सतत् समर्पण ही भक्ति है। आत्मा का परमात्मा के प्रति, व्यक्ति का समाज के प्रति, शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण में भक्ति की यथार्थता और सार्थकता है। निष्काम और निस्स्वार्थ भक्ति ही फलती है। तभी भक्त भगवान का साक्षात्कार प्राप्त करता है, तभी व्यक्ति जनचेतना अथवा राष्ट्रभावना का पर्याप्त बना जाता है और तभी शिष्य में गुरुत्व कृतार्थ हो उठता हैं भक्ति कभी अकारथ होती ही नहीं, जितना निष्फल अंश में भी स्वार्थ, आकाँक्षा, लिप्सा का भाव शेष रहता है, वही भाव उतने ही अंशों में भक्ति को निष्फल करता है।
साधक और सिद्धि की एकरूपता ही भक्ति है। इस सायुज्य में दो एक हो जाते है-शरीर, मन, प्राण और आत्मा से। जो तू है वह मैं हूँ, जो मैँ हूँ वह तू है। तेरे-मेरे का भेद जहाँ जितने अंशों में समाप्त होता है, भक्ति की सिद्धि उतनी ही निकट आती है। यह सिद्धि भक्त को प्रभुदर्शन के रूप में मिलती है। भक्ति अपने भगवान् से तदाकार हो जाता है। भक्ति। भक्ति है। वह आध्यात्मिक हो सकती है और उसका रंग सामाजिक, राजनैतिक और पारिवारिक भी। प्रभुभक्त, जनभक्त, समाजभक्त, राष्ट्रभक्त के साथ पितृभक्त, मातृभक्त, आदर्श पति-पत्नी, सद्गृहस्थ आदि बहुत से प्रचलित शब्द इसके संकेत है। भक्ति एक योग है। हाँ, इसका क्रमिक विकास अवश्य है। इसका प्रारंभिक रूप जहाँ मातृ-पितृभक्ति है, तो यही अपने विकसित रूप समाजभक्ति, राष्ट्रभक्ति और अंततः प्रभुभक्ति के रूप में स्वयं को प्रकट करती है।
मार्ग अनेक है। मंजिल एक है। भक्त न उलझता है, न चिंतित होता है। वह सहज रूप में अनेक और अनंत को भी अपना एक बना लेता है और वह एक कपड़ा बुनते हुए कबीर को, कपड़ा सिलते हुए नामदेव को, जूते गाँठते हुए रैदास को, हजामत बनाते हुए सेना नाई को भी मिल जाता है। उसे एक को प्राप्त करने वाला व्यक्ति न मोची है, न जुलाहा, व न राजा है न रंक। वह तो सहजता, सच्चाई, प्रेम, विश्वास अपनाने वाला भक्त होता है।
भक्त के लिए तो जीवन का हर कर्म पूजा होती है, सृष्टि का हर प्राणी भगवान् होता है, धरती का कण-कण मंदिर होता है। मंदिर में भगवान् की पूजा करते हुए जितने शुद्ध भाव अनिवार्य होते है, उतने ही शुद्ध भाव जीवन में हर कर्म करते हुए रहें, यही भक्ति की साधना है।
तप! तप!! और तप!!! यही प्रवृत्ति थी उसकी। असुरवंश का जन्म लेने के बावजूद तप ही उसका दैनिक कर्म था। वही उसकी दिनचर्या थी। अहोरात्रि उसे भगवद्ध्यान में लीन देखकर उसके साथी-सहचरों, मित्रों कुटुंबियों सभी को गहरा आश्चर्य होता था। आखिरकार क्या चाहत है उसे? धन-वैभव, भोग-विलास के सभी साधन तो उसे अनायास सुलभ है, तब उसे और क्या चाहिए। इस सवाल का जवाब ढूँढ़ पाने में सभी नाकाम थे। अब तक प्रायः सभी ने सभी तरह को कोशिश की थी, उसे तप से विरत करने की, परन्तु इनमें से कोई सफल नहीं हो सका। उसके मन की हर तरंग सत्-चित्-आनन्द के महासागर में विलीन होने के लिए विकल थी। उसकी भावनाओं का हर बिन्दु भगवत्कृपा के महासिंधु में अपने विसर्जित करने के आतुर था।
उसके तप से प्रभावित होकर स्वयं ब्रह्मा जी उसके सामने पहुँचे और उससे कहने लगे-”तुम्हारी तपस्या फलीभूत हुई, देखो मैं स्वयं जगत्पिया ब्रह्मा, तुम्हें तुम्हारा वाँछित प्रदान करने के लिए यहाँ आया हूँ।” उनकी बात उसने शाँतिपूर्वक सुन ली। परन्तु ऐसा लगा कि उस पर ब्रह्मा जी की बातों का कुछ भी असर नहीं पड़ा। बड़े ही निर्विकार भाव से वह बोला-”आप मेरे पास यहाँ आए प्रभु! इसके आपका आभार।” परन्तु मेरे तप का मकसद कुछ पाना नहीं है, बल्कि स्वयं को पवित्र बनाना है। हाँ, यदि आप मुझसे कुछ चाहें, तो मुझे वह आपको प्रदान करके गहरा आत्मसंतोष होगा।
उसकी बात ने ब्रह्मा जी को चकित कर दिया। वे सोचने लगे, कैसा है वह? इतना कठोर एवं प्रचण्ड तप करके भी कुछ चाहता नहीं, उलटे मुझे ही कुछ देना चाहता है। ब्रह्मा जी कुछ सोचते रह गए। और एक बार फिर उन्होंने आग्रह किया-सोच लो वत्स! मैं ऐसे नित्य तो आता नहीं। एक बार आया हूँ, तुम जो भी चाहो मुझसे वरदान प्राप्त कर सकते हो, बस तुम्हारे कहने भर की देर है।
परन्तु उसने कहा-”देखिए महाराज! मुझे लोभ में न डालें। मेरा लक्ष्य तो पवित्रता के चरमोत्कर्ष पर पहुँचकर जीवन काक समग्र रूपांतरण करना है। यह सब तो भगवान् की परमचेतना में निमग्न होने से ही संभव है। हाँ, आपने मेरे पास आकर मुझ पर बड़ी
एक भक्त भावविभोर होकर प्रार्थना कर रहे थे- “मेरे प्रभू, द्वार खोलो, ताकि मैं तुम तक पहुँच सकूँ।”
उधर से निकलने वाले दूसरे संत ने कहा-”जरा गहरे उतरकर देखो तो, ईश्वर का द्वार क्या कभी किसी के लिए बन्द रहा है। अपनी माँ की परिवारजनों की सेवा करके देखो भगवान तुम्हें माँ के आँचल में बैठा मिलेगा।” भक्त को सही दिशा मिली। उपवन छोड़कर वह परिवार के तपोवन में चला गया।
कृपा की है। आपके किसी काम यदि मैं आ सका, तो मुझे परम सन्तोष होगा।”
ब्रह्मा जी ने तनिक सोचते हुए कहा-”अच्छा, तुम मुझे देना ही चाहते हो, तो अपनी यह विशाल देह मुझे देह डालो। वस्तुतः मैं दीर्घकाल तक तुम्हारी इस सुदृढ़ देह पर यज्ञ करूंगा।”
ब्रह्मा जी की कामना सुनकर वह परम तपस्वी हँस पड़ा। बोला-”वाह महाराज, आपने भी क्या तुच्छ चीज माँग डाली। अरे, तेरे इस शरीर का भला क्या मूल्य है। लीजिए-मैंने उसे दे दिया आपको। अब आप जो चाहें इसका उपयोग करें, अब यह मेरा नहीं रहा।”
ब्रह्मा जी को उसकी देह पर यज्ञ रचाते शत शरद बीत चले, परन्तु वह अविचल था, जरा-मृत्यु से दूर। आखिर वह पुण्यशील जो था। तप करते रहने पर भी उसका प्रतिदान नहीं चाहा था, वरन् ब्रह्म जी को भी दान देने का साहस किया था।
ब्रह्मा जी हैरान थे। उन्होंने सृष्टि के स्वामी भगवान् विष्णु को पुकारा। सर्वेश्वर आए, तो उनके चरणयुगल उसके वक्ष पर पड़े। वह निहाल हो गया। यही तो चाहता था वह। पहले सृष्टिकर्ता आए और अब स्वयं सृष्टि के स्वामी पधारे। उसका हृदय रोमाँचित हो गया, उन चरणों ने कहा-वत्स! तुम्हारा आयुष्य पूर्ण हो गया। मृत्युवेला में माँगों, तुम जो चाहो, वह मैं तुम्हें दूँगा।
उसने गद्गद् कंठ से कहा-”प्रभू! मैंने सिर्फ पवित्रता की चाहत रखी है, वही मुझे मिले।”
भगवान् भक्त के स्वरों से विह्वल हो गए। वह कहने लगे-”गयासुर! मेरे भक्त!! तुम परम पवित्र हो, पवित्रतम हो। मैं तुम्हारी भावनाओं की सराहना करता हूँ। मेरा वचन है कि तुम्हारा शरीर जिस क्षेत्र में है, जहाँ तुमने तप किया है, वह भविष्य में तुम्हारे ही नाम से विख्यात होगा। जन-जन इसी गयाधाम कहकर पुकारेगा। यहाँ जो भी जन अपने पितरों-पुरखों का श्राद्ध करेंगे, वे पितर, मृतात्माएँ तुम्हारी पवित्रता के अंश से पवित्र होगी, उन्हें मुक्ति मिलेगी। तुम पवित्र तो हो ही, मुक्त भी हो। अब से तुम्हारा यह तप क्षेत्र भी मुक्तिधाम बनेगा।” भगवान् के इसी कथन के साथ अब भक्त और भगवान् एकात्मक हो गए।
संस्कृति मानवता का मेरुदण्ड है। यह शिष्टता, सौजन्यता तथा झील की आधारशिला है। संस्कृति ने क्रमशः विकसित होकर सुसंस्कृत व्यक्तित्व से समुन्नत समाज को अपना लक्ष्य बनाया है। अपना अतीत संस्कृति की इसी भावधारा से आप्लावित था। सभ्यता इसका बादाम एवं परिवर्द्धित रूप है। बीतते समय के साथ अनेक कारणों से इसमें विकृति आने लगी। परिणामतः आज की अपसंस्कृति का जन्म हुआ। इसके दंश से समूचा देश व समाज ही नहीं सारी मानव जाति त्रस्त हो चली है। भारत की तो आत्मा ही साँस्कृतिक मूल्यों के पतन से मूर्च्छित हो गई लगती है।
हो भी क्यों नहीं, भारत की आत्मा भारतीय संस्कृति में ही तो निहित हैं यहाँ के महर्षियों ने सभ्यता के अरुणोदय काल में ही मानवमात्र के पथप्रदर्शन एवं जीवनपद्धति के निर्धारण के लिए संस्कृति का दिग्दर्शन कराया था। तभी तो भारतीय सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यता है तथा यहाँ की संस्कृति श्रेष्ठतम। जहाँ पाश्चात्य संस्कृति भौतिकवाद की ओर उन्मुख है, वही भारतीय संस्कृति अध्यात्मवाद पर आधारित है। इसीलिए महर्षि अरविन्द ने कहा था, “आध्यात्मिकता भारतीय मस्तिष्क को समझने की कुँजी है।” जब समस्त विश्व गहन अंधकार में डूबा था, तब भारत अपने ज्ञान का आलोक फैला था। संभवतः इसी वजह से मिश्र, सुमेर, बेबीलोन, यूनान, रोम आदि सभ्यताओं के अवसात के बावजूद भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता ने अपना अस्तित्व बनाए रखा है।
‘संस्कृति के चार अध्याय’ नामक अपने सुविख्यात ग्रंथ में रामधारी सिंह दिनकर ने माना है कि भारतीय संस्कृति की प्रचण्डतम शक्ति इसकी उदारता एवं भावप्रवणता है। इसीलिए इस महासमुद्र में सभी जातियाँ विलीन हो गई। इस संस्कृतियों को अपने आत्मसात् करके अपनी शक्ति और क्षमता अर्जित की है। राष्ट्रमनीषी दिनकर का मानना है-सभ्यता एवं संस्कृति परस्पर घनिष्ठ रूप से संबंधित होती है। सभ्यता शरीर है, तो संस्कृति आत्मा। दोनों का समन्वय एवं सामंजस्य ही किसी समाज या राष्ट्र को विकसित कर सकता है। सुविख्यात दार्शनिक सी. ई. एम. जोड़ का कथन है कि सभ्यता बाहरी एवं संस्कृति आँतरिक विकास को दर्शाती है। सभ्यता मानवजीवन के विकास का तो संस्कृति उसके गुणों का परिचय कराती है। इसे और अधिक स्पष्ट किया जाए, तो यही कहना होगा, संस्कृति अभ्यंतर है, सभ्यता बाह्य है संस्कृति का संबंध निश्चय ही धार्मिक विश्वास से है। सभ्यता सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों से बँधी हुई है।
प्रत्येक संस्कृति एक सभ्यता होती है। जब संस्कृति के मुख्यतत्त्व समाज द्वारा अनुमोदित परंपराओं में परिवर्तित हो जाते है, तब वे उस देश की समस्या के अंग हो जाते है। सभ्यता का संबंध मनुष्य के आचार से है, तो संस्कृति का उसके विचारों से। संस्कृति का प्रयोगात्मक पक्ष ही सभ्यता है। यही साँस्कृतिक मान्यताओं को आगे बढ़ाती एवं क्रियान्वित करती हैं मैकाइवर का मत है कि सभ्यता सभ्यता का संबंध उपयोगिता के क्षेत्र से है, जबकि संस्कृति का मूल्यों के क्षेत्र से है, जबकि संस्कृति का अधिक विकसित एवं जटिल रूप है। फ्राँज बोमस, जागबर्न तथा निमकाफ का भी यही मानना है कि सभ्यता संस्कृति की एक अवस्था है।
इन दोनों का विकास भी साथ-साथ होता है। किसी संस्कृति का सभ्यता में रूपांतरण दीर्घ एवं लम्बी कालावधि में होता है। अतएव यही यही मानना होगा कि सभ्यता की अपेक्षा संस्कृति अधिक प्राचीन एवं सुदृढ़ होती है। भारतीय संस्कृति की नींव में यहाँ के ऋषियों का अनन्त तप एवं त्याग की भावना सन्निहित है। इसका आधार बहुत ही सुदृढ़ एवं नींव बहुत ही गहरी है। इसने विकास के अगणित आयामों को पार किया है, इसे इसका अनुभव हैं सदियों से बहती जीवन की इस निर्बाध चेतना-धारा में मानवता ओत-प्रोत है। यह सुनिश्चित सत्य है कि हमारी संस्कृति मानवकेन्द्रित और अगणित जीवनमूल्यों का पुँज हैं यही मूल्यवाँदिता इसकी विशिष्टता एवं विशेषता है। तभी तो रामधारी सिंह दिनकर को कहना पड़ा संस्कृति सुख नहीं सदाचार है, संस्कृति विजय नहीं मैत्री है, संस्कृति का परम रूप समस्त प्राणियों को आप्लावित करने वाला प्रेम है। विरोधी के मन को कलेश देना इसकी महत्ता है।
पश्चिमी दुनिया की याँत्रिकता और भोगवाद के विपरीत भारतीय संस्कृति के केंद्र में मानव है। यह मानव कोई जैविक इकाई या आर्थिक घटक के रूप में नहीं, बल्कि आदर्शों का प्रकाश पुँज है। संस्कृति की विचारधारा सर्वप्रथम मानव के ही अंतःकरण में अवतरित होती है। यह वह दृष्टिकोण है, जिससे कोई समुदाय जीवन की समस्याओं पर दृष्टिनिक्षेप करता है, तत्पश्चात् ही समाज की परिकल्पना आती है। यह उसके साँस्कृतिकमूल्यों पर आधारित होता है। यह समाज को जाति-वर्ग में काटती-बाँटती नहीं, बल्कि बिना किसी भेदभाव के सभी को अपनी संवेदना से सींचती है। यह विचारपद्धतियों की जन्मदात्री है और समाज की दिशाधारा, संरचना व विकास की आधारशिला है। अतीत में अपना भारतीय समाज इन्हीं मूल्यों एवं गुणों से ओत-प्रोत था, तभी इसे देवसमाज की संज्ञा दी गई थी। इसी देवसमाज में ही देवमानवों का निर्माण हुआ।
देवसंस्कृति ने एक होते हुए भी अनेक रूपों में अपनी अभिव्यक्ति दी है। अपने देश में बहुभाषी परिवेश है। उनसे जुड़ी अनेकों मान्यताएँ है। असंख्य जीवनपद्धतियाँ है, परन्तु सबकी आदर्शवादी जीवनमूल्यों में निष्ठा है। सभी यहाँ की साँस्कृतिक संवेदनाओं की वजह से जुड़े है। पारस्परिक विश्वासों एवं व्यवहार को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और धार्मिक संगठनों से संयुक्त करने के प्रति हमारी आस्था रही है। इन्हीं कारणों से संकुचित की जड़े इतनी गहरी हुई कि उनकी शाखाएँ दूर-दूर तक विस्तार करती चली गई। वे न तो नष्ट होती है और न सूखती है। हालाँकि मनुष्य की सामयिक आवश्यकताएं सभ्यताओं के स्वरूप में फेरबदल करती है। पश्चिमी सभ्यता अर्थ, विज्ञान एवं इनके उपभोग पर टिकी है। परन्तु भारतीय सभ्यता का जब तक अपने साँस्कृतिक मूल्यों पर निष्ठा एवं विकास है, तब तक यह अक्षुण्ण रहेगी।
प्राचीन समय में सभ्यता और संस्कृति का संबंध सुदृढ़ एवं अनुकूल था। संस्कृति की समस्त धाराओं को समुचित सम्मान मिला हुआ था। उनमें पारस्परिक संयोजन था। अतीत लौटता भले ही न हो, पर यह प्रच्छन्न रूप से हमारे वर्तमान प्रभावित करता है। समृद्धिशाली एवं गौरवमय अतीत से वर्तमान की नींव पड़ती है और इसी महनीय वर्तमान में भविष्य की संभावनाएँ निर्भर करती है। हमारा साँस्कृतिक अतीत अवश्य ही पवित्र एवं प्रखर था। परन्तु जब अतीत और वर्तमान के बीच टकराहट पैदा होती है, तो बहुत-सी असद्वृत्तियाँ सक्रिय हो उठती है। इससे उपजी वैचारिक कलुषता साँस्कृतिक पतन का कारण बनती है। इनसानी जिन्दगी एवं सामाजिक परिवेश में अनैतिक तत्त्वों का संयोग और समावेश तीव्र साँस्कृतिक संकट पैदा करता है। आज वर्तमान में यही स्थिति है।
रूसी मनीषी निकोलाय वर्चाएव के अनुसार जब मानवी जीवन भोगपरायण बना जाता है, तब साँस्कृतिक-सृजनशीलता का हास होने लगता है और क्रमशः सभ्यता में भी इसके ये परिणाम नजर आने लगते है। डॉ. नन्द किशोर देवराज ने अपने गं्रथ’संस्कृति का’ में उल्लेख किया है कि मूल्यों के उस तटस्थ एवं सार्वभौमिक अनुसंधान के बिना जिसे हम संस्कृति कहते है, न तो सभ्यता अस्तित्व में आ सकती है और न ही वह अपना अस्तित्व बनाए रख सकती है। वे रूढ़ियां तथा प्रथाएँ, वे कानून व संस्थाएँ जो सभ्य व्यवहार का आधार
महात्मा रामानुज से एक गृहस्थ ने प्रश्न किया-”महात्मन्! क्या कोई ऐसा मार्ग नहीं है कि मुझे यह संसार भी न छोड़ना पड़े और स्वर्ग भी मैं पा सकूँ।” रामानुज हँसे और बोले-”वत्स! स्वर्ग कही और थोड़े ही है। तुम अपने अन्दर झांको व सोए को जगाओ। अपने यथार्थ स्वरूप को पहचानकर मनुष्य जैसा व्यवहार करोगे तो स्वर्गीय आनन्द पाने के सुपात्र बनोगे।” गृहस्थ ने संदेह व्यक्त करते हुए कहा-”पर भगवन्! कहा जाता है कि यह सब तो गृहस्थ को छोड़कर संन्यास लेने पर ही संभव है।” रामानुजाचार्य बोले-”बेटा जिसे आत्मकल्याण की सच्ची लगन होती है, वह गृहस्थाश्रम निबाहते हुए भी, नरपशु-सा नहीं-नरनारायण का जीवन जी सकता है। नारकीय यातनाओं से बचने की इच्छा अभ्युदय ही आत्मजाग्रति है।”
है, उस व्यवहार की जो मनुष्यों के बीच सहयोग एवं बंधुत्व की भावना स्थापित करता है, मूलतः उस सृजन की प्रवृत्ति में उदित होता है। यही मानव संबंधों के अधिक सुन्दर रूपों की परिकल्पना करती है। परन्तु इसमें उत्पन्न व्यतिक्रम सभ्यता के अस्तित्व का प्रश्नचिह्न खड़ा कर देता है। संस्कृति के स्थान पर विकृति पनपने लगती है।
डॉ. देवराज ने साँस्कृतिक पतन के कारणों का उल्लेख करते हुए कहा है-लोभ तथा वासनात्मक दृष्टि और उच्चतर मूल्यों, अनास्था का प्रसार, असंयम व उच्छृंखलता, विवेकहीनता, आन्तरिकता का अभाव, जीवन के विभिन्न लक्ष्यों तथा हितों के अन्वेषण में दिशाहीनता तथा उस धैर्य तथा संकल्पशक्ति की कमी, जिनकी संस्कृति के विभिन्न क्षेत्रों में उच्चस्तरीय उपलब्धियों में अपेक्षा होती है। इस तरह मूल रूप से देखने पर दो कारण मूल रूप से सामने आते है-जीवन के मूल्यों तथा उसकी उच्चतर संभावनाओं में आस्था का अभाव और मानवीय महत्त्वाकाँक्षाओं की-भौतिक तथा क्षणिक चीजों की ओर रुझान। साँस्कृतिक अधःपतन का एक और मूल्यवान कारण है-उच्चवर्ग के लोगों में जनसाधारण के प्रति उपेक्षा।
इस विषमता एवं विकृति ने अभिजात्य संस्कृति एवं लोकसंस्कृति के बीच दरारें पैदा कर दीं। जबकि अपनी शैलियों के अन्तर के बावजूद ये दोनों एक ही साँस्कृतिक भावधारा की अभिव्यक्ति थे, जबकि अलगाव एव अपेक्षा की विकृति ने समाज में विषमता की खाई पैदा कर दी है। गोपीनाथ कविराज ने लोकसंस्कृति का इस तरह उल्लेख प्रकृति की गोद में पलती और पनपती है, जबकि लोकोत्तर संस्कृति आग उगलती चिमनियों, हुँकार करती हुई मशीनों और विद्युत से प्रदीप्त नगरों में निवास करती है। लोकसंस्कृति का साध्य-त्याग होता है, तो लोकोत्तर सांस्कृतिक भोग की उपासक होती है।
आज लोकसंस्कृति की बजाय लोकोत्तर संस्कृति का जहर फैल गया है। सांस्कृतिक विनाश के कारणों में पनपे अंतर्विरोधस्वरूप जातिवाद, क्षेत्रवाद तथा संप्रदायवाद की विकराल स्थिति खड़ी हो गई है। औपनिवेशिक मानसिकता ने जिस भोगवादी संस्कृति को पनपने का अवसर दिया है, इसी मानसिकता ने वैयक्तिक चरित्र और सामाजिक प्रतिष्ठा व राष्ट्र की अस्मिता चकनाचूर करके रख दी है। इस अपसंस्कृति ने युवावर्ग को सबसे अधिक क्षति पहुँचाई है। फलस्वरूप विकास की अंधी चाल, अनियंत्रित याँत्रिक दौड़ एवं अर्थोपार्जन की लोलुप्रवृत्ति पैदा हुई है। इसकी चपेट में कोई एक समाज या राष्ट्र नहीं, बल्कि समूचा विश्व आ चुका है।
अपसंस्कृति की यह समस्या काफी विकराल एवं विध्वंसक है। इसके समाधान के जिए भारतीय संस्कृति ही आशा की एकमात्र की किरण है। क्योंकि इसी में आशा की एकमात्र किरण है। क्योंकि इसी में साँस्कृतिक नव्योत्थान के सारे आधारभूत तत्त्व विद्यमान है, जो परंपराओं तथा आधुनिकता के बीच गत्यात्मक संबंधों के मूल्याँकन को प्रोत्साहित कर सकें। इसमें भाव है, भाषा है, संप्रेषण के सहज माध्यम है। विकृति के उन्मूलन एवं संस्कृति की स्थापित करने का अजस्र प्राण है। याँत्रिक विश्व में शक्ति की होड़, निर्जीविता एवं भोगवादिता के विरोध में हमारी संस्कृति मूल्यवादी एवं सजीव है। यही भौतिकवाद और भोगवाद की दिशा मोड़कर इस यंत्रयुग में मानव को अवमूल्यित होने से बचा सकती है। यहाँ डार्विन के ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ के मत्स्यन्याय के पश्चिमी सिद्धान्त के विपरीत ‘त्येन त्यक्तेन भुँजीथाः’ एवं ‘वसुधैव कुटुँबकम्’ के वैदिक सूत्रों का उद्घोष क्रियान्वयन हुआ है।
भारतीय संस्कृति ने सदा से अपने उन्नयन की प्राथमिकताएँ स्वयं तय की है। इसने आततायियों के आक्रमणों से अपनी रक्षा की है, तो विश्व के अनंत परिवर्तनों का स्वागत भी किया है। हजारों आघातों के बीच इसका अस्तित्व मिटा नहीं है। भारतीय संस्कृति की इसी विशेषता को देखकर सुप्रसिद्ध इतिहासकार डावडेल ने उल्लेख किया है कि यह महान् संस्कृति उस महासमुद्र के समान है, जिसमें अनेक नदियाँ आकर मिल जाती है। एक अन्य विचारक आल्फ्रेड जोजफ का कहना है, मानवजाति की भारतवासियों ने जो सबसे बड़ी चीज वरदान में दी है, वह है यहाँ की साँस्कृतिक विरासत। जो सदा-सदा अनेक जातियों के लोगों और अनेक प्रकार के विचारों के बीच समन्वय स्थापित करने की तैयार हैं विविधताओं-विभिन्नताओं के बीच एकता एवं सामंजस्य कायम करने की दृढ़ इच्छाशक्ति व साहस इसमें सदा से अद्भुत रहा है। निश्चित ही इसे विश्वमानवता के लिए वरदान समझा जा सकता है।
यह महान संस्कृति चिरकाल से विद्यमान है। इसमें निहित अनेक सद्गुणों ने इसे न केवल सुसमृद्ध किया है, वरन् इसको अनंतकाल से अनेक विपत्तियाँ आने पर भी एक सजीव प्राणवान् संस्कृति के रूप में जीवित रखा है। काकाकालेलकर कहते हैं-भारतीय सांस्कृतिक एक जीवंत, चैतन्यमय और वर्द्धमान चेतना है। मानवता का अंतिम कल्याण ही उसका आदर्श हैं भारतवर्ष तो सिर्फ इसका केंद्र है, मध्य बिंदु है, इसका कार्यक्षेत्र तो अखिल विश्व है। यह आज भी उतनी ही सामाजिक व चिरंतन हैं वर्तमान की समस्यासंकुल रहा में यह मानव की मार्ग दिखाने में समर्थ है। समूचे विश्व में इसके सूत्रों को व्यापक रूप से अपनाकर ही मानवीय जीवन को उज्ज्वल भविष्य की राह दिखाई जा सकती है।
एक तालाब में तीन मछलियाँ रहती थी-एक का नाम था ‘यद्भविष्यति’ दूसरी का ‘प्रत्युत्पन्ननमति’, तीसरी का ‘दूरदर्शी’। एक दिन मछुओर आए व बोले-कल यहाँ जाल डालेंगे-काफी मछलियाँ है।’यद्भविष्यति’ ने कहा-यही रहने में भला है। कल ये लोग आएँ यह आवश्यक नहीं। ‘दूरदर्शी’ बोली-भला इसी में है कि आज ही स्थान बदल लिया जाए और वह दूसरी पोखर में चली गई। तीसरी प्रत्युत्पन्नमति बोली-कल जब ये लोग आएँगे तब परिस्थिति के अनुसार निर्णय किया जाएगा। अगले दिन मछुआरे आए। जाल डाला गया। दोनों पकड़ी गई। प्रत्युत्पन्नमति ने मृतवत होने का ढोंग रचा। मृतक समझ मछुआरा ने उसे जाल से निकाल दिया, वह उचककर गहरे पानी में तैरती हुई धारा को पार कर दूसरी ओर चली गई। सद्भविष्यति पकड़ी गई व अपने भाग्य पर अवलंबन पाती बुद्धि पर रोती रही।
इसी प्रकार दूरदर्शी, तुरन्त निर्णय लेने वाले व भविष्य-भारत पर विश्वास कर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने वाले तीन प्रकार के मनुष्य होते है। वे इस तथ्य की पूरी साक्षी देते है कि मनुष्य अपने भाग्य का विधाता आप है।
अध्यात्म एक समग्र विज्ञान है। आधुनिक विज्ञान के नवीनतम अनुसंधानों में भी यही सत्य प्रमाणित हुआ है। विज्ञान के इन निष्कर्षों में वही सत्य ध्वनित होता है, जिसे आर्यावर्त के महर्षियों ने अपनी अध्यात्मचेतना से पाया था और उपनिषदों में संकलित किया था। इस सत्य को मोटेतौर पर यों भी कहा जा सकता है कि सृष्टि चेतना का भाँडागार है, इसके कण-कण में अनंत ऊर्जा भरी पड़ी है। अध्यात्म की इस स्वीकारोक्ति को विज्ञान भी स्वीकारने लगा है। जैसे-जैसे विज्ञान आने नए अनुसंधान करता जा रहा है, उसकी गति स्थूल से सूक्ष्म की ओर हो चली हैं इसी के साथ ऋषिप्रणीत सारे सूत्रों से निहित वैज्ञानिकता भी उजागर होने लगी है।
हालाँकि विज्ञान की अपनी सीमाएँ है। उसके सारे अनुसंधान एवं संपूर्ण अध्यावसाय पदार्थ पर केंद्रित हैं परन्तु पदार्थ के पार प्राप्त सूक्ष्म एवं अनंत ऊर्जास्रोत, जिसे क्वांटम कण व तरंग सिद्धान्त के नाम से प्रतिपादित किया गया है, ने वैज्ञानिकों को हतप्रभ व आश्चर्यचकित कर रखा है। सुविख्यात वैज्ञानिक एवं मनीषी माइकेल टालबोट ने अपने शोध अध्ययन ‘मिस्टिसिज्म एण्ड द न्यू फिजिक्स’ में भारतीय तंत्र एवं योगविद्या की वैज्ञानिकता प्रमाणित की है। उनके अनुसार इसकी महत्ता एवं विशेषता आज भी ही नवीन और प्रासंगिक है। एसलीन इंस्टीट्यूट के मनोविज्ञानी लॉरेंसलीसेन ने महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों पर कई सफल वैज्ञानिक प्रयोग सम्पन्न किए है। विज्ञानवेत्ता हर्मन निकोबस्की की स्पेसटाइम की व्याख्या में प्रकाराँतर से कार्यकारण के सिद्धान्त का ही प्रतिपादन हुआ है, जिसके अनुसार सृष्टि का हर कार्य किसी एक कारण विशेष द्वारा ही होता है। प्रत्येक कार्य के पीछे कारण सन्निहित होता है, बिना कारण कुछ भी संभव नहीं है।
क्वाँटम कण और तरंग सिद्धान्त में ब्रह्मांड को ऊर्जातरंगों का संघनित रूप माना गया है। इसके अनुसार समस्त सृष्टि का कण-कण तरंगों से विनिर्मित है। इसकी वैज्ञानिक व्याख्या श्रोड्रिगर के कैट मत एवं जॉन ए डीलर कीक सुपर स्पैस कीक परिकल्पना में हुई है। इस व्याख्या में यही है कि संसार के सभी क्रिया–कलापों के मूल में एक ही शक्ति क्रियाशील है, जो विभिन्न रूपों में दृश्यमान होती है। स्वामी विवेकानन्द ने भारतीय दर्शन का हवाला देते हुए उल्लेख किया है कि प्रकृति में दो सत्ताएँ है-एक आकाश कहलाती है, वह पदार्थ है, अत्यन्त सूक्ष्म है और दूसरी प्राण कहलाती है, वह शक्ति है। आकाश एक सर्वव्यापी-सर्वानुस्यूत सत्ता है। ठोस, तरल और वाष्पीय सब प्रकार के पदार्थ, सभी प्रकार के शरीर, पृथ्वी, सूर्य, चंद्र और तारे सब इसी आकाश से विनिर्मित है। यह आकाश प्राण क्रिया से परिवर्तित होकर सूक्ष्म-से-सूक्ष्मतर या स्थूल-से-स्थूलतर बनता है। जिस तरह आकाश इस जगत् का कारण स्वरूप अनंत एवं सर्वव्यापी भौतिक पदार्थ है, प्राण भी उसी तरह जगत् की उत्पत्ति का कारण अनंत सर्वव्यापी विशेषकारी शक्ति है। कल्प के आदि और अंत में संपूर्ण सृष्टि आकाश रूप में परिणत होती है और जगत् की सभी शक्तियाँ प्राण में लीन हो जाती है।
यही प्राण गतिरूप में अभिव्यक्त हुआ है कि गुरुत्वाकर्षण विद्युत चुम्बकीय, बीक एवं स्ट्राँगफोर्स के रूप में स्वयं को प्रकट करता है। वैज्ञानिक हन्ही चार को ब्रह्माण्ड की संचालन शक्तियाँ मानते है। यह प्राण ही स्नायविक शक्तिप्रवाह, विचारशक्ति एवं दैहिक क्रिया के रूप में भी व्यक्त होता है। बाह्य एवं अंतर्जगत् की समस्त शक्तियाँ जब अपनी मूल अवस्था में पहुँचती है, तब उसी को प्राण कहते है। उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में जर्मन भौतिकशास्त्री मैक्स प्लैक ने पहली बार बताया कि प्रकाश एक तरंग नहीं वरन् क्वाँटा नामक ऊर्जा इकाई से बना है। क्वाँटम मैकेनिक की नींव यहीं से पड़ी, जो उसी प्राणतत्त्व की ओर संकेत करता है। भले ही इसकी अपनी अलग भाषा ही, पर यह उसी का अलग ढंग से किया गया विश्लेषण मात्र है।
जैकसेरफानी ने अपने सुविख्यात ग्रंथ ‘स्पेस टाइम एण्ड बियोंड’ में ह्नीलर की क्वाँटम व्याख्या पर आधारित मिनी ब्लैक होल और मिनी ह्नाइट होल की बात कही है। उनके अनुसार इनका व्यास 10-33 सेमी व भार 10-5 ग्राम होता है। इनकी यह सूक्ष्म संरचना अति विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण होती है। जब ग्रह-नक्षत्र टूट जाते है, तो वे ब्लैक होल व परिवर्तित हो जाते है। सेरफानी के अनुसार, आकर्षण का स्वकेंद्रित प्रकाश है।
अंतरिक्षवेत्ता कार्लसागा ने ‘द काँस्मिक कनेक्षन’ में वार्महोल और ब्लैक होले को विश्व का रहस्य बताया है। इस युग के बौद्धिक चमत्कार समझे जाने वाले स्टीफेन हाफिंका ने स्पष्ट किया है कि ब्लैक होल में स्पेसटाइम समाप्त हो जाता है। इसका गुरुत्वबल असाधारण व आश्चर्यजनक रूप में बढ़ जाता है। यह त्रिआयामी होता है। और इसकी पूँछ में फोटान कण घूमते रहते है। विज्ञानी माइकेल टालबोट ने इसकी समानता कुँडलिनी शक्ति से स्थापित करने का प्रयास किया है। उनके अनुसार कुंडलिनी भी ब्लैक होल के समान सोई पड़ी रहती है। परन्तु जब जाग्रत् होती है, तो प्रचण्ड बलयाकृत तरंगों के सदृश ऊपर उठती है। ब्लैक होल व कुँडलिनी दोनों ही अपरिमित एवं अनन्त शक्ति के भंडार होते हैं दोनों की ही गति की चलायाकृति माना गया है। ब्लैक होल का फोटान इसी तरह गति करता है।
जॉन ए. ह्नीलर ने अपनी शोध ‘द सुपरनेचर एण्ड द नेचर ऑफ क्वाँटम जिओ मेट्रोडायनेमिक्स’ में इसकी व्याख्या करते हुए लिखा है कि अंतरिक्ष में वार्महोल बिखरे पड़े हैं। ये आपस में संबंधित होते है। यह संबंध कुछ इस तरह का होता है कि जॉन ह्नीलर ने इस अंतरिम का नर्वस सिटम भी कहा है। इसी के माध्यम से अंतरिम में विद्युत् धाराओं का प्रवाह सुनिश्चित क्रम में होता रहता है। इनकी दिशाएं बड़ी स्पष्ट एवं अलग होती है, अतएव कभी भी ये आपस में नहीं टकराते। ये वस्त्रों की तरह धागों से बुनी होती है, तभी ह्नीलर ने इसे आकाशीय धागों से बुना जियो मेट्रोडायनेमिकल परिधान कहा हैं ये विद्युतधाराएं वार्महोल से होकर गुजरती हैं माइकेल टालबोट ने इसे शिव की जटा के समान बताया है। जैसे शिव की जटा को खोला और समेटा जा सकता है, इसी तरह इन धाराओं व वार्महोल में संकुचन व प्रसार संभव है। अध्यात्मवेत्ताओं की भी यही मान्यता है कि कल्प के आदि में आकाश का प्रसार एवं अंत में संकुचन होता है।
आधुनिक विज्ञानवेत्ताओं का यह भी मानना है कि अध्यात्मविद्या में वर्णित नाद और बिंदु के सिद्धान्त को भी क्वाँटम के तरंग और कण के माध्यम से जाना जा सकता है। नाद का अर्थ है-तरंग और बिन्दु का अर्थ है-उसका कण। ब्रह्माण्ड के निर्माण के साथ ही चेतना का प्रवाह तरंग या नाद के रूप में हुआ। मनुष्य के व्यक्तिगत महत् या चित्त में विचार भी तरंगों के रूप में उठा करते है, जो बाद में स्थूल रूप में क्रियान्वित होते है। बृहत् ब्रह्माण्ड में ब्रह्म हिरण्य गर्भ या समष्टि महत् ने पहले अपने को नाम के और फिर बाद में रूप अर्थात् दृश्यमान जगत् के आकार में अभिव्यक्त किया। यही वजह है कि अध्यात्मविद् समस्त जगत् की अभिव्यक्ति का कारण शब्द या नादब्रह्म को मानने है। वैज्ञानिकों का भी यही मानना है। कि प्रकृति के अन्तराल में एक ध्वनि प्रतिक्षण उठती रहती है, जिसकी प्रेरणा से आघातों द्वारा परमाणुओं में गति उत्पन्न होती है और सृष्टि का समस्त क्रिया−कलाप चलता है। यह ध्वनि ही ॐ का नाद है। दूसरा है बिन्दु, जिसका अर्थ है-सूक्ष्म-से-सूक्ष्म जो कण है, वहाँ तक अपनी गति हो जाने पर ही ब्रह्म की समीपता तक पहुँचा जा सकता है।
विज्ञानी जॉन ए. ह्नीलर के कण तरंग, एंडीवेडक्स द्वारा उल्लेखित सिंगल प्वाइंट और अध्यात्मविदों द्वारा
स्वामी रामतीर्थ हमारे देश के एक प्रतिष्ठित विद्वान् संत हो गए है। उनकी विद्याध्ययन की रुचि और तेजस्वी बुद्धि से प्रभावित होकर लाहौर कॉलेज के प्रिंसिपल ने उनका नाम विविलसर्विस की परीक्षा के लिए देने का निर्णय किया।
इस बात की सूचना जैसे ही उन्हें मिली, वे तुरन्त ही प्रिंसिपल महोदय के पास पहुँचे और उनसे नम्रतापूर्वक बोले-मैंने अपनी फसल से लाभ उठाने के लिए, उसे बेचकर टके गिनने के लिए मेहनत नहीं की है। मैंने तो वह बाँटकर खाने के लिए तैयार की है। मैं कोई बड़ा अधिकारी नहीं बनना चाहता। मैं तो सेवक हूँ, अतः सेवा करना चाहता हूँ। इसलिए मैं अफसर बनने की बजाय अध्यापक बनना ही पसन्द करूंगा।
प्रिंसिपल के समझाने पर भी वे अपने निर्णय पर दृढ़ ही रहे। ज्ञान व कर्म को जो भक्ति से मिला देता है-वह स्वामी रामतीर्थ की तरह फसल बोकर अनेक गुना होते उसे पाता है। अपने संबंध में यह आत्मबोध जिस-जिसको हुआ है, वह महामानव-यशस्वी बना है।
बताए गए नाद एवं बिन्दु से एक ही सत्य का प्रतिपादन होता है। स्वामी प्रत्यागतानंद ने अपने सुविख्यात ग्रंथ ‘द मेटाफिजिक्स ऑफ फिजिक्स’ में इसका रोचक ढंग से वर्णन किया है। उनके अनुसार समस्त ब्रह्माण्ड नाद और बिन्दु की ही परिणति का परिणाम है। तंत्र विशेषज्ञ सर जान वुडरफ ने तंत्रविद्या को एक परिशुद्ध वैज्ञानिक प्रक्रिया बताया है। अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘द सरपेंट पॉवर’ में पदार्थजगत के नियंत्रण के नियंत्रण को प्राणशक्ति द्वारा प्रदर्शित किया है, जिसे पदार्थजगत का निर्माण होता है। उनके अनुसार पदार्थ कुछ नहीं शक्ति का स्थूल रूप है।
इसी प्रकार वेदाँत ने सृष्टि की माया कहा है। वेदाँत दर्शन के अप्रतिम व्याख्याकार आचार्य शंकर ने कहा है ब्रह्माण्ड की रचना एक आभास मात्र है। ठीक इसी तरह क्वाँटम सिद्धान्त के जानकार संसार को स्वप्निल संसार बताते है। उनके अनुसार संसार के सुन्दर दृश्यों, पहाड़ों, पर्वतों, नदियों, वृक्ष-वनस्पतियों, प्राणियों में एक ही चेतना का क्रीड़ा-कल्लोल है। विज्ञानवेत्ता सरफानी ने इस चेतना की व्याख्या अपने ढंग से की है। इनके अनुसार ग्रेविटेशन बल पदार्थ पर क्रिया करता है। उन्होंने प्राणियों और जीव-जन्तुओं पर क्रियाशील इस बल को बायोग्रेविटेशन नाम दिया है। इस प्रकार माइंड एवं मैटर का स्रोत एक ही चेतना हैं आधुनिक भौतिकी के मतानुसार पदार्थजगत का कोई अस्तित्व है ही नहीं सर्वत्र एक ही चेतनसत्ता विद्यमान हैं इसी के प्रभाव से मारा संसार गतिशील है। सत्प्रेम ने ‘द एडवेंचर ऑफ कान्शसनेस’ में इसे बड़े ही मोहक ढंग से विश्लेषित किया है। उनके अनुसार चेतना का विस्तार पदार्थजगत की बहुआयामी सृष्टि करता है और इसका ऊर्ध्वगमन प्राण-मन एवं अतिमन के उच्चस्तरीय आयामों की रचना करता है। यह वही ऊर्जा है, जो जड़ एवं चेतन सभी को बाँधे रखती है, इसे ही कानषस फोर्स या चित्तारिन कहा गया है।
श्री अरविंद ने अपने ग्रंथ ‘सिंथेसिस ऑफ योग’ में इस शक्ति को ब्रह्मांडीय चेतना नाम दिया है। उनका कहना है कि सर्वत्र एक ही शक्ति प्रवाहित एवं परिचालित है। वृक्ष-वनस्पतियों, जीव-जन्तुओं, कीड़े-मकोड़ों से मानवमन तक एवं ध्यान से समाधि की गहराई तक एक इसी चेतना का विस्तार दिखाई देता हैं सृष्टि का एक कण भी इसके बाहर नहीं हो सकता। सर्वत्र ही एक ही शक्ति है दो नहीं, अतः एक छोटे-छोटे से कण के शक्तिहीन हो जाने से तो समूचा ब्रह्माण्ड ही शक्तिहीन हो जाता है। अलबर्ट आइंस्टीन के सूत्र श्व = रुष्ट2 में इसी तथ्य का प्रकटीकरण हुआ है। सर्वव्यापी चेतना ही पदार्थ है, म है एवं सारी सृष्टि है। मुँडकोपनिषद् में भी यही सत्य उद्घाटित हुआ है। इसके ऋषि का प्रतिपादन है कि ऊर्जा ने ही कालाँतर में जड़जगत का निर्माण किया है।
विज्ञानवेत्ताओं के अनुसार क्वाँटम यूनिवर्स में प्रत्येक कण अनन्त ऊर्जा का स्रोत है। सुपर होजोग्राम ही ‘यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे’ का उद्घोष करता है। महर्षि अरविन्द ने अपने महाकाव्य सावित्री में उल्लेख किया है कि प्रकृति के हर कण में अनन्त ब्रह्माण्डीय ऊर्जा संव्याप्त है। अपनी एक अन्य कृति ‘द आवर ऑफ गॉड’ में इसी सत्य का विश्लेषण करते हुए वह कहते है कि एक कण में समस्त सृष्टि की शक्ति बीज रूप में सन्निहित हे। वैज्ञानिक इवान हेरिस वाकर ने भी अपने प्रयोगों से यही तो निष्कर्ष निकाला था-सूक्ष्म कण कान्षस फोर्स का यूनिट है।
इन कणों का संसार कैसा होगा? इसे रॉबर्ट ए. मोनरो ने अपने ग्रंथ ‘जर्नीस आउट ऑफ द बॉडी’ में स्पष्ट करेन की कोशिश की है। उनके अनुसार दृश्य जगत् में चेतना का रूपांतरण संभव है, जिसे हमारी आँखें देख पाती है। परंतु इससे भी परे एक ऐसी अद्वितीय और अद्भुत सृष्टि भी है, जहाँ न तो स्पेस है और न ही टाइम और न दृश्यप्रकृति का कोई नियम लागू होता है। रॉबर्टमोनरो ने इसे लोकल स्पेस के रूप में अभिव्यक्ति दी है। भारतीय शास्त्रों में यह तथ्य लोक-लोकान्तर के रूप में वर्णित में वर्णित है। जॉन सी. लीली अपने ग्रंथ ‘द ह्मूमेन कम्प्यूटर’ में मानवमन को शक्तिशाली तरंग के रूप में निरूपित किया है। उनके अनुसार मन का सूक्ष्म रूप ही उसे ब्रह्माण्ड की झाँकी दे सकता है।
