपस्या का पुण्यफल उपहारस्वरूप दिया। बहुत दिन बाद संयोगवश विश्वामित्र भी वशिष्ठ के आश्रम में पहुंचे। उनका भी वैसा ही स्वागत-सत्कार हुआ। जब विश्वामित्र चलने लगे तो वशिष्ठ जी ने एक दिन के सत्संग का पूर्णफल उन्हें भेंट किया।
विश्वामित्र मन-ही-मन बहुत खिन्न हुए। वशिष्ठ को एक हजार वर्ष की तपस्या का पुण्य भेंट किया था। वैसा ही मूल्यवान उपहार न देकर वशिष्ठ जी ने केवल एक दिन के सत्संग का तुच्छ फल दिया। इसका कारण उनकी अनुदारता और मेरे प्रति तुच्छता की भावना का होना ही हो सकता है। यह दोनों ही बातें अनुचित है।
वशिष्ठ जी विश्वामित्र के मनोभावों को ताड़ गए और उनका समाधान करने के लिए विश्वामित्र को साथ लेकर विश्वभ्रमण के लिए चल दिए। चलते-चलते दोनों वहां पहुंचे जहाँ शेष जी अपने फन पर पृथ्वी का बोझ लादे हुए बैठे थे। दोनों ऋषियों ने उन्हें प्रणाम किया और उनके समीप ठहर गए।
अवकाश का समय देखकर वशिष्ठ जी ने कहा -भगवन्! एक हजार वर्ष का तप अधिक मूल्यवान है या एक दिन का सत्संग? शेष जी ने कहा-इसका समाधान केवल वाणी से करने की अपेक्षा प्रत्यक्ष अनुभव से करना ही ठीक होगा। मैं शिर पर पृथ्वी का इतना भार लिए बैठा हूँ। जिसके पास तपबल है वह थोड़ी देर के लिए इस बोझ को अपने ऊपर ले ले। विश्वामित्र को तपबल पर गर्व था। उन्होंने अपनी संचित एक हजार वर्ष की तपस्या के बल को एकत्रित करके उसके द्वारा पृथ्वी का बोझ अपने ऊपर लेने का प्रयत्न किया,पर वह जरा भी नहीं उठी। अब वशिष्ठ जी को कहा गया की वे एक दिन के सत्संग से पृथ्वी उठावे। वशिष्ठ जी ने प्रयत्न किया और पृथ्वी को आसानी से अपने ऊपर उठा लिया।
शेष जी ने कहा -"तपबल की महत्ता बहुत है। सारा विश्व उसी की शक्ति से गतिमान है। परन्तु उसकी प्रेरणा और प्रगति का स्रोत सत्संग ही है। इसलिए उसकी महत्ता तप से भी बड़ी है।" विश्वामित्र का समाधान हो गया और उन्होंने अनुभव किया की वशिष्ठ जी ने न तो कम मूल्य की वस्तु भेंट की थी और न उनका तिरस्कार किया था।
सत्संग से ही तप की प्रेरणा मिलती है। इसलिए तप का पिता होने के कारण सत्संग को अधिक प्रशंसनीय माना गया है। यो शक्ति का उद्भव तो तप से ही होता है।
एक बरहमन समूची दिल्ली में कुफ्र फैल रहा है, आने वाले ने तीखे स्वरों में और हिकारत भरे अंदाज में शाही दरबार में अपनी शिकायत दर्ज की।
कुफ्र? बादशाह के माथे पर बल पड़े।
शिकायत है जहाँपनाह! उस बरहमन की बातों में आकर कई इस्लाम के बन्दे भी बहक गये है, गुमराह हो गये है। दूसरे ने शिकायत का समर्थन किया।
कौन है वह गुस्ताख़? बादशाह ने जानना चाहा।
एक पागल है, बुतपरस्त है। हर वक्त वह बुत उसके साथ रहता है। शहर के आम जगहों में भी खुलेआम बुतपरस्ती में मशगूल रहता है।
किसी ने उसे रोका नहीं?
पागल समझकर लापरवाही की गई, लेकिन हुजूर-कुफ्र के साथ ही वह बगावत का जहर भी उड़ेलता है।
वह कैसे?
कहता है बरहमन किसी की हुकूमत में नहीं रहता, किसी का हुक्म नहीं मनाता, क्योंकि उसका बादशाह राम है-बरहमन उसी की बादशाहत में रहता है।
क्या बकते हो? मेरी ही सल्तनत में बादशाह भी पैदा हो गया?
जहाँपनाह! वह तो बुत्परास्तो का ही एक देव है। वही राम-रावण के किस्से वाला.........। इतना कहकर बादशाह कुछ सोचने लगा। बोला- वाकई पागल है, लेकिन फिर इस्लाम के बन्दों को उसने कैसे बहकाया?
शहर में अफवाह गरम है की वह बुत हर एक मुराद पूरी करता है। इस झूठ के शिकार बनकर कई मुसलमान औरतें और नौजवान भी बरहमन के मुकाम पर जाने लगे है, उस बुत को सिजदा करते हैं।
तोबा! तोबा! खास मेरी दारुल सल्तनत में यह गुनाह। बुतपरस्त को हम माफ कर सकते....।
आलीजाह! शाहीहुक्म के बमुजिब बुतपरस्ती पर सख्त पाबन्दी है, इसी कानून के खिलाफ वह अपने आँगन में एक जश्न करता है, तमाम हिंदुओं को इकठ्ठा करता है, उनके बीच बुत को संवारता है, सजाता है, फिर इबादत का दिखावा करता है। कई मुसलमान भी उस जलसे में नजर आये है।
उन मुसलमानों को भला यह क्या सूझी है?
गरीब परवर! बरहमन बहुत मक्कार है। बना हुआ पागल है। बुतपरस्ती के बाद वहाँ आये हुए मुसलमान मर्द, औरतों और बच्चों को भी बुत की जूठन बांटता है।
बुत की जूठन?
जूठन ही कहिये। काफ़िर उसे प्रसाद कहते हैं। उनका अकीदा है की बुत को जो चीज नजर करो, वह उसे मंजूर करता है, फिर जो बच रहा, वही जूठन उनके लिए प्रसाद होती है। आलिम ने अपनी जानकारी सबको बताने की कोशिश की।
कुफ्र! और दिल्ली में! जासूसों को हाजिर करो। जासूस बुलाये गये। ये लोग वेश बदलकर जनता की खबरें सुल्तान को पहुँचाया करते थे। जासूसों ने कोर्निश बजाई। सुल्तान ने पूछा-तुम लोगों को उस काफ़िर के कारनामे की कुछ भी खबर नहीं?
है जहाँपनाह!
बयान करो!
आलीजाह! उस बरहमन ने बुत की एक तस्वीर बने है। वह लकड़ी एक तख्ते पर कई रंग मिलकर बनाई गयी है। बुत बाहर नहीं निकालता, तस्वीर ही वह बाहर ले जाता है। बरहमन उसे साथ लिए घूमता है, जहाँ जाता है वही उसको सिजदा करता है, इबादत का ढोंग करता है। उस पर पानी-फूल चढ़ाता है।
तुम लोगों ने इसकी इत्तिला हाकिमो को क्यों नहीं की?
की थी हुजूरे आला! लेकिन उन्होंने कुछ तव्वजो नहीं की। फरमाया की किसी पागल के पीछे पड़ने से क्या फायदा?
पागल! कैसा पागल? बुतपरस्ती का दीवानगी नहीं, वह गुनाह है। कानूनन जुर्म है। हाकिमो से कहो, बुतपरस्त को गिरफ्तार करके बुत समेत हाजिर किया जाये।
जो हुक्म शहंशाह!
अब तक साँझ झुक आई थी। ब्राह्मण के घर थोड़ा ही आटा बचा था। ब्राह्मणी भूसी से प्रसाद बनाने का उपक्रम कर रही थी। इस घर में दो समय से अधिक संचय कभी रहा ही नहीं। ब्राह्मण कल की फिक्र नहीं करता था। बड़े मजे से वह इस वाक्य को जब-तब दुहरा लिया करता था। उसे किसी ने एक दिन चेतावनी दी- पंडित जी! फिरोजशाह तुगलक का जमाना है, मूर्तिपूजा पर रोक लगी है। क्यों संकट मोल लेते हो?
ब्राह्मण ने आनंद भरे मन से उत्तर दिया- भाई! इस शरीर का कुछ मोह नहीं। सुल्तान शरीर ही छीन सकता है, आत्मा तो राम की है, राम ही उसकी गति है। फिर कैसा भय?
एक दिन उसके पड़ोस के एक मुसलमान लड़के ने आकर उसका घड़ा छू लिया। कहने लगा- जनाब यह पानी तो बेकार हो गया। अब अपने खुदा को क्या पिलाओगे?
ब्राह्मण हा-हा करके हंसने लगा। बोला- बेटा! पानी तो सबको पवित्र करता है। वह तुम्हारे छूने से अपवित्र कैसे हो सकता है? राम की सब संतानें है, वह संसार का पिता है। तुम्हारे खेल-कूद से वह चिढ़ता थोड़े ही है।
मुसलमान लड़का इज्जत उस निश्छल मुँह को ताकता रह गया। पूछने लगा धीरे से- पंडित जी अभी प्रसाद नहीं बनाया गया?
बन रहा है बेटा! आरती का समय आए, तब आना। प्रसाद ले जाना।
एक दिन दोपहरी में मैला-कुचैला एक डोम का लड़का आँगन में आ खड़ा हुआ डरा-सा। वह अपरिचित इस ओर कभी नहीं आया था? कहीं दूर का अनाथ बालक था। ब्राह्मण ने देखा, लड़का भयभीत है। कहा- आओ पुत्र! मेरे पास आओ। प्यार भारी आवाज़ से आकृष्ट हो, हिम्मत करके वह लड़का आगे बढ़ा। ब्राह्मण में उठ कर उसके हाथ-मुँह धोए। अपने अँगोछे से उसका मुँह पोंछा। अपने पास चौकी पर बिठाया। ब्रह्माणी से कहा- अरे, आओ देखो। तुम्हारे घर अतिथि भगवन् आयें हैं, बाल भगवान।
ब्राह्मणी उत्सुक हो दौड़ी आई। देखा एक किशोर लड़का पति के पास बैठा है।
पत्नी को देखते ही ब्राह्मण देवता बोल उठे- बड़े भाग्य! बाल-भगवान कृपा करके आए हैं। इनकी सेवा करो। जल्दी से कुछ बनाओ, इन्हें जिमाओ।
ब्राह्मणी ने जो कुछ रूखा-सूखा था, बनाया। बालक को अपनी गोद में बैठाकर भोजन कराया। कहा- भैया! रोज आया करो। अपने माता-पिता से कह देना की हम वहाँ जाते हैं। आओगे न? बालक ने प्रसन्नता से सिर हिलाकर विदा ली। ऐसी घटनाएँ उस आँगन में आए दिन होती रहती थीं। सबका आलय था वह आँगन और वह ब्राह्मण सचराचर जगत को राममय देखता था। पूरी दिल्ली में वही अकेला नागरिक था, हाथ उठा कर नितांत निर्भयता से कहा करता था- "मैं राम के राज्य में रहता हूँ, सुल्तान हमारा राजा नहीं। "
यह वाक्य सुनते-सुनते कुछ लोग उसे सनकी या पागल समझने लगे थे, तो क्या आश्चर्य! भीर भी आरती के समय उसका आँगन प्रायः भरा-भरा रहता था।
आज भी आरती का समय हो गया था। ब्राह्मणी प्रसाद बना लायी। ब्राह्मण रामलला को स्नान करने गया।दोनों समय स्नान-विधि होती थी, फिर एक स्वच्छ कपड़े से वह मूर्ति पोंछता। पश्चात नैवेद्य चढ़ाता था, जो भी घर में प्राप्त हो। आज जैसे ही आरती समाप्त हुई- सुल्तान के सिपाहियों ने घर घेर लिया। ब्राह्मण को गिरफ्तार कर लिया गया। उसकी मुश्कें कास दी गयीं। सिपाही मूर्ति भी उठाकर ले चले। ब्राह्मण ज़रा भी घबड़ाया नहीं, रोया चिल्लाया नहीं। सब कुछ देखता रहा-सहता रहा। चलते समय पत्नी से कहा- देवी! धीरज रखना, मूर्ति लौटेगी नहीं, शायद मैं भी न लौट सकूँ... किन्तु मूर्ति के स्थान पर तुम आरती व प्रसाद का नियम भंग न करना, जब तक जीवन रहे। मूर्ति मिट्टी की भी बना सकती हो। मिट्टी माता है। सब खनिज उसी से उपजते हैं। ताँबा-पीतल न सही, माटी-मूरत सही। उसी में मोद मानो। राम के सेवक कैसे होते हैं, इसकी आन निभाना। ब्राह्मणी ने बहुत रोका, फिर भी दो आँसू की बूँदें नीचे ढुलक पड़ी, पति की अर्चना में। विदा वेला की अर्चना थी वह। इतने दिन साथ रहे, साथ जिए। राम की सेवा साथ-साथ की। दुःख को भी सुख माना। कभी कोई शिकायत नहीं की। अब कब मिलेंगे कुछ ठीक नहीं। कहते हैं- " राम के सेवक की आन निभाना। "
"निभाऊँगी-निभाऊँगी? अकेले भी निभाऊँगी।" रोते हुए हृदय से यही आश्वासन मुख पर मूर्त हो उठा- पति के संतोष के लिए। वे चले गए, बँधे हुए और वहाँ जा पहुँचे जहाँ फिरोजशाह तुगलक का दरबार था।
मसनद के सहारे तलवार टिकाकर बैठा था सुल्तान। जिरह बख्तर से सज्जित सिपाही और सिपहसालार दोनों तरफ पंक्तिबद्ध खड़े थे। हृदय से यही आश्वासन मुख पर मूर्त हो उठा- पति के संतोष के लिए। वे चले गए, बँधे हुए और वहाँ जा पहुँचे जहाँ फिरोजशाह तुगलक का दरबार था।
मसनद के सहारे तलवार टिकाकर बैठा था सुल्तान। जिरह बख्तर से सज्जित सिपाही और सिपहसालार दोनों तरफ पंक्तिबद्ध खड़े थे।वजीर एक तरफ बैठा था। जहाँपनाह! पागल काफ़िर हाजिर है। सिपाहियों ने निवेदन किया।
सुल्तान ने दृष्टि किया, मुंह से कुछ बोला नहीं। दूसरे ही क्षण रस्सों से जकड़ा वह ब्राह्मण उपस्थित किया गया। उसकी मुश्कें बँधी थीं। सुल्तान की दृष्टि उस पर पड़ी। साथ शाही फरमान हुआ, इसकी मुश्कें खोल दी जाएँ। फिर कैदी से पूछा क्यों! यह किसकी सल्तनत है?
तमाम दुनिया का साम्राज्य उसी की लीला है। वही सबका सम्राट है?
वह कौन है?
जिसने जगत सिरजा।
खुदा की बात करते हो?
आप खुदा कह लें मैं राम कह लेता हूँ।
गलत! खुदा को कोई कैद नहीं कर सकता। तुम्हारा राम मेरे यहाँ कैदी बनकर हाजिर है।
झूठ यह मूर्ति राम की पहचान है। हजारों पहचानों में से एक। मूर्ति का कुछ भी करो राम की तुम धुल भी नहीं पा सकते। हाँ, यह सच है की राम की ही तरह उसकी पहचान भी पवित्र है, लेकिन उनके लिए जो इसे पहचाने, नहीं तो पत्थर है ......?
तुम्हारा यह अफसाना मैं नहीं समझ पाया।
समझना चाहें तो देर नहीं लगेगी। आपके अन्तः पुर में ही गुरु मिल जायेगा। कहीं खोजना नहीं होगा।
क्या मतलब? सुल्तान चौंका।
आप नाराज़ न हों, मेरा तात्पर्य श्रीमान की मातुश्री से था। मैं उन्हें जनता हूँ, वे राजपूत की बेटी हैं , राम और उनकी मूर्ति की महिमा आप उनसे भलीप्रकार समझ सकते हैं।
वदज़ुबान बरहमन! तिलमिला उठा सुल्तान। उसका चेहरा उतर गया।
मैंने कोई बदजुबानी नहीं की। हर एक की माँ मेरी भी माँ है। आप इसे गलत नहीं समझें।
तुम टी पागल नहीं लगते। फिर भी कानून तोड़ने की जुर्रत करते हो?
मैंने कोई कानून नहीं तोड़ा।
क्यों क्या तुम नहीं जानते, मेरी सल्तनत में बुतपरस्ती जुर्म है।
मैं इसे कानून नहीं मानता। जोर-जुल्म का नाम कानून नहीं है।
यह बगावत है और तुम जिसके राज्य में हो ..........।
कैदी ने बीच में टोककर कहा- ब्राह्मण किसी के राज्य में नहीं रहता। वह स्वतंत्र रहकर ही मृत्यु को प्राप्त होता है।
हूँ,काजी और उलेमा अपना फतवा दे की इस बागी काफ़िर को कौन -सी सजा दी जानी चाहिए।
काजियो ने अपनी पुरानी पोथियाँ उलटनी-पलटनी शुरू की। इसके बाद उलेमा आपस में कानाफूसी करके सजा तजवीज करने लगे। फिरोजशाह तुगलक दांतों से मूंछें कुतरता रहा। थोड़ी ही देर में उलेमाओ ने फ़तवा दे दिया -जहाँपनाह!इस काफ़िर को सजाए मौत से कम तो कोई सजा नहीं दी जा सकती।
शरअत कहती है की काफ़िर की गर्दन उड़ा दी जाये। काजियो ने भी हामी भरी।
एक रास्ता है, जाँ बख्शी का,बशर्ते यह इस्लाम काबूल कर ले।
शर्म करो। मेरे शरीर के दो टुकड़े कर दो। इस्लाम की बात क्यों करते हो? मैं हिन्दू रहकर ही मरूँगा। ब्राह्मण की आवाज़ में बड़ा वजन था।
ठीक है। इसे जिन्दा जला दो। हुक्म देते हुए एक क्षण सुतन की निगाह राम की मूर्ति पर गयी, बोला यह बुत भी इसके साथ आग के हवाले कर दिया जाए।
जो,हुक्म,जल्लाद जो उसका कत्ल करने के लिए बुलाई गए थे,ब्राह्मण को ले चले। मूर्ति को भी उसके साथ ले जाया गया। ब्राह्मण का चेहरा अलौकिक तेज़ से उद्भासित हो उठा। प्रसन्न मन से बार बार घूमकर वह मूर्ति को देखता जा रहा था,मानो कह रहा हो-"ओ प्रभु!सेवक तुम्हारे साथ ही है "।
लकड़ियों का एक बड़ा सा पहाड़ खड़ा कर दिया गया। ब्राह्मण के हाथ पैर बांध कर उस पर डाल दिया गया। वह जोर लगा कर किसी तरह उठ कर बैठ गया?मूर्ति भी उसके साथ फेंक दी गयी। बंधे हाथों से उसने मूर्ति को जैसे-तैसे उठाकर अपने पास ही रखा। तभी जल्लाद ने आवाज़ दी-होशियार आखिरी वक्त आ गया, खुदा को याद कर ले।
ब्राह्मण ने सर उठाया। एक बार नीले आकाश को देखा।अहा! कितना स्वच्छ गगन है। सूर्य कैसे देदीप्यमान है। दूर पर हरियाली की साड़ी लिए क्षितिज किसकी प्रतीक्षा में खड़ा है। धरती किसकी वंदना में तनमुख बैठी है।
भावविभोर हो वह कहने लगा, मेरे मन में राम हैं, तुम सर्वत्र हो। आज मैं देह की इस तुच्छ दीवार को तोड़कर तुममें सामने आ रहा हूँ। प्रभु! तब तक आग लकड़ियों में तेजी से धधक उठी। अग्नि की उठती उभरती ज्वाला के साथ उसकी भगती भी प्रचंड और प्रखर होती गयी। ऐसी घटना को युग बीत गए, फिर भी भगती की अग्नि -परीक्षा की इस अनोखी दास्तान को कोई नहीं भुला सकता।
अवसर का यथोचित उपयोग ही मनुष्य-जीवन की सफलता का रहस्य है। कोई भी 'अवसर' अपनी अंजलि में मनुष्य के लिए बहुमूल्य उपहार लेकर ही उपस्थित होता है। अब उनको प्राप्त करना, न करना मनुष्य के अपने हाथ की बात है।
किसी एक 'अवसर ' के अनेक प्रत्याशी हो सकते हैं, जिनमें प्रतिद्वन्द्विता भी हो सकती है। किन्तु जीतता वही है, जिसके पक्ष में 'अवसर' लड़ता है और 'अवसर' आता है। किन्तु एक बार निराश होने पर दुबारा नहीं आता है। किसी भी 'अवसर' से यह आशा करना मृग-मरीचिका के तुल्य है की वह आपका स्वर खटखटायेगा। बुद्धिमान लोग अवसर को आगे से आलिंगन करते हैं, घेरते हैं और पकड़ते हैं, क्योंकि इसके दुम नहीं होती जो आगे बढ़ जाने पर पकड़ी जा सके।
मनुष्य जीवन से बढ़कर कोई 'अवसर' नहीं। इसके सदुपयोग न करने से बढ़कर कोई दुर्भाग्य नहीं हो सकता।
दूध ने पानी से कहा-बन्धु किसी मित्र के बिना हृदय सुना है। आओ मैं तुम्हें हृदय से लगा लेना चाहता हु।पानी ने खा-भाई तुम्हारी बात तू मुझे पसंद है, पर यकीन नहीं होता की अग्नि-परीक्षा के समय भी तुम मुझसे अलग न होंगे, दूध ने वचन दिया- ऐसा ही होगा और दोनों में मित्रता हो गई, ऐसी की उनके प्रथक स्वरूप को ही पहचानना कठिन हो गया।
अग्नि हर रोज़ परिक्षा लेती है और पानी को जलाती है, पर दूध है की वह हर बार मित्र की रक्षा के लिए अपने आप को जलाता है। दूध की तरह जो लोग अपने दाम्पत्य, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में परस्पर मेल रखते है, उन्हीं का मनुष्य जीवन सफल होता है।
सिर पर मन का बोझ हो, तो व्यक्ति से ना तो भली प्रकार चलते बन पड़ता है, ना तो कुछ करते -धरते। शरीर के साथ भी यह बात है। पंचभौतिक ढकोसला, उसकी गति -विधियों को सीमित और सीमाबद्ध बनाये रखता है।; परन्तु जैसे ही उका बंधन ढीला होता है, वह अपनी वास्तविक सत्ता और क्षमता का परिचय देना आरम्भ करता और ऐसे-ऐसे कार्य कर गुजरता है, जिसे देखकर दांतों तले उगले दबानी पड़ती है।
घटना एक व्यापारी जहाज की है। ब्रिटेन की कम्पनी का यह जहाज व्यापार के सिलसिले में लिव्रपुल से चल कर नोवास्कोटीया जा रहा था। कई सप्ताह बीत गए। 'रॉक ' नमक यह जहाज अटलांटिक महासागर में पश्चिम दिशा की ओर बढ़ा चला जा रहा था। अचानक एक दिन जहाज का एक कर्मचारी रॉबर्ट ब्रुश ने कप्तान के कक्ष में एक अजनबी को देखा, वह ब्लैक बोर्ड पर कुछ लिख रहा था। एक नितांत अपरिचित को वहन देख कर ब्रुश को आश्चर्य हुआ। उसने इसकी सूचना कप्तान को दी। कैप्टन को ब्रुश की बातों पर विश्वास नहीं हुआ। वह यही सोचता रहा की उसके कक्ष में किसी दूसरे को क्या मतलब हो सकता है और कोई उसमें अनाधिकार प्रवेश क्योंकर करेगा?फिर भी वस्तुस्थिति जानने वह चल पड़ा। वहाँ कोई व्यक्ति तो नहीं दिखाई पड़ा, हाँ ब्लैक बोर्ड पर कुछ निर्देश अवश्य अंकित थे। उसमें सुस्पष्ट अक्षरों में लिखा था।- "उत्तर - पश्चिम की ओर बढ़े।" इसे पढ़कर कप्तान कुछ सोच में पड़ गया। वह इस उधेड़बुन में था की आखिर इस विशिष्ट दिशा में बढ़ने का संकेत लिखने वाला अपना क्या प्रयोजन सिद्ध करना चाहता है? जब उसकी कुछ समझ में नहीं आया, तो वह अपने कमरे की पड़ताल करने लगा की अजनबी यहीं -कहीं छुपा तो नहीं है? कोना - कोना ढूंढ़ लेने पर भी उसे कुछ नहीं मिला। अब तक वह आश्वस्त तो हो चूका था लेकिन ब्रुश का कथन असत्य नहीं है। उसके कक्ष में कोई न कोई अवश्य है। वह कौन हो सकता है और वह अचानक कहाँ गायब हो गया? कही वह अपना कोई कर्मचारी तो नहीं? यह निश्चय कर उसने सहयोगियों से पूछताछ करनी आरम्भ की। हर किसी ने इस बात से इनकार किया की उसने कप्तान के कमरे में प्रवेश किया था। इतने पर भी उसे संतोष नहीं हुआ। वह यही समझता था की नाराजगी से बचने के लिए ही सब मिथ्या प्रलाप कर रहे है, अन्यथा समुद्र मध्य स्थित जहाज से कोई कैसे प्रवेश पा सकता है? उसने सभी की हैण्डरइटिंग की जांच की, पर किसी की भी राइटिंग श्यामपट्ट के अक्षरों से नहीं मिली।
जहाज लिखे निर्देशानुसार उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ने लगा। काफी दूर चलने उपरांत कर्मचारी ने देखा की सामने बर्फ में एक अन्य जहाज फंसा पड़ा है। सभी यात्रियों को बाहर निकाला गया। वे जब दूसरे जहाज पर सवार थे, तो अकस्मात् एक व्यक्ति पर बर्ष की आंखें टिक गयी। ध्यान से देखा तो वह हैरान रहा गया। यह वही व्यक्ति था जो कप्तान के कक्ष में दिखलाई पड़ा था। अधिकारी को जब इसकी जानकारी दी, तो उसने उस व्यक्ति से वही वाक्य लिखने को कहा, जो उसके ब्लैकबोर्ड पर लिखा था। अधिकारी स्तब्ध था, कारण की दोनों की हस्तलिपियां हु-ब-हु मिलती थी। इससे भी आश्चर्यजनक बात यह थी की वह इस विचित्र ग्यातना के बारे में बता पाने को असमर्थ था। हाँ, दुर्भाग्यग्रस्त जहाज के कप्तान से इतनी जानकारी अवश्य मिली की लगभग उसी व्यक्त,जब दूसरे जहाज में उसकी अनुकृति देखि गयी, वह सो रहा था। उठने पर वह पूर्णविश्वास के साथ यह कहता पाया गया की सभी सुरक्षित बच जायेंगे, चिंता की कोई बात नहीं है। उक्त वृत्तान्त का उल्लेख रॉबर्ट डेल ओविन ने अपनी पुस्तक "फुटफाल्स आन दी बाउंड्री ऑफ अनदर वर्ल्ड ' में विस्तारपूर्वक किया है।
एक इसी प्रकार की दूसरी घटना की चर्चा हैरॉल्डओवेन ने अपनी कृति 'जर्नी फ्रॉम अब्सक्युरीटी ' में की है। प्रसंग विश्वयुद्ध काल का है। प्रथम विश्वयुद्ध हुए अभी कुछ ही माह बीते थे। तब हैरॉल्ड ओवेन "एच.एम्.ऍस. आस्ट्रिया ' नमक पोत पर एक अफसर थे। पोत उस समय टेबुल की खाड़ी पर लंगर डाले था। युद्ध की समाप्ति की खुशी में जहाज के कप्तान ने भोज का आयोजन किया था, जिसमें अफसर भी निमंत्रित थे। इतने पर भी ओवेन न जाने क्यों प्रसन्न नहीं लग रहे थे। उन्हें एक विचित्र प्रकार का अवसाद घेरे हुए था। न जाने क्यों उनके मस्तिष्क में एक ही विचार बार- बार आ रहा था की उसका भाई युद्ध में जिन्दा बच सका या नहीं? जल्दी ही पोत ने कैमरून के लिया प्रस्थान कर दिया। वहन जा कर ओवेन बीमार पड़ गए। इसी अवस्था में उन्हें एक विलक्षण अनुभूत हुई, जिसका उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि एक दिन वे चिट्ठी लिखने के विचार से अपने कमरे में गए। दरवाजे के परदे को हटा कर जैसे ही अपने केबिन में कदम रखा, वे चौक पड़े। संपे ही कुर्सी पर उनका भाई विल्र्फेड बैठा दिखाई पड़ा। उसे दिखती ही एक विचित्र सिहरन उनके पुरे शरीर में दौड़ गई। हाथ-पैर शिथिल हो गए। उनने धीरे से पूछा की वह किस प्रकार यहाँ आ गया? विल्र्फेड ने जवाब तो नहीं दिया, पर उसकी भंगिमा से स्पष्ट प्रकट हो रहा था कि वह चाहकर भी कोई चेष्टा नहीं कर पा रहा था और जड़वत बना हुआ था। प्रश्न का उत्तर मात्र एक बेजान मुस्कान से दिया। अल्फ्रेड को वहां देख कर ओवेन को प्रसन्नता भी हो रही थी और अचम्भा भी। उत्सुकतावश ओवेन ने एक बार पुनः प्रश्न दोहराया,किन्तु इस बार भी वहां मौन रहा। उत्तर स्वरूप एक फीकी हंसी मात्र उसे दिखाई दी। ओवन लिखते है की वे अपने भाई से असीम प्यार करते थे। अतः उसकी उपस्थिति इस समय सुखद प्रतीत हो रही थी। उन्होंने आगे इस बात को जानने का प्रयास नहीं किया की वह किस प्रकार केबिन में आ पहुंचा? कुल तब अल्फ्रेड अपनी सैनिक की पोषक में था। उस सुरुचिपूर्ण कक्षा -सज्जा से उसकी संगति बिलकुल बैठ पा रही थी। केबिन की सजावट शालीनता और सौम्यतायुक्त थी। उसमें युद्ध की पोशाक इसी प्रतीत हो रही थी मानो करुण रस में वीररस की बेमेल युगलबंदी हो गयी हो इसी क्षण कुछ पल के लिए उनकी दृष्टि अल्फ्रेड से हटी। जब नजारे दोबारा उस ओर मुड़ी, तो कुर्सी खाली थी। वहां अल्फ्रेड नहीं था। इसके साथ ही ओवेन को ऐसा महसूस हुआ, जैसे उनके हाथ -पैर अनायास ही सामान्य स्थिति में आ गए हो और यह भी आभास मिला,मानो कोई अपूर्णीय क्षति हुई हो। वे अत्यधिक थकान का अनुभव करने लगे और सुस्ताने के लिए लेट गए। गहरी नींद के उपरांत जब वे जगे; तो उनका मन पूरी तरह आश्वस्त हो चूका था की अल्फ्रेड इस दुनिया में नहीं रहा। कुछ दिन पश्चात सैनिक हेडक्वार्टर की ओर से सूचना मिली।
आत्मसत्ता ईश्वर का अंशधर है। उसमें वे सारी विभूतियां बीज रूप में विद्यमान है, जो परमात्मा में है। साधारण स्थिति में समर्थता, स्थूलता के बंधन में जकड़ी रहती है। इसलिए आदमी रक्त-मांस के शरीर को ही सब कुछ मन बैठता और उसकी सजा- सज्जा में खोया रहता है। उसकी भौतिक आकांक्षाएं इतनी प्रबल हो उठती है, जिसे प्राप्त करने के लिया वहां प्राणपण से जुट पड़ता, जैसे जैसे दुनिया मई इस से बढ़कर कोई दूसरा प्राप्तव्य और प्रयोज्य हो ही नहीं। बस यही दिग्भ्रान्ति उसे अपने चरम लक्ष्य से मोड़ लेने के लिए विवश करती है हर कोई इस तथ्य को आत्मसात कर सका होता है की भौतिक उपार्जन में जितना समय,श्रम, प्रयास, पुरुषार्थ खर्च होता है, उसका एक-चौथाई हिस्सा भी उन बन्धनों को ढीला करने और अन्तराल को परिष्कृत करने में लगाया गया होता है,तो इसका सत्यपरिमाण चौगुना-सौगुना बनकर किसान की लहलहाती फसल के रूप में सामने आता और काय- कलेवर को दिव्य ऐश्वर्य से इस प्रकार ओत−प्रोत करता है,जिसे देखकर लोग यही कहते है की यह तुच्छ चिंगारी में छिपा ज्वालमाल है।
शरीर छोटा दीखता भर है, पर उसकी क्षमता उतनी ही भर नहीं है, जितनी हल-चले उसके अंग-अवयव करते दीखते है। उसमें आकाश की तरह अनंत संभावनाएं है। वे साकार इस लिए नहीं हो पाती की उन्हें प्रत्यक्ष और प्रकट होने का मौका नहीं मिलता। जब कभी अवसर मिलता है, तो इसे अद्भुत कृत्य कर गुजरती है, जिन्हें देखकर यही कहना पड़ता है की परोक्ष की शक्ति प्रत्यक्ष जगत से अनेक गुना अधिक है। उसका मूल्य और महत्त्व समझा जाना चाहिए। पदार्थपरक भोगवादी प्रत्यक्ष जीवन के मूल में भूमिका उस पर परोक्ष की ही है, यह संकेत ये घटनाएं अनायास ही देती है।
गुरु द्रोणाचार्य से पांडव धनुर्विद्या सीखने वन में गए हुए थे। उनका कुत्ता लौटा तो देखा की किसी ने उसके होठों को बाणों से सी दिया है .। इस आश्चर्यजनक कला को देखकर पांडव दंग रह गए की सामने से किस प्रकार तीर चले गए की वह अन्यत्र न लग कर केवल होठों में ही लगे, जिससे कुत्ता मर तो नहीं पाया लेकिन भौंकना बंद हो जाए। कुत्ते को लेकर पांडव द्रोणाचार्य के पास पहुंचे की यह कला हमें सिखाये। गुरु ने कहा- यह तो हमें भी नहीं आती। तब यही उचित समझा गया की जिसने बाण चलाये है, उसी की तलाश की जाये! कुत्ते के मुंह से टपकते हुए खून के चिन्ह गुरु के साथ पांडव भी उस व्यक्ति की तलाश में चले। अंत में वहाँ पहुंचे जहां की भील बालक अकेला ही बाण चलने का अभ्यास कर रहा था। पूछने पर मालूम हुआ की उसी ने कुत्ते को तीर मारा था। अब अधिक पूछ-ताछ शुरू हुई। यह विद्या किससे सीखी? तुम्हारा गुरु कौन है? उसने कहा -"द्रोणाचार्य मेरे गुरु हैं, उन्होंने मुझे यह विद्या सिखाई है "। द्रोणाचार्य आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने कहा मैं तुम्हें जानता तक नहीं फिर बाणविद्या मैंने कैसे सिखाई?"
