कठिनाइयों से डरो मत, प्रयासरत रहो।

यदि हम कोई दोष सुधारना चाहते है या कोई कठिनाई दूर करना चाहते है, तो बस एक ही प्रक्रिया है। स्वयं को पूर्णतः चैतन्य बनाए रखो। पूर्णरूप से जाग्रत रहो। सबसे पहले तुम्हें लक्ष्य को साफ-साफ देखना होगा। परन्तु इसके लिए अपने मन पर निर्भर न रहो। क्योंकि वह बार बार इतस्ततः करता है। संदेह भ्रम एवं हिचकिचाहटों के अंबार पैदा करता है। इसलिए एकदम आरम्भ में ही तुम्हें यह ठीक ठीक जानना चाहिए बल्कि एकाग्रता के द्वारा, अभीप्सा के स्वर और पूर्णतः संकल्पशक्ति के द्वारा जानना चाहिए। यह बहुत ही आवश्यक बात है।

दूसरे धीरे धीरे निरीक्षण के द्वारा सतत् और स्थाई जागरूकता के द्वारा तुम्हें एक पद्धति ढूंढ़ निकालनी चाहिए, जो तुम्हारे अपने लिए व्यक्तिगत हो केवल तुम्हारे लिए ही उपयुक्त हो। प्रत्येक व्यक्ति को अपने निजी प्रक्रिया ढूंढ़ निकालनी चाहिए, जो व्यवहार में लाने पर धीरे धीरे अधिकाधिक स्पष्ट और सुनिश्चित होती जाए। तुम एक विषय को सुधारते हो दूसरे को एकदम सरल बना देते हो और क्रमशः इस तरह आगे बढ़ते रहते हो इस प्रकार कुछ समय तक ठीक ठाक चलता रहता है। परन्तु एक सुहावने प्रातः काल में तुम्हारे सामने कठिनाई आ उपस्थित होती है, एकदम अकल्पनीय और तुम निराश होकर सोचते हो कि सब व्यर्थ हो गया। पर बात ऐसी बिलकुल नहीं है। यह तुम निश्चित रूप से जान लो कि जब तुम अपने सामने इस तरह की कोई दीवार देखते हो तो यह किसी नई चीज़ का प्रारम्भ होता है। इस तरह बार बार होगा और कुछ समय बाद तुम्हें इसकी आदत पड़ जाएगी। निरुत्साहित होने और प्रयास छोड़ देने की बात तो दूर तुम प्रत्येक बार अपनी एकाग्रता अपनी अभीप्सा एवं अपने विश्वास को बढ़ाते जाओगे और जो नई सहायता तुम्हें प्राप्त होगी, उसके सहारे तुम दूसरे साधनों को विकसित करोगे और जिन साधनों को तुम पार कर चुके हो, उनके पर उन्हें बिठाओगे।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि जो कुछ तुम जानो उसे व्यवहार में ले आओ और यदि तुम सतत् प्रयास करते रहोगे, तो अवश्य सफल होंगे। कठिनाईयाँ बार बार आएगी जब तुम अपने लक्ष्य पर पहुँच जाओगे, तभी सभी कठिनाईयाँ एक ही बार में सदा के लिए विलीन हो जाएँगी।


गुरुद्रोह कि परिणति

गुरु अर्जुनदेव जी विनम्रता कि मूर्ति थे। उनके शब्द -कीर्तन में जो भी योगी -कीर्तनकार भाग लेते थे, वे उनका पूरा सम्मान करते थे ऐसे ही दो योगी, जिनके कीर्तन से सम्मा बंध जाता था बल्कि भक्ति का वातावरण ऐसा अद्भुत बन जाता था कि नास्तिक भी कुछ क्षण वहाँ बैठने को राजी हो जाए, वे सत्ता व बलवंड थे, जो गुरुजी के सत्संग में कीर्तन करते थे। प्रतिभा जब तक समर्पित रहती है -गुरु के प्रति निष्ठावान् होती है एवं उसमें श्रद्धा-समर्पण का भाव रहता है, तभी तक उसमें प्रभावोत्पादक सामर्थ्य होती है। जहाँ उसे घमंड आया - अपने को ही सब कुछ मान लेने कि विषवृति ने उसे धर दबाया, वही उसका पतन-सर्वनाश आरम्भ हो जाता है।

ऐसा ही कुछ सत्ता-बलवंड के साथ भी हुआ।वे गुरुनानक के दरबार में उनके चहेते कीर्तनकार व शिष्य रहे मर्दाना के वंशज थे। किन्तु उनकी दुर्बुद्धि ने उस दिन उनसे कुछ ऐसा कहलवा दिया, जो उनके महानाश का कारण बन गया। गुरुजी के बुलावे पर भी दरबार में न पहुँचने पर गुरु अर्जुनदेव स्वयं पैदल चल पड़े। डेरे पर गुरुजी आगे आगे व पीछे शिष्य समुदाय। जिन गुरु कि एक झलक पाने के लिए देवता भी नर रूप धारण कर नरसेवा में भाग लेने आए थे, उनके द्वार पर पहुँचकर आवाज लगाने पर भी दोनों कीर्तनकार बहार नहीं निकले। दो -तीन बार आवाज दी जाने पर बाहर आये भी तो गुरु के चरणों को नमन करने के स्थान पर तानकर खड़े होकर कहने लगे कि आप हमारे साथ धोखा करते है। चढ़ावे कि सारी रकम संगत ने रख ली एवं हमारे कीर्तन में कुछ गिने चुने व्यक्ति भेजकर हमारा अपमान भी कराया।

गुरुजी बड़े विनम्र स्वर में बोले कि भाई! आप तो हमारे आदरणीय है क्योंकि आपने गुरुनानक के घर कीर्तन करने वालों के यहाँ जन्म लिया है। चढ़ावे कि रकम संगत को दी जाये, यह तो आपका ही आग्रह था। यदि आप चाहते है तो वापस ले लेंगे। राशि कम हो तो ओर ले लेना। गर्वोन्नत दोनों बोल पड़े, अरे! हमारे बिना संगत कभी हो ही नहीं सकती, फिर यह अपमान करने कि हिम्मत कैसे किसी की हुई? यह तो हमारा ही प्रताप है ( कीर्तन-संगीत-शब्दपाठ का ) कि आपको लोग गुरु मानते है अन्यथा आपको कौन पूछे? हम जिसे चाहे गुरुपद पर बिठा दे, गुरुनानक जी को भी तो हमारे पूर्वज मर्दाना ने ही कीर्तन करके गुरु बनाया था, नहीं तो उन्हें कौन पूछता।

किसी ने सच ही कहा है कि विनाशकाल में बुद्धि विपरीत ही चलने लगती है गीता कार ने भी तो कहा है -

क्रोधादिभवति सम्मोह सम्मोहत्स्म्रतिभिभ्रम्ह। स्मृतिभ्रन्शाद बुद्धिनासो बुद्धिनाश्त्प्रन्श्यती॥

अर्थात् क्रोध से अत्यंत मूढ़भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृतिभ्रम से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है, और बुद्धि का नाश हो जाने से वह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है।

गुरुजी ने दोनों अहंकारियों के द्वारा किया गया अपना अपमान तो बर्दाश्त कर लिया था, परन्तु उनसे अपने जगद्गुरु नानकदेव जी के प्रति कहे गए वे शब्द बर्दाश्त नहीं हुए। उनके मुख से निकल ही पड़ा - तुम दोनों द्रष्टा कि सीमा पारकर गुरुनानक जी के प्रति कुवचन कहते हो, अहंकार के वशीभूत तुम द्रष्टा कि चरम सीमा पर पहुँच गए हो। जाओ तुम्हें कोढ़ फूट जायेगा। कोई तुम्हारी सुधि नहीं लेगा, इतना कहकर गुरु जी अपने सिखों के साथ वापस लौट आये। जिनने कभी वाद्य-यंत्र छुए भी न थे,उनसे बजाने को कहा एवं ऐसा दिव्य संगीत बजा कि लोग सत्ता व बलवंड को भूल गए व मंत्रमुग्ध हो गए। गुरुजी ने एक बात और कही कि कीर्तन अब किसी विशेष कुल -घराने कि थाती नहीं है, सभी इसे सीखे। सारे शिष्यों को शब्द-कीर्तन -गुरुवाणी का अभ्यास होना चाहिए। सत्ता -बलवंड कि सिफारिश भी कोई लेकर न आये, इसकी भी विशेष ताकीद कर दी गई।

गुरु जी के श्राप का समाचार जन जन तक पहुँच गया। दो दिन तक तो सत्ता -बलवंड प्रतीक्षा करते रहे कि शायद गुरु अर्जुनदेव किसी से बुलावा भेजे, फिर उनका कीर्तन चल पड़े किन्तु कोई नहीं आया तीसरे दिन उनके सारे शरीर पर चकत्ते दिखाई दिए, जो कि गलित कुष्ठ के चिन्ह थे। चौथे दिन उनमें मवाद भर गयी एवं एक हफ्ते के भीतर कोई उन्हें पहचान नहीं सकता था कि ये वे ही सत्ता -बलवंड है, जो कभी गर्व से कीर्तन में गाते व लोग उनकी आवाज पर झूमते थे। जिधर वे रहते थे, दुर्गन्ध के मारे लोगों ने निकलना छोड़ दिया, अन्न-वस्त्र समाप्त हो गए। दवा करने के पैसे भी न बचे-स्त्री -बच्चे भूख से मरने लगे। गुरुनिन्दक के पास कौन जाता?

इतिहास बताता है कि इन दोनों गुरुद्रोहियों को सच्चे पश्चाताप कि अग्नि में जलते देखकर लाहौर के भाई लद्धाजी ने ही उबारा। यह उन्हीं कि हिम्मत थी कि गुरु अर्जुनदेव के शब्दों का मान रख उनसे क्षमा माँगने वे अपमानित स्थिति में उनके पास पहुँचे व बारम्बार इन दोनों गुरुनिन्दकों को क्षमा करने की भीख माँगी। क्षमा भूषण -भक्तवत्सल गुरुजी कि कृपा से दोनों का कष्ट तो समाप्त हो गया, किन्तु वे पुनः वह स्थान न पा सके, जहाँ उनके गुरु के नाम ने पहुँचा दिया था। गुरुद्रोह कि क्या परिणति हो सकती है, यह सभी के लिए एक सबक है।


एक शाश्वत सांस्कृतिक प्रतीक है -कमल

भारतीय संस्कृति में प्रतीकों का अत्यधिक महत्व है। यहाँ प्रतीकों के माध्यम से अपने इष्ट एवं लक्ष्य कि उपासना - आराधना का विधान है। इस क्रम में कमल एक शाश्वत -सांस्कृतिक प्रतीक है। कमल भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही तथ्यों का प्रतीक माना गया है। यह श्रृंगार एवं वैराग्य तथा सृष्टि व प्रलय के रूप में वर्णित होता है। यह असीम -अनंत आकाश के साथ प्राणी के सूक्ष्म अन्तः कारण का भी प्रतीक है। इसे जल, पृथ्वी, आकाश, अग्नि, सूर्य, चंद्रमा एवं ब्रह्माण्ड के तत्व के रूप में भी स्वीकारा गया है। शास्त्रकारों के अनुसार यह पवित्रता, निर्मलता, कोमलता,सृजन जीवन, सौंदर्य, सुरभि एवं अमरता का प्रतीक है। इसके गुण शोभा, स्नेह, आकर्षण दिव्यता, प्रेम, ज्ञान, ऊर्जा, मंगलिता, भव्यता, शीतलता आदि है। कमल के इन्हीं गुणों के कारण उसे विभिन्न धर्मों में सम्मानपूर्वक प्रतिष्ठा मिली है। यही वजह है कि इसकी महत्त्व वैदिक काल से लेकर समय तक अक्षुण्ण है।

कमल शब्द संस्कृत की श्कम धातु से बना है। श्कम का तात्पर्य है जल और अल का अर्थ है - अकलंक कृत करे वह कमल है। पदम् इसका प्रसिद्ध पर्याय है। जल से उत्पन्न होने के कारण जल कि पर्यायवाची शब्दों के साथ ज, जात अथवा जन्य प्रत्यय लगाने से कमल का पर्याय बन जाता है। इसी तरह रुह प्रत्यय का अर्थ है, अंकुरित और विकसित होना। इसी विशेषता के कारण इसे जलोरुह, सरसीरुह आदि नाम से जाना जाता है। कमल के अनेक अर्थ एवं अनेक नाम है। महाप्रलय के जलप्लावन के पश्चात् विष्णु की नाभि से सृष्टि का सृजन माना जाता है। यह पृथ्वी के सृजन का एक मूर्तिमान् रूप है। श्रीमद्भागवत पुराण, मत्स्यपुराण तथा हरिवंशपुराण में नारायण कि नाभि से कमल कि उत्पत्ति का वर्णन विभिन्न अलंकारिक रूपों में हुआ है।

ऋग्वेद में कई स्थानों पर नीलोत्पल का उल्लेख आया है। यजुर्वेद के एक मन्त्र के अनुसार बालक के माता पिता उसे कंलो कि माला पहनाकर आचार्य कुल में प्रवेश करने ले जाते है। अथर्ववेद में कमल कि दो जातियाँ पुष्कर (नीलकमल ) और पुण्डरीक ( स्वेत कमल ) का उल्लेख आया है। ऋग्वेद में जल से कमल भूमि कि उत्पत्ति का वर्णन है। वाजस्नेयी संहिता में कमल पृथ्वी का द्योतक है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार-

ष्आयो वै पुष्कर तारस्मिय्म पर्ण यथा हवाइदम पुष्करम पर्णम्प्स्वध्याहित्मेव-मियम्स्व्वाध्य्हिता सेयं योनि रानेरियम,...।

अर्थात् जल कमल है और पृथ्वी कमलपत्र है। जैसे जल पर कमलपत्र रखा रहता है उसी प्रकार जल पर पृथ्वी ठहरी हुई है। छान्दोग्य उपनिषद् में आचार्य उपकोसल को यह शिक्षा मिली, यथा पुष्कर पलाश आपो न शिल्स्यन्तेमेव विदि पापं कर्म न शिल्स्य्नती इति। अर्थात् जैसे कमल के पत्रों पर जल नहीं रुकता वैसे ही ब्रह्मा को जानने वाले पाप कर्म में लिप्त नहीं होते।

छांदोग्य उपनिषद् के अष्टम अध्याय में कमल को हृदय का प्रतीक माना गया है। आत्म्बोधोप्निषद में हृदय कमल के सम्बन्ध में कहा गया है - इस हृदय के ब्रह्मपुत्र कमल में प्रकाशित होने वाले दीपक या विद्दुत के समान देवकी पुत्र, मधुसूदन पुंडरीकाक्ष तथा अच्योत विष्णु ब्रह्म ज्ञानियों के हितैषी है। हृदय कमल में रहने वाला ब्रह्मा ही प्रज्ञा स्वरूप प्रज्ञा -मन्त्र तथा प्रज्ञा में ही रहने वाला है। कैव्ल्योप्निसाद में भी कमल का वर्णन आया है इसमें एकांत में पवित्र होकर,सुखासन में बैठकर भक्तिपूर्वक गुरु को नमन करके शोकरहित हृदय कमल का चिंतन करने का उल्लेख है।

ब्राह्मणोपनिषद् के मतानुसार लोगों को कर्मफल तथा सौभाग्य देने वाले भगवान वामदेव उनके हृदय के अष्टदल कमल में रहते है। अथर्ववेद में गर्भाशय को कमल के समान चित्रित किया गया है। सूक्ष्म जगत में ह्र्त्कामल का उल्लेख योगशास्त्र में विश्त्रतकिया रूप में हुआ है।

श्रीमद्भागवत् गीता में कमल कि निर्मलता एवं अलिप्तता को इस प्रकार प्रकट किया गया है –

ब्रम्हान्ध्यकर्मन्शंड त्वय्क्त्वकरोतियह लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रं मिवंभ्सा।

अर्थात् जो व्यक्ति अपने को ईश्वर में समर्पित करते हुए आशक्ति कि त्याग कर कार्य करता है, वह पाप से उसी प्रकार लिप्त नहीं होता जिस प्रकार जल में रहते हुए कमल पात्र लिप्त नहीं होता। श्री सूक्त में लक्ष्मी को पद्मिनी पद्द्थिता,पद्द्वानो,पद्द्सम्भ्वा आदि नामों से वर्णन किया गया है। गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान् राम के लिए

नवकंज लोचन कंजमुख, करकंज पद कंजारुणं के रूप में चित्रित किया है। महाकवि सूरदास ने कृष्ण के सौंदर्य का बखान करते हुए कहा है सुन्दर श्याम कमल दल लोचन सूरदास सुखदाई। मीराबाई कि भावाभिव्यक्ति सुभग शीतल कमल कोमल त्रिविध ज्वालाहरण के रूप में हुई है।

कमल कि गणना सात्विक आयुधों में की जाती है। ब्रह्मा,लक्ष्मी,गायत्री, भगवान् बुद्ध, शिव आदि देवता कमलासन कहलाते है, मत्स्यपुराण के अनुसार गणेश जी कमल पुष्प को हाथों में धारण करने वाले माने जाते है। श्री शारदा तिलक में भी गणेश जी को कमल से सम्बंधित दर्शाया गया है। शिल्पराज, अष्टभुजी, हेरंब तथा श्री तत्वनिधि ग्रन्थ में भी गणेश जी के हाथों में कमल लिए चित्रित किया गया है। भविष्यपुराण के ब्रह्मपर्व में उल्लेख आता है कि गरुड़ के छोटे भाई अरुण अपने ललाट पर अर्धचन्द्राकार कमल धारण किये भगवान् सूर्य के सारथी का कार्य करते हैं। देवताओं में से सूर्य ही एकमात्र देवता है, जिनके दोनों हाथों में कमल है। सूर्य को कमलबन्धु कमल्वाल्ल्भ आदि कहा जाता है। सूर्य के साथ कमल का विशेष संबंध है। सूर्योदय के साथ कमल खिलता है और सूर्यास्त के समय संकुचित होता है। मत्स्यपुराण व शारदातिलक में सूर्य भगवान् को लाल कमल के आसन पर स्थिर बताया गया है। वास्तुविद्द्यदिप न्व में १ पृथक आदित्य बताये गए हैं। इनमें से आदित्य गौतम,भानुमान, शाचित, भूमकेतु, संतुष्ट, सुवार्णकेतु के हाथों में कमल है। बृहत् संहिता में भी ऐसा ही वर्णन प्राप्त होता है। मिश्र,तिब्बत,चीन जापान तथा अन्य अनेक देशों तथा भाषाओं में सूर्य देवता और कमल के संबंधों पर प्रकाश मिलता है।

ब्रह्मा सृष्टिकर्ता हैं। मत्स्यपुराण के अनुसार ब्रह्मा का वर्ण कमल के भीतरी भाग के समान अरुण है। बृहत्संहिता में ब्रह्मा को कमलासन पर स्थिर कमण्डलु लिए हुए दो भुजो तथा चार मुख वाला दर्शाया गया है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में ब्रह्मा को कमलासन पर तथा विष्णु पुराण में विष्णु की नाभि का वर्णन है। ब्रह्मपुराण एवं पद्मपुराण में पुष्कर तीर्थ का संबंध भी कमल से किया गया है। स्कंदपुराण में ततो अंगुष्ठ मात्रस्तु पुरुषो दृश्यते जनैः अर्थात् कमल के मध्य में परम पुरुष अंगुष्ठ परिमाण में दृश्यमान होता है।

विष्णु पोषण के देवता है। विष्णु के पद्म का नाम पुण्डरीक है। भगवान विष्णु के सहस्र नामों के अंतर्गत पुष्कराक्ष, पद्मनाभ, पुंडरीकाक्ष का वर्णन आता है। इसके अलावा भगवान विष्णु को कमलाकार, कमलनयन आदि भी कहा जाता है। रूप मंडल ग्रन्थ में विष्णु की सभी चौबीस मूर्तियों की भुजाओं में कमल दर्शाया गया है। वैश्नवजन बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार मानते है। बृहत्संहिता में भगवान बुद्ध को पद्मासन पर बैठे हुए वर्णित किया गया है। विष्णु धर्मोत्तर व अग्निपुराण में भी भगवान बुद्ध को पद्मासन वर्णित किया गया है। शिव कल्याण के देवता है। शिव जी के हाथों में भी कही कही कमल दर्शाया गया हैं।

कमल से अत्याधिक सम्बन्धित देवी महालक्ष्मी है। ये कमल के आसन पर उपस्थित है, उनके हाथों में कमल है, उनके गले में कमलों की माला है और उनके सब अंगों की उपमा कमल से दी जाती है। श्री मद भगवत् पुराण, मार्कंडेय पुराण, दुर्गा सप्तशती तथा अन्य अनेक ग्रंथों में लक्ष्मी को कमल से अलंकृत किया गया है। देवमूर्ति प्रकनम में द्वादश सरस्वती स्वरूपों का वर्णन है। इन सभी स्वरूपों के चारों हाथों में कमल है। इसी तरह दुर्गा एवं गायत्री आदि अनेक देवियों को कमल से विभूषित किया गया है।

तांत्रिक विद्या के सबसे प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय यंत्र श्रीयंत्र है। भगवान शंकराचार्य की सौंदर्य लहरी के अनुसार श्रीचक्र या यंत्र में दो पद्दचक्र है एक अष्टदल कमल और दूसरा खोद्स्दल कमल। सर्वतोभाद्र चक्र में २८९ कोष्ठक है जिसके मध्य में अष्टदल कमल की स्थिति है। महानिर्वाण तंत्र में १६ पंखुड़ियों वाला कमल बताया गया है। अग्निपुराण में उल्लेखनीय दो रक्षापंक्तियों में भी कमल का स्थान है। एक अन्य यंत्र कमल यंत्र नाम से प्रसिद्धि है। स्त्रियों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए तथा बंध्या स्त्रियों को पुत्रलाभ हेतु कमल यंत्र धारण कराया जाता है। इस यंत्र में एक वृत्त और अष्टदल कमल बनाया जाता है। कमल आकार से युक्त असंख्य यंत्रों में से कुछ यंत्रों में आकारों साथ साथ कमलों का स्वरूप इस प्रकार है। श्यामयंत्र में भीतर अष्टदल कमल है और बाहर चौबीस दल कमल है। कालीयंत्र, धूमवतीयंत्र एवं छिन्नमस्तायंत्र में आठ पंखुड़ियों वाला कमल है। भुवनेश्वरीयंत्र में भीतर अष्टदल कमल और बाहर शोदासदल कमल है। शम्भुयंत्र में बत्तीस दल वाला कमल है रामयंत्र में दो अष्टदल, एक द्वादश दल, एक षोडशदल और बत्तीस पंखुड़ियों वाला एक पाँच कमल है। दुर्गायंत्र में एक अष्टदल और चौबीस दल कमल है।

इस प्रकार शतचक्र कमल की भाँति रूपायित है। मूलाधार में चतुर्भुज कमल है ये चारों पंखुड़ी लाल रंग की है। स्वाधिष्ठान चक्र में छह पंखुड़ी वाला कमल है। सिंदूरी जैसी गुलाबी है। मणिपुर चक्र दस पंखुड़ी वाले कमल की रूप में है। इनका रंग मेघ के समान नीलवर्ण का है। अनाहत चक्र में द्वादश दल कमल है। विशुद्ध चक्र षोडशदल कमल तथा आज्ञाचक्र दो पंखुड़ी वाले कमल के रूप में है। सहस्र चक्र सहस्रदल कमल स्वरूप है। अन्य धर्मों में भी प्रतीकात्मक रूप से कमल का वर्णन मिलता है। बौद्धधर्म के पदार्वीदस्तक के अनुसार बुद्ध के पाँव में कमल का चिन्ह है। बुद्ध की अधिकाँश प्रतिमाओं में वह खिले कमल पर पद्मासन में बैठे या खड़े दिखाए गए है। कमल उनकी अलौकिकता,महाकरुणा,अमरता एवं बुद्धत्व का प्रतीक है। सभी बोधिसत्वों के वाहन तथा आयुध कमल है। अलाव्किक्तेस्वर, पद्मिनी, तारा, पारमिता बोधिसत्वों के अतिरिक्त वज्र गर्भ,पद्द्म्फलोदभव हयग्रीव, गोरिमाहविद्द्या, चिंतामणि चक्र, यशोधरा, करुणा, मुद्रिता महामैत्रे आदि अन्य प्रसिद्ध बोधिसत्व अलंकरणों से युक्त कमलासन पर स्थिर तथा अन्य आयुधों के साथ साथ अपने हाथों में कमल धारण किये हुए है।

बौद्धगाथाओं के अनुसार सिद्धार्थ का जन्म होते हुए कमल पुष्प खिल उठे। सभी बौद्ध यंत्रों में कमल कोष और उसकी पंखुड़ियों में विभिन्न बुद्धौ और बोधिसत्वों के चित्र बनाये जाते है। सर्वाधिक मान्यता प्राप्त बौद्ध मन्त्र ष्ओंमणि पद्मेहुम हैं, अर्थात् हे कमल से स्थिर मणि! हम तुम्हारी वंदना करते है एशिया में प्रचलित महायान शाखा का प्रसिद्ध ग्रन्थ श् सर्द्धम पुंडरीक सूत्र श् है, जिसका अर्थ है -सत्यधर्म का कमल सूत्र महाविरोचन सूत्र के मतानुसार विश्वविज्ञान के मुद्रा श्वेत कमल पर स्थित है। श्वेत कमल हरदे का प्रतीक है।

बौद्ध गठाव में कमल सर्वस्व का प्रतीक है। उनके अनुसार आदिबुद्ध सृष्टि के आरंभ में कमल से निकलती हुई ज्वाला के रूप में प्रकट हुए बौद्धों का विश्वास है कि तब तब कमल की कली जल के ऊपर निकलती है। संयुक्त निकाय की तृतीय अध्याय में में भगवान बुद्ध के उपदेश का इस प्रकार उल्लेख किया गया है - भद्र! जैसे कमल जल में उत्पन्न होता है, जल में पूर्ण विकसित होता है तथा जल में ही जल की सतह तक उभरता है, परन्तु फिर भी जल से भीगता नहीं है। इसी प्रकार तथागत संसार में उत्पन्न हुए, संसार में पूरी तरह बड़े हुए, संसार से ऊपर उठे किन्तु फिर भी संसार से प्रभावित नहीं हुए। इसी भाँति जैन धर्म में भी कमल का विशिष्ट स्थान है बुद्ध के समान ही जैन तीर्थकार भी कमल पर बैठे हुए चित्रित किये गए है। जैन मंदिरों कला, स्थापत्य एवं मूर्तिकला में कमल का पर्याप्त प्रयोग मिलता है जैन परंपरा में पाँच लोकोक्तियों या पारमेष्ट्य की पूजा का विधान है। ये है अहन्त, आचार्य उपाध्याय, साधु। कमल की चार पंखुड़ियों में इन पाँच पर्मेस्त्यो को प्रस्तुत किया गया है। जैन पुराण, पद्मपुराण के अनुसार तीर्थकार की प्रतिमा की सुवर्ण के समान कमलों से पूजित प्रदर्शित करनी चाहिए। जैन परम्परा में १ देवियाँ है। उनमें से काली, गाँधारी, मानवी, बिदेवी का वाहन कमल है। वज्र श्रृंखला और गौरी देवी की भुजाओं में कमल है। भगवान् महावीर की माता द्वारा अपने गर्भकाल में देखे गए स्वप्नों में तीन तथा चौदह में से चार का संबंध कमल से है।

सुंदरता, कोमलता, कामनीयता तथा सौरभ के प्रतीक के रूप में कमल को सभी देशों में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है। संसार की सृष्टि से कमल का संबंध प्राचीन मिश्र में भी उपलब्ध है। हर्मोपोलिसस की एक लोकगाथा में श्रेष्ठतम देवता स्वयं एक कमल पर उद्भव हुए। ग्रीक रोमान काल में निर्मित एडगू के देवालय में एक शिलालेख में प्रथम आदिम देवता को महाकमल कहा गया है, जिसने अस्तित्व में आने पर संसार की रचना की, अव्लोकितेस्वर जिन्हें चीन में श्कुयान इन की रूप में पूजा जाता है। उनके धारिनो सूत्र में चार प्रथम रंगों के कमलों के ये चार लक्षण है, (१) श्वेत कमल गुणवत्ता का परिचायक है, (२) नीलकमल पृष्ठभूमि में पुनर्जन्म का प्रतीक है, (३) नीलवर्ण बोधिसत्वों के दर्शन का प्रतीक है, (४) लालकमल देवताओं के स्वर्ग में पुनर्जन्म का द्योतक है। प्राचीन मिश्र में भी कमल पुनर्जन्म का प्रतीक माना गया था। ओसोसिस देवता मृत्यु के पश्चात पुनः एक कमल से उत्पन्न हुए थे अतः मिश्र के मकबरों, कब्रों एवं ताबूतों पर कमल उत्कीर्ण किया जाता था। इसे पुनर्जन्म का प्रतीक मानते हुए यूनानी, रोमन तथा प्रारंभिक ईसाइयों की शव यात्रा में कमल का उपयोग किया जाता था।

असंदिग्ध रूप से कमल शाश्वत सांस्कृतिक प्रतीक है। इसकी विशेषता है - सूक्ष्म, अदृश्य, अलिप्तता तथा अलंकरण का सेतु होना। यह सूर्य एवं उसके प्रकाश का भी प्रतीक है यही नहीं यह अन्धकार अविवेक एवं अज्ञान की विरोध का द्योतक है। शतपथ ब्राह्मण में कमल को अग्नि का पर्याय माना गया है। तैत्तिरीय संहिता में उल्लेख है, हे कमल! तुम जल से ऊपर रहने वाले हो और अग्नि के जन्मदाता हो। तुम समुद्र को बढ़ाते हो। सर्वत्र वृधि को प्राप्त होते हुए जल में सभी प्रकार स्थित हो। द्युलोक के तेज से और पृथ्वी की विशालता से चारों ओर विस्तृत हो।

कुछ भी हो, पर यह सनातन सत्य है कि कमल कीचड़ में उत्पन्न होकर भी उससे अंशमात्र भी नहीं छुआ है। सदा पवित्र एवं पावन बना रहता है। अतः कमल का प्रतीक मनुष्य को भी सांसारिक मोहपंक में रहते हुए भी उससे अलिप्त बने रहने की सीख देता है। कमल के प्रतीक के इस रूप को ह्राद्य्गम किया जा सके, तो ही कमल रूपी सांस्कृतिक प्रतीक कि महत्ता एवं विशेषता सार्थक सिद्ध होगी।


चयन की दिशाधारा (Kahani)

श्रुतायुध के पास शंकर जी के वरदान से प्राप्त एक गदा थी। शर्त मात्र यही थी कि वह उसका अनीतिपूर्वक प्रयोग न करे। यदि करेगा तो लौटकर वह उसी को नष्ट करेगी, महाभारत युद्ध में क्रोध के आवेश में उसने उस गदा का प्रयोग सारथी कि भूमिका निभा रहे भगवान् श्री कृष्ण पर कर डाला, गदा बीच से ही वापस लौटकर श्रुतायुध पर ही आ गिरी और उसे क्षत-विक्षत कर गयी।

भस्मासुर ने भी यही वरदान माँगा था कि वह जिसके सिर पर हाथ रख देगा वही भस्म हो जाएगा। जब उसने वरदान का दुरुपयोग आरम्भ किया, तो भगवान ने माया रची और उसकी दुर्बुद्धि ने उसे स्वयं अपने ऊपर हाथ रखवाकर भस्म कर डाला।

यह चयन की दिशाधारा ही है, जो मनुष्य का गंतव्य-भवितव्य निर्धारित करती है।


गुरु ही सच्चा रक्षक

बात अतीत की है, परन्तु वर्तमान का है। एक गुरु और शिष्य निरंतर चलते हुए बहुत थक गए थे। अतः गुरु उपयुक्त स्थान देखकर विश्राम करने कि लिए रुके। जब शिष्य गहरी नींद में था, तब गुरु जाग रहे थे। इतने में एक काला सर्प सरसराता हुआ शिष्य की ओर आने लगा, तो गुरु ने धीरे धीरे एक ओर हटकर उसे मार्ग देना चाहा किन्तु सर्प तो एकदम निकट आ गया। गुरु ने उसे रोकने का प्रयत्न किया तो, वह मनुष्यवाणी में बोला, हेे मुनिश्रेष्ठ! मुझे तुम्हारे इस शिष्य को काटना है, अतः रोकिये मत। इसे काटने का आखिर कुछ कारण तो होगा? गुरु ने सर्प से प्रश्न किया। कारण यही है कि पूर्वजन्म में इसने मेरा रक्त पिया था, अब मुझे इसका रक्त पीना है। पूर्व जन्म में इसने मुझे बहुत सताया था, बदले के लिए ही मैंने सर्प योनी में जन्म लिया है आप कृपया मुझे रोके नहीं। रोकेंगे तो मैं ओर किसी समय आपकी अनुपस्थित में आकर इसे काटूँगा। पूर्वजन्म में मैं एक बकरा था, इसने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए मुझे निर्दयतापूर्वक तलवार से काटकर मेरा लहू पिया, इसके देखते देखते मैंने तड़फ तड़फ कर प्राण त्याग दिए, सर्प ने आक्रोश प्रकट करते हुए बताया।पूर्वजन्म का कोष अभी तक है?

गुरु ने मनोआत्मलीन होकर कहा। इसी के साथ क्रुद्ध सर्प की बदला लेने की आत्मपीड़ा की बात सुनकर गुरु ने सर्प दर्शन कस शाश्वत रहस्य समझाया -बन्धु! अपनी आत्मा ही अपना शत्रु है, अन्य कोई नहीं। तू इसे कटेगा, तेरे प्रति इसके हृदय में बैर जगेगा यह इस शरीर को त्याग कर नया शरीर धारण करेगा,फिर बैर का बदला लेगा। फिर तू भी बैर का भाव लिए हुए मरकर दूसरे जन्म में बैर का बदला लेगा, उसके पश्चात यह लेगा, इस तरह बैर की परंपरा बढ़ती रहेगी, लाभ क्या होगा?

सन्तप्रवर! आपकी बात सत्य है, पर मैं इतना अज्ञानी नहीं हूँ। आप समर्थ पुरुष है, मैं नहीं, क्षमा कीजिए, मैं बैर का बदला लिए बिना इसे नहीं छोड़ूंगा, सर्प ने कहा।

गुरु ने कहा तो बन्धु! इसके बदले मुझे कट लो। आप जैसे पवित्र पुरुष को काट कर मैं घोर नरक में नहीं जाना चाहता। मैं अपने अपराधी को ही काटूँगा। इसी का खून पीऊँगा, सर्प ने कहा।पंख कटे जटायु को गोद में लेकर भगवान राम ने उसका अभिषेक आँसुओं से किया, स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए, भगवान राम ने कहा - तात! तुम जानते थे रावण दुर्दश और महाबलवान है, फिर उससे तुमने युद्ध क्यों किया?

अपनी आँखों से मोती छलकाते हुए जटायु ने गर्वोन्नत वाणी में कहा प्रभो! मुझे मृत्यु का भय नहीं है, भय तो तब था जब अन्याय के प्रतिकार की शक्ति नहीं जागती?

भगवान राम ने कहा -तात! तुम धन्य हो। तुम्हारी जैसे संस्कारवान आत्माओं से संसार को कल्याण का मार्ग -दर्शन मिलेगा।

अंत में जब सर्प को बहुत समझाने पर भी न माना तो गुरु ने कहा -यदि मैं तुम्हें इसी का रक्त निकालकर दे दूं तो तुम्हारी प्रतिहिंसा संतुष्ट हो जाएगी?

हां ऐसा कर सकते हैं। सर्प ने गुरु की बात स्वीकार कर ली।

ज्ञानी गुरु, शिष्य की छाती पर चढ़ बैठा और पत्ते का डोंगा उसके गले के पास रखकर एक चाकू से गले के पास चीरा लगाया, फिर डोंगे में एकत्रित रक्त को सर्प को पिलाने लगा। गले पर चाकू लगते ही शिष्य की नींद उड़ गई, पर गुरुसत्ता को देख वह आश्वस्त एवं शाँत बना रहा। छाती पर चढ़कर गले से खून निकलकर गुरु सर्प को पिला रहे है। यह सब देखकर वह तत्काल आँखें बंदकर चुपचाप सोया रहा। सर्प को जब तृप्ति हो गयी तो वह वापस चला गया। गुरु ने शल्य चिकित्सक की बहती उस घाव को बंद करके उस पर वनौषधि की पट्टी बाँध दी गुरु जब छाती पर से नीचे उतर गए, तब शिष्य उठ बैठा।

गुरु ने उलाहने की मुद्रा में उससे कहा -कितनी गहरी नींद है तेरी?

हाँ गुरुदेव! आपकी छत्रछाया में मैं सुरक्षित सब देख रहा था आप मेरी छाती पर बैठे थे। हाथ में चाकू था गले के पास चीरा लगाकर रक्त निकाल रहे थे। शिष्य ने कहा -गले पर चाकू लगते ही मैं जाग गया था। वत्स! तब तू बोला क्यों नहीं?, गुरु ने पूछा।

गुरुदेव मुझे आप पर आस्था है, मैंने अपना हित आपको अर्पित कर दिया है और इसी से सर्प की बात सुन,उसका कृत्य देख, आपके बैर त्याग के उपदेश को सुन सर्प की भाँति मेरा भी प्रतिशोध भाव शाँत हो गया है। मैं धन्य हो गया।

आपके हाथों मेरा अनिष्ट कभी हो ही नहीं सकता। आप मेरी आत्मा के उद्धारक ही नहीं अपितु शरीर के भी रक्षक है मेरा सब कुछ आपका है - शरीर भी और जीवन भी इसका जैसा उपयुक्त समझे आप उपयोग करे। आपकी परम समझ को भला मैं अल्पज्ञ प्राणी कहाँ समझ सकता हूँ? मुझे अपनी कोई चिंता नहीं है। शिष्य के इस वचनों को सुनकर गुरुदेव की अंत करण से आशीष का स्रोत प्रस्फुटित हो उठा।


हिमालय से जुड़े हिममानव का अस्तित्व वास्तव में है क्या

वह एक रहस्य है फिर भी युगों से लोगों के मन मस्तिष्क पर छाया हुआ है। कही वन देवता पर्वतों की देवात्मा के रूप में पूज्य, कही अपने पगचिन्हों से पर्वतारोहियों और खोजी व्यक्तियों के रोमाँच का विषय और कही मानव विकास की लुप्त कड़ियों को खोजते वैज्ञानिकों का रोचक विषय यही है हिमाच्छादित -पर्वत श्रृंखलाओं में अपने रहस्यमय अस्तित्व के साथ विचरण करने वाला हिममानव येती।

लद्दाख से तिब्बत -नेपाल होते हुए सिक्किम -अरुणाचल प्रदेश तक लाखों वर्ग कि .मी . में फैली हिमालय की ऊँची बर्फीली चोटियों से ढकी घाटियों में रहने वाले लोग हिममानव को सदियों से जानते है। अलग अलग क्षेत्रों में इसे येती मिटे शुफ्पा, मीगो और कगामी आदि नामों से जाना जाता है। कही इसे शिकार व वन के देवता और पर्वत की आत्मा के रूप में पूज्य मानते है, तो कही यह रोचक पुराणकथाओं का नायक है। पर्वतीय लोगों में येती खोज या जिज्ञासा की जगह श्रद्धा का विषय अधिक रहा है।

येती को देखने का सर्वप्रथम विवरण सन १ में मिलता है, जब एक नेपाली व्यापारी ने नेपाल तिब्बत मार्ग पर एक पशु मानव देखने का दावा किया था। वह लगभग दस फुट ऊंचा था और उसका शरीर लाल रंग के बालों से ढका हुआ था। सन १८६७ में रोगर पेटर्सन इसकी फिल्म लेने में सफल हो गया। यह सब एकाएक हो गया फिल्म दूर से लिए जाने व प्रकाश का सामंजस्य न हो पाने के कारण अत्यंत धुँधली आयी। किन्तु इससे येती की अस्तित्व को बहुत बल मिला। सन १८७२ में प्रसिद्ध पर्वतारोहियों पुंडराक ने तथा १८७७ में नवे के एक पर्वतारोही ने बर्फ पर सहित ऋतु की अंत में अत्यंत विशालकाय मानव पगचिह्न देखने की बात कही थी। सन १८८९ में कर्नल बेडेले ने मानव के पैरों के बिशाल्के चिन्ह देखे थे, परन्तु किसी वैज्ञानिक ने इसका अध्ययन नहीं किया। इसी प्रकार सन १९०६ में हेनरी एल्यूस ने हिमालय के एक ग्लेशियर में विचित्र पदचिह्न देखे थे, परन्तु इन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया।

हिमालय के हिममानव येती संबंधी सर्वप्रथम प्रामाणिक दावा १९२१ में एवरेस्ट आरोहण दल के अध्यक्ष सी. के. पारी ने किया। उन्होंने देखा की नीचे बर्फीली ढलान पर एक बड़े बालों वाला विशालकाय प्राणी चला आ रहा है। जिसकी आकृति मनुष्य से मिलती है। साथी शेरपाओं ने बताया कि यही येती है। इसके बाद में अपनी हिमालय यात्रा का वर्णन करते हुए वुड किक्लैंड और मेक्स ने लिखा है कि

४००० मीटर की ऊंचाई पर उन्होंने दो पैरों से चलने वाले बालों से लदे लंगूरों को देखा। नवे निवासी फ्रास्तिस और यार्वर्ग हिमालय में येती के पदचिह्नों का पीछा करते हुए अचानक बिखरे हुए बालों वाले रो बशाल हिममानवों से जा भिड़े। जब दोनों खोजकर्ताओं ने कमंद फेंककर उन्हें पकड़ने की कोशिश की तो येतियों ने फ्रास्तिस पर हमला करके उसका कन्धा नोच डाला। यार वर्ग ने हवाई फायर करके अपने साथी की जान बचाई। इतने समीप से हिममानव देखने व छूने की संभवाना यह प्रथम घटना थी। समूचे विश्व के सामने हिममानव के अस्तित्व का सबसे प्रथम प्रमाण एरिक शिफ्तन ने १९५१ में हिममानव की पदचिह्नों की फोटो खींचकर प्रस्तुत किया। जंगलों की जाँच -पड़ताल करने वाले दल के इस नेता को ये पदचिह्न २० फुट नेमलंग ग्लेशियर पार करते समय मिले थे। शिफटन द्वारा हिममानव के पदचिह्नों के फोटो प्रस्तुत करने के बाद विश्वभर के पर्वतारोहियों एवं खोजी वैज्ञानिकों का रुझान इस ओर बढ़ा। दो वर्ष बाद १९५३ में सर जान हट के नेतृत्व में गए एवरेस्ट अभियान दल के एक सदृश्य विलफिड बोडस ने पर्वतारोहियों के दौरान एक विचित्र सी आवाज सुनी थी और उसे किसी के पद चिन्हों के निशान भी दिखाई दिए थे। उन्हें ऐसा लगा था जैसे कोई हिममानव चोटी से उतरकर उन लोगों के शिविर तक आया और फिर लौट गया।

हिममानव को देखे जाने की एक घटना मार्च, ७ को हुई। उस दिन ब्रिटिश पर्वतारोहियों का एक दल अन्नपूर्णा शिविर पर कठिन चढ़ाई का प्रयास कर रहा था। इस प्रयास में जब रात हो गयी तो पर्वतारोहियों ने अपने-अपने तम्बू लगा दिए। रात के समय दल के एक सदस्य ने एक विशालकाय दोपाए जीव को तम्बू के इधर उधर घूमते देखा। सूचित किये जाने पर उसके अन्य साथियों ने भी इसे दिखा। निरीक्षण करने पर पाया गया कि यह जीव कहानियों में वर्णित येती से मिलता -जुलता था। सन १९७६ में ब्रिटिश एवरेस्ट अभियान साल ने दावा किया था कि उसे हिममानव दिखाई दिए थे, पर वे उन्हें देखकर भाग खड़े हुए। इनके पगचिह्न ३१ सेंटीमीटर लम्बे और ० सेंटीमीटर चौड़े थे। बी. बी. सी. ने इनके फोटो टेलीविजन पर भी दिखाए थे।

एवरेस्ट पर सर्वप्रथम विजय पताका फहराने वाले शेरपा–तेनजिंग के साथी सर एडमंड–हिलेरी ने भी अपने स्मरणों में हिममानव की चर्चा की है। एक बार उन्हें हिममानव का बाल भी मिला था जो मोटा, खुरदरा, काला और लम्बा था। हिममानव के पदचिह्नों का उल्लेख करते हुए एडमंड हिलेरी ने लिखा है, ये चिन्ह सचमुच किसी विशालकाय जीव के थे। बारह इंच लम्बे और चार इंच चौड़े, देखने में ताजे थे। शायद पिछली रात ही वह वहाँ से गुजरा होगा। अगले भाग में अंगूठे और पिछले भाग में एड़ी के साफ निशान थे।

हिममानव के रहस्यमय अस्तित्व के चर्चे हिमालय तक ही सीमित नहीं है, बल्कि विश्व के सभी ठण्डे व बर्फीले क्षेत्रों में इसका प्रभाव पुराणकथाओं से लेकर प्रत्यक्ष आमना सामना व पदचिह्नों के रूप में देखा जा सकता है, किन्तु येती की ही तरह इसके जीवंत प्रमाण अभी रहस्य के दायरे में ही है। हिमालय के अतिरिक्त कनाडा, अमेरिका व साइबेरिया के बर्फीले क्षेत्रों में इसके पाए जाने के उल्लेख मिले है। यहाँ इसे बिगफुत, सेस्कुएच और याली आदि नामों से जाना जाता है।