डॉन जुआन ने भी आचार्य शंकर की तरह इस विश्व ीि आभासी माना है। उनके मत से यह चेतना की स्थूल अवस्था है। इसमें पदार्थ, स्पेस एवं टाइम का अनुभव होता है। वैज्ञानिक लारेंस लिषेन ने अपनी रचना ‘द मीडियम द मिस्टिक एण्ड द फिजिसिस्ट’ में दो जगत् के बारे में उल्लेख किया है। इनमें से एक आभासी है, तो दूसरा वास्तविक। उन्होंने इस दृश्यजगत को आभासी एवं इससे परे जगत् की यथार्थ व वास्तविक निरूपित किया हैं पहले जगत् में स्पेसटाइम के अनुरूप संरचनात्मक अस्तित्व होता है और दूसरे में क्रियाशील होता है, जो प्रकाश की गति से भी तीव्रतम होता है। बुद्ध के निर्वाण की व्याख्या करते हुए विज्ञानी माइकेल टालबोट ने कहा है कि आम जब प्राकृतिक नियमों से पार जाकर मूलतत्त्व परमात्मा से मिल जाती है, तो उस परम अवस्था को प्राप्त करती है। इनके मतानुसार आज का विज्ञान अगर पदार्थ जगत् के कणरूपी परिकल्पना से कुछ और आगे बढ़ सके, तो संभवतः उस अदृश्य कहे जाने जगत् की झलक-झाँकी पा सके।
अब तो विज्ञानवेत्ता भी स्वीकार करने लगे है कि क्वाँटम सिद्धान्त में कण एवं तरंग निश्चित रूप से उसी परम ऊर्जा की झलक देते है, जिसे आध्यात्मिक मनीषियों ने ब्राह्मीचेतना कहा है। अब यह बात पारदर्शी हो चली है कि प्राचीनकाल के आध्यात्मिक निष्कर्ष आधुनिक विज्ञान के प्रयोगों की कसौटी पर भी सर्वथा खरे साबित होते है। आध्यात्मिक सत्य जब पूर्णरूपेण वैज्ञानिक तथ्य भी है, तो यह भी मानना पड़ेगा कि अध्यात्म एक सर्वांगीण विज्ञान है, हाँ यह आज के विज्ञान से निस्संदेह उच्चस्तरीय एवं उन्नत तो है ही। इसका सार्थक प्रतिपादन एवं अनुशीलन निश्चित रूप से अपने भारत देश को फिर से भावी नवयुग में जगद्गुरु के गरिमापूर्ण आसन पर बिठाने वाला होगा।
एक गोताखोर बहुत दिन से असफल रह रहा था। घोर परिश्रम करने पर भी कुछ हाथ न लगा। पेट भरने के लाले पड़ गए। कोई रास्ता सूझता न थाँ सो एक दिन उसने किनारे पर बैठकर देवता की बहुत प्रार्थना की-”आप सहारा न देंगे, तो मैं जीवित कैसे रहूँगा?” देवता पसीजे। इस बात डुबकी में उसे एक पोटली हाथ लगी। खोलकर देखा, उसमें छोटे-छोटे पत्थर भर बँधे थे। दुर्भाग्य को उसने कोसा। देवता को निष्ठुर बताया और पत्थर के टुकड़ों को पानी में फेंकना आरम्भ किया। सोचने लगा- अब वह गोताखोर का धंधा छोड़ेगा। कल से मछली पकड़ेगा, उसमें हाथों-हाथ लाभ भी है और जोखिम भी नहीं। इन्हीं विचारों के बीच एक-एक करके पत्थर के टुकड़ों को भी फेंकता चला गया। अंतिम टुकड़े को ध्यान से देखा, तो वह बहुमूल्य नीलम था। देवता के अनुग्रह से मिली इतनी राशि उसने अपने हाथों गँवाई, इस पर भारी रोष प्रकट कर रहा था। देवता प्रकट हुए ओर बोले-”अकेले तुम्हीं इस दुनिया में प्रमादी नहीं हो अन्य लोग भी रत्नराशि से बढ़कर जीवनसम्पदा को इसी प्रकार बरबाद करते है। जाओ जो बचा है, उसे बेचकर आज का काम चलाओ। समझ बढ़ाओं, ताकि धन पाने का ही नहीं, उसके उपयोग का भी बोध हो सके।”
पिरामिड वस्तुतः क्या थे और क्यों बनाये गये? इस सम्बन्ध में विवाद का अंत नहीं; पर यदि उक्त शब्द की व्युत्पत्ति की ओर ध्यान दे, तो काफी कुछ संकेत इसके मूल उद्देश्य के सम्बन्ध में मिल जाता है। यह ग्रीक भाषा के श्पायराश् अर्थात् अग्नि तथा मिड अर्थात् मध्य के मेल से बना है। इस प्रकार पिरामिड का अर्थ हुआ- अग्नि ऊर्जा मध्य। यह वास्तव में इसी ऊर्जादोहन के माध्यम थे, इसलिए उन्हें काफी वैज्ञानिक ढंग से बनाया और खड़ा किया गया था।
ये पुरानिर्माण कितनी सटीक वैज्ञानिक गणनाओं पर आधारित थे, इसका अनुमान उनके ज्यामितीय अध्ययनों से सहज ही लग जाता है। वैज्ञानिकों ने जब मिस्र में स्थित गीजा के श् ग्रेट पिरामिड श् का अध्ययन किया, तो उससे कई आश्चर्यजनक वैज्ञानिक तथ्य प्राप्त हुए, जो इस बात को प्रमाणित करते है कि तब के लोगों का ज्ञान साधारण नहीं था। उसके आधार का क्षेत्रफल निकलकर ऊंचाई के बारह गुना संख्या से भाग देने पर जो योगफल प्राप्त होता है, वह गणितीय स्थिराँक श् पाई श् के मान ( ३ण्१४३ )के बराबर पाया गया यह केवल संयोग नहीं हो सकता। इसी प्रकार उसकी ऊंचाई को लाख गुना करने पर पृथ्वी से सूर्य कि दूरी ९ करोड़ ३० लाख मील प्राप्त होती है। स्पष्ट है सूर्य कि ऊर्जा कुल दूरी के लाखवें हिस्से अधिक सकेंद्रित होती है। पिरामिड के मध्य का उत्तर-दक्षिण अक्ष सम्पूर्ण पृथ्वी को बिलकुल दो भागो में बाँटता है, साथ ही पृथ्वी के जल और स्थल दोनों को ही ठीक आधा क्र देता है। इसका मतलब यह हुआ कि इसके निर्माताओं को पृथ्वी का गोलाकार होना सुनिश्चित रूप से ज्ञात था, तभी तो अचूक गणितीय गणनाओं से पिरामिडों का निर्माण संभव हुआ। इस निर्माण में एक आश्चर्यजनक बात यह भी है कि पिरामिड गुरुत्वाकर्षण केंद्र के ठीक ऊपर स्थित है। गीजा के ग्रेट पिरामिड का पदाधार ६३५६०० मीटर है, जो पृथ्वी के अर्धव्यास का ठीक दसवाँ भाग है। आधुनिक मीटर इसका चालीसवाँ हिस्सा है। नौवीं-दसवीं शताब्दी तक नापप्रणाली में पुरातमीटर ही प्रचलन में था। इससे उनकी उच्चस्तरीय नापपद्धति का पता चलता है। वर्ष में ३६५ दिन होते है इसका सौ गुना कर उसमें एक दिन के चौबीस घंटे जोड़ गति के अंत में सूर्य जिस बिंदु तक पहुँच वापस लौटता है, उसको श् वसंत संपात श् कहते है। सूर्य २१ जून को इस संपात बिंदु पर पहुँचता है। प्रत्येक पिरामिड का दरवाजा इसी बिंदु की ओर होना निश्चय ही किसी विशिष्ट उद्देश्य की ओर इंगित करता है।
इन सब तथ्यों के आधार पर यह कहना गलत न होगा की यह ने पर योग ३६५२४ प्राप्त होता है। यह ( मीटर में ) पिरामिड के आधार की परिधि है। पिरामिडों के दरवाजे सर्वत्र पूर्वाभिमुख है। इसे अकारण नहीं कहा जा सकता। संरचनाएँ गृह-नक्षत्रों की स्थिति का गणितीय ज्ञान ध्यान में रखकर निर्मित की गयी होंगी। प्राचीन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि तत्कालीन मिस्त्री गणितज्ञ ड्रमहाटेप ने ईसा पूर्व ४२२९ वर्ष का विस्तृत पंचाँग तैयार कर उसमें ३६५ दिनों कि गणना की थी। इतना अचूक गणित उसने कैसे किया होगा? यह अब भी रहस्यमय है, कारण कि इस प्रकार कि गणनाएं आकाश में ग्रह-नक्षत्रों को देखकर ही प्रायः कि जाती है। काहिरा ( मिस्र ) के आकाश में मात्र श् व्याधि नक्षत्र श् ही दिखलाई पड़ता है, वह भी इतना सुस्पष्ट नहीं, जितना कि अन्यत्र खी से दिखाई पड़ता हो। ऐसे में उस अस्पष्टता के बावजूद इतना त्रुटिहीन पंचाँग तैयार कर लेना आसान है। यह भी विदित तथ्य है कि इमहाटेप के पश्चात् इतने सुविकसित पिरामिड कभी नहीं बने।
कुछ अध्येताओं ने पिरामिडों की व्याख्या मिस्त्री वेधशालाओं के रूप में की है। अरबों की भी ऐसी ही मान्यता थी, किन्तु उनके इस मत को महत्व नहीं मील पाया। बाद में ब्रिटिश ज्योतिर्विज्ञानी रिचर्ड एंथोनी प्राक्टर ने एक पुस्तक लिखी, नाम था- श् दी ग्रेट पिरामिड-आर्ब्जवेटरी, टाम्ब एंड टेम्पल श्। अपनी उक्त पुस्तक में विद्वान लेखक ने पिरामिड के ज्योतिर्विज्ञान से सम्बंधित कितने ही रहस्यमय पक्षों को उजागर किया है उनका कहना है कि पिरामिडों का निर्माण ठीक भूमध्य रेखा पर उत्तरी-दक्षिणी भू-अक्ष पर हुआ है, जहाँ से उत्तरी ध्रुव की ओर के ग्रह-नक्षत्रों एवं तारों की दूरी, स्थिति एवं गति की गणना तत्कालीन ज्योतिर्विद् करते होंगे। अंदर की गहरी सुरंगें ठीक ध्रुव तारे के सीध में है, ताकि किरणों के व्यतिपात कोण को नापा जा सके। वास्तव में यह सुरंगें प्रकाश के परवर्ती कोण ( २६ डिग्री १७ मिनट ) के अनुरूप धरातल से नीचे खोदी गयी थी। आरोही और अवरोही सुरंगों की संरचना आपाती और परवर्ती कोणों के अनुसार की गई है। धरती के नीचे पिरामिडमध्य २०० फुट गहरे सुरंगनुमा यह अंधकूप निर्माताओं के खगोलीय ज्ञान की ओर संकेत करते है। यह भी एक रहस्यमय तथ्य है कि पिरामिड भूतल के ऊपर अपनी सम्पूर्ण ऊंचाई जितनी ही भूगर्भ में भी स्थित होते है अर्थात् धरातल के ऊपर उसकी जितनी ऊंचाई होती है, भूमि के अंदर के निर्माण कि गहराई भी उतनी ही होती है। अध्ययनों से यह भी ज्ञात हुआ है कि पिरामिड कि रचना में गणितीय स्थिराँक श् फाई श् के मान का भी प्रयोग हुआ है। इसके द्वारा पिरामिड कि भुजाओं का अनुपात होता है। यह १.६१८ के बराबर है।
यह तो पिरामिड कि निर्माण सम्बन्धी विशेषताएं हुई। अनुसंधानकर्ताओं ने जब उसके भीतर के वातावरण का अध्ययन-विश्लेषण करना शुरू किया, तो उन्हें यह जानकर घोर आश्चर्य हुआ कि वहाँ कोई अद्भुत किस्म कि ऊर्जा विद्यमान है। सन १९७८ में नोबेल पुरस्कार विजेता लुई अल्वारेज ने कास्मिक काउंटर मशीन से इस ऊर्जा को नापने का प्रयास किया था, पर वे सफल नहीं हो सके। उनका उक्त यन्त्र वहाँ आते ही निष्प्रभावी हो गया। बाहर निकलते ही वह उपकरण पुनः क्रियाशील हो उठता था, किन्तु पिरामिड परिसर एवं उसके अंदर वह न जाने क्यों निष्क्रिय हो जाता था। मूर्द्धन्य भौतिकीविद् डॉ. अमर गोहेड ने इस बात कि पुष्टि की है कि पिरामिड में पदार्थविज्ञान के नियम कारगर नहीं होते। कनाडा, आन्टेरियो के शोधकर्मी डॉ. मार्शल मकलुहाल ने भी पिरामिड ने भी पिरामिड सम्बन्धी अपने शोधनिष्कर्ष में यही कहा है कि पिरामिड में ज्ञात इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शक्ति से भिन्न कोई अन्य शक्ति कार्यरत है।
पिरामिड के इन वैज्ञानिक पहलुओं को देखते हुए शोधकर्मी वैज्ञानिकों का मानना है कि विज्ञान के अगणित तथ्यों पर आधारित यह संरचनाएं शवगाह नहीं हो सकती। उनके पीछे का प्रयोजन निश्चित रूप से कहीं अधिक श्रेष्ठ और उच्चस्तरीय रहा होगा। उनकी मान्यता है कि यह या तो उपासनागृह रहे होंगे या फिर वेधशाला जैसे उद्देश्य कि पूर्ती कि जाती रही होंगी अथवा एक साथ दोनों कार्य पूरे होते होंगे। वे मानते है कि उनके अंदर जो ब्रह्मांडीय ऊर्जा व्याप्त है, वह साधारण नहीं है। उसमें दिव्य रूपांतरण कि क्षमता विद्यमान है।
इसी मत का समर्थन करते हुए मैनमे पामर हाल ने अपनी रचना श्दी सीक्रेट टीचिंग्स ऑफ एजेज श् में लिखा है कि पिरामिड में सामान्य व्यक्ति प्रवेश करता था; किन्तु वहाँ थोड़े दिन रहकर जब उससे बाहर निकलता था, तो वह ऐसी आध्यात्मिक चेतना से ओत−प्रोत और अनुप्राणित होता था, जिसे उत्कृष्ट और उदात्त कहना चाहिए। वे यह मानते है कि ये समग्र व्यक्तित्व को रूपांतरित करने वाले आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र के रूप में प्रयुक्त होते होंगे।
इसके अतिरिक्त इनके रचनाकाल से भी इस धारणा को बल मिलता है कि यह मिस्र के फ़राओ शासकों के कब्रगाह नहीं थे और न वे निर्माता ही थे। सन १९६४ में प्रकाशित अपने शोधप्रबंध श् दि पिरामिड ऑफ इजिप्ट श् में शोधकर्ता आई, ई. इस. एडवर्ड्स ने ३१०० ईसापूर्व से ३३२ ईसापूर्व के ऐतिहासिक कालखंड की देन है, जबकि वैज्ञानिक विधियों से जब इनका कालनिर्धारण किया गया, तो यह उससे कहीं अधिक प्राचीन पाए गये। ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता वाल्टर एमरी ने स्पेक्ट्रोग्राफ यंत्र से गीजा के ग्रेट पिरामिड के पत्थरों का परीक्षण कर उन्हें ग्यारह से पंद्रह हजार वर्ष पुराना बताया। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के बोडलेइन ग्रंथागार में एक अति प्राचीन मिस्त्री ग्रन्थ है, जो भोजपत्रों में लिखा गया है। इसके लेखक अबू अल मसूदी ने लिखा है कि पिरामिडों का निर्माण जलप्रलय से पूर्व हुआ है। इतिहासवेत्ता जलप्रलय को लगभग १५ हजार वर्ष पुराणी घटना मानते है। इससे भी विदित होता है कि इनके वास्तविक निर्माता फ़राओ सम्राट नहीं है।
अरबी विज्ञानवेत्ता अबू जेद अल बल्खी ने कार्बन-१४ विधि का इस्तेमाल कर पिरामिडों कि आयु लगभग ६३ हजार वर्ष बताई है। यहाँ डेनिस स्टेनफोर्ड और प्रो. टाम ड़ीलेहे का महाभिनिष्क्रमण सम्बन्धी नवीन मत ध्यान देने योग्य है। उन्होंने पूरा आवासीय धन्चो, अस्थि-पिंजरों, भाषाई इतिहास और अनुवांशिकीय साक्ष्यो के आधार पर उस प्रचलित धारणा का खंडन किया है की एशियाई लोग बोरिंग की खाड़ी होते हुए अब से लगभग दस हजार वर्ष पूर्व अमेरिका आकर बसे। केंटुकी विश्वविद्यालय के पुरातत्ववेत्ता प्रो. टाम ड़ीलेहे कहते है कि चिली में ३३ हजार साल पहले भी लोग रहते थे, बल्कि उनका तो यहाँ तक कहना है कि इससे भी बहुत पूर्व एशियाई लोगों का महाभिनिष्क्रण अमेरिका कि ओर आरंभ हो चुका था। वे इसे भी निर्द्वंद होकर स्वीकारते है कि ९ हजार वर्षों के से अवरुद्ध बोरिंग जलडमरूमध्य में विशाल हिमखंडों से आच्छादित अवरोध भी इस महानिर्गमन को बंद नहीं कर सका। स्थिमसोनियन इंस्टीट्यूट के पुराविद डेनिस स्टेनफोर्ड इस निर्गमन को तीन-चार चरणों में घटित हुआ मानते है यहाँ अबू जेद अल बाल्खी और टाम ड़ीलेहे के निष्कर्षों में काफी समानता है। यह भी इसी बात कि ओर संकेत करते है कि पिरामिडों के सृजेता प्राचीन मिस्त्री नहीं, कोई और थे यह कोई और कौन हो सकते है? इस सम्बन्ध में बिल शूल और एड पेटिट का कथन उल्लेखनीय है। वे अपने ग्रन्थ श् सीक्रेट पावर्स ऑफ पिरामिड श् में लिखते है कि इस धरती पर गणितविद्या के जनक के रूप में यूनानियों कि ख्याति सिर्फ इसलिए है कि उन्होंने अनजानी अति प्राचीन सभ्यता के विज्ञान से कुछ क्षुद्राँश पा लिया और आधुनिक दुनिया के वैज्ञानिक मसीहा बन बैठे। शास्त्रीय सिकंदरी यूनान को वे कुछ ज्ञानबूँदें ही मिली, जो मिस्र में न जाने कहाँ से आयें मुट्ठी भर ज्ञानियों कि पोटलियों से रिस गई। त्रिकोणमिति और ज्यामितिक वास्तुविद्या के आधार पर प्राचीन मंदिर और पिरामिड बनाने वाले अनजाने प्रवासी यही लोग थे।
लेखकद्वय के इस कथन द्वारा प्रकाराँतर से टाम ड़ीलेहे कि मान्यता को ही समर्थन मिलता है। स्पष्ट है, यह अनजाने प्रवासी और कोई नहीं, विश्व भर में ज्ञान का अलोक भैलाने वाले भारतीय ऋषि ही थे, जिनके पास दिव्य अतीन्द्रिय क्षमताओं के साथ-साथ उच्चस्तरीय पदार्थज्ञान भी था। वे अध्यात्मविद्या के भी निष्णात थे और पदार्थविद्या वास्तुविद्या में भी प्रवीण-पारंगत। मत्स्यपुराण के २५२वे अध्याय में इसका स्पष्ट उल्लेख है-
भृगुरत्रिर्वसीष्ठश्च विश्वकर्मा मयस्तथा। नारदो नग्नजिच्चैव विशालाक्षः पुरंदरः॥
ब्रह्मकुमारो नंदिशः शौनको गर्ग एव च। वसुदेवोअनिरुद्धश्च तथा शुक्रबृहस्पति॥
अष्टादशैते विख्याता वास्तु शास्त्रों पदेशकाः। संक्षेपेणोपदिष्टं यन्मनवे मत्स्यरुपिणा॥
तब वास्तुशास्त्र के यह अट्ठारह उपदेष्टा आचार्य थे; किन्तु इनमें शिरोमणि दो ही थे- विश्वकर्मा और मय। विश्वकर्मा देवशिल्पी थे, जबकि दानवों के वास्तुशास्त्री मय थे। इन दोनों ने कितने विलक्षण यंत्र-उपकरणों और अद्भुत भवनों का निर्माण किया था, इसका उल्लेख विगत अंक में हो चुका है। अतः उनके लिए पिरामिड सरीख संरचनाएं गढ़ना कोई कठिन कार्य नहीं था। उनमें प्रयुक्त टनों वजनी शिलाखंडों को उठाना, चिनना और उन्हें सुदूर पर्वतों से वायुमार्ग द्वारा निर्माणस्थल तक लाना उनके लिए अत्यंत सरल था। यह भी प्रमाणित हो चुका है कि मैक्सिको की मय सभ्यता और भारतीय मय सभ्यता एक ही परंपरा की अंग है। इक्वाडोर से लेकर पेरु तक इसी की शाखा श् इन्का श् सभ्यता के रूप में फैली हुई थी। यह सब साक्ष्य टाम ड़ीलेहे के दावे की ही पुष्टि करते है। अतएव यह मानने में हर्ज नहीं की पिरामिड भारतीय वास्तु-शास्त्र का अंग है एवं इनके रचनाकार विशुद्ध भारतीय थे। शुल्ब्सूत्र तथा ब्रह्मसूत्र का रचनाकाल भी इतिहासवेत्ता इसी के आसपास मानते है। ज्ञातव्य है कि यह वास्तुरचना विज्ञान के आधारस्तंभ है। इनसे भी पिरामिडों के भारतीय निर्माण होने का संकेत मिलता है।
इतना स्थापित होने के बाद अब यह प्रश्न उठता है कि आखिर इनके निर्माण कि आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या ये शवगाह थे? अब तक के अध्ययन-अनुसन्धान से इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि यह मृतशरीर को सुरक्षित और संरक्षित करने वाली संरचनायें नहीं थी। कदाचित इनका प्रयोजन अधिक उच्चस्तरीय था। यह क्या हो सकता है? काफी माथापच्ची करने के बाद शोधकर्मी वैज्ञानिक इस निश्चय पर पहुँचे है कि पूर्व पुरुषों ने ये उपासनास्थल के रूप में बनवाए थे, जहाँ सुरक्षित ध्यान-साधना एवं पूजा करते हुए ब्रह्माँडीय ऊर्जा और चेतना से सम्बन्ध साधा जा सके। कालान्तर में इन्हें कभी शव सुरक्षित और संरक्षित रखने का सर्वोत्तम स्थल समझकर शायद ऐसा किया जाने लगा हो, लेकिन केवल शवसंरक्षण के लिए इतनी विशाल, श्रम, समय एवं व्ययसाध्य संरचनाएं खड़ी करने की बात गले नहीं उतरती। शव सिद्धाँत को तब गहरा आघात लगा, जब अन्वेषकों को पिरामिडों का महीनों खाक छानने के बाद भी उसमें न कोई ममी मिली, न उनकी शवपेटिकाएं, न धन-दौलत ही।
ऐसे ही एक पिरामिड के शिलाखंडों को खलीफा हारुन अल रशीद के दुस्साहसी बेटे अब्दुल्ला अल मैमून ने सं ८२० में कुछ साहसी लोगों के साथ छेनी-हथौड़ों के द्वारा हटाने का जीतोड़ कोशिश की, लेकिन उसका वज्र-संकल्प उन प्राचीन शिल्पियों की कुशलता के आगे परास्त हो गया। अंततः एक स्थान पर तेजाब से पत्थर को गलाकर एक छोटा मार्ग बनाया गया। उसके द्वारा सब अंदर गये, पर महीनों भीतर की भूल-भुलैयों में चक्कर काटने के बाद भी कुछ हाथ न लगा- न शव, न संपत्ति। सब उलटे पैर निराश वापस लौटे।
तो फिर इस अवधारणा का कारण क्या है? विशेषज्ञों का अभिमत है कि कदाचित फराओ शासकों को महिमा-मंडित करने के लिए यह बात बनाई गई हो, अन्यथा प्राचीन मिस्त्रियों और उनके शरीर संरक्षण सिद्धाँत को इससे जोड़ने का कोई निमित्त नजर नहीं आता। इस प्रकार घूम-फिरकर बात वहीँ आ जाती है कि यह ब्रह्मचेतना से तादात्म्य स्थापित करने के दिव्यस्थल रहे होंगे। ऐसा मानने का कारण भी है। वैज्ञानिक बताते है कि उसके अंदर जो ऊर्जा संघनित और संकेंद्रित होती है, वह सामान्य इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्तर की नहीं है और न वह वैसा व्यवहार करती है। पल ब्रंटन ने गीजा के महँ पिरामिड में बिताई रात्रि के अनुभव की चर्चा करते हुए अपनी पुस्तक श् ए सर्च इन सीक्रेट इजिप्ट श् में लिखा है कि वहाँ किसी दिव्यचेतना कि उपस्थिति का स्पष्ट आभास मिलता है। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक प्रयोग-परीक्षणों से भी यह बात सिद्ध होती है कि वहाँ कि ऊर्जा असाधारण स्तर की है। आस्ट्रियन वैज्ञानिक वर्न कैमरान का स्नानागार में तरबूज पर प्रयोग बहुत चर्चित रहा है। इसमें आश्चर्यजनक बात बात यह देखी गई कि स्नानघर कि सघन नमी भी तरबूज को पिरामिड के अंदर सूखने से नहीं रोक सकी। वह सिकुड़कर जरदालू के आकार जितना छोटा हो गया, पर स्वाद अद्भुत था। इस परिवर्तन का कारण जानने के लिए उन्होंने एक अभामापी उपकरण बनाया। इसके द्वारा जब पिरामिड अनुकृति के प्रभामंडल का अध्ययन किया गया, तो वे यह देखकर दंग रह गये कि उसके ऊपर उलटे पिरामिड आकार का आभामंडल था, जिससे बलधाराएँ निकलकर पिरामिड के आधारतल तक आती थी। इस दौरान उन्होंने यह भी नोट किया कि पिरामिड को उसके स्थान से हटा लेने के उपराँत भी कई दिनों तक ऊर्जा आवेश वहाँ यथावत बना रहता है।
पिछले दिनों रूसी वैज्ञानिकों ने भी पिरामिड के अंदर की ऊर्जा-प्रतिक्रिया को दर्शाने वाला एक प्रयोग किया। उन्होंने एक छह इंच लम्बी और दो-तीन पत्तियों वाली पौध को काँच के एक पिरामिड में गमले सहित रखा और उसकी प्रतिक्रिया को एक टाइमलैस कैमरे द्वारा वीडियो फिल्म बनाकर प्रदर्शित किया। देखा गया की पौधा पहले पूरब से पश्चिम की ओर घुमा, वैसे ही जैसे कोई नर्तक वाद्ययन्त्र की स्वर-लहरियों पर लहराता है। सर्वप्रथम वह धरती की ओर प्रणत हुआ, फिर दायें से अर्द्ध गोलाकार मुद्रा, पुनः पश्चिम की ओर मुड़कर सीधा हो गया और डोलने लगा। यह क्रिया हर दो घंटे पर देखी गयी, जबकि पिरामिड के बाहर के पौधों में इस प्रकार की कोई हलचल नहीं थी। जब गमले की पौध के निकट धरती पर एक स्वर्णखंड रखा गया, तो मनुष्य की भाँति उसकी स्वर्णलोलुपता स्पष्ट दिखलाई पड़ी। उसकी ओर झुककर उसने इसे प्रकट किया।
निर्माता ऋषियों को पिरामिड के अंदर की इस विलक्षण ऊर्जा का पहले से ज्ञान था। वे आत्मोत्थान के क्षेत्र में इससे दूसरों को लाभान्वित करना चाहते थे, इसलिए इन संरचनाओं को खड़ा किया। यह न तो शवगाह थे, न मिस्त्री निर्माण। इसकी तुलना में इन्हें ज्ञानप्रचारक भारतीयों की उपासनास्थली कहना ज्यादा तर्क और तथ्यसंगत होगा।
अपनी कूटनीति से महाभारत युद्ध में दुर्योधन ने शल्य को कर्ण का सारथी बनने के लिए सहमत कर लिया। कर्ण ने कहा था--यदि मुझे शल्य जैसा सारथी मिल जाये, तो एक अर्जुन तो क्या सैकड़ों अर्जुन जैसे वीरो को मर दूँगा।
पांडवों को मालूम हुआ कि मामा शल्य ने कर्ण का सारथी बनना स्वीकार कर लिया है। शल्य का सारथी बनना सचमुच ही पांडवों के लिए खतरे से खली न था बात कृष्ण को मालूम हुई। नीतिनिपुण कृष्ण ने शल्य से निवेदन किया- कर्ण का सारथी बनने के लिए आप वचनबद्ध है। युद्ध में कौरवों का साथ दीजिये, पर धर्मयुद्ध के लिए मात्र आप कर्ण को हतोत्साहित करते रहिये। शल्य ने कृष्ण का निवेदन स्वीकार कर लिया। इतिहासप्रसिद्ध है कि शल्य के हतोत्साहित करते रहने के फलस्वरूप ही कर्ण का मनोबल टूटता रहा, फलतः वह हरा और मारा गया।
आत्मविश्वासियों को ही ईश्वर का अनुग्रह मिलता है, पर वह प्राप्त होता है- एक ही कीमत पर। अपनी प्रमाणिकता सिद्ध करने पर प्रमाणिकता का अर्थ है- प्रभु का अनुशासन मानना-उनकी व्यवस्था में विश्वास रखना- जो भी कहे उसे बिना तर्क-वितर्क के मानना।
शरीर तथा आत्मा में परस्पर संवाद चल रहा था। शरीर ने कहा-मई कितना सुँदर हूँ, आकर्षक व बलवान हूँ। आत्मा बोली- तुम अपनी अपेक्षा मुझे अधिक सुँदर, आकर्षक व बलवान बना दो, तुम्हारी ये विशेषताएं मेरे सुँदर हुए बिना क्षणिक ही है। मुझे सुँदर बनाकर तुम भी शाश्वत सौंदर्य से युक्त हो जाओगे। किन्तु शरीर की समझ में कुछ न आया वह आकर्षणों में उलझा- जीवन समाप्त करता रहा। शरीर से आत्मा के विच्छेद का समय आ पहुँचा, अब शरीर को ज्ञात हुआ कि यदि आत्मा को भी उसने सुँदर बनाया होता, शक्ति दी होती तो उसका स्वरूप निखर गया होता- मरने के बाद भी उसे याद किया जाता। चलते समय आत्मा बोली- मई तो जाती हूँ। यदि तुम पहले से चेते होते, प्राप्त अधिकार का सदुपयोग कर अपने अंत को सुन्दर बनाते तो अमर हो जाते- महामानव कहलाते। शरीर सर धुनता रहा विदा हो गई आत्मा नया शरीर पाने को।
एक बार नारद को कामवासना पर विजय पाने का अहंकार हो गया था। उन्होंने उसे भगवान विष्णु के समक्ष भी अभिमान सहित प्रकट कर दिया। भगवान ने सोचा की भक्त के मन में मोह-अहंकार नहीं रहने देना चाहिए उन्होंने अपनी माया का प्रपंच रचा- सौ योजन विस्तार वाले अति सुरम्य नगर में शीलनिधि नामक राजा रहता था उसकी पुत्री परमसुन्दरी विश्वमोहिनी का स्वयंवर हो रहा था। उसे देखकर नारद के मन में मोहवासना जाग्रत हो गई। वे सोचने लगे की नृपकन्या किसी विधि उनका वरण कर ले। भगवान को अपना हितैषी जानकर नारद ने प्रार्थना की। भगवान प्रकट हो गये और उनके हितसाधन का आश्वासन देकर चले गये। मोहवश नारद भगवान की गूढ़ बात को समझ नहीं सके। वे आतुरतापूर्वक स्वयंवर भूमि में पहुँचे। नृपबाला ने नारद का बन्दर का-सा मुँह देखकर उधर से बिलकुल मुँह फेर लिया। नारद बार-बार उचकते-कूदते रहे। भगवान् विष्णु नरवेश में आये। नृपसुता ने उनके गले में जयमाला दल दी वे उसे ब्याह कर चल दिए। अपनी इच्छा पूरी न होने पर नारद जी को गुस्सा आ गया और मार्ग में नृपकन्या के साथ जाते हुए विष्णु भगवान को श्राप दे डाला भगवान ने मुस्कुराकर अपनी माया समेट ली। अब वे अकेले खड़े थे। नारद जी की आंखें खुली-की-खुली रह गई। उन्होंने बार-बार क्षमायाचना की। कहा- भगवान मेरी कोई व्यक्तिगत इच्छा न रहे, आपकी इच्छा ही मेरी अभिलाषा हो, लोकमंगल की कामना ही मेरे मन में रहे।
नारद भगवान से निर्देश-सन्देश लेकर जन-जन तक उसे पहुंचाने के लिए उल्लास के साथ धरती पर आये एवं व्यक्त के रूप एक नहीं अपितु समष्टि में संव्याप्त चेतनाप्रवाह के रूप में व्यापक बने। आज ध्वंस की तमिस्रा के मध्य जो नवसृजन का आलोक बिखरा दिखाई पद रहा है, वह इसका प्रतिफल है
ष् सचमुच हम एक नए अनुभव से गुजरे है ऐसा आनंद पहले कभी नहीं आया सुनकर लगा की यह नाद थमे ही नहीं, चलता ही रहे।ष् पच्चीस साल के युवक अमृतकाँत का कहना था। इतना कहकर अमृत ने फिर कैसेट शुरू कर दिया। उससे गायत्री मंत्र की स्वर-लहरी गूँजने लगी। अपने बारे में अमृत का कहना था की बेहद तनाव रहता था। कहीं पहुँचना हो तो तनाव की देर न हो जाये, रावण होते-होते चिंता की कुछ छूट न जाये। तीन-चार बार पलट-पलट कर देखना पड़ता। एक बार घड़ी देखने पर मन निश्चिन्त नहीं हो पाता। मिनट-आधा मिनट के अंतर से तीन-चार बार देखता तब जी मानता कि वास्तव में इतना ही समय हुआ है। जीवन के दूसरे क्रिया–कलापों में भी यही आदत रहती। किसी ने गायत्रीमन्त्र का कैसेट लाकर दिया। एक बार सुना तो आनंद अनुभव हुआ पहली बार स्पर्श होने वाले स्वाद कि तरह तृप्ति हुई। अगले दिन फिर सुनने कि इच्छा हुई। क्रम आगे बढ़ा। आवर्तिता बढ़ी और अब सुबह-शाम मन्त्र के साथ स्तवन भी सुनने का अभ्यास हो गया है। नहीं सुने तो चैन नहीं आता महीने भर बाद स्वभाव में हड़बड़ी कुछ कम हुई। चित्त थोड़ा स्थिर हुआ कैसेट सुनते हुए चार महीने हो गये है। अब अस्सी प्रतिशत सुधार है। अपनी बात संक्षेप में कहने की कोशिश करते हुए अमृत ने कहा- जिंदगी में जैसे इत्मिनान नाम की कोई चीज आई है। यह विश्वास दृढ़ हुआ की कोई शक्ति है, जो संसार चला रही है, इसकी व्यवस्था संभाल रही है, हम बिना वजह चिंतित और अधीर होते है।
अमृत की तरह अनुभव करने वाले युवकों की संख्या अच्छी-खासी है। सिर्फ गायत्री मंत्र ही नहीं हरे राम संकीर्तन, रामधुन, हरिओम् धुन, नमः शिवाय, प्रणव की धुन आदि मंत्रजप की ऑडियो कैसेट सुनने वालों की भरमार है। सुनने वालों में ज्यादातर नै और युवा उम्र के लोग है। कई युवक छह-सात महीनों से धुन सुन रहे है और अपने आप में खो रहे है।
बाजार में इन दिनों अड़तालीस तरह के ऑडियो कैसेट है, जिनमें संकीर्तन धुन या संगीत है और नए कैसेट भी आ रहे है। साधना-परंपरा के अलावा बाजार में भी लोकप्रिय हो रहे है। म्यूजिक कम्पनियाँ उद्योग की तरह इनका उत्पादन और विज्ञापन कर रही है। टाइम्स म्यूजिक द्वारा तैयार गायत्री मन्त्र के कैसेट को साढ़े तीन लाख प्रतियाँ कुछ ही सप्ताहों में बिक गई। योग वेदाँत सेवा समिति ने हरिओम् धुन के दस लाख से ज्यादा कैसेट बेच लिए। श् म्यूजिक टुडे की मेडीटेशन कैसेट ने भी बिक्री के रिकार्ड तोड़े उसमें नाद ध्वनि और कुछ रागों का सम्मिश्रण है, जो मन को विश्राम देता है।
तेज धुनों वाले संगीत की तुलना में धुन या संकीर्तन वह अध्यात्म की ओर बढ़ती रुचि का परिचायक भी है। लेकिन वहीं संतोष नहीं कर लेना चाहिए। मनसविद् मानते है की एक ही प्रकार की धुन, लय या आवृत्ति एक सीमा तक ही सहायक होती है। गाढ़ी नींद में एक बार जगा देने की तरह ही वह उपयोगी है। उसके बाद जागते रहने का स्वयं ही प्रयास करते रहना होता है। सजगता कायम रखनी पड़ती है। ध्यान और संकीर्तन के ऑडियो कैसेट की भी यही सीमा है। उससे आत्मजागरण को सतत् बनाये न रखा जाये, तो चित्त फिर तन्द्रा में जा सकता है। वह स्थिति निद्रा से भी ज्यादा निचले स्तर की है योग की भाषा में उसे श् क्षिप्त श् कहते है। एक ही अवस्था में ठहर जाने और फिर भी गतिशील रहने का भ्रम क्षिप्त श् अवस्था में बनता है। यह स्थिति अध्यात्मिक प्रगति को अवरुद्ध करती है।
जप की मानसिक आत्मिक प्रक्रिया समझने वाले जानते है कि अपने उच्चतम स्तर पर वह स्थिति अजपा में बदल जाती है। जप के लिए विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता। उच्चार, श्रवण और चिंतन कि प्रक्रिया अपने आप चलने लगती है। जप के विभिन्न रूपों में वाचिक जप और मानसिक प्रमुख है। वाचिक जप में मंत्र का उच्चारण किया जाता है। वह उच्चारण होंठ, जीभ, तालू, कंठ आदि के स्पर्श और वायु के संघात से उत्पन्न होता हुआ वैखरी वाणी से भी व्यक्त होता है। उपांशु जप में होंठ हिलते है, कंठ से भी उच्चारण होता सुने नहीं देती। सभी प्रक्रियाएं वाचिक जप कि तरह संपन्न होती है, सिर्फ वाणी ही व्यक्त नहीं होती। मानसिक जप में न होंठ हिलते है और न ध्वनि निकलती है। मन के स्तर पर ही जप चलता है। उसका प्रभाव वाचिक और उपाँशु जप कि तुलना में हजार और सौ गुना ज्यादा होता है। दूसरों के द्वारा सुनकर मन को रमाने वाली प्रक्रिया भी जप के अंतर्गत ही आती है वह सिर्फ श्रवण के स्तर पर होती है। प्रस्थान बिंदु कि तरह उसका उपयोग किया जा सकता है। उसे पकड़कर वही स्थिर नहीं हुआ जा सकता। अक्षर ज्ञान से आरम्भ कर शिक्षा का क्रम आगे चलना चाहिए। नहीं चलता है तो अक्षरज्ञान को प्रगति नहीं श्रद्धा कि श्रेणी में ही रखेंगे।
जप, उपासना,ध्यान-धारणा में यों कर्मकाँड नहीं करने पड़ते। थोड़े-बहुत उपचार होते है। पवित्रीकरण, आचमन, आसनशुद्धि, प्राणायाम आदि उपचारों के साथ वह भावभूमि निर्मित कि जाती है, जिसमें जप-ध्यान में प्रवेश किया जाता है। जप−ध्यान आदि साधन स्वयं ही संपन्न करने होते है वक्ता,उपदेशक, आचार्य उसमें शिक्षक या दिशानिर्देश देने कि स्थिति में ही रहते है। उन्हें देखते-सुनते रहने से साधना में गति नहीं होती तैराकी सीखने के लिए मास्टर के संकेत और क्रिया देखने से काम नहीं चलता। स्वयं ही पानी में उतरना पड़ता है। जप, धुन और ध्यान के निर्देश या संगीत से भी दिशा तो ग्रहण कि जा सकती है, लेकिन वही अटक जाने से बात न उस प्रक्रिया का अभ्यास भी करना चाहिए।
जप-ध्यान कि धुनों कि तरह इन दिनों स्तोत्र, आरती, पुण्यश्लोक और भजन-कीर्तन के ऑडियो-वीडियो कैसेट भी बाजार में विपुल संख्या में आ गया है। दो-एक साल पहले तक पूजा-विधान उपलब्ध, नहीं थे। अब वह भी मिलने लगे है। सप्ताह या नौ दिन तक चलने वाली रामायण-भागवत कथाओं के ऑडियो-वीडियो कैसेट भी लोकप्रिय हुए है, यह स्थिति धर्म-अध्यात्म के प्रति बदला हुआ रुझान सिद्ध करती है। ऑडियो-वीडियो कैसेट पर कथा-सत्संग सुने-देखे या नहीं, यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि यह उपक्रम उत्कर्ष कि दिशा में प्रेरित करता है अथवा नहीं। देखने-सुनने का प्रभाव चित्त और प्राणों में रम जाता हो तो समझना चाहिए प्रारंभिक उपचार का कोई असर हुआ है अन्यथा सुनने-गुनने और झूमने लगने को सामान्य संगीत से ज्यादा महत्व नहीं दिया जा सकता। श् रामा हो रामा हो जैसे गीतों कि धुन पर नाचने और हरे राम भजन कि धुन पर नाचने में तब कोई मूलभूत अंतर नहीं रह जाता। संगीत और अध्यात्म में समान रुचि रखने वाले समीक्षकों कि राय में भक्ति-संगीत मन को संस्कारित भी करता है और निवृत्त भी संगीत और स्वर कितने ही उत्कृष्ट स्तर का हो, यदि प्रस्तुतकर्ता का व्यक्तित्व श्रद्धास्पद नहीं है, तो वह संस्कारित नहीं करता। भजन संध्याओं में बहुत बार गायक मंच से उतरने के बाद अपने अभ्यास व्यसनों में लिप्त हो जाते है। गायत्री के स्तर पर उनकी प्रस्तुति को निम्न शरनी का कटाई नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन प्रस्तुति निष्प्राण लगती है। कारण यही है कि वक्ता कि वाणी सिर्फ उत्सुकता जगती है, उसमें आकर्षण और ऊर्जा का समावेश व्यक्तित्व से आता है। व्यक्तित्व अर्थात् प्रस्तुत करने वालों का तप-तेज़। वह नहीं है, तो प्रस्तुति व्यवसायिक स्तर से रत्ती भर ऊपर नहीं उठती।
जो भी हो, प्रचारतंत्र और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के देन है कि धर्मधारणा के लिए रुझान बढ़ा है। विज्ञान कि इन सुविधाओं को धन्यवाद देना चाहिए। सुविधा अपने भीतर नहीं होती, तो हजारों लोगों को अपने भीतर साधना संस्कार जगाने कि प्रतीक्षा करनी पड़ती। इस अनुदान को यही तक उपयोगी मानकर अगले चरण के लिए सन्नद्ध होना चाहिए।
शिष्य लम्बा रास्ता पर करके आया था। उसके पैरों में अनेक काँटे चुभ रहे थे। शिष्य ने कहा दुनिया बड़ी खराब है। इसमें पग-पग पर काँटे बिछे है। गुरु ने कहा पैरों में खड़ाऊं पहन लो दुनिया में काँटे बिनना कठिन है। अपना स्वभाव सज्जनता और सहिष्णुता का बना लेना ही खड़ाऊं पहनना है। यह शिक्षण ही वास्तविक यदि गुरुजनों कि वाणी को, सदुपदेशों को हृदयंगम किया जाएँ, तो प्रतिकूलताएं निरस्त होती चलेंगी।
एक व्यक्ति एक संत के पास आया व उनसे याचना करने लगा कि वह निर्धन है। वे उसे कुछ धन आदि दे दे, ताकि वह जीविका चला सके। संत ने कहा- हमारे पास तो वाष्ट्र के नाम पर यह लंगोटी और उत्तरीय है लंगोटी तो आवश्यक है, पर उत्तरीय तुम ले जा सकते हो। इसके अलावा और कोई ऐसी निधि हमारे पास है नहीं। वह व्यक्ति बार-बार गिड़गिड़ाता रहा, तो वे बोले-अच्छा, झोपड़ी के पीछे एक पत्थर पड़ा होगा। कहते हैं, उससे लोहे को छूकर सोना बनाया सकता है। तुम उसे ले जाओ। प्रसन्नचित वह व्यक्ति भागा व उसे लेकर आया। खुशी से चिल्ला- महात्मन! यह तो पारसमणि है आपने यह ऐसे ही फेंक दी।
संत बोले- हां बेटा! मैं जनता हूं कि यह नरक की खान भी है। मेरे पास प्रभुकृपा से आत्मसंतोष रूपी धन है, जो मुझे निरंतर आत्मज्ञान और अधिक ज्ञान प्राप्त करने को प्रेरित करता है। मेरे लिए इस क्षणिक उपयोग की वास्तु का क्या मूल्य? वह व्यक्ति एकटक देखता रह गया।
फेंक दी उसने भी पारसमणि। बोला-भगवन्! जो आत्मसंतोष आपको है व जो कृपा आप पर बरसी है। उसे मैं इस पत्थर के कारण वंचित नहीं होना चाहता। आप मुझे भी उस दिशा में बढ़ने की प्रेरणा दे, जो सीधे प्रभुप्राप्ति की ओर ले जाती है संत ने उसे शिष्य के रूप में स्वीकार किया वे दोनों मोक्षसुख गये।
विवेकवान के समक्ष हर वैभव, हर सम्पदा तुच्छ है। वह सतत् अपने चरमलक्ष्य परमपद की प्राप्ति की ओर बढ़ता रहता है
