आओ! हम भी युगज्योति का स्पर्श पाएँ

सब तरफ हाहाकार-चीत्कार-चारों ओर अंधकार-ही-अंधकार। साधन बहुत,शक्ति,किंतु अंधकार में उनका उपयोग कैसे हो? जिन्हें कुछ चाहिए, कुछ-का-कुछ उठा ले रहे हैं। जिनके पास कुछ देने को है, उन्हें पता नहीं किसे देना है। हर कार्य और उसके लिए हर वस्तु, पर इससे क्या-सभी बेठिकाने-अनर्थ तो होगा ही-कारण अंधकार। इस अंधकार को दूर करो, इसे निकाल बाहर करो- चारों ओर यही चीख-पुकार। यही हमें सब ओर से घेरे है।

एक नन्हा-सा दीपक मुसकराया- कहाँ है अंधकार? हर तरफ से आवाजें उठीं-यहाँ-यहाँ। दीपक पहुँचा- पूछा, कहाँ? उत्तर मिला-हर तरफ। दीपक ने कहा- पर अभी तो कहा जा रहा था ‘यहाँ’! पर यहाँ तो कहीं नहीं है। लोगों न चारों ओर देखा, सारी स्थिति साफ-साफ दीख रही थी। अपनी बात सही न साबित होते देख सभी दीपक पर ही बिगड़ उठे- तुम हमें झूठा साबित करने आए हो। हमारी चोटें देखो, हमारी हालत देखो, यह क्या बिना अंधकार के संभव है? दीपक शाँतभाव से बोला- तुम्हें झूठा सिद्ध करने का नहीं, अपना सत्य समझाने का विचार है, पर जो समझे उसी को तो समझाऊँ। तुमने अपनी चोटें देख लीं- उनमें मलहम लगाओ, मैं अन्य स्थान देखूँ।

दीपक हर आवाज पर गया, पर कहीं अंधकार नहीं मिला। सब जगह वही क्रम दोहराया गया। लोगों ने देखा, अरे सचमुच अंधकार तो दीपक के पहुँचते ही भाग जाता है। जहाँ दीपक होता है, वहाँ साफ-साफ दिखाई पड़ने लगता है। दीपक के चारों ओर भीड़ लग गई। सब प्रसन्नचित्त अपना-अपना काम करने लगे।

एक ने पूछा- अंधकार किसने भगाया? उत्तर मिला- इस ज्योति ने। एक बोला- तो ज्योति हमें दे दो, अपने घर ले जाएँगे। दूसरा बोला- नहीं मुझे दो और मुझे-मुझे का शोर मच गया। दीपक ने कहा- ज्योति सभी के साथ जा सकती है, पर उसकी अपनी शर्त है, कीमत है। लोग हर्षं से पुकार उठे- हम कीमत देंगे, शर्त पूरी करेंगे, ज्योति लेंगे।

तो सुनो, ज्योति वर्तिका पर ठहरती है, पर उसे स्नेहासिक्त होना चाहिए और हाँ उसे धारण करने के लिए ऐसा पात्र जो सीधा रह सके और स्नेह को स्वयं ही न पी जाए। यह सब कर सको, तो फिर ज्योति पाने की तैयारी। कुछ ने सार्थक प्रयास किया, दीपक ने उन्हें स्पर्श किया, वे प्रकाशित हुए और चल पड़े। शेष शिकायत करते रहे।

आज भी हर व्यक्ति के लिए कुछ ऐसा ही अवसर है। युगज्योति हममें से हर एक का आह्वान कर रही है। पर हम हैं कि लाभ उठाने की कोशिश कम, शिकायतें अधिक कर रहे हैं। अच्छा हो, इसके लिए जीवन में साधन जुटाएँ, युगज्योति के संपर्क में आने की साधना करें। फिर तो युगज्योति का स्पर्श पाते ही, जीवन में अंधकार खोजने पर भी नहीं मिलेगा।


कृष्ण आराधिका मीरा

चाँद आसमान में था और चाँदनी धरा पर। पूर्णिमा की उजियारी तारों भरे आकाश को एक अनोखी आभा प्रदान कर रही थी। ऐसे में मीरा जगी हुई थीं। कृष्णप्रेम में बावले उनके प्राण छटपटा रहे थे। वह सोच रही थीं कि यदि वह दो क्षण सितार के स्वरों में अपनी वेदना उतार पाती तो शायद कुछ शाँति मिलती, किंतु उससे महल के अन्य लोगों की निद्रा भंग हो जाएगी?

लेकिन वेदना का भार बढ़ता ही गया और जब रोम-रोम किसी को पुकार उठने को आकुल हो उठा, तो आत्मा का संगीत मंद स्वर में बहिर्गत हो चला-

दरस बिन दूखन लागे नैन।

जब से तुम बिछुरे प्रभुजी कबहुँ न पायो चैन॥

अरे गिरधरनागर! कब देखूँगी तुम्हारी मुखछवि! अब तो हर पल, हर क्षण भारी है। दर्शन के बिना ये आँखें भी दुखने लगी हैं। हे कृष्ण! करवट लेते रात गुजर रही है। टकटकी लगाकर तुम्हारी बाट जोह रही है। जल्दी आओ मेरे स्वामी!

रात बीती, प्रभाव हुआ, तो राणा कुछ ज्यादा ही क्रुद्ध दिखाई पड़े। शायद किसी ने उनसे मीरा की शिकायत कर दी थी कि वह रात-रात भर सोती नहीं, न जाने किसको लक्ष्य करके विरहगीत गुनगुनाया करती हैं। मीरा की ननद ऊदाबाई उन्हें उपदेश देने भी चली आई कि एक विधवा नारी के लिए गायन-वादन वर्जित है। उसे विरहगीत गाते लज्जा आनी चाहिए।

परंतु मीरा ने तो जैसे उसकी ओर देखा ही नहीं। मन की कसक शब्द बनकर बह निकली। वह कहने लगी-ननद जी! वह ध्येय ही कैसा जो बरजने से छूट जाए? वह लगन ही क्या, जो निंदा-स्तुति से बदल जाए। मेरी प्यारी ननद जी! मुझे संसार से कुछ नहीं लेना। यह तन जाए- धन जाए और भले ही सिर भी जाए, परंतु यह रास्ता अब छूटने का नहीं......। उनके शब्दों में टीस थी। वह कह रही थी- मैं सबके बोल सहूँगी। परंतु यह मन का ‘मनका’ टूटने का नहीं, यह सुमिरण तो चलता ही जाएगा- जब तक साँस है और साँस में आस स्थिर है।

लेकिन भैया जोकुपित हैं? ऊदाबाई ने मीरा के देवर राणा विक्रमाजीत के कठोर-क्रोधी स्वभाव की ओर इंगित किया................।

ऊदा की इस बात पर मीरा के अधरों पर मंदस्मित आया और वे बोलीं- अरी बहना! सीसोदिया रूठेगा तो मेरा क्या करेगा? कौन है जो मुझे अपने गोविंद जी के गुणगान से विरत कर दे? यह कहते-कहते उनके होंठों पर हलकी-सी एक व्यंग्य की रेखा आई और उन्होंने कहा- राणा रूठेगा तो अपने राज से निकाल देगा और क्या करेगा, परंतु हरि जो रूठेंगे तो मेरे लिए कहाँ ठौर है? कहाँ जाऊँगी मैं गिरधर से ठुकराई जाकर? ननद जी! यह लोकलाज की डोरी मुझे बाँधने से रही। मेरी कृष्ण नाम की झाँझ कभी टूटने से रही।

ऊदा हार-थककर चली गई। मीरा एकाकिनि बैठी थी। उनका सितार तो मौन था, परंतु हृदयतंत्री के तार झंकृत हो रहे थे और जीवन के सातों स्वरों में साँवले श्याम की साधना जारी थी। जाति से चमार कहे जाने वाले रैदास को उन्होंने अपना सद्गुरु बना लिया था। सारा विरोध इसी को लेकर था।

तभी किसी ने आवाज दी। मन-वीणा की झंकार में एक पल के लिए अवरोध आया। आने वाली कह रही थी- रानी बहू! यह भगवान् का चरणामृत राणा ने भेजा है तुम्हारे लिए। और उसने हाथ का पात्र आगे बढ़ा दिया।

लाओ बहन! जन पड़ता है देवर जी आज इस दुखियारी पर बहुत प्रसन्न हैं; कहती हुई वह उत्साह के साथ गट-गटकर पी गईं संपूर्ण चरणामृत।

चरणामृत कहीं कड़ुआ होता है! इतना तीक्ष्ण! बुद्धि ने हृदय से प्रश्न किया और तब उत्तर दिया मीरा ने-”राणा जी! जहर दियो मैं जाणी।” राणा जी ने नाराज होकर यह जहर भेजा है, क्योंकि मैंने रैदास जी को अपना गुरु बनाया है।

वह अपने कृष्ण की याद करके मुसकराई और उस आने वाली से कहा- बहन! देवर जी से कहना कि यह उन्होंने ठीक ही किया है, क्योंकि जब तक कंचन कसौटी पर नहीं कसा जाता, तब तक विश्वसनीय नहीं होता। परंतु जहाँ तक मेरे बेपरदा रहने की बात है, कहना कि वे अपनी कुलनारियों से परदा कराएँ, मैं तो अपने कृष्ण के हाथ बिकी हुई हूँ- बिरानी हूँ, अतः मेरी चिंता न करें। देवर जी से कहना कि मैं अपने गिरधर तक पहुँचने के लिए ही संतचरणों से जा लिपटी हूँ और लिपटी रहूँगी और कोई भी भय मुझे उनसे विलग नहीं कर सकता। कृष्ण प्रेम ही मेरा सर्वस्व है।


गिलहरी (Kahani)

गिलहरी पूँछ से धूल लाती और समुद्र में डाल आती। वानरों ने पूछा-देवि! तुम्हारी पूँछ की मिट्टी से समुद्र का क्या बिगड़ेगा? तभी वहाँ पहुँचे भगवान् राम ने उसे अपनी गोद में उठाकर कहा- एक-एक कण धूल से एक-एक बूँद पानी सुखा देने के मर्म को समझो वानरो! यह गिलहरी चिरकाल तक सत्कर्म में सहयोग के प्रतीक रूप में सुपूजित रहेगी।


पंद्रह साल बाद सही होता लग रहा उपन्यास

सन् 1984 का वर्ष दूसरे और वर्षों की तरह सामान्य ही था। प्रमुख घटनाओं के तौर पर उस साल अंतरिक्ष शटल चैलेंजर में सवार यात्रियों ने अपना उपग्रह ‘सोलर मैक्स’ अंतरिक्ष में ही सुधारा, उसकी पूरी मरम्मत की और उसे फिर जीवित कर दिया। घटनाएँ और भी घटीं, लेकिन अपाहिज से हो गए शून्य अंतरिक्ष में आवारा चट्टान की तरह यहाँ-से-वहाँ तैर रहे ‘सोलर मैक्स’ की मरम्मत सूचना-विश्व में एक जबरदस्त उपलब्धि के रूप में ख्याति पा गई। जिस सूचना तकनीकी- प्रधान विश्व (इन्फोटे वर्ल्ड) में आज हम रह रहे हैं, उसके निर्माण में 1984 की यह उपलब्धि महत्त्वपूर्ण समझी जाती है। यों उस वर्ष भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या और देश भर में सिख विरोधी दंगे भड़कना भी एक अकल्पनीय घटना और उसकी व्यापक प्रतिक्रिया थी, लेकिन यहाँ सिर्फ सूचना विश्व की ही चर्चा अभीष्ट है।

उपग्रह के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि वाले साल से वर्षों पहले ‘उन्नीस सौ चौरासी’ (1984) शीर्षक उपन्यास बहुत चर्चित हुआ था। जॉर्जऑरवेल के लिखे इस उपन्यास में विज्ञान की सहायता से असीम शक्ति अर्जित कर लेने वाले शासकवर्ग का वर्णन था। इस उपन्यास में वर्णित घटनाक्रमानुसार प्रभुवर्ग इतना शक्तिशाली और साधनसंपन्न हो गया कि उसकी “मर्जी के बिना पत्ता तक नहीं हिलने” वाली कहावत अक्षरशः सही साबित होती दिखाई दी। राज्य में सूचनातंत्र का जाल इस तरह फैला और कसा हुआ चित्रित किया गया था कि नागरिक वही सोचते हैं जो शासक चाहते हैं और इस विश्वास के साथ निर्णय लेते हैं कि जैसे वे स्वयं फैसला ले रहे हों।

सूचनातंत्र और उसके माध्यम से राज्य की पूरी पकड़ में आ जाने की कहानी भविष्यकथन की तरह थी। करीब बीस साल तक चर्चित रहे इस उपन्यास ने भविष्यवाणियों की तरह संदेश दिया कि 1984 में संसार नष्ट हो जाएगा, सभ्यता नष्ट हो जाएगी और मनुष्य बचेगा तो सिर्फ राज्य के हाथों की कठपुतली के रूप में ही। ऐसी कठपुतली, जिसे राज्य के नियामक जब चाहें जैसे हिला-डुला लें और नचा सकें। सन् 1984 में, जॉर्ज ऑरवेल के लिखे इस उपन्यास के आधार पर विद्वानों ने सर्वनाश का अनुमान भी लगाया था। वह वर्ष बीत गया तो जैसे चैन की साँस ली। बहुतों ने इस उपन्यास को साम्यवाद के बढ़ते हुए खतरे से सावधान करने वाले काव्य के रूप में भी लिया। सोवियत संघ का प्रभाव उन दिनों फैल रहा था। उपन्यास का वर्ष बीतने के ठीक सात साल बाद सोवियत संघ का पूरी तरह विघटन हो गया, तो समीक्षकों ने लिखा कि यह मनुष्य को पूरी तरह अपनी पकड़ में रखने वाली व्यवस्था का अंत है।यह शुभ ही हुआ।

लेकिन नहीं। उपन्यास का वर्ष बीतने के पंद्रह साल बाद जॉर्ज ऑरवेल की दूरदृष्टि सही सिद्ध होती दिखाई दे रही है। उपन्यास का आधार सूचना तंत्र के छा जाने और सूचनाविश्व के समृद्ध हो जाने के खतरों पर केंद्रित था। उसके निश्चित ही लाभ भी थे। समीक्षकों को हाल ही में ध्यान आया है कि जॉर्ज ऑरवेल के बताए खतरे अलग तरह से सही सिद्ध हो रहे हैं। शासनतंत्र न सही, उद्योग-व्यापार मनुष्य के चित्त को अपनी जकड़ में ले रहे हैं। लोग जाने-अनजाने उन्हीं विषयों में सोचते और उसी तरह के फैसले लेते हैं जैसे कि उस विश्व के नियामक चाहते हैं।

सूचनाविश्व के आधुनिक और सक्षम-समृद्ध रूप ने इस प्रतिपादन को स्थापित कर दिया है कि मनुष्य ने अब तक जितना विज्ञान विकसित और सिद्ध किया है उसका नब्बे प्रतिशत भाग पिछले पचास वर्षों में ही संभव हुआ, शेष दस प्रतिशत पिछले दो हजार सालों में विकसित हुआ। यह भी कि पिछले पचास वर्षों में विज्ञान जितना विकसित हुआ, उसका पचास प्रतिशत पिछले पंद्रह वर्षों में हुआ। इस अवधि में विकसित विज्ञान और साधनों में सबसे ज्यादा उन्नति सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुई। इतनी प्रगति कि हम जिस अवधि में जी रहे हैं, उसे सूचनायुग कहा जाने लगा है। उपग्रह, दूरसंचार और कंप्यूटर विज्ञान के मेल से बने सूचनायुग ने विश्व कल राजनीति और अर्थव्यवस्था तक बदल दी है।

‘सूचना प्रौद्योगिकी’ के नाम से अभिहित विधा या तकनीक ने जिन रास्तों से दुनिया को मनमरजी के अनुसार बदलना संभव बनाया, उन्हें ‘सूचना हाइवे’ और ‘सूचना सुपर हाइवे’ कहते हैं। अलग-अलग ‘हाइवेज’ में इंटरनेट भी एक सुपर हाइवे है। दूरसंचार और उपग्रह तकनीक से बना लाखों कंप्यूटरों का यह एक ऐसा प्रवाह है, जिसमें हजारों लाइब्रेरियाँ, रेडियो, टीवी चैनल, अखबार, पत्रिकाएँ और नवीनतम सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती हैं। मुश्किल से एक वर्गमीटर जगह घेरने वाले कंप्यूटर के जरिए घर बैठे सुदूर देशों के पुस्तकालयों-संदर्भकेंद्रों और घर या कार्यालयों से मनचाही जानकारी मँगाई जा सकती है। बीस-पच्चीस साल पहले सूचनाओं और जानकारियों को इकट्ठा करने के लिए एक बड़ा तंत्र बनाना पड़ता था। अब उसकी आवश्यकता नहीं रह गई। पलक झपकते ही दुनिया के किसी भी कोने से जानकारी मँगाई जा सकती है। अब बहुत जगह घेरने वाली लाइब्रेरियां और मोटी-मोटी पुस्तकें सँभालकर रखने की जरूरत नहीं रही, एक मामूली-सी माइक्रोचिप्स में वह संकलित और सुरक्षित रखी जा सकती है।

ज्ञान और सूचना के लिए निर्भरता समाप्त हुई। वर्षों तक पढ़ना और यहाँ-वहाँ भटकना जरूरी नहीं रहा। थोड़े-से समय में दुनिया भर के ज्ञानकोष से ज्ञान जुटाया जा सकता है। यह सूचनायुग का विशिष्ट और सकारात्मक पक्ष है। शिक्षा और संस्कार के क्षेत्र में इस प्रौद्योगिकी का उपयोग होता तो मानवीय चेतना और तेजी से ऊपर उठती; लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग मनुष्य के कल्याण की अपेक्षा कुछ लोगों, संगठनों और देशों के स्वार्थ तक सीमित रह गया। निस्संदेह यह उन्हीं के काम की चीज रह गई, जिन्होंने इसे विकसित किया। सूचनायुग के आरंभिक वर्षों में अर्थात् 1980-81 में विकासशील देशों ने इसके कल्याणकारी उपयोग की माँग उठाई थी। उनका कहना था कि अमीर देश अपनी-अपनी पूँजी और साधनों के दम पर गरीब देशों से कच्चा माल उठाते हैं और उसे आकार देकर वापस उन्हीं देशों को बेच देते हैं। खरीद कौड़ियों के मोल होती है और बिक्री रत्नों के दाम। अपेक्षा की गई थी कि सूचनायुग का लाभ संतुलित और मुक्तप्रवाह के रूप में विकासशील देशों को भी मिलेगा। लेकिन सूचना तंत्र पर गिने-चुने देशों का कब्जा है। वे उसी तरह की जानकारियाँ देंगे, जो उनके लिए अनुकूल हो।

विकासशील देशों की अपेक्षाएँ निरस्त करते हुए विकसित देशों ने कहा कि सूचनाओं का प्रवाह ‘मुक्त’ होना चाहिए। उसे संतुलित रखने का कोई अर्थ नहीं है। इससे प्रगति में, बाधा आएगी, उन्हीं देशों की चली। यह तथ्य अपरिचित नहीं है कि मुक्तप्रवाह का अर्थ शक्तिशाली और साधनसंपन्न के हाथों में दुधारी तलवार देना है। उस तलवार से वह कमजोर को निरंतर दबाता व काटता रहेगा। प्रतियोगिता में वह कभी खड़ा ही नहीं रह सकेगा।

विभिन्न विषयों की चर्चा नहीं करें; समाचारों के क्षेत्र में ही इन दिनों कुछ देशों की गिनी-चुनी कंपनियाँ छाई हुई हैं। उनमें भी पश्चिम की चार प्रमुख एजेंसियों ने समाचारों और प्रसारणों के नब्बे प्रतिशत भाग पर नियंत्रण कर रखा है। चार एजेंसियाँ जैसी सूचनाएँ देना चाहेंगी, वैसी ही मिलेंगी। उनके अलावा जानकारी जुटाने का कोई जरिया आसानी से उपलब्ध नहीं है।

सूचना प्रौद्योगिकी का सबसे बड़ा खतरा है कि उससे लोगों के मन-मस्तिष्क प्रभावित किए जा सकते हैं। जिस काम के लिए पहले बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी जाती थीं और रक्त बहाया जाता था, वह आज सूचनातंत्र से मामूली हेर-फेर से किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, शिकायत है कि इन दिनों नायक की दृष्टि से कोई प्रेरक चरित्र नहीं है, जो उत्कर्ष और सेवा के लिए प्रेरित करे। कारण यही है कि सूचनातंत्र को उस तरह की जानकारी देने में कोई लाभ नहीं दिखाई देता। जिन लोगों के हाथ में यह तंत्र है उनकी दिलचस्पी सिर्फ अपना उत्पाद खपाने में है। वह उत्पाद उपभोक्ता सामग्री के रूप में हो या विचारों के रूप में।

विश्व के महाबली देश और सूचनातंत्र पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों से सिर्फ वही जानकारियाँ लोगों को मिलती हैं, जिनसे उन देशों या कंपनियों का लाभ होता हो। जरूरी नहीं कि जरूरी और उपयोगी सूचनाएँ हमें मिलें। विकसित देशों में भी नागरिकों को शिकायत रहती है कि उन्हें सही जानकारियाँ नहीं मिलतीं। प्रसिद्ध लेखक एच. बैन्सन ने अपनी पुस्तक ‘द एवार्ड’ में सवाल उठाया है कि हम ऐसे विषयों के बारे में बहुत-सी जानकारी रखते हैं जिनकी हमें कोई जरूरत ही नहीं है। इसके अलावा ऐसी सूचनाएँ बाढ़ की तरह आ रही हैं, जो समग्र विकास की प्राथमिकताओं को तोड़ती-मरोड़ती हैं। लेखक ने सोवियत संघ के पराभव के बाद ‘वैश्वीकरण’ और ‘मुक्त अर्थ-व्यवस्था’ के विचार का उल्लेख किया है। उनका कहना है कि इस विचार ने पूरे वातावरण को जैसे निगल लिया ‘वैश्वीकरण’ और ‘मुक्त अर्थव्यवस्था’ का दर्शन चंद महाबली देशों के आर्थिक साम्राज्य को सुदृढ़ करने के लिए गढ़ा गया। सूचनातंत्र के जरिए यह विचार इस तरह फैलाया गया कि दुनिया भर के मुल्क इस पर मुग्ध हैं।

निजी और पारिवारिक जीवन के आदर्शों के लोप होते जाने का संकट भी इसी तंत्र की देन है। देश, समाज, कला, संस्कृति, विज्ञान और साहित्य के क्षेत्र में अपना जीवन होम देने वाली विभूतियों की अब चर्या नहीं होती है। उनकी चर्चा का अर्थ है- त्याग, उत्सर्ग और निष्ठा को प्रेरित करना। इन प्रेरणाओं से व्यवसायी वर्ग को कोई मतलब नहीं। सेवा, परोपकार, नैतिकता और सादगी के विचार विलासी बनाने वाले उत्पादों की खपत में लगे तंत्र को निरुत्साहित ही करते हैं। इसलिए महान् विभूतियों के स्थान पर सुँदर-आकर्षक लगने वाले चेहरे-मोहरों, मायालोक रचने वाले नायकों और विलास को ही परमसुख तबाने वाले चरित्रों का बोलबाला है। सूचनातंत्र इन्हीं विचारों और प्रेरणाओं को उकसाता है, प्रोत्साहन देता है।

विचारतंत्र के जरिए हावी हो गए सूचनाविश्व ने आने वाले समय में प्रतिभाओं के लोप होने का संकट खड़ा कर दिया है। मनीषियों ने यह आशंका जताई है कि भविष्य में ऋषि-मुनि-संत-महात्मा और वैज्ञानिकों का विकास शायद असंभव हो जाए। उन प्रतिभाओं के विकास के लिए जिस स्तर की मेधा चाहिए वह रौंदी-सी जा रही है। मेधा सिर्फ स्वतंत्रता के माहौल में ही सुरक्षित रहती है। सूचनातंत्र पहल ही नियत और निहित उद्देश्यों के लिए बच्चों के मन-मस्तिष्क को ढाल देता है। उस स्थिति में स्वतंत्र चिंतन और मेधा का विकास संभव ही नहीं हो पाएगा। दूसरे शब्दों में यह कि प्रतिभाएँ सूचनातंत्र का नियमन करने वाली शक्तियों के अनुशासन में रहेंगी, उन्हीं के लिए काम करेंगी और अपने संस्कार या विवेक के अनुसार कुछ भी निश्चित नहीं कर सकेंगी। मनुष्यजाति के पूरी तरह गुलाम हो जाने की जॉर्ज ऑरवेल की भविष्यवाणी इस अर्थ में सही होने जा रही है। क्या अध्यात्म तंत्र इस सूचना प्रौद्योगिकी की क्राँति को रचनात्मक मोड़ देकर युगपरिवर्तन की प्रक्रिया को प्रशस्त कर सकता है? यह प्रश्नचिह्न संक्राँति वेला में हम सबके समक्ष है।


विवेकशील प्रज्ञावान् (Kahani)

जय-विजय भगवान् विष्णु के द्वारपाल थे। उन्हें अपने इस अधिकार पर घमंड हो गया। उन्हें इसमें अपना अनादर प्रतीत हुआ कि कोई उनसे पूछे बिना ही बैकुँठाधिपति से मिलने चला जाए। इन द्वारपालों ने अपने अधिकार का दुरुपयोग कर नारायणप्रिया लक्ष्मी स्वयं गृहस्वामिनी को भी भीतर जाने से रोक दिया। लक्ष्मी जी शालीन स्वभाववश मौन रह गईं, पर जिस दिन उन्होंने सनक-सनंदन,सनातन और सनत्कुमार जैसे महात्माओं को रोक दिया तब वे चुप न रहे। उन्होंने दोनों को असुर होने का श्राप दिया। तीन कल्पों में उन्हें हिरण्याक्ष-हिरण्यकश्यप, रावण-कुँभकरण एवं शिशुपाल-दुर्योधन के रूप में जन्म लेना पड़ा। संतों को तो उन्हें निरहंकारिता का पाठ पढ़ाना था। बैकुँठवासी होने के नाते स्वयं में पूर्णता मानकर अपने आपको पतन के भय से मुक्त मान लेना किसी के लिए भी पराभव का कारण बन सकता है। निष्कर्ष यही है, जब स्वर्ग में बैठा एक उच्च पदाधिकारी भी इस दुर्बलता के कारण रावण आदि असुर योनि को प्राप्त होता है, तो फिर मर्त्यलोक का प्राणी यह कैसे मान लेता है कि वह आत्मा की उपेक्षा कर प्रगति कर सकता है?

प्राचीनकाल की बात है। दुर्दांत दैत्यों ने एक साथ सगे भाइयों के रूप में जन्म लिया। मायानगरी जैसे जादू भरे तीन नगर इन्होंने बनाए। सारे संसारवासी इस माया में भ्रमित हो गए- धर्म का लोप हो गया और अधर्म की विजयदुदुंभी बजने लगी। धर्म ने प्रजापति से विनती की। प्रजापति ने महाकाल को-भगवान् शंकर को इसके लिए नियोजित किया, क्योंकि वे ही परिवर्तनों के अधिष्ठाता देवता हैं। पूरी बात भगवान ने सुनी और स्थिति को समझा। तीन पुर बसाने वाले वे दैत्य यद्यपि दीखते अलग-अलग थे, पर वस्तुतः पूर्णतया घुले-मिले थे। उन्हें वरदान मिला हुआ था कि जब मरेंगे तो एक ही साथ एक ही शस्त्र से। महाकाल ने यह स्थिति देखते हुए त्रिशूल बनाया, जिसमें एक ही शस्त्र पर तीन मुख होने के कारण वह तीनों दैत्यों का एक साथ संहार कर सकता था।उन्होंने पूरे वेग से त्रिशूल का प्रहार कर तीनों दैत्यों की शक्ति को विदीर्ण कर डाला। धर्म की जीत हुई। महाकाल की इस विजय का सर्व? अभिनंदन हुआ और इस विजय के उपलक्ष्य में उन्हें त्रिपुरारि कहा जाने लगा।

ये त्रिपुरियाँ हैं- 1-लोभ 2-मोह 3-अहं। नीति का विचार किए बिना अनावश्यक संग्रह इंद्रियों के असंयम एवं विलासिता की वृद्धि रूपी व्यामोह तथा थोड़े-से व्यक्तियों को ही अपना माने का मोह, अपनी क्षुद्र सत्ता पर अहंकार एवं उद्धत महत्त्वाकांक्षाएं-ये ही वे भवबंधन हैं, जिनमें सामान्यजन शहद के लोभ में लिपटी मक्खियों की भाँति फँसे-तड़पते जीवन बिताते हैं।

विवेकशील प्रज्ञावान् अपने अंदर आदर्शवादी दूरदर्शिता विकसित कर इन तीनों रिपुओं से संघर्ष करते हैं एवं प्रचंड पुरुषार्थ द्वारा धर्म की पुनर्स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं।


संवेदना का जागरण ही भटकन रोक पाएगा

आतंकवाद बर्बरता तथा हृदयहीनता का पर्याय है। तीव्र मानसिक कुँठा एवं आत्महीनता जब विद्रोही हो जाती है, तो विद्रोह की यही ज्वाला आतंकवाद बनकर सारे समाज को जलाने लगती है। आतंकवाद कई तरह के होते हैं- साँप्रदायिक, वैचारिक, नस्लवादी तथा राजनीतिक आतंकवाद। उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप में जार ने रूस में इसका प्रयोग किया था। अनेक राष्ट्राध्यक्ष अपनी कूटनीति के तहत इस आग को हवा देते रहते हैं। रॉबर्ट रंगेल्स सोला के अनुसार राजनीतिक आतंकवाद संपूर्ण विश्व के लिए सबसे अधिक संघातक है। इसकी शुरुआत भले ही प्रतिपक्ष का विनाश करे, किंतु इसकी चरम परिणति स्वयं के विनाश में ही होती है। विशेषज्ञों के मत से वर्तमान आतंकवाद का दौर विश्व के इतिहास में सबसे ज्यादा भयानक और खतरनाक है।

वामपंथी आहतंकवाद फ्रेज फेनन और सात्रे से शुरू हुआ और कार्लोस मेरीगला व हर्बर्ट माक्यूस तक चला गया। यह धारा अब पतन की ओर है। दक्षिणपंथी आतंकवाद की सीमाएँ प्रायः राज्य तक सिमटी रहती हैं। फिर भी ये दोनों आतंकवाद आपस में अविच्छिन्न रूप से संबंधित होते हैं। ज्यादातर आतंकवादी स्वयं को क्राँतिकारी के रूप में प्रचारित करते हैं, परंतु इन दोनों के स्वरूप एवं भावनाओं में मौलिक अंतर है। क्राँति किसी प्राचीन व विगलित परंपरा व तंत्र को हटाकर उच्च आदर्शों की नूतन व्यवस्था को कायम करती है। इस पवित्र और पावन उद्देश्य के लिए हिंसा-हत्या का सहारा लेना बहुत मजबूरी के तहत होता है, जबकि उग्रवाद या आतंकवाद का लक्ष्य इसके एकदम विपरीत होता है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम क्राँति का परिचायक था, लेकिन पंजाब, कश्मीर और असम की समस्याएं मात्र विखंडन, अशांति व असंतोष पैदा करने के लिए हैं।

रूस के विचारक विक्टर विटुकी ने वामपंथी आतंकवाद को लूटमार एवं निर्दयता का पर्याय माना है। उनके अनुसार यह सुलगती आग की भाँति है, जो परिस्थितियों की हवा पाने पर धधक उठती है। अमेरिका के साइकिएट्री के प्रोफेसर फ्रेडरिक जे. हैकर्स ने इसे तीन समूहों में बाँटा है- सनकी, अपराधी और जेहादी। विक्टरविटुकी ने आतंकवाद का गहन विश्लेषण किया है। उनके अनुसार इसमें अधिकतर युवा संलग्न होते हैं, जिनका वैयक्तिक, शैक्षणिक तथा सामाजिक जीवन कुँठाओं से ग्रस्त रहता है। ये भटके हुए बेरोजगार युवक आतंकवादी संगठन में स्वयं को समर्पित कर देते हैं। कभी-कभी तो इसमें अति धनाढ्य वर्ग के ऐसे युवा होते हैं, जो गहरी मानसिक अशांति से ग्रस्त होते हैं।

कुछ भी हो आतंकवाद सामाजिक संरचना में अमानवीय तरीके से परिवर्तन करने के लिए प्रतिबद्ध होता है। इसका भयावह ताँडव प्रायः तीन स्तरों पर होता है- आस्थासंकट, विरोधाभास तथा न्यायिक संघर्ष। आतंकवादी पहला काम भय एवं आतंक के द्वारा सरकार एवं सुव्यवस्था से जनता की आस्था तोड़ने के रूप में करते हैं। इसके लिए वे हर-संभव क्रूर, घटिया, वीभत्स हथकंडों का सहारा लेने से नहीं चूकते। दूसरे वर्ग के अंतर्गत आतंकवादी न केवल देश के कानून में परिवर्तन चाहते हैं, बल्कि संपूर्ण तंत्र को बदल देने की धमकी देते हैं। कभी-कभी तो ये अपने अलग शासन की माँग करते हैं। सरकारी तंत्र तथा राजनीति में आपराधिक तत्त्वों को प्रवेश कराकर सर्वत्र भ्रष्टाचार फैला देते हैं। उनकी इस हरकत के कारण देश में सर्वत्र न्यायिक संघर्ष पैदा हो जाता है। प्रशासन एवं जनता के बीच स्पष्ट विभाजक रेखा बन जाती है। इससे समुचे देश का भविष्य धुँधलाने लगता है।

सन् 1981 में अपने देश में आतंकवाद का जोर पंजाब प्राँत में शुरू हुआ। इसकी आग से सारा पंजाब एक दशक से अधिक वर्षों तक जलता रहा। सन् 1981 से 1992 के बीच बारह वर्षों में 1920 आतंकवादी घटनाएँ हुईं। इस अवधि में 11,584 सामान्यजनों सहित 1,689 सैनिकों को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा। इसी दौरान 15 करोड़ 18 लाख 51 हजार एवं 165 रुपये की संपत्ति तबाह हुई। अनेकों बार सामूहिक नरसंहार हुआ। आतंकवादियों ने राजनेता, उच्चपदस्थ अधिकारी तथा पत्रकारों को चुन-चुनकर अपनी गोली का निशाना बनाया। अपनी राह में रोड़े अटकाने वाले किसी भी शख्स को उन्होंने नहीं बख्शा। सन् 1988 से 1992 के बीच 320 राजनेता मेरे गए, इसके अतिरिक्त 8 ज्यूडीशियल अधिकारी, 33 उच्चपदस्थ अधिकारी, 62 बैंक अधिकारी तथा 34 अध्यापक इस आतंकवाद की भेंट चढ़ गए।

पंजाब की आग अभी ठंडी नहीं हो पाई थी कि पड़ोसी देश पाकिस्तान के अराजक तत्त्वों ने कश्मीर में आतंक का भयंकर जाल बुना। भारत का स्वर्ग कहलाने वाला यह प्रदेश खून की नदियों से आप्लावित हो गया। पिछले कुछ सालों में यहाँ तकरीबन 20,000 व्यक्ति आतंकवाद की भेंट चढ़ गए। जनवरी सन् 1990 से अब तक 34,760 वारदातें हुईं। सन् 1996 में 666 अपहरण हुए। पिछले सात सालों के दौरान 2671 लोग अपहृत हुए, जिसमें मुख्यतया चार विदेशी थे। अपहरण की संख्या 1990 में 169, 1991 में 290, 1992 में 281, 1993 में 349 तथा 1994 में 360 थी। बंधकों में से 73% लोगों को मार दिया गया। सुरक्षा सेनाएँ भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकीं। सन् 1990 से अब तक सैकड़ों निर्दोष सैनिक मारे गए, हालांकि इस क्रम में आतंकवादियों को भी अपने किए का परिणाम भुगतना पड़ा।

आतंकवादियों का उद्देश्य भीषण रूप से भय और आतंक को पैदा करके मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना है। आतंकवादी तीन तरीके से अपनी कार्ययोजना को परिचालित करते हैं- आतंक, हिंसा तथा हत्या। इनका उद्देश्य मात्र हत्या या हिंसा नहीं होता, बल्कि संपूर्ण संप्रदाय, समाज तथा राष्ट्र को आतंकित करना होता है। ये पूरे क्षेत्र में भय, हिंसा, असुरक्षा का ऐसा दहशत भरा माहौल पनपा देते हैं- जिससे लोगों का जीना दूभर हो जाता है। जितना नुकसान इनकी हत्या-हिंसा से होता है, उससे कहीं ज्यादा नुकसान आतंक फैलने से होता है।

नक्सलवाद आतंकवाद का ऐसा ही हिंसात्मक परिचय और पर्याय है। सन् 1960 के दशक में पहले−पहल इसका स्पष्ट नजारा देखने में आया। इस दौर में अपने देश में 30 नक्सलाइट समूह क्रियाशील थे। इन्होंने मुख्यतया आंध्रप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब, उत्तरप्रदेश तथा महाराष्ट्र में अपना जाल बिछाया हुआ है। आंध्रप्रदेश नक्सलवादियों का गढ़ है। यहाँ पन सन् 1981 से 1990 के दस वर्षों के दौरान 2994 घटनाएँ घटीं जिसमें 430 निर्दोष लोगों की जान गईं। सन् 1991 से सन् 1993 के तीन वर्षों में ही 2494 मुठभेड़ों में 604 लोग मारे गए। मध्यप्रदेश की 182 घटनाओं में 93, महाराष्ट्र की 237 घटनाओं में 49, उड़ीसा की 29 घटनाओं में 20, पश्चिम बंगाल की 51 घटनाओं में 15 लोग मारे गए। बिहार की स्थिति तो और बद्तर है। यहाँ 1333 वारदातों में 640 से भी अधिक लोग मारे जा चुके हैं।

आतंकवाद का साया उत्तरपूर्वी भारत जैसे- आसाम, नागालैंड, मणिपुर आदि प्रदेशों में काफी भयावह है। यहाँ इनके संगठन एन. एस. सी. एन. (नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड) यू. एल. एफ. ए. (यूनाइटेड लिबरेशनल फ्रंट ऑफ आसाम), यू. एन. एल. एफ. (यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट) और पी.एल. ए. (पीपुल लिबरेशन आर्मी) के रूप में सक्रिय हैं। इन आतंकवादियों द्वारा पूर्वोत्तर राज्यों में घटनाएँ एवं मारे गए लोगों की संख्या चिंताजनक है। सन् 1991 से अबतक अनेकों वारदातों में अगणित लोग मारे जा चुके हैं। करोड़ों रुपये की राष्ट्रीय संपत्ति स्वाहा हो चुकी है।

आतंकवाद या उग्रवाद मात्र भारत की ही ज्वलंत समस्या नहीं है वरन् यह एक अहम अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा है। पश्चिम जर्मनी में सन् 1960 के दशक में रेडिकल स्टूडेंट मूवमेंट ने आतंकवादी गतिविधियाँ शुरू कीं। अर्जेंटीना तथा अलसल्वाडोर में आतंकवादियों ने डेथ स्क्वायड बनाया है। पेलेस्टीनियन, इस्लामिक जेहाद ने अपनी कार्यशैली में परिवर्तन कर आतंकवाद का कुख्यात तंत्र ही खड़ा कर दिया है। इटली, म्यामार, आयरलैंड, इंडोनेशिया में राजनीतिक आतंकवाद का प्रयोग जारी है। ईरान, पाकिस्तान, लीबिया, सीरिया, सूडान, उत्तरी कोरिया में विधिवत् आतंकवाद का पालन-पोषण किया जाता है। श्रीलंका में पल-बढ़ रहा एल. टी. टी. ई. का कुख्यात होना तो विश्वप्रसिद्ध है। इसके द्वारा पिछले एक दशक में हजारों लोगों, राजनेताओं सहित अपार संपत्ति नष्ट की जा चुकी है।

ब्रिटेन, फ्राँस, स्पेन, लेबनान, मिश्र, इजराइल आदि देशों की तरह अमेरिका में भी आतंकवाद की छाया गहराने लगी हैं। इस भयावह दंश से सुरक्षित समझा जाने वाला यह देश भी आतंकवाद के जाल में जकड़ता जा रहा है। 19 अप्रैल 1993 में अमेरिका के ओकलाहामा सिटी में एक ट्रकबम का विस्फोट किया था। इस घटना में 81 व्यक्ति मारे गए तथा 100 व्यक्ति लापता बताए गए। अमेरिकी रिपोर्टों के अनुसार यहाँ करीब 20 राज्यों में ईसाई आतंकवादी संगठन और उनकी निजी वाहिनियाँ सक्रिय हैं। एक सर्वेक्षण से पता चला है कि अमेरिका में ईसाई आतंकवादी संगठनों की निजी वाहिनियों में करीब एक लाख सैनिक हैं। मिशिगन उग्रवाद संगठन में सदस्यों की संख्या 12 से 15 हजार तक बताई जाती है। वाकोकाँड भी इसी आतंकवादी अभियान का परिणाम माना जाता है। इसके अलावा अमेरिका में कई श्वेत श्रेष्ठतावादी ईसाई आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं।

किसी समूहविशेष के विरुद्ध हिंसा का प्रयोग भी आतंकवाद का एक रूप है। पाकिस्तान अपने देश में धर्म के नाम पर आतंकवाद एवं अलगाववाद का जहर घोल रहा है। एक अन्य प्रकार के आतंकवाद में जहाँ खुद वहाँ वहाँ की सरकार अपने लोगों पर अत्याचार करती है और किसी जाति या समूहविशेष को आतंक की राजनीति के तहत उनका मुँह बंद करती है। स्टालिन ने खुद अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए पूर्व सोवियत संघ के कई कम्युनिस्ट नेताओं को मौत के घाट उतार दिया था। लैटिन अमेरिका में कई ऐसे देश हैं, जहाँ पर तानाशाहों ने आतंक की राजनीति के द्वारा अपने स्वार्थों को साधा है। 1981 में अलसलवाडोर के सैनिकों ने वहाँ के नागरिकों पर बुरी तरह से कहर बरपा दिया। यूगांडा में मुख्य रूप से दो जातियों के लोग रहते हैं। जो समर्थ जाति है वह सरकार से बाहर होने के कारण प्रशासनिक तौर पर कमजोर है। परंतु मात्र 15 फीसदी वाली जाति सरकार से गठजोड़ करके दूसरी जाति पर आतंक बरपा कर रही है। 1987 से 1997 के बीच यूगांडा में इस जातीय आतंकवाद से लाखों लोगों की हत्या हुई। सच तो यह है कि अब दुनिया का कोई कोना आतंकवाद की लपटों से अछूता नहीं रह गया है।

वेद मारवाह ने अपनी पुस्तक ‘अपविविल वार’ में आतंकवाद के कतिपय रहस्यात्मक तथ्यों का खुलासा किया है। इनके अनुसार आतंकवादी जनसामान्य व समाज के दिलोदिमाग में दरार पैदा कर अशांति, असुरक्षा तथा विद्रोह की भावना को जगा देते हैं। सारा समाज व राष्ट्र इसकी आग में झुलसने लगता है। इसके दुष्चक्र में विकास अवरुद्ध होकर रह जाता है। आतंकवाद की इस विध्वंसात्मक व विस्फोटक मनःस्थिति का अध्ययन करने पर पता चलता है कि अधिकतर वे युवा जो लक्ष्यहीन होने के साथ प्रतिशोध की आग में जलते रहते हैं, इस जघन्य कृत्य की ओर अग्रसर होते हैं। मार्थाकोसाँ के अनुसार जब परिस्थिति के कारण व्यक्ति अपने आपको असहाय व उपेक्षित समझता है, तो वह स्वयं को दुश्मन समझ बैठता है, जिसका परिणाम होता है- आतंकवादी बनना। वहाँ इसके इन मनोविकारों को और बढ़ावा मिलता है।

आतंकवादियों के मनोविश्लेषण हेतु अमेरिका और ब्रिटेन में काफी शोध हुआ है। इनके शोध-अनुसंधान से स्पष्ट होता है कि इनकी मानसिक संरचना बड़ी जटिल होती है। अनेकानेक मनोग्रंथियों में इनकी जीवनधारा फँसी और उलझी रहती है। सच तो यह है कि इनकी सोचने-समझे की शक्ति लुप्त हो जाती है। ये स्वयं नहीं सोच पाते कि वे क्या कर रहे है? क्यों कर रहे हैं और किसके लिए यह सब कर रहे हैं?

आतंकवादियों की हरकतों एवं आतंकवाद के कुचक्र से निबटने के लिए समूची दुनिया की सरकारों के साथ अपने देश की भी केंद्रीय सरकार के साथ राज्य सरकारें यथासाध्य प्रयत्नशील हैं, परंतु इनके वह उपाय तात्कालिक रूप से ही कारगर हो सकते हैं। इनसे स्थायी समाधान निकल पाना संभव नहीं। स्थायी समाधान और निदान के लिए तो इन हजारों−हजार दिग्भ्रमित एवं भटके हुए नवयुवकों को उनकी इस भटकन से उबारना होगा। इसके लिए आर्थिक स्वावलंबन एवं रोजगार तो कारगर उपाय हैं ही। इसी के साथ उनमें उस संवेदना का जागरण भी अनिवार्य है, जो उन्हें उनके मानवीय, राष्ट्रीय एवं सामाजिक दायित्व का बोध कराएँ। ऐसा होने पर ही उलटे को उलटकर सीधा कर पाना संभव होगा। ध्वंस सृजन का रूप ले लेगा और उस उज्ज्वल भविष्य की कल्पना साकार होगी, जिसके लिए केवल हम ही नहीं स्वयमेव महाकाल संकल्पित है।


संयम, सहनशीलता और स्परिक सहकार का महत्त्व (Kahani)

काफी वर्षों पूर्व जापान में एक मंत्री श्री ओ. पी. शाद्र हुए हैं। उनका परिवार सारे जापान में सबसे बड़ा परिवार था। इस भरेपूरे परिवार में कुल सदस्यों की संख्या एक हजार से भी ज्यादा थी। इस विशाल परिवार में कभी किसी ने तू-तू, मैं-मैं तक नहीं सुनी थी।

इस शालीन परिवार की ख्याति तत्कालीन जापानी सम्राट् यामातो तक पहुँची, तो उसने वास्तविकता की जाँच करनी चाही। इसके लिए सम्राट् ओ. पी. शाद्र के घर पहुँचे। वृद्ध मंत्री ने सम्राट् का यथोचित आदर-सत्कार किया। सम्राट् ने वृद्ध मंत्री से इतने बड़े परिवार की शालीनता एवं सज्जनता का कारण पूछा।

वृद्ध मंत्री ने संयतवाणी में कहा-”हमारे परिवार का हर सदस्य संयम, सहनशीलता और स्परिक सहकार का महत्त्व समझता है। शालीनता को बनाए रखना सभी अपनी पवित्र साधना का एक महत्त्वपूर्ण अंग मानते हैं।” सम्राट् ने परिवारसंस्था में गुणों के समावेश एवं इस प्रकार संभव हुए विकास की महत्ता को समझा एवं अन्य नागरिकों के लिए इसे एक आचरण संहिता के रूप में अपनाने को कहा।

प्रचेता एक ऋषि के पुत्र थे। स्वयं भी दिन-अनुदिन तप संचय कर रहे थे, किंतु उनका स्वभाव बड़ा क्रोधी था। उन्होंने क्रोध को एक व्यसन बना लिया था और जब-तब उससे हानि उठाते रहते थे। किंतु न जाने वे अपनी इस दुर्बलता को दूर क्यों नहीं करते थे, इस दुरभिसंधि की उपेक्षा करने से होता यह था कि एक लंबी साधना से प्रचेता जो आध्यात्मिक शक्ति संचय करते थे वह किसी कारण से क्रोध करके नष्ट कर लेते थे। अस्तु एक मानसिक तनाव बना रहने से उनका स्वभाव खराब होता गया और वे जरा-जरा-सी बात पर उत्तेजित हो उठते थे। एक बार वे एक वीथिका से गुजर रहे थे। उसी समय दूसरी ओर से कल्याणपाद नाम का एक और व्यक्ति आ गया। दोनों एक-दूसरे के सामने आ गए। पथ बहुत सँकरा था। एक के राह छोड़े बिना, दूसरा जा नहीं सकता था, लेकिन कोई भी रास्ता छोड़ने को तैयार न हुआ और हठपूर्वक आमने-सामने खड़े रहे। थोड़ी देर खड़े रहने पर उन दोनों ने हटना, न हटना प्रतिष्ठा-अप्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया। अजीब स्थिति पैदा हो गई

यहाँ पर समस्या का हल यही था कि जो व्यक्ति अपने को दूसरे से अधिक सभ्य, शिष्ट और समझदार समझता वह हटकर रास्ता दे देता और यही उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण होता। निश्चित था कि प्रचेता कल्याणपाद से श्रेष्ठ थे। एक साधक थे और आध्यात्मिक उन्नति में लगे थे। कल्याणपाद एक धृष्ट और ढीठ व्यक्ति था। यदि ऐसा न होता तो एक महात्मा को रास्ता तो देता ही, साथ ही नमन भी करता। प्रचेता को यह बात समझ लेनी चाहिए थी, किंतु कुस्वभाव के कारण उन्होंने वैसा नहीं किया, बल्कि उसी के स्तर पर उतरकर अड़ गए। कुछ देर दोनों खड़े रहे। पर फिर प्रचेता को क्रोध हो आया। उन्होंने उसे श्राप दे दिया कि राक्षस हो जाए। तप के प्रभाव से कल्याणपाद राक्षस बन गया और प्रचेता को ही खा गया। क्रोध से विनष्ट प्रभाव हुए प्रचेता अपनी रक्षा न कर सके।


योगेश्वर की माया

प्रभु के विराट् स्वरूप का दिव्यदर्शन करने वाले वीरवर अर्जुन अब तो महाभारत के महासमर में विजयश्री पा चुके थे। धर्मराज युधिष्ठिर के धर्मराज्य की यशपताका दिग्दिगंत में अपना प्रभाव विकीर्णित कर रही थी। अभी हाल में संपन्न हुए अश्वमेध महायज्ञ से जहाँ युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा और भी अधिक प्रतिष्ठित हुई, वहीं महावीर अर्जुन के रणकौशल के सामने सभी को नतमस्तक होना पड़ा। अर्जुन समेत सभी पाँडव इसको कृष्णकृपा का चमत्कार मानते थे।

अपने आराध्य की कृपा को भक्त अपना अधिकार मानता है। भगवान् भी भक्तवत्सल हैं, वे भी हर पल-हर क्षण अपने भक्त पर भाँति-भाँति से कृपादृष्टि करते रहते हैं। हाँ उनकी इस कृपा के रंग-रूप अवश्य विविध-बहुविध होते हैं। उस दिन भी अश्वमेध यज्ञ की समाप्ति के बाद अर्जुन ने श्रीकृष्ण से निवेदन किया, “प्रभो! महाभारत के महासागर के मैदान में मैंने आपके विराट् स्वरूप के दर्शन किए थे। प्रभु! उस दिव्यदर्शन ने मेरे जीवन को धन्य कर दिया है। मेरी एक आकाँक्षा और भी है।”

“कहो सखा!” अंतर्यामी भक्तवत्सल प्रभु मुसकराए।

“जन-जन आपको मायापति कहता है। मैं भी आपकी इस माया को देखना चाहता हूँ।” अर्जुन के स्वरों में उनकी उत्कट इच्छा झलक रही थी। वे बोले- “स्वयं आपने भी मुझे गीता का उपदेश करते हुए ‘मन माया दुरत्यया’ कहा था। आखिर वह दुरूह माया कैसी है? मैं उसे जानना चाहता हूँ।”

भगवान् इशत् मुसकराए और कहने लगे- “पार्थ! जब तुम कहते हो, तो मैं तुम्हारी इस इच्छा को भी पूरा करूंगा, किंतु समय आने दो।”

इस वार्ता को हुए काफी समय बीत गया। अर्जुन भी भूल ही गए कि मैंने भगवान् से उनकी माया के चमत्कारदर्शन की प्रार्थना की थी।

एक प्रातः भगवान् कृष्ण आए और आते ही कहने लगे- “हे अर्जुन! मुझे बहुत जोर से भूख लग रही है। शीघ्रता से भोजन कराओ।”

महारानी द्रौपदी ने कहा- “आप थोड़े समय रुकें केशव! मैं अभी भोजन तैयार किए देती हूँ।”

द्रौपदी के इस आश्वासन के बावजूद भगवान् की अधीरता कम नहीं हुई। वह तो आज कुछ और ही सोचकर आए थे। भगवान् की अधीरता एवं व्यग्रता को कम करने के लिए अर्जुन ने उनसे कहा-”माधव! जब तक द्रौपदी भोजन तैयार करें, तब तक हम लोग नदी पर स्नान कर आएँ।”

कृष्ण को भला इसमें क्या आपत्ति हो सकती थी। दोनों स्नान के लिए नदी की ओर चल दिए। अर्जुन चाहते थे कि स्नान करके लौटने में थोड़ा समय अधिक लगे, ताकि द्रौपदी वापस लौटने तक खाना बना लें। इसलिए वह धीरे-धीरे बढ़ रहे थे। अंतर्यामी प्रभु सब कुछ जानते हुए नासमझ की तरह चले जा रहे थे। नदी के तट को आना ही था, सो वह आ गया। दोनों मित्र अधोवस्त्रों में नदीस्नान करने के उद्देश्य से घुस गए। उसी समय अर्जुन के हृदय में विचार उत्पन्न हुआ, क्यों न कोई ऐसा खेल किया जाए, जिससे थोड़ा अधिक समय बीत जाए।

अर्जुन ने तत्काल कृष्ण से कहा- “आज हम लोग शर्त लगाकर देखते हैं कि पानी के अंदर कौन अधिक देर तक रह सकता है?”

