हम कहाँ पहुँच गये? यह तो हमारा अभीष्ट स्थान नहीं। हमें यहाँ चैन नहीं मिल सकता। हम ऐसी स्थिति में क्यों पहुँचे, कैसे पहुँचे, किसकी भूल थी-इस ओर देखें या न देखें-यह देखना सार्थक हो या निरर्थक पर हमें यह सहन नहीं। इससे तो हटना ही पड़ेगा-बचना ही होगा। अवांछनीय परिस्थितियों में पड़े हुए, अपने पीड़ित अनुभव करने वाले व्यक्ति अगणित हैं। उन सबकी एक ही कामना-आकांक्षा होती है कि हम इस स्थिति से बाहर निकलें। ऐसी स्थिति का हर व्यक्ति कुछ-न-कुछ उपक्रम भी उसके लिए अपनाता ही है।
लेकिन कुछ ऐसे व्यक्ति भी होते हैं, जो मात्र रोना ही रोते रहते हैं। अपने प्रयत्न का सबसे सार्थक पक्ष उन्हें यही दिखता है कि अपनी अवांछनीय परिस्थितियों के लिए किसी अन्य को दोषी ठहरा दें। भगवान से लेकर अपने आस-पास के किसी व्यक्ति को उसका लाँछन देने-उसका कारण सिद्ध करने में ही वह सारी अकल खर्च कर देते हैं। इससे उन्हें झूठा संतोष भले ही मिल जाता हो, पर उस यंत्रणा से मुक्ति तो मिल ही नहीं सकती।
कुछ व्यक्ति ऐसे समय पर परिस्थितियों से समझौता कर लेते हैं तथा उन्हीं हालातों में मरते -खपते रहने के लिए किसी प्रकार मन पक्का कर लेते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने समय-श्रम व सूझ-बूझ को विषम स्थितियों की प्रतिक्रियाओं को नहीं मूल कारणों को देखते हैं तथा उन्हें ही ठीक करने के लिए दम-खम्भ के साथ उतर पड़ते हैं। समय-श्रम और सूझ-बूझ उनकी भी लगती है, पर एक-एक कदम पर उनकी सार्थकता अधिक से अधिक होती जाती है। एक कारण का निवारण हो जाने पर उनकी अनेक कठिनाइयाँ अनायास ही सरल होती चली जाती है।
पुरुषार्थ की दिशा यदि सही नहीं है, तो धुँआधार काम करके भी परिणाम नहीं के बराबर ही रह जाना स्वाभाविक है। हाय-तौबा मचाते रहना, रोना रोते रहना, दोष किस पर मंढ़े? इसके प्रयास करते रहना भी एक प्रकार का पुरुषार्थ ही तो ही है, भले ही उसे दिशाविहीन कहा जाय।
बड़े परिवर्तन सदैव सही दिशा में कार्य करने वाले पुरुषार्थियों द्वारा संभव हुए हैं। महात्मा बुद्ध हों या फिर स्वामी विवेकानन्द सभी के साथ यह बात लागू होती है। वर्तमान परिवर्तनचक्र भी इससे भिन्न सिद्धांतों पर नहीं चल सकता। जो भी व्यक्ति इस युगपरिवर्तन के लिए की जाने वाली महासाधना के लिए आगे आएँगे, वे सभी इस दिशा में किये गए प्रखर पुरुषार्थ की मर्यादा से ही अपने बढ़ेंगे। जिनमें समझदारी का अंश है, उन्हें अवश्यंभावी परिवर्तन तथा उसकी आवश्यक शर्तों पर ध्यान देते हुए आज ही अपने पुरुषार्थ की सही दिशा तय कर लेनी चाहिए।
बौद्ध धर्म की विचारधारा भारत देश की सीमाओं को लाँघती हुई अन्य राष्ट्रों को भी प्रभावित कर रही थी। उन विचारों को ठीक प्रकार समझ पाना तथा उसके उपरांत अपना सकना तभी संभव हो सकता था, जबकि अन्य देशों के निवासियों के लिए उन्हीं की भाषा में बौद्ध धर्म के विचारों का प्रकाशन हो। इस महान कार्य के लिए बौद्ध भिक्षुक प्रयत्नशील थे।
जापान भाषा में बौद्ध ग्रंथों के प्रकाशन का कार्य हाथ में लिया। कार्य अत्यंत दुष्कर था तथा साधन-साध्य भी। संपूर्ण ग्रंथों के अनुवाद कराने में लगभग दस हजार येन के लगभग राशि का खर्च आता था। उक्त भिक्षुक ने जनसहयोग प्राप्त करने के लिए भिक्षा माँगना आरंभ किया। सतत् प्रयत्न एवं मनोयोग का सत्परिणाम जनसहयोग के रूप में मिला। अभीष्ट धनराशि एकत्रित हो गई। अनुवादकार्य प्रारंभ होने वाला ही था कि एक आकस्मिक घटना हुई। इस क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा। अकालपीड़ितों की वेदना ने भिक्षुक के हृदय को झकझोर कर रख दिया। आँतरिक करुणा, सेवा-सहयोग एवं त्याग के रूप में प्रवाहमान हों उठी, यह सोचकर कि ग्रन्थों का अनुवाद, प्रकाशन तो बाद में भी हो सकता है तथा जिस दया, करुणा का पाठ पढ़ाने एवं इस भावना को उभारने के लिए यह कार्य किया जा रहा है, उसकी ही रक्षा न हो तो फिर उसका उद्देश्य कहाँ रहा। बौद्ध भिक्षुक ने तत्काल निर्णय लिया तथा एकत्रित धनराशि को अकाल से त्रस्त लोगों की क्षुधातृप्ति के लिए समर्पित कर दिया। उसके सहयोगियों ने कहा कि जिस कार्य के लिए तुमने धन एकत्रित किया है, वह अपूर्ण रह जाएगा। भिक्षुक ने उत्तर दिया, उस महान कार्य की नींव यही है।
अकाल का प्रकोप दूर होते ही उसने पुनः गाँव-गाँव जाकर भिक्षा माँगना आरंभ किया। दस वर्षों तक निरंतर प्रयास करने पर इतना धन संग्रह हो गया कि उससे ग्रंथों का अनुवाद तथा प्रकाशनकार्य पूरा हो जाय। किंतु लगता था कि प्रकृति को अभी यह स्वीकार नहीं था। बाढ़ के भयंकर विप्लव ने जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। जनता के करुण क्रंदन ने पुनः सहयोग की अपेक्षा की। भिक्षुक ने प्राप्त धनराशि को फिर बाढ़ पीड़ितों में बाँट दिया। इस अवधि तक उसकी आयु सत्तर वर्ष पार कर चुकी थी। साथियों ने उसके इस कार्य को पागलपन की संज्ञा दी। उन सबकी बातों को भिक्षु ने हँसते हुए टाल दिया।
निर्लिप्त भाव से वह पुनः भिक्षा के प्रयोजन से निकला। नब्बे वर्ष की आयु तक वह भिक्षा माँगता रहा। धनराशि एकत्रित होते ही उसने फिर उस अधूरे कार्य को पूरा करने की बात सोची। उसे ईश्वरीय कृपा ही कहना चाहिए कि उस समय कोई प्राकृतिक प्रकोप नहीं हुआ। ग्रंथ का अनुवाद हुआ तथा छपा। पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा गया कि यह तीसरा संस्करण है। दो इसके पूर्व निकल चुके हैं, जो पीड़ा-पतन के निवारण में अपनी आहुति दे चुके हैं, इसलिए वे अदृश्य हो गये। वे दोनों संस्करण इस तीसरे दृश्य ग्रंथ की तुलना में कहीं अधिक सुंदर एवं प्रेरणास्पद थे।
ज्ञान का उद्देश्य है- अज्ञान की तमिस्रा में डूबे लोगों को आलोक प्रदान करना, पीड़ा-पतन का निवारण करना। इस महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही अनेकानेक धर्मग्रंथों की रचना की गई है। उस श्रेष्ठ पथ पर बढ़ने में ये मार्गदर्शन करते हैं। यदि उस लक्ष्य को भुला दिया गया तथा ग्रंथों की रचना को ही मात्र लक्ष्य मान लिया जाय तो यह भूल होगी। धर्म-अध्यात्म कर विशाल कलेवर खड़ा करने का एकमात्र उद्देश्य है-मानवी संवेदनाओं का विकास तथा समष्टिगत चेतना के साथ उसे जोड़ देना। दूसरों के दुःख-दर्द में अपनी भाव-संवेदनाएँ यदि न जुट सकीं तो सारा सरंजाम जो धर्मधारणा के विस्तार के निमित्त विनिर्मित किया जाना है, व्यर्थ ही सिद्ध होता है। ज्ञान को पीड़ा-पतन के निवारण में नियोजित होना ही चाहिए। उसी में उसकी सार्थकता हैं।
एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परं तपः। सावि«यास्तु परं नास्ति मौनात्सत्यं विशिष्यते॥ -मनुस्मृति 2183
एकाक्षर अर्थात् ॐ परब्रह्म है। प्राणायाम ही परम तप है और गायत्री मंत्र से बढ़कर पवित्र करने वाला और कोई भी मंत्र नहीं है।
मनुष्य में कितना शक्ति-सामर्थ्य है, इसका एक छोटा उदाहरण उसकी आरंभिक स्थिति ‘भ्रूणावस्था’ की गतिविधियों का पर्यवेक्षण करते हुए सहज ही किया जा सकता है। अपनी सत्ता के प्रकटीकरण-अवसर पर साधनरहित स्थिति में यदि इतना अधिक पुरुषार्थ किया जा सकता है, तो साधनसंपन्न और विकसित स्थिति में अपेक्षाकृत और भी अधिक पराक्रम कर सकना संभव होना चाहिए, किंतु देखा यह जाता है कि श्रीगणेश का उपक्रम पीछे चलकर शिथिलता की दिशा में बढ़ने लगता है और क्रमशः ठंडा होता चला जाता है। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए अन्यथा कोई कारण नहीं कि आरंभ में जिस स्तर की सक्रियता अपनाई गई थी, उसमें शिथिलता आने लगे। यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि आरंभ में विशेष क्षमता होती है और वह पीछे स्वयमेव घट जाती है। बीज से अंकुर निकलते समय, अंकुर को पौधा बनते समय जो प्रगतिक्रम दृष्टिगोचर होता है वह पीछे समाप्त या शिथिल कहाँ होता है? उस विकास प्रक्रिया में क्रमशः अभिवृद्धि ही होती चलती है, फिर कोई मनुष्य द्वारा किया जाने वाला पुरुषार्थ आगे चलकर अधिकाधिक तीव्र न होता चले।
पिता के शरीर से निकला हुआ शुक्राणु इतना छोटा होता है कि आलपिन की नोंक पर उसके हजारों भाई बैठ सकते हैं। उसे बिना शक्तिशाली सूक्ष्म-दर्शक यंत्र के खुली आँखों से तो देखा नहीं जा सकता। संतानोत्पादन के लिए की गई प्रक्रिया द्वारा शाँत पड़ा वह जीव उत्तेजित हो उठता है और अपनी स्वतंत्र सत्ता का निर्माण करने के लिए सहयोगी की तलाश में द्रुतगामी से परिभ्रमण करता है। उस समय उसके हाथ, पैर, आँख आदि कुछ नहीं होते, तो भी अपनी आँतरिक आकांक्षा से प्रेरित होकर अभीष्ट साथी को खोजने के लिए इस तेजी से दौड़ता है कि हिरन, चीते की दौड़ से भी उसका अनुपात बढ़ा-चढ़ा रहता है।
शुक्राणु को डिंबाणु तक पहुँचने में अपने आकार और स्थान की दूरी के अनुपात से उतनी लंबी यात्रा करनी पड़ती है, जितनी कि उसे मनुष्य के बराबर आकार का होने पर पूरी पृथ्वी की दूरी नापनी पड़ती। इस यात्रा पर स्खलन के समय लाखों शुक्राणु अभीष्ट मनोरथ की पूर्ति के लिए निकलते हैं। इसे ‘डर्बी की घुड़दौड़’ के समतुल्य प्रतिस्पर्धा माना जा सकता है। प्रकृति सबल को सफलता देने की नीति अपनाती है। जो उस लम्बी और कष्टसाध्य यात्रा में अंत तक प्रबल पुरुषार्थ नहीं कर पाते, बीच में ही थककर बैठ जाते है, वे दम तोड़ देते हैं। जो अणु प्राणपण का साहस करता है, वही सफल होता है और भ्रूण बनने का प्रगतिपथ पर अग्रसर होने का श्रेय प्राप्त करता है।
शुक्र और डिंब का मिलकर बना हुआ ‘कलल ‘ बिजली की नेगेटिव और पॉजिटिव दो-दो धाराओं के सम्मिलन से उत्पन्न शक्तिप्रवाह की तरह सक्रिय हो उठता है। गंगा-यमुना का यह मिलन तीर्थराज संगम बनता है। सहयोग और सहकारिता का, मैत्री और सघन आत्मीयता का जीवन के पहले ही दिन जो पाठ पढ़ा जाता है उसका सत्परिणाम तत्काल देखने को मिलता है। यह सहकारिता यदि आगे भी जारी रखी गई होती, उसका महत्व भुला न दिया गया होता तो मनुष्य प्रगति करते-करते न जाने कहाँ से कहाँ जा पहुँचा होता।
भ्रूणकलल आरंभ में बाल की नोक की बराबर होता है, किंतु वह एक महीने के भीतर ही इतनी प्रगति करता है कि आकर में 50 गुना और वजन में 8000 गुना बढ़ जाता है। जो पहले दिन चिपचिपे जलबिन्दु के अतिरिक्त और कुछ नहीं था, वही एक महीने में चौथाई इंच का बुलबुला बन जाता है। उसे परीक्षण, विश्लेषण की मेज़ पर रखा जाय तो स्थिति को देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ेगा। उसके सिर और धड़ को देखा जा सकता है पैर। पूछ की तरह होते हैं। हाथ तो स्पष्ट नहीं होते, पर हृदय धड़कता हुआ और नसों में रक्त चक्कर लगाता हुआ देखा जा सकता है। जीव की सृजनात्मक गति का यह अद्भुत परिचय है। निर्माण का संकल्प जब कार्यरूप में परिणत होने के लिए आतुर हो उठे तो सहयोग, साधन और परिस्थितियाँ किस प्रकार अनुकूल होती चली जाती हैं, इसका यह प्रत्यक्ष प्रमाण है। एक महीने मात्र स्वल्प समय में किया गया काय-निर्माण का कार्य कितनी प्रगति कर लेता है, इसे देखते हुए जीव की अद्भुत सृजनात्मक शक्ति पर संदेह करने का कोई कारण शेष नहीं रहता।
माता के शरीर में असीम मात्रा में पोषक पदार्थ भरे रहते हैं। उसे इच्छानुसार मात्रा में प्राप्त करने में भ्रूण पर कोई रोकथाम नहीं होती, पर वह सही विकास के सिद्धांत को समझता है कि निर्वाह मात्र के लिए न्यूनतम लिया जाय अन्यथा अनावश्यक संग्रह उसके लिए अंततः भार बनेगा और विपत्ति उत्पन्न करेगा। तेन त्यक्तेन भुँजीथाः का पाठ प्रत्येक प्रगतिशील को पढ़ाना पड़ा है। भ्रूण भी उस सनातन सिद्धांत से अपरिचित नहीं होता। उसे अपने शरीर के चारों ओर एक परत चढ़ानी पड़ती है, जो गर्भाशय में उपलब्ध सामग्री में से छना हुआ, उपयुक्त पोषक पदार्थ ही भ्रूण तक जाने देती है। इसे संयम और मर्यादा का आवरण कह सकते हैं। शरीर शास्त्र की दृष्टि से इस झिल्ली को ‘ट्रोफोब्लास्ट’ कहते हैं। संपत्ति के समुद्र में से मात्र उपयुक्त निर्वाह स्वीकार करने की व्यवस्था यह झिल्ली ही बनाती है। आक्सीजन और रसायन मिश्रित भ्रूण का उपयोगी आहार उसके शरीर में इसी झिल्ली द्वारा छनकर भीतर पहुँचता है। बात इतने से ही समाप्त नहीं होती। भ्रूण के शरीर से मल भी बनता है। उसे बाहर निकालना आवश्यक है, यह बाहर निकालना आवश्यक है, यह झिल्ली ही उस मल को बाहर लाती है और माता के रक्त में धकेल देती है। उसकी सफाई माता के रक्त को अपनी निज की सफाई के साथ-साथ ही करनी पड़ती है? उपलब्धि की तरह परित्याग का सिद्धांत अपनाया जाना कितना आवश्यक है, इसे हृदयंगम करने पर ही भ्रूणकलल की सुरक्षा और अभिवृद्धि संभव होती है। ‘हम’ तथाकथित ‘बुद्धिमान’ लोग दोनों हाथों से अनावश्यक संग्रह में जुटाते। फलतः उस भार संग्रह की विषाक्तता जीवन की नाव को बीच मझधार में डुबो देने का कारण बनती है।
अनुदानों के लिए लालायित रहने वाले लोग सोचते हैं कि दूसरों के अनुग्रह से मिली सामग्री से ही काम चल सकता है, पर यह कुकल्पना सर्वथा निरर्थक ही सिद्ध होती है। लोग संभवतः यही मानते हैं कि माता का रक्त ही भ्रूण की नसों में घूमता है, किंतु वास्तविकता वैसी है नहीं। बच्चे का अपना स्वतंत्र रक्त होता है। यह बात अलग है कि उसके निर्माण की साधन-सामग्री माता के शरीर से उपलब्ध होती है।
दूसरे महीने में भ्रूण स्वयं के ऊपर एक रक्षा-कवच जलीय जाकेट के रूप में धारण कर लेता है। वह जानता है कि हर समर्थ को सुरक्षा संग्राम में उतरना पड़ता है। जीवन एक खुला संघर्ष है। जो इस रणक्षेत्र में उतरने से डरता है-सुविधाओं की वर्षा होते रहने के सपने देखता है, वह पाता कुछ नहीं खोता बहुत है। संकटों से जूझने में जितने मरते हैं, उसकी तुलना में उनसे डरने के कारण, बेमौत मरने वाले कायरों की संख्या कहीं अधिक होती है। भ्रूण की शरीर-संपदा बढ़ती है तो साथ ही खतरा भी बढ़ता है। बाल की नोंक या चना-मटर जितने शरीर को पेट में कुछ विशेष खतरा नहीं था, पर जब आकार बढ़ेगा तो खतरे की आशंका भी रहेगी ही। बच्चे के बढ़े हुए शरीर पर माता के पेट का दबाव बढ़ता है, साथ ही उसके चलने-फिरने उलटने-पलटने की क्रिया भी भ्रूण को प्रभावित करती है।
ऐसी दशा में यह सुरक्षा-कवच आवश्यक है। सुरक्षात्मक जीवन-संघर्ष के क्षेत्र में भ्रूण को कवच धारण करके उतरना पड़ता है और उसकी आवश्यकता मृत्युपर्यंत बनी रहती है।
एक महीने का भ्रूण एक इंच के दसवें भाग की बराबर लम्बा होता है। तभी से उसके हृदय, मस्तिष्क, फेफड़े और आँतें बनना शुरू हो जाती हैं। गुर्दे बनाने में तो जीव को भारी उखाड़-पछाड़ करनी पड़ती हैं। आरंभिक गुर्दा मछली के गुर्दे से मिलता-जुलता होता है। पीछे वह मेंढक जैसा बनता है। फिर उसकी आकृति छोटे पशुओं के समतुल्य होती हैं। संभवतः यह विकास परम्परा का क्रम है। शरीर की मूल-सत्ता आदिम स्मृतियों को धारण किए रहती है और अपना काम वहीं से आरम्भ करती है, किंतु विकसित जीव उससे अपना काम चलता नहीं देखता। फलतः वह अपनी मर्जी के गठन में जुटता है। गुर्दों के परिवर्तन में देखी जाने वाली प्रवृत्ति यदि आगे भी चलती रहे तो पशु-प्रवृत्तियों से लड़-झगड़कर उन्हें खदेड़ देना और आत्म-गौरव के अनुरूप उच्चस्तरीय प्रकृति ढाल लेना और प्रवृत्ति अपना लेना कुछ भी कठिन न रह जाएगा।
पहले महीने में भ्रूण की जो स्थिति होती है। दूसरे महीने में उसका क्रम बढ़ता ही चला जाता है। पहले महीने की तुलना में उसकी लम्बाई छह गुनी और वजन 500 गुना बढ़ता है। ज्ञानेन्द्रियों के निशान-रीढ़ की हड्डी-अस्थियों का ढाँचा-तंत्रिकाओं का जाल- इसी अवधि में विनिर्मित होने आरंभ हो जाते हैं।
तीसरे महीने में यों शरीर के अन्य अवयव भी स्पंदन, ऐंठन और हलचल करते देखे जाते हैं, पर सबसे अधिक उथल-पुथल आँतों में होती हैं। वे होती तो अनगढ़ रस्सी की तरह हैं, पर उनकी मंथनक्रिया देखते ही बनती है। पूर्ण मनुष्य की आँतें जितना जिस गति से काम करती हैं, उसकी तुलना में भ्रूण की आँतें प्रायः हजार गुना अधिक पुरुषार्थ कर रही होती हैं। जीव चेतना की मूलभूत क्षमता का यह प्रारंभिक परिचय है। इससे उसकी तात्त्विक सामर्थ्य का पता चलता है। यदि इसे कुंठित न किया जाए तो पेट की पाचनशक्ति अद्भुत स्तर तक अपनी क्रियाशीलता का परिचय देती रह सकती है।
शरीर में अत्याधिक महत्वपूर्ण अवयव दो हैं-एक मस्तिष्क दूसरा हृदय। तीसरे महीने इनका विकास आरंभ हो जाता है। बुद्धि और भावना की दो क्षमताएँ ही ऐसी हैं, जो मनुष्य को अभीष्ट गति और उपयुक्त दिशा देती हैं। विकास साधनों के आधार पर नहीं, इन्हीं दो अवयवों, दो विभूतियों के आधार पर होता है। सफलताएँ और उपलब्धियाँ तो इन दो तत्वों की प्रतिक्रिया मात्र हैं। गर्भस्थ शिशु इन्हें विकसित करने की आवश्यकता समझता है और किसी योग्य हो सकने की स्थिति में आने के लिए दो महीने की अवधि पूरी होते ही वह इन दो अति महत्वपूर्ण केंद्रों को विकसित करने में जुट जाता है। उन दिनों इन पर जितना श्रम होता है, उतना ही यदि जन्मकाल के उपरांत भी किया जा सके तो मनुष्य की ज्ञान संपदा और भावविभूति की चरम उन्नति हो सकती है। ऐसा मनुष्य देवात्मा स्तर का आलोकमय जीवनयापन कर सकता है।
लिंगभेद की पृथकता तीसरे महीने से प्रारंभ होती है। उससे पूर्व भ्रूण में उभय-लिंगी लक्षण होते हैं। जन्म लेते ही बालक जीवन-संघर्ष के लिए भयंकर मल्ल-युद्ध आरंभ करता है। भीतर और बाहर की परिस्थितियों में भारी अंतर होता है। उदर के सुरक्षित दुर्ग में उसे बाहरी खतरों का सामना नहीं करना पड़ता था, पर बाहर तो ऋतु प्रभाव से लेकर घातक विकिरणों से भरा हुआ नया एवं अपरिचित संसार होता है। आहार, विश्राम, मलत्याग आदि की सर्वथा नई परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इस परिवर्तन को ऐसा ही माना जा सकता है, जैसे एक लोक के प्राणी को दूसरे लोक में बसने के समय हो सकता है। स्थिति का सामना करने के लिए बहुमुखी समर्थता चाहिए। यह अनुदान कोई और नहीं दे सकता। जीव को अपने ही बलबूते उपार्जित करना पड़ता है। जन्म लेते ही वह अपने शरीर को नई परिस्थितियों से टक्कर लेने योग्य बनाने के लिए प्रचंड प्रयास करता है। इसको जन्मकाल में बालक की विचित्र गतिविधियों के रूप में देखा जा सकता है। नवजात शिशु जन्म लेते ही चीखता है, हाँफता है, काँपता है, हाथ-पैर पीटता है। यह सब क्या है? इसे उसका सामर्थ्य-संपादन प्रयत्न ही कहा जा सकता है। गर्भरज्जु कटते ही उसे स्वावलंबन का उत्तरदायित्व सँभालना पड़ता है। तब माता उसके विकास में सीमित सहयोग ही दे पाती है। इस संसार का यही नियम है कि जीव को अपने बलबूते निर्वाह और प्रगति के साधन जुटाने पड़ते हैं। सहयोग तो आदान-प्रदान के सिद्धांत पर ही टिकता है। उदर-अनुदान तो क्रमशः घटते ही जाते हैं।
पेट से बाहर आने में कष्ट तो माता को होता है, पर उसके बाहर आने की प्रक्रिया में प्रबल चेष्टा और अदम्य आकांक्षा शिशु की ही काम कर रही होती है। गर्भस्थ शिशु अतिशय दुर्बल हो तो वह माता की कितनी ही इच्छा होने पर भी बाहर न आ सकेगा। उसे माता का पेट चीरकर ही बाहर निकलना पड़ेगा। इसी प्रकार यदि जन्मने के तुरन्त बाद बालक रोये-चिल्लाए नहीं, हाथ-पैर न पीटे तो उसका जीवित रहना कठिन हो जाएगा। ऐसी स्थिति होने पर चतुर दाइयाँ ठंडे पानी के छींटे देकर दूसरे कृत्रिम उपायों से बच्चे को रोने-चिल्लाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। कहावत है कि बिना रोये माता दूध नहीं पिलाती। प्रकृति भी समर्थता का उपहार बालक को तभी देती है, जब वह इसके लिए भारी उत्कंठा प्रकट करे। रोने-चिल्लाने में इसी माँग की प्रचंडता का आभास मिलता है।
जीव को जन्म लेने के उपरांत नये लोक में पहुँचकर नये उत्तरदायित्व सँभालने, नये लोगों के साथ तालमेल बिठाने, नई परिस्थितियों को समझने, नये साधन उपयोग करने की तरह हर स्तर की नवीनता से परिचय ही नहीं अभ्यस्त भी होना पड़ता है। जीव को प्रसुप्ति से जाग्रति में आने और तज्जनित परिस्थितियों का सामना करने में कितने प्रबल पुरुषार्थ और कितनी अधिक सामर्थ्य की आवश्यकता पड़ती है, इसे देखकर उसकी मौलिक गरिमा का अनुमान लगाया जा सकता है।
आत्मा की सामर्थ्य का मूल स्रोत परमात्मा है। परमात्मा अनंत समर्थता का पुँज है। फिर उससे अविच्छिन्न संबंध सूत्रों का साथ जुड़ा हुआ आत्मा ही क्यों किसी प्रकार अभावग्रस्त हो सकता है? यह काय-कलेवर हाड़-माँस का पिटारा नहीं है। उसके रोम-रोम में आत्मसत्ता ओत-प्रोत है। अपने आरंभिक दिनों में जीव अपने घरौंदे को जिस प्रबल पुरुषार्थ के सहारे विकसित करता है, यह समर्थता उसमें सदैव बनी रहती हैं। उसे विस्मृत और उपेक्षित पड़े रहने देने से ही हमें हेय और दुर्बल स्थिति का सामना करना पड़ता है।
गायत्री महाशक्ति की साधना से वह पथ-प्रशस्त होता है, जिससे मानवीकाया में सन्निहित विशेषताओं को उभारना और उपयोग में लाना संभव हो सके। कहना न होगा कि यदि निष्ठापूर्वक इसके लिए प्रयास किया जाए तो कोई भी व्यक्ति उतनी प्रगति कर सकता है, जितनी कि भूतकाल में किसी ने की है। इतना ही नहीं, भविष्य की संभावनाएँ तो भूतकाल की सफलताओं की अपेक्षा और भी अधिक बढ़ी-चढ़ी हो सकती हैं।
ब्रह्मदर्शन होने से मनुष्य चुप हो जाता है। जब तक दर्शन न हो, तभी तक विचार होता है। घी जब तक पक न जाय, तभी तक आवाज करता है। पके घी से शब्द नहीं निकलता। पके घी में कच्ची पूरी छोड़ी जाती है तो फिर एक बार वैसा ही शब्द निकालता है। जब कच्ची पूरी को पका डाला, तब वह फिर चुप हो जाता है। वैसे ही समाधिस्थ पुरुष लोकशिक्षण के लिए नीचे उतरता है, फिर बोलता है।
-श्री रामकृष्ण परमहंस
“गीध खूब ऊँचा उड़ता है पर उसकी नजर लाश पर-हड्डियों पर ही रहती है। जो खाली पण्डित हैं, वे सुनने के ही हैं, पर उनकी कंचन-कामिनी पर आसक्ति होती है-गीध की तरह वे सड़ी लाशें ढूँढ़ते हैं। आसक्ति का घर अविद्या के संसार में है। दया-भक्ति-वैराग्य ये विद्या के ऐश्वर्य हैं।”
तब समूचा हिंदुस्तान रियासतों में बँटा हुआ था। इन्हीं में से एक रियासत विक्रमपुर के राजा थे चित्रसेन। विक्रमपुर रियासत छोटी होने के बावजूद राजा चित्रसेन का अहं बहुत बढ़ा-चढ़ा था। वे स्वयं को राजाधिराज एवं सम्राट से कम नहीं समझते थे। उनकी सनक भी उनके अह के अनुरूप ही विद्रूप एवं भयावह थी। अपनी इस विचित्र सनक के कारण वह अच्छी-से-अच्छी चीज में कसर निकाल देते थे। प्रायः यही होता कि उनके पास पुरस्कार की आशा लगाकर आने वाले दण्ड पाकर लौटते। आखिरकार धीरे-धीरे यह हुआ कि कलाकारों ने उनके पास आने का साहस करना बंद कर दिया।
एक बार किसी अन्य रियासत से एक मूर्तिकार विक्रमपुर आया। वह राजा चित्रसेन से भेंट करने के लिए उत्सुक था। लोगों ने उसे समझाया कि वह राजा से नहीं मिले, किंतु वह नहीं माना। इस लगातार की रोक-टोक की वजह से उसकी उत्सुकता और बढ़ गयी थी।
वह राजदरबार में गया। प्रणाम करने के उपरांत उसने राजा को अपनी विद्या से परिचित कराया। राजा ने मूर्तिकार को सरसरी नजर से देखा, उसके हाथ में सारस की एक मूर्ति थी।
राजा कड़ककर बोला- “सारस इतना छोटा होता है? तुम्हें क्या दंड दूँ?”
“दंड देने का अधिकार आपका है महाराज।” मूर्तिकार हाथ जोड़कर बोला। फिर उसने कहा- “किंतु आपको बता दूँ कि मेरी कला कभी भी संदेह का विषय नहीं बनती। मैं हर बिन्दु पर ध्यान देता हूँ। ऐसा सारस यहाँ से कुछ हजार मील दूर एक स्थान पर पाया जाता है। आप यदि आज्ञा दे तो मैं आपकी नजरबंदी में जाकर उसे यहाँ लाकर दिखा सकता हूँ। क्या मजाल, जो जरा-सा भी अंतर पड़ जाए, मैं तो सिर्फ हाव-भाव पर ही नहीं, वजन पर भी ध्यान देता हूँ।”
राजा चिढ़ गया-उसकी जरूरत नहीं तुम मेरी मूर्ति बनाओ, मुझे देख लो। ध्यान रहे, जरा-सा भी नुक्स निकलने पर तुम्हारा सिर कलम कर दिया जाएगा।”
“मुझे मंजूर है।” मूर्तिकार ने कहा। आवश्यक सामान की व्यवस्था राजा ने करा दी। चार दिन बाद मूर्तिकार दरबार में आया। मूर्ति उसके साथ थी, उसने उसे कपड़े से ढँक रखा था।
“कपड़ा हटाओ।” राजा के कहने पर मूर्तिकार ने कपड़ा हटा दिया। मूर्ति सिर से कमर तक ही थी। राजा चीखा - “ये पूरी मूर्ति है?” “महाराज, आपने मूर्ति बनाने को कहा था, पूरी या आधी का आदेश आपने नहीं दिया था।” राजा के चेहरे पर क्रोध तैर रहा था। मूर्तिकार ने आगे कहा-” यह हूबहू आपकी मूर्ति है। इसका वजन चालीस सेर है। पैरों को छोड़कर आपका भी वजन इतना ही है। यह मैं दावे के साथ कह रहा हूँ।”
“यदि परीक्षण से तुम्हारा दावा...? क्रोध से खौलता-उबलता राजा चित्रसेन अभी और कुछ कह पाता कि बीच में मूर्तिकार बोल उठा-तो आप मेरा सिर कलम करा सकते हैं।”
“परीक्षण किया जाय।” राजा भावावेश में चीख उठा। “ल.............लेकिन..............।” मंत्री के कहने पर राजा और क्रोधित हो उठा-मेरे आदेश का
पालन किया जाय।”
“पर महाराज, परीक्षण के लिए आपका शरीर काटना पड़ेगा, सिर से कमर तक।” मंत्री ने स्पष्ट किया। राजा हठात् किंकर्तव्यविमूढ़ उसके पसीने छूट गए। दो क्षण बोल न फूटे।
प्रज्ञावान मूर्तिकार के आगे उसकी आँखें झुक गयीं। भारी मन से उसने कहा-मूर्तिकार मुझे क्षमा करना। तुमने मेरी आँखें खोल दीं।”
कुछ रुककर राजा ने कहा-मैं बहुत शर्मिंदा हूँ। तुम जो चाहो, मैं पुरस्कार स्वरूप दूँगा। माँगों।”
“देना ही है तो आप वचन दें कि आप अपनी अहंवृत्ति का त्याग कर देंगे। अहं से मनुष्य का
विवेक नष्ट हो जाता है। आप अहं त्याग सके तो स्वतः ही विद्या-कला की देवी सरस्वती सम्मानित होती रहेगी। भगवती सरस्वती के सम्मान से उनके वरदपुत्रों की अपने आप ही ख्याति बढ़ती रहेगी।” इतना कहकर प्रज्ञावान मूर्तिकार चला गया।
राजा चित्रसेन बहुत देर तक सिर झुकाए बैठे रहे, फिर धीमे से बोले-मैं अपने अहं का त्याग करूँगा उनकी वाणी में उनकी आत्मा का संकल्प ध्वनित हो रहा था।
मैं लोगों से कहता हूँ कि लम्बी-लम्बी साधना करने की उतनी जरूरत नहीं है। उस छोटे से गायत्री मंत्र का जप करके देखो। गायत्री का जप करने से बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ मिल जाती हैं। यह मंत्र छोटा है, पर इसकी शक्ति भारी है।
-श्री रामकृष्ण परमहंस
इस युग के सबसे ज्यादा चर्चित द्रष्टा, भविष्यविद् के रूप में मान्यता प्राप्त फ्रेंच मनीषी नोस्ट्राडेमस की एक भविष्यवाणी पर पिछले दो-तीन वर्षों से सारे विश्व में काफी मंथन चल रहा है। उस भविष्यवाणी के अनुसार सितम्बर, 1999 में धूमकेतु की पूँछ में छिपी एक बड़ी उल्का के पृथ्वी पर टकरा जाने से सारी पृथ्वी पर गहरी तबाही आ जाएगी। इसके दुष्प्रभाव ज्वार-भाटों के साथ बड़े विकराल समुद्री तूफान-जलप्रलय भूकम्पों की श्रृंखला, अकाल एवं वैश्विक स्तर पर राजनैतिक उथल-पुथल के रूप में सामने आ सकते हैं। यहाँ तक कि इसी को उनने तृतीय विश्वयुद्ध की शुरुआत कहा है, जिसमें एक एण्टीक्राइस्ट उभरकर आ सकता है एवं पूरी पश्चिमी सभ्यता को नष्ट कर सकता है। नोस्ट्राडेमस 99, डूम्स डे 1999 ए डी, इत्यादि नामों से प्रायः दो दर्जन पुस्तकें इन दिनों बाजारों में बिकती देखी जा सकती हैं। स्टीफन पॉलस की नोस्ट्राडेमस-99 इन सबमें शिखर पर है। हम जिस समय-विशेष में जी रहे हैं उसके विषय में सभी ने विशिष्ट संधिवेला के रूप में इसे वर्णित भी किया है। परमपूज्य गुरुदेव ने तो आज से ग्यारह वर्ष पूर्व से ही युगसंधि महापुरश्चरण रूपी ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की शुरुआत करा दी थी। ऐसे में यह विस्तार से जानना कि वास्तव से जानना कि वास्तव में ऐसा क्या कुछ होने जा रहा है, सभी की उत्सुकता को शाँत भी करेगा एवं अपनी भूमिका निर्धारित करने के लिए दिशाबोध भी देगा।
लेखक स्टीफनपॉलस यह स्वीकारते हैं कि नोस्ट्राडेमस, जो सोलहवीं सदी में फ्राँस में जन्मे, की प्रायः सभी भविष्यवाणियाँ सत्यता की कसौटी पर खरी उतरी हैं। इनके सारे पूर्वकथित काव्यरूप में छंदबद्ध हैं एवं इन्हें चतुष्पदी के क्रमांक के अनुसार जाना जाता है। सभी जानते हैं कि नोस्ट्राडेमस नो इन्हें चतुष्पदी के क्रमांक के अनुसार जाना जाता है। सभी जानते हैं कि नोस्ट्राडेमस ने इन्हें सबसे पहले लिखा व जानबूझकर इनके क्रम को अस्त व व्यस्त कर दिया। लिखकर उनने हवा में फेंक दिया व जिस क्रम से उन्हें उठाया, उसी क्रम से उस विलक्षण, भविष्यवक्ता ने उन्हें लिखना चाहा था-उसी की खोज फ्यूचरोलॉजिस्ट या नोस्ट्राडेमस विशेषज्ञ विगत कई वर्षों से कर रहे हैं व अपने आकलन अनुमानों के आधार पर उनकी घोषणा करते रहें हैं। यह सोलहवीं सदी का द्रष्टा एक कैथोलिक फ्राँस वासी था। उनकी भविष्यवाणियों में जहाँ विशेष रूप से किसी देश के नाम का संकेत है, उसे छोड़कर शेष सारी भविष्य-वाणियाँ उनके अनुसार फ्राँस या यूरोप पर ही लागू होती हैं। अपनी ही लेखनी से अपनी दिव्यदृष्टि से देखकर लिखें कथन को उनने इतना रहस्यमय क्यों बना दिया, इसका उत्तर संभवतः यह है कि वे अपने जीवनकाल में तत्कालीन शासकों के कोप का शिकार नहीं होना चाहते थे। फिर भी वे इतनी जटिलताओं में भी काफी कुछ संकेत ऐसे छोड़ गए हैं, जिनसे उलटबाँसियों का समाधान निकल आता है।
‘ नोस्ट्राडेमस 1999’ के लेखक स्टीफन पाँलस ने इन्हीं समाधानों का तर्कसम्मत संकलन कर शोध ग्रंथ लिखा है, जो इस समय लोकप्रियता के शिखर पर है। संकलन के क्रम में सेंचुरी 10, क्वोट्रेन 72 में आसमान से आतंक को लेकर धरती पर बरसने वाली संभावना का वर्णन है। इसके अनुसार एक विशाल उल्का, धूमकेतु की पूँछ से निकलकर धरती पर संभावना है कि अटलांटिक महासागर में कहीं सितम्बर, 1999 में आ गिरेगी। लेखक ने सेंचुरी 3, क्वाट्रेन 34 के हवाले से लिखा है कि 11 अगस्त, 1999 को जो खग्रास सूर्यग्रहण आने वाला है, उसका संकेत विख्यात द्रष्टा ने करते हुए इंगित किया है कि इसके साथ ही विपत्तियों के बादल घुमड़ने लगेंगे। अंतरिक्ष से आने वाले ‘मान्सटर’ (रुह्रहृस्ञ्जश्वक्र) से उनका संकेत एक विशाल धूमकेतु से था। एक ऐसा ही धूमकेतु जो पृथ्वी की कक्षा से बहुत समीप होकर गुजरा था, एक नवंबर 1948 को खोजा गया, जबकि नैरोबी में पूर्ण सूर्यग्रहण की स्थितियों में उसे देखा गया था। धूमकेतु की पूँछ के ‘काँमा’ बनने तक जब तक देखा नहीं जाता, वह अविज्ञात ही रहता है। ऐसा पहले विज्ञान की इस विकसित सदी में कम-से-कम पाँच बार हो चुका है कि वैज्ञानिक तब धूमकेतु का गुजरना बता पाए, जबकि वह या तो गुजरने बता पाए, जबकि वह या तो गुजरने वाले थे अथवा गुजर कर सौरमण्डल से बाहर हो चुके थे। धूमकेतु को नोस्ट्राडेमस ने ‘बिअर्डेड स्टार ‘ दाढ़ी वाले तारे की संज्ञा देते हुए उसे पृथ्वी पर सूर्य के पीछे से आते हुए बताया है। ग्रहों की दशा देखते हुए इसका समय सूर्यग्रहण के बाद जब सूर्य कर्क राशि से निकल ही रहा होगा-सितम्बर 1999 का माह ही बताया है व स्थान अटलांटिक महासागर का अफ्रीका व यूरोप से मिलता हुआ हिस्सा दर्शाया है।
एरिका चीटम ने अपनी पुस्तक 'दी फाइनल प्रोफेसीज ऑफ नोस्ट्राडेमस’ में भी यही लिखा है कि एक बड़ी भारी उल्का इस धूमकेतु के पूँछ से निकलकर पृथ्वी से आ टकरायेगी व इसके परिणाम सारी धरती के लिए अत्यंत भयावह होंगे। इस समय सारे भू-भाग में भूकम्पों की श्रृंखला आरंभ हो सकती है। नोस्ट्राडेमस ने इसके संकेत के रूप में ‘ग्रेट वन ऑफ रोम’ ईसाइयों के धर्मगुरु पोप की उस समय मृत्यु के रूप में इसे निरूपित किया है। वे लिखते हैं कि उस भयावह वेला में पृथ्वीवासी अंतरिक्ष में दो सूर्य एक साथ देखेंगे। मार्च 1996 में हायकूटेक नामक तथा अप्रैल 1997 में हैलीबाप नामक धूमकेतु हम लोग देख चुकें हैं। इनका आना एक खगोलीय घटना माना गया एवं अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने इन्हें अध्ययन की दृष्टि से देखा-सामान्यजनों ने अपने मनोरंजन की दृष्टि से इनका अवलोकन किया। सबसे चमकदार धूमकेतु अब तक का 1721 का रहा है। नोस्ट्राडेमस जब सितंबर में आने वाले धूमकेतु की तुलना सूर्य से करते हैं, वह भी आज से चार सौ वर्ष पूर्व तो वे जानते हैं कि वे क्या लिख रहे हैं व किस विभीषिका का वर्णन कर रहे हैं।
स्चुरी एक, क्वाट्रेन 61 में एक वर्णन इस घटना के परिप्रेक्ष्य में आता है कि एक घटना के परिप्रेक्ष्य में आता है कि एक पहाड़नुमा वस्तु धूमकेतु की पूँछ से आकर धरती से टकरायेगी व इस संभावित उल्का की अनुमानित परिधि सात स्टेडियम के बराबर अर्थात् पाँच हजार फीट के लगभग हो सकती है। ऐसी संभावना है कि इतनी बड़ी उल्का जब धरती, जो सूर्य के चारों ओर परिक्रमा कर रही है, से अनुमानतः 60 किलोमीटर प्रति सेकेण्ड की गति से टकरायेगी तो इससे जो ऊर्जा उत्पन्न होगी-वह लगभग 2000 मेगाटन टी.एन.टी. के बराबर होगी। हिरोशिमा पर गिरे परमाणु बम से उत्सर्जित ऊर्जा की मात्रा 15000 टन टी.एन.टी. भर ही थी। अनुमान लगाया जा सकता है कि उससे भी एक लाख तीस हजार से भी अधिक भयावह परिमाण भी अधिक भयावह परिमाण वाला व परिणाम लाने वाला विस्फोट आगामी सितम्बर में संभावित है। यह वर्णन डराने के लिए नहीं है, विगत भविष्यवाणियों की सत्यता के आधार पर नोस्ट्राडेमस की भविष्यवाणी की वैज्ञानिक अध्ययन कर फ्यूचरोलॉजिस्टों ने निकाला है। 30 जून, 1908 को, साइबेरिया की तुगुस्का नदी के ऊपरी तट पर 4 मील ऊँचाई पर एक उल्का के आकर फटने से साढ़े सात सौ मील क्षेत्र में हुए महाविनाश का भी इन वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया है। उसका प्रभाव चीन के मध्य से लेकर सुदूर यूरोप लंदन तक में देखा गया था। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जो घटना सितम्बर में घटने वाली है-वह तुगुस्का से 600 गुना अधिक भयानक परिणाम लाने वाली हो सकती है।
हमारे घरों के आकार की छोटी-छोटी उल्काएँ प्रायः पचास की संख्या में प्रतिदिन पृथ्वी एवं चंद्रमा की कक्षा में से गुजरती रहती हैं। फिर घबराने की क्या बात है? क्यों डराया जा रहा है। अमेरिका के स्टेनफोर्ड रिसर्च सेण्टर के वैज्ञानिक का कहना है कि प्रायः विगत पचास वर्षों से जब से मनुष्य द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका देख चुका है-एक परमाणु बम विस्फोट से उसका समापन देख चुका है व तदुपरान्त अनेक राष्ट्रों द्वारा अणुयुद्ध की तैयारियाँ भी देख रहा है-हमें अंतरिक्ष से संदेश आ रहे हैं कि हम इन सब तैयारियों को रोकें। यूफाँलाँजीस्टों (यू से अनआइडेन्टीफाइड-अनजानी एफ से फ्लाइंग-उड़ने वाली, ओ से आँब्जेक्टस-वस्तुएँ अर्थात् उड़नतश्तरी विशेषज्ञों) के अनुसार हमें उड़नतश्तरियों के माध्यम से सबसे पहला संकेत तब से ही मिलना आरंभ हुआ है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अंतरिक्षवासी-हमारी हितैषी मित्र सभ्यताओं के संकेतों की उपेक्षा कर नोस्ट्राडेमस की बतायी भविष्यताओं का शिकार होने जा रहे हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आज से प्रायः 650 लाख वर्ष पूर्व जब डायनोसोर्स धरती से गायब हुए थे तब जो उल्का पृथ्वी से टकराई थी, उसके प्रभाव से 100 मिलियन मेगाटन ऊर्जा (टी.एन.टी) निकली थी। संभावित चर्चित घटनाक्रम से यह पचास हजार गुना अधिक तीव्रता की टकराहट थी। कल्पना की जा सकती हैं कि इतना भी कुछ यदि पृथ्वी के साथ घटित होता है, तो उसके अपनी कक्षा से खिसक जाने से लेकर शाँत प्रसुप्त पड़े ज्वालामुखियों का फूटना अंतरिक्षीय तापमान में वृद्धि-वैचारिक स्तर पर संव्याप्त दूरचिंतन की आँधियों से विश्वयुद्ध व अराजकता का दौर-सभी कुछ संभव है।