जीवन में थोड़ी बहुत सनक प्रायः प्रत्येक में देखी जाती है पर वह अस्थायी होती और जल्दी ही समाप्त हो जाती है,किन्तु कुछ ऐसे होते है,जिनका सम्पूर्ण जीवन ही अजीबोगरीब गतिविधियों में संलग्न होता और एक प्रकार से स्वेच्छाचार पैदा करता है। अस्त्यस्त चिंतन और उपयुक्त कार्य वाले ऐसे ही व्यक्ति वास्तविक सनकी है। समय-समय पर इस तरह के प्रसंग प्रकाश में आते रहते हैं।
ऐसी ही एक महिला सारा विनचेस्टर थी। वह कैलीफोर्निया की रहने वाली थी। पति का देहाँत हो जाने के बाद अपने ससुर के साथ रह रही थी। डेविड क्रोपे नामक यह व्यक्ति बहुत ही क्रूर किस्म का था। उसने अगणित हत्याएं की थी और लूट में माल से अपने को धनकुबेर बना लिया था। जब वह मरा तो उसके पास कई करोड़ की संपत्ति थी। अब उसकी स्वामिनी सारा बन गई ही इस अपार संपदा को पाकर वह खुश तो थी परन्तु उसे एक भय भी सता रहा था वह यह सोचकर परेशान थी जिन जिन व्यक्तियों से धन छीना गया है उनकी आत्माएं कही उसे तंग न करे। वह इनसे बचने के उपाय ढूंढ़ने में निमग्न रहती।
एक बार सारा मृतात्मा और परलोक विद्या से सम्बंधित एक पुस्तक पढ़ रही थी। उसमें आत्माओं से संपर्क करने उन्हें सहयोगी बनाने और उनके संत्रास से बचने के कुछ उपाय बताये गए थे। सारा महीनों तक उन कर्मकाँडी को करती रही; पर न तो मृतात्माओं से संसर्ग करने में सफल हो सकी,। हाँ उनके आतंक से वह अवश्य अब तक बची हुई थी। उपर्युक्त तरीके निष्फल हो जाने से वह कुछ परेशान - सी थी; पर इससे उसके चिंतन को एक आधार मिल गया था। अब वह बराबर उसी दिशा में सोचती रहती। एक दिन अचानक उसके मन में विचार आया की यदि प्रेतात्माओं के लिए उनके सुविधा जनक महल बना दिया जाए, तो शायद वह उनके कोप से बच सकती है बस फिर क्या था। उसने अपने विचार को क्रियान्वित कर डाला। दूसरे दिन कैलीफोर्निया पहुंची और कूपर टिनो में निकट १८ कमरों का एक मकान खरीद लिया। उसमें और कमरे बन्ने लगे और प्रत्येक में आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाने लगी। निर्माण कार्य चल ही रहा था की उसे ऐसा प्रतीत हुआ की जैसे कुछ भूल हो रही हो। अब उसने प्रश्नों का जबाब पाने के लिए एक विलक्षण तरीका ढूँढ़ लिया था। उसे जब भी किसी सवाल का प्रश्न पाना होता, वह किसी शाँत -एकाँत कमरे में चली जाती और स्थिर चित्त होकर बैठ जाती। इस समय उसके मन में जो प्रथम विचार आता उसे वह उसका उत्तर मान लेती और हर हालत में उसको पूरा करती।
जब वह त्रुटि जानने के लिए एकाग्रता में आ गई तो उसे ऐसा लगा की निर्माण कार्य के दौरान यहाँ औजारों और उपकरणों की आवाज दिन-रात गूँजती चाहिए। इससे कदाचित प्रेताभय भयवश यहाँ नहीं आए और यदि किसी प्रकार आ भी गई तो कमरों में उपलब्ध अत्याधुनिक सुविधाएं को भोगने के चक्कर में पड़कर वही उलझकर रह जाए। इस विचार को तत्काल क्रियान्वित कर दिया गया। सन १८८४ से लेकर सितम्बर १९२२ तक वहाँ अहिर्निश कार्य चलता रहा लगभग दो दर्जन कारीगर अनवरत रूप से उसमें लगे रहे। ५ सितम्बर १९२२ को जब सारा की म्रातिव हुई तभी इसमें विराम लगा, लेकिन तब कमरों का मकान १६० कमरों जितना विस्तार कर अट्टालिका का रूप ले चूका था।
आधे अधूरे १८ कमरों के पूर्व ही जाने के वाद उसने अगल बगल की कुछ और जमीं खरीद ली और निर्माण कार्य अब उसमें होने लगा। अहाते की पुराणी दीवार तोड़ दी गई और विस्तृत क्षेत्र में नए सिरे से नै देवर कड़ी की गई इस प्रक्रिया की पुनरावृत्ति उसके जीवनकाल में अनेक बार हुई। हर बार संरचना -शैली में कुछ नवीनता जुड़ी होती, यही कारण है कि आज उस भव्य भवन के प्रथक प्रथक हिस्सों को निहारने से उसमें अलग अलग प्रकार के वास्तुशिल्प कि छवि झलकती झांकती है।
उस इमारत के कमरे कई कई बार तोड़े और बनाये गए। जब कभी दीवारों में उकेरी गई नकाकाशी अथवा कमरे कि आँतरिक बनावट पसंद नहीं आती उसे अंशतः या पूर्णतः तोड़ दिया जाता है तथा नए ढंग से नए रूप में उसका पुनर्निर्माण होता। उसमें प्रेतों के लिए एक सभागार भी बनाया गया, पर उसे सिर्फ इसलिए तोद्दिया गया था, कारण कि सारा को उस सम्बन्ध में कोई प्रेरणा नहीं मिली थी कुछ समय बाद ध्यान करते समय ये प्रश्न उठा प्रेतों के लिए विचार -विनिमय हेतु कोई सभामंडप होना आवश्यक है अतएव कारीगरों को उसने पुनः एक नायाँभिरम कक्ष के निर्माण का आदेश दिया। जब वह बनकर तैयार हुआ, तो उसमें उसी प्रकार का एक विशाल मंच था जैसा, ऑडिटोरियम में हुआ करता है। इसके अतिरिक्त सैकड़ों आरामदेह कुर्सियां रखी गई, ताकि प्रेतों को कोई तकलीफ न हो। उस सभाभवन कि साज -सज्जा भी अद्भुत थी उसमें कीमती साउंड सिस्टम लगा हुआ था,। दरवाजे और खिड़कियों पर सुनहरे रेशमी परदे लटक रहे थे। चारों कोनों पर चार छोटे छोटे एवं सभाकक्ष के मध्य में एक बड़ा समुदाय छत से झूल रहा था। सभी रत्न जड़ित थे। फर्श में इरान निर्मित एक कीमती कालीन बिछा हुआ, था जिसमें रंगों का संयोजन अत्यंत मनोहारी था। कुल मिलाकर वह कक्ष बहुत ही आकर्षक और आरामदायक था।
इमारत के एक कोने में सारा का एक सुन्दर-सा ध्यानकक्ष था। निर्माण सम्बन्धी अथवा प्रेतों कि आवश्यकता के विषय में कोई जानकारी प्राप्त करनी होती, तो वह उसी कक्ष में शाँत वातावरण में आकर देर बैठी रहती इस बीच यदि कोई तत्संबंधी विचार आता तो उसको वह तत्काल लिपोवाद्ध कर लेती। बाद में उसी के अनुसार व्यवस्था बनाई जाती।
इस कक्ष में जाने का मार्ग अत्यंत गोपनीय था उसकी सीढ़ियां इतनी खतरनाक थी कि तनिक -सी भी असावधानी से व्यक्ति गिरकर अपना अंग लेती। बाद में उसी के अनुसार व्यवस्था बनाई जाती।
इस कक्ष में जाने का मार्ग अत्यंत गोपनीय था उसकी सीढ़ियां इतनी खतरनाक थी कि तनिक -सी भी असावधानी से व्यक्ति गिरकर अपना अंग भंग कर लेना। स्वयं सारा ही इस पर से दो बार गिर चुकी थी। तब से वह यहाँ आते समय अत्यधिक सतर्क रहती। इस प्रकार कि घातक सीढ़ियां बनवाने के पीछे उसका हास्यास्पद तर्क यह था कि इससे बुरी आत्माएं उस तक नहीं पहुँच सकेंगी।
इसीसे जुड़ा हुआ,उसका शयन -कक्ष था। रात्रि में वह यहाँ अकेली सोती कोई सहायक या, सेविका अपने पास नहीं रखती। सोने जाने से पूर्व अपने ध्यानकक्ष में लोबान, गुग्गुल सरीखे सुगन्धित द्रव्य जला देती, ताकि प्रेत आत्माएं वहाँ से दूर रहे, उस ओर न आए। उसकी ऐसी मान्यता थी कि खुशबूदार स्थानों से प्रेत परे रहते है। इसके अतिरिक्त कमरे में स्थान -स्थान पर उसने ऐसे कांच लगा रखे थे, जिसमें चेहरा बहुत भिभातस ओर डरावना लगता था। उसका विश्वास था कि मृतात्मा इनके सम्मुख आने से डरेंगे।
सहयोगी के नाम पर उसके पास सिर्फ दो लोग थे -एक उसकी सेक्रेटरी जो उसकी अपनी ही भाजी थी ओर दूसरा उसका नौकर, जो भोजन पकाने के साथ साथ निर्माण कार्य के लिए आवश्यक था, जबकि सेक्रेटरी सुझाव परामर्श में अतिरिक्त निर्माण कार्य देखती थी।
बीसवीं सदी के तीसरे दशक में सारा कि जब मौत हुई, तो करोड़ों के फर्नीचर एवं दूसरे साज-सामान उस भवन में आ चुके थे। इसके अतिरिक्त इमारत बनवाने में काफी संपत्ति खर्च हुई। फिर भी उसके पास दौलत का एक बड़ा हिस्सा बचा हुआ था जिसकी भाँजी के नाम वसीयत कर दी आज भी वो अट्टालिका कैलीफोर्निया के कूपर्तिनो नामक स्थान में वीरान पड़ी हुई है।
ऐसे निर्माणों को देखकर बार-बार मस्तिष्क में यह विचार उठता है कि अगोचर सत्ता के प्रति जो इतना सतर्क, सावधान ओर संवेदनशील हो सकता है, उसका ध्यान समाज के गोचर इकाइयों कि दयनीय अवस्था कि और क्यों नहीं जाता? यह जानते हुए भी कि सूक्ष्मसत्ताओं को स्थूल पदार्थों की जरूरत नहीं होती, उनके लिए यदि कोई महँगे सुविधा-साधन इकट्ठे करता है, तो उसे क्या कहेंगे- सनकी? पागल? या समाज की कृतज्ञता को भूल जाने वाला कृतघ्न? निश्चित ही उसे समाज के उपकार को विस्मृत कर देने वाका घोर स्वार्थी ओर सनकी ही कहा जाएगा। हमें ऐसे सनकियों के प्रति सावधान रहना चाहिए, जो समाज के धन को निजी उपार्जन समझकर स्वेच्छाचारी ढंग से बर्बाद करते है।
एक बार एज शिष्य की अशाँति बढ़ी ओर बढ़ाती ही चली गई। जब चित्तवृत्तियों अनियंत्रित हो उठी तो वह अपने गुरुदेव के चरणों में जा गिरा। प्रार्थना करते हुए उसने निवेदन किया-भगवन् आज मन बड़ा अस्थिर है। लगता है इतने दिनों की साधना ओर ताप सब आज भंग हो जाएगा। आचार्यप्रवर कुछ देर तक निश्छल बैठे विचार करते रहे, फिर बोले- मन का सीधा सम्बन्ध अन्न से है- कही तुमने कुछ चुराकर तो नहीं खा लिया।
नहीं,नहीं देव! ऐसा नहीं है, किन्तु आज मैं एक नगरभोज में अवश्य सम्मिलित हुआ था। कहते हैं जिस सेठ ने यह भोज दिया, वह बहुत धर्मात्मा पुरुष है। नगर में उनका अन्नक्षेत्र चलता है। धर्म-कर्म में अत्यंत रुचि है। वह देवपूजा, अतिथिपूजा आदि शुभकर्मों में संलग्न रहता है। उसके द्वार से याचक निराश नहीं लौटता। आज के भोज में अनेक लोग सम्मिलित थे। सेठ ने सभी का बड़ा आदर सत्कार कर उनका भोज के साथ दान- दक्षिणा भी दी ओर सबका उचित सम्मान भी किया।
आचार्य हँसे और बोले- ठीक है, अब समझ में आया कि जो तुमने खाया वह बना परिश्रम का ही नहीं था। वरन् अनीति का भी था। जिस सेठ ने भोज दिया है उसने वृद्धावस्था में भी एक गरीब घर कि लड़की से विवाह किया और वह भी धन देकर। यह भोज उसने उस पाप से बचने के लिए ही किया है। आज जब तुमने खाया ही पाप का है, तो उसका फल तो भुगतना ही पड़ेगा। इसीलिए कहते है-आत्मकल्याण के इच्छुक को सदैव अपने परिश्रम और ईमानदारी से कमाया हुआ अन्न ही ग्रहण करना चाहिए
अगर किसी को स्वर्ग की तलाश हो, तो वह इसे अपने पारिवारिक जीवन की खुशियों में पा सकता है। परिवार मनुष्य को सामाजिकता से जोड़ने वाली महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील कड़ी है। यही मनुष्य को त्याग और सहजीवन का पहला पाठ सीखने को मिलता है। पारिवारिक भावना ही मनुष्य को दूसरे की भावना का सम्मान करना व अपने मत के प्रति दुराग्रही न होने की शिक्षा देती है। यही अन्य जीव-जंतुओं से अलग मनुष्य की श्रेष्ठ भी सिद्ध करती है। परिवार में ही हर किसी को एक संरक्षण, भावनात्मक सुरक्षा व रागात्मक अपमान मिलता है अपने परिवार में मनुष्य का स्वयं को सुरक्षित महसूस करना इतना विशिष्ट है की परिवारविहीन मानव समाज की कल्पना ही स्वयं में प्रकृति विरुद्ध लगती है। इसमें बच्चे बूढ़े सभी एक-दूसरे सभी एक दूसरे के चुरक बनते हुए परिवार को लघु समाज का रूप देते हैं। अपने मन से भरे−पूरे इस माहौल में प्रेम, त्याग, सहयोग, आज्ञापालन, अनुशासन जैसे गुणों का अभ्यास एक सुगढ़ व्यक्तित्व का निर्माण करता है। यहाँ बच्चो को अपने आप उत्तम संस्कार मिल जाते हैं। अपनी क्षमता के अनुरूप काम करते उपनग एवं अल्पबुद्धि भी प्यार के हकदार बनते हैं। दुख कष्ट व् आपत्तियों से भरे समय को एक-दूसरे के सहारे बड़ी आसानी से पार कर लिया जाता है। पारस्परिक। सहयोग से कठिन-से कठिन- काम भी सहज हो जाता है। समाजशास्त्रियों के अनुसार पारिवारिक जीवन से बढ़कर मनुष्य को भावनात्मक संतुष्टि, संतृप्ति कहीं और मिलना संभव नहीं। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि हर किसी को खुशियों का बराबर हक़ देने वाली परिवार संस्था आज स्वयं दुख्बरे दौर से गुजर रही है। पश्चिमी जगत में तो इसका दुःख-दुर्भाग्य चरम सीमा पर जा पहुँचा है। वहां के पारिवारिक विघटन की झलक हम बढ़ाते हुए तलाकों की संख्या से पा सकते है। यूरोपियन यूनियन स्टैतीस्टिकल ऑफिस द्वारा किये गए सर्वेक्षण के अनुसार यूरोप में विवाह कम व तलाक अधिक हो रहे है। ब्रिटेन में विवाह करने वालों की संख्या में १६ प्रतिशत कमी आई है। यहाँ हर दो विवाह में एक पति-पत्नी तलाक ले लेते है। तलाक में एक-चौथाई शादी के ५ से ९ वर्षों के अन्दर व २० प्रतिशत बीस सालों के अंतराल में हो जाते है। तलाक के कारण अपने शिशुओं का एकाकी पालन करने वाली माताओं की संख्या १३ लाख तक पहुँच गयी है। ४० प्रतिशत कामकाजी महिलाओं को इसी वजह से अपने शिशुओं को मित्रों, रिश्तेदारों या बच्चाघरों में छोड़कर जाना पड़ता है। ऐसे अकेले माता-पिता जो अपने शिशुओं को पाल रहे है, ब्रिटेन में गत चार वर्षों में २ प्रतिशत तक पहुँच गए है। गत दो दशकों में इनकी संख्या दो गुनी बढ़ी है। पश्चिमी दुनिया के उन्नत देशों में ऐसे परिवार निरंतर कम होते जा रहे है, जहाँ एक ही छत के नीचे दादा-दादी से लेकर नाती-पोते तक सभी एक साथ रहते हो। १९९१ तक ब्रिटेन में दो व्यक्ति वाले परिवार सबसे अधिक प्रतिशत थे, जबकि से अधिक ३४ सदस्यों वाले परिवार मात्र २ प्रतिशत एवं या ४ व्यक्ति वाले परिवार १६ प्रतिशत व ५ सदस्य वाले परिवार कुल ५ प्रतिशत ही थे। हाल ही में आबादी गणना और सर्वेक्षण विभाग द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार कुटुँब सिकुड़ते जा रहे है व कम -से कम सदस्यों वाले परिवार बढ़ते जा रहे हैं।
पश्चिमी समाज में पारिवारिक मूल्यों के कारण सर्वाधिक परेशानी वहाँ के बुजुर्गों को हो रही है। अधिकांश वृद्ध स्त्री -पुरुष विशेष तौर पर बनाये गए ओल्डएजहोम में रहने के लिए मजबूर है। इतना ही नहीं वहाँ किशोरों की हिंसक कारगुजारियों व बच्चो के साथ अभिभावकों व रिश्तेदारों द्वारा किये जाने वाले यौन शोषण ने परिवार संस्था की यौन शुचिता व पवित्रता को तहस नहस कर दिया है।
बिना विवाह किये एक ही छत के नीचे रहने का चलन लम्बी दूरी तय कर चुका है। इन सारे प्रचालनों के साथ यौन संबंधों की उच्चश्रृंखला व सारी मर्यादाओं को पार करने वाली स्वच्छंदता ने पश्चिम के पारिवारिक मूल्यों को मृतप्राय सा बना दिया है। एक सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटेन में प्रत्येक पांच जोड़ो में से एक जोड़ा बिना सादी में एक ही छत के नीचे जीवन व्यतीत कर रहा है।
पश्चिम में संतानोत्पत्ति में संदर्भ में भी अविवेकपूर्ण रवैया अपनाया जा रहा ही। ज्यादातर बच्चे विवाहहीन युगलों द्वारा पैदा किये जा रहे है। ऐसे बच्चे अपने विकास में साथ जो मानसिक एवं भावनात्मक संत्रास भोगते है, वह मनोवैज्ञानिकों, एवं मनोचिकित्सकों की शोध का विषय बन चूका है। समाज विज्ञानियों के अनुसार परिवारों के बिखरने की सबसे बड़ी वजह जीवन विलासी बनते जले जाना है। वहाँ के समाजशास्त्रियों के लिए पारिवारिक मूल्यों की पुनः स्थापना अब एक मात्र विकल्प बचा है। जो मानवीय कुँठा,हिंसा,अवसाद व विलगाव से राहत दिला सकता है। ब्रिटेन के राजनेता इसलिए श्बैक टु द बेसिक श् का नारा बुलंद कर रहे है, जिसका निहितार्थ पारिवारिक मूल्यों की पुनः स्थापना से है।
अमेरिका में भी वहाँ का सबसे बड़ा मुद्दा यही बन चूका है। वहाँ पिता और पुत्र बतौर एक अमेरिकन बग्र कि जानते है। न पिता अपने बेकार बेटे का ख्याल करता है, न बेटा अपने बूढ़े माँ बाप की चिंता करता है वहाँ की सरकार को ही वे सब काम करने पड़ते हैं, जो हिन्दुस्तान में समाज स्वतः जी परिवार के माध्यम से करता है। छोटी बहन की शादी के लिए त्याग तपस्या करता है विधवा -वृद्ध आदि के पोषण की व्यवस्था घरवाले ही करते हैं। यदि यहाँ की स्थित अमेरिका जैसी हो जाये, भारत सरकार की पूरी सामर्थ्य भी इन लोगों को दो वक्त की रोटी उपलब्ध कराने में कम पड़ जाए। परिवार द्वारा मिलने वाली सामाजिक एवं भावनात्मक सुरक्षा की तो सरकारी सुरक्षा से तुलना भी नहीं की जा सकती।
आर्थिक क्षेत्र में अमेरिका को भी पछाड़ने वाले विश्व के धनाढ्य देशों में एक जापान में भी परिवार व्यवस्था संकट में है। वहाँ तलाक की परवर्ती बढ़ रही है। जापान के स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय के अनुसार गत वर्ष वहाँ लगभग दो लाख छाये हजार तलाक हुए, जो की अब तक का एक रिकार्ड है यह १९९४ की अपेक्षा ७९५० अधिक है। मंत्रालय के अनुसार १९९९ से ही तलाक में बढ़ोत्तरी जरी है। भौतिकता की अतिशय वृद्धि के कारण परिवार की अपेक्षा व अवमानना का दुष्परिणाम यह है कि आज वहाँ स्कूली छात्रायें शौकिया वैश्या व्रती करने लगी है जापान के शिक्षा मंत्रालय ने औद्योगिक घरानों का आवाहन करते हुए कहा है कि कार्यरत कर्मचारियों को जल्दी घर जाने व अधिक अवकाश कि सुविधा की जाए, ताकि वे घर का अधिक ध्यान रख सके। शिक्षा विशेषज्ञों ने घर पर अभिभावकों कि उपस्थिति, उनके मार्गदर्शन व सान्निध्य को बच्चों के लिए अपरिहार्य बताया। उन्होंने घर को अभिभावकों व बच्चों के परस्पर मिलन, वार्ता, व सहयोग का केंद्र बनाने पर जोर दिया है।
विकसित देशों में परिवार में टूटन व -दरकन -विघटन का दौर वहाँ कि भौतिक प्रगति से उपजी भोगवादी संस्कृति से सुरू हुआ, वहाँ पिछली आधी शताब्दी में दौरान जो व्यापक भौतिक विकास हुआ, उसी के साथ वहाँ पर भौतिकता से प्रेरित जीवनदृष्टि व जीवनशैली भी विकसित हुई। इसमें व्यक्तिगत संस्था कि खुली वकालत कि गई है। परिवार संस्था को व्यक्ति कि स्वतंत्रता को छिनने वाला एक उपक्रम सिद्ध करने वाले कई सिद्धांत गढ़े गए। परिवार कि विलक्षणता व मानवसभ्यता के विकास कि इसकी भूमिका समझे बिना इसके महत्त्व को खत्म करने का उन्माद शुरू हुआ,। व्यक्तिगत स्वतंत्रता उन्मुक्तता व श्रृंखला के चलते परिवार संस्था कि अंतहीन टूटन का सिलसिला चल पड़ा। शुरुआती दौर में कुछ लोग ऐसी जगह आ गए, जहाँ सिंगल पेरेंट फैमली श्को भी बड़ी मुश्किल से मान्य किया जा सका। यह उन्माद यहाँ तक पहुंचा कि अब तो वहाँ सेम सेक्स फैमली अर्थात् समलैंगिक परिवार भो होने लगे है। भौतिक प्रगति, वैज्ञानिक प्रगति के साथ साथ पनपा यह पारिवारिक एवं भौतिक पतन अमेरिका का जापान जैसे देशों के बाद अब विश्व के दूसरे देशों पर भी सर चढ़कर बोल रहा है।
साम्यवादी देशों ने तो पहले ही परिवार को कृत्रिम व्यवस्था करार दे दिया था। इसकी अवहेलना, उपेक्षा करके वहाँ कम्युनो कि स्थापना कि गई। वहाँ पश्चिम कि तरह पारिवारिक बिखराव कठोर नियमों व कई तरह के प्रतिबंधों के चलते शुरुआत में समझा नहीं जा सका। लेकिन आज जब सोवियत संघ का पतन हो चुका है, इसकी स्थित भीतर से बुरी तरह टूट चुकी है। वहाँ के सामाजिक बिखराव कि भयावहता को देख -समझकर स्थित का आँकलन किया जा सकता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार रूस में तलाकों कि संख्या शादियों कि संख्या से एक तिहाई बढ़ गई है १० लाख बच्चे ऐसे परिवार में रहते है, जहाँ या तो सिर्फ माँ है या तो सिर्फ पिता। ५ लाख से ज्यादा बच्चे अविवाहित माता पिता कि संतान है
चीन में भी परिवार व्यवस्था कि हालत ठीक नहीं है। यहाँ जनसँख्या नियंत्रण के लिए एक संतान के सिद्धांत को कठोरता से लागू किया गया है, किन्तु इस नियम के पचास वर्षों बाद इसके सामाजिक दुष्परिणाम दिखाई देने सुरू हो गए है। आज चीनी समाजशास्त्री
इसके लिये बेहद चिंतित है एक संतान के नियम से वहाँ की परिवार व्यवस्था काफी ध्वस्त हो चली है और ऊपर से पश्चिम प्रभाव ने इस प्रक्रिया की तीव्रता कर परिवारसंस्था को दयनीय स्थिति तक पहुंचा दिया है।
पश्चिमी जीवन शैली के विश्व -व्यापी प्रभाव के चलते पारिवारिक विघटन के दौर से भारत भी अछूता नहीं रह पाया है। भारत में संयुक्त परिवार जिस तेजी से बिखर रहे हैं, उससे यह शंका पैदा हो रही है कि हमारा हश्र भी पश्चिम जैसा ही न हो जाए। पिछले दिनों श्युनेतेड न्यूज ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार भारत में तलाक के मामले तेजी से बढ़ रहे है, जो परिवारों के बिखराव का सूचक है। महानगरों यह स्थिति बद्तर है जो की परिवारों के बिखराव का सूचक है। जो की भोगवादी जीवनशैली के अन्धानुकरण में सबसे आगे है। दिल्ली के न्यायालय में १९६० के दशक में दाम्पत्य सम्बन्ध विवाद के प्रायः १.२ मामले आ रहे है गत वर्ष दिल्ली में ऐसे लगभग ८५०० मामले आए थे, जोकि गत दशक के मुकाबले दो गुना से भी अधिक है। गत दस वर्षों में पंजाब व हरियाणा में तलाक सम्बन्धी मामलों में १५ प्रतिशत वृद्धि हुई है। केरल जैसे सार्थक व शिक्षित प्रान्त में यह वृद्धि दर गत वर्षों में ३५ प्रतिशत है।
परिवार संगठन में परम्पराओं का महत्व कितना है इसका प्रमाण चेन्नई व कलकत्ता के उच्च न्यायालय की रिपोर्ट में देखा जा सकता है। वहाँ गत वर्ष दस वर्षों में तलाक सम्बन्धी मामलों में क्रमशः केवल १० से १५ प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ज्ञात ही की तमिलनाडु एवं पश्चिम बंगाल परंपराओं के गढ़ माने जाते है पारिवारिक झगड़े निपटने के लिए परिवार न्यायालय, मैरेज ब्यूरो परिवार सलाह केन्द्रों की संख्या बताती है की भारत में पारिवारिक संकट के बदल मंडराने लगे हैं।
आधुनिक, उपभोक्तावाद और स्वच्छंदता के चलते अपने देश में परिवार टूटने का कर्म तेजी से बढ़ रहा है। हमारे महानगरों अमेरिका, जापान व यूरोप की खानी दुहरा रहे है। उदारीकरण के बाद तो भारत में यौन सम्बन्ध उच्छृंखलता के दायरे में प्रवेश कर रहे है। अकेले दिल्ली में १५०० किशोरियों के गर्भपात करवाने की जानकारी मिली है। इनमें प्रायः सब की सब अविवाहित थी। यौनसंबंधों की यह उच्छृंखलता सीधे-सीधे पारिवारिक मूल्यों की मृत्यु का शोकसंदेश देती है, क्योंकि स्वच्छंद यौनाचार के नियंत्रण के लिए ही प्रधानतया विवाहसंस्था का निर्माण किया गया था।
टूटने की यह प्रक्रिया महानगरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि छोटे नगरों, कस्बों यहाँ तक की गांवों तक इसकी गूँज सुनाई देने लगी है। व्यक्ति अधिक आत्मकेंद्रित व सुविधाभोगी होता जा रहा है। भौतिक के नशे में वह मदमस्त है भोगवाद की आँधी हमारी संस्कृति व संस्कार को ध्वस्त करने पर तुली है। हमारे आदर्श एवं जीवन मूल्य बिखर रहे है। परिवार संस्कार आरोपण की पाठशाला थी, लेकिन स्वच्छंदतावादी व्यक्ति के लिए तो यह उसकी आजादी में बाधक ही है।
युवा पीढ़ी पारिवारिक भावनाओं के अभाव में लगातार भटकाव की ओर बढ़ चली है। परिवारों के टूटन पर समाज की प्रथम इकाई है। इकाई के टूटने पर समाज रूपी ढांचे का बना रहना कैसे संभव है? समाज की स्थिरता व प्रगतिशीलता तो परिवार पर ही टिकी है। इससे भी महत्वपूर्ण भूमिका है, व्यक्ति को शिक्षा एवं संस्कार देकर उसे नररत्न का रूप देने में। इसलिए जरूरी यही है की बिना देर लगे पारिवारिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की दिशा में ठोस कदम उठाए जाए। ध्यान रहे -नव युग निर्माण का अनिवार्य कार्यक्रम पारिवारिक जीवन में भौतिक सुधार करके, संवेदना एवं संस्कारों को बढ़ावा देकर हम एक सामयिक व सार्थक कदम बढ़ा सकते है।
एक गीदड़ ने सिंह के बच्चे को नवजात अवस्था में कहीं पड़ा देखा, उठाया और उसे अपने बच्चों के साथ पालने लगा। सिंह शावक गीदड़ों के बच्चों के साथ पलते -पलते, उस परिकर में विकसित होते कभी स्वयं को नहीं पहचान पाया। एक बार यह परिवार शिकार को गया। मरे हाथी पर जैसे ही यह खाने के लिए टूटे वैसे ही स्वयं वनराज सिंह वहाँ आ गए। उन्हें देखते ही गीदड़ परिवार कुछ कर गए पर सिंह कि पकड़ में सिंह शावक आ गया। सिंह ने उससे पूछा- वह कैसे उनके साथ था और भयभीत क्यों होता है? शावक समझ नहीं पा रहा था कि यह सब क्या है? उसे भय से काँपते देख वनराज सब समझ गए। उन्होंने उसे पानी ने अपनी परछाई दिखाई व फिर स्वयं अपना चेहरा स्वयं दहाड़े और उसे सायं दहाड़ने को कहा। तब उसे अपने विस्तृत आत्मस्वरूप का ज्ञान हुआ और वह सिंह कि बिरादरी में शामिल हो उन्मुक्त भयमुक्त विचरण करने लगे।
एक बार महामना पं. मदनमोहन मालवीय जी के पास एक धनी सेठ आए। उनके बारे में यह प्रसिद्धि थी कि वे अपना धन भिखारियों में बाँट सकते हैं, पुण्यार्जन की दृष्टि से चींटियों को दाना खिलाने के लिए कर्मचारियों को ढेरों की संख्या में लगा सकते हैं, पर लोक मंगल के लिए उन्होंने न कभी खर्च किया है, न करेंगे। आए तो थे वे अपनी बच्ची के विवाह हेतु सम्मिलित होने का निमंत्रण देने, परन्तु उलटे मालवीय जी से सशर्त जुड़ कर चले आए। मालवीय जी उन दिनों काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का निर्माण करा रहे थे। संयोग से जिस लड़के से उनकी लड़की का विवाह हो रहा था, वह उनका विद्यार्थी भी था। उन्होंने खा आप विवाह में जो राशी खर्च कर रहे है, मैंने सुना है वह लाखों में है। उसके बदले आप लड़के के नाम कुछ राशी जमा कर दे व उसे स्वावलंबी बनने दे। वह मेहनती है, अपना संसार खुद बना लेगा पर जो राशी उस प्रदर्शन में किसी का लाभ न होगा, कन्या के विवाह उपराँत कष्ट का कारण अवश्य बन सकता है। इस राशी को आप हमें दहेज में देदे ताकि उससे हिन्दू विश्वविद्यालय का बाकी काम पूरा हो सके। लड़के का गुरु होने के नाते मैं यह दक्षिणा लोकमंगल के लिए आपसे मग रहा हूँ। उनका कहना भर था और उस कंजूस सेठ को बदलना न केवल आदर्श विवाह उन्होंने किया; कई भवन विश्वविद्यालय के लिए बनवा भी दी। धन का ऐसा सुनियोजन ही श्रद्धा जनसम्मान के रूप में फलित होता है
आज विकास सबसे प्रचलित नारा बन गया है, जिसने भूख, गरीबी, बेरोजगारी की चिंता को पीछे धकेल दिया है। इन दिनों व्यवसाय -नौकरी में सुस्थापित लोगों के मनों में इसके लिए बहुतायत में आकर्षण पंप रहा है। उनके लिए विकास का अर्थ कुछ इस तरह से होता है - चमकती सड़कें, किस्म-किस्म की गाड़ियाँ, दूरसंचार माध्यमों, उपभोक्ता सामग्री से पेट बाजार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भरमार। कुल मिलाकर सुख -सुविधा एवं उपभोग की सामग्री यों से भरे पुरे चकाचौंध भरे जीवन की सृष्टि।
विकास की इस अवधारणा ने पिछले कुछ दशकों में ही जोर पकड़ा है, जबकि इसका बीजारोपण डेढ़ सौ से दो सौ वर्ष पहले एन्फ्लैद की औद्योगिक क्राँति के साथ हो चूका था। बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना के साथ ही उत्पादन में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई। इसकी विकास की इस अवधारणा ने पिछले कुछ दशकों में ही जोर पकड़ा है, जबकि इसका बीजारोपण डेढ़ सौ से दो सौ वर्ष पहले एन्फ्लैद की औद्योगिक क्राँति के साथ हो चूका था। बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना के साथ ही उत्पादन में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई। इसकी खपत के लिए अतिरिक्त सस्ते मानव एवं प्राकृतिक संसाधनों की जरूरत महसूस हुई। इसी के साथ प्राकृतिक एवं मानव के विरुद्ध निर्बाध आक्रामकता का दौर शुरू हुआ और इसके अगले ही चरण में गैर यूरोपीय लोगों की प्राकृतिक संपदा की लूटपाट व उनके ऊपर अमानवीय अत्याचार व शोषण का सिलसिला शुरू हुआ।
यही वह आधार है, जिस पर वर्तमान भौतिक सभ्यता की चमत्कारिक उपलब्धियाँ टिकी हुई है। प्रशंसा भरे स्वरों में कभी कार्लमार्क्स ने इन्हीं के विषय में लिखा था की इन उपलब्धियों के सामने चीन की दीवार या पिरामिड जैसी मानव की प्राचीन उपलब्धियाँ नगण्य लगती है। उस समय औद्योगीकरण ने पश्चिम जगत को इतना प्रभावित किया था की वहाँ के पूंजीवादी और समाजवादी दोनों तरह के विचारकों के लिए यह औद्योगिक विकास ही समाज का गंतव्य निर्धारित करने वाला दिखाई देता था इसकी मूलभूत विसंगतियों एवं अमानवीय चेहरे को सबसे पहले महात्मा गाँधी ने पहचाना, तभी उन्होंने इसे शैतानी ख डाला और सच भी यही है, यह विकास जहाँ भी गया, अपने साथ घोर विषमता के बीज भी साथ ले गया।
अंग्रेजी जमाने में जब इस तथाकथित विकास ने अपनी जड़े भारत में फैलानी शुरू की थी तब यहाँ विषमता बहुत कम थी। डी इकानामिस्ट के अक्टूबर १४ के अंक के अनुसार १७८० में राज्य के ऊंच्चे अधिकारी व सामान्य नौकरों के बीच अंतर करना कठिन था। बिलहरी जिले एक सर्वेक्षण के अनुसार १८०६ में तीन वर्ग थे - अमीर,सामान्य और निम्न। जिनकी प्रतिव्यक्ति खपत क्रमशः १६ रुपये तीन आने ४ पैसे, ९ रुपये दो आने ४ पैसे और ७ रुपये एक आना थी अर्थात् अमीर और गरीब वर्ग के बीच का अनुपात २रु३रु१ था टीपू सुल्तान अपने किले के गवर्नर को रुपये प्रतिमाह देते थे और साधारण सिपाहियों का वेतन ० रुपये प्रतिमाह होता था। अंग्रेजों ने किला पर फट करने के बाद इस वेतन का अनुपात में १००रु१का अंतर कर दिया। अर्थात् अब गवर्नर का वेतन १०० रुपये हो गया इस तरह अपनी लोभ एवं शोषण मुल्क कुटिल व्यापारिक नीतियों के अंतर्गत अंग्रेजों ने कुछ लोगों को सुविधाएं प्रदान कर अपने साथ कर लिया, जबकि किसान, करिग्र४ जैसे सामान्य वर्ग जिनके कारण भारत की समृद्धि थी, उसे लुट दिया गया, उन पर अत्याचार किए गए।
दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के पश्चात भी भारत ने विकास की पश्चिमी नीतियों को ही प्राथमिकता दी। इन्हीं नीतियों के सहारे यहाँ आर्थिक स्वावलंबन, प्रगति एवं एकता समता के स्वप्न देखे। इसी के परिणाम स्वरूप आज हम आर्थिक दलदल में फंसे है और समाज घोर विषमता एवं कंगाली की त्रासदी से अभिशप्त है। एकाँगी प्रगति के नाम पर हम संतोष कर सकते है की पिछले वर्षों में खाद्य उत्पादन चार गुना बढ़ गया, समग्र घरेलू उत्पादन चार गुना बढ़ा है, औद्योगिक उत्पादन में भी इतनी ही वृद्धि हुई है। लेकिन प्रगति के ये मायने नहीं रखते है। जब अधिकाँश जनता इससे लाभान्वित न होती हो जब ४० करोड़ जनता गरीबी के नर्क के आग में झुलस रही हो जब गरीबीरेखा से नीचे वालों की संख्या प्रतिवर्ष तीन करोड़ की गति से बढ़ रही हो। ऐसे में यह तथाकथित प्रगति एवं विकास किस कम के।
आर्थिक उदारीकरण के नाम पर विकास की जिन नीतियों का अनुसरण हमने किया है उसने गरीबी और विषमता को और गंभीर बना दिया है। पिछले वर्ष हुए सर्वेक्षण के अनुसार आर्थिक सुधर के अनुसार जो लोग अमीर और अमीर हुए है और गरीब अधिक तेजी से गरीब। इंडिया मार्केट डेमोग्राफिक्स -१९९८ नमक रिपोर्ट के तहत कुल तीन तथ्य एकत्र किए गए। रिपोर्ट के अनुसार १९८७ से १९९० के आर्थिक सुधर के दौर में निम्न आय वाले परिवार की हिस्सेदारी ६४ण्१ प्रतिशत से घट कर ५८ण्८ प्रतिशत रहा गयी जो १९९०.९७ में और तीव्रता से कम हुई इसके विपरीत उच्च आय वर्ग का सुधर पूर्व दौर में १.१ प्रतिशत से १ण्४ प्रतिशत था, जो सुधार के पश्चात बढ़ते-बढ़ते ३.७ प्रतिशत हो गया। विकास की नीतियों के अंतर्गत विगत ५० वर्षों में विश्व के सकल घरेलू उत्पादकता में ७ गुना की वृद्धि हुई। व्यापार में भी इससे कही अधिक वृद्धि हुई है, साथ ही प्रतिव्यक्ति आय भी ५००० डॉलर पार कर गयी। अनुसार गत तीन वर्षों में विश्व अर्थव्यवस्था में चार प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। भारतीय महाद्वीप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कुछ देशों की अर्थव्यवस्था में भी भरी उछाल आया है, किंतु विश्व पटल पर हो रहा यह विकास भी भीषण विडंबनाओं से ग्रसित है इस दौरान गरीबी बढ़ी है। १९७१ में ही जब विश्व बैंक के के तत्कालीन अध्यक्ष रॉबर्ट इस. मैक्नमारा ने गरीबी परिभाषित किया था, तब ७० क्रीड लोग गरीबी के दंश से पीड़ित थे, आज तो इनकी संख्या से भी अधिक हो चुकी है। तथाकथित विकसित देश भी इसकी गरम आँच से अछूते नहीं है अमेरिका व यूरोपीय संघ में १५ प्रतिशत जनता गरीबीरेखा से नीचे रहती है। विकास का नाम पर बड़े-बड़े बाधाओं का निर्माण भले ही हो गया हो, पर भुखमरी की समस्या का कोई समाधान नहीं हो पाया है। विश्व के दस करोड़ अभी भुखमरी के शिकार है जिनमें एक-चौथाई बच्चे हैं इनमें एक करोड़ चालीस लाख तो प´्च वर्ष से पहले ही भूख के कारण दम तोड़ जाते हैं। एक -चौथाई दुनिया को तो पीने का स्वच्छ जल, सफाई, स्वास्थ्यसुविधा जैसी मूलभूत आवश्यकताएं भी उपलब्ध नहीं हो पाती है।
विकसित व अविकसित देशों के बीच की खाई कितनी गहरी है, इसका अनुमान इस तुलनात्मक सर्वेक्षण द्वारा लगाया जा सकता है। एक ओर मोजाँबिक जैसा कंगाल देश जहाँ प्रतिव्यक्ति सकल उत्पादन गत ६ वर्षों में १७ डॉलर से ९० डॉलर तक घाट गया है, वाही दूसरी ओर स्विट्जरलैंड जैसा अमीर देश जिसकी उपर्युक्त दर २१ए३३० से बढ़कर ३७ए९३० डॉलर हो गई है। विकास को गति देने का दावा करने वाले उदारीकरण व भूमंडलीकरण की नीतियों के तहत विश्व में बढ़ती आर्थिक विषमता व गरीबी कैसा भयावह रूप ले रही है, यह संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की मानव विकास रिपोर्ट १९९८ में देखा जा सकता है।
मानव विकास रिपोर्ट १९९८ में उपभोग को आधार बनाकर विश्व जनसँख्या की स्थिति देखने की कोशिश की गयी है। इसके अनुसार पिछले कई दशकों में उपभोग के क्षेत्र में एक उछाल आया है, पर एक बहुत बड़ी आबादी इससे बाहर है। सर्वाधिक धनी लोग अपनी विलासिता एवं गैर जरूरी चीजों पर जितना खर्च करते है, वह पूरी जनसँख्या के बुनियादी स्वस्थ, पोषण एवं शिक्षा के लिए जरूरी खर्च से कही अधिक है। इससे स्पष्ट है की तथाकथित आर्थिक सुधारो के दौर में गरीबी -अमीरी की खाई बढ़ी है। भूमंडलीकरण के माध्यम से एक ऐसी विश्वव्यवस्था की रचना हो रही है, जहाँ आम जनता के सरोकार गायब है। कुछ हाथों में पूजी के संचय को देख कर समतामूलक समाज की परिकल्पना पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग जाता है रिपोर्ट के अनुसार विश्व के तीन धनी व्यक्तियों के पास सबसे कम विकसित देशों के सकल घरेलू उत्पाद के बराबर पूँजी है। ऐसी तरह विश्व के ३२ सबसे धनी व्यक्तियों की संपत्ति दक्षिण एशिया के देशों - भारत, पाकिस्तान, बंगला देश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, मालवादीप, ईरान और अफगानिस्तान के सम्मिलित सकल घरेलू उत्पाद से अधिक है।
इससे स्पष्ट है की विश्व विकास के नाम पर किस दिशा में जा रहा है? भारत सहित समूची दुनिया में एक घोर गैर बराबरी से ग्रस्त समाज का निर्माण हो रहा है सवाल सिर्फ विकसित और विकासशील देशों के बीच बढ़ती विषमता का नहीं है, विकसित देशों में भी अमीर- गरीब के बीच खाई बढ़ रही है। अपने देश में भी विकसित देशों की तर्ज में विकास का आदर्श मंडल खा जाने वाला प्रान्त केरल आज आरती विकास की धीमी गति, बढ़ते सामाजिक, पारिवारिक असंतोष एवं वैमान के कारण ने मॉडल की तलाश में है। यहाँ उच्च शिक्षा के साथ बेरोजगारी भी बढ़ी है। साथ ही आत्महत्या का प्रयास करने वालों की संख्या में तीस गुना बढ़ोत्तरी हुई है। समाज में मनोरोगियों की संख्या भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है। यहाँ बढ़ते असंतोष, अवसाद के कारण बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति की वजह से केरल के निवासी एक समग्र आर्थिक विकास के मॉडल की खोज में है, जो जीवन की सार्थकता भी सिद्ध कर सके।