कृष्ण सहर्ष तैयार हो गए। दोनों ने पानी में गोता लगाया। अर्जुन अपने प्रयास के बावजूद पानी के अंदर अधिक देर तक न ठहर सके। उन्होंने अपना मुँह पानी से बाहर निकाला। पानी से मुँह निकालते ही वह चकित रह गए। वहाँ न तो कृष्ण थे, न वह किनारा, न ही वह स्थान।

अब वह कर भी क्या सकते थे। तत्काल नदी से बाहर निकालकर किनारे-किनारे चल पड़े। अपनी उधेड़बुन में वह यह भी भूल गए कि वह स्नान करने भरी दुपहरी में आए थे, किंतु इस समय सूर्योदय होने वाला था। अपनी राह पर चलते हुए उन्हें एक विशाल नगर दिखाई देने लगा। वह शीघ्रता से उस ओर बढ़े। नगरद्वार पर पहुँचते ही उनकी भेंट उस नगर के प्रधानमंत्री एवं सेनापति से हुई। वे सब उन्हें बिना समय गँवाए राजदरबार में ले आए।

राजदरबार में पहुँचते ही प्रधान आमात्य ने निवेदन किया-”श्रीमन्! हमारे महाराज रात्रि में स्वर्गवासी हो गए हैं। उनका कोई वारिस नहीं है। इस राज्य का नियम है राजा की मृत्यु के बाद उसका वारिस न होने पर जो भी व्यक्ति प्रातःकाल सर्वप्रथम दिखाई दे, उसे ही राजा बना दिया जाएं अर्जुन कुछ कह न सके। उन्हें वहाँ का शासक बनना पड़ा। उन्हें अपने सखा कृष्ण एवं बंधुओं की याद बार-बार सताती रही। पर वे विवश थे। इसी विवशता में मंत्रियों के अत्यधिक आग्रह से उन्हें विवाह भी करना पड़ा।

अब उन्हें राजा बने काफी समय व्यतीत हो गया। उनकी पत्नी अनिंद्य सुँदरी थी। इस बीच उनके तीन पुत्र भी हो गए थे। उनका जीवन, परिवार तथा राज्य संतोषप्रद स्थिति में चल रहा था।

तभी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में महारानी की मृत्यु हो गई। महारानी का शव नदी किनारे श्मशान घाट पर लाया गया। अर्जुन भी साथ थे। उन्हें यह देखकर आश्चर्य हो रहा था कि श्मशान में दो चिताओं का निर्माण किया जा रहा है। वह अभी कुछ सोच पाते, उससे पूर्व ही महारानी के शव को नगरवासियों ने एक चिता पर रख दिया। दूसरी चिता पर वे अर्जुन को पकड़कर रखने लगे। अर्जुन द्वारा विरोध करने पर नगरवासियों ने उन्हें समझाया- हमारे राज्य का नियम है कि पत्नी की मृत्यु के बाद पति को पत्नी के साथ जिंदा जलकर ‘सती’ होना पड़ता है।

पहले तो अर्जुन ने उनसे काफी अनुनय-विनय की। किंतु कुछ परिणाम न निकलने पर उन्होंने कुछ सोचते हुए नगरवासियों से कहा-”आप लोगों की बात मानने में मुझे कोई हर्ज नहीं है, परंतु इसके पहले मुझे नदी में स्नान की अनुमति दें।” अपने इस प्रयास के साथ ही उन्हें कृष्ण पर क्रोध भी आ रहा था।

अर्जुन ने पानी में गोता लगाया और पानी के भीतर-भीतर बहने का प्रयास करने लगे। परंतु तभी समवेत आवाजें उन्हें सुनाई पड़ीं, “पकड़ो-पकड़ो भागने न पाए।” वे यह सब सुनकर भयभीत हो रहे थे। किंतु पानी में कितने समय वे अंदर रह सकते थे? रुककर उन्होंने अपना मुख बाहर निकाला, सोचा अब तो मरना ही है।

पर यह क्या? यहाँ तो पहले का कुछ नहीं था। यह तो उनका अपना नगर था। वह अभी कुछ सोच पाते, तभी श्रीकृष्ण ने भी पानी से अपना मुँह बाहर निकालकर हँसते हुए कहा- “अर्जुन तुम हार गए, मैं जीत गया।”

अर्जुन तो हैरत में थे। वर्षों तक राज्य, पत्नी, पुत्र-वह सब क्या था? कृष्ण उनकी परेशानी जानते हुए भी कह रहे थे,”अरे भाई! इस शर्त में तुम हार गए, तो क्या हुआ? आप घर चलो, मुझे जोरों की भूख लगी है।” अर्जुन जैसे-तैसे घर की ओर वापस चले। जाते समय वह सोच रहे थे कि इतने समय में द्रौपदी ने न जाने कितनी बार खाना बनाया होगा। पर घर पहुँचने पर तो वह हैरान रह गए, द्रौपदी तो अभी तक सब्जी छील रही थी। कृष्ण ने आते ही व्याकुलता दिखाते हुए कहा- “अभी तक खाना नहीं बना, मुझे जोरों से भूख लगी है।”

तब द्रौपदी ने कहा-”आप लोगों को नदी तक जाने-आने में कुछ क्षण ही तो हुए हैं।” यह सुनकर तो अर्जुन और हैरान रह गए। अर्जुन को चिंतित देख द्रौपदी ने पूछा-”भोजन तो मुझे बनाना है, आप क्यों चिंता कर रहे हैं?” तब श्रीकृष्ण ने विनोद में कहा-”हम दोनों ने शर्त लगाई और ये हार गए हैं। इसीलिए परेशान है।”

थोड़ी देर में भोजन तैयार हो गया। अर्जुन-श्रीकृष्ण दोनों ही भोजन करने लगे, पर अर्जुन अभी भी परेशान थे। द्रौपदी के आग्रह पर उन्होंने अपनी आपबीती कह सुनाई। सब कुछ सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण हँसते हुए बोले-”पार्थ! वह मेरी माया का दर्शन था।” अब अर्जुन ने कहा-”प्रभो! अगर आपको माया दिखानी ही थी, तो मुझे कह देते। मैं कैसे मानूँ कि वह आपकी माया ही थी।”

श्रीकृष्ण मुसकराए- “पार्थ! कुछ पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लो।” मेरी माया का भान तुम्हें पुनः हो जाएगा।” अर्जुन ने जैसे ही आँखें बंद कीं, वह पुनः श्मशानघाट पर पहुँच गए। वही पकड़ो-पकड़ो की आवाजें सुनाई देने लगीं। अर्जुन ने घबड़ाकर अपनी आँखें खोल दीं। वह पसीने से तरबतर हो गए। कृष्ण के मुख पर मंद स्मित था।

अर्जुन ने कृष्ण से निवेदन किया-”प्रभु! मैं सर्वतोभावेन आपकी शरण में हूँ। मुझे आपकी माया का चमत्कार नहीं देखना है। मुझे अपनी शरण में ले लो माधव।” कृष्ण का वरद्हस्त अर्जुन के सिर का स्पर्श करने लगा तथा उन्होंने अर्जुन को अपने हृदय से लगा लिया। यह भक्त और भगवान् का अलौकिक मिलन था।


मदालसा पुत्र (Kahani)

मदालसा ने अपने तीनों पुत्रों को आदर्शवादी-निवृत्तिमार्गी साधक बनाया। आरंभ से ही वैसे संस्कार दिए और चिंतन उभारे। पति महाराज ऋतध्वज की इच्छा के कारण चौथे पुत्र अलर्क को राजा बनाया। वैसा ही चिंतन विकसित कर गर्भावस्था से ही संस्कार दिए।

अलर्क ने एक बार पूछा-”माँ! तीनों भाइयों ने आत्मकल्याण के लिए वनवासी, कम सुविधा का जीवन क्यों चुना? साधना तो नगर के सुविधाभरे जीवन में भी हो सकती थी?”

मदालसा बोली-”बेटे! बतलाओ, जिसका उद्देश्य नदी पार करना हो, वह सुविधा-सामग्री युक्त विशाल-किंतु छिद्र वाली नौका चुनेगा या सामान्य-सी छिद्रहीन नौका?” अलर्क ने कहा-”निश्चित रूप से छिद्रहीन नौका चुने जाने योग्य है।”

माँ ने समझाया-”वत्स साँसारिक सुख-सुविधाओं के बीच मनुष्य के व्यक्तित्व में दोषों के छिद्र पैदा होने लगते हैं। साधनायुक्त तपस्वी जीवन जीने से व्यक्तित्व का विकास होता है और प्रखरता आती है। इसीलिए साधक सुविधा भरा जीवन छोड़कर तपस्वी जीवन चुनते हैं, ताकि व्यक्तित्व को छिद्रहीन बनाना। साधनों को जरूरत से ज्यादा महत्त्व मत देना। माँ से शिक्षा पाकर ही अलर्क एक सुयोग्य राजा बना।


जागते रहें, ताकि ध्यान सिद्ध हो

वायुरहित स्थान में अकंप लौ की तरह चित्त की स्थिति हो जाती है, तो ध्यान सिद्ध होने लगता है। तब न तृष्णा और विरति विचलित करती है और न ही आवेग क्षुब्ध करते हैं। वियतनामी बौद्धीिक्षु ‘तिकन्यात’ ने ध्यान की सफलता के लिए इस लक्षण को कसौटी बताया है। विश्वभर में इन दिनों ध्यान के प्रति गहरा आकर्षण है। योग, भक्ति और ज्ञान के प्रति उत्सुकता भी ध्यान से ही प्रेरित है। ध्यान शिक्षक एण्ड्रू कोहेन के अनुसार आधुनिक मनुष्य तनाव और क्षोभ के दौर से गुजर रहा है, उसे विश्राम चाहिए। विश्राम के लिए ध्यान की शरण में जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं।

चित्त को विश्राम मिलना ध्यान की प्रथम सिद्धि है। ‘तिकन्यात’ जिस परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसके प्रवर्तक भगवान् बुद्ध की ही धर्मदेशना है कि प्रथम सीढ़ी पर ही ठहर मत जाना। वासना और तृष्णा की आँधी जब तक पूरी तरह शाँत न हो जाए, ध्यान में स्थित रहना, उसका अभ्यास करना। वह अभ्यास सध जाए तो ध्यान में सहज ही स्थिति हो जाती है, बुद्ध ने सतत् जागरूकता को ध्यान की सिद्धि कहा है। ‘सति मत्थान सूत्र’ में जिन सूत्रों का उपदेश किया गया है, वे इस मार्ग के प्रमुख सिद्धाँतों में गिने जाते हैं। ध्यान का उपदेश देने वाले सभी शिक्षक प्रायः इन्हीं सूत्रों का विवेचन करते आए हैं।

‘सति’ पद का अर्थ है- सचेत अवस्था में रहना। यह आँख खोलकर जागने और आसपास के जगत् को परखते रहने से सर्वथा भिन्न स्थिति है। बुद्ध ने इस अवस्था को ऐसा मार्ग बताया है, जिसमें व्यक्ति शरीर और मन की गुत्थियों को सुलझा लेता है, दुख-दर्द से उबरता हैं वेदना को नष्ट करता और उच्चतम प्रज्ञा को उपलब्ध होता है। पद्मासन या सुखासन लगाकर बैठना और चित्त के प्रवाह को किसी एक विषय में स्थिर करना, इस प्रक्रिया का एक अंग है। दिनचर्या के सामान्य कामकाज जारी रखते हुए भी यह अभ्यास निरंतर जारी रखना चाहिए।

सचेत होने का अभ्यास शरीर, भावना, मन और मन के विषयों के साथ किया जाता है। उन तलों पर जो घटनाएँ होती हैं, प्रतिक्रियाएँ और प्रभाव आते-जाते हैं, उन्हें सिर्फ देखते रहना है, यह गौण है, उनसे प्रफुल्लता आती है या क्षोभ होता है। उनकी चिंता किए बिना देखते रहना है। जब प्रतिक्रियाएँ नहीं होतीं और बोध बना रहता है तो साधक की ध्यान में स्थिति होती है।

सचेत अवस्था की व्याख्या वर्तमान में स्थिर रहने के रूप में भी की जाती है। उसके अनुसार वर्तमान ही सत्य है। अतीत और भविष्य, स्मृति और कल्पना के सिवाय कहीं नहीं हैं। जो क्षण अभी उपलब्ध है, वही जीवन है, शेष स्मृति है। यह क्षण निमिषमात्र भी स्थिर नहीं रहता, बदल जाता हैं उस क्षण को पकड़ने और उसमें स्थिर हो जाने के लिए विभिन्न अभ्यास बताए गए हैं। आरंभ समय की धारणा को ठीक से समझकर होता है। समझ यही है कि समय अनवरत प्रवाह नहीं है। अभी इसी क्षण जो प्रस्तुत है, वही समय है। उसे न बाँटा जा सकता है, न बिताया जा सकता है।

वर्तमान में स्थिर रहने के लिए बौद्ध परंपरा जिन उपायों का वर्णन करती है, वे बोध जगाने के लिए हैं। उदाहरण के लिए, शरीर पर ध्यान के समय कुछ करना नहीं होता। सिर्फ सचेत रहना पड़ता है। दिखाई देने वाली गतिविधियों के साथ सूक्ष्म गतिविधियों के प्रति भी सजग होना पड़ता है। बौद्धभिक्षु तिकन्यात हुन्ह ने बोध अभ्यासक्रम को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि शरीर जब श्वास ले रहा हो तो ज्ञात रहना चाहिए कि साधक श्वास ले रहा है। श्वास जब ठहरा हो तो ज्ञात रहना चाहिए कि विराम है। श्वास को भीतर खींचने, रोकने ओर विराम लेते समय ज्ञात रहे कि ऐसा हो रहा है। चलते समय यह बोध रहे कि चल रहा है, बैठें तो भी ज्ञात होना चाहिए। नहान, धोने, कपड़े पहनने और सोने-बैठने के समय भी ये बोध जाग्रत रहना चाहिए यह ‘धारणा’ बैठकर साधना करने पर ही नहीं, पूरे दिन और प्रत्येक क्षण में करनी चाहिए।

भावनाओं या विचारों की धारण के समय भी ‘साक्षीभाव’ जाग्रत् रहे। देखना चाहिए कि भावनाएँ कैसी व कैसे उठ रही हैं, कैसे विकसित हो रही हैं और किस तरह तिरोहित होती जा रही हैं, वे सुख दे रही हैं या दुख। शरीर के किसी भाग में पीड़ा हो तो साधक अनुभव करे कि पीड़ा किस भाग में हो रही है। उसका उठना, लहर लेना कम-ज्यादा होने के प्रति भी साधक को होश से भरा होना चाहिए। सराहे जाने पर होने वाली खुशी के समय भी उस केंद्र के प्रति सजग रहना चाहिए। यह धारणा प्रत्येक भावना को सहज और शाँत करती है। भावनाओं के प्रति बोध से भरने का अभ्यास थोड़े-बहुत समय नहीं, पूरे दिन और प्रतिक्षण किया जाना चाहिए।

चित्त और उसके विषयों पर ध्यान-धारणा की विधि भी शरीर और मन की तरह ही है। चित्त और उसके विषय शरीर और भावनाओं के ही अधिक सूक्ष्म रूप हैं। शरीर की क्रिया और भावनाओं के वेग के प्रति जागरूक रहने के बाद मन की अवस्था के प्रति बोध पूर्ण हुआ जाता है। दिनभर में मन कई स्थितियों से गुजरता है। उसके आवेश बदलते रहते हैं। हर्ष, विषाद, राग, द्वेष, प्रेम, घृणा, क्रोध, क्षमा, सद्भाव, शाँति और क्षोभ जैसी मनोदशाएं आती-जाती रहती हैं। मन के प्रति बोध से भरने का अर्थ है इन दसों दशाओं के प्रति जागे रहना। हसचेत रहने का अर्थ कारणों की तलाश करना नहीं है। कारण तलाशते हुए चिंतनप्रक्रिया चलने लगती है और बुद्धि अतीत में चली जाती है। कारण जानने के लिए स्मृतियों में जाना ही पड़ेगा। अतीत में चले जाने के बाद सचेत रहने वाली दृष्टि धुँधला जाती है। भगवान् बुद्ध इसीलिए अपने उपदेशों में बारबार सावधान करते हैं कि सिर्फ जागे रहना है। कोई प्रतिक्रिया नहीं करनी है। मन यदि क्षुब्ध हो रहा है, तो केवल देखें कि दुख की लहर उठ रही है। प्रसन्नता हो रही है तो सिर्फ देखें कि चित्त प्रफुल्लित हो रहा हैं क्रोध या आलस्य आए तब भी देखते रहना है कि मन क्रुद्ध हो रहा है या सोने लगा है।

चित्त के विषयों में सचेत होने के बाद बौद्ध ध्यानपद्धति में निर्वाण बताया गया है। निर्वाण का अर्थ है-बुझ जाना। बौद्धदर्शन के अनुसार तृष्णा ही दुख है। तृष्णा मन या चित्त की जीवनीशक्ति है। वह सूख गई तो चित्त को दग्ध करने वाली लपट भी बुझ जाती है। चित्त के पाँच विषय हैं-शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध। व्यक्ति इन विषयों के माध्यम से ही बालजगत् से जुड़ता है। विषयों के प्रति सचेत हो जाने से विचलित और क्षुब्ध करने वाला संबंध टूट जाता है। प्रहरी को जागा हुआ देखकर चोर जिस तरह घर में नहीं घुसते, इसी तरह चेतना के बोध से भरे होने पर विषय साधक के अंतस् को विचलित नहीं करते। वहाँ उनका प्रवेश निषिद्ध हो जाता है।

शरीर, भाव, मन और विषय एक ही सत्ता के सघन-विरल रूप हैं क्रम से उनकी क्रिया और गति के प्रति जागरूकता का अभ्यास ध्यान को समाधि की स्थिति तक पहुँचाता है। गोरखनाथ ने इस स्थिति को ही ‘सहज समाधि’ कहा है। वेदाँत इस ध्यान-धारणा को साक्षीभाव कहता है। वहाँ भी शरीर, मन, बुद्धि, चित्त और जगत् के तल पर जो कुछ भी होता है, उसे देखते रहना है, यह साक्षीभाव अनर्थ से और व्यर्थ से रक्षा करता है। आचार्य वेदाँत देषिक ने सामान्य जीवन में साक्षी सजगता के प्रभाव विभिन्न उदाहरणों से समझाए हैं। उन्हीं में एक उदाहरण बैठे बैठे पाँव हिलाने का है। कई लोगों को खाली बैठने पर पाँव या पंजा हिलाने की आदत होती है। आचार्य वेदाँत देष्कि ने उपदेश के समय किसी साधक को यों ही पंजा हिलाते देखा और टोक दिया था कि अपने पाँव को देखो। साधक की हरकत ही नहीं, आदत भी हमेशा के लिए छूट गई। साक्षीभाव अथवा सचेत अवस्था व्यक्ति को संपूर्ण रूप से जाग्रत् करती है और उसे कषाय-कल्मषों से छुटकारा दिलाती है। शरीर, भाव, मन और विषयों में क्रम से किया गया जागरूकता का अभ्यास उसी दिशा में सीढ़ी-दर-सीढ़ी उत्थान है।


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ध्यान की प्रथम सिद्धि है- चित्त को विश्राम मिलना। बौद्ध धर्म में ध्यान की अनेकानेक पद्धतियाँ हैं। इन सभी में एक बात समान रूप से देखने में आती है कि साधक को जागे रहते हुए साधना में स्थित होने को कहा जाता है। सदैव सचेत रहकर साक्षी भाव में स्थित होकर मन के विकार कैसे नष्ट किए जाएँ, इसी का विवेचन यहाँ प्रस्तुत है।


पाँच प्यारे (Kahani)

गुरु गोविंदसिंह ने एक नरमेध यज्ञ किया। उक्त अवसर पर उन्होंने घोषणा की- भाइयो! देश की स्वाधीनता पाने और अन्याय से मुक्ति के लिए चंडी बलिदान चाहती है, तुममें से जो अपना सिर दे सकता हो, वह आगे आए। गुरु गोविंदसिंह की माँग का सामना करने का किसी में साहस नहीं हो रहा था, तभी दयाराम नामक एक युवक आगे बढ़ा। गुरु उसे एक तरफ ले गए और तलवार चला दी, रक्त की धार बह निकली, लोग भयभीत हो उठे। तभी गुरु गोविंदसिंह फिर सामने आए और फिर पुकार लगाई। अब कौन सिर कटाने आता है। एक-एक कर क्रमशः धर्मदास, मोहकम चंद, हिम्मतराय तथा साहबचंद आए और उनके शीश भी काट लिए गए। बस अब मैदान साफ था। कोई आगे बढ़ने को तैयार न हुआ।

गुरु गोविंदसिंह अब उन पाँचों को बाहर निकाल लाए। विस्मित लोगों को बताया, यह तो निष्ठा और सामर्थ्य की परीक्षा थी, वस्तुतः सिर तो बकरे के काटे गए। तभी भीड़ में से ‘हमारा बलिदान लो-हमारा बलिदान लो’ की आवाज आने लगी। गुरु ने हँसकर कहा- यह पाँच ही तुम पाँच हजार के बराबर हैं, जिनमें निष्ठा और संघर्ष की शक्ति न हो, उन हजारों से निष्ठावान् पाँच अच्छे? इतिहास जानता है इन्हीं पाँच प्यारों ने सिख संगठन को मजबूत बनाया।

जो अवतार प्रकटीकरण के समय सोए नहीं रहते, परिस्थिति और प्रयोजन को पहचानकर इनके काम में लग जाते हैं, वे ही श्रेय-सौभाग्य के अधिकारी होते हैं, अग्रगामी कहलाते हैं।


विश्वास नहीं करें तो भी मंत्र फल देते हैं

विश्वास करें या न करें; अग्नि के समीप बैठें तो आँच लगेगी ही, छूने की कोशिश करें तो वह जलाएगी भी सही। धूप में बैठें तो शरीर गरम होगा। बर्फ को छुएँ तो ठंडक लगेगी। तेज धार को छुएँ और उस पर दबाव दे तो चमड़ी कटेगी, माँस छिलेगा। इन प्रक्रियाओं में विश्वास करना जरूरी नहीं है। प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता, इस उक्ति के आधार पर वस्तु अथवा शक्ति का प्रभाव एक बार सिद्ध हो जाए तो उसकी पुष्टि के लिए प्रमाण नहीं जुटाना पड़ता। मंत्रों की शक्ति के संबंध में ही प्रमाण क्यों प्रस्तुत किए जाते हैं। अगर उनका प्रभाव है तो विश्वास की शर्त क्यों रखी जाती है। बिना विश्वास किए मंत्रों का जप करें तो क्या फल नहीं मिलेगा?

एक साधक पूछते हैं-विश्वास ही फलदायक है, तो कोई विशिष्ट मंत्र जपना ही क्यों जरूरी है? ओम् का जप करने से चित्त शाँत होता है। सिर्फ विश्वास ही फलदायी है, तो ‘ओम्’ के स्थान पर ‘कोक’ या ‘पेप्सी’ शब्द के प्रति ही विश्वास स्थिर कर लिया जाए। वह जप भी ओम् की तरह प्रभावशाली सिद्ध होगा। यह सही है कि मंत्र में सिर्फ विश्वास ही फलदायक नहीं होता। उसका महत्त्व जप-साधना में बल उत्पन्न करने भर के लिए है। विश्वास हो कि लक्ष्य को साधकर छोड़ा गया तीर उसे वेध देगा तो धनुष की डोरी के खिंचवा में बल आएगा। निशाना ठीक से सधेगा। विश्वास हो कि आग पर रखने से रोटी पक जाएगी, तो भोजन तैयार करने की प्रक्रिया व्यवस्थित चल सकेगी। विश्वास हो कि वाहन पर बैठकर की गई यात्रा गंतव्य तक पहुँचा देगी, तो दूरी तय होने के बीच का समय बिना किसी तनाव के बीत जाएगा, अन्यथा इस बीच उठती रहने वाली चिंता मन को थकाएगी और यात्रा के बीच में हो सकने वाले छोटे-मोटे काम भी गड़बड़ा जाएँगे।

मंत्र−साधना की सफलता में विश्वास एक सीमा तक ही उपयोगी है। कुछ आचार्यों के अनुसार वह साधना का तारतम्य और प्रवाह बनाए रखने मात्र के लिए जरूरी है। हो तो ठीक और नहीं हो तो भी ठीक। थोड़ा गिरते-पड़ते ही सही, मंत्र अपना प्रभाव दिखाते ही हैं। मंत्र−साधना को जो आधार सिद्धि तक पहुँचाते हैं, उनमें मुख्य है- शब्द शक्ति, जप या मंत्रों की आवर्तिता और साधक की चर्या

शब्द मंत्र का शरीर है। यह ऋषियों की साधना और परमसत्ता के अनुग्रह से मिलकर बना है। जिन दिव्य आत्माओं की चित्तभूमि में मंत्र प्रकट हुआ उन्हें ही उस मंत्र का ऋषि कहा गया। ऋषियों मंत्रद्रष्टाओं की आर्ष उक्ति इस संबंध में प्रसिद्ध है। मंत्र जिस रूप में प्रकट हुआ, शब्दों का गुँफन और उच्चारण की जो प्रक्रिया निश्चित हुई, वही ऊर्जा प्रकट करती है अन्यथा शब्दों में स्वतंत्र रूप से कोई शक्ति नहीं होती। जिस शब्द को ब्रह्म कहा गया है, वह ‘मंत्र’ स्तर का ही हो। सामान्य व्यवहार में हम जिन शब्दों का दिन-रात प्रयोग करते हैं, उनके लिए ब्रह्म का विशेषण नहीं लगाया जा सकता।

मंत्र यदि सामान्य शब्दों की तरह होते तो वे भी सिद्धि तक नहीं पहुँचाते। नई खोजों के अनुसार, सामान्य शब्दों के जप में जरा भी ऊर्जा नहीं होती, इतनी भी नहीं कि लाख बार उच्चारण करने के बाद पास का तिनका भी हिल जाए। शब्द की सामान्य शक्ति के वैज्ञानिक प्रभाव का अध्ययन करने वालों ने सिर खपाकर जितना पाया है उसका सार यह है कि तीस साल तक निरंतर किसी शब्द को दोहराया जाए तो उससे इतनी ही गरमी पैदा होगी कि सिर्फ एक प्याली पानी गरम किया जा सके। मंत्रों में ऐसी क्या विशेषता है कि उनसे व्यक्ति के भीतर विराट् शक्ति प्रकट हो जाती है? इसका उत्तर बंदूक की गोली छूटते समय होने वाली आवाज के उदाहरण से समझा जाता है। फायर सामने हो या दूर कहीं, दागे जाते समय ‘फट्’ की तेज आवाज होती है और जिसके कान में सुनाई देती है, उनके सीने पर चोट-सी लगती है। ‘फट’ के स्थान पर ‘आ हा’ की ध्वनि निकलती तो चित्त में विश्राम का सा भाव जगता। किसी भी व्यक्ति को ‘आ हा’ कहते देखते है तो बिना बताए समझ आ जाता है कि वह प्रसन्न हो रहा है। दो अक्षर या शब्द उस उल्लास को सुनने वाले तक संचरित करते हैं।

विचार किया जाना चाहिए कि ‘फट’ की आवाज बंदूक का आविष्कार होने के बाद ही सुनाई दी होगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि बंदूक की मारक क्षमता से परिचित होने के कारण यह आवाज दहला देती हो, लेकिन तंत्रशास्त्र बंदूक का आविष्कार होने से शताब्दियों पहले इस शब्द का प्रयोग करता आ रहा है। इस विधा के आचार्य अभिचार कर्मों में ‘फट’ शब्द का प्रयोग बीजमंत्र की तरह करते हैं। प्रयोगों के अभीष्ट परिणाम भी मिलते हैं।

शब्दों और अक्षरों का गुँफन मंत्र को अपने ढंग से जीवंत बनाता है। स्वर और लय के साथ उनका जप सामान्य श्रेणी के परिणाम देते हैं, जैसे कि चित्त की एकाग्रता, मन का लय अथवा काम्यकर्मों में छोटी-मोटी सफलताएँ विशिष्ट प्रभाव उनके ध्वनिरहित जप से ही उत्पन्न होते हैं। कान से सुनी जा सकने वाली ध्वनि को न अध्यात्म ज्यादा महत्त्व देता है और न ही विज्ञान। अध्यात्मक्षेत्र में इसे प्राथमिक स्तर का कहा गया है। शास्त्रवचन प्रसिद्ध है कि वाचिक जप की तुलना में उपांशु जप सौ गुना शक्तिशाली है और उपांशु की तुलना में मानसिक जप सहस्र गुना। वाचिक जप अर्थात् बोलकर किया गया जप, उपांशु जप में होंठ हिलते रहते हैं, लेकिन उच्चारण सुनाई नहीं देता। मानसिक जप में न होंठ हिलते हैं और न जीभ चलती है। जप मन-ही-मन चलता रहता है। प्रभाव की दृष्टि से यही जप शक्तिशाली होता है।

मंत्रशास्त्र के विद्वान डॉ. गोपीनाथ कविराज लिखते हैं कि मन से चलने वाले जप की शक्ति को विज्ञान अभी नहीं माप सका है। वह कानों से सुनी जा सकने वाली ध्वनि को ही माप पाया है। कंठ के भीतर जिन स्थानों से शब्द फूटते हैं, उनके मापने के प्रयत्न नहीं किए गए। मंत्रशास्त्र अभी भी श्रव्यध्वनि को तीसरे स्थान पर मानता है। जिसकी गति, शक्ति और सीमा अत्यल्प हो, जो ध्वनि मंत्र को प्राणवान् बनाती है, वह सूक्ष्म स्तर की होती है और चित्त के तल पर गूँजती है।

जो ध्वनि ‘परा’ स्तर की कही गई है और मन के तल पर गूँजती है, वह शरीर के मर्मस्थलों को प्रभावित करती है। योगशास्त्र में इन केंद्रों को चक्र कहा गया है। छह, सात, आठ, दस और चौदह की संख्या तक अनुभव किए गए चक्रों में प्रत्येक का अपना अक्षर, वर्ण और ध्वनि है। साधन के समय इनका अनुभव होता है। शास्त्र या गुरु से जान लेने के बाद इन की ध्यान-धारणा मर्मस्थलों- शक्तिकेंद्रों अथवा चक्रों को जाग्रत करने में सहायक भी होती है। मानसिक जप इन केंद्रों को अनिवार्य रूप से तरंगित और प्रभावित करता है।

मंत्रविदों का एक वर्ग जप के साथ लय को भी आवश्यक बताता है। उनके अनुसार लय अथवा रिद्म में शब्द का बलाघात, आरोह, अवरोह, ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत आदि का समावेश होता है। गीत नहीं गाया जाए, मात्र संगीत या धुन ही गूँजती रहे तो भी मन दुखी या प्रसन्न हो जाता है। केवल वाद्ययंत्रों की ध्वनि ही हर्ष, विषाद और उल्लास के भाव जगा देती है। छंदशास्त्र का निर्माण इसी आधार पर किया गया है। संस्कृत के प्रसिद्ध काव्यग्रंथों में इस तथ्य को अनुभव किया जा सकता है। अर्थ समझ नहीं आए तो भी पदों की लय अथवा छंद मन को छूते हैं। इस संबंध में कालिदास के लिखे ‘कुमारसंभव’ ग्रंथ का ‘रति-विलाप’ प्रसंग अथवा ‘रघुवंश’ का अज-विलाप’ प्रसिद्ध है। जिन्हें संस्कृत नहीं आती वे भी इन प्रसंगों को सुनकर रो उठते हैं। जगनिक का आल्हा खंड छंद-शास्त्र का स्पष्ट प्रमाण है। उसे पढ़-सुनकर लोगों में रौद्र भाव उत्पन्न होने की घटनाएँ कहानियों की तरह कही-सुनी जाती हैं। मंत्रों में शब्द का छंद, गण और लय का गठन उन्हें प्रभावी बनाता है।

साधक की जीवनचर्या उसे मंत्रों का प्रभाव ग्रहण करने योग्य बनाती है। प्रत्येक मंत्र की सिद्धि, खास तरह का रहन-सहन, खानपान और विधि-निषेध तप है। इस पक्ष को साधना अथवा मंत्र का अनुशासन भी कह सकते हैं गायत्री मंत्र के साधकों को अपना आहार-विहार सात्त्विक और नियमित रखना ही चाहिए। दुर्गा के उपासक थोड़े राजसी स्तर के हो सकते हैं। काली की उपासना में कतिपय क्षेत्रों में थोड़ी छूट दी गई। वह शक्ति के रौद्र पक्ष को ध्यान में रखकर ही दी गई थी। यह विडंबना ही रही कि भोगी और तामसी वृत्ति के लोगों ने उसका दुरुपयोग किया और शक्ति उपासना को ही बदनाम कर दिया। इसी प्रकार राम, हनुमान, विष्णु, कृष्ण, इंद्र, सूर्य आदि देवताओं की आराधना में भी कुछ विशिष्ट विधान रखे गए हैं। सामान्यतः सभी साधनाओं में संयम-नियम का ध्यान रखना अनिवार्य है। उसी स्थिति में यंत्रों का प्रभाव ग्रहण करने योग्य पात्रता आती है। विशिष्ट साधनाओं में कुछ विशेष विधान उस यंत्र की विशिष्ट क्षमता को ध्यान में रखकर ही किया जाता है।

मंत्र−साधना में सही उच्चारण, लय और नियत चर्या का पालन किया जाए, तो निश्चित परिणाम होते हैं। इन तीनों पक्षों का निर्वाह करने के बाद किसी साधक को विश्वास हो या न हो, मंत्र का लाभ मिलेगा ही। अग्नि, ईंधन और पात्र के साथ पानी या आहार का मेल हो तो विश्वास करें न करें, भोजन पकेगा ही। फलदार वृक्ष हो, यात्री हो और तोड़ने के लिए प्रयत्न हो तो फल हस्तगत होकर रहेगा ही। विश्वास करें या न करें, नियत प्रक्रिया संपन्न कर लेने के बाद अभीष्ट कार्य सिद्ध होकर ही रहते हैं। मंत्र भी सिद्ध होते हैं, यह विश्वास साधक को हमेशा रखना चाहिए एवं सतत् उसे दृढ़ बनाव रखना चाहिए।


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बंदूक की गोली छूटती है, तो विश्वास करें या न करें, वह निशाने पर लगकर अपना प्रभाव दिखाती ही है। फूल खिलता है, तो विश्वास करें या न करें सुगंध फैलती ही है। चलने के लिए कदम आगे बढ़ाते हैं तो मंजिल तक पहुँचते ही हैं, भले ही विश्वास न करें। मंत्रों का प्रभाव भी होता है, विश्वास करें या न करें। बिना विश्वास किए भी मंत्र जिस आधार पर फल देते हैं, उन पर एक इस लेख में।


जीवन का अर्थ है सच्ची सुगंध (Kahani)

प्रातःकाल की पवनलहरी आई और गुलाब को स्पर्श कर चली गई। पत्ते ने हँसते गुलाब को देखा तो आगबबूला हो गया। बोला- यह भी कोई जीवन है, माली आता है और असमय में ही तुम्हारी जीवनलीला समाप्त कर देता है। इतने अल्पजीवन में भी क्या आनन्द! मैं रोज देखता हूँ कितने ही फूल खिलते हैं और मुरझा जाते हैं।

गुलाब ने बड़े शाँत स्वर में उत्तर दिया-भाई! जीवन का अर्थ है सच्ची सुगंध। इस प्रकार चारों ओर सुगंधि को फैलाते हुए आमंत्रित मृत्यु ही जीवन और अमरता है।


समरसता ही जीवन है

यह माना जाता रहा है कि बीमारियाँ ऋतुपरिवर्तन से, मक्खी-मच्छरों से, वात-पित्त-कफ के प्रकोप से, विषाणुओं से, छूत से फैलती हैं। गंदगी भ उनका एक मुख्य कारण है, किंतु अब प्रगतिशील विज्ञान ने गहराई में उतरकर यह निष्कर्ष निकाला है कि चेतना को उद्वेलित करने वाले मन की विकृतियाँ रक्त को, तापमान को, अवयवों की ऊर्जा को प्रभावित करती हैं। इसी कारण सजातीय द्रव्य विजातीय में परिवर्तित होता है ओर जहाँ कहीं से इसे फूट निकलने का अवसर मिलता है, वहीं दर्द, ज्वर, सूजन, जकड़न आदि की समस्याएँ पैदा हो जाती हैं।

उपचार करने वाले शारीरिक स्तर पर इसका समाधान ढूँढ़ते और ऐसी युक्ति अपनाते हैं, ताकि पीड़ा देने वाले अंग को सामयिक रूप से सुन्न किया जा सके और उससे उत्पन्न दर्द की अनुभूति को टाला जा सके। इसके अतिरिक्त इंजेक्शन समूचे रक्त में रोगविरोधी तत्त्व भरते हैं अथवा अधिक विकृत अंग को शल्यप्रक्रिया द्वारा पृथक् कर दिया जाता है। प्रचलित अनेकों चिकित्साविधियाँ इसी सिद्धाँत के इर्द-गिर्द घूमती हैं। कारण और निवारण की पुरातन मान्यताओं को ही मिलाजुलाकर निदान और उपचार किया जाता है, फिर भी रोग नियंत्रण में नहीं आते। चिकित्सक और चिकित्सालय बढ़े जाते हैं; पर उसी अनुपात में रोगों में भी बढ़ोत्तरी हो रही है। वे घटना का नाम नहीं लेते। बहुत बार तो ऐसा भी होता है कि नए रोग नई आकृति-प्रकृति धारण कर इस रूप में सामने आते हैं कि चिकित्सक समझ तक नहीं पाते कि रोग क्या है? उसकी उत्पत्ति कैसे, किस अनजान कारण से हुई और उसका उपचार क्या होना चाहिए?

इन असमंजसों के बीच एक तर्क, तथ्य और प्रमाण पर आधारित निष्कर्ष यह निकला है कि चेतनास्तर की तरह आरोग्य और रुग्णता के केंद्र मस्तिष्क है और उसी केंद्र में कहीं गड़बड़ी पड़ने पर बीमारियों का सिलसिला चल पड़ता है। उड़ते बादलों में जैसे कई आकृतियाँ बनती-बिगड़ती रहती हैं, उसी प्रकार रोग भी अनेक नाम-रूपों में प्रकट होते रहते हैं।

जीवन और मरण का प्रत्यक्ष केंद्र कभी हृदय माना जाता था। अब उसमें इतना और जुड़ गया है कि हृदय की धड़कन बहुत कुछ मनःसंस्थान पर निर्भर है और जीवन-मरण का अंतिम निर्णायक भी वही है। धड़कन बंद हो जाने पर भी यदि मस्तिष्क में क्रियाशीलता विद्यमान है, तो उसे मृतक नहीं, जीवित ही माना जाएगा।

मस्तिष्कीय रोगों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-एक संरचना क्षेत्र के, दूसरे संवेदना क्षेत्र के। संरचना क्षेत्र में चोट, अनिद्रा, सिरदर्द, ट्यूमर, हैमरेज, संक्रमण आदि की गणना की जा सकती है। इनका उपचार औषधियों से अथवा शल्यक्रिया से होता है। जन्मजात अविकसित मस्तिष्क के पीछे प्रायः आनुवांशिकी रहती है। गर्भकाल में भ्रूण पर औषधियों के, चोट के, एक्सरे के आघात लगने से भी बच्चा मानसिक दृष्टि से अपंग हो सकता है। इन कठिनाइयों का समाधान क्या हो? इस संदर्भ में शरीर की मांसपेशियों एवं कोशिकाओं को उलटा-पुलटा जा रहा है और निराकरण का उपाय सोचा जा रहा है।

मस्तिष्क का दूसरा कोमल पक्ष संवेदनात्मक है। बुद्धिकौशल को तो प्रशिक्षण, वातावरण एवं अनुभव के साथ जोड़ा जाता है और इसके संवर्द्धन का उपाय समाजव्यवस्था में हेरफेर करने के रूप में सोचा जा रहा है; किंतु संवेदनाएँ विशुद्ध वैयक्तिक हैं। वे चिंतन के अभ्यास से संचित संस्कारों पर निर्भर हैं। कई व्यक्ति बड़ी घटना को भी छोटी मानते हैं और किन्हीं की कल्पना में छोटी घटना भी पहाड़ तुल्य भारी होती है। इस हलकेपन और भारीपन का अचेतन-सुपरचेतन क्षेत्र में आघात लगता है। कभी-कभी तो वह सहज होता है और समय के साथ-साथ अनुभूतियाँ धीमी पड़ती जाती हैं; किंतु कभी-कभी वे इतनी असह्य होती हैं कि चिंतनतंत्र को ही बुरी तरह झकझोर देती हैं, साथ ही ऐसी स्थिति बना देती हैं कि मानस सही तरीके से सोचने-समझने में समर्थ न रहे और प्रवाह जिस ओर भी चल पड़े, फिर रोके न रुके।

समग्र विक्षिप्तता की यही स्थिति है। इसमें रोगी सामाजिक शिष्टाचार, जीवननिर्वाह एवं अनिवार्य दायित्वों तक की उपेक्षा करने लगता है। यह उपेक्षाएँ अनचाहे-अनजाने ही बन पड़ती हैं।

पागलखानों में बंद रोगी इसी प्रकार के होते हैं। वे अपनी जीवनरक्षा और साथियों के प्रति जिम्मेदारी को भी वहन नहीं कर पाते। ऐसी दशा में उन्हें सुरक्षा की दृष्टि से भी और चिकित्सा की आवश्यकता की दृष्टि से भी पागलखानों में भरती किया जाता है।

विचारणीय है कि संरचनाघटक यथावत् होते हुए भी ऐसी स्थिति किस प्रकार उत्पन्न हुई? खोज यह बताती है कि उन्हें कोई सामाजिक विग्रह से उत्पन्न मानसिक आघात लगा है। किसी प्रियजन की मृत्यु, अपमान, विश्वासघात, भयावह दुर्घटना के दृश्य आदि कारणों से ऐसा हो जाता है कि संवेदना क्षेत्र में असाधारण उथल-पुथल हो जाती है, फलतः संरचना क्षेत्र भी उससे प्रभावित होता है और शारीरिक क्रिया–कलापों तथा मस्तिष्क के ऊर्जाकेंद्रों की स्थिति विपन्न हो जाती है।

इस विश्लेषण से इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि अतिशय बढ़ी-चढ़ी भावुकता भी एक विपत्ति की तरह है। घटनाक्रमों को देखा-समझा जाए; पर उनका इतना गहरा प्रभाव न पड़ने दिया जाए कि बहुमूल्य मानसतंत्र की कार्यक्षमता से ही हाथ धो बैठना पड़े।

असाधारण और अप्रत्याशित घटनाएँ प्रायः मस्तिष्क पर असहाय दबाव डालती हैं और उसका प्रभाव हलकी-भारी विक्षिप्तता जैसा बन जाता है। यह खतरा अतिभावुकों को अधिक रहता है। विचारशील लोग संसार में परिवर्तनों की स्वाभाविकता को समझते हैं और उन सभी को सामान्य दृष्टि से देखते हैं। महर्षि अरविंद की शब्दावली में कहें, तो ऐसे लोगों की तुलना में ऊँचा होता है और वे मन के उन आयामों में अवस्थान करते हैं, जिन्हें उन्होंने ‘साइकिक’ एवं ‘स्प्रिचुअल’ मन कहा है।

वे अपनी पुस्तक ‘हाईरार्किक ऑफ माइंड्स’ में लिखते हैं कि मन के पाँच स्तरों में से सर्वसाधारण उसके आरंभिक तीन स्तरों पर ही स्थित होते और उन्हीं से कार्य करते हैं। फिजिकल, वाइटल और मेंटल-यह मन के वे तल हैं, जिनके द्वारा निम्नस्तरीय इच्छाएँ, आकाँक्षाएँ, आस्थाएँ, मान्यताएँ एवं भावनाएँ क्रियाशील होती हैं और व्यक्ति को अशाँत-अस्वाभाविक जैसी स्थिति में बनाए रखती हैं। इन स्तरों में निवास करने वाले लोगों में मानसिक दृढ़ता का सर्वथा अभाव होता है एवं परिस्थितियों से वे प्रभावित हो जाते हैं। परिस्थितियाँ यदि अनुकूल और उत्तम हुई, तो वे उसमें सुखद अनुभव करते हैं किंतु उसके प्रतिकूल होते ही उनमें मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है, वे किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते और निषेधात्मक चिंतन करने लगते हैं। जीवन की सारी सरसता इस एक ही कठिनाई से समाप्त होती प्रतीत होने लगती है और कई बार इस स्थिति में ऐसे आत्मघाती कदम उठा लिए जाते हैं, जो हर दृष्टि से हेय और हीन कहलाने योग्य हैं। परिस्थितियों की यह दासता दुर्बल मनःस्थिति के कारण पैदा होती है एवं कमजोर मनःस्थिति मन के निम्नतलों में अवस्थान की परिणति है।

बालक जब छोटा होता है, तो इंद्रियों के माध्यम से वह जो कुछ भी ग्रहण-अवधारण करता है, उसमें उसका भौतिक मन क्रियाशील होता है। इस सजगता में विकास-विस्तार का नाम ही ‘वाइटल’ मन है। इस दशा में भावनात्मक प्रतिक्रिया आरंभ हो जाती है। करीब नौ-दस वर्ष की अवस्था तक में वाइटल या भावनात्मक मन का निर्माण इतना सुदृढ़ और परिपक्व हो जाता है कि बालमन में तरह-तरह के प्रश्न और जिज्ञासाएँ उठने लगती हैं। इसे मानसिक मन की सक्रियता का शैशवकाल कह सकते हैं। इसी का जब और अधिक विकास होता है, तो परिपक्व मनुष्य की उस बुद्धि का प्रादुर्भाव होता है, जिसे भौतिक उन्नति की जननी कहनी चाहिए। पदार्थ संबंधी समग्र प्रगति इसी के इर्द-गिर्द घूमती है। इस स्तर तक मनुष्य हर प्रकार के घात-प्रतिघातों, परिस्थितियों, घटनाओं से प्रभावित होता रहता है। यह बात और है कि मानसिक होता रहता है। यह बात और है कि मानसिक दृढ़ता और निर्बलता के अनुसार उसका असर किसी में कम, किसी में अधिक दिखलाई पड़ता है, पर अछूता कोई नहीं रहता।

साइकिक और आध्यात्मिक मन इसकी उच्चतर अवस्थाएँ हैं। इन आयामों पर आरुढ़ व्यक्ति का चिंतन और दृष्टिकोण दार्शनिकों की भाँति तटस्थ और निर्लिप्त होता है। वे अपने आचरण और व्यवहार से दूसरों को तो प्रभावित करते हैं, पर साँसारिक घटनाओं से वे स्वयं जल में कमलवत् सर्वथा अप्रभावित रहते हैं। यही वास्तविक आध्यात्मिक दृष्टि है। इसका निचोड़ समाज और संसार के दुखों को हलका करना और चरमलक्ष्य की ओर निरंतर अग्रसर होना है।

अध्यात्म तत्वदर्शन का उद्देश्य मानवी मस्तिष्क को ज्ञानी-उदासीन जैसा बना देने का है। स्थितप्रज्ञता इसी को कहते हैं, जिसमें प्रिय-अप्रिय दोनों ही प्रकार की प्रभावपूर्ण घटनाओं को हलका करके आँका जाए और समझा जाए कि इस परिवर्तन भरे संसार में संयोग-वियोग के, हानि-लाभ के, मानापमान के द्वंद्व तूफान की तरह उठते और झाग की तरह बैठते हैं। जब सुख की स्थिति चली गई, तो दुःख की पीड़ा भी सदा क्यों बनी रहेगी? समय बदलेगा और मन को किसी अन्य दिशा में मोड़ देगा। इस स्तर का तत्वज्ञान यदि हृदयंगम किया जाता रहे, तो असहाय घटनाएँ भी सह्य स्तर पर वहन कर ली जाती है और मानसिक उद्वेग उत्पन्न होने पर भी शाँति एवं स्थिरता बनी रहती है। यही सही जीवन जीने की कला है। समरस रहना या आध्यात्मिक बनना इसी का दूसरा नाम है। दैनंदिन जीवन में यही दृष्टि अपनाई जानी चाहिए।


शिखिध्वज (Kahani)

शिखिध्वज ब्रह्मज्ञानी बनना चाहते थे। उनने सुन रखा था- त्याग-वैराग्य के द्वारा ब्रह्मज्ञानी बना जा सकता है। सो उनने घर-गृहस्थी, खेती-बाड़ी आदि सभी जिम्मेदारियों को छोड़कर वन में पलायन किया और वहीं कुटी बनाकर रहने लगे।

उस वन में तपस्वी शतमन्यु रहते थे। इस नवागंतुक को एक गृहस्थी छोड़कर दूसरी बसाने के प्रयत्न में संलग्न देखकर वह खिन्न हुए और समझाने के लिए उनके पास पहुँचे।

गांव की गृहस्थी उजाड़कर वन में वही सरंजाम जुटाने से क्या लाभ? वस्तुओं से व्यक्तियों से तो पाला पड़ेगा ही। वैराग्य तो अहंता और लिप्सा से होना चाहिए और बन पड़े तो घर भी तपोवन बन सकता है।

शिखिध्वज को यथार्थता का बोध हुआ, वे घर वापस लौट गए और परिवार के बीच रहते हुए सेवा-साधना में निरत रहे। एकाकी मुक्ति पाने के स्थान पर उनने समूचे परिवार को ऋषि बनाया। उनके वंशज बाल्यखिल्य ऋषियों के नाम से प्रख्यात हुए और समूचे जंबू द्वीप को देवभूमि बनाने में सफल रहे।


प्रतिभा संवर्द्धन की दिशा में चल रहे बहुमुखी प्रयास

एक जमाना था, जब बुद्धिमत्ता का मूल्याँकन इस आधार पर किया जाता था कि मस्तिष्क में कितना अधिक या कम द्रव है; वह कितना भारी, बड़ा या विस्तार वाला है। अब यह बात पुरानी पड़ गयी। प्रतिभा और प्रखरता अब अभ्यास पर अवलंबित आँकी गई हैं। किसी विचारधारा में रुचिपूर्वक निमग्न रहने पर सामान्य बनावट के मस्तिष्क को भी इतना प्रशिक्षित किया जा सकता है कि उसे अपने विषय का विशेषज्ञ होने का अवसर मिल सके। कुछ अपवादों को छोड़कर सभी ढंग से निर्वाह कर सकने में समर्थ हैं।

मस्तिष्क का आकार, प्रकार और विस्तार इस बात का चिन्ह नहीं है कि उतने भर से किसी की बुद्धिमत्ता समुन्नत स्तर की बन जाएगी। गेटे, मैकियावेली, क्राँमवेल, मोजार्ट, ज्विग जैसे मनीषियों के मस्तिष्क शरीरविज्ञान के अनुसार ही पूर्ण और परिपुट पाए गए, किंतु आइंस्टीन का मस्तिष्कीय भार और प्रभाव कम आँका गया था, फिर भी उनकी बौद्धिक क्षमता की तुलना अन्य किसी के साथ नहीं की जा सकी। कई वर्षों तक उनका मस्तिष्क सुरक्षित रखा गया, ताकि उस पर अध्ययन किया जा सके; लेकिन निष्कर्ष कुछ नहीं निकला। स्त्रियों के मस्तिष्क का भार और क्षेत्रफल कम होता है, इतने से ही यह नहीं कहा जा सकता कि वे बुद्धिमान नहीं होतीं।

मस्तिष्कीय संरचना पर ध्यान देते हैं, तो उसके दृश्य विभाजन को क्षमता स्तर पर वर्गीकृत करने पर तीन नए विभागों में बाँटा जा सकता है- आदि मस्तिष्क, मध्य मस्तिष्क और वर्तमान मस्तिष्क। आदि मस्तिष्क को जड़, मध्य को तना और वर्तमान को डालियों, पत्तियों एवं कलियों के रूप में चित्रित किया जा सकता है। आदि मस्तिष्क वह है, जो प्रगतिक्रम में अनादिकाल से लेकर अब तक की विभिन्न रूप में संचित की गई जानकारियों, आदतों को सँजोए रहता है। मध्य मस्तिष्क वह है, जिसकी अविज्ञात या अतींद्रिय क्षेत्र के रूप में विवेचना की जाती है। वर्तमान मस्तिष्क वह है, जो गर्भाधान से लेकर भ्रूण, शैशव अवधि के उपलब्ध हुए संस्कारों तथा संपर्क, शिक्षण, अनुभव के आधार पर बनता और विकसित होता है। एक के ऊपर दूसरा, दूसरे के ऊपर तीसरा-यह क्रम प्याज की परतों के समान है। इनमें सबसे अधिक सशक्त छोटा होने पर भी आदि मस्तिष्क ही है। इसे जीवनसमुदाय का प्रतिनिधि भी कहा जा सकता है। वास्तविक व्यक्तित्व इसी केंद्र में केंद्रीभूत रहता है।