द्रोणाचार्य को साक्षात् सामने खड़ा देख कर बालक ने उनके चरणों पर मस्तक रखा और कहा - "मैंने मन ही मन में आपको गुरु माना और आपकी मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसी के सामने अपने आप अभ्यास आरम्भ कर दिया।"
गुरु भाव सच्चा और दृढ़ होने पर गुरु की मिट्टी की मूर्ति भी इतनी शिक्षा दे सकती है, जितनी की वह गुरु शरीर भी नहीं दे सकता। श्रद्धा का महत्त्व अत्यधिक है।
स्वाधिष्ठान चक्र संस्थान का एक अतीव महत्वपूर्ण केंद्र है। मूलाधार चक्र के जागरण में इसका उल्लेखनीय योगदान है। इसकी अवस्थिति गुदा द्वार के ठीक ऊपर मेरुदंड के एकदम निचले छोर पर जहाँ पुचास्थी (टेल बोन या कक्सिक्स ) है, शारीरिक दृष्टि से यह प्रोस्टेट ग्रंथि के स्नायु से संबंध है। इसका क्षेत्र शरीर के सामने की और जन्नांग के ठीक उपस्थ में है। यह षट्दल कमल है। इसकी पंखुड़ियां का रंग सिंदूरी है। प्रत्येक दल में क्रमशः ब, भ, म, य, र तथा ल वर्ण चमकीले रंग में अंकित हैं। इसका तत्व जल है। कमल के अंदर एक स्वेत अर्धचंद्र इसका प्रतीक है। यही इस चक्र का यंत्र है। इसका निर्माण दो छोटे - बड़े वृत्त से हुआ है। बाह्य वृत्त से बाहर की और कमलदल निकले होते हैं, जो भौतिक चेतना का प्रतिनिधित्व करते है। अर्धचन्द्र के छोटे वृत्त में अंदर की ओर पंखुड़ियों निकलती है। यह संचित कर्मों के भांडागार की प्रतीक है। चक्र का वाहन है, मगर है, जो इस स्तर की चेतना की चाल अथवा गति की प्राकृत को निरूपित करता है। इसका बीज मन्त्र 'व' है। विष्णु इसके देवता और देवी राकिनी नीलकमल वर्ण के वस्त्रभार्नो से सुसज्जित हैं। वे वनस्पतियों की देवी हैं। अतएव इस चक्र के जागरण में सात्विक और निरामिष आहार ही उपयोगी सिद्ध होता हैं।
इसका लोक 'भुवः' है। तन्मात्रा रस या स्वाद है। जिह्वा इसकी ज्ञानेन्द्रिय तथा जननांग, वृक्क एवं मूत्र संस्थान इसकी कामेंद्रियां हैं। स्वाधिष्ठान की वायु 'व्यान' है। यह चक्र प्राणमय कोष के अंतर्गत आता है। स्वाधिष्ठान चक्र का सम्बन्ध अचेतन मन से भी है, जहाँ हर प्रकार के संस्कार संचित होते हैं। उदाहरण के लिए, पिछले दिनों किसी को बुरा-भला महसूस होता है, तो यह एक अवचेतन प्रक्रिया बनकर सक्रिय रहता है और चेतना को दिशा देता है। ऐसे ही विगत जन्म के अनेकानेक अनुभव ऐसे हैं, जो हमें स्मरण नहीं होते, किन्तु हमारे व्यवहार, दृष्टिकोण तथा गतिविधियों को नियंत्रित और प्रभावित करते हैं। जीवन के बहुत सारे धर्म इन्हीं संस्कारों पर गतिशील होते, किन्तु हम उनसे पूर्णरूपेण अनभिज्ञ रहते हैं।
स्वाधिष्ठान चक्र की इस अचेतनता का अर्थ सुषुप्ति अथवा अक्रियाशीलता से कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए। सच तो यह है की साधारण चेतना से यह कहीं अधिक क्रियाशील तथा सामर्थ्यवान है। जागरण में चेतना का प्रवेश जब उक्त संस्थान में होता है, तो इस अचेतन स्थिति का बहुत शक्तिशाली अनुभव होता है। यह मूलाधार की अनुभूति से पृथक है। यहाँ केवल अचेतन की अभिव्यक्ति होती है। मूलाधार में पशु स्तर के कर्मों की अभिव्यंजना काम-क्रोध-लोभ-मोह, ईर्ष्या-द्वेष आदि के रूप में होती है। वहाँ कर्मों के प्रकटीकरण और अभिव्यक्ति के माध्यम से उनका क्षय रोता रहता है लेकिन स्वाधिष्ठान स्तर पर इस प्रकार की कोई क्रियाशीलता नहीं दिखलाई नहीं पड़ती। यही हिरण्यगर्भ ब्रह्मांडीय गर्भाशय है, जहां सब कुछ सुषुप्तावस्था में विद्यमान है।
मन की यह विशेषता ही कहनी चाहिए की वह छोटे-बड़े, प्रधान-अप्रधान हर प्रकार के अनुभवों और घटनाक्रमों को अपने अचेतन तल पर सँजोकर रखता है। यों फालतू और निरर्थक प्रसंगों का व्यक्ति के दैनिक जीवन से कोई लेना-देना नहीं, इसे तो बस संयोग कहना चाहिए की वह उनका साक्षी बन बैठता है, पर प्रत्यक्षतः और अप्रत्यक्षतः इनसे उसका कोई सरोकार नहीं। इतने पर भी ये घटनाएँ अचेतन स्तर पर उसी प्रकार अंकित हो जाती है, जिस प्रकार टेपरिकार्डर के आगे कोई भी ध्वनी बिना किसी छटनी के रिकार्ड होती चलती है। यह अवांछनीय और अनावश्यक संग्रह उस समय बहुत भ्रामक स्थिति पैदा कर देता है, जब साधक जागरणकाल के दौरान स्वाधिष्ठान भूमिका से होकर गुजरता है।अप्रिय प्रसंगों की मन पर बहुत गहरी छाप पड़ती है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता, पर रह चलते किसी अजनबी व्यक्ति, वस्तु,की एक हलकी झांकी भी हो जाये, तो मन उसे भी अंकित किये बिना नहीं रहता। संक्षेप में ये कहें की मनुष्य के सम्पर्क में जो कुछ भी आता है, वह चाहे महत्वपूर्ण हो, महत्वहीन, उपयोगी, अनुपयोगी, चाहे कुछ भी हो, मन के एक कोने में दबी-छुपी स्थिति में संग्रहित रहता है, तो यह अत्युक्ति नहीं होगी। अचेतन मन का निर्माण इन्हीं महत्वहीन कर्मों से होता है। जागरण क्रम में यह हीनकर्म चट्टान की तरह आड़े आते हैं और साधक को विचलित करने में कोई भी कसर नहीं उठा रखते हैं।
यही कारण है की स्वाधिष्ठान का जब जागरण आरम्भ होता है, तो उसके साथ-साथ कितनी ही प्रकार की समस्याएँ भी उठ खड़ी होती हैं, जिसके कारण साधक मतिभ्रम की-सी स्थिति में आ जाता है। यदि उस समय उसे किसे सुयोग्य गुरु का संरक्षण और मार्गदर्शन नहीं मिला, तो उसके भटकाव की संभावना बढ़ जाती है, वह मानसिक रूप से असंतुलित होने लड़ता है और अपने लक्ष्य के प्रति भी संदेह करने लग जाता है। ऐसा अचेतन स्तर की क्रियाशीलता के कारण होता है।
इसलिए कुण्डलिनी योग में स्वाधिष्ठान को एक बड़ा अवरोध मन गया है, कारण की मन के अचेतन तल में जमे वे क्षुद्र संस्कार उस शक्ति को आगे बढ़ने और ऊँचा उठने बार-बार रोकते हैं। इस अड़चन के कारण कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होकर भी बार-बार सुषुप्तावस्था में लौट आती है। इस स्तर की सबसे बड़ी बाधा विक्षुब्ध कामेच्छा है। इस कल में इतनी तीव्र और अनियंत्रित हो उठती है की तनिक सी असावधानी से साधक के पतित होने की संभावना बलवती हो उठती है। योगाभ्यासी के भूलवश कुण्डलिनी यदि पुनः मूलाधार में वापस चली गई, तो फिर उसका ऊर्ध्वगमन काफी कठिन हो जाता है। इसलिए साधना मार्ग के पथिकों को इसके प्रति सदा सावधान रहना चाहिए तथा आहार-विहार एकदम सात्विक रखना चाहिए। अश्लील साहित्य एवं फिल्म अथवा चित्रों से परहेज रखते हुए मन को स्वाध्याय एवं चिंतन में व्यस्त रखकर इस अवस्था से पर किया जा सकता है।
जब कुण्डलिनी स्वाधिष्ठान चक्र में अवस्थान करती है, तब जन्म-जन्मान्तरों के संचित हेय संस्कार अचानक तेजी से उभर पड़ते है। इस समय निषेधात्मक चिंतन, ईर्ष्या, द्वेष,क्रोध, भय, कम-वासना, आलस्य, अवसाद, निराशा जैसी तमाम तामसिक प्रवृत्तियां प्रकट होकर समाप्त होने लगाती हैं, इसलिए विकास की यह अवस्था एक प्रकार से शोधनकाल कहलाती है, जिसमें साधक अपरिष्कृत चेतना शुद्ध और परिष्कृत बनती है। जब इस स्तर से होकर कुण्डलिनी शक्ति आगे बढ़ती है, तो योगाभ्यासी को भयंकर मानसिक त्रास और अशांति झेलनी पड़ती है। इस स्थिति से उबार पाना सामान्य मनःस्थिति वालों के वश की बात नहीं। वही साधक इस अवस्था को सफलतापूर्वक पर कर पाते हैं, जो संकल्प शक्ति धनी हैं अथवा जिनमें समर्थ गुरु की कृपा प्राप्त है या जो लक्ष्य के प्रति सजग, समर्पित एवं निष्ठावान हैं।
इसको भली–भांति पर करने का एक अन्य तरीका तीव्र वैराग्य हो सकता है। जो साधक इस काल में मोह-माया के पाश में बँधते और भौतिक आकर्षणों की ओर खिंचते हैं उनकी संदिग्ध बनी रहती है, किन्तु जो इस वास्तविकता को सही-सही समझ लेते है की जीवन के सुखों का कोई अंत नहीं, इच्छाएं अनंत हैं,एक की पूर्ति होते ही, उद्भिजों की तरह अनेक उपज पड़ती और अपनी-अपनी बारी का इंतजार करती रहतीं हैं। ऐसे में तो अगणित जन्मों में भी उन्हें पूरा कर पाना संभव नहीं। स्थिति तब और विचित्र हो जाती है, जब शरीर असमर्थ-अशक्त होकर सुखोपभोग के लायक नहीं रहता, फिर भी मन उन्हें भोगने के लिए मचलता रहता है। इसलिए वैराग्य,शोधन या रूपांतरण ही इनमें मुक्ति पाने का सरल उपाय हो सकता है।
जो इस प्रकार सोचते है, उन्हें उक्त बाधा से उबरने में विशेष कठिनाई नहीं होती और कुण्डलिनी शक्ति अपेक्षाकृत तीव्र गति से अगले पड़ाव की ओर बढ़ जाती है। यदि इस प्रकार के चिंतन का साधक में अभाव है, तो स्वाधिष्ठान चक्र उसके लिए एक अभेद्य कवच की तरह है, जिसे हजार जन्मों में भी वह कदाचित पार कर सके।
योगविद्या के आचार्यों का मत है की कामेच्छा का उभार जागरण के किसी भी चरण में हो सकता है, अंतर सिर्फ इतना है की स्वाधिष्ठान में वह अत्यंत उत्तेजित दशा में होती है, जबकि चेतना की उच्चतर अवस्थाओं में बीज रूप में विद्यमान रहती है। इसलिए चेतना की उच्च भूमिका में प्रतिष्ठित साधक को यह अहमन्यता नहीं पालनी चाहिए की उसने कामतत्व पर विजय प्राप्त कर ली। वास्तविकता तो यह है की यहाँ उस ऊर्जा का रूपांतरण मात्र होता है। इससे अधिक कुछ नहीं। भक्ति, ज्ञान, वैराग्य सब उसी कामतत्व के परिवर्तित और अपरिवर्तित रूप हैं। शक्ति एक ही है, पर जब वह अपरिष्कृत 'काम' रूप में होती है, तो वह संतानोत्पत्ति के काम आती है,किन्तु उच्चतर आयामों ने पहुँचकर वही दिव्य अनुभूति का आधार बनती है।
इसे दूसरे रूप में यों समझ सकते हैं। दही, माखन,पनीर,छाछ सब एक ही मूल पदार्थ दूध के रूपांतरण हैं।जब जिसकी आवश्यकता पड़ती है, दूध को आवश्यकतानुसार उस रूप में बदल लिया जाता है। इसी प्रकार शक्ति तत्व का जब दिशांतर होता है, तो वह भिन्न-भिन्न नाम-रूपों में प्रकट- प्रत्यक्ष होती है।उच्चतम स्तर पर इसको आध्यात्मिक अनुभव, शारीरिक स्तर पर काम-वासना, निम्न स्तर पर अज्ञान अथवा अविद्या कहते हैं। ऐसे ही भौतिक संबंधों में पिता के रूप में प्यार, पत्नी के रूप में काम, भगिनी के रूप में स्नेह तथा जननी के रूप में वात्सल्य आदि सब उसी एक तत्व के भिन्न-भिन्न प्रकटीकरण है। यही कारण है की ईश्वर-आराधक ईश-आराधना में उन्हें पिता, पुत्र, प्रेमी, पति, पत्नी, माता आदि मानकर पृथक-पृथक स्मरण करने लगते हैं। ओस प्रकार से भावात्मक शक्ति का ऊर्ध्वीकरण, दिव्य अनुभव एवं जागरण में कर उस आद्यशक्ति का रूपांतरण संभव है। स्वाधिष्ठान चक्र की साधना में इसका विशेष ध्यान रखना पड़ता है।
स्वाधिष्ठान साधना के समय जब साधक यौन आकर्षण से मुक्त अनुभव करने लगता है, तो इसका यह मतलब हुआ की कुण्डलिनी शक्ति इस केंद्र से उत्थित हो चुकी है। इसके साथ ही कई प्रकार की अन्य सुखदायी संवेदनाओं का भी अनुभव होता है। जिस व्यक्ति में यह संस्थान अन्यों की तुलना में अधिक जाग्रत होता है, वह भोजन तथा भोग-विलास में आनंद की खोज करता है। मूलाधार से यह इस अर्थ में भिन्न है की मूलाधार चक्र प्रधान व्यक्ति अपनी सुरक्षा की दृष्टि से धन-संपत्ति एकत्रित करता है, जबकि स्वाधिष्ठान प्रधान व्यक्ति इन्द्रिय-सुख निमित्त इनका संग्रह करता है। अतएव जो व्यक्ति धन-साधन के प्रति अतिशय मोहग्रस्त दिखे, समझा जाना चाहिए की आध्यात्मिक प्रगति की दृष्टि से वह अत्यंत निम्न कोटि का है और चक्र संस्थान के बिलकुल निचले तल पर है।
इस चक्र के जागरण से साधक में कई प्रकार की विशेषताएँ आ जातीं हैं, जिनमें पानी से भयभीत न होना, अंतर्ज्ञान का प्रारंभ, सूक्ष्म शक्तियों के प्रति सजगता, अहंकारनाश, मोहनिवृत्ति तथा रचनाशक्ति आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त काम-क्रोध, लोभ-निवारण तथा वाणी में मृदुलता एवं काव्यात्मकता की स्पष्ट झलक मिलने लगती है।चक्र-ध्यान स्वाधिष्ठान जागरण का सबसे सरल उपाय बताया गया है। ध्यान साधना के समय उसके बीजमंत्र 'वं' का जप भी अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त सिद्धासन, सिद्धयोनि आसन जैसे योगाभ्यासों से भी इसके विकास में सहायता मिलती है। स्थिति परिस्थिति एवं मनोभूमि को देखते हुए दोनों में से किसी भी अभ्यास को अपनाया जा सकता है।
यह स्मरण रखना चाहिए की स्वाधिष्ठान स्तर ताकि चेतना शुद्ध नहीं होती। मूलाधार और स्वाधिष्ठान पाशविक चेतना के प्रतीक है, अतएव अज्ञान तथा भ्रम के कारण इस तल पर जाग्रत अतीन्द्रिय शक्ति के साथ-साथ बहुधा अवांछनीय मानसिक प्रवृत्तियों का भी उदय होता है। इस दशा में जब साधक उस अतीन्द्रिय शक्ति के द्वारा अपनी अभिव्यक्ति करना चाहता है, तो दिव्य अनुभूतियों की जगह यह व्यक्तिगत तथा हेय प्रवृत्तियों का माध्यम बन जाता है, अस्तु यहाँ सावधानी बरतने की आवश्यकता है।
संक्षेप में स्वाधिष्ठान स्तर 'स्व' में अधिष्ठित होने की साधना है। जैसा की पहले कहा जा चुका है, यह तल पशुता का प्रतीक-प्रतिनिधि है, अतः उसे निकल-बाहर कर अपने शुद्ध स्वरूप ('स्व') में प्रतिष्ठित होना ही इसका वास्तविक प्रयोजन है। इसमें हम कितने अंशों में सफल हुए? इसका एक ही पैमाना है की हमारे रहन-सहन में क्या भोगवाद का क्या और कितना स्थान है? हमारी वाणी और व्यवहार कैसे हैं एवं उचित-अनुचित का कितना ध्यान रखते है? जो इस प्रतिमान में खरा उतरता है, समझाना चाहिए उसकी स्वाधिष्ठान-साधना सफल हुई और अब वह आगे की भूमिका में प्रवेश कर चुका है।
एक दिन एक साहूकार को शक हुआ, उसके खजाने में कहीं खोटे सिक्के तो नहीं आ गए। यह जांचने के लिए उसने सब सिक्के इकट्ठे किये और उनकी पड़ताल शुरू की।
अच्छे सिक्के तिजोरी में और खराब सिक्के एक तरफ पटके जाने लगे, तो खोटे सिक्के घबराये। उन्होंने परस्पर विचार किया- " भाई अब तो अपने बुरे दिन आ गए, यह साहूकार अवश्य हम लोगों को छाँट-बीनकर तुड़वा डालेगा,कोई युक्ति निकालनी चाहिए, जिससे इसकी नजर से बचकर तिजोरी में चलें जाएँ।"
एक खोटा सिक्का बड़ा चालक था। उसने कहा-"भाइयो, हम लोग अगर जोर से चमकने लगें, तो यह साहूकार पहचान नहीं पायेगा और अपना कम बन जायेगा।"
बात सबको पसंद आयी। सब खोटे सिक्के दिखावटी चमकने लगे और सेठ की तिजोरी में पहुंचने लगे। खोटे सिक्के को अपनी चालाकी पर बहुत अभिमान हुआ।
गिनते-गिनते एक सिक्का नीचे ज़मीन पर गिर पड़ा। नीचे पत्थर पड़ा हुआ था। सिक्का उसी से टकराया। साहूकार चौंका- हैं यह क्या,चमक तो अच्छी है मगर आवाज़ कैसी थोथी है। उसे शंका हो गयी। दुबारा उसने फिर से सब सिक्के निकले और पटक-पटकर उनकी जांच सुरू की। फिर क्या था असली सिक्के एक तरफ, नकली सिक्के एक तरफ।
खोटों की यह दुर्दशा देखकर एक नन्हा-सा असली सिक्का हंसा और बोला- मेरे प्यारे खोटे सिक्को! दिखावट और बनावट थोड़े समय चल सकती है, खोटी अंततः इसी तरह प्रकट हो जाती है। कोई मनुष्य अपनी कमजोरी नहीं छिपा सकता।
राज्यसभा लगी हुई थी। सहसा एक बौद्ध भिक्षुक ने प्रवेश किया। राजा तथा सभासदों ने खड़े होकर उनका अभिनन्दन किया। राजा के अनुरोध पर भिक्षुक एक उच्चपीठ पर आसीन हुए। कुछ क्षण रुककर उन्होंने कहा- राजन! संसार में तथागत बुद्ध के उपदेशों की बड़ी आवश्यकता है। आप भगवान के उपासक हैं। मैं भी उनका एक भिक्षुक उपासक हूँ, साथ ही मैं उपदेशों का अधिकारी विद्यावान् भी हूँ। आओ उपासक हैं पर उपदेशों की गहराई में अब तक नहीं उतरे हैं। आवश्यकता है, राज्य-सञ्चालन का उत्तरदायित्व ऐसे व्यक्ति पर हो, जो भगवन् बुद्ध के संदेशों को दूर-दूर तक फैलाने के साथ-साथ उनके उनके अनुसार राज्यव्यवस्था को भी चला सके। राजन! आप सोचें, इसके लिए हम दोनों में कौन उपयुक्त रह सकता है? कुछ रुककर राजा ने कहा- भंते! मैं यह अच्छी तरह से जनता हूँ की हम दोनों के बीच आप ही इस कार्य के योग्य हैं। कितना सुन्दर हो, इस दायित्व को आप सँभालें और मैं आपके चरणों में बैठकर भगवान तथागत के वचनों का चिंतन-मनन कर सकूँ। भिक्षुक की आँखों में प्रसन्नता की चमक आ गयी। उन्हें अनुभव हो रहा था की तीर लक्ष्य तक पहुँच चुका है।
कुछ क्षणों तक नीरवता छा रही। सहसा राजा ने मौन भंग किया। उसने कहा- भंते! आपने त्रिपिटकों का गहरा अनुशीलन किया है, इसकी मुझे परम प्रसन्नता है। क्या आप मेरा एक निवेदन स्वीकार करेंगे? उत्सुकतापूर्वक भिक्षुक ने कहा- अवश्य! वह क्या है? शीघ्र कहें।
राजा ने करबद्ध निवेदन किया- भंते! कितना सुन्दर हो, यदि आप एक बार त्रिपिटकों का परायण और कर सकें। भिक्षुक शीघ्रता से बोला- यह तो कोई कठिन कार्य नहीं है। अभी जाता हूँ और कुछ ही दिनों में सम्पूर्ण त्रिपिटकों का परायण करके वापस आता हूँ।
भिक्षुक विहार में पहुँच गए। एकांत कुटिया में जाकर बैठे। कुछ ही महीनों में अध्ययन-अनुशीलन करके राज्य सभा में पुनः उपस्थित हुए।
राजा ने दृढ़ता के साथ कहा- भंते! आपने बहुत अच्छा किया। इसी एक वाक्य में राजा ने अपना कथन समाप्त कर दिया। भिक्षुक अगले वाक्य की प्रतीक्षा करने लगा जब उस ओर से कुछ नहीं कहा गया तो भिक्षुक ने अपनी ओर से स्पष्ट शब्दों में कहा-राजन! राज्यसत्ता अब मुझे सौंप दें। मैं भगवान की शिक्षाओं के अनुरूप सञ्चालन करूँगा।
राजा ने गहराई से भिक्षुक की ओर देखते हुए कहा- यद्यपि मैं निवेदन करने का अधिकारी तो नहीं हूँ, फिर भी धृष्टता कर रहा हूँ। आप एक बार पुनः त्रिपिटकों का अनुशीलन करने का कष्ट करें।
भिक्षुक के की आँखों में कुछ रोष उभरा, परन्तु फिर भी उन्होंने एकांत में रहकर पुनः समग्र त्रिपिटकों का पारायण किया। सत्ता-संचालन की उनके मन में व्यग्रता थी। अतः शीघ्रता में सब कुछ किया। कुछ दिनों बाद वे पुनः राजसभा में आये और राजा से सत्ता की बागडोर सौंपने को कहा।
राजा शांत था। उसने भिक्षुक का सम्मान करते हुए पुनः एक बार उससे त्रिपिटकों का अनुशीलन करने का आग्रह किया। भिक्षुक का चेहरा तमतमाने लगा। उन्होंने रोष भरे शब्दों में कहा, राजन! यदि तुम मुझे राज्य नहीं देना चाहते तो व्यर्थ ही मुझे इतना परेशान क्यों किया?
विनम्रता से राजा बोला- भंते! मैं आपको कतई परेशान नहीं करना चाहता। मेरा उद्देश्य तो केवल इतना ही है कि त्रिपिटकों का परायण सम्यक प्रकार से हो जाए, ताकि अपना सभी कार्य सुगमता पूर्वक हो सके।
भिक्षुक पुनः कुतिया में आये। उनके मन में रोष था, अतः वह गंभीरतापूर्वक अध्ययन करने लगे। सहसा एक पद आया। "अप्प दीपोभवः।" अपने लिए दीपक बनो। भिक्षुक ने चिंतन को इसे पढ़ने पर केन्द्रित कर दिया। कुछ ही समय में वे अपने लिए दीपक बन गए। उनका चिंतन उभरा, मैंने अपने जीवन में अब तक भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को नहीं उतारा। यदि उतारा होता तो विरक्तभाव में रमण करने वाला क्या मैं पुनः इस संसार में लौटने का प्रयत्न करता?
एक ही पद के चिंतन में लीं भिक्षुक का न मालूम कितना समय व्यतीत हो गया। उन्हें दिन-रत का भान नहीं रहा। जब कई महीने बीत गए और भिक्षुक लौटकर नहीं आए, तो राजा उनकी कुटिया में पहुँचा। भिक्षुक को आत्मलीन देखकर निवेदन किया- भंते! पधारे, सत्ता सँभालकर अनुग्रहीत करें।
भिक्षुक के मुँह से एक ही वाक्य निकला- " राजन! मैंने अपनी सत्ता सँभाल ली है। मुझे अब किसी अन्य की अपेक्षा नहीं है।
“आत्मविश्वास की कमी ही हमारी बहुत-सी असफलताओं का कारण होती है, शक्ति के विश्वास में ही शक्ति है। वे सबसे कमजोर हैं, चाहे वे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हो, जिन्हें अपने आप तथा अपने पर विश्वास नहीं है।
आत्मविश्वास के द्वारा दुर्गम पथ भी सुगम हो जाता है।
आत्मविश्वास की मात्रा हममें जितनी अधिक होगी उतना ही हमारा सम्बन्ध अनंत शक्ति के साथ गहरा होता जायेगा।”
महर्षि ने योगदर्शन के विभूतिपाद के ४१ वें सूत्र में कहा है- "श्रोत्राकाशयो: संबंधसंयामादिदव्यं श्रोत्रं।।" अर्थात् श्रवणेंद्रिय तथा आकाश के संबंध पर संयम करने से दिव्य ध्वनियों को सुनने की शक्ति प्राप्त होती है।
वस्तुतः प्रत्येक व्यक्ति को भगवान ने जो कान दिए हैं, उनकी शक्ति-सामर्थ्य अनुपम है। प्रयोग-परीक्षणों द्वारा भी अब यह सिद्ध हो चुका है की अपने कानों की मदद से व्यकी लगभग पांच लाख आवाजें सुन कर पहचान सकता है। जबकि इस वैज्ञानिक युग में सैकड़ों फुट ऊंचे एंटीना, ट्रांसमीटर, रिसीवर, सुपरफ्रीक्वेंसी युक्त रेडियो, एनर्जी इंडीकेटर, माडुलेटर, सिंक्रोनाइजर, जैसे अनेकानेक यन्त्र-प्रणालियों से सुसज्जित रेडारों में इससे बहुत कम क्षमता होती है। सामान्यतया कानों की बहिर्मुखी संवेदनधर्मिता और प्रखर एकाग्रता का अभाव व्यक्ति की श्रावण क्षमता को सीमित रखता है। परन्तु कर्णेंद्रियों की सूक्ष्मशक्ति को जब योग-साधना द्वारा जगाया जाता है, तब अनंत ब्रह्माण्ड में होने वाली हलचल, पृथ्वी के चलने की आवाज़ और घोष, मंदाकिनियों के बहने का स्वर, उल्काओं के टक्कर के भीषण निनाद सभी कुछ किसी भी स्थान पर बैठकर सुने जा सकते है। परन्तु ऐसा तभी संभव है जब नाद योग द्वारा सूक्ष्म और कारण शरीर में सन्निहित श्रवण शक्ति को विकसित किया जाये।
मनुष्य की कर्णेंद्रिय विश्व का सबसे संवेदनशील ट्रांसड्यूसर एवं 'माइक्रोक्रिस्टल' है। अन्य सभी अन्य सभी ज्ञानेन्द्रियों में संरचना की दृष्टि से इसे सर्वाधिक सूक्ष्मयन्त्र माना जाता है। ध्वनि कंपनों को वह कितने अच्छे भेद-प्रभेद के साथ पकड़ता है और उनका विश्लेषण कर सकता है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है की कोलाहल रहित स्थान में मक्खी की भिनभिनाहट जैसी बारीक आवाज़ दो मीटर दूरी से सुनी जा सकती है। इससे सिद्ध होता है की हमारे कान हलकी-से-हलकी आवाज़ को सुन और भयंकर भोष को भी बर्दाश्त कर सकते हैं। न केवल बाह्य ध्वनिकंपनों को वरन् अपने शरीर के विभिन्न अंग-अवयवों के अन्दर रक्त-अभिसरण, श्वास-प्रश्वास,आकुंचन-प्रकुंचन, ग्रहण-विसर्जन, स्थगन-परिभार्मन, विश्राम, स्फुरणा, शीत-ताप जैसे परस्पर विरोधी अथवा पूरक-जितने भी अगणित क्रिया−कलाप निरंतर होते रहते हैं, इनमें से हर हलचल ध्वनितरंगें उत्तान करती हैं। इन शब्दप्रवाहों को भी उपयुक्त स्थिति में संवेदनशील कर्णेंद्रिय भलीप्रकार सुन सकती है।
कण जैसा कोई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बना सकना वैज्ञानिकों के लिए संभव नहीं, क्योंकि स्रष्टा ने कण में ऐसी संवेदनशील झिल्ली लगे है जिसकी मोटाई १ इंच का २५०० बिलियन है, इतनी पतली साथ ही इतनी संवेदनशील ध्वनिग्राहक झिल्ली बना सकना मानवीय कर्त्तव्य के बाहर की बात है। सुनने के प्रयोजन में प्रयुक्त होने वाले मानवनिर्मित यंत्रों की तुलना ममे कान की संवेदनशीलता दस हजार गुनी अधिक है। कान की अंदरूनी संरचना में सत्ताईस हजार अतिसंवेदी तंत्रिका तंतु विद्युत परिपथ की भाँति कार्य करते हैं। इतनी छोटी-सी जगह में इतना बड़ा परिपथ विद्यमान है, जो किसी महानगर के टेलीफोन व्यवस्था से कम नहीं है। अपनी विशिष्ट संरचना के कारण ही हमारे काम लाखों प्रकार की आवाजें पहचान सकते है और और उनके भेद-उपभेद का परिचय पा सके हैं। सौ वाद्ययंत्रों के समन्वय से बजने वाला आर्केष्ट्रा सुनकर उनसे निकलनी वाली ध्वनियों का विश्लेषण प्रस्तुत करने वाले कान कितने ही संगीतज्ञों के देखे गए हैं। शतावधानी लोग सौ शब्द श्रृंखलाओं के क्रमबद्ध रूप से सुनने और उन्हें मस्तिष्क में धारण कर सकने में समर्थ होते हैं। कहते हैं की पृथ्वीराज चौहान ने घंटे पर पड़ी चोट को सुनकर उसकी दूरी की सही स्थिति विदित कर ली थी और शब्दबेधी बाण का संधान करके शत्रु को मौत के घात उतार दिया था।
सिकंदर के बारे में विख्यात है की वह दूर की आवाजें सुन लेता था। उसकी श्रवण शक्ति विलक्षण थी। घटना उस समय की है जब पंजाब की सीमा पर आ पहुंचा था। एक बार रात को उसने एक गाना सुना। निस्तब्ध नीरवता में वह गीत बहुत दूर से उठ रहा था, पर सिकंदर ने उसे सुना ही नहीं, याद भी कर लिया। दूसरे दिन वह संगीत प्रवाह उसी तरह, उसी समय पर फिर से सुनाई पड़ा, तब उसने पहरेदारों को बुलाया और पूछा - यह गाने की आवाज़ कहाँ से आ रही है? पहरेदारों ने बहुत ध्यान लगाकर सुनने की कोशिश की, पर उन्हें कहीं कुछ नहीं सुनाई दिया। भौंचक्के पहरेदार एक दूसरे का मुँह ताकने लगे और बोले-महाराज! हमें तो कहीं से भी गाने की आवाज़ नहीं सुनाई दे रही।
सिकंदर ने सेनापति को बुलाया और उस गायक की दिशा और दूरी बताकर उसे बुलाने के लिए सिपाहियों को भेजने का आदेश दिया। जिस दिशा से सिकंदर ने आवाज़ आना बताया था, सैनिक उधर ही बढ़ते गए। बहुत पास जाने पर उन्हें एक ग्रामीण युवक के गाने का स्वर सुनाई दिया। वस्तुतः नीरव जंगल में वही व्यक्ति गया करता था, जिसकी आवाज़ सिकंदर ने सुनी थी। पता करने पर ज्ञात हुआ की वह स्थान फौजी छावनी से प्रायः २००० गज की दूरी पर था। इसी तरह नेपोलियन बोना की स्मरणशक्ति व श्रवणशक्ति बहुत तीव्र थी। अपनी सेना के प्रायः हर सिपाही का नाम उसे याद रहता था और आवाज़ सुनने भर से बिना देखे वह यह बता देता था की कौन बोल रहा है।
सामान्यतया हमारे कान श्रव्यतरंगों को ही सुनने की क्षमता रखते हैं अर्थात् वे २० से लेकर २०००० हर्ट्ज प्रति सेकेंड आवृत्ति वाली ध्वनि-तरंगों को सुन सकते हैं। इससे कम अथवा ऊपर की आवृत्ति ध्वनियों को, जिन्हें 'पराध्वनि' कहा जाता है, हमारी कर्णेंद्रियां इन्हें सुनने में असमर्थ होती है। इन्हें क्रमशः इन्फ्रासोनिक-सुपरसोनिक कहते हैं।
हमारे कर्णेंद्रियों की श्रवणप्रक्रिया बहुत ही जटिल होती है। सर्वप्रथम कानों की झिल्ली आवाज़ की बिखरी तरंगों को एक स्थान पर केन्द्रित करके भीतर की नली में भेजती है। वहां ये तरंगें विद्युत तरंगों में बदल जातीं हैं। इसी केंद्र में तीन छोटी किन्तु अतिसंवेदनशील हड्डियाँ जुड़ती हैं, वे परस्पर मिलकर एक पिस्टन का काम करती हैं। इसके आगे लसिका युक्त घोंघे की आकृति वाले गह्वर- 'लैम्ब्रिन्थ' में पहुँचते-पहुँचते आवाज़ का स्वरूप फिर स्पष्ट हो जाता है। इस तीसरे भाग की झिल्ली का सीधा संबंध मस्तिष्क से है। कान के बाहरी पर्दे पर टकराने वाली आवाज़ आगे धकेला जाता है। इनका संबंध प्रायः २७००० सूक्ष्म तंत्रिका तंतुओं से होता है। इस आवाज़ को मस्तिष्क तक पहुँचने में सेकेंड के हजारवें भाग से भी कम समय लगता है। मस्तिष्क उसे स्मरण शक्ति कोष्ठकों में वितरित-विभाजित करता है। वह स्मरणशक्ति पूर्व अनुभवों की आवाज़ पर ही यह निर्णय करती है की यह आवाज़ किसकी है- घंटा-घड़ियाल की है अथवा हारमोनियम की। सुनने की प्रक्रिया को अंतिम रूप यहीं आकर एक बड़ी, किन्तु स्वल्प समय में पूरी होने वाली प्रक्रिया के उपरांत मिलता है।
कितने ही प्राणियों में मनुष्य की अपेक्षा दूर की तथा निम्न आवृत्ति वाली- इन्फ्रासोनिक एवं उच्च आवृत्ति वाली अल्ट्रासोनिक ध्वनितरंगों को सुनने की क्षमता होती है। पानी में रहने वाले एवं सबसे बड़े, भीमकाय स्तनधारी जीव-ह्वेल को ही लें, तो वह एक लाख से सवा लाख हर्ट्ज तक की पराश्रव्य ध्वनितरंगें सुनने में सक्षम होता है। मीलों दूर तक अपने सजातियों से ध्वनिसंकेतों के माध्यम से सूचनाओं का आदान-प्रदान कर लेता है। इतना ही नहीं, सुदूरवर्ती घटनाओं-हलचलों का भी उन्हीं के माध्यम से यह प्राणी पता लगा लेता है। डॉल्फिन की भी श्रवण क्षमता इसी प्रकार है। इसके विपरीत हटी जैसा विशाल प्राणी अत्यंत निम्न आवृत्ति वाली एक हर्ट्ज आवृत्ति की इन्फ्रासोनिक-अश्राव्य ध्वनितरंगों तक को सुन लेता है। यही कारण है की जंगलों में ये सदैव सतर्क व चौकन्ने रहते हैं और प्रतिकूल परिस्थितियों का आभास मिलते ही तदनुरूप कदम उठाते हैं। घोड़ा भी मनुष्य की अपेक्षा अधिक हलकी अर्थात् कम आवृत्ति की आवाजें सुन लेता है।
जीव-जंतु, पशु-पक्षी चाहे वे पालतू हो अथवा जंगली इनमें पराध्वनियों को सुनने व उन्हें विश्लेषित कर तदनुरूप कदम उठाने की अद्भुत क्षमता होती है। आसन्न संकट, प्राकृतिक आपदाओं- जैसे भूकंप, आँधी-तूफान, ज्वालामुखी विस्फोट, जलप्लावन आदि के सूक्ष्म प्रकंपनों को वे घटना के घटित के घटित होने के पूर्व ही सुन-समझ लेते है और सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर जाते हैं। इसमें पक्षियों को विशेष महारत हासिल हासिल है। अपनी इसी क्षमता के कारण प्रवासी पक्षी दूर-दूर तक की यात्रायें कर लेते हैं। रास्ते में आने वाले आँधी-तूफान की सही जानकारी प्राप्त कर ये पक्षी या तो अपना मार्ग बदल देते हैं अथवा सुरक्षित स्थान पर उतार जाते है। अफ्रीका में पाया जाने वाला एक विशेष प्रजाति का मुर्गा सैकड़ों मील दूर तक उठे आँधी-तूफान की ध्वनि-तरंगों को पकड़ लेता है। इसी तरह कबूतर भी एक हर्ट्ज की आवृत्ति वाली हलकी ध्वनितरंगों को आसानी से सुन लेता है। उल्लू के दोनों कान एक सीध में न होकर थोड़ा ऊपर-नीचे होते है। इससे वह अपनी चौतरफा घूमने वाली गर्दन को घुमाकर आवाज़ की सही दिशा ज्ञात कर लेते है।
कुत्ते को प्रकृति ने जहाँ सूँघने की विशिष्ट क्षमता प्रदान की है, वहीँ उसे देखने व उच्च आवृत्ति वाली ३८०० हर्ट्ज तक की ध्वनितरंगों को सरलता से सुनने की शक्ति भी दी है। अपनी इसी क्षमता के कारण कुत्ते जासूसी की दुनिया में अपना विशेष स्थान रखते है। नन्हे कानों वाला चूहा एक लाख हर्ट्ज की आवृत्ति वाली पराश्रव्य तरंगों को सुनने में सक्षम है, तो चमगादड़ जैसे उड़ने वाले एकमात्र स्तनपायी के सुनने की क्षमता तीन लाख ' हर्ट्ज ' तक है। इसकी श्रवणशक्ति के आधार पर ही आधुनिक रेडार प्रणाली विकसित की गयी है। दो हजार हर्ट्ज प्रतिसेकेण्ड से अधिक आवृत्ति वाली पराश्रव्य ध्वनितरंगों को सुनने-पकड़ने में मछलियों को विशेष योग्यता हासिल है।शार्क जैसी मछली २०० मीटर दूर की सूक्ष्म ध्वनितरंगों को सुन सकती है, मेंढक भी ५०० से १००० मीटर दूरी तक की ध्वनितरंगों को ग्रहण कर लेते है। इस तरह हर प्राणी की अपनी-अपनी सुनने की क्षमता है। सभी प्रकार की ध्वनितरंगों को पकड़ना किसी भी जीवधारी के लिए संभव नहीं है।
मनुष्य ईश्वर का वरिष्ठ राजकुमार है। बीज रूप में उसमें अपने सृजेता की समस्त विभूतियाँ प्रसुप्त स्थिति में दबी पड़ी है। यदि उन्हें जाग्रत एवं विकसित किया जा सके तो लघु से महान, अणु से विभु बनने में कोई अवरोध आड़े नहीं आता। अपने इसी काय-कलेवर में एक से बढ़कर एक बहुमूल्य यंत्र-उपकरण भलीभांति सुसज्जित है। तीन शरीरों-स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर, पंचकोशों एवं षटचक्रों आदि के रूप में कितने ही शक्ति-भांडागार है, जिनमें जड़ प्रकृति सहित समूचे विराट चैतन्य जगत को-आंदोलित करने की करने की क्षमता विद्यमान है। ऋषि-तपस्वी अपनी इसी अध्यात्मिक प्रयोगशाला में अनुसंधानरत रहते है और उसमें सन्निहित स्रष्टा के उत्तराधिकार में उपलब्ध अनंत ऋद्धि-सिद्धियों को बीज रूप में ही पड़े न रहने देकर उन्हें उगाने, विकसित करने और विशाल वट-वृक्ष के रूप में परिणत करने का प्रयास करते है। अध्यात्म में इस प्रयोग को योग एवं तप कहते है। यही वह साधनात्मक पुरुषार्थ है, जो मनुष्य को हाड़-मांस का पुतला न रहने देकर नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम बना देता है। जीवन का उद्देश्य भी यही है।
कर्णेंद्रियों का माध्यम शब्द है। इसे नादब्रह्म की साधना द्वारा विकसित किया जाता है। प्रकृति के रहस्यों, हलचलों, संभावनाओं, घटनाओं, को जानने एवं सूक्ष्म शब्दप्रवाहों को सुनने की क्षमता का विकास नादयोग की साधना से होता है। कर्णकुहर बंद कर लेने पर उनमें बाहरी स्थूल शब्दों का प्रवेश रुक जाता है। तब निखिल विश्व-ब्रह्माण्ड में चल रहें सूक्ष्म ध्वनि कंपनों को उस नीरवता में सुन-समझ सकना सरल हो जाता है। झींगुर बोलने, बदल गरजने, शंख बजने, बंशी निनाद होने जैसे कितने ही शब्द आरम्भ में सुनाई पड़ते है और नादयोग का साधक उन ध्वनियों के सहारे यह जानने की चेष्टा करता है की सूक्ष्म जगत में क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है। भूत, वर्तमान और भविष्य की कितनी ही रहस्यमयी जानकारियां नादब्रह्म की साधना से अवगत होती है। नादयोग की अंतिम परिणति है- 'ॐकार ' ध्वनि का सुनाई पड़ना। उसका माध्यम से साधक दैवी संकेतों को समझने, ईश्वर के साथ वार्तालाप करने और भावनात्मक आदान-प्रदान करने में समर्थ हो सकता है। समाधिसुख भी इसी की देन है।
काका कालेलकर से किसी विदेशी ने पूछा- " गाँधी जी का देश के हर वर्ग पर इतना प्रभाव किन कारणों से पड़ा?