विकास की इस अंधी दौड़ में प्रकृति भी मनुष्य के लोभ, निरंकुश भोग एवं शोषण का शिकार हुई है आज विश्व के कई देशों एवं क्षेत्रों में जहाँ उजाला दीखता है, वही पृथ्वी अंधकारमय होती जा रही है। पिछले ३०० वर्षों में प्राकृतिक संसाधनों का जितना विनाश हुआ है, उतना मानव,प्रगति के पिछले २००० वर्षों में भी नहीं हुआ। जंगल रूपी पृथ्वी की सुरक्षा जैकेट का अंधाधुंध सफाया कई संकटों को अपने साथ लाया है। कार्बन डाई आक्साइड की बढ़ती मात्रा, पतली होती ओजोन परत, बढ़ता तापमान, पिघलते ग्लेशियर, बिगड़ता परिस्थितिकी तंत्र एवं मौसम चक्र, सब मनुष्य के लिए घोर विपत्ति का अंदेशा लेकर आ रहे है कृषि में रसायनों के अति उपयोग के कारण भूमि की स्थायी उर्वरता व फसल की गुणवत्ता दोनों को ही बहुत हानि पहुंचती है। खेतों -वनों में जैव–विविधता की निरंतर कमी से नये रोग, वायरस आदि का खतरा बढ़ता जा रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व की दो-तिहाई शहरी जनता प्रदूषित वायु के दमघोटू वातावरण में रहने के लिए मजबूर है ५० प्रतिशत शहरों में कार्बन डाई आक्साइड हानिकारक सीमा पार कर चुकी है। यूरोप के बड़े हिस्से में जीवनदायिनी वर्षा तेजाबी वर्षा में बदल चुकी है। विकास के इस मॉडल के तहत गंगा -यमुना प्रदूषित हो गयी है चीन की पिली नदी साल के २२६ दिन सागर तक नहीं पहुंच रही। दूषित जल, वायु एवं हरदा के कारण फल, शक व अन्न से लेकर दूध तक विषाक्त तत्वों से भरते जा रहे है। भारतीय समाज के लिए इसके भावी खतरे को सूचित करते हुए यु, एन. डी. पि. की १९९६ की मानव विकास रिपोर्ट की भूमिका में जेम्स गुर्स्तब स्मिथ ने कहा था -पिछले १४,वर्षों में न केवल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देशों के भीतर लोगों के बीच आर्थिक ध्रुवीकरण बढ़ा है। यदि यह खतरनाक परवर्ती जरी रही तो औद्योगिक एवं विकासशील देशों के बीच आर्थिक विषमताएं अनुचित न रहकर अमानवीय रूप धर लेगी।
जाने माने विचारक वोल्फ गोग साक इस संदर्भ में अपने सारगर्भित विचार प्रस्तुत करते हुए कहते है की विकास की जिस रोशनी की तरफ राष्ट्र एवं सरकारें पिछले ४-५ दशक से बढ़ी रही है वह रोशनी न केवल दूर होती जा रही है, बल्कि मंद पड़ती जा रही है। समय आ गया है की विकास की इस पद्धति से पीछा छुड़ा लिया जाए। मदर टेरेसा ने एक बार तुलना करते हुए कलकत्तावासियों को न्यूयार्क से अधिक विकसित बताया था क्योंकि कलकत्तावासियों में प्रेम और स्नेह -सौहार्द्र की मात्र अधिक है। उनके अनुसार ऐसा विकास मायने नहीं रखता, जिसमें मानवीय मूल्यों का कोई स्थान नहीं। इसी आधार पर सिनापुर को वहाँ के प्रधानमंत्री गोह चोक टुग अभी विकसित नहीं मानते है जबकि सुख-सुविधा एवं केन्द्रों में एक सफलतम व्यावसायिक केन्द्रों में एक है। चोक टुँग के अनुसार विकसित खलने के लिए मानवीय मूल्यों का विकास करना अभी शेष है। अतएव आज के परिप्रेक्ष्य में मानवीय विकास की सर्वथा नूतन व्याख्या अपेक्षित है, जो एकाकी आर्थिक प्रगति एवं मूल्यविहीन भोगवादी संस्कृति से मुक्त हो। जिसमें व्यक्ति भूख, गरीबी एवं अमानवीय शोषण के दंश से पीड़ित न हो। वह प्रकृति के साथ सामंजस्य -संतुलन बिठाने हुए प्रगति पर अग्रसर हो सके। यह वस्तुतः तभी संभव है, जबकि हम यह समझ सके की भारतमाता ग्रामवासिनी है और जीवन की सार्थकता अध्यात्मोमुखी होने में है। साथ ही हमें यह अनुभव करना होगा की सर्वोच्च मानवीय मूल्य संवेदना है। इस समझदारी से ही मनुष्य की भोगवादी एवं स्वार्थपरक निरंकुश परवर्ती पर अंकुश लगाकर उसे सहयोग -शकर के लिए प्रेरित किया जा सकेगा। ऐसा होने पर ही विकास की अंधी दौड़ में अपनी घोर निराशा एवं अस्तित्व के संकट की समस्या का समाधान होगा और मनुष्य के समग्र एवं सार्थक विकास का पथ प्रशस्त होगा।
महापराक्रमी और पुण्यात्मा विद्रुध समयानुसार दिगंत हुए और अपने सत्कर्मों के फलस्वरूप स्वर्ग में सुखोपभोग करने लगे। वहाँ सुख-साधन बहुत और परमार्थ का अवसर तनिक भी नहीं ऐसे स्वर्ग में उनका डीएम घुटने लगा। निरंतर खिन्न रहने लगे।
देवराज इंद्र ने एक दिन उनके खिन्नता का कारण पूछा, तो उन्होंने अपने मन की व्यथा सुनाई उन्हें सुख नहीं शाँति चाहिए। वे विलास में नहीं, परमार्थ में संतोष अनुभव करेंगे। उन्हें धरती पर जाकर व्याप्त दुष्प्रवृत्तियों के निवारण में बहुत शाँति मिलेगी-उसमें जो आनंद है, वह स्वर्ग में नहीं।
सुरगुरु बृहस्पति जी ने विद्रुध को देवसभा में बहुत सराहा और कहा -सुख -सुविधा से भरे हुए स्वर्ग की अपेक्षा तपस्वियों का तपः लोक अधिक श्रेष्ठ है, ऐसे व्यक्ति ही वरिष्ठ देवमानव कहे जाने चाहिए। इन्हें सेवा-साधना के बिना चैन नहीं मिलता।
रामकृष्ण परमहंस से नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद ) ने पूछा - भगवान! मनुष्य विचारशील और श्रेष्ठतम प्राणी जाना जाता है, फिर भी इसमें दो विभिन्नताएं पी जाती है। यह एक विरोधाभास ही है की एक श्रेणी निकृष्टता को ही पसंद करती है, तो दूसरी उत्कृष्टता को, परमार्थ परायणता को; ऐसा क्यों? परमहंस ने उदाहरण द्वारा समझाते हुए कहा - तराजू का जिधर का पल्ला भरी होता है, उधर को झुक जाता है, जिधर हल्का होता है उधर उठ जाता है मनुष्य का मन भी तराजू की भाँति है। उसके एक ओर संसार है, दूसरी ओर भगवान। जिसके मन में संसार,सुखोपभोग,मान-सम्मान का भर अधिक होता है, उसका मन भगवान की ओर उठकर संसार की ओर झुक जाता है। जिसके मन में वैराग्य, विवेक और आत्मज्ञान की प्रबल उत्कंठा का भर हो उसी का मन संसार की ओर उठकर भगवान् की ओर झुक जाता है
सुखी और स्वस्थ जीवन के लिए शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ होना अनिवार्य है। संतुलित आहार, आवश्यक व्यायाम एवं उचित विश्राम द्वारा पूर्ण स्वास्थ्यलाभ प्राप्त किया जा सकता है। व्यायाम से न सिर्फ बीमारियों से बचाव होता है, बल्कि यह चिकित्सा का सर्वजन सुलभ साधन भी है। यों तो व्यायाम कई तरह के होती है,, लेकिन सबसे सरल एवं सहज व्यायाम है टहलना या सैर। सुबह की सैर निरापद होने के साथ हर एक के लिए संभव एवं सहज है। इससे उत्तम स्वास्थ एवं दीर्घजीवन का आनंद उठाया जा सकता है।
सामान्यतया सैर प्रातः काल किये जाने का प्रचलन है। प्रातः सैर के वक्त तेज चल से चलना चाहिए जिससे शरीर के सारे अंग -प्रत्यंग सक्रिय -सतेज हो उठे। सुबह सवेरे का वातावरण स्वच्छ एवं दिव्य होता है। इस समय ब्रह्मांडीय किरणों की अधिकता होती है। अतः आधा - एक घंटा के लिए सैर पर निकलना न केवल शारीरिक दृष्टिकोण से वर्ण मानसिक परिप्रेक्ष्य से भी बहुत लाभदायक होता है। शायद इसी वजह से वैदिक वाङ्मय से लेकर प्राचीन शास्त्रों में भी प्रातः भ्रमण की बड़ी महिमा -महत्ता बताई गयी है।
आधुनिक जीवन जितना गतिशील है उतना ही जटिल हो गया है। जटिलता जीवन में तनाव जन्य परेशानियों व कठिनाइयों को जन्म देती है, जबकि प्राकृतिक सहचर्य से उपजी सरलता, शाँति, स्फूर्ति व सक्रियता का स्रोत। है अतः सरल, सहज व स्वास्थ जीवन के लिए भी प्रातः की सैर अनिवार्य जान पड़ती है।
पैदल घूमना दीर्घायु होनी का सफलतम सूत्र है इस सत्य को प्रत्येक चिकित्सा पद्धति ने दीर्घजीवी जीवन के लिए पदभ्रमण रूपी एक सूत्र कार्यक्रम अनोखा एवं निराला है। वैज्ञानिक के दल ने दीर्घायु जीवन जीने वाली की जीवनचर्या पर विशेष ध्यान -अन्वेषण किया। पूर्व सोवियत संघ के काकेशस, अल्खाजिया व यकुनिया क्षेत्रों में दीर्घायु व्यक्ति की संख्या आश्चर्यजनक रूप से अधिक है। संसार के सर्वाधिक शतायु व्यक्ति इन्हीं क्षेत्रों में होते है। अतः प्रयोग-परीक्षण हेतु स्नेही व्यक्तियों को चुना गया। इस प्रायोगिक निष्कर्ष से यही स्पष्ट पता चला है की इन व्यक्तियों के जीवन में पद भ्रमण जुड़ा हुआ है। पैदल चलना ही इनकी सेहत का कुँजी है। प्राकृतिक जीवन और पैदल चलने के कारण ही ये निरोगी, स्वास्थ एवं शतायु की सीढ़ी को पार करने में सफल हुए।
जापान के चिकित्साविशेषज्ञों के अनुसार प्रतिदिन दस हजार डग चलने से ८० से अधिक सम जिया जा सकता है। अमेरिका की स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी की आधुनिक शोध से स्पष्ट होता है की पद भ्रमण से आशान्वित परिमाण पाए गए है। प्रति सप्ताह १२ किलो मित्र अर्थात् डेढ़ किलोमीटर प्रतिदिन की दर से टहलना स्वास्थ में २१ प्रतिशत की बढ़ोतरी करता है २१ एक अन्य सर्वेक्षण से पता चला है की ग्रामीण एवं आदिवासी सदा ही पैदल चलने के आदी होते है, इसीलिए इनका स्वास्थ अपेक्षाकृत अधिक सबल है। ये प्रतिदिन औसतन ६ से १० किलोमीटर चल लेते है।
सुबह या शाम की सैर से शारीरिक रोग एवं मानसिक परेशानियों से मुक्ति मिलती है। इससे अन्य कई लाभ है घूमने से माँसपेशियों की सक्रियता बद जाती है। शरीर की ऐच्छिक एवं अनैच्छिक मांसपेशियां जागरूक हो जाती है। इस दौरान सर से लेकर पाँव तक लगभग २०० मांसपेशियां की गति शीलता इतनी अधिक नहीं होती है। सामान्यतया हृदय एक मिनट में बार धड़कता है। लेकिन तेजी से पैदल चलते समय इसकी धड़कन बढ़कर ८० से ऊपर हो जाती है। प्रति धड़कन के साथ हृदय से २५ ग्राम रक्त परिसंचरण होता है। इस प्रकार टहलने से हृदय द्वारा प्रत्येक मिनट में लगभग २५० ग्राम एवं एक घंटे में १५ किलोग्राम रक्त का संचरण हो जाता है। इस वजह से शरीर में रक्त का दौरा तेजी से होता है और पुरे शरीर में शुद्ध रक्त पहुंचने पर फुर्ती एवं तंदुरुस्ती आ जाती है इस क्रम में कोलेस्ट्रॉल और ट्रइंग्लिश राइडान की मात्रा में काफी कमी आने से हृदय रोग की संभावनाएं न्यून हो जाती है। एक लाभप्रद कोलेस्ट्रॉल एच, डी.एल. शरीर में बढ़ता है, जिससे रक्तचाप में कमी आ जाती है और हृदय की पेशियाँ मजबूत होती है शिराओं में संकुचन होने से अशुद्ध रक्त तेजी से निकलता है।
अतः सैर करने से आवश्यक प्राणवायु की प्रचुर मात्रा मिल जाती है। इससे केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र स्वस्थ एवं सतेज रहते है। मस्तिष्क में आन्तरिक आक्सीजन पहुंचने के कारण वह शाँत और शीतल रहता है, जिससे विचार करने की शक्ति बढ़ती है। तनाव, उद्विग्नता तथा चिड़चिड़ेपन की तो यह अचूक औषधि है। शरीर में आक्सीजन आपूर्ति बढ़ती है तथा फेफड़ों का वह भाग जो निष्क्रिय पड़ा रहता है, वह सक्रिय हो जाता है। लाल रक्त कं और होमोग्लोबिन में बढ़ोत्तरी होती है और इससे बढ़ी हुई रोग प्रतिरोधक क्षमता शरीर को नई मजबूती प्रदान करती है।
भोजन की संतुलित मात्रा रखकर यदि एक महीने तीस-चालीस मिनट तक रोज पैदल चला जाए तो अनावश्यक मोटापे में कमी देखी गई है। इससे आधा किलो तक भर घट जाता है। प्रातः भ्रमण से कोशिका स्तर पार भी आक्सीजन की पर्याप्त मात्रा प्रत्येक जैव रासायनिक क्रियाओं को अनुकूल रखती है। कोशिकाओं की टूटन -बिखराव की मरम्मत इससे बराबर होती रहती है। पसीने द्वारा शरीर से विषैले एवं त्याज्य पदार्थों का परित्याग सहज ढंग से होता रहता है। मांसपेशियां रक्त शर्करा की अतिरिक्त मात्रा का सदुपयोग कर लेती है। इस सम्बन्ध में वैज्ञानिक ने एक आश्चर्यजनक तथ्य का उद्घाटन किया है। उनके अनुसार प्रातः भ्रमण करने से इंसुलिन जैसे हरमो का स्राव नियमित एवं नियंत्रित होने लगता है। अतः डॉक्टरों ने यह तक कहा है की मधुमेह जैसे खतरनाक रोगियों के लिए प्रातः घूमना सबसे सरल एवं उपयोगी व्यायाम है। उच्च रक्तचाप के रोगियों को भी इससे लाभ मिलता है।
यह भ्रमण व्यायाम महिलाओं के लिए भी उपयोगी एवं लाभप्रद होता है। चिकित्साविज्ञानियों के एक दल ने कुछ इसी महिलाओं पार प्रयोग किया जो नित्यप्रति अतः सैर करने जाती है। इनके अध्ययन से यह पता चलता है की शारीरिक हारों स्राव में नियंत्रण एवं नियमन हो जाने से अधिकतर महिलाएं स्वस्थ तथा प्रसन्न रहती है। एक किलोमीटर घूमने से १०० कैलोरी ऊर्जा खर्च होती है। जो लोग शारीरिक श्रम नहीं करते उनके शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा का सदुपयोग नहीं होता और खासकर महिलाओं में मोटापे की शिकायत हो जाती है। अतः इससे मुक्ति का एकमात्र निदान है -प्रातः या समय सैर करना।
सही मायने में टहलना सबसे सुलभ एवं सरल व्यायाम है अन्य तरह के व्यायाम के लिए भले ही मार्गदर्शन की जरूरत पड़ती है। परन्तु टहलने के साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं है। निरोगी एवं स्वस्थ जीवन के लिए हरेक को प्रकृति के सान्निध्य में आना चाहिए और इसके लिए उन्मुक्त उपाय है - सुबह की सैर।
स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास हो सकता है। अतः मन मस्तिष्क को शाँत तथा विचारपद्धति को संतुलित बनाए रखने के लिए प्रातः सैर का कार्यक्रम अनिवार्य रूप से अपनाया जाना चाहिए।
महाभारत के पात्र पांडवों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर की धर्मराज ने कई बार परीक्षा ली। वन में अज्ञातवास की अवधि में धर्मराज ने यक्ष रूप में आकर, जब पानी पीने आए चारों पांडवों को मृतवत कर दिया, तब उनके समुचित उत्तर देने पर वे सभी जीवित हो गए और उनसे वर माँगने को कहा गया। वे चाहते तो छिना गया राज्य-वैभव माँग सकते थे। पार उन्होंने अपना अंतिम वर मांगा - हे भगवान! मैं लोभ, मोह, और क्रोध को जीतकर दान, तप, सत्य में परवर्त रहूं -सब पर मेरा एक जैसा स्नेह बना रहे, कभी किसी के प्रति दुर्भाव न आए -यही वर चाहता हूँ।
राजकुमार सिद्धार्थ और मंत्रीपुत्र देवदत्त दोनों साथ -साथ बाग में घूमने जा रहे थे। सहसा सिद्धार्थ ने देखा दो सुन्दर राजहंस आकाश में जा रहे हैं। उन्हें देखकर वह प्रसन्न हो उठा -देवदत्त! देखो ये कितने सुँदर पक्षी जा रहे है। देवदत्त ने ऊपर देखा और अपना धनुष बाण उठाया, एक पक्षी को मार गिराया सिद्धार्थ की प्रसन्नता शोक और व्याकुलता में प्रिंट हो उठी। सिद्धार्थ दौड़े और रक्त से सने राजहंस को गोदी में उठा लिया और सीने से लगा लिया।
इस पक्षी पार मेरा अधिकार है सिद्धार्थ देखते नहीं हो, इसे मैंने बाण से मारा है। देवदत्त ने कहा। सिद्धार्थ बिना कुछ कहे -सुने पक्षी को लेकर चले गये भवन में और वहाँ उसकी सेवा -सुश्रूषा करने लगे। देवदत्त ने उस समय राजकुमार समझकर कुछ झगड़ा नहीं किया, किन्तु जवाब इनकारी में ही मिला। सिद्धार्थ बड़े प्यार से उसकी सेवा में लगे।
देवदत्त ने न्यायप्राप्ति के लिए महाराज के पास जाकर शिकायत की। महाराज ने दोनों को दरबार में उपस्थित होने की आज्ञा दी। एक ओर देवदत्त खड़े थे दूसरी ओर सिद्धार्थ अपनी गोद में पक्षी को लिए हुए। देवदत्त ने अपना तर्क प्रस्तुत किया -महाराज मैंने पक्षी को बाण मारा, इसलिए इस पर मेरा अधिकार है। किन्तु मैंने इसे बचाया है। मरने वाला नहीं, बचाने वाला बड़ा होता है। इसलिए इस पर मेरा अधिकार होना चाहिए सिद्धार्थ ने बिना पूछे कहा। महाराज ने पक्षी को दोनों के बीच में छुड़वा दिया और वह स्वयं सिद्धार्थ के पास चला गया। यही है वह अन्तः की भावना, जो बचपन में बीज रूप में जन्म लेकर बाद में आत्मविस्तार का स्वरूप लेती है और व्यक्ति को विश्वमानव बना देती है
सभ्यता और संस्कृत के विकास का आरम्भ परिवारसंस्था के साथ जोड़ा जा सकता है। पौराणिक और अध्यात्मिक दृष्टि से इसके उद्भव की जो भी कथाएं हैं, समाज-शास्त्रीय दृष्टि से मनुष्य के भीतर जन्मे सहयोग और अनुराग को परिवार का आधार कहा जाता है। सहयोग-सद्भाव का जन्म न होता तो न स्त्री-पुरुष साथ रहते, न संतानों का जिम्मेदारी से पालन होता और न ही इस तरह बने कुटुँब के निर्वाह के लिए विशिष्ट उद्यम करते बनता। बच्चों को जन्म और प्राणी भी देते हैं। एक अवस्था तक वे साथ रहते है और अपना आहार खुद लेने लायक स्थिति में पहुँचने पर अपने आप अलग हो जाते हैं, उन्हें जन्म देने वाले युगल को भी उनकी कोई चिंता नहीं रहती। मनुष्य ने साथ रहना शुरू किया और उस कारण दायित्व बढ़े तो उन्हें पूरा करने के लिए नए साधनों की खोज भी करनी पड़ी। इस खोज में ही विज्ञान, शिक्षा, प्रौद्योगिकी, संस्कार, समूह, ग्राम, नगर, राज्य, समाज, देश, आदि आयाम प्रकट होने लगे। मनुष्य अपनी यात्रा पर तेजी से बढ़ने लगा लगा और कुछ ही समय में वह अपने आपको सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहलाने की स्थिति में पहुँच गया।
विकास की इस यात्रा के पीछे कहीं-न-कहीं।परिवारसंस्था ही विद्यमान है यदि यह संस्था नहीं होती तो सीधे प्रकृति से आहार लेने और अपने शरीर का रक्षण करने के सिवा कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं थी। मनुष्य सभ्यता का इतिहास परिवार बसाने की और उसकी आवश्यकता पूरी करने, उसके सदस्यों के विकास की चिंता करने के बिंदु से आरंभ होता है। एक-दूसरे के लिए त्याग, बलिदान, उदारता, सहिष्णुता, सेवा और उपकार जैसे मानवीय अध्यात्मिक मूल्यों की प्रयोगशाला भी परिवार का परिकर ही है।
समाजशास्त्री मानते हैं कि समाज, देश, विश्वमानवता जैसी धारणाएं भी परिवार का ही विकसित रूप है। पति-पत्नी और उनकी संतान से बनी इकाई में जब संतानों के पत्नी-बच्चे भी आ जुड़ें तो संयुक्त परिवार का उदय होता है। संयुक्त परिवार ने बस्ती, ग्राम और नगर के रूप में विकास किया। विरत रूप लेते गए इस स्वरूप के साथ सामूहिकता, व्यापकहितों की भावना और उनके लिए मर मिटने का उत्सर्ग अथवा पूरा जीवन खपा देने वाला समर्पण भाव जन्मा। उनकी व्यवस्था के लिए विधिविधान बने, नागरिक और प्रशासनिक संगठनों का ढाँचा तैयार हुआ विज्ञानं के सहयोग से उत्पादन, संरक्षण और विकास के विभिन्न आयाम खुले। इस सारणी को आगे बढ़ते जाएँ, तो सभ्यता-संस्कृति के विकास की हर कड़ी परिवारसंस्था के आरंभ से जुड़ती चली जाती है।
परिवारसंस्था संबंध में यह पृष्ठभूमि चित्रित करने का उद्देश्य? अध्यात्मविद्या मानते है कि मनुष्य की चेतना अभी कुटुंब-परिवार की सीमा लाँघकर आगे नहीं बढ़ी है नगर, ग्राम, देश, समाज उसके अगले विस्तार जरूर हैं लेकिन मानवीय चेतना ने उसमें अभी रंग नहीं भरा है। अपने आप को उससे पूरी तरह नहीं जोड़ा है। देश, समाज उसकी विकासयात्रा के अगले पड़ाव हैं, लेकिन वे बहुत दूर हैं। उन्हें लक्ष्य कहा जा सकता है, खाका बताया जा सकता है, रूपरेखा समझा जा सकता है, जिन्हें अभी ठोस आकर लेना है। अध्यात्मविद् यह भी मानते हैं कि इन रेखाओं में रंग भरने से पहले ही एक दुर्घटना घट गयी है। उस दुर्दशा के कारण परिवारसंस्था सुदृढ़ होने के स्थान पर जर्जर होने लगी अब उसके टूटने के लक्षण दिखाई देने लगे हैं। समाजशास्त्री कहते हैं कि उस दुर्घटना के कारण परिवार के सदस्य एक-दूसरे के प्रति सेवा और उत्सर्ग का भाव रखने के स्थान पर स्वार्थी-संकीर्ण होने लगे हैं। अपने सुख और भोग के लिए अत्यंत आत्मीय स्वजन की बलि चढ़ाने में अब हिचक भी मिटती जा रही है अ
परिवार के विकास का एक प्रयोग इस सदी के आरम्भ में श्कम्यून लार्जर फैमिलीश् के रूप में किया गया था। साम्यवादी व्यवस्था के शुरुआती दिनों में प्रयोग चले भी। जहाँ साम्यवादी व्यवस्था नहीं थी, वहाँ सहकारी प्रयोगों में उसका प्रभाव दिखाई दिया। आठवाँ दशक पूरा होने तक साम्यवादी व्यवस्था दम तोड़ने लगी। उसके साथ कम्यून और सहकारी जीवन के प्रयोग भी लड़खड़ा गए। परिवारसंस्था का आधार खिसकने लगने का यह उपलक्ष्य मात्र है, मुख्य समस्या इसके अस्तित्व पर मंडराने लगे संकट और उसके गहराते जाने कि है।
संकट का स्वरूप कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं इस शताब्दी का उत्तरार्द्ध शुरू होने तक भारत में संयुक्त परिवारों का चलन लोकप्रिय था। माता-पिता अपने बच्चों और उनकी संतानों के साथ मजे से रहते थे। तीन और उससे ज्यादा पीढ़ियाँ भी एक ही परिसर में रहतीं, एक ही चौके में बना भोजन करतीं और सुख-दुःख को हार्दिक स्वीकृत से निभाती चलती थीं। छठें-सातवें दशक में संयुक्त परिवार बिखरने लगे। ये अपवाद पहले भी थे, जिनमें पति-पत्नी और उनके बच्चे माँ-बाप से अलग बस जाते थे, लेकिन उनका अनुपात बीस-पच्चीस प्रतिशत ही था। गाँव, समाज और रिश्तेदारी में उन्हें निन्दित भाव से देखा जाता था। सातवें दशक में संयुक्त परिवार की टूट को सहज भाव से देखा जाने लगा, क्योंकि वह यात्रा-तत्र बहुतायत घटने लगी थी।
टूट के कारण रोजगार के अवसर और स्वरूप में बदलाव के साथ सुविधा-साधनों के प्रति बढ़ती हुई ललक बताई गई। कहा गया में संयुक्त परिवार की टूट को सहज भाव से देखा जाने लगा, क्योंकि वह यात्रा-तत्र बहुतायत घटने लगी थी।
टूट के कारण रोजगार के अवसर और स्वरूप में बदलाव के साथ सुविधा-साधनों के प्रति बढ़ती हुई ललक बताई गई। कहा गया कारण हैं, जैसे कहीं सम्मिलित खेती है या साझा व्यवसाय है अथवा अनबटी पैत्रिक संपत्ति है। जले हुए कपड़ों की भस्मीभूत धागों की तरह वे दिखाई भले ही न देते हों, वस्तुस्थिति वैसी नहीं है। हवा का एक हल्का-सा झोंका भी उन्हें बिखेर देने के लिए पर्याप्त है।
बीस-पच्चीस वर्षों में संयुक्त परिवारों का कम तमाम हो गया। अब बारी एकल परिवारों की है। जिन्हें वास्तविक और मूल जैसे विश्लेषणों से संबंधित किया जाता है। पति-पत्नी पहले भी कामों में हाथ बँटाते और एक-दूसरे के दायित्वों को संभालते हुए स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाये रखते थे अब स्वतंत्र व्यक्तित्व का आग्रह अलग रूप लेने लगा है। उसके अनुसार, प्रत्येक का अपना अलग व्यवसाय है। निजी और सामाजिक जीवन है, दायित्व है, इच्छाएँ-आकांक्षाएं हैं और हित या स्वार्थ है। क्षुद्र अहं से प्रेरित स्वतंत्र व्यक्तित्व का आग्रह इतना हठीला और क्रूर है कि दूसरे का सहयोग-हस्तक्षेप तो दूर ताँक–झाँक तक बर्दाश्त नहीं है। पति-पत्नी के निजी एकान्तिक संसार की तरह बच्चों में भी अपनी निजता या प्राइवेसी का आग्रह बढ़ने लगा है। कथित वास्तविक परिवार में पड़ रही इस दरार को महानगरों की जीवनशैली पर आँख गड़ाए रहने वाली संस्थाओं ने रेखांकित किया है। नीराजनश् नामक स्वयंसेवी संस्था द्वारा किये गए एक अध्ययन के अनुसार दिल्ली, बंबई, कलकत्ता और चेन्नई के कामकाजी परिवारों में २० प्रतिशत अपने बच्चों और साझा जरूरतों को लेकर ही एक दूसरे में रुचि लेते है, इन विषयों पर विचार करते है और उतनी ही जिम्मेदारी समझते है। शेष उनका अपना जीवन है, जिससे जीवनसाथी को कोई मतलब नहीं होना चाहिए।
महानगरों में बिना विवाह के साथ रहने और संतान को जन्म देने की प्रवृत्ति भी जड़े जमाने लगीं हैं। इस तरह का सहजीवन जब तक मन करे साथ रहने और बाद में अलग हो जाने की छूट देता है। उस स्थिति में किसी का भी किसी के प्रति वैधानिक दायित्व नहीं बनता। न आपस में और न बच्चों के प्रति एन प्रवृत्तियाँ परिवारसंस्था पर मंडराते जा रहे संकट की।ोतक हैं। दूर की सोचने वाले मनीषी चिंतित हैं कि दिशाधारा यही रही, तो सभ्यता और संस्कृति भी क्या सिकुड़-सिमट जाएगी? जिस आत्मीयता. स्नेह और उत्सर्ग की भावना ने उसका आधार रचा, वही लुप्त हो गया तो संकट की विभीषिका का सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है। उज्ज्वल भविष्य की की आशा रखने वाले आस्तिकजन निराश नहीं हैं। उनकी आशा है कि जगतनियंता हस्तक्षेप जरूर करेंगे और अपनी रचना को निश्चित ही सुरक्षित निकाल लेंगे।
कड़ाके की ठण्ड पड़ी। पृथ्वी पर रेंगने वाले कीटक उससे सिकुड़कर मरने लगे अन्य प्राणियों के लिए आहार की समस्या उत्पन्न हो गयी। लोग शीतनिवारण के लिए जलावन ढूंढ़ने निकले। सबके शरीर अकड़ रहे थे कष्टनिवारण का उपाय किसी से बन नहीं पड़ रहा था। वृक्ष से यह सब देखा न गया। इन कष्टपीड़ितों की सहायता के लिए उसे कुछ तो करना ही चाहिए। पर करे भी तो क्या उसके पास न बुद्धि थी, न पुरुषार्थ, न धन, न अवसर। फिर भी वह सोचता ही रहा- क्या मेरे पास कुछ भी नहीं है? भला ऐसे कैसे होगा। सर्वथा साधनहीन तो इस सृष्टि में एक कण भी नहीं रचा गया है? गहराई से विचार किया तो लगा कि वह भी साधनहीन नहीं है। पत्र-पल्लव की प्रचुर सम्पदा प्रकृति ने उसे उन्मुक्त हाथों से प्रदान की है। वृक्ष ने संतोष की साँस ली। पुलकन उसके रोम-रोम में दौड़ गई। वृक्ष ने अपने सारे जमीन पर गिरा दिए। रेंगने वालों ने आश्रय पाया, पशुओं को आहार मिला, जलावन को समेटकर मनुष्यों ने आग तापी और जो रहा- बचा सो खाद के गड्ढे में दल दिया।
कुछ समय उपराँत बसंत आया। उसने ठूँठ बनकर खड़े वृक्ष को दुलारा और पुराने पत्तों के स्थान पर नई कोपलों से उसका अंग-प्रत्यंग सजा दिया। यह तो उसके दान का प्रतिदान था। अभी उपहार का अनुदान शेष था, सो भी वसंत ने नए वासंती फूलों से, मधुर फलों से लादकर पूरा कर दिया। वृक्ष गौरवान्वित था और संतुष्ट भी।
दुनिया में कितनी ही मनुष्यकृत रचनाएँ हैं वे सबकी-सब सरल, सहज, और बुद्धिगम्य हैं, सो बात नहीं। उनमें से आज भी दुर्बोध बनी हुई हैं और अधुनातन मानव के समक्ष चुनौती प्रस्तुत कर रही है। इन्हीं में से एक है- थीब्स के विशाल पाषाण विग्रह मेमनन के नाम से विख्यात यह भीमकाय मूर्तियाँ मिस्र में नील नदी के किनारे पर थीब्स के भग्नावशेषों के मध्य लम्बे काल से खड़ी हैं। कहा जाता है कि यह मूर्तियाँ वास्तव में मेमनन कि नहीं, वरन् अमेन्होटेप की हैं, परन्तु चिर काल से यह मेमनन के नाम से ही प्रसिद्ध है। अगल-बगल बनी इन प्रतिमाओं में से प्रत्येक की ऊँचाई ५० फुट है और दोनों के बीच की दूरी भी इतनी ही है।
इन विग्रहों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि समय-समय पर ये चित्र-विचित्र आवाजें निकलते रहते हैं; लम्बे काल से अब यह मौन हैं। निर्माण के पश्चात् भी बहुत समय तक यह निस्तब्ध बने रहे थे। उपलब्ध प्रमाण बताते हैं कि बीच का २०० वर्षों का कालखंड ऐसा रहा है, जिसमें यह मूर्तियाँ मुखर हुई थीं।
इनकी रचना ईसापूर्व १५०० में हुई बताई जाती है। तब से अब तक काल के थपेड़े को झेलते हुए यह निर्माण अपनी उपस्थित को बनाए हुए हैं, किन्तु अंग-भंग और विकृत अवस्था में। पूर्वी छोर की मूर्ति को इसकी अधिक मर झेलनी पड़ी है पीठिका से लेकर कमर तक यह एक ही प्रस्तर खंड से बनी है और जगह-जगह दरार युक्त है कमर से ऊपर तक यह पाँच तल में विभक्त है और अपेक्षाकृत छोटे शैलखण्डों से विनिर्मित है, जबकि पश्चिमी किनारे की प्रतिमा एक ही चट्टान से बनी है।
यों तो सीना, हाथ और पैर इसके भी क्षतिग्रस्त हैं; लेकिन तुलनात्मक दृष्टि से यह अधिक सुरक्षित मन जा सकता है।
इन दोनों संरचनाओं में केवल पूर्वी छोर वाली मूर्ति की आवाज़ेने अब तक सुनी गयी हैं, जबकि दूसरी प्रतिमा अपने निर्माण काल से ही चुप हैं। ऐसा मन जाता है कि सर्वप्रथम ईसापूर्व में मेमनन की मूर्ति से ध्वनि निस्सृत हुई थी। उस समय से सन ६ तक बीच-बीच में लम्बे-छोटे अंतराल पर उसकी आवाजें सुनी गईं, तदुपराँत उसके सुने जाने का कोई साक्ष्य नहीं मिलता। ईसापूर्व में पहली बार किसी प्रमाणिक व्यक्ति ने इस बात की पुष्टि की कि मेमनन की प्रतिमा सचमुच बोलती है। यह थे तत्कालीन प्रसिद्ध इतिहासकार स्ट्रैबो। अपने यात्रा वृत्तांत में इस बात का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं कि उससे निकलने वाली ध्वनि हलके प्रहार जैसी थी एक अन्य यात्री पउसैनियाज वह वीणा के तर टूटने जैसी थी। उल्लेखनीय है की पउसैनियाज ने थीब्स की यात्रा १३० में सम्राट हैड्र यिन के साथ की थी इन भिन्नताओं के आधार पर ध्वनि की तान के बारे में किसी एक निश्चय पर पहुँच पाना संभव नहीं; पर इसके समय के संबंध में सभी एकमत थे। सभी ने मेमनन की आवाज़ का समय सूर्योदय के करीब बताया है। मूर्ति पर अंकित यात्रियों के विवरण से ज्ञान होता है कि दो बार प्रतिमा की ध्वनि सूर्योदय से पूर्व निकली थी। १८ बार यह सूर्योदय के बाद सुनी गयी। ८ बार सूर्योदय के बाद के प्रथम घंटे में, ६ बार सूर्योदय सूर्योदय के एक घंटे बाद, २ बार सूर्योदय के दूसरे घंटे में तथा ३ बार सूर्योदय के दो घंटे पश्चात्। इस प्रकार कुल ३९ पर्यटकों द्वारा अपने भ्रमणकाल में कर की गई ध्वनि का समय विग्रह पर उल्लिखित है उक्त उल्लेख से ऐसा विदित होता है कि इनमें से अधिकाँश ध्वनियाँ फरवरी और मार्च के महीने में सुनी गईं। ऐसा भी नहीं कि हर प्रातः ये निकलती हों; पर वर्ष में कई-कई बार यह अवश्य निस्सृत होती थीं। कितने ही लोगों को इसे एक से अधिक बार सुनाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जबकि ऐसे भी अनेक यात्री थे, जिनको अपनी दूसरी-तीसरी यात्रा तक इसके लिए इंतजार करना पड़ा।
ऐसा कहा जाता है कि सन २०० से मेमनन का विग्रह मौन है; लेकिन इ. स्मिथ नामक एक अंग्रेज पर्यटक ने इसे मार्च १८२१ में सुनने का दावा किया है। यों तो किसी उन्नीसवीं सदीं में किसी अंग्रेज घुमंतू के मिस्र पहुँचने थीब्स जाने का कोई प्रमाणिक सुबूत नहीं मिलाता, फिर भी इस बात को तात्कालिक ग्रंथों में ढूंढ़ा जा सकता है कि उस दौरान भी लोग वहाँ आते-जाते रहे। रिव्यू इन्साईक्लोंपीडिक ही एकमात्र ऐसा ग्रन्थ है, जिसमें ए. स्मिथ की मिस्रयात्रा की चर्चा है इसलिए विशेषज्ञ इस बारे में संदेहशील है कि निकट भूत में मेमनन की मूर्ति मुखर हुई थी।
ध्वनि उत्पत्ति स्थान के संबंध में भिन्न-भिन्न मान्यताएं हैं कुछ लोग इसे पीठिका से उत्पन्न बताते हैं, जिनमें स्ट्रैबो भी एक हैं, जबकि अनेक इसका स्थल प्रतिमा देह को मानते है कईयों का कहना है कि इसका स्रोत मूर्ति-मुख है गवेषकों की विस्तृत खोज भी अब तक इस बात का सही-सही निर्धारण नहीं कर सकी है कि आवाज़ का वास्तविक केंद्र विग्रह में कहाँ हैं।
ध्वनि कि प्रकृति के बारे में भी एक-सी धारणाएँ नहीं है। कुछ अनुसंधानकर्ताओं ने तो इसकी वास्तविकता पर उंगली उठायी है और कहा है कि यह किंवदंती के अतिरिक्त कुछ नहीं है। विलकिंसन जैसे शोधकर्ताओं ने इसमें अभियाँत्रिकी के प्रयोग की बात कही है। दुर्भाग्यवश उनका यह अनुमान गलत साबित हुआ, क्योंकि कर्जन आदि शोधकर्मियों की सूक्ष्म पड़ताल के बाद भी मूर्ति के उदार में ऐसी किसी युक्ति का पता नहीं चल सका। अधिकाँश लोक इसकी प्रकृति को अलौकिक मानते और इसे चमत्कार की संज्ञा देते हैं; किन्तु ऐसे लोगों की भी कमी नहीं, जो इसे प्रकृति के मर से उत्पन्न हुई, विग्रहविकृति का परिणाम मानते हैं। सच्चाई क्या है? अभी तक अविज्ञात है। इसके दैवी शक्तियुक्त होने की बात स्वीकारने वालों के कुछ ठोस तर्क हैं। वे कहते हैं कि यदि आवाज़ किसी याँत्रिक युक्ति का परिणाम होती, तो वह हमेशा उत्पन्न होनी चाहिए थी। यहाँ इस संभावना पर भी गहरे से विचार किया गया है कि कदाचित याँत्रिकी और प्रकृति दोनों का संयुक्त नतीजा हो अर्थात् कुछ ऐसे यन्त्र मौसम और परिस्थिति के तालमेल से बिठाए गए हों कि उस मौसम विशेष में ही वह उपकरण सक्रिय होते हों और ध्वनि निकलती हो गहन जाँच-पड़ताल में यह संभव्यता निरस्त ही जाती है। यदि सचमुच ऐसा होता, तो वर्ष के निर्धारित समय में सदा ही मूर्ति के बोल निकलने चाहिए थे, पर ऐसा नहीं होता। उस दौरान कुछ ही बार ध्वनि प्रस्फुटित होती है। यह उसके अलौकिक उद्गम कि ओर संकेत करता है। यदि सूर्य प्रकाश से यन्त्र का कोई सीधा सम्बन्ध मन लें, तो हर सूर्योदय के प्रति उसकी प्रतिक्रिया सामने आनी चाहिए थी, कम-से-कम फरवरी-मार्च के नियमित महीने में तो अवश्य ही; लेकिन ऐसा नहीं होता देखा जाता। यह भी याँत्रिक अथवा प्राकृतिक निमित्त को अमान्य करता है। ऐसी स्थिति में उसके दैवीय होने की पुष्टि होती है।
दूसरी ओर इस बात के भी पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं कि प्रतिमा आरम्भ
काल से ही मौन थी। प्रख्यात फ्राँसीसी पुराविद एवं इतिहासकार जे.ए. लेट्रोंन अपने ग्रन्थ श्ला स्टैच्यू वोकल डी मेमनन में लिखते हैं कि यदि विग्रह शुरू से ही उक्त गुणसम्पन्न होता, तो इसका उल्लेख कहीं-न-कहीं अवश्य होता। इस बात की भी चर्चा नहीं मिलती कि ये तत्कालीन लोगों के श्रद्धा के केंद्रबिंदु थे। उनका मानना है कि इतनी चमत्कारिक घटना का वर्णन कहीं न हो, यह अपने आपमें आश्चर्यजनक है। प्रायः ऐसा होता नहीं, अतएव वे मानते उन्हें महिमामंडित करने वाले शायद ग्रीक यात्री हों। जब मिस्र पर रोमानो का आधिपत्य हुआ, तो मेमनन मूर्ति की स्थापन के पंद्रह शताब्दी बाद कदाचित यह अवधारणा स्थापित हुई हो और तभी से अपरिवर्तित चली आ रही हो। तत्कालीन मिस्रवासियों के लिए यह मूर्ति सम्माननीय तो थी,; पर पूजनीय नहीं। उनके लिए वे सिर्फ एमेनहोटेप कि प्रतिमाएँ थीं। इससे उनके दैवीय होने का खंडन होता है।
संप्रति यह गहन शोध का विषय है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पूर्व तत्संबंधी वस्तु के विभिन्न पहलुओं पर सूक्ष्मतापूर्वक विचार करना पड़ता है। इतने पर भी संसार में कितने ऐसे रहस्य हैं, जिनका ठीक-ठीक उत्तर नहीं ढूंढ़ा जा सकता हैं। अनुमान और आकलन द्वारा उनकी मनगढ़ंत व्याख्या कर देना एक बात है और यथार्थ का अनावरण करना सर्वथा दूसरी। आशा करनी चाहिए की आगामी समय में विज्ञानं इन रहस्यों पर से पर्दा हटा सकेगा और उनका युक्तियुक्त जवाब देने में सफल होगा।
विश्वविख्यात वैज्ञानिक आविष्कारक थामसअल्वा एडीसन ने जीवनभर एकनिष्ठ भाव से आविष्कारों में रुचि ली और अपनी समूची तत्परता उसी एक कम में लगायी ग्रामोफोन, टेपरिकार्डर; चलचित्र, कैमरा, बिजली के बल्ब जैसे छोटे-बड़े २५०० आविष्कारों का अपना कीर्तिमान है। दूसरा कोई भी अभी तक इतने प्रकार के इतने महत्वपूर्ण कम नहीं कर सका है। एडीसन बचपन में ही बहरे हो गए थे, लेकिन इसका उन्होंने कभी दुःख नहीं माना। माता-पिता के शिक्षण से स्वावलंबी बने एवं हमेशा अपनी प्राकृतिक कमी को ईश्वरीय वरदान कहते रहे। उनका कहना था कि बेकार कि गप्पबाजी में अपना समय गुजारते हैं। मुझे ऐसी बरबादी का सामना नहीं करना पड़ता, वह समय मैं सोचने और पढ़ने में लगता हूँ। यदि दूसरों कि तरह मेरे भी कान खुले होते, तो इतना न कर पता, जो कर पाया।
एडीसन ने छोटे कामों में भी कही हेठी अनुभव न की। वे हर कम को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर, उसे सही, पूरा और शानदार स्तर का बनाने का प्रयत्न करते थे। रेल के डिब्बों में सब्जी बेचना, अख़बार बेचना, तार बाँटना जैसे अनेक छोटे काम उन्हें अपने आरंभिक जीवन में करने पड़े, पर इसमें कभी हीनता का अनुभव नहीं किया। हर काम को इज्जत का मानना और हर अवसर के महत्वपूर्ण सदुपयोग का शिक्षण, उन्हें उनके माता-पिता द्वारा बचपन से ही मिला था।
