मैं उन्हीं के बीच जाकर बैठ गया। लगा जैसे मैं भी एक फूल हूँ। यदि ये पौधे मुझे भी अपना साथी बना लें, तो मुझे भी अपने खोए बचपन को पाने का सुअवसर मिल जाए। भावना आगे बढ़ी। जब अंतराल हुलसता है, तो कुतर्की विचार भी ठंडे पड़ जाते हैं। भावों में प्रबल रचनाशक्ति है, वे अपनी दुनिया आप बना लेते हैं-काल्पनिक नहीं, पुरी तरह से शक्तिशाली और सजीव। देवों की रचना भावनाओं के बल पर ही हुई है। अपनी श्रद्धा को पिरोकर ही उन्हें महान बनाया गया है। अपने भाव फूल बनने को मचले तो वैसा ही बनने में देर न थी। लगा कि इन पंक्ति बनाकर बैठे हुए पुष्प बालकों ने मुझे भी सहचर मानकर अपने में सम्मिलित कर लिया है।
एक गुलाबी फूल वाला पौधा बड़ा हँसोड़ और बातूनी था। अपनी भाषा में उसने कहा-दोस्त तुम मनुष्यों में बेकार आ जन्मे! उनकी भी कोई जिंदगी है, हर समय चिंता, तनाव, उधेड़बुन, कुढ़न। अबकी बार तुम पौधे बनना और हमारे साथ रहना। देखते नहीं, हम सब कितने प्रसन्न हैं, कितने खिलखिलाते रहते हैं? जिंदगी को हँसी-खेल मानकर जीने में कितनी शाँति है, यह हम सब कितने प्रसन्न हैं, कितने खिलखिलाते रहते हैं? जिंदगी को हँसी-खेल मानकर जीने में कितनी शाँति है, यह हम लोग जानते हैं। देखते नहीं हमारे भीतर का आँतरिक उल्लास हमारी सुगंध के रूप में चारों ओर फैल रहा है। हम सबको प्यार करते हैं, सभी को प्रसन्नता प्रदान करते हैं। आनंद से जीते हैं और जो पास आता है, उसी को आनंदित कर देते हैं। यही तो जीवन की कला है। इनसान बेकार में अपनी बुद्धिमानी पर घमंड एवं चिंता, तनाव, घुटन ही तो पाता है।
मेरा मस्तक उस खिलखिलाते हुए फूल के प्रति श्रद्धा से नत हो गया। मैं कहने लगा-पुष्य-मित्र तुम धन्य हो। स्वल्प साधन होते हुए भी जीवन कैसा जीने चाहिए- तुम यह जानते हो। एक हम हैं- जो उपलब्ध सौभाग्य को कुढ़ने में ही व्यतीत करते रहते हैं। सखा, तुम सच्चे उपदेशक हो, वाणी से नहीं जीवन से सिखाते हो। हँसोड़ गुलाबी फूल वाला पौधा खिलखिलाकर हंस पड़ा। सीखने की इच्छा रखने वाले के लिए पग-पग पर शिक्षक मौजूद हैं। पर आज सीखना कौन चाहता है? सभी तो अपनी उथली जानकारी के अहंकार के मद में ऐंठे-ऐंठे फिरते हैं। सीखने के लिए हृदय का द्वार खोल दिया जाए तो बहती हुई वायु की तरह शिक्षा-सही अर्थों में विद्या स्वयं ही हमारे अंतःकरण में प्रवेश करने लगेगी।
-परमपूज्य गुरुदेव
तेज बुखार की वजह से महाराणा प्रताप की देह तवे की मानिंद तप रही थी। महाराणा भूमि पर लेटे हुए वैद्यों से घिरे थे। एक सेवक पैर दबा रहा था। वैद्य का एक सहायक लेप पीस-पीसकर महाराणा के ललाट पर लगा रहा था। अचानक ही कराहते हुए महाराणा उठ बैठे। वैद्य जी ने पसीना पोंछा। धधकते नेत्रों से आसपास के लोगों को देखकर महाराणा पूछ उठे-अमरसिंह की कोई खबर आई है क्या?
अभी तक तो नहीं आई, अन्नदाता! एक सेवक ने हाथ जोड़, सिर नवाकर कहा।
आप कुँवर जी की चिंता छोड़े महाराणा। वे आपकी संतान हैं, आपकी शान में बट्टा लगाकर वे हारेंगे नहीं, विजय पताका फहराकर ही आएँगे। आपको तेज ज्वर है, आप आराम फरमाइए। वैद्य ने उन्हें लिटाते हुए कहा।
वैद्यराज आपके मुँह में घी-शक्कर जो कुँवर रण जीत आए। दरअसल बात यह है-वैद्यराज जी कि मुगल सेना के सेनापति अब्दुर्रहीम खानखाना अनुभवी, वीर और बुद्धिमान हैं। ऐसे रणबाँकुरे कम ही मिलते हैं। यदि मैं स्वस्थ होता तो रणभूमि में एक विलक्षण योद्धा के साथ युद्ध करने का आनंद उठाता। अफसोस है कि मैं बुखार से घिरकर यहाँ छटपटा रहा हूँ। महाराणा ने बात अभी पूरी नहीं की थी कि एक सैनिक ने आकर’ महाराणा की जय हो’ कहकर प्रणाम किया।
महाराणा ने उसे देखकर मुस्कराकर पूछा-क्यों क्या खबर लाए हो, उज्ज्वल सिंह?
महाराणा की जय हो अन्नदाता, कुँवर अमरसिंह ने मुगल सेना को खदेड़कर भगा दिया है। कई मुगल सरदार बंदी बना लिए गए हैं। तो फिर कुँवर...
हुजूर, हमारी सेना ने कुँवर सा के नेतृत्व में मुगल हरम को घेर रखा है। आगंतुक सैनिक ने कहा।
ओह गज़ब हो गया वैद्यराज जी।
आप आराम कीजिए अन्नदाता, ईश्वर सब ठीक करेगा।
पर उज्ज्वल सिंह मुगल हरम को घेरने का आदेश किसने दिया। उत्तेजित महाराणा उठ बैठे।
गुस्ताख़ी माफ करें अन्नदाता, सेना तो कुँवर सा के इशारे पर ही घेराबंदी करने लगी थी। उज्ज्वल सिंह डर के मारे थर-थर काँप रहा था।
अरे अमरसिंह, ऐसी कमीनी हरकत करने से पहले तू मर क्यों नहीं गया। अपनी महान संस्कृति के नाम पर कलंक लगाएगा क्या? अरे स्त्री हिंदू हो या मुसलमान, वह तो जननी है, माता है, हर हाल में वह पूजनीय है। महाराणा बोले।
हम अभी युद्धभूमि जाएँगे। वैद्यराज उन्हें तेज ज्वर की याद दिलाकर भी रोक नहीं पाए। महाराणा तुरंत घोड़े पर सवार होकर चल दिए। वैद्यराज भी सैनिकों के साथ उसी तरफ आगे बढ़ गए।
रणभूमि पर महाराणा के आगमन की बात सुनते ही कुँवर अमरसिंह जल्दी से शिविर से बाहर आकर उनकी ओर लपके। महाराणा ने बिना कुछ कहे ही उन्हें जलते नेत्रों से घूरकर देखा तो बिना कहे ही अमरसिंह को अपनी गलती का अहसास हो गया। इतने में चेतक मुगल हरम के बाहर जाकर रुका। महाराणा ने पुकारा...बड़ी बी साहिबा को मेवाड़ के सपूतों का साष्टाँग प्रणाम। बड़ी बी साहिबा! जो सिर कभी शहंशाह अकबर के सामने नहीं झुका, उसे मैं आपके सम्मान में झुकाता हूँ। आप मेरे पुत्र का अपराध क्षमा करें। कल सुबह होते ही आपको सुरक्षित रूप से रवाना करवाने की व्यवस्था हो जाएगी। आज तो आप भी मेवाड़ का रूखा-सूखा खाना जो भी यहाँ मौजूद है, वह स्वीकार कर आराम फरमाएँ, आप हमारी अतिथि हैं। माता और अतिथि दोनों ही रूपों में आप हमारे लिए पूजनीय हैं।
आप चिंता मत कीजिए, महाराणा हिंदू कुल तिलक कहलाते हैं, तो उसकी आन निभाना भी जानते हैं। यह हमें मालूम था। हम सब यहाँ उतनी ही शान से हैं, जितनी कि अपने महल में रहती हैं। आप हम सबका आदाब कुबूल कीजिए। हरम में से एक हल्का-सा नारी स्वर गूँजा।
उधर बेगमात को रणक्षेत्र में छोड़ आने की भयंकर गलती के लिए अकबर ने जब सेनापति अब्दुर्रहीम खानखाना को लताड़ा, तो उन्होंने इत्मीनान से कहा-गुस्ताख़ी माफ हो, जहाँपनाह, महाराणा को मैं जानता हूँ। बेगमात वहाँ उतनी ही सुरक्षित हैं, जितनी कि शाही हरम में होती हैं।
पर वे तो हमारे दुश्मन ठहरे।
दुश्मन वे अवश्य हैं, पर हिंदू कुल तिलक पहले हैं। इनसान पहले हैं। उनकी यह बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि अर्दली ने आकर महाराणा की तरफ से भेजी सूचना दी कि-अगली सुबह राजकीय सम्मान के साथ राजपूत सैनिकों की सुरक्षा में बेगमों की पालकियाँ विदा होंगी। वे सब ठीक हैं, चिंता न करें।
वाह रे फरिश्ते! अचानक शहंशाह अकबर के मुँह से निकल पड़ा। खानखाना भी सिर नवा बैठे प्रताप को। बोले-नारी के लिए माता के समान सम्मान से कोई भी राष्ट्र-समाज आगे बढ़ पाता है।
दूसरे दिन सब अपनी-अपनी जगह सुरक्षित पहुँच गए। हर कोई बेगमों के साथ-साथ भारतीय संस्कृति के और महाराणा के गुण गा रहे थे।
“आने वाले कम-से-कम तीन साल भारत ही नहीं दुनिया के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध होंगे। नियंता को अब यह स्वीकार नहीं है कि उसकी सृष्टि हेय और पतन की स्थित में पड़ी रहे। परिवर्तन और परिष्कार की प्रक्रिया तेजी से चल रही है। प्रक्रिया पाँच वर्षों में संपन्न होनी है। ढाई वर्ष का पूर्वार्द्ध बीत चुका है, उत्तरार्द्ध अभी शेष है। पिछले ढाई साल यदि उथल-पुथल के दिन थे तो आने वाला समय और तनाव, विग्रह, हिंसा, रोग और विपदाओं से भरा होगा, इस के बाद एक सुखद और उज्ज्वल भविष्य सामने है।”
ये पंक्तियाँ किन्हीं कूटपदों का भावार्थ नहीं हैं। न ही किसी दैवी आवेश में दिए गए आश्वासन हैं, प्रसिद्ध ज्योतिर्विद् कोट्टस राजू नारायण राव ने पिछले २३ सौ साल के इतिहास को खंगाल कर यह घोषणा की है। इस अवधि के इतिहास की प्रमुख घटनाओं और उस समय की ग्रह स्थितियों का अध्ययन करने के बाद वे इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि आने वाली शताब्दी मनुष्य जाति के लिए बहुत आशाप्रद होगी।
बीसवीं शताब्दी बीत रही है। इसके अंत में भयावह स्थितियों की भविष्य-वाणियाँ प्रायः की जाती रही हैं। दुनिया में फैले तनाव, युद्ध, विग्रह, उत्पात और प्राकृतिक विपदाओं का हिसाब लगाएँ तो पाएँगे कि वे सही भी हो रही हैं।
हालाँकि नास्त्रेदामस की भविष्यवाणियों के आधार पर वर्षों से यह भी कहा जा रहा था कि जुलाई ९९ के पहले सप्ताह में दुनिया नष्ट हो जाएगी। वह भविष्यवाणी या व्याख्या गलत ही साबित हुई। श्री राव ने अप्रैल ९७ में अपने एक शोधपत्र में लिखा था कि ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा। ‘जनरल ऑफ एस्ट्रोलॉजी’ के अप्रैल १९९७ के अंक में पिछले तेईस सौ साल की घटनाओं का आकलन किया गया था। शोधपत्र का निष्कर्ष यह है कि शनि और केतु की युति उथल-पुथल लाती रही है। दोनों ग्रहों का विशिष्ट योग संसार के भाग्य-भविष्य को निर्धारित करता है। श्री राव के अनुसार ९ जनवरी ९७ की सुबह आने वाले दिनों में परिवर्तन का संकेत थी। उस दिन सुबह ५; ३० बजे शनि और केतु मीन राशि में एक ही अंश पर स्थित थे। उससे सातवें घर में मंगल और राहु की यही स्थिति थी। यह स्थिति अभाव, रोग और आपदाएँ लाती हैं। यों भी कह सकते हैं कि इस तरह के ग्रहयोग विपदाओं का संकेत करते हैं।
पाँच वर्ष का परिवर्तन योग द्रुतगति से चल रहा है। ज्योतिष के क्षेत्र में की गई शोध यह सिद्धांत स्थिर करती है कि शनि और केतु की युतियाँ देशकाल को मोड़ देने वाली सिद्ध हुई हैं। यह योग संपन्न हो चुका। अब १४ मई २००२ की ग्रहस्थिति बताती है कि उस के बाद की दुनिया अबकी तुलना में बहुत श्रेष्ठ और शुभ होगी।
वस्तुतः ज्योतिष संभावनाओं का शास्त्र है। वह इस आधार पर चलता है कि समूचा ब्रह्माण्ड एक चैतन्य शरीर है। शरीर के किसी भी अंग अवयव में कष्ट-पीड़ा या असुविधा होती है तो पूरा शरीर ही प्रभावित होता है। कष्ट या सुविधा ही नहीं अंगों की स्थिति भी शरीर को प्रभावित करती है। ब्रह्माण्ड में असंख्यों ग्रह-नक्षत्र और तारागण हैं। सभी की स्थिति अस्तित्व को प्रभावित करती है। उनकी बारीकियों में जाए बगैर ज्योतिष शास्त्र नौ प्रमुख ग्रहों और सत्ताईस नक्षत्रों का अध्ययन करता है, यह विद्या इतनी विकसित हो चुकी है कि सही गणनाएँ भावी की पदचाप को स्पष्ट सुन लेती है। अक्षरशः भविष्य कथन कोई भी सही नहीं निकलता। इस विषय के मर्मज्ञ मनीषी भी मानते हैं कि सत्तर प्रतिशत कथन सही निकल जाए, तो उस विद्वान को अधिकारी और प्रामाणिक मान लेना चाहिए।
श्री राव कहते हैं कि परिवर्तन के लिए सन २००० या २००९ जैसा कोई मानदंड नहीं है। भारतीय ज्योतिष में कालगणना के लिए चंद्र संवत्सर का उपयोग किया जाता है तथा संवत् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को शुरू होता है। शास्त्रीय मान्यता है कि ब्रह्मा ने इसी दिन सृष्टि का निर्माण आरंभ किया। यों भी कह सकते हैं कि जिस दिन सृष्टि का उद्भव हुआ उस दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा थी। आरंभ का क्षण तिथि, मास और संवत् के इस मान के आधार पर सृष्टि संवत् भी प्रचलित है। आमतौर पर संकल्प और कालगणना में कलि तथा विक्रमी संवत् का ही उपयोग किया जाता है। ज्योतिषीय अध्ययन में भारतीय पद्धति ही व्यावहारिक है। श्री राव का कहना है कि ग्रोमेरियन कैलेण्डर के आधार पर न साल का भविष्यकथन किया जा सकता है और न ही राशिफल बताया जाना चाहिए। वह अवैज्ञानिक है, इक्कीसवीं सदी या सन २००० आदि का उल्लेख सुविधा के लिए ही किया गया हो सकता है! उसे आधार नहीं मानना चाहिए।
ग्रहों के विशिष्ट योग अपना प्रभाव दिखाते हैं। पिछले चालीस वर्ष का एक उदाहरण लें। उसका आतंक बहुत फैला था कि दुनिया तबाह हो जाएगी, सर्वनाश हो जाएगा। प्रलय मच जाएगी आदि। ५ फरवरी १९६२ के अष्टग्रही योग की स्मृति रखने वाले लाखों लोग हैं। तब चंद्रमा, शनि, बुध, सूर्य, बृहस्पति, शुक्र, मंगल और केतु मकर राशि में स्थित थे। वर्षों पहले ज्योतिष इस योग की भयावह संभावनाओं के बारे में बताने लगे थे। उन प्रभावों के व्यापक प्रचार से जागरण, पाठ, अनुष्ठान, यज्ञ-याग आदि आयोजनों की लहर छा गई थी। बहुतों ने तो अपना मरणोत्तर संस्कार भी अपने सामने अपने हाथों ही कर लिया था। उन दिनों अखण्ड ज्योति’ के पृष्ठों पर यह आश्वासन छपता था कि अष्टग्रही योग अपना प्रभाव दिखाकर संपन्न हो जाएगा। निश्चिंत रहा जाना चाहिए कि इस योग के कारण प्रलय नहीं होने वाली है।
प्रलय जैसा तो कुछ नहीं हुआ, लेकिन उस योग के बाद भारत को जबर्दस्त आघात लगे। चीन ने जबर्दस्त हमला किया। भारतीय नेतृत्व इस विश्वास में ही खोया रहा कि चीन उसका अभिन्न मित्र है। दोनों देशों ने मिलकर पंचशील के सिद्धांत का प्रतिपादन किया है। चीन के हमले ने भारतीय नेतृत्व को स्तब्ध कर दिया था। सीमा पर विशेष तैयारी नहीं थी। इसलिए सेना को पीछे हटना पड़ा। जवाहरलाल नेहरू उस सदमे से बीमार पड़ गए और दो साल के अंदर ही वे उसी बीमारी में चल भी बसे। उन दिनों भारत का विदेशी मुद्रा संतुलन बुरी तरह लड़खड़ा गया था। कोष लगभग खाली हो गया। बाद में अकाल, महामारी, प्राकृतिक विपदाएँ और भुखमरी जैसी स्थितियाँ व्याप गईं। उन विपदाओं से देश लंबे समय बाद उबर सका। दूसरे देशों की भी लगभग यही स्थिति थी।
शनि, केतु या राहु की विशिष्ट स्थिति बड़ी आपदाएँ लाती रही हैं। आचार्य बाराहमिहिर ने भारत का लग्न ‘मकर’ स्थिर किया है। उस आधार पर किया गया अध्ययन लगभग सही निष्कर्षों पर पहुँचता हैं। शनि केतु की युति हो तो रहा सातवें स्थान पर होता है और शनि-राहु की युति हो तो केतु सातवें स्थान पर होता है। दोनों स्थितियों में अप्रत्याशित घटनाएँ घटती हैं। श्री राव का प्रतिपादन है कि शनि के अलावा मंगल और राहु-केतु के योग भारत की नियति तय करते रहे हैं। ईसा से ३२७ साल पहले भारत पर हमला हुआ हो या बाद के वर्षों में गजनी-गौरी के आक्रमण, शनि-मंगल केंद्र में रहे हैं। राहु-केतु भी उस समय मिलकर योग बनाते थे।
महमूद गजनबी ने २७ नवंबर १०१७ को भारत पर हमला किया। उस दिन शनि और राहु करीब एक ही अंशों में स्थित थे। लग्न में स्थित दोनों ग्रह जब द्वि-स्वभाव राशि मिथुन में थे, तब सोमनाथ मंदिर का ध्वंस हुआ। १३९८ में तैमूर का हमला हुआ। १५२३ में पानीपत की पहली और नवंबर १५५६ में दूसरी लड़ाई के समय शनि पापग्रहों के साथ करीब समान अंशों में स्थित था। विश्वविजय पंचांग के संस्थापक-आदि संपादक पंडित हरदेव शर्मा का मानना था कि मंगल और राहु की युति दिल्ली सिंहासन हिलाती-डुलाती रही है। इस संदर्भ में अगस्त १९४२ का उदाहरण दिया जाता हैं उस दिन सुबह दस बजे मंगल और राहु सिंह राशि में लगभग समान अंशों पर थे। यह ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की शुरुआत की तिथि है। इसी आंदोलन ने ब्रिटिश राज की विदाई का आधार तैयार किया। जुलाई ९७ में मोरारजी देसाई की सरकार गिरी। तब राहु शनि के साथ सिंह राशि में स्थित था। २३ जून १९८० को मंगल और शनि सिंह राशि में थे। तब सरकार तो नहीं गिरी, लेकिन विमान दुर्घटना में संजय गाँधी की मौत के बाद भारत की राजनीति का स्वरूप एकदम भिन्न हो गया।
भारत ही नहीं दुनिया की नियति समझने में भी शनि और राहु केतु का संदर्भ उपयोगी है। ९ अगस्त १९४५ को नागासाकी और ६ अगस्त १९४५ को हिरोशिमा में गिराए गए बम के समय शनि और राहु गिराए बम के समय शनि और राहु साथ बैठे थे। पहला विश्वयुद्ध २८ जून १९१४ ई. को शुरू हुआ। उस समय शनि के साथ केतु योग बना रहा था। इन तथ्यों के आधार पर श्री राव ने कहा है कि ९ जनवरी ९७ को सुबह साढ़े पाँच बजे एक अलग तरह का अष्टग्रही योग बनता है। उस समय बृहस्पति को छोड़कर सभी ग्रह केंद्र में स्थित थे। लगन में शुक्र, मंगल, सूर्य और चंद्रमा के बाद चौथे भाव में केतु, शनि और दशम भाव में राहु स्थित थे। इसके बाद के वर्ष उथल-पुथल लाने वाले माने गए। पाँच वर्ष तक विपदा और विग्रह का दौर बताया गया। अभी ढाई साल बीते हैं। इन वर्षों में तीन बड़े-बड़े भूकंप, सात बड़ी लड़ाइयाँ और सामूहिक हिंसा की बारह घटनाएँ हुईं। भूकंपों में बलूचिस्तान, ईरान, उत्तराखण्ड (भारत) में आए भूकंपों में जान-माल की भारी क्षति हुई। अभी उत्तरार्द्ध शेष है।
स्थितियाँ यही नहीं रहेंगी। अंधकार छटेगा एवं १४ मई २००२ के बाद परिवर्तन-प्रक्रिया का दूसरा आयाम शुरू होगा। इसमें सृजन, उत्साह और शुभ की प्रधानता होगी। उस दिन छह ग्रह एक साथ वृष राशि में होंगे। बुध, चंद्रमा, शनि, राहु, मंगल और शुक्र का यह योग अतीत में भी सुखद परिणाम प्रस्तुत करता रहा है। विभिन्न उदाहरणों से यह सिद्ध किया गया है और श्री राव का कहना है कि उसके बाद की दुनिया अब से श्रेष्ठतर होगी। सच्चाई, कर्तव्यनिष्ठा, त्याग, उदारता और व्यापक हितों को महत्व देने वाली प्रवृत्तियों को बल मिलेगा। उनके लिए अनुकूल स्थितियाँ बनेंगी। आदर्शों को अपनाने वाले लोग नासमझ और अयोग्य नहीं कहे जाएँगे। उन्हें अनुकरणीय समझा जाएगा और वैभव नहीं सद्गुण व्यक्ति की प्रतिष्ठा के आधार बनेंगे। भारत के संदर्भ में राजनैतिक स्थिरता और सामाजिक सौहार्द्र के भाव भी प्रबल होंगे। अब जैसा अनिश्चय और धुँधलापन तो नहीं ही दिखाई देगा। उन श्रेयस्कर स्थितियों की प्रतीक्षा की जानी चाहिए। कभी मन को निराश न होने देकर उज्ज्वल भविष्य से भरी इक्कीसवीं सदी हेतु साधनात्मक पुरुषार्थ में जुटे रहना चाहिए।
पाँच वर्ष का परिवर्तन योग द्रुतगति से चल रहा है। ज्योतिष के क्षेत्र में की गई शोध यह सिद्धांत स्थिर करती है कि शनि और केतु की युतियाँ देशकाल को मोड़ देने वाली सिद्ध हुई हैं। यह योग संपन्न हो चुका। अब १४ मई २००२ की ग्रहस्थिति बताती है कि उस के बाद की दुनिया अबकी तुलना में बहुत श्रेष्ठ और शुभ होगी।
मनुष्य की विशेषता उसके विचार हैं। विचारों की विकासयात्रा में ही धर्म, दर्शन एवं विज्ञान उपजे एवं पनपे हैं। इन तीनों का ही मकसद मानवीय जीवन को पूर्णता तक पहुँचाना एवं समाज को स्वर्गीय वातावरण से ओत−प्रोत करना है। सामान्यतया मानवीय विकास की दो गतियाँ हैं, पहली आँतरिक तो दूसरी बाह्य। बाहरी विकास को हम सभी अपनी आँखों से देख पाते हैं, जबकि आँतरिक विकास प्रत्यक्ष तौर पर न दिखने पर भी इस बाहरी विकास की दशा और दिशा का निर्धारण करता है। इस आँतरिक विकास के प्रेरक विचार धर्म एवं दर्शन में निहित हैं, जबकि वैज्ञानिक विचारधारा बाह्य विकास को सशक्त एवं समृद्ध बनाती हैं।
वैज्ञानिक विकास के विभिन्न पहलुओं को तो हम रोजमर्रा के जीवन में देखते-परखते ही रहते हैं, पर आध्यात्मिक-दार्शनिक क्षेत्र भी विकास की गतिविधियों से अछूता नहीं है। हाँ, सामान्य तौर पर पश्चिमी दृष्टिकोण को वैज्ञानिक एवं पूर्वी दृष्टि को आध्यात्मिक माना जाता है। एक तर्क प्रधान है तो दूसरा भावप्रधान। यद्यपि तर्क निरंतर परिवर्तनशील होते हैं। जबकि आध्यात्मिक तत्व शाश्वत एवं चिरंतन बने हुए हैं। इस अलगावरेखा के बावजूद पिछले कुछ दशकों के इतिहास के पृष्ठों को पलटें तो स्पष्ट देखा जा सकता है कि आध्यात्मिक परंपरा वाले भारत महादेश ने भी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। दूसरी ओर पश्चिम ने धार्मिक आदर्शवाद के अनेकों उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। इस तरह पूर्व एवं पश्चिम के बीच-अध्यात्म एवं विज्ञान के बीच अलगाव पैदा करने वाली रेखा अब उतनी गहरी नहीं रही।
हाँ, इतना अवश्य है कि विज्ञान ने पदार्थ के अस्तित्व को इतना उलझा दिया है कि उसे स्वयं ही इसका ज्ञान नहीं रहा। वही वैज्ञानिक जो कभी पदार्थ को सर्वोपरि एवं सर्वोत्तम माना करते थे, अब क्वांटम एवं अनिश्चितता के सिद्धांत के द्वारा उच्चस्तरीय चेतना को स्वीकारने लगे हैं। भारतवर्ष में चेतना के पारखी ऋषियों ने शुरुआत में ही इस तत्व को समझ लिया था, हालाँकि हाल में हुए इन वैज्ञानिक अनुसंधानों से आध्यात्मिक सत्यों को और अधिक प्रखरता मिली है।
अब तो यह हर कहीं समझा जाने लगा है कि विज्ञान एवं धर्म दोनों ही मानवीय जीवन एवं संस्कृति के अविभाज्य अंग हैं। ये तार्किक एवं आध्यात्मिक दो ऐसे सूत्र हैं, जो मानवीय स्वभाव में अविच्छिन्न रूप से जुड़े हैं। प्रकृतिगत इस सत्य को नजरअंदाज कर देने के कारण एक दौर ऐसा भी आया जब तार्किकता के अभाव में धर्म अंधविश्वासों-अंधमान्यताओं से भरमाया और भावनाशून्य विचारप्रणाली से विध्वंसक नाभिकीय आयुधों का बेशुमार निर्माण होने लगा।
मानवीय इतिहास के विभिन्न युगों में जब भी ऐसी स्थिति आई है, परिणति भयावह ही हुई है। वर्तमान विग्रह एवं विसंगतियों का कारण भी आध्यात्मिक विचारधारा का विरोध ही है। पश्चिम में थेल्स से लेकर ह्वाइटेड तक तथा पूर्व में ऋग्वेद की ऋषियों से लेकर महर्षि अरविंद तक दर्शन अनुभव प्रधान रहा है, परंतु ये अनुभव इंद्रियों की सीमाओं में सिमटे रहे यह जरूरी नहीं। इनकी सीमा का विस्तार अतींद्रिय होना भी संभव है, जबकि आज की परिस्थिति में तार्किक प्रत्यक्षवाद तथा अस्तित्ववाद, सारे अनुभव एवं अनुभूतियों को इंद्रियों की सीमा में पकड़े-जकड़े रहने के बालहठ पर अड़ गए। आध्यात्मिक विचारधारा से उनके बैर-विरोध का कारण उनका यही अज्ञान रहा।
प्राचीन ग्रीक चिंतनशैली में प्रोटोगोरस ने जब अपना मंतव्य प्रकट करते हुए कहा कि सत्य तभी सार्थक है- जब वह इंद्रियों द्वारा ग्रहणशील हो। तब प्लेटो ने इसकी कटु आलोचना की थी। उन्होंने कहा कि सत्य के उच्चतर पहल इंद्रियातीत भी हो सकते हैं। आधुनिक यूरोपीय दर्शन में ह्यूम का मानना है कि ईश्वर, आत्मा आदि के संबंध में कोई वास्तविक या सार्थक दावा नहीं हो सकता। परंतु काँट ने किस्मत को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया। हालाँकि ह्यूम के विचारों को जहाँ स्वीकारोक्ति मिली वहाँ धार्मिक विचार विश्वास मूर्खतापूर्ण कहे गये तथा तत्व मीमांसा को त्याज्य माना गया।
तत्वमीमांसा इनसान, प्रकृति एवं परमात्मा के पारस्परिक संबंधों की व्याख्या है। जिन धर्मों में तत्वमीमांसा की प्रणाली नहीं होती उनका अस्तित्व ज्यादा समय तक बरकरार नहीं रह सकता। यदि रहा भी तो उसमें सिवाय कट्टरपन के कुछ नहीं बचता। वे धर्म वैज्ञानिकता की कठोर कसौटियों को झेल नहीं पाते हैं। भारत की आध्यात्मिक परंपरा अपनी तत्वमीमांसा के कारण ही विज्ञान सम्मत बन सकी है।
पश्चिमी प्रत्यक्षवाद ने सत्य को इंद्रियों को सीमा में समेटने की जो बल हठ ठानी है उसी के चलते वह अध्यात्मिक सत्यों को समझने में विफलप्राय हुआ है। सत्य की व्यापकता को भला सीमाबद्ध कैसे किया जा सकता है। एक गागर में भला समूचा सागर कैसे समा सकता है। जो अदृश्य, सूक्ष्म, इंद्रियातीत है वह स्थूल परिकरों में कैसे और किस तरह प्रकाशित हो? प्लेटो के आदर्शवाद से लेकर मार्क्स के आदर्शवाद तक तत्वविद्या को अमान्य तो किया जा सकता है परंतु सच्चाई से भागा और बचा नहीं जा सकता है। जब भी चिंतन और विचार अपने बारे में पूरी तरह से चैतन्य होता है तो वह अध्यात्म बन जाता है।
इंद्रिय अनुभव, पश्चिमी दर्शन एवं उस पर आधारित विज्ञान की जहाँ सीमा है वहीं इसकी सबसे बड़ी दुर्बलता है जिसका परिणाम है व्यापक एवं सार्थक दर्शन का निषेध। यथार्थ दर्शन तो अस्तित्व की गहराई में जाता है तो सत्य को अखण्ड बनाने के लिए वैज्ञानिक, अध्यात्मिक एवं नैतिक परिकल्पना करता है। जीवन मूल्यों की उपयोगिता सीमाबद्ध नहीं है बल्कि समस्त संसार व समाज के कल्याण के लिए सारे अनुभव मात्र इंद्रियों के दायरे में किस तरह सिमट सकते है, नैतिक, सौन्दर्यात्मक एवं आध्यात्मिक अनुभव भी होते है। हमारे घनीभूत अनुभवों में ज्ञान के लिए उत्साह, सौंदर्य हेतु प्रेम, नैतिकता की आशा एवं दैवी संवेदनाओं को अमान्य तो नहीं किया जा सकता। विज्ञान पदार्थ से सत्य का प्रकटीकरण करता है ये ठीक है। परंतु इसमें आध्यात्मिक मूल्यों का भी समावेश भी अनिवार्य है।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्राध्यापक सी.डी. ब्राँड ने अपनी पुस्तक ‘फाइब टाइम्स ऑफ एथिकल थ्योरी’ की भूमिका में नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों एवं मानदण्डों में अंतर बताया है। उनके अनुसार नैतिक मूल्य मानव के सामाजिक विकास के लिए आवश्यक एवं उपयोगी है जबकि आध्यात्मिक मूल्यों का उद्देश्य मनुष्य का आँतरिक एवं चेतनात्मक विकास है। मनीषी ब्राँड के अनुसार अध्यात्म विषय अनुभव जगत की वास्तविक व्याख्या है। इसमें असीम एवं अनंत को नये आकार प्रकार से संजोया जाता है। ये मात्र कल्पना नहीं बल्कि उच्चतर सत्य के साक्षात्कार है, जबकि वैज्ञानिक अनुभव विद्युत ऊर्जा, गुरुत्वाकर्षण जैसे पदार्थों की सीमा में सिमटे सत्यों को ही जाँच परख सकते है। इनसे सापेक्षता तो जानी जा सकती है परंतु निरपेक्ष सत्य तो अंजान ही बना रहता है।
यद्यपि ये वैज्ञानिक प्रयोगवाद भी कम आवश्यक नहीं है क्योंकि वे सब इस आधारभूत तथ्य से आरंभ करते है कि किस चीज का अस्तित्व है और यही धर्म को अंधविश्वासों से मुक्त करने के लिए सहायता करता है। सच्चाई तो यही है कि धर्म में निहित सत्य की अवहेलना किसी ने नहीं की है। उससे थोथे कर्मकाण्ड पर ही कुठाराघात हुआ है। हाँ इस तरह के अधूरे ज्ञान से ये भ्रम जरूर पलता है कि लोग सोचने लगे है कि धर्म का यथार्थ अस्तित्व है भी या नहीं। अब तो ये दर्शन का पुनीत कर्तव्य है कि धार्मिक अध्यात्मिक सत्य को इस ऊहापोह से निकालकर नवीन रूप दे, जिससे मानव समाज को जीवन का दिशाबोध हो सके।
परंतु ये तभी संभव है जब कि विचार एवं भावनाओं का संयोग हो, श्रद्धा एवं तर्क का मिलन हो। पश्चिमी जगत में यों प्लेटो का दर्शन तार्किक युक्तियों पर आधारित है, परंतु उन्होंने इस दुनिया से परे एक अन्य लोक का भी जिक्र किया है। उनके अनुसार जो एक अजगर को अपने आकार और पराक्रम पर बड़ा अभिमान था। यह भी सोचता था कि जिसे भी अपनी पकड़ में जकड़ लेगा, उसका कचूमर निकालकर ही छोड़ेगा। मंदिर की चौखट पर खड़ा हुआ संगमरमर का शेर उसने देखा, तो गुस्से में आग बबूला हो गया। मुझे देखकर बड़े-बड़े जानवर डरकर भागते हैं, एक तू है, जो जहाँ-का-तहाँ बैठा अकड़ रहा है। सिंह कुछ बोल नहीं सकता था, सो बोल भी नहीं। अजगर उससे लिपट गया और निगलने लगा। प्रयास निष्फल हो गया गया। जितना-जितना वह क्रुद्ध होता और आक्रमण करता, उतनी ही चोट उसे लगती और लहूलुहान हो जाता। अंत में उसे अपनी मूर्खता समझ में आई और लहूलुहान शरीर लेकर बिल में वापस लोट गया। आवेशग्रस्त की ऐसी ही दुर्गति होती है।