मस्तिष्क में सक्रिय घटक जिन्हें ‘नर्वसेल’ कहते हैं, प्रायः 10 अरब पाए जाते हैं, जबकि संसारभर में मनुष्यों की संख्या लगभग छह अरब है। हर नर्वसेल आकार-प्रकार में नगण्य होते हुए भी सामर्थ्य और संरचना की दृष्टि से उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि दृश्यमान एक परिपूर्ण मनुष्य। संसारभर के मनुष्यों को सही रास्ते पर चलाया जा सके, तो विश्व-व्यवस्था का स्वरूप इसी धरती पर स्वर्ग से बढ़कर दृष्टिगोचर होने लगे। ठीक इसी प्रकार यदि कोई मनुष्य अपने मस्तिष्कीय घटकों को अनुशासन में रखने और उन्हें अधिक सुयोग्य-सक्षम बनाने में जुट पड़े, तो इतने भर से उसे उन्हीं परिस्थितियों में देवतुल्य सुविकसित स्थिति प्राप्त कर सकने का अवसर मिल सकता है। संसारभर के छह सौ करोड़ मनुष्यों के बिखराव और स्वेच्छाचार को देखते हुए उनका नियमन कठिन है; पर किसी मनस्वी व्यक्ति के लिए यह सरल है कि अपनी मानसिक संपदा का महत्व समझे और उसे अधिक प्रखर बनाने या सत्प्रयोजनों में लगाए रहने में सफल सिद्ध हो सके। इस दिशा में प्रयत्नरत मनुष्य को विश्वशासन की व्यवस्था सँभालने वाले चक्रवर्ती राजा के समतुल्य माना जा सकता है।

मस्तिष्क की विशेषता उसके भार या विस्तार पर निर्भर नहीं होती, वरन् इस बात पर निर्भर रहती है कि उसके घटकों की संख्या, सूक्ष्मता एवं ऊर्जा की स्थिति क्या है? भार की दृष्टि से व्हेल का मस्तिष्क 7000 ग्राम होता है। मनुष्यों में नर का 1400 ग्राम और नारी का 1300 ग्राम के लगभग होता हैं। इस आधार पर किसी की कुशलता या विशिष्टता का मूल्याँकन नहीं किया जा सकता। वह तो सूक्ष्म संरचना पर आधारित है। इस दृष्टि से भी मनुष्य को अतिरिक्त रूप से भाग्यवान् कहा जा सकता है कि उसने न केवल अनेक विशेषताओं से भरापूरा शरीर पाया है, वरन् इस स्तर का मस्तिष्क भी उपलब्ध किया है, जिसे विश्वसंपदा का बीजाणु कहा जा सके। सौरमंडल की हलचलों तथा वैभवों का सार-संक्षेप परमाणु के छोटे-से कलेवर में भरा हुआ है। इसी प्रकार विश्वचेतना की समस्त संभावनाओं को मानव मस्तिष्क के तनिक-से क्षेत्र में केंद्रीभूत समझा जा सकता है। उसका जाग्रत भाग भी कम आश्चर्यजनक नहीं, फिर प्रसुप्त की परतें यदि उघाड़ी जा सकें, तो उस तिजोरी की बहुमूल्य रत्नराशि की तुलना कुबेर के वैभव से कम नहीं आँकी जा सकती।

संसार में अगणित व्यक्ति विलक्षण मेधावान हुए हैं। कितनों की स्मरणशक्ति आश्चर्यजनक थीं। किन्हीं में दूरदर्शिता, प्रतिभा, सूझबूझ एवं संभावनाओं का सही अनुमान लगा सकने जैसी विशेषताओं का बाहुल्य पाया गया है। ऐसे असाधारण मेधावी लोगों का अपना इतिहास और कीर्तिमान है। कभी ऐसे प्रसंगों को दिव्य वरदान या भाग्योदय जैसे कारण बताकर समाधान किया जाता था; पर अब पर्यवेक्षण ने सिद्ध कर दिया है कि यह मनःक्षेत्र की प्रसुप्ति में जहाँ-तहाँ जागरण होने भर का चमत्कार है। उस आधार पर मानसिक और शारीरिक क्षमताओं की दृष्टि से वह अपनी स्थिति असामान्य स्तर की बना सकता है। कभी हनुमान का समुद्र छलाँगना, रावण का दस सिर बीस भुजाओं वाला होना, सहस्रार्जुन को हजार भुजा वाला कहा जाना पौराणिक उपाख्यान कहा जाता रहा होगा; किंतु अब ऐसी विशेषताओं से संपन्न होना संभव की परिधि में आ गया है। मानवीय मस्तिष्क असाधारण रूप से विलक्षण है। उसके रहस्यमय कोष्ठक यदि अपना-अपना काम आँशिक रूप से भी करने लगें, तो व्यक्तित्व में ऐसी विचित्रताएँ उभर सकती हैं, जिन्हें चमत्कारी ऋद्धि-सिद्धियों में गिना जा सके।

मानसिक क्षमता के अभिवर्द्धन में तीन तत्व काम करते हैं। एक, सात्विक आहार, जिससे रक्त में अनावश्यक उत्तेजना उत्पन्न न होने पाए और मस्तिष्क शाँत-सौम्य बना रहे। दूसरा, उद्विग्नताओं से बचाव, चिंताओं एवं मनोविकारों से छुटकारा। यदि चिंतन विधेयात्मक रहे और आवेशों से परहेज रखे, तो सीधी-सादी सरल, संतोषी और सही जिंदगी आसानी से गुजर सकती है। ऐसी दशा में विक्षोभरहित मस्तिष्क सही काम को सही ढंग से करते हुए क्रमिक रूप से प्रगति करता रहेगा। तीसरा आधार है-प्रशिक्षण। अभ्यास के आधार है- प्रशिक्षण। अभ्यास के आधार पर शरीर के किसी भी अवयव को परिपुष्ट किया जा सकता है। फिर मस्तिष्क भी शरीर का एक अंग ही है। उसे अभीष्ट विषय में रस लेने, महत्व समझने, एकाग्र रहने और नियमपूर्वक अभ्यास करने से किसी की भी प्रतिभा अभीष्ट क्षेत्र में विकसित हो सकती है।

अपना या दूसरों का मस्तिष्क दुर्बल है- ऐसी हीनभावना किसी के भी मन पर सवार नहीं होने देनी चाहिए। जब पशु-पक्षियों को सिखाने वाले उन्हें मनुष्यों जैसी समझदारी का परिचय देने के लिए सधा लेते हैं, तो कोई कारण नहीं कि अपना या दूसरों का मस्तिष्क प्रयत्नपूर्वक अधिक विकसित न किया जा सके। इस दिशा में अब तो मानवीय प्रयासों के साथ-साथ कम्प्यूटर लर्निंग क्रम भी खूब चल गया है; परंतु पुरुषार्थपूर्वक अध्यवसाय से कमाई गई मस्तिष्कीय संपदा का महत्व अपने स्थान पर यथावत् रहेगा।

जापान की प्रयोगशाला में वानरों पर अनेक प्रयोग किए गए। टोक्यो यूनिवर्सिटी में संपन्न प्रयोगों में वानरों के अनेकों प्रसंगों में खरे-खोटे की पहचान करने और ढेर में से उपर्युक्त सामग्री बीन-बीनकर कायदे-करीने के साथ रख देने की शिक्षा में प्रवीणता प्राप्त कर सकने जैसा उन्हें योग्य पाया गया। प्रयोग यह भी चल रहा है कि क्या वे उन कराए गए अभ्यासों को अपनी भावीपीढ़ी के लिए भी हस्ताँतरित कर सकते हैं? संभावना ‘हाँ’ में व्यक्त की जा रही है।

मानसिक विकास की यदि उपयोगिता समझी जा सके और उसे नशेबाजी की ही तरह कामुकता, उदासी, उत्तेजना, उपेक्षा जैसे दुर्व्यसनों से नष्ट न किया जाए, तो अपने को तथा दूसरों को अपेक्षाकृत अधिकाधिक बुद्धिमान् बनाते चलने में किसी को कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए, विशेषकर इसलिए भी कि वे सारी संभावनाएँ हर एक में विद्यमान हैं। हम प्रयत्न करे, प्रतिफल हमारे सम्मुख होगा।


चित्र का मूल्य (kahani)

टिटियन नामक प्रसिद्ध चित्रकार के जीवन की एक घटना है। वह एक दिन अपने स्टूडियो में बैठा चित्र बना रहा था। उसने अपना सर्वस्व ही चित्रों में उड़ेल रखा था। अनेक व्यक्ति उसके पास चित्रों को देखने और खरीदने को आ रहे थे। एक धनिक कलाप्रेमी आया। उसने देर तक एक चित्र को देखकर पूछा, “मैं इस चित्र को अपने लिए चुनता हूँ। इसका मूल्य क्या है?”

“पचास गिन्नियाँ।” चित्रकार ने शाँत स्वर में उत्तर दिया।

“एक छोटे-से चित्र का इतना अधिक मूल्य! आपको इस चित्र को बनाने में कठिनता से एक सप्ताह लगा होगा। कागज, रंग इत्यादि का खरच तो नहीं के बराबर है। फिर इसका दाम पचास गिन्नियाँ कैसे? आप शायद भूल करते हैं।”

टिटियन ने उत्तर दिया,”महाशय, आप भूलते हैं। पूरे तीन साल निरंतर परिश्रम करने के बाद मैं इस योग्य बना हूँ कि ऐसे चित्र को चार दिनों में ही बना सकता हूँ। इसके पीछे मेरा वर्षों का अनुभव, साधना और योग्यता छिपी हुई है।”

धनी व्यक्ति उत्तर से संतुष्ट हुआ। उसने इतने बड़े मूल्य पर उस चित्र को खुशी-खुशी खरीद लिया। यदि चित्रकार अपनी कला का मूल्य कम लगाता, तो निश्चय ही उसे कम मूल्य मिलता। पर उसके आत्मविश्वास और कलासाधना की अंततः जीत हुई।

जिसने अपने को जितना मूल्यवान समझा संसार से उसका उतना ही मूल्य प्राप्त हुआ। हमें उतना ही सम्मान, यश, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि प्राप्त होती है, जितना हम स्वयं अपने व्यक्तित्व का लगाते हैं।


दृढ़ निश्चय हो तो सफलता अवश्य मिलेगी

जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता का मूल मंत्र व्यक्ति की दृढ़ इच्छाशक्ति, अटूट विश्वास एवं एकनिष्ठ प्रयास है। अन्य बातें समान होने पर भी अनेक व्यक्तियों में से वही सफल होता है, जिसकी इच्छाशक्ति सबसे प्रबल और अधिक पूर्ण होती है। सफलता का इतिहास लिखने वाले सभी व्यक्तियों ने इसी गुण के बल पर महान् सफलताएँ अर्जित कीं। उनमें भले ही अन्य गुण न रहे हों, चाहें उनमें कुछ दुर्बलताएँ भी क्यों न रही हों परंतु अटूट निश्चय एवं दृढ़ इच्छाशक्ति द्वारा वे भीषण बाधाओं के बीच भी निरंतर संघर्ष करते रहे और अंततः उन्नति के महान् शिखरों पर आरुढ़ हुए।

‘रिअलाइज युअर पोटेंशियल’ के विद्वान लेखक वी. पेकेलिस ने ऐसे कई इतिहासपुरुषों का हवाला पुस्तक के अध्याय ‘डिवाइन वर्सेज सेल्फ मेड जीनियस’ में दिया है। जो बचपन या युवावस्था तक सामान्य से भी न्यूनस्थिति में पड़े रहे, परंतु समय के साथ जब उन्होंने होश सँभाला तो अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति एवं ध्येयनिष्ठा के आधार पर अद्भुत गति से सफलता के मार्ग पर आगे बढ़े। यूनान के महानतम वक्ता डेमोस्थनीज अपने शुरुआती दौर में बहुत ही संकोची व तुतलाकर बोलने वाले बालक थे, जिनसे कोई बड़े काम की आशा नहीं की जा सकती थी। रूस के श्रेष्ठतम विद्वान मिखाइल लोमोनसेव एक अनपढ़ किसान परिवार में जन्मे थे। सुविख्यात वैज्ञानिक न्यूटन को भौतिकी एवं गणित बहुत कठिन विषय लगते थे। चार्ल्स डार्विन को पिता के ताने इसलिए सुनने पड़ते थे कि उसे शिकार एवं आवारागर्दी के सिवा और कुछ नहीं आता। जेम्सवाट, जोनाथन स्विफर और कार्ल गाँस स्कूल में नालायक विद्यार्थियों की श्रेणी में गिने जाते थे। किंतु इन सभी व्यक्तियों ने अपने अध्यवसाय के बल पर अपनी दुर्बलताओं, अक्षमताओं को तोड़-मरोड़कर रख दिया और अपने-अपने क्षेत्रों में स्वयं के व्यक्तित्व एवं प्रतिभा की अमिट छाप छोड़ते हुए इतिहासपुरुष बन गए।

यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि जिस भी वस्तु की इच्छा हम मन में करते हैं, उसकी ओर हमारी समूची शारीरिक एवं मानसिक शक्तियाँ लग जाती हैं। मन में संकल्प के रूप में उभरी आशा-आकाँक्षाएँ ही समय के साथ जीवन में मूर्तरूप लेती है। सुप्रख्यात विचारक कैंडी का कहना है कि आपके हृदय में जब किसी पदार्थ के प्रति तीव्र इच्छा जाग्रत होती है, तो समझ लीजिए कि परमात्मा ने आपके लिए विशेषतौर पर उसे सुरक्षित रखा हुआ है। फिर भले ही आप निराशा के झूले में झूलते रहें या अंधकार में भटकते रहें-इस बात की कोई चिंता नहीं। यदि आपमें ध्येय के प्रति अटूट निष्ठा और दृढ़ संकल्प है, तो आपको इसमें अवश्य सफलता मिलेगी।

अभिनेता विल्फटन कापड़े ने जब अभिनय शुरू किया, तो लोगों का कहना था कि वह कभी भी अभिनय नहीं कर सकेगा। लेकिन कापड़े अपने निश्चय पर अटल था। वह बराबर अपना सुधार करता रहा, निरंतर अपने अभिनय को निखरता रहा और एक दिन अमेरिका का स्टार बन गया। उसकी सफलता का रहस्य केवल इतना था कि उसने अपनी समस्त शक्तियों को अपने लक्ष्य पर केंद्रित कर दिया था। जब तक व्यक्ति अपने जीवन की समूची शक्ति किसी कार्य में नहीं लगा देता, तब तक वह किसी ठोस सफलता की आशा नहीं कर सकता। अमेरिकन राष्ट्रपति रुजवेल्ट के जीवन का महान् रहस्य यही था कि वह संपूर्ण जीवनीशक्ति को दृढ़ संकल्प के साथ लक्ष्य पर लगा देते थे। जिस भी काम को वे हाथ में लेते थे, उसमें अपनी पूरी सामर्थ्य संगठित करके झोंक देते थे।

दृढ़ संकल्प में अद्भुत शक्ति है, उससे प्रेरित व्यक्ति दृढ़ता व लगन के साथ आगे बढ़ता है। दृढ़ संकल्प पीछे लौटने के सभी रास्तों को बंद कर देता है और आगे की बाधाओं को रौंद डालता है। अब्राहम लिंकन ने स्वाधीनता संघर्ष के समय अपनी डायरी में लिखा था कि मैं इस काम को अवश्य पूरा करूंगा। इस प्रण ने ही उन्हें वह सामर्थ्य दी, जिससे वे उस कार्य को पूरा कर सके और आपातकाल में देश को सफल नेतृत्व देने में समर्थ हुए।

अपना लक्ष्य निर्धारण-निश्चित होने पर ही मन-मस्तिष्क की समस्त शक्तियाँ एवं योग्यताएँ एक बिंदु पर केन्द्रित हो जाती हैं और तभी अभीष्ट सफलता का मार्ग सरल व सुनिश्चित होता है। युद्ध में नैपोलियन की सफलता का सबसे बड़ा कारण यही था कि उसका लक्ष्य निश्चित होता था और वह सीधा निशाने पर वार करता था। अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के बल पर ही नैपोलियन ने अपने समय की स्थिति को थाम लिया था। ग्लैडस्टन का मस्तिष्क बहुत ही तीव्र था, फिर भी उसका कहना था कि वह एक समय में दो काम नहीं कर सकता। वह जिस काम को करता था, एकाग्रचित्त होकर करता था और उसी में अपनी सारी शक्ति लगा देता था। हाथ में लिए हुए काम में उसकी लगन व शक्ति साफ दिखने लगती थी। यहाँ तक कि जब वह किसी मनोविनोद के सामान्य से प्रसंग में लीन होता था, तब भी वह एकाग्रचित्त, तन्मय और तल्लीन हो जाता था।

सफलता के अभीप्सु व्यक्ति के लिए चित्त की एकाग्रता अनिवार्य शर्त है। यदि शक्तियों को एक ही समय में कई बातों में बिखेर दिया जाए, तो सफलता प्रायः संदिग्ध हो जाती है। सभी महान् व्यक्तियों में चित्त की एकाग्रता बहुत अधिक थी।वे अपने उद्देश्य से बाहर की बातों को ध्यान से ही निकाल देते थे। इससे कुछ अधिक स्वेटमार्डन लिखते हैं कि हिचकिचाहट या दुविधा व्यक्ति की असफलता एवं दुःखी होने के वे दो कारण बताते हैं। एक है- अपनी योजनाओं के लिए पक्के निश्चय की कमी और दूसरा उन पर काम करते समय बार-बार की दुविधा।

जॉन ऑफ आर्क की सफलता का रहस्य यही था कि वह कभी दुविधा में नहीं रहती थी। वह किसी टेढ़े सवाल को सामने देखती तो फौरन उसे हल करने चल पड़ती थी। वह तुरंत निर्णय लेती थी। उसने साहस, वीरता और अद्भुत प्रतिभा से अधिक इसी गुण की बदौलत विजय पाई थी। कोलंबस अपने निश्चय के बल पर ही सफल हुआ था। उसमें दृढ़ निश्चय शक्ति थी, जिसके बल पर वह सीधा लक्ष्य की ओर चल पड़ा था। चाहे कुछ भी हो, लोग कितनी भी निंदा करें, उसने निराशा को हावी नहीं होने दिया।

लक्ष्य एवं आदर्श की एकनिष्ठा का महत्ता पर प्रकाश डालते हुए स्वामी विवेकानंद अपने व्याख्यान ‘द पॉवर ऑफ माइंड’ में कहते हैं- यदि जीवन में अभीष्ट सफलता चाहते हो तो एक आदर्श को लो, उसका चिंतन-मनन करो, उसी को अपने सपने में पा लो। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, स्नायुतंत्र व समूचे अंग-प्रत्यंगों को इसी आदर्श के विचार से ओत−प्रोत कर दो और अन्य विचारों को एक तरफ हटा दो। फिर देखो सफलता कैसे तुम्हारे कदम चूमती है। यदि तुम अपना जीवन सफल बनाना चाहते हो व समूची मानवजाति के लिए वरदान बनना चाहते हो तो तुम्हें गहराई में जाना होगा। दृढ़ निश्चयी व्यक्ति को उसका लक्ष्य रूपी ध्रुवतारा बड़ी-से-बड़ी बाधाओं को पार करने की शक्ति देता है। परिस्थितियों के ज्वार−भाटों व आँधी -तूफानों के बीच भी वह हिम्मत नहीं हारता और निरंतर अपने ध्येय की ओर बढ़ता रहता है।

महाकवि मिल्टन का कथन था- ”परिस्थितियाँ संभवतः कभी व्यक्तियों की सहायता नहीं करती। जिन लोगों ने विजय के लिए घोर संघर्ष किया, अपने मार्ग की बाधाओं से लड़ाई लड़ी, वे ही सफलता के दरवाजे तक पहुँच पाए।

परिस्थितियों पर विजय का सच्चा मार्ग यही है कि हम परिस्थितियों से अधिक प्रबल एवं महान् बन जाए।” डिजरायली के अनुसार मनुष्य को परिस्थितियों का दास नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे परिस्थितियों को अपने अधीन रखना चाहिए। डिजरायली का अपना जीवन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण था। विदेश में जन्म लेकर इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री बनने में वे सफल हो गए थे।

जिनका कोई उद्देश्य नहीं होता, उनका जीवन बिना पतवार की नाव की तरह होता है। ऐसे व्यक्ति एक बिंदु पर ध्यान एकाग्र नहीं कर पाते। उनमें उद्देश्य, साहस व चरित्र की कमी होती है। वे जीवन को जैसे-तैसे काटते रहते हैं। उद्देश्य के अभाव में उनको न दिशाबोध होता है, न कोई योजना होती है और वे परिस्थितियों के दास होते हैं। वे बिना रीढ़ के व्यक्ति की तरह होते हैं, जो अपनी शक्ति व क्षमताओं को संगठित नहीं कर पाते। स्थिर उद्देश्य के अभाव में जीवन विचारों की झोंक के अनुसार चलता है। बिना पतवार की नाव की तरह हवा अनुकूल हुई तो शायद वह बंदरगाह तक पहुँच भी जाए और यदि उलटी हो तो नाव चट्टान से टकराकर चूर-चूर हो सकती है।

दृढ़ निश्चयी व उद्देश्यनिष्ठ व्यक्ति जीवन की विषम परिस्थितियों के बीच भी अपना मार्ग खोज लेते हैं। साधन-सहयोग का अभाव या प्रतिकूल परिस्थितियाँ उन्हें नहीं रोक सकतीं। ‘इफ यू रिअली वाँट टू सक्सीड’ में जॉन एंडरसन लिखते हैं कि मैंने सीखा कि किसी भी क्षेत्र में चरम शिखर पर पहुँचने वाले अनिवार्य रूप से प्राकृतिक प्रतिभासंपन्न नहीं होते। बल्कि वे दृढ़ निश्चयी व्यक्ति होते हैं, जो अथक् श्रम एवं अध्यवसाय से निरंतर लक्ष्य की ओर गतिशील रहते हैं। जॉनलीडन इसी तरह के एक उदाहरण हैं, जो गड़रिये के घर में पैदा हुए। उनकी स्कूली शिक्षा प्राइमरी तक ही सीमित रही, किंतु उनकी ज्ञान−पिपासा अदम्य थी। सारी बाधाओं का सामना करते हुए उन्होंने अंततः पुस्तकों की एक दुकान खोजी और यहीं आकर किताबें पढ़ने लगे। इस क्रम में उन्हें अन्न-जल तक की सुधि न रहती। इस रास्ते में तमाम बाधाएँ आईं, लेकिन उनकी ज्ञान−पिपासा के संकल्प को हतोत्साहित न कर सकीं और अंततः एक समय वह भी आया जब उन्होंने मात्र 19 वर्ष की अवस्था में अपने ग्रीक एवं लैटिन के ज्ञान से समूचे यूरोप को आश्चर्यचकित कर दिया। शायद इसीलिए पाश्चात्य जगत् के महान् मनीषी सैमुअल विल्सन कहा करते थे कि मैं दीर्घकालीन चिंतन-मनन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि निश्चित उद्देश्य वाले व्यक्ति कुछ भी प्राप्त कर सकते हैं और कोई भी शक्ति इच्छाशक्ति को नहीं रोक सकती। जो अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने समूचे अस्तित्व को दाँव पर लगाने को तैयार हैं, उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं।

नेलसन नामक महान् अंग्रेज योद्धा द्वितीय विश्वयुद्ध में अपने अद्वितीय रणकौशल व सफलताओं की लंबी श्रृंखला के लिए चिरस्मरणीय बने हुए हैं। उनकी नीति थी कि वह प्रत्येक कार्य को सफलता के अटल निश्चय, अदम्य विश्वास व अटूट निष्ठा के साथ करते थे, जिसमें असफलता की कोई गुँजाइश शेष नहीं रहती थी। एक बार मोरचे पर उनके एक सहयोगी कैप्टन ने जब उनकी योजना की सफलता पर संदेह व्यक्त किया, तो नेल्सन का आत्मविश्वास खौल उठा और उन्होंने पूरे निश्चय से कहा-जीत निश्चय ही हमारी होगी। विजय की कहानी कहने वाला कोई बचेगा या नहीं, यह पता नहीं। कल इस समय से पहले या तो मुझे विजय मिलेगी या वेस्टमिंस्टर में मेरी कब्र तैयार होगी। जिसके पास इस तरह का दृढ़ निश्चय, अडिग आत्मविश्वास और साहस है, उसे आगे बढ़ने से भला कौन रोक सकता है!

परिस्थितियों के अत्याचारी हाथ ऐसे संकल्पवान् को अधिक देर तक अपनी मुट्ठी में दबोचकर नहीं रख सकते। ऐसे व्यक्ति के लिए समूचा संसार भी एक ओर हटकर मार्ग दे देता है। महाकवि गेटे के अनुसार-”जिसकी इच्छाशक्ति अटल व अटूट है वह विश्व को अपनी इच्छा के साँचे में ढाले लेता है।” चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस का कहना था कि एक विशाल सेना के सेनापति को हटाया जा सकता है,किंतु एक मनुष्य की दृढ़ इच्छाशक्ति को कोई नहीं हटा या झुका सकता।

आधुनिक मनोविज्ञान के जनक विलियम जेम्स के अनुसार, किसी भी क्षेत्र में, किसी भी विषय के प्रति आपकी सच्ची लगन ही आपकी सफलता के मार्ग को प्रशस्त करती है। यदि आप लक्ष्य के प्रति ईमानदार हैं, तो आप उसे अवश्य पा जाएँगे। आप इस जीवन में धन, बल, विद्या, श्रेष्ठता, सफलता जो भी चाहते है, वह आपको अवश्य मिलेगी। आवश्यकता इतने भर की है कि इच्छा करनी होगी और उसे पूर्णरूपेण चाहना होगा, न कि एक समय में सैकड़ों अन्य चीजों को उतनी ही तीव्रता से चाहें। एक कहावत सुप्रचलित है-ईश्वर उसी की सहायता करता है, जो अपनी सहायता अपने आप करते हैं। यों संसार में अपने भाग्य का रोना रोने वालों की कमी नहीं है, जो अपनी असफलताओं के लिए दूसरों को दोष देते रहते हैं या परिस्थितियों का हवाला देकर स्वयं को झूठी साँत्वना देते हैं। कुछ तो नास्तिक बनकर ईश्वर को कोसते रहते हैं, किंतु दृढ़ निश्चयी एवं उत्साही व्यक्ति को किसी भी तरह से निराशा या हताश होने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उसका निश्चित उद्देश्य एवं लक्ष्य आदर्श के प्रति अदम्य उत्साह एवं अनन्य लगन उसकी सफलता एवं उज्ज्वल भविष्य को सुनिश्चित करते हैं, क्योंकि ये ही सफलता, प्रगति एवं उन्नति के मार्ग की प्रथम आवश्यकताएँ हैं। बाकी गुण तो स्वयं ही इनका अनुसरण करते हैं और लक्ष्य की प्राप्ति को सुनिश्चित करते हैं।


लालबहादुर शास्त्री जी (Kahani)

देवमंदिर का पुजारी भगवान की पूजा तो पूरे विधि-विधान से करता, किंतु सुबह-शाम पूजा करने के बाद बचे समय में वह स्वार्थ के वशीभूत हो ऐसे कर्म करता, जिससे भगवान के बनाए अन्य प्राणी दुःख पाते।

उसे अंतःकरण से एक दिन भगवान् बोले-अरे मूर्ख! सेवा कर, मेरी पूजा करने के बाद सेवा की इच्छा न हो तो पूजा व्यर्थ है। पुजारी ने कहा-भगवान् मेरा मन तो आपकी पूजा में लगता है। लोगों की सेवा में नहीं। भीतर से आवाज आई-तू पगला है, क्या मैं पत्थर की मूर्ति में ही हूँ, इन जीते-जागते प्राणियों में तुझे मेरा रूप नहीं दिखता? पुजारी को सच्चा ज्ञान हुआ कि सेवा ही पूजा की कसौटी है। यदि उपासना करने के पश्चात् भी लोकसेवा की भूख न जागे तो समझना चाहिए कि कहीं-न-कहीं भूल है। अपने आपको इस कसौटी पर कसने पर वह खरा न उतरा। उसने आगे से लोकसेवा को नित्यकर्म में सम्मिलित कर लिया।

सन् 1949 की बात है। उन दिनों स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री उत्तरप्रदेश सरकार के गृहमंत्री थे। एक दिन लोकनिर्माण विभाग के कुछ कर्मचारी उनके निवासस्थान पर कूलर लगाने आए। बच्चों को बड़ी प्रसन्नता हुई कि अबकी बार गरमी अच्छी तरह गुजर जाएगी।

जब शाम को शास्त्री जी घर आए, तो उन्हें पता चला कि कूलर लगाया जा रहा है, उन्होंने तुरंत विभागीय कर्मचारियों को टेलीफोन पर मना कर दिया। पत्नी ने कहा-”जो सुविधा बिना माँगे मिल रही है, उसकी मना करने की क्या आवश्यकता है?

“यह आवश्यक नहीं कि मैं मंत्री पद पर सदा बना रहूँगा, फिर इससे आदत बिगड़ जाएगी। कल लड़कियों की शादी करनी है, मान लो विवाहोपराँत इस तरह की सुविधाएँ न मिलीं, तो उन्हें कष्ट ही होगा। जाने किस स्थिति में उन्हें रहना पड़े।” शास्त्री जी ने कहा।

शास्त्री जी ने सारी शिक्षा अपनी माँ से ग्रहण की थी एवं वही पोषण अपने परिवार में भी दिया, ताकि बच्चे सद्गुणी बन सकें, पिता के पद का लाभ उठाकर सुविधाओं के अभ्यस्त न हो जाएँ, हर परिस्थिति में अपने को ढाल सकें। यही कारण था कि वे स्वयं राष्ट्र के सर्वोच्च पद पर पहुँच सकने में सफल हुए एवं अपने बच्चों को भी संस्कार दे सके।


शिक्षाविस्तार ही दिला सकता है नारी को गौरव

बात जब नारी के गौरव एवं आत्मसम्मान की आती है, तो उसमें शिक्षा का महत्व अनायास ही जुड़ जाता है। वैदिक भारत के स्वर्णिम युग का रहस्य उस काल की विदुषी नारियों में ही निहित था। वे राजनीतिक, सामाजिक एवं प्रशासनिक दायित्वों का कुशलता से निर्वाह करने के साथ ही ऋषित्व के वर्चस् की भी धनी थीं। इसके प्रमाण वेदों के अनेकानेक स्थलों पर देखे जा सकते हैं। ऋग्वेद में 24 और अथर्ववेद में 5 वैदिक विदुषियों का उल्लेख हैं। हो भी क्यों नहीं, शिक्षा ही तो वह माध्यम है, जिसके द्वारा नारी का सर्वांगीण विकास संभव है। वैदिक भारत के स्वर्णिमकाल को यदि वर्तमान युग में साकार करना है, तो हमें नारीशिक्षा के चहुँमुखी विकास के लिए हर संभव यत्न करने होंगे।

ऋग्वेद (2/19/17) में वर्णित है कि स्त्रियों पर ही जीवन आधारित है और वे शिक्षा प्रदान करती हैं। यजुर्वेद (39/2) में कहा गया है कि नारियों को वेद पढ़ने का पूरा अधिकार है। अथर्ववेद (11/16/13-18) में उल्लेख है कि लड़कियाँ लड़कों के समान ब्रह्मचर्य धारण करके शिक्षा ग्रहण करें। इस परिप्रेक्ष्य में युगद्रष्टा स्वामी विवेकानंद ने उद्घोष किया है कि वही देश उन्नति कर सकता है जहाँ स्त्रियों को उचित स्थान दिया जाता है तथा उनकी शिक्षा का भी उचित प्रबंध किया है। आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानंद ने अपने ओजस्वी शब्दों में कहा था कि राष्ट्र, समाज, प्रशासन तथा परिवार के क्रिया−कलाप तब तक उचित ढंग से नहीं किए जा सकते, जब तक महिलाओं को शिक्षा न मिले। पं. जवाहरलाल नेहरू के अनुसार लड़के की शिक्षा केवल एक व्यक्ति की शिक्षा हैं, किंतु लड़की की शिक्षा सारे परिवार की शिक्षा है।

विश्वविद्यालय आयोग (1948-49) ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता के पश्चात् नारीशिक्षा का महत्व बताते हुए उल्लेखित किया था-”स्त्रीशिक्षा के बिना लोग शिक्षित नहीं हो सकते। यदि शिक्षा को पुरुषों अथवा स्त्रियों के लिए सीमित करने का प्रश्न हो तो यह अवसर स्त्रियों को दिया जाए, क्योंकि उनके द्वारा ही भावी संतान को शिक्षा दी जा सकती है। श्रीमती हंसा मेहता समिति (1962) का कथन है कि यदि नए समाज का निर्माण ठोस आधार पर करना है, तो स्त्रियों को वास्तविक और प्रभावपूर्ण ढंग से पुरुषों के समान अवसर देने होंगे। शिक्षा आयोग (1964-66) ने स्पष्ट किया था कि स्त्रियों की शिक्षा पुरुषों की शिक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण है। 1986 की शिक्षा नीति में इस बात पर विशेष बल दिया गया था कि महिलाओं को शैक्षिक एवं सामाजिक दृष्टि से समान स्तर पर लाने के लिए विशेष कार्य की आवश्यकता है। 16 दिसंबर 1993 को नौ देशों के ‘सभी के लिए शिक्षा’ सम्मेलन में महिलाओं तथा लड़कियों को शिक्षा तथा उन्हें अधिकार दिए जाने की ओर विशेष ध्यान देने के लिए बल दिया गया।

मध्य भारत के अँधेरे युग के बाद ब्रिटिशकाल में भारत में नारीशिक्षा की ओर ध्यान देना प्रारंभ हो गया था। सन् 1854 में वुडस डिस्पैच आने पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने ‘शिक्षा विकास कार्यक्रम’ को मान्यता प्रदान की। इसमें विशेष रूप से महिलाओं को नौकरी तथा शिक्षा का उल्लेख मिलता है। उस समय लड़कियों के लिए अलग विद्यालय खोले गए। सन् 1882 में नारीशिक्षा के आँकड़े व्यवस्थित रूप से एकत्रित किए जाने लगे। सन् 1881 से 1902 के मध्य काल की उल्लेखनीय उपलब्धि थी कॉलेजों में महिलाओं का प्रवेश। सन् 1883 में पहली बार दो भारतीय महिलाओं ने कॉलेज की परीक्षा पास की। इस काल में माध्यमिक शिक्षा के नामाँकन में पाँच गुना वृद्धि हुई तथा प्राथमिक शिक्षा के नामाँकन में भी पाँच गुना बढ़ोत्तरी हुई। सन् 1902 से 1922 के दो दशकों में माध्यमिक शिक्षा तथा उच्चशिक्षा के क्षेत्र में सक्रियता और बढ़ी। भारतीय महिला विश्वविद्यालय की स्थापना इसी काल की देन है। सन् 1916 में मुँबई में स्थापित इस विश्वविद्यालय का नाम श्रीमती नाथी बाई दामोदर ठाकरसी वूमैंस यूनिवर्सिटी है। सन् 1921-22 में माध्यमिक कक्षाओं में प्रवेश संख्या 10,309 से बढ़कर 36,698 हो गई। कॉलेजों में नामाँकन छह गुना बढ़ा। इसी दौरान मेडिकल में 197 लड़कियों की संख्या में 2812 से 11599 की बढ़ोतरी हुई।

सन् 1922 से 47 तक समाज-सुधार एवं गाँधी जी द्वारा संचालित आँदोलनों के प्रभाव के कारण लड़कियों के प्रति समानता की भावना का प्रादुर्भाव हुआ। सन् 1926 के दौरान अखिल भारतीय महिला सम्मेलन हुआ। इस काल में हर्टींग कमेटी की सिफारिशें लागू हुई जिसमें शिक्षा पर नारी के अधिकार की बात स्पष्ट की गई थी, इसके अनुसार नारी एवं पुरुष का शिक्षा पर समान अधिकार माना गया। साथ ही यह भी स्वीकार किया गया कि दोनों की शिक्षा के विकास के लिए नई शिक्षा-योजना का निर्माण आवश्यक है। इस दौर में नारी शिक्षा की काफी प्रगति हुई।

प्राथमिक शिक्षा में छात्राओं की नामाँकन संख्या 12 लाख से बढ़कर सन् 1947 तक 35 लाख पहुँच गई। इसी प्रकार माध्यमिक शिक्षा में प्रवेशसंख्या 2 लाख 81 हजार को पार कर गई। इस काल में उच्च शिक्षा में प्रवेश की गति काफी तेज रही। 1921-22 में यह आँकड़ा 1529 तक सीमित था, जो इस काल में 23,207 हो गया।

स्वतंत्रताप्राप्ति के पश्चात स्त्रीशिक्षा के प्रसार तथा गुणात्मक सुधार में काफी तेजी से प्रगति हुई। हालाँकि इस प्रगति को बहुत संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। इस परिप्रेक्ष्य में राममूर्ति (1990) ने महिला शिक्षा की धीमी गति के बारे में कहा है कि भारत में महिलाओं की शिक्षा पर हुए अनुसंधान से पता चलता है कि कई ऐसे सामाजिक, साँस्कृतिक और आर्थिक कारण हैं जिनके कारण महिलाएँ शिक्षाप्रणाली में भाग नहीं ले पातीं उनके अनुसार नारीशिक्षा की अनेक समस्याएँ हैं, जैसे पुरुष प्रधान समाज, रुचि की कमी, अज्ञानता, बालविवाह, गरीबी, दोषयुक्त पाठ्यक्रम, सहशिक्षा का विरोध, सुविधाओं का अभाव, अपव्यय, नारीशिक्षा के प्रति उदासीन नीति, परदाप्रथा, कई क्षेत्रों में अध्यापिकाओं की कमी आदि।

इन समस्याओं को ध्यान में रखकर अपने देश में अनेकों परियोजनाएँ प्रारंभ की गईं, जिससे कि नारीशिक्षा में प्रगति एवं जाग्रति उत्पन्न हो। संशोधक राष्ट्रीय शिक्षानीति (1986) में महिलाओं की शिक्षा को समदृष्टि पैकेज का एक घटक होने की वजह से उच्च प्राथमिकता प्रदान की गई। सन् 1991 के दस वार्षिक जनगणना आँकड़ों को प्रोत्साहित करने वाली विशेषता पुरुषों की तुलना में महिलाओं की साक्षरता दर में सुधार है। इन आँकड़ों के अनुसार 1981 में 29.8 प्रतिशत की तुलना में 39.4 प्रतिशत महिलाएँ साक्षर हैं। वर्ष 1881 के दौरान पुरुषों की 7.5 प्रतिशत की तुलना में 9.6 प्रतिशत महिला साक्षरता दर में वृद्धि हुई है। महिला साक्षरता की यह दस वार्षिक दर पुरुषों से ज्यादा है। सन् 1995-96 में कुल नामाँकन में बालिकाओं का नामाँकन प्राथमिक स्तर पर लगभग 43 प्रतिशत, मिडिल में 39 प्रतिशत, माध्यमिक स्तर पर 34 प्रतिशत तथा उच्चशिक्षा में 33 प्रतिशत था। ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के आधीन संशोधित नीतिकरण में एक अनिवार्य शर्त यह रखी गई कि भविष्य में नियुक्त किए जाने वाले शिक्षकों में 50 प्रतिशत महिलाएँ होनी चाहिए। ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड योजना (1987-88) के अंतर्गत प्राथमिक स्कूल शिक्षकों के 1.53 लाख

पद सृजित किए गए, जिन्हें मुख्यतः महिलाओं द्वारा भरने का निश्चय किया गया। नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार शिक्षकों के 1.49 लाख पद भरे जा चुके हैं, जिसमें 48.52 प्रतिशत महिला शिक्षक हैं। छात्रावासों के निर्माण की योजना का संचालन इस उद्देश्य से किया जा रहा है कि अधिक-से-अधिक बालिकाएँ माध्यमिक शिक्षा का लाभ उठा सकें। बालिकाओं के अनौपचारिक केंद्रों का संचित योग 1.18 लाख है। इन केंद्रों की कुल संख्या 2.41 लाख है। नवोदय विद्यालयों में भी बालिकाओं का दाखिला 30.91 प्रतिशत तक सुनिश्चित हो गया है।

पूर्ण साक्षरता अभियानों में महिलाओं को पूर्ण अधिकार देने के उद्देश्य पर खास ध्यान दिया गया है। प्रौढ़ शिक्षा और उत्तर साक्षरता शिक्षा केंद्रों में महिलाओं के नामाँकन पर भी काफी ध्यान दिया जा रहा है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सामान्य और तकनीकी दोनों दृष्टि से महिलाओं के लिए शैक्षिक अवसरों में असाधारण एवं अद्भुत विस्तार हुआ है। विश्वविद्यालय और कॉलेज स्तरों पर महिला शिक्षा में विविधता आई है और समाज, उद्योग तथा व्यापार की बदलती आवश्यकताओं के अनुसार उसका प्रबोधन किया गया है। उच्च-शिक्षा संस्थानों में महिलाओं के नामाँकन की संख्या सन् 1996-97 में लगभग 22 लाख हो गई और यह वृद्धि पिछले छियालीस वर्षों की अवधि में पचपन गुना से भी अधिक है। इस अवधि के दौरान प्रति सौ नामाँकित पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या चार गुना से भी ऊपर है। अर्थात् 1950-51 के 14 प्रतिशत से बढ़कर 1996-97 में 53 प्रतिशत हो गई है। कुल नामाँकन की प्रतिशतता के रूप में महिलाओं के नामाँकन का प्रतिशत 1981-82 में 27.7 से बढ़कर 1996-97 में 34.1 हो गया।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी विश्वविद्यालयों के महिला अध्ययनों में अनुसंधान की सुपरिभाषित परियोजनाएँ आरंभ करने हेतु वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है। आयोग ने सामाजिक विज्ञान तथा इंजीनियरिंग एवं प्रौद्योगिकी सहित विज्ञान एवं मानविकी में महिला उम्मीदवारों के लिए अंशकालिक एसोशिएट्शिप के चालीस पद सृजित किए हैं। सितंबर 1996 तक महिला अध्ययनों के उद्देश्य से संबद्ध 33 अनुसंधान परियोजनाएँ अनुमोदित की जा चुकी हैं। विभिन्न प्रस्तावों की जाँच करने के पश्चात् महिला अध्ययन स्थायी समिति ने भी क्रमशः महिला अध्ययन केंद्रों और कक्षों की स्थापना हेतु 21 विश्वविद्यालयों और 11 कॉलेजों एवं विश्वविद्यालय विभागों को सहायता देने की सिफारिश की है।

वर्ष 1992 के दौरान श्रमिक विद्यापीठ के प्रौढ़शिक्षा कार्यक्रम के अधीन यूनीसेफ ने दक्षता आधारित साक्षरता कार्यक्रम आयोजित करने हेतु दस चुनिंदा श्रमिक विद्यापीठों को विशेष सहायता प्रदान की। इस उपक्रम में 1993 के मध्य तक दस हजार महिलाओं को न केवल साक्षर बनाया गया, अपितु उन्हें लोकप्रिय व्यवसाय में दक्षता के लिए समर्थ किया गया। महिला समाख्या कार्यक्रम डच सहायता से अप्रैल 1989 में आरंभ किया गया। यह परियोजना राष्ट्रीय शिक्षानीति (1986) के अनुसरण पर तैयार की गई। इस परियोजना का कुल समग्र उद्देश्य ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करना है, जिससे महिलाएँ अपनी दशा को बेहतर ढंग से समझ सके और अपने वातावरण को प्रभावित कर अपने परिवार के लिए एक शैक्षिक अवसर भी पैदा कर सकें।

विश्व के विकसित विकासशील देशों में नारीशिक्षा की प्रगति काफी उत्साहपूर्ण है। श्रीलंका, ब्रिटेन, फ्राँस, जापान, स्विट्जरलैंड तथा स्वीडन में माध्यमिक स्तर पर पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं का नामाँकन अधिक है। प्रौढ़शिक्षा तथा प्राथमिक स्तर पर भी महिलाएँ पुरुषों के बराबर चल रही हैं। स्पष्ट है कि ये देश महिलाशिक्षा के विकास पर बहुत जोर दे रहे हैं। स्विट्जरलैंड में प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय सबसे अधिक हैं। वहाँ पर महिलाओं की शिक्षा का प्रतिशत भी काफी ऊँचा है। प्रायः जिन देशों में प्रति व्यक्ति आय कम है, वहाँ पर स्त्रीशिक्षा की दशा लगभग दयनीय है। नेपाल तथा अफगानिस्तान महिलाशिक्षा के क्षेत्र में बहुत पीछे हैं। अन्य विकासशील देशों की तुलना में भारत की स्थिति भी कुछ खास ठीक नहीं है।

एक सर्वेक्षण के अनुसार भी यही निष्कर्ष निकाला गया है। नारी प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में लगभग 130 देश हमसे आगे हैं। भारत की नारी प्रौढ़शिक्षा की दर 38 है,

जबकि अनेक देशों में यह दर 100 प्रतिशत है। हमारे पड़ोसी देश नेपाल में यह प्रतिशत केवल 11 है। इसी प्रकार लड़कियों का स्कूल में नामाँकन भी भारत में अपेक्षाकृत बहुत कम है। एशिया महाद्वीप में जापान में सभी लड़कियाँ प्राथमिक स्तर पर स्कूल न जाने वाली लड़कियों की दर 39 प्रतिशत है। इस क्रम में सोमालिया सबसे पिछड़ा देश है।

विश्व में ऐसे भी देश है, जहाँ महिलाशिक्षा शतप्रतिशत या 90 से अधिक है। ये देश है-आस्ट्रेलिया, आस्ट्रिया, अजर बैजान, बेल्जियम बेलारुस, बुल्गारिया, चीन कोलंबिया, बुक द्वीपसमूह, कोस्टारिका, क्रोएशिया, क्यूबा, साइप्रस, डेनमार्क, इक्वेडोर, एसटोनिया, फिनलैंड, फ्राँस, जार्जिया, जर्मनी, ग्रीस, गुयाना, हंगरी, आयरलैंड इजराइल, इटली कजाकिस्तान, कोरिया,

किर्गिस्तान लाताविया, लेबनान, लिथुआनिया, मालदीव, माल्टा, न्यूजीलैण्ड, नार्वे, पनामा, पैराग्वे, पेरु, फिलीपींस, पोलैंड, पुर्तगाल, रोमानिया, रूस, सिंगापुर, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, ताजिकिस्तान, थाइलैंड, त्रिनिदाद एवं टोबैको, तुर्कमेनिस्तान, यूक्रेन, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका, उरुग्वे, उज़्बेकिस्तान, बेनेजुएला, यूगोस्लाविया आदि।

जहाँ तक अपने देश का सवाल है, तो उसे अभी इस क्षेत्र में बहुत कुछ करना है, काफी आगे बढ़ना है। स्वतंत्रताप्राप्ति से अब तक नारीशिक्षा में यों तो काफी प्रगति हुई है, सरकारी योजनाएँ बनीं एवं बढ़ी हैं। परंतु इस महान कार्य का दायित्व सरकार से कहीं अधिक समाज का है। इस हेतु जरूरत उन जागरूक व्यक्तियों एवं जाग्रत आत्माओं की है, जो भविष्य की आहट सुन और पहचान रहे हैं। ऐसे जिम्मेदार लोगों को अपने क्षेत्र एवं अपने परिवेश के अनुसार सभी उम्र की महिलाओं के लिए शैक्षणिक योजनाएँ क्रियान्वित करनी चाहिए। इन क्षणों में जबकि हम सब ही नहीं समूचा देश, विश्व एवं सारा जमाना एक नए युग के द्वार पर खड़ा है। ऐसे में नारीशिक्षा का यह कार्य नवयुग के स्वागतसमारोह की तरह है, जिसमें हर विचारशील को पूर्ण उत्साह के साथ भाग लेना चाहिए। उनकी यह भागीदारी ही भावी नवयुग में वैदिक-काल के स्वर्णयुग को साकार करेगा।


जनसहयोग (Kahani)

काशीनरेश की धर्मपत्नी बड़ी प्रतिभावान् और सुँदरी थी। एक दिन दासियों समेत प्रातःकाल गंगास्नान को गईं। अभ्यास न होने के कारण ठंड से काँपने लगीं। सो उन्होंने गंगातट पर बनी झोपड़ियों को जलाकर ठंडक छुड़ाने का प्रयत्न किया।

यह सूचना काशीनरेश तक पहुँची। उन्होंने रानी को दरबार में अपराधी की तरह बुलाया और कहा कि वे सारे कीमती कपड़े उतारकर भिखारियों जैसे वस्त्र पहनें और अज्ञात रूप में भिखारियों के साथ रहकर उसी तरह भिक्षा माँगे और उपलब्ध धन से जली हुई झोपड़ियों को नई बनवाएँ। रानी अपनी सजा पूरी करके लौटी, तो काशीनरेश ने उनका सम्मान किया और कहा-” देवि, राज्य हमारा परिवार है। हम इस परिवार के प्रमुख हैं। हम जिन आदर्शों का स्वयं पालन करेंगे, वही राज्य में पनपेंगे। तुम से भूल हुई, उसका प्रायश्चित सहर्ष करके तुमने प्रजा का विश्वास ही नहीं जीता, श्रेष्ठ परंपराओं को भी पोषण दिया है।”

अमेरिका के राष्ट्रपति रुजवेल्ट अपनी सफलता का रहस्य बताते हुए कहा करते थे-”मैंने अपने को सदा सौभाग्यशाली समझा है, समय-समय पर ऐसा ही दूसरों पर प्रकट भी किया है। इस दुनिया में सहयोग उन्हीं को मिलता है, जिन्हें समर्थ, सुयोग्य और सफलता तक पहुँचने वाला समझा जाता है। असमर्थों और अभागों को सस्ती सहानुभूति भर मिल सकती है, पर उन्हें कहीं से कोई कहने लायक सहायता नहीं मिलती।”

संसार में जिन्होंने भी महत्वपूर्ण सफलताएँ पाईं हैं, उन सबने जनसहयोग अर्जित करने का प्रयत्न किया है। एकाकी मनुष्य कितना ही सुयोग्य क्यों न हो, बड़े काम करने और बड़े उत्तरदायित्व वहन करने में सफल नहीं हो सकता।


मादरे वतन पर कुरबान एक जाँबाज

उसने न केवल देवगिरि पर विजय प्राप्त कर ली थी, बल्कि अपने चाचा जलालुद्दीन का वध करके दिल्ली का सिंहासन भी हथिया लिया था। सिंहासन पाने के बाद उसने अपने सहयोगियों और अनुयायियों को धन, पद और सम्मान देकर संतुष्ट किया। अपने भाई अयमस बेग को डलगु खाँ, मलिक हजबरुद्दीन को जफरी खाँ और मलिक नसरत खाँ को नसरत खाँ की उपाधि देकर तथा जनता में स्वणमुद्राओं की बौछार करके अपने प्रति आकृष्ट किया।

वह महत्वाकाँक्षी तो था ही, गुजरातविजय के बाद उसकी आँखें राजपूताना की ओर गईं। एक ओर तो चित्तौड़ की रानी पद्मिनी के अपूर्व सौंदर्य की अतृप्त पिपासा, तो दूसरी और रणथम्भोर जैसे अभेद्य दुर्ग पर विजय पाने की उत्कट अभिलाषा। उसने रणथम्भोर के राणा को संदेश भेजा’ या तो हमारे यहाँ से भागे हुए नवमुस्लिमों को हमारे सुपुर्द करो अथवा उनका वध कर दो, अन्यथा युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।’

रणथम्भोर के राणा हम्मीर बहादुर राजपूत शासक थे। शरणागतों की रक्षा करना वह अपना धर्म समझते थे। उन्होंने शरणागतों की रक्षा की अपनी परंपरा का उल्लेख करते हुए उत्तर भेजा, ‘वह यद्यपि सुलतान से शत्रुता मोल लेने के इच्छुक नहीं हैं, पर फिर भी उन्हें किसी की भी शत्रुता से भय नहीं है। उन्हें किसी का भी भय इस बात के लिए विवश नहीं कर सकता कि वह अपने कर्त्तव्य से मुख मोड़कर अपने शरणागतों को उनके सुपुर्द करें।’

उसकी तो चाहत ही किसी तरह से अपने युद्धोन्माद को पूरा करने की थी। उसने डलगु खाँ और नसरत खाँ को शाही सेना की कमान सौंपी और आदेश दिया कि रणथम्भोर पर ऐसा भयंकर हमला किया जाए कि तवारीख से रणथम्भोर की शहंशाहियत का नामोनिशान हमेशा के लिए मिट जाए और वहाँ पर दिल्ली की हुकूमत का परचम लहरा उठे।

शाही सेना बड़े उत्साह और उमंग के साथ रणथम्भोर की ओर चल पड़ी। कुछ दिनों की रणयात्रा के पश्चात् युद्ध प्राँगण में दोनों ओर की सेनाएँ आ डटीं। जहाँ एक ओर अत्याचारी सुलतान के सैनिकों के हृदय में अपने शासन की पताका फहराने का उन्माद था, वहीं दूसरी ओर रणथम्भोर के वीर रणबाँकुरों की रगों में स्वतंत्रता के खौलते रक्त का तेज प्रवाह था। अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता बचाने के लिए प्रत्येक वीर सैनिक के हृदय में मर मिटने की उत्कट चाहत थी।

उनमें से कोई नहीं चाहता था कि उनकी रणथम्भोर की पवित्र धरती पर विदेशी शासन की कलुषित छाया तक पड़े। अतः अपने मान-सम्मान एवं हृदयों के सम्राट राणा हम्मीर के इशारे पर इस्लामी सेना का सामना करने के लिए युद्धभूमि में सिरों पर कफन बाँधकर वे आ डटे। एक ओर इस्लाम के प्रचार व साम्राज्यप्रसार का जोश तो दूसरी ओर शरणागतों की रक्षा का उल्लास और दायित्व। दोनों ओर से भयंकर युद्ध हुआ। राजपूतों की असहनीय मार से नसरत खाँ युद्ध में मारा गया और डलगु खाँ को पीछे हटना पड़ा।

सुलतान को जब यह समाचार प्राप्त हुआ, तो उसके क्रोध का पारा आसमान को छू गया। उसे अपने स्वर्णिम स्वप्नों के महल ढहते हुए प्रतीत हुए और सारी शहंशाहियत धूल में मिलती हुई दिखाई देने लगी। उसे लगा कि जैसे सारे प्रलयंकारी बादल सिर पर मँडराने लगे हैं और इनके प्रकोप से खिलजी वंश लिए जाएगा। उसकी आँखों के सम्मुख अँधेरा छा गया। उसके रक्त की उष्णता में मानो शीतलता आ गई। लेकिन फिर प्रिय सेनापति नसरत खाँ की मूकछाया उसके मस्तिष्क में एक बार उसे ललकारती हुई नाच उठी। उसे लगा कि नसरत खाँ का बदला, साम्राज्य का प्रसार सब कुछ रणथम्भोरविजय पर ही निर्भर है। अतः कुछ क्षणों में ही उस में आत्मविश्वास जाग उठा। उसके मृत विचारों में एक प्रलयंकारी चेतना जाग उठी। उसकी रगों में रक्त का प्रवाह तेज हो उठा। उसकी लड़खड़ाती जीवननौका को मानो किनारा मिल गया। उसने स्वयं शाही सेना के संचालन का संकल्प कर लिया और वह युद्धभूमि में आ पहुँचा।

दोनों ओर से भयंकर युद्ध हुआ। भयंकर युद्ध की चीत्कारों, हाथियों की प्रलयंकारी चिंघाड़ों और अश्वों की हिनहिनाहट से सारा वातावरण गूँज उठा। दोनों ओर के सैनिकों ने अपूर्व शौर्य का प्रदर्शन किया। पर इस बार रणथम्भोर की भाग्यलक्ष्मी मानों रुष्ट हो गई थी और विदेशी छाया पड़ने के आसार प्रकट होने लगे थे। हम्मीर की सारी आशाओं पर पानी फिर गया। अपने देश की स्वतंत्रता को बचाने के सारे उपाय निष्फल हो गए। राणा हम्मीर मारे गए। नारियों के जौहर से निकली भयानक आग की विशाल लपलपाती लपटों से समूचा रणथम्भोर भस्म होता दिखाई देने लगा।

इस युद्ध में विजय सुलतान अलाउद्दीन को प्राप्त हुई; पर वह राजपूतों का अदम्य उत्साह एवं अपूर्व वीरता देख चुका था और उस राजपूत सेना के एक नवयुवक रणबाँकुरे का रणकौशल उसके हृदय में घर कर गया था, जो कि अपने देश की रक्षा के लिए अपूर्व साहस व वीरता प्रदर्शित कर चुका था। उससे परिचय पाने के लिए लालायित हो उठा, ताकि चलते वक्त उसकी वीरता के लिए उसे शाबाशी दे सके और संभव हो तो उसे अपनी सेना का सिपहसालार बना दे। इसी विचार से वह जब ढलती हुई शाम में मशालों के बीच में हाथी पर चढ़ा हुआ सेना के घायल सैनिकों को देख रहा था, तो उसे असीम वेदना से कराहते हुए एक घायल सैनिक की आवाज कानों में सुनाई पड़ी। वह रुक गया। उसकी आँखें उस घायल नवयुवक के रक्तरंजित मुख पर अटक गईं। मशाल की लौ और तेज हो गई। उसका चेहरा और स्पष्ट हो गया। यह वही रणबाँकुरा था, जिसकी उसे तलाश थी। सुलतान उसे देखते ही अपने को सँभाल न सका, पूछ बैठा-

“नौजवान, तुम्हारा नाम।”

“मुहम्मद! “ एक कराह मुँह से निकली।

इस्लामी नाम सुनकर शहंशाह के मन में जातीयता का विस्फोट हो गया। मन-ही-मन एक सिहरन और गुदगुदी पैदा हुई। मुसकराकर पूछा- “और जाति?”