काका ने कहा- " वे अपने साथ संयम की कड़ाई बरतते थे हैं। जो मन में है, वही वाणी से कहते हैं और अपने क्रिया–कलापों को सार्वजनिक हित में लगाये रहते हैं। वे वही कहते हैं, जो करते हैं, इसीलिए वे विश्वभर में असंख्यों के लिए अनुकरणीय हैं।"
महान बनने के यह प्रख्यात सिद्धांत हैं, जिसे गाँधी जी ने अपनाया।
प्रयाग के सेट्टीराज की कन्या अर्बुद पंचाल के धनीसेठ पुत्र मणियार को ब्याही गई। अर्बुद शिक्षित थी, ज्ञानवान थी, वैसे ही उसके विचार, कार्य, योजनायें भी स्वच्छ, सुन्दर और पवित्र होती थी। ससुर के यहाँ पैर रखते ही उसने घर को एक नयी रोशनी में बदल दिया।
मणियार महँ ईश्वरभक्त था, किन्तु उसका वैयक्तिक जीवन कुविचार और बुरे आचरणों से ग्रस्त होने के करण दुखी और अशांत था।
अर्बुद ने कहा- स्वामी दुःख और अशांति का कारण स्वच्छ मन है, आप ज्ञान के प्रकाश से पहले अपने अंतरतम को मिटाइए, तभी शांति मिलेगी। मणियार ने कहा- नहीं! हम लोग तीर्थ-स्नान करने चलेंगे। तीर्थ-स्नान से मन पवित्र हो जाता है।
अर्बुद स्त्री थी, झुकना पड़ा। तीर्थ-यात्रा पर चलने से पूर्व उसने एक पोटली में कुछ आलू बांध लिए। जहाँ-जहाँ मणियार ने स्नान किया, उसने इन आलुओं को भी स्नान कराया। घर लौटते-लौटते आलू सड़ गये। अर्बुद ने उस दिन भोजन की थाली में वह आलू भी रख दिए। उनकी दुर्गन्ध पाकर मणियार चिल्लाया-यह दुर्गन्ध कहाँ से आ रही है?
अर्बुद ने हंसकर कहा- यह आलू तो तीर्थ-स्नान करके आये है, फिर भी इनमें दुर्गन्ध है क्या? मणियार समझ गया यदि मन को ज्ञान के जल से न धोया जा सका, तो सचमुच तीर्थस्नान व्यर्थ है। वह उस दिन से ज्ञान आराधना में जुट गया।
दूर -दूर तक खेतों में फैली हरियाली समूचे कुरुक्षेत्र को हरा-भरा बना रही थी। हालाँकि सूरज अभी कुछ ही ऊपर चढ़ पाया था, फिर भी खेतों की धूप अखरने लगी थी, इसलिए तो नन्हे-नन्हे पखेरू दूर वृक्षों पर जा बैठे थे। हरी-हरी शाखाओं के बीच, पत्तों के झुरमुट में दुबके हुए वे नीचे खेतों पर बार-बार अपनी दृष्टि डाल लेते जहाँ गेहूँ और जौ की बालियाँ बिखरी पड़ी थी।
खेत काटे जा चुके थे। अनाज खलिहानों में इकट्ठा हो चुके था, परन्तु किसानों ने खेतों में पड़ी रह गयी बालें अभी तक बीनी नहीं। किसान उन्हें कभी बीनते भी नहीं, कभी उन्हें पक्षी चुगते हैं, कभी गौयें चरती है, तो कभी-कभी कोई शीलोश्च वृत्ति वाला साधु अथवा गृही उन्हें इकट्ठा कर लेता है। उन दिनों देश में ऐसे आदमी का बड़ा मान होता था, क्योंकि वह अपरिग्रही था, सबकी दृष्टि में अमित संतोषी और निश्चित ही उसने आपने जीवन को तप के अर्पण कर दिया था।
महर्षि मुद्र्गल ऐसे ही शीलोश्च वृत्ति वाले महात्मा थे। वे गृहस्थ होते हुए भी जनपदों में महर्षि का मान पाते थे। इस समय चढ़ती धूप में वे खेतों की बालें बीन रहे थे, उनकी पत्नी उनका हाथ बटाने में लगी थी।
इसी तरह वो लगातार दो सप्ताह तक सील बीनते थे और इतनी अवधि में वे ३४ सेर ( एक द्रोण ) अनाज इकट्ठा कर लेते थे। बाद में जब पूर्णिमा आती, अमावस्या पड़ती, तो उनकी कुटी में बड़ा समारोह होता। इष्टिकृत यज्ञ और दर्श पौर्णमास याग का आयोजन पूर्ण होता। इन दिनों अतिथि भरपेट प्रसाद पाते, निमंत्रित भोजन करते, सबसे बाद में महर्षि का परिवार भोजन करने बैठता। इस प्रकार महर्षि का परिवार मास में केवल दो बार भोजन करने के लिए प्रसिद्ध हो गया था।
इस बार पूर्णिमा का चन्द्रमा अभी थोड़ा ही निकला था, निर्मल आकाश के आँगन में अभी कुछ ही तारे आ पाए थे की महर्षि ने आज्ञा दी ...... हमें कुछ देर और प्रतीक्षा करना उचित होगा, शायद कोई अतिथि अभी आ ही जाए, तो हम किस प्रकार उसे संतुष्ट करेंगे? परिवार ने ये शब्द अपने हृदय में संजो के रखे की अभी भोजन नहीं करना है हमें।
पुरे पंद्रह दिन बीत चुके थे, सदा की भांति आज दर्श पौर्णमास याग संपूर्ण हुआ था, उसमें पूरा दिन बीत गया, परन्तु महर्षि भी भी भोजन करने से विरत थे, प्रतीक्षा कर रहे थे किसी अथिति की।
तभी बाहर बालव्रंद ने कोलाहल मचाया। विक्षिप्त है ...... पगला ...... वे किसी अर्धनग्न आदमी को घेरे चले आ रहे थे।
महर्षि ने द्वार की ओर देखा-बाल बिखरे, धुल-धूसरित, आयन बायं-सायं रटता एक पगला कुटी में प्रविष्ट हो रहा था।
कहाँ है मुद्र्गल? भोजन दे मुझे। भूखा हूँ मैं-नहीं, नहीं और कहीं भी कुछ न लूँगा मैं। बस मैं मुद्र्गल के ही यहाँ प्रसाद पाऊंगा। आइए, पधारिये ......कहकर महर्षि अभ्यर्थना करते लपके।
तू ही मुद्रगल है?
आपकी ही कुटी है। सेवा स्वीकार करे ......।
महर्षि ने उन्हें एक पीठिका पर बिठाया, अपने हाथ से मल-मलकर स्नान कराया। स्वच्छ परिधान पहनाया।
फिर भोजन परोसा। न जाने कितना भूखा था पगला, महर्षि परोसते गये, वह खाता चला गया, यहाँ तक की जो कुछ था, सब उदरस्थ कर गया और ऋषि परिवार की वह पूर्णिमा यों ही गुजर गयी, बिना खाए। पंद्रह दिन बीते की पगला फिर आ पड़ा और चटकर गया सब कुछ। महर्षि भूखे-के-भूखे मन्द स्मिति मात्र करते खड़े रहे पगले को विदा देते हुए। यह क्रम तीन मास तक चला। निराहार रहते-रहते उनका शरीर टूट चला। वमन प्रारंभ हो गया। शिरोशुल, उदरशूल भी परन्तु परिवार में किसी ने उफ न की, आह न भरी।
आज पूर्णिमा फिर से आ गयी। नीलाकाश में आतापी ऊँचे और ऊँचे उड़ती जा रही थी। महर्षि दुर्वासा पदचाप सुनकर चौंके की तीसरे पहर आज कौन आया इस एकांत स्थली में?
ओह स्वागत महर्षि। दुर्वासा ऋषि बाघम्बर से उठे।
इन शब्दों से अपराधी बनूँगा मैं। बहुत छोटा हूं आपसे? महर्षि मुदगल ने हाथ जोड़े।
अच्छा विराजिये तो ....हँसे दुर्वासा ऋषि।
एक प्रार्थना है की आज आप कुटी पर दर्शन दे। कुरुक्षेत्र में आपका आगमन मेरे लिए वरदान बनेगा।
मुदगल जी! कहते हुए गंभीर हो रहे दुर्वासा, दूसरी ओर दृष्टि फिराकर कहते गये वे- आज तीन मास से प्रति पंद्रहवें दिन मैं ही जीमता चला आ रहा हूँ, आपके यहाँ। क्षमा करें परीक्षा का यह कठिन कार्य मुझे ही करना पड़ा और आप इसमें उत्तीर्ण हुए। आप जितने सदाशयी है उतने ही भावसंवेदना से ओत-प्रोत। आपकी यह संवेदना ही आपके लिए आत्मिकप्रगति का पथ प्रशस्त करेगी। इस संवेदना का जागरण व आत्मनिग्रह ही तो महायज्ञ कहा गया है। ब्रह्मर्षि दुर्वासा के इन वचनों से महर्षि मुदगल कृतार्थ हुए और कृतकृत्य भी।
करीब चार सौ साल पहले ईरान की एक फौज दिल्ली लूटकर वापस लौट रही थी। रास्ता जालंधर होकर था। फौज आयी तो सिपहसलार ने ठहरने का हुक्म दिया। पड़ाव पड़ गये। सैकड़ों खेमे पड़ गये। इसके बाद वे सिपाही जालंधर लूटने निकले। हाथों में नंगी तलवारें, नेजे और आँखों में खुनी प्यास। जहाँ जो मिला लूटा, औरतें बेइज्जत हुई। कुहराम मच गया। कोई त्राता नहीं, कहाँ जाये? किससे कहे?
तब कुछ बड़े-बूढ़ों किसी तरह हिम्मत जुटाकर के सिपहसालार के पास पहुंचे। हाथ जोड़कर उन्होंने दया प्रार्थना की। सिपहसलार गरजा, कल सुबह होने से पहले सवा ग्यारह लाख रुपये हाजिर कर दो, वरना शहर का बच्चा-बच्चा कत्ल करके दरियाए बियास ( व्यास नदी ) में फेंक दिया जायेगा। जिन औरत-मर्दों को हम चाहेंगे ईरान के बाजार में ले जाकर बेच देंगे या उन्हें गुलाम बना लेंगे।
दया की भीख मांगने आये बड़े-बूढ़ों के चेहरे स्याह हो गये। उनमें से एक मुसलमान भी था। पर दुखी दुखी हो वे भी पुकारे भी तो किसे। ईश्वर प्रार्थना भी वे जोर से नहीं कर सकते थे। अंतर में ही उन्होंने प्रभु को पुकारा उस दिन। इतना पैसा किसी के पास नहीं था। कौड़ियां तनख्वाह में मिलती थी, उस वक्त एक रुपये की बड़ी कीमत थी। एक पैसा भी आज के कई रुपये के बराबर था।
सन्नाटा फैल गया। जो भी होना हो, हो। कोई चारा नहीं। आपस में एकता हो, हमदर्दी हो, भाईचारा हो तो मिल−जुलकर बड़ी मुसीबत का भी मुकाबला किया जा सकता, रुपये भी इकट्ठे हो सकते थे। लेकिन अपने अपने जीवन के अलग-अलग बचाव की बात सोचने से यह कहाँ संभव था। हर आदमी अपने को अकेला समझता था। मुसलमान समझते थे की हम तो ईरानियों के हम-मजहब है, धर्म-भाई है, बच जायेंगे। उन्होंने हम-मजहब होने की, दिन दुहाई दी भी। लेकिन बेकार।
कोई भी हो, 'हिंदी हो तुम लोग भी।' कहकर उनके चेहरों पर थूक दिया गया। उन्हें ठोकरें मरी गयी।
सिपहसालार ने सबको कैद करा लिया। महिलायें, बच्चे, बूढ़े और जवान सभी रस्सों से कस दिए गये। खुले मैदान में उन पर फर बैठा दिया गया। कई हजार निरपराध-निर्दोष कैदी थे। हर घर से एक आदमी तो जरूर ही पकड़ा गया। जालंधर मृतप्राय हो गया। सिपहसालार ने प्रभात होने से पूर्व सबको व्यास नदी के तट पर ले जाने का आदेश दिया। नदी किनारे कत्लेआम होगा। कोई नहीं बचेगा। मंदिर वीरान मस्जिदें वीरान।
रत का धूप-अँधेरा फैल गया। जालंधर की वह रात कराहों, सिसकियों और दुखभरी आहों से सिहर उठी थी। इतने में सीमा पर पदचाप सुने पड़ी। पीले कपड़े पहने, दाढ़ी बढ़ाये एक साधू वेशधारी पुरुष नगर में प्रविष्ट हुआ।
वह तीर्थयात्री था। कई महीने हुए, तीर्थाटन पर निकला था। चारों धाम की यात्रा हो चुकी थी। पैदल चलते-चलते शरीर छीज गया था। पैर दुःख रहे थे, छाले पड़ गये थे फिर भी वह खुश था। चारों धाम के दर्शन- बड़ा भाग्यशाली है तभी तो अब शरीर उठ भी जाये, तो क्या चिंता। घर लौटने के आनंद में था वह। किन्तु यह सब उजाड़ क्यों है? उनके द्वार खुले क्यों है? उसका आनंदातिरेक तिरोहित हो गया?
नगर की कुशलक्षेम जानने चला। जानकर एक क्षण अवाक् हुआ, हतप्रभ। फिर विवेक ने झकझोरा, उठा। कई खच्चर बुलाये। लाल रंग के घोरे जैसे ऊँचे- पूरे खच्चर। अपना तहखाना खोला। चंडी के रुपये उन पर लादे जाने लगे। रात की नीरवता उनकी खनखनाहट से भंग होने लगी। सवा ग्यारह लाख रुपये लड़ने में समय लगा।
भोर होने में अभी देर थी। सिपहसालार के शिविर के पास एक मानव छाया आ खड़ी हुई पास ही कुछ और छायाएं भी थी। उनके बड़े-बड़े कण बार-बार चौकन्ने होकर हिल उठते थे। पहरेदार ने पूछा- कौन हो तुम? क्या चाहते हो? आगंतुक मानव छाया ने कहा- सिपहसालार से मिलाना चाहता हूँ।
पहरेदार ने तीखे स्वर में कहा- जा भाग यहाँ से, सिपहसालार नींद टूटने से नाराज होगा। तुझे जहन्नुम भेज देगा। भले ही भेज दे- आने वाले ने कहा। एक बार दरख्वास्त कर दे की एक अदना-सा आदमी आपका दीदार चाहता है।
पहरेदार बूढ़ा आदमी था। सिपहसालार का विश्वासी था। लूट और कत्ल से जहाँ तक हो, वह बूढ़ा ईरानी बचता रहता था। सोचता था, जिन्दगी के आखरी दिन है, जहाँ तक गुनाह करूँ- वही गनीमत। वह सिपहसालार के खेमे में आहट लेने लगा। सिपहसालार जग चूका था। तीन-चार घंटे की नींद उसके लिए काफी होती थी। खरखराती आवाज में पूछा- क्या है शीराज?
हुजूर! एक शख्स दीदार के लिए दरख्वास्त करता खड़ा है।
पेश करो।
पहरेदार उसे ले गया। आगंतुक व्यक्ति ने सिर से लिपटी चादर जरा हटाई और बोला- जनाब के लिए मालिक से रुपये मांगे थे, पेशे खिदमत है।
कैसे रुपये?
पूरा जालंधर सवा ग्यारह लाख रुपये की फिक्र में मुब्तिला है, सुना था आपको ही दरकार है वे रुपये।
जरूर-जरूर, तुम कौन हो अजनबी। कौन है मालिक तुम्हारा?
वही जो सबको जन्म देता है, सबकी परवरिश करता है।
ओह! परवरदिगार की बात करते हो। उसने तुम्हें इतने रुपये बख्श दिए।
बेशक हुजूर! मालिक बड़ा करसाज़ है। राई को पर्वत कर दे, पर्वत को राई में बदल दे। सिपहसालार उस आदमी के सामने खुद को छोटा महसूस करने लगा। खिसियाना-सा उठ खड़ा हुआ, क्रुद्ध हो गया। कहा है रुपये?
आइये चंद कदम मेरे साथ आइये।
दोनों बहार आये। सिपहसालार ने देखा- कई खच्चर लादे-फदे है। अजनबी ने कहा- सवा ग्यारह लाख है, हिसाब चुकता कर दीजिये और........
और उन हजारों बदनसीबों को बरी कर दीजिये, जो मौत के इंतजार में खड़े हैं। अजनबी के स्वर में जरा भी हिचक नहीं थी, अभीत वाणी।
सिपहसालार को उस निर्भयता ने विश्वास करा दिया की रुपये होंगे और सवा ग्यारह लाख होंगे। तेज़ स्वर में बोला- शीराज।
हुजूर! पहरेदार तो वही खड़ा था। कलम-दवात ले आओ। शीराज खेमे में गया। मशाल जलाई, समान ले आया। तब रिहाई का परवाना लिखा गया। शीराज उसे लेकर व्यास नदी की तरफ बढ़ा। चलता गया।
अजनबी तुम्हारा नाम।
जाँ बख्शी चाहता हूँ। कुछ मुझे भी दीजिये।
सिपहसालार समझा, कुछ रुपये वापस चाहता होगा। बोला- साफ-साफ कहो क्या मंशा है?
बस एक मौका मुझे मिले- हुजूर नाम न पूछे।
मुझे गरज नहीं।
अपना रास्ता लो, बेवकूफ आदमी। क्रूरकर्मा सिपहसालार भन्ना गया और अजनबी अँधेरे में ही गायब हो गया। सिपहसालार बड़बड़ाता रहा, कैसा है यह हिंदी आदमी। जादूगरों को मात करता है। पीर-औलिया को भी मात कर गया। सवा ग्यारह लख देने आया, नाम नहीं बताएगा। हातिमताई का दादा बन गया। कहाँ से ले इतना धन वो भी नहीं मालूम। मालिक का नाम लेता है- परवरदिगार न हुआ इसका खादिम हो गया। हिंदी आदमी। अजीबोगरीब है। इतना पैसा है, फिर भी फौज नहीं बनता। जंग नहीं करता। शर्म की बात। सिपहसालार अपनी झेंप पर अहंकार की परत चढ़ाने लगा। व्यास नदी का पुलिन अश्वातापों से गुंजित हुआ। शीराज पहुंच गया था। प्रमुख प्रहरी को परवाना दिया। सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी, रिहा, बिकुनंद ( सबको रिहा करो )
कैदी मुक्त हो गये। चकित थे। हर्षित थे, कैसे हुआ? किसने मुक्त कराया मौत के चंगुल से? कहीं से कोई ठीक उत्तर नहियो मिलता था और भी बहुत दिन बीत गये।
रहस्य का उत्तर बही-खाते में रहा आक्रामक ईरानी नहीं जान सके थे, उसका नाम। जालंधर के निवासी भी नहीं जान पाए उसे और कितने ही शरद आए-गए। एक बार पतझड़ में जिस तरह तमाम पीले पत्ते झड़े, वह अजनबी भी दुनिया से चुपचाप चल बसा, बिना कुछ बताये। फिर बसंत आया। नए पत्ते, नयी कोंपल। नयी पीढ़ी समय की सीढ़ियां चढ़ने लगी। पिछली पीढ़ी गुजर चुकी थी। एक दिन एक घर में पुराने कागज-पत्र साफ किये जा रहे थे। कूड़ा-करकट जलाया जा रहा था, तभी एक बहीखाता उनके हाथ लगा। उसमें एक वाकया पढ़ कर सब चकरा गए। बड़े–बूढ़ों को दिखाया गया वह। भोजपत्र के एक पृष्ठ पर बीचोंबीच लिखा था-
सवा ग्यारह लाख रुपया व्यास में कैद आदमियों को छुड़ाने वास्ते दिया गया। सही की- सदासुख अरोड़ा।
सदासुख की कृष्णभक्ति से बुजुर्ग परिचित थे। अपनी जिन्दगी में सतत् उन्हें निष्काम कर्म पसंद था। परन्तु निष्काम कर्मयोगी गीता-गायक के रूप में भक्ति की इतनी उच्चकोटि की व्याख्या वे कर जायेंगे, इसका एहसास सभी को उस दिन हुआ। उपस्थितजनों की आंखें भीग गयीं। सभी निष्काम कर्म के सुखद अहसास में डूब गये।
कौशाम्बी राज्य में एक बार भयंकर अकाल पड़ा। लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हो गये। अनाज के भाव आसमान चूमने लगे। निर्धनों की मृत्यु का ताँता बांध गया। नगर-के-नगर और गाँव-के-गाँव खली हो गये।
इसी नगर में चम्पक नाम का ईमानदार मजदूर रहता था। उसकी धर्म-पत्नी हव्या भी बड़ी ईमानदार और पतिपरायणता थी। वे दिनभर कड़ी म्हणत करते, शाम को जो कुछ मिलता, बच्चों को खिला देते और आप भूखे सो जाते।
पर कुछ दिन में उन्हें भी अन्न का मिलना बंद हो गया। दोनों बच्चे अकाल देवता के भेंट चढ़ गये। एक दिन भूखा-प्यासा चम्पक हव्या के साथ लौट रहा था। उसने रास्ते में एक सोने का कड़ा पड़ा हुआ देखा। पत्नी को कही उसका मोह न जग पड़े, इसलिए उसने उस कड़े के ऊपर धूल डाल दी।
हव्या अभिप्राय समझ गयी- उसने कहा-" स्वामी! नाहक धुल डाल रहे है, आप इतने निर्लोभ है, तो क्या आपकी हव्या आपके आदर्श से दिग सकती है? "भगवान इन्द्र मजदूरों की इस ईमानदारी से अति प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा-"जहाँ ऐसे कर्मठ और ईमानदार लोग रहते हों, वहां अकाल नहीं रह सकता।" उस रात खूब जलवृष्टि हुई और अकाल दूर हों गया।
अखण्ड ज्योति का कलेवर छपे कागजों के एक पैकेट जैसा लगता है, पर वास्तविकता यह है की उसके पृष्ठों पर युगदृष्टा-परमपूज्य गुरुदेव की प्राणचेतना लहराती है, पढ़ने वालों को अपने आँचल में समेटती है, कहीं-से-कहीं पहुँचाती है। लेखनी का मार्गदर्शन-अनुग्रह-अवतरण किसी ऊपर की सत्ता से ही होता है। वस्तुतः स्वयं पूज्यवर के शब्दों में, यह हिमालय के देवात्मा क्षेत्र में निवास करने वाली ऋषिचेतना का समन्वित-प्रतिनिधि सत्ताओं द्वारा सूत्र-सञ्चालन है, अन्यथा इसके माध्यम से असंभव दिख पड़ने वाला युग-परिवर्तन जैसा कार्य संभव नहीं हो पता।
परमपूज्य गुरुदेव ने जनवरी, १९८८ की अखण्ड ज्योति पत्रिका को 'ज्योति जागरण विशेषांक' के रूप में लिखा था। प्रस्तुत लेख में इसी एक अंक के विभिन्न लेखों से उद्धृत अंश यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे है। इससे न केवल हमारी दैनंदिन जीवन की समस्याओं का समाधान हमें प्राप्त होगा, हमें ऐसी खुराक भी मिलेगी, जो आज के घटाटोप भरे अंधकार जैसी परिस्थितियों में संजीवनी का कार्य करेगी, अखण्ड ज्योति के महात्म्य को आत्मसात करके नियमित स्वाध्याय हेतु प्रेरित करेगी एवं विधेयात्मक चिंतन को गतिशील करेगी।
" अखंड ज्योति मानवी चेतना के अंतराल में दृश्यमान होने वाला वह तत्व है, जिसे अध्यात्म की भाषा में ' श्रद्धा ' कहते है। इसका जहाँ जितना उद्भव होता है, वहां उतना ही आदर्श के प्रति निष्ठा का परिचय मिलता है। "
" श्रद्धातत्व ही अखण्ड, अविनाशी प्रकाशपुंज और विभूतियों का ऊर्जाओं का भंदागर है। वह उसके अंतराल में बसने वाला निराकार स्वरूप है। इसी का साकार स्वरूप है 'अखण्ड ज्योति' जिस प्रकार निराकार भगवान की साकार प्रतिमाएँ बनाकर देवस्थानों में प्रतिष्ठित की जाती है, उसी प्रकार यह मन जाना चाहिए की खंडित न होने वाली निरंतर जलने वाली ज्योति के रूप में दृश्यमान अखण्ड दीपक को कलेवर प्रदान किया गया अखण्ड ज्योति के रूप में।"
" सूर्योदय होने पर उसकी अनेक प्रतिक्रियाएं अनेक स्थलों पर, अनेक रूपों में दिख पड़ती हैं। कमलपुष्प अनायास ही खिल पड़ते हैं। चिड़िया अपने घोंसले से निकलकर चहचहाने और फुदकने लगती है। मंदामरुत शीतलता लिए हुए प्रवाहित होने लगता है। इसी प्रकार महाप्रज्ञा की, भावश्रद्धा की अखण्ड ज्योति का जब और जहाँ अवतरण होता है, वहां उसका प्रभाव सुदूर क्षेत्रों के अनेकानेक पक्षों को प्रभावित करते देखा जा सकता है। "
" अखण्ड ज्योति को एक प्रतीक माना जाये, एक आदर्श कहा जाये या उसे उसके आराधक का प्रतिनिधि स्वरूप माना जाये, हर हालत में उसकी ऐसी प्रकाश किरणें फूटनी चाहिए, जो युगधर्म की महती आवश्यकताओं को पूरा करने में प्राणपण से कटिबद्ध दृष्टिगोचर हों। "
" युगधर्म- के निर्वाह हेतु समय की चुनौती के रूप में अनिवार्य है युगपरिवर्तन। इस परिवर्तन के लिए जो कुछ आवश्यक है, उसके सुविस्तृत होते हुए भी सरंजाम जुटाने का संकल्प अखण्ड ज्योति ने अब तक पूरा किया है और वह व्यक्तिविशेष का सञ्चालन उठ जाने पर भी अनंत कल तक अपनी ज्योतिज्वाला ज्वलंत रखे रहेगी। "
" जिस छपे कागज के पुलिंदे को पाठक हाथ में लिए हुए है, वह एक अन्य पत्रिकाओं की तरह प्रकाशित होने वाली देखने में एक सामान्य पुस्तिका भर नजर आती है। कागज, छपाई आदि की दृष्टि से उसे अग्रणी या उत्कृष्ट नहीं कहा जा सकता। न उसमें चित्रों की भरमार रहती है और न मनोरंजक मसाला। फिर भी उसका अपना एक स्थान है। ५० से भी अधिक वर्षों से इसका अनवरत प्रकाशन और भविष्य में उसका प्रवाह इसी प्रकार जरी रहने की संभावना को देखते हुए आश्चर्य ही किया जा सकता है, क्योंकि कुछ अपवादों को छोड़कर अन्य सभी पत्रिकाएं विज्ञापन के सहारे जीती है। जब व्यवसायिक दृष्टिकोण और रीति-नीति अपनाकर निकालने वाले पत्रों का हाल बुरा है, तो उन व्रतशीलों के लिए तो कहा ही क्या जाये जिनका प्रकाशन कल के बाद अपवाद रूप में कुछ वर्षों के बाद से ही विज्ञापन न लेने का संकल्प रहा है। आजीविका हेतु विज्ञापनों से कमाना अखण्ड ज्योति को अपने आदर्शों के अनुकूल नहीं लगा। इसलिए उसने इस नीति का आरम्भ से ही परित्याग कर दिया। यह जानबूझकर आर्थिक संकट मोल लेना था।"
" विज्ञापनों, चित्रों की भरमार से सज-धजकर निकलने वाली पत्रिकाओं में ठोस सामग्री उनके कलेवर की तुलना में भूत ही कम रहती है। इस प्रतियोगिता में अखण्ड ज्योति कहीं आगे है। इसमें रहने वाले कवर सहित ५८ पृष्ठों में ठोस और ठसाठस भरी हुई इतनी सामग्री होती है, जितनी उसकी तुलना में दूना कलेवर रखने वाली पत्रिकाओं में भी नहीं रहती है। "
" इन परिस्थितियों में अखण्ड ज्योति जीवित कैसे है, यह व्यवसायिक दृष्टि से एक आश्चर्यचकित कर देने वाला प्रश्न है। दान-अनुदान के रूप में कोई राशि स्वीकार न करने पर भी वह कागज, छपाई, पोस्टेज का खर्च किसी प्रकार निकाल लेती है। इस रहस्य की बारीकी में जाने वालों को कुछ समाधानकारक रहस्य और तथ्य हस्तगत हो सकते है। लेखों की उत्कृष्टता सर्वविदित है। उनमें से प्रत्येक को गहन अन्वेषण और विशाल अध्ययन के आधार पर लिखा जाता है। इसे एक प्रकार से समुद्रमंथन से निकले हुए चौदह रत्नों के समतुल्य ही समझा जा सकता है। इसे अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय का सार-संक्षेप भी कहा जा सकता है।
"अखण्ड ज्योति पत्रिका के प्रकाशन के पीछे पत्रिका निकालने भर का शौक कम नहीं कर रहा था वरन् उसके साथ लोकमानस के परिष्कार का अत्यंत विशाल और कष्टसाध्य लक्ष्य था। "
" अखण्ड ज्योति बड़ी संख्या में छपती है। वह हर महीने लाखों-करोड़ों के अंतराल को नियमित रूप से झकझोरती है। इसका प्रभाव-परिणाम भी हाथों-हाथ सामने आता रहता है। लोकसेवियों का, युगशिल्पियों का, प्रज्ञापुत्रों का एक बड़ा समुदाय उभरकर दूध की मलाई की तरह ऊपर आया है। गायत्री तपोभूमि, युगनिर्माण योजना, शांतिकुंज, ब्रह्मवर्चस, २४०० शक्तिपीठों को सँभालने वाले प्रचण्ड प्रतिभावान ऊँची योग्यता के कार्यकर्ताओं ने मिशन को अपने कंधे पर उठाया हुआ है। वे ही उसके अश्वमेध के घोड़े की तरह दसों दिशाओं में घूमते फिरते है। उनका संख्या-विस्तार और साहस-पौरुष जिस क्रम से उभरा है उसे देखते हुए प्रतीत होता है की अब वर्षों पूर्व देखा गया सपना अधूरा नहीं रहेगा। "
" सहायकों का अभाव, पूँजी का अभाव, अन्याय सेवाकार्यों की व्यस्तता में लेखन के लिए स्वल्प समय बचा पाना जैसे अनेक अवरोध थे, जिसके कारण समय की महती मांग को पूरा करने में एकनिष्ठभाव से युगसाहित्य का सृजन न हो सका। फिर भी बूँद-बूँद से घाट भरने की उक्ति सार्थक सिद्ध होती रही। इस ज्योति-परिकर का सूत्र-संचालक अपने निर्धारित उपासनाक्रम को पूरा करने के अतिरिक्त चार घंटा नित्य युगसाहित्य सृजन में लगता रहा। उसी का परिणाम है की कछुआ खरगोश से आगे जा पहुंचा। चीलों ने गरुड़ों से पहले मंजिल पूरी कर ली। "
" योजनाबद्ध सत्साहित्य का सृजन अखण्ड ज्योति के प्रकाशपुंज की एक जाज्वल्यमान किरण है। इसका चमत्कारी प्रभाव तो अगले दिनों युगसृजन के रूप में देखने को मिलेगा। "
" अखण्ड ज्योति की प्रधानचेतना विचारक्रांति अभियान के रूप में फूटी है। उसने त्रिदेव की भांति, त्रिपदा गायत्री की भांति, तीनों लोकों और तिन शरीरों की भांति बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्रांति का पांचजन्य बजाया है और उस तुमुलनाद ने न केवल अपने देश में, वरन् समस्त विश्व के वातावरण में अभूतपूर्व हलचल उत्पन्न की है। उसे विचारशीलों का परिपूर्ण सहयोग भी मिलेगा, व्यक्ति-निर्माण, परिवार-निर्माण एवं समाज-निर्माण उसके त्रिविध क्रिया−कलाप है। घर-घर अलख जगाने और जन-जन को युगचेतना से अवगत कराने के लिए उसके त्रिविध प्रयास विगत आधी शताब्दी में एकनिष्ठभाव से प्रयत्नशील रहे है और उनमें उसे आशातीत सफलता भी मिली है। "
" अखण्ड ज्योति की ऊर्जा ने अनेकों में प्राण-संचार किया है। चौबीस लाख की गणना तो सदस्यों-पाठकों की है। फिर उनका संपर्क-सान्निध्य-परामर्श भी तो कम करता है और एक से अनेक होने की पद्धति का अनुसरण करते हुए यह परिकर करोड़ों की संख्या को पर कर चुका है। यह ऐसे है, जो निजी जीवन की दुष्प्रवृत्तियों से मुक्त और सत्प्रवृत्तियों के प्रयोक्ता बनकर संपर्क क्षेत्र को प्रभावित कर रहे है।
" अखण्ड ज्योति के विगत ५२ वर्ष ( आज प्रायः ६३ वर्ष ) के उत्पादन में बहुत बड़ी संख्या उन चन्दन वृक्षों की है, जिनकी सुगंध और शोभा से सारा वातावरण महक उठा है। उन्हें शांतिकुंज हरिद्वार में, गायत्री तपोभूमि मथुरा में तथा सहस्रों शक्तिकेंद्रों में कम करते देखा जा सकता है। इन सबके पारस्परिक मिलन तो यदाकदा होते है। सभी अपने-अपने निर्धारित कार्यक्रमों में प्राणपण से लगे रहते है। कहीं उनका अधिक झुरमुट देखना हो तो मथुरा और हरिद्वार में जीवनदानी की तरह कम करते हुए देखा जा सकता है। उन्हें प्राचीनकाल के संतों-मनीषियों, धर्मसेवियों में गिना जा सकता है। इनकी संख्या भी हजार को पर कर गयी है। "
" अखण्ड–ज्योति की पंक्तियों में जो प्राणवान ज्योति ज्वाल रहती है, वस्तुतः वह प्रस्तोता ऋषियुग्म गुरूजी-माताजी की प्राणाग्नि ही है, जो चुम्बक का कम करती है। हर कसौटी पर खरी सिद्ध होने के उपरांत प्राणऊर्जा का आदान-प्रदान करती है। यही है एकमात्र है वो रहस्य, जिसने न केवल साधु स्तर के, ब्राह्मण स्तर के लोकसेवियों की एक विशालकाय सेना खड़ी कर दी, वरन् युगपरिवर्तन के क्रिया–कलापों में आश्चर्यजनक गतिशीलता भी उत्पन्न कर दी। "
" अखण्ड ज्योति की अनेक प्रेरणाओं और स्थापनाओं में से एक शांतिकुंज भी है, जिसे तीर्थपरंपरा का ऋषियुग की रीति-नीति का सार-संक्षेप समझा जा सकता है। यहाँ वे सभी प्रवृत्तियाँ चलती है, जिनके आधार पर इन दिनों भी इन्हीं कारणों से ऋषियुग का साक्षात्कार किया जा सकता है। "
" गंगा गोमुख से निकलती है और गंगासागर में विलीन होती है। इस सुदूर मार्ग में सर्वत्र उसे गंगा ही कहा जाता है। यद्यपि उसमें अनेकों छोटी-बड़ी नदिया मिलती चली गयी है। उसे इन सबकी सम्मिलित सम्पदा भी कहा जाता सकता है। अखण्ड ज्योति को ज्ञानगंगा कहा जाये, तो मानना पड़ेगा की वह किसी व्यक्ति या शक्ति का एकाकी प्रयास नहीं है। उसके साथ अनेक मूर्धन्य शक्तिकेंद्रों की दिव्यचेतना जुड़ती चली गई है। "
" अखण्ड ज्योति की प्रकाशप्रेरणा से अनेकों महत्त्वपूर्ण और दर्शनीय सेवा-संस्थानों का निर्धारण हुआ है। वे अपने-अपने प्रयोजन को आशातीत सफलता के साथ संपन्न कर रहे है। उनमें से मथुरा में विनिर्मित गायत्री तपोभूमि, युगनिर्माण योजना से प्रज्ञापरिवार का हर सदस्य परिचित है। आचार्य जी की जन्मभूमि में स्थित शक्तिपीठ से जुड़े लड़कों के इंटरमीडिएट कॉलेज, लड़कियों के महाविद्यालय तो अधिकांश ने देखे है। इसके अतिरिक्त देश के कोने-कोने में विनिर्मित चौबीस सौ प्रज्ञासंस्थानों की गणना होती है। इन सभी को दूसरे शब्दों में ' चेतना विस्तार केंद्र ' कहना चाहिए। हरिद्वार का शांतिकुंज गायत्रीतीर्थ और ब्रह्मवर्चस देखने में इमारतों की दृष्टि से अपनी स्वतंत्र इकाई से दीखते है, पर यदि कोई इनके निर्माण का मूलभूत आधार गहराई में उतरकर देखे तो, वे सभी अखण्ड ज्योति के अंडे-बच्चे दिखाई पड़ेंगे। "
" अखण्ड ज्योति पत्रिका मात्र नहीं है। उसमें लेखक का-सूत्र संचालक का दिव्यप्राण भी आदि से अंत तक घुला है अन्यथा मात्र सफेद कागज को काला करके न कहीं किसी ने इतनी बड़ी युगसृजेताओं की सेवावाहिनी खड़ी की है और न इतने बड़े ऊँचे स्तर के इतनी बड़ी संख्या में सहायक-सहयोगी-अनुयायी ही मिले है। फिर इन अनुयाइयों की की ही यह विशेषता है की जिस लक्ष्य को उन्होंने हृदयंगम किया है, उसके लिए निरंतर प्राणपण से मरते-खपते भी रहते है। देश के कोने-कोने में बिखरी हुई प्रज्ञापीठें, हरिद्वार और मथुरा की संस्थाएं जो कार्य करती दिखती है, उनके पीछे इन्हीं सहयोगियों का रीछ-वानरों जैसा भी और अंगद-हनुमान, नल-नील जैसा पराक्रम एवं त्याग कम करते देखा जा सकता है। यह सब अनायास ही नहीं हो गया। इसे बनाने, पकाने और शानदार बनाने में कोई अदृश्य ऊर्जा ही कम करती देखी जा सकती है। चमत्कार उसी का है। "
" इतने हमारे, बाकी हमारे नहीं " जब यह अलगावन वाली बात आ जाती है, तब धर्म, अधर्म बन जाता है।
विनोबा ने एक दफा बड़े मजे की बात कही थी। किसी ने उनसे पूछा- " आप महाराष्ट्रीय ब्राह्मण है? कोकणस्थ है या देशस्थ? " उन्होंने कहा-" मैं देश में रहता हूँ इसलिए देशस्थ हूँ। काया में रहा हूँ इसलिए कायस्थ हूँ और सबसे आखिर में स्वस्थ हूँ, तो सब कुछ हूँ। ऐसा ही आप मुझसे क्यों पूछते है? मैं हिन्दू हूँ, इसलिए मुसलमान नहीं, ऐसा नहीं है। मैं हिन्दुस्तान में रहता हूँ, इसलिए तुर्किस्तान में नहीं हूँ, ऐसा नहीं है। हरिजन आश्रम में हूँ, इसलिए अहमदाबाद व गुजरात में नहीं हूँ, ऐसा नहीं है।"
धर्म में व्यापक वृत्ति होती है, धर्म व्यापक और संप्रदाय संकीर्ण होता है। हम कह चुके है, विचार जब मिट जाता है, तो उसका संप्रदाय बन जाता है। धर्म संघर्ष के लिए नहीं है, मनुष्य को मनुष्य से मिलाने के लिए है।
पूछा जायेगा की अधर्म क्यों, धर्म के रूप में आता है? बात साफ है, आयेगा तो भगवान के नाम से ही आयेगा। शैतान का अपना स्वरूप इतना भद्दा है की वह भगवान का ही नाम-रूप लेगा। इसलिए दुनिया धर्म है। जिनके कारण विरोध होता है, वे सब अधर्म है।
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३३- षोडश संस्कार विवेचन
हमारी संस्कृति का मेरुदंड हमारे संस्कारों से भरा रहा है। ये संस्कार जन्म पूर्व से लेकर मरणोत्तर जीवन तक जुड़े हुए है। हमारे यहाँ षोडश संस्कार प्रमुख हैं।
ये षोडश संस्कार आवश्यक क्यों है; हम जानना चाहेंगे-
संस्कारों की पुण्य परंपरा तथा उसका पुनर्जीवन एक विज्ञानसम्मत प्रक्रिया।
संस्कारों का प्रयोजन।
संस्कार प्रकरण-पुंसवन एवं सीमांत संस्कार।
मानसिक चिकित्सा की प्रखर पद्धति।
नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म एवं कर्णवेध।
विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत एवं विवाह संस्कार।
वानप्रस्थ, अंत्येष्टि, मरणोत्तर संस्कार।
जन्म दिवसोत्सव तथा विवाह दिवसोत्सव।
युगसंस्कार पद्धति, सूक्ति संहिता।
३४- भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व
भारतीय संस्कृति को देव-संस्कृति कहकर सम्मानित किया गया है। यह संस्कृति सर्वोत्कृष्ट है। इसकी श्रेष्ठता का कारण क्या है, इसे जानने के लिए हम पढ़ें-
संस्कृति का अध्यात्मिक आधार और स्वरूप।
स्वाध्याय आत्मा का भोजन।
भारतीय संस्कृति की मान्यताएँ।
आस्तिकता, पुनर्जन्म, भक्ति, ब्राह्मणत्व।
कर्मफल, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
हिन्दू समाज के कर्मकांड, परम्पराएँ, पूजा-पद्धतियां।
मूर्तिपूजा, स्वास्तिक, यज्ञोपवीत, शिखा, माला. तिलक।
तीर्थयात्रा, धार्मिक मेले, देववाद, पंचदेव, दुर्गा-पूजा।
शिव का तत्वज्ञान, तैंतीस कोटि देवता।
श्राद्ध और तर्पण, मृतक के परिवार को मार्गदर्शन।
भारतीय संस्कृति का सामाजिक पक्ष ब्रह्मचर्य, उपवास।
सांस्कृतिक पुनरुत्थान एक महत्वपूर्ण कार्य।
३५- समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान
भारत ने अत्यंत प्राचीनकाल से समस्त संसार का मार्गदर्शन किया है। किसी राष्ट्र की प्रगति-अवगति का आधार उस राष्ट्र के सांस्कृतिक मूल्य होते है। इनसे किस प्रकार संस्कृति का विस्तार संभव हो सकता है, इसके लिए जाने-
देवसंस्कृति की गौरव-गरिमा।
ज्ञान−विज्ञान का धनी पुरातन भारत।
सृष्टि का प्रथम मानव भारतभूमि पर जन्मा।
स्वर्णिम अतीत पर एक दृष्टि।
भारतीय संस्कृति का विराट स्वरूप।
बृहत्तर भारत के अंगोपांग-
तिब्बत, नेपाल, भूटान, सिक्किम, बर्मा, लंका, बंगलादेश,।
जावा, सुमात्रा, बोर्निओ, चंपाराज्य, बलि, स्याम।
३६- धर्मचक्र प्रवर्तन एवं लोकमानस का शिक्षण
धर्मतंत्र में प्रचण्ड शक्ति-सामर्थ्य छिपी पड़ी है। धर्मतंत्र यदि परिष्कृत है तो उसकी शक्ति से मानव का निर्माण और समाज का मार्गदर्शन किया जा सकता है।
इस लोकमानस के शिक्षण के आधार है-
धर्मतंत्र से लोकशिक्षण, आदर्शवादिता का अभिनन्दन।
पूँजी जन-जागरण के उद्योगों में लगे।
धर्मक्षेत्र की गरिमा और क्षमता।
हमारी संस्कृति के स्तम्भ-पर्व-त्यौहार।
दोनों नवरात्रियाँ, रामनवमी, अक्षयतृतीया, गायत्रीजयंती।
गुरुपूर्णिमा, रक्षाबंधन, श्रीकृष्णजन्माष्टमी, गीताजयंती आदि।
लोकजागरण हेतु जनसम्मेलन, देवजीवन का अवसर।
लोकरंजन और लोकमंगल का समन्वय।
धर्मचक्र प्रवर्तन- प्रव्रज्या का पुनर्जागरण।
जीवन का उत्तरार्द्ध परमार्थ में नियोजित करें।
पूज्यवर ने अपने सभी मानसपुत्रों, अनुयायियों के लिए मार्गदर्शन एवं विरासत में जो कुछ लिखा है- वह अलभ्य ज्ञानामृत ( पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय सत्तर खंडों में ) अपने घर में स्थापित करना ही चाहिए। यदि आपको भगवान ने सम्पन्नता दी है, तो ज्ञानदान कर पुण्य अर्जित करें। विशिष्ट अवसरों एवं पूर्वजों की स्मृति में पूज्यवर का वाङ्मय विद्यालयों, पुस्तकालयों में स्थापित कराएं। आपका यह ज्ञानदान आने वाली पीढ़ियों तक को सन्मार्ग पर चलाएगा, जो भी इसे पढ़ेगा धन्य होगा।
३७- तीर्थसेवन : क्यों और कैसे?