विज्ञान के चरम शिखर पर पहुँच चुका मानव जब कंप्यूटर युग में आकर अपनी उपलब्धियों को देखता है, तो गर्वोन्मत्त हो उठता है, परंतु विगत पचास वर्षों में हुए घटनाक्रम व अभी विगत बारह वर्षों से सतत् घटित हो रहे अप्रत्याशित परिवर्तन बताते हैं कि हम एक विलक्षण संधिवेला से गुजर रहे हैं। सूर्य का अशाँत-कुपित होना व उल्काओं के धरती से टकराने की संभावनाओं से डरना तो नहीं चाहिए, पर इनसे एक संदेश तो लेना ही चाहिए कि हम सामूहिक साधनात्मक पराक्रम की ओर बढ़ें-जीवनशैली में परिवर्तन लाएँ-अपने प्रयास-पुरुषार्थ के साथ विवेक जोड़ें, यदि ऐसा नहीं किया तो महामरण, सामूहिक विनाश निश्चित है।
हर एक गुरु नहीं हो सकता। कीमती शहतीर पानी में स्वयं भी बहता हुआ चला जाता है और अनेक जीव-जन्तु भी उस पर चढ़कर जा सकते हैं, पर मामूली लकड़ी-घुन लगी लकड़ी पर चढ़ने से लकड़ी भी डूब जाती है और जो चढ़ता है, वह भी डूब जाता है। इसीलिए ईश्वर युग-युग में लोकशिक्षण के लिए गुरु रूप में स्वयं अवतीर्ण होते हैं ताकि अनेकों को पार सकें। सच्चिदानन्द ही गुरु है। -रामकृष्ण परमहंस
भारतीय-दर्शन की यह मान्यता है कि जीवात्मा अमर है और मृत्योपरांत वह अपने कर्मों के अनुसार छोटे-बड़े कृमि-कीटकों पशु-पक्षियों सहित मनुष्य योनियों में जन्म लेता है। शास्त्रों में इन योनियों की संख्या चौरासी लाख बतायी गयी है। यह भी कहा गया है कि मनुष्य को दूसरा जन्म मनुष्य योनि में ही मिलता है। इसके पीछे तर्क भी है। जीवचेतना का इतना अधिक विकास-विस्तार हो चुका होता है कि उतने फैलाव को निम्नकोटि के प्राणियों में समेटा नहीं जा सकता। बड़ी आयु का मनुष्य अपने बचपन के कपड़े पहनकर गुजारा नहीं कर सकता। यही बात मनुष्य योनि में जन्मने के उपरांत पुनः मनुष्येत्तर योनि में वापस लौटने के संबंध में लागू होती है। यह हो सकता है कि जीव क्रमिक विकास करते हुए मनुष्य स्तर तक पहुँचा हो। डार्विन का प्रख्यात विकासवादी सिद्धांत भी यही प्रमाणित करता है कि जीव एक बार जन्म लेने के उपरांत क्रमिक विकास करता है, पीछे नहीं लौटता।
कर्मफल की सुनिश्चितता की दृष्टि से देखा जाय तो जहाँ तक कर्मों का फल भुगतने की बात है, वहाँ दुष्कर्मों का दंड जितना अधिक मनुष्य जन्म में मिल सकता है, उतना पिछड़ी योनियों में नहीं। मनुष्य को शारीरिक कष्ट से भी अधिक मानसिक प्रताड़नायें सहनी पड़ती हैं। शोक, अपमान, चिंता, भय, घाटा, विछोह-वियोग आदि से वह तिलमिला उठता है, जबकि अन्य प्राणियों को शारीरिक कष्ट तो होते हैं, किंतु भावनात्मक एवं मानसिक कष्ट उतने अधिक नहीं होते, जितने कि मनुष्यों को होते हैं। अन्य प्राणियों का मानसिक विकास उतना नहीं होता। जितना मनुष्य का। उनमें उतनी पीड़ा, संवेदना नहीं होती, जितनी मनुष्य योनि में होती है। ऐसी दशा में पापकर्मों का दंड भुगतने के लिए निम्नगामी योनियों में मनुष्य को जाना पड़े, यह आवश्यक नहीं। अब तक विश्व में जितने भी प्रमाण मिले हैं, उनमें प्रत्येक ने मनुष्य योनि के अनुभवों, स्मृतियों का वर्णन किया है। निम्न योनियों की स्मृतियाँ और अनुभव किसी ने भी नहीं सुनाए हैं। इससे सिद्ध होता है कि मनुष्य का पुनर्जन्म योनि में ही होता है, निम्न योनियों में नहीं।
पुनर्जन्म की घटनाओं का विज्ञान की भाषा में-पैरानार्मल फिनामिना’ में अध्ययन किया जाता रहा है। वैज्ञानिकों ने इस संदर्भ में गंभीरतापूर्वक अनुसंधान किये हैं और प्रमाण जुटाये हैं। पाश्चात्य दार्शनिकों में पाइथागोरस, इमर्सन, ड्राइडन, वड्सवर्थ मैथ्यू, अर्नोल्ड, वाल्टविटमैन, शैली, ब्राउनिंग आदि ने पुनर्जन्म को सही माना है। अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों में सर विलियम बार्नेट, ओलीवरलॉज, सर विलियमकुक, अल्फ्रेडरसेल वालेस एवं ईवान स्टीवेस, गर्ने, मायर्ज, फ्रेंक पोडमीर, हडसन, विलियम जेम्स आदि प्रमुख हैं, जिन्होंने तथ्यों के साथ इस बात का प्रतिपादन किया है कि मनुष्य का पुनर्जन्म होता है। इस संदर्भ में पाश्चात्य देशों में कितने ही शोध-संस्थान एवं संस्थाएँ कार्यरत हैं। उनकी अब तक की खोजें इस सिद्धान्त की पुष्टि करती हैं कि मनुष्य का पुनर्जन्म मनुष्य योनि में ही होता है। इस संबंध में वहाँ अनेकों प्रामाणिक ग्रंथों का भी प्रकाशन हुआ है।
अमेरिका के वर्जीनिया यूनिवर्सिटी में कार्यरत मूर्धन्य वैज्ञानिक डॉ. स्टीवेन्सन ने भारत सहित संसार भर के विभिन्न क्षेत्रों से पुनर्जन्म से संबंधित सैकड़ों घटनाएँ एकत्रित की हैं। देवसंस्कृति में तो आत्मा की अमरता, पुनर्जन्म एवं कर्मफल की सुनिश्चितता पर आदिकाल से ही आस्था है। बैंगलोर स्थित ‘राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान ‘ के सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानी डॉक्टर पसरीचा ने इस संबंध में गहन अध्ययन किया है और डॉ. स्टीवेंसन के निर्देशन में पुनर्जन्म संबंधी प्रामाणिक घटनाओं को एकत्रित किया और डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की है।
संकलित घटनाओं में से एक उदाहरण उत्तराखण्ड के पासौली गाँव की मालती शंकर नामक बालिका का है, जिसका पूर्वजन्म का नाम कृष्णा था और वह चमोली की रहने वाली थी। दो वर्ष की मालती ने एक दिन यह कहकर अपने माता-पिता को अचंभे में डाल दिया कि वह यहाँ से चार मील दूर चमोली की रहने वाली है। उसके पिता पान का व्यापार करते हैं। वह अपने परिवार तथा अपनी मृत्यु का विस्तृत वर्णन भी सुनाती कि किस तरह से उसका भरा-पूरा परिवार था और कैसे उसकी शिव मंदिर में जल चढ़ाने के लिए पानी भरते समय कुएँ में डूबकर असमय मृत्यु हुई थी। उसकी इन तोतली बातों को उसके माता-पिता अनसुनी करते रहते। प्रायः ऐसी घटनाओं को बाल-सुलभ बातें मानकर उन पर ध्यान नहीं दिया जाता और कालांतर में विस्मृत के गर्त में छिप जाती हैं। आयुवृद्धि के साथ मालती भी पिछले जन्म की बातें भूल जाती और सहज जीवनक्रम चलता रहता।
किंतु एक दिन घटनाक्रम ने नया मोड़ लिया, जब बलदेव नामक चमोली गाँव का एक व्यक्ति पासौली आया। समीप में ही खेल रही मालती की नजर उस पर पड़ी और उसने उसे चाचा कहकर संबोधित किया। बलदेव के यह कहने पर कि वह उसे नहीं जानता, उसने उसके परिवार की एक-एक बात बताकर उसे अचंभित कर दिया।
बलदेव इस घटनाक्रम को भूला नहीं। अपने गाँव वापस पहुँचने पर उसने स्वर्गीय कृष्णा के माता-पिता से संपर्क किया और उन्हें सारे घटनाक्रम से अवगत कराया। उत्सुकतावश परिवार के सदस्य पासौली आये तो उन्हें देखते ही मालती पहचान गयी और अपनी पूर्व जन्मदात्री माँ से लिपटकर रोने लगी। परिवार के अन्य सदस्यों से मिलकर उसकी प्रसन्नता देखते ही बनती थी। उनके द्वारा पूछे गये सभी प्रश्नों के उत्तर संतोषजनक ढंग से देने पर सबको यह विश्वास हो गया कि यह लड़की पूर्वजन्म की कृष्णा ही है। बाद में डॉक्टर पसरीचा एवं अन्य वैज्ञानिकों ने भी तथ्य की गहराई में प्रवेश कर इस घटना की पुष्टि की है।
पुनर्जन्म की कितनी ही घटनाएँ समय-समय पर प्रकाश में आती रहती हैं। पिछले दिनों टाइम्स ऑफ इंडिया’ नामक दैनिक समाचार पत्र में गोपाल नामक एक ढाई वर्षीय बच्चे का विवरण छपा था। उसके पिता आसफ अली रोड, दिल्ली के एक पेट्रोल पंप पर काम करते हैं। एक दिन गोपाल अपने पिता से कहने लगा कि वह मथुरा के एक प्रतिष्ठित परिवार का सदस्य-शक्तिप्रसाद है। सन् 1948 में जब वह पैंतीस वर्ष का था, तो आपसी प्रतिद्वंद्विता में उसके भाई ने गोली मारकर उसकी हत्या कर दी थी। पिता को उसकी इन बातों पर पहले विश्वास नहीं हुआ, लेकिन जब गोपाल जिद करने लगा तो उसे मथुरा लाया गया, जहाँ उसके द्वारा बताये गये सभी विवरण सही पाये गये।
इसी तरह की एक अन्य घटना श्रीलंका की है, जो इन दिनों सर्वत्र चर्चा का विषय बनी हुई है। इसी वर्ष जनवरी मध्य में कई समाचारपत्रों ने श्रीलंका के नुवारा एलिया जिले के एक किसान परिवार में जन्मे लगभग दो वर्षीय बालक के पुनर्जन्म का विवरण प्रकाशित किया है। ‘सामंत नुवान बंडारा विजेबाहु’ नामक यह बालक अपने को पूर्वजन्म का श्रीलंका का पूर्व राष्ट्रपति आर. प्रेमदास बताता है साथ ही वह यह भी विस्तारपूर्वक बताता है कि किस तरह बाबू नामक आत्मघाती तमिल हमलावर ने उसकी हत्या की थी। सर्वविदित है कि एक मई 1993 को इसी नाम के एक आत्मघाती हत्यारे ने बम विस्फोट करके तत्कालीन राष्ट्रपति प्रेमदास को मार डाला था। इसके चार साल पश्चात् दो सितम्बर सन् 1997 को विजबाहु का जन्म हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार इस बच्चे की शक्ल-सूरत प्रेमदास के दो वर्ष की आयु की फोटो से बहुत कुछ मिलती-जुलती है। अपनी दिनचर्या, पूर्व के पारिवारिक सदस्यों के नाम आदि वह सुस्पष्ट रूप से पत्रकारों को बताता है। उसकी दिनचर्या ऐसी रहती है मानो कोई वह बड़ा-बुजुर्ग व्यक्ति हो। प्रतिदिन सुबह तीन बजे उठकर बौद्ध प्रार्थना-पंचशील करना उसकी दिनचर्या का प्रमुख अंग है। ऐसी ही दिनचर्या दिवंगत राष्ट्रपति आर. प्रेमदास की भी रहती थी।
इस घटना का परामनोवैज्ञानिक के द्वारा विश्लेषण किया गया है। तथ्यों को सत्य पाकर वे भी हतप्रभ हैं व सोचने पर विवश हो गए हैं कि आत्मा के अस्तित्व को विज्ञान जब प्रमाणित करेगा तब की बात अलग है, प्रत्यक्ष प्रमाण स्वतः ही अब पुनर्जन्म व आत्मा की निरंतर यात्रा सिद्ध कर रहे हैं।
इस संदर्भ में योगवासिष्ठ 6/1/50/39 में उल्लेख है-
काले काले चिता जीवस्त्वयोन्यो भावयति स्वयम्। भाविताकारवानंतर्वासनाकलिकोदयात्॥
अर्थात् अपने भीतर की वासना को मूर्तरूप देने की इच्छा से आकार धारण करने के लिए जीव अपना शरीर बदलता रहता है।
यों तो पुनर्जन्म के उदाहरण भारत में विशेषकर हिंदू समाज में समय-समय पर मिलते रहते हैं, जिनमें पिछले जन्मों की स्मृतियों को प्रमाणित करके मूर्धन्य अनुसंधानकर्ता इस तथ्य की यथार्थता सिद्ध करते हैं। मुस्लिम व ईसाई समुदाय में यद्यपि पुनर्जन्म की नहीं माना जाता, किंतु परामनोविज्ञानी संस्थाओं ने उन संप्रदायों में भी इस प्रकार की घटनाओं का घटित होना ढूँढ़ निकाला है, जो गीताकार के “वाससंसि जीर्णानि यथा विहाय” के कथन का सत्यापन करती हैं।
घटना सन् 1951 की है। उत्तरप्रदेश के बरेली जिले के करीम उल्लाह नामक एक पाँच वर्षीय बालक ने अपने पिछले जन्म की बातें बताकर सबको अचंभे में डाल दिया। यह घटना तब घटी जब करीम उल्लाह के पिता इश्मतुल्लाह अंसारी, जो कि एक अध्यापक थे, अपने इस बेटे के साथ बरेली के ही एक प्रतिष्ठित मुस्लिम श्री इकराम अली के यहाँ ईद मिलने गये। इनके दो बेटे थे-एक पाकिस्तान में, दूसरा भारत में उन्हीं के साथ रहता था, जिसका नाम था-मोहम्मद फारुक। फारुक की मृत्यु सन् 1954 में हो गयी थी।
श्री अंसारी इकराम अली के यहाँ बच्चों को पढ़ाते भी थे। जैसे ही उस दिन वे अपने बेटे के साथ उनके मकान में प्रविष्ट हुए, करीम उल्लाह कहने लगा कि यह तो हमारा अपना मकान है। उसने बताया कि पूर्वजन्म में वह मोहम्मद फारुक के नाम से इस घर का सदस्य था। उसने अपनी सभी वस्तुओं को पहचाना। अपनी पूर्व पत्नी श्रीमती फातिमा बेगम को भी पहचाना। उससे बातें भी लहजे में कीं तथा कई ऐसे रहस्यों को उद्घाटित किया जिसे केवल फारुक स्वर्गीय मोहम्मद फारुक और उनकी पत्नी बेगम फातिमा ही जानती थी। उसने यह भी बताया कि उसके पास एक बंदूक थी, साथ ही यह रहस्योद्घाटन भी किया कि किस तरह पाँच हजार रुपये उसने भाई के पास पाकिस्तान भेजे व बैंक के निजी खाते में मृत्यु के समय भी तीन हजार रुपये जमा थे। इस तरह की कितनी ही गुप्त बातें बतायीं, जिसे इकराम अली के परिवार ने सही पाया। यह बात भी सामने आयी कि सन् 1954 में मोहम्मद फारुक की मृत्यु हुई थी और उसी वर्ष करीम उल्लाह का जन्म उसी शहर में हुआ था। पुनर्जन्म की यह घटना तब वाराणसी से निकलने वाले समाचार पत्र-संसार के दिनाँक 3/7/59 के अंक में विस्तारपूर्वक छपी थी।
इसके अतिरिक्त कई अन्य समाचारपत्रों ने भी इसे प्रकाशित किया था।
अनुसंधानकर्ताओं ने पुनर्जन्म के अनेकों प्रमाण जुटाये हैं, किंतु इनमें से सर्वाधिक महत्व और प्रामाणिक एडगर केसी के कथनों को माना गया है, जिसने ऐसे विवरण बताये हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि सत्कर्मों या दुष्कर्मों का फल इसी या दूसरे जन्म में अवश्य मिलता है। उन्होंने जो प्रमाण जुटाये थे उनमें से अधिकाँश कष्ट पीड़ित, विकलांग एवं रोगी थे। उन्हें यह व्यथा क्यों झेलनी पड़ी, इस संदर्भ में जो विवरण एवं तथ्य सामने आये, वे सत्य थे। इनकी प्रामाणिकता में बताये गये घटनाक्रम को खोज कर्ताओं ने एकदम सही पाया। इसी प्रकार पूर्वजन्म, कर्मफल पर तथा रोग-चिकित्सा पर केसी ने प्रकाश डाला हैं। वह जो भी स्थान, वस्तुएँ व्यक्ति, सम्बन्धियों की सूचना देता, वे सही पाये गये। वे सभी प्रायः इतनी दूर के होते थे कि सोचा भी नहीं जा सकता था कि उनमें किसी प्रकार कोई छल, कपट अथवा अविश्वास किया गया है। सारी कसौटियाँ किया गया है। सारी कसौटियाँ यही प्रमाणित करती हैं कि पुनर्जन्म ध्रुव सत्य है। शरीर नष्ट होने पर आत्मा नष्ट नहीं होती। वह अनेकों स्मृतियाँ अपने में सँजोये रहती है।
निश्चित ही पुनर्जन्म की मान्यता जितनी सत्य है, उतनी ही लोकोपयोगी भी। आत्मा की अमरता और मरणोपरान्त पुनः शरीर धारण में यदि आस्था बनी रहे, तो व्यक्ति दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाकर कर्मफल और ईश्वर में विश्वास बनाये रह सकता है और निकृष्ट कर्मों से विरत रहकर श्रेष्ठ कर्मों में लगा रह सकता है।
सन् 1990 से लेकर सन् 2000 तक के दस वर्ष जोतने, बोने, उगाने, खाद-पानी डालने और रखवाली करने के हैं। इक्कीसवीं सदी से वातावरण बदल जाएगा, साथ ही परिस्थितियों में भी भारी हेर-फेर होगा। इस सभी के विस्तार में एक शताब्दी लग जाएगी। सन् 2000 से 2011 तक। इस बीच इतने बड़े परिवर्तन बन पड़ेंगे, जिन्हें देखकर जन-साधारण आश्चर्य में पड़ जाएगा।
-नवसृजन के निमित्त महाकाल की तैयार’ से
अगर दुनिया की तारीख पर नजर डालें, तो हम यह पाते हैं कि बड़े-बड़े संकट के दौर दुनिया के सामने आयें हैं और हर जमाने में लोगों ने यही समझा है कि उनका जमाना संसार के इतिहास का सबसे खतरनाक जमाना है। फिर भी दुनिया कायम रही-न सिर्फ कायम रही, बल्कि कई दिशा में आगे बढ़ी, तरक्की की।
ऐसे ही एक जमाने में हम लोग जीते हैं। हो सकता है इसके बुरे और दर्दनाक पहलुओं को जरूरत से ज्यादा अहमियत दे रहे हों और इस बात को न समझ पा रहे हों कि बुराई और दर्द की इस परत के नीचे शायद कुछ अच्छी चीजें कुलबुला रही हैं और मुमकिन है कि उनके अंकुर फूटने ही वाले हों और इंसान को तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ाएँ।
ऐसी आस्था बनाए रखना अच्छा है। ऐसे ढाँढस का लंगर हमें बहुत ज्यादा बह जाने, भटक जाने से रोक सके-यह अच्छा है।
पं. जवाहरलाल नेहरू
दो मित्र मोटरसाइकिल पर सवार होकर जा रहे थे कि एक पेड़ से टकरा गये। चालक तो टक्कर होते ही मारा गया। पीछे जो बैठा था वह भी बुरी तरह घायल हो गया था। उधर से एक राहगीर निकला। उसने देखा बेचारे की गर्दन पीछे घूम गई दिखाई देती है। बड़ी मेहनत से उसने गर्दन घुमाई और मोड़कर आगे की ओर कर दी इतने में पुलिस आई और छानबीन की कि क्या हुआ। राहगीर बोला-चालक तो टक्कर होते ही मारा गया, किन्तु दूसरे की गर्दन पीछे मुड़ गई थी, जो मैंने सीधी की तब तक कुछ साँस थी। गर्दन सीधी करते ही इसके मुँह से आह निकली और मर गया। पुलिस के सिपाही ने गौर से देखा कि जिसकी गर्दन सीधी की है, वह हवा के बचाव के कारण कोट उल्टा पहने था ताकि सीने में हवा न लगे और राहगीर ने उसका सिर उल्टा समझा, जो धोखे में सीधे सिर को ही उल्टा घुमा दिया। वह उसमें ही मारा गया अन्यथा वह जिन्दा था। न सुधारा जाता तो बच जाता। करीब-करीब हमने भी प्रकृति के साथ यही खिलवाड़ ही है। जहाँ भी छेड़खानी की कि सब कुछ अस्त-व्यस्त हो गया है।
किसान होते हुए भी श्रम में उसकी आस्था न थी। वह रात-दिन इसी उधेड़-बुन में रहता था कि किस प्रकार बिना मेहनत किए वह धनवान् बन जाए। इसी उधेड़-बुन में वह अपना समय काट रहा था कि उसके देश के राजा ने एक रात स्वप्न देखा कि उसे हर वस्तु पीली-पीली दिखाई पड़ रही है। सुबह होते ही राजा ने घोषणा करवा दी कि जो व्यक्ति उसके स्वप्न का अर्थ बता देगा, उसे राजकोष से एक लाख रुपयों का पुरस्कार दिया जाएगा।
किसान ने जब यह घोषणा सुनी तो वह विकल हो उठा। किसी भी तरह वह लखपति बनने का मौका खोना नहीं चाहता था। वह जंगल की ओर चल पड़ा और वहाँ भगवान को प्रसन्न करने के लिए ध्यान लगाकर बैठ गया। तीन दिन बाद एक वृद्ध की आत्मा प्रकट हुई और किसान को मदद करने का प्रस्ताव किया। किसान ने राजा के स्वप्न और उससे प्राप्त होने वाली राशि का जिक्र किया, तो वृद्ध की आत्मा बोली, “मैं तुम्हें स्वप्न का अर्थ बता दूँगा, लेकिन एक शर्त है, जो राशि तुम्हें मिलेगी उसमें से आधा मुझे दे जाओगे"।
किसान ने शर्त स्वीकार कर ली तो वृद्ध की आत्मा ने बताया कि राजा को स्वप्न में हर चीज पीली-पीली दिखाई दी, इसका अर्थ है कि इस वर्ष राज्य में भयंकर अकाल पड़ने वाला है। किसान राजा के पास गया और स्वप्न का अर्थ बताकर एक लाख रुपया प्राप्त कर लिया। रुपया पाने पर उसके मन में बेईमानी समा गयी। सोचा कि वृद्ध की आत्मा के पास नहीं जाऊँगा। वह मेरा क्या कर लेगी। इंतजार करते-करते निराश होकर वापस लौट जाएगी। किसान यह सोचते हुए सीधे घर लौट गया।
कुछ समय बाद राजा ने फिर एक स्वप्न में हर वस्तु लाल-ही-लाल दिखाई दे रही थी। दूसरे दिन राजा ने स्वप्न का अर्थ जानने के लिए घोषणा करवा दी कि जो व्यक्ति स्वप्न का सही अर्थ बताएगा, उसे डेढ़ लाख रुपये दिए जाएँगे।
राजा की घोषणा सुनकर किसान बहुत पछतावा कि अगर मैं उस वृद्ध की आत्मा को पहले आधी राशि दे देता, तो यह डेढ़ लाख तो न जाता। फिर यह सोचकर कि वृद्ध की आत्मा से माफी माँग लूँगा, वह किसान जंगल की ओर चला गया। तीन दिन तपस्या के बाद वह आत्मा प्रकट हुई तो किसान ने माफी माँगते हुए और रोते हुए राजा के स्वप्न और उसकी पुरस्कार राशि के संबंध में बताया।
आत्मा बोली-मैं तुम्हें स्वप्न का अर्थ तो बता दूँगी, लेकिन इस बार बेईमानी न करना।” किसान ने पुनः वादा किया तो आत्मा बोली, “इस साल राज्य में युद्ध की स्थिति होगी। पड़ोसी देश आक्रमण करेगा और भारी रक्तपात होगा।”
किसान राजा के पास गया और स्वप्न का अर्थ बताकर पुरस्कार राशि प्राप्त कर ली। धन प्राप्त करते ही किसान के मन में विचार उठा कि वृद्ध की आत्मा को पुरस्कार में से आधा देने से अच्छा होगा कि तलवार से उसका होगा कि तलवार से उसका वध कर दिया जाय। इसी विचार से वह तलवार लेकर जंगल की ओर चल पड़ा। वृद्ध की आत्मा अदृश्य हो गयी।
एक वर्ष बाद राजा ने फिर स्वप्न देखा कि उसे सारी वस्तुएँ हरी-हरी दिखाई पड़ रही हैं। दूसरे दिन उसने घोषणा की कि इस स्वप्न का अर्थ जो व्यक्ति बता देगा, उसे दो लाख रुपया दिया जाएगा।
राजा की यह घोषणा सुनकर किसान बहुत पछताया और मन-ही-मन सोचने लगा कि उससे बहुत बड़ी गलती हो गयी है। लेकिन अब क्या किया जाय? अंत में उसने निश्चय किया कि इस बार जो भी पुरस्कार मिलेगा, वह सब-का-सब मैं वृद्ध की आत्मा को दे दूँगा। यही सोचकर वह जंगल की पड़ा।
जंगल पहुँचने पर उसे अचरज हुआ कि वृद्ध की आत्मा पहले से ही उसकी प्रतीक्षा में खड़ी हैं। वृद्ध की आत्मा को देखकर किसान हार्दिक पश्चाताप से उसके चरणों पर गिर पड़ा और सिसकते-सिसकते माफी माँगने लगा।
वृद्ध की आत्मा ने झुककर किसान को उठाया और अपने सीने से लगाकर बोली-” इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है। यह समय का प्रभाव था। जब देश में अकाल पड़ा तो तुम्हारी नीयत भी बुरी हो गयी थी और जब युद्ध की स्थिति आयी तो उससे भी तुम मुक्त न हो सके। तुमने उस प्रभाव के कारण ही मेरे ऊपर प्रहार किया। लेकिन अब राजा को स्वप्न में हर वस्तु हरी-हरी हर तरफ खुशहाली का साम्राज्य छाने वाला है। इसीलिए तुम्हारे अंदर भी अच्छे विचार उठने लगे हैं। इसी का परिणाम है कि तुमने बिना माँगे ही पुरस्कार की सारी राशि मुझे देने की सोच लिया।”
समय के इस अद्भुत प्रभाव पर किसान चकित था। उसे बोध हो रहा था कि उज्ज्वल भविष्य अपने साथ सद्विचारों के प्रवाह को लेकर आता है।
मानव हृदय से बढ़कर कोई तीर्थ नहीं। भगवान इसी में बसते हैं और वहाँ तक पहुँचने वाले को दर्शन दिए बिना नहीं लौटने देते।
-परमपूज्य गुरुदेव
मानसिक असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए, चित्तवृत्तियों के बिखराव को एकीकरण के द्वारा एकाग्रता की स्थिति में लाने के लिए ध्यान से श्रेष्ठ कोई उपाय नहीं। आज के भौतिकवादी युग में जहाँ सारे समाज में साधनों को बटोरने की बेवजह बेतहाशा दौड़-सी चल रही है, प्रायः सभी का मन असंतुलित, बिखरा हुआ-तनावग्रस्त देखा जाता है। कई बार मन क्रोध, शोक, प्रतिशोध, विक्षोभ, कामुकता जैसे उद्वेगों में फँस जाता है। उस स्थिति में किसी का हित नहीं सधता। अपना या पराया किसी का भी कुछ अनर्थ हो सकता है। उद्विग्नताओं के कारण आज समाज में सनकी-विक्षिप्त स्तर के व्यक्ति बढ़ते जा रहे हैं। सही निर्णय करना तो दूर वे कब आत्मघाती कदम उठा लेंगे, समझ में नहीं आता। इन विक्षोभों से मन-मस्तिष्क को उबारने का एक ही उपाय है- मन को विचारों के संयम का-संतुलित स्थिति बनाए रखने का अभ्यस्त बनाने पर जोर दिया जाय। इसी का नाम ‘ध्यान साधना’ है। मन को अमुक चिन्तन प्रवाह से हटाकर अमुक दिशा में नियोजित करने की प्रक्रिया ही ध्यान कहलाती है। शुभारंभ के रूप में भटकाव के स्वेच्छाचार से मन को हटाकर एक नियत-निर्धारित दिशा में लगाने के प्रयोगों का अभ्यास किया जाय तो शीघ्र सफलता मिलती है।
कहा गया है कि जो अपने को वश में कर लेता है। गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता (अध्याय 2)। बार-बार जब वे इन्द्रियों को वश में रखने की बात कहते हैं तो उसमें सबसे प्रधान है मन, जिसके इशारे पर शेष सारी इन्द्रियाँ नाचती हैं। आत्मनियंत्रण से प्रज्ञा के प्रतिष्ठित होने का पथ प्रशस्त होता है व उसके लिए बेसिर-पैर की दौड़ लगाने वाला अनगढ़ विचारों को बार-बार घसीटकर श्रेष्ठ-चिन्तन के प्रवाह में लाने का प्रयास-पुरुषार्थ करना पड़ता है। आसान नहीं है यह, पर असंभव भी नहीं। यदि यह किया जा सका तो आत्मिक और भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से लाभ मिलते हैं। जहाँ इस वैचारिक तन्मयता की फलश्रुति आध्यात्मिक जगत में प्रसुप्त शक्तियों के जागरण से लेकर ईश्वरप्राप्ति-रसौ वै सः की आनन्दानुभूति के रूप में प्राप्त होती है, वहाँ भौतिक क्षेत्र में अभीष्ट प्रयोजनों में पूरी तन्मयता-तत्परता नियोजित होने से कार्य का स्तर ऊँचा उठता है, सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है और बढ़ी-बढ़ी उपलब्धियाँ मिलती हैं।
वस्तुतः विचारों का, श्रेष्ठ सकारात्मक विचार-प्रवाहों का व्यक्तित्व को कराया गया स्नान ही ध्यान है। सूक्ष्म व कारण सत्ता पर नित्य जमने वाले कषाय-कल्मषों की धुलाई इसी ध्यान रूपी साबुन से हो सकती है। ध्यान है। ध्यानयोग का मूलभूत लक्ष्य है- साधक को अपनी मूलभूत स्थिति के बारे में, अपने आपे के बारे में बोध कराना। उसकी उस स्मृति को वापस लौटाना, जिससे कि वह भटका हुआ देवता अपने मूलस्वरूप को जान सके। आज का हर व्यक्ति आत्मविस्मृत मनःरोगी की स्थिति में जी रहा है। ऐसी स्थिति में व्यथित-ग्रसित लोग स्वयं तो घाटे में रहते ही हैं, अपने परिचितों, संबंधियों को भी दुखी करते रहते हैं। विस्मरण का निवारण एवं आत्मबोध की भूमिका में पुनः जागरण, यही है ध्यानयोग का लक्ष्य।
किसी संत ने कहा है कि ध्यान किया नहीं जाता है, हो जाता है। सही भी है, जब ध्यान के लिए मन पर बलात् दबाव डाला जाता है, मन अपनी चंचलता के शिखर पर पहुँचकर बहुत नचाता है। इसीलिए ध्यान के लिए बारबार श्रेष्ठ चिन्तन के प्रवाह को बुलाना, उन्हीं में रमण करना ध्यान होने की स्थिति ला देता है। मानवी मन वस्तुतः जंगली हाथी की तरह है, जिसे पकड़ने के लिए पालतू-प्रशिक्षित हाथी भेजने पड़ते हैं। सधी हुई बुद्धि पालतू हाथी का कार्य करती है। ध्यान के रस्से से जकड़कर उसे काबू में लाती है और फिर श्रेष्ठ प्रयोजनों में संलग्न हो सकने योग्य सुसंस्कृत बनाती है।
ध्यान के लिए इसी से सविचार स्थिति प्रारंभिक साधकों के लिए श्रेष्ठ है। धीरे-धीरे निर्विचार-निर्विकल्प स्थिति आती है। इसीलिए ध्यान में तन्मयता-तल्लीनता का भाव पैदा करने के लिए सृजनात्मक-विधेयात्मक चिंतन का अभ्यास करने की बात पर बार-बार जोर दिया जाता रहा है। तन्मयता की फलश्रुतियाँ अपार हैं। वैज्ञानिकगण अपने विषय में तन्मय हो जाते हैं और विचार समुद्र में गहरे गोते लगाकर नई-नई खोजों के रत्न ढूँढ़ लाते हैं। साहित्यकार-चिंतक-मनीषी तन्मयता के आधार पर ही राष्ट्रोत्थान के, समाज के नवनिर्माण के चिंतन को जन्म दे पाते हैं। तन्मय स्थिति में होना अर्थात् शरीर से परे होने का भाव पैदा कर स्वयं को विचार समुद्र में डुबा देना। लोकमान्य तिलक के जीवन की एक प्रसिद्ध घटना है कि जब उनके अँगूठे में एक फोड़े को चीरा लगाया जाना था, तो डॉक्टरों ने आपरेशन की गंभीरता बताकर दवा सुंघाकर बेहोश करने का प्रस्ताव रखा। उनने कहा कि “मैं अपने को गीता के प्रगाढ़ अध्ययन में लगा दूँ। आप बेखटके आपरेशन कर लें।” डॉक्टरों को सुखद आश्चर्य हुआ कि पूरी अवधि में वे बिना हिले-डुले गीता पढ़ते रहे-शान्तिपूर्वक आपरेशन करा लिया। पूछने पर इतना ही कहा कि “तन्मयता इतनी प्रगाढ़ थी कि आपरेशन की ओर ध्यान नहीं नहीं गया और दर्द भी नहीं हुआ।”
विचारों के बिखराव का एकीकरण-चित्तवृत्तियों का निरोध यदि किया जा सके तो मनुष्य दुनिया के बुद्धिमानों की तुलना में असंख्य गुनी विचारशीलता, प्रज्ञा, भूमा प्राप्त कर सकता है, मात्र समझदार न कहलाकर तत्व द्रष्टा कहला सकता है। आत्मिक प्रगति का अभीष्ट प्रयोजन भी पूरा कर सकता है। मेडीटेशन-मनोनिग्रह की योग के प्रकरण में अक्सर चर्चा होती है, पर यह है वस्तुतः चित्त की वृत्तियों का अधोगामी चिंतन प्रवाह का निरोध एवं तदुपरान्त ऊर्ध्वीकरण। इसके लिए निराकरण ध्यान भी किया जा सकता है व साकार भी। कई व्यक्ति इसी ऊहापोह में रहते हैं कि कौन-सा ध्यान श्रेष्ठ है-निराकार या साकार। ध्यान उपासना के साथ जब भी जोड़ा जाता है, वह आत्मिक प्रगति के साथ भौतिक प्रगति का भी लक्ष्य पूरा करता है। ईश्वरप्राप्ति-जीवनलक्ष्य की प्राप्ति जैसे महानतम उद्देश्यों के कारण उपासना व ध्यान परस्पर जोड़कर किये जाते हैं व तुरंत लाभ भी देते हैं। विभिन्न संप्रदायों तथा विधियों में उसके प्रकारों में थोड़ा-बहुत अंतर भले ही हो, पर ध्यान का समावेश हर पद्धति में है।
साकार ध्यान में भगवान की अमुक मनुष्याकृति को मानकर चला जाता है-उनके गुणों का ध्यान किया जाता है, वहीं निराकार ध्यान में प्रकाशपुँज पर आस्था जमाई जाती है। सूर्य जैसे बड़े आग के गोले-सविता देवता का ध्यान और प्रकाश बिन्दु जैसे छोटे आकार का ध्यान भी एक प्रकार का साकार ध्यान नहीं है। अंतर मात्र इतना ही है कि उसमें मनुष्य जैसी आकृति नहीं है। ध्यान के कई तरीके हैं, जिनमें से जिन्हें जो उपयोगी हो, वह करके लाभान्वित हो सकता है। प्रखर साधना वर्ष में सारे भारत व विश्व में अखण्ड जप के साधना-आयोजन चल रहे हैं। उन सभी में ध्यान को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। बिना ध्यान का जप मात्र जीभ का व्यायाम है। जप में प्राण-प्रतिष्ठा ध्यान द्वारा की जाती है। अतः ध्यान को तकनीक न मानकर भाव प्रवाह के रूप में समझते हुए करने का अभ्यास यदि इष्ट मंत्र के जप के साथ किया जाय तो वह निश्चित ही जप को प्रभावी व फलश्रुति परक बना देता है।
एक प्रकार का ध्यान प्रातःकालीन उदीयमान सूर्य का, सविता देवता का किया जा सकता है। स्वर्णिम प्रकाश की किरणें साधक के शरीर में प्रवेश कर रही हैं एवं वह अंदर से बाहर तक निर्मल, पवित्र, प्रकाशवान होता चला जा रहा है। यह ध्यान सर्वश्रेष्ठ है एवं इसमें सतत् सूर्य के पापनाशक तेज से आत्मसत्ता के घिरे होने के भाव चित्र बनाए जा सकते हैं, प्रार्थना की जा सकती है कि यह तेज सभी कषाय-कल्मषों को नष्टकर सद्बुद्धि का उदय कर सत्कर्म की ओर प्रेरित कर दे। यदि उदीयमान सूर्य देख पाना हर किसी के लिए अपने आवा, कमरे, पूजाकक्ष कर स्थिति के कारण संभव नहीं है, तो ऐसे चित्र का ध्यान कर भावपटल पर ऐसा चिंतन किया जा सकता है।
सूर्य का छोटा संस्करण है- दीपक। जलती हुई दीपक की लौ को थोड़ी देर खुली आँखों से देखना-फिर कुछ क्षणों के लिए आँखें बंद कर उसे भ्रूमध्य नासिका के अग्र स्थान पर जहाँ दोनों नेत्र मिलते हैं-ज्योति के रूप में देखना-ज्योति अवतरण की बिंदुयोग साधना कहलाती है। इससे बहिर्त्राटक व अन्तर्त्राटक की क्रियाओं द्वारा उसे साधकर पीनियल-पिट्यूटरी एक्सिस को- आज्ञाचक्र को जगाया जा सकता है। खुली आँखों से देखने का क्रम क्रमशः कम करते हुए लौ को बार-बार देखने का अभ्यास करना चाहिए, साथ में धीरे-धीरे मानसिक जप भी चलते रहना चाहिए व खींची श्वास के साथ पवित्र वायु के-ज्योतिष्मान प्रकाश के प्रवेश का भाव एवं छोड़ी हुई निश्वास के साथ मलीनता भरे विचारों के बहिर्गमन का भाव भी साथ-साथ किया जा सकता है। यह ध्यान बुद्धि-लब्ध भाव-लब्ध स्मृति बढ़ाने से लेकर अलौकिक ऋद्धि-सिद्धियों के द्वार खोलता है।
एक ध्यान हिमालय का किया जा सकता है। परमपूज्य गुरुदेव हिमालय को अपना संरक्षक, अभिभावक व पारस कहते थे। चार बार यात्रा कर व सतत् हिमालय का ध्यान कर उनने अपने को दिव्यदर्शी, प्रज्ञापुरुष, अवतारीसत्ता के रूप में विकसित किया। हिमालय, अध्यात्म-चेतना का ध्रुव केन्द्र है। ऋषियों की तपःस्थली हिमालय से सतत् चैतन्य धाराओं का प्रवाह आ रहा है एवं मन-मस्तिष्क को शीतल बना रहा है-तपते हुए अंतःकरण पर ठंडे छींटे लगा रहा है-यह भाव किया जा सकता है।
हिमालय सदा से ही अध्यात्म-पिपासुओं-जिज्ञासु साधकों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। फिर उसका ध्यान तो निश्चित ही अलौकिक क्षमताओं का जागरण करने की शक्ति रखता है। इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर रही मानवजाति के तपते-तनावग्रस्त तन के लिए हिमालय का ध्यान-सतत् वहीं रमण करते रहने का चिंतन एक श्रेष्ठतम चिकित्सा-उपचार हो सकता है।
एक और तरीका ध्यान का है-दर्पण में अपनी आकृति देखते हुए बार-बार आत्मबोध की स्थिति में अपने अंतस् को ले जाना। तत्वमसि, अयमात्माब्रह्म, सच्चिदानंदोऽहम् का भाव लाते हुए कि हम शरीर नहीं, हाड़-माँस का पुतला नहीं हम श्रेष्ठता की प्रतिमूर्ति हैं, भाव-संवेदनाओं का पुँज हैं-हम वही हैं जो भगवान हैं। हमें वैसा ही बनना है जैसे भगवान हैं। “मुखड़ा देख ले दर्पण में” शीर्षक वाले श्री प्रदीप के गीत पर जब प्राण-प्रत्यावर्तन सत्रों (1973-74) में ध्यान का क्रम चल पड़ता था तो साधक फूट-फूट कर रो पड़ते थे। उन्हें बार-बार स्मरण दिलाया जाता था कि अब तक जो जीवन जिया था वह एक पशु का था। अब मानव, देवमानव का जीवन जीना है। दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता। सारे विगत कर्मों का उसमें देखते हुए साधक को ईश्वरीय स्वरूप का बोध होता है। आभास होता है कि हमें अपने आपको अब क्या बनाना है।
एक ध्यान अपने इष्ट पर किया जा सकता है। ध्यान में याद रखना चाहिए कि आकृति से पीछा छूटना आसान नहीं है। ध्यान-धारणा के सहारे आत्मचिन्तन का प्रयोजन पूरा हो सके, इसके लिए इष्ट चाहे वे शिव-पार्वती हों, शिवलिंग हों, भगवान श्रीकृष्ण, विष्णु, माँ गायत्री, अम्बा, भवानी, दुर्गा, सरस्वती अथवा गणेश या हनुमान एवं काबा का ध्यान हो, चाहे ईसामसीह का पैगम्बर का हो अथवा अपने गुरु का-उन पर मन आरोपित कर ध्यान को प्रगाढ़ बनाना चाहिए। इष्टदेव के समीप-अति समीप होने, उनके साथ लिपट जाने, उच्चस्तरीय प्रेम के आदान-प्रदान की गहरी कल्पना करनी चाहिए। इसमें भगवान और जीव के बीच माता-पुत्र स्वामी-सेवक जैसा कोई भी सघन संबंध बनाया जा सकता है। इससे आत्मीयता को अधिकाधिक घनिष्ठ बनाने में मदद मिलती है। भक्त अपनी अहंता-संकीर्णता को भगवान के इष्ट के चरणों में अर्पित करता है। भावना करता है कि यह सारी सत्ता-सारा वैभव उसी दैवी शक्ति की धरोहर है। सद्गुरु अथवा भगवान -किसी पर भी ध्यान आरोपित कर वह शक्ति पायी जा सकती है, जिसकी कि कल्पना भी नहीं की जा सकती।
एक ध्यान जिस विपश्यना के रूप में भी प्रचलित माना गया है- खींची व छोड़ी श्वास पर ध्यान केन्द्रित करने का किया जा सकता है। हर श्वास को प्रेक्षक की तरह देखना व उस पर ध्यान केन्द्रित करना, धीरे-धीरे श्वासगति को कम कर पूरे शरीर को शिथिल करते चले जाना - यह इस ध्यान की मूल अचेतन क्रियाएँ हैं। इससे सारा शरीर सक्रिय ऊर्जा से भर जाता है। इसी की उच्चावस्था गायत्री की सोऽहम् साधना अथवा हंसयोग के रूप में बतायी गयी है, जिसमें अजपा जप भी चलता है, साथ ही खींची श्वास के साथ ‘सो’ तथा छोड़ी के साथ हम का भाव किया जाता है। ‘सो’ के साथ भगवत् चेतना का अंदर प्रवेश तथा ‘हम’ के साथ अपनी आत्मसत्ता का उसमें सराबोर होना-अपने अहं भाव को बाहर विसर्जित करना। ध्यान किसी भी पद्धति से हो, अपनी सुविधानुसार चयन कर नियमित उसे करते रहना चाहिए। अभी यहाँ ध्यान की कुछ पद्धतियाँ बतायी गयी हैं, अगले अंक में कुछ और पर प्रकाश डालकर साधकों का पथ प्रदर्शन किया जाएगा।
कबीर सिद्धपुरुष की तरह प्रख्यात हो गये।
दूर-दूर से जिज्ञासु लोग आते। तब भी वे पहले की तरह ही कपड़ा बनाते रहते और साथ-साथ सत्संग चलाते। शिष्यों में से एक ने पूछा-आप जब साधारण थे तब कपड़ा बुनना ठीक था, पर अब जबकि सिद्धपुरुष हो गये और निर्वाह में कमी नहीं रहती तो आप कपड़ा क्यों बुनते हैं?
