मन सिकुड़ा है, मस्तिष्क फैला है। कर्मक्षेत्र समूचे विश्व तक फैलकर सीमातीत हुआ है, स्नेह-सूत्र परिवार की छोटी-से-छोटी इकाई में भी टूटकर टुकड़े-टुकड़े हुआ है। स्थूल फैलकर स्थूलतम हो रहा है, सूक्ष्म और अधिक सिमटकर सूक्ष्मतम बन रहा है। कर्म-तर्क बौद्धिकता के धरातल पर मनुष्य महानता का मुखौटा पहनकर आगे बढ़ा दिख रहा है, कर्म-श्रद्धा अगोचर के मूल्यों पर वह बौना और कमजोर पड़ रहा है, आखिर क्यों ?
बुद्ध का कहा आज लाखों पृष्ठों में विवेचित हो रहा है, श्रीकृष्ण की गीता के अक्षर-अक्षर पर प्रवचन और भाष्य हो रहे हैं। कुरान और बाइबिल को घर-घर तक, प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए अथक प्रयास किए जा रहे है, पर बुद्ध की करुणा, श्रीकृष्ण का निष्काम कर्म, ईसा व मुहम्मद का प्रेम व भाईचारे की छवि क्यों नहीं चमक-दमक रही है, यह एक गूढ़ पहेली है।
विचार में विश्वास नहीं, धर्म में श्रद्धा नहीं, परस्परता-सामाजिकता में सुख-दुःख की अनुभूति नहीं, तब वह व्यक्ति न तो धार्मिक हो सकता है और न ही सामाजिक। धर्म और समाज के विभिन्न सवाल उस व्यक्ति की स्वार्थ-लालसा और लिप्सा को तीखा और कड़वा बना देते हैं। ये कटुस्वार्थ जब सामाजिक कटुता का रूप लेते हैं, तो साँप्रदायिक, जातीय, क्षेत्रीय आदि-आदि विषवल्लरियाँ उगती और पनपती है।
संप्रदाय, जाति, क्षेत्र-जीवन की ये इकाइयां हैं, समग्रता नहीं। जैसे आँख, कान, नाक, हाथ, पाँव ये शरीर की इकाइयां हैं, समग्रता नहीं। इकाइयाँ समग्रता की पूरक हैं, विरोधी-विद्रोही नहीं। विषग्रस्त मनुष्य ही धार्मिकता के मूल्य पर हिन्दू-मुसलमान, सिख, ईसाई को लड़ाता है। हम धार्मिक हैं, हम मनुष्य हैं-समग्रता के इस ईश्वरीय बोध में साँप्रदायिकता, जातीयता का विष उत्पन्न हो ही नहीं सकता। हम हिंदु-मुसलमान हैं, पर अविरोधी पूरक इकाई के रूप में ही। समग्रता में तो हम मनुष्य हैं, परमेश्वर की संतान, मनुष्य हैं-मननशील मनुष्य।
हर व्यक्ति के सपनों का संसार सुख-शाँति एवं प्रगति-आनंद के ताने-बाने से बुना होता है और सभी इस दिशा में अपनी ओर से भरसक प्रयास भी करते रहते हैं। परिणामस्वरूप पुरुषार्थ के अनुरूप धन, नाम, यश, पद-प्रतिष्ठा आदि सब कुछ मिलते जाते हैं, किन्तु इस कल्पित स्वर्ग के बावजूद न जाने क्यों जीवन मानसिक यंत्रणाओं से भरे यातनागृह का रूप लेने लगता है। बाहरी चमक-दमक के पीछे आँतरिक अशाँति, उद्विग्नता एवं हताशा-निराशा के बादल उमड़-घुमड़ रहे होते हैं।
‘हाऊ टु केट व्हाट यू वाँट एंड व्हाट यू हैव’ के लेखक सुविख्यात मनीषी जॉन ग्रे ने इस विडंबना पर बड़ी मोहक टिप्पणी की है। उनका कहना है कि बिना आँतरिक सफलता के बाहरी सफलता, स्थिति को और विपन्न बना देती है। जिसमें असंतोष, उद्विग्नता एवं परेशानी बढ़ती जाती है। जब सारा ध्यान बाहर केंद्रित होता है, तो हम तीव्रता से आगे बढ़ते हैं, किन्तु हमारा आँतरिक पतन भी उतनी ही तीव्रता से होने लगता है। अतः बाह्य इच्छा पर केंद्रित होने से पूर्व हमें स्वयं के प्रति सच्चा बनना होगा व प्रसन्नता की खोज पहले भीतर करनी होगी। बाह्य उपलब्धियां सुख-शाँति का सृजन तभी करती हैं, जब ये तत्व अंदर भी विद्यमान हों। सच्ची इच्छा और अपने उत्कट प्रयास से कोई भी इन्हें अर्जित कर सकता है और यह हर व्यक्ति की पहुँच में है।
इसे पाने की विधि को वे चार चरणों में स्पष्ट करते हैं। इनमें से सर्वप्रथम है-दृष्टिकोण की स्पष्टता, इसके अंतर्गत सबसे पहले हमें यह जानना होगा कि हम कहाँ खड़े हैं ? अर्थात् अंतः बाह्य संतुलन के लिए हमें क्या करना है ? क्योंकि यदि दिशा सही न हो तो किसी भी तरह के प्रयास प्रतिकूल परिणाम ही उत्पन्न करेंगे। मन, भाव व इंद्रियों के साथ आत्मा की इच्छा के अनुरूप कार्य करने पर अंतः बाह्य सफलताओं का मार्ग प्रशस्त होता है।
इसके दूसरे चरण में हमें स्वयं को जानने के साथ स्वयं के प्रति सच्चा बनना भी होगा। बाहरी सफलता पर धन केंद्रित करने से पूर्व आँतरिक प्रसन्नता को खोजना होगा। इसके लिए मनीषी जॉन ग्रे दस प्रकार के प्रेम संबलों की समझ को अनिवार्य बताते हैं। इन्हें वे आत्मा का पोषण करने वाले विटामिनों की संज्ञा देते हैं। इनमें से किसके पास किस तरह के विटामिनों का अभाव है और वे उन्हें कैसे पा सकते हैं ? इस समझ के साथ ही आँतरिक सफलता का अनुभव शुरू होता है।
इनमें से सबसे पहला है-प्रभु प्रेम का संबल, इसके अभाव में जीवन घोर संघर्ष बन जाता है। जिसमें प्रायः हम थक-हार जाते हैं, क्योंकि हम सोचते हैं कि सब कुछ हमें स्वयं ही करना हैं और हमारी छोटी-सी सामर्थ्य सदा ही हमें आशंकाओं-निराशाओं से घेरे रहती है। नित्य ध्यान-उपासना के क्षणों में हम प्रभु से प्रेमसंबंध स्थापित कर इस संबल को पा सकते हैं।
जॉन ग्रे की भाषा में इस विटामिन-1 के बाद विटामिन-2 की आवश्यकता होती है। विटामिन-2 माँ-बाप यानि के अभिभावकों का प्रेम संबल है। इसके बिना जीवन असुरक्षा, अपर्याप्तता एवं हीनता के भाव से ग्रस्त रहता है। भावसंतुलन गहरे तनाव की स्थिति पैदा कर देता है। कुशल मनःचिकित्सक बहुत कुछ अपना बेशर्त प्रेम देकर इस कमी को पूरा कर सकते हैं। वैसे प्रभुप्रेम इसकी पूर्ति का एक निरापद तरीका है। विटामिन-3 जिन-परिजनों का प्रेम संबल है, इसके अभाव में जीवन अति गंभीर हो जाता है। दोस्त-मित्रों से जीवन हलका-फुलका हो जाता है, साथ ही स्वयं को अपने वास्तविक रूप में स्वीकार करने में भी मदद मिलती है।
विटामिन-4 समकक्ष जनों का प्रेम संबल है। इसकी पूर्ति हम अपनी रुचि की किसी सामूहिक गतिविधि, खेल की टीम या क्लब आदि में शामिल होकर पूरी कर सकते हैं। विटामिन-5 स्व प्रेम का संबल है। यह विशुद्ध रूप से स्वयं से प्रेम करना है। हम जैसे भी हैं अच्छे-बुरे, उसे उसी रूप में स्वीकार करना और अपने भाग्यनिर्माता के रूप में दुर्बल पक्ष को सुधारने व अच्छे पक्ष को उभारने के लिए नित्य कुछ समय निकालना। जिसमें आत्मनिरीक्षण क्षरा अपनी सर्वांगीण प्रगति का ताना-बाना बुना जा सके। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि जब तक स्वयं से प्रेम न करेंगे, तब तक कोई अन्य भी हमसे प्रेम न करेगा। अतः सबसे पहले हमें स्वयं से प्रेम करना होगा।
जॉन ग्रे के अनुसार, इन पाँच विटामिनों के मिलते ही आँतरिक सफलता का मार्ग खुलने लगता है और अधिकाँश समस्याएं हल होना शुरू हो जाती है। इनके अलावा पाँच विटामिन और हैं, जो हमारे व्यक्तित्व को सुविकसित करते हैं। इनमें से विटामिन-6 है आत्मीय जीवन सहचर का प्रेम संबल, इसमें परस्पर प्रेम का आदान-प्रदान होने से भावनात्मक संतुष्टि मिलती है। विटामिन-7 यह बच्चों या आश्रितों पर बेशर्त प्रेम है। यदि बच्चे न हाँ तो पालतू पशु या पेड़ पौधों पर यह प्रयोग किया जा सकता है। इस तरह का बेशर्त प्रेम करने से आत्मा सबल हो जाती है।
विटामिन-8 अपने समुदाय-परिवेश को सुँदर-सुरम्य बनाने में अपना सहयोग देना है। यह जीवन में मिले उपहारों को बाँटने की प्रक्रिया है। विटामिन-9 समूचे समाज और विश्वमानव का प्रेम संबल। यह स्वयं के असीम आत्मविस्तार की प्रक्रिया है। इन सभी प्रेम संबलों की प्रक्रिया में जब अनुभवों की पूँजी बढ़ी-चढ़ी होती है, तो स्वयं की अंतःप्रज्ञा भी बढ़ी-चढ़ी होती है। लोग भी अधिकाधिक विश्वास करते हैं। तब विश्वमानव तक सेवा का विस्तार व्यक्तित्व के नूतन आयाम खोलता है। ऐसे में व्यक्ति अधिक आयु के बावजूद ज्यादा जीवंत एवं युवा महसूस करता है। इसके बाद विटामिन-10 की बारी आती है। जॉन ग्रे के अनुसार, उपर्युक्त प्रेम संबलों के पोषण के बाद जीवन का पुष्प खिल जाता है, प्रेम छलकने लगता है व पूर्ण समर्पण की स्थिति आती है और व्यक्ति प्रभु का एक यंत्र बन जाता है। तब वह जो इच्छा करता है, वह प्रभु की ही इच्छा होती है।
मनीषी जॉन ग्रे का आंकलन है कि इन प्रेम विटामिनों के सहारे हम आत्मा के संपर्क में आते हैं व आँतरिक सफलता को पाते हैं। सच्ची इच्छा उद्दीप्त होती है और हम बिना अपनी आँतरिक शाँति को खोए इच्छित वस्तु को पाना शुरू करते हैं। जब अंतःप्रज्ञा से संपर्क होता है, तब अतिवाद तक जाने की संभावना भी नहीं रहती। यहाँ श्रम से अधिक विश्वास साथ देता है। यहाँ अपनी सीमा से अतिक्रमण का बोध नकारात्मक भावों के उठने से हो जाता है। और हम उस कार्य को छोड़कर प्रभु की ओर मुड़ जाते हैं, क्योंकि अब प्रभु ही हमारे सब कुछ होता है। ग्रे के अनुसार, अब तो बस कार चलाने के लिए स्टेयरिंग पर हाथ रखकर उसे संभालना होता है, न कि गाड़ी को धक्का लगाना, क्योंकि वह तो इंजन स्वयं कर लेता है। इसी तरह परमेश्वर की ओर मुड़ने से जीवनयात्रा अधिक सरल हो जाती है।
हम जो वास्तव में चाहते हैं, वस्तुतः उसे जानना इतना आसान नहीं है। इसमें हमारे कुछ नकारात्मक भाव प्रबल रूप से आड़े आते हैं। जॉन ग्रे ने इस तरह के पथ अवरोधक 121 तरह के भावों का उल्लेख किया है।
इनमें से सर्वप्रथम-1. परनिंदा एवं क्रोध। दूसरों को भला-बुरा कहने व नुकसान पहुँचाने के भाव से हमारे जीवन का नियंत्रण दूसरे लोगों के हाथों में चला जाता है। अपनी दुर्दशा के लिए दूसरों को दोष देने की वृत्ति से हम जितना मुक्त होते हैं व क्षमाभाव को धारण करते हैं, हमारी रचना शक्ति उतनी ही बढ़ती है व प्रेम की कुँठित शक्ति उतनी ही मुक्त होती है।
2. निराशा व अवसाद। यह प्रायः तब अनुभव होता है, जब यह विचार सिर पर चढ़ा रहता है कि मनचाही वस्तु या लक्ष्य को पाने का एक ही तरीका है, जबकि उसके कई विकल्प उपलब्ध होते हैं। दस प्रेम संबलों की समझ हमें इनका दिग्दर्शन करवाती है। दूसरा जब तक हमें जीवन में जो मिला है, उसके प्रति अपना हृदय खुला नहीं रखते, तब तक हम अपने उज्ज्वल भविष्य का अनुमान नहीं लगा सकते।
3. संशयजन्य उद्विग्नता। भूतकाल की कुछ अनसुलझी गुत्थियाँ ही वर्तमान में उद्विग्नता का कारण बनती हैं। इनका परिष्कार आवश्यक है।
4. नकारात्मक भावों को सही ठहराना। जब हम परिस्थिति को बदलने की अपनी नैसर्गिक क्षमता पर विश्वास रखते हैं, तभी नकारात्मक भावों को उचित सिद्ध करते हैं, किन्तु इससे मुक्त हुए बिना समस्या हल नहीं होती। नकारात्मक भावों का उदात्तीकरण मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। यह विश्वास असहाय एवं शक्तिहीन अवस्था में भी समाधान यानि कि सकारात्मक परिणामों की आशा दिलाता है।
5. कटाक्ष, विद्रोह का भाव। दूसरों के प्रति व्यक्त यह भाव गहराई में स्वयं के प्रति होता है। दूसरों में हम वह देख रहे होते हैं, जो हमें स्वयं में पसंद नहीं। हालाँकि दूसरों से असंतोष बहुत गलत नहीं है, किन्तु कटुता-तिक्तता हमें हृदय के प्रेम से काट देती है। हम दूसरे की अद्वितीयता को नकारते हैं, उसके प्रतिकूल व्यवहार से अधीर एवं कुँठित हो जाते हैं।
6. अनिर्णय एवं किंकर्त्तव्यविमूढ़ता की स्थिति। इसमें हम तब उलझते हैं जब दिशानिर्धारक आँतरिक क्षमता से विलग हो जाते हैं। इससे उबरने के लिए हमें पहले की असफलताओं से सबक लेते हुए जीवनलक्ष्य के प्रति स्पष्ट दृष्टि रखनी होगी।
7. दीर्घसूत्रता। इसका तात्पर्य है-जीवन में जो कर सकते हैं, उसे न करना। ऐसी स्थिति में हमारी इच्छाशक्ति कभी पवित्र एवं सशक्त नहीं होती और हम आधा-अधूरा जीवन जीने के लिए विवश होते हैं।
8 पूर्णतावादी होना। यह अतिवाद है, जीवन अपूर्णता से पूर्णता की ओर प्रवाहमान है। जब हम इस तथ्य से शून्य होते हैं, तो पूर्णतावादी बन जाते हैं। ग्रे का कहना है कि बाह्य जीवन में पूर्णता का आग्रह रखना स्वस्थ चाह नहीं है। इसकी पूर्ति हम आँतरिक जीवन में प्रभु से जुड़कर कर सकते हैं।
9. क्षोभ एवं द्वेश। ऐसी स्थिति तब बनती है जब हम भूतकाल में जी रहे होते हैं। ध्यान नकारात्मक पर लगा होता है व ऐसा लगता है कि देने के लिए कुछ नहीं है। यह अनुदारता क्षोभ उत्पन्न करती है। क्षोभ इस बात का स्पष्ट संकेत होता है कि हम गलत दिशा में काफी ध्यान दे रहे हैं। इसी तरह दूसरों में दोषदर्शन की जगह हमें स्वयं से प्रेम व अन्य प्रेम संबलों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। तभी हम द्वेश से मुक्त हो पायेंगे।
10. आत्मदया का भाव। ग्रे के अनुसार, आत्मदया के भाव से हम तब ग्रसित होते हैं, जब जीवन में उपलब्ध सफलताओं एवं अनुदानों को नकारते हैं और सारा ध्यान कमियों पर केंद्रित करते हैं।
11. संभ्राँति। यह तब होती है जब जीवन के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं होता। सभी उत्तर तुरंत चाहते हैं और प्रश्नों के साथ जीने की कला नहीं जानते। आवश्यकता है-भूतकालीन सीखों को धन्यवाद देने की व हर कटु अनुभव से शिक्षण पाने के अभ्यास की। क्योंकि जीवन कभी चुनौतियों से खाली नहीं होता। हाँ हमारी इनसे जूझने की क्षमता अवश्य बढ़ती रहती है।
12. अपराधबोध। यह तब पनपता है जब हम स्वयं से प्रेम नहीं करते व अपनी गलतियों को क्षमा नहीं करते। ऐसी स्थिति में हम अपनी मासूमियत से वंचित हो जाते हैं। इस मासूमियत के अनुभव के लिए यह समझ जरूरी है कि गलतियों के बावजूद हम प्यार के काबिल हैं।
इन बाधाओं के निराकरण का प्रयास बाह्य सफलताओं की तरह समय, ऊर्जा व समर्पण की माँग करता है। दस प्रेम संबलों के साथ, इनके प्रति सतत् जागरुकता एवं इनका अध्यवसायपूर्वक परिशोधन करते हुए हम गहनतम इच्छा के संपर्क में आना शुरू करते हैं। ग्रे यहाँ पर नकारात्मक भावनाओं के दमनचक्र के प्रति सचेत करते हुए कहते हैं कि जब नकारात्मक भावों का हम उदात्तीकरण नहीं कर पाते, तो सरलतम तरीका उनका बहिष्कार एवं दमन रह जाता है। परिणामस्वरूप हम अपनी वास्तविक इच्छा से दूर हो जाते हैं, जबकि व्यक्ति को अपनी शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक एवं अध्यात्मिक सभी तरह की इच्छाओं का सम्मान करना होगा। इन्हें सम्मान करने का अर्थ उनको क्रियारूप में परिणत करना नहीं है बल्कि उनको सुनना, समझना और उन्हें सुसंगत करना है। ऐसी स्थिति में रूपांतरण स्वतः ही होने लगता है। जब किसी एक स्तर पर उत्पन्न इच्छा दूसरे स्तरों से सद्भावपूर्ण हो तो वह सच्ची इच्छा होगी। जितना हम अपनी सच्ची इच्छा के संपर्क में आएंगे, प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता जाएगा और हमारे सपनों का संसार साकार रूप लेने लगेगा।
एक बार पत्रकारों की गोष्ठी में बापू राजनीतिक प्रसंगों पर उत्तर दे रहे थे। उसी समय हास्य-विनोद की मुद्रा में एक पत्रकार ने पूछा कि यदि आपको एक दिन के लिए भारत का डिक्टेटर बना दिया जाए, तो क्या करेंगे ? बापू जी ने कहा-मैं सभी विचारशील व्यक्तियों और सरकारी कर्मचारियों को सफाई में जुटा दूँगा। सफाई ही सुव्यवस्था है। इसका जब तक महत्व न समझा जाएगा, तब तक किसी व्यक्ति या देश की वास्तविक उन्नति होना असंभव है।
सूर्यदेव समूचे विश्व को अपने प्राण-अनुदान बाँटने के लिए आ चुके थे। समूची प्रकृति उनके आज के इस प्रथम स्पर्श से पुलकित थी। प्रातःकाल के ये क्षण बड़े ही सुहावने थे। महर्षि पिप्पलाद अपना कुटिया में आत्मचिंतन में लीन थे, तभी भार्गव वैदर्भी ने उन्हें श्रद्धाभाव से प्रणाम किया और एक ओर खड़ा हो गया। महर्षि ने उसे अपने पास बुलाते हुए बैठने का संकेत करते हुए कहा-आयुष्मान् ! तुम्हारी मानसिक परेशानियों का शमन हो गया अथवा नहीं ? तुम्हें और क्या जानना शेष है ? तुम्हारे मन में जो संशय-शंकाएं हों, उन्हें तुम मुझसे पूछ सकते हो।
भार्गव वैदर्भी पलभर मौन रहकर विनम्र स्वर में बोला- भगवान् आपके सान्निध्य में आकर कोई अभागा ही होगा, जो मानसिक परेशानियों से घिरा रहे, किन्तु मेरा मन अभी भी प्रश्नों और तर्कों से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो पाया है। मैं इसीलिए आपसे यह जानना चाहता हूँ कि कितने देव इस आश्चर्यजनक सृष्टि को नमन करते हैं, कौन से देव इस सृष्टि को प्रकाशित करते हैं, इसका ज्ञान कराते हैं और कौन से देव उन सभी में मुख्य और श्रेष्ठ हैं ? हे देव ! आप कृपा करके मुझे यह ज्ञान दीजिए।
महर्षि पिप्पलाद भार्गव वैदर्भी के इन प्रश्नों को सुनकर थोड़ा चिंतनलीन हुए और उनके अधरों पर मंदस्मित झलका। जिसकी आभा उनके समूचे मुखमंडल पर फैल गई। वह बोले- वत्स ! आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, वाक्, चक्षु, कान ये सभी देवता है। इंद्रियों के द्वारा ये सभी मिलकर देवों की शक्ति को प्रकाशित करते हैं और प्राणी के शरीर को धारण करते हैं।
इनमें श्रेष्ठ कौन है, इस विषय में मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ। एक समय की बात हैं, सभी इंद्रियाँ आपस में संघर्ष करने पर उतारू हो गई। सभी अपने को श्रेष्ठतम सिद्ध करना चाहती थी। उन सबमें वरिष्ठ प्राण ने उन्हें काफी समझाने की कोशिश की कि आखिर तुम लोग झगड़ती क्यों हो ? किन्तु इंद्रियाँ चुप होने को तैयार न थी। हर एक अपने को दूसरे से श्रेष्ठ बता रही थी। प्राण बड़ी चिंता में पड़ गया कि जड़ जगत् के पाँचों महाभूत एवं चेतन जगत् की पाँचों इंद्रियाँ आपस में उलझ गई हैं। प्राण ने उन्हें फिर से समझाने की कोशिश की कि क्यों तुम सब बेकार के मूर्खतापूर्ण अभिमान के चक्कर में पड़े हो। मैं ही अपने को पाँच प्राणों में बाँटकर जड़-चेतन सृष्टि रूपी इस छप्पर को धारण किए हुए हूँ।
प्राण की इन बातों को सुनकर इंद्रियों के साथ पंच-महाभूत भी बुरी तरह से बौखला उठे। उन्होंने किसी भी तरह उसके कथन को मानने से इनकार कर दिया। प्राण ने तब उनसे कहा-चलो यही सही, तुम्हीं अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करो। नेत्रों को भारी गर्व था कि वे देख सकते हैं। उन्होंने दूसरों से कहा, तुम सब हम पर निर्भर होकर ही अपना काम कर पाती हो। यदि हम क्षणभर को भी विराम ले लें, तो तुम सब अपने आप ही निरर्थक हो जाओगी।
वाणी यह अपना अपमान सहन न कर सकी। तत्काल उसने व्यंग्यबाण छोड़ा और धमकाते हुए सबको डाँटा और कहा- मेरे बिना क्षणभर तो तुम अपना काम चला नहीं सकती, जबकि मैं तो दूसरी इंद्रियों के बगैर भी शरीर धारण करने में सक्षम हूँ। उसका यह बड़बोलापन कानों से सहा न गया। उन्होंने वाणी को टोकते हुए कहा-तुम चाहे जितना क्रोध में चिल्लाकर कहती रहो, पर जब तक हमारा अस्तित्व न होगा तुम्हारी सारी चेष्टाएं विफल हो जाएंगी। हमारे बिना तुम सभी का अस्तित्व बेकार ही है।
मन अभी एक कोने में खड़ा मौन भाव से सबकी बातों को सुनता हुआ अपने संकल्प-विकल्प की वीथियों में विचरण कर रहा था और साथ-ही-साथ इंद्रियों की मूर्खतापूर्ण बातों का उपहास कर रहा था, किन्तु इनकी बातें सीमा से बाहर चले जाने पर उसका अब मौन बने रहना असंभव हो गया। अपने स्वभावानुसार वह गंभीर स्व में कहने लगा, अरी इंद्रियों ! मैं तुम्हारा वाहन हूँ। तुमसे जैसा चाहूं वैसा काम करवा सकता हूँ। मेरे नियन्त्रण से बाहर जाने पर तुम्हारी सारी महत्ता धरी-की-धरी रह जाएगी।
आँखों और कानों को तो मन की यह बात कुछ समझ में आई और वे शाँत भी हुए, पर वाणी भला इतनी आसानी से कहाँ चुप होने वाली थी, उसने मन को ललकारा और कहने लगी, मन तुम्हारी अपने आप में भला क्या सत्ता है ? तुम तो हम सब पर ही आश्रित हो। यदि हम सब मिलकर तुम्हारा सहयोग न करें, तो तुम किस तरह अपना काम कर सकोगे ? अब तो मन भी चंचल हो उठा। अविवेकी मन ने भी मान लिया और वाणी ने अपनी धाक जमा ली। फिर क्या था, वाणी ने फिर से दूसरी इंद्रियों को भी धमकाना शुरू किया। वे भी कब तक चुप रहतीं। अब तो झगड़ा उग्र-से-उग्रतर होता गया। प्राण उनकी मूर्खता पर मुस्करा रहें थे, पर वे चुप रहे।
ये सब लड़ते-लड़ते प्रजापति के पास जा पहुँची। प्रजापति ने उनका सारा झगड़ा सुना और उन्होंने सभी को शाँत करते हुए कहा- हे इंद्रियवंद! तुम सबकी बातें सुनकर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि तुम सब श्रेष्ठ हैं। फिर क्या था वाणी सबसे पहले अपनी श्रेष्ठता की धाक जमाने के लिए सभी से विद्रोह करके एक वर्ष के लिए चली गई और जाते-जाते कहती गई-अब पता चलेगी तुम सबको मेरी महिमा। मेरे न रहने पर तुम सबकी जो दुर्दशा होगी, उसके परिणाम खुद-ब-खुद सामने आ जाएँगे। उसे भ्रम था कि वाणी से रहित होने पर लोग न तो बोल पाएँगे और न कुछ काम कर सकेंगे।
एक साल बिताकर वाणी जब वापस लौटी तो वह अपनी महिमा पर स्वयं में बड़ी प्रसन्न हो रही थी। वह सोच रही थी कि सब-की-सब इंद्रियाँ उसके अभाव में परेशान हो उठी होंगी और उसके पहुँचते ही प्रसन्नता से भर जाएँगी। इस तरह सब पर अपने ही आप उसका रौब चल जाएगा। पर यहाँ हुआ उलटा, सभी इंद्रियों ने उसके पहुँचते ही उस पर व्यंग्य किया-अरे! तुम एक साल तो क्या दस साल भी न लौटतीं, तो इस शरीर का कोई अनिष्ट नहीं कर सकता था। आखिर हम जो थीं यहाँ। वाणी का गर्व हो गया, वह लज्जित हो गई। उसकी मुखरता फीकी मुसकान में विलीन होकर रह गई। कानों और आँखों की भी यही गति हुई। मन ने भी विद्रोह किया, पर विद्रोह के एक वर्ष की अवधि में भटकते हुए उसे कुछ ऐसा लगा, जैसे कि वह स्वयं को ही सता रहा हैं।
प्राणों के लिए अब यह इंद्रियों का अति भौतिकवाद असहनीय हो चला था। अब उसने जड़-चेतन से उत्क्रमण करना शुरू कर दिया। प्राण का विद्रोह करा भर था कि पाँचों इंद्रियाँ अपनी जड़ से हिल गईं। वे उसके साथ ही शक्तिहीन हो गई और स्वयं भी निकलने लगीं। जब प्राण फिर से स्थिर हुआ, तब वे पुनः स्थिर हो पाई। यह सब कुछ ठीक उसी प्रकार घटित हुआ, जैसे मधुमक्खियों में रानी मक्खी के उड़ जाती हैं और उसके बैठ जाती जाने पर फिर से सब-की-सब बैठ जाती हैं। प्राण के विचलित होते ही दूसरी इंद्रियों का भी अस्थिर होना स्वाभाविक था। अब उनका यह भ्रम टूट गया और उन्हें विश्वास हो गया कि हम सभी का अस्तित्व प्राण पर ही निर्भर हैं। सभी ने प्राण से व्याकुल भाव से याचना की कि वह उन सबको छोड़कर कहीं न जाए। क्योंकि उसका एक पल का वियोग ही शरीर को व्यर्थ व नष्ट कर देगा। जड़ जगत् के पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश तथा चेतन जगत् की सभी इंद्रियाँ मिलकर प्राण की प्रीतिपूर्वक स्तुति करने लगे।
महर्षि पिप्पलाद अपनी अंतर्चेतना की गहनता में निमग्न होकर यह सारा विवरण देते जा रहे थे। कालगति जैसे थम गई थी। आसपास के वातावरण में गहरी निस्तब्धता थी। प्राण की महिमा स्पष्ट करते हुए पिप्पलाद ने कहा, संपूर्ण जातिगत भेद-विभेद और आयोजनों का मूल आधार जीवन ही हैं। जैसे रथ के पहिये की नाभि से अरे लगे होते हैं, वैसे ही सब कुछ जीवन से ही जुड़ा है और यह प्राण ही जीवन है। यही जीवनरूपी पहिये की नाभि हैं। यज्ञ आदि के साथ सभी संस्कारों के कर्मकाँड भौतिक शक्ति सब कुछ इसी प्राण में अवस्थित हैं।
यही प्राण देवों की अग्नि हैं। पितरों की स्वधा है, ऋषियों में चरित है, अथर्वांगिरस का सत्य हैं। यही प्राण तेजस्वी इंद्र है। रक्षाकर्म के कारण वही रुद्र है, अंतरिक्ष में प्रवाहित वायु भी यही हैं। यही पर्जन्य बनकर जलवर्षा करता है। यही वनस्पतियों और अन्न का रूप धारण करता है। इसी के आधार पर जीवन टिका हुआ हैं। इसी प्राण के वश में सब कुछ हैं। इंद्रियाँ भी प्राण की इस महिमा से अभिभूत थीं। उन्होंने प्राण से प्रणत हो निवेदन किया, हे प्राण! अब तुम उत्क्रमण मत करो, जो तुम्हारा रूप हमारे मन में भरपूर प्राणशक्ति का संचार हो। हे प्राण! आ हमारी इस प्रकार से रक्षा करो, जैसे माता अपने पुत्रों की रक्षा करती हैं। अब आप ही हमारे लिए श्री एवं प्रज्ञा विधान करें, ताकि हम भौतिक ऐश्वर्य और आध्यात्मिक सौंदर्य से सुशोभित हो सकें।
महर्षि पिप्पलाद के इन वचनों को सुनकर भार्गव वैदर्भी विस्मयमुग्ध थे। अब वे प्राण की महिमा को जान चुके थे। परंतु अब उनमें प्राणविद्या को जानने की जिज्ञासा बलवती हो उठी। वह प्राणविद्या के उस विज्ञान एवं विधान का जानना चाहते थे, जिसके आचरण, अनुकरण एवं प्रयोग से प्राणों को नियंत्रित एवं संयमित किया जा सके। जिसके द्वारा स्वयं में असीमित ऊर्जा का प्रखर प्राणभंडार स्वयं में संजोया जा सके। महर्षि से उनकी यह आंतरिक उथल-पुथल छुपी न रह सकी। उन्होंने करुणार्द्र दृष्टि से कहा-पूछो वत्स! तुम क्या पूछना चाहते हो।
हे प्रभु! मैं इस प्राणविद्या का विज्ञान-विधान जानना चाहता हूँ। भार्गव वैदर्भी के इन शब्दों में उसकी उत्कट जिज्ञासा की स्पष्ट गूँज थी।
महर्षि के मन में आज अनूठी शिष्यवत्सलता थी। बिना एक पल की देर लगाए वह करने लगे-”गायत्री विद्या ही प्राणविद्या हैं। चौबीस अक्षरों वाले गायत्री महामंत्र में प्राणविद्या का समस्त विज्ञान -विधान निहित है। महर्षि आत्मनिमग्न हो बोल रहे थे-सूर्य ही समस्त सृष्टि के प्राणों का आदि स्त्रोत हैं वत्स! सभी जीवधारी, वृक्ष-वनस्पति इसी से प्राणों का अनुदान पाते हैं। इसी की प्रचंड ऊर्जा प्रखर प्राणचेतना बनकर समूचे ब्रह्माँड में संव्याप्त देव हैं।”
हे भगवान! कहते हुए भार्गव वैदर्भी ने कुछ और पूछना चाहा, परंतु महर्षि तो जैसे आज स्वयं की गहराइयों में पूर्णतः विलीन हो चुके थे। वे ब्रह्मस्पंदनों से अनजान बोले जा रहे थे- ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। यह चौबीस अक्षरों वाला मंत्र सविता देवता का शब्द रूप हैं। सविता के साथ समूची सृष्टि के रहस्य इसमें सँजाए और समाए हैं। वाणी से इसका जप, मन से इसका अर्थ-अनुसंधान एवं हृदय से सविता देव के प्रति पूर्णतः समर्पित होकर उनका ध्यान, जीवन और सृष्टि के समस्त रहस्यों को स्वयमेव उद्घटित कर देता है। इस महामंत्र के उच्चारण के साथ सवितादेव के ध्यान का योग होते ही सृष्टि में संव्याप्त वैश्व प्राणचेतना जीन से एकाकार हो जाती है और अनंत अपने आप ही मानव चेतना में समाता चला जाता है।
महर्षि पिप्पलाद के इन वचनों को सुनकर भार्गव वैदर्भी का अंतर्मन प्राणविद्या के शुभ प्रकाश से आलोकित हो उठा। उसने गुरुचरणों में प्रमाण किया और निवेदन किया, हे प्रभु! अब मुझे सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों ही विषयों के संदर्भ में कोई संदेह नहीं रह गया है। मैं कृतार्थ और कृतकृत्य हो गया हूँ देव। अब मैंने जान लिया है कि गायत्री महामंत्र ही सृष्टि एवं जीवन का सार है। इसकी उपासना से भौतिकता एवं आध्यात्मिकता दोनों ही सुलभ हैं। गायत्री महामंत्र का जप एवं सविता देव का ध्यान ही प्राण को सुपुष्ट, मन को सतेज, इंद्रियों को सचेतन, हृदय को पवित्र एवं जीवन को बलवान बनाता है। भार्गव वैदर्भी के इन स्वरों में उसके आत्मबोध की झलक थी।
महर्षि पिप्पलाद विश्व के स्वामी सविता देव की प्राणचेतना की प्रचंड धारा लीन अभी भी ध्यानावस्था में थे। विस्मय-विमुग्ध वैदर्भी उनकी चरणधूलि लेकर अपनी कुटिया में लौट गए। उन्होंने अपने साथी अंतेवासियों को गुरुसुख से ज्ञात प्राणमहिमा और गायत्री विद्या का रहस्य बताया। यह सब जानकर उसके उन्य सभी साथियों के मन में भी सविता देव के प्रति भक्ति जाग उठी। वे सबके सब भी गायत्री महामंत्र की साधना में लीन होने लगे।
कुछ कर दिखाएँ
युग-परिवर्तन के लिए जिस सबसे बड़े साधन की, माध्यम की आवश्यकता है वह यही है कि मनस्वी प्रतिभाएँ क्षुद्रता की जकड़न को शिथिल करें और महानता के स्वर्ण सिंहासन पर जा विराजे। जो दूसरों से कराया जाना अपेक्षित हैं, उसे स्वयं कर दिखने के लिए साहस जुटाएँ और विशिष्टता की कसौटी पर अपने को खरा सिद्ध करके दिखाएँ।
--वाङ्मय 27,पृ0 6.26
नई सहस्राब्दी एवं सदी की अपेक्षा यही है कि इनसान ज्यादा समझदार बने और दुनिया को परमाणु बमों कि विनाशकारी खतरे से छुटकारा दिलाए। 6 अगस्त व 1 अगस्त 1245 ई. को हिरोशिमा और नागासाकी में जो कुछ भी हुआ, वह नई सदी में भी भुलाया नहीं जा सकेगा। वहाँ बहे रक्त से इनसानियत का दामन जिस तरह से दागदार हुआ, वह आसानी से धुलने वाला नहीं है। वहाँ उठी पीड़ा-कराहटों एवं सिसकियों की गूंज विश्वनभ में इतने सालों बाद भी थाती नहीं हैं। हालाँकि इन्हें सुन पाना उन्हीं के बूते की बात है, जिनमें मानवीय सोच और समझ हैं।
पहला परमाणु बस अमेरिका के कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जे.आर. आपेन हाइमर ने बनाया था। उन्होंने 16 जुलाई 1245 ई. को न्यूमैक्सिको अलमोगार्डो के उत्तरी रेगिस्तान भाग में इसका विस्फोट परमाणु विखंडन की प्रक्रिया से होता है। इसमें संवर्द्धित व समृद्ध प्लेटोनियम का उपयोग किया जाता है। इस विनाशकारी परंपरा के नए हथियार हाइड्रोजन बम की शक्ति 10 मेगाटन की होती हैं। इसके निर्माण में ड्यूटोरियम व ट्राइटियन का उपयोग होता है। यह साधारण परमाणुबम से तीन हजार गुना शक्तिशाली होता है। पहले-पहल इसे अमेरिका ने 1251 ई. में प्राप्त किया। अब तो यह रूस, इंग्लैंड, फ्रांस तथा चीन सहित कुछ अन्य देशों के पास भी हैं।
परमाणु हथियारों की विध्वंसक क्षमता को और आगे बढ़ाया सैमुअल टी. कोहेन ने। जिन्होंने न्यूट्रोन बम की खोज की। इसका विस्फोट उच्चशक्ति वाली लेजर किरणों से किया जाता है। इसका प्रभाव केवल जीवधारियों पर पड़ता है, अन्य भौतिक साधनों-सामग्रियों पर नहीं। इसके विस्फोट का मतलब है, विश्वविनाश का अंतिम एवं सर्वनाशी युद्ध लड़ना। इन नाभिकीय हथियारों को और अधिक घातक एवं प्रहारक बनाने के लिए मिसाइल तथा वारहेड भी बना लिए गए हैं। अमेरिका ने अपनी ‘थियेटर मिसाइल डिफेंस’ योजना के तहत सारे संसार में प्रक्षेपास्त्रों का जाल बिछा दिया हैं। इस जंगी बेड़े में आसमान में उड़ते उपग्रह भी तैनात हैं। इस तकनीक ने समूचे संसार को एक तरह से मिसाइल की नोकों पर लटका दिया हैं।
अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध पत्रिका न्यूजवीक ने अपने एक अंक में विभिन्न देशों में उपलब्ध परमाणु जखीरे का ब्यौरा दिया है। इस विवरण के अनुसार, अमेरिका व रूस के पास विश्व के 15 प्रतिशत नाभिकीय आयुध मौजूद हैं। रूस एवं अमेरिका के पास यदि इस तरह के विभिन्न उपक्रमों की संख्या हजारों में है, तो दूसरे तीन अंकों का सैकड़ा तो रखते ही हैं। उदाहरण के लिए, फ्राँस की परमाणु हथियार भंडारण क्षमता 482 वारहेड, 18 एल.बी.एम., 374 एस.बी.एम. तथा 80 परमाणु बम हैं। ब्रिटेन व चीन की स्थिति भी ‘हम किसी से कम नहीं’ की उक्ति को चरितार्थ करने वाली है। नवीनतम सर्वेक्षण के अनुसार, चीन ने अपने पास 1600 परमाणु बम रखने का दावा किया है। अब तो भारत और उसके शरारती पड़ोसी पाकिस्तान ने भी परमाणु हथियार बना लिए हैं। इनके अलावा ईराक, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, अर्जेन्टीना, लीबिया, अल्जीरिया, उत्तरी कोरिया, जापान, क्यूबा व आस्ट्रेलिया जैसे देशों के पास या तो परमाणु बम हैं या फिर ये बनाने की क्षमता रखते हैं।
परमाणु बम बनाने के प्रयुक्त साधन यूरेनियम एवं प्लेटोनियम भंडारण की क्या स्थिति है ? इसकी रिपोर्ट मोनेटरी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडी इन कैलीफोर्निया के विलियम पोर्टर नरे तैयार की है। उनके अनुसार रूस के पास एक हजार टन परिष्कृत यूरेनियम तथा 170 टन समृद्ध प्लेटोनियम का विशाल भंडार है। परंतु वहाँ की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाने के कारण इसका रखरखाव ठीक से नहीं हो पा रहा है। परिणामस्वरूप तस्करों की बन आई है। पूर्वी यूरोपीय देशों में 1993 में 53 मामले और 1994 में 124 मामले पकड़े गए। बरामद हुए इन पदार्थों से कई बम बनाए जा सकते हैं।
अमेरिका के पास 21 परमाणु हथियार केंद्र है। इसके संपूर्ण घोषित परमाणु हथियार 4000 से 10,000 मेगावाट के बराबर हैं। हग एवरेट और जी.ई. पग ने इस संबंध में पर्याप्त शोध की है। अपने इस शोध अध्ययन को उन्होंने ‘बायोलॉजिकल इन्वायरन्मेंटल इफेक्ट ऑफ न्यूक्लियर वार’ के नम से प्रकाशित किया है। उनके अनुसार,समूची दुनिया के पास जो सम्मिलित रूप से परमाणु हथियार हैं, उसका यदि मात्र 15 से 20 प्रतिशत का प्रयोग किया जाये तो लगभग दस लाख वर्ग कि.मी. जैसे व्यापक क्षेत्र में भीषण अग्निज्वाला जंगल की आग की भाँति भड़क उठेगी। सारे हथियारों के प्रयोग से तो पृथ्वी को कई बार राख की ढेरी में बदला जा सकता है।
‘प्रोग्रेस आँर कैटास्ट्राफी’ में बेंटेले ग्लास ने भी कुछ इसी तरह से सर्वेक्षण किया है। उनके अनुसार 1500 मेगावाट का विस्फोट 630 लाख व्यक्तियों को मारने की क्षमता रखता है। 10000 मेगाटन के विस्फोट से तो पुराने सोवियत संघ के पूरे क्षेत्रफल के 70 फीसदी लोगों को पूरी तरह से विनष्ट किया जा सकता है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि वस्तुतः परमाणु विस्फोट से बचे हुए लोग भी इसके विकिरण के आँशिक असर से मर जाएंगे।
‘एक्शन ऑफ रेडियेशन आँन मेमेलियन सेल्स’ में विज्ञानवेत्ता टी.टी. पक ने आनुवांशिकी पर विकिरण के प्रभाव का विस्तार से उल्लेख किया है। इनके अनुसार, परमाणु विकिरण से न केवल कोशिकाएं बल्कि क्रोमोसोम्स भी क्ष्ज्ञत-विक्षत हो जाते हैं। वाशिंगटन के ‘जेनेटिक कमेटी ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस’ ने परमाणु विकिरण के आनुवंशिक प्रभाव को तीन प्रकार से बताया है, क्रोमोसोम्स का टूटना, टूटे भाग का नष्ट हो जाना तथा जीन म्यूटेशन। इसे जे.जी. कार्लसन, एम.ए. बैडर, एन.पी. डुबीनीन तथा जे.पी. ब्रावन जैसे वैज्ञानिकों ने भी प्रमाणित किया है। इनके अनुसार, परमाणु विकिरण से जो जेनेटिक प्रभाव होते हैं, उससे भावी पीढ़ी का विकलाँग होना सुनिश्चित है।
विस्फोट से निकले आयोडीन-131 की घातक अवधि एक माह तक रहती है। इसके विकिरण से थाइराइड ग्लैंड की प्रत्येक कोशिका नष्ट हो जाती है। स्ट्राँशियम-89 अपना विषाक्त प्रभाव 53 दिनों तक बनाए रखता है। इससे निकली बीटा किरणें अस्थि कोशिकाओं एवं मज्जा को विनष्ट कर डालती हैं। कैसियस-137 की प्रभावी आयु 30 वर्षों तक होती है। इससे बीटा तथा गामा किरणें विकसित होती हैं, जो प्रजनतंत्र पर बुरा असर डालती है। कार्बन-14 तो हजारों साल तक अपना प्रभाव बनाए रखता है। इसका प्रभाव जीन को म्यूटे कर देता है, जिससे भावी संतान विकलाँग हो जाती है। यूरेनियम-38, रेडियम-26 एवं पोटेशियम-40 आदि रेडियोएक्टिव तत्वों का विषाक्त अंश भी हजारों साल तक बना रहता है। इसकी वजह से फेफड़े, गुरदे, आँख तथा स्नायुसंस्थान में असाध्य बीमारियाँ फैलती है।
डीन जोनाथन ने परमाणु विस्फोट से पैदा होने वाले वीभत्स दृश्य के बारे में कुछ इस तरह से कहा है- “जब अस्पताल, पानी, बिजली, परिवहन, उत्पादन तथा व्यापार समाप्त हो जाएगा और सर्वत्र सड़ी-जली लाशों की दुर्गंध फैल रही होगी, तो कौन-सा व्यक्ति या कौन-सा समाज उस रौरव नरक के बीच जीना चाहेगा।”
परमाणु युद्ध से उत्पन्न होने वाले पर्यावरण संकट का शब्दचित्र विश्वविख्यात अमेरिकन विज्ञानवेत्ता कार्लसाँगा ने खींचा है। उनके अनुसार, भौगोलिक एवं जैवीय संपदा में रासायनिक जहर घुल जाने से रक्ताल्पता, पीलिया, मूर्छा आदि बीमारियाँ सामान्य हो जाएंगी। यह नाभिकीय शीत ऋतु महाप्राण निराला की शत ऋतु की सर्पिणी की भाँति हिंस्र हो उठेगी। करोड़ों टन धुएं और धूल के काले बादल वातावरण पर काली परत चढ़ा देंगे। पृथ्वी के तापमान में 40 से 50 डिग्री की जोरदार गिरावट आएगी। नाभिकीय शीत ऋतु का एक मॉडल 1983 में रिचर्ड टुर्को, ओवेन टून, थामस एकरमेन, जेम्स पोलैंड आँर कार्ल साँगा ने तैयार किया था। इसे टेप्स मॉडल के नाम से जाना जाता है। इसके अनुसार तब पुराणोक्त रौरव नकर साकार हो उठेगा। इसमें बचे रहेंगे, तो सिर्फ काक्रोच या तिलचट्टे। क्योंकि ये ही हैं, जो चार लाख रंटजन की तीव्रता को आसानी से पचा सकते हैं।
इस भयावह विनाश से बचने और बचाने के लिए अधिक न सही तो थोड़े से लोगों ने तो जरूर सोचा है। इसी सोच का परिणाम है, ‘परमाणु विद्युत ऊर्जा परियोजना’। इस समय संसारभर में 560 परमाणु संयंत्रों से विद्युत किया जा रहा है। 26 देशों में परमाणु ऊर्जा केन्द्रों से 300 गीगावाट बिजली पैदा हो रही है। एक गीगावाट दस हजार लाख वाट के बराबर होता है। एक टन यूरेनियम 235 को जलाने से तीन लाख टन कोयले के बराबर शक्ति मिलती है। 2000 टन यूरेनियम से एक लाख मेगावाट विद्युत का उत्पादन किया जा सकता है।
हालाँकि इन परमाणु संयंत्रों का एक दूसरा पहलू है, जो वैज्ञानिक दुनिया के सामने एक महाप्रश्न की तरह है। यह सवाल है, परमाणु कचरे को ठिकाने लगाना। परमाणु ऊर्जा को उत्पन्न करने वाले सभी देश इस समस्या से बुरी तरह चिंतित और व्यथित है। साथ ही इसके विकिरण से जहाँ एक ओर ओजोन कवच नष्ट होता है, वहीं दूसरी ओर इन संयंत्रों के पास रहने वाली आबादी विभिन्न शारीरिक, मानसिक एवं आनुवंशिक रोगों का शिकार होती है। फिर भी यह परमाणु क्षमता का न्यूनतम खतरा है, ऐसा माना जा सकता है।
दुनिया को परमाणु खतरे से बचाने के लिए सबसे पहले सन् 1963 ई. में आँशिक परीक्षण प्रतिबंध संधि हुई। 1967 ई. में लैटिन अमेरिका में नाभिकीय हथियारों पर प्रतिबंध के लिए दूसरी महत्वपूर्ण संधि हुई। 1968 में एन.पी.टी. तथा 1972 में एंटी बैलेस्टिक मिसाइल संधि हुई। इसी वर्ष रासायनिक हथियारों के बारे में भी समझौता हुआ। सन् 1985 ई. में दक्षिण पैसिफिक को सर्वसम्मति से परमाणु मुक्त क्षेत्र के रूप में स्वीकारा गया।
इन सबके बाद बहुचर्चित सी.टी.बी.टी. यानि कि व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि सामने आई। इन दिनों इस संधि की योजना समूचे देश एवं समूची दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है। आखिर यह है क्या ? तो इसका जवाब निम्न बिन्दुओं में है-
1- कोई भी परमाणु क्षमता संपन्न देश किसी अन्य देश को न तो कोई परमाणु हथियार देगा और न ही इसके निर्माण या प्रयोग के लिए उसे प्रेरित करेगा।
2- संधि पर हस्ताक्षर करने वाले कोई भी गैर परमाणु क्षमता संपन्न देश किसी क्षमता संपन्न देश से परमाणु हथियार या प्रौद्योगिकी प्राप्त नहीं करेंगे।
3- (क) हर परमाणुरहित देश अंतर्राष्ट्रीय परमाणु एजेंसी के निर्णय को मानेगा। (ख) शाँतिपूर्ण उपयोग के लिए भी परमाणु तकनीक का आदान-प्रदान यह एजेंसी ही करेगी। (ग) शाँतिपूर्ण उपयोग के लिए यदि किसी तरह का परमाणु विस्फोट किया जाता है, तो इसकी जाँच-पड़ताल भी यही एजेंसी करेगी।
4- इस संधि को मानने वाले देश हथियारों की होड़ कम करने का प्रयास करेंगे।
5- परमाणु हथियारों पर रो लगाने के लिए कुछ देशों के समूह अलग संधि या प्रयास कर सकते हैं।
इस परमाणु अप्रसार संधि पर 5 मार्च 1970 में अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्राँस और चीन ने हस्ताक्षर किए थे। जबकि विश्व में कुल स्वतंत्र राष्ट्रों की संख्या 221 है। इनमें से 185 देश तो संयुक्त राष्ट्र के सदस्य है। हालाँकि इस परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने वाले सदस्य देशों की संख्या 178 हो चुकी है और इस संधि से संबंधित किसी प्रस्ताव के अनुमोदन के लिए 90 देशों की सहमति आवश्यक है। परंतु यह संधि है बड़ी भेदभाव भरी। इसके तहत सिर्फ पाँच देशों को ही परमाणु हथियार रखने का अधिकार प्राप्त है अन्य को नहीं। इसकी अनेकों खामियों के चलते भारत ने अब तक हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
इसे यदि कुछ यों कहा जाए कि दुनिया के कुछ प्रभावशाली देश अपने परमाणु हथियारों के बल पर इस संधि के सहारे अपने वर्चस्व को बरकरार रखना चाहते हैं, तो कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं। क्योंकि इस संधि के प्रभाव में आने के बाद से परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र कम से कम नौ बार गैर-परमाणु क्षमता संपन्न देशों पर आक्रमण की धमकी दे चुके है। लगभग आठ देशों में नाभिकीय होड़ स्पष्ट दिखाई दे रही है। परमाणु विध्वंसकों की तादाद में कम से कम पाँच गुना बढ़ोतरी हुई है। संधि पर हस्ताक्षर करने के बावजूद फ्राँस व चीन ने परमाणु परीक्षण किए हैं। अमेरिका जीरोयील्ड के तहत अपनी ही प्रयोगशाला में अनगिन परमाणु परीक्षण करता चला जा रहा है। दिखावा कुछ भी हो, पर उसकी राहें अभी बदली नहीं।
जबकि नई सदी नई सोच की माँग करती है। यह सोच ऐसी हो, जो दुनिया में शाँति व समृद्धि की नई राहें बना सके और उस पर चलने की हिम्मत जुटा सके। अब तक हमने जो भूल की, उनका प्रायश्चित करने का ठीक यही समय है। इक्कीसवीं सदी को उज्ज्वल भविष्य का रूप देने के लिए जिस प्रबल पुरुषार्थ की अपेक्षा है, उसे आज से-अभी से शुरू करना पड़ेगा। हम सबको इसके लिए संकल्पित होना पड़ेगा कि नई सदी में हमारे कदम विध्वंस और विनाश की नहीं, शाँति और सृजन की राह पर चलें।
इक्कीसवीं सदी को उज्ज्वल भविष्य का रूप देने के लिए जिस प्रबल पुरुषार्थ की अपेक्षा है, उसे आज से-अभी से शुरू करना पड़ेगा। हम सबको इसके लिए संकल्पित होना पड़ेगा कि नई सदी में हमारे कदम विध्वंस और विनाश की नहीं, शाँति और सृजन की रा पर चलें।
“अक्टूबर 99 में उड़ीसा में आया समुद्री तूफान इस सदी का आखिरी और सबसे बड़ा तूफान था। उड़ीसा में आए भीषण चक्रवाती तूफान के रास्ते में जो कुछ भी आया वह ध्वस्त हो गया, परंतु कोणार्क का प्रसिद्ध सूर्य मंदिर उसके बावजूद ज्यों-का त्यों रहा।
सूर्य मंदिर के आसपास का क्षेत्र हालाँकि तूफान से हुई भीषण तबाही की कहानी कह रहा है। लगभग सात सौ वर्ष पुराना यह स्मारक समूचे पूर्वी भारत में अंतर्राष्ट्रीय स्वर की एकमात्र साँस्कृतिक धरोहर है। सन् 1255 में गेग वंश के शासक सम्राट नरसिंह देव द्वारा बनाया गया सूर्य मंदिर तूफान के दौरान भी खुला था और इसे कोई क्षति नहीं पहुँची है।--एक समाचार
महायोगी अरविंद जब योगसाधना में प्रवृत्त हुए और उन्हें सिद्ध संतों की कृपा मिलने लगी, तो एक प्रेरणा स्वामी रामकृष्ण परमहंस की ओर से भी आई। सूक्ष्मजगत का नियम है कि जब भी कोई निष्ठापूर्वक साधना उपासना में प्रवृत्त होता है, तो उस मार्ग पर आगे तक पहुँची विभूतियाँ सहायता और पथप्रदर्शन के लिए दौड़ी आती है। श्री अरविंद के संबंध में कहते हैं कि उनकी साधना से असंख्य मुमुक्षुओं को मार्ग मिलना था उनके योग का संदेश है कि साधक ही मुक्ति की कामना नहीं करता, मुक्त करने में उसका अपना पुरुषार्थ ही काम नहीं आता, दिव्य शक्तियाँ भी सहयोग करती हैं। मुक्त होने की तीव्र आकाँक्षा हो तो दिव्यचेतना भी उतरकर आती है और साथ ही पथप्रदर्शन करती है। श्री अरविंद की साधना जगत् हित के लिए भी थी, इसलिए कई दिव्य शक्तियाँ और मुक्त आत्माएं उनकी सहायता के लिए आती थी। श्री अरविंद जिन दिनों साधना कर रहे थे, उन दिनों रामकृष्ण परमहंस की ओर से संदेश आया, ‘मंदिर बनाओ,’ मंदिर बनाओ’।
आश्रम में चलने वाली साँध्यवार्ताओं में एक बार श्री अरविंद ने साधकों से इव अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि संदेश मिलने के समय उन्हें स्पष्ट नहीं हो सका था। वे समझ नहीं पाए कि परमहंस मंदिर बनाने के लिए क्यों कह रहे है ? आश्रम विकसित होने के बाद वे जा पाए कि परमहंस का आशय एक ऐसे जीवंत और जाग्रत केंद्र बनाने से था, जहाँ साधकों को आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने में अनायास ही सहायता मिले। वहाँ का वातावरण, संस्कार और गतिविधियाँ दिनचर्या इस तरह निर्धारित हों कि साधक जितना प्रयास के, उससे कई गुना ज्यादा लाभ मिले। उसकी प्रगति तीव्र गति से हो।
जिन दिनों मंदिर जाग्रत् और जीवंत केंद्र होते थे उन दिनों वे समाज की प्रमुख गतिविधियों के केंद्र होते थे। आज भी हैं। लेकिन अभी उनका महत्व पूजापाठ, आरती तक ही सीमित है। इन्हें जीवंत नहीं कहा जा सकता। जिस तरह दूसरी सार्वजनिक इमारतें होती है, मंदिर भी उन्हीं में से एक है। इतना जरूर है कि वे दूसरी इमारतों और केंद्रों की तुलना में सात्विक हैं।
जिस आर्षदृष्टि ने उनकी कल्पना की, रूपरेखा बनाई और उन्हें आकार दिया, उसकी झलक आधुनिक मंदिर में नहीं दिखाई देती। आर्षदृष्टि ही थी कि मंदिर को अपने और समाज के जीवन में शीर्ष पर रखा गया। आप पाएंगे कि किसी गाँव में हो सकता है पक्का मकान न हो, लेकिन मंदिर के रूप में एक पक्का भवन या छोटा शिवालय जरूर होगा। श्रद्धालुओं ने अपने पास जो कुछ भी मूल्यवान था, उसे मंदिर में अर्पित किया। घरों में अंधेरा रखकर भी मंदिरों में घी के दीप जलाए। फटे-पुराने वस्त्र पहनकर भी अपने इष्ट-आराध्य के विग्रह को महंगे आभूषणों से सजाया। मंदिर के पुजारियों और अधिकारियों-प्रबंधकों के लिए सुविधासंपन्न साधन जुटाए। उनके लिए सुखपूर्वक रहने के इंतजाम किए।
मंदिर किसी भी अर्थ में साधारण या भव्य किस्म के भवन नहीं है। वे भव्य से अधिक दिव्य हैं। जिन मंदिरों की दिव्यता खो गई, वे काल के थपेड़ों में नष्ट हो गए। दिव्य होने का आशय मंदिरों में जगाई गई वह ऊर्जा है, जो साधक को अपनी ओर आकर्षित करे। इस ऊर्जा को जगाने के लिए स्थापना से लेकर व्यवस्था और दिनचर्या तक विशेष उपाय किए गए। उन उपायों की शुरुआत मंदिर का स्वरूप तब करने से होती है। सामान्य भवन मामूली नींव खोदने और गारा-मिट्टी डालकर भर देने के अलावा सामान्य पूजापाठ से बनना शुरू होते हैं। वास्तुशास्त्र और कला के आधार पर उनकी डिजाइनिंग की जाती है। मंदिरों के लिए इन प्रारंभिक बातों का ध्यान तो रखा ही जाता है, विशिष्ट साधना-उपचार के अनुष्ठान भी किए जाते हैं, वे मंदिर को आरंभ से ही ऊर्जावान बनाते हैं।
मंदिरों के जीवंत-जाग्रत् होने की पहचान बताते हुए एक रहस्यदर्शी महात्मा का कहना है कि कोई मानवीय प्रयत्न और प्राकृतिक विपदा इसको नष्ट नहीं कर सकती। समुद्री तूफान के बावजूद कोणार्क का सूर्य मंदिर नष्ट नहीं होने का एक कारण यह भी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सूर्य मंदिर पूर्ण अर्थ में जीवंत जाग्रत है। स्थापना से साधना-अनुष्ठान तक वहाँ जो प्रवृत्तियाँ चलती रहीं, जो प्रयास किए गए, उनके संस्कार अवशेष रूप में मंदिर को टिकाए रहे। यदि वह पूर्ण जाग्रत् होता, तो वहाँ जाने वाले पर्यटकों को आत्मिक उत्थान की दिशा में बढ़े बिना चैन नहीं पड़ता। मंदिर किसी समय जीवंत हरा होगा। उसकी सामर्थ्य और जीवनीशक्ति के बारे में यह आँशिक प्रमाण ही है कि तूफान जिसने पूरे इलाके में प्रलय मचा दी और कोणार्क का कुछ नहीं बिगड़ा। मात्र कोणार्क ही क्यों, बहुसंख्य मंदिर-उपासनागृह निताँत सुरक्षित बने रहे।
उड़ीसा को प्रकृति ने बड़े लाड़−दुलार से सजाया है। यहाँ समुद्र अपने तट पर सीपियाँ बिखेरता है। धरती उत्तम प्रकार की प्रस्तर चट्टानों से भरी हुई है। प्रकृति की शोभा-सुषमा प्रकृति प्रेमियों का ध्यान खींचती है। पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर से करीब पैंतीस किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में सूर्य मंदिर शान से खड़ा है। बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में बने इस मंदिर का रंग समय के थपेड़ों के कारण काला पड़ गया है। आधुनिक गवेशक इसे बौद्ध विहार के रूप में देखते हैं। उनके लिए यह “काला पैगोड़ा” है। दूर से देखने पर यह अति विशालकाय और रहस्यमय दिखाई देता है। पास जाने पर इसकी आयोजना अति सरल दिखाई देती है। देवल अर्थात् मंदिर का वह चबूतरा, जिस पर देवप्रतिमा स्थित होती है। जगमोहन, नटमंडप, भोगमंडप; मंदिर के गर्भगृह और आसपास के स्थानों में विशेष प्रतिमाएं नहीं हैं। पूजा-अर्चा तो ठप पड़ी हुई है। फिर भी मंदिर अहसास दिलाता है कि किसी समय वह भव्य और दिव्य था।
अभी यह स्थान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की देख−रेख में है। विभाग के भुवनेश्वर कार्यालय के निदेशक एस.एल. राव ने कहा कि उन्होंने तूफान के बाद एक टीम के साथ मंदिर की प्रारंभिक जाँच की। विभिन्न रासायनिक पड़तालों से निष्कर्ष निकला कि प्राँगण में भले ही समुद्र का खारा पानी भर गया हो, मिट्टी इकट्ठी हो गई हो, मंदिर की दीवारों को कोई क्षति नहीं पहुँची। आँधी-तूफान के वेग से कुछ वृक्ष गिर गए। उनका कूड़ा-कबाड़ जमा हो गया। पुरातत्व विभाग मंदिर के क्षरण को बचाने के लिए प्राँगण की रसायनों से सफाई की योना बना रहा है। हालाँकि उसके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि सैकड़ों साल से मंदिर फिर भी कैसे सुरक्षित बचा रहा।
प्राकृतिक दृष्टि से मंदिर की शोभा-सुषमा बढ़ाने वाले वृक्ष-वनस्पतियाँ का भारी नुकसान चक्रवात के कारण हुआ है। लेकिन यह हानि पहले भी हो रही थी। अर्थलोभी व्यापारी और शिकारी पेड़ काट रहे थे, वहाँ पाए जाने वाले वनचरों का नाश कर रहे थे। सैकड़ों हिरणों और लुप्तप्राय प्रजाति काले मृग का निवासस्थान बालूखंड अभयारण्य पूरी तरह नष्ट हो गया है। बहुत कुछ विनाश तो पहले ही हो चुका था, रहा-सहा तूफान ने उजाड़ दिया। किसी को नहीं पता कि यहाँ रहने वाले पशु-पक्षियों का क्या हश्र हुआ होगा। समुद्र में आए ज्वारभाटे से उठी पानी की तेज लहरों के साथ बह गए होंगे। पुरी और कोणार्क के बीच से गुजरने और अभयारण्य में से होकर जाने वाला 35 किलोमीटर मार्ग भी जगह जगह पर टूट गया है।
पुरातत्व विभाग की चिंता है कि मंदिर के आसपास के पर्यावरण का क्या हुआ होगा ? वहाँ छाए रहने वाले वन और पेड़ मंदिर के लिए कवच का काम करते थे। वास्तुविद् कह देंगे कि सूर्य मंदिर का निर्माण ऐसे पत्थर से किया गया है, जो आसानी से क्षरित नहीं होता। यहाँ तक तो स्थापत्य का कमाल मान सकते हैं, लेकिन मंदिर की प्रेरणाओं और संदेशों का श्रेय स्थापना से पहले और उस समय किए गए साधना-उपचारों को ही दिया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, मंदिर के बाहर परकोटे और परिक्रमा में रतिक्रीड़ा चित्रित करती मूर्तियां है। इस तरह की मूर्तियां और मुद्राएं कहीं और चित्रित होती, तो उन्हें देखकर मन में निश्चित रूप से कामविकार उत्पन्न होता। लेकिन कोणार्क के बाहर बनी मुद्राओं के संबंध में ऐसा नहीं है। उन्हें शांतचित्त से देखने पर गर्भगृह में पहुँचने पर साधकों को ध्यान की गहरी अनुभूति हुई है। खजुराहो, पुरी और दिलवाड़ा के मंदिरों की परिक्रमा में इस तरह का शिल्प देखकर भी लोगों को मन के विकार शाँत होने की अनुभूति हुई है। नैतिक मूल्यों को आत्यंतिक महत्व देने वाले आँदोलनों ने इन मंदिरों का विरोध भी किया है। पचास के आसपास कुछ सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने मंदिरों की दीवारों को लेप देने के लिए छुटपुट आँदोलन छेड़े थे। मंदिरों का बचाव करने वाले रहस्यदर्शी साधक आगे नहीं आए होते, तो वे मंदिर शायद नष्ट कर दिए जाते। इन पर अंकित मूर्तियां तो कम-से-कम हटा दी जाती।
कोणार्क का सूर्य मंदिर सविता देवता के पृथ्वी पर अवतरण को चित्रित करता हुआ बनाया गया है। कश्मीर का मार्तंड मंदिर और गुजरात का मोढेरा मंदिर भी सूर्य की आराधना-उपासना के लिए ही है, लेकिन कोणार्क मंदिर अपने आप में विशिष्ट है। सूर्यरथ के आकार में बने इस महालय को सात अलंकृत अश्व खींचते हुए दिखाए गए हैं। ये अश्व सूर्य की सात किरणों के प्रतीक हैं। रथान के नीचे दोनों ओर बारह पहिये बने हुए हैं। प्रत्येक पहिया दस फुट ऊँचा है। इस मंदिर को नष्ट करने के लिए बारह आक्रमण हुए और हर बार उन्हें मुँह की खानी पड़ी। चक्रवात और समुद्री तूफान तो कई बार आए होंगे। उन सबके बीच मंदिर स्थिर रहा।
हजार साल पुराने मंदिरों में पुरी का जगन्नाथ मंदिर भी है। सन् 1030 में बने इस मंदिर को करीब नब्बे साल बाद एक बार मरम्मत की जरूरत पड़ी। उसके बाद यह काल और उन्माद के थपेड़े खाता रहा, लेकिन कुछ नहीं बिगड़ा, चौदहवीं शताब्दी में बंगाल के सामंत काला चाँद उर्फ काला पहाड़ ने पुरी मंदिर पर कई आक्रमण किए। एक बार तो उसने पुजारियों को गड्ढे खोदकर गले-गले तक मिट्टी से दबा दिया। उनके सिर जमीन से बाहर रहने दिए और उन पर घोड़े दौड़ा दिए। इन ज्यादतियों के बावजूद मंदिर की परंपरा अविच्छिन्न रही। क्या रहस्य था ? महामहोपाध्याय कविराज लिखते हैं कि मंदिर में साधना-उपासना के कारण तेजस् इतना घनीभूत था कि लाख प्रयत्न करते हुए भी कोई उसे नष्ट नहीं कर सका। जो पुजारी घोड़ों की टापों से कुचल दिए गए, वे युद्ध भी कर सकते थे। लेकिन किन्हीं गुह्य कारणों से उन्होंने आत्मोत्सर्ग का मार्ग चुना। उनके बलिदान से मंदिर युद्धभूमि में बदलने से बच गया।
सोमनाथ मंदिर में भी एक समय तक इसी तरह की प्रखरता बनी रही। ग्यारहवीं शती में महमूद गजनी ने मंदिर को लूटा। उस समय तक मंदिर की प्रखरता बनी रही। स्वामी वामदेव ने उस समय रचे गए संस्कृत काव्य ‘सोमपुलय’ की टीका में लिखा है कि दो सौ वर्षों से सोमनाथ में ‘महामृत्युँजय अनुष्ठान’ चल रहा था। महमूद गजनी के आक्रमण से तीन महीने पहले पुजारियों के अंतर्कलह से अनुष्ठान अवरुद्ध हो गया। उससे मंदिर की सुरक्षा पंक्ति शिथिल हुई और सोमनाथ की लूट संभव हो सकी। स्वामी वामदेव ने ‘महामृत्युँजय’ के अलावा ‘कालचक्र’ ‘सोम अभिषेक’ ‘शैव शृंगार’ जैसे अनुष्ठानों का भी उल्लेख किया है। इनमें कोई अनुष्ठान दो वर्ष पहले, तो कोई छह महीने पहले बद हो गए। कहते हैं कि इन अनुष्ठानों चलते मंदिर में श्रद्धालुओं ने सोमनाथ के दिव्य विग्रह के सहज ही दर्शन किए।
उज्जयिनी के महाकाल मंदिर में तेजस् और प्रखरता के जीवंत रहने तक गर्भगृह के बाहर बने कुँड से शिव-पार्वती को हर-हर कहते हुए निकलते देखने के काव्यात्मक वर्णन मिलते हैं। मंदिर के तीसरे तल पर बने नाग मंदिर में श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन दिव्य सर्पों के दिखाई देने की किंवदंती भी प्रचलित है। इन उल्लेखों में तथ्यात्मक सच्चाई भले न हो, इस सत्य की ओर संकेत तो है ही कि महाकाल परिसर में किसी समय तेजस्-वर्चस् छाया रहता था। उस कारण आततायियों की आँख इस पर कभी टिक नहीं सकी। दक्षिण की लूट के वापस आते हुए महमूद गौरी यहाँ से कुछ किलोमीटर दूर कई हफ्तों आराम करता रहा। उसने मंदिर को लूटने के मनसूबे भी बाँधे, लेकिन वह कामयाब नहीं हो सका। मंदिर की पौरोहित्य परंपरा से संबद्ध रहे पंडित श्रीनाथ शर्मा कहते हैं कि मंदिर की दिव्य व्यवस्था गड़बड़ाते ही क्षिप्रा भी सूख गई और परिसर में अक्सर दुर्घटनाएं घटने लगी। अब वह दिव्य आभामंडल भी वहाँ अनुभव नहीं होती।
मंदिरों का तेजस् और वर्चस् से संपन्न होने के ढेरों प्रमाण गिनाए जा सकते हैं। उनकी निष्पत्ति यही है कि देवता बनकर ही देव की आराधना की जानी चाहिए। देवस्थान वहाँ प्रतिष्ठित देवता के लोक की तरह दिव्य हो तभी साधकों का कल्याण करते हैं। यह मंदिर को जीवंत और चैतन्य देखने की अनिवार्य शर्त है।
देवालयों में ईश चेतना का निवास होता है, यह भारतीय संस्कृति की मान्यता है। युगों-युगों से ये जाग्रत जीवंत देवालय मानव मात्र को प्रेरणा देते हरे हैं। पिछले दिनों आए उड़ीसा के तूफान में जहाँ बड़े-बड़े भवनों-पूरे गाँवों का समुच्चय नष्ट होता चला गया, वहीं बहुसंख्य देवालय सुरक्षित बने हरे। क्या कारण है इसका ! दैवी ऊर्जा जो मंदिरों में प्राण प्रतिष्ठा के साथ जगाई जाती है, वही इन्हें जाग्रत केंद्र बनाती है।
“मैं कौन हूँ ? क्या हूँ ? क्यों हूँ ? कैसे हूँ ?” इन प्रश्नों ने उसके मन में तीव्र उथल-पुथल मचा रखी थी। वह अपनी जिज्ञासा के समाधान के लिए भगवान तथागत के पास गया। भगवान उस समय जैतवन में एक विशाल वट की छाया में बैठे ध्यान में लीन थे। उसकी आकुल पुकार से उनकी तन्मयता भंग हुई। उनके करुणार्द्र नेत्र कमलदलवत धीरे-धीरे खुले। उन्होंने बड़े ही भावमय स्वर में पूछा- “तुम कौन हो वत्स ?”
“यही जानने तो मैं आपके पास आया हूँ ?” उसने बड़े ही आकुल स्वरों में अपनी व्यथा प्रभु को निवेदित करते हुए कहा- “वैसे पुरजन परिजन मुझे यथागत के नाम से पुकारते हैं।”
महात्मा बुद्ध ने उसके चेहरे की ओर एक नजर देखा। उसके चेहरे पर व्याकुलता झलक रही थी। एक क्षण के लिए रुककर उन्होंने उसे संबोधित करते हुए कहा-”तुम्हारा प्रश्न है आत्मविज्ञान के लिए। मैं एक साधारण-सा व्यक्ति भला यह तत्वज्ञान तुम्हें कैसे समझा सकता हूँ ?” भगवान तथागत उसकी जिज्ञासा को कसौटी पर कस रहे थे।
परंतु जिज्ञासु अपने मंतव्य पर दृढ़ था। उसकी जिज्ञासा उत्कट और तीव्र थी। उसके नेत्रों में भगवान तथागत के कथन पर निराशा की बजाय आस्था के भाव दृढ़ हुए। वह कहने लगा- “आप सामर्थ्यवान हैं, प्रभु ! यदि आपके चरणों के सान्निध्य में भी मेरे मन को शाँति न मिली, तो मैं यहीं प्राण त्याग दूँगा।
तथागत विचारमग्न हो गए। वह सोचने लगे, आत्मज्ञान तो है-मन वाणी से परे अनुभूति का विषय। मात्र शब्दों द्वारा इसे किसी प्रकार भी समझाया नहीं जा सकता। किंतु जिज्ञासु तो है सच्चा, पूर्ण अधिकारी। कुछ करना ही होगा। “ठीक है, कुछ दिन यहीं पर मेरे पास रहो और जो मैं तुमसे कहूँ, तुम वैसा ही करो।” तथागत बोले।
“आप जैसा कहेंगे, वैसा ही करूंगा। मुझे आदेश करें भगवन्।” यथागत का चेहरा अब आशा और उल्लास से चमक रहा था। “अभी तो इतना ही करो। तुम रोज सुबह नगर में जाया करो और रात को लौटकर वहाँ के सभी समाचार मुझे सुनाया करो।”
“जैसी आज्ञा भगवन्” यथागत ने सिर झुकाया। प्रभु का आदेश मानकर अब वह नियमित रूप से नगर जाता और वहाँ से लौटकर वहाँ की सारी घटनाएं तथागत को ज्यों-की-त्यों सुना देता। महीनों यह क्रम अविराम गति से चलता रहा। अचानक एक दिन तथागत ने पानी से भरी हुई थाली उसे दी और कहा- “आज यह थाली अपने साथ लेकर तुम्हें नगर में जाना होगा। लेकिन सावधान रहना, पानी की एक बूँद भी थाली से नीचे गिरने न पाए। लौटकर रोज की तरह नगर का पूरा हाल मुझे सुनाना।”
इसके बाद उसी के सामने अपने एक अनुगत शिष्य को बुलाकर तथागत ने आज्ञा दी।--तुम एक तीक्ष्ण धार वाली तलवार लेकर इस यथागत के पीछे-पीछे जाओ। इसके हाथों की थाली से एक बूँद भी पानी गिरे, तो तुरंत वहीं इसके हाथ काट देना ! मेरे पास पूछने के लिए भी आने की जरूरत नहीं।”
“जो आज्ञा प्रभु !” अनुगत शिष्य ने कहा और तलवार लेकर यथागत के पीछे-पीछे जाने को तैयार हो गया।
नित्य नगर जाकर समाचार लाने की एक ही दिनचर्या से वह ऊब-सा गया था। आज कार्यपरिवर्तन तो हुआ, पर बड़ा ही रोमाँचक एवं अत्यंत दुस्साध्य। वह बेहद डर गया। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि तथागत ऐसा अद्भुत, अनोखा और साथ ही इतना भयानक आदेश भी देंगे। खैर ! बड़ी सावधानी से पानी से भरी थाली लिए यथावत ने नगर की ओर प्रस्थान किया। नंगी तलवार लिए दूसरा शिष्य उसकी थाली कड़ी नजर रखते हुए उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।
रास्ते में लोग कुतूहल और विस्मय से इस दृश्य को देखते और परस्पर अनुमानादि तर्कों से इस विस्मयदायक दृश्य का समाधान ढूंढ़़ते, पर यथागत का ध्यान थाली और उसके पाली को छोड़कर कहीं भी अन्य किसी ओर जरा भी नहीं था। जब कोई कुछ पूछता, तब भी वह उत्तर न दे पाता। फिर विगत दिनचर्या के क्रम में समाचार संग्रह की सुधि भी उसे कहाँ ? जैसे-तैसे, शनैः-शनैः पूरे नगर का परिभ्रमण पूरा हुआ। रात को दोनों लौटकर भगवान तथागत के पास पहुँचे। कहना न होगा, थाली से एक भी बूँद पानी नीचे नहीं गिरा था।
“नगर के सभी समाचार सुनाओ।” भगवान तथागत ने उसे अपना आदेश कह सुनाया। “लेकिन प्रभु ! नगर तो आज मैं जरा भी नहीं देख पाया। फिर वहाँ के समाचार मैं आपको कैसे सुनाऊँ भगवन्।” यथागत ने विनम्रतापूर्वक कहा।
“क्यों ? नगर से ही तो तुम आ रहे हो! क्या पूरे दिन नगर का चक्कर तुमने नहीं लगाया ?”
