जीवन क्या है?

जीवन क्या है ? यह एक ऐसा प्रश्न है, जो युगों युगों से पूछा जा रहा है एवं अनुसरित हैं । श्रुति की शरण में जाएँ, तो वह कहती है कि हर व्यक्ति द्वारा जीवन के स्वरूप को समझा जाना चाहिए और उससे जुड़े तथ्यों को स्वीकार करना चाहिए, चाहे वे कितने भी कडुए एवं अप्रिय क्यों न प्रतीत होते हों ? जीवन एक चुनौती है, एक समर है, एक जोखिम है एवं उसे इस रूप में स्वीकार करने के अलावा हमारे पास ओर कोई चारा भी नहीं ।

जीवन एक रहस्य है, तिलिस्म है, भूल-भुलैया है, एक प्रकार से एक गोरखधंधा है जिस किसी के पास भी गंभीर पर्यवेक्षण करने की दृष्टि हो, वह उसकी तह तक पहुँच सकता है । इसी आधार पर जीवन से जुड़ी भ्राँतियों के कुहासे को भी मिटाया जा सकता है कई प्रकार के खतरों से भी बचा जा सकता है। कर्तव्य के रूप में जीवन अत्यंत भारी किंतु अभिनेता की तरह हँसने-हँसने वाला हलका फुलका रंगमंच भी है, जिसका विनोदपूर्वक मंचन कर आनंद लिया जा सकता है ।

जीवन एक गीत है,जिसे पंचम स्वर में गाया जा सकता है। जीवन एक अवसर है, जिसे गँवा देने पर सब कुछ हाथ से निकल जाता है। जीवन एक स्वप्न है, जिसमें स्वयं को खोया जा सके तो भरपूर आनंद का रसास्वादन किया जा सकता है । जीवन एक प्रतिज्ञा है, यात्रा है, जीने की एक कला है। उसे सफल कैसे बनाया जाए, यह यदि जान लिया जाए, इस पर मनन कर लिया जाए, तो फिर उससे बड़ा भाग्यशाली कोई नहीं। जीवन सौंदर्य है, सत् - चित - आनंद है। वह सब कुछ है, जो नियंता की इस सृष्टि में सर्वोत्तम कहा जाने योग्य है। हम इसे जीकर तो दिखाएँ।


तंत्र को न तो गर्हित समझे और न ही बनाएँ

विभिन्न साधनाएँ बिना गुरु के भी संपन्न की जा सकती हैं। उन्हें करने में कोई झंझट नहीं है। नाम−जप, स्तुति पाठ, स्मरण, कीर्तन आदि का क्रम चलाने में सतत् मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं है। ये साधनाएँ एक बार गुरु से सुनकर, दीक्षा लेकर कहीं भी चलाई जा सकती हैं। तंत्र के संबंध में ऐसा नहीं है। उस मार्ग पर चलते हुए मार्गदर्शन और संरक्षण की सतत् आवश्यकता है। उसके बिना एक कदम आगे नहीं बढ़ा जा सकता, क्योंकि तंत्र-साधना करते हुए साधक का विकास तीव्रगति से होता है। सहज सामान्य विकास अपने ढंग से चलता रहता है, वहाँ कोई जोखिम नहीं। लेकिन तंत्र एक विशिष्ट विधा हैं उसके अनुभव से गुजरते हुए सतत् देखभाल चाहिए।

तंत्रमार्ग के आचार्यों ने इस अंतर को दैनंदिन व्यायाम और शरीर-सौष्ठव की साधना करने वालों के विशेष प्रयोगों-अभ्यासों से समझाया है। सामान्य स्वास्थ्य के लिए सुबह टहलना, आधा घंटा दौड़ लेना, कुछ आसन आदि कर लेना और आहार-विहार में संयम रखना पर्याप्त है। जिन्हें शरीर को सुदृढ़, महाबली बनाना हो, उन्हें योग्य-समर्थ पहलवानों, उस्तादों की देख−रेख में घंटों नियमित व्यायाम करना पड़ता है। घंटों प्रतिदिन वर्षों तक अभ्यास करने के बाद वे कड़ी प्रतिद्वंद्विता में टिकी रहने वाली सामर्थ्य अर्जित कर पाते हैं। उस सामर्थ्य को स्थिर रखते हैं। तंत्र-साधना अपने भीतर विद्यमान् दिव्य शक्ति के विशिष्ट जागरण, आहान और अर्जन की विधान है। उसे गुरु अर्थात् समर्थ मार्गदर्शक के साथ संपन्न किया जा सकता है। अपने आप किए गए प्रयास या प्रयोगों में लाभ के साथ हानि की संभावना भी है, बल्कि नुकसान का जोखिम ही ज्यादा है।

तंत्र को अध्यात्म जगत् का व्यावहारिक विज्ञान कहा गया है। विज्ञान का क्षेत्र सिद्धाँत की दृष्टि से सभी के लिए खुला है। किसी के लिए प्रतिबंध या निषेध नहीं है। लेकिन व्यवहार में हर किसी को इतनी छूट नहीं दी गई है कि जो भी चाहे स्थिति, योग्यता और अवसर का विचार किए बिना उसमें घुसपैठ कर जाए। योग्यता और मार्गदर्शन उस क्षेत्र में प्रवेश करने की पहली शर्त है। प्रवेश के बाद इस कसौटी पर निरंतर खरे उतरते रहना पड़ता है। विज्ञान की सिद्धि से कितने ही चमत्कारी और उपयोगी यंत्र उपलब्ध है। उसे हर कोई जब चाहे छूने-छेड़ने नहीं लगता। जब तक कोई जानकार अनुभवी मास्टर उनका उपयोग सिखा नहीं देता तब तक मंत्रों को छेड़ने की हिम्मत नहीं होती। किस स्विच या बटन को दबाने से यंत्र किस तरह काम करने लगेगा, यह जानकारी यह यंत्र का विज्ञानी अथवा याँत्रिक ही दे सकता है। तंत्र की विधियाँ भी रोजमर्रा काम आने वाली सामान्य और विशिष्ट मशीनों तरह ही जटिल हैं। जो प्रयोग नहीं जानते, उनके लिए विधियाँ हानिप्रद ही है। बिना योग्य गुरु के सिखाए और उनका संरक्षण प्राप्त किए, इस दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता।

गुरु या मार्गदर्शक की अनिवार्य आवश्यकता होते हुए भी आचार्य बलदेव उपाध्याय ने लिखा है, धर्म या अध्यात्म के क्षेत्र में तंत्र ही आज के युग में सबसे ज्यादा उपयोगी और सुलभ है। जिस प्रकार व्यवहार जगत् में आज विज्ञान का युग हैं, उसी प्रकार अध्यात्म जगत् में तंत्र का युग हैं। यह सबके लिए खुला है। कोई भी इस क्षेत्र में प्रवेश कर सकता है। प्रवेश के बाद विधिवत् उपयोग किया जाए, तो व्यक्ति द्रुतगति से आत्मकल्याण की दिशा में बढ़ता रह सकता है।

तंत्र को सार्वकालिक और सब के लिए उपयोगी मानने वाले विद्वानों का एक वर्ग इस वैदिक मार्ग से भी ज्यादा महत्वपूर्ण मानता है। उनके अनुसार ‘वैदिक कर्मों’ के अनुष्ठान में शूद्र तथा क्षत्रिय दोनों का अधिकार नहीं है, परंतु तंत्र में दोनों के लिए छुट है। वेद-शास्त्रों ने तीन वर्णों को ही अधिकार दिया हुआ है, लेकिन आगम ने अपने द्वार सबके लिए खोल दिए। यहाँ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है, जाति-पाँति के आधार पर साधक को अयोग्य नहीं ठहराया जाता। साधक की पात्रता में जन्म, वंश, शरीर का भेद नहीं किया जाता। विशिष्ट योग्यता का निर्धारण सिर्फ गुरु ही करता है। उसकी अपनी कसौटियाँ हैं।

आचार्य बलदेव के अनुसार, तंत्र युगधर्म भी है। आज के युग में वह जितना सुलभ और व्यवहार्य है, उतना किसी भी युग में नहीं रहा। कलियुग में मनुष्य की आत्मशक्ति और आँतरिक स्थिति पिछले युगों की तुलना में क्षीण ही रहती है। जितना त्याग, तप, तितिक्षा और धैर्य प्राचीन-काल में संभव था, उतना आज कहीं नहीं दिखाई पड़ता। बाह्य और आँतरिक शुद्धि की भी यही दशा है। वैदिक कर्मों का अनुष्ठान जिस त्याग, तप पर आश्रित था, उसका नाम भी आज कहीं नहीं दिखाई पड़ता। आज के युग अर्थात् कलियुग में उनका यथेष्ट आचरण संभव ही नहीं रह गया है। तंत्र में उसकी आवश्यकता इतनी अनन्य और प्रगाढ़ स्तर पर होती भी नहीं है। इसलिए तंत्र को आज की युग-साधन कह सकते हैं।

तंत्र में क्या सचमुच साधन-शुचिता और तप-तितिक्षा की बहुत आवश्यकता नहीं है। इस प्रश्न का उत्तर यह है कि शरीर, मन और बुद्धि की पवित्रता-निर्मलता इस मार्ग में उतनी ही अपेक्षित है जितनी योग अथवा भक्तिमार्ग में। अंतर सिर्फ इतना है कि पवित्रता और निर्मलता पर इतना ज्यादा जोर नहीं दिया गया कि साधक उसी में अटक कर रह जाए। विभिन्न साधना-पद्धतियों में तीन-चार बार नहाने, वस्त्र बदलने, घंटों तक विधि-विधान से पूजा करने, दूसरों का छुआ, बनाया, लाया हुआ आहार नहीं लेने जैसे कितने ही प्रतिबंध है। कुछ विधि-निषेध तो इतने कड़े है। कि उनका पालन करते रहने में ही साधक उलझ जाता है, विकास के लिए वह साधना-उपासना की दिशा में बढ़ नहीं पाता। उदाहरण के लिए, वैष्णव मत में दीक्षित कुछ साधक दूसरों की छाया पड़ जाने से ही आहार और जल को दूषित हुआ मान लेते हैं। वे छायाविष्ट अन्न या जल को ग्रहण नहीं करते। पूजा-पाठ से पहले किसी से छू जाएँ या छाया अविष्ट हो जाएँ, तो नहाते हैं। पहने हुए वस्त्र को बदलते और फिर पूजा-पाठ करते हैं।

तंत्र ने इन विधि-निषेधों की बहुत ज्यादा परवाह नहीं की। यहाँ तक स्वीकार किया कि जीवन अपने सभी रूपों में स्वीकार्य है। वह उत्कृष्ट स्तर का हो, माध्यम हो, सामान्य हो अथवा निम्न-निकृष्ट हो। व्यक्ति की आँतरिक स्थिति जैसे भी है, उसे तिलाँजलि दिए बिना उसका अतिक्रमण किया जा सकता है। यह नहीं कि व्यक्ति पहले अपनी आँतरिक स्थिति का परिष्कार करें, उसे संस्कारित करें और फिर आत्मिक विकास की दिशा में पग बढ़ाएँ।

जहाँ हैं, वहीं से अपनी यात्रा आरंभ करने की छूट देने के कारण ही तंत्र में सभी आचार-विचार के लोग मिल जाते हैं। सात्विक, संस्कारी और शुद्ध लोग भी इस मार्ग पर है और मद्य-माँस का सेवन करने वाले तामसी प्रकृति के लोग भी। क्योंकि तंत्र ने जीवन के सभी रूपों और अभ्यासों को मान्यता दी, इसलिए यह सत् रज और तम तीनों ही प्रवृत्ति वालों के लिए उपयोगी सिद्ध हो सका है।

लोगों ने इस मान्यता या स्वीकृति का अनुचित लाभ भी उठाया। इस छूट को अपनी कामना, वासना और उच्छृंखलताओं की ओट बनाया। शुभ-अशुभ दोनों के स्वीकार के कारण लोग दुराचार-व्यभिचार के मार्ग पर भी बढ़े, बल्कि उन्हीं में रम गए। तंत्र की मार्गदर्शक सत्ता का निर्देश था कि जिस कीचड़ में धँसे हो, वहीं से आगे बढ़ो। कीचड़ से सने हो, इसलिए अपने आपको निःश्रेयस को प्राप्त करने के लिए कृतसंकल्प बनो। विपर्यय यह हुआ कि लोगों ने अतिक्रमण का आहान अनसुना कर दिया और कामना-वासना के दलदल को ही साधना-स्थल मान लिया। यह भी हुआ कि लोग इस छूट या सुविधा का लाभ उठाकर अपने दोष-दुर्गुणों और लिप्साओं को हवा देने लगे।

मध्यकाल में वामाचार के नाम पर जिस तरह की उच्छृंखलताएं हुई, उसके अवशेष आज भी देखे जा सकते है। मीन, माँस, मद्य, मैथुन और मुद्रा के पंचमकारों को प्रचलित अर्थों में ही मुक्त का मार्ग बताने वाले आचार्यों की आज भी भरमार है। पंचमकारों की व्याख्या करते हुए वे कहते हैं, आहार-विहार में किसी प्रकार का संयम रखने की आवश्यकता नहीं है। उस स्तर पर शुद्धि की परवाह किए बिना जो जी में आए खाते-पीते रहो। यौन-शुचिता और संयम भी आवश्यक नहीं है। इतना ही पर्याप्त है कि बताई हुई विधि का बिना सोचे-समझे पालन करते रहो, जो उपाय बताए गए हैं, उन्हें अपनाने में अपनी बुद्धि का उपयोग मत करो। अध्यात्म-मार्ग में बुद्धि-विवेक की सर्वथा तिलाँजलि दे देनी चाहिए।

नए आचार्यों की ये शिक्षाएँ भोगवादी प्रवृत्ति के लोगों को बहुत रास आती है। उन्हें उच्छृंखल भोगवाद का अनुकरण करते हुए अपनी मुक्ति का लाभ सहज ही मिलता दिखाई देता है। नई व्याख्याओं के कारण वे परम आश्वस्त रहते हैं। इसी तरह की विडंबना मध्यकाल में भी हुई और लोगों ने अपनी भोग-लिप्सा को तंत्र, गुहा विद्या, वाममार्ग की आड़ में खुलकर खेलने का मौका दिया। इस प्रयत्न का विरोध भी हुआ आचार्यों और मनीषियों ने सिर्फ इन स्वेच्छाचारी पद्धतियों के कारण ही तंत्र को वेद-विरुद्ध अथवा अवैदिक करार दे दिया।

समालोचकों ने वेद-शास्त्रों में भी तंत्र के उपदेश ढूँढ़ निकाले है। तंत्रमार्ग में जिस शक्ति की आराधना की जाती है, वह सबसे पहले वेदमंत्रों द्वारा ही आराधी गई है। ऋग्वेद के वागम्भृणि सूक्त (10/145) में जिस शक्तितत्त्व का प्रतिपादन किया गया है, तंत्रशास्त्र उसी का विकास हैं। स्वामी विष्णुतीर्थ ने भी इस प्रतिपादन के पक्ष में विशद विवेचना की है। उनके अनुसार आगे चलकर तंत्र-शास्त्र का जितना भी विस्तार हुआ वह वागम्भृणी सूक्त का ही भाष्य है। बृहदारण्यक (6/12) और छाँदोग्य (5/8) में जिस पंचाग्नि विधा का उपदेश दिया गया , वह तंत्र की ही आधारभिति है। छाँदेग्य उपनिषद् (3/1-10) में ही मधु-विधा का उपदेश भी दिया गया है। स्वामी विष्णुतीर्थ के अनुसार वह भी तंत्र की ही व्याख्या हैं।

जिस कारणों से तंत्र को अवैदिक ठहराया गया , वह उसका भोगवादी स्वरूप है। शिव-पार्वती से लेकर आचार्य शंकर के आख्यानों में तंत्र के जो सिद्धाँत या प्रयोग दिए गए उनमें भोगवाद कहीं नहीं हैं। इस विद्या के आधारग्रंथों को छान लेने पर कहीं पुष्टि नहीं हुई कि तंत्र किसी भी तरह की भोगलिप्सा को छूट देता है। सिद्धाँत रूप में जहाँ भोग की चर्चा हुई, लोलुप विद्वानोँ ने उसे ही तोड़े-मरोड़कर अपने पक्ष में कर लिया । विकृति अथवा अनर्थ का कुल इतना ही कारण हैं।

विपर्यय अथवा अनर्थ के कारण एक समय ऐसा भी आया जब साधना और विद्या की धारा ही अवरुद्ध हो गई । श्री अरविंद ने इस अनर्थ को रेखाँकित करते हुए लिखा हैं, तंत्र में विशेषकर उसके वाममार्ग में ऐसी बातें आ गई, जिनके कारण अच्छे-बुरे का , पाप-पुण्य का कोई विचार नहीं रह गया। इतना ही नहीं स्वभाव नियत सद्धर्म के स्थान पर अनियंत्रित कामाचार, असंयत सामाजिक व्यभिचार और दुराचार को मानो एक पंथ मिल गया । तथापि तंत्र असल में एक बड़ी चीज थी, बड़ी बलवती योगपद्धति थी । इसके दक्षिण और वाप दोनों ही मार्ग बड़ी गंभीर अनुभूति के फल थे। उनमें एक ज्ञान का मार्ग है और दूसरा आनंद का ।

जिस आचार्यों ने भोगवाद के दलदल से बाहर आने के लिए प्रेरित किया, उनके कथन का अनर्थ किया गया । उनका आशय था कि उस मलीनता के कारण ग्लानि में डूब जाना उचित नहीं है। ग्लानि से उबरो। जिस मलीनता में डूबें रहकर तुम अपने उद्धार के प्रति निराश हो चले हो , वह भी परमात्मा की ही लीला हैं । इस आश्वासन का अनर्थ यथास्थिति बनाए रखने में किया गया।इसे युग का प्रवाह कहे कि आश्वासन को भी सिद्धांत मान लिया। अनर्थ यथास्थिति बनाए रखने में किया गया। इसे युग का प्रवाह कहे कि आश्वासन को भी सिद्धाँत मान लिया । अनर्थ प्रायः पांचवीं से दसवीं शताब्दी तक चला। उन दिनों भगवान् बुद्ध के अनुयायी तंत्र के वामाचारी प्रयोगों में अग्रणी भूमिका निभा रहें थे मध्यम मार्ग के नाम पर स्वाद और यौनसुख के आग्रह ने बौद्ध मठों को विलास के अड्डे बना दिया।

शिक्षाओं के अनर्थ का एक उदाहरण बुद्धचरित में इस प्रकार मिलता है। एक भिक्षु को अपनी चर्या में पूरे दिन घूमते रहने पर भी कुछ नहीं मिला। वह अपने संघाराम में लौट रहा था कि रास्ते में उसके पात्र में माँस का एक टुकड़ा गिरा। माँस का टुकड़ा ऊपर उड़कर जा रही चील के मुँह से छूटकर गिरा था। उस दिन सायंकालीन गोष्ठी में इस घटना की चर्चा हुई नियम था कि पात्र में जो भी आए उसे ग्रहण करना है, तिरस्कार नहीं करना हैं। दूसरे, भिक्षु क्षुधा से त्रस्त भी था। व्यवस्था दी गई कि अनायास ही मिले माँस का उपयोग किया जा सकता है,। व्यवस्था यह सोचकर दी गई थी कि यह अवसर अपवाद रूप है, अन्यथा कहाँ किसी पक्षी के मुँह का टुकड़ा गिरता है ओर कौन भिक्षा में माँस देता है।

अपर्द्धम की तरह दी गई इस व्यवस्था का दुरुपयोग हुआ और बौद्ध धर्म में माँस का प्रयोग बढ़ने लगा । बुद्ध के दस शीलों में एक शील मद्य-माँस का त्याग भी हैं। दूसरों का दिया अथवा अनायास सामने आया माँस का त्याग भी है। दूसरों का दिया अथवा अनायास सामने आया माँस ग्रहण किया जा सकता है । इस आपर्द्धम ने सामान्य धर्म का रूप ले लिया और लोग पशुओं को पहाड़ की चोटी तक दौड़ाकर ले जाने लगे । ताकि वे गिरकर मर जाएं और उनका माँस खाया जा सके। आश्चर्यचकित कर देने वाला तथ्य है कि दक्षिण एशिया के बौद्ध देश इस समय माँस के प्रमुख निर्यातक देशों में है। निर्यात करने वाले व्यापारी खुद पशुओं का वध नहीं करते, दूसरों से कराती है।

तंत्र के संबंध में भी यही अनर्थ हुआ है, अन्यथा शरीर को भगवान् का दिया हुआ साधन मानकर उसके द्वारा मोक्षमार्ग पर ले जाने वाली यह विद्या विकृत नहीं हुई होती । तंत्र के संबंध में फैली भ्रांतियों का निराकरण होना चाहिए। भ्राँतियों के बादल छटे तो ही तत्र का तेजस्वी आलोक अध्यात्म जगत् के विज्ञान को उद्घाटित कर सकेगा।


हम कहीं भी किसी तरह स्वतंत्र नहीं

ज्योतिष के क्षेत्र में शोध-अनुसंधान कर रहे पंडित सुरेश कौशल ने कुँडली को सरसरी नजर से देखा और कहा कि आपकी माँ आपकी तुलना में ज्यादा सुँदर और गौरवर्ण हैं तथा उनकी पहली चार संतानें जीवित नहीं रहीं? जातक ने उतर दिया, ठीक है। फिर पूछा, आपके पिता की मृत्यु करीब बीस वर्ष पहले हुई होगी ? उतर था, आप ठीक कहते है?जातक का उद्देश्य आपने कारोबार की संभावनाओं का आँकना था। पंडित कौशल कुँडली के सही, शुद्ध और प्रामाणिक होने की जाँच कर रहे थे। उन्होंने फिर पूछा, आप भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं। उतर था ठीक । आपका विवाह 1177 में हुआ। यह सभी सही था । कुछ गणना कर बताया, जनवरी , फरवरी 2001 के महीने आर्थिक संकट के रहेंगे इन दिनों सावधानी से रहें। आगे कामकाज अच्छा चलेगा ।

भविष्यकथन वाला भाग अभी परखा नहीं गया, लेकिन बारह वर्गों और नौ ग्रहों में बटे एक मामूली से दस्तावेज के आधार,पर माँ, भाई-बहन और पिता के बारे में सही बता देना आश्चर्य का विषय है प्रसिद्ध ज्योतिर्विद् कोट्टम राजू नारायण राव ने करीब चालीस हजार कुँडलियाँ का संग्रह कर रखा है। कई प्रमुख लोगों की कुँडलियाँ पढ़कर उनके बारे में भविष्यकथन किया हैं वे कथन सही निकले या नहीं इस बारीकी में न जाएँ। कुँडली लेकर उनके पास आई एक महिला से छोटा सा संवाद इस प्रकार है।

आपके पिता ने एक मकान आपके भाई को दिया है और दूसरा आपको? हाँ महिला की स्वीकारोक्ति थी । फिर श्री राव ने पूछा,आपकी भावज बहुत सुँदर है, लेकिन हठी स्वभाव की हैं,। उतर था, हाँ।

वह अपने पति अर्थात् आपके भाई को आपसे झगड़ा करने के लिए उकसाती रहती है? आपके पति अक्सर अपने साले और सलहाज का पक्ष लेते हैं अक्सर आपकी उपेक्षा करते है? पक्ष लेने के कारण घर में अक्सर तकरार भी हो जाती है ?

इन सभी प्रश्नों का उत्तर महिला ने ‘हाँ’ में दिया। आश्चर्यवश पूछने लगी कि आपने यह सब कैसे जाना- श्री राव ने कहा, ग्रह सब कुछ बोलते हैं। फिर महिला ने यह भी पूछा कि ऐसा कोई उपाय नहीं हो सकता कि मेरे पति मेरे भाई-भावज की तरफदारी करना छोड़ दें और मेरे वश में हो जाएँ। श्री राव ने कहा, उपाय है लेकिन किसी तंत्र-मंत्र से यह संभव नहीं है। सिर्फ ईश्वर-प्रार्थना ही उपाय है। वही सब कुछ करने और नियति को बदलने में समर्थ हैं।

एक ही कुँडली से माता-पिता और भाई-बहनों से लेकर संतानों तक की स्थिति का सही अनुमान कोरी कल्पना नहीं। उसके सुनिश्चित नियम है। पंडित सुरेश कौशल ने प्रारंभ में की गई विवेचना का तकनीकी पक्ष सामने रखा। चौथा घर माँ का हैं। इसमें सूर्य, बुध और शनि बैठे हैं। यहाँ से पाँचवे घर में राहु बैठा है। वह संतान का कारक बनता है। माँ के घर से संबंध होने के कारण उसने पूर्ववर्ती संतानों को जीवित नहीं रहने दिया। माँ के घर से दूसरे घर में चंद्रमा और शुक्र स्थित हैं। उन दोनों का योग बताता है कि माँ बहुत सुँदर और मानिनी होगी। माँ के घर को लग्न भाव मानें तो अष्टम में बैठा बृहस्पति पति का जातक के पिता का द्योतक है। जातक की शनि दशा में गुरु का अंश आया होगा, तो पिता चल बसे।

(ज्योतिष का एक पक्ष यह है कि मनुष्य को स्वतंत्र होने का दम नहीं भरना चाहिए। ग्रह-स्थिति और उनका प्रभाव यह भी सिद्ध करते हैं कि पूरा ब्रह्माण्ड एक शरीर है और जीव-चेतना उसका एक घटक। कहीं भी होने वाले परिवर्तन पूरे शरीर को प्रभावित करते हैं। इस नाते कोई किसी भी स्तर की सफलता अर्जित कर ले, उसे गर्व से फूल नहीं जाना चाहिए कि अकेले अपने प्रयत्नों का परिणाम है। समूचा अस्तित्व उसे अपने अनुग्रहों से कृतकृत्य करना चाहता है, तभी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ अर्जित होती हैं। )

एक अन्य कुँडली की व्याख्या में बताया गया कि सप्तमेश की अंतर्दशा में राहु का संचार हुआ। जातक की पत्नी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था। आचार्य ने कहा, एक वर्ष तक बीमारी रहेगी। पत्नी के प्राणों नहीं जाएँगे, लेकिन वह मरणाँतक कष्ट झेलेगी। जिनसे की कुंडली देखी गई थी उनकी पत्नी की नो जन्मतिथि मालूम थी और न ही स्वास्थ्य का अगला-पिछला हिसाब। सिर्फ बारह घरों में बँटी आकृति को ही देखा-परखा गया था।

ज्योतिष एक विज्ञान है। यह तथ्य स्वीकार किया जा चुका हैं। भारतीय ज्योतिष विज्ञान के साथ विद्या, साधना और सिद्धि भी है। यह भी सर्वमान्य है। निश्चित ही इस विद्या में अपनाए गए सिद्धाँतों में कुछ तथ्य की दृष्टि से सही सिद्ध नहीं होते। उदाहरण के लिए, पृथ्वी इस जगत का केंद्र नहीं है। जिसे आधार मानकर आकाश को बारह खानों में बाँटा गया और प्रत्येक खाने की राशि का नाम दिया गया। वैज्ञानिक दृष्टि से पृथ्वी नहीं सूर्य इस जगत का केंद्र हैं। सभी ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं।

ज्योतिष विद्या में जिन पिंडों को ग्रह का नाम दिया गया, वे सभी ग्रह नहीं हैं। सूर्य ग्रह नहीं है। चंद्रमा, राहु और केतु ग्रह नहीं हैं। सूर्य अपने मंडल का केंद्र है और मंगल, बुध, बृहस्पति,

शुक्र, शनि, यम, वरुण, वारुणी आदि ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं। पृथ्वी भी इनमें शामिल हैं। राहु-केतु ग्रह नहीं है। खगोल विज्ञान की दृष्टि से वे दो बिंदु हैं, जहाँ पृथ्वी अपने परिक्रमा-पथ पर कुछ क्षण के लिए अपना रास्ता बदलती है। यम, वरुण, वारुणी आदि ग्रहों को ज्योतिष ने पूरी मान्यता नहीं दी है। वे कुँडली में अंकित जरूर किए जाते हैं। भविष्यकथन अथवा संभावनाओं का पता लगाने में उनकी कोई भूमिका नहीं है।

तथ्यों की दृष्टि से खरा नहीं उतरने पर भी ज्योतिष के आधार पर सही गणनाएँ की जाती हैं। क्या यह अटकलों के साथ अंतर्दृष्टि के तालमेल का विज्ञान है। उत्तर है नहीं। गणित की तरह यह निश्चित सिद्धाँतों और उनके आधार पर सही निष्कर्षों तक पहुँचाने वाला विज्ञान हैं। यह सही है कि वराहमिहिर और आर्यभट्ट के समय सूर्य के आकाश-मंडल का केंद्र होने का पता चल गया था। अंतरिक्ष का अध्ययन करते समय इस तथ्य का पता चल चुका था, लेकिन पहले से प्रचलित मान्यताओं में उलटफेर नहीं किया गया, क्योंकि उससे अंतर नहीं पड़ा, सिद्धाँत की दृष्टि से पृथ्वी को केंद्र माना जाए अथवा सूर्य को, ग्रह पिंडों की गति उतनी ही रहती है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगा रही है, तो भी इस पर रहने वाले प्राणी सौरमंडल की ऊर्जा से उतरने ही तरंगित होते हैं जितने सूर्य के द्वारा परिक्रमा लगाने पर प्रभावित होते। प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है कि सूर्य पूर्व दिशा में उदित होता है और पश्चिम में अस्त। असलियत यह है कि उदय और अस्त के बीच पृथ्वी अपनी कील पर घूमते हुए एक स्थिति तक घूम जाती है। सूर्योदय के समय व्यक्ति जगह खड़ा होता है, अस्त के समय वह जगह सूर्य से पृथ्वी की आधी परिधि के बराबर पूर्व में गति कर जाती है। उस जगह सूर्य अस्त होता दिखाई देता है। तथ्य की दृष्टि से सूर्य नहीं पृथ्वी ही अपने स्थान पर आगे-पीछे हुई है, लेकिन प्रभाव की दृष्टि से स्थान विशेष पर खड़े व्यक्ति के लिए उदय और अस्त की यात्रा ही संपन्न हुई है। भाषा और बोध की दृष्टि से उसके लिए यह कहना ही सुविधाजनक है कि सूर्य पूर्व से पश्चिम दिशा में चला गया।

राहु-केतु आदि परिक्रमा बिंदुओं और चंद्रमा के उपग्रह हो हुए भी ग्रह मान लेने से अंतर नहीं पड़ता। गणित में कोई भी साध्य एक परिकल्पना के आधार पर शुरू किए जाते हैं हल करने की प्रक्रिया संपन्न होती है, तो वे निष्कर्ष पर भी पहुँचते हैं। उदाहरण के लिए, कल्पना की जाती है कि अब से एक त्रिभुज है। आरंभ इस शब्दावली से होता है, माना कि ‘अ ब स’ एक त्रिभुज है। छात्र इस कल्पना को आगे बढ़ाते हैं और तीनों कोणों के बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। इस तरह की परिकल्पनाओं को रचने और निष्कर्षों पर पहुँचते रहने की प्रक्रिया से ही विभिन्न आविष्कार हुए, भवन खड़े हुए, औषधियों की खोज हुई, सुविधा-साधन बढ़े और जीवन उत्तरोत्तर सुखद-संपन्न होता गया।

कौन ग्रह किसकी परिक्रमा करता है, इसका तथ्य की दृष्टि से भले ही महत्व हो, लेकिन गतिशील जगत् में उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मान्यताएँ बदल जाएँ तब भी परिणाम वही निकलते हैं। भारतीय परंपरा चंद्रमा की स्थिति के आधार पर राशियों का निर्धारण करती है। उसके अनुसार चंद्रमा जिन नक्षत्रों के घेरे में रहता है, उनके अनुसार राशियाँ अदलती-बदलती हैं। चंद्रमा की गति, तेज है ओर यात्रापथ छोटा। वह ढाई दिन में एक राशि खंड पार कर लेता है, इसलिए ढाई-तीन दिन बाद राशि बदल जाती है। पश्चिम का ज्योतिष सूर्य को आधार मानता है। सूर्य एक महीने में राशि बदलता है। इसलिए सूर्य-चक्र के आधार पर बारह राशियों का चक्र साल भर में पूरा होता है। उस पद्धति से निश्चित हुई राशि और भारतीय पद्धति से स्थिर राशि में बहुत अंतर होता है। वह विपरीत स्थिति तक जा सकता है, लेकिन उसने कथन में कोई अंतर नहीं पड़ता। भारतीय ज्योतिष भी उसी निष्कर्ष पर पहुँचता है, जिस पर पश्चिमी ज्योतिष। बल्कि भारतीय ज्योतिष सूक्ष्म गणनाओं के कारण अपेक्षाकृत ज्यादा सही निष्कर्षों पर ले जाता है।

मान्यताओं और कसौटियों में अंतर महत्वपूर्ण नहीं हैं। महत्वपूर्ण वह शाश्वत सत्य है, जो ज्योतिष के आधार पर सिद्ध होता है। अजीत कुमार एक व्यक्ति हैं। उसके जन्म के समय ग्रहों की जो स्थिति थी, उसके माता-पिता के जीवन में क्या घटनाएँ हुई होंगी। कमल कुमार के चतुर्थ भाव में स्थित सुर्य-शनि कुछ बारीकियों को ध्यान में रखने पर इस नतीजे तक पहुँचाते हैं कि पिता-पुत्र में नहीं बनेगी । कमल कुमार के एक विशेष आयु वर्ष पूरा करने पर यह बात सही निकलती है, तो स्वयंसिद्ध है कि कमल कुमार का जन्म ओर संबंध उसके पिता के जन्म और संबंध से संबंधित हैं उसका जन्म स्वतंत्र नहीं है, बल्कि पिता ही नहीं भाई, बहन, विवाह के बाद आने वाली पत्नी और होने वाली संतानों पर भी निर्भर है। जातक पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है।

ज्योतिष के क्षेत्र में अपना पूरा जीवन होम देने वाले ऋषि-मुनियों का प्रतिपादन है कि मनुष्य कतई स्वतंत्र नहीं है कि आसपास के प्रभावों से बच सके । वह घटनाओं के तारतम्य की एक कड़ी है। आर्षग्रंथों में यह तथ्य समझाया गया। आधुनिक ज्योतिष के जनक बेंगलोर के वेंकट रमन (बी.वी.रमन) ने अनेक शोध -प्रयोगों द्वारा निरूपित किया है कि मनुष्य अपने संबंधियों, माता-पिता और भाई-बहनों से ही नहीं, मित्रों और ज्ञात-अज्ञात साथी-सहचरों से भी प्रभावित होता है। आज जन्म लेने वाले बालक का पच्चीस साल बाद 21 जुलाई 2015 को किस व्यक्ति से परिचय होगा। उसका कैसा स्वभाव होगा, यह पता किया जा सकता है। बी.वी.रमन ने इस तरह के कितने ही प्रयोग किए और उनके निष्कर्ष सही निकले। इस अध्ययन में व्यक्ति के निवास, वहाँ के वातावरण ओर घर के आसपास उगे पेड़-पौधे के बारे में भी बता दिया गया । सन् 1992 में दिल्ली में श्री रमन ने कहा था कि 1999 में आप यहाँ से ढाई सौ किलोमीटर दूर चंडीगढ़ में होगे । वहाँ आपके घर के सामने नीम के दो पेड़ होगे घर के आसपास एक छोटा सुँदर बगीचा भी होगा। अशोक शर्मा ने उस समय ये बातें नोट कर ली और यों ही कहीं रख लीं। सात साल बीतते-बीतते वे वास्तव में चंडीगढ़ पहुँच गए जिस जगह ठिकाना मिला उसे देखकर लगा कि इस जगह के बारे में पहले कभी कुछ सुना है। जगह परिचित-सी लगी। स्मृति पर जोर दिया, तो सात साल पूर्व कही बातें याद आने लगीं।

इस तरह के उद्धरणों ओर प्रमाणों का आशय यह नहीं है कि नियति ही सब कुछ हैं ज्योतिष संभावनाओं का सुनिश्चित विज्ञान हैं। इस आधार पर अतीत को समझा जा सकता है और आने वाले समय का निर्धारण किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, कुँडली के छठे भाव से व्यक्ति के बैरी-विरोधियों का अनुमान लगाया जाता है। नैष्ठिक और सात्विक ज्योतिर्विद् बता सकते हैं कि व्यक्ति ने पिछले जन्म में किन के प्रति अपराध हुए है, वे वर्तमान जन्म में भी किसी -न-किसी रूप में विद्यमान हैं ओर भाव बताता है कि वे कैसा व्यवहार करेंगे । उन संभावनाओं को स्थान में रखकर अपने आचार-व्यवहार को मर्यादित रखा जा सकता है। आचार्य बृहस्पति देव ने सरोजनी नगर के एक जातक का छठा और बारहवाँ भाव देखकर बताया कि आपने पिछले जन्म में कम से कम सत्तर निर्दोष जीवों का वध किया है। वे इस जन्म में अपना वैर चुका सकते हैं। जातक ने इस होनहार को आधार मानकर प्राणियों के प्रति सदय और आत्मीय व्यवहार शुरू किया। माँसाहार छोड़कर सात्विक भोजन करने लगा। उन जातक का कहना है कि अब तक चार बार ऐसी घटनाएँ हुई जिनमें दूसरों के कारण कष्ट उठाना पड़ा। एक बार बैल ने सींग मार दिया , ज्यादा चोट नहीं लगी। दूसरी बार स्टेशन पर अकारण ही किसी का कोपभाजन होना पड़ा। दो अन्य घटनाओं में छोटी माटी झड़पें शामिल हैं। उन जातक के मार्गदर्शक का कहना है कि अपने कर्म का परिणाम भोगने और वैर-वृद्धि का त्याग करने से कठिन परिस्थितियाँ आसान और सहन करने लायक स्थिति लेकर आई। वृति यदि पहले की तरह क्रूर होती, तो संभव है ज्यादा कष्ट सहने पड़ते।

जन्मकुँडली व्यक्ति के पिछले कर्मों और उनके भावी परिणामों का ब्लू प्रिंट हैं। इस आधार पर भी कर्मफल की सुनिश्चिता तय होती हैं अध्यात्म की दृष्टि से ज्योतिष का एक पक्ष यह है कि मनुष्य को स्वतंत्र होने का दम नहीं भरना चाहिए।ग्रह-स्थिति और उनका प्रभाव यह भी सिद्ध करते हैं कि पूरा ब्रह्म एक शरीर है और जीव-चेतना उसका एक घटक। कहीं भी होने वाले परिवर्तन पूरे शरीर को प्रभावित करते हैं। इस नाते कोई किसी भी स्तर की सफलता अर्जित कर ले, उसे गर्व से फूल नहीं जाना चाहिए कि अकेले अपने प्रयत्नों का परिणाम है। समूचा अस्तित्व उसे अपने अनुग्रहों से कृतकृत्य करना चाहता है, तभी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ अर्जित होती है।


सेवा-साधना की एक मिसाल

मनुष्य-जन्म की शुरुआत सेवा से होती है और अंत भी उसी में। जीवन का आदि और अंत-यह दो ऐसी अवस्थाएँ है, जब मनुष्य सर्वथा अशक्त-असमर्थ होता है, इसलिए उसे सहारे की आवश्यकता पड़ती है । इन दोनों का मध्यवर्ती अंतराल ही ऐसा है, जिसमें आदमी सबसे समर्थ, सशक्त और योग्य होता है यही वह काल है, जब उसे स्वयं पर किए गए उपकारों के बदले समाज को उपकृत करके ऋण चुकाना पड़ता है यदि वह ऐसा न करे और जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत सेवा लेता रहे, तो उसकी वह कृतघ्नता मरणोत्तर जीवन में ऐसा वज्राघात बनकर बरसती है, जिसके लिए उसके पास सिर्फ पछतावा ही शेष रहता है। इसलिए समझदार लोग सेवा की महत्ता को समझते और उसे अपनाते हैं

ऐसे ही लोगों में एक है, डॉ0 शरद कुमार दीक्षित । न्यूयार्क के बुकलिन क्षेत्र के निवासी डॉ0 दीक्षित भारतीय मूल के एक सुयोग्य प्लास्टिक सर्जन है। विगत लगभग दो दशकों से वे सेवा की ऐसी प्रतिमूर्ति बने हुए हैं , जिसका उदाहरण अन्यत्र मिलना मुश्किल हैं । यों समाज में रहने वाले हर एक व्यक्ति द्वारा दूसरे की न्यूनाधिक सहायताएँ होती रहती हैं, भले ही वह मजबूरीवश बन पड़े या किसी अपरिहार्य कारणवश, पर सेवा जिस उच्चस्तरीय भावना का नाम है, वह निःस्वार्थ हुए बिना बन नहीं पड़ती । यह निस्स्वार्थता यदि कहीं ढूँढ़नी हो , तो वह डॉ0 दीक्षित के जीवन में देखी जा सकती है। त्याग और समर्पण का ऐसा अद्भुत समन्वय विरले ही कहीं दिखाई पड़ता है।

अपने विद्यार्थी जीवन में अक्सर वे सोचा करते कि क्या जीवन सिर्फ लेना-ही - लेना है? समाज को निस्पृह होकर देने का दायित्व क्या उसका नहीं ?यदि ऐसा ही है, तो धर्म और अध्यात्म की उपयोगिता कितनी है? इस पर विचार होना चाहिए। धर्म जीवन को अनुशासित करने वाली विधा है, यदि यह सच है, तो उसका व्यावहारिक रूप समाज सेवक किसी भजनानंदी धार्मिक की तुलना में कम धार्मिक या अधार्मिक कैसे हो सकता है?

प्रश्नों के इन झंझावातों से कई बार वे इतने विचलित हो उठते कि यह तक सूझ नहीं पड़ता कि ज्ञान की कौन−सी धारा अपनाई जाए कि उसका स्वार्थ और परमार्थ दोनों सध सकें । भावुकता पर काबू पाकर काफी विचार मंथन के बाद उनने यह निश्चय किया कि चिकित्सा का क्षेत्र ही एक मात्र ऐसा क्षेत्र है, जिससे जीविकोपार्जन और लोक मंगल का द्विविधि कार्य सरलतापूर्वक संपन्न होता रह सकता है। यह निर्णय कर उनने चिकित्सा शास्त्र में प्रवेश ले लिया और अंततः प्लास्टिक सर्जन बनकर निकलें।

(धर्म जीवन को अनुशासित करने वाली विधा है, यदि यह सच है, तो उसका व्यावहारिक रूप समाज-सेवा को मानना ही पड़ेगा । ऐसे में एक समाज सेवक किसी भजनानंदी धार्मिक की तुलना में कम धार्मिक कैसे हो सकता है?)

आरंभ में उनने अपने गृहराज्य महाराष्ट्र को अपनी सेवाएँ दी , पीछे अमेरिका चले गए। वहाँ भी वे चैन से न रह सके। लोगों का निराश स्वर, म्लान मुख ,बेबस आँखें जब उनके मानस पटल पर उभरतीं, तो वे व्याकुल हो उठते, सोचते, कैसे उनके चेहरों को फूल की तरह खिलाऊँ और मुस्कराहट पैदा करूं ? पर जब अपनी विवशता का ध्यान आता, तो संपूर्ण उत्साह तप्त तवे पर पानी उड़ेलने की तरह ठंडा पड़ जाता । धन और साधन के बिना अच्छी से अच्छी योग्यता भी कितनी निकम्मी साबित होती है, यह आज उन्हें ज्ञात हुआ। उन्हें लगा कि दुनिया में संपत्ति के अभाव में शायद लोकसेवा भी असंभव है, इसलिए ऐसे लोगों की पहली आवश्यकता संपदा इकट्ठी करना होनी चाहिएं। इतना निश्चय कर वे अपने डॉक्टरी पेशे में रात-दिन एक करके जुट पड़े । परिश्रम और लगन जब कभी समन्वित होते हैं ,तो कुबेर की तरह धन संचय में देर नहीं लगती। डॉ0 दीक्षित के साथ भी यही हुआ । कुछ ही वर्षों में उन्होंने इतने पैसे जमा कर लिए कि उससे लोककल्याण के कार्य का सरलतापूर्वक श्रीगणेश किया जा सकें।

आगे उन्होंने एक साहसिक निर्णय लिया कि छह महीने अमेरिका रहकर आजीविका निर्वाह के निमित्त श्रम करेंगे और शेष छह महीने भारत जाकर गरीबों का निःशुल्क उपचार। तब से लेकर अब तक उनका यह क्रम अनवरत रूप से लेकर अप्रैल माह तक तह महाराष्ट्र में रहते और हजारों अभावग्रस्त लोगों के चेहरों को खूबसूरती प्रदान करते हैं । जिनके आँख, कान , नाक या ओष्ठ में किसी प्रकार के बाह्य विकार जन्मजात रूप से या दुर्घटनास्वरूप बन गए हों , वे उसे ऑपरेशन द्वारा ठीक कर देते हैं इस प्रकार जो व्यक्ति अपनी निर्धनता के कारण इन्हें ढोने के लिए मजबूर थे, वे अब अपनी विकृति निवारण के उपरांत काफी प्रसन्नता अनुभव करते हैं। इस संबंध में डॉ0 दीक्षित कहते हैं कि ऑपरेशन के बाद लोगों के मुरझाए चेहरे पर चमक देखकर उनको अपार संतोष होता है भगवान् से प्रार्थना करते हुए वे कहते हैं कि ईश्वर उन्हें इस योग्य बनाए रखे कि