कबीर ने सरल भाव से कहा-पहले मैं पेट पालने के लिए बुलाता था पर अब मैं जन-समाज में समाये हुए भगवान का तन ढकने और अपना मनोयोग साधने के लिए बुनता हूँ।
कार्य वही रहने पर भी दृष्टिकोण की भिन्नता से उत्पन्न होने वाले अन्तर को समझने से शिष्य का समाधान हो गया।
एक जिज्ञासु कबीर के पास पहुँचा, बोला-दो बातें सामने हैं-संन्यासी बनें या गृहस्थ।
कबीर ने कहा-जो भी बनो आदर्श बनो। उदाहरण समझाने के लिए उन्होंने दो घटनाएँ प्रस्तुत कीं।
अपनी पत्नी को बुलाया। दोपहर का प्रकाश तो था, पर उन्होंने दीपक जला लाने के लिए कहा-ताकि वे कपड़ा अच्छी तरह बुन सकें। पत्नी दीपक जला लायी और बिना कुछ बहस किये रखकर चली गई।
कबीर ने कहा-गृहस्थ बनना हो तो परस्पर ऐसे विश्वासी बनना कि दूसरे की इच्छा ही अपनी इच्छा बने।
दूसरा उदाहरण सन्त का देना था। वे जिज्ञासु को लेकर एक टीले पर गये, जहाँ वयोवृद्ध महात्मा रहते थे। वे कबीर को जानते थे। नमाज के उपरान्त उनसे पूछा-आपकी आयु कितनी है? बोले-अस्सी बरस।
इधर-उधर की बातों के बाद कबीर ने कहा-बाबाजी आयु क्यों नहीं बताते? संत नो कहा था-बेटे अभी तो बताया था, अस्सी बरस। तुम भूल गये हो। टीले से आधी चढ़ाई उतर लेने पर कबीर ने सन्त को जोर से पुकारा और नीचे आने के लिए कहा। वे हाँफते-हाँफते चले आये। कारण पूछा, तो फिर वही प्रश्न किया-आपकी आयु कितनी है? सन्त को तनिक भी क्रोध नहीं आया। वे उसे पूछने वाले की विस्मृति मात्र समझे। कहा-अस्सी बरस है और हँसते वापस लौट गये। कबीर ने कहा-सन्त बनना हो तो ऐसा बनना जिसे क्रोध ही न आये।
वर्षों पूर्व महात्मा गाँधी ने एक पत्र लिखा था। इस पत्र का प्रारूप इंग्लैण्ड होता हुआ हवयना जा पहुँचा, प्रकाशन के लिए। इस पत्र के प्रिन्ट पर नजर पड़ते ही प्रकाशक मार्क्स हायक एकदम अचरज में पड़ गए, क्योंकि इतनी विचित्र हस्तलिपि उन्होंने अपने लम्बे जीवनकाल में कभी नहीं देखी थी, यद्यपि उन्हें दुनिया की अगणित हस्तलिपियों को पढ़ने और देखने का अवसर मिला था। इस पत्र पर नीचे महात्मा गाँधी जी के हस्ताक्षर थे। मार्क्स ने गाँधी जी के बारे में का फल कुछ पढ़ और सुन रखा था। महारथ
उन्हें गाँधी जी एक अलग ही प्रकार के महापुरुष लगते थे। वे राजनीति में थे, परंतु महात्मा थे। वे स्वतंत्रता संग्राम का संचालन कर रहे थे, लेकिन अहिंसा व मैत्री भावना के माध्यम से वे दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य को अपने देश से हटाना चाहते थे, लेकिन निहत्थे सत्याग्रहियों के बल पर उनको गाँधी जी का आचार बड़ा विचित्र लगता था। राजनीति को उन्होंने रचनात्मक कार्य से जोड़ रखा था। सफाई करना, चरखा चलाना, खादी पहनना उनके स्वाधीनता संग्राम की अनिवार्य शर्त थी। वे स्वयं भी नियमित चरखा काटते थे।
गाँधी जी के प्रशंसक होने के नाते मार्क्स उनके बारे में और भी अधिक जानने को उत्सुक थे विशेषकर भविष्य को लेकर कि क्या गाँधी जी अपने उद्देश्यों में सफल हो सकेंगे। ऐसे में उन्हें याद आयी वियना विश्वविद्यालय के हस्तलिपि विज्ञान-विशेषज्ञ प्रो.. रयफल शेमनि की। उनको इस विद्या में हासिल थी। मार्क्स ने यह पत्र उन्हें दिखाने का निश्चय किया। इस निर्णय के बाद उन्होंने गाँधी जी के हस्ताक्षर काटकर अलग कर दिए। नाम को पत्र से अच्छी तरह से अलग करने के बाद मार्क्स जा पहुँचे प्रो.. रायफल के घर। प्रोफेसर उस समय अपने अध्ययनकक्ष में थे। प्रायः प्रो. रायफल से उस समय मिलना बहुत मुश्किल होता था, जब वे अपने अध्ययन कक्ष में हों। यही कारण था कि जब मार्क्स उनसे मिलने पहुँचे तो एक बार तो उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया, पर फिर न जाने क्या सोचकर उनको बुला लिया।
मार्क्स ने उन्हें बताया कि उनके पास एक पत्र का प्रारूप है। जिसकी हस्तलिपि बड़ी अजीबोगरीब है। मैं इस हस्तलिपि वाले व्यक्ति के बारे में जानना चाहता हूँ। मुझे विश्वास है कि आप इस संबंध में अवश्य बता सकेंगे। इसीलिए मैं आपके पास विशेष रूप से आया हूँ। उस पत्र को लेकर जैसे ही प्रो. रायफल ने देखा वैसे ही बोल उठे- “भई, ऐसी हस्तलिपि तो मैं स्वयं भी जीवन में पहली बार देख रहा हूँ। खैर.......” इतना कहकर वे उन टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में पूरी तरह लीन हो गए। फिर लगभग आधे घण्टे बाद बोले, “यह व्यक्ति असाधारण है, महान है। इसका जीवन सदैव संघर्षशील रहा है और आगे भी लोकहित में संघर्ष करता रहेगा। यह व्यक्ति सामाजिक कुरीतियों से लड़ने वाला तथा उन्हें समाप्त करने वाला है। जिस कार्य को करने का संकल्प लेता है, उसे पूरा करके ही छोड़ता है। इस हस्तलिपि वाले व्यक्ति की जैसी स्मरणशक्ति किसी-किसी के पास ही होती है। यह व्यक्ति इतिहास में अमर रहेगा। यह अहिंसा का पुजारी है। यह व्यक्ति इतना दयालु है कि किसी का भी दुःख-दर्द नहीं देख सकता। कुल मिलाकर संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि यह व्यक्ति अपरिभाषित है। सत्य को ही कहता है, करता है बिना किसी भय के।”
जब मार्क्स ने इस व्यक्ति के बारे में अधिक पूछा तो उत्तर मिला, “यह व्यक्ति कोई भी कार्य अपने लिए नहीं करता, न ही इसकी कुछ महत्त्वाकाँक्षा है। इसे अपने उद्देश्य में शतप्रतिशत सफलता मिलेगी, परंतु इसे किसी बात की चिंता नहीं होती है। केवल यह व्यक्ति अपनी आत्ममुक्ति के लिए चिन्तित है। इस व्यक्ति से संबंधित सबसे विशेष बात यह है कि यह व्यक्ति अस्वाभाविक मृत्यु मरेगा। इसकी हत्या की जाएगी। यह शहीद होगा।”
प्रो. रायफल ने एक क्षण आँख बंद कर मौन रखा, फिर बोले- “महापुरुष शहीद ही होते हैं। कुछ निपट स्वार्थी लोग महापुरुषों के व्यापक उपदेशों को बर्दाश्त नहीं कर पाते। उनको लगता है कि इनके विचारों से हमारे स्वार्थों को खतरा है और
इसीलिए उनको अपने रास्ते से हटाने का प्रयत्न करते हैं। संसार को नवजीवन देने वाले महापुरुष प्रायः शहीद ही होते हैं।”
मार्क्स ने प्रो. रायफल से अगला प्रश्न किया-आपके विचार से इस व्यक्ति को किस धर्म का अनुयायी होना चाहिए।” उत्तर था-इस हस्तलिपि वाले व्यक्ति का धर्म केवल मानवता है।” मार्क्स का प्रो. रायफल से अंतिम प्रश्न था कि “इस व्यक्ति की कमजोरी क्या है।” “इस व्यक्ति की सबसे बड़ी कमजोरी है कि यह व्यक्ति केवल अपनी आत्मा की आवाज सुनता है एक जन नेता के लिए यह बहुत बड़ी कमजोरी हो सकती है।”
काल ने सही पलों में इस सच को निर्णित किया कि हस्तलिपि व्यक्ति के चरित्र एवं भविष्य की गवाही देती है। सही समय पर गाँधी जी के जीवन में प्रो. रायफल की सभी बातें शत-प्रतिशत सही साबित हुई।
अंतरात्मा को कुचलना आत्महत्या से भी भयंकर अपराध है।
-आचार्य पं. श्रीराम शर्मा
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जीवन के हर पक्ष को इसके माध्यम से उल्लासमय बनाने का प्रयास किया गया है। ऋतुक्रम में हेमंत की ठिठुरन वसंत के आगमन के साथ पुलकन व उल्लास में बदलने लगती है, किंतु यह वसंत मात्र वसंत पंचमी के मनाने तक सीमित नहीं है। प्रायः 40 दिन की अवधि तक होली के पूर्व आने तक मनाया जाता है एवं वातावरण को एक अनोखी मादकता-पवित्र सात्विक भाव-अंतरंग से उभरकर आने वाली दिव्य शाँति से भर देता है। नवीन संवत्सर के आगमन के पूर्व की यह वेला जिसमें एक पर्व महाशिवरात्रि का भी बीच में आता है, आध्यात्मिक अनुदानों को ग्रहण करने की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है, साथ ही यह नवदुर्गा चैत्र नवरात्रि के आगमन की पूर्व वेला होने के नाते यह और भी अधिक महत्वपूर्ण बन जाती है। ऋतु-परिवर्तन से मानव-समुदाय आधि-व्याधि ग्रसित न हो जाय, इस कारण एक विज्ञानसम्मत निर्धारण हमारे ऋषिगणों ने प्रस्तुत पर्व के माध्यम से किया।
होली का पर्व यों तो दो दिन की अवधि तक मनाया जाता है, पर प्रायः भारतवर्ष के कई क्षेत्रों में इसकी शुरुआत वसंत पंचमी से ही हो जाती है एवं कहीं-कहीं रंगपंचमी तक चलती है। यह मूलतः एक यज्ञीय पर्व है। नई फसल पकने लगती है। भारत जैसे कृषि प्रधान राष्ट्र में इसका महत्त्व समझते हुए, इसके उल्लास में नवान्न यज्ञ के रूप में पहले अन्न देवता को यज्ञीय ऊर्जा से संस्कारित करने व तत्पश्चात समाज को समर्पित करने का भाव उसके पीछे रहा करता था। ऋषिगणों ने इसे वासन्ती नव-सस्येष्टि यज्ञ नाम दिया है। इसीलिए होली की अग्नि में नये अन्न की बालों को भूनकर खाना अनिवार्य एवं पावन कृत्य माना जाता है।
होली का त्योहार फाल्गुन पूर्णिमा के दिन आता है। शुक्लपक्ष की अंतिम तिथि को होलिका दहन किया जाता है व अगला दिन धुलण्डी के नाम से रंगोत्सव के रूप में, समता के पर्व के रूप में मनाया जाता है। समस्त भारतीय संस्कृति से जुड़े पर्व-त्यौहारों में यह सबसे विलक्षण व अपने ढंग का निराला है। होली ही एकमात्र ऐसा त्योहार है, जिसमें हिन्दू ही नहीं, समस्त मानव-समुदाय के प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे का सामीप्य पा सकते हैं, बिना ऊँच-नीच जाति, वर्ग-भेद के परस्पर प्रेमपूर्वक मिल सकते हैं। छोटे-से-छोटा व्यक्ति भी उच्चस्थिति के व्यक्ति के साथ बिना किसी औपचारिकता के व्यवहार कर सकता है। पारस्परिक सौहार्द्र, उल्लास, हार्दिक हास्य विनोद-समानता के तत्व इस त्योहार की प्रेरणाओं में भरे हुए हैं।
पौराणिक दृष्टि से यह त्योहार आरंभ कब हुआ, इसके बारे में विभिन्न मत हैं। पारंपरिक प्रचलन में तो यही है कि होलिका द्वारा प्रह्लाद को जाने की घटना इससे जुड़ी है। भविष्य पुराण के अनुसार ठुँठला नामक राक्षसी के द्वारा शिव-पार्वती से यह वरदान तपश्चर्या द्वारा प्राप्त किया गया था कि वह सुर-असुर नर-नाग किसी से न मारी जा सके एवं जिस बालक को खाना चाहे खा सके। ऐसी कथा है कि वरदान देते समय भगवान महादेव ने यह शर्त लगा दी कि वर्ष में केवल होली के एक दिन यह वरदान फलीभूत नहीं होगा और उस दिन जो भी बालक वीभत्स आचरण करते-निर्लज्जता पूर्वक फिरते पाये जाएँगे, उन्हें वह नहीं खा सकेगी। कहा जाता है कि उस राक्षसी से बचने के लिए तरह-तरह के वीभत्स स्वाँग रचने की परंपरा इस त्योहार से बनी। एक और मान्यता यह है कि आज ही के दिन के लिए महर्षि वशिष्ठ जी ने सब मनुष्यों के लिए अभयदान माँगा था, ताकि वे निःशंक होकर इस दिन हँस-खेल सकें, परिहास-मनोविनोद कर सकें।
प्रचलित पौराणिक मान्यताओं में आदर्श सत्याग्रही भक्त प्रह्लाद के दमन के लिए जब उनके पिता हिरण्यकश्यप के सभी प्रयास निरर्थक हुए तब उन्हें होलिका की गोद में बिठाकर जलाने का प्रयास किया गया, परंतु, होलिका जल मरी एवं प्रह्लाद तपे कंचन-आग में से निखरकर आये और भक्त के रूप में स्थापित हुए। इसके बाद पिता ने अपने पुत्र को स्वयं मारने का प्रयास किया एवं तब खंभे से नृसिंह भगवान ने प्रकट होकर हिरण्यकश्यप का अन्त कर दिया। यह सभी कथानक होलिका त्योहार से जुड़े हैं। इसी त्योहार की प्रेरणा स्वरूप भगवान नृसिंह का पूजन, मातृभूमि-रजपूजन निधा-समता देवी का पूजन, क्षमावरणी रजधारण एवं नवान्न यज्ञ आदि कृत्य इसमें सम्पन्न किये जाते हैं। सत्य, धर्म एवं विवेक के मार्ग पर दृढ़ रहने के लिए प्रह्लाद ने अपने अभिभावकों तथा दूसरों का घोर विरोध एवं दमन सहते हुए भी आदर्शवादी साहसिकता का परिचय दिया, हमारी स्थिति भी वैसी ही बन-यह प्रेरणा इस पर्व की है। मातृभूमि की रज मस्तक पर लगाकर समाज से असमानता का अभिशाप, पारस्परिक विग्रह मिटाकर देशभक्ति-राष्ट्र की एकता-अखंडता की प्रतिज्ञा लेने का यह दिन है। यज्ञीय कार्यों में अपना कुछ अंश नियोजित कर अपने अन्न-धन को पवित्र व सात्विक बना लेने की प्रेरणा भी इस पर्व की है। छोटा काम करने में भी गौरव अनुभव कर सामूहिक रूप से कूड़े-कर्कट की सफाई कर उसे जलाना, श्रमदान की प्रवृत्ति को सामूहिक क्रम में बढ़ावा देना-यह शिक्षण भी इसी पर्व का है। एक-दूसरे पर रंग डालने से अभिप्राय यह था कि सभी से समानता का व्यवहार करते हुए हँसी-खुशी का वातावरण बनाने, वर्षीर बनाए रखने का प्रयास करेंगे। इतनी दिव्य प्रेरणाओं से भरा यह पर्व आज के समाज में गंदे हँसी-मजाक से लेकर गंदगी भरे प्रदर्शन, अश्लीलता व क्षुद्रचिंतन के परिचायक स्वरूप में बदल गया है, यह एक विडंबना ही है। समाज में पारस्परिक सामंजस्य, समरसता-एकत्व स्थापित करने के लिए जिस पर्व का प्रावधान ऋषिगणों ने किया था, उसकी यह छीछालेदारी होगी-यह कभी सोचा भी न था।
अनेकानेक प्रेरणाओं में से आज जिन दो पर सर्वाधिक ध्यान जाना चाहिए- वे हैं टूटते-बिखरते समाज को जोड़ने के लिए इसे सामाजिक समानता-राष्ट्रीय एकता के पर्व-त्योहार के रूप में मनाया जाय- दूसरे यज्ञीय जीवन से नवीन संवत्सर को आदर्शवादी पराक्रम के साथ आरम्भ करने का प्रभु समर्पित जीवन जीने का संकल्प आज के दिन किया जाय। गायत्री परिवार के अधिष्ठाता-संस्थापक परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने पर्वों से लोकशिक्षण की परम्परा को आरंभ किया एवं न-जन तक धर्मतंत्र की इस प्रगतिशील प्रक्रिया को प्रचलित किया। आज इसे राष्ट्रीय ही नहीं, वैश्विक रूप देने की आवश्यकता है।
समाज आज धर्म-संप्रदायों की विविधता के नाम पर जाति-वर्ग-भेद के आधार पर, ऊँच-नीच धनी-गरीब पुरुष-नारी इन भेदों के नाम पर विभाजित है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नक्सलवाद अभी भी किन्हीं-न-किन्हीं रूपों में विद्यमान है। जिस ईश्वर ने यह सृष्टि रची, उसने कभी सोचा भी न होगा कि उसी परब्रह्म की संतानें अपनी उपासना पद्धति के नाम पर बनाये गये विभिन्न मार्गों-संप्रदायों के नाम पर परस्पर लड़ने लगेंगी, एक-दूसरे की जान लेंगी-और एक-दूसरे के पूजा गृहों को आग लगाएँगी। जब ईश्वर एक ही है, तब किसी का धर्मांतर जबरदस्ती, प्रलोभन से या भय से करना उतना ही बड़ा पाप है, जितना कि किसी दूसरे संप्रदाय से घृणा, द्वेष रखते हुए उन पर अत्याचार करना। भारतवर्ष में आज घट रही घटनाएँ एक गलत होली के जलने का संकेत दे रही हैं। जहाँ जातिगत एकता के सद्भाव से-मनोमालिन्य दूर होने के मैत्री भाव से होलिका पर्व मनाया जाता था- उस देश में आज जाति-वर्ग के नाम पर एक-दूसरे का सामूहिक नरसंहार किया जा रहा है। निरीह-भोले छोटे-छोटे बच्चों का क्या दोष है कि वे किसी जाति विशेष में पैदा हुए। किसी जाति विशेष से घृणा करके उनकी जान लेकर-नरसंहार की नृशंस होली जो आज बिहार व अन्य प्राँतों में खेली जो रही है, उतनी ही भर्त्सना की पात्र है जितनी कि किसी भी संप्रदाय के आधार पर इज्जत से खेलना-द्वेषभाव रखना एवं उनके साथ दुश्मनों जैसा बर्ताव करना। दूसरी ओर हिन्दू संस्कृति की सदाशयता-उदारता का लाभ उठाकर सनातन धर्म की मूल मान्यताओं पर प्रहार भी इस संधिवेला के परिवर्तन के क्षणों में यही बताता है कि दुर्जन-असुरों-विधर्मियों का अब जीवन-मरण का यह अंतिम युद्ध का समय आ गया है। होलिका पर्व सामूहिकता का संदेश लेकर इस वर्ष आया है एवं सभी को यही प्रेरणा देता है कि किसी भी स्थिति में असुरता जीतने न पाए। हिरण्यकश्यप एवं होलिका को जलना ही पड़ेगा। विकृतियों-सामाजिक असमानताओं, राजनैतिक अराजकताओं-वर्गभेदों को इस होली में जलकर भस्म होना ही पड़ेगा। यदि वह न हो सका तो मानवजाति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा एवं सभी आदिम मानव की तरह एक-दूसरे की जानें लेकर इस सुंदर धरती को नष्ट कर देंगे।
इस विश्व -वसुधा का यह सिद्धांत अपनी सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक-धार्मिक विकृतियों को संघर्ष पूर्वक हटाती रहती हैं व जीवित रहती हैं। जो भाग्य भरोसे शुतुरमुर्ग की तरह बालू में मुँह गाड़कर निश्चिंत एवं निष्क्रिय बनी बैठी रहती हैं, वे नानाप्रकार के दुःख भोगते हुए नष्ट होती चली जाती हैं। हिन्दू संस्कृति जीवंत और पुरुषार्थी जाति-धर्म का शिक्षण देती है। इसलिए इसके प्रत्येक निर्धारण में विश्वराष्ट्र को एक-अखण्ड बनाए रखने का संकल्प छिपा हुआ है। प्रस्तुत होली पर्व यही संदेश संघे शक्तिः कलियुगी अंतिम प्रखर साधना वर्ष की वेला में लेकर आया है कि कहीं हम सभी ने भी इस वर्ष तो होली परंपरागत रूप में जलते हुए तो नहीं देखी, खूनी फाग देखकर मौन तो नहीं बैठे रह गये, बिना मन्यु जगाएँ कहीं सोये तो नहीं रह गये? जवाब हम सभी से संस्कृति के पुरोधा ऋषिगण माँग रहे हैं।
सब काम करना चाहिए, परंतु मन ईश्वर में रखना चाहिए। माता-पिता स्त्री-पुरुष आदि सब रहते हुए सबकी सेवा करनी चाहिए, परंतु मन में इस ज्ञान को दृढ़ रखना चाहिए कि ये हमारे कोई नहीं हैं। किसी धनी के घर दासी उसके घर का काम करती है, किंतु उसका मन अपने गाँव के घर पर लगा रहता हैं मालिक के लड़कों का वह लालन-पालन अपने लड़कों की तरह करती है। उन्हें मेरा मुन्ना-मेरा राजा कहती है, पर मन-ही-मन खूब जानती है कि ये मेरे कोई नहीं हैं। कछुआ रहता तो पानी में है, पर उसका मन रहता है किनारे पर, जहाँ उसके अण्डे रखे हैं। संसार का काम करो, पर मन रखो ईश्वर में। -रामकृष्ण परमहंस
षट्चक्रों में विशुद्धिचक्र आज्ञाचक्र के बाद दूसरे क्रम पर है। यों सीधे क्रम से बढ़ने पर आज्ञाचक्र के बाद दूसरा स्थान मूलाधार का है, पर अवरोही क्रम में द्वितीय स्थान पर विशुद्धिचक्र ही आता है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इसका संबंध संतुलन-शुद्धिकरण से है, इसलिए इसे ‘शुद्धिकरण केंद्र’ भी कहते हैं। इसका एक नाम ‘अमृत तथा विष केन्द्र’ है, कारण कि यहाँ पर दोनों ही प्रकार के रस-स्राव बिन्दु-विसर्ग से झरते रहते हैं।
शरीर शास्त्र की दृष्टि से इसकी ठीक-ठीक अवस्थिति ग्रीवा के पीछे ‘सरवाइकल प्लेक्सस’ में है। इसका ‘क्षेत्र’ गले का सामने वाला हिस्सा या थाइराइड ग्रंथि को माना जा सकता है। कायिक स्तर पर विशुद्धि चक्र का संबंध ग्रसनी तथा स्वरयंत्र तंत्रिकाओं से है।
यह जागरण की एक ऐसी स्थिति है, जिसे जीवन को अनुभूतियाँ प्रदान करने वाला माध्यम माना जाता है। इससे साधक के ज्ञान में वृद्धि होती है। जीवन कष्टपूर्ण न रहकर आनंदमय बन जाता है। साधक जीवन को सहजतापूर्वक लेता है तथा घटनाओं के प्रति अनासक्त बना रहता है। संपूर्ण प्रकृति में शुभ-अशुभ विष तथा अमृत इन दोनों तत्वों का समावेश है। इनका अवशोषण विशुद्धिचक्र में होता रहता है। जीवन के द्वन्द्वों, प्रतिकूलताओं तथा अनुकूलताओं को समान रूप से अंगीकार किये जाने के कारण ज्ञान तथा विवेक का उदय होता है।
विशुद्धिचक्र का अधिक सूक्ष्म पहलू उसकी उच्च विवेक की क्षमता है। यहाँ पर टेलीपैथी संदेशों की सत्यता को सरलतापूर्वक परखा जा सकता है। यह एक उच्च चेतना केन्द्र है, इस कारण से यहाँ होने वाली वास्तविक अनुभूतियों तथा कल्पना एवं अचेतन मन के कारण होने वाली अवास्तविक अनुभूतियों का अंतर भी स्फुट समझ में आने लगता है।
कतिपय तंत्रग्रंथों में विशुद्धिचक्र को गहरे भूरे रंग वाले कमल चक्र के रूप में वर्णन किया गया है, लेकिन ‘साधना ग्रंथों’ में इसका रंग बैंगनी बताया गया है। इसके 16 पंखुड़ियाँ हैं। यह सभी यहाँ के नाड़ी-गुच्छक से संबद्ध हैं। इस षोडश दल कमल में एक वृत्त है, जो चंद्रमा की तरह धवल है। इसे आकाशतत्त्व का प्रतीक-प्रतिनिधि माना गया है।
“यह आत्मा न व्याख्यान से मिलती है, न बुद्धि से और न बहुत सुनने-पढ़ने से। यह आत्मा जिसे चुनती है, जिस पर अनुग्रह करती है, उसी को प्राप्त होती है। उसी कृपापात्र के सम्मुख यह अपने आपको प्रगट करती है।” -मुंडकोपनिषद् 3/2/2
इस वृत्त में सप्त सूँडों वाला एक श्वेतवर्णी हाथी है। यह भी आकाशतत्त्व को निरूपित करता है। इसे इस चक्र का वाहन कहते हैं।
यह वाहन वास्तव में और कुछ नहीं, वरन् उन-उन चक्रों में वायु या चेतना की गति है। प्रत्येक चक्र में वायु की चाल एक समान नहीं होती। जैसे वात, पित्त, कफ की नाड़ी, कपोत, मंडूक, सर्प कुक्कुट आदि की चाल से चलती है, उस चाल को पहचानकर वैद्य लोग अपना कार्य करते हैं, वैसे ही तत्वों के मिश्रण, टेढ़ा-मेढ़ा मार्ग, भँवर, बीज आदि के संयोग से प्रत्येक चक्र में रक्त संचरण और वायु अभिगमन के समन्वय से एक विशेष से एक विशेष चाल वहाँ परिलक्षित होती है। यह चाल किसी चक्र में हाथी के समान मंदगति, किसी में मगर की तरह डुबकी मारने वाली, किसी में हिरन की सी छलाँग मारने वाली, किसी में मेंढक की तरह फुदकने वाली होती है। इसलिए इन्हें चक्रों का वाहन कहते है।
इस चक्र का तत्व बीज ‘हं’ है। यह भी श्वेत है, जो आकाशतत्त्व के स्पंदन से उत्पन्न है। इसके देवता सदाशिव हैं। यह धवलवर्णी हैं। उनके तीन आँखें, पाँच मुख तथा दस भुजाएँ हैं। उनका परिधान व्याघ्र चर्म है। चक्र की देवी शाकिणी है। यह पीताम्बरधारी है। उनके चार हाथ हैं, जिनमें से प्रत्येक में आयुध हैं- एक में धनुष, एक में बाण, फंदा तथा अंकुश हैं।
विशुद्धिचक्र वास्तव में चेतना का पंचम आयाम है। इसका संबंध पाँचवें लोक ‘जनः’ से है। इसमें व्याप्त वायु उदान है, जिसका प्रवाह ऊर्ध्वगामी है। इसकी तन्मात्रा ‘शब्द’ है, ज्ञानेन्द्रिय ‘कर्ण’ तथा कर्मेन्द्रिय ‘पाद’ है।
तंत्रशास्त्र में ऐसा उल्लेख आता है कि कपाल के पीछे के हिस्से में बिन्दुविसर्ग स्थित चंद्रमा से अमृत झरता रहता है। इससे आत्मसत्ता और परमात्मसत्ता का मिलन-समागम सहस्रार में होता है। इसलिए साधना विज्ञान में इस द्रव को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है तथा इसे चेतना के शुद्धिकरण और ऊर्ध्वीकरण में अत्यंत सहयोगी बताया गया है।
इस दिव्यरस को कितने ही नामों से पुकारा जाता है। अंग्रेजी में इसको ‘एम्ब्रोसिया- दि नेक्टर ऑफ दि गॉड’ कहते हैं। वेदों में यही ‘सोम’ और तंत्र में मद्य के नाम से अभिहित है। सूफी समुदाय में इसे ‘मीठी शराब’ कहा गया है। यह संज्ञा अकारण नहीं है। यह रस जब बिन्दु से स्रवित होता है, साधक में ऐसा दिव्य नशा छा जाता है, जिसकी तुलना मदोन्मत्त व्यक्ति से की जा सकती है। अंतर इतना है कि शराब साधारण स्तर का द्रव है और उससे उत्पन्न मादकता शरीरस्तर तक सीमित होती है, जबकि साधकों की आनन्दानुभूति चेतनास्तर की होती है, जिसे साधारण नहीं, दिव्य कहना चाहिए।
साधनाशास्त्र के मर्मज्ञों का कथन है कि बिन्दु और विशुद्धिचक्र के मध्य एक अन्य छोटा चेतना केन्द्र है। साधना-विज्ञान में इसे ‘ललना चक्र’ कहा गया है। विशुद्धिचक्र से इसका अत्यंत निकट का संबंध है। विशेषज्ञ बताते हैं कि जब अमृत बिन्दु-विसर्ग से निकलना प्रारंभ करता है, तो इसका एकत्रीकरण ललना में होता है। यह अवयव नासा-ग्रन्थी (नेजो फैरिंक्स) के पीछे तालू के ऊपरी भाग के आँतरिक गड्ढे में वहाँ स्थित है, जहाँ नासिका द्वार आकर खुलता है। खेचरी मुद्रा का वास्तविक उद्देश्य इसी केन्द्र को उत्तेजित करना होता है।
यों तो इसे अमृत कहकर पुकारा गया है पर यह कई दशाओं में विष का-सा व्यवहार करता है। जब तक यह ललना में संगृहीत रहता है, तब तक उसकी स्थिति में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन उत्पन्न कर पाना शक्य नहीं होता। विशुद्धिचक्र की निष्क्रियता की अवस्था में यह द्रव सीधे मणिपुर चक्र तक पहुँच जाता है, जहाँ उसे उक्त चक्र द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। यह स्थिति साधक के लिए ठीक नहीं कही जा सकती, कारण कि विशुद्धिचक्र से नीचे उतरने पर यह ऊतकों को हानि पहुँचाना आरंभ करता है। इसी कारण से इसका अधःपतन विषतुल्य माना गया है।
कुछ योगाभ्यासी इस अमृत को साधना-उपचारों के माध्यम से ललना चक्र से विशुद्धिचक्र तक लाने में सफल हो जाते हैं। जब ऐसा होता है, तो इसका उपयोग वहीं कर लिया जाता है। इस स्थिति में यह चिरयौवन प्रदान करने वाले अमृत की तरह बर्ताव करता है, किंतु यह तभी संभव है, जब विशुद्धिचक्र पूर्णरूपेण जाग्रत हो। उसकी सुप्तावस्था में इस दिव्यरस का वहाँ उपयोग नहीं हो पाता, इसलिए योगमार्ग के पथिकों के लिए बिंदु-विसर्ग (जहाँ से अमृत झरता है) की साधना प्रारंभ करने से पूर्व विशुद्धिचक्र का जागरण अनिवार्य होता है।
आर्ष आख्यान के समुद्र मंथन की संगति यहाँ विशुद्धि चक्र के विष-अमृत वाले प्रसंग से ठीक-ठीक बैठ जाती है। वास्तव में यह किसी मंदराचल पर्वत द्वारा किसी जलीय समुद्र का मंथन नहीं था। यह तो आलंकारिक वर्णन है। यथार्थ में जब साधना-रई आरा प्राण रूपी समुद्र को मथा जाता है, तो कितने ही प्रकार के बहुमूल्य ऐश्वर्य प्रकट होते हैं। उपयोग-भेद के आधार पर यह अमृत तुल्य अनमोल और उपयोगी हो सकते हैं और विषतुल्य घातक भी। यह तो साधक पर निर्भर है कि वह अमृत को उसी रूप में आत्मसात् कर ले, अन्यथा अमृत का विष में परिवर्तन और विष का अमृत में रूपांतरण संभव है। समुद्र-मंथन से उत्पन्न अमृत को विष्णु ने देवताओं को दे दिया था, जबकि विष शिव जी ने गले में धारण कर लिया, क्योंकि उसे कहीं फेंकना विनाश का कारण बन सकता था।
यहाँ अमृत श्रेष्ठता का, उच्चता का, दिव्यता का प्रतीक है। जिसका व्यक्तित्व ऐसा देवोपम होगा, वह विष को भी उपयोगी अमृत बना सकता है। ‘शिव’ का अर्थ ही ‘कल्याण’ होता है। ऐसा व्यक्ति ही गरल को पचाकर स्वयं अपना और दूसरों का कल्याण कर सकता है।
उपर्युक्त तथ्य इस बात पर प्रकाश डालता है कि विशुद्धिचक्र का जागरण होने पर विष को भी आत्मसात् किया जा सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि सजगता के उच्च स्तर पर विशुद्धि तथा उससे उच्च चक्रों में होने पर विषैले तथा नकारात्मक पक्ष हमारे संपूर्ण अस्तित्व के उपयोगी भाग बन जाते हैं तथा उनका रूपांतरण आनंदमय स्थिति में हो जाता है। इसे विशुद्धिचक्र की विशेषता कहनी चाहिए कि यह न केवल आँतरिक, वरन् बाहरी जहर को भी ग्रहण-धारण कर उसे निष्प्रभावी बना देता है। यह इस चक्र की सिद्धि है और इस प्रकार के चमत्कार इसे जाग्रत कर लेने वाले योगीजन अक्सर दिखाते पाये जाते हैं।
नादयोग योग-विज्ञान की एक शाखा है। यह ध्वनि के स्पंदन से संबंधित है। चक्र साधना में विशुद्धि और मूलाधार स्पन्दनों के दो आधारभूत केन्द्र माने गए हैं। नादयोग में चक्रों के माध्यम से चेतना के ऊर्ध्वीकरण का संबंध संगीत के स्वरों से है। हर एक स्वर का तादात्म्य किसी चक्र विशेष की चेतना के स्पंदन स्तर से होता है। अक्सर ये स्वर जो मंत्र, भजन तथा कीर्तन के माध्यम से उच्चरित किए जाते हैं, विभिन्न चक्रों के जागरण के शक्तिशाली आधार हैं।
मूलाधार सरगम की ध्वनि तरंगों का प्रथम आयाम तथा विशुद्धि पंचम स्तर है। यहाँ से निःसृत ध्वनियाँ ही चक्रों का संगीत हैं। यह ध्वनियाँ या मंत्राक्षर जो यंत्र के सोलह दलों में अंकित हैं, आधारभूत ध्वनियाँ हैं। ये विशुद्धिचक्र से आरंभ होती हैं एवं इनका सीधा संबंध मस्तिष्क से है।
विशुद्धि चक्र वह संस्थान है, जहाँ सामने वाले व्यक्ति के मन में उठने वाली विचार-तरंगों को ग्रहण-धारण किया जाता है, तत्पश्चात् उन्हें मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों (जो अन्य चक्रों से संबंधित हैं) में भेजा जाता है। इस प्रकार उनकी अभिव्यक्ति वैयक्तिक सजगता एवं जागरूकता के रूप में सामने आती है। दूसरे शब्दों में, यह कह सकते हैं कि सामने वाले के मन में क्या ऊहापोह चल रही है- इसे जानने का यह एक सूक्ष्म संस्थान है। यों दूसरों की विचार-तरंगों को मणिपूरितचक्र पर भी अनुभव किया जा सकता है, पर विशुद्धिचक्र में इसकी अनुभूति का निमित्त एक अन्य उपकेन्द्र है, जिसका विशुद्धि से गहन संबंध है।
विशुद्धि से ही संबंधित एक नाड़ी है, जो ‘कूर्म नाड़ी’ कहलाती है। चक्र जागरण के क्रम में जब यह जाग्रत होती है, तो साधक अपनी भूख-प्यास पर विजय प्राप्त कर लेता है अर्थात् उसकी क्षुधा-तृषा एकदम समाप्त हो जाती है।
ऐसा देखा गया है कि योगीजन आयु पर अधिकार कर लेते और चिरयुवा बने रहते हैं। ऐसा विशुद्धि चक्र पर नियमन नियंत्रण के कारण होता है। योगविद्या विशारदों का कथन है कि जब कुण्डलिनी विशुद्धि में प्रतिष्ठित है, तो अक्षुण्ण यौवन प्राप्त होता है। ऊतकों, अवयवों तथा शारीरिक संस्थानों में विशुद्धिचक्र के कारण होने वाला कायाकल्प मनुष्य की सामान्य ह्रास प्रक्रिया के विपरीत है।
विशुद्धिचक्र पर ध्यान करने से मन आकाश की तरह शुद्ध हो जाता है। इसके अतिरिक्त चित्त शाँति, त्रिकालदर्शी, दीर्घजीवन, तेजस्विता, नीरोगता, वक्तृता, सर्वहित परायणता, शास्त्र ज्ञान जैसी कितनी ही विशेषताएँ प्रकट-प्रत्यक्ष होने लगती हैं, साधक की श्रवणशक्ति अत्यंत तीव्र हो जाती है। इसका कारण मन होता है, श्रवणेन्द्रियों में कोई शारीरिक परिवर्तन नहीं।
विशुद्धिचक्र को जगाने के लिए जालंधर वध और ध्यान-साधना यह दो सरल उपाय बताये गए हैं। स्वस्थ चित्त से सावधान होकर एक मास तक इस चक्र की साधना करने से वह प्रस्फुटित हो जाता है। ध्यान में उसके लक्षण अधिक स्पष्ट होने लगते हैं और चक्र के स्थान पर उससे संबंधित मातृकाओं, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों में अचानक कंपन, रोमांच, स्फुरण, उत्तेजना, दाद, खुजली जैसे अनुभव होते हैं। यह इस बात के चिह्न हैं कि चक्र का जागरण हो रहा है। एक मास या न्यूनाधिक काल में इस प्रकार के लक्षण प्रकट होने लगें, ध्यान में चक्र का रूप स्पष्ट होने लगे, तो उससे आगे बढ़कर इससे नीचे की ओर दूसरे चक्र में प्रवेश करना चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण से एक बार एक यादव ने प्रश्न किया- आप युधिष्ठिर को धर्मराज क्यों कहते हैं? भगवान श्रीकृष्ण बोले- महाभारत का युद्ध चल रहा था। तब युधिष्ठिर सायंकाल वेश बदलकर कहीं जाया करते थे। पाँडवों ने इस रहस्य का पता लगाने के उद्देश्य से एक दिन उनका पीछा किया तो पता चला कि वे युद्धक्षेत्र में पड़े घायलों की सेवा-शुश्रूषा किया करते थे। शेष तीनों भाइयों ने उनसे वेश बदलकर यह शुभकर्म करने का कारण पूछा, तो वे बोले- इनमें से कई कौरव पक्ष के हैं, जो यदि मैं प्रकट रूप में होता तो मुझे अपना कष्ट न बताते और मैं सच्ची सेवा के अधिकार से वंचित रह जाता। इसलिये ऐसा करना पड़ा। यह घटना सुनाने के बाद श्रीकृष्ण ने बताया। धर्म और परमार्थ अन्योऽन्याश्रित हैं। इसी से युधिष्ठिर धर्मराज कहलाते हैं और धर्मतंत्र में उन्हें शीर्षस्थान दिया जाता है।
कुम्हार अपने घड़े-मटकों को बेचकर बाज़ार से लौट रहा था। उसे रास्ते में एक बड़ा हीरा मिला। उसको चमकदार पत्थर समझकर गधे के गले में लटका लिया। सोचा, घर पर बच्चे खेलते रहेंगे। रास्ते में एक जौहरी निकला। उसने गधे के गले में चमकदार पत्थर देखा। वह समझ गया कि हीरा है। उसने कुम्हार से पूछा-इसका क्या लेगा? कुम्हार ने बहुत हिम्मत बाँधकर कहा-एक रुपया मिल जाय तो ठीक है। जौहरी समझ गया कि इस मूढ़ को कुछ पता नहीं कि यह क्या है। बोला- बारह आने लेने हैं, किन्तु कुम्हार एक रुपये पर ही डटा रहा। जौहरी ने सोचा- मूरख है। अभी आता है लौटकर। किंतु अचानक उधर से दूसरा जौहरी निकला। उसने भी चमकदार पत्थर गधे के गले में लटका देखा। उसने कुम्हार से कीमत पूछी, तो उसने वही एक रुपया माँगा। उसने तुरन्त कीमत चुकाई और हीरा खरीद लिया। कुम्हार को फिर वह वही पहले वाला जौहरी मिला। बोला क्या हुआ उस पत्थर का? उसने रुपया दिखाया बोला वह तो बिक गया एक रुपये में। पहला जौहरी बोला- अरे मूरख! तूने लाखों का हरा एक रुपये में बेच डाला। कुम्हार बोला- ठीक है मुझे तो नहीं मालूम था कि हीरा है। मैंने पत्थर समझकर एक रुपये में बेच डाला किन्तु आप तो जानकार थे, फिर भी रुपया देने में डर रहे थे और कीमती हीरा तुमने कौड़ियों के मोल गँवा दिया। शास्त्रों के ज्ञाता, ज्ञानी और जानकार अपना हीरे जैसा बहुमूल्य जीवन इसी तरह गँवा देते हैं।
सूरदास की मन की आँखों के आगे त्रिलोकी के रहस्य खुले पड़े रहते थे। तन के चक्षुओं की निष्क्रियता के बावजूद वह बड़ी आसानी से जागतिक जीवन के सार-असार तत्वों का विश्लेषण कर लेते थे। जिज्ञासाएँ अपने सरलतम रूप से लेकर गंभीर रूप में उनके सम्मुख आती थीं और वह उन्हें दर्पण में बिम्ब के समान सही-सही देख सुलझा देते थे। उनके प्रवचन में ज्ञान बरसता था, वाणी में रस झरता था और छवि में आनंद तरंगित होता था।
शहंशाह शाहजहाँ के दोनों पुत्र औरंगजेब और दाराशिकोह एक दिन ऐसे ही प्रवचन पर्व में जा बैठे। बालक वयमान में अबोध थे, परंतु जिज्ञासा अगाध थी। उनकी पहली जिज्ञासा सुन प्रबुद्ध प्रवचनकर्ता ने कहा-हाँ मानव का पूर्वजन्म होता है।” उन्होंने आगे बताया-मैं और मेरे परिजन सभी पूर्वजन्म के कृत्यानुसार सुख-दुख भोगते हैं।” जिज्ञासु और श्रोताओं ने इसका शास्त्रोक्त प्रमाण माँगा तो संत ने उत्तर दिया, गीता में कहा है- शुचीनां श्रीमतं गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते अर्थात् पवित्र एवं समृद्ध कुल में पूर्व जन्म के भ्रष्ट योगी जन्म लेते हैं और सत्कर्मों को करते हुए, ये आवागमन के चक्र से मुक्त होकर कैवल्य पद पाते हैं।”
स्तन ने इस गूढ़ रहस्य को विस्तार से समझाया तो एक और व्यक्ति ने गहरी जिज्ञासा से सिर उठाया, “पूर्वजन्म के कर्मों का ज्ञान मानव को कैसे हो?” “इसका उत्तर तो कोई विद्वान ज्योतिषाचार्य ही दे सकता है, क्योंकि मानव की जन्मकुण्डली उसके पूर्व जन्म का लेखा-जोखा है। विद्वान ज्योतिषी जन्मकुण्डली के पंचम व नवम् भाव को देखकर मानव के पूर्वजन्मों के कर्मों को देख लेता है और बता सकता है कि उसे किस देवता की उपासना करनी चाहिए जिससे उसके
पापों का क्षय हो सके।”
जिज्ञासु संतुष्ट था, पर जिज्ञासा का अंत नहीं था। उसने फिर जिज्ञासा की- “क्या व्यक्ति अपना पूर्वजन्म देख सकता है? यदि हाँ तो कैसे?” “कोई भी व्यक्ति यदि ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नानादि से पवित्र होकर आज्ञाचक्र में दोनों भौंहों के मध्य दृष्टि केन्द्रित करके आधा घंटा ध्यान करे तथा फिर संपुटित महामृत्युञ्जय मंत्र का ध्यानयुक्त जप एक वर्ष नियमित रूप से करे तो भयंकरतम रोग तो नष्ट होते ही हैं, साथ ही पूर्वजन्म भी दिख जाता है और मानव की ऋतम्भरा प्रज्ञा जाग्रत हो जाती है।”
“कुछ व्यक्तियों को पूर्वजन्म की स्मृतियाँ रहती हैं, इसका क्या कारण है?” “हाँ लाखों में से किसी एक को पूर्वजन्म की उपासना के कारण पूर्वजन्म की स्मृति रह जाती है।”
इस पर औरंगजेब तमककर बोला “हमारी शरीर में तो पूर्वजन्म का नामोनिशान नहीं है। तुम्हारी यह बकवास सर्वथा बेबुनियाद है।”
दाराशिकोह संत की वाणी में समाए ज्ञानरस में भीगता जा रहा था। उसे औरंगजेब का व्यवहार दुष्टतापूर्ण लगा। इसी वजह से उसने अपने इस छोटे भाई को समझाने की कोशिश की, पर यह कोशिश औरंगजेब के हठ के कारण कलह में बदल गयी। दोनों लड़ते-झगड़ते अपने पिता शाहजहाँ के पास पहुँचे। औरंगजेब को समझाना शाहजहाँ के भी वश का नहीं था और अब तो उसने हठ पकड़ ली थी कि उस अंधे संत को बुलवाया जाए और वही सिद्ध कर बताए कि क्या पुनर्जन्म वास्तव में होता है।