“लगाया तो है भगवन्!” यथावत बोला। “फिर नगर नहीं देखा। ऐसा क्यों कहते हो ?” पूछा तथागत ने।
“आपने मेरे नगर भ्रमण के साथ ही अपने अनुगत शिष्य को यह आदेश भी तो दिया था कि थाली से एक भी बूँद पानी नीचे गिरे, तो मेरे दोनों हाथ वह उसी समय तलवार से काट दे। इस वजह से भयाक्राँत हो, मैं एक पल के लिए भी अपना ध्यान थाली से नहीं हटा सका। फिर नगर भला कैसे देख पाता।” यथागत ने उत्तर दिया।
“बस वत्स, बस यही है आत्मज्ञान की कला, आत्मविद्या की प्राप्ति का उपाय। जिस प्रकार थाली में से पानी गिरने के डर से तुम पूरे नगर में घूमते हुए भी, कुछ भी देख-सुन न सके। तुम्हारे मन की वृत्तियाँ जरा-सी भी इधर-उधर नहीं गईं। यद्यपि नगर की सजावट, चहल-पहल, राग-रंग एवं घटनाक्रम सभी कुछ तो पूर्ववत ही थे। फिर इसके बावजूद भी तुम्हारा ध्यान वह अपनी ओर किंचित मात्र न खींच सके .............।”
“ ............................ ठीक उसी प्रकार संसार की सारी मोह-ममता को छोड़कर, सभी वस्तुओं-व्यक्तियों से ध्यान हटाकर दीपक की लौ की तरह सच्चे एकाग्र मन से एक परमात्मा में ही ध्यान लगा दो, तो धीरे-धीरे तुम्हारा स्वरूप तुम्हारे सामने स्पष्ट होगा और होगा तुम्हारी सभी शंकाओं का समाधान। इसी के साथ उपलब्ध होगा तुम्हें अपने सभी प्रश्नों का उत्तर और मिलेगी मन को परम अध्यात्मिक शाँति। यही है निर्वाण का पथ और तुम्हारा जीवनलक्ष्य !” इतना कहकर भगवान तथागत समाधिस्थ हो गए। यथागत भी तथागत होने की राह पर चल पड़ा।
एक सेठ बहुत धनी था। उसके कई लड़के भी थे। परिवार बढ़ा पर साथ ही सबमें मनोमालिन्य, द्वेश एवं कलह रहने लगा। एक रात को लक्ष्मीजी ने सपना दिया कि मैं अब तुम्हारे घर जा रही हूँ। पर चाहो तो चलते समय एक वरदान माँग लो। सेठ ने कहा-भगवती आप प्रसन्न हैं, तो मेरे घर का कलह दूर कर दें, फिर आप भले ही चली जाएं।
लक्ष्मीजी ने कहा- मेरे जाने का कारण ही गृहकलह था। जिन घरों में परस्पर द्वेश रहता है, मैं वहाँ नहीं रहती। अब जबकि तुमने कलह दूर करने का वरदान माँग लिया और सब लोग शाँतिपूर्वक रहेंगे तब तो मुझे भी वहीं ठहरना पड़ेगा। सुमति वाले घरों को छोड़कर मैं कभी बाहर नहीं जाती।
महिषपुर नगर में रविदत्त नामक एक व्यक्ति रहता था। अपने पशुओं को चराता व गृहस्थी में व्यस्त रहता था। विद्वानों का एक समूह तीर्थाटन करते गाँव में आया। सामूहिक उद्बोधन में वे बोले-क्यों इन व्यर्थ के बखेड़ों में तुम सब अपना जीवन नष्ट कर रहे हो। व्यर्थ संचय न करो। परलोक की तैयारी करो। रविदत्त ने उपदेश का प्रारंभिक आधा भाग ही सुना और ब्रह्मज्ञान प्राप्ति की लालसा से घर से निकल भागा। घाटियाँ-वन-उपत्यिकाएं पार कर एक संत के पास पहुँचा, जो चिड़ियों को दाने चुगा रहे थे।
बड़ी देर तक उनने ध्यान नहीं दिया, वह झुंझला उठा- “आप कैसे संत है। हम कब से खड़े आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। हमें भी ब्रह्मज्ञान दीजिए।” अनाज की टोकरी उसके हाथ में थमा संत बोले- “आओ ! तुम भी इन्हें दाना चुगाओ। यह मस्ती व आनंद का साम्राज्य देखो।” रविदत्त आपा खोकर संत को भला-बुरा कहने लगा। तब बिना किसी उत्तेजना के उन्होंने उसे अपनी बाँहों में भर लिया। वे बोले- “भाई ! जिसे तुम खोज रहे हो-वह शास्त्रों उपदेशों में नहीं है। उसे तो तुम आपा खोकर खो ही रहे हो। फूलों की सुगंध और अग्नि की ऊष्मा की तरह आनंद तो तुम्हारे भीतर कैद है। उसे कैद से मुक्त करो, खिलो और अपना सौरभ, हंसी सबको बाँटो। कर्त्तव्यपालन के द्वारा इस सृष्टि के सौंदर्य को बढ़ाओ। अपने को रीता कर दो, तब आनंद का समुद्र तुम्हें अपने ही भीतर लहराता मिलेगा।”
विचार या संकल्पशक्ति का एक साधारण सा अनुभव भी जिन लोगों को हुआ है, उन्हें तंत्र का प्रारंभिक विज्ञान समझने में कठिनाई नहीं होगी। यहाँ दी जा रही घटनाएं बहुत साधारण हैं। प्रत्येक के जीवन में इनसे मिलते-जुलते अनुभव होते रहे होंगे। एक घटना सन् 1999 के अगस्त माह की है। मुँबई की एक मध्यवर्गीय कालोनी में उत्तरप्रदेश के एक कस्बे से गए पत्रकार अपने आपको स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहे थे। एक साँध्य दैनिक में काम मिला। सुबह सात बजे काम पर निकल जाते और रात दस-ग्यारह बजे लौटते। दफ्तर से तो दोपहर बाद तीन बजे ही छुट्टी हो जाती, बाकी समय वे अपना परिचय-संपर्क बढ़ाने में लगाते।
शहरी जिंदगी, कस्बे से आया व्यक्तित्व और महानगर का उन्मुक्त जीवन। यार-दोस्तों की संगति में उन्हें शराब का चस्का भी लग गया। एक दिन नशे में धुत्त चले आ रहे थे कि गाड़ी ने टक्कर मार दी। जब तक ब्रेक लगे तब तक बायाँ हाथ पहिये के नीचे आ गया। सिर भी बुरी तरह जख्मी हुआ। बेहोश हो गए। कुछ लोगों ने अस्पताल पहुँचाया और जेब में पड़े मिले परिचयपत्र के आधार से दफ्तर में खबर दी। उपचार शुरू हुआ। हालत गंभीर थी, लेकिन घर का पता नहीं था, किसे खबर दें। इस घटना के तीन दिन बाद इन पत्रकार की माँ आश्चर्यजनक रूप से अस्पताल में पहुँच गई।
आश्चर्य इसलिए कि उनकी माँ मुँबई से करीब डेढ़ हजार किलोमीटर दूर कस्बे में रहती थी। ठेठ ग्रामीण महिला। बेटा मुँबई में रहता है, कहाँ रहता है, कुछ नहीं मालूम। जिस दिन बेटा दुर्घटनाग्रस्त हुआ, उस दिन से विचित्र अनुभवों से गुजर रही थी। कहने लगी-शाम आठ-नौ बजे ऐसा लगा जैसे बाबू (बेटे का दुलार का नाम) जोर-जोर से बुला रहा है। उस पुकार में छह-सात वर्ष की अवस्था का ध्यान आता है, जब बाबू बाहर किसी से लड़-झगड़कर आता, तो माँ को उंगली पकड़कर ले जाता और प्रतिद्वंद्वी को अपना जोर दिखाता था।
शुरू में तो ध्यान नहीं दिया, लेकिन बार-बार इस तरह का ध्यान आया। तड़के तक मन जाने क्यों कहने लगा कि बाबू तकलीफ में है। मदद के लिए पुकार रहा है। सुबह होने तक प्रतीत होने लगा कि छह-सात वर्ष का बाबू उंगली पकड़कर कहीं ले जा रहा हैं माँ बाबू के पिता से कहकर, नहीं माने तो जिद कर चल दी। मुँबई जाने वाली ट्रेन में बैठ गए। वे बिना अता-पता जाने मुँबई के स्टेशन पर उतरे। माँ को स्टेशन पर उतरते ही लगा कि बाबू उंगली पकड़कर फिर आगे खींचता हुआ-सा चल रहा है। उसकी बताई दिशा और रास्ते पर चलते हुए पति-पत्नि दोनों अस्पताल पहुँच गए। वह पुत्र को इस हालत में देखकर स्तब्ध रह गए।
नई दिल्ली में दिसंबर 99 में हुए पराविद्या सम्मेलन में कई बुद्धिजीवी और तर्कवादियों ने यह घटना सुनी। वे पत्रकार भी उस सम्मेलन में थे। उन्होंने बताया कि नीम बेहोशी की हालत में वे भी अपने को पाँच-छह वर्ष का अनुभव कर रहे थे। माँ को उंगली पकड़कर खींचते हुए ला रहे थे। जब होश आया, तो माँ को सिरहाने खड़ा देखकर चकित रह गए।
राजधानी के ही साहित्यकार हैं विजयकाँत। उनकी पत्नी को किसी ज्योतिषी ने कह दिया कि पति को अकेले कहीं मत जाने देना। दिल्ली से बाहर तो कतई नहीं। कभी कहीं जाना भी पड़े, तो दूसरों के हाथ का बना भोजन नहीं करें, इस तरह की सावधानी बरतना। वरना तुम्हारा पति विपदा में पड़ जाएगा। वह इस संसार से जा भी सकता है। जिस किसी ने भी यह सीख दी, उसने कोई युक्तिसंगत कारण नहीं बताया। पत्नी कमलेश्वरी ने भी इस सीख पर सोच-विचार नहीं किया। उसकी गाँठ बाँध ली। औसत स्तर की पढ़ी-लिखी घरेलू किस्म की महिला थी। कुलीन और संस्कारी होने के साथ घर-परिवार पति-परमेश्वर तक ही अपना संसार मानती थी। सीख सुनने के बाद अगले मंगलवार को पति के साथ कनाट प्लेस स्थित हनुमान मंदिर गई। पति हनुमान को इष्ट मानते हैं, बिना कोई भूमिका बाँधे पहले वचन लिया और फिर संकल्प करा दिया कि दिल्ली से बाहर वे कहीं भी अकेले नहीं जाएंगे। यहां रहते हुए किसी के हाथ का बना भोजन नहीं करेंगे, होटल और भोज-स्वागत-समारोह आदि अवसरों पर भी नहीं।
संकल्प लिए हुए करीब बारह वर्ष हो गए। साहित्यिक पत्रकारिता कहीं आए-जाए और भोजन चाय-पानी के बिना गति नहीं पकड़ती। लेकिन विजयकाँत भी पूरी तरह पत्नीभक्त ठहरे। वचन दे दिया, तो दे दिया। दिल्ली से बाहर आज तक अकेले नहीं गए। दिल्ली में भी किसी के यहां खाना नहीं खाया। 1992 में कमलेश्वरी गर्भवती हुई। तीसरा बच्चा था। उसे जन्म देने के बाद दो सप्ताह तक अस्पताल में रहना पड़ा। पत्नी की स्थिति बिस्तर से उठने लायक नहीं थी। वचन दिया था इसलिए विजयकाँत ने दो सप्ताह तक भोजन नहीं किया। फल आदि से ही काम चलाया।
1987 में संकल्प लिया था। निभता रहा या कहें कि निभाना पड़ा। दो-चार बार चोरी से कुछ खाने की कोशिश की, लेकिन घर आकर देखा, तो पत्नी बीमार पड़ी मिली। एक बार विजयकाँत खाते ही खुद बीमार पड़ गए। अस्वस्थ दशा में घर पहुँचे, तो पत्नी ने फटकारा, हनुमान जी के सामने कहा था कि कुछ मत खाना। देख लिया उसका परिणाम। पिछले साल अप्रैल में कमलेश्वरी बीमार पड़ी और बहुत इलाज कराने के बावजूद बच न सकी। मरते-मरते कह गई, मैं तुम्हें वचनमुक्त करती हूँ। कहीं भी जा सकते हो, खा सकते हो। मैं तुम्हारी पहरेदारी करती रहूँगी। चिंता मत करना।
इन घटनाओं का तंत्र के गुह्य विज्ञान से सीधा कोई संबंध नहीं है। इनसे सिर्फ शरीर के साथ मन और संकल्प की, भाव की सामर्थ्य को एक झलक के रूप में समझाता कसता है। पहली घटना माँ और पुत्र के संबंधों की प्रगाढ़ता के साथ उनके अंतर्संबंधों की परिचायक है, तो दूसरी घटना समर्पण, चिंता और निष्ठा की। तंत्रविद्या के जानकार कहते हैं कि साधना के क्षेत्र में सफल होने के लिए इन्हीं चीजों की आवश्यकता है। संकल्प, प्रगाढ़ संकल्प मन की सोई हुई शक्तियों को जगा देता है। मन आकाश में संव्याप्त ऊर्जा को सोखता और घनीभूत करता है। घनीभूत ऊर्जा प्रकृति के हज न्रपरह करे गति देती है और दीर्घकाल में मिलने वाले परिणाम कुछ ही समय में दिखाई देने लगते हैं।
तंत्रशास्त्र की मान्यता है कि दिक् और काल महाशक्ति के ही विलास हैं। मूल रूप में उनका अपना अस्तित्व नहीं है। दिक् अर्थात् दिशाएं, विस्तार, स्थान। काल का अर्थ है समय। कोई भी विकास, परिणति अथवा फलश्रुति इन दो तत्वों पर ही आश्रित होती है। तंत्रविद्या इन दोनों को ही साधने का काम करती है। साधने का एक निश्चित विधान है। उसे संपन्न करते हुए कोई भी व्यक्ति अभीष्ट फल प्राप्त कर सकता है, परा अथवा अपरा प्रकृति के नियम किस तरह काम करते हैं ? यह जानने की भी उन्हें जरूरत नहीं होती। तंत्रविद्या से जिन्हें लाभ उठाना है। उनके लिए तकनीक भर जानना काफी है। गुह्य ज्ञान-विज्ञान तो तंत्रविद्या के आचार्य अथवा सिद्ध ताँत्रिक ही जानते हैं।
विद्या के रहस्य नहीं समझ पाने के कारण ही कई बार उसकी प्रामाणिकता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। तंत्र से संबंधित घटनाओं और सिद्धियों को लोग अंधविश्वास का नाम दे देते हैं। तंत्र के नाम पर ठगी और धोखाधड़ी चलती भी खूब है। लेकिन इसका कारण विद्या का खोखलापन नहीं, उसके संबंध में फैला हुआ अज्ञान है।
वस्तुतः तंत्र को अंधविश्वास का फतवा देने की उतावली इसलिए भी हो जाती है कि लोग इसे चमत्कार और जादू-टोने की विद्या मान लेते हैं। निश्चित ही तंत्रक्षेत्र में चमत्कार किए जा सकते हैं, लेकिन वह विलक्षण और सर्वोच्च स्तर पर पहुँचे लोगों द्वारा विधेयात्मक स्तर पर ही संभव हैं। सामान्य जानकारों को छोटे-मोटे प्रयोगों तक ही सीमित रहना पड़ता है। उनके लिए चमत्कार और विलक्षण दावों को लेकर प्रतिबंध है।
संदेह और अविश्वास का एक कारण इस विद्या से शोध-अनुसंधान का लोप हो जाना भी है। आचार्य गोविंद शास्त्री ने इस विद्या के चमत्कार नहीं दिखाई देने का कारण बताते हुए कहा है - सिर्फ उपेक्षा ही है, जिसके चलते तंत्र जैसी शक्ति मनुष्यजाति का भला नहीं कर पा रही है। लोग इसे अविश्वास की दृष्टि से देख रहे हैं, लोग समग्र तंत्रविद्या को अविश्वसनीय करार देकर क्षणभर में छुटकारा पा लेते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि परमाणु ऊर्जा के निर्माण, विकास एवं उस तंत्र को सुचारु चलाने में कितने लोग का कर रहे है। वैज्ञानिक जगत् की उन पर कितनी आस्था है, पूरी व्यवस्था को चलाने के लिए कितना पैसा खर्च किया जा रहा है, इसके अतिरिक्त वान के क्षेत्र में उन्नति के लिए जितना धन खर्च किया जा रहा है, जितने लोग लगे हुए हैं, तीनों साधन झोंके जाते हैं, उसका सौवाँ हिस्सा भी इस विद्या में लगाया जाए तो तंत्र आज भी अपनी प्रामाणिकता सिद्ध कर सकता है। मनुष्य के शो-संताप हर सकता है और उसे सुख-सुविधाओं से संपन्न कर सकता है। आवश्यकता इस विद्या से जुड़े लोगों के सक्रिय होने की-विज्ञानसम्मत आधार पर उसके प्रस्तुतीकरण की होगी। निश्चित ही ऐसा होगा एवं इस आध्यात्मिक ऊर्जा का नियोजन समाज के रचनात्मक उत्कर्ष हेतु होगा।
अपनी परंपरा, संस्कृति और इतिहास की समीक्षा करते हुए प्रगतिशीलता का अहं सिर्फ, ‘विलाप’ और ‘ग्लानि’ से ही संतुष्ट होता है। समीक्षा की प्रगतिशील दृष्टि हजार बार अपने पुरखों को जब तक कोस नहीं लेती और लाख बार ऋषि-मुनियों के अनुदान को शून्य नहीं ठहरा लेती तब तक चैन नहीं लेती। उनके अनुसार, भारत में जो भी श्रेष्ठ है वह अंगरेजों के आने से आया अथवा उससे पहले मध्य एशिया से आए आक्रमणों और उनमें मिली पराजय के बाद आई दासता ने दिया। विदेशी शासकों के पास चाहे वे अरब-फारस के मुसलमान हों अथवा पुर्तगाल, फ्रेंच और अंगरेज हों, उनके पास उन्नत तकनीक थी, उच्चकोटि का कला-कौशल था। इस कारण वे विजयी हुए। उन्होंने अपने साम्राज्य स्थापित किए, तो उनके उच्छिष्ट से भारतीय समाज धन्य हुआ। सिद्धांत यह है कि शासक के गुण-दोष उनकी शासित जातियों में आते ही हैं। भारत कम से कम साढ़े आठ सौ वर्ष गुलाम रहा है, इसलिए शासकों के अनुदानों से उसे लाभान्वित होना ही था।
ग्लानि में आकंठ डूबा यह वर्ग निरूपित करता है कि हम श्रेष्ठ, उन्नत और बलवान थे, तो विदेशी आक्रमणों के आगे झुके ही क्यों ? कमजोर थे इसीलिए पराजित हुए। उनके अनुसार, भारत के पास व्यवस्थित तंत्र नहीं था, छोटे-मोटे कई राज्य थे और वे आपस में लड़ते रहते थे। एक-दूसरे से लड़ने-भिड़ने में ही उनकी शक्ति बरबाद होती रही थी। इस कारण वे बाहरी हमलों का सामना नहीं कर पाए। उनके अनुसार, भारत ने दासता के दिनों में कुछ खोया नहीं, बल्कि राज चलाने का कौशल अर्जित किया, युद्ध कौशल सीखा। एक-दूसरे को बराबर समझने वाली सामाजिक दृष्टि विकसित हुई, जाति-पाँति के बंधन शिथिल तो नहीं हुए, लेकिन उनके कारण होने वाली हानियों को अनुभव किया। उन भेदभावों को सर्वथा तिलाँजलि नहीं दी, तो भी उससे छुटकारा पाने का संकोच तो जगा।
निष्पक्ष भाव से समीक्षा करें, तो पाएंगे कि आक्रमण और उनमें हुई जय पराजय का चक्र भारत में ही नहीं चला, संसार के सभी देश समय-समय पर हमलों के शिकार हुए। भारत सिर्फ आठ सौ वर्ष तक विभिन्न आक्राँताओं से ग्रस्त रहा। इसके बावजूद वह पूरी जिजीविषा से उठ खड़ा हुआ। संसार के बहुत से देश तो दो-चार हमलों में ही इस तरह पस्त हो गए कि फिर कभी खड़े हो ही नहीं पाए। भारत के पास निश्चित ही कोई अक्षय ऊर्जा थी, जो उसे झंझावातों में भी टिकाए रही। यूनान, मिश्र, रोम, ईरान, रूस, कजाक यहाँ तक कि अमेरिका भी अपने अस्तित्व को मूल रूप में नहीं बचा पाए।
आठ सौ वर्ष की गुलामी ने भारत का इतना विनाश नहीं किया, जितना सौ-सवा सौ साल के आक्रमणों ने दूसरे देशों और सभ्यताओं का किया है। इन दिनों पढ़ाए जाने वाले इतिहास के अनुसार यूनान, रोम, मिश्र और चीन की सभ्यताएं प्राचीन भारतीय सभ्यता की समकालीन हैं। कालप्रवाह ने उनके साथ जो व्यवहार किया, उसे विश्व-इतिहास के विद्यार्थी भलीभाँति जानते हैं। एक समय यूनान लोकतंत्र, शिक्षा और संस्कृति का केंद्र था। भूमध्यसागर के तट पर बाल्कन प्रायद्वीप में फैला यह देश दो हजार ईसा पूर्व सभ्य और सुसंस्कृत देशों में स्थान पा चुका था। माइसीनियन सभ्यता यहाँ फल-फूल चुकी थी। सुकरात, अरस्तू, ड्रैको आदि दार्शनिकों ने इस देश के आध्यात्मिक वैभव को समृद्ध किया, तो सिकंदर जैसे सम्राट ने विश्वविजय का स्वप्न देखा।
ईसा पूर्व पहली शताब्दी तक यूनान राजनीतिक दृष्टि से पूर्ण स्वतंत्र था। उसी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में वह रोमन आक्रमणों का शिकार होने लगा। देखते ही देखते वाइजैंटाइन और ओटोमन राजवंशों ने यूनान पर अपना जो शासन स्थापित किया तो 1830 तक उनका साम्राज्य कायम ही रहा, करीब 1900 साल की गुलामी ने यूनान की प्राचीन सभ्यता-संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। 1830 में वह एक राजतंत्र के रूप में ही स्वाधीन हो सका। इस बीच यूनान में प्राचीन धर्म के स्थान पर ईसाइयत छा चुकी थी, उसने धर्म का ऐसा शिकंजा समाज पर कसा कि पुरोहितों की अनुमति -सहमति के बिना समाज के किसी भी क्षेत्र में कुछ नहीं किया जा सकता था।
मिश्र में इन दिनों इस्लाम और ईसाई धर्म छाया हुआ है। वहाँ की परंपराएं कुरान अथवा बाइबिल से प्रेरित हैं। इन ग्रंथों से सीधे अनुशासित न होकर लोग इनकी व्याख्या करने वाले मौलवी और पादरियों के संकेतों पर जीते हैं। सात हजार साल पहले मिश्र में एक उन्नत सभ्यता थी। लोगों का विचार की स्वतंत्रता थी। सम्राट अथवा राजा के सामने वे अपनी बात निस्संकोच रख सकते थे। समाधान नहीं होता तो शासक उत्तर भी देते थे।
पाश्चात्य इतिहासकार बताते हैं कि भारतीय सभ्यता उन दिनों मिश्र के सामने कुछ भी नहीं थी। आर्य तब ध्रुव प्रदेशों अथवा मध्य एशिया से भारत आना शुरू ही हुए थे। यहाँ अपने डेरे बसाने में लगे हुए थे और मकान आदि बनाना बिलकुल नहीं जानते थे, इसलिए झोंपड़ियाँ बनाकर रहते थे। भारत को शिशु और असंस्कृत बौना सिद्ध करने में ही अपनी विद्वता सार्थक समझने वाले विचारक मानते हैं कि आर्यों को अर्थात् भारतीयों को रहना नहीं आता था, इसीलिए आश्रम बनाते और पेड़ पत्रों की छाँव में निवास करते थे। गाय-भैंस चराते समय जो गीत गाए जाते वह बाद में लिपिबद्ध कर लिए गए। उन्हें संकलित कर वेदों का नाम दे दिया गया। इस तरह की बकवास करने वालों के लिए यूनान के बाद मिश्र, रोम आदि सभ्यताएं अत्यंत उन्नत थी। भारत के लिए वे गुरु की भूमिका में थी, क्योंकि तब मिश्र के लोग पत्थर की चिनाई करना जानते थे। यहाँ आश्चर्य की तरह देखे जाने वाले पिरामिड तब बनने लगे।
तब ढाई हजार ईसापूर्व मिश्र के लोग कैलेंडर बना लेते हैं। अचानक मिश्र पर यहूदी आक्रमण शुरू होते हैं। 1450 ईसापूर्व तक वे लोग बार-बार हमले करते हैं और कभी हारते कभी जीतते हैं। इस बीच में अपनी सभ्यता संस्कृति के अंश मिश्र में छोड़ते हैं। वहाँ यहूदी धर्म फैलने लगता है। इस गति से फैलता है कि मिर कमे राजा अमेनहोटप को हथियार उठाकर क्राँति की घोषणा करनी पड़ती है। वह यहूदी धर्म पर पाबंदी लगाकर नए धर्म की घोषणा करता है। स्थिति इससे सुधरती नहीं, बल्कि उलझ जाती है। तनातनी का ऐसा दौर चलता है कि ईसा से हजार साल पहले मिर अपने स्वरूप, स्वभाव और गुण-धर्म से हाथ धो बैठता है।
इटली के नाम से अभिहित रोम किसी जमाने में एक बड़े साम्राज्य का केंद्र था। आल्पस पर्वत से शुरू होकर भूमध्य सागर के भीतर तक फैला हुआ यह देश आज भी विश्वसभ्यता के लिए एक चुनौती है। संसार की एक-तिहाई आबादी यहाँ स्थित केंद्र वेटिकन से प्रेरणा लेती ओर उसके आगे नतमस्तक होती है। वेटिकन को यद्यपि एक स्वतंत्र राज्य का दरजा मिला हुआ है, लेकिन उसकी मान-प्रतिष्ठा और गौरव को अक्षुण्ण रखने का दायित्व तमाम ईसाई देशों पर है। अमेरिका जैसे महाबली देश में भी शासन अध्यक्ष का चुनाव पोप के संदेश से प्रभावित होता है। भारतीय सभ्यता-संस्कृति को यदि किसी केंद्र से साँस्कृतिक दृष्टि से धर्मांतरण रूपी गंभीर खतरा हो सकता है, तो वह इटली और उसके हृदयप्रदेश में स्थित वेटिकन ही है।
असहिष्णुता का इतना आग्रह रोमन साम्राज्य में ही देखा जा सकता है कि गैलीलियो को सिर्फ अपनी मान्यता नहीं बदलने के लिए मृत्युदंड स्तर की प्रताड़ना का भागी बनना पड़ा। गैलीलियो का कहना था कि पृथ्वी ही सूर्य की परिक्रमा लगाती है, सूर्य पृथ्वी के आसपास नहीं घूमता। क्योंकि यह बात धर्मग्रंथों में लिखे विवरणों से मेल नहीं खाती, इसलिए धर्मगुरुओं ने गैलीलियो से अपना मत बदलने और क्षम माँगने के लिए कहा। गैलीलियो ने न तो अपना मत बदला और न ही माफी माँगी। इस अपराध के लिए न केवल अपनी गलती सबके समक्ष स्वीकारने को कहा गया, प्रचंड प्रताड़ना भी दी गई। इतनी क्रूर और आक्रामक रोमन सभ्यता का अंत होना ही था। उस सभ्यता के गर्भ से निकली ईसायत का नैतिक पक्ष बहुत उज्ज्वल नहीं है। यद्यपि ईसामसीह ने आध्यात्मिकता का संदेश दिया। लोगों को ईश्वरीय प्रेरणा के अनुसार जीने दुखी-दरिद्रों की सेवा करने और पतितों को उबारने की उनकी शिक्षा ने करोड़ों लोगों के जीवन में सुख-शाँति का प्रकाश उत्पन्न किया। इस तथ्य के साथ यह भी सही है कि ईसायत की ओट में साम्राज्य फैलाने के जितने भी प्रयत्न हुए, उनके मूल में बर्बरता और अत्याचार ही है। इन अत्याचारों के चलते हजारों लोगों को जिंदा जला दिया गया। लाखों लोगों को अपनी परंपरा से विच्छिन्न कर दिया गया।
मिश्र, रोम और यूनान में किसी समय ज्ञान-विज्ञान की ऊँचाइयाँ मापी गई हो और राजतंत्र-लोकतंत्र का विकास हुआ हो, लेकिन भारत की साँस्कृतिक धरोहर की तुलना में वे सभ्यताएं बौनी ही सिद्ध होती है। यूरोपीय सभ्यता तो उसके आगे कुछ भी नहीं है। जिन्हें लोग चरवाहों का संगीत कहते रहे, वैदिक ज्ञान में से जर्मन, फ्राँस और इटली के वैज्ञानिकों ने विलक्षण गणितीय फार्मूले ढूंढ़ निकाले हैं। यूरोपीय विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाने वाला वैदिक गणित हिसाब लगाने में कम्प्यूटर को भी पीछे छोड़ देता है। गणितज्ञ लेले ने लिखा है कि विज्ञान की दृष्टि से वेदों का अध्ययन किया जाए, तो निश्चित ही संभव है कि बिना किसी उपकरण के हम इलेक्ट्रॉनिकी को पीढ़ियों पीछे छोड़ दें।
राजनीतिक दृष्टि से भारत कभी एक संगठित राज्य नहीं रहा। चंद्रगुप्त मौर्य,, विक्रमादित्य, अशोक, हर्ष और सम्राट अकबर को छोड़कर किसी भी युग में उसका अधिकाँश भाग एक शासनसूत्र में नहीं बंध सका। इसे संगठन की कमी मानें, तो अलग बात है, अन्यथा संघीय ढाँचे का ही प्रभाव कहना चाहिए कि न तो सिकंदर और न ही मोहम्मद गौरी या चंगेजखाँ, तैमूरलंग, नादिरशाह आदि बादशाह हिमालय से समुद्र तक फैले देश को पैरों तले रौंद ही सके। सिकंदर को पूर्वी सीमा पर दाँत खट्टे कर देने वाले प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। उसे यह मालूम हुआ कि आगे पुरु से भी ज्यादा जुझारू योद्धा हैं, तो उसे पीछे लौट जाना पड़ा। कहते हैं कि सीमा पर मिली चोट ने उसे इतना तोड़ दिया था कि बेबीलोन में एक मामूली से बुखार के कारण उसकी मृत्यु हो गई।
मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराकर दिल्ली में गुलामवंश की नींव रखी, तो सिर्फ संघीय ढाँचे के कारण ही भरत उसकी मुट्ठी में नहीं जा सका। यदि पूरा देश उस समय एक केंद्रीय शासन के अधीन होता तो पृथ्वीराज की पराजय समूचे भारत को दासता की जंजीरों में जकड़ सकती थी। बाद में तुगलक, अकबर, औरंगजेब ओर यहाँ तक कि अंगरेजों के समय में भी एकछत्र शासन स्थापित नहीं हो सका। सिर्फ इसलिए कि दूसरे क्षेत्रों में समर्थ चुनौतियाँ मिलती रही थी। अकबर और औरंगजेब जैसे चक्रवर्ती सम्राटों को अपना पूरा समय विद्रोहों को दबाने में लगाना पड़ता था।
आठ सौ वर्ष की गुलामी साधारण नहीं है। विभिन्न देशों और संस्कृतियों ने दो-चार आक्रमणों और सौ-पच्चास सालों में ही दम तोड़ दिया, तो फिर भारत किस आधार पर जीवित रह सकता, रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा है कि यहाँ की आध्यात्मिकता ने उसे जीवित रखा। राजनीतिक दृष्टि से समझें, तो शायद निराश होना पड़े। लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से देखें, तो उसी ने अमित जिजीविषा प्रदान की। अध्यात्म प्रधान होने के कारण ही भारत ने कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया। यहाँ से धर्म का संदेश लेकर असंख्य भिक्षु-संन्यासी दिग्दिगंत में गए। उनके पीछे-पीछे राजसत्ता तलवार लेकर कभी नहीं गई।
भारत ने धर्मप्रचारक भेजे और समूचे एशिया को अध्यात्म से आप्लावित कर दिया। प्रचारक नौकाओं में ग्रंथ लेकर गए, समुद्री थपेड़ों को सहा, उनके कारण डूबे-उतराए लेकिन उन्होंने कभी उपनिवेश नहीं बनाए, क्योंकि यहाँ नेतृत्व धर्मचेतना के हाथों में रहता था। इस तथ्य को निरूपित करते हुए डेविड फ्राले ने लिखा है, “कोई भी राष्ट्र अपने भीतर विद्यमान उन प्रवृत्तियों को बाहर प्रकट करने के लिए अनिवार्य रूप से प्रवृत्त होता है, जो उसके स्वभाव से मेल खाती हैं, उसके प्रमुख विचार को व्यक्त करती हैं। भारत के मूर्द्धन्य स्थान पर महान् संत और धार्मिक व्यक्ति दिखाई देते हैं, जो महानता की सबसे अधिक आश्चर्यजनक और अविरल गौरवान्वित पंक्ति की रचना करते हैं। उनके कारण भारत जीवित दिखाई देता है। ठीक वैसे ही जैसे रोम अपने योद्धाओं राजनेताओं और शासकों में जीवति दिखाई देता है।” प्राचीन भारत के ऋषि सबसे आगे थे और शूरवीर उनके पीछे-पीछे चलते थे। बाद के मध्ययुग में सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली पंक्ति में रामानुज, नानक, चैतन्य, रामदास, कबीर, तुकाराम आदि को जानते हैं।
धार्मिक-आध्यात्मिक प्रति के अग्रिम पंक्ति में होने का अर्थ यह नहीं है कि भारत राजनीति अथवा समाज के अन्य क्षेत्रों में पिछड़ा था। यहाँ भी साम्राज्य बने हैं और लोकप्रिय शासन की मिसालें कायम हुई है। ज्ञात इतिहास के प्रारंभ युग में ही शासन जनता के द्वारा नियंत्रित और संचालित होता दिखाई देता है। जनता से संचालित होने का अर्थ यह नहीं है कि वास्तविक शासन जनसाधारण के हाथों में है। असल बात यह है कि जब जनता को यह भरोसा है कि उसके स्वीकार अथवा अस्वीकार का प्रभाव पड़ेगा, तो वह निर्द्वंद्व भाव से अपनी सम्मति देती है।
यह उदात्त भावना आध्यात्मिक विरासत और ऋषि मुनियों के दिए गए संस्कारों के कारण ही आ सकती है। जिन्हें भारत की अमरता का रहस्य जानना हो वे यहाँ के अध्यात्म में ढूंढ़े।
संसार के सभी देश समय-समय पर हमलों के शिकार हुए। भारत सिर्फ आठ सौ वर्ष तक विभिन्न आक्राँताओं से ग्रस्त रहा। इसके बावजूद वह पूरी जिजीविषा से उठ खड़ा हुआ। संसार के बहुत से देश तो दो-चार हमलों में ही इस तरह पस्त हो गए कि फिर कभी खड़े हो ही नहीं पाए। भारत के पास निश्चित ही कोई अक्षय ऊर्जा थी, जो उसे झंझावातों में भी टिकाए रही।
छूकर, आशीर्वाद देकर और दूर से ही हाथ उठाकर “रोगमुक्त हो जाओ” कहने के अनेक उदाहरण पुराणों, योग और तंत्र के ग्रंथों तथा सिद्ध संतों के जीवन चरित में पड़ने को मिलते हैं। इन उल्लेखों को अतिरंजित, अंधविश्वास और कपोल-कहानियाँ बताकर चुटकियों में उड़ा दिया जाता है। निश्चित ही इस तरह के वर्णनों में कई कथा-कहानियों से ज्यादा नहीं होते, लेकिन उन कहानियों का आधार भी एक सच्चाई है। सच्चाई यह है कि मनुष्य के संकल्प और सद्भाव में बड़ी शक्ति है। ऐसी शक्ति जो लड़खड़ाते स्वास्थ्य और विचलित स्थितियों को संभाल सके। मनुष्य की सूक्ष्म ऊर्जा, जिसे “प्राणऊर्जा” भी कह सकते हैं, इतनी समर्थ है कि उसके सहारे न केवल अपने आपको रोगमुक्त किया जाता है, बल्कि दूसरों की रोग-बीमारियां भी मिटाई जा सकती है। प्राणशक्ति से उपचार को अब चमत्कार की तरह नहीं देखा जाता। उसे बाकायदा विज्ञान का दरजा मिला हुआ है। यह ऊर्जा किस तरह काम करती है। यह जानने से पहले कुछ अनुभवों को टटोलें।
क्वेजानसिटी (जापान) के अड़सठ वर्षीय टियोफिलो पी. वेलाँस्को ने अपने चिकित्सक को लिखा है, दस वर्ष पहले मेरे हाथ काँपते थे, पीठ, घुटने और कमर के नीचे सभी अंग बेहद दर्द करते थे। पैर कमजोर हो गए थे और माँसपेशियों में खिंचाव आ गया था। हाथ बुरी तरह काँपते थे। किसी दूसरे व्यक्ति की मदद के बिना मैं कुछ भी खा-पी नहीं सकता था। संयोग से मुझे प्राणशक्ति से उपचार के बारे में मालूम हुआ और में इस विद्या के जानकार से मिलने लगा। उन्होंने सप्ताह में दो बार मेरा इलाज शुरू किया। जब मेरा उपचार किया जाता था, तो मुझे मेरा शरीर हलका और माँसपेशियाँ ढीली होती अनुभव होती थी। ऐसा प्रतीत होता कि कोई रहस्यमय शक्ति मुझे ठीक कर रही है। छह महीने तक उपचार लेने के बाद मैं पूरी तरह ठीक हो गया।
फिलिपींस विश्वविद्यालय में अंगरेजी, स्पैनिश और लैटिन के प्रोफेसर कार्लोस ओजेडा आरियस के अनुभव भी गौरतलब है। उन्होंने लिख है, जब मैं अस्पताल पहुँचा तो मेरी हालत बहुत नाजुक थी, मेरा पूरा चेहरा सूजा हुआ था और मैं दर्द से छटपटा रहा था। तीन दिन पहले मैंने दांतों के डॉक्टरों से ऊपरी कैनाइन दाँतों की मरम्मत कराई थी। डॉक्टर ने पहले सुन्न करने का इंजेक्शन दिया और फिर खून निकलने तक दाँतों में छेद किया। बाद में पता चला कि उस डॉक्टर ने दाँत की जड़ से आधी दूर तक छेद कर दिया था। कुछ घंटों तक आराम रहा। बाद में दर्द अचानक बढ़ने लगा। चेहरा सूजने लगा। इतना सूज गया कि आंखें ढंकने लगी और सूजा हुआ हिस्सा उन पर इतना छा गया कि ठीक से दिखाई देना भी बंद हो गया। सबसे ज्यादा कष्ट दर्द से हो रहा था। पाँच दिन और रात तक अत्यधिक दर्द और बुखार सहने के बाद मुझे लगा कि अब बचूंगा नहीं। मैंने अपनी वसीयत तैयार की। अपने दफन किए जाने की जगह और करने के बाद मेरी वस्तुओं का क्या किया जाए, यह सब लिखा। प्राणिक हीलर मास्टर चो को मेरे दोस्तों से मेरी तकलीफ के बारे में पता चला। वे उपचार के लिए मेरे पास आए और कुछ देर तक चेहरे के पास अपना हाथ घुमाया। उनके हाथ घुमाने से दर्द में कुछ राहत मिली। वह धीरे-धीरे कम होने लगा। उन्होंने मुझे भरोसा बंधाया कि मैं जल्दी ही ठीक हो जाऊंगा। बद में पता चला कि प्रथम उपचार के समय उन्होंने दाँतों की जड़ों में बन रहे मवाद को दिमाग में जाने से रोक दिया था। बाकी समस्याएं धीरे-धीरे ठीक होने लगी थी।
लखनऊ के एक प्रसिद्ध चिकित्सक परिवार से संबद्ध नीलिमा थामस को आठ वर्ष पुराना सिरदर्द था। महीने में कम से कम तीन बार इतना तेज दौरा पड़ता कि बिस्तर पकड़ लेना पड़ता था। चार-पाँच दिन आराम किए बिना चैन नहीं पड़ता था। नीलिमा ने कितने ही चिकित्सकों और विशेषज्ञों से परामर्श किया, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। प्राणिक चिकित्सा के जानकार अब्राहम विजोलिया से संपर्क हुआ। उसने योगशरीर में मान्यचक्रों का उपचार शुरू किया। सप्ताह में दो बार प्राणिक स्पर्श दिया और तीसरे सप्ताह से ही लाभ होने लगा। अब नीलिमा पूरी तरह ठीक है।
जटिल और बेहद कष्ट देने वाले रोगों का इलाज करते करते रोगी जब थक जाता है, तो गुह्य चिकित्साविधियों का सहारा लेने लगता है। औषध उपचार भी चलते रहते हैं और आध्यात्मिक चिकित्सा भी। प्रचलित चिकित्साविधियों में झाड़-फूँक, टोने-टोटके और ग्रहों या देवी-देवताओं के निमित्त किए जाने वाले दान पारंपरिक क्रम भी सम्मिलित हैं। इन विधियों से कई लोगों को लाभ होता है। मनोविज्ञानियों के अनुसार रोग में कोई लाभ नहीं होता। व्यक्ति अपने आपको भुलावा देने लगता है कि वह ठीक है और यह भ्रम उसे कुछ समय तक दौड़ता रहता है। रोग जब बेकाबू हो जाता है, तो वह फिर विलाप करने लगता है, शरीर चिकित्सा का सहारा ढूंढ़ता है ओर पहले से ज्यादा छटपटाता, दौड़-धूप करता है।
आस्था चिकित्सा की तमाम विधियों से होने वाले लाभ को मानसिक संभ्रम की संज्ञा देने वाले चिकित्सक भी प्राणिक हीलिंग के परिणामों को देखकर चकित है। ऐसे कई केस हैं, जिनके बारे में किसी भी तरह सिद्ध नहीं किया जा सका कि वे किसी संभ्रम के शिकार हुए हैं। रोग के लक्षणों को जिस तेजी और असरदार ढंग से गायब होते देखा गया है, उन्हें किसी भी परीक्षण या विश्लेषण से झुठलाया नहीं जा सका।
प्राणिक हीलिंग अथवा प्राणशक्ति से उपचार से गुजरते हुए प्रत्यक्ष रूप में एक ही प्रक्रिया संपन्न होती दिखाई देती है। रोगी बैठा अथवा लेटा हुआ होता है। प्राण चिकित्सक उससे कुछ दूरी पर बैठता है और वह हथेलियों से कुछ मुद्राएं बनाकर हाथ को खास ढंग से लहराता रहता है। लहराने की प्रक्रिया बहुत कुछ ऐसी दिखाई देती है, जैसे कुछ समेटा, पोंछा और पास ही रखे नमक के पानी में फेंका जा रहा हो। चिकित्सक न तो रोगी के शरीर का स्पर्श करता है और न ही उसे कोई खाने के लिए देता है। ‘प्राणिक हीलिंग’ अथवा प्राणशक्ति उपचार कोई नई चिकित्साविधि नहीं है। ऋषि मुनियों और सिद्ध संतों के वरदानों आशीर्वादों के रूप में यह हजारों साल से भारत में प्रचलित रही है। उन घटनाओं को पढ़ते समय प्रतीत होता है कि आशीर्वाद-वरदान की सामर्थ्य किसी दैवी कृपा के कारण आती है। गहन अर्थों में यह सामर्थ्य ईश्वरीय अनुग्रह तो है ही। प्राणिक हीलिंग के जनक अथवा संयोजक चे कोक सुई ने सिर्फ इतना ही का है कि उस अनुग्रह को अर्जित करने लायक उपाय ढूंढ़़ दिए हैं। उन उपायों का सहारा लेकर कोई भी व्यक्ति दूसरों के शारीरिक मानसिक कष्टों का निवारण कर सकता है। वह अपना उपचार स्वयं भी कर सकता है।
फिलिपींस में खोजी या व्यवस्थित की गई यह चिकित्सा विधि ‘रेकी’ से भिन्न है। रेगी में चिकित्सक रोगी के पीड़ित अंगों का स्पर्श करते हुए उसे रोगमुक्त होने का निर्देश देता है। ‘प्राणिक’ में रोगी का स्पर्श नहीं किया जाता । सामने अथवा थोड़ी दूर बैठकर ही आवश्यक निर्देश दिए जाते हैं। ये निर्देश बोलकर नहीं केवल संकल्प द्वारा ही दिए जाते हैं। सामने या पास बैठना भी अनिवार्य नहीं है। रोगी दूर हो, तो चिकित्सक उसका ध्यान करते हुए भी संकेत भेज सकता है और देखा गया है कि उस स्थिति में भी पूरा आराम मिलता है।
‘प्राणिक हीलिंग’ अथवा ‘प्राणशक्ति उपचार’ है क्या ? इसमें प्राण नामक जिस तत्व का उपयोग किया जाता है वह क्या है? उपचार सिद्धि कैसे काम करती है ? इन प्रश्नों के उत्तर चे कोक सुई ने उदाहरणों और प्रमाणों से दिए हैं। प्राणशक्ति से संबंध में योग और अध्यात्म के विद्यार्थियों को विशेष कुछ बताना आवश्यक नहीं है। प्रायः सभी जानते हैं कि शारीरिक बल और मानसिक शक्ति से भी सूक्ष्म एक ऊर्जा है, जो मानवी काया में विद्यमान रहती है। मनुष्य के अलावा यह ऊर्जा दूसरे प्राणियों, पेड़-पौधों और जड़ दिखाई देने वाले पदार्थों में भी रहती है। लेकिन वहाँ इसका स्वरूप धूमिल और लुँज-पुँज किस्म का होता है। मनुष्य ही ऐसी विधियाँ खोज पाया है, जिसमें प्राणऊर्जा का संवर्द्धन किया जा सकता है, उसे व्यवस्थित बनाया जा सकता है।
चो कोक सुई जिन्हें ‘प्राणिक हीलर मास्टर चो’ के नाम से पुकारते हैं, का कहना है कि प्राणऊर्जा का विकास और उपयोग उनकी मौलिक खोज नहीं है। भारत में लोग हजारों साल से इसे जानते हैं। भारत के हर गाँव-कस्बों में इस विद्या के दो-तीन जानकार आसानी से मिल जाते हैं। यह बात अलग है कि उनकी तनिक प्राणिक हीलिंग से अलग और पारंपरिक किस्म की होती है।
भारत के अलावा ग्रीक, चीन, मिश्र और कई एशियाई देशों में लोग प्राणऊर्जा से परिचित हैं। मास्टर चो ऊर्जा के बारे में लिखते हैं-इसे भारत में ‘प्राण’, जापान में ‘की’, इटली में ‘न्यू या’, पालिनेशियई ‘मन’ और यहूदी लोग ‘रूह’ कह सकते हैं। कम पढ़े लिखे सामान्य लोग इसे साँस के रूप में भी जानते हैं। साँस का मतलब नथुनों से फेफड़ों में भरी और छोड़ी जाने वाली हवा है। विश्वव्यापी प्राणतत्व को भी नथुनों से ग्रहण किया जाता है, लेकिन वह साँस के जरिए भीतर-बाहर आती-जाती हवा नहीं है। प्राण को ग्रहण और धारण करने के लिए योग ग्रंथों में उपदिष्ट ‘प्राणायाम’ से साधक भलीभाँति परिचित है।
मास्टर चो के अनुसार, प्राणशक्ति अर्जित करने के तीन प्रमुख स्त्रोत हैं। एक सूर्य-इस स्त्रोत से धूप में खड़े होकर कुछ विशिष्ट क्रियाओं द्वारा सूर्य से बहती रहने वाली प्राण ऊर्जा को ग्रहण किया जाता है। उन क्रियाओं को नहीं करते हुए भी केवल धूप में खड़े रहने से भी प्राण ऊर्जा मिलती है। लेकिन उसका स्तर और स्वरूप विरल किस्म का होता है।
वायु प्राण शक्ति अर्जित करने का दूसरा प्रमुख उपाय है। मास्टर चो इसके लिए लयबद्ध साँस लेने और ऊर्जा केंद्रों को खुला रखकर इस स्त्रोत का लाभ उठाने का महत्व बताते हैं। ऊर्जा केंद्र शरीर के चारों ओर घेरे रहने वाली आभा में होते हैं। इन केंद्रों को ‘चक्र’ कहा गया है। योगविद्या में इन्हें शरीर के निचले हिस्से रीड़ की हड्डी के आखिरी छोर से आरंभ कर सिर के ठीक मध्य में शिखास्थल के पास तक स्थित माना गया है। अलग-अलग उल्लेखों में इन चक्रों की संख्या छह, सात, आठ, बारह, सोलह और चौबीस तक बताई गई है। प्राच्य रूप से इनकी संख्या छह अथवा सात ही है।
मास्टर चो के अनुसार, भूमि भी प्राणशक्ति का भंडार है। उस भंडार से ऊर्जा तलुवों के जरिए शरीर में प्रवेश करती रहती है। उल्लेखनीय है कि ये तीनों स्त्रोत केवल मनुष्य को ही प्राणशक्ति नहीं सौंपते, बल्कि दूसरे प्राणी और पेड़ पौधे भी उनसे लाभान्वित होते हैं। प्राण ऊर्जा के बिना जीवनचेतना का कहीं अस्तित्व ही नहीं है। बहरहाल मनुष्येत्तर प्राणी इस ऊर्जा का सीमित अंश ही उपयोग कर पाते हैं। संचित हो गई अतिरिक्त प्राण ऊर्जा को वे छोड़ते रहते हैं। थके या बीमार व्यक्ति को पेड़ के नीचे बैठने या लेटने से आराम मिलता है, तो उसका कारण पेड़ से झरती रहने वाली प्राण ऊर्जा ही है। मास्टर चो ने कुछ विधियाँ और प्रयोगों से यह सिद्ध भी किया है कि बीमार व्यक्ति किसी पेड़ के नीचे जाकर सहायता की प्रार्थना करे, तो उसे तुरंत लाभ होता है। इस प्रक्रिया को पेड़ द्वारा उत्तर देना या अनुरोध स्वीकार करना भी कह सकते हैं।