प्रदत्त है वह प्रकृति के ऊपर नहीं जाता परंतु दिव्य प्रेरणा उसे पार ले जाती है। प्लेटो का सह भी विचार है कि मृत्यू अंत नहीं है और यही पुनर्जन्म की अवधारणा सिद्ध होती है। थेरेव्स में सुकरात ने मनुष्य को देवतुल्य बनाने के लिये आह्वान किया था। उनका कथन था कि मनुष्य अपूर्ण है और पूर्णता की प्राप्ति ही उसका एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए। इसी तरह काँट ने संपूर्ण सत्य या सत्ता को सूली में ही बंद नहीं माना है। उनका कथन है कि तर्क से आत्मा परमात्मा के रहस्यों को अनावृत कर पाना संभव नहीं है। अतः ज्ञान विज्ञान का खोज सत्यनिष्ठा और विश्वास के बलबूते ही बन पड़ती है। जहाँ तक तर्क का तीर नहीं पहुँच पाता वहां आध्यात्मिकता अनुभव की पारदर्शिता ही कामयाब होती है। प्रकृति का सौंदर्य नदियों का कल कल निनाद सूर्य की इन्द्रधनुषी आभा एवं तारों भरा गगन किसी भी तर्क का मुहताज नहीं है। काँट ने अपने दर्शन में प्रकृति के इस स्वरूप की पहचान के लिये स्न दिखाया है ताकि विचारों की उत्कृष्टता, समग्रता एवं समृद्धता बनी रहे। भारतीय चिंतन में भी अस्तित्ववादी संकट और बौद्धिकता दोनों का समावेश हुआ है। इसका संबंध मानव की पूर्णता से उसके अंतिम लक्ष्य से है। यहाँ मानवीय जीवन की सर्वतोमुखी प्रगति आत्मोत्कर्ष मन शाँति एवं भौतिक समृद्धि के लिये विचार किया गया है। मानव के भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन के लिये भारतीय विचार पद्धति पथप्रदर्शक है। वेदांत दर्शन एवं उपनिषदों में यथार्थ सार्थक एवं समग्र ज्ञान तथा उसके प्रति बौद्धिक आचरण पर प्रकाश डाला गया है। समुद्र एवं जलकणों के समान ब्रह्म एवं आत्मा एक ही है। ब्रह्म सांसारिक क्रिया के पीछे की सत्ता का नाम है तो वैयक्तिक अहं के पर्दे के पीछे आत्मसत्ता प्रकाशित रहती है। जिसे ब्रह्मविद्या कह सकते है और तत्वमीमांसा भी। इसका सारतत्त्व यही है कि स्वयं को जाने समझे बिना पदार्थ का जीवन का सही उपयोग कतई संभव नहीं है। भगवत् में पिंड में ब्रह्माण्ड की परिकल्पना की गई है। यह परिकल्पना बीज में वृक्ष की कल्पना के सदृश है। मनुष्य के अंदर ईश्वरीय सत्ता समाई है। मनुष्य के बीज रूप में समस्त ईश्वरीय विभूतियाँ अपने बीज रूप में निहित है। बस आध्यात्मिक ज्ञान एवं चेतना से उन्हें जाग्रत एवं विकसित भर करना है। शाश्वत वर्तमान मनुष्य के संकुचित व्यक्तित्व से आच्छादित है। अंतः अहंबद्ध संकीर्णता छोड़कर ही चेतना के उच्चतर आयामों के ज्ञान एवं विकास हो सकता है। इतने पर भी भारतीय दर्शन एवं चिंतन पद्धति ने यह साफतौर पर बताया कि विकास की समग्रता तभी है जब हम स्वयं की आँतरिक एवं बाह्य आध्यात्मिक एवं भौतिक दोनों अर्थों एवं स्तरों पर विकसित करे। इसके लिये जितनी आवश्यकता आध्यात्मिक विचारों एवं प्रक्रियाओं की है उतनी ही वैज्ञानिक सूत्रों एवं प्रयोगों की। मानवीय जीवन एवं समग्र एवं सार्थक विकास का अर्थ है जीवन में विचारों की त्रिविध आयामों का समावेश। विचारों के त्रिविध आयाम के रूप धर्म दर्शन एवं विज्ञान का समन्वित उद्देश्य ही मानव की पूर्णता को साकार करना है। वैज्ञानिक आध्यात्मवाद की अवधारणा इस अभूतपूर्व समन्वय की ही सार्थक परिभाषा है। निजी और सामाजिक जीवन में इसका प्रयोग उपयोग स्वयं को और समाज को आर्थिक एवं वैचारिक एवं भावनात्मक धरातल पर विकसित करेगा। फिर मानव में देवत्व एवं धरती पर स्वर्ग का अवतरण मात्र एक विचार नहीं बल्कि आँखों देखी जानी वाली सच्चाई बनेगी। इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य के उद्घोष का यही पर्याय अभिप्राय है। चौबीस अवतारों में से एक कपिलजी तो ज्ञानावतार थे सहज संत। पुत्रियों का विवाह करते ही ऋषि कर्दम तथा देवहूति ने संन्यास ले लिया। देवहूति ने ज्ञानी कपिल जी से पूछा इंद्रियाँ चोरों की तरह आचरण करती है। मैं ऊब गयी हूँ। स्थिर आनंद की प्राप्ति के लिये क्या करूँ। कपिलजी बोले माताजी इंद्रियाँ और मन असत का संग करने के आदि हो गये है। असत के सहयोग से दुख की उत्पत्ति होती है। संग अर्थात् आसक्ति छूटती नहीं इसे असत से सत की ओर मोड़ दिया जाता है। इसी मोड़ से सत्संग मिलता है। सत्संग सा आनंद उपजता है। सन्त तो संसार में दिखता है सत्संग का संग किससे करूँ कपिल जी ने कहा यदि ऐसा लगता है तो समझो अभी अपनी पाप दृष्टि का क्षय नहीं हुआ जब तक पाप दृष्टि है संत मिल जाये तो उनके सद्भावना उपजती उसके बीना उनके संग का लाभ उठाया ही नहीं जा सकता जा स्वयं संत बनता है उन्हें संत मिल जातं है जब तक स्वयं संत से जुड़ने की उमंग नहीं उठती संत दृष्टि पैदा नहीं होती और यह संसार दुष्टों से ही भरा दिखता है स्वयं संत बने बीना न संत मिलता है न सत्संग होता है
लाला जी अपने समय के माने हुए वकील व काँग्रेस के नेता थे। संध्याकाल ताँगे में जरूरी काम से जाना था। कोचवान ताँगे की बत्ती जलाने लगा। असावधानी के कारण माचिस की तीन तीलियाँ बुझ गयी। लाला जी ने कोचवान को डाँटा और कहा-इतनी फिजूल खर्ची करते हो, पैसे की कीमत नहीं समझते। लाहौर में अनाथालय बन रहा था। कमेटी के सदस्य लाला जी चंदा माँगने आये थे। दो कारणों से झिझक रहे थे-एक तो वे जाने की तैयारी में थे, दूसरे इतने किफायतसार कि तीन तीलियों को खर्चने भर का ध्यान रख रहे थे। पास खड़े लोगों से आने का कारण पूछा, तो उनने अनाथालय खुलने और उसके लिए चंदा एकत्रित करने की बातें कर दी। लाला जी ने दस हजार रुपये का चेक काट दिया। माँगने वालों में से एक ने आश्चर्य व्यक्त किया। आपकी तीन तीली जलने पर डाँटने की कंजूसी से हमें अचम्भा हो रहा था कि आप कुछ दे पायेंगे कि नहीं। पर आप ने तो इतनी बड़ी राशि दे दी। लाला जी ने कहा-ऐसी किफायतसारी स्वभाव में लाने के कारण कि इतना बचा पाया कि आपकी कुछ सेवा हो सकी।
उस दिन पादरी डुप्रे दक्षिण अफ्रीका की केपटाॅउन स्थित राजकीय जेल में उस कोठरी में दाखिल हुए जहाँ वह कैद था। पादरी के हाथों में बाइबिल थी। पादरी को आते हुए देखकर वह अपने स्थान से उठकर खड़ा हो गये। कोठरी के द्वार पर दो सिपाही तैनात थे। कैदी युवक अपने स्थान से आगे बढ़ा और उसने पादरी के हाथ से बाइबिल ले ली और कहने लगा यह ग्रंथ मेरा जीवन है, मैं सदैव इसी के साथ जिया हूँ और मैं इसे हाथ में लेकर ईश्वर की सौगंध खाता हूँ कि मैंने पियरे विलियर्स की हत्या नहीं की। मैं एक निर्दोष और भोला भाला निरपराध व्यक्ति हूँ परंतु फिर भी मैं मृत्यु का वरण करने के लिये विवश हूँ। पादरी ने युवक के काँधे थपथपाये और वे भर्राए गले से बोले मुझे तुम पर विश्वास है मेरे बच्चे लेकिन मैं कुछ भी नहीं कर सकता। कानूनी फैसले के अनुसार आज तुम्हें फाँसी पर लटकाए जाने का निर्णय किया जा चुका है। कुछ ही देर बाद एक वरिष्ठ अधिकारी जेल बौर नियमानुसार औपचारिक दस्तावेज पढ़कर सुनाने लगा। इसमें दंडित व्यक्ति को यह स्मरण कराया गया था कि उसे यानि जॉन गेमार्ड को फाँसी पर लटकाए जाने की सजा सुनाई गई है क्योंकि उसने पियरे विलियर्स नामक एक खेतिहर मजदूर को उसका गला घोंट कर मार डाला था। क्या इस संदर्भ में तुम्हें कुछ कहना है इस पर कैदी ने उत्तर दिया हाँ मैं सर्वथा निर्दोष हूँ। परंतु उसका यह कथन सर्वथा अर्थहीन ही बना रहा और नवंबर ९८५३ की वह सुबह भी आ गई। उस दिन चारों ओर धूप खिली हुई थी। जॉन गेमार्ड नपे तुले कदमों से चलता हुआ फाँसी के फंदे के पास तक आया। उसके चेहरे पर भय की कोई भी शिकन तक ना थी। पादरी डुप्रे ने जैसे ही विधिविधान के मुताबिक़ धर्मोपदेश सुनाने आरंभ किए गेमार्ड ने उसकी ओर मुखातिब होकर कहा फादर इस काम में अपना समय बरबाद करने की तकलीफ आप ना करें, ये लोग मेरे शरीर को नष्ट कर सकते हैं लेकिन मेरी आत्मा को कोई नहीं मार सकता। इस दौरान फाँसी की कार्यवाही पुरी करने वाली ने उसे फाँसी का फंदा पहना दिया और फिर उसे कस डाला इस कार्यवाही के बाद थोड़ी देर में ही उसके प्राण पखेरू उड़ गये। लेकिन मृत्यु से पूर्व काले कपड़े में बँधा अपना सिर घुमाकर उसने कहा सुनो मुझे किसी भी कब्र में कैद नहीं रखा जा सकता समझे, किसी भी कब्र में नहीं क्योंकि मैं बेकसूर मारा जा रहा हूँ। फिर जैसे ही झटके के साथ रस्सा छोड़ा गया गेमार्ड का शरीर अधर में झूल गया। लगभग दो घटे बाद उसके सारे डॉक्टरी परीक्षण किये गये और नियमानुसार यह सुनिश्चित किया गया कि कानून द्वारा दी गई सजा के मुताबिक़ उसकी मृत्यु हो चुकी है। फिर उसके शव को एक सादी सी काले रंग की शव पेटी में रखा गया। हत्या का यह मामला जिसमें जॉन गेमार्ड को मृत्युदण्ड मिला था आम लोगों में चर्चा का विषय बन गया था, अतः अधिकारी भी इस ओर विशेष ध्यान देने के लिये मजबूर हो गए थे। उन्होंने फाँसीघर में जाकर बार बार यह सुनिश्चित किया कि गेमार्ड की शव पेटी को पर्याप्त रूप से कीलें ठोककर अच्छी तरह से बंद किया गया है या नहीं। उन्होंने इसका भी निरीक्षण किया कि शवपेटी को गाड़ी में रखे जाने से पूर्व अच्छे तरह सीलबंद कर दिया था। जब वे पुरी तरह से आश्वस्त हो गए तो शव को दफनाने के लिये कैदखाने के पीछे की ओर स्थित पार्ल पर्वत के ढलान पर ले जाये गये। सुरक्षाकर्मियों ने शव को आठ फुट गहरी कब्र में रख दिया फिर उस पर पत्थर चुनकर मजार बना दी गई। वरिष्ठ अधिकारी के आदेश के अनुसार कब्र के पास दो सुरक्षाकर्मी रात-दिन पहरे पर नियमित रूप से रहने लगे, ताकि कोई भी व्यक्ति शव को निकालने का प्रयत्न ना करे। यह पहरा लगातार दो महीने तक बिठाए रखा गया। इसी दौरान कुछ अन्य घटनाएँ उभरकर प्रकाश में आ रही थीं, जो इस असाधारण मामले को एक नया मोड़ दे रही थीं। हुआ यह कि जिस खेत में हत्या की गई थी, उसके मालिक ने मृतक पीयरे विलियर्स का बटुआ पीटरलॉरेंज नामक एक व्यक्ति के पास बरामद कर लिया था। यह व्यक्ति पशुओं की देखभाल का काम करता था। लॉरेंज ने भागने की कोशिश की तो उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया गया। जब उसके कमरे कि तलाशी ली गई तो उसके पास से मृतक की अँगूठी और घड़ी भी बरामद हुई। आखिरकार काँपते शब्दों में लॉरेंज ने स्वीकार किया कि पीयरे विलियर्स की हत्या उसी ने की थी। उसने पीयरे विलियर्स के गले में रस्से का फंदा डाल कर उसे घोट डाला था। इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट हो गया कि न्यायालय ने एक बहुत बड़ी दुखद भूल की थी, जिसके कारण जॉन गेमार्ड को फाँसी के फन्दे पर लटकना पड़ा। इस पर गवर्नर ने आदेश दिया कि ग्रेमार्ड का नाम अपराधियों के लिस्ट से हटा दिया जाये और निर्दोष व्यक्ति की विधवा माँ को तत्काल एक हजार पाउण्ड बतौर मुआवज़ा दिया जाये और साथ ही यह भी कि जब तक वह जीवित रहे उसे १०८ पाउण्ड प्रतिवर्ष पेंशन के रूप में दिये जाएँ। गवर्नर ने यह आदेश भी जारी किये कि सरकारी खर्च पर जॉन गेमार्ड का शव कब्र से निकालकर किसी पवित्र स्थल पर दफनाने कि व्यवस्था की जाये। परिणामस्वरूप पार्ल पर्वत के उस ढलवाँ स्थल तक सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों का दल पहुँचा, जहाँ केवल दो महीने पूर्व जॉन गेमार्ड का शव दफन किया गया था। उस समय दल के साथ जॉन गेमार्ड की पत्नी भी थी। सिपाहियों ने कब्र को खोद कर पत्थर हटाये। जॉन गेमार्ड कि पत्नी चुप चाप पास ही खड़ी यह सारा दृश्य देख रही थी। आखिर शवपेटी को बाहर निकाला गया। जेल के अधिकारियों ने शवपेटी का निरिक्षण किया और उसे शील बन्द पाया। फिर सुरक्षाकर्मियों ने शवपेटी को खोला तो सभी आँखें फाड़े आश्चर्य से देखते रह गये। वह खाली थी। आखिर शव कहाँ गायब हो गया? इसकी छान बीन शुरू कि गई। जाँच पड़ताल से पता चला कि दो महीने पूर्व जब उसे दफनाया गया था तब से लेकर आज तक लगातार सुरक्षाकर्मी यहाँ पहरा देते रहे। एक क्षण के लिये भी पहरा नहीं हटाया गया तब शवपेटी खाली क्यों है? क्या शव स्वयं उठ कर चुप चाप निकल गया? अथवा किसी ने जादू से उस शव को गायब कर दिया? इन्हीं प्रश्नों में उलझे कर्मचारी छान बीन करते रहे लेकिन शव का पता न चला। आखिर जॉन गेमार्ड का शव कब्र से लापता घोषित कर दिया गया। लगभग सौ वर्ष बाद १९५६ में पार्ल पर्वत के उसी ढलवाँ स्थल पर कुछ लोग पर्यटन के लिये आये तो उन्हें काफी ऊँचाई पर काले पत्थर की एक शीला नजर आयी जो उल्टी पड़ी हुई थी और उस पर कुछ खुदा हुआ था। उसे पढ़ा गया, लिखा था - जान गेमार्ड की पवित्र स्मृति, जो परमात्मा में लीन है, उस पर परमात्मा कि असीम अनुकम्पा है। यह शिला आज भी केपटाॅउन के संग्रहालय में सुरक्षित है और आज भी जान गेमार्ड के इस दावे का निरंतर स्मरण करा रही है कि उसे किसी कब्र में कैद कर के नहीं रखा जा सकता- सचमुच ईश्वर के सच्चे भक्तों के जीवन में प्रकृति कि समस्त चमत्कार सम्भव हैं।
विश्व ब्रह्माण्ड में मनुष्य कि स्थिति क्या है? इस प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ने का प्रयास साधक को अपनी वस्तुस्थिति का बोध करा सकता है। मनीषियों ने ध्यान में प्रवेश के लिये इस मंथन को एक उपयोगी साधन भी माना है। कहा है कि मनुष्य इस जगत का सबसे अभिमानी और उद्दंड प्राणी है। अपने अहंकार के चलते उसने प्रकृति में कई विक्षेप उत्पन्न किये हैं। उसकी व्यवस्था में अनावश्यक हस्तक्षेप किये हैं और अपनी तथा जीव जगत के लिये भयंकर संकटों को निमंत्रण दिया है। साधक मनुष्य की स्थिति का विचार करते हुए सर्वश्रेष्ठ होने के अहंकार से मुक्त हो सकता है। अभी मनुष्य इस अहंकार से पीड़ित है कि संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। विश्व की अन्य सभी घटक उसकी इच्छा आवश्यकता की पूर्ति के लिये है। इसके लिये नहीं हो तो भी वह अपनी सुविधा और सुख के लिये प्रकृति का मनमाने ढंग से उपयोग कर सकता है। पर उसका ये अधिकार है डेढ़ सौ से दो सौ सेंटीमीटर लम्बाई और पच्चास साठ से नब्बे पंचानवे किलोग्राम वजनी शरीर में सिमटे अस्तित्व वाले मनुष्य की स्थिति पर ध्यान दिया जाना चाहिए। मोटे तौर पर विराट विश्व में अस्तित्व के असंख्यों रूपों में एक रूप वह भी है कि मनुष्य का आकार और स्वरूप स्पष्ट है लेकिन विश्व का आकार कोई नहीं जानता। करीब १९ सौ साल से वैज्ञानिक विश्व का आकार प्रकार मापने में लगे हुए हैं। लेकिन आज तक सफलता नहीं मिली। आधुनिक खगोलविज्ञान जिस वैज्ञानिक क्लाडियस टालेमी की देन है। उसने सन १४० में यह काम शुरू किया था। टाॅलेमी की शोध भी मनुष्य के इस अहंकार से प्रेरित लगती है कि वह विश्व में सबसे श्रेष्ठ और महाबली है। अन्यथा यह पृथ्वी को विश्व का केन्द्र नहीं बताता और न ही वह यह कहता कि सूर्य तथा अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा कर रहे हैं। टाॅलेमी से सैकड़ों साल पहले आर्यभट्ट जैसे भारतीय मनीषी कह चुके थे कि सूर्य केन्द्र है और पृथ्वी समेत अन्य ग्रह उसके इर्द गिर्द घूम रहे हैं। विश्व के निरन्तर बढ़ते फैलते रहने वाले स्वरूप को ब्रह्माण्ड की संज्ञा दी गई है। भारतीय परम्परा के इस शब्द का अर्थ है कि ब्रह्म का स्थूल रूप, विराट शरीर। ब्रह्म शब्द का अर्थ स्वयं भी विराट और वर्धमान है। अँग्रेजी में ब्रह्माण्ड के लिये काॅसमाॅस आता है। इसका अर्थ है- व्यवस्था। भारतीय और यूरोपीय भाषाओं में प्रचलित सभी शब्दों का अर्थ निरन्तर बढ़ते, व्यवस्थित रूप से चलते और नियमों से संचालित होता हुआ अस्तित्व है। नियम बहुधा अज्ञात होते हैं। इनका प्रभाव दिखाई जरूर देता है। निरन्तर फैलते या असीम ग्रहण करते जा रहे ब्रह्माण्ड की विवेचना में कई निष्कर्ष निरूपित किये गये हैं। उनमें नवीनतम और पिछले सभी निष्कर्षों से ज्यादा सुसंगत सिद्धान्त डॉक्टर एलेन संडेज का है। संडेज के अनुसार विश्व ब्रह्माण्ड का जन्म १२० करोड़ वर्ष पूर्व एक प्रचंड विस्फोट से हुआ। भारतीय मनीषी इस विस्फोट को सौम्य शब्दों में निरूपित करते हुए कहते है कि आरम्भ में वह एक नाद था, शब्द था। शब्द से ही सृष्टि से ही उत्पत्ति हुई। डॉक्टर संडेज के अनुसार विश्व ब्रह्माण्ड का विस्तार २९० करोड़ वर्षों तक निरन्तर चलता रहेगा। विस्तार में निहित गुरुत्वाकर्षण का नियम अपने आप उस गति को विराम देगा। उसके बाद सिकुड़ने लगेगा। अर्थात् वे विश्व ब्रह्माण्ड अपने भीतर ही सिमट जायेगा। भारतीय मनीषी इस क्रम को ईश्वर का लीलाविस्तार और उसे वापस अपने में लीन कर लेने के रूप में निरूपित करते हैं। विश्व ब्रह्माण्ड के खरबों वर्षों की आयु के संदर्भ में मनुष्य की आयु कितनी बैठती है। औसत आयु ७० वर्ष भी माने तो वह कालमान से ब्रह्माण्ड वर्ष (४८० करोड़ मानवीय वर्ष) के एक सेकेंड का करोड़वाँ अंश होगा। मानवी वर्ष की तुलना में यह आयु आँखों से नहीं दिखाई देने वाले सूक्ष्म जन्तुओं की क्षण भर में ही पूर्ण हो जाने वाली पाँच पीढ़ियों की आयु से कम है। आशय यह है कि काल कि दृष्टि से मनुष्य एक कोशीय जीव की तरह नगण्य क्षणभंगुर आयु वाला प्राणी है। विश्व के छोटे से परमाणु से लेकर विशाल आकाशगंगायें, असंख्यों ग्रह नक्षत्र, अगणित तारे और असीम आकाश हैं। पृथ्वी खगोलीय अर्थों में एक ग्रह ही है और ऐसे कितने ही ग्रह हैं जहाँ अपनी पृथ्वी से ज्यादा समृद्धि और जीवन के लिये अनुकूल परिस्थितियाँ हैं। अकल्पनीय विराट विश्व में पृथ्वी कि स्थिति यहाँ वहाँ भिनभिनाती रहने वाली मक्खी जैसी है। इस औकात वाली पृथ्वी में भी मनुष्य कि स्थिति उसके परिवार में विद्यमान असंख्य प्रजातियों में से एक है। परम्परा जीवन के विभिन्न रूपों को चौरासी लाख योनियों के रूप में बताती है। इनमें प्रोटोजोआ जैसे अकोशीय जीवों के अलावा पोरिफेरा,सीलैंट्रेटा, टेनीफोरा, प्लेटीहेल्मिंथिज, नेमटेनिया, इटोपोकिया। ब्रायोजोना, मोलस्का, कार्डेटा जैसे कई वर्ग हैं। ये वर्ग परस्पर मिलने वाली समानताओं के आधार पर निश्चित किए गए हैं। ऐसी असंख्य जातियों-प्रजातियों अथवा योनियों में मनुष्य भी एक है। विकास सिद्धांत के अनुसार मनुष्य पृथ्वी परिवार का सबसे कम उम्र वाला सदस्य है। यों भी कह सकते हैं कि वह विश्व सुधा का नन्हा शिशु है, जो मात्र पचास हजार साल पहले उस जगत में आया। सबसे छोटा होने के कारण प्रकृति उसकी उच्छृंखलताओं को भी सहन करती है, शायद यह मानकर कि वह नटखट है। छोटा होने के कारण उसकी शरारतों को सहन कर लेना चाहिये अन्यथा अपने उत्पातों और उच्छृंखलताओं के कारण पृथ्वी से कई जातियाँ विलुप्त हो गई हैं। प्रकृति के प्रकोप ने उन्हें अपना अस्तित्व समेट लेने के लिये बाध्य कर दिया। मनुष्य प्रकृति परिवार का सबसे छोटा सदस्य है जरूर, लेकिन उसकी इच्छाओं, वासनाओं, अंतहीन तृष्णा ने उसे उत्पाती भी कम नहीं बनाया है। प्रकृति के दिये बुद्धि-वैभव ने उसकी इच्छा-वासनाओं को उद्धत किया। उसके उद्धत आवेग के साथ बुद्धिवैभव ने जुड़कर मनुष्य को अहंकारी ही बनाया है। मनुष्य कितना भी बलशाली और अभिमानी हो जाये वे प्रकृति से बड़ा नहीं हो सकता। शरीर की एक कोष बहुत पुष्ट और समर्थ होकर भी मानवीय अस्तित्व से बड़ी नहीं हो सकती। उसकी स्थिति और क्षमता एक हिस्सा होने के नाते काया से बड़ी नहीं हों सकती। अतः मनुष्य विश्ववसुधा का एक कण मात्र ही रहेगा, अपना अस्तित्व इसी रूप में समझना और अनुभव करना चाहिए। वैज्ञानिक, खगोलीय, समाजशास्त्री और वैश्विक संदर्भ में अपने वस्तु स्थिति आसानी से समझी जा सकती है। पौराणिक क्रिया प्रसंग भी इस सम्बन्ध में अपना बोध कराते हैं। एक आख्यान के अनुसार सम्राट विद्युत्सेन पृथ्वी को जीत लेने के बाद 'भूवः' और 'स्वः' लोक को जीतने के अभियान पर निकले। दोनों लोकों पर विजय प्राप्त करने के बाद वे इंद्र के पास पहुँचे। वह तीनों लोकों पर विजय की सूचना दी। कहा कि विश्व ब्रह्माण्ड में मेरा स्थान सुनिश्चित किया जाये। तीनों लोकों पर जीतने वाला सम्राट कदाचित ही हुआ है। विश्व के इतिहास में हुआ भी तो एकाध ही कई होगा। इंद्र ने कहा कि तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने वाले को सुमेरु पर्वत पर अपनी यशोगाथा लिखने का अवसर दिया जाता है। सम्राट विद्युत्सेन आप भी वैसा कर सकते है। सम्राट विजय दर्प में भरे हुए सुमेरु पर्वत पर यशगाथा लिखने के लिये गये। लाखों योजन क्षेत्र में फैले सुमेरु पर्वत पर विजय गाथा लिखने का अवसर सम्राट के लिये रोमांचित कर देने वाला अवसर था। लेकिन पर्वत पर जा कर देखा तो वहाँ का कोई हिस्सा खाली नहीं था। विद्युत्सेन इंद्र से यह पूछने के लिये लौटे कि अपना नाम कहा लिखूँ तो उत्तर था किसी पूर्व चक्रवर्ती दिग्विजय सम्राट का नाम मिटा कर लिख दीजिये। विद्युत सेन थोड़ा स्तब्ध रहा। इंद्र ने उसका समाधान किया संकोच मत कीजिये अपनी अवधि में तो यही देख है कि कोई भी दिग्विजय पहले लिखा गया काई नाम मिटा कर ही अपना नाम अंकित कर पाया है। आख्यान का अंत राजा विद्युत्सेन का दर्प तिरोहित होने के रूप में होता है और वह वापस चला जाता है। साधक अपने अहं को इस बोध से विगलित कर सके तो साधना सफल हुई मानी जाती है
चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से स्वास्थ्य की सकारात्मक परिभाषा नहीं है। कोई परिभाषा स्थिर करने चलें तो वह निषेधपरक ही होगी। कुछ इस तरह कि रोगों का नितान्त अभाव ही स्वास्थ्य है। शरीर, मन और मस्तिष्क में कोई विकार उत्पन्न होते हैं तो उनके निवारण का उपाय चिकित्सा है। सामान्यतया स्वस्थ दशा में इसकी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। रोग या विकार शरीर, मन या मस्तिष्क में विभिन्न कारणों से पहुँची विषमताओं से आते हैं। इन दिन दुनिया भर में फैल रही रेकी उपचार पद्धति के अनुसार शरीर, मन और आत्मचेतना में समस्वरता, संतुलन का नाम स्वास्थ्य है। वह संतुलन गड़बड़ाता है तो रोग विकार उत्पन्न होते है। अन्य उपचार पद्धतियाँ, औषधि शल्य और विधिनिषेध के पालन को रोग निवारण के उपाय मानती हैं। रेकी पद्धति के विशेषज्ञ औशध उपचारों को पर्याप्त नहीं मानते। उसके अनुसार ये अनावश्यक तो है ही कई बार हानिकारक भी सिद्ध होते हैं। रेकी विशेषज्ञों के अनुसार मनुष्य शरीर में ही इतनी ऊर्जा और संभावना विद्यमान है कि उसका उपयोग कर स्वास्थ्य हुआ जा सकता है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार तो सच्चे मन से मात्र भावना ही की जाए कि हम स्वस्थ हो रहे हैं तो उससे भी रोग दूर किये जा सकते है। लेकिन यह सिद्धि पवित्र और निर्दोष चित में ही संभव है। जर्मनी की प्रसिद्ध रेकी विशेषज्ञ पाला हारेन के अनुसार ज्यादातर लोगों को दूसरे सिद्धपुरुष की सहायता आवश्यक है। बीमार होने पर सिद्ध रेकी मास्टरों का सहयोग उनके भीतर छाए असंतुलन को दूर करता है। रेकी का व्यवहारपक्ष समझने से पहले उसका परिचय जान लें। मूलतः बौद्धग्रंथों और मठों से खोजी गयी उस पद्धति को गढ़ने का श्रेय जापान के डॉक्टर मिकाओ उसुई को जाता है। १८ वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुए डॉ. उसुई क्योटो के एक ईसाई संस्थान में पढ़ाते थे। वे बौद्ध धर्म छोड़कर ईसाई बने थे। और उन्हें बाइबिल में अगाध आस्था थी। गाथाओं में प्रसिद्ध है कि ईसामसीह रोगियों को छूकर चंगा कर देते थे। उनका यह वचन भी विख्यात है कि जैसा मैं करता हूँ वैसा तुम भी कर सकते हो। इस आश्वासन को पढ़कर डॉ. उसुई के मन में प्रेरणा उठी और शोध अनुसंधान में जुट गये। बौद्धधर्म की जैन शाखा के एक मठ में उन्हें दिशा मिली। वहाँ के प्रधान भिक्षुक की प्रेरणा से तिब्बत गए और वहाँ उपलब्ध बौद्धसूत्रों का अध्ययन किया। सूत्रग्रन्थों में वर्णित साधनाएँ की। विभिन्न चरणों से गुजरते हुये इक्कीस दिन के एक उपवास अनुष्ठान के बाद उनमें स्पर्श से रोग ठीक करने की सामर्थ्य प्रकट हुई। पहली बार उन्होंने छोटे से होटल के मालिक की पौत्रि का इलाज किया। उस लड़की की दाँतों में असह्य कष्ट था। और दोनों जबड़े सुखे हुये थे। डॉ. उसुई ने उसके जबड़ों पे हाथ रखा और पीड़ा के साथ सूजन भी ठीक हो गई। इस आरंभ के बाद डॉ. उसुई ने अपनी चिकित्सा पद्धति को व्यवस्थित रूप देना शुरू किया। इसका नाम रखा गया रेकी। जापानी भाषा के इस शब्द का अर्थ है दिव्यचेतना। डॉ. उसुई ने रेकी के पाँच सिद्धान्त निश्चित किये और उसके प्रचार प्रसार में जुट गये। अपने बाद उन्होंने प्रचार का दायित्व सुयोग्य शिष्य डॉ. चुजीरो हयासी को सौंपा। डॉ. हयासी ने तोक्यो में रेकी चिकित्सालय शुरू की। इस परम्परा का यह पहला अस्पताल था। यहाँ उपचार और प्रशिक्षण दोनों की ही व्यवस्थाएँ थी। बाद में रेकी पद्धति कई देशों में फैल गई। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्राँस, जर्मनी, नीदरलैण्ड, रूस, स्वीडन आदि देशों में इस परम्परा के करीब डेढ़ सौ प्रशिक्षण संस्थान हैं। भारत में कई विशेषज्ञ स्वतंत्र रूप से यह काम कर रहे हैं। इन विशेषज्ञों को रेकी मास्टर कहा जाता है। दिल्ली, बम्बई जैसे शहरों के रेकी मास्टर उपचार और प्रशिक्षण की अच्छी फीस भी लेते हैं। हालाँकि डॉ. उसुई ने इस सेवा को निस्वार्थ भाव से करते रहने का निर्देश दिया था। रेकी पद्धति में जिसे दिव्यचेतना या ईश्वरीय शक्ति कहा गया है उसे भारतीय धर्म के अनुयायी प्राणशक्ति के नाम से अच्छी तरह समझ सकते हैं। डॉ. उसुई के अनुसार विश्वव्यापी इस शक्ति का सम्बन्ध मनुष्य से भली भांति स्थित कर दिये जाये तो वह रोग कष्टों से मुक्त हो सकता है। एक प्रमुख रेकी मास्टर गैब्रियल काजिन्स ने इस पद्धति का तत्त्वदर्शन और विज्ञान समझाते हुए लिखा है हमारे शरीर में कुछ ठोस ऊर्जा क्षेत्र और कुछ सूक्ष्म ऊर्जा क्षेत्र है। इस सूक्ष्म केन्द्रों के आस पास सूक्ष्म ऊर्जा प्रकाश से भी तेज गति से भी घूमती रहती है। इनकी गति व स्थिति हमारी भावनाओं, गतिविधियों और शरीर के अंग अवयवों को आधार देती है। भौतिक स्तर पर जब सूक्ष्म केन्द्रों से ऊर्जा भली भांति गतिशील होती है शरीर में संगति और समस्वरता आती है। ये ऊर्जा क्षेत्र कुछ कम गति करते है। शरीर के स्थूल घटक जैसे रक्त, माँस, मज्जा और उनके कारक एंजाइम प्रोटीन विटामिन आदि का संयोजन करते हैं। इनके संयोजन से अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ और कोशिकाएँ सुचारु रूप से काम करती हैं। भावनात्मक या मानसिक और आत्मिक दबावों के कारण ऊर्जा क्षेत्रों में गति कम ज्यादा होती है तो शरीर में असंतुलन आ जाता है। इस दशा में आधि-व्याधियाँ घेर लेती हैं। ऊर्जा के प्रकार और संचार के कम होने से शरीर का क्षय होने लगता है। उस क्षय के कारण रोग के साथ बुढ़ापा भी घेरने लगता है। बुढ़ापे के बारे में कहते है कि वह शरीर का स्वाभाविक क्षय है लेकिन रेकी विज्ञान इसे नहीं मानता। ऊर्जा के संतुलन से वृद्धावस्था को हमेशा के लिये टाला जा सकता है। यहाँ तक कि अंत तक जवान रहा जा सकता है। रेकी प्रक्रिया को संक्षेप में समझाते हुए डॉ. काजिंस ने लिखा है इसका मूल उद्देश्य और प्रभाव सूक्ष्मशरीर में व्याप्त ऊर्जा को संतुलित करता है। सूक्ष्मशरीर का संतुलन कुछ विशिष्ट केंद्रों पर निर्भर है। इन केंद्रों को भारतीय योगी चक्र कहते हैं। अलग अलग मान्यताओं के अनुसार इनकी संख्या छह से सोलह तक है। जब सूक्ष्मशरीर और शक्ति प्रवाह एक धारा में नहीं होते तो शरीर और मन को कष्ट होता है। ऊर्जा के इस अवरुद्ध प्रवाह को सुसंगत करने के लिये रेकी चिकित्सक की सहायता ली जा सकती है। इस पद्धति को थोड़े प्रयत्न द्वारा स्वयं भी सीखा जा सकता है, अपना उपचार खुद किया जा सकता है। स्पर्श और शुभकामना व्यक्त करने के कुछ विशेष प्रयोग के अलावा रेकी पद्धति जीवन में अध्यात्म के समावेश पर जोर देती है। चेतना को निर्मल बनाने का कोई भी प्रयोग कम से कम इक्कीस दिनों तक चलाने की मर्यादा है। चिकित्सक इसे तीन सप्ताह तक उपचार लेना कहते हैं। उद्देश्य यह है की चिकित्सार्थी और शिक्षक दोनों साधना की मनोभूमि में स्थिर हो सके। उस मन स्थिति में पहुँचने के बाद गति सहज हो जाती है। डॉ. काजिंस इस पद्धति के अध्यात्म पक्ष को स्पष्ट करते हुए स्प्रिचुअल न्यूटशन एड रेनबोडाइट में लिखते हैं- मानवीय चेतना सूक्ष्म पारदर्शी स्फटिकों से निर्मित है। ध्यान की गहन अवस्था में इन स्फटिक कणों को स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है। ये स्फटिक स्थूल और तरल कणों से बने हैं जो निरंतर प्रवाहित होते रहते हैं। हम जो आहार करते हैं वह तो इनकी दिशाधारा निश्चित करता ही है, हमारे विचार और भाव भी उन्हें प्रभावित करते हैं। रेकी के पाँच सिद्धांतों का निर्धारण भावों और विचारों को सुसंगत रूप देने के उद्देश्य से ही किया गया। उन सिद्धांतों का सार यह है कि नकारात्मक विचार जीवनीशक्ति को अवरुद्ध करते है। असंतोष, क्रोध, असहिष्णुता और उत्तेजना जैसे भाव प्रकृति के स्वाभाविक क्रम को तोड़ते हैं। प्रकृति की प्रक्रिया जिस सहज गति और प्रवाह से चलती है उनके विरुद्ध जाने वाले सभी विचार और भाव नकारात्मक हैं। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति असंतुष्ट है तो वह प्रकृति के न्याय की अवहेलना कर रहा है। उसकी पात्रता और अधिकार के अनुरूप प्रकृति ने जो कुछ दिया है वह उससे शिकायत कर रहा है। यदि वह क्रोध में है तो प्रकृति के नियमों को चुनौती देने का पाप कर रहा है। वे नियम जो शाँत और सहजता निश्चित करते हैं उत्तेजना और आवेश समय से पहले कुछ पा लेने की माँग की प्रतिक्रिया है। रेकी विशेषज्ञों के सुझाए नियम या शैली जीवन और प्रकृति के सहज स्वीकार को ऊर्जा के रक्षण का मार्ग बताते हैं। उनके अनुसार असंतोष, विरोध, शिकायत और अधीरता जैसे मनोभव ऊर्जा को विश्रृंखलित करते हैं। इन मनोभावों में रहने वाले व्यक्तियों का आभामण्डल धुँधला देखा गया है। किर्लियन फोटोग्राफी में वह जगह जगह से खंडित या खिन्न-भिन्न भी अंकित हुआ है। रेकी का अभ्यास क्रम सबसे पहले असंतोष और अधिकार को छोड़ने की दिशा में ले जाता है। विकटोरस कस्विनिस्कस ने सरवाइवल इन टू दा टवेन्टी फास्ट सेंचुरी में लिखा है कि आने वाले दिनों में जीवन इतना जटिल और प्रकृति इनकी क्षुब्ध हो जाएगी कि विरोध, असंतोष को त्याग देने में ही भला होगा। ये विचार या भाव शरीर व्यवस्था से बाहर हो जाते हैं तो सार्वभौम जीवनीशक्ति हमारे अस्तित्व में सीधे और पुरे वेग से प्रवेश करने लगती है। यह ऊर्जा जितनी निर्वाधता से प्रवाहित होगी, ईश्वरीय शक्ति के प्रचंड प्रवाह 'कुँडलिनी' का उतनी ही तेजी से जागरण होगा। उसके जाग्रत हो जाने पर व्यक्ति दूसरों के लिए भी अध्यात्मिक विकास और परिवर्तन की संभावनाएँ खोलेगा। रेकी इस अर्थ में सिर्फ उपचार प्रक्रिया मात्र नहीं है, वह साधना पद्धति भी है। जीवन क्रम को व्यवस्थित करने पर ध्यान देने के अलावा रेकीप्रक्रिया कुछ बाहरी उपायों का भी प्रयोग करती हैं। इन दिनों बाहरी उपायों से ही लोग ज्यादा परिचित हैं। योग के आठ अंगों में जैसे आसन, प्राणायाम और ध्यान तीन ही मुख्य हो गए हैं। यम, नियम,प्रत्याहार धारणा की विशेष चर्चा नहीं की जाती उसी तरह रेकी में पाए सिद्धान्तों और आत्म सुधार आदि की चर्चा प्रायः नहीं होती। वहा स्पर्श, रंग और ध्वनि के प्रयोग, स्फटिक के उपयोग और कुछ विशिष्ट व्यायामों की चर्चा ही ज्यादा होती है। रेकी की आत्मा जीवनपद्धति में आवश्यक संशोधन और सहज सरल मार्ग में अच्छी तरह प्रकट होती है। वह मार्ग अपना लिया जाए तो स्वास्थ्य संतुलन के साथ चेतनात्मक उत्कर्ष की भी संभावनाएँ खुलने लगती है
कहा जाता है कि भगवान अपने कार्य में हाथ बटाने के लिये मनुष्य को वरिष्ठ राजकुमार के रूप में एक सुनिश्चित आयु व गिनी हुई साँसें देकर इस धरती पर भेजता है। अतः हमारे जीवन का एक एक पल बहुमूल्य है। इतने पर भी हम इस तथ्य से अनजान बने रहते हैं कि हमारी साँसें गिनी हुई हैं। एक श्वास के साथ ही जीवन की इस अमूल्य निधि की एक इकाई कम हो जाती है। चिकित्साविज्ञानी जानते हैं कि एक स्वस्थ व्यक्ति सामान्यतः एक मिनट में लगभग तीस बार श्वास प्रश्वास लेता है। इस हिसाब से वह एक घण्टे में १७०० बार तथा चौबीस घण्टे में ४३ २०० तक, एक माह में १२ १६००० बार एवं एक वर्ष में १ ५५५२३००० बार साँसें लेता है। अब यदि मनुष्य की औसत क्षमता आयु ७० वर्ष मान ली जाये तो उसे जीवन में प्रकृति प्रदत्त १०८८६४०००० अर्थात् एक अरब ८ करोड़ ४६ लाख ४००० साँसें ही मिली हुई हैं। इनमें से यदि एक एक इकाइयाँ ही कम होती जायें तो जीवन की पूंजी एक दिन चुक जाती है उस समय यमराज के मृत्युदूत कालपाश लेकर लेने आ जाते हैं। इसके साथ साथ व्यक्ति पीछे मुड़कर देखता है तो उसे ज्ञात हो जाता है कि उसने कितनी बेदर्दी से साँसों को खर्च किया और समय को गँवाया है या उसके एक एक कण व एक एक क्षण का सदुपयोग किया है। यों तो हर रोज यह सभी देखते और समझते हैं कि प्राची में सुर्योदय उदय हुआ और पश्चिम में अस्त हो गया और इस तरह एक दिन समाप्त हो गया। लेकिन कितने लोग हैं जो यह जानने का गम्भीरतापूर्वक प्रयत्न करते हैं कि लो आज हमारी आयु में से एक दिन कम हो गया है। आज हमारी ४३२०० साँसें किस कार्य में खर्च हो गई। समय तो अपनी गति से चल रहा है। चल ही नहीं तीव्र गति से भाग रहा है। हमारी साँसें भी खर्च हो रही हैं। निरंतर गतिमान इस समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने पर ही जीवन की सार्थकता है। इसके साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलने वाले व्यक्ति पिछड़ जाता है और पिछड़ना सफलता से दूर हटना है, उसकी ओर गतिशील होना नहीं। धन सम्पदा का, विद्या-प्रतिभा का रोना सभी को रोते देखा जाता है। कोई धन के अभाव में दुखी है तो किसी के पास ज्ञान नहीं, विद्या नहीं, प्रतिभा नहीं। उसके लिये वह सिर पीट रहा है। समझ में नहीं आता कि वह कौन से जामवंत की प्रतीक्षा कर रहा है जब वह उसकी सामर्थ्य का बोध कराएँगे और तब वह हनुमान अपने सामर्थ्य को समझेंगे तथा एक छलाँग मारकर लंका पहुँच जायेंगे। विश्व की संपदाएँ, विश्व का ज्ञान तथा दिव्य आध्यात्मिक शक्तियाँ तो उनकी बाट जोह रहा है। समय जैसी मूल्यवान संपदा का भंडार भरा होते हुए भी जो नियोजन कर धन, प्रतिभा तथा लोकहित को नहीं पा सकते उनसे अधिक अज्ञानी किसे कहा जाए। समय अमूल्य है। समय को जिसने बिना सोचे समझे खर्च कर दिया वह जीवनपूंजी भी यों ही गंवा देता है। साँसों की तरह यह पूंजी भी अपने पास खर्च होती है। हम कृपण बनकर भी उसे सोने चाँदी के सिक्कों की तरह जोड़कर नहीं रख सकते। यह गतिमान है। हम अपनी अन्य सम्पदाओं की तरह उस पर अधिकार जमा नहीं सकते। हमारा उस पर स्वामित्व वहीं तक है कि हम उसका सदुपयोग कर लें। वस्तुतः जिस व्यक्ति में समय को खर्च करने की, उसका सदुपयोग करने की सामर्थ्य नहीं होती है तो समय ही उसे खर्च कर देता है। दिन रात के चौबीस घण्टे कम नहीं होते। उस समय को हम किस प्रकार व्यतीत करते हैं, यदि उसका लेखा-जोखा करते चलें तो हमें ज्ञात हो जाता है कि हम जी रहे हैं या समय को व्यर्थ गँवाकर एक प्रकार से जीवन की इतिश्री कर रहे हैं। उदाहरण के लिये विद्यार्थी जीवन को ही लिया जाये तो अमूमन यह काल २५ वर्ष का माना जाता है। इस अवधि में हम इस प्रकृति प्रदत्त धरोहर का कितना सदुपयोग कर पाते है यदि इसका लेखा-जोखा लिया जाये तो पता चलेगा कि मुश्किल से ९-१० वर्षों का ही हम सदुपयोग कर पाये। क्योंकि बचपन में इतना ज्ञान नहीं होता कि हम इसका मूल्य समझे। अतः पाँच वर्ष तक खेल-कूद तथा मित्रों व भाई बहनों के झुंड के साथ यों ही इस समय को लुटा देते हैं। अब बचे २० वर्ष। इसमें यदि सोने का समय ८ घण्टे प्रतिदिन मान लिया जाये अर्थात् १० बजे रात्रि में सोकर ६ बजे सुबह उठने का क्रम निर्धारित कर लिया जाये तो ८ घण्टे के प्रतिदिन के हिसाब से १ माह में २४० घण्टे और एक साल में २१२० घण्टे अर्थात् लगभग साढ़े चार महीने होते हैं। इस तरह २० वर्ष में ८ माह तो नींद में निकल जाता है। नित्य नैमित्तिक दैनिक कार्यों जैसे शौच, स्नान दोनों समय भोजन, स्कूल-कॉलेज आने जाने आदि अनिवार्य दैनिक कार्यों में कुल मिला कर चार घण्टे तथा अन्य फुटकर कामों के लिये अतिरिक्त एक घण्टा मान ले तो कुल मिला कर पाँच घण्टे होते हैं। पाँच घण्टे प्रतिदिन के हिसाब से एक माह में १५० घण्टे, एक वर्ष में १८०० घण्टे अर्थात् २ माह १५ दिन एवं २० वर्ष में लगभग चार वर्ष दो माह दैनिक कामों में खर्च हो गये। इस तरह मोटे हिसाब से २० वर्ष के जीवन काल में १० माह खर्च हो जाने पर सार्थक कार्यों के लिये मात्र एक वर्ष। इसमें से भी यदि खेलकूद सिनेमा आदि मनोरंजन अवसर को भी यदि निकाल दिया जाये तो फिर कितना समय बचेगा। शायद ही अंदाजा लगाया जा सकता है। २० वर्ष की आयु से हर नौजवान को दाढ़ी बनाने कि आवश्यकता पड़ती है। ७० वर्ष तक की प्राप्त आयु से व्यक्ति को यदि प्रतिदिन ३० मिनट दाढ़ी बनाने में खर्च कर दे तो ५० वर्ष में कुल मिलाकर १००० घण्टे अर्थात् ३६५ दिन हो जाता है। इस तरह हमारे जीवन का अधिकाँश समय दैनिक जीवन के कार्यों में व्यर्थ हो जाता है। मनुष्य को युवावस्था ईश्वर प्रदत्त समय के बहुमूल्य वरदान के रूप में मिलती है। यह वह सामर्थ्य होती है जिसे यदि अधिक समय तक स्थाई बनाया जा सके तो तन से- मन से बूढ़े ना हो जाएँ तो गिनी हुई साँसों के इस जीवन में हम बहुत काम कर सकते हैं। उदाहरण के लिये यदि हम प्रतिदिन एक घण्टा एकाग्रता के साथ २० पृष्ठ भी पढ़े तो महीने में ६०० और साल भर में ७२०० पृष्ठों का अध्ययन कर सकते हैं। उसी तरह से यदि नियमित रूप से १५ वर्ष तक पढ़ते रहे तो यह पृष्ठ संख्या पढ़ कर १८००००० हो जाती है। इतने अधिक पृष्ठों में कितने ही विविध विषयों की पुस्तकें समाहित हो जाती हैं। यदि एक ही विषय रखा गया हो तो वह भारी भरकम 'एनसाइक्लोपीडिया' बन जाता है और पढ़ने वाला उसका विशेषज्ञ। मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी समय है। यदि उससे खर्च करना सीख लिया जाए तो बहुमूल्य सफलता भी खरादी जा सकती है। निश्चय ही जिन व्यक्तियों ने समय के मूल्य को समझा और अपने जीवन के एक एक क्षण का, एक एक श्वास का सदुपयोग किया, उनकी गणना महामानव में हुई। इतिहास के पन्ने ऐसे ही महामानवों की जीवनगाथाओं से भरे पड़े हैं। उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम जोरों पर चल रहा था। गाँधी जी का अहिंसात्मक आंदोलन आँधी की तरह देशव्यापी रूप में चल रहा था, किन्तु महाराष्ट्र में लोक मान्य बालगंगाधर तिलक के नेतृत्व मे उसकी तीव्रता कुछ अधिक ही तेज था। अँग्रेजी सरकार ने उन्हें वर्मा की मांडले जेल में नजर बन्द कर दिया। इस स्थिति में जनसम्पर्क तो नहीं हो पाता था, अतः एकान्त समय का अच्छे से अच्छा उपयोग करने के लिये उन्हें "श्रीमद भागवत गीता का रहस्य" की रचना कर डाली। लगभग ९सौ पृष्ठ के इस सम्पूर्ण ग्रन्थ का लेखन बर्मा की मांडले जेल में २ नवम्बर सन १९१० से आरम्भ करके ३० मार्च सन १९११ के दिन अर्थात् ५ माह में पुरा करके गीता पर एक अनुपम कृति विश्व को प्रदान की। इसी तरह केसरी अख़बार सम्पादन में जो थोड़ा बहुत समय बच जाता, उस बीच उन्होंने भारत के प्राचीन वैदिक गौरव को विश्व के सामने प्रस्तुत करने के उद्देश्य से "द ओरियन" अर्थात् "वेदकाल का निर्णय" नामक ग्रन्थ की रचना की। वस्तुतः समय एवं श्रम का समुचित सदुपयोग किया जा सके, तो किसी भी दिशा में व्यक्ति शानदार सफलता प्राप्त कर सकता है। समय श्रम तथा विचारों का महत्व समझने वाले कितने ही व्यक्तियों ने जेल के घुटन भरे अंधकारपूर्ण जीवन में साहित्य, ज्ञान व विज्ञान के क्षेत्र को प्रकाशित किया है। जर्मनी के जाइगोर नामक एक नवयुवक की कहानी कुछ इसी प्रकार है। किसी अपराध में वह पकड़ा गया और कारागार में डाल दिया गया। जेल की उस एकांत कोठरी में रहते हुए उसने उस समय का उपयोग अध्ययन-मनन में किया और कालांतर में एक सफल लेखक बना। जेल अधिकारियों ने उसकी लगन और श्रमशीलता को देखकर सुविधाएँ प्रदान कीं। कुछ समय पश्चात उसकी प्रथम साहित्यिक रचना-दी फोट्रेस’ प्रकाशित हुई और जर्मनी में काफी लोकप्रिय हुई। जेल में बंद मुलजिम जाइगोर समय के सदुपयोग एवं अपनी श्रमनिष्ठा से साहित्य जगत का सिरमौर बन गया।
बंगाल केमिकल के संस्थापक पी.सी. राय का जन्म एक सामान्य परिवार में हुआ था। विरासत में उन्हें श्रमनिष्ठा, बुद्धि, चातुर्य एवं समय की महत्ता मिली थी। पारिवारिक उत्तरदायित्वों व कार्यों में पूरा सहयोग करते हुए भी वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल हुए। उन्होंने समय के एक एक क्षण का सही सदुपयोग करने का व्रत ले रखा था। कलकत्ते के प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्राध्यापक पद पर रहते हुए अध्यापन करने के साथ ही साथ गाँधी जी के खादी प्रचार का कार्य भी करते थे। इतना सब करते हुए भी जो थोड़ा समय बचता, उसमें उन्होंने विश्वविख्यात ग्रंथ-हिंदू केमिस्ट्री” की रचना की और अमर हो गए।
सामान्यक्रम में देखते देखते जिंदगी के कितने वर्ष ऐसे ही हँसते-हँसाते रोते-कलपते व्यतीत हो जाते हैं और शरीरयात्रा पूरी करने के अतिरिक्त कोई और महत्वपूर्ण कार्य नहीं हो पाता। किंतु यदि दिनचर्या बनाकर समय के एक-एक क्षण का ठीक तरह से उपयोग करने का क्रम बना लिया जाए, तो मनचाही दिशा में कितनी बड़ी प्रगति संभव हो जाती है। यदि कोई व्यक्ति एक घंटे का समय अध्ययन में लगाएँ तो कुछ ही दिनों में किसी भी विषय में प्रवीणता प्राप्त कर सकता है। जर्मनी के सुप्रसिद्ध विद्वान एंडरसन ने नित्य एक घंटा अन्य भाषाओं के सीखने के लिए निश्चित किया और नियमपूर्वक उसका निर्वाह करते हुए तीस वर्ष में संसार की प्रमुख भाषाओं के अधिकारी विद्वान बन गए।
अपने देश के महान संत बिनोवा भावे २३ भाषाओं के विद्वान थे। यह ज्ञान उन्होंने अपने व्यस्त कार्यक्रम में से थोड़ा समय ज्ञानसंपादन के लिए नियमित रूप से लगाकर पाया था। जीवन के अंतिम समय वे चीनी भाषा सीख रहे थे।
एडवर्ड बटलर लिटन के साठवें ग्रंथ के प्रकाशन पर एक मित्र ने जिज्ञासा व्यक्त करते हुए उनसे पूछा-महाशय आप राजनीति और पार्लियामेंट के कार्यों में इतने व्यस्त रहते हुए भी साहित्यिक रचनाएँ कैसे कर लेते हैं? मुसकराते हुए लिटन ने कहा-मैंने तीन घंटे का समय पढ़ने और लिखने के लिए नियत किया है। बस इस थोड़े, किंतु नियमित समय ने मुझे हजारों पुस्तकों को पढ़ डालने और अनेक ग्रंथों के प्रणयन करने का सौभाग्य प्रदान किया।
इस विश्वमंच पर उन्नति की महत्त्वाकाँक्षा रखने वाले हर व्यक्ति ने समय-संपदा के महत्त्व को जाना और लाभ उठाया है। समय के एक छोटे-से-छोटे घटक का भी कितना महत्त्व है, वह इस घटना को पढ़कर जाना जा सकता है। चाय बनाने के लिए उबलते पानी के लिए इंतजार करने में जितना समय लगता है, इस छोटी-सी अवधि में लाँगफेलो ने ‘इनफरलो’ नामक ग्रंथ का अनुवाद करना शुरू किया। नित्य इस कार्य को करते हुए कुछ ही दिन में ग्रंथ का अनुवाद पूरा हो गया। इसी तरह मोजार्ट ने समय के हर क्षण का उपयोग करना जीवन का आदर्श बना लिया था। बीमारी की अवस्था में मौत से संघर्ष करते हुए भी उसने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘रैक्यूम’ की रचना कर डाली। ब्रिटिश कॉमनवेल्थ और प्रोटेक्टरेट के मंत्रीपद की जिम्मेदारी वहन करते हुए मिल्टन को जो भी समय खाली मिलता, उसमें उन्होंने ‘पैराडाइस लास्ट’ नामक विश्वविख्यात काव्यसंग्रह की रचना कर डाली। नियमितता की आदत मनुष्य को प्रगति के शिखर पर पहुँचा देती है।
समय को, जिस पर सर्वसाधारण कुछ भी ध्यान नहीं देते, उसी समय के एक-एक क्षण का सदुपयोग करके लोगों ने अनेकों महत्त्वपूर्ण कार्य कर दिखाए। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के जाने-माने गणितज्ञ-चार्ल्स फास्ट ने प्रतिदिन एक घंटा गणित के अभ्यास में लगाया और उनका यह क्रम जीवनपर्यन्त चलता रहा। परिणामस्वरूप वे गणित के प्रख्यात आचार्य बन गए। हैनरी ह्वाइट ब्रिटिश सेना में चिकित्सक थे। वे अपने घर से कार्यालय पैदल आया-जाया करते थे। इस आने-जाने के समय का नियमित उपयोग करके उन्होंने ग्रीक, इटालियन, फ्रेंच जैसी अनेक भाषाएँ सीख ली थीं।
मनस्वी दूरदर्शी होते हैं और विवेकवान भी। वे जो निर्णय करते हैं, उस पर दृढ़तापूर्वक आरूढ़ रहते हैं। आवश्यक साधन जुटाने के लिए वे सूझबूझ का पूरा प्रयोग करते और समय के एक-एक क्षण का सदुपयोग करके अपने संकल्पों को पूरा करते हैं। विश्वविख्यात खगोलशास्त्री एरिग्मे की कहानी कुछ ऐसी ही है।
एरिग्मे एक पुस्तक विक्रेता की दुकान पर फटी-पुरानी पुस्तकों पर जिल्द चढ़ाने का काम करते थे। उसी मेहनत-मजूरी से वे अपना व अपने परिवारजनों का भरण-पोषण करते थे। रात्रि में वे उसी दुकान के बाहर बने बरामदे के धुँधले उजाले में अध्ययन करते। जब तक वे उस दुकान में कार्यरत रहे, उनका अध्ययन नियमित रूप से चलता रहा। समय के सदुपयोग, लगन व मेहनत की त्रिवेणी ने अपना रंग दिखाया और एक दिन वे विश्वप्रसिद्ध खगोलवेत्ता और विविध विषयों के प्रकाण्ड विद्वान बन गए।
प्रकृति ने किसी को गरीब-अमीर या विद्वान-मूढ़ नहीं बनाया। उसने तो सबको मुक्तहस्त अपना अमूल्य वैभव लुटाया है। श्रम करने की सामर्थ्य तथा समय का अनुदान-इन दो अस्त्रों से सुसज्जित करके उसने अपने राजकुमारों को जीवन के समरांगण में मस्तक पर तिलक लगाकर विजयश्री वरण करने के लिए ही भेजा है।
समय-संपदा धन से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसलिए विवेकशील व्यक्ति उसका भी उसी प्रकार बजट बनाते हैं-समय-सारणी बनाते हैं, जैसा कि कोई समझदार व्यक्ति बजट बनाकर पैसे-पैसे का हिसाब रखता और आवश्यकतानुसार खर्च करता है। दिन भर के चौबीस घंटों में किस समय से किस समय तक क्या-क्या काम होंगे, इस प्रकार का टाइम–टेबुल बनाकर उस पर चलने से समय का सदुपयोग तो होता ही है, गुणात्मक रूप से भी काम अधिक और अच्छा होता है। साथ ही जीवन में सरसता बनी रहती है। जो उसका विभाजन नहीं करते, वे दिन भर कोल्हू के बैल की तरह लगे भले ही रहें, कम ही काम कर पाते हैं और परिणामस्वरूप खीज़, मानसिक थकान, अरुचि व निराशा ही हाथ लगती है। समय का विभाजन हो जाने से काम करने तथा विश्राम करने में सामंजस्य बना रहता है।
मनुष्य का जीवनकाल ईश्वर ने निर्धारित करके उसे गिनी हुई साँसें प्रदान की हैं। अपनी इस अमूल्य संपदाओं-समय और श्वास की महत्ता को समझकर विवेकपूर्ण ढंग से खर्च करके हम अपने जीवन की उसी तरह सफल और सार्थक बना सकते हैं जिस प्रकार महामानवों ने इनका सदुपयोग करके अपने का धन्य बनाया। उनके पदचिह्न आज भी हमारा पथ-प्रदर्शन कर रहे हैं, जिन पर चलकर हम अपना ही नहीं, समाज का भी उद्धार कर सकते हैं।
आद्रिक मुनि ने वसंतपुर के एक विद्वान की कन्या से इस शर्त पर विवाह किया कि जब तक पुत्र उत्पन्न न होगा तब तक वे गृहस्थ रहेंगे। बाद में संन्यास ले लेंगे। पुत्र उत्पन्न हुआ। माता ने अपने गुजारे के लिए सूत कातने का अभ्यास किया। एक दिन पुत्र ने माता से चरखे का सूत लेकर पिता की बीस परिक्रमा की और कच्चे सूत से बाँध दिया। साथ ही कहा-मुझे स्वावलंबी मुनि ने सूत के कच्चे धागे को कर्तव्य का प्रतीक माना और संन्यास की अपेक्षा कर्तव्यपालन को श्रेष्ठ मानकर उनने वन जाने का विचार छोड़ दिया।
नारद जी कलियुग का क्रम देखते हुए, एक बार वृंदावन पहुँचे। देखा, एक युवती के पास दो पुरुष मूर्च्छित पड़े हैं। दुखी युवती ने नारद जी को बुलाया पूछने पर बतलाया-मैं शक्ति हूँ। मेरे ये दो पुत्र ज्ञान और वैराग्य असमय में वृद्ध हो गए और मूर्च्छित पड़े हैं। इनकी मूर्च्छा दूर करें, तो मेरा दुख दूर हो। नारद जी ने उनकी मूर्च्छा दूर करने का प्रयास किया। वेदादि के पाठ से सामान्य हलचल शरीरों में हुई, पर मूर्च्छा नहीं टूटी। नारद जी दुखी होकर प्रार्थना करने लगे। आकाशवाणी हुई-हे नारद! आपका प्रयास उत्तम है, किंतु मात्र वेदपाठ से इनकी मूर्च्छा दूर नहीं होगी, संतों से परामर्श करके कुछ सत्कर्म करो, तो ज्ञान-वैराग्य भी प्रतिष्ठापित हों।
नारद जी ने तमाम संतों से पूछा-क्या सत्कर्म करें, जिनसे इनकी मूर्च्छा टूटे। कहीं समाधान न मिला। अंत में बदरी विशाल क्षेत्र में सनकादिक मुनियों से भेंट हुई। उन्होंने सारी बातें सुनी और कहा- आपकी भावना दिव्य है। कलि के प्रभाव से मूर्च्छित ज्ञान-वैराग्य की मूर्च्छा दूर करने के लिए ज्ञानयज्ञ ही एकमात्र ऐसा सत्कर्म है, जिसका प्रभाव निश्चित रूप से होगा। ज्ञानयज्ञ के लिए वेदादि का उपयोग भी ठीक है, पर वह कलि में बोधगम्य नहीं होने से उसका प्रभाव कम होता है, अतः आप कथा माध्यम से ज्ञानयज्ञ करें, वह निश्चित रूप से सफल होगा।
नारद जी सनत्कुमारों के साथ गंगा के किनारे आनंदवन में गए। वहाँ पवित्र वातावरण में उन्होंने यज्ञ का कथा-दृष्टांत के माध्यम से धर्मधारणा के विस्तार हेतु शिक्षण का शुभारंभ किया। उनकी इस सक्रियता से और ऋषियों को भी प्रेरणा मिली एवं उन्होंने भी सद्ज्ञान विस्तार का पुण्य-परमार्थ करने का निश्चय किया।
मानव है, तो कहीं उसकी उत्पत्ति भी हुई होगी। हाँ, यह सवाल जरूर है कि कहाँ पैदा हुआ और इतने विराट परिवार को विकसित करने में कैसे सफल हुआ? प्रथम मानव का धरती के किस स्थान पर आगमन हुआ, इस विषय पर अनेक मत हैं। पूर्वी जगत मनु को मनुष्य का पूर्वज मानता है, तो पाश्चात्य विज्ञान बंदर से मनुष्य के विकास को मान्यता प्रदान करता है। इस वैज्ञानिकों के अनुसार वानर से मानव विकास की यह यात्रा काफी धीमी गति से चलती रही है। नृतत्वविज्ञानियों के अनुसार, वानर से पूर्वमानव तक छह करोड़ वर्षों का दीर्घ समय लगा होगा। इन छह करोड़ वर्षों के समय को वे पाँच युगों में बाँटते हैं। १. पूर्व जीवकाल-१ करोड़ ७० लाख वर्ष। २. आदि जीवकाल-१ करोड़ २० लाख वर्ष। ३. अल्प जीवकाल-१ करोड़ २० लाख वर्ष। ४. मध्य जीवकाल-१ करोड़ ६० लाख वर्ष एवं ५. अति नूतनकाल-१ करोड़ १० लाख वर्ष।
कुछ विद्वानों का मत है कि अति नूतनकाल के अंतिम समय में ही मानव की विकासयात्रा प्रारंभ हुई होगी। मनीषी क्लेरी अलेक्सेवेव ने अपने अध्ययन मानवजाति की उत्पत्ति’ में इसका निर्धारण कुछ इस तरह किया है। १-आदिम प्राग युग-जिसे पूर्व पाषाण काल की आरंभिक अवस्थाएँ भी माना जाता है। इसके चालीस से बीस लाख वर्ष पहले आस्ट्रेलोपिथिसिस का आगमन माना जाता है। २-आरंभिक आदिम-युग पूर्व पुरापाषाण काल की उत्तरवर्ती अवस्था है, इसमें पिथिकैंथ्रोपस ने जन्म लिया। ३− मध्य पुरापाषाण काल-आदिम-युग का विकसित युग कहते हैं, इसमें नियंडरथल मानव का विकास हुआ। ४-आदिम सुदाय या उत्तरपाषाण काल, मध्यपाषाण काल, नवपाषाण काल और आरंभिक काँस्ययुग में आधुनिक मानव का विकास हुआ।
विश्वविख्यात पत्रिका ‘टाइम’ के १४ मार्च १९९४ के अंक में इस पर विस्तृत विवरण प्रकाशित किया गया था। इसके अनुसार १७५६ में निअंडर घाटी की खोज की गई। सर्वप्रथम मनुष्य का अस्तित्व इसी घाटी में प्रमाणित होने के कारण मनुष्य को निअंडरथल कहा गया। इसकी अवधि दो लाख से सत्ताईस हजार वर्ष पूर्व मानी जाती है। यह समय डार्विन की ओरिजन ऑफ स्पिशीज के प्रकाशन से काफी पहले का समय है, जब निअंडरथल मानव के अस्तित्व का पता चला। आयरिश भूगर्भवेत्ता डॉ. विलियम किंग इसे आदि मनुष्य के रूप में चित्रित करते हैं। जर्मन विज्ञानवेत्ता रुडोल्फ पिर्चो इसे ही मानव का मूल मानते हैं। १७७६ ई. में रुडोल्फ पिर्चो की इस मान्यता को स्वीकारा गया। सन १९०० के पूर्व दक्षिण फ्राँस के डार्डोगन क्षेत्र में बड़ी मात्रा में निअंडरथल की खोपड़ियाँ बरामद हुई। इस बरामदी को मानव की उत्पत्ति के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में माना गया।
अमेरिकी और ब्रिटिश नृतत्व-विज्ञानियों ने इसे होमोसेपियंस से संबंधित माना। खुद वैज्ञानिक इसको होमोइरेक्अस के बाद की कड़ी भी मानते हैं। इनके अनुसार यह ३५ से ३० हजार वर्ष पूर्व अचानक गायब हो गया था। इस बारे में वैज्ञानिकों में मतान्तर है। तेल अबीव यूनिवर्सिटी इज़राइल के यौल रैक का कहना है कि यह संभवतः यूरोप में आए हिमयुग के कारण लुप्त हुआ होगा। हारवर्ड विश्वविद्यालय के बारयोरोफ के अनुसार यह लुप्त नहीं हुआ, बल्कि हिमयुग से बचने के लिए उत्तरी क्षेत्र की ओर पलायन कर गया। मिशिगन विश्वविद्यालय के मिलफोर्ड वोलपाक इसे अभी भी जीवित मानते हैं, जो तकरीबन दस हजार वर्ष पूर्व आधुनिक मानव में परिवर्तित हुआ।
मानव की उत्पत्ति के बारे में इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन ओरिजिन ने काफी गहन अन्वेषण-अनुसंधान किए हैं। इस संस्थान के वैज्ञानिक कार्ल स्वीशर और गर्निश कर्टीस ने इंडोनेशिया से प्राप्त होमोइरेक्टस का काफी बारीकी से अध्ययन किया है। इनके अनुसार पहला मानव अफ्रीका में पैदा हुआ और संभवतः वहाँ से चलकर इंडोनेशिया पहुँच गया होगा। इस बात को जॉन हाॅपकिंस यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक एलेन वाकर भी अपने शोध-निष्कर्षों के आधार पर स्वीकार करते हैं। और भी अनेक वैज्ञानिकों का स्पष्ट रूप से कहना है कि आज से चालीस वर्ष पूर्व अफ्रीका के जंगलों में आदिमानव स्वच्छंद एवं निर्द्वंद रूप से विचरण करता रहता था। उस समय अफ्रीका का जलवायु मनुष्य के लिए उपयुक्त माना जाता था।