चुनाव संपन्न होने के बाद कौन प्रधानमंत्री बनता है- कहना कठिन है पिछले बावन वर्षों में कितने ही प्रधानमंत्री सत्तारुढ़ हुए काँग्रेस के अतिरिक्त विरोधी दलों को भी सत्ता संभालने के अवसर प्राप्त हुए; पर जिस रूप में भी हम सब मिलकर इस लोकसभा का संचालन कर रहे हैं, उसे सही नहीं कहा जा सकता।
पाँच वर्ष की अवधि के लिए चुनी गई लोकसभा की औसत उम्र का हिसाब निकाले तो वह ढाई वर्ष भी नहीं बैठता। शुरू की तीन लोकसभाओं ने अपना कार्यकाल पूरा किया। चौथी लोकसभा चार वर्ष चली तब तक लोकतंत्र वयस्क हो चुका था। उसके बाद बनी नौ लोकसभाओं में कोई एक साल चली, तो कोई तीन। यानी बाद की सभी प्रतिनिधि- सभाएँ कालकलवित हुईं।
अब नई लोकसभा चुनी जा रही है और नै सरकार कार्यभार सँभालने को है तो लोकतंत्र के स्वास्थ और भविष्य के बारे में विचार किया जाना चाहिए आजादी के शुरुआती दिनों में चार-पाँच प्रमुख पार्टियाँ होतीं थीं। उनमें एक पार्टी जो सत्तारुढ़ रहती, काँग्रेस कही जाती थी १९७७ तक शासन करने वाले दल या समूह का नाम काँग्रेस ही हुआ करता था आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाली वाली काँग्रेस में ७७ से पहले भी टूट आई लोगों ने उसे ही असली माना, जो सरकार बनाने और चलने में कामयाब हो सकी। १९५० से तक काँग्रेस के अलावा जनसंघ, कम्युनिस्ट, समाजवादी, स्वतंत्र और हिन्दू महासभा आदि दल भी हुआ करते थे। लेकिन १९७७ की महाक्रान्ति ने उन सबका विलय कर दिया। जनता प्रयोग के बाद काँग्रेस पहली बार सत्ता से बाहर आई। वह टूटी भी सही। लेकिन तीन साल बाद ही इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में वह फिर वापस आ गयी इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद गठित हुई आठवीं लोकसभा ने तो जैसे सभी दलों को ध्वस्त कर दिया। देश में काँग्रेस-ही-काँग्रेस रह गई लेकिन यह दूर देर तक नहीं चला। तीन-चार साल में ही सत्तारुढ़ पार्टी बिखरने लगी। इसमें से निकाले विश्ववनाथ प्रतापसिंह आदि ने दूसरे दलों के साथ मिलकर फिर जनता प्रयोग किया और सरकार बनाई। सरकार में शामिल विभिन्न दलों, विचारों या निहित स्वार्थों की टकराहट ने उस प्रयोग को फिर तोड़ा। इसके बाद का समय काँग्रेस और दूसरे दल तथा भाजपा और दूसरे दल या तीसरी शक्तियों की मिल−जुलकर बनी सरकारों का युग रहा।
चुदाह्विन लोकसभा के चुनाव ने अपने अभियान में यह तथ्य स्पष्ट रेखाँकित किया है कि भारतीय राजनीति में दल और विचार जैसा कोई विभाजन नहीं रह गया है जो लोग पिछले चुनाव या छः महीने पहले तक किसी पार्टी के घोर विरोधी हुआ करते थे, चुनाव आते-आते उनमें से कई उन्हीं दलों में शरणार्थी बन गए। नीतियों और कार्यक्रमों से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव में निजी संभावनाएं हो गई जीत सुनिश्चित करने के लिए फिर जैसे भी उप्पे किए जाते हैं, वे सभी जानते हैं। हज़ार बार हज़ार अवसरों पर कहा जा चुका है कि अपनी तमाम खामियों के बावजूद लोकतंत्र सर्वश्रेष्ठ शासनव्यवस्था है। जो स्वरूप उसका अभी प्रचलित है, वह कितने ही प्रयोगों और अनुभवों से निखर कर आया है चिंता यही करनी चाहिए कि वह कैसे और परिष्कृत बने। इसी के लिए प्रयत्न भी किये जाने चाहिए। बीस-पच्चीस साल बाद भारत का लोकतंत्र जिस तरह पटरी से उतरा वहीँ से शुरुआत करें। पहली लड़खड़ाहट यह है कि प्रतिनिधि-संस्थाएँ अपनी अवधि पूरी नहीं कर पातीं। समर्थन देने, मोर्चों में शामिल होने, दल बनाने और तालमेल बिठाने के साथ ही उन्हें उलट देने का जो क्रम चल पड़ा, वह प्रतिनिधिसंस्थाओं की आयु क्षीण कर देता है। चुदाह्विन लोकसभा में चुनकर आये सदस्य कृपया यह निश्चित कर ले कि इसे पूरे समय चलने देंगे। भारत जैसे देश में बार-बार चुनाव होना देश-समाज पर ज्यादती ही है। बचाव के लिए कहा जा सकता है कि चुनाव में होने वाला खर्च आखिर इसी देश में रहता है, कहीं बाहर तो नहीं जाता। हजारों कार्यकर्ताओं और लाखों मजदूरों को काम मिलता है, चुनाव लड़ रहे लोगों को जनता से आमना-सामना करना पड़ता है। यह ठीक है कि चुनाव में होने वाला खर्च यहीं के लोगों में रहता है। कहीं बाहर न जाकर, यहीं रहते हुए भी खर्च हुआ, लेकिन जिस अव्यवस्थित ढंग से वह खर्च होता है, वह साधनों के दुरुपयोग से लेकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाली कई विकृतियाँ ही पैदा करता है। जो लोग उम्मीदवारों को लड़ने के लिए प्रकट-अप्रकट सहायता देते हैं, वे जीतने के बाद किसी-न-किसी रूप में उसकी वापसी भी चाहते ही होंगे।
वापसी की अपेक्षा और स्वरूप सामान्य व्यवस्था में अनुचित उलटफेर ही लाती है, बार-बार होने रक्तप्रवाह को दूषित ही करता है।
साल-दो-साल में होने वाले चुनाव देश के उस समय को उलझा लेते हैं, जो विकास में लगाना चाहिए एक बार चुनाव घोषित होने के बाद कम-से-कम दो महीने जैसे सभी कामकाज ठहर जाते हैं। सरकारी दफ्तरों से लेकर निजी उद्यमों तक सभी प्रतिष्ठान चुनावचर्चा और राजनेताओं के गुण-दोष में ही व्यस्त हो जाते हैं। प्रचार-माध्यम, राजनैतिक कार्यकर्त्ता और दूसरे लोग भी इन्हीं कामों में जुटते हैं। बीस लाख लोग अपनी सामान्य दिशाधारा से हटकर राजनीति में ही उलझ जाते हैं। यह उलझाव निश्चित रूप से देश के सामान्य जीवन को अस्त−व्यस्त करता है। इसलिए भी जरूरी कि अगले पाँच साल किसी और चुनाव की नौबत न आये।
यह लोकसभा अपनी अवधि पूरी करे, इसके लिए आवश्यक उपाय किये जाने चाहिए। निजी तौर पर तो सावधानी बरती ही जाए, जरूरी हो तो संविधान में भी संशोधन किया जा सकता है। जब तक यह सुनिश्चित न हो कि चुनी गयी सरकार अपनी अवधि पूरी करेगी तब तक लोगों का राजनैतिक व्यवस्था में भरोसा नहीं बँधता।
दल और विचार के आधार पर पार्टियाँ बनना और चलना मुश्किल हो गया है। इस चुनाव ने ही नहीं पिछले कई चुनावों ने भी सिद्ध किया है देश में कोई अखिल भारतीय पार्टी नहीं है जिन्हें हम राष्ट्रिय दल कहते हैं वे भी ५-७ प्रान्तों से ज्यादा क्षेत्र अस्तित्व नहीं रखते। आगे कभी कोई अखिल भारतीय दल उभरकर आएगा, इसकी संभावना भी कम ही दिखाई देती है। अब न्यूनतम कार्यक्रम निश्चित करना ही उपाय रह जाता है, जो जैसे-तैसे बनें समीकरणों या गठबन्धनों को स्थिर रख सकता है। चुनाव के बाद बन रही सरकार में जो भी दल आधिपत्य कर रहा हो, उसे अपने कार्यक्रमों के आधार पर ही सामंजस्य बनाने कि कोशिश करनी चाहिए। यह अपेक्षा तो की ही जानी चाहिए कि चुनकर गए प्रतिनिधि राष्ट्र के हितों का ध्यान भी रखेंगे यह ठीक है कि राजनीति में जाने वाले लोग भी मनुष्य ही होते हैं। उनसे देवता होने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। न ही वे संत और शहीद हैं, जो जनहित में अपना सब कुछ बलिदान कर दें अथवा निजी हितों की श्रद्धाँजलि दे दें। देवता, महामानव या संत होने की अपेक्षा नहीं रखते हुए भी नागरिक धर्म का पालन की उम्मीद तो की ही जानी चाहिए। जिन मतदाताओं ने चुनकर उन्हें भेजा है, उनकी भावनाओं और अपेक्षाओं पर खरे उतरें देश-समाज और उसकी व्यवस्थाओं के लिए बहुत कुछ त्याग न करें। कम-से-कम उन्हें वरीयता तो दें ही राष्ट्रहित को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने का का संस्कार हो तब तो कोई कठिनाई ही नहीं है। इतना नहीं हो तो कम-से-कम यह तो किया ही जा सकता है कि मतदाताओं के विश्वास को बाँये रखा जाए। जिन लोगों ने उन्हें चुनकर भेजा है, उनके लिए काम करें।
जय-विजय अपना विमान लेकर धरती पर आए, विधाता के इस आदेश के साथ कि धरती पर सच्चा स्वर्ग का अधिकारी ढूंढ़कर लाओ। धर्म-कर्म में लगे कई साधक उन्होंने देखे। पूछा आप यह क्यों कर रहें हैं? उत्तर मिलता-यह संसार नश्वर है- हम यह भक्ति इसलिए कर रहे है कि मुक्त हो जाएँ। नित्य कुछ-न-कुछ पापकर्म तो होते ही रहते हैं, उनकी भी शुद्धि इसी से कर लेते हैं। उनका आचरण व वाणी दोनों में कोई सामंजस्य न देख वे आगे बढ़े। एक स्थान पर उत्सुकतावश वे रुक गए। रात्रि हो गयी थी। एक अँधा दीपक जलाए बैठा था आने वालों की पदचाप सुनकर वह उन्हें रास्ता बताता था। कीचड़ में सने व्यक्तियों के हाथ-पैर धुलाकर उन्हें अपने पास विश्राम के लिए बिठाता था व भूखे-प्यासे को यथासंभव खिलाता-पिलाता था। दिन होने पर वह थोड़ी देर विश्राम कर वह बगीचे में काम करने लगा, ताकि कुछ सब्जी बेचकर गुजारे लायक राशि जूता सके। जय- विजय यह दृश्य देखकर उससे पूँछ बैठे- आप ईश्वरोपासना नहीं करते सुबह का समय तो इसीलिए होता है ष् अंधा बोला- ष् मुझे रात्रि में लोगों को राह बताना, उनकी सेवा करना व दिन में श्रम करना ही उपासना का स्वरूप समझ में आया है इससे अधिक मैं नहीं जनता ष् अपना निरीक्षण पूरा कर जय-विजय लौटे।। प्रजापति ने उनके लिखे विवरण पर दृष्टि दौड़ाई। उनकी दृष्टि सब पढ़कर उस अंधे के विवरण पर ही जाकर टिकी वे बोले- तुम्हारा विवरण देखकर मुझे लगता है कि वर्तमान में शेष सभी तो आडम्बर व समयक्षेप में लगे हैं। मात्र यही एक अधिकारी है, जिसे स्वर्ग लाया जाना चाहिए ष् जय-विजय की मानसिक उलझन को पढ़ कर वे आगे बोले- ष् तात! उपासना मात्र जप-तप नहीं है वरन् जनमानस को सही दिशा देना भी उपासना का एक स्वरूप है आदर्शवादिता से भरे अन्तःकरण में ही ईश्वर निवास करते है
यों प्रत्येक नवरात्र अपनी तरह से विशिष्ट होते है। सृष्टि बहुत विस्तृत है-असीम और काल भी अनंत है, उसकी अवधि को मापा नहीं जा सकता। सृष्टि के दो कर्ण एक समान नहीं होते। प्रत्येक रचना अनूठी और विलक्षण है। काल या समय का प्रवाह में भी जो बीत रहा है, वह लौट कर नहीं आता। इसलिए प्रतिक्षण सृष्टि नई है और उसकी प्रत्येक अवधि इकाई मुक्त है। उसकी पुनरावृत्ति की कोई सम्भावना नहीं इस अर्थ में आ रहे नवरात्र अपने आप में ही विशिष्ट है। कोई भी अवसर बीत जाता है उसे वापस पकड़ने का उपाय नहीं किया जा सकता। यह नवरात्र भी बीत गए तो इस अवसर के उपयोग की सम्भावना फिर नहीं बनेगी।
सामान्य अर्थों में विशिष्ट होते हुए भी प्रस्तुत नवरात्र युगसंधि महापुरश्चरण साधना वर्ष का है। संधि वेला संपन्न हो रही है। बीसवीं शताब्दी समापन की ओर अग्रसर है-ऐसा कह सकते है। नंदन संवत्सर का यह पर्व ज्योतिष के मन से संज्ञा के रूप में साठ वर्ष के बाद आएगा। वर्ष के मान से संवत्सर सर्जन और अर्जन की तरुण संभावनाओं से संपन्न है। साठ वर्ष के काल चक्र में इस वर्ष को साकार करने वाली अवस्था है। संज्ञा और संवत् की दृष्टि से भी यह वर्ष हममें से प्रत्येक व्यक्ति के जीवन से दोबारा नहीं आएगा। इन दिनों नवरात्र साधना करने वालों में कुछ प्रतिशत लोग ही होंगे जो साठ साल बाद नंदन संवत्सर में फिर साधना कर सकेंगे। किन्हीं के जीवन में वह अवसर आ भी गया तो युगसंधि महापुरश्चरण जैसे अवसर कहा होंगे। साठ वर्ष के बाद की दुनिया सर्वथा भिन्न ही होगी।
नवरात्र की महत्ता संधिपर्व के रूप में प्रायः प्रतिपादित की जाती है-वर्ष में आने वाली विविध ऋतुओं का संधिपर्व। छह ऋतुओं में प्रत्येक का अपना संदर्भ और लक्षण है। दिन और रात में आने वाले छह कालखंड प्रातः- मध्याह्न -साय-रात्रि, निशीथ और ब्रह्मबेला की तरह ऋतुचक्र को भी छह खंडों में बाटा जा सकता है। वस्तुतः दिन और रात्रि की तरह ऋतुचक्र का मूल विभाग गर्मी और सर्दी के दो रूपों में ही किया जा सकता है। आतप और शीत में ये दो ही प्रधान ऋतुयें है। शेष चार ऋतुयें इन्हीं के अनुपात के विविध स्तर है। मौसम के हिसाब से भी सर्दी और गर्मी दो ही मुख्य है। वर्षा में दोनों का असर होता है। आषाढ़-श्रावण गर्मी का प्रभाव लिए रहते है, तो भाद्रपद और आश्विन में हवाएं ठंडक लिए रहती है।
दिवस और रात्रि के संधिकाल को प्रातः और साय कहते है। इसी तरह गर्मी और शीत ऋतु के संधिकाल को नवरात्र कहते है। वर्ष की इन संधिवेलाओं का वर्णन विविध रूपों में किया जाता है। इन दिनों प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों की बात कई बार कही-लिखा जा चुकी है। उसे फिर से कहना एक औपचारिक पूरी करना होगा। प्रस्तुत अश्विन नवरात्र के संदर्भ में यह नया तथ्य है की युगसंधि महापुरश्चरण का यह विशिष्ट अवसर है। नए युग के आगमन-अवतरण के लिए की जा रही सामूहिक साधनाओं में भागीदारी का वैसा अवसर दोबारा नहीं मिलेगा। जो लोग अभी तक नवरात्र साधना नहीं कर पाए, उनके लिए भी प्रस्तुत अवसर पूर्णाहुति में शामिल होकर पुरे यज्ञकर्म में शामिल होने का अधिकार बनने का अवसर है।
प्रकृति में होने वाले बाहरी परिवर्तन अपने आसपास के दृश्यमान जगत में स्पष्ट दिखाई देते है उन्हें खुली आँखों से बिना किसी के बताये भी देखा जा सकता है।
सूक्ष्म परिवर्तनों के सम्बन्ध में हर किसी को यह अनुभव होना चाहिए कि सृष्टा ने शुभ और पावन सम्भावना वाले युग का आधार पूरी तरह रच दिया है। प्रस्तुत अवसर उस अधर या निर्माण के समापन कि घड़ी है इस घड़ी में अपनी भावसंवेदना और श्रद्धा-निष्ठा के साठ जो भी महाकाल कि अगवानी के लिए खड़ा दिखाई देगा, वह निर्माणयज्ञ में वर्षों से लगे साधकों के समान ही पुण्यभागी होगा। सूक्ष्म परिवर्तनों को लिखने-बताने कि बजाय अनुभव ही किया जाना चाहिए। ब्रह्मजगत में उसे देखना ही हो तो नमूने के रूप में दो प्रमुख प्रवाहों के रूप में बताया जा सकता है। एक प्रवाह सीमा पर दो महीने तक लादे गए प्रकट-अप्रकट युद्ध में हुई विजय के रूप में है। जिन दिनों यह युद्ध लड़े गया, उन दिनों देश में पूर्ण अधिकार संपन्न सरकार नहीं थी। लोकसभा भंग हो चुकी थी और जो सरकार चल रही थी, वह काम चलाओ थी। नीतिगत फैसले और बड़े निर्णय लेने के लिए प्रतिबंधित।
सरकार के नेतृत्व में देश कि कूटनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में सफलता चतज कि वह सफलता यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि देश का मनोबल ऊँचा था नेतृत्व ने सिर्फ प्रतीकात्मक अगवानी कि संचालन तो देश कि प्राणऊर्जा ही कर रही थी।
सूक्ष्म प्रकृति में आये परिवर्तनों का प्रभाव एक और स्थूल रूप में दिखाई देता है। इन दिनों भारत में नहीं बाहर के देशों में भी आध्यात्मिक प्रगतियों के प्रति रुझान बढ़ा है। साधना-उपासना के कार्यक्रमों में लोग जिस तरह उत्साह से भाग लेते है, उसकी तुलना दस- पाँच साल पूर्व होने वाले श्राँक-पाँपश् म्यूजिक कार्यक्रमों से कि जा सकती है। कथा-कीर्तन-सत्संग-प्रवचन से लेकर मंदिर या धर्मसंस्थान के छोटे-मोटे आयोजन भी लगो को प्रबल रूप में आकर्षित कर लेते है। अनुमान जो भी लगाये,उनके पीछे सूक्ष्म जगत में आये उभार ही मूल कारण दिखाई देते है। प्रतीत होता है कि महाकाल ने युग- चेतना को मथ-सा दिया है और उसमें अध्यात्म कि भूख जाग्रत हुई है। अभीप्सा का अमृत निकल रहा है।
और भी कई प्रकट लक्षण तलाशे जा सकते है कि सूक्ष्म जगत में नवयुग अवतरण कि सम्भावना पूर्णतया बन चुकी है। वह प्रकट होने के दौर से गुजर रही है। नवरात्र जैसे संधिकाल में साधना-उपासना कि कुछ आहुतियाँ अपनी ओर से भी दी जा जानी चाहिए।
सामान्य विशिष्ट अर्थों में नवरात्र को संधिकाल कि तरह निरूपित किया ही गया है, प्रकृति में इन दिनों जो बाह्य परिवर्तन होते है, वे वृक्ष-वनस्पतियों में, नदी-तालाबों में और गिरी-कंदराओं में नये उभार के रूप में परिलक्षित हॉट है, प्रकृति परिवार के इन रूपों में ही नहीं जीव-जंतुओं में भी इन्हीं दिनों सर्जन, परिवर्तन और परिधान कि नई स्फुरणाएं जाग्रत होती है। वृक्ष- वनस्पतियों में नई कोपलें, उनके स्वरूप में आता बदलाव, नदी-तालाबों के प्रवाह में नई गति और गिरिकंदराओं कि स्थिति में आये परिवर्तन उस उभार का प्रतीक है, जो सर्जन कि प्रेरणा से उमगता है, उस सुखी धरती में इन दिनों स्नान और प्रक्षालन से आई ताजगी जैसा अभिराम वातावरण दीखता है। जीव जगत में भी इन दिनों सर्जन कि स्फुरणा विशेष रूप से जागती है। वह नीड़ और बसेरे के निर्माण से लेकर बिल बनाने,ठौर ढूंढ़ने और साथी चुनने के विविध रूपों में दिखती है। मनुष्यों के सम्बन्ध में भी इन दिनों कला, साहित्य, संस्कृत जैसे ललित विषयों में विशेष रुचि जागती देखी गयी है। कुछ अध्ययनों में यह निष्कर्ष भी निकल के आया है कि चित्त में इन दिनों सामान्य दिनों कि तुलना में कामभाव विशेष रूप स जागता है। मिस्टिक इंडिया श् नामक संस्था से जुड़े फ्रांस के डॉक्टर सेनिता ने विचित्र निष्कर्ष दिए है। उनके अनुसार मानवीजगत में आने वाले नए सदस्यों में पच्चीस प्रतिशत दिसंबर और जून के महीनों में जन्म लेते है। इन दो महीनों में एक-चौथाई बच्चे संसार में आते है, बाकी तीन-चौथाई शेष दस महीनों में आते है। डॉक्टर सेनिता के निष्कर्ष का अर्थ है कि चैत्र और अश्विन के महीनों में मनुष्य के भीतर वंश वृद्धि के भाव विशेष रूप से आते है। कामभाव का यह उभार संयम और सर्जन कि दिशा में मुड़ सके, तो वह विश्ववसुँधरा कि शोभा-सुषमा बदलने वाला ही सिद्ध होगा। भारतीय मनीषियों ने काम कि उर्ध्व और अधोगति को ध्यान में रख कर ही नवरात्र के समय संयम-नियम से रहने, साधना-उपासना में व्यतीत करने का विधान किया। ये उपविचार काम को उर्ध्वदिशा में ले जाते है। शास्त्रों ने नवरात्र कि वेला को शक्ति-साधना का अवसर कहा है। सर्जन शब्द बहुत कम आया है। सर्जन वस्तुतः परिणति है, उससे पहले ध्वंस आता है दोनों का मेल-परिवर्तन प्रक्रिया को सम्पूर्ण बनाता है। प्रक्रिया जिस प्रवाह से संपन्न होती है, उसका नाम शक्ति है। वह हो तो यथा अवसर उपयोग भी हो जाता है। नहीं हो तो न कोई उपाय करते बनता है।और न ही व्यवस्था सधती ही। शक्ति का अर्जन आगे आने वाली आवश्यकताएं पूरी करने के लिए ही होता है। नवरात्र में जिस शक्ति कि आराधना कि जाती है, वह परपावन आध्यात्मिक ही होती है। सप्तशती, रामायण, भागवत, देवीपुराण जैसे विविध अनुष्ठान अपने इष्ट और भाव के अनुसार ही संपन्न किये जाते है। गायत्री परिवार के परिजन और उपासक इन दिनों पुरश्चरण साधना के रूप में अर्जन तप करते है। वह प्रक्रिया उत्साहपूर्वक चलनी चाहिए।
सामान्य विशिष्ट अर्थों में नवरात्र को संधिकाल कि तरह निरूपित किया ही गया है, प्रकृति में इन दिनों जो बाह्य परिवर्तन होते है, वे वृक्ष-वनस्पतियों में, नदी-तालाबों में और गिरी-कंदराओं में नये उभार के रूप में परिलक्षित हॉट है, प्रकृति परिवार के इन रूपों में ही नहीं जीव-जंतुओं में भी इन्हीं दिनों सर्जन, परिवर्तन और परिधान कि नई स्फुरणाएं जाग्रत होती है। वृक्ष- वनस्पतियों में नई कोपलें, उनके स्वरूप में आता बदलाव, नदी-तालाबों के प्रवाह में नई गति और गिरिकंदराओं कि स्तीथी में आये परिवर्तन उस उभार का प्रतीक है, जो सर्जन कि प्रेरणा से उमगता है, उस सुखी धरती में इन दिनों स्नान और प्रक्षालन से आई ताजगी जैसा अभिराम वातावरण दीखता है। जीव जगत में भी इन दिनों सर्जन कि स्फुरणा विशेष रूप से जागती है। वह नीड़ और बसेरे के निर्माण से लेकर बिल बनाने,ठौर ढूंढ़ने और साथी चुनने के विविध रूपों में दिखती है। मनुष्यों के सम्बन्ध में भी इन दिनों कला, साहित्य, संस्कृत जैसे ललित विषयों में विशेष रुचि जागती देखी गयी है। कुछ अध्ययनों में यह निष्कर्ष भी निकल के आया है कि चित्त में इन दिनों सामान्य दिनों कि तुलना में कामभाव विशेष रूप स जागता है। मिस्टिक इंडिया श् नामक संस्था से जुड़े फ़्राँस के डॉक्टर सेनिता ने विचित्र निष्कर्ष दिए है। उनके अनुसार मानवीजगत में आने वाले नए सदस्यों में पच्चीस प्रतिशत दिसंबर और जून के महीनों में जन्म लेते है। इन दो महीनों में एक-चौथाई बच्चे संसार में आते है, बाकी तीन-चौथाई शेष दस महीनों में आते है। डॉक्टर सेनिता के निष्कर्ष का अर्थ है कि चैत्र और अश्विन के महीनों में मनुष्य के भीतर वंश वृधि के भाव विशेष रूप से आते है। कामभाव का यह उभार संयम और सर्जन कि दिशा में मुड सके, तो वह विश्ववसुँधरा कि शोभा-सुषमा बदलने वाला ही सिद्ध होगा। भारतीय मनीषियों ने काम कि उ ध्व और श्अधोगति को ध्यान में रख कर ही नवरात्र के समय संयम-नियम से रहने, साधना-उपासना में व्यतीत करने का विधान किया। ये उपविचार काम को उर्ध्वदिशा में ले जाते है। शास्त्रों ने नवरात्र कि वेला को शक्ति-साधना का अवसर कहा है। सर्जन शब्द बहुत कम आया है। सर्जन वस्तुतः परिणति है, उससे पहले ध्वंस आता है दोनों का मेल-परिवर्तन प्रक्रिया को सम्पूर्ण बनाता है। प्रक्रिया जिस प्रवाह से संपन्न होती है, उसका नाम शक्ति है। वह हो तो यथा अवसर उपयोग भी हो जाता है। नहीं हो तो न कोई उपाय करते बनता है।और न ही व्यवस्था सधती ही। शक्ति का अर्जन आगे आने वाली आवश्यकताएं पूरी करने के लिए ही होता है। नवरात्र में जिस शक्ति कि आराधना कि जाती है, वह परपावन आध्यात्मिक ही होती है। सप्तशती, रामायण, भागवत, देवीपुराण जैसे विविध अनुष्ठान अपने इष्ट और भाव के अनुसार ही संपन्न किये जाते है। गायत्री परिवार के परिजन और उपासक इन दिनों पुरश्चरण साधना के रूप में अर्जन तप करते है। वह प्रक्रिया उत्साहपूर्वक चलनी चाहिए।
संज्ञा और संवत् कि दृष्टि से भी यह वर्ष हममें से प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में दोबारा नहीं आएगा। इन दिनों नवरात्र साधना करने वालों में एकाध प्रतिशत लोग साल बाद नंदन संवत्सर में फिर साधना कर सकेंगे। किन्हीं के जीवन वह अवसर आ भी गया तो युगसंधि महापुरश्चरण जैसे अवसर कहा होंगे। साठ वर्ष बाद कि दुनिया सर्वथा भिन्न ही होगी।
रामकथा के प्रतिनिधि ग्रंथों में शक्ति पूजा का उल्लेख नहीं आता। देवी भागवत और दूसरे पुराणग्रंथों में ही कहा गया है कि लंका विजय से पहले नवरात्र अनुष्ठान किया था और शक्ति ने स्वयं प्रकट होकर राम को विजय के आशीष दिए थे। रामकथा के प्रतिनिधि ग्रंथों में सविता देवता कि आराधना के प्रसंग आते है। कहा सूर्य कि स्तुति के रूप में,तो कही संध्यावंदन और गायत्री जप के रूप में। रामायण आदि ग्रंथों में शक्ति पूजा के प्रसंग नहीं है। मनीषीगण प्रसंग को यह कहकर शक्ति पूजा से जोड़ते है कि राम का विजय अभियान सीता कि वापसी के लिए था।
कथानक जिस रूप में भी प्रचलित हो, उनका आशय यह है कि कि आसुरी तत्त्वों ने शक्ति का हरण कर लिया था। वह हरण किये जाने पर भी उन्हें हस्तगत नहीं हुई थी। आसुरी तत्वों का आधिपत्य हो जाता तो नारायणी शक्ति का उपयोग और ज्यादा आतंक, अन्याय और उपद्रव के लिए ही होता व आसुरी तत्वों कि वह जीत धर्म मार्ग कि पराजय के रूप में लिखी जाती। शक्ति अथवा सीता लंका में रहकर भी मर्यादा पुरुषोत्तम में ही लीं रही। सीता कि लौ और लगन राम के प्रति अविचल रही। सीता को मुक्त करने के लिए राम का लंका अभियान भी शक्ति कि आराधना- उपासना के रूप में में परिभाषित किया जाता है। राम की विजय और शक्तिसाधना पूरी होने की तिथि एक ही है। विजयादशमी पर आसुरी आतंक के प्रतिनिधि रावण का पराभव हुआ। नवरात्र की अंतकथा के अनुसार इस दिन भगवती दुर्गा ने महिषासुर और शुँभ-निशुँभ आदि दैत्यों का संहार कर देवसत्ताओं को निष्कंटक राज्य दिया। विजयादशमी उस शक्ति की आराधना के समापन और विसर्जन का दिन है। शक्ति उपासना में नौ दिनों तक दुर्गा पूजा के बाद विसर्जन के लिए विजयादशमी या उससे पहले नवमी का दिन निर्धारित है। किन्हीं क्षेत्रों में आश्विन नवरात्र के समय रामलीला का चलन रहा है। और किन्हीं क्षेत्रों में दुर्गा पूजा का। अब साधना सम्प्रदायों की कोई सीमा रेखा नहीं खींची जाती। इसलिए राम लीला के साथ दुर्गा पूजा भी सम्मिलित-समन्वित हो गयी है। दोनों आयोजन साथ-साथ चलते रहते है। समन्वित रूप में विजयदशमी शक्ति और मर्यादा का प्रेरक पर्व है। नवरात्र साधना शक्ति की आराधना के रूप में ही की जाती है। शास्त्रों में ढेरों प्रसंग है, जिनमें शक्ति संपन्न होने के बाद मिलने वाले परिणामों का विवेचन मिलता है। महिषासुर और शुँभ-निशुँभ भी शक्ति के आराधक थे। देवसत्ताओं के संगठित बल को उन्होंने नवरात्र के ही दिनों में चुनौती दी। देवासुर संग्राम उन्हीं दिनों लड़ा गया था। बाहुबल, बुद्धिबल और कूटनीति में आसुरी शक्तियाँ दैवी शक्तियों पर भारी ही पड़ती थी,लेकिन जीत अंततः देव पक्ष की ही हुई। आसुरी शक्तियों को पराभूत ही होना पड़ा।
रामकथा प्रसंग में मेघनाद और रावण ने भी उन्हीं दिनों शक्ति पूजा की थी, जिन दिनों जिन दिनों राम ने शक्ति का आराधन किया था। असुर सम्राट और लंका के सेनापति के पास साधन सुविधाएं राम की तुलना में श्रेष्ठ ही थी। श्रद्धाभक्ति और विश्वास की दृष्टि से भी वे राम के सामने उन्नीस नहीं बैठते थे। पुराणों में उल्लेख आता है की पूजा-उपासना और यज्ञे-अग्निहोत्र के बाद राम के सामने भी शक्ति प्रकट हुई और रावण को भी साक्षात् दर्शन हुए अर्थात् दोनों ही पक्षों की पूजा-आराधना सफल हुई,लेकिन विजय श्री ने राम का ही वरण किया। साधन और श्रद्धा में कम नहीं होने पर भी रावण को पराजित होना पड़ा, क्योंकि उनके पास धर्म मर्यादा नहीं थी।
दुर्गा,गौरी,गायत्री,लक्ष्मी और शक्ति रूपों का तत्वदर्शन विस्तृत है। उसे विवेचन में मनीषियों ने लाखों शब्द कहे है और हजारों पन्ने रंगे है, विवेचन का संक्षिप्त सार यही है उस शक्ति का मर्यादित उपयोग ही सफलता तक पहुंचता है। मर्यादा का उल्लंघन होते ही ध्वंस की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है।वह ध्वंस भी सूक्ष्म अर्थों में शक्ति का ही वरदान ही है। उसे निमंत्रित करने का अर्थ है- अपने आप को व्यर्थ उलझाना देवी पुराण में उल्लेख आता है की युद्ध से पहले आराधना करने पर राम और रावण दोनों के सामने शक्ति प्रकट हुई राम को उसने आशीर्वाद दिया ‘विजयी भवः’ - तुम्हारी जीत हो। रावण से कहा की तुम्हारा कल्याण हो- ‘कल्याणमस्तु।’ रावण का कल्याण उसके अभिमान और शूरता के साथ मिट जाने में ही था, वह आशीर्वाद फलीभूत हुआ। शक्ति की तुलना अग्नि से करे तो स्वर्ण के लिए उसका आशीर्वाद तपने और कुँदन सिद्ध होने के रूप में ही चरितार्थ होगा। वह कचरे के लिए भी प्रकट होगी और वरदान के रूप में उसे जलाकर भस्मीभूत ही करेगी। स्वर्ण और कूड़े में अग्नि के लिए कोई भी उदारता या बैर का कारण नहीं है। आशीर्वाद-वरदान भी दोनों के लिए उपलब्ध है, लेकिन परिणति दोनों के लिए अलग-अलग हो जाती है।
पौराणिक साहित्य में विजय और शक्ति का संदर्भ राम से ही जुदा है। अन्य अवतारी सत्ताओं से दूसरे संदर्भ जुड़े है, जैसे कृष्ण के साथ कर्म और ज्ञान का; बुद्ध के साथ करुणा का, परशुराम के साथ ब्रह्मतेज का, मत्स्य, कच्छप, वराह,वामन, नृसिंह आदि अवतारों के विकास, सामर्थ्य-अनुकूल, दान नीति आदि संदर्भ है, परन्तु शक्ति, विजय, मर्यादा और कीर्ति का उल्लेख राम के लिए ही आता है, क्योंकि राम का जीवन अपने चिंतन और चरित्र से मनुष्य की सम्पूर्ण गरिमा को चरितार्थ कर्ट है, मनुष्य किस स्तर तक विकसित हो सके, इस प्रश्न का उत्तर रामचरित में मिलता है। जिन्हें मानव धर्म की पूरी पराकाष्ठा में देखना हो वे मर्यादा पुरुषोत्तम का अवगाहन करे।
वाल्मीकि रामायण का आरंभ नारद की जिस जिज्ञासा से होता वह सम्पूर्ण मानव की खोज है। देवऋषि नारद वाल्मीकि से पूछते है की संसार में गुणवान, तेजस्वी, धर्मज्ञ, उपकार मानने वाला, सत्यव्रती, दृढ़प्रतिज्ञ, सदाचार से युक्त, सबका हितैषी, प्रियदर्शी जितेंद्रिय, क्रोध और समस्त आवेगों पर नियंत्रण रख ने वाला, कान्तिमान और अनिंद्य कौन है? ऐसा कौन-सा पुरुष है, जो दूसरों को जीतने की कामना नहीं रखता और स्वयं अजेय है? महर्षि वाल्मीकि इस प्रश्न के उत्तर में राम चरित्र सुनाते है।
मानवीय गुणों की पराकाष्ठा होने के कारण ही राम मर्यादा पुरुषोत्तम है। वे मानवीय मर्यादाओं से कही भी विचलित होते नहीं दिखाई देते। शस्त्र और शास्त्र दोनों ही उनके हाथ में आकर अपने आप को धन्य अनुभव करते हैं। क्षात्र धर्म और ब्रह्मणत्व दोनों का निर्वाह करते हुए परशुराम भी अपनी सत्ता राम में लीन कर देते है। धर्म को शस्त्र और शास्त्र दोनों के प्रयोग से चरितार्थ होने की मर्यादा स्थापित करने के लिए परशुराम अवतरित हुए। राम के अवतरित होने पर उन्हें अपना होना आवश्यक नहीं लगता उनकी ज्योति मर्यादा पुरुषोत्तम की ज्योति में मिल जाती है।
धर्म मर्यादा से ऊर्जा ग्रहण करने वाले राम को अपनी विजय के लिए विशेष कुछ नहीं करना पड़ता। समर भूमि में उनके सामने रावण का सभी शस्त्र-साधनों से संपन्न रथ है। उस रथ पर बैठ कर रावण ने बड़े-बड़े युद्ध लड़े और जीते है। राम उनके सामने पैदल है, लेकिन विजय रथ राम के पास है। वह किन्हीं वहाँ-उपकरणों से नहीं बना। विजय रथ के निर्माण में धर्म मर्यादा ही काम आई है। मानसकार ने स्वयं राम से ही कहलाया-ष्जेहि जय होई सो स्यंदन आना, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है। उस रथ के पहिये, ध्वजा,पताका, छात्र, आसन, अश्व आदि धर्म की विभिन्न अभी व्यक्तियों से निर्मित है। यह अभिव्यक्ति धर्ममर्यादा है। मर्यादाओं में रहने पर शक्ति निजी, कीर्ति और विभूति प्रदान करती है। उनसे विचलित होने पर अनिष्ट-अनय ही लाती है। विजय दशमी पर शक्तिपूजा और राम के विजयोत्सव को अलग-अलग नहीं देखना चाहिए। उसे शक्ति मर्यादा के संयुक्त उत्सव के रूप में समझना चाहिए दोनों की ही कामना और साधना समग्र सिद्धि बनती है।
मेघनाद और रावण ने भी उन्हीं दिनों शक्ति पूजा की थी, जिन दिनों जिन दिनों राम ने शक्ति का आराधन किया था। असुर सम्राट और लंका के सेनापति के पास साधन सुविधाएं राम की तुलना में श्रेष्ठ ही थी। श्रद्धाभक्ति और विश्वास की दृष्टि से भी वे राम के सामने उन्नीस नहीं बैठते थे राम और रावण दोनों की पूजा सफल हुई। आशीर्वाद भी दिए फिर भी विजयश्री राम को ही क्यों मिली?
राजा विक्रमादित्य के राज्य में एक सदाचारी-संतोषी ब्राह्मण था वह निर्धन था। स्त्री की प्रेरणा से धन प्राप्ति के निमित्त घर से निकला तो जंगल में एक महात्मा से भेंट हुई। उन्होंने उसे चिंतित देख आश्वासन दिया और विक्रमादित्य को पत्र लिखा की तुम्हारी इच्छापूर्ति का अब समय आ गया है। अपना राज्य इस ब्राह्मण को देकर यहाँ चले आओ।
वह पत्र विक्रमादित्य ने पढ़ा, तो उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और ब्राह्मण को राज्य सौंपने की तैयारी की। ब्राह्मण ने राजा को राज्य त्याग के लिए इतना उत्सुक और अत्यंत आनंद विभोर देखा, तो सोचना लगा की जब राजा ही राज्य सुख को लात मारकर योगी के पास जाने में विशेष आनंद अनुभव कर रहे है, तो योगी के पास अवश्य ही कोई राज्य से भी बड़ा सुख है। अतः उसने राजा से कहा-महाराज! मैं महात्मा के पास पुनः जा रहा हु, लौट कर राज्य लूँगा।ष् यह कहकर वह योगी के पास पहुंचकर बोला-भगवान! राजा तो राज्य त्याग कर आप के पास आने के लिए निताँत उतावला और हर्षविभोर हो गया। इससे जान पड़ता है की आप के पास राज्य से भी बड़ी कोई वस्तु है, मुझे वही दीजिये।ष् महात्मा ने प्रसन्नचित हो ब्राह्मण देवता को आत्मविधा सिखाई और उसे वह वैभव दे दिया जो उसे मोक्ष दिला गया। उस सुख की तुलना में सारे साँसारिक सुख नगण्य है।
जो आत्मावलंबी बहुरंगी दुनिया के सुख-आकर्षणों को ठुकराता है, अन्तः वह इस श्रेय का भागी बनता है। जो क्षणिक सुखलाभ के मोह में उन्हीं में लिप्त हो जाता है, वे अन्तः त्रास ही पाते है, भले ही उसमें तत्कालीन दृष्टि से सुख मिलता हो। उनकी उपमा तो उस बालक से ही की जा सकती है, जो खिलौने से खेल कर सामयिक आनंद पाने में ही रुचि लेता है। आयु की दृष्टि से बड़े होने पर भी ऐसे मंद बुद्धि बालकों का अनुपात जन्समुदाये में ही अधिक ही होता है।
भारतीय संस्कृति में वास्तुशास्त्र को चौसठ महत्वपूर्ण विधाओं में से एक मन गया है। ऋग्वेद एवं अथर्ववेद में वास्तु या स्थापत्य एवं भवन विन्यास सम्बन्धी अनेक सूत्र है। चारों वेदों के साथ ही चार उपवेद भी है, जिनके नाम है- गंधर्ववेद, धनुर्वेद, आयुर्वेद एवं स्थापत्य वेद। इनमें से स्थापत्य वेद को ही वास्तुशास्त्र कहते है। वैदिककाल में जन्मे इस वास्तु विद्या का विकास ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् एवं पौराणिक काल में हुआ। तदुपराँत रामायण एवं महाभारत काल- जिसे उत्तरवैदिक काल भी कहा जाता है, में वास्तुशास्त्र विद्या का पूर्ण विस्तार हुआ। अयोध्यानगरी लंकानगरी, द्वारिका एवं हस्तिनापुर आदि का स्थापत्यकला अपने चरमोत्कर्ष पर थी। उसकी सुन्दरता एवं निर्माण काल अनुपम एवं अद्वितीय थी। अयोध्या के स्थापक अर्थात् निर्माणकर्ता भगवान मनु थे, तो लंकानगरी के विश्वकर्मा और माय दानव। महाभारत के पश्चात एक समय ऐसा भी आया जब कहने लायक कोई निओर्मान नहीं हुआ। जब आठवीं सदी से छठवीं शताब्दी ईसापूर्व नए-नए राज्य का उदय हुआ, तब फिर से युग की आवश्यकता के अनुरूप नए भवनों, राजप्रसादों, चैत्य आदि का निम्न आरंभ हुआ। चौथी शताब्दी ईसापूर्व जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया तो उसके द्वारा भारतीय संस्कृति को भारी क्षति उठानी पड़ी। बहुत कुछ तहस-नहस कर दिया गया। किन्तु उसके बाद चाणक्य काल में वास्तुशास्त्र को नया आयाम मिला। उस अर्थशास्त्र काल में बड़े-बड़े भवन, दुर्ग, सभागार, अधिकारियों एवं सामान्यजनों के आवास, शस्त्रालय, पूजागृह, अतिथिशालाओं, चैत्यों को नमय स्वरूप प्रदान किया।
मध्यकाल में विदेशी आक्रांताओं, मुगल आक्रमणकारियों के कारण भारतीय वास्तुकला संक्रमणकाल से गुजरी। ऐशोआराम की जिन्दगी जीने वाले आक्रांताओं ने भवन निर्माण शिल्प को अपने-अपने दृष्टिकोणों के आधार पर प्रभावित किया। वर्णभेद, जातिवाद, धर्मभेद आदि अनेक संकीर्ण आधारों ने जनसामान्य के बीच भेदभाव की दीवार खड़ी कर दी। अधिकाँश सामान्य जनता को शर से भर कर दिया गया। अंग्रेजी शासनकाल तक यही क्रम चलता रहा। फलतः प्राचीन वास्तुविद्या का प्रायः लोप ही हो गया। आज लोग मनमाने ढंग से भवनों, फ्लैटों, काम्प्लेक्स, अपार्टमेंट, आवासीय, कालोनियों, गगनचुम्बी इमारतों के अंबार लगते चले जा रहे है। बढ़ती आबादी के कारण घिचपिच मकानों की भरमार होती चली जा रही है। इन निर्माणों में वास्तुशास्त्रों के नियमों का पालन नहीं हो पता है। ऐसी स्थिति में उनमें निवास करने वाले, व्यवसाय-व्यापार खड़ा करने वाले स्वास्थ्य की, सुख-शान्ति की, समृद्धि की कल्पना कैसे कर सकते है?