भारतवर्ष में अनेक छोटे-बड़े तीर्थ है। धर्म की दृष्टि से तीर्थ सदैव महत्वपूर्ण रहे है। ये तीर्थ प्रायः प्रसिद्ध नदियों के तट पर स्थित हैं। ये तीर्थ किस कारण से लाभप्रद है, जानने के लिए पढ़िए-
तीर्थ क्या थे? क्या बन गये? क्या बनने चाहिए?
अध्यात्म चेतना का ध्रुव केंद्र- देवात्मा हिमालय।
अन्तरंग को बदलने वाले गुरुकुल-आरण्यक।
प्राचीन तीर्थपरंपरा का अभिनव निर्धारण-गायत्रीतीर्थ।
नवसृजन के शक्ति-संस्थान-गायत्री शक्तिपीठ।
तीर्थयात्रा कैसे करें? तीर्थसेवन से आत्मपरिष्कार।
तीर्थप्रक्रिया का पुनर्जीवन- पदयात्राएं, प्रचारयात्राएँ।
तीर्थयात्रा-धर्मपरंपरा का पुनर्जीवन।
मंदिर जागरण के केंद्र बने।
३८-प्रज्ञोपनिषद
भारतवर्ष में वेद-पुराणों का बहुत सम्मान है। इन ग्रंथों के साथ उपनिषद् ग्रंथों का भी बहुत महत्त्व माना गया है। इन उपनिषदों में सारभूत धर्मतत्वों का समावेश किया गया है। इन उपनिषदों के अनुरूप ही एक नया उपनिषद् रचा गया है- प्रज्ञा उपनिषद्। इस उपनिषद् के पठनीय विषय है-
लोककल्याण जिज्ञासा, संयमशीलता, कर्तव्यपरायणता।
उदार भक्ति-भावना, सत्साहस, युगान्तरीय चेतना।
देवमानव, समीक्षा, धर्म विवेचन, अनुशासन-अनुबंध।
परिवार-व्यवस्था, नारी-महात्म्य, शिशुनिर्माण।
वृद्धजन महात्म्य, सुसंस्कारिता संवर्द्धन, विश्वपरिवार।
देव-संस्कृति, वर्णाश्रम धर्म, संस्कार-पर्व।
मरणोत्तर जीवन-आस्थासंकट, प्रज्ञावतार।
कर्मव्यवस्था, आत्म-परिष्कार, लोक-साधना।
व्यवहारिक तपोयोग, आत्मबोध, धर्मधारणा।
३९- निरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र
हमारे आहार-विहार और रहन-सहन से हमारे निरोग जीवन का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। हम अपनी संतुलित और संयमित जीवनचर्या पर निरोग बन सकते हैं। इसकी जानकारी हेतु पढ़ें-
स्वस्थ रहने के मूलभूत सिद्धांत। क्या खाएँ? कैसे खाएँ?
अक्षुण्ण स्वास्थ्यप्राप्ति का शाश्वत राजमार्ग।
शाकाहारी व्यंजन-तन, मन, स्वस्थ रखें।
भोजन करते समय ध्यान देने योग्य बातें।
खाद्यान्न संकट और उसका हल।
मांसाहार अनुचित है, तम्बाकू भयानक दुर्व्यसन।
परिधान सभ्यता और संस्कृति के अनुरूप हो।
४०-चिकित्सा-उपचार के विविध आयाम
बिना प्राकृतिक जीवन अपनाये और अपनी मनः स्थिति को ठीक रखें स्वास्थ्य-रक्षा संभव नहीं है। किस विधि से मनुष्य स्वस्थ रह सकता है, इसके लिए हम पढ़ें-
आसनों द्वारा कायचिकित्सा, प्राणचिकित्सा विज्ञान।
प्राणायाम से आधि-व्याधि निवारण।
सोऽहं साधना, शिथिलीकरण, योगनिद्रा।
सूर्य चिकित्सा विज्ञान, सरल चिकित्सा विज्ञान।
पुरुषों के तथा स्त्रियों के रोगों की चिकित्सा।
चूर्ण, वती, गुग्गुल, आसव, अरिष्ट, विष चिकित्सा।
घरेलू चिकित्सा, नेत्ररोगों की प्राकृतिक चिकित्सा।
ज्योतिवर्धक, आयुर्वेदिक नुस्खे, और सुरमे।
बल रोगों की चिकित्सा, सौंदर्य बढ़ाने के उपाय।
परिचर्चा एवं उसके मूलभूत तत्व।
फर्स्ट एड, अभिमंत्रित औषधियां।
वह त्रिकालज्ञ ज्योतिषी थे। दमकते हुए चौड़े ललाट पर त्रिपुण्ड, गले में रुद्राक्ष की माला, देह पर रेशमी पीला वस्त्र उनके व्यक्तित्व की शोभा को द्विगुणित कर रहा था। उनके एक हाथ में ज्योतिष विद्या की कुछ हस्त-लिखित पुस्तकें थी। अपने वयोवृद्ध गुरु की बीमारी का समाचार पाकर वह उनके दर्शनों के लिए पाटलिपुत्र जा रहे थे। मार्ग में कज्जली नदी आयी। नदी में जल अधिक न था। उसे पर करना काफी सरल था। किन्तु लगातार चलते-चलते वह थककर एक आम्रवृक्ष की सघन छाया में बैठकर सुस्ताने लगे।
तभी उनकी दृष्टि नदी तट तक जाते हुए कुछ पदचिह्नों पर पड़ी। तट की गीली मिट्टी में वे चिन्ह स्पष्ट अंकित थे। लग रहा था, कोई पथिक उनसे कुछ पहले उधर गया था। थोड़ी देर बाद तरोताजा होकर वह पुनः चले तो कुतूहलवश उन पदचिह्नों को फिर ध्यान से देखा। बहुत सुंदर-सुडौल चरणों से वह चिन्ह बने थे। उनकी जिज्ञासा बढ़ी। ज्योतिषी का स्वभाव ठहरा। चिकनी मिट्टी में साफ उभरी हुई तलुओं की रेखाओं पर उन्होंने गूढ़ दृष्टि डाली।
आश्चर्यचकित हो वह वही उन चरण-चिन्हों के समीप[ बैठ गये। बार-बार अपना माथा सहलाते, फिर उन चिन्हों का अध्ययन करते, गणना लगाते। कुछ श्लोक बुदबुदाकर उन्होंने अपने जीवनभर के संचित ज्ञान को पुनः स्मरण किया.....नहीं खी कुछ भूल नहीं। गलती नहीं है। यह पदचिह्न निश्चय ही एक चक्रवर्ती सम्राट के है। विशाल ऊँचे महल, स्वर्णरथ, हाथी-घोड़े, दुर्लभ वस्त्राभूषण, मणि-माणिक्य, अन्तःपुर में देश-देशांतर से चयनित लावण्यमयी दासियाँ, इस अपार व अलौकिक वैभव को भोगने वाले सम्राट के पदतल की हैं, ये रेखाएं।
किन्तु यहाँ इस झुलसती गर्मी में, निर्जन तट पर यह सम्राट नंगे पांव क्या करने आया है? कहाँ छोड़ दिया उसने अपना रथ? कहाँ गए मंत्रीगण, सेनापति, पार्षद, दस-दासियाँ? यह भला कैसे संभव है? आश्चर्य? घोर आश्चर्य? क्या गुरु जी द्वार प्रदत्त ज्ञान झूठा है? अथवा फिर ये शास्त्र, ऋषि-मुनियों की वाणी असत्य है? कदापि नहीं। उन्होंने दृष्टि दौड़ाई। पदचिह्न नदी के दूसरे तट पर भी थे। वह फुर्ती से उठे। धोती घुटनों तक चढ़ाई, ग्रंथों का झोला सहेजा और नदी में उतर गये। पर जाकर वह तेज़-तेज़ कदमों से उन पदचिह्नों की दूर तक दिखाई पड़ती पांत के साथ-साथ चलने लगे। नजर पर काफी जोर डालने पर ही उन चिन्हों का अटूटक्रम उनका मार्गदर्शन कर रहा था। शायद वह पथिक उनसे कई घड़ी पहले गुजरा होगा।
अंत में कई घंटों के श्रम के पश्चात् वे उस तक पहुँच गये। वह पथिक एक भिक्षुक था। जो अब पीपल के वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहा था। भिक्षु के मुखमंडल पर तपस्या का असह्य तेज़ था। उसकी आंखें स्वयमेव उस महाभिक्षु के सामने श्रद्धा से झुक गयीं।
उसने अपनी थकान और देह से बह रही पसीने की धाराओं को भूल कर भिक्षु के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और फिर कहने लगा- " राज-राजेश्वर! यह कैसी माया है आपकी? कैसी लीला है? विधि के समस्त विधान, शास्त्रों के समस्त वचन, ऋषियों की सहस्रों वर्षों के तप से प्राप्त अमोघ वाणी; इन सबको आप छिन्न-भिन्न किये दे रहे है। क्या सूर्य पश्चिम से उदय होने लगेगा? प्रकृति के समस्त नियम झूठे पड़ जायेंगे? "
भिक्षु ने कोमल व गंभीर स्वर में कहा- "शांत हो! क्यों इतने व्यग्र हो तुम? "
उसने अपनी घोर उलझन कह सुनाई और बोला- " ग्रह, नक्षत्र, राशि, शकुन, सामुद्रिक आदि का मेरा ज्ञान कभी असत्य नहीं हुआ। आज आपके सम्मुख यह झूठा पड़ रहा है। अब लगता है, मेरे जीवन भर की सारी कमाई मिट्टी हो गयी। अपने जिस अध्ययन, चिंतन, मनन और अनुभव पर मुझे गर्व था, वह मिथ्या हुआ। मेरे ये ग्रन्थ, जिन्हें मैं प्राणों से भी अधिक प्रिय समझता था, अब इन्हें आग में झोंक देना होगा, क्योंकि अन्य कोई मार्ग नहीं है। बस, आप एक बार अपने श्रीमुख से कह दे। "
भिक्षु ने बड़ी शांत दृष्टि से उसकी ओर देखते हुए गंभीर शब्दों में कहा- " ब्रह्मगुप्त मत पड़ भ्रम में। तेरा ज्ञान, तेरे शास्त्र सत्य हैं। सत्य है तेरा सामुद्रिक ज्ञान। पड़ताल की रेखाओं को देखकर तेरा सत्यफलकथन प्रशंसा के योग्य है। "
भिक्षु के मुंह से अपना नाम सुनकर उसे आश्चर्य तो हुआ, पर पुनः आघात लगा। वह आकुल होकर बोल पड़ा- " सच! आप यह क्या कह रहे है? तो मैं यह क्या देख रहा हूँ? आप अपना परिचय देकर मेरे इस प्राणहारी विस्मय को दूर करे।"
महाभिक्षु ने मंद मुस्कान के साथ कहा- " मेरा नाम सिद्धार्थ है। कपिलवस्तु के राजा मेरे जन्मदाता है। सब ऐश्वर्य, सब भोगविलास मुझे सुलभ था। अतः प्रकट है की तुम्हारा ज्योतिष असत्य नहीं है, पर ब्रह्मगुप्त, तुम यह जानो की गृह-नक्षत्र और भाग्य के बंधन मनुष्य को तभी तक बांधते है, जब तक वह सोया रहता है। मैं भी इन बन्धनों से बंधा हुआ था। पर कैवल्य ज्ञान की ज्वाला में ये बंधन जलकर भस्म हो जाते हैं। जाग्रतपुरुष, मुक्तपुरुष होता है। उसे ज्योतिष नहीं जान सकता- भाग्य नहीं बांध सकता। मैंने बोध पाकर ये बंधन छोड़ दिए है। हमेशा के लिए जान लो, अध्यात्मवेत्ता ज्योतिष ज्ञान से परे होता है। सर्वथा मुक्त।"
तभी ब्रह्मगुप्त ने देखा- चीवरधारी शिष्यों का एक दल। वे गाते हुए चले जा रहे थे- बुद्धं शरणम् गच्छामि।
न्यायमूर्ति महादेव गोविन्द रानाडे का विवाह एक अशिक्षित कन्या से किया जाने लगा। कोई और पढ़ा-लिखा व्यक्ति होता तो शायद ऐसा नहीं होने देता, परन्तु उन्होंने अपूर्व आदर्शनिष्ठा का परिचय दिया। उन्होंने अपने पत्नी के प्रति प्रेम में कोई कमी न आने दी। सच्चे प्यार की परख त्याग और बलिदान में है। रानाडे ने संकल्प लिया की मैं स्वयं ही अपनी पत्नी को शिक्षित बनाऊंगा और वे अपने संकल्प को पूरा करने में जुट गये। सायंकाल अवकाश के समय वे नियमित रूप से अपनी पत्नी रमाबाई को पढ़ने लगे, उधर परिवार की अन्धविश्वासी महिलाओं को यह अच्छा नहीं लगा। रानाडे और रमाबाई दोनों को व्यंगबाण सहने पड़ते। सहने पड़ते, परन्तु उनकी परवाह किए बिना दोनों अपने कार्य में जुटे रहे।
रानाडे के प्रयासों से रमाबाई की निष्ठा और श्रम के सत्परिणाम शीघ्र ही सामने आये और वे कुछ ही दिनों में मराठी तथा अंग्रेजी भाषा पर अधिकार पा गयी। घर का हिसाब-किताब, रिश्तेदारों से पत्र-व्यवहार, आगंतुक अतिथियों का आदर-सत्कार और शिष्ट व्यवहार आदि सभी कार्य सफलतापूर्वक करने लगी। रानाडे के उदार दृष्टिकोण और सूझबूझ की जब भी प्रशंसा की तो वे मुस्कुराकर कहते- भाई मैंने इसमें कौन सा महान कार्य किया है। अपनी पत्नी का विकास मेरे ही विकास का प्रश्न था। मैं सभी विद्याओं में कितना ही निष्णात क्यों न होऊं, यदि मेरी पत्नी निरक्षर और अनपढ़ ही रहती तो सारा विकास अधूरा ही रह जाता।
आज स्थिति इसके विपरीत ही नहीं बहुत कुछ भिन्न भी है। पढ़ा, लिखा और कुलीन युवक अच्छी, शिक्षित और सभ्य पत्नी चाहता है। संयोगवश उच्च शिक्षित कन्या मिल भी जाती है, तो लड़के की पढ़ाई-लिखाई का खर्च हर्जाना, दहेज के रूप में लम्बी-चौड़ी रकम लेकर वसूल करना चाहते है। इसी कारण अभिभावक अपनी पुत्री को ज्यादा पढ़ने-लिखाने से घबराते है और पढ़ा-लिखा भी देते है, तो उसके योग्य वर का मूल्य नहीं पाते। नारी शिक्षा की दृष्टि से पिछड़ी है-इसका यह बहुत बड़ा कारण है और शैक्षणिक स्तर से ही नहीं, सामाजिक तथा पारिवारिक जीवन में भी स्त्री बहुत पिछड़ी हुई है।
नारियां अपना उद्धार स्वयं करें-यह बात ठीक है, परन्तु उसकी बहुत बड़ी जिम्मेदारी पुरुषों पर भी है। स्त्रियों का पिछड़ा रहना स्वयं पुरुष वर्ग के लिए भी कम घातक नहीं है। स्त्री-पुरुष को गाड़ी के दो पहिये कहा गया है। एक पहिया छोटा या टूटा होगा, तो दूसरा किसी हालत में आगे नहीं बढ़ सकेगा। समाज नारी-पुरुष के युग्म से बनता है। यह कदापि संभव नहीं की युग्म का एक पक्ष तो पिछड़ा रहे और दूसरा उन्नति करता जाये। नारी पुरुष का सामाजिक विकास के लिए समान महत्व है।
तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाये तो नारी की महत्ता पुरुष से बढ़कर है। सृष्टिक्रम सुचारु रूप से चलने में पुरुष तो एक सामान्य हेतु है, शेष सारा उत्तरदायित्व और संभावनायें नारी की सामर्थ्य पर ही निर्भर है। गर्भ धारण करने से लेकर शिशु जन्म देने, उचित पालन-पोषण करने, घर बसाने, व्यवस्था चलाने आदि का दायित्व नारी पर ही है। पुरुष तो अपने आप में एक उच्छृंखल इकाई है। क्वांरे, अविवाहित और विधुर लोगों की गृहव्यवस्था देखकर इस तथ्य की वास्तविकता से सहज ही परिचित हुआ जा सकता है। एकाकी पुरुष का, स्त्रीरहित परिवार सुव्यवस्था, श्रृंखला आदि अनेक दृष्टि से बिखरा हुआ पाया जायेगा। परिवार सुव्यवस्थित तभी होता है, जब कोई स्त्री धर्मपत्नी बनकर घर में प्रवेश करती है।
समाज व्यवस्था कहने मात्र के लिए पुरुष प्रधान है। इसकी मूल इकाई परिवार का जीवन और अस्तित्व स्त्री, माता, पत्नी के कारण ही है। संसदीय जनतंत्र शासन व्यवस्था में जो स्थान राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का होता है परिवार में वही स्थान पुरुष और स्त्री का है। शासन व्यवस्था का सूत्रधार प्रधानमंत्री है, राष्ट्रपति तो नाम मात्र का सर्वेसर्वा है। यों भी गृहव्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने का अधिकांश उत्तरदायित्व नारी पर ही है। पुरुष तो कमाता भर है। किस काम में कितना खर्च होना है, इसका नियोजन और निर्धारण गृहिणी ही कुशलतापूर्वक कर सकती है। कमाना जितना आसान है, समझदारी से खर्च करना उतना सरल नहीं है। इस प्रकार व्यवस्था की दृष्टि से भी नारी की महत्ता पुरुष की अपेक्षा खिन्न अधिक है।
किन्तु कितने खेद की बात है। नारी को जितना सम्मान चाहिए था, वह तो दूर उल्टा उसे हेय; गिरी हुई और छोटी निगाह से देखा जाता है। जब-जब जिस समाज और जिस जाती में नारी को समुचित स्थान और महत्व दिया गया, उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आत्मिक विकास की व्यवस्था रखी गयी है, तब-तब से समाज और वे जातियां संसार में समुन्नत होकर आगे बढ़ी है; तथा जब-जब उसे उचित स्थान से पदच्युत कर उसकी अवमानना जिस जाती ने की, वैसे-वैसे उसका निश्चित रूप से पतन हुआ है।
भारत के गौरवपूर्ण अतीत के निर्माण में नारी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। नारी जननी है, माँ है, इसलिए संतान के पालन-पोषण से लेकर उसके व्यक्तित्व के गठन तक का श्रेय उसी को है। संतान का अच्छा या बुरा होना प्राच्य संस्कृति की मान्यताओं के अनुसार माँ की मर्यादा के साथ जुड़ा हुआ था। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, शिवाजी, प्रताप, अशोक, विक्रमादित्य, सुभाष, गाँधी, नेहरू जैसे महामानव का उद्भव और पालन माँ की ही छत्रछाया में हुआ था। आज भी मनुष्य जीवन में माँ का स्थान वही है। पिता के प्यार और संरक्षण का प्रभाव संतान पर उतना नहीं पड़ता, जितना की माँ की ममता और लाड़-प्यार की कमी का। माँ के आँचल की छाया जिस पुरुष को नहीं मिली, उसने जीवन में आगे चलकर कोई बड़ा कार्य किया हो ऐसी विभूतियाँ अपवादस्वरूप ही मिलती है। लेकिन व्यक्तित्व के गठन से लेकर समाज, सभ्यता और संस्कृति के निर्माण का दायित्व नारी तभी निभा सकती है, जबकि उसे स्वयं के विकास का अवसर मिला हो।
सुसंस्कृत माता ही विकासशील संतान को जन्म दे सकती है। जो माँ सभ्यता, जीवन और देशकाल के अनुसार स्वयं ही पिछड़ी हो, उससे उन्नत संतान की आशा कैसे की जा सकती है।
प्राचीनकाल में भारतीय नारी को विकास के अवसर ही नहीं मिले थे, वरन् समाज में भी उसका बहुत ऊँचा स्थान था। शिक्षण व्यवस्था से आने-जाने और सामाजिक गतिविधियों तथा आयोजनों में भाग लेने की सुविधाएँ उसे प्राप्त थी। जब तक समाज में नारी का स्थान ऊँचा और बराबर रहा, भारतीय संस्कृति अपने विकास की चरमसीमा को छूती रही। उस नारी ने नर-नारायणों को जन्म दिया, भारतभूमि ३३ करोड़ देवताओं की पवित्र भूमि कहलाई। कालांतर में एक-एक कर जैसे-जैसे कई प्रतिबन्ध नारी जाती पर लगाये जाते रहे। हमारा पौरुष, साहस, वीरता, धर्म और संस्कृति तब निरंतर क्षीण होने लगे। यहाँ तक की हम अपने जन्म-सिद्ध अधिकार स्वतंत्रता को भी खो बैठे।
इस पराधीनता के खिलाफ भी सर्वप्रथम आवाज उठाने वाली भी नारी ही थी। पुरुषों ने तो आत्मसम्मान, स्वाभिमान लगभग खो-सा दिया था। कुछ जाग्रत माताओं के लाडलों ने स्वतंत्रता संग्राम की योजना बनायीं। सन १८५७ की ३१ मई को एक साथ सभी स्थानों पर विद्रोह की आग भड़कने वाली थी, किन्तु २१ दिन पूर्व ही मेरठ की छावनी के सैनिकों ने क्रांति का झंडा ऊँचा कर दिया।
दुर्भाग्य से इस छावनी के ८५ लोगों ने ही भाग लिया। सामूहिक असहयोग के अभाव में सभी क्रांतिकारी सैनिक पकड़े गये। उन्हें सजा हुई और जो अपने साथियों का सहयोग नहीं दे पाए थे, वे जब मेरठ शहर में आये तो उनका अद्भुत स्वागत किया गया- उन्हीं की गृहणियों ने नारियों के जत्थों ने उन्हें चूड़ियां दिखाई और कहा- तुम्हारे भाई इस अपमानित हुए है और तुम चुपचाप हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहे। क्या मुंह लेकर आये हो हमारे सामने। धिक्कार है तुम्हारे पुरुषत्व पर। लो यह चूड़ियाँ पहनो और अपने हथियार हमें दो। हम अंग्रेजों से लड़ेंगी। इस तीव्र भर्त्सना से आहत सैनिक वापस लौट गये और रातों-रात मेरठ एक ही दिन में स्वतंत्र हो गया।
इस स्वतंत्रता संग्राम में नारी ने साहस और प्राण ही नहीं फूंके, स्वयं भी भाग लिया और अपनी वीरता तथा शौर्य का परिचय दिया। रानी लक्ष्मीबाई, बेगम जीनत महल, अजीजन आदि सैकड़ों महिलाओं ने लड़ाई में भाग लिया। योगीराज अरविन्द की तो मान्यता थी की भारतमुक्ति आन्दोलन मातृ-शक्ति के कारण ही सफल हुआ। जब भी इतिहास ने करवट बदली है, समाज और राष्ट्र में बड़े परिवर्तन आये है, उनकी पृष्ठभूमि में महिलाओं का ही हाथ रहा है।
यह कहना अनुचित नहीं होगा की पुरुष जाति का अस्तित्व नारी के कारण ही सुरक्षित रहा है। पुरुष वर्ग नारी को प्रतिबंधित कर, अपने मिथ्या अहं को भले ही पोषित करे, परन्तु उसमें उसकी ही अपर हानि है। पुरुष आततायी नहीं आत्मघाती सिद्ध हो रहा है। राष्ट्र की जननी, पुरुष की सहयोगिनी, सहचरी और अनुवर्ती को पैर की जूती और पशुओं से भी बद्तर बनाकर उसका अपना क्या हित होगा? जिसके सहारे ऊँचा उठा जा सकता था, उसे ही तोड़कर क्या पाया जा सकता है। जिस डाली पर बैठे हो उसे काटने की वज्रमूर्खता हम ही तो कर रहे है। मनुष्य जाति का विकास और उन्नति नारी के बलबूते पर ही संभव हुई है। उसको ही पतन के गर्त में ढकेलना वज्रमूर्खता का ही तो प्रमाण है।
अशिक्षा-नारी वर्ग के पिछड़ेपन का मूल कारण है। घर की चहारदीवारी में कैद नारी असभ्य, अपंग और अयोग्य ही बनी रहेगी। उसकी जड़ चेतना, समाज एवं राष्ट्र के लिए उसकी सारी उपादेयता को नष्ट करके ही छोड़ेगी। अज्ञान और पुरुष के प्रतिबंधों ने उसे कायर और भीरु बना दिया है। घर में अकेले रहते हुए भी यह कितनी दबी-दबी है, मानो उस पर अभी ही कोई विपत्ति आने वाली है, जिससे वह आत्मरक्षा नहीं कर पायेगी और जब वास्तव में ही कोई आपत्ति आती है, तो उसका सामना करने तथा प्रतिकार करने की अपेक्षा कांपने या रोने लगती है। किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में आपदाओं और आपत्तियों का विरोध तथा संघर्ष करने का न तो उसमें साहस रहता है, न बुद्धि। इस स्थिति के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है-पुरुष। वस्तुस्थिति को समझकर स्वयं के हित में ही सही- अपनी संतानों का भला करने के लिए ही सही-पुरुषों को चाहिए की नारी को इस दयनीय स्थिति से उबारें।
उन्हें सर्वप्रथम अशिक्षा एवं अज्ञान के अंधकार से निकालना चाहिए। शिक्षा-दीक्षा के सम्बन्ध में उदार और सुधारवादी दृष्टिकोण अपनाया जाये। नारी का उद्धार स्वयं नारी ही कर सकती है- यह कहकर अपने उत्तरदायित्व कम नहीं किए जा सकते है। इसके लिए तो स्वयं हमें भी बड़ा परिश्रम तथा प्रयास करना पड़ेगा अन्यथा पुरुष जाति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जावेगा।
एक थे राजा। एक दिन उन्होंने मंत्रियों और सभासदों से प्रश्न किया- "किसी काम के लिए ठीक अवसर कैसे जानना चाहिए?" किसी ने कहा- गृह-नक्षत्रों की गति जानने वाले ज्योतिषी से पूछकर; किसी ने कहा- बड़े-बुजुर्गों से पूछकर काम का समय निश्चित करना चाहिए। पर इन उत्तरों से राजा का मानसिक समाधान न हुआ। तब वे एक साधू के पास पहुंचे और वही प्रश्न किया।
साधू कुछ न बोला। कुटी के सामने क्यारियां गोड़ता रहा। राजा चुपचाप लौट आया।
दूसरे दिन पानी बरसता रहा, राजा वह न जा पाए। तीसरे दिन वह फिर कुटी पर पहुंचे और अपना प्रश्न दुहराया। पर पहले की भांति आज भी वह साधू क्यारियों में फूल लगते रहे।
शाम हुई, राजा ने प्रश्न किया- "भगवन्! आपने मेरे प्रश्न का समाधान नहीं किया।" साधू ने हंसकर कहा- " तुम्हारे प्रश्न का उत्तर तो उसी दिन दे चुका, पर तुम समझे ही नहीं।"
अब राजा की समझ में आया- जो काम सामने है, वही सबसे उपयुक्त अवसर है। उसी में जुटे रहने से हर काम समय से पूरे हो जाते है।
एक बार भगवान कृष्ण से भेंट करने उद्धव गये। उद्धव और माधव दोनों छुटपन के दोस्त थे। द्वारपाल ने कहा-" इस समय भगवान पूजा में बैठे है, इसलिए थोड़ी देर आपको ठहरना होगा।" समाचार पाते ही भगवान शीघ्र पूजाकार्य से निवृत्त होकर उद्धव से मिलने आये। कुशल-प्रश्न के बाद भगवान ने पूछा-"उद्धव, तुम किसलिए आये हो? "
उद्धव ने कहा-"वह तो बाद में बतलाऊंगा, पहले मुझे यह बतलाइए की आप पूजा किस की कर रहे थे?" भगवान ने कहा- "उद्धव! तुम यह नहीं समझ सकते।" लेकिन उद्धव कब मानने वाले थे। उन्होंने जिद्द की। तब भगवान ने कहा-"उद्धव, तुझे क्या बताऊँ? मैं तेरी ही पूजा कर रहा था।"
उद्धव, माधव की पूजा करता है और माधव उद्धव की पूजा करता है। भगवान भक्त की पूजा करता है और भक्त भगवान की।
इस आदर्श से भगवान बताना चाहते है की-" जो मालिक है, वे मजदूरों के सेवक बने। शिक्षक विद्यार्थियों के सेवक बने, माता-पिता अपनी संतान के सेवक बने, उद्योगपति श्रमिकों के सेवक बने। जिस किसी को जिम्मेदारी का काम मिला है, वे सब सेवक बनकर कम करेंगे, तो दुनिया के सारे झगड़े मिट जायेंगे।"
मैंने पूछा-"मैं किसे प्यार करूँ?" तो अंतरतम से एक आवाज आई-"उन्हें,जिन्हें लोग दलित और गर्हित समझते है। जो निंदा और भर्त्सना के पात्र हो चुके है, उनके मित्र बनकर उन्हें ध्यान और प्रकाश दो। तुम्हारा गौरव इसमें नहीं की तुम्हें संसार में बहुत से लोग प्यार करते है, वरन् तुम संसार को प्यार करके स्वयं गौरवान्वित होंगे।"
मैंने कहा-"लोग कहते है जो त्वचा, वर्ण और शरीर से सुन्दर नहीं है, उन्हें देखने से सुख और शांति नहीं मिलती।" मेरी प्यारी आस्था ने कहा- तुम असुंदर के माध्यम से उस शाश्वत सौंदर्य की खोज करो, जो त्वचा, वर्ण और शरीर के धुंधले बदलो में आकाश की नीलिमा के सदृश प्रच्छन्न शांति लिए बैठा है। जब बाह्य आवरणों का धुंधला बादल छंट जायेगा, तो सौंदर्य के अतिरिक्त कुछ रह ही न जायेगा।"
मैंने कहा-" माँ! संसार कोलाहल से परिपूर्ण है। सर्वत्र करुण और कठोर क्रंदन गूंजते रहे है, तुम बताओ मैं सुनूंगा क्या?"