“मुगल पठान।” और कराहने की आवाज तेज हो गई।

सुनते ही मानो सुलतान की रगों में रक्त का प्रवाह और तेज हो गया। प्रसन्नता से हृदय की धड़कनें तीव्रतर हो गईं। इस्लामी नवयुवक और वह भी पठान, सोचते ही मुँह से निकल गया, “सुभान अल्लाह।” अलाउद्दीन के हृदय में उसके प्रति अब और जातीय स्वार्थ जाग्रत हो गया। इसलिए कि वह मुसलमान है। वह सोचने लगा-काश यह हमारी सेना में आ जाए। तभी मशाल की लौ और भी अधिक तेज हो गई। सुलतान कुछ क्षण चुप रहकर बोल उठा “नौजवान! हम तुम्हारी दिलेरी देखकर बहुत खुश हैं।”

“शुक्रिया।”

“हम सोचते हैं कि तुम्हारे घावों का इलाज करा दिया जाए।”

“बेहतरीन।”

“लेकिन अगर तुम्हारे घाव ठीक हो जाएँ तो फिर तुम क्या करोगे?”

“काश! मेरे घाव ठीक हो जाएँ और मेरे जिस्म में पहले जैसी खून की रवानगी हो जाए तो मैं वह पहला आदमी हूँगा, जो कि अपने मादरेवतन पर नापाक नजर डालने की जुर्रत करने वाले तुम जैसे काफिर की गरदन अपनी शमशीर से अलग कर दूँगा।” सहसा उसकी आँखें चमक उठीं।

मशाल की लौ सहसा हवा के झोंकों में काँप उठी। सुलतान चिल्ला उठा, भौंहें तन गईं, नाक के नथुने फूल गए, क्रोध में मुट्ठियां बँध गईं। वह हौदे में घुटने के बल उचककर बैठता हुआ चिल्ला पड़ा, “नमक हराम! काफिर! तू अब मेरी नजर के सामने अधिक साँसें लेने के काबिल नहीं। मैं तो चाहता था कि तुझे आसमान पर बिठा दूँ। परंतु नाली का कीड़ा नाली में ही रहना पसंद करता है। तो तू भी वही रहा।” और इतना कहकर उसने अट्टहास के साथ महावत को इशारा किया। अगले पल ही हाथी का अगला पाँव उस नवयुवक के मुँह से एक चीख निकली। सारे शरीर की नसें खिंच गईं। हथेलियाँ तन गईं और आँखें सदा-सदा के लिए बंद हो गईं। नवयुवक ने मुसलमान होकर भी अपनी मातृभूमि का ऋण चुका दिया, जिसकी गोद में वह पला था। उसकी आत्मा परिष्कृत हो गई।

अलाउद्दीन डलगु खाँ को वहाँ का शासक नियुक्त करके यह आदेश दे गया, “भले ही यह नौजवान मेरी नजरों में काफिर था, पर फिर भी वह एक बाँका दिलेर था और मादरे-वतन पर मर मिटने वाली बेमिसाल खूबसूरत हीरा था। ऐसे नौजवान की याद में एक कब्र बनवा दी जाए और उसके पत्थर पर लिखवा दिया जाए-’एक ऐसे जियाले मुस्लिम नौजवान की यादगार, जिसने अपने मजहब व कौम की परवाह न करते हुए केवल अपने वतन की खातिर अपने को कुरबान कर दिया’।”


शास्त्रीजी की परोपकारिता (Kahani)

घटना सन् 1940 की है। उन दिनों महात्मा गाँधी के आश्रम सेवाग्राम में परचुरे शास्त्री नामक एक विद्वान् भी रहते थे, जो कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। बापू स्वयं उनका उपचार किया करते थे। वे उनकी मालिश किया करते, घावों को धोते और दवाई लगाते।

एक दिन जब बापू शास्त्री जी की मालिश कर रहे थे। आश्रम के ही एक कार्यकर्ता पंडित सुँदरलाल भी वहीं उपस्थित थे। उन्होंने गाँधी जी से कहा-”बापू! कोढ़ की तो एक अचूक औषधि है। कोई जीवित काला नाग पकड़कर मँगवाएँ और कोरी मिट्टी की हाँड़ी में बंद कर उसे उपलों की आग पर इतना तपाएँ कि नाग जलकर भस्म हो जाए। उस भस्म को यदि शहद के साथ रोगी को खिलाया जाए तो कुष्ठ कुछ ही दिनों में दूर हो सकता है।”

महात्मा गाँधी इस उपाय के संबंध में कुछ कहें, इसके पहले ही शास्त्री जी ने कहा -”बेचारे निर्दोष साँप ने क्या बिगाड़ा है? जो उसको जलाकर अपना रोग ठीक किया जाए। इससे तो मेरा स्वयं का मरना ही ठीक है, क्योंकि हो सकता है पूर्व जन्म के किसी पाप के कारण मुझे यह रोग लगा हो।”


गुरु ने बताई जीवन की सार्थकता

रथ के पहियों से निकली घर-घर्र ध्वनि से वनप्राँतर की नीरवता टूट-टूटकर बिखर बिखर रही थी। षोडशवर्षीय अयोध्या के राजकुमार राम अपने छोटे भ्राता लक्ष्मण सहित रथ के पीछे वाले भाग में बैठे थे। उनके बीच में विशाल देहयष्टि वाले महर्षि विश्वामित्र विराजमान् थे। कुशल सारथी के संकेत से अश्व पवन-गति से उड़े चले जा रहे थे। इसी के साथ श्री रामभद्र के मनोआकाश में विचार पाँखियों की पाँत उड़ती जा रही थी।

उन्हें याद आ रहा था वो दिन, जब सेवकों-माताओं के साथ उनके पिताश्री महाराज दशरथ भी चिंतित हो उठे थे। सभी परेशान थे कि राजकुमार रामभद्र दिन-पर-दिन इतने दुबले क्यों होते जा रहे हैं। महाराज के माथे की लकीरें गहरी हो गईं थी, आखिर क्यों? किसलिए? मेरा राम ऐसा क्यों है? उनका पितृहृदय व्याकुल हो उठा था। वे स्वयं भी काफी समय से यह सब अनुभव कर रहे थे।

काफी पूछताछ के बाद कोई भी उन्हें समुचित कारण नहीं बता पाया। परिजन-पुरजन-सेवक इतना भर बता पाए-”हम लोग इतना भर कह सकते हैं कि जो दृश्य उन्हें पहले आनंदित-आह्लादित कर देते थे, उनकी ओर अब आँख उठाकर भी नहीं देखते।” जिसने जो देखा, जो समझा वही बताए जा रहा था।

राजवैद्य को भी दिखाया गया था, परंतु वे भी कुछ नहीं समझ पाए, जब रोग ही नहीं पता चला, तब निदान भला क्या हो?

बताने वाले इतना बता रहे थे कि राजकुमार जब से यात्रा से लौटे हैं, तभी से उनकी यही दशा हैं?

यात्रा और राजकुमार की स्थिति का अंतर्संबंध महाराज की समझ में नहीं आया। भला यात्रा से यह कैसे हुआ? अपने देश की नदियों, पर्वतों, प्रकृति लीलास्थली, वन-अरण्यों, तीर्थों, नगरों तथा ग्रामों के दर्शन से तो उनका ज्ञान बढ़ेगा, यही सोचकर मैंने उन्हें जाने की अनुमति दे दी थी। देशदर्शन से ज्ञानवृद्धि होना तो स्वाभाविक ही हैं, परंतु वह स्वयं में इतना व्यथित हों उठेंगे कि आहार-निद्रा भी त्याग देंगे, यह समझ में नहीं आ रहा....... महाराज दशरथ कहते जा रहे थे।

सेवक बता रहे थे-”रामभद्र को इन दिनों एकाँत अच्छा लगता है। नदी तट, विजन अरण्य तथा एकाकी चिंतन में उन्हें रुचि है, लेकिन मित्रों के हास-परिहास से अब उन्हें विरक्ति हो गई है। वे एक स्थान पर कितनी ही देर तक प्रस्तरवत् बैठे रहते हैं अथवा फिर उदासीन एवं गंभीर मुद्रा में टहलने लगते हैं।”

महाराज सोचने लगे-जब मेरे संतान नहीं थीं, तो सोचा करता था शायद निस्संतान होना ही सबसे बड़ा

दुर्भाग्य है। पर आज मुझे लगता है कि अपनी संतान का कष्ट दूर न कर पाना शायद उससे भी ज्यादा पीड़ादायक है।

इधर सेवक का बताना जारी था, स्वामिन्! रामभद्र इन दिनों कुछ अधिक ही पीले पड़ गए हैं। कुछ पूछने पर अन्यमनस्क हो

दूर चले जाते हैं, मानों बोलने बातचीत करने से उन्हें अरुचि हो गई हो। कभी-कभी जब वे राजमहल की कोई मूल्यवान् वस्तु देखते हैं, तो उनके कमल जैसे नेत्रों में अश्रु छलक आते हैं और वे उनकी ओर से मुख मोड़ लेते हैं।

महाराज दशरथ से अब और सुना नहीं गया, वे शून्य की ओर ताकते हुए बोले-देखें-सर्वेश्वर की क्या इच्छा है? और वे एक ओर धीमे कदमों से चले गए।

इधर रामभद्र के मनोआकाश में कुछ और ही बिंब उभर रहे थे। उनकी विचार-तरंगों में यह उमड़ रहा था-”यह धन-संपत्ति, यह राज्य वैभव, यह प्रासाद आखिर कितने दिन......?”

सोचते-सोचते उन्हें अपनी यात्रा के दृश्य स्मरण हो आए, मानसरोवर की सुनील जलराशि, कैलाश के शुभ्र-धवल हिमशिखर।

श्री बद्री-केदार के पुनीत स्थलों का वह प्रबोधगान कि मानव ऊर्ध्वरेता बनकर रहे तथा मलविक्षेप आवरण उसे स्पर्श न कर पाएँ, परंतु अपने आसपास की जिंदगी में ऐसे दिव्यपुरुष कितने मिलते हैं। ऋषियों की वह दिव्य तपोभूमि-हर पल उनको झकझोरती हुई यही पूछने लगी, संपूर्ण देश त्रासरहित तो है? और फिर तो जैसे उन्हीं का मन चीत्कार कर उठा-राम! तू तरुण होने आया, इन सोलह बसंतों में तूने माता-पिता का प्रेम ममत्व देखा, परिजनों -पुरजनों का स्नेह -समादर देखा, परंतु क्या तुझे रावण जैसे सत्ताशक्ति प्रमत्त द्वारा पीड़ित मानवता की अश्रुपूरित आँखें दिखाई दीं? देश के अनेक जनपद आज उस स्वेच्छाचारी द्वारा भेजे घुसपैठियों के स्कंधावार बने हुए हैं? तो क्या कल समूचे देश उनकी नृशंस बर्बरता से अछूते रह सकेंगे? आज अपनी इस यात्रा में वे जिस चिंतनधारा में निमग्न थे, उसकी व्यापकता सीमाहीन थी।

तभी ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने उन्हें पुकारा-”वत्स रामभद्र।” और वे क्रमशः विचारों से यथार्थ की दुनिया में आते हुए विनीत स्वर में बोले-आज्ञा गुरुदेव? अभी भी उनका स्वर सुदूर से ध्वनित होता मालूम पड़ रहा था।

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने एक दिवस पहले ही उनके पिता महाराज से उन्हें अपनी सहायता के लिए माँगा था। उनकी इस माँग को महाराज ने बड़े विह्वल मन से पूरा किया था। पर स्वयं श्रीराम के लिए तो महर्षि का सुपास मानो जीवनलक्ष्य की प्राप्ति ही लगा था। अब वे महर्षि की ओर देख रहे थे।

“उन शालवृक्षों के निकटस्थ भग्न कुटीर देख रहे हो?”

“हाँ, गुरुदेव!” इस बार रामभद्र के स्वर में लक्ष्मण का स्वर भी सम्मिलित था।

“इनमें कभी अपरिग्रही योगी-यती साधनारत थे। भोजन के रूप में वे केवल वन्यफल ही लेते थे और नदी का उन्मुक्त जल। परंतु रावण के सैनिकों ने उन्हें यहाँ से बलात् निकाल बाहर किया और उनके कुटीरों को रौंद डाला।”

“गुरुदेव! प्रकाँड वेदवेत्ता महर्षि विश्रवा के पुत्र.....।”

रामभद्र कुछ और कह पाते कि ब्रह्मर्षि विश्वामित्र कहने लगे “इसमें मुनि का दोष नहीं वत्स राम! उन्होंने उसे सुसंस्कार देने के पर्याप्त प्रयास किए पर बड़े होने पर उस मातुलकुल का प्रभाव छा गया और आज वह अकारण जनसंहार एवं निर्लज्ज कामुकता का पर्याय बन गया है।”

राम की भृकुटियाँ तन गईं। नेत्रकोण रक्तिम हो उठे। लक्ष्मण की सुदीर्घ भुजाएँ फड़क उठीं और वे विनम्र स्वरों में कह उठे-

“गुरुदेव! हम दोनों का समस्त जीवन यदि इस कार्य में लग सके तो हम बड़भागी होंगे।”

“धैर्य धारण करो वत्स! तुम्हारे पिता महाराज से आज की भिक्षा में मैं रावण का पराभव और इस देश का अक्षुण्ण गौरव एवं उज्ज्वल भविष्य ही तो माँग लाया हूँ।”

“रामभद्र! तुम्हारी मनोदशा कैसी है? जिसके लिए तुम्हारे पिताश्री चिंतित हो रहे थे। क्या यह अरण्यप्रकृति तुम्हें थोड़ा स्वास्थ्य दे सकी?”

“मैं स्वस्थ हो रहा हूँ गुरुदेव! मेरे मानसिक अवसाद का कारण तो जीवन का निष्प्रयोजन लगना था। आपका सान्निध्य पाते ही मुझे लगने लगा कि नहीं अब मेरे जीवन की भी सार्थकता है, इसका भी कोई प्रयोजन है।”

“रामभद्र! अगले दस दिनों तक राष्ट्रकल्याण के लिए किया जाने वाला मेरा यज्ञ चलेगा। इस बीच तुम्हें अनुभव होगा कि यह देश उसकी संस्कृति एवं उसका धर्म अब निरापद नहीं रहे।”

वे श्रीराम एवं भ्राता लक्ष्मण को अपना मूल उद्देश्य बता रहे थे।

“गुरुदेव! आपका यह शिष्य वचन देता है कि रक्त की अंतिम बूँद रहते वह अपनी देवसंस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष करेगा। “ राम की दक्षिण भुजा ऊँची हुई।

“ब्रह्मर्षि! श्रीराम का यह अनुचर भी आपको यह आज्ञा मैं अपने सर्वस्व की आहुति देकर भी पूरी करूंगा।” लक्ष्मण के धनुष की टंकार से वनप्राँतर ध्वनित हो उठा।


एंड्रयू कार्नेगी (Kahani)

मिलान के आर्कविशप पोप पाल उन दिनों कार्डिनल में आर्थिक तंगी का जीवन जी रहे थे। उन्हीं दिनों अकाल की भी स्थिति थी। एक दिन एक समाजसेवी व्यक्ति उनके पास पहुँचे और बोले अभी भी बहुत लोगों तक खाद्यसामग्री पहुँच नहीं पाई, जबकि कोष में एक भी पैसा नहीं बचा। पोप पाल ने कहा-”कोष रिक्त हो गया-ऐसा मत कहो, अभी मेरे पास बहुत-सा फर्नीचर, सामान पड़ा है, इसे बेचकर काम चलाओ। कल-की-कल देखेंगे।” आज का काम भी रुका नहीं, कल आने तक उनकी यह परदुःखकातरता दूसरे श्रीमंतों को खींच लाई और सहायताकार्य फिर द्रुतगति से चल पड़ा।

डनफर्मलाइन (स्कॉटलैंड) में एक बालक जन्मा। उसकी माँ केक बनाती थी और एक छोटी-सी कोठरी में बैठकर उन्हें बेचा करती थी। पिता फेरी लगाता था, शाम को उतने पैसे मिल जाते थे, जितने से तीनों प्राणी पेटभर लेते थे और आधे फटे कपड़े पहन लेते थे। गरीबी से दुःखी लड़का एक दिन घर से भाग गया और अमेरिका पहुँचकर एक इस्पात कंपनी में चपरासी हो गया। काम उतना था नहीं, इसलिए अपने साहब की अलमारी से कोई किताब निकाल लेता और पढ़ने लगता। दूसरे कर्मचारी आते और उसे बातचीत में लगाना चाहते, पर वह उन्हें किसी-न-किसी बहाने से टरका देता और फिर अपने पढ़ने में लग जाता। वह इतनी तल्लीनता से पढ़ता कि पुस्तक की अधिकाँश बातें एक पाठन में ही याद हो जातीं।

एक दिन एक मीटिंग थी। कोई प्रश्न आ पड़ा, उसे मैनेजिंग डायरेक्टर भी सुलझाने में असमर्थता अनुभव कर रहे थे। वह लड़का पास ही खड़ा था, उसने एक किताब उठाई, बीच में से शीघ्रता से एक पृष्ठ खोलकर डायरेक्टर के आगे बढ़ा दिया। यही वह उत्तर था, जिसकी खोज हो रही थी। बालक की इस असाधारण प्रतिभा से सब हक्के–बक्के रह गए। वह बालक अपनी बुद्धि से उस उद्योग की तमाम तकनीक सीख गया और एक दिन करोड़पति होकर एंड्रयू कार्नेगी के नाम से विख्यात हुआ। वह श्रेय-जिसने उसे जमीन से उठाकर आसमान पर पहुँचा दिया-उसकी स्वाध्यायबुद्धि को ही दिया जा सकता है।


बीसवीं सदी में राजनीति का अनुभव सार

बीसवीं सदी का अनुभव है कि राजनीति मनुष्य के लिए कल्याणकारी नहीं है। उसके विविध रूपों में जितने प्रयोग पिछले सौ साल में हुए, उतने दो हजार साल में नहीं हुए होंगे। सभी प्रयोगों और घटनाओं ने निराश ही किया। राजनीति से मनुष्यजाति का जैसे मोह भंग हो गया है। मोहभंग की इस स्थिति में विचार किया जाना चाहिए कि राजनीति का विकल्प अब नई शताब्दी में क्या होना चाहिए।

बीसवीं शताब्दी बीत चली। इतिहास की दृष्टि से यह सदी भयंकर आपदाओं और विग्रहों को अपने भीतर दबाकर जा रही है। दो हजार साल का इतिहास यदि शताब्दियों के अनुसार बीस खंडों में लिखा जाए तो बीत रही शताब्दी में मनुष्य द्वारा आमंत्रित विनाश के पन्ने ही सबसे ज्यादा होंगे। यह विनाश राजनीति और उससे प्रेरित युद्धों के कारण ही है। राजनीति को सतह मानें तो युद्ध और विग्रह उसके नीचे बहने वाली गरम और कम गरम धाराएँ हैं। इतिहास के इस अध्ययन के साथ विचारशील व्यक्ति सवाल उठा रहे हैं कि इक्कीसवीं सदी में भी राजनीति ही हावी रहेगी या उसका स्थान कोई और विधा लेगी।

इस सदी ने राजनीति से मोह भंग किया है। जिस उत्साह और तेजी से यह मनुष्य की आशा का केंद्र बनने लगी थी, उससे भी तेज गति से उत्तरार्द्ध आने तक खिसकने लगी। सदी बीतने तक मनुष्य पूरी तरह इसके मोहपाश से मुक्त हो चला हैं। यों बीसवीं सदी का आरंभ होते ही युगद्रष्टास्तर के महामानव अनुभव करने लगे थे कि राजनीति मनुष्य के लिए कल्याणकारी नहीं है। वह थोड़ा-सा आश्वासन देती है और बदले में स्वतंत्रता का हरण कर लेती है। पहरेदारी करने वाले लोग अपने स्वामी या बस्ती के लोगों को ही बंधक बना लें तो जो अनर्थ होता है, वैसा ही अनर्थ राजनीति से आशा-अपेक्षा करने के बाद हुआ। दक्षिण अफ्रीका में प्रायः उन्नीस वर्ष रहने वाले महात्मा गाँधी बीच में जब भारत लौटे तो उन्होंने पहली बार राजनीति के हाथ में चाबी सौंपने का संकट भांप लिया था। 1901-02 की अपनी पहली पूरे देश की यात्रा (अचर्चित) करने के बाद भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की बैठक में उन्होंने इस संकट की चर्चा भी की थी। बाद में दक्षिण अफ्रीका लौटकर 1904 में डर्बन के पास उन्होंने फीनिक्स आश्रम खोला। स्थापना का उद्देश्य राजनीति का विकल्प तलाशना ही था। स्वामी विवेकानंद, टॉलस्टाय, रस्किन, जुडास और स्वामी चंद्रशेखरेंदु आदि ने भी राजनीति के खोखलेपन की ओर इशारा कर दिया था। यह बात अलग है कि युगद्रष्टा मनीषियों ने जिस सत्य का अनुभव किया उसे समझने में मनुष्यजाति को पूरी सदी लग गई है, लेकिन आज सभी समीक्षक और विश्लेषक अनुभव करते हैं कि राजनीति सचमुच व्यर्थ सिद्ध हुई है। उसने अनर्थ ही ज्यादा किए हैं।

महात्मा गाँधी के संबंध में प्रश्न किया जा सकता है कि उन्होंने राजनीति की व्यर्थता अनुभव कर ली थी तो उसे ही अपना कार्यक्षेत्र क्यों चुना, इसका उत्तर गाँधी जी के आत्मकथा और विचार हैं। उन्हें सरसरी तौर पर भी पलटा जाए तो जवाब मिल सकता है कि महात्मा गाँधी ने राजनीति को आपर्द्धम के रूप में चुना था। उनका मन और जीवन अध्यात्म से ही अनुप्राणित था। राजनीतिक गुलामी और शोषण से समाज को मुक्त किए बिना कोई व्यक्ति धार्मिक हो ही नहीं सकता। इस अनुभूति ने गाँधी जी को राजनीति में प्रेरित किया, अन्यथा उनकी आकाँक्षाएँ और चर्या इस दलदल से सर्वथा मुक्त रही हैं। ‘रामनाम’, ‘आश्रम’,’संतवेश’,’प्रार्थना’, ‘स्वाध्याय’,’शील’,’महाव्रत’,’भगवद्गीता’,’गोसेवा’ आदि रूपों में गाँधी जी का व्यक्तित्व अराजनीतिक अधिक सिद्ध होता है।

विचारणीय यह भी है कि सौ साल के किन अनुभवों ने मनुष्यजाति का राजनीति से मोह भंग किया? छिटपुट अनुभव तो कितने ही होंगे। इनमें दस घटनाओं का प्रमुखता से उल्लेख किया जाता है। पहली घटना या घटनाओं की श्रृंखला 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध का आरंभ तथा आस्ट्रिया, सार्बिया, जर्मनी, फ्राँस, बेल्जियम, जापान, ब्रिटेन ओर टर्की आदि देश युद्ध में उतरते चले जाना। सन् 1917 तक चले इस महायुद्ध ने शामिल हुए और अलग रहे कई देशों की काया पलट दी। सदी के इन आरंभिक दशकों में जर्मनी एक महाशक्ति की तरह उभरकर आया था। विमान टेक्नोलॉजी उन दिनों प्रारंभिक अवस्था में थी। वेद विज्ञान द्वारा अनुभव प्राप्त जर्मनी में उस दौर में भी उनके विमान हजारों मील दूर उड़कर जाते और इंग्लैण्ड के शहरों पर बम बरसा कर वापस लौट आते थे। उस समय ब्रिटेन दुनिया के अधिकाँश देशों पर छाया हुआ था। ‘अँगरेजों के राज में सूरज कभी अस्त नहीं होता’ वाली उक्ति उन्हीं दिनों कही जाती थी। युद्ध में भाग ले रहे सभी देश त्रस्त थे, लेकिन इंग्लैण्ड की हालत सबसे खराब थी। इसे अपने यहाँ बाकायदा ‘युद्ध मंत्रिमंडल’ गठित करना पड़ा। करीब चार साल तक चले इस युद्ध के तात्कालिक परिणाम ब्रिटेन का साम्राज्य सिमट जाने के रूप में जरूर दिखाई दिया। ब्रिटेन का साम्राज्य पराभूत होने अथवा पराधीन देशों के स्वतंत्र होते जाने को युद्ध का शुभ परिणाम कह सकते हैं। लेकिन युद्ध इसके लिए नहीं लड़ा गया था। देशों का स्वतंत्र होना युद्ध का उपपरिणाम है। उसका दंड हजारों लोगों के मरने, लाखों परिवार बरबाद हो जाने, भाग ले रहे देशों की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाने और हथियारों की होड़ मचने के रूप में मनुष्यजाति को भुगतना पड़ा है।

इस सदी की दस प्रमुख राजनीतिक या राजनीतिक कारणों से उत्पन्न हुई महाघटनाओं पर सिलसिलेवार नजर दौड़ाई जाए। वे क्रम से इस प्रकार हैं-(1) सन् 1914 में प्रथम महायुद्ध की शुरुआत।(2) रूस में साम्यवादी क्राँति। (3) हिटलर का उदय और द्वितीय विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि बनना। विश्वयुद्ध का आरंभ। (4)परमाणु बम का विस्फोट। (5) संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना। (6) इजराइल की स्थापना और खाड़ी देशों में तनाव। (7) सत्याग्रह आँदोलन का सफलता और भारत की आजादी। (8) भारत का विभाजन।(9) जर्मनी का एकीकरण और (10) सोवियत संघ में कम्युनिस्ट शासनव्यवस्था की विफलता। पूरी शताब्दी इन दस मोड़ों के इर्द-गिर्द घूम रही है। इनमें पहली श्रृंखला की चर्चा की जा चुकी है। दूसरा मोड़ सोवियत संघ में साम्यवादी क्राँति है। यह क्राँति पहले महायुद्ध के बाद बने दबाव और रूस के तत्कालीन अंतर्विरोधों से उपजी थी। इस क्राँति ने राजनीतिक उपायों से समरसता लाने का लक्ष्य सामने रखा। मानकर चला गया था कि संसार में दो ही वर्ग हैं-शोषक और शोषित। शोषक वह है जो समर्थ है, शक्तिशाली है और अपने तंत्र के द्वारा वह कमजोर लोगों के बल, उपलब्धि व साधनों पर अधिकार करता है, उनका अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करता है। जिनका शोषण होता है, उन्हें सर्वहारा कहा गया। इस वर्ग में ज्यादातर मजदूर,किसान वर्ग के लोग ही आते हैं। क्राँति के जरिए स्वप्न यह दिखाया गया कि शोषकों का युग समाप्त होगा, शोषित और युग समाप्त होगा, शोषित और दलित लोग अपने श्रम का लाभ स्वयं उठा सकेंगे। यही नहीं वे अब तक शोषण करते आ रहे अत्याचारियों से बदला भी लेंगे।

साम्यवादी तंत्र का स्वप्न बहुत लुभावना था। पहले रूस में फिर आस-पास के राज्यों में क्राँति हुई। लेनिन के नेतृत्व में सभी राज्यों का महासंघ बना। उसे सोवियत गणराज्य अथवा सोवियत संघ नाम दिया गया। सोवियत संघ से प्रेरणा लेकर और भी कई देश लाल झंडे के तले आए। इनमें पोलैंड, चैकोस्लोवाकिया, जर्मनी का पूरबी भाग, हंगरी, चीन आदि देशों में सर्वहारा का शासन स्थापित हुआ। जल्दी ही अनुभव होने लगा कि शोषण से मुक्ति तो मिली नहीं, उस बहाने लाखों-करोड़ों लोगों को गुलामी के बंधन में और बँध जाना पड़ा। पुराने शासकों की जगह नए तानाशाह स्तर के शासक हुए। वे इतने क्रूर साबित हुए कि विरोध करना तो दूर उनसे असहमति जताना भी अपने लिए विनाश को आमंत्रित करना हो गया। कम्युनिस्ट देशों के यातनाशिविरों में लाखों लोग ठूँस दिए गए, जिन्होंने नए शासकों के खिलाफ थोड़ी भी चूँचपड़ की थी। सिद्ध हुआ कि राजनीति के जरिए किसी को दुख और अन्याय से मुक्ति नहीं मिल सकती। मुक्तिदाता स्वयं स्वामी बन बैठता है। वह और भी जोर से गला दबाता है।

जर्मनी में हिटलर का उदय और उसकी तानाशाही भी समाज में हुए घाव को भरने के रूप में हुई थी। प्रथम महायुद्ध में बुरी तरह पराजित जर्मनी का स्वाभिमान मर्माहत था। उसे अपने गौरव की पुनः प्रतिष्ठा करनी थी। यह आकाँक्षा राष्ट्र के मन-मानस को मोड़-मरोड़ रही थी। हिटलर और उसके सहयोगियों ने उस छटपटाहट को स्वर दिया। सन् 1933 में वह जर्मनी का चाँसलर बना। बाद के वर्षों में उसने जर्मन लोगों में इस कदर युद्धोन्माद भरा कि 1939 में दूसरा महायुद्ध शुरू हो गया। उधर इटली में भी मुसोलिनी ने वहाँ के नागरिकों में युद्धोन्माद भरा था। पोलैंड पर रूस और जर्मनी के आक्रमण से शुरू हुआ दूसरा महायुद्ध कुछ ही महीनों में डेनमार्क, नार्वे, बेल्जियम, फ्राँस, जापान, फिलीपीन, सारावक आदि देशों को अपनी लपेट में ले गया।

इस युद्ध का अंत 1945 में नागासाकी और हिरोशिमा पर गिराए गए अणुबमों के साथ हुआ। अणु-विस्फोट की वह विभीषिका अब भी लोगों के रोंगटे खड़े कर देती है। उस विस्फोट के शिकार लोगोँ में कोई नहीं बचा था। जिन पर परमाणु विकिरण का प्रभाव हुआ उनकी आपबीती ही देखने-सुनने को मिलती है। वह भी रोमाँचित कर देती है। अणुविस्फोट का भय पूरी मनुष्यजाति के मानस में इस कदर छा गया है कि उस घटना की किसी भी रूप में पुनरावृत्ति का विचार भी कँपकँपा देता है। दूसरे महायुद्ध में 20 लाख से ज्यादा लोग मारे गए। जिन्हें आर्थिक और पारिवारिक तबाही भोगना पड़ी, उनकी संख्या तो कई गुना ज्यादा है।

दूसरे महायुद्ध ने विश्वसमाज के शरीर पर गहरे घाव किए। उन्हें भरने और दोबारा वैसा तनाव उत्पन्न नहीं होने देने के लिए संयुक्त राष्ट्र का गठन किया गया। घोषणा हुई, करार किए गए, शपथ ली गई कि कोई भी देश किसी अन्य देश की सार्वभौम सत्ता का उल्लंघन नहीं करेगा। आपसी विवाद शाँतिपूर्ण तरीकों से निपटाए जाएँगे। युद्ध से नहीं बातचीत और मध्यस्थता से तनाव का हल खोजा जाएगा। युद्ध और राजनीति के दंश से विश्व को बचाने के लिए बनी यह संस्था विश्वसरकार का प्रारूप बन सकती थी। इस रूप में वह उभर भी रही थी, लेकिन पाँच महाबली देशों-अमेरिका, रूस, ब्रिटेन फ्राँस और चीन ने इसे अपने वर्चस की होड़ का मैदान बनाया। पाँचों की होड़ में अमेरिका और रूस ही आगे रहे। सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका अकेला दादा रह गया। दूसरे देश अपने ढंग से उसे चुनौती देते रहते थे। विश्वसरकार वसुधैव कुटुँबकम और मानवजाति के एक होने का स्वप्न जिस संस्था के माध्यम से साकार होने की उम्मीद की जा रही थी, वह भी राजनीति का अखाड़ा बनकर रह गई।

सत्याग्रह आँदोलन की सफलता और 1947 में भारत की आजादी विश्व इतिहास की अकेली ऐसी घटना है, जो सत्य ओर अहिंसा की सामर्थ्य सिद्ध करती है। बिना हथियार उठाए भी महाशक्तिशाली शासकों की सत्ता उलटी जा सकती है यह दुनिया ने पहली बार जाना। लेकिन इस आजादी के साथ आया विभाजन राजनीति के विषैलेपन को फिर उजागर करता है। विचारधारा ने दूसरे महायुद्ध के बाद बाँट दिया था। एक तरफ परंपरागत व्यवस्था थी, दूसरी तरफ साम्यवादी तंत्र। भारत को राजनेताओं की निजी आकाँक्षा और आग्रहों -दुराग्रहों ने बाँटा। धर्म-संप्रदाय के नाम पर अलग हुए हिस्से भी एक कहाँ रह सके। वे भी बँट गए। 1947 में अलग बने पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान पच्चीस साल भी साथ नहीं रह सके। वे भी बँट गये। जर्मनी जरूर एक हो गया। वह भी इसलिए कि साम्यवाद से वहाँ के लोगों का जल्दी ही मोह भंग हो गया। उन्हें समता, न्याय, मुक्ति, सर्वहारा जैसे नारों के पीछे छिपा छल दिखाई देने लगा और 1990 में वह ऐतिहासिक बर्लिन की दीवार टूट गई जिसने एक देश के एक नगर और परिवार को बाँट रखा था। उसी साल सोवियत संघ का साम्यवाद स्वप्न भी बिखरने लगा। दमन और उत्पीड़न के जरिए लोगों को बाँधें रखने वाली जंजीरें साल-डेढ़ साल में बिखर गईं और 25 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ का ढाँचा पूरी तरह बिखर गया।

तमाम घटनाओं को दर किनारे छोड़ें तो भी ब्रिटिश साम्राज्य का अस्त होना और कम्युनिज्म की विफलता, दो ऐसी महाघटनाएँ हैं। जो सिद्ध करती हैं कि मानवीय चेतना मूलतः स्वतंत्र और मुक्त है। उसे हमेशा के लिए कोई नहीं बाँध सकता। पहले और दूसरे महायुद्ध ने विनाश की शक्ति को भी बौना कर दिया। राजनेताओं और शासकों की खुलती रहने वाली पोल तो इन दस मोड़ों के सामने कुछ भी नहीं है। लेकिन इस तरह के हजारों रहस्योद्घाटन साबित करते हैं कि राजनीति के दिन लद गए। उसके पास समाधान नहीं है। राजघरानों और तानाशाहों, साम्राज्यों के रूप में राजनीति की चमक उन्नीसवीं सदी के अंत के साथ खो गई। उसके बाद की राजनीति साफ-सुथरा चेहरा लेकर कभी भी प्रस्तुत नहीं हुई। समाजवाद, साम्यवाद, लोकतंत्र, मजहबी राज्य, सद्विप्रों का शासन सैनिक शासन (मार्शल ला) तानाशाही आदि कितने ही रूपों में राजनीति ने लुभाने की कोशिश की। इन रूपों में लोग तो वही थे जिनके मन में सत्ता और अधिकार की लिप्सा लपलपाती रही है। बीसवीं शताब्दी में इतने अधिक प्रयोग हुए कि राजनीति की सारी कलई खुल गई। लोगों को उससे कोई आशा-अपेक्षा नहीं है। सवाल अपनी जगह है कि राजनीति का विकल्प क्या है? क्या परिष्कृत धर्मतंत्र यह भूमिका निभा सकता है। राजनीति का मुखौटा पहने समाजतंत्र के विभिन्न घटक क्या इसे उतारकर परिष्कृत रूप में वास्तविक समाजसेवा हेतु उतर कर इस शून्य को भर सकते हैं, जो आज की खोखली राजनीति के असरहीन होने से पैदा हुआ है। उत्तर आप हम सभी को अपेक्षित है। हमीं को देना भी होगा।


शुभारंभ हमेशा छोटे-छोटे कदमों से होता है (Kahani)

शिवाजी उन दिनों मुगलों के विरुद्ध छापा मार युद्ध लड़ रहे थे। रात को थके-माँदे वे एक वनवासी बुढ़िया की झोपड़ी में जा पहुँचे और कुछ खाने-पीने की याचना करने लगे। बुढ़िया के घर में कोदों थी, सो उसने प्रेमपूर्वक भात पकाया और पत्तल पर उसने सामने परोस दिया। शिवाजी बहुत भूखे थे। सो सपाटे से भात खाने की आतुरता में उँगलियाँ जला बैठे, मुँह से फूँककर जलन शाँत करनी पड़ी। बुढ़िया ने आँखें फाड़कर उसे देखा और बोली-सिपाही तेरी शक्ल शिवाजी जैसी लगती है और साथ ही यह भी लगता है कि तू उसकी तरह मूर्ख भी है।

शिवाजी स्तब्ध रह गए। उनने बुढ़िया से पूछा- भला शिवाजी की मूर्खता तो बताया और साथ ही मेरी भी।

बुढ़िया ने कहा- तूने किनारे-किनारे से थोड़ी ठंडी कोदों खाने की अपेक्षा बीच के सारे भात में हाथ मारा ओर उँगलियाँ जला लीं। यही बेअकली शिवाजी करता है, वह दूर किनारों पर बसे छोटे-छोटे किलों को आसानी से जीतते हुए शक्ति बढ़ाने की अपेक्षा बड़े किलों पर धावा बोलता है और मार खाता है। शिवाजी को अपनी रणनीति की विफलता का कारण विदित हो गया। उन्होंने बुढ़िया की सीख मानी और पहले छोटे लक्ष्य बनाए और उन्हें पूरा करने की रीति-नीति अपनाई। छोटी सफलताएँ पाने से उनकी शक्ति बढ़ी और अंततः बड़ी विजय पाने में समर्थ हुए।

शुभारंभ हमेशा छोटे-छोटे कदमों से होता है, पर यथार्थता की प्रकाश किरणें इतने मात्र से एक व्यक्ति की जीवनधारा बदल देती है।


युगपुरुष की लेखनी से - पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय -अमृत कलश

65- सामाजिक नैतिक एवं बौद्धिक क्राँति कैसे?

पिछले युगों की अपेक्षा आज का मनुष्य अधिक सुविधा एवं साधन संपन्न है किंतु, फिर भी वह दुखी है। इसका कारण यह है कि हमने समाज के इन तथ्यों को भुला दिया है-

विचारक्रान्ति अपने समय की असाधारण महाक्राँति।

बौद्धिक, नैतिक, सामाजिक क्राँति -पृष्ठभूमि, रूपरेखा।

बौद्धिक क्राँति हेतु प्रेरक प्रयास।

बौद्धिक क्राँति की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम।

शाँतिकुँज की प्राणवान् प्रशिक्षण प्रक्रिया।

नैतिक क्राँति की दिशाधारा।

सामाजिक क्राँति क्यों और कैसे?

युगपरिवर्तन का अंतिम चरण-महासंघर्ष।

सामाजिक क्राँति और उसका आधार।

समाज की अभिनव रचना-सद्विचारों से।

67-प्रेरणाप्रद दृष्टाँत

जनसाधारण को समझाने की दृष्टि से दृष्टाँत कथापरक होते हुए भी प्रेरक होते हैं। ऐसे ही श्रेष्ठ दृष्टाँतों के संकलन में है-

आस्तिकता और ईश्वरविश्वास।

ईश्वरभक्ति और आध्यात्मिकता।

आत्मबोध और आत्मविस्तार।

आत्मशोधन और जीवनसाधना।

सेवा, परोपकार और पुण्यपरमार्थ।

पात्रता की कसौटी एवं योग्यता की परख।

प्रेम, करुणा और उदारता।

उत्सर्ग, त्याग और बलिदान।

कर्तव्यपरायणता और सिद्धाँतनिष्ठा।

संयम, संतुलन एवं आत्मनियंत्रण।

66 -युग निर्माण योजना-दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम

नवयुग के नवनिर्माण का काम जाग्रत और जीवंत तथा कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तियों के द्वारा ही संभव है। ऐसे ही भावनाशीलों का संगठन करने हेतु युगनिर्माण परिवार के प्रमुख सूत्र हैं-

युगनिर्माण योजना और उसकी दिशाधारा।

युगनिर्माण योजना -दर्शन और स्वरूप।

नवनिर्माण की पृष्ठभूमि और आधार।

युगनिर्माण योजना की रूपरेखा और कार्यपद्धति।

युगनिर्माण सत्संकल्प की दिशाधारा।

युगनिर्माण योजना के आदर्श और सिद्धाँत।

युगनिर्माण योजना का शतसूत्री कार्यक्रम।

युग की वह पुकार, जिसे पूरा होना ही है।

अशिक्षा का अंधकार दूर किया जाए।

68-पूज्यवर की अमृतवाणी (भाग एक)

अपने दीर्घ तपस्वी जीवन के अनुभव और साधना-सार को बहुत ही सुँदर रूप में प्रस्तुत करना कठिन कार्य है, किंतु जब अमृतवाणी में आप पढ़ते हैं, तब पाते हैं-

मनुष्य में देवत्व का उदय व धरती पर स्वर्ग का अवतरण।

देवसंस्कृति के दो आधार-गायत्री और यज्ञ।

आध्यात्मिक कायाकल्प के सूत्र और सिद्धांत।

साधना से सिद्धि।

महाकाल की पुकार अनसुनी न करें।

युगपरिवर्तन की पूर्व वेला एवं संधिकाल।

विषम परिस्थिति में नवयुग की तैयार।

आपत्तिकाल का अध्यात्म।

धर्मतंत्र की गरिमा एवं महत्ता।

69-विचारसार एवं सूक्तियाँ (प्रथम खंड)

साहित्य में यत्र-तत्र अत्यंत उत्तम स्थल एवं विचारों का गुँफन मिलता है। सारपूर्ण विचारों को मनुष्य ग्रहण करता है तो उसे जीवन में अनायास लाभ मिलता है। इन्हीं विचारसार एवं सूक्तियों में हैं-

अध्यात्म एक चिंतनधारा।

धर्म और विज्ञान।

जीवनसाधना।

मनोबल एवं इंद्रियनिग्रह।

सद्गुणों की सच्ची संपत्ति।

समय का सदुपयोग।

छिद्रान्वेषण।

मूढ़’-मान्यताएँ और अंधविश्वास।

70- विचारसार एवं सूक्तियाँ (द्वितीय खंड)

जीवन की धाराएँ विभिन्न होना संभव है, किंतु जीवन के मूल सिद्धांत प्रायः समान ही होते हैं। सारयुक्त विचारों और सूक्तियों का सावधानीपूर्वक चयन करें तो पाते हैं-

राष्ट्र और संस्कृति, महापुरुषों की वाणी।

पंथ अनेक, लक्ष्य एक।

कुछ महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सूक्तियाँ।

विवेक-सतसई।

जीवन-मूल्य, भावसंवेदना, अपना दृष्टिकोण बदलें।

सेवा-साधना स्वाध्याय एवं सद्विचार।

स्वस्थ जीवन, भोगविलास, त्याग और बलिदान।

महापुरुषों की दिव्य-अनुभूतियाँ और दिव्यसंदेश।

वेदों की दिव्यसूक्तियाँ।

परमात्मा और उसकी उपासना।


VigyapanSuchana

पूज्यवर ने अपने सभी मानसपुत्रों, अनुयायियों के लिए मार्गदर्शन एवं विरासत में जो कुछ भी लिखा है- वह अलभ्य ज्ञानामृत (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय सत्तर खंडों में ) अपने घर में स्थापित करना ही चाहिए। यदि आपको भगवान ने संपन्नता दी है, तो ज्ञानदान कर पुण्य अर्जित करें। विशिष्ट अवसरों एवं पूर्वजों की स्मृति में पूज्यवर का वाङ्मय विद्यालयों, पुस्तकालयों में स्थापित कराएँ। आपका यह ज्ञानदान आने वाली पीढ़ियों तक को सन्मार्ग पर चलाएगा, जो भी इसे पढ़ेगा, धन्य होगा।


शोर हमें पागल कर दे इससे पूर्व चेतें

ध्वनि कानों द्वारा ग्रहण की गई तथा मस्तिष्क तक पहुँचाई गई एक संवेदना है। एक निश्चित सीमा में यह मनुष्य के लिए वरदान है। परंतु विकास के नाम पर, औद्योगिक क्राँति व मशीनीकरण से यह संवेदनशीलता एकदम तहस-नहस हो गई है। शाँत, सुरम्य, सौम्य प्रकृति की स्वरलहरियों के स्थान पर आज सर्वत्र कर्णभेदी कोलाहल ही सुनाई देता है। इसका दुष्प्रभाव हर कहीं अनेकानेक शारीरिक, मानसिक व्याधियों के रूप में दिखाई दे रहा है।

शोर एक ऐसी ध्वनि है, जिसमें कोई क्रम नहीं होता है, जिसकी अवधि लंबी या छोटी तथा आवृत्ति परिवर्तनीय होती है। मनोविज्ञान की दृष्टि में यह कोई भी ऐसी ध्वनि हो सकती है, जो श्रोता को अप्रिय लगे। फिर यह चाहे संगीत या गायन ही क्यों न हो, शोर ही मानी जाएगी। अनावश्यक असुविधाजनक तथा अनुपयोगी आवाज शोर के सिवा और कुछ नहीं। शोर तथा सामान्य ध्वनि में मुख्य अंतर तीव्रता है। मनुष्य 16 से 20,000 से ऊपर के कंपनों को अल्ट्रासोनिक ध्वनि कहते हैं। कुत्ता सांप आदि इन्फ्रासोनिक तरंगों को भी आसानी से पहचान लेते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ध्वनिप्रदूषण के मुख्य स्रोत दो ही हैं-

(1) प्राकृतिक स्रोत (2) कृत्रिम स्रोत। प्राकृतिक स्रोत के अंतर्गत बादलों की गड़गड़ाहट, बिजली की कड़क, तूफानी हवाएँ, भूकंप व ज्वालामुखी फटने की भीषण आवाजें होती हैं, परंतु वह सब अस्थायी होता है। कृत्रिम शोर में उद्योगधंधे, मशीनों की घरघराहट, स्थल एवं वायु परिवहन के साधन, मनोरंजन के साधन व अन्य आवाज करने वाले क्रिया−कलाप शामिल हैं। शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में लगातार बढ़ते शोर या ध्वनिप्रदूषण से नित नई समस्याएँ पैदा होती है। महानगरों, नगरों और यहाँ तक कि भीड़भाड़ वाले कुछ कस्बों में ध्वनिप्रदूषण का स्तर काफी अधिक है। मुँबई, कलकत्ता, दिल्ली, मद्रास और कानपुर जैसे शहरों में ध्वनिप्रदूषण का स्तर 85 से 115 डेसीबल तक पहुँच चुका है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मापदंडों के अनुसार इसकी अधिकतम सीमा 45 डेसीबल है। 130 डेसीबल की ध्वनि तो अतिकष्टदायी तथा असह्य होती है।

50 डेसीबल का शोर सोते हुए आदमी को जगाने के लिए पर्याप्त है। 50 से 80 डेसीबल की ध्वनि सोते हुए व्यक्ति की धड़कन को तेज कर सकती है। लाउडस्पीकर से 50 से 80 के अनुपात के लगभग ध्वनि प्रसारित होती है। फुसफुसाहट से 15-20 डेसीबल का कंपन होता है। ट्रैफिक शोर में 40-45, साधारण बातचीत में 40-60, गुस्से भी बातचीत में 70-80, मोटरसाइकिल में 90, अखबारी प्रेस में 100, शेर की दहाड़ में 110, राकेट 170, साइरन 200 तथा ग्रामीण मेले 80 से 90 डेसीबल तीव्रता की ध्वनि निकलती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के सन् 1990 के मानकों के अनुसार रात्रि के समय घर के अंदर 35 डेसीबल की ध्वनि होती है तो इससे बराबर नींद खुलती रहती है। दिन के समय प्रायः यह ध्वनि 45 डेसीबल के आसपास होती है, जिससे बातचीत में व्यवधान पड़ता है। शहरी क्षेत्र में रात्रि में यह तीव्रता 45 तथा दिन में 55 के लगभग होती है। शहरी क्षेत्र में रात्रि में यह तीव्रता 45 तथा दिन में 55 के लगभग होती है। इससे नींद में व्यवधान, खीझ, झुँझलाहट एवं गुस्सा आता है। औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्रों में यह 75 डेसीबल होती है, जबकि 75 डेसीबल का भार 8 घंटे तक लगातार सुनने पर बहरापन आ सकता है। औद्योगिक क्षेत्रों में 45 प्रतिशत लोगों के बहरेपन का कारण यही है।