शाहजहाँ के मन में भी उत्सुकता थी। अतः संत को सम्मान सहित बुलवाया गया। शाहजहाँ ने बालक औरंगजेब की जिज्ञासा उनके सामने रखते हुए कहा, “यह बालकों का झगड़ा तो आपको निपटाना ही होगा।” शाहजहाँ के स्वर में आदेश नहीं मनुहार थी।
“अच्छा तो फिर आपके महल की सभी स्त्रियों, दास-दासियों को कहिए कि वे एक-एक करके मेरे सामने कुछ बोलकर जाएँ।
शाहजहाँ ने सबको बुलाकर कतार में खड़ा कर दिया और हुक्म दिया कि वे एक-एक करके आएँ और संत बाबा से सलाम कहकर इनके सामने से जाएँ। सबने आज्ञा मानी और जब सबसे अंत में जहाँआरा आई तथा उसने ज्यों ही ‘संत बाबा सलाम’ कहा तो अंधे संत ने कहा, “ललिता तोहे पूछत शाहजहाँ।” तो जहाँआरा के मुख से निकला, “उद्धव तुम हो, कृष्ण कहा?” और वह मूर्च्छित हो गयी।
एक-दूसरे ने एक-दूसरे के पूर्वजन्म कह सुनाया। संत ने शाहजहाँ को बताया कि ”पूर्वजन्म में यह कृष्ण सखी ललिता थी और मैं कृष्ण सखा उद्धव। संत ने शहंशाह को यह भी बताया कि इस जन्म में भी यह कन्या धार्मिक होगी, तुम्हारी बहुत सेवा करेगी और जब मृत्यु आएगी तो इसके हृदय पर धर्मग्रन्थ होगा तथा इसी जन्म में मोक्ष पा जाएगी।” संत सूरदास के इस प्रामाणिक कथन पर शाहजहाँ के परिवार को मानना पड़ा कि पुनर्जन्म एवं पूर्वजन्म आश्चर्यजनक लगते हुए भी पूर्णतया सत्य हैं।
गायत्री मंत्र द्वारा विश्व को उत्पन्न करने वाले परमात्मा को जो उत्तम तेज है, उसका ध्यान करने से बुद्धि की मलीनता दूर होती है और धर्माचरण में श्रद्धा ओर योग्यता उत्पन्न होती है।
-महर्षि दयानंद सरस्वती
चिकित्साशास्त्र पर नोबुल पुरस्कार विजेता, फ्राँस के लियोविश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. एलेक्सिस कैरेल ने जटिल-से-जटिल रोगों का उपचार कर दिखाया है। उन्होंने चिकित्साविज्ञान को अपनी प्रतिभा द्वारा कई महत्वपूर्ण अवदानों से भी संपन्न बनाया। जिन रोगों का उपचार तो दूर, निदान करना भी बड़े-बड़े डॉक्टरों के वश में नहीं था, डॉ. कैरेल ने उनके अचूक इलाज और कारगर औषधियाँ खोज निकाली। उनसे जब इस सफलता का रहस्य पूछा गया तो वे बोले, “आम लोगों की तरह में भी एक साधारण मनुष्य हूँ और उनसे अधिक मेरी कोई सामर्थ्य भी नहीं है। मुझे जो सफलताएँ प्राप्त करने का श्रेय मिला है, वे मेरे पुरुषार्थ का कम, परमेश्वर के दिव्यसहयोग का प्रतिफल अधिक है।
प्रार्थना सभी करते हैं। उसमें ईश्वर से कुछ माँगते और याचना भी करते हैं, परंतु देखा जाता है कि किन्हीं लोगों की प्रार्थना अथवा याचना फलीभूत होती है और किन्हीं को सर्वथा निराश ही होना पड़ता है। डॉ. कैरेल जिस किसी भी रोगी का उपचार करते, उससे कहते थे, प्रार्थना करो, सच्चे मन से प्रार्थना करो, अपनी भूलों के लिए पश्चात्ताप और भविष्य में निर्मल जीवन जीने की प्रतिज्ञा के साथ यदि प्रार्थना करोगे तो वह जरूर सुनी जाएगी। सच्चा इलाज तो प्रार्थना है और जो सच्चे हृदय से प्रार्थना करेगा वह शारीरिक ही नहीं, आँतरिक रोगों से भी छुटकारा पा जाएगा।
वस्तुतः प्रार्थना फलित होती ही तब है जब वह सच्चे मन से की जाए। उसके लिए हृदय में सच्ची माँग उत्पन्न की जाए, क्योंकि प्रार्थना में अवलम्बन तो ईश्वर का ही लिया जाता है, पर वह ईश्वर के बहाने अपने आप से ही की जाती है। ईश्वर सर्वव्यापी और परमकारुणिक सत्ता है। उसे हर किसी की इच्छा और आवश्यकता का ज्ञान है तथा वह उपयोगी और लाभदायक इच्छाओं की पूर्ति भी करना चाहता है, परंतु इच्छा मात्र से कुछ नहीं होता। उसके लिए पुरुषार्थ भी करना पड़ता है। जन्म देने और पालन करने वाला पिता भी अपनी संतान के प्रति सभी जिम्मेदारियाँ तब तक निभाता है, जब तक कि वह अपने पैरों पर खड़ा होने योग्य नहीं हो जाता। आत्मनिर्भर होने के बाद वह उन्हीं कार्यों में योगदान देता है, जो पुत्र के वश की बात नहीं है और पिता अपने अनुभवों के आधार पर उन्हें पूरा करा सकता है।
पुरुषार्थहीन प्रार्थना तो याचना ही कही जाएगी और याचना अपने आप में हेय है, क्योंकि दीनता, असमर्थता और परावलम्बन की प्रवृत्ति उसके साथ जुड़ी हुई है, जो आत्मा का गौरव बढ़ाती नहीं घटाती है। हाथ चाहे किसी व्यक्ति के सामने पसारा जाए अथवा भगवान के सामने झोली फैलाई जाए, उससे कोई अंतर नहीं पड़ता। बात एक ही है। चोरी चाहे किसी मनुष्य के घर में की जाए अथवा भगवान के मन्दिर में, चोरी तो चोरी है, बुराई है और बुराई हर स्थान पर बुराई ही रहेगी।
जिस प्रार्थना को सच्ची प्रार्थना कहा जा सकता है, उसका अर्थ अपनी आत्मा को परमात्मा का प्रतीक मानकर स्वयं को समझाना है कि वह अपने में ऐसी पात्रता विकसित करे, जिससे आवश्यक विभूतियाँ उसकी योग्यता के अनुरूप सहज ही मिल सकें। वर्षा होती है। पहाड़ों, मैदानों और सरोवरों में बिना किसी भेदभाव के बादल पानी बरसाते हैं, पर पहाड़ की चोटियों पर पानी नहीं ठहरता, मैदानों पर वह जाता है और सूख भी जाता है। लेकिन नदियाँ-सरोवर और गड्ढे-कुएँ पानी से भर जाते हैं, क्योंकि उनमें वह रिक्तता-पात्रता विद्यमान रहती है, जिसमें कि पानी ठहर सके।
यहाँ एक तथ्य और भी ध्यान देने योग्य है कि सरोवर हो या गड्ढे, बाहर से उनमें पानी आता है तो वह उतना ताजा नहीं रहता, जितना कि नदियों व कुओं में ताजा और निर्मल रहता है, इसका कारण है- नदियों तथा कुओं के स्रोत अपने आप में होते हैं। अपने में निहित स्रोतों से कुओं और नदियों में निरन्तर जल आता रहता है। वह ताजा और शुद्ध तो रहता ही है, कभी सूखता भी नहीं, जबकि तालाब और गड्ढे-पोखरों का पानी थोड़ी-सी धूप और जरा-सी गर्मी पड़ने पर सूख जाता है।
प्रार्थना मनुष्य का संपर्क विश्वव्यापी महानता के साथ बढ़ाती है। सच्चे हृदय से की गई प्रार्थना का परिणाम आदर्शों के रूप में, भगवान की दिव्य अभिव्यक्ति के रूप में होता है। उसके साथ जुड़ जाने पर प्रतीत होता है कि अपने दुःख-क्लेशों का हेतु कोई और नहीं, अपनी ही तमसाच्छन्न मनोभूमि है, जिसमें अज्ञान और आलस्य ने जड़ें जमा ली हैं। प्रार्थना की कुदाली से अन्तःभूमि में व्याप्त कुत्सा और कुंठा का निराकरण कर अंतःशक्ति के स्रोत को खोलने का प्रयास किया जाए, तो मनुष्य की कोई भी इच्छा अधूरी नहीं रहती। कोई भी आकांक्षा बिना पूरी हुए नहीं रहती।
अन्तःशक्ति को जगाने वाली अन्तःज्योति की एक भी किरण उग सके तो उस अंधकार से सहज ही छुटकारा मिल सकता है, जिसमें पग-पग पर ठोकरें लगती हैं और उनसे शोक-संताप उत्पन्न होता है। उस स्थिति में यह अन्तःप्रकाश उत्पन्न होता है, परमेश्वर यों साक्षी, द्रष्टा, नियामक, उत्पादक, संचालक सब कुछ है, पर उसके जिस अंश की हम उपासना या प्रार्थना करते हैं, वह सर्वात्मा है और पवित्रात्मा है।
यह प्रकाश उत्पन्न होने पर व्यक्तिगत परिधि को संकीर्ण रखने तथा पेट और प्रजनन के लिए सीमाबद्ध रखने वाली वासना-तृष्णा की मूढ़माया से छुटकारा पाने के लिए मन तड़पने लगता है। वासना-तृष्णा के इस भवबन्धन से छुटकारा पा लेना और अपने आत्मविस्तार के क्षेत्र को व्यापक बना लेना यही ‘आत्मोद्धार’ है। इसी को आत्मसाक्षात्कार भी कहते हैं। प्रार्थना में अपने उच्च आत्मस्तर से, परमात्मा से यही प्रार्थना की जाती है कि वह अनुग्रह करें और प्रकाश की ऐसी किरण प्रदान करें, जिससे सर्वत्र दिखाई पड़ने वाला अन्धकार दिव्यप्रकाश के रूप में परिणत हो सके।
प्रार्थना वही सच्ची है, जो अपनी आत्मा की गौरव-गरिमा के अनुरूप कही जाएगी, जिसमें यह कामना जुड़ी रहे कि परमात्मा हमें इस लायक बनाये, जिसमें हम उसके सच्चे भक्त, अनुयायी एवं पुत्र कहलाने का गौरव प्राप्त कर सकें। प्रार्थना में ईश्वर से वह शक्ति प्रदान करने की विनती की जाती है, जिसके आधार पर भय और प्रलोभन से मुक्त होकर विवेकसम्मत कर्तव्यपथ पर साहसपूर्वक चला जा सके और इस मार्ग में जो अवरोध आते हैं, उनकी उपेक्षा करते हुए अटल रहा जा सके। कर्मों के फल अनिवार्य हैं, अपने प्रारब्धभोग जब उपस्थित हों तो उन्हें धैर्यपूर्वक सह सकने और प्रगति के लिए परम पुरुषार्थ करते हुए कभी निराश न होने वाली मनःस्थिति बनाते रहा जा सके।
मन को इतना निर्मल बना देने का अनुनय हो कि कुकर्मों की ओर प्रवृत्ति ही न हो और हो भी तो उन्हें करने का दुस्साहस न उठे। इस प्रकार मनुष्य जीवन को अपनी आत्मा के स्तर को निरंतर ऊँचा उठाने और गतिशील बनाये रहने की माँग ही सच्ची प्रार्थना कही जाएगी। जिसमें धन, सम्मान, स्वास्थ्य, सफलता आदि की याचना की गई हो, वह प्रार्थना नहीं कही जा सकती। जिसमें अपने पुरुषार्थ, कर्तव्य के अभिवर्द्धन का स्मरण न हो ऐसी प्रार्थना को याचना मात्र कहा जाएगा और ऐसी याचनाओं की सफलता प्रायः संदिग्ध ही रहती है।
अहंकार को खोकर समर्पण की नम्रता स्वीकार करना और उद्धत मनोविकारों को ठुकराकर परमेश्वर का नेतृत्व स्वीकार करने का नाम प्रार्थना है। जिसमें यह संकल्प भी जुड़ा रहता है कि भावी जीवन परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार पवित्र और पुरुषार्थी बनकर जिया जाएगा। ऐसी गहन अन्तस्थल से निकली हुई प्रार्थना, जिसमें आत्म-परिवर्तन की आस्था जुड़ी हुई हो, भगवान का सिंहासन हिला देती है। ऐसी प्रार्थना के परिणाम भी इतने अद्भुत होते हैं कि उन्हें ‘चमत्कार’ भी कहा जा सकता है।
जब मन दुर्बल हो रहा हो, मनोविकार बढ़ रहे हों और लगता हो कि पैर अब फिसला, तब फिसला, तो सच्चे मन से परमात्मा को पुकारना चाहिए। गज को ग्राह के चंगुल से छुड़ाने वाले भगवान, पतन से परित्राण पाने के लिए व्याकुल आर्तभक्त की पुकार अनसुनी नहीं करते हैं और उस मनोबल के रूप में अन्तःकरण में उतरते हैं, जिसे गरुड़ कहा जा सकता है तथा जो पतनोन्मुख दुष्प्रवृत्तियों के सर्पों को उदरस्थ करने का अभ्यासी है भी। परमात्मा से यही माँगा भी जाना चाहिए। समझदारी इसी में है। भिखारी बनकर राजा के पास पाँच-दस पैसे माँगने पहुँचा जाए तो उसे मूर्ख ही कहा जाएगा। फिर ईश्वर तो राजाओं का भी राजा, सम्राटों का भी सम्राट और अधिपों का भी महाधिपति है, उससे लौकिक याचनाएँ पूरी करने के लिए कहना भिखारी जैसी मूर्खता करने जैसा है। भगवान से वही माँगना चाहिए, जिन्हें देने में वह भी संतुष्ट होता है और प्राप्त होने पर स्वयं को भी गौरव की अनुभूति होती है। यह माँगने योग्य वस्तु आत्मबल, मनोबल, आत्मबोध, अंतःप्रकाश अथवा समर्पण स्वीकार ही है।
भगवान को अपने में और अपने को भगवान में समाया होने की अनुभूति जब इतनी प्रबलता के साथ अनुभूत होने लगे कि उसे कार्यरूप में परिणत किये बिना रहा ही न जा सके, तो यही समर्पण भाव की परिपक्वता है। ऐसी शरणागति व्यक्ति को द्रुतगति से देवत्व की ओर अग्रसर करती है तथा यह गतिशीलता इतनी प्रभावकारी होती है कि भगवान को अपनी समस्त दिव्यता सहित भक्त के व्यक्तित्व में उतरना पड़ता है।
आरंभ अपने पापों के पश्चाताप, निर्मल जीवन जीने के संकल्प और सफलताओं के लिए विनम्रतापूर्वक ईश्वर को धन्यवाद देने से करना चाहिए। निस्संदेह सफलताएँ अपने ही परिश्रम-पुरुषार्थ का प्रतिफल होती हैं, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि उस परिश्रम-पुरुषार्थ की प्रेरणा देने वाला परमात्मा अपने अंतःकरण में ही विद्यमान है। यदि इस तथ्य को नकारकर अपने क्षुद्र अस्तित्व का अभिमान किया जाता है, तो मदोन्मत्त हाथी की तरह न केवल अपनी शक्तियों का विध्वंसकारी दुरुपयोग होने की संभावना बनती है, वरन् उनके भी नष्ट होने का संकट खड़ा रहता है। अस्तु, जो कुछ प्राप्त है, उसके लिए परमात्मा के प्रति कृतज्ञता और धन्यवाद के बोध से भरकर परमात्मा से आत्मबल, मनोबल, आत्मबोध के ही दिव्य वरदान की माँग की जाए। सर्वतोभावेन परमात्मा के प्रति समर्पित भक्त का योगक्षेमं वहन करने की प्रतिज्ञा भगवान ने स्वयं की है, पर उस शर्त को भी तो पूरा किया जाना चाहिए, जो पात्रता विकसित करने, हृदय को वासनाओं और तृष्णाओं से रिक्त करने के रूप में जुड़ी हुई है।
‘हम दूसरों से अलग हैं- हमारा व्यक्तित्व मात्र अपने तक सीमित अथवा स्वतंत्र हैं’- यह मानना अपने आपको असहाय एवं दीन-दुर्बल स्थिति में ले जाकर पटक देना है। अकेला व्यक्ति सर्वथा नगण्य एवं तुच्छ बनकर ही रहेगा, भले ही वह कितना ही समर्थ एवं साधनसंपन्न क्यों न हो। अँधेरे में जाने में अथवा एकाकी यात्रा में डर लगता है, आशंका बनी रहती है और उदासी छाई रहती है। इसका कारण इक्कड़पन की अवांछनीयता ही समझी जानी चाहिए।
मेले-ठेले में जाने से अनेक प्रकार की असुविधाएँ उठानी पड़ती हैं, पर वहाँ जाने को मन इसलिए करता है कि एकत्रित हुए जन-समूह की एक इकाई अपने को मान लेने की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया सहज ही अपने को प्रमुदित बनाती है। सेना का अंग बनकर चलने वाला सैनिक साहस और उत्साह से भरा रहता है, जबकि एकाकी चलने पर उसे अनुत्साह और अवसाद घेरता है।
हम अकेले हैं, संबंधित लोग अपनी सुविधा बढ़ाने मात्र के लिए हैं- ऐसा सोचते ही मनुष्य असुर बन जाता है। वह पत्नी का तरह-तरह से शोषण करता रहता है और उसे कठपुतली, पैर की जूती, क्रीतदासी बनाकर रखने से कम में संतुष्ट नहीं होता। मतभेद या असहमति व्यक्त करते ही आग-बबूला हो जाता है और क्षणभर पहले जो प्रेम प्रदर्शित करने की विडंबना चल रही थी, वह न जाने कहाँ चली जाती है, उसके स्थान पर जल्लाद जैसी दुष्टता तांडव नृत्य करती दिखाई पड़ती है। यह सब एकाकी मनोभूमि के दुष्परिणाम हैं।
परिवार के लोगों को असह्य, अभावग्रस्त और दुखी परिस्थिति में भटकता छोड़कर कितने ही लोग नशेबाजी, यारबाजी, शौकीनी मटरगश्ती में पैसा उड़ाते रहते हैं। उन्हें अपनी थोड़ी-सी इच्छापूर्ति सर्वोपरि मालूम पड़ती है। इसके कारण परिवार के अन्य सदस्यों को कितना त्रास सहन करना पड़ेगा, यह बात उनकी समझ में ही नहीं आती। एकाकी मनोभूमि के लोगों के लिए अपना आपा ही सब कुछ होता है। दूसरों से क्या और कैसे लाभ उठाया जा सकता है, वे इतना ही सोच पाते हैं। माता-पिता के पास जो कुछ है, वह किस तरह झटक लिया जा सकता है, इसमें उनकी बुद्धि तीव्र होती है, पर क्या उनकी सहायता करना भी कर्तव्य है, यह बात सूझती नहीं। छोटे लड़के माता का जेवर चुराकर मुम्बई सैर करने निकल जाते हैं। घर में कैसा कुहराम मच रहा होगा, इसकी उन्हें कल्पना भी नहीं होती। अपनी मौज उन्हें बहुत कुछ प्रतीत होती है। विछोह में बिलखते अभिभावक उनके लिए महत्वहीन मिट्टी के पुतले भर बन जाते हैं। एकाकीपन मनुष्य को कितना निष्ठुर बना देता है, इसकी कल्पना करना भी कठिन है।
तनिक-से लाभ या मनोरंजन के लिए, तनिक-से अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए बहुत लोग प्राणघातक आक्रमण कर देते हैं। ऐसा मात्र आवेश में ही नहीं होता वरन् आक्रमणकारियों की उस विकृत मनोवृत्ति का भी गहरा कारण होता है, जिसमें वे दूसरों को चलते-फिरते गाजर-बैंगन जैसे अनुभव करते हैं। उनको कितना कष्ट होगा या उनके परिवार को कितनी व्यथा सहनी पड़ेगी, यह सोचना उनके लिए संभव नहीं रहता। एकाकी मनुष्य स्वार्थपरता की भूमिका में जितना उतरता जाता है, उतना ही निष्ठुर बनता जाता है। चोर, डाकू, हत्यारे, ठग, प्रपंची, दुराचारी प्रकृति के अपराध परायण लोग इन कुकर्मों में गर्व और विनोद इसलिए अनुभव करते हैं कि उन्हें एकाकीपन की स्वार्थपरायण निष्ठुरता मिल गई।
अपराधों की संख्या अनेक हैं। उनके स्वरूप भी विभिन्न हैं। कुकर्मों के प्रयोग-विनियोग कई-कई तरीकों से होते हैं, पर वस्तुतः वे सब एक ही स्वार्थी वृक्ष के पत्र-पुष्प होते हैं। स्वार्थी मनुष्य यदि साहसहीन, डरपोक हुआ तो धोखेबाजी का सहारा लेगा और यदि उग्र-उद्दण्ड हुआ तो उत्पीड़क, शोषक, आतंकवादी आचरण करेगा। आग जहाँ रहती है वहीं जलाती हैं, स्वार्थी जिसके भी संपर्क में आता है, उसी का सर्वनाश करता है। इसके अपवाद उसके स्त्री-बच्चे भी नहीं। कितनी ही स्त्रियाँ स्वार्थी पतियों द्वारा पग-पग पर दी जाने वाली प्रताड़नाओं से इतनी संत्रस्त रहती हैं, मानो उन्हें हर घड़ी जल्लाद की छुरी के नीचे रहना पड़ता हो। नरक नाम का कोई स्थान कहीं नहीं है, उसकी घिनौनी भयंकरता तो स्वार्थपरायण वातावरण में कहीं भी देखी जा सकती है। ऐसे नारकीय दृश्य हम अपने आस-पास ही कहीं भी देख सकते हैं।
डरावने प्रेत-पिशाचों की कल्पना के साथ यह मान्यता भी जुड़ी रहती है कि वे मरघट जैसे किसी वीभत्स स्थान में एकाकी निवास करते हैं। ऐसे भूत-पलीत होते हैं या नहीं, यह संदिग्ध है। पर यह असंदिग्ध है कि स्वार्थी मनुष्य की मनःस्थिति सर्वथा इसी प्रकार की होती है। वे एकाकी रहते हैं। अपनी वासना, तृष्णा और अहंता की पूर्ति के लिए कुछ भी करने को उद्यत रहते हैं। दूसरों की लाशें पास में जलती रहें, इसका उन पर कोई असर नहीं पड़ता वरन् विनाश के विनोद को देखने की उनकी दुष्टता को पोषण मिलता है। सृजन तो वे कर नहीं सकते, ध्वंस देखकर वे प्रसन्न होते हैं। सुना है भूतों का काम दूसरों को डराना, बीमार करना या अन्य प्रकार की हानियाँ पहुँचाना होता है, मुफ्त के उपहार पाने के लिए वे तरह-तरह के दबाव डालते हैं। यह पिशाचवृत्ति अनेकों में देखी जा सकती है और उन्हें जीवित रहते हुए भी मरा हुआ कहा जा सकता है। उन्हें प्रेत-पिशाच की संज्ञा देना अनुपयुक्त नहीं है।
प्रसन्नता एकाकी मन में संभव ही नहीं हो सकती। उपनिषद् के ऋषि का प्रतिपादन है कि “सृष्टि के आदि में ईश्वर अकेला था। इस एकाकीपन में उसे ऊब आई और खीज़ उठीं इस स्थिति में देर तक रह सकना उसके लिए अशक्य हो गया। अस्तु, एक से बहुत बनने की ठान ठानी। अपने को खण्ड-विखण्ड कर डाला। जड़ परमाणु और चेतन जीवाणु उसने बनाये। पदार्थ और प्राणी सृजन। इसके बाद उनमें रमण करता हुआ प्रसन्न-प्रमुदित रहने लगा।” यह तथ्य आलंकारिक भी हो सकता है, पर मानव जीवन में यह सच्चाई असंदिग्ध है। व्यक्ति एकाकी मनःस्थिति में खीजता और ऊबता रहेगा। उसे अपने आत्मीयता का क्षेत्र बढ़ाए बिना चैन न पड़ेगा। अपनापन जितने विस्तृत क्षेत्र में बिखरा हो उतना ही अधिक आनंद, उल्लास का कार्यक्षेत्र उसे उपलब्ध होगा। रमण करना, प्रसन्न-प्रमुदित रहना तो विस्तृत जन-समूह के साथ अपने को जोड़ने से ही संभव हो सकता है।
पुण्य-परमार्थ के जितने भी श्रेष्ठ सत्कर्म जहाँ-तहाँ उभरते दृष्टिगोचर होते हैं, वहाँ मनुष्य की उदारता एवं सहृदयता काम कर रही होगी। यह उदारता क्या है? वस्तुतः यह और कुछ नहीं, केतन आत्मविस्तार की भावना ही है। हम जब अपने आपको सुविस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ देखते हैं, तो सभी वस्तुएँ अपनी प्रतीत होती हैं और जिस तरह अपने निज के प्रयोग में आने वाली, अपने स्वामित्व की परिधि में समाने वाली वस्तुओं को सँभाल कर रखते हैं, उसी प्रकार उस सुदूर क्षेत्र में फैली हुई- पराई कही जाने वाली वस्तुएँ भी अपनी ही लगती हैं। तब उन्हें सँभाल कर रखने और सदुपयोग करने में भी वैसी ही प्रवृत्ति होती है जैसी कि निजी वस्तुओं में। अमुक वस्तु हमारी नहीं है, इसलिए उसे सँजोये जाने या बर्बाद होने में अपने को क्या लेना-देना यह विचार तभी मन में आयेगा, जब अपनत्व का दायरा सीमित होगा। जिसने इस दायरे को जितना बढ़ा रखा होगा, वह बिना अपने-पराये का भेदभाव किये सभी वस्तुओं को अपने ईश्वर की, ममता की परिधि की मानेगा और उनकी सुरक्षा, सुव्यवस्था एवं सुसज्जा का पूरा-पूरा ध्यान रखेगा।
संकुचित स्थिति में केवल अपना शरीर ही अपना होता है। उसकी सुविधा के लिए संबद्ध परिवार वालों की उपेक्षा भी की जाती है और उनके साथ अनीति बरतना भी खूब होता है। पर जब आत्मीयता बढ़ती है तो स्वयं कष्ट उठाकर-अभावग्रस्त रहकर कुटुंब के सदस्यों को सुखी बनाने के साधन जुटाये जाते हैं। अविकसित मनोभूमि पत्नी तक, बहुत हुआ तो बच्चों तक सीमित होकर रह जाती है, किंतु जिनने अपनत्व को बढ़ाया है, वे माता-पिता भाई-बहिन से लेकर मित्र-पड़ोसी तक की सुख-शान्ति में पूरी दिलचस्पी लेते हैं और अपने से जो बन पड़ता है, उसमें कुछ उठा नहीं रखते। आत्मविकास की मात्रा यदि अधिक हुई तो उसी अनुपात से ग्राम, नगर, प्राँत, देश और अन्ततः समस्त बिखरे हुए मानव-प्राणियों में यह ममत्व फैलता है। तब सब में एक ही आत्मा-एक ही विश्वात्मा ओत-प्रोत दीखती है। सभी अपने प्रतीत होते हैं। पराया कोई दीखता ही नहीं। जहाँ अपनापन होगा वहाँ प्रेम की उमंगें उठेंगी, सहानुभूति जगेगी। फलतः उदारता, सेवा-सहायता का भावभरा सहृदय व्यवहार ही सबके साथ बन पड़ेगा। यह आत्म-विस्तार ही समस्त अध्यात्म-विज्ञान का एकमात्र लक्ष्य है।
आत्मीयता का विस्तार मनुष्यों तक सीमित न रहकर क्रमशः प्राणिमात्र में विस्तृत होता चला जाता है। तब अन्य प्राणी भी अपने ही कुटुम्बी लगते हैं। उनकी सुविधाओं का भी ध्यान रखा जाता है। उनके कष्टों में भी अपने जैसे कष्ट की अनुभूति होती है। मानवी अन्तःकरण का जहाँ संतोषजनक स्तर तक विकास होगा, वहाँ स्नेह-सौजन्य का समुद्र उमड़ रहा होगा। अकारण कष्ट किसी भी प्राणी को दे सकना संभव न रहेगा। ऐसे मनुष्य प्राणियों का वध करके उनका माँस खाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। यह नृशंस कृत्य उन्हें उतना ही कष्टकारक होता है, जितना किसी सामान्य व्यक्ति को अपने बच्चे या भाई को मारकर खाना। जीभ के स्वाद अथवा शरीर पुष्टि की लालसा जैसे अत्यन्त तुच्छ स्वार्थ के लिए अन्य प्राणियों को मर्मान्तक पीड़ा देना केवल पाषाण हृदय असुरों से ही बन पड़ सकता है, जिसमें आत्मा की सत्ता मौजूद है और वह सुविकसित कहे जा सकने वाले स्तर तक जा पहुँचा है, उसके लिए माँसाहार का ग्रास हाथ से उठा सकना भी संभव न होगा। इस कृत्य को करते हुए उसका हृदय धड़केगा और हाथ कांपेंगे।
यह समस्त सृष्टि हमारे ही लिए नहीं बनाई गई है। समस्त विश्व-वसुधा हमारी बपौती नहीं है। अन्य प्राणी भी ईश्वर के बनाये हैं और उस धरती पर रहने तथा प्रकृति-संपदा का उपभोग करने का अधिकार उन्हें भी है। सबके अधिकार छीनकर, सबके अस्तित्व को खतरे में डालकर हम अपनी ही स्वार्थलिप्सा पूरी करने की बात सोचें, तो यह संकीर्ण स्वार्थपरता अनीतिमूलक ही होगी। उससे मानवता का गौरव गिरेगा ही, औचित्य इसी में है कि हम अपने को एकाकी अनुभव न करें। अपनत्व का दायरा विस्तृत करते चले जाएँ, तभी व्यक्ति की महानता और समाज की सुख-शाँति स्थिर बनायी रखी जा सकेगी।
साधना क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए संचित पापकर्मों, कषाय-कल्मषों कुसंस्कारों का परिशोधन आवश्यक है। इसके लिए धर्मशास्त्रों में प्रायश्चित के अनेक विधि-विधानों का उल्लेख है। पापों के प्रायश्चित के लिए जिन तपों का शास्त्रों में वर्णन है उनमें चांद्रायण व्रत का महत्त्व सर्वोपरि है। विभिन्न शारीरिक और मानसिक स्थिति के व्यक्तियों के लिए, विभिन्न पापों के प्रायश्चितों के लिए, आत्मबल को विभिन्न दिशाओं में बढ़ाने के लिए विविध प्रकार के चांद्रायण व्रतों का वर्णन मिलता है। देश, काल, पात्र के भेद से भी इस प्रकार के अंतर पाये जाते हैं। प्राचीनकाल में लोगों की शारीरिक-मानसिक स्थिति बहुत अच्छी होती थी। वे देर तक कठोर उपवास एवं तप-साधना कर सकते थे। इसलिए उन परिस्थितियों को देखते हुए उस प्रकार के कठोर विधानों का बनाया जाना स्वाभाविक ही था। आज की परिस्थितियाँ भिन्न हैं। कठिन तप-साधनाएँ विरले ही कर पाते हैं। इतने पर भी प्रायश्चित्तपरक तपश्चर्या की महत्ता असंदिग्ध है।
चांद्रायण व्रत के विविध रूपों को समझने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि प्रायश्चित्त किसे कहते हैं? प्रायश्चित शब्द ‘प्रायः’ और ‘चित्त’ शब्दों से मिलकर बना है। इसके दो अर्थ होते हैं।
प्रायः पापं विजानीयात् चित्तं वै तद्विषोधनम्। प्रायोनाम् तपः प्रोक्तं चित्तं निश्चय उच्यते॥
अर्थात् (1) ‘प्रायः’ का अर्थ है-पाप और ‘चित्त’ का अर्थ है- शुद्धि। प्रायश्चित अर्थात् पाप की शुद्धि।
(2)’प्रायः’ का अर्थ है-तप और ‘चित्त’ का अर्थ है निश्चय। प्रायश्चित्त अर्थात् तप करने का निश्चय।
दोनों अर्थों का समन्वय किया जा तो यों कह सकते हैं कि तपश्चर्या द्वारा पापकर्मों का प्रक्षालन करके आत्मा को निर्मल बनाना।” तप का यही उद्देश्य भी है। चांद्रायण तप की महिमा और साथ ही कठोरता सर्वविदित है।
यों तो शास्त्रों में प्रायश्चित्त प्रकरण में कई प्रकार के विधानों का वर्णन है जैसे- कृच्छ, अतिकृच्छ, तप्त-कृच्छ सौम्यकृच्छ, पादकृच्छ, महाकृच्छ, कृच्छातिकृच्छ, साँतापन, कृच्छसाँतापन, महासाँतापन, प्रजापात्य, पराक, ब्रह्मकूर्य आदि। किंतु इनमें चांद्रायण व्रतों को तप में सर्वप्रमुख माना गया है।
स्कंदपुराण में चांद्रायण व्रत की चर्चा के संदर्भ में युधिष्ठिर और कृष्ण का संवाद मिलता है। युधिष्ठिर पूछते हैं-
चक्रायुध नमस्तेस्तु देवेष गरुणध्वज। चांद्रायण विधि पुण्यमारव्याहि मम्॥
अर्थात् चक्रायुध और गरुणध्वज धारण करने वाले भगवान कृष्ण को नमस्कार करके, युधिष्ठिर ने पवित्र चांद्रायण व्रत का वर्णन करने की प्रार्थना की।
भगवान श्रीकृष्ण ने इस महाव्रत का माहात्म्य बताते हुए कहा-
चंद्रायणेन चीर्णेन यत् कृतं तेन दुष्कृतम्। तत् सर्व तत्क्षणादेव भस्मी भवति काष्ठवत्॥
अर्थात् चांद्रायण व्रत करने से मनुष्य के किये हुए पाप उसी प्रकार दूर हो जाते हैं, जैसे जलती हुई अग्नि में सूखी लकड़ी जल जाती है।
अनेक घोर पापानि उपपातकमेवच। चंद्रायणेन नष्यन्ति वायुना पाँसवो यथा॥
अर्थात्- अनेक घोर पाप तथा सामान्य पाप चांद्रायण व्रत से उसी प्रकार उड़ जाते हैं जैसे आँधी चलने पर धूलि के कण।
प्राचीन साधना ग्रंथों के अनुसार ‘कृच्छ’ और ‘मृदु’ भेद से दो प्रकार के चांद्रायण व्रत माने गये हैं। कृच्छ चांद्रायण व्रत का विधान उन लोगों के लिए है, जिनसे कोई बड़े पाप बन पड़े हैं अथवा तीव्र तपश्चर्या कर सकने की सामर्थ्य जिनमें है। प्रायः इनका उपयोग सतयुग आदि पूर्व युगों में होता था जब मनुष्य की सहनशक्ति पर्याप्त थी।
मृदु चांद्रायण-शारीरिक और मानसिक दुर्बलता वाले व्यक्तियों के लिए है। इसे स्त्री-पुरुष बाल-वृद्ध सभी कर सकते हैं। छोटे पापों के शमन और थोड़ा आत्मबल बढ़ाने में भी इस व्रत से सहायता मिलती है। आरोग्य की दृष्टि से यह चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करता है। मृदु चांद्रायण को कई ग्रंथों में शिशु चांद्रायण भी कहा गया है, क्योंकि वह कठोर चांद्रायण की तुलना में बालक ही है।
कृच्छ चांद्रायण के विधि-विधान के संदर्भ में शास्त्रकार कहते हैं-
शोधयेत् तु शरीरं स्वं पंचगव्येन मंन्त्रितः। सः षिरः कृष्णपक्षस्य तत् प्रकुर्वीत वापनम्॥
शुक्लः वासाः शुचिर्भूत्वा मौंजीं बन्धीत मेखलाम्। पलाष दण्डमादाय ब्रह्मचर्य व्रते स्थितः॥
कृतोपवासः पूर्व तु शुक्ल प्रतिपादे द्विजः। नदी संगम तीर्थेषु शुचौ देषे गृहेऽपिवा॥
अर्थात् शरीर को दस स्नान-विधान से शुद्ध करे। अभिमंत्रित करके पंचगव्य पिये और फिर सिर को मुड़ा कर कृष्ण पक्ष में व्रत आरंभ करे। श्वेत वस्त्र पहने, पवित्र रहे, कटिप्रदेश में मेखला धारण किये रहे। पलाश की लाठी दंड लिए रहे और ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करे। नदी के संगम, तीर्थ, एवं पुण्य प्रदेशों अथवा घर में रहकर भी शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा में चांद्रायण व्रत आरंभ करे।
नदीं गत्व विषुद्धात्मा सोमाय वरुणाय च। आदित्याय नमस्कृत्वा ततः स्नायात् समाहितः॥
उत्तीर्योदकमाचम्य च स्थत्वा पूर्वतो मुखः। प्राणायामं ततः कृत्वा पवित्रेभि सेचनम्॥
वीरघ्नमृषभं वापि तथा चाप्यघमर्षणम्। गायत्री मम देवीं वा सावित्रीं वा जपेत् ततः॥
अर्थात्- शुद्ध मन से नदी में स्नान करे। सोम, वरुण और सूर्य को नमन करे। पूर्व को मुख करके बैठे। आचमन, प्राणायाम, पवित्रीकरण, अभिसिंचन, अमर्षण आदि संध्या-कृत्यों को करता हुआ सावित्री-गायत्री का जप करे।
आधारावाज्य भागो च प्रणवं व्याहृतिस्तथा। वारुणं चैव पंचैव हुत्वा सर्वान् यथाक्रमम्। प्रणम्य चाग्निं सोमं च भस्म घृत्व यथाविधि॥
अर्थात् आधारहोम, आज्य-भाग प्रणव, व्याहृति, वरुण आदि का विधिपूर्वक हवन करे और अग्नि तथा सोम को प्रणाम करके मस्तक पर भस्म धारण करे।
अंगुल्यग्र्रे स्थितं पिंड गाय «याचाभिमंत्रयेत्। अंगुलीभिस्त्रिभि पिण्डं प्राष्नीयात् प्रांमुख शुचिः॥
यथा च वर्धतेसोमो ह्रसते च यथा पुनः। तथा पिंडाष्च वर्धन्ते हृसन्ते च दिने-दिने
अर्थात् - तीन उँगलियों पर आ सकें, इतना अन्न का पिण्ड गायत्री महामंत्र से अभिमंत्रित करके पूर्व की ओर मुख करके खाएँ। जिस प्रकार कृष्णपक्ष में चंद्रमा घटता है, उसी प्रकार भोजन घटाएँ और शुक्ल पक्ष में जैसे चंद्रमा बढ़ता है, उसी प्रकार बढ़ाते जाएँ।
अध्यात्मशास्त्रों में कृच्छ चांद्रायण के चार भेद बताये गए है- (1) पिपीलिका मध्य चांद्रायण (2) यव मध्य चांद्रायण (3) यति चांद्रायण (4) शिशु चांद्रायण। यों तो चांद्रायण का सामान्य क्रम यह है कि जितना सामान्य आहार हो, उसे धीरे-धीरे कम करते जाना और फिर निराहार तक धीरे-धीरे बढ़ते हुए सामान्य आहार तक पहुँचना, किंतु कृच्छ चांद्रायण के नियम भिन्न और कठोर हैं। चारों प्रकार के कृच्छ चांद्रायण व्रतों में 240 ग्रास भोजन ही एक महीने में करने का विधान है।
कृच्छ चांद्रायण के चारों प्रकारों के विधि-विधान संक्षेप में इस प्रकार हैं-
(1) पिपीलिका मध्य चांद्रायण
इस संदर्भ में शास्त्रों में उल्लेख है-
‘ऐकेकं ह्रासयेत पिण्डं कृष्ण शुक्ले च वर्धयेत्। उपस्पृषंस्त्रिषवणमेतच्चंद्रायणं स्मृतमं॥’
अर्थात् पिपीलिका मध्य चांद्रायण में पूर्णमासी को पंद्रह ग्रास भोजन करते हैं। फिर प्रतिदिन क्रमशः एक-एक ग्रास घटाते हैं और अमावस्या को निराहार रहकर प्रतिपदा से एक-एक ग्रास बढ़ाते हुए पूर्णिमा को पुनः पंद्रह ग्रासों पर जा पहुँचते हैं। इस व्रत में पूरे एक माह में कुल 240 ग्रास ग्रहण करते हैं।
(2) यव मध्य चांद्रायण
एतमेव विधि कृत्स्नमाचरेद्यवमध्यमे। शुक्ल पक्षादि नियतष्चरंष्चंद्रायणं व्रतम॥
अर्थात् यव मध्य चांद्रायण शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होता है। अमावस्या के दिन उपवास करके शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को एक ग्रास भोजन लेते हैं। इसके पश्चात् पूर्णिमा तक एक-एक ग्रास बढ़ाते हुए पंद्रह ग्रास तक पहुँचते हैं। इसके बाद कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से एक-एक ग्रास घटाते हुए चतुर्दशी को एक ग्रास खाते हैं और अमावस्या को पूर्ण निराहार रहते हैं। इस प्रकार इस व्रत में भी 240 ग्रास ही खाने का विधान है।
(3) यति चांद्रायण
अष्टौ अष्टौ समष्नीयात् पिण्डान माध्यन्दिने स्थिते। नियतात्मा हविष्याषी यति चंद्रायणं स्मृतम्॥
अर्थात् प्रतिदिन मध्याह्नकाल में आठ-आठ ग्रास खाता रहे। इसे यति चांद्रायण कहते हैं। इसमें न किसी दिन कम करते हैं और न अधिक। इससे भी एक मास में 240 ग्रास ही खाये जाते हैं।
(4) शिशु चांद्रायण
च्तुरः प्रातरष्नीयात् पिंडान् विप्रः समाहितः। - चतुरोऽस्त मिते सूर्ये षिषुचंद्रायणं स्मृतम्॥
अर्थात् चार ग्रास प्रातःकाल और चार ग्रास सायंकाल खाएँ। यही क्रम नित्य रहता है। इस प्रकार शिशु चांद्रायण में प्रतिदिन आठ ग्रास खाते हुए एक मास में 240 ग्रास पूरे किये जाते हैं। तिथि की वृद्धि या क्षय हो जाने पर ग्रास की भी वृद्धि या कमी हो जाती है।
अब यहाँ प्रश्न उठता है कि इस व्रत के समय आहार स्वरूप लिया जाने वाला ग्रास कितना बड़ा होना चाहिए? ग्रास का अर्थ क्या है? ग्रास के दो अर्थ किये गये हैं- बौद्धायन का कथन है- “पिंडान प्रकृति स्थात प्राष्नति” अर्थात् साधारणतया मनुष्य जितना बड़ा ग्रास खाता है, वही ग्रास का परिमाण है।
उपर्युक्त चारों प्रकार के चांद्रायण व्रतों में आहार ग्रहण करते समय प्रत्येक ग्रास को प्रथम गायत्री महामंत्र से अभिमंत्रित करते हैं, तत्पश्चात् ( / भूः / भुवः / स्वः / महः / जनः / तपः / सत्यं / यशः / श्रीः / अर्क / इट् / ओजः / तेजः / पुरुषः / धर्मः / शिवः - इन मंत्रों के आरंभ में ( और अंत में नमः स्वाहा संयुक्त करके उस मंत्र को उच्चारण करते हुए ग्रास का भक्षण किया जाता है। यथा- “ ( सत्यं नमः स्वाहा” ऊपर जो मंत्र लिखे गये है, इनमें से उतने ही मंत्र प्रयोग होंगे जितने कि ग्रास भक्षण किये जाएँगे। उदाहरण-स्वरूप जैसे चतुर्थी तिथि को चार ग्रास लेने हैं तो - (1) ( ( नमः स्वाहा (2) ( भूः नमः स्वाहा (3) ( भुवः नमः स्वाहा (4) ( स्वः नमः स्वाहा। इन चार मंत्रों के साथ क्रमशः एक-एक ग्रास ग्रहण किया जाएगा।
चांद्रायण व्रतों के दिनों में संध्या, स्वाध्याय, देवपूजा, गायत्री जप, हवन आदि साधनात्मक-उपासनात्मक धार्मिक कृत्यों का नित्य-नियम रखना चाहिए। भूमिशयन एवं ब्रह्मचर्य पालन का विधान आवश्यक है। व्रत का संकल्प लेते समय मुंडन कराने का भी शास्त्र आदेश है, साथ-ही-साथ चांद्रायण का उत्तरार्द्ध पक्ष यह है कि जो खाई खोदी गयी है अर्थात् जो दुष्कृत्य अपने से बन पड़े है, उनकी किसी-न-किसी रूप में भरपाई की जाय। व्रत की समाप्ति पर सामर्थ्यानुसार हवन-यज्ञ ब्राह्मण या कन्याभोज, ब्रह्मभोज जैसे उपक्रम भी अपनाये जा सकते हैं।
काँची नरेश की राजकुमारी प्रेतछाया से पीड़ित हुई। भूत सामान्य नहीं, ब्रह्मराक्षस था। तब श्री रामानुजाचार्य बुलाये गये। उन्होंने वहाँ जाकर पूछा- आपको यह योनि क्योंकर मिली। रोकर ब्रह्मराक्षस बोला- मैं विद्वान था, किंतु मैंने अपनी विद्या छिपा रखी। किसी को भी मैंने विद्यादान नहीं किया, इससे ब्रह्मराक्षस हुआ। आप समर्थ हैं, मुझे इस प्रेत तत्व से मुक्ति दिलाइये। श्री रामानुज ने राजकुमारी के मस्तक पर हाथ रखकर जैसे ही भगवान का स्मरण किया, वैसे ही ब्रह्मराक्षस ने उसे छोड़ दिया, क्योंकि वह स्वयं प्रेतयोनि से मुक्त हो गया। उस दिन से श्री रामानुज ने प्रतिज्ञा की कि वह स्वाध्याय का लाभ अपने समाज को भी देते रहेंगे।
पाठ समाप्त हुआ। आचार्य रामानुज प्रदक्षिणा के लिए उठे ही थे कि सामने से चाँडाल आ गया। उसे देखते ही आचार्यजी क्रुद्ध हो उठे और गर्जकर बोले- शठ! आगे से हट जा, रास्ते को अपवित्र न कर। चाँडाल ठिठक गया। लौटना चाहा पर किसी अज्ञात शक्ति ने उसे रोक दिया। हाथ जोड़कर उसने विनयपूर्वक पूछा- भगवान् अभी चला जाता हूँ, किन्तु आप यह बताइए जाऊँ किधर? मेरे चारों ओर पवित्रता बिखरी पड़ी है, फिर मैं अपवित्र कहाँ जाऊँ? रामानुज की आँखों से अज्ञान का पर्दा हट गया। चाँडाल सब ओर पवित्रता के ही दर्शन करता है और मैं भगवान का भक्त होकर भी अपने मन का मल भी नहीं साफ कर सका?