प्राण ऊर्जा को अधिक स्पष्ट ढंग से व्यक्त करने के लिए मास्टर चो कहते हैं कि इसे प्रारंभिक तौर पर इच्छा-शक्ति के रूप में अनुभव किया जा सकता है। जब आप किसी काम को करने की ठान लेते हैं, तो इच्छाशक्ति जाग्रत होती है। बिजली से चलने वाले किसी भी उपकरण में स्विच ऑन करते ही जैसे करंट प्रवाहित हो जाता है, उसी तरह इच्छा या संकल्प उठते ही प्राणशक्ति प्रवाहित होने लगती है।
प्राणिक हीलर संकल्प द्वारा जरूरतमंद व्यक्ति में यही ऊर्जा प्रक्षेपित करता है। मास्टर चो के अनुसार, जिसके पास यह शक्ति विशेष रूप से होती है, वे अनायास ही दूसरे लोगों तक इसका प्रक्षेपण करते रहते हैं। जिन लोगों के पास पहुँचकर अथवा बातचीत से ही आपको ताजगी और स्फूर्ति का अनुभव होने लगे, उनके बारे में मानना चाहिए कि वे प्राणशक्ति का विशेष भंडार लिए हुए हैं। यह अनुभव भी कई बार होता है कि कुछ लोगों के पास बैठकर बिना कारण ही थकान व घुटन महसूस होने लगती है। जिन लोगों के पास बैठकर ऐसा अनुभव होता है, वे प्राणिक दृष्टि से दरिद्र और चोर किस्म के लोग होते हैं। वे अपने आसपास के लोगों से प्राण ऊर्जा खींचते रहते हैं।
प्राणिक हीलर को आरंभ में ही सावधान कर दिया जाता है कि वे सजग-सावधान रहें। उनके पास प्राणशक्ति का संचय कोश होता है। सावधान नहीं होने पर जेबकतरे और चोर जैसे जेब में रखे हुए पैसे तथा पास में रखा सामान लेकर चंपत हो जाते हैं। उसी तरह प्राण ऊर्जा का अपहरण भी हो सकता है। प्राणिक हीलर अपने आभा शरीर को कुछ क्रियाओं द्वारा इस तरह संभालकर रखता है, जिसे ताला लगाने या बंद करने के रूप में समझा जा सकता है। प्राणचिकित्सा के मर्मज्ञ इस प्रक्रिया को ‘एनर्जी सील’ करना कहते हैं। मास्टर चो की सलाह है कि सामान्य व्यक्तियों को भी अपना संगी-साथी चुनते समय इस तरह का ध्यान रखना चाहिए कि प्राण ऊर्जा अनजाने में ही बहती न रहे।
आस्था चिकित्सा की तमाम विधियों से होने वाले लाभ को मानसिक संभ्रम की संज्ञा देने वाले चिकित्सक भी प्राणिक हीलिंग के परिणामों को देखकर चकित है। ऐसे केस हैं, जिनके बारे में किसी भी तरह सिद्ध नहीं किया जा सका कि वे किसी संभ्रम के शिकार हैं।
चरैवेति-चरैवेति का महामंत्र भारत देश की प्राणचेतना में समाया हुआ है। पुराकाल से इसी का अनुशलन करते हुए देश के प्रज्ञजनों ने समूची विश्ववसुधा को भारतीय ज्ञानसंपदा, अध्यात्मविद्या एवं संस्कृति के अजस्र अनुदान सौंपे हैं। पुराणों के अनुसार, ब्रह्मर्षि विश्वमित्र के पुत्र आस्ट्रेलिया चले गए और उसे नए सिरे से बाया। राजकुमार तृणाबिंदु के भी उस देश में जाने का विवरण पुराणों में मिलता है। महर्षि पुलत्स्य आस्ट्रेलिया में धर्म स्थापना के लिए गए थे-ऐसा पौराणिक कथाएं कहती हैं। शायद इसी प्राचीन संपर्क सूत्र का परिणाम है कि आस्ट्रेलिया की आदिम जातियाँ की भाषा भारतीय कोल भील एवं द्रविड़ क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषाओं के सदृश है।
महाभारत में उद्दालक ऋषि के पाताललोक चानि कि अमेरिका जान का वर्णन है। भारत की ही मग नामक पराक्रमी जाति मंगोलिया जाकर बसी। उसने अपने वंश के नाम पर ही अपने देश का नामकरण मंगोलिया रखा। इन लोगों का एक दूसरा नाम शक था, तभी उस देश को शाकद्वीप भी कहा गया। अफ्रीका में पाए जाने वाले जुलू लोग ‘झल्ल’ वंश के क्षत्रियों की संतानें हैं। पुराणकथाएं कहती हैं कि महर्षि कण्व मिश्र गए थे। वहाँ उन्होंने अनेक जनों को सुसंस्कृत बनाया। राजा इक्ष्वाकु के पौत्र राजकुमार शक से ही शक जाति जन्मी। जो मिश्र-ग्रीक आदि देशों में जा बसी।
ई. मार्सडन, नैरिस, मैनिंग, क्लैडविल आदि विश्वप्रसिद्ध, पुरातत्ववेत्ता इस तथ्य को स्वीकारते हैं कि आस्ट्रेलिया की आदिम जातियों का मूल भारत है। डॉ. मार्टिन का तो यह भी मानना है कि पूर्व में सूर्यवंशी लोग ही अमेरिका में जाकर बसे थे। ‘काँक्वेस्ट ऑफ मैक्सिको’ के लेखक पोस्कर का मानना है कि ‘साल कंकट’ नाम भारतीय ने मैक्सिको को समुन्नत किया। पेरु शब्द का संस्कृत भाषा में अर्थ सूर्य का देश है। भारतीयों के दिए इसी नाम से आज भी पेरु को जाना जाता है।
इतिहास के पृष्ठों में सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा के लंका जाने की कथा पढ़ी जा सकती है। सम्राट अशोक ने अनेकों संस्कृति प्रचारकों को भारत देश से बाहर मलाया, सीरिया, मिश्र, मैसेडोनिया, इपिरस, सिनेनिया आदि देशों में भेजा। परवर्ती समय में कनिष्क ने मध्य एशिया, चीन, जापान, तिब्बत, बर्मा, थाईलैंड एवं कंबोछिडया आदि देशों में देवसंस्कृति के संदेशवाहक भेजे। नौ बौद्ध प्रचारक मंडलों के देश-देशाँतर में जाने की कथा भी इतिहास में मिलती है। इनके अंतर्गत मज्झाँतिक, मज्झिम, महादेव, योगधम्म, महाधम्म, सोणउत्तर तथा महिंद आदि प्रचारकों ने गंधर, यूनान, अरब, मिश्र, साल्मीन, लंका, मध्य एशिया एवं पूर्वी द्वीप समूह आदि देशों में कष्टसाध्य यात्राएं करके भारतीय ज्ञान एवं संस्कृति का आलोक फैलाया। भारत से मंत्रसिद्ध नामक प्रकाँड विद्वान के खोतान पहुँचने की कथा भी इतिहास में वर्णित है। यह क्षेत्र इन दिनों तुर्किस्तान के अंतर्गत आता है।
इतिहासवेत्ता अर्नाल्ड मैनिंग की रचना ‘इंडिया इन वर्ल्ड’ के अनुसार काश्यप, मातंग और धर्मरक्षित असम होते हुए चीन गए थे। सातवीं सदी में तिब्बती मार्ग से नालंदा विश्वविद्यालय के उपाध्याय पद्मसंभव, श्रीघोष, जिनमित्र, दानशील, गोधिमित्र, दीपंकर आदि ने चीन में धर्मचक्र प्रवर्तन किया। इसके पश्चात् तिब्बती मार्ग से ही काश्मीर के राजकुमार गुणवर्मन और उज्जैन के बौद्ध भिक्षु चीन पहुँचे थे। परमार्थ जिसका एक नाम गुणरत भी था, उन्होंने उस देश की भाषा में संस्कृत एवं पाली ग्रंथों का अनुवाद संपन्न किया।
चीन में सनातन संस्कृति का धर्म बताने वाले राजकुमार गुणवर्मन असाधारण विद्वान, तपस्वी एवं विलक्षण प्रतिभा संपन्न थे। इन्होंने चीन में महिला भिक्षुणियों का उद्भव और संगठन या। नारी जागरण के पिछड़े क्षेत्र में उनके इस प्रयास से भारी जागृति उत्पन्न हुई। गुणवर्मन के उपराँत गुणभद्र, धर्मजालयश, धर्मरुचि, बोधिरुचि, प्रज्ञारुचि नामक प्रतिभाशाली एवं उद्भव विद्वान धर्मप्रचारक भी भारत से चीन पहुँचे। कुमारजीव के साथ अनुवाद करने में संलग्न शिष्यों में धर्मरक्ष, संघभट्ट, धर्मप्रिय, बुद्धजीव आदि कितने ही ऐसे विद्वान थे जो कुमारजीव के शरीर त्यागने के पश्चात् भी संस्कृति विस्तार के कार्य में अविरल श्रद्धा के साथ लगे रहे।
जापान में बोधिसेन भारद्वाज सन् 638 ई. में पहुँचे थे। उन्होंने ही पहले-पहल जापानी वर्णमाला को व्यवस्थित किया था। एक दूसरे धर्मप्रचारक धर्मबोधि भी जापान पहुँचे। सन् 736 ई. में बुद्धसेन नाम के एक भारतीय विद्वान अपने साथ एक अच्छी संगीत मंडली लेकर वहाँ पहुँचे। इन्होंने गीत-संगीत के माध्यम से भारतीय संस्कृति का मर्म वहाँ के निवासियों को समझाया।
वियतनाम को पहले हिंद-चीन के नाम से जाना जाता था। इतिहास बतलाता है कि समय-समय पर कौडिन्यो ने ईसा की प्रथम शताब्दी में चहाँ पहुँचे। चौथी शताब्दी में देसरे कौडिन्य के जाने का विवरण उपलब्ध होता है। इसके तीन सौ वर्ष पश्चात् एक तसरे कौडिन्या भी वहाँ गए। पांचवीं शताब्दी के शासन जयवर्मा को भी कौडिन्य नाम से संबोधित किए जाने का वर्णन मिलता है।
कंबोडिया के शासक इंद्रवर्मन, श्रेष्ठवर्मन, जयपवर्मन, रुद्रवर्मन, गुणवर्मन, भववर्मन आदि शासक एक ही वंश के थे, जो भारतीय थे। इतिहासवेत्ताओं के अनुसार यशोवर्मन के शासनकाल में सामशिव, शंकरस्वामी, विनयपंडित, जयेंद्र, फलप्रिय, योगेश्वर, सर्वज्ञमुनि, जयमहाप्रधान, केशव आदि आचार्यों का गौरवास्पद उल्लेख है। ये सभी भारतीय थे। भारतीय प्राध्यापिकाओं में जयमाला, जनपद, राजदेवी, इंद्रदेवी, जयराज देवी आदि के नाम आते हैं। इन सभी ने वहाँ के जन-जन को देवसंस्कृति के सनातन सूत्रों की शिक्षा दी। इतिहासकार पीलियो के अनुसार वहाँ शिक्षा एवं संस्कृति को समुन्नत करने का दायित्व तकरीबन एक हजार भारतीय ब्राह्मणों पर था। उनमें शिव कैवल्य, हिरण्यदास, अगस्त्य, दिवाकर, हृषिकेश, वामशिव, शिवाचार्य आदि प्रमुख थे।
अरकाना में काशीदेश के राजकुमार पहुँचे थे। सातवीं शताब्दी में नालंदा के आचार्य धमपा सुवर्णद्वीप पहुँचे थे। आठवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में दक्षिण भारतीय बौद्धभिक्षु बज्रवोधि व उनके शिष्य अमाघवज्र भी कुछ समय के लिए यहाँ पहुँचे थे। सातवीं शताब्दी में नालंदा के आचार्य धर्मपाल सुवर्णद्वीप पहुँचे थे। आठवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में दक्षिण भारतीय बौद्धभिक्षु बज्रवोधि व उनके शिष्य अमोघवज्र भी कुछ समय के लिए चहाँ पहुँचे थे। धर्मपाल तथा वज्रबोधि ने मलेशिया में भी धर्मप्रचार का कार्य बड़ी आस्था से किया। उन्होंने तपस्यापूर्ण जीवन बिताते हुए यहाँ की भाषा में प्रतिपाद्य ग्रंथों की रचनाएं भी की।
इन सभी महानुभावों ने देवसंस्कृति के प्रचार-विस्तार का दायित्व उस समय पूरा किया, जबकि यात्राएं अति कष्टकर होती थी। न तो यातायात के साधन सुलभ थे और ही दूरसंचार की आधुनिक सुविधाएं। उनके पास थी तो मानवीय संवेदनाएं। तप और विद्या के प्रति असीम अनुराग, जन-जन को देवसंस्कृति की दुर्लभ विभूतियाँ बाँटने की अदम्य लालसा। अपनी इस पूँजी के बल पर उन्होंने असाध्य को सुलभ एवं साध्य बना दिया। अपने उत्कृष्ट जीवन का उदाहरण प्रस्तुत कर मानवीय जीवन के लिए विचार एवं आदर्श की संपदा जुटाई। आधुनिक युग में विज्ञान ने साधन-सुविधाओं का अंबार लगा दिया है। कुछ ही घंटों में पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचा जा सकता है। पलक झपकते एक देश से दूसरे देश तक संदेशों का आदान-प्रदान किया जा सकता है। फिर भी संस्कृति सरिता सूखा है, मानवीय संवेदना मुरझाई हुई हैं। देवसंस्कृति की अलौकिक विभूतियाँ तो अभी भी हैं, बस वितरक नहीं है। आवश्यकता उनकी है, जो आज के युग के कौडिन्य एवं कुमारजीव बन सकें। इस पथ पर चलने के लिए यदि हम में से कुछ जन ही आगे कदम बढ़ा सके, तो फिर से संस्कृति सरिता प्रवाहित होने लगे, मानवीय संवेदना मुस्करा उठे और देश में ही नहीं समूचे विश्व में मानवीय जीवन फिर से अपना खोया हुआ सौंदर्य पा जाए। जरूरत है, तो बस चरैवेति-चरैवेति के भूले हुए महामंत्र को याद करने की।
अंबपाली का आतिथ्य स्वीकार कर, उसे भिक्षुणी बनाकर, समाजसेवा में प्रवृत्त कर जब भगवान प्रव्रज्या पर आगे बढ़े, तो आनंद ने जिज्ञासा उनके समक्ष रखी- “भगवन् ! आज तो एक पतिता को आपने तार दिया। पर जब सारा मानव समाज कुरीतियों से ग्रस्त हो, अज्ञान के दलदल में अनेकों मानव कराह रहे हों, आप अकेले कहाँ-कहाँ तक जाएंगे, किस-किस का उद्धार करेंगे।” बुद्ध हंसे। बोले- “आनंद ! इसका उत्तर भी क्या मुझे ही देना होगा। बुद्ध-धर्म संघ की शरण में आने का तात्पर्य एक व्यक्ति बुद्ध में नहीं, उसके अग्रदूत बने विवेक बुद्धि के प्रतीक अनेकों शिष्यगण है। जो आने वाले समय में विचारक्राँति की व्यापक आग सारे समाज में फैलाकर इन अवाँछनीयताओं का नाश करेंगे। बुद्ध अभी ही अवतार के रूप में नहीं आया हैं, वह भविष्य में जब भी उद्धारकों की आवश्यकता होगी, प्रज्ञा व विवेक के रूप में आएगा। तुम्हें, अर्थात् तुम सब प्रज्ञावानों को घर-घर जाकर विवेक की, नीति की, सदाशयता की शरण में जाने का शिक्षण देना है, ताकि पतन-पराभव की स्थिति से मानव समाज उबरे।”
आधुनिक समझी जाने वाली बेतुकी जीवनशैली ने इन दिनों जिन स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दिया है, उनसे शायद ही कोई व्यक्ति बचने में समर्थ रह पाया हो। आधुनिक चिकित्सापद्धति भी इन समस्याओं के पूर्ण निदान की बजाय सिर्फ दबाने में ही सफल हो पाती है। ऐसी स्थिति में समस्याएं बाद में और भी विकराल रूप में उभर उठती है। संभवतः यही कारण है कि अब लोग फिर से प्राचीन चिकित्सापद्धति आयुर्वेद की ओर मुड़ रहे है।
आयुर्वेद के इतिहास पर नजर डालें, तो पता चलता है कि भारत में प्राचीनकाल से ही आयुर्वेद अत्यंत विकसित अवस्था में था। वेदों की अनेक शाखाओं के अध्ययन में आयुर्वेद संबंधी विचार पाए जाते हैं। नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ाए जाने वाले पाँच अनिवार्य विषयों में आयुर्वेद भी एक था। सुदूर हिंद एशिया, चीन, मध्य एशिया, मंगोलिया आदि देशों के छात्र जब नालंदा से लौटते तब भारतीय आयुर्वेद का ज्ञान भी अपने साथ ले जाते थे। यूरोपीय देशों में भी आयुर्वेद कम प्रतिष्ठित नहीं था। हाँ इतना अवश्य है कि भारतीय और यूरोपी देशों के चिकित्सा लेखकों की शैली में एक स्पष्ट अंतर रहा। जहाँ भारतीय लेखकों ने आयुर्वेद का इतिहास लिखते समय इसकी परंपरा, इसके आचार्य, प्रवर्तक तथा ग्रंथों की चर्चा विशेष रूप से की है, वहीं यूरोपीय विद्वानों ने आयुर्वेद के आचार्य व ग्रंथों की चर्चा संक्षेप में करके आयुर्वेद विषय का ही प्रतिपादन करने का प्रयास किया है। डॉ. सिम्मर की हिंदू मेडिसिन तथा डॉ. जौली की इंडियन मेडिसिन इसके उदाहरण है।
आयुर्वेद का इतिहास बताता है कि प्राचीनकाल में भारत के पड़ोसी देशों में परस्पर चिकित्साज्ञान का विनिमय भी होता था। जैसे तिब्बती भाषा में आयुर्वेद के ग्रंथ की रचना की गई थी। आठवीं सदी में भी बहुत-सी आयुर्वेदिक पुस्तकें तिब्बती भाषा में अनूदित की गई थी। बाद में इन्हीं पुस्तकों का अनुवाद मंगोलियन भाषा में भी हुआ था। आज भी तिब्बती चिकित्सा का मूल आधार आयुर्वेद है। श्रीलंका में तो आयुर्वेद को राष्ट्रीय चिकित्सा का दरजा प्राप्त है। वहाँ आयुर्वेद के विकास और नवीनतम अनुसंधान को प्राथमिकता दी जाती है। श्रीलंका में बौद्धधर्म के प्रवेश के साथ ही भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद ने भी प्रवेश किया था।
ईरान व अरब में भी आयुर्वेद के प्रचार के प्रमाण मिलते हैं। ईरान की चिकित्सा में उपयोगी वस्तु ‘पारसीक यवानी’ का सिद्धयोग में वर्णन आता है। हींग एवं नारंगी के गुणों का चरक व सुश्रुत में उल्लेख है। भारतीय चिकित्सा की पुस्तकें अवेसियन के समय ईरानी भाषा में अनूदित की गई, फिर इनका अरबी में अनुवाद हुआ। आबू-संसूर की पुस्तक में औषधि निर्माण के संबंध में भारतीय सामग्री आज भी सुरक्षित है। यह अरबी लेखक स्वयं भारत आया था। इसी प्रकार भारतीय द्रव्यगुण संबंधी निघंटु के नाम ग्रीस में बहुत पहले चले गए थे। ज्वर (बुखार) की आमावस्था, पच्यमानावस्था एवं पक्वावस्था का वर्णन भारतीय चिकित्सा की ही भाँति ग्रीक चिकित्सा में भी है। अंगरेजी चिकित्सा के जनक हिपोकेटस द्वारा बनाई गई प्रज्ञा, जो चिकित्सकों को कराई जाती है, वह पूर्णतः चरक संहिता में वर्णित वचनों की ही नकल है।
वर्तमान परिस्थितियों में निश्चित रूप से आयुर्वेद की प्रासंगिकता बढ़ी है। भारत के साथ-साथ एशिया के सभी देशों में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धतियाँ लोकप्रिय हो रही है। पश्चिमी दुनिया के अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी आदि देशों में भी आयुर्वेदिक चिकित्साविधियों को अपनाया जा रहा है। एलोपैथिक चिकित्सक भी मानने लगे हैं कि आयुर्वेद में वात, पित्त, कफ के रूप में प्रकृति का वर्गीकरण वैज्ञानिक है। वात प्रकृति का संबंध संचरण से है। यह संचरण रक्त, श्वसन, विचार आदि का हो सकता है। पित्त का संबंध मेटाबोलिज्म यानि हारमोन, रक्त, जैव रसायनों और ऐंजाइमों से है। कफ प्रकृति का संबंध संरचनात्मक अर्थात् हड्डियों, ऊतकों की बनावट से है।
वात प्रकृति वायु व आकाश तत्व के योग का परिणाम है। ऐसे लोग दुर्बलता एवं गैस की बीमारी से पीड़ित होते हैं, साथ ही उन्हें नींद की शिकायत होती है व दिल की धड़कन भी अनियमित होती है। शरीर का तापमान कम रहता है एवं त्वचा शुष्क रहती है। पित्त दोष अग्नि व जलतत्वों के योग से पैदा होता है। इस दोष से ग्रस्त व्यक्ति गरमी से आक्राँत रहते हैं। पसीना अधिक आता है एवं एसीडिटी के शिकार होते हैं। कफ प्रकृति पृथ्वी एवं जल का संगम है। कफ का प्रकोप होने से शरीर में भारीपन रहता है। सरदी-जुकाम बार-बार होना, गले में कफ आना, खाँसी, शरीर में जकड़न एवं स्वाद के प्रति अरुचि इसके अन्य लक्षण हैं। आयुर्वेद के अनुसार, ये तीनों ही स्थूल व सूक्ष्म रूप में शरीर को चलाने वाले हैं। इन तीनों के स्वाभाविक रूप से रहने पर शारीरिक क्रियाएं ठीक तरह से चलती रहती हैं, लेकिन जब ये बिगड़ जाते हैं, तो रोग का कारण बन जाते हैं।
मनुष्य के शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़े तीनों दोषों के अनुसार शरीर की प्रकृति पहचानकर, खान-पान का चयन करके रोगों से बचा जा सकता है। खाद्य वस्तुओं के स्वाद का इन तीनों ही दोषों पर असर पड़ता है। मीठी चीजों से वात व पित्त कम होगा, कफ बढ़ेगा। खट्टी चीजों से वात कम होगा पित्त बढ़ेगा। नमकीन चीजों का असर भी खट्टी चीजों जैसा ही होता है, कसैली चीजों के सेवन से वात दोष बढ़ता है, परंतु पित्त व कफ घटता है। तीखी वस्तुओं से वात, पित्त बढ़ते हैं, कफ कम होता है। इसी प्रकार पाचनक्रिया सुबह सूर्य निकलने के दो-तीन घंटे बाद से लेकर मध्याह्न तक तीव्र होती है। इसीलिए इस अवधि में गरिष्ठ प्रोटीन युक्त वस्तुएं खाई जा सकती है। मध्याह्न के बाद पाचनक्रिया शिथिल पड़ने लगती है। यही कारण है कि आयुर्वेद में शाम को हलके भोजन की आवश्यकता बताई गई है। रात को अधिक प्रोटीन खाने से नींद संबंधी विकार होने की संभावना बढ़ जाती है।
आज हम जिस शल्य चिकित्सा के गुण गाते नहीं थकते, उसके मूल में भी आयुर्वेद ही है। सुश्रुत को शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में, विभिन्न शल्यक्रियाओं के जनक के रूप में विदेशी वैज्ञानिकों द्वारा भी स्वीकार किया जाता है। प्रसव क्रिया में विलोम की स्थिति पर गर्भस्थ शिशु को शल्य क्रिया से निकालने की जो प्रक्रिया सुश्रुत संहिता में बताई गई है, उसी को आधार मानकर ही आजकल ऑपरेशन किए जाते हैं। परिवार-नियोजन, हार्निया, मोतियाबिंद जैसे रोगों की चिकित्सा या शल्य क्रिया की जानकारी एवं प्रयोगविधि का स्पष्ट वर्णन सुश्रुत संहिता में मिलता है।
जहाँ अन्य चिकित्सापद्धतियाँ सिर्फ मनुष्य के चिकित्सा पद्धति में स्वस्थ शरीर के लिए मानव के मानसिक व आध्यात्मिक अस्तित्व को भी मान्यता प्रदान की गई है। आयुर्वेद के अनुसार मन पर जब ईर्ष्या, द्वेश, भय, संदेह की भावनाएं अपना अधिकार जमाने लगती हैं, तब मन अशाँत व विचलित हो उठता है, जिसका नतीजा मधुमेह, हृदय रोग या मस्तिष्क की नसें फट जाने आदि रूपों में होता है। मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ है- दूसरों के प्रति द्वेश विहीनता। दूसरों के चरित्र एवं व्यवहार पर अपने निजी मूल्याँकन से बचना। हर व्यक्ति में अच्छाई ढूंढ़ने का प्रयास करना। आध्यात्मिक स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण नियम है- अहं केंद्रित इच्छाओं का त्याग। ऐसी स्थिति में मन में न तो कोई विकार पैदा हो पाता है और शरीर को कोई व्याधि घेर पाती है। निश्चित रूप से आयुर्वेद भारतीय महर्षियों के द्वारा मानव को दिया गया समग्र स्वास्थ्य वरदान है। इसमें भारत की आध्यात्मिक संस्कृति की विशिष्ट प्राणऊर्जा संजोई है। देवसंस्कृति के प्रचार-विस्तार के लिए संकल्पित-समर्पित शाँतिकुँज ने आयुर्वेद के शोध एवं पुनरुद्धार में अपने कदम बढ़ाए हैं, ताकि देशकाल की सीमाओं से परे संपूर्ण मानवजाति इस ऋषिप्रणीत स्वास्थ्यपद्धति से लाभान्वित हो सके।
एक राजा ने महात्मा को अपना हीरे-मोतियों से भरा खजाना दिखाया। महात्मा ने पूछा- “इन पत्थरों से आपको कितनी आय होती है ?” राजा ने का-”आय नहीं होती, बल्कि इनकी सुरक्षा पर व्यय होता है ?” महात्मा, राजा को एक किसान की झोंपड़ी में ले गया। वहाँ एक स्त्री चक्की से अनाज पीस रही थी। महात्मा ने उसकी ओर संकेत कर कहा- “पत्थर तो चक्की भी है और तुम्हारे हीरे-मोती भी। परंतु इसका उपयोग होता है और नित्य पूरे परिवार का पोषण करने योग्य राशि दे देती हैं तुम्हारे हीरे-मोती तो उपयोगहीन हैं। उन्हें यदि परमार्थ में खर्च करोगे, तो सुरक्षा-व्यय तो बचा ही लोगे, बदले में जनश्रद्धा, दैवी अनुदान अजस्र मात्रा में पाओगे।”
शिमला से लगभग तीस मील दूर हिमालय के एक सुरम्य शिखर के पास ही यह गाँव था। इस गाँव के ही एक किनारे पर था यह बंगला, छोटा पर निहायत खूबसूरत। मुसकराते फूलों एवं लहराती बेलों ने इसके सौंदर्य को कई गुना बढ़ा दिया था। इस बंगले की तरह गाँव भी छोटा-सा ही था। यही कोई बीच-पच्चीस घर होंगे बस। गाँववाले बंगले में रहने वाले अंगरेज साहब की काफी इज्जत करते थे, हाँ थोड़ा भय भी खाते थे। उन दिनों अंगरेजों का जमाना जो था। गाँववालों के लिए तो विदेशी गोरा रंग ही खासे रौब-दाब का पर्याय था। हालाँकि वे अंगरेज साहब कैप्टन लैंग काफी भले आदमी थे। भारत और भारतीय के लिए इनके मन में काफी आकर्षण था। अनेकों सुविख्यात भारतीय इनके मित्र थे। भोले-भाले ग्रामीणजनों की भी ये समय-समय पर सहायता कर दिया करते थे। गाँववाले इन लैंग साहब को अपनी पहाड़ी भाषा में ‘लानसाहब’ कहकर बुलाते थे। लैंगसाहब को यहाँ की आँचलिक भाषा में अपने नाम का अनुवाद लानसाहब बहुत भला लगता।
इन्हीं लानसाहब के एक मित्र इन दिनों आए हुए थे। ये मित्र भारतीय थे। भारत की अस्मिता, ज्ञान के गौरव की झलक इनमें थी। प्रवृत्ति से ये आध्यात्मिक थे। इनके संवेदनशील ज्ञान की ऊर्जा को भारत ने ही नहीं पश्चिमी जनों ने भी छुआ था। दक्षिणेश्वर के संत श्री रामकृष्ण परमहंस की संगत में उनकी यह प्रवृत्ति और भी अधिक उभरी और निखरी थी। हिमालय का आकर्षण ही इन्हें यहाँ खींच लाया था। बातों-ही बातों में एक दिन परमहंसदेव ने इनसे कहा था, हिमालय तो साक्षात् अध्यात्म है। इसके हर शिखर में आध्यात्मिकता का एक अनोखा गौरव, एक अनूठी ऊँचाई है। केशवबाबू जा सको, तो हिमालय जरूर जाओ। उन्हें परमहंसदेव की बात भा गई और वे कुछ दिनों के लिए यहाँ आ गए। हिमालय की अनोखी सुषमा को देखने और इसके अनूठेपन को अपने कैनवास पर उतारने।
इस गाँव से हिमालय का ऐसा रोमाँचक दृश्य दिखाई देता था कि वर्णन ही नहीं किया जा सकता................. बस हाथ बढ़ाकर पकड़ लो इतने नजदीक लगते हैं पहाड़। उनके ऊपर भोर से साँझ तक खेलती सूर्यरश्मियाँ एक ऐसी अनूठी-अनोखी चित्रकारी करती हैं, जो पल-पल बदलती रहती है। .............. उन्होंने आते ही तय किया कि इस स्वर्णिम ज्योतिर्मय आभास को मूर्तरूप दिया जाए, अपने कैनवास पर। विख्यात चित्रकार न होने पर भी चित्रकारी करना उनका शौक था। फुरसत के पलों में उनकी यह कलात्मक संवेदना उनकी आध्यात्मिक संवेदना से एकाकार हो जाती। इस समय भी कुछ यही हो रहा था।
उन्होंने देखा लानसाहब के बंगले के पास कुछ ही दूर पर बहते एक सोते के बीच में कुछ बड़े पत्थर उभरे थे ......... उनके ऊपर के हिस्से लगभग सपाट थे। अपनी इजल फिट की और डूब गए पिरवेश में
सहसा एक हंसी खनकी .............। वह चौंक गए। ऐसा लगा कि चाँदी की पायजेबें थरथराई हैं। उनके हाथ से ब्रश गिर गया और जब तक वे इसे संभाले तब तक तो वह पत्थरों पर लुढ़कता धारा के ऊपर बहता अदृश्य हो गया ................। उनकी प्रकृति थी जब वे काम में डूबे रहते हैं, तो अपने ही आप से बातें करते रहते। सच तो यह है कि वे खुद भी नहीं जानते कि क्या बातें करते हैं ? पर उनके मित्र अक्सर उनकी इस आदत पर कुछ-न-कुछ टिप्पणी करते रहते हैं। उन्होंने सोचा आज भी उनकी इस बेतुकी आदत पर कोई हंसा होगा।
उन्होंने सिर घुमाया। एक प्यारी सी बच्ची थी, लगभग पाँच साल की। उनकी तरफ शैतानी से देख रही थी ....................। पर उनको अपनी ओर मुड़ते देखकर सहसा वह घबरा गई और पत्थरों ऊपर उछलती-कूदती दूर भाग गई। ऐसा लगा कि कोई मृगछौना भाग रहा है। निष्प्रयास। वह उन्हें जरा भी आभास दिए बिना चुपचाप उन पत्थरों पर चढ़ आई थी, जहाँ वह काम कर रहे थे........... और अचानक जब उसने देखा कि उनका ब्रश गिर गया, तो वह घबरा उठी। शायद उसने सोच लिया कि ये उसे मारने तो नहीं लगेंगे।
पर उसकी अपेक्षा के विपरीत वह मुस्कराए और बड़े प्यार से बोले - आ जाओ गुड़िया.........। आओ, तुम्हारा नाम क्या है ? उन्होंने उसे पुकारा। उसने कुछ भी जवाब नहीं दिया। अच्छा आओ.......... मैं तुम्हारी तस्वीर बनाऊँगा, उन्होंने दूसरा ब्रश निकालकर उसे दिखाया।
वह थोड़ा नजदीक आई। चंपा है मेरा नाम चंपा......... मेरे बाबू लानसाहब के बंगले में कार करते हैं।
तो यह थी नयनसिंह की बेटी........। सचमुच यह उतनी ही प्यारी है जितना कैप्टन लैंग उन्हें बताया करते थे।
उन्होंने हिमालय की देवदूतों जैसी गरिमावान चोटियों को कैनवास पर उतारने का प्रयास छोड़ दिया..........और बनना शुरू हुआ चंपा का चित्र...............। लेकिन वह बनाने दे तब तो।...........। हर दस-पंद्रह सेकेंड बाद वह उठती और देखती कि पूरा हो गया या नहीं।
वह मुश्किल से उसे बैठाते.........। थोड़ी देर बाद जब उसने कैनवास पर एक चंपा को वाकई उतरते देखा, तो उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में विस्मय झलक आया..........। पाँच सल की चंपा शहद और दूध का मिला रंग.......उड़ते बाल, बड़ी बड़ी आंखें, लेकिन उनका दिल नहीं हुआ कि उसकी फटी तार-तार फ्रॉक को कैनवास पर ज्यों-का-त्यों उतारा जाए। उन्होंने उसे एक लाल रंग की सितारों जड़ी फ्रॉक पहना दी.......। पर साब मेरे पास तो ऐसी सुँदर फ्रॉक है ही नहीं। तुम तस्वीर वाली चंपा से निकालकर मेरे को दे दो न। उसने आँसू बहाते हुए कहा। तभी नयनसिंह वहाँ आ गया और रोना बंद हुआ।
अगले साल जब वह आए, तो उसके लिए बिलकुल वैसी ही फ्रॉक ढूंढ़-खोजकर ले आए। फिर तो वे दोनों अच्छे दोस्त बन गए। ...... चंपा कंटीली झाड़ियों से हिंसोरु जमा करती....... सूर्य उदय होने से पहले ही उनको जमा करना पड़ता। बड़ी कंटीली झाड़ियाँ होती हैं हिंसोरु की, पर स्वाद जो कोई खा ले कभी भूले ही नहीं। उसके हाथों और पाँवों पर अक्सर काँटे की लकीरें होती। वह उसको लाख मना करते पर ........।
कलकत्ता में आपको यह कहाँ मिलेगा....... खा लो। उसकी निष्कलुष समझ ने उनकी कमजोरी को पकड़ लिया था। उसे पता चल गया था कि इन बाबू को हिंसारु बहुत भाते हैं।
उस साल के बाद कई सालों का अंतराल हो गया। हाँ यदा-कदा नयनसिंह की चिट्ठी आ जाती, जिसमें चंपा का भी जिक्र होता। चंपा नाम जेहन में आते ही उसकी नादानियाँ, शैतानियाँ और चंचल-खूबसूरत प्यारापन सब-के-सब एक साथ जेहन में आ जाते। लेकिन इधर व्यस्तता काफी बढ़ गई थी। ब्रह्मसमाज आँदोलन के साथ अनेकों तरह के कामकाज में वह मशरुफ होते गए। धर्मप्राण समाज सुधारक केशवचन्द्र सेन के नाम से वह सुपरिचित ही नहीं सुविख्यात हो चुके थे। हालाँकि अपनी अतिव्यस्तता में भी उस भोली-सी पहाड़ी लड़की को वह भूले नहीं, पर संपर्क करने का अवसर ही नहीं मिला। इधर नयनसिंह की चिट्ठी भी उन्हें नहीं मिली थी।
आखिरकार इस साल उन्होंने पहाड़ पर दीवाली मनाने का निश्चय किया और इस आशय का एक पत्र उन्होंने कैप्टन लैंग को लिखा और एक पत्र नयनसिंह को। पहाड़ की दीवाली भी बड़ी निराली होती है। बिलकुल अंधेरी घाटी और दूर-दूर तक फैले पहाड़ों पर सहसा हजारों प्रकाशबिंदु अचानक न जाने कहाँ से बिछ जाते हैं। लगता है जैसे असंख्य जुगनूँ कहीं से डेरा डालने आ गए हों।
लानसाहब के बंगले पर पहुँचने पर उन्हें नयनसिंह नजर आया। बिलकुल हड्डी-हड्डी हो गया था। कैप्टन लैंग भी थोड़ा मुरझाए से लग रहे थे। चंपा कैसी है ? उन्होंने पूछा। दरअसल चंपा के वहां न दिखने पर वह थोड़ा निराश हो गए थे। उन्होंने सोचा था कि हंसती-खिलखिलाती चंपा उनसे मिलने जरूर पहुँचेगी।
चंपा, चंपा तो खत्म हो गई। उसने कहा भर्राई आवाज में। क्या कहा, क्या कहा तुमने। वह लगभग चीख पड़े, क्या हुआ उसको.......।
साब वह तो पिछले साल बच्चा होने में खत्म हो गई थी। अब तो एक साल होने को है।
क्या कह रहा है यह, पागल तो नहीं हो गया है.........।
मुश्किल से तेरह-चौदह साल की होगी वह......उन्होंने कहा।
हाँ साब तेरह की थी। हमारे यहाँ तो जल्दी शादी का रिवाज है। समाज का दबाव तो मानना पड़ता है। नयनसिंह बोलता जा रहा था, पर वह निःशब्द थे।
कैप्टन लैंग के बंगले पर उन्होंने वह रात सिसकियों के बीच बिताई। वह हैरान भी थे, बेहद परेशान भी। समाज के दबाव से दस साल की छोटी-सी बच्ची की शादी और तेरह साल में उसकी मौत। बालविवाह की इस घिनौनी बुराई ने उन्हें विक्षुब्ध कर दिया। रात बीतते ही वह नयनसिंह के घर जा पहुँचे। यह बंगले का आउट हाउस ही था।
फर्श पर फीणे की चटाई पर नयनसिंह बैठा था। उसकी पत्नी ने आग्रह से चाय पिलाई। जब चाय खत्म हो गई, तो नयनसिंह बिना कुछ कहे उठा और पिछले कमरे से वही कैनवास उठा लाया, जो उन्होंने आठ साल पहले बनाया था। कैनवास धुएं से बदरंग हो चला था। एक कोना किसी चूहे ने शायद कुतर डाला था और टूटी छत से चू रहे पानी ने कई जगह रंग को धूमिल कर दिया था, पर चंपा फिर भी वहीं मौजूद थी। उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में अभी भी वैसा ही विस्मय था, जैसाकि उन्होंने उस दिन देखा था, जब वे उसका चित्र बना रहे थे। उनकी आँखों से आँसू की एक बूँद निकली और कैनवास पर टपक पड़ी। नयनसिंह और उसकी पत्नी भी सिसक उठे। वह बिना कुछ कहे पहाड़ों की ओर निकल पड़े।
बालविवाह की सामाजिक कुरीति उनके मन-मस्तिष्क में हलचल मचाए थी। वह सोच रहे थे बालविवाह एक तरह से बालहत्या ही तो है। अब यह व्यक्ति स्वयं करे या फिर समा के दबाव में आकर करे, अपराध कम तो नहीं होता। फिर यदि व्यक्ति की मानसिकता बदल सकती है, तो समाज की क्यों नहीं। एक नहीं, अनेक सामाजिक कुरीतियाँ अपने देश में नागफनी की तरह फैल रही हैं। इनके काँटों से रोज अनेक मासूम जिंदगियाँ तार-तार हो जाती है। उनके मस्तिष्क की यह हलचल एक निश्चय में बदल गई-वह सामाजिक कुरीतियों की नागफनी को साफ करेंगे, ताकि फिर किसी मासूम चंपा की खिलखिलाहट न छिने।
उन्होंने अनुभव किया कि दुःख की बाढ़ उतरने पर मनुष्य में एक शक्ति आ जाती है और वह इनसान को उसके पुरुष-स्त्रीपन से परे उसके शारीरिक-मानसिक गुण-अवगुणों से परे पहचानने लगता है। एक तादात्म्यता का बोध होता है, मनुष्यमात्र से, शायद प्राणिमात्र से। एक ऐसी दृष्टि मिलती है, जो पहले नहीं थी। आज उन्हें ऐसी ही दृष्टि मिली थी। उन्हें इस अनोखी दृष्टि का वरदान देकर उस दिन का सूरज चला गया। शाम रात में बदलने लगी। यह दीवाली की रात थी। घने अंधेरे में अनेकों प्रकाशबिंदु चमक उठे। अभी भी वह सोच रहे थे कि यदि हर विवेकवान एवं विचारशील अपने अंचल में सामाजिक कुरीतियों-बुराइयों के विरोध में प्रकाशबिंदु की तरह चमक उठे, तो समूचे देश में चमकने वाले ये अनेकों प्रकाशबिंदु घने अंधेरे को भी रोशन कर देते। शुरुआत उन्होंने स्वयं से की। ‘केशवचंद्र सेन’ उनका यह नाम बालविवाह ही नहीं सभी तरह की सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष का पर्याय बना गया।
एक नहीं, अनेक सामाजिक कुरीतियाँ अपने देश में नागफनी की तरह फैल रही हैं। इनके काँटों से रोज अनेक मासूम जिंदगियाँ तार-तार हो जाती है। उनके मस्तिष्क की यह हलचल एक निश्चय में बदल गई-वह सामाजिक कुरीतियों की नागफनी को साफ करेंगे, ताकि फिर किसी मासूम चंपा की खिलखिलाहट न छिने।
एक सेठ था। उसके पास बहुत धन था, पर स्वभाव से वह था कंजूस। न स्वयं खा-पी सके और न किसी को दे सके। घर में अपने धन को इसलिए नहीं रखता था कि कोई चोर-डाकू न चुरा ले, अतः गाँव के बाहर एक जंगल में गड्ढा करके अपना सारा धन गाड़ आया। दूसरे-तीसरे दिन जाता और उस स्थान को चुपचाप देख आता। उसे अपने पर बड़ा गर्व था।
एक बार एक चोर को शक हुआ, वह कंजूस के पीछे-पीछे चुपचाप गया और छिपकर देख आया। उसे समझते देर न लगी कि इस स्थान पर अवश्य कोई मूल्यवान वस्तु दबी है। जब कंजूस चक्कर लगाकर घर चला गया, तो उस चोर ने खुदाई करके सारा धन प्राप्त कर लिया और वहाँ से रफूचक्कर हो गया।
दूसरे दिन जब वह कंजूस फिर अपने छिपे धन को देखने गया, तो उसे जमीन खुदी हुई दिखाई दी। आसपास मिट्टी का ढेर लग रहा था और बीच में एक खाली गड्ढा था। उसका सारा धन जा चुका था। इतनी बड़ी हानि वह सहन नहीं कर सका। माथा पकड़कर जोर से रोने-चिल्लाने लगा-”हाय! मैं तो लुट गया, मेरे सारे जीवन की कमाई चोर ले गए।”
रोना चिल्लाना सुनकर जंगल में रहने वाले आस-पास के कई आदमी आ गए। उन्होंने पूछकर स्थिति जानी। एक आदमी ने समझाते हुए कहा- “सेठ जी ! धन तो आपके काम पहले भी न आया था और न आपके जीवन में आ सकता था। हाँ उस पर आपका अधिकार अवश्य था और उसे यहाँ छिपाकर रख छोड़ा वह बेकार ही था। ऐसी स्थिति में दुःखी होने की क्या आवश्यकता है?’
बीसवीं शताब्दी जागरण की शताब्दी थी। इस युग में जन्में सिद्धान्तों ने अपने तप और मौन अनुग्रह से विश्व-समाज को आध्यात्मिक संस्कार दिए। महर्षि रमण का नाम इस तरह का अनुग्रह करने वाले गिने-चुने संतों में लिया जाता है। उनके समकालीन संतों में स्वामी रामकृष्ण परमहंस और महायोगी अरविंद का ही उल्लेख किया जाता है। कोई और विभूति उनके सामने नहीं टिकती।
महर्षि रमण की विलक्षणता थी कि उन्होंने बोलकर अथवा लिखकर ज्यादा कुछ नहीं कहा। उनका सान्निध्य साधकों में स्वयं ही प्रकाश जगाता था। इसमें वे अपना मार्गदर्शक स्वयं बनने का प्रयास बताते थे। उनके सान्निध्य में आध्यात्मिक ही नहीं, लौकिक दृष्टि से भी लोगों को विलक्षण अनुभव हुए। इनमें साक्षात्कार भी शामिल है और शरीर, मन एवं परिवार संबंधी पीड़ाओं का निवारण भी।
सन् 1879 में तमिलनाडु के एक कस्बे विरुयु जुही कस्बे में जन्मे वेंकटरमण (बाद में महर्षि रमण के नाम से विख्यात) पूर्वजन्म में अर्जित पुण्य, साधना और अध्यात्म का वैभव साथ लेकर आए थे। उन्हें बचपन से ही समाधि लगने लगी थी। या तो वे गहन ध्यान में डूबे रहते अथवा सोए रहते। सत्रह वर्ष की आयु में उन्होंने घर छोड़ दिया। तिरुवन्नामलाई में मीनाक्षी मंदिर में जाकर संन्यास ले लिया। संन्यास से पाँच वर्ष पहले ही उनके पिता का निधन हो गया था। अपने पिता के निधन ने उन्हें मृत्यु के संबंध में नया भावबोध जगाया। इस बोध के परिपक्व होते ही उन्हें संन्यास सिद्ध हो गया। फिर घर में रहने या नहीं रहने से कोई अंतर नहीं पड़ा।
अपने आपको शरीर तक ही सीमित नहीं मानने, उससे तादात्म्य पूरी तरह तोड़ लेने और कायाक्लेश से रत्तीभर प्रभावित न होने पर भी उन्होंने दूसरों का कष्ट दूर करने के लिए जोखिम उठाई। कर्मफल को ब्रह्म की तरह सत्य और अटल मानते हुए भी महर्षि रमण कहते थे कि दूसरों के कष्ट अपने ऊपर लिए जा सकते हैं। आशीर्वाद वरदान देने से ही काम नहीं चलता। जो आशीर्वाद दे रहा है, उसे अपने पुण्य का एक अंश भी पीड़ित व्यक्ति को देना होता है। न्यायालय ने किसी अपराध के लिए अर्थदंड दिया है, तो जुर्माना भरना ही पड़ेगा। दंडित व्यक्ति जुर्माना दे अथवा अनुरूप, सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी। कष्टमुक्ति के लिए पुण्य तो चुकाना ही पड़ेगा। इस नियम का निर्वाह करते हुए उन्होंने कितने ही भक्तों के कष्ट अपने ऊपर लिए और उन्हें पीड़ामुक्त किया।
लोगों को कष्टमुक्त करते रहने के कारण महर्षि रतण पर कल्मषों का बोझ इतना बढ़ गया कि उसका विग्रह करने के लिए प्रकृति ने उनकी बायीं भुजा में कैंसर रोप दिया। इससे पहले वे गठिया और शरीरक्षय जैसे रोगों-विकृतियों को आमंत्रित कर चुके थे। उनके जीवनीकार आर्थर आँसबोर्न ने लिखा है कि वे रोगी थे। बहुत दुर्बल दिखाई देते थे, लेकिन उन्हें इसकी चिंता नहीं थी। वे सत्तर साल के भी नहीं हुए थे, परंतु इस आयु से कहीं ज्यादा बूढ़े दिखाई देते थे। वे चिंता से जर्जरित नहीं थे, क्योंकि इसका कोई चिन्ह उनमें कभी दिखाई ही नहीं दिया। उन्होंने कभी चिंता की ही नहीं।
फिर भी क्या कारण है कि जो व्यक्ति इतना स्वस्थ और स्फूर्तिमान् था, जिसने कभी रोग, शोक और चिंता की परवाह की ही नहीं, पर अपनी आयु से भी अधिक वृद्ध दिखाई दे। इसका कारण सिर्फ यही है कि उन्होंने अपने भक्तों, श्रद्धालुओं और याचकों के पाप-तापों को अपने ऊपर ले लिया। विनती करने वालों के कर्मबंधन शिथिल कर दिए। धर्म-अध्यात्म के इतिहास में इस तरह के अनेक उदाहरण मिलते हैं। भगवान बुद्ध की मृत्यु विषूचिका रोग के कारण हुई, भगवान शंकराचार्य अंत तक भगंदर रोग से पीड़ित रहे। इसी युग में स्वामी रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु भी इसी वजह से कैंसर रोग के कारण हुई।
महर्षि रमण ने अपनी पहली आध्यात्मिक अनुभूति के बारे में कहा है कि वह मृत्यु के भय के रूप में थी। इस भय पर विजय पा लेने के बाद कोई कारण नहीं बचा, जिसने उन्हें विचलित किया हो। उन्होंने स्वयं इस अनुभूति का वर्णन किया है। उन्हीं के शब्दों में, “मदुराई से सदा के लिए रवाना होने से लगभग छह सप्ताह पूर्व यह परिवर्तन पाया था। परिवर्तन आकस्मिक था। अपने चाचा के मकान की पहली मंजिल पर मैं अकेला कमरे में बैठा हुआ था। मुझे कभी कोई बीमारी नहीं हुई थी और उस दिन मेरा स्वास्थ्य भी बिलकुल ठीक था। यकायक मृत्यु के भीषण भय ने मुझे आ घेरा। मैंने इस भय का कारण पता लगाने की कोई चेष्टा नहीं की। केवल ऐसा अनुभव होने लगा कि मुझे मरना है। मैंने यह सोचना शुरू किया कि अब क्या किया जाए ?”