क्या सचमुच में मनुष्य जाति की उत्पत्ति बंदर के वंशों से हुई? इस बात को प्रयोगों से प्रमाणित करने के लिए आई. एच. ओ. प्रेसीडेंट डोनाल्ड जाॅन्सन ने इथ्योपिया के सघन जंगलों का दौरा किया। वहाँ से प्राप्त अवशेषों के आधार पर डोनाल्ड ने एक रोचक जानकारी दी। यह जानकारी उनकी एवं उनकी टीम द्वारा पच्चीस साल तक अध्ययन करने का परिणाम है। इनके अनुसार इस क्षेत्र में साढ़े तीन फुट की महिला ही आदिमानव की माँ थी, जिसका नाम वैज्ञानिकों ने लूसी दिया। भूगर्भशास्त्री इसी लूसी को आदिमानव की माँ मानते हैं। आई. एच. ओ. के बील किंबेल तथा टीम व्हाइट इस लूसी के अवशेषों की उम्र साढ़े उन्नीस लाख वर्ष आँकते हैं। सन १९७० में तंज़ानिया की मेरी लिली ने लूसी को ३९ लाख वर्ष पहले का माना है। इनकी टीम ने ज्वालामुखी चट्टानों पर लूसी एवं इसके परिवार के अन्य सदस्यों के पाँवों के निशानों को भी खोजने में सफलता पाई है।
आदिमानव की माता लूसी को विज्ञानवेत्ताओं ने आस्ट्रेलोपिथिकस अफेरंसिस जाति में रखा है। उनके अनुसार यह चिंपांजी एवं गोरिल्ला के समान दो पैरों से चला करती थी। डोनाल्ड जान्सन ने इस लूसी को बंदर के सदृश चित्रित किया है। इसके आगे का जबड़ा और खोपड़ी चिंपांजी के समान ही पाई जाती थी। अनुमान है-लूसी पाँच फुट के बंदर के समान ज्यादा चालाक नहीं होती थी। वह पैरों एवं हाथों का स्वतंत्र रूप से संचालन कर लेती थी। इसी वजह से उसे अपनी भोजन व्यवस्था जुटाने में कोई विशेष कठिनाई नहीं होती थी। इसके अवशेष को इथियोपिया की ग्रेट रिफ्ट घाटी में पाया गया।
इस घाटी की विशेषता है कि यहाँ पर अफ्रीका, सोमाली तथा अरब की टेक्टोनिक प्लेटें आपस में मिलती है। अन्वेषकों का कहना है कि मनुष्य की खोपड़ी १३०० घन से. मी. के आस-पास की होती है, जबकि लूसी की खोपड़ी ५०० घन से. मी. थी। होमो हेवीलीस की खोपड़ी ६३० घन से. मी. की है। सामान्यतः पुरुष पाँच फुट ऊँचा एवं १०० पाउण्ड वजन का होता है। महिलाओं का औसत वजन ६० पाउण्ड माना जाता है। लूसी का वजन भी ठीक इसी के समान पाया गया। अनुमान है कि लूसी ने एक लाख अस्सी हजार वर्षों में ९ हजार पीढ़ियों का सफर तय किया। लूसी के इन अवशेषों को क्वींलैंड म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री में रखा गया है। इसका काल्पनिक चित्र सर्वप्रथम ओवेन लवजाय तथा ब्रुस लंटीमर ने बनाया।
यह सभी जानते हैं कि विकास जगत की मूलभूत प्रकृति है। प्रकृति में इसी नियम के अनुसार ए. अफेंरसिस भी विकसित हुआ होगा। डार्विन का कहना है कि वही जाति अपने गुणों को अगली पीढ़ी तक पहुँचा सकती है, जो मजबूत एवं सशक्त हो। प्रकृतिवरण का नियम ए. अफेरंसिस पर भी लागू हुआ होगा। जो भी हो, विभिन्न प्रमाणों से वह सिद्ध होता है कि यह जाति ३० से २० लाख वर्ष तक निर्द्वंद भाव से विचरण करती रही। इस दौरान इनकी शारीरिक बनावट में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। परिवर्तन हुआ तो सिर्फ अस्थियों का यह परिवर्तन तीन नई जातियों में बँट गया। इसे आस्ट्रेलोपिथिकस अफ्रेकेनस, पैरान्थोपस रोबुस्टा एवं पैरान्थोपस बोसेई के रूप में जाना गया। वैज्ञानिकों की मान्यता है कि पी. रोबुस्टा एवं पी. बोसेई काल के गर्त में समा गए। केवल ए. अफ्रेकेनस ही जीवित रह पाया। यही बाद में बुद्धिमान मानवजाति का पूर्वज सिद्ध हुआ।
इसके २५ लाख वर्ष पूर्व होमो हैबिलीस जाति थी। इसे हैंडीमैन के नाम से जाना जाता है। इसकी खोपड़ी अपेक्षाकृत बड़ी थी। इसी जाति ने पहले-पहल अपनी आत्मरक्षा के लिए औजारों का आविष्कार एवं उनका उपयोग प्रारंभ किया। हाँ, यहाँ यह सवाल जरूर है कि आदिम जाति के ये लोग हथियारों का उपयोग किस काम के लिए करते थे। इस बारे में भी वैज्ञानिकों के अलग-अलग मत हैं। कुछ वैज्ञानिकों कहना है कि ये वनस्पति खाद्य के संग्रहण में खाने योग्य जड़ों को खोद निकालने में, खाने योग्य जड़ों को खोद निकालने में, छोटे जंतुओं के बिलों की खुदाई करने में इस्तेमाल किए जाते थे।
बुद्धिमान होमोहैबिलीस हथियारों को खूबसूरती से तराशता था। इसके कुछ हथियार तो १.५२ मीटर तक ऊँचे तथा ४५ किलो तक वजनी मिले हैं। हालाँकि यह पूरी तरह से शाकाहारी था। इन हथियारों का उपयोग वह जंगली जानवरों से अपनी आत्मरक्षा में करता था, साथ ही ये हथियार जड़ों एवं कंदों को खोदने में काम आते थे। इसके बाद होमोइरेक्टस की ऊँचाई ५ फुट ६ इंच थी। गर्दन के निचले भाग को देखने से यह आज के मनुष्य से काफी कुछ मिलता है। यद्यपि इसकी खोपड़ी गोरिल्ला तथा चिंपांजी के समान चौड़ी थी तथा निचले जबड़े में ठोड़ी नहीं दिखाई देती। नृतत्त्वविज्ञान में मानव एवं बंदर के बीच की कड़ी नहीं मिलती। इस अज्ञात कड़ी को वैज्ञानिकों ने अपने-अपने ढंग से प्रमाणित करते की कोशिश की है।
नृतत्त्वविज्ञानी होमोइरेक्टस की उत्पत्ति अफ्रीका को मानते हैं। चूँकि विज्ञानविदों ने इसे यायावरी जाति के रूप में पाया और माना है, इसलिए संभव है यह अफ्रीका से विश्व के अन्य भागों में पहुँचा होगा। यह अवधि १७ लाख वर्ष पूर्व की होगी। पिछले १४ लाख वर्ष से ४००० वर्ष तक होमोइरेक्टस का अस्तित्व देखा गया है। बाद में यह अफ्रीका के मध्य पूर्व एवं यूरोप होते हुए पैसिफिक क्षेत्र में फैल गया। वैज्ञानिकों के अनुसार होमोइरेक्टस के हथियार और भी विकसित रहे थे। उसने अपने ये हथियार विशेष तरह के पत्थरों से बनाए थे। ऐसा पत्थर जो टूटे नहीं और नुकीला भी हों। वैज्ञानिकों ने इनकी इस तकनीक को ‘एश्यूलियन’ नाम दिया।
एश्यूलियन युग में ये आदिम जाति के लोग पशुओं का हाँककर किसी निश्चित स्थान पर ले जाते थे। यही नहीं हिंसक जानवरों को वे अपने इन नुकीले हथियारों से मार भगा देते थे। इनके द्वारा मारे गए पशुओं में सबसे अधिक संख्या घोड़ों एवं अन्य खुरदार पशुओं की है। भूगभ्रशास्त्रियों एवं नृतत्व विज्ञानियों ने किन्हीं निश्चित स्थानों पर पाए गए विशाल ढेरों को देखकर उपर्युक्त निष्कर्ष निकाला है। इस समय छोटे जानवरों का शिकार करना एवं कंद-मूलों का संग्रह करना आम प्रचलन था। वैज्ञानिक अनुमान के अनुसार लगता है कि ये लोग सर्वभक्षी थे। इस समय प्राणि प्रोटीन इनके आहार का मुख्य घटक रहा होगा। होमोइरेक्टस के औजार के संबंध में आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी कैनबरा के प्राध्यापक एलेन थौर्ने ने बताया है कि ये आदिमानव पत्थरों के अलावा बाँस-लकड़ी आदि के हथियारों का भी निर्माण एवं संचालन करते थे। इसका प्रमाण पूर्वी अफ्रीका की रीफ्ट घाटी में अवशेष के रूप में मिलता है।
होमोइरेक्टस के काल में नृतत्वशास्त्रियों ने मानव विकास की जानकारी के लिए और अनेक जीवाश्मों को खोज निकाला है। इस विषय में ‘साइंस’ पत्रिका में विस्तृत विवरण प्रकाशित हुआ था। इसके अनुसार सन १९३६ में मोजाकार्टो चाइल्ड की दस लाख वर्ष प्राचीन खोपड़ी बरामद हुई। इसकी उम्र का पता रेडियोएक्टिव तकनीक द्वारा खोजी गई इस प्रक्रिया से चला कि इसकी वास्तविक उम्र २० लाख वर्ष है। विज्ञानवेत्ता स्वीशर ने इसे ‘मिसिंगलिंक’ के रूप में माना। स्वीशर ने मानव विकास की यात्रा को इसी जीवाश्म से मानते हुए कहा कि यह लाखों वर्ष प्राचीन होगा। स्वीशर ने आगे स्पष्ट किया कि इसने मूल स्थान से अन्य भागों की ओर प्रवास किया होगा। वैज्ञानिकों के अनुसार प्रवास का यह इतिहास काफी पुराना है। हाथी भी अफ्रीका को छोड़कर गया है। इसी तरह आदिमानव भी अफ्रीका के प्रतिकूल वातावरण एवं जलवायु से बचने के लिए अन्य जगहों की ओर गया होगा।
येल विश्वविद्यालय के पैलियेन्टोलाँजिस्ट एलिजाबेथ बर्था का मानना है कि आदिमानव में प्रतिरोधक क्षमता आश्चर्यजनक रूप से विकसित हुई थी। वह इसी क्षमता के बल पर प्रकृति के उतार-चढ़ावों को हँसते हुए झेलता रहा। इन विपरीत स्थितियों में उसका अवसान न होना ही इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। एलिजाबेथ के अनुसार
२५ से २७ लाख वर्ष पूर्व अफ्रीका में अल्पकालीन हिमयुग था। उस समय वहाँ का अधिकतम तापमान ११ डिग्री सेल्सियस था। संभवतः इसी वजह से आदिमानव ने सवाना जैसे सूखे प्रदेश की ओर प्रवास किया। ये बड़े-बड़े सघन वनों में वृक्षों की ओर रहते थे। इसी कारण इन जीवों को वृक्षोपजीवी कहा गया। ये हाथों का प्रयोग अधिकतम करते थे। वर्षा एवं अन्य कई कारणों से वातावरण में काफी परिवर्तन आया। जंगल एवं घास के बड़े-बड़े मैदान सिमटने लगे। मैदानी इलाकों में चिंपांजी आदि को चलना पड़ा, इसलिए पैरों का प्रयोग हुआ। विकास के इस चरण में पैरों के विकसित होने के पश्चात ही आदिमानव ने संसार के अन्य क्षेत्रों की ओर प्रस्थान किया होगा।
जॉन हाॅपकिंस विश्वविद्यालय के प्राध्यापक वाकर के अनुसार होमो सेपियंस होमोइरेक्टस में विकसित हुआ। नृतत्वशास्त्री होमोसेपियंस की उत्पत्ति भी अफ्रीका में मानते हैं। आधुनिक मानव एवं होमोसेपियंस के बीच घनिष्ठ संबंध होने की मान्यता है। आस्ट्रेलिया के थार्ने की मान्यता है कि होमोसेपियंस कई समूहों में विभाजित हो गया। इन समूहों की पीढ़ियों के बीच आनुवंशिक गुणों का स्थानान्तरण हुआ। इस तरह विज्ञान की मान्यताओं के अनुसार मानव जीन का जोहंसवर्ग से बीजिंग तक एवं पेरिस से चेन्नई तक प्रसार हुआ। ‘टाइम’ के १४ मार्च १९९४ के अंक के अनुसार चीन में पाया गया दो लाख वर्ष प्राचीन जीवाश्म एशिया में मानव उत्पत्ति का संकेत करता है। गोरखपुर विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर श्री एच. गोपाल के शोधपत्र ‘प्रागैतिहासिक मानव और संस्कृति’ में भी कुछ ऐसा ही उल्लेख हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार मानव की चार मुख्य जातियाँ हैं-श्वेत काकेशस, पीले मंगोलियन, काले नीग्रो एवं रेड इंडियन। इन चारों के अलावा भारतीयों को पाँचवीं जाति माना जाता है। इस जाति में चारों रंगों एवं आकार का मिलन-मिश्रण है। जेनेटिक संरचना से स्पष्ट होता है कि भारतीय जाति उपयुक्त चारों जातियों की संकरता से नहीं उत्पन्न हुई है। भारतीयों में सभी प्रकार के जीन पाए जाते हैं। संसार की किसी दूसरी मनुष्य जाति में अब सब जातियों के आकार के जीन नहीं रहे। वर्णसंकर हुए बिना श्वेत जाति से नीग्रो या मंगोलियन आकृति का शिशु उत्पन्न हो जाता है। अनुसंधानकर्ता इसका यही अर्थ निकालते हैं कि मनुष्य जाति की उत्पत्ति निश्चित रूप से भारत में ही हुई होगी।
डॉक्टर ऐन्सन एवं अन्य कई विद्वानों ने भौगोलिक स्थिति का अध्ययन करके पता लगाया है कि पूर्वकाल में अफ्रीका, अमेरिका तथा यूरोप की ऐसी स्थिति नहीं थी कि वहाँ मानव की उत्पत्ति को परोक्ष रूप से हिमालय की ओर इंगित किया है। टेलर साहब की मान्यता है कि वह स्थान स्वर्ग तुल्य कश्मीर ही है। ईरान की पारसी जाति भी अपना मूल निवास हिमालय को ही मानती है। पारसियों, हिंसुओं, यहूदियों, क्रिश्चियनों के धर्मग्रंथों के अनुसार यदि सृष्टि ऐसे स्थान पर हुई जहाँ दस महीने सर्दी तथा दो महीने गर्मी पड़ती है, तो निश्चित रूप से वह स्थान मानसरोवर से कश्मीर तक होना चाहिए। इब्ने अली हातिम ने भी स्वीकारा है कि हिंद की घाटी में ही आदम बहिश्त से उतरा था। इतिहासवेत्ता ए. एल. बाशम ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘द वंडर दैट वाज इंडिया’ में स्पष्ट रूप से लिखा है-ईसा से तकरीबन एक लाख से भी अधिक वर्ष पहले मानव ने पहली बार अपने जीवन के प्रथम चिन्ह भारत में छोड़े। महाभारत के इस श्लोक में भी मानवजाति की उत्पत्ति भारत में ही बतायी गयी है−
अथगच्छेतराजेन्द्रदेविकाँलोकविश्रुताम्। प्रसूतिर्यश्रविप्राणाँश्रूयतेभरतर्षभ॥
अर्थात् सप्तऋषि तीर्थ के पास वितस्ता नदी की शाखा देविका नदी के तट पर मानवजाति की उत्पत्ति हुई। इस तरह सारे प्रमाण सिद्ध करते हैं कि आदिमानव का जन्म देवभूमि भारत के उत्तराखण्ड क्षेत्र में ही हुआ। यहीं से सब ओर सभ्यता की किरणें फैली। इतनी स्पष्ट होने पर समझा जा सकता है कि भारत में जन्म लेना क्यों इतना महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इस सुरदुर्लभ तन का यदि जननी जन्मभूमि क निमित्त नियोजन हो सके, तो उससे श्रेष्ठ और क्या सदुपयोग इसका हो सकता है।
अपरिग्रह आदि महाव्रत कहलाते हैं। ऐसे उच्चस्तरीय नियमों का प्रतिज्ञापूर्वक परिपालन भी इसमें आता है। उपवास, अस्वाद, मौन आदि व्रत भी अनेक दिशाओं में बिखरी हुई शक्ति को एकत्र करके अभीष्ट दिशा में लगाने के लिए किए जाते हैं। व्रत एक संकल्प है, जिसे लेकर मनुष्य अपने ऊपर एक स्वेच्छा उत्तरदायित्व लेता है। यह उत्तरदायित्व प्रतिज्ञा के आधार पर पालन होता रहता है। महर्षि रमण का मौनव्रत विख्यात है। शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस, दयानंद, विवेकानंद, आदि ऋषि आहार संबंधी सीमाबंधन का सरलतापूर्वक निर्वाह कर सके। श्रम संबंधी नियम भी निभ सकते हैं। इतना अध्ययन, व्यायाम, भजन आदि करना है, ऐसी प्रतिज्ञाएँ उपयुक्त भी हैं और निभती भी हैं।
यही बात सत्य के संबंध में भी है। सुरक्षा या सैन्य विभाग के रहस्यों का प्रकट करना वाचक सत्य हो सकता है, पर उद्देश्यपूर्ण सत्य नहीं। चोरों और ठगों को अपनी वास्तविक स्थिति बता देना प्रकारांतर से अनीति का ही परिपोषण करना है। अतः हम व्रतशील तो बनें, संकल्प लें, प्रतिज्ञाएँ भी करें, परंतु वे सभी विवेकपूर्ण और दूरदर्शिता युक्त हों। आवेश में की हुई हठवादिता को जितना जल्दी उलटा जा सके उतना ही अच्छा है।
संत-महापुरुषों का जीवन-चरित्र जिनने गंभीरतापूर्वक पढ़ा है, वे जानते हैं कि संत ज्ञानेश्वर के पिताजी ने गृहस्थ के उत्तरदायित्व को अधूरा छोड़कर संन्यास ले लिया था। उनके गुरु देव स्वामी रामानंद को जब वस्तुस्थिति विदित हुई तो उनने उन्हें पुनः गृहस्थ धर्म में प्रवेश करने का आदेश दिया और संन्यास छुड़ा दिया। इसमें वचनभंग का दोष तो आता है, पर उससे बड़ा व्रत निभाता है-भूल सुधार का।
प्रख्यात है कि अंगुलिमाल डाकू नित्य अपने चंगुल में फँसे निर्दोषों की अंगुलियां काटकर उनकी माला देवी पर चढ़ाया करता था। इसी आधार पर उसने अपना नाम अंगुलिमाल रखा हुआ था। भगवान बुद्ध के संपर्क में आने पर उस प्रतिज्ञा से मुँह मोड़ा वह अहिंसा का प्रचारक बन गया। इसी तरह अंबपाली को नगरवधू रहने की शपथ दिलाई गई थी, उसने बुद्ध की शरण में आते ही उस अनीति बंधन को टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिया और सती-साध्वी की तरह धर्मप्रचार में संन्यासिनी बनकर जुट गई।
कई हठवादी एक बार मुख से निकले शब्दों को पूरा करने में ही संकल्प की पूर्ति समझते हैं और अपने दर्प को पूरा हुआ समझते हैं। गुरु द्रोणाचार्य राजा द्रुपद के दरबार में कुछ याचना करने गए और गुरु कुल में साथ पढ़ने की मित्रता का स्मरण दिलाया। इस पर द्रुपद ने उनका उपहास उड़ाया। द्रुपद से उस अपमान का बदला लेने के लिए उनने अपने शिष्य पाँडवों से उन्हें परास्त करने और मुश्कें बाँधकर सामने प्रस्तुत करने का आदेश दिया। वही हुआ। इसके बाद प्रतिशोध की क्रिया-प्रतिक्रिया चल पड़ी और उसका अंत महाभारत के सर्वनाशी रूप में सामने आया। चम्बल के डाकुओं की खदान उमड़ पड़ने का कारण भी प्रतिशोध की परंपरा चल पड़ना ही निमित्त कारण है। इसीलिए कहा गया है कि किसी आवेश में की हुई प्रतिज्ञा का पूर्ण करना आवश्यक नहीं। मन बदलने पर परिस्थितियों में अंतर आ जाने पर बात को बदल देने में समझदारी ही मानी जाती है।
कहा जाता है कि सम्राट अशोक ने जीवन के अंत में बुद्ध संघ को सहस्र स्वर्णमुद्राएँ दान देने का संकल्प लिया था। परंतु राज्य उनके उत्तराधिकारी के हाथ में चले जाने पर दैनिक उपयोग की वस्तुएँ दीं और अंत में एक सूखा आँवला जो उनके पास शेष रहा था, वह उनने संघ को देकर अपने संकल्प की पूर्णाहुति मान ली।
वचन के एक बार मुँह से निकल जाने पर वैसा ही करते रहना प्रतिज्ञापूर्ति मानी जाती है, पर उसका मूल्य तभी है जब अपनी सामर्थ्य को तोलते हुए, परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उच्च उद्देश्यों के निमित्त की जाए। इस कसौटी पर आत्मशोधन के लिए किए गए, व्रत, उपवास, संयम, निर्वाह आदि के संकल्प ही उस
मर्यादा के अंतर्गत आते हैं, जिन्हें कष्ट सहते हुए भी निबाहना चाहिए।
कई व्यक्ति एक पैर पर खड़े रहने, एक हाथ ऊँचा रखने, जमीन पर न सोने-बैठने आदि की प्रतिज्ञाएँ कर लेते हैं और उन्हें बहुमूल्य जीवन शक्तियों का समापन करते हुए निबाहते हैं। कुछ लोग कष्टसाध्य मौन धारण करते हैं एवं कभी स्लेट-पेन्सिल पर अपनी इच्छाएँ व्यक्त कर वार्त्तालाप का क्रम चलाते हैं। ऐसे व्रतधारण को अनावश्यक ही नहीं, अहितकर परंपरा उत्पन्न करने वाला और दूसरों के सम्मुख अपना बड़प्पन सिद्ध करके यश लूटने का षड्यन्त्र भी माना जा सकता है। सादगी अपने अप में एक व्रत है, जिसके साथ उच्च विचारों का अविच्छिन्न संबंध जुड़ा हुआ है।
भगवान बुद्ध आरंभ में अत्यंत कठोर तप करने लगे थे और अस्थिपञ्जर मात्र रह गए थे। तब उन्हें दैवयोग से उस हठ को छोड़ने और मध्यम मार्ग अपनाने की प्रेरणा मिली। उनने कठोर तप से विरत हो आत्म-बोध के लक्ष्य को योग द्वारा ही प्राप्त किया।
व्रतशीलता और प्रतिज्ञा पालन अच्छी बात है। उससे मनोबल बढ़ता है, पर साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी के बहकावे में आकर कोई कुकृत्य कर बैठने की प्रतिज्ञा तो नहीं कर ली गई है। यदि ऐसा हो तो उसे तत्काल सुधारा जाता चाहिए। आत्मसुधार में हठवादिता का परित्याग भी आता है, जो अपने आप में एक श्रेष्ठ व्रत है।
अस्तित्व को चुनौती देते हुए गुजर जाने वाले संकट अपने पीछे एक अवसर छोड़ जाते हैं। वह अवसर आत्मनिरीक्षण, आत्मचिंतन और आत्मबोध के क्षण होते हैं, उन क्षणों को जीआ जा सके तो चित्त में ध्यान और समाधि के फूल खिल उठते हैं। ‘विज्ञान भैरव’ तंत्र में इस तरह के कई अवसरों का उल्लेख है, जिसमें व्यक्ति अपनी आत्मचेतना के केंद्र में स्थिर होता है। संकट का सदुपयोग किया जाए तो बोध का एक सामान्य-सा भाव भी साधक की दिशाधारा मोड़ देता है।
पिछले डेढ़-दो वर्षों में हमारी पृथ्वी कई संकटों से गुजरी और सुरक्षित निकल आई। भूकंप, ज्वालामुखी, दावानल, बाढ़, सुखा, युद्ध जैसी विपदाएँ तो आती ही रहती हैं। उनसे जूझने के सरंजाम भी जुटाए जाते हैं, जो संकट पृथ्वी के अस्तित्व को चुनौती देते हुए निकल गए, वे आकाशीय थे। कम-से-कम दस घटनाएँ ऐसी घटी हैं, जिन्हें चेतावनी के तौर पर लिया जाना चाहिए। इनमें से कोई भी घटना अपना प्रभाव उत्पन्न कराती तो भारी संकट आ सकता था।
अगस्त १९९७ में पृथ्वी से बहुत दूर स्थित एक तारे से अज्ञात विकिरण निकला और पृथ्वी के वायुमंडल को वेधता चला गया। सूर्य हमारे लिए परिचित सबसे समीप तारा है। उससे निकलने वाला ऊर्जाप्रवाह पृथ्वी पर जीवन और निवास को संभव बनाता है। यह पृथ्वी से १४.९ करोड़ किलोमीटर दूर है। अंतरिक्ष में दूरी मापने के लिए जिस कालमान का उपयोग करते हैं वह ‘ प्रकाशवर्ष’ है। प्रकाशवर्ष के मानदंड से सूर्य पृथ्वी से साढ़े सात मिनट दूर है। इस स्पष्टीकरण से अज्ञात तारे की दूरी और सामर्थ्य का अनुमान लगाया जा सकता है। वह तारा पृथ्वी से करीब २० हजार प्रकाशवर्ष दूर है। उससे निकला विकिरण पृथ्वी के वायुमंडल से टकराया। विकिरण अपने में इतनी क्षमता समेटे हुआ था कि यदि उसे किसी तरह सँभालना संभव होता तो पृथ्वी की कई अरब साल की ऊर्जा आवश्यकताएँ पूरी हो सकती थीं।
एस. जी. आर. १९००/१४ नामक इस तारे से निकला ऊर्जाप्रवाह दिन के समय पृथ्वी को सूर्य से मिलने वाले प्रवाह के बराबर था। बीस हजार प्रकाशवर्ष की दूरी एक प्रकाशवर्ष भी कम हुई होती तो पृथ्वी पर जमी हुई बर्फ पिघलने लग सकती थी। समुद्र का जलस्तर बढ़ जाता और उस कारण पृथ्वी का कितना ही भूभाग उस बाढ़ में डूब जाता। समुद्र के तट पर बसे नगर तो कम-से-कम बर्बाद हो ही जाते। एक बड़े हिस्से में जलप्रलय की स्थिति आ जाती।
कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के कैविन हरले क अनुसार एस. जी. आर. तारे से निकली गामा और एक्स किरणें २७ अगस्त ९८ की रात को पृथ्वी के वायुमंडल से टकरायी। सात उपग्रहों ने इस टकराव को रिकार्ड किया। प्रवाह इतना प्रचंड था कि दो उपग्रहों को बंद कर दो पड़ा। यदि वे चालू रहते तो विकिरण उनके इलेक्ट्रानिक्स को नष्ट भ्रष्ट कर देता। आश्चर्य यह है कि उस प्रचंड प्रवाह को पृथ्वी के आयनमंडल का बचाव करने वाली परत पर ही रोक लिया गया। वहाँ हुई टक्कर ने वायुमंडल को नुकसान तो पहुँचाया, लेकिन पृथ्वी की सतह पर होने वाली क्षति टल गई।
१९९९ के अगस्त महीने में चालीस किलोमीटर लंबे एक क्षुद्रग्रह के पृथ्वी के आस-पास मँडराने लगने को भी एक दुर्घटना के रूप में देखा गया था। बर्फ और बिखरी चट्टानों के ढेर से बना यह ग्रह पृथ्वी के क्षेत्र में आ जाता तो किसी भी हिस्से में विनाश ला सकता था। वह आशंका टली और खगोलविदों को शोध-अनुसंधान की एक नई सीढ़ी हाथ लगी।
गए साल जून का महीना शुरू होते ही दो बड़े धूमकेतु सूर्य के पास पहुँचे। ये धूमकेतु ‘केयुरज सन ग्रेज’ जाति के थे जो आमतौर पर सूर्य के प्रभामंडल से ५० हजार किलोमीटर दूर घूमते रहते हैं। वैज्ञानिकों ने इन दो धूमकेतुओं को सूर्य के पास पहुँचते देखा। मान लिया गया कि सूर्य की सीमा में पहुँचने के बाद वे जलकर नष्ट हो गए। प्रकाश की एक तेज चमक कौंधी और थोड़ी ही देर में उनका दिखाई देना बंद हो गया। उनके विलीन होने के बाद सूर्य के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में तीव्र विस्फोट हुआ, यों सूर्य क्षेत्र में विस्फोट होते ही रहते हैं। उसकी समस्त ऊर्जा विस्फोटों से ही जागती और प्रक्षेपित होती हैं। लेकिन यह विस्फोट विलक्षण किस्म का था, जो सूर्य के उस भाग में घटी चुंबकीय प्रक्रिया के कारण हुआ था। जलती हुई आग के गोला-बारूद फेंक देने की तरह हुए इस विस्फोट का प्रभाव पृथ्वी और अन्य ग्रहों पर भी पड़ सकता था। उससे पृथ्वी का तापमान बढ़ सकता था। नए ऊर्जा प्रवाह रोग-बीमारियाँ ला सकते थे, फसलों को नुकसान पहुँचा सकते थे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
साल भर भी नहीं बीता होगा उस घटना को, जब भारत समेत तमाम एशियाई देशों में रात के तीसरे पहर लोग अपने घर की छतों पर खड़े होकर आसमान की ओर निहार रहे थे। वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणी की थी कि आसमान में आतिशबाजी होने वाली है। उस दिन पृथ्वी पर बड़ी संख्या में उल्काएँ बरसने वाली थीं। भारत में लोगों ने आधी रात के बाद आकाश को निहारते हुए रात बिताई। चीन से स्विट्जरलैंड और नार्वे तक कोई नहीं सो पाया। कहा गया था कि उल्काएँ पृथ्वी पर गिरकर जन-धन को क्षति भी पहुँचा सकती हैं। वैसा होना तो दूर रहा अनारदानों जैसी चिंगारियाँ भी कहीं नहीं दिखाई दीं। वैज्ञानिकों ने कहा था कि उल्कापात देखने के लिए चीन की दीवार के पास वाला क्षेत्र आदर्श स्थान है, लेकिन लोग वहाँ ठंड में ठिठुरते खड़े रहे और कुछ नहीं हुआ।
क्या हुआ? क्या अध्ययन-अनुसंधान के आधार पर किया गया अनुमान गलत निकला? नहीं! जापान में लोगों ने उल्कापात का आनंद लिया। उस दिन समुद्रतट हजारों परिवारों से अड़े पड़े थे। दूर सागर की लहरों पर आग के फूल बरसते देखे गए थे। थाइलैंड में भी उल्कापात हुआ। बाकी सभी जगह शाँति थी। निष्कर्ष गलत क्यों सिद्ध हुए? खगोलविदों के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है। अध्यात्मविद् ही कह सकते हैं-नाश की पूरी आशंका होते हुए भी रचयिता उसे टाल देता है। वह हस्तक्षेप किसी शुभ प्रयोजन के लिए ही होता है।
एक और आकाशीय घटना कुछ महीनों पहले घटी। अमेरिकी खगोलविदों ने पाया कि आकाशगंगा में कुछ आवारा तारे प्रवेश कर गए हैं और संदिग्ध अवस्था में चक्कर काट रहे हैं। किसी भी आकाशगंगा के सदस्य तारे परिवार के अनुशासन में बँधे रहते हैं और अपनी कक्षा में घूमते रहते हैं। खगोलज्ञों ने जिन तारों को विजातीय माना, वे अपनी ही नहीं मंदाकिनी की कक्षा से भी दस बार विचलित हुए। खगोलविदों को इन तारों का व्यवहार विचित्र लगा और वे मान रहे हैं कि ये किसी और मंदाकिनी से आए हैं।
इन आकाशीय घटनाओं के संदर्भ में विचार किया जाना चाहिए कि इनके पीछे नियंता का कोई निश्चित उद्देश्य है या ग्रह-उपग्रह या तारे ऊधम मचा रहे हैं। विश्वब्रह्माण्ड जिस व्यवस्था में चल रहा है, उसमें अपवाद की गुँजाइश नहीं के बराबर है। अपवाद यदि होते भी हैं तो वे एकाध ही होते हैं और पचास साल में दिखाई देते हैं-डेढ़-दो साल में जितनी घटनाएँ घटीं उनमें से प्रत्येक सौ-डेढ़ सौ साल के अंतराल से होती होंगी। कैनिन हरले के अनुसार पैंतीस-चालीस में एकाध आकाशीय अपवाद होते थे, किंतु अब मात्र दो साल में दस घटनाएँ निश्चय ही आश्चर्यजनक हैं।
जीव-जंतुओं की तरह ग्रह-नक्षत्र और तारे भी अपनी मौत मरते रहते हैं। उनके शव असीम आकाश में किसी कोने में फेंक दिए जाते हैं। उन्हें कोई पूछने नहीं जाता। जीते-जागते ग्रह-उपग्रह इस तरह की हरकत नहीं करते। उनकी मौत या विचलन को अकाल मृत्यु की कहा जाना चाहिए। इन घटनाओं को गंभीरता से नहीं लिया गया, लेकिन लिया जाना चाहिए। जीवन की क्षणभंगुरता से लेकर उसे लिप्सा-लोलुपता में ही नहीं खपा देने, मर्यादाओं में रहने, नीति-नियमों का पालन करने जैसी प्रेरणा उभरनी चाहिए। दुर्घटनाओं को ऐसे संकट के रूप में लेना चाहिए, जो मूर्त नहीं हुआ। सिर्फ छूकर निकल गया। उसके स्पर्श से आई कँपकँपी अंतर्जगत के प्रवेश का द्वार बने तो आने वाला समय उज्ज्वल-धवल मानना चाहिए।
सन १८९४ में टोरेन्टो कनाडा के नाई परिवार में एक लड़का जन्मा। नाम रखा गया थामसन। वह जैसे-तैसे कुछ पढ़ा और चौदह वर्ष का होते-होते सात रुपये मासिक की मजूरी करने लगा। घर की तंगी को देखते हुए और कोई चारा भी नहीं था। लड़के ने गरीबी से हार नहीं मानी। योग्यता बढ़ाने, ऊँचा हौसला रखने और नया रास्ता खोजने में उसने अपनी सारी प्रतिभा लगा दी। एकाग्रता, तत्परता और जिम्मेदारी यह तीन उसके ऐसे आधार थे, जिन्हें उसने आदि से अंत तक कभी भी छोड़ा नहीं। अपनी विशेषताओं के कारण वह हारा नहीं अपने लिए जगह बनाता और प्रोत्साहन पाता गया। उसे फेरीवाला, क्लर्क, मुनीम, माली जैसे कितने ही छोटे-बड़े काम करने पड़े। उसकी तत्परता और सज्जनता एक के बाद दूसरे अनदेखे काम बनाती और सफल बनाती चली गई। मितव्ययिता और नियमितता के दो सद्गुणों के सहारे उसने लंबी जीवनयात्रा संपन्न की। जीवन के अंतिम चरण में पहुँचते-पहुँचते वह लार्ड थामसन के नाम से जाना जाता था। वह १२८ समाचारपत्रों का स्वामी था, १५ रेडियो और टेलीविजन स्टेशन चलाता था और वायुयान चलाने वाली कंपनी का मालिक था। अरबपतियों में उनकी गणना होती थी। अपनी आत्मकथा में उनने लिखा है कि मेरी प्रगति में न भाग्य का खेल हैं और न किसी के अनुग्रह का, उपलब्ध सफलताओं का सारा रहस्य एक ही बात में भरा हुआ है कि मैंने प्रतिभा-तत्परता निखारने में भरपूर प्रयास किया और किसी भी स्थिति में संतुलन नहीं खोया।