न्यू साउथ वेल्स के इकस गिलरय ने याली से जुड़ी एक हजार घटनाओं का विवरण एकत्रित किया है, जो अमेरिका के चालीस राज्य तथा कनाडा के पाँच प्रान्तों से सम्बंधित है। ये सभी विवरण सन १९४० के बाद के है, जो अमेरिका के मूल निवासियों के विवरणों से मिलते है, जो इसे ष्बिडिगो के नाम से पुकारते है। क्रेफोई काउंटी कन्सास के टिम्बले का कथन है कि याली मनुष्य से इस सीमा तक मिलता है कि कोई इसे मरना नहीं चाहता। न्यू साउथ वेल्स के डेविड स्कमार्स ने विशाल याली के दिखने का दावा किया है, जो आठ फुट ऊँचा था। उसके लगभग तीन इंच लम्बे भूरे बाल शरीर पर थे। बड़ी -बड़ी भूरी भूरी व नीली आंखें थी, चेहरा आधा लंगूर व आधा मानव जैसा था। उसने भूमि के अन्दर प्रवेश करने से पूर्व जिस वृक्ष को खरोंचा था, वह भूमि से १ फुट ऊँचाई पर था।

प्रख्यात मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्ताव युँग ने अपनी पुस्तक में याली का चित्रण करते हुए लिखा है कि इसके बाजू लम्बे व हाथ विशाल होते है। चेहरे पर घने बाल होते है, जिससे यह भयानक दिखता है। अधिकतर यह दोनों पैरों से चलते है, किन्तु कभी कभी यह दोनों हाथों का भी प्रयोग करते है। इसी पुस्तक में एक घटना का भी उल्लेख है कि सन १९१७ के पतझड़ के मौसम में गेरी जेनिस और जिम निवेल ओरिगास के जंगलों में शिकार करने गए थे। गेरी ने एक हिरन मार गिराया इससे पहले कि वह उसे उठा लेता एक नौ फुट ऊंचा लम्बे बालों वाला जीव वहाँ आ पहुँचा। उसने हिरन को उठाया और वहाँ से चल दिया। गेरी ने उस पर गोलियाँ दागी, किन्तु ऐसा कोई संकेत नहीं मिला, जिससे यह लगे कि उसे कोई हानि पहुँची हो। केवल सी सी की आवाज प्रत्येक बार सुनाई दी। उससे आभास होता था कि वह दर्द के मारे चिल्ला रहा है।

जिस जीवात्मा ने मन और इंद्रियों सहित शरीर को जीत लिया है उस जीवात्मा के तो आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इंद्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिए वह आप ही शत्रु है सदृश शत्रुता में वर्तता है।

गोली लगने कि अन्य घटनायें भी हुई है, किन्तु थोड़ा रक्त निकलने के अतिरिक्त और कोई प्रभाव नहीं हुआ।

हिममानव सम्बन्धी इसी घटनाओं का उल्लेख ई. आर. डोदास ने अपनी पुस्तक ग्रीक्स एण्डदी एरेक्सल में किया है। हिममानव की चर्चा करने वाली अन्य पुस्तकें है -पैट्रिक हार्वर की डेमोनिक रियल्टी, काँलिन और बोर्ड जेनेट की बिगफुत, केपबुक्क - इलाइन एनीमल, प्रो. लायोंटिल की पुस्तक एपोलॉजी फोर दी फेबिल्स ऑफ रोमर और द डिफेक्टिव आरेकुलम।

चीन और रूस में भी हिममानव के रहस्यमय अस्तित्व पर शोधकार्य चल बार हिममानव को देख चुका है। वयोक्या ब्लादिमोर के आग्रह पर उसके घर रुकी और उन्होंने रात्रि की घटना से हिममानव के अस्तित्व को स्वीकारा।

उस रात ब्लादिमोर के घर में खिड़की के पास खटखटाने की आवाज हुई। बाहर कुत्ता भी जोर जोर से भौंक रहा था। जब तक खिड़की खोली जाती वातावरण शाँत था। प्रातः तलाश करने पर कुत्ते की लाश जंगल में मिली। उसका शरीर दो भागो में तोड़ दिया गया हो। वयोक्या के अनुसार हिममानव का काम था।

इसी तरह चीनी वैज्ञानिकों के एक दल ने भी १४ मई ए १९७६ को हवई प्रान्त के चुनसुइया गाँव के पास एक येती को देखने का दावा किया। इसके बाद पीकिंग विश्वविद्यालय ने अन्वेषकों को येती की खोज में लगा दिया। लेकिन अभी तक उसे रहस्य की घेरे से बहार नहीं निकला जा सका है।

हालाँकि अभी ३ वर्ष पूर्व १९९६ में घटित एक घटना ने हिममानव के अस्तित्व की प्रमाणिकता को एक नया आधार दिया है। यह घटना रूस के साइबेरिया क्षेत्र में घटित हुई, जहाँ रूसी भूगर्भ वैज्ञानिकों को एक शोध अभियान के दौरान बर्फ के नीचे दबे ४ मीटर लम्बे एक जीव का शव मिला। रूसी दैनिक सेवनिया प्रावदा के अनुसार इस जीव के शरीर के ऊपर बाल थे, सिर चपटा व आगे की ओर उभरा हुआ, था। इस शव को हिममानव अथवा येती की संज्ञा दी जा रही है। प्रत्यक्षदर्शी हिममानव की खोज में जुटे वैज्ञानिकों ने इस रहस्यमय जीव के बारे में अब तक जो जानकारियाँ प्रस्तुत की है,उनसे उसके आकार - प्रकार का एक अनुमान अवश्य लगाया जा सकता है। वोयोक्वा के अनुसार येती की ऊँचाई दो मीटर होती है। आंखें अन्दर की ओर धसी, और बहुत छोटी होती है। जबकि सिर अपेक्षा कृत बड़ा होता है। इसका भार किलो तक हो सकता है। रूस में तीन वर्षों पूर्व पाए गए जीव का शव लगभग इसी आकार -प्रकार का था। इसके अतिरिक्त सुप्रसिद्ध वनार्ड होवेल्मेंस की पुस्तक -ऑन द ट्रेक ऑफ अननोन एनिमल्स में हिममानव की तीन जातियाँ बताई गयी है। पहले प्रकार की हिममानव को येती कहा गया है जो पाँच मीटर या इससे भी अधिक ऊँचा हो सकता है। इसका पूरा शरीर बालों से ढका होता है। दूसरा प्रकार शिमिश्का है, ४००० मीटर पर पाए जाने वाले शिमि की ऊँचाई लगभग तीन मीटर बताई गयी है। तीसरी श्रेणी न्याया लामो की है,जो ४००० मीटर से अधिक ऊँचाई वाले बर्फीले स्थानों पर बताया गया है। सफेद चेहरे व बालों से पूरी तरह ढके शरीर वाले न्याया लामो की ऊँचाई चार पाँच मीटर बताई गयी है।

हिममानव के संदर्भ में वैज्ञानिकों का अपना ही मत है। उनके अनुसार यह जीव कुछ गोरिल्ला और कुछ -कुछ औरंग - ओटान से मिलता -जुलता है। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या हिममानव मानव विकास की कोई खोई हुई कड़ी तो नहीं है, मानव का उद्भव लगभग दस लाख वर्ष पूर्व हुआ उसे आज के रूप में आने के लिए कई परिवर्तनों से होकर गुजरना पड़ा। मानव के उदविकास में निएद्र्थल पूर्ण पुरुष का अपना एक विशेष स्थान है। ऐसे हम पूर्ण मानव नहीं कह सकते। यह पशुओं के समान कंदराओं में रहता था। भोजन की आवश्यकता पड़ने पर शिकार करने निकल जाता था।

निएँडरथल मानव की खोपड़ी की लम्बाई चौड़ाई की अपेक्षा अधिक होती थी। इसमें ठीक हिममानव के समान नेत्र, गोलको के ऊपर अस्थि का एक उभर था। निचले जबड़े में ठोड़ी का अभाव तथा अनेक बड़े आकर के दाँत सब मिलाकर ऐसा प्रतीत होता था मानो निएंद्रथल का जबड़ा मनुष्य का नहीं वरन् किसी विशाल वानर का था।

रीढ़ की हड्डी तथा घुटनों पर झुकाव के कारण उसका शरीर धनुषाकार था, जैसा की गिब्बन और चिपंजी का होता है। बहुत संभव है कि निएंद्रथल मानव की ही किसी शाखा में, किसी समय उत्परिवर्तन के प्रभाव से हिममानव का उद्भव हुआ हो। हिमाच्छादित शैल–शिखरों पर बसे होने के कारण उसके शरीर पर धीरे धीरे मोटे व कड़े बाल विकसित हो गए है। इस तरह वैज्ञानिक हिममानव को मानव विकास की एक कड़ी के रूप में मानते है।

कुछ के लिए हिममानव रहस्यमय कल्पना है। जुँग की अवधारणा श् सामूहिक अवचेतन से जोड़ते हुए कहते है कि ये हमारे पूर्वज के लम्बे बालों वाले अर्धमानव के भय व उनसे संघर्ष की अचेतन स्मृतियों का अंश है, जो यदा कदा ऐसी घटनाओं को जन्म देते है। सत्य कुछ और भी हो सकता है। हिमालय का हिममानव वहाँ के रहस्यों में से एक अद्भुत रहस्य है जो अपने रहस्यमय अस्तित्व के कारण मानवी बुद्धि से लिकाचिपी करता हुआ सबकी जिज्ञासा का केंद्र बनता जा रहा है। यदा-कदा इसके अस्तित्व की झलक व रोमाँचक किस्से बतलाते रहते है। प्रकृति के रहस्य और भी है जो मानवी बुद्धि की लिए चुनौती भी है और जिज्ञासा अनुसन्धान की विषय वस्तु भी।


विवेकपूर्ण चयन (Kahani)

भगवान श्री कृष्ण के पास दुर्योधन व अर्जुन दोनों पहुँचे। महाभारत के पूर्व कौरव व पाँडव दोनों ही कृष्ण को अपने पक्ष में करना चाहते थे। दुर्योधन पहले पहुँचे व अहंकारवश सो रहे भगवान के सिरहाने बैठ गए। बाद में अर्जुन आये व अपनी सहज श्रद्धा -भावनावश पैरों के पास बैठ गए। श्री कृष्ण जागे। अर्जुन पर उनकी दृष्टि पड़ी, कुशलक्षेम पूछकर अभिप्राय पूछने ही जा रहे थे कि दुर्योधन बोल उठा - पहले मैं आया हूँ, मेरी बात सुनी जाए। श्री कृष्ण असमंजस में पड़े, बोले अर्जुन छोटे है इसलिए प्राथमिकता तो उन्हीं को मिलेगी, पर माँग तुम्हारी भी पूरी करूँगा। एक तरफ मैं हूँ,और दूसरी तरफ मेरी विशाल सेना। बोलो अर्जुन! तुम दोनों में से क्या लोगे? चयन कि स्वतंत्रता थी, यह विवेक पर निर्भर करता था,कौन क्या माँगता है। भगवत् कृपा अथवा उनका वैभव? अर्जुन बोले-भगवान्! मैं तो आपको ही लूँगा, भले ही आप युद्ध न करे -बस साथ भर बने रहे। दुर्योधन मन ही मन अर्जुन कि इस मूर्खता पर प्रसन्न हुआ, और श्री कृष्ण कि विशाल अपराजेय सेना पाकर फूला न समाया। अनीतिवादी दुर्योधन, ईश्वरीय समर्थन वाले अर्जुन जिसके पास श्री कृष्ण भी निःशस्त्र थे, वह हारा ही नहीं, महाभारत के युद्ध में बन्धु-बांधवों सहित मारा भी गया। दुर्योधन जैसे अनीति का चयन करने वाले एवं अर्जुन जैसे ईश्वरीय कृपा को वरण करने वाले तत्व हर मनुष्य के भीतर विद्यमान है - एक को विवेक या सुबुद्धि एवं दूसरे को अविवेक या दुर्बुद्धि कह सकते है। किसका चयन व्यक्ति करता है, यह उसकी स्वतंत्रता है।


धर्म किए- धन न घटे

विक्रम संवत् १६८७ में भयानक दुष्काल पड़ा था। जनता अन्न के एक एक दाने के लिए तरसने लगी थी। बीर जी सेठ, संत प्यारेदाश के आश्रम पर गए और विनयपूर्वक संत के चरणों में नमन कर कुछ हितोपदेश की आशा में मौन बैठ गए। संत ने कहा सेठ! एक दिन तुम्हारी माया का तो नाश होगा ही और काया किसी की भी अमर नहीं रही; सिर्फ सत्कर्म ही अमर रहता है। इस समय स्वार्थ को हटाओ यह पूँजी तुम्हारी नहीं, उस मालिक की दी हुई है यही समय है, इसे परमार्थ में खर्चे करो। अवसर चुकोगे तो फिर पछताना पड़ेगा।

सेठ पर संत के वचनों का अत्यंत प्रभाव पड़ा सेठ ने कहा, बाबा आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। मैं अपनी तमाम पूँजी भूख से तड़पकर मरते हुए लोगों को जीवित रखने के प्रयत्न में अन्नदान में लगा दूँगा। संत का आशीर्वाद ले सेठ अपने घर आये और पैसा जनसेवा में लगाने लगे।

वैसे तो औरंगजेब के अंत समय में अकाल लगातार पड़ते ही गए थे, किन्तु १८ का अकाल तो सबसे अधिक भयानक था। स्वयं शाहजहाँ की तवारीख नवेश के लाहौरी ने इसका जो बयान किया है, बहुत ही दर्दनाक है। गुजरात और महाराष्ट्र के लोगों की दशा करुणा के अंतिम छोर तक पहुँच गयी थी। रोटी के एक टुकड़े के लिए जीवन भर गुलाम रहने के लिए लोग तैयार हो जाते थे। रोटी के सामने इज्जत-आबरू की कोई कीमत नहीं रही। सड़क व रास्ते मुर्दों के शरीरों से बंद हो गए थे। कुछ ही भाग्यशाली ऐसे थे जिनके पाँवों में कुछ शक्ति शेष बची थी और वे एनी प्रान्तों की ओर रोटी पाने चले गए। सेठ वीर जी को संत के वचन याद थे कि धर्म करने से धन कभी नहीं घटता। सेठ ने अपनी पूँजी की जरा भी परवाह नहीं की,जनता को जीवित रखने में उनका विपुल खजाना खाली हो गया था। अपना घर इस तरह धनहीन होते देख सेठ के कुटुंबीजन विरोध करने लगे। सेठ ने किसी की परवाह न करते हुए अपना काम चालू रखा। धन की सारी तिजोरियाँ खाली हो गयी। सेठ को भी धन का नशा उतर गया किन्तु धन का व्यय सत्कार्य में करने से पश्चाताप बिलकुल नहीं हुआ। उनका हृदय तो आनंद से भरा हुआ था, भले तिजोरियाँ खाली हो गयी थी।

अकाल बीत चुका था। वर्षा हुई, लोग - बाग खेती में लगे। सुकल का समय आ गया,किन्तु वीर जी सेठ के घर में सुकल नहीं आया। इसके बावजूद सेठ के मन में परमसंतोष था। संतोषी सदा सुखी। एक दिन प्रभात के समय सेठ बीर जी जब आसन पर बैठे, प्रभु के ध्यान में मग्न थे,उसी समय दरवाजे पर किसी ने उनके नाम कि पुकार लगाई। सेठ ने आकर दरवाजा खोला। सामने ही एक बनजारे ने सिर झुकाया। बनजारे ने कहा सेठ जी मेरा नाम रघुवर है, मैं आपके ही पास आया हूँ। प्रभात का समय है, यदि आपके ध्यान -पूजा में बाधा पड़ी हो तो क्षमा करे।

सेठ ने कहा, भाई बनजारे इस घर को तुम अपना ही घर समझो। कहो मेरे लिए क्या हुक्म है?

बंजारे ने कहा, मुझे बहुत लम्बा दूर जाना है इसलिए मेरी ये गठरियां कृपया अपने पास रख लीजिए। जब में वापस आऊँगा तो इन्हें ले लूँगा। अच्छा मैं चलता हूँ।

सेठ ने कहा, बंजारे भाई मैं गरीब हो चुका हूँ मेरे यहाँ पर माल रखना ठीक नहीं है। बंजारे ने बात अनसुनी करते हुए पोटे उतारकर सेठ के भवन में रखवा दी। सेठ तो किंकर्तव्यविमूढ़ हो धर्म - संकट में पड़ गया। बंजारे द्वारा अनकहे विदा लेने पर थोड़ी देर बाद जब सेठ का चित्त स्थिर हुआ, तो गठरियां गिनवाते हुए उनकी नजर एक गठरी पर पड़ी, जिस पर लिखा था, सेठ जी! माया का मोह छोड़कर आपने जनसेवा में अपनी पूरी पूँजी लगा दी। भूख से तड़प तड़प कर मरते हुए लोगों के मुँह में निवाला देखकर मैं बहुत खुश हुआ हूँ। सेठ जी तुम मुझे पहचान न सके मैं वही हूँ जिसका तुम अभी ध्यान कर रहे थे। बंजारा बनकर तुम्हारे द्वार पर आया और अपार धन - संपत्ति से भरी गठरियां जो तुम्हारे यहाँ पर रखी गयी है,वे सब तुम्हारी है। तुम्हारी दान में दी हुई वस्तुएँ ही तुम्हें लौटा रहा हूँ। इन्हें स्वीकार करे। बंजारे का यह पत्र पढ़ते ही सेठ के नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगे। वे बंजारे के पीछे भागे भी किन्तु निराशा ही हाथ लगी। भगवान तो अपना काम कर चुके थे। सुप्रसिद्ध कवि दुलाराम ने लोकचरित्र प्रकाश नामक ग्रन्थ में इस घटना का उल्लेख करते हुए अंतिम पद में लिखा है -

धर्म किये धन न घटे,यही संतन की दें! तुला को ही सत्य को,देखा वीरजी अपने नैन॥

सिद्ध हो गया कि ब्रह्माण्ड कि उत्पत्ति नाद से है। पौराणिक आख्यानों में सृष्टि की उत्पत्ति शब्द - शक्ति हुई बतायी गयी है और कहा गया है कि सृष्टि के अंत में समस्त भौतिक शक्तियां पुनः उसी में लय हो जाती है। इस सत्य की ओर विज्ञान के चरण अब क्रमशः बढ़ते चले जा रहे है और वह इस स्थिति में पहुँच चुका है, जब दावे के साथ यह कह सकते है कि आर्षवाक्य में जो मिथक और गल्प अब तक आलंकारिक उल्लेख मात्र माने जाते थे, उसमें सच्चाई का एक बड़ा अंश विद्यमान है।

शब्द अथवा ध्वनि का सूक्ष्म रूप श्नाद है। यह सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है इसे अनाहत श् नाद कहते है। यह तो अब विज्ञान भी स्वीकारता है कि शब्द - शक्ति का सर्वथा रूप नहीं होता। हम जो कुछ भी कहते है -बोलते है, वह तरंग रूप में सर्वदा मौजूद रहता है। यदि किसी प्रकार उन तरंगों को पकड़ पाना संभव हो सके, तो उन्हें पुनः - पुनः सुना जा सकता है। इसी आधार पर वैज्ञानिकों ने यह आशा व्यक्त की है कि महाभारत युद्ध के दौरान भगवान् कृष्ण द्वारा अर्जुन को दी गए गीता के उपदेश को भी कर्णगोचर कर पाना शक्य है।

यह ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत ( ला ऑफ कंजर्वेशन ऑफ एनर्जी ) पर आधारित निष्कर्ष हुआ। इससे आगे बढ़कर विज्ञान अब यह कहता है कि सम्पूर्ण विश्व ही तरंगयुक्त है। इस बिंदु पर दार्शनिक और वैज्ञानिक अवधारणा परस्पर मेल खाती है। दर्शन, सृष्टि में नाद की सर्वव्यापकता बतलाता है। विज्ञान इसे ही अपनी शब्दावली में तरंग कहता है। दोनों दो नहीं, तत्त्व एक ही है यहाँ पदार्थ की प्रकृति तरंगयुक्त कैसे है - इस पर तनिक चर्चा कर लेना अनुपयुक्त न होगा। विज्ञान क्या कहता है कि पदार्थ कणों का समुच्चय है। ये कण अणु और परमाणु कहलाते है। परमाणु पदार्थ का सूक्ष्मतम कण है। इसकी संरचना सौरमंडल की तरह है। इसके केंद्र में एक न्यूक्लियस (केन्द्रक ) होता है, जिसके गिर्द बंद परिपथ में अनेक ऋणावेशित कण या इलेक्ट्रान अनवरत रूप से घूमते रहते है और क्वांटम फील्ड पैदा करते है। यह एक परमाणु की संरचना हुई पदार्थ में इस प्रकार के अगणित परमाणु होते है। सब मिलकर एक बृहत् क्वाँटम फील्ड का निर्माण करते है यह क्वाँटम फील्ड वस्तुतः ओर कुछ नहीं तरंग या कम्पन्न का ही दूसरा नाम है। क्वाँटम सिद्धाँत को गढ़ा ही इस लिए गया है, ताकि पदार्थ की सही सही व्याख्या की जा सके। वह एक साथ तरंग और कण कैसे हो सकता है? यह सामान्य बुद्धि की समझ में आसानी से नहीं आता। उक्त सिद्धाँत पदार्थ के द्वैत स्वभावों में संगति को बैठता और कहता है कि पदार्थ की मूल सत्ता क्वाँटम या कम्पन्न है। आकृति अथवा कण एवं गति (या तरंग ) उस एक सत्य की दो अभिव्यक्ति है। पदार्थ के इन दो पक्षों की विस्तृत व्याख्या मूर्धन्य अमेरिकी वैज्ञानिक एवं संगीत चिकित्सक जान विलु ने अपनी पुस्तक म्यूजिक एंड साउंड इन दी हीलिंग आर्ट्स में किया है।

अब नाद से ब्रह्माण्डव्यापी पदार्थों का उद्भव कैसे हुआ -इस पर विचार करे। इसे समझने के लिए श्साइमैटिस्कश् या तरंग विज्ञान का प्रथम प्रयोग संगीतज्ञ एवं प्रख्यात भौतिकशास्त्री अनस्ट चादनी ने किया। अपने प्रयोगों के आधार पर उन्होंने लिखा नाम था - दिस्कवरिज कंसरनिग दी थ्योरी ऑफ म्यूजिक। सम्पूर्ण पुस्तक का सार निष्कर्ष इतना ही था कि ध्वनि तरंगों में विभिन्न प्रकार कि ज्यामितीय आकृतियों की निर्माण -क्षमता होती है। उन्होंने अपने प्रयोगों में भिन्न -भिन्न तरंगों द्वारा पृथक - पृथक आकृतियाँ बनाकर दिखाई। यह आकृतियाँ बाद में श्चडनी फिगर्स या चडनी की आकृतियों के नाम से प्रसिद्ध हुई। उन्होंने इसके लिए वायलिन का प्रयोग किया और आकृतियों का निर्माण का बालुका कणों पर किया। इससे आगे का कार्य फ्राँसीसी गणितज्ञ जुल्स लिसजू ने किया। उन्होंने देखा कि जब अगणित तरंगें 90 डिग्री के कोण पर परस्पर मिलती है तो एक विशेष डिजाइन कि रचना करती है। यह विशिष्ट संरचना ही लिसजू ने भी प्रदर्शित किया कि कम्पायमान तरल किस प्रकार गुरुत्वाकर्षणीय असर को निरस्त करता है और तिर्यक करने पर भी नहीं गिरता एवं आकृतियाँ गढ़ता रहता है।

अनुसन्धान का सबसे अद्भुत एवं आश्चर्यजनक पहलू वह था, जिसमें हैंस जेनी ने संस्कृत एवं हिब्रू जैसी प्राचीन भाषाओं पर प्रयोग किया। जब उनकी स्वर वाणी के बारी-बारी से उच्चारण किए गए, तो पलट कर स्थित बालुका कणों ने मिलकर वैसे ही आकार गढ़े जैसे कागज पर वे लिखे जाते थे। दूसरी अदुनातन भाषाओं के साथ यह विशेषता नहीं दिखलाई पड़ी। इससे यह कहा जा सकता है कि उक्त भाषाएँ स्वर या ध्वनि विज्ञान की गलत उदाहरण है एवं उनमें उच्चारण शास्त्र, ध्वनिविज्ञान तथा आकृति - विज्ञान का अद्भुत समन्वय हुआ है।

इसी प्रकार विज्ञान ने यह तो सिद्ध कर दिया कि ध्वनि तरंगों में आकृति निर्माण की रचना होती है। पर वह द्विआयामीय है, उसमें सिर्फ लम्बाई और चौड़ाई होती है जबकि मोटाई या ऊँचाई का तीसरा आयाम पूर्णतः अनुपस्थित होता है। सामान्य पदार्थ प्रायः तीन आयामी होती है। इस तीसरे आयाम की सर्जन समर्थ साधारण तरंगों में नहीं पाई जाती। उसके लिए नाद स्टार की सूक्ष्मता चाहिए जो तरंग और नाद में प्रकृति की दृष्टि से कोई अंतर नहीं, फिर भी उन्हें स्थूल और सूक्ष्म के दो वर्गों में विभाजित तो किया जा सकता है इसे यों समझे। मिर्च स्थूल पदार्थ है। उसे जो कोई खाता है, तो उसका स्वाद या प्रभाव केवल उसी तक सीमित हो कर रह जाता है, किन्तु जब उसी मिर्च को अग्नि के माध्यम से सूक्ष्मीकरण किया जाता है तो उसका प्रभाव इतना व्यापक होता है कि उस वातावरण में जो कोई भी आता है, वही छींकने खाँसने लगता है। यह सूक्ष्म की शक्ति है तरंग और नाद में इसी स्तर का अंतर है।यह तो सर्वविदित है कि पदार्थ की सूक्ष्मता जैसे-जैसे बढ़ती है, तदनुसार उसकी क्षमता में भी उत्तरोत्तर विकास होता है। तरंग जब नाद में रूपांतरित होती है, तो उसमें एक आकर्षण - शक्ति पैदा हो जाती है। इस शक्ति के द्वारा वह क्वाँटम कणों को अपनी और खींचता है। कणों का समुच्चय बाद में प्रकट होता है यह पदार्थ -रचना सम्बन्धी विज्ञान होता है।

अब यह प्रश्न है कि विश्व में इतने प्रकार के पदार्थों का प्रादुर्भाव कैसे हुआ? इस सम्बन्ध में विज्ञानी क्वाँटम कणों की सघनता और विरलता को करणभूति मानते हैं। जैसे की चडनी और लिसजू के प्रयोगों से स्पष्ट है आवृत्ति अथवा तरंग- दैर्ध्य में या दोनों में परिवर्तन से आकृतियों में भी बदलाव आता है, वैसे ही क्वाँटम कणों के किसी समूह की पहले वाली आवृत्ति बदल जाती है। इस परिवर्तित आवृत्ति के कारण जो स्थूल अभिव्यक्त होगी, वह पहले से भिन्न होगी अर्थात् दोनों दो प्रकार के पदार्थ होंगे ऐसे ही कण जुड़ने अथवा उससे पृथक होने के कारण आवृत्ति में जो अंतर आएगा, वह हर बार एक नवीन अभिव्यक्ति को जन्म देगा। इस प्रकार नये-नये पदार्थ पैदा होते चले जाएँगे।

विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि क्वाँटम कण कोई वास्तविक कण नहीं, ऐसी सत्ता है, जिनकी मात्रा नहीं होती। वे जिस क्वाँटम फील्ड या क्षेत्र का निर्माण करते हैं, वह वस्तुतः कंपन या तरंग है। इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है की पदार्थ का मूल स्वरूप तरंगयुक्त है। यहाँ वैज्ञानिक और शास्त्रीय मान्यताएँ मिलकर एक हो जाती है। विज्ञान यह भी कहता है कि सभी पदार्थों के इलेक्ट्रान, प्रोटान या क्वाँटम कण मूलतः एक ही है। उनमें किसी प्रकार का पार्थक्य या विभेद नहीं होता। यह तो उनका समूह या संख्या है, जो पदार्थों को उनकी विशिष्टता या गुण प्रदान करते हैं। यह भी परोक्ष रूप में उस शाखीय अवधारण को ही पुष्ट करता है कि सृष्टि का मूल तत्व नाद है विज्ञान उसे अपनी भाषा में क्वांटम तरंग कहता है।

नाद या तरंग किस प्रकार दृश्य अभिव्यक्तियाँ ग्रहण करते हैं- इसे मरणोत्तर जीवन की घटनाओं द्वारा भी जाना समझा जा सकता है। अनेक बार ऐसी घटनाएँ देखने-सुनने में आती हैं। जो व्यक्ति वर्षों पूर्व कर चुके वही अपने स्नेही-स्वजनों के समक्ष किन्हीं विशिष्ट प्रयोजनों के लिए प्रकट-प्रत्यक्ष होते और फिर तिरोहित हो जाते हैं। यह कोई भ्रम या मिथ्या नहीं यथार्थ है। वास्तव में चेतना की प्रकृति तरंगमय है वह चाहे तो गोचा स्वरूप ग्रहण कर सकता है। इसी प्रकार कई बार किन्हीं प्राचीन स्थलों में जाने पर वहाँ का जीवंत दृश्य उसी रूप में अचानक उपस्थित हो जाता है, जैसा सैकड़ों वर्ष पूर्व था। अनेक अवसरों पर इसे आँखों का धोखा कह दिया जाता है। सही गलत का पता तो तब चलता है, जब गहन जाँच-पड़ताल में वह सत्य साबित होता है इसलिए विज्ञान का यह कहना ठीक ही है कि पदार्थ या घटनाएँ अपनी स्थूल सत्ता खोने के बाद भी अस्तित्व में बनी रहती हैं उनका यह अस्तित्व और कुछ नहीं, तरंग या नाद ही है

इस प्रकार विज्ञान ने उस शास्त्रीय मान्यता को सच साबित कर दिया है, जिसमें ब्रह्मांड की उत्पत्ति शब्द अथवा नाद से हुई बताई गई है। आगे यदि वह दूसरी दार्शनिक मान्यताओं को भी अपनी कसौटी पर कसकर खरा सिद्ध कर दे, तो इसे आश्चर्य नहीं माना जाना चाहिए, कारण कि दोनों एक ही सत्य के दो अन्वेषक हैं।


मुक्ति का रास्ता (Kahani)

संत लाओत्से के पास एक जिज्ञासु पहुँचा और बोला कि मैं मुक्ति चाहता हूँ। लाओत्से हँसे उन्होंने कहा - तू मुक्ति किसलिए चाहता है। लाओत्से बोले पहले मैं को ढूँढ़कर ला। फिर मुक्ति कि बात करेंगे, जिज्ञासु लौट गया और लगा मैं को खोजने। खोजते-खोजते वर्षों बीत गए। वर्षों बाद लौटा, तो लाओत्से के चरणों पर सिर रख दिया। लाओत्से बोले - खोज लिया मैं। जिज्ञासु ने कहा मैं को खोजते-खोजते मैं ही मिट गई और मुझे मुक्ति का रास्ता मिल गया।


अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।

परमेश्वर विष्णु के वाहन! अपने ही इस आत्मपरिचय ने गरुड़ को गर्व से भर दिया। वह सोचने लगे, विष्णु का काम मेरे बिना चलना संभव नहीं। मेरी सेवा के बिना विष्णु एक डग भी नहीं चल सकते। संसार में मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता, विष्णु स्वयं मेरे अधीन है। मैं सब कुछ कर सकता हूँ। यही सोच कर गरुड़ ने साँपों का नाश करना शुरू कर दिया। जहाँ कहीं कोई साँप मिलता गरुड़ उसे निगल जाते, मार डालते। साँपों में हाहाकार मचाना स्वाभाविक था। वे गरुड़ से भयभीत हो इधर-उधर भागने लगे और अपनी सुरक्षा के उपाय खोजने लगे। साँपों का बाहर घूमना-फिरना बंद हो गया।

आखिर साँपों ने एक सभा की। सभा का अध्यक्ष शिव के प्रमुख मणि को बनाया गया। साँपों ने गरुड़ से मुक्ति पाने के उपायों पर विचार करना शुरू किया। कई प्रकार के उपाय सोचे गए, पर कोई भी उपाय गरुड़ को वश में करने का सही प्रतीत नहीं हुआ। अंततः अध्यक्ष मणि ने कहा- मैं साँप जाति के विध्वंस को रोकूँगा। आप चिंता न करें, मणि अश्वासन पर सभा उठ गई।

मणि ने शिव की भक्ति की। मणि की भक्ति से शिव प्रसन्न हुए। उन्होंने मणि से वरदान माँगने को कहा, मणि ने शिव से वर माँगा- भगवान्! मुझे वर दें की गरुड़ मुझे मार न सके। शिव ने तथास्तु कहा और अपने लोक चले गए।

मणि घूमते हुए तुरंत विष्णुलोक पहुँचा। विष्णुलोक में वह इधर-उधर घूमने-फिरने लगा। घूमते-घूमते उसे गरुड़ ने देख लिया। अपने शत्रु को अपने ही लोक में देख गरुड़ का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। उसने कहा अरे मणि! तेरी इतनी हिम्मत की तू मेरे ही लोक में इस तरह स्वतंत्रता से घूम रहा है।

इतना क्रोध न करें, महाराज! आप शाँत हो। हमारी जाति का नाश करके आप को क्या लाभ होगा? मणि ने विनम्रता से कहा।

गरुड़ कहने लगे- मैं साँपों का शत्रु हूँ। मैं उनकी जाति का नाश करके ही चैन की साँस लूँगा। मैं तुझे भी खाऊंगा, पर इस समय नहीं। इस समय मुझे भूख नहीं है। मैं आज शाम को तेरे नरम-गरम ताजे माँस से अपनी भूख शाँत करूँगा और गरुड़ ने मणि को एक सुरक्षित स्थान में बंद कर दिया। शाम हुई, शिवलोक में आज मणि नहीं था। नंदी को इसकी जानकारी मिली। वह शिव के पास पहुँचे उन्होंने शिव को मणि के शिवलोक में न होने की बात कही। शिव ने ध्यान लगाया, पता लगा की मणि विष्णुलोक में बंदी हैं। उन्होंने नंदी को कहा- नंदी! मणि को गरुड़ ने विष्णुलोक में बंदी बना लिया है। वह उसको खाना चाहता है अतः तुम जल्दी से विष्णुलोक जाओ। भगवान् विष्णु को हमारा सन्देश कहना कि वे मणि को गरुड़ से मुक्त करवा दें।

विष्णु ने नंदी से शिव का संदेश सुनकर तुरंत गरुड़ को बुलाया और मणि को मुक्त करने का आदेश दिया।

गरुड़ ने विष्णु की बात सुनी, बात सुनकर वह आग बबूला हो गया। आवेश में बोला- आप कैसी बातें करते हैं। मैं मणि को आज मुक्त नहीं करूंगा। आज मैं उसे खाकर अपनी भूख शाँत करूंगा। भगवान् मैंने आपकी बहुत सहायता की है। आप यह न भूलें कि आपकी हर विजयश्री के लिए मैं ही निमित्त हूँ, आपकी सभी यात्राएँ मेरे ही कारण संपन्न हुई हैं। विष्णु गरुड़ की बात सुनकर शाँत रहे। वे मन-ही-मन सोचने लगे की गरुड़ को अहंकार हो गया है। अहंकार दूर न होने पर इसका अनिष्ट हो जाएगा। अतः उन्होंने गरुड़ को शाँत होने को कहा। गरुड़ के कुछ शाँत होने पर उसे थपथपाकर विष्णु बोले- गरुड़ हमें तुम पर गर्व है! तुम्हारे कारण ही हम इधर-उधर घूम सकते हैं। यह सच है कि कई विजय हमें तुम्हारे कारण ही मिली हैं। तुमने हमारे भारी-भरकम शरीर को कोसों दूर तक ढोया है और प्यार भरी बातों में विष्णु ने केवल अपने दाहिने पैर का अंगूठा गरुड़ पर रख दिया।

भगवान् विष्णु ने अपना अंगूठा गरुड़ की पीठ पर रखा ही था कि गरुड़ तिलमिला उठे। उनको लगा कि भारी बोझ उन पर आ गया है। वह बोझ के नीचे दबकर मर जाएगा, उसके प्राण निकल जाएँगे। वह क्षणभर तो छुप रहा। भगवान् से भला अपना अंगूठा हटाने को कैसे कहें, पर जब उससे सहन नहीं हुआ तो बड़ी दीनता से बोले- भगवान् जरा अंगूठा........ मैं दबकर पिसा जा रहा हूँ।

क्यों अंगूठे से क्या हुआ? तुमने तो हमारा शरीर कोसों दूर ढोया है। घोर आश्चर्य! भगवान् बोले।

गरुड़ अब तक सारी बातें समझ चुके थे। वह धीरे-धीरे बोले- भगवान् मुझे क्षमा कर दें, मुझे अहंकार हो गया था। आपने मेरा अहंकार नष्ट कर के मेरा उपकार किया है मैं मणि को अभी मुक्त कर दूँगा। मुझे क्षमा कर दें भगवान्!

भगवान् विष्णु ने अपना अंगूठा गरुड़ के शरीर से हटाया तो उनकी रुकती हुई सांसें चलने लगी। उन्होंने इस सत्य का गहराई से अनुभव कर लिया कि भगवत्कार्य में कोई भी कर्ता नहीं, मात्र निमित्त ही होता है। अपने से कितना भी बड़ा एवं विशिष्ट कार्य सम्पन्न हो जाने पर भी यदि स्वयं को निमित्त मात्र ही माना जाए, तो अहंकार नहीं होता।


रहस्यों और तिलिस्मों से भरी हुई अपनी दुनिया

उड़नतश्तरियाँ हम धरतीवासियों के लिए एक पहेली हैं। इसके अविज्ञात तथ्य को अभी तक नहीं जाना जा सका है, पर इसे कपोल-कल्पना कहकर टाल भी नहीं सकते हैं। उड़नतश्तरियों से संबंधित प्रमाणों से पता चलता है कि अन्य विकसित ग्रहों के निवास धरती पर उतरने के लिए इन तीव्रगामी यानों का प्रयोग करते होंगे। इन पर सवार जीव भी बड़े विचित्र एवं अद्भुत होते हैं। उनकी संरचना भूलोकवासियों से एकदम भिन्न देखी गयी है। कुछ उड़नतश्तरियाँ पृथ्वी का चक्कर काट कर चली जाती हैं, तो कुछ धरती के लोगों का अपहरण कर ले जाती हैं। इन पर विश्व में अनेकों शोध-अनुसंधान किए जा रहे हैं। इस मामले में अमेरिका अग्रणी हैं।

आज के वैज्ञानिक अनुसंधानों के अलावा ऐतिहासिक प्रमाण भी इसकी पुष्टि करते हैं। २९ ईसा पूर्व के रोम के ऐतिहासिक वृत्तान्त में उड़नतश्तरी का वर्णन मिलता है। इल्जिरियाई सहारा के तसिली एवं सफारा नामक पहाड़ों की गुफाओं में अंतरिक्ष-वासियों का चित्र खुदा हुआ है। ये चित्र ९८ फुट ऊँचे हैं। उनकी भारहीन व्यवस्था के दर्शनों के लिए आस-पास चन्द्र-सूर्य कि आकृतियाँ बनी हुई हैं। जापान के डेंगू मूर्तियाँ अन्य लोकों की जान पड़ती है। इस्टर द्वीप की आँक नामक पत्थरों की विशाल प्रतिमाएँ उड़नतश्तरियों से मेल खाती हैं। असीरिया नामक क्षेत्र से मिली पुरानी मुद्राओं में अंतरिक्ष-परिधानों के सजे प्राणियों के चित्र अंकित हैं। अनंत आश्चर्यों से भरे अन्तरिक्षवासियों की अनेकानेक आकृतियाँ, संकेत व लिपियाँ जर्मन, इटली, स्पेन, अमेरिका आदि देशों में मिली हैं।

चीनी ग्रन्थ सरित्सागर में एक उड़नतश्तरी की घटना का उल्लेख हुआ है। इस कथा के अनुसार राजवर और प्राणधार नामक दो भाई माया यंत्र के निर्माण में निपुण थे। इन दोनों भाइयों ने उड़नतश्तरी बनाई एवं राजा के कोषागार से सारे धन को लेकर अंतरिक्ष के किसी अन्य लोक में चले गए। सन ८ में विख्यात चीनी पुरातत्वेत्ता चिपुईताई ने अपने देश की दरकन कला उला नामक कंदराओं में लोकोत्तर प्राणियों का शव ढूँढ़ निकालने का दावा किया था। मध्य अमेरिका की प्राचीनमय सभ्यता के लोग लोहे के यंत्रों से परिचित नहीं थे। इसके बावजूद उनके पास उच्चकोटि का पंचांग मौजूद था। यहाँ पर हवाईपट्टी भी मिली हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि यह उपलब्धि उनको किसी दूसरे ग्रह के प्राणियों द्वारा मिली थी। लेटिन अमेरिका के देश पेरु के पठारी क्षेत्र में इंका नामक पुरानी सभ्यता के समय की हवाईपट्टी जैसी रचनाएँ मिली हैं। यह सीधी एवं वृत्ताकार नागिनों से जड़ी रेखाओं के समान हैं। संभव है पर आवागमन हेतु इन्हें बनाया हो।

आस्ट्रिया के आल्पस पर्वतीय क्षेत्र में माल्ज्वर्ग नामक एक सुन्दर नगर बसा है। सन १६ में यहाँ कोयले की खान में ८ ग्राम पाइप का एक टुकड़ा प्राप्त हुआ। इसका कार्बन परीक्षण अत्यंत चौंकाने वाला था। वह पाइप इतना पुराना है कि इसके निर्माणकाल के समय पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म भी नहीं हुआ होगा। फिर यह सवाल है कि इसका निर्माता कौन है? जाहिर है यह अंतरिक्षवासियों द्वारा लाया गया होगा। सिंधुघाटी की सभ्यता तथा मौर्यकाल में तमाम ऐसी मूर्तियाँ मिलती हैं, जो अंतरिक्ष सूट जैसे वस्त्र पहने हैं इतिहासकार इन्हें आकाशवासियों की देन मानते हैं।

पेरु के नाज्कर क्षेत्र में भी ऐसे अनेक प्रमाण मिले हैं। वहाँ पाँच हज़ार पूर्व का इंका मंदिर भग्नावशेष अवस्था में हैं। इनकी दीवारों में आश्चर्यजनक चित्र अंकित हैं। इनमें से एक राकेट इंजन व पुर्जों का है। रॉकेट में हैलमेट पहने एक व्यक्ति को बैठे हुए दिखाया गया है। जिसके पीछे आग की लपटें दर्शायी गयी हैं। यहीं एक ओर गुफा भी है। उस गुफा के भित्तिचित्र पर एक विचित्र विमान पर एक व्यक्ति का चित्र खुदा हुआ है? वह व्यक्ति अंतरिक्ष सूट व हेलमेट धारण किए हुए है और उसके नीचे लिखा है- सूर्यपुत्र सातवें आसमान से उतरा। यह सूर्यपुत्र अंतरिक्षवासी रहा होगा। इसी प्रकार का एक प्रमाण अमेरिका के एण्डीज पर्वत में टीटीकाँग नामक झील में मिलता है। झील के निकट एक सूर्य-मंदिर का भग्नावशेष है। मंदिर के मुख्यद्वार पर विचित्र प्रकार का कैलेंडर खुदा है। इस कैलेंडर का वर्ष 290 दिन का है, जिसमें 24-24 दिनों के दस महीने एवं 25-25 दिनों के शेष दो महीने आते हैं इस मंदिर का निर्माण इंका राजाओं ने करवाया था, परंतु इस कैलेंडर का कहीं तुक नहीं बैठता। संभव है यह भी अंतरिक्षवासियों का उपहार हो इस पर उनके आने का दिन व तारीख भी अंकित है। इस प्रकार से समस्त प्रमाण बतलाते हैं कि पृथ्वी के अलावा भी ऐसी कई ग्रह होंगे, जिनमें धरती के निवासियों से अधिक बुद्धिमान प्राणी निवास करते हो, शायद वे अधिक उन्नतावस्था में भी हो।

प्रसिद्ध अमेरिकी विज्ञान-कथा लेखक हेर्ल्वग ने चौंकाने वाली भविष्यवाणी की है। इनके अनुसार बीसवीं सदी के अंत एवं इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ में भारी मात्रा में अंतरिक्षवासियों का अवतरण होगा। इस संबंध में अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं। पेरु के एक द्वीप इकेनारा में कुछ प्रस्तर-खंड प्राप्त हुए हैं। उस पर अज्ञात लिपि में कुछ लिखा है तथा विचित्र प्रकार के चित्र भी अंकित हैं। ऐलिकेंन पादरी डॉ. परियो एरेस ने उस लिपि को पढ़कर सबको हैरत में डाल दिया है। इन्होंने पत्थर को दो लाख वर्ष पुराना माना है तथा लिपि को दस हज़ार वर्ष प्राचीन कहा है। ये पत्थर सामान्य नहीं हैं, ये पानी में नाव की भाँति तैरते हैं। ये इस लोक के लगते भी नहीं पिछले किसी युग में लोकोत्तर प्राणी इन पत्थरों को यहाँ भूल गए होंगे। इनके किनारे पर बनी त्रिभुजाकार आकृति यह स्पष्ट संकेत करती है कि आकाशवासियों का अवतरण पिरामिडों के देश मिस्र में होना चाहिए। इस्टरद्धीप एवं फिलीपीन्स के भिजनाओं द्वीप के प्रमाण भी बतलाते हैं कि निकट भविष्य में अंतरिक्षवासी पृथ्वी पर संपर्क साधने एवं उतर पाने में सफल होंगे।

यह रहस्यमय आकाशीय यंत्र अभी भी वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्य की वस्तु है। इनका उद्देश्य एवं क्रिया−कलाप रहस्य के घेरे में है। उड़नतश्तरियों को देखने की घटनाएँ आश्चर्यजनक एवं कौतूहलपूर्ण हैं। इनसे संबंधित कई रोचक जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं। उड़नतश्तरियों को देखने की घटनाओं की गणना करने पर पता चलता है कि विश्व के लगभग 135 देशों में कोई 65 हजार बार इन्हें देखा गया है। सबसे अधिक बार इन्हें देखने का सौभाग्य अमेरिकी नागरिकों को प्राप्त हैं। सन 1947 से 1969 के बीच 12,618 उड़नतश्तरियाँ केवल अमेरिका में देखी हैं। इनसे प्राप्त किसी घटना में अमेरिका को कोई आशंका एवं खतरे का संकेत नहीं मिला इसलिए उड़नतश्तरियों पर अमेरिकी सी. आई. ए. द्वारा निगरानी करना बंद कर दिया गया था। इन दिनों यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। हाल ही में उच्चतकनीकी यू. एफ. ओ. ( अनआइडेनटीफाइ फलाइंग आब्जेक्ट ) के सदस्यों द्वारा ली गई सामूहिक आत्महत्या के बाद पुनः इस ओर सक्रियता आई है।