रामानुज ने हाथ जोड़कर कहा- क्षमा करो तात! आज तो तुमने मेरी आँखें खोल दीं। तुमने तो मुझे भी पवित्र कर दिया।
1812 ई. में जब अँगरेजों और अमेरिकनों में संग्राम चल रहा था, सीचिवे मास नामक बस्ती के सन्निकट समुद्र में अँगरेजों का जहाज दिखाई दिया। उसमें से कुछ सिपाही छोटी-छोटी नाव में बैठकर बस्ती की ओर आग लगाने के निमित्त बढ़ने लगे। एक मकान के ऊपर की मंजिल में खिड़की से रेबिका वेट्स नामक 12 वर्षीया एक लड़की यह दृश्य देख रही थी। साराबिन्सर नामक एक युवक से इस कन्या ने कहा-क्या कहूँ मैं पुरुष नहीं हूँ। देखो किस प्रकार सिपाही नाव में बैठकर आ रहे हैं।” साराबिन्सर ने कहा-यदि तुम पुरुष होती तो क्या करतीं।” लड़की ने उत्तर दिया-मैं संग्राम करती, अपनी कुछ परवाह न करती। सारा बिन्सर ने उत्तर दिया कि कदाचित लोग इसलिए छिप रहे हों कि सिपाही आ जाएँ तो उन पर वे टूट पड़ें। रेबिका ने कहा-अरे ढोल कहाँ हैं जो बाबा कल मरम्मत के लिए लाये थे। रेबिका उन ढोलों को तथा कई लड़कियों के साथ मकानों के बाहर छिपकर निकल गई और टीलों के पीछे जोर-जोर से ढोल बजाने और हल्ला मचाने लगी। बस्ती के जो लोग डरकर छिप गये थे, ढोल के शब्द और चिल्लाहट सुनकर समझे कि पास गोस्टनगर से सहायता के निमित्त सिपाही आ गये, इसलिए साहस करके नाव में बैठकर नदी में आगे बढ़ गये और शत्रुओं पर हमला करने लगे। ऐसा होते ही अंग्रेजी सिपाही भयभीत हो गये और अपनी नावों को वापस कर अपने जहाज पर चले गये।
नील नदी के उत्तरी किनारे पर एक बुजुर्ग दरवेश की छोटी-सी झोंपड़ी थी। उसमें वह स्वं, उसकी पत्नी और चार बच्चे रहते थे। दरवेश रात-दिन खुदा की इबादत में मशगूल रहता। उसकी पत्नी सुबह-शाम निकट की एक बस्ती से जरूरत के मुताबिक़ आटा-दाल माँग लाती। बस्ती के लोग खुले हाथ से उसे खूब खैरात देते। इस तरह उस दरवेश के परिवार का गुजर-बसर हो रहा था।
एक दिन की बात है, नील नदी में भयंकर बाढ़ आयी हुई थी। उस दिन बहुत तेज बरसात हुई थी। आकाश काले बादलों से घिरा था। तेज तूफानी हवाएँ चल रही थीं। संध्या समय दरवेश ने अपनी पत्नी से कहा, “नदी के दूसरे किनारे पर एक पेड़ के नीचे एक फकीर सुबह से भूखा-प्यासा खुदा की इबादत कर रहा है। यह अच्छा नहीं लगता कि हम भरपेट भोजन करके सोएँ और वह भूखे पेट रहे।”
अपने पति की बात सुनकर उस स्त्री को आश्चर्य हुआ कि उसके पवि को सहज ही यह कैसे मालूम हो गया कि नदी के दूसरे किनारे पर कोई फकीर भूखा-प्यासा बैठा हुआ है? उसने सोचा, इसकी सत्यता परखनी चाहिए। उसके समक्ष प्रश्न यह था कि वह नदी के दूसरे किनारे तक पहुँचे कैसे? फिर भी उसने अपने पति से कहा-निश्चय ही यह कोई अच्छी बात नहीं है कि हम पेट भर भोजन करके सोएँ और वह खुदा का नेक बन्दा भूखा रहे। मैं चाहती हूँ कि मैं स्वयं उसके लिए भोजन लेकर जाऊँ, किंतु इसमें एक कठिनाई है।”
दरवेश ने पूछा- “वह क्या?”
पत्नी बोली- “आज नदी में भयंकर बाढ़ आयी हुई है। मैं भला नदी के दूसरे किनारे तक कैसे पहुँच सकूँगी? अब आप ही इसका कोई उपाय बताएँ।
दरवेश बिना एक पल का इंतजार किए बोला, “इसमें कौन-सी परेशानी की बात है। तुम भोजन लेकर अवश्य ही उस फकीर के पास जाओ। जब नील नदी का किनारा आ जाए, तो नदी से कहना, हे नील नदी, मुझे उस दरवेश के नाम पर रास्ता दे दे, जिसने हमारे वैवाहिक जीवन के पिछले बीस वर्षों में कभी भी मेरे साथ सहवास नहीं किया है।” बस इतना कहते ही नील नदी तुम्हें रास्ता दे देगी।”
अपने पति की अटपटी बातें सुनकर उस स्त्री को अतीव आश्चर्य हुआ। उसने एक बार अपने दरवेश पति के चेहरे पर नजर डाली और सोचने लगी, “मेरे इनसे चार बच्चे हैं और ये कहते हैं कि उन्होंने मेरे साथ कभी सहवास नहीं किया है। भला यह कैसे हो सकता है?”
यद्यपि अपने पति के इस कथन से उसके मन में शंका उत्पन्न हो गयी, फिर भी वह शाँत रही। अपने मन की उधेड़बुन को बाहर न प्रकट करते हुए अपने चौके में जाकर उसने उस अनजाने फकीर के लिए भोजन तैयार किया और नील नदी की ओर चल दी। रास्ते भर वह अपने पति के कहे हुए वाक्य को मन में दुहराती रही। जब वह नदी के किनारे पहुँची, तो उसने एक बार हतप्रभ होते हुए हैरानी से नदी की ओर देखते हुए कहा- “हे नील नदी, मुझे अपने उस दरवेश के नाम पर रास्ता दे दे, जिसने आज तक मेरे साथ कभी सहवास नहीं किया।”
नदी में बाढ़ का पानी हिलोरें ले रहा था। पानी में नदी का कहीं ओर-छोर दिखाई नहीं दे रहा था। आकाश में काले बादल अभी भी छाए हुए थे। चारों ओर अँधेरा था। नदी में बाढ़ का पानी भयंकर गर्जन-तर्जन कर रहा था। ऐसे वातावरण में उस स्त्री की आवाज हवा में यूँ ही कहीं खो गयी। स्त्री ने वे ही शब्द फिर से दुहराने शुरू किए ही थे कि उसे नदी में एक अजीब-सी गड़गड़ाहट की आवाज होती सुनायी दी और उसने देखा कि नदी अपने में स्वयं सिमट रही है। थोड़ी ही देर में नदी का दूसरा किनारा सिमटकर पहले किनारे के पास आ लगा और नदी के फैलाव का आकार इतना छोटा हो गया इक वह स्त्री सिर्फ अपना एक कदम आगे बढ़ाकर उसे आसानी से पार कर सकती थी।
स्त्री ने तुरंत एक कदम आगे बढ़ाया और नदी पर कर ली। जैसे ही वह नदी को पारकर, जो एक छोटी नाली के समान हो गयी थी, दूसरी ओर पहुँची कि नदी फिर एक गड़गड़ाहट के साथ अपने असली आकार में आने लगी। कुछ ही क्षणों में नदी अपने असली रूप में आ गयी।
स्त्री भोजन लेकर जब नदी के उस ओर पहुँची, तो उसने देखा कि सचमुच ही वहाँ पेड़ के नीचे एक फकीर बैठा हुआ था। स्त्री ने फकीर पर एक नजर डाली।उसके चेहरे पर एक अजब गजब नूर था। उसकी आँखें अधखुली थीं। हाथों की उँगलियाँ बसबीह के मनकों पर धीरे .धीरे चल रही थीं। उसके होंठों पर अल्लाह का पाक नाम था।स्त्री ने फकीर के सामने चुपचाप भोजन रख दिया।फकीर ने एक नजर आसमान की ओर देखा, मानो वह मालिक का शुक्रिया अदा कर रहा हो। फिर बिना कुछ बोले वह चुपचाप भोजन कर चुका, तो वह दरवेश की पत्नी अपने बर्तन उठाकर वापस लौटने लगी। उस समय अँधेरा और भी अधिक गहरा और घना हो गया था। नदी पहले की ही भाँति साँप जैसी फुफकार रही थी। स्त्री को विचार आया कि वहाँ से यहाँ तक पहुँचने के लिए तो पति से तरीका पूँछ लिया था अब वापस कैसे चला जाए। वापसी के संबंध में उसने पति से कुछ भी नहीं पूछा था। फकीर ने देखा कि वह स्त्री वहीं खड़ी किसी परेशानी में कुछ सोच रही है, उसे इस तरह सोच में डूबी हुई देखकर वह बोला, “बहिन! तुम किस सोच में डूबी हो? “
वह बोली, मैंने वहाँ से यहाँ नदी पार करने का तरीका अपने पति से पूछ लिया था, लेकिन नदी की इस भयंकर बाढ़ में वापस लौटते समय नदी से क्या कहूँ कि वह मुझे रास्ता दे दे।यह पूछना मैं भूल गयी। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं अब नदी कैसे पार कर सकूँगी?इसी कारण से मैं चिन्तित हूँ।”
उस स्त्री की बात सुनकर फकीर ने कहा- “हे साहिबा तुम्हें परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं, लौटते समय नदी से कहना, हे नील! मुझे उस फकीर के नाम पर रास्ता दे दे, जिसने जिसने पिछले बीस साल से आज तक भोजन नहीं किया है और साहिबा इतना कहने मात्र से नील नदी तुम्हें वापस जाने के लिए अवश्य रास्ता दे देगी।”
दरवेश की पत्नी और भी आश्चर्य में डूब गयी। उस फकीर ने अभी उसके सामने ही तो भोजन किया था और वह कहता है कि उसने जिसने बीस वर्षों से भोजन नहीं किया। आखिर यह क्या रहस्य है? उसको कुछ समय में नहीं आया। फिर भी वह नदी के किनारे आयी आर उसने फकीर का कहा वाक्य ज्यों-का -त्यों दोहरा दिया। नदी पहले की ही तरह गड़गड़ाहट की आवाज से सिकुड़ने लगी और क्षणभर में एक छोटी-सी नाली के समान हो गयी।स्त्री ने एक कदम आगे रखकर उसे पार कर लिया। नदी के उस ओर पहुँचते ही नदी फिर फैलने लगी और अपनी मूल स्थिति में आ गयी।
नदी पार करके स्त्री जब अपनी झोंपड़ी में पहुँची तो उसने अपने दरवेश पति से यह पूछा,” आपसे मेरे चार बच्चे है, किंतु आपने कहा कि आने मेरे साथ कभी भी सहवास नहीं किया है। इसी तरह उस फकीर ने स्वयं मेरे सामने भोजन किया,किंतु कहा कि उसने कभी भोजन नहीं किया है। इन्हीं दोनों वाक्यों के कहने पर नदी ने मुझे रास्ता भी दिया। आखिर इसका क्या रहस्य है? ”दरवेश बोला, “ये दोनों ही बातें सत्य हैं। यद्यपि तुम मेरी पत्नी हो और मैंने तुम्हारे साथ सहवास भी किया है, लेकिन मैंने ऐसा कामवासना की तृप्ति के लिए कभी नहीं किया। इसी प्रकार उस फकीर ने भी स्वाद के लिए कभी भोजन नहीं किया।इन्द्रियों के भोग एवं मन की आसक्ति के बिना किया गया कोई भी कर्म खुदा की इबादत ही है।” दरवेश। की पत्नी को अनासक्त कर्म’ की महिमा का बोध हो गया। उसके होंठों पर मधुर मुसकान खोलने लगी।
भगवान महावीर रास्ते से गुजर रहे थे। रास्ते में मिले एक ग्रामीण ने उनके चरणों पर गिरकर प्रणाम किया। उत्तर में अर्हता ने भी उसके चरणों पर मस्तक टेका।
ग्रामीण सकपकाया बोला-आप तपस्या के भण्डार हैं, उस विभूति को मैंने नमन किया। पर मैं तो कुछ नहीं हूँ, मेरा नमन किसलिए।
अर्हता ने कहा-तेरे भीतर जो परमपवित्र आत्मा है, मैं उसी को देखता हूँ और नमता हूँ। मेरे ‘तप’ से तुम्हारा ‘सत्य’ बड़ा है।
पत्थर की एक बड़ी चट्टान को देखकर शिष्य ने बुद्ध से पूछा-भगवान् क्या इस चट्टान पर किसी का शासन संभव है?
पत्थर से कई गुनी शक्ति लोहे में होती है। इसीलिए लोहा पत्थर को तोड़कर टुकड़े-टुकड़े कर देता है। भगवान बुद्ध ने शिष्य की जिज्ञासा को शान्त करते हुए उत्तर दिया। तो फिर लोहे से भी कोई वस्तु श्रेष्ठ होगी-शिष्य ने प्रश्न किया। क्यों नहीं? अग्नि है। जो लोहे के अहं को गलाकर द्रव्य रूप में बना देती है। अग्नि की विकराल लपटों के सम्मुख किसी की क्या चल सकती होगी?
केवल जल है, जो उसकी ऊष्मा को शीतल कर देता है। जल से टकराने की फिर किसमें ताकत होगी? प्रतिवर्ष बाद तथा अतिवृष्टि द्वारा जन और धन की अपार हानि होती है। ऐसा क्यों सोचते हो तत् इस संसार में एक-से-एक शक्तिशाली पड़े। वायु का प्रवाह जलधारा की दिशा बदल देता है। संसार का प्रत्येक प्राणी वायु के महत्व को जानता है, क्योंकि इसके बिना उसके जीवन का महत्व ही क्या है? जब वायु ही जीवन है, फिर इससे अधिक महत्वपूर्ण वस्तु क्या होगी? भगवान बुद्ध को हंसी आ गई, बोले-मनुष्य की संकल्प शक्ति, जिसके द्वारा वायु भी वश में हो जाती है। मानव की यह शक्ति ही सबसे बड़ी है।
इन दिनों मानवी-मूल्यों और आदर्शों में इतनी गिरावट आई है कि जो समाज-व्यवस्था कभी नैतिक की सुदृढ़ नींव पर टिकी थी, वह पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गई। न कहीं सुख-चैन रहा, न शाँति की शीतल छाया। मारकाट से लेकर अपहरण-अत्याचार तक की विद्रूपता समाज में इस कदर छायी हुई है, मानो यह सब जीवन के सामान्य प्रसंग हो। बेईमानी को देखकर ऐसा लगता है, जैसे ईमानदारी अप्रासंगिक हो गई हो। ऐसे में मनुष्य को ‘मनुष्य’ कहने में संकोच होता है। उसे नरपशु कहना चाहिए। यदि वह इतना पतित हो चुका है, तो उसका अभ्युत्थान सर्वोच्च शिखर तक कैसे हो? इस दिशा में विज्ञान और दर्शन दोनों ही अपने-अपने ढंग के प्रयास कर रहे हैं। देखना यह है कि इनमें सबसे सर्वसुलभ, समयानुकूल, सरल और व्यावहारिक कौन है? पहले विज्ञान पक्ष को लें। वैज्ञानिक इस संदर्भ में अत्यंत आशावान् स्तर का बनाया जा सकना संभव है। उनकी चिंतन- परिधि चूँकि स्थूलशरीर तक सीमित है, इसलिए वे इसी में सुधार-संशोधन कर मनुष्य को श्रेष्ठ और संस्कारवान बनाने की बात सोचते हैं। विज्ञान की अवधारणा में मनुष्य के संस्कार कोष उसके ‘जीन’ हैं। इसी के गर्भ में इसकी समस्त अच्छाइयाँ और बुराइयाँ छुपी हुई होती है। यदि वह अपराधी, हत्यारा, चोर-डकैत क्रूर-कठोर है, तो इसके लिए इसका जीन जिम्मेदार है और यदि वह संत हृदय जैसा सरल, शिष्ट और सदाचारी है, तो इसके पीछे भी उसी ‘जीन’ की भूमिका है। चाहे वंशानुगत रोग हो या त्वचा की स्निग्धता, बालों का रंग हो या स्वभाव का चंचलता- सभी के लिए वह समान रूप से उत्तरदायी है-यहाँ शरीर-शास्त्रियों का कहना है कि यदि ऐसा है, तो उक्त विकृति (जन) को निकालकर अथवा नवीन श्रेष्ठ जीन प्रत्यारोपित कर व्यक्ति के स्वभाव और संस्कार को उदात्त बनाया जा सकता है। इसके लिए यूजेनिक्स (सुजनन विज्ञान) एवं जीन अभियांत्रिकी जैसी शरीरविज्ञान की कितनी ही शाखाएँ सक्रिय हैं। वर्षों पूर्व मूर्धन्य मनीषी विलियम शोकले ने सुझाव दिया था कि मंद मति लोगों को प्रजनन न करने के लिए सहमत किया जाए और इसका उन्हें भत्ता दिया जाए। विगत बरस चीन की सरकार ने भी घटिया प्रजनन रोकने संबंधित अपने नीति-नियमों की घोषणा कर आगामी पीढ़ी को अधिक समुन्नत और प्रतिभासम्पन्न बनाने का संकेत दिया है। महामानवों की यह नई प्रजाति विकसित करने की दिशा में वहाँ की सरकार ने जो उपाय अपनाये हैं, उसके अंतर्गत गर्भवती महिलाओं का परीक्षण कर यह सुनिश्चित किया जाएगा कि गर्भ में पलने वाला भ्रूण स्वस्थ है या नहीं? यदि उसमें तनिक भी आनुवंशिक असामान्यता पायी गई, तो माता को गर्भपात कराना पड़ेगा। उसी प्रकार आनुवांशिकीय कमी वाले पुरुषों को प्रजनन की अनुमति नहीं दी जाएगी। साम्यवादी व्यवस्था की स्पष्ट झलक उसकी इस नीति में दृष्टिगोचर होती है। इसकी तुलना में सिंगापुर ने अधिक उदारवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए शोकले के सुझाव का अनुसरण किया है और साम्यवादी कठोरता लागू करने की अपेक्षा पूँजीवादी प्रोत्साहन के माध्यम से इसके क्रियान्वयन का प्रयास किया है। यहाँ सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि नियंत्रण का तरीका क्या हो?मुख्य प्रश्न यह है कि पूरे राष्ट्र में गर्भपात की व्यवस्था कैसे हो? कोई भी माँ निजीतौर पर यह परेशानी मोल लेना नहीं चाहेगी कि वह अपने स्तर पर अपनी रुची से ऐसा करे। किसी को इतनी झंझट उठाने से क्या लाभ? फिर भ्रूण में यदि कोई दोष हुआ, तो उसे गिराकर स्वास्थ्य-संकट जैसी विपत्ति झेलना कौन पसंद करेगी? गाँव-गाँव और शहर-शहर में एक-एक महिला पर निगरानी रखना और उन्हें इसके लिए बाध्य या प्रेरित करना- यह बहुत ही कठिन कार्य है। तो भी यदि मान लें कि किसी प्रणाली द्वारा इसे संभव बना लिया जाता है, तो क्या यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अपहरण नहीं हुआ? इसको किसी के मौलिक अधिकारों से वंचित करना नहीं कहेंगे? अब जबकि संसार में लोकतंत्र की-मूलभूत अधिकारों की माँग की हवा बह रही है, तो इस स्थिति में ऐसी पाबन्दी लगा पाना असंभव है। तानाशाही और साम्यवाद का जमाना लद गया, जब व्यक्ति बलपूर्वक कुछ करने या नहीं करने के लिए विवश था। अब समान अधिकारों की माँग हर वर्ग, लिंग और क्षेत्र से उठ रही है। ऐसे में किसी के निजी जीवन में हस्तक्षेप अनुचित और अनैतिक ही कहलायेगा। कुछ देश इस तरह के प्रयास भले ही करते रहें, पर वे इसमें सफल ही होंगे-इसकी क्या गारण्टी है? भत्ते के रूप में प्रजनन अधिकार को खरीदना भी एक प्रकार से उसके नितांत निजी मामले में राष्ट्रीय अतिक्रमण ही है।
इसके विपरीत दोष यदि विकलांगता के रूप में शारीरिक है, तो इसके लिए शरीर वेत्ता मनुष्य को जिम्मेदार ठहराते और कहते हैं कि भ्रूणहत्या इसका विकल्प नहीं हो सकता, कारण कि रहन-सहन खान-पान और चिंतन इसका कारण है। जब तक अपनी इन आदतों में व्यक्ति सुधार-संशोधन नहीं कर लेता, तब तक मूल समस्या ज्यों-की-त्यों बनी रहेगी। चिकित्साविज्ञानी बताते हैं कि गर्भकाल में आहार-विहार यदि शुद्ध-पवित्र नहीं हुआ, तो गर्भस्थ शिशु पर इसका प्रतिकूल असर पड़ता और बाद में अपंगता के रूप में सामने आता है। अनेक अवसरों पर ऐसा पाया गया है कि भ्रूण को पोषण देने अथवा प्रसव के स्वास्थ्य-संवर्द्धन हेतु जब आवश्यकता से अधिक दवाओं का सेवन किया जाता है, तो उसका दुष्परिणाम गर्भ में पल रहे बालक पर कायिक विकृति के रूप में प्रकट होता है। ऐसे ही उस दौरान यदि रहन-सहन में सावधानी बरती नहीं गई, तो उसका भी नतीजा वाँछनीय नहीं होता। गर्भिणी के आस-पास का वातावरण यदि स्वास्थ्य के प्रतिकूल हुआ, तो वहाँ स्वस्थ शिशु के प्रसव की उम्मीद नहीं की जा सकती। हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम गिराये जाने के बहुत वर्ष बाद तक बच्चे लूले-लँगड़े पैदा होते रहे। इससे यह सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है कि बाह्य वातावरण का गर्भस्थ बालक पर कितना अवांछनीय असर पड़ता है। चिंतन की समर्थता जब शरीर की स्वस्थता-अस्वस्थता को प्रभावित कर सकती है, तो उदरदरी में विकास की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरने वाले कोमल माँस पिण्ड पर उसका कितना घातक असर होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। इसलिए इस संदर्भ में गर्भपात की नहीं, चिंतन, वातावरण और आदत में परिवर्तन-परिष्कार की आवश्यकता है। इतना यदि हो सका, तो विज्ञान द्वारा मनुष्य की एक सुविकसित प्रजाति के निर्माण का एक पहलू पूरा हो जाता है, कारण कि विज्ञान की अवधारण का ‘सुपरमैन’ हर दृष्टि से स्वस्थ, सुंदर और सुगठित होना चाहिए, जबकि अध्यात्म तत्त्वज्ञान में इसके लिए अंतरंग पक्ष को महत्त्वपूर्ण माना गया है।
इसका दूसरा पहलू जीन अभियांत्रिकी से संबंधित है। काया यदि सुंदर और सुडौल बना ली गई। पर गुण, कर्म, स्वभाव उसके अनुकूल न हुए, तो इसे एकांगी और अधूरा प्रयास ही कहेंगे। देह-लालित्य का महत्त्व तब है, जब उसके साथ चित्ताकर्षक आचरण भी जुड़ा हुआ हो, अन्यथा रंग बिरंगे मोहक सर्प की समीपता शायद वही पसंद करे, जिसे अपनी जान प्यारी न हो। ‘जीन इंजीनियरिंग इस अंतरंग पहलू को ही सुधारने-सँवारने का नाम है। इसमें दोषपूर्ण जीन को काट-छाँटकर व्यक्तित्व के घटियापन को बढ़िया बनाया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति नृशंस है, तो इसके लिए निश्चित रूप से कोई-न-कोई ‘जीन’ जिम्मेदार होगा, जो उसे बार-बार क्रूरता बरतने के लिए प्रेरित करता है। उक्त विज्ञान द्वारा इसकी पहचान कर उसे निकाल दिया जाता है। यह वैसा ही हुआ, जैसा विषधर को निर्विषय करना। इस स्थिति में सर्प का बाहरी आकर्षण उसके भीतरी स्वभाव से पूरी वह मेल खाता है, अतः इसे वाँछनीय कहेंगे। व्यक्ति में इस प्रकार के कितने ही दोष-दुर्गुण हो सकते हैं, जिनसे संबद्ध जीन की कटाई-छँटाई करनी पड़ती है, पर इस प्रक्रिया में अनेक कठिनाइयाँ हैं। सिद्धांत रूप में यह प्रणाली जितनी सरल लगती है, उतनी वस्तुतः है नहीं। प्रथम तो सैकड़ों जीन में से दोषयुक्त की पहचान करना न सिर्फ श्रमसाध्य है, वरन् समयसाध्य भी। दूसरे, जटिल प्रक्रिया होने के कारण यह इतनी खर्चीली होगी कि उसका भार वहन कर पाना हर किसी के वश की बात नहीं। तीसरे, यह उच्च एवं नवीनतम तकनीक है, अतः सर्वत्र सुलभ नहीं होगी। इसके अतिरिक्त इसमें एक और बड़ा अवरोध है, वह यह कि यह निर्णय कौन करेगा कि कौन-से गुण वाँछनीय हैं और कौन अवांछनीय। यह फैसला यदि प्रयोक्ता के ऊपर छोड़ दिया गया, तो वह भी अपने निजी मानदंड और मनःस्थिति के अनुसार ही इसका चयन करेगा। वह उदात्त अंतराल वाला हुआ, तो वैसे ही संस्कार कोष उसमें डालना चाहेगा तथा बुरों को निकालना चाहेगा। इसके विपरीत हेय अंतःकरण अपनी ही एक अन्य अनुकृति गढ़ना चाहेगा। फिर गुण-दोष के बीच कोई स्पष्ट सीमा-रेखा भी नहीं। वे सापेक्षिक स्थितियाँ हैं। यह आवश्यक नहीं कि जो विशिष्टता किसी को गुण प्रतीत हो रही हो, उसे दूसरे भी पसंद करें-गुण समझें। चोर, डकैत, धूर्त, ठग आदि को अपने दुर्गुण कभी दोष प्रतीत नहीं होते। वे चाहेंगे कि उनमें कोई ऐसा बीज कोष डाल दिया जाए, जिससे अपने-अपने क्षेत्र और अपनी-अपनी विधा में और निष्णात हो जाएँ। ऐसे में जो अतिमानव निर्मित होगा, वह कदाचित महर्षि अरविंद की अवधारण वाला ‘सुपरमैन’ न होकर नीत्से का ‘सुपरमैन’ हो जाए। इस प्रकार सम्पूर्ण मनुष्यजाति को महामानव बनाने की विज्ञान की आकांक्षा पूरी न हो सकेगी।
कितने ही विशेषज्ञ इसकी तुलना में उत्तम प्रजाति और उत्तम गुणों वाले नर-नारी का पारस्परिक समागम की वकालत करते और कहते हैं कि इससे उपर्युक्त लक्ष्य को प्राप्त करना आसान होगा। किंतु यहाँ भी कम बाधाएँ नहीं हैं। यह मिलन भले ही रज-वीर्य के रूप में परोक्ष रूप से परखनली में हो, फिर भी हर समाज और संस्कृति के लोग इसे स्वीकार कर सकेंगे- इसमें संदेह है। यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न नैतिकता संबंधी उठ खड़ा होगा। क्या ऐसी संतान नैतिक कही जा सकेगी? समाज उसे मान्यता प्रदान करेगा? इसके अतिरिक्त दो सर्वथा भिन्न समाज, संप्रदाय अथवा वर्ग के अनुयायी उसके माता-पिता उस बालक को भावनात्मक पोषण किस प्रकार दे सकेंगे? क्या माता का सामीप्य एवं स्नेह तथा पिता की छत्र-छाया न मिल पाने के कारण शिशु का वैसा विकास हो सकेगा, जैसा अभीष्ट है? व्यक्तित्व का एक पहलू यदि रज-वीर्य से जुड़ा है, तो दूसरा अधिक महत्वपूर्ण पक्ष माता-पिता का प्यार-दुलार एवं निकटता है। वह न मिल सका, तो जिस प्रकार खाद-पानी के अभाव में अच्छे बीज भी भली प्रकार नहीं पनप पाते और अच्छी फसल नहीं दे पाते, वैसी ही स्थिति ऐसे बालकों के व्यक्तित्व में भी परिलक्षित होगी।
मनुष्य के साथ यहाँ एक और कठिनाई यह है कि दो श्रेष्ठ गुणों वाले नर-नारी के संयोग से उत्पन्न बालक श्रेष्ठ ही होगा- यह आवश्यक नहीं। यह ठीक है कि गधे और घोड़े के मिलन से भार-वहन में अधिक समर्थ खच्चर पैदा होता है, पर आनुवांशिकी के ‘प्रभाविता का नियम’ (ला ऑफ डोमिनेन्स) के अनुसार माता-पिता के किन्हीं विशिष्ट गुणों को दृष्टिगत रखकर यदि ऐसा किया जाता है, तो जरूरी नहीं कि वे गुण संतति में प्रकट ही हो जाएँ। वह उसमें अप्रभावित और अप्रकट स्थिति में भी बने रह सकते हैं। यह भी संभव है कि जो लक्षण माता-पिता में लेशमात्र भी नहीं, वह अभिव्यक्त हो जाएँ। इसलिए यह कहना ठीक नहीं कि मंदबुद्धि पिता से सदा वैसी ही संतति पैदा होगी। ऐसे ही खूबसूरत माँ से बदसूरत संतान भी पैदा हो सकती है, ऐसा प्रजनन-विज्ञान के आचार्यों का कथन है।
जॉर्ज बर्नार्डशा के बारे में प्रसिद्ध है कि एक बार उनके निकट एक रूपवती महिला विवाह प्रस्ताव लेकर आई और कहने लगी कि हमें आप जैसा एक बुद्धिमान पुत्र चाहिए, जो हमारी तरह सौंदर्य संपन्न हो। बर्नार्डशा कुरूप थे। उन्होंने विनोद करते हुए कहा- कहीं उलटा हो गया तो? अर्थात् तुम्हारी बुद्धि और हमारा सौंदर्य उसे मिला, तो क्या तुम उसको उतना ही प्यार दे सकोगी? महिला बिना कुछ कहे वापस लौ गई।
उक्त प्रसंग कितना सच है, यह तो नहीं कहा जा सकता, पर उसमें जिस संभावना की चर्चा है, वह जेनेटिक के नियमों के अनुसार शत-प्रतिशत संभव है। इसलिए विज्ञान द्वारा महामानव निर्माण की प्रक्रिया दुरूह ही नहीं, असंभव और अव्यावहारिक भी है।
अध्यात्म-दर्शन काया की तुलना में चेतना को प्रधानता देता है और उसके परिष्कार द्वारा महामानव के विकास की बात कहता है। भौतिक शास्त्र पदार्थसत्ता का अनुसंधान-अन्वेषण करने वाला जड़ विज्ञान है और इस संसार को उसका जखीरा भर मानता है, जबकि दर्शन पदार्थसत्ता का आदिकारण चेतना को बताता और यह स्वीकारता है कि उसमें जो स्पंदन और ऊर्जा है, उसका मूल स्रोत वही है। मनुष्य के संदर्भ में उसके गुण, कर्म, स्वभाव का आधार और स्तर भी उसी को माना गया है, इसलिए व्यक्तित्व निर्माण का वास्तविक शुभारंभ वहीं से होना चाहिए, ऐसा उसका मत है। यह बात तब और स्पष्ट हो जाती है, जब हम मानवी विकास पर गहराई से चिंतन करते हैं। स्कूल-कालेजों में पढ़ाया जाने वाला विकासवाद शारीरिक विकासयात्रा की व्याख्या-विवेचना भर करता और यह बताता है कि उसका वर्तमान स्वरूप इस स्तर तक किस प्रकार विकसित हुआ। आदमी के संबंध में उसकी मान्यता है कि उसका वर्तमान शरीर चिंपांजी अथवा गोरिल्ला प्रभृति प्राणियों से विकसित हुआ है। इसका प्रमाण वह क्रोमैग्नन, नीण्डरथल आस्ट्रेलो-पिथैकस एपमैन जैसी कितनी ही आदिमानव प्रजातियों की श्रृंखलाबद्ध कड़ियों द्वारा जोड़-तोड़कर देता है और कहता है कि वर्तमान मनुष्य का इसी प्रकार क्रमिक विकास हुआ। जहाँ कोई कड़ी नहीं मिलती, उसकी व्याख्या के लिए नवीन सिद्धांत गढ़ देता है। इस प्रकार उसने मानव की एक सुसम्बद्ध विकासवादी श्रृंखला बनाकर तैयार कर दी। उल्लेखनीय है कि यह उसकी शारीरिक विकास-यात्रा है।
दर्शन चेतनात्मक विकास की बात करता है। उसका कहना है कि चेतना के उत्तरोत्तर विकास के साथ-साथ जीव-चेतना का देह-परिवर्तन या योनि-परिवर्तन होने लगता है अर्थात् यदि कोई कीटक है, तो उसकी चेतना के तनिक उच्चस्तरीय हो जाने के बाद संभव है, अगली बार उसे कुछ उच्चतर छिपकली की देह प्राप्त हो जाए। उसमें आगे और प्रगति होने पर मुर्गा, मुर्गा से कुत्ता, कुत्ते से घोड़ा, घोड़ा से हाथी, हाथी से गाय, गाय से गोरिल्ला और फिर मनुष्य की काया मिले। तत्त्वज्ञानी कहते है कि जीव विकास क्रम में चेतना उन्नत होते हुए जिस-जिस देह-स्तर को प्राप्त करती चलती है, उसे वही-वही योनि मिलती जाती है। इस विकास-यात्रा के अन्त में जब उसे मानव-शरीर मिलता है, तो उसमें पिछले समस्त जन्मों के लक्षण, आदत, अभिरुचि और प्रवृत्तियाँ संस्कार के रूप में संचित होती हैं। यह संस्कार समय-समय पर मानवी विचार-व्यवहार में प्रकट भी होते रहते हैं। इनमें से अधिकाँश ऐसे होते हैं, जिन्हें पाशविक कहना चाहिए, कारण कि वे सभी निम्न योनि वाले जीवों से आते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति बात-बात पर आगबबूला हो उठता है, तो ऐसा कहा जा सकता है कि उसमें सर्पयोनि के संस्कार अधिक प्रभावी हैं। कोब्रा, करैत जैसे विषधर तनिक-से खटके से भी फन फैलाकर आक्रमण की मुद्रा में आ जाते हैं और यदि ऐसे समय अनजाने में भी कोई उनके निकट आ जाए तो वे डसने से नहीं चूकते। ऐसे ही यदि किसी में भय का भूत बढ़े-चढ़े परिमाण में है, तो चेतना विज्ञानी यही कहते हैं कि उसमें शुतुरमुर्ग जैसे किसी डरपोक प्राणी के संस्कार हैं।
शरीर विज्ञानी इसकी व्याख्या शरीरस्तर पर करते और कहते हैं कि इसके लिए मस्तिष्क का एनीमल ब्रेन (रेप्टिलियन ब्रेन) जिम्मेदार है, जिसमें पूर्व संचित पशु-प्रवृत्तियाँ एवं कुसंस्कार छाये रहते हैं। दर्द, भय, भूख, क्रोध, आक्रमण आदि के केन्द्र इसी में हैं। किन्हीं बाह्य उद्दीपनों के प्रभाव में आकर जब ये केन्द्र उत्तेजित होते हैं, तो मस्तिष्क में कुछ विशिष्ट प्रकार के रसायनों की प्रतिक्रिया स्वरूप भिन्न-भिन्न मनोदशाएँ पैदा होने लगती हैं। उदाहरण के लिए, जब बाह्य कारकों के प्रभाव से मस्तिष्क का हाइपोजैन्थिन ट्रांसफरेज एंजाइम का रस स्राव रुक जाता है या कम पड़ जाता है, तो यह स्थिति यूरिक एसिड पैदा करने लगती है, जो क्रोध, आक्रमण जैसी मनःस्थिति के लिए उत्तरदायी है। इसी प्रकार मस्तिष्क में जब मोनो अमीन ऑक्सीडेज एन्ज़ाइम (माओ) का रस स्राव बढ़ जाता है, तो भय, बेचैनी, तनाव जैसी अवस्थाएँ उत्पन्न होती हैं। शरीरवेत्ताओं के उक्त तर्क यदि कुछ क्षण के लिए मान भी लें, तो आगे यह प्रश्न पैदा होगा कि उन्हें नियंत्रित कैसे किया जाए? वैज्ञानिक इसका कोई समुचित उत्तर दे पाने में असमर्थ हैं। इसका हल मनोविज्ञान देता है।
मनोविज्ञान चेतना विज्ञान के निकट का शास्त्र है। वह रोगों का समाधान काया में न ढूँढ़कर मानवी मन की गहराइयों में तलाशता है, फलतः उसे घटाने-मिटाने में सफल भी होता है। चिकित्साविज्ञान भी अब मनःकायिक रोगों की वकालत कर इसी निष्कर्ष पर पहुँचा है। उसके अनुसार रोग पहले मन में पनपते हैं, फिर शरीर में उभरते हैं। यही कारण है कि पश्चिमी देशों में अब किसी भी शरीरगत व्याधि के उपचार से पूर्व रोगी का गहन मनोवैज्ञानिक अध्ययन और विश्लेषण किया जाता है, ताकि रोग का सही-सही निदान और निराकरण किया जा सके।
अस्तु, अध्यात्म दर्शन की यह मान्यता ठीक ही है कि आदतों, आकांक्षाओं, भावनाओं, प्रवृत्तियों को शोधन-सुधारने के लिए चेतनास्तर पर प्रयास किया जाना चाहिए। उसी की अभिव्यक्ति मनुष्य जीवन में चरित्र, चिंतन, व्यवहार के रूप में होती है। यदि वह श्रेष्ठ और समुन्नत स्तर की हुई, तो मानव के महामानव बनते देर न लगेगी। जप, तप, व्रत, अनुष्ठान का विधान और विज्ञान इसी निमित्त विनिर्मित है, जो कषाय-कल्मषों को गला-जलाकर समाप्त करता और चेतना एवं साथ-साथ मनुष्य को अधिक प्रखर एवं पवित्र बनाता है। यह शुचिता और श्रेष्ठता ही महान बनने की प्रथम तथा अंतिम शर्त है। चूँकि उक्त राजमार्ग सभी के लिए समान रूप से खुला हुआ एवं अधिक व्यावहारिक तथा अपेक्षाकृत सुगम है, अतएव वर्तमान समय के लिए महामानव गढ़ने-ढालने का यही एकमात्र विकल्प हो सकता है- ऐसा मनीषियों का कथन है।
एक व्यक्ति गुरु आश्रम में वर्षों रहा किंतु कुछ पा न सका। उसकी कुछ पाने की वर्षों से इच्छा थी, वह पूरी न होते देखकर उसने अपनी व्यथा गुरु जी को बताई। गुरु ने आदेश दिया कि यदि वास्तव में तेरी कुछ पाने की इच्छा है, तो नगर के बाहर एक सराय है, कुछ दिन वहाँ ठहर। सराय का जो मालिक है उसे ठीक से समझ। तेरी इच्छा पूरी होगी। वह युवक उस सराय में ठहरा, किंतु उसके मन में शंका बनी रही कि इतने बड़े संन्यासी के आश्रम में इतने दिनों रहा, कुछ न मिल सका, भला सराय के मालिक से क्या मिलने वाला है। किन्तु गुरु की आज्ञा मानकर सराय में जाकर ठहर गया। सायंकाल का समय था। देखा सराय का मालिक बर्तनों के ढेर को साफ करने में लगा है। बर्तन साफ हो जाने के बाद उसने कमरों की झाड़ू लगाई। आगन्तुकों को बड़ी विनम्रता से ठहराया। उनकी व्यवस्था की। जब इस कार्य से उसे फुरसत मिली तो युवक ने कहा- मेरे अमुक आश्रम के गुरु ने आपके पास मुझे कुछ सीखने के लिए भेजा है।
मालिक बोला- मेरे पास सीखने के लिए क्या है? आये हो तो ठहरो, किन्तु मैं सिखा नहीं सकता। तुम कुछ स्वयं सीख सको तो बात दूसरी है और दुनिया में कोई किसी को सिखा भी नहीं सकता। लोगों को स्वयं सीखना पड़ता है। युवक ने सोचा- यहाँ भी गलत आ फँसे। दो-चार दिन ठहरकर वह वही क्रमबद्ध क्रिया देखता रहा। आगंतुक आते हैं, मालिक विनम्र भाव से, निस्वार्थ भाव से समान रूप से ठहराता, उनके कमरों की सफाई करता, बिछावन देता। समय पर भोजन की व्यवस्था करता। जाते समय उन्हें विदा करता। यह सब देखकर युवक ऊबने लगा कि इससे क्या सीखने भेजा है गुरु ने- झाड़ू लगाना, बरतन साफ करना, आगंतुकों को ठहराना, विदा करना। भला यहाँ क्या है सीखने के लिए। युवक ने वापस जाकर गुरु को सारा वृत्तान्त बताया कि वहाँ क्या है जो आपने सीखने को भेज दिया? गुरु ने कहा-यदि तुम वहाँ भी कुछ न सीख सके तो मेरे पास भी सीखने को कुछ नहीं है, क्योंकि मैं भी अपने आश्रम में उसी सेवा योग की साधना सिखाता हूँ, सेवा के बलबूते ही लोगों को अपना बनाया जा सकता है और सब कुछ पाया जा सकता है। युवक की समझ में अपनी भूल आ चुकी थी।
9- गायत्री महाविद्या का तत्त्वदर्शन
गायत्री को वेदमाता कहा जाता है। शास्त्रों में ऋषिगणों ने इस मंत्र की महिमा का गुणगान खुलकर किया है। गायत्री को उपासक कामधेनु अथवा कल्पवृक्ष के रूप में मानते हैं। इस खण्ड में साधना के इन महत्वपूर्ण सूत्रों का विवेचन है, कृपया पढ़ें-
गायत्री माहात्म्य, स्वरूप तथा रहस्य, वेदमाता गायत्री
गायत्री और ब्रह्म की एकता, विभूतियों का भण्डार।
मधुविद्या, गायत्री की भुजाएँ-योग और तप।
वेद, उपनिषद् एवं धर्मशास्त्रों में गायत्री।
गायत्री सहस्र का विज्ञान, गायत्री चालीसा।
गायत्री का गोपनीय वाममार्ग, आग्नेयास्त्र।
गायत्री ही कामधेनु, कष्ट-निवारण हेतु गायत्री।
गायत्री रहित ब्राह्मण की दुर्गति।
दीक्षा और गुरुमंत्र, आँतरिक कायाकल्प।
देवताओं, अवतारों, ऋषियों की उपास्य गायत्री।
गायत्री का वाहन राजहंस, अमृत-पारस-कल्पवृक्ष
गायत्री का ब्रह्मतत्त्व-ब्रह्मवर्चस
10-गायत्री साधना का गुह्य विवेचन
ऋषिगणों ने गायत्री महामंत्र को एक महान आध्यात्मिक शक्ति माना है। इस महामंत्र के उच्चारण मात्र से अनेकानेक प्रसुप्त शक्तियाँ मानवीय देह में जाग्रत हो जाती हैं। इसके लिए हम जानें-
-ॐ तथा गायत्री का अर्थ।
गायत्री पर रावण आदि विद्वानों के भाष्य।
विभिन्न पुराणों में गायत्री की व्याख्या।
गायत्री के चौदह रत्न, चौबीस शक्तियाँ।
देवत्व का अवलंबन दैवी संपत्तियों का संचय।
गायत्री की 24 शिक्षाएँ।
गायत्री मंत्र, ज्ञान-विज्ञान का अनंत भंडार।
ईश्वरानुभूति कैसे, शक्ति संचय की प्रणाली।
धन का सदुपयोग, आत्मविश्वास।
आध्यात्मिक विकास, धैर्य, नारी-गृहलक्ष्मी
वैवाहिक जीवन का उत्तरदायित्व।
प्राकृतिक सौंदर्य, प्रकृति का अनुसरण।
पंचतत्वों का उपयोग। मानसिक संतुलन।
11-गायत्री साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार
किसी भी सुपात्र द्वारा गायत्री साधना सम्पन्न किये जाने पर गायत्री उसे वह सब कुछ दे देती है, जो सद्बुद्धि पाने पर किसी को भी अभीष्ट होता है। गायत्री साधना एक सूक्ष्म विज्ञान-सम्मत प्रणाली है। अपने जीवन में गायत्री-साधना के सम्बन्ध में जानें-
सर्वशक्तिमान गायत्री, गुप्तशक्ति की कुँजी, ध्रुव को परमपद।
आनंद स्वामी, माधवाचार्य, काठियाबाबा की गायत्री साधना।
तंत्र साधना, पूर्व जन्मों का ज्ञान, इच्छा मृत्यु।
स्वामी दयानंद की गायत्री उपासना।
गायत्री द्वारा भौतिक सफलताएँ, ब्रह्मतेज।
गायत्री की सिद्धियाँ, विपत्ति निवारिणी गायत्री।
गायत्री साधना से श्री-समृद्धि
गायत्री मंत्र की अनुभूतियाँ।
गायत्री साधना से वाक्–सिद्धि।
साधकों को चेतावनी।
गायत्री मंत्र लेखन की साधना।
12-गायत्री की दैनिक एवं विशिष्ट अनुष्ठान परक साधनाएँ
गायत्री महाशक्ति की जो मनुष्य उपासना करता है, उसके जीवन में कोई अभाव नहीं रह जाता। प्राचीन प्रमुख ऋषि-मुनियों की आराधना का आधा गायत्री रहा है। गायत्री की अनुष्ठान परक साधनाएँ जानने के लिए पढ़िए-
गायत्री और सावित्री का उद्भव, शक्ति केन्द्रों का उद्दीपन।
यज्ञोपवीत के रूप में गायत्री, नवनिधियों की साधना।
यज्ञ और गायत्री, निष्काम साधना।
उपासना क्यों और किसी? गायत्री से अंतः कायाकल्प।
साधना की सफलता का विज्ञान, साकार और निराकार ध्यान।
गायत्री का नारी स्वरूप।
द्विजों का नित्य नियम, समय-साधना
साधना में माला की आवश्यकता, ब्रह्मसंध्या।
गायत्री से पाप मुक्ति, प्रायश्चित।
कुमुहूर्त एवं अपशकुन विचार।
गायत्री से अनेक प्रयोजनों की सिद्धि।
13-गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उपलब्धियाँ
गायत्री के पंचमुखी एवं दस भुजाधारी होने का वर्णन अनेक स्थानों पर आता है। वस्तुतः यह सत्य है। पंचकोश आत्मसत्ता के पाँच खजाने के समान हैं। इन्हें जानने के लिए पढ़ें-
उच्चस्तरीय साधना की सिद्धि तथा तत्त्वज्ञान।
गायत्री के पाँच मुख, पाँच दिव्यकोष।
वैज्ञानिक अध्यात्मवाद।
अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय कोषों की साधना एवं उनका अनावरण-जागरण
जीवात्मा के तीन शरीर-उनकी साधना तथा कार्यक्षेत्र।
चमत्कारी हारमोन ग्रंथियाँ, जीन प्रक्रिया।
आहार-विहार से जुड़ा है मन। उपवास, आसन, तपश्चर्या से आत्मबल की उपलब्धि।
तप-साधना द्वारा दिव्यशक्तियों का उद्भव।
नौ प्रकार के प्राणायाम और प्राणशक्ति।
मूलबन्ध उड्डियान बंध, जालंधर बंध।
त्राटक द्वारा आज्ञा चक्र का जागरण।
14-गायत्री साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि
गायत्री महामंत्र अनादि कालीन प्रथम ऋचा है और यह महामंत्र ज्ञान-विज्ञान की दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण है। इसे भली प्रकार समझे बिना इसकी साधना का लाभ प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इसके वैज्ञानिक आधा पर समझने के लिए जानें-
गायत्री की गुप्त शक्ति, शक्ति कोषों का उद्भव।
शिखा-सूत्र वैज्ञानिक आधार।
गायत्री मंत्र की श्रेष्ठता, सामर्थ्य, सिद्धि का विज्ञान।
ध्वनि विज्ञान पर आधारित मंत्र विद्या।
गायत्री उपासना विज्ञान की दृष्टि में, रोगोपचार हेतु।
मंत्रशक्ति द्वारा मेघ वृष्टि, वरुण यज्ञ।
सरलतम और समग्र शक्तिमान ‘(‘।
मंत्र शक्ति और देवसत्ताओं का तारतम्य।
गायत्री साधना संबंधी शंका-समाधान
वितंडावादों से बचने की नीति।
स्त्रियों का गायत्री अधिकार।
15-सावित्री, कुण्डलिनी एवं तंत्र
सावित्री, कुण्डलिनी तथा तंत्र- तीनों ही अभी तक जन-साधारण के लिए गुह्य विषय बने हुए थे। इनके सम्बन्ध में बहुत कुछ अभी तक अज्ञात रहा है। इस गुह्यविज्ञान के परिचय के लिए आप पढ़ना चाहेंगे-
गायत्री गंगा की अनेकानेक धाराएँ।
शिव और शक्ति, महाकाल की महाकाली।
सावित्री साधना और कुण्डलिनी जागरण।
सावित्री का शक्ति स्रोत- सविता देवता।
सूर्य की क्षमता और आराधना।
सूर्य की साधना से सद्बुद्धि, सविता का अनुदान प्राणशक्ति के रूप में।
समूचा ब्रह्माण्ड एक चैतन्य शरीर।
दिव्यलोकों से बरसने वाला शक्तिप्रवाह।
भूगोल बदले तो इतिहास भी बदले।
तंत्र-अध्यात्म क्षेत्र का भौतिक विज्ञान।
16-मरणोत्तर जीवन तथ्य एवं सत्य
पंचतत्वों से बनी काया क्षणभंगुर है किन्तु, आत्मा अमर है। मनुष्य में सदैव ही यह उत्सुकता रही है कि, जन्म के पूर्व आत्मा कहाँ रहती है और मरण के बाद आत्मा कहाँ चली जाती है? इसकी जानकारी के लिए आप जानना चाहेंगे-
मरण-सृजन का अभिनव पर्व इसे सुखद बनाएँ।
मरणकाल की व्यथा, अमर होना संभव है क्या?