धरती को समूचे सौरमण्डल में विश्व-ब्रह्माण्ड में अनुपम स्थान प्राप्त है। यह उसके इर्द-गिर्द काम करने वाली शक्तियों एवं परिस्थितियों की ही परिणति है। यह विशेष उपलब्धियाँ यदि उसे प्राप्त न होती तो अंतरिक्ष में फैले हुए अनेकानेक निर्जीव, निस्तब्ध ग्रह-गोलकों में ही एक गणना उसकी भी होती और स्वर्ग से भी बढ़कर यह धरतीमाता, जिस पर अवतरण के लिए देवताओं से लेकर भगवान तक प्रयासरत रहते हैं, अपनी गरिमा कभी की खो बैठती। यद्यपि मनुष्य ने अनेकों तरह के दुष्कृत्य अपनाकर अपनी कृतघ्नता एवं धृष्टता का परिचय दिया है, फिर भी उस ममतामयी धरतीमाता को देखिए कि वह उसके हितसाधन के लिए अपनी विशिष्ट क्षमताओं का नियोजन सदा-सर्वदा से करती चली आ रही है। अपनी छाती फाड़कर सब कुछ लुटा देने वाली धरती के प्रति क्या हमारा कुछ भी कर्तव्य नहीं बनता कि हम उसके दर्द को समझें और समय रहते अपनी ही विनाशलीला को आमंत्रित करने से बचें।
जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं, उसके बारे में अभी सामान्य स्तर की जानकारी ही प्राप्त कर पाए हैं। यों तो पृथ्वी का व्यास और परिधि का मापन हो चुका है, पर वह स्थिर नहीं है। वैज्ञानिक प्रयत्नों किया गया है या जो कुछ जाना गया है, वह अत्यंत स्वल्प है। नूतन अनुसंधानों से पता चलता है कि भूतत्व के संबंध में अब तक की हजारों वर्षों की जानकारी बहुत स्वल्प है। अभी इसके संबंध में बहुत कुछ जानना शेष है। मनुष्य की बौद्धिक ऊहापोह और यांत्रिक निरीक्षण भी पूरी तरह कामयाब नहीं हो पा रहे हैं।
यों तो धरती उछलती-कूदती नाचती −थिरकती अपनी मोद-विनोद भरी जीवनयात्रा पर अनवरत गति से चलती चली जा रही है, किंतु अपनी धुरी पर वह सर्वथा स्थिर नहीं है। उसके अक्ष और सिरे अपना स्थान बदलते रहते हैं। ऐसी स्थिति में जब मनुष्य उसकी नैसर्गिक गतिविधियों से छेड़खानी करता है। उसके गर्भ में छिपे खनिज द्रव्यों, बहुमूल्य संपदाओं का अंधाधुन्ध दोहन करके उस रिक्त बना देता है, तो उस असहज वेदना एवं छटपटाहट से जो दृश्य उभरकर सामने आता है, वह अत्यंत भयावह और विनाशकारी होता है। पिछले दिनों विश्व में कई जगहों पर हुए ज्वालामुखी विस्फोटों एवं भूकंपों की श्रृंखला ने यह सिद्ध कर दिया है कि पृथ्वी अपना ध्रुवीय संतुलन खो बैठी है। ऐरीजोना में वैरोंजर ज्वालामुखी विस्फोट की घटना इस बात का प्रमाण है, जिसके कारण ध्रुवक्षेत्र में बर्फ पिघलने से भूगर्भ में भरा हुआ गर्म लावा फूट पड़ा था। इन प्राकृतिक विपदाओं-प्रकोपों को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि पृथ्वी अपने निवासियों विशेषकर मनुष्य की करतूतों से रुष्ट हो गई है और अब वह उसे न केवल सबक सिखाना चाहती है, वरन् उसके अस्तित्व तक को मिटा देने पर उतारू हो गई है।
इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्रीमैन डाइसन ने अपनी कृति ‘डिस्टर्बिंग दि यूनीवर्स’ में कहा है कि मानवी दुष्कृत्यों-उत्पादों के फलस्वरूप ही अंतर्ग्रही प्रतिक्रिया क्रुद्ध होकर अपना कुप्रभाव पृथ्वी पर छोड़ती है। उनके अनुसार मनुष्य इन दिनों वातावरण को-पर्यावरण को जिस तरह विभिन्न स्रोतों से विषाक्तता से भरता जा रहा है, वह स्वयं की विनाशलीला का एक प्रमुख उपक्रम है। जानते-समझते हुए भी हम इस अनर्थकारी प्रक्रिया को रोकने में असमर्थ बने हुए हैं। इसका प्रभाव अंतर्ग्रही परिस्थितियों पर पड़ता है। सामान्य परिस्थितियों में, प्राकृतिक अवस्था में जहाँ अनंत अंतरिक्ष से जीवनदायी प्राणपर्जन्य की वर्षा होती है, वहीं विद्रूप परिस्थितियों में आकाश-मंडल से आग के गोले बरसते हैं। पानी से स्थान पर विषैले रसायनों की बरसात होती है। एक ओर जहाँ पृथ्वी क्रमशः फूलती जा रही है, दूसरी ओर वहीं समुद्र सूखता जा रहा है। सर्वेक्षणकर्ता प्रक्रिया के साथ मानवी दुर्बुद्धि को भी दोषी ठहराया है।
पृथ्वी पर प्रतिवर्ष हजारों उल्कापिंड टूटकर गिरते हैं, जिनमें से दो-तिहाई समुद्र में समा जाते हैं। इनमें से अधिकाँश इतने छोटे होते हैं जिनकी तुलना धूलकणों से लेकर छोटे-मोटे कंकड़-पत्थरों से की जा सकती है। लेकिन कभी-कभी बड़े आकार के भारी उल्कापिंड भी धरती पर आ टपकते हैं, जिनसे जन-धन को भारी क्षति उठानी पड़ती है। डायनासोर जैसे भीमकाय प्राणियों के विलुप्त होने का मूल कारण इन प्राकृतिक विपत्तियों को माना जाता है।
धूमकेतुओं की विनाशलीला सर्वविदित है। सन १९०८ में साइबेरिया के तुँगुस्का क्षेत्र की ८०० वर्गमील की सरसब्ज भूमि को रेगिस्तान में परिवर्तित कर देने का प्रमुख कारण वैज्ञानिकों ने इन्हीं को माना है। खगोलज्ञों ने इन कणों को ‘कौमेटरी न्यूक्लियस’ नाम से संबोधित किया है। वस्तुतः इस प्रकार की विभीषिकाएँ पृथ्वी के साथ धूमकेतुओं के टकराने से उत्पन्न होती हैं। दुर्भिक्ष, बाढ़, भूकंप आदि इसी की दुष्परिणती है।
अन्वेषणकर्ता मूर्द्धन्य भूगर्भविदों ने पृथ्वी के दोनों ध्रुवों में हो रहे आकस्मिक परिवर्तनों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि मनुष्य को हिमयुग की स्थिति का सामना अब जल्दी ही करना पड़ सकता है। यदि ध्रुवों की परिवर्तनशीलता की गति इसी प्रकार से चलती रही तो पृथ्वी का अंत होने में ज्यादा विलंब नहीं समझना चाहिए।
अमेरिका के मूर्द्धन्य अभियंता डॉ. एडम बारबेर ने गाइरोस्कोप नामक यंत्र का निर्माण करके पृथ्वी की परिभ्रमणशीलता को मापने में पूर्णरूपेण सफलता पाई है। उनने ‘बारबेर साइंटिफिक फाउंडेशन’ नामक एक संस्था भी स्थापित की है। उनने अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘द कमिंग डिजास्टर वर्स दैन द एच’ में पोल शिफ्ट अर्थात् ध्रुवीय विस्थापन के रहस्यमय तथ्यों का विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। अपनी उक्त पुस्तक में पृथ्वी के एक नहीं दो ग्रहपथ अर्थात् कक्षाओं के अस्तित्व के प्रमाण प्रस्तुत करते हुए बताया है कि छोटी कक्ष ५७ करोड़ मील और दूसरी बड़ी कक्षा १०० करोड़ मील की आँकी गई है। पृथ्वी जब अपनी धुरी पर सीधी घूमती है, तो उसकी दोनों कक्षाएँ समकोण पर सुनिश्चित अवधि में भ्रमणशील बनी रहती हैं। यदि अनायास ही उसकी धुरी १३५ डिग्री के अनुपात से खिसकना आरंभ करती है तो उत्तरी ध्रुव पर इसका प्रभाव पड़ता है और वह ९० डिग्री तक खिसकना आरंभ कर देता है। परिवर्तन की इस तात्कालिक प्रक्रिया को पूरा होने में मात्र डेढ़ घंटे का समय लगता है।
पृथ्वी का यह तात्कालिक परिवर्तन अब सन्निकट आता दृष्टिगोचर होने लगा है। लगभग ९००० वर्ष पूर्व एक ऐसा ही परिवर्तन हुआ था और परिणामस्वरूप भीषण प्राकृतिक विपत्तियाँ सामने आ खड़ी हुई थीं। उनके अनुसार गाइरोस्कोप के माध्यम से पृथ्वी की धुरी की गतिविधियों का अवलोकन करने से यह स्पष्ट होता है कि अब इसका संतुलन गड़बड़ाने लगा है। २६ हजार वर्ष के परिभ्रमणकाल को पूरा करने के उपरांत अब पृथ्वी अपनी क्रियाशीलता और भू-चुंबकत्व को क्रमशः खोती जा रही है और अन्य ग्रह-गोलकों की भाँति शाँत और जड़वत् जीवनयापन करने की बात सोचने लगी है।
पृथ्वी की धुरी का चुंबकत्व ध्रुवप्रदेश की विशेषताओं के रूप में देखा जा सकता है। वहाँ से निस्सृत होने वाले चुंबकत्व का समूचे भूमंडल पर किस प्रकार बहुआयामी प्रभाव होता है, उसे देखकर ही इसकी क्षमता को, गरिमा को समझा जा सकता है। विनाश के कगार पर खड़ी धरतीमाता को कैसे बचाया जाए, इसके लिए दुनिया के मूर्द्धन्य वैज्ञानिक, दार्शनिक तथा अध्यात्मवेत्ता अपनी-अपनी तरह के प्रयत्न, उपाय-उपक्रम कर रहे हैं, फिर भी सफलता के आसार नजर नहीं आते।
पृथ्वी के ध्रुवीय विस्थापन के अनेकानेक कारणों में सबसे प्रमुख सूर्य द्वारा अपनी सहचरी पृथ्वी को जीवनोपयोगी परिस्थितियों के अनुदान में कटौती कर देने का है। इतना ही नहीं, वह प्रतिशोध स्वरूप हानिकारक विषैली गैसें व विकिरण छोड़ने में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा है। ऐसी परिस्थितियों में पृथ्वी का भविष्य क्या होगा? इस संबंध में भिन्न-भिन्न तरह की विचारधाराएँ भिन्न-भिन्न समुदायों द्वारा समय-समय पर प्रस्तुत की जाती रही हैं। मिश्र के पिरामिडों में अंकित भविष्यकथनों को देखते हुए तो यही लगता है कि पृथ्वी अब प्रायः अस्त-व्यस्त एवं जर्जर स्थिति में पहुँचकर अपनी मौत की घड़ियाँ गिन रही है। उसकी रुग्ण स्थिति को देखकर कुछ नहीं कहा जा सकता कि वह कब दम तोड़ बैठेगी। मूर्द्धन्य मनीषी मदर शिप्टन के अनुसार इसकी क्रियाशीलता पर विराम लगने ही वाला है। यदि मनुष्य इसकी उपयोगी क्षमताओं की गरिमा को न समझकर अपनी विनाशकारी दुर्बुद्धि का परिचय ही देता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी अपने जीवन को समेट लेगी।
‘प्लेन ट्रुथ’ विश्व की प्रमुख पत्रिकाओं में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। उसके एक अंक में ‘प्रजेंट एज’ नामक शीर्षक से प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि पृथ्वी अपने जीवनक्रम के ६००० वर्ष हँसते-हँसाते बिता चुकी है, किंतु अब वह विभिन्न प्रकार की आधि-व्याधियों से ग्रस्त होकर मरणासन्न स्थिति में जा पहुँची है और अपने पुत्रों की करतूतों को कोसती हुई मानों कह रही है कि वे कैसे कुपात्र निकले, जो प्रकृति-प्रदत्त जीवनोपयोगी परिस्थिति एवं चिरसंचित संपदा का सदुपयोग करने की क्षमता भी खोते जा रहे हैं।
इस संपदा और परिस्थिति को उपयुक्त बनाए रखने के लिए पृथ्वी अपने ढंग से प्रयास करती रहती है। वातावरण प्रदूषित होने पर वह वृक्ष-वनस्पतियों द्वारा उसे परिशोधित करती रहती है। अत्याधिक शीत एवं ताप से बचने के लिए सूर्य से उपयुक्त परिमाण में गर्मी प्राप्त करती है और घातक ब्रह्मांडीय किरणों से यहाँ के जीवन योग्य परिस्थितियों को सुरक्षित रखने के लिए अपने चारों ओर विभिन्न प्रकार के सुरक्षाकवचों का निर्माण करती है, ताकि यहाँ से स्वर्गीय वातावरण का लाभ मनुष्य एवं अन्य प्राणी ले सकें। परंतु इस अनुदान का प्रतिदान मनुष्य उसे पंगु बनाकर लेने पर अमादा है। यह नैतिकता एवं मानवी अस्तित्व-दोनों ही दृष्टि से अनुपयुक्त एवं आत्मघाती है। पृथ्वी एवं पर्यावरण की रक्षा में ही अपनी सुरक्षा है। इसे अकालमृत्यु से बचाया ही जाना चाहिए।
जड़ पदार्थों के भी प्रेत होते हैं क्या? इस संबंध में आए दिन चर्चा होती रहती और यह तर्क दिया जाता है कि मनुष्यों का प्रेत उसकी प्राणचेतना के कारण होता है। स्थूलशरीर के न रहने पर उसका प्राणिक शरीर ही प्रकट-प्रत्यक्ष होकर अपनी उपस्थिति का आभास दिलाता है। जड़ पदार्थ जब प्राणहीन है, तो उसका प्रेत कैसे हो सकता है?
इस प्रकार की दलील देने वालों को यह समझ लेना चाहिए कि जड़ पदार्थ भी सर्वथा चेतनाविहीन नहीं होते। उनमें भी एक प्रच्छन्न चेतना मौजूद है। यही, स्थूल तत्वों के न रहने पर आकार ग्रहण करती ओर मूल संरचना की भ्राँति पैदा करती है। आए दिन इस प्रकार के कितने ही प्रसंग प्रकाश में आते और उपर्युक्त तथ्य को प्रमाणित करते रहते हैं।
ऐसी ही एक घटना एक डच जहाज से संबंधित है। कहा जाता है कि एक बार हेंड्रिक वानडर डेकन नामक डच कप्तान अपने जहाज को लेकर एम्सटरडम से ईस्टइंडीज के लिए रवाना हुआ। उसका उद्देश्य वहाँ जाकर व्यापार में आना भाग्य आजमाना था। गुड होप अंतरीप तक सब कुछ ठीक-ठाक रहा। इसके बाद उसका जहाज एक भीषण तूफान में फँस गया, जिससे उसके पाल के चीथड़े उड़ गए और जलयान बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। इसके उपरांत वह देर तक तैरता न रह सका और डूब गया, उसके साथ ही कप्तान की भी मौत हो गई। तब से लेकर अब तक अनेक लोगों ने अनेक अवसरों पर उस जलयान को तूफान में घिरा, थपेड़ों से जूझता हुआ देखा है। दृश्य इतना जीवंत होता है कि कई बार लोग उसे सचमुच का जहाज समझकर सहायता के लिए बढ़ते देख गये हैं, किंतु दूसरे ही पल सब कुछ सामान्य नजर आता है और लोग हैरान रह जाते हैं। उनकी समझ में यह नहीं आता कि कुछ क्षण पूर्व जो कुछ दिखाई पड़ा, वह भ्रम था या वास्तविकता? ऐसी मान्यता है कि यान का यह प्रेत जिस किसी को दिखलाई पड़ जाता है, जल्द ही वह संकट में फँस जाता है।
उक्त दृश्य को ब्रिटिश जहाज एच. एम. एस. इलकाँन्सटैंट के नाविकों ने भी देखा था, जिसे तब लॉग बुक में दर्ज कर लिया गया। उसके साथ के दो और जलयानों ने भी उसे देखा था। इनमें से एक, जिसे उस यानप्रेत के बारे में जानकारी नहीं थी, सहायता के लिए जब उस ओर बढ़ा, तो देखते-देखते सब कुछ ओझल हो गया। कहते हैं कि इस जहाज के कप्तान को उसके तुरंत बाद अचानक मौत हो गई।
यों तो दुर्भाग्यग्रस्त यान का वह भूत अक्सर दिखाई पड़ता रहता है, पर अब तक वह सिर्फ समुद्री यात्रियों को ही दृष्टिगोचर होता रहता था, लेकिन सितंबर १९४२ में वह पहली बार स्थल के लोगों को दृष्टिगोचर हुआ। केपटाउन के मॉल प्वाइंट स्थित मकान में ग्लेन मिलर अपने तीन मित्रों के साथ बालकनी में बातचीत कर रहे थे, तभी उनकी दृष्टि समुद्र की ओर गई। उनने देखा कि एक बहुत पुरानी किस्म का जहाज लहरों में उलझकर बुरी तरह हिचकोले खा रहा है। जाल की धज्जियाँ उड़ गई हैं और यान भी सुरक्षित नहीं बच पाया है। उसके कई हिस्से टूट चुके हैं तथा वह टेबल की खाड़ी की ओर बढ़ रहा है। वे लोग उसे लगभग १५ मिनट तक देखते रहे। उसके बाद वह अकस्मात् न जाने कहाँ अदृश्य हो गया।
इस घटना के तीन वर्ष पूर्व सन १९३९ के मार्च महीने में भी यह यान-प्रेत करीब शताधिक लोगों द्वारा देखा गया था। ये लोग केपटाउन के दक्षिण पूर्व में स्थित फाँल्स की खाड़ी में ग्लेनकेयर्न के समुद्री तट पर धूपस्नान ले रहे थे, तभी मस्तूल पाल से सुसज्जित एक जहाज खाड़ी में आत दीख पड़ा। वह वहाँ से सीधा आगे बढ़ गया। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो वह दूर के किसी पृथक तट की ओर जा रहा हो। अभी वह थोड़ी ही दूर बढ़ा था कि शाँत समुद्र में भयंकर ऊर्मियाँ उठती दिखाई देने लगीं। आश्चर्य की बात यह थी कि वह तरंगें जहाज के आसपास के थोड़े-से क्षेत्र में ही उठती नजर आ रही थीं, शेष संपूर्ण हिस्सा शाँत था। अभी वे कुछ समझ पाते कि इतने में ही वह यान गायब हो गया। इसके साथ ही जहाज के करीब के जल की अस्थिरता भी समाप्त हो गई।
इस प्रकार के यानप्रेत विश्व के दूसरे भागों में भी देखे गए हैं। यह यान-प्रेत मानवीप्रेत की भाँति ही भले-बुरे दोनों होते हैं। बुरे प्रेत दूसरों की जान के लिए खतरनाक होते हैं, जबकि अच्छी प्रकृति के यानप्रेत सिर्फ दर्शन-झाँकी देकर तिरोहित हो जाते हैं।
‘लेडी लोवीबाँण्ड’ यान का प्रेत ऐसा ही था। ब्रिटेन का यह जहाज १८ वीं सदी में १३ फरवरी के दिन गुडविन, लंदन में प्रस्थान करके ओरपोर्टो, पुर्तगाल जा रहा था। जहाज के कप्तान की अभी-अभी शादी हुई थी। उसके साथ उसकी पत्नी तथा कुछ और संबंधी थे। कप्तान का एक मित्र भी उसमें सवार था। कहा जाता है कि वह कप्तान से ईर्ष्या करता था। विवाह के बाद उसका द्वेष और बढ़ गया। उसने अच्छा मौका जानकर जहाज में उसकी हत्या कर दी और संपूर्ण जहाज को गुडविन में डुबो दिया। तब से हर पचासवें वर्ष ‘लेडी लोवीबाँण्ड’ का भूत इंग्लिश चैनल के गुडविन तट पर दिखलाई पड़ जाता है। वह पचास वर्ष के अंतराल पर ही क्यों दृष्टिगोचर होता है, यह रहस्य अभी भी अनसुलझा है। एक मान्यता के अनुसार जिस दिन यान पुर्तगालयात्रा पर जा रहा था, उस दिन उसके निर्माण के पचास वर्ष पूरे हो रहे थे। शायद इसलिए वह अपनी स्वर्ण-जयंती क याद में आधी-आधी शताब्दी पर प्रकट होता हो। इसमें कितनी सच्चाई है, कुछ कहा नहीं जा सकता।
उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार दुर्घटना के बाद यह पहली बार १३ फरवरी १७९८ में प्रकट हुआ। तब घटना के पचास वर्ष पूरे हो रहे थे। दर्शकों ने देखा कि एक तीन मस्तूलों वाला जहाज गुडविन की ओर चला आ रहा है। उसके अंदर से नाचने-गाने की आवाजें आ रही थीं, जिसमें एक स्त्री स्वर भी था। इसे उसके पीछे-पीछे आ रही मछली पकड़ने वाली नौका के मछुआरों ने स्पष्ट सुनी। नाविकों का कहना है कि वह गुडविन के बलुआही किनारे की ओर तेजी से बढ़ रहा था। कुछ देर उपराँत वह तट की बालू से जोर से टकराया और टूट गया। इसके साथ ही यान अंतर्ध्यान हो गया।
वही दृश्य पुनः १३ फरवरी १८४८ में देखा गया। इस बार वह गुडविन तट से कुछ दूर जलमय प्रकट हुआ और ओरपोर्टो की ओर जाता दृश्यमान हुआ। उसके पीछे लगभग आधे किलोमीटर के फासले पर एक अन्य जलपोत चला जा रहा था। करीब दस मिनट पश्चात यात्रियों ने जब पुनः उस ओर दृष्टि दौड़ाई, तो दूर-दूर तक उसका कहीं पता नहीं था। उसके डूबने के भी कोई अवशेष नहीं थे। उसकी ओर से संकटकालीन सहायता की भी माँग नहीं आई। उससे स्पष्ट है वह ‘लेडी लोवीबाँण्ड’ का ही भूत होगा, ऐसा यानयात्रियों का मत था।
१३ फरवरी १८९८ में वह फिर दृष्टिगोचर हुआ। इस समय उसकी अवस्थिति डील, केंट में थी। इंग्लैंड का यह तट गुडविन से दूर है। इस बार भी वह पूर्व की भाँति अकस्मात् विलुप्त हो गया। इसके पश्चात १३ फरवरी १९४८ को इसकी पुनरावृत्ति इसलिए नहीं देखी जा सकी, कारण कि उस रोज मौसम खराब था और गुडविन एवं आसपास के संपूर्ण क्षेत्र में धुँध छाया हुआ था। पिछले वर्ष फरवरी में एक बार फिर अपनी झाँकी दिखाकर जलपोत के प्रेत ने यह प्रमाणित कर दिया कि हर पचासवें वर्ष से उसका गहरा संबंध है।
ऐसा ही एक अन्य यानप्रेत रोड द्वीप के आसपास प्रायः दिखाई पड़ता है। कहते हैं कि यह ‘पैलेटाइन’ नामक जहाज का भूत है। १८वीं सदी के मध्य में उत्तरी अमेरिका का यह जलपोत हालैंड से चलकर फिलाडेल्फिया जा रहा था। चार दिन बाद तूफान में फँसकर रास्ता भटक तथा जहाज के कप्तान की इस विपदा में मृत्यु हो गई। यात्रीगण इस आकस्मिक विपत्ति से भयभीत हो उठे। इसी अवस्था में उनने जैसे-तैसे क्रिसमस डे मनाया। उसके दो दिन पश्चात यान ब्लैक द्वीप की एक चट्टान से जा टकराया और ज्वार-भाटों के थपेड़ों के कारण टूटने लगा तूफान की तीव्रता जब कुछ शाँत हुई, तो वह पुनः चट्टान से फिसलकर समुद्र में खिसकने लगा, लेकिन ऐसा होने से पूर्व ही स्थानीय मछुआरों ने जहाज को लूट लिया। इसके बाद सभी यात्रियों को नीचे उतारकर उसमें आग लगा दी। दुर्भाग्यवश एक महिला यात्री उसमें छुपी रह गई। यान जब आग ही लपटों से पूरी तरह घिर गया और समुद्र में बहने लगा, तो सबने देखा कि व हडेक में खड़ी होकर बुरी तरह चीख रही और सहायता के लिए मनुहार कर रही थी, किंतु उसे बचाया नहीं जा सका और पोत के साथ ही जलकर मर गई। तभी से लपटों में घिरा यान का वह प्रेत समय-समय पर न्यू इंग्लैंड के समुद्री तट पर प्रकट होता रहता है।
जो बीत गया उसे ‘भूत’ कहते हैं, फिर वह चाहे प्राणी हो या पदार्थ अथवा काल सब उसी श्रेणी में आएँगे। मनुष्यों की प्रेतस्थिति के विषय में अभी भी कइयों के मन में असमंजस है, कई उनका अस्तित्व नहीं मानते, किंतु घटनाक्रम बताते हैं कि जड़ भी निष्प्राण नहीं होते। चेतना का कुछ अंश उनमें भी विद्यमान होता है। पदार्थों के प्रेतों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए एवं इस विधा को एक विराट परिप्रेक्ष्य में रखकर समझना चाहिए। ऐसा आज के चेतनाविज्ञानियों का मत है।
एक विधवा का एक ही पुत्र था। उसके पालने-पोसने-पढ़ाने के उपरांत उसका विवाह भी कर दिया। सास बहू में पटरी न खाई। आए दिन लड़ाई रहने लगी। निदान बूढ़ी माँ ने घर छोड़ दिया और भिक्षा माँगकर पेट भरने लगी। बुढ़िया का क्रोधी स्वभाव तब भी ठंडा न पड़ा। एक विद्वान उस राह से निकले। उनसे वृद्धा ने इस कौतुक का कारण बताया और पुत्रवधू के कलह को धर्म की मृत्यु मानकर उसकी अंत्येष्टि करने के प्रयास का विवरण बताया। विद्वान ने समझाया-माता जी धर्म मरा नहीं है। आप अपने धर्म का पालन करें, पुत्रवधू से पुत्रवत् व्यवहार करें, धर्म फिर जीवित हो जाएगा। विद्वान वृद्धा को साथ लेकर उसके घर गया और सास-बहू दोनों को समझा दिया। वे प्रेमपूर्वक रहने लगीं और मरा धर्म जीवित हो गया।
चुनावयज्ञ में मतदाता का उत्साहपूर्वक निकलना और मतदान में हिस्सा लेना ही पर्याप्त नहीं है। यह प्रारंभिक पक्ष है। अनुष्ठान का शेष अंश ज्यादा महत्त्वपूर्ण है और वह गहरी समझ के साथ किए गए निर्णय पर निर्भर करता है। जिन दिनों लोग विरासत में या बलप्रयोग से, हिंसा की शक्ति द्वारा सत्ता पर अधिकार कर लिया करते थे, उन दिनों की बसत और है। वे दिन अब इतिहास का विषय बन गए। कई देशों में आज भी राजतंत्र या सैन्य-तंत्र प्रचलित है। उन देशों को पिछड़े युग का समझा जाता है। आधुनिक विश्व में उनका कोई सम्मानजनक स्थान नहीं है। लोकतंत्र इसी लिए सराहा और श्रेष्ठ समझा जाता है कि लोग स्वयं उसे चुनते और चलाते हैं। अगर गलत लोग चुन लिए जाते हैं, भले ही वे तिकड़म और फरेब से सफल होते हों, तो भी जिम्मेदारी मतदाता की अपनी ही होती है। मतदाता यदि अपना स्वामित्व नहीं समझे तो मानना चाहिए कि उस देश में पुरानी-पिछड़े युग की व्यवस्था ही चल रही है। लोकतंत्र नाम भले ही, वस्तुतः वह है नहीं।
तिकड़म, फरेब, बाहुबल और हिंसा के सहारे लोग सत्ता में पहुँचते हैं तो वह व्यवस्था सभ्य और उन्नत नहीं कही जा सकता। पिछले दिनों भारतीय व्यवस्था में इस प्रवृत्ति ने बल पकड़ा है। स्वतंत्रता आंदोलन का प्रभाव रहने तक तो लगता था कि लोग विचार, व्यक्ति और कार्यक्रमों को वोट देते हैं। करीब तीस वर्षों तक साफ दिखाई देता था कि मतदाता एक भावबोध से प्रेरित होकर मत देने आता था। वह बोध विभिन्न स्तरों का होता था, उनमें विरोध भी होता था, लेकिन एक अर्थ में वे सहज और स्वीकार्य भी होते थे, क्योंकि उनके माध्यम से समाज की चिंता झलकती थी। लोग किसी-न-किसी कसौटी पर राष्ट्र, समाज और क्षेत्र का हित सोचते थे, उस आधार पर मतदान करते थे, उससे पूरी तरह सही और खरे न सही, व्यावहारिक स्तर के भरोसेमंद और उत्तरदायी प्रतिनिधि चुनकर आते थे।
बाद के वर्षों में स्थितियाँ विषम होती गई। इतनी विषम कि आसुरी और पाशविक शक्तियों का सहारा लेकर ही लोग चुनाव में जीतने लगे। किसी समय भ्रष्ट साधनों से चुनाव जीतने का आरोप लगने भर से प्रतिनिधि का सिर लज्जा से झुक जाता था। वह अपने लिए दुनिया भर की सफाई देता और लोकसमाज में अपनी छवि औसत से बहुत ऊपर से स्तर की रखने और निभाने की कोशिश करता था। याद कीजिए वे दिन, जब एक मामूली रेल दुर्घटना से खिन्न होकर लालबहादुर शास्त्री ने रेलमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। यही नहीं, प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए भी अपने परिवार द्वारा विलासिता के साधन यथा एयरकंडीशनर प्रयोग करने पर उनने कड़ा कदम उठाया था, किंतु इन दिनों इस तरह की कामना भी नासमझी होगी। कोर्ट से चुनाव रद्द कर दिए जाने पर लोग न्याय का मुँह चिढ़ाते और उसकी आँखों में धूल झोंकने का उपक्रम रचते हैं।
बात यहीं तक सीमित नहीं। विभीषिका यहाँ तक पहुँच गई है कि अपराध जगत के नामी सरगना लोकतंत्र के मंदिर में डेरा जमाए रहते हैं। जिन लोगों के नाम गिरफ्तारी वारंट जारी हुए हैं, गिरफ्तार रहे हैं और संगीन मामलों में पुलिस को तलाश रहते हैं, वे येन-केन-प्रकार से चुनाव जीतकर राज करने लगते हैं। निश्चित ही सही, योग्य और ईमानदार लोग भी बड़ी संख्या में चुनाव जीतकर जन प्रतिनिधि संस्थाओं में पहुँचते हैं। वे संख्या में सत्तर-अस्सी प्रतिशत होंगे। इससे ज्यादा प्रतिशत भी हो सकता है। गलत तरीकों से गलत और अपराधी अतीत वाले लोग थोड़ी संख्या में भी सफल होते हैं, एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है, की तरह अंगुली पर गिने जाने लायक लोग भी यदि राजनेता बन जाते हैं, तो उससे व्यवस्था दूषित होती है।
यह बात मर्यादा और संकेत रूप में ही कही जा रही है कि आज अपराधी प्रवृत्ति के गिने-चुने लोग ही राजनेता बन पाते हैं। अपने आसपास दृष्टि दौड़ाकर स्वयं अनुभव किया जा सकता है कि इस तरह के लोगों की संख्या कम है या ज्यादा? स्थिति इतनी विषम भी दिखाई दे सकती है कि लोग प्रतिनिधि संस्थाओं में पहुँचकर भी अपराधी गतिविधियाँ चला रहे हैं। प्रश्न यह है कि गलत और अयोग्य लोगों के चुनाव जीतकर प्रतिनिधि संस्थाओं में पहुँच जाने के लिए उत्तरदायी कौन है? इसका उत्तर एक ही हो सकता है-मतदाता
व्यवस्था, चुनाव पद्धति, वोट की राजनीति और इसी तरह के दूसरे बहानों के आधार पर मतदाता अपने दायित्व से बच नहीं सकता। योग्य, कर्तव्यनिष्ठ और समाज के प्रति अपना दायित्व निभाने वाले लोग ही चुनाव जीत पाएँ, यह देखन मतदाता का काम है। मतदाता किसी भी कारण इस दायित्व से विमुख होता है तो उसका परिणाम उसे और पूरे देश-समाज को भुगतना पड़ता है। दायित्व से विमुख होने का अर्थ है-योग्य और सही मामले में जनप्रतिनिधित्व करने वाले प्रत्याशी को मत नहीं देना। उसके स्थान पर दूसरे कारणों से प्रेरित होकर जिस-तिस को वोट दे बैठना।
इन दिनों दूसरे कारणों और दबावों से वोट देने का प्रचलन ही बढ़ा है। इन कारणों से क्षेत्रीयता और जाति− वर्ग के नाम पर मतदान की प्रवृत्ति मुख्य है। बीस-पच्चीस साल पहले क्षेत्रीयता के आधार पर वोट देने का प्रचलन था। कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, उड़ीसा, पंजाब, जम्मू-कश्मीर में क्षेत्रीयता वोट संगठित करने का आधार बनी। उसकी अपील ने असर किया। आज इन सभी प्राँतों में क्षेत्रीय पार्टियों का वर्चस्व है। अखिल भारतीय स्तर की पार्टियों का अस्तित्व इन राज्यों में क्षीणप्राय है। क्षेत्रीय या भाषाई पार्टियाँ ही हावी हैं।
भारत विविधताओं से भरा देश है। एक राष्ट्र राज्य के रूप में यह संगठित नहीं हो सका। कम-से-कम गुप्त साम्राज्य के बाद से तो कभी नहीं। विभिन्न रीति-रिवाजों भाषाओं और बोलियों वाले इस देश में धार्मिक-साँस्कृतिक आधार से सिवाय एकता के कोई विशेष सूत्र नहीं है। उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में राष्ट्रप्रेम का आधार बना और फैला। वह सुदृढ़ भी हुआ। क्षेत्रीय और भाषीय आग्रहों ने उस भाव को तोड़ा तो नहीं, प्राथमिकता क्रम में दूसरे स्थान पर जरूर ला दिया। राष्ट्रहित को दूसरे क्रम पर रखकर भाषा और क्षेत्र को ध्यान में रखकर वोट देने का चलन इसीलिए बढ़ा।