इसके लिए अमेरिकी वायु सेना के जासूसी विमान यू. और एस. आर. 69 का प्रयोग किया जाता है। यू.2 में फोटोग्राफी से पता चलता है कि उड़नतश्तरियों की आकृति भिन्न-भिन्न होती है। एस. आर. 69 ने सर्वप्रथम 1964 में इसे देखा। सी. आई. ए. गैराल्ड के. हेंस ने भी इसके अस्तित्व की पुष्टि की है। सी. आइ. ए. की पत्रिका में गेराल्ड के. हैंस के उड़नतश्तरी संबंधित लेख को विशेष रूप से प्रकाशित किया गया था। इनका कहना है कि हज़ारों कोशिशों के बावजूद उड़नतश्तरी को पकड़ा नहीं जा सका है।

अब तक किए गए शोध-निष्कर्ष यह भी बताते हैं कि उड़नतश्तरी केवल रात को ही दिखाई देती हैं। इनकी गति तीव्र एवं सीधी रेखाओं में होती है। ये अधिकतर निर्जन प्रदेशों या जलीय क्षेत्रों के निकट उतरती हैं या दिखाई देती हैं। उड़नतश्तरियाँ जिन मार्गों से गति करती हैं, वहाँ की रेडियोधर्मिता अत्यधिक बढ़ जाती है। इनसे निकली अदृश्य तरंगों या धुएँ से संचार-व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाती है। इन तमाम कारणों से उड़नतश्तरी की स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाती। ये रहस्यमय यान पाँच वर्ष के चक्र में अत्यधिक दिखाई देते हैं। एक अन्य अनुमान के आधार पर पता चलता है कि पृथ्वी का डिग्री के आस-पास का क्षेत्र इन्हें ज्यादा ही पसंद है। इन क्षेत्रों में उड़नतश्तरियों को देखने की घटनाएँ सर्वाधिक हैं। उत्तरी अमेरिका, लेटिन अमेरिका और अफ्रीका के मध्य देखी गयी उड़नतश्तरियों की संख्या समूचे विश्व के तीन-चौथाई के बराबर है।

द्वितीय विश्वयुद्ध में जहाँ जापान की तबाही हो गयी वही इन रहस्यमय यानों की आवाजाही में भारी बढ़ोत्तरी हुई है। बम विस्फोट के ठीक दूसरे वर्ष ही स्कैन्डनेविया में एक उड़नतश्तरी को सागर के आकार में पहचाना गया। इसके पूर्व सन 1896-97 में अमेरिका व ब्रिटेन में उड़न तश्तरियाँ दिखाई दी थी। इसके पश्चात 1908, 1909, 1915, 1917, 1917, 1930 एवं 1935 में इन अनजान यानों की झाँकी मिली। 30 जून, 1908 को सैबोरिया को साइबेरिया के तुँगुस्का इलाके में पृथ्वी से कोई रहस्यमय वस्तु टकराई, जिससे इतना प्रकाश हुआ कि तीन दिन वहाँ बिजली की जरूरत नहीं पड़ी। इसके प्रकाश की तीव्रता इतनी थी कि इसे फ्रांस तक देखा गया। 13 मई 1997 को पुर्तगाल के फातिमा नगर में लिस्बन से कोई सौ किलोमीटर दूर कारपी द इरिया नामक झरने के निकट उड़ान भर रही थी। यहाँ पर तीन लड़कों ने उन लोकोत्तर यात्री से बात करने का प्रयास किया। इसके ठीक दो माह बाद जुलाई को हजार लोगों ने उड़नतश्तरियों के नज़ारे का आनंद उठाया।

एक फ्राँसीसी लेखक एमी माइकल ने भी 1952 और 1954 ईस्वी में फ्रांस के विभिन्न स्थानों पर सिगार नुमा उड़नतश्तरियों का उल्लेख किया है। आस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में 3 मई, 1964 को मौसम विशेषज्ञों ने एक उड़नतश्तरी से कई छोटी-छोटी तश्तरियों को निकलते और पुनः उसी में समाते देखा। 1978-79 के दौरान इटली में और 19 अप्रैल 1979 को दक्षिण फिलीपीन्स के दो नगरों में उड़नतश्तरियाँ पहचानी गयी। मार्च 1979 में न्यूजीलैंड में उड़नतश्तरियों पर बकायदा फिल्म बनायीं गई। कुछ साल पूर्व सोवियत संघ के यूरोपीय हिस्से में उड़नतश्तरियों की हलचलें एवं इनकी गतिविधियाँ एक-एक बढ़ गई। यह क्षेत्र है काकेशस और साइबेरिया। यूकोलॉजी साइटीफिक सेंटर के प्रधान ब्लिदिमिर असना के अनुसार, रूस में 1992 में ही 300 से ज्यादा उड़नतश्तरियाँ दिखाई दी।

1978 को एक उड़नतश्तरी उदयपुर नगर में दिखी और एक फ्राँसीसी वैज्ञानिक द्वारा इसकी पुष्टि की गयी। इसके एक सप्ताह बाद उड़नतश्तरी के दिल्ली में जोरदार अंधड़ आया। इस शक्तिशाली तूफान में 28 लोग मर गए। प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार, यह वस्तु चक्रीनुमा थी। 3 अप्रैल 1978 को भारत के विभिन्न स्थानों पर एक ही उड़नतश्तरी देखे जाने की पुष्टि हुई है। इसके अलावा 20 अक्टूबर, 1978 को खासी पहाड़ियों में, 23 सितम्बर 1980 को मध्यप्रदेश में विलासपुर के पास, 16 फरवरी 1982 को बस्तर के काकेर में, 5 जुलाई 1982 को बस्तर के नारायणपुर में, 26 अप्रैल 1987 को भी भारत के अनेक स्थानों पर उड़नतश्तरियों को देखा गया।

उड़नतश्तरियों से उतरते हुए ऐसे विलक्षण जीवों को देखा गया है, जिनकी बनावट भूलोक के व्यक्तियों से भिन्न थी। अमेरिका के न्यूमैक्सिको प्रदेश में सन 1946 से 48 के मध्य कई उड़नतश्तरियों के आने जाने की घटना घटी। 7 जुलाई 1947 की शाम को 4 बजे के आसपास यांत्रिक खराबी के कारण एक उड़नतश्तरी टूटकर जमीन पर गिरी। अमेरिका रक्षा विभाग ने गोपनीयता की दृष्टि से दबाने की कोशिश की, परन्तु प्रत्यक्षदर्शियों ने मलबे में कुछ नाटे कद के मृत जीवों को देखने का दावा किया। सन् 1947 में ही रुजवेल्ट के पास स्थित सेंट आग्स्तियान के मैदान में उड़नतश्तरी टूटकर बिखर गयी।

इसके मलबे में 16 मृत व्यक्तियों के साथ चार फुट का एक जिन्दा व्यक्ति बरामद हुआ। उस लोकोत्तर प्राणी का शरीर रोओ से रहित था। इसका सिर बड़ा, आंखें बड़ी-बड़ी तथा कान -नाक विहित था। अमेरिका के पश्चिमी तट पर उड़नतश्तरी का जब चित्र लिया जा रहा था तभी वह टूट गई। इसके धात्विक परीक्षण से ज्ञात हुआ कि यह 16 मिश्रधातुओं से विनिर्मित है। इसके अधिकतर तत्व पृथ्वी पर नहीं पाए जाते है।10 सितम्बर 1947 को ब्राजील के सलोपलो नगर के पास उबतुबा नामक स्थान पर किसी उड़नतश्तरी के फटने से प्राप्त मलबे का परीक्षण किया गया। यह तश्तरी मैग्नीशियम धातु की बनी थी।

जुलाई ६९ में चंद्रमा पर जाने वाले अंतरिक्षयात्री के इर्द-गिर्द कुछ अदृश्य प्राणियों की उपस्थिति महसूस की गई। उस समय यह यान पृथ्वी से लाख हजार किलोमीटर दूर अन्तरिक्ष में था। इस पर अध्ययन करने वालों में एक अन्वेषक और भौतिकी के प्राध्यापक हार्ट रुट्लेग थे। उन्होंने उड़नतश्तरी का अध्ययन प्रारंभ किया। रुट्लेग ने तीन उड़नतश्तरी को काफी करीब से देखा 19 सितम्बर 1967 में स्पेन में 11.5 मित्र व्यास का बकुरे व नीले रंग के वस्त्र पहने हुए हट्टे - कट्टे लंबे कद के अद्भुत प्राणी थे।

22 अक्टूबर 1974 को एक इंजीनियर कैवित्न अपनी दूरबीन से सुदूर आकाश की ओर निहार रहे थे। उन्हें आकाश में एक विलक्षण वस्तु दिखाई दी, जो धीरे धीरे चक्कर लगाती हुई पृथ्वी पर उतरी। उसमें से विचित्र किस्म के आदमी को देखते ही इंजीनियर महोदय बेहोश होकर गिर गए। अन्तरिक्षवासियों की संरचना यहाँ के निवासियों से भिन्न थी। ऐसी ही एक घटना अगस्त 1961 में रोजर्स केन्टकी में घटी विवन्स नामक एक महिला अपनी दो बच्चियों के साथ कृषि फार्म के निरिक्षण हेतु गई थी। वही उसने उड़नतश्तरियों का दृश्य देखा। उसमें से एक अजीबोगरीब परछाई उतरी और विवन्स का पीछा करते-करते अदृश्य हो गयी। विवन्स अपनी बच्ची के साथ सोई हुई थी। डेढ़ बजे जब अचानक आँख खुली, तो वह डर के मारे काँप उठी। गोलमटोल सिर का एक अजीब व्यक्ति उनके पास खड़ा था।

सन १ में डॉ. बीटा ७० मिल प्रति घंटे की रफ्तार से कार में जा रहे थे। उन्होंने अचानक एक चमकीली उड़नतश्तरी दिखी, जो चक्कर लगाती हुई एक सुनसान क्षेत्र में उतर रही थी। उसमें सवार सभी आकाशवासी उड़नतश्तरी से उतरे और हरी घास पर बैठ गए। उनकी ऊँचाई फीट के आस पास थी। उनके चेहरे एकदम काले थे। जैसे कोई काला पेंट कर दिया गया हो। इस घटना के तुरंत बाद डॉ. बीटा अपने अन्य मित्रों को बुला लाए। वहां उन्हें राख का ढेर मिला। जिसे छूने पर उनके हाथ बैगनी रंग के हो गए और वर्षों तक साफ नहीं हुए। इसके कुछ दिनों बाद डॉ. बीटा ने तीन उड़नतश्तरियों को देखा। इस दृश्य को देखने के पश्चात डॉ. बीटा के शरीर पर फफोले पड़ गए। इस दृश्य को देखनेे के बाद उन्हें अत्यधिक बुखार आया, जो उनके जीवन काल की अंतिम बिमारी साबित हुई।

म्यूचल यू. ऍफ़. ओ. नेटवर्क के डायरेक्टर के अनुसार यूनियन टाउन के फेतेकौती में ६ फरवरी को एक लम्बे पैरों वाले व्यक्ति को उड़नतश्तरी से नीचे उतरते देखा गया। गार्डेन महाशय ने ऐसी ९८ विलक्षण यातना का वर्णन किया है। जिसमें उड़नतश्तरी से पृथ्वी पर आने वाला अद्भुत प्राणी का उल्लेख किया गया है। उड़नतश्तरी अनुसन्धान केंद्र की रिपोर्ट के अनुसार अब तक १५० घटनाओं में प्राणियों की संरचना पृथ्वीवासियों से सर्वथा भिन्न पाई गई।

कैलीफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के भौतिकशास्त्री एच. पी. रॉबर्टसन ने बताया कि यु. फ़. ओ. समाज के लिए घातक हो सकती है। इनके रेडिएनस का प्रभाव भयंकर होता है।यह बात इस घटना की पुष्टि करती है पुल्किस, फिनलैंड की दो लड़कियों ने दिसंबर २ को गुंबदाकार उड़नतश्तरी को आकाश में उड़ते देखा। जैसे ही लड़कियों पर प्रकाश की किरणें पड़ी तो दोनों का शरीर सिर से पाँव तक लकवाग्रस्त हो गया। उनकी इतनी दुर्दशा हो गयी कि उनमें सुनने व श्वास लेने की क्षमता नहीं रही। उड़नतश्तरियों ने लोगों को तथा विमानों को या तो लापता कर दिया या अपहरण कर लिया। ऐसी ही एक घटना 28 अगस्त 1995 के दिन घटी जिसमें फस्टफोथ्नार्फाक नामक ब्रिटिश रेजिमेंट के कई सिपाही एकाएक गायब हो गए। यह दल प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गेलीपोली अभियान के तहत श्हिल 70 श् पर चढ़ाई कर रहा था। उन्हें आकाश में उड़नतश्तरी दिखी और पूरा दल लापता हो गया। 7 जनवरी 1948 को दोपहर एक बजकर 15 मिनट पर चार अमेरिकी 51 विमान पर गए। फ्लाइट लेफ्टिनेट आर विल्सन ने 1250 की. मी. तक उड़नतश्तरी का अनुसरण किया। इसके बाद इस अद्भुत आकाशीय वस्तु ने विमान सहित विल्सन का अपहरण कर लिया। इसी प्रकार लेक्न्हीथ, इंग्लैंड में 13 अगस्त 1956 को रात साढ़े तीन बजे दो उड़नतश्तरी ने लड़ाकू विमानों का अपहरण कर लिया।

17 सितम्बर 1963 को ही प्रातः 8 बजे जापान के कनामाची स्थान पर टोकियो की एक कार का उड़नतश्तरी ने अपहरण कर लिया। स्पेन के जेट विमान को वैलेशिया हवाई अड्डे पर 12 नवंबर 1979 को अचानक उतरना पड़ा। इसका कारण था, चार उड़नतश्तरी जेट विमान का पीछा कर रही थी। 4 सितम्बर 1983 को एक उड़नतश्तरी ने एक चीनी युवती को बीहड़ के पास छोड़ दिया। युवती पहाड़ी सड़क पर कार ड्राइव कर रही थी। 13 सितम्बर 1967 को एक महिला तथा कई पुलिस वालों सहित 58 व्यक्तियों ने इस रहस्यमयी यान को देखा। इनमें से एक तश्तरी ने कार ले जा रही महिला का 15 किलोमीटर तक पीछा किया। अक्टूबर 1973 में ओहियो आर्मी के हेलीकॉप्टर के चालक ने उड़नतश्तरी के चंगुल से जैसे-तैसे अपने को सुरक्षित कर पाया। उनके अनुसार एक रहस्यमय यान हेलीकॉप्टर से कोई 500 मीटर ऊँचाई पर रुका और उन्हें ऊपर खींच लिया।

विशेषज्ञों के अनुसार उड़नतश्तरी की कल्पना कहानी नहीं है। अमेरिका के ५ फीसदी से अधिक से लोग इस पर विश्वास करते है। अमेरिका में कई एकेडेमी इन घटनाओं का अध्ययन कर रही है। वहां के एक विश्वविद्यालय में भी यु फ़. ओ. सम्बन्धी अध्ययन-अध्यापन कार्य जारी है, कैलीफोर्निया और कनाडा में इसका गुप्त अध्ययन केंद्र है। इनका सम्बन्ध ब्रिटेन, पश्चिम जर्मनी, ताईवान से भी है। अमेरिका के प्रसिद्ध अन्तरिक्ष विज्ञानी गार्डेन कूपर ने यू. फ. ओ. को अन्तर्ग्रही वाहन कहा है। इनके अनुसार उड़नतश्तरी एन्तिग्रेविती प्रोपल्सन के तहत प्रयोग में लायी जाती है। कैलीफोर्निया में आयोजित एक संघोष्टि में खगोलविदों और अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने खुले मन से स्वीकारा है कि उड़नतश्तरी किसी अन्य ग्रहों के कुशल मस्तिष्क द्वारा संचालित होती है। उड़नतश्तरियों की दिशा नियंत्रक क्षमता तथा उन्नत वैज्ञानिक प्रणाली को देख कर अनुमान लगाया जा सकता है कि इसके पीछे कोई विशिष्ट उद्देश्य होगा।

वैज्ञानिकों का मानना है कि उड़नतश्तरी के रहस्य को उजागर किया जा सके, तो अन्य ग्रहों के बारे में जानकारियाँ मिल सकती है। अगर ऐसा हो सका तो भावी सदी में उड़नतश्तरी से अन्तर्ग्रही यात्रा मात्र सपना नहीं रह जाएगी। सम्भव है कि इक्कीसवीं सदी के प्रज्ञावान मनीषी इस सम्भावना को सत्य साकार कर ले।


आदर्शों के प्रति सजग (Kahani)

गुरु गोविन्दसिंह ने अपने बड़े पुत्र अजीतसिंह को आज्ञा दी कि तलवार लो और युद्ध में जाओ। पिता की आज्ञा पाकर अजीतसिंह युद्ध में कूद पड़े और वही बलिदान हो गया। इसके बाद गुरु ने अपने द्वितीय पुत्र जोझासिंह को वही आज्ञा दी। पुत्र ने इतना कहा - पिताजी प्यास लगी है, पानी पी लूँ। इस समय पर पिता ने कहा - तुम्हारे भाई के पास खून की नदियाँ बह रही है। वही प्यास बुझा लेना। जोझासिंह उसी समय युद्ध क्षेत्र को चल दिया और वह अपने भाई का बदला लेते हुए मारा गया।

इन बच्चों का बलिदान से सिखों में ऐसी आग पैदा हुई कि दुश्मन को अपना खेमा उखाड़ते ही बना। आदर्शों से जुड़ने वाले दैवी अनुग्रह के पात्र किस प्रकार बनते है, इसका यह प्रत्यक्ष उदाहरण है।

यह दैवी अनुग्रह ही था, जो उनके अंत में प्रेरणा के रूप में उभरा एवं आदर्शवादी उत्तकर्शत्ता से जुड़ कर बदले में उन्हें यश सम्मान भी दिया।


चेतना का क्रीड़ा - कल्लोल - स्वप्नदर्शन

अठारहवीं शताब्दी के महान योद्धा टीपू सुल्तान को अपने समय का सफलतम शासक माना जाता रहा है। इस सफलता के पीछे उन्हें समय-समय पर सम्बंधित विषयों के बारे में स्वप्न के माध्यम से मिलते रहने वाले पूर्वाभास की प्रमुख भूमिका रही है। यह रहस्योद्घाटन उस डायरी से हुआ जो सन् ७९ में श्रीरंग्पातटम के युद्ध में हुई। उनकी मृत्यु के पश्चात् अंग्रेजों के सम्बन्ध में उन्हें कभी स्वप्न में तो कभी अनायास बैठे बैठे ही अंतः प्रेरणा उभरती है कि अब अमुक कदम उठाने चाहिए। वैसे ही वह करते भी थे। अपनी मृत्यु तक का वर्णन उस डायरी में उन्होंने किया है।

स्वप्नों के सम्बन्ध में दी अमज न्स एंड डेवलपमेंट ऑफ साएकोएनलिसिस नामक पुस्तक में मनोवेत्ता सिगमंड फ्रायड ने बताया है कि रात्रि में व्यक्ति सो जाता है, तो उसका शरीर शिथिल हो जाता है, परन्तु मन तब भी जागृत रहता है और यही अपनी इच्छाओं आकांक्षाओं के स्वप्न सजाता देखता रहता है। उसके अनुसार स्वप्न मनुष्य की दमित एवं अपूर्ण इच्छाओं की प्रतीकात्मक पूर्ति मात्र है। इससे अधिक कुछ भी नहीं है।

आधुनिक शोध- अनुसन्धान के आधार पर अब यह सिद्ध हो गया है कि स्वप्नों के सम्बन्ध में फ्रायड की उक्त मान्यता भुत उथली है। स्वप्नों के मात्र इतने बार ही कारण नहीं होते। इस संदर्भ में भारतीयों मनीषियों ने भुत पहले ही अथर्ववेद, देवज्ञकल्पद्रुम, सुत्रुत संहिता, अग्नि पूरण आदि ग्रंथों में स्वप्नों के बारे में कही अधिक छानबीन की है। कठोपनिषद् में तो मन को विद्युत शक्ति के समान माना गया है। कहा गया है सामान्य स्थिति में तामसिक स्वप्न आते है, जो अपने शरीर के विषयों तक सीमित रहते है। ऐसे स्वप्न ऊलजलूल और ऊटपटाँग हुआ करते है। संभवतः फ्रायड की विश्लेषणात्मक कल्पनाशक्ति की दौड़ यही तक चक्कर काटकर समाप्त हो जाती है।

तामसिक स्वप्न से आगे जब शरीर रजोगुण प्रधान रहता है, तो उस समय जागृत अवस्था में देखे हुए पदार्थ या दृश्य ही कुछ रूपांतर से स्वप्नावस्था में दिखाई देते है। ऐसे स्वप्न जागृत होने के बाद भी याद रहते है। इन दो प्रकार के सामान्य स्वप्नों से भिन्न एक ओर प्रकार के स्वप्न का भी शास्त्रों में उल्लेख किया गया है। जिन्हें सात्विक स्वप्न कहते है। इसमें मन का सम्बन्ध जब आत्मा से होता है तब ऐसे स्वप्न आते है, सोते समय जिस किसी भी क्षण मन आत्मा से सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। सोते समय भूत, भविष्य, वर्तमान की काल - सीमा और स्थान की मर्यादा से लगता है।

सुप्रसिद्ध मनीषी सर ओलीवर लॉज ने अपनी क्रति श्सरवाइवल ऑफ मैन में कहा है कि स्वप्नों में इस तरह भविष्य की घटना दिखाई देना इसका एक प्रमाण है। उन्होंने इस तथ्य को स्वीकार किया है कि मन के माध्यम से हम स्वप्नावस्था में अलौकिक जगत और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं को देखते और जान लेते है। उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने लिखा है कि यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के सपनों के बारे में लिखा है कि उन्हें अपने कार्य एवं भविष्य की घटना के बारे में अधिकाँश जानकारी व प्रेरणा स्वप्नों के माध्यम से ज्ञात होती है।

इसी तरह एक घटना पादरी इ. के. एलियट के जीवन से सम्बंधित है। 14 दिसंबर, 1856 में जब वे एक समुद्री यात्रा पर थे, तो उस रात एक स्वप्न देखा कि उनके चाचा का एक पत्र आया है, जिसमें लिखा है कि उनके छोटे भाई की 14 जनवरी 1847 को मृत्यु हो गयी है। नींद खुलने पर पादरी ने यह स्वप्न अपनी डायरी में नोट कर लिया और अपने सब कार्यक्रम रद्द करके घर वापस लौट पड़े। यात्रा आरम्भ करने से पूर्व भाई को टाइफ़ाइड से ग्रस्त छोड़ कर आये थे, जो आब ठीक हो गया था। घर पहुँचने पर उसे स्वस्थ पाकर उन्हें स्वप्न के कारण भ्रम का शिकार बनने पर पश्चाताप भी हुआ और आश्चर्य भी, क्योंकि स्वप्न में देखे गए घटनाक्रम इतने स्पष्ट थे कि मानस पटल से हटते-मिटते ही नहीं थे। अंततः यह स्वप्न सही सिद्ध होकर रहा। कुछ दिनों के बाद भाई फिर से बीमार पड़ा, उसे दुबारा टाइफ़ाइड हो गया था और उसी तारीख को, जिसे पादरी ने समुद्री यात्रा के समय स्वप्न में देखा था, उसका देहांत हो गया। उपनिषदों में एक चौथे प्रकार के स्वप्न का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें जो दृश्य स्वप्न में दिखाई देता है, प्रायः ज्यों-के-त्यों घटित होते है इन स्वप्नों को तुरीय स्वप्न कहा जाता है। इसमें मनश्चेतना आत्मचेतना के साथ घुल-मिल जाता है और अनागत भविष्य को भी देख लेती है। उपर्युक्त अब्राहम लिंकन की तरह ही नेपोलियन के जनरल बैकमेन हेनरी तृतीय और कैनेडी को अपनी हत्या के दृश्य स्वप्न में दिखाई दिए थे। स्वप्न का अर्थ होता है और वे महत्वपूर्ण भी होते है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चाच्र लि भी कई बार इन्हीं स्वप्न के कारण मौत के मुँह से बच निकलने में कामयाब रहे थे।

श्ड्रीमवल्ड्र नामक अपनी पुस्तक में स्टुअर्ट हालराइड ने स्वीडिश सोसायटी फॉर सैकिक्ल रिसर्च की सनाथापिका इव हेलस्ट्रोम के स्वप्न का उल्लेख किया है। उसके अनुसार ईवा को सन् 1954 में एक स्वप्न आया कि वह अपने पी. टी. आई के साथ एक हवाईजहाज में अपने गृहनगर स्टाकहोम के ऊपर उड़न भर रही है और नीचे एक चौराहे पर नीले रंग की बस भूरे रंग की हुआ करती थी। इस सपने के कुछ महीने बाद सचमुच उसका रंग भूरे से नीला कर दिया गया है। अब तो ईवा को अपना स्वप्न बरबस याद आने लगा। उसने अपनी डायरी में उस चौराहे का हाथ से काल्पनिक स्केच भी बना डाला, साथ ही यह भी उल्लेख किया कि चार नंबर की नीली बस के साथ दृस्तोम नामक स्थान पर यह दुर्घटना घटित होगी। 4 मार्च 1956 के दिन चार नवम्बर की नीली बस की टक्कर एक कार से हो गयी और वह भी उसी स्थान पर, जहाँ स्वप्न में इव ने हवाईजहाज से यह दुर्घटना घटित होते देखी थी।

श्अनएक्सप्लेंड - मिस्ट्रीज ऑफ टाइम स्पेस इन माईंड नामक पुस्तक में इस तरह की अनेक घटनाओं का उल्लेख किया है, जिनके घटित होने से पूर्व लोगों को स्वप्न के माध्यम से पूर्वाभास हो चुका था। उसके अनुसार जेम्स केस्ट्ल नामक स्पेन के एक व्यक्ति को स्वप्न में अपनी मृत्यु का पूर्वाभास मिल गया था, जिसके आधार पर उसने अपने जीवनबीमा की एक लाख डॉलर की राशी तुरंत उसके बाद ही जमा की थी। इसके कुछ सप्ताह बाद ही जेम्स आफिश से अपने घर की और पचास मील प्रति घंटा की रफ्तार से गाड़ी चलाते हुए आ रहे थे कि सामने से एक सौ मील प्रति घंटे की तीव्रगति से आ रही कार से जा टकराई। तेज गति के कारण दूसरी कार उछलकर जेम्स के कार के ऊपर जा गिरी और उसकी वही मृत्यु हो गयी। सामान्यता बीमा कंपनियों तुरंत लिए हुए बीमे के बंद होने वाली मृत्यु के मामलों में आसानी से भुगतान नहीं करती, लेकिन इस प्रसंग में कम्पनी के मैनेजर ने कहा कि वह तो एक इसी अविश्वसनीय दुर्घटना है, जिसमें शंका की कोई गुँजाइश नहीं रहती। जेम्स की पत्नी प्रसूता थी। स्वप्न भी प्रसूति के बारे में ही था कि नवजात शिशु को वह देख नहीं पाएगा सारी राशी उन्हीं को मिली।

उपयुक्त पुस्तक में ही अमेरिका के डेविड वुथ नामक व्यक्ति का उदाहरण दिया है डेविड को लगातार कई रात्रि तक एक ही स्वप्न आता रहा कि अमेरिका एयरलाइनस के एक हवाई जहाज का इंजन फेल हो गया है और वह हवा में उछलकर जमीन पर गिरते ही टूट गया और उसमें से आग की लपटें निकल रही है। बार-बार दिखने वाला यह स्वप्न इतना स्पष्ट था मानो उस दृश्य को टेलीविजन पर देख रहा हो। अंततः उसने 22 मई,1979 को फेडरल एविएसन एडमिनिस्ट्रेशन को फोन किया और विस्तार से सारे घटनाक्रम का वर्णन किया। इसके साथ ही सिनसिनाटी विश्वविद्यालय के सेकिआत्रिस्त को भी फोन पर ब्यौरा दिया। पहले तो लोगों को उसकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। लेकिन जब 26 मई, 1979 को स्वप्न में बताये गए उसी हवाई अड्डे पर डी. ब. 10 नंबर नाम का जहाज दुर्घटनाग्रस्त होकर गिर पड़ा, जिसका कारण इंजन का फेल होना पाया गया तो अधिकारियों एवं मनोवेत्ताओं को आश्चर्यचकित हुए स्वप्न की सत्यता का विश्वास करना पड़ा।

दशरथ और मायासुर का युद्ध हो रहा था। मायावी राक्षस से सभी राजा परस्त हो चुके थे। दशरथ को अपनी विजय में संदेह ही दिखाई दे रहा था तब एक नारी संग्राम में उतरी। दशरथ की अर्द्धांगिनी कैकेयी-सुता ने सारथी का पद संभाला। उस दिन

ब्रह्म सूत्र में महर्षि वेदव्यास ने स्पष्ट किया है कि स्वप्न भविष्य में घटित होनी वाली शुभ-अशुभ घटनाक्रमों को।

उस दिन कैकेयी ने उंगली पहिये में लगा दी और तब तक उस स्थिति में बनी रही, जब तक उस दिन का युद्ध समाप्त नहीं हो गया।

वह युद्ध कहते है दशरथ ने जीता था। पर यदि सच्चाई को अभिव्यक्त होने का अवसर दिया जाए, तो यह कहना पड़ेगा की वह विजय पत्नी की कर्तव्यपरायणता की विजय थी। भारतीय नारी की ये निष्ठा ही भारतीय समाज को वह शक्ति प्रदान करती है, जिनकी यशगाथाएँ आज भी विश्व - इतिहास के अन्तरिक्ष में सूर्य की भाँति देदीप्यमान है।

प्रतीक होता है योगसूत्र में भी स्वप्न की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि चेतनाओं से अचेतनावस्था में प्रविष्ट होने पर ही स्वप्न दिखते है। अवचेतन मन विराट चैतन्य से जुड़ा हुआ है। अतः अतीन्द्रिय क्षमताएँ वही से उद्भूत होती है। प्रयत्नपूर्वक उन्हें जाग्रत व विकसित किया जा सकता है। व्यष्टि मन में समष्टि मन से तादात्म्य बिठाने एवं अनागत भविष्य की दर्शन झाँकी करने की अद्भुत क्षमता है।

श्दी स्टोरी ऑफ एडगर केसी में विश्वविख्यात अतिर्दीय क्षमता संपन्न एडगर केसी के द्वारा देखे गए स्वप्न और उसके जीवन में फलितार्थ होने का सुविस्तार विवरण प्रकाशित किया है। केसी को अपने जीवन में आने वाले उतार -चढ़ाव का आभास स्वप्नों के द्वारा बहुत पहले ही हो गया था और किस तरह संकट से जूझना होगा। संपर्क क्षेत्र के लोग जानते है कि एडगर केसी के जीवन में अतिर्दीय क्षमता के विकास के साथ ही उन्हें भारी उपहास ईर्ष्या का शिकार होना पड़ा, यहाँ तक की जेल की हवा भी खानी पड़ी कारावास की यंत्रणाओं से गुजरना पड़ा। इतने पर भी वह विचलित नहीं हुए और प्रकृति प्रदत्त अपनी अतींद्रिय क्षमता के शेयर पीड़ित मानवता का दुःख -दर्द दूर करने में निरंतर प्रयत्नशील रहे। अतींद्रिय क्षमता से प्राप्त ज्ञान से वह अनेक रोगियों की चिकित्सा करने में सफल रहे। स्वप्नविज्ञान की नवीनतम खोजो ने भी अब अवचेतन मन द्वारा अतींद्रिय-क्षमताओं के जागरण का समर्थन किया है। मनोविज्ञानी फ्रायड के अनुसार, यदि स्वप्न केवल रोगात्मक जीवन से ही सम्बंधित है, तो उपर्युक्त स्वप्नों का क्या कारण है? वस्तुतः स्वप्न मन का क्रीड़ा- कल्लोल भी है और उसकी अनुभूतियाँ भी फ्रायड के सिद्धाँत का खंडन प्रख्यात मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्ताव जुँग करते हुए कहते है कि दैनिक जीवन कि घटनाओं और संवेदनाओं का प्रभाव मन पर होने के कारण स्वप्नों में रहता तो है, पर स्वप्न इतने तक ही सीमित नहीं है। विश्व - ब्रह्माण्ड में प्रवाहित होते रहने वाले सुक्ष्मपरिवर्तन के कारण पराचेतना में अनेक प्रतिबिम्ब तैरते रहते है। मनुष्य कि अनुभूतियाँ इनसे प्रभावित होती है और वह प्रभाव व्यक्ति की जिनकी स्थिति के साथ सम्मिलित होकर स्वप्न जैसी विचित्र प्रतिक्रिया भी उत्पन्न करता है, अर्थात् व्यक्ति कि सीमित चेतना विराट चेतना के साथ मिलकर जिस स्तर का अनुभव करती है, उसका आड़ा-टेढ़ा और सीधा-सादा परिचय स्वप्न-संकेतों के रूप में मिल जाता है। कोई स्टेशन ठीक से न पकड़ पाने के कारण रेडियो जिस तरह गड्ड-मड्ड ध्वनियाँ निकलता है, उसी प्रकार मन का आत्मचेतना से मेल-संयोग यदि सीधा व सही हो, तो स्वप्नों में स्पष्ट संकेत मिल जाते है। मन के इधर -उधर भटकते रहने पर ऊलजलूल व निरर्थक स्वप्न आते है।

यदि मन शुद्ध, सात्विक, निर्मल और परिष्कृत हो तो सूक्ष्मजगत के स्पंदनों को पकड़ने में ओर भी आसानी हो सकती है। अशुद्ध, निकृष्ट और अपरिष्कृत मन खराब रेडियो सेट की तरह व्यर्थ और निरर्थक शोर-शराबा ही उत्पन्न करेगा, जिसकी जीवन में न कोई उपयोगिता है और न ही आवश्यकता। कौन से निरर्थक, इसका कोई स्पष्ट विश्लेषण नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की मन की संरचना भिन्न-भिन्न प्रकार की हुआ करती है। फिर भी स्वप्न दिव्यसंदेशों से भरे होते है एवं निर्मल पवित्र मन में वे आगत की महत्वपूर्ण सूचनाओं को लेकर अवतरित होते है यदि यह विज्ञान समझा जा सके तो मनुष्य परोक्ष जगत की इस विभूति से अनेकानेक संकेत पाकर अपना जीवन धन्य बना सकता है।

शारीरिक सुंदरता बढ़ाने के लिए नर-नारियों में इन दिनों सौंदर्य प्रसाधनों के प्रयोग की धूम मची है। बाल्य-जीवन से लेकर बुढ़ापे की आयु तक के लोगों को इसने अछूता नहीं छोड़ा है। बेबी पाउडर तथा आफ्टर शेव–लोशन के प्रचलन को देखकर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। सौंदर्य वृद्धि के बाह्य मापदण्डों को अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों ने अत्यंत हानिकारक बताया है, फिर भी न जाने लोग क्यों इनका अंधाधुन्ध प्रयोग करते हैं? विशेषतया महिलाएँ इन दुष्प्रवृत्तियों का अधिक शिकार बन रही हैं। भड़कीले विज्ञापनों से प्रभावित महिलाएँ अपने रूप-सौंदर्य को अधिक आकर्षक बनाने के लिए कृत विविध प्रकार के क्रीम-पउडरों का प्रचलन इसी की पुष्टि करता है। साबुन तथा टूथपेस्ट जैसी चीजें तो तुरंत शरीर में घुलकर प्रभावहीन हो जातीं हैं, लेकिन पाउडर, क्रीम, बिंदी, लिपस्टिक, मस्कारा, नाखून पालिश, शैम्पू, स्प्रे, सुरमा आदि का प्रभाव शरीर में देर तक बना रहता है, जिसके कारण ये चीजें अपना दुष्प्रभाव शरीर पर अवश्य दिखाती हैं।

नेशनल हेल्थ ऐसोसिएशन, ब्रिटेन की अध्यक्षता श्रीमती सिक वोकरडेल का कहना है कि हर सौंदर्यप्रेमी महिला अपने पूरे जीवनकाल में एक टन की मात्रा में लिपस्टिक आदि पदार्थ होठों को सुन्दर बनाने में प्रयुक्त करती हैं। इसमें से अधिकाँश हानिकारक पात्र उनके पेट में पहुँचती है। इनमें उपस्थित कुछ विषैले रसायन भी इसके साथ चले जाते हैं, जिसके कारण महिलाओं को रसौली जैसी घटक रोग का शिकार बनना पड़ता है इसी तरह वैनिशिंग क्रीम में मोम, पाउडर में चाक तथा खड़िया, क्रोमियम तत्त्व एवं सुरमा, मस्कारा, काजल, आईलाइनर एवं आइशेडस में कोलतार की उपस्थिति भी कम खतरनाक नहीं होती है। अन्यान्य खोजकर्ता वैज्ञानिकों ने भी सुरमे आदि में सीसे कि उपस्थिति पायी है। इसके प्रभाव से आँखों की ज्योति में कमी तो आती ही है, साथ-ही-साथ कैंसर जैसे जानलेवा रोग की संभावनाएँ भी बनी रहती हैं। ऊपर से चमक-दमक दिखाने वाले सौंदर्य प्रसाधन कितने खतरनाक हो सकते है, यह बात इन पदार्थों की गंभीरतापूर्वक वैज्ञानिक जाँच-परख करने के पश्चात सामने आई है। चेहरे को चमकाने में प्रयुक्त होने वाली क्रीम में विश्लेषणकर्ताओं ने पारा मिश्रण की उपस्थिति अधिक मात्रा में पाई है। यही कारण है कि पिछले दिनों ताईवान में बनी छः प्रकार की क्रीमों पर सिंगापुर, मलेशिया और हाँगकाँग जैसे देशों में प्रतिबन्ध लगा दिया गया। मलेशिया के स्वास्थ्य मंत्रालय ने लोगों को चेतावनी दी कि उसमें आवश्यकता से अधिक मात्र में मरक्यूरिक अमोनियमक्लोराइड नामक जहरीला पदार्थ मिला हुआ है। इसके नियमित उपयोग से त्वचारोग, कंपकंपी यकृत रोग, हृदय रोग सहित अन्य अनेक बीमारियाँ हो सकती हैं। इसी तरह का निष्कर्ष आयरलैण्ड व ट्रीनटी कॉलेज डबलिन के वैज्ञानिकों ने निकला। पाया गया कि लिपस्टिक आदि प्रसाधनों में अप्राकृतिक रूप से सीसे की मात्र अधिक थी। पिछले दिनों बेनेजुएला स्वास्थ्य मंत्रालय के दो विशेषज्ञों ने गहन पर्यवेक्षणों के पश्चात् भविष्यवाणी की थी कि सन् २०१० तक विश्व के अधिकाँश मानव अपने सर के बालों को गंवा बैठेंगे। भविष्यवाणी करने वाले वैज्ञानिक थे- डॉ. लियोनार्ड गार्सिया तथा डॉ. डिकार्ली। इनके अनुसार विगत कुछ वर्षों से गंजापन बढ़ रहा है। रसायनों का अधिकाधिक प्रयोग, प्रदूषण से युक्त वातावरण और आधुनिक असंयमित जीवन बालों को काला, चमकीला एवं सुन्दर बनाने वाले रसायनों का अधिक प्रयोग मनुष्य को गंजा बनाने में सहायक सिद्ध हो रहा हैं।

चित्र-विचित्र फैशन बनाने व रंग-रोगन पोतने की अपेक्षा यही अच्छा है कि प्रकृति-सान्निध्य में रहा जाए और धूप-हवा को अपना काम करने दिया जाए। शुद्धजल से शरीर व कपड़ों को धोते रहा जाए। प्रकृति पर विश्वास रखना चाहिए कि जो फूलों को सहज ही इतना सुन्दर बना देती है, वह प्रकृति प्रेमी मनुष्यों को क्यों न सुन्दर बना देगी।


Quotation

बुझते दीपक ने पूर्णशक्ति के साथ अंतिम बार अपनी आभा को बिखेरते हुए कहा-भाई इस भौतिक जगत में जिसका जन्म होता है उसका अंत भी होता है। हम प्रयास करने पर भी उससे बचा नहीं सकते है, इतना अवश्य कर सकते है कि अपने जीवन की मूल्यवान घड़ियों को व्यर्थ ही नष्ट न होने दे।


तप कर! तप कर!! (Kahani)

खलीफा दिनभर में जो पाते है, साँझ होते ही सब यतीमो, फकीरों, जरूरतमंदों को बाँट देते। उनका नियम था-उनका उसूल था कि जो पा जाते या जो भी उन्हें देता, उसे बचाकर रखना वे पाप समझते। उन्हें ईश्वर पर इतना विश्वास था कि उन्हें सवेरे की चिंता नहीं रहती और प्रातः फिर कुछ लोग उन्हें देने दरवाजे पर आ पहुँचते। एक अवसर ऐसा आया कि वे रात में बीमार पड़े, पत्नी ने सोचा कुछ बचा लेना चाहिए क्या पता रात में क्या जरूरत पड़ जाए। देने वाला सुबह देगा, किन्तु आधी रात-----? पत्नी ने प्रेम के कारण पाँच दीनार बचाकर रख ली। कहते है खलीफा उस रात सो न सके, करवटें बदलते रहे रात के बारह बजे होंगे, बेचैनी बहुत थी। पत्नी से बोले ऐसी बेचैनी तो कभी नहीं हुई, लगता है जीवन का कोई नियम टूट गया?

मैं सदा चैन से सोता था, आज मेरी हालत वैसी हो रही है जैसे धनपतियों की होती है। करवट बदलता हूँ नींद नहीं आती। मैं सदा का गरीब, मुझे कभी चिंता नहीं सताती थी आज लय हो रहा है, क्या तुमने दिन भर मिलने वाली राशि बाँटी नहीं? कुछ बचाया तो नहीं? पत्नी घबराई और बोली - क्षमा करे बड़ी भूल हो गई। पाँच दीनार मैंने आपकी दवा -दारु के लिए सहेज लिए थे, क्या पता कब जरूरत पड़ जाए। मुहम्मद बोले - यह तुमने क्या किया, मेरे जीवन भर के विश्वास पर पानी फेर दिया। मरते समय इल्जाम लगेगा, खलीफा जरूर कुछ साथ रखता था। मेरी जिन्दगी भर की फकीरी पर दाग लग जाएगा। पत्नी ने आधी रात को दरवाजा खोला देखा दरवाजे पर भिखारी खड़ा है। खलीफा ने कहा- देखती हो जब लेने वाला आधी रात को आ सकता है तो देने वाला क्यों नहीं। जैसे ही पत्नी ने आखिरी पाँच दीनार भिखारी को दिये, कहते है खलीफा ने चादर ओढ़ी और अंतिम साँस ली। जिसे ईश्वर पर इतना अटूट विश्वास -अव्वल दर्जे का यकीन हो, ऐसे संत बिरले ही होते है सौंदर्य प्रसाधन सुन्दर नहीं कुरूप बनाते हैं।

ब्रह्माजी कमल के फूल पर बैठे हुए चिंतन में लीन थे। वे सोच रहे थे सृष्टि का निर्माण कैसे करूं? इसी असमंजस में पड़े हुए, ब्रह्मा को एक आकाशवाणी सुनाई दी, जो कह रही थी- तप कर! तप कर!! ब्रह्माजी आकाशवाणी को ईश्वरीय आदेश मानकर तप में संलग्न हो गए। उन्होंने लम्बे समय तक घोर तप किया और उसी के बल पर उन्हें सृष्टि के निर्माण की क्षमता प्राप्त हुई। पुरुषार्थ और साहस करके ही ब्रह्माजी ने कुछ पाया था। यही मार्ग ब्रह्मा द्वारा रचे गए प्रत्येक प्राणी के लिए है। उद्योगी मनुष्य उन्नति करते एवं सुख पाते है और अकर्मण्य व्यक्ति भाग्य को दोष देकर रोते-झींकते जिंदगी पूरी करते है। प्रगतिशीलों के लिए आज भी ईश्वर की आकाशवाणी का एक सन्देश है-तप कर! तप कर!!