ध्वनि यह यों कहें शोर की यह तीव्रता पटाखे से 120 डेसीबल, डिस्को संगीत से 120, बिजली की कड़क से 120, रेलगाड़ी की सीटी से 110, भारी तूफान से 110, जोर से चिल्लाने से 100, टेलीफोन की घंटी से 70, शोर करते बच्चों से 60-80 तथा गलियों में शोरगुल से 70 डेसीबल के कंपन पैरा होते हैं। ये काफी तेज व प्रभावी होते है। 13 डेसीबल ध्वनि में सहनशक्ति घटकर चार घंटे रह जाती है, जबकि 16 डेसीबल पर केवल 2 घंटे। 120 डेसीबल में रहने वाले व्यक्तियों के कान में दर्द, 150 से त्वचा में जलन, 160 से टिम्पेनिक मेम्ब्रेन प्रभावित होता है तथा 180 डेसीबल की ध्वनि स्थायी बहरापन लाने में सक्षम है।

सन् 1904 में नोबुल पुरस्कार विजेता रॉबर्ट कारव ने शोर के बारे में अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा था- एक दिन ऐसा आएगा, जबकि मनुष्य को अपने स्वास्थ्य के सबसे बड़े शत्रु के रूप में निर्दयी शोर से संघर्ष करना पड़ेगा। मानव को शोर से संघर्ष करना पड़ेगा। मानव को शोर के विरुद्ध वैसा ही युद्ध लड़ना पड़ेगा, जैसा कि उसने चेचक, प्लेग, हैजा, व मलेरिया के विरुद्ध लड़ा था। जापान, इटली, इंग्लैंड, फ्राँस, जर्मनी, रूस एवं अमेरिका जैसे देशों में तो बाकायदा यह मुहिम छिड़ भी गई है।

जर्मन दार्शनिक शेपनहॉवर बड़े ही शाँतिप्रिय एवं संवेदनशील व्यक्ति थे। उन्नीसवीं शताब्दी में वे अपने घर के पास की सड़क पर चलते गाड़ीवान् की चाबुकों की फटकार से विकल हो उठते थे। वह कहा करते थे- शोर उर्वन मस्तिष्क के लिए अत्यंत हानिकारक है। यह मस्तिष्क को अशक्त एवं चिंतन को नष्ट कर डालता है। अमेरिकी राजनेता, वैज्ञानिक और साहित्यकार डॉ. बेंजामिन फ्रेंकलिन ने एक बार अपना आवास इसलिए बदल दिया था कि उनके घर के पारस बाजार के कोलाहल से उनके चिंतन में विघ्न पड़ता था। डॉ. नीलस्केगी तथा डॉ. फ्राँसब्रोक ने काफी पहले ही बहरेपन पर शोधग्रंथ लिखकर स्पष्ट कर दिया था कि ध्वनिप्रदूषण अगणित रोगों-तकलीफों का मुख्य कारण है।

विकसित देशों के संदर्भ में यह बात पूरी तरह सही हैं वहाँ तो बहरेपन बढ़ते जाने का मुख्य कारण शोर है। डगलस स्थित अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन की वाक् शाखा के निदेशक डॉ. ग्लोरिग की मान्यता है कि संपूर्ण पृथ्वी शोर से बुरी तरह से ग्रसित है तथा इसका प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है। न्यूयार्क माउंट सिनाई अस्पताल के डॉ. सेमुअन रोबजन इसी को मानसिक तनाव का प्रधान कारण मानते हैं। विख्यात मनोचिकित्सक एडवर्ड सी. लयूज का मानना है कि निरंतर तेज शोर-शराबे से दिमागी हालत खतरे में पड़ सकती है। स्वच्छ पर्यावरण के लिए ठित समिति द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार मुंबई के 37 प्रतिशत लोग निरंतर इस प्रदूषण को झेल रहे हैं। 76 प्रतिशत लोगों की शिकायत है कि वे शोर की वजह से मानसिक रूप से परेशान हैं। आज भारत के शहरों में रहने वाले 69 प्रतिशत लोगों को ध्वनिप्रदूषण के कारण पूरी तरह नींद नहीं आती।

ध्वनिप्रदूषण मानवीय क्रिया–कलापों को मुख्यतया तीन तरह से प्रभावित करता है-1. श्रवण शक्ति पर प्रभाव, 2. शरीर की जैविक क्रियाओं पर प्रभाव 3. सामाजिक व्यवहार पर प्रभाव। उद्योगों में काम कर रहे 50 प्रतिशत लोग इसके प्रभाव से बुरी तरह से प्रभावित है। ट्रैफिक कंट्रोल से जुड़े 80 फीसदी व्यक्ति, श्रवणेंद्रियों की परेशानियों के शिकार हुए है। एक अध्ययन के अनुसार विभिन्न स्कूलों और कॉलेजों के 5000 छात्रों पर इसके प्रभाव को देखा गया। इनमें से जो छात्र तेज या झन्नाटेदार संगीत के शौकीन थे और मोटरसाइकिल की घरघराहट के लगातार संपर्क में रहते थे, वे अपनी 35 से 50 प्रतिशत श्रवण शक्ति खो चुके थे।

विकसित कहे जाने वाले देशों की युवक-युवतियों की तो इससे भी बद्तर स्थिति है। टोकियो में एक वर्ष के अंदर ही शोर से संबंधित 14000 शिकायतें दर्ज की गई। अपने ही देश में पश्चिमी मध्यप्रदेश के कुछ प्रमुख शहरों से देवास, इंदौर, उज्जैन के आंकड़े तो काफी चौंकाने वाले हैं। कुछ समय पूर्व यह क्षेत्र अति शाँत क्षत्र के रूप में जाना जाता था, जबकि हाल में हुए सर्वेक्षण के वैज्ञानिक विश्लेषण से पता चलता है कि यहाँ के लोगों में सामान्य चयापचय एवं आँतरिक क्रियाओं में काफी परिवर्तन पाया गया है। अनिद्रा, बहरापन, रक्तचाप और महिलाओं के मासिक चक्र में गड़बड़ी अत्यधिक तादाद में देखी गई है।सूडान देश की एक जनजाति “मवान” है। यह जाति अत्यंत ही शाँत वातावरण में रहती है। ये लोग किसी भी प्रकार के रक्तचाप व हृदय की बीमारी से ग्रसित नहीं होते। जबसे इन्होंने अधिक शोरवाले इलाकों में अपने घर बनवाना शुरू किया, तब से इन्हें कई तरह के रोग होने लगे।

शोर शरीर की क्रियात्मक गतिविधियों को काफी हद तक प्रभावित करता है। मनुष्य के स्वचालित स्नायुतंत्र के माध्यम से अधिक शोर का प्रभाव हृदय एवं पाचनतंत्र पर पड़ता है। शोरगुल से एड्रेनेलीन नामक हार्मोन का अतिस्राव होता है। इससे हृदय के क्रिया–कलापों में व्यतिक्रम आता है और मुक्त वसीय अम्ल व कोलेस्ट्रॉल रक्त में पहुंचता है। चिकित्सकों का मत है कि हर तीन स्नायुरोगों के मामलों में से एक तथा सिरदर्द के पाँच मामलों में से चार के लिए बढ़ता हुआ शोर ही उत्तरदायी है। ब्रिटेन में लगभग हर चौथा आदमी स्नायु संबंधी रोग से पीड़ित है। आधुनिक शोधप्रयत्नों से यह जानकारी मिली है कि ध्वनिप्रदूषण हाइपोथेलेमस तथा पिट्यूटरी ग्रंथियों पर सीधा असर करता है। इससे अंतःस्रावी ग्रंथियों की कार्यप्रणाली विचलित हो जाती है। ध्वनि के मामले में बच्चे व महिलाएँ बहुत संवेदनशील होते हैं। इस क्रम में माँ के गर्भ में पलने वाला बच्चे भी शोर से नहीं बच पाता है। अजन्मे बच्चे की घड़कन शोर के कारण बढ़ जाती है। गर्भवती स्त्री का अधिक शोर में रहना शिशु में जन्मजात बहरेपन का कारण बन सकता है, क्योंकि कान गर्भ में पूर्णरूपेण विकसित होने वाला पहला अंग है।

बैक्टीरिया के अलावा अन्य समस्त जीवधारियों में एक बायोलॉजिकल घड़ी होती है। यही जैविक क्रियाओं का नियमन, संपादन और उचित समन्वयन करती है। ध्वनिप्रदूषण इस जैविक घड़ी को बुरी तरह झकझोर कर रख देता है। इससे मनुष्य के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर होता है। शिशु विशेषज्ञ डॉ. अवधेश कुमार के अनुसार, ध्वनिप्रदूषण के कारण बच्चों को विस्टेजियल इंफेक्शन हो रहा है। संक्रमण से एक्यूम बेकोलाइट्रस तथा फ्रैंक निमोनिया हो जाता है। इस वजह से बच्चे अधिक तेजी से साँस लेते हैं। ध्वनिप्रदूषण से सिरदर्द व तनाव में वृद्धि होती है। कान द्वारा मानवशरीर का संतुलन बना रहता है। परंतु अत्यधिक ध्वनि से संतुलन क्षमता में कमी आती है। रोजमर्रा की जिंदगी में व्याप्त कोलाहल को सामाजिक तनावों, लड़ाई-झगड़ा, मानसिक अस्थिरता, कुँठा तथा पागलपन आदि विकारों का कारण माना जाता हैं यह मनुष्य की कार्यक्षमता को कम करता है तथा देश एवं समाज के आर्थिक विकास में भी बाधा डालता है। शोर का घातक प्रभाव अन्य जीवों तथा निर्जीव पदार्थों पर भी देखा गया है। इससे मुर्गियों के अंडे देने तथा गाय, भैंसों के दूध देने की दर में कमी आ गई। बड़े-बड़े नगरों की बहुमंजिली इमारतों की छतों में दरारें पड़ गई।

ध्वनिप्रभाव और श्रवणशक्ति से संबंधित जैवरासायनिक अनुसंधानकर्ता डॉ. डेसूचर के अनुसार तीव्र ध्वनि हमारे शरीर के मल ऊर्जा उत्पादन संस्थान में परिवर्तन लाती है, जिसके फलस्वरूप चयापचय की क्रिया प्रभावित होती है। कान के पेरीलिम्फ का ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है। रक्तवाहिनियों के संकुचन, आहार नाल की विकृतियाँ, ऐच्छिक-अनैच्छिक माँसपेशियों में तनाव इत्यादि प्रभाव नजर आने लगते हैं। हृदयगति भी धीमी हो जाती है और गुर्दे पर प्रतिकूल असर पड़ता है। कोलेस्ट्रॉल के बढ़ जाने से रक्त शिराओं में हमेशा के लिए तनाव उत्पन्न हो जाता है। और दिल का दौरा पड़ने की आशंका पैदा हो जाती है। अधिक शोर से नेत्रगोलकों पर भी तनाव उत्पन्न होता है, जिससे आँखें बारीक काम करने पर एकाग्र नहीं ही पातीं।

शोर नियंत्रण आज के जमाने में कठिन काम जरूर है, फिर भी इसकी रोकथाम इनसानी अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। स्रोत की शेरक्षमता कम करके ध्वनि के मार्ग में बाधा उत्पन्न करके तथा ध्वनि सुनने वाले को सुरक्षा प्रदान करके काफी हद तक इसे किया जा सकता है। वैसे इसका सर्वमान्य हल है-वृक्षारोपण। विज्ञानवेत्ताओं की राय है कि ताड़, नारियल, इमली, आम इत्यादि के लंबे एवं घने वृक्ष लगाने चाहिए। पेड़ों के पत्ते ध्वनि को अवशोषित करते हैं। वृक्षों से वातावरण का 10 प्रतिशत डेसीबल तक शोर कम किया जा सकता है। घर के बाहर में मेंहदी की बाड़ भी ध्वनिप्रदूषण को रोकने में सहायक हो सकती है। ध्वनिविशेषज्ञों के अनुसार रंगों में हलका हरा-सा रंग ध्वनि के लिए सर्वाधिक अवरोध होता है। अतः इन रंगों से घर को पुतवा लेने से भी कुछ राहत मिल सकती है।

जो भी हो, पर इतना सर्वप्रचलित सच है कि ध्वनिप्रदूषण मनुष्य एवं समाज के लिए सर्वनाशी एवं विध्वंसक सिद्ध होता जा रहा है। मानव, देश व समूचे विश्व की शांति प्रगति तथा विकास हेतु दिशापरिवर्तन आवश्यक और अपरिहार्य है। ऐसे में वृक्षारोपण जैसी सृजनात्मक क्रियाओं को अपनाने के साथ ऐसी जीवनशैली का विकास करना चाहिए, जो आज के कृत्रिम दौर का रुख मोड़कर उसे प्रकृति की ओर उन्मुख कर सके। बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय के उद्देश्य से इस महत् कार्य करने में प्रत्येक जागरूक एवं विचारशील को अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करनी चाहिए।


नौकर का समाधान (Kahani)

जिज्ञासु व्यक्ति किसी भी बात की तह तक बैठकर उसमें से किसी-न’किसी प्रकार की उपयोगिता खोज लाता है। जिज्ञासा शारीरिक,मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक चारों उन्नतियों की हेतु होती है। मनुष्य को अपनी जिज्ञासा को प्रमादपूर्वक नष्ट नहीं करना चाहिए। उसे विकसित एवं प्रयुक्त करना चाहिए और जिसमें नहीं है, उसे चाहिए कि वह तन्मय एवं गहरे पैठने के अभ्यास से उसे पैदा करे, क्योंकि जिज्ञासा भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में प्रगति एवं उन्नति का आधार बनती है।

एक बादशाह का एक बहुत ही मुँह लगा नौकर था। वह दिन-रात बादशाह की सेवा में लगा रहता था। एक दिन उसे विचार आया कि वह बादशाह की सेवा में दिन-रात लगा रहता है, तब भी उसे केवल पाँच रुपये ही मिलते हैं और मीर मुँशी जो कभी कुछ नहीं करता पाँच सौ रुपये वेतन पाता है। इस भेद का क्या कारण है? उनने अपने यह उलझन बादशाह को कह सुनाई। बादशाह ने हँसकर कह दिया-किसी दिन मौके पर बतलाऊँगा।

एक दिन एक घोड़ों का काफिला उसकी सीमा से गुजरा। बादशाह ने अपने सेवक को भेजा कि जाकर मालूम कर यह काफिला कहाँ जा रहा है?

नौकर गया और आकर बतलाया कि हुजूर वह काफिला सीमा के कंधार देश जा रहा है।

अब बादशाह ने मीर मुंशी को भेजा। उसने आकर बतलाया कि यह काफिला काबुल से आ रहा है और कंधार जा रहा है। उसमें पाँच सौ घोड़े और बीस ऊँट भी है। मैंने अच्छी तरह पता लगा लिया है कि वे सब सौदागर हैं और घड़े बेचने जा रहें हैं। खरीदना चाहें तो कम कीमत पर मिल सकते हैं। मैंने पचास ऐसे घोड़ों को छाँट लिया है, जो नौजवान और बड़ी ही उत्तम नस्ल के हैं। बादशाह ने तुरंत ही पचास घोड़े खरीद लिए, जिससे उसे कम दामों पर अच्छे घोड़े मिल गए। काफिले के विषय में चिंता जारी रही और उन परदेशी सौदागरों पर बादशाह की गुण-ग्राहकता का बड़ अनुकूल प्रभाव पड़ा। बादशाह ने नौकर से कहा-देखा तुम्हें पाँच रुपये क्यों मिलते हैं और मीर मुँशी को पाँच सौ क्यों? नौकर ने इस अंतर के रहस्य को समझा और सदा के लिए सावधान हो गया।


इस दीपोत्सव पर्व पर हमारी आस्था का बुझा दीप जले

“तमसो मा ज्योतिर्गमय” इस पावन संदेश के साथ दीपावली फिर आ गई। गगनचुँबी अट्टालिकाओं से लेकर छोटी-छोटी झोपड़ियों में कहीं रंग-रोशनी की जगमग, तो कहीं टिमटिमाते दीप, लेकिन इतना तय है कि अमीरी-गरीबी की भावनाओं से ऊपर उठकर रोशनी पूरे भारतवर्ष में होगी। आखिर दीपावली है न। कहीं दीपों से सजी सैकड़ों पंक्तियाँ जैसे कतार में खड़े जुगनुओं का समूह चमक रहा है, तो कहीं आसमान से सितारों को जमीन पर बिछा देने वाली इंद्रधनुषी आभा। हर ओर जगमग-जगमग।

वाचिकतौर पर दीपावली दीप और अवली इन दो शब्दों के मेल से बना है, जिसका अर्थ होता है, दीपों की पंक्ति। महाकवि सूर ने इसे दीपमालिका कहा है। अपनी देवसंस्कृति में दीपक को ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक माना गया है। कृष्णभक्त कवियों ने दिवारी, दीवाली या दीपमालिका के अवसर पर दीपकों की उस पंक्ति का उल्लेख किया है, जिसके प्रकाशपुँज से अँधेरा मिट जाता है। दीपावली के दिये लोकजीवन के जागरूक पहरुए हैं। ये दिये सृष्टि के महासागर के अंतराल में चमकते-दमकते मुक्ता है। ये दीपक लोकजीवन के असंख्यों तनावों-निराशा को अपने तरल प्रकाश में विलीन कर देते हैं। निश्चित रूप से इस कथन में गहरी सार्थकता है कि दीपोत्सव आशा, उत्साह एवं उमंग को संचारित-संवाहित करने वाला ज्योतिपर्व है।

लक्ष्मीपूजन की अनवरत परंपरा को देखते हुए इसे वैदिककालीन पर्व कहा जा सकता है। भारत में निवास करने वाली द्रविड़ एवं अन्य सभ्यताएँ पहले से दीपावली मनाती थीं। “एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन एण्ड एथिक्स” के अनुसार द्रविड़ जाति के लोग भू-प्रेतों से रक्षा के लिए दीपावली के अवसर पर दीप जलाते थे और मशाल लेकर नृत्य करते थे।

प्राचीन हड़प्पाकाल की खोज में देवी लक्ष्मी की मूर्ति प्राप्त हुई थी, जो इस बात की पुष्टि करती है कि उस काल में भी दीपावली मनाई जाती थी। इसी प्रकार की मूर्ति ईसा से 4500 वर्ष पूर्व की मोहनजोदड़ों सभ्यता के पुरातत्वविदों को प्राप्त हुई है। इसमें लक्ष्मी की मूर्ति के दोनों ओर दीपक बने हुए हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए दीपदान किया जाता था। बौद्धधर्म एवं जन संप्रदाय में भी यह परंपरा ईसा पूर्व से चली आ रही है। आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व भगवान् बुद्ध के स्वागत में दीप सजाए गए थे। कल्पसूत्र के अनुसार भगवान् महावीर ने इस दिन निर्वाण प्राप्त किया था। उन्होंने कहा था- जगत् से ज्ञान की ज्योति बुझ गई है, अतः दीप प्रज्वलित करें।

यह भी मान्यता है कि भगवान् श्रीराम चौदह वर्ष बाद रावण के अत्याचारों को समाप्त कर बन से अयोध्या लौटे तब अयोध्यावासियों ने प्रसन्नतापूर्वक घर-घर में दीप जलाए। उसी दिन की याद में दीपावली पर्व प्रारंभ हुआ। श्रीमद्भागवत् एवं विष्णु पुराण के मतानुसार जब भगवान् कृष्ण ने नरकासुर का संहार कर दिया, तब लोगों ने हर्षातिरेक में दीवाली मनाई। एक अन्य मान्यता है कि श्रीकृष्ण जब प्रथम बार गाय चराने के लिए ग्वाल−बालों के साथ गए थे, तब दीपोत्सव मनाया गया था।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्णन मिलता है कि उन दिनों दीपावली के अवसर पर मंदिरों एवं घरों को दीपों से सजाया जाता था। वात्स्यायन ने अपने ग्रंथ “कामसूत्र” में दीपावली का यक्षरात्रि के रूप में वर्णन किया है। सम्राट् चंद्रगुप्त विक्रमादित्य दीपावली के दिन ही सिंहासनारूढ़ हुए थे। सम्राट् अशोक ने अपनी दिग्विजय दीपावली के शुभ अवसर पर पूर्ण की थी। सिखों के छठवें गुरु हरगोविंद सिंह जी कारागार से मुक्त होकर जब अमृतसर स्थित स्वर्णमंदिर पहुँचे तो सर्वत्र दीप जलाए गए। स्वर्ण मंदिर का निर्माणकार्य भी दीपावली को ही प्रारंभ किया था।

महमूद गजनबी के साथ अपने वाले इतिहासकार अलबेरुनी ने लिखा है कि भारत में दीपावली का त्योहार उस दिन मनाया जाता है, जब सूर्य तुला राशि में स्थित रहता है और नया चाँद निकलने वाला होता है। लोग उस दिन उत्सव मनाते थे और मंदिरों में दोपहर को पूजा-अर्चना करते थे। रात्रि के समय दीप जलाए जाते थे। मुगल सम्राट् भी दीपावली का पूर्व हर्षोल्लास से मनाया करते थे। हुमायूँ ने इस अवसर पर तुलादान प्रारंभ कराया था। तत्कालीन इतिहासकार अबुलफजल ने “आइने अकबरी” में उल्लेख किया है कि दीपावली के अवसर पर अकबर राजमहल, दुर्ग तथा नगर में दीपदान करता था और गोवर्धन पूजा में शामिल होता था। बाद के दिनों में मुगल सम्राट् जहाँगीर, शाहजहाँ तथा बहादुरशाह जफर ने भी इस परंपरा को बनाए रखा। शाहजहाँ के काल में लालकिला के पीछे स्थित मैदान में दीपावली मेला लगता था, जो बहादुरशाह जफर के समय तक जारी रहा।

यह दीप महोत्सव अति प्राचीनकाल से भारतवर्ष में मनाया जाता रहा है। रोशनी का यह पर्व केवल अपने देश में ही प्रचलित नहीं है, बल्कि विश्व के अनेक देशों में इसके मनाए जाने का प्रचलन है। प्राचीन आख्यान इसके प्रमाण रहे हैं। पेरु के माया मंदिर में दीपक की उत्पत्तिकथा उत्कीर्ण है। मिश्र में दीपदान का प्रचलन है। अफ्रीका में प्रतिवर्ष नवंबर के प्रथम सप्ताह में देवी-देवताओं व मृत्यु के देवता के प्रति अपना सम्मान प्रकट करने के लिए दीप पर्व का आयोजन होता है।

अनेक एशियाई देशों में भारत के समान अक्टूबर या नवंबर माह में प्रकाश पर्व दीपावली मनाए जाने का प्रमाण मिलता है। सुमात्रा एवं जावा में भी दीपोत्सव मनाया जाता है। माँरीशस और नेपाल में तो इस पर्व को दीपावली के नाम से ही मनाया जाता है। वहाँ पर इस अवसर पर घरों को दीपों से सजाते हैं। नेपाल में तो दीपावली राष्ट्रीय तौर पर चार-पाँच दिनों तक मनाई जाती है। बड़े परंपरागत ढंग से किया जाता है। फरनो पर्वत पर स्थित एक मंदिर में इस अवसर पर लक्ष्मीपूजन का पत्री विधान रहा है।

श्रीलंका में दीपावली को एक राष्ट्रीय पर्व के पूर्व में मनाया जाता है। रात्रि में वहाँ के घर दिये और बिजली की रोशनी से जगमग कर उठते हैं। वहाँ के निवासी अपने खुशी आतिशबाजी छोड़कर प्रकट करते हैं। जापान में दीपावली के पर्व को “तोरा नागाची” कहते हैं, जिसे लालटेनों का पर्व कहा जाता है। जापानी इस पर्व को पूर्वजों को प्रकाश दिखाने के लिए मनाते हैं। चीन की दीपावली अपने ही देश के समान है। “नई महुआ” नाम से प्रसिद्ध इस पर्व के स्वागत में महीनों पहले मकानों को स्वच्छ कर लिया जाता है। चीनियों का विश्वास है कि दीपपर्व अरिष्टनाशाक होता है। भारत के समान चीनी व्यापारी भी इसी दिन धनलक्ष्मी का आहृन कर नए बही-खाते की शुरुआत करते हैं।

थाइलैंड में यह आलोकपर्व “कायंग” नाम से प्रसिद्ध है। अक्टूबर माह में केले के प्रत्येक पत्र पर मोमबत्ती या दीप जलाकर एक सिक्का तथा धूपबत्ती भी छोड़ा जाता है। म्यांमार में दीपों का यह पर्व “थार्दिग्यत” के रूप में मनाया जाता है। गुयाना में दीपावली का आयोजन राष्ट्रीय स्तर पर किया जाता है। इस अवसर पर याना सरकार ने 1976 में चार डाक टिकटों की श्रृंखला जारी की थी। ईरान में दीपोत्सव का आयोजन मार्च महीने में होता है। वहाँ पर दीपक को मुँह से फूँककर बुझाना अशुभ माना जाता है। नवंबर में जर्मनी में मनाया जाने वाला एक कैथोलिक पर्व ठीक दीपावली की ही भाँति होता है। इंग्लैंड में यह पर्व “गार्ड फाक्स डे” के रूप में जाना जाता है। इस दौरान वहाँ पर आतिशबाजी की धूम मचती है। मलेशिया में भी पूर्णतया भारतीय तौरतरीकों के अनुसार बड़े उल्लासपूर्ण माहौल में दीपावली मनाई जाती है।

वैसे अन्य देशों की अपेक्षा अपने भारतवर्ष में दीपावली का कुछ खास ही महत्व है। यहाँ इसका सामाजिक-साँस्कृतिक ही नहीं, आध्यात्मिक महत्व भी है। मनीषियों के अनुसार, यह पर्व मूलतः अँधेरे के विरुद्ध संघर्ष एवं ऋतु-परिवर्तन का प्रतीक है। जब वर्षाकाल बीतता है और धरती हरी-भरी होती है, नई फसल की शुरुआत सारे दुख-दारिद्र्य को दूर फटकारने लगती है। लोग इसी खुशी में बड़े ही आनंद-उमंगपूर्वक दीपोत्सव मनाते हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से दीपावली बंधनमुक्ति का दिन है। व्यक्ति के अंदर अज्ञान रूपी अंधकार का साम्राज्य है। दीपक को आत्मज्योति का प्रतीक भी माना जाता है। अतः दीप जलाने का तात्पर्य है- अपने अंतर को ज्ञान के प्रकाश से भर लेना, जिससे हृदय और मन जगमगा उठें। इस दिन चतुर्दिक तमस् में ज्योति की आभा फैलती एवं बिखरती हैं। अंधकार से सतत् प्रकाश की ओर बढ़ते रहना ही इस महापर्व की प्रेरणा है। हमारी संस्कृति आलोक संस्कृति रही है। अपना अतीत दीपावली की ही भाँति ज्योतिर्मय रहा है।

परंतु सब कुछ के बावजूद न जाने क्यों उल्लास एवं उमंग का यह ज्योतिपर्व अचानक इतना अंधकारमय हो गया है। इस पर्व में पुष्पित, पल्लवित एवं फलित आस्था, अनुराग और विश्वसनीयता से पूर्ण मानवीय गुण पता नहीं कैसे वैचारिक और आचरणगत कलुषता से ढँक-छिप गए है। प्रेम-स्नेह-सद्भावना के आलोक के बदले घृणा, द्वेष एवं वैमनस्यता के गुब्बारे में मानस एवं समाज ढकते जा रहे हैं। जैसे दूसरों को प्रकाश देने के निमित्त जलने वाला दीप अपने आप को ही जलाए डाल रहा हो। फटाखों की अनुगूँजों से हर्षविभोर हरने वाला जनसमूह आज बमों के धमाकों के बीच चिथड़े-चिथड़े होकर कराहटों एवं चीखों से घिरकर रह गया है।

राष्ट्र समाज एवं परिवार को समृद्ध करने वाली लक्ष्मीपूजन की परंपरा के स्थान पर झूठ,, फरेब और शोषण की जालसाजी में समाज का एक बड़ा संभ्राँत वर्ग लिप्त है। अब सर्वजनहिताय-सर्वजन सुखाय की नहीं, बल्कि अपना के बैलेंस बनाने-बढ़ाने की होड़ लगी है। जिसके लिए भ्रष्टाचार की सारी सीमाएँ लांघी जा चुकी है। सामाजिक मानदंड बदल गए हैं। चारों ओर वैभव-विलासिता का उच्छृंखल प्रदर्शन हो रहा है, उसे आधुनिक दीपावली की प्रतिष्ठा प्राप्त है।

पहले कभी अपनी इस देवभूमि-अलोकभूमि में आस्था की धधकती आग से पवित्रता, उदारता, संयम, सज्जनता, नीति-निष्ठा और सामूहिकता जैसे सद्गुण जगमगाते रहते थे, आज उसी भूमि में अनीति, अत्याचार, आतंकवाद, अलगाववाद जैसे तत्वों का बोलबाला दिखाई पड़ रहा है। राष्ट्र की सीमाएँ ही नहीं, स्वयं राष्ट्र का केंद्र भी अँधेरे की लपेट एवं चपेट में आ गया है। समाज, परिवार वं व्यक्ति भी इस दुर्दशा से कम नहीं व्याकुल है। इसके मूल में देखा जाए, तो दीप की वह स्नेहसंवेदना चुक गई है। इसी अंतर संवेदना के सूख जाने से इनसान इतना निष्ठुर, निर्दयी हो चला है। वह अपने संकीर्ण दायरों से बाहर नहीं आ पा रहा है, जबकि दीपक इन्हीं संकीर्ण सीमाओं को तोड़ देने की प्रेरणा देता है। दीपावली की उज्ज्वल रोशनी में यह सारा तमस तिरोहित हो जाता है।

आज जरूरत है, दीपावली की मल प्रेरणा को फिर से पुररुज्जीवित करने की। दीपोत्सव पर्व की सार्थकता इसी में निहित है कि दीपोत्सव के साथ अपने अंदर बुझे आत्मदीप को भी प्रज्वलित किया जाए। इसके ऊपर जन्म-जन्माँतरों से जमे कषाय-कल्मषों को धो दिया जाए। जिससे चिरज्योतित आत्मा का प्रकाश बाहर आ सके। यही आत्मदीपोभवः का मूलमंत्र है। इसी आदर्श के प्रति गहरी आस्था ही दीपावली का मर्म है। इस आस्था के बुझे दीप को जलाना हममें से हर एक जन का पुनीत कर्त्तव्य होना चाहिए।

दीपोत्सव प्रकाश को अपने प्राणों में बसाकर अंधकार को अलविदा करने का अनवरत अनुष्ठान आरंभ करने का पवित्र, प्रेरक और प्राणवंत अवसर है। यह भारत की भाग्यलक्ष्मी का साक्षात्कार करके भारतमाता के आँगन में अपने प्राणों और पौरुष को बिदा देने, स्वयं बिछ जाने और स्वयं को न्योछावर कर देने का पर्व है। यह न भूलें कि माँ, भारत माँ की प्रसन्नता उसकी सुरक्षा उसकी प्रसन्नता एवं उसकी समृद्धि में ही हम अपनी सौभाग्यलक्ष्मी के दर्शन पा सकेंगे। यदि हम केवल अपने-अपने घर के दीपों की चिंता में लगें रहे तो किसी के दिये नहीं बचेंगे, किसी के घर भी उजाला नहीं बचेगा। सबका सब कुछ बचा रहे, बढ़ता रहे, इसलिए सभी को सबकी चिंता और सबका चिंतन करना ही होगा। दीवाली के दिनों की तरह सवेरा होने और उज्ज्वल भविष्य का सूर्य उदित होने तक अपने लिए ही नहीं दूसरों के लिए भी जना होगा। यह केवल दीये और दिवाली की बात नहीं, भारतमाता के दिलवाली बात भी यही है।


अवसर का चित्र (Kahani)

एक गृहस्थ को सर्वोत्तम सौंदर्य की खोज थी। सो वे एक तपस्वी के पास पहुँचे और अपनी जिज्ञासा प्रकट की। उन्होंने उत्तर दिया, श्रद्धा मिट्टी के ढेले को गणेश बना सकती है। समाधान न हो पाने से एक भक्तजन के पास पहुँचे। उन्होंने कहा, प्रेम ही सुँदर है। काले कृष्ण गोपियों को प्राणप्रिय लगते थे। समाधान कुछ हुआ, कुछ न हुआ। सोच-विचार करते वे आगे चल पड़े। युद्धभूमि से लौटा, शस्त्रों से लदा सैनिक मिला। उससे पूछा, सौंदर्य कहाँ हो सकता है? सैनिक का उत्तर था-शाँति में।

जितने मुँह उतनी बातें। निराश गृहस्थ अपने घर लौटा। दो दिन की प्रतीक्षा में सभी व्याकुल हो रहे थे। पहुँचा, तो सभी लिपट पड़े। पुत्री की आँखों से आँसू झर पड़े। आत्मीयता का, स्नेह का, गहन श्रद्धा का सागर-सा उमड़ पड़ा। सभी को असाधारण शाँति का अनुभव हुआ।

गृहस्थ ने तीनों समाधानों का समन्वय अपने घर में देखा। उसके मुँह से निकल पड़ा, मैं कहाँ भटक रहा था। श्रद्धा, प्रेम और शाँति इन तीनों के ही दर्शन तो अपने घर में हो रहे हैं। यही सबसे श्रेष्ठ एवं सर्वाधिक सौंदर्यपूर्ण कृति है।

एक बार एक कलाकार ने अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाई। उसे देखने के लिए नगर से सैकड़ों धनी-मानी व्यक्ति भी पहुँचे। एक लड़की भी उस प्रदर्शनी को देखने आई। उसने देखा सब चित्रों के अंत में एक ऐसे मनुष्य का भी चित्र टँगा ह, जिसके मुँह को बालों से ढँक दिया गया है और जिसके पैरों पर पंख लगे थे। चित्र के नीचे बड़े अक्षरों में लिखा था “अवसर।” चित्र कुछ भद्दा-सा था इसलिए लोग उस पर उपेक्षित दृष्टि डालते और आगे बढ़ जाते।

लड़की का ध्यान प्रारंभ से ही इस चित्र की ओर था। जब वह उसके पास पहुँची तो चुपचाप बैठ कलाकार से पूछ ही लिया-”श्रीमान् जी यह चित्र किसका है? आपने इसका मुँह क्यों ढँक रखा है तथा उसके पैरों में पंखों का क्या रहस्य है,” कलाकार ने जवाब दिया- “यह बेटी”अवसर का चित्र है। चूँकि साधारण व्यक्ति इसे पहचान नहीं पाते। अतः मैंने इसका मुँह ढँक रखा है, ताकि इसे देखकर जिज्ञासा तो उठे। पैरों में पंख इसलिए कि यह अवसर जो आज चला गया, कल फिर आएगा नहीं। इसलिए उसे उड़ने से पहले ही थाम लो। इसका सदुपयोग कर लो।” लड़की ने मर्म को समझा और तत्क्षण ही अपने जीवननिर्माण में जुट गई।


हमारी रात्रिचर्या कैसी हो

हमारे आयुर्वेद के प्रणेता ऋषिगण दैनंदिन जीवन के स्वास्थ्य संबंधी जो सूत्र दे गए हैं, उनमें रात्रिचर्या भी एक महत्वपूर्ण प्रसंग है। शयन विधि के संबंध में आयुर्वेद कहता है। कि रात्रि में सोने से पूर्व वस्त्रों की स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। जो वस्त्र सारे दिन पहने हों, उन्हें पहनकर सोना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। सोने से पूर्व वस्त्रों को बदल लेने, अंगों पर दबाव न डालने वाले ढीले वस्त्रों को पहनने का प्रावधान आयुर्वेद में किया गया है। इसी प्रकार बिस्तर भी साफ होना चाहिए।ओढ़ने-बिछाने के वस्त्र प्रायः सभी के अलग-अलग होने चाहिए।

आयुर्वेद कहता है कि ऋतु-परिवर्तन के अनुसार बिस्तर के वस्त्र होने चाहिए। अधिक गुदगुदे-डनलप आदि के गद्दों का प्रयोग अच्छा है। ग्रीष्म एवं वर्षाकाल में गद्दे की अपेक्षा दरी का उपयोग करना चाहिए। चारपाई को अपेक्षा तख्त पर सोना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं जहाँ तक हो किसी दूसरे के बिस्तर का उपयोग न करें। इससे संक्रामक रोग फैलने का डर है। सुश्रुत में एक वर्णन इस संबंध में बड़ा सामयिक है।

प्रसंगात् गात्र संस्पर्शान्िश्वासात्सहभाजनम्। सहशरुया सताच्चापि वस्त्रमाल्यानुलेपनम्॥

मुष्ठं ज्वरस्य शोश्रि नेत्राभिष्यन्द एवं च। औपसर्गिक रोगाश्च संक्रामन्ति नरान्तरम्॥

अर्थात् मैथुन, अंगस्पर्श, निःश्वास, सहभोजन, साथ में शयन एवं बैठना, वस्त्र, माला और अनुलेपन द्वारा कुष्ठ, ज्वर, शोथ, नेत्राभिष्यंद और औपसर्गिक (गरमी, सूजाक आदि) रोग मनुष्य से मनुष्य में फैलते हैं।

एक ही बिस्तर पर सोने से अच्छी निद्रा भी नहीं आती। अतः प्रत्येक का बिस्तर अलग ही होना चाहिए। सोने वाला कमरा हवादार होना चाहिए। खिड़की आदि बंद करके सोना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। हवा का आना-जाना क्राँस वेंटीलेशन आदि का पूरा ध्यान रखना चाहिए। बहुत से ऐसे मामले प्रकाश में आते हैं, जब ठंडक के दिनों में खिड़की आदि बंद कर कोयले की सिगड़ी जलाकर सोने वाले “कार्बन मोनो ऑक्साइड” के धीमे विष से सदा की नींद सोते देखे गए है। हवादार कमरे में सोने से एक सबसे बड़ा लाभ यह होता है। कि श्वास रोग, संधिकाल में ज्वर-जुकाम आदि तकलीफें नहीं होतीं।

चरक ऋषि कहते हैं-

रात्रिस्वभावप्रभवा मता याताँ भूतधत्रीं प्रवदन्ति निद्राम्॥

अर्थात्- रात्रि स्वभाव के कारण उत्पन्न होने वाली जो रात्रि की निद्रा होती है, विशेषज्ञ उसको भूतधात्री कहते हैं। भूतानि प्राणिनी दधाति पुष्णाति इसलि भूतधात्री (चक्रपाणि) अर्थात् रात्रि निद्रा में सर्वाधिक लाभ होने से भूतधात्री। धात्री जिस प्रकार बालकों का पालन-पोषण करती है, निद्रा भी ठीक इसी प्रकार प्राणियों का पोषण करती है।

सोया रात्रि में ही जाए, दिन में कम-से-कम बिस्तर पर लेटा जाए, इस पर हमारे आयुर्वेद के ज्ञाता एक मत हैं वे कहते हैं कि रात्रि की निद्रा पित्तनाशक होती है, जबकि दिन की निद्रा कफ संग्राहक। आज सारी पद्धति ही जीवन की उलट-सी गई है अधिकतर व्यक्ति अकारण ही रात्रि को देर तक जागते हैं व फिर दिन में देरी तक सोते है। महाभारत में वेदव्यास कहते हैं-रात्रि प्रथम दो पहरों में निद्रासेवन करके अंतिम प्रहर में जागकर मनुष्य को धर्म और अर्थ का अर्थचिंतन करना चाहिए। रात्रि के 10 बजे से प्रातः- साढ़े तीन-चार तक का समय महानिशा बताया गया है। इस समय सोने वाला व्यक्ति सुख भरी रोगनाशक नींद लेता है। यह एक अकाट्य सत्य है। ऐसे व्यक्ति की कायाग्नि प्रदीप्त होती है और ग्रहण कर उसे पचा लेता है, वह आहार उसके शरीर के लिए परम पुष्टिकर बन जाता है।

निद्रा व स्वप्न का भी बड़ा प्रगाढ़ संबंध आयुर्वेद में बताया गया है। चरक कहते हैं-”गाढ़ी नींद न आने वाला मनुष्य इंद्रियों के स्वामी मन के क्षरा सफल तथा निष्फल अनेकविध स्वप्न देखता है। आयुर्वेद के अनुसार भाँति-भाँति के अनगढ़ स्वप्न शरीर को परिपूर्ण आराम नहीं देते- न ही मन शाँत हो पाता है। अतृप्त क्षुब्ध मन ऐसे स्वप्नों के कारण ही जन्म लेता है। जो शारीरिक परिश्रम करते हैं, वे गाढ़ी नींद लेते हैं, इन्हें चित्त को उद्विग्न करने वाले स्वप्न नहीं सताते। आयुर्वेद में सप्तविध स्वप्न बताए गए हैं। शेष अर्थ देने वाले, पूर्वाभास के द्योतक तथा शुभ फल लाने वाले होते हैं। शास्त्र कहता है- रोगग्रस्त, शोकग्रस्त, चिंताग्रस्त कामार्त और उन्मत्त के देखे हुए स्वप्न निरर्थक होते है।

निद्राविज्ञान अपने आप में एक स्थापित विधा है। यदि इसे आयुर्वेद के परिप्रेक्ष्य में समझा जा सके तो रोगों से बचा जा सकता है।


सही मायने में राष्ट्रीय पर्व दीपावली

अन्य पर्व-त्योहारों के संबंध में सही भी हो सकता है कि वे क्षेत्रविशेष में या कुछ-ज्यादा क्षेत्रों में प्रचलित हैं, लेकिन दीपावली के संबंध में यह बात नहीं है। उत्तर से दक्षिण तक और पूर्व से पश्चिम तक वह पूरे देश में मनाई जाती है। श्रीलंका, म्यांमार, इंडोनेशिया, बाँग्लादेश, पाकिस्तान नेपाल आदि देशों में भी यह पर्व मनाया जाता है- उन सभी देशों में जो कभी भारत का हिस्सा रहे हैं या जहाँ आज भी भारतीय संस्कृति का प्रभाव है। पाँच दिन तक चलने वाले इस महापर्व में कितने ही संदर्भ जुड़े हुए हैं। वे भारत में उद्भूत हुए सभी धर्मों और संप्रदायों के विश्वास से जुड़े हुए है। वैदिक मत के अनुयायियों के अलावा जैन, सिख, बौद्ध और वेदों में असद् भक्ति रखने वाले सभी संप्रदायों के शलाकापुरुष कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से शुरू होने वाले महापर्व में किसी-न-किसी दिन याद किए जाते हैं। उनकी कोई स्मृति पाँच दिन के किसी समय से जुड़ी है। इसीलिए यह माँग उठती रही है कि दीपावली को राष्ट्रीय पर्व घोषित किया जाना चाहिए।

स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और महात्मा गाँधी की जन्म जयंती पिछले पचास-बावन सालों से मनाई जाती है। उनकी गरिमा और महत्ता अक्षुण्ण हैं। उस आँच आने दिए बगैर दीपावली को राष्ट्रीय पर्व मानने के पीछे आग्रह भी है कि यह पर्व भारतीय संस्कृति और परंपरा की पुरातन पहचान से संबद्ध है। धार्मिक या पारंपरिक कारणों से यदि संकोच हो तो भी कोई हर्ज नहीं है। दीपावली को लोकसमाज ने तो राष्ट्रीय पर्व मान ही लिया है। धनतेरस या धन्वंतरि जयंती, नरक चतुर्दशी, कालिपूजा, लक्ष्मीपूजा, हनुमान जयंती, महावीर निर्वाण, बलि प्रतिपदा, गोवर्द्धन पूजा, नवसंवस्तर, भई दूज और यम द्वितीया जैसे एकादश संदर्भों वाले इस अवसर को लोकपर्व की प्रतिष्ठा तो सदियों से मिली हुई है।

दीपावली का सामान्य परिचय लक्ष्मीपूजा के उत्सव के रूप में है। समुद्रमंथन के समय इस दिन लक्ष्मी के प्रकट होने की अंतर्कथा वाला यह प्रसंग दीपावली का प्रमुख संदर्भ है। पौराणिक महत्व के साथ व्यावहारिक सच्चाई भी है कि लक्ष्मी की प्रसन्नता सभी के लिए अभीष्ट है। साल भर में पाँच मिनट भी पूजापाठ और प्रदीप ध्यान में नहीं लगाने वाले व्यक्ति भी इस दिन सिक्कों की खनखनाहट को मंदिर की घंटियों की तरह सुनते और लक्ष्मीपूजा में मन लगाते हैं। धन-वैभव हर किसी को चाहिए। इसलिए उसकी अधिष्ठात्री शक्ति की पूजा-आराधना भी व्यापक रूप से प्रचलित होगी ही।

लेकिन दीपावली के दूसरे संदर्भ भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। उन संदर्भों की दिशा और संकेतों को समझने की चेष्टा करें तो जीवन का संपूर्ण शास्त्र अपने रहस्य खोल देता है। इस पुनरावृत्ति में जाना जरूरी नहीं है कि खेतीबाड़ी से निपटकर आनंद-उल्लास मनाने की दृष्टि से यह पर्व रचा गया। यह भी कि पर्व पहले से प्रचलित था और धीरे-धीरे तमाम संदर्भ जुड़ते गए। संस्कृत वाङ्मय में यह पर्व शारदीय उत्सव के रूप में भी चित्रित किया गया है। उन उल्लेखों के अनुसार दशहरे के बाद से शुरू होकर पर्व पूरे सत्रह दिन तक मनाया जाता था। शरद पूर्णिमा इस उत्सव का पड़ाव था। उस दिन कौमुदी उत्सव, शारदीय उत्सव, शरद पूर्णिमा और रास जैसे ललित मधुर उत्सव मनाए जाते थे। वह परंपरा कहाँ लुप्त हो गई किसी को नहीं मालूम।

दीपावली के रूप में विख्यात आधुनिक महापर्व स्वास्थ्यचेतना जगाने के साथ शुरू होता है। त्रयोदशी का पहला दिन धन्वंतरि जयंती के रूप में मनाया जाता है। लोग इसे धनतेरस भी कहते हैं और पहले दिन का संबंध धन−वैभव से जोड़ते हैं।धन्वंतरि जयंती का संबोधन घिस-पिटकर धनतेरस के रूप में प्रचलित हो गया। वस्तुतः यह आरोग्य के देवता धन्वंतरि का अवतरण दिवस है। मान्यता है कि समुद्रमंथन के समय इसी दिन धन्वंतरि आयुर्वेद और अमृत लेकर प्रकट हुए थे। समुद्र−मंथन का प्रयोजन पूरा हुआ मानकर देव और असुर दोनों तेजी से लपके थे। इन दिनों धन्वंतरि जयंती चिकित्सा व्यवसाय में जुड़े लोगों तक ही सीमित रह गई है। प्रचलित क्रम के अनुसार यम के निमित्त एक दीया जलाकर धनतेरस मनाई जाती है। दीया घर के मुख्य द्वार पर रखा जाता है। कामना की जाती है कि वह दीप अकालमृत्यु के प्रवेश को रोके। ऐसा विवेक जगाए जो स्वास्थ्य, शक्ति और शाँति दे। यम की बहन यमुना नदी जिन क्षेत्रों में बहती है वहाँ यह विशेष पूरा का दिन भी है। उस दिन श्रद्धालु यमुना में स्नान कर यम को मनाने की भावना करते हैं। दीपावली महापर्व का पहला दीप जलाकर शुरू हुए महोत्सव का एक अंग नए बरतन खरीदना भी है। लक्ष्मी के लिए भोग-प्रसाद घर में ही बनाना चाहिए। खाने-बाँटने के लिए बाजार से कितने ही व्यंजन मँगाए जाएँ। पूजनसामग्री घर में ही तैयार हो, देवता को कोरा, ताजा अच्छा और पवित्र भोजन अर्पित करना चाहिए। नए बरतन भी इसीलिए खरीदे जाते हैं कि प्रसाद तैयार करने के लिए प्रयुक्त पात्रों का उपयोग भी भोग पूजा तैयार करने के साथ शुरू हो।

नरक चतुर्दशी और हनुमान जयंती महापर्व का दूसरा दिन है। “नरक” विशेषण से स्पष्ट है कि इसका संबंध भी मृत्यु अथवा यमराज से है।

विधायक अर्थ में यह दिन स्वास्थ्य साधना का दिन है। पर्व का विधान हैं कि इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नानादि करना चाहिए। चतुर्दशी के दिन जो लोग सूर्योदय के बाद स्नान करते है।, उनके लिए कठोर शब्द कहे गए हैं।सायंकाल दीपदान के लिए है। दीप यम के लिए जलाए जाते हैं। सुबह स्नान और शाम को दीपदान से चूकने को धर्मशास्त्रों में अक्षम्य पाप बताया है। कहा है कि उन लोगों को वर्षभर किए गए पुण्यकर्मों का फल नहीं मिलेगा। आशय यह कि आलस्य और प्रमाद में सुबह-शाम गँवा देने वाले लोग जीवनरस को छककर नहीं पी सकते। आधे-अधूरे मन से किए गए उनके काम विपरीत परिणाम ही देते हैं।

यम यदि मृत्यु के देवता हैं, उनका काम संसार का नियमन करना है, तो संयम के अधिष्ठाता देव भी हैं। उन देव हनुमान की जयंती नरक चतुर्दशी के दिन मनाई जाती है। हनुमान जयंती यों चैत्र मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है, लेकिन उत्तर भारत के कई भागों में यह दीवाली से एक दिन पहले मनती है। आशय यह है कि संयम-नियम से रहने वालों को मृत्यु से जरा भी भयभीत नहीं होना चाहिए। उनकी अपनी साधना उनकी रक्षा करेगी।

पर्व का नाम नरक चतुर्दशी प्रचलित है। इसका यह नाम कृष्ण लीला से संबंधित भी है। पौराणिक कथा है कि इसी दिन भगवान् कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। उस राक्षस ने हजारों कुलीन स्त्रियों को बंदी बना लिया था। उनसे दासी की तरह व्यवहार करता था। नरकासुर के आतंक से पृथ्वी के समस्त शूर और सम्राट् थरथर काँपते थे। प्रतीक की दृष्टि से नरकासर उद्दाम अहं और वासना का उदाहरण है। ये प्रवृत्तियाँ कितना ही आतंक मचा लें, अंततः पराभूत ही होती हैं। जब इनका दारुण अंत होता तो आँसू नहीं बहाता था। प्रत्युत लोग खुश होते थे।

अमावस्या दीपावली का प्रमुख उत्सव है। बीत गए दो दिन भूमिका और विस्तार के थे। लक्ष्मीपूजा का प्रसंग मुख्य है और वह पर्व के ठीक मध्य में आता है। जाति, वर्ग, स्थिति पद, प्रतिष्ठा और ऊँच-नीच के सभी भेद बाधित हो जाते है और उत्साह भरे धीरज के साथ पर्व मनाते हैं। उत्साह लक्ष्मी के आवाहन के लिए और धीरज पुकार सुन लेन लेने की प्रतीक्षा के लिए। दूसरे पर्व उत्सवों की तरह इस दिन आमोद-प्रमोद के साधन इकट्ठे नहीं होते, लेकिन यह कर्मठता और जागरूकता का संदेश जरूर दे जाता है। रात भर जागकर प्रतीक्षा करने का अर्थ ही यह है कि जागरूक रहते हुए पुरुषार्थ किया जाए। उद्यमी प्रयत्नशील और पुरुषार्थी व्यक्ति पर ही लक्ष्मी का अनुग्रह बरसता है।

गोवर्धन पूजा वायवीय, आकाशीय शक्तियों का मुँह ताकने के स्थान पर प्रकृति की आराधना का प्रतीक है। स्वास्थ्य, धन और प्रवृत्ति को जिसने साध लिया, उसके लिए सभी दिशाओं में जय-हो-जय है। मृत्यु और यम उसके लिए भाई-बहन की तरह हो जाते हैं, जो सभी स्थितियों में रक्षा करते हैं, संरक्षण देते हैं। दीपावली का समापन मर्यादा और पारिवारिक दायित्वों के स्मरण के साथ है। उन सभी का स्मरण रखना चाहिए, जो सहोदर हैं, लौकिक दृष्टि से भाई-बहन हैं। उसमें प्रकृति परिवार के अन्य सदस्य भी आ जाते हैं। कम-से-कम वे सदस्य तो निश्चित ही, जो किसी भी रूप में, किसी भी कोण से सहोदर हैं जो अपने आसपास ही जन्मे और पले-बढ़े हैं। इस प्रकार यह पर्व समुच्चय महती शिक्षण हमें दे जाता है।


निर्लोभ करुणाकर (Kahani)

महिष्मती के प्रथम नागरिक (करुणाकर) स्वास्थ्य, विवेक और संपन्नता के प्रेरणास्रोत माने जाते थे। वे प्रचुर संपदा के स्वामी थे तथा उसका उपयोग लोकहित में भी करते थे। एक बार वे एक वर्ष की कल्पसाधना के लिए अंगिरा के पास गए। वहाँ साधना में डूबे रहे और जनहिताय तीर्थयात्रा में दूर देशों तक यात्रा करते रहे, उनके मित्र उनकी संपदा की रक्षा न कर सके, चारों ने उनकी सारी संपत्ति चुरा ली। मित्र दुख थे, पर लाचार थे। सोचते थे करुणाकर आएँगे तो जीवन भर की कमाई संपदा चली जाने से कितने दुखी होंगे

करुणाकर आए। सारी बात सुनी और मुसकरा दिए। बोले- मित्रों चिंता न करो। मैं यहाँ नंगा, असमर्थ बालक के रूप में आया था। परिजनों के स्नेह, सहयोग और अपने विचार एवं पुरुषार्थ के सहारे ही तो संपत्ति कमाई थी। प्रभुकृपा से मेरी इंद्रियाँ अभी ठीक काम करती हैं, विचारों में परिपक्वता आ चुकी है, जीवन का समय अभी समाप्त नहीं हुआ और आप सबके स्नेह-सहयोग का पात्र भी हूँ। फिर मुझे क्या कमी है? संपदा फिर आ जाएगी।