क्षेत्रीयता से भी ज्यादा हानिकारक या घातक भाव जाति और वर्ग का इन दिनों पनपा है। राष्ट्रीय हितों या क्षेत्र के विकास को दरकिनार कर जाति या वर्गविशेष के नाम पर वोट देने की अपील प्रायः सुनाई देती है। लोग अपनी जाति के प्रत्याशी को वोट देते हैं और लालच या भय के कारण वोट देते हैं। जाति-वर्ग के आधार पर नए-नए राजनैतिक दल भी बने, आदिवासी, अल्पसंख्यक, हरिजन, पिछड़े जैसे वर्गीकरणों को इन दलों ने वोट बैंक बनाया। उस आधार पर मिली छोटी-मोटी सफलताओं से सत्ता में हिस्सा बँटाने का दावा भी किया। राष्ट्रहित और सामूहिक हित की प्राथमिकता निचले क्रम पर चली गई तो क्षुद्र और संकीर्ण स्वार्थों का सिर उठाना ही था, उन्हें सफल होना ही था और वे सफल होने लगे।
चुनाव के दिनों में मतदाता की जरा-सी नासमझी कितने बड़े संकट को आमंत्रित करती है, यह हम आज की स्थिति में अनुभव कर सकते हैं। पिछले आठ सालों में चार चुनाव देश को देखने पड़े। हर दूसरे चुनाव में पाया कि जो प्रतिनिधि चुनकर आए हैं, वे पिछली सरकार से भी कम दिनों तक चलने वाले सदन के सदस्य रहे हैं। दलगत स्वार्थ या निजी राग-द्वेष समर्थन-विरोध का आधार बनते हैं, इसलिए जब भी तात्कालिक स्वार्थ बदलते हैं सदन भी चरमराने लगता है। केंद्र भी नहीं राज्यों की विधायिकाएँ भी इसी रोग का शिकार बनी हैं। वहाँ भी जाति-वर्ग संप्रदाय जैसे आधार पर चुने गए प्रतिनिधि आते हैं और पूरी या आधी अवधि चलने वाला सदन बनाते हैं। अल्प अवधि वाले सदन में भी दो-तीन बार सरकारें बनाते हैं।
आसन्न चुनावों में मतदाता को इस विवेक से अपने अधिकार का प्रयोग करना चाहिए कि पूरे समय चलने वाली सरकार चुने। उन उम्मीदवारों को वोट दें जो किसी भी निर्णय या प्रस्ताव को समर्थन देने से पहले व्यापक हित को सोचें। जिनके निजी और सार्वजनिक जीवन में ऐसे आक्षेप न लगे हों जो उन्हें अपराधी और भ्रष्ट सिद्ध करते हों या वैसा होने की शंका उत्पन्न करते हों, उनके चरित्र और स्थिति को संदिग्ध बताने वाले आरोप जिन लोगों पर लगे हों, वे जनप्रतिनिधि का दायित्व नहीं निभा सकते। कम-से-कम इसका नैतिक अधिकार तो इन्हें नहीं ही रह जाता था।
जागरूक मतदाता जब अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं, तो लोकतंत्र के नथुनों में शुद्ध-स्वच्छ प्राणवायु की काया में ऊर्जा और पवित्रता का संचार करते हैं। उस प्रयोग के बाद चुनकर आई सरकार ही लोक और समाज को विकास के पथ पर ले जाएगी। मताधिकार का प्रयोग विवेकपूर्वक नहीं किया गया तो विपत्ति विडंबना भी किस सीमा तक बढ़ेगी, कहा नहीं जा सकता। इस विभीषिका से लोकतंत्र को बचाना चाहिए। मतदाता को अपने अधिकार का विवेक के साथ प्रयोग करना चाहिए।
विलियम वेडर बर्न हिंदुस्तान में अपने पिता के साथ कोई ऊँचा सरकारी पद पाने आए। वह उन्हें मिला भी। अपनी प्रतिभा के कारण उन्हें ‘सर’ की उपाधि भी मिली, पर भारतीयों की दरिद्रता और शोषण को देखकर उनका मन पिघल गया। नौकरी छोड़ दी और जनजागरण के काम में लग गए। पहला काम उनने राष्ट्रीय काँग्रेस को जन्म देने और समर्थ बनाने का किया। वे मि. ह्यूम के दाहिने हाथ बन गए। जो काम उनने किया उसके अनुसार वे देश के मूर्द्धन्य नेता बने। उन्होंने सच्चे अर्थों में भारतीय नागरिकता स्वीकार की। इंग्लैंड की पार्लियामेंट में वे भारत के प्रतिनिधि की हैसियत से सदस्य चुने गए। काँग्रेस के दो बार अध्यक्ष रहें। अँग्रेज अपने शासन की नींव कमजोर करने वाला कहकर उन पर तरह-तरह के लाँछन लगाते थे, पर वे अपनी प्रतिज्ञा पर आजीवन अडिग रहे। उनने न्याय का पक्ष लिया, बिरादरी का नहीं। वे स्वयं को किसी देश विशेष का नहीं, समस्त विश्व का नागरिक करते थे।
सांख्य योग’ नामक गीता का द्वितीय अध्याय सर्वाधिक है, यह पूर्व में बताया जा चुका है। बहत्तर श्लोकों के इस अध्याय के प्रारंभिक प्रसंग “अर्जुन के अंदर से शिष्यत्त्व आ उभार एवं उसके द्वारा श्रीकृष्ण को सद्गुरु-भगवान के रूप में वरण किया जाना” की चर्चा की जा चुकी है। यह प्रसंग द्वितीय अध्याय के दसवें श्लोक गीता का उपदेश यहीं से आरंभ होता है। इसके पूर्व अर्जुन कह चुका है “मेरे लिए निश्चित कल्याणकारक साधन मुझे कहिए, क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ-आपके शरण हुए मुझ अकिंचन को शिक्षा दीजिए।” साथ ही वह यह भी कहता है कि मेरी इंद्रियों को सुखाने वाले शोक को दूर कर सके ऐसा ज्ञान मुझे दीजिए, क्योंकि भूमि में निष्कंटक, धन-धान्यसंपन्न राज्य को-स्वामित्व को प्राप्त होकर (सातवाँ व आठवाँ श्लोक)। इसके बाद के दो श्लोक में संजय द्वारा दी गई जानकारी से उत्तर की प्रतीक्षा करने लगे। इस अंक में अर्जुन के अंदर से शिष्यत्त्व के जागरण के बाद के इसी प्रसंग का विवरण है, जो योगेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीमुख से तत्त्वज्ञान के रूप में निस्सृत हुआ है।
अर्जुन के अंदर एक अभीप्सा पैदा कर महाक्रान्ति की है श्रीकृष्ण ने, तभी वह युद्ध न करने की बात कहकर भी शिष्यभाव से उनकी शरणागति आया है एवं वह तत्त्वज्ञान जानना चाहता है, जो उसकी आत्मिक प्रगति भी कर सके एवं युगधर्म की स्पष्ट व्याख्या उसे समझा सके। गुरु ने भगवान ने जब भी शिष्य की ऐसी स्थिति देखी है, तो इसे उचित मनः स्थिति पाकर उसकी अच्छी-खासी धुलाई की है। चाहे वे विरजानन्द जी हों, रामकृष्ण परमहंस हों अथवा श्रीराम शर्मा आचार्य जी। गुरु की डाँट भी भले के लिए होती है। बिना धुलाई के रंगाई कैसे संभव होगी। शिष्य के प्रारब्धों को इसमें कम में काटा भी नहीं जा सकता। हम कभी-कभी असमंजस में आ जाते हैं कि हमने तो समर्पण किया हैं एवं गुरुजी हमें डाँट लगा रहे हैं-हमें झाड़ रहे हैं। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। हममें से न जाने कितने हैं, जिन्हें उस डाँट को सुनने का सौभाग्य मिला, वह न मिलती, तो संभवतः पूर्व का अहंभाव, पूर्वाग्रह सभी यथावत
रहते एवं वह प्रगति न हो पाती, जिसने आज यहाँ तक पहुँचाया है। यदि वह प्रगति हो नहीं पाई है, तो इसका कारण संभवतः यही हे कि गुरु की डाँट को हमने अंतस् में प्रविष्ट नहीं होने दिया, बुरा मान बैठे अथवा हमारे जड़ता भरे पूर्वाग्रह आड़े आ गए। अर्जुन श्रीकृष्ण की डाँट ‘कुतस्त्वा कश्मलमिंद विषमे सपुपस्थितम्’ के माध्यम से दूसरे अध्याय के दूसरे श्लोक में सुन चुके हैं एवं तत्त्वज्ञान को जानने की अभीप्सा प्रकट कर रहे हैं, भगवान उन्हें गीता का वह तत्त्वज्ञान सुनाते हैं, जो हम सब शिष्यों के लिए है। अनादिकाल से यह ज्ञान सबका मार्गदर्शन करता रहा है एवं आगे भी असमंजस में-ऊहापोह में फंसी मानवजाति का त्राण करता रहेगा। समय-समय पर छोटे-छोटे व्यवधानों-शरीरगत क्लेशों या तनाव के कारण-पारिवारिक क्लेशों या तनाव के कारण-पारिवारिक संकटों के कारण हम शोकग्रस्त हो जाते हैं। समझ में नहीं आता, क्या करे? तब हमें समग्र मार्गदर्शन प्रदान करती है।
श्री भगवान कहते हैं-
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादाँश्च भाषसे। गतासूनगतासंश्च नानूशोचन्ति पण्डिताः॥ (२/११)
अर्थात्- “हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पंडितों के से वचन कहता है- परंतु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं, उनके लिए भी पंडितजन शोक नहीं करते।”
भगवान कह रहे हैं कि तु तो पंडित है। इतनी बड़ी-बड़ी पंडितों जैसी-बुद्धिमानों जैसी बातें पूर्व में कह चुका है। बोलता है-ज्ञानियों की भाषा और है पूर्णतः अज्ञानी। जो सोचना नहीं चाहिए, वह सोचता है। बुद्धि का मान रखने वाले बुद्धिमान-तथाकथित पंडित तर्क तो कई दे लेते हैं, किंतु व्यावहारिक धरातल पर उस ज्ञान के लागू आने का मौका आता है तो फिसड्डी साबित होते हैं। तर्क-बुद्धि को प्रपंच ही तो समर्पण में आड़े आता है। इसीलिए पहली चोट-डाँट लगाकर-लताड़ मारकर श्रीकृष्ण उसके अहं को विगलित करने का प्रयास करते हैं। कहते हैं कि पंडितजनों को जो प्राण छोड़कर चले गए हैं या जीवित हैं, उनके लिए कभी भी शोक नहीं करना चाहिए। भगवान सद्गुरु भी हैं, पारदर्शी भी, ऋषि भी और अंतर्यामी भी। वे कह रहे हैं कि मन के अरमान तो तेरे बड़े ऊँचे हैं। बड़ी-कड़ी विद्वता की बातें कहता है वे कहता हैं कि तू भीख माँगकर गुजारा कर लेगा, किंतु युद्ध नहीं करेगा। भीख माँगना अर्जुन के लिए संभव नहीं है, क्योंकि वह वैरागी नहीं है। वह स्वभावतः एक योद्धा है।
भिक्षा माँगना एक योगी-वैरागी के लिए ही ठीक हैं, वह भी तब, जब वैराग्य पूर्णतः प्रज्वलित हो। गैरिकवस्त्र जो पहने जाते हैं, वे प्रज्वलित अग्नि ज्वालाओं के प्रतीक हैं विरजु होम किया जाता है तब संन्यास धर्म अपनाया जाता है। वैरागी-संन्यासी अपना ही श्राद्ध-दर्पण करती है व फिर अपने नाम-कुल को भूल जाता है। कभी इस तरह भिक्षा माँगना ज्ञान की बात मानी जाती थी। महात्मा बुद्ध ने भी इस परंपरा का निर्वाह किया। परंतु परमपूज्य गुरुदेव ने कहा-आज के युग का धर्म, आज का नवसंन्यास है-परिव्रज्या समयदान- अंशदान द्वारा समाज को पीड़ा-पतन-पराभव से मुक्त कराना। यह बात अर्जुन के कथन के परिप्रेक्ष्य में बड़ी अच्छी तरह समझी जा सकती है कि युगधर्म का निर्वाह एवं परिव्राजक बनकर समय की माँग का परिपालन पूज्यवर के अभियान में जुटकर किया जा सकता है।
हम अर्जुन के तर्कों व उसकी पांडित्यपूर्ण तर्कों पर योगेश्वर श्रीकृष्ण की लताड़ के परिप्रेक्ष्य में चर्चा कर रहे थे। भगवान कहते हैं-तुझे शोक नहीं करना चाहिए। न तो ऐसा है कि मैं किसी काल में नहीं था तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे। (जिनके लिए तू शोक कर रहा है) और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे। (बारहवाँ श्लोक)। इसके आगे वे कहते हैं कि जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है। उस विषय में धीरपुरुष मोहित नहीं होते (शोक नहीं करते)। (तेरहवाँ श्लोक)
देह से परे जाकर समझने की बात कहकर भगवान अपने शिष्य को आसक्ति से मुक्त करना चाह रहे हैं। हर गुरु बचपन की याद दिलाकर, जो छूट गया से ठीक अब वर्तमान को देखने-जीवनयात्रा की निरंतरता के देखने की बात शिष्य को समझाता है। गुरु पूर्वकाल को भी जानता है, हमारे बचपन को भी-हमारे वर्तमान को भी एवं भविष्य में क्या होने वाला है यह भी। वह बार-बार यह बात कहता हैं, क्योंकि जब तक शिष्य के आसक्ति के बंधन नहीं छूटेंगे, तब तक अध्यात्म के मर्म को नहीं जाना जा सकता।
परमपूज्य गुरुदेव भी बार-बार हमारे आसक्ति के बंधनों पर चोट मारते थे। जो भी जीवनदान देकर शान्तिकुञ्ज आने की बात कहता था, उसे यही कहते कि एक झटके से मोह तोड़ सको पारिवारिक संबंधों से, तो ही आओ। नहीं तो रहोगे यहाँ, मन रहेगा परिवार संबंधियों में। न जाने हमारे काका जी, मौसी जी का क्या हो रहा होगा। जब भी कोई कार्यकर्ता किसी शादी-ब्याह में, किसी की बीमारी में जाता था, तो पूज्यवर यही कहते थे कि “तू अपनी नानी की बेटी की मौसी की, बच्ची के ब्याह में क्यों जा रहा है। अब तू बाबाजी बन गया है। तेरी जिम्मेदारी बड़ी है। भले ही तू अपने खर्चे से जा रहा है, तेरे समय की कीमत तुझे मालूम नहीं हैं। तू यहीं रह। शादी-ब्याह के बाद रिश्तेदारों को युगतीर्थ में आशीर्वाद के लिए बुला ले। सब निहाल हो जायेंगे, तेरा पैसा वे मिशन का समय बच जाएगा। तू यहाँ के खर्चे से यदि शादी-ब्याह में जाएगा तो मान ले कि हमारे पेट में चाकू मारकर तो मान ले कि हमारे पेट में चाकू मारकर जा रहा हैं। किसी की बीमारी में जाना हो बेटे, प्रार्थना हम कर देंगे। तू कोई डॉक्टर है जो जाकर ठीक कर देगा। अब व्यवहार आदि की प्रक्रिया से परे होकर चलो तुम सब।” हमने यह सब यहाँ सभी को याद दिलाने को लिखा है कि देहातीत यात्रा-आसक्ति के बंधन तोड़कर यात्रा करने-आसक्ति के बंधन तोड़कर चलने की बात लोकसेवी के लिए एक दिशा-दर्शन की तरह है। यही समय-समय पर पूज्यवर ने सबको समझाई। यदि युगगीता के परिप्रेक्ष्य में आज भी यदि हम उनकी-गुरुसत्ता की वेदना को समझ सकें तो अपने आसक्ति के बंधन तोड़कर अपने को एक विराट परिवार का अंग मानकर उन सभी पर अपनी पारिवारिकता को लागू कर उनके कार्य को अंजाम दे सकते हैं। यदि श्रीकृष्ण-अर्जुन के इस संवाद के द्वारा यही तथ्य हमारे केंद्रीय-क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं की समझ में आ जाए, तो यह लेखन सार्थक माना जाएगा।
श्री भगवान अर्जुन के आसक्ति के बंधनों पर चोट करने के बाद चौदहवें श्लोक में उसके शोक संबंधी कथन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहते है कि “हे कुंती पुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुख को देने वाले इंद्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशलीला और अनित्य हैं। इसलिए तू उन्हें सहन कर।”
इसके पहले आठवें श्लोक में अर्जुन कह चुका है कि “मेरी इंद्रियों को सुखाने वाले शोक को दूर कर सकने वाला उपाय मुझे दिखाइए।” यहाँ भगवान कह रहे हैं कि एवं उसे सहन करने की आदत डालनी चाहिए। वे आगे कहते हैं ऐसा व्यक्ति जिसे से संयोग व्याकुल नहीं करते, वही मोक्ष के योग्य होता है। (पंद्रहवाँ श्लोक) आगे वे सत्रहवें-अठारहवें श्लोक में कहते हैं कि हे अर्जुन! नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह संपूर्ण जगत-दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई समर्थ नहीं हैं। इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान् कहे गए हैं। इसलिए हे भरतवंशी! तू युद्ध कर।
कितने बड़े दर्शनपरक प्रसंग को अति संक्षेप में कहकर योगेश्वर कृष्ण उसे पुनः उसी प्रवाह में आते हैं कि यह शरीर तो नाशवान् है, मात्र आत्मा ही है, जिसे नष्ट नहीं किया जा सकता। जो दिखाई देता है, वह नाशवान् है-क्षणभंगुर हैं। जो अदृश्य है, वह अविनाशी है। देखते-देखते कितने लोग मृत्यु के गर्त में समा गए। उस अविनाशी तत्त्व को पहचान, जिसका नाम है आत्मा, जो देहातीत हैं। वे अगले श्लोकों में यही कह रहे हैं और उसे इस सांख्ययोग के प्रथम भाग ‘देहातीत आत्मा का भान’ के संबंध में समझाने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि वह अपना कर्त्तव्य समझ सके एवं युद्ध में स्वयं को नियोजित कर सके।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हयन्ते॥
न जायते म्रियते वा कदाचित न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोडयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
अर्थात्- जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते। क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी के द्वारा मारा जाता है। यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है, क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
उपर्युक्त व्याख्या आत्मा के विभिन्न गुणों के विवेचन के साथ तीसवें श्लोक तक आई है। गीता का सार माने जाने वाले एवं किसी प्रियजन की मृत्यु पर शोकग्रस्त व्यक्ति के लिए मननीय-पठनीय अंश यही हैं, जो ग्यारहवें से तीसवें श्लोक तक फैले हुए है। बारबार उत्साह करा रहे हैं भगवान कि इस देह के लिए परेशान मत हो। इन रिश्तेदारों के प्रति जो मरणधर्मा हैं, मोह मत कर। गुरु हर शिष्य को ही हम बुद्धिमानों की भाषा-पांडित्यपूर्ण वचन बोलते हैं- गुरु हमें आइना दिखा देता है। यह गुरूर किसलिए - यह मोह किसके लिए- समाप्त हो जाने वाली काया के लिए-नश्वर संबंधों के लिए। बारबार योगेश्वर कृष्ण अपने शिष्य अपने से कहते हैं कि वह शाश्वत संबंधों को पहचानो, अस्थायी संबंधों को भूले। शाश्वत है- आत्मा-परमात्मा का, जीव ब्रह्म का, शिष्य-गुरु का संबंध तथा अस्थायी व नाश को प्राप्त होते रहने वाला संबंध है-रिश्तेदारों वाला-भाई चाचा, मामा वाला। हम जिन्हें सगा मानते हैं-वे वस्तुतः मात्र गुरु-है युगों-युगों तक अनंतकाल तक चलते हैं गुरु-शिष्य के संबंध। जिस में सच्ची भावना है, उदात्त प्रगाढ़ पवित्र संबंध है- वह मात्र गुरु- शिष्य का संबंध है। जिस में सच्ची भावना है, उदात्त भावना है, प्रगाढ़ पवित्र संबंध है- वह मात्र गुरु- शिष्य को ढूँढ़ लेता है एवं सच्चा शिष्य को ढूँढ़ लेता हैं एवं सच्चा गुरु सदैव सच्चे शिष्य को ढूँढ़ लेता है एवं सच्चा शिष्य सदैव सच्चे गुरु को ढूँढ़ लेता है।
भगवान बारबार अर्जुन को मोह पर चोट करते हुए अगले श्लोकों में भी यही बात पुनः जोर देकर कहते हैं-
वासंसि जीर्णानि नरोडपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्तापो न शोषयति मारुतः॥
अर्थात्-पुराने वस्त्रों का त्याग कर मनुष्य जैसे नए कपड़े धारण कर लेता है वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर नए शरीरों को प्राप्त करती है। इस आत्मा को शस्त्र काट सकते हैं न आग ही जला सकती है, न जल इसे गला सकता है और न वायु इसे सुख सकता है।
नित्य-सर्वव्यापी-अचल-स्थिर-सनातन आत्मा की विशेषताएँ समझा रहे योगेश्वर उसे अगले श्लोकों में विकाररहित बताते हुए कहते हैं कि इस प्रकार से आत्मा को समझ लेने वाले अर्जुन को किसी भी स्थिति में शोक नहीं करना चाहिए, न ही अवसादग्रस्त होकर युगधर्म से मुँह ही मोड़ना चाहिए। यह सारा प्रसंग देहातीत आत्मा के भान का है, जो वे बराबर करा रहे है, ताकि उनका शिष्य मोहग्रस्तता की स्थिति से उबर सके। वे कहते हैं कि आज जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है एवं मरे हुए का जन्म निश्चित है, इसलिए बिना कोई विकल्प या कारण वाले इस शोक को करना उसे शोभा नहीं देता। आगे (सत्ताईसवां श्लोक)। आगे यह कहते हुए कि यह आत्मा सबके शरीरों में अवश्य है (उसका वध नहीं किया जा सकता- बध् तो मात्रा शरीर रूपी बाह्य आवरण का होता है) इसलिए किसी भी स्थिति में उसे शोक नहीं करना चाहिए। वे सीधे युगधर्म की व्याख्या कर देह से स्वधर्म आचरण की बात पर आ जाते हैं।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छेयोडन्यत्क्षत्रास्य न विद्यते॥
अर्थात् अपने धर्म को देखकर भी तुझे भय नहीं करना चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्त्तव्य नहीं है।
इस श्लोक के माध्यम से सांख्य योग रूपी इस दूसरे अध्याय के शिष्यत्त्व के जागरण के बाद का देहातीत आत्मा के मन से संबंधित दूसरा प्रकरण समाप्त होकर तीसरा आरम्भ हो जाता है एवं यह है देह से स्वधर्म आचरण की मीमांसापरक। भगवान अर्जुन से कहते हैं कि तुझे यह देह इसलिए मिली है कि तू देह के माध्यम से स्वधर्म निर्वाह कैसे किया जाना चाहिए, यह समझ सके। परमपूज्य गुरुदेव कहते थे कि हमें यह शरीर मिलता है कि इस माध्यम से ही आत्मा और ईश्वरीय प्रकाश की रश्मियाँ फैलती हैं। यह हमें मिला ही इसलिए है कि हमारे माध्यम से परमात्मा झर सके, परमात्मा का वैभव प्रकट हो सके। फव्वारा है हमार शरीर-हमारा मन-हमारी देह, हमारे प्राण हमारे कर्म एवं विचार। अद्भुत ईश्वरीय संरचना है मानवी देह। भगवत् चेतना में आरूढ़ होकर यदि हम इस देह से कर्म करेंगे, तो वह स्वधर्म आचरण-कर्तव्यपालन कहा जाएगा। अपने कर्तव्यपालन कहा जाएगा। अपने कर्त्तव्य के परिपालन से बड़ा कोई तप नहीं है।
इस परिप्रेक्ष्य में महाभारत की एक कथा बड़ी प्रासंगिक है। एक जाजल्य मुनि थे, जिनके तप की महिमा का गान गाया जाता था। उनने अपनी तपस्या से अद्भुत सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। धोती वे ह़माम में फेंक देते थे एवं वह सुख जाती थी। कोई तार या रस्सी बाँधों की जरूरत नहीं पड़ती थी। एक दिन उनने देखा कि किसी कौवे ने उस पर बीट कर दी। उनने क्रोध से उसे देखा एवं वह जलकर भस्म हो गया। उन्हें अपनी तपश्चर्याजन्य उपलब्धियों पर बड़ा ही नाज था। इसी घटना के तुरंत बाद एक आकाशवाणी हुई कि हे जाजल्य! ज्ञान व तप जानना चाहता है, तो अहंकार मत कर, सुलभा से मिलना चाहते हैं। सुलभा ने कहा कि वह थोड़ी देर में आएँगी- अभी बच्चों को खिला रही हैं, थोड़ी देर प्रतीक्षा करें। उन्हें गुस्सा आ गया। बोले- तू जानती है कौन आए है। रास्ते भर लोग हमें प्रणाम करते आए है। तू हमें पहचान की भी उपेक्षा कर रही है। अंदर से सुलभा बोल- न हम धोती हैं, जो आपके इशारे पर सूख जाएँ, न ही हम कौए है, जिसे जलाकर प्रणाम करते आए होंगे, पर हम जानते हैं कि आप क्या है? मुनिवर आश्चर्यपूर्वक सोचने लगे कि इसे अतींद्रिय ज्ञान कैसे मिला? यह कैसे हमारे बारे में इतना जानती है। सुलभा बोली-मुनिश्रेष्ठ आश्चर्य न करें, यह देह से स्वधर्म के आचरण का तप ही है, जिसने हमें यह सिद्धि दी है। यदि और जानना हो तो तुलाधर वैश्य के पास जाएँ।
तुलाधर वैश्य ग्राहकों को निपटा रहा था। मुनिवर बोल- हमें सुलभा ने भेजा है। हमारी बात पहले सुनो। तुलाधर बोले-पहले हम ग्राहकों को निपटाएंगे, फिर आपकी बात सुनेंगे। तुरंत उन्हें क्रोध आ गया। तुलाधर तुरंत बोले कि हम कौए हैं, न धोती है, क्रोध मत करिए धैर्य रखिए। आश्चर्यचकित जाजल्य मुनि सोचने लगे कि इन्हें यह सिद्धि कैसे मिली। वे बोले- हम मुनाफ़ाखोर नहीं हैं, ईमानदारी से तौलते हैं- अपने धर्म पर सही-सही आचरण करते हैं। यही हमारा तप है। आगे जाजल्य मुनि को ऐसे कई अनुभव हुए, जिनने उन्हें यह समझाया कि अपने कर्त्तव्य का -धर्म का परिपालन ही सबसे बड़ा तप है। उन्हें अपने तप व उसकी सिद्धि पर इस तरह गर्व नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये क्षणिक होती हैं व क्रोध के आने के बाद समाप्त हो जाती हैं। जनक आदि ज्ञानी भी इसी देह के स्वधर्म आचरण से योगी-विदेह बन गए, यह तत्त्वज्ञान भी इसी माध्यम से जाजल्य मुनि को मिला।
यहाँ भगवान भी बार-बार यही तथ्य अपने शिष्य अर्जुन की समझा रहे है व कह रहे हैं कि यह युद्ध जिसे लड़ने तू खड़ा हुआ है, अपने आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप में भाग्यवानों को ही मिल पाता है एवं यदि वह इस कर्त्तव्य का पालन- अपनी देह से स्वधर्म का आचरण नहीं करेगा-इस धर्मयुक्त युद्ध में नहीं लड़ेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा। सब लोग बहुत समय तक उसकी अपकीर्ति का कथन करेंगे और माननीय पुरुषों के लिए तो अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है। (३२,३३ व ३४वाँ श्लोक)
परमपूज्य गुरुदेव भी युग-संधिकाल के लिए हमें तप बता गए। संधिकाल के लिए हमें तप बता गए। महापुरश्चरण में भागीदारी, लोकहित में ही अपना हित समाहित है, यह मानते हुए है? ज्ञानयज्ञ में लगे रहना, यही सबसे बड़ा तप पूज्यवर ने बताया। लोगों को सद्बुद्धि की शरीर में लाना-उज्ज्वल भविष्य का मार्ग दिखना- यही सबसे बड़ा आज का कर्त्तव्य है, यह पूज्यवर ने बताकर गायत्री परिवार को दिशा दी। इस तप-साधना में सुख भी छोड़ने पड़ सकते हैं, कठिनाइयाँ भी सहन करनी पड़ती है, परंतु सेवा-साधना रूपी इस तप की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत बड़ी भूमिका है, यह हमारी गुरुसत्ता हमें बारबार समझाकर चली गई। उनने कहा कि इस तप-साधना से विरत होना तमोगुणी बनने की तरह है- महाभारत से दूर भागने की तरह है। स्वधर्म से आचरण-लोकसेवा में अपनी विभूतियों का सुनियोजन, युगधर्म का परिपालन- इसी प्रसंग पर द्वितीय अध्याय पर और आगे की विवेचना अगले अंक में।
हमारी गुरुसत्ता ने १९२६ से सतत् १९९४ तक स्थूल रूप में शिव और शक्ति के रूप में तथा बाद में अपने सूक्ष्म व कारण रूप में ऐसा दिव्य संरक्षण प्रदान किया है, जिसे शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी एवं माता भगवती देवी एक-दूसरे के पूरक थे-अविभाज्य अंग थे। आश्विन कृष्ण संवत् १९८२, २० सितंबर १९२६ को प्रातः ८ बजे साँवलिया बोहरे (आगरा) के श्री जसवंतराय के घर जन्मी परमवंदनीया माताजी एक दैवीसत्ता- शक्ति के रूप में ही अवतरित हुई थीं। यह मात्र संयोग ही नहीं है कि पंद्रह वर्ष की आयु में उसी वर्ष की आयु में उसी वर्ष संवत् पर्व पर उनके भावी जीवनसाथी- उनके आराध्य एवं गुरु परमपूज्य पं. श्रीराम शर्मा जी ने भी अपने अखण्ड दीपक के प्रज्ज्वलन के माध्यम से अपनी सूक्ष्मशरीरधारी गुरुसत्ता के लगभग १६ मील दूर स्थित आँवलखेड़ा ग्राम में दर्शन किए एवं अपने तीनों जन्मों की जानकारी प्राप्त की थी। यह मात्र एक संयोग नहीं है कि उसी वर्ष श्री अरविंद ने भागवत चेतना का सिद्धिवर्ष इसे घोषित किया था। इस ये सारे असाधारण स्तर के संयोग बताते हैं कि ऋषियुग्म के रूप में एक दैवी चैतन्य-शक्ति हम सबको मार्गदर्शन करने आई। यह बात अलग है कि ‘देवदूत आया, हम पहचान न सके’ लिखने व पढ़ने वाले हम उनका अत्यधिक सामीप्य पाने वाले परिजन भी अंत तक उनके वास्तविक स्वरूप नहीं जान पाए।
परमपूज्य गुरुदेव के जीवन की सबसे बड़ी थाती रही है- वह पाती जो वे १९७१ में मथुरा छोड़कर हरिद्वार आने तक परिजनों को भेजते रहे, जिसके माध्यम से ममत्व पर केंद्रित इस विराट तंत्र का निर्माण हुआ। ये मात्रा काले वाले पत्र ही नहीं थे, उस व्यक्ति के अंतरंग-बहिरंग को झकझोरने वाला सूक्ष्म मार्गदर्शन भी थे, अपने वास्तविक स्वरूप की एक झलक भी थी तथा एक परोक्ष आश्वासन भी कि वे सदैव उनके साथ रहेंगे, शर्त यही है कि लोकसेवा के निमित्त उनकी विभूति का कुछ अंश नियोजित हो। ऐसा ही एक पत्रा जिसमें वे स्वयं अपनी लेखनी से अपने सूक्ष्मशरीर की उनके कार्य की सिद्ध हेतु उपस्थिति की बात करते हैं, यहाँ उद्धत है-
हमारे आत्मस्वरूप, १३-५-५५
पत्र मिला। विवाह का विस्तृत समाचार जाना। वह सब समाचार पूर्ण रूप से हमें मालूम है। क्योंकि हमारा सूक्ष्मशरीर उस समय चौकीदार की तरह वहीं अड़ा रहा है और विघ्नों को टालने के लिए-शत्रुओं को नरम करने के लिए-आपत्तियों को हटाने के लिए जो कुछ बन पड़ता है, बराबर करते रहते हैं। फिर भी आपके पत्र से सब बातें भली प्रकार विदित हो गई। सब कार्य कुशलपूर्वक हो गया, यह आपके पुण्य, सद्भाव और बुद्धि-चातुर्य का फल है माता की कृपा तो सर्वोपरि है ही।
यह पत्र जो मिशन के कर्णधार एवं कानूनी सलाहकार भी रहे श्री शिवशंकर जी के पिता श्री बशेशर नाथ जी को लिखा गया था। इस परिवार की चारों पीढ़ियाँ परमपूज्य गुरुदेव के लिए समर्पित रही हैं। कितना अद्भुत संरक्षण है व खुली स्वीकारोक्ति भी कि “हाँ हम मौजूद थे।” साथ ही यह भी कि यह कार्य आपके पुण्य व बुद्धिचातुर्य के कारण ही सफल हो पाया है। मात्रा गुरुकृपा को ही नहीं, मनुष्य को स्वयं को भी श्रेय मिल जाए, वह भी गुरु की लेखनी के माध्यम से, इससे बड़ा विनम्रता भरा कथन और क्या हो सकता है।