मृत्यु से वापस लौटने वालों के अनुभव, प्रेतदशा।
अत्यधिक मोह के कष्टकर परिणाम।
अनीति त्रास देती है, अभिशप्त यान एवं भवन।
व्हाइट हाउस में मरणोत्तर जीवन।
परकाया प्रवेश की शक्ति-सामर्थ्य
प्राण परिवर्तन, प्रेतों से साक्षात्कार।
भूत-भ्रम या वास्तविकता, भूतबाधा का निवारण।
पितर संपर्क से लाभ-ही-लाभ दैवी अनुदानों के प्रसंग।
पुनर्जन्म का सिद्धान्त और विज्ञान।
सर्वत्र ही स्वर्ग, दुष्कर्म ही अपवर्ग।
चांद्रायण-व्रत का विधान।
क्रमशः
पूज्यवर ने अपने सभी मानसपुत्रों, अनुयायियों के लिए मार्गदर्शन एवं विरासत में जो कुछ लिखा है- वह अलभ्य ज्ञानामृत (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वांग्मय-सत्तर खण्डों में) अपने घर में स्थापित करना ही चाहिए। यदि आपको भगवान ने सम्पन्नता दी है, तो ज्ञानदान कर पुण्य अर्जित करें। विशिष्ट अवसरों एवं पूर्वजों की स्मृति में पूज्यवर का वांग्मय विद्यालयों, पुस्तकालयों में स्थापित कराएँ। आपका यह ज्ञानदान आने वाली पीढ़ियों तक को सन्मार्ग पर चलाएगा, जो भी इसे पड़ेगा, धन्य होगा।
नैतिकता वह जीवन-व्यवस्था है, जिसके सहारे मानव-मंदिर का सफल निर्माण होता है। नैतिक शक्ति मानव जीवन के विकास की जड़ है। नैतिक जीवन जितना बलवान और पवित्र होगा, उसी परिमाण में व्यक्ति का विकास होता है। नैतिक निर्बलता व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा अड़ंगा है। समाज या राष्ट्र व्यक्तियों की नैतिक शक्ति पर ही पनपता है, अतः जिस देश के व्यक्तियों का नैतिक स्तर गिर जाता है, वह देश निर्बल हो जाता है। आज भारत में चारों ओर नैतिक शक्ति की गिरावट का स्पष्ट दर्शन होता है। देश में और देश के नेतृत्व में यदि सर्वव्यापी चिंता का कोई विषय है, तो वह है आज के भारत की सर्वव्यापी नैतिक गिरावट। जीवन के समस्त क्षेत्रों में चाहे वह राजनैतिक हो, सामाजिक हो, आर्थिक हो, धार्मिक हो अथवा शैक्षणिक हो, सबमें नैतिक स्तर गिरा हुआ है। इसका यह अर्थ नहीं कि देश के हर व्यक्ति का नैतिक स्तर गिरा है और समान रूप में गिरा है। आज देश में ऐसे व्यक्ति भी हैं, जिनका नैतिक स्तर खूब ऊँचा है और यत्किंचित् भी उसमें कमी नहीं है। दूसरा वर्ग वह है जिसमें नैतिक स्तर के गिरावट की सीमा कुछ सीमित है और समाज में ऐसे अनेक लोग हैं, जिनका नैतिक स्तर बिलकुल गिरा हुआ है। राष्ट्र में उच्चस्तर के व्यक्तियों के होते हुए भी राष्ट्रीय स्तर इसलिए गिरा हुआ दिखाई देता है, क्योंकि बहुसंख्यक जनता का स्तर गिरा हुआ है। बहुजन की स्थिति पर ही राष्ट्र की स्थिति निर्भर रहती है और इसीलिए आज संपूर्ण देश में नैतिक पतन का दृश्य दिखाई दे रहा है। ऐसी स्थिति में यदि देश को फिर से ऊँचा उठाना है, सभ्य समाज का महानता की चट्टान पर नव-निर्माण करना है, तो नैतिक शक्ति की बुनियाद पर ही ऐसा हो सकेगा। देश की सबसे प्रमुख समस्या संव्याप्त अनैतिकता ही है। उसका निवारण हर व्यक्ति की नैतिक शक्ति जगाने से ही संभव है। अब हमें यह देखना है कि नैतिक शक्ति क्या है, उसे किस प्रकार जगाया जा सकता है और उसे किस तरह परिणामकारी बनाया जा सकता है। सभ्य समाज व स्वस्थ मानव का नवनिर्माण ही नैतिकता का उद्देश्य है।
विश्व में जीवन-निर्माण के साथ जीवित रहने की भावना का प्रादुर्भाव हुआ। पशु-पक्षियों में यह भावना जीवन व्यापी है। मानव के जीवन में इस भावनाशक्ति के साथ विचार-शक्ति ने जन्म लिया। मानव की बाल्यावस्था भावनामय अवस्था है। इसके बाद विचार-शक्ति का जन्म होता है और विचार-शक्ति का ही उन्नत स्वरूप विवेकशक्ति है। मनुष्य की विवेक-शक्ति जितनी परिष्कृत व उच्च होगी, उतना ही उसका नैतिक स्तर ऊँचा और प्रभावशाली होगा। विवेक मानव-जीवन की निर्णयात्मक सर्वश्रेष्ठ शक्ति है। कौन-सा कार्य उचित है और कौन-सा अनुचित, इसका निर्णय यही विवेकशक्ति करती है। यह शक्ति फिर विचारों से टकराती है और यदि विचार निम्न श्रेणी के हों तो विवेक न्याय-अन्याय का दर्शन करते हुए भी निर्बल रह जाता है और मनुष्य अन्याय मार्ग से कार्य करता रहता है। उदाहरण के लिए मनुष्य को कई प्रकार के व्यसन रहते हैं। विवेक कहता है कि व्यसन खराब हैं, हानिकारक हैं, पर व्यसन शक्ति बलवान रहती है। फलतः मनुष्य व्यसनों को त्याग नहीं सकता। दुनिया की किसी वस्तु को अनधिकार ले लेना, यह अनुचित विचार है। विवेक कहता है कि यह अनुचित कार्य है, पर उसकी आवाज निर्बल रहती है और मनुष्य अन्याय को जानते हुए भी जीवन में उसका अवलम्बन करता है। साराँश मनुष्य की विवेकशक्ति जितनी प्रभावी होगी, उतना ही व्यक्ति का नैतिक बल भी प्रभावी होगा। अतः समाज के स्वस्थ नव-निर्माण के लिए सर्वप्रथम इस बात की आवश्यकता है कि मनुष्य की विवेक-बुद्धि इतनी बलवान और जाग्रत हो कि वह अनुचित कार्य के मोह में न फँसे और जो न्याय दिखाई दे, उसी मार्ग पर जीवन को निश्चय के साथ अग्रसर कर सके।
नैतिक शक्ति का मूल स्रोत यद्यपि मानव की अंतस्थ विवेकशक्ति में है, पर यह अंतस्थ शक्ति बाह्य स्थिति से प्रभावित हुआ करती है और बाह्य शक्तियाँ इस अंतस्थ शक्ति को अपने अनुरूप ढालने का प्रयत्न किया करती हैं। ये बाह्य शक्तियाँ हैं-मानव समाज की सामयिक स्थिति और व्यवस्था।
समस्त मानव-समाज का यदि अवलोकन किया जाय तो वहाँ नैतिकता मानव व्यापी दिखाई देगी। इस दृष्टि से नैतिकता ही मानव-समाज की सर्वश्रेष्ठ शक्ति है और इसकी बुनियाद पर ही देवमानव का एवं उज्ज्वल भविष्य का निर्माण होना संभव हो सकता है। नैतिकता यदि विवेक पर आधारित विश्वव्यापी बनेगी, तो वह आत्मशक्ति प्रेरित नैतिकता होगी। उस नैतिकता में निर्भयता रहेगी। वहाँ आत्मप्रेरणा का स्रोत रहेगा और मानव को अपनी जीवनीशक्ति का एक नया अनुभव आएगा। आज इस प्रकार की विश्व-व्यापी नैतिकता की माँग संसार में बढ़ रही है और यद्यपि सर्वत्र राज्य-सत्ता और संकुचित धर्म-सत्ता की प्रबलता दिखाई देती है, पर इसमें कोई संदेह नहीं कि आने वाला युग नैतिकता और विज्ञान शक्ति का युग होगा।
नैतिकता के क्षेत्र में दो बातों का स्पष्ट दर्शन होना चाहिए- (1) अपने मानवीय अधिकारों के रक्षण की सामर्थ्य और (2) हर कार्य में निर्भय-वृत्ति समाज में व्यक्ति के सुखों का और सामाजिक सुखों का समन्वय आवश्यक है। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के सुख भिन्न-भिन्न होते हैं और जिनके पास अधिक शक्ति है, वे निर्बलों का शोषण करते हैं। निर्बल व्यक्ति शोषण को सहन करता है और जीवित रहता है, यह मानसिक अवस्था नीति युक्त नहीं। नीति का दर्शन वहाँ होगा, जहाँ व्यक्ति अपने सिद्धांतों एवं अधिकारों की रक्षा करने में समर्थ होगा और उसके लिए अपनी सारी शक्ति लगा देगा, यहाँ तक कि जीवन-समर्पण तक के लिए तत्पर रहेगा, तभी नैतिकता का सही अवलंब व्यक्ति के जीवन में दिखाई देगा। नैतिकता में अपने अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ दूसरों के अधिकारों की रक्षा का भी समावेश होता है। शक्तिशाली अनैतिक मनुष्य अपने अधिकारों की तो रक्षा करता है, पर वह निर्बलों का शोषण कर उनके अधिकारों पर आक्रमण करता है। सभ्य नीतिवान व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता। अपने अधिकारों की रक्षा और अन्यों के अधिकारों का आदर उसका जीवन-लक्ष्य रहेगा। इस लक्ष्य से ही व्यक्ति और समाज के सुखों का समन्वय होकर शाँतिमय, कल्याणप्रद समाज-व्यवस्था स्थापित होगी।
नैतिकता का दूसरा लक्षण है, निर्भयता। धर्म और राजसत्ता से प्रभावित नैतिकता भयग्रस्त हुआ करती है, किंतु स्वप्रेरित नैतिकता पूर्णतः निर्भय होती है और वही स्थायी एवं सच्ची नैतिकता कहलाती है। भयपूर्ण नैतिकता की आड़ में मनुष्य छिपकर अनुचित कार्य करता है और छिपाने का प्रयत्न करता है। अनुचित कार्य करने पर वह व्यक्ति असत्य का आश्रय लेता है और जब सारा समाज असत्य की बुनियाद पर नीतिवान बनने का दावा करता है, तब अनीति सर्वव्यापी बन जाती है और समाज निस्वत्व बन जाता है। स्वप्रेरित नीतिवान व्यक्ति प्रथमतः अनुचित कार्य करेगा ही नहीं, पर किसी स्थिति में कर भी डाले तो उसे वह निर्भयता से स्वीकार कर लेता है। ऐसा करना यद्यपि समाज की दृष्टि से उचित न हो, पर नीति की दृष्टि से अनुचित नहीं होगा। कोई व्यक्ति भावनावश या अन्याय के प्रतिकार में किसी का खून कर डालता है, पर उसकी विवेक-शक्ति इतनी बलवान होती है कि वह थाने में जाकर अपने अपराध को स्वीकार करता है। शासन और धर्म के नाते भले ही उसका कार्य अनुचित हो, परंतु यदि वह निर्भयता से उसे स्वीकार करता है, तो वह व्यक्ति नीतिवान ही कहा जाएगा।
निर्भयता का दर्शन मानव-जीवन की आकांक्षाओं की पूर्ति में भी होता है और वह है कार्य की सफलता के लिए उचित साधनों का प्रयोग। नैतिकता के क्षेत्र में साध्य की अपेक्षा साधनों की शुचिता का अधिक महत्व होता है। नीतिवान व्यक्ति उचित एवं न्यायपूर्ण साधनों का ही अवलंब करता है। किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए वह अनुचित साधन का उपयोग नहीं करता है। ऐसी हालत में उसे निर्भयवृत्ति का परिचय देना ही पड़ता है। अनुचित साधनों का प्रयोग निर्भयता के साथ प्रायः नहीं किया जाता। अतः निर्भयता जीवन के कार्यक्षेत्र में बहुत बड़ी शक्ति है और वह शक्ति व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में नीतिमय बनाये रखने में सहायक होती है।
मानव-जीवन में अनेक गुणात्मक शक्तियाँ होती हैं। यथा-सत्य अहिंसा, अक्रोध आदि। इन सारी शक्तियों की जड़ भी निर्भयता में है। जिस
व्यक्ति के जीवन में भय है, वह दृढ़तापूर्वक सदा सत्य का पालन नहीं कर सकता। न वह अहिंसा का उपासक हो सकता है और न क्रोध को ही वश में रख सकता है।
सन्मार्ग के अवलंबन के लिए अनेक गुणों के समन्वय की आवश्यकता है। जीवन की पवित्रता और जीवन की श्रेष्ठता सन्मार्ग पर अवलंबित है। व्यक्ति और समाज दोनों की महानता व्यक्ति के गुण समन्वय पर आधारित है। सारे सद्गुणों की शक्ति का स्रोत निर्भयता है। निर्भयता में से ही अनेक गुणों का प्रवाह स्रवित होता है, जो जीवन-सरिता को सर्वत्र सन्मार्ग में प्रवाहित करता रहता है। देश की आज सर्वाधिक आवश्यकता जीवन के सर्वव्यापी क्षेत्र में सही मार्ग का अवलंब, उसका निर्भयता के साथ पालन एवं जीवन की सर्वव्यापी ऊँचाई की है। इसी में व्यक्ति के जीवन एवं समाज के विकास तथा शाँतिमय सहअस्तित्व की सफलता है।
बगीचे में बैठे साधु वास्वानी शिष्यों को समझा रहे थे कि वे किस प्रकार लोगों के पीड़ा-पतन और दुख-दर्द में यथाशक्ति सहायता कर सकते हैं। इतने में कुछ संन्यासी उनसे मिलने आये। आते ही उन्होंने स्वर्ग-मुक्ति जन्म-मरण अमरता, नश्वरता की बातें करना प्रारम्भ कर दीं। कुछ देर तक तो वास्वानी जी उनकी बातें सुनते रहे, फिर अचानक टोकते हुए बोले कि आखिर आप यह सब किसे सुना रहे हैं। यहाँ तो कोई स्वर्ग और मुक्ति नहीं चाहता। ये सब तो मेरे साथ उन लोगों की सहायता की बात कर रहे हैं, जो इस धरती पर अज्ञान-अंधकार के कारण नारकीय यंत्रणा भोग रहे हैं। क्या आप भी उनकी सहायता में कुछ योगदान करने की स्थिति में हैं। इतना सुनकर संन्यासियों की बोलती बन्द हो गई और एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। तब वास्वानी जी ने उन्हें समझाया। मुक्ति और स्वर्ग का सुख बातों से नहीं, दूसरों के दुख में काम आने, सेवा-सहायता जैसे मानवीय कृत्यों से अनायास ही मिल जाता है।
भगवान भास्कर शनैः-शनैः अस्ताचल की गोद में विश्राम लेने हेतु जा चुके थे। पक्षियों की कलरव-ध्वनि धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। गहन कालिमा बढ़ती जा रही थी। परंतु वसंत की शीतल-मंद-सुरभित वायु वातावरण में पुलकन और आनंद की वृद्धि करती जा रही थी।
गुरु द्रोणाचार्य एक प्रस्तर शिला पर ध्यानमग्न बैठे थे। आश्रम के एक छोर पर राजकुमार धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहे थे। एकाएक गुरुदेव के शब्दों ने आश्रम की शाँति को भंग किया। उनका तेजस्वी स्वर गूँज उठा- राजकुमारों! जाओ, संध्यावंदन का समय हो गया है। अभ्यास बंद कर शीघ्र ही नित्य कर्म करो।”
इस आदेश के साथ ही हाथ के तीरों ने तरकस की शरण ली। सब राजकुमार अपनी-अपनी कुटिया की ओर उन्मुख हो गए। गुरुवर भी उठ खड़े हुए। दो कदम बढ़ाए तो समीप ही अर्जुन खड़े नजर आए। “तुम नहीं गए वत्स?” गुरुदेव ने रुकते-रुकते पूछा।
“हाँ गुरुदेव! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ।” - अर्जुन ने अपने शब्दों में विनय लाने का प्रयत्न करते हुए हाथ जोड़कर कहा।
“हाँ, हाँ, वत्स!” निःसंकोच होकर पूछो।” कहते हुए गुरुदेव दो कदम पीछे हटे और
उसी शिलाखंड पर जा विराजे।
अर्जुन बढ़े और बोले- “गुरुदेव! प्रातःकाल आपने समस्त राजकुमारों से कहा था कि आज धनुर्विद्या सीखने का अंतिम दिन है। जितनी शिक्षा आप इस विषय की दे सकते थे, वह हमें दे चुके हैं। कल, सब अपने-अपने घर जा सकते हैं, लेकिन गुरुदेव मैं इससे भी अधिक कुछ और सीखना चाहता हूँ। बतलाए मैं क्या करूँ?”
“वत्स! तुम्हारी ज्ञान-पिपासा की मैं मुक्तकण्ठ से सराहना करता हूँ। इस संसार में इतना ज्ञान है, इतनी विधाएँ हैं कि उनका कोई पार नहीं पा सकता है। फिर भी धनुर्विद्या में मैं जितना ज्ञान रखता था, तुम्हें दे चुका हूँ। सचमुच ही तुम उस ज्ञान के पूर्ण अधिकारी पात्र भी हो! वत्स! आगे इस विद्या को सीखना हो तो तुम्हें देवराज इंद्र को अपना गुरु वरण करना होगा, क्योंकि वे शस्त्रविद्या के प्रकाण्ड पंडित हैं, किन्तु वत्स! यह कभी मत भूलना कि देवराज से शिक्षा ग्रहण करना, उनका शिष्यत्व स्वीकार करना सहज साध्य नहीं है। यह यात्रा बड़ी काँटों भरी है। वहाँ शिष्यत्व से पूर्व तुम्हें कितनी ही कठिन परीक्षाओं को उत्तीर्ण करना होगा और उन परीक्षाओं में सबसे कठिन होगी-संयम व ब्रह्मचर्य की परीक्षा। जहाँ पग-पग पर फिसलने का डर बना रहता है।” गुरुदेव ने अर्जुन को समझाते हुए कहा।
यह सुनकर अर्जुन के मुख पर देदीप्यमान चमक आ गयी। दृढ़ता के भाव उनके चेहरे पर छिटक गए। कुछ क्षण वे विचार करते रहे। फिर धीरे से बोले - “गुरुदेव! यदि आप आज्ञा दे तो मैं देवराज के पास जाकर शस्त्रविद्या सीखूँ? आपका आशीर्वाद साथ है, तो निश्चित रूप से मैं एक नहीं सैकड़ों परीक्षाओं में उत्तीर्ण होकर, योग्य शिष्य होने का गौरव प्राप्त कर लूँगा।”
“वत्स! मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है। जाओ! अपने राष्ट्र, अपनी संस्कृति और अपने पूर्वजों का मान बढ़ाओ। जाओ, तुम सदा विजयश्री का वरण करोगे।” कहते-कहते भरितकंठ गुरुदेव के कदम अपनी पर्णकुटी की ओर बढ़ गए-जहाँ संध्यावंदन की सामग्री उनकी बाट जोह रहीं थी।
कुछ दिनों के उपरांत अर्जुन देवराज इंद्र के सान्निध्य में पहुँच गए। उस समय देवराज इंद्र सिंहासन पर आसीन थे। उनके समीप देवगण, यक्ष, किन्नर और भूलोक के कई सम्मान्य अतिथिगण भी उपस्थित थे। सभी ओर एक ही फुसफुसाहट हो रही-अब समय आ पहुँचा है परीक्षा का।” देखें, कौन इस परीक्षा में विजयी होकर इंद्र के शिष्यत्व का पात्र बनता है? सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनने का अधिकारी कौन होता है?
मुसकराते हुए देवराज का आदेश पाते ही नृत्यायोजन प्रारंभ हुआ। यक्ष, किन्नर और गंधर्व गण सबके सब अपने वाद्ययन्त्रों में तन्मय हो गए। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। वातावरण एक अजीब प्रकार की मादकता से भर गया। वातावरण में माने सम्मोहन छा गया। सभी अपनी सुध-बुध भूल गये। देवराज इंद्र यह सब देखकर मन-ही-मन मुस्करा रहे थे। मुसकराते हुए उन्होंने अर्जुन की ओर दृष्टि घुमाई। अर्जुन आँखें नीची किए विचारमग्न बैठे थे। उन पर मानो इस मादकता का कोई असर नहीं था। उनकी भावमुद्रा देखकर लगता था कि अर्जुन इंद्र सभा में नहीं, निर्जन अरण्य में बैठे हों।
अप्सराएँ आतीं, अपना नृत्य-कौशल दिखलाती और वापस चल देतीं। इसी प्रकार नृत्य चलता रहा और सभासद उस मस्ती में अपने आपको निमग्न करते रहे। तभी एकाएक देवराज की आज्ञा हुई- उर्वशी को बुलाया जाए।”
देखते-ही-देखते स्वर्ग की अद्वितीय सुंदरी सभागृह के मंच पर आयी। अनेक ऋषि-मुनियों और त्यागी तपस्वियों का तप भंग करने का उसे गर्व था, जो बारंबार उसके चेहरे से छलक पड़ता था, देवराज को प्रणाम कर वह नृत्य में लीन हो गई। वह नाचती रही-थिरकती रही, उसका अंग-अंग गतिमान हो उठा। सभा में जादू-सा छा गया। दर्शकगण संज्ञाशून्य से हो गए। देवराज ने फिर अर्जुन की ओर मुँह फेरा। वे तो अभी तक उसी प्रकार बैठे थे, मौन-निर्विकार देवराज ने मन-ही-मन कहा- क्या अर्जुन पर इस मायाजाल का तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ा। नृत्य चलता रहा, लेकिन अर्जुन ‘जल में कमलवत’ ही बैठे रहे। अचानक न मालूम उन्हें क्या सूझा और उनके नेत्र उठ गए। मुख ऊपर उठते ही उनकी आँखें उर्वशी की आँखों से जा टकराई। फिर झुक गयीं। अर्जुन ने देखा- नृत्य निरत उर्वशी अपलक उन्हें निहार रही है। उस विमुग्धकारी दृष्टि की कल्पना मात्र से ही अर्जुन का शीश अमित श्रद्धा से झुक गया। नेत्र अधमुँदे से हो गए। उधर उर्वशी ने मन-ही-मन सोचा कि चलो मेरा तीर ठीक निशाने पर बैठ गया प्रतीत होता है।
झन-झन-झनन करती पायलें रुक गयीं। वाद्ययंत्र बंद हो गए। सब एकदम चौंक से पड़े, मानो गहन निद्रा से किसी ने उन्हें जगा दिया हो। देवराज इंद्र स्वयं बड़ी देर तक विचार करते रहे। आखिर इस परीक्षा में किसकी विजय हुई-सौंदर्य की या संयम की। पर वह कोई निर्णय नहीं ले पाए। अंततोगत्वा सभा विसर्जित हुई और देवराज इंद्र संयम की जय और सौंदर्य की विजय के ऊहापोह में विचारमग्न हो उठ खड़े हुए।
कुछ समय के उपरांत रात्रि आ पहुँची। पल-क्षण बीतते नीरव रात्रि का दूसरा प्रहर हो आया। अर्जुन अपने शयन-कक्ष में न मालूम किस व्यग्रता में करवटें बदल रहे थे। इतने में कक्ष के मुख्य द्वार पर थपथपाहट हुई। अर्जुन शय्या से उठ खड़े हुए और बोले-कौन
मैं-एक क्षीण, किंतु मृदुमोहक ध्वनि कक्ष के बाह्य भाग में गूँज उठी।
अर्जुन समझ गए कि यह देवी उर्वशी ही है, परंतु मन का कुतूहल छिपाते हुए बोले- “देवी
उर्वशी
“हाँ, वीरवर! उर्वशी
“गहन तिमिराच्छादित नीरव रात्रि में देवी का इस अकिंचन के द्वार पर कष्ट करने का हेतु?”
“प्रथम द्वार तो खोलो, वीरवर! इतने निष्ठुर होकर प्रश्नावलियों की झड़ी मत लगाने लगो।”
ये शब्द कानों में पड़ते ही अर्जुन के मन में संशय की एक लकीर खिंच गयी। मुख पर गंभीरतापूर्ण कठोरता छा गयी और उसने तत्क्षण ही द्वार खोल दिया। उर्वशी ने अंदर आते ही कहा- “वीर श्रेष्ठ, मैं तुम्हें अपना हृदय देने आयी हूँ। इस नीरव किन्तु, सरस रजनी में तुम भी शायद असहमत नहीं हो, क्योंकि इसकी साक्षी तुम्हारे प्रेमविह्वल नेत्रों ने मुझे देव सभा में ही दे दी थी।”
“मैं यह क्या सुन रहा हूँ देवी! यह तुम्हारी भूल है। मैंने तुम्हें नृत्य के समय देखा अवश्य था, लेकिन देवी! यदि तुम अपने हृदय में पवित्रता लिए होती, तो अवश्य ही मेरे मन की शुद्धता एवं पवित्रता को भी देख पातीं।”
“परंतु वीरवर! मेरी आँखें धोखा नहीं खा सकतीं। मैंने तुम्हारे इन नेत्रों में प्रेम का अदम्य सागर लहराते देखा था। आप उस समय..........................”
“देवी तुम पुनः गलती पर हो। वह प्रेम न होकर श्रद्धा के उत्कट भाव थे। मैंने तुम्हारी उत्कृष्ट कला की खूब प्रशंसा सुनी थी। अतः कला का पुजारी होने के नाते केवल श्रद्धा-भक्ति से तुम में कला की देवी के दर्शन कर रहा था। तुम्हें ज्ञात है देवी, उस समय मैं क्या सोच रहा था? शायद नहीं। तो सुन लो। देवी! आज तक मैं यही मानता रहा था कि मेरी माता ही संसार में सर्वाधिक सुंदर है। परंतु मैंने सोचा कि काश! मैं तुम्हारी कोख से जन्म लेता तो और भी अधिक सुंदर होता।”
सामने खड़ी उर्वशी सुन रही थी, अपने अतुल सौंदर्य की प्रशंसा। पर अंत के वाक्यों को सुनते ही मानो वह सातवें आसमान से गिर पड़ी। उसका हृदय वेदना और प्रायश्चित की अग्नि में जल उठा। किंकर्तव्यविमूढ़-सी स्थिति में उसके कदम धीरे-धीरे अर्जुन के शयन-कक्ष से दूर हटते गए। उसके कानों में अर्जुन के अंतिम शब्द ही सतत् गूँज रहे थे- “काश! मैं तुम्हारी कोख से जन्म लेता।”
आसमा हैरी नाम के सुविख्यात संत एक बार एक गली से जा रहे थे। इसी समय किसी ने उन पर अचानक ऊपर से राख भरी थाली उलट दी। संत ने अपने वस्त्र झाड़े और ईश्वर का धन्यवाद देने लगे। उनके शिष्यों ने यह देखा तो वे बोले, आपके ऊपर तो किसी दुष्ट ने राख डाल दी और फिर भी आप ईश्वर को धन्यवाद दे रहे हैं? इस समय धन्यवाद किसलिए?
संत ने अपने शिष्यों की ओर देखा और बोले, मैं तो अग्नि में जलाए जाने के योग्य था, किन्तु ईश्वर ने दया कर के राख से निर्वाह कर दिया। ऐसे में उन्हें धन्यवाद न दूँ तो क्या दूँ? शिष्य उनकी विनम्रता एवं ईश्वर परायणता को देखते ही रह गए।
तब मिश्र में नकिबेन का राज्य था। उनके सत्य आचरण से मनुष्य ही नहीं देवता भी बहुत प्रसन्न थे। एक दिन नील देवता ने प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिए। इसी के साथ वह राजा को तलवार देते हुए बोले-यह तलवार लो। इसे लेकर तुम विश्वविजयी होंगे।
राजा ने कहा- भगवन्! मुझे तलवार की कोई जरूरत नहीं। विश्व को विजय करके मैं क्या पाऊँगा?
देवता ने कहा- अच्छा तो यह पारस पत्थर ले लो। इससे तुम्हारे पास देवताओं से भी अधिक धन प्राप्त होगा।
राजा बोला, भगवन्! मुझे यह पारस पत्थर भी नहीं चाहिए। इतना धन प्राप्त कर मैं आखिर करूँगा क्या?
देवता ने कहा- तो फिर स्वर्ग की सबसे सुन्दर अप्सरा ले लो। राजा ने उसके लिए भी मना कर दिया।
अन्त में नील देवता ने कह- अच्छा तो ये फूल का पौधा ले लो। यह जहाँ उगेगा वहाँ जड़-चेतन मित्र-शत्रु सभी सुगन्ध से भर जाएँगे।
इस पर राजा ने कृतज्ञतापूर्वक वह पौधा ले लिया। देवता ने राजा को आशीर्वाद दिया और अन्तर्ध्यान हो गए।
निस्संदेह भोग-विलास की वस्तुओं से वह संपदा श्रेष्ठ है, जिससे सभी को प्रसन्नता मिल सके।
सर्प को कालरज्जु कहा गया है। वह चलती-फिरती मौत जैसा है। उसको देखते ही होश उड़ जाते हैं। हुक्का-बक्का हुआ आदमी भी साँप को एक प्रत्यक्ष संकट दीखता है। दोनों के बीच में भय की भयंकरता आ खड़ी होती है। इस भयंकरता के दबाव में कितने ही अपने प्राण गँवा बैठते हैं। कुछ सर्प-दंशन से मरते हैं और कुछ आशंका-कुकल्पना के शिकार बनकर अपनी धड़कन बन्द कर लेते हैं। हाथ-पैर सुन्न होते देर नहीं लगती।
संसार में छह इंच से लेकर पंद्रह गज तक के चित्र-विचित्र साँप पाये जाते हैं। श्रीलंका के जंगलों में पाये जाने वाले बोआ सर्प 30 फुट लंबे होते हैं और वृक्ष की टहनियों से लटकते रहते हैं। साँप की कुल प्रजातियों में सिर्फ 15 प्रतिशत सर्प जहरीले होते हैं, शेष तो रस्सी का खिलौना जैसे, कीड़े-मकोड़े जैसे प्रकृति के प्राणिमात्र होते हैं।
साँप के काटने से संसार भर में पंद्रह हजार आदमी एक वर्ष में मरते हैं, किंतु आदमी एक साल में पचास हजार सर्प मार डालता है। पंद्रह हजार विषैले सर्पों में से कितने काटने के दोषी थे, यह सही-सही नहीं कहा जा सकता, पर यह कितना सत्य है कि वह निर्दोषों को नहीं काटता। ऐसी ही यह भी मिथ्या नहीं है कि अधिकाँश बेकसूर साँप भयभीत लोगों द्वारा मारे जाते हैं।
विश्व में साँपों के कितने ही पर्व प्रचलित हैं। दक्षिण अमेरिका के रेड इंडियनों का साल में एक दिन सर्प पर्व होता है। वे जहाँ भी साँपों का निवास समझते हैं, वहाँ चावल लेकर निमंत्रण देने जाते हैं। उनके पूजा-स्थल में पत्थर का एक छोटा खण्ड होता है, उसी की पूजा की जाती है। पर्व वाले दिन सैकड़ों सर्प उस पत्थर के गिर्द इकट्ठा हो जाते हैं। रेड इंडियंस उन्हें हाथ से पकड़-पकड़कर एक विशेष प्रकार की खीर खिलाते हैं। दिनभर यह क्रम चलता है। इस लोमहर्षक दृश्य को देखने के लिए दूर-दूर से लोग वहाँ एकत्रित होते हैं। जाते समय दाँतों तले उँगली दबाकर लौटते हैं। शाम होते-होते साँप भी विदा होने लगते हैं। दूसरे दिन ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलते। यह पर्व उस समुदाय में लंबे समय से चला आ रहा है, पर अब तक किसी प्रकार की कोई दुर्घटना नहीं घटी।
ग्रीक द्वीप सीफालोनिया में मार्कोपोलो एवं अर्जीनिया नामक गाँव के समीप होली स्नेक गिरजे में छह अगस्त की नियत तिथि को जो वर्जिन मेरी का दिन है, प्रतिवर्ष बिना बुलाये ही सैकड़ों सर्प मरियम के दर्शन करने आते हैं और 15 अगस्त, जो ईसामसीह का दिन है, तक वहाँ रहते हैं। इस दौरान सर्प मूर्ति के चरणों पर लोटते रहते हैं। दर्शकों का अप्रतिहत ताँता भी साँपों का ध्यान नहीं बँटा पाता और नौ दिनों तक वे लगातार प्रतिमा के है आस-पास चक्कर काटते रहते हैं। दसवें दिन वे जिस प्रकार आए थे, वैसे ही वापस लौट जाते हैं।
तार्किक और अविश्वासी लोग सर्वत्र पाये जाते हैं। वहाँ भी ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो इसे ‘झूठों का मिथ्या प्रचार’ बताते हैं। अतएव वहाँ के पादरियों ने इस भ्रम को दूर करने के लिए कुछ वर्ष पूर्व इस संपूर्ण दृश्य की एक वीडियो फिल्म बनायी, ताकि इस आश्चर्य को जनसामान्य देख-समझ सकें।
भारत में नागपंचमी बरसात का त्योहार है। शेषनाग के फन पर पृथ्वी हुई है, ऐसी मान्यता है। उस दिन सर्प दर्शन शुभ माना जाता है एवं नाग की पूजा की जाती है। कितने ही लोग उस अवसर पर उनके बाम्बियों के आगे पात्र में दूध रख आते और देव-भाव से उसे ग्रहण करने की उनसे प्रार्थना करते हैं।
यह सर्पों से संबंधित प्रचलन और मान्यताएँ हुईं। अब उनके आहार-विहार और प्रकृति की चर्चा कर ली जाए। साँप शिकार को निगलता है। चबाने लायक उसके दाँत नहीं होते। छोटे साँप एक बार का निगला हुआ एक सप्ताह में पचा पाते हैं। अजगर जैसे बड़े साँप भी हिरन या बकरी जैसी बड़ी शिकार पकड़ पकड़ लेते हैं और चार-पाँच महीने में पचा जाते हैं। इसका मध्यवर्ती अंतराल वे ऐसे ही लोट-पोट करने में गुजारते हैं।
साँप अंडज श्रेणी का प्राणी है। वह अंडे तो देता है, पर रक्त ठंडा होने से वह उन्हें सेने में समर्थ नहीं है। कुछ साँप जरायुज वर्ग के हैं और बच्चे देते हैं। जो सर्प बच्चे देते हैं, उन्हें गर्भाधान से जनन तक में 15 से 28 सप्ताह लगते हैं। अंडे देने वाले साँप अपेक्षाकृत कम समय लेते और एक बार में 4 से लेकर 100 तक अंडे देते हैं।
अधिकाँश साँप जमीन में रहते हैं, लेकिन अनेक ऐसे भी हैं, जो वृक्षों पर बसेरा करते हैं। भूमि में रहने वाले सर्प अक्सर चूहे आदि के बिलों में रहते हैं, जबकि पादपीय सर्प उनमें पाये जाने वाले गिलहरी के कोटरों में निवास करते हैं।
साँप को ‘विषधर’ कहा गया है, पर संसार में पाये जाने वाले अधिकतर सर्प विषहीन प्रकृति के होते हैं। मणिधर सर्प बहुत ही विषैला होता है। उसमें इतना घातक गरल है कि वैसे साँपों की उपस्थिति मात्र से शरीर में खाज-खुजली जैसी प्रतिक्रिया होने लगती है।
बात उन दिनों की है, जब चैतन्य महाप्रभु के कृष्ण-संकीर्तन का शुभारंभ ही हुआ था। उन्हीं दिनों महात्मा हरिदास नामक एक मुस्लिम भक्त पश्चिम बंगाल के शाँतिपुर के निकटवर्ती ग्राम फुलिया में एकांत सेवन और ईश्वर-स्मरण के निमित्त कुटिया बनाकर रह रहे थे। कुटिया गंगा किनारे एकांत में बनी हुई थी, फिर भी शाम के समय उनके दर्शन के लिए लोगों की भीड़ लगी रहती। दर्शन से उन्हें आत्मिक शाँति तो मिलती; पर पता नहीं क्यों उस दौरान दर्शनार्थियों के संपूर्ण शरीर में खुजली होने लगती। कुछ निष्णात वैद्यों ने वहाँ की जलवायु और टोपोलॉजी के अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि यहाँ कोई महाविषधर सर्प होना चाहिए। इस बात को पक्का मानते हुए कुछ लोगों ने संत हरिदास से वह स्थान त्यागने का निवेदन किया। महात्मा जी ने अपनी सहमति प्रकट करने हेतु कहा कि यदि कल शाम तक उस विषधर ने इस जगह का परित्याग नहीं किया, तो वे स्वयं इसे छोड़कर अन्यत्र चले जाएँगे।
दूसरे दिन शाम को जब सब लोग वहाँ इकट्ठे थे, तो देखा कि एक टीले के निकट प्रकाश हो रहा है। धीरे-धीरे उसमें गति आई और वह गंगा के तट की ओर चल पड़ा। यह वास्तव में मणिधर सर्प ही था, जिसके सिर पर स्थित मणि प्रकाश बिखेर रही थी। उस दिन के बाद से फिर किसी को कोई शारीरिक कष्ट नहीं हुआ।
जिस सर्प को लोग साक्षात काल समझते हैं, वही कुछ लोगों के लिए खिलौने जैसा होता है। ऐसा ही एक व्यक्ति हैदराबाद के समीपवर्ती गाँव में रहता था। मुथैया नामक इस व्यक्ति को एक बार एक विषधर ने डस लिया; पर उसे हुआ कुछ नहीं। ऐसी बात नहीं कि वह जहरीला नहीं था। जब विष का बिलकुल प्रभाव नहीं पड़ा तो वह बहुत हैरान हुआ और स्वयं को विषरोधी मान लिया। इसी तरह एक बार जब वह एक किंग कोब्रा (नाग) पकड़ने का प्रयास कर रहा था, तो उसने उसे काट खाया। कुछ ही समय में वह मूर्च्छित हो गया। लगभग चार-पाँच घंटे की गहरी मूर्च्छा के बाद जब उसे होश आया, तो ऐसा लगा जैसे वह गहरी निद्रा से उठ रहा हो। अब वह बिलकुल स्वस्थ था। जहर का कहीं कोई असर नहीं था। इस संदर्भ में पूछे जाने पर मुथैया ने बताया कि वह वर्षों से नीम के दातौन का इस्तेमाल करता आ रहा है। संभव है इससे उसके रक्त में विषरोधी प्रभाव उत्पन्न हो गया हो। इसके अतिरिक्त मुथैया की दिनचर्या और आहार-विहार का क्रम बिलकुल साधारण ही था।
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में सर्पों की अगणित प्रजातियाँ देखी जा सकती हैं। सर्प विशेषज्ञों के अनुसार यह द्वीप उनका आदर्श वास-स्थान है, इसलिए संख्या के साथ-साथ प्रजातियाँ भी अधिक दृष्टिगोचर होती हैं। यहाँ एक विचित्र किस्म का ‘टाइफ्लस’ सर्प देखा जाता है। इसकी आँखें कमजोर होती हैं, जिसके कारण यह अपना रास्ता ढूँढ़ पाने में असमर्थ होता है। इसके लिए वह अपनी जीभ और नाक का इस्तेमाल करता है, जो अति संवेदनशील होती हैं। मार्ग खोजने के क्रम में पहले वह जीभ को बाहर फेंककर फिर अंदर लाता और तालू का स्पर्श कर मस्तिष्क को संदेश भेजता है, तत्पश्चात मस्तिष्क उसका मार्गदर्शन करता है। इसकी आँखें भी संवेदनशील होती हैं और दिशा संबंधी ज्ञान प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
साँप कीड़े-मकोड़ों एवं छोटे जीवों को अपना आहार बनाकर पर्यावरण को संतुलित बनाये रखने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। यदि वे ऐसा करना बन्द कर दें अथवा उनका समूल नाश हो
जाए, तो हानिकारक कीड़े-मकोड़ों की संख्या इतनी और इस कदर बढ़ जाएगी, जिससे यहाँ भारी असंतुलन पैदा हो जाएगा।
सृष्टि का हर प्राणी एक वृहत श्रृंखला की कड़ी है। जिस प्रकार कड़ी के टूटने से श्रृंखला भंग हो जाती है, वैसे ही प्राणि जगत में जीवों की श्रृंखला है। यहाँ के हर छोटे-बड़े जीव उससे सम्बद्ध हैं। इनमें से यदि कोई भी प्राणि वर्ग विलुप्त हो जाए, तो पर्यावरण संबंधी भारी अव्यवस्था फैल जाएगी। इसलिए सृष्टि में उनके नियमन और संतुलन की एक स्वसंचालित प्रक्रिया है, इसमें हस्तक्षेप कर प्रकृति के स्वाभाविक क्रम को नहीं बिगाड़ना चाहिए।
साँपों के संबंध में प्रचलित अज्ञान को यदि हटाया जा सके और उनकी प्रकृति एवं उपयोगिता के संबंध में अधिक समझा जा सके, तो प्रतीत होगा कि सृष्टि का यह सुन्दर प्राणी अन्य जीवधारियों की तरह ही स्रष्टा की सुन्दर संरचना का एक आकर्षक प्रमाण है।
स्वामी केशवानन्द जिन्होंने शिक्षा का व्यापक प्रचार किया, राज्यसभा के सदस्य थे। तब की बात है कि उनके एक सहकारी ने देखा कि वे हाथ पर दो-तीन रूखी रोटियाँ रखे दाल से खा रहे हैं। रोटियाँ सूखी व ठण्डी थीं, उन्हें वे जल्दी-जल्दी चबाकर गले के नीचे उतार रहे थे। सहकारी ने इसका कारण पूछा तो बोले- मुझे कई जगह जाना है और शाम को गाड़ी पकड़नी है, इसलिये तंदूर से यहीं दो रोटियाँ मँगा ली हैं।
इस आयु में आपको ऐसा भोजन नहीं करना चाहिए। कुछ नहीं तो घी, मक्खन व फल तो लिया करें। सहकारी बोला। इस पर वे मुसकराते हुए बोले- ठीक तो है, पर जब इन्हीं बातों की चिन्ता करनी थी, तो संन्यासी बनकर कुछ सेवा करने का व्रत ही क्यों लेता?
व्यक्तिगत सुखों की चिंता न करना सेवा-व्रती का आदर्श है।
संत-समागमों में आए दिन त्याग-वैराग्य की ज्ञान-चर्चा होती ही रहती है। यह वैराग्य वस्तुतः है क्या? क्या संसार छोड़कर वन-उपवनों के, गुफा-कंदराओं में रहना ही यथार्थ वैराग्य है? यदि नहीं, तो क्यों?