“इस आघात के कारण मैं अंतर्मुखी हुआ और मेरे मन में अनायास ही ये विचार आने लगे-अब मृत्यु आ गई है ? इसका क्या अभिप्राय है ? मृत्यु किसकी होनी है ? आदि विचार आने लगे। फिर मैंने अपनी मृत्यु का अनुभव किया। शरीर से प्राण निकले, अरथी बनाई गई, शवयात्रा हुई, शरीर जलकर खाक हो गया। यह सब होते हुए भी मैं अपने व्यक्तित्व की संपूर्ण शक्ति को अनुभव कर रहा हूँ। अपने भीतर उठने वाली आत्मसत्ता की आवाज भी सुन रहा हूँ। शरीर की मृत्यु हो जाती है, परंतु आत्मा को मृत्यु स्पर्श तक नहीं कर सकती। यह सब शुष्क विचार प्रक्रिया नहीं थी। जीवित सत्य की भाँति चह अनुभूति अत्यंत स्पष्ट रूप से मन में बिजली की तरह कौंध गई। बिना किसी विचार प्रक्रिया के मुझे सत्य का प्रत्यक्ष हो गया।”
मृत्यु की अनुभूति, उसके भय से मुक्ति और आत्मचेतना के प्रत्यक्ष बोध ने वेंकटरमण को महर्षि रमण बना दिया। इस अनुभूति के कुछ ही वर्ष बाद वे संन्यासी हो गए और अरुणाचल की तलहटी में कुटिया बनाकर रहने लगे। अरुणाचल में वे ऐहिक यात्रा के कई पड़ावों से गुजरे, लेकिन वे संसार छोड़कर वैरागी हुए संन्यासी नहीं थे। अरुणाचल में कुटिया बना लेने के कुछ वर्ष बाद उनकी माँ भी आ गई। माँ ने उन्हें पुराने जीवन में लौट चलने के लिए कहा। संन्यस्थ जीवन में प्रवेश तो संभव है, अपवाद छोड़कर कभी वापसी संभव नहीं है। श्री रमण ने वापस जाने से मना कर दिया। कुछ महीनों बाद माता ही आश्रम में रहने लगी। महर्षि रमण के अनुसार, साक्षात्कार के लिए संसार छोड़ना आवश्यक नहीं है। संन्यास लेने के लिए आतुर एक भक्त से उन्होंने कहा था-
“भगवान सदा आपके साथ है, आप में हैं। आपकी आत्मा भगवान है। आपको इसी का साक्षात्कार करना है। इसके लिए संसार छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। परित्याग का अर्थ वस्त्रपरिवर्तन या गृहत्याग भी नहीं है। वास्तविक परित्याग तो इच्छाओं, वासनाओं और आसक्तियों का परित्याग है। जो संसार का त्याग करता है, वह आसक्ति से मुक्त होना चाहता है, वह वस्तुतः संसार में निमग्न हो जाता है और अपने प्रेम की परिधि इतनी विस्तृत कर लेता है कि उसमें समस्त विश्व समा जाता है। गेरुए वस्त्र धारण करने और घर छोड़ देने की अपेक्षा सार्वलौकिक प्रेम के रूप में भक्त की वृत्ति को निरूपित करना अधिक उपयुक्त होगा।”
अधिकाँश लोगों की धारणा है कि अध्यात्म जीवन के आरंभ में सिद्धियाँ देता है। साधक उस शक्ति के आधार पर प्रकृति का अतिक्रमण कर जाता है। यह संभव है। लेकिन साधक को सिद्धियों की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। आश्रम में आए एक दर्शनार्थी को रमण महर्षि ने सिद्धियों के बारे में पूछने पर झिड़का भी था।
जिस ज्ञान या सिद्धाँत को व्यवहार में नहीं उतारा जाता, वह अज्ञान से भी ज्यादा घातक है, क्योंकि इस तरह का ज्ञान दंभ और मिथ्या अभिमान में उलझाता है। बहुधा होता यह है कि तर्क, तथ्य, प्रमाण और सिद्धाँत की घंटों तक चर्चा करने वाले बुद्धिजीवी मामूली कारणों से क्षुब्ध हो जाते हैं। क्लेश कलह में फंस जाते हैं, जबकि एक साधारण व्यक्ति भगवत्कृपा से लाभ उठा लेता है। महर्षि रमण कहा करते थे, “जिस चीज की आवश्यकता है, वह वस्तुतः हार्दिक भाव है, न कि कोरा सैद्धाँतिक ज्ञान।”
“सैद्धाँतिक ज्ञान सहायक हो सकता है, लेकिन वह बहुत बड़ी बाधा भी बन सकता है। उन व्यक्तियों के ज्ञान का क्या लाभ, जो अपने आप से यह प्रश्न भी नहीं कर सकते कि मैं कौन हूँ ? अपने संबंध में प्रश्न और साक्षात्कार के लिए प्रयत्न न करते हुए वे अपने आपको ग्रामोफोन बना लेते हैं, जो पहले से रिकॉर्ड की गई ध्वनी को ही बजा-सुना देता है। ज्ञान के बावजूद जिनका अहंभाव नहीं गया, उनके लिए साक्षात्कार संभव नहीं है। उनसे जल्दी तो वे लोग सत्य तक पहुँच जाएंगे जो सरल है, और शुद्ध भाव से प्रयत्न कर रहे है।”
महर्षि रमण संसार छोड़कर संन्यासी हुए थे, लेकिन उनका संन्यास पलायन नहीं था। वह अधिक संघर्ष और उत्तरदायित्व का वरण था। रमण आश्रम में कई विदेशी भक्त भी आते थे। महर्षि के कुछ जीवनीकारों ने तो यह भी लिखा है कि रमण आश्रम हमेशा विदेशी भक्तों से ही भरा रहता था। उनमें भी अंगरेजों की संख्या ज्यादा थी। प्रायः सभी प्रथम श्रेणी के अधिकारी। भारत में ब्रिटिश राज के कर्णधार लेकिन उन्होंने कभी किसी भक्त को शान का प्रतिनिधि होने के नाते नहीं अपनाया। साधक मुमुक्षुभाव से आया हो, तभी वे स्वीकार करते थे।
उन दिनों भारत में स्वतंत्रता आँदोलन चल रहा था। कई नेता और क्राँतिकारी भी आया करते थे। कभी-कभार वे अपने प्रयासों के बारे में पूछते। महर्षि उनके आँदोलन को ध्यान-साधना और धर्मधारणा के समतुल्य ही बताते। उसमें निष्ठापूर्वक लगे रहने के लिए प्रेरित करते। यहाँ तक कि वे सेवा को भी योग का सरल उपाय बताते थे। उनके अनुसार समाज और लोक की सेवा करते हुए भी व्यक्ति अध्यात्म के उच्चलक्ष्य पर पहुँच सकता है। जरूरी नहीं कि उच्चकोटि की तप−साधना और अनुष्ठान आदि किए जाएं, सेवाकार्य या सामाजिक उद्देश्यों में लीन रहते हुए भी व्यक्ति उसी स्तर पर पहुँच सकता है, जिन पर गहन साधनाएं पहुँचाती है। आवश्यकता इतनी ही है कि समाज साधना निष्काम भाव से चलती रहे। एक बार जमनालाल बजाज उनके आश्रम में आए। आश्रम उन दिनों अध्यात्मिक गतिविधियों के लिए विख्यात था। उन्होंने पूछा- क्या स्वराज के लिए काम करना और इच्छा रखना उचित है ? उसके लिए प्रयत्न करने पर आत्मविकास में बाधा आती है ? महर्षि ने कहा, इच्छा रखना उचित है। आत्मिक स्तर पर कामना-वासना के बंधन जितने हुए हैं, उतनी ही बुरी सामाजिक-राजनीतिक गुलामी भी है। उससे छुटकारा पाने के लिए प्रयत्न करना चाहिएं निरंतर प्रयत्न करना चाहिए। निरंतर प्रयत्न करने से व्यक्ति का दृष्टिकोण व्यापक बनता चला जाता है। समाज की साधना करने वाला अपने आपको लक्ष्य के साथ लय कर देता है। इस तरह का तप विराट् आत्मचेतना में लीन कर देने के समान ही है।
जमनालाल जी को प्रसन्नता हुई। इस प्रकार उन्होंने महर्षि रमण से अपने राजनीतिक ध्येय के लिए स्वीकृति प्राप्त कर ली। उन्होंने फिर पूछा, निरंतर संघर्ष और उत्सर्ग के बाद यदि स्वराज मिलता है, तो उससे हमें क्या गर्व और गौरव नहीं होगा ? वह अभिमान क्या हमारा पतन नहीं करा देगा ?
महर्षि ने कहा “नहीं ! संघर्ष के दौरान अपने आपको उच्चसत्ता के प्रति समर्पित कर देना चाहिए। उसकी शक्ति को सदा अपने सम्मुख रखना चाहिए। अपने कार्य के परिणामों की चिंता नहीं करनी चाहिए। तब वह निष्काम कर्म कर सकेगा। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि तुम किस प्रकार का कर्म करते हो, अपने कार्य को शुद्ध और निस्वार्थ भाव से करते रहो। यही तुम्हें साक्षात्कार तक पहुँचा देगा।”
साधना किसी भी प्रकार की हो लौकिक अथवा आध्यात्मिक, पथप्रदर्शक की आवश्यकता दोनों ही दिशा में रहती है। अध्यात्म मार्ग में तो वह और भी जरूरी है। महर्षि कहा करते थे कि लौकिक सफलता का मार्ग जमीन पर बनी हुई सड़क की तरह है। एक बार समझ लिया जाए, तो आराम से चलते रह सकते हैं। अध्यात्म का क्षेत्र खुले आकाश की तरह है। वहाँ कोई पथ या पगडंडी बनी हुई नहीं है। सभी को अपने डैनों के बल पर उड़ना है। उस स्थिति में मार्गदर्शक का सहारा लोकसाधना की पूर्ति करते हैं। उन्होंने एक श्रद्धालु से गुय का अर्थ बताते हुए कहा था-
“गुरु शब्द का उपयोग तीन अर्थों में किया जाता है। एक अर्थ ऐसे व्यक्ति से हो सकता है, जिसने अध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त नहीं की तथापि वह दीक्षा और उपदेश दे सकता है। वह प्रायः उत्तराधिकारी से गुरु होता है। शिक्षक हो सकता है। चिकित्सक की तरह वह स्वस्थ रहने में मदद भी कर सकता है। दूसरे अर्थ में गुरु को कुछ आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त होती है। जिस स्थिति में वह पहुँचा होता है, वहाँ से अपने उपदेश और सान्निध्य द्वारा शिष्यों का मार्गदर्शन कर सकता है। शब्द के सर्वोच्च और सच्चे अर्थ में गुरु वह है जिसने विश्वात्मा के साथ एकरूपता अनुभव कर ली हो।” निश्चित ही रमण महर्षि का मार्गदर्शन युगानुकूल था, सार्वजनीन था। आज भी वह वैसा ही उनके चिंतन नवनीत के रूप में उपलब्ध है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार प्रजापति ब्रह्म ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन सृष्टि का आरंभ किया। तथ्य को यों भी कहा जा सकता है कि जिस दिन सृष्टि का उद्भव हुआ उस दिन को चैत्र का शुक्ल प्रतिपदा मान लिया गया। वह दिन वर्ष का पहला दिन था। ईस्वी सन् ईसा के जन्म के साथ शुरू होता है। मुहम्मद साहब ने जिस दिन मक्का से मदीना की ओर प्रस्थान किया, उस दिन से हिजरी सन् की शुरुआत होती है। शक, भारत, सप्तर्षि, बुद्ध, महावीर, फसली आदि संवत्सरों का आरंभ किसी न किसी ऐतिहासिक घटना की वर्षगाँठ से होता है। भारतीय अथवा वैदिक संवत्सर का आरंभ किसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति नहीं कराता वरन् वह सृष्टि के आरंभ का स्मरण कराता है। उसमें नीति है कि जिसका आरंभ होता है, उसका अंत भी सुनिश्चित है। “जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुवं........” के अनुसार मनुष्य को भी अपने जन्म, जीवन और उसके समापन को स्मरण रखना चाहिए।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होने वाली मान्यता में वर्ष में सृष्टि के उद्भव, संचालन और समाहार के महत्वपूर्ण सूत्र बिखरे हैं। कहा जा चुका है कि पहले से काई पंचाँग तैयार नहीं था, जिये देखकर ब्रह्मा ने सृजन आरंभ किया। तथ्य और तत्व की दृष्टि से सृष्टि का सर्जन, नियामक नियंता अनादि अनंत है। इसलिए उसकी सूचना का भी आरंभ और अंत नहीं है, लेकिन देश और काल की सीमाओं में बँधे मनुष्य को अनादि, असीम सहज ही समझ नहीं आता। इसलिए आरंभ की कल्पना करनी पड़ती है। यह व्यवहार की सुविधा के लिए है। काल्पनिक ही सही, एक प्रस्थान बिंदु निश्चित हो जाने पर अस्तित्व में प्रवेश सुगम हो जाता है। वर्षमान अथवा संवत्सर की मान्यता भी एक प्रस्थान बिंदु नियत करने के लिए हैं।
आशय यह भी नहीं है कि अस्तित्व में प्रवेश के लिए संवत्सर की कल्पना की गई। चूँकि कल्पना है इसलिए उसका कोई अर्थ ही नहीं है। अपने शुद्धतम रूप में सरल रेखा का कोई अस्तित्व नहीं है। जो भी खींची जाएगी, वह रेखा टेढ़ी होगी उसमें मोटाई भी होगी, इसलिए वह आयताकार भी होगी। सरल रेखा चह है, जिसकी लंबाई तो हो, लेकिन मोटाई न हो। कठिनाई वह है कि मोटाई नहीं होगी, तो दिखाई कैसे देगी। इसलिए स्वीकार किए बिना चारा नहीं है कि रेखा में न्यूनतम मोटाई भी कितनी ही सरल हो, खिंची तो पृथ्वी पर ही जाएगी। पृथ्वी गोल है, इसलिए किसी भी दूरी पर उसका समतल सपाट होना संभव ही नहीं है और परमात्मा के सृजन को समझने के लिए असीम अनादि सृष्टि के संवत्सर की धारणा भी सरल रेखा की तरह व्यावहारिक आवश्यकता है।
वर्ष प्रतिपदा अर्थात् वह दिन जब सृष्टि का आरंभ हुआ आदि में जुड़े संदर्भों के साथ कुछ पौराणिक ऐतिहासिक मान्यताएँ भी है। इन मान्यताओं का अर्थ है। संवत्सर के रूप में मान्य संदर्भों के विक्रम, माव और शक आदि संवतों के लिए अलग दिन नियत हैं। इस वर्ष 7 अप्रैल 2000 को आरंभ हो रहे नए विक्रमी संवत् के साथ राष्ट्रीय गौरव की एक स्मृति जुड़ी हुई है। इस दिन सम्राट् विक्रमादित्य ने सिंधु नदी के पार से आ रहे शक और हूण आक्रमणकारियों को आत्यंतिक रूप से सीमा पार खदेड़ा था। उस विजय की स्मृति में ही विक्रमीय संवत्सर का प्रवर्तन किया गया।
संवत् के रूप में शुरू हुए नए प्रचलन से पहले भी तिथियों और महीनों की गणना प्रचलित थी। विक्रमादित्य ने उसमें कोई फेरबदल नहीं किया। आवश्यक राजसूय और अश्वमेध का आयोजन कर प्रचलन को शास्त्रीय पारंपरिक मान्यता दिलवा दी। जिन विक्रमादित्य के नाम से यह संवत् प्रसिद्ध है, उनकी ऐतिहासिकता पक कई विद्वान प्रश्नचिह्न लगाते हैं। इतिहासकारों की दृष्टि में उन विक्रमादित्य का अस्तित्व हो या न हो, लोकस्मृति में वे जीवित हैं। आज भी विक्रम के न्याय और पराक्रम की कहानियां सिंहासन बत्तीसी और वेताल पच्चीसी की गाथाओं के रूप में कही-सुनी जाती हैं। कहने सुनने वालों के लिए उनके सही गलत में जाने की कोई आवश्यकता नहीं है, वे जो कहानियाँ कहते हैं, उनकी प्रेरणा और आश्वासन ही उनके लिए पर्याप्त हैं।
तर्क और प्रमाणों के आधार पर कुछ लोगों के द्वारा विक्रमादित्य के अस्तित्व को नाकारा जा सकता है, लेकिन उनके समकालीन कालिदास, भवभूति, वराहमिहिर आदि साहित्यकारों और विज्ञानियों को कहाँ ले जाएँगे। इन विभूतियों के अवदान को कैसे विस्मृत किया जा सकता है। कालिदास के काव्य, भवभूति के नाटक और वराहमिहिर के गणित, नक्षत्रविधा, ज्योतिष के क्षेत्र में किए शोध को नहीं नकारपाने के कारण ही पश्चिमी इतिहासकारों को विक्रमादित्य का अस्तित्व स्वीकार करना पड़ा। उन्होंने ऐसे विक्रमादित्य का अस्तित्व सन् 370 से 413 के बीच माना और कहा कि इस राजा के पहले से प्रचलित संवत् को अपना नाम चस्पा कर दिया।
जो भी हो, पराक्रम, शौर्य और विधा-वैभव के रूप में विक्रम अथवा मालव संवत् अपने समय की स्वर्णिम स्थितियों का जीता-जगता प्रमाण है। विक्रम संवत् के 137 वर्ष बाद शालिवाहन ने एक और संवत् आरंभ किया। सम्राट कनिष्क का नाम भी इससे जुड़ा हुआ है। संध्यावंदन, यज्ञ-अनुष्ठान, पूजा-पाठ और अन्य धर्मकृत्यों में संकल्प पढ़ते हुए दोनों का स्मरण किया जाता है। एक संवत् का प्रचलन अपेक्षाकृत कम है, क्योंकि वह गौरव का बोध उतना नहीं जगाता जितना विक्रमी। फिर भी हमारे राष्ट्रीय स्तर पर शक-संवत्सर की मान्यता है।
ऐसा नहीं है कि संवत्सर का आरंभ कोई भी सम्राट् विद्वान या राजप्रमुख यूँ ही कर देता हो। ‘काल विस्तर’ ग्रंथ में इसके लिए आवश्यक कसौटियां दी गई हैं। उनके अनुसार सिर्फ वहीं शासक संवत् का आरंभ कर सकता है, जिसके राज्य में कम से कम दो तिहाई लोग पवित्र स्वभाव और श्री संपन्न हों, कोई किसी का धन नहीं छीनता हो, किसी के यश-वैभव को ललचाई दृष्टि से नहीं देखता हो और राज्य में भीतरी या बाहरी दुरभिसंधियाँ नहीं रची जाती हों। ‘वायुपुराण’ ‘नक्षत्र आभरण’ और ‘संवत् अधिशासन’ ग्रंथों में एक सरल सी कसौटी दी गई है कि सिर्फ वही शासक वर्ष प्रतिपादन कर सकता है, जिसके राज्य में कोई ऋणी न हो। आशय स्पष्ट है कि जिस शासन में प्रजा दैहिक, दैविक और भौतिक पाप तापों से सर्वथा मुक्त है, वही संवत् चला सकता है।
शास्त्रीय कसौटी अथवा प्रामाणिकता के आधार पर विक्रम से पहले एक ही संवत् प्रचलित हुआ। उसे ‘कंलिसंवत्’ कहते हैं। इसका प्रवर्तन राजा परीक्षित ने किया। लेकिन यह भाद्रपद मास में कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को आरंभ हुआ। शास्त्रीय उल्लेख है कि उस दिन कलि ने परीक्षित के राज्य में प्रवेश किया था। परीक्षित ने उसे पृथ्वी छोड़कर कहीं और जाने का आदेश दिया। कलि ने कातर होकर शरण माँगी, तो उसे मदिरा, छूत, वेश्यालय और वधिकगृह में रहने की छूट दी। चार स्थान कम पड़े। कलि ने एक स्थान और चाहा, तो सुवर्ण को भी वास बनाने दिया। भागवत् के व्याख्याकार बताते हैं कि इन प्रतीकों के अनुसार काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद कलि के वासस्थान हो गए। इन विकारों से जो ग्रस्त होगा, उसे कलि सताएगा। संयम और मनोविकारों पर नियंत्रण रखने वालों पर कलि का कोई प्रभाव नहीं होगा। यह व्यवस्था बनाने के कारण ऋषि-मुनियों ने परीक्षित को कलि संवत् के प्रवर्तन की अनुमति दी। इन दिनों 5100 वाँ कलिसंवत् चल रही है, जिसे ‘युगाब्द’ नाम से भी कहा जाता है।
संवत्सर और चन्द्रमा की गति के अनुसार महीनों का विभाजन बार बार संशोधन के बाद निर्धारित नहीं हुआ। आर्षग्रंथों में आए वर्णनों को बारीकी से देखें, तो पाएँगे कि इस निर्धारण के पीछे प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए जीवन बिताने की भावना हैं। ज्योतिर्विधा का समूचा आधार ही आकाश में स्थित ग्रह-नक्षत्रों और उनकी गतियों से तालमेल बिठाने का विज्ञान हैं। चंद्रमा मन का द्योतक है। पृथ्वी के समीप अथवा दूर उसकी स्थिति और सूर्य का प्रकाश लेकर चमकने की उसकी नियति मनुष्य ही नहीं, उन प्राणियों को भी प्रभावित करती है, जो भाव संवेदनाओं से जीते हैं।
सत्ताईस नक्षत्रों में से चंद्रमा जब जिसके साथ एक विशेष दूरी और कोण पर होता है, उसी के अनुसार महीने का नाम निश्चित किया जाता है। कारण यह है कि चंद्रमा सिर्फ सूर्य से ही प्रभावित नहीं होता, नक्षत्रों से भी ऊर्जा ग्रहण करता और उन्हें ऊर्जा देता भी रहता है। नक्षत्रों की संख्या सत्ताईस है। जब जिस नक्षत्र से वह विशिष्ठ संबंध (दूरी और कोण) बनाता है, तो ज्योतिष की भाषा में उसे चंद्रमा का नक्षत्र कहते हैं। उदाहरण के लिए, इस वर्ष प्रतिपदा को अश्विनी नक्षत्र का उदय हो रहा है, तो ज्योतिष की भाषा में कहेंगे कि चंद्रमा अश्विनी का हैं। महीनों का निर्धारण करते हुए ऋषियों ने सही तथ्य ध्यान में रखा। पूर्णिमा चंद्रमा की सबसे सशक्त तिथि है। उस दिन वह अपनी सभी कलाएँ बिखेरता है। उस दिन जिस नक्षत्र का उदय होता है, संबंधित माह उसी नाम से संबोधित किया जाता है। स्पष्ट है कि चैत्र पूर्णिमा को चित्रा नक्षत्र ही उदित रहता है। अगली पूर्णिमा को विशाखा इसीलिए वह माह वैशाख। ज्येष्ठा, आषाढ़, भद्रा, अश्विनी, कृतिका आदि नक्षत्रों की उदय स्थिति के अनुसार ही ज्येष्ठ, आषाढ़ आदि नाम निश्चित किए गए।
संवत्सर का मान, महीनों और तिथियों की गणना भारत में जिस बारीकी से की गई, उसे देखकर यूरोपीय विज्ञानवेत्ता भी दाँतों तले उँगली दबाते हैं। ग्रेगोरियन कैलेंडर में चार सौ साल पहले तक संशोधन किए जाते रहे, फिर भी वह सर्वांगपूर्ण नहीं है। भारतीय संवत्सर न केवल सर्वांगपूर्ण हैं बल्कि वैज्ञानिक और जीवन को सामंजस्य से भर देने वाली विधा भी है। यह उचित ही है कि सरकारी कामकाज को छोड़कर जीवन के महत्वपूर्ण निर्धारण जैसे पर्व-त्योहार, संस्कार-मुहूर्त आदि इसी के आधार पर निश्चित किए जाते हैं।
गायत्री ज्ञानयज्ञ योजना
“यह पुस्तक/पत्रिका आपके पास गायत्री माता की कृपा से आई हैं। इसे स्वयं पढ़े एवं परिवार में सबको पढ़ाएं, एक माह बाद इसे किसी अन्य सुपात्र को स्वाध्याय हेतु दे दें, ताकि ज्ञान का आलोक जन-जन तक पहुँच सके और स्वाध्याय का क्रम चलता रहे।
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उपर्युक्त स्िल्प टाइप करके अथवा छपवाकर पुरानी अखण्ड ज्योति, युग शक्ति गायत्री पत्रिकाओं तथा क्राँतिधर्मी साहित्य, युगनिर्माण योजना द्वारा प्रकाशित गायत्री विधा संबंधी पुस्तकों के साथ लगातार परिचितों को देकर परिजन अपने पास आने वाली पत्रिकाओं की पाठक संख्या में कई गुना विस्तार कर सकते हैं। विगत एक वर्ष से ‘युग निर्माण योजना’ मासिक के माध्यम से इस प्रकार का प्रयोग आरंभ किया गया है, जो बड़ा सफल रहा है। ऐसी स्लिपें क्षेत्रों में भी उपलब्ध हैं- कई शक्तिपीठों ने छपवाई भी हैं। विधा विस्तार योजना के अंतर्गत परमपूज्य गुरुदेव के विचार जन−जन तक पहुँचाने का एक सशक्त तरीका है। इस महापूर्णाहुति वर्ष में यह अभियान गति पकड़े, ऐसा भावभरा अनुरोध हैं।
भगवान् बुद्ध बीमार थे। उन दिनों वे किसी से मिल भी नहीं रहे थे। इसी समय श्रेष्ठी सुभद्र वहाँ आए और शिष्य आनंद से उन्होंने आग्रह किया-”तथागत का यह अंतिम समय है, मुझे भावी परिस्थितियों पर चर्चा करनी है। कृपया भेंट अवश्य करा दें।” आनंद ने अपनी विवशता बता दी। अंदर तथागत तक आवाज पहुंची। उन्होंने स्वयं आवाज देकर सुभद्र को बुलाया आर आनंद से कहा- “ अस्वस्थता की इस स्थिति में भी यदि में लोकमंगल के प्रयोजन से आने वाले इस नरश्रेष्ठ को मार्गदर्शन न कर पाया तो मेरा ‘बुद्ध बनना ही निरर्थक है।” बुद्ध से हुई इस अंतिम भेंट ने, जो सद्भाव से प्रेरित थी, सुभद्र को इतना प्रभावित किया कि वे अपना सब कुछ अर्पण कर भिक्षु हो गए और बौद्धधर्म के विस्तार में अभूतपूर्व योगदान दे सकने में समर्थ हुए।
इस दुनिया का हर प्राणी अपनी दिनचर्या में स्वाभाविक अंतराल कर ‘नींद’ अवश्य लेता है। पर आखिर क्यों ? वैज्ञानिक अभी तक इसका कोई ठोस कारण नहीं ढूंढ़ पाए है, परंतु इतना जरूर कहा जा सकता है कि नींद प्रत्येक जीवधारी की अनिवार्य जरूरत है। विज्ञानवेत्ताओं के अनुसार ‘नींद’ चेतना का अस्थायी हरण है, जिसके माध्यम से शरीर एवं दिमाग को आराम मिलता है। शरीर के ऊतकों की मरम्मत होती है एवं खर्च की हुई शक्ति वापस मिलती है। तन-मन में नई ऊर्जा का संचार होता है, जिससे व्यक्ति दूने उत्साह के साथ अपना काम करने के लिए सक्षम हो जाता है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि सोते समय मानव−शरीर की बाह्य गतिविधियाँ समाप्त हो जाती है, साथ ही आँतरिक गतिविधियाँ भी कम हो जाती है। मस्तिष्क की विद्युत तरंगों के अध्ययन से पता चला है कि सोते समय व्यक्ति कई स्तरों से गुजरता है। सबसे पहले हलकी नींद, फिर क्रमशः गहरी नींद में पहुँचता है। उसके बाद उस स्तर में पहुँचता है। उसके बाद उस स्तर में पहुँचता है, जिसमें उसकी आँख की पुतलियाँ घूमती रहती है। ज्यादातर सपने इसी स्थिति में आते हैं। वैज्ञानिक अनुसंधान के अनुसार सोने के क्रम में बहुत सारी जटिल रासायनिक प्रक्रियाएँ होती एवं विद्युत तरंगें उठती हैं। इन सारी क्रियाओं-प्रक्रियाओं का नियंत्रण मस्तिष्क के मध्य भाग से होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हमारी नींद टुकड़ों में बंटी होती है। सबसे पहले भुजाओं, पैरों, पीठ एवं गरदन की बड़ी मांसपेशियां सोती हैं। अंत में सबसे छोटी जैसे होठों एवं पलकों की मांसपेशियां सोती है। इसी प्रकार हमारे चेतनाकेंद्र भी क्रमशः एक-एक करके सोते हैं। पहले सूंघने की शक्ति, तत्पश्चात् देखने व सुनने की शक्ति और अंत में स्पर्शशक्ति अवचेतना के आगोश में समा जाती है। परंतु इसका मतलब यह नहीं कि शरीर भी अपना काम करना बंद कर देता है। नींद में भी शरीर के उपयोगी अंग क्रियाशील रहते हैं, भले ही इनकी क्रियाशीलता थोड़ी धीमी पड़ जाती है। नींद में रक्तचाप कम हो जाता है। हृदय एवं नाडी की गति मंद पड़ जाती है। यकृत, मस्तिष्क तथा वृक्क में रक्तप्रवाह मंद पड़ जाता है। इससे शरीर के अवयवों को आराम मिलता है। यदि किसी व्यक्ति को बहुत समय तक जागना पड़े, तो थकान के कारण चिड़चिड़ाने लगेगा एवं उसका शरीर व दिमाग ठीक से काम नहीं कर पाएँगे।
चिकित्सकों के अनुसार एक स्वस्थ मनुष्य के लिए औसतन 6 से 7 घंटे की नींद पर्याप्त होती है। हालाँकि नींद से मिलने वाला लाभ इस बात पर निर्भर नहीं होता कि कौन कितनी गहरी नींद सोया। बार-बार उचटने वाली 6-7 घंटे की नींद से दो तीन घंटे की गहरी नींद ज्यादा लाभप्रद है। इसी तरह रात में ही सोना अनिवार्य नहीं, बल्कि आवश्यकता के मुताबिक किसी भी समय सोया जा सकता है। उम्र के अनुसार नींद की आवश्यकता भी अलग-अलग होती है। बच्चों को वयस्कों से ज्यादा नींद की जरूरत होती है, क्योंकि उनकी अधिकांश ऊर्जा खेलने में खर्च हो जाती है, साथ ही उनके शारीरिक विकास के लिए भी ऊर्जा चाहिए। आमतौर पर एक साल के बच्चे के लिए आठडडडड घंटे, किशोरवय के लिए दस घंटे, वयस्क के लिए 6-7 घंटे एवं बुजुर्ग के लिए पाँच-छह घंटे की नींद पर्याप्त होती है।
आजकल नींद न आना एक आम समस्या बन गई है। प्रसिद्ध अमेरिका मनोचिकित्सक डॉ. एंथोनी वेल्स के अनुसार इसके कई कारण है। चिकित्साविज्ञान के अनुसार बहुत तीव्र दर्द, पुरानी खाँसी, हड्डी-प्लास्टर आदि नींद न आने के कई कारण हो सकते हैं। इन बीमारियों से छुटकारा मिलते ही अनिद्रा रोग भी स्वतः समाप्त हो जाता है। दूसरा कारण मनोवैज्ञानिक विकृति है, जैसे रेस्टलेसनेस ऑफ मेनिया या डिप्रेशन। ऐसे में व्यक्ति को किसी कुशल मनोचिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए। वास्तव में मनोवैज्ञानिक कारण जैसे चिंता, तनाव, ईर्ष्या, द्वेश, भय, अत्यधिक उत्तेजना एवं क्रोध नींद न आने के सबसे बड़े कारण हैं। चाय, काफी, शराब एवं धूम्रपान का अतिसेवन भी नींद संबंधी अनियमितता उत्पन्न करता है।
निद्रा संबंधी गड़बड़ी के पीछे चाहे जो भी छोटे बड़े कारण हों, वे स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत ज्यादा नुकसानदेह हैं। कई मामलों में तो जानलेवा भी सिद्ध हो जाते हैं। निद्रा संबंधी ऐसी ही बीमारी का नाम है- नारकोलीप्सी। इन रोग में कभी भी गहरी नींद आने लगती है, जिससे व्यक्ति का जगे रहना असंभव हो जाता है। इस बीमारी से व्यक्ति में निराशा व उदासी पनपने लगती है। स्मरणशक्ति क्षीण होने के साथ दृष्टिभ्रम भी होने लगता है। एक अन्य बीमारी है- रेपिड आई मूवमेंट स्लीप बिहेवियर डिसऑर्डर। इसमें व्यक्ति विक्षुब्ध हो उठता है। कई मामलों में मिरगी के समान दौरे भी पड़ते हैं।
सामान्यतः खर्राटे लेना गहरी नींद की निशानी समझी जाती है, परंतु सच्चाई यह नहीं है। तेज या गहरे खर्राटे अक्सर ऊपरी श्वसननलिका में बाधा पैदा करते हैं, जिससे न सिर्फ रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, वरन् पूरी रात मस्तिष्क नींद से उत्तेजित रहता है। यह आदत धीरे धीरे एक बीमारी में परिणत हो जाती है, जिसे ‘आँब्सटक्टिव स्लीप एवनीया सिडोम’ कहते हैं। इससे रोगी व्यक्ति पूरी रात छाती एवं गले में घुटन अनुभव करते हुए बिस्तर पर करवट बदलते हुए बिता देता है। ऐसे रोगी में अचानक दिल का दौरा पड़ने की संभावना बढ़ जाती है।
श्वसन एवं निद्रारोग विशेषज्ञ डॉ. एम.एस कंवर के अनुसार अमेरिका व यूरोप में ऐसे सभी रोगी अपने इलाज के लिए निद्रा प्रयोगशालाओं की मदद लेते हैं। पश्चिम में इन प्रयोगशालाओं के लिए इतनी भीड़ बढ़ती जा रही है कि मरीज को अपनी बारी के लिए महीनों का इंतजार करना पड़ता है। ये प्रयोगशालाएं रोगी की नींद का पूरी रात ‘पाँलीसोमनोग्राफी’ विधि से निरीक्षण करती हैं। यह एक मात्र ऐसी विधि है, जो निद्रा संबंधी गड़बड़ियों, श्वास का नींद के विभिन्न चरणों से संबंध, दिल की धड़कन, रक्तचाप में असामान्यता आदि को नोट करता है। जिसके आधार पर रोगी का सही उपचार संभव होता है। नवीन शोध प्रयासों के अनुसार स्पेक्ट्रोस्कोपी ने भी दिमाग के किसी भी हिस्से का बहुत बारीकी से विश्लेषण कर नींद की समस्या को सुलझाया जा सकता है। भारत में भी कुछ स्थानों पर निद्रा की ऐसी प्रयोगशालाएं स्थापित की गई हैं।
नींद आने में गड़बड़ी समूचे जीवनक्रम को अस्त-व्यस्त कर देती है। पारिवारिक दायित्वों का दबाव, रोजगार व कार्यक्षेत्र में बढ़ते तनाव का असर भी सामान्य व्यक्ति की नींद पर पड़ा है। परंतु नींद संबंधी अधिकांश रोगों के लिए व्यक्ति का रहन-सहन, व्यायाम की कमी, खान-पान की बिगड़ी आदतें एवं मोटापा आदि ज्यादा जिम्मेदार हैं। नींद सामान्य हो, इसके लिए अभी तक कोई अवा व विधि नहीं विकसित हो पाई है, जिससे स्वाभाविक नींद बिना किसी कुप्रभाव के आ सके। चिकित्सकों के अनुसार जब तक अनिद्रा के मूल कारणों को समाप्त नहीं किया जाता, नींद की गोली की गोली से स्थायी निदान पूरी तरह से असंभव है।
निद्रा विशेषज्ञों के अनुसार सहज निद्रा के लिए व्यक्ति को तभी बिस्तर पर जाना चाहिए, जबकि वह सोने के लिए तैयार हो। बिस्तर पर जाने से पूर्व ही उसे स्वयं को समस्त चिंताओं एवं तनाव से मुक्त कर लेना चाहिए। कम से कम सोने से दो घंटे पूर्व ही भोजन कर लेना चाहिए। यह भी जरूरी है कि सोने का कमरा साफ-सुथरा हो, साथ ही कमरे में शाँति हो। पूर्व दिशा की ओर सिर रखकर सोने से सुखमय व शाँतिदायक नींद आती है। यह बात विभिन्न वैज्ञानिक अनुसंधानों से प्रमाणित हो चुकी है। अनिद्रा से बचाव के लिए दिनचर्या को नियमित किया जाना आवश्यक हैं। सूर्योदय से पूर्व उठना, नियमित व्यायाम, तनावपूर्ण वातावरण से बचना नींद लाने में सहायक हैं।
आयुर्वेद में निद्रा को ‘भूतधात्री’ कहा गया है। भूत यानि कि प्राणिमात्र, धात्री अर्थात् पोषण करने वाली। जिस तरह एक माँ बच्चे का पालन पोषण करती है, उसी तरह निद्रा भी शरीर का पोषण करती है। यदि हम चिंता-उद्वेग को दूर फेंककर सरल-निश्छल मनोभावों को आत्मसात कर सोने का प्रयास करें, तो निश्चित रूप से हमें निद्रा से मिलने वाले लाभों-अनुदानों से वंचित नहीं रहना पड़ेगा।
तीर्थंकर महावीर ने दो कमंडलु एक साथ जल धारा में छोड़े। एक जिसमें छेद थे धीरे-धीरे पानी भरने के कारण वहीं डूब गया एवं दूसरा जा सही सलामत था- दूर तक तैरता चला गया। तीर्थंकर ने समझाते हुए कहा- मनुष्य इसी प्रकार जीवनधारा में बहकर अपनी नाव भी पार लगा सकता है और डूब भी सकता है। इसमें परिस्थितियों का कहीं कोई हस्तक्षेप नहीं। मन ही है, जो इंद्रियों को गुलाम इस प्रकार बना देता है कि जीवनक्रम ही अस्त-व्यस्त हो जाता है।
आध्यात्मिक साधनाओं में शक्तिसंचय करने की दृष्टि से नवरात्रि पर्व का असाधारण महत्व है। गायत्री उपासक चैत्र एवं आश्विन नवरात्रियों में अपनी आँतरिक संपदा बढ़ाने के लिए गायत्री अनुष्ठान करते हैं। इस संधिवेला में साधना का जा लाभ मिलता है, वह अन्य अवसरों पर की गई साधनाओं द्वारा नहीं मिल पाता। सूक्ष्मदर्शी जानते हैं कि इस ऋतुकाल में विशिष्ट प्रकार का चैतन्य प्रवाह प्राणऊर्जा प्रवाह सूक्ष्मजगत् में चलता है, जिसे गायत्री अनुष्ठान के माध्यम से साधक खीचते, धारण करते और अपनी शक्ति बढ़ाते हैं। नवरात्रियों में सूक्ष्म प्रकृति से जो दिव्य अनुदान बरसते हैं, उन अनुदानों के प्रभाव से आत्मिक प्रगति की दिशा में की गई साधनाएँ विशेष फलवती सिद्ध होती हैं। प्रजा परिजन आरंभ से ही नवरात्रियों में बरसने वाले इन अनुदानों से लाभान्वित होते रहे हैं।
इन दिनों मनाई जाने वाली नवरात्रियाँ पिछली सभी नवरात्रियों से भिन्न और असाधारण हैं, क्योंकि इसमें युगसंधि महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति का विशेष प्रयोजन भी जुड़ गया है। यों तो नवरात्रियाँ अपने आप में ही असाधारण हैं, क्योंकि इन्हीं दिनों अदृश्य-अविज्ञात अपनी स्वर्गीय विभूतियों को धरती पर उतारता और उससे जाग्रतों के आँतरिक भंडार भर देता है। परिणामस्वरूप निष्ठापूर्वक साधना करने वाले अनुभव करते हैं कि इन दिनों किया गया पुरुषार्थ तत्काल कुछ न कुछ चमत्कारी परिणाम दर्शाता है। इस प्रकार के दैवी चमत्कारों की एक ही पृष्ठभूमि है-उत्कृष्ट चिंतन को आदर्शवादी उपक्रम में उभारने वाला पराक्रम-पुरुषार्थ। जो इसे हजम कर पाते हैं, वे ही विभूतिवान् और सिद्धपुरुष कहलाते हैं।
जब सामान्य नवरात्रियों में ही इस प्रकार के चमत्कारी परिणाम सिद्ध होते देखे जा सकते हैं, तो प्रस्तुत नवरात्रियाँ तो युगसंधि की समापन वेला के साथ जुड़ी हुई हैं। इसलिए इनका महत्व तो और भी अधिक है। अमावस्या एवं पूर्णिमा को यों सदा ही पर्व के रूप में मनाया जाता है और शुभ कार्यों के लिए उन्हें विशेष अवसर या उपयुक्त मुहूर्त समझा जाता है, किंतु जब उनके साथ कुछ विशिष्टता जुड़ जाती है, तो स्थिति और भी उच्चस्तरीय बन जाती है। सोमवती अमावस्या शरद पूर्णिमा गुरुपूर्णिमा श्रावणी आदि को अतिरिक्त पर्व माना जाता है और उन पर्वों के साथ अमावस्या तथा पूर्णिमा का महत्व और भी बढ़ जाता है। चंद्रग्रहण वाली पूर्णिमा और सूर्यग्रहण वाली अमावस्या की स्थिति भी असामान्य होती है। इन पर्वों पर श्रद्धालुओं को कुछ अतिरिक्त योजनाएँ बनाते हुए देखा जाता है। इस बार का नवरात्रि पर्व भी ऐसी ही अतिरिक्त विशेषताओं से संपन्न होने के कारण सामान्य नहीं है। यह एक ऐसा ऐतिहासिक एवं पुण्यफल प्रदाता अवसर है, जो फिर इस जीवन में मिलना संभव नहीं। अतः इसे साधक स्तर की मनोभूमि बनाकर मनाया ही जाना चाहिए।
इस बार चैत्र नवरात्रि 8 अप्रैल से आरंभ होकर 12 अप्रैल को समाप्त होगी। रामनवमी 12 अप्रैल की है, परंतु साधना पूरे नौ दिन की होती है। नवरात्रि नाम ही इसलिए दिया गया है कि उस तिथियों की घट बढ़ को कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इन दिनों की विशेष उपासनाएँ इस प्रकार हो सकती हैं-
1- प्रतिदिन 27 माला गायत्री महामंत्र का जप करके नौ दिन में चौबीस हजार का अनुष्ठान। इसमें प्रायः ढाई घंटा समय प्रतिदिन लगता है।
2- पंचाक्षरी गायत्री-”ॐ भूर्भुवः स्वः” का 24 हजार का संक्षिप्त अनुष्ठान-इसके 27 माला जप में प्रतिदिन एक घंटा समय लगा हैं।
3- गायत्री चालीसा के 109 बार पाठ।
4- नौ दिन में 1000 गायत्री मंत्रलेखन और पाठ।
इनमें भी प्रायः एक एक घंटा समय नित्य लगता है। इतना समय यदि एक साथ निकाल पाना कठिन जान पड़े, तो एक दिन का साधनाक्रम दो बार में पूरा किया जा सकता है। नवरात्रि के इस गायत्री अनुष्ठान में सुख शाँति, समुन्नति, आत्मकल्याण तथा पारमार्थिक प्रयोजनों की पूर्ति के सभी बीज विद्यमान हैं।
युगसंधि की इन नवरात्रियों में की जाने वाली अनुष्ठान साधनाओं का विशेष महत्व हैं। इन साधनाओं के विशिष्ट परिणाम भी मिलने वाले हैं। यह तथ्य ध्यान में रखने के साथ साथ यह रहस्य भी हृदयंगम किया जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के साथ जुड़ी रहने वाली सिद्धियों की दृष्टि से नवरात्रि अनुष्ठानों का मर्म दस अवसर पर किए जाने वाले अनुशासनों के साथ जुड़ा हुआ है। अनुष्ठान का अर्थ ही है- विशेष साधना, जिसमें कुछ तपश्चर्याएं भी जुड़ी रहती है, उन्हें न अपनाने पर वह साधारण उपासना मात्र रह जाती है, अनुष्ठान नहीं कहलाती।
अनुष्ठानों के साथ जिन नियमों, तपश्चर्याओं का पालन करना पड़ता है, वे सामान्य व्यवहार में कुछ कठिन तो पड़ते हैं, पर ऐसे नहीं हैं कि जिन्हें सच्ची लगन या निष्ठा के रहते व्यस्त रहने वाले व्यक्ति भी पालन न कर सके। ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि इन दिनों पालन किए जाने वाले अनुशासनों का नवरात्रियों में अभ्यास करने के उपराँत उन्हें जीवनदर्शन में स्थायी रूप से सम्मिलित करने की जो प्रेरणा है, उसी को अपनाने पर प्रगति का समस्त आधार केंद्रीभूत हैं।