कृतघ्न की भी रक्षा करती है गुरुसत्ता

बैजूबावरा स्तब्ध रह गया। उसने कल्पना भी नहीं की थी कि उसका परमप्रिय शिष्य गोपाल उसे अचानक छोड़कर चला जायेगा। कृष्णभक्त बैजूबावरा वैरागी, साधु, ब्रह्मचारी और सुरों के देव थे। उनकी छाँव में गोपाल न केवल पला-बढ़ा बल्कि संगीत में भी निपुण बना। जब वह कृष्णमंदिर में धमारस गाता तो लगता सारा वातावरण शाँत हो गया है, वातावरण में पत्ता भी आवाज़ नहीं दे रहा होता, ताकि गोपाल की आवाज़ सबके कानों में पहुँच सके और स्वयं पेड़-पौधे भी उसके स्वर में झूमने लगते।

एक दिन मंदिर में बैठे जोधपुर नरेश के एक सामंत प्रभंजन सिंह ने गोपाल का गीत सुना तो ठगे- से रहे गए।

इतना रस, इतनी मिठास उन्होंने पहले कभी नहीं सुनी थी। गायन के बाद जब गोपाल से एकांत में मुलाकात हुई, तो प्रभंजन सिंह ने उससे कहा, लगता है आपके कंठ से तो स्वयं सरस्वती गीतवर्षा करती हैं। आप यहाँ इस मंदिर में पड़े-पड़े क्या कर रहे हैं, मेरे साथ चलिए जोधपुर नरेश आपका गायन सुनेंगे तो आपका जीवन भी आनंदमय हो उठेगा।

गोपाल न तो हाँ कह सका था और न ही न कह सका। वह दुविधा में था। ठाकुर प्रभंजन सिंह ने उसकी मनोदशा समझ ली थी। इसलिए वह लगातार उसे उकसाते रहे, ललचाते रहे। बार-बार गोपाल के मन में यह बात जमाते रहे कि उसके जैसा गायक इस संसार में नहीं है। वह सर्वथा अद्वितीय है।

और फिर गोपाल आखिर उनके चक्रव्यूह में फँस ही गया। एक दिन गुरु को बताये बिना, बिना बातचीत किये वह कृष्ण-मंदिर से चुपचाप प्रभंजन सिंह के साथ खिसक गया और जोधपुर नरेश के दरबार में जा पहुँचा। जोधपुर नरेश के दरबार में गोपाल ने प्रवेश किया, तो वह वहाँ की चकाचौंध से चकित रह गया। फिर भी उसने अपने निर्मल मन पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ने दिया और अवसर मिलते ही मन से गाया। जोधपुर नरेश का दरबारी संगीतकार समझ गया कि उसका वास्ता आज किससे पड़ा है? फिर भी उसने साहस कर गाया और खूब गाया, परन्तु गोपाल के स्वरों ने उसे उखाड़ दिया। धमार और चाँवेर, तीन ताल और दादरा, दीपचंदी और ध्रुपद बस गिरीराज एक बार उखड़ा तो जम नहीं सका। जोधपुर नरेश उसकी बुरी हालत का भी आनंद ले रहे थे। अन्तः वह खामोश हो गया। गोपाल की विजय स्पष्ट थी।

जोधपुर नरेश ने अपने गले से मोतियों का हार उतारकर गोपाल के गले में डालते हुए पूछा- आपके गुरु कौन हैं? गोपाल के मन पर विजय का उल्लास अभिमान बनकर छू चुका था। उसने सगर्व कहा- महाराज! जो कुछ सीखा कृष्णमंदिर में बैठकर, सुन-सुन कर कईयों के संगीत से सीखा। गुरुज्ञान से मैं वंचित ही रहा, राजन।

इतनी साधना गुरु के बिना? जोधपुर नरेश आश्चर्य से कुछ सोचते हुए बोले- गोपाल! तुमने कृष्णमंदिर में संगीत सीखा, इसका मतलब हुआ कि तुम साक्षात् मुरलीमनोहर के शिष्य हो। आज से तुम हमारे राजगायक हुए, तुम्हें सभी सुविधाएँ हमारे यहाँ से मिलेंगी।

बैजूबावरा का शिष्य राजसी सुविधाएँ पाते ही एकाएक बदल गया, उधर बैजू का बुरा हाल था। गोपाल के एकाएक लुप्त हो जाने से वह बेचैन हो उठे। लाठी टेकते कभी इधर जाते-कभी उधर जाते, कभी भक्तों से कहते, तो कभी मुलाकातियों से प्रार्थना करते- मेरा गोपाल खो गया! मेरा बच्चा कहाँ चला गया? जाओ कोई ढूँढ़कर लाओ उसे। कोई पता लाकर दो मेरे बच्चे का, बड़े व्यग्र थे, बैजू अपने प्रिय शिष्य के बिना। अपने गुरु को दिए वचन अनुसार जीवन को केवल भक्ति एवं संगीत को आत्मसात् करने वाले बैजू गोपाल के वियोग में इतने दुखी हुए कि मथुरा के कृष्णमंदिर में आने वाले हर दर्शनार्थी से वह यही प्रश्न करते, तुमने मेरे गोपाल को देखा है और एक दिन उन्हें अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया। किसी ने उन्हें गोपाल की उपलब्धि का पूरा लेखा-जोखा दे दिया। यह पता चलते ही कि गोपाल जोधपुर नरेश का राजगायक बन चुका है, बैजूबावरा लाठी टेकते अपने शिष्य से मिलने चल पड़े। मार्ग में चलते-चलते उनके पाँव में छाले पड़ गए। एक दिन जयपुर के पास एक मंदिर में कुछ यात्री मिल गए। यात्रियों ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह उन्हें अपने रथ पर बिठा कर जोधपुर ले चलेंगे और गोपाल तक पहुँचा देंगे।

वसंतोत्सव के दिन बैजू को लेकर यात्री जोधपुर दरबार में पहुँचे। वहाँ गोपाल वसन्त राग गा रहा था। हर कोई उसमें ध्यान लगाये हुए था। बैजू ने गोपाल को देखा तो रह नहीं सके। सभी मर्यादाएँ तोड़कर गाते हुए गोपाल से जा लिपटे। रंग में भंग पड़ गया, महाराज के संकेत पर बैजू को उनके पास ले जाया गया। उन्होंने पूछा- तुम कौन हो। बैजू को भावविह्वल हो रहा था, रोते हुए बोला- महाराज आपका राजगायक गोपाल मेरा शिष्य है, मेरा बेटा है। मैं नहीं जनता इसे, यह कौन हैं?, गोपाल ने कहा। उधर बैजूबावरा कह रहे थे गोपाल! तू यह कह क्या रहा है? तू अपने गुरु को नहीं पहचानता। तभी जोधपुर नरेश ने हाथ ऊपर करके उन्हें शाँत रहने के लिए कहा। वह बैजूबावरा से बोले- संगीत सम्राट! आपकी ख्याति तो सारे संसार में है। यह मेरे अहोभाग्य हैं कि आप जैसे महान गुनी व्यक्ति के दर्शन मुझे हो सके। हे महान संगीतकार!हमें अपने कंठ- स्वर से निकले रस का पान जरूर कराओ।

बैजू कुछ उत्तर दे पाते, उससे पहले महारथ ने फिर कहा- गोपाल को आपके साथ प्रतियोगिता करनी होगी। बैजूबावरा ने गंभीरता से कहा- महाराज प्रतियोगिता क्या मैं अपने बेटे से करूंगा? परन्तु तभी गोपाल का दंभ मुखरित हो उठा वह बोला- मैं प्रतियोगिता के लिए तैयार हूँ।

बैजू सहज भाव से गा रहे थे। आनंदमय हो उनके कंठ से संगीत की मनमोहक सरिता बहने लगी, परन्तु गोपाल की आवाज़ काँपने लगी। थोड़ी देर में वह गुमसुम होकर बैठ गया। गीत समाप्त करते ही बैजू गोपाल की ओर लपके और कहने लगे जोधपुर के बजाय कृष्ण दरबार में गाओ बेटा, वही गाने से सच्चा सुख मिलता है।

मगर जोधपुर नरेश क्रोध में थे। बोले- नहीं संगीत सम्राट! इस गोपाल ने गुरु का अपमान किया है। इसे कल सुबह हाथी के पाँव के नीचे कुचल दिया जाएगा। बैजू दहाड़ें मारकर रो उठा। उसने जोधपुर नरेश से कई तरह से याचना की, परन्तु उन पर कोई असर न हुआ।

एकाएक बैजू ने कहा- महाराज! मैंने प्रतियोगिता जीती है, क्या मुझे इसका पुरस्कार नहीं मिलेगा?

जोधपुर नरेश ने कहा- मान्यवर! गोपाल के प्राणों के अतिरिक्त आप जो चाहें माँग लीजिये, मैं इनकार नहीं करूंगा। परन्तु इसे दंड देने से कोई छूट नहीं दे सकता।

बैजूबावरा ने गंभीर और दृढ़. स्वर में कहा-नहीं महाराज! मैं आपसे गोपाल के प्राणों की भीख नहीं माँग रहा, मैं तो आपसे यही चाहता हूँ कि जिस समय गोपाल पर हाथी छोड़ा जाए, उस समय मुझे वहाँ गाने की इजाज़त दे दी जाय। जोधपुर नरेश ने सहमति दे दी।

अगले दिन सुबह एक विशाल मैदान में गोपाल को ला खड़ा किया गया। एक पागल हाथी को जब मैदान के सिरे पर लाया गया, तो मैदान के एक ओर बैजूबावरा के कंठ से गणेश राग की स्वर लहरियाँ गूँजने लगी। बैजू गाते-गाते खो गए। उधर मस्त हाथी को छोड़ दिया गया। वह एक बार जोर से चिंघाड़ा और गोपाल की ओर दौड़ा। परन्तु जैसे बैजू के स्वर का उस पर जादू होने लगा। वह चलते-चलते रुका और बैजू के पास आकर खड़ा हो गया और जोर से चिंघाड़ा। थोड़ी देर बाद जब उन्होंने अपना स्वर बदला तो हाथी मस्त होकर झूमने लगा और फिर थोड़ी देर बाद उनके पास बैठ गया। बैठकर कुछ देर वह सूँड को संगीत की स्वर लहरियों के साथ हिलाता रहा और अंततः वह पूर्ण शाँत होकर बैठ गया। जब बैजू ने गायन समाप्त किया, तो हाथी ऐसे पड़ा था जैसे वह निर्जीव हो।

बैजूबावरा उठे। उन्होंने अपने गले की माला निकाली और हाथी के सूँड पर रख दी। फिर उसके सिर पर हाथ फेरा, जैसे उसे दुलार रहे हो। उसके बाद जोधपुर नरेश के पास गए और बोले- महाराज आपका दंड पूरा हो चुका है अब तो मेरे गोपाल को जाने दीजिये।

जोधपुर नरेश बैजू के पैरों पर गिर पड़े और बोले- आप जैसे महान गुरु के रहते ईश्वर भी गोपाल का कुछ नहीं बिगाड़ सकता, फिर मैं तो एक साधारण-सा राजा हूँ। आप आज विश्राम करें, कल प्रातः आपको राजरथ वृंदावन छोड़ आएगा। इस सारे दृश्य को अपनी आँखों से देखकर वहाँ सभी जन हर्षातिरेक में कह उठे, हे गुरु! आपकी बलिहारी है, जिन्होंने कृतघ्न की भी रक्षा की।


ज्ञान व कर्म (Kahani)

कुरुक्षेत्र की धर्मभूमि में तपस्यारत ऋषि मुदगल धर्माचरण, आराधना और उदारवृत्ति द्वारा जीवन निर्वाह, उनके आदर्श थे। मास के पहले पक्ष में वे खेतों से बीन-बीन कर चावल एकत्र करते, दूसरे पक्ष में उसे यज्ञ और अतिथि सत्कार में व्यय कर देते। ऋषि श्रेष्ठ दुर्वासा छः हज़ार शिष्यों सहित मुदगल की परीक्षा हेतु उनके आश्रम पर कई बार गए और निस्पृह मुदगल ने उन्हें हर बार आतिथ्य द्वारा पूर्णतः संतुष्ट कर दिया।

दुर्वासा ऋषि मुदगल पर कृपालु हुए। उन्होंने कुरुक्षेत्र के इस तपस्वी को स्वर्गप्राप्ति का वरदान दिया। मुदगल ने स्वर्ग ले जाने आये देवदूत को नम्रतापूर्वक नमन करते हुए कहा-हे दूत! खेद है तुम्हें एकाकी ही स्वर्ग लौटना पड़ेगा, मैं तुम्हारा साथ नहीं दे सकूँगा। जिस लोक कर्म को स्थान नहीं, वहाँ केवल सुख भोगने मैं नहीं जाना चाहता। कर्म करते ही मैं सौ वर्ष तक जीने की इच्छा रखता हूँ। मुझे अपना यह कर्मलोक ही प्रिय है, जहाँ कर्म-साधना और भक्ति के अवलंबन द्वारा मैं निर्वाण प्राप्त कर सकता हूँ। तपस्वी मुदगल मृत्युलोक में ही लोकमंगल के लिए चिर-साधना करते हुए निर्वाण को प्राप्त हुए।

ज्ञान व कर्म को जिस व्यक्ति ने अपने जीवन में सत्प्रयोजनों से जोड़ दिया हो, भक्ति की भावतरंगें स्वतः ऊपर उमड़ आतीं हैं। ज्ञान, कर्म व भक्ति की यह त्रिवेणी तथा ऐसा तीर्थराज हम सबके अन्दर विराजमान है जिसमें स्नान-अवगाह कर हम अपने जीवन को कृत्य-कृत्य बना सकते हैं।


मणि की तरह निर्मल-उज्ज्वल बनती है मणिपूरित चक्र की साधना

(षट्चक्रों पर धारावाहिक श्रृंखला का चौथा पुष्प)

चक्रसंस्थान का चौथा मनका (अवरोही क्रम में) मणिपूरित है। मणिपूरित का अर्थ रत्नों से भरा हुआ होता है। इसे यह संबोधन इसलिए दिया गया, क्योंकि यहाँ प्राणऊर्जा प्रचुर परिमाण में पाई जाती है तथा यह उसका उत्पादन केंद्र है। इसे सूर्या चक्र भी कहते है, कारण कि यह सूर्य की तरह सम्पूर्ण शरीर में प्राणशक्ति का संचार करता है। तिब्बतीय साधना प्रणाली में इसको मणिपद्म कहकर अभिहित किया गया है, जिसका अर्थ है- मणियों का कमल।श्

यह ऊर्जा केंद्र जब शिथिल हो जाता है, तो व्यक्ति निष्क्रिय एवं निस्तेज प्रतीत होता है, उसमें शक्तिहीनता स्पष्ट रूप से झलकने लगती है। वह अवसाद एवं व्याधिग्रस्त-सा दिखलाई पड़ता है। उत्साह एवं उल्लास की कमी, उत्तरदायित्वों के प्रति लापरवाही, कार्यों में असफलता आदि इस चक्र के सुप्तावस्था में पड़े होने का प्रमुख लक्षण है। इसलिए इसका जागरण साधकों के साथ-साथ सर्वसाधारण के लिए भी अति महत्वपूर्ण है। इसकी उपस्थिति नाभि के ठीक पीछे मेरुदंड में है। इसका नाभिक्षेत्र में किया जाता है, अतएव उसको इसका क्षेत्रम् कहते हैं। कायिक दृष्टि से सोलर प्लेक्सस को इसका गोचर स्वरूप माना जाता है, जो प्रायः पाचन एवं ताप-नियंत्रक के लिए जिम्मेदार है। यह दस दलों वाला कमल है। इसका रंग नीला या पीला होता है कुछ तंत्र-ग्रंथों में इसे धूम्रवर्णी भी बताया गया है कमल की प्रत्येक पंखुड़ी में डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं, फं, आदि वर्ण अंकित होते हैं। इसका यन्त्र लाल त्रिकोण है, जो सूर्य की तरह चमकदार है रंश् इसका बीजमंत्र है तथा वाहन मेष (भेड़) है। रुद्रश् इसके देवता हैं तथा देवी श्लाकिनीश् हैं। इसका तत्त्व श्अग्निश् है, तन्मात्रा- श्रुप, ज्ञानेन्द्रिय आँखें तथा कर्मेंद्रिय पैर हैं। लोक स्वः तथा वायु-समान है, जिसका सम्बन्ध पाचन तथा पोषण से है मणिपूरित तथा स्वाधिष्ठान चक्र ये प्राणमय कोश के अंतर्गत है। साधना ग्रंथों में ऐसा मिलता है कि बिंदु- विसर्ग स्थित चन्द्रमा से मणिपूरित में अमृत बरसता है, जो यहाँ स्थित सूर्य का आहार बन जाता है। इससे शरीर में क्षयप्रक्रिया आरम्भ होती है, जिसकी अंतिम परिणति वार्धक्य, अशक्ति, रोग तथा मरण है। इस प्रक्रिया की दिशा को कुछ योगाभ्यासों द्वारा पलटा जा सकता है और मणिपूरित में उत्पन्न ऊर्जा को मस्तिष्क में भेजा जा सकता है। ऐसी स्थिति में उसका उपयोग और उपभोग भोग जैसे तुच्छ प्रयोजनों में नहीं, योग में, आनंद और ईश्वरप्राप्ति में होता है। साधनाक्षेत्र के निष्पातों का कथन है कि जप-तप द्वारा जब इस चक्र की सम्पूर्ण शुद्धि हो जाती है, तो फिर काया व्याधिरहित और ओजपूर्ण बन जाती है।

मणिपूरित चक्र को चेतना जगत के उच्चतर आयाम का प्रवेश-द्वार कह सकते हैं। इससे पूर्व के दो स्तर अर्थात् मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्र पशु जीवन की उच्च भूमिका से सम्बंधित हैं, इसलिए इनके अनेक तंत्रग्रंथों में इनका उल्लेख तक नहीं किया गया है। बौद्ध मत में कुण्डलिनी का यथार्थ जागरण मणिपूरित चक्र से ही हुआ माना जाता है और यहीं से उच्च मानवीय चेतनात्मक स्तर का प्रारंभ होता है, कारण कि इस भूमिका के उपरांत वह फिर निम्नगामी नहीं होती। संभव है वह आरम्भ के दो मणिपूरित तक अनेक बार पहुँची हो, पर उसके सुप्त होने के कारण वह पुनः अधोगामी हो गई हो; किन्तु एक बार जब यह चक्र जागृत हो जाता है, तो कुण्डलिनी के फिर से निम्नगामी होने की संभावनाएँ समाप्त हो जाती है।

इस चक्र का जागरण योगाभ्यासियों के साथ-साथ सांसारिक व्यक्तियों में भी हो सकता है। जब यह ऐसे किसी व्यक्ति में सक्रिय होता है, तो उसके लक्षण शुद्ध -जीवन, पवित्र-आचरण ईश्वर विश्वास, कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी, परोपकारिता और सेवा जैसे उच्च आदर्शों के रूप में सामने आते हैं। साधकों में इसकी आंतरिक प्रतीति विभिन्न प्रकार की चेतनात्मक अनुभूतियों के रूप में होती है। चक्रों में वास्तव में ओर कुछ नहीं, कुछ विशिष्ट केंद्र-बिन्दुओं पर ऊर्जा का विकास है। इसे प्रयासपूर्ण संपन्न करना पड़ता है। इसके लिए कितनी ही प्रकार की क्रिया-प्रक्रिया अपनाई जाती है। इन्हीं में से एक है- स्वरयोग या श्वास विज्ञान! इसके माध्यम से शरीर में पाँच प्रकार के प्राणों को कुछ विशेष प्रकार से समायोजित किया जाता है। इस समायोजन से कुण्डलिनी के उत्थान में सहायता मिलती है। उल्लेखनीय है कि नाभि-क्षेत्र प्राण और अपानवायु की क्रियास्थल है। प्राणवायु नाभि से गले के मध्य ऊपर-नीचे तथा अपानवायु पेरिनियम से नाभि के बीच ऊपर-नीचे प्रवाहित होती रहती है। सामान्य श्वास के साथ प्राण का प्रवाह नाभि से ग्रीवा तक होता है। रेचक के समय वह ग्रीवा से नाभि तक तथा अपानवायु मणिपूरित से मूलाधार तक नीचे की ओर जाती है। इस तरह प्राण एवं अपानवायु अनवरत रूप से क्रियाशील रहती है तथा हर एक पूरक एवं रेचक के साथ इसकी दिशाएँ बदलती रहती है।

स्वरयोग का उद्देश्य इनकी दिशाओं पर नियंत्रण स्थापित करना होता है। इसके द्वारा इनका गतिप्रवाह उल्टा जा सकता है। सामान्य स्थिति में प्रश्वास के समय अपान का प्रवाह मूलाधार की ओर होता है। कुछ विशेष अभ्यासों के द्वारा जब जब इसकी दिशा ऊर्ध्वगामी बनाकर मणिपूरित की ओर मोड़ी जाती है, तो प्राण एवं अपान का मिलन नाभिकेंद्र पर एक विस्फोट के रूप में होता है। यह विस्फोट ठीक वैसा ही है, जैसा दो विरोधी शक्तियों का पारस्परिक संयोग। इस शक्ति-संयोग से बड़े परिमाण में ऊष्मा एवं ऊर्जा उत्पन्न होती है, जिससे मणिपूरित चक्र जागृत हो उठता है। फलस्वरूप प्राण-प्रवाह एक बार फिर से पुनर्व्यवस्थित होता है, परिणामस्वरूप कुण्डलिनी उत्थित होकर मणिपूरित में प्रतिष्ठित हो जाती है।

चक्र-संस्थान के सात चक्र (जिसमें अंतिम शून्य चक्र या सहस्रार है) सात लोकों के समान हैं। चेतनात्मक विकास क्रम में जब कुण्डलिनी इन-इन केन्द्रों से होकर गुजरती है, तो साधक को उन-उन लोकों से सम्बंधित कितनी ही रहस्यमयी जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। मणिपूरित स्वः लोक से सम्बंधित है, अतएव जब इसका जागरण होता है, तो साधक के समक्ष इसका गूढ़ ज्ञान स्वयमेव प्रतिभासित हो उठता है। इस स्तर पर चेतना के अनंत विस्तार का बोध होता है। उक्त बोध के साथ-साथ साधक के आचार, विचार और व्यवहार में आमूल-चूल परिवर्तन परिलक्षित होते हैं। उसकी आस्थाएँ, मान्यताएँ, विचारणाएं बदल जातीं है वह राग-द्वेष से ऊँचा उठ जाता है। उसकी प्रवृत्तियाँ सृजनात्मक हो जातीं हैं। परमार्थ-प्रयोजनों के प्रति उसके पूर्ववर्ती रुझान में स्पष्ट बदलाव दृष्टिगोचर होता है। इस भूमिका में आरूढ़ साधक न सिर्फ स्वयं सन्मार्ग पर चलता है, वरन् अन्य अनेकों को इसके लिए प्रेरित-उत्साहित करता है। इस स्तर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें व्यक्ति का अंतस् और बाह्य एक हो जाता है। उसकी कथनी और करनी में समानता आ जाती है। वह मिथ्याभाषण से परहेज करता, सत्य का सहारा लेता और ईमानदारी को अपनाता है। दोष-दर्शन उसका स्वभाव नहीं। वह दूसरों की त्रुटियों को भी अपने उदात्त चिंतन के अनुरूप व्याख्या-विवेचना कर लेता और उसके प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाता है। इसके विपरीत जब कुण्डलिनी शक्ति और स्वाधिष्ठान जैसे पशु-स्तरीय भूमिकाओं में अधिष्ठान करती है, तो व्यक्ति औसत स्तर के लोगों जैसी सांसारिक उलझनों में उलझा रहता है। उसका चिंतन और व्यवहार ओछे स्तर के व्यक्तियों जैसा हेय और हीन होता है।मानसिक और भावात्मक समस्याओं से वह पग-पग पर दो-चार होता रहता है, किन्तु जैसे ही इन भूमिकाओं से ऊँचा उठकर साधक मणिपूरित की वास्तविक मानवी भूमिका में अधिष्ठित होता है, समाज और संसार की परिभाषा परिवर्तित हो जाती है जो मन खीझ और कुढ़न से पहले परेशान रहता था, वही अब उत्फुल्लता के आनंद से ओत-प्रोत रहने लगता है।

इस चक्र के जागरण से साधक में अनेकानेक प्रकार की अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास होता है, जिनमें संहार एवं पालन सामर्थ्य, भय-निवारण भौतिक शरीर का पूर्णज्ञान, ऐश्वर्यप्राप्ति एवं आत्मरक्षा आदि प्रमुख हैं।

इस शक्ति-संस्थान को उद्दीप्त करने के लिए योगशास्त्रों में जिन साधना-उपचारों का वर्णन है, उनमें प्राणयोग के अतिरिक्त उड्डियान बंध एवं चक्र ध्यान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त जप, तप, आसन भी कुछ हद तक मदद करते है। पर अकेले इनके द्वारा चक्रों का जागरण समयसाध्य एवं श्रमसाध्य प्रक्रिया है। अतः सुयोग्य मार्गदर्शक ऐसे साधना-अभ्यासों पर विशेष बल देते है, जो सीधे उन्हें प्रभावित करते और थोड़े समय और श्रम में फलवती बनाते हो।

इस स्तर की चेतना हमें मणियों की तरह धवल, उज्ज्वल और निर्मल बनने की प्रेरणा देती है। जिसका अन्दर-बहार एक हो गया, समझा जाना चाहिए कि वह इस भूमिका में अवस्थान कर चुका है।


दानवीर कर्ण (Kahani)

भगवान कृष्ण एक दिन कर्ण की उदारता की चर्चा कर रहे थे। अर्जुन ने कहा- धर्मराज युधिष्ठिर से बढ़कर वह क्या उदार होगा?श्री कृष्ण ने कहा- अच्छा परीक्षा करेंगे। एक दिन वे ब्राह्मण का वेश बनाकर युधिष्ठिर के पास आये और कहा- एक आवश्यक यज्ञ के लिए एक मन सूखे चन्दन की आवश्यकता है। युधिष्ठिर ने नौकर को लेने को भेजा, पर वर्षा की झड़ी लग रही थी। इसलिए सूखा चन्दन नहीं मिल रहा था, जो कटकर आता वह पानी में भीगकर गीला हो जाता। युधिष्ठिर सेर, दो सेर चन्दन दे सके, अधिक के लिए उन्होंने अपनी असमर्थता प्रकट कर दी। अब वे कर्ण के पास पहुँचे और वहाँ भी एक मन सूखे चन्दन का सवाल किया। वह जानता था कि वर्षा में सूखा चन्दन नहीं मिलेगा। इसलिए उसने अपने घर के किवाड़-चौखट उतारकर फाड़ डाले और ब्राह्मण को सूखा चन्दन दे दिया।

भक्ति-भावना अंदर तक ही सीमित न रहे। वह परमार्थ हेतु सत्कर्मों के रूप में अभिव्यक्त हो तो ही वह सार्थक है। वृत्ति कृपण जैसी हो तो कुबेरों का खजाना भी व्यर्थ है। उदार के लिए, तो प्रतिकूल परिस्थिति में भी परमार्थ की आकुलता रहती है।


अगली सदी समन्वित समग्र व्यक्तित्व के निर्माण की होगी

संतुलन का उत्कर्ष शाँति है। असंतुलन अस्थिरता पैदा करता है। वह चाहे किसी भी स्तर पर हो, वहाँ अव्यवस्था और अराजकता ही पनपेगी। समाज भी इसका अपवाद नहीं। इन दिनों समाज में उथल-पुथल मची है, उसके पीछे कौन-सा तत्व कारणभूत है? समाजविज्ञानी इसके अनेक कारणों में से एक कारण उस अधूरेपन में ढूँढ़ते है, जिसे एकांगी व्यक्तित्व कहा गया है। उनका मानना है कि व्यक्तित्व का यदि एकपक्षीय विकास हुआ, तो वह विभिन्न प्रकार की समस्याएं ही पैदा न करेगा वरन् स्वयं अपनी और समाज की प्रगति भी बाधित करेगा। इस प्रकार अस्थिरता, अवगति और अशाँति का ताँडवनृत्य चतुर्दिक् अपना ही विस्तार करता दिखलाई पड़ेगा। इस पहलू पर तनिक गहराई से विचार करें, तो ज्ञात होगा कि स्त्री-पुरुष जैसे दिखाई पड़ते है, वे वास्तव में ऐसे ही नहीं है। पुरुष अपना अर्धांश ही प्रकट करता है, उसके भीतर की सम्पूर्ण स्त्री अप्रकट स्तर की बनी रहती है उसी प्रकार नारी के अंदर एक समग्र नर विद्यमान होता है। सामान्यतौर पर उसका वह पक्ष अभिव्यक्त नहीं हो पाता और प्रच्छन्न बना रहता है। इस खंडित विकास के कारण अनेकानेक प्रकार की विद्रूपताएं समाज में सिर उठाने लगती और जो नहीं होने चाहिए, वह सब होने लगता है। उदाहरण के लिए, जब कोई हत्यारा किसी की हत्या करता है, तो वह कुकृत्य करते समय मृतक की पीड़ा और परिजनों की अपार वेदना की अनुभूति नहीं कर पाता। यदि इसका बोध एक क्षण के लिए भी उसे हो जाये, तो कदाचित ऐसे पातक की कल्पना मात्र से उसका हृदय हाहाकार कर उठे। ऐसी प्रतीति कितनों को हो पाती है? यह बताने की आवश्यकता नहीं। अंतर की सरसता और संवेदना का अभाव ही इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है।

मूर्धन्य मनीषी सी. एम. जोड ने अपनी पुस्तक श्दी मैनकईंडश् में लिखा है कि शुरू से ही मनुष्य की संवेदना को यदि उभारा गया होता, तो जगत के युद्धों का इतिहास स्नेह-सौजन्य के अध्याय के रूप में उल्लेखित होता; पर इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि जो काम स्नेह-सहकार से संभव हो सकता था, उसके लिए बात-बात पर हथियार उठाये जाते और रक्त की नदियाँ बहायी जाती हैं। इससे पुरुष प्रकृति का अतिवादी पक्ष हुआ। दूसरी ओर नारियों में संवेदना तो होती है; लेकिन साहस का अभाव होता है। ऐसे में पराक्रमपूर्ण कार्य करने में वह असक्षम साबित होती है और अंतरंग के मात्र एकपक्षीय पहलू का दामन थामे रहने के कारण निर्बल कहलाती है। यह भी उसका यथार्थ निरूपण नहीं है, उसमें अधूरापन है या यों कहना चाहिए कि यह उसका अपूर्ण विकास है।

हर बात के दो पहलू होते हैं। जहाँ गर्मी होगी, वहाँ निश्चित रूप से ठंडक भी मौजूद होगी। सच्चाई तो यह है कि गर्मी का बोध ही अपने अन्दर शीत का ज्ञान छिपाए बैठा है। अन्धकार कि अनुपस्थिति का नाम ही प्रकाश है। इसका यह मतलब नहीं है कि अँधेरे कि सत्ता है ही नहीं, वरन् यह है कि वह उसके साथ-साथ विद्यमान है। बुराई की पहचान अच्छाई के कारण ही हो पाती है। इसी प्रकार काला-गोरा लंबा-नाटा धन-ऋण प्रिय-अप्रिय सुख-दुख हर्ष-विलाप गरीब-अमीर श्रेष्ठ-निकृष्ट आदि प्रकृति और पदार्थ में पाये जाने वाले द्विधा स्वभाव या गुण हैं। इन युग्मों के कारण ही प्रकृति, पदार्थ, समाज, संसार संतुलित तथा नियंत्रित रह पाते हैं। स्त्री-पुरुष समाज की दो विपरीत सत्ताएँ हैं। दोनों की उपस्थिति के कारण ही समाज का संतुलित विकास संभव है। इनमें से एक यदि साहस, वीरता, पुरुषार्थ परायणता, श्रमशीलता का परिचायक है, तो दूसरी दया, ममता, करुणा, उदारता, सहिष्णुता, प्रेम की प्रतिमूर्ति है। दोनों को मिलाकर ही सुमार्ग समाज बनता है। ईश्वर ने उन दोनों को संतुलित करने के लिए उनमें पृथक-पृथक नर-नारी तत्वों का समावेश किया है, ताकि कोई एक तत्त्व व्यक्तित्व पर हावी होने की कोशिश करे, तो उसमें मौजूद उसका विरोधी तत्त्व उसकी नकेल कसे और नियंत्रित करे। इस प्रकार नर तत्व समाविष्ट है। वैसे ही स्त्रियों में कोमलता और दयालुता जैसे सत्रैन पहलू को संतुलित करने के लिए पुरुष तत्व विद्यमान होता है, ताकि व्यक्ति किसी प्रकार एकांगी न होने पाए।

आज यह प्रवृत्ति आम है कि जब कोई नारी पुरुषोचित कार्य करती, साहस और वीरता दिखाती है, तो उसे महिमामण्डित किया जाता, इनाम-इकराम दिए जाते है। इसके विपरीत जब कोई पुरुष दया करुणा, अहिंसा की बातें करता है, तो उस पर उपालंभ बरसाया जाता है, व्यंग किया जाता है और कभी-कभी तो ऐसी वस्तुएँ भेंट की जाती है, जो नारीत्व की-नारी दुर्बलता की पर्याय होती, इसके माध्यम से यह कहने का प्रयास किया जाता कि स्त्रियोचित गुण पुरुषों को शोभा नहीं देते। यह तो कायरों और डरपोकों के आभूषण हैं। इसे नारी जाति का सरासर अपमान कहना चाहिए। जब नर-नारी दोनों समाज के दो घटक है और यदि नर के गुणों का नारी में प्रकटीकरण को गौरवशाली माना जाता है, तो फिर नर में नारी विभूतियों का प्राकट्य क्यों हेय और हीन माना जाना चाहिए? वह स्थिति भी सम्मानीय है उसका अनादर नहीं होना चाहिए, किन्तु आज सर्वत्र उल्टा ही हो रहा है। लोग नारी में पुरुषोचित गुण की प्रशंसा करते हैं, जबकि इसके विपरीत स्थिति को असहनीय मानते है यह समाज में पुरुष-वर्चस्व का प्रतीक है। सामाजिक असंतुलन का एक बड़ा कारण यह भी है, चाहे वह ऊंच-नीच के रूप में हो अथवा गरीब-अमीर क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद, संप्रदायवाद, लिंगवाद, सभी के पीछे पुरुष मानसिकता का बढ़ा-चढ़ा योगदान है इससे विसंगतियाँ पनपती है और विपन्नताएं उपजती हैं।

अब समय की माँग यह है कि दोनों में समन्वय हो और उस समन्वित इकाई से एक समग्र व्यक्तित्व का निर्माण हो। नर एक समय में नर हो, तो दूसरे समय वह सम्पूर्ण नारी-गुण प्रदर्शित करे। उसमें पुरुषोचित साहस-पुरुषार्थ का भी माद्दा हो और नारीसुलभ दया-करुणा की निर्झरिणी भी अंतस् में बहे, ताकि जब जिस तत्त्व की आवश्यकता पड़े, उसका तत्काल उपयोग किया जा सके। जहाँ दुष्टता-दमन की जरूरत पड़े, वहाँ शौर्य-पराक्रम दिखाए जाएँ और जब दुखों के भारी बोझ से सामने वाले का मनोबल क्षत-विक्षत हो रहा हो, तब स्नेह-संवेदना की मरहम-पट्टी लगायी जाए।

यही बात स्त्रियों के साथ भी लागू होती है। वह केवल कोमल हृदय, स्नेह-सलिला होने को ही चरितार्थ न करे। उसमें अदम्य साहस भी होना चाहिए, अपनी ओर उठने वाली बुरी नज़र को दुस्साहस का दंड व सही दिशा में मोड़ने के लिए कम-से-कम विवश तो करे। भले ही उसमें नारी हृदय की सजलता हो, तो पुरुष जैसा पराक्रम भी। कहा जाता है कि साँप भले ही न काटे, वह विषैला चाहे हो अथवा नहीं; पर केवल उसका फुफकारना ही आत्मरक्षा के लिए पर्याप्त है यह नारियों पर भी लागू होता है।

इस प्रकार का समग्र बनकर ही समाज को आगे बढ़ाया जा सकता है अन्यथा एकांगी व्यक्तित्व या तो शोषण-उत्पीड़न का शिकार बनेगा अथवा शोषक-उत्पीड़क का शिकार की भूमिका निभाएगा। यह दोनों ही स्थितियाँ अस्वीकार्य हैं। मनुष्य अब तक दोनों इकाइयों को पृथक-पृथक शरीर और सत्ता के रूप में जीता रहा है। अब उनका विलय-विसर्जन एक में होना चाहिए। यह एकत्व और एकीकरण ही नारी के संदर्भ में बरती जाने वाली असमानता और अन्याय को दूर कर समाज को स्थायित्व प्रदान करेगा एवं नारी को अधिक सम्मानित तथा प्रतिष्ठित करेगा।

इसके लिए उपाय क्या हो? कैसे अखंड बना जाए और अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व को- उसके दोनों तत्वों को समग्र रूप से विकसित किया जाए? मनः शास्त्रियों का मत है कि बचपन से ही यदि अन्तराल के कोमल तत्वों को जगाने के लिए तत्पर हुआ जाए, तो कोई कारण नहीं कि तरुणाई तक बालक की संवेदना को सुविकसित नहीं किया जा सके। जीजाबाई ने शौर्यपूर्ण कथा-कहानियाँ सुनाकर शिवाजी में वीरता का संचार किया था, फिर मर्मस्पर्शी प्रसंगों के माध्यम से बालक के मन को करुणापूर्ण साँचे में न ढाला जा सके, ऐसी बात नहीं। बालिकाओं को भी अति आरम्भ से ही वीररस की कविता-कहानियाँ सुनाकर उनमें प्रखर पराक्रम विकसित किया जा सकना संभव है। भारतीय संस्कृति में तो संस्कारों की महत्ता पर विशेष बल दिया गया है और उसके द्वारा वांछित व्यक्तित्व गढ़ सकना शक्य बताया गया है। विज्ञान भी इस बात को स्वीकारता है कि जब मनुष्य नर-नारियों के दोनों अंशों का सम्मिलित स्वरूप है, तो उनकी अभिव्यक्ति की भी पूरी-पूरी संभावना उसमें मौजूद है। अब यह अभिभावकों पर निर्भर है कि वे संतति के समग्र विकास में कितना योगदान करते हैं।


कर्मफल सिद्धाँत (Kahani)

एक बार जिज्ञासु अग्निवेश ने आचार्य चरक से पूछा- संसार में जो अगणित रोग पाये जाते हैं, उनका कारण क्या है? आचार्य ने उत्तर दिया-व्यक्ति के पास जिस स्तर के पाप जमा होते हैं, उसी के अनुरूप शारीरिक एवं मानसिक व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। व्यक्तिगत-व्याधियाँ ही प्रकृति के सामूहिक दंड ही मनुष्य के सामूहिक पतन के दुष्परिणाम होते हैं।

कर्मफल सिद्धाँत पर ही समस्त संसार का व्यापार चल रहा है। संपूर्ण सृष्टि इस मर्यादा से बंधी हुई है। जो समझदार हैं, वे इस शाश्वत तथ्य को समझते तथा कर्मों के फल को सहर्ष स्वीकार करते हैं।

भिक्षु कश्यप ने श्रावस्ती में योग-चमत्कार दिखाना आरंभ कर दिया, इससे उनका यश दूर-दूर तक फैल गया। वे भीड़ से दिन-रात घिरे रहते, उन्हें आत्मकल्याण की साधनों के लिए समय ही न मिलता। जब भगवान बुद्ध ने यह समाचार सुना तो वे बड़े दुखी हुए और उन्होंने समाचार भेजकर कहलाया- प्रशंसा के लिए अथवा ख्याति पाने के लिए योग-साधनों का दुरुपयोग न कर, दुखियारों की सेवा में लगा होता तो अनेकों का भला होता और तुम्हारा भी कल्याण होता।


युगपुरुष की लेखनी से पं. श्री राम शर्मा आचार्य वाङ्मय- अमृत कलश

२५- यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान

सविता देवता की उपासना गायत्री महामंत्र का प्राण है वस्तुतः अग्नि ने ही भौतिकी ज्ञान-विज्ञान का मार्ग प्रशस्त किया है सामान्य अग्नि और यज्ञाग्नि में अंतर है। इस अंतर-ज्ञान के पठनीय विषय है-

गायत्री-यज्ञः उपयोगिता और आवश्यकता

यज्ञ के विविध लाभ-सुसन्तति प्रायश्चित, आत्मशान्ति

विश्व कल्पतरु यज्ञ- ब्रह्म, देव, पित्र तथा नृ-यज्ञ

गायत्री यज्ञ-विधान यज्ञाग्नि की शिक्षा, प्रेरणा।

यज्ञीय कर्मकाण्ड- बड़े तथा छोटे यज्ञ।

दैनिक उपासना में अग्निहोत्र, आरती, विसर्जन

गायत्री यज्ञों की विधिव्यवस्था, पंचवेदी, सर्वतोभद्र, पंचभूसंस्कारादि

ज्ञान और विज्ञान के स्रोत-गायत्री और यज्ञ।

मानव प्रगति का मूल तत्त्व-यज्ञ

यज्ञ के संपूर्ण विश्व का पालन कैसे?

हिन्दू धर्म में यज्ञों का स्थान और प्रयोजन

26 - यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया

यज्ञों में समिधाओं, शाकल्य तथा मन्त्रों का उपयोग, एक विशेष विधि-व्यवस्था और एक विधान सम्मत विधि से रोग निवारक हो जाता है, यज्ञोपचार वस्तुतः मानसोपचार के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा-प्रक्रिया है, इसके लिए पढ़ें-

उपचार-मंत्रशक्ति यज्ञीय धूम, सूक्ष्मीकरण पर आधारित।

वेदों में यज्ञ चिकित्सा, प्राणोद्दीपन

यज्ञोपचार में उपयोगी समिधा, हवन सामग्री

यज्ञाग्नि और सामान्य अग्नि में अंतर

संधि पीड़ा-मनोरोगों का निवारण, गंध की उपादेयता

वातावरण परिष्कार, अध्यात्म उपचार, प्राण-पर्जन्य

अणु विकिरण और यज्ञ, अश्वमेध यज्ञ

बलिवैश्व, दीपयज्ञ, सामूहिक यज्ञायोजन।

बालसंस्कारशालाएँ, यज्ञकर्ता ध्यान दें

गायत्री यज्ञ अभियान

यज्ञोपैथी एक समग्र चिकित्सा पद्धति

यज्ञायोजन में ध्यान रखने योग्य तथ्य

२-युग परिवर्तन कैसे और कब?

यह युगपरिवर्तन का काल है विज्ञान की अतुल उपलब्धियाँ प्राप्त करके भी आज का मानव संतुष्ट और सुखी नहीं है। भविष्यताओं के अनुसार युग-परिवर्तन अवश्य होगा और हम सबका भविष्य उज्ज्वल है। इस आगामी युग के सम्बन्ध में आप जानना चाहेंगे-

युगनिर्माण, युगसंधि अभी ही क्यों?

मानवी दुर्बुद्धि और आसन्न संकट।

अब न चेते तो विनाश होकर रहेगा।

अंतर्ग्रही हलचल और विश्वव्यापी उथल-पुथल

युद्ध और अणु-आयुध-निराकरण व समाधान।

हमारी ऋषिसत्ता भविष्यवाणी

इक्कीसवीं सदी एवं भविष्यवेत्ताओं के अभिमत

भविष्यविज्ञानियों के अनुमान और आकलन।

सभ्यता का शुभारम्भ, निष्कलंक अवतार

अपना देश बनेगा सारी दुनिया का सरताज

2८- सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण-1

आने वाले युग में सतयुग की वापसी सुनिश्चित है भावी युग हर दृष्टि से मंगलमय होगा और उसमें मानव का जीवन आज की अपेक्षा अधिक सुखी होगा। इसमें सूक्ष्मीकरण की क्या भूमिका होगी, इसके लिए पढ़े-

सूक्ष्मीकरण साधना- स्थूल का सूक्ष्म में परिवर्तन

प्रतिभाओं का उद्भव विकास, प्रचंड मनोबल की प्रतिभा में परिणति

सृष्टि का सर्वोपरि उपहार-प्रखर प्रज्ञा।

अनुष्ठानों की आवश्यकता क्यों?