वीतरागी पुरुषों की परिभाषा करते हुए मनीषियों ने कहा है कि संसार का परित्याग करना वैराग्य नहीं, पलायन है। इसे संत हृदय सत्पुरुष नहीं, प्रपंची अपनाते और अपना स्वार्थ साधते हैं। जिनके अंदर सचमुच में विरक्ति पैदा होती है, उन्हें कहीं अन्यत्र नहीं जाना पड़ता। वे कीचड़ में कमल की तरह होते हैं। संसार की माया उनका स्पर्श तक नहीं कर पाती। इसलिए योगी-यति जब संसार छोड़ने की बात करते हैं, तब वह बाहरी नहीं, भीतरी होता है। उसे यदि व्यक्ति स्वयं से चिपका रहे और बाहर की दुनिया में इधर-उधर चाहे कितना और कहीं भी निर्जन निकुँज में भागता रहें, कोई फर्क पड़ने वाला नहीं, कारण कि वह अपना संसार अपने अन्दर लिये फिर रहा है।
संसार की विवेचना करते हुए विज्ञजन कहते हैं कि इसका उल्लेख दो संदर्भों में होता है। एक तो वह, जो जड़ प्रकृति है, जिसमें हम सब रहते हैं और जो पंचतत्वों से विनिर्मित है। दूसरा संसार हर एक का अपना पृथक् है। यह पूर्णतः उसका निजी है। इसे जीवन जीने की शैली या उसको देखने का ढंग कहा सकते हैं। यहाँ इसकी ही चर्चा हो रही है। संन्यास और वैराग्य का संपूर्ण तत्त्वदर्शन उसी पर आश्रित है, अतएव यहाँ इसे तनिक विस्तार से समझ लेना चाहिए।
जब व्यक्तिगत दुनिया का उल्लेख होता है, तो यह भी विदित होना चाहिए कि वह निजी दृष्टि पर अवलम्बित है। दृष्टि यदि त्यागी-तपस्वियों जैसी हुई, तो उसका अपना जगत भी वैसा ही होगा, वह उसी प्रकार से चिंतन करेगा, आचरण और कृत्य भी वैसे ही होंगे; लेकिन औसत आदमी की तरह यदि वह भी भौतिकवादी हुआ, तो बाहरी आकर्षणों में ही संपूर्ण जीवन फँसा रहेगा। एक ज्ञानी और सामान्यजन में यही अंतर है। ज्ञानी यहीं पर पत्थरों में छिपे परमात्मा को देख लेता है, जबकि संसारी सर्वव्यापी परमात्मा में केवल पत्थर को- मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर और गुरुद्वारे को देख पाता है। सब कुछ देखने के तरीके पर निर्भर है। बाहर वही सब दिखलाई पड़ता है, जो मन के अंदर है। व्यक्ति वह नहीं देखता, जो वास्तव में हैं। इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है।
बाहर यदि खूब हँसी-खुशी का वातावरण हो, लोग मौज-मस्ती कर रहे हो,, किंतु सामने वाले का मन खिन्न और उदास हो, तो सारा वातावरण उसे उदास नजर आएगा। इसके विपरीत किसी कारणवश वातावरण भारी बन गया हो, प्रतिकूलता का बोझिल प्रभाव वहाँ स्पष्ट रूप से विद्यमान हो, किंतु अन्तस् का उल्लास यदि निर्झर की तरह प्रवाहित हो रहा हो, तो वहाँ भी वह लोगों को अपनी तरह हलका बनाता रह सकता है। तात्पर्य यह कि बाहर का पसारा हमारे अपने ही अभ्यंतर का विस्तार है। हम जैसे हैं, उसी प्रकार का जगत चतुर्दिक् निर्मित करते हैं। कोई व्यक्ति कई दिनों का भूखा है, वह बाज़ार के रास्ते गुजर रहा है, तो उस दिन उसे कपड़े की, खिलौने की, यंत्र-उपकरणों की दुकानें कुछ भी दिखलाई नहीं पड़ेगी। सम्पूर्ण बाज़ार में माने केवल मिष्ठान्न भण्डार ही हों, भोजनालय और जलपानगृह ही हों। तब दूसरा कुछ भी उसे नजर नहीं आएगा। चारों ओर से भोजन की ही सुगंधि उठती प्रतीत होगी। अन्य दिन वही व्यक्ति जो कहीं से खाकर चलता है, तो उसके लिए बाज़ार का दृश्य बदल जाता है।
मूर्धन्य विचारक एवं दार्शनिक रोमा रोलाँ ने लिखा है कि मानवी प्रवृत्तियों का नियमन बाह्य वातावरण के नियंत्रण से संभव तो है, पर उसे एक प्रकार का अंकुश ही कहना पड़ेगा, परिवर्तन नहीं; कारण कि इसके मूल में ‘मन’ है। उसके हेय क्रिया–कलापों को बाहरी दबावों द्वारा सुधारा नहीं, सिर्फ रोका भर जा सकता है। मनःचेतना के परिष्कार के लिए आँतरिक अभीप्सा और संकल्पबल चाहिए। इनके द्वारा जब यह परिमार्जन प्रक्रिया सम्पन्न हो जाती है, तो यह अवस्था ही आत्मसत्ता के, परमात्मा के अंशधर होने का ठीक-ठीक प्रमाण है। इसमें इनसान भगवान के समतुल्य बन जाता है। इससे पूर्व वह इनसान है; क्योंकि अपनी ही बनायी दुनिया में जीता और औंधे-सीधे कुछ भी करता रहता है। इसीलिए कहा जाता है कि संसार एक नहीं है। यह उतने ही हैं, जितने मन हैं। प्रत्येक व्यक्ति का यह अपना निजी सृजन, जिसको वह सदा ढोता फिरता है। चाहे कहीं चला जाए, उसकी वह सृष्टि हमेशा साथ रहेगी। जब तक इस तथ्य को सही-सही नहीं समझ लिया जाता, तब तक न तो कोई ठीक अर्थों में संन्यासी बन सकता है, न त्यागी; क्योंकि जब छोड़ने और त्यागने की बात आएगी, तो व्यक्ति उसे छोड़ेगा, जो बाहर है एवं उस संसार को पकड़े रहेगा, जो भीतर है। इससे क्या फर्क पड़ने वाला है? तथाकथित संन्यासी प्रत्यक्षतः तो भौतिक सुविधा-साधनों के अभाव में जीते हैं, पर दिन-रात सोचते उसी के बारे में हैं। इससे यदि वह हिमालय की गुफा में भी बैठे रहें तो वह ‘वह’ ही बने रहेंगे। उनमें राई-रत्ती भर भी अंतर नहीं आने वाला? यदि व्यक्ति का अन्तःजगत अपरिवर्तनीय बना रहा, तो कंदरा क्या कर लेगी? पहाड़-पर्वत क्या कर लेंगे? निर्जन-एकांत से क्या बन पड़ेगा? सब कुछ निष्प्रयोजन और निरर्थक सिद्ध होंगे।
पौराणिक आख्यानों में ऐसा वर्णन मिलता है कि ऋषि -मुनियों को डिगाने के लिए इंद्र अप्सराएँ भेजा करते हैं। विश्वामित्र के समक्ष मेनका उपस्थित हुई थी। यदि इन उल्लेखों पर गहन चिंतन किया जाए, तब इनका तात्पर्य समझ में आएगा कि यह वास्तव में बाहर का खेल नहीं, भीतर का व्यापार है। इंद्र जैसे देवता और अप्सराओं को इतनी फुर्सत कहाँ कि वे लोगों को डिगाने की, गिराने की व्यवस्था करते रहें। श्रेष्ठ सत्ताएँ तो सदा आगे बढ़ाने और ऊँचा उठाने में सहयोग ही करती हैं। वे किसी को क्यों गिराने लगें? इतने पर भी यदि किन्हीं के समक्ष मेनका, रम्भा, उर्वशी जैसी स्वर्ग-सुन्दरियाँ उपस्थित होती हैं, तो यह यथार्थ में उनके मनोराज्य का बीजांकुर हैं। जो वासनाएँ और दमित इच्छाएँ अब तक दबी-छुपी स्थिति में थीं, वह एकांत पाते ही उभरकर बाहर आती और मनोनुकूल प्रतिमाएँ गढ़ने लगती हैं। ऐसे में किन्हीं को कुछ नारी-मूर्तियाँ दिखाई पड़ती हैं। इन्हें कहीं बाहर का अवतरण नहीं, भीतर का प्रक्षेपण कहना चाहिए। इसीलिए संन्यास-वैराग्य के संदर्भ में सोचने से पूर्व इसे भली-भाँति समझ लेना पड़ेगा कि एक मन निर्मित जगत भीतर है। उसे पूर्णरूपेण विसर्जित किये बिना वास्तविक अनासक्ति का उदय हो पाना संभव नहीं। अस्तु, जब कबीर जैसे संत यह कहते हैं-जग सूँ प्रीत न कीजिए” तो भ्रम में नहीं पड़ जाना चाहिए। यथार्थ में यहाँ बाह्य नहीं, उस भीतरी जगत की ओर संकेत है, जो अपने ही मन का हिस्सा है। छोड़ना इसी ‘मन’ को है। यह काम आसान नहीं। यदि यह इतना ही सरल रहा होता तो यहाँ कितने ही बुद्ध, महावीर और विवेकानंद पैदा हो जाते, पर ऐसे त्यागी-तपस्वी दुनिया में इक्का-दुक्का ही जन्म लेते है, कारण कि यह साहस का काम है। इसमें क्राँति की आवश्यकता पड़ती है। सड़े-गले मन को गलाकर नवीन मन उत्पन्न करना-यह क्राँति से किसी भी प्रकार कम नहीं। इसके फलस्वरूप जो विराट मन पैदा होगा, वह अपने अंदर सारे मनों को समाहित कर लेगा। उसमें इतनी महानता और व्यापकता आ जाती है कि वह सभी को अपने अंदर समेट लेता है। इसमें कोई परेशानी प्रस्तुत नहीं होती, पर साधारण स्थिति में जब दो मन मिलने का प्रयास करते हैं, एक दूसरे के करीब आते हैं, तो दो संसार आपस में टकराते हैं। इसलिए यहाँ मित्रता बड़ी मुश्किल है और दुर्लभ भी। जहाँ मित्रता जैसी कुछ दिखलाई पड़ती है, वहाँ भी मित्रता नहीं है, वरन् स्वार्थों की निकटता है। उसके पूरा होते ही टकराव और वैमनस्य शुरू हो जाते हैं। जिस दिन यह सत्य समझ में आ जाएगा कि बाहर की दुनिया हमारे मन का परिणाम है, उसी के आधार पर हम उसका निर्माण करते हैं, उस दिन फिर बाह्य संसार से पलायन करने की आवश्यकता महसूस नहीं होगी। तब बार-बार अन्तःकरण यही कहेगा कि वह जो अंदर सपनों का महल खड़ा है, उसे ध्वस्त कर दिया जाय और जिस मन ने उसे जन्म दिया है, उसका कायाकल्प किया जाए। जिस क्षण यह बोध जगेगा, उसी पल व्यक्ति के भीतर का संन्यासी जन्म लेगा। तब यह प्रश्न नहीं रह जायेगा कि हम कहाँ हैं? जगत में या निर्जन में? भवन में या झोंपड़ी में? जहाँ भी रहें, वहीं संन्यस्त हैं।
इसी बात को और स्पष्ट करते हुए कबीर कहते हैं-” एक कनक अरु कामिनी, जग में दोउ फंदा” इसे पढ़कर लोग यही समझते हैं कि कबीर कनक अर्थात् सोना और कामिनी अर्थात् स्त्री की बात कर रहे हैं। इन्हें छोड़ दिया जाए-संपत्ति और स्त्री का परित्याग कर दिया जाय, तो ब्रह्म उपलब्ध हो जाएगा, क्योंकि जगत तो उन्हीं दोनों के गिर्द घूम रहा है, इन्हीं में बँधा है। लोगों की दो ही आकांक्षाएँ होती हैं-धन और नारी। इन्हें छोड़ देने से वैराग्य हो जाएगा - ईश्वर मिल जाएगा। इसलिए लोग घर-द्वार पत्नी-पुत्र धन-संपत्ति त्यागकर निर्जन में चले जाते हैं, फिर भी खाली हाथ ही रहते है, क्योंकि कबीर का आशय हम ठीक-ठाक नहीं समझ पा रहे हैं। ब्रह्म-प्राप्ति यदि इतनी सरल होती, तो पलायनवादी कब के परमपद पा गए होते, पर ऐसा नहीं है। समझने में यहाँ एक बार फिर हम गलती कर रहे हैं।
कबीर प्रतीकों की भाषा बोलते हैं। लोभ का प्रतीक है- सोना और इन्हें त्यागने की बात करते हैं, तो इसका मतलब साफ है कि वे लिप्सा और काम के परित्याग के बारे में कह रहे हैं। जब तक काम है, कामिनी रहेगी। काम ही कामिनी को निर्मित करता है। इसलिए त्याज्य कामिनी नहीं, काम है। सोना किसी को थोड़े ही पकड़े हुए है, वह तो लोभ है, जो आदमी को जकड़े रहता है। वह समाप्त हो गया, तो व्यक्ति का एक बंधन टूट गया। यदि काम पर भी उसने विजय प्राप्त कर ली, तो समझना चाहिए वह बंधन मुक्त हो गया, संन्यासी-बैरागी बन गया। इसलिए महत्वपूर्ण अन्तस् का विसर्जन है, बाहर का त्याग नहीं। बाहर तो केवल पत्र-पल्लव हैं। उन्हें तोड़ते-मरोड़ते रहने पर भी नित-नई कोपलें फूटती रहेंगी। जड़ तो अन्दर है, वह उन्हें हरा बनाये रखेंगी। अतएव मूल के उच्छेदन में ही सार है।
दोस्तोवस्की ने अपने संस्मरण में लिखा है कि जिन दिनों जारशाही के विरुद्ध वे क्राँतिकारी गतिविधियों में संलग्न थे, एक दिन पकड़ लिये गए। दस और साथी थे। सभी को मृत्युदंड सुनाया गया। तिथि तय हुई। उस दिन प्रातः छह बजे सभी को गोली मारी जानी थी। सारी तैयारियाँ कर ली गईं, कब्रें खुद चुकीं थीं। ताबूत निर्मित हो गये। बस, अब निर्धारित क्षण की प्रतीक्षा थी। एक-एक पल उनके लिए भारी पड़ रहा था। मानसिक रूप से तो वे मर चुके थे। बस, शारीरिक मौत बाकी थी। सब एक पंक्ति में खड़े थे, तभी छह का घंटा बजा। सैनिक अपनी-अपनी बंदूक के घोड़े दबाते इससे पूर्व एक घुड़सवार वहाँ आ पहुँचा और संदेश सुनाया कि मृत्युदंड आजीवन कारावास में बदल दिया गया है, लेकिन तब तक उनमें से एक आदमी गिर चुका था, यह सोचकर कि बस मरे। छह बज चुके। अब बचने का कोई उपाय नहीं। उसे बताया गया कि सजा आजीवन कारावास में बदल दी गई है। इसे सुनते ही कुछ पल बाद वह उठ खड़ा हुआ और सबके साथ कारागृह चला गया।
दोस्तोवस्की लिखते हैं कि इस घटना के बाद भी वह वर्षों जिन्दा रहा, पर अब वह पहले वाला आदमी न था। वह चलता-फिरता उठता-बैठता काम करता-सब कुछ सामान्य आदमी की तरह था, किंतु पूछने पर बोलता कि वह अमुक तिथि को प्रातः छह बजे मर चुका है। लोग उसे पागल कहते, पर पागलों का कोई लक्षण उसमें था नहीं। वह निस्पृह योगी की तरह प्रतीत होता। न कोई आसक्ति रही, न इच्छा, न लगाव-एकदम निर्लिप्त। दोस्तोवस्की कहते हैं कि उस दिन के बाद वे भी दूसरे आदमी हो गए, पहले वाला दोस्तोवस्की मर गया।
यहाँ न तो किसी पागल को संन्यासी की संज्ञा दी जा रही है, न उसे निर्लिप्त योगी बताया जा रहा है। कहा मात्र इतना भर जा रहा है कि यदि भीतर की अनासक्ति उभर पड़े और पहले से गढ़ी अंतर की दुनिया लय हो जाए, तो प्रखर वैराग्य की अनुभूति न सिर्फ की जा सकती है, वरन् व्यक्तिगत जीवन में उसकी झलक-झाँकी भी करायी जा सकती है। इसी स्थिति में यथार्थ संन्यास सधता है। भर्तृहरि के ‘वैराग्यशतक ‘ का इतना ही निचोड़ है।
फार्म-4
(1) प्रकाशन स्थान मथुरा
(2) प्रकाशन अवधि मासिक
(3) मुद्रक का नाम मृत्युंजय शर्मा
क्या भारत का नागरिक है हाँ
पता-जनजागरण प्रेस, वृन्दावन मार्ग, मथुरा
(4) प्रकाशक का नाम-मृत्युंजय शर्मा
पता- अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
(5) सम्पादक का नाम- डॉ. प्रणव पंड्या
क्या भारत के नागरिक हैं-हाँ
पता- शाँति कुँज हरिद्वार
(6) उन व्यक्तियों के नाम व पते-मृत्युंजय शर्मा
जो समाचार-पत्र के स्वामी हों तथा जो अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
समस्त पूँजी के एक प्रतिशत से अधिक के साझेदार या हिस्सेदार हों।
मैं मृत्युंजय शर्मा एतद् द्वार घोषित करता हूँ कि मेरी अधिकतम जानकारी एवं विश्वास के अनुसार ऊपर दिए गये विवरण सत्य हैं। दिनाँक 28-2-99
जो दुर्भाग्य के दुर्गम पथ पर साहस से विचरण करता है, वह दूसरे के लिए आश्वासन के सुरभित फूल बिखेर जाता है।
जब मैं तरुणी थी और कॉलेज में पढ़ती थी, मैंने अपना यह जीवन-मंत्र लिखा था-मैं भगवान में विश्वास करती हूँ और विश्वास करती हूँ इनसान में, आत्मशक्ति में। मैं मानती हूँ-भगवान के रचे इस विश्व के विषय में एक भी अपशब्द हमारे मुँह से नहीं निकलना चाहिए। किसी को सृष्टि के बारे में शिकायत करने का अधिकार नहीं, क्योंकि प्रभु ने इसे सुंदर बनाया है और हजारों लोगों ने इस सुंदर बनाये रखने का प्रयत्न किया है।”
ये शब्द लिखे बहुत वर्ष बीत गये और इस बीच मैंने बहुत से वियोग और शोक सहे हैं, लेकिन इन्हें बदलने का कारण मुझे आवश्यक प्रतीत नहीं होता। जो भगवान, इनसान और आत्मा में आस्था रखता है, निश्चय ही आशावादी है। कितनी ही पीड़ा उसे क्यों न हो, वह जानता है कि संसार में सत शक्ति का वर्चस् है और सदा अपने को उसी सत शक्ति और प्रभु प्रेम से घिरा पाता है।
-हेलेनकेलर
एक पापी मनुष्य को एक बार अपने पापों के लिए पछतावा हुआ। उससे किसी ने कहा-तू कबीरदास के पास जा। वे तेरे मन को शान्ति प्रदान करेंगे। वह मनुष्य जैसे रोगी अस्पताल में जल्दी जाता है, उसी तरह कबीर के यहाँ गया। कबीर घर पर नहीं थे। इसलिए उनकी पत्नी ने दृढ़तापूर्वक तीन बार भगवान का नाम लेने को कहा। पापी ने सच्चे भाव से वैसा ही किया। इससे उसका मन शान्त हो गया और वह नाचता-कूदता हुआ ईश्वर -स्मरण में मस्त हो गया। इसी समय कबीर घर आ गये। ऐसे प्रेमी मनुष्य को देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए। पत्नी ने उस भक्त का सब हाल बताया। कबीर ने खिन्न होकर अपनी पत्नी से कहा-केवल एक बार प्रभु का नाम ले लेने से सब कुछ सिद्ध हो जाता है। तब तुमने तीन बार हरिनाम लेने को क्यों कहा? इससे मालूम होता है कि तुमको ईश्वर पर विश्वास नहीं है। स्त्री बोली-तीन बार नाम लेने का आशय यह था कि जिससे उस पापी का कायिक, वाचिक और मानसिक मैल दूर हो जाय। कबीर अपनी पत्नी की इस सूझ पर बहुत प्रसन्न हुए।
प्रखर साधना वर्ष के परिप्रेक्ष्य में एक लेख यहाँ प्रस्तुत है। यह साधना की ओर गतिशील करने के लिए दिया गया एक सत्परामर्श है। आज के बहिर्मुखी चिन्तन करने वाले मानव, भटकावों में ले जाने वाली गतिविधियों में संलग्न साधक के लिए एक मार्गदर्शन है, जो विराट गायत्री परिवार के संस्थापक -संरक्षक ने 1940 की अखण्ड-ज्योति पत्रिका के जून अंक में संपादकीय के रूप में लिखा था। पढ़ें व आत्मचिन्तन करें।
मनुष्य वास्तव में अकेला ही जाएगा। उसका सारा धर्म-कर्म एकान्तमय है। उसे अपनी परिस्थितियों पर स्वयं विचार करना पड़ता है, अपने लाभ-हानि का निर्णय भी उसे स्वयं करना पड़ता है। अपने उत्थान-पतन के साधक स्वयं उपलब्ध करने होते हैं। इस संघर्षमय दुनिया में जो भी अपने पाँवों पर खड़ा होकर अपने बलबूते चल पड़ता है, वह चल लेता है, बढ़ जाता है और अपना स्थान प्राप्त कर लेता है, किंतु जो दूसरों के कंधे पर अवलम्बित है, दूसरों की सहायता पर आश्रित है, वह भिक्षुक की तरह कुछ प्राप्त कर ले तो सही अन्यथा निर्जीव पुतले और बुद्धि रहित कीड़े-मकोड़ों की तरह ज्यों-त्यों करके अपनी साँसें पूरी करता है। मनुष्य के वास्तविक सुख-दुख हानि-लाभ उन्नति-पतन बंधन-मोक्ष का जहाँ तक संबंध है, वह सब एकांत के साथ जुड़ा हुआ है।
रुपया-पैसा जायदाद, स्त्री-कुटुम्ब आदि हमें अपने दिखाई देते हैं, पर वास्तव में हैं नहीं। ये सभी चीजें शरीर की सुख-सामग्री मात्र हैं। शरीर छूटते ही इनसे सारा संबंध क्षणमात्र में छूट जाता है, फिर कोई किसी का नहीं रहता। पाठक विश्वास करें, कुछ श्रम हो तो उसे उठा दें। मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं तुम्हें सच्ची बात बता रहा हूँ। तुम अकेले हो, बिलकुल अकेले। न तो कोई तुम्हारा - न तुम किसी के। हाँ! लौकिक धर्म के अनुसार साँसारिक कर्तव्य और कर्म हैं, जो तुम्हें शरीर रखने तक पालने पड़ेंगे। उनसे छुटकारा नहीं हो सकता। कर्म किये बिना शरीर रह नहीं सकता-यह उसका धर्म है। परंतु हे इक्के के घोड़े! ये सब वस्तुएँ तेरी नहीं हैं, जिन्हें तू सारे दिन ढोता है- तू अकेला है। ये सवारियाँ तेरी कोई नहीं हैं, जिन्हें अपने ऊपर बिठाकर तू सरपट तेजी से दौड़ता चला जा रहा है।
उपर्युक्त पंक्तियों से कोई भ्रम में न पड़े। संन्यास या निवृत्ति का वह पाठ हम किसी को नहीं पढ़ा रहे, जिसके अनुसार लोग कपड़े रंग कर भिखारी बन जाते हैं और कायरों की भाँति लड़ाई से डरकर जंगलों में अपनी जान बचाना चाहते है। कर्मयोग किसी से कम नहीं है। हम अपने कर्तव्यों का ठीक तरह पालन करते हुए पक्के संन्यासी बने रह सकते हैं। यहाँ तो हमारा अभिप्राय यह है कि तुम अपनी वास्तविक स्थिति का अनुभव करते रहो। अपने साधकों को हमारी शिक्षा है कि वे नित्य कुछ दिन एकांत सेवन करें। इसके लिए यह जरूरी नहीं कि वे किसी जंगल, नदी या पर्वत पर जाएँ। अपने आस-पास ही कोई शाँत स्थान चुन लो। कुछ भी सुविधा न हो तो अपने कमरे के सब किवाड़ बन्द करके अकेले बैठो। वह भी न हो सके तो शोरगुल से रहित स्थान में बैठकर आँखें बन्द कर लो या चारपाई पर लेटकर हलके कपड़े से अपने को ढँक लो। शाँतचित्त होकर मन-ही-मन जाप करो-मैं अकेला हूँ- मैं अकेला हूँ, मैं एक स्वतंत्र, अखण्ड आर अविनाशी सत्ता हूँ। मेरा कोई नहीं और न मैं किसी का हूँ। आधे घण्टे तक अपना सारा ध्यान इसी क्रिया पर एकत्रित करो। अपने को बिलकुल अकेला अनुभव करो। अभ्यास के कुछ दिनों बाद एकांत में ऐसी भावना करो कि “मैं मर गया हूँ। मेरा शरीर और उपयोग में आने वाली संपूर्ण वस्तुएँ मुझसे दूर पड़ीं हैं।”
उपर्युक्त छोटे से साधन को हमारे प्राणप्रिय अनुयायी आज से ही आरंभ करें। वे यह न पूछें कि इससे क्या हो जाएगा, किंतु शपथपूर्वक कहता हूँ कि जो सच्चे हृदय से विश्वासपूर्वक इसे करेगा, वह कुछ ही समय में सच्चे आत्मज्ञान की ओर बढ़ जाएगा। साँसारिक घोर पाप, दुष्कर्म, बुरी आदतें, नीच वासनाएँ और नरक की ओर घसीट ले जाने वाली कुटिलताओं से उसे छुटकारा मिल जाएगा। इन पापमयी पूतनाओं को छोड़ने के लिए साधक अनेक प्रयत्न करते हैं पर वे छाया की भाँति पीछे-पीछे दौड़ती रहती हैं और पिण्ड नहीं छोड़ती। यह साधन उस ममत्व को ही छुड़ा देगा, जिसकी सहचरी ये पाप वृत्तियाँ हैं।
अपने को अकेला अनुभव करो। नित्य अभ्यास करो। शरीर को निश्चेष्ट पड़ा रहने दो। मन को पूरी योग्यता, तर्क, बुद्धि के साथ यह समझने दो कि मैं अकेला हूँ। केवल बुद्धि द्वारा सोच लेना ही पर्याप्त न होगा। यह भावना मन के ऊपर गहरी अंकित हो जानी चाहिए। अभ्यास इतना बढ़ जाना चाहिए कि जब अपने बारे में सोचो, तो सोचो कि मैं अकेला हूँ। हर घड़ी अपने को संसार की समस्त वस्तुओं से ऊँचा कमलपत्रवत् ऊपर उठा समझो। मैं कहता हूँ कि यह साधन तुम्हें मनुष्य से देवता बना देने में पूरा समर्थ है।
“अहो! आज का यह शुभ्र चंद्रमा बड़ा मधुर लग रहा है। कितना दीप्तिमान है यह?”
प्रिय! आज का यह चन्द्रमा वैसा ही दीप्तिमान है....”
“कैसा स्वामी?” पुलकित-प्रमुदित ऋषि पत्नी अरुंधती ने साश्चर्य महर्षि वशिष्ठ जी से पूछा।
“अरुंधती, अभी तुम जब आज के इस शीतल चंद्र की दीप्ति की प्रशंसा कर रहीं थीं, तो मेरे मन में अनायास ही एक उपमा आ गयी।” वशिष्ठ जी ने अपनी धर्मपत्नी को उत्तर दिया।
कौन-सी उपमा? बताइए न, आज के दीप्तिमान चंद्र की तुलना आपने किससे की है? चुप क्यों रह गए?”
“कहूँ- बुरा तो न मान जाओगी?”
“उपमा तो साहित्य का एक अलंकार मात्र है। इसमें बुरा मानने की भला क्या बात है?”
प्रिय, आज का चंद्रमा वैसा ही दीप्तिमान है, जैसा विश्वामित्र का तप।”
इस उपमा को सुनकर सचमुच ऋषि पत्नी अरुंधती खिन्न हो गयीं।
“अरे! तुम म्लान मुख कैसे हो गईं?”
विश्वामित्र की प्रशंसा महर्षि वशिष्ठ के मुँह से सुनकर अरुंधती सचमुच ही दुःखी हो गयीं। अनायास ही उन्हें अपने अतीत जीवन की एक कटुस्मृति याद हो आई। वह ऐसी भयानक घटना थी, जिसे कोई भी माँ कभी भी भूल नहीं सकती। वशिष्ठ जी ने पुनः कहा- “अरे अरुंधती! तुम उपमा सुनकर चुप कैसे रह गईं?”
“क्या वह अतीत का भयंकर पृष्ठ आप पुनः खुलवायेंगे। महर्षि! अपने सौ पुत्रों को निर्ममतापूर्वक मार डालने वाले हत्यारे की ऐसी प्रशंसा भला मैं कैसे सहन कर सकती हूँ। आखिर मैं भी एक माँ हूँ। एक माता का व्यथित हृदय लिए बैठी हूँ। आप तो साँसारिक माया-मोह से ऊपर हैं, ममता के बंधन में नहीं बँधे हैं, पर मैं तो वात्सल्य के कोमल तंतुओं में जकड़ी माँ हूँ। इस हत्यारे ने मेरे पुत्रों की हत्या कर डाली है। हाय, जीवन में इसने क्या छोड़ा है अब?” “ओह! ते यह बात है, ठीक भी है, तुम्हारे हृदय पर बड़ा मार्मिक आघात लगा है। विश्वामित्र ने उत्तेजनावश दुष्कर्म कर डाला था ........पर एक बात है................. किसी व्यक्ति के सद्गुणों का मूल्याँकन करते हुए हमें व्यक्तिगत वैमनस्य से ऊँचा उठना चाहिए। यह मैं मानता हूँ कि विश्वामित्र ने क्षणिक भावावेश में आकर हमारा समस्त परिवार नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है, पर ....................... उनमें कुछ सद्गुण भी हैं। विशिष्ट महानता भी है।.............. इस विशिष्टता की हमें कद्र भी करनी चाहिए। शत्रु में भी यदि दिव्यगुण हों, तो उनकी प्रशंसा करनी चाहिए।”
अरुंधती सहसा उत्तर नहीं दे सकीं।
फिर हल्के से व्यंग्यमिश्रित स्वर में बोलीं-महर्षि यदि ऐसा ही है जो आप उन्हें ब्रह्मर्षि की उपाधि क्यों नहीं दे डालते? बस यही तो वे आपसे कहलवाना चाहते हैं। इसी का तो सारा झगड़ा है।”
महर्षि वशिष्ठ व्यथित हो गए। एक कटुसत्य की ओर निर्देश किया गया था। उन पर जो आरोप लगाया गया था, वह सच ही था।
“उन्हें ‘ब्रह्मर्षि’ कह दीजिए और उनका सारा रोष समाप्त हो जाएगा बस इतनी-सी बात है।”
महर्षि वशिष्ठ चुप! जैसे कोई गहरी बात सोच रहे हों।
“महर्षि! क्या सोचने लगे। बोलते क्यों नहीं? क्या इसे मेरी अशिष्टता मानकर मौन हैं?”
वशिष्ठ को बोलना ही पड़ा, “भद्रे! सद्गुणों की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा करना मनुष्य का कर्तव्य है। विचार भी संक्रामक हैं। वे वायुमण्डल में तरंगों की भाँति तीव्र है। यदि हम सद्गुणों की प्रशंसा न करेंगे, तो दुर्गुणों का गंदा वातावरण स्वतः फैलता चला जाएगा। समाज का अहित होगा, इसलिए स्वस्थ वातावरण की सृष्टि के लिए सद्गुणों का चिंतन आवश्यक है।”
“पर विश्वामित्र तो अनेक दुर्बलताओं के घर हैं।”
“विश्वामित्र में वस्तुतः तो एक ही दोष है। अन्य दुर्बलताएँ तो उसी के इर्द-गिर्द पनपने वाली शाखा-प्रशाखाएँ हैं।”
“क्या मैं जान सकती हूँ, कौन-सा दोष है वह?”
“अहंकार! वे अपने तप के समान किसी दूसरे का तप नहीं मानते हैं। जो उनके तप की श्रेष्ठता स्वीकार नहीं करता उसी से वे रुष्ट हो जाते हैं।”
“मात्र अहंकार ही उनका दोष है?”
“हाँ अरुंधती अहंकार से ही ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध और विक्षोभ उत्पन्न होते हैं उसी से प्रेरित होकर मनुष्य दुष्कर्म करने लगते है।”
“सच! तो यह आपके मनोभाव हैं। एक हत्यारे को भी आप अहंकार रहित होने पर महान पुरुष की कोटि में रखते हैं।” अरुंधती ने वक्रभाषा का प्रयोग किया।
“मनुष्य को चाहिए कि दुष्टों से बचकर साधु पुरुषों के साथ रहे। सद्गुणों की प्रशंसा करे। मैं विश्वामित्र के दुर्गुण (अहंकार) को न देखकर उसके सद्गुणों, तपश्चर्या, कष्टसहिष्णुता को देख रहा हूँ। तभी मेरे मुँह से निकल गया कि आज का चंद्रमा वैसा ही दीप्तिमान हो रहा है, जैसा महर्षि विश्वामित्र का तप।”
“अब समझी आपका दृष्टिकोण! आपने अपने पुत्रों के हत्यारे में भी सद्गुण ही देखे हैं।”
संयोग की बात, महर्षि विश्वामित्र, वशिष्ठ जी की कुटिया के पीछे छिपे यह संवाद सुन रहे थे। ये बातें सुनकर उन्हें अचरज हुआ। वशिष्ठ कभी उनकी प्रशंसा न करते थे। उन्हें प्रसन्न करने के लिए उन्होंने भारी तप किया था। अनेक प्रकार के कष्ट सहे थे। समस्त विश्व उनके तप की श्रेष्ठता स्वीकार करता था, किंतु वशिष्ठ मौन रहते थे। रोष और उत्तेजना में आकर उन्होंने वशिष्ठ के पुत्रों की हत्या तक कर डाली थी, किंतु समुद्र जैसे गंभीर वशिष्ठ के मुँह से न तो प्रशंसा के शब्द निकले और न क्लेश की आहें। अतः वे वशिष्ठ को अपना शत्रु समझते थे और आज उन्हें मारने आए थे। ‘ब्रह्मर्षि’ बनने की अदम्य और उत्कट लालसा उन्हें उद्विग्न बनाए हुए थी।
वार्तालाप सुनकर उनका मन-कमल खिल उठा। अहा! आखिर वशिष्ठ जी ने उनके तप की श्रेष्ठता स्वीकार कर ही ली। उन्हें ऐसा लगा कि वे ब्रह्मर्षि बन गए हैं। उनका अहंकार तृप्त हो गया, उद्विग्नता जाती रही। शाँति और संतुलन की शीतलता ने उनको आनंद विभोर कर दिया।
अब उनका विवेक पूरी तरह सक्रिय था। न्याय भावना उभर आयी थी। विवेक की दृष्टि से देखने से विश्वामित्र को अपनी भयंकर भूल का ज्ञान हुआ। उन्होंने जाना कि द्वेष से नहीं, बल्कि न्याय से प्रेरित होकर ही वशिष्ठ उन्हें ब्रह्मर्षि घोषित नहीं करते थे।
अब विश्वामित्र की दृष्टि में वशिष्ठ एक न्याय-दृष्टि रखने वाले कर्तव्यनिष्ठ, सुहृद बन गए थे। अब वे कुटिया के पीछे न रह सके। पश्चाताप के वशीभूत हो-पिछवाड़े से हटकर एकाएक अरुंधती और वशिष्ठ के सम्मुख उपस्थित हो गए। वे महर्षि वशिष्ठ के चरणों पर गिरकर अपने अपराध और अविवेक के लिए क्षमा माँगने लगे।
जिसे अरुंधती हत्यारा कह रही थी वह अब उनके पति के चरणों पर गिरकर क्षमा-याचना कर रहा था। पश्चाताप के गरम आँसू महर्षि वशिष्ठ के पाँवों पर टप-टप कर गिर रहे थे। महर्षि वशिष्ठ जी को अब पूरा विश्वास हो गया कि विश्वामित्र का अहंकार दूर हो गया है।
अहंकार गलित हो जाने के बाद पशुत्व और निकृष्टता का स्तर भला कहाँ रहता है? मन सही दिशा में बदला, तो मानो सब कुछ बदल गया।
वशिष्ठ जी ने अपने चरण पकड़े विश्वामित्र को बड़े प्यार एवं आत्मीय भावना से उठाते हुए संबोधित किया-उत्तिष्ठ ब्रह्मर्षि-अर्थात् हे ब्रह्मर्षि उठो! विश्वामित्र चकित थे। अब उन्हें अनुभव हो रहा था कि जब वह भीतर से बदल गए हैं, तो भला बाहरी स्तर बदलने में क्यों कठिनाई होने लगी? दर्प और द्वेष से जो चाहते थे, वह उन्हें नहीं मिला, पर हृदय-परिवर्तन होते ही सारी बाधाएँ स्वयं ही समाप्त हो गयीं। अब वह सर्वत्र ‘ब्रह्मर्षि’ के नाम से पुकारे जाने लगे।
राजा श्रोणिक सदा अशान्त रहते थे। निद्रा की न्यूनता, चेहरे की उदासी, अतृप्ति और आशंका उन्हें हर घड़ी हैरान किये रहती थी। कारण और समाधान पूछने वे भगवान बुद्ध के पास गये।
प्रवचन चल रहा था, सभी भिक्षु अति प्रसन्नमुद्रा में उसे श्रवण कर रहे थे। चेहरे पर तेजस्विता और आनन्द की पुलकन से सभी दिव्य लग रहे थे।
राजा की जिज्ञासा को समझते हुए तथागत ने उसी प्रवचन में यह तथ्य जोड़ दिया कि मनुष्य क्लान्त और उल्लसित क्यों रहता है। उन्होंने कहा-तृष्णायें ही मनुष्य को खाती हैं। उनसे बचा जा सके तो राजा-रंक सभी समान रूप से सुखी रह सकते हैं।
सुबह-सुबह एक लोहार घर से बाहर निकला। रास्ते में उसे लोहे के दो टुकड़े मिल गए। उसने उन्हें उठा लिया। घर लौटने पर लोहार ने एक टुकड़े से तलवार बनायी और दूसरे को ढाल बना दिया।
कुछ दिनों के बाद एक योद्धा आकर तलवार और ढाल खरीद कर ले गया। उस योद्धा ने कई युद्धों में उनका उपयोग किया। एक युद्ध में तलवार टूट गयी, मगर ढाल भी पास ही पड़ी थी।
रात में जब सब सो गए, तलवार कराहती हुई ढाल से बोली, बहिन देखो मेरी कैसी दुर्दशा हो गयी है और एक तू है, ज्यों-की-त्यों सुरक्षित।
हम दोनों में एक फर्क जो है-ढाल ने कहा।
वह क्या? तलवार पूछ बैठी। तू सदैव किसी को मारने-काटने का काम करती रही है और मैं बचाने का। ढाल ने फर्क बताते हुए आगे कहा-ख्याल रखो, मारने वाले से बचाने वाले की आयु ज्यादा है।
(पूर्वार्ध)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो!