नवरात्रि साधना को प्रखर बनाने एवं साधक की निष्ठा परिपक्व करने के लिए अनुष्ठानों में जो नियम अनुबंध रखे गए है, उन्हें ‘व्रत’ कहते हैं। इन व्रतों के पालन की परंपरा शास्त्रकारों ने इस दृष्टि से बनाई है कि साधना में अधिकाधिक प्रखरता का समावेश किया जा सके। तपश्चर्याओं के तत्वदर्शन का सार संक्षेप यही है कि आदर्शवादी उद्देश्यों के लिए स्वेच्छापूर्वक कष्ट सहन किया जाए और उस अवसर पर संकल्पशक्ति एवं आस्था को परिपक्व बनाया जाए। इस प्रकार की निष्ठा एवं सत्साहस ही मनोबल की वृद्धि करते हैं तथा उच्चस्तरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए ऊर्जाभंडार की तरह काम आते हैं।
नवरात्रि साधना के दिनों जिन अनुशासनों, व्रतों या तपश्चर्याओं का पालन किया जाता है, उनमें से पाँच प्रमुख हैं। ये हैं-उपवास, ब्रह्मचर्य, भूमिशयन, अपनी शरीर सेवा स्वयं करना और चमड़े की वस्तुओं चमड़े के बने जूते चप्पल, कोट, बैग, बेल्ट आदि का परित्याग। यथा-संभव इन नियमों, व्रतों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। परंतु परिस्थितिवश यह संभव न हो तो उसमें कुछ सरलता बरतने की गुंजाइश भी है। कृच्छ चाँद्रायण और सौम्य चाँद्रायण व्रत का अंतर जो जानते हैं, वे इस तथ्य से भली-भाँति अवगत हैं कि साधक की शारीरिक, मानसिक एवं सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप व्रतबंधों में ढील रखने का प्रावधान भी रखा गया है। नवरात्रि के दिनों जिन व्रत नियमों का पालन करने की परंपरा है, उनमें स्थिति विशेष को देखते हुए ढील या कमी भी की जा सकती है। उसमें किसी प्रकार की हानि या विग्रह की आशंका नहीं है।
नवरात्रि उपासना के तत्वज्ञान में सन्निहित व्रतों में प्रमुख है- उपासना। इन नौ दिनों में सर्वाधिक कठिनाई भोजन के संबंध में ही रहती है। अतः जहाँ तक हो सके स्वयं पकाया हुआ सात्विक आहार ही इन दिनों लेना चाहिए। स्वयं पकाने की बात अनभ्यस्तजनों के लिए कठिन पड़ सकती है। इस दृष्टि से बिना पकाई हुई वस्तुओं पर ीहने, फलाहार उपवास आदि को महत्व मिला है, किंतु सरलता की दृष्टि से इतनी छूट भी रखी गई है कि एक लगावन के अतिरिक्त और ठोस आहार उपयोग में न लाना भी उपवास के अंतर्गत मान लिया गया है। शाक, चावल या दाल रोटी जैसी वस्तुओं पर नवरात्रि काट ली जाए, तो उतने मात्र से भी प्रतिबंध की आवश्यकता पूरी होती रह सकती है।
उपवास का तत्वज्ञान आहारशुद्धी से संबंधित है। साधक सात्विक आहार करें और चटोरेपन के कारण अधिक खाने की लिप्सा से बचे। पेट हलका और आहार सात्विक रहेगा, तो साधना मार्ग को अवरुद्ध किए रहने वाले व्यवधान से भी छुटकारा मिल जायगा। यह शरीरगत उपवास हुआ। मनोगत उपवास यह है कि आहार को प्रसाद एवं औषधि की तरह श्रद्धा भावना से ग्रहण किया जाए। आध्यात्मिक दृष्टि से सात्विक आहार वह है, जो ईमानदारी और मेहनत के साथ कमाया गया है। उपवास का अपना तत्वज्ञान है। उसमें सात्विक खाद्यों को कम मात्रा में लेना ही नहीं, न्यायोपार्जित होने की बात भी सम्मिलित है। इतना ही नहीं, इस संदर्भ में एक बात और भी आती है कि इस प्रकार आत्मसंयम बरतने से जो बचत होती है, उसका उपयोग परमार्थ प्रयोजनों में हो। यही कारण है कि नवरात्रि अनुष्ठानों में उपवास करके जो बचाया जाता है, उसे पूर्णाहुति के अंतिम दिन ब्रह्मभोज में खर्च कर दिया जाता है।
नवरात्रि अनुष्ठानों में दूसरा व्रत है- ब्रह्मचर्यपालन। इसमें ओजस् को रतिकर्म में अपव्यय से बचाने की संयमशीलता तो है ही, उससे भी अधिक अश्लील चिंतन से मन मस्तिष्क को बचाने का अत्यधिक महत्व है क्योंकि नर नारी के बीच मिलन तो यदा कदा ही होता है इसमें परिस्थितियाँ और मर्यादाएँ बहुधा अवरोध बनती हैं। इतने पर भी इस प्रसंग में चिंतन और विचार की निकृष्टता से अधिक हानि पहुँचती है। इसलिए ब्रह्मचर्य में केवल नर नारी का संयोग संयम ही नहीं, चिंतन संयम भी सम्मिलित है। ब्रह्मचर्य के इस तत्वज्ञान को अपनाने वाले केवल आध्यात्मिक प्रगति की दिशा में द्रुतगति से अग्रसर होते हैं, वरन् शारीरिक और मानसिक, पारिवारिक और आर्थिक क्षेत्रों की भौतिक सुख-शांति का भी प्रत्यक्ष लाभ लेते हैं।
तीसरा प्रमुख अनुशासन है- भूमिशयन। भूमिशयन से तात्पर्य कोमलता के स्थान पर कठोरता अपनाना है।
इस तपश्चर्या से कष्ट सहन करने में प्रसन्नता अनुभव करने की मनःस्थिति का निर्माण होता है। इसके अतिरिक्त अपने शरीर की सेवा आप करने, स्वयं हजामत बनाने, स्वयं कपड़े धोने जैसे काम तो सहजता से पूरे किए जा सकते हैं। इसी प्रकार चमड़े की वस्तुएँ न प्रयोग कर, नौ दिन रबड़ की प्लास्टिक की चप्पल पहनकर काम चलाया जा सकता है। यह कोई कठिन बात नहीं है, किंतु इसके पीछे तो तथ्य छिपा हुआ है, वह यह है कि चमड़े के उपयोग से न केवल नवरात्रि में वरन् अन्य समय में भी कमी करने या बचने की आवश्यकता है। क्योंकि इसके पीछे अहिंसा वृति के विकास का तत्वज्ञान एवं प्राणिमात्र के प्रति करुणा बरतने - ‘ आत्मवत् सर्वभूतेषु’ का सिद्धाँत व्यवहार में उतारने की प्रेरणा छिपी हुई है।
इस प्रकार के अनुशासनों को नियमितता और निष्ठापूर्वक पालन करने से अनुष्ठान का उद्देश्य पूरा होता है। उक्त तत्वदर्शन को जीवनक्रम में समाविष्ट कर जो साधक साधना करते हैं, उनके लिए नवरात्रि साधना की चमत्कारी परिणति का लाभ ले सकना तनिक भी कठिन नहीं है।
संपर्क में आते ही मनुष्य के जिस कृत्य का सर्वप्रथम प्रभाव पड़ता है वह व्यवहार ही है। किसी व्यक्ति की वेशभूषा, आकृति और उसके बोलने का ढंग ही प्रथम संपर्क में आते हैं। खानपान की आदतें, रहन-सहन, प्रकृति स्वभाव और आचार-विचार तो बाद में मालूम पड़ते हैं। मनुष्य के व्यक्तित्व का पहला परिचय व्यवहार से ही मिलता है। इसलिए कहा गया है कि व्यवहार मनुष्य की आँतरिक स्थिति का विज्ञापन है। कई लोग दीखने में बड़े सौम्य दिखाई देते हैं, आकृति बड़ी शाँत और सरल होती है, लेकिन जैसे ही कोई उनसे संपर्क करता है, तो उनकी वाणी से वे सभी बातें व्यक्त हो जाती है, जो उनके स्वभाव में दुर्गुणों के रूप में शामिल है।
असंस्कृत मन अशिष्ट, भद्दे और फूहड़ व्यवहार के लिए प्रेरित करता है। कुसंस्कारी चित उसी प्रकार व्यवहार के माध्यम से अपना परिचय दे देता है और पहले संपर्क की प्रतिक्रिया अंत तक अपना प्रभाव कायम रखती है, यहाँ तक कि वह बाद के सभी अच्छे प्रभावों को भी धूमिल कर देता है। इसलिए लोकसेवी को अपने व्यक्तित्व का गठन करते समय आचरण, रहन-सहन और स्वभाव को आदर्श रूप में प्रस्तुत करने के साथ-साथ व्यवहार के द्वारा भी अपनी आदर्शवादिता का प्रभाव छोड़ना चाहिए।
शिष्टता और शालीनता सद्व्यवहार के प्राण हैं। व्यवहार में इन गुणों का समावेश होने पर ही पता चलता है कि व्यक्ति कितना संस्कारी है। प्रायः लोग आत्मीयता जताने या अपने को दूसरों से बड़ा सिद्ध करने के लिए अन्य व्यक्तियों से आदेशात्मक शैली तू-मेरे का संबोधन करते देखे जाते हैं। इसका यह अर्थ होता है कि व्यक्ति में सेवाभाव होते हुए भी अच्छे संस्कारों की कमी है अथवा केवल वह अपने अहंकार का पोषण करने के लिए इस क्षेत्र में आया है। हर किसी से आप या तुम का संबोधन तथा बातचीत करने में निर्देशात्मक शैली के स्थान पर सुझाव शैली का उपयोग सिद्ध करता है कि लोकसेवी कोई संदेश लेकर पहुँच रहा है, न कि अपने बड़प्पन या विद्वता की छाप छोड़ने के लिए। शिष्टता का अर्थ है- प्रत्येक के साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार और शालीनता अर्थात् प्रत्येक के प्रति स्नेह और आत्मीयता की उच्चस्तरीय अभिव्यक्ति।
स्नेह और आत्मीयता तो सर्वत्र व्यक्त की जाती है। असंस्कृत वर्ग के दो मित्र मिलते हैं, तो वे भी स्नेहप्रदर्शन और प्रेम की अभिव्यक्ति करते हैं। लेकिन उनकी परिभाषा में जो फूहड़पन होता है वह अभिव्यक्ति के स्तर में गिरावट ला देता है। लोकसेवी को तो अपने आचरण और व्यवहार द्वारा भी लोकशिक्षण करना है, साथ ही अपने व्यक्तित्व का स्तर भी ऊँचा उठाना है। अतः यह आवश्यक है कि व्यवहार में स्नेह-प्रेम का समावेश करने के साथ-साथ शिष्टता और शालीनता भी समाविष्ट की जाए।
शिष्टता के साथ शाँतिपूर्वक बोलने और आवेशग्रस्त न होने की आदत भी लोकसेवी के स्वभाव का अंग होनी चाहिए। वैसे बहुत से लोग स्वाभाविक रूप से ही कठोर और कटुभाषी होते हैं। जोर से बोलना या कटूक्तियाँ कहना उनके स्वभाव में ही होता है, लेकिन यह भी संभव है कि वे अपने सिद्धाँतों पर दृढ़ रहने की दृष्टि से कठोर व्यवहार कर रहे हों, किंतु स्वभावगत कटुता तो लोकसेवी के स्वभाव में होनी ही नहीं चाहिए। सिद्धाँतों के प्रश्न पर भी लोकसेवी के स्वभाव में होनी ही नहीं चाहिए। सिद्धाँतों के प्रश्न पर भी लोकसेवी का व्यवहार कटु-कर्कश न हो। दृढ़ता बात अलग है और कटुता बात अलग है।
दृढ़ता का अर्थ है- अपने सिद्धाँतों और मर्यादाओं पर अडिग रहने की निष्ठा। कई अवसर आते हैं, जब सिद्धाँतों से विचलित होने का भय उपस्थित हो जाता है। लोग अपने स्नेह और श्रद्धावश उस तरह का आग्रह भी करते हैं। लोगों की श्रद्धा व्यक्ति के प्रति केंद्रीभूत होकर उसे सम्मानित करने, अभिनंदित करने के लिए भी उमड़ सकती है और व्यक्ति पूजा का क्रम चल पड़ता है। ऐसी स्थिति में अपने आदर्श पर दृढ़ रहने , मर्यादाओं का पालन करने के लिए दृढ़ रहना तो आवश्यक है, पर कटु होने की कही भी आवश्यकता नहीं है।
अपने सिद्धाँतों पर दृढ़ होते हुए भी लोगों के आग्रह से, जिनके कि मर्यादा टूटने का डर रहता है, विनम्रतापूर्वक बचा जा सकता है। महात्मा गाँधी के जीवन में ऐसे कई प्रसंग आए, जबकि उन्हें अपने सिद्धाँतों की रक्षा के लिए दृढ़ता बरतने की आवश्यकता हुई। परंतु गाँधी जी बिना किसी प्रकार की कटुता व्यक्त किए, अपने सिद्धाँतों पर दृढ़ बने रहे। उनके विदेशी मित्रों ने एक बार प्रीतिभोज का आयोजन किया। उस समय गाँधी जी विदेश में पढ़ रहे थे। प्रीतिभोज का आयोजन करने वाले मित्र उनके सहपाठी ही थे। भोज में माँस भी पकाया गया और परोसा जाने लगा, तो उन्होंने मना करते हुए कहा कि मैं इसका इस्तेमाल नहीं करता। मित्रों ने समझाया कि इसमें क्या नुकसान है। डॉक्टर लोग तो इसे स्वास्थ्यवर्द्धक बताते हैं।
गाँधी जी ने कहा- “परंतु यह मेरा व्रत है कि मैं कभी माँसाहार न करूंगा।” मित्र वाद-विवाद पर उतर आए और तर्क देने लगे। बहुत संभव था कि गाँधी भी वाद-विवाद करने लगते। मित्रों ने यह कहकर तर्क युद्ध छोड़ने का प्रयास किया कि उस व्रत की क्या उपयोगिता जिससे लाभदायक कार्यों को न किया जा सके। तो गाँधी जी ने यह कहकर विवाद को एक ही वाक्य में समाप्त किया- “इस समय मैं व्रत की आवश्यकता, उपयोगिता, का बखान नहीं कर रहा हूँ, बल्कि मेरे लिए अपनी माँ का दिया गया वह वचन ही काफी है, जिसमें मैंने माँस न खाने और शराब न छूने का संकल्प लिया था।”
गाँधी के मित्र वहीं चुप रह गए। वहाँ सिद्धाँत रक्षा भी हो गई और कटुता भी उत्पन्न न हुई। लोकसेवी को अपनी बात नम्रता और शालीनतापूर्वक कहनी चाहिए। यह नम्रता और शालीनता अंतःस्तल से व्यक्त होनी चाहिए, अन्यथा व्यवहार में बनावटीपन भी हो सकता है। कई लोग आँतरिक क्षेत्र में द्वेश-दुर्भाव रहते हुए भी मीठा बोलने और अपने को हितैषी जाहिर करने का अच्छा अभ्यास कर लेते हैं। ठग और जालसाज अपने मन में दूसरे व्यक्ति को ठगने, उसका धन छीनने की भावना रखते हुए भी बाहर से ऐसा व्यक्त करते हैं कि चतुर से चतुर व्यक्ति भी उनसे धोखा खा जाते हैं। लेकिन इस बनावटीपन का प्रभाव कुछ देर तक ही रहता है। उस क्षणिक प्रभाव में ही ठग, जालसाज अपना मतलब हल कर चलते बनते हैं।
लोकसेवा का उद्देश्य तो स्थायी प्रभाव छोड़ना और व्यक्ति की जीवन दिशा मोड़ना है। इसलिए उसका व्यवहार आँतरिक भावनाओं से संयुक्त होना चाहिए। सोचा जा सकता है कि हमारे अंतःकरण में जब सद्भावनाएं विनयभाव, स्नेह और प्रेम, सौजन्य उत्पन्न होगा, तब लोगों से अच्छा व्यवहार करेंगे। यह भी एक आत्मप्रवंचना है। लोकसेवी को अपने व्यवहार में आंतरिक गहराई तो लानी चाहिए, पर उसके लिए अंतःकरण में सद्भावनाओं के उदय तक अपने व्यवहार का स्तर गिरा ही नहीं रहने देना चाहिए, क्योंकि व्यवहार का उद्देश्य प्रभाव उत्पन्न करने के साथ-साथ शिक्षण करना भी तो है। व्यवहारकुशलता प्राप्त करने के साथ साथ आँतरिक निष्ठा के समावेश की साधना भी नियमित रूप से चलती रहे।
यदि आँतरिक एकात्मता उत्पन्न करने के प्रयास न किए गए, तो व्यवहार में बनावटीपन बना ही रहेगा और एक न एक दिन वास्तविकता सामने आने से न रुकेगी। बनावटीपन के लिए मिथ्याचरण के लिए कितना ही अभ्यास किया जाए, पर व्यक्ति का अपने मस्तिष्क पर जैसे ही नियंत्रण थोड़ा कम होता है, वैसे ही वास्तविकता प्रकट हो जाती है। एक छोटी सी घटना है, उत्तरप्रदेश के प्रमुख राजनेता, जो पर्वतीय क्षेत्र में पैदा हुए थे, एक बार गंभीर रूप से बीमार पड़े। उन्होंने आरंभ से ही हिंदी और अँगरेजी बोलने का अभ्यास कर रखा था। प्रायः वे अपने मित्रों और बोलने वालों से हिंदी तथा अँगरेजी में बाते किया करते थे। बीमार पड़ने पर काफी समय तक तो वे डॉक्टरों से अँगरेजी में बाते किया करते रहे, लेकिन थोड़ी देर में हिंदी बोलने लगे। स्वास्थ्य जैसे जैसे बिगड़ता गया वैसे वैसे मस्तिष्क पर उनका नियंत्रण कम होने लगा और स्थिति तो ऐसी आ गई कि वे अपने क्षेत्र की प्रचलित भाषा पर्वतीय भाषा में बोलने लगे। सुनने वाले लोग उनके मुँह से वह भाषा सुनकर आश्चर्यचकित हुए, क्योंकि उन लोगों ने, जो काफी समय से उनके साथ काम करते रहते थे, कभी वह भाषा उनके मुँह से नहीं सुनी थी।
कहने का अर्थ यह है कि बाहरी अभ्यास मस्तिष्क पर नियंत्रण रहने तक ही साथ देते हैं। मस्तिष्क पर से जैसे ही नियंत्रण हटा या कम हुआ, व्यक्ति के आँतरिक भाव दुर्गुण उभरकर सामने आ जाते हैं। यह जो मनोवैज्ञानिक का पक्ष है, इसे भली भाँति समझते हुए समाजसेवा के क्षेत्र में उतरने वाले हर व्यक्ति को अपने जीवन की व्यावहारिक पृष्ठभूमि पहले चिंतनक्षेत्र में आरोपित करने का अभ्यास कर लेना चाहिए। जैसे जैसे आँतरिक अभ्यास परिपक्व होने लगता है, मनःसंस्थान उन्हीं संस्कारों में ढल जाता है, जैसा कि बहिरंग के व्यवहार में उन्हें झलकना चाहिए। ‘स्वे स्वे आचरेण शिक्षयेत्’ का सिद्धाँत हमारे ऋषिगण हमें पढ़ा गए हैं। उसे हमें अच्छी तरह आत्मसात् कर अपनी जीवन-शैली में ढालने का प्रयास करते रहना चाहिए।
परम वंदनीया माताजी का नवरात्रि की वेला में दिया गया उद्बोधन
गायत्री मंत्र हमारे साथ साथ बोले,
ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्॥
हमारे आत्मीय परिजनों ! नवरात्रियों में अनुष्ठान क्यों किया जाता है और इसका क्या महत्व है ? दो ऋतुओं के मिलने को संधिवेला कहते हैं। गरमी के जाने से और सरदी के आने से - इन दोनों का जो मिलन होता है, इसका अपना महत्व है। जाड़े के जाने और गरमी के आगमन चैत्र की नवरात्रि होती है। इसी प्रकार वर्षाऋतु के समापन और शरदऋतु के आगमन पर वह आश्विन नवरात्रि है। साधना की दृष्टि से इसका विशेष महत्व है। जिस तरीके से सोमवती अमावस्या को स्नान करने क्यों जाते हैं ? गंगा तो वही है ना। यों तो गंगा में जब भी नहाया जाएगा तब ही उसका महत्व है, लेकिन विशेष पर्व का विशेष महत्व होता है। जिस तरीके से कुँभ लगता है और कुँभस्नान का विशेष महत्व होता है, उसी प्रकार साधना की दृष्टि से नवरात्रि का भी विशेष महत्व है।
इन नवरात्रियों में साधक का मन अपने भाव साधना में लगता हुआ चला जाता है। यदि किसी साधक का मन नहीं लगता, तो हम यह मानकर चलेंगे कि वह भौतिक जंजालों में फँसा हुआ है, इसलिए उसका मन भगवान् की गायत्री माता की उपासना में नहीं लग रहा है। उपासना में दिलचस्पी है या नहीं, उसमें कैसे फर्क माना जाए। इसकी पहचान साधक की मनोभूमि और अंतःकरण के आधार पर की जायगी। अंतःकरण अर्थात् उसकी भूमि कैसी है ? बीज तो उसमें पड़ जाएगा। भगवान् की अनुकंपा, दया, उसका अनुदान, वरदान तो मिलता हुआ चला जाएगा, परंतु उसका फलित होना इस बात पर निर्भर करेगा कि हमारी अंतःभूमि कैसी है ? यदि भूमि उपजाऊ नहीं है, ठीक नहीं है, तो बीज कितना ही अच्छा क्यों न हो, वह गल जाएगा, सड़ जाएगा। उसका कोई महत्व नहीं रहेगा।
बीज का महत्व तभी है जब भूमि साफ सुथरी हो उपजाऊ हो। इसके बाद उसमें खाद और पानी देने की जरूरत पड़ती है। खाद और पानी देने की जरूरत पड़ती है। खद और पानी क्या होता है ? वह है हमारी श्रद्धा और निष्ठा। निष्ठा और श्रद्धारूपी खद पानी जब हम देते हैं तब हमारी उपासना फलीभूत होती है। कैसे फलीभूत होती है, इस संबंध में मैंने कई बार गुरुजी का उदाहरण दिया है कि उन्होंने पंद्रह वर्ष की आयु से उपासना करते रहे। वे 6 घंटे प्रतिदिन उपासना करते थे, लेखन करते थे, व्यक्तियों से मिलते थे। इतना बड़ा संगठन भी उन्होंने तैयार किया। आखिर इसकी स्थापना कैसे की ? केवल उपासना के द्वारा उपासना हमारा एक ऐसा संबल है। इस श्रद्धा और निष्ठा के सहारे हम आगे बढ़ते हुए चले जाते हैं और हमारे अंदर वह शाँति और वह भावना आती हुई चली जाती है, जो हमारे महापुरुषों में आती हुई चली गई।
अभी मैंने गुरुजी का उदाहरण दिया और यह बताया कि उन्होंने बचपन से जो संबल पकड़ा- गायत्री माता का आँचल पकड़ा और अपने गुरु का सान्निध्य और प्रेरणा पाई, तो आजीवन उस प्रेरणा को केवल अपने अंतःकरण में ही नहीं बिठाया, वरन् उसे बाहर साकार रूप भी दिया। उस प्रेरणा को, भावनाओं को, श्रद्धा को उन्होंने साकार रूप दिया और जनमानस में गहरे बैठाया तथा एक ऐसी सेना तैयार की, जिसको लाखों व्यक्ति की सेना कहना चाहिए। यह कौन सी और कैसी सेना है ? यह भावनाशीलों की सेना है, श्रद्धावानों की सेना है, निष्ठावानों की सेना है। यह सेना ऐसी है कि जब जिससे जो कह दें, उस काम के लिए वे तुरंत खड़े हो जाएँ और सारे राष्ट्र में जाग्रति पैदा कर दें।
उपासना क्या सिखाती है ? उपासना हमको यही सिखाती है कि हमको दयावान् होना चाहिए, करुणामय होना चाहिए। हमारे अंदर संवेदना होनी चाहिए। जब तक हमारे अंदर संवेदना पैदा नहीं होती, तब तक उसका प्रतिफल क्या मिला, हम कैसे मानें कि आपने उपासना की है। मैं आपको सावित्री का एक उदाहरण देना चाहूँगी। सावित्री के लिए उसके पिता वर देख रहे थे, तो सावित्री ने अपने पिता से कहा कि पिताजी यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं स्वयं ही अपने लिए वर ढूंढ़ लूँ। उन्होंने कहा बेटी तू बहुत प्रतिभाशाली बच्ची है और अपने लिए स्वयं वर देख सकती है, मैं तुझे इसकी आज्ञा देता हूँ। सावित्री गई और जगह जगह ढूंढ़ती फिरी, कहीं कोई उसे अपने योग्य वर दिखाई नहीं दिखाई नहीं पड़ा। एक जंगल से गुजर रही थी कि उसे एक लड़का दिखायी पड़ा, जो कि लड़की का गट्टा सिर पर लिए हुए जा रहा था। उससे सावित्री ने पूछा कि तुम्हारे चेहरे पर इतना तेज कैसे है ? तुम इतने बलवान् कैसे हो ? उस युवक ने कहा कि मैंने उपासना की है एक बात, दूसरी बात मैंने अपने माता-पिता की सेवा की है। राज्य की ठुकरा करके जीवन शोधन के लिए, आत्मशोधन के लिए मैं जंगलों में घूम रहा हूँ।
सावित्री ने उसके गले में वरमाला डाल दी। सत्यवान ने कहा कि सावित्री तू तो राजकुमारी है और मैं तो एक कंगाल हूँ। मैं तो सब कुछ छोड़ करके आया हूँ, क्या तू मेरे साथ रहना पसंद करेगी ? उसने कहा कि मैं सत्यवान के साथ शादी कर रही हूँ और आपके अंदर मुझे सत्यता दिखाई पड़ रही है, प्रतिभा दिखाई पड़ रही है, इसलिए मैं आपके साथ शादी कर रही हूँ। अर्थात् वह शक्ति जिसको हम गायत्री कहते हैं, सावित्री कहते हैं। सावित्री भौतिक और गायत्री पारलौकिक शक्ति है। इन दोनों ही शक्तियों से मिलने को नतमस्तक होने को जी चाहता है। ये दोनों एक ही शक्ति हैं।
सावित्री और गायत्री को कब धारण किया जा सकता है ? जब अपने अंतःकरण को कमल के तरीके से खिलने दिया जाए। यदि वह कमल की तरह से खिला नहीं है, तो गायत्री माता आकर कहाँ बैठेंगी ? क्या कूड़े-करकट में बैठेगी ? हंस जैसे जीवन में जब नीर क्षीर की विवेकशीलता का माद्दा अंदर आ जायगा, तब गायत्री माता आएँगी और हमारे हृदयकमल पर बैठेंगी, जैसे कि गुरुजी के हृदयकमल पर वे बैठती हुंई चली गई और वे निहाल हो गए और गायत्री माता भी निहाल हो गई। क्योंकि वह धूल में दबी हुई हमारी माँ थीं, उस माँ को उन्होंने घर घर में पहुँचाया। भगवान् बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन में कितने ही व्यक्तियों ने योगदान दिया और घर घर जाकर अलख जगाया था। उसी का परिणाम है कि बुद्ध धर्म कहाँ से कहाँ तक फैलता हुआ चला गया। उस धर्मचक्र प्रवर्तन में अशोक, संघमित्रा, महेंद्र तथा अन्य और भी ढेरों व्यक्ति सम्मिलित थे। उनमें अंगुलिमाल भी था, जो कि कभी एक सौ आठ अँगुलियों की माला पहनता था, परंतु जब भगवान् बुद्ध की शरण में गया, तो उसने अपने सारे विकार त्याग दिए और अच्छे पथ पर, संतों के पथ पर चलने लगा।
बेटे ! जो लोग आज गुरुजी का अनुकरण कर रहे हैं और उस पथ पर चलने की हिम्मत कर रहे है, मैं उनको महेंद्र ही कहूँगी, उनको मैं अशोक ही कहूँगी, उनको मैं विवेकानंद कहूँगी और अर्जुन कहूँगी। उनको मैं शिवाजी कहूँगी, क्योंकि उन्होंने कम से कम अपना हौसला ता दिखाया, आगे चलने का। गुरुजी के पदचिह्नों पर चलने का उन्होंने हौसला तो दिखाया। हौसला कौन दिखाता है ? आगे चलने का हौसला वही साधक दिखाता है, जिसके अंदर संवेदना उभरती हुई चली जाती है। जिस तरह से वाल्मीकि के जीवन में घटित हुआ। एक समय उनके जीवन में ऐसा आया कि नारद जी के कहने पर उन्होंने पिछला जीवन बदल दिया और भगवान् से जुड़ गए। उनकी कायापलट हो गई और जब एक पक्षी के जोड़े को तिलमिलाते हुए उन्होंने देखा मरते देखा, तो उनकी करुणा फूट पड़ी। पहले नहीं फूटती थी, परंतु भगवान् से जुड़ने के बाद करुणा फूटने लगी उन्होंने वाल्मीकि रामायण की रचना कर डाली।
एक समय संत तुलसीदास जी का भी ऐसा ही हाल उनकी अपनी पत्नी के कहने पर हुआ। उनकी पत्नी ने कहा कि आपका जितना लगाव इस नश्वर शरीर से है, यदि उतना ही लगाव कहीं भगवान् से हो जाए तो आपका उद्धार हो जायगा। फिर आप भगवान् का काम भी करेंगे और उनका नाम भी लेंगे। आप भगवान् का नाम तो ले, पर उससे कहीं ज्यादा उसका काम करें। तुलसीदास को अपनी पत्नी की यह बात चुभ गई और वे संत तुलसीदास हो गए। संत तुलसीदास होने के बाद उन्होंने एक महाकाव्य की रचना की, जिसको हम ‘रामचरितमानस’कहते हैं। वह रामचरितमानस हमारे जनमानस के संबंध में है कि गुरु शिष्य के भाई भाई के पिता पुत्र के पति पत्नी के संबंध कैसे हों यह सारे के सारे उदाहरण आप उसमें पढ़ते हुए चले जाइए। कैसे बढ़िया काव्य है कि बस कहते हुए मन अघाता नहीं है।
बेटे ! गुरुजी ने भी ऐसे ही पुराणों सहित आर्षग्रंथों को ऐसा बनाया कि वे जनसामान्य के लिए बन गए। आज हरिद्वार के जितने भी आश्रम हैं, उनसे लेकर देश के सभी आश्रमों, बड़े बड़े पुस्तकालयों में उनके वेद, पुराण, दर्शन, उपनिषद् स्मृतियाँ व प्रज्ञापुराण रखे हुए हैं। जब वेदों का उन्होंने भाष्य किया तो लोग सोचते ही रह गए। जब उन्होंने एक सौ आठ उपनिषदों का भाष्य किया, तो लोगों को आश्चर्य हुआ कि एक व्यक्ति इतना कैसे कर सकता है ? मैं कहती हूँ कि एक व्यक्ति क्यों नहीं कर सकता ? कर सकता है यदि उसके अंदर भावनाएँ हो, कर्मठता हो, क्रियाशीलता हो तो वह क्या नहीं कर सकता है अर्थात् सब कुछ कर सकता है। गुरुजी ने वह सब करके दिखा दिया। बत्तीस सौ पुस्तकें उन्होंने अपने जीवनकाल में लिख करके यह बताया कि उन्होंने अपने वजन से भी ज्यादा साहित्य लिखा। उन्होंने दिखाया कि उपासना के द्वारा किस तरीके से प्रखरता आती हुई चली जाती है। यदि व्यक्ति यह मानकर चले कि हम जो उपासना कर रहे हैं, वह भगवान् के लिए अंतरंग के लिए है, जिससे कि हमारे अंतरंग व अपने जीवात्मा पर जो मल विक्षेप छाए हुए है, उनको हटाने के लिए हैं। लेकिन यहाँ तो कुछ उलटा ही है। यहाँ तो उपासना माने चापलूसी, उपासना माने आशीर्वाद माना जाता है। लोग सोचते हैं कि चलो गुरुजी से, माताजी से आशीर्वाद तो ले आएँ, पर मन में यह नहीं आया कि गुरुजी और माताजी के पदचिह्नों पर भी हमें चलना है क्या ? नहीं हमको बेटा दे दो, हमको पैसा दे दो, हमारी शादी करा दो। धत तेरे की ... उपासना इसी का नाम है क्या ? इसका नाम उपासना नहीं है।
भगवान् फोकट में कभी किसी को कुछ नहीं देता है। देने से पहले वह माँगता है। उसने सुदामा से भी माँगा था। सुदामा जब कृष्ण भगवान् के यहाँ गए, तो उन्होंने कहा कि पहले यह बताओ कि आप लाए क्या हो ? लाइए दीजिए हमको। उन्होंने कहा- हम क्या दे सकते हैं आपको ? कृष्ण ने कहा- झूठ मत बोल, तेरे बगल में जो पोटली बँधी है, उसे ला। वह चावल की पोटली थी, जो चलते वक्त सुदामा की पत्नी ने दी थी। श्रीकृष्ण उस पोटली के चावलों को ही फाँकते चले गए। भगवान् राम जब शबरी के यहाँ गए, तो वहाँ भी माँगते हुए चले गये। उससे कहा कि शबरी जो कुछ भी तेरे पास है, उसे ही मुझे खिला। शबरी बोली कि भगवान् ! मेरे पास तो कुछ नहीं है। मैं तो गरीब हूँ, मेरे पास क्या है ? मेरा तो छुआ पानी तक कोई नहीं पीता है। भगवान् ने कहा- शबरी कौन कहता है कि तू अछूत है ? तू मेरे भक्तों में से है। ला, जो कुछ तेरे पास है। भगवान् मेरे पास तो कुछ बेर हैं। उन्हें ही वह चख-चखकर देती गई और भगवान् राम जूठे बेर खाते गए। यह कौन करता है ? यह तो वही करता है, जो भगवान् का प्रिय है और जो भगवान् का प्रिय है और जो भगवान् को स्मरण करता है। वह भेदभाव नहीं करता। वह सारे मानवजाति को एक ही तराजू में तौलता है।
तो क्या साहब ! शबरी ने ऐसा किया था ? हाँ, शबरी ने कुछ ऐसा ही किया था। वह मातंग ऋषि के आश्रम में रहती थी। उसने सोचा कि कहीं ऋषि पर छू जाएँगे, तो उनको दोबारा नहाना पड़ेगा, इसलिए वह रात को चार बजे ही मार्ग साफ कर दिया करती थी। पढ़ी-लिखी तो थी नहीं, पर मन ही मन उपासना करती थी और कहती थी कि भगवान् कभी तो आप सुनेंगे, कभी तो मेरे घर आएँगे। और भगवान् राम शबरी के घर पहुँचे। वे विदुर के घर भी पहुँचे। कौरवों के राजमहल में कृष्ण को दावत दी गई थी। दुर्योधन ने दावत दी कि आप हमारे यहाँ आइए, लेकिन उसके यहाँ का कुधान्य उन्होंने नहीं खाया। साधक कभी कुधान्य नहीं खाता है। बेईमानी नहीं करता है, चोरी चकारी नहीं करता है। जो उसकी मेहनत की कमाई है, उसे ही वह खाता है। अपनी मेहनत की कमाई खाता है। जब श्री कृष्ण विदुर के यहाँ पहुँचे, तो उन्होंने कहा कि भगवान् ! मेरे पास कुछ तो नहीं है, जो आपको खिलाऊँ। विदुर जी की पत्नी केला लेकर आई। भावविभोर होकर केला तो नीचे डालती गई और छिलका भगवान् को खिलाती गई। यह देखकर विदुर ने कहा कि यह क्या कर रही हो ? गूदा नीचे डालती जा रही हो और छिलका खिला रही हो ! तो भगवान् कृष्ण ने कहा कि न मैं मेवा खाता हूँ, न मिष्ठान खाता हूँ, मैं तो केवल भक्त की भावना और निष्ठा को खाता हूँ। मुझे और कुछ नहीं चाहिए विदुर ! मेरे और भक्त के बीच में तू आड़े कैसे आ गया है ?
इसी प्रकार की एक घटना मैं आपको और बताऊँगी, जो गुरुजी के साथ घटित हुई थी। एक बार गुरुजी कहीं गए। उनके साथ तीन व्यक्ति और थे, जो भजनोपदेश दे सकते थे। वे लोग जहाँ जाकर के ठहरे, वहाँ की एक गृहिणी दूध लेकर आई। उस दूध में वह नमक डालकर लाई थी। उस बेचारी को भावातिरेक में यह ध्यान नहीं रहा कि वह दूध में नमक डाल लाई है। उसने समझा कि शक्कर है, तो चुटकी भर के स्थान पर दो तीन चम्मच गिलास में मिलाया और नमक का दूध सबके सामने आ गया। जो और लोग साथ में बैठे थे नमक का दूध पाकर उन्होंने कहा कि आचार्य जी ! आप से क्या करते हो ! यह नमक मिला दूध हुआ दूध आ गया है। आचार्य जी ने पूछा क्यों ? क्या बात हो गई ? इसमें तो नमक पड़ा है। उन्होंने कहा- चुप रहो। क्या हो जायगा, जो नमक पड़ा है ? नमक पीने से मर थोड़े ही जाएँगे। नमक से तो पेट साफ हो जायगा। दस्त हो जाएँगे, तो अपना पेट साफ हो जायगा। उसमें क्या दिक्कत है ? काहे को बेचारी की भावना को तुम ठेस पहुँचा रहे हो ? और उन्होंने वह दूध पी लिया। बाद में वह स्त्री रोती हुई और उसने गुरुजी के पैर पकड़ लिए और बोली, गुरुदेव मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। उन्होंने कहा- नहीं, बेटी ! तुझसे कोई गलती नहीं हुई। तेरा दिया हुआ दूध तो बहुत मीठा लग रहा था, क्योंकि वह भावनाओं से संबद्ध था।
आप दूसरों का तिरस्कार मत कीजिए, उनकी भावनाओं का सम्मान कीजिए, ताकि आपको श्रद्धा मिले। दूसरों का हम सम्मान नहीं करेंगे, तो हमें श्रद्धा कैसे, मिलेगी ? आप किसी की श्रद्धा पाना चाहते हैं, तो आप उसे प्यार दीजिए ना। सारा संसार प्यार का भूखा हैं। सर्वत्र प्यार का अभाव हैं। प्यार आपने जीवन में चखा ही नहीं, प्यार को आपने जाना ही नहीं। प्यार को आपने बाँटा ही नहीं। न प्यार आपने खाया है और न प्यार आपने खिलाया है। हमने जिंदगी भर प्यार बाँटा है और श्रद्धा ली है। हमारे पास कुछ नहीं है। गुरुजी के पास कुछ नहीं था, लेकिन सारी जिंदगी उन्होंने व्यक्तियों के मनोबल को बढ़ाया। उन्होंने उन्हें सहारा दिया, जो कीचड़ में पड़े हुए थे। उनको उठाया, उनको मार्गदर्शन दिया, उनको प्रेरणा दी ताकि वे आगे बढ़ सकें। आपने तो खुद ही कमाए और खुद ही खाए। केवल आप अपने गृहस्थ जीवन को ही पालते रहे। बस, इतना ही जीवन है क्या ? इतना ही जीवन नहीं है। ये तो पशु भी करते हैं चारा खाते हैं, बच्चा पैदा करते हैं और बस खत्म हो जाते हैं। लेकिन मनुष्य का जीवन तो ऊँचे लक्ष्य के लिए है, परोपकार के लिए है, जनसेवा के लिए हैं।
अभी मैं उपासना के लिए कह रही थी, अब मैं साधना के बारे में कहूँगी। साधना माने अपना परिष्कार और उपासना माने भगवान् के समीप बैठना। अगर हम भगवान् के समीप बैठ रहे है, तो अपनी मलिनताओं को अपने दोष-दुर्गुणों को निकाल रहे हैं। ये तो हुई उपासना और साधना हुई अपने व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए। यदि आपने साधना की है, तो अपने व्यक्तित्व को बनाया या नहीं। यदि आपने अपने उपासना की है, साधना की है कि नहीं की है। उपासना की है, तो आपका व्यक्तित्व बनना चाहिए और आपके द्वारा दूसरों को भी ऊँचा उठना चाहिए।
और आराधना ? आराधना माने सेवा। संसार को राष्ट्र को , समाज को आप जैसे भावनाशीलों की बहुत आवश्यकता है। सेवा की लोगों को बहुत जरूरत है। कैसी सेवा ? ज्ञानदान की। अतः आप ऊपर से चाहे रँगे हो या न रँगे हो, लेकिन अपने अंतरंग को अवश्य रँगना चाहिए। इसके बिना काम नहीं चलेगा। एक गीत की कड़ी है, जिसमें कहा गया है - “मेरा रँग दे वसंती चोला” चोला तो रँग लिया कपड़ा तो रँग लिया यह बहुत अच्छी बात है। रँगना ही चाहिए, यह सादगी का प्रतीक है, त्याग का प्रतीक है। हम अपने हर परिजन से कहते हैं कि आपको ब्राह्मणोचित जीवन जीना चाहिए। गायत्री किसकी है ? ब्राह्मण की । केवल ब्राह्मण की है ? नहीं, ब्राह्मण का अर्थिवल जाति-वर्गविशेष से नहीं है, वरन् ब्राह्मण का अर्थ ‘ब्रह्मतेज’ है।
इस संदर्भ में मैं आपको एक उदाहरण और सुनाऊंगा। वह उदाहरण है - महर्षि वसिष्ठ का। एक बार राजा विश्वामित्र लड़ाई पर जा रहे थे। उनके साथ दस हजार सैनिक थे। मार्ग में एक समय ऐसा आया जब उनके पास खाने-पीने को कुछ नहीं था। उस जंगली मार्ग में महर्षि वसिष्ठ जी का आश्रम पड़ा, तो वसिष्ठ जी ने कहा कि आप हमारे यहाँ आइए, आपका निमंत्रण है और हम आपको खिलाएँगे। उन्होंने कहा कि आपके आश्रम में जो थोड़े से फल-फूल रखे है, उनसे आप इतनी बड़ी सेना को कैसे खिला सकते हैं ? उन्होंने कहा - आप बैठिए तो सही, हम आपको खिलाएँगे और उन्होंने दस हजार व्यक्तियों को खिलाया। यह सब देखकर विश्वामित्र ने कहा कि वसिष्ठ जी आप यह बताइए कि यह सब आप लाए कहाँ से ? उन्होंने कहा कि गायत्री मंत्र की मेरे पास अपार शक्ति है। मेरे पास नंदिनी गाय हैं। गायत्री और नंदिनी दोनों मेरे पास है।
विश्वामित्र ने कहा कि नंदिनी गाय मुझे दे दीजिए। वसिष्ठ जी ने कहा कि ये नंदिनी मेरे सिवा और किसी के पास नहीं जा सकती। चूँकि वसिष्ठ जी मार्गदर्शन देते थे। राज्य के राज्य बदलते चले गए, रामराज्य की स्थापना हुई, लेकिन वसिष्ठ जी नहीं बदले। संचालन का मार्गदर्शन का जो कार्य होता था, वह वे करते थे, मार्गदर्शन देते थे, पर प्रलोभन से अलग थे। प्रलोभन उनके ऊपर सवार नहीं था। उन्होंने कहा कि ये शक्ति मुझसे अलग नहीं हो सकती। इस पर विश्वामित्र बोले कि हम इसको बलपूर्वक ले जाने लगे, तो नंदिनी ने उनके सारे हौसले पस्त कर दिये। जब वे परास्त हो गए, तो उन्होंने - “धिक् बलं क्षत्रिय बलम् ब्रह्मतेजो बलम् बलत्।” ब्रह्मतेज का जो बल है, वह अपार है। उन्होंने कहा कि वसिष्ठ जी, हम आपके आगे नतमस्तक हैं। आपने जो मुझे प्रेरणा दी, मार्ग दिखाया, मैं आजीवन उसको निभाऊँगा और उन्होंने आजीवन गायत्री उपासना की। गायत्री मंत्र की उपासना से इतना आत्मबल पैदा कर लिया कि जब राम और लक्ष्मण उनके पास गए, तो उन्होंने कहा कि इनके द्वारा कुछ बड़ा काम कराना है। श्रेय खुद नहीं लिया जाता, वरन् दूसरों को दिया जाता है। उन्होंने कहा कि सफलता का सारा श्रेय किसको देना है ? राम और लक्ष्मण को देना है। जब वे अपनी परीक्षा में पास हो गए, तो उन्होंने बला और अतिबला दोनों शक्तियाँ राम और लक्ष्मण को दे डालीं।
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ
ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्॥
देवियों ! भाइयों !