यद्यपि आज गृहनिर्माण में प्राचीन वास्तुशास्त्र के नियमों-सिद्धाँतों का यथा रूप पालन करना सर्वत्र संभव नहीं दिखता। लेकिन कुछ सूत्र संकेत इतने सरल है जिन्हें निर्माण में अपनाकर मनुष्य अपने छोटे से घरौंदे से लेकर विशालकाय भवनों, प्रासादों तक में सुख-शाँतिपूर्वक रह सकता है और पारिवारिक जीवन का आनंद लेते हुए प्रगति के उच्च सोपानों पर चढ़ते हुए मनवाँछित धन-सम्पदा का स्वामी बन सकता है।
गृहनिर्माण सम्बन्धी कमियों,त्रुटियों एवं उनसे उत्पन्न शारीरिक-मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक एवं सामाजिक परेशानियों को वास्तुशास्त्र के अनुसार मानचित्र बनाकर घर बनाने, आवासीय कालोनियों बसाने या औद्योगिक प्रतिष्ठान खड़ा करने से अथवा पूर्व निर्मित भवनों-घरों में वास्तुनियमों के अनुसार थोड़ा-बहुत फेर बदल करके समाधान किया जा सकता है। इसके लिए सर्वप्रथम यह जन लेना आवश्यक है कि जो मकान या भवन हम बनाने जा रहे है, उसमें कौन-सा कक्ष अर्थात् कमरा कहाँ और किस दिशा में बनाना उपयुक्त रहेगा इससे नैसर्गिक शक्तियों, पंचमहाभूतों एवं सूर्य आदि शक्तिस्रोतों का उनमें निवास करने वालों पर अनुकूल व उपयुक्त प्रभाव पड़ता है और वे अधिक-से-अधिक सुख-शान्ति एवं वैभव का लाभ उठा सकते हैं।
जैसा कि पिछले अंकों में बताया जा चुका है कि (१) पूजाकक्ष या मंदिर- ईशानकोण में होना चाहिए। इसके अलावा (२) स्नानगृह-पूरब में (३) रसोईघर- आग्नेयकोण में (५) स्ट्राँगरूम या धनकक्ष--वायव्य कोण में (६) स्टोररूम या भंडारकक्ष- उत्तर दिशा में (७) दूध-दही.घृत-तेल कक्ष --आग्नेयकोण और पूरब के मध्य में (८) शौचालय एवं सेप्टिक टैंक - दक्षिण और नैऋत्य कोण के मध्य में (९) अध्ययनकक्ष-स्टडीरूम- पश्चिम या नैत्रत्त्य कोण दाम्पत्य कक्ष - वायव्व कोण व उत्तर दिशा में तथा (१०) मनोरंजन कक्ष - वायव्य कोण में होना चाहिए इसके अतिरिक्त (११) क्लीनिक या औषधालय-- उत्तर दिशा व ईशान कोण के मध्य (१२) मैटरनिटी होम या प्रसूति कक्ष -- नैत्रत्त्यकोण में (१३) डाइनिंग हॉल या भोजनकक्ष --पश्चिम दिशा में (१४) बैडरूम या शयनकक्ष--दक्षिण में;१५द्ध
ड्राइंगरूम या स्वागतकक्ष--ईशान कोण व पूर्व दिशा के मध्य में (१६) पशुशाला व धान्य कक्ष -- वायव्य कोण में (१७) शस्त्रागार- नैत्रत्त्य कोण में (१८) गैराज--वायव्य या आग्नेयकोण में (१९) कुआँ, पानी के टैंक आदि पूरब, पश्चिम, उत्तर या ईशान कोण में शुभ माने जाते है (२०) तलघर, ब्रह्मस्थान अर्थात् आँगन, मुख्यप्रवेश द्वार, भवन के आस-पास पेड़-पौधे, आंतरिक साज-सज्जा आदि का भी वास्तुशास्त्र में अपना-अपना महत्व व प्रभाव है। इसके अतिरिक्त बिजली के उपकरण, हीटर, स्विचबोर्ड, टेलीविजन,रेडियो, टेलीफोन, फ्रीज, कूलर आदि यंत्र-उपकरणों को आग्नेयकोण तथा दक्षिण में लगाने कि अप्निऊ वास्तुशास्त्रीय मर्यादा है।
उपयुक्त पंक्तियों में भवन के जिन प्रमुख कक्षों की-आवश्यक अंगों की दिशास्थिति का उल्लेख किया गया है, वास्तुविद्याविशारदों ने अपने कृतियों में इस सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। इनमें से (१) पूजाकक्ष या देवालय की स्थिति के बारे में अखंड ज्योति के अगस्त अंक में विस्तारपूर्वक बताया जा चूका है। इससे आगे के कक्षों अर्थात् कमरों की स्थिति वास्तुविद्या के अनुसार कहाँ और कैसी होनी चाहिए, यह इस प्रकार से है --
(२) स्नानगृह- स्नान का दैनिक जीवन में अपना महत्व है। प्रायः सभी जीवधारी स्नान करते है। परिंदों से लेकर हाथी तक को छोटे-मोटे जलस्रोतों से लाकर बड़े-बड़े जलाशयों, नदी-तालाबों में डुबकी लगते हुए देखा जाता है। नहाने का मजा जो ले जलाशयों में आता है, वह छोटे-बड़े घरों के एक कोने में बने छोटे-से बाथरूम-स्नानगृह में कहाँ मिल सकता है? स्नान करने से न केवल शरीर की सफाई हो जाती है, वरन् शारीरिक, मानसिक मानसिक थकान व तनाव होकर एक नवीन जीवनशक्ति का, स्फूर्ति का संचार होता है और व्यक्ति तरोताज़ा हो उठता है। बढ़ती आबादी, सूखते व प्रदूषित होते जलस्रोत तथा आपाधापी भरी व्यस्त जिंदगी में आज किसको इतनी फुर्सत है कि वह नहाने के लिए प्राकृतिक जलस्रोतों- नदी, तालाब,झरने आदि को तलाशता फिरे। ऐसी स्थिति में गृह में बने बाथरूम अर्थात् स्नानगृह से ही काम चलाना पड़ता है।
भारतीय वास्तुशास्त्रीय परम्परा के अनुसार किसी भी भवन में बाथरूम यानी स्नानकक्ष पूरब दिशा में सबसे अधिक उपयुक्त व स्वास्थ्यकर माना जाता है इसका प्रमुख वैज्ञानिक कारण यह है कि प्रातः काल जब सूर्य पूरब से उदित होता है, तो उसकी किरणों का सीधा प्रवेश स्नानघर में होता है इन किरणों के प्रभाव से नहाने वाले में नवीन ऊर्जा का संचार होता है और वह दिनभर स्फूर्तिवान बना रहता है। परन्तु आज तो स्नानगृह भी भी प्रदर्शन कि वस्तु बन गया है। आवश्यकता को नहीं, रुची को प्रधानता दी गयी है। स्नानगृह में सौंदर्य प्रसाधन की सुविधाओं की भरमार होने लगी है। इसके लिए बाथटब, वाशबेसिन, गीजर, पंखा,दर्पण आदि की व्यवस्था की जाती है। कुछ व्यक्ति स्नानघर की व्यवस्था घर के बाहर करते है तो कुछ घर के भीतर। परन्तु अब इससे भी आगे यह बढ़ गया है कि प्रायः बैडरूम-शयनकक्ष के साथ ही श् अटैज्ड बाथरूम का प्रचलन हो गया है।
सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप भवननिर्माण व्यवस्था बदल जाने तथा पाश्चात्य भवननिर्माण तकनीक का अनुसरण करने के कारण भी आज शयनकक्ष, अध्ययनकक्ष आदि कि दिशाएँ बदल गयी है, जिनके कारण स्नानगृह व शौचालय का स्थान भी परिवर्तित हो गया है। साथ ही भवनों का स्वरूप बहुमंजिला हो जाने के कारण भी स्नानगृह में परिवर्तन आया है। ऐसी स्थिति में दिशाचयन की समस्या और भी पेचीदा हो जाती है।
इस संदर्भ में ध्यान रखने योग्य प्रमुख बात यह है कि नैत्रत्यकोण तथा ईशान कोण में कभी भी स्नानगृह नहीं बनाया जाना चाहिए। इसी तरह सीढ़ियों के नीचे भी स्नानगृह व शौचालय नहीं बनवाना चाहिए अन्यथा इससे बीमारियाँ पैदा होती है। आग और पानी दोनों विपरीत गुण वाले तत्व है, अतः स्नानगृह व रसोईगृह आमने-सामने नहीं होना चाहिए, अन्यथा गृहकलह बनी रहेगी। डाइनिंग हॉल- भोजनकक्ष भी स्नानगृह के सामने भी नहीं पड़ना चाहिए। स्नानगृह कि खिड़की पूरब की ओर होना चाहिए। स्नानगृह की स्थिति पूरब की ओर होने से नहाते समय स्वाभाविक ही मुँह पूरब की ओर हो जाता है, जो की स्नान की सर्वोत्तम स्थिति है।
पूरब दिशा में स्नानगृह व शौचालय साथ-साथ कभी नहीं बनाना चाहिए। यदि अटैज्ड बाथरूम बनाना ही हो तो दक्षिण-पश्चिम भाग में ( नैत्रत्य कोण के अतिरिक्त ) या वायव्य कोण में बनाना चाहिए। इसके अतिरिक्त यह इस बात पर निर्भर है कि भवन का मुख्य द्वार किस दिशा में है। उसी के अनुरूप स्नानगृह में फेरबदल किया जा जा सकता है। स्नानगृह में एक ही द्वार रखना चाहिए खिड़की पूरब कि ओर खुलती हो तो अच्छा है। नहाने के कमरे में यदि एडजस्ट-फैन लगाना हो तो उत्तर या पूरब कि दीवार में लगाया जा सकता है। गीजर आदि विद्युत चालित मशीनें आग्नेयकोण में लगनी चाहिए, क्योंकि इनका सम्बन्ध अग्नि तत्वों से है। स्नानगृह में नहाने वाले नल पूरब दिशा में लगा होना चाहिए, जिससे नहाते समय व्यक्ति का मुँह पूरब की ओर रहे। पूर्व की ओर मुँह करके नहाना स्वास्थ्यकर होता है। वास्तुशास्त्र का सिद्धाँत भी यही है कि प्राकृतिक शक्तियों;यथा- पृथ्वी, जल, अग्नि,वायु, आकाश आदि के अनुसार ही गृह के कक्षों -कमरों का निर्माण करना चाहिए। इससे नैसर्गिक शक्तियों का अनुकूल प्रभाव भवननिर्माता को उसमें रहने वाले को सहज ही मिलता रहता है
आयुर्वेद के अंतर्गत दिनचर्या के महत्वपूर्ण पक्षों के अंतर्गत कई प्रसंगों कि चर्चा पूर्व के अंकों में की जा चुकी है। आहारपक्ष पर विगत तीन अंकों में विस्तार से पाठकों ने जाना है। इससे आगे अब रात्रिचर्या कैसी हो संध्याकाल से प्रातः तक के नियमों-उपनियमों कैसे हो उस पर विवेचन इस अंक में। संध्याकालोचित आचरण से लेकर रात्रिकाल में करणीय सर्वकर्म यथा रात्रिभोजन, शयन, निद्रा अवम स्वपन, गर्भाधान, रजस्व्लाचार्य तथा ब्रह्मचर्यादि का पालन- ये सभी स्वस्थ वृत्त सम्बन्धी रात्रिचर्या के अंग है। इनका संक्षिप्त शास्त्रोक्त विवेचन इस प्रकार है -
एतानि प´्चकर्माणि संध्यायाँ वज्रयेद बुध॥ आहारं मैथुनं निद्राँ सम्पाठं गतिम्ध्वनि।
भोजनाज्जयते व्यधिर्मै थुनार्द्रभ्वैक्रितिः। निद्राया निःस्वता पठादा यु हनिर्गमातेर्भायम॥ प्रदोष पश्चिमौ यामौ वेदाभ्यासेन तौनयेत।
प्रहरद्वयं शयानो ब्रह्मभूयाय कल्पते। रात्रौ च भोजनं कुर्यत्प्रथमप्रहरंतारे॥
किंचीदुनं समशनीयाद दुर्जर तत्र वर्जयेत।
अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति साँयकाल भोजन, नींद, पढ़ना, और मार्गगमन इन पाँच कार्यों को त्याग दे, क्योंकि इस समय भोजन से व्याधि, मैथुन से गर्भ में विकार, नींद से दरिद्रता, पढ़ने से आयु की हानि अवम मार्गगमन से भय होता है। रात्रि के पूर्व और अंतिम प्रहरों को वेदाभ्यास में नियोजित करे। शेष दो प्रहरों में छह घंटे सोने वाला ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति करता है रात्रि के प्रथम प्रहर में ही भोजन कर लेना चाहिए। भोजन दिन की अपेक्षा कुछ कम खाना चाहिए। देर से न पचने वाले गरिष्ठ पदार्थ न खाए जाए, तो स्वास्थ्य के लिए ठीक है।
उपयुक्त श्लोक किसी अतिरिक्त व्याख्या का मोहताज नहीं है। ऋषिगण बड़ा स्पष्ट कह गए है कि रात्रि के प्रारंभिक क्षणों में संभव हो तो सूर्यास्त से पूर्व या पश्चात प्रथम प्रहर में ही भोजन कर ले। यह विज्ञानसम्मत भी है। भोजन नलिका को पचाने हेतु पर्याप्त समय भी मिल जाता है। आज जीवन शैली आमूलचूल विकृत हो चुकी है। लोग प्रातः देर से उठकर ब्रेकफास्ट लेते एवं दोपहर का भोजन प्रायः दो-तीन बजे करते है। इसी कारण एवं आज इलेक्ट्रॉनिक युग में देर तक टीवी देखते हुए १-१२ बजे भोजन करने के कारण सारी शारीरिक मशीन ही गड़बड़ा गई है। जैनधर्म में सूर्यास्त के पूर्व भोजन लेने का प्रावधान है, ताकि संधिकाल के समय उत्पात मचाने वाले जीवाणु, कीटक भोजन के साथ अन्दर न चले जाए। कितना सटीक विवेचन रहा है ऋषिगणों का कि संधिकाल का तो विशुद्धतः साधनात्मक उपचारों में नियोजित कर ले, हो सके तो उसके पूर्व या बाद भोजन ले लें। छह घंटे कि गाढ़ी योगनिद्रा पर्याप्त है, यदि दिनभर का क्रम श्रम से भरा-द्वंद्वों से मुक्त है। अभ्यास किया जाए, तो संधिकाल में थोड़ा प्राणायाम-ध्यान का क्रम ठीक से बैठ जाने से इस निद्रा को रोज का एक क्रम बनाया जा सकता है। आज हिंसा व अश्लीलता से भरे टेलीविजन नेटवर्क जो हमारे अंतर्कक्षों तक पहुंचा गया है, से दो-दो हाथ होने के बाद किसी को योगनिद्रा तो क्या आएगी, भोगनिद्रा ही आएगी। सप्ताह में एक दिन मनोरंजन का रखा जा सकता है, किन्तु अभ्यास रात्रिचर्या का इसी क्रम से किये जाना चाहिए, जैसा की ऋषिगणों का निर्देश है।
हमारे आयुर्वेद के विद्वान् यह भी कहते है कि भोजन करने व सोने के मध्य दो-तीन का अंतर होना चाहिए। भोजन के पश्चात व सोने से पूर्व एक-एक घंटे के अंतर से कम-से-कम दो या तीन बार जल लेना चाहिए। इससे भोजन को पचाने में मदद मिलती है। रात्रि में अपच होने कि सम्भावना भी नहीं रहती, निद्रा भी ठीक आती है एवं प्रातः शौच भी साफ हो जाता है। सोने से पूर्व उष्ण पेय चाय या काफी भी नहीं लेना चाहिए। इससे निंद्रा प्रभावित होती है। अच्छी नींद न आने से प्रातः उठने पर शरीर में थकावट रहती है। स्नान तथा व्यायाम आदि करने का मन भी नहीं होता। ऋषिगण यह भी कहते है कि रात्रि में सोने से पूर्व पैरों को अच्छी तरह धो लेना चाहिए। शीतऋतु में उष्ण जल से ग्रीष्म ऋतु में शीतल जल से। यदि नींद आने में थोड़ी कठिनाई हो तो सोने से पूर्व पैरों के तलवों में गौघृत या सरसों के तेल कि मालिश भी कि जा सकती है। इससे नींद ठीक आती है। किसी भी प्रकार के जुकाम-खाँसी आदि कि संभावना नहीं रहती।
महाभारत में वेदव्यास कहते है -
नक्तंचर्यांदिवास्वप्नमलास्यमपैशुनन्मदम। अतियोगमयोगमचश्रेयासोअथ्रीपरित्यजेत॥
अर्थात्-अपने हित की इच्छा रखने वाले को रात में जागरण, दिन में निद्रा, आलस्य, चुगलखोरी, नशा करना तथा आहार-विहार-निद्रा इत्यादि विहित कर्मों का अतियोग तथा आयोग-इनका वर्जन करना चाहिए।
इसे बात को अष्टाँग हृदय में इस तरह कहा गया है-
अतियोगमयोगम च अनुपायात प्रतिपदम सर्वधर्मेशु मध्यमाम॥ष्
निद्रा की परिभाषा क्या है? योगसूत्र बड़ी सुन्दर व्याख्या करता है। ष् अभाव-प्रत्ययावलम्बना वृतिनिद्रा। अर्थात् पदार्थ मात्र के अभाव का अनुभव जिसका आधार है, ऐसी जो चित्त की वृति है वही निद्रा है।ष् चरक के अनुसार निद्रा भौतिक शरीर के तीन उपस्तंभों में से एक है- त्रय उपस्तम्भा इत्याहारः स्वप्नौ ब्रह्मचर्यमिति। ष् आज न आहार पर किसी का ध्यान है, न निद्रा पर एवं न ही ब्रह्मचर्य पर, तो निश्चित ही रोगियों की संख्या बढ़ना स्वाभाविक है इस पर इस सदी का अंत आते-आते अनिद्रा ( इनसोमिनिया ) के रोगी तो करोड़ों में है, जो नित्य नींद की गोली का प्रयोग करते है, जो कभी गाढ़ी निद्रा नहीं लाती, आलस्य व अस्वास्थ्य को और शरीर में ला विराजती है। काव्यमीमाँसा में कवि इसलिए कहते है- अच्छी गाढ़ी नींद शरीर के लिए परम आरोग्यप्रद होती है। ष् ( सम्यकस्वापों वपुषः परमारोग्याय ) सम्यक स्वापः यानी उचित काल पर उचित काल तक की निरस्वपन गाढ़ी नींद। श् परमारोग्या अर्थात् रोग में आरोग्य देने वाली एवं निरोग स्थिति में आरोग्यरक्षक।
इसी तथ्य को कवि इस प्रकार भी कहता है -
अर्धरोगहरी निद्रा अर्थात् निद्रा रोग हरण करने का आधा कम करती है।
चंडकौशिक के अनुसार -
चित्तं प्रसादयति लाघवमाददाति प्रत्यंगमुज्ज्वल्यती प्रतिभाविशेषम। दोषानुदस्यति करोति च धातु साम्य मानन्दमर्पयति योगविशेषगम्यम॥
अर्थात् ष् निद्रा चित्त में प्रसन्नता, शरीर में लाघव ( हल्कापन ) अंग-प्रत्यंगों में उमंग, बुद्धि में विशेष प्रकार की प्रतिभा उत्पन्न करती है। दोषों का नाश करती है। धातुसाम्य( निरोगता ) स्थापित करती है और योग विशेष से प्राप्त होने वाले आनंद भी प्राप्त करती है परन्तु ऐसा कौन-सा व्यक्ति होता है। अर्थात् ष् निद्रा चित्त में प्रसन्नता, शरीर में लाघव ( हल्कापन ) अंग-प्रत्यंगों में उमंग, बुद्धि में विशेष प्रकार की प्रतिभा उत्पन्न करती है। दोषों का नाश करती है। धातुसाम्य( निरोगता ) स्थापित करती है और योग विशेष से प्राप्त होने वाले आनंद भी प्राप्त करती है परन्तु ऐसा कौन-सा व्यक्ति होता है जिसे ऐसी निद्रा सुलभ हो सकती है उत्तर हमें चरक से मिलता है -
ब्रह्मचर्यरतेग्रा म्यसुखनिस्पृहचेतसः। निंद्रासंतोषतृप्तस्य स्वं कालं नातीव त्तते॥
अर्थात् ष् विद्याध्ययन में रत, विषयोपभोग से निस्पृह तथा संतोष तृप्त मनुष्य की निंद्रा अपने उचितकाल का अतिक्रमण नहीं करती है।ष् पद्मपुराण कहता है कि जितेन्द्रिय मनुष्य समय पर सोता है, सुख से सोता है और समय पर जागता है।
निद्राप्रसंग के अंतर्गत आयुर्वेद में रात्रि से सम्बन्धी कुछ नियम और बताए गए है- आयुर्वेद में सोने से पूर्व नेत्रों में अंजन का बड़ा महत्त्व बताया गया है।
चरक के अनुसार--
सौवीरमंजन नित्यं हितमक्षणोंः प्रयोजयेत। चक्षुस्तेज़ोम्यम तस्य विशेषाच्छालेष्मतों भयं॥ ततः शलेषमहरं कर्म हितं द्दषटेः प्रसादनम॥
समीक्षा- चूँकि नेत्र तेजस्वरूप है, अतः उन्हें श्लेष्मा ( जल ) से विशिष्ट भय रहता है, इसलिए कफनाशक कर्म नेत्र का प्रसादन करने में ( स्वस्थ बनाने में ) हितकर होते है। अतः नेत्ररोगों में कफदोष से अधिक रोगी होने का वर्णन है।
अंजन का ही एक दूसरा स्वरूप सुरमा है, जी यूनानी प्रभाव से भारत में आया है। यह कफनाशक होता है। गुलाबजल आँखों में डालकर सोने से निद्रा भी ठीक आती है व नेत्र भी स्वस्थ रहते है। शुद्ध मधु लगाने में कुछ जलन होती है, किन्तु यदि यह सहन किया जा सके तो मोतियाबिंद से काफी हद तक बचा जा सकता है। हमारी संस्कृति में कई प्रकार के काजल लगाने का प्रावधान है। काजल बनाने की आयुर्वेद सम्मत विधि यह है कि शुद्ध अरंडी के तेल में भिगोकर रुई कि बत्ती को जलती लौ के ऊपर काँसे का बर्तन लगा दिया जाए व उसकी कालिख इकट्ठी कर गोघृत तथा थोड़े से भीमसेनी कपूर में मिलाकर अच्छी तरह घुटाई की जाए। इसे काँच की शीशी में रखें एवं रात्रि को सोने से पहले बच्चे-बड़े सभी लगाएँ। इससे नेत्रों की सौंदर्य बढ़ता है। नेत्ररोग नहीं सताते तथा नींद अच्छी आती है। आजकल बने-बनाए काजल आते है। इनकी शुद्धि व औषधीय क्षमता संदिग्ध रहती है, अतः इन्हें न लगाया जाए व एक ही उंगली से सभी बच्चों को न लगाया जाए, नहीं तो संक्रमण सभी को फिल्ट चला जाएगा।
रात्रि में सोने से पूर्व दाँतों को साफ कर लेना चाहिए। पश्चिम में भी प्रायः सभी इस नियम का पालन करते है। इससे मुँह में ताजगी रहती है, नींद ठीक से आती है।
( सुभाष बोस बच्चे ही थे। माँ के बगल से उठकर जमीन पर जा सोए। माँ के पूछने पर उन्होंने बताया- आज अध्यापक कह रहे थे कि हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि थे जमीन पर सोते और कठोर जीवन जीते थे। मैं भी ऋषि बनूँगा, सो कठोर जीवन का अभ्यास कर रहा हूँ। पिताजी जग गए। उन्होंने कहा- जमीन पर सोना ही पर्याप्त नहीं है। ज्ञानसंचय और सेवासंलग्न होना भी आवश्यक है अभी तुम माँ के पास सो जाओ, बड़े होने पर तीनों काम करना।सुभाष ने अध्यापक की ही नहीं पिताजी की बात भी गिरह बाँध ली। आई सी. इस पास करके जब अफसर बनने की बात सामने आई तो उन्होंने कहा- मैं जीवन का लक्ष्य निश्चित कर चुका हूँ। मातृभूमि की सेवा करूंगा और महान बनूँगा बचपन का निश्चय उन्होंने मरणपर्यंत निबाहा। ऐसे होते है महामानव।
गायत्री मंत्र हमारे साथ, ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो! मनुष्य को दो दुख हैं। एक दुख का नाम ‘नरक’ और दूसरे का नाम ‘बंधन’। इन दो चीजों से आदमी निकल जाए, तो सारे संसार में सुख-ही-सुख है। बंधन क्या है? बंधन वह है जिसमें कि हम और आप जकड़ जाते हैं। कल्पना कीजिए उस पक्षी की, जो पिंजड़े में बंद किया हुआ है। जो कुछ आता या मिलता है, खा लेता है। दाना तो खा लेता है, लेकिन बंधन में जकड़ा हुआ होने की वजह से कुछ कर नहीं पाता। बंधन की वजह से न कहीं खुली हवा ले पाता है, न कहीं आकाश को देख पाता है। कुछ नहीं देख पाता, केवल छोटे-से पिंजड़े में दिन गुजारता रहता है।
बंधन से बंधा हुआ व्यक्ति कैसा होता है? जेलखाने के कैदी के बारे में आप जानते हैं न, वह चारों ओर से जकड़ा हुआ होता है। हाथ जिसके बँधे हुए हैं, पैर जिसके बँधे हुये हैं, गले में जिसके रस्सा पड़ा हुआ है॥ आजकल तो इतना नहीं होता है, लेकिन पुराने जमाने में जेलखाने में जो आदमी रखे जाते थे, उनके हाथों में हथकड़ियाँ हर समय पड़ी रहती थीं। वे कुछ कर नहीं सकते थे। पैरों में बेड़ियाँ पड़ी रहती थीं। गले में रस्सा पड़ा रहता था। बेचारा कुछ कर नहीं सकता था। जैसे घोड़े को अगाड़ी व पिछाड़ी लगाम लगा देते हैं, इसी तरह से कैदी को रहना पड़ता था। जो लोग उस जमाने में रहते थे, आप उनके दुख की कल्पना कर सकते हैं कि तब मन को कितना मसोसना पड़ता रहा होगा।
मित्रों, हमारी योग्यता, प्रतिभा, भगवान् का दिया हुआ संसार और हमारी क्षमता-इन सबका हम कुछ भी उपयोग नहीं कर पाते हैं। सब कुछ गड़बड़ा जाता है। तब क्या करना चाहिए? हमारे शास्त्रों में आदमी के लिए सबसे बड़ा पुरुषार्थ एक ही बताया गया है। वह क्या बताया गया है? वह है- ‘बंधनों से मुक्ति’। बंधनों से अगर मुक्ति मिल जाए, तो आदमी कितना सुखी हो सकता है! बंधनों से अगर मुक्ति मिल जाए, तो आदमी कितना सुखी हो सकता है! मुक्ति का अर्थ लोग कुछ और तरह से समझते हैं। सायुज्य मुक्ति? सारूप्य मुक्ति, सान्निध्य मुक्ति और सालोक्य मुक्ति की कल्पना इस तरीके से लोगों ने अपने में बिठा रखी है कि भगवान् नाम का कोई व्यक्ति है। उसका एक बढ़ा-सा कोई बैकुँठ नाम का गाँव है। इस गाँव में फालतू फंड के आदमी बैठे रहते हैं। भवान् के समीप बस बैठे रहते हैं, न कुछ करते हैं और न करने देते हैं। बस उनके पास में सान्निध्य मुक्ति, सालोक्य मुक्ति है, सारूप्य मुक्ति है। इसका रूप कैसा है? इसका रूप भवान् जैसा है। भवान् का रूप बहुत सुँदर है। हमारा भी रूप बहुत सुँदर हो गया है। खाने-पीने की सारी व्यवस्था सालोक्य में है। हम भी उसी में शामिल हो गए। सामीप्य में चौबीस घंटे बैठे रहे। क्या सुगंध जा रही है, पंखे झल रहे, हैं भगवान् जी के समीप। इस तरह की कल्पना मुक्ति के संबंध में लोगों ने कर रखी है। वास्तव में यह कल्पना बच्चों जैसी है। इससे क्या लाभ हो सकता है?
मुक्ति का माहात्म्य हर एक आध्यात्मिक शास्त्र ने सिखाया है और यह बताया है, सुनाया है कि जो आदमी मुक्ति के अधिकारी हो जाते हैं, वे जीवन में सफलता प्राप्त कर लेते है। जीवनमुक्त और भगवान् की प्राप्ति समान अर्थों में ली गई है। जीवनमुक्त किसे कहते हैं? जीवनमुक्त उसे कहते हैं जिसका जीवन बंधनों से छूट गया, जो पिंजरे में से निकल गया, जो ‘जेलखाने से छूट गया। जो बच्चा माँ के पेट में छोटे-से दायरे में बैठा रहता है, न बोल सकता है, न बात कर सकता है, न साँस ले सकता है। उसमें से जब डिलीवरी हो जाती है, जन्म हो जाता है, तब वह मुक्त हो जाता है। आप साँसारिक मुक्ति का अर्थ समझ गए होंगे न? अच्छा, अब उसकी बात सोचिए कि मोह से मुक्ति क्या है? बंधनों से मुक्ति क्या है?
बंधनों से मुक्ति यह है कि जिस तरीके से हमारी विचारणाएँ, भावनाएँ हैं और हमारी क्रियाशीलताएँ है, जिन बंधनों से जकड़ गई हैं, उन बंधनों को हम तोड़ डालें, छोड़, तो हम जीवनमुक्त हो जाते हैं। असल में यही जीवनमुक्ति है। लोगों का जो ये ख्याल है कि स्वर्ग में जा करके मुक्ति मिलती है, व्यक्ति स्वर्ग में कहीं बैठा रहता है या भगवान् जी के मालगोदाम में कहीं जमा हो जाता है। बेटे! न् कहीं भवान् जी का मालगोदाम है और न कहीं आदमी बैठे रहते हैं। मुक्ति केवल जीवन में ही होती है। जीवनमुक्त आदमी होते हैं, जिनको ऋषि कहते हैं, तत्वदर्शी कहते हैं, जिनको मनीषी कहते हैं। मुक्ति केवल मानवजीवन में ही संभव है।
तो क्या करना चाहिए? यही तो मैं आपसे निवेदन कर रहा हूँ कि क्या करना चाहिए। आपकी तीन बंधनों से छुटकारा पा लेना चाहिए। आप यहाँ शांतिकुंज में आए हुए हैं, कल्पसाधना कर रहे।, उपासना कर रहे हैं, तो आपको क्या करना चाहिए? आपको तीन बंधनों से मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए। आप कोशिश कीजिए कि तीनों बंधन तोड़ दें। अगर आप चाहें तो इन तीन बंधनों को तोड़ सकते हैं। मकड़ी जाला स्वयं बनाती है और उसमें स्वयं फँस जाती है और फँसने के बाद में जब उसका मन आता है कि जाला हमारे लिए नुकसानदायक है और जाले में हमको नहीं रहना चाहिए, तो वह क्या करती है कि सारे-के-सारे जाले को अपने मुँह से समेट लेती है और निगल जाती है तथा भाग खड़ी होती है।
मित्रो! यह बंधन भी, जो चारों ओर से हमको जकड़े हुए है, असल में किसी और बाहरीशक्ति की देन नहीं है। किसी बाहरीशक्ति में इतनी गुंजाइश और दम नहीं है कि वह आदमी को जकड़ सके। भवान् के बेटे का भला कौन जकड़ सकता है। मनुष्य को बंधन में कोई नहीं रख सकता है। बंधनों में आपको कौन जकड़ सकता है? बंधनों में जकड़ने के लिए उसका अपना ही अज्ञान, अपनी ही बेवकूफी, अपने ही कुसंस्कार है, जिसने आपको जकड़ लिया है। वे कौन-कौन से बंधन है? उनमें से एक नाम है- ‘लोभ’, एक का नाम है- ‘मोह’ और एक का नाम है- ‘अहंकार’। ये तीन हमारे शत्रु हैं। गीता के तीसरे अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है-
काम एष क्रोध ए ष रजोगुणसमुद्भवः। महाषनो महापाप्पा विद्धयेनमिह वैरिणम्॥
ये तीनों ही सबसे बड़े बंधन और बैरी हैं। अपने इन तीनों बैरियों से रावण, कुँभकरण और मेघनाथ से अगर आप निपट लें तो मजा आ जा जाएगा। अगर आप कंस, जरासंध आदि से निपट लें तो मजा आ जाएगा। ये तीन आपके दुश्मन हैं। उन्होंने आपकी जिंदगी को कैसा भयानक बना दिया है? कैसा पिछड़ा बना दिया है? कितना अस्त-व्यस्त बना दिया है? अगर ये आपके जीवन को अस्त−व्यस्त न बनाएँ तो आप अपने आप को देख सकते हैं कि आपके जीवन में कितना कायाकल्प हो सकता है और आप वर्तमान परिस्थितियों की तुलना में थोड़े दिनों कहां-से-कहाँ पहुँच सकते है। आप इन दुश्मनों से आगाह जाएं और इन्हें तोड़ने के लिए कोशिश कीजिए।
लोभ क्या है और इसे किस तरीके से तोड़ा जाए? लोभ कहते हैं अनावश्यक संग्रह का। लोभ यही है कि आदमी का गुजारे के लिए मुट्ठी भर चीजों की जरूरत है। मुट्ठी भर से गुजारा हो जाता है। आदमी का पेट कितना छोटा होता है? भैंसे का पेट कितना बड़ा है? गधे का पेट कितना बड़ा है? घोड़े का पेट कितना बड़ा है? परंतु आदमी का पेट कितना छोटा है। जरा सा है। उसके लिए थोड़ा-सा चार मुट्ठी अनाज काफी होना चाहिए। लेकिन आदमी के लोभ को देखा है न आपने, वह कितना लालची, कितना संग्रही, कितना विलासी होता है। कितना जमा कर ले, चौबीसों घंटे जमा करने के लिए मरता, खपता और छटपटाता रहता है।
संसार में बहुत से नशे हैं, जिनकी लोगों को हविश हो जाती है। शराबियों को नशे की हवस हो जाती है। शराबियों के नशे की हवस हो जाती है और वह बार-बार शराब माँगता है। इसी तरीके लालच एक शराब है। आदमी की जरूरत क्या है और कितनी है? कुछ भी नहीं। व्यर्थ में अपने अहंकार को बढ़ाने के लिए, अपनी औलाद का और अपने घरवालों को तबाह और बरबाद करने के लिए, पीछे कलह उत्पन्न करने के लिए और दुर्व्यसन पैदा करने के लिए केवल धनसंग्रह करता रहता है। जिंदगी का सारे-का-सारा हिस्सा इसी में खर्च हो जाता है। आपको इस लालच को छोड़ना पड़ेगा। आपको इस लोभ को छोड़ना पड़ेगा।
इसके लिए आपको क्या करना पड़ेगा? आप क्या करेंगे? आपको सादा जीवन और उच्च विचार के सिद्धाँतों को स्वीकार करना पड़ेगा। ऊंचे विचार सिर्फ उस आदमी के पास आ सकते हैं, जो सादा जीवन के जिए। सादा जीवन का मतलब ठाटबाट से नहीं है, वरन् इसका मतलब लोभ और लालच से है। आप लोभ और लालच अपने मन से निकाल दें और निर्वाह की बात सोचें, तो आप थोड़े-से घंटे मेहनत करे के बाद में अपना पेट बड़े मजे में भर सकते हैं। रही कुटुँबियों की बात, तो कुटुँबियों की बात भी वैसी ही है, जिसको ‘मोह’ कहते है। लोभ का बढ़ा हुआ दायरा जो कुटुँब तक फैल जाता है, उसका नाम ‘मोह’ है और जो अपने आप तक सीमित रहता है, धन तक सीमित रहता है, उसका नाम ‘लोभ’ है और जो कुटुंबियों तक फैल जाता है, उसका नाम मोह है।
कुटुँबियों के प्रति आपकी जिम्मेदारियाँ तो हैं, ये तो मैं नहीं कहता कि आपकी जिम्मेदारी नहीं है। जिम्मेदारी तो आपकी सबके प्रति है। आपकी जिम्मेदारी आपके शरीर के प्रति भी है, मस्तिष्क के प्रति भी है। जीवन के प्रति भी आपकी जिम्मेदारी है। भगवान् के प्रति भी आपकी जिम्मेदारी है। आपकी बहुत जिम्मेदारियाँ हैं। इन सभी जिम्मेदारियों को आप सहयोग से निभाइए। उसमें आपका कुटुँब भी शामिल है। कुटुँबियों के शामिल होने का मतलब यह नहीं है कि कौन कैसा है? उन सबका लालच आप पूरा करते हैं क्या? कुटुँबियों की अनावश्यक आवश्यकताओं को और अनावश्यक माँगों को आप मानने से इनकार कर दीजिए। तो आप क्या करेंगे? अगर वे माँगते हैं तो भी नहीं और नहीं माँगते हैं तो भी नहीं। जिस चीज की जरूरत है उसे दीजिए।
आपके कुटुँबियों की किसकी जरूरत है? आपके कुटुँबियों मो तीन चीजों की जरूरत है। पहली जरूरत है-शिक्षा। आपके कुटुँबियों को शिक्षित होना चाहिए। स्कूली शिक्षा की बात तो मैं नहीं कहता, पर मैं यह कहता हूँ कि स्कूली शिक्षा अगर आपके पास में न भी हो, तो भी जिसको शालीनता कहते हैं, सभ्यता कहते हैं, सज्जनता कहते हैं, वह तो होनी ही चाहिए। शिक्षा का मतलब सभ्यता, शालीनता और सज्जनता से है। आप अपने घरवालों को बनाइए। उनका व्यवहार ऐसा बनाइए, उनके सोचने का तरीका ऐसा बनाइए, जानकार बनाइए, शिक्षित बनाइए। अगर ये बना देते हैं तब हम समझते हैं कि आपने अपने घरवालों को आजीविका से भी ज्यादा, जीवन बनाने से भी ज्यादा, सोने-चाँदी के जवाहरात बनाने से भी ज्यादा आपने उनकी मदद की। इसलिए आपको मोह की अपेक्षा शिक्षा में खर्च करना चाहिए।
मित्रो! शिक्षा के साथ-साथ में क्या करें? अपने हर कुटुँबी को स्वावलंबी बनाइए। किसी को परावलंबी मत बनने दीजिए। आप अपनी पत्नी को स्वावलंबी बनाइए। किसी को परावलंबी मत बनने दीजिए। आप अपनी पत्नी को स्वावलंबी बनाइए, गुड़िया मत बनाइए। उसको आप यह मत कहिए कि आपको पानी नहीं भरना है, खेती नहीं करनी है। आप खाना मत पकाइए। आपके लिए खाना नौकरानी पकाएगी। कपड़े आपके नौकरानी धोएगी। बस, आप पंखे के नीचे बैठे रहा करिए। ऐसा मत कीजिए। आप उसे स्वावलंबी होने दीजिए।
भगवान् न करे कभी ऐसा खराब दिन आ जाए जब आप न हों। भगवान् न करे कि ऐसा दिन आ जाए कि आपको संपत्ति चली जाए। फिर आप क्या करेंगे? आपने तो अपनी स्त्री को घूँघट में रख करके अपाहिज बना दिया। उसे मेहनत नहीं करने दी, परिश्रम नहीं करने दिया। उपार्जन के लिए योग्य बनाया नहीं, क्षमता बढ़ाई नहीं। आज हर आदमी के अंदर उपार्जन की क्षमता उत्पन्न होनी चाहिए। आप अपने कुटुँबियों में से हर एक में उपार्जन की क्षमता उत्पन्न होनी चाहिए। आप अपने कुटुँबियों में हर एक में उपार्जन की क्षमता उत्पन्न होने दीजिए, बढ़ने दीजिए। बच्चे जरा बड़े हो गए हैं, तो उनको हाथ बँटाने दीजिए, ताकि जो वे घर का अनाज खाते हैं, उस संस्था का जरा सहयोग तो करें। उन्हें कुट्टी कूटना सिखाइए, पानी भरना सिखाइए, शाक-वाटिका लगाना सिखाइए, कपड़े धोना सिखाइए, ताकि वे अपने घर की आर्थिक स्थिति में कुछ मदद कर सकें। आप उन्हें स्वावलंबी बनाइए, परिश्रमशील बनाइए।
साथियों! अगर आपने अपने घर-गृहस्थी वालों को स्वावलंबी नहीं बनाया है, तो यह आपका मोह है। अगर आप अपने घरवालों की अनावश्यक इच्छाओं को पूरा करने के लिए जेवर खरीदने से लेकर सिनेमा दिखाने तक अर्थात् वे चीजें जो उनके जीवन को विकसित करने के लिए आवश्यक नहीं हैं, केवल उनके मनोरंजन के लिए, उनकी हविश और जो बुरी आदतें हैं, उनको पूरा करने लिए जो वे माँगते हैं, आप उसको पूरा कर देते हैं, तो वह आपका ‘मोह’ हो जाता है। इसके स्थान पर आप उन्हें संस्कारवान् बनाइए, सभ्य बनाइए, शिक्षित बनाइए, स्वावलंबी बनाइए। अगर आप ये तीनों काम करने के लिए जितनी मेहनत करते हैं, हम समझते हैं कि आप अपने कुटुँबियों के लिए कर्त्तव्यपालन कर रहे हैं।
अगर आप कुटुँबियों की हविश, कुटुँबियों की इच्छा और कुटुँबियों का दबाव इसलिए पूरा करते हैं कि कुटुँबी आपसे प्रसन्न रहेंगे और प्रसन्न रह करके बच्चे आपकी आज्ञा मानेंगे और औरत आपकी कामवासना की पूर्ति के लिए मदद करेगी, इसलिए आपको उन्हें प्रसन्न करना चाहिए, तो आप गलती करते हैं। आप किसी को मत प्रसन्न कीजिए। प्रसन्न करना है, तो अपनी आत्मा को प्रसन्न कीजिए, अपने परमात्मा को प्रसन्न कीजिए। इसके अलावा इस संसार में आप जितना ही लोगों को प्रसन्न करने की कोशिश करेंगे? उतना ही आप हैरान होंगे और उतने ही आप खाली हाथ जर जाएँगे। इसलिए लोभ और मोह के दो बंधनों से लालच मत कीजिए। समय पर अगर आप अपने दिमाग को खाली कर दें कि हमको गुजारे भर के लिए कमाना है, तो आपका दिमाग, आपकी स्कीम, आपकी योजनाएँ, आपका परिश्रम और पुरुषार्थ सब बच जाएगा। फिर उस बची हुई शक्ति को क्षमता को आप उन कामों में लगा सकेंगे, जिससे आपकी आत्मा की उन्नति होती है और समाज के प्रति अपना कर्त्तव्यपालन होता है और भगवान् के आदेशों का निर्वाह होता है। उससे कम में काम बनेगा नहीं।
आपका लालच चाहे पूरा होता हो या नहीं होता हो, यह तो मैं नहीं कहता कि आप संपन्न हो गए हैं कि नहीं हो गए हैं, पर आप लालची मुझे जरूर मालूम पड़ते हैं। ऐसी स्थिति में आप संपन्न कैसे हो जाएँगे? अक्ल तो है नहीं, योग्यता तो है नहीं, विद्या तो है नहीं, पुरुषार्थ है नहीं, परिश्रम है नहीं, चाँस है नहीं, पूँजी है नहीं तो कैसे धनवान् हो जाएँगे? आप तो गरीब-के-गरीब रहने वाले थे और गरीब ही रहने वाले हैं। क्योंकि आदमी को संपन्न बनाने के लिए तो अनेक साधन चाहिए। आपके पास तो कुछ भी साधन नहीं है, फिर संपन्न कैसे बनेंगे? परंतु अगर आपने लालच छोड़ दिया होता तो आप इतने ही साधनों से कम-से-कम समय में गुजारा कर सकते थे। लालच अभी जितना आपका समय खा जाता है, शक्ति खा जाता है, बुद्धि खा जाता है, उस सबको आपने बचा लिया होता। बचाने के बाद में वह काम कर लिया होता जो असंख्य लोगों ने किया है, पारिवारिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए भी।
कबीर की भी शादी हो गई थी। जवाहरलाल नेहरू की भी शादी हो गई थी। गाँधी जी की भी शादी हो गई थी। शंकर भगवान् की भी शादी हो गई थी। रामचन्द्र की भी शादी हो गई थी। हमारी भी शादी हो गई है। शादी होना और पेट भरना इतना बड़ा काम नहीं है कि जिसके लिए यह कहा जा सके कि हमारी सारी शक्ति और सारी बुद्धि, सारा परिश्रम और सारा पुरुषार्थ इसी में खर्च हो जाता है। वस्तुतः ये लोभ और मोह के व्यामोह के दो बंधन हैं, जो न आपकी अक्ल को चलने देते हैं, न परिश्रम को चलने देते हैं। आपका सारा परिश्रम लोभ के लिए विसर्जित हो गया, आपकी अक्ल और आपकी भावना मोह के लिए विसर्जित हो गई। लोभ के लिए आपका शारीरिक श्रम विसर्जित हो गई। लोभ के लिए आपका शारीरिक श्रम वर्जित हो गया, मोह के लिए भावनाएँ एवं मानसिक क्षमता विसर्जित हो गई, तो फिर क्या रह गया। आपके पास? तोड़िए न इन बंधनों को आप यहाँ रह करके इस कल्पसाधना में अपने आपको बदल दीजिए और लोभ एवं मोह के बंधनों में अपने आपको पीछे हटाइए।
मित्रों! मैं यह थोड़े ही कहता हूँ कि आपके पेट भरने के लिए गुजारा नहीं करना चाहिए। गुजारा करना एक बात है और लालच के लिए मरते-खपते रहना दूसरी बात है। आपको अपना कुटुँब सीमित रखना चाहिए, फिर आप क्यों बढ़ाते चले जाते हैं? किसने कहा था आपको रोज बच्चे पैदा करने के लिए? आप बिना बच्चों के जिंदा नहीं रह सकते क्या? कम बच्चों से आपका गुजारा नहीं हो सकता? आपके जो कम बच्चे हैं, उनको आप क्या पर्याप्त नहीं मान सकते? हमारा कहना मानिए अब बच्चे मत बढ़ाइए। जो बच्चे हैं, अगर उनकी क्वालिटी बढ़ाना चाहते हैं, तो आपको संख्या घटानी चाहिए। इससे आगे तो किसी भी हालत में आगे मत बढ़ाइए। तब आपका मोह कम हो जाएगा॥ फिर आप एक माली के तरीके से अपने गृहस्थ का पालन कर रहे होंगे। तब आप एक सदाचारी और संयमी के तरीके से अपना गुजारा कर रहे होंगे। इन दोनों तरीकों से आप गुजारा कर लेंगे तो मजा आ जाएगा।
इनके अतिरिक्त आपको तीसरा एक और काम करना चाहिए। अहंकार को हटाना चाहिए। आप अपने अहंकार को भी हटाइए। आदमी अपना आत्मविज्ञापन करने के लिए? बड़ा आदमी बनने के लिए न जाने कितना ढंग और ढोंग बनाता रहता है। लिबास, फैशन, ठाटबाट ये सब अहंकार के लिए करता है। अहंकार के लिए-सब जगह से मेरी पदवी बढ़नी चाहिए, मेरे पास बढ़िया जेवर होना चाहिए, मुझको नेता बनना चाहिए, मुझे मंच मिलना चाहिए। अपने अहंकार की पूर्ति और बड़प्पन के लिए वह जाने क्या-क्या स्वाँग रचाता रहता है। अपने अतिरिक्त किसी और की उन्नति उसे सुहाती नहीं। ‘मैं’ और ‘मेरा’ बस यही उसके दो लक्ष्य बन जाते हैं। मित्रों! यह अहंकार बड़ा हानिकारक है। यह आपको ले डूबेगा।
गुरु जी! आप क्या कर रहे हैं? बेटे! मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आपकी महत्वाकाँक्षाएँ जरूर बढ़नी चाहिए। परंतु अहंकार के नाम पर, लोगों के सामने अपनी चकाचौंध पैदा करने के नाम पर, लोगों के सामने बड़ा आदमी बनने के नाम पर अगर अपने अहंकार का पोषण कर रहे होंगे, तो गलती कर रहे हैं। इस अहंकार की दिशा मोड़ दीजिए। फिर किसमें लगाएँ? आप इस अहंकार को महानता की दिशा में लगाएँ कि हम महान् बनेंगे। आप महान् बनिए। यह विचार कीजिए कि दूसरों की तुलना में हमारे गुण, कर्म, स्वभाव अच्छे बनेंगे। आप ये विचार कीजिए न। क्या विचार करें? आप ये विचार कीजिए कि हमको महान् बनना है। दूसरों के सामने आपको अपनी निशानियां छोड़ जानी हैं, ताकि वे आपके बारे में सोचते रहें, विचार करते रहें कि देखो यह आदमी कितना शानदार था, कितना मनस्वी था, कितना धैर्यवान् था, कितना साहसी था। आप इसको बड़प्पन पर न्योछावर कर सकते हैं।
संसार में जितने भी महान् आदमी हुए हैं, उन्होंने अपनी जिंदगी श्रेष्ठ कामों में लगा दी। वे लोगों के सामने उदाहरण छोड़कर चले गए। यही उनकी विरासत है। आप तो विरासत में क्या छोड़कर जाएँगे। बेटे के लिए मकान जरूरी नहीं है। फिर क्या जरूरी है? आप बेटे के लिए यह विरासत छोड़कर जाइए, ताकि लोग यह कह सकें कि यह किसका बच्चा है। उससे आपका सम्मान बढ़ेगा। न केवल अपने बच्चों के लिए, वरन् सारे समाज के लिए विरासत छोड़कर जाइए कि जिससे लोग यह कह सकें कि हमारे पूर्व पुरुष ऐसे थे, हमारे गाँव का निवासी ऐसा था। अमुक सज्जन ऐसा था। लोक-सम्मान अर्जित कीजिए न। आत्मसम्मान अर्जित कीजिए न। भगवान् अनुग्रह अर्जित कीजिए न। आपको इसमें क्या दिक्कत पड़ती है? इसमें तो कोई दिक्कत नहीं पड़नी चाहिए।
ये ही तीन बंधन हैं, जिन्होंने आपकी तीन चीजों को खत्म कर दिया है। पहला-आत्मसंतोष, जो आप पा सकते थे, उससे आप वंचित रह गए और उसे अब आप पा नहीं सकेंगे। क्यों? क्योंकि लोभ तो आपको कहाँ पाने देगा? लोभ तो आपको उचित और अनुचित काम करने के लिए लगाए रहेगा। लोभ आपको मेहनत करने के लिए लगाए रहेगा, कर्ज लेने के लिए लगाए रहेगा। लोभ आपको रिश्वत लेने के लिए मजबूर करता रहेगा। लोभ आपको बेईमानी के लिए मजबूर करता रहेगा। फिर आप किस तरीके से आत्मसंतोष पाएँगे, तो उसके बदले में आपको आत्मसंतोष गँवाना-ही-गँवाना है।
एक दूसरी और चीज है- लोक-सम्मान। लोकसम्मान आप नहीं पा सकेंगे? क्यों? क्योंकि आपकी सारी शक्ति, सारा प्यार इन थोड़े-से आदमियों में केंद्रित हो गया है। आप अपनी औरत को ही सब कुछ समझ बैठे हैं। आप अपने बच्चों को ही सब कुछ समझ बैठे हैं। कहीं कोई समाज में भी रहता है क्या? कहीं कोई संस्कृति भी है क्या? कहीं कोई दीन-दुखियारे भी रहते हैं क्या? समाज के प्रति भी कुछ कर्त्तव्य और फर्ज है क्या? नहीं साहब! जो हमने कमाया था, चार बेटों में बराबर बाँट दिया। और पड़ोसियों को? और मोहल्ले वालों को? और लोगों को, जिनके अहसान आपके ऊपर लदे हुए हैं। उनके लिए जिन अध्यापक ने आपको पढ़ाया था और जो बेचारा आजकल भिखारी की तरह गुजारा कर रहा है। उनके प्रति भी कुछ फर्ज है आपका कि नहीं है? नहीं, साहब मैंने तो चार बेटों में बराबर बाँट दिया। ऐसा मत कीजिए। चार बेटों में बराबर मत बाँटिए। बच्चों को स्वावलंबी बनने दीजिए और जो कुछ भी आपकी संपत्ति हैं, उससे समाज को लाभ उठाने दीजिए। संस्कृति को लाभ उठाने दीजिए।
भाइयो! बहनो! अपने अहंकार का परिपोषण आप उस मायने में कीजिए कि हमको महापुरुष बनाना है और हम महामानव बनते हैं। अपनी चाल-ढाल और चाल-चलन ऐसा शानदार बनाते हैं कि जिससे भगवान् के अनुग्रह भी हमको प्राप्त हो सके। अगर आप महानता की दिशा में नहीं जाएँगे, बड़प्पन की दिशा में जाएँगे, तो आपको लोभ, मोह और अहंकार इन तीनों को पकड़ना पड़ेगा। इनके सहारे आपको नरक में गिरना पड़ेगा। कदाचित् अगर आप एक कदम आगे बढ़ा दें और महानता की ओर चल पड़े तब? तब आपको दूसरा काम करना पड़ेगा। तब फिर आपको औसत भारतीय की तरीके से सीमित में निवाई करना पड़ेगा। आपके सारे भाई जिस तरह का गुजारा करते हैं, आप क्यों नहीं कर सकते हैं? आप सारे बच्चों को अपना क्यों नहीं मान सकते। कितने बच्चे हैं, जो विद्या के अभाव में बैठे रहते हैं। आप अपने बच्चों को कीमती कपड़ा पहनाएँ और अमुक चीज छोड़कर मरें और पड़ोसियों के बच्चों के लिए आप किताब तक खरीद कर नहीं दे सकते? ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के तरीके से आप क्या ऐसे नहीं रह सकते कि अपने घर का पचास रुपये से गुजारा कर लें और बची हुई चार सौ पचास रुपये की नौकरी को पड़ोस के विद्यार्थियों के लिए खर्च कर दें। ऐसा आप नहीं कर पाएँगे क्या?