और सचमुच करुणाकर पुनः यश-वैभव के स्वामी बन गए। कोई उनकी सराहना करता, तो वे कहते- बंधु यह कुछ नहीं है, मात्र प्रभु द्वारा प्रदत्त साधनों के सदुपयोग की प्रतिक्रिया है। धन्य मैं नहीं, वह प्रभु है जिसने ऐसी अनमोल संपदाएँ हमें दी है।


धन-वैभव, महालक्ष्मी का कृपाप्रसाद

लक्ष्मी को धन-संपदा की अधिष्ठात्री देवी माना गया है।पौराणिक दृष्टि से वह विश्व का पालन करने वालीसत्ता विष्णु की अर्द्धांगिनी है। विष्णुभक्त ही नहीं, अन्य इष्ट-आराध्य की उपासना करने वाले श्रद्धालु भी उसे माता कहते हैं। “श्री सूक्त” “लक्ष्मी सूक्त” “महालक्ष्मी स्तोत्र”ए “लक्ष्मीयंत्र”, “श्री सिद्धि” जैसे अनेक विधान हैं, जिनमें नारायणी का मंत्रशक्ति के रूप में आराधना की गई है। विपर्यय के न जाने किस दौर में यह मान्यता प्रचलित हो गई कि लक्ष्मी चलपा और चंचला है। वह किसी एक जगह स्थिर नहीं रहती। उसके आशीर्वाद-वरदान बरसते और बदलते रहते हैं। चपला-चंचला और कहीं भी पहुंचने, अपनी कृपा समेट लेने की धारणा उस दौर में ही जन्मी जब ज्ञान और साधना की परंपरा छिन्न-भिन्न होने लगी थी। बाहरी आक्रमणों ने संपन्न-वैभवशाली लोगों के लिए जीवनसंकट खड़ा कर दिया। श्री-समृद्धि की अधिष्ठात्री के आशीष उन्हीं दिनों अभिशाप समझे जाने लगे होंगे, अन्यथा धन एक शक्ति है, ऐश्वर्य “ईश्वर” की ही अभिव्यक्ति है।

महर्षि अरविंद ने लक्ष्मी को मातृशक्ति का ललित और सम्मोहक रूप कहा है। उन्होंने लिखा है-केवल प्रज्ञा और शक्ति की भगवती माता के व्यक्त रूप नहीं हैं, उनकी प्रकृति का एक और सूक्ष्म रहस्य है, जिसके बिना प्रज्ञा और शक्ति अपूर्ण रहती है-वह है महालक्ष्मी। उसकी ओर सभी बड़े उल्लास और उत्कंठा से मुड़ते हैं,क्योंकि वह भगवान् की सम्मोहक मधुरता का जादू फैलाती है। उनके पास होने का अर्थ ही है-गहन सुख पाना और उन्हें अपने हृदय के अंदर अनुभव करना। महालक्ष्मी से लावण्य, मोहकता और मधुरता इस तरह प्रवाहित होती है, जैसे सूर्य का प्रकाश।

महालक्ष्मी भागवत् चेतना का सौम्य और मृदुल स्वरूप है। श्री अरविंद ने महेश्वरी, महाकाली और महासरस्वती के रूपों में भी उसकी व्याख्या की है। महालक्ष्मी को वे विश्व की विभिन्न सत्ताओं को बाँधे रखने और आनंद देने वाली शक्ति बताते हैं। उन्होंने लिखा है- यह ज्ञान और शक्ति के ऊपर शाश्वत सौंदर्य का चमत्कार है। दिव्य सामंजस्यों का अगम रहस्य है, अतिसम्मोहक विश्वव्यापी मनोहरता और आकर्षण का जादू है, जो वस्तुओं, शक्तियों और सत्ताओं को आकर्षित करता है। उन्हें मिलने और एक होने के लिए बाधित करता है, ताकि छिपा हुआ आनंद परदे के पीछे अपना स्वरूप बना सके। यह महालक्ष्मी की शक्ति है और देहधारी सत्ताओं के लिए दिव्य शक्ति का कोई रूप इतना आकर्षक नहीं होता।

वैभव-समृद्धि को अवगुण और दोषों का जनक बताकर निंदित किया गया है। एक अर्थ में यह सभी भी है कि लोग धन आने के बाद बुराइयों, दुर्गुणों और दोष-दुष्प्रवृत्तियों से घिर जाते हैं, लेकिन इसके लिए धन-संपदा नहीं, पतित होने वाले व्यक्ति के संस्कार उत्तरदायी हैं।धन शक्ति है। उसका उपयोग कल्याण के लिए भी हो सकता है और भोग-विलास के रास्ते अनिष्ट-अमंगल के लिए भी। व्यक्ति के अपने संस्कार हैं कि वह उत्थान की दिशा चुनते हैं या पतन-प्रवाह में गिरते हैं। श्री अरविंद के अनुसार धन-वैभव पर आसुरी तत्वों ने अधिकार कर लिया। इसी कारण वह उन्माद, उद्दंडता और उत्पीड़न का प्रतीक बना। “द मदर” पुस्तक में वह लिखते हैं-भगवान् को अन्य शक्तियों की भाँति यह शक्ति भी निम्नतर प्रकृति के लोगों को सौंप दी गई। इसका अपहरण अहंकार के लिए या आसुरी प्रयोजनों के लिए किया जाने लगा। आसुरी प्रभावों की पकड़ में आकर उन उद्देश्यों के लिए इसे विकृत किया जा सका। वास्तव में यह उन शक्तियों में से एक है, जिनके लिए मानव और असुरों में सबसे ज्यादा आकर्षण होता है। जिन लोगों के पास में शक्तियां-सत्ता, धन और सृजन हैं, वे ज्यादातर अनधिकारी हैं। उनके हाथों इन शक्तियों का दुरुपयोग ही होता है बहुत कम लोग उस विकृतिकारक प्रभाव से बच पाते हैं, जिसकी छाप लंबे समय से असुरों के हाथों में रहने से इस पर लग-सी गई है।

श्री अरविंद की दृष्टि में आध्यात्मिकता पर जोर देने वाली विभिन्न संस्कृतियों ने त्याग-तप के लिए आत्यंतिक आग्रह रखा। वह आग्रह धन के तिरस्कार की सीमा तक गया। बाइबिल का वह उपदेश प्रसिद्ध है जिसमें किसी अमीर व्यक्ति को ईश्वर के राज्य में प्रवेश लगभग असंभव बताया गया है। कहा गया है कि सुई के छेद से ऊट का निकलना आसान है, लेकिन धनवान् का सुख से रहना कठिन है। श्री अरविंद ने धन-वैभव के आसुरी उपयोग को त्याज्य बताया है, उसे वर्जित किया है। पिछले युग में इस प्रवृत्ति ने इतना जोर पकड़ा कि धन की कामना को ही निंदनीय मान लिया गया।

वे लिखते हैं, इसी कारण अधिकाँश आध्यात्मिक साधनामार्ग पूर्ण आत्मसंयम और अनासक्ति पर तथा धन और उसे पाने की सारी व्यक्ति और अहंकारयुक्त अभिलाषा के त्याग पर बल देते हैं। यहाँ तक कि कुछ तो धन और वैभव पर प्रतिबंध लगा देते हैं और जीवन की दरिद्रता तथा रिक्तता को ही एकमात्र आध्यात्मिक अवस्था घोषित करते हैं, किंतु यह एक भूल हैं, जो उस शक्ति को विरोधी सत्ताओं के हाथों में छोड़ देती है। यह भगवान् की शक्ति है और इसे भगवान् के लिए पुनः अर्जित करना और भागवत्-भाव से भागवत् जीवन के लिए इसका उपयोग करना चाहिए।

धन-संपदा भगवती महालक्ष्मी का अनुग्रह-वरदान है। अनुग्रह को श्रद्धा से ग्रहण किया जाता है, स्वामी बनकर नहीं। राजसत्ता, संस्थाएँ और समाज जब किसी को सम्मानित करते हैं तो लोग अनुग्रहीत होते हैं, विजय अथवा स्वामित्व के मद में चूर नहीं हो जाते। धन के प्रति स्वामी का नहीं ग्रहण शीलता का भाव होना चाहिए। अपने को उसका स्वामी नहीं रक्षक और साधक समझना चाहिए। श्री अरविंद लिखते हैं सारा धन भगवान् का है, वह जिन लोगों के हाथों में है, वे उसके मालिक नहीं, न्यासी या ट्रस्टी हैं। आज वह उन लोगों के पास, कल कहीं और हो सकता हैं। सब कुछ इस पर निर्भर है कि जब तक धन उनके पास है, वे अपनी धरोहर को किस भाव से, किस चेतना से, किस उद्देश्य से उपयोग करते हैं।

धन-संपदा का उपयोग किस प्रकार होना चाहिए? श्री अरविंद कहते हैं-प्रसाद की तरह। मंदिर में मिलने वाले प्रसाद को न कोई लोभ-लालच से संचित करता है और न ही टूट पड़ने की तरह खाने-डकारने लगता है। महालक्ष्मी के प्रसाद का सेवन किस तरह करना चाहिए, इस पर श्री अरविंद पुनः लिखते हैं-धन का अपने लिए उपयोग करते हुए जो कुछ तुम्हारे पास है, तुम्हें मिलता है या तुम जो कुछ लाते हो, उसे माँ का मानो। कोई माँग न करो, वरन् जो कुछ वह दे, उसे स्वीकार करो और जिस काम के लिए दिया गया हो उसी काम में उसे लगाओ। पूरी तरह निःस्वार्थी, पूरे ईमानदार और सच्चे बनो। सदा ध्यान रखो कि तुम जिस धन का है, तुम्हारा नहीं। दूसरी ओर माँ के लिए जो कुछ तुम्हें मिले, उसे धार्मिक भाव से उनके सामने रखो। अपने या और किसी के काम में स्वार्थभावना से कुछ भी न लगाओ।

किसी को उसके धन के कारण ऊँचा न समझो और न उसके आडंबर, शक्ति या प्रभाव का अपने ऊपर असर होने दो। माँ के लिए जब किसी से माँगों तो वह अनुभव करो कि एक छोटा-सा अंश मात्र माँग रही है, जो वस्तुतः उनकी ही है।

संपन्नता और विपन्नता में समान भाव से रहने को साधना का उत्तम रूप बताते हुए श्री अरविंद ने लिखा हैं कि दरिद्रता में रहना पड़े तो रहें, अभाव की कोई भावना नहीं खटके, न ही साधक के भीतर भागवत् चेतना के क्रीड़ा-कल्लोल में कोई बाधा पड़नी चाहिए। यदि समृद्धि में रहना पड़े तो प्रसन्नतापूर्वक रहा जाए। एक क्षण के लिए भी इच्छाओं और वासनाओं के गर्त में न गिरें, धन या अपने व्यवहार की चीजों पर आसक्त न हों, विलासी न बनें। भगवान् की इच्छा और भगवत् आनंद ही साधक के लिए सब कुछ होना चाहिए।


VigyapanSuchana

समयदान हेतु महाकाल का आमंत्रण

परमपूज्य गुरुदेव ने कहा-हमारे विचार, क्राँति के बीज हैं। ये युगपरिवर्तन करने में समर्थ हैं। यदि आप हिम्मत करके कदम बढ़ाएँ हमारे साथ, तो बात बन जाएगी। महाकाल अपनी शतो। पर आपको आमंत्रण दे रहा है। हमारे साहित्य को घर-घर पहुँचाएँ, यह साहित्य लोगों के विचारों में परिवर्तन लाएगा और इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य लाने का श्रेय आपको मिल जाएगा।

पूज्यवर रचित वाङ्मय, जो उनका मूर्तिमान स्वरूप है, घर-घर पहुँचे-इसके लिए यदि आप दो माह का समयदान दे सकते हैं, तो निम्न जानकारियों सहित आवेदन भेजें। टोलियाँ 1 दिसंबर 19 99,1 फरवरी 2000,1 अप्रैल 2000, 1 जून 2000 से निकलेंगी।

कृपया अपना नाम-पता, फोन नं., आयु, शिक्षा, पद-व्यवसाय, आप पर कौन-कौन आश्रित हैं? गायत्री परिवार से कब जुड़े? समयदान की अवधि का विवरण देते हुए पत्र-व्यवहार करें।

व्यवस्थापक अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा


घर में रसोईकक्ष की स्थिति कहाँ हो

वास्तुशास्त्र पर आधारित यह लेखमाला विशेष रूप से पाठक-परिजनों को भारतीय संस्कृति-स्थापत्य-विज्ञान की उस विधा के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराना है, जो आज लोकप्रिय तो हो गई है, पर जन-जन के भयभीत होने के रूप में। हर कोई अपने घर में फेरबदल कराने हेतु वास्तु-विशेषज्ञ के पास चला जाता है। बिना अध्ययन किए ढेरों वास्तुविद् समाज में पैदा भी हो जाए हैं। इस लेखमाला द्वारा यदि यह समझा जा सके कि घर यदि बन गया है, तो उसमें मामूली फेरबदल कर अंतर्ग्रही प्रभावों, भूचुँबकीय धाराओं से लाभान्वित हुआ जा सकता है, तो इसकी सार्थकता होगी। किसी भी पुरुषार्थ में प्रमादवश, यदि अपनी हर असफलता के लिए घर के वास्तुशास्त्र को कोई दोष देता है तो वह गलत है। दिशाएँ कैसे होती हैं, यह भी नीचे के चित्र से समझ लें।

वास्तुशास्त्र में सर्वाधिक महत्व पाकशाला अर्थात् रसोईघर को दिया जाता है। झोंपड़ी से लेकर मिट्टी के कच्चे घरौंदे एवं आलीशान पक्के महलों तक का यह सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। चीन में रसोईघर को गृह का कोष अर्थात् खजाना माना जाता है। घर का यही वह स्थान है, जो अग्नि से संबंधित है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश-इन पंचमहाभूतों में अग्नि की अपनी विशिष्टता है। प्राचीनकाल में जब इसका आविष्कार नहीं हुआ था, तो लोग कंद, मूल, फल आदि कच्चे खाद्यपदार्थों। से अपनी क्षुधा मिटाते थे, किंतु अग्नि की खोज के बाद मनुष्य भोजन पकाकर खाने लगा है। भौतिक जगत् में अग्नि जहाँ ताप एवं ऊर्जा का स्रोत है, वहीं आध्यात्मिक जगत् में यह ओजस् एवं तेजस् प्रदान करता है।

शास्त्रों में अग्नि की दिशा दक्षिण-पूर्व का कोना अर्थात् आग्नेय कोण निर्धारित की गई है। इसका स्वामी अग्निदेव को माना गया है। अतः गृहनिर्माण में ताप, अग्नि एवं विद्युत आदि संबंधी सभी कार्यों, जैसे चूल्हे, बर्नर, स्टोव, हीटर, भट्टी विद्युत उपकरण आदि के लिए आग्नेय कोण उपयुक्त माना गया है। इस दिशा की स्थिति पर ही वास्तु अर्थात् भवन की स्थिरता, सुदृढ़ता, तेज एवं उसमें निवास करने वाले व्यक्तियों का शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य तथा तेज निर्भर करता है। अग्नि का निवास सूर्य में होने के कारण ही इस दिशा में हवन-यज्ञ आदि शुभकार्य करने का शास्त्रीय विधान है। इससे याजक को सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य, कीर्ति एवं दीर्घायुष्य का लाभ मिलता है। अग्नि एवं उससे संबद्ध सूर्यदेव उनकी रक्षा करते हैं। अग्निपुराण में इस संदर्भ में विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है और अग्नि को आग्नेय कोण का स्वामी बताते हुए कहा गया है कि जो व्यक्ति अग्निहोत्र, बलिवैश्व आदि द्वारा नित्य अग्नि की उपासना करते हैं, वे ओजस्, तेजस् एवं वर्चस् का लाभ प्राप्त करते है। अग्निकोण में दीप प्रज्वलित रखने, रसोईघर में सतत् अग्नि जलाए रखने व उसे न बुझने देने को शास्त्रों ने इसीलिए शुभदायक बताया है। यदि भवन में अग्निकोण का समुचित सदुपयोग किया जा सके तो जीवन में प्रगति-उन्नति तो होती है, व्यक्तित्व भी आकर्षक एवं ओजस्वी-तेजस्वी बनता है।

पंचभौतिक तत्वों से निर्मित हमारी भौतिक काया का पोषण खाद्य-पदार्थों द्वारा होता है और इन पदार्थों का निर्माण रसोईघर में होता है। रसोईघर में बनने वाले उत्तम भोज्यपदार्थों पर ही पारिवारिक सदस्यों का स्वास्थ्य निर्भर करता है। ‘विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र’ के 22/1-13 में इस संदर्भ में उल्लेख करते हुए कहा गया है।-

पृथिव्यादि महाभूतैर्निर्मिता मानुषी तनुः। तस्मात्तदुत्थसद् द्रव्यैस्तस्याः पोषणमीरितम्॥

यथाकालं पक्वमत्रं भक्ष्यं खाद्य«च लेह्मकम्। भु«ज्यान्मतिमान्देही स्थाने सल्लक्षणान्विते॥

तस्मात्सुखादिश्रेयोऽर्थी भोजनागारमुत्तमम्। स्थापयेत्स्वगृहे नित्यं नैमित्तिकमिदं बुधः॥

वास्तुविद्याविशारदों ने रसोईघर के लिए दक्षिणपूर्व का कोना अर्थात् आग्नेय कोण को सर्वश्रेष्ठ माना है। वाराह मिहिर ने अपनी अनुपम कृति ‘वृहत्संहिता’ के तिरपनवें अध्याय-’वास्तुविद्याध्याय’ के 198 श्लोक में लिखा है कि ईशान कोण में पूजागृह, आग्नेय कोण में पाकशाला-रसोईघर, नैऋत्य कोण में भंडारकक्ष-गृहसामग्री कक्ष एवं वायव्यकोण में धन-धान्य स्थापनगृह बनाना चाहिए।

इसी तरह अग्निपुराण के एक सौ छठवें अध्याय-’नगरादिक वास्तु कथनम्’ के 18-19 श्लोक में एक उल्लेख आता है, जिसका भावार्थ है-भवन में पूर्व की ओर स्ट्रांगरूम कोशागार, आग्नेय कोण में पाकशाला, दक्षिण की तरफ शयनकक्ष, नैऋत्य कोण की तरफ शस्त्रागार, पश्चिम की ओर भोजनकक्ष, वायव्यकोण की ओर धान्यागार, उत्तर की ओर द्रव्यागार तथा ईशान कोण में देवालय या पूजाकक्ष बनाना चाहिए।

सभी शास्त्र कहते हैं कि इस तरह से निर्मित भवन गृहस्वामी एवं उसमें निवास करने वालों के लिए कल्याणकारी होता है।

वास्तुविद्या के ज्ञाताओं ने ‘किचन’ अर्थात् रसोईघर को दक्षिणपूर्व अग्निकोण में बनाने के लिए प्राथमिकता इसलिए दी है कि प्रातःकाल पूर्व दिशा से उदित होने वाले सूर्य से आने वाली लाभदायक किरणपुँजों के साथ प्राणपर्जन्य एवं शुद्ध वायु की उस दिशा में बहुलता होती है। इनके प्रभाव से न केवल पूर्वाभिमुख होकर भोजन बनाने वाला व्यक्ति स्वस्थ एवं प्रसन्नचित रहता है वरन् उसके द्वारा बनाया गया भोजन भी स्वादिष्ट और पुष्टिवर्द्धक होता है। विशेषज्ञों का तो यहाँ तक कहना है कि भोजन को चखकर स्वाद के आधार पर यह जाना जा सकता है कि किस घर में रसोईघर किस दिशा में स्थित है? इसी तरह संपन्नता, निर्धनता, रुग्णता, स्वस्थता, गृहकलह आदि का परिचय पाकशाला की दिशाधारा के आधार पर पाया जा सकता है कि वह कौन से गृह में किस दिशा में स्थित है?

चीनी मान्यता के अनुसार व्यक्ति का संतुलित स्वास्थ्य बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि घर में रसोईकक्ष की स्थिति कैसी है, वह किस दिशा में है और किस दिशा में मुँह करके भोजन बनाया गया है। चीनी वास्तुविज्ञान ‘फेंग सुई’ के अनुसार व्यक्ति का स्वास्थ्य एवं धन−संपदा दोनों को ही रसोईघर प्रभावित करता है। किसी भी घर का यह सबसे महत्वपूर्ण अंग है, क्योंकि इसमें बने-पके भोजन को खाकर ही व्यक्ति बाह्यजगत में जाकर कर्मक्षेत्र में उतरता और दक्षतापूर्वक काम करते हुए सफलता अर्जित करता है।

भवननिर्माण करते समय सबसे पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि भूखंड-’प्लाँट’ का आकार कैसा है? वह चौकोर, आयताकार, गोलाकार, त्रिकोण या विदिशा आदि किस प्रकार है? सड़क किधर से निकलती है? भवन का आकार कैसा होगा? उसमें कितने कमरे बनेंगे? आदि बातों की जानकारी हो जाने पर वास्तुनियमों के अनुसार गृह के प्रमुख कक्षों का निर्धारण करना आसान हो जाता है। यों तो आजकल लोग मनचाहे ढंग से ऐसे गृहों का निर्माण करने लगे हैं, जिसमें प्रायः भवन के मुख्य दरवाजे के सामने रसोईकक्ष पड़ता है। इसके लिए कुतर्क यह दिया जाता है कि इस तरह रसोईघर मुख्य दरवाजे के सामने होने से घर में आने-जाने वाले लोगों पर नजर रखी जा सकती है। किंतु वास्तुशास्त्र की दृष्टि से यह निर्णय अनर्थकारी एवं विनाशक ही सिद्ध होता है। ऐसे भवनों में निवास करने वाले पारिवारिक सदस्यों के मध्य प्रायः लड़ाई-झगड़ा होता रहता है। आपसी मनमुटाव, कलह-क्लेश बना रहता है, मानसिक तनाव व अवसाद घेरे रहता है एवं आर्थिक हानि, तंगी व बीमारियाँ डेरा डाले रहती हैं। अतः हर हालत में कमरों की व्यवस्था ऐसे बनानी चाहिए कि रसोईघर भवन के दक्षिणपूर्व में पड़े। यदि किसी कारणवश इस दिशा में रसोई बनाना संभव न हो तो इसे पश्चिम दिशा में बनाया जा सकता है, बशर्ते इस रसोईघर में चूल्हा या गैसस्टोव आदि रसोईघर के आग्नेय कोण में ही रहे।

आज प्रायः सभी जगहों-विशेषकर कस्बों एवं छोटे-बड़े शहरों में भोजन पकाने के लिए स्टोव तथा गैस सिलेंडर का प्रयोग होता है। गाँवों में तो रसोई में अभी भी उपले और लकड़ी के चूल्हे ही जलते हैं। गैसचूल्हे की पट्टी प्लेटफार्म या स्लैब दो तरह से बनाए जाते हैं। एक तो ‘एल’ आकार के और दूसरे दो समानाँतर पट्टियों वाले। समानांतर स्लैब में एक पट्टी दक्षिण पूर्व दीवार के सहारे और दूसरी दक्षिण-पश्चिम में होती है। इनमें से दक्षिण पूर्व वाले स्लैब या पट्टी का प्रयोग गैसचूल्हा रखने के लिए तथा दूसरे का बर्तन तथा रसोईघर के अन्य उपयोगी उपकरण रखने के लिए किया जाता है।

वास्तुनियमों के अनुसार गैसचूल्हे की पट्टी या प्लेटफार्म आग्नेय कोण में पूरब की दीवार के सहारे बनाना अधिक उपयुक्त रहता है। इससे चूल्हा या स्टोव पश्चिमाभिमुखी हो जाता है और खाना पकाने वाले का मुँह पूरब की तरफ होता है। अपनी आवश्यकता के अनुसार स्लैब या पट्टी की चौड़ाई डेढ़ फीट से दो फीट तक रखी जा सकती है। स्लैब का निर्माण कराते समय इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि स्लैब उत्तरी दीवार से सटा हुआ न हो, वरन् कम-से-कम तीन इंच दूर हो और दक्षिणी दीवार से सटा हो। कमरा छोटा हो या बड़ा, निजी भवन हो या किराये का मकान-सभी जगह ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि रसोई वाला भाग आग्नेय कोण या वायव्य पश्चिम में पड़े।

यदि रसोईघर में ‘एल’-आकार की गैसपट्टी बनानी हो तो उसमें भी उत्तरी दीवार को छोड़ते हुए एक पट्टी आग्नेयपूर्व में तथा दूसरी आग्नेयदक्षिण में संयुक्त रूप से बनानी चाहिए। इसमें भी चूल्हा या स्टोव दक्षिणपूर्व की तरफ रहेगा। यदि किसी कारणवश आग्नेय कोण में रसोईघर का निर्माण करना संभव न हो तो इसे वायव्य-पश्चिम दिशा में बनाया जा सकता है। ईशानकोण में रसोईघर कभी नहीं बनाना चाहिए। इसी तरह मध्य-उत्तर, मध्य-पश्चिम, मध्य-दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम अर्थात् नैऋत्यकोण एवं केंद्र में रसोईघर बनाना उचित नहीं है। इसी तरह पूजाकक्ष, शयनकक्ष या शौचालय के ऊपर या नीचे रसोईघर नहीं होना चाहिए। वास्तुशास्त्र की मान्यता है कि यदि रसोईघर गलत जगह पर होगा तो घर के सदस्यों के स्वास्थ्य पर उसका बुरा असर पड़ेगा। ऐसे घरों में लोग अपच, अरुचि, एचिडिटी, हृदयाघात जैसी बीमारियों से सदा जकड़े रहेंगे। विदिशा भूखंड अर्थात् कोणों में स्थित भूखंड वाले भवनों में रसोईकक्ष भूखंड के पूर्व में बनाए जाते हैं अथवा दक्षिणी खंड में इनकी व्यवस्था की जाती है।


लोकसेवियों के लिए दिशाबोध-6 - साधनासमर के लिए समर्थ बनें-सृजन सैनिक

इमारतों का सृजन सीधा-सादा-सा होता है। पुल, सड़कों, बाँधों का निर्माण निर्धारित नक्शे के आधार पर चलता रहता है, पर युगों के नवसृजन में अनेकानेक पेचीदगियाँ और कठिनाइयाँ आ उड़ेली हैं। कार्य का स्वरूप ही ऐसा है। विचारक्राँति, युगपरिवर्तन, जनमानस का परिष्कार ऐसे संकल्प हैं, जिनकी पूर्ति में प्रायः उन सभी से टकराना पड़ता है, जो अब तक स्वजन, संबंधी, हितैषी, निकटवर्ती एवं अपने प्रभावक्षेत्र के अंतर्गत माने जाते थे। इसमें मारकाट न होने पर भी इसे भूतकाल में संपन्न हुए महाभारत के समतुल्य माना जा सकता हैं, भले ही उस टकराहट को दृश्य रूप में न देखा जा सकता हो।

अभिमन्यु चक्रव्यूह में अकेला ही घिरा पड़ा था, सब दिशाएँ शत्रुओं से अवरुद्ध थीं। ऐसी दशा में भी अर्जुनपुत्र ने समय की महती आवश्यकता और न्यायनीति को बिजली बनाने की ललक में वह सब कुछ किया, जो उसके बलबूते में था। इस संदर्भ में उसे प्राण गँवाने पड़े, पर विजयदुदुंभी इतिहासकार अनंत काल तक उसी के यशोगान की बजाते रहेंगे। इसी स्तर का साहस उन्हें भी अर्जित करना पड़ेगा, जो अवाँछनीयता, मूढ़मान्यता, लोभलिप्सा, संकीर्ण-स्वार्थपरता और निकृष्टता के व्यामोह को चीरकर नवसृजन का मार्ग बनाना चाहें।

तथ्यों का पर्यवेक्षण अपने आप से आरंभ करें। जन्म-जन्माँतरों के संचित पैशाचिक स्तर के कुसंस्कार, निकटवर्ती क्षेत्र में अधिकाँश लोगों द्वारा अपनाए गए अनाचारियों के प्रभाव में आकर बहुत कठोर हो जाते हैं, उन्हें अपनाई गई हठवादिता से विरत करना, आदर्शवादिता, परामर्शों के आधार पर भी टेढ़ी खीर हो जाता है। जब अधिकाँश लोग पैसा और वाहवाही लूटने के अतिरिक्त और कोई तीसरी बात सोचते ही नहीं, तो हमें ही एकाकी दिशा-निर्धारण की बात सोचकर प्रस्तुत समुदाय के सामने क्यों उपहासास्पद बनना चाहिए? यह प्रश्न पूछती है, वह तथाकथित समझदारी, जो आम लोगों पर पूरी तरह हावी हैं।

आदर्शों की बात कहने-सुनने भर की समझी जाती है। कथा कहने-सुनने भर स्वर्गमुक्ति मिल जाने वाली मूढ़मान्यता ही सरल मालूम पड़ती है। कठोर कार्य करने के साथ संबंध जोड़ने से सभी घबराते और काँपते देखे जाते हैं। फिर अपना मार्ग एकाकी निश्चय के आधार पर किस प्रकार अपनाते बने? ‘एकला चलो रे’ गीत गाने भर में तो उत्साहवर्द्धक प्रतीत होता है, पर उसे कर दिखाने में नानी याद आती है। अपने निज के कुसंस्कार ही लोभ, मोह और अहंकार की हथकड़ी-बेड़ी जैसे बंधन बनकर कस जाते हैं। वे यथास्थिति में पड़े रहने के लिए ही बाधित हैं।

इन बंधनों को तोड़ न भी सकें, तो उन्हें कम-से-कम शिथिल तो करना ही पड़ता है अन्यथा न संकल्प उभरता है और न ऐसा प्रयास करते बन पड़ता है, जिसके सहारे नवसृजन के संदर्भ में कुछ कहने लायक पराक्रम करते बन पड़े? प्रथम कठिनाई यह कूपमंडूक बनाए रहने वाली स्थिति ही है। उछल कर सुविस्तृत विश्ववसुधा के साथ जुड़ जाने की योजना तक गले नहीं उतरती, फिर उस स्तर का पराक्रम करते किस प्रकार बन पड़े? जब समूचा समय और साधन अभ्यस्त विडंबना में ही खप जाता है, तो वह कैसे करते बन पड़े, जिसके जिए महाकाल का आमंत्रण हुँकारने और युगधर्म को अपनाने के लिए अंतरात्मा पर दबाव डालता है। जो अपने भीतरी असमंजस से निपट लेता है, अपनी राह आप बनाने के लिए कटिबद्ध हो जाता है, उसी के लिए यह संभव है कि ‘क्षुद्रं हृदय दौर्बल्य, त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप’ वाले गीताप्रवचन को जीवन में उतार सके।

यह प्रथम मोरचे पर जूझने की बात हुई। इससे बिलकुल सटा हुआ ही दूसरा मोर्चा है, जिसे संबंधियों-हितैषियों का परिकर कह सकते हैं। धर्मधारणा का परिकर कह सकते हैं। धर्मधारणा और सेवाभावना के लिए सब कुछ करने पर उतारू व्यक्ति, इन दिनों अपने तथाकथित स्वजनों को ही सर्वाधिक विरोधी पाता है। आज के वातावरण में हर किसी को संपन्नता और विलासिता की सुविधाएँ ही सब कुछ प्रतीत होती हैं। वे अपनी मान्यता के अनुरूप एक ही परामर्श दे सकते हैं कि परमार्थ की कष्टसाध्य प्रक्रिया से व्यवहारतः कोसों दूर रहना ही लाभदायक है।

उनकी बात, जो जिस हद तक स्वीकार कर लेता हैं, उसे उसी सीमा तक स्वार्थरत रहना पड़ता है। परमार्थ की दिशा में आगे बढ़ना उसके लिए उतना ही कठिन हो जाता है। कोई वास्तविक कारण न होते हुए तर्कों, तथ्यों और प्रमाणों का इतना बड़ा जखीरा सामने ला खड़ा किया जाता है कि पिछले दिनों की मित्रता को ध्यान में रखते हुए वह कथन-परामर्श ही अभेद्य दीवार बनकर रह जाती है। स्वार्थ के पिंजड़े से बाहर एक कदम भी रखना उस स्थिति में सहन नहीं होता।

इस दूसरे मोरचे से निपट सकने का अंगुलिनिर्देश तुलसीदास के उस पत्र से ही मिलता है, जो उन्होंने मीरा को उनके पत्र के उत्तर में लिखा था। उसमें कहा गया था कि-

जाके प्रिय न राम वैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, यद्यपि

परम सनेही॥ पिता तज्यो प्रहृद, विभीषण बंधु, भरत महतारी। बलि

गुरु तज्यो, कंत ब्रज बनितन भये मुद मंगलकारी॥

इस निर्देशन में मीरा ने अपना और समस्त समाज का भला देखा और अपने असमंजसों को निरस्त करते हुए, वे आदर्शवादिता को नए सिरे से प्रतिष्ठापित करने के लिए निकल पड़ीं और बदली जैसी अमृतवर्षा करने में जीवन भर निरत रहीं।

तीसरा मोरचा उस समुदाय के साथ बनता है, जिन्हें अचिंत्य-चिंतन से, अनुचित गतिविधियों से पीछे हटने का परामर्श दिया जाता है। वे इतने भले कहाँ होते हैं कि भ्राँतियों के विपरीत जो श्रेयस्कर अनुरोध किया जा रहा है, उसे सहज स्वीकार कर लें। पूर्वाग्रहों से जकड़ी मान्यताएँ और आदतें, जो अभ्यास में गहराई तक घुसकर बैठ गई हैं। परामर्श कितना ही तथ्यपूर्ण क्यों न हो, पर नशेबाज के गले वह शिक्षा कहाँ उतरती है कि इस आत्मघाती कुटेव से विरत होने में ही भलाई हैं। वह परामर्शदाता से तर्क से न जीत सकने की संभावना देखते हुए कभी-कभी हाँ-हाँ भी कर देता है, पर वह आश्वासन बहकावा भर होता है। नशेबाजी छोड़ने का न उसका मन बनता है और न वैसा साहस उभरता है। ठीक ऐसी ही कठिनाई तब सामने आती है, जब पैर से सिर तक कीचड़ में धँसे हुए लोगों को अपनी स्थिति बदल लेने के लिए कहा जाता है। दुर्बुद्धि ऐसी पिशाचिनी है कि वह जिसे एक बार पकड़ लेती है, उसे आसानी से चंगुल में से छूटने नहीं देतीं।

इतना होते हुए युगसृजेताओं के सामने इसके अलावा कोई चारा भी नहीं कि वे अचिंत्य-चिंतन से लोगों को छुड़ाएँ और कुमार्ग पर चलने से लौटाने का प्रयास करें। यह कार्य प्रत्यक्षतः झंझट भरा है। तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण प्रस्तुत हुए अपने प्रतिवेदन का औचित्य तो अकाट्य सिद्ध किया जा सकता है, पर उस हठवादिता के लिए क्या किया जाए, जो आम आदमी पर विशेषतया अनगढ़ वर्ग पर पूरी तरह सवार देखी जाती है। ऐसी दशा में उपदेष्टाओं का परामर्श भी अरण्यरोदन बनकर रह जाता है। बहुतों को बहुत बातें समझाते रहने पर भी लोग आदर्शों की ओर मुड़ने को तैयार नहीं हैं, लाभ की हानि और हानि को लाभ समझने की दृष्टि जो उनकी परिपक्व हो गई है।

सृजनशिल्पी के करने के लिए काम तो अनेकों सामने ही हैं। पर सबसे बड़ा कार्य एक ही होता है, प्रवाह को, प्रतिबंध-प्रचलन को अमान्य कर सकने वाले लोकमानस का नवसृजन करना। प्रतिकूलताओं को अनुकूल स्तर की बनाकर दिखाना। युगशिल्पियों को प्रधानतया इस एक ही प्रयत्न में आजीवन निरत रहना पड़ता है। भले ही प्रत्यक्ष क्रिया−कलाप परिस्थिति के अनुरूप बदल जाते हों। जब करना यही है, उसका कोई विकल्प हो नहीं सकता, तो नए सिरे से नया निर्धारण करने और नए हथियार सँजोने के लिए कुछ समय वस्तुस्थिति को समझने और उसका उपयुक्त समाधान खोज निकालने की आवश्यकता पड़ेगी।

बड़े काम हलके साधनों के सहारे संपन्न नहीं हो पाते। उनके लिए अधिक समर्थ साधन जुटाने होते हैं। बंदूकों के दाँत खट्टे करने के लिए तोप के गोलों का प्रहार ही विकल्प रहता हैं। मजदूरों द्वारा न उठ सकने वाले भर को मजबूत क्रेनें उठाती है। जिन चट्टानों को हथौड़ों से नहीं तोड़ा। जा सकता उन्हें डायनामाइट के कारतूसों से उड़ाना पड़ता है। बड़ी समस्याओं को बड़प्पन की अनेक विशेषताओं से संपन्न मस्तिष्क ही सुलझा पाते हैं।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए इन मोरचों पर जूझने वालों को असाधारण प्रतिभा का धनी होना चाहिए। समय की विपन्नता को चुनौती देने वाले और उसके स्थान पर सुसंपन्नता प्रतिष्ठापित करने के लिए जिनने निश्चय किया है, उनका व्यक्तित्व और कर्त्तव्य ऐसा मजबूत होना चाहिए, जो स्वयं तो डगमगाए नहीं, वरन् प्रतिकूलताओं से मल्लयुद्ध करते हुए पछाड़ सकने वाले बलवान्-पहलवान की भूमिका निभा सकें। किसी महान् प्रयोजन में सफलता का श्रेय हर किसी को मिल नहीं पाता। इसलिए यदि वस्तुतः लक्ष्य साधना हो, तो अर्जुन एवं एकलव्य जैसी लक्ष्य के प्रति ऐसी एकाग्रता सँजोनी चाहिए, जिसमें कोई व्यवधान आड़े न आ सके।

सृजनशिल्पी को अपना स्तर-शब्दबेधी बाण जैसा बनाना चाहिए, जिसे निशाना बेधने के अतिरिक्त और कहीं भटकने जैसी कठिनाई का सामना करना ही न पड़े। मनस्वी ऐसे ही लोगों को कहते हैं। मनस्विता के सहारे वे इंद्रवज्र और ब्रह्मास्त्र की तरह अभेद्य लक्ष्य वेध सकने में समर्थ होते रहे हैं।

मनस्वी के साथ अन्य विभूतियाँ भी आ मिलती है। ओजस्वी और वर्चस्वी बनाने वाली सहायक शक्तियाँ उस तक स्वयमेव खिंचकर चली आती हैं। नदी जितनी गहरी होती है उसमें उतना ही अधिक गहरी होती है उसमें उतना ही अधिक पानी भरा पाया जाता है। इतना ही नहीं, उस गहराई के अनुरूप ही दूर-दूर तक के नदी-नाले उसी दिशा में बहते-दौड़ते चले आते हैं और आत्म-विसर्जन करके सरिता का वैभव-विस्तार बढ़ाते रहने में अपनी-अपनी भूमिका संपन्न करते रहते हैं। यह लाभ उन्हें ही मिलता रहता है, जो सचमुच के मनस्वी, तेजस्वी, व्रतशील, संयमी और संकल्पवान् है। इन विशेषताओं को अर्जित करने के लिए अपने चिंतन, चरित्र और व्यवहार को ऐसा बनाना पड़ता है, जिसके कण-कण में मनोहारी सुगंध उभरती रहती है। ऐसे वरिष्ठ व्यक्तित्व वैचारिक प्रतिकूलता और परिस्थितियों की विकटता से भी निपटने में सफल हो जाते हैं।

दृढ़ निश्चयी अपनी निज की मानसिकता में घुसी हुई कायरता, क्षुद्रता और लोभ-लिप्सा से निपट लेते हैं। कम-से-कम इतना तो कर ही लेते हैं कि बाहर वालों को अँगुली उठाने का इतना अवसर न मिले, ताकि अच्छाइयाँ और सेवाभावना प्रख्यात बुराइयों के भार से दबकर धूमिल और निरर्थक हो जाएँ। संसार में अनेकों लोग दुर्गुणों और पिछली भूलों का प्रायश्चित करके भावी जीवन में महामानव बन सके हैं। हर बुरा आदमी भी सुधारप्रक्रिया को अपनाकर प्रामाणिक ही नहीं श्रद्धास्पद भी बन सकता है। अंबपाली, अंगुलिमाल, अशोक जैसे असंख्यों के उदाहरण इस संभावना को समर्थन देने के लिए विद्यमान हैं।

जो दूसरों से कहना और कराना है, उसे कार्यान्वित करने के लिए शुभारंभ अपने आप से ही करना चाहिए। जो निश्चय किया है, उस दृढ़तापूर्वक आरुढ़ रहना चाहिए। बेपैंदी के लोटे की तरह इधर-से-उधर लुढ़ककर अपने को उपहासास्पद नहीं बनाना चाहिए। संकल्पों को, निर्धारित निश्चयों को उस दिशा में तो पूरा किया ही जाना चाहिए, जब वे सुधार, संयम जैसे आदर्शवादी पक्ष के साथ जुड़े हुए हों। रामायण की यह चौपाई हर प्रमाणिक व्यक्ति को ध्यान में रखे ही रहना चाहिए, जिसमें कहा गया है कि प्राण जाहि पर वचन न जाई, नित नई प्रतिज्ञाएँ करने और जोश ठंडा होते ही गिरगिट की तरह कुछ से कुछ बन जाने वाले लोग अपनी हँसी कराते और अविश्वास का वातावरण बनाते हैं। युगप्रवर्तकों, विचारक्राँति के सूत्रधारों का स्वभाव इतना शिष्ट, मृदुल और शालीनतासंपन्न होना चाहिए कि जिससे भी बात करनी पड़े, वह मिलने भर से पुलकित हो उठे। उस पर सज्जनता की छाप पड़े और यह मान्यता अनायास ही उभरे कि व्यक्ति अपने में ऐसे तत्व समाविष्ट कर चुका है, जिसके आधार पर सहज सद्भाव की मनः स्थिति बनती है।

इतनी स्थिति कर लेने के उपराँत प्रतिकूलता को मोड़-मरोड़ देते हुए, अनुकूलता तक घुमा कुछ कठिन नहीं रह जाता हैं। संकट तब खड़ा होता है, जब दोनों ही पक्ष ऐंठ-अकड़कर प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते हैं। ऐसी स्थिति कभी भी, कहीं भी बननी नहीं चाहिए। एक बार में बात बनती न दीख पड़े, तो झगड़कर प्रसंग को समाप्त कर देने की अपेक्षा यह गुँजाइश छोड़ दी जाए कि भविष्य में समय मिलते ही नए सिरे से, नए दृष्टिकोण से उस पर चर्चा की जा सके। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में मतभेदों को किसी हद तक दूर करने में ऐसे ही विचार-विनिमय काम देते हैं। इसके लिए जो प्रतिनिधि नियुक्त किए जाते हैं, उनमें यह विशिष्टता परखी जाती है कि वह घोर मतभेद के बीच भी सरलता और तरलता की दृष्टि से लोचदार-लचदार बने रहें और उलझनों को सुलझाने की दिशा में क्रमशः आगे सफल होते रहें। ऐसे ही कूटनीतिज्ञ पाते और महानीति के लिए अधिकारी समझे जाते हैं।

नागरिकता, सामाजिकता सभ्यता, शालीनता का समन्वय ही शिष्टाचार बन जाता है। उसके प्रदर्शन का व्यावहारिक स्वरूप तो क्षेत्रों और वर्गों की स्थानीय प्रचलित परंपराओं के अनुरूप बनता हैं, पर उसके मोटे सिद्धाँत दो हैं-एक अपनी नम्रता और दूसरा, दूसरों की प्रतिष्ठा को समुचित रूप से बनाए रहना। उद्दंडता का, असभ्यता का तनिक-सा भी पुट बनी बात बिगाड़ देता है। प्रतिपक्षियों को अनुकूल बनाना तो दूर, इस कारण अपने समर्थक समझे जाने वाले लोग तक सामान्य बात का बतंगड़ बना देते हैं। शिल्पियों को अधिकाँश समय जनरूपक में ही बिताना पड़ता है और मान्यताओं के क्षेत्र में प्रायः अपनी भूमिका इतनी लचीली रखनी पड़ती है कि इच्छित परिवर्तन तो होता रहे, पर उसमें अभद्रता कहीं आड़े न आए। अभीष्ट सफलता का बहुत कुछ श्रेय इन्हीं छोटी-छोटी बातों पर निर्भर रहता है। कलावंत प्रदर्शन करने से चूकते नहीं।

युगशिल्पी को अपने व्यवहार में दो अन्य बातों का समावेश करना चाहिए, जो देखने में साधारण मालूम पड़ती हैं, पर उनकी प्रतिक्रिया असाधारण स्तर की होती है। उनमें से एक है-सार्वजनिक पैसे को अत्यंत पवित्र धरोहर मानकर उसकी एक-एक पाई का इतनी सावधानी से प्रयोग करना कि जाँच करने वाले को इसमें कहीं खोट दिखाई न पड़े। साथ ही अपनी अंतरात्मा और सर्वसाधारण को यह विश्वास बना रहे कि दान के पैसे में कहीं किसी प्रकार की कोई गड़बड़ी नहीं हुई हैं। जिसके भी हाथ में वह धन रहा, उसके द्वारा संतों जैसी निस्पृहता की दृष्टि से इस प्रसंग में सतर्कता बरती ही जानी चाहिए।

दूसरा प्रसंग है-नर और नारी के मध्यवर्ती संबंधों का। सार्वजनिक क्षेत्र में नर और नारी मिल−जुलकर ही सामूहिक कार्यक्रमों और आयोजनों को संपन्न करते हैं। ऐसी दशा में इस आशंका की गुँजाइश रहती है कि कहीं अनैतिक चिंतन और आचरण आड़े न आने लगा हो। भावनाओं की पवित्रता तो ऐसे प्रसंगों में अक्षुण्ण नहीं भूलना चाहिए कि तरुण और तरुणियों की घनिष्ठता, निकटता और असाधारण सहकारिता भी साधारणजनों की आँखों में खटकती हैं। उतने भर से आशंकाओं का ऐसा बवंडर बन पड़ता है कि जो बदनामी के स्तर तक पहुँचा देता है। ऐसी दशा में न केवल संबंधित व्यक्तियों को, वरन् उस लक्ष्य को भी भारी क्षति पहुँचती है, जिसके लिए एकत्र हुआ गया था और मिल−जुलकर काम करने में कुछ अनुचित नहीं माना गया था।

अपनी दृष्टि और क्रिया कुछ भी क्यों न रही हो, पर लोग तो लोग हैं। संसार में प्रचलित अनेकानेक विसंगतियों को देखते हुए अशुभ आशंका कहीं भी की जा सकती है। इस लोकमान्यता को ध्यान में रखते हुए, संस्थागत हिसाब-किताब में तथा नर-नारी की निकटता वाले अवसरों पर, उतनी अधिक सावधानी बरतनी चाहिए कि कुकल्पना के लिए कहीं कोई गुँजाइश ही शेष न रहे।

यहाँ एक बात और हर समाजसेवी को नोट कर लेनी चाहिए कि श्रेय पाने, हर प्रसंग में अपने को अग्रणी सिद्ध करने वाले लोग जनसाधारण की दृष्टि में ओछे-बचकाने समझे जाते हैं और लोकसेवी का बाना पहनने पर भी बहुत घटिया समझे जाते हैं। उनकी सम्मान यदि धोखे से कभी मिल भी जाए, तो वह कागज के फूल की तरह थोड़े ही समय में आकर्षण खो बैठता हैं। नेता बनने के लिए लालायित लोग नाम छपाने, चेहरा मटकाने और माइक पर छाए रहने की कोशिश करते हैं। बड़प्पन जताने के लिए व्याकुल लोग, कुछ हाथ में रहा हो, तो उसे भी गँवा बैठते हैं। इससे अनेकों प्रतिस्पर्धी, विरोधी और ईर्ष्यालु उपज पड़ते हैं। ऐसे विग्रहों का परिणाम उस संगठन या मंच को भी बदनाम करता है, जिस पर चलकर वे ऊँचे बनना चाहते है। वे स्वयं बदनाम होते हैं और उस संगठन को ले डूबते हैं, जिसके कि वे नेता कहलाना चाहते थे।

गाँधी जी सादगी, सज्जनता और विनम्रता प्रसिद्ध थी। इसलिए वे काँग्रेस के कोई नियुक्त नेता-पदाधिकारी न होते हुए थे। व्यक्तित्व उभारने का यही राजमार्ग है। नेतागिरी के लिए उछल-कूद करने वाले तो मात्र नर्तक स्तर के अभिनेता बनकर रह जाते हैं। प्रामाणिकता के अभाव में कोई भी देर तक श्रद्धास्पद नहीं रह सकता और न उसकी नेतागिरी देर तक चलती है। सृजनशिल्पी इस तथ्य से भलीप्रकार अवगत रहें, तो ही ठीक हैं।


आत्मनिर्माण का उद्देश्य (Kahani)

स्वामी विवेकानंद एक सत्संग में भगवान् के नाम की महत्ता बता रहे थे। एक तार्किक ने कहा-”शब्दों में क्या रखा है, उन्हें रटने से क्या लाभ?”

विवेकानंद ने उत्तर में उन्हें अपशब्द कहे। मूर्ख, जाहिल आदि कहा। इस पर वह तार्किक आगबबूला हो गया और भन्नाते हुए कहा-”आप संन्यासी के मुँह से ऐसे शब्द शोभा नहीं देते। उन्हें सुनकर मुझे

बहुत चोट लगी है।” स्वामी जी ने हँसते हुए कहा-”भाई वे तो शब्द मात्र थे। शब्दों में

क्या रखा है। मैंने कोई पत्थर तो नहीं मारा?”

सुनने वालों तक का समाधान हो गया। शब्द जब किसी को क्रोध उत्पन्न कर सकते हैं, तो जिसके लिए प्रिय शब्द भावपूर्वक कहे जाएँगे, उसका अनुग्रह वे क्यों न आकर्षित करेंगे?