अविचल और उसी शांतभाव से मेरे हृदय में शीतलता जगाती हुई आत्मा की एक और स्वरझंकृति सुनाई दी-" वत्स उन शब्दों को सुना करो, जिनका उच्चारण न जिह्वा करती है न ओंठ और न कंठ। निविड़ अंतराल से जो मौन प्रेरणाएं और परा-गान प्रस्फुटित होता रहता है, उसे सुनकर तेरा मानव जीवन धन्य हो जायेगा।"
तब से मैं किसी भी वर्ण, त्वचा और शरीर वाले दिन-दुखी को प्यार करने लगा हूँ। तब से मैं हृदय गुहा में आसीत सौंदर्य के ध्यान में निमग्न हूँ, तभी से मौन की शरण होकर उस स्तोत्र को सुनकर आनंदपूरित हो रहा हूँ, जिसे युगों से नभोमंडल का कोई सदृश्य गायक गाता और प्राणियों का मन बहलाता रहता है।
यों तो आँसू मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक दशा के द्योतक है, इतने पर भी यह कहना की आँख की हर बूंद पीड़ा का परिणाम है, उचित न होगा। यह हर्ष की परिणति है, वियोग का नतीजा और दुःख का प्रतीक भी- यह सब उसके रासायनिक विश्लेषण से स्पष्ट हो चुका है।
अब तक की मान्यता थी की अश्रु चाहे किसी भी मनोकायिक अवस्था की फलश्रुति क्यों न हो, उसकी बनावट सदा एक-सी होती है; पर पिछले दिनों हुए अध्ययनों से इस अवधारणा को आघात पहुँचा है। वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है की रासायनिक दृष्टि से प्रसन्नता के आँसू विषाद से भिन्न होते है एवं विछोह की पीड़ा से जो दृगजल निस्सृत होता है, उसमें प्रेम के उद्रेक से प्रवाहित होने वाले नीर के तत्व नहीं होते।
वियना यूनिवर्सिटी के रसायनज्ञ सी. फ्रीडमैन ने इसके लिए लोगों के तीन वर्ग बनाये। प्रथम में उन्हें रखा गया, जो असह्य कायिक कष्ट झेल रहे थे। दूसरी श्रेणी उनकी बनायीं गई, जो भीषण मानसिक संत्रास से गुजर रहे थे। तीसरा समूह उन व्यक्तियों का था जो प्रेम में उन्मत्त थे और जिनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं। इन तीनों अवस्थाओं के आँसू एकत्रित किये गये और उनके रासायनिक गुणों का अध्ययन किया गया। डॉ. फ्रीडमैन का कथन है उनमें स्पष्ट अंतर दृष्टिगोचर हुआ। उनके अनुसार सबकी मूल संरचना तो एक ही थी; पर दशांतर का स्फुट प्रभाव उनके रसायनशास्त्र में परिलक्षित हुआ। प्रसन्नता के आँसू में स्वास्थ्यवर्धक कुछ ऐसे रसायन पाए गए, जिनकी उपस्थिति आरोग्यशास्त्र की दृष्टि से अच्छी मणि जाती है। दूसरी ओर शारीरिक और मानसिक व्यथा वाले अश्रु में ऐसे तत्वों की प्रधानता थी, जिन्हें स्वास्थ्य की दृष्टि से अहितकर माना गया और जो देह के लिए विषतुल्य साबित होते है। इन्हें शरीर से बाहर निकाल देना हर प्रकार से लाभकारी होता है- ऐसा चिकित्साविज्ञानियों का मत है। इसका एकमात्र उपाय रोना है इसलिए अब रोने को भी हँसने की तरह एक स्वास्थ्य टानिक बताया जाता है। दोनों के प्रयोजन लगभग एक-से है। हँसने से अंतर के समस्त अंगों का व्यायाम और स्वास्थ्य में सुधार होता है, जबकि रोने से अश्रुधारा के साथ उन शरीरगत विषों का निर्गमन होता है, जो घनीभूत पीड़ा के दौरान बनते और बढ़ते रहते है।
अक्सर ऐसा कहते सुना जाता है की रो लेने से मन हल्का हो गया-यह केवल लोकोक्ति भर नहीं, वरन् एक वैज्ञानिक सच्चाई है। अनुसंधानों से ज्ञात हुआ है की व्यक्ति जब निषेधात्मक चिंतन में डूबा रहता अथवा दारुण दुःख से आकुल-व्याकुल हो रहा होता है, जो मन मस्तिष्क पर बोझ की तरह लद जाते है। इनका शरीर-मन पर द्विविध प्रभाव पड़ता है। काया में सुस्ती, आलस्य लगती है और मन अवसादग्रस्त, अस्त−व्यस्त, उत्साहहीन तथा भारभूत-सा प्रतीत होने लगता है। इस दौरान जब व्यक्ति दहाड़ मर कर रोता है, तो अश्रुधारा के साथ वो तत्व बाहर निकल जाते है, जो मन को अन्यमनस्क और शरीर को अस्वस्थ जैसी स्थिति में निरंतर बनाये रहते है। इससे शरीर-मन हल्का हो जाता है। इसलिए मनोवैज्ञानिकों की यह सलाह है की जब हंसी का अवसर आये तो उन्मुक्त हंसी हंस लेनी चाहिए और विषादपूर्ण स्थिति को मन में दबाये नहीं रखना चाहिए। उसे भी रोकर निकाल देना चाहिए।
वह अवस्था कितनी दुखद होगी, जिसमें व्यक्ति को न रोने की छुट हो, न हंसने की स्वतंत्रता। परिणाम पागलपन होगा, कारण की मानसिक संवेग, आवेग और उद्वेग को नियंत्रित और निरस्त करने के दो ही मार्ग है- हँसना और रोना। जब यह दोनों ही बंद हो जाये, तो नतीजा अत्यंत दुखदायी होता है। यही कारण है की विक्षिप्त लोग निरर्थक हँसते और निरुद्देश्य रोते रहते है। इनका निमित्त समझाते हुए मनोवेत्ता कहते है की मन की यह आदत है की वह स्वयं को दबाव-मुक्त रखना चाहता है, जबकि आदमी उसके इस स्वभाव पर अंकुश लगा देता और अगणित मनोव्यथाएं अपने अंदर पलता रहता है। पनपने और निकलने की उभयपक्षीय प्रक्रिया चलती रहे, तो मन सहज स्थिति में बना रहता है, किन्तु जब बहिर्गमन का पथ अवरुद्ध हो जाता है, तो अनवरत रूप से एकत्रित होते असह्य बोझ को झेल पाने में मन असमर्थ होता है, जिसकी फलश्रुति पागलपन के रूप में सामने आती है। इस दशा में मनुष्य का सजग नियंत्रण उस पर से हट जाता है, तो मन उस वजन को अपनी स्वाभाविक प्रक्रिया द्वारा हंस-रोकर उतरने लगता है, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी होती है। इतने मात्र से विक्षिप्तता दूर नहीं होती। उसके लिए अतिरिक्त उपचार की आवश्यकता पड़ती है।
अतएव आज के जटिल समय में आंसुओं की महत्ता, उपयोगिता और अनिवार्यता को समझते हुए किसी को भी इसमें कोताही नहीं बरतना चाहिए- ऐसा मनःशास्त्रियों का मत है और स्वस्थता की मांग भी।
जीवन का आनंद स्वेच्छा के अनुकूल जीने में नहीं वरन् ईश्वर और धर्म के मार्गदर्शन में अपने को चलने में है।
आयुर्वेद एक समग्र जीवन है, जिसका आविर्भाव ही विश्वमानव को आधि-व्याधि मुक्त-स्वस्थ, अक्षुण्ण यौवन भरा जीवन जीने के लिए ऋषिगणों द्वारा हुआ है। मानव जीवन के जितने भी पहलू हो सकते हैं, सभी को आयुर्वेद में स्पर्श किया गया है। सर्वाधिक महत्व जीवनचर्या के सुव्यवस्थित परिपालन पर इस विद्या में दिया जाता रहा है। ऋषिगणों का पालन मत रहा है की यदि दिनचर्या सही हो तो कभी बीमार होने का कोई कारण ही नहीं पैदा होगा। ' स्वस्थ व्रत समुच्चय ' प्रकरण में विधान ऋषियों ने देश-काल की परिस्थितियों को दृष्टि में रखते हुए नियम-उपनियम बनाए हैं। यदि इनका कुछ प्रतिशत भी हमारे जीवन में उतर सके, तो आज ही भगा दौड़ी से भरी दुनिया में हमारा अस्पतालों का चक्कर- दवाओं का खर्च काफी कुछ बच सकता है। विगत दो अंकों से जारी इस लेखमाला में आयुर्वेद के मतानुसार दैनन्दिन जीवनचर्या पर विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है। यद्यपि रोजमर्रा की ये गतिविधियां लगती तो छोटी-छोटी-सी हैं, किन्तु इनके परिपालन पर ही स्वास्थ्य टिका है। यह बहुत कम लोग समझ पते हैं। आयुर्वेद का उद्देश्य- प्रयोजन कितना पवित्र है, यह निम्नलिखित श्लोक से प्रतीत होता है।
धर्मार्थ नार्थ्कामार्थामयुर्वेडोरा महर्षिभिः। प्रकाशितो धर्मं प्रैरिचाधिभ्दिः स्थान्नाम्क्श्रम।।
अर्थात् "स्वर्ग में अक्षय स्थान प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले धर्मनिष्ठ महर्षियों ने आयुर्वेद का प्रकाशन धर्मं का पालन करने की दृष्टि से किया है न की काम या धन प्राप्त करने की दृष्टि से।" आज हम स्थिति ठीक उलटी देखते हैं, जब चारों ओर कमेक्चा के अभिवर्धन-जीवनीशक्तियों के ह्रास या धन-हरण की दृष्टि से चिकित्सा एक व्यवसाय व अधर्ममय परोजन वाला कर्म बनता चला गया है।
आयुर्वेद के स्वास्थ्य के नियमों की विगत अंकों में की गयी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए प्रस्तुत लेख में संध्योपासना एवं योगाभ्यास तथा भोजन लेने के नियमोपनियमों की चर्चा करेंगे। प्रातःकाल जल्दी उठना, व्यायाम-अभ्यंग के पश्चात् स्नान, वस्त्र धारण के बाद हर व्यक्ति के अध्यात्मिक-मानसिक, शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है की वह नैमित्तिक कर्म के रूप में संध्योपासना एवं योगाभ्यास के क्रम को अपनाये। प्रायः गायत्री मंत्र के साथ संध्या करने से व्यक्ति दीर्घायु होता है, बुद्धि,यश, कीर्ति तथा ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति होती हैं। उपासना आत्मा की खुराक है। शरीर का आहार जितना अनिवार्य नहीं, उतना आत्मिक आहार अनिवार्य है। चाणक्य नीति में कहा गया है-
विप्रो विर्क्षस्त्रस्य मूलं च संध्या वेदः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम। तस्यांमूलम यत्नतो रक्षणीयम छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम।।
यदि संध्या को जीवन का आधार कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। संध्या के रूप में प्रारंभिक कर्मकांड जिसमें सत्कर्म के रूप में पवित्रीकरण, आचमन, शिखाबंधन, प्राणायाम, न्यास एवं पृथ्वी पूजन जैसे कुछ अभ्यासों से वह पृष्ठभूमि बनती है, जिसमें दिन भर स्फूर्ति-उल्लास का संचार बना रहता है। इन अभ्यासों के माध्यम से शरीर के अंग प्रत्यंग को नित्य शिक्षण मिलता है एवं शरीर के एक-एक कोष में प्राणशक्ति का संचार होता है। संध्या यदि संभव हो तो त्रिकालिक प्रातः मध्याह्न, सायं की जानी चाहिए। यदि संभव न हो तो दस मिनट ही सही, प्रातः-सायं अवश्य कर लेनी चाहिए, विशेषतः संधिकाल में। संध्योपासना में महत्त्व गायत्री जप का है जिसमें जितना भावविह्वल हो कर जप किया जाएगा, उतना ही प्रतिफल निर्मलबुद्धि से प्राप्त होगा। सादी बुद्धि की अवधारणा-उज्ज्वल भविष्य के साथ अपना कोई इष्ट मंत्र-गुरुमंत्र हो इसका जप भी किया जा सकता है, पर गायत्री महामंत्र की महिमा असंदिग्ध है।
योगाभ्यास के क्रम में प्रज्ञायोग के विभिन्न आसन-मुद्राओं को गहरी श्वास के साथ संपन्न किया जा सकता है। इससे शरीर में हल्कापन, मन में प्रफुल्लता का संचार होता है। शरीर चुस्त बना रहता है। आर्य समाज में महर्षि दयानन्द ने दैनिक संध्या को बड़ा महत्व देकर वैदिक धर्म के आधारों को सशक्त बनाने का प्रयास आज से एक शतक पूर्व किया था। गायत्री परवर ने उन्हीं प्रयासों को आगे बढ़ाया है। इसी क्रम में सूर्य नमस्कार का महत्व तो जितना बताया जाए, कम है। मत्स्य पुराण में उल्लेख आता है-
अदित्यस्थ नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने-दिने। जन्मान्तर शहस्त्रयेशु दरिद्रियम नोपजायते।।
अर्थात् जो प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्य नमस्कार रूपी योग-व्यायाम करते है, उन्हें इस जन्म में ही नहीं, आने वाले अनेक जन्म-जन्मांतरों में भी दारिद्रय उत्पन्न नहीं होता।
एक विलक्षण प्रयोग के रूप में प्रज्ञायोग, जो परमपूज्य गुरुदेव द्वारा एक शोध-निष्कर्ष के रूप में जन-जन के सम्मुख प्रस्तुत किया गया है- सूर्य नमस्कार का ही एक युगानुकूल संस्मरण है। संध्या का महत्व आयुर्वेद में कितना प्रतिपादित किया गया है, इसका परिचय- 'साहित्यिक सुभाषित वैद्यकम' में इस प्रकट मिलता है-
चत्वारि घोररूपाणि संध्याकाले परित्यजेत। आहारं मैथुनं निद्रा स्वस्ध्ययम च विवर्जयेत।।
अर्थात्- संध्या के समय उपहार, मैथुन, निद्रा तथा अध्ययन और परिणामकारी होता है। अतः: उस समय- विशेष को मात्र ईश उपासना व प्राणायाम जैसे पुण्यकार्यों में ही नियोजित करें। संध्या दिन-रात्रि के बीच की वह कालावधि है, जिसमें न दिन का सूर्य दिखाई देता है, न रात के नक्षत्र-
"अहोरात्रस्य या संधिः सुर्यनाक्षत्र वर्जिता। सातु संध्या समाख्याता मुनिभिस्तत्व दर्शिभिः।।"
गरुड़पुराण तो कहता है की सूर्यास्त के समय निद्रा लेने वाले विष्णु को लक्ष्मी भी त्याग देती है।
दूसरा प्रकरण है आहार ग्रहण करना का। यह दैनंदिन जीवन का प्रसंग है की शरीररक्षा के लिए भोजन मना ही पढ़ता है। अन्ननलिका से जो कुछ भी शरीर के अन्दर जाता है, उसे आहार कहते हैं। यह आहार रसादि धातुओं में परिणत होकर शारीरिक अंगों का शोषण करना है, साथ ही शरीर की रक्षा करता है, शांतिपूर्ति कर शरीर के विभिन्न अंगों के शक्ति बढ़ाता है व प्राणी को जीवित रखता है। अक्तीपूर्ति ग्रहण किया अन्न अमृततुल्य हैं अब यदि उसे सही विधि से, सही समय पर न लिया जाए, तो वह विष बन जाता है, इसलिए आहार ज्ञान का परिचय होना जरूरी है।
ब्रहघोगीयागयवालक्या समृति में उल्लेख आता है -
अमृतं कल्पयित्वा च यद्त्रं समुपगातम। प्रनाग्निहोत्रविधिना भोज्यं तव्ददघापहम।।
अर्थात् जो अन्न सामने आता है, उसको अमृतसम मानकर प्राण अग्निहोत्र विधि से सेवन करना चाहिए, तब वह पाप-हर अर्थात् रोग-हर कहलाता है।
आहार के सम्बन्ध में गीता स्पष्ट निर्देश देती है-
आयुः सत्व्बलारोग्यासुख्प्रीतिविवार्धनाह। रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्य आहाराः सत्विक्प्रिया।।
अर्थात्- "आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बदलने वाले, रसयुक्त और चिकन-स्थिर रहने वाले, तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय, ऐसे आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ सात्विक वृत्ति वालों को प्रिय होते है।" इसके विपरीत गीता कहती है की जो सड़े-गले, बासी, दूसरे के जूठे, अधपके, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, अपवित्र भोजन ग्रहण करता है अथवा पसंद करता है, वह व्यक्ति तामसी होता है।
रामायण में जटायु रावण संवाद के अंतर्गत आहार का प्रकरण भी आया है एवं जटायु नीति उपदेश देते हुए कहते हैं की- " हे सौम्य! जो अन्न सेवन करने पर विकार उत्पन्न न करके पांच जाये, वाही अन्न सेवन किया जाना चाहिए।" विष्णुपुराण में कितना आहार लिया जाए, इसे स्पष्ट समझाते हुए लिखा है-
जठरं पूर्येद्धार्म्न्नैर्भागम जलें च। वायोः संचार्नार्थाये चतुर्थाम्वाशैस्येत।।
अर्थात् "ठोस अन्न से जथर का आधा और जल तथा पेय पदार्थ से चौथाई भाग भर दिया जाए और वायु रूपी द्रव्यों के संचरण के लिए चौथाई भाग खाली रखा जाए।
आज अधिकांश रोग पेट भरकर अति आहार के कारण शहरी वातावरण में होते देखे जाते हैं। शास्त्रों के निर्देशों को ध्यान में रखा जाए, तो समझ में आता है की ऋषिगणों का चिंतन कितना विज्ञानसम्मत रहा है। जठराग्नि में प्रतिक्रियास्वरूप आमाशय में वायु रूपी पदार्थ उत्पन्न होते हैं। यदि इसे खचाखच भर दिया जाए, तो इन वायुरूपी पदार्थों का न केवल पेट पर अपितु हृदय पर भी दबाव पड़ता है। 'इन्जाइना' रूपी हृदय रोग इसी कारण आज अधिकाधिक लोगों में होते देखा जाता है। दूसरे जथर खाली न रहने से पाचक रस व भोजन का ठीक मिश्रण भी नहीं होता व पाचन सम्बन्धी कई रोग जन्म लेते है।
आहार-भोजन ग्रहण करने के सम्बन्ध में मुख्यतः पांच सूत्र याद करने योग्य है। ये है-
क्या खायें, क्यों खायें, कितना खायें, कब खायें एवं कैसे खायें?
यदि इन पंचों को विधिपूर्वक समझ लिया जाये, तो व्यक्ति कभी रोगी नहीं हो सकता। इन सबके बारे में विस्तार से इस धारावाहिक लेखमाला के क्रम में अगले अंक में पड़ेंगे। परमपूज्य गुरुदेव ने बड़ी विस्तार से इसके विषय में लिखा है। इस लेख का समापन तो एक नीति सूत्र से करने है। जिसमें बताया गया है की आहार का सेवन विधिपूर्वक हो तो मनुष्य व्याधि मुक्त रहता है।
जीर्णभोजनिम व्यधिनोर्पस्प्रपी।
अर्थात् " प्रथम किया हुआ भोजन ठीक पच जाने पर दूसरा भोजन करने वाले के पास कभी व्याधि फटकती नहीं।"
क्रमशः
तुर्कों ने कोशुढ़ को कैद कर लिया। जेल में पड़े कोशुंड के सामने शर्त रखी गई यदि- आप इस्लाम स्वीकार कर लें तो आपको मुक्त किया जा सकता है।
कुशुंड ने विचार किया और हंसकर कर उत्तर दिया- मृत्यु और लज्जा इस दोनों में से किसे स्वीकार किया जाये, आज मेरे सामने ऐसी उलझन नहीं पड़ी। मृत्यु जीवन का अनिवार्य सत्य है, तो फिर उससे दर कर अपना सर क्यूँ नीचा करूँ। जब मेरे पास सब कुछ था तब मैंने अपने धर्म न बदला। आज केवल वाही मेरा साथी है, तो मैं उसे कैसे छोड़ दूँ? ईश्वर की आज्ञा पूरी करो। मरने के लिए तैयार हूँ, कलंक लगाने के लिए नहीं।
श्रीमद्भगवद्गीता जैसे महान ग्रन्थ की भूमिका पक्ष की चर्चा विगत अंक में हो चुकी। विस्तार से उसमें कहा गया है एवं इसके होते हुए किसी अन्य शास्त्र के विस्तार में जाने की कोई आवश्यकता नहीं। अनेकानेक उदाहरणों से उसमें भगवान श्रीकृष्ण एवं अर्जुन की इस महान ग्रन्थ की रचना के मुख्य पत्र के रूप में चर्चा की गयी। अब इस अंक में पाठकवृंद पढ़ें; अर्जुन विवाद युग नामक प्रथम अध्याय को। यह शुभारम्भ अपने आप में अनूठा एवं ऐसी स्थिति का परिचालक है, जो हममें से प्रत्येक के जीवन में आती है। सैंतालिस श्लोकों वाला यह प्रथम अध्याय भावनाओं के उतार-चाव एवं युद्धभूमि के वर्णन से भरा पड़ा है। इसे समझकर ही गीता के महात्म्य को भलीभांति समझा जा सकता है।
गीता अब गुरुसत्ता के चिंतन के परिप्रेक्ष्य में हम सभी इस प्रथम अध्याय को समझने का प्रयास करें, तो हमें पग-पग पर परोक्ष मार्गदर्शन की अनुभूति होगी। यह अध्याय अपने आप को अभूतपूर्व है। इसमें कहीं भी भगवान श्रीकृष्ण के नाम से उल्लेख नहीं आया है, जिसे हम पूरी गीत में " श्री भगवान उवाच" नाम से होता देखते हैं। मात्र एक छोटा सन्दर्भ अर्जुन द्वारा युद्धभूमि के मध्यक्षेत्र में रथ खड़ा किए जाने के पश्चात श्रीकृष्ण के हवाले से संजय ने कहा है - "उवाध पार्थ पश्येतान्स्म्वेतान्कूरुनिती।" (२५वें श्लोक का उतरार्द्ध) अर्थात् हे पार्थ। युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख। " शेष सत्रह अध्यायों में तो अर्जुन बार-बार अपनी जिज्ञासाएं रखता है एवं श्री भगवान उनका जवाब देते हैं, किन्तु इस अध्याय में संजय के हवाले से युद्ध क्षेत्र का वर्णन है एवं फिर अर्जुन का असमंजस भारी अवसाद-विषाद के रूप में वर्णित किया गया है। तीन पात्र हैं, इस अध्याय में। धृतराष्ट्र, संजय एवं अर्जुन- जिसे पूरी गीता के अनेक नामों से- पार्थ- धनंजय, गुडाकेश - कौन्तेय- संबोधित किया गया है। जरा इन पात्रों को जान ले पहले।
गीता का शुभारंभ ही धृतराष्ट्र से हुआ है। धृतराष्ट्र अंधे थे, मोहान्ध थे। गीता अंधे आदमी के कथन से आरंभ होकर संजय के इस आश्वासन पर जाकर अट्ठारहवें अध्याय में समाप्त होती है की जहाँ अर्जुन व श्रीकृष्ण जैसे दो महापुरुष हों, वहां जीत अवश्य नीति की होती है। धृतराष्ट्र मोहान्ध के रूप में पहले श्लोक में रूप में पूछ बैठते हैं-
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:। नामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।
"हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छा वाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने किया? " धृतराष्ट्र को इस लड़ाई में अपने ही बेटों की स्थिति क्या है- 'नामक:'- यह नहीं की पहले अपने दिवंगत भाई के उन बेटों के बारे में पूछ जो सतत् आततायी उसके पुत्रों द्वारा सताये जाकर अग्यात्वास झेलते रहे हैं। बाद में वे कहते हैं - पाण्डु के बच्चों के बारे में भी मुझे बताओ- 'पाण्डवाशचैव।' सवाल धृतराष्ट्र करते हैं, जो अन्धता को प्राप्त हैं। आज के औसत आदमी की यही स्थिति है - पुत्रेष्णा से अँधा व्यक्ति परहित पहले नहीं देखता- पहले अपने दुष्पुत्रों का अहित जानने का प्रयास करता है। धृतराष्ट्र महाभारत का एक पात्र है, गीता के शुभारंभ करने वाले इस प्रश्न के पूछने वाले के रूप में। आज ढेरों- करोड़ों धृतराष्ट्र समाज में, राजतंत्र में हमारे आसपास भरे पड़े हैं, जो पुत्रमोह में अंधे होकर नीति को परे रखे उन्हीं के द्वारा मनोसंचालित हो रहे हैं। अपने ज्ञानचक्षु को वे जगा नहीं पा रहे हैं। एक बहुत बड़ी विसंगति इसी कारण समाज में पैदा हुई है।
दूसरे पात्र है संजय, जो धृतराष्ट्र के प्रश्नों का जवाब देते हैं एवं पूरी गीता उसे दिव्यदृष्टि से देखकर सुनाते हैं। संजय सारथी हैं अंधे राजा धृतराष्ट्र के। संजय सौभाग्यशाली व्यक्ति थे कि वे महात्मा विदुर के शिष्य थे। विदुर जैसा ज्ञानी, नीतिज्ञ, परमभक्त भारत के इतिहास में विरला ही देखने को मिलता है। तभी तो भगवान ने दुर्योधन के मेवा त्याग कर विदुर के घर का सीधा-सादा सात्विक साग खाया था। सादगी से जीवन जीने वाले विदुर के जीवन में यानि आचरण और क्रिया में कोई अंतर नहीं देखने को मिलता। बहुत सरल था उनका जीवन। उन्हीं विदुर ने अपनी तपश्चर्या की सिद्धि से संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की। धृतराष्ट्र प्रश्न इसलिए पूछ रहे हैं कि वे जन्मांध तो हैं ही, प्रज्ञाचक्षु भी उनके जाग्रत नहीं हो पाए। किन्तु संजय को प्राप्त थी दिव्यदृष्टि, जिसकी वजह से ही वे आँखों देखा हाल-दूर युद्ध क्षेत्र में घट रहे एक-एक घटनाक्रम व मनःस्थिति के उतार-चढ़ावों का विवरण सुन पाने में सफल हुए। संजय के पास बहार की आँख भी हैं वे प्रज्ञावान भी हैं- नीतिज्ञ भी हैं, दिव्यदृष्टि संपन्न है एवं एक विनम्र सेवक भी अंधे राजा के। संजय यह सारा महाभारत का दृश्य अपने मनोमयकोश के जागरण की सिद्धि के माध्यम से धृतराष्ट्र ही नहीं, युगों-युगों से स्वाध्याय कर रहे हम सभी जिज्ञासुओं को दिखाते आ रहे हैं। विदुर ने उनके आज्ञाचक्र जागता है, तब क्या होता है? प्रकाशपुंज- जैसे सर्कस की लाइट होती है - बीम की तरह से वहां जाकर स्थिर हो जाती हैं, जहाँ से सम्बंधित विवरण संजय सुना रहे हैं। हमारे शरीर में पिट्यूटरी व पीनियल के बीच हाइपोथेलेमस नाम का स्थान होता है। इसे द्विदलीय आज्ञाचक्र कहते हैं। इसके जागरण की सिद्धि का चमत्कार ही है कि एकाग्र होते ही मन से प्रकाश की बीम- तेज किरणों का पुंज सर्कस की लाइट की तरह घेरा बना लेता है एवं उसी घेरे में संकल्पित स्थान दिखाई पड़ता है। संजय गदगद होकर अपनी इसी सिद्धि को बलबूते सारा दृश्य अपने राजा को देखकर सुना रहे हैं। हमारे शरीर में पिट्यूटरी व पीनियल के बीच हाइपोथेलेमस नाम का स्थान होता है। इसे द्विदलीय आज्ञाचक्र कहते हैं। इसके जागरण की सिद्धि का चमत्कार ही है की एकाग्र होते ही मन से प्रकाश की बीम-तेज किरणों का पुंज सर्कस की लाइट की तरह जाकर घेरा बना लेता है एवं उसी घेरे में संकल्पित स्थान दिखाई पड़ता है। संजय गदगद होकर अपनी इसी सिद्धि के बलबूते सारा दृश्य अपने रजा को देखकर सुना रहे है। विदुर, भीम एवं कृपाचार्य का सत्संग जिन्हें प्राप्त है ऐसे संजय की दिव्यदृष्टि का समग्र विवरण है गीता। संजय कौरवों के बीच रहते अवश्य है, पर वे कौरवों के नहीं है। नीति के मामले में वे पाण्डवों के सदाचार के पक्ष में है। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है।
तीसरा पात्र है अर्जुन। अर्जुन वीर है- योद्धा है किन्तु उसके मन में संदेह है, भ्रम है, व्याकुलता है एवं परेशानियां हैं। वह इस समय एक हताश-निराश व्यक्ति के रूप में हमारे समक्ष आता है। जब व्यक्ति सभी तरफ से निराश हो जाता है, तो धर्मसम्मूढ़ कहलाता है। मूर्च्छना की यही स्थिति आत्मजागरण की स्थिति है, अभीप्सा के पैदा होने की स्थिति है। यह मनःस्थिति के पैदा होने के बाद ही शिष्यत्व पैदा होता है। जो इस गहरे स्तर तक विषाद में चला जाय जैसा की गीता के प्रथम अध्याय में समझाया गया है, समझ लेना चाहिए की वह आत्म-संताप की उस प्रक्रिया से गुजर रहा है, जो गुरु तक उसे पहुँचाने के लिए अनिवार्य थी। जिसे गुरु की आवश्यकता होती है वाही विषाद की चरम स्थिति तक पहुँचता है। जिसे गुरु न चाहिए, न वह ढूंढ़ने की इच्छा रखता है- न गुरु को पहचान पता है, वह बड़ा दुर्भाग्यशाली है, वह जीवनभर प्रवचन देता है, तर्क देता है, नीति की बात करता है, पर कभी अपने ऊपर लागू नहीं करता। अपने ही तर्कों से अपनी जिज्ञासा मिटाकर आत्मिकप्रगति का पथ अवरुद्ध कर देता है। युधिष्ठिर धर्मराज कहलाते थे, नीति की बात करते थे, दुनिया भर की बातों की व्याख्या कर देते थे, किन्तु वे कभी विषय नहीं बन पाए, एक उपदेशक धर्मराज ही बने रहे। भीम अपनी शारीरिक सामर्थ्य पर अधिक विश्वास रखते रखते थे, अपनी ताकत का उन्हें अभिमान था। वे सोचते थे की सारा युद्ध वे अपनी शक्ति के बल पर जीत लेंगे इससे अधिक उन्होंने कभी सोचा नहीं। नकुल और सहदेव भावनाशील थे, सरल थे - तार्किक नहीं, जो भी कहा जाये, वे कर लेते थे। इन सभी महाभारत के पात्रों को श्रीमद्भगवद्गीता के परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास हमें करना चाहिए। हमें जानना चाहिए की गुरु का भाव मन में कैसे पैदा किया जाता है। गुरु की आवश्यकता पड़ती है, विषाद की, असमंजस की धर्मसम्मूढ़ता की चरम पराकाष्ठा की स्थिति में। पहला अभ्यास इसी तथ्य को समझने के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है। यहाँ अर्जुन के मन में श्रीकृष्ण के प्रति मित्र का भाव है, सखा का भाव है, सच्ची आत्मीयता है, पर गुरु का - भगवान् का भाव नहीं है। उसी को पैदा करने के लिए भगवान् ने उसके मन में सम्बन्धियों-रिश्तेदारों के बीच युद्ध में खड़ा करके विषद की चरम स्थिति पैदा की है।
कई परिजन कहते हैं की हम गुरुदेव के- माताजी के बड़े समीप थे। हमारे पास गुरुदेव का कुरता रखा है-गुरुदेव का एक दांत निकाला गया था, वह हमने अपने पास रख लिया था। माताजी की चप्पलें हमारे पास रखी हैं। गुरुदेव के हाथ से उपयोग में आने वाली पेन हमारे पास है। हो सकता है उनके पास श्रद्धावश ये सब चीजें हों। परन्तु गुरुदेव जैसी अवतारी सत्ता को, भगवत् स्वरूप को जो नहीं समझ पाया अपने अंतर्जगत में विषाद पैदा न कर पाया उस के मन सच्चा शिष्यत्व कभी जगा नहीं। वह तो कहने भर को उन्हें परमपूज्य गुरुदेव कहता-उनकी दुहाई दे लेता था। गुरु जब शिष्य के अंत:करण में विराजमान होता है, तो चरम विषाद की स्थिति लाकर- उसके मोह को तोड़ता है - उसके जीवन में सच्चा वैराग्य पैदा कर उसके सूत्र ब्राह्मीचेतना से जोड़ता है। इस अध्याय में अर्जुन का विषाद यही बताता है की गुरु को पाने के लिए भयंकर मानसिक आकुलता की प्रक्रिया से गुजरने पड़ता है। गुरु सम्बन्धी हो सकता है, मित्र हो सकता है, एक ठग के लिए आड़े समय में काम आने वाला साधन-सिद्धि सम्पन्न हो सकता है, किन्तु गुरु कब किस सच्चे शिष्य के लिए सच्चा गुरु बनता है, यह जानना हो तो हमें पहला अध्याय मन लगाकर पढ़ना एवं आत्मसात करना चाहिए।
भगवान् और भक्ति का रिश्ता बहुत ही उच्चकोटि का है। भक्त भगवान् को डांट लगता रहता है एवं भगवान् अपने सच्चे भक्त की हर बात मानने को तैयार रहते खड़ा रहता है, चाहे वे नामदेव हों, चाहे कबीर, चाहे गृह के मुंह में फंसे गजराज हों, अथवा द्रौपदी हों। आप जानते हैं न संत नामदेव की कथा को। संत नामदेव ने भगवान् को डांट लगाई की हम आपके आंगन में आपकी मूर्ति के सामने खड़े कीर्तन कर रहे हैं एवं ये ब्राह्मण पण्डितगण हमें बाहर निकलने को कहते हैं। आप इन्हें कुछ कहते क्यों नहीं? भगवान् ने कुछ नहीं कहा। बस भगवान् से नाराज होकर वे मंदिर के पीछे चले गए, वहां कीर्तन करने लगे। भगवान् से अपने भक्त की व्याकुलता, उनका अपमान देखा नहीं गया व उन्होंने मंदिर का मुंह ही उधर कर दिया जिधर नामदेव खड़े थे। पंढरपुर में सारे में मंदिर पूरब की पूरब की ओर मुंह किये विनिर्मित है, किन्तु एक यही मंदिर है, जो पश्चिमोमुख है एवं भक्ति की, कीर्ति की गाथा आज तक कहता है। भगवान्- भक्त के रिश्ते अलग हैं - गुरु- शिष्य के रिश्ते अलग। गुरु धुनिये की तरह शिष्य को धुनता है - उसे काबिल बनाता है। ये हाड़- मांस के रिश्ते भावनाओं के रिश्तों से अलग हैं। गुरु कैसे शिष्यत्व का जागरण करता है, इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है श्रीमद्भागवतगीता का पहला, दूसरा, ग्यारहवां, सत्रहवां अठारहवां अध्याय। वैसे तो पूरी गीता ही सच्चे शिष्य के जागरण हेतु एक समग्र पाठ्यपुस्तक है।
कृष्ण-अर्जुन के सबसे समीप थे, पुराने संबंधी भी थे। द्रौपदी की शादी में भी अर्जुन व कृष्ण साथ थे एवं श्रीकृष्ण की बहिन सुभद्रा की शादी तो अर्जुन से ही हुई थी। ममेरे-फुफेरे भाई भी थे- कुन्ती श्रीकृष्ण की बुआ होने के नाते एवं साले- बहनोई भी थे। अज्ञातवास में भी साथ रहे। कई युद्ध साथ-साथ लड़े, पर भाव वही रहा सखा-मित्र- भाई का। गुरुभाव भी अभी तक पैदा नहीं हुआ, जिसे गीता काव्य के रचयिता महर्षि व्यास ने अर्जुन श्रीकृष्ण के योगेश्वर स्वरूप में परिचित अवश्य है, किन्तु वह इस सीमा तक धर्मसम्मूढ़-किंकर्तव्यविमूढ़ है की अपने संगे- संबंधियों को सामने देखा भारी अवसाद की स्थिति में आ गया है। ऐसी स्थिति में ही उन श्रीकृष्ण में से एक महागुरु योगीराज श्रीकृष्ण जन्म मते हैं।
प्रायः: ऐसी ही स्थिति हम प्रज्ञापरिजनों की भी रही है। हम भी अपने आराध्य गुरुदेव को जानते हैं, किन्तु मानते नहीं। उनके मनोकामना पूरी करने वाले- हमारे अभिभावक आदि रूपों में ढेरों स्मृतियां हमारी मस्तक पटल पर हैं, किन्तु हम यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं की वे योगेश्वर हैं, प्रज्ञावतार की सत्ता हैं, महादेव शिव हैं- उस परब्रह्म की सत्ता के प्रतिनिधि हैं, जिन्हें गोविंद से भी बढ़कर सम्मान शास्त्रों नए दिया है। अर्जुन व हमारी स्थिति भिन्न नहीं है। हम भी यदि विषाद अवसाद की चरमावस्था में पहुंचे, कृष्ण द्वैपायन कयास ने श्रीमद्भगवद्गीता में बड़ी सुंदरता से वर्णित किया है, तो वे ही सद्गुरु हमारे गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य में से प्रकट होकर हमारे सम्मुख आ खड़े होंगे। हमें अपने गुरु को शरणागति भाव के साथ, परब्रह्म के स्तर पर ही समझना होगा, क्योंकि गुरु के रूप में यही भाव शिष्य के अन्दर के सारे रसायन शास्त्रों के, स्नायु- संरचनाओं को अन्दर के रोम-रोम को बदलने की सामर्थ्य रखता है। अर्जुन के रूप में हम सभी शिष्य यदि चाहते हैं की गुरुसत्ता हमारे अन्दर भी वही भाव पैदा करे तो विवाद की चरमावस्था पर जाकर सब कुछ गुरु को सौंपना होगा। अपनी इच्छा मिटानी होगी। प्रथम अध्याय की यह विशेषता है की अर्जुन ही बोलता है एवं अर्जुन ही जवाब देता है। कृष्ण को तो मौका इस अध्याय में मिला ही नहीं। खुद ही प्रश्न खुद ही उत्तर। अच्छे-अच्छे तर्क अर्जुन प्रस्तुत कर रहा है। ऐसा तब होता है जब किसी को अच्छा काम करने में। धर्मसम्मत आचरण करने में, कठिनाई होती है, तो अपने ही तर्कों से इन सभी नीति की बातों को काटने का वह प्रयास करता है। अर्जुन विद्वान है, ज्ञानी है, ख्यातिलब्ध अपने समय का महापराक्रमी धनुर्धर है, प्रतिभासंपन्न है। पाण्डवों में ओर भी है, पर अर्जुन जैसा कोई नहीं। आज के समाज में यदि कोई युगनेतृत्व सँभालने की योग्यता रखता है, तो वह मात्र अर्जुन स्तर का व्यक्ति ही हो सकता है, नकुल, सहदेव, भीम या युधिष्ठिर स्तर का नहीं। अर्जुन वस्तुतः सारी मनुष्यता का रिप्रेजेंटेशन है। सारे शिष्य समुदाय का प्रतिनिधित्व है- प्रतीक है। शिष्य समुदाय के लिए योगेश्वर कृष्ण ने तब जो सन्देश दिया- पहला अध्याय का, अर्जुन का रुदन सुनाने के बाद वह हम सब के लिए आज भी युगानुकूल है- शाश्वत है गीता में प्रारंभ में ही बड़ी विलक्षण स्थिति देखने को मिलता है। अर्जुन व धृतराष्ट्र दोनों में पीड़ी का अंतर है। दोनों ही मोहग्रस्त है। शोक व मोह की स्थिति में कोई निर्णय नहीं ले पाता। अर्जुन भी युद्धभूमि में खड़ा रिश्तेदारों को देख रहा है और धृतराष्ट्र भी संजय की दिव्यदृष्टि के माध्यम से रिश्तेदारों को ही देख रहे हैं। फिर भी दोनों के मोह में अंतर है। धृतराष्ट्र यदि मोहान्ध है तो अर्जुन मोहाकुल है। धृतराष्ट्र द्वेष से भरे हुए हैं, किन्तु अर्जुन समर्पण भाव से भरे हुआ है। धृतराष्ट्र की वजह से न जाने कितने परिवार महाभारत में बर्बादी की कगार पर खड़े हैं, किन्तु अर्जुन उस समय के भारत को महाभारत बनाने के अनीति-अधर्म के साम्राज्य को मिटाने की कुंजी बनकर आया है। इसी कारण श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ही चुना गीता सुनाने के लिए- कर्मयोग का शिक्षण देने के लिए। वही सही पात्र है। इसी कारण चरमस्तर का विषाद देवी कृपा से उन्होंने अर्जुन के - अपने सखा भक्त के मन में उत्पन्न किया है। आज अनेकों धृतराष्ट्र समाज में हैं - समय लोकसेवा के क्षेत्र में उतरने का है, किन्तु वे हैं की मोहांधता की अदालत से बाहर आने को तैयार नहीं। अच्छे खासे मिले अवसर को आज के युग के धृतराष्ट्र गंवाते - सिर धुनते, पछताते देखे जाते हैं।
गीता प्रारंभ से ही बड़े विलक्षण दृश्य प्रस्तुत करती है। कुरुक्षेत्र का मैदान है। संजय दूसरे श्लोक से ही बताना प्रारंभ करते हैं।
द्रष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढम दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनंब्रवित।।
पश्यैता पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम। व्यूढ़ं द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता।।
अर्थात्- " संजय बोले- तब राजा दुर्योधन ने व्यूह रचना युक्त पाण्डवों की सेना को देखकर और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा- की हे आचार्य, आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार कड़ी की हुई पाण्डवों की इस बड़ी भरी सेना को देखिए।"
इन दोनों श्लोकों के अर्थ में बड़े रहस्य की बात छिपी है, जो दुर्योधन की मनोवैज्ञानिक वृत्तियों का भी परिचय देती है। दुर्योधन- द्रोणाचार्य के पास ही क्यों नहीं गया और किसी के पास क्यों नहीं। धृष्टद्युम्न का ही नाम क्यों लिया- और किसी का क्यों नहीं? यह इसलिए की धृष्टद्युम्न का जन्म ही द्रोणाचार्य के वध के लिए हुआ था। इसलिए उनके पास जाकर उसका नाम लिया, ताकि उनके मन में आक्रोश-ज्वाला भड़क उठे। पाण्डव पुत्रों की सेना में सेनापति थे धृष्टद्युम्न एवं द्रुपद के पुत्र थे। द्रुपद से भारी दुश्मनी थी द्रोणाचार्य की, इसलिए उसने 'द्रुपद पुत्र' नाम जानबूझ कर लिया। यज्ञ से पैदा हुआ धृष्टद्युम्न यही देवी आदेश लेकर आया था की उसने द्रोणाचार्य का वध करना है। दुर्योधन जानता है की यदि उसने प्रारंभ में ही अपने सेनापति आचार्य द्रोण के मन में आक्रोश भर दिया तो वे पुरे शौर्य के साथ लड़ेंगे। इतना कहकर वह सभी का नाम बताता है। प्रसंगवश अभिमन्यु सहित द्रौपदी के पांचों पुत्रों का भी उल्लेख करता है, ताकि आक्रोश ठंडा न हो। फिर अपने बारे में भी बताता है की अपनी सेना में कौन-कौन महारथी है तथा साथ-ही-साथ दसवें श्लोक में निर्णय भी स्वयं कर देता है की कौन जीतेगा। वह कहता है-
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्मभिराक्षितम। पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमभिरक्षितम।।
अर्थात् "भीष्मपितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है ओर भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है।" दुर्योधन की दृष्टि में मात्र भीम ही रक्षक है। वह इतना गर्वोन्मत्त है की उसे अपनी ग्यारह अक्षौहिणी सेना अजेय नजर आ रही है। यही अति आत्मविश्वास एवं दुर्बुद्धि उसके पतन का कारण बनता है। संभवतः यह भी नहीं-प्रमुख पात्र श्रीकृष्ण व अर्जुन की उपेक्षा उसके विनाश का कारण बनती है। दुर्योधन के मन में द्वेष का बीज है, इसलिए उसे गदाधारी भीम ही चारों तरफ दिखाई देता है। भगवान् श्रीकृष्ण उसे ग्वाले ही नजर आते हैं- मात्र सारथी हैं वे अर्जुन के। एक सामान्य व्यक्ति है, जिनका वह पहले अपमान कर मुँह की खा चुका है। यदि दुर्योधन का मूल्याङ्कन सही होता की कौन क्या है, तो दसवें श्लोक में यह कह कर वह गलती नहीं करता-शायद युद्ध ईमानदारी से लड़ता नहीं लड़ा इसलिए मारा गया। महाभारत का यह गीता प्रकरण हम सबके लिए इसलिए पड़ने-समझने योग्य है की यह हमारे चिंतन को विकसित करने की दृष्टि हमें प्रदान करता है- हमें जीवन-संग्राम में नीति के पद पर चलने हेतु समग्र शिक्षण देता है।
बालक युनेज-सैंडो अत्यंत दुर्बल ओर रोगी था। अपनी बुरी आदतों के कारण उसने बचपन में ही अपना स्वास्थ्य खराब कर लिया। एक दिन सैंडो अपने पिता के साथ अजायबघर देखने गया। रोम की गैलरी में उसने प्राचीनकाल के बलिष्ठ पुरुषों की मूर्तियां देखी। उसे विश्वास न हुआ की ऐसे माँसल भुजाओं वाले स्वस्थ और बलवान लोग भी इस संसार में हो सकते हैं। सैंडो इन प्रतिमाओं को देखकर प्रभावित हुआ।
उसने पिता से पूछा- 'पिताजी! यह प्रतिमाएँ काल्पनिक हैं अथवा ऐसा स्वास्थ्य कभी संभव हो सकता है?" पिता ने बड़े आत्मा विश्वास के साथ कहा- "हाँ-हाँ, संसार में संभव क्या नहीं है, यदि तुम भी नियमित व्यायाम ओर परिश्रम करो, संयमी ओर निरालस्य बन सको तो ऐसा ही स्वास्थ्य क्यों नहीं प्राप्त कर सकते।"
बात सैंडो के मन में बैठ गई। पिछली खराब जिंदगी का चोला उसने उतार फेंका ओर नियमपूर्वक व्यायाम ओर कठोर श्रम करना प्रारंभ कर दिया। फलस्वरूप वह एक प्रख्यात बलवान बना। उसने व्यायाम की अनेक विधेय भी निकाली, जिन्हें सैंडो की कलाएं कहा जाता है।
शौरपुच्छ नामक बणिक ने एक बार भगवान बुद्ध से कहा-भगवन् मेरी सेवा स्वीकार करें। मेरे पास एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ हैं, वह सब आपके काम आयें। बुद्ध कुछ न बोले- चुपचाप चले गए?