प्रत्यक्ष घाटे के पीछे, परोक्ष लाभ-ही-लाभ है।

शाँतिकुँज और उसका प्रज्ञा अभियान।

युगसंधि वेला में सृजनशिल्पियों के दायित्व।

लोकसेवा आज का सबसे बड़ा पुण्य-परमार्थ

हमारी भविष्यवाणी-विनाश नहीं सृजन।

प्रतिभा का प्रकटीकरण स्वयं के बूते।

पूज्यवर ने अपने सभी मानसपुत्रों, अनुयायियों के लिए मार्गदर्शन एवं विरासत में जो कुछ भी लिखा है- वह अलम्य ज्ञानामृत (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय सत्तर खण्डों में) अपने घर में स्थापित करना ही चाहिए। यदि आपको भगवान ने सम्पन्नता दी है, तो ज्ञानदान कर पुण्य अर्जित करें। विशिष्ट अवसरों एवं पूर्वजों की स्मृति में पूज्यवर का वाङ्मय विद्यालयों, पुस्तकालयों में स्थापित कराएँ। आपका यह ज्ञानदान आने वाली पीढ़ियों तक को सन्मार्ग पर चलाएगा, जो भी इसे पढ़ेगा धन्य होगा।

२9 - सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण-2

समाज का नवनिर्माण सदा विचार-क्राँति से प्रारंभ हुआ। भविष्य के उज्ज्वल निर्माण के लिए भी यह आवश्यक है। विचारक्राँति के कुछ प्रमुख बिंदु है, उनको जानने के लिए पढ़ें-

अनौचित्य का प्रतिकार, परिवर्तन के महान क्षण।

अपने युग की असाधारण महाक्रान्ति

शिव की तृतीय नेत्रोंमीलन और कम-कौतुक की समाप्ति, नवयुग का स्वरूप

इक्कीसवीं सदी और उसकी उज्ज्वल भावनाएँ।

इक्कीसवीं सदी अवतरण के आवश्यक अनुबंध

हम बिछुड़ने के लिए नहीं जुड़े

तीर्थप्रक्रिया का पुनर्जीवन, प्रज्ञावतार का लीलासंदोह

सहस्रकुण्डीय महायज्ञों का देशव्यापी सरंजाम

आस्था-संकट की विभीषिका और उससे निवृत्ति। प्रज्ञावतार की विस्तार प्रक्रिया

यह समय चूकने का नहीं है

सतयुग की वापसी- महामानव बादलों की भूमिका में।

३-मर्यादा पुरुषोत्तम राम

भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम माना है। उन्होंने अपने जीवन में पारिवारिकता का, बंधुत्व का, दाम्पत्य-प्रेम का और लोक-मर्यादाओं का पालन जिस तरह से किया है, उससे वे विश्व-वन्दनीय बन गए हैं। इस संबंध में जानने के लिए पढ़ें-

पारिवारिक जीवन का आदर्श- पिता-पुत्र संबंध

स्त्री का सुशील तथा गुनी होना

सास-बहु संबंध, राज-कर्मचारियों की स्वामी भक्ति।

भारत का माता से विरोध, शबरी के बेर, सुग्रीव की मैत्री

वर्ग विहीन समाज की स्थापना

राम-राज्य में आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्वच्छता

परिवार नियोजन, नारी की दशा, प्रजा का हित चिंतन।

विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा।

लक्ष्मण के वीरोचित वचन, हनुमान का शौर्य।

अंगद तथा वानर-भालुओं का शौर्य

परहित भावना, कृपा, दया, क्षमा।

सद्बुद्धि की प्रतीक कौशल्या माता।

यातायात के तीव्रगामी साधन

३२-रामायण की प्रगतिशील प्रेरणाएँ

बाल्मीकि रामायण और श्रीरामचरितमानस दोनों ही आदर्श ग्रन्थ हैं इन दोनों ही ग्रंथों का भारतीय समाज पर गहन प्रभाव है। इन ग्रंथों में जीवन को सफल बनाने के लिए अनेक दिव्य सन्देश भरे हुए हैं इन्हें जानने के लिए पढ़े-

श्रीरामचरितमानस प्रगतिशील प्रेरणा

पुरुष पत्नीव्रत धर्म पालें, संतानोत्पादन की मर्यादा

रामराज्य, धर्मराज्य की शासन-पद्धति

विवेकयुक्त हंसवृत्ति, अवतारीपुरुष एवं उनके लक्षण।

बाल्मीकि रामायण से प्रगतिशील प्रेरणा

सत्संग और कुसंग का प्रतिफल

धार्मिकता अर्थात् कर्तव्यपरायणता।

वाणी का शील और संतुलन, यज्ञीय संस्कृत का संरक्षण

शिष्टाचार का अभ्यास बचपन से हो। समाज प्रकरण, नागरिक कर्तव्यों का पालन।

रामकथा का उद्देश्य लोक-मंगल

मानवजीवन का सदुपयोग।

मूल्य प्रति खण्ड १२५/- व सत्तर खण्डों का सेट रु. 7000/- मात्र


निराकार ने लिया साकार रूप

और फिर बाबा नानक विचारते हुए हसन अबदाल के जंगल में जा निकले। गर्मी बहुत थी। चिलचिलाती हुई धूप, चारों ओर सुनसान, पत्थर-ही-पत्थर रेत-ही रेत, झुलसी झाड़ियाँ, सूखे वृक्ष, दूर-दूर तक कोई भी जीव-प्राणी नजर तक नहीं आता था।

बाबा नानक अपने ध्यान में मस्त चले जा रहे थे कि उनके शिष्य मर्दाना को प्यास लगी, किन्तु पानी वहाँ कहाँ? बाबा नानक ने कहा- मरदाने! संतोष कर, अगले गाँव में पेट भर पानी पी लेना। पर मरदाने को तो तेज प्यास लगी थी, बाबा नानक यह जानकार चिंतित हुए। इस जंगल में तो दूर-दूर तक पानी नहीं था और मरदाना अड़ जाता तो सब के लिए कठिनाई पेश कर देता था। बाबा ने फिर समझाया- मरदाने! यहाँ पानी कही भी नहीं, तुम सब्र करो ईश्वर को याद करो। पर मरदाना तो वही

बैठ गया। एक कदम भी आगे नहीं चल सकता था। गुरुनानक मरदाने की जिद्द पर मुसकराते हुए हैरान थे। अंततः जब नानक ने उसे मानते हुए न देखा, तो वे ध्यानमग्न हो गए काफी देर बाद जब गुरुनानक की आंखें खुली - तो उन्होंने देखा की मरदाना मछली की तरह तड़फ रहा था। सतगुरु उसे देख कर हल्के से पुनः मुस्कराए और कहने लगे - भाई मरदाने! इस पहाड़ी पर एक कुटिया है, जिसमें वली कंधारी नाम का एक दरवेश रहता है। यदि तुम उसके पास जाओ तो तुम्हें पानी मिल सकता है इस इलाके में मात्र वही कुआं पानी से भरा है। अन्यत्र कही भी पानी नहीं है।

मरदाने को जोरों से प्यास लगी थी। नानक की बात सुनते ही वह तेजी से पहाड़ों की ओर बढ़ने लगा, वहाँ पहुँचा तो वली कंधारी ने पूछा, हे भले आदमी! तुम कहाँ से आये हो? मरदाने ने कहा - मैं नानक पीर का साथी हूँ। हम घूमते घूमते इधर आ निकले है मुझे तीव्र प्यास लगी हुई है और होठों पर पानी नहीं। बाबा नानक का सुनकर वली कंधारी क्रोधित हुआ और मरदाने को उसने वैसा-का-वैसा कुटिया से बहार निकल दिया। थका-हारा परेशान मरदाना नीचे आकर नानक से फरियाद करने लगा।

बाबा नानक ने उससे सारी कथा व्याख्या सुनी और मुस्करा कर बोले -मरदाने तुम बार फिर जाओ। नानक ने मरदाने को परामर्श दिया, इस बार तुम नम्रता से आस्थावान् होकर जाओ। कहना, मैं नानक दरवेश का साथी हूँ, मरदाने को प्यास बहुत सता रही थी। पानी अन्यत्र कही था नहीं। खीजता -कुढ़ता, शिकायत करता मरदाना पुनः वहां जा पहुँचा। किन्तु वली कंधारी ने फिर भी पानी नहीं दिया। मैं एक काफ़िर के साथी को पानी का घूँट भी नहीं दूँगा। वली कंधारी ने मरदाने को फिर ज्यों-का-त्यों लौटा दिया। जब मरदाना इस बार नीचे आया तो उसका बुरा हाल था उसके होठों पर पपड़ी जमी थी। मुँह पर हवाईयां उड़ रही थी। यो लगता था कि मरदाना घड़ी - पल का ही मेहमान है। बाबा नानक ने सारी बात सुनी और मरदाने को पुनः एक बार वली के पास जाने को कहा। आज्ञाकारी मरदाना चल पड़ा, किन्तु वह जानता था उसके प्राण इस बार रास्ते में ही निकल जायेंगे। जैसे-तैसे वह फिर से एक बार पहाड़ी की चोटी पर, वली कंधारी के चरणों में जा टिका। किन्तु क्रोध में जलते फकीर ने इस बार भी उसकी विनती ठुकरा दी। वहां गुस्से में कहने लगा - नानक अपने आपको पीर कहलाता है, तो अपने मुरीद को एक घुट पानी भी नहीं पिला सकता? वली कंधारी ने ऐसी लाखों खरी - खोटी मरदाने को सुनायी।

मरदाना इस बार जब नीचे पहुँचा, तब प्यास से निहाल वहां बाबा नानक के चरणों में बेहोश हो गया। गुरुनानक ने मरदाने की पीठ थपथपाई, उसे साहस दिया तो मरदाने ने आंखें खोली। बाबा ने उस सामने से एक पत्थर उखाड़ा तो नीचे से पानी का स्रोत बह निकला। चारों ओर पानी-ही पानी हो गया।उधर वली कंधारी को पानी की जरूरत पड़ी। कुएं में कुओं झाँका तो पाया की पानी की एक बूँद भी नहीं है। कंधारी को आश्चर्य हुआ। नीचे पहाड़ी के कदमों में स्रोत बह रहे थे। दूर-बहुत-दूर एक कीकर के नीचे कंधारी ने देखा तो बाबा नानक और मरदाना बैठे थे। क्रोधवश वली कंधारी ने चट्टान का एक टुकड़ा पूरी शक्ति से गिराया। एक पहाड़ी को अपनी और खिसकते आते देखकर मरदाना विक्षुब्ध हो उठा। बाबा नानक ने धीरज के साथ मरदाने से 'धन्न निरंकार' बोलने को कहा और जब पहाड़ी का टुकड़ा बाबा के सर तक आ गया, तब गुरुनानक ने पंजे के साथ हाथ देकर उसे रोक लिया और हसन अबदाल में इस स्थान का नाम पंजा साहिब हो गया। पहाड़ी के उस टुकड़े पर अभी तक बाबा नानक का पंजा लगा हुआ है।

पराधीन भारत में रहे किशोर वर्ष के गुरुमीत ने कई बार गुरुद्वारे में यह प्रसंग सुना था। अभी पिछले ही दिन कॉलेज में उसे यही साखी सुनायी गयी थी और आज उसने पंजा साहिब के बारे में यह अचरज भरी घटना सुनी। उसका गाँव पंजा साहिब से कोई अधिक दूर नहीं था। ज्यों ही इस घटना की खबर आयी, वह अपनी माँ के साथ पंजा साहिब की ओर चल पड़ा और जब वे पंजा साहिब पहुँचे, तो वहाँ लोगों ने गीली आँखों से इस कहानी को सुनाया।

दूर कही शहर में अंग्रेजों ने निहत्थे भारतीयों पर गोली चलाकर निहत्थों को मार गिराया था। मृतकों में युवक भी थे, वृद्ध भी थे और जो शेष रह गये उन्हें रेलगाड़ी में डालकर किसी दूसरे शहर जेल भेजा जा रहा था। कैदी भूखे-प्यासे थे और आज्ञा यह थी कि गाड़ी को रास्ते में कही न ठहराया जाये। जब पंजा साहिब यह खबर पहुँची, तो जनसमूह आक्रोश से भर उठा। बाबा नानक ने जहाँ स्वयं मरदाने की प्यास बुझाई थी, वही पंजा साहिब, वहाँ से भरी हुई प्यासे लोगों की गाड़ी निकल जाये, तड़पते भूखे-प्यासे देशभक्त निकल जाएँ, यह कैसे हो सकता है?

और फैसला हुआ गाड़ी को रोका जाये। स्टेशन−मास्टर से प्रार्थना की गयी, तार गये, किन्तु फिरंगी साहिब का हुक्म था कि गाड़ी रास्ते में कहीं नहीं रोकी जाएगी। गाड़ी में आजादी के परवाने देशभक्त हिन्दुस्तानी भूखे थे। उनके लिए पानी का कोई प्रबंध नहीं था। गाड़ी को पंजा साहिब नहीं रुकना था, पर वहां की जनता का निर्णय अटल था कि गाड़ी को जरूर रोकना है और नागरिकों ने स्टेशन पर खीर-पूड़ी के ढेर लगा दिए। किन्तु गाड़ी तो आँधी कि तरह आयेगी और तूफान की तरह निकल जाएगी इसे भला कैसे, किस तरह रोका जाये?

और गुरुमीत की माँ की सहेली ने उसे बताया कि उस जगह पटरी पर सबसे पहले वे लोग लेट गये। तदुपरान्त औरतें लेट गयी, फिर उनके बच्चे.... और तब गाड़ी आई, दूर से चीखती-चिल्लाती सीटियाँ मारती हुई। गाड़ी अभी दूर ही थी कि धीमी पड़ गयी, किन्तु रेल थी धीरे-धीरे ही ठहरती। प्रत्यक्षदर्शी महिला कह रही थी कि मैं देख रही थी कि पहिये उनकी छाती पर चढ़ गये थे, फिर उनके साथी की छाती पर... और देखने वाले देख न सके। उन्होंने आंखें बंद कर ली। जब आंखें खुली तो सिर पर गाड़ी खड़ी थी। कइयों की साथ-साथ धड़क रही, छातियों में 'धनं निरंकार' के स्वर फूट रहे थे और फिर सबके देखते-देखते लाशें टुकड़े-टुकड़े हो गई। उन्होंने अपनी आँखों से बह रही खून की नदी देखी। बहती-बहती कितनी ही दूर तक पक्के नाले के पुल तक चली गई थी। पंजा साहिब में एक बार फिर चमत्कार घटित हो गया अबकी बार भी सतगुरु की कृपा सक्रिय हुई थी, पर आत्मचेतना के रूप में नहीं लोकचेतना के रूप में। निरंकार ने साकार रूप लिया था। इस घटना ने जनचेतना को प्रबुद्ध कर दिया। बाबा नानक कहीं दूर मुस्कुरा रहे थे। उनके अन्तः स्पंदनों में यह संगीत ध्वनित हो रहा था कि अभी मेरे शिष्यों में भाव-संवेदना प्रवाहित हो रही है। मेरे शिष्य एक नहीं सैकड़ों मरदानो की भूख-प्यास को शाँत करने में समर्थ है। दिव्यलोक से सतगुरु नानक का आशीष प्रवाह झरने लगा। जनचेतना उससे सनत हो उठी।


महाप्रभु चैतन्य (Kahani)

आरती का पुनीत समय था। शंख और घंटे की आवाज से भगवान जगन्नाथ का मंदिर गूँज रहा था। महाप्रभु चैतन्य गरुड़-स्तंभ के पास खड़े भगवान की आरती को बड़ी तन्मयता से गा रहे थे। मंदिर में भक्तों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। बाद में आने वालों को मूर्ति के दर्शन नहीं हो पा रहे थे। एक उड़िया स्त्री जब दर्शन करने में असमर्थ रही तो झट गरुड़-स्तंभ पर चढ़ गई और एक पैर महाप्रभु के कंधे पर रखकर आरती देखने लगी।

महाप्रभु ने तो इस बात को सहन कर भी लिया, परन्तु उनका शिष्य गोविन्द भला क्यों सहन करता? वह उस स्त्री को डाँटने लगा, पर महाप्रभु ने ऐसा करने से मना किया। क्यों बाधक बनते हो, भगवान के दर्शन कर लेने दो। इस माता को दर्शन की जो प्यास भगवान ने दी है, यदि मुझे भी प्राप्त होती तो मैं धन्य हो जाता। इसकी तन्मयता तो देखो कि इसे यह भी ध्यान नहीं रहा कि पैर किसके कंधे पर है?

महाप्रभु का इतना कहना था कि वह धम्म से नीचे आ गिरी और उनके चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगी। महाप्रभु ने अपने चरण हटाते हुए कहा- अरे! तुम यह क्या कर रही हो मुझे तुम्हारे चरणों की वंदना करनी चाहिए ताकि तुम जैसा भक्ति-भाव मैं भी प्राप्त कर सकूँ। उक्त वृद्ध को उन्होंने पैरों में से उठाकर खड़ा किया और स्वयं पैर छूने लगे। उन्हें पैर छूते देखकर आसपास के लोगों ने जो उन्हें पहचान गये थे, महाप्रभु से कहा- यह क्या करते हो महाराज! इस नीच बुढ़िया के पैर छू रहे हो

क्या हुआ भाइयों- चैतन्य बोले- अपने से अच्छे और श्रेष्ठ लोगों को आदर-सम्मान देने में कोई बुराई थोड़े ही है। वैसे भी यह वृद्धा मुझसे आयु में बड़ी है। मैं इनके पैर छू रहा हूँ तो कौन-सा पाप कर रहा हूँ। यह तो लक्ष्मी का ही अवतार है।

महाप्रभु चैतन्य के जीवन में आध्यात्मिकता का वास्तविक स्वरूप-लोकसेवा का लक्षण पूरी तरह प्रकट हुआ था। उन्होंने अपना सारा जीवन दुखी-दरिद्रों तथा गिरे हुओं को ऊँचा उठाने में लगाया।

भक्तिभाव से गदगद वाणी सुनकर आसपास एकत्र लोग धन्य-धन्य कह उठे।


ऊर्जा का अभाव ही थकान है

अनवरत श्रम एवं भाग-दौड़ के इस ज़माने में थकान बड़ा ही स्वाभाविक सत्य बन गया है। हालाँकि कुछ देर के विश्राम के बाद इससे छुटकारा पाया जा सकता है, किन्तु थोड़े काम के बाद ही थक जाना, शरीर का शिथिल हो जाना व मन का भारीपन आज के जीवन का एक अभिन्न अंग बनता जा रहा है। कुछ लोग तो विश्राम एवं नींद के बाद भी तन-मन का हल्कापन एवं ताज़गी अनुभव नहीं कर पाते और स्थायी या जीर्ण थकान की गंभीर समस्या का शिकार हो जाते है। थकान की इस गहराती समस्या से स्कूली बच्चों से लेकर युवा, वृद्ध व श्रमिक से लेकर बुद्धिजीवी-व्यापारी तक और सामान्य गृहिणी से लेकर कामकाजी महिला तक न्यूनाधिक रूप से प्रभावित है। अमेरिका जैसे विकसित देशों में तो यह समस्या और गंभीर रूप ले रही है। जर्नल ऑफ अमेरिकन मेडिकल ऐसोसिएशन की एक रिपोर्ट के अनुसार वहाँ चिकित्सकों के पास आने वाले रोगियों में २४ प्रतिशत स्थायी थकान से पीड़ित होते है।

आश्चर्य होता है की धरती का सबसे बुद्धिमान एवं विकसित प्राणी मानव ही क्यों जड़ता के इस अँधेरे में खोता जा रहा है, जबकि मनुष्येत्तर प्राणी अन्य जीव-जंतु वनस्पति-जगत यहाँ तक कि तथाकथित जड़प्रकृति तक ऊर्जा से भरपूर एवं सतत् गतिशील है। पक्षी प्रातः उठते है, चहकते-गाते है। अथक श्रम से अपना घोंसला बनाते है व अपने बच्चों के लिए आहार जुटा लेते है। गिलहरी एक पेड़ से दूसरे पेड़ में व एक टहनी से दूसरी में उछल-कूद करती रहती है। वनस्पति-जगत तो बसंत में जैसे अपनी चरम जीवन्तता व उल्लास से अर्जित होकर प्रकट होता है। प्रकृति स्वयं भी ऊर्जा से भरी-पूरी है। लहरे समुद्री किनारों से टकरा रही है, नदियाँ अविरल सागर की ओर गतिशील है। हवा बहती हुई सबको अपने साथ झुलाती है। पृथ्वी अपनी धुरी पर सक्रिय है और सूर्य के इर्द-गिर्द निर्धारित गति से घूम रही है। सूर्य स्वयं भी हर पल कल्पनातीत गर्मी व प्रकाश बिखेर रहा है।

इंसान यदि थका-हारा और परेशान है, तो सिर्फ अपनी भोगवादी जीवन-पद्धति के कारण। इसी वजह से वह ऊर्जा के नैसर्गिक स्रोत से कटता जा रहा है। खान-पान की बिगड़ी आदतें, आहार-विहार का असंयम, निषेधात्मक चिंतन, अव्यवस्थित कार्यपद्धति व भावनात्मक जटिलताएं उसकी जीवनीशक्ति को निचोड़कर थकान के सघन तमस में धकेल रही है।

स्वाभाविक रूप से मनुष्य में शक्ति की सीमित मात्र होती है। इसी से उसका जीवन-व्यापार चलता रहता है। वह कुशलतापूर्वक तभी कार्य करता रह सकता है, जबकि यह शक्ति बनी रहे। शक्ति के क्षय के साथ ही उसकी कार्य-कुशलता में निरंतर ह्वास होने लगता है। इसी से कार्य में अरुचि होने लगती है। रह-रहकर ध्यान उचटने लगता है। मस्तिष्क की नसें तन-सी जाती है, कभी-कभी सरदर्द भी होने लगता है, आंखें पथरा-सी जाती है, स्वभाव में चिड़चिड़ापन एवं खीज आदि आने लगते है। ये सब-के-सब थकान के लक्षण है।

शारीरिक ऊर्जा का प्रमुख स्रोत आहार है। प्राकृतिक रूप से उपलब्ध सुपाच्य एवं पौष्टिक आहार से शरीर को प्रचुर मात्रा में ऊर्जा मिलती है। आहार नियत समय पर उचित मात्रा में लिया जाये, तो ही ठीक है अन्यथा पाचनतंत्र पर बोझ डालने से वह थकान को ही बढ़ावा देता है। सफेद चीनी की जगह प्राकृतिक शर्करा, डिब्बा बंद फास्टफूड व कोलापेय की जगह हरी सब्जी, दूध-फल अंकुरित अन्न आदि स्वस्थ विकल्प है। थकान के कुछ स्पष्ट कारण शरीर के गंभीर रोग जैसे-अनीमिया थायराइड समस्या, कृमिज्वर, मधुमेह, गुर्दारोग, टी. बी. या अन्य जीर्ण रोग हो सकते है, जिसमें ऊर्जा व जीवनशक्ति का तीव्रगति से ह्वास होता है। इनका चिकित्सकीय परामर्श द्वारा उपचार आवश्यक है। सामान्यक्रम में थकान का शरीर से अधिक मन से गहरा सम्बन्ध है। भावनात्मक एवं मनोवैज्ञानिक समस्याओं से उपजा तनाव वस्तुतः शरीर को बुरी तरह थका देता है। एक अध्ययन के अनुसार, स्थायी थकान से पीड़ित रोगी अवसाद या तनावजन्य मानसिक रोगों से ग्रसित थे। तनाव में शरीर के अन्दर लड़ो या भागो की स्थिति से निपटने में ऊर्जा खर्च होती है। यदि तनाव की स्थिति दीर्घकाल तक बनी रहे, तो ऊर्जा का अतिशय क्षय होता है। तनाव की, भय या उदासीनताजन्य स्थिति में मस्तिष्क से ऐसे न्यूरोरसायनों इम्यूनोमोडूलेटर प्रतिरक्षा-तंत्र को दुर्बल बनाता है। मानसिक तनाव से उत्पन्न थकान का मुख्य कारण व्यक्ति का निषेधात्मक चिंतन ही होता है। जीवन में सार्थक कार्य के अभाव में या खाली व निठल्ला व्यक्ति इससे अधिक ग्रसित पाया जाता है। ऐसा व्यक्ति जीवन को भार की तरह ढोता फिरता है और अपनी ही कुंठाओं के कारण उसे स्थाई थकान की शिकायत बनी रहती है। ऐसी थकान को अनिद्रा या नींद की कमी पूरी करने के लिए नींद की गोली खाने से तात्कालिक राहत तो मिलती है, किन्तु थकावट यथावत बनी रहती है। नींद न आने से उतना नुकसान नहीं होता, जितना नींद की गोलियाँ खाने से होता है। ऐसा व्यक्ति यदि चाहे तो अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति एवं आहार-विहार के परिवर्तन द्वारा अनिद्रा रोग पर काबू पा सकता है।

जीवन को सार्थक उद्देश्य के निमित्त खपाकर व अपनी अभिरुचियों को व्यापक आधार देकर व्यक्ति बहुत कुछ थकान की समस्या से मुक्ति पा सकता है। जहाँ आरामतलब एवं उद्देश्यहीन व्यक्ति थोड़े-से काम से ही थक जाते है, वही उद्देश्यनिष्ठ व्यक्ति दीर्घकाल तक बिना थके श्रम कर सकता है। थकान के कारण इससे प्रभावित व्यक्ति को अपनी समूची जीवनशैली का अवलोकन करना चाहिए और तनाव के कारक तत्वों को दूर करने का यथायोग्य प्रयास करना चाहिए। वैसे थकान का तात्कालिक एवं सबसे महत्वपूर्ण उपचार विश्राम है। थके हुए शरीर व मन को पूर्ण विश्राम देने से थकान से राहत पाई जा सकती है। अल्पकालीन विश्राम के अतिरिक्त पूर्ण विश्राम का अचूक उपाय नींद है, जो थके-हारे व्यक्ति के लिए टॉनिक का काम करती है। अत्यधिक श्रम व मानसिक तनाव से खर्च ऊर्जा की भरपाई अच्छी व गहरी नींद से बखूबी हो जाती है।

कार्य को सुव्यवस्थित एवं सुनियोजित ढंग से करने पर भी व्यक्ति अनावश्यक तनाव एवं थकान से बच सकता है। रुचिकर कार्य करने से भी व्यक्ति कम थकता है और एक साथ देर तक कार्य कर सकता है। अतः कार्य में रुचि का समावेश थकान को दूर करता है। कार्य करने के समय को यदि अपेक्षाकृत छोटे-छोटे खंडों में बाँट दिया जाये, तो कार्य करने वाला शीघ्र नहीं थकता। कार्य करते समय बीच-बीच में थोड़ी-थोड़ी देर के लिए विश्राम कर लेने से थकान शीघ्र नहीं आती। विश्राम की थोड़ी-सी अवधि व्यय-शक्ति को वापस लौटा देती है। कार्य के बीच-बीच में मनोरंजन की व्यवस्था भी थकान को पास फटकने नहीं देती।

कार्य की एकरसता भी थकान का कारण बनती है। ऐसे में कार्य में परिवर्तन करने से थकान दूर हो जाती है। महात्मा गाँधी इस सिद्धाँत का बखूबी पालन करते थे। शारीरिक कार्य के बाद मानसिक कार्य और मानसिक कार्य के बाद शारीरिक कार्य अदलते-बदलते रहने से थकान दूर होती रहती है। इसमें शीघ्र कार्य निपटने की प्रवृत्ति भी अच्छी होती है। दीर्घसूत्री व्यक्ति कार्य करने की योजना पर ही विचार करते रह जाते है। ऐसा सोचने से ही उनको थकान घेर लेती है। अतः योजना को व्यवहारिक रूप देकर उसे छोटे-छोटे खंडों में क्रियान्वित किया जाना चाहिए। छोटी-छोटी सफलताएँ मन को उत्साहित बनाये रखती है और थकान पास तक नहीं फटकने पाती, बीच-बीच में विगत उपलब्धियों का स्मरण भी थके-हारे मन को उत्साह से भरने का प्रभावशाली उपाय है।

कोई भी व्यक्ति शक्ति भर ही कार्य कर सकता है। अतः अपनी शारीरिक एवं मानसिक शक्ति के अनुरूप कार्य करने से भी थकान की समस्या असाधारण नहीं होने पाती। अपनी पुस्तक बाऊंडलेस एनर्जी में सुप्रसिद्ध लेखक दीपक चोपड़ा लिखते है कि किसी भी क्षण व्यक्ति का ऊर्जा स्तर कई चीजों पर निर्भर करता है, जैसे- आहार व उसकी पाचनक्रिया, वातावरण, ताप, विचार व भाव। लेकिन दैनिक जीवन में मूल जीवनशक्ति का निर्धारण चारों ओर संव्याप्त घनीभूत ऊर्जा का भंडार करता है। जिसके एक अंश मात्र से सारी प्रकृति चैतन्य एवं गतिशील है। इसी ऊर्जा भंडार का संपर्क हमारे शरीर में ऊर्जा व जीवनशक्ति के प्रवाह को निर्धारित व नियंत्रित करता है। जैसे अंधकार का स्वयं कोई अस्तित्व नहीं है, बल्कि प्रकाश का अभाव ही अन्धकार मात्र है। वैसे ही थकान स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, वह मात्र ऊर्जा का अभाव है।

सही कहें तो आज की गंभीर होती जा रही थकान की समस्या का एकमात्र निदान की जीवनशक्ति के स्रोत की ओर विमुखता के त्याग में निहित है। अपनी प्रकृति के अनुरूप सार्थक उद्देश्य से जुड़कर रुचिपूर्ण कार्य में जुट जाएँ। अपनी शक्ति एवं क्षमता भर कार्य करते हुए सतत् सक्रिय रहे। आहार विहार के संयम व विधेयात्मक चिंतन को जीवन का अभिन्न अंग बनायें। इस तरह स्वयं ही स्फूर्ति एवं आनंद के साथ जीवन प्रगतिशील एवं विकसित रहेगा।


महाराज रंतिदेव (Kahani)

महाराज रंतिदेव की प्रचंड तपश्चर्या से जब इन्द्रासन रो उठा, तो प्रजापति ब्रह्मा को उनके सामने प्रकट हो वरदान देने के लिए बाध्य होना पड़ा। उन्होंने कहा-तुम्हारी तपश्चर्या से मैं अत्यधिक प्रसन्न हूँ। चाहो जो वरदान माँग लो। महाराज रंतिदेव बोले- देवराज! अगर आप मुझ पर प्रसन्न है और वरदान देना चाहते है, तो मैं चाहता हूँ- मेरे राज्य में ही नहीं, समस्त पृथ्वी पर कोई भूखा न रहे, कोई पीड़ित-शोषित दिन-हीन न रहे। पृथ्वी हिरन्यगर्भा हो। जन-जन के मन में बैर, द्वेष, कलह व दुर्भावनाओं का नाम- निशान न रहे। कोई रोगी न हो, दुखी न हो, यह मेरा कर्तव्य है और मुझे इस कर्तव्य के पालन की शक्ति दीजिये।

यही आदर्श न केवल राष्ट्रप्रमुख का अपितु हर नागरिक का होना चाहिए। सभी एक ही माँ के पुत्र है।


देने वाला और कोई नहीं, अल्लाह ही है

वह बादशाह तो था, पर था बड़ा अभिमानी। उसकी सात लड़कियां थी। वह अपनी सातवीं लड़की को बहुत

चाहता था। वह लड़की बहुत खूबसूरत थी, साथ ही गृहकार्यों में भी उसकी कुशलता अद्वितीय थी। बादशाह रोजाना दरबार में आने से पहले अपनी सातों लड़कियों को बुलाता और उनसे पूछता- बताओ तुम्हें अच्छे-अच्छे कपड़े, शाही ठाट-बाट किसकी बदौलत मिलते है?

छह लड़कियां तो कहती- आपकी बदौलत, जो बादशाह और हमारे वालिद भी है। लेकिन सातवीं लड़की चुप रहती। बादशाह को उसकी खामोशी पसंद न थी। एक दिन बादशाह ने उससे कहा- तुम मेरे सवाल का जवाब क्यों नहीं देती? आज तुम्हें जवाब देना ही पड़ेगा।

लड़की ने डरते-डरते कहा- बाबा! देने वाला अल्लाह है। वही सब कुछ देता है और सबको देता है।

यह जवाब सुनकर बादशाह को गुस्सा आया और उसने लड़की से कहा-जा हमारी नजरों के सामने से दूर हो जा। इसी के साथ उसने एक सैनिक को हुक्म दिया कि उसे ले जाकर जंगल में छोड़ आये।

लड़की जंगल में रोते-रोते सो गयी। सुबह बाँसुरी की सुरीली आवाज से उसकी आंखें खुली, तो उसने देखा की एक लड़का खड़ा बाँसुरी बजा रहा है। शहजादी ने उससे पूछा- तुम यह क्या कर रहे हो?

लड़के ने जवाब दिया- मैं चरवाहा हूँ। अपने मालिक की भैंसे चराता हूँ। कल से एक भैंस गायब है। घर जाते हुए डर रहा हूँ। लेकिन शहजादी! आप इस जंगल में कैसे आ गयी? शहजादी ने उससे कहा- मैं भी घर नहीं जा सकती। तुम मेरे सेवक बन जाओ फिर दोनों कही चलकर अपने रहने का प्रबंध करेंगे।

चरवाहे ने शहजादी की बात मान ली। वे दिनभर भूखे-प्यासे चलते-चलते एक शहर की चारदीवारी तक पहुँच ही गये। शहजादी ने चरवाहे से कहा- तुम किसी बड़े जौहरी को ढूँढ़कर उससे कहो कि एक शहजादी शहर के बाहर तुम्हारा इंतजार कर रही है। चरवाहा जल्दी ही एक जौहरी को साथ लेकर आ गया। जौहरी ने शहजादी के जेवरात देखते हुए उसके मुँह माँगे दाम दे दिए।

अब सफ़र फिर शुरू हुआ। चलते-चलते शहजादी को एक जगह पसंद आ गयी। अतः उसने वहाँ एक छोटा-सा घर बनाने का निश्चय किया। एक दिन जब शहजादी उस लड़के के साथ सैर को निकली और रास्ते में उसे प्यास लगी, तो उसने कहा- जाओ जैसे भी बने, मेरे लिए पानी ले आओ?

लड़का फौरन पानी की तलाश में चला गया। अल्लाह सबकी जरूरत पूरी करता है। जल्द ही उसे ठंडे पानी का चश्मा मिल गया। गिलास में पानी भरकर अभी वह वापसी का इरादा कर ही रहा था कि उसकी नज़र कुछ लालों पर पड़ी, जो चश्मे कि तह में पड़े हुए थे उसने उन लालों को उठा लिया।

कुछ समय बाद छोटा-सा पर खूबसूरत घर बनकर तैयार हो गया। शहजादी वहाँ अपने सेवक के साथ रहने लगी। एक दिन उस चरवाहे लड़के ने सोचा कि अगर वह उस चश्मे के किनारे-किनारे जाये, तो वह उस जगह जहाँ से ये चमकते हुए लाल बहकर आये है, पहुँच जायेगा। यह सोचकर वह चश्मे के किनारे चलते हुए काफी दूर पर बने एक बड़े महल कि चहारदीवारी तक पहुँच गया। यहीं से यह पानी बहकर आ रहा था वह महल के आँगन में आ पहुँचा। चश्मे का स्रोत यही था।

चश्मे के स्रोत के पास उसे एक खूबसूरत औरत का कटा हुआ सिर नज़र आया। उससे खून टपक रहा था। खून के कतरे पानी में गिरते ही लाल बन जाते थे। पास ही औरत का धड़ भी पड़ा हुआ था। वह बहुत डरा, पर जैसे ही भागने के लिए उसने कदम उठाया, उसका पाँव लकड़ी के एक तख्ते पर पड़ा। पैर का तख्ते पर पड़ना था कि कटा हुआ सिर उछलकर धड़ से जुड़ गया और औरत जिन्दा हो गयी।

औरत ने दयाभरी नजरों से उस लड़के को देखा और कहा- जान प्यारी है, तो यहाँ से भाग जाओ वरना जिन्न तुम्हें चिर-फाड़कर खा जायेगा। लड़के ने हिम्मत की और पूछा-आप कौन है?

औरत ने जवाब दिया- मेरा नाम लालपरी है। मैं परियों के बादशाह की बेटी हूँ। एक जिन्न जबरदस्ती मुझसे शादी करना चाहता है। उसने मुझे यहाँ कैद कर रखा है। रोज शिकार पर जाने से पहले वह मेरी ऐसी ही हालत बना देता है, अब तुम जल्दी करो और तख्ते को इसी प्रकार रख दो जैसा पहले था और तुम जाकर कहीं छुप जाओ।

लड़के ने परी की बात मान ली। उसके छुपते ही जिन्न गरजता-चीखता हुआ बोला- कहीं आदमी है? यहाँ आदमी की गंध आ रही है। यह कहते हुए उसने उस खूबसूरत औरत को फिर जिन्दा करके उससे पूछा- यहाँ जरूर कोई आदमी है। कहाँ है वह? मैं बहुत भूखा हूँ। बता ताकि उससे अपना पेट भर लूँ।

परी ने बात बनाई और कहा-आदमी! कैसा आदमी!! मैं नहीं जानती कि वह कहाँ और कैसा है? जिन्न परी के जवाब से अस्वस्थ हो गया। उसने फिर मुर्दा कर दिया और शिकार की तलाश में दोबारा निकल गया। वह नजरों से ओझल हुआ, तो लड़का बाहर निकल आया। उसने जादू के तख्ते की मदद से परी को जिन्दा कर दिया। फिर दोनों वहाँ से बच निकलने की तरकीब सोचने लगे।

लालपरी ने एक कोठरी की ओर इशारा करते हुए कहा- इस कोठरी में जाओ, वहाँ पिंजरे में तुम्हें तोता मिलेगा। उस तोते में ही जिन्न की जान है। जिन्न जब शिकार के लिए निकलता है, तो अपनी जान उसी तोते में छोड़ जाता है। जल्दी से उस तोते को मेरे पास ले आओ।

लड़का तोते को लेकर जैसे ही परी के पास पहुँचा, गरज और तूफान से जमीन काँपने लगी। फिर देखते-ही-देखते धुएँ का एक बादल उठा और जिन्न उसमें से बाहर आया। वह गुस्से से पागल हो रहा था वह दोनों को निश्चय ही मार डालता। लेकिन परी ने झट से तोते को पिंजरे से निकालकर उसकी गर्दन मरोड़ दी, इस तरह परी और लड़का दोनों तख्ता लेकर महल से बच निकले और शहजादी के पास पहुँच गये। शहजादी लालपरी को देखकर बहुत खुश हुई। फिर दोनों बहिनों की तरह रहने लगी।

रात को लालपरी तख्ते पर लेट जाती। उसका सर धड़ से जुदा हो जाता और कतरा-कतरा खून से कीमती रत्नों के ढेर लग जाते। सुबह को दोनों मिलकर तख्ता हटा देते और लालपरी जिन्दा हो जाती। कुछ दिनों बाद लालपरी ने सफ़र पर जाने का इरादा किया। जाने से पहले तख्ते की मदद से शहजादी के लिए एक नया महल बनाया और एक दावत की व्यवस्था की। मेहमानों में शहजादी के पिता बादशाह भी था। शहजादी ने वह खाना पकाया था, जो बादशाह को बहुत पसंद था।खाना शुरू होते ही बादशाह की आँखों में आँसू उमड़ आये। उसे अपनी बेटी याद आ गयी, जो उसे अच्छे-अच्छे व्यंजन पकाकर खिलाया करती थी और जिसे घर से निकालकर वह पछता रहा था। क्योंकि बहुत तलाश करने के बावजूद वह उसे अभी तक नहीं मिल सकी थी।

लालपरी ने बादशाह से रोने का कारण पूछा। बादशाह ने उसे सारी बात सही-सही बता दी। परी ने बादशाह से पूछा- क्या आप अब भी पहले की तरह ही अपनी लाड़ली को चाहते है? बादशाह ने जवाब दिया- हाँ, मेरे दिल में बस एक ही इच्छा है और वह यह है कि मरने से पहले अपनी उस बेटी को एक नज़र देख लूँ। जवाब देने के बजाये परी ने एक चुटकी बजायी। चुटकी बजाते ही बादशाह की खोयी हुई बेटी अपने पिता के सामने आ खड़ी हुई। देखते ही दोनों एक दूसरे से लिपटकर रोने लगे। रोते-रोते शहजादी बोली-अब्बा! क्या अल्लाह के सिवा कोई और भी देने वाला है? देखिये उसने मुझे यह महल दे दिया और इतना बड़ा खजाना भी, जबकि आप बादशाह होने के बावजूद भी अपनी ही खोई हुई लड़की को ढूँढ़ तक न सके।

बादशाह को अपनी गलती का अहसास हो गया। उसने सच्चाई को स्वीकारते हुए कहा- सच है बेटी, देने वाला अल्लाह के सिवा और कोई नहीं। अल्लाह की नेमत और रहमत ही इन्सान को काबिल और समर्थ बनाती है।

है तो यह जिन्न व परी की कहानी, किन्तु कितना बड़ा सबक सिखाती है कि परमसत्ता के होते हुए भी न जाने क्यों हम अपने पर अभिमान कर बैठते है, स्वयं से, अपने आसपास के परिकर से, चाटुकारों से आत्म-मुग्ध हो, उसकी उपेक्षा कर अपने को ही सर्वनियन्ता समझ बैठते है। कर्तापन का अभिमान त्यागना ही ईश्वरप्राप्ति की दिशा में पहला कदम है।


भक्त जलाराम (Kahani)

एक बार ध्राँगध्रा के महाराज के सिपाही वीरपुर के पास से निकले। जलाराम उनको बुलाकर एक बर्तन में से दो लड्डू और एक मुट्ठी सेव प्रसाद देने लगे। जब लगभग १५० सैनिकों को प्रसाद देने पर भी वे बर्तन ज्यों-के-त्यों भरे नज़र आये, तो सिपाही आश्चर्यचकित हो गये। उनमें एक सिपाही घोड़ा दौड़ाकर महाराज के पास पहुँचा और इस घटना की खबर उनको सुनाई। राजा प्रभास पाटन की यात्रा करने निकले थे और उनके साथ भी उन १५० के अतिरिक्त २५० सिपाही और थे। आश्चर्य की बात सुनकर वे भी अपनी सेनासहित वीरपुर की ओर चले आये। वहाँ पर देखा तो वास्तव में भक्त जलाराम दोनों हाथों से प्रसाद बाँट रहे थे। उन्होंने महाराज को देखकर हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा-राजासाहब अभी जूनागढ़ दूर है, भगवान का प्रसाद तो लेते जाइये। राजा ने कहा- अभी पहुँच जायेंगे भक्तराज, मेरे साथ सैनिक बहुत है।

प्रसाद लिए बिना तो न जाने दूँगा। यह कहकर जलाराम ने सब सैनिकों को उसी बर्तन में से प्रसाद बाँटना आरंभ कर दिया। चमत्कार से प्रभावित होकर राजा ने कुछ देने की इच्छा प्रकट की तो भक्त ने कहा- आश्रम में कुछ बड़ी चक्कियों की आवश्यकता है। सुना है कि आपके राज्य में इसके लायक बढ़िया पत्थर मिलता है। इसलिए कुछ पत्थर भिजवा दे तो कृपा होगी। राजा ने कहा- अरे भक्त, यह क्या माँगा। धन अथवा जागीर माँगी होती तो बात थी।

जलाराम ने कहा- यहाँ तो साधु-संत है, राम का भजन करते है और वे ही जो कुछ देते है, वह सबको खिला देते है। महाराज ऐसा भाव देखकर बड़े प्रसन्न हुए और अपनी इच्छा से बहुत-सा धन भेंट चढ़कर चले गये। उन्होंने बहुत से बढ़िया पत्थर भी भिजवाये, जिनकी चक्कियां अब तक काम दे रही है।


आपका स्वास्थ्य आयुर्वेद के मतानुसार-२

दिनचर्या के कुछ और महत्वपूर्ण उपक्रम

आयुर्वेद के स्वस्थ वृत्त प्रकरण में सर्वांगपूर्ण दृष्टि रखते हुए दैनंदिन जीवन के प्रत्येक पक्ष पर बड़ी विज्ञान-सम्मत विवेचना की गयी है। विगत अंक में इसकी भूमिका पर प्रकाश डालते हुए रोजमर्रा के जीवन की छोटी-छोटी की निरोग जीवन हेतु व्याख्या की गयी थी। इसमें प्रातः उठने से लेकर उषापान, दंतधावन, आत्मबोध की साधना जैसे पक्षों का विवरण था। इस अंक में इसी क्रम को आगे बढ़ाते है। इसमें अभ्यंग (तेल मालिश), क्षौरकर्म (दाढ़ी बनाना), व्यायाम, प्रातः भ्रमण एवं स्नान से लेकर वस्त्रधारण तक की चर्चा है। किसी को लग सकता है कि उनके पीछे क्या वैज्ञानिकता हो सकती है, पर जब आयुर्वेद के मर्मज्ञ ऋषिगणों का चिंतन आर्षवचनों के परिप्रेक्ष्य में पढ़ते है तो ज्ञात होता है कि कितनी दूरदर्शिता से दिव्यद्रष्टा होने के नाते वे यह सब डेलीरूटीन (दिनचर्या) को व्यवस्थित बनाने के लिए लिख गये है।

अभ्यंग-तेल मालिश

अथ जातान्न पानेच्छो मरुतध्नैः सुगन्धिभिः। यथर्तुसंर्स्पश सुखैस्तैलैरभ्यंग माचरेत।

अन्नपान कि इच्छा करने वाला पुरुष यदि यह चाहता है कि मन्दाग्नि और अजीर्ण न हो तो ऋतु के अनुसार सुख देने वाले शीतकाल में उष्ण तथा

उष्णकाल में शीत वायुनाशक सुगन्धित तेलों से शरीर कि मालिश करें।

अभ्यंगमाचरेंनित्यं स जराश्रमवाताहा। दृष्टिप्रसाद पुष्टयामु स्वप्न सुत्वक्चदाढ़र्य कृत। शिरः श्रवणपादेषु तं विशेषेण शिलयेत।

प्रतिदिन तेल मालिश करने से वायुविकार, बुढ़ापा, थकावट नहीं होती है। दृष्टि कि स्वच्छता, आयु कि वृद्धि, निद्रा, सुन्दर त्वचा और शरीर दृढ़ हो जाता है। सिर, कान तथा पैरों में विशेष मालिश करनी चाहिए। ऋषि आगे कहते है-

सार्षपं गन्धतैलं यत्तैलं पुष्पवासितं। अन्यद्रव्ययुतं तैलं न दुष्यति कदाचन॥

सरसों का तेल, सुगन्धित तेल, पुष्पवासित और अन्य द्रव्यों से युक्त तेल कभी वर्जित नहीं होता। तेलों में तिल का या सरसों का तेल मालिश करने के लिए अच्छा माना गया है।

स्नेहभ्यन्गा।था कुम्भ्श्चर्म स्नेह्विदर्मनात। भाव्त्युपाँगो दक्षश्च दृढः क्लेशसहो यथा॥

तथा शरीर मभ्यन्गादृढं सुत्वक प्रजायते। प्रशान्तमारुताबाधं क्लेशव्यायामसंग्रहम॥

र्स्पशने चाधिको वायुः र्स्पशनंच त्वमाश्र तिम। त्वच्यश्च परमोभ्यंगस्तस्मात्तं शिल्येन्नरः॥

न चाभिघाताभिहतं गात्रमाभ्यंगसेविनः। विकारं भजतेर्त्यथ बलकर्मणि व क्वचित॥

सुर्स्पशोपचितान्गाश्च बलवान प्रियदर्शनः। भवत्यभ्यंग नित्यत्वान्नरोल्पोजर एव च।

अर्थात् यह कि- जिस प्रकार स्नेह की मालिश से घड़ा, स्नेह की मालिश से

चमड़ा, स्नेह तिक्तियो से युक्त गाड़ी का पहिया मजबूत आपत्ति सहने वाला है, उसी प्रकार शरीर में तेल अभ्यंग करने से वह सुन्दर चमड़ी वाला और मजबूत बनता है, वायुविकार शाँत रहते है तथा श्रम और क्लेश को सहने की क्षमता बनी रहती है।

नित्य मालिश करने से मनुष्य कोमल स्पर्श, पुष्ट अंग वाला और बुढ़ापे में उसके लक्षणों की कमी होकर शरीर सुन्दर हो जाता है। तेल मालिश से आयु बढ़ती है तथा शरीर की काँति बढ़ती है। तेल का महत्व घृत से कम किसी भी स्थिति में नहीं है।

घृतादष्ट गुणं तैलं मर्दने न तुभक्षणे।

तेल में घृत से आठ गुणा शक्ति है, अंतर केवल इतना है कि घृत खाने पर गुणकारी है और तेल मालिश करने पर। मालिश करने कि विधि आयुर्वेद में इस प्रकार बताई गई है। सबसे पहले तेल नाभि में लगाना चाहिए। उसके बाद हाथों और पैरों के नाखूनों में। मालिश पैरों के तलवों की करने के बाद दोनों पैरों की पिंडलियों, जंघाओं, फिर दोनों भुजाओं, गर्दन, पीठ, पेट और बाद में सीने कि मालिश करनी चाहिए। पैरों, भुजाओं और पीठ की मालिश नीचे से ऊपर की ओर और पेट तथा छाती की मालिश हृदय से ऊपर की ओर करनी चाहिए। गर्दन की मालिश ऊपर से नीचे की ओर करने से लाभ होता है। ग्रीष्मकाल में शीतल छाया में तथा शीतकाल में धूप उपलब्ध हो सके, तो धूप में ही करनी चाहिए। शीतकाल में मालिश करते समय तेज शीतल वायु का ध्यान रखकर उक्त स्थिति में कमरे के अंदर मालिश करनी चाहिए। कानों में तेल डालने से वायु के रोग नहीं होते। पैर के तलुओं की मालिश करने से नेत्र-ज्योति बढ़ती है। प्रतिदिन न हो सके, तो अवकाश के दिन अवश्य ही मालिश करनी चाहिए। वैसे मालिश करने में अधिक समय नहीं लगता। नहाने से कुछ समय पहले करके फिर और क्षौरकर्म के पश्चात स्नान किया जा सकता है। ज्वर-कास आदि रुग्णावस्था में मालिश नहीं करनी चाहिए तथा भोजन के बाद कम-से-कम तीन घंटे पूरे होने तक मालिश नहीं करनी चाहिए।