ऐसी ही एक अनुभूति का जिक्र यहाँ करना अप्रासंगिक न होगा। श्री राम बहादुरसिंह कार्यवाहक गायत्री ज्ञान मन्दिर प्रज्ञानगर पो. माधवपुर छतौना (जि. सुल्तानपुर उ.प्र.) द्वारा लिखी यह घटना परमपूज्य गुरुदेव के इलाहाबाद दौरे से संबंधित है उन्हें श्री रामलाल जी श्रीवास्तव, जो गायत्री शक्तिपीठ इलाहाबाद के मुख्य ट्रस्टी भी हैं, वर्षों से जुड़े पुराने कार्यकर्ता भी तथा अंग्रेजी युगनिर्माण योजना पत्रिका जो १९७१ के बाद के कुछ वर्ष प्रकाशित हुई थी, के संपादक भी रही हैं। उनने श्री राम बहादुर सिंह को एक घटना सुनाई कि पूज्य गुरुदेव मध्यप्रदेश के दौरे पर इलाहाबाद होते हुए जाने के लिए आए। रामलाल जी से कहा - भाई! ट्रेन तो देरी से है, इस बीच यूनिवर्सिटी पुस्तकालय हो लेते हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहले भी २-३ बार पुस्तकों के लिए पूज्यवर आ चुके थे। यही सोचकर कि यूनिवर्सिटी से यदि देरी होगी तो सीधे स्टेशन निकल जाएँगे, वे सामान आदि लेकर चलने लगे। गुरुदेव ने कहा-भई रामलाल! यहीं आकर जाएँगे। अभी आते हैं। विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में पहुँचकर पूज्यवर ऐसे डूब गए कि उन्हें दीन-दुनिया का होश ही नहीं रहा। जैसे-जैसे ट्रेन जाने का समय समीप आ रहा था। रामलाल बाबू का जी घबड़ा रहा था। वे २-३ बार बोले कि सामान भी लेना है। स्टेशन भी पहुँचना है। गुरुदेव बोले कि समय हो गया होगा। यह भी तो एक यज्ञ है। इसे बीच में छोड़कर नहीं चल सकते। गुरुदेव पुस्तकें पढ़ने में पूरी तरह मग्न थे। एक पुस्तक में लगभग दस मिनट लगता, वे एक तरफ रख देते। वे हिंदी अंग्रेजी, प्रकृत, पाली, संस्कृत सभी भाषाओं की किताबें इस बीच देख गए। ट्रेन का समय निकल गया।
अर्जुन के अंदर एक अभीप्सा पैदा कर महाक्रान्ति की है श्रीकृष्ण ने, तभी वह युद्ध न करने की बात कहकर भी शिष्यभाव से उनकी शरणागति आया है एवं वह तत्त्वज्ञान जानना चाहता है, जो उसकी आत्मिक प्रगति भी कर सके एवं युगधर्म की स्पष्ट व्याख्या उसे समझा सके। गुरु ने भगवान ने जब भी शिष्य की ऐसी स्थिति देखी है, तो इसे उचित मनः स्थिति पाकर उसकी अच्छी-खासी धुलाई की है। चाहे वे विरजानन्द जी हों, रामकृष्ण परमहंस हों अथवा श्रीराम शर्मा आचार्य जी। गुरु की डाँट भी भले के लिए होती है। बिना धुलाई के रंगाई कैसे संभव होगी। शिष्य के प्रारब्धों को इसमें कम में काटा भी नहीं जा सकता। हम कभी-कभी असमंजस में आ जाते हैं कि हमने तो समर्पण किया हैं एवं गुरुजी हमें डाँट लगा रहे हैं-हमें झाड़ रहे हैं। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। हममें से न जाने कितने हैं, जिन्हें उस डाँट को सुनने का सौभाग्य मिला, वह न मिलती, तो संभवतः पूर्व का अहंभाव, पूर्वाग्रह सभी यथावत
रहते एवं वह प्रगति न हो पाती, जिसने आज यहाँ तक पहुँचाया है। यदि वह प्रगति हो नहीं पाई है, तो इसका कारण संभवतः यही हे कि गुरु की डाँट को हमने अंतस् में प्रविष्ट नहीं होने दिया, बुरा मान बैठे अथवा हमारे जड़ता भरे पूर्वाग्रह आड़े आ गए। अर्जुन श्रीकृष्ण की डाँट ‘कुतस्त्वा कश्मलमिंद विषमे सपुपस्थितम्’ के माध्यम से दूसरे अध्याय के दूसरे श्लोक में सुन चुके हैं एवं तत्त्वज्ञान को जानने की अभीप्सा प्रकट कर रहे हैं, भगवान उन्हें गीता का वह तत्त्वज्ञान सुनाते हैं, जो हम सब शिष्यों के लिए है। अनादिकाल से यह ज्ञान सबका मार्गदर्शन करता रहा है एवं आगे भी असमंजस में-ऊहापोह में फंसी मानवजाति का त्राण करता रहेगा। समय-समय पर छोटे-छोटे व्यवधानों-शरीरगत क्लेशों या तनाव के कारण-पारिवारिक क्लेशों या तनाव के कारण-पारिवारिक संकटों के कारण हम शोकग्रस्त हो जाते हैं। समझ में नहीं आता, क्या करे? तब हमें समग्र मार्गदर्शन प्रदान करती है।
श्री भगवान कहते हैं-
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादाँश्च भाषसे। गतासूनगतासंश्च नानूशोचन्ति पण्डिताः॥ (2/11)
अर्थात्- “हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पंडितों के से वचन कहता है- परंतु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं, उनके लिए भी पंडितजन शोक नहीं करते।”
भगवान कह रहे हैं कि तुम तो पंडित है। इतनी बड़ी-बड़ी पंडितों जैसी-बुद्धिमानों जैसी बातें पूर्व में कह चुका है। बोलता है-ज्ञानियों की भाषा और है पूर्णतः अज्ञानी। जो सोचना नहीं चाहिए, वह सोचता है। बुद्धि का मान रखने वाले बुद्धिमान-तथाकथित पंडित तर्क तो कई दे लेते हैं, किंतु व्यावहारिक धरातल पर उस ज्ञान के लागू होने का मौका आता है तो फिसड्डी साबित होते हैं। तर्क-बुद्धि को प्रपंच ही तो समर्पण में आड़े आता है। इसीलिए पहली चोट-डाँट लगाकर-लताड़ मारकर श्रीकृष्ण उसके अहं को विगलित करने का प्रयास करते हैं। कहते हैं कि पंडितजनों को जो प्राण छोड़कर चले गए हैं या जीवित हैं, उनके लिए कभी भी शोक नहीं करना चाहिए। भगवान सद्गुरु भी हैं, पारदर्शी भी, ऋषि भी और अंतर्यामी भी। वे कह रहे हैं कि मन के अरमान तो तेरे बड़े ऊँचे हैं। बड़ी-कड़ी विद्वता की बातें कहता है वे कहता हैं कि तू भीख माँगकर गुजारा कर लेगा, किंतु युद्ध नहीं करेगा। भीख माँगना अर्जुन के लिए संभव नहीं है, क्योंकि वह वैरागी नहीं है। वह स्वभावतः एक योद्धा है।
भिक्षा माँगना एक योगी-वैरागी के लिए ही ठीक हैं, वह भी तब, जब वैराग्य पूर्णतः प्रज्वलित हो। गेरुआ वस्त्र जो पहने जाते हैं, वे प्रज्वलित अग्नि ज्वालाओं के प्रतीक हैं विरजु होम किया जाता है तब संन्यास धर्म अपनाया जाता है। वैरागी-संन्यासी अपना ही श्राद्ध-दर्पण करती है व फिर अपने नाम-कुल को भूल जाता है। कभी इस तरह भिक्षा माँगना ज्ञान की बात मानी जाती थी। महात्मा बुद्ध ने भी इस परंपरा का निर्वाह किया। परंतु परमपूज्य गुरुदेव ने कहा-आज के युग का धर्म, आज का नवसंन्यास है-परिव्रज्या समयदान- अंशदान द्वारा समाज को पीड़ा-पतन-पराभव से मुक्त कराना। यह बात अर्जुन के कथन के परिप्रेक्ष्य में बड़ी अच्छी तरह समझी जा सकती है कि युगधर्म का निर्वाह एवं परिव्राजक बनकर समय की माँग का परिपालन पूज्यवर के अभियान में जुटकर किया जा सकता है।
हम अर्जुन के तर्कों व उसकी पांडित्यपूर्ण तर्कों पर योगेश्वर श्रीकृष्ण की लताड़ के परिप्रेक्ष्य में चर्चा कर रहे थे। भगवान कहते हैं-तुझे शोक नहीं करना चाहिए। न तो ऐसा है कि मैं किसी काल में नहीं था तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे। (जिनके लिए तू शोक कर रहा है) और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे। (बारहवाँ श्लोक)। इसके आगे वे कहते हैं कि जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है। उस विषय में धीरपुरुष मोहित नहीं होते (शोक नहीं करते)। (तेरहवाँ श्लोक)
देह से परे जाकर समझने की बात कहकर भगवान अपने शिष्य को आसक्ति से मुक्त करना चाह रहे हैं। हर गुरु बचपन की याद दिलाकर, जो छूट गया से ठीक अब वर्तमान को देखने-जीवनयात्रा की निरंतरता के देखने की बात शिष्य को समझाता है। गुरु पूर्वकाल को भी जानता है, हमारे बचपन को भी-हमारे वर्तमान को भी एवं भविष्य में क्या होने वाला है यह भी। वह बार-बार यह बात कहता हैं, क्योंकि जब तक शिष्य के आसक्ति के बंधन नहीं छूटेंगे, तब तक अध्यात्म के मर्म को नहीं जाना जा सकता।
परमपूज्य गुरुदेव भी बार-बार हमारे आसक्ति के बंधनों पर चोट मारते थे। जो भी जीवनदान देकर शान्तिकुञ्ज आने की बात कहता था, उसे यही कहते कि एक झटके से मोह तोड़ सको पारिवारिक संबंधों से, तो ही आओ। नहीं तो रहोगे यहाँ, मन रहेगा पारिवारिक संबंधियों में। न जाने हमारे काका जी, मौसी जी का क्या हो रहा होगा। जब भी कोई कार्यकर्ता किसी शादी-ब्याह में, किसी की बीमारी में जाता था, तो पूज्यवर यही कहते थे कि “तू अपनी नानी की बेटी की मौसी की, बच्ची के ब्याह में क्यों जा रहा है। अब तू बाबाजी बन गया है। तेरी जिम्मेदारी बड़ी है। भले ही तू अपने खर्चे से जा रहा है, तेरे समय की कीमत तुझे मालूम नहीं हैं। तू यहीं रह। शादी-ब्याह के बाद रिश्तेदारों को युगतीर्थ में आशीर्वाद के लिए बुला ले। सब निहाल हो जायेंगे, तेरा पैसा वे मिशन का समय बच जाएगा। तू यहाँ के खर्चे से यदि शादी-ब्याह में जाएगा तो मान ले कि हमारे पेट में चाकू मारकर तो मान ले कि हमारे पेट में चाकू मारकर जा रहा हैं। किसी की बीमारी में जाना हो बेटे, प्रार्थना हम कर देंगे। तू कोई डॉक्टर है जो जाकर ठीक कर देगा। अब व्यवहार आदि की प्रक्रिया से परे होकर चलो तुम सब।” हमने यह सब यहाँ सभी को याद दिलाने को लिखा है कि देहातीत यात्रा-आसक्ति के बंधन तोड़कर यात्रा करने-आसक्ति के बंधन तोड़कर चलने की बात लोकसेवी के लिए एक दिशा−दर्शन की तरह है। यही समय-समय पर पूज्यवर ने सबको समझाई। यदि युगगीता के परिप्रेक्ष्य में आज भी यदि हम उनकी-गुरुसत्ता की वेदना को समझ सकें तो अपने आसक्ति के बंधन तोड़कर अपने को एक विराट परिवार का अंग मानकर उन सभी पर अपनी पारिवारिकता को लागू कर उनके कार्य को अंजाम दे सकते हैं। यदि श्रीकृष्ण-अर्जुन के इस संवाद के द्वारा यही तथ्य हमारे केंद्रीय-क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं की समझ में आ जाए, तो यह लेखन सार्थक माना जाएगा।
श्री भगवान अर्जुन के आसक्ति के बंधनों पर चोट करने के बाद चौदहवें श्लोक में उसके शोक संबंधी कथन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहते है कि “हे कुंती पुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुख को देने वाले इंद्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशलीला और अनित्य हैं। इसलिए तू उन्हें सहन कर।”
इसके पहले आठवें श्लोक में अर्जुन कह चुका है कि “मेरी इंद्रियों को सुखाने वाले शोक को दूर कर सकने वाला उपाय मुझे दिखाइए।” यहाँ भगवान कह रहे हैं कि एवं उसे सहन करने की आदत डालनी चाहिए। वे आगे कहते हैं ऐसा व्यक्ति जिसे से संयोग व्याकुल नहीं करते, वही मोक्ष के योग्य होता है। (पंद्रहवाँ श्लोक) आगे वे सत्रहवें-अठारहवें श्लोक में कहते हैं कि हे अर्जुन! नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह संपूर्ण जगत-दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई समर्थ नहीं हैं। इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान् कहे गए हैं। इसलिए हे भरतवंशी! तू युद्ध कर।
कितने बड़े दर्शनपरक प्रसंग को अति संक्षेप में कहकर योगेश्वर कृष्ण उसे पुनः उसी प्रवाह में आते हैं कि यह शरीर तो नाशवान् है, मात्र आत्मा ही है, जिसे नष्ट नहीं किया जा सकता। जो दिखाई देता है, वह नाशवान् है-क्षणभंगुर हैं। जो अदृश्य है, वह अविनाशी है। देखते-देखते कितने लोग मृत्यु के गर्त में समा गए। उस अविनाशी तत्त्व को पहचान, जिसका नाम है आत्मा, जो देहातीत हैं। वे अगले श्लोकों में यही कह रहे हैं और उसे इस सांख्ययोग के प्रथम भाग ‘देहातीत आत्मा का भान’ के संबंध में समझाने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि वह अपना कर्त्तव्य समझ सके एवं युद्ध में स्वयं को नियोजित कर सके।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतोनायं हन्ति न हयन्ते॥
न जायते म्रियते वा कदाचि न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोडयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
अर्थात्- जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते। क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी के द्वारा मारा जाता है। यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है, क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
उपर्युक्त व्याख्या आत्मा के विभिन्न गुणों के विवेचन के साथ तीसवें श्लोक तक आई है। गीता का सार माने जाने वाले एवं किसी प्रियजन की मृत्यु पर शोकग्रस्त व्यक्ति के लिए मननीय-पठनीय अंश यही हैं, जो ग्यारहवें से तीसवें श्लोक तक फैले हुए है। बारबार उत्साह करा रहे हैं भगवान कि इस देह के लिए परेशान मत हो। इन रिश्तेदारों के प्रति जो मरणधर्मा हैं, मोह मत कर। गुरु हर शिष्य को ही हम बुद्धिमानों की भाषा-पांडित्यपूर्ण वचन बोलते हैं- गुरु हमें आइना दिखा देता है। यह गुरूर किसलिए - यह मोह किसके लिए- समाप्त हो जाने वाली काया के लिए-नश्वर संबंधों के लिए। बारबार योगेश्वर कृष्ण अपने शिष्य अपने से कहते हैं कि वह शाश्वत संबंधों को पहचानो, अस्थायी संबंधों को भूले। शाश्वत है- आत्मा-परमात्मा का, जीव ब्रह्म का, शिष्य-गुरु का संबंध तथा अस्थायी व नाश को प्राप्त होते रहने वाला संबंध है-रिश्तेदारों वाला-भाई चाचा, मामा वाला। हम जिन्हें सगा मानते हैं-वे वस्तुतः मात्र गुरु-है युगों-युगों तक अनंतकाल तक चलते हैं गुरु-शिष्य के संबंध। जिस में सच्ची भावना है, उदात्त प्रगाढ़ पवित्र संबंध है- वह मात्र गुरु- शिष्य का संबंध है। जिस में सच्ची भावना है, उदात्त भावना है, प्रगाढ़ पवित्र संबंध है- वह मात्र गुरु- शिष्य को ढूँढ़ लेता है एवं सच्चा शिष्य को ढूँढ़ लेता हैं एवं सच्चा गुरु सदैव सच्चे शिष्य को ढूँढ़ लेता है एवं सच्चा शिष्य सदैव सच्चे गुरु को ढूँढ़ लेता है।
भगवान बारबार अर्जुन को मोह पर चोट करते हुए अगले श्लोकों में भी यही बात पुनः जोर देकर कहते हैं-
वासंसि जीर्णानि नरोडपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्तापो न शोषयति मारुतः॥
अर्थात्-पुराने वस्त्रों का त्याग कर मनुष्य जैसे नए कपड़े धारण कर लेता है वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर नए शरीरों को प्राप्त करती है। इस आत्मा को शस्त्र काट सकते हैं न आग ही जला सकती है, न जल इसे गला सकता है और न वायु इसे सुख सकता है।
नित्य-सर्वव्यापी-अचल-स्थिर-सनातन आत्मा की विशेषताएँ समझा रहे योगेश्वर उसे अगले श्लोकों में विकाररहित बताते हुए कहते हैं कि इस प्रकार से आत्मा को समझ लेने वाले अर्जुन को किसी भी स्थिति में शोक नहीं करना चाहिए, न ही अवसादग्रस्त होकर युगधर्म से मुँह ही मोड़ना चाहिए। यह सारा प्रसंग देहातीत आत्मा के भान का है, जो वे बराबर करा रहे है, ताकि उनका शिष्य मोहग्रस्तता की स्थिति से उबर सके। वे कहते हैं कि आज जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है एवं मरे हुए का जन्म निश्चित है, इसलिए बिना कोई विकल्प या कारण वाले इस शोक को करना उसे शोभा नहीं देता। आगे (सत्ताईसवां श्लोक)। आगे यह कहते हुए कि यह आत्मा सबके शरीरों में अवश्य है (उसका वध नहीं किया जा सकता- बध् तो मात्रा शरीर रूपी बाह्य आवरण का होता है) इसलिए किसी भी स्थिति में उसे शोक नहीं करना चाहिए। वे सीधे युगधर्म की व्याख्या कर देह से स्वधर्म आचरण की बात पर आ जाते हैं।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छेयोडन्यत्क्षत्रास्य न विद्यते॥
अर्थात् अपने धर्म को देखकर भी तुझे भय नहीं करना चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्त्तव्य नहीं है।
इस श्लोक के माध्यम से सांख्य योग रूपी इस दूसरे अध्याय के शिष्यत्त्व के जागरण के बाद का देहातीत आत्मा के मन से संबंधित दूसरा प्रकरण समाप्त होकर तीसरा आरम्भ हो जाता है एवं यह है देह से स्वधर्म आचरण की मीमांसापरक। भगवान अर्जुन से कहते हैं कि तुझे यह देह इसलिए मिली है कि तू देह के माध्यम से स्वधर्म निर्वाह कैसे किया जाना चाहिए, यह समझ सके। परमपूज्य गुरुदेव कहते थे कि हमें यह शरीर मिलता है कि इस माध्यम से ही आत्मा और ईश्वरीय प्रकाश की रश्मियाँ फैलती हैं। यह हमें मिला ही इसलिए है कि हमारे माध्यम से परमात्मा झर सके, परमात्मा का वैभव प्रकट हो सके। फव्वारा है हमार शरीर-हमारा मन-हमारा देह, हमारे प्राण हमारे कर्म एवं विचार। अद्भुत ईश्वरीय संरचना है मानवी देह। भगवत् चेतना में आरूढ़ होकर यदि हम इस देह से कर्म करेंगे, तो वह स्वधर्म आचरण-कर्तव्यपालन कहा जाएगा। अपने कर्तव्यपालन कहा जाएगा। अपने कर्त्तव्य के परिपालन से बड़ा कोई तप नहीं है।
इस परिप्रेक्ष्य में महाभारत की एक कथा बड़ी प्रासंगिक है। एक जाजल्य मुनि थे, जिनके तप की महिमा का गान गाया जाता था। उनने अपनी तपस्या से अद्भुत सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। धोती वे हमाम में फेंक देते थे एवं वह सुख जाती थी। कोई तार या रस्सी बंधनों की जरूरत नहीं पड़ती थी। एक दिन उनने देखा कि किसी कौवे ने उस पर बीट कर दी। उनने क्रोध से उसे देखा एवं वह जलकर भस्म हो गया। उन्हें अपनी तपश्चर्याजन्य उपलब्धियों पर बड़ा ही नाज था। इसी घटना के तुरंत बाद एक आकाशवाणी हुई कि हे जाजल्य! ज्ञान व तप जानना चाहता है, तो अहंकार मत कर, सुलभा से मिलना चाहते हैं। सुलभा ने कहा कि वह थोड़ी देर में आएँगी- अभी बच्चों को खिला रही हैं, थोड़ी देर प्रतीक्षा करें। उन्हें गुस्सा आ गया। बोले- तू जानती है कौन आए है। रास्ते भर लोग हमें प्रणाम करते आए है। तू हमें पहचान की भी उपेक्षा कर रही है। अंदर से सुलभा बोल- न हम धोती हैं, जो आपके इशारे पर सूख जाएँ, न ही हम कौए है, जिसे जलाकर प्रणाम करते आए होंगे, पर हम जानते हैं कि आप क्या है? मुनिवर आश्चर्यपूर्वक सोचने लगे कि इसे अतींद्रिय ज्ञान कैसे मिला? यह कैसे हमारे बारे में इतना जानती है। सुलभा बोली-मुनिश्रेष्ठ आश्चर्य न करें, यह देह से स्वधर्म के आचरण का तप ही है, जिसने हमें यह सिद्धि दी है। यदि और जानना हो तो तुलाधर वैश्व के पास जाएँ।
तुलाधर वैश्य ग्राहकों को निपटा रहा था। मुनिवर बोल- हमें सुलभा ने भेजा है। हमारी बात पहले सुनो। तुलाधर बोले-पहले हम ग्राहकों को निपटाएंगे, फिर आपकी बात सुनेंगे। तुरंत उन्हें क्रोध आ गया। तुलाधर तुरंत बोले कि हम कौए हैं, न धोती है, क्रोध मत करिए धैर्य रखिए। आश्चर्यचकित जाजल्य मुनि सोचने लगे कि इन्हें यह सिद्धि कैसे मिली। वे बोले- हम मुनाफ़ाखोर नहीं हैं, ईमानदारी से तौलते हैं- अपने धर्म पर सही-सही आचरण करते हैं। यही हमारा तप है। आगे जाजल्य मुनि को ऐसे कई अनुभव हुए, जिनने उन्हें यह समझाया कि अपने कर्तव्य का -धर्म का परिपालन ही सबसे बड़ा तप है। उन्हें अपने तप व उसकी सिद्धि पर इस तरह गर्व नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये क्षणिक होती हैं व क्रोध के आने के बाद समाप्त हो जाती हैं। जनक आदि ज्ञानी भी इसी देह के स्वधर्म आचरण से योगी-विदेह बन गए, यह तत्त्वज्ञान भी इसी माध्यम से जाजल्य मुनि को मिला।
यहाँ भगवान भी बार-बार यही तथ्य अपने शिष्य अर्जुन की समझा रहे है व कह रहे हैं कि यह युद्ध जिसे लड़ने तू खड़ा हुआ है, अपने आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप में भाग्यवानों को ही मिल पाता है एवं यदि वह इस कर्तव्य का पालन- अपनी देह से स्वधर्म का आचरण नहीं करेगा-इस धर्मयुक्त युद्ध में नहीं लड़ेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा। सब लोग बहुत समय तक उसकी अपकीर्ति का कथन करेंगे और माननीय पुरुषों के लिए तो अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है। (३२,३३ व ३४ वाँ श्लोक)
परमपूज्य गुरुदेव भी युग-संधिकाल के लिए हमें तप बता गए। संधिकाल के लिए हमें तप बता गए। महापुरश्चरण में भागीदारी, लोकहित में ही अपना हित समाहित है, यह मानते हुए है? ज्ञानयज्ञ में लगे रहना, यही सबसे बड़ा तप पूज्यवर ने बताया। लोगों को सद्बुद्धि की शरण में लाना-उज्ज्वल भविष्य का मार्ग दिखना- यही सबसे बड़ा आज का कर्तव्य है, यह पूज्यवर ने बताकर गायत्री परिवार को दिशा दी। इस तप-साधना में सुख भी छोड़ने पड़ सकते हैं, कठिनाइयाँ भी सहन करनी पड़ती है, परंतु सेवासाधना रूपी इस तप की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत बड़ी भूमिका है, यह हमारी गुरुसत्ता हमें बारबार समझाकर चली गई। उनने कहा कि इस तपसाधना से विरत होना तमोगुणी बनने की तरह है- महाभारत से दूर भागने की तरह है। स्वधर्म से आचरण-लोकसेवा में अपनी विभूतियों का सुनियोजन, युगधर्म का परिपालन- इसी प्रसंग पर द्वितीय अध्याय पर और आगे की विवेचना अगले अंक में।
हमारी गुरुसत्ता ने १९२६ से सतत् १९९४ तक स्थूल रूप में शिव और शक्ति के रूप में तथा बाद में अपने सूक्ष्म व कारण रूप में ऐसा दिव्य संरक्षण प्रदान किया है, जिसे शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी एवं माता भगवती देवी एक-दूसरे के पूरक थे-अविभाज्य अंग थे। आश्विन कृष्ण संवत् १९८२, २० सितंबर १९२६ को प्रातः ८ बजे साँवलिया बोहरे (आगरा) के श्री जसवंतराय के घर जन्मी परमवंदनीया माताजी एक दैवीसत्ता- शक्ति के रूप में ही अवतरित हुई थीं। यह मात्र संयोग ही नहीं है कि पंद्रह वर्ष की आयु में उसी वर्ष की आयु में उसी वर्ष संवत् पर्व पर उनके भावी जीवनसाथी- उनके आराध्य एवं गुरु परमपूज्य पं. श्रीराम शर्मा जी ने भी अपने अखण्ड दीपक के प्रज्ज्वलन के माध्यम से अपनी सूक्ष्मशरीरधारी गुरुसत्ता के लगभग १६ मील दूर स्थित आँवलखेड़ा ग्राम में दर्शन किए एवं अपने तीनों जन्मों की जानकारी प्राप्त की थी। यह मात्र एक संयोग नहीं है कि उसी वर्ष श्री अरविंद ने भागवत चेतना का सिद्धिवर्ष इसे घोषित किया था। इस ये सारे असाधारण स्तर के संयोग बताते हैं कि ऋषियुग्म के रूप में एक दैवी चैतन्य-शक्ति हम सबको मार्गदर्शन करने आई। यह बात अलग है कि ‘देवदूत आया, हम पहचान न सके’ लिखने व पढ़ने वाले हम उनका अत्यधिक सामीप्य पाने वाले परिजन भी अंत तक उनके वास्तविक स्वरूप नहीं जान पाए।
परमपूज्य गुरुदेव के जीवन की सबसे बड़ी थाती रही है- वह पाती जो वे १९७१ में मथुरा छोड़कर हरिद्वार आने तक परिजनों को भेजते रहे, जिसके माध्यम से ममत्व पर केंद्रित इस विराट तंत्र का निर्माण हुआ। ये मात्रा काले वाले पत्र ही नहीं थे, उस व्यक्ति के अंतरंग-बहिरंग को झकझोरने वाला सूक्ष्म मार्गदर्शन भी थे, अपने वास्तविक स्वरूप की एक झलक भी थी तथा एक परोक्ष आश्वासन भी कि वे सदैव उनके साथ रहेंगे, शर्त यही है कि लोकसेवा के निमित्त उनकी विभूति का कुछ अंश नियोजित हो। ऐसा ही एक पत्रा जिसमें वे स्वयं अपनी लेखनी से अपने सूक्ष्मशरीर की उनके कार्य की सिद्ध हेतु उपस्थिति की बात करते हैं, यहाँ उद्धत है-
हमारे आत्मस्वरूप, १३-५-५५
पत्र मिला। विवाह का विस्तृत समाचार जाना। वह सब समाचार पूर्ण रूप से हमें मालूम है। क्योंकि हमारा सूक्ष्मशरीर उस समय चौकीदार की तरह वहीं अड़ा रहा है और विघ्नों को टालने के लिए-शत्रुओं को नरम करने के लिए-आपत्तियों को हटाने के लिए जो कुछ बन पड़ता है, बराबर करते रहते हैं। फिर भी आपके पत्र से सब बातें भली प्रकार विदित हो गई। सब कार्य कुशलपूर्वक हो गया, यह आपके पुण्य, सद्भाव और बुद्धि-चातुर्य का फल है माता की कृपा तो सर्वोपरि है ही।
यह पत्र जो मिशन के कर्णधार एवं कानूनी सलाहकार भी रहे श्री शिवशंकर जी के पिता श्री बशेशर नाथ जी को लिखा गया था। इस परिवार की चारों पीढ़ियाँ परमपूज्य गुरुदेव के लिए समर्पित रही हैं। कितना अद्भुत संरक्षण है व खुली स्वीकारोक्ति भी कि “हाँ हम मौजूद थे।” साथ ही यह भी कि यह कार्य आपके पुण्य व बुद्धिचातुर्य के कारण ही सफल हो पाया है। मात्रा गुरुकृपा को ही नहीं, मनुष्य को स्वयं को भी श्रेय मिल जाए, वह भी गुरु की लेखनी के माध्यम से, इससे बड़ा विनम्रता भरा कथन और क्या हो सकता है।
ऐसी ही एक अनुभूति का जिक्र यहाँ करना अप्रासंगिक न होगा। श्री राम बहादुरसिंह कार्यवाहक गायत्री ज्ञान मन्दिर प्रज्ञानगर पो. माधवपुर छतौना (जि. सुल्तानपुर उ.प्र.) द्वारा लिखी यह घटना परमपूज्य गुरुदेव के इलाहाबाद दौरे से संबंधित हैं उन्हें श्री रामलाल जी श्रीवास्तव, जो गायत्री शक्तिपीठ इलाहाबाद के मुख्य ट्रस्टी भी हैं, वर्षों से जुड़े पुराने कार्यकर्ता भी तथा अंग्रेजी युगनिर्माण योजना पत्रिका जो १९७१ के बाद के कुछ वर्ष प्रकाशित हुई थी, के संपादक भी रहे हैं। उनने श्री राम बहादुर सिंह को एक घटना सुनाई कि पूज्य गुरुदेव मध्यप्रदेश के दौरे पर इलाहाबाद होते हुए जाने के लिए आए। रामलाल जी से कहा - भाई! ट्रेन तो देरी से है, इस बीच यूनिवर्सिटी पुस्तकालय हो लेते हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहले भी २-३ बार पुस्तकों के लिए पूज्यवर आ चुके थे। यही सोचकर कि यूनिवर्सिटी से यदि देरी होगी तो सीधे स्टेशन निकल जाएँगे, वे सामान आदि लेकर चलने लगे। गुरुदेव ने कहा-भई रामलाल! यहीं आकर जाएँगे। अभी आते हैं। विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में पहुँचकर पूज्यवर ऐसे डूब गए कि उन्हें दीन-दुनिया का होश ही नहीं रहा। जैसे-जैसे ट्रेन जाने का समय समीप आ रहा था। रामलाल बाबू का जी घबड़ा रहा था। वे २-३ बार बोले कि सामान भी लेना है। स्टेशन भी पहुँचना है। गुरुदेव बोले कि समय हो गया होगा। यह भी तो एक यज्ञ है। इसे बीच में छोड़कर नहीं चल सकते। गुरुदेव पुस्तकें पढ़ने में पूरी तरह मग्न थे। एक पुस्तक में लगभग दस मिनट लगता, वे एक तरफ रख देते। वे हिंदी अंग्रेजी, प्रकृत, पाली, संस्कृत सभी भाषाओं की किताबें इस बीच देख गए। ट्रेन का समय निकल गया।
इस बीच उनके घर मित्र भटनागर जी गुरुदेव को लेकर स्टेशन ही गए होंगे, वे सीधे वहीं पहुँच गए। थोड़ी देर ढूँढ़ा पर यह सोचकर कि कहीं बैठ गए। गए, निधा
सोचकर कि कहीं बैठ गए होंगे, हम छूट जाएँगे। उनने टिकट लिए व चलती गाड़ी में बैठ गए। गए, निर्धारित कार्यक्रम में पूरा भाग लिया। लौटे तो गदगद थे कि न जाने कैसे गुरुदेव ने ट्रेन में हमें ढूँढ़ लिया व अगले स्टेशन पर ही हमारे पास आकर बैठ गए। पर आप नहीं मिले। कार्यक्रम बढ़िया रहा। हम सीधे स्टेशन से ही आ रहे हैं, पर स्टेशन पर दिखते भी कैसे। वे तो लायब्रेरी से ट्रेन टाइम के निकल जाने के आधे घंटे बाद रामलाल जी के साथ घर लौटे व चादर ओढ़कर सो गए। रामलाल जी ने पूछा भी कि अब कार्यक्रम का क्या होगा। वे हंसकर लेट गए। उधर भटनागर जी सोच रहे थे कि रामलाल जी कैसे हैं, जो गुरुजी को अकेले भेजकर खुद घर पर रह गए। भटनागर जी का वार्तालाप अंदर लेटे गुरुदेव ने सुना-बुलाया व करि के क्या लड़कपन करते हो। दोनों की बात सच्ची है! मैं यहाँ भी था, वहाँ भी था। वहाँ रेल में भी भटनागर जी के साथ मैं ही था। यज्ञ में भी मैं ही था। तुम इस बात को गोपनीय ही रखा। यह मेरा स्वरूप मेरे महाप्रयाण के बाद ही लोगों को पता लगे, यह ध्यान रखना। समय आने पर ऐसी ढेरों बातें लोगों को पता लगेंगी, तब वे हमारे स्वरूप को पहचान पाएँगे।
धन्य हैं गुरुदेव-धन्य हैं आपकी लीला। अखण्ड ज्योति पत्रिका का वर्तमान संपादक जो तथाकथित बुद्धिजीवी भी रहा है। इन सब बातों की वैज्ञानिकता को नहीं समझता, किंतु वह स्वयं साक्षी रहा है अपने गुरु के दैवीस्वरूप का। वह क्या तो समीक्षा करे, वह क्या किसी को समझाए?