कुछ दिन बाद वह पुनः तथागत की सेवा में उपस्थित हुआ ओर कहने लगा- देव! यह आभूषण और वस्त्र ले लें, दुःखियों के काम आयेंगे, मेरे पास अभी बहुत-सा द्रव्य शेष है। बुद्ध बिना कुछ कहे वहां से उठ गए। शौरपुच्छ बड़ा दुःखी था की वह गुरुदेव को किस तरह प्रसन्न करे?
वैशाली में उस दिन महाधर्म-सम्मेलन था, हजारों व्यक्ति आये थे। बड़ी व्यवस्था जुटानी थी। सैकड़ों शिष्य और भिक्षु काम में लगे थे। आज शौरपुच्छ ने किसी से कुछ न पूछा- काम में जुट गया। रात बीत गई, सब लोग चले गए पर शौरपुच्छ बेसुध कार्य-निमग्न रहा। बुद्ध उसके पास पहुँचें और बोले-शौरपुच्छ! तुमने प्रसाद पाया या नहीं? शौरपुच्छ का गला रुंध गया। भाव-विभोर होकर उसने तथागत को साष्टांग प्रणाम किया। बुद्ध ने कहा-वत्स परमात्मा किसी से धन और संपत्ति नहीं चाहता, वह तो निष्ठा का भूखा है। लोगों की निष्ठाओं में ही वह रमण किया करता है और तुमने स्वयं यह जान लिया।
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो १ अब हमारा जीवन एक नया मोड़ लेकर आया है। इतनी लंबी जिंदगी हमने अपने मित्रों से, भाइयों से, कुटुम्बियों से, भतीजों से, बच्चों से मिल−जुलकर साथ-साथ में व्यतीत की है। ऐसा नहीं हुआ की हम कभी अकेले रहे हों। रात को भी सोते रहे हैं, तो आप लोगों का चिंतन बराबर करते रहे हैं। समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का ख्याल करते रहे हैं। जनता के साथ हम बराबर रहे हैं। हमने अब अपने जीवन में एक नया मोड़ दिया है। नया मोड़ क्या है? अब आपके और हमारे मिलने-जुलने का क्रम बंद हो जायेगा। अब आप यह उम्मीद करें की आप हमसे बात करेंगे, हमारी बात सुनेंगे, कठिनाइयों की अथवा जिज्ञासाओं की कोई बात हमारे सामने रखेंगे और हम उनका समाधान करेंगे। नहीं, अब यह संभव नहीं हो सकेगा। हमने अपना एक नया कार्यक्रम बना लिया है।
मित्रो, हमारे गुरु ने जो आदेश भेजा, उसी के आधार पर ही हमारा सारा-का-सारा जीवनक्रम चला है। अब तक की जिंदगी को हमने अपनी मर्जी से व्यतीत किया है अपने कार्यक्रम स्वयं नैन बनाये है। हमारे मास्टर, हमारे गुरु जिस ढंग से हमसे जो करते है, हम करते है। इसी तरीके से हमारी साड़ी जिंदगी की गतिविधियाँ चलती रही हैं। अभी-अभी हमारा जो एक नया कार्यक्रम बना है, उन्हीं के आदेश के अनुसार बना है। क्या बना है? अब हमारा आपका संपर्क नहीं रहेगा। रहेंगे, तो हम जमीन पर ही, आसमान में थोड़े ही जायेंगे, लेकिन आप लोगों से संपर्क की जो जरूरत है, वह संभव नहीं हो सकेगी। आप लोग नीचे बैठे होंगे, हम ऊपर बैठे होंगे, तो क्या बातचीत नहीं करेंगे? नहीं, अब यह संभव नहीं हो सकेगा। यह हमारे जीवन का नया मोड़ है।
आप लोग यह ख्याल कर सकता है की इसका किया कारण हो सकता है? आमतौर से कारण ऐसे ही होते हैं। कोई आदमी डर जाते हैं, भयभीत हो जाते हैं, शर्म के मारे बोलना बंद हो जाता है। कुछ व्यक्ति आलसी होते हैं जगे पड़े रहते हैं। जब घर वाले आवाज देते हैं की उठो भाई, कुछ करो, तब भी वे झूठमूठ खर्राटे लेते रहते हैं। ऐसे होते हैं आलसी और डरपोक आदमी। सुना है की जो मिलेट्री में भर्ती होते हैं, उनमें से कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं की जब लड़ाई का मौका अता है, दनादन गोलियां चलती हैं, तो कोई न कोई बहाना बनाते हैं, जैसे पेट दर्द हो गया, पुट्ठे में दर्द हो गया। चला नहीं जाता है, ये बात हो गयी है आदि दुनिया भर की बातें बना लेते हैं और युद्ध से भागने की कोशिश करते हैं। इन्हें पलायनवादी कहा जाता है। इस तरह आलसी एक, डरपोक दो और पलायनवादी तीन श्रेणी के व्यक्ति हुए।
तो क्या हम भी इन्हीं में से हैं? नहीं, हम इनमें से कोई भी नहीं हैं? जिन लोगों ने हमको नजदीक से देखा है, उनके स्पष्ट मालूम हैं की उन तीनों में से एक भी ऐब गुरूजी के भीतर नहीं हैं। इन खराबियों को हमने शुरू से ही अपने भीतर से उखाड़ फेंका है। अब तो पचहत्तर साल होने को आयें हैं। तो किया इतने लम्बे समय में वह बुराइयाँ कहीं छिपकर बैठ गयीं होंगी? नहीं हमने उन्हें कहीं छिपकर बैठने नहीं दिया है। फिर किया कारण है की हमको अलग एकांत में रहना पड़ा? अगले दिनों संकटों के घटाटोप और अधिक सघन होंगे, इसलिए उन्हें निरस्त करने और उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करने के लिए हमको अपने शक्तियों के फैलाव को रोककर एक जगह इकट्ठा करना पड़ रहा है, ताकि वह इकट्ठी हुई शक्तियां आपके ज्यादा काम आ सकें। आप से मतलब है - समाज से, धर्म से, देश से, मानव जाती से, संस्कृति से। इसलिए फैलाव को- बिखराव को हमने बंद कर दिया है।
बिखराव को रोककर एक दिशा में सुनियोजन
मित्रों, आपने देखा होगा की सूर्य की किरणें जब एक आतिशी शीशे के ऊपर एकत्रित कर देती हैं, तो वो कितने पैनी हो जाती हैं। हमारी शक्ति भी वैसी ही हो जाएगी। इस सन्दर्भ में आप कहेंगे की गुरुजी! आप तो फिर कमजोर हो जायेंगे? नहीं, बेटे! हम कमजोर नहीं होंगे। मान लीजिए, अगर हम कमजोर हो गए तो जो भी हमारे बच्चे होने वाले हैं, वे बहुत ताकतवर होंगे। आपने महाभारत पड़ा होगा की कुन्ती तो कमजोर हो गयी थी और अपनी जिठानी गांधारी के साथ जंगल में ताप करने चली गयी थी। लेकिन उनके बच्चे कितने शानदार थे, अर्जुन, भीम, और दूसरे सब बच्चे एक-से-एक समर्थ थे। कुन्ती मरी नहीं थी, वरन् अपनी जगह दूसरों को छोड़ गई थी। हम भी अपनी जगह पर दूसरों को छोड़ जाने की कोशिश में लग रहे है, ताकि हमारी परंपरा बंद न होने पाए।
यों तो स्थूल रूप से हमारी परंपरा बंद भी हो सकती है। पिचहत्तर साल की उम्र के बाद में आदमी कहाँ तक जिएगा? अधिक-से-अधिक पाँच वर्ष और चुस्ती व फुर्ती के साथ। उसके बाद कोई जिएगा, तो बुड्ढा हो जाता है, कमजोर हो जाता है, इन्द्रियाँ साथ देना बंद कर देती है। बुढ़ापे में किसी को जवान देखा है, आपने? नहीं कोई जवान नहीं देखा है। फिर हम कैसे जवान रह सकते हैं? स्वयं भाग-दौड़ करके कैसे काम कर सकते हैं? इस भाग-दौड़ के लिए हमने नये आदमी तलाश किये है और उनको ही बनाने में लग रहे हैं।
तप एकांत में ही क्यों?
आपने बिल्ली देखी है। बिल्ली जब बच्चा देती है, तो क्या सड़क पर देती है? नहीं, कोई ऐसा स्थान तलाश करती है जहाँ कोई आदमी न हो और उसे देखता न हो। ये छिपकर करने वाले काम हैं- एकांत के काम हैं। हम भी आप लोगों से अलग हटकर एकांत में जा रहे हैं, ताकि अपनी शक्तियों को एकत्र कर सकें और शक्तिशाली बन जाएँ। एकांत होने का मतलब यह है की आपको हम दिखाई न पड़ें। दिखाई न देने से क्या आपको कोई नुकसान है? और दिखाई पड़ें, तो आपको कुछ फायदा है क्या? बताइए क्या, आपको अपना दिल दिखाई पड़ता है? नहीं दिखाई पड़ता। आपने अपने गुर्दे देखे हैं? किसी और के भले ही देखें होंगे, पर अपने नहीं देखें होंगे। फेफड़े आपने देखे है अपने? वह भी नहीं देखे है। शीशे में आपने अपने आंख और कान देखें हो तो देखें हों और वह भी प्रत्यक्ष नहीं देखे होंगे। इस प्रकार आप हर चीज को नहीं देख सकते। देखना कोई बहुत जरूरी नहीं। यदि जरूरी होता तो भगवान शंकर और पार्वती जी कैलाश पर्वत पर मानसरोवर, जो यहाँ से बहुत दूर हैं, तप करने क्यों जाते? दिल्ली के चावड़ी बाजार में क्यों नहीं बैठ जाते? तब उनके पास देखने वाले-दर्शन करने वाले हजारों आदमी आते? विष्णु भगवान के बारे में मैंने आपको बताया है की वे कहा रहते है। वे क्षीरसागर में शेषशैया पर सोये रहते हैं और एकांत में रहते हैं। कोई काम नहीं करते।
मित्रो! एकांत का मतलब यहाँ वह भी नहीं है, जो अभी मैंने बताया है- भाग खड़े होना, आलसी हो जाना। यद्यपि एक मतलब यह भी होता है। दूसरा मतलब एकांत का है- अपनी शक्तियों को एकत्रित करना। माँ के पेट में जब बच्चा आता है, तो वह चुपचाप पड़ा रहता है। एकांत में चुपचाप बैठा रहता है। न किसी से बात करता है, न बोलता है और न हिलता-डुलता है। न अपनी आवश्यकता कहता है, न लड़ता है, न चिल्लाता है। चुपचाप नौ महीने तक माँ के पेट में बैठा रहता है। इससे क्या फायदा है? इससे यह फायदा है की पानी की एक नन्हीं बूंद एक पूरे बच्चे के रूप में विकसित हो जाती है।
आजकल हमारा जो एकांत चल रहा है- सूक्ष्मीकरण चल रहा है, इसके बारे में आप उसी तरह से समझिये। आप यह न सोचिये की हम भाग खड़े हुए। आप यह भी न सोचिये की हम भाग खड़े हुए। आप यह भी न सोचिये की हमने आप से मुहब्बत खत्म कर दी। मुहब्बत हमारी जिंदगी से खत्म नहीं हो सकती। उन लोगों के बारे में सोचिये जो बैरागी हो जाते हैं, माँ-बाप को छोड़ देते हैं। भाइयों को, बच्चों को बिलखता छोड़ देते हैं। ऐसे बैरागी हम कहाँ हो सकते हैं? ऐसा हमारे लिए संभव नहीं है, क्योंकि वह रास्ता जिन लोगों ने अख्तियार किया है, उन लोगों में से सभी को हमने रोका है। सबको मना कर दिया है और कहा है की नहीं भाई, यह रास्ता गलत है। समाज के साथ स्वयं को आगे बढ़िए, अपने गुणों को बढ़ाइये, और दूसरों को आगे बढ़ाइये। हमारी यही मनोकामना है। अभी मैं आपसे अलग होने की सफाई दे रहा था। इस संबंध में क्षीरसागर में बैठे भगवान विष्णु की सफाई दी, कैलाशवासी भगवान शंकर की सफाई दी- अकेले एकांत में रहने की। चलिए अभी मैं आप को और उदाहरण बताता हूँ। पांडिचेरी के अरविंद घोष का नाम सुना है न आपने, उन्होंने अपने सब काम कर लिए थे। अपनी ताकत, जितनी भी थी, सब खर्च कर ली थी। ताकतवर नौजवान के साथ लेकर अंग्रेजों को को भगाने का उनका मकसद था, पर वह पूरा न हो सका। फिर उन्होंने एक नेशनल कॉलेज खोला, उसमें विद्यार्थी पढ़ायें। इस नयी पीढ़ी को लोगों को समझाया की आजादी की लड़ाई लड़नी चाहिए। वह प्रयास भी यूँ ही नाकारा साबित हुआ। इसके बाद उन्होंने ने एक राजनैतिक पार्टी बनायी, बम चलाये। बम चल कर अंग्रेजों को भगाने-डराने की बात कही, लेकिन यह बात भी उनकी सफल नहीं हुई। फिर उनको दिखाई पड़ा की सबसे बड़ी ताकत कौन-सी है जिससे की बड़ी-से-बड़ी हुकूमतों से टक्कर मना संभव है। तब उनको दिखाई पड़ा की यह शक्ति केवल तप में है। तप कहाँ होता है? तप के लिए एकांत चाहिए। पांडिचेरी के अरविंद-घोष तप के लिए एकांत में चले गए। मालूम है न आपको। उनके साथ जो माताजी रहती थीं। दिनभर एक बार दर्शन के लिए माताजी बहार आती थीं। अरविंद सालभर बाद-छह माह बाद-जब उनका मन होता था दर्शन दे जाते थे। उसमें भी दूर ही रहते थे। इससे किया फायदा हुआ? इसका फायदा यह हुआ की उन्होंने सारे-के सारे वातावरण को गरम कर दिया। ऐसा वातावरण गरम हुआ जैसे गर्मी में चक्रवात आते हैं और धुल-मिट्टी के बवंडर उठते हैं और लगातार आकाश की ओर ऊपर उठते रहते हैं। ऐसे ही कितने सारे चक्रवात यहाँ हिन्दुस्तान में तैयार हुए। उनमें से एक का नाम गाँधी, एक का नाम नेहरू, एक का नाम पटेल, एक का नाम सुभाष, एक का नाम मालवीय था। एक साथ इतने सारे महामानव खी दुनिया के परदे पर पैदा नहीं हुए। आजादी की लड़ाई में, आंदोलनों में लोग तो बहुत सारे साथ हुए है, पर जब से जमीन बनी है तब से ऐसा नहीं हुआ, जब एक साथ एक मुल्क में इतने सारे महापुरुष पैदा हुए हो, जितने की अरविंद घोष के जमाने में हुए है।
महर्षि रमण का मौनतप
ठीक इसी तरह से महर्षि रमण का बकाया है। वे भी अकेले रहते थे, मौन रहते थे,बात नहीं करते थे। चिड़िया आती थी, दूसरे जानवर आते थे, उनके साथ बैठ जाते थे और उनकी मौन वाणी को सुनते थे। आप भी हमारी मौनवाणी को बराबर सुनते रहेंगे। ताज वाणी को आपके कान बर्दाश्त कर सकेंगे या नहीं, यह तो मैं नहीं जनता, लेकिन हमारी आवाज जो दूसरी और तीसरी वाणी में होंगी, अब वह बोलेगी। यह वैसी ही वाणी है जिसे, हम भी आपके सामने बोल रहे है। इन्हीं वाणियों से हम आप से जिंदगी भर बात करते रहेंगे। इसके अलावा आदमी की तीन और वाणियां है। एक है! माध्यम वाणी जो व्यक्ति के चेहरे से टपकती है। दूसरी होती है - परा वाणी जो आदमी के विचारो से, दिमाग से निकलती है। तीसरी - 'पश्यंति'वाणी है, जो मनुष्य के अंतरात्मा के अंदर रहती है। यह सत्संग की वाणी है। इन तीन वाणी को कोई बंद नहीं कर सकता, इनमें कोई रुकावट नहीं डाली जा सकती है। मौन रहकर भी -एकांत में रहकर भी ये तीनों वाणी बराबर काम करती रहेगी और आपको फायदा देती रहेगी।
हमसे कुछ पाने का प्रयास कीजिए
मित्रो! यह कब फायदा देगी, यह कब तक फायदा देगी जब आप हमारे साथ घुलेंगे- मिलेंगे। अगर आप दूर-दूर रहेंगे तो बात कैसे बनेगी? दूर रहने से काम नहीं बनेगा, आपको हमारे पास आना पड़ेगा। पास आने का केवल यह मतलब नहीं है की आप शांतिकुंज में, हमारे कमरे में आ जाते हैं, मिल जाते हैं, वरन् पास आने का मतलब यह है कि आप हमारे विचारों के साथ कितनी घरी से जुड़ते हैं। हमारे पास क्या रखा है? हमने जो त्याग, तपश्चर्याएं, उपासनाएं की है, ऐसे ढेरों आदमियों के नाम बता सकता हूं, जिन्होंने इस तरह की उपासना की हैं। लेकिन यह सही बात- ईमानदारी की यह बात है की हमारे गुरु की गुरु शक्ति की सामर्थ्य हमें बराबर मिलती रही है। और उसी के आधार पर हम कठपुतलियों की तरह तमाशा करते आये हैं। आप भी आइये, आपके लिए भी रास्ता खुला है।
हमसे पहले भी बहुत से आदमियों ने इसी तरह का रास्ता खोल दिया है। रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद के जोड़े का नाम सुना है आपने। रामकृष्ण परमहंस केवल ध्यान देते थे, उन्होंने कोई अनुष्ठान नहीं किया, ना कोई विशिष्ट जप किया, ना तो हिमालय गए, परमहंस ने सारी आध्यात्मिकता संपदा उनके शिष्य नरेंद्र को मिली। उसी को लेकर विवेकानंद ने वह काम किया जो रामकृष्ण आपने शरीर से नहीं कर सकते थे।
आपने विरजानंद और महर्षि दयानंद का नाम सुना है कौन दयानंद? आर्य समाज वाले। उनके गुरु स्वामी विरजानंद मथुरा में रहते थे। वे आंख से अंधे थे। उन्होंने आपने समर्थ को स्वामी दयानंद को हस्तांतरित कर दिया। इसके बाद दयानंद ने वह कम कर दिखाया, जो हजार आदमी नहीं कर सकते थे। आपके लिए रास्ता खुला है, आप भी इस शक्ति का फायदा उठाना चाहे,जो आगे चल कर और भी ज्यादा हो जाएगी, तो उठा लीजिए। पहले से भी ऐसे बहुत से लोग है, जो हमारे साथ चलते रहे है। उन्हें लाभ भी हुआ है। गांधीजी के साथ में मीरा बहिन चलती थी, नेहरू जी चलते थे, सुभाष जी चलते थे, विनोबा जी चलते थे उन्हें क्या फायदा मिला? सब को फायदा ही हुआ है।
आपने स्वामी रामदास और शिवा जी का नाम सुना है। शिवा जी कौन थे? शिवाजी वह व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदुस्तान को आजाद कराने की तारीख में पहला कदम उठाया और समर्थ गुरु रामदास थे जो संत प्रकृति के हो गये थे और इस बात की तलाश में थे की संत के लिए आजादी की लड़ाई लड़ना, कहना-खच्चर आदि सब मुनासिब नहीं है, इस लिए कोई दूसरा रास्ता तलाश करना चाहिए। उन्होंने शिवाजी को तलाश लिया। उनका इम्तहान सिंहनी का दूध मंगाकर लिया और इसके बाद उन्होंने भवानी के हाथ से - देवी के हाथ से एक इसी तलवार दिलाई, जिसको लेकर वे अक्षय और अजेय हो गये। यहाँ कही भी वह तलवार गयी उन्हीं की विजय हुई।
जिस तरह शिवाजी और समर्थ गुरु रामदास का जोड़ा है, उसी तरीके से चाणक्य और चन्द्रगुप्त का जुड़ा है। चाणक्य के पास बहुत समर्थ थी शक्ति थी, किंतु चन्द्र गुप्त एक दासी का बेटा था वह कुछ नहीं कर पाता था। लेकिन चाणक्य की शक्ति को जब उसने स्वीकार कर लिया, तो वह चक्रवर्ती सम्राट बन गया। "मैं आप की शक्ति को स्वीकार करता हूं " कहने का मतलब है की मैं तुम्हारे कहने पर चलूँगा। अगर आप कहते हैं कि यह शक्ति हम को भी मिल शक्ति जाएगी, तो यह बेकार बात है, क्यों की शक्ति कहीं किसी को नहीं मिलती है। वे उद्देश्य के लिए मिलती है। किसी काम के लिए मिलती है किसी मकसद के लिए, किसी किसी वजह के लिए मिलती है और किसी खास आदमी को मिलती है।
शक्ति-अनुदान विशेष उद्देश्यों के लिए
मित्रो! हम खास आदमी भी है और हमें जो शक्तियां मिली है, वे किसी मकसद में लगाने के लिए मिली है हमारे गुरु से तीन बार हमारा मिलना हुआ है, लेकिन वे निरंतर हमारा मार्ग दर्शन किया करते है। ऐसा कभी नहीं हुआ कि उन्होंने कभी धीरे से कान में आकर या जोर से कही हो और हमने गौर से उनकी बात सुनी न हो। नाव को और राहगीर को जानते है न आप। नाव पार होगी तो क्या राहगीर जो उस पर बैठा है, पार नहीं होगा। जिस राहगीर को तैरना नहीं आता, वह कैसे पार होगा? लेकिन नाव में जब सवार हो जाता है, उसका मल्लाह नाव को भी पार लगा देता है और उसमें बैठे मुसाफिर को भी पार लगा देता है। आप सब हमारी नाव में बैठे है, हम आप सब को पार लगा देंगे और आपकी जिन्दगी को भी पर लगा देंगे। आप जो इतना बड़ा काम करने जा रहे है, हम उस को भी पूरा कर देंगे। आपको निश्चित रूप से हमारी शक्ति मिलती रहेगी, हमारा सहयोग मिलता रहेगा। यह काम हम पहले भी करते है,और एकांत में भी बराबर करते रहेंगे।
समय की विभीषिका बड़ी विकट
साथियों! अब ऐसा वक्त आ गया है की इस भयंकर वक्त में कुछ बड़ा कदम उठाये बगैर काम चलने वाला था नहीं। इन्हीं दिनों की विभीषिका ऐसी हुई है, जिसे आप पढ़ते होंगे। भविष्यवाणियां पढ़ते होंगे। टोरंटो की भविष्यवक्ता कांफ्रेंस - समाचार आपने पड़ा है न, कोरिया का समाचार पढ़ा है न। सारी परिस्थितियां यह समय बड़ा भयंकर है। इन दिनों हवा में इतना जहर मिल रहा है, पानी में इतना जहर मिल, खाद्यपदार्थ में इतना जहर मिल रहा है। आप जानते है की परमाणु - भट्ठी से, परमाणु विस्फोटों से कितनी तेजी से जहर फैल रहा है, जिन -जिन देशों ने बिजली उत्पादन के लिए आपने यह परमाणु भट्ठी लगायी है, उनसे विकिरण निकल रहा है। जनसँख्या में अंधाधुंध वृद्धि हो रही है। मक्खी-मच्छरों से भी ज्यादा मनुष्यों की वृद्धि हो रही है। अगले दिनों खड़े होने के लिए कही जगह भी नहीं मिलने वाली है। सड़क पर चलना भी मुश्किल हो जायेगा। खाना उनके लिए मुश्किल हो जायेगा।
यह सब मुसीबतें नहीं बहुत बड़ी मुसीबतें है। एटमी युद्ध से भी ज्यादा भयावह है ज्यादा बच्चा पैदा होना क्राइम को -अपराध को जन्म देना है। आपने देखा नहीं, आज आदमी की मनोवृत्ति अपराध करने की हो गयी है। ईमानदारी व भलमनसाहत किसी की समझ में नहीं आता है। लालाजी दुकान पर बैठे तो जरूर है, पर मिर्च में गेरू मिल दे रहे है। लोग मंदिर दर्शन करने जरूर जाते है, हनुमान चालीस का पाठ जरूर करते है, लेकिन नियत उनकी भी खराब होती है। यदि आदमी की नियत खराब हो जाये तो उससे भयंकर भला और क्या हो सकता है?