क्षौरकर्म-शेविंग

व्यायाम के समान ही नियमित रूप से क्षौरकर्म समग्र शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण एवं दिनचर्या का एक प्रमुख अंग बन गया है।

पौष्टिकं वृष्यमायुष्यं शुचि रुपविराजनम। केशश्मश्रूनखादीनाँ कल्पनं संप्रसाधनं॥

पापोपशमनं केशनखरोमापमार्जनम। हर्षलाघवसौभाग्यकरमुत्साहवर्धनम॥

चरक ने इसे पुष्टिकर, वृष्य, आयुष्य, शुचिकर तथा सौंदर्यवर्धक कर्म कहा है। इसी प्रकार सुश्रुत संहिता में भी उदाहरण आता है कि पापों को शमन करने वाला, हर्षोत्पादक, सौभाग्यकर, हल्कापन लाने वाला एवं उत्साहवर्धक यह कर्म है। अतः नियमित रूप से क्षौरकर्म करना चाहिए। प्रतिदिन दाढ़ी बनाने से शरीर में स्फूर्ति आती है। जो लोग दाढ़ी रखते है, उन्हें नियमित सफाई पर ध्यान रखना चाहिए। महीने में एक बार बाल कटाने चाहिए। संभव हो सके, तो तीन सप्ताह में ही कटावे। सप्ताह में एक बार नाखून काटना आवश्यक है। दाढ़ी बनाने एवं नाखून काटने का स्वयं अभ्यास करना चाहिए। नाई से केवल केश कटाने चाहिए। उसके उस्तरे, ब्रश आदि से संक्रामक रोगों की संभावना बनी रहती है। क्षौरकर्म के पश्चात स्नान करना ऋषिगणों ने एक अनिवार्य कर्म बताया है।

व्यायाम

नियमित व्यायाम आयुर्वेद की दृष्टि से सबके लिए अनिवार्य है।

शरीर चेष्टा या चेष्टा स्थैर्यार्था बलवर्धिनी। देह व्यायाम संख्याता मात्रया ताँ समाचरेत॥

शरीर की चेष्टा, देह को स्थिर करने एवं उनका बल बढ़ाने वाली प्रक्रिया को व्यायाम कहते है।

जीवन रक्षा के लिए जिस प्रकार भोजन आवश्यक है, उसी प्रकार व्यायाम को हम स्वास्थ्य-संजीवनी कह सकते है। चाभी के बिना घड़ी नहीं चलती, इसी प्रकार व्यायाम के बिना शरीर भी नहीं चलता। व्यायाम कामधेनु तथा कल्पवृक्ष के समान है। महर्षि चरक के अनुसार-

लाघवं कर्मसाम थ्यं स्थैर्य दुःख सहिष्णुता। दोष क्षयोग्निवृधिश्च व्ययामादुपजापते॥

व्यायाम से शरीर में हल्कापन, कार्य करने की शक्ति, स्थिरता तथा कष्ट सहने की शक्ति बढ़ती है। शरीर के विकारों का नाश होता है एवं जठराग्नि प्रदीप्त होती है। भावप्रकाश के अनुसार-

व्यायामदृढगात्रस्य व्याधिर्नास्ति कदाचन। विरुद्धं व विदग्धं व भुक्तं शीघ्रं विपच्यते॥

अर्थात् व्यायाम के द्वारा शरीर सुदृढ़ होकर कोई रोग उत्पन्न नहीं होने देता। शरीर में रोगों से लड़ने की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ जाती है। आहार में लिया गया विरुद्ध अन्न ( अच्छी प्रकार न पचने वाला ) भी शीघ्र पच जाता है मोटापा दूर करने के लिए व्यायाम के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है। व्यायाम करने वाले को बुढ़ापा नहीं सताता। शरीर की माँस-पेशियाँ दृढ़ एवं सुडौल हो जाती है। नाड़ियों को नवजीवन प्राप्त होता है। फेफड़े दृढ़ होते है, रक्त की शुद्धि होती है तथा मनुष्य दीर्घायु को प्राप्त करता है। व्यायाम सदैव खुली हवा में करना चाहिए। विद्यार्थियों के लिए प्रातः दौड़ना और प्रज्ञायोग के व्यायाम अधिक लाभकारी बताये गये है। प्रत्येक ऋतु में अपने बल की आधी शक्ति से व्यायाम करना चाहिए। इसके विपरीत अधिक व्यायाम करना हानिकारक है। विशेषकर आज के युग में जबकि एरोबिक व्यायाम के नाम पर हेल्थक्लबों में शारीरिक फिटनेस का बुखार सब पर चढ़ा हुआ है। आयुर्वेद के अति व्यायाम को बलार्द्ध की उत्पत्ति की बात कहता है।

हृदिस्थाने स्थितो वयुर्यदा वक्रं प्रप।ते। व्यायामं कुर्वंतो जन्तोः स्ताद्वलार्द्धस्य लक्षणं॥

कक्षा ललाट नामासु हस्त्पादा दिसन्धिपू। प्रस्वेदानमुख शोषाच्च बलार्धताद्धि निर्दिशेत॥

अर्थात्-व्यायाम करते हुए हृदय की वायु जब मुख में प्राप्त होने लगे (हाँफने लगे) तो अर्धबल का लक्षण है। काँख, ललाट, हाथ, नाक, पैर आदि की संधियों में पसीना आने लगे, मुँह सूखने लगे तो बलार्द्ध कहना चाहिए। ऋषि कहते हैं-

श् स्त्रीणारुचिच्छर्दिरक्तपित्तभ्रमक्लमः। कासशोषज्वरश्वसा अतिव्यायाम संभवः॥

अर्थात् अधिक व्यायाम से क्षय, प्यास, अरुचि, वमन, रक्त, पित्त, चक्कर, सुस्ती, खाँसी, रोग ज्वर और श्वास रोग हो जाते हैं।

व्यायाम क्या सभी को करना चाहिए? किसे नहीं करना चाहिए इस सम्बन्ध में आयुर्वेद कहता है-

रक्तपित्ती कृशः शोषी श्वासकासक्षतातुरः। भुक्तवनस्त्रीषु च क्षीणों भ्रमार्तश्च विवर्जयेत॥

रक्त-पित्त का रोगी, कृश, शोष श्वास-कृच्छ खाँसी और उरः क्षत से पीड़ित, तुरंत भोजन किया हुआ, भोगी तथा चक्कर से पीड़ित मनुष्य को व्यायाम नहीं करना चाहिए।

योगाभ्यास शब्द को एकयुग्म की तरह से आयुर्वेद प्रयुक्त करता है। इसका अर्थ- आध्यात्मिक उन्नति का पथ-प्रशस्त करने वाली प्रक्रिया। युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव द्वारा निर्देशित प्रज्ञायोग में यौगिक व्यायाम का दोहरा लाभ है। एक ओर आसनों से शरीर बलिष्ठ और रोगरहित होता है तथा दूसरी ओर आत्मिक उन्नति भी होती है। प्रज्ञा का जागरण होता है। कुछ समय तक नियमित यौगिक व्यायाम का अभ्यास करने से मस्तिष्क की धारणशक्ति बढ़ जाती है। स्नायु तथा माँसपेशियों में बल आ जाता है। कब्ज, बहुमूत्र रोग आदि दूर होते है शरीर रोगमुक्त होकर यौवन काँति, ओज की वृद्धि और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।

प्रातः भ्रमण

दिनचर्या के क्रम में प्रातः भ्रमण को बड़ा महत्व दिया गया है। प्रातः काल का समय शारीरिक स्वास्थ्य तथा मानसिक एवं बौद्धिक शक्तियों के संवर्धन के लिए अत्यधिक उपयोगी है। प्रातःकालीन वातावरण उल्लास से भरा होता है। इसी समय पृथ्वी से मंद-मंद गंध, जो कि स्वास्थ्यवर्धक भी है, निकलती है। शीतल समीर शरीर को स्फूर्ति प्रदान करता है। इस अमृतमय शीतल-सुगंध समीर के स्पर्श से शरीर में बल, तेज़ व स्फूर्ति का संचार होता है, जो दिनभर ऊर्जा प्रदान करता है।

प्रातःभ्रमण करते समय गर्दन सीधी, रीढ़ की हड्डी सीधी, सीना तना हुआ, दोनों हाथ पूरी तरह हिलते रहना चाहिए। ग्रीष्म और वर्षाऋतु में शरीर पर कम-से-कम वस्त्र होने चाहिए। मुँह बंद, नाक ही से श्वास लेनी चाहिए। टहलते समय, सदैव गहरी-गहरी श्वास लेते रहना चाहिए। संभव हो तो तेज गति से दौड़ना चाहिए, इससे गहरी श्वास स्वतः चलने लगती है। टहलते समय भावना यह होनी चाहिए कि मेरे अंदर ओज, तेज़ और शक्ति का संचार हो रहा है, शरीर में संचित विकार निकल रहे है। युवाओं को दौड़ने का,वृद्ध को टहलने का क्रम अपनाना चाहिए। महात्मा गाँधी प्रतिदिन प्रार्थना के बाद टहलते थे जो कि नियमित क्रम था। महर्षि दयानंद प्रतिदिन दौड़ लगाया करते थे। प्रतिदिन भ्रमण करने वालों को कब्ज नहीं रहता तथा खुलकर भूख लगती है। जिन्हें वासनात्मक विकार अधिक आते है, उन्हें दौड़ने का नियमित क्रम अपना लेने से ऐसे विकारों का शमन होता है। टहलने का स्थान पवित्र हो तथा शुद्ध वायु हो। बाग बगीचे व पार्क को चुना जा सकता है।

जिन्हें दौड़ने का स्थान न मिले उन्हें खुला द्वार रखकर कमरे में ही अपनी जगह पर दौड़ने का कदम ताल की तरह अभ्यास करना चाहिए। यह क्रम पन्द्रह मिनट से आधे घंटे चलाया जा सकता है।

स्नान

प्रतिदिन स्नान वैदिक दिनचर्या का एक अंग माना है। स्नान करने से शरीर शुद्ध हो जाता है रोम, कूप खुल जाते है, शरीर का आलस्य तथा निद्रा दूर होकर चित्त शाँत होता है, मन में प्रसन्नता होने से उपासना, ध्यान, पढ़ाई आदि में मन लगता है। स्वाध्याय की प्रति रुचि जगती है। पाचक अग्नि तीव्र होकर क्षुधा को बढ़ाती है। वेद में जल को अमृत और जीवन का नाम दिया है।

आप इद वा उ भेषजिरापो अमिव्चातनिः। आपो विश्वस्य भेषजीस्तासत्वा मुन्चंतु क्षेत्रियात।

जल ही औषधि है, जल ही रोगों का शत्रु है।अतः सभी रोगों का नाश करता है। जल में आरोग्यता प्रदान करने की शक्ति है, जल कल्याण करने वाले है। वेदों में एक स्थान पर यहाँ तक कहा है - ष्भिशग्यो भिशक्त्रा आपः

जल औषधियों में भी परम औषधि है। जल के इस महत्त्व को समझकर जल चिकित्सा द्वारा रोगों की चिकित्सा की जाने लगी है। पाश्चात्य विद्वान भी जल के महत्त्व को अनुभव करने लगे है। जर्मनी के प्रसिद्ध डॉक्टर लुई कूवे तो केवल स्नानक्रिया से ही मनुष्य के सभी रोगों को दूर किया करते थे।

प्रतिदिन स्नान करने से बल, पुष्टि तथा स्वास्थ्य का स्वन्वार्द्धन होता है। शरीर में स्वच्छता और स्फूर्ति बनी रहती है। महर्षि चरक ने स्नान के निम्न लाभ बताये है।

पवित्रं व्रश्य्मयुश्यम श्रम स्वदेमलापहम। शरिर्बल्संधानाम स्नान्मोज्स्क्रमपरम।

स्नान करने से शरीर पवित्र होता है। यह आयुवर्द्धक है, थकावट,पसीना और मैल को दूर करता है, शारीरिक बल बढ़ाकर ओज उत्पन्न करता है। सुश्रुत के अनुसार -

स्नानामदाहश्रम्हरम स्वेद कंदुत्र्शापहम। हद्दम मल्हरम श्रेष्ठं सर्वेन्द्रियविशोधानेम॥

तन्द्रपपोप्शाम्नाम तुष्टिदम पुँसत्व वर्धनम। रक्त्प्रसदंम चापि स्नान्म्ग्नेश्च दीपनम॥

स्नान दाह, थकावट, पसीना, खुजली और प्यास को नाश करने वाला, हृदय को प्रसन्न करने वाला, मैलनाशक तथा श्रेष्ठ इन्द्री शोधक है।

तन्द्रा पाप को नष्ट करने वाला है। पौरुषवर्धक, रक्त को साफ करने वाला एवं अग्नि को प्रदीप्त करने वाला है। अधिक गरम पानी से स्नान नहीं करना चाहिए। गरमजल से नेत्रों की जोती क्षीण होती है। ठंडे जल से स्नान करने से रक्त पित्त रोग शाँत पड़ता है तथा आरोग्यता एवं बल की प्राप्त होती है। सर्वप्रथम जल सिर पर डालना चाहिए। सिर नीचा करके दो -तीन लोटे जल डालना चाहिए। ऐसा करने से मस्तिष्क की गर्मी पैरों से निकल जाती है, सिर को भिगोकर अन्य अंगों को भिगोना चाहिए। गीले खद्दर आदि वस्त्र की सहायता से शरीर को खूब रगड़ना चाहिए, इससे रोमकूप खुल जाते हैं, साबुन की स्थान पर बेसन हल्दी, सरसों के तेल का उबटन आदि सप्ताह में एक या दो बार लगाया जाये तो शरीर की अच्छी सफाई हो जाती है। स्नान के बाद शरीर को अच्छी तरह सुखा लेना चाहिए।

ज्वर-अतिसार कान के रोग, नेत्ररोग, जुकाम, अजीर्ण की स्थिति में तथा भोजन के बाद स्नान नहीं करना चाहिए। यह प्रतिबन्ध सामान्य स्थिति आने पर शरीर की मालिश एवं गीले तौलिये से पोंछने तक सीमित रखा जा सकता है। लक्षण ठीक होने लगे तो स्नान औषधि की तरह उपयोगी होता है।

वस्त्रधारण

काम्ययशस्य्मयुश्य्लाक्ष्मिनाम प्रहर्षणं। श्रीमात्परिशाद्म शस्तं निम्लार्म्बधरानाम॥

अर्थात् निर्मल वस्त्र आयु को बढ़ाने वाला दरिद्रतानाशक, प्रसन्न करने वाला और श्रेष्ठ लोगों के मध्य बैठने योग्य बनाता है। सोने, बाहर निकलने तथा देवपूजन के लिए वस्त्र अलग अलग होने चाहिए। इसी प्रकार ऋतुओं की अनुसार भी वस्त्र धारण कर सके, तो स्वास्थ्य की लिए सर्वोत्तम है। ग्रीष्म काल में सूती तथा वर्षा ऋतु में स्वेतवस्त्र धारण करना उपयुक्त है। शीतकाल में मनुष्यों को रेशमी, ऊनी, लाल तथा कई रंगों वाला कपड़ा पहनना चाहिए। कषाय वस्त्र मेधा के लिए हितकारी, शीतल, पित्तनाशक होता है, अतः यह ग्रीष्मकाल में पहनना चाहिए। सफेद वस्त्र सुखदाई, शीत और धूप को रोकने वाला और न अधिक उष्ण न अधिक शीतल होता है इसे वर्षा ऋतु में धारण करना चाहिए। किसी दूसरे का धारण किया हुआ, पुराना मैला, व अत्यंत गहरे चटकीले रंगों वाला कपड़ा नहीं पहनना चाहिए।

सफेद वस्त्र पहनने से व्यक्तित्व वजनदार बनता है। भड़कीले चटक भटक वाले वस्त्रों को पहनने से व्यक्तित्व में हल्कापन आता है। कपड़े, स्वयं ही धोने का अभ्यास करना चाहिए। इससे शरीर का व्यायाम होता है, साथ ही शुद्धता की दृष्टि से भी सही है।


एक और पन्नाधाय

उन दिनों जूनागढ़ के राजा राव महिपाल सिंह थे। वे जितने साहसी थे उतने ही प्रजावत्सल। उनकी न्यायप्रियता एवं कुशल प्रशासन की ख्याति अन्य राज्यों में भी फैल चुकी थी। परन्तु समय परिवर्तनशील है। समय की यह परिवर्तनशीलता जूनागढ़ राज्य पर भी आ पहुँची और पाटन के राजा ने वहाँ आक्रमण कर किया। राव महिपाल सिंह अपने सैनिकों के साथ शत्रुसेना का सामना करने की लिए युद्ध भूमि में पहुँचे। शत्रुसेना संख्या में अधिक थी। वीरता का परिचय दिया, पर शत्रुसेना पर विजय न प्राप्त कर सके।

राजा महिपाल सिंह ही अपनी सेना के प्रधान नायक थे। उनके मरते ही सैनिकों का जोश समाप्त हो गया। बिना राजा के सेना लड़ती भी कैसे! उनका मनोबल कौन बढ़ाता? बिना नायक के वे टिक नहीं सके और भाग खड़े हुए।

शत्रुसेना विजय की पताका फहराती राव के राजमहल में गयी, वहाँ अल्पवयस्क राजकुमार नौघण और महारानी महामाया चिंतातुर बैठे थे। अकस्मात् मंत्री धर्मदेव को अपने कर्तव्य की पुकार सुनाई दी। उसने अपने प्राणों की बाजी लगाकर राजकुमार और महारानी को गुप्तमार्ग द्वारा महल से बाहर निकला और अपने साथ वह उन्हें लेकर गिरनार के जंगल में पहुँच गया। गिरनार के जंगलों में बसे एक छोटे से गाँव विजयपुर में उसने दोनों को एक अहीर के मकान में छिपा दिया।

अहीर का नाम रामनाथ था। वह गायो का दूध बेचकर गुजारा करता था। उसने मंत्री की चिंता दूर करते हुए प्राणपण से राजकुमार नौघण और महारानी की रक्षा करने का वचन दिया। महामंत्री निश्चिन्त होकर वहाँ से चले गए। लेकिन दुर्योग से बीच में ही वह शत्रुसेना के हाथों में फस गए। सैनिक उन्हें अपने सेनापति के पास ले गए। सेनापति ने उनसे पूछा -बताओ राजकुमार नौघण और महारानी कहाँ पर है?

महामंत्री ने बताने से इंकार कर दिया। शत्रुसेना के सेनापति ने उन्हें प्रलोभन दिए और न बताने पर मार डालने की धमकी दी, परन्तु महामंत्री अपने कर्तव्य से तनिक भी विचलित नहीं हुए। अंत में सेनापति ने उन्हें तलवार से मौत के घाट उतार दिया। महामंत्री ने हँसते हँसते मौत का आलिंगन किया, पर अपने कर्तव्य पथ से नहीं हटे।

अब जूनागढ़ पर शत्रुसेना का अधिकार हो गया था। एक दिन जूनागढ़ के सेनापति को ज्ञात हुआ कि राजकुमार नौघण और महारानी महामाया गिरनार के जंगलों में स्थित एक गाँव में किसी अहीर के यहाँ छिपे है। वह तुरंत अपने सैनिकों के साथ वहाँ गया और गाँव को घेर लिया। सेनापति ने अहीर रामनाथ को राजकुमार और महारानी को अपने सुपुर्द करने को कहा।

अहीर रामनाथ ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। सेनापति ने आदेश दिया कि अहीर को पकड़कर खम्भे से बाँध दो और उनके घर के कोने कोने को छानकर राजकुमार का पता लगाओ। रामनाथ को तुरंत अपने धर्म और वचन का स्मरण हो आया। उसके दिमाग में एक बात कंध गयी। उसने अपनी पत्नी को बुलाया और नेत्रों की भाषा में उससे कुछ कहा। जब उसे विश्वास को गया की पत्नी सब कुछ समझ गयी है और उनके मन में अपने धर्म के पति गहरे भाव है, तो उसने दहाड़ते हुए स्पष्ट शब्दों में पत्नी को आदेश दिया कि - जा देख क्या रही है राजकुमार नौघण को शीघ्र यहाँ ले आओ। चतुर अहीर की पत्नी ने न केवल पति का वास्तविक संकेत समझ लिया था अपितु, भीतर राजभक्ति की लहरे भी हिलोरे लेने लगी थी। उसने अपने इकलौते पुत्र को राजकुमार के वस्त्र पहनाकर सेनापति के समक्ष उपस्थित किया।

बलिदानी माता- पिता का बेटा भी बलिदान की भावना से ओत−प्रोत था। सेनापति के पूछने पर दस वर्षीय अहीर पुत्र ने अपना परिचय राजकुमार नौघण के रूप में दिया। निर्दयी सेनापति ने उसी क्षण माता-पिता के सामने उस वीर बालक का वध कर डाला, खून का घुट पीकर भी माता -पिता शाँत बने रहे।

किसी के नेत्रों से एक भी आँसू नहीं गिरा। ऐसा हो जाने पर सेनापति को उन पर संदेह हो सकता था।

सेनापति व उसके सैनिक अपना दुष्कर्म पूराकर चले गए, तो अहीर व उसकी पत्नी के धैर्य का बाँध टूट गया। वे दहाड़े मारकर रोने लगे। छाती से चिपटाया पुत्र का शव वे किसी भी रूप में दूर नहीं कर पा रहे थे, परन्तु वे उस बात से गर्वित थे कि उन्होंने अपने देश के राजकुमार की सत्यधर्म से रक्षा की। अहीर की पत्नी ने पन्नाधाय का उदाहरण दुहरा दिया।


नियम की अवहेलना (Kahani)

(कथावाचक गरीब ब्राह्मण कथाएँ बाँटकर ही अपना निर्वाह करते थे। इस प्रकार जीविकोपार्जन के साथ साथ सद्ज्ञान प्रचार का पुण्य प्रयोजन भी पूरा हो रहा था। धर्मग्रंथ का अध्ययन करते हुए उन्होंने एक स्थान पर पढ़ा -ज्ञानदान का प्रतिफल धन के रूप में ग्रहण नहीं करना चाहिए।

उन्हें बड़ा दुःख हुआ कि अब तक वे इस नियम की अवहेलना ही करते थे। धर्मप्रचार की लिए जब वे कथाएँ किया करते तो लोग जो दक्षिणा देते उसी से अपना गुजारा चलाते थे। अब तक जो भूल हो गयी अब न होने दूँगा। इस संकल्प के साथ उन्होंने जंगल में लकड़ी काटकर अपना गुजारा चलाना आरम्भ कर दिया। दान दक्षिणा से लोग पैसा तो चढ़ाते थे, उस धन का उपयोग वे गुरुकुल, पुस्तकालय तथा अन्य जनोपयोगी कार्यों में करने लगे।)


कैंसर जैसी महाव्याधि का उपचार भी उपवास

उपवास अत्यंत लाभकारी एवं महत्वपूर्ण प्रयोग है। इसके माध्यम से शारीरिक स्वास्थ्य में प्रगति, मानसिक विकास में वृद्धि एवं आत्मविस्तार में उन्नति की जा सकती है। उपवास का वैज्ञानिक महत्त्व भी है स्वास्थ्य -रक्षा एवं स्वास्थ्य- सुधार के प्रति उपवास का इतिहास बहुत प्राचीन है रोगों के उपचार हेतु उपवास का विवरण भारत, यूनान तथा अन्य देशों में पुराणी सभ्यता में मिलता है। आयुर्वेद ने तो रोगों की रोकथाम तथा स्वास्थ्य की प्राप्ति की एक मुख्य और प्रमाणिक विधि के रूप में उपवास का वर्णन किया है। अब तो आधुनिक चिकित्सा वैज्ञानिकों ने भी यह कहना प्रारम्भ कर दिया है कि उपवास का एक निश्चित वैज्ञानिक आधार है।

अधिक भोजन से अवशिष्ट पदार्थ हमारे शरीर के वसाकोशों में जमा हो जाते हैं। उनको निकालकर और शरीर को मलरहित कर रोगों की सम्भावना समाप्त करने के उद्देश्य से निश्चित समय के लिए भोजन के पूर्ण अथवा आँशिक परित्याग का नाम उपवास है। पुराणी चिकित्सक विधियों जैसे चीनी एवं यूनानी में भी उपवास को कई रोगों में स्वास्थ्य देना वाला बताया गया है। उपवास की इन्हीं विशेषताओं एवं महत्ता के कारण सारे संसार के विद्वानों ने अपने -अपने मत प्रकट किये है। आचार्य चरक के अनुसार, उपवास मियादी बुखार, आमाशय का घाव तथा अन्य अनेक पेट के रोगों के उपचार के लिए आवश्यक है। प्लेटो तथा सुकरात जैसे दार्शनिक ने भी उपवास की महत्ता को स्वीकारते हुए कहा है, शारीरिक व मानसिक शक्ति को बढ़ाने के लिए दस दिन का उपवास करना चाहिए। औषधि विज्ञान के जन्मदाता हिप्पोक्रेट्स ने उपवास को अनेक असाध्य रोगों को दूर करने वाला बतलाया है।

इसी क्रम में प्रसिद्ध अरबी चिकित्सक अबी सेन्ना ने अखंड स्वास्थ्य के लिए उपवास का उपदेश दिया है चीनी चिकित्सा शास्त्री यूशुन की मान्यता है कि उपवास संक्रामक रोगों को ठीक करता है। पेरासल्सस का दावा है कि उपवास सबसे अच्छी उपचार विधि है। हफ्मेन के एक ग्रन्थ में सभी रोगों में उपवास से मिले महान परिणामों का विस्तृत विवरण मिलता है। उपवास की महनीय महत्ता को प्रतिपादित करते हुए डॉ. एडाल्फ मेयर ने इसे सभी रोगों में सुधार की सबसे अधिक प्रभावशाली विधि माना है। डॉ. ओ. एच .एफ . वुशिन्जर के अनुसार उपवास उपचार का सर्वाधिक सुगम एवं सरल रास्ता है।

उपवास की इन्हीं विशेषताओं के आधार पर कई डॉक्टरों एवं शोध अन्वेषकों ने कई प्रकार के प्रयोग भी किये है। डॉ. जेम्स मैकेचन ने १९२५ से ५६ तक उपवास द्वारा ७१५ रोगियों का उपचार किया। डॉ. विलियम एसें ने १९६८ से ७० तक १५६ रोगियों का सफल उपचार किया।

डॉ. ग्लोरियो ने हृदय रोगों पर उपवास के लाभों का प्रयोग प्रदर्शित किया है। इसके अतिरिक्त कम परिणाम में ही सही आधुनिक चिकित्सा पद्धति में भी उपवास पर प्रयोग कर उसका बहुत अच्छा परिणाम पाया है।

इसके अलावा विश्व के हर धर्म ने शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास हेतु उपवास की संस्तुति की है। हिन्दू धर्म में तो उपवास को पूजा और सेवा का सहायक माना गया है। इसका ताप,सेवा -सुमिरन के रूप में उल्लेख मिलता है। इस्लाम में रोज़ा - नमाज तथा ईसाई धर्म में फास्टिंग चेरिटी- प्रेयर को धर्म माना गया है।

श्रीरामचरितमानस में मनु- सतरूपा तथा पार्वती के प्रसंगों में महान कवि, दार्शनिक एवं युगपुरुष संत तुलसीदास ने सुखप्राप्ति एवं अच्छे स्वास्थ्य के लिए उपवास की महत्वपूर्ण भूमिका का वर्णन किया है।

इस प्राचीन महत्त्व के अलावा इसका वैज्ञानिक आधार भी है। वसाकोशों के माध्यम से इसकी भूमिका अधिक अच्छी तरह स्पष्ट की जा सकती है क्योंकि इस दौरान वसाकोशों का विशेष महत्व रहता है। प्राचीन समय में लोग अन्न का भंडार भरकर नहीं रखते थे। वे भोजन की तलाश में घूमा करते थे और कई सप्ताह तक बिना भोजन के भी रहते थे। इस समय शरीर में जमा वसा से उनको ऊर्जा मिलती थी। इस तरह वे सदा स्वस्थ, तंदुरुस्त रहते। शरीर में संचित वसा का पूर्णतः प्रयोग हो जाता था। परन्तु आजकल तो दिन की शुरुआत ही बैड टी एवं नाश्ते से करने की आधुनिक प्रथा चल पड़ी है। इससे शरीर में वसा की मात्रा उपवास के माध्यम से इन वसाओं का प्रयोग कर लिया जाता है।

जिगर और आँतों को भोजन पचाने के अलावा और भी आवश्यक कार्यों में भागीदारी निभानी पड़ती है। यदि आमाशय में भोजन प्रति ४-६ घंटे पर डाला जाएगा, तो यकृत तथा लिम्फोसाइट्स भी भोज पचाने में ही लगे रहेंगे। इस प्रकार इन अंगों को दूसरे बहुत जरूरी कार्यों के लिए समय ही नहीं मिलेगा। जब व्यक्ति बहुत दिन उपवास करता है, तब उसको संचित वसा से ऊर्जा मिलती है तथा पाचनक्रिया से मुक्ति रहने के कारण यकृत एवं आँतों को अन्य आवश्यक कार्यों का समय मिल जाता है। इससे वे रोगों से लड़ने का कार्य, रक्तनलिकाओं की सफाई आदि सुचारु रूप से कर लेते है। उपवास ठीक वैसे ही है जैसे किसी फैक्टरी की मरम्मत के लिए उसका प्रबंधक ( मस्तिष्क ) कुछ समय के लिए काम रोक दे।

एक सर्वेक्षण से स्पष्ट हुआ है कि अधिकतर लोगों ने क्रानिक ब्राँकाइटिस, दमा, गठिया, मधुमेह, आँतों के उत्तेजनापूर्ण लक्षणों आदि रोगों से मुक्ति के लिए उपवास का सहारा लिया है, अब बिना किसी औषधि के उनका स्वास्थ्य अच्छा हो रहा है। एक अन्य महत्वपूर्ण प्रयोग में उपवास के प्रभाव का विशेषकर शारीरिक एवं जैव रासायनिक परीक्षण किया गया। यह परीक्षण 75 उपवासकर्ताओं पर हुआ जो उपवासकाल में केवल सादा जल ही लेते रहे। इसमें 20 से 85 वर्ष तक कि आयु के स्त्री-पुरुष सम्मिलित थे। उपवास के उपरांत समान आयु व लिंग के जनसामान्य के 200 अन्य व्यक्तियों से उनकी तुलना की गई। इस क्रम में उनकी आगरा जाँच भी की गई- होमोग्राम सीरम शर्करा, सीरम यूरिया, सीरम पित्त रक्तवर्णक, लिपिड प्रोफाइल, प्रतिरक्षी ग्लोबुलिन्स, सीरम वित घटक, इलेक्ट्रो-कार्डियोग्राफी।

इन परीक्षणों से पता चला कि उपवास रखने वालों के वजन में 2.5 किग्रा. की कमी हुई लेकिन शारीरिक शक्ति के सभी सूचकों में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। उपवासकाल में समस्त रक्त-प्रवाह सामान्य रहा। इस दौरान नींद पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। अधिकाँश के मूत्र में किटोंन पाए गये हालाँकि आश्चर्य की बात यह थी कि असिडोसिस के लक्षण किसी में भी नहीं थे। सामान्य धारणा के विपरीत प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक व मानसिक क्रियाशीलता में वृद्धि हुई, हिमोग्राम प्रायः औसत स्थिति में था उपवास से शर्करा घटती है, इस धारणा के विपरीत सीरम शर्करा पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा और वह सामान्य रही उपवास के दौरान रक्त यूरिया पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा और गुर्दे का कार्य सुचारु रूप से चलता रहा। सीरम एलेक्ट्रोलाइट भी सामान्य रहे, जो जल व एलेक्ट्रोलाइटस के संतुलन के सूचक है

उपवास के प्रारंभ तथा बाद में सीरम बिलिरुविन का प्रदर्शन भी आशानुरूप रहा। हेमोलिसिस में वृद्धि नहीं हुई तथा यकृत अपना कार्य सफलतापूर्वक सम्पादित करता रहा। इस अवधि में कोलेस्ट्रॉल एल. डी. एल. में उल्लेखनीय कमी पाई गयी एच. डी. एल. में वृद्धि हुई। ये परिवर्तन शरीर के अनुकूल है। नियमित उपवासकर्ताओं में प्रतिरोधी तथा विषाक्त रोगों को रोकने की क्षमता की वृद्धि के लक्षण उनमें विशेष पाए गये। यही कारण है कि इन लोगों को संक्रमण के प्रभाव से बचाने के लिए एंटीबायोटिक्स की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

इस तरह देखा जाये, तो उपवास से लाभ होना एक निश्चित वैज्ञानिक सत्य है इसके और भी अनेक लाभ दिखाई देते है। उपवास आर्थ्राइट्स, मधुमेह आदि रोगों में लाभदायक है। अधिक आयु वाले के शरीर का वजन यदि कम रहे, तो मधुमेह, हाइपरटेंशन तथा चोट लगने पर घाव नहीं भरता है। उपवास कीटोएसिडोसिस से जमा एथेरोमेट्स ( थक्को ) को निकालने में सहायता करता है प्रतिरोधी का बढ़ना संक्रमण नियंत्रण में सहायक होता है। इससे एलर्जी तथा गठिया द्वारा शरीर के जोड़ो में दर्द होना, श्वास नलिकाओं का दमा, चर्मरोग, एक्जिमा आदि कि संभावना घटती है। लिम्फोसाइट्स की संख्या तथा प्रतिरोधक क्षमता का बढ़ना एड्स की संभावना को कम करता है।

उपवासकाल की सबसे आश्चर्यजनक उपलब्धियों में से एक है कि इस दौरान कैंसर कि कोशिकाएँ भूखे मरने लगती है। शरीर के अन्य कोशों को जमा हुई वसा से ऊर्जा प्राप्त होती है इस प्रकार कैंसर कोष कई गुना बढ़ने के पहले ही कम या नष्ट होने लगते है। प्रतिरोधकता के बढ़ने से इन दूषित कोशों पर बेहतर चौकसी संभव हो पाती है, जिससे उनकी वृद्धि से शरीर मुक्त होता है। इस तरह विषाणुजन्य रोगों की रोकथाम होती है। निश्चित रूप से उपवास एक सरल-सहज एवं सुगम उपचार विधि है यह शरीर को स्वस्थ एवं निरोग रखता है उपवास की इन्हीं विशेषताओं के कारण इसका प्रचालन वर्तमान युग में बढ़ने लगा है। प्राचीनकाल के वैदिक ऋषियों ने भी निश्चित ही इन्हीं विशेषताओं को परखा एवं पहचाना होगा। संभव हो तो सप्ताह में एक दिन का उपवास निश्चिततौर पर करना चाहिए। अध्यात्मिक दृष्टि से देखा जायेगा, तो रविवार का व्रत मन व विचार को परिष्कृत करता है, तथा गुरुवार का उपवास भावना को पवित्र एवं पावन बनाये रखने में सहयोग करता है अतः मनोनुकूल दिन का चयन करके सप्ताह में एक दिन उपवास के लाभों को आत्मगत किया जाना चाहिए।


कर्तव्यपालन (Kahani)

सम्राट पुष्यमित्र के एक सेनापति पर महाभियोग लगा। आचार्य मार्तंड न्यायाधीश बनाये गये। अगले दिन दरबार होना था। सेनापति स्वयं भारी धनराशि लेकर आचार्य मार्तंड के पास उपस्थित हुआ और बोला- महाशय आप चाहे तो अशर्फियों की यह थैलियाँ लेकर अपना दारिद्र्य दूर कर सकते है। इन्हें रखिये और न्याय हमारे पक्ष में कीजिये, विश्वास रखे यह बात हम दोनों के अतिरिक्त और कोई नहीं जानने पाये।

आचार्य ने एक उपेक्षित दृष्टि थैलियों पर डाली और हंसकर बोले- महापुरुष! धरती, आकाश, मेरी आत्मा, आपकी आत्मा और परमात्मा की जानकारी में जो बात आ गयी, वह छुपी कहाँ रही। इन्हें ले जाइये कर्तव्य और उत्तरदायित्व को प्रलोभन के बदले झुठलाना मेरे लिए संभव नहीं।


महाविनाश समीप लाती है महामारी

आज उपभोक्तावाद की भरमार है। उपभोक्तावाद की इस दौड़ में लाभ कमाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। लाभ कमाने की इस होड़ ने लोभवृत्ति को जन्म दिया है। लोभ एवं लालच स्वस्थ समाज के निर्माण में हमेशा से ही एक बड़ी बाधा रहे है। लालच उत्पादन और इसके अनुपात में आय को नहीं देखता, बल्कि अधिक-से-अधिक मुनाफ़ा करना चाहता है। वह ओर अधिक पा लेने की कोशिश एवं प्रयास में जुट जाता है। अधिक मुनाफे का निर्धारण अधिकतम होने तक भी नहीं हो पाता। यही वह निश्चित वजह है, जिसके कारण खाद्य–पदार्थों में अपमिश्रण का कर्म चल पड़ा है। इससे समाज में रोग दूर रोगियों की संख्या में भारी वृद्धि हो रही है। इसका प्रत्यक्ष एवं स्पष्ट प्रमाण पिछले दिनों आई भयानक रोगों की बाढ़ है। दूध में पानी, चावल में कंकड़, हल्दी में लाल मट्टी आदि की मिलावट अब तो पुरानी बात हो गयी है। इन दिनों तमाम तरह के रासायनिक पदार्थों को भोज्यपदार्थों में मिलाये जाने का प्रचलन है। विकसित देशों में खाद्य-पदार्थों में मिलाये जाने वाले अप्राकृतिक तत्वों की संख्या २०००० से भी अधिक है। आज से ३ वर्ष पूर्व प्रमुख चिकित्सा पत्रिका लैंसेट ने चेतावनी दी थी कि ब्रिटेन में एक व्यक्ति औसतन पौंड जहर प्रतिवर्ष खा रहा है। आज सारे संसार में ५ लाख से भी अधिक रसायन व्यवहार में लाये जाते है। यदि इन रसायनों को एक साथ वातावरण में छोड़ दिया जाए, तो यह मानव-जीवन के साथ-साथ वनस्पति एवं जीव-जंतु तक का जीवन खतरे में डाल सकते है।

प्रसिद्ध पत्रिका 'आउटलुक' के अनुसार, आज बाजार में उपलब्ध कोई भी खाद्य-पदार्थ ऐसा नहीं है, जिसमें घातक रासायनिक पदार्थों की उपस्थिति न हो। भोजन जो जीवनदायक होता है वह विषाक्त एवं घातक होने लगा है। विभिन्न आइसक्रीमों, बिरयानी, जलेबी, समोसे और मिठाइयों में जो चटक रंग प्रयोग किये जा रहे हैं, ये रसायन विषैले और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। बैंगलोर स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान के विशेषज्ञों के अनुसार, मिठाइयों में प्रयुक्त रंग औद्योगिक डाई श्रेणी में आते हैं। इन्हें मुख्यतया वस्त्र रंगने के लिए बनाया जाता है। इन विषैले रंगों से गुर्दे एवं कैंसर के रोगों की सम्भावना बढ़ जाती है। नमकीन, सेब, जलेबी और मुगलई पुलाव का पीलापन देने के लिए इनमें टानील येलो रंग मिलाया जाता है। इससे कैंसर, एनीमिया, लकवा और युवाओं में दिमागी पिछड़ा जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती है। दाल को गाढ़ा पीला करने के लिए भी इस रंग का प्रयोग किया जाता है। लाल- मिर्च में सुडान रेड की मिलावट की जाती है, जिससे लकवा और कैंसर की शिकायतें मिली है। समोसा, टमाटर कैचप, चीज़, मशरूम आदि में नाइट्रोसोमाइन्स मिलाये जाते हैं। ये रसायन कैंसर जनक होते है। मिलावट का सिलसिला यही नहीं थमा है, बल्कि इसने काफी विकराल रूप धारण कर लिया है। यह अपमिश्रित चीनी में चाक पाउडर, सिरके में मिनरल एसिड, नमक में सफेद पत्थरों का चूरा, केसर में मक्के के फूल, हिंग में खड़िया मिट्टी, पीसी मिर्च में ईंट का चूरा, हल्दी में गेरू, काली मिर्च में पपीते के बीज, पीसी हुई धनिया में लकड़ी का बुरादा, मीठी सुपारी में सेक्रीन आदि की मिलावट का रूप लेता है।

दूध में पानी की मिलावट तो आम बात हो गयी है लेकिन अब तो इसमें कास्टिक सोडा, यूरिया, हाइड्रोजन पराक्साइड, पामोलिन, तथा डिटरजेंट पाउडरों का भी इकरना शुरू कर दिया है। इंडियन-काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च द्वारा की गयी जाँच-पड़ताल के उपरांत स्पष्ट किया गया है कि गर्भस्थ एवं दूध पीते शिशु भी मिलावट एवं भोजन की विषाक्तता से मुक्त नहीं है। भारत में माताओं के दूध में डी. डी. टी. तथा डी. डी. एल. की मात्रा कही अधिक होती है। लुधियाना व फरीदकोट में किये गए अध्ययन में यह मात्रा क्रमशः १७ण्१८ तथा २६ण्६६ पी. पी. एम. है। इसका कारण है - भोजन में मिलावट।

यह मिलावट माताओं में कैंसर एवं बच्चों में शारीरिक व मानसिक विकलांगता बढ़ा रही है दूध एवं इससे निर्मित खाद्यपदार्थों में ५ से ३ फीसदी तक वर्जित रंगों का प्रयोग किया जाता है।

पिछले दिनों हुई तेल में मिलावट ने सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए तथा सभी सामाजिक पहलुओं को दरकार कर दिया। अभी हाल में ही सरसों के तेल में आर्जीमोन ( भटकैया ) के बीजों से निकले तेल कि ४० प्रतिशत की मिलावट पायी गयी है। वैज्ञानिकों के अनुसार सरसों के तेल में १.१७ प्रतिशत की मिलावट भी ड्रोप्सी महामारी के पनपने के लिए पर्याप्त होती है। इसके अलावा सरसों के तेल में बटर येलो, अलसी तेल और अन्य प्रकार के विषैले कचरों की भी मिलावट पायी गयी है यह स्वास्थ्य के लिए अति हानिकारक है। ड्राप्सी का इतिहास आर्जीमोन से जुड़ा हुआ है। आज से १२१ वर्ष पूर्व ड्राप्सी को भारत में ही पहचाना गया था। १८७७ में मुँबई में पाश्चात्य वैज्ञानिक लिओन ने इसके विषाक्त प्रभाव का उल्लेख किया था। सन ११८० के दशक में इस बीमारी को टॉक्सिक ऑयल सिल्ड्रोम का नाम दिया था। ११८८ में भारत में पुनः इसका पदार्पण हुआ।


गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्र विस्त्रीय

अपने जीवन काल में ही परमपूज्य गुरुदेव ने गीता विश्वकोश पर कार्य आरम्भ कर दिया था। अपने अस्सी वर्ष के जीवनकाल में वजन से भी पाँच गुना अधिक साहित्य लिखने वाले परमपूज्य गुरुदेव की आकांक्षा यह थी कि कार्य सतत् चलता रहे एवं श्रीमद्भागवतगीता को योगानुकुल परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का पुरुषार्थ संपन्न हो। ब्रह्मवर्चस द्वारा यह कार्य जारी है। उसी कड़ी में शाँतिकुँज में पिछले दिनों-गीता गुरुसत्ता द्वारा किये गए सूत्रों में परिप्रेक्ष्य में विषय पर अक्टूबर १८ से जनवरी ११ तक व्याख्यानमाला चली। बीच में २ माह के अंतराल के विराम के बाद वह अब पुनः आरम्भ हुई है। इसमें सदियों से जन-जन के लिए प्रेरणा का स्रोत रही गीता के महात्म्य से लेकर प्रथम दस अध्यायों पर प्रकाश डाला गया है। इस लेख माला के माध्यम से हम गुरुसत्ता के चिंतन एवं श्रीमद्भागवतगीता का मर्म इन दो विषयों को गुंथकर व्याख्यापरक शैली में प्रतिमाह इसे प्रस्तुत करेंगे। यह क्रम अठारह अध्याय की टीका समाप्त होने तक चलता रहेगा। इससे आज के युगसंधि काल में युगगीता का हम सबके लिए क्या मार्गदर्शन है, कैसे विभिन्न उदाहरणों के द्वारा गीता कि गूढ़ विवेचनाओं को आत्मसात् का जीवन में उतारा जा सकता है, इस पर व्यवहारिक आध्यात्म की भाषा में सन्देश पाठकों को प्राप्त होगा। प्रथम कड़ी में हम गीता माहात्म्य प्रसंग ले रहे है।

श्रीमद्भगवद्गीता के विषय में जो माहात्म्यपरक वंदना आती है, वही से इसका शुभारम्भ होता है। भगवान् श्री कृष्ण देवयान व्यास के मुख से निकला स्तुति का वाक्य है-

गीता सुगीता कर्तव्य किमन्येः शाश्त्रविश्त्रीय। या स्वयं पदमनाभस्य मुख-पधाद्वीनी स्रतता॥