जबलपुर शक्तिपीठ की प्राण-प्रतिष्ठा हो रही थी। दूसरा दिन था। गुरुदेव आए-शक्तिपीठ में प्राणसंचार किया। बीसों हजार लोगों ने दीक्षा ली, चरणस्पर्श किए, किंतु रिलीवर के अभाव में श्री बी.एस.गौतम ‘श्रीनाथ की तलैया ८ में दिया उनका ऐतिहासिक प्रवचन में न सुन पाए, न ही अपनी लगाई ड्यूटी से हट पाए। चरण स्पर्श न कर पाने का दुख उन्हें साल रहा था। पूज्यवर की विदाई का समय निकल चुका था। सभी विदा करके शक्तिपीठ लौटते दिखाई भी दे रहे थे। गौतम जी शक्तिपीठ पर जहाँ ड्यूटी लगी थी, खड़े थे। एकाएक उनने देखा कि पूज्यवर उनके सामने से निकल कर आए व मंदिर में माँ गायत्री के सामने जाकर खड़े थे। किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में गौतम जी समझ भी न पाए कि यह क्या हो गया। दो मिनट बाद वे निकले उनके सामने आकर खड़े हो गए। श्री कपिलजी को बोले कि पूजा कि थाली लाओ। थाली आई। पूज्यवर ने अपने प्रिय भक्त का-सच्चे स्वयं-सेवक का तिलक किया और कहा बेटा यह शक्तिपीठ संभालना। यह तुम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। हिलक-हिलककर रोते हुए उनने पूज्यवर के चरण छुए। कपिल जी भी उसके बाद उन्हें हृदय से लगाते हुए बोल पड़े-भैया गौतम तुम बड़े भाग्यवान हो। थोड़ा आगे निकलकर पूज्यवर ने काफिला लौटाने की बात कही व मंदिर दर्शन को आ गए। जबकि कार्यक्रम ऐसा नहीं था। तुम्हारी भक्ति स्तुत्य है।
वे इतना वार्तालाप कर ही रहे थे। कि इतने में कुछ फोटोग्राफर आ गए। पूज्यवर फिर मंदिर में गए। गौतम जी को बुलाकर कहा-चरणस्पर्श कर व फोटोग्राफर्स से फोटो खींचने को कहा। वह फोटो उस घटना की सारे परिवार को आज भी याद दिला देता है। अपने भक्त की पुकार सुन जो गुरुवर चले आएँ, उन्हें भगवान न कहें तो क्या कहें।
ऐसा ही एक पत्र यहाँ उद्धृत करने का मन है। जिसमें २०-१-६७ को परमपूज्य गुरुदेव ने अंजार-भुज-गुजरात की अपनी प्रिय शिष्यों को लिखा है-
तुमने स्वप्न में हमें देखा, सो वह स्वप्न नहीं था। जाग्रति थी। हमारा प्राण शरीर में से निकल कर निष्ठावान् साधकों के पास जाया करता है और उन्हें प्रकाश प्रदान करता है। जब हम उधर जाते हैं, तभी तुम उस प्रकार का अनुभव करती हो। कितनी स्पष्ट स्वीकारोक्ति है उस प्रक्रिया की, जो गुरुसत्ता की अनुभूति के रूप में भक्तों को हुआ करती थी। ऐसी ही विलक्षण अनुभूतियों का विस्तृत वर्णन तो अगले अंकों में परिजन पढ़ेंगे, यहाँ तो परमपूज्य गुरुदेव की लिखी कुछ पंक्तियाँ मातृसत्ता के चरणों में उनकी पाँचवीं पुण्यतिथि पर समर्पित हैं-वे भावमयी हैं। प्यार तो जैसे उनके राम-राम में बसता है। उन्हें हमारी तरह बातें बनाना तो नहीं आता, पर ममत्व लुटाने में वह हमसे कहीं बहुत आगे हैं। भले ही हमारी तरह वह बौद्धिक चातुर्य की धनी न हों, किंतु ममता की पूँजी उनके पास हमसे कई गुना अधिक है। इसी कारण हम उन्हें सजल श्रद्धा कहते हैं। मिशन के प्रत्येक परिजन ने उन्हें इसी रूप में अनुभव किया है।”
उसी सजल श्रद्धा की पूज्यवर ने प्रखर प्रज्ञा के समीप स्थापना करवाई एवं दोनों के महाप्रयाण के बाद उन्हें अग्नि वहीं पर दी गईं। वह समाधि स्थल जो शान्तिकुञ्ज के प्रवेशद्वार के समीप है, हर परिजन को ऋषियुगल के सतत् सान्निध्य की अनुभूति कराता है- उनके दुखों-कष्टों का निवारण करता है।
दूध में घुले मक्खन को अलग निकालने के लिए उबालने-मथने जैसे कई कार्य संपन्न करते पड़ते हैं। जैसे ही मलाई तैरकर ऊपर आती है, एक चरण पूरा हो जाता है-शेष थोड़े से पुरुषार्थ से पूरा हो दुग्ध का सार नवनीत के रूप में मिल जाता है। प्राणवान प्रतिभाओं को भी समुद्ररूपी दुग्ध के नवनीत की संज्ञा दी गई। इनका अनुपात जिस समाज में जितना अधिक होता है, उतना ही उसके प्रगति के पथ पर बढ़ चलने की संभावनाएँ प्रबल होती चली जाती है। प्राणवान प्रतिभाओं की इस युगसंधि के उत्तरार्द्ध की समापन वेला में जितनी आवश्यकता है उतनी विश्व के इतिहास में पहले कभी नहीं रही। अनिष्ट के अनर्थ से मानवीय गरिमा को विनष्ट होने से वे ही बचा सकते हैं। इन दिनों उन्हीं की ढूँढ़-खोज का कार्य चल रहा है।
आज के असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए महाकाल की ही योजना के अंतर्गत एक युगसंधि महापुरश्चरण की योजना बनी। १९८० में घोषित अभियान साधना के उग्र तपश्चर्या परक बारह वर्षीय उत्तरार्द्ध वाले एक विश्वव्यापी महाअनुष्ठान के रूप परिवर्धित हुए इस उपक्रम की घोषणा परमपूज्य गुरुदेव द्वारा आश्विन नवरात्रि १९८८ को की गई थी। अब उस महापुरश्चरण की अंतिम समापन घड़ियाँ आ पहुँची हैं। यह सारी अवधि सारी मानवजाति के लिए प्रतिकूलताएँ झेलते हुए अग्नि परीक्षा की तरह बीती हैं। इस सदी का अंतिम गुरुपूर्णिमा पर्व भी इस महापुरश्चरण के साधना वर्ष व पूर्णाहुति वर्ष की मिलन वेला में आया है एवं हमें सोचने पर विवश करता है कि इस अग्निपरीक्षा में-तप-साधना प्रधान अनुष्ठान ने क्या वह उद्देश्य पूरा किया, जिस प्रयोजन के लिए इसे आरंभ किया गया था। अभी वह अभियान कसौटी की अवधि पूरी भी नहीं हुई है, आगामी कुछ परीक्षा की घड़ियाँ लिए डेढ़-दो वर्ष हमारे सामने हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने तब अक्टूबर १९८८ की अखण्ड ज्योति में लिखा था- यह एक लंबा संग्राम है। संभवतः प्रस्तुत परिजनों के जीवन भर चलते रहने वाला। इक्कीसवीं सदी आरंभ होने में अभी दस वर्ष से भी अधिक समय शेष है। इस युगसंधि वेला में तो हम सबको उस स्तर की तप-साधना में संलग्न रहना है, जिसे भगीरथ ने अपनाया और धरती पर स्वर्गस्थ गंगा का अवतरण संभव कर दिखाया था। महामानवों के जीवन में कहीं कोई विराम नहीं होता। वे निरंतर अनवरत गति से शरीर छूटे तक चलते ही जाते हैं। इतने पर भी लक्ष्य पूरा न होने पर जन्म-जन्मान्तरों तक उसी प्रयास में निरंतर रहने का संकल्प संजोये रहते हैं। इसी परंपरा का निर्वाह उन्हें भी करना है जिन्हें अपनी प्रतिभा निखारनी और निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र में अनुकरणीय-अभिनंदनीय उपलब्धियाँ कमानी हैं।
परमपूज्य गुरुदेव ने ‘प्रतिभा की महासिद्धि’ की साधना हेतु ही इस विषम वेला में एक सामूहिक उसकी समापन घड़ियाँ हमारे सामने हैं। सारा मार्गदर्शन जो १९८८ से १९९० तक लिखे पूज्यवर के अमृतवचनों के माध्यम से मिलता है-वह एक ही धूरि पर घूमता है। “प्राणवान प्रतिभाओं का परिष्कार उनके माध्यम से युगपरिवर्तन रूपी दैवी प्रयोजन पूरा किया जाना।” इसके लिए उनने साधना की धुरी पर दो मोर्चे आरंभ किए जाने की बात कही थी-पहला-आदर्शवादी सहायकों में उमंगों को उभारना और एक परिकर, एक सूत्र में संबद्ध करना, साथ ही कुछ नियमित-सृजनात्मक गतिविधियों का आरंभ होना, जो सद्विचारों को सत्कार्यों में परिणत कर सकने की भूमिका निभा सकें। दूसरा-अनीति विरोधी मोर्चा खड़ा किया जाना। उसे एक प्रयास से आरंभ कर विशाल-विकराल बनाया जाना।
परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद श्रद्धांजलि समारोह एवं शपथ समारोह से लेकर परमवंदनीया या माताजी के मार्गदर्शन में संपन्न देवसंस्कृति दिग्विजय के आश्वमेधिक पराक्रमों का लक्ष्य उपयुक्त दो मोर्चों को सशक्त किया जाना था। १९९४ की भाद्रपद पूर्णिमा को परमवंदनीया माताजी के गुरुसत्ता के साथ विलय हो जाने के बाद उनके सूक्ष्म संरक्षण में बाद के भारत व विश्व के विराट भव्य आयोजन संपन्न हुए, साथ ही संस्कार महोत्सवों, जिनकी संख्या प्रखर साधना वर्ष के शुभारंभ तक ४०० को पार कर गई के द्वारा भारतीय संस्कृति के निर्धारण प्रायः चार करोड़ से अधिक सामान्यजनों तक जो गाँव-शहरों-महानगरों में रहते थे, पहुँचे। प्रखर साधना वर्ष वसंत पर्व २२ प्रायः सात माह पूरा होने को आ रहे हैं। अब महापूर्णाहुति वर्ष १० फरवरी २०००(वसंत पंचमी) से आरंभ होने जा रहा हैं। इस गुरु पर्व पर हम एक के उत्तरार्द्ध एवं दूसरे की पूर्व तैयारी के संधिस्थल पर खड़े हैं। एक ऐतिहासिक महापुरश्चरण की पूर्णाहुति कैसे-क्या होने जा रही है, यह सबके लिए एक कुतूहल का विषय हो सकता है। इस संबंध में बड़ा ही स्पष्ट चिंतन एवं एक सुनिश्चित लक्ष्य पूज्यवर हमारे समक्ष रख गए हैं। गुरु सत्ता ने प्रज्वलित संकल्पशीलों, प्राणवान, प्रतिभावानों की लक्ष्य संख्या एक से दो करोड़ निर्धारित की है। निश्चित ही गुरुसत्ता का भविष्यकथन मात्र पदार्थ यज्ञ नहीं, विभूति यज्ञ की ओर इंगित करता है। जिसका हवाला प्रारंभ में दिया गया था।
विभूतियों से तात्पर्य परिष्कृत प्रतिभाओं से है, जो नवसृजन के निमित्त नियोजित होंगे। वे ही सही अर्थों में युगनिर्माण योजना, गायत्री परिवार-प्रज्ञा अभियान रूपी इस विराट संगठन के सही अर्थों में उत्तराधिकारी-प्रतिनिधि एवं श्रेय के अधिकारी माने जाएँगे, जो इस प्रखर साधना वर्ष में स्वयं को परिपक्वता के शिखर तक पहुँचाएँगे एवं अपने को दस से अधिक व्यक्तियों के रूप में बहुगुणित कर महापूर्णाहुति के निमित्त दो करोड़ साधकों के एक विराट जाग्रत संगठन के रूप में प्रस्तुतीकरण कर सकेंगे। ऐसे बीस लाख परिजन भी यदि हम इस प्रखर साधना वर्ष में संकल्पित कर लेते हैं। जिनने ४८ साधना केंद्रों के माध्यम से स्वयं को जोड़ा है या अगले दिनों जुड़ सकते हैं तो यह लक्ष्य हम पूरा कर सकेंगे। वस्तुतः यह साधना की धुरी पर संगठन के पुनर्गठन का वर्ष हैं एवं निश्चित ही पूज्यवर द्वारा घोषित संधिवेला की प्रखरतम अग्निपरीक्षा का भी वर्ष है।
महापूर्णाहुति की एक मोटी रूपरेखा फिलहाल परिजनों के सम्मुख प्रस्तुत की जा रही है। मूल ढाँचा तो यही रहेगा, किंतु क्रमशः इसके सूक्ष्मतम विस्तार का पूरा स्वरूप निश्चित ही इस वर्ष की (आश्विन नवरात्रि १०-१८ अक्टूबर १९९९) की वेला तक सबके समक्ष प्रस्तुत हो सकेगा। महापूर्णाहुति को परमपूज्य गुरुदेव द्वारा लिखित सभी मार्गदर्शन परक टिप्पणियाँ तंत्र ने पाँच खण्डों में बाँटा है।
प्रथम चरण-पूर्वाभ्यास महापूर्णाहुति के पूर्व एक पारमार्थिक पूर्वाभ्यास तथा संघशक्ति के प्रतीक रूप सभी धर्म-संप्रदायों की उसमें साझेदारी के रूप में इस वर्ष दिसंबर माह की तीन तारीख को एक आयोजन एक साथ सारे भारत में एक ही समय संपन्न किया जाना है। यह प्रसंग भारत में पोलियो उन्मूलन अभियान के राष्ट्रीय कार्यक्रम की पूर्व वेला में जन चेतना के जागरण के रूप में आया है। इस सदी की अंतिम पोलियो खुराक ५ दिसंबर ९९ के एक साथ सारे भारत में शिशुओं को पिलाई जाएगी। उसके पहले जन चेतना जगाते हुए एक अभियान अपने विराट व्यापक तंत्र के द्वारा चलाया जाएगा, जिसमें सभी धर्म संप्रदायों-समाजसेवी संगठनों की भागीदारी होगी। उन्हें सहमत किया जाएगा कि पोलियो उन्मूलन के इस महायज्ञ के साथ “सबको स्वास्थ्य, सबके लिए उज्ज्वल भविष्य ‘की प्रार्थना के रूप में 3 दिसंबर की संध्या 5 से ६ सभी एक साथ दीपयज्ञ करें। जहाँ दीप प्रज्ज्वलन संभव नहीं-वहाँ मोमबत्ती जलाकर, लोवान जलाकर अथवा अपने देवालयों की प्रतिमा के समक्ष एक साथ बैठकर प्रार्थना की जा सकती है एवं जनसाधारण की इसमें भागीदारी कराई जा सकती है। इसके लिए विभिन्न धर्म संप्रदायों के प्रमुखों, उपासनागृहों -देवालयों, तीर्थों तथा रोटरी लायन्स क्लब भारत विकास परिषद जैसे समाजसेवी संगठनों से संपर्क, अपने परिजनों को अभी से आरंभ करना होगा। इसमें हमें जन-जन तक पहुँचने, सबसे सद्भाव स्थापित करने का मौका मिलेगा, साथ ही महापूर्णाहुति का एक पूर्वाभ्यास भी संपन्न हो जाएगा, जिसमें संभवतः इन सभी संगठनों की हम पुनः भागीदारी करा सकेंगे।
द्वितीय चरण-फरवरी २००० पर- वसंत पर्व, जो पूज्यवर का आध्यात्मिक जन्मदिवस व मिशन का प्रमुख पर्व है, की पावन वेला में पुनः एक ही समय सभी जगह पूर्वाभ्यास के समान दीप महायज्ञ किए जाएँगे। इक्कीसवीं सदी के आगमन की शुभ वेला एवं महापूर्णाहुति के शुभारंभ पर सभी शाखाओं-प्रज्ञापीठों-शक्तिपीठों-प्रज्ञामंडल केंद्रों एवं पूर्व में जुड़े अन्यान्य धर्मावलम्बियों के उपासनागृहों में एक साथ संपन्न इस दीपयज्ञ के माध्यम से महापूर्णाहुति वर्ष में किए जानेवाले संकल्पों की, राष्ट्रनिर्माण की प्रतिज्ञाओं की घोषणा की जाएगी। हर परिजन अपनी भूमिका-भागीदारी का स्वरूप एवं अपने प्रभाव क्षेत्र का तब तक अध्ययन कर चुका होगा। ये सभी घोषणाएँ इस वेला में होंगी।
तृतीय चरण-वसंतपर्व (१० फरवरी २०००) से गायत्री जयंती (११जून २०००) पूरे देश में क्रमशः ग्राम पंचायत, ब्लॉक, जिला, संभाग एवं प्राँत स्तर पर पाँच खंडों में महापूर्णाहुति के घोषित कार्यक्रम पूर्व निर्धारित अनुशासनों के साथ चलेंगे।
चतुर्थ चरण- महापूर्णाहुति का उत्तरार्द्ध होने के नाते सामूहिक स्तर पर इसे वर्ष के अंत तक संपन्न किया जाना है। इसका स्पष्ट स्वरूप समयानुसार परिजनों को पढ़ने को मिलेगा। वसंत से गायत्री जयंती तक राष्ट्रभर में व विश्व के अस्सी से अधिक देशों में उभरी शक्ति और संकल्पित कार्यों का संयुक्त स्वरूप इसमें उभर कर आएगा। इसमें पूरा भारत के परिजनों सहित युगतीर्थ आँवलखेड़ा, गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं शान्तिकुञ्ज हरिद्वार की सक्रिय भूमिका रहेगी। जिस क्षेत्र में जिस स्तर की क्षमता उभरकर आएगी, उसी आधार पर परिजनों को-प्राणवानों को इक्कीसवीं सदी के सृजन अभियान की कमान सौंपी जाएगी।
पंचम चरण-वसंत पर्व २००१(२९ जनवरी) -पर एक साथ पुनः दीपयज्ञ संपन्न होने के रूप में पूरा होकर महापूर्णाहुति का समापन होगा। इसमें २००० के अंत में क्षेत्रवार परिजनों-संगठनों द्वारा स्वीकार की गई जिम्मेदारियों की स्वीकारोक्ति के साथ नई सहस्राब्दी का स्वागत दीपदान द्वारा किया जाएगा।
यह दीपदान एक साथ सारे भारत के विभिन्न केंद्रों-देवालयों एवं विश्व भर के शक्तिकेन्द्रों में संपन्न होकर एक ऐसी शक्ति को जन्म देगा, जिसके माध्यम से आगत के शुभ होने एवं विभीषिकाओं के निरस्त होने की संभावनाएँ प्रबल होंगी। भारतीय संस्कृति पुनः विश्व संस्कृति के रूप में प्रतिष्ठित हो, उज्ज्वल भविष्य के माध्यम से सतयुग की वापसी के संकल्प को साकार करेगी।
धर्मतंत्र संभाले भावनात्मक परिष्कार की महती जिम्मेदारी
आज विश्व में दो ही शक्तियों का बोलबाला है। एक राजतंत्र और दूसरा धर्मतंत्र। दोनों यों तो स्वतंत्र विधाएँ हैं, किंतु नासमझी में हम दोनों में पारस्परिक मिलावट करते रहते हैं, इसी कारण इनका सुनियोजन नहीं हो पाता, न जनमानस इनके सही स्वरूप को समझ पाता हैं राजतंत्र वह है जो राज्य या राष्ट्र की सुरक्षा- आंतरिक कानून व्यवस्था एवं राजस्व जुटाकर जनसामान्य की प्रति के सरंजाम जुटाने के हेतु संकल्पित एक तंत्र है। धर्मतंत्र व्यक्ति की सदाशयता को- सद्भावना को उसके आँतरिक उत्कर्ष के निमित्त नियोजित करने हेतु मार्गदर्शन करने वाला एक ऋषि कालीन तंत्र है, जिसके कारण हमारी शाश्वत-सनातन संस्कृति अभी तक अक्षुण्ण रूप में अपना अस्तित्व बनाए हुए है। न जाने कितनी सभ्यताएँ, संस्कृति आई, किंतु समय के प्रभाव से वे विलुप्त होती चली गईं। किंतु यह हमारी भारतीय संस्कृति ही है, जिसने अपना समरसता का, सहिष्णुता का स्वरूप बनाए रख सारे विश्व का मार्गदर्शन सतत् किया है और इसका श्रेय जगत प्रगतिशील धर्मतंत्र को जाता है।
राजतंत्री शक्ति के प्रभाव के औचित्य-अनौचित्य पर विचार न कर येन-केन प्रकारेण किसी राष्ट्र के तंत्र का संचालन करता है कूटनीति एवं छल उसके रंग-रग में समाए हुए हैं। यदि ये न हों तो संभवतः कोई शासक अपना अस्तित्व ही न बचा सके। राजतंत्र कभी राजा-महाराजाओं जमींदारों, सामंतशाही नवाबों के शासन के रूप में था, पर अब वह समाप्तप्राय है। इंग्लैंड की रानी, स्पेन, हालैंड जापान आदि देशों के राज प्रमुखों का अभी भी अस्तित्व है, पर वे अब सक्रिय राजनीति के रूप में नहीं, एक मोहर मात्र लगाने हेतु प्रयुक्त होते हैं। कभी “इंग्लैंड के साम्राज्य में सूरज कभी डूबता नहीं” यह अत्युक्ति कही जाती थी एवं औपनिवेशिक साम्राज्य के रूप में सारी धरती तो नहीं, पर तीन-चौथाई पर तो उनका शासन था ही। लोकशाही की हवा आई एवं उस प्रवाह में सारे तंत्र का स्वरूप बदल गया। राजतंत्र का एक और स्वरूप हमें मजदूरों के रहनुमा के रूप में उभरे साम्यवादी तानाशाहों के रूप देखने को मिलता हैं कार्लमार्क्स व लेनिन के सिद्धांतों को भुलाकर एशिया, पूर्वी यूरोप, चीन आदि सभी देशों में जनता ने इसे भी ठुकरा दिया। एक उदारवाद की लहर आई एवं उसमें सारा तथाकथित साम्यवाद बर्लिन की दीवार ढहने के साथ चरमरा गया। आज इन सभी देशों में उलटे उपभोक्तावाद, भोगवाद, पूँजीवाद, सुख-सुविधावाद की होड़ लगी है। एक अति के बाद दूसरी अति। कहीं-न कहीं कोई त्रुटि रही होगी। तभी आज उस तंत्र का सिद्धांतहीनता के कारण अस्तित्व समाप्तप्राय सा है।
राजतंत्र की ही बात करें तो इसके दुरुपयोग के रूप में हिटलर-मुसोलिनी की तानाशाही व उसके परिणाम के रूप के रूप में हुआ एक भयावह नरसंहार, द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका तथा परमाणु बत का पहला विस्फोट याद आता है और अंदर से हिलाकर रख देता है। सभी अफ्रीकी देश प्रायः तानाशाहों, मिलिटरी शासकों की गिरफ्त में रहे हैं। सबने जी भरकर शोषण किया व अपनी देश की अर्थ-व्यवस्था को चरमरा कर रख दिया है। चाहे वह केन्या हो, मलाबी, काँगो या जाँबिया अथवा बुरुंडी, अंगोला सभी देशों में आज भी लोकतंत्र पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाया है। लेटिन अमेरिका (दक्षिण अमेरिका) व मध्य अमेरिका का इतिहास तो रक्तरंजित कारनामों से भरा पड़ा है। देख-देखकर लगता है कि वाकई एक जन-जन को मार्गदर्शन देने वाली विधा का मानवता के विकास के लिए नहीं, विनाश के लिए प्रयोग हुआ है। जिस महाशक्ति के पास कहने को तो लोकतंत्र है व सारे विश्व की अगुआई करने का दावा करता है, वह स्वयं हथियारों के निर्माण व उनकी उपर्युक्त राष्ट्रों में बिक्री से अपना आर्थिक क्षेत्र में वर्चस्व स्थापित किए हैं। जिस दिन वह यह सब बंद कर देगा, उसका पूँजी वाद एवं तथाकथित लोकशाही ध्वस्त हो जाएगी।
१९४७ में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद एक विराट लोकतंत्र के रूप में भारत उभरकर आया हैं उसके चारों तरफ ही नहीं, विश्व भर सरकारें लोकतंत्र के दायरे से बाहर निकलती चली गई, किंतु भारतवर्ष में अभी भी चुनाव के आधार पर जन नेता चुने जाते हैं एवं वे राष्ट्र का मार्गदर्शन करते हैं। सारी उपलब्धियों के बावजूद-लोकतंत्र को अक्षुण्ण बनाए रखने पर प्रशस्ति के बावजूद विगत बीस-पच्चीस वर्षों से राजतंत्र को जो स्वरूप अपने देश में देखा जा रहा है, उससे लगता है कि यह तंत्र कहीं इतना विकृत तो नहीं हो गया कि इसके आमूलचूल परिष्कार हेतु प्रबुद्धों, प्रतिभाओं को, जन-चेतना को जगाने हेतु आगे आना पड़े। इस अंक में इस विषय पर कई लेख विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र (1 अरब जनसंख्या, प्रायः ६० करोड़ से अधिक मतदाता) एवं इस माह हो रहे चुनाव पर लिखे गए हैं। क्या इस विषय में अध्यात्मतंत्र की- परिष्कृत धर्मतंत्र की कोई भूमिका हो सकती है, इसे प्रासंगिक मानते हुए यह संपादकीय लिखा मतदाता) एवं इस माह हो रहे चुनाव पर लिखे गए हैं। क्या इस विषय में अध्यात्मतंत्र की -परिष्कृत धर्मतंत्र की कोई भूमिका हो सकती है, इसे प्रासंगिक मानते हुए यह संपादकीय लिखा जा रहा है। विकृति तो राजतंत्र में थोड़ा बाद में परिलक्षित होने लगी, किंतु इसके बीज स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महात्मा गाँधी की अपनी संस्था काँग्रेस को लोकसेवी तंत्र के रूप में ‘डिजाल्व कर राजनीति से परे चलने की सलाह की अवज्ञा के साथ ही डच गए थे। शासनतंत्र में भ्रष्टाचार, भाई- भतीजावाद, कुर्सी से चिपके रहना, दल बदलना एवं अशोभनीय आचरण का क्रम थोड़ा बाद से चला गया एवं परिणति निकली- इस विराट तंत्र के विघटन एवं कुछ समय आदि राष्ट्र में पहली कार सैनिक शासन स्तर की ‘इमरजेंसी लागू होने के रूप में तब से अब तक के 24 वर्षों में कितनी सरकारें बनी हैं- कितने अधिक क्षेत्रीय दल बन गए हैं एवं कितनी अल्पावधि की सरकारें बनी है, यह आँकड़े देखकर दिमाग चकरा जाता है। जब राष्ट्र के नागरिकों की मूलभूत आवश्यकता न पूरी हो पा रही हों, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी नितांत जरूरी विधाओं के लिए बजट में प्रावधान एक -चौथाई से भी कम हो, तब चुनाव हेतु अरबों की राशि खर्च करना व वही निष्कर्ष बार-बार हाथ लगना क्या सिद्ध करता है? यही कि अब सबके मिल-बैठकर इस तंत्र की उपयोगिता-अनुपयोगिता पर चर्चा करने का समय आ गया। गायत्री परिवार सारे विश्व में छाया हुआ है। धर्मतंत्र में एक बहुत बड़े तंत्र के रूप में प्रखर व उज्ज्वल इसकी छवि है। कई लोग पूछते हैं कि युग-निर्माण को तत्पर यह विराट संगठन सारे रचनात्मक कार्य करने में लगा है, क्यों वह राजतंत्र को परिष्कृत करता? क्यों वह राजतंत्र में अपनी भागीदारी को संकल्पित नहीं होता। ऐसा समय- समय पर अपने कई ऐसे परिजन भी पूछते रहते हैं, इसी कारण जागने लगी है कि इस विराट तंत्र से जुड़े लोगों का वे प्रतिनिधित्व संसद में कर सकेंगे। हमें समय-समय पर ऐसी असमंजस भरी घड़ियों में परमपूज्य गुरुदेव का अक्टूबर १९७० में लिखे ‘ हम राजनीति में भाग क्यों नहीं लेते’ तथा फरवरी १९७० में लिखे ‘अध्यात्म विकृत नहीं परिष्कृत रूप में ही जी सकेगा’ ये दो संपादकीय पढ़कर सारा समाधान मिल जाता है। सभी परिजन भी राष्ट्र में सक्रिय विघटनकारी शक्तियों के चलते माहौल में जब चुनाव संपन्न हो रहे हैं, इन्हें जान सकें, इसलिए यहाँ कुछ सटीक मार्गदर्शन, अपने आराध्यसत्ता की लेखनी के माध्यम से ही दिया जा रहा है। यह युगसंधि की प्रस्तुत वेला में प्रखर साधना वर्ष की समापन की समापन की अवधि व महापूर्णाहुति की तैयारी में संलग्न परिजनों का निश्चित ही समाधान करेगा, उनके मनोबल को ऊँचा उठायेगा। इससे पूर्व जुलाई १९६१ में लिखे पूज्यवर के लिखे एक लेख प्रतिष्ठापना होनी ही है’, (पृष्ठ ६०) के कुछ अंश उद्धत हैं।
पूज्यवर लिखते हैं- “अगला समय अनीति सहन नहीं करेगा, भले ही वह किसी वर्ग की क्यों न हो। राजतंत्र समाप्त हो गए, अब वर्ग-तंत्र भी समाप्त होने जा रहा है। नए युग में किसी को इस आधार पर ऊँचा-नीचा न माना जाएगा कि उसका अमुक वंश में जन्म हुआ है। बड़प्पन के आधार केवल गुण-कर्म-स्वभाव रह जाएँगे। रंग, जाति, लिंग या वंश के आधार पर किसी को न तो अहंकार करने का अवसर ही रहेगा और न इस कारण किसी की हीनता-दीनता अनुभव करने पड़ेगी।” आज जो स्थिति जाति- भेदपरक राजनीति-वंशवाद पर टिकी राजनीति-वंशवाद पर टिकी राजनीति एवं लिंग-भेदपरक अव्यवस्थित सामाजिक ढाँचे के कारण पैदा हुई है, उसका समाधान परमपूज्य गुरुदेव के उपर्युक्त संकल्प में देखा जा सकता है। इसी लेख में वे आगे कहते हैं- अपनों से अपनी बात कहते हुए हमें इन पंक्तियों द्वारा यह स्पष्ट कर देना है कि नया युग तेजी से बढ़ता चला आ रहा है। उसे कोई रोक न सकेगा। महाकाल उसके लिए आवश्यक व्यवस्था बना रहे हैं और तदनुकूल व्यवस्था बना रहे हैं और तदनुकूल आधार उत्पन्न कर रहे हैं। युग का परिवर्तन अवश्यंभावी है।.... हमने अपना जीवन नवयुग की पूर्व सूचना देने- महाकाल के इस महान प्रयोजन में सम्मिलित होने के लिए प्रबुद्ध आत्माओं को निमंत्रण में लगा दिया। जिस काम लिए हम आए थे, वह पूरा होने को है। अगला काम महाकाल स्वयं करेंगे। अगले दिनों उनकी प्रेरणा से एक-से एक बढ़कर प्रतिभाशाली और प्रबुद्ध आत्माएँ सामने आएँगी। ये ऐसा एक व्यापक संघर्ष विश्वव्यापी परिमाण में प्रस्तुत कर सकेंगी, जो असमानता के सारे कारणों को तोड़ मरोड़कर फेंक दे और समता की मंगलमयी परिस्थितियों का शुभारंभ करके इसी धरती पर स्वर्ग का वातावरण संभव कर दिखाए।
उपर्युक्त पंक्तियाँ जो आज से तीस वर्ष पूर्व लिखी गई थीं, इसीलिए उद्धत की गईं कि हम अपने स्वरूप एवं अपनी भूमिका को विकृत राजतंत्र की विनाशकारी भूमिका के परिप्रेक्ष्य में समझ सकें।
आगे १९७० की अक्टूबर पत्रिका में गुरुसत्ता हमें धर्म और राजनीति के पारस्परिक संबंधों के विषय में बताते हुए हमार मार्गदर्शन भी करती है कि क्या करना है- कैसे किया जाना है। वे लिखते हैं कि “ इतिहास ने हमें सिखाया है कि धर्म की स्थापना में राजनीति का सहयोग आवश्यक है और राजनीति के मदोन्मत्त हाथी पर धर्म का अंकुश रहना ही चाहिए। दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं वरन् पूरक हैं।” यहाँ उनकी लेखनी बड़ा स्पष्ट करती है कि परिष्कृत धर्मतंत्र ही राजनीति की उन्मत्तता से भरी निरंकुश दौड़ पर अनुशासन का अंकुश लगा सकता है। पर उसका स्वरूप क्या हो? गुरुदेव लिखते हैं- “शासनतंत्र की असफलता से हम दुखी हैं बहुत खेद है कि विगत २२ वर्षों (१९४७ से १९६१) में जितना बढ़ा जा सकता था, उतना में जितना बढ़ा जा सकता था, उतना बढ़ा जा सकता था, उतना नहीं बढ़ा गया। प्रगति कुछ भी न हुई हो से बढ़ा नहीं, पर दूसरे देशों की तुलना में हमारी चाल इतनी धीमी है कि इस क्रम से हजार वर्ष में भी प्रगतिशील देशों की पंक्ति में भौतिक दृष्टि से हम खड़े न हो सकेंगे। गाँधी जी के धर्मराज्य, रामराज्य और वर्ष मंगल की आध्यात्मिक प्रगति तो अभी लाखों मील आगे की बात है।” आगे वे लिखते हैं कि “आज जनता का स्तर ही ऐसा है कि वह वोट का मूल्य और उसके दूरगामी परिणामों को अभी समझ ही नहीं पाई झांसेपट्टी और वास्तविकता का अंतर करना उसे आया ही नहीं। इसलिए चुनाव में वे लोग बन न जी सके जो रामराज्य स्थापित करने में सचमुच समर्थ हो सकते थे। जनता ने अपने स्तर के विधायक व सांसद चुने। उनने अपने स्तर की सरकारें बनाई। उन सरकारों के संचालकों ने वही किया जो जनता कर रही है या कर सकती है। जड़ के आधार पर पत्ते बनते हैं। धतूरे के बीज से उगे पौधे पर शहतूत कहाँ से लगें।”
परमपूज्य गुरुदेव का सीधा जोर जनता के मानसिक स्तर को उठाने पर उपर्युक्त पंक्तियों में परिलक्षित होता है। जिस बौद्धिक, सामाजिक व नैतिक क्राँति की अपेक्षा थी, उस दिशा में बहुमुखी प्रयास न होने की असफलता को स्वयं स्वीकारते हुए पूज्यवर कहते है कि बिना अध्यात्मतंत्र द्वारा लोकशक्ति का भावात्मक परिष्कार किए सारे राजतंत्र के ढाँचे को बदलने की कल्पना करना भी हास्यास्पद है। इसी लेख में पृष्ठ ५९ पर वे आगे लिखते हैं- “प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि शासन संचालन करने वाली मशीन कैसे उत्कृष्ट बने? तारे फिर बात लौटकर वहीं आ जाती है। सरकारी कर्मचारी आकाश से नहीं उतरते। वे जनता के ही बालक होते हैं। नौकरी पाते ही वे सारे संस्कार भुलाकर देवता बन जाएँ, यह आशा करना व्यर्थ है। इसी प्रकार पैसे लेकर वोट बेचने वाली, व्यक्तिगत या क्षेत्रीय लाभ के प्रयोजनों से आकर्षित होने वाली अदूरदर्शी जनता से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह उन्हें चुनेंगी जो सुयोग्य एवं आदर्शवादी तो हैं, पर पैसा लुटाने या बहकाने वाले हथकंडे अपनाने में समर्थ नहीं। यह एक सच्चाई है कि प्रजातंत्र में जनता के स्तर की ही सरकार बनती है और उसी स्तर की सरकारी मशीनी चलती है।”
स्वतंत्रता संग्राम में १३ वर्ष ते अपनी साधना के साथ-साथ निरंतर मोर्चे पर लड़ते रहने वाले सैनिक के रूप में परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम ‘मत्त’ जी ने निष्कर्ष आजादी के २४ वर्ष बाद दिए, निश्चित ही उसके पीछे उनके जीवन के ४५ महत्त्वपूर्ण वर्षों कि गहन चिंतन एवं द्रष्टा स्तर की शक्ति ही थी वे लिखते हैं कि “दूसरे सैनिकों ने अपनी वर्दियाँ उतार दीं और राजमुकुट पहन लिए, पर अपने लिए आजीवन उस चिंतन-लक्ष्य की ओर चलते रहना ही धर्म बन गया है, जिसके ऊपर राष्ट्र की सर्वतोमुखी समर्थता निर्भर है। हमार विश्वास है कि बौद्धिक क्राँति की त्रिवेणी बहाए बिना तीर्थराज न बनेगा और उसमें स्नान किए बिना हमारे पाप ताप न कटेंगे। जन जागरण और लोकमानस में उत्कृष्टता आदर्शवादिता का बीजांकुर बोया जाना वस्तुतः इस धरती पर स्वर्ग के अवतरण का अभिनव प्रयोग हैं हम इसी दूरगामी परिणाम वाली प्रक्रिया को हाथ में लेकर धर्म, साहस, निश्चय और प्रबल पुरुषार्थ के सहारे आगे बढ़ रहे हैं।
पूज्यवर सारे चिंतन का निचोड़ इन शब्दों में व्यक्त कर हमारा समाधान कर देते है। भौतिक सुधार करना राजतंत्र का क्षेत्र हैं भावनात्मक सुधार के लिए प्रजातंत्र के वातावरण में केवल धर्मतंत्र ही समर्थ हो सकता हैं धर्म और अध्यात्म को हमने मानवजाति की समग्र प्रगति के लिए नियोजित किया है। धर्ममंच अब तक प्रतिगामियों का दुर्ग समझा जाता रहा है, हमने उसे नई दिशा दी हैं अस्सी प्रतिशत देहातों में बसे एवं सत्तर फीसदी अशिक्षित देश में अपनी सुधारात्मक प्रक्रिया आँधी तूफान की तरह इसलिए सफल होती चली जा रही है कि हमने धर्मप्रथाओं एवं कलेवरों के बाह्य स्वरूप में हेर फेर किए बिना उनके मूल प्रयोजन में क्राँतिकारी परिवर्तन कर दिया हैं हम स्वस्थ राजनीति के विकसित हो सकने की संभावना वाला भवन बनाने में नींव के पत्थर मात्र बनकर रहेंगे और जो भी हमारे प्रभाव संपर्क में आएगा उसे इसी दिशा में प्रेरित आकर्षित करते रहेंगे।
गायत्री परिवार की रणनीति को वर्तमान चुनाव महायज्ञ में जो अब ऊब भरी थकान जैसी स्थिति में प्रगति की ओर उन्मुख इस राष्ट्र पर जबर्दस्ती आ पड़ा है, इसी चिंतन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। परिष्कृत अध्यात्मतंत्र का पुनर्जीवन एवं उससे राजतंत्र की मूल धुरी जनमानस का भावनात्मक परिष्कार विचारक्रांति एवं ज्ञानयज्ञ के द्वारा किया जाने वाला पुरुषार्थ ही हम सबको संपन्न करना है। इस दिशा में जितनी जागरूकता हम जनमानस में पैदा कर सकेंगे उतना ही लोकतंत्र सशक्त व प्रभावी ताकत राष्ट्र प्रगति की दिशा में अग्रसर होगा। यह एक लंबा संग्राम है एवं संभवतः आगामी दो या तीन वर्ष तक चलने वाला विशेषतः संक्रमण-काल की इस विशेष अवधि में यदि हम पूज्यवर की विचार−चेतना पर पक्का विश्वास राष्ट्र शताब्दी के इस अंतिम चुनाव महोत्सव को जागरूकता समझदारी एवं देशभक्ति का पर्व मानते हुए सही प्रतिनिधि चुनने की आवश्यकता जन जन को समझाएँ तो निश्चित ही बदल दल समझा जाने वाला यह सशक्त तंत्र भी परिष्कृत हो स्थायित्व देने की स्थित में आ सकेगा।
*समाप्त*