ये सारी की सारी चीजें एक साथ क्या मिल गयी है, विश्व -मानवता के सामने मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा है। अब आप ही बतायें इन चीजों से भला कौन ले? हर आदमी लेगा? आप लेंगे? चौराहे पर खड़े नेता लोग टक्कर ले लेंगे? यह बिलकुल भी संभव नहीं है। इसके लिए तो सामर्थ्यवान व्यक्ति होना चाहिए। जब तक कोई समर्थवान नहीं होगा तो इतनी बड़ी शक्तियों से टक्कर नहीं ली जा सकती। फिर टक्कर लेने वाले बुत से तैयार हो जाते हैं। दो काम करने हैं। एक तो भान्यकर्ता हमारी आपकी ओर घनघोर घ्त्र के रूप में बढ़ती चली जा रही है, उससे टक्कर लेनी है टकराव के लिए मजबूती आदमी होना जरूरी है मजबूत हस्तियां चाहिए। मजबूत आध्यात्मिक शक्ति चाहिए।
भागीरथी पुरुषार्थ की वेला
आप ने पढ़ा होगा- सृष्टि के इतिहास में दो बार ऐसी ही घटना हो चुकी है। एक बार सब जगह पानी की कमी पड़ गयी थी, पानी कहीं था ही नहीं। भागीरथ स्वर्ग से गंगा को जमीन पर लाने के लिए तप करने लगे। गंगा जमीन पर आई और धरा चहुंओर लहलहा उठी। यह क्या है तप की शक्ति। ऐसी तरह दूसरी घटना है। बहुत समय पहले की बात है - वृत्तासुर नामक एक ऐसा राक्षस था, जिसने सारे देवताओं को मार कर भगा दिया था। तब उसका मुकाबला करने के लिए दधिचि को अपनी हड्डी देनी पड़ी थी। उसका जो वज्र बना कर उससे जो मारा गया। जब ये सब आप ने सुना है। तो बात सुन लीजिए की आप चाहे तो हमारी भी संगति उसी से बिठा सकते है।
वृत्तासुर हनन हेतु दधिचि ने दिया वज्र
आज इस समय आ गया है की भागीरथ को फिर एक बार इस धरती पर ज्यों की गंगा लानी है, जिससे दुनिया में सन्ति पैदा हो। दूसरी ओर दधिचि का वज्र जो इंद्र के हाथ में रहा था और उसके प्रहार से वृत्तासुर का चुरा हो गया था, चुरा कर देने वाली ऐसी शक्ति चाहिए। वज्र की शक्ति और ज्ञान गंगा की शक्ति का संतुलन करने के लिए हमारा कार्यक्रम चल पड़ा है। हम उसी के लिए ताप कर रहे है। आप यह मत सोचिए की हम भाग रहे है? हम भाग नहीं रहे है। हम माँ के पेट में बैठे है, ताकि हम अपनी शक्ति बड़ा करके और ज्यादा कर सके। क्या आप यही ख्याल करते है की औरों की तरीके से हम भी स्वर्ग की प्राप्ति के लिए कोशिश कर रहे है? या मुक्ति के लिए कुछ कर रहे है?आपका यही ख्याल है की सिद्धियां और ऋद्धियां पाने के लिए तप कर रहे है? नहीं बेटे, यह तो हमने बहुत पहले से ही पता कर लिए थे। स्वर्ग हमारी निगाहों में हर जगह दिखाई है,
इसी तरह मुक्ति का बंधन हम न जाने कब के काटकर फेंक चुके है लोभ हमारे पास नहीं है, हमारे पास आता भी नहीं है। वासनाओं की सलाखें, अहंकार की जंजीरें जाने
कब का तोड़कर फेंक चुके होते है मुक्ति के लिए भी प्रयास तो हम तब करे जब हमें यहां रहना हो और सिद्धियां? सिद्धियों के लिए उसी को कोशिश करना चाहिए जिसके पास यहां न हो। हमारे पास स्वर्ग चारों ओर नजदीक ही घुमा करता है। हम अपने आप को तपा रहे है। हीरा देखा है। वः कोयला होता है, उसको ज्यादा गर्मी दी जाती है तो वह हीरा बन जाता है। एटम देखा है ना आपने? वह धुल का एक कण होता है, जो जमीन पर पड़ा रहता है, लेकिन जब वैज्ञानिक विधि से अलग किया जाता है और उसका विस्फोट किया जाता है, तो हिरोशिमा और नागासाकी जैसा विध्वंसकारी बन जाता है।
पंचमुखी गायत्री की उपासना पांच वीरभद्रों का जागरण
मित्रो! अब हम पंचमुखी गायत्री की साधना करने जा रहे हैं। अब तक हमने एक मुखी गायत्री की उपासना की है। तो आपने हमें क्यों नहीं बताया पंचमुखी गायत्री की उपासना? इसलिए की आप इसे नहीं कर सकते हैं। आपको एक मुखी गायत्री की उपासना करना ही मुश्किल है। माँ और बेटे का सम्बन्ध निभाना ही मुश्किल है। पंचमुखी गायत्री की, पांच देवताओं की उपासना कर रहे हैं, पाँच इष्टों की की उपासना कर रहे हैं, पाँच शक्तियों की उपासना कर रहे हैं, क्योंकि हमें पांच क्षेत्रों में काम करना है। बुद्धिजीवियों के साथ काम करना है। हमको राजनेताओं की अक्ल ठिकाने लगाना है। हम कलाकारों को एक खास रास्ते पर ले जायेंगे। हम सम्पन्न आदमियों से कुछ कम कराएंगे और आप जैसे लोगों से, जिनको हम भावनाशील कहते हैं। आप बुद्धिजीवी न सही, राजनेता न सही, किसी देश के प्रधानमंत्री न सही, उससे हमें क्या लेना देना। कलाकार आप नहीं है, आपकी वाणी में जोश-खरोश और दूसरी अन्य गायन सम्बन्धी विशेषताएं नहीं है, तो न सही? आप सम्पन्न नहीं, तो न सही, मरने दीजिए पैसे को; भावनाशील तो है आप। यहां संसार की, सबसे बड़ी यहां दौलत है। हमें आपको अग्रिम मोर्चे पर खड़ा करना है।
इसी तरह भावनाशीलों को, बुद्धिजीवियों को, कलाकारों को, राजनेताओं को, संपन्न व्यक्तियों को आगे से जाकर के हमको झकझोरना है और इस तरीके से रास्ते पर लाना है की वे लड़ाई के मोर्चे पे हमारे साथ-साथ चले। कंधे-से-कंधे मिलाकर चले। पांडव का नाम तो सुना होगा न? की वे पाँच भी भाई थे। अर्जुन धनुर्धर था, उसके साथ-साथ उसके सभी भाई चलते थे। क्या मजाल की कोई अलग हो जाये। हम इसी तरीके से प्रबंध कर रहे हैं। हम इसी तरीके से प्रबंध कर रहे हैं। हमारी पाँच गुना शक्ति बढ़ने जा रही है। हम पाँच वीरभद्र पैदा करने में जुटे रहे हैं। हम आप से कही दूर नहीं जा रही है और न अलग हो रहे हैं।
मित्रो, अभी हम आपको सफाई दे रहे थे की कही आप इस तरीके से न सोच ले कि गुरु जी अपनी मुक्ति के लिए, स्वर्गप्राप्ति के लिए हमको दगा दे रहे हैं और हमसे जो बातचीत करते हैं, उस तरीके को भी उन्होंने बंद कर दिया। ऐसी बात नहीं है, हम तो आपके पीछे भूत की तरीके से लगे हैं। ऐसी तरह हम राजनेताओं के पीछे, कलाकारों के पीछे, बुद्धिजीवियों और संपन्न व्यक्ति के पीछे भूत की तरह से लगेंगे। नया युग लाने के लिए हमें जिन भी शक्तियों की आवश्यकता पड़ेगी, उसे ऐसी क्रम में नियोजित करेंगे। उसके लिए तब क्या करना पड़ेगा? हम आपसे अलग चले जायेंगे। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है समझना की अलग चले जाने से कोई दुश्मनी होती है। माँ अपने बच्चे को गुरुकुल में पढ़ने के लिए भेज देती है, तो क्या माँ बच्चे की दुश्मनी होती है। धन कमाने के लिए कोई परदेश चला जाता है, और परदेश में दो पैसे कमाकर अपने बच्चों के मनीआर्डर से भेजता रहता है। आप समझते है की बाप, जो परदेश चला गया था, उसने अपने बच्चों से मुहब्बत कम कर दी? अपने माता-पिता से मुहब्बत कम कर दी? न, ऐसा मत कहिये। अलग होने का मतलब मुहब्बत कम करना नहीं होती है, इस मुहब्बत को सार्थक करने के लिए ही हमारे ये नये कदम उठे है।
देते ही रहेंगे हम जीवन भर
आप हमको देख नहीं पायेंगे, तो कोई हर्ज की बात नहीं। जब आप अपने आमाशय, गुर्दे, जिगर, हृदय आदि को नहीं देख सकते, फिर भी वे आप के साथ काम करते हैं। आपका दिल फिर भी आपके साथ धड़कता तो है, फिर आप क्या शिकायत करते है। अभी तो हम सन २००० तक स्थूल या सूक्ष्म रूप में जिन्दा रहने वाले है। यह एक भयंकर समय है जिसमें की आदमी की मुस्तैदी - चौकीदारी की बराबर जरूरत है। इस संध्याकाल की बेला में हम बराबर काम करेंगे और आपके साथ रहेंगे। यह हमारी आवश्यकता भी है। इसमें हम कभी कमी नहीं आने देंगे। हमने जिंदगी भर दिया है और देते रहेंगे। आपके नजदीक न रहेंगे तो क्या? सूर्य आपके नजदीक है क्या? फिर भी आप धूप में बैठे, और आपके कपड़े सुखा जाता है। चंद्रमा आपके नजदीक है क्या, लाखों मील दूर है। समुद्र आपके नजदीक है क्या, समुद्र ना जाने कितनी दूर है आपसे, फिर भी वह बराबर आपका ख्याल रखता है। आप जो पानी पीते है, कपड़े धोते है, स्नान करते है, वह पानी कहाँ से आता है? बादलों से आता है।बदल कहाँ से आते है? समुद्र से। समुद्र का दिया हुआ पानी आप पीते है, परन्तु समुद्र को शायद ही आपने देखा हो। सूर्य और चंद्रमा की शक्ल आप ने देखि है, पर उसके नजदीक आप गए है क्या? उसके पास तक पहुंचे है कभी? नहीं पहुंचे है। तब सब चीजें आप से बहुत दूर है। लेकिन दूर रहते हुए भी आपकी सेवा करते हैं कि आपकी जिन्दगी को संवारे बैठी है। यदि हवा आपको ना मिले तो आपके प्राण निकल जायेंगे। हवा आपने देखी नहीं। अतः देखने की बात आप अपने मन से हटा दे। आप-हमको न देख पाए या हम आपको, इससे कुछ बनता -बिगड़ता नहीं है। हम एकांत में रहा कर ज्यादा मजबूती से काम करेंगे। और आप से भी यही उम्मीद करेंगे की आप भी ज्यादा मजबूती से हमारे साथ - साथ कदम उठाएंगे।
आप हमारे विचारो के समीप आएं
मित्रो! हम चाहते है की आप हमारे नजदीक आये, साथ-साथ कंधे-से -कन्धा मिलाकर चले। हमारे नजदीक और पास नहीं आयेंगे और दूर बने रहेंगे तो फिर हमारा शक्ति एकत्रित करना भी बेकार है। अगर आप बुद्धिजीवी है, राजनेता है, संपन्न है, कलाकार है, लेकिन भावनाशील नहीं है, तो हमारे किस काम के? आपको भावनाशील होना चाहिए। हमें भावनाशीलों की जरूरत है अन्यथा हमारे मोहल्ला - पड़ोस में ढेरों मजदूर काम करते है, तो किसी की कृपा अनुग्रह उन पर हुई है क्या? हम आपने गुरुदेव के नजदीक है। तीन बार उनके पास गये है। बाकी चौबीसों घंटे उन्हीं का हुक्म बजाते है और कहते है की आप आदेश दीजिए। हम क्या कहते और चाहते है, उस बात को आप गौर से सुनना। अगर आप गौर से नहीं सुनेंगे तो फिर हमारे नजदीक रहने, न रहने से कोई फायदा नहीं। शिव भगवन् और पार्वती बहुत दूर रहते है कैलाश पर्वत पर, परन्तु इतनी दूर रहते हुए भी आपकी सेवा में कोई कमी नहीं आने देते है। जब भी आप ध्यान करते है, वे कैलाश पर्वत से उतर कर सीधे आप तक चले आते है। भगवान् विष्णु क्षीरसागर छोड़ कर आप तक चले आते है। अतः आप सिद्धांतों को सुनिए, सिद्धांतों को को समझिये। बच्चों का सा मत देखिए की आप हमारी शक्ल देखे और हम आपकी शक्ल देखे। देखना हो तो देख भी लेना हम इंतजाम किये देते हैं। आप आमने-सामने आवाज ना सुन सकेंगे ना सही, हम टेप कराये देते हैं, इसे आप सुन लेना। आपको संतोष तो हो। आपको संतोष हो जाएगा, तो हम को बहुत प्रसन्नता होगी।
आज आपको सफाई देने और आगे का काम बताने के लिए ही बुलाया है। सफाई इसके लिए नहीं की अभी आपको सन् २००० तक जीवित रहना है। इस शरीर से न भी रहे, तो सूक्ष्म शरीर से रहेंगे। मनुष्य के तीन शरीर है - स्थूल, सूक्ष्म और कारण। स्थूल शरीर मर भी जाये तो इससे क्या बिगड़ता है। किन्तु स्थूल शरीर न रहने पर उससे कई गुना ज्यादा काम सूक्ष्मशरीर से किया जा सकता है। गुरूजी तो क्या आप हिमालय चले जायेंगे? हिमालय चले जायेंगे, तो आपको क्या दिक्कत आयेगी? हमारे गुरु भी हिमालय में रहते हुए भी, हमारी बहुत सेवा करते हैं। हम कहीं भी चले जाएँ, हिमालय चले जाएँ, शांतिकुंज में रहें, या इस शरीर को छोड़ जाएँ, पर आप यह विश्वास रखिये की हम सन् दो हजार तक हम यही शांतिकुंज में मौजूद रहूंगा। इस अवधि में आप हमको बराबर अपने समीप पायेंगे और आपके के लिए बराबर काम करते रहे होंगे। बस आपसे इतनी ही प्रार्थना है कि आप हमारे लिए भी कुछ काम कीजिए, तो मजा आ जायेगा और क्या कहूँ आगे। आज की बात खत्म करता हूँ।
ॐ शांतिः।।
महिष्मती के प्रतापी सम्राट नृपेन्द्र का यश पूर्णिमा की चंद्रमा की भांति सर्वत्र फैल रहा था। राजकोष सेना, स्वर्ण, सौन्दर्य, शक्ति किसी की वास्तु का कोई अभाव न था। महाराजा नृपेन्द्र प्रजावत्सल और न्यायकारी थे। सम्पूर्ण प्रजा भी बहुत श्रद्धा की दृष्टि से देखती थी।
समय बीता। शक्ति घटी। शरीर टूटा। वृद्धावस्था बैठने लगी और उसके साथ ही नृपति के अंतर में उद्वेग और क्षोभ छाने लगा। उन्होंने बोलना-चलना बंद कर दिया। किसी से मिलते भी नहीं थे। उदास, बेचैन रजा न जाने किस चिंता में डूबे रहते?
एक दिन बड़े सवेरे सम्राट राज-उद्यान की ओर निकल गये। एक स्फटिक शिला पर पूर्वाभिमुख अवस्थित नृप भी कोई वास्तु खोज रहे थे। धीरे-धीरे प्रातः रवि उदित हुआ। राजसरोवर में उनकी बाल किरणें पड़ी और सहस्र दल कमल खिलने लगा। धीरे -धीरे कमल पूर्ण रूप से खिल गया और अपना सौरभ सर्वत्र बिखेरने लगा।
आत्मा से आवाज़ फूटी - क्या तुम अब भी रहस्य नहीं जान पाये की सूर्य का प्रकाश कहाँ से आता है? प्रकाश उनके अंतर स्फुरणा नहीं है क्या? कमल का सौरभ उसके भीतर से ही फूटता है। यह जो सर्वत्र जीवन दिखाई देता है वह सब विश्व - आत्मा के भीतर से ही फूटता है। आनंद का स्रोत तुम्हारे भीतर है। उसे तुम्हें ही जगाना पड़ेगा। उसके लिए आत्मोन्मुख बनना पड़ेगा और साधना करनी पड़ेगी।
मनुष्य का जीवन दो प्रकार से कटता है। (१) जागते हुए (२) सोते हुए। आमतौर से लोग दिन में जागते हैं और रात को सोते है। सूना जरूरी भी है, क्योंकि बिना उसके शारीरिक और मानसिक थकान नहीं मिटती। दिनभर काम करने से जो शक्तियाँ व्यय होती है, उनकी क्षतिपूर्ति के लिए निद्रा की आवश्यकता पड़ती है। रातभर सोकर जब मनुष्य प्रातः:काल उठता है, तो उसमें स्फूर्ति और ताजगी होती है। काम करने की नई क्षमता आ जाती है। यदि दो चार दिन भी लगातार न सोया जाये, तो इतनी थकान हो जाएगी की जीवन यात्रा का चलना दुर्लभ दिखाई देगा।
जिस प्रकार सोना जरूरी है, उसी प्रकार जागना भी जरूरी है, क्योंकि जितने भी काम होते है, जाग्रतावस्था में ही होते है। निर्वाह और विकास की समस्त कार्यप्रणाली जाग्रत अवस्था में ही चलती है। यदि निंद्रा ही प्रधान रूप धारण कर ले और जागरण कम हो जाये, तो भी जीवन में विकट संकट उत्पन्न हो जाता है। जिस प्रकार गाढ़ी निद्रा में सोने से थकान पूरी तरह से मिट जाती है और नयी प्रफुल्लता पैदा होती है, उसी प्रकार पूरी तरह से जाग्रत रहने से जाग्रत जीवन की कार्यप्रणाली सुचारु रूप से चलती है।
कितने ही मनुष्य ऐसे है, जो जाग्रत अवस्था में भी सोते रहते है।उनके मस्तिष्क का एक अंश जगता रहता है और शेष भाग सोता रहता है। इस अर्धमूर्च्छितावस्था में रहने वाला मनुष्य एक प्रकार से लुंज हो जाता है। उसकी दशा करीब- करीब अर्धविक्षिप्त जैसी, भुलक्कड़ बालक-सी एवं अपाहिज की सी हो जाती है। यह जाग्रत तन्द्रा का ऐसी भयंकरता से फैला हुआ है की आजकल अधिकांश इसके शिकार मिलते है।
इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। पाठकगण अविश्वास न करें। सचमुच ही यह रोग बड़े भयंकर रूप से फैला हुआ है और अधिकांश जनसमूह इससे ग्रसित है। इस रोग का रोगी देखने में अच्छा - भला, तंदुरुस्त, हट्टा–कट्टा और भला -चंगा मालूम होता है, शारीरिक दृष्टि से तंदुरुस्ती में कोई फर्क नहीं मालूम पड़ता, फिर भी जाग्रत तन्द्रा के कारण उसके जीवन का सारा विकास रुका हुआ होता है। उसकी सारी प्रतिष्ठा एवं साख नष्ट हो जाती है। जिम्मेदारी के साथ होने वाली सभी महत्वपूर्ण कार्यों से वह वंचित रह जाता है।
जाग्रत तन्द्रा के तीन दर्जे हैं- (१) लापरवाही, (२) आलस्य,(३) प्रमाद। तीनों ही क्रमशः अधिक भयंकर एवं घातक हैं। कहने और सुनने में ये तीनों बहुत मामूली बातें प्रतीत होती है, क्योंकि अधिकांश लोग इनसे ग्रसित होते दिखाई देते है। फिर भी इनके लगने से इनकी भयंकरता कम नहीं हो जाती। दुर्गुण जहाँ रहते है, अपने दुष्परिणाम उत्पन्न किये बिना नहीं रहते।
यह एक सुनिश्चित तथ्य है की जिस कार्य को मनुष्य पूरी दिलचस्पी से, जाग्रतमन से, ध्यानपूर्वक करेगा, वह कार्य ठीक, निर्दोष एवं सुंदर होगा। इस जाग्रति एवं दिलचस्पी में जितनी कमी होगी उतना ही फूहड़पन रह जायगा और भूलें होती चली जायेंगी। घोड़ा जितनी तेज़ चलता है, उतनी ही तेजी से तांगे का पहिया घूमता है? पहिया स्वतन्त्र रूप से नहीं चलता। उसकी गति घोड़े की चाल के ऊपर निर्भर है। मन की जिस कार्य में जितनी रुचि होगी, वह उतना ही अच्छा बन पड़ेगा। यदि घोड़ा ऐब ले आयेगा, तो तांगे की चाल रुक जाएगी. यात्रा देरी से पूरी होगी, बैठने वालों को कष्ट होगा और हर घड़ी खतरा बना रहेगा। यही हाल दिलचस्पी की कमी के साथ किये जाने वाले कामों का होता है। वे अनेक प्रकार से भरे होते है।
क्रियापद्धति के साथ पूरी दिलचस्पी को न जोड़ना 'जाग्रत तन्द्रा' का प्रमुख चिन्ह है। इस अवस्था में किये गए कार्यों का ठीक प्रकार पूरा होना असंभव है। अधूरे मन से किये गए कार्य को, लापरवाही, असावधानी, आलस्य एवं प्रमाद नाम इस लिए दिया जाता है। हर काम को सफल बनाने के लिए दो बातों का धान रखना पड़ता है। एक यह की " इस कार्य को उत्तमता के साथ किये जाये।" दूसरा ये धान रहे की " कहीं यह कार्य खराब न हो जाये।" सफलता का लोभ और असफलता का भय- इन दोनों वृत्तियों का समन्वय ही जागरूकता है। जैसे पॉजिटिव व नेगेटिव तारों के मिलने से ही बिजली की धारा का संचालन होता है, ठीक वैसे ही उपर्युक्त लोभ और भय का धाय रखने से मानसिक जागरूकता उत्पन्न होती है यह जागरूकता सतेज होकर शरीर और मस्तिष्क की काम करने वाली शक्तियों को संगठित और संयोजित करके सुव्यवस्थित रूप से कार्य में प्रवृत्त करती है, तब वह कार्य सफल हो जाता है।
परन्तु जब मनुष्य असफलता की लज्जा को भूल जाता है और असफलता के गौरव की उपेक्षा करता है, तब उस जागरूकता रूपी विद्युत शक्ति का संचार नहीं होता। नाड़ियां शिथिल पड़ जाती है कार्य करने की शक्ति मंद पड़ जाती है। सामने पड़ा कार्य पर्वत के सामान भरी प्रतीत होते है। उसे करते समय मन में स्फूर्ति नहीं उठती, वरन् बेगार के भार की तरह झुंझलाते हुए उसे किया जाता है। जब उस कार्य में रस नहीं आता तो उसके बिगड़ सुधर की बारीकियों की ओर भी मन नहीं जाता है। ऐसे स्वभाव ही असावधानी या लापरवाही कहा जाता है। ऐसे स्वभाव के आदमी में दो प्रकार के दोष और पाए जाते हैं, वह (१) आगे-पीछे के कार्यक्रम की परवाह नहीं करता। (२) अपने उत्तरदायित्व को अनुभव नहीं करता। जहाँ पहुँच गए बस वाही की बातों में उलझ गए। जरूरी काम को छोड़कर दस मिनट के लिए किसी से मिलने गए हैं, तो तीन घंटे निरर्थक गप्प हांकने में लगा दिए। लौटकर देखते है की बहुत काम हर्ज हो गया है। उस वक्त कुछ अफसोस भी करते है, पर फिर वही रफ्तार, दूसरे दिन फिर वैसी ही लापरवाही, नियत समय पर कोई काम नहीं। स्नान, भोजन, जागना, सोना कुछ भी समय पर नहीं। जीविका उपार्जन का जो व्यवसाय है, वह भी ऐसा ही खण्ड-खण्ड हो जाता है। दुकान पर बैठते है, कभी नहीं बैठते। निराश ग्राहक लौट जाते है। नौकरी में देरी से पहुँचते है, रोज असंतुष्ट मालिक के उलाहने सुनते है। फल यह होता है की इस लापरवाही के कारण आर्थिक स्थिति गिरने लगती है और धीरे-धीरे दरिद्र बन जाते है।
लापरवाह व्यक्ति अपने वचनों का पालन नहीं कर पाता। वह पहले तो सोचता है की अभी क्या जल्दी है, बहुत समय पड़ा है, इस काम को बहुत जल्द ही पूरा कर देंगे। ऐसे ही टालते-टालते समय बीत जाता है और जब वचन पूरा करने की अवधि बिल्कुल समीप आ जाती है, तब उसके हाथ-पैर फूल जाते है की अब यह कार्य कैसे पूरा हो। अंत में दांत निपोरकर रह जाते है।
जिन में जागरूकता नहीं है, उनकी साड़ी चीजें अस्त-व्यस्त रहती है। उनके निवास पर जाकर देखिये तो साड़ी चीजें इधर-उधर, अस्त-व्यस्त, कूड़े-कचरे की तरह जहाँ-तहाँ पड़ी होंगी। शरीर मैला, कपड़े बेढंगे, हजामत बढ़ी हुई, बिल्कुल अव्यवस्थित जीवनक्रम। यदि कोई दूसरा व्यवस्था करने वाला न हो तो उनके चारों ओर दरिद्र महाराज छाये हुए दृष्टिगोचर होंगे।
लापरवाही के बड़े भाई का नाम आलस्य है। मानसिक असावधानी को लापरवाही कहते है। यही जब बढ़ती चली जाती है, तो शरीर पर भी कब्जा जमा लेती है। फिर परिश्रम करना बुरा लगता है। जब तक अत्यंत उग्र प्रेरणा न उठे, तब तक मेहनत करने को देह सक्रिय नहीं होती। अपना काम दूसरों से करने के अवसर ताका करते हैं। शरीर को उठाकर इधर-उधर ले जाना ऐसा लगता है, मनोपहाड़ उठाने का काम उन्हें करना पड़ रहा हो। समय को वे निरर्थक गंवाते रहते हैं और हर काम को नियत अवधि से पीछे करते है। आलस्य उनका किसी काम में साथ नहीं छोड़ता। आलस्य में ही उनके जीवन-क्षण निरर्थक बर्बाद होते रहते है।
प्रमाद इन दोनों से भी आगे बढ़ी हुई स्थिति है। जानबूझकर, अधिक उपयोगी एवं आवश्यक कार्यों की ध्राश्ताता पूर्वक उपेक्षा करना, उन्हें बिगड़ने देना प्रमाद कहलाता है। अलसी या लापरवाह व्यक्ति अपनी भूल के लिए कुछ पश्चाताप करता है, किन्तु प्रमादी व्यक्ति जानता है की लापरवाही का क्या दुष्परिणाम हो सकता है, फिर भी अपनी धृष्टता और निर्लज्जता के चलते उसकी परवाह न कर उपेक्षा करता है। कर्त्तव्य पालन न करने पर जो भर्त्सना होती है, उससे शर्मिंदा होने के स्थान पर वह ध्रष्टतापूर्वक बेतुके जवाब देता है। अपनी भूल का निराकरण या सुधार करने के स्थान पर वह भर्त्सना करने वाले के दोष दिखाने लगता है।
लापरवाही, असावधानी, गैरजिम्मेदारी, आलस्य, प्रमाद जैसे भयंकर दोष 'जाग्रत तन्द्रा' के कारण पैदा होते हैं। साधारण दृष्टि से देखने पर ये दोष छोटे मालूम पड़ते हैं। उनसे किसी भयंकर अनर्थ की आशंका नहीं मालूम पड़ती। इसलिए अधिक ध्यान नहीं दिया जाता। परन्तु स्मरण रखा जाना चाहिए की "छोटी-छोटी आदतों से ही जीवन-निर्माण होता है। छोटे-छोटे परमाणुओं के संगठन से कोई बड़ी वास्तु बनती है। पीले और नीले रंग के नन्हे नन्हे परमाणु अमुक मात्र में मिल जाते है- तो हरा रंग बनता है, पर यदि उनकी मात्र में न्यूनाधिकता रहे तो दूसरी प्रकार का रंग बनेगा। निशाना लगते समय यदि बन्दूक की नली एक जौ भर भी नीची हो जाए, तो निशाने तक गोली के पहुँचने में कई गज का अंतर पड़ जाता है। इसी प्रकार छोटे-छोटे गुणों, छोटे-छोटे दोषों का अंतर जीवन की अंतिम सफलता में जमीन आसमान का फर्क कर देता है।
दिन का अधिकांश समय, एक बच्चा एकांत में बिताता। न खाने में कोई तर्क, न बहार निकलने की इच्छा। कही जाना होता तो अपनी रह जाता और अपनी रह आप लौट आता।
पिता को चिंता हुई। एक दिन पूछ ही लिया-"बेटा! आजकल काम-धंधा कुछ नहीं करते। कुछ कष्ट रहता है क्या?"
बेटे ने विनीत भाव से उत्तर दिया- "पिताजी! आप ही तो कहते थे-मनुष्य को शांति का जीवन बिताना चाहिए।" पिता ने हँसकर कहा-"बेटे! चुपचाप पड़े रहें का नाम शांति नहीं, कैसी भी स्थिति हो धैर्य रखकर, अनिवार्य दुखों को स्वयं वीरतापूर्वक झेलता हुआ भी उद्विग्न न हो, उसे शांति कहते है।"
मस्तिष्क शरीर का एक महत्वपूर्ण स्थान है। उसके गड़बड़ाने और लड़खड़ाने से व्यक्तित्व की सम्पूर्ण संरचना प्रभावित होती है और मनुष्य कुछ-का-कुछ बनता और कहीं- से- कहीं पहुँच जाता है।
व्यक्ति के उत्थान और पतन में मस्तिष्क का बहुत बड़ा योगदान है। लोभ-मोह, कामना-वासना, त्याग-सेवा, पुण्य-परमार्थ- यह कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी स्तर पर मस्तिष्क से सम्बन्ध है- ऐसा शरीरवेत्ताओं का मत है। उनका कहना है की ऐसा यदि नहीं होता, तो सर्वसाधारण में अपने द्वारा बने पड़े कुकृत्यों का पश्चाताप कभी न उभरता और वे प्रायश्चित कर्म के लिए शायद ही तैयार होते। यह इस बात का प्रमाण है की उनके मस्तिष्क की कामना, वासना, सेवा, त्याग, लोभ, मोह के केंद्र कहीं-न-कहीं अवश्य है। सामान्य स्थिति में यह निष्क्रिय जैसे अवस्था में पड़े रहते है; पर उन्हें उद्दीप्त करने वाले तत्सम्बन्धी कारक जब उनके समक्ष उपस्थित होते है अथवा उनकी ( कारकों की ) बार - बार की स्मृति से जब वे केंद्र विक्षुब्ध होते है, तो व्यक्ति अनपेक्षित रूपों में ऐसे कृत्य कर डालता है, जिनके बुरे होने पर संताप और पश्चाताप होता है अच्छे होने पर संतोष और आनंद।
इसे यों समझो। जब किसी चोर को नोटों की गद्दियाँ कहीं दीख जाती है, तो उसकी लार टपकने लगती है और वे उन्हें येन-केन प्रकारेण प्राप्त करने की कोशिश करने लगता है। ऐसे ही व्यभिचारी को तनिक भी मौका मिलते ही वह अपनी काम-पिपासा को तृप्त करने से नहीं चूकता। चूँकि व्यभिचारी और चौर-वृत्ति उनकी सामान्य प्रवृत्ति बन चुकी होती है और तत्सम्बन्धी मस्तिष्कीय केंद्र सम्पूर्ण रूप से जाग्रत हो चुके होते है, अतः: ऐसे दुरितों के पश्चात उनमें पश्चाताप नहीं उभरते, किन्तु साधारण व्यक्ति में जब परिस्थितिवश, मजबूरी से या अकस्मात रूप से असाधारण कारक के आ उपस्थित होने पर जब उपयुक्त कृत्य बन पड़ते है, तो बाद में इसका भारी दुःख भी उन्हें ही होता है, कारण की तब वे मस्तिष्कीय केन्द्रों की अचानक सक्रियता के कारण इतने अनियंत्रित हो उठते है की उनको भले-बुरे का ज्ञान जाता रहता है, पर उद्दीपक के हटते ही या क्रिया के सम्पन्न हो चुकने के उपरान्त केंद्र जब सामान्य दशा में लौटते है, तो उन्हें अपनी भरी भूल का ज्ञान होता है।
यही बात सेवा और सहयोग के बारे में भी है। कई बार कई व्यक्ति सामान्य जीवन जीवनक्रम में अत्यंत कठोर होते है, सहयोग,सहकार तो उनके स्वभाव में ही नहीं होता, किन्तु राह चलते, सड़क किनारे के फटेहाल लोगों को देखकर अचानक इतने द्रवित हो उठते हैं कि अचंभा होता है कि यह वे ही व्यक्ति है या कोई और? यह सब उद्दीपक की सामर्थ्य पर निर्भर करता है की वह सामने वाले के मस्तिष्कीय केंद्र को किस स्तर तक कितना प्रभावित- उत्तेजित करता है? सेवाभावी लोगों में तत्सम्बन्धी केंद्र अत्यंत सक्रिय अवस्था में होता है अतः: उन्हें सोते-जागते सदा इसी कार्य की चिंता बनी रहती है और उसी में आनंदमग्न होते है। अन्य कार्यों में उन्हें रस आता ही नहीं। यही उनकी पूजा, प्रार्थना तथा भक्ति है।
विवेकानंद ने एक स्थान पर कहा है की चिंतन यदि पवित्र है और भावनाएँ शुद्ध, तो इसका यह अर्थ है की व्यक्ति की समस्त निम्न प्रवृत्तियां उच्चस्तरीय तरंगों में रूपांतरित हो चुकी है। इसका तात्पर्य इतना ही हुआ की मस्तिष्क के वे केंद्र अब परिष्कृत चेतनासंपन्न बन गए।
अब विज्ञान भी इस अवधारण का समर्थन करने लगा है। स्टटगार्ट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने लम्बे काल तक मस्तिष्कीय शोध के उपरान्त यह निष्कर्ष निकाला है की व्यक्ति की जब भौतिकवाद से अध्यात्मवाद की ओर, बुराई से अच्छाई, अनुचित से उचित, अनीति से नीति, बेईमानी से ईमानदारी की ओर से अभिरुचि और रुझान होने लगता है, तो उसमें मस्तिष्क की संरचना ( एनोटॉमी ) नहीं, वरन् क्रियापद्धति ( फिजियोलॉजी ) बदलती है। इस प्रकार घृणा का प्रेम में, क्रोध का वात्सल्य में, स्वार्थ का त्याग में एवं मोह का उत्सर्ग में रूपांतरण हो जाता है। इसे आकृति का नहीं, प्रकृति का बदलाव कहना चाहिये। जप, तप,व्रत, अनुष्ठान का सम्पूर्ण तत्वदर्शन इसी निर्मित है की उनसे हमारी मानसिक वृत्तियां पवित्र एवं शुद्ध बने, अपवित्रता का आवरण हटे और व्यक्तित्व इतना प्रखर हो, प्रमाणिक तथा उच्चस्तरीय बने की उसकी उपमा इंसान से नहीं, भगवान से दी जा सके।
मस्तिष्क एक जटिल संरचना है और कार्य प्रणाली वाला अवयव है। पिछले दिनों इस पर काफी अध्ययन और अनुसन्धान हुए है, की मनुष्य उत्कृष्टता की तुलना में निकृष्टता की ओर क्यों इतनी सहजता और सरलता से बहता चला जा रहा है?
एक लड़की ने पूछा- " पिता जी! कौवा और कोयल दोनों काले है, पर लोग कौवे को मारते और कोयल को प्यार करते है, यह क्यों?" बालिका पर एक सकरुण दृष्टि डालकर पिता ने उतर दिया -" कोयल सबको प्यार करती है, इसलिए मीठा बोलती है। वाणी और भावनाओं की के कारण ही वह सर्वप्रिय बन गई। कौवे तो अपने स्वार्थ और धूर्तता के कारण ही उस आदर से वंचित रह गया।"
सूक्ष्मीकरण साधना के दौरान नैष्ठिक कार्यकर्ताओं के लिए पूज्य गुरुदेव द्वारा एक बार नित्य पढ़ने के निर्देश के साथ लिखा गया एक विशेष पत्रक
यह मनोभाव हमारी तीन उंगलियां मिलकर लिख रही है, पर किसी को यह नहीं समझना चाहिए की जो योजना बन रही है और कार्यान्वित हो रही है, उसे प्रस्तुत कलम, कागज या उंगलियां ही पूरा करेंगी। करने की जिम्मेदारी आप लोगों की, हमारे नैष्ठिक कार्यकर्ताओं की है।
इस विशालकाय योजन में प्रेरणा ऊपर वाले ने दी है। कोई दिव्यसत्ता बता या लिख रही है। लिखा ही नहीं रहा है, वरन् उसे पूरा करने का ताना- बाना भी बुन रहा है। योजना की पूर्ति में न जाने कितनों का, कितने प्रकार का मनोयोग और श्रम, समय, साधना आदि का कितना भाग होगा। मात्र लिखने वाली उंगलियां न रहे या कागज-कलम चुक जाए, तो भी कार्य रुकेगा नहीं, क्योंकि रक्त का प्रत्येक कण और मस्तिष्क का प्रत्येक अणु उसके पीछे काम कर रहा है। इतना ही नहीं, वह दैवीसत्ता भी सतत् सक्रिय है, जो आँखों से न तो देखी जा सकती है और न दिखाई जा सकती है।
योजना बड़ी है, उतनी ही बड़ी जितना की बड़ा उसका नाम है- युग - परिवर्तन। इसके लिए अनेक वरिष्ठों का महान योगदान लगना है, उसका श्रेय संयोगवश किसी को भी क्यों न मिले।
प्रस्तुत योजना को कई बार पढ़ें। इस दृष्टि से की उसमें सबसे बड़ा योगदान उन्हीं का होगा, जो इन दिनों-हमारे कलेवर के अंग-अवयव बनकर रह रहे है। आप सबकी समन्वित शक्ति का का नाम ही वह व्यक्ति है, जो इन पंक्तियों को लिख रहा है।
कार्य कैसे पूरा होगा? इतने साधन कहाँ से आएंगे? इसकी चिंता आप न करे। जिसने करने के लिए कहा है, वही साधन में जुटायेगा। आप तो सिर्फ एक बात सोचे की अधिकाधिक श्रम समर्पण करने में एक - दूसरे में कौन अग्रणी रहा?