अर्थात् जिसका गायन किया जा सके, ऐसा सुन्दर काव्य है गीता गायन व मनन करने के बाद हमें अन्य शास्त्रों के विस्तार में जाने की क्या आवश्यकता है। यह तो स्वयं पद्मनाभ भगवान विष्णु के मुखारविंद से निकली है, ऐसे में इसका महात्म्य जितना बताया जाये कम है। जब हम इस पद को समझने का प्रयास करते है, तो ज्ञात होता है कि यह मात्र गीता का पाठ नहीं- अर्थ एवं भावसहित उसे अन्तः करण में धारण कर लेना- मनन करना है गीता एक दर्शन है, जीवन संजीवनी है। इसे पौराणिक ढंग से मात्र श्लोकों के पाठ तक सीमित ना रख कर इसे भगवान की वाणी समझते हुए आत्मसात् करने का प्रयास किया जाना चाहिए, यह दैनंदिन जीवन में कार्य करने की शैली में अभिव्यक्त होना चाहिए, तभी गीता पाठ का महत्त्व है। इसी श्रीमद्भगवद्गीता महात्म्य प्रकरण में आगे आता है-

र्ष्सवोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधिभोक्ता दुग्ध गीतामृतं महत॥

अर्थात् समस्त उपनिषद् गायों के सामान है। उन गौमाताओं को दुहने का कार्य भगवान् कृष्ण- गोपालनंदन ने किया है। पार्थ अर्जुन( प्रथा के पुत्र होने के नाते) बछड़े के सामान इस ज्ञानरूपी दग्धामृत को पीने वाले के रूप में इसमें विद्यमान है। सारे उपनिषदों का निचोड़ गीता में है। योगीराज के रूप में स्वयं भगवान ने उस अमृत को इस काव्य के अठारह अध्यायों के सात सौ दस श्लोकों के माध्यम से प्रस्तुत किया है। यही इस ग्रन्थ के अति महत्वपूर्ण एवं वैशिष्ट्यपूर्ण स्थान का परिचायक है। अदालत में शपथ ली जाती है तो गीता की। इस कारण गीता को हिन्दूधर्म का प्रतिनिधि ग्रन्थ माना गया है। मुस्लिम कुरान की, ईसाई बाइबिल की शपथ लेते है, तो उन्हीं के समक्ष स्थान हिन्दू धर्म में गीता को दिया गया है। सभी ज्ञानीजनों ने गीता को ही हिन्दूधर्म का प्रतिनिधि ग्रन्थ मान कर कहा कि कसम गीता की ली जानी चाहिए। इसी से ग्रन्थ के महात्म्य का परिचय मिलता है। वेदों- उपनिषदों सबका सार-निचोड़ यदि कही एक स्थान पर है, तो वह गीता में है। प्रस्थान-त्रयी के अंतर्गत ब्रह्मसूत्र उपनिषदों के बाद श्रीमद्भगवद्गीता को लिया गया है। तीनों ही ग्रन्थ भारतीय अध्यात्म के आधारभूत ग्रन्थ है एवं इस पथ पर अरुण होने वाले के लिए विशेष स्थान रखते है।

भगवान श्री कृष्ण के रूप में एवं द्वैपायन व्यास के रूप में चौबीस अवतारों में से दो अवतार द्वापर योग में हुए। दोनों ही गीता से जुड़े हुए है। श्री कृष्ण ने गीता कही -श्रीव्यास ने उसे काव्यात्मक रूप दिया-उसे लिखा। दोनों ही विष्णु के अवतार है। श्री व्यास जी द्वारा ही महाभारत ग्रन्थ भी लिखा गया है, जिसका एक अंग गीता जी को माना जाता है। महाभारत में अट्ठारह पूर्व है, जिनमें पूर्वार्ध में ६ पूर्व है एवं उत्तरार्ध में बारह पूर्व। इस वर्णन में सात अक्षौहिणी सेना एक तरफ थी, ग्यारह अक्षौहिणी सेना दूसरी तरफ एवं दोनों के बीच महासमर का महाकाव्य है, महाभारत इसी में कही गयी है। गीता ऋषि-मुनियों ने जितना कुछ तत्वज्ञान दिया है आरण्यकों-गिरिगुहा-कंदराओं में दिए हैं, किन्तु गीता जैसा तत्वज्ञान युद्ध के मैदान में दो सेनाओं के बीच खड़े होकर दिया गया है। यही इस ग्रन्थ की विशिष्टता है। गीता में भी महाभारत के अट्ठारह अध्याय है, जिन्हें छह -छह अध्याय के तीन खंडों में बाटा जा सकता है। पहले छह अध्याय कर्मयोग पर आधारित है, सातवें से बारहवें तक के अध्याय में भक्तियोग पर बड़ा मार्मिक विवेचना है तथा अन्तिम छह अध्याय ज्ञानयोग की पराकाष्ठा तक ले जाकर अर्जुन को स्वधर्म की, युगधर्म की महत्ता बताते हुए उसके समर्पण पर समाप्त होते है। यों कर्म-भक्ति-ज्ञान की त्रिवेणी पूरी गीता में स्थान-स्थान पर गुथी देखी जा सकती है, पर पूरे अध्याय का रुझान जिस दिशा में है, वह इसी विभाजनक्रम के अनुसार निर्वाह कर कहा गया है।

ग्रन्थ में ग्रंथकार की महिमा जुड़ने से उसकी विशिष्टता स्थापित होती है ग्रन्थकार वह होता है, जो जन्म देता है ग्रन्थ को। माँ आत्मसात् करती है- सारी शक्ति को एवं उसे अपने बालक के रूप में, एक अद्भुत कृति के रूप में जन्म के समय जागती को देती है। गीता में जो कुछ है, वह भगवान् कृष्ण ने योगस्थः हो आत्मसात् कर अर्जुन को कहा है। इसलिये हमें भगवान् कृष्ण के साथ गीता को जोड़ कर- माँ के साथ उसकी रचना को जोड़कर समझना होगा, तभी हम श्रीमद्भगवद्गीता का मर्म आत्मघात कर सकेंगे। विनोबा गीता को गीताई कहा करते थे। महाराष्ट्र में माँ को आई कहते है-अर्थात् -गीता माँ। हर कष्ट-हर दुःख के लिए गीताई की शरण में जाओ, यह विनोबा का कथन था। गाँधी जी कहते थे कि गीता मेरी माँ के समान है, जब मुझे समस्याएं सताती है, मैं अपनी माँ कि गोद में चला जाता हूँ, मुझे सारे हल मिल जाते है। इसलिए यहाँ बार-बार गीता के साथ रचना को जन्म देने वाले उनके ग्रंथकार वक्ता योगीराज श्रीकृष्ण को समझने की बात कही जा रही है उन्हें समझे बिना गीता नहीं समझी जा सकती।

ग्रंथकार योग के उपदेषता श्रीकृष्ण जगद्गुरु है उनके बारे में कहा जाता है-

वसुदेवसुत देव कंसचार्णुमर्दनम। देवकीपरमानन्दम कृष्ण वन्दे जगद्गुरु॥

श्री कृष्ण सारे जगद के गुरु हैं। यह इसलिए कि वे युग कि समस्याओं का हल करने का एक विराट संकल्प लेकर आये थे। ये समस्याएं अनेक तरह की थी- शास्त्रीय, जातिभाव, धर्मगत, प्रकृति, जगद सम्बन्धी- इन सभी के लिए उन्होंने कहा- संभवामि युगे-युगे धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ। हर युग में अवतार की आवश्यकता पड़ती है। भगवान कृष्ण यही कार्य करने के लिए अपने युग में जगद्गुरु बनकर आये। यह शब्द ओर किसी अवतार के साथ प्रयुक्त नहीं हुआ है, मात्र श्री कृष्ण के लिए, जो महायोगी शब्द से भी, योगीराज शब्द से भी संबोधित किये गए है। यही श्रीकृष्ण की गीता के साथ जुड़कर विशिष्टता झलकती है।

परमपूज्य गुरुदेव ने अगस्त, ११६१ की अखंड ज्योति में अवतारों की प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- अवतार की प्रक्रिया एक ही है- जनमानस में अवांछनीयता के प्रति विद्रोह यही अवतार का वास्तविक स्वरूप है। आगे उन्होंने लिखा है-ईश्वरीय शक्तियां ही एक विचारप्रवाह एवं कार्यप्रवाह के रूप में अवतरित होती है एवं तत्कालीन समाज की समस्याओं का समाधान करती है। जगद्गुरु स्तर की अवतारीचेतना लेकर परम पूज्य गुरुदेव भी इस धरती पर आये। उन्होंने केवल ज्ञान-कर्म-भक्ति-नीति का ही उपदेश नहीं दिया, उपासना के अनेकानेक आयाम खोले- उसे युग धर्म से जोड़कर आराधना का, विश्वब्रह्मांड की सेवासाधना का विराट रूप दे दिया। विचार क्राँति के माध्यम से आसुरी चिंतन को निरस्त करने हेतु एक व्यापक ज्ञानयज्ञ उन्होंने रचा। सबसे बड़ी बात गायत्री व यज्ञ को एक सीमित दायरे से निकलकर उसे जनसुलभ बना दिया। यह अवतारी स्तर की जगद्गुरु स्तर की चेतना ही कर सकती है। पूज्यवर कहते है -हर अवतार ने अपने समय की विकृतियों के समाधान का नेतृत्व अवश्य किया, पर उनके पीछे वस्तुतः अपार जनशक्ति थी। जनशक्ति ही वह चंडी है जो असुरता का समग्र वध करने में समर्थ है। यहाँ उनके द्वारा प्रयुक्त शब्द असुरता का समग्र वध पर ध्यान देना जरूरी है। समग्र नहीं करेंगे, आँशिक वध करेंगे, तो असुरता पुनः जीवित हो हावी होने लगेगी इसलिए असुरता आमूलचूल नष्ट हो जानी चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव ने भी लालमशाल के प्रतीक के नीचे एक विराट जनमेदिनी खड़ी की एवं उसके द्वारा समग्र क्राँति की रूपरेखा स्पष्ट कर नवयुग की सम्भावना को विचार युद्ध रूपी महाभारत के माध्यम से साकार किये जाने की बात कही है। अगस्त, १९६९ की अखंड ज्योति का पूरा अंक विचार क्राँति अंक है। उसमें वे लिखते है-इन दिनों पार्थ सारथी की बेचैनी स्पष्ट अनुभव की जा सकती है। अर्जुन को संतृप्त और विकल देख कर उसे कितनी बेचैनी है। यहाँ हम यदि इन वाक्यों को समझ सके, तो पार्थ सारथी-पार्थ के सारथी श्रीकृष्ण परमपूज्य गुरुदेव है एवं अर्जुन हम सभी प्रज्ञापरिजन, जिन्हें विकल-संतृप्त क्षुद्रस्तर का जीवन जीते देख उन्हें कितनी व्यथा हो रही है, यह समझा जा सकता है। इसी परिप्रेक्ष्य में हमें गुरुदेव और गीता के उनके सन्देश को समझना चाहिए।

जगद्गुरु श्रीकृष्ण ने यह जो गीता कही है-उसे भगवद्गीता कहा गया है। इसलिए सारी गीता में जब उनके बोलने का प्रकरण आता है- श्री भगवान उवाच। कही भी श्री कृष्ण-वासुदेव ऐसा उल्लेख नहीं है। यही सन्देश है, जो महाभारत के महासमर में योगस्थः होकर भगवान के भाव से परमात्मचेतना में प्रतिष्ठित होकर उन्होंने अर्जुन को दिया। इसलिए इसे भगवद्गीता कहा गया है। यों भगवान् श्री कृष्ण ने अनुगीता, पाँडवगीता व उद्धवगीता नाम से नहीं संबोधित हुए। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा कि महाभारत युद्ध में गीता उपदेश से मेरे विकल चित्त को बड़ी शाँति मिली, अब चूँकि युद्ध समाप्त हो गया है-मैं उस समय युद्धभूमि में होने के कारण पूरी तरह समझ नहीं पाया था, पुनः उस उपदेश को सुनना चाहता हूँ। तब श्री कृष्ण ने अर्जुन को अनुगीता सुनाई। पाँडवगीता में पाँडवों को स्वर्गारोहण के पूर्व उपदेश दिया गया एवं उद्धव गीता जो श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्द का एक भाग है, श्री कृष्ण द्वारा उद्धव को सुनाई गयी। उन तीनों में ही श्री कृष्ण का भाव सुनाने वाले का है। किन्तु श्रीमद्भगवद्गीता में परमात्मचेतना का है अतः वह और अधिक महत्वपूर्ण ग्रन्थ बन गया है।

परमपूज्य गुरुदेव ने भी जीवन भर लिखा, जो भी कुछ अखंड ज्योति के माध्यम से हमें कह गए, वह योगस्थः होकर परमात्मचेतना में प्रतिष्ठित होकर लिखे इसलिए उनके लिखे प्रत्येक वाक्य जो वाङ्मय में है, अखंड ज्योति में है। आज के युग की गीता के सामान है। गुरुदेव कहते भी थे कि हम नहीं लिखते -हमारे ऊपर भगवान्-दैवी चेतना उतरती है एवं वही लिखती है।

ऊपर कहा गया कि 'कृष्ण वन्दे जगद्गुरुम्' आज जब इतने जगत गुरु है -महामंडलेश्वर है, तब श्री कृष्ण को वह दर्जा देने की क्या जरूरत है, जो आज सामान्य-सा हो गया है। हर कोई स्वानामधन्य जगद गुरु बन बैठा है। जगत गुरु वस्तुतः वही बन सकता है, जो जगत की समस्याओं का समाधान करे, अपने समय की समस्याओं का हल जो आचरण-तप-क्रिया से अपनी आध्यात्मिक शक्ति से प्रस्तुत करे, औरों के लिए नमूना बने- वही जगद्गुरु संबोधन पा सकता है। श्री कृष्ण ने बाल्यकाल में बकासुर-पूतना वध से लेकर गोवर्धन खड़ाकर, ग्वाल-बालों की रक्षा-संदीपनि मुनियों के पुत्रों की मुक्ति दिलाने से लेकर कंस -चाणूर का मर्दन किया। जीवन भर यही लीलाएँ करते रहे। समाज में अवाञ्छनीय तत्व न बढ़ने पाए, उनसे रक्षा की जानी चाहिए, यही उनका लक्ष्य रहा। उनके स्तर का महापुरुष ही था, जो राजसुयज्ञ में अपने मनपसंद के काम में अतिथियों के चरण धोने-जूठी पत्तल का कार्य अपने कंधों पर लेकर अहंकार को गलाने का शिक्षण दे गया। ऐसे में अग्रपूजा का प्रकरण आता है, तो भीष्म पितामह, वासुदेव, श्री कृष्ण का ही नाम लेते हैं। कर्मयोगी श्री कृष्ण ही जगदपुरुष बन सकते है, हर कोई नहीं।

भगवान श्री कृष्ण कि एक दूसरी विशेषता जो गीता में झलकती है-वह है उनका भक्त वत्सल होना। भगवान बार-बार गीता में कहते है-

ष्मामेकं शरणं वज्र ष्न में भक्तः प्रणश्यति एवं मध्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्धभक्तः स में प्रियः।

मेरे भक्त की मैं ही रक्षा करता हूँ। महाभारत युद्ध के बाद की बात है युधिष्ठिर प्रतीक्षा करते रहे। बाहर आने पर पूछा- भगवान आप तो स्वयं परमात्मा हैं, आपको ध्यान करने की आवश्यकता? वे बोले-मैं अपने भक्त भीष्मपितामह का ध्यान कर रहा था वे इस समय शर-शैया पर पड़े हैं। विवश होकर नीति से बंधे होने के कारण उन्होंने अर्जुन-भीष्म भी विवशता की स्थिति में लड़े थे, किन्तु अन्दर से उनकी अनुरक्ति श्रीकृष्ण के परमात्मभाव के प्रति थी। वे भी शर-शैया पर लेटे उन्हीं का ध्यान कर अपना कष्ट दूर कर रहे थे। कितनी विलक्षण बात है भक्त भगवान ध्यान कर रहे हैं एवं भगवान् भक्त का। जो अपनी भावनाएँ भगवान को देता है, भगवान उस भक्त का खुद दास बन जाता है और सतत् उनको स्मरण करता रहता है, उनकी रक्षा करता रहता है। परमपूज्य गुरुदेव भी प्रेम के महासागर थे। जिस कक्ष में आज पूज्य गुरुदेव का निवास है, उनके पीछे गौशाला है। जब भी गाय को और बछड़े को अलग अलग बाड़े में देखते थे और यह पाते थे कि माँ व्याकुल है उसे पास नहीं आने दिया जा रहा, तो वेदना से उनकी आँखों में आँसू आ जाते थे। अपनी अखण्ड ज्योति में वे लिखते हैं कि बछड़े से बिछुड़ी गाय की उदासी, म्लान और व्यथा-वेदना जिन्होंने देखी हैं, उन्हें यह अनुमान लगाने की कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि गाय से अधिक भावनासंपन्न और मुहब्बत भरे प्राणी, इस मानव की क्या दशा हो सकती है। वीतराग, परमहंस, स्थितप्रज्ञ, समदर्शी होने का हमने कभी दावा नहीं किया। हमारी विशेषता रही है तो वह है - ममता, आत्मीयता स्नेह और सद्भावना का अंश दूसरों से कुछ अधिक होना। यही बढ़ा हुआ अंश हमें रुला देता है पोषण हृदयों और परमहंसों को ऐसी व्यथा में सहेज बने रहने का लाभ भी मिल जाता है, किन्तु काबू में जिसका दिल न हो वह गरीब क्या करे। यह प्रेम -आत्मीयता भक्तवत्सल परम पूज्य गुरुदेव को भी कृष्ण के समक्ष स्थापित करती है।

महाभारत के पश्चात पाँडवों को तत्वज्ञान का, राजधर्म का उपदेश दिलाने के लिए श्रीकृष्ण पाँडवों के साथ शर-शैया पर घायल लेटे भीष्मपितामह के पास पहुँचे। भीष्म बोले -आपसे अच्छा उपदेशक कौन हो सकता है प्रभु? आप मुझे श्रेय देना चाहते है। यह में समझ रहा हूँ किन्तु शरीर घायल है मन स्थिर नहीं है। भगवान कृष्ण ने भीष्म के सिर पर हाथ फिराकर कहा कि अब आपको योगस्थः कर दिया है जरा भी वेदना नहीं होगी। भीष्म ने जो उपदेश दिया, इसके बाद वह पूरा पर्व महाभारत का शांतिपर्व कहलाता है, ऐसी कृपा करते है, भक्तवत्सल भगवान अपने शिष्य पर। भगवान कृष्ण के जीवन के विस्तार अनंत है, अतिव्यापक है। प्राफेट द किंगमेकर नाम से स्वामी श्री राम -कृष्णानंद महाराज (स्वामी विवेकानंद के साथी -शशिमहाराज ) ने एक पुस्तक लिखी है, जिसमें कृष्ण के जीवन के अनेक पक्षों का विवरण है राजाओं को सिंहासन पर आरूढ़ करने वाला स्वयं कभी राजा न बनने वाला अवतार श्रीकृष्ण का ही है। भगवान गीता में कहते है - जन्मकर्म च दिव्यम मेरे जन्म व कर्म दोनों ही अति पावन व अलौकिक है यह सारे पक्ष उनकी बाललीला से लेकर अधमोद्धारक रूप तक, भक्तवत्सल वाले यशोदा गोपियों व ग्वाल -बाल से प्रेम वाले रूप तक दिखाई पड़ते है कुछ ऐसा ही विलक्षण परमपूज्य गुरुदेव के जीवन में भी मिलता है।

भगवान कृष्ण ने जहाँ जहाँ गुण देखे है, उनका सम्मान किया है, उनकी प्रशंसा किए बिना नहीं रहे कर्ण की दुर्योधन के प्रति मित्रता देखकर उसकी प्रशंसा की, युद्ध के मैदान में कर्ण का युद्ध -कौशल देखकर भी उसकी तारीफ की, यह विशेषता भगवान स्तर की सत्ता में ही हो सकती है। भगवान महाभारत में सारथी बने, सारथी का अर्थ है - अपने मन की डोर भगवान के हाथों सौंप दे। इनका एक नाम है ऋषिकेश ऋषिक व अर्थात् इंद्रियों, ईश अर्थात् स्वामी-इन्द्रियों का, अंतः करण का स्वामी। यदि हम इस रूप में उन्हें प्रतिष्ठित कर ले, उन्हें जीवन -नैया का सारथी बना ले तो कही कोई कठिनाई नहीं होगी, किन्तु इसके लिए हमें अर्जुन बनना पड़ेगा। रिजु-न शब्द से अर्जुन शब्द बना है अर्थात् जो टेढ़ा नहीं सीधा सरल है -संदेह है तो स्पष्ट कहता है, नहीं समझ में आता तो कह बैठता है कि मैं शिष्यभाव से आपकी शरण में आया हूँ, मुझे कर्तव्य समझाइये।

(शिष्यस्तेअहं शाधि माँ त्वम प्रपन्नम )

जब यह भाव मन में आकर व्यवहार में उतरने लगता है, तो भगवान का गीता सन्देश आरम्भ हो जाता है। शरणागति समर्पण यही गीता का मर्म है। अहंकार का, कर्मों के फल का, कर्म-आशक्ति का समर्पण त्याग ही बार बार भगवान ने अर्जुन को समझाया है व हम सबके लिए आत्मसात् करने योग्य है। जब तक हम भगवान कृष्ण के व्यक्तित्व को नहीं समझते, हम उनके इस अश्वासन को आत्मसात् नहीं कर सकते कि वे बार -बार आयेंगे (संभवामि युगे -युगे )। आज का महाभारत इस युग के महाभारत से भी बड़ा है। तब देश देशांतर के, भारतवर्ष के लोग इसमें सम्मिलित थे। आज दो विश्वयुद्ध हो चुकने के बाद तीसरे की कगार पर सारा विश्व खड़ा है। श्री कृष्ण इसलिए आज भी सामयिक है, गीता आज भी युगानुकूल है। परमपूज्य गुरुदेव के दिए हुए सूत्र जीवन-सम्बन्धी निर्देश श्रीमद्भागवतगीता के ही पार वर्धित संस्करण है। हमें इसलिए गीता विश्वकोष की विराट व्याख्या के पूर्व भगवान श्री कृष्ण रेन परम पूज्य गुरुदेव के व्यक्तित्व एवं कर्तव्य को जीवन के हर पक्ष को समझना होगा। यदि हम अर्जुन बन सके, तो गीता हमारे रोम रोम में श्वास श्वास में से बोलेगी।


VigyapanSuchana

शाँतिकुँज, हरिद्वार से प्रकाशित नवीनतम साहित्य

शाँतिकुँज ने परमपूज्य गुरुदेव के विपुल साहित्य के विशेष धार्मिक अंशों का, संकलन का आठ जेब पुस्तकों (पॉकेट बुक्स ) का प्रकाशन किया है, ताकि वर्तमान समय के प्रत्येक पहलू पर पूज्य गुरुदेव के विचार प्रज्ञायुग के प्रत्येक परिजन के पास हर समय उपलब्ध रह सके। परिजन इनमें वह सामग्री भी पायेंगे जो नए नए परिजनों को बेहद प्रभावित करने बाली है। अतः समर्थ परिजनों-शाखाओं को इनके वितरण का अभियान भी चलाना चाहिए। प्रत्येक पुस्तक का मूल्य मात्र डेढ़ रुपया है।

पुस्तक सूची-- (१) यह बोल रहा है महाकाल (२) ज्योति कण (३) सद्गुरु वचनामृत (४) गुरुवर की अमृत वाणी (५) मातृशक्ति के वचनामृत (६) महाकाल का घोंसला -शाँतिकुँज (७) नमो वेदमाता (८) बिना मोल आफत- दुर्व्यसन। इसके अतिरिक्त उपनिषद् का साधना खंड भी प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा वैज्ञानिक अध्यात्मवाद तथा कुछ अन्य विषयों पर परम पूज्य गुरुदेव द्वारा लिखा गया यह साहित्य जो लम्बे समय से उपलब्ध नहीं था, का पुनः प्रकाशन किया गया है।

नयी प्रस्तावित ३९ पुस्तकों में से ३० पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है, जिनकी सूची इस प्रकार है - (१) असीम पर निर्भर असीम जीवन (२) तत्वदृष्टि से बंधन मुक्ति (३) दृश्य जगत की अदृश्य पहेलियाँ (४) युगशक्ति गायत्री का अभिनव अवतरण (५) ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है? (६) शरीर की अद्भुत क्षमताएँ एवं विशेषताएँ (७) भूत कैसे होते है? क्या करते है? (८). प्रज्ञा प्रवचन (९) जीवन साधना-प्रयोग और सिद्धियाँ (१०) सेवा धर्म और उसका स्वरूप (११) बिना औषधि कायाकल्प (१२) पुनर्जन्म एक धुत्त सत्य (१३) जीव - जन्तु बोलते भी है,सोचते भी है (१४) समस्त समस्याओं का समाधान अभ्यास (१५) अध्यात्मवाद ही क्यों? (१६) धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं,पूरक (१७) मानवीय क्षमता असीम अप्रत्याशित (१८) पाँच प्राण -पाँच देव (१९) मस्तिष्क प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष (२०) आत्मशक्ति से युगशक्ति का उद्भव (२१) मनुष्य चलता -फिरता पेड़ नहीं है (२२) विज्ञान को शैतान बनने से रोके (२३) जड़ के भीतर विवेकवान चेतन (२४) सपने झूठे भी सच्चे भी (२५) पितरों को श्रद्धा दे वे शक्ति देंगे (२६) मरे तो सही,पर बुद्धिमानी के साथ (२७) बच्चे बढ़कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी न मारे (२८) स्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे (२९) स्वर्ग -नरक की स्व -संचालित प्रक्रिया (३०) प्रेरणा भरे पावन प्रसंग।


भागीरथी पुरुषार्थ की बेला है यह

कोठे में अन्न के भण्डार भर जाने की संभावना का सार्थक अनुमान लगाने की लिए कुछ प्रयत्नों, घटनाओं, प्रवाहों और साधनों को देखते हुए वस्तु स्थित का अनुमान लगाया जा सकता है। किसान समुदाय यदि खेत जोतने में, खाद डालने में, सिंचाई का प्रबंध करने में, जुटा हो तो लाभदायक उपलब्धियों का अनुमान लगाया जा सकता है। बीज बोये जाने और अंकुर उगने पर रखवाली की चौकसी चल पड़े, खरपतवारों को उखाड़ने से लेकर निरे - गुड़ाई का सिलसिला ठीक प्रकार चलता रहे तो समझना चाहिए कि अपवाद रूप में ही दुर्भाग्य बाधक हो सकता है, अन्यथा धन-धान्य से कोठे भरने में कोई व्यवधान रह नहीं गया।

विद्वान बनने के लिए लम्बा अध्ययन करना पड़ता है। पहलवान बनने की लिए मुद्दतों अखाड़े गाड़ने पड़ते है। इक्कीसवीं सदी की मणिमुक्तकों वाली फसल उगने के लिए ऋषि गुणों को, हिमालयवासी सत्ताव को बड़ी महत्वपूर्ण तैयारी - कठोर ताप की प्रक्रिया संपन्न करनी पड़ी है। राम वनवास के चौदह वर्षों में से बारह वर्ष ताप -साधना में और दो वर्ष युद्ध संघर्ष में लगे थे। पाँडवों को वनवास में आरंभिक बारह वर्ष महान प्रयोजन की तैयारी में लगाने पड़े थे। युग संधि की बारह वर्षीय अवधि इसी प्रकार की रही है। ९ से आरंभ हुई यह संक्रमण की अवधि जिसके प्रायः दस वर्ष बीत चुके है जिसमें प्रज्ञावान व सत्ताधारियों को लोभ, मोह और अहंकार की महत्वाकांक्षायें एक कोने पर रखनी पड़ी है और औसत नागरिक स्तर का निर्वाह करते हुए,परिवार को सुसंस्कारित, स्वावलम्बी बनाने भर की जिम्मेदारी निबाहते हुए अपने समय, श्रम,चिंतन और साधनों का अधिकांश भाग उस बीजारोपण में लगाना पड़ा है, जो अगले दिनों सतयुग की फसल के रूप में फलता-फूलता दिखाई पड़ेगा। अगली शताब्दी में ऐसा परिवर्तन कर दिखायेगा जिससे ना भूत ना भविष्यति की संज्ञा सके। पिछले सतयुग में आध्यात्म की ही वरिष्ठता थी। विज्ञान का उन दिनों इस स्तर तक उभर और प्रचलन नहीं हुआ था। पर अब तो बुद्धिवाद, विज्ञान की प्रमुखता है, कमी केवल एक ही है- इसके साथ अध्यात्म का समावेश नहीं हो सकता। तीनों के मिल जाने पर तो जल, थल, आकाश के बने हुए समन्वय की तरह पूर्णता की स्थिति बन जाएगी। अगला सतयुग पिछले सभी सत्युगों की तुलना में अधिक समर्थ, अधिक संपन्न और अधिक ज्ञान-विज्ञान से इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिये।

इक्कीसवीं का फलता-फूलता कल्प-वृक्ष देखने के लिए मात्र प्रतीक्षा करनी ही काफी नहीं होगी, उसके लिए प्राण चेतना से भरे-पुरे लोगों को आगे बढ़कर मार्ग दर्शन करना होगा। चुम्बक अपनी आकर्षण-शक्ति से सजातीय लौहकर्णों को खींचकर समीप एकत्रित कर लेते है। खोदने, बनने और बढ़ने के पीछे यही सिद्धाँत काम करता है। सेनायें इसी प्रकार एकजुट एवं प्रशिक्षित होती है। महान संस्थाओं के संगठन भी इसी आधार पर खड़े होते है उनके मूल में ऐसे व्यक्तित्व रहे होते है, जो अपनी प्रमाणिकता और सेवा-भावना से लोकश्रद्धा अपने साथ समन्वित कर सके। हनुमान के आगे चलते ही रीछ-वानरों का विशाल समुदाय उनके पीछे-पीछे प्राण हथेली पर रख कर चल पड़ा था। कृष्ण-कन्हैया की विवशता से ग्वाल-बालों का एक बड़ा समुदाय प्रगार्ण निष्ठा सहित साथ में जुट गया था। गोवर्धन उठाने में वही काम आया। दुर्योधन की असीम सेना थी। पाँडव पाँच थे, पर उनके न्यायोचित पक्ष का समर्थन करने के लिए असंख्यों ने स्वेच्छा से सहयोग देकर मोर्चा संभाला था। ईसा के अनुयायियों की कमी नहीं थी। बुद्ध के आवाहन पर लाखों भिक्षु-भिक्षुणियाँ विश्व के कोने-कोने में धर्म चक्र प्रवर्तन के लिए चल पड़े थे। गाँधी जी के सत्याग्रह में सम्मिलित होने वालों की कमी नहीं थी। विनोबा का भूदान आन्दोलन अपने समय में इतना सुविस्तृत हुआ कि उस उपक्रम को एक कीर्तिमान ही कहा जाने लगा था।

इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल कि परिकल्पना को साकार करने के लिए आगामी डेढ़ -दो वर्षों में नव सृजन के निमित्त जुटने वाले को बहुत कुछ करने की आवश्यकता पड़ेगी। जीवन के इन दो वर्षों को एक प्रकार से विश्वकल्याण के निमित्त समर्पित मानते हुए स्वयं को विसर्जित करना होगा। मन को डावांडोल न करके एकचित्त से एकनिष्ठ होकर एक लक्ष्य के साथ तन्मय हो चला जाये तो निशाना ठीक तरह साधने में कोई अड़चन रह नहीं जाती। लक्ष्य के प्रति समर्पित लोगों ने ही संसार में बड़े-बड़े काम किये है। महामानवों की चिस्मरणये कृतियों के पीछे उनकी प्रगाढ़ निष्ठा ही काम करती रही है। जो मात्र कौतुक-कौतूहल के लिए बाल क्रीड़ा करते रहते है, बंदरों की तरह डालियों पर उछलते-मचलते रहते है, उनसे ऐसा कोई काम नहीं बन पाता जिसे चिस्मरणये कहा जा सके और उनका अनुसरण करने के लिए अनेकों का मनन मचलने लगे।

युगसंधि की इस बेला में सबसे महत्त्व कार्य है-विचार क्राँति के लिए योजनाबद्ध रूप से विभूतियों का व्यापक सुनियोजन। इन दिनों लोकचित्त में असाधारण रूप से विकृतियों की भरमार हुई है। कुसंस्कारों की ओर बढ़ता आकर्षण आज सहज स्वभाव के रूप में बहुलता के साथ पाया जाता है। इसके साथ-साथ तथाकथित ऐसे बुद्धिमान को दावानल की तरह फूट पड़ने और फैल पड़ने का अवसर मिला है कि लोग अनीति का ढीठता के साथ समर्थन करने लगे है। डरने, झेंपने, सकुचाने के स्थान पर वे कुकर्म का, तर्कों का अम्बार लगाते हुए समर्थन करते है स्वल्प बुद्धि वालों का उससे सहज प्रभावित हो जाना स्वाभाविक है। मनुष्य का स्वभाव भी कुछ ऐसा ही है कि तत्कालीन लाभ के लिए जो उपाय अपनाकर दूसरों को लाभ उठाते हुए देखा जाता है तो उसे अपनाने की सहज प्रवृत्ति अपना ली जाती है। बड़ों को जो करते देखा जाता है उसकी नकल छोटे भी करते हुए गर्व अनुभव करते है।

प्रायः इन दिनों यही सार्वजनिक प्रचलन है। इससे ऊपर वालों की छूत नीचे वालों तक पहुँच जाती है। रामलीला देखने वाले बच्चे उस मेले से ही राक्षसों और बंदरों के मुखौटे खरीद लाते है और चाव से पहनकर कूदते, छलाँग लगाते रहते है। प्रचलन की भावशक्ति असाधारण है। प्रथा परम्पराएँ इसी आधार पर पनपती है। कुरीतियों और मूढ़ मान्यताओं के भूत इसी प्रकार लोगों के सर पर सवार होते है। मनः स्थिति में भर चला प्रदूषण ही परिस्थितियों, क्रिया–कलापों और घटनाओं को हेय स्तर का बनाता चला जा रहा है। इस प्रवाह को उलट कर शालीनता का, सज्जनता का, विवेकशीलता अपनाये जाने का प्रवाह बहाना अत्यंत कठिन है। इसको भागीरथी द्वारा गंगावतरण किये जाने वाले महान कार्य के समतुल्य ठहराया जा सकता है। दुष्प्रवृत्तियों को सत्प्रवृत्तियों में बदलने वाले उपचार का नाम ही है -'विचार क्राँति'। इसे यों भी कह सकते है-चिन्तन में सत्प्रवृत्तियों का इतना गहरा समावेश, जो चरित्र में आदर्शवादिता के प्रति अगाध निष्ठा उत्पन्न कर सके, उलटे को उलट कर सीधा करना इसी को कहते है।

इन दिनों विचार क्राँति के माध्यम से आदमी के चिंतन में आमूलचूल परिवर्तन, यही अवतारी चेतना के प्रकट होने का प्रबलतम संकेत है। जिन-जिन के अन्दर यह रुझान तेजी से बढ़ता दिखाई देगा -उनके अन्दर अवतारी चेतना प्रवेश उतनी ही तेजी से होगा। विचार परिवर्तन एवं इसमें निमित्त अपना सब कुछ सर्वस्व लगा देना ही इस समय का युगधर्म है।


अपूर्णता को पूर्णता में बदलने की याचना (Kahani)

एक मनुष्य किसी महात्मा के पास पहुँचा और कहने लगा-जीवन अल्पकाल है। इस थोड़े से समय में क्या-क्या करे? बाल्यकाल में ज्ञान नहीं रहता। बुढ़ापा उससे भी बुरा होता है। रात-दिन नींद नहीं लगती है। रोगों का उपद्रव अलग बना रहता है युवावस्था में कुटुम्ब का भरण-पोषण किये बिना नहीं चलता तब भला ज्ञान कैसे मिले? लोक-सेवा कब की जाये? इस जिंदगी में तो समय मिलता दिखता ही नहीं। ऐसा कह और खिन्न होकर रोने लगा।

उसे रोता देख कर महात्मा भी रोने लगा, उस आदमी ने पूछा-आप क्यों रोते है? महात्मा ने कहा-क्या करूं बच्चा! खाने के लिए अन्न चाहिए। लेकिन अन्न उपजाने के लिए मेरे पास जमीन नहीं है। मैं भूख से मर रहा हूँ। परमात्मा के एक अंश में माया है। माया के अंश में तीन गुण है गुणों के एक अंश में आकाश है। आकाश में थोड़ी सी वायु है और वायु में बहुत सी आग है। आग के एक भाग में पानी है। पानी का शताँश पृथ्वी है। पृथ्वी के आधे हिस्सों में पर्वतों का कब्ज़ा है। नदियों और जंगलों को जहाँ देखो वहां बिखरे पड़े है। मेरे लिए भगवान ने जमीन का एक नन्हा-सा टुकड़ा भी नहीं छोड़ा। थोड़ी-सी जमीन भी थी, सो उस पर और लोग अधिकार जमाये हुए बैठे है। तब बताओ मैं भूखा नहीं मरूँगा? उस मनुष्य ने कहा- यह सब होते हुए भी तुम जिन्दा तो हो ना? फिर क्यों रोते हो? महात्मा तुरंत बोल उठे- तुम्हें भी तो समय मिला है, बहुमूल्य जीवन मिला है, जीवन समाप्त हो रहा है, इसकी रट लगाकर क्यों हाय-हाय करते हो, अब आगे से समय न मिलने का बहाना न करना। जो कुछ भी है उसका तो उपयोग करो।

साधनों कि न्यूनता की दुहाई देना, ईश्वर के राजकुमार को तो कदापि शोभा नहीं देता। अपनी अपूर्णता को पूर्णता में बदलने की याचना यदि आत्मिक क्षेत्र के विषय में हो तो वह मानवोचित भी है, गरिमा पूर्ण भी। पर यदि वह साधन प्रचुर मात्र में हो तब उसकी ऐसी शिकायत दुर्भाग्य पूर्ण ही है।


परम पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी- - विवेक की साधना और सिद्धि

(४ जून, १९६९ गायत्री तपोभूमि, मथुरा )

गायत्री मन्त्र हमारे साथ-साथ बोले-ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। देवियों, भाइयों! महात्मा आनंद स्वामी ने एक बार एक व्यक्ति से कहा था कि तू जब तक अनीति द्वारा कमाया हुआ धन खायेगा तेरी प्रगति और बुद्धि नष्ट होती चली जाएगी। अतः हमें सात्विक अन्न खाना चाहिए। विशेष रूप से यह विचार करना होगा कि आपका आहार सात्विक है या नहीं। यहाँ अन्न से मतलब आजीविका से है। आजीविका शुद्ध होनी चाहिए। आजीविका ठीक होगी तो मन भी ठीक होगा मनुष्य के जीवन में आजीविका का अपना महत्त्व है। अन्न का अपना महत्त्व है। यदि यह शुद्ध होंगे तो साधना से सिद्धि मिलने में देर नहीं लगेगी। सात्विकता से सिद्धियाँ स्वतः आती है।

एक तपस्वी महात्मा जी थे। वह एक पेड़ के नीचे बैठे थे कि एक चिड़िया ने बिट कर दिया। उन्होंने उसकी ओर देखा और वह जल कर भस्म हो गयी। महात्मा जी को अपनी ही सिद्धि पर अहंकार हो गया था। एक दिन वे एक गाँव में गए और एक महिला से भीख माँगने लगे। महिला ने कहा कि आप थोड़ी देर रुके, थोड़ी देर बाद भी जब वह नहीं आई तो महात्मा जी ने उसे आवाज़ लगाई। महिला ने बोला कि इस समय हम योगाभ्यास कर रहे है। पति की सेवा करना, खाना खिलाना, बच्चों को स्कूल भेजना-यह मेरा योगाभ्यास है। जब यह खत्म हो जायेगा तो हम आपकी सेवा करेंगे।

महात्मा जी नाराज़ हो गए और उन्होंने उसे शाप देना चाहा। महिला बोली कि महात्मन्! हम चिड़िया नहीं है जो आप हमें जला देंगे। महिला के इस कथन से महात्मा जी आत्मग्लानि हुई और वे सोच में पड़ गए। उन्होंने उससे पूछा कि तुम कैसे जानती हो कि यह घटना घटित हो चुकी है। महिला बोली कि मैं पति को परमेश्वर मान कर उनकी सेवा करती हूँ, जो हमारे लिए भोजन-वस्त्र की व्यवस्था करते है, देखभाल करते है। यह उसी का परिणाम है। महात्मा जी बनिया के पास गए। वह प्रातः काल से सांय तक पूरे परिश्रम और ईमानदारी से अपनी दुकान करता है। यही उसका नित्य का योगाभ्यास था। इसके बाद महात्मा जी एक भंगी के पास गए। वह भी ईमानदारी के साथ अपने कर्तव्य-कर्म-सफाई के काम में लगा रहता। शाम को माता-पिता की सेवा करता। उसने भी महात्मा जी को बतलाया की देखा हमारा योगाभ्यास यही है ईमानदारी का योगाभ्यास, परिश्रम का योगाभ्यास।

वस्तुतः यह तीनों ही शुद्ध अन्तः करण वाले व्यक्ति थे। पिप्पलाद ऋषि का नाम सुना या पढ़ा होगा आपने! उनके जीवन में जो भी चमत्कार होता चला गया, वह उनके सात्विक आहार का था। तपस्या-उपासना जो बल देता है, उसका नाम अन्न है। यह सात्विक होना चाहिए इससे मन पवित्र, स्थिर और शाँत रहता है। अगर आपका मन ठीक नहीं रहता है, तो साधना-उपासना का मूल आप समझ नहीं पाए है, फिर मैं आपको कैसे समझा सकता हूँ, जब आपके दिमाग में कूड़ा भरा है। उस गन्दगी को आपके दिमाग से हम कैसे साफ कर सकते है। इसकी सफाई आपको स्वयं ही करनी होगी।

मित्रो! हमारा मन साधना-उपासना में बहुत लगता है इसमें हमें जो आनंद आता है, उसका वर्णन हम नहीं कर सकते है। आपका भी मन लगे, इसके लिए आपको अन्न की सात्विकता अपनानी

होगी, तभी प्रगति हो सकती है हमने चौबीस साल तक अपनी जीभ को साधा तथा सात्विक अन्न का सेवन किया। आप अपने को साधना नहीं चाहते है, तो उपासना के क्षेत्र में आगे कैसे बढ़ेंगे? एक दिन हमने आपको आहार-विहार के बारे में बताया था, साथ ही यह भी चर्चा की थी कि समय का विभाजन करे और समय का मूल्य समझे। अगर आप अपनी जीभ को साध ले, तो चमत्कार उत्पन्न हो जायेगा। आहार-विहार के असंयम के कारण ही बीमारियों आपको घेरे रहती है। इसी के कारण अभी तक आप छोटे आदमी बने रहे।

मित्रो, चन्द्रभान नामक एक व्यक्ति भारत-पाक विभाजन के बाद पाकिस्तान से यहाँ आये थे। वे वहाँ पर एक टेलीफोन ओपेरटर थे। यहाँ आने पर उन्होंने अपना कागज़ वगैरह दिखाया, तो उनको भारत में नौकरी मिल गयी। आज बीस वर्ष बाद वे इसी विभाग के डायरेक्टर बनकर उच्चतम पोस्ट पर पहुँच गए। मित्रो यही सिद्धि है। यह कैसे मिली? यह उनके व्यवहार, परिश्रम तथा सात्विक अचार-व्यवहार के कारण मिली और वे प्रगति पथ पर आगे बढ़ सके। उन्होंने उपासना के साथ साधना भी की, जिसका लाभ उन्हें मिल गया। वे ऑपरेटर के साथ-साथ विभाग के अन्य पेंडिंग कार्यों को भी पूरा करते रहे उनके विभाग के लोग उनके कार्य एवं व्यवहार से प्रसन्न रहते थे।

मित्रो, जब हम आगरा में प्रेस में काम करते थे। वहाँ एक हमारे मित्र थे, जो कहते थे कि काम ऐसा करो कि मालिक के हाथ-पैर-तोड़कर रख दो। हमने कहा कि आप हमें जेल भिजवायेंगे क्या? उन्होंने कहा कि इसका मतलब यह है कि मालिक का सारा कामकाज अपने जिम्मे ले लो, तो मालिक आप पर निर्भर हो जाएगा, साथ ही आपकी इज्जत भी करेगा। चन्द्रभान जी, जिनके बारे में अभी मैंने बताया, वे इसी प्रकार अपने ऑफिसर के हाथ- पैर तोड़ते चले गए। आगे जब भी मौका आता था तब अपने अफसर से कहते कि हमारा प्रमोशन नहीं हो सकता? अफसर कहता अवश्य होगा, वे परीक्षा में बैठते और ऑफिसर उनका सहयोग कर देता था। इस प्रकार उनकी प्रगति होती चली गयी। उनका पहनावा -ड्रेस भी बहुत सीधा- सादा था। लोगों को उनकी सादगी से प्रेम था।

मित्रों! मैं आपको अभी व्यवहार की सिद्धियाँ बता रहा था, आहार की सिद्धियाँ बता रहा था कि आप अपनी जबान पर काबू पाइए तथा सबके मित्र बनते चले जाइये। पिछले दिनों हमने आपको बतलाया भी था कि जब हम अज्ञातवास में गए थे तो एक साल तक केवल शाक-भाजी पर जिन्दा रहे। आप तो आडम्बर में आकर न जाने क्या-क्या खाते चले गए। आपने प्राकृतिक चिकित्सा की पुस्तकें भी पढ़ी, परन्तु आपने कभी उस पर चलने का प्रयास नहीं किया। आपने समय का संयम भी नहीं किया। इस कारण आप उन्नतिशील भी बन न सके। जापान एवं अमेरिका के लोग सारे दिन भजन नहीं करते, परन्तु वे कितनी प्रगति पर है। वे अपने समय का एक मिनट भी बर्बाद नहीं करते है हमारा बच्चा जब कमाने लगता है और हम बूढ़े हो जाते है, तो घर में बैठे रहते है, मक्खी मारते रहते है। जबकि बुड्ढे गाँधी ने बहुत काम किया। बूढ़े जवाहर ने लगभग पिचहत्तर वर्ष की उम्र में भी अठारह-अठारह घंटे काम किया। जवान आदमी की तरह ही बूढ़े व्यक्ति को भी काम करना चाहिए। कामचोर-हरामखोर हमें पसंद नहीं है। साधना, जो मनुष्य को उत्कृष्ट बना देती है, इसी संदर्भ में, मैं बतला रहा था जो आपको अपने दिमाग में बैठा लेना चाहिए। कल हमने आपको बतलाया था कि मन को काबू में कर लेने के बाद भगवान का ध्यान कैसे करना चाहिए? गायत्री माता का ध्यान कैसे करना चाहिए? उन्हें बार-बार घूम-घूमकर देखना होगा, ताकि आपका इधर-उधर भागने वाला मन काबू में रहे तथा आप उनसे सम्बन्ध रख सके। इसके लिए आपको मन की साधना करनी पड़ेगी। मन की साधना के दो माध्यम है। पहला है- विवेक और दूसरा- साहस। इनके द्वारा ही हम ऋद्धि- सिद्धियों से भरते चले जाते है। अपने आहार-विहार को ठीक करने के बाद अपनी प्रगति होती चली जाती है। मनुष्य के अंतःकरण में बैठा हुआ विवेक और साहस जब जाग्रत हो जाता है, तो इन दो आधारों पर ही मनुष्य जो चाहे प्राप्त करता हुआ चला जाता है।

मित्रो! राजस्थान में एक संस्कृत के अध्यापक थे- हीरालाल शास्त्री। शास्त्री जी की पत्नी की मृत्यु हो गयी। हमारे आपके साथ ऐसा हो जाने पर या तो आत्महत्या कर लेंगे या दूसरी शादी कर लेंगे। परन्तु संस्कृत का वह अध्यापक गाँव चला गया। उसने कहा कि उस महान नारी ने हमें आनंद-उल्लास से भर दिया था, हमारे अन्दर विवेक, साहस जाग्रत कर दिया था। उसके मरने के बाद उसकी याद में हम इस गाँव के अंदर कुछ करना चाहते है। हम उसके प्रति अपना फर्ज अदा करना चाहते है। इस गाँव की कन्याओं को हम पढ़ाना चाहते है। वे नौकरी छोड़ कर गाँव आ गए और एक पेड़ के नीचे बैठकर उस गाँव की कन्याओं को पढ़ाने लगे। तीस दिन की रोटी का प्रबंध तीस घरों से हो गया और वह अपने आदर्श-कर्तव्यों पर आरूढ़ हो गए तथा पूरी निष्ठा के साथ उस कार्य को करने लगे। आदर्श-सिद्धाँतों का धनी वह उस स्कूल को चलाता चला गया। लोग आए और मदद करते चले गए। विद्यालय का काम सुचारु रूप से चलने लगा।

मित्रो, शीरीं-फरहाद की कहानी आप जानते है। शीरीं को फरहाद चाहता था। राजा ने इस समस्या का हल करना चाहा तथा फरहाद को इस रास्ते से अलग करने का मन बना लिया। उसने एक योजना बनायीं। फरहाद से कहा कि देख-इस पहाड़ के उस पार एक नदी है। इसको काटकर उधर से नहर लानी है। फरहाद का प्रेम अमर था। उसने कहा की ठीक है, हम वैसा ही करेंगे। उसने कुल्हाड़ी उठायी और पहाड़ को काटकर नहर ले आया। लोगों ने भी सहयोग दिया। इस साधना को देखकर राजा को शीरीं का हाथ फरहाद के हाथ में देना पड़ा।

इसी प्रकार उस अध्यापक का विद्यालय चल पड़ा तथा कुछ ही दिनों में वह राजस्थान का एक महान विद्यालय बन गया। वह व्यक्ति राजस्थान का मुख्यमंत्री भी बन गया। उस हीरालाल शास्त्री को सब लोग ने पसंद किया तथा उसे सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री बनाया गया। मित्रों, इस तरह विवेक की सिद्धियाँ प्राप्त करने वाले लोग महान बनते चले गए, उनकी प्रगति के रास्ते खुलते चले गए। साथियों! एक छोकरी थी। उसकी शादी एक दरोगा के लड़के के साथ हो गयी थी। दरोगा शराब पीता था तथा उस लड़के को भी शराब की लत लग गयी थी। वह भी अट्ठारह साल की उम्र से ही शराब पीने लगा। छोकरी ससुराल आयी, उस घर का सारा दृश्य देखा, परन्तु घबराई नहीं। अपने पति की सेवा करती रही और अपनी कर्तव्य-परायणता पर अडिग रही। उसका पति रोज बारह बजे रात में आता था, तब तक वह जागती रहती थी। उसको भोजन कराके ही वह भोजन करती थी। चूँकि उसके परिवार वालों ने बताया था कि पत्नी को पति को भोजन कराके खाना चाहिए।

एक दिन रात को दो बज गए। वह आया ही नहीं। आटा गूँथकर रखा था, चूल्हा जल रहा था। थोड़ी देर के बाद वह आया, तो काफी शराब पी रखी थी। आते ही उलटी करने लगा। सारे कपड़े खराब कर दिए। पत्नी ने सफाई की, नहलाया-धुलाया तथा सुला दिया। सुबह आँख खुली तो उसने देखा कि चूल्हा जल रहा है, आटा गुँथा रखा है। उसने पत्नी से पूछा कि क्या तुमने खाना नहीं खाया? पत्नी बोली- भला मैं कैसे खा लेती। मेरे माता पिता ने कहा है कि पति के खाने के बाद खाना तथा उसकी सेवा करना। कल रात्रि में जब आप आए तो काफी मात्रा में शराब पी रखी थी। हमने सफाई की, क्योंकि आपने उलटी कर दी थी। आपने जब भोजन नहीं किया तो फिर हम कैसे कर लेते?