मित्रो! लोभ, मोह को आप छोड़ दीजिए। आप अहंकार की, बड़प्पन की, अमीरी की और दूसरों की आँखों में चकाचौंध पैदा करने की हवस को छोड़ दीजिए। इसके स्थान पर आप दूसरी हवस पैदा कीजिए कि हम महान् बनेंगे। दूसरों के सामने उदाहरण पेश करेंगे।
अपनी जिंदगी का नमूना पेश करेंगे और लोगों को अपने रास्ते पर चलने के लिए, पीछे चलने के लिए हम नया रास्ता बनाकर जाएँगे। ये महानता के रास्ते हैं। अगर आप महानता के रास्ते पर चल पड़े तो आपके जीवन की मुक्ति हो गई। जीवनमुक्त जैसे इसी जिंदगी में आनंद उठाते हैं, मजा उड़ाते हैं और सारे विश्व में पंख लगाकर स्वच्छंद उड़ते चले जाते हैं जैसे कि पखेरू सारे विश्व में उड़ता हुआ चला जाता है। वह कैसा सुँदर दृश्य देखता है? कैसी सुहावनी छवि का लाभ उठाता है, आप भी उठा सकते हैं, अगर आप जीवनमुक्त होने की दिशा में कोशिश करें तब। यह आपकी मुट्ठी में है और आप चाहें तो इसे खरी भी सकते हैं। आप जरा हिम्मत तो कीजिए। लोभ, मोह और अहंकार का तिरस्कार कीजिए, फिर देखिए आपकी मुक्ति आपके चरणों में आती है कि नहीं। मुझे उम्मीद है कि आप यहाँ इस कल्पसत्र में आए हैं और जीवनमुक्त होकर जाएँगे। आज की बात समाप्त। ॐ शांतिः
प्रतिभाओं को आमंत्रण
परमपूज्य गुरुदेव रचित वाङ्मय के 70 खंडों के प्रकाशन के बाद शेष 39 खंडों संपादन-प्रकाशन होना है साथ ही साथ 108 ग्रंथों का गुजराती तथा अंग्रेजी संस्करण प्रकाशित किया जाना है। इस मिशन के साहित्य संपादन में जिन परिजनों की अभिरुचि हो तथा योग्यता प्राचार्य, प्रोफेसर, व्याख्याता स्तर की हो एवं समर्पण भाव से निम्न क्षेत्रों में से किसी में लगभग एक-दो वर्ष तक का समयदान दे सकते हों, कृपया संपर्क करें।
(क) अंग्रेजी अनुवाद
अन्य विवरण के साथ हिन्दी से अंग्रेजी अनुवाद का अनुभव, प्रुफरीडिंग अनुभव एवं अगस्त मास की अखण्ड ज्योति पत्रिका पृष्ठ 55, 56, 57 का अनुवाद भी संलग्न करें।
(ख) गुजराती अनुवाद
अन्य विवरण के साथ हिंदी से गुजराती अनुवाद का अनुभव, प्रुफरीडिंग अनुभव एवं अगस्त मास की अखण्ड ज्योति पत्रिका पृष्ठ 55, 56, 57 का अनुवाद भी संलग्न करें।
(ग) हिंदी साहित्य
थ्जन परिजनों की हिंदी साहित्य संपादन, प्रुफरीडिंग आदि में अभिरुचि हो, उसके अनुभव का उल्लेख करते हुए अन्य विवरण के साथ संलग्न करें।
वाँछित अन्य विवरण-
नाम, पता, फोन नं., आयु पारिवारिक उत्तरदायित्व, योग्यता, स्वास्थ्य, पद/व्यवसाय, कार्य का अनुभव, समयदान की अवधि, गायत्री परिवार से जुड़ने का वर्ष। संपर्क सूत्र-
अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
हिंदूधर्म में अनेक मान्यताएँ प्रचलित हैं। विविध बातों के संबंध में परस्पर विरोधी मतभेद भी हैं। परंतु गायत्री मंत्र की महिमा एक ऐसा तत्व है, जिसे सभी शास्त्रों ने, सभी संप्रदायों ने, सभी ऋषियों ने एक स्वर से स्वीकार किया है।
अथर्ववेद 19-71-1 में गायत्री की स्तुति की गई है, जिसमें उसे आयु, प्राण,शक्ति, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली कहा गया है। विश्वामित्र का कथन है- “गायत्री के समान चारों वेदों में कोई मंत्र नहीं है। संपूर्ण वेद, यज्ञ, दान, तप, गायत्री मंत्र की एक कला के समान भी नहीं हैं।” भगवान मनु का कथन है- “ब्रह्माजी ने तीन वेदों का सार तीन चरण वाले गायत्री मंत्र के रूप में निकाला। गायत्री से बढ़कर पवित्र करने और कोई मंत्र नहीं है। जो मनुष्य नियमित रूप से तीन वर्ष तक गायत्री का जप करता है, वह ईश्वर को प्राप्त करता है। जो द्विज दोनों संध्याओं में गायत्री जपता है, वह वेद पढ़ने के फल को प्राप्त होता है। अन्य कोई साधना करे या न करे, केवल गायत्री जप से भी सिद्धि पा सकता है। नित्य एक हजार जप करने वाला पापों से वैसे ही छूट जाता है, जैसे केंचुली से सर्प छूट जाता है। जो द्विज गायत्री की उपासना नहीं करता, वह निंदा का पात्र है।”
ऋषि याज्ञवल्क्य कहते हैं- “गायत्री और समस्त वेदों को तराजू में तोला गया। एक ओर षट्अंगों समेत वेद और दूसरी ओर गायत्री को रखा गया। वेदों का सार उपनिषद् है। उपनिषदों का सार व्याहृति समेत गायत्री है। गायत्री वेदों की जननी है, पापों का नाश करने वाली है इससे अधिक पवित्र करने वाला अन्य कोई मंत्र स्वर्ग और पृथ्वी पर नहीं है।” वस्तुतः यही कहा गया है कि गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, केशव से श्रेष्ठ कोई देव नहीं गायत्री से श्रेष्ठ कोई मंत्र न हुआ है, न आगे होगा। गायत्री जान लेने वाला समस्त विधाओं का वेत्ता और श्रेष्ठ श्रोत्रिय हो जाता है। जो द्विज गायत्रीपरायण नहीं, वह वेदों का पारंगत होते हुए भी शूद्र के समान है, अन्यत्र किया हुआ उसका श्रम व्यर्थ है। जो गायत्री नहीं जानता ऐसा व्यक्ति ब्राह्मणत्व से च्युत और पापयुक्त हो जाता है।
पाराशर मुनि कहते हैं- “समस्त सूक्तों तथा वेदमंत्रों में गायत्री मंत्र परम श्रेष्ठ है। वेद और गायत्री की तुलना में गायत्री जपने वाला परम मुक्त होकर पवित्र बन जाता है। वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास पढ़ लेने पर भी जो गायत्री से हीन है, उसे ब्राह्मण नहीं समझना चाहिए।”
शंख ऋषि का मत है - “नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़कर बचाने वाली गायत्री ही है। गायत्री का ज्ञाता निस्संदेह स्वर्ग को प्राप्त करता है। “शौनक ऋषि का मत है ”अन्य उपासनाएँ करें चाहे न करें, केवल गायत्री जप से द्विज जीवनमुक्त हो जाता है। साँसारिक और पारलौकिक समस्त सुखों को पाता है। संकट के समय दस हजार जप करने से विपत्ति का निवारण होता है।”
अत्रि ऋषि कहते हैं - “गायत्री आत्मा का परम शोधन करने वाली शक्ति है। उसके प्रताप से कठिन दोष और दुर्गुणों का परिमार्जन हो जाता है। जो मनुष्य गायत्री तत्त्व को भलीप्रकार समझ लेता है, इसके लिए इस संसार में कोई दुख शेष नहीं रह जाता।” महर्षि व्यास कहते हैं- “जिस प्रकार पुष्पों का सार शहद, दुग्ध का सार घृत है, उसी प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री है। सिद्ध की हुई गायत्री कामधेनु के समान है। गंगा शरीर के पापों को निर्मल करती है, गायत्री रूपी ब्रह्मगंगा से आत्मा पवित्र होती है। जो गायत्री छोड़कर अन्य उपासनाएँ करता है, वह पकवान छोड़कर भिक्षा माँगने वाले के समान मूर्ख है। काम्य सफलता तथा तप की वृद्धि के लिए गायत्री से श्रेष्ठ और कुछ है नहीं।”
भारद्वाज ऋषि कहते हैं- “ब्रह्मा आदि देवता भी गायत्री का जप करते हैं, वह ब्रह्मसाक्षात्कार कराने वाली है। अनुचित काम करने वालों के दुर्गुण गायत्री के कारण छूट जाते हैं। गायत्री से रहित व्यक्ति शूद्र से भी अपवित्र है।” नारद जी की उथ्कत है- “गायत्रीशक्ति का ही रूप है। जहाँ भक्तिरूपा गायत्री है, वहाँ श्री नारायण का निवास होने में काई संदेह नहीं होना चाहिए।” वर्तमान शताब्दी के आध्यात्मिक तथा दार्शनिक महापुरुषों ने भी गायत्री के महत्व को उसी प्रकार स्वीकार किया है जैसा कि प्राचीनकाल के तत्वदर्शी ऋषियों ने किया था। महात्मा गाँधी कहते हैं- “जिस बहुमुखी दासता के बंधनों में भारतीय प्रजा जकड़ी हुई, उसका अंत राजनैतिक संघर्ष करने मात्र से न हो जाएगा। उसके लिए आत्मा के अंदर प्रकाश उत्पन्न होना चाहिए, जिससे सत् और असत् का विवेक पैदा हो, कुमार्ग को छोड़कर श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिले। गायत्री मंत्र में वही भावना विद्यमान है।”
महामना मालवीय जी ने कहा है- “ऋषियों ने जो अमूल्य रत्न हमें दिए हैं, उनमें से एक अनुपम रत्न गायत्री है। गायत्री में ईश्वरपरायणता का भाव उत्पन्न करने की शक्ति है।” श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे-लंबे साधन करने की जरूरत नहीं है। इस छोटी-सी गायत्री की साधना करके तो देखो। इससे बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ मिल जाती है। उपर्युक्त सभी मंतव्य बताते हैं कि गायत्री उपासना के पीछे आत्मोन्नति में सहायक ठोस तत्वों का बल है। गायत्री साधना कभी निष्फल नहीं जाती।
किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण और जीवन की दिशा निर्धारित निर्माण और जीवन की दिशा निर्धारित करने का काम क्षण भर में नहीं हो जाता। स्वयं अपना निर्माण भी अनवरत प्रयासों से कई फिसलनों और भटकाओं के बाद हुआ है, तो अपने निकटवर्तियों से शीघ्रता की आशा कैसे की जा सकती है। खासतौर से उस स्थिति में जबकि लोकसेवी का अपना रुझान आदर्शों की ओर था, टीस भी थी, जबकि दूसरों में अभी लगन-निष्ठा भी पैदा करनी है। इसके लिए क्रमबद्ध शिक्षण और धैर्यपूर्वक प्रयास आवश्यक है।
आदर्शों पर दृढ़ रहने की निष्ठा परिवार वालों में भी आदर्शों के वरण की ललक जगाती है। लोकसेवी द्वारा अपने आदर्शों की कीमत पर उन्हें प्रेरणा प्रदान करने का कार्य प्रभावशाली ढंग से संपन्न नहीं होता है। जैसे लोकसेवा पिता ने यह व्रत ले रखा है कि हम सूत या खादी के वस्त्र ही पहनेंगे। स्वयं तो वह नहीं खरीदेगा, लेकिन स्वावलंबी और कमाऊ लड़के स्नेह-श्रद्धावश उसके लिए टेरीकाँट या पोलिस्टर के कपड़े ले आएँ, तो असमंजस की-सी स्थिति उत्पन्न हो जाती है, पर तभी जब अपना दृष्टिकोण परिवार वालों के सामने साफ न रहा हो। यदि स्वजन-संबंधियों को सादगी में शान समझने और व्यक्तित्व की उज्ज्वलता को गौरवास्पद अनुभव करने की प्रेरणा दी जाए, स्वयं अपना व्यक्तित्व भी उसी स्तर का रखा जा सके, तो ऐसी असमंजसपूर्ण स्थिति आ ही नहीं सकती। क्योंकि तब घर के लोग भी लोकसेवी की मान्यताओं और दृष्टिकोण के महत्व को समझने, स्वीकारने लगेंगे तथा वे भी उन्हीं आदर्शों को अपनाने, उस व्रत पर दृढ़ रहने की निष्ठा विकसित कर सकेंगे।
अपने व्रत पर दृढ़ रहने की निष्ठा को प्रखर अभिव्यक्ति देने से लोग भले को प्रखर अभिव्यक्ति देने से लोग भले ही वैसा व्रत न अपनाएँ, पर वे व्रत के महत्व को तो समझेंगे। परिवार के लिए लोगों शिक्षित करने के लिए परिस्थिति के अनुसार इस प्रकार के कितने ही तरीके खोजे जा सकते हैं।
परिवार के सदस्यों में उत्कृष्टता और सद्गुणों की अभिवृद्धि के साथ-साथ लोकसेवी को चाहिए कि वे अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को और ज्यादा न बढ़ाएं। प्राचीनकाल में जिन्हें लोकसेवा का व्रत लेना होता था वे तो ब्रह्मचर्याश्रम से सीधे ही लोकसेवा के क्षेत्र में उतर पड़ते थे और गृहस्थ व्यक्ति यदि लोकसेवा करना चाहते तो पारिवारिक उत्तरदायित्वों से मुक्त हो जाते थे। इसका अर्थ यह नहीं कि घर-परिवार छोड़कर संन्यासी हो जाते थे। लोकसेवा के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए वे अपनी जिम्मेदारियों को इस प्रकार पूरा कर देते या ऐसी व्यवस्था कर देते थे, जिससे कि वे परिवार के प्रति कम-से-कम उत्तरदायी हों। उदाहरण के लिए बच्चे बड़े हो गए, तो घर-परिवार की व्यवस्था उनके हाथ में सौंपकर माता-पिता ने वानप्रस्थ ले लिया और निकल पड़े समाजसेवा के लिए अथवा परिवार उत्तरदायित्वों को इतना कम रखें कि उसके लिए अपना अधिकांश समय और श्रम न देना पड़े।
आज की स्थिति में युवा लोकसेवियों को चाहिए कि वे संतान की संख्या न बढ़ाएँ। अच्छा तो यही है कि लोकसेवा के क्षेत्र में रहते हुए संतानोत्पादन से बचा जाए। संतान आखिर ममता और वात्सल्य भावना की अभिव्यक्ति के लिए के लिए ही तो आवश्यक समझी जाती है। ममता और वात्सल्य लुटाने के लिए समाज में बहुत से बच्चे हैं। यह कोई आवश्यक नहीं कि बच्चा अपनी ही संतान हो। जो विवाह की आवश्यकता अनुभव न करते हों वे अविवाहित ही रह लें और जो विवाह करना चाहें उन्हें तो संतान की आवश्यकता ही नहीं समझनी चाहिए या जिनके बच्चे हैं वे वहीं तक सीमित रखें। पारिवारिक उत्तरदायित्वों को हलका रखने से लोकसेवा के लिए अधिक समय बच सकेगा और अपनी प्रतिभा तथा योग्यता का अधिकाधिक लाभ समाज को दे सकेंगे। जापान के गाँधी कागावा की तरह वे भी विवाहित किंतु संतान उत्पन्न न कर सारे समाज का उत्तरदायित्व सँभाल सकेंगे।
सेवा के अनेक क्षेत्र हैं और उसके व्यापक स्वरूप को पूरी तरह स्पर्श कर सकना संभव नहीं है। यह सोचकर लोग अंतःकरण में सेवा की उमंग उठते हुए तथा सेवाधर्म के लिए हर दृष्टि से योग्य होते भी पीछे हट जाते हैं। वे सोचते हैं संसार में इतनी विकृतियाँ हैं, समस्याएँ इतनी विकराल हैं या हजारों लोग बाढ़ की चपेट में आ गए हैं। हम क्या कर सकते हैं? सेवाकार्य तो आरंभ हुआ नहीं कि उसके परिणाम पर दृष्टि पहले गई। यदि अन्य लोग जो सार्वजनिक समस्याओं के समाधान के लिए घर से निकलते हैं, वे सभी ऐसा सोच लें तो संसार में सेवापरक गतिविधियाँ चलेंगी ही नहीं? परिणाम क्या होगा, यह सोचे बिना अपनी सामर्थ्य और स्थिति के अनुसार प्रयास प्रारंभ कर देना सेवाभाव की पहली शर्त है। गिलहरी जानती थी कि रीछ-वानरों को, समुद्र पर पुल बनाने में कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं दे सकती। फिर भी उसने सागर में डुबकी लगाना और रेत पर लौटने के बाद फिर सागर में डुबकी लगाना जारी रखा। उसका योगदान परिणाम की दृष्टि से भले ही न्यून रहा हो, पर भगवान् का कार्य करने वालों में उस गिलहरी को अग्रणी स्थान मिला।
व्यवहारिक दृष्टि से भी एकाकी योगदान निष्फल नहीं जाते। रीछ-वानर जाते थे कि हमारी शक्ति कितनी है, फिर भी उन्होंने लंकाविजय की योजना बनाई और उस पर काम किया। साधनहीन और शक्तिशाली प्रतिपक्ष को किस प्रकार परास्त किया, उदाहरण सामने है। इंद्र के क्रोधित होने पर जब ब्रज का डूबना लगभग निश्चित लगने लगा तो कृष्ण ने गोप-बालों के सामने गोवर्द्धन पहाड़ उठाने की योजना रखी। कहाँ गोप-बाल और कहाँ गोवर्द्धन पर्वत का उठाना। कार्य की गुरुता के आगे सभी अपने को असमर्थ मान रहे थे, फिर भी पीछे नहीं हटे और गोवर्द्धन पर्वत उठाकर ही रहे। लोकसेवा की उमंग अनुभव करने और उस मार्ग पर कदम बढ़ाने वाले को चाहिए कि वह बूँद-बूँद से घट भरने की बात सोचे।
प्रत्यक्ष देखने पर सेवाकार्य में घाटा पड़ता है, जबकि वस्तुतः ऐसा नहीं है। कृषिविज्ञान से एकदम अनभिज्ञ व्यक्ति किसी किसान को खेत में बीज डालते देखकर यह सोचने लगे कि किसान बीजों को यों ही गँवा रहा है तो कोई आश्चर्य नहीं, पर उसके परिणाम हमेशा सुखद लगते हैं। सेवासाधना के परिणाम भी सामाजिक सुव्यवस्था और व्यक्तिगत आत्मसंतोष एवं आनंद के रूप में प्राप्त होते हैं। वह अनुभूति आँतरिक है-लेकिन जिनकी दृष्टि बाहरी परिणामों पर ही टिकी रहती है, वे सेवा को घाटे का सौदा समझते हैं।
समाज में यह स्थिति सदैव बनी रहने वाली है। जनसाधारण स्थूल दृष्टि से ही हर वस्तु का मूल्याँकन करते हैं। इसीलिए सेवासाधना के असाधारण लाभों को समझ नहीं पाते और उसके लिए आगे आने में, सहयोग देने में झिझकते हैं। जब कोई साहसी लोकसेवी उस क्षेत्र में पहल करता है, प्रसन्नतापूर्वक अकेला ही आगे बढ़ता जाता है, तो लोगों का भ्रम दूर होता है। सेवासाधना के लाभ सबको दिखने लगते हैं और लोकसेवी को सम्मान से लेकर सहयोग-समर्थन तक दिया जाने लगता है।
परंतु यदि लोकसेवी का दृष्टिकोण शुद्ध तथा प्रखर नहीं है, तो वह बीच में मिलने वाली उपेक्षा और कठिनाइयों से विचलित हो जाता है। उसे लगता है कि सेवा का लाभ सारे समाज को मिलता है, फिर भी समाज उसके लिए सहयोग नहीं देता, तो हम ही क्यों-मरें-खपे? और यह भाव आते ही लोकसेवी की प्रखरता घटने लगती है।
यह चिंतन उभरने का अर्थ है- ‘लोकसेवी का दृष्टिकोण खो जाना।’ ऐसा चिंतन उस मस्तिष्क में ही उभरेगा, जो सेवाकार्य को कर्त्तव्य नहीं किसी पर किया गया अहसान मानता है। सेवा भाव से संतोष बढ़ता है और अहसान के भाव से अहंकार पनपता है। उसके बढ़ने पर पतन निश्चित है। अस्तु, सेवाभावी का दृष्टिकोण सेवा के प्रति शुद्ध रहना ही चाहिए। वह सेवाकार्य को कर्त्तव्यपूर्ति का, सामाजिक ऋण से मुक्त होने का, भगवान का प्रेम पाने का एक अलभ्य अवसर मानता है। उसे खोना नहीं चाहता। उसे सौभाग्य मानकर अपनाने के लिए दौड़ पड़ता है। कोई साथ आ रहा है या नहीं, यह देखने की उसकी इच्छा ही नहीं होती। यदि कोई आ गया तो प्रसन्नतापूर्वक उसके सहयोग से कार्य को और भी प्रखर कर देता है। सहयोगी के अभाव में उसका मनोबल नहीं घटता है और सहयोगी के आने पर उसे यह भी नहीं लगता कि कोई उसके श्रेय में हिस्सा बँटाने क्यों आ गया। उसकी दृष्टि तो सेवाकार्य को अधिक से-अधिक कुशलता से करने पर रहती है। इसलिए उसकी प्रखरता एवं उसे मिलने वाले संतोष में जरा भी कमी नहीं आने पाती।
अस्तु, सेवाक्षेत्र में प्रविष्ट होने वाले हर व्यक्ति को अपना दृष्टिकोण शुद्ध एवं प्रखर बनाकर रखना चाहिए, तभी वह सही अर्थों में अपनी शक्ति उस कार्य में लगा सकेगा। आत्मोत्कर्ष एवं समाजोत्कर्ष का संयुक्त लाभ इसी आधार पर प्राप्त हो सकेगा।
समयदान हेतु महाकाल का आमंत्रण
परमपूज्य गुरुदेव ने कहा- “हमारे विचार, क्राँति के बीज हैं। ये युगपरिवर्तन करने में समर्थ हैं। यदि आप हिम्मत करके कदम बढ़ाएं हमारे साथ, तो बात बन जाएगी। महाकाल अपनी शर्तों पर आपको आमंत्रण दे रहा। हमारे साहित्य को घर-घर पहुँचाएँ, यह साहित्य लोगों के विचारों में परिवर्तन लाएगा और इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य लाने का श्रेय आपको मिल जाएगा।”
पूज्यवर रचित वाङ्मय, जो उनका मूर्तिमान स्वरूप है, घर-घर पहुँचे-इसके लिए यदि आप दो मास का समयदान दे सकते हैं, तो निम्न जानकारियों सहित आवेदन भेजें। टोलियाँ 1 अक्टूबर 1999, 1 दिसम्बर, 99, 1 फरवरी 2000, 1 अप्रैल 2000, 1 जून 2000 से निकलेंगी।
कृपया अपना नाम-पता, फोन नं., आयु, शिक्षा, पद-व्यवसाय, आप पर कौन-कौन आश्रित हैं? गायत्री परिवार से कब जुड़े? समयदान की अवधि का विवरण देते हुए पत्र व्यवहार करें। व्यवस्थापक अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
श्रीमद्भगवद्गीता के साँख्ययोग (द्वितीय अध्याय) की युगानुकूल विवेचना-गताँक से जारी
गत अंक में योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा जिज्ञासु अर्जुन को “देहातीत आत्मा के भान” संबंधी विवेचना का हमने विस्तार से जाना। सद्गुरु-पारदर्शी-अंतर्यामी भगवान् बताते हैं कि पंडितजनों को जो प्राण छोड़कर चले गए हैं या जीवित हैं, के लिए किसी भी प्रकार शोक नहीं करना चाहिए। वे विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से अपने शिष्य को आसक्ति के बंधनों मुक्त करना चाहते हैं। हमने युगगीता के इस खंड में पाठकों को बताया था कि सद्गुरु के रूप में हमारी गुरुसत्ता ने भी किस तरह हमारी आसक्ति के बंधनों पर चोट मारते हुए हमें गढ़ने प्रयास किया। नाशरहित, नित्यस्वरूप जीवात्मा का एवं उसे धारण किए नाशवान् शरीर का स्वरूप समझते हुए भगवान् गीता में अर्जुन को बारबार युद्ध करने की याद दिलाते हैं। जो अपनी देह के लिए-देह से जुड़े संबंध के लिए व्यथित होते रहते हैं, उनके लिए भगवान् का द्वितीय अध्याय के पूर्वार्द्ध में संदेश है कि हमें अपने शाश्वत संबंधों को पहचानने का प्रयास करना चाहिए आत्मा-परमात्मा, शिष्य-गुरु, जीव-ब्रह्म का संबन्ध हो, इसकी प्रारंभिक मीमाँसा विगत अंक में की गई थी एवं 32, 33, 34 वें श्लोकों के माध्यम से यह समझाया गया था कि उसे इस धर्मयुद्ध में अवश्य ही लड़ना चाहिए, नहीं तो वह स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप का प्राप्त होगा। देह से स्वधर्म आचरण की उसी व्याख्या का इस अंक में आगे बढ़ाते हैं।
युगधर्म की व्याख्या करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को बार-बार यह तथ्य समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि यदि वह संग्राम नहीं करेगा, तो धर्म से च्युत हो पाप को प्राप्त होगा। वे एक मार्के की बात कहते हुए निम्नलिखित श्लोकों के माध्यम से एक संदेश देते हैं।
भयाद्रणादुपरत। मंस्यन्ते त्वाँ महारथाः। येषा च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥
“जिनकी दृष्टि में पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे बहुत-से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे; उससे अधिक दुख और या होगा?”
हतो वा प्राप्स्यसि र्स्वगं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥
“तेरे बैरी लोग तेरी सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे बहुत-से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे; उससे अधिक दुख और क्या होगा?”
ळतो वा प्राप्स्यसि र्स्वगं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धायाँ कृतनिष्चयः॥
“या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा।”
सुखदुखे समे कृत्वा लालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धा युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥
“जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख समान समझकर इसके बाद युद्ध करने से त पाप को प्राप्त होगा।”
उपर्युक्त चार श्लोकों के माध्यम से तीन मुख बातें सामने आती हैं। पहला-”तेरा ममत्व-मोह-असमंजस तुझे पाप की ओर ले जा रहा है। यह पलायनवाद एक महापाप है।” दूसरा “कर्त्तव्यपालन करते हुए मरना ही श्रेष्ठ है। मरकर स्वर्ग प्राप्त करना एवं संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगना-यही एक योद्धा का लक्ष्य होना चाहिए। इसीलिए तू कृत-निश्चय हो युद्ध के लिए खड़ा हो जा।” तीसरा हानि-लाभ, जय-पराजय, सुख-दुख के बारे में मत सोच। इनके द्वंद्व में फँसेगा, तो गिरेगा, तिरस्कृत होगा, निकृष्ट योनि को प्राप्त होगा। क्योंकि यह युद्ध तू पापकर्म के निमित्त नहीं-कर्त्तव्यकर्म के निमित्त कर रहा है, तू दृढ़ निश्चय होकर युद्ध के लिए तैयार हो जा।
अकारण परिजनों से मोह-कर्त्तव्य से दूर भागना- नैष्कर्म्य से जन्मा पलायनवाद, आलस्य-प्रमाद ये सभी वृत्तियाँ हमें पाप की ओर ले जाती है। हमें अपने लिए निर्धारित कर्म को देख देह से स्वधर्म आचरण में ही प्रवृत्त होना चाहिए। यह शिक्षण भगवान् के अड़तीसवें श्लोक तक दिए प्रतिपादन के माध्यम से हमारे समक्ष आता है। एक बात बड़ी स्पष्ट कही है योगेश्वर कृष्ण ने। अपने स्वधर्म से विमुख होना महापाप है। यदि हम सभी गायत्री परिजन इस बात को गाँठ बाँध यही सोच लें कि सन् 2000 की समाप्ति तक-इक्कीसवीं सदी का नवप्रभात आने तक, हमें अपने शरीर-मन की सभी तकलीफों को भूलकर गुरुकार्यों में तत्पर बने रहना है। जरा भी आलस्य-प्रमाद आड़े नहीं आने देना है, किसी भी कालनेमि की माया में न फँसकर मात्र अपने कर्त्तव्य को करते चले जाना है, तो न केवल इस देह से स्वधर्म आचरण संभव हो जाएगा-प्रतिकूल अवधि भी निकल जाएगी एवं हम ऐसे जमाने में पहुँच जाएँगे जहाँ तनिक-सा पुरुषार्थ भी हमें यश व कीर्ति के चरम शिखर तक पहुँचा देगा। इन दिनों महापूर्णाहुति का कार्य हमारे सिर पर है। सारे राष्ट्र में नीतिमत्ता-राष्ट्रीयता के जागरण का अलख जगाना है। यह युगधर्म किया ही जाना है। उससे विमुख होना महापाप है। यदि यही हमें संदेश मिल जाए तो बहुत बड़ी बात है।
भगवान् कहते हैं कि यही काम करते-करते यदि तुम अंतिम गति को प्राप्त भी हो जाओ तो कोई हर्ज नहीं, तुम्हें स्वर्ग मिलेगा। यदि जीवित रहे तो यश की पराकाष्ठा पर पहुँचोगे। यही बात तो हमें अपने सद्गुरुदेव भी समझा गए, तो फिर किस बात का असमंजस? परमपूज्य गुरुदेव ने सितंबर 1978 की अखण्ड ज्योति में लिखा है- “रिजर्वफोर्स के सैनिक बहुत दिन सो लिए, आलस्य कर चुके। कर्त्तव्य से विमुख होंगे तो उसका कल्याण न आज है, न कल।” यह वाक्य अपने आप में न केवल गुरुसत्ता की टीस बताता है, हमें अपना कर्त्तव्यकर्म भी समझाता है।
इसके पश्चात् के श्लोकों में भगवान् श्रीकृष्ण अपने शिष्य अर्जुन को कर्मयोग के परिप्रेक्ष्य में उसे किस बुद्धि को अपनाना चाहिए, यह समझाते हैं। वे कहते भी हैं कि अभी तक तो आत्मा-परमात्मा की, युगधर्म की ज्ञानयोगपरक बातें सुन रहा था, लेकिन अब इस प्रतिपादन को “कर्मयोग के विषय में सुन-जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बंधन को भलीभाँति त्याग देगा अर्थात् सब प्रकार से नष्ट कर देगा (एवं फिर युगधर्म में प्रवृत्त हो जाएगा)।” (श्लोक-39 “बुद्धया युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि”)। इसी बात को आगे अच्छी प्रकार से समझाते हुए कहते हैं कि “इस कर्मयोग में आरंभ का अर्थात् बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है। बल्कि इस कर्मयोगरूपी धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूपी महान् भय से रक्षा कर लेता है।” (श्लोक 40)
आर्यधर्म-क्षत्रियधर्म की व्याख्या के तुरंत बाद वासुदेव ने अपने उपदेश की शैली बदली है। वे अर्जुन की कठिनाइयों-ऊहापोहों का पहला उत्तर संक्षेप में दे चुके हैं। अब वे दूसरे उत्तर की ओर मुड़ते हैं और उनके मुँह से जो शब्द निकलते हैं वे हम सबको साँख्य और योग में एक भेद बताते है-उस बुद्धि से योग में स्थित होकर कर्म किया जाता है, तो अर्जुन अपने कर्मबंधन को छुड़ा सकता है, यह उन्होंने उपर्युक्त 39वें श्लोक में समझाया।
यहाँ श्री अरविंद के ‘गीता प्रबंध’ के परिप्रेक्ष्य में इस जटिल पहली को थोड़ा समझ लें। “गीता मूलतः वेदाँत ग्रंथ है। वेदाँत के तीन सर्वमान्य प्रमाण ग्रंथों में एक गीता है। इसका इतना अधिक आदर है कि यह श्रुति न होते हुए भी लगभग तेरहवीं उपनिषद् के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसके वेदांतिक विचारों के कारण इसके दर्शन पर एक विलक्षण समन्वय साँख्य व योग की छाप आ गई है। यह सिद्धाँत व व्यवहार का अद्भुत सम्मिश्रण है। गीता का यह ज्ञान कर्म को ज्ञान और भक्ति की नींव पर खड़ा करता है। गीता का साँख्ययोग एक स्वाभाविक आत्मविकास की प्रक्रिया पर आधारित है। गीता चाहती है कि कर्म के कुछ सिद्धाँतों का अवलंबन पर जीव अपना उद्धार करें। निम्न प्रकृति से दिव्यप्रकृति में आरोहण करें।” व्यावहारिक अध्यात्म के रूप में यही दिव्यज्ञान परमपूज्य गुरुदेव ने हमें दिया एवं दी जीवन जीने की कला-नरमानव से देवमानव बनने की दिशाधारा व सूत्र। इन्हीं सबको तो भगवान् ने इस श्लोकों में समझाने का प्रयास किया है।
भगवान् अर्जुन के मन का असमंजस क्रमशः धीरे-धीरे मिटा रहे हैं। जैसे कोई सर्जरी सोची-समझी नीति के अंतर्गत की जा रही हो। अर्जुन को पाप का डर है-दुख का डर है-नरक और दंड पाने का ईश्वर का डर है। परंतु इस महाभय से मुक्ति उसे तार सकती है, यदि वह भगवान् कृष्ण की बात को समझ लें, उन पर विश्वास कर ले। इसीलिए वे कहते हैं- “इस कर्मयोगरूपी महान् भय से तेरी रक्षा करेगा। स्वल्प साधन भी तुझे मुक्ति दिला देगा।” एक बार भी तूने इस मार्ग पर चलने का प्रयास किया जो देखेगा कि कोई भी कदम व्यर्थ नहीं गया। एक भी ऐसी बाधा नहीं मिलेगी जो तेरी प्रगति को अटका सके। कितनी निर्भीक प्रतिज्ञा है योगेश्वर श्रीकृष्ण की, जो बार-बार भयभीत-शंकित मन वाले अर्जुन को आश्वस्ति दिलाती है। गीता के इस प्रारंभिक उद्घोष के साथ यदि हम गुरुसत्ता के 1940 से अब तक चले आ रहे मार्गदर्शन को जोड़ लें तो लगेगा कि इस युग का महानायक युगकृष्ण हमें यही तो बताता आया है। गायत्री मंत्र रूपी साधना में स्वयं को प्रवृत्त कर उसका थोड़ा-सा भी साधन जीवन का कल्याण सुनिश्चित है। इसमें कहीं भी बीज का नाश नहीं, न उलटा फलरूप दोष ही है। यह भी बारंबार सबको समझाकर गुरुसत्ता ने करोड़ों व्यक्तियों की जीवन की दिशाधारा बदल दी। बुद्धि के सद्बुद्धि में बदलने की इस छोटी-सी चिनगारी ने एक महादावानल खड़ा कर क्राँति कर दिखाई है, इसे सहज ही समझा जा सकता है।
भगवान् यहाँ कहते हैं कि मानवी बुद्धि दो प्रकार की होती है (41 से 44वाँ श्लोक)। पहली बुद्धि की विशिष्टता है एकत्व, एकाग्र स्थिरता, केवल परम तत्त्व को समर्पित। दूसरी बुद्धि में कोई संकल्प नहीं, कोई एक निश्चय नहीं, वह जीवन और परिस्थिति से उठने वाली इच्छाओं के पीछे इधर उधर भटका करती है। गीता में बुद्धि शब्द आया है-मन की विवेक और निश्चय करने वाली समस्त क्रिया के परिप्रेक्ष्य में। इस प्रकार भगवान् व्यावसायिक और अव्यावसायिक दो प्रकार की बुद्धि के रूप में विश्लेषण करते हैं। बहुशाखा वाली, बहुधंधी, बहुत से व्यापारों में लगी बुद्धि अपने कर्त्तव्यकर्म की उपेक्षा करती है, यह भवान् यहाँ समझाने का प्रयास कर रहे हैं। बुद्धि को ऊर्ध्वमुखी और अंतर्मुखी करना ही हमारा कर्त्तव्य होना चाहिए-इस बात को समझाने के लिए भगवान् को इतना बड़ा स्पष्टीकरण अर्जुन को देना पड़ रहा है।
41वें श्लोक में भगवान् कहते हैं-
व्यवसायित्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। ब्हुषाखा ह्नानन्ताष्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥
अर्थात् हे अर्जुन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि तो एक ही होती है, किंतु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनंत होती हैं।
हमें इसमें दो-तीन शब्दों को समझना चाहिए।-अस्थिर विचार वाले, विवेकहीन, सकाम, बहुत भेदों वाली व अनंत बुद्धि। पहले तीन शब्द उन मनुष्यों के लिए प्रयुक्त किए गए हैं, जो धर्म को कर्त्तव्यकर्म नहीं व्यापार मानते हैं। भगवान् से भी सकाम भक्ति करते हैं। कामना की पूर्ति हो तो भगवान हैं, नहीं तो नहीं हैं। ऐसे लोगों को विवेकहीन कहकर भगवान् ने उनकी बुद्धि अनंत अर्थात् बहुदिशा वाली, भटकने वाली, अस्थिर बताई है। आगे वे कहते हैं-
“हे अर्जुन! जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परमप्राप्य वस्तु है और जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं, ऐसा कहने वाले हैं, वे अविवेकीजन इस प्रकार की जिस पुष्पित अर्थात् दिखाऊ शोभायुक्त वाणी को कहा करते हैं, जो कि जन्मरूप कर्मफल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए नानाप्रकार की क्रियाओं का वर्णन करने वाली है, उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है, जो भोग तथा ऐश्वर्य में अत्यंत आसक्त है, उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती।” (42 से 44 श्लोक)
एक प्रकार से उन्होंने आज के युग की समीक्षा ही कर डाली है। भोगवाद में लिप्त-देखने में बड़ी सुँदर शोभायुक्त वाणी कहने वाले किंतु ऐश्वर्य की कामना मन में रखे बैठे ऐसे व्यक्ति जिनका चित्त सदैव भौतिकवाद में ही लिप्त है-आत्मकल्याण की बात कैसे सोच सकते हैं। आज का बहुसंख्यक वर्ग चाहे वह तथाकथित धर्मपरायण भी माना जाता हो-इसी श्रेणी में आता है।
व्यवसायात्मिका बुद्धि को भगवान् श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे- पटवारी बुद्धि जोड़-गाँठ न करके संपूर्ण कामनाओं का त्याग जो करे उसकी बुद्धि सही है। इसीलिए भगवान् अर्जुन से कहते हैं कि “तू आसक्तिहीन होकर योगक्षेम को न चाहने वाला व स्वाधीन अंतःकरण वाला बन।” (45वाँ श्लोक) अप्राप्त की प्राप्ति का नाम है-’योग’ एवं प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम है ‘क्षेम’। इसी के लिए वे कह रहे हैं कि इसको न चाहकर स्वाधीन अंतःकरण वाला बन-व्यावसायिक बुद्धि को छोड़ सद्बुद्धि को ग्रहण कर एवं द्वंद्वों से रहित होकर अपने कर्त्तव्यकर्म में लग जा, साथ ही कर्मों के फल की कामना भी मत कर।
अब यहाँ हम गीता के के सर्वाधिक महत्वपूर्ण श्लोक पर आ जाते हैं जिसका गान युगों-युगों से किया जाता रहा है। कर्मयोग प्रधान-सांख्ययोग प्रधान कर्म लिए यह श्लोक हजारों वर्षों से जनचेतना का प्रेरणा स्रोत रहा है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सड्.ोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थात्- “तेरा कर्म करने में ही अधिकार है। उसके फलों में कभी नहीं। इसीलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।”
यहाँ से लेकर 53वें श्लोक तक जो विवेचना आई है, वह गीता का मर्म है, वास्तविक सार है, योग की सही अर्थों में व्याख्या है। भगवान् कह रहे हैं कि तुझे कर्म करने का अधिकार प्राप्त है, उनके फल मिले कि नहीं-नहीं मिले तो क्यों नहीं मिले-यह सोचने का जरा भी अधिकार नहीं। कई व्यक्ति गीता के इस वाक्य का महावाक्य भी कहते हैं। परंतु गीता का समझना हो तो उसके आदि से अंत तक विकासात्मक क्रम से उसे समझने का प्रयास करना चाहिए। गीताकार यहाँ कह रहा है कि मनुष्य कर्म का कर्त्ता नहीं है, त्रैगुण्यमयीशक्ति ही उससे कर्म कराती है और शिष्य को यह साफ-साफ देख लेना व शिक्षण ग्रहण कर लेना होगा कि कर्म का कर्त्ता वह नहीं है। जैसे ही हमें अपनी चेतना में यह अनुभूति होने लगती है कि हम अपने कर्मों के कर्त्ता नहीं हैं त्यों ही कर्म फलाधिकार के समान ही कर्माधिकार भी मन-बुद्धि से तिरोहित हो जाता है। तब कम्विषयक सारे अहंकार भी समाप्त हो जाते हैं। अगले अध्यायों में हम देखेंगे कि भगवान् अर्जुन को समझा रहे हैं कि साधक को त्रिगुणातीत हो अपने कर्म उस परमपुरुष की सत्ता में समर्पित करने होंगे, जिन्हें हम परमेश्वर कहते हैं। उनके संकल्प के साथ अपने संकल्प का तादात्म्य हो जाना होगा, उनकी चेतना से सचेतन होना होगा, उन्हीं को कर्म का निर्णय और आरंभ करने देना होगा। यह समर्पण की मनुष्य के लिए निर्धारित योग है-उसे नर से नारायण बनाने वाला, जीव से ब्रह्म के साथ एकाकार करने वाला महापुरुषार्थ है। उसकी शुरुआत यहाँ से होनी है, जिसे 47वें व फिर 48वें श्लोक में बताया है।