गाँधी जी के आश्रम में सफाई और व्यवस्था के कार्य हर व्यक्ति को अनिवार्य रूप से करने पड़ते थे। एक समाज को समर्पित श्रद्धावान् बालक उनके आश्रम में आकर रहा। स्वच्छता-व्यवस्था के काम उसे भी दिए गए। उन्हें वह निष्ठापूर्वक पूरा करता भी रहा जो बतलाया गया, उसे जीवन का अंग बना लिया।

जब आश्रम निवास की अवधि पूरी हुई, तो गाँधी जी से भेंट की और कहा-बापू! मैं महात्मा बनने के गुण सीखने आया था, पर यहाँ ता सफाई व्यवस्था के सामान्य कार्य ही करने को मिले। महात्मा बनने के सूत्र तो न बतलाए गए, न उनका अभ्यास कराया गया।

बापू ने सिर पर हाथ फेरा। समझाया, कहा-’बेटे? तुम्हें यहाँ जो संस्कार मिले हैं, वे सब महात्मा बनने के सोपान हैं। जिस तन्मयता से सफाई तथा छोटी-बातों में व्यवस्था बुद्धि का विकास कराया गया, यही बुद्धि मनुष्य को महामानव बनाती हैं।

अवंतिका की विशाल जनसभा समाप्त हो गई थी, थोड़े से बौद्ध भिक्षु और श्रेष्ठ सामंतजन शेष रहे थे। यह विचारवान वर्ग था। सब अपनी-अपनी शंकाओं का समाधान तथागत से करा रहे थे। एक बालक जो अति जिज्ञासु दिखाई देता था, वहीं समीप ही खड़ा था। अवसर मिलते ही उसने पूछा-”भगवन्! संसार में सबसे छोटा कौन है?” बालक की प्रतिभा देखकर भगवान् बुद्ध गंभीर हुए और बोले-

“जो केवल अपनी बात सोचता है, अपने स्वार्थ को सर्वोपरि मानता है।” इन शब्दों में भिक्षुराज ने व्यावहारिक अध्यात्म की रूपरेखा थोड़े और सरल शब्दों में समझा दी।

आत्मनिर्माण का उद्देश्य यह है कि मनुष्य की इच्छाएँ, लालसाएँ और मनोवृत्तियों उनके निजी सुख और उपभोग तक ही सीमित न रहें वरन् उनका विस्तार हो। लेने-लेने में ही सब आनंद नहीं है। जब तक केवल पाने की अभिलाषा रहती है तब तक मनुष्य बिल्कुल छोटा, दीन, असहाय, अकाय और बेकार-सा लगता है। किंतु जैसे ही उसके शरीर, मन, बुद्धि और संपूर्ण साधनों की दिशा चतुर्मुखी होने लगती है, चारों ओर फैलने लगती है, वैसे ही उसकी महानता भी बिखरने लगती है और वह अपने जीवनलक्ष्य की ओर अग्रसर होने लगता है।


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी - फिजा बदल देती है-अवतार की आँधी

पूर्वार्द्ध - 30 अगस्त 1975 जन्माष्टमी पर उद्बोधन

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियो, भाइयो! आज जन्माष्टमी का पुनीत पर्व है। आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व इसी दिन पृथ्वी पर भगवान् की वह शक्ति अवतरित हुई, जिसने प्रतिज्ञा की थी कि हम सृष्टि का संतुलन कायम रखेंगे। भगवान् की उस प्रतिज्ञा के भगवान् कृष्ण प्रतिनिधि थे, जिसको पूरा करने के लिए उन्होंने अपनी सारी जिंदगी लगा दी। उसी प्रतिज्ञा के आधार पर उन्होंने जनसाधारण को विश्वास दिलाया है कि हम पृथ्वी को असंतुलित नहीं रहने देंगे और सृष्टि में अनाचार को नहीं बढ़ने देंगे। भगवान् ने यह प्रतिज्ञा की हुई है-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मनं सृजाम्यहम्॥

परित्राणाय साधूनाँ विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

मित्रो! मनुष्य के भीतर दैवी और आसुरी-दोनों ही वृत्तियाँ काम करती रहती है। दैत्य अपने आपको नीचे गिराता हैं। पानी का स्वभाव नीचे की तरफ गिरना है। पानी बिना किसी प्रयास के, बिना किसी ‘परपज’ के नीचे की तरफ गिरता हुआ चला जाता हैं। इसी तरह मनुष्य की वृत्तियाँ जब बिना किसी के सिखाए और बिना किसी आकर्षण के अपने आप पतन की ओर, अनाचार और दुराचार की ओर बढ़ती हुई चली जाती हैं, तब सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाता है। व्यक्ति के भीतर भी और समाज के भीतर भी संतुलन बिगड़ जाता है। ऐसी स्थिति में समाज में सफाई की प्रक्रिया यदि न चलाई जाए, कमरे में झाड़ न लगाई जाए, तो कूड़ा भरता चला जाएगा। दाँत पर मंजन न किया जाए, शरीर को स्नान न कराया जाए, तो उस पर मैल जमता चला जाएगा। इसी तरह अगर कपड़े को न धोया जाए, तो कपड़ा मैला होता चला जाएगा।

मलीनता को साफ करने की प्रक्रिया जब बंद हो जाती है या ढीली पड़ जाती है, तो सृष्टि में अनाचार बढ़ जाता है, यह सृष्टि के बहिरंग रूप में भी और अंतरंग रूप में भी फैल जाता है। अंतरंग रूप हमारा व्यक्तिगत रूप हैं। यह भी एक सृष्टि है। व्यक्ति अपने आप में सृष्टि है, व्यक्ति अपने आप में संसार है, विश्व है। अगर संघर्ष की गुँजाइश न हो, सफाई की गुँजाइश न हो, धुलाई की गुँजाइश न हो, तब इसके भीतर भी अनाचार बढ़ता हुआ चला जाता है। इसी तरह बहिरंग संसार की प्रक्रिया, सही करने की प्रक्रिया को जारी न रखा जाए, तब संसार में अनाचार बढ़ता चला जाता है।

कभी-कभी देव भी हार जाते हैं, जब समाज को ऊँचा उठाने वाले उनके सलाहकार धीमे पड़ जाते हैं, हारने लगते हैं। जब हम अपना संघर्ष बंद कर देते हैं और दुष्ट प्रवृत्तियों को खुली छूट दे देते हैं, तब हमारा भीतर वाला देव हारने लगता है और दुष्ट प्रवृत्तियाँ खुलकर खेलने लगती हैं। दुष्ट प्रवृत्तियाँ हमारे स्वभाव और अभ्यास में बनी रहती हैं। चूँकि हम अपने भीतर से संघर्ष बंद कर देते हैं, दुष्प्रवृत्तियों को रोकते नहीं, काटते नहीं, तोड़ते-मरोड़ते नहीं, उनसे लोहा लेते नहीं और न ही उन्हें छोड़ते हैं, इसलिए वे हम से चिपक कर बैठी रहती है ओर उनको हमारे अंतरंग जीवन में खुलकर खेलने का मौका मिल जाता है। और बहिरंग जीवन में? बहिरंग जीवन में भी यही बात है। बहिरंग जीवन में आप अनाचार को छूट दे दीजिए, उसे रोकिए मत, सुधारिए मत, प्रतिबंध लगाइए मत, तब वह चारों ओर से बढ़ता हुआ चला जाएगा। अनाचार आता बहिरंग से है, लेकिन उतरेगा अंतरंग जीवन से हैं, लेकिन उतरेगा अंतरंग जीवन में। इस कारण कभी-कभी आप में ऐसा असंतुलन पैदा होगा, जो विनाश की ओर ले जाएगा। जब कभी असंतुलन पैदा हो जाता है, तो यह मालूम पड़ता है कि दुनिया का विनाश होने वाला है। हमारी भीतर की दुनिया का भी ओर बाहरी दुनिया का भी विनाश होने वाला हैं। यह विनाश नहीं, वरन् विनाश के आधार हैं

मित्रो! विनाश का आधार एक ही है-अनाचार। अनाचार की वृद्धि अर्थात् विनाश। अनाचार और विनाश दोनों एक ही चीज हैं। इनमें जरा भी फरक नहीं हैं। एक दूध है तो एक दही। दूध अगर जमा दिया जाएगा, तो दही बन जाएगा और जीवन में अनाचार को बढ़ावा दिया गया होगा तो विनाश उत्पन्न हो जाएगा। यह प्रक्रिया न जाने कब से बार-बार बनती और चलती आ रही है। भगवान् को सृष्टिनिर्माण से पूर्व ही यह ख्याल था कि कहीं ऐसा न हो जाए और सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाए। इसलिए सृष्टि का संतुलन जब कभी बिगड़ने लग जाता है, तो उसका बैलेंस ठीक करने के लिए भगवान् अपनी शक्तियों को लेकर अवतार लेते रहे हैं।

अब तक भगवान् ने जाने कितने अवतार लिए हैं, हम कह नहीं सकते। उनमें से एक अवतार यह भी है जिसका कि हम जन्मोत्सव मनाने के लिए, जन्मदिन मनाने के लिए, जिसकी जन्माष्टमी मनाने के लिए हम एकत्रित हुए हैं। भगवान् के अवतार हमारे यहाँ हिंदू सिद्धाँत के अनुसार दस और एक दूसरे सिद्धाँत के आधार पर चौबीस हुए हैं। कोई कहता है कि दस अवतार हुए हैं, तो कोई कहता है कि भगवान् के चौबीस अवतार हुए हैं कि भगवान् के चौबीस अवतार हुए हैं। यह तो मैं हिंदू समाज की बात कह रहा हूँ। लेकिन हिंदू समाज ही दुनिया में अकेला नहीं है। मुसलमान समाज अगल है। मूसा से लेकर मोहम्मद साहब तक ढेरों अवतार हुए हैं। ईसाइयों में भी न जाने कितने अवतार हुए हैं। पारसियों में कितने अवतार हो चुके हैं। बौद्धधर्म में न जाने कितने अवतार हुए हैं। पारसियों में कितने अवतार हो चुके हैं। हर मजहब में कितने अवतार हो चुके हैं, यह हम नहीं बता सकते। अवतार होने से हमें कोई शिकायत भी नहीं है।

मित्रो! चलिए इन अवतारों में हम एक और कड़ी जोड़ने को तैयार हैं। जितने भी महामानव, महर्षि, लोकसेवक एवं संसार को रास्ता बताने वाले हुए हैं, चलिए उन सबको हम अवतार मान लेते हैं। इस संबंध में हम यह नहीं कहेंगे कि यह अवतार नहीं था या वह अवतार नहीं था। हमारे ये सब अवतार हैं। मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि अवतार आपके भीतर में कई तरीके से प्रकट होता रहता है। कभी अनाचार को दबाने के लिए खड़ा हो जाता है, तो कभी पीड़ा-पतन निवारण के लिए खड़ा हो जाता है। तो कभी विकृतियों से जूझने के लिए खड़ा हो जाता है। जिस तरीके से कसाई बकरे को बाँधकर ले जाता है, उसी तरीके से हमारा आँतरिक अवतार न जाने कहाँ से कहाँ ले जाने के लिए हमें विवश कर देता है। दुनिया में ऐसी कौन-सी शक्ति है, कौन है वह जो हमें बताता है कि इस रास्ते पर चलना नहीं है। वह शक्ति हमें ऐसे रास्ते पर चलने से रोक देती है। जब कभी शौर्य का-साहस का उदय हमारे भीतर होता है, तो मित्रो हम कह सकते हैं कि अवतार का उदय हुआ।

अवतार का उदय कितने मनुष्यों के भीतर हुआ और उन्होंने कितनों का कायाकल्प कर दिया? एक उदाहरण बताता हूं आपको समर्थ गुरु रामदास का। समर्थ गुरु रामदास शादी के लिए तैयार खड़े थे। पंडित पंचाँग लेकर पति-पत्नी को एक-दूसरे के गले में वरमाला पहनाने को कह रहे थे। तभी समर्थ के सामने दो सपने आकर खड़े हो गए। सपना नंबर एक कि बीबी आएगी, हाथ-पाँव दबाया करेगी, सिर में तेल लगाया करेगी, खाना पकाया करेगी और बच्चा पैदा किया करेगी। दूसरा सपना इतना जबरदस्त आया कि चूहे के तरीके से रोटी के टुकड़े को देखकर मौत के पिंजड़े में जाने को तैयार हैं? यह पता नहीं कि जिंदगी कितनी कीमती है और इसके लिए क्या करना चाहिए? भगवान् आया और उसने समर्थ को आवाज दी-बुलाया। भगवान् हमारे और आपके पास भी रोज आता है। रोज संदेश देता है, आदेश देता है, निर्देश करता है। लेकिन भगवान् की पुकार हम और आप कब सुनते हैं? भगवान् आदर्श की, सिद्धाँतों की, नैतिकता की, मर्यादा की बातें बताकर चला जाता है, लेकिन हम और आप यह सब सुनते हैं क्या? हमारे लिए तो भगवान् की पूजा करने के लिए ये खेल-खिलौने ही काफी हैं, जो हमने और आपने पकड़ रखे हैं। हमारी और आपकी समझ में तो भगवान् की आरती उतारनी चाहिए, जप कर लेना चाहिए, भगवान् को धूपबत्ती चढ़ा देनी चाहिए, भगवान् को चावल चढ़ा देना चाहिए और प्रसाद बाँट देना चाहिए। इतना काफी है। और कुछ? नहीं और ज्यादा न हमारी हिम्मत हैं, न हमारा मन है, न हमारी तबियत है, न हमारे अंदर जीवट है और न हमारे अंदर चिंतन है। बस, इन्हीं बाल-बच्चों जैसे खिलौनों से खेलते रहते हैं। भगवान् की पूजा के लिए इन खेल-खिलौनों के अतिरिक्त हम और हिम्मत नहीं कर सकते।

लेकिन भगवान् तो अपनी पूजा के लिए कुछ और ही चाहता है। वह धर्म स्थापना के लिए, समय की माँग को पूरा करने के लिए, समय की माँग को पूरा करने के लिए आपको रोज पुकारता है। धर्म की स्थापना के लिए भगवान् ने किसको-किसको पुकारा? समर्थ गुरु रामदास को पुकारा। उनसे कहा कि अरे! कहाँ चलता है नरक में, चल तेरे लिए तेरे लिए दूसरा रास्ता खुला पड़ा है। उन्होंने कहा-भगवान् मैं आया। भगवान् मैं डूब रहा हूँ, इस भवसागर से आप मेरा त्राण कीजिए अर्थात् रक्षा कीजिए। भगवान् का तो संकल्प ही है- “परित्राणाय साधूनाँ” अर्थात् साधुओं का त्राण होता हैं, असाधुओं का नहीं। असाधुओं के त्राण के लिए भगवान् के पास कोई फुरसत नहीं है, कोई टाइम नहीं है और कोई मोहब्बत नहीं है। जो आदमी साधु-संत नहीं है अथवा साधु होकर भी पाप के गर्त में गिरते हुए चले जाते हैं, तो भगवान् क्यों करेंगे उनसे? एक सिद्धाँत वाले-उच्च आदर्शों वाले की ओर उन्होंने अपना हाथ बढ़ा दिया और समर्थ गुरु उठकर खड़े हो गए। शादी के मंडप से वे भाग खड़े हुए। लोगों ने कहा कि पकड़ना इन्हें, पर समर्थ गुरु उनकी पकड़ से दूर भाग खड़े हुए। उनकी होने वाली बीबी का ब्याह दूसरे व्यक्ति से कर दिया गया। समर्थ गुरु रामदास जाने कहाँ चले गए।

मित्रो! समर्थ गुरु रामदास वहाँ चले गए, जहाँ से हिंदुस्तान के अध्याय का नया इतिहास आरंभ हुआ। उन्होंने न जाने कितने शिवाजी तैयार कर दिए। महाराष्ट्र में उन्होंने न जाने कितने ज्ञानकेंद्रों, हनुमान मंदिरों को स्थापित किया। एक-एक मुट्ठी अनाज घर-घर से एकत्र करके कितना अपार धन अर्जित किया और उसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए शिवाजी की सेना में लगा दिया। शिवाजी के नाम से जो संग्राम चला, उसके असली संचालक कौन थे? समर्थ गुरु रामदास। समर्थ गुरु रामदास का इतिहास-भगवान् का इतिहास है। आपका इतिहास? औरों का इतिहास है, चूहों का इतिहास है, जो केवल पेट के लिए जीते हैं, औलाद के लिए जीते हैं। हम और आप भी कोई भगवान् के भक्त हैं? नहीं, साहब हम तो भगवान् की शरण चाहते हैं। खाक चाहता है अभागा कहीं का। बस भक्ति के नाम पर चंदन चढ़ाता हुआ चला जाता है, माला घुमाता हुआ चला जाता हैं। नहीं साहब! हम तो बद्रीनाथ जाते हैं, चंदन चढ़ाते हैं, माला घुमाते हैं, धूपबत्ती जलाते हैं। ये कुछ नहीं, मात्र तू खेल-खिलौना करता, मजाक करता और भगवान् को अँगूठा दिखाता है। आपके ये पूजा करने के ढंग भगवान् से दिल्लगीबाजी करने के समान हैं। पूजा करने के हैं, जो समर्थ गुरु रामदास के पास आए थे।

मित्रो! पूजा करने के सही तरीके वे हैं जो भगवान् की पुकार सुनने वालों ने अपनाए हैं। भगवान् की पुकार सुनने वालों में से एक नाम जगद्गुरु शंकराचार्य का भी है। एक ओर शंकराचार्य की माँ चाहती थीं और ये कहती थी कि मेरा फूल-सा छोकरा ब्याह करके गोरी बहू लाएगा और नाती-पोते पैदा करेगा। कमाकर लाएगा, महल बनाएगा, कोठी बनाएगा, गाड़ी लाएगा और घर में पैसे इकट्ठे करेगा। एक ओर इस तरह शैतान वाला ख्वाब, पाप वाला ख्वाब, लोभ वाला ख्वाब, आकर्षण वाला ख्वाब था, दैत्य वाला ख्वाब था, तो दूसरी ओर शंकराचार्य के मन में देवत्व वाला ख्वाब था। भगवान् ने शंकराचार्य के कान में इशारे से कहा-अरे अभागे! जिस काम के लिए कुत्ते और बिल्ली, मेढ़क और चूहे अपनी सारी जिंदगी खर्च कर देते हैं, वह तेरे लिए काफी नहीं है। तेरे लिए दूसरा रास्ता खुला हुआ है, उस ओर चल।

शंकराचार्य ने अपनी माँ को समझाया, परंतु माँ की समझ में कहाँ और क्यों आने वाला था? उसकी समझ में तो यही आता था कि मुझे पोता चाहिए, पोती चाहिए, कोठी चाहिए। मित्रो! इन सब ख्वाबों को लात मार उठ खड़ा हुआ-शंकराचार्य। कौन खड़ा हो गया? चारों धाम की स्थापना करने वाला शंकराचार्य, बौद्ध नास्तिकवाद की जड़ें उखाड़कर हिंदुस्तान से बाहर करने वाला शंकराचार्य। उन दिनों बौद्धों का नास्तिकवाद हिंदुस्तान में लोगों के मन-मस्तिष्क में घुसता हुआ चला जा रहा था, तब शंकराचार्य ने कहा था कि हिंदुस्तान में आस्तिकता जिंदा रहेगी, नास्तिकता को हम जिंदा नहीं रहने देंगे। हिंदुस्तान से नास्तिकता को उन्होंने निकाल बाहर किया। फिर वह कहाँ चली गई? चाइना चली गई, कोरिया चली गई, मलेशिया चली गई, जापान और वर्मा चली गई, नेपाल चली गई, श्रीलंका चली गई, कहीं भी चली गई, पर हिंदुस्तान से भाग गई। ये शंकराचार्य की हिम्मत थी। चारों धामों की स्थापना करके सारे हिंदुस्तान को एकता के सूत्र में पिरोने वाला वह शंकराचार्य, दिग्विजय करने वाला वह शंकराचार्य, अनूठे विचारों वाला शंकराचार्य अलग था। उसने भगवान् की पुकार सुन ली थी।

मित्रो! अगर शंकराचार्य ने भगवान् की पुकार न सुनी होती तब? तब बेटे यही होता जो हमारा-आपका हुआ है। क्या हो जाता? नौ बेटे और ग्यारह बेटियाँ होतीं। एक बच्चा गोद में बैठा होता तो एक सिर पर बैठा होता और एक माँ के पेट में। एक गालियाँ दे रहा होता, एक मूँछें काट रहा होता और एक मारपीट कर रहा होता। आपके जैसे उसकी भी मिट्टी पलीद हो गई होती। लेकिन भगवान् की पुकार को सुनने वाला शंकराचार्य उनकी कृपा से जीवन की दिशाओं को लेकर न जाने कहाँ से कहाँ चला गया। भजन इसी का नाम है, जिसमें कि आदमी के जीवन की दिशाधारा बनाई जाती है, विचार बनाए जाते हैं और काम करने के तरीके बदले जाते है। इसी का नाम है भजन। भजन माला घुमाना नहीं है, भगवान् की पुकार सुनने का नाम भजन है।

मित्रो! भगवान् की पुकार सुनने का प्रतिफल यही होता रहा है। कितने मनुष्यों के भीतर भगवान् की पुकार पैदा हुई और किन-किन सामाजिक परिस्थितियों में पैदा हुई? भगवान् समय-समय पर साकार रूप में भी आते हैं। निराकार रूप में भगवान् किस-किसके पास आए, जैसा कि अभी मैंने आपको सुनाया। गुरुदेव अभी आप और उदाहरण सुनाएँगे? नहीं बेटे, अब मैं और नहीं सुनाऊँगा। अगर और हवाला देना पड़ा तो सारे विश्व का वह इतिहास आपके सामने पेश करना पड़ेगा, जिन्होंने नियमों के लिए, सिद्धाँतों के लिए, आदर्शों के लिए कुरबानियाँ दीं, बलिदान दिए, कष्ट उठाए और दूसरों की नजरों में बेवकूफ कहलाए, बेकार कहलाए। लेकिन अपने आदर्शों के लिए, सिद्धांतों के लिए, दुनिया में शाँति कायम रखने के लिए, दुनिया में शालीनता कायम रखने लिए जिन्होंने अपने आपको, अपनी अक्ल को, अपनी ताकत को और अपनी संपत्ति को सर्वस्व न्योछावर कर दिया, ऐसे लोगों की संख्या सारी-की-सारी तादाद लाखों भी हो सकती है और करोड़ों भी। भगवान् की गाथाएँ सुनाने पड़ेंगे। आप इन सबकी कथा−गाथा को भगवान् की कथा−गाथा मान सकते हैं।

इसी तरह गाँधीजी की कथा−गाथा को यह कहने में कोई ऐतराज नहीं है कि वह भगवान् की कथा−गाथा है। बुद्ध की, शंकराचार्य की कहानी कहने में मुझे कोई ऐतराज नहीं है कि वह भगवान् की कथा−गाथा है। दूसरे अन्य लोगों ने, जिन्होंने भी ने जीवन, श्रेष्ठ जीवन जिया, आदर्श जीवन जिया, लोगों को प्रकाश देने वाला जीवन जिया, अपने आप में नमूने का जीवन जिया, मित्रो! वे सारे-के-सारे भगवान् थे, क्योंकि उनके भीतर भगवान् अवतरित हुआ होगा और भगवान् ने भगवान् की बाँह पकड़ ली होगी। भगवान् से उन्होंने कहा होगा कि हम आपके पीछे चलेंगे और आपकी छाया होकर रहेंगे।

साथियों! भगवान् का हुक्म जिन लोगों ने माना, वे सब आदमी भगवान् के अवतार कहे जा सकते हैं, देवता कहे जा सकते है और जिन लोगों ने भगवान् को ठोकर मारी, माला भले ही घुमाते रहे, उन्हें मैं कैसे कह सकता हूँ कि आप भगवान् के भक्त हो सकते हैं। मैं ऐसे किसी व्यक्ति को मानने को तैयार नहीं हूँ कि वह व्यक्ति भगवान् की इज्जत करने वाला हो सकता है, भगवान् पर विश्वास करने वाला हो सकता है, जो सारा दिन माला घुमाता है, सारा दिन भजन करता है, लेकिन उसकी जिंदगी ऐसी घिनौनी है, जिसे देखकर घृणा आती है और नफरत होती है। ऐसे व्यक्ति भगवान् के भक्त नहीं हो सकते और न ही उनके अंदर भगवान् अवतरित हो सकता है।

भगवान् के अवतार मन में अवतरित हुए हैं, हृदय अवतरित हुए हैं, आदर्शवादी सिद्धांतों और श्रेष्ठकर्मों के रूप में अवतरित हुए हैं। सृष्टि में हवा के रूप में, आँधी के रूप में निराकार भगवान् व्याप्त हैं। हवाएँ दिखाई नहीं देतीं, फिर भी अपना काम कर जाती हैं। इसी प्रकार निराकार भगवान् है। गाँधी जी के जमाने में एक हवा आई थी। गाँधी जी आगे-आगे चलते थे तो उनके पीछे-पीछे सब चल पड़ते थे। गाँधी जी अकेले थे? नहीं, मित्रो! वे अकेले नहीं थे, हजारों-लाखों आदमी उनके साथ काम करते थे। हजारों-लाखों लोगों की कुरबानियों-बलिदानों, लाखों लोगों की तबाही, लाखों लोगों का गाली खाना आदि तरह-तरह की मुसीबतों को झेलकर, सबसे मिलकर उनका संग्राम हुआ। तब देश को आजादी मिली।

मित्रो! इस देश में हर जमाने में एक-एक ऐसी हवा चली है, जिसने दुनिया की दिशाधारा ही बदल दी अन्यथा इस देश में नास्तिकवाद, अनाचारवाद फैल जाता। इस हवा को लेकर कौन आया? हवा के संदेश को लेकर कौन आया? संदेश लेकर के यहाँ भगवान बुद्ध आए थे। तो क्या भगवान् बुद्ध ने हिंदुस्तान का- सारे एशिया का बेड़ा गर्क नहीं कर दिया था? नहीं मित्रो! ऐसा नहीं हो सकता। यह काम पीछे वालों का अनुयायियों का तो हो सकता हैं, पर भगवान् बुद्ध का नहीं। बुद्ध भगवान् अकेले क्या कर सकते थे? एक अकेला चना भाड़ को नहीं फोड़ सकता। एक आँधी आती है, एक तूफान आता है, एक हवा आती है। जब आँधी आती है, तो हमें आगे का काम दिखाई पड़ता है। सेना जब चढ़ाई करने जाती है, जब एक विशेष रंग का झंडा आगे-आगे फहराता हुआ चलता है और सैनिक बढ़ते हुए चले जाते है। ठीक है जब चढ़ाई होती है तो झंडे के निशान आगे बढ़ते हुए दिखाई देते हैं, परंतु वह झंडा तो लड़ाई नहीं लड़ता, लड़ने वाली फौज होती है। हवाएँ कभी-कभी आती है। ये हवाएँ क्या काम करती हैं? ये हवाएँ यह काम करती हैं कि असंख्य मनुष्य उपकार में लगे दिखाई पड़ते हैं। गाँधी एक हवा थी, बुद्ध एक हवा थी, कृष्ण एक हवा थी, राम एक हवा थी। मित्रो! राम अकेले अगर रावण को मार सकते तो उन्होंने वहीं से क्यों नहीं मार दिया? नहीं साहब, अकेले राम नहीं मार सकते थे हाँ, बेटे, अकेले नहीं मार सकते थे। उन्हें रीछों की सेना लेनी पड़ी, वानरों की सेना लेनी पड़ी, जमीन पर सोना पड़ा। मनुष्य होकर रहना पड़ा। विभीषण को साथ लेना पड़ा। ढेरों-के-ढेरों मनुष्यों को संग लेना पड़ा और तब एकत्रित सेना को लेकर रावण से युद्ध लड़ा। इस तरह से रावण का खात्मा हुआ। यह हवा थी एक जमाने में।

इसी तरह क्या कृष्ण भगवान् महाभारत युद्ध अकेले नहीं लड़ सकते थे? अगर अकेले नहीं लड़ सकते थे? अगर अकेले लड़ सकते तो पाँडवों की खुशामद क्यों करते? पाँडव बार-बार यही कहते रहे कि हमें यह लड़ाई नहीं लड़नी है। वे हमारे रिश्तेदार लगते हैं। हम तो भीख माँगकर खा लेंगे, अपनी दुकान चलाकर खा लेंगे। हमें राजपाट नहीं चाहिए। हमें लड़ाई से छुट्टी दीजिए। हमसे अपने स्वजनों का खून–खराबा नहीं होगा। फिर भी कृष्ण भगवान् खुशामद करते रहे, हाथ-पाँव जोड़ते रहे, नाराज होते रहे, गालियाँ सुनाते रहे और कहते रहे कि तुम्हें लड़ना चाहिए। कृष्ण अगर अकेले महाभारत का युद्ध लड़ सकते, कंस को मार सकते, असुरों को मार सकते, सभी आततायियों को मार सकते तो फिर मैं सोचता हूँ कि सारे विश्वभर में निमंत्रण भेजकर सेनाओं को बुलाने की क्या जरूरत थी? अगर अकेले ही गोवर्द्धन उठा सकते थे तो ग्वाल−बालों को लाठी लगाने की क्या जरूरत थी?

मित्रो! अकेला आदमी कितना कर सकता है। मैं किसी तरह से यह विश्वास करने को तैयार नहीं हूँ कि एक व्यक्ति विशेष सारे-के-सारे समाज को रोक सकता है, बदल सकता है। ऐसा नहीं हो सकता। ये हवा है, जिसे पैदा करने की कोई मशीन काम करती होगी, इस बात का समर्थन करने को मैं तैयार हूँ। इस हवा में बहुत से ढेरों आदमी घिरे होते हैं। इनके दिमाग और दिल एक दिशा में चल पड़ते हैं, जैसे कि अपने आँदोलन में। आपके अपने इस आँदोलन में क्या आदमी संचालन करता है? नहीं, एक आदमी संचालन नहीं कर सकता। क्या एक आदमी नियम बनाने के लिए आश्वासन दे सकता है? नहीं, एक आदमी के बस की बात नहीं है। एक आदमी फिजा बदल सकता है।? एक आदमी नया जमाना ला सकता है? एक आदमी लोक-समाज में हलचल पैदा कर सकता है? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।

क्रमशः अगले अंक में


अध्यात्म सुसंस्कारिता को कहते हैं (Kahani)

एक अस्त−व्यस्त युवक सुकरात के पास पहुँचा और बोला-”मुझे अध्यात्म के विषय में शिक्षा दीजिए।’

सुकरात ने कहा-”पहला पाठ है- सफाई सीखे। नहा-धोकर आओ। बाल या तो कटवाओ और यदि रखे हो, तो साफ करके, तेल डालकर कंघी से सँभालकर आओ। अध्यात्म सुसंस्कारिता को कहते हैं। पहले अस्वच्छता का प्रत्यक्ष कुसंस्कार हटाओ, तब अन्य कुसंस्कार हटाने की बात सोची जा सकेगी।”


युगगीता-7 - जो परमात्मसत्ता में अधिष्ठित हो, वही है स्थितप्रज्ञ

श्रीमद्भगवद्गीता के साँख्ययोग (द्वितीय अध्याय) की युगानुकूल विवेचना

विगत अंक में आपने इस धारावाहिक लेखमाला के अंतर्गत युगधर्म की व्याख्या के साथ-साथ गीता के साँख्ययोग प्रकरण की कर्मयोग प्रधान अति महत्वपूर्ण विवेचना से भरे श्लोकों के साथ प्रतिपादनों को पढ़ा। “हम न हो, न ही हम कर्मों के फल का हेतु बने।” यह गीता सुप्रसिद्ध श्लोक “कर्मण्येवाधिकारस्ते- - ते सग्डोऽस्त्वकर्मणि (2/47) के माध्यम से विगत अंक में समझाया गया था। इसके बाद के प्रायः आठ श्लोकों में गीता मर्म छिपा पड़ा है। योगस्थ होकर कैसे जिया जा सकता है, इसे जिन श्लोकों को आत्मसात् कर समझा जा सकता है, वे दूसरे अध्याय के 47 वें से 53 वें श्लोक तक की व्याख्या के माध्यम से समझाए गए। समत्वं योग उच्यते के माध्यम से वासुदेव श्रीकृष्ण अर्जुन को सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित होकर कर्त्तव्यकर्म करने की प्रेरणा देते हैं। योग ही कर्मों में कुशलता का नाम हैं एवं कर्मबंधन से छूटकर मोक्षप्राप्ति का मार्ग हैं, यह श्री भगवान् की व्याख्या के माध्यम से अर्जुन को निमित्त बनाकर महाकाल की सत्ता हमें बताना चाह रही है। क्रमशः अर्जुन का शोक व असामंजस्य दूर कर उसके शिष्यत्व को जगाकर देहातीत आत्मा के भान-देह से स्वधर्माचरण को समझाते हुए भगवान उसे इस स्थिति में ले आए हैं कि वह यह जान सके कि स्थितप्रज्ञ कैसे बना जाता हैं। कैसे ब्रह्म में दृढ़प्रतिष्ठ योगी वह बन सकता है। यहीं साँख्ययोग का तीसरा चरण आरंभ होता है-स्थितप्रज्ञ के लक्षण, वह कैसा होता है- इसकी व्याख्या योगेश्वर श्रीकृष्ण के द्वारा; द्वितीय अध्याय के श्लोक क्रमाँक 50 में अर्जुन ने जिज्ञासा प्रकट की है एवं श्री भगवान् ने क्रमाँक 55 से 72 तक उसका उत्तर दिया है। इस अंक में उसी व्याख्या को पढ़ें-

अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिर बुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह कैसे बोलता है कैसे बैठता है, कैसे चलता है? (54/2)

यहाँ अर्जुन स्पष्ट पूछ रहा है कि “समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त, स्थिर बुद्धि वाला पुरुष”-कैसा होता है? वह समझ चुका हैं कि व्यवसायी बुद्धि से व्यक्ति को समाधि नहीं प्राप्त होती। क्योंकि ऐसी बुद्धि व्यक्ति की भोगवाद में आसक्ति बढ़ाती है एवं उसी में उसको सारा सुख जान पड़ता हैं इसी बुद्धिवाद के कुचक्र से मानवजाति को उबारने के लिए परमपूज्य गुरुदेव ने युगानुकूल विचार दिए, ताकि सही प्रतिभाएँ समाज के नेतृत्व हेतु आगे आ सकें। आज चमक-दमक तो बहुत है, शिक्षा व विज्ञान की शाखा-प्रशाखाएँ हैं, परंतु है यह ‘प्रोफेशनल इंटेलीजेंस।’ यह बुद्धि जब तक प्रज्ञा का रूप नहीं लेती तब तक व्यक्ति समाधि को प्राप्त नहीं हो सकता। स्थितप्रज्ञता स्वार्थबुद्धि से परे जाकर शुरू होती है। आज के समाज की सारी समस्याएँ परमपूज्य गुरुदेव के अनुसार दार्शनिक भ्रष्टता के कारण जन्मी है। दर्शन को भी वैभव से जोड़ दिया कार्लमार्क्स ने। परमपूज्य गुरुदेव ने मानव मात्र को एक ही संदेश दिया कि हम बुद्धिवाद के कुचक्र से उबरकर निष्काम कर्म की ओर प्रवृत्ति बढ़ाएँ। त्याग का मूल्य समझें- व्यवसायी बुद्धि वालों को बलिदान व त्याग से मिलने वाले सुख व श्रेय की अनुभूति कराएँ। उपनिषद् अक्सर उद्धत करते थे-”त्यागेनैके अमृतत्व मानशुः।” त्याग से ही अमृततत्व की प्राप्ति होती है। त्याग का मर्म, देने का आनंद बुद्धिवादी कैसे समझ सकता है। इसी बात को भगवान् पहले 52 वें श्लोक में कह चुके हैं एवं अब 55 वें श्लोक में कह रहे हैं। पहले वे कह चुके हैं कि जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूप दलदल से भलीभाँति पार कर जाएगी, उसी समय तुझमें भी भोगों से वैराग्य प्राप्त हो जाएगा। अब वे कह रहे हैं कि हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को भली-भाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है। (55-2)।

बारबार श्रीकृष्ण भगवान् एक ही बात कह रहे हैं-कामनाओं को त्यागकर, मोह से उबरकर ही गुरु-शिष्य में शाश्वत संबंध स्थापित हो सकते हैं एवं महामानव बनने का द्वार खुल सकता है। ‘भवरोग वैद्यक’ है गुरु, यदि हम चाहते हैं कि हमारा भटकाव रुके, हमारी बुद्धि, परमात्मा में प्रतिष्ठित हो, तो हमारे अंदर पवित्रता का परिमाण बढ़ता चला जाएगा। ज्यों-ज्यों हम त्याग के मार्ग पर बढ़ेंगे, वैसे-वैसे हमारी बुद्धि प्रज्ञा-परमात्मा में स्थितप्रज्ञा अर्थात् स्थितप्रज्ञ हम बनते चले जाएँगे-यह भगवान् यहाँ समझाने का प्रयास कर रहे हैं। योगदर्शन में कहा गया हैं-”तस्य प्रज्ञा ऋतम्भरा।” अर्थात् ऋत परमसत्य को प्राप्त परमात्मा में प्रतिष्ठित वह बुद्धि ऋतम्भरा-प्रज्ञा कहलाती हैं।

अर्जुन यह जान रहा है कि गुरु के रूप में भगवान् उसे भटकाव से उबर कर आने की एवं उसके लिए अलौकिक संभावनाओं का द्वार खोलने की प्रक्रिया आरंभ कर चुके हैं। इसीलिए वह पूछता है कि स्थितप्रज्ञ आखिर होता कैसा है, उसके लक्षण क्या होते हैं? कभी देखा नहीं, देखा तो समझा नहीं। उसके जीवनक्रम के बारे में उसे उत्सुकता है। इसीलिए उसने प्रश्न पूछा जिसका उत्तर भगवान् दे रहे हैं। हमें उत्सुकता होती हैं, प्रधानमंत्री का जीवनक्रम कैसा है, उनका रूटीन क्या होता है। अभिनेताओं के विषय में युवा मनों में जानने की जिज्ञासा होती हैं। यह स्वाभाविक भी है, पर परमेश्वर का पार्षद कैसा होता है। जिसने अपना सब कुछ त्यागकर परमसुख की प्राप्ति कर ली हो व जिसकी विचारणा-भावना परमात्मा में प्रतिष्ठित हो, ऐसा व्यक्ति कैसा होता है यह जानने की जिज्ञासा हमें भी होनी चाहिए। यदि हम स्थितप्रज्ञ को बहुत नजदीक से जानना चाहते हैं, तो हमें परमपूज्य गुरुदेव के जीवन के हर पहलू का, हर पक्ष का मार्मिक ढंग से अध्ययन करना चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव ने जीवन के हर पक्ष पर न केवल लिखा, उसे स्वयं जिया भी है। वे जानते थे कि व्यक्ति के विचार ही उसे उठाते व गिराते हैं। यही बात उनने धुरी बनाकर प्रस्तुत की व विचारनिर्माण की प्रक्रिया का अभ्यास करने हेतु सभी साधकों-शिष्यों को प्रेरणा दी। यदि बुद्धि सही होगी-विचार सही होंगे-उनके निर्माण की प्रक्रिया हमें आती होगी तो हमें यह भी समझ में आ जाएगा कि कैसे योग को प्राप्त हुआ जा सकता है-परमात्मा से नित्य का संयोग कैसे हो सकता है। ध्यान-धारणा से लेकर सभी योगपरक उपचार एवं तपसाधनाएँ व्यक्ति के विचारों को परिष्कृत करने के निमित्त ही तो हैं, यह बात उनने हमें घूंटी की तरह पिलाई हैं। अखण्ड ज्योति 1969 में परमपूज्य गुरुदेव ने पृष्ठ 40 पर लिखा है-मुद्दतों से हम यह भी भूल गए हैं कि विचार भी कोई तत्व है और उसका भी मानवजीवन पर कोई प्रभाव पड़ता है। इस विस्मृति का एक ही कारण है कि हम जीवननिर्माण और मनुष्य के सामने उपस्थित ज्वलंत समस्याओं के बारे में न कभी कुछ सोचते हैं, न कहते हैं, न पढ़ते-सुनते हैं। ऐसी चर्चा हमें वैसी ही निरर्थक लगती है जैसे भीलनी को रत्नराशि की कीमत एवं उपलब्धि की चर्चा। जो जिस विषय में अपरिचित है, वह भला उसमें रस ले भी कैसे सकता है। मानवजीवन की सर्वोपरि शक्ति और संपत्ति उत्कृष्ट विचारणा के संबंध में जब हमें किसी ने कुछ कहा, बताया ही नहीं तो आखिर उसकी जानकारी होती भी कैसे? अस्तु, हम विचारनिर्माण के क्षेत्र में एक प्रकार से सूने-अछूते ही हैं।

यदि हम गुरुदेव की विचारक्राँति अभियान की प्रक्रिया को जानने का प्रयास करें तो वह इसी धुरी पर टिकी है, व्यक्ति मात्र को सोचने-विचारने, सद्बुद्धि का विकास कर जीवन जीने की कला सिखाना। यह विचार यदि पैदा हो सके एवं साधनों-भोगविलास की सामग्री के प्रति दृष्टि सही विकसित हो तो निष्काम कर्म करने की प्रवृत्ति जीवन में आएगी। जब हम इस ओर प्रवृत्त होते हैं तो सबसे पहले मोह से उबरते हैं एवं तब हमें स्थितप्रज्ञ बनने का मार्ग स्पष्ट दिखाई देता है। भगवान् कह रहे हैं कि जो संपूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है, वही व्यक्ति स्थितप्रज्ञ कहा जाता है, साथ ही यह भी कह रहे हैं कि वह आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान् पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥

यहाँ ‘स्थितप्रज्ञ’ को इस श्लोक के अर्थ के परिप्रेक्ष्य में एवं अर्जुन की जिज्ञासा के संदर्भ में हमें समझने का प्रयास करना चाहिए। भगवान् इससे पूर्व कह चुके हैं कि इस स्तर के महापुरुषों को तत्व से जानने का प्रयास करना चाहिए। अर्जुन पूछ रहा है कि वह होता कैसा है, उसके लक्षण क्या होते हैं। वह बोलता कैसे है, बैठता कैसे है व चलता कैसे हैं? सामान्यतः ऐसा लगता है कि कैसा मूढ़ की तरह प्रश्न यह पूछा जा रहा है? क्या बहिरंग द्वारा समझा जाए कि स्थितप्रज्ञ कैसा होता हैं? श्रीकृष्ण पहले ही कह चुके हैं “यो माँ वेत्ति तत्वतः” जो मुझे तत्व से जान लेता है, वह मेरा मर्म जान लेता है। अतः वह सुन-जानकर भी अर्जुन की जिज्ञासा समझने योग्य है। दैनंदिन जीवन में स्थितप्रज्ञ पुरुष होता कैसा है, उसे पहचानें कैसे? जो स्थूल इंद्रियों से-चर्मचक्षुओं से समझा-देखा जा सकता है वह यही कि बोलचाल कैसी है-चलते हैं तो गरिमापूर्ण ढंग से या हलके-फुलके व्यक्ति की तरह। बहिरंग की हलचल अंदर की मनः स्थिति को दर्शाती है। अतः अर्जुन का इस तरह पूछना स्वाभाविक है, किसी भी कार्यकर्त्ता-लोकनायक का स्तर इतने बहिरंग के स्वरूप से ही जाना-समझा जा सकता है। वाणी तो बाद में कार्य करती है। पूज्यवर ने भी लोकसेवियों की आचारसंहिता में पहले बहिरंग के इन अनुशासनों को साधने की बात कही है।

उत्तर बड़ा विलक्षण है भगवान् श्रीकृष्ण का। वे कहते है ‘स्थितप्रज्ञता’ जब आ जाती है तब मनुष्य अपनी समस्त कामनाओं को पूरी तरह त्याग देता है। आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है। कामनाओं से उबरकर आत्मा के सुख में विचरण करने वाला व्यक्ति स्थितप्रज्ञ है और वह भी तब तक जब तक कि वह यही मनः स्थिति अपनी बनाए रखता है। वासुदेव श्रीकृष्ण ने प्रारंभ भी यही से किया है व अंत भी 79 वें श्लोक में यही करते हैं-

विहाय कामान्यः सर्वामाँश्ररति निःस्पृहः। निर्ममो निरहंकारः स शाँतिमधिगच्छति॥

अर्थात् जो पुरुष संपूर्ण कामनाओं को त्यागकर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता, वही शाँति को प्राप्त होता है एवं स्थितप्रज्ञ कहलाता है। अर्थात् मानसिक शाँति समस्वरता, जीवनयोग की धुरी एक ही है- विहाय कामान्यः-संपूर्ण कामनाओं का (इस लोक व परलोक में ) परिपूर्ण त्याग। यही सच्चे शिष्य की, संतुलित व्यक्तित्व की निशानी है कि उसकी कोई कामनाएँ नहीं रहतीं इसीलिए वह शाँति को प्राप्त दृष्टिगोचर होता है। वह ममतारहित भी होता है-इस उत्तरार्द्ध वाले श्लोक के अनुसार ममता अर्थात् व्यक्ति विशेष से मोह, अहंरहित व्यक्ति ही स्थितप्रज्ञ बन सकता है। कामना और भक्ति, कामना और प्रेम एक साथ नहीं रह सकते। कामना के रहते बुद्धि स्थिर नहीं रह सकती। कामना बाँधती है तो भक्ति मुक्त करती है। कामनाएँ घसीटती हैं तो भक्ति विसर्जन की ओर ले जाती है। जब कामनाएँ है, बुद्धि अस्थिर है तो वह परमात्मचेतना में स्थित पुरुष बन कैसे सकता है। वही व्यक्ति भक्तिप्रज्ञ हो सकता है, जिसकी बुद्धि स्थिर हो। जब यह हो जाता है, संसार में मन नहीं रहता, सृष्टि के केंद्र में व्यक्ति स्थित हो जाता है, लगता है सारी हलचलें मेरी हैं। मैं बुद्धि से परे हूँ। फिर दुनिया भर के प्रपंच मुझको सता नहीं सकते। नाम क्यों नहीं मिला, यश क्यों नहीं गाया गया, मेरी कीर्ति क्यों नहीं हुई, मेरी निंदा क्यों हुई, यह सब चीजें परेशान नहीं करतीं। छोटा बच्चा खिलौना टूटने पर रोने लगता है, इसी प्रकार एक अस्थिर व्यक्ति कामनाओं के पूरा न होने पर रोता रहता है, व्यथित होता है तथा तनावग्रस्त हो जाता है, जबकि एक बड़ा बच्चा जिसके लिए खिलौने कोई महत्व नहीं रखते, ऐसा कोई प्रसंग आने पर परेशान नहीं होता। एक परिपक्व व्यक्ति की तरह स्थितप्रज्ञ की स्थिति होती है। ठाकुर रामकृष्ण परमहंस का भतीजा मर गया। समाचार आया तो उनकी प्रतिक्रिया थी कि ऐसा लग रहा है जैसे तकिए में से किसी ने खोल निकाल लिया हो। बिल्कुल सामान्य-सी बात में ठाकुर जैसे स्थितप्रज्ञ ने इस हृदयविदारक घटना को उड़ा दिया। ऐसी स्थिति बनती है जब हम कामनाओं से मुक्त होकर आत्मा में स्थित हो जाते हैं।

अगले श्लोक में भगवान् कहते हैं-

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

अर्थात् दुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा निस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिर बुद्धि कहा जाता है। दुखों के कारण तो कई आते हैं, पर उन्हें स्थितप्रज्ञ सहन कर लेता हैं, उद्विग्न नहीं होती। उसे सुख की कामना भी नहीं होती। सुख पाने की आकाँक्षा में वह उद्विग्न भी नहीं होता। वह वीतराग हो जाता हैं स्वयं को राग, भय, क्रोध से परे चलकर अपनी मनः स्थिति उच्चस्तर की बना लेता है। हम जैसे सामान्य व्यक्ति सुखों की इच्छा बराबर बनाए रखते हैं, दुख में परेशान हो जाते हैं। यही हममें व स्थितप्रज्ञ में सबसे बड़ा अंतर है।

परमपूज्य गुरुदेव कहते थे कि दुख को तप बना लो एवं सुख को योग बना लो। दुर्भाग्यवश दुख को दिया दंड मानकर परेशान होते रहते हैं एवं सुख को भोग में बदल डालते हैं। भोग की प्रक्रिया अंततः दुख ही देती है। दुख में सभी भगवान् को याद करते हैं, सुख में कोई नहीं करता। (दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय) भगवान् संकटमोचन की तरह मात्र दुख में हमें याद आता है। सुख यदि योग बन जाता एवं हर क्षण हम भोगी की नहीं, योगी की दृष्टि रखते तो कभी कष्ट-तनाव हमें विक्षुब्ध नहीं करते। परमपूज्य गुरुदेव ने संजीवनी साधना, जीवन जीने की कला के प्रशिक्षण एवं जीवन देवता की साधना-आराधना, हमारी वसीयत और विरासत जैसी ऐतिहासिक स्तर की रचनाओं के द्वारा यही प्रतिपादित किया कि हम योगस्थ हो कैसे जिएँ। स्थितप्रज्ञ बनने की दिशा में पहली सीढ़ी तो चढ़ें-सुख को भोग एवं दुख को तप बनाकर। उतार-चढ़ाव तो आते रहते हैं, प्रत्येक को जीवन भर इनका सामना करना पड़ता है, पर ये आते हैं हमें योगी बनाने के लिए, तपस्वी बनाने के लिए।

अगले कुछ श्लोक वासुदेव श्रीकृष्ण द्वारा बड़े विलक्षण ढंग से स्थितप्रज्ञ की परिभाषा के रूप में समझाए गए हैं। सत्तावनवें श्लोक में भगवान् कहते हैं-

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तप्राप्य शुभाशुभम्। नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

अर्थात् जो पुरुष स्नेहरहित होकर उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है। इसी प्रकार अगले श्लोक में एक महत्वपूर्ण बात भगवान् के श्रीमुख से निकलती है-

यदा संहरते चायं कूर्मोऽड्डानीव सर्वशः॥ इंद्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यतस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

अर्थात् “और कछुआ सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इंद्रियों के विषयों से इंद्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिए)।”

इन दो श्लोकों के मर्म को हम समझने का प्रयास करें। जिसकी प्रज्ञा आत्मा में प्रतिष्ठित हो, ऐसा स्थितप्रज्ञ व्यक्ति व्यक्तिविशेष के स्नेह में न बँधकर ममता-दया से परे होकर चलता है। जहाँ भी परमात्मचेतना का एक अंश भी विद्यमान हो, वहीं उसे स्नेह और ममता पैदा होती है। यह मानव के जीवनकाल की सबसे बड़ी परीक्षा है। आदमी स्वयं को ममता और दया से परे यदि मान ले और परमात्मचेतना से ही मात्र प्रेम रखता हुआ उनके अनुकूल कार्य करे, यह आध्यात्मिक पुरुषार्थ की सर्वोपरि उपलब्धि है। व्यक्तिविशेष से स्नेह हमें बाँधता है। किसी भी शुभ या अशुभ वस्तु की प्राप्ति पर न मन को अत्यधिक प्रसन्नता हो-हर्षातिरेक हो, न ही द्वेषभाव-क्लेशभाव मन में आए-यह कितने बड़े सौभाग्य की प्राप्ति है, इसे वही समझ सकता हैं जो इस मनः स्थिति पर पहुँच सके। वस्तुतः ईर्ष्या (द्वेष) सबसे बड़ा कीड़ा है, जो व्यक्तित्वरूपी वस्त्र को खा-खाकर काटकर समाप्त कर देता है। ईर्ष्या व्यक्तित्व के खोखला बनाने वाला एक सबसे बड़ा दुर्गुण है एवं यह किसी अच्छे खासे प्रगति की दिशा में गतिशील व्यक्ति की भी दुर्गति कर उसे पतन की पराकाष्ठा पर पहुँचा देता है।

यदि आपको गायत्रीतीर्थ में, शाँतिकुँज में क्षेत्र के अगणित गायत्री परिजनों में कहीं भी परमात्मचेतना का थोड़ा-सा भी अंश दीखता हो तो उस चेतना से प्रेम करिए, न कि व्यक्ति से। व्यक्तिविशेष से प्रीति न रख उसकी वृत्ति से लगाव हमें आध्यात्मिक ऊँचाइयों के शिखर पर पहुँचा सकता है। परमात्मचेतना परमात्मा के सभी गुणों को लेकर लौकिक बंधनों से परे चलती है एवं व्यक्ति के जीवन में एक क्राँति ला देती है।

अगला श्लोक जिसे ऊपर उद्धत किया गया; बड़ा महत्वपूर्ण है। अट्ठावनवें श्लोक में वर्णन है-जैसे कछुआ अपने सभी अंगों को समेट लेता है एवं मात्र उसका ऊपरी कड़ा भाग उन नाजुक अंगों को अपने में समेटे दिखाई पड़ता है, मनुष्य को भी कुछ इसी तरह अपनी इंद्रियों को सिकोड़ने का अर्थात् अपने को इंद्रियों का दास न बनाकर उन पर नियंत्रण करने का अभ्यास करना चाहिए। जो इस अभ्यास में, जिसमें विषयों के भोगों में इंद्रियों के लिप्त होने की प्रक्रिया पर नियंत्रण स्थापित किया जाता है, प्रवीण हो जाता है, वह व्यक्ति प्रतिष्ठित प्रज्ञा वाला ऋतंभरा-प्रज्ञा में स्थित, स्थितप्रज्ञ महापुरुष बन जाता हैं।

भगवान् श्री रामकृष्ण परमहंस के परमशिष्य अखंडानंद जी महाराज गायत्री जप करते थे तो ठाकुर से अभ्यास की प्रक्रिया पूछते थे। वे बताते थे कि जैसे संध्या गायत्री में विलीन होती है, गायत्री ओंकार में विलीन होती है एवं ओंकार आत्मतत्व में विलीन होता है, ऐसे हमें गायत्री जप करना चाहिए। एक-एक करके विलीन कर अपने आपको सिकोड़ने की प्रक्रिया ठाकुर समझाते थे, जैसे कछुआ अपने अंगों को समेटता हैं-यही साधना बुद्धि को सूक्ष्मातिसूक्ष्म बना उसे सविता में प्रतिष्ठित कर देती है, साधक को स्थितप्रज्ञ बना देती है। रामकृष्ण मठ की डायरी से निकला यह उद्धरण है एवं हमें साधना के माध्यम से स्थितप्रज्ञ बनने की कला समझा रहा है। जैसे भगवान् ने गीता में उदाहरण देकर लिखा है, उसे यदि हम ढंग से समझ सकें तो ऐसे इसे व्यावहारिक ढंग से प्रतिपादित किया जा सकता है। स्थितप्रज्ञ को इंद्रियों को मन में, मन को चित्त में, चित्त को अहं में, अहं को आत्मा में (शुद्ध अहं में ) एवं आत्मतत्व को परमात्मतत्त्व में सिकोड़ने की प्रक्रिया में निष्णात् होना चाहिए। यदि समेटने की यह प्रक्रिया जीवन का अभ्यास बन जाए तो हमारे अस्तित्व के कण-कण से परमात्मचेतना झरने लगेगी। कछुए का उदाहरण देकर गीताकार ने साधना−विज्ञान का मर्म हमारे समक्ष रख दिया है।