भगवान् बु से उनके शिष्यों ने पूछा - मनुष्य इतना सशक्त और समर्थ होते हुए भी आखिर गिर क्यों पड़ता है ? अधःपतित क्यों हो जाता है ? उन्होंने घटना यह दिखाई कि अपने कमंडलु को पानी में फेंक दिया। कमंडलु तैरने लगा। शिष्यों से पूछा- यह कमंडलु डूबेगा कि नहीं ? उन्होंने कहा - यह क्यों डूबेगा ? यह डूबता थोड़े ही है। कमंडल डूबने वाला नहीं है। यह तो तैरता रहेगा। भगवान् बुद्ध ने दुबारा उसको उठाकर उसमें एक सुराख कर दिया पैंदे में, फिर उसको पानी में फेंक। धीरे-धीरे पानी उस कमंडल में भीतर भरने लगा और वह डूब गया। शिष्यों से पूछा - भाई ! अभी तुम कह रहे थे कि कमंडल डूबता नहीं है, यह तो डूब गया। शिष्य कहने लगे- महाराज जी ! आपने सुराख कर दिया इसके भीतर। सुराख कर देंगे, तो डूबेगा ही। ठीक बात है- भगवान् बुद्ध ने जवाब देते हुए शिष्यों से कहा- इनसान के भीतर सुराख हो जाए, उसमें पानी भरने लगेगा और वह डूब जाएगा और सुराख न हो, तब ? तब न पानी भरेगा और न वह डूबेगा। एक ये उदाहरण भगवान् बुद्ध ने अपने शिष्यों को दिया। एक और भी दिया उन्होंने। उन्होंने कहा- अगर तुम्हारे पास गाय हो और गाय बहुत दूध देनी वाली हो, बहुत दूध देने वाली गाय का दूध आप दुहें, लेकिन जिस बरतन में आप दुहें, उसमें सुराख हों और छेद हो तब ? तब फिर क्या होगा बताओ ? शिष्यों ने कहा - महाराज जी ? फिर वह दूध चलनी में रुकेगा थोड़े ही। चलनी में जो सुराख है, उससे तो नीचे जमीन पर टपक जाएगा, कपड़े भी मैले हो जाएँगे और ग्वाले के हाथ कुछ भी नहीं लगेगा, सिवाय थकान के। उँगलियों को बेचारा दबोचता रहा, थनों को दबाता रहा, गाय भी परेशान ! लेकिन दूध पीने का वक्त जब आया, तब यह मालूम पड़ा इसमें कुछ भी नहीं है। नीचे से बरतन का दूध टपक गया।
यह उदाहरण बताता है कि आदमी के जीवन में अगर बहुत सारे सुराख हों, तो उसकी संपदाएँ, उसकी विभूतियाँ और उसकी विशेषताएँ- सब खत्म हो जाएँगी। फिर कुछ बचेगा ही नहीं, इसलिए उन्नति की बात करना तो ठीक है, आदमी को वैभव उपार्जित करना तो ठीक है, लेकिन उसके साथ-साथ में ये भुला मत दीजिए। क्या न भुलाएँ ? यह मत भूलिए कि आपको सुराखों को बंद करना है, अपने छिद्रों की रोकथाम करनी है, अपनी मलीनताओं और अपनी असंयमितताओं के ऊपर हावी होना है, तो क्या करें ? मैंने बताया न आपको ! चार बात करनी पड़ेगी आपको। तक, जिसका कल जिक्र किया गया था, चार प्रकार के होते हैं। एक तप इंद्रिय तप कहलाता था, दूसरा जो है, ब्रह्मचर्य को भी तप कहते हैं। तीसरा समय के संयम को तप कहा जाता है। चौथा धन के संयम को तप कहा जाता है और विचारों के संयम को तप कहा जाता है। विचारों का संयम - एक। पैसों का संयम - दो। समय का संयम - तीन और इंद्रियों का संयम - चार। तपश्चर्या की चार धाराएँ है। आपको इन चार धाराओं में से सबसे पहली धारा का यहाँ बुला करके अभ्यास कराया गया और जिह्वा को तपस्वी बनाया जा रहा है। स्वाद के लिए भटकने वाली जिह्वा, इसने आपके स्वास्थ्य को खराब कर दिया, आपके मन को खराब कर दिया। आप काबू में रख सके और लगाम को लगा सकें...... अगर आप घोड़े को लगाम नहीं लगाएँ तब ? ऊँट को नकेल नहीं लगाएँ तब ? आप बैल के नाक में रस्सी नहीं डाले तब ? हाथी के ऊपर अंकुश नहीं लगाएँ तब ? तब फिर आप समझ लेना, ये जानवर आपके लिये बड़े खौफनाक साबित होगे और आपको तहस-नहस करेंगे। इसलिए आपको नियंत्रण में करने के लिये सब जरूरी है। इंद्रियां हमारी है तो बहुत अच्छी, इनसे ही सब काम चलता है, लेकिन इनको उच्छृंखल बनने दे, रोकथाम ना करें, तपस्वी ना बनाये, संयमी न बनाएँ तो इंद्रियां आपके लिये मुसीबत खड़ी कर देगा। जैसे आप खानपान के बारे में असंयम बरतते रहे है, उसका परिणाम ये हुआ है कि पेट खराब हो गया। पेट खराब होने के परिणाम यह हुआ कि स्वास्थ्य खराब हो गया स्वास्थ्य खराब होने का दोष किसी को मत दीजिये। इस सृष्टि में जितने जानवर है इनमें से कोई बीमार नहीं पड़ता। मरते तो सब है, पर बीमार कहाँ पड़ते हैं ? कबूतर बीमार पड़ते हैं ? लोमड़ी खरगोश जो जंगल में उछलते है, कभी बीमार पड़ते देखे है आपने ? कोई नहीं पड़ता है। एक ही बेवकूफ जानवर है, जिसका नाम है - मनुष्य। यह ही बीमार पड़ता है ? क्यों पड़ता है ? सिर्फ एक वजह है उसके बीमार पड़ने की, वह अपनी जीभ को इतना छुटल बना देता है कि वह अभक्ष्य खाती रहती है, जरूरत से ज्यादा खाती रहती है, जो चीजें नहीं खानी चाहिये वह खाती रहती है। पेट काम नहीं करता, पेट हजम नहीं करता, मशीन खराब हो जाती है और शरीर कमजोर और बीमार पड़ जाता है। अगर आप जीभ पर काबू कर लें तब ! तो आप विश्वास रखिये, आपको खोया हुआ स्वास्थ्य मिल जायेगा। अगर आप जीभ पर काबू कर लें, तो आप दिन-दिन कमजोर होते गये, या होते जायेंगे, उस से आप निजात पा सकते हैं।
इसी प्रकार से ये जो अपना मन है, मन भी इसी का है। अन्य से विकसित होते हुए, अन्य से माँस बनता है, रक्त बनता है, हड्डियाँ बनती है, पर अंततः अन्य से मन बनता है। अंतिम चरण जो अन्य का है, वह मन है “जैसा खाएँ अन्य, वैसा बने मन” - ये सौ फीसदी सही है। आप अभक्ष्य खाते रहिये, तमोगुणी चीजें खाते रहिए, माँस खाते रहिए, दूसरी घिनौनी चीजें खाते रहिए, फिर आप देखिये आपको मन कैसा चंचल हो जाता है ? आप नशेबाज होइए, फिर आप देखिये आपका मन कैसा चंचल हो जाता है ? आपको मन स्थिर करना कैसा कठिन पड़ जायेगा। मन अपने आपे में नहीं है। इंधन नीचे डालते हैं तब भगौने के पानी में उबाल आता है। मन तो ऊपर भगौने में पानी जैसा है। नीचे आप जैसे लकड़ी डालेंगे वैसा ही तो उबाल आयेगा। अगर आपने बराबर अभक्ष्य खाने का क्रम जारी रखा है, तो आपका मन बराबर चंचल बना रहेगा। आपको कभी ऐसा मौका नहीं देगा कि आप मन कि स्थिरता को रख पाये। इसलिये जीभ पर काबू पाइये, स्वादेंद्रियां पर काबू पाइये। स्वाद पर आपने काबू पा लिया, तो मन को संभालने और शरीर कि बीमारियों से मुकाबला करने में आप सफल हो जायेंगे। जीभ कि बात चल पड़ी, तो जीभ को एक और हिस्सा है। जीभ को दो इंद्रियों में बाँटा गया है - एक इसको स्वादेंद्रिय भी कहते हैं और एक इसको वाक्इंद्रिय भी कहते हैं। वाणी पर संयम, वाणी पर अगर आपका संयम नहीं है, चाहे जिससे, चाहे जैसे शब्द बोलते हैं, कडुए बोलते है- इसका परिणाम क्या हुआ ? इसका परिणाम कभी अच्छा नहीं हो सकता “ वशीकरण एक मंत्र है, तज दे वचन कठोर।” कौआ अपने कड़वे वचन से सबको ना खुश करता रहता है और कोयल अपने मीठे वचनों से सबकी प्यारी बनती रहती है। जीभ से हमको दूसरों को सम्मान देना चाहिये, दूसरों कि इज्जत और अपनी नम्रता का ध्यान रखना चाहिये। क्रोध और आवेश में कई आदमी ऐसे शब्द बोलते रहते हैं जो मुनासिब नहीं होते। उसका परिणाम यह होता है, कितने आदमी बैरी हो विद्रोही हो जाते हैं। आपको मालूम है न द्रौपदी ने व्यंग और उपहास में ऐसे शब्द कह दिये थे कि कौरवों को बहुत बुरा लगा। उसका अंतिम परिणाम महाभारत के रूप में आया जीभ कटारी के तरीके से है। जीभ में बिच्छू का डंक बताया गया है। जीभ में साँप का जहर बताया गया है। जब कड़वा बोलते हैं तब ! नहीं बोलते हैं तब ! मीठा बोलते हैं तब ! यह जीभ न जाने आपके लिये कितने काम कि हो सकती है। इससे मोहब्बत कीजिये, दूसरों कि इज्जत कीजिये, अच्छे परामर्श दीजिये, लोगों का उत्साह बढ़ाइये। लोगों की हिम्मत को तोडिये मत। लोगों कि हिम्मत बढ़ाने वाली बात कहिये। अगर आप ऐसा कर लेते हैं फिर मैं आपको तपस्वी कहूंगा।
ये वाणी का तप हुआ, जिह्वा का तप हुआ। अब चलिए, इसमें एक और आती है। इंद्रियों में एक और बात आ जाती है। इंद्रियों के तप में ब्रह्मचर्य का तप भी आता है। वैसे तो इंद्रियां दस है, पर आप झंझट में मत पड़िये दो को ही मान लीजिये। एक जीभ मुख्य है और दूसरी वाली कामेंद्रिय मुख्य है। कामेंद्रिय का मतलब केवल यौन कर्म ही नहीं होता, यौन कर्म के अलावा है। ये इंद्रियां सब मस्तिष्क से संबंध रखती है। काम वासना के बारे में आपको विचार आते रहते हैं। उनको देख कर आपके दिमाग खराब होते रहते हैं। अमुक अंग को और अमुक अंग कि खूबसूरती और बदसूरती को ढूंढ़ते रहते हैं। इसका परिणाम क्या होता है यह मानसिक दुराचार है। किसी भी औरत के बारे आपके मन में कोई संस्कार या विचार आते हैं तो इसका मतलब है कि प्रकाराँतर से पवित्रता का नुकसान हो गया है। आंखों से ही ब्रह्मचर्य का क्षय होता है। आप कुदृष्टि से देखते रहिये, स्त्रियों को देखते रहिये, बहिन बेटी और माँ कि इज्जत मत कीजिये, अपनी धर्मपत्नी को भी रमणी और कामिनी की दृष्टि से देखिए, तो देखिए प्रत्येक औरत आपके लिए डाकिन और नागिन का काम करती है या नहीं और इन्हीं को आप बेटी मान पाएँ तब ? बहिन मान पाएँ तब ? माता मान पाएँ तब ? सहधर्मिणी मान पाएँ तब ? तब ! यही महिलाएँ आपके लिए देवी की तरह से सहायक होंगी। आप चाहें स्त्रियों को देवी बना लीजिए, चाहे डाकिन बना लीजिए- आपकी मरजी की बात है। स्त्रियाँ भी आपके तरीके से साधारण मनुष्य है। आप अपना दृष्टिकोण अगर पवित्र नहीं रखेंगे, तो कुदृष्टि का परिणाम यह हुआ कि स्त्रियाँ आपके लिए कितनी हानिकारक हो गई है और आपके ब्रह्मचर्य को खंडित करती है और आपके पतनोन्मुख बनाती है और आपकी मनःस्थिति को नष्ट-भ्रष्ट करती है। अगर आप ये अपने मन के ऊपर देख पाएँ, फिर आप कैसे अच्छे-अच्छे हो सकते हैं। आपने गाँधारी का नाम सुना है न ! आँख पर पट्टी बाँध ली थी और इंद्रियों का संयम करना शुरू कर दिया था और अपने बेटे को लोहे का बना दिया था। आपने दमयंती का नाम सुना है ? राजा नल की पत्नी का नाम दमयंती था। जंगल में अकेली रह रही थी और बहेलिया उससे छेड़खानी करने लगा। बस, छेड़खानी के समय दमयंती ने आँख उठाकर देखा, तो बहेलिया जलने लगा और खत्म हो गया। आपको गाँधी जी बात मालूम है ? बत्तीस वर्ष की उम्र में उन्होंने ब्रह्मचर्य लिया था और अपनी पत्नी को माता कहने लगे थे। ये ब्रह्मचर्य का प्रताप था कि दुबले पतले और कमजोर होते हुए भी मनःशक्ति के हिसाब से ऐसे थे, जैसे कि कोई बड़ा पहलवान भी नहीं हो सकता था। आपको भीष्म पितामाह की बात मालूम है ? भीष्म पीतामाह शैया पर पड़े रहे, छह महीने बाद तक पड़े रहे और कहा मुझे फुरसत नहीं है। कितने तीरों से घायल थे ! ये कैसे हो पाया ? वे ब्रह्मचारी थे। ये इंद्रियनिग्रह की बात है। स्वामी दयानंद के विषय में सुना है आपने ? एक बार दो साँड लड़ रहे थे। स्वामी जी ने उन खूनी सांडों के दोनों के सींग पकड़कर इस तरीके से दबोचा और फेंका कि एक इधर गिरा और एक उधर गिरा। ये सामर्थ्य किसकी होती है ? ब्रह्मचर्य की। हनुमान को आप नहीं जानते ? हनुमान जी का ब्रह्मचर्य था, जिससे कि सामान्य बंदर से हनुमान बन सके। शंकराचार्य के बारे में यही कहा जाता है। शंकराचार्य ब्रह्मचारी न होते तब ? शादी-विवाह करके बहुत सारे बच्चे पैदा करते तब ? काम-वासनाओं में अपने आपको उलझाए रहते तब ? भगवान् शंकर का अवतार बनने का मौका नहीं मिलता तब ? लक्ष्मण जी ने मेघनाद को मारा था। मेघनाद को यह वरदान मिला था कि उसे वही आदमी मार सकता है, जिसने चौदह वर्ष का ब्रह्मचर्य पालन किया हो। लक्ष्मण जी ने चौदह वर्ष का ब्रह्मचर्य पालन किया था। अपनी पत्नी से भी दूर रहे और सीता जी को माता के समान मानते रहे। उनके आभूषण जमीन पर पड़े हुए मिले। रामचंद्रजी ने पूछा कि इन जेवरों में से सीताजी का कौन सा है ? उन्होंने बिछुए को तो पहचान लिया, ये सीताजी का बिछुआ है, लेकिन गले के हार को नहीं पहचान सके, कानों के कुंडलों को नहीं पहचान सके। उन्होंने कहा कि हमने कान तो कभी देखे नहीं हैं उनके, यद्यपि घूँघट नहीं मारती थीं। ये लक्ष्मण जी के ब्रह्मचारी होने का सबूत है, जिसकी वजह से वे इतना बड़ा काम करने में समर्थ हो सके। ये संयम है, कौन सा वाला ? ये इंद्रिय संयम की बात मैं कह रहा था।
अभी मुझे आपसे और कहना है। समय का संयम समय आपकी संपत्ति है। जीवन जो बँधा है, ये समय से गुँथा हुआ है। समय का अर्थ होता है - जीवन। जीवन का अर्थ होता है - समय। आप समय के एक एक लमहे को, एक एक मिनट को इस तरह से खर्च कीजिए, जिसमें आपका एक भी लम्हा व्यर्थ और बेकार खर्च न होने पाए। ये कैसे संभव है ? ये इसी तरह संभव है। कैसे ? जैसे कि संसार के प्रत्येक महापुरुष ने अपने अपने समय का ठीक से नियमन किया है। विनोबा 23 भाषाओं के विद्वान थे, कैसे ? कैसे उन्होंने भूटान की यात्राएँ कर ली -कन्याकुमारी से लेकर रामेश्वरम् तक। ये कैसे हुआ ? वे बराबर समय का विभाजन करते रहे, अन्य भाषाओं को सीखते-पढ़ते रहे। अब्राहम लिंकन जब सड़क से निकलते थे, तब लोग अपनी घड़ियों का सही करते थे। उनके उठने और टहलने का जो समय था, उसे उनकी लंबी टांगों की आवाज से लोग समझ लेते थे कि लिंकन जा रहे है। बिलकुल समय पर जाते थे, क्या मजाल समय का एक लमहा भी खराब करते। ये क्या है ? श्रम की शक्ति को, समय की शक्ति को आप समझते हो, मूल्य समझते हों, तो न जाने आप क्या से क्या कर सकते हैं ? मनोयोग वगैरह आप लगाएँ तब ? मनोयोग लगाएँ, तो आपने देखा है न ! मन लगाकर परिश्रम करें तब ? मन लगाकर परिश्रम करने और बिना मन के परिश्रम करने वाले का हर काम खराब, हर काम बेकार, हर काम घटिया और मन लगाकर काम करने वाले का काम कैसा होता है, आप देख सकते हैं।
बया पक्षी होता है, एक-एक तिनके को ढूंढ़कर लाता है, उसकी लंबाई-चौड़ाई नापकर के लाता है, हिसाब से लाता है, मोटाई को देखकर के लाता है और जहाँ लगाता है घोंसले में, बड़ी सावधानी से और मनोयोग से लगाता है। दूसरी ओर घोंसला बनाने वाला है - कबूतर। उल्टी-पुलटी, टेढ़ी-तिरछी लकड़ी ले आता है, जहाँ-तहाँ रख लेता है और अपना घोंसला बना लेता है। हवा चलते ही आमतौर से घोंसले उसके, किसके ? कबूतर के, जमीन पर गिरते हैं और बच्चे सब तबाह हो जाते हैं। इसलिए अक्सर देख गया है, कबूतर किसी पुराने मकान में या खंडहर में या कुएं में घोंसला बनाते हैं,ताकि हवा का झोंका उनके घोंसले को बरबाद न कर सके, लेकिन बया को ये परेशानी नहीं है। बया बच्चे अपने घोंसले में बैठे रहते हैं और बड़ा मजा उड़ाते रहते हैं। क्या मजाल कि एक बूँद पानी भी चला जाए। क्यों ? उसने मन लगा करके घोंसला बनाया हैं। यही बात आप हर किसी के बारे में देख सकते हैं। मन लगाकर काम करना- ये आदमी के सम्मान का प्रश्न होना चाहिए। ये प्रतिष्ठा का प्रश्न है। आदमी के बारे उसे कोई कामचोर कहे, हरामखोर कहे, तो समझाए ये बहुत बड़ी बेइज्जती है। वह विश्राम भले ही करे, इसमें हर्ज नहीं है, लेकिन विश्राम टाइम पर होना चाहिए। आलसियों के तरीके से काम को इधर छोड़ दिया, अधूरा छोड़ दिया, आधा छोड़ दिया, अधूरा छोड़ दिया- आप ऐसा मत कीजिए। समय का संयम पालिए।
तीसरा हमारा संयम है - धन को संयम। पैसा भगवान् ने आपको दिया है। इसलिए आपको नहीं दिया है कि आप बेसिलसिले से खर्च करें। आप कमाएँ तो चाहे जितना, कमाने के ऊपर रोक नहीं है लेकिन ईमानदारी से कमाएँ और शराफत के तरीके से खर्च करें। बेसिलसिले का खर्च मत कीजिए। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का सिद्धाँत आपने सुना है न ! जो सादा जीवन जिएगा, उच्च विचार उसी के हिस्से में आएँगे। उसका विलासी जीवन, खर्चीला जीवन, ठाठ-बाट का जीवन दिखावे का जीवन जितना ज्यादा होगा, उसका खर्च, पैसे का खर्च और समय के खरचे इतने ज्यादा हो जाएँगे कि उससे ही बेचारे के पास न कुछ समय बच सकता है, न पैसा बच सकता है। खर्चीली जिंदगी, विलासी जिंदगी, ऐश की जिंदगी, अकर्मण्यता से भरी हुई जिंदगी, ठाठ-बाट से भरी जिंदगी, ना ये नहीं। आप अपने पैसे को इसमें मत खर्च कीजिए। समय को भी खर्च मत कीजिए। आप किफायतशारी का जीवन जिएँ। संत जीवन वह है, जिसमें औसत भारतीय स्तर को अंगीकार किया है। औसत भारतीयों का जो स्तर है, आप अपने खरचे का स्तर उसी हिसाब से रखिए। आप भी इस मुल्क के निवासी हैं न ! जो बाकी तीन चौथाई आदमी जिस ढंग से गुजारा करते हैं, आप क्यों नहीं कर सकते ? ईश्वरचंद्र विद्यासागर यही करते थे। उनकी पाँच सौ रुपये की आमदनी थी। पचास रुपये में अपना गुजारा चलाते थे और साढ़े चार सौ रुपये बच्चों के लिए, विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति और दूसरे कामों के लिए खर्च कर देते थे। आप क्यों नहीं कर सकेंगे। किफायत से रहिए, कम खर्च में रहिए। ये मत कहिए, जो आदमी खर्चीली जिंदगी जीते हैं, वह शक्तिशाली हो जाते हैं, बुद्धिमान हो जाते हैं, मजबूत हो जाते हैं। आप बेकार की बात मत कहिए। सही बात ये है, जो आदमी जितना खर्चीला होता है, उतना ही दुर्व्यसनों में उसका धन खर्च होता है। दुर्व्यसनों की कीमत पर क्या-क्या खरीदा जाता है ? ईर्ष्या खरीदी जाती है, बीमारियाँ खरीदी जाती है, बेअकली खरीदी जाती है, आक्रोश खरीदा जाता है, सब चीजें तो खरीदी जाती हैं। आपके पास पैसा फालतू है ? खर्च करेंगे, तो नशे जैसी चीजों पर खर्च करेंगे ? नशे जैसी चीजों पर खर्च करेंगे, तब सेहत गँवा देंगे, तब अपनी अक्ल गँवा देंगे, तब अपनी औलाद गँवा देंगे, तब अपनी इज्जत गँवा देंगे, तब आप सब कुछ गँवा देंगे। ये कैसे हो सकता है ? ये फिजूलखर्ची की बात है। पैसा फिजूल में खर्च होगा, तो सब आफत क्यों न आएँगी, जाइए। इसलिए पैसे के बारे में आप हमेशा किफायत से कसत लीजिए। आदमी होशियार है समझदार है कि बेअक्ल है- इसकी पहचान सिर्फ एक है कि वह खर्च कैसे करता है ? कमाने को तो आप कुछ भी कमा लेते हैं, सट्टा मिल जाए तब, लाटरी खुल जाए तब, जमीन में गड़ा हुआ धन मिल जाए तब, कोई बाप बहुत ज्यादा धन देकर मर जाए तब, तो बेवकूफ आदमी भी धनवान बन सकता है, लेकिन समझदारी की परख एक है उसने खर्च कैसे किया ? खर्च करना बहुत समझदारी का काम है। आप फिजूलखर्ची करेंगे, तो अपने घर और औलाद के लिए परंपरा छोड़ जाएँगे, जिससे कि वह तबाह हो जाए। इसलिए आप खर्चीली जिंदगी न जिएँ। ईमानदार आदमी मितव्ययी हो सकता है। जो फिजूलखर्च हो, उसको बेईमानी करनी पड़ेगी, फालतू पैसा लायेगा कहाँ से ? रिश्वत लेनी पड़ेगी, चोरी करनी पड़ेगी, अमुक काम करना पड़ेगा, लेकिन जो आदमी किफायतशार है, वह आसानी से ईमानदारी की जिंदगी जी पाएगा। ये तीसरा वाला तप था।
चौथा वाला एक और भी तप है, उसको अगर आप करने लगें, तो आपका हमारे यहाँ साधनासत्र में आ करके उपासना करना सार्थक हो जाएगा। यह तप विचार-संयम है। विचारों को भटकने मत दें। विचारों की शक्ति आप समझते नहीं हैं। पैसे की शक्ति समझते हैं, विचारों को क्यों नहीं समझते ? विचार असल में सबसे बड़ी शक्ति हैं। विचारों का अपव्यय मत होने दीजिए। विचारों को आवारा कुत्ते के तरीके से मत होने दीजिए। विचारों को एक दिशा में लगाइए। विचारों को ऐसे लगाइए, जैसे बंदूक की नली में कारतूस लगा करके एक दिशा में छोड़ते हैं, तो किसी निशाने पर लगता है। बारूद को फैला दें तब ? तब कैसा अस्त−व्यस्त हो जाएगा। अर्जुन के बारे में आपने सुना नहीं ? अर्जुन एक तरीके से मछली का कोई हिस्सा देखता था, इसलिए उसका निशान लगाना संभव हो सका। जो दूसरे राजकुमार थे, जो मछली का संपूर्ण सिर-पैर देखते थे, उनका कोई निशान नहीं लगा। आपको अपने विचारों को अर्जुन के तरीके से एकाग्र रखना चाहिए। एकाग्रता का मतलब केवल यह नहीं है कि आप इनको रोक लें। एकाग्रता का मतलब केवल यह नहीं है कि आप इनको रोक लें। एकाग्रता का मतलब यह है कि एक दिशा में, अच्छी दिशा में, वैज्ञानिक के तरीके से इन्हें नियोजित कर देना। वैज्ञानिक विचार करते रहते हैं, पर एक दिशा में विचार करते हैं,फालतू विचार ही नहीं है। साहित्यिक है, ज्ञानी हैं, तपस्वी है और विचारशील लोग हैं - सब एक दिशा में अपने विचारों को लगाए रखते हैं और एक दिशा में विचार रखने का परिणाम ये होता है कि इसके कई अच्छे नतीजे निकलते हैं। सूरज की किरणें चारों ओर फैलती रहती है। आतिशी शीशे के ऊपर इकट्ठा करके उनको एक जगह पर केंद्रित कर दें, तब आप देखते हैं न। आग जल जाती है। इसी तरीके से आदमी के फैले हुए विचार, आवारागर्दी के विचार, अनावश्यक विचार, बेसिलसिले के विचार आदमी की मनःशक्ति कितनी मूल्यवान है, सबको बरबाद कर देते हैं। आप ऐसा मत होने दीजिए। विचारों को जहाँ-तहाँ मत घूमने दीजिए। आप अभ्यास डालिए। आप सिद्धाँतों पर विचार करें। सृजनात्मक विचार करें। आप ऐसे विचार करें, जिससे कि आपका भविष्य बनता हो अथवा कोई योजना बनती हो। आप ऐसे क्रमबद्ध विचारों का अभ्यास डालिए। बिना क्रम के विचारों को, जो भी आएँ, उनको हटा दीजिए। विचारों से विचारों की लड़ाई कराइए। कुविचार जब आपके मन में आते हों, तो सदाचार के विचारों की सेना बनाकर रखिए और उन्हें गुत्थमगुत्था करा दीजिए। दुराचार के विचार जब आएँ, तो आप सदाचार और संयम के विचारो को आगे बढ़ा दीजिए, गुत्थमगुत्था करा दीजिए, तो विचार भाग जाएँगे। विचारों से विचारों को काटिए, विचारो को विचारों से सँभालिए। विचारों को संपत्ति समझिए। विचारों का संयम कीजिए। विचारों को ऊपर उठने दीजिए। विचारों को उथल-पुथल में गिरने से रोक दीजिए। अगर आप ऐसा करेंगे, तो मैं समझूँगा कि आप विचारों के क्षेत्र में तपस्वी हैं।
आपको चारों तप करने चाहिए। इंद्रियनिग्रह का तप - एक, समय-संयम का तप- दो, धन का संयम और धन का बजट बनाकर खर्च करने का तप - तीन अपने विचारों को एक विषय विशेष में रोके रहने का उपक्रम करना चाहिए - यह चौथा तप है। इसका नाम विचारसंयम है, विचार तप है। आप तपस्वी जीवन जिएँ। जरूरी नहीं है कि आप धूप में खड़े हों, खाना खाना बंद कर दें और अमुक काम करे। ये जरूरी है कि अपने जीवन के जो सुराख है, जो आपकी गलतियां और कमजोरियाँ हैं, उनको रोकें और जो अच्छाइयाँ आपके भीतर नहीं हैं, उनको बढ़ाने की कोशिश करें। अगर आप ऐसे काम में लगातार लगे रहेंगे, तब मैं आपको तपस्वी कहूँगा। यहाँ साधना शिविरों में बुलाने का उद्देश्य था, आपको तपस्वी बनाना। आप यहाँ से जाएँ, तो तपस्वी होकर जाएँ। यहाँ हैं, तो तपस्वी होने का अभ्यास करे। तपश्चर्या में कितनी शक्ति भरी पड़ी है ? इसका वर्णन मैंने अभी आपसे किया। आप चाहें, तो इसका अनुभव करके स्वयं भी देख सकते हैं कि तपस्वी कितने समर्थ होते हैं, कितने शानदार होते हैं ? आपको वैसा ही बनना चाहिए। आज की बात समाप्त।
(गीता के तृतीय अध्याय कर्मयोग के प्रारंभिक उपदेश)
विगत अंक तक श्रीमद्भागवत् गीता के प्रारंभिक दो अध्याय पूरे हो चुके। पिछले अंक में स्थितप्रज्ञ की समापनात्मक टिप्पणी में हमने जाना कि ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त हो जाना ही स्थितप्रज्ञ बन जाता है। शिष्यत्व के जागरण की व्याख्या से आरंभ हुआ 72 श्लोकों का संख्यायोग नामक दूसरा अध्याय हर दृष्टि से प्रत्येक जीवनसाधक-लोकसेवी के लिए माननीय है, पठनीय है। बुद्धिवाद के कुचक्रों से घिरी मानवता को उबारता है श्रीमद्भागवत् गीता का यह दर्शन, जिसमें देहातीत आत्मा के भान से लेकर - देह से स्वधर्माचरण- युगधर्म का परिपालन करते हुए स्थितप्रज्ञ की पहचान व उस पद की प्राप्ति का नानाप्रकार के उदाहरणों से निरूपण किया गया। इस अंक से आरंभ होता है तीसरा अध्याय, शीर्षक है- कर्मयोग। अभी तक श्रीकृष्ण भगवान् ज्ञान की बातें युगधर्म के परिप्रेक्ष्य में कह रहे थे। साँख्य माने ज्ञान। अर्जुन जो चिंताजनित अवसाद में चला गया था, ब्राह्मी स्थिति तक पहुँचने- सिद्ध पुरुष बनने के लक्षण भी जान गया है। एक शिष्य का विकास दूसरे अध्याय की योगेश्वर की शिक्षणपद्धति द्वारा हुआ है। उसने जाना कि वासनाक्षय, आसक्ति से निवृत्ति ही आत्मविकास की मुख्य सीढ़ी है। अब यह क्षय कैसे करें ? क्षय से पूर्व उन्हें परिष्कृत कैसे करें ? परिष्कृत वासनाओं से जन्में श्रेष्ठ कर्मों के संस्कारों में बँधे या बचें, यही शिक्षण तृतीय अध्याय में है। कर्म कैसे किया जाएँ, ताकि हम ‘मैं’ की वासना से अहंता से बंधन में जकड़े न जाएँ, यही इस तृतीय अध्याय का शिक्षण है।
कर्मयोग एक प्रकार से एक वैज्ञानिक जीवनपद्धति की व्याख्या करता है। भगवान् इस अध्याय में अपने शिष्य को बताना चाह रहे है कि उसका जन्म एक रजोगुणी के रूप में - क्रियाप्रधान वासनाओं के साथ हुआ है। उनका क्षय राष्ट्र व संस्कृति की सेवा के निमित्त शौर्यप्रदर्शन, वीरतापूर्वक युद्ध करके, अनीति मिटाकर ही हो सकता है। उसे जमकर कमर कसकर कर्म करना चाहिए। अपने सम्मुख उपस्थित तात्कालीन समस्याओं से मोरचा लेना चाहिए। उनसे डरकर नहीं भागना चाहिए। चाहे ये समस्याएँ कितनी ही कष्टदायी क्यों न हों, ये जीवन समर में उसके लिए सहायक - एक पौष्टिक आहार ही साबित होंगी। उसे उनका सामना करना चाहिए, युगधर्म का परिपालन करना चाहिए।
इस अध्याय का शुभारंभ अर्जुन रूपी श्रेष्ठतम शिष्य के द्वारा पूछे गए एक बड़े ही उपयुक्त प्रश्न से होता है - “हे ......... ! यदि आप यह मानते हैं कि कर्मों की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ है, तो हे केशव, आप मुझे इस (युद्धरूपी) घोरकर्म में क्यों धकेलना चाहते हैं।” “तम्किं कर्मणि घोरे माँ नियोजयसि केशव” (3-1) अभी तक अर्जुन ज्ञान की बातें सुन रहा था। वह कहता है कि यदि ज्ञान ही श्रेष्ठ है, तो फिर ऐसा क्यों कहते हो कि कर्म करो, वह भी युद्ध करने जैसा घोर-भयंकर कार्य। इसके अतिरिक्त वह यह भी कहता है दूसरे श्लोक में कि “आप मिले हुए से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे है। एक बात निश्चित होकर कहिए, जिससे कि मैं कल्याण को प्राप्त होऊँ - मेरे मन को शाँति मिले।”
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे। तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोहमानुयाम्॥
अर्जुन के जितने भी प्रश्न है, किसी भावुक बुद्धिहीन व्यक्ति के नहीं है। किसी भी जिज्ञासु साधक के स्तर के प्रश्न ये हो सकते हैं। कभी-कभी हम परमपूज्य गुरुदेव की बातें समझ नहीं पाते, हम समझते हैं कि कभी वे कुछ कहते हैं - कभी कुछ। वे कभी कहते हैं कि ज्ञानयज्ञ करो, घर-घर गायत्री व यज्ञ का संदेश फैलाओ। कभी आज्ञाचक्र पर ध्यान लगाने की बात कहते है, तो कभी हमें प्रचार अभियान में लगा देते हैं। कभी शक्तिपीठ निर्माण में लगा देते हैं, तो कभी क्षेत्रीय आयोजन में शक्ति झोंक देने को कहते हैं। कभी वे साधना की गहराइयों में, ज्ञान के महासागर में डूबकियाँ लगवाते हैं, तो कभी कहते हैं कि सेवाधर्म ही श्रेष्ठतम है। लगता है कि यह सब लौकिक प्रपंच क्यों ? कर्म किसलिए, जब ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं, इससे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं तो नहीं कर्म करने की आवश्यकता क्यों है ?