48वें श्लोक में भगवान् कहते हैं-हे धनंजय! तू आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला होकर योग में स्थित हुआ कर्त्तव्य कर्मों को कर। समत्व ही योग कहलाता है।” -योगस्थः कुरु कर्माणि” -योग में स्थित होकर कमकर सड्.त्यकत्वा- आसक्ति को छोड़कर तथा “समत्वं योग उच्यते” जो कुछ भी कर्म किया जाए उसके पूर्ण होने और न होने तथा इसके फल मं समभाव रहने का नाम समत्व है एवं इसी को योग कहा गया है-यह तीन महत्वपूर्ण व्याख्याएं इस श्लोक में आई हैं एवं साँख्ययोग के मूल मर्म तक हमें ले जाती है। यदि हमें जीवन की किसी भी जटिलता का समाधान चाहिए, तो हमें ‘योगस्थ’ होकर कर्म करने की शैली सीखनी होगी। यही हमें श्रेष्ठ जीवन जीने वाला कलाकार, श्रेष्ठ व्यवस्थापक, श्रेष्ठ परिवार का अधिष्ठाता बना सकती है। लोकसेवी बनकर युगसाधना करना परमपूज्य गुरुदेव ने हमें सिखाया तो बार-बार कहा- योग में स्थित होकर अपने कर्म करो-भवबंधनों से आसक्ति को छोड़ो एवं समत्व का भाव मन में ले आओ। यदि हम घर पर रहकर परिवार चलाते हुए भी जीवन जीना चाहते हैं, तो यही सूत्र हमारे जीवन का मार्गदर्शक बन जाता है।
एक बड़ी विशेष बात श्लोक में आई- “सड्.त्यक्त्वा धनंन्ज्य” - हे धनंजय! तू आसक्ति छोड़कर कर्म कर। धनंजय अर्जुन का बड़ा प्रख्यात नाम है। पर यही पर भगवान ने उसे इस नाम से संबोधित क्यों किया? इसका प्रत्युत्तर बड़ा रोचक है। धनंजय का अर्थ है-धन का खजाना जीतकर अपने वाला विजय पुरुष। श्रीकृष्ण यहाँ पार्थ भी कह सकते थे। अर्जुन भी कह सकते थे, लेकिन जहाँ साधनों के प्रति आसक्ति छोड़ योग में स्थित होने की बात जा रही है, वहाँ कह रहे हैं धनंजय! तू खजाना जीतकर लाया था-तुझे सिद्धि प्राप्त है, वैभवशाली है-वीर है, पर इन सब भावों के प्रति आसक्ति छोड़कर कर्म कर। तू ‘समत्व’ को धारण कर। संतुलन-कर्म के पूर्ण होने व उसके फल में समभाव बनाए रखने में विश्वास रख। क्योंकि यही वास्तविक योग है। समत्व यानि संतुलन। अर्जुन बहुत ज्यादा ज्ञानी बनता है, पर ज्ञानियों जैसा आचरण नहीं है। अतिवादी न बनकर बीच के भाव में चलना ही श्रेष्ठ है एवं वह आसक्ति के भाव को छोड़े बिना आ नहीं सकता।
आगे भगवान् कहते हैं- “इस समत्व रूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यंत ही निम्न श्रेणी का है। इसलिए हे धनंजय! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ़। जो फल के हेतु बनते है, वे अत्यंत दीन होते हैं।” (श्लोक 49/2) इस श्लोक में समबुद्धि शब्द बड़ा विशिष्ट प्रयुक्त हुआ है। बुद्धि में समत्व भाव लाना कोई खेल नहीं है। जो ऐसा कर लेता है वह युक्तपुरुष-स्थितप्रज्ञ बन जाता है, जिसकी व्याख्या साँख्ययोग के उत्तरार्द्ध के 18 श्लोकों में की गई है। भगवान् कहते हैं कि योगस्थ होकर किया जाने वाला कर्म न केवल उच्चतम होता है वरन् अत्यंत समझदारी से भरा, सांसारिक विषयों का प्रसंग आने पर भी अतिशक्तिशाली व अमोघ होता है कारण यह है कि इसमें सब कर्मों के स्वामी भगवान् का ज्ञान और संकल्प भरा होता है। इसीलिए भगवान् आगे कहते हैं-
तस्मा।ोगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्। -50/2
तू समत्व रूपी योग में ही लग। यह योग ही कर्मों में कुशलता का पर्याय है अर्थात् कर्म बंधन से छूटने का उपाय है। भगवान् कहते हैं कि ऐसी योगी जन्म बंधन से मुक्त हो परमपद को प्राप्त होते हैं (51/2)। इसके लिए वे अर्जुन को मोहरूपी दलदल से उबरकर आने के लिए नहीं कहते, लोक व परलोक संबंधी भोगों से वैराग्यप्राप्ति का आश्वासन भी उसे देते हैं (52/2)। यह योग प्राप्त कैसे हो, इसके लिए वे 53वें श्लोक में कहते हैं “भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जाएगी, तब तू योग को प्राप्त होगा अर्थात् तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जाएगा।” कितना सुँदर उत्तर अर्जुन की समस्त जिज्ञासाओं का है। कई उतार-चढ़ाव के बाद ममत्व भरी लताड़ के बाद योगेश्वर श्रीकृष्ण अपने शिष्य अर्जुन को ऐसी स्थिति में ले आए है। कि न केवल उसका शोक दूर होता चला जा रहा है, वह ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त योगी भी बनने की दिशा में अग्रसर हो रहा है। पर उसके प्रश्न अब जाग उठे हैं। वह जानना चाहता है कि ब्रह्म में दृढ़ प्रतिष्ठा योगी वह कैसे बने? इस प्रश्न व उसके उत्तर के साथ ही साँख्ययोग का तीसरा व अंतिम अति महत्वपूर्ण प्रसंग चालू होता है-स्थितप्रज्ञ के लक्षण, वह कैसा होता है, कैसे बोलता, कैसे चलता है, कैसा उसका आचरण होता है इत्यादि। ‘निश्चला’ बुद्धि की बात कह भगवान् ने उसकी जिज्ञासा जगा दी है। स्थितप्रज्ञ योगी के संबंध में विशद् व्याख्या व विवेचना इसके बाद आती है। देह से स्वधर्म आचरण से लेकर समत्व बुद्धि योग कर्म कौशल वाला योग की व्याख्या जब तक इस लेख में हुई है। इससे आगे हम अब नवंबर, अंक में पढ़ेंगे।
एक सद्गृहस्थ राज्याधिकारियों का कोपभाजन बना और कोई आरोप लगाकर उसे बंदीगृह में पहुँचा दिया गया। बंदी ने एक रात स्वप्न देखा-उसने अपनी माता की हत्या कर दी सबेरे उठते ही इस विचित्र स्वप्न से वह सिहर उठा। माता के प्रति अन्नन्य भक्ति-भाव रखने और उसकी सेवा-सहायता का निरंतर ध्यान रखने वाले को यह दुस्स्वप्न क्यों आया? समाधान वह किससे पूछता। एक दिन एक धर्मोपदेशक बंदीगृह में पहुँचे। कैदियों ने अपनी अपनी जिज्ञासाएँ प्रस्तुत की। उसी अवसर पर इस मातृहत्या का स्वप्न देखने वाले ने भी अपना असमंजस प्रकट किया। साधु ने बताया-लगता है-भोजन बनाने या परोसने वाला कोई ऐसे ही कृत्य का अपराधी रहा होगा। उसके कुसंस्कार अन्न के साथ तुम्हारे मन को वैसी ही उत्तेजना देने लगे होंगे। तलाश किया तो बात सच निकली। एकमात्र हत्यारा बंदीगृह का रसोइया था। जब वह छूट गया और दूसरे कैदी भोजन बनाने लगे, तो उस प्रकार के सपने भी समाप्त हो गए। अन्न के साथ जुड़ने वाले संस्कारों की बात सभी ने अच्छी तरह समझी।
गायत्री परिवार रूपी विराट् संगठन को-उसके क्रिया–कलापों को देख कइयों को लगता है कि अन्य संगठनों की तरह ही यह भी विनिर्मित हुआ है व समय के प्रवाह के कारण इसकी लोकप्रियता बढ़ी है। अब चूँकि मार्गदर्शक सत्ता प्रत्यक्ष रूप में नहीं है, क्या मालूम इसका भी वह हश्र हो जो औरों का होता है। कतिपय घटनाक्रम का, जो समुद्र में समाई एक बूँद की तरह होते हैं, हवाला देकर मात्र बहिरंग तक की ही जानकारी के आधार पर वे कहते भी देखे जाते हैं कि हम कौन हैं, जो इस विराट् परिवार को संरक्षण देगा। वे भूल जाते हैं कि इस तंत्र का नियामक, कर्त्ता-धर्ता सूक्ष्म-परोक्ष में विद्यमान है एवं वह हर उस भक्त के-समर्पित परिजन के योगक्षेम के वहन के लिए सतत् तैयार रहता है। संभवतः यही कारण है कि उच्चस्तरीय आध्यात्मिक चिंतन-दूरदर्शी रीति-नीति एवं एक समग्र समाज, राष्ट्र व युग के नवनिर्माण के संकल्प को लेकर खड़ा हुआ यह विराट् संगठन विगत नौ वर्षों में विराट् से विराटतम बनता चला गया है।
कुछ अनुभूतियां-घटनाओं-पन्नों के हवाले से इस स्तंभ में पाठक-परिजनों का बताने प्रयास करेंगे कि किस प्रकार बताने का प्रयास करेंगे कि किस प्रकार सूक्ष्म में समाई प्रज्ञापुरुष की, ऋषियुग्म की सत्ता सतत् न केवल इस विराट् वटवृक्ष को पोषण देती रही है, उसके विस्तार का हेतु भी है-कण-कण में समाई है एवं सदैव उन्हें संरक्षण देती रहेगी। परमपूज्य गुरुदेव ने अपने स्थूलशरीर की उपस्थिति में ही इस पत्रिका में यह लिख दिया था, “हम दोनों का अस्तित्व सूक्ष्म रूप में शांतिकुंज गायत्री तीर्थ, गायत्री तपोभूमि के कण-कण में प्रज्ञापरिजनों के हृदय स्थानों में सन् 2000 तक बना रहेगा एवं उसके पश्चात् यह प्रायः छह अरब विश्ववासियों के कल्याण के निमित्त एक शताब्दी तक सूक्ष्म-कारण दोनों एक शताब्दी तक सूक्ष्म-कारण दोनों की रूपों में न केवल युगतीर्थ में अपितु सारे विश्व में फैल जाएगा।” इस पर हमें विश्वास करना चाहिए, क्योंकि हमारी आराध्यसत्ता इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य का आश्वासन हमें दे गई है।
बाराँ राजस्थान के श्री नाथूलाल नंदवाना की एक अनुभूति गुरुसत्ता के सूक्ष्मीकरण के परिप्रेक्ष्य में यहाँ उल्लेखनीय है। वे प्रथम बार जुलाई 1984 की गुरुपूर्णिमा पर शांतिकुंज नौ दिवसीय सत्र के लिए पहुंचे। गुरुदेव के सामीप्य-दर्शन से वे वंचित रहे, क्योंकि उन दिनों गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना चल रही थी। सत्र में शिक्षण के दौरान उन्हें प्रेरणा मिली अपने ग्राम पाठेड़ा में वसंतपर्व के अवसर पर गायत्री यज्ञ कराने की। नए-नए जुड़े थे। चिंता हो रही थी कैसे सब कुछ होगा किंतु ऐसी परिस्थितियों में दिसंबर 1984 में सूक्ष्मीकरण से स्वप्न में गुरुसत्ता ने अनुभूति कराई कि तू इस कार्य की चिंता छोड़ दे और पूर्ण लगन के साथ प्रयत्न करता चल। तेरे यज्ञ में मैं स्वयं उपस्थित रहूँगा। दो माह पश्चात् जब वे तैयारी में लगे थे उन्हें ऐसा लगा कि आज यज्ञ का दिन है, गुरुसत्ता निश्चित ही उपस्थित होगी। इसी बीच गाँव के बाहर एक पेड़ की छाया में तुम्हारे गुरु जी आकर बैठे हैं, चलो उन्हें लेकर ससम्मान यज्ञ में लाओ। श्री नाथूलाला जी हमें लिखे पत्र में लिखते हैं कि “मैंने उन्हें समझाया कि गुरुदेव शांतिकुंज से बाहर ही नहीं निकलते व आजकल तो वहाँ भी किसी को दर्शन नहीं देते। अतः उनके आने का प्रश्न ही नहीं उठता। अगर गुरुदेव ही हैं तो आपने कैसे पहचाना, जबकि मैंने स्वयं आज तक उन्हें नहीं देखा है। तब लोगों ने मेरे घर में लगे उनके फोटो को बताते हुए कहा कि ये जिनका फोटो है, वही आए हैं।” भागे-भागे सभी वहाँ पहुँचे। गुरुदेव सशरीर तो नहीं थे, मात्र झलक देकर जा चुके थे, किंतु गाँव में चारों ओर से आने वालों का ताँता लग गया था। सब यज्ञ करने पधारे थे। वातावरण में उल्लास व दिव्यता सभी को अनुभव हो रही थी। प्रायः पांच हजार ग्रामीणों की उपस्थिति में एक विराट् यज्ञ उस दिन वसंत की वेला में हो जाना व 19,000 रुपयों की व्यवस्था भी स्वतः बन जाना, यह सब श्री नाथूलाल जी गुरुसत्ता की कृपा का प्रसाद ही मानते हैं। कुछ ग्रामीणों को तो दर्शन पूज्यवर ने दे दिए थे। श्री नाथूलाल जी ने प्रत्यक्ष दर्शन सूक्ष्मीकरण के समापन पर शांतिकुंज आकर स्वयं किए, गदगद हृदय-अश्रुभरे नेत्रों से अपने आराध्य को जी भरकर देखा व एक समर्पित कार्यकर्त्ता के रूप में तब से ढल गए।
यह किसी को भी एक छोटी-सी घटना लग सकती है, किंतु इस विलक्षण विराट् संगठन का प्राण है वह अनुभूति, जो एक सामान्य अपरिचित परिजन को जिसने अपने गुरु को देखा तक न था, एक इकाई के रूप में विनिर्मित कर गई। ऐसी एक नहीं सैकड़ों अनुभूतियाँ हैं, जिन्हें लिखने के लिए एक विश्वकोष भी कम पड़ जाएगा।
बाधाएँ कइयों के जीवन में आती है। गुरुकार्य करने में भी कम प्रतिकूलताओं का सामना नहीं करना पड़ता। फिर भी गुरुसत्ता अपना दिव्य संरक्षण किस प्रकार प्रदान करती है, उसकी एक बानगी पानीपत के श्री श्यामलाल जी एवं श्रीमती कमला धरनी को इस आपबीती से मिलती है। उन दिनों वे अमृतसर में थे। एक सत्र में शांतिकुंज आए। झोला पुस्तकालय चलाने का संकल्प दोनों ले लिया। उग्रवाद उस समय पंजाब में बढ़ोत्तरी पर था। शहर में कई-कई दिन कर्फ्यू लगा रहता था। मात्र एक घंटे के लिए चौबीस घंटों में खुलता था। ऐसे में झोला पुस्तकालय कैसे चले? सोचा गया कि एक घंटे की जो गैप मिलती है, इसमें कमला जी घर-घर साहित्य पढ़ने को दे आएँगी एवं श्यामलाल जी राशन-सब्जी आदि ले गाया करेंगे। रोज नियम निभता रहा। एक बार सतत् तीन दिन-तीन रात कर्फ्यू चला, पर दो घंटे की छूट मिली। कमला जी ने झोला टाँगा, निकल गई। जब वे समीप के मोहल्ले को पार कर थोड़ी दूर पहुँची तो पता चला कि पुनः गोली चल जाने से कर्फ्यू लग गया है। कमला जी वहीं घिर गई। सी. आर. पी. एफ. के जवानों ने उन्हें रोककर झोला खोलकर दिखाने को कहा। बड़े सम्मान से कमला जी ने कमांडिंग ऑफिसर के समक्ष रखी टेबल को अपने पल्लू से साफ कर उस पर पुस्तकें रखना आरंभ की। अखण्ड ज्योति व अन्य पुस्तकें रखी ही थीं कि एक काँस्टेबल वहाँ आया, बोला- “यह माताजी मुहल्ले-मुहल्ले घूमकर साहित्य पढ़ने को देती हैं। मुझे गायत्री चालीसा व अन्य पुस्तकें भी दी हैं।” कमाँडिंग ऑफिसर ने अखण्ड ज्योति पत्रिका देखते ही कहा कि यह आप कहाँ से मँगाती हैं, यह तो मेरे घर भी आती है। इतना कहकर उसने पत्रिका रख ली एवं इसी काँस्टेबल से कमला जी को मिलिट्री की जीप में छोड़ आने को कहा। सुरक्षित कमला जी तनावग्रस्त श्यामलाल जी के पास पहुँची व कहा कि गुरु जी के साहित्य के कारण मैं सुरक्षित आ गई। ठीक चार दिन बाद माता जी का लिखा पत्र मिला- “बच्चो! तुम उतना ही काम करो जितना आसानी से कर सको। अपनी जान को जोखिम में डालकर हमारा ध्यान अपनी तरफ मत खींचो। हमें और भी बड़े-बड़े काम करने है। तुम ज्ञानयज्ञ में भाग लो, पर अब खतरा मोल न लेना।” बिना किसी सूचना के गुरुसत्ता की ओर से चेतावनी भी आ गई एवं स्पष्ट बता गई कि इस दिन सुरक्षा किस सत्ता ने की थी। यह अवधि वह थी जब परमपूज्य गुरुदेव सूक्ष्मीकरण में गए ही थे।
ग््राम नरौका, जि. रायबरेली के अपने एक परिजन हैं, सूर्यप्रसाद त्रिपाठी। उन्हें समय-समय पर पूज्यवर की अनुभूतियाँ होती रही हैं, जबकि स्वयं वे अप्रैल 1990 में प्रथम बार शांतिकुंज आकर संस्था से जुड़े थे। परमपूज्य गुरुदेव के प्रत्यक्ष दर्शन तो कर नहीं सके थे। कई विलक्षण घटनाक्रमों का वर्णन उनकी अनुभूतियों में है। एक विषय उल्लेखनीय है-12 जून 1992 के दिन वे मोटरसाइकिल से अपने कार्य से वापस घर लौट रहे थे। मार्ग में उनके एक मित्र मिले और रोककर कुछ बातें करने लगे। दोनों बात करके अलग हुए ही थे व उन्होंने मोटरसाइकिल स्टार्ट ही की थी कि ऊपर से बिजली के तीन तार उनके ऊपर टूटकर गिर गए। मोटरसाइकिल समेत तारों में लिपटकर वे जमीन पर आ गिरे। उनके मुख से एक ही शब्द निकला- ”अरे गुरुजी”। थोड़ी देर में होश आ गया। उनके साथी ने बताया कि” आप बिलकुल सुरक्षित हैं। तार गिरने से मात्र कुछ सेकेंड पूर्व बिजली चली गई थी। मात्र गिरने व शाक के कारण आप थोड़ी देर बेहोश हो गए, लेकिन यदि बिजली के तारों में प्रवाह दौड़ रहा होता तो आप नहीं बचते।” त्रिपाठी जी लिखते हैं कि मेरा रोम-रोम कृतज्ञता से भरा पड़ा है, इस गुरुसत्ता के लिए जो सूक्ष्म में निरंतर सक्रिय रह कई बार मेरी प्राण रक्षा कर चुकी है।
धामपुर (उत्तर प्रदेश) की काँति देवी त्यागी उन कुछ सौभाग्यशाली शिष्याओं में से रही है, जो पूज्यवर की पाती सन् 1950 से भी पूर्व से पाती रही हैं। अनेक संकटों से उनकी रक्षा हुई। उन्हीं को लिखे 30-11-1954 के एक पत्र का एक अंश यहाँ उद्धृत है-प्रिय पुत्री काँता
आशीर्वाद! तुम्हारे जीवन का जो अनष्मिय भयंकर संकट आया था, सो अब टल गया है। केवल शरीर की अस्वस्थता कमजोरी थोड़ी शेष है। सो आहार-विहार के द्वारा ठीक होगी। जो जीवन तुम्हें मिला है, वह नया जन्म ही समझें और इसे आत्मा के कल्याण में लगाती रहो।-श्रीराम शर्मा आचार्य
जब भी काँता जी शांतिकुंज आतीं तो बताती थीं कि किस प्रकार गुरुदेव ने समय-समय पर उनकी रक्षा की एवं जब तक इसका उन्हें अनुभव हो पाता, पूज्यवर का पत्र उनके पास पहुँच जाता। उनके कई पत्र हमारे पास इसी तरह के सुरक्षित रखे हैं।
एक अन्य पत्र जो इतिहास बन गया है, उद्धृत कर इस माह का यह कथा प्रसंग समाप्त करेंगे। यह पत्र परमपूज्य गुरुदेव द्वारा पं. रामगोपाल शर्मा वैद्य मु. पो. खूड़ जिला सीकर को 19-9-1962 को लिखा गया था। उन्हें मारकेष की चिंता थी जो उनके ज्योतिषी की घोषणा के अनुसार उनकी कुँडली में था। उन्हें लगा कि वे अब बचेंगे नहीं। उन्होंने पूज्यवर को जो पत्र लिखा, उसी का प्रत्युत्तर एक छोटे-से पोस्कार्ड रूप में आया जो आज भी हमारे पास सुरक्षित है। 29-9-62 हमारे आत्मस्वरूप,
पत्र मिला। आपका मारकेष हमारे यहाँ रहते सफल नहीं होगा। हम अभी पौने नौ वर्ष इधर हैं, तब तक आप पूर्ण निश्चिंत रहें। सभी स्वजनों को हमारा आशीर्वाद माताजी का स्नेह कहें।
आपका ही-श्रीराम शर्मा आचार्य
श्री रामगोपाल जी के संबंधीगण आज भी खूड़ में हैं। वे बताते हैं कि ज्यों ही यह अवधि पूरी हुई, गुरुदेव ने इन्हें मथुरा में स्मरण किया, मूक प्रणाम किया वह यह घोषणा भी उनका पत्र लेकर आने वालों के समक्ष की कि अब वे रहे नहीं। उन्हें हमारा प्रणाम। यह घटना विस्तार से कभी बाद में कहेंगे। यह पत्र यह बताता है कि सतत् एक दैवी संरक्षण, एक सुनिश्चित आश्वासन प्रज्ञावतार रूपी सत्ता के साथ चलने वालों पर रहता है। आवश्यकता मात्र यह विश्वास करने, दृढ़ बनाए रखने की है। हम कभी-कभी विचलित हो जाते हैं व्यथित हो जाते हैं कि हमारा क्या होगा। जब गुरुदेव थे, माताजी थीं तो हमारा कष्ट वे सुनकर ठीक कर देते थे। अब कौन करेगा? वस्तुतः इस लेखमाला के माध्यम से हम अपने परिजनों को आश्वस्त कर देना चाहते हैं कि मानवी पुरुषार्थ तो पूरा हो, तुम दृढ़ मनोबल के साथ गुरुसत्ता पर विश्वास प्रबल हो तो कोई भी कष्ट यदि पूर्णतः समाप्त नहीं, कम तो किया ही जा सकता है। अभी भी इस शताब्दी की समापन वेला में उनका सतत् आश्वासन है कि यह ज्योति कभी बुझेगी नहीं। इन दिनों जब समूची मानवजाति का भाग्य नए सिरे से लिखा जा रहा है, हर गायत्री परिजन का योगक्षेम वहन करने वाली ऋषियुग्म की अवतारीसत्ता उनका हर कष्ट सुनने व यथायोग्य समाधान करने हेतु उद्यत है। जरा पुकार लगाकर तो देखें।
अपनों से अपनी बात-1
प्रखर साधनावर्ष की समापन वेला में बीसवीं शताब्दी की इस महत्वपूर्ण नवरात्रि के रूप में प्रस्तुत नौ दिवसीय विशिष्ट प्रसंग 10 से 18 अक्टूबर की तारीखों मं हम सबके लिए आ रहा है। अगला वर्ष इस शताब्दी का अंतिम वर्ष होगा, पर हमारे लिए अति महत्वपूर्ण महापूर्णाहुति वर्ष होगा, जिसमें हम सारे भारत व केंद्र में अपनी आहुतियाँ दे रहे होंगे। इस वर्ष सभी ने किसी-न किसी रूप में अपना साधना को अधिकाधिक प्रखर बनाया है, अन्यान्य व्यक्तियों को भी साधनाक्रम में सम्मिलित कर विशुद्धतः अपनी साधना के साथ एक पुण्यपरमार्थ का संपुट जोड़ा है। प्रस्तुत नवरात्रि अन्य वर्षों की तरह सामान्यक्रम में नहीं आई है, यह एक विशिष्ट मुहूर्त्त में विशिष्ट अनुदानों व अपेक्षाओं के साथ आई है। यदि हम ग्यारह वर्ष के साधनात्मक पुरुषार्थ का समापन शानदार ढंग से करना चाहते हैं, तो महापूर्णाहुति वर्ष के पूर्व आई इस नवरात्रि से लेकर सन् 2001 की चैत्र नवरात्रि (26 मार्च से 2 अप्रैल) तक का डेढ़ वर्ष का एक विशेष संकल्प ले सकते हैं। वह इस रूप में हो सकता है कि हमारी साधना में और निखार आए एवं हम नए युग की नई भारी-भरकम जिम्मेदारियों को उठाने योग्य स्वयं को सुपात्र बना सकें।
कई व्यक्ति मंत्रजाप को ही सब कुछ मान बैठते हैं। हमने इतने घंटे जप किया-अखण्ड जप इतने संपन्न कराए, हम इतने अनुष्ठान कर चुके-इसका उद्घोष करने वाले कम नहीं हैं। फिर क्या किया जाए? हम तो उपासना की निर्दिष्ट प्रक्रिया ही संपन्न कर रहे थे। कुछ और भी जुड़ना चाहिए था क्या? इस संबंध में मार्गदर्शन हेतु प्रस्तुत समय से अच्छा और कोई समय नहीं हो सकता। परमपूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शन की अपेक्षा के साथ हमने ‘अखण्ड ज्योति’ के पन्ने पलटे, थोड़ा गहरे डूबकर स्वाध्याय किया एवं कुछ पाया है, जो जन-जन को दिशा दे सकता है, सही अर्थों में हम सभी को साधक बना सकता है।
परमपूज्य गुरुदेव मई 1969 की अखण्ड ज्योति पत्रिका में लिखा है- “आत्मिकप्रगति के लिए उपासना और साधना का जोड़ा अविच्छिन्न रूप से आवश्यक है। इसमें न तो ढील की गुंजाइश है, न उपेक्षा की। शास्त्रकारों से लेकर तपोनिष्ठ ऋषियों और सफल आराधकों ने सदा इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है। हमारे मार्गदर्शक ने यह बात प्रारंभ में ही कूट-कूटकर अंतरंग में बिठा दी थी कि उपासना आवश्यक है, किंतु इस क्षेत्र की सफलताओं का स्रोत भावनात्मक विकास की जीवनसाधना पर ही अवलंबित है। हमने इस शिक्षा को गाँठ बाँध लिया।” आगे परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं- “मंत्रशास्त्र का विशाल अध्ययन और अन्वेषण हमने किया है। महामाँत्रिकों से हमारे संपर्क रहे हैं और साधनापद्धतियों के सूक्ष्म अंतर-प्रत्यांतरों को हम इतना अधिक जानते हैं जितना वर्तमान पीढ़ी के मंत्रज्ञाताओं में से शायद ही कोई जानता हो। लोगों ने एकाँगी पढ़ा-सीखा है। हमने शोध और जिज्ञासा की दृष्टि से इस विद्या को अति विस्तार और गहराई के साथ ढूँढ़ा-समझा है। इस जानकारी की भी जहाँ उपयोगिता हो वहाँ हम प्रयोग करते हैं, किंतु हमारी अपनी क्रियापद्धति अति सरल और सीधी-सादी है। यही सीधा-सा एक ॐ तीन व्याहृति ॐ , अधिक बीज-संपुट आदि की लाग-लपेट जोड़े जप-साधना में लग जाते हैं।”
बड़ा सीधा-सादा सरल-सा मार्गदर्शन परमपूज्य गुरुदेव हमें सौंप गए। जो उन्होंने किया, अपने जीवन पर लागू या, यदि हम भी विश्वासपूर्वक कर सकें, तो हमारी उपासना-जप में भी प्राण आ सकते हैं। शरीर और वस्त्रों की शुद्धि-पूजा-उपकरणों की स्वच्छता, शांत और सौम्य वातावरण, प्रफुल्ल मन का ध्यान रखकर नियत समय, नियत स्थान पर बैठकर उपासना की जाए, तो वह सरस और फलदायी बन जाती है। उपासना के षट्कर्म से लेकर जप के नियम-अंत में भगवान् सूर्य को अर्घ्य चढ़ाना तथा सृजन यह क्रम तो सभी को मालूम है, अतः बताने की आवश्यकता नहीं, किंतु ज पके समय की मनोभूमि के विषय में परमपूज्य गुरुदेव का मार्गदर्शन आज की परिस्थितियों में अभीष्ट भी है व समयानुकूल भी।
पूज्यवर लिखते हैं- “जिन्हें निराकार साधनाक्रम पसंद है, उनके लिए प्रातःकाल उगते हुए अरुण वर्ण सूर्य का ध्यान करना उत्तम है। यह हर किसी धर्म-संप्रदाय के व्यक्तियों के लिए संभव है। किंतु जो साकार ध्यान करना चाहते हों, उन्हें मन को एक सीमित परिधि में भ्रमण कराने का अभ्यास डालना चाहिए। माता का चित्र सामने रहने से उनके अंग-प्रत्यंगों और आवरणों का बारीकी से मनोयोगपूर्वक निरीक्षण करते रहने की ध्यान-साधना मन को इधर-उधर न भागने देने की समस्या हल कर देती है। यह छविध्यान थोड़े अभ्यास से तस्वीर को देखे बिना भी
कल्पना के माध्यम से आँखें बंद कर के भी होने लगता है। इष्ट की छवि को देखते समय इसमें रस-प्रेम, एकता और तादात्म्य उत्पन्न करना और भी शेष रह जाता है और यह प्रयोजन ध्यान में प्रेम-भावनाओं समावेश करने से ही संभव होता है। आगे वे लिखते हैं-उपासना के आरंभ में अपनी एक दो वर्ष जितने निश्चिंत, निर्मल, निष्काम, निर्भय बालक जैसी मनोभूमि बनाने की भावना करनी चाहिए और संसार में नीचे नीलजल और ऊपर नीलाकाश के अतिरिक्त किसी अन्य पदार्थ एवं इष्टदेव के अतिरिक्त और किसी व्यक्ति के न होने की मान्यता जमानी चाहिए। बालक और माता, प्रेमी और प्रेमिका, सखी और सखा जिस प्रकार पुलकित हृदय से परस्पर मिलते, आलिंगन करते हैं, वैसी ही अनुभूति इष्टदेव की समीपता की होनी चाहिए। चकोर जैसे चंद्रमा को प्रेमपूर्वक निहारता है और पतंगा जैसे दीपक पर अपना सर्वस्व समर्पण करते हुए तदनुरूप हो जाता है, ऐसे ही भावोद्रेक इष्टदेव की समीपता के उन ध्यान में जुड़े रहना चाहिए, जिसे साधना कहा गया है। इससे भावविभोरता की स्थिति प्राप्त होती है और उपासना ऐसी सरस बन जाती है कि उसे छोड़ने को जी नहीं चाहता। “परमपूज्य गुरुदेव के चौबीस लक्ष के चौबीस अनुष्ठान उपर्युक्त मनोभूमि की धुरी पर ही चले। हमें क्या कठिनाई हो सकती है, यदि हम भी इसी प्रकार अपने जप में प्राण डाल सकें व अपनी साधना के वे प्रतिफल प्राप्त कर सकें, जिनकी अपेक्षा गुरुसत्ता ने समूहमन के निर्माण से समष्टि के उपचार के रूप में की है।
प्रस्तुत प्रखर साधनावर्ष में इस जप-उपचार में यही विशिष्टता जोड़ी गई है। कि हम सबके उज्ज्वल भविष्य की संभावित विभीषिकाओं से मानवमात्र की रक्षा की प्रार्थना भी इस जप-ध्यान के साथ करें। “धियो यो नः प्रचोदयात्” के साथ उसके अर्थ का ध्यान करते ही बात आ जाती है। इसमें से किसी को यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि हम जो भी कुछ संधिकाल उपचार। इसी कारण बारबार मंत्रजप के साथ उसमें प्राणप्रतिष्ठा करने, उसके अर्थ के ध्यान के साथ स्वयं का समर्पण भाव बढ़ाने की बात बराबर कही जा रही है। किसी को यह भी लग सकता है कि यह तो शैशव अवस्था का मार्गदर्शन है। इसमें नवीनता क्या है, पर यही कठिनाई है कि वरिष्ठ-से वरिष्ठ कार्यकर्त्ता इस ध्यानपक्ष में चूक कर जाते हैं, जप तो कर लेते हैं, संख्या भी पूरी कर लेते हैं, पर प्रतिफल उतना नहीं निकल पाता। परमपूज्य गुरुदेव लिखते भी हैं, इसी अंक में, इसी बात को आगे बढ़ाते हुए- “पूजा-पाठ की नन्हीं-सी टंट-घंट करके भगवान् की असीम कृपा अनायास ही प्राप्त हो जाने की गुरु की असीम कृपा अनायास ही प्राप्त हो जाने की गुरु, देवता या मंत्र का तनिक से प्रयोग, उपयोग से अपान लाभ मिल जाने की कुकल्पना वर्तमानकाल के उतावले अनास्थावान् लोगों की है। इस बंध्या कल्पना को लेकर आकाश-पाताल के सपने देखे जा सकते हैं। मिलना किसी को कुछ नहीं है। हमें इस बालविनोद में कोई आकर्षण नहीं है। हम जानते हैं कि-उपासना एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है-लूटमार नहीं। आत्मिक प्रगति का एक सर्वांगपूर्ण विज्ञान है यह। उचित साधन, उचित श्रम और उचित परिस्थितियाँ उपलब्ध होने पर ही यह प्रक्रिया फलवती होती है। सो उसी को करने-कराने में हम निष्ठापूर्वक लगे हैं।”
परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं- “ईश्वर भक्ति की प्रयोगशाला में, व्यायामशाला में आरंभ किया और क्रमिक विकास करते हुए प्रभुप्रेम के दंगल में जा पहुँचे।” - “प्रेम का अभ्यास करने के लिए ऐसी नाव ढूँढ़नी पड़ती है, जो बीच में डूबने वाली न हो और किनारे पर पहुँचा दे।” निश्चित ही पूज्यवर के शब्दों में यह नाव गुरु के संरक्षण व उनके सतत् सामीप्य की अनुभूति से ही हमें मिल सकती है। समर्पण यदि समग्र है, कोई कंजूसी उसमें नहीं की गई है- “माँगना कुछ नहीं, देना सब कुछ” का प्रेम का सिद्धाँत निबाहा गया है, तो साधना की सफलता में कोई संदेह किसी को नहीं होना चाहिए। हमारी इस प्रखर साधनावर्ष की उपासना में गुरुसत्ता के प्रेमभाव-समर्पण और अधिक प्रगाढ़ हो, उनके कार्यों की पूर्णता के अंजाम तक पहुँचाने की टीस बढ़ती ही चली जाए, तो मानना चाहिए कि साधना प्राणवान् होती चली जा रही है।
ईश्वरीय प्रेरणा से ही गायत्री परिवार-युगनिर्माण आँदोलन का सृजन हुआ है। विचारपरिवर्तन का एक विश्वव्यापी अभियान इस मिशन के माध्यम से सारे विश्व में गति पकड़ चुका है। असुरता का विशाल कलेवर देखते हुए इस अभियान का स्वरूप छोटा लग सकता है, पर गुरुसत्ता के शब्दों में “विवेकशीलता का तेल और औचित्य के कपड़े को लेकर यह ज्ञानयज्ञ की मशाल जलाई गई है। वह यों ही बुझ जाने वाली नहीं है। यह अपने युग की महत्तम आवश्यकता एवं ईश्वरीय इच्छा पूरी होने तक जलती ही रहेगी।” हमें सब परिजनों के सामूहिक पुरुषार्थ को इसी परिप्रेक्ष्य में देखना व समझना चाहिए।
इन दिनों सूक्ष्मजगत् में तीव्र गति से हलचलें हो रही हैं। ब्रह्ममुहूर्त युगसंधि के नवप्रभात का आ चुका है। ऐसे मुहूर्त्त में साधक और तपस्वी जाग जाते हैं, जबकि विषयी लोग अधिक गहरी नींद का मजा लेते हैं। असुरता भरी निशा का अंत होने जा रहा है। यह संधिकाल प्रभात की उषा लेकर आया है। युगनिर्माण योजना एक शंखनिनाद के समान है, जो सभी सुसंस्कारी व्यक्तियों को जगाने एवं उन्हें प्रभातकालीन कर्त्तव्यों में जुटने की प्रेरणा दे रहा है। काश! हम सभी इस नवरात्रि के वेला में उसे सुन सकें और पुनीत धर्मकर्त्तव्य में संलग्न हो सकें।
जॉन कैनेडी ने एक प्रेस इंटरव्यू में अपने आकर्षक व्यक्तित्व एवं सफलताओं का रहस्योद्घाटन करते हुए कहा था कि मेरी माँ सिद्धाँतों एवं आदर्शों की दृष्टि से अधिक कठोर और संवेदनाओं की दृष्टि से मोम से भी अधिक मुलायम थीं। उनके अगाध स्नेह ने ही मुझे वर्तमान स्थिति तक पहुँचाया है।
महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति की घड़ियाँ समीप आ पहुँची हैं। मात्र कुछ माह के अंदर प्रथम चरण के आरंभ होने के साथ ही बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण के रूप में एक ऐतिहासिक ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की अंतिम घड़ियाँ आरंभ हो जाएँगी। विगत अंक में पाँच चरणों की मोटी-मोटी जानकारी दी जा चुकी है। आगामी नवंबर अंक में तथा प्रज्ञा अभियान ‘पाक्षिक’ के अंकों के माध्यम से परिजन इसका विस्तृत स्वरूप जान सकेंगे। यहाँ उन पाँच चरणों की थोड़ी जानकारी कुछ स्पष्टीकरण के साथ परिजनों को दी जा रही है।
प्रथम चरण
महापूर्णाहुति के पूर्व एक पूर्वाभ्यास के रूप में तथा हम सबकी संघबद्धता को परीक्षा की कसौटी पर कसने के लिए 3 दिसंबर, 1999 को एक आयोजन-एक साथ, एक ही समय सारे भारत व विश्व के नागरिकों द्वारा किया जाना है, जिसका लक्ष्य है- ‘सबको स्वास्थ्य-सबके लिए उज्ज्वल भविष्य’। यह प्रसंग यों तो सबकी संघबद्धता को परीक्षा की कसौटी पर कसने के लिए 3 दिसम्बर, 1999 को एक आयोजन-एक साथ, एक ही समय सारे, एक ही समय सारे भारत व विश्व के नागरिकों द्वारा किया जाना है, जिसका लक्ष्य है- ‘सबको स्वास्थ-सबके लिए उज्ज्वल भविष्य’। यह प्रसंग यों तो भारत में पोलियो उन्मूलन अभियान के राष्ट्रीय कार्यक्रम की पूर्वबेला में जनचेतना के जागरण अभियान के रूप में आया है, परंतु दैवी पुरुषार्थ के बिना यह साधारण-सा दीखने वाला संकल्प पूरा होगा नहीं। पोलियो यों तो शारीरिक अपंगता-विकलाँगता के आमूलचूल निवारण का संकल्प लेकर अपने-अपने धर्मस्थलों पर दीपयज्ञ करेंगे-प्रतीक रूप में जो भी निर्दिष्ट है वैसा साधनात्मक उपचार करेंगे और प्रार्थना करेंगे कि सारा विश्व क्षुद्र चिंतन-मानसिक एवं मनोशारीरिक व्याधियों-तनाव, मानसिक विकलाँगताओं एवं शारीरिक अपंगता से मुक्त हो।
यह एक पारमार्थिक पूर्वाभ्यास है--संघशक्ति के सामूहिक धर्मानुष्ठान के रूप में। ईसाई, मुस्लिम, जैन, बौद्ध, पारसी, सिख, बहाई प्रायः सभी संप्रदायों के प्रमुखों-प्रतिनिधियों से संपर्क कर उनसे धर्म-संप्रदायों से परे इस महाअभियान में भागीदारी हेतु अपने अनुयायियों को निर्देश देने हेतु सहमत किया जा रहा है। रोटरीक्लब, लॉयंस-क्लब, भारत विकास परिषद् जैसी संस्थाएँ भी इसमें सहयोग दें, इसके लिए उनसे संपर्क किया जा रहा है ताकि जनचेतना जागे। इस दिन (शुक्रवार 3 दिसंबर 1999) संध्या से 5 से 6 सभी दीप प्रज्वलित कर लोबान या मोमबत्ती जलाकर अपने देवालयों में बैठकर एक साथ प्रार्थना करेंगे। यह एक संयोग ही है कि इसी दिन से दक्षिण अफ्रीका के कैपटाउन शहर में सारे विश्व के धर्मगुरुओं की ‘वर्ल्ड पार्लियामेंट’ भी एकजुट हो इक्कीसवीं सदी के धर्म ‘मानवधर्म’ पर विचार करने जा रह है। 3 से 8 दिसंबर तक चलने वाले इस अभियान में गायत्री परिवार की भी भागीदारी है। प्रायः मतीन वर्ष पूर्व से घोषित इस धर्मसंसद के इसी समय आयोजन से सूक्ष्मजगत् द्वारा दैवी संचालन प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है।
द्वितीय चरण-
10 फरवरी सन् 2000 जो वसंत पर्व की पावन वेला है, उस दिन एक ही समय सारे भारत व विश्व में एक साथ सभी परिजनों द्वारा दीपयज्ञ द्वारा अपनी आराध्यसत्ता का आध्यात्मिक जन्मदिवस मनाया जाएगा। महापूर्णाहुति वर्ष के अंतिम महत्वपूर्ण प्रसंग ‘विभूति यज्ञ’ के अंतर्गत प्रतिभाओं द्वारा अपने संकल्पों की इसी दिन घोषणा की जाएगी।
तृतीय चरण-
10 फरवरी 2000 से गायत्री जयंती (11 जून 2000) तक सारे देश में एक विराट् मंथन अभियान के रूप में ग्राम पंचायतों से केंद्र द्वारा निर्धारित कार्यक्रमों के साथ आरीं होकर प्रायः पचास से भी अधिक प्राँतीय स्तर के स्थानों पर विराट् दीपयज्ञों के माध्यम से संपन्न होगा। विभिन्न सृजनात्मक, राष्ट्रोत्थानपरक तथा सुधारात्मक योजनाओं की गति पंचायत स्तर से ब्लॉक, जिला, कमिश्नरी व फिर प्राँत इस प्रकार पाँच खंडों में लिए जाने वाले संकल्पों द्वारा दी जाएगी।
चतुर्थ चरण-
गायत्री जयंती से शरदपूर्णिमा (13 अक्टूबर 200) की चार माह की अवधि में एक विराट् तीर्थयात्रा अभियान चलेगा। अभी योजना यह बनी है कि द्वारिका, जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम्, दक्षिणेश्वर तथा जम्मू से पाँच विराट् रथयात्राएँ गायत्री जयंती से आरंभ हों। सृजन सैनिक साथ चलें एवं स्थान-स्थान पर आयोजन संपन्न कर पूरे भारत के चप्पे-चप्पे का मंथन कर सभी लोग युगतीर्थ आँवलखेड़ा एवं गायत्री तपोभूमि मथुरा होते हुए शांतिकुंज हरिद्वार एक साथ पहुँचे, जहाँ विराट् महाकुँभ के माध्यम से सभी अपनी आहुतियाँ देकर अपने संकल्प को पूर्णता दे सकें, इक्कीसवीं सदी की कमान सँभाल सकें।
पंचम चरण-
29 जनवरी 2001, वसंत पर्व पर पुनः सारे भारत व विश्व में एक साथ दीपयज्ञ के साथ जाएगा।
अभी तृतीय, चतुर्थ व पंचम चरणों को और विस्तृत रूप दिया जा रहा है इसका स्पष्ट प्रारूप अगले अंक में पाठक-परिजन पढ़ सकेंगे। हम सभी प्रथम-द्वितीय चरण के लिए अभी से कमर कसकर तैयारी कर लें।
*समाप्त*