साधना, योग्यता, शिक्षा आदि की दृष्टि से हनुमान उस समुदाय में अकिंचन थे। उनका भूतकाल भगोड़े सुग्रीव की नौकरी करने में बीता था, पर जब महती शक्ति के साथ सच्चे मन और पूर्ण समर्पण के साथ लग गए, तो लंकादहन, समुद्र छलांगने और पर्वत उखाड़ने का, राम-लक्ष्मण को कंधे पर बिठाएँ फिरने का श्रेय उन्हीं को मिला। आप लोगों में से प्रत्येक से एक आशा और अपेक्षा है की कोई भी परिजन हनुमान से कम स्तर का न हो, अपने कर्तव्य में कोई भी अभिन्न सहचर पीछे न रहे।
काम क्या करना पड़ेगा? यह निर्देशन और परामर्श आप लोगों को समय-समय पर मिलता रहेगा। वह तो समय की बात है। काम बदलते भी रहेंगे और बिगड़ते भी रहेंगे। आप लोग तो सिर्फ एक बात का स्मरण रखें कि जिस समर्पण के भाव को लेकर घर से चले थे, पहले लेकर आये थे, उसमें दिनों-दिन बढ़ोतरी होती रहे, कहीं राई-रत्ती भी कमी न पड़ने पाये।
कार्य की विशालता को समझें। लक्ष्य तक निशाना न पहुंचे, तो भी वह उस स्थान तक अवश्य पहुंचेगा, जिसे अद्भुत, अनुपम, असाधारण और ऐतिहासिक कहा जा सके। इसके लिए बड़े साधना चाहिए, सो ठीक है, उसका भार दिव्यसत्ता पर छोड़े। आप तो इतना ही करे की आपके श्रम-समय, गुण-कर्म-स्वभाव में कहीं भी त्रुटि न रहे। विश्राम की बात न सोचें, अहर्निश एक ही बात मन में रहे की हम इस प्रस्तुतीकरण में पूर्णरूपेण खपकर कितना योगदान दे सकते है? कितना भार उठा सकते है? स्वयं को अधिकाधिक विनम्र बनाएं, दूसरों को बड़ा माने। स्वयंसेवक बनने में गौरव अनुभव करे। इसी में आप का बड़प्पन है। अपनी थकान और सुविधा की बात न सोचे। जो कर गुजरे, उसका अहंकार न करे, वरन् इतना ही सोचें हमारा चिंतन, मनोयोग एवं श्रम कितने अधिक ऊँची भूमिका निभा सका? कितनी बड़ी छलांग लगा सका? यही आपकी अग्निपरीक्षा है। इसी में आपका गौरव और समर्पण की सार्थकता है। अपने साथियों को श्रद्धा व क्षमता घटने न दे, उसे दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ाते रहें।
स्मरण रखे की मिशन का काम अगले दिनों बहुत बढ़ेगा, अब से कई गुना। इसके लिए आपकी तत्परता ऐसी होनी चाहिए, जिसे ऊँचे-से-ऊँचे दर्जे का कहा जा सके और आपका अंतराल जिसका लेखा-जोखा लेते हुए अपने को कृत - कृत्य अनुभव करे। आप फूले ना समाये और प्रेरकसत्ता आपको इतना घनिष्ठ बनाये, जितना की राम पंचायत में छठे हनुमान भी घुस पड़े थे।
कथन का सारांश इतना ही है, आप नित्य अपनी अंतरात्मा से पूछे की जो हम कर सकते थे, उसमें राई-रत्ती त्रुटि तो नहीं रही? आलस्य-प्रमाद को कहीं चुपके से आपके क्रिया-कलापों में घुस पड़ने का अवसर तो नहीं मिल गया? अनुशासन में व्यतिरेक तो नहीं हुआ? अपने कृत्यों को दूसरे से अधिक समझने की अहंता कहीं छद्म रूप में आप पर सवार तो नहीं हो गयी?
यह विराट योजना पूरी होकर रहेगी। देखना इतना भर है की इस अग्निपरीक्षा की वेला में आपका शरीर, मन और व्यवहार कहीं गड़बड़ाया तो नहीं। ऊंचे काम सदा ऊंचे व्यक्तित्व करते हैं। कोई लम्बाई से ऊँचा नहीं होता, श्रम, मनोयोग, त्याग और निरहंकारिता ही किसी को ऊँचा बनाती है। आपकी ऊंचाई उससे कम न पड़ने पाए, यह एक ही आशा, अपेक्षा और विश्वास आप लोगों पर रखकर कदम बढ़ रहे है। आप में से कोई इस विकास वेला में पिछड़ने न पाए, जिसके लिए बाद में पश्चात्ताप करना पड़े।
'गंगा ' का महत्व भारतीय समाज में कितना है, इसे में नहीं लिखा जा सकता। पुण्यसलिला, त्रिविधि पापनाशिनी भागीरथी ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन इस धराधाम पर अवतरित हुई, इसलिए इस पर्व को ' गंगा दशहरा ' कहा जाता है। दस महापातक गंगा का तत्वदर्शन जीवन में उतारने से छूट जाते है, ऐसी मान्यता है। गंगा के सामान ही पवित्रतम हिंदूधर्म का आधारस्तंभ गायत्री महाशक्ति के अवतरण का दिन भी यही पावन तिथि है, इसलिए इसे 'गायत्री जयंती' के रूप में मनाया जाता है। गायत्री को वेदमाता, ज्ञान-गंगोत्री एवं आत्मबल-अधिष्ठात्री कहते है। यह गुरु मंत्र भी है एवं भारतीय धर्म के ज्ञान विज्ञान का स्रोत भी। गायत्री को एक प्रकार से ज्ञान गंगा भी कहा जाता है एवं इस प्रकार गायत्री महाशक्ति एवं गंगा दोनों का अवतरण एक ही दिन क्यों हुआ, यह भलीप्रकार स्पष्ट हो जाता है। भागीरथ ने ताप करके गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतारा था, तो विश्वामित्र ने प्रचंड तपसाधना करके गायत्री को देवताओं तक सीमित न रहने देकर सर्वसाधारण के हितार्थाय जगत तक पहुँचाया। दोनों ही पर्व एक तिथि पर आने के कारण भारतीय संस्कृति की विलक्षणता भी सिद्ध होती है एवं इस पर्व को मनाने का महात्म्य भी हमें ज्ञात होता है।
एक और विलक्षण तथ्य प्रज्ञापरिजनों को भलीभांति विदित है की इस विराट गायत्री परिवार के अभिभावक-संरक्षण, संस्थापक वेदमूर्ति तपोनिष्ठ आचार्य पं. श्रीराम शर्मा जी ने अपने स्थूलशरीर के बन्धनों से मुक्त होकर इसी पावन दिन माँ गायत्री की गोद में स्थान पाया था। हमारे अधिष्ठाता-गायत्री महाविद्या के तत्वज्ञान गुरुदेव ने अपने पूर्वकथन द्वारा इसी पावन दिन का चयन कर स्वयं को सूक्ष्म में विलीन किया था। इस युग के भागीरथी एवं विश्वामित्र की संज्ञा जिन्हें प्राप्त है, जिनने अस्सी वर्ष की आयु में चार सौ वर्ष के बराबर जीवन जीकर एक अतिमानवी पुरुषार्थ कर दिखाया, उन आचार्यश्री के लिए और कौन-सी श्रेष्ठ तिथि हो सकती थी, स्वयं को अपनी आराधक माँ भगवती गायत्री की महासत्ता में विलीन करने के लिए। प्रातः आठ बजकर पञ्च मिनट पर २ जून, १९९० (गायत्री जयंती) के पावन दिन आज से नौ वर्ष पूर्व आचार्य श्री ने अपनी अस्सी वर्ष की सुनियोजित यात्रा संपन्न कर महाप्रासान किया था। इस वर्ष यह पर्व २३ जून को आ रहा है।
इस पावन पर्व की वेला में युगऋषि के गायत्री महाशक्ति को समर्पित एक सच्चे साधक के स्वरूप के विषय में जानने का प्रयास करें, तो हमें हमारे लिए इनके द्वारा बताये गए, मार्गदर्शन को समझने में कठिनाई नहीं होंगी। पूछे जाने पर पूज्य वर कहते थे- "मेरा दृश्य जीवन जो लोग जानते है, मात्र एक वर्ष का ही है। शेष ७९ वर्ष मैंने एक साधक की जिंदगी जी है।" वस्तुतः उनका व्यक्तित्व एक साधक की प्राणऊर्जा का अक्षयकोष था। साधना के नए आयामों को उन्होंने खोला एवं इसे गुह्यवाद-रहस्यवाद के लटके-झटकों से बहार निकलकर सच्ची जीवनसाधना के रूप में प्रस्तुत किया। मिथ्या अध्यात्म-कर्मकांडी धर्म के विषय में बड़ी कड़ाई से लिखने वाले आचार्य श्री ने इस क्षेत्र की 'ओवर होलिंग' कर सच्ची साधना पद्धति प्रस्तुत की, यदि यह कहा जाय, तो अत्युक्ति न होगी। उन्होंने कहा की परिवर्तन जीवनपद्धति में हो- चिंतन में हो, वेश में होना अनिवार्य नहीं। साधना से सिद्धि को उन्होंने परिष्कृत जीवन रूपी प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष के रूप में प्रतिपादित किया, प्रमाणित भी किया- स्वयं वैसा जीवन जीकर। हम ढेरों साधकों की जीवनी देखते है- परन्तु लोक उनसे क्या शिक्षण ले? क्या सभी हिमालय चले जाये, कुण्डलिनी जगाने के सम्मोहन भरे जाल में उलझकर जीवन संपदा गंवा बैठे- या मरघट में बैठकर तांत्रिक साधना करे? नहीं, उन्होंने लोकमानस के बीच रहकर उनके जैसा जीवन जीकर बताया है की अध्यात्म सौ फीसदी व्यावहारिक है, सत्य है एवं इसे उन्होंने अपनी जीवन रूपी प्रयोगशाला में स्वयं अपनाकर देखा व खरा पाया है।
साधना व जीवन को दूध व पानी की तरह घुलाकर जैसे जीवनसाधना की जा सकती है, इसे हम गायत्री जयंती के पावनपर्व के प्रसंग में गुरुसत्ता की जीवनी को देख-पढ़, आत्मसात कर अपने लिए भी एक मार्गदर्शन के रूप में पा सकते हैं। अभी तक यही धारणा चल रही है, चाहे वो बुद्ध हो अथवा पतंजलि, गोरखनाथ हो, आद्यशंकर हो अथवा महावीर- सभी यही करते रहते है की जीवन और ' साधना ' दो विरोधी ध्रुवों पर स्थित शब्द है। जो जीवन से मोह करता है, वह साधना से लाभ नहीं प्राप्त कर सकता एवं जो साधना करना चाहता हो, उसे जीवन का त्याग करना होगा। संन्यास के रूप में एक श्रेष्ठ परंपरा इसीलिए पलायन का प्रतीक बन गयी है- वैराग्य भिक्षावृत्ति का बाना पहनकर रह गया। परमपूज्य गुरुदेव ने संधिकाल इस बेला पे आस्थासंकट की चरम विभीषिका की घड़ियों में जीवन और साधना को जीवन जीने की कला के रूप में प्रतिपादित ही नहीं, प्रमाणित करके दिखा दिया।
परमपूज्य गुरुदेव के जीवन में न केवल बुद्ध की करुणा, महावीर का त्याग दिखाई देता है, आद्यशंकर की ज्ञाननिधि से ओत−प्रोत भी वे दिखाई देते हैं, यह सब विलक्षण संयोग, होने पर भी पूर्वजन्म के सुसंस्कारों की प्रारब्धजन्य प्रबल प्रेरणा होते हुए भी उन्होंने जीवन से मुख नहीं मोड़ा, एक गृहस्थ का जीवन जिया, ब्राह्मणत्व को जीवन में उतार कर दिखाया, सही अर्थों में स्वे स्वे आचरण शिक्षते की वैदिक परम्परा को पुनः जीवित कर सबके समक्ष एक ज्वलंत उदाहरण बनकर प्रस्तुत हुए। हमारे अभिभावक, विराट गायत्री परिवार के पिता न केवल भावसंवेदना से ओत−प्रोत थे,आज की कुटिलताओं से भरी दुनिया में लोकाचार-शिष्टाचार कैसे निभाया जा सकता है, इसके भी श्रेष्ठतम उदाहरण है। न जाने कितने चमत्कारों का विश्वकोष पूज्यवर के जीवन से जुड़ा है,पर लौकिक जीवन में वे एक सामान्य-व्यवहारकुशल, एक सीधे सरल लोकसेवी के रूप में ही प्रतिष्ठित रहे। जीवनभर उन्हें कोई उस रूप में नहीं जान पाया, जिस रूप में महाकाल की अंशधर वह सत्ता हमारे बीच आयी थी। सूक्ष्मीकरण साधना उनकी चौबीस वर्ष के चौबीस लक्ष के महापुरश्चरणों के प्रायः ३२ वर्ष बाद संपन्न हुई थी। यदि महापुरश्चरणों गुरु के आदेशों के अनुरूप जीवन को साधकों के रूप में विकसित करने हेतु थे, तो सूक्ष्मीकरण का पुरुषार्थ विश्वमानव को केंद्र बनाकर किया गया प्रचंड साधनात्मक पराक्रम था - विश्व की कुंडलिनी जागरण की दिशा में एक अभूतपूर्व प्रयोग था। उन्होंने लिखा भी की इनकी इस साधना का उद्देश्य था -' जन -जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अगणित भगीरथों का सृजन ' इसी क्रम में १९८८ की आश्विन नवरात्रि में उन्होंने युगसंधि महापुरश्चरण की घोषणा की, जिसे बारह वर्ष तक चलना था- नवयुग के आगमन तक। आज जब हम 'साधना वर्ष ' मना रहे है - राष्ट्र के कोने - कोने में अखंड जप-प्रधान आयोजन संपन्न हो रहे है, उस महासाधक का पुरुषार्थ याद हो आता है, जिसने नरपामर-सी, नरपशु-सा जीवन जीने वाले हम सभी को नरमानव के रूप में रूपांतरित कर देवमानव बनने का पथ दिखा दिया।
गायत्री जयंती की वेला में साधना के परिप्रेक्ष्य में अपनी गुरुसत्ता के जीवनक्रम का अध्ययन करने वाले हम सभी जिज्ञासुओं को उस युग-भगीरथ का गायत्री साधक के रूप में सच्चे ब्राह्मणत्व रूपी उर्वर भूमि में ही गायत्री साधना का बीज पुष्पित-पल्लवित हो वटवृक्ष बन पता है। गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है, मूलमंत्र से जिसने अपनी शैशव अवस्था आरम्भ की थी, उसने जीवनभर जीवन-साधना की ब्राह्मण बनने की। 'ब्राह्मण' शब्द आज एक जाति का परिचायक हो गया है। ब्राह्मणवाद, मनुवाद न जाने क्या कहकर उलाहने दिये जाते है परमपूज्य गुरुदेव ने ब्राह्मणत्व को सच्चा अध्यात्म नाम देते हुए कहा की हर कोई गायत्री के महामंत्र के माध्यम से जीवन-साधना द्वारा ब्राह्मणत्व अर्जित कर सकता है। उन्होंने ब्राह्मणत्व को मनुष्यता का सर्वोच्च सोपान कहा। आज जब समाज ही नहीं समग्र राजनीति जातिवाद से प्रभावित नजर आती है, तो समाधान इस वैषम्य के निवारण का एक ही है - परमपूज्य गुरुदेव के ब्राह्मणत्व प्रधान तत्वदर्शन का घर-घर विस्तार। न कोई जाति का बंधन हो, न धर्म-सम्प्रदाय का। सभी विश्वमानवता की धुरी में बांधकर यदि सच्चे ब्राह्मण बनने का प्रयास करे, समाज से कम-से-कम लेकर अधिकतम देने की प्रक्रिया सीखे सकें, आदर्श जीवन जी सके, तो सतयुग की वापसी दूर नहीं है। गायत्री साधक के रूप में सामान्य जन को अमृत,पारस,कल्पवृक्ष रूपी लाभ सुनिश्चित रूप से आज भी मिल सकते है, पर उसके लिए पहले ब्राह्मण बनना होगा। गुरुवर के शब्दों में " ब्राह्मण की पूँजी है- विद्या और तप। अपरिग्रही ही वास्तव में सच्चा ब्राह्मण बनकर गायत्री की समस्त सिद्धियों का स्वामी बन सकता है, जिसे ब्रह्मवर्चस के रूप में प्रतिपादित किया गया है।" सतयुग, ब्राह्मण युग यदि अगले दिनों आना है तो आएगा, यह इसी साधना से, जिसे बड़े सरल बनाकर युगऋषि हमें सूत्र रूप में दे गए एवं अपना जीवन वैसा जीकर चले गए। ब्राह्मण बीज को संरक्षित कर ब्राह्मणत्व को जगा देना-सारी धरित्री को गायत्रीमय के देना ही परमपूज्य गुरुदेव की पुण्यतिथि पर उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है।
वाजिश्रवा ने अपने पुत्र नचिकेता के लिए यज्ञफल की कामना से विश्वजित यज्ञ आयोजित किया। इस यज्ञ में वाजिश्रवा ने अपना सारा धन दे डाला। दक्षिणा देने के लिए जब वाजिश्रवा ने गायें मंगाई, तो नचिकेता ने देखा वे सब वृद्ध और दूध न देने वाली थी, तो उसने निरहंकार भाव से कहा -" पिता जी निरर्थक दान देने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति नहीं होती।" इस पर वाजिश्रवा क्रुद्ध हो गये और उन्होंने अपने पुत्र नचिकेता को ही यमराज को दान कर दिया।
यम ने कहा - वत्स! मैं तुम्हें सौन्दर्य, यौवन, अक्षय धन और अनेक भोग प्रदान करता हूँ, किन्तु नचिकेता ने कहा - जो कुछ क्षणिक और शरीर को जीर्ण करने वाले हो, उन्हें लेकर क्या करूँगा, मुझे आत्मा के दर्शन कराइये। जब तक स्वयं को न जान लूँ वैभवविलास व्यर्थ है।साधना के लिये आवश्यक जिज्ञासा, सत्यनिष्ठा और तपश्चर्या का भाव देखकर यम ने नचिकेता को पंचाग्नि विद्या ( कुंडलिनी जागरण ) सिखाई, जिससे नचिकेता ने अमरत्व की शक्ति पाई।
आज से प्रायः तीन वर्ष पूर्व का प्रसंग है। मार्च १९६९ की अखंड-ज्योति में 'हमारे पाँच पिछले एवं पाँच अगले कदम' शीर्षक से लिखे अग्रलेख में परमपूज्य गुरुदेव ने सभी पाठकों को सूचना दी की वे सप्तऋषियों की तपोभूमि में नवयुग का एक अभिनव संस्करण स्थापित काटने जा रहे हैं। १९७१ के जून माह में मथुरा से विदाई लेकर वे भागीरथी के तट पर 'शांतिकुंज' नामक स्थान पर परमवंदनीय माता जी के साथ चले जाएँगे, जहाँ से आगे हिमालय ताप हेतु जाने का कार्यक्रम पूर्व निर्धारित होगा। तब पाठकों-परिजनों ने सोचा भी नहीं था की यह बीज जो स्थापित होने जा रहा है एक विशाल वाट-वृक्ष का रूप ले लेगा, जिसकी असंख्यों-शाखा-प्रशाखाएं सारे भारतवर्ष व विश्व के कोने-कोने में फैल जाएँगी।
एक वर्ष बाद हिमालय प्रवास से लौटकर परमपूज्य गुरुदेव ने प्राण-प्रत्यावर्तन सत्रों की श्रृंखला चलाई। उनका स्वप्न था की विश्वामित्र की इस तपस्थली से प्रेरणा लेकर अनेक साधक अपनी जीवनपद्धति में बदलाव लाएँगे एवं दिग्-दिगंत तक जाकर गायत्री व यज्ञ का सन्देश फैलाएँगे। प्राण−प्रत्यावर्तन सत्रों में विशिष्ट साधनाएं करायी गयी। आज तक उन शिविरों में भागीदारी करने वाले साधक स्मरण रहे है- इन विशिष्ट साधनाओं का, जिनके माध्यम से उन्हें विशिष्ट उपलब्धियां हुई-गुरुवार के तेजो अनुदान मिले-आत्म-पर्यवेक्षण का अवसर मिला। उसके पश्चात् जीवन-साधना सत्र, परिव्राजक, वानप्रस्थ सत्र, नारी-जागरण सत्रों की श्रृंखला चलती रही एवं सारे भारत में देवकन्याओं के कार्यक्रम संपन्न होकर एक विलक्षण माहौल बना। ब्रह्मवर्चस शोधसंस्थान के रूप में विज्ञान और आध्यात्म के समन्वयात्मक प्रतिपादनों पर अभिनव अनुसन्धान वाला एक सुसज्जित तंत्र बनकर खड़ा हो गया, तो सारे भारतवर्ष में शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों-प्रज्ञासंस्थानों, प्रज्ञामंडलों की स्थापना का क्रम चल पड़ा। मिशन लक्षाधिक विस्तार पता चल गया। गायत्री व यज्ञ अभियान गाँव-गाँव, घर-घर तक पहुँच गया।
इस युग के व्यास की लेखनी से प्रज्ञापुराण रूपी १९वें पुराण के चार खंड प्रकाशित हुए, साथ ही सूक्ष्मीकरण साधना के समापन के बाद विरत राष्ट्रिय एकता सम्मेलन, दीपयज्ञों के आयोजन संपन्न हुए। महाप्रयाण के पूर्व के एक वर्ष में महाकाल का क्रांतिधर्मी साहित्य युगऋषि ने लिखा, जिसे उन्होंने वाजल के बराबर गुणात्मक दृष्टि से अपने अब तक के लिखे साहित्य के समकक्ष कहा। २ जून, १९९० को गुरुसत्ता के महाप्रयाण के बाद एक विराट ऐतिहासिक श्रद्धांजलि समारोह हम सभी न मनाया। इस प्रयोजन में प्रायः पच्चीस लाख से अधिक परिजनों की भागीदारी रही। सभी संकल्पबद्ध हो गुरुवार के कार्यों को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लेकर गए। हिमालय जैसी विरत गुरुसत्ता का कार्य रुक कैसे सकता था। सारे भारत में अखंड जप के कार्यक्रम संपन्न हुए। भूमि के चप्पे चप्पे को साधनामय बनाने का प्रयास किया गया व जून, १९९२ में गायत्री जयंती पर एक अभूतपूर्व शपथ समारोह में भी सभी ने गुरुग्राम की माटी हाथ में लेकर उनके कार्यों में निमित्त और अधिक समय-साधन देने का संकल्प ले देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के शुभारंभ की घोषणा शक्तिस्वरूपा माताजी से सुनी। समयदान-अंशदान के बलबूते ही २७ विराट आश्वमेधिक आयोजन भारत व विश्वभर में संपन्न हुए एवं मिशन विराटतम रूप लेता चला गया।
इस अश्वमेधिक श्रृंखला के बीच ही माँ भगवती-शक्तिस्वरूपा माताजी भी हमें रूठ-बिलखता छोड़ कर सितम्बर, १९९४ में महाप्रयाण कर अपनी आत्मसत्ता से एकाकार हो गयी, परन्तु काफिला रुका नहीं। उन्हीं के दिशानिर्देशों के अनुसार अश्वमेधिक पराक्रम चलता रहा- आंवलखेड़ा की प्रथम महापूर्णाहुति जिसमें पचास लाख लोगों ने भाग लिया (नवम्बर,१११४ ) से लेकर मोनट्रिअल अश्वमेध अवं न्यू जर्सी अमेरिका के वाजपेय यज्ञों के साथ-साथ प्रायः ढाई सौ से अधिक भारत -विदेश में संपन्न संस्कार महोत्सवों के रूप में जारी रहा! जितने परिजनों ने शपथ समारोह से लेकर अभी हाल में संपन्न हुए संस्कार महोत्सवों में भागीदारी की है,उनकी संख्या का अनुमान एक साधारण गणित का जानकार नहीं लगा सकता! भावनाशीलों -संकल्पशीलों की गिनती -"एक सिख सवा लाख के बराबर "की तरह कई गुना में होने के कारण संभव नहीं है। यह सारा उपक्रम एक ऐसी मिसाल बनकर आया है, जिसकी उपमा भारतीय संस्कृति के विगत दो हजार वर्षों के इतिहास में मुश्किल से ही किसी अभियान या आन्दोलन से दी जा सके।
ऊपर सारा वर्णन जो किया गया,वह इसलिए की अब तक जो भी कुछ हुआ है,इससे कई गुना बड़ा पराक्रम आगामी डेढ़ वर्षों में होना है। परिजनों को लगेगा तो अवश्य असंभव-सा,पर है यह सत्य। अनेकों झंझावातों -प्रतिरोधों के बावजूद महाकाल का घोंसला जहां पूज्यवर एवं मातृसत्ता की सूक्ष्म उपस्थिति है,कृतसंकल्प है,अपनी महापूर्णाहुति को विराटतम रूप में संपन्न करने को। संधिकाल की अंतिम घड़ियां आ पहुंची एवं आपाधापी से भरे इस समय की अंतिम अट्ठारह माह की वेला अब चुनौती बनकर आई है। जिससे दुर्गे शक्ति के सहारे अश्वमेधिक दिग्विजय संपन्न हुई,उसके पुनः जागने,हुंकार लेने एवं आगामी वर्ष की नवम्बर,दिसम्बर से २००१ की वसंत तक संपन्न होने वाली विराट महापूर्णाहुति को विराटतम स्तर पर संपादित करने का समय आ गया है।'साधना वर्ष 'इसी निमित्त आत्मबल उपार्जन करने हेतु सारे भारत व विदेश में मनाया जा रहा है। अभी -अभी ५ माह पूर्व ४८ स्थानों पर संपन्न साधना प्रशिक्षण व वहां से हुए विकेंद्रीकरण के द्वारा संगठन ने नयी करवट ली है। सभी के साधक बनने,पूर्ण -परिपक्व प्रखर होकर जागरूक -संगठित होने की वेला है यह। आत्मशक्ति की प्रचंडता ही युगशक्ति का अवतरण करेगी,यह सुनिश्चित है,इसी तथ्य को दृष्टिगत रख केंद्रीय स्तर पर कुछ महत्वपूर्ण निर्धारण किये गए है,जिन्हें तत्काल लागू किया जा रहा है। (१ ) पांच दिवसीय साधना /तीर्थसेवन प्रशिक्षण सत्रों को साधना प्रशिक्षण प्रधान बनाया जा रहा है एवं ये गुरुपूर्णिमा तक यथावत चलते रहेंगे। ३० जुलाई तक साधक -परिजन उनमें पूर्वानुमति लेकर आते रह सकते है। तीर्थाटन की सामान्य भीड़ जो घूमने-फिरने में विश्वास रखती है,को निरुत्साहित किया जा रहा है एवं जो महापूर्णाहुति की तैयारी के लिए स्वयं को साधक बना सके -संगठन के रूप में उभर सके,उन्हें ही आमंत्रित किया जा रहा है।
(२ ) साधना वर्ष सारे भारतवर्ष व विश्वभर में मनाया जा रहा है। सभी ओर ढाई दिवसीय साधना प्रधान आयोजन संपन्न हो रहे है। अपने साधना केन्द्रों के माध्यम से साधना की धुरी पर संगठन का पुनर्गठन -सारी जानकारी केंद्र तक पहुंचाने का दायित्व सभी क्षेत्रीय -परिजनों को सौंपा गया है। उनके कार्य का पर्यवेक्षण करने के लिए सहयोगी समीक्षक के रूप में समयदानी कार्यकर्ताओं के दल क्षेत्रों में दौरा कर रहे है। ऐसे समयदानियों का अधिकाधिक संख्या में आह्वान किया गया है।
(३ ) एक जुलाई से केंद्र में संगीत प्रधान ढपली पर युगगायन का प्रशिक्षण देने वाले सत्र आरम्भ होंगे। इनमें तबला,हारमोनियम आदि वाद्य यंत्रों का प्रशिक्षण इस वर्ष नहीं दिया जायेगा। ये सत्र तीन माह के होंगे,परन्तु योग्यता की परीक्षा पर खरा उतरने के बाद ही पंद्रह दिवसीय प्रारम्भिक परीक्षण के बाद पूरी अवधि तक रुकने की अनुमति दी जाएगी।
(४ ) इसी प्रकार स्वास्थ्य संरक्षण प्रधान जड़ी-बूटियों के तथा शिक्षकों के संस्कार प्रधान शिक्षण प्रक्रिया के प्रशिक्षण सत्र भी अगस्त के प्रारंभ से 'शार्टटर्म कोर्स '(अल्पावधि प्रशिक्षण )के रूप में केंद्र में संपन्न होंगे। विस्तृत जानकारी पाक्षिक में पढ़ें।
(५ ) एक अगस्त से पांच -पांच दिन के विशेष सत्र शक्तिपीठों के त्रासितगणों -क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं के विभिन्न प्रान्तों के क्रम से बुलाये जा रहे है। ये तीन माह चलेंगे। इसमें संगठन का सुनियोजन,प्रज्ञा संस्थानों की कार्यपद्धति का निर्धारण -प्रगति समीक्षा का अध्ययन तथा महापूर्णाहुति की तैयारी हेतु चिंतन प्रधान विषय होगा।
(६ ) केंद्र में नए विस्तार में नालंदा -तक्षशिला स्तर के विश्व विद्यालय तथा आयुर्वेद शोध केंद्र एवं विश्व विद्यालय के भूमि पूजन व शिला न्यास के साथ ही इक्कीसवीं सदी के गंगोत्री के विराट रूप लेने की प्रक्रिया आरम्भ हो गयी है। आर्कीटेक्टों के परामर्श से नई ली गयी है। भूमि में जहां ये दोनों स्थापनाएं होने जा रही है,जो कल्पना मूर्त रूप ले रही है, वह स्वयं में अद्वितीय व अभूतपूर्व-सी लग रही है। अपने ही परिवार के समयदानी इंजीनियर्स, टेक्निशियंस आर्कीटेक्टों के भावभरे सहयोग के बल पर यह गोवर्धन कैसे व कब उठकर खड़ा हो गया,यह देखकर परिजन दांतों तले उंगलियां दबा बैठे। भूमि क्रय करने के बाद शिला न्यास में देरी तो लगी पर एक विराट तंत्र के निर्माण हेतु सभी स्तर के विशेषज्ञों से विचार -विमर्श जरूरी समझा गया था।
१९६१ में जिस शांतिकुंज के रूप में एक पौधा लगाया गया था,परमपूज्य गुरुदेव के अनुदानों -सूक्ष्म संरक्षण ने उसे इस गायत्री जयंती पर परम पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण दिवस पर यही संकल्प लेना है की हम महाकाल के घोंसले की गरिमा बनाये रख प्राण पर्ण से लगकर आगामी तीन वर्षों में पूरी शक्ति से लगकर अपने-अपने जिम्मे लिए दायित्वों को पूरा करेंगे। राष्ट्र व समाज में छाए निराशा के कुहासे को दूर करेंगे।
आज फांसी लगने वाली है। "भगतसिंह ने विचार किया इससे अच्छा दिन कौन-सा आएगा।आज तो किसी महापुरुष के दर्शन करने चाहिए। कहा जेल में?नहीं,वहां कहा संभव?"वसीयत के बहाने मुझे लेनिन की जीवनी दे जाना।"कारागार के भीतर से सरदार भगतसिंह ने अपने वकील के पास खबर भेज दी। वकील ने पुस्तक भगतसिंह को पहुंचा दी। उधर फांसी की तैयारी होने लगी,इधर आजाद लेनिन का जीवन -वृत्तांत पढ़ने में निमग्न हो गए।
जेल अधिकारी उन्हें फँसी के लिए आये,उस समय वे अंतिम अध्याय पढ़ रहे थे।उन्होंने अपना ध्यान पन्नों पर रखे हुए हाथ उठाकर कहा- "महाशय,अभी ठहरिये,एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।"अधिकारी स्तब्ध रह गए, मौत के सन्नाटे में भी जीवन की निश्चलता। जहां थे वही रुक गए। पुस्तक का अंतिम अध्याय समाप्त कर हर्ष से उछलते भगतसिंह उठ खड़े हुए और फांसी के लिए झूमते हुए चल पड़े। फांसी के फंदे में झूलने तक वीरवर भगतसिंह का मनोबल आकाश की भांति ऊँचा ही उठा रहा।
(अखंड ज्योति जनवरी १२८८ से उध्द्रीत पूज्यवर की; लेखनी से लिखे कुछ अंश )
"अखंड ज्योति की अनेक प्रेरणाओं और स्थापनाओं में से एक है शांतिकुंज, जिससे तीर्थपरंपरा का-ऋषियुग की रीति-नीति का सार-संक्षेप समझा जा सकता है। यहाँ वे सभी प्रवितियां चलती है, जिनके आधार पर इन दिनों भी इन्हीं कारणों से ऋषियुग का साक्षात्कार किया जा सकता है।" "गंगा की गोद,हिमालय की छाया,सप्तधाराओं वाले क्षेत्र में इस छाया,सप्तऋषियों की तपोभूमि, सप्तधाराओं वाले क्षेत्रों में इस गायत्री तीर्थ का निर्माण किया गया। संस्कारित भूमि में गायत्री के तत्वद्रष्टा विश्वामित्र की पुरातन संस्कार चेतना अभी भी देखी जा सकती है।
"दिव्य विभूतियों से सुसंपन्न ऋषिकल्प हिमालय के सिद्धपुरुषों का संयुक्त वरदान-सम्मिलित अनुदान गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में कार्यान्वित करने का प्रयास किया गया है,जो अब तक आशा जनक परिणाम में सफल एवं अग्रगामी होता रहा है। "
"गंगा की गोद,हिमालय की छाया,सप्तऋषि की तप वाली सप्तधाराएं यही है। यह पुरातन है। आधुनिक यह है की यहाँ लंबे समय से जलती चली आ रही है। 'अखंड ज्योति 'की स्थापना है। नित्य लाखों की संख्या में गायत्री जप इसके समक्ष होता है। तीर्थसेवनों,अन्नक्षेत्र,अतिथि-सत्कार,गुरुकुल,दातव्य चिकित्सालय जैसे पुण्यकार्यों से इस भूमि की पवित्रता निरंतर बढ़ती ही जाती है।"
"आश्रम के संचालकों की सूक्ष्मसत्ता को प्रखर प्रज्ञा और सजल श्रद्धा के रूप में जाना जाता है। इनका प्राण−प्रवाह आश्रम के कर्ण -कर्ण में छाया-अनुभव किया जा सकता है।" "प्रशिक्षण के जितने भी तंत्र है,उनमें वातावरण की प्रभावशीलता को सर्वोपरि माना गया है? शांतिकुंज का वातावरण ऐसा ही है,जिसमें व्यक्तित्व के परिष्कार की साधना ठीक प्रकार बन पड़ती है। यह कार्य घर के लोकव्यवहार सम्बन्धी उतार-चढ़ाव के बीच रहकर संभव नहीं हो सकता।"
"शांतिकुंज के सम्बन्ध में आरम्भ से ही यह कल्पना और योजना थी की इसे नालंदा एवं तक्षशिला स्तर का विश्वविद्यालय बनाया जाये। भले ही उनके जैसे इतने भव्य भवन न बने। भले ही इसमें इतने अधिक छात्रों,अध्यापकों के लिए स्थान तथा निर्वाह की व्यवस्था न हो,पर प्रशिक्षण का आधार एवं स्तर वही हो? इनमें कल्पनाओं ने अपना साकार स्वरूप बनाया है और शुभारंभ के दिनों उपजी योजना ने अपना व्यवहारिक ढांचा खड़ा किया है।"
"अखंड ज्योति के पौत्र शांतिकुंज ने वनौषधि अनुसन्धान का जो कार्य हाथ में लिया है,उसकी अपनी विशेषता है। इसलिए उसे अपने ढंग का अनोखा भी कह सकते है। कारण की यह इस उत्पाद के साथ प्रयोग-परीक्षण भी चलता रहता है। उसे एक शब्द में आरोग्य का पुनर्जीवन भी कह सकते है।"
"सतयुग की साम्यवाद की चर्चा ने लोगों ने सुनी है,पर उनका प्रत्यक्ष स्वरूप देखा नहीं। किन्तु शांतिकुंज में आकर उसे व्यवहार में उतरते देखा जा सकता है। यही है वह प्राण-प्रेरणा जो संचालकों के व्यक्तित्व से लेकर आश्रम की रीति-नीति तक तथा अखंड ज्योति के लेखों में प्रादुर्भूत होती देखी जा सकती है।"
"सतयुग की,साम्यवाद की चर्चा लोगों ने सुनी है,पर उनका प्रत्यक्ष स्वरूप देखा नहीं। किन्तु शांतिकुंज में आकर उसे व्यवहार में उतरते देखा जा सकता है। यही है वह प्राण- प्रेरणा जो रीति -नीति तक तथा अखंड ज्योति के लेखों में प्रादुर्भूत होती देखी जा सकती है।"
"शांतिकुंज में कार्य करने वाले कार्यकर्ता प्रायः दो सौ पचास से अधिक बड़ी संख्या में इतने ऊँचे स्तर के नर रतन कदाचित ही कही एकत्रित दिख पड़े। अधिकाँश गृहस्थ है,पर ब्रह्मचारी की तरह जीवनयापन करते है, पुरुषों की तरह स्त्रियां भी निरंतर मशीन के कार्यों में कंधे -से कंधे मिलाकर जुटी रहती है। न इन्हें कभी अवकाश लेने की आवश्यकता पड़ती है और न छोड़े गए सम्बन्धी की याद सताती है। उनके पास जाने या उन्हें बुलाने के लिए सामान्यजनों की तरह मन नहीं भटकता। इनकी उत्कृष्ट आदर्शवादिता ही इन्हें खींचकर यहाँ लायी है।किसी प्रलोभन के कारण यह यहाँ नहीं आये। स्वयं को आदर्श लोकसेवी के रूप में प्रस्तुत करने और अपनी सेवा-साधना से जनचेतना को उभारने, सत्प्रवृत्तियों के उद्यान लगाने, दुष्प्रवृत्तियों के विपक्ष को उखाड़ने की श्रद्धा ही इन्हें अहर्निश काम में लगाये रखती है।'
"यों हम लोगों के शरीर शांतिकुंज में रहते है। पीछे भी वे इस परिसर के कर्ण -कर्ण में समाये हुए रहेंगे। इसकी अनुभूति निवासियों-आगंतुकों को सामान रूप से होती रहेगी।"
"शरीर परिवर्तन की वेला आते ही यों हमें साकार से निराकार होना पड़ेगा,पर क्षणभर में उस स्थिति में अपने को उभार लेंगे और दृश्यमान प्रतीक के रूप में इसी अखंड दीपक की ज्वलंत ज्योति में समा जायेंगे,जिसके आधार पर अखंड ज्योति नाम से संबोधन दिया गया है। शरीरों के निष्प्राण होने के उपरान्त भी जो चर्मचक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे,वे इसी अखंड दीपक की जलती लौ में हमें देख सकेंगे।इस तेल- बाती की प्रथक सत्ताओं की एक लौ में समावेश होने की तरह अद्वैत रूप में गंगा-यमुना के संगम,प्रज्ञा और श्रद्धा के एकीकरण के रूप में देखा जा सकेगा।"
"हमारे वास्तविक स्वरूप समझने वाले परिजनों को जानना चाहिए की मिशन तीरे की तरह सनसनाता हुआ अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ेगा। हम लोगों की स्थिति प्रत्यंचा की तरह अभी तनी है और भविष्य में भी वैसी ही बनी रहेगी 'ज्योति कभी बुझेगी नहीं।'
*समाप्त*