मित्रो! उस करुणा की देवी, वात्सल्य की देवी की आवाज आत्मा में पहुँची, वह द्रवित हो गया। उसे आत्मग्लानि हुई तथा उसी दिन से उसने शराब न पीने का संकल्प ले लिया। साथियों आगे चलकर वही व्यक्ति मुँशीराम, स्वामी श्रद्धानन्द नाम से विख्यात हुआ। उनके द्वारा स्थापित गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय कितना महान है। वह मालवीय द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय के समक्ष एक दूसरा विश्वविद्यालय है।

विवेक के आधार पर आत्मचिंतन करने वाला व्यक्ति स्वामी श्रद्धानन्द बन गया। आदर्शवादिता की ओर अग्रसर कर देने वाला विवेक बड़ा महान है। विवेक मनुष्य को कहाँ-से-कहाँ उछालकर ले जाता है। सिद्धियाँ मनुष्य के भीतर पड़ी है। अगर विवेक के आधार पर हम चले, तो सब कुछ प्राप्त कर सकते है।

एक बार हम महाराष्ट्र गए और महर्षि कर्वे के आश्रम से यह सीखकर आए कि महिलाओं की सेवा किस तरह से हो सकती है? महर्षि कर्वे के आश्रम में जाकर मैंने यह सब सीखा। उन्होंने कहा कि मैं बंधन का जीवन नहीं जीना चाहता और न ही नौकरी करना चाहता हूँ। मैं तो देश, समाज तथा संस्कृति की सेवा करना चाहता हूँ। इस दुनिया के अंतर्गत जो भी पीड़ित और पतित है, उनकी मैं सेवा करना चाहता हूँ। जो दुखी है, उनकी आँखों के आँसू पोंछना चाहता हूँ। उनके आश्रम में जाकर हमने भी एक प्रेरणा प्राप्त की थी कि नौकरी नहीं करेंगे तथा दूसरों को भी नौकर नहीं बनने की शिक्षा नहीं देंगे। महर्षि कर्वे ने भी जीवनभर गुलामी नहीं की।

मित्रो! उनके पिताजी ने सभी लड़कों को तीन-तीन हजार रुपये दिए थे। महर्षि कर्वे ने उसे जमा कर दिया और सेवा में लग गए। साथियों, बच्चों को फोकट का खिलाना ठीक नहीं है। इससे बच्चे बिगड़ जाते है। यह अनीति एवं अत्याचार है। बच्चों को कुसंस्कारी, भ्रष्ट एवं दुराचारी बनाना है, तो उनके हाथों में बेकार के, मुफ्त के पैसे थमा दीजिये।

अगर आप अपने बच्चों को कर्तव्य-परायणता के पाठ पढ़ाते चले जाए तो आपके बच्चे हीरे एवं मोती के बनते चले जायेंगे, परन्तु अगर आपने बेईमानी से कमाया तथा उन्हें अन्न खिलाया तो उसका असर उन पर अवश्य होगा। अगर आप फोकट का धन छोड़ते है तथा यह सोचते है कि इससे बेटा खाएगा, तो यह आपकी भारी भूल है। मित्रों, इस धन को बेटा नहीं खाएगा, वरन् यह धन ही बेटे को खा जाएगा। उसे बर्बाद करेगा। विवेक की सिद्धियाँ अगर आपको प्राप्त करनी है, तो आप सरदार पटेल बनने का प्रयास करें। लालबहादुर शास्त्री को नाना ने ढाई रुपये दिए थे, जो उनके जीवन में चमत्कार करता हुआ चला गया। उनने जवाहरलाल नेहरू के ऊपर अपनी छाप छोड़ी और भारत के प्रधानमंत्री बने। यह है विवेक की सिद्धि, जिसे आप तो समझते ही नहीं है। विचार भी नहीं करते है। बच्चों को फिजूलखर्च कराते चले जाते है।

मित्रो, सातवलेकर ने रिटायर्ड होने के बाद अपने विवेक का काम लिया और संस्कृत पढ़ाना प्रारंभ किया, तो वह महानता को प्राप्त हो गये। उनने चारों वेदों को भाष्य किया और हिन्दुस्तान में सम्मान प्रपात किया साथियों! यह है विवेक की उपासना, जो सातवलेकर ने की और उच्चतम स्थान तक पहुँच गए। मछली पानी को चीरती हुई आगे बढ़ती है, उसी प्रकार अध्यात्मवादी आदमी अपना रास्ता स्वयं बनाते हुए चले जाते है। उनका रास्ता कोई नहीं रोक सकता है।

मित्रो! मथुरा के राजा महेंद्र प्रताप ने विवेक की उपासना की थी। लोगों ने कहा कि आपके बच्चे नहीं है अतः आपको दूसरी शादी करनी चाहिए या फिर कोई बच्चा गोद लेना चाहिये, नहीं तो वंश कैसे चलेगा? उन्होंने कहा कि ऐसा संभव नहीं है। हमें देश, संस्कृति की सेवा करनी है। असंख्य ऐसे बच्चे है जिनकी पढ़ाई नहीं होती, जो गरीबी की मार से दबे रहते है, उनकी हमें सेवा करनी है। उन्होंने आपने मन में विचार किया और मालवीय जी को नामकरण संस्कार कराने के लिए बुलाया।

संस्कार के समय सब सोच में पड़ गए कि यहाँ तो कोई बच्चा नहीं है, फिर किसका संस्कार होगा? लोगों ने सोचा दासी आती होगी और अपने साथ किसी बच्चे को लाएगी। थोड़ी देर बाद राजा साहब ने कहा कि रानी के बच्चे नहीं है, हमारे बच्चे हुए है। लोग बड़े आश्चर्यचकित हुए कि कहीं राजा के बच्चे भी होते है? उन्होंने एक थाली में रखी चादर हटाई और लोगों को दिखाया कि यही हमारा बच्चा है, जिसका नाम आदरणीय मालवीय जी ने प्रेम महाविद्यालय रखा है। यहाँ बच्चों की पढ़ाई होगी। बच्चे विवेकवान होंगे तथा देश, समाज और संस्कृति की सेवा करेंगे। हमारा नाम जो रोशन होगा, वह ऐसे बच्चों से ही होगा। उसमें देश के विभूतिवान व्यक्ति अध्यापक रखे गए थे। उसमें पढ़ाई भी आश्चर्यजनक हुई। इस विद्यालय में विवेकवान, विभूतिवान, आदर्शवान विद्यार्थी निकले। जिन्होंने देश, समाज तथा राजा महेंद्र प्रताप का नाम उज्ज्वल किया।

मित्रो! यह विवेक की सिद्धि महान थी, जिसने राजा महेंद्र प्रताप को ऊँचा उठा दिया। आज अज्ञान में डूबे लोग, अहंकार में डूबे लोग उपासना के सही अर्थों को समझ नहीं पाते है। वास्तव में विवेक की सिद्धि महान स्थान रखती है। छोटे से गाँव में पैदा हुए व्यक्ति डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति हो गए। यह विवेक की सिद्धि है।


अखंड ज्योतिः आज से पचास वर्ष पूर्व - आपको यज्ञोपवीत धारण करना ही चाहिए

यज्ञोपवीत का भारतीय धर्म में सर्वोपरि स्थान है। इसे द्विजत्व का प्रतीक माना गया है। द्विजत्व का अर्थ है- दूसरा जन्म, मनुष्यता के उत्तरदायित्वों को स्वीकार करके नयी भूमिका में प्रवेश। जो लोग मनुष्यता की जिम्मेदारियों को उठाने के लिए तैयार नहीं, पाशविक वृत्तियों में इतने जकड़े हुए है कि तहँ मानवता का भार वहाँ अनहित कर सकते, उनको अन्प्वीतश् शब्द से शास्त्रकारों ने तिरस्कृत किया है और उनके लिए आदेश किया है कि वे आत्मोन्नति करने वाली मंडली से अपने पृथक-बहिष्कृत एवं निकृष्ट स्तर का मानें।

ऐसे लोगों को वेदपाठ-यज्ञ-ताप आदि सत्साधनाओं का भी अनाधिकारी ठहराया गया है, क्योंकि जिसका आधार ही मजबूत नहीं, वह स्वयं खड़ा कैसे रह सकता है, धार्मिक कृत्यों का भार कैसे वहाँ कर सकता है?

भारतीय धर्मशास्त्रों की दृष्टि में मनुष्य का यह आवश्यक कर्तव्य है कि वह अनेक योनियों में भ्रमण करने के कारण संचित हुए पाशविक संस्कारों का परिमार्जन करके मनुष्योचित संस्कारों को धारण करे। इस धारणा को ही उन्होंने द्विजत्व के नाम से घोषित किया है। कोई भी व्यक्ति जन्म से द्विज नहीं होता है, माता के गर्भ से तो सभी शूद्र उत्पन्न होते है, शुभ संस्कारों को धारण करने से वे द्विज बनते है। एक स्थिति से दूसरी स्थिति में पदार्पण करने के परिवर्तन पद्धति को उपनयन कहा गया है।

देखने में यज्ञोपवीत कुछ लड़ों का सूत्र मात्र है, जो कंधे पर पड़ा रहता है। इसमें स्थूलरूप से कोई विशेषता नहीं मालूम पड़ती। बाज़ार में दो-दो चार-चार पैसे के जनेऊ बिकते है। स्थूल दृष्टि से यही उसकी कीमत है तथा मोटेतौर से वह उस वर्ण की पहचान है, जिसमें उसका जन्म हुआ है। वस्तुतः बात इतनी मात्र नहीं है, इसके पीछे एक जीवित-जाग्रत दर्शन-शास्त्र छिपा पड़ा है, जो मानवजीवन का उत्तम रीति से गठन-निर्माण विकास कराता हुआ उस स्थान तक ले जाता है, जो जीवधारी का परमलक्ष्य है। यज्ञोपवीत एक ऐसा प्रतीक है, जो बाजारू कीमत से भले ही दो-चार पैसे का हो, पर उनके पीछे एक महान तत्वज्ञान जुड़ा है। इसलिए ऐसा नहीं सोचना चाहिये कि जनेऊ पहनना कंधे पर एक डोर लटका लेना है, वरन् इस प्रकार सोचना चाहिये कि मनुष्य की दैवी- जिम्मेदारियों का एक प्रतीक हमारे कंधे पर अवस्थित है।

मंदिर में जाकर प्रभुप्रतिमा के सम्मुख अनायास ही जो आनंद प्राप्त होता है, वह बिना मंदिर में जाए, चाहे जब कठिनता से प्राप्त होगा। गंगातट पर बैठकर जो पवित्र भावनाएँ उत्पन्न होती है, वे हर स्थान पर मुश्किल से हो सकती है। इसी प्रकार यद्यपि बिना यज्ञोपवीत धारण किये हुए भी दैवी भावनाएँ कोई मनुष्य बेरोक-टोक अपने में उत्पन्न कर सकता है। पर इस परम-पवित्र दिव्यभावना-संपन्न सूत्र को माध्यम बनाकर, हर समय कंधे पर धारण किये रखकर, जितना अपने उत्तरदायित्व को स्मरण रखना सुगम है, उतना बिना उसे धारण किये सुगम नहीं। इसी दृष्टि से हमारे आचार्यों ने प्रत्येक भारतीय मनुष्य बेरोक-टोक अपने में उत्पन्न कर सकता है। पर इस परम-पवित्र दिव्यभावना-संपन्न सूत्र को माध्यम बनाकर, हर समय कंधे पर धारण किये रखकर, जितना अपने उत्तरदायित्व को स्मरण रखना सुगम है, उतना बिना उसे धारण किये सुगम नहीं। इसी दृष्टि से हमारे आचार्यों ने प्रत्येक भारतीय धर्मावलम्बी को यह आदेश दिया था कि वह द्विजत्व की जिम्मेदारी का बोझ अपने कंधे पर अनुभव करे, सतत् इस बात का स्मरण रखे कि हमें शपथपूर्वक दिव्यत्व की जिम्मेदारी जीवन भर वहन करनी है। जिस प्रकार किसी बात को याद रखने के लिए कपड़े में गाँठ लगाकर स्मरण रखने का माध्यम नियुक्त कर लेते है, उसी प्रकार कंधे पर यज्ञोपवीत धारण करके उपयुक्त बातों को स्मरण रखें। जनेऊ एक ऐसी तख्ती है, जो रोज हमारे जीवनोद्देश्य और जीवनक्रम को व्यवस्थित रखने की याद हर घड़ी दिलाती है।

जिन उच्च भावनाओं के साथ वेद-मन्त्र के माध्यम से अग्नि और देवताओं को साक्षी मानकर यज्ञोपवीत धारण किया जाता है, उससे मनुष्य के सुप्तमानस पर एक विशेष छाप पड़ती है। यह सूत्र यज्ञमय एवं अत्यंत पवित्र है इसके धारण करने से मेरा शरीर पवित्र है, इसलिए इस शरीर को सब प्रकार की अपवित्रताओं से बचाना चाहिये। यह भावना हर उस व्यक्ति के मन में उठनी चाहिए जो जनेऊ धारण करता है। जहाँ इस प्रकार की सात्विक आकांक्षा होगी, वहाँ दैवी-शक्तियाँ इसके संकल्प को पूरा करने में सहायक होगी, उसे प्रेरणा और साहस देंगी। जहाँ वह फिसलेगा उसे रोकेंगी और यदि गिरेगा भी तो उसे फिर उठाएंगी। मनुष्यों! अपने साधारण जन्म से संतुष्ट न रहो। हमारा धर्म हमें आदेश देता है कि श्रेष्ठ जीवन जियो, देवत्व को प्राप्त करो, नरदेह को सफल बनाओ। प्रतिज्ञा करो कि हम इस का अवलंबन करेंगे, जो कल्याणकारी है। इस प्रतिज्ञा के भावों को अपने दिव्यत्व को, पुष्ट और विकसित करने के लिए आपको यज्ञोपवीत धारण करना ही चाहिए।

( कुकर्मों के दुष्परिणाम अदूरदर्शियों को जन्मांधों की तरह नहीं दिख पाते, किन्तु जिनके ज्ञानचक्षु खुले है, वे सम्भलकर पैर रखते है और परमलक्ष्य तक पहुँचते है


अखंड ज्योति के पृष्ठों से झाँकता युगदृष्टा का चिंतन

एकरस, एकनिष्ठ भाव से अपने मार्ग पर चलते हुए एक लम्बी मंजिल हम पूरी कर चुके। विराम का अवसर आया तो यह उत्कंठा तीव्र हो चली कि हमारा परिवार घटियास्तर का जीवन यापन करने का कलंक न ओढ़े रहे। प्रकारांतर से यह लांछन अपने ऊपर भी आता है। हम किस बूते पर अपना सिर गर्व से ऊँचा कर सकेंगे और किस मुख से यह कह सकेंगे कि अपने पीछे कुछ ऐसा छोड़कर आए, जिसे देखकर लोग उसके संचालक का अनुमान लगा सके। ईश्वर की महान कृतियों को देखकर ही उसकी गरिमा का अनुमान लगाया जाता है। हमारा कर्तव्य पोला था या ठोस, यह अनुमान उन लोगों को परख करके लगाया जाएगा, जो हमारे श्रद्धालु एवं अनुयायी कहे जाते है। यदि वे वाचालता भर के प्रशंसक और दंडवत-प्रणाम भर के श्रद्धालु रहे तो माना जाएगा कि सब पोला रहा। असलियत कर्म में सन्निहित है। वास्तविकता की परख क्रिया से होती है। यदि अपने परिवार की क्रियापद्धति का स्तर दूसरे अन्य नरपशुओं जैसा बना रहा, तो हमें स्वयं अपने श्रम और विश्वास की निरर्थकता पर कष्ट होगा और लोगों की दृष्टि में उपहासास्पद बनना पड़ेगा। यह अवसर न आए, इसलिए हम इन दिनों बहुत जोर देकर अपने उद्बोधन का स्वर तीखा करते चले जा रहे है और गतिविधियों में गर्मी ला रहे है ताकि यदि कुछ सजीव लोग अपने साथियों में हो रहे हो, तो आगे आए और मृत-मूर्छित अपनी माँद में जाकर चुपचाप पड़ जाए। 'बात बहुत-काम कुछ नहीं' वाली विडम्बना का तो अब अंत होना ही चाहिए।

युगनिर्माण आन्दोलन एक संस्था नहीं, दिशा है। अनेक काम लेकर इस प्रयोजन के लिए अनेक संगठनों तथा प्रक्रियाओं का उदय होगा। भावी परिवर्तन का श्रेय युगनिर्माण आन्दोलन को मिले, यह आवश्यक नहीं। अनेक नाम रूप हो सकते है और होंगे। इससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। मूल प्रयोजन विवेकशीलता की प्रतिष्ठापना और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन से है, सो हर देश, हर समाज, हर धर्म और क्षेत्र में इन तत्वों का समावेश करने के लिए अभिनव नेतृत्व का उदय होना आवश्यक है।

सार्वजनिक क्षेत्र में धन, पद और यश के लोभी सिंह की खाल ओढ़े श्रृंगाल भर विचरण कर रहे हैं। सच्ची लगन के थोड़े- से भी कर्मवीर क्षेत्र में रहे होते तो विश्व का कायाकल्प हो सकना कठिन रह जाता। इसी अभाव की पूर्ति करने के लिए हम अपने भीतर प्रचंड दावानल उत्पन्न करेंगे, जिनकी ऊष्मा से जंगल-के-जंगल वृक्ष-के-वृक्ष जलते दिखाई पड़े और लोकनिर्माण के जिन साहसी सैनिकों का आज अभाव दिखाई दे रहा है, उसकी कमी भी पूरी की जा सके। अगले दिन बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति के त्रिवेणी किस तरह उद्भूत होती है, उसे लोग आश्चर्य भरी आँखों से देखेंगे। लोकसेवियों की एक ऐसी उत्कृष्ट चतुरंगिणी खड़ी कर देना है, जो असंभव को संभव बना दे, नरक को स्वर्ग में परिणित कर दे, हमारे ज्वलंत जीवन कर्म का अंतिम चमत्कार होगा। अब तक के जिन छिटपुट कामों को देखकर लोग हमें सिद्धपुरुष कहने लगे है, उन्हें अगले दिनों के परोक्ष कर्तृत्व का लेखा-जोखा यदि सूझ पड़े तो वे इससे भी आगे बढ़कर न जाने क्या-क्या कह सकते है।

हमारे दिमाग में गाँधी जी के सत्याग्रह, मजदूरों का घेराव और कम्युनिस्टों की सांस्कृतिक क्रान्ति के कड़वे-मीठे अनुभवों को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी समग्र योजना है, जिससे अराजकता भी न फैले और अवांछनीय तत्वों को बदलने के लिए विवश किया जा सके। उसके लिए जहाँ स्थानीय, व्यक्तिगत और सामूहिक संघर्षों के क्रम चलेंगे, वहाँ स्वयंसेवकों की एक विशाल युगसेना का गठन भी करना होगा, जो बड़े-से -बड़ा त्याग-बलिदान करके अनौचित्य से करारी टक्कर ले सके। भावी महाभारत इसी प्रकार का होगा। यह सेनाओं से नहीं, महामानवों, लोकसेवियों के द्वारा लड़ा जाएगा। सतयुग आने से पूर्व ऐसा महाभारत अनिवार्य है। अवतारों की श्रृंखला सृजन के साथ-साथ संघर्ष की योजना भी साथ लाई है, युगनिर्माण की लालमशाल का निष्कलंक अवतार अगले दिनों इसी भूमिका का सम्पादन करे, तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं मानना चाहिए। प्रचारात्मक, संगठनात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक चतुर्विधि कार्यक्रमों को लेकर युगनिर्माण योजना क्रमशः अपना क्षेत्र बनाती और बढ़ाती चली जाएगी। निस्संदेह इसके पीछे ईश्वरीय इच्छा और महाकाल की विधि-व्यवस्था काम कर रही है। हम केवल उसके उद्घोषक मात्र है। यह आन्दोलन न तो शिथिल होने वाला है और न निरस्त। हमारे चले जाने के बाद वह घटेगा नहीं, हजार-लाख गुना विकसित होगा।


अपनों से अपनी बात - गुरुवर का अंतिम सन्देश पुनः पढ़ा व हृदयंगम किया जाना चाहिए

अपने अंतिम सन्देश में, जो जुलाई १९० की अखंड ज्योति में प्रकाशित हुआ था, परमपूज्य गुरुदेव जी ने कहा कि हमारी शरीरयात्रा होने से किसी को यह नहीं समझना चाहिए कि ज्योति बुझ गई। अब तक के जीवन में जितना कार्य इस स्थूल शरीर ने किया है, उससे सौ गुना सूक्ष्म अंतःकरण से संभव हुआ है। आगे का लक्ष्य विराट है। संसार भर के छह अरब मनुष्यों को अन्तश्चेतना को प्रभावित और प्रेरित करने, उनमें आध्यात्मिक प्रकाश और ब्रह्मवर्चस जगाने का कार्य परमशक्ति से ही संभव है। हम अपने परिजनों को विश्वास दिलाते है कि इस शताब्दी के अंत तक, जब तक सूक्ष्मशरीर कारण के स्तर तक न पहुँच जाए, हम शाँतिकुँज परिसर एवं प्रत्येक परिजन के अंतःकरण में विमान रहकर अपने बालकों में नवजीवन और उत्साह भरते रहेंगे। उनकी समस्या का समाधान इसी प्रकार निकलता रहेगा, जैसा कि हमारी उपस्थिति में उन्हें उपलब्ध होता। हमारे आपसी सम्बन्ध अब और भी प्रगाढ़ हो जायेंगे, क्योंकि हम बिछुड़ने के लिए नहीं जुड़े थे। हमें एक क्षण के लिए भी भुला पाना आत्मीय परिजनों के लिए कठिन हो जाएगा। जिनने पूज्यवर को देखा है, उनका प्यार भरा स्पर्श-ममत्व पाया है, वे ऊपर की पंक्तियों में एक अभिभावक-एक पिता की छलकती भावसंवेदना का दर्शन कर सकते है। जिनने उन्हें नहीं देखा, मात्र उनके कर्तृत्व एवं व्यक्तित्व का दिग्दर्शन उनके लिखे विराट साहित्य या अमृतवाणी के माध्यम से किया है, वे भी अपने लिए सुनिश्चित आश्वासन इन पंक्तियों में पढ़ सकते है। आज जब उनके महाप्रयाण को नौ वर्ष पूरे हो रहे है- संधिकाल की अंतिम घड़ियों में, जहाँ उलटी गिनती आरम्भ हो जाती है, हम प्रवेश कर चुके- हम भली-भाँति अपने कर्तव्य को बार-बार यादकर अपनी दिशा का निर्धारण कर सकते हैं। पिता के देहावसान के बाद पुत्र को, जो सबसे बड़ा है, पगड़ी पहना दी जाती है एवं सारे दायित्व उस पर आ जाते है। धीरे -धीरे ही सही, पर उसमें गंभीरता व प्रौढ़ता विकसित होती चली जाती है एवं पिता की तरह ही सारी जीवन-व्यापार की विभिन्न गतिविधियों का संचालन करता हुआ वह उम्र के पड़ाव पार करता चला जाता है। जहाँ महाशक्ति का अवतरण एक युगपुरुष में हुआ हो व उन्होंने अपनी मात्र स्थूलकाया छोड़ी हो, उनके सूक्ष्म-अस्तित्व के प्रमाण के रूप में शाँतिकुँज, गायत्री तपोभूमि, आँवलखेड़ा, अखंड ज्योति संस्थान एवं ब्रह्मवर्चस रूपी भव्य तीर्थ-स्थापनाएं प्रत्यक्ष सभी को दिखाई पड़ रही हो, किसी को भी मन में यह असमंजस नहीं रखना चाहिए कि अब हमारा क्या होगा, कौन हमें देखेगा। यह इसलिए भी मन में आ सकता है कि परमवन्दनीय माताजी ने भी तो मात्र चार वर्ष बाद अपनी चेतना को उसमें विलीन कर दिया था? शक्ति का उत्तराधिकारी कोई व्यक्ति नहीं, वह शक्तिशाली संगठन होता है, जो ऐसी अवतारी-सत्ताएँ अपने सामने खड़ा कर सकती है। अखंड–ज्योति पाठक-परिजनों का विराट गायत्री परिवार उस अंश को धारण कर वही कार्य विगत नौ वर्ष से पहले अपनी आराध्य मातृसत्ता के साथ एवं पिछले पाँच वर्षों से एक संयुक्त शक्ति के प्रतीक लाल मशाल के साथ करता चला आया है। इस अवधि में गायत्री परिवार के विराट रूप लेने, अखिल विश्व तक उसका विस्तार होने, देवसंस्कृति दिग्विजय के उपक्रम के रूप में गुरुसत्ता के सूक्ष्म साहचर्य व कर्तृत्व को कौन नकार सकता है। यह कार्य जो विगत पाँच वर्षों में सम्पन्न हुआ है, कोई व्यक्ति थोड़े ही कर सकता था। यदि कोई ऐसा समझता है व कहता है कि ऐसा उसके कारण ही संभव हो पाया है, तो उससे बड़ी मूढ़ता व आत्मप्रवंचना ओर क्या हो सकती है। जिस विराट जनमेदनी ने परमपूज्य गुरुदेव एवं वन्दनीय माताजी के आदर्शों को अपना इष्ट-लक्ष्य मानकर

उस वटवृक्ष को सींचा, अपने समयदान-साधनदान-अंशदान से परिपुष्ट किया है-वह भली-भाँति जानती है कि अंतिम सन्देश में जो अभिव्यक्ति गुरुसत्ता ने दी है, वही अब साकार होती चली जा रही है एवं उसकी भवितव्यता की ओर बढ़ रही है, जिसे विराट-विराटतम कहा जा सके। इस पूरी अवधि में किसी भी निष्ठावान् परिजन ने गुरुसत्ता के संदेशानुसार ही एक पल के लिए भी उनको भुला पाने में असमर्थ पाया है। सोते-जागते काम करते, पढ़ाई करते सभी समय मानो वे ही मन-मस्तिष्क पर छाए रहे है। जिस किसी ने भी उनके आदर्शों-निर्धारणों को परे रख थोड़ा भी चिंतन किया है अथवा जीवनशैली बदली है, उसे लोकभर्त्सना के साथ आत्मा की धिक्कार भी सुननी पड़ी है। ( प्रतिभाओं को प्रशिक्षण हेतु भावभरा आमन्त्रण )

ब्रह्मांड जगत की एक बड़ी सुहानी व आकर्षक घटना है-सूर्यग्रहण। ग्रहण सूर्य व चाँद को ही लगता है, तारों को और क्षुद्रग्रहों को नहीं। ग्रहण एक खगोलीय घटना है। विधि के सुनिश्चित क्रमों में विज्ञानजगत द्वारा प्रतिपादित यह विधाता की ऐसी झाँकी है, जिससे ज्ञानीजन-प्रज्ञावान-समझदार प्रभावित नहीं होते। हाँ कुछ प्रभाव पड़ता है, तो शूद्र जीवों पर, पक्षियों पर, वृक्ष-वनस्पतियों पर जो उसे वास्तव में सूर्य का छिप जाना व अन्धकार का आ जाना मान बैठते है। उनकी समझदारी वही तक विकसित है, अतः अधिक-से-अधिक साढ़े सात मिनट की अवधि वाले सूर्यग्रहण की घड़ी में उनका व्यवहार विचित्र-सा दीख पड़ता है, पर वास्तविकता स्पष्ट होते ही थोड़े ही क्षणों बाद उनका सहज जीवनक्रम चल पड़ता है। जीव-जंतु भयभीत हो जाते है-छिपने का प्रयास करते है-अपने घरों की ओर लौटने लगते है, चारों ओर नीरव शाँति छा जाती है। एक सन्नाटा-सा व्याप्त हो जाता है, किन्तु उसी समय ब्रह्माण्डविज्ञानी सौरज्वालाओं का, सूर्य की किरणों का, सूर्य की शाँत व उग्र परिस्थितियों का परीक्षण बड़ी गहराई से, इसे एक अमोल घड़ी मानकर कर रहे होते है। ऐसे अवसर जब भी आते है, वे अपने उपकरण लादकर द्वीप हो तो वहाँ, पहाड़ी हो तो वहाँ जा पहुँचते है व समस्त असुविधाओं में भी इस खगोलीय घटना का बड़ा गहन विश्लेषण व अध्ययन करके ब्रह्मांड के रहस्यों का उद्घाटन करने का प्रयास करते है। इसी समय धर्मपरायण-आस्तिक-निष्ठावान् समझे जाने वाले व्यक्ति जाप करते एवं भगवान से सद्बुद्धि की प्रार्थना करते देखे जाते है। ग्रहण के तुरंत बाद दान-पुण्य भी करते है। एक दूसरा इनसे ऊँचा वर्ग जो ज्ञानी-परमहंसों का होता है, उनके लिए यह रोज की घटना की तरह आ कर चला जाता है व उन पर कहीं इसका प्रभाव नहीं देखा जाता। हमें अपना मूल्याँकन स्वयं करना है। हमारी गुरुसत्ता व उनके द्वारा स्थापित यह विराट मिशन एक ज्वलंत, जाज्वल्यमान सूर्य के सामान है। एक नए जमाने का स्वप्न लेकर इसका अधिष्ठाता इस धरती पर आया था। हम सबको उज्ज्वल भविष्य की रूपरेखा ही नहीं दे गया, सारा ग्राउण्डवर्क स्वयं कर गया अब सूक्ष्मशरीर से वह जो कुछ भी कर रहा है, उसे साधनावर्ष में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। जब सूर्य को ही ग्रहण लगता है- भरे उजाले में एवं अन्धकार में किन्तु पूर्णिमा के प्रकाश के बीच चंद्रमा को, तो यह क्षणिक है- सामयिक है एवं सृष्टिक्रम का दैनंदिन जीवन का अंग है, ऐसा आचरण हमारा होना चाहिए। मान लीजिये हम परमहंस नहीं है, ज्ञानी नहीं है, तो एक अध्यात्म में आस्था रखने वाले चिरपुरातन रीति-रिवाजों को मानने वाले कर्मकाण्डी धर्मभीरु तो है ही। तो हम अपने को गायत्री-जप अनुष्ठान-उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए आगे सुखद समय के लिए स्वयं को तैयार रखना चाहिए। यही हम सभी ने, अधिकाँश परिजनों ने इस साधनावर्ष के सामान्यक्रम में किया भी तो है। बस यह वर्ष एक अद्भुत विलक्षणताओं, दैवी आपदाओं प्रतिकूलताओं से भरा होने के कारण हमसे कुछ अतिरिक्त आध्यात्मिक पुरुषार्थ की अपेक्षा रखता है। युगसंधि महापुरश्चरण के अंतिम दो वर्ष के कारण भी इस विषम समय में हम सभी को स्वयं को श्रेष्ठ-प्रौढ़ स्टार के साधक बनाने का पुरुषार्थ निभाना चाहिए, तब तक जब तक कि उज्ज्वल भविष्य से भरा सतयुग नहीं आ जाता। हाँ यदि हम उन क्षुद्र-नासमझ जीव- जंतुओं जैसा व्यवहार कर रहे हो, जो ग्रहण की अवधि को अन्धकार मान बैठते है, तो यह आत्मसमीक्षा-अपने आत्मिक विकास हेतु कुछ कदम उठाने का समय है। यदि ऐसा न किया गया तो नियति उन्हीं नरकीटकों-नरपशुओं जैसे होनी है।

बार-बार जब दृष्टि आ जाती है पूज्यवर के अंतिम सन्देश पर, तो उनके द्वारा दिया दायित्व याद आने लगता है। कहीं हम भूल तो नहीं कर रहे, कहीं हम पर तो प्रमाद तो हावी नहीं हो रहा है, कहीं हम सनक तो नहीं रहे, कहीं हम ढेरों दिग्विजय, पराक्रमसंपन्न कर मदोन्मत्त तो नहीं हो गए, समीक्षा करने की वेला है यह, क्योंकि शक्ति के उत्तराधिकारी का आचरण, सिंहरूपी गुरुसत्ता के सिंहशावकों का व्यवहार वैसा ही होना चाहिए, विशेषकर तब जबकि विषम वेला सामने आ पहुँची। अपने अंतिम सन्देश में पूज्यवर ने कहा है- ब्रह्मनिष्ठ आत्माओं का उत्पादन, प्रशिक्षण एवं युगपरिवर्तन के महान कार्य में उनका नियोजन बड़ा कार्य है। यह कार्य हमारे उत्तराधिकारी को करना है। शक्ति हमारा काम करेंगी तथा प्रचंड शक्तिप्रवाह अगणित देवात्माओं को इस मिशन से अगले दिन जोड़ेगी। उपयुक्त शब्द हमें बार-बार अपने कर्तव्य की याद कराते है। ब्रह्मनिष्ठ आत्माएँ, उच्चस्तरीय प्रतिभायें क्षेत्र में छुपी पड़ी है। कौन परिवर्तन नहीं चाहता? कौन चाहता है खूनी विध्वंस और महाविनाश? सभी चाहते है परिस्थितियाँ बदलें-विषमताओं का घनघोर-घटाटोप मिटे एवं स्वर्णिम उज्ज्वल प्रभात आये। लगभग सभी ओर से स्वर भी प्रायः यही उभरकर आ रहा है कि इस वर्ष वसंत से आरम्भ हुआ एक विराट परिवार के गायत्री परिजनों का प्रखर साधना वर्ष, एक जनवरी से आरम्भ हुआ १९९९ का नववर्ष, भारतीय पंचांग के अनुसार विक्रम संवत् २०५६ को चैत्र प्रतिपदा से विगत माह आरम्भ हुआ तथा साथ ही कालगणनानुसार युगाब्द ५२०१ जिसका शुभारम्भ भी इसके साथ हुआ अगली शताब्दी के रूप में भारतीय अध्यात्म के सारे विश्वभर छा जाने की प्रक्रिया हिन्दू-संस्कृति के विश्वसंस्कृति बनने के क्रियान्वयन रूप में आया है। यह स्वर मात्र भारत से उठ रहा है, यह बात भी नहीं, पाश्चात्य तत्वचिंतक व द्रष्टास्तर के मनीषी भी अब प्रायः इसी स्तर की चर्चा कर रहे है। भारत के महाशक्ति बनकर उभर कर आने-सारे विश्व के एक विराट कुटुंब के रूप में बंधकर एक संस्कृति- एक भाषा- एक व्यवस्था, एक आचारसंहिता बनने की बात अगले दिनों साकार होती दिखे तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए।

प्रतिभाओं को आत्मबोध हो एवं वे युगपरिवर्तन के कार्य में हाथ बटाना आरम्भ कर दे, यही हम सबको सौंपा गया इस संधिवेला का विशिष्ट दायित्व है। इसी एक सूत्र कार्यक्रम में पूरी शक्ति झोंककर ज्ञानयज्ञ को प्रज्वलित ही नहीं उसकी लपटों को आकाश तक पहुँचा देना हम सबका इस समय का कर्तव्य होना चाहिए। इससे इतर न किसी को सोचना है, न अपनी ओर से कोई कल्पना करनी है तथा अगणित देवात्माएँ इस प्रचंड शक्तिप्रवाह से जुड़ने को तैयार है, तो हम सभी को संचालन-साधक स्तर की प्रौढ़ता अपने अन्दर विकसित करना एवं फिर ऐसे नवरत्नों को खोज-खोजकर नवनिर्माण के कार्य में जुटाना है। इतना स्पष्ट मार्गदर्शन है कि कहीं किसी शक की कोई गुँजाइश ही नहीं।

परमपूज्य गुरुदेव ने अक्टूबर १९८९ की अखंड ज्योति में लिखा है- सन २००० के अंत में युगसंधि-महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति होगी, जिसमें एक करोड़ साधक होंगे। इन ग्यारह वर्षों में एक लाख प्राणवान कार्यकर्ता कार्यक्षेत्र में उतार दिये जाएँगे। इक्कीसवीं सदी इस विश्व की सबसे बड़ी, सबसे व्यापक और सबसे आश्चर्यजनक उथल-पुथलों से भरी क्राँति है। इस अवधि में इतने महामानव दूध में से मलाई की तरह उछलकर ऊपर आयेंगे, जिन्हें देखते हुए श्रेय साधकों द्वारा भगीरथ जैसे गंगावतरण का नाम दिया जा सके। बगीचा लगाने वाले की तीन पीढ़ियाँ मूड मानती है। स्वतंत्रता सैनिक इन दिनों भी गौरवान्वित हो रहे है। यह सृजन कार्य में जुड़े श्रेय का ही कमाल है।

जो भी कुछ वर्णित है, इतना साफ है कि किसी को भी समझाने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। कैसे होगा यह, कौन करेगा यह- यदि यह असमंजस मन में हो तो पूज्यवर के शब्दों से ही उसे दूर भी किया जा सकता है। अक्टूबर १९८८ की अखंड ज्योति में पूज्यवर लिखते है- प्रतिभाएँ अनायास ही नहीं बरस पड़ती, न ही वे उद्भिजों की तरह उग पड़ती है। उन्हें प्रयत्नपूर्वक खोजा, उभारा और खरीदा जाता है। इसके लिए आवश्यक एवं उपयुक्त वातावरण का सृजन किया जाता है इन दिनों शाँतिकुँज में कुछ ऐसा चल रहा है। असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए महाकाल की कोई बड़ी योजना बन रही है। उसे मूर्तरूप देने के लिए दो छोटे, किन्तु अतिमहत्त्वपूर्ण कार्यक्रम सामने आये है, एक आदर्शवादी सहायकों में उमंगों का उभारना और एक सूत्र में, एक परिसर में सम्बन्ध होना, साथ ही कुछ नियमित एवं सृजनात्मक गतिविधियों का आरम्भ करना, जो सद्विचारों को, सत्कार्यों में परिणत कर सकने की भूमिका बना सके। दूसरा कार्य यह कि अनीति विरोधी मोर्चा खड़ा किया जाए, उसे एक प्रयास से आरंभ करके विशाल बनाया जाए। यही है वह अग्रगमन, जिसमें शालीनता के सृजन व अनीति के दमन को दो स्तर की रीति-नीति अपनायी जानी है जिस पर कदम-कदम बढ़ाते हुए नवयुग का अवतरण संभव हो सकता है इस महाजागरण से ही प्रतिभाओं की मूर्छना जगेगी, वे अंगड़ाई लेती हुई दिनमान की ऊर्जा-प्रेरणा से कार्य-क्षेत्र में पौरुष का परिचय देती दृष्टिगोचर होगी।

यदि हमारा विश्वास प्रबल है एवं प्रतिभाएँ कहीं मौजूद है, जो स्वयं को पहचान पा रही है, शाँतिकुँज उन्हें नवयुग के अवतरण की वेला में विशिष्ट प्रशिक्षण हेतु भावभरा आमंत्रण देता है। इन दिनों समाज की हर क्षेत्र से जुड़ी विभूति के लिए संगठन द्वारा अनेकानेक रचनात्मक कार्यक्रमों के प्रशिक्षण की बहुमुखी प्रक्रिया शाँतिकुँज में चली आ रही है। जिसमें भी देश-समाज-संस्कृति के लिए थोड़ी पीड़ा है, कसक है, एवं कुछ कर गुजरने की उमंग मौजूद हो, चाहे आयु कुछ भी हो उसे शाँतिकुँज के विशिष्ट प्रशिक्षणों में भागीदारी करने की बात मन में सोचनी चाहिए। प्रशिक्षण यहाँ लेकर क्षेत्रों में जाकर करने के कितने अनंत अवसर है यह यहाँ आकर ही जाना जा सकता है।

( राजगृह पथ पर जा रहे गौतम बुद्ध ने देखा, एक गृहस्थ भीगे वस्त्र पहने सभी दिशाओं को नमस्कार कर रहा था।

बुद्ध ने पूछा- महाशय! दिशाओं की पूजा का अर्थ क्या है? यह पूजा क्यों करनी चाहिए?

गृहस्थ बोला- यह तो मैं नहीं जानता।

बुद्ध ने कहा- बिना जाने पूजा से क्या लाभ होगा।

गृहस्थ ने कहा - आप ही कृपाकर बतलाए कि दिशाओं की पूजा क्यों करनी चाहिए?

तथागत बोले - पूजा करने की दिशाएँ भिन्न है। माता-पिता और गृहपति पूर्व दिशा है, आचार्य दक्षिण, स्त्री-पुत्र पश्चिम और मित्र आदि उत्तर दिशा में है। सेवक नीची तथा ब्राह्मण ऊँची दिशा है - इनकी पूजा से लाभ होता है। गृहस्थ बोला-ओर तो सब ठीक है, परन्तु सेवकों की पूजा कैसे? वे तो स्वयं मेरी पूजा करते है?

*समाप्त*