भगवान की समीपता और कृपा पाने के लिए जिन दो कार्यों की आवश्यकता होती है, उनका विवेचन हम इन शिविरों में करते आ रहे हैं। इन सबका एक ही उद्देश्य है कि आप लोग जो यहाँ आये, अब यहाँ से जाने के साथ-साथ भगवान के साथ रिश्ता मजबूत बनाते हुए जाएँ। रिश्ता मजबूत करने के साथ-साथ उनकी कृपा भी प्राप्त करें। भगवान का रास्ता अपनाना केवल धार्मिक कर्मकाण्ड ही नहीं है, केवल परलोक की तैयारियाँ ही नहीं है, मरने के बाद मुक्ति या स्वर्गलोक प्राप्त करने का आधार ही नहीं है, बल्कि इसी जीवन में सुख और शान्ति से ओत-प्रोत होने का रास्ता है। मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा या नहीं? यह हम नहीं जानते, लेकिन इसी जीवन में स्वर्ग स्थापित कर सकते हैं, आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर चलते हुए।
मित्रो, साधना नकद धन है, यह उधार नहीं! कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिनका परिणाम तुरंत मिलता है, लेकिन कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिनका परिणाम तुरंत नहीं मिलता। विद्या पढ़ने का परिणाम शायद तुरंत ही मिल जाता है। गलत काम करने के परिणाम देर से मिलें, लेकिन अपने दोष और दुर्गुणों के परिणाम तुरंत ही मिल जाते हैं। इसी तरीके से अध्यात्म एक ऐसी प्रक्रिया का नाम है, जो मनुष्यों को तुरंत लाभ प्रदान करती है, जिसका परिणाम तुरंत मिलता है।
आज हमारे पास नकली अध्यात्म है। नकली अध्यात्म से परिणाम प्राप्त करने में देर लगती है और लम्बा इंतजार करना पड़ता है, देर तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है और यह उम्मीद लगानी पड़ती है कि हमारी मौत आयेगी और भगवान के यहाँ जायेंगे और अध्यात्म का परिणाम इस तरीके से मिलेगा।
स्वर्ग के बारे में यह ख्याल है कि कोई स्थान विशेष है, जगह विशेष है। हमारे ख्याल से जहाँ तक हम समझ पायें हैं कि किसी स्थान का जगह का नाम स्वर्ग नहीं है! बल्कि स्वर्ग आँखों से देखने का एक तरीका है। जैसे फोटोग्राफ लिए जाते हैं। किसी आदमी का अगर हम सामने से फोटोग्राफ लें तो उसकी आँखें, नाक, कान दिखायी देंगे, चेहरा दिखायी देगा और हँसता हुआ मनुष्य दिखायी देगा, अगर पीछे से किसी आदमी का फोटोग्राफ लें तो उसके बाल और पीठ दिखायी देगी। उसमें नाक, कान, आँखें, मुँह कुछ भी दिखायी नहीं देता है। फोटोग्राफ आ गया, यह किस आदमी का है, पता ही नहीं। क्योंकि उसकी मूँछें-दाढ़ी तो हैं ही नहीं। उसका चेहरा तो है ही नहीं, माथा तो है ही नहीं, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि उसके यह सब चीजें नहीं हैं। पीछे से फोटोग्राफ लेने के कारण ये सब चीजें दिखायी नहीं पड़तीं। दुनिया भी ठीक इसी प्रकार से है। हमारा जीवन और समस्याएँ भी इसी प्रकार से हैं और परिस्थितियाँ भी ठीक इसी प्रकार की हैं। जब हम इन सबको देखने का तौर-तरीका या नजरिया बदलते है, तो हमें अपनी समस्याएँ, विपत्तियाँ दिखायी पड़ती हैं और जब चीजें उल्टी-पुल्टी दिखायी देती हैं। हमें अपने जीवन में अभाव मालूम पड़ते हैं।
एक आदमी था, जो कह रहा था कि यह अभागा गुलाब ऐसी परिस्थिति में पैदा हुआ कि इसके भाग्य फूट गये। काँटों में पैदा हुआ, क्या कर्म में लिखा कर लाया? जहाँ इसका जन्म हुआ वहाँ काँटे ही काँटे। दूसरा आदमी कह रहा था-कैसे भाग्यवान काँटे हैं कि गुलाब के साथ पैदा हुए। क्या सुंदर गुलाब है जो काँटों में उगा है। गुलाब कितना सौभाग्यशाली है जो कि काँटों के साथ जुड़ा है। यह देखने का तरीका है। जो लोग जीवन को उल्टे तरीके से देखते हैं अनेकों अपना जीवन कठिनाइयों से अभावों से, संकटों से, विपत्तियों से भरा मालूम पड़ता है। वैसे हमारे सुखों में अभाव नहीं है, हमारी शाँति में अभाव नहीं है। लेकिन जब हम आसमान की ओर देखते हैं। तब हमको बहुत मुसीबत मालूम पड़ती है। हमारा बड़ा वाला अफसर दो हजार रुपये कमाता है और हमको पाँच सौ पचास रुपये भेजता है। बड़ा क्लेश होता है, ईर्ष्या होती है कि बड़ा अफसर हमारे घर के पास रहता है। कितना बढ़िया मकान, मोटरकार, नौकर-चाकर और हमारे पास साइकिल है। हम कहीं भी जाते हैं, तो साइकिल से जाते हैं। कोठरी में रहते हैं। हम कभी देखें तो दुनिया में हमसे भी ज्यादा परेशान, दुखी लोग हैं। धिक्कार है हमारा जीवन, जो हम दुखी होते हैं। हमसे भी ज्यादा दुखी वे लोग हैं, जो झोंपड़–पट्टी में रहते हैं, जिनके पास पहनने को कपड़े नहीं हैं, खाने को अन्न नहीं है। किसी दिन नौकरी मिल जाती है और किसी दिन नहीं! यदि उनके साथ मुकाबला करें तब हमको मालूम पड़ेगा कि हमारे सुखों का कोई ठिकाना नहीं है। हम बहुत सुखी हैं।
मित्रो, सुख कोई वस्तु नहीं है। लोगों के देखने का दृष्टिकोण का नाम ही सुख है। लोगों का ख्याल है कि जिसके पास धन-संपत्ति नौकर-चाकर कार-बंगला आदि है वही सुखी होते हैं। नहीं यह बात गलत है। हमारा संपत्ति वाले लोगों से बहुत मिलना-जुलना रहा है। संपत्ति वाले सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा कहीं अधिक दुखी और परेशान नजर आते हैं। केवल हमें मालूम पड़ता है कि ये लोग सुखी हैं। हम भी वही चीजें पाने की कोशिश करते हैं, नकल करते हैं, लेकिन जब इनका दिल खोलकर देखा जाए, समझने की कोशिश की जाए, तो इन्हें सामान्य आदमी से भी ज्यादा दुखी पाते हैं।
हेनरी फोर्ड संसार का सबसे बड़ा आदमी जब मरने लगा तो उसने अपनी डायरी में एक वृत्तांत लिखा कि मैं अपनी फैक्टरी में काम करने वाले मजदूरों को मोटी-मोटी रोटियाँ खाता हुआ देखता हूँ तो मुझे ईर्ष्या होती है, डाह होती है कि मैं हेनरी फोर्ड संसार का सबसे धनी व्यक्ति, पर मुझे कभी नींद नहीं आयी। मुद्दतों से सोया नहीं, खाना भी कभी हजम नहीं हुआ। उन्होंने लिखा- हे भगवान! जब मुझे मौत आये और मैं दुबारा जन्म लूँ तो मैं चाहूँगा कि मुझे इसी फैक्टरी में लोहा काटने का काम मिल जाये। मैं मजदूरों के साथ काम करूँ। छड़ी चलाऊ तथा हथौड़ा चलाता रहूँ, ताकि मेरा पेट ठीक से काम करे, मुझे नींद अच्छी आये। हेनरी फोर्ड समझता था कि सबसे सुखी व अमीर आदमी हैं और मजदूर समझते थे कि हेनरी फोर्ड सबसे अमीर व सुखी आदमी है। इसी तरीके से दोनों एक दूसरे को सुखी व अमी आदमी समझते थे। कौन सुखी और कौन दुखी है जहाँ तक हम समझते हैं कि यह मनुष्य के ख्याल हैं, जो उसे सुखी व दुखी बनाते हैं।
एक था मल्लाह और एक था उसका पुत्र। दोनों एक बड़ी नाव पर सवार होकर समुद्र में उसे खेते हुए जा रहे थे। थोड़ी देर बाद तूफान आया और नाव डगमगाने लगी। मल्लाह ने अपने बेटे से कहा कि ऊपर जा और अपनी पाल को ठीक से बाँध दे। पाल को अगर ठीक से बाँध दिया जाएगा तो हवा का रुख धीमा हो जाएगा और हमारी नाव डगमगाने से बच जायगी। बेटा बाँस के सहारे ऊपर चढ़ गया और पाल को ठीक तरीके से बाँधने लगा। उसने जब ऊपर की ओर देखा तो उसे चारों तरफ समुद्र की ऊँची लहरें दिखायी दे रहीं थीं। जोरों से हवा चल रही थी। सब ओर सुनसान नजर आ रहा था। अँधेरा छाता जा रहा था। कोई भी व्यक्ति दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा था। यह सब देखकर बेटा चिल्लाया-पिताजी मेरी तो मौत आ गयी, देखिये दुनिया में प्रलय होने जा रही है।” तब उसका पिता चिल्लाया-बेवकूफ सिर्फ नीचे की ओर नजर रख और इधर-उधर मत देख।” बाप उस वक्त हुक्का गुड़गुड़ा रहा था। बेटा नीचे चला आया।
अपने बेटे की तरफ हुक्का बढ़ाते हुए उसने कहा कि अपने से ऊपर देखने वाले महत्त्वाकाँक्षी व्यक्ति दिन-रात जलते रहते हैं। लोकैषणा, वित्तैषणा और पुत्रैषणा वाले मनुष्यों की कामनाएँ असीम और अपार हुआ करती हैं। ऐसे व्यक्ति को न शाँति मिलने वाली है और न मुक्ति। मनुष्य का जीवन शाँति वाला होना चाहिए, उन्नतिशील-प्रगतिशील जीवन होना चाहिए, अशाँत और विक्षुब्ध नहीं, लेकिन यह सब नहीं होता।
मित्रो, दोनों चीजें मालूम तो पड़ती हैं एक समान, लेकिन इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। जीवन में उन्नति करना एक बात है और प्रगति करना दूसरी बात। इसके लिए आदमी को धैर्य, साहस, मुसकराहट, संतुलन, परिश्रम की जरूरत है। इन पाँचों के सहारे उन्नति के रास्ते खुलते हुए चले जाते हैं और मनुष्य प्रगति करता हुआ चला जाता हैं। जो छोटे-छोटे आदमी आगे बढ़ें हैं और सफलताएँ पायीं हैं, भौतिक और आध्यात्मिक शक्तियाँ प्राप्त की हैं। उनके संबल और सहारे रहे हैं-संतोष उत्साह, परिश्रम, संतुलन। इन चीजों के द्वारा ही वे आगे बढ़ें हैं। लेकिन जिन्होंने अपने आप को आकांक्षाओं की आग में जलाना शुरू किया कि हमको ये नहीं मिला, हमको वह नहीं मिला, हम तो मर जाएँगे, ये करेंगे, वो करेंगे। जो व्यक्ति परिश्रम से घबराते रहे, बड़बड़ाते रहे, जिन्होंने अपना सारा का सारा मानसिक संतुलन खो दिया, वे जीवन में क्या कुछ प्राप्त कर सकेंगे? जो वस्तुओं में शाँति की तलाश करते रहेंगे, वे अपने गिरह की भी शाँति खो बैठेंगे।
मित्रो! अध्यात्म जीवन जीने की प्रणाली है, जीवन जीने की प्रक्रिया है। मरने के बाद स्वर्ग मिलता है कि नहीं, यह मैं नहीं जानता, लेकिन मैं यह जानता हूँ कि आध्यात्मिकता के सिद्धांतों को यदि हम जीवन में समाविष्ट कर सकते हों तब, हमारे चारों ओर स्वर्ग बिखरा हुआ दिखाई पड़ेगा। तस्वीर खींचने का यदि हमको सही ढंग मालूम हो तो हम इस दुनिया की बेहतरीन तस्वीरें खींच सकते हैं और अपने आप की भी। हमारी भी तस्वीरें बेहतरीन है, लेकिन यदि हमने दुनिया की खराब वाली तस्वीर देखना शुरू किया, अपना कैमरा कहीं गलत जगह पर फोकस कर दिया तब हमको क्या चीजें मिलने वाली हैं? तब सबसे ऊपर की शक्ल या सिर आएगा या फिर पैर आएगा और यदि उसी आदमी को बैठाकर फोटो खींचेंगे तो मालूम पड़ेगा कि कोई लम्बा-लम्बा भूत खड़ा हुआ है। कैमरे को लेन्स वही है, जिससे आपने व्यक्ति को सामने खड़ा करके फोटो लिया था। कैमरे का लेन्स वही है, जिससे आपने व्यक्ति को सामने खड़ा करके फोटो लिया था। कैमरे को लेन्स वही है जो आपने पीठ पीछे से लिया हैं, खड़ा करके। आपको दुनिया का नहीं, अपने अंतरंग जीवन का फोटो लेना है और उसके आधार पर अपनी शाँति, सुख, समृद्धि का मूल्याँकन करना है। अध्यात्म को अपने जीवन का अंग बनाना है।
साथियो! आध्यात्मिकता एक फिलॉसफी है- एक दर्शन है, सोचने-समझने की प्रणाली है, जीवन जीने की कला है। हमें अपनी समस्याओं के बारे में सोचना है। यदि हमारा विचार करने का क्रम ठीक हो तो हम आपको आशीर्वाद दे सकते हैं कि आपका जीवन सुखों से भरा हुआ हो, आप प्रसन्न रहें, उन्नति से भरा हुआ हो सकता है, यदि आपको सही ढंग से देखना आता हो तब। मान लीजिये किसी के कुटुम्बी की मौत होने वाली है। ठीक है आपको अपना भाई-भतीजा चाचा-ताऊ दादा-दादी प्यारे थे, लेकिन दूसरों को भी आवश्यकता है-अपने भाई-भतीजों को गोद में खिलाने की। यदि हम उनको चिपकाकर रखेंगे तो किसी के घर ढोलक कैसे बजेगी? मिठाई कैसे बाँटी जाएगी? कोई माँ अपने लाल को कैसे धन्य होगी? एक का आनंद-दूसरे का शोक, एक का नफा दूसरे का नुकसान-यही दुनिया का क्रम है।
यदि हमारे विचार करने का क्रम सही हो जाए तब हमें बढ़िया से बढ़िया चीजें देखने को मौका मिलेगा। यदि इन आँखों का लेन्स बदल दिया जाय और उस लेन्स से हम चीजों को देखें जो देखने लायक है जो मजा आ जाएगा। हमारे पड़ोस में ब्लॉक बनाने वाला रहता है। उसके पास कई तरह कई तरह के कैमरे रहते हैं। हम उससे तस्वीरें बनवाते रहते हैं। उसके पास कई रंग मिले रहते हैं। उसके पास कई रंग के ब्लॉक है, जिनसे वह तरह-तरह के रंगों से रंग-बिरंगे चित्र तैयार कर लेता हैं। अलग-अलग तस्वीर की अलग-अलग प्लेटें तैयार करता है और सुंदर चित्र छाप देता है।
इसी तरह मित्रों! मनुष्य के भीतर दुष्टताएँ, कमियाँ, बुराइयाँ और मूर्खताएँ होती हैं, लेकिन दुनिया में कोई भी मनुष्य इस तरीके का नहीं बनाया गया हैं, जिसके अन्दर कमियाँ ही कमियाँ हों, बुराइयाँ ही बुराइयाँ हों। ऐसा इनसान हमने आज तक नहीं देखा कि जिसमें सिर्फ कमियाँ और बुराइयाँ ही हों, अच्छाइयाँ न हों। कसाई के भीतर भी अच्छाई होती है। वह भी अपने बच्चों से प्यार करता है। डाकू के भीतर भी विशेषता होती है और वह है उसका-साहस डकैती के कारण उसको परलोक में दंड मिलता है, उसको जेल जाना पड़ता है। वह लम्बी-लम्बी सजाए भुगतता है। लेकिन उसके साहस के कारण उसको यश भी मिलता है, पैसा भी मिलता है। रात में जंगलों में घुसने पर जब हमको भय का भूत सताता है, तब वह अपने कंधे पर बंदूक रखकर लंबे-लंबे डग भरता है। यह उसकी विशेषता है।
मित्रों! हर मानव विशेषताओं से भरा हुआ है। हमारे देखने वाले आँखों के लेन्स यदि सही हों, खींच लेते है, जैसा कि हमारे पड़ोस में रहने वाला फोटोग्राफर हर ब्लॉक को अलग निकाल लेता है, लाल रंग को अलग निकाल लेता है-पीले रंग को अलग निकाल लेता है, लाल रंग को अलग कर सकता है, तो हममें से हर मनुष्य यदि अच्छाइयों को देखना शुरू करे और अच्छाइयों को ही प्रोत्साहन दे, अच्छाइयाँ बढ़ाने का प्रयत्न करे, तो सर्वत्र अच्छाइयाँ बढ़ाने का प्रयत्न करे, तो सर्वत्र अच्छाइयाँ ही अच्छाइयाँ नजर आएँगी।
आप कहेंगे कि बुराइयों से कैसे लड़ा जाएगा, उनको कैसे खत्म किया जाएगा? बुराइयों से लड़ने के बहुत से तरीके हैं। उनमें से एक तरीका यह है कि उस पर लाँछन लगा करके तथा मारपीट करके व गाली-गलौज करके उसको अपमानित करते हैं। अपमानित करने के बाद में उसे ढीठ बनाते हैं। दूसरा तरीका बुराइयों को दूर करने का यह है कि हम अपने आपको सुधारें। अपने को सुधारने के लिए बड़े-से बड़े काम किये जा सकते हैं। कुशल डॉक्टर अपना तेज चाकू ले आता है और बड़े प्यार से मोहब्बत से मरीज के कभी पेट पर चलाता है, तो कभी टाँग के ऊपर, तो कभी सिर के ऊपर चलाता है। जगह-जगह चाकू चलाता रहता है और आपरेशन चलता रहता है। परंतु यह सब कुछ वह बिना गुस्से के करता है, बिना घृणा के चाकू चलाता है। डॉक्टर के ऊपर आप मुकदमा नाहीं चलाते, उसको सजा नहीं दिलाते, क्योंकि वह आपकी जान बचाता है। पेट में छुरा घोंप देने वाले, मारने वाले को दस साल की सजा हो जाती है, लेकिन आपरेशन करने वाले, चाकू चलाने वाले डॉक्टर की तरक्की की जाती है। यह सब नीयत का कमाल है। नीयत अच्छे व्यवहार के लिए भी की जाती है और इसी आधार पर अच्छे लोगों को बदनाम भी किया जा सकता है।
मित्रो! यदि हम सबका दृष्टिकोण बदल जाय तो तो क्या से क्या हो सकता है? बेलनगंज,
जो कि आगरा शहर का एक मोहल्ला है, वहाँ के एक सम्पन्न व्यक्ति को पन्द्रह दिन से नींद आनी बन्द हो गयी। साथ ही साथ उसे ऐसी शिकायत हो गयी कि दिमाग की नसें फटने लगीं और ऐसा लगने लगा कि उसकी मौत हो जाएगी। आँखें बिलकुल लाल-लाल हो गयीं। यह सब लक्षण देखकर घरवालों की लगन लगी कि सचमुच उसकी मौत हो जाएगी। पंद्रह दिनों से नींद न आने के कारण उसका बुरा हाल था। किसी ने कहा था कि मथुरा में एक आचार्य जी रहते हैं, उनके पास जाने से कई आदमी अच्छे हो गये हैं, तुम भी उन्हीं के पास चले जाओ। इससे पूर्व उन्नाव की एक महिला, जो एक तहसीलदार की पत्नी थीं, और वही प्रिंसिपल थीं, आयी। उस स्त्री का बुरा हाल था। वह खूब रोया करती थी। किसी ने उससे कहा कि आचार्य जी के पास मथुरा चली जाओ। वह मेरे पास आयी। मैंने उसके सिर पर पट्टी बाँधी और वह बैठे-बैठे वहीं तख्त पर सो गयी। ऐसे ही किस्से-कहानियाँ किसी ने उसे सुना दिये थे। वजह ठीक होकर चली गयी।
हाँ तो आगरा वाले व्यक्ति को लोग मेरे पास लाये और कहा कि इनको पंद्रह दिन में नींद नहीं आयी है। आँखें सूजकर लाल हो गयीं हैं। नसें फटी जा रही हैं। अगर इनको नींद नहीं आयेगी तो यह मर जाएँगे। महाराज जी इनका इलाज किया जा सकता है और इन्हें अच्छा भी किया जा सकता है। उनके साथ आये हुए लोगों को हमने दूसरे कमरे में भेज दिया। फिर उनसे पूछा कि क्या बात है? उन्होंने कहा कि क्या बात है? उन्होंने कहा कि हमारे साथ एक काण्ड हो गया है। हमारे घर में इनकम टैक्स अफ़सर ने छापा मारा था, जिसमें दो बही-खाते ले गये थे। यह सब हमारे मुनीम ने कराया था। उसने जाकर अफ़सर को बताया और अपने साथ सेल्स टैक्स अफ़सर को बताया और अपने साथ सेल्स टैक्स अफ़सर व इनकम टैक्स अफ़सर को ले आया। छापा मारने के बाद में हमारे दोनों बही-खातों को पुलिस ले गयी। उसके बाद हमारे ऊपर केस चलाया गया। हमारी गिरफ्तारी हुई। अब हम जेल से छूट गये हैं, लेकिन हमको भय लगता है कि अब न जाने क्या होने वाला है। अब हमारा क्या होगा?
यह सब सुनकर मैंने राहत की साँस ली और कहा कि आप थोड़ी देर आराम से बैठ जाइये। आपकी बीमारी तो दूर हो जाएगी, लेकिन इसके साथ-साथ हम आपको इस मुकदमें से छुटकारा दिलाना चाहते हैं। वह हँसने लगा कि कैसे दिलायेंगे। मैंने पूछा-अच्छा बताइये आपके असली और नकली बहीखाते में वास्तव में कितने खर्चे का अंतर है? उन्होंने कहा दस लाख रुपये करीब का अंतर है। फिर पूछा-अगर आपको इनकम टैक्स देना पड़े तब कितना नुकसान भरना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि करीब बीस लाख रुपये का अंतर है। हमें बीस लाख रुपये देने पड़ेंगे। मैंने उनसे सहानुभूति जताई और कहा आपके पास क्या-क्या सामान है तथा कितनी संपत्ति व जायदाद है? वह कागज-पेन्सिल लेकर बैठ गये और नोट करने लगे। उन्होंने बताया कि फैक्टरी व उसमें लगी मशीनों तथा बैंकों में जमा पैसा, इधर-उधर की लेने-देन का, सब मिलाकर कोई पचास लाख रुपये की संपत्ति है। हमने कहा कि अगर इसमें से बीस लाख निकाल दिया जाय तो कितना रुपया बचेगा? उनने कहा-तीस लाख।
मैंने कहा कि मेरे पास तो तीस पैसे भी नहीं हैं, फिर भी देखिये क्या मौज की जिंदगी जीता हूँ। मान लीजिए अगर गवर्नमेन्ट आपके बीस लाख रुपये ले लेती है, तो भी आपके पास तीस लाख बचे रहते हैं। तीस लाख रुपये किसे कहते हैं? तीस लाख रुपये के तीस हजार प्रति लाख रुपये के तीस हजार प्रति महीने ब्याज होगा। आप जब मुकदमें से छूट जाएँ और बीस लाख जुर्माना चुका दें तब आप मुझे बुला लेना। आपका जो बचा हुआ पैसा है, उससे आपको एक क्वार्टर दिला देंगे। और शेष रुपये बैंक में जमा करा देंगे। आपको तीस हजार रुपये महीने की आमदनी उससे मिलती रहेगी और आप घर बैठे आनन्द किया करेंगे। बात उनकी समझ में आ गयी। जब मैंने उनसे पूछा कि आपका महीने में कितना खर्च करने के बाद आपके पास कितना बच रहता है? पच्चीस हजार। मैंने कहा कि पच्चीस हजार रुपया एक महीने में बच जाता है तो साल भर में कितना हो जाएगा? उनने कहा-तीन लाख रुपये। अगर आप इतना रुपया सात-आठ साल तक बचाये तो कितना रुपया हो जाएगा? उनने कहा-तीस लाख रुपये। मैंने कहा कि अगर गवर्नमेंट आपका बीस लाख रुपये ले ले तो आपका क्या हर्ज होगा? आप सोच लीजिए कि सात-आठ साल तक आपने कमाया ही नहीं। वह मुस्कराने लगा। फिर मैंने उसे माताजी के पास भेज दिया। मैंने पूछा कि क्या आप पतली रोटी खाते हैं? आप माताजी के हाथ की रोटियाँ खाइए, मोटे हो जायेंगे। उस रात उसे पूरी नींद आयी। लोगों ने कहा-क्या आप इनसे जप वगैरह कराएँगे? मैंने कहा-नहीं उसके जाने के बाद घरवालों की चिट्ठियाँ आयीं कि न जाने आपने कौन-सा मंत्र फूँक दिया है कि वह अब एकदम स्वस्थ व प्रसन्नचित्त हैं।
मित्रो! यदि हमारे सोचने का, देखने का ढंग बदल दिया जाय तो जीवन में आनंद और उल्लास आ जाएगा। लोग मरने के बाद स्वर्ग का, मुक्ति का ख्वाब स्वर्ग देखने की इच्छा कम से कम मेरे जैसा पसन्द नहीं करेगा। मुसलमानों के स्वर्ग के बारे में मैंने पढ़ा कि वहाँ पर शराब की नहरें बहती रहती हैं। जब पीना हो तो शराब। मुसलमानों की जन्नत में सत्तर हूर व बहत्तर गुल में हैं, जो सेवा करते हैं। मित्रों, अगर हमको इस तरीके की जन्नत मिल जाये तो मैं मर जाऊँगा। अगर कोई आदमी रेलगाड़ी में बीड़ी पीता है, तो मैं अपना सिर खिड़की से बाहर निकाल लेता हूँ, लेकिन जहाँ सब लोग शराब पीते हों, ऐसी जन्नत में जाकर मैं क्या करूँगा। जिस जन्नत में हूरों के, अप्सराओं के नाच-गाने चलते हों, ऐसी जगह जाना मैं कभी पसन्द नहीं करूँगा।
हिंदुओं के स्वर्ग के बारे में भी मैंने पढ़ा है कि वहाँ इंद्र का दरबार लगा रहता है और सुबह से शाम तक नाच-गाना ही चलता है। ऐसा स्वर्ग देखने की जरूरत होगी, खाने के लिए बढ़िया-बढ़िया चीजें होगी और घूमने के लिए मोटर कारें होंगी तो मैं अशोका होटल, नटराज होटल चला जाऊँगा। दो सौ रुपये रोज का फ्लैट लूँगा, पैसे कमा कर लाऊँगा और खूब मौज करूँगा। जब ऐसा स्वर्ग मुझे इसी जिंदगी में धरती पर मिल सकता है, तो फिर मैं मरने का इंतजार क्यों करूँ। यदि इसी का नाम स्वर्ग है, खाने-पीने की सुविधा का नाम, नाच-रंग देखने का नाम स्वर्ग है, तो वह स्वर्ग तो यहीं पर है। कम से कम मेरे जैसा आदमी जिसने परिश्रम से प्यार किया है, जिसे पसीना बहाये बिना नींद नहीं आती। जो आदमी श्रम के बिना, सेवा के बिना, सहानुभूति के बिना जिन्दा नहीं रह सकता, ऐसा पाया है मैंने मन। मुझे तो उस स्वर्ग से भागना पड़ेगा और कहना पड़ेगा कि कृपा करके मुझे यहाँ से विदा कर दीजिये। क्योंकि मुझे गरीब, पिछड़े, असहाय लोगों की सेवा करनी है। क्रमशः
निठल्लापन व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के लिए अकल्याणकारी है।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
इस माह से यह विशिष्ट सामग्री देने का क्रम आरंभ किया जा रहा है। इसमें परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा आज से पचास वर्ष पूर्व संपादकीय के रूप में लिखें अमृत वचनों को उद्धत किया जाएगा। पृष्ठ सीमा के कारण अभी यह पठन सामग्री मात्र एक पृष्ठ की होगी। इस माह, मार्च 1949 के संपादकीय से लिया गया यह अंश यहाँ प्रस्तुत है।
हर आदमी विद्या-बुद्धि की शक्ति से सम्पन्न नहीं होता। किन्हीं बिरलों को ही यह ज्ञान सम्पदा मिलती है। सृष्टि में चौरासी लाख प्रकार के जीव-जन्तु, कीट-पतंग पशु-पक्षी बताये जाते हैं। इनमें नाममात्र की बुद्धि होती है, उसके सहारे वे बेचारे मुश्किल से अपनी जीवन यात्रा पूरी कर पाते हैं। उनका बुद्धिबल इतना कम होता है कि कई बार तो उन बेचारों को छोटी-छोटी अड़चनों के कारण अपने प्राण तक गँवाने पड़ते हैं और आये दिन तरह-तरह के दुख भोगने पड़ते हैं। यदि उनकी बुद्धि थोड़ी अधिक विकसित रही होती, तो भी मनुष्य की भाँति सुखी और समृद्ध रहे होते। परंतु कर्म की गति गहन होने के कारण उन्हें वह साधन प्राप्त नहीं हैं, फलस्वरूप मनुष्य की अपेक्षा कई दृष्टियों से अधिक सक्षम होते हुए भी जैसे-तैसे जीवन का भार ढो रहे हैं।
मनुष्य अन्य जीव-जंतुओं की तुलना में बहुत पिछड़ा हुआ है। पक्षियों की तरह वह आकाश में उड़ नहीं सकता, कच्छ-मच्छ की तरह जल में किलोल नहीं सकता, हिरन और घोड़े की बराबर बोझ नहीं ले जा सकता। हाथी के बराबर बोझ नहीं ले जा सकता। सिंह-व्याघ्र जैसा बलवान नहीं, भेड़-बकरी की तरह शाक–पात खाकर गुजारा नहीं कर सकता। ऊँट की तरह कई दिन बिना खाये-पिये नहीं गुजार सकता। सर्प की तरह सैकड़ों वर्ष जी नहीं सकता, जुगनू की तरह चमक नहीं सकता। मोर-सा सुन्दर नहीं, बन्दर-सी छलाँग नहीं मार सकता, सर्दी-गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर सकता। इतना निर्बल-पिछड़ा होते हुए भी वह अन्य समस्त जीव -जंतुओं से आगे बढ़ा हुआ है सृष्टि का मुकुटमणि है, सबका नेता तथा स्वामी है। इतनी बड़ी सफलता का एक ही कारण है-उसका बुद्धिबल ने ही उसे एक साधारण प्राणी से महान मानव बना दिया है।
नीति का वचन है कि ”बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धस्य कुतोबलम्” जिसमें बुद्धि है, उसमें बल है, निर्बुद्धि में बल कहाँ से आया? जो जितना ही बुद्धिमान है, वह उतना ही बलवान है। इसी की न्यूनाधिकता के कारण मनुष्य-मनुष्य के बीच अंतर दिखाई देता है। जिसमें जितना बुद्धितत्त्व अधिक है, वह उतना ही बड़ा आदमी बन जाता है। बहुत-थोड़े मनुष्य इस संसार में ऐसे हैं, जिनको विशिष्ट बुद्धिबल प्राप्त है, जो दूर की सोचते हैं, जिनका विवेक परिमार्जित है, जो बहुश्रुत हैं, जिनने विशाल अध्ययन किया है एवं जो असाधारण कार्य करने की क्षमता रखते हैं।
ज्ञान परमात्मा की अमानत है, धरोहर है। वह इसलिए दी गई है कि इस वह परमात्मा की इच्छानुसार, उसके बताये हुए प्रयोजनों में खर्च करे। बुद्धिमानों का परम पवित्र उत्तरदायित्व यह है कि वे अपने बुद्धिबल को जनकल्याण में लगायें। ठाट-बाट जमाने और गुलछर्रे उड़ाने में बुद्धि का उपयोग करने की बात सोचना उचित नहीं। एक राजा अपने नौकरों को नियत मात्रा में वेतन देता है, जिससे वे अपना गुजारा कर सकें, परंतु किसी विशेष को वह विश्वासपात्र समझकर उसे खजांची नियुक्त करता है और उसके पास बड़ी-बड़ी रकम जमा करता है। ये रकम इसलिये खजांची को दो जाती हैं कि वह उन्हें सुरक्षित रखें और सिर्फ उन कामों में खर्च करे, जिनके लिए राजा आज्ञा दे, राज का हित हो। यदि वह मनमाने उपयोग की बात सोचने लगा तो अनुचित होगा, उसे दंड मिलेगा। यदि खजांची को मौज-मजा करने के लिए धन राजा ने दिया होता तो इसी प्रकार दिनभर परिश्रम करने वाले अन्य कर्मचारियों को भी उतना ही धन क्यों नहीं दिया। यदि नहीं दिया तो राजा को पक्षपाती ठहराया जाएगा। यही बात परमात्मा के बारे में कही जा सकती है। उस के सभी पुत्र समान हैं, वह समदर्शी है, निष्पक्ष है। बड़ा उत्तरदायित्व मिलना किसी की योग्यता-श्रेष्ठता का सर्वोपरि प्रमाण है। जिम्मेदारी हर किसी के ऊपर नहीं डाली जाती। जो उसके अधिकारी है, उन्हें ही वह गौरव दिया जाता है। यह गौरव इतना बड़ा आनंद है कि उसकी तुलना इंद्रियों की क्षणिक खुजली मिटाने के-भोग भोगने के सुख से किसी भी प्रकार नहीं की जा सकती। महानता का गौरव प्राप्त करना एक आनंद है और वह इतना उत्तम, इतना उच्चकोटि का आनंद है कि उसके लिए इन्द्रियों के भोग और लोभ की तृष्णा को तिलाञ्जलि दी जा सकती है। बड़प्पन एक श्रेष्ठ आनंद है, पर वह आनंद यों ही नहीं मिल जाता। उसको प्राप्त करने वाले को त्याग करना पड़ता है, तप करना पड़ता है और तुच्छता से ऊपर उठना पड़ता है।
भगवान को समदर्शी-न्यायकारी-करुणासागर आदि नामों से पुकारा जाता रहा है। कोई यह आरोप उस परमपिता परमात्मा पर नहीं लगा सकता कि उसके साथ पक्षपात या अन्याय हुआ है, उसे वे साधन नहीं मिले जो औरों को मिले हैं। सामान्य स्तर के जीवधारियों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करते रहने योग्य क्षमता सभी को उस सत्ता ने अनायास ही समान रूप में ईश्वरीय सत्ता के दो भागों ने सुविधा की दृष्टि से जो कार्यक्षेत्र बाँटे हैं-उसमें प्रकृति के जिम्मे पदार्थ क्षेत्र की सुव्यवस्था बनाने और पुरुष के जिम्मे भावना क्षेत्र को सम्पन्न बनाए
चेतनात्मक जगत के अणु विस्फोट की वेला है यह
रख मानवी गरिमा के अनुरूप जीवन जीने की प्रेरणा वाले कार्य आते हैं। पूरा ब्रह्माण्ड माया-ब्रह्म की साझेदारी ये चल रहा है, फिर भी काम दोनों घटक बाँट-बाँटकर चलाते हैं। प्रकृति के-माया के शिकंजे में फँसा मानव पेट और प्रजनन के माध्यम से सृष्टि के क्रम को भी आगे बढ़ाता चलता है, अपनी जीवन यात्रा भी पूरी करता चलता है। पुरुष की-ब्रह्म की भूमिका, चेतना क्षेत्र को सुसंस्कृत बनाने में नियोजित होती है। ‘प्रकृति’ की तरह ‘पुरुष’ ने भी अपना क्रीड़ा क्षेत्र कम आकर्षक-कम महत्वपूर्ण नहीं बनाया है। वस्तुतः चेतना में सुसंस्कारिता के समावेश की नाप तौल करके ही यह जाना जा सकता है कि मानव की अन्तःचेतना पर परब्रह्म का कितना अनुदान बरसा, कितनी प्रकाश किरणें उतरीं। उपर्युक्त भूमिका प्रस्तुत वसन्त पर्व से आरंभ हुए ‘प्रखर साधना वर्ष’ के क्रम में परिजनों द्वारा अपनायी जा रही जीवन-साधना को दृष्टिगत रख लिखी गयी है। प्रायः छह अरब लोगों की इस दुनिया का भाग्य इन आगामी कुछ वर्षों में नए सिरे से लिखें जाने की शुभ घड़ी आ गयी है। ऊपर जो विभाजन दिया गया, उसमें मात्र पेट-प्रजनन की सीमा में सीमाबद्ध-पशु प्रवृत्तियों में निरत-नितान्त स्वार्थांधता व्यक्ति वे हैं जिन्हें नर पामर की नरपशु नरकीटक की संज्ञा दी गयी है। हमें नर पामर एवं नर मानव में अंतर समझना होगा एवं अधिक से अधिक व्यक्तियों करे नर मानव की परिधि में लाकर उन्हें देवत्व की दिशा में ऊँचा उठाने हेतु सामूहिक पुरुषार्थ करना होगा। यही युग-साधना है। मानव कौन है? मानव का अर्थ है- वे व्यक्ति, जिन्हें पारिवारिकता और सामाजिकता के साथ जुड़े हुए अनुबन्धों के प्रति विश्वास है-परिपालन का साहस है। जो परब्रह्म की छत्रछाया में जीकर मानवी आदर्शों को आत्मसात् करने का अवसर प्राप्त कर रहे हैं। एवं अपनी ही नहीं सारे समूह, समाज, विश्ववसुधा एवं युग के नवनिर्माण की उमंगों से जिनका अन्तःकरण हुलसता रहता है। प्रखर साधना वर्ष की साधना साधकों की संख्या में अभिवृद्धि करने हेतु सभी को समष्टि के उत्कर्ष हेतु किये जा रहे पुरुषार्थ में नियोजित करने का महान उद्देश्य लेकर महाकाल के श्रीचरणों में समर्पित है।
आकृति की दृष्टि से तो नर-पामर, नर−वानर, नरपशु, नरपिशाच, नर मानव और नरनारायण सभी के अंग-अवयव एक जैसे होते हैं, किंतु अंतर एक ही समझ में आता है-जब उनकी प्रकृति की जाँच-पड़ताल की जाती है। नर मानव एवं नर-नारायण को मानवी गौरव-गरिमा का ज्ञान होता है- राजहंस की तरह नीर-क्षीर का विवेक उनमें जीवंत पाया जाता है। मर्यादाओं का निर्वाह ही नीर-क्षीर विवेक है। कर्त्तृत्व पालन ही मोती चुगाना है। मानव-देवमानव ऐसा कदम नहीं उठाते, जिससे उन्हें लज्जित होना पड़े-उनकी आत्मा धिक्कारे। वस्तुतः चरित्रनिष्ठा ही मनुष्यता है, जिसे दो पलड़ों में रखकर मापा जाता है, एक अवांछनीय आकांक्षाओं, लिप्साओं पर नियंत्रण एवं दूसरा आदर्शों के क्रियान्वयन हेतु साहस भरा पराक्रम। इन दोनों को जो जीवनभर साध ले, उसका जीवन ईश्वर की नजरों में संतुष्टि देने वाला एवं दुनिया की दृष्टि में भी सफलतम माना जाता है। ऐसे व्यक्ति जब समाज में बढ़ने लगें तो मानना चाहिए कि परिवर्तन की घड़ी आ गयी। युग बदलने का वासन्ती संदेश आ गया।
चेतनात्मक प्रगति की अंतिम सीढ़ी-देवत्व पर पहुँचने का राजमार्ग एक ही है-स्वयं को पशु-प्रवृत्तियों से उबारकर मानव एवं फिर उत्कर्ष की दिशा में गतिशील हो साधनात्मक पराक्रम द्वारा अपने को अन्तःकरण की प्रगति की दृष्टि से सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित कर देना। ऐसा मानवी पुरुषार्थ दैवी सुयोग्यों के कारण बड़ी शीघ्रता से संपन्न होने-बड़ी उमंगों के साथ कठिनाइयाँ सहते हुए भी प्रसन्न रहकर करने का कभी-कभी अवसर आता है। ऐसे अवसरों को ही अवतारी चेतना के प्रवाह के प्रकटीकरण का समय कहा गया है। जब यह पुरुषार्थ समष्टिगत पुरुषार्थ में बदल जाय तो मानना चाहिए कि यह दैवी आकांक्षा का ही प्रतिफल है कि कइयों के मनों में तप व योग को साधते हुए आँतरिक उत्कृष्टता की अभिवृद्धि करने का बढ़चढ़कर कुछ करने का ज्वार-सा आ रहा है। निष्कलंक प्रज्ञावतार के प्रकटीकरण की वेला में करोड़ों व्यक्तियों द्वारा अपनी साधना का समष्टि हेतु नियोजन, असंख्यों देवमानवों के सृजन, उनके अंदर वैसी प्रवृत्तियों के उभरने जैसी परिणति के रूप में निकलता यदि आज दृष्टिगोचर हो रहा है, तो यह अकारण नहीं है। वस्तुतः यह समय ही विशिष्ट है।
22 जनवरी, 1999 का वसंत इस मायने में ऐतिहासिक रहा है कि इस युग ही नहीं, कई युगों में एक अपने आप में अभूतपूर्व एक साधनात्मक पुरुषार्थ का प्रखर वेग से सूत्रपात इस दिन हुआ है। जिस पावन दिन को प्रज्ञा परिजन-अखण्ड ज्योति के पाठक वृन्द अपने सूत्र−संचालक के अध्यात्मिक जन्मदिन के रूप में मनाते रहे हैं-उस दिन से एक साथ प्रायः चौबीस हजार से अधिक स्थानों पर युगसाधना का शुभारम्भ परोक्ष जगत की ऐसी घटना है, जिसके दूरगामी परिणाम प्रत्यक्ष जगत में परिजन आगामी कुछ दिनों-माहों में देखेंगे। यह वसंत मानवों के देवमानवों के रूप में ‘विकसित’ होने, अपनी गरिमा को पहचान अपनी साधना को जीवनसाधना के स्तर पर ले जाकर युग-साधना में परिणत करने का एक भागीरथी पुरुषार्थ लेकर आया है। जितने भी अवतार आए हैं- उनके आने के पूर्व से बाद तक के सारे घटनाक्रम क्रमशः प्रत्यक्ष जगत में सभी को स्पष्ट दृष्टिगोचर होते रहे हैं। एकाएक कोई चमत्कारी घटना घटी एवं तुरंत असुरता का निवारण हो-युगपरिवर्तन हो गया-ऐसा नहीं हुआ है। इसी तरह परमपूज्य गुरुदेव के आँवलखेड़ा स्थित साधना कक्ष में जल रहे अखण्ड दीपक से 1926 की वसंत पंचमी के पावन दिन उनकी सूक्ष्म शरीरधारी गुरुसत्ता का प्रकट होना-उन्हें दैवी संदेश मिलना-अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के द्वारा उत्कृष्टता के विस्तार हेतु एक नयी क्राँतिकारी शुरुआत होना-गायत्री तपोभूमि की स्थापना के माध्यम से चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों की श्रृंखला की पूर्णाहुति होना तथा 1958 में आयोजित सहस्रकुण्डीय गायत्री महायज्ञ के माध्यम से बंधन मुक्त गायत्री व यज्ञ विधा का चतुर्दिक् विस्तार हो एक विराट गायत्री परिवार बनना-प्रज्ञावतार के क्रिया-कलापों का प्रायः चालीस वर्षों में फैलना एक लेखा-जोखा कहा जा सकता है। आज जिस स्थिति में विश्वव्यापी गायत्री परिवार है-उसके मूल में मनुष्य का कायाकल्प कर-उसके चिंतन में क्राँतिकारी परिवर्तन कर उसे उत्कृष्टता की दिशाधारा में सोचने हेतु विवश करने वाली वह संजीवनी साधना ही रही है, जिसे आप चाहें तो गायत्री महाशक्ति कह सकते हैं अथवा विचारक्रांति अभियान अथवा यज्ञों के माध्यम से मानवमात्र का नवनिर्माण करने वाली युगांतरीय चेतना।
अणु विस्फोट स्थूल जगत में होता है, तो उसके परिणाम तत्काल काफी अधिक दिनों तक दिखाई देते हैं। चेतना जगत में होने वाला अणु विस्फोट कितने विराट स्तर के-सारी विश्वमानवता को प्रभावित करने वाले परिणाम लेकर आता है- यह इस युग के मानव को अभी देखना है। गायत्री महाविद्या का सार्वभौम रूप लेकर उज्ज्वल भविष्य के अवतरण की, सद्बुद्धि की प्रार्थना के माध्यम से वैश्वीकरण-समस्त संप्रदायों के बंधन तोड़कर समग्र मानव समुदाय के चिंतन में उसका प्रवेश चेतना जगत का, इस युग का अणु विस्फोट है। आत्मशक्ति के संवर्द्धन से युगशक्ति के उद्भव की यह विस्फोटक प्रक्रिया क्या रंग लाएगी, इसे हम आने वाले कुछ समय में देखेंगे। हम जहाँ भी हैं, जिस भी स्तर के साधक है, यदि इस विशिष्ट वेला में कुछ विशिष्ट कर दिखाने हेतु तत्पर हो जाएँ तो अपने सौभाग्य को कुछ वर्षों बाद हम ही सराहेंगे। अपनी समझदारी को जो समय पर अपना ली गयी, बार-बार धन्यवाद देंगे।
बार-बार समय की विशिष्टता, दैवी आकांक्षा, युग-परिवर्तन की वेला एवं साधना पराक्रम की बात इन पंक्तियों में कही जाती रही है। इस वर्ष सारे भारत व विश्व में ढाई दिवसीय अखण्ड जप प्रधान आयोजनों की श्रृंखला चल रही है, जो न्यूनाधिक रूप में 2001 के आने तक भी चलती ही रहेगी। ऐसे आयोजन भावपूर्ण वातावरण में जितनी अधिक संख्या में होंगे-उतना ही अनिष्ट के कम होने -समष्टि का कल्याण होने की संभावनाएँ बढ़ती चली जाएँगी। नए साधक जो जुड़ रहे हैं-वे तो विगत अंक में बताए एवं मार्गदर्शक तीन पुस्तिकाओं के अनुसार अपना क्रम बनाते चलेंगे। इससे अधिक उन्हें कुछ करना है, तो वह उसी के परिमाण को बढ़ाने के रूप में, पुण्य-परमार्थ की प्रवृत्ति के समावेश के रूप में हैं। अधिक-से-अधिक समय देवसंस्कृति के विस्तार के निमित्त इन दो वर्षों में नियोजित होना चाहिए, अधिक-से-अधिक साधनों का अंश उसी के निमित्त किये जा रहे कार्यों में अब लगना चाहिए। वैयक्तिक सुविधाएँ बढ़ाने के स्थान पर अब राष्ट्र की, संस्कृति की सेवा हेतु नियोजित अंशदान जितना अधिक होगा-उतना ही दैवी-अनुदानों के बरसने का अनुपात बढ़ता चला जाएगा।
जो पहले से साधना करते रहे हैं, स्वयं दिन-रात युग निर्माण पुरुषार्थ में जुटे रहते हैं, उन्हें अपनी साधना-उपासना को जीवन -साधना के रूप में फलित कर निज के व्यक्तित्व परिष्कार के रूप में उसे संपन्न कर दिखाना है।
वस्त्रों से बसंती पीले कपड़े वाले परिजन तो ढेरों हैं, पर जिनके व्यक्तित्व से वसंत झलके, ऐसों की युग नेतृत्व करने वालों की संख्या अब बढ़नी ही चाहिए। इन्हीं को वरिष्ठ, विशिष्ट एवं विशेषज्ञ स्तर का कहा गया है। वाणी से व्यक्तित्व तक मात्र वसंत हो अभिव्यक्त हो-वाणी पर सरस्वती, आचरण में देवत्व एवं आकांक्षाओं के माध्यम से बसंती उल्लास झलकता दिखाई दे तो जीवनसाधना फलित हो साधना सत्र के आयोजक को भाग लेने वाले साधकों से ऊँचे दर्जे का विशिष्ट नजर आना ही नहीं, होना भी चाहिए। ऐसे साधक जो स्वयं को वरिष्ठ कहते हैं-मिशन से जिनकी साझेदारी लम्बी-नहीं तो गहरे स्तर की हो चुकी है, अपनी वैयक्तिक साधना का स्तर भी ऊँचा उठाएँ। मालाओं की संख्या बढ़ाने के रूप में नहीं-अपने व्यक्तित्व के परिष्कार के रूप में प्रतिभा के उन्नयन के रूप में। जितना भी जप संपन्न हो भावपूर्वक हो-गुरुसत्ता की चेतना से एकाकार होकर संपादित किया गया हो-साथ ही उनका वैचारिक सामीप्य भी पाने हेतु स्वाध्याय का सुनियोजित नियमित क्रम चल रहा हो। साधना की धुरी पर संगठन बनने का भारी दायित्व इससे कम में नहीं उठाया जा सकता। जो भी सप्त-महाक्रान्तियाँ संपन्न होती हैं- वैचारिक धरातल पर नहीं मात्र प्रचारात्मक हलचलें मचाकर नहीं, साधनात्मक धरातल पर ही संपन्न हों सकती हैं। श्रेष्ठ साधक युग मनीषी ही युगपरिवर्तन को साकार कर दिखाएँगे-यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
अब सभी वरिष्ठ स्तर के साधक जो पहले से गायत्री साधना करते रहे है, अधिक-से-अधिक समय देव-संस्कृति के विस्तार हेतु जन-जन तक उसके निर्धारण करें। यदि वे आगामी दो वर्षों में प्रतिवर्ष 3 से 6 माह का समय भी केन्द्र द्वारा निर्देशित कार्यों के क्षेत्रीय स्तर पर संपादन में देते हैं, तो इसमें इन्हें जो पुण्य अर्जित होगा उसका मूल्याँकन अभी तो नहीं कुछ वर्षों बाद वे स्वयं करेंगे तो पुलकित हुए बिना न रहेंगे। यदि कुछ विशिष्ट साधना इन दो वर्षों में करने का किन्हीं का मन है, तो उसके लिए सीमित समय नियोजित कर अपने व्यक्तित्व का स्वयं मूल्याँकन कर, जो कमियाँ है, उन्हें दूर करने, जिन विशेषताओं को बढ़ना है, उनका संवर्द्धन करने के लिए चौबीस गायत्री महाशक्तियों में से किसी की भी साधना का क्रम अपना सकते है। आधे घंटे से एक घंटे में संपन्न हो जाने वाली से साधनाएँ इन दो वर्षों में अनेकानेक शुभ परिणाम दे व्यक्तित्व का सर्वांगीण परिष्कार कर दिखाएगी, यह सुनिश्चित है। इनके बारे में विस्तार से गायत्री महाविज्ञान के दूसरे खण्ड में पढ़ा व जाना जा सकता है।
यदि परिजन कुछ विशिष्ट मार्गदर्शन अपने व औरों के लिए अपनी उपासना, जीवनसाधना, सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन की पुण्य-परमार्थ वाली युग-साधना हेतु पाना चाहते हैं, तो रामनवमी 25 मार्च के बाद आरंभ हो रहे विशिष्ट पाँच दिवसीय व्यक्तित्व परिष्कार-युग साधना सत्रों में भागीदारी कर सकते हैं। ये पाँच दिवसीय सत्र चार माह तक गुरुपूर्णिमा के बाद तक चलेंगे। पहले कितने भी साधनासन्न किये हो, यदि कुछ विशेष अनुदान पाना है- ऋषियुग्म की सत्ता का विशिष्ट सूक्ष्म मार्गदर्शन पाना है, तो यह अवसर महापूर्णाहुति की पूर्व बेला में अपने आप में एक विलक्षण अनुग्रह के रूप में आया है। मार्च के अंतिम सप्ताह में 26 मार्च, 1999 से आरंभ प्रतिमास पाँच-इस प्रकार कुल पच्चीस ये सत्र 30 जुलाई तक चलेंगे। इस वर्ष 28 जुलाई की गुरुपूर्णिमा है। इसके बाद ही इस युग की महापूर्णाहुति की विशिष्ट तैयारियाँ आरंभ हो जाएँगी, जिनका विस्तार अगले अंक में परिजन पढ़ सकेंगे। आत्मशक्ति के संवर्धन एवं अपने आँतरिक जीवनक्रम को देवमानव के स्तर तक पहुँचाने हेतु अभूतपूर्व अवसर लेकर आया है यह प्रखर साधना वर्ष। जितना अधिक इस वेला के एक-एक क्षण का जो सुनियोजन-सदुपयोग कर पाएगा, वह उतना ही श्रेय का अधिकारी बन सकेगा। लाखों वर्षों में ऐसे अवसर विरले ही कभी आते हैं। बड़भागी होंगे वे, जो इस अवधि को आपाधापी, धींगामुश्ती, पारस्परिक-द्वन्द्व मतभेद, मतभेदों वाली नर पामर वाली स्थिति में न गंवाकर ऊँचा उठते हुए देवमानव वाली जीवन शैली को अंगीकार कर युगसाधक बन सकेंगे। जमाना उन्हें शीश नवायेगा-देवता पुष्प बरसायेंगे।
विज्ञान आगे भी अनर्थ पैदा करता रहेगा, ऐसी आशंकाएँ किसी को भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि खनिज तेल, विद्युत उत्पादन जैसे स्रोत ही सूख जाएँगे तब विज्ञान जीवित कैसे रह सकेगा? लोगों को लौटा कर फिर प्राकृतिक जीवन अपनाना पड़ेगा, जिसमें विकृतियों के अभिवर्धन की कोई गुँजाइश ही नहीं है।
विज्ञान जीवित रहेगा, पर उसका नाम भौतिक विज्ञान न होकर अध्यात्म विज्ञान हो जाएगा। उस आधार को अपनाते ही वे सभी समस्याएँ सुलझ जाएँगी, जो इन दिनों अत्यन्त भयावह दीखती हैं। इन आवश्यकताओं को प्रकृति ही पूरा करने लगेगी, जिनके अभाव में मनुष्य अतिशय उद्विग्न, आशंकित और आतंकित दिखाई देता है? न अगली शताब्दी में युद्ध होंगे, न महामारियाँ फैलेंगी और न जनसंख्या की अभिवृद्धि से वस्तुओं की कमी पड़ने के कारण चिन्तित होने की आवश्यकता पड़ेगी। -परमपूज्य गुरुदेव
‘परिवर्तन के महान क्षण’ से, पृष्ठ 31-32
*समाप्त