यदि इस बात को सही ढंग से समझने का प्रयास किया जाए, तो आज की जो परिस्थितियाँ हैं वे वैसी ही है, जो कभी कृष्ण व अर्जुन के समय में थी। महाभारतकाल जैसी ही हैं। हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम देखें कि कहीं अर्जुन के रूप में हम तो नहीं हैं। हमें जब श्रीकृष्ण की बात सुनाई पड़े, तो यह मानना चाहिए कि यह हमारे पूज्यवर गुरुदेव की ही आवाज है। इतने भर से इस युगगीता में कई समाधान निकाल आएँगे। यदि इतना भर अहसास हो जाए, तो यह समझ में आ जाएगा कि स्थितप्रज्ञ-परमहंस के स्तर की सत्ता से हमें क्या माँगना चाहिए।
जिस कर्म की बात परमपूज्य गुरुदेव कहा करते थे, इसमें वे किसी से लेखनी चलवाते थे, किसी से प्रवचन कराते थे, किसी से झाडू लगवाते थे, तो किसी से बिल्डिंग निर्माण की बात कहते थे। क्षेत्रस्तर के हमारे कार्यकर्ताओं से यज्ञ संस्कार कराते थे व कहते थे कि अखण्ड ज्योति के पाठक बढ़ाना ही सबसे बड़ा पुण्य है। साथ में उसी ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में ज्ञान-ध्यान की बातें भी बताते थे। एक लेख कर्म पर होता था, तो दूसरा समाधि पर। कहीं वैराग्य की बात है, तो कहीं सेवासाधना में ही - कर्म में ही भगवत्पूजा की। ऐसे में मन में व्यामोह पैदा होना, असमंजस होना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में हमें पुनः भगवत्स्वरूप गुरुवर योगेश्वर की शरण में जाकर उनसे उनकी ही कही उस उलटबाँसी की व्याख्या हेतु निवेदन करना चाहिए।
जो असमंजस हम शिष्यों के मन में कभी उठता रहा है, कभी अर्जुन के मन में उठा था, सहज स्वाभाविक है। वस्तुतः श्रीकृष्ण की कोई भी बात परस्पर विरोधाभासी नहीं है। कभी सत्य का एक पहलू उजागर होता है, कभी दूसरा। श्री अरविंद ने ‘उपनिषद्’ ग्रंथ में लिखा है कि “ हम परमात्मा की, समग्र की अवधारणा कर नहीं सकते, क्योंकि उसमें शुभ-अशुभ दोनों है। लगता है यह विरोधाभास प्रकृति में कैसे ? पर वह जरूरी है। एक ही मकान में पूजाघर भी होता है, जो पवित्रतम स्थान है एवं उसी मकान में पूजाघर भी होता, जो पवित्रतम स्थान है एवं उसी में शौचालय जैसी अपवित्र जगह भी है। दोनों के बिना हमारा काम नहीं चल सकता।”
श्री रामकृष्ण उपदेश के दौरान स्वामी विवेकानंद से कहते हैं - “वेदोपनिषद् के वाक्य यदि हमें समझ में नहीं आएँ, तो हमें यह नहीं मानना चाहिए कि ये गलत हैं। हमारी बुद्धि की क्षुद्रता है। ये परमात्मा के वचन हैं। हमें अनुभवी व्यक्ति से पूछाते रहना चाहिए एवं परस्पर विरोधाभासी वाक्यों पर अपना संशय स्पष्ट कर लेना चाहिए।” इसीलिए दूसरे श्लोक के अर्जुन कहता है- “तदेकं वद निश्चित्य” एक बात निश्चित करके एक व्यक्ति के रूप में - मेरे कल्याण के लिए कहिए। सच्चे जिज्ञासु की उत्कंठा है अर्जुन में, इसीलिए वह व्याकुल होकर प्रश्न सामने रख रहा है। एक बात और अर्जुन कहता है - “येन श्रेयो हमाप्नुयाम्” इसमें ‘ श्रेय ‘ शब्द आया है। श्रेय अर्थात् सर्वांगपूर्ण कल्याणकारी समृद्धि। कई बार श्रेय शब्द का गलत अर्थ मात्र समृद्धि के पर्याय के रूप में कर दिया जाता है। यहाँ अर्जुन का प्रश्न है कि उसे किस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, जिससे कि उनकी अपनी पीढ़ी की सर्वांग वृद्धि हो - राष्ट्रीय उन्नति हो और वह उसमें से अपने हिस्से का भी उपभोग कर सके। भगवान् उत्तर में कहते हैं-
लोके स्मिनिद्धविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। ज्ञानयोगेन साड्रख्यानाँ कर्मयोगेन योगिनाम्॥
अर्थात् “ हे निष्पाप अर्जुन ! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गई हैं। उनमें साँख्य योगियों की निष्ठा तो ज्ञानयोग से और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से होती है।”
वेदाँत मानवता का कल्याण चाहता है। यह पूर्णता की प्राप्ति का विज्ञान है। ऐसे में भगवान् गीता के माध्यम से दो प्रकार के मार्गों की चर्चा करते हैं। पहला मार्ग सक्रियता का - कर्मठता का है। तो दूसरा बुद्धिप्रधान है, विचारतंत्र से जुड़ा है, ज्ञानतंतुओं को झकझोरता है। पहला कर्मयोग का मार्ग है, दूसरा ज्ञानयोग का मार्ग है।
यहाँ भगवान् ने अर्जुन के लिए निष्पाप शब्द प्रयुक्त किया है। कितना मधुर संबोधन है। अर्जुन के कई नाम है, परंतु यहाँ उसके भाव की विशुद्धता व निर्मल अंतःकरण पर मानो वे मोहर लगाते हुए संबोधन कर रहे हैं। दो प्रकार की निष्ठा बताते हुए वे कहते हैं कि ज्ञानयोग को आलस्य परायणता का मार्ग है। शास्त्रों में जिस नैष्कर्म्यभाव की बात कही गई है, वह उस तरह की नहीं है जिसे पलायन करके कंदराओं में या संपन्न मठों की ऊँची दीवारों में भोगा जाता है। वासना कामनारहित अवस्था में जन्मी विचारशीलता की स्थिति सही मायने में ज्ञानयोग की निष्ठा है। नैष्कर्म्य अवस्था शुद्ध चैतन्य अनंत सत् यही है। यहाँ अर्जुन नैष्कर्म्य की आड लेकर युद्ध से भागने का प्रयास न करे, इसलिए वे बड़े स्पष्ट ढंग से अगले श्लोक में समझाते हैं कि -”मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्याग मात्र से सिद्धि यानी साँख्य निष्ठा को प्राप्त होता है।”
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्य पुरुषो श्नुते। न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥
संपूर्ण क्रियाओं में कर्त्तापन के अभिमान से रहित सर्वव्यापी परमात्मा के ही चिंतन में निरत रहने को ही ज्ञानयोग-साँख्ययोग या संन्यासयोग कहा जाता है। केवल भगवत् सत्ता के निमित्त समत्वभाव से, बिना किसी फल का कामना के - आसक्ति को त्यागकर जो कर्म किया जाता है वही गीता का कर्मयोग है। इसी को तदर्थकर्म, मदर्थकर्म, मर्त्कम, समत्वयोग नाम से स्थान स्थान पर भगवान् ने उच्चरित किया है।
वे बड़ा स्पष्ट कहते हैं कि योगियों की निष्ठा कर्मयोग में है, संन्यासियों की- ज्ञानियों की निष्ठा ज्ञानयोग में है, पर यदि कर्म किए बिना कोई भी नैष्कर्म्य की सिद्धि को नहीं पहुँच सकता एवं कर्मों को छोड़ देने मात्र से ही वह ज्ञानी नहीं बन जाता - साँख्य निष्ठा को नहीं प्राप्त होता। इस तरह कोई कर्म छोड़कर अकर्मण्य बनकर कुछ भी हासिल नहीं कर सकता। आज हमें समाज में जितना फ्रस्ट्रेषन-डिप्रेशन-मनोशारीरिक रोगों का बाहुल्य दिखाई पड़ता है, उसका मूल कारण है या तो आदमी की कर्म में अत्यधिक आसक्ति, बहुत ज्यादा की कामना मन में रखकर कर्म करते चले जाना अथवा निठल्लापन आलसीपन। कर्म हो किंतु बिना किसी फल की कामना के। यदि निष्कर्मता (जिस अवस्था में प्राप्त हुए पुरुष के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् फल उत्पन्न नहीं करते) ही हमारी पूर्णता की चरमावस्था की एक ऐसी स्थिति है, जो हम सबके लिए अभीष्ट है, तो फिर कर्मों का संपादन किया ही क्यों जाए, यह बात मन में आने लगती है। तब भगवान् कहते हैं कि कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। क्योंकि सभी को अपने प्रकृतिजनित गुणों द्वारा विवश होकर कर्म करना ही पड़ता है।
न हि कष्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्मवषः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥
वास्तव में कबना कर्म के मनुष्य का कोई अस्तित्व नहीं है। जो कर्म किए बिना जीता है, वह अपने अस्तित्व को खो बैठता है। जो कर्म की अवमानना करता है वह मानो जीवनदेवता का अपमान करता है। व्यक्ति के कर्म उसके भीतर की वासनाओं के ठीक अनुरूप ही होते हैं। वासनाओं को मुख्यतः जीन भागों में बाँटा जा सकता है - सात्विक, राजसिक, तामसिक। सत, रज, तम इन तीनों प्रकार के गुणों की उत्पत्ति हमारे भीतर की प्रकृति से ही होती है। “प्रकृति जैर्गुणै “ शब्द जो ऊपर आया है, वही हमारे कर्मों का मूल क्षेत्र है। हम किसी स्थिति में कर्म न भी करना चाहें तो भी हमारी अंतर्निहित वासनाएँ हमें कर्म करने के लिए विवश कर देंगी। हम कभी निष्क्रिय रह नहीं सकते। जीवन सदैव सक्रियता से भरा व सकारात्मक स्वरूप लिए होता है। कर्मों के रूप में जीवन वस्तुतः गतिशीलता को ही अभिव्यक्ति है। जीवित रहते हुए मनुष्य एक क्षण के लिए भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। (श्लोक की प्रथम पंक्ति) अर्थात् जब सब कर्म समाप्त हो जाते हैं, मनुष्य मर जाता है या यों कहें जो अकर्मण्य होता है, वह जीवित मृतक के समान है। कर्म से भागने का अर्थ है - जीवन से भागना और मृत्यु के मुख में स्वयं को जा धकेलना। यह तो एक प्रकार की आत्महत्या ही हुई।
गीता का संदेश बड़ा स्पष्ट है। कभी भी कर्म किए बिना न रहो। समाजसेवा करो, राष्ट्र का गौरव बढ़ाओ, मानवमात्र के कष्टों की निवृत्ति हेतु तपो। यही वस्तुतः जीवन है। जीते हुए धरना देना, धीमे काम करना, हड़ताल करना, भाग खड़े होना, कर्तव्य त्याग देना - अनुपस्थित रहना यह सब उपाय जीवन को धीमी मृत्यु की ओर ले जाते हैं, सौंदर्य छीन लेते हैं व जीवन का क्षरण कर डालते है। समाज व्यवस्था के प्रति विद्रोह नाम कोई भी भले ही अपने कर्मों के स्वरूप को दे दे, पर वस्तुतः उन्होंने जीवन देवता को नीचा दिखाया है, अपनी गरिमा के प्रतिकूल जीवन जिया है। जीवन समर में सभी प्रकार की उथल पुथल का सामना करते हुए जीना, सक्रिय हो उधमी बने रहना ही मनुष्य को शोभा देता है। कर्म करो, सक्रिय होकर जियो एवं निर्भय होकर रहो। परिश्रम से मत डरो। निराशाओं का सामना करने से हिचकिचाओ मत। जब तक जीवित हो, वास्तव में जीवन का एक एक पल जियो। कर्मों द्वारा ऊँचे उठो, कर्मों द्वारा ही उन्नति करो, कर्मों से ही अपना विस्तार करो। गीतकार का जीवन को कलाकार की तरह जीने का, हँसती-हँसाती, खिलती-खिलखिलाती मस्ती भरी जिंदगी जीने का संदेश स्वयं में एक प्रमाण है कि गीता संन्यास की पाठ्यपुस्तक नहीं है। गीता जीवन जीने की कला सिखाती है व “कुर्वन्नैवेह कर्माणि जिजिवेश्च्छताँ समाः” की उपनिषद्कार की उक्ति अनुसार कर्म करते हुए ही सौ वर्षों तक जीते रहने की इच्छा प्रबल बनाए रखने की बात करती है।
कर्मयोग के इस प्रारंभिक प्रसंग में इतना ही। इसके बाद का प्रसंग है - मिथ्याचारी न बनकर मन पर भी पूरा अंकुश स्थापित कर जो कर्म करता है, वही श्रेष्ठतम योगी है। यह अगले अंक में।
गायत्री महामंत्र के माध्यम से एक विराट् परिवार का निर्माण हमारी गुरुसत्ता ने किया। जो भी गायत्री के तत्वदर्शन को जीवन में उतारता है-अपने चिंतन को परिष्कृत कर तदनुसार अपनी रीति नीति बनाकर कार्य करने को तैयार है, वह गायत्री परिवार का सदस्य है, यह निर्धारण परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा जी आचार्य ने किया। इसी धुरी पर एक विराट् संगठन खड़ा होता चला गया। जिसकी संख्या आज नौ करोड़ के लगभग आँकी जाती है। ममत्व विस्तार साधना से लेकर जीवन व्यापार संबंधी सही समय पर दिए गए मार्गदर्शन ने परिजनों को दिशा दी एवं वे गायत्री परिवार के अभिभावक संरक्षक आचार्यजी से जुड़ते चले गए। जुड़ाव भी घर के एक बुजुर्ग सदस्य जैसा। समय समय पर परमपूज्य गुरुदेव द्वारा अपने परिजनों को लिखे गए पत्रों से सही दिग्दर्शन मिलता है।
कई बार परिजन-आत्मीयजन लोगों के बहकावे में आकर यह विचार करने लगते हैं कि हमारे साथ घट रही जो प्रतिकूल परिस्थितियाँ है, उनके पीछे जरूर किसी की चाल है। हर कोई व्यक्ति हमारे कान में आकर जो भी कुछ कह देता है, हम उसी पर विश्वास कर बैठते हैं व सोचते हैं कि वही हमारा शुभेच्छु है। कोई ताँत्रिक चाल या ऊपर की हवा की बात बताकर हमें आशंकित कर देता है। हम भयभीत हो जाते हैं एवं तब हमें एक ही राह दिखाई देती है। गुरुदेव ही हमारी रक्षा करेंगे। तब गुरुदेव के उत्तर इस प्रकार का होता था -
हमारे आत्मस्वरूप
आपके दोनों पत्र मिले। नाम नोट कर लिए हैं। आशा है विरोध घटेगा।
आप भय, संदेह और आशंका को घटाते चलें। जो लोग आपको सूचना देते हैं और संदेह बढ़ाते हैं, उन लोगों पर पूरा विश्वास न करें। ऐसे लोग भी कई बार विरोध बढ़ाने के कारण होते है।
आप उस दिशा में उपेक्षा रखें और परमात्मा पर विश्वास करें। गायत्री उपासकों पर कोई ताँत्रिक प्रहार सफल नहीं होता।
आपके कल्याण के लिए हम प्रयत्नशील हैं।
-श्रीराम शर्मा
इस पत्र की एक विशेष बात ध्यान देने योग्य है, जो अंतिम पैराग्राफ में है। एक प्रकार से मनोवैज्ञानिक उपचार करते हुए पूज्यवर ने अपने शिष्य को हौसला दिया है कि गायत्री उपासना इतनी शक्तिशाली साधना है कि कोई भी टोना-टोटका जादू-तंत्र उसके सामने निष्प्रभावी ही रहती है। इतना संरक्षण गुरुसत्ता का मिलने के बाद शिष्य निश्चित हो जाता है। यह पत्र न केवल उन सज्जन ( श्री शिवशंकर गुप्ता नई दिल्ली व उनके भाई) के लिए एक शिक्षण के रूप में था, आज भी इतने वर्षों बाद भी हम सबके लिए जो समय-समय पर भटक जाते हैं- एक प्रकार से लोकशिक्षण का एक नमूना है।
इसी प्रकार गायत्री साधना संबंधी मार्गदर्शन करते हुए परमपूज्य अपने एक साधक शिष्य को 1 नवंबर 1954 को लिखे एक पत्र में बताते हैं -
हमारे आत्मस्वरूप
आपका पत्र मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। गायत्री से बढ़कर आत्मकल्याण का और कोई मार्ग नहीं। यदि आप श्रद्धापूर्वक माता का आँचल पकड़ेंगे, तो इसका परिणाम बहुत ही कल्याणकारक होगा। इतना निश्चित है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। मंत्रलेखन आप जारी रखें। जो मंत्र लिखे हैं, सो भेज दें और उस प्राँत में गायत्री प्रचार के लिए कुछ विशेष परिश्रम करें। यह एक बहुत ही उच्चकोटि का पुण्य परमार्थ होगा।
हमारा सहयोग, सद्भाव और आशीर्वाद आपके साथ है। आपका साधनाक्रम ठीक चल रहा है, उसे चालू रखें। हमारा मार्गदर्शन आपको अदृश्य रूप से बराबर प्राप्त होता रहेगा। हमारा आशीर्वाद आपके साथ है।
श्रीराम शर्मा आचार्य
गुजरात पोरबंदर के श्री. एल.आर जोशी को यह पत्र लिखा गया था। पत्र बड़ा ही सरल व सीधी सी भाषा में है। स्पष्ट लिखा है कि श्रद्धापूर्वक साधना करने से किसी की गायत्री साधना कभी निष्फल नहीं जाती। यह एक उच्चकोटि का पुण्य-परमार्थ है तथा अदृश्य रूप में उनका (परमपूज्य गुरुदेव का) सतत् मार्गदर्शन उन्हें मिलता रहेगा। किसी भी साधक के लिए इससे स्पष्ट आश्वासन और क्या हो सकता है।
आज हम जब दक्षिण भारत में गायत्री प्रचार को जोर-शोर से बढ़ा रहे हैं, तो मार्ग में आने वाले अनुरोध को देखकर लगता है कि आज से प्रायः 40-50 वर्ष पूर्व परमपूज्य गुरुदेव को कितना कुछ विरोध सहना पड़ा होगा। गायत्री साधना संबंधी अनेकानेक भ्राँतियाँ जन-जन के मन में थीं। उन्हें निताँत निर्मूल कर हमारी गुरुसत्ता ने कभी पत्रों द्वारा, कभी उद्बोधन से, कभी लेखनी से पत्रिका द्वारा इस सीमा तक झकझोरा कि वे सारे रूढ़िवादी बंधन मिटते चले गए। आज प्रायः सारे उत्तर व मध्य भारत में, उड़ीसा, गुजरात आदि क्षेत्रों में इस संबंध में काफी जागरुकता मिलती है। गायत्री मंत्र के कई प्रकार में आडियो कैसेट बनकर तैयार हैं। जिसे कभी जोर से कहने का निषेध किया जाता था, आज वह जन-जन तक ध्वनि-विस्तारक द्वारा पहुँच रहा है। वशिष्ठ और विश्वामित्र स्तर की सत्ता द्वारा ही यह कार्य होना था और हुआ है।
समय-समय पर ऐसे पत्र भी पूज्यवर के पास आते, जिनमें जिज्ञासाएँ रहतीं कि अमुक-अमुक सज्जन उनके संबंधी-मित्रों के स्वास्थ्य-जीवन व्यापार में आई बाधाएँ वे दूर करें। गायत्री साधक-महापुरुष होने के नाते उनका विश्वास दृढ़ था कि लिख देने मात्र से सब कुछ ठीक हो जाएगा। होता भी था। इधर व्यक्ति ने अपनी समस्या लिखी उसी दिन से स्वास्थ्य सुधरना आरंभ हो गया, ऐसे हमारे पास अनेकानेक पत्र हैं। इतना प्रगाढ़ विश्वास होता था, पत्रलेखक में अपनी गुरुसत्ता के प्रगति कि वह अपनी बात लिखकर निश्चित हो जाता था। कई-कई पत्रों से, जो आगे भी हम प्रस्तुत करते रहेंगे, यह जानकारी पाठकों को मिलेगी कि तब का पत्राचार मानो बेतार के तार की तरह होता था। इधर पत्र लिखा-शाम तक एक दिन पहले की तारीख में लिखा जवाब भी पोस्टकार्ड से आ गया, मानो सारी व्यवस्था अंतरिक्ष ट्राँसमिशन की गुरुसत्ता के हाथों में ही हो। बड़ा आश्चर्य होता है व हम हतप्रभ होकर रह जाते हैं कि किस उच्चस्तरीय साधना के स्तर पर इस मिशन के - विराट् गायत्री परिवार के नींव के पाए विनिर्मित कि गए हैं।
एक मात्र बानगी के बतौर यहाँ प्रस्तुत है-
बिलासपुर के रामाधार जी विश्वकर्मा को यह पत्र 17-2-64 को लिखा गया था। वे लिखते हैं कि “पत्र मिला। कल तार भी मिल गया था। यह पत्र पहुँचने तक आपको नींद आने लगी होगी और पिछले दिनों जो गड़बड़ी पैदा हो गई थी, सो दूर हो गई होगी। तार आने से पूर्व ही हमें सूचना मिल चुकी थी और उपचार आरंभ कर दिया था। आशा है कि आप अब ठीक हो गए होंगे।
माहुले जी का जीवनकाल बहुत लंबा नहीं खींचा जा सकता। थोड़ी ही रोकथाम संभव हुई है। सो आप यथासंभव जल्दी ही बच्चियों की शादी से उन्हें निवृत्त कराने का प्रयत्न करें।”
प्रस्तुत पत्र में बड़ा ही स्पष्ट है कि तार आने से पूर्व ही उपचार आरंभ हो गया था। गुरु-शिष्य संबंधों के अंतर्गत चेतना जगत् के स्तर पर संपन्न होने वाली यह एक अद्भुत प्रक्रिया है। जैसे ही पुकारा- अंतर्मन से गुहार लगाई, तुरंत समाधान हो गया। पत्र तो मानो उसकी पुष्टि हेतु पहुँचना था, हम उसके शिक्षण हेतु लिखा गया था। कबीरदास ने कहा भी तो है-”खोजी होय तो तुरतै मिलि हौ पल भर की तलाश में” (यदि तुम मुझे एक पल या एक क्षण के लिए भी चाहो तो उसी क्षण मैं तुमसे आ मिलूँगा)। इसी बात को रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे- निर्जन में व्याकुल होकर प्रभु को पुकारो, वह तुम्हारी सुनेगा। वही बात प्रायः अपनी गुरुसत्ता के भक्तों के साथ भी हुआ करती थी, होती रहती थी, अभी भी होती है व आगे भी उनकी सूक्ष्मसत्ता के माध्यम से होती रहेगी।
इसी पत्र की आगे की पंक्तियों में लिखा है कि आमुक जी का जीवनकाल बहुत लंबा नहीं खींचा जा सकता। निश्चित ही गुरुदेव की अतींद्रिय स्तर की क्षमता से वह दिग्दर्शन हो रहा था कि उनकी जीवनावधि अब अल्प रह गई है। कभी भी वे शरीर छोड़ सकते हैं। फिर भी पूज्यवर लिखते हैं कि थोड़ी ही रोकथाम संभव हुई हैं। जो भी एक्सटेंशन मिला है उसे वे इन्हें कन्या ऋण से मुक्ति हेतु दिया बता रहे हैं। ऐसा ही हुआ। माहुरी जी ने कन्याओं के विवाह संपन्न किए, उसके तुरंत बाद ही उन्होंने शरीर छोड़ दिया। यह अवतारी स्तर की प्रज्ञापुरुष की चेतना ही है, जो स्पष्ट लिखकर दे देती है कि परमचेतना की व्यवस्था में गुरुसत्ता हस्तक्षेप तो कर सकती है, पर उसकी भी एक सीमा है एवं वह भी शिष्य की पात्रता-तप पर बहुत कुछ निर्भर करती है।
ऐसा ही एक घटनाक्रम स्मरण हो आता है प्रथम पत्र में वर्णित श्री शिवशंकर जी संदर्भ से जुड़ा 1972 के मार्च-अप्रैल में उनको मस्तिष्कीय रक्तस्राव के कारण कोमा की स्थिति में भरती होना पड़ा। शिवशंकर जी श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट के प्रारंभ से जुड़े ट्रस्टी भी थे, एल.एल.एम प्रथम श्रेणी उत्तीर्ण एक मेधावी प्राणवान् व्यक्तित्व थे। कानून की सभी पुस्तकें उन्हें कंठस्थ याद थीं। इतना सब होते हुए भी पूज्यवर के आदेशानुसार वे अपनी पुश्तैनी दुकान बशेशर नाथ एंड संस दरीबा कलाँ पुरानी दिल्ली पर ही बैठते थे। घर के एक महत्वपूर्ण सदस्य-मिशन के एक घटक के कोमा में जाते ही सभी सदमे में आ गए। तब उनके भतीजे डॉ. जितेंद्र गुप्ता शांतिकुंज में ही निवास करते थे। परमपूज्य गुरुदेव को समाचार मिला, तो उन्होंने इन पंक्तियों के लेखक व जितेंद्र को दिल्ली भेजा व कहा कि चिकित्सकीय आधार पर पूरी देखभाल हो, इसका ध्यान रखें। आपका अभी समय शेष है। अभी उन्हें अपनी पुत्री का विवाह भी करना है। कुपनी से सभी मामले निपटाने हैं तथा शांतिकुंज से संबंधित सारी औपचारिकताएँ भी पूरी करनी है। वहाँ गए तो देखा स्थिति विषम है। कोमा की बड़ी गहरी स्थिति थी। तीन-चार दिन में देखा कि क्रमशः सुधार हो रहा है। चिकित्सक आश्चर्यचकित थे, परंतु असंभव संभव होता चला गया। एक डेढ़ माह में वे पूर्णतः स्वस्थ हो गए, किंतु स्मरणशक्ति पर प्रभाव पड़ा। लकवे की स्थिति से भी धीरे-धीरे मुक्ति मिली। चार माह बाद हरिद्वार पूज्यवर के पास प्रणाम हेतु आए। पूर्व में प्रति सप्ताह दोनों भाई शिवशंकर जी व हेमचंद्र जी निसमित रविवार को आकर शाम को चले जाते थे। अब इतने दिन बाद आए, तो मन भावविह्वल था। पूज्यवर ने मस्तिष्क पर हाथ रखकर साँत्वना दी। नीचे उतरकर उन्होंने दिए गए निर्देशानुसार श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट के विधि-विधान सहित पुरी एक मार्गदर्शिका उस दिन लिखी। न जाने कहाँ से स्मृतिकोष जीवित होते चले गए। दिल्ली लौटे तो कंपनी/फार्म पर आया एक इनकमटैक्स नोटिस मिला, जिसमें विगत बीस वर्षों के बारे में विस्तार से पूछा गया था। वे कार्यालय पहुँचे व बिना किसी कागज-फाइल के विगत बीस वर्षों से भी पूर्व के सारे विवरण वर्ष वार नोट कराना आरंभ किया। पूरा स्टाफ देखता रहा कि एक-एक आँकड़ा मिल रहा है। कहीं कोई जरा सा भी फर्क नहीं है। चार घंटे लीला चली। कमिश्नर महोदय ने पूछा कि कोमा से गुजरने के बाद भी आप की स्मरणशक्ति इतनी प्रखर कैसे ? जवाब था गुरुसत्ता की अनुकंपा से। इस घटना के तुरंत बाद उन्होंने अपनी पुत्री संगीता के विवाह की व्यवस्था की। फर्म का कार्य विधिवत् व्यवस्थित किया। दो वर्ष का एक्सटेंशन मिला था। 1974 में पुनः उच्चरक्तचाप के कारण उन्हें दिल का दौरा पड़ा व वे सारे कार्य समाप्त कर महाप्रयाण कर गए। यह विवरण बिलकुल ऊपर वाले पत्र से मेल खाता है।
ऐसा ही एक पत्र रायपुर के सुमंत मिश्र को लिखा गया था 2/6/56 को
“आपके स्वर्गीय पिताजी के देहावसान का वृत मालूम करके लौकिक दृष्टि से दुःख हुआ। वस्तुतः तो हम और आपको उनके लिए दुःख मानने को कोई कारण नहीं। वे पूर्वजन्मों के ऋषि थे। जो तपस्या शेष रह गई थी, उसे पूर्ण करने और जो प्रारब्ध शेष था, उसे भुगतने आए थे। उद्देश्य पूरा होते ही वे चले गए। उन्हें पागल या सनकी समझना भारी भूल होगी। ऊँचे संत लोगों को अपनी ओर से विरत रखने के लिए अपने व्यवहार में कुछ ऐसा ही अंतर कर लेते हैं, जिसके कारण दूसरे लोग उनसे लिपटना छोड़कर उदास हो जाते हैं और उनकी साधना में विघ्न नहीं फैलाते।”
इस पत्र में न केवल सुमंत जी को साँत्वना दी गई है, वहाँ यह भी स्पष्टीकरण है कि उनके पिता श्री की अंतिम समय की विक्षिप्ताव्स्था को वे अन्यथा न लें। यह हम सबके लिए एक लोकशिक्षण भी है।
परमपूज्य गुरुदेव का एक पत्र और उद्धृत है, जिसमें उन्होंने छोटे भाई की मृत्यु से दुखी एक परिजन (उत्तमचंद्र जी मिश्रा, घुरसेना-वाया भाटापार जिला दुर्ग) को 6 अगस्त 1951 को पत्र लिखा। वे लिखते हैं-
“कर्मविज्ञान के नियम ऐसे ही हैं कि जब मनुष्य के साधारण मानसप्रवाह को मोड़कर किसी विशेष दिशा में फेरते हैं, तो ऐसे ही आघात लगते हैं। सूरदास, तुलसीदास, गौतम बुद्ध, शंकराचार्य आदि को आपकी ही भाँति आघात लगे थे, जिससे तिलमिलाकर उनकी जीवन दृष्टि बदल गई। कौन जाने वह बच्चा आपका गुरु रहा हो और उसके आने-जाने का प्रयोजन आपकी मनोदशा पर तीव्र आघात पहुँचाकर उसकी दिशा मोड़ना रहा हो। बच्चा चला गया। काल-परसों हम आप भी उसी राह पर बिस्तर बाँधे बैठे हैं। दूसरों के लिए शोक करने के साथ-साथ हमें अपनी शोकयात्रा के लिए भी बिस्तर समेटना है।”
पत्र की भाषा स्वयं में इतनी सरल है कि किसी व्यथित संबंधी को न केवल वह मरहम पट्टी लगाती है बल्कि जीवन के संबंध में एक दृष्टि भी देती है।
पत्रों के माध्यम से कितना कुछ आध्यात्मिक मार्गदर्शन हम पाते हैं, उसके साक्षी हैं ऊपर दिए गए पूज्यवर के पत्र। किसी भी संगठन का निर्माण पारिवारिकता की जिस धुरी पर होता है उसका प्राण है, ऐसे दिल को छू जाने वाले मार्गदर्शन पत्र। ऐसी सत्ता के संगी-सहचर होने का हमें भी गौरव होना चाहिए।
सृष्टि को सुव्यवस्थित बनाने और जो भी कुछ दिया गया है उसे कर्मयोगी के नाते सँभाल-संजोकर रखने का दायित्व हर मनुष्य का है। जो इसमें सफल होता है, वह उतना ही श्रेय का भागी होता है, सम्मान पाता एवं दूसरों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बनता है।
-परमपूज्य गुरुदेव
फरवरी 1957 की ‘अखण्ड ज्योति’ में परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा है-”नवयुग के फलितार्थ होने की सही अवधि इक्कीसवीं सदी है। महाकाल की असीम अवधि में युग की-इतिहास की दृष्टि से सैकड़ों क्या हजारों वर्षों का भी कोई महत्व नहीं होता। सतयुग की भविष्यवाणी जो हमने की है, उसका पहला आधार है- अदृश्य जगत् का सूक्ष्मप्रवाह, जो कुछ नई उथल-पुथल करने के लिए अपने उद्गम से चल पड़ा है और अपने उद्देश्य पूरा करके ही रहेगा। दूसरा आधार है- हमारा निज का संकल्प, जो किसी उच्चसत्ता की प्रेरणा से महाकाल की चुनौती की तरह अवधारित किया गया है। नवनिर्माण के लिए अपनी निज की क्षमता को इन्हीं तीन वर्षों में विशेष रूप से पैना और तीक्ष्ण किया गया है। अपने इस कथन के बारे में निश्चित हम इसलिए हैं कि इस प्रयोजन में हमसे भी कही अधिक बड़ी और समर्थ सत्ता इस कार्य को आगे बढ़कर कर रही है। जो घटित होने वाला है, उस सफलता के लिए श्रेयाधिकारी-भागीदार बनने से दूरदर्शी विज्ञजनों में से किसी को भी चूकना नहीं चाहिए।” (पृष्ठ 63-64) यह उद्धरण यहाँ इसलिए दिया गया है कि महापूर्णाहुति वर्ष के इस महापुरुषार्थ के तृतीय चरण ये गुजरते हुए कहीं हम में से किसी पर अहंता का आक्रमण न हो जाए कि जो दृश्यमान है, सक्रिय है वही कर रहा है। ऐसा भी न हो कि प्रस्तुत परिस्थितियों के निराशाजनक वातावरण में औरों की तरह हम भी इस कार्य को असंभव मानने लगें।
इन दिनों की दिव्य भूमिका में गुरुसत्ता द्वारा छोड़े उत्तराधिकार को वहन करने की, उनके द्वारा संकल्पित पुरुषार्थ को पूरा करने हेतु बल देते रहने की सामर्थ्य हर किसी में है। यह अनुभूति यदि हमें हो सके, तो अब से लेकर आगामी डेढ़-दो वर्षों में होने जा रहे युगपरिवर्तन के रोमाँचकारी क्षणों का न केवल हम आनंद ले सकेंगे, प्रतिपल- प्रतिश्वास इसी निमित्त जी भी सकेंगे। यह राष्ट्र की कुंडलिनी जागरण की - उसके सारे विश्व का सिरमौर बनने की पूर्ववेला वाला समय है। हममें से हर किसी को साधक की मनःस्थिति पैदा करनी होगी, वैसा बनना ही नहीं दिखना भी होगा। परिवर्तन उसके पश्चात् तो छूत की बीमारी की तरह फैलता चला जाता है।
महापूर्णाहुति के दो चरण संपन्न हुए। अब तीसरा चरण सारे देश व विश्वभर में चल रहा है। महापूर्णाहुति के महापुरुषार्थ का यही मेरुदंड भी है। वसंतपंचमी से गायत्री जयंती तक की एक महत्वपूर्ण अवधि, जो प्रायः चार माह की होती है, दो उपक्रमों के लिए आवंटित है। ये है (1) राष्ट्र जागरण तीर्थयात्रा (2) क्षेत्रीय दीपयज्ञों के संगठन प्रधान समारोह-प्रतिभाओं के संकल्प एवं संभागीय स्तर की पूर्णाहुतियाँ। राष्ट्र जागरण तीर्थयात्रा भूमि के प्रसुप्त संस्कारों को जगाती जन−जन में नवचेतना उमगाती चौदह रथों द्वारा भारत में संपन्न हो रही है। जिस शक्ति का उपार्जन इस प्रक्रिया से हो रहा है, उसका सुनियोजन क्षेत्रीय संगठन समारोहों में होना है। इसलिए महत्वपूर्ण दोनों ही हैं, किंतु कहीं ऐसा न हो कि प्रचार प्रधान तीर्थयात्रा में ही परिजनों की शक्ति चुक जाए। उसे ही सब कुछ मान बैठें । ऐसा करने से तो हम यू टर्न करके नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली उक्ति को सार्थक करते हुए, मिशन की प्रौढ़ावस्था की अवधि में पुनः प्रचारात्मक हल्ले-गुल्ले तक पहुँच पाएँगे। सभी परिजनों को अपने अपने क्षेत्र की तीर्थयात्राओं के स्वागत की तैयारी भी करनी है, व्यवस्था भी देखनी है, पर यह मात्र एक सप्ताह का कार्य है। शेष सारा समय इस चार माह की अवधि का संगठनात्मक पुरुषार्थ में- ज्ञानयज्ञ की पुण्य प्रक्रिया के विस्तार में तथा विधेयात्मक उल्लास पैदा कर सप्त क्राँतियों की विराट् स्तर पर तैयारी में ही लगना चाहिए।
सभी को अपने अपने जिले का - अपने लिए निर्धारित समय तीर्थयात्रा के लिए पूर्व से तय कर लेना चाहिए। इस पत्रिका के पहुँचने तक एक बहुत बड़े क्षेत्र में यात्रा भ्रमण कर चुकी होगी, फिर भी जो हिस्सा रह गया है, वह इस प्रतीक्षा में कही इस बहुमूल्य समय को गँवा न दे। जहाँ से यात्रा गुजर चुकी, वहां पैदा हुए उत्साह व जनसमर्थन का नियोजन संगठनात्मक प्रयाज व संभागीय महापूर्णाहुति के निमित्त होना है। जहाँ से यात्रा गुजरनी है, वहाँ अपनी पूर्व तैयारी तो रहे, साथ ही गाँव-ब्लॉक, जिले, नगरीय स्तर के मंथन भी साथ चलते रहें। सही व्यवस्था बुद्धि वही होती है, जो अपना समयचक्र ठीक से बना लेती है। हमारे कार्यकर्ताओं को अब प्रौढ़-परिपक्व बनकर अपनी कार्ययोजना बनाना आना चाहिए। समय तो तेजी से भागता है। देखते-देखते 19 जून (गायत्री जयंती) की वेला आ जाएगी। तब कहीं यह पछतावा न हो कि हमारा मंथन तो हो ही नहीं पाया। हमने पढ़ा तो था, किंतु व्यक्ति-परिवार समाज निर्माण की सुनिश्चित आहुतियों का संकल्प तो पूरा हुआ ही नहीं। एक बेहतर इनसान बनने व जुड़ने वाले हर व्यक्ति को श्रेष्ठ इनसान बनाने का हमारा संकल्प लिया ही नहीं गया, तो युगनिर्माण होगा कैसे ? अपना परिवार गायत्री परिवार व शुभेच्छुओं के परिवारों तक संस्कार चेतना नहीं पहुँची, तो फिर एक बड़ी कमी रह गई, हमारे अभियान में। संभागीय पूर्णाहुतियाँ तो हो जाएँगी, महापूर्णाहुति भी विराट् स्तर पर हो जाएगी, पर यह जा कमी है, यह भविष्य में किसी प्रायश्चित के लिए भी समय नहीं देगी। एक सही व्यक्ति व प्रजातंत्र की छोटी-सशक्त व समर्थ इकाई परिवार मिलकर ही समाज बनाते हैं। समाज निर्माण ऐसी प्रतिभाओं के द्वारा ही होगा। प्रतिभाओं का संगठन संगतिकरण ही इस समय का श्रेष्ठतम कर्म है, युगयज्ञ है एवं हम सभी की इसमें भागीदारी इस समय का युगधर्म हैं।
समाज के - राष्ट्र के नवनिर्माण हेतु इस समय सृजन क्राँति के सात कार्यक्रम दिए गए हैं। ये इस प्रकार हैं -
(1) साधना - उपासना पद्धति भले ही भिन्न क्यों न हो, सभी को जीवन साधना के सूत्रों का अभ्यास करना चाहिए। यह साधना इतनी प्रखर बन जाए कि साधक का व्यक्तित्व नवसृजन के लिए ईश्वर के साथ साझेदारी में युगधर्म के निर्वाह में सक्षम हो जाए। आत्मशक्ति के निखार से ही युगशक्ति का उद्भव होगा। इसी के प्रशिक्षण समग्र रूप में जन-जन तक विस्तार हेतु देवसंस्कृति विश्वविद्यालय का एक प्रभाग भाषा एवं धर्म विद्यालय के रूप में खोला जा रहा है।
(2) शिक्षा - साक्षरता विस्तार से लेकर अपने जीवन को कौशल पूर्वक जीना। संस्कारयुक्त सार्थक शिक्षा का प्रचार-प्रसार करते हुए उज्ज्वल भविष्य की ओर अग्रगमन। शिक्षणतंत्र में एक बुनियादी परिवर्तन लाने हेतु संकल्पित होना। इस विधा पर भी एक पूरा संकाय विश्वविद्यालय में स्थापित किया जा रहा है।
(3) स्वास्थ्य - अशक्ति निवारण को प्रारंभिक आवश्यकता मानते हुए समाज के हर वर्ग को उन्हीं की परिस्थितियों व संसाधनों के बीच स्वस्थ, सक्रिय व सुखी बनाने का प्रयास करना। वनौषधि विज्ञान का पुनर्जीवन तथा आयुर्वेद को विज्ञानसम्मत बनाकर जन-जन तक उसका विस्तार। स्वास्थ्य संबंधी जागरुकता फैलाने के लिए स्वास्थ्य शिक्षा विस्तार योजना को गति देना। ‘नंगे पैर चिकित्सक’ वाली क्राँति यथाशीघ्र संपन्न करना इसका उद्देश्य है। इस विधा पर भी एक पूरा समग्र संकाय स्थापित किया जा रहा है।
(4) स्वावलंबन - हर व्यक्ति में स्वावलंबी जीवन जीने की उमंग विकसित हो। आर्थिक क्राँति को साकार करने के लिए घर-घर कुटीर उद्योग, ग्रामोद्योगों का प्रचलन। गौशालाओं व गौ केंद्रित अर्थव्यवस्था को धुरी बनाकर वैसी ही जीवनशैली विकसित करने का प्रयास इसके अंतर्गत किया जाना है। स्वयंसेवी बचत समूहों द्वारा राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करना तथा स्वदेशी आँदोलन को गति देना इसी के अंतर्गत आता है। ग्राम विकास होगा तो ही बढ़ती आबादी, प्रदूषण, शहरीकरण से उपजी समस्याएँ घटेंगी, यह निश्चित मानना चाहिए। इसी विधा के परिपूर्ण प्रशिक्षण के लिए एक फैकल्टी विश्वविद्यालय में स्थापित की गई है।
(5) पर्यावरण - पर्यावरण के संरक्षण में सहयोगी वृक्षों का विस्तार, ऐसी ही विकास योजनाओं का प्रचलन। प्रदूषण निवारण हेतु एक सशक्त आँदोलन स्वयं से आरंभ कर समाज तक चलाना। सूक्ष्म के परिशोधन हेतु सामूहिक साधना का अवलंबन-शब्दशक्ति के प्रयोग-यज्ञविज्ञान की उपचार प्रक्रिया का अवलंबन इसके अंतर्गत आता है। जो भी घटक पर्यावरण को बिगाड़े, उसके विरुद्ध एक आँदोलन।
(6) महिला जागरण - पृथ्वी का शोषण व महिला शक्ति पर दमन मानव की तथाकथित विकासयात्रा में साथ-साथ चला है। महिलाओं को उनके गौरव का भान कराते हुए, उनकी योग्यता का जागरण, विकास व नवसृजन में भागीदारी इस आँदोलन का मुख्य अंग है। नारी सुरक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन एवं उनकी पुरुषों के समान प्रतिष्ठा आध्यात्मिक स्तर पर किए जा रहे पुरुषार्थ द्वारा ही संभव हो सकेगी। गायत्री परिवार में आधी कार्यशक्ति महिला शक्ति है। इसका नवजागरण शक्ति जागरण इस क्राँति का मूल उद्देश्य है।
(7) व्यसन मुक्ति- कुरीति उन्मूलन- बढ़ते व्यसनों एवं कुरीतियों के दुष्परिणामों से जन-जन को अवगत कराते हुए उनसे मुक्त कराना इस समय का युगधर्म है। व्यसनों से बचे समय साधनों अर्थशक्ति को सृजन प्रयासों में लगाया जाना चाहिए।
सप्त क्राँतियों में से जो जितना कर सके, गति के साथ सँभाल सके वह आने वाले बारह वर्षों में हो रहे विराट् नवसृजन के पुरुषार्थ में भागीदार बन सकेगा। ये सभी संकल्प इन्हीं दिनों के सघन मंथन के साथ व्यक्तिगत या सामूहिक स्तर पर लिए जाने हैं।
संभागीय स्तर की महापूर्णाहुतियों का क्रम प्रायः बीस मई के बाद आरंभ हो जाएगा। प्रायः 18 केंद्रीय टोलियों द्वारा छह चरणों में, इस तरह 108 स्थानों पर यह कार्यक्रम 19 जून गायत्री जयंती तक संपन्न होने हैं। भारतभर के सभी स्थानों का निर्धारण लगभग हो चुका है। विस्तार से जानने के लिए 1 अप्रैल का पाक्षिक ‘प्रज्ञा अभियान’ सभी पढ़ लें। जैसाकि बताया गया था 19 जून को अंतिम आयोजन के बाद सभी यात्राएँ जन्मभूमि आंवलखेड़ा, गायत्री तपोभूमि अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा होती हुई शांतिकुंज हरिद्वार 16 जून ज्येष्ठ पूर्णिमा की पहुँचेगी व अपने-अपने कलश अखण्ड दीपक की साक्षी में स्थापित करेंगी। इस समय गुजरात में पाँच, म0प्र0 में दो, राजस्थान में एक हरियाणा, हिमाचल, जम्मू, पंजाब में एक उड़ीसा बंगाल में एक उत्तरप्रदेश में दो महाराष्ट्र में एक तथा दक्षिण भारत में एक इस प्रकार कुल 14 यात्राएँ विभिन्न जोन में होती हुई निकल रही हैं। सघन मंथन भी चल रहा है एवं गायत्री परिवार के विषय में जनचेतना तेजी से जाग रही है।
इसी स्तर की तीर्थयात्राएँ दो अमेरिका व कनाडा में एक यू0के0 में एवं एक दक्षिण पूर्वी अफ्रीका में भी निकाली जानी हैं। अमेरिका व कनाडा की यात्रा तो आठ अप्रैल से आरंभ हो रही है। इंग्लैंड की रथयात्रा मई व जून में चलेगी तथा दक्षिण अफ्रीका की जून से अक्टूबर तक। इसी के साथ विदेश की धरती पर ढाई-ढाई दिन प्रायः चौबीस संस्कार महोत्सव 18 जून से 9 सितंबर तक की अवधि में उतरी अमेरिका (दस स्थानों पर), कनाडा (दो स्थानों पर), इंग्लैंड व यूरोप (छह स्थानों पर), दक्षिणी व पूर्वी अफ्रीका, मारीशस, सूरीनाम (चार स्थानों पर) तथा आस्ट्रेलिया क्षेत्र में (दो स्थानों पर) संपन्न होंगे। इनके साथ-साथ युवावर्ग की पाँच दिवसीय तीन गोष्ठियाँ अमेरिका में तथा तीन यूरोप की धरती पर रखी जा रही हैं। विस्तार से अगले अंक में इसकी जानकारी परिजन पा सकेंगे।
19 जून के महापुरुषार्थ के बाद भारतवर्ष के स्थान-स्थान पर सघन मंथन की गोष्ठियों का क्रम चलेगा। कार्यकर्ताओं के द्वारा संगठित सक्रिय समयदानियों के समूहों की केंद्रीय कार्यकर्ताओं द्वारा जिलों के समुच्चय स्तर पर गोष्ठियाँ आयोजित होंगी। घर-घर क्राँतिधर्मी साहित्य व उसके अनुवादों को पहुँचाया जाएगा। जनसाहित्य जो पाँच पुस्तकों के सेट के रूप में छपा है, वह भी अधिक से अधिक व्यक्तियों तक पहुँचाया जाएगा। बौद्धिक वर्गों की गोष्ठियाँ स्थान-स्थान पर ली जाएँगी। चैंबर ऑफ कॉमर्स, रोटरी व लायंस क्लब, भारत विकास परिषद, विभिन्न जातीय संगठन, क्लबों, संगठनों के बीच, युवावर्ग व प्रशासकीय अधिकारियों आदि के बीच होने वाली इन गोष्ठियों से गायत्री परिवार की वर्तमान व भविष्य की राष्ट्रनिर्माण की योजनाओं की जानकारी प्रत्येक को मिलेगी।
चतुर्थ चरण में 13 अक्टूबर 2000 शुक्रवार शरद पूर्णिमा के दिन शाम 8 से 9 के बीच नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में प्रायः पचास हजार संकल्पित प्रतिभावानों का एक विभूति ज्ञानयज्ञ संपन्न होगा। इसमें राष्ट्र के प्रमुख दो पदाधिकारी राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री, सभी देशों के राजदूत, स्वैच्छिक संगठनों, धर्म-संप्रदाय के प्रमुखों की उपस्थिति में गायत्री परिवार के नवनिर्माण के संकल्प को घोषित किया जाएगा। निश्चित ही इस कार्यक्रम की गूँज दिग्दिगंत तक फैलेगी। इसी के 9 माह बाद 7 से 19 नवंबर की तारीखों में सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ के रूप में महापूर्णाहुति कार्यक्रम शांतिकुंज हरिद्वार के तत्वावधान में माँ गंगा की गोद में संपन्न होगा। सुनिश्चित समय साधन पुरुषार्थ साधना लोकमंगल के निमित्त नियोजित करने वाले ही इसमें भागीदारी करेंगे।
जैसे-जैसे समय गुजरता जा रहा है, हर परिजन को युगपरिवर्तन के क्षणों की सहज ही अनुभूति भी हो रही है। समग्र परिवर्तन लेकर आ रही इक्कीसवीं सदी के आगमन की पूर्ववेला में आया यह संक्रमण काल वाला वर्ष निश्चित ही अत्यंत महत्वपूर्ण है, यह सभी जानते हैं।
इस वर्ष के सत्रों के विषय में जान लें
यह महापूर्णाहुति वर्ष है। रथयात्राओं से उभरे उत्साह व क्षेत्रीय मंथन प्रक्रिया के बाद संभव है कि एक जन-सैलाब उमड़ पड़े। उसे व्यवस्थित-सुनियोजित करने के लिए ही 1 मई से 20 जून तक नौ दिवसीय सत्र बंद कर मात्र पाँच दिवसीय सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। 1 से 4, 6 से 9, 11 से 14, 16 से 19 जमन की तारीखों में जून माह में चलेंगे। बीच का एक दिन आने व जाने के अवकाश की दृष्टि से रखा गया है। एक माह के सत्र मई-जून में चलते रहेंगे। 21 जून से 29 जून के नौ दिवसीय सत्र के साथ संजीवनी साधना सत्रों की शृंखला पुनः आरंभ हो जाएगी। महापूर्णाहुति के शांतिकुंज में होने वाले आयोजनों में सक्रिय भागीदारी करने वाले स्वयंसेवकों को 18-7-2000 के बाद शाँतिकुँज बुलाया जाएगा। इस बीच 27, 29, 30 अप्रैल को विभिन्न अश्वमेधों संस्कार महोत्सवों व प्रथम महापूर्णाहुति व श्रद्धाँजलि समारोह में भागीदारी करने वाले विभिन्न विभागों के प्रभारियों का एक त्रिदिवसीय सत्र शाँतिकुँज में रखा गया है। इस संबंध में परिजन पत्राचार कर भागीदारी सुनिश्चित करें। जिन्हें इस वर्ष गरमी के 7 दिवसीय सत्रों में आना है, पूर्व अनुमति लेकर ही रिजर्वेशन कराएँ। शेष प्रतिबंध यथावत लागू रहेंगे।
(मंगल विजय ‘विजयवर्गीय’)
हो रहा हो, संस्कृति-सीताहरण, राम के हनुमान तुम क्यों मौन हो। निश्चरों से हीन करने को मही, राम के आह्वान तुम क्यों मौन हो॥
कुटिल चाल चली अहं के कंस ने, कोप ढाया सत्ता लोलुप इंद्र ने। कूरता-कौरव निरंकुश हो रहे, कृष्ण पार्थ के प्राण तुम तुम क्यों मौन हो।
हो रहा हो, संस्कृति-सीताहरण, राम के हनुमान तुम क्यों मौन हो॥ हो रहा शोषण निरीहों का सतत्, धर्म का पाखंड करता है मदद।
बुद्ध की करुणा कहाँ पर सो गई, बुद्ध करुणावान तुम क्यों मौन हो। हो रहा हो, संस्कृति-सीताहरण, राम के हनुमान तुम क्यों मौन हो॥
सत्य का खुलकर निरादर हो रहा, राष्ट्र हिंसा का प्रताड़न ढो रहा। अहिंसा महावीर की क्यों सुप्त है, बापू के बलिदान तुम क्यों मौन हो।
हो रहा हो, संस्कृति-सीताहरण, राम के हनुमान तुम क्यों मौन हो॥ धर्म, संस्कृति, राष्ट्र पर संकट घिरे, आस्था विश्वास के आँसू झरे।
नानकजी की गुरुभक्ति को क्या हुआ,गोविंद सिंह के ज्ञान तुम क्यों मौन हो। हो रहा हो, संस्कृति-सीताहरण, राम के हनुमान तुम क्यों मौन हो॥
राष्ट्र की सामर्थ्य क्यों सोई हुई, किसलिए व्यामोह में खोई हुई। शहीदों का रक्त क्या ठंडा हुआ, वसंती बलिदान तुम क्यों मौन हो।
हो रहा हो, संस्कृति-सीताहरण, राम के हनुमान तुम क्यों मौन हो॥ जागरण का शंख अब बजने लगा, युग-प्रवर्तक सैन्यबल सजने लगा।
राष्ट्र के पुरुषार्थ, प्रतिभा के धनी, प्रखर प्रज्ञावान तुम क्यों मौन हो। हो रहा हो, संस्कृति-सीताहरण, राम के हनुमान तुम क्यों मौन हो॥
*समाप्त*