फिर वे कहते हैं कि वह प्रक्रिया जबर्दस्ती नहीं संपन्न की जा सकती। जब भी जबर्दस्ती की जाती है एवं मन को पहले तैयार नहीं किया जाता-शरीर के साथ कड़ाई तो हो जाती है पर वाँछित नहीं सध पाता। हो सकता हैं हम बड़े त्यागी हों, तपस्वी हों, अस्वादव्रत साधते हों-नमक, शक्कर में से कोई एक या दोनों को ही नहीं खाते हों, पर मन से स्वाद न निकाला हो तो हम स्वाद से परे नहीं जा सकते। स्वादेंद्रियों को सिकोड़ना अनिवार्य है-मन से। इंद्रियों से स्वाद निकाल लिया तो क्या फायदा। मन से स्वाद निकालना जरूरी है। नमक नहीं खाते तो बहुत अच्छा है, हम कई बीमारियों से बचे रहेंगे, ब्लडप्रेशर ऊँचा नहीं होगा, गुर्दे हमारे ठीक रहेंगे-शरीर में सूजन नहीं आएगी। शक्कर नहीं खाते है, तो भी कई बीमारियों से बच पाएँगे पर बैठे है मिठाई के सामने, मन-ही-मन स्वाद ले रहे है व कहें जा रहे हैं कि क्या करें, कंट्रोल कर रखा है, नहीं तो अवश्य आनंद लेते। तो फिर यह तप नहीं है, न योग है। हमारा नियंत्रण इंद्रियों पर हो, इसके लिए हमें मन पर जाना होगा-मन से चित्त पर, जहाँ आदतों का, चिरसंचित संस्कारों का जखीरा है, चित्त से अहं पर, फिर शुद्ध अहं में स्वयं को प्रतिष्ठित करना होगा, यही आशय है इंद्रियों के विषयों से इंद्रिय को हटाकर प्रज्ञा में प्रतिष्ठित होने से। बाहर के इंद्रिय रस से मन को हटाकर हम रसौ वै सः वाले परमात्मा के रस से जोड़ दें। परमात्मरस ही रस का पर्याय है। बड़ा ही विलक्षण आनंद से भरी अनुभूति का क्षेत्र है यह। इस अनुभूति के बाद सारी इंद्रियों के रसों से विरक्ति हो जाती है। तब न मन कामुक होता है, न आँखें गलत चीज देखने को मचलती हैं, न भाँति-भाँति की तलबें उठती हैं, जो हमारी इंद्रियों को खोखला बनाने का मार्ग बनाती हैं। मात्र इंद्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुषों के केवल विषय तो निवृत्त हो जाते है परंतु उनमें रहने वाली आसक्ति से वे निवृत्त नहीं होते। स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति से भी निवृत्ति हो जाती है, क्योंकि वह परमात्मसत्ता में अधिष्ठित हो जाता हे। स्थितप्रज्ञ की इस व्याख्या को अगले अंक में और विस्तार से पढ़ें।

क्रमशः


मन के निकृष्ट विचार (Kahani)

एक ग्रामीण ने संत ज्ञानेश्वर से पूछा-संयमित जीवन बिताकर भी मैं रोगी हूँ, महात्मा ऐसा क्यों?  संत

बोले-पर मन में विचार तो निकृष्ट हैं, भले ही तुम बाहर से संयम बरतते रहो, मन में कलुष भरा हो, विचार गंदे हों तो वह अपव्यय रोगी बनाएगा ही।


गुरुकथामृत-4 - पत्रों से संप्रेषित होता शक्तिपात

हमारे आत्मस्वरूप,

पत्र मिला। आपकी उत्कृष्ट भावनाओं का स्पर्श करके अंतःकरण पुलकित हो उठा। आप वस्तुतः पूर्व जन्मों की अत्यंत उच्च आत्मा हैं। किसी महान उद्देश्य के लिए ही आए हैं। जो कार्य पहले जन्मों में शेष रह गया है, वह आपको इस जन्म में पूरा करना है। साधारण लोगों की तरह रोटी कमाने और पेट भरने में ही आपका बहुमूल्य जीवन व्यतीत नहीं हो सकता। यदि ऐसा ही रहा तो आपकी आत्मा हर घड़ी आपको नोचती-कचोटती रहेगी। आपको महापुरुषों के पथ का ही अवलंबन लेना होगा। इस दिशा में आपकी आत्मा में जो प्रेरणा उठी है, उसे ईश्वर का प्रत्यक्ष संदेश समझें और भावी जीवन की योजनाएँ बनाने में भावनापूर्वक लग जाएँ।

प्रस्तुत पत्र परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा 4-11-66 को बालाघाट के श्री पी. एल. श्रीवास्तव जी को लिखा गया था। पत्रलेखन के द्वारा किसी व्यक्ति को किस तरह ऊँची प्रेरणाएँ दी जा सकती हैं, इसका यह जीवंत उदाहरण है। पूर्व जन्म की बात बताकर इस जन्म में दैवीकार्यों में नियोजित होने एवं ऐसा न करने पर क्या परिणति होगी, यह लिखकर गुरुसत्ता ने आत्मतत्व में सोए परमेश्वर को ही जगाने का प्रयास किया है। अनेकानेक लोगों के लिखे गए अनेकों पत्रों में से एक नमूना भर है, जो बताता है कि किस परिश्रम से पूज्यवर ने गायत्री परिवार के एक-एक मनके को माला में गूँथा है। ऐसा ही एक पत्र 1/ 11/66 को एक ऐसे परिजन को लिखा गया, जिनने अपना नाम गुप्त ही रखने की इच्छा व्यक्त की है। पूज्यवर लिखते हैं-

आप साधारण परिस्थिति परिस्थिति में गुजर जरूर कर रहे हैं, पर वस्तुतः अत्यंत उच्चकोटि की आत्मा हैं। रोटी खाने और दिन गुजारने के लिए आप पैदा नहीं हुए हैं। विशेष प्रयोजन लेकर अवतरित हुए हैं। उस प्रयोजन को पूरा करने में ही लग पड़ना चाहिए।मन तो हमेशा हिम्मत को कच्ची करता हैं आत्मबल द्वारा ही साहसपूर्ण कदम उठाए जाते हैं। आप अब इसी की तैयारी करें और हमारे सच्चे उत्तराधिकारी की तरह हमारा स्थान सँभालें।

उपरोक्त पत्र की एक-एक पंक्ति व्याख्या की अपेक्षा रखती है। हम साधारण परिस्थितियों में रहकर हीनभाव से ग्रसित न हों। गुरु तो आत्मिक स्तर को देखता है। यह भी बताता है कि शिश्नोदर परायण जीवन जीकर, हम धरती पर भार बनकर न रहें। यह तो साधारण पशु भी कर लेते हैं। पर भार बनकर न रहें। यह तो साधारण पशु भी कर लेते है। हम सभी को अपने जन्म का प्रयोजन तथा इसका लक्ष्य याद रहना चाहिए। मन की कमजोरी ही व्यक्ति को श्रेष्ठ कदम उठाने में, कोई साहस भरी छलाँग लगाने में बाधक बनती है। उसे वश में करने के लिए आत्मबल को नित्य प्रतिक्षण मजबूत करना जरूरी हैं पूज्यवर कहते हैं कि वे अपने आत्मबल को बढ़ाएँ-अपने उस पथ पर चलने की तैयारी करें व गुरुवर के सच्चे उत्तराधिकारी बनें।

जिन सज्जन को यह पत्र लिखा गया था, वे किन्हीं कारणवश सब कुछ छोड़कर पूज्यवर की यात्रा में साथी तो नहीं बन सके, परंतु कार्यक्षेत्र में निरंतर संलग्न रहकर एक शानदार जागृतात्मा की जिंदगी जीकर गए। गुरुदेव ने उत्तराधिकारी के रूप में अपने हर जाग्रत परिजन को संबोधित किया है। जब वे उत्तराधिकारी लिखते हैं तो कार्यक्षेत्र में फैले ढेरों काम सँभालने वाले परिजनों के आशय से यह लिखते हैं। हमारे पास कम से कम सौ से अधिक पूज्यवर के हाथों से लिखे ऐसे पत्र रखें हैं, जिनमें उनने अपने संबोधन में उन्हें उत्तराधिकारी व कइयों को विवेकानंद स्तर की आत्मा लिखा है। यहाँ किसी को भ्रम नहीं होना चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव के स्तर की सत्ता विराट् पुरुष की सत्ता थी। वह जब संबोधन करती है तो सभी के मनोबल को उछालने के लिए। हर आत्मा में वह प्रकाश विद्यमान है, जो उसे विवेकानंद स्तर बना सके, पर उस प्रकाश का बोध होना व उसके बाद उसका उस दिशा में प्रयासरत होना अत्यंत अनिवार्य है। गुरु का वाक्य फलित तभी होता है। जब उनकी इच्छानुसार चला जाता है। ऐसे कई विवेकानंदों-निवेदिताओं को पूज्यवर का उलाहना सुनते व साधारण से भी निचले स्तर के दर्जे के जीवन की उन्नत जीवन में परिणति होती गई है। ऐसे प्रत्यक्षदर्शी भी मौजूद हैं।

‘ज्वाला महाराज’ नाम से प्रसिद्ध महासमुँद (म. प्र.) शक्तिपीठ के हमारे प्रमुख कार्यकर्त्ता पूज्यवर के अति प्रियपात्र रहे हैं। 28/2/1970 को उन्हें लिखा परमपूज्य गुरुदेव का पत्र यहाँ उद्धत कर रहे हैं, वे लिखते हैं-

तुम सप्तऋषियों को हम आँखों के आगे ही खड़ा और घूमता देखते हैं। यों तुम लोगों की उच्च आत्मिक भूमिका से हम कई जन्मों से परिचित हैं और हमारे प्रति जो निष्ठा, श्रद्धा, आत्मीयता सँजोए हुए हो, उसकी भी जानकारी है। हमारे लिए यह बड़ी मूल्यवान संपत्ति है। इस बार जो साहस एवं पुरुषार्थ तुम लोगों ने लिया हैं, इससे हमारी छाती गर्व से फूल उठती है। इस बार का शतकुँडीय यज्ञ बहुत सफल रहा। अगला कदम तो तुम लोगों न इतना बड़ा उठाया है कि 50 लाख सदस्यों वाले गायत्री परिवार के हर व्यक्ति का ध्यान मथुरा की तरह महासमुँद से परिचित हो गया है और आचार्य जी के बाद उनके सच्चे शिष्य सप्तर्षियों को देखने के लिए लालायित है। तुम असंभव को संभव करने जा रहे हो। इस पुरुषार्थ को तुम लोगों के न रहने पर भी हजारों वर्षों तक स्मरण रखा और सराहा जाता रहेगा।

कितना प्रेरणादायी-ओज भर देने वाला संबोधन है एवं कैसे कूट-कूटकर शक्ति भरता है, यह पत्र। श्री ज्वाला प्रसाद जी एक विनम्र कार्यकर्त्ता के रूप में गुरुकृपा को स्वीकार करते हैं। इस पत्र की प्राप्ति के बाद उनने भारत भर में संपन्न 1008 कुँडी गायत्री महायज्ञों में से एक अपने यहाँ किया, जिसमें गुरुदेव की शक्ति के ढेरों चमत्कार उनने देखे। आज भी वे पूज्यवर की वाणी को सार्थक करते हुए निरंतर कार्यरत हैं। महासमुँद, छत्तीसगढ़ (म. प्र.) क्षेत्र के हृदयस्थल पर स्थित है। न जाने कितने कार्यकर्त्ता उस क्षेत्र ने दिए हैं। निश्चित ही भगवान् श्रीराम की अपने युग की क्रियास्थली रहा वह क्षेत्र आज भी उनके अनुदानों से निरंतर उऋण होने का प्रयास कर रहा है।

ऐसा ही किंतु बड़े स्पष्ट आश्वासन से भरा एक पत्र पूज्यवर के हाथों से लिखा (29/12/1967) केशर बहन विश्राम भाई ठक्कर (अंजार गुजरात) को संबोधित हमारे पास है। पूज्यवर लिखते हैं-

प्रिय पुत्री केशर,

आशीर्वाद।

तुम्हारा भावनापूर्ण पत्र मिला। पढ़ते समय लगता है कि तुम हमारे सामने ही बैठी हो, हमारी गोदी में ही खेल रही हो। शरीर से तुम दूर हो, पर आत्मा की दृष्टि से हमारे अति निकट हो।

हमारा प्रकाश तुम्हारी आत्मा में निरंतर प्रवेश करता रहेगा और इसी जीवन में तुम्हें पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचा देगा। संतों और तपस्वियों को जो उच्च भूमिका प्राप्त होती है, वही तुम्हें भी प्राप्त होगी। अपनी तपस्या का एक अंश हम तुम्हें देंगे। तुम्हें पूर्णता तक पहुँचा देंगे। हमारा सूक्ष्मशरीर तीन वर्ष बाद इतना प्रबल हो जाएगा कि बिना किसी कठिनाई के कहीं भी पहुँच सके और साक्षात् दर्शन दे सके।

सभी को हमारा आशीर्वाद।

श्रीराम शर्मा आचार्य केशर बहन एक साधिका थीं एवं उन्हें सतत् पूज्यवर का मार्गदर्शन मिलता रहा। उनका जीवन जितना शानदार रहा उतना ही गरिमापूर्ण उनका महाप्रयाण रहा। जो परिजन पुराने हैं, उनसे परिचित रहे हैं, वे जानते हैं कि जो-जो अनुदान पूज्यवर के उन्हें मिले, कितनी विनम्रतापूर्वक उनने स्वीकार किए, पर कभी उनका प्रदर्शन नहीं किया। कितना स्पष्ट लेखन पूज्यवर का है कि अपने सूक्ष्मशरीर के समर्थ-शक्तिशाली होने की घोषणा भी कर रहे हैं व उसके द्वारा किसी के भी पास पहुँचकर दर्शन देने की सामर्थ्य अर्जित होने की भविष्यवाणी भी कर रहे हैं।

पत्र तो मात्र माध्यम हैं, परमपूज्य गुरुदेव के स्तर की अवतारी सत्ता के स्वरूप को समझने के। कई घटनाक्रम ऐसे हैं, जो इस पत्र की तिथि से पच्चीस से तीस वर्ष पूर्व तक के हैं, जिनमें उनके सूक्ष्मशरीर ने कइयों को दर्शन दे कृतार्थ किया। वस्तुतः चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण की समाप्ति के बाद चौबीस दिन के जल उपवास के बाद प्रथम प्राणदीक्षा देने के साथ ही उनके अलौकिक प्रसंगों का क्रम आरंभ हो चुका था। फिर भी केशर बहन को तीन वर्ष तक तपसाधना में निरत रख, उन्हें परमगति देने के लिए पूज्यवर ने उन्हें आश्वासन दिया व लिखा कि उनके सूक्ष्मशरीर के दर्शन की आकाँक्षा है तो वे तीन वर्ष और प्रतीक्षा करें। तीन वर्ष बाद पूज्यवर मथुरा छोड़ने वालों थे, सदा के लिए एवं हिमालय को स्पर्श कर ऊर्जा का प्रचंड स्रोत बन एक विराट्तंत्र गायत्रीतीर्थ का शुभारंभ करने जा रहे थे। संभवतः यह पत्र उसी तथ्य को इंगित करता है। पूज्यवर के पत्रों को पाठकों के समक्ष रखते हुए हमें रोमाँच हो उठता है व लगता है कि इस माध्यम से हम गुरुसत्ता के बहुआयामी अवतारी स्वरूप को जान, अपने सौभाग्य को सराह सकें, ऐसी दूरदर्शिता भरी सौभाग्य को सराह सके, ऐसी दूरदर्शिता भरी सूझबूझ हमें मिले। इस क्रम को आगे भी जारी रखेंगे।


आत्मपरिष्कार (Kahani)

एक नट खेल दिखाकर लौटा तो पीछे-पीछे एक साधु भी अपने शिष्य के साथ चल पड़े। मार्ग में नदी पड़ी। नट किनारे बैठकर नाव वाले को पुकारने लगा। संत ने पूछा-क्यों भाई तुम तो ऐसे-ऐसे करतब दिखा रहे थे-यह छोटी-सी नदी भी पार नहीं कर सकते? नट ने कहा- भगवन्! नटकला और बात है नदी पार करना और। इन दोनों में कोई संगति नहीं।

साधु ने अब शिष्य की ओर संकेत करके कहा-तात्! ऐसे ही आध्यात्मिक उन्नति के लिए साँसारिक दृष्टि से चतुर होना ही पर्याप्त नहीं, उसके लिए तो साध नहीं काम आते हैं। बिना आत्मपरिष्कार के सारे कर्मकाँड मात्र इस नट के क्रिया–कलापों तक ही सीमित हैं।


अखण्ड ज्योति आज से पचास वर्ष पूर्व - ऐ अज्ञानियो! मझधार में डूब मरोगे

परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी से नवंबर 1949 की अखण्ड ज्योति में प्रकाशित अग्रलेख

आ यद्योनिं हिरण्ययमाशुऋतस्य सीदति। जहात्यप्रचेतसः। अभि वेना अनूषतेयक्षन्ति प्रचेतसः। मज्जन्त्यविचेतसः।

अर्थात् भोक्त जीव (आशुः) जो (यत्) ऋत की (ऋतस्य) स्वर्णिम (हिरण्यम्) गोद में (योनिम्) आ बैठता है (आसीदति), उसे मूढ़ अज्ञानी (अप्रचेतसः) छोड़ देते हैं (जहाति) अथवा वह अज्ञानियों को (अप्रचेतसः) छोड़ देता है (जहाति)। बुद्धिमान्, मेधावी (बेनाः) अभिमुख होकर प्रशंसा करते हैं (अभि अनुषते)। ज्ञानी (प्रचेतसः) यज्ञ करते हैं (यज्ञन्ति), सत्कर्म करते हैं और अज्ञानी (अविचेतसः) डूब मरते हैं (मज्जन्ति)।

पूरी सूक्ति का आशय यह कि ऋत की, सत्य की, कल्याण की, श्रेय की स्वर्णमयी शांतिदायक गोद में जो बैठ जाता है उसे अज्ञानी, मूर्ख लोग छोड़ देते है या वह उन मूर्खों को छोड़ देता है, क्योंकि उन दोनों के मार्ग एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न होते हैं। दोनों के विचारों व कार्यों में भारी अंतर होता है। इससे उनकी पटरी आपस में नहीं बैठती। फलस्वरूप दोनों को अलग-अलग रहने के लिए विवश होना पड़ता है। जिनने स्वर्णिम ऋतंभरा बुद्धि को अपना लिया है, उनका दृष्टिकोण दूसरा होता हैं। वे सत्य को ढूँढ़ते हैं, सत्य को ही देखते हैं एवं सत्य को ही प्राप्त करना चाहते हैं। यही उनका लक्ष्य होता है कि मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ, मुझे वह करना चाहिए जो अविनाशी आत्मा के गौरव के अनुकूल हो, आत्मशक्ति में सहायक हो। आत्मलाभ में उसे अपना सच्चा लाभ दिखाई पड़ता है।

अज्ञानियों का दृष्टिकोण दूसरा होता है। वे दूर की नहीं सोच पाते। आज का भौतिक हानि-लाभ ही उन्हें वास्तविक हानि-लाभ दीखता है। ऐसे आदमी तीन वस्तुएँ चाहते हैं-(1) अपरिमित धन−संपदा (2) हर घड़ी बढ़िया-बढ़िया इंद्रिय भोग (3) अहंकार की, गर्व की पूर्ति। इन तीन इच्छाओं की पूर्ति के लिए वे व्याकुल रहते हैं। जितनी मात्रा में यह त्रिविधि माया उन्हें मिलती है, उतनी ही उनकी तृष्णा बढ़ती जाती है। अधिक का और अधिक का लालच बढ़ाता जाता हैं, यहाँ तक कि वे उचित-अनुचित का विचार छोड़ देते हैं और जैसे भी बने वैसे इस त्रिविध माया को पकड़ने के लिए दौड़ते हैं। इस दौड़ के आवेश में वे बुरे-से-बुरे कर्म को करने में नहीं चूकते।

ऋत की गोद में बैठा व्यक्ति सोचता है, इस माया में, इस मृगतृष्णा में भटकने से कोई लाभ नहीं, अपरिमित धन को जमा करके क्या करूंगा? यह मेरे साथ जाने वाला तो है नहीं। बिखेर हुए बालू के कण जमा करके महल बनाने के समान बालक्रीड़ा करने से क्या लाभ? धन एक स्थान पर जमा रह नहीं सकता। ऐसी अस्थिर वस्तु को बटोरने की थूकविलौअल करने से, पानी को मथने से क्या लाभ? वह निर्वाह के लायक नीतिपूर्वक कमाता है और अपनी आवश्यकताएँ सीमित रखता हुआ, थोड़े में गुजारा कर लेता है ओर सुखी रहता है।

ऋत की गोद में बैठा व्यक्ति इंद्रिय भोगों की अति के पीछे चलती-फिरती मृत्यु की छाया देखता है। विषयी, कामी, असंयमी, चटोरे, रँगीले, आरामतलब, मनोरंजनों में मस्त लोग अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को खोखला कर डालते हैं। निरोगता उनका साथ छोड़ देती है, शाँति उनके मन विदा हो जाती है, वृद्धावस्था, अशक्यता-अकालमृत्यु उनके सिर पर मंडराना लगती है। भोग की अधिकता के कारण इंद्रियाँ जवाब दे जाती हैं, उनमें नीरसता अनुभव करती हैं, फिर भी आदत से मजबूर चटोरे व्यक्ति उसी राह पर बढ़े चलते हैं। कुत्ता सूखी हड्डी चबाकर अपने मसूड़े छील लेता है और अपना खून आप पीकर बड़ा प्रसन्न होता है। इसके विपरीत समझदार मेधावी देखता है कि विषयी पुरुष अपने ही बल-वीर्य की, अपनी ही जीवनीशक्ति की होली फूँक रहे हैं। इस बेवकूफी से वह दूर रहता हैं। वह अपनी ईश्वरप्रदत्त बहुमूल्य शक्तियों को इस प्रकार नष्ट न करके उन्हें संयम-पूर्वक आत्मोन्नति की साधना में लगाता है।

मायाबद्ध, अचेतस, अज्ञानी अलग रास्ते पर चलते हैं। उन्हें आत्मिक जगत् से कुछ प्रयोजन नहीं, भौतिक जगत् में ही उलझते-सुलझते, हँसते-रोते व्यस्त रहते हैं। दूसरी ओर ऋतसेवी आत्मकल्याण को प्रधानता देते हैं, शरीर को किराये का मकान समझ उसकी चौकसी और आवश्यकतापूर्ति के लिए साँसारिक कार्य करते हैं, सामाजिक दायित्वों को निबाहते हैं। फिर भी उनमें इतना लिप्त नहीं होते कि आत्मचेतना को भूल जाएँ व अनीति के मार्ग पर चलने लगें। ऋतमार्ग पर चलने वाले ज्ञानी अंत में परमात्मा तक पहुँच जाते हैं, परंतु अज्ञानी माया की मृगतृष्णा में भटककर किसी गहरे गर्त में जा गिरते हैं। अज्ञानी पाप-पाषाणों के बोझ से डूब मरते हैं। वेद भगवान् इस ध्रुवसत्य को, अटल तथ्य को उक्त मंत्र द्वारा प्रकाशित कर सावधान करते हैं कि यदि असत् मार्ग पर चले तो ऐ अज्ञानियो! मझधार में डूब मरोगे।


अपनों से अपनी बात - महापूर्णाहुति की महायोजना

युगसंधि की अंतिम घड़ियाँ आ पहुँची। इस अवधि के बारह वर्षों को खट्टे-मीठे स्वाद का सम्मिश्रण समझा जा सकता है। अशुभ की विदाई और शुभ की अगवानी का मिश्रित माहौल इन दिनों हमें देखने को मिल रहा है। एक और ऑपरेशन की छुरी-कैंची सँभाली जा रही है, तो दूसरी ओर घाव सीने और मरहम-पट्टी के सरंजाम भी इकट्ठे हो रहे हैं। वधू को विदा करते समय जहाँ एक घर में आँसू टपकते हैं वहीं दूसरे घर में गृहलक्ष्मी के आगमन की वेला में सभी के चेहरे का उल्लास देखते ही बनता है। ऐसी ही द्विधा से भरी रही है युगसंधि की वेला। विगत ग्यारह वर्षों में काफी ज्वारभाटे आए हैं, इस समय का अंत आते-आते कहर बरसेगा एवं विक्षुब्ध प्रकृति से लेकर अनैतिक आचरण की ऐसी बाढ़ आएगी कि किसी को लग सकता है कि कहीं सृष्टि के समापन की-महाप्रलय की वेला तो नहीं आ पहुँची। परंतु हमारी गुरुसत्ता ने एक सुनिश्चित आश्वासन दिया कि इक्कीसवीं सदी निश्चित ही उज्ज्वल भविष्य का संदेश लेकर आ रही है। उससे पूर्व कठिन अग्निपरीक्षा से हमें गुजरना पड़ सकता है, पर गायत्री साधकों ने यदि साधनात्मक पुरुषार्थ प्रखर बनाए रखे तो यह सामूहिक पराक्रम एक ब्रह्मास्त्र संधान की तरह कार्य कर समष्टि की रक्षा करेगा। परिजनों के लिए तीन दिशाधाराएँ 1988 दिग्विजय के अंतर्गत आश्वमेधिक पराक्रमों ने संगठन को गति देने एवं युगचेतना को विश्वव्यापी बनाने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब बारी तीसरे पक्ष की है।

यह तीसरा पक्ष हैं- सूक्ष्मजगत् के परिशोधन एवं भविष्य को उज्ज्वल बनाने हेतु एक दिव्य सामूहिक उपासनात्मक पराक्रम, मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव बनाने के लिए सामूहिक महासाधना का नियोजन। यह दिव्य पुरश्चरण, शाँतिकुँज हरिद्वार। गायत्रीतीर्थ से आरंभ कर सारे विश्व में विगत ग्यारह वर्षों में तीव्र वेग के साथ संपन्न हो रहा है। अपने समय का

युगसंधि वेला में इस सदी का अंतिम साधना महापराक्रम

किंतु यह सुनिश्चित होता चला जा रहा है कि संकट चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, उज्ज्वल भविष्य का सृजन इन्हीं दिनों होगा। प्रतिभाएँ इन्हीं दिनों उभरेंगी और उनके द्वारा बहुमुखी सृजन को ऐसी योजनाएँ भी बनेंगी, जो चरितार्थ होने पर ऐसा वासंती वातावरण बना देंगी जिसकी इक्कीसवीं सदी के रूप में आशा-अपेक्षा चिरकाल से की जाती रही है।

प्रसवपीड़ा से भरी इस युगसंधि के चरमावस्था वाला समय परमपूज्य गुरुदेव द्वारा 1988 की आश्विन नवरात्रि को बारह वर्ष का घोषित किया गया। यद्यपि युगसंधि महापुरश्चरण अपने पाँच कार्यक्रम के रूप में [(अ) जागृतात्माओं की विशिष्ट उपासना, (प्रातः पंद्रह मिनट प्राणाकर्षण की विशेष साधना, रात्रि की पंद्रह मिनट की नियति संतुलन साधना एवं नित्य-नियमित प्रातः गायत्री का माला का जप) (ब) जीवन साधना (स) सामूहिक साधनाएँ (द) सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन (ई) दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन। ]

1980 से बीसवर्षीय विशिष्ट अभियान साधना के रूप में चल रहा था, पूज्यवर ने घोषित किया कि यह अवधि विशेष है। यह भी उनने कहा कि की आश्विन नवरात्रि से दी गई थीं-

(1) लोकमंगल के लिए अपनाए जा रहे प्रत्यक्ष उपायों में सहयोग करना।

(2) विचारक्राँति को विश्वव्यापी बनाने हेतु विशिष्ट भूमिका संपन्न करना।

(3) सामूहिक अध्यात्म साधना से सूक्ष्म वातावरण में संव्याप्त प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलना।

परमपूज्य गुरुदेव ने यह भी लिखा कि यद्यपि अन्यान्य स्वैच्छिक संस्थाओं राजतंत्र एवं अर्थतंत्र के द्वारा प्रथम चरण को पूरा किया जा रहा है, तो भी उसमें यथाशक्ति सहयोग प्रज्ञापरिजनों को देना चाहिए। दूसरे व तीसरे चरण की विशेष जिम्मेदारी युगशिल्पियों-प्रज्ञापरिजनों के अपने कंधे पर उठाने हेतु निर्देश दिए गए। लेखनी, वाणी और सद्भावसंपन्नों के संगठनों को सक्रिय कर, युगसृजेताओं की बड़े व्यापक स्तर पर प्रशिक्षण की व्यवस्था बनाकर, युगसाहित्य की विपुल परिमाण में रचना व अन्यान्य भाषाओं में प्रकाशन की व्यवस्था द्वारा तथा दीपयज्ञों-बौद्धिक सम्मेलनों की श्रृंखला के माध्यम से विचारक्राँति के क्षेत्र में एक बड़ा कार्य विगत दिनों किया गया है। देवसंस्कृति यह सबसे विराट् अनुष्ठान रहा है, जिसमें 2400 करोड़ से अधिक के जप मात्र केंद्र में ही प्रतिवर्ष संपन्न हुए हैं। क्षेत्र के इसके विस्तार के आधार पर विराट् रूप की कल्पना मात्र की जा सकती है। विगत ग्यारह वर्षों में गुरुसत्ता के आदेशानुसार नौ दिवसीय गायत्री अनुष्ठानों की श्रृंखला सतत् चलती रही है। इस अवधि में प्रतिवर्ष नैष्ठिक परिजनों ने एक अनुष्ठान गायत्री तीर्थ की संस्कारिता भूमि में संपन्न किया है एवं विराट् सामूहिक जप यज्ञ के भागीदार बनने का श्रेय प्राप्त किया है। इस युगसाधना में सूर्य की ध्यान−धारणा के साथ प्राण−प्रत्यावर्तन का भाव समर्पण सम्मिलित रहा है। गुरुसत्ता के निर्देशानुसार अत्यधिक व्यस्तों के लिए भी कम-से-कम दस मिनट मानसिक रूप से गायत्री जप और ध्यान, मन-ही-मन सूर्यार्घ्य दान देने का भाव तथा शांतिकुंज पहुँचकर मन-ही-मन उस उद्गम की परिक्रमा लगाने का उपक्रम संपन्न किए जाने की बात कही गई थी।

अखण्ड ज्योति पृष्ठ 63, नवंबर 1988।

परमपूज्य गुरुदेव ने यह भी लिखा (वाङ्मय खंड 14, 7-19) कि पिछले दिनों गायत्री परिजनों ने चीन के आक्रमण की वेला में, बाँग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान, अमेरिकी उपग्रह स्काईलैब के भारतभूमि पर गिरने की आशंका के समय भी ऐसे ही महापुरश्चरण संपन्न किए एवं उनके परिणाम अनुकूल रहे हैं। 1980 से ‘जुपिटर इफेक्ट’ व सौरकलंकों की बाढ़ से संभावित आशंकाओं के कारण बीसवर्षीय साधना-अनुष्ठान जो आरंभ किया गया था, उसे पूज्यवर ने विगत तीनों अनुष्ठानों की संयुक्त शक्ति से बढ़कर बताया। इसका वर्णन करते हुए उनने कहा कि गायत्री का ब्रह्मास्त्र संधान किया जा चुका है। महाप्रज्ञा का-त्रिपदा गायत्री का स्वरूप युगशक्ति के रूप में सामने आ रहा है। फिजिसिस्ट आर्थरकेसलर के हवाले से उनने बताया कि विश्वयुद्ध की विभीषिका से जगती को गायत्री मंत्र ही बचा सकती है। श्री केसलर का मत था कि यदि पचास लाख भारतवासी भी एक साथ गायत्री मंत्र का उच्चारण करें तो इससे उद्भूत ऊर्जा आणविक विभीषिका को टाल सकती है। समूह शक्ति के साथ जुड़ी इस मंत्र के अर्थ की विशिष्टता तथा छंद के रूप में शब्द ऊर्जा का गुँथन सारे विश्व को विभीषिकाओं से भरी संभावनाओं से मुक्त कर सकता है। पूज्यवर ने इसी परिप्रेक्ष्य में तीव्र देते हुए बीसवर्षीय महापुरश्चरण की अंतिम बारहवर्षीय अवधि को विशिष्ट युगसंधि महापुरश्चरण नाम दिया था, जिसका विस्तृत वर्णन ऊपर दिया गया। इसकी पूर्णाहुति गुरुसत्ता की जन्मस्थली आगरा जिले के आँवलखेड़ा ग्राम में 1915 के नवंबर माह में एक अभूतपूर्व पुरुषार्थ के रूप में संपन्न हो चुकी, जिसमें प्रायः पचास लाख से भी अधिक लोगों ने भागीदारी की। अब प्रखर साधनावर्ष के समापन के साथ पाँच चरणों वाली महापूर्णाहुति की वेला आ पहुँची है। परमपूज्य गुरुदेव के तत्कालीन निर्देशानुसार इस महापूर्णाहुति को सन् 2000-2001 में दो करोड़ व्रतशील साधकों द्वारा संपन्न होना है। महापूर्णाहुति को पाँच चरणों में बाँटकर निम्नानुसार संपन्न किया जाना है।

प्रथम चरण

पूर्वाभ्यास की सामूहिक साधना व दीपयज्ञ को आयोजन के रूप में तीन दिसंबर, 1999 शुक्रवार को सारे भारत में एक साथ, एक समय संपन्न हो रहा है। यह प्रसंग भारत में पोलियो उन्मूलन अभियान के राष्ट्रीय कार्यक्रम की पूर्व वेला में जनचेतना के जागरण के रूप में आया हैं।इस सदी की अंतिम पोलियो वैक्सीन की खुराक 5 दिसंबर से सारे भारत में एक साथ पिलाई जाएगी। अन्यान्य संगठन भी इसमें रुचि लेकर शताब्दी के इस अंतिम धक्के के साथ पोलियो रूपी प्रतीक के माध्यम से विकलाँगता को भारत से निकाल बाहर करने हेतु संयुक्त पुरुषार्थ कर रहे है। हम उसे और बड़ा व्यापक रूप देते हुए ‘सबके लिए स्वास्थ्य सबको उज्ज्वल भविष्य सबकी सद्बुद्धि’ की प्रार्थना के साथ जोड़ रहे हैं। शारीरिक स्वास्थ्य आज जर्जर है, तो मानसिक तनाव, कुंठाओं, आशंकाओं व भोगवाद से जन्मी चिन्ताओं के कारण। पोलियो रूपी शारीरिक विकलाँगता से कम खतरनाक नहीं है आत्महत्या की प्रवृत्ति (स्कीजोफ्रेनिया), एंक्जाइटीन्यूरोसिस एवं डिप्रेसिवसाइकोसिस जैसे मनोरोग एवं मनोविकार। इन सबका शमन हमारी सामूहिक साधना के द्वारा हो, इसके लिए एक घंटे का एक आयोजन शाम 5 से 6 सारे भारत में एक साथ होगा। यह निजी घरों, गायत्री परिवार की शाखाओं, प्रज्ञासंस्थानों, शक्तिपीठों पर, स्वैच्छिक संगठनों के कार्यालयों, विद्यालयों महाविद्यालयों में फैक्ट्रीज व सरकारी कार्यालयों में, दुकानों, सामाजिक या जातीय संगठनों के केंद्रीय कार्यालयों पर, कालोनियों के क्लबों सहित सभी मतों को मानने वालों उपासनागृहों पर संपन्न होगा। इसके लिए रोटरी-क्लब, लॉयन्स-क्लब, भारत विकास परिषद् जैसे सभी संगठनों के साथ मिलकर चर्चा कर उन्हें भागीदारी करने व अधिकाधिक को उससे जोड़ने के लिए सहमत किया जा रहा हैं।

एक घंटे के इस उपक्रम में प्रारंभिक क्रम में आधा घंटे समय की विषमता-प्रस्तुत प्रसंग की अनिवार्यता सामूहिकता के प्रभाव-परिणामों सहित सबके लिए स्वास्थ्य जैसे इन विषयों पर उद्बोधन होगा, जिसका प्रारूप केंद्र से सारे भारत में विभिन्न भाषाओं में भेजा जाएगा। इसके पश्चात् दस मिनट देववृत्तियों को नमन कर उनसे आशीर्वाद की मंगलकामना वाला संक्षिप्त कर्मकाँड हो दीप प्रज्वलित किये जाएँगे। अगले दस मिनट में एक साथ चौबीस बार गायत्री मंत्र का उच्चारण सभी उपस्थित व्यक्ति करेंगे। नए व अपरिचित क्षेत्रों में सर्वप्रचलित प्रार्थना अपने-अपने इष्टमंत्रों के समवेत उच्चारण का स्वरूप होगा। इसके बाद 5 मिनट मौन प्रार्थना में सभी एक साथ मानसिक जप के द्वारा ‘सबको स्वास्थ्य, सबको सद्बुद्धि सबको उज्ज्वल भविष्य की’ ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ भाव रखते हुए साधनारत रहेंगे। रोगनिवारण अभियान-पोलियो उन्मूलन हेतु अपने समय व श्रम का नियोजन करने के संकल्प के साथ यह एक घंटे का क्रम समाप्त होगा। गायत्री परिजन इस माध्यम से नए वर्ग के परिजनों को-अनेकानेक स्वैच्छिक संगठनों को इस अभियान से जोड़ सकेंगे। संभावना व्यक्त की जा रही है कि प्रायः 5 से 6 करोड़ व्यक्ति इसमें एक साथ भागीदारी कर सकते हैं। यह संख्या बढ़कर दुगुनी भी हो सकती है।

प्रथम चरण के लिए बैनर्स आदि के अलावा, स्टीकर्स-प्रचार साहित्य का निर्माणकार्य केंद्रों में चल रहा हैं इसके तुरंत बाद हमारे सभी नैष्ठिक परिजन 10 फरवरी से आरंभ होने वाले दूसरे चरण की तैयारी के लिए जुट जाएँगे। इस मध्य की अवधि में वे प्रयास करेंगे कि स्थान-स्थान पर बीस क्राँतिधर्मी साहित्य की पुस्तकें (जो पूज्यवर ने 1989 में लिखी थीं ) तथा चार गायत्री साधना-महापुरश्चरण अभियान संबंधी पुस्तकों का एक सेट स्थापित करेंगे। मिशन की पत्रिकाओं के पाठकों की संख्या बढ़ाएँगे। अखण्ड ज्योति पत्रिका अधिक-से-अधिक पाठकों तक पहुँच सके, वे इसके लिए निरंतर प्रयासरत रहेंगे। प्रयास यह हो कि महापूर्णाहुति वर्ष में इसकी ग्राहक संख्या दुगुनी हो जाए ताकि एक-से-दस के माध्यम से एक करोड़ व्यक्ति हिंदी व शेष एक करोड़ व्यक्ति अन्यान्य भाषाओं में गुरुसत्ता की प्राणचेतना से जुड़ सकें, यही प्रयास मिशन की अन्यान्य पत्रिकाओं के लिए भी किया जाना है। दीक्षा सेट की तरह पाँच प्रारंभिक पुस्तकों का एक नया सेट भी इन दिनों तैयार किया जा रहा है। यह पुरुषार्थ पूरे दिसंबर माह, जनवरी 2000 में चलता रहेगा व 10 फरवरी 2000 वसंत पंचमी को दूसरे चरण के आरंभ होने के साथ नई गति पकड़ेगा।

द्वितीय चरण

वसंत पर्व 2000, 10 फरवरी गुरुवार के दिन पड़ रहा है। यह हमार गुरुसत्ता का अध्यात्मिक जन्मदिवस भी है, साथ ही मिशन के क्रमिक विकास की प्रक्रिया में प्रतिवर्ष नया मोड़ लेने वाला एक महत्वपूर्ण दिन भी। इस दिन का एक साथ एक समय पूर्वाभ्यास की तरह ही सभी शक्तिपीठों, गायत्री परिवार की सभी शाखाओं, सभी प्रज्ञामंडलों व सभी के अपने-अपने उपासनागृह में एक साथ दीपयज्ञ होंगे। इस दीपयज्ञ के माध्यम से प्रतिभाओं के नवयुग के नवनिर्माण में नियोजन के संकल्पों की घोषणा की जाएगी। प्रत्येक परिजन अपनी भूमिका-अपनी भागीदारी का स्वरूप एवं प्रभावक्षेत्र को निर्धारित कर अपने-अपने संकल्पों को व्यक्त करेंगे। यही संकल्प क्रियारूप में एक वर्ष बाद 29 जनवरी 2001 को सामने आ जाएँ, यह मूल आधार रहेगा। परमपूज्य गुरुदेव ने एक लाख प्रतिभाओं के माध्यम से एक करोड़ व्यक्तियों की महापूर्णाहुति में भागीदारी की बात कही थी, बाद में 1989 में उनने लक्ष्य बढ़कर 2 लाख प्रतिभाओं से दो करोड़ जाग्रत् साधकों के निर्माण तक का निर्धारित कर दिया। एक व्यक्ति यदि सौ व्यक्ति तैयार करता है तो निश्चित ही जाग्रत्, सक्षम, संगठन स्तर के इतने कार्यकर्त्ताओं के समूहों को हम पूर्णाहुति के समापन का वेला में दे सकेंगे।

तृतीय चरण

तृतीय चरण का शुभारंभ वसंत पर्व (10 फरवरी 2000 ) से होकर समापन गायत्री जयंती (11 जून 2000 रविवार) को होगा, जो कि परमपूज्य गुरुदेव की पुण्यतिथि भी है। ग्राम पंचायतों से प्रतिभाओं के राष्ट्र के सृजनात्मक प्रयोजनों में मिशन की साधनात्मक-संगठनात्मक गतिविधियों में नियोजन की प्रक्रिया आरंभ होगी एवं माघ पूर्णिमा से आरंभ हुई यह प्रक्रिया प्रतिमाह पूर्णिमा के दीपयज्ञों पर संकल्पों की घोषणा के साथ क्रमशः ब्लॉक, जिला व संभाग स्तर पर संपन्न होती चली जाएगी। समापन पर संभावना है कि 48 घोषित साधनों केंद्रों एवं उपकेद्रों सहित कुल दो सौ चालीस केंद्रों पर विराट् दीपयज्ञों का आयोजन होकर, पर विराट् दीपयज्ञों का आयोजन होकर, यह चरण समाप्त हो इन सभी केंद्रों तक जिस धरातल से पहुँचा जा रहा है, उससे एक व्यापक संगठनात्मक मंथन प्रक्रिया पूरे देश में संपन्न हो सकेगी। सभी उपकेंद्रों पर केंद्रीय पर्यवेक्षकों की उपस्थिति में विभिन्न प्रयोजनों में लगी-मिशन की भावी कार्ययोजना में नियोजित होने वाली राष्ट्र के नवनिर्माण की धूनी पर केंद्रित क्रिया–कलापों में संलग्न प्रतिभाओं के समयदान-साधनदान-श्रमदान की घोषणा होगी। यही प्रक्रिया चौथे चरण के प्रारंभ तक विभूति महायज्ञ के स्वरूप की चरमशिखर तक ले जाएगी।

चतुर्थ चरण

16 जून 2000 ज्येष्ठ पूर्णिमा से आरंभ होकर प्रायः’ अक्टूबर मध्य तक सारे भारत में पाँच स्थानों से निकालने वाली विराट् राष्ट्र जागरण रथयात्राओं के माध्यम से संपन्न होगी। ये विशाल अलख जागरण यात्राएँ समूचे साधनों से सज्जित रामेश्वरम्, पुरी, दक्षिणेश्वर, जम्मू (वैष्णोदेवी) तथा द्वारिका से चलकर चार माह से भी अधिक समय की अवधि में एक बहुत बड़ा पुण्यपावन भारतभूमि का हिस्सा स्पर्श करती हुई गायत्रीतीर्थ पहुँचेंगी। इनके साथ झाँकियाँ होंगी-मिशन के कार्यक्रमों को दर्शाने वाली प्रदर्शनी होंगी, उस क्षेत्र विशेष की भाषा में प्रवचन देने वाले-दीपयज्ञ करने वाली प्रवचन मंडली साथ होगी, जो गीत भी प्रस्तुत करती चलेगी। उस क्षेत्र विशेष की भाषा का साहित्य भी उसके पास होगा। मल्टीमीडिया प्रोजेक्ट्स इनके साथ चलेंगे। जहाँ भी ये रुकेंगी, वहाँ दीपयज्ञ के साथ भविष्य के सतयुगी समाज का दिग्दर्शन उनके द्वारा विशाल परदे पर कराया जाएगा। वाक्यलेखन भी साथ होता चलेगा। सभी यात्राओं में मुख्य मार्गों पर क्रमशः जिले स्तर पर उस जिले की छोटी-छोटी इसी स्तर की यात्राएँ जुड़ती चली जाएँगी। पर्यावरण जाग्रति से लेकर राष्ट्र को सशक्त व अखंड बनाने वाली चिंतन की धारा को गायत्री महाशक्ति के प्रवाह के साथ जोड़कर चलने वाली इन यात्राओं से सारा देश एक अनूठे रंग में रँगकर इक्कीसवीं सदी के लिए स्वयं को तैयार कर सकेगा। कितनी विभूतियाँ इसमें नियोजित होंगी, इसकी कल्पना ही मात्र की जा सकती हैं इन सभी रथयात्राओं का समापन शाँतिकुँज हरिद्वार में होगा। मार्ग में पड़ने वाली सभी शक्तिपीठों, तीर्थनगरियों, गुरुग्राम आंवलखेड़ा तथा गायत्री तपोभूमि मथुरा से होती हुई पाँचों रथयात्राएँ लगभग अक्टूबर के द्वितीय सप्ताह से हरिद्वार क्रमशः आती रहेंगी व इन सबके समापन पर एक माह तक चलने वालों विराट् महायज्ञों द्वारा चार खंडों में भारत के विभिन्न प्राँतों व विश्वभर के देशों से आए परिजनों द्वारा आहुतियाँ दी जाएँगी। इस प्रकार यह चौथा चरण द्रव्ययज्ञ व विभूतियज्ञ के समन्वय के साथ एक विराट् ज्ञानयज्ञ के माध्यम से संपन्न होगा।

प्रवासी भारतीयों व विश्वभर के अन्य देशों के नागरिकों के लिए फरवरी 2000 से जनवरी 2001 तक के लिए एक अलग रणनीति बनाई गई है। यद्यपि चतुर्थ चरण सभी के लिए एक-सा होगा। इसे परिजन बाद में पढ़ेंगे।

पंचम चरण

अंतिम चरण 29 जनवरी 2001 वसंत पंचमी को नवयुग की स्वागत आरती के रूप में सभी पूर्ववत स्थानों पर दीपयज्ञों के माध्यम से संपन्न होगा। इसमें नई सहस्राब्दी में प्रवेश कर रहे परिजनों के लिए परमपूज्य गुरुदेव की जन्म शताब्दी (2010-11) तक के दो पंचवर्षीय कार्यक्रम दिए जाएँगे, जिन्हें पूरा करने हेतु वे कृतसंकल्प होंगे।

भारतीय संस्कृति निश्चित ही विश्व संस्कृति बनने जा रही है। पाँच चरणों में संपन्न यह महापूर्णाहुति आशावाद को जिंदा रख उज्ज्वल भविष्य की एक झलक-झाँकी जन-जन को दिखाएगी। सतयुग की वापसी के पूज्यवर के स्वप्न को तो साकार करेगी ही, साथ ही इस समयविशेष में संभावित विभीषिकाओं से परिजनों को बचाकर उनके लिए एक सुरक्षाकवच का निर्माण भी करेगी।


परिजनों से एक भावभरा अनुरोध

‘अखण्ड ज्योति’ के पृष्ठों पर काले अक्षर ही नहीं छपते, वरन् उसके साथ प्रचंड प्राण−प्रवाह भी बहता है। परमपूज्य गुरुदेव की प्राणचेतना सोतों को जगाती है, जागों को खड़ा करती है, खड़ों को चलाती है और चलतों को उछाल देती है। इस प्राण−प्रवाह की दिव्यक्षमता में कहीं कोई सन्देह की गुँजाइश नहीं है। विगत 62 वर्षों में इस पत्रिका रूपी कल्पवृक्ष की छाया में अनेकों ने अपनी जिज्ञासाओं का समाधान पाया है, परेशानियों से मुक्ति पाई है तथा मनोकामनाओं की पूर्ति होते देखी है। पचास लाख से लेकर एक करोड़ से अधिक चंदनवृक्ष के समान परिजनों को इस कल्पवृक्ष ने पोसा व बड़ा किया है। अपने स्तर को बनाए रख, विज्ञापनबाजी से दूर रह, इस पत्रिका ने सत्प्रवृत्ति−संवर्द्धन की दिशा में जो कार्य किया है, उसका लेखा-जोखा और कहीं देखने को नहीं मिलता। यह एक स्वर से अद्भुत एवं अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है।

जो अब तक ‘अखण्ड ज्योति’ के माध्यम से हो चुका है, उसे इतिहास के प्रेरणा पृष्ठ भर कहा जा सकता है। दर्शनीय वह है जो वर्तमान में योजनाबद्ध ढंग से हो रहा है। उत्साहवर्द्धक वह है जो भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है, जिसकी संभावना का चित्र खींचने की सामर्थ्य जिनके भी पास है, वे पुलकन अनुभव करते हैं व विश्वास करते हैं कि ‘सतयुग की वापसी-नवयुग का अवतरण’ निकट भविष्य में होना ही है। यह एक तथ्यपूर्ण यथार्थता है।

जो भी कुछ सामग्री ‘अखण्ड ज्योति’ में प्रकाशित होती है, इस उत्पादन को समुद्रमंथन में उपलब्ध हुए अमृतकलश के समान माना जा सकता है। इसकी महिमा गाई जा सकती है, पर वह वहाँ जाकर अवरुद्ध हो जाती है, जब उसकी वितरण व्यवस्था जन-जन तक पहुँचाने की क्रियाप्रणाली अपंग-असहाय जैसी अस्त−व्यस्त दिखाई पड़ती है। जनसाधारण तक महापूर्णाहुति की वेला में इसे पहुँचाने के लिए अभीष्ट संख्या में कर्मवीर बादलों की तरह मैदान में उतरते नहीं देखे जाते तो लगता है वह लक्ष्य कैसे पूरा होगा, जो युगऋषि ने दिया है। कम-से-कम पोस्टमैन बनकर, उमंग पैदा कर एक से पच्चीस तक पहुँचाने की प्रक्रिया को गतिशील किया जा सकता है।

महापूर्णाहुति के प्रथम चरण में पूर्वाभ्यास के दीपयज्ञ के बाद सभी परिजनों को यह लक्ष्य दिया जा रहा है कि वे पत्रिका की पाठक संख्या वसंतपर्व तक की ढाई माह की अवधि में कम-से-कम पाँच गुना कर दें। यह तभी हो सकेगा जब अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में लिपटी प्राणवान् ऊर्जा के महत्व को स्वयं समझा जा सके, उस चेतना में स्वयं को स्नान कराया जा सके। जो उपयोगी है, जिसकी प्रकाशप्रेरणा में जीवन का ज्योतिर्मय होना माना जाता है, उसे अग्रगामी होने के लिए अवसर क्यों न दिया जाए? यह उत्साह मन में क्यों न जगाया जाए कि अपने घर-परिवार के सभी सदस्य उसे पढ़ें या सुनें। एक कदम और आगे बढ़कर मित्रों-संबंधियों-पड़ोसियों-परिचितों तक भी इस प्रयास को गतिशील किया जा सकता है। जो भी इस अमृतकलश से सर्वथा अपरिचित हैं, उन्हें पहले पुराने अंक देकर, फिर स्वयं ही इसे नियमित रूप से प्राप्त करते रहने के लिए प्रेरित किया जा सके तो यह आपका सबसे बड़ा पुण्यपरमार्थ होगा।

‘अखण्ड ज्योति’ का कलेवर अब बढ़े पृष्ठों के साथ 65 पृष्ठ का होगा। यही नहीं, इसमें नियमित चल रहे लोकप्रिय स्तंभों के अतिरिक्त युगानुकूल नई सदी का चिंतन लिए नवीनतम सामग्री भी होगी। पहली शुरुआत हम जनवरी 2000 के सहस्राब्दी विशेषाँक ‘महापूर्णाहुति विशेषाँक’ से कर रहे हैं। इसकी सामग्री अति रोचक व पूरी सहस्राब्दी के सफरनामे से लेकर भविष्य की संभावना से भरी होगी। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर नवीनतम खोजों के निष्कर्ष-भारतीय संस्कृति के विश्व-विद्यालय की समग्र पाठ्यसामग्री लिए, इक्कीसवीं सदी के समाज का संविधान का स्वरूप तथा साधनापद्धति में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा प्रणीत नए सूत्रों के समावेश से भरे लेखन का समुच्चय होगा अखण्ड ज्योति 2000 व उसके बाद के अंकों का प्रारूप।

महापूर्णाहुति जिस विराट् लक्ष्य को लेकर आयोजित की गई है, वह सफल निश्चित ही होनी है, जो लक्ष्य परिजनों को प्रभावित कर उसकी प्रखर आभा से आलोकित करने का रखा गया है, वह करोड़ों की संख्या को स्पर्श करने जा रहा है। इससे जो भूख पैदा होगी वह विचारक्राँति प्रधान साहित्य एवं अखण्ड ज्योति पत्रिका जन-जन तक पहुँचाकर ही पूरी की जा सकती है। अखण्ड ज्योति हर व्यक्ति तक पहुँचाने का अर्थ है-संस्कारों का समुच्चय एवं परमपूज्य गुरुदेव की प्रखर प्रज्ञा व परमवंदनीया माताजी की सजल श्रद्धा को उनके घरों में पहुँचाना।

सभी पाठकों से यही भावभरा अनुरोध है कि वे इन दिनों एक आदर्शवादी लक्ष्य अपने सामने रख ‘अखण्ड ज्योति’ के पाठक-ग्राहक अधिक-से-अधिक बनाए बिना चैन न लें। पत्रिका महंगाई के युग में भी उसी मूल्य में परंतु बढ़े कलेवर में परिजनों तक पहुँचती रहेगी। वार्षिक चंदा है 60 रुपये, आजीवन के लिए 750 रुपये एवं विदेश के लिए 5000 रुपये प्रतिवर्ष। सन् 2011-2012 में मनाई जाने वाली पूज्यवर की जन्मशताब्दी तक हम सबको अपनी सदस्यता स्थिर रखनी है, यह संकल्प तो लेना ही है।

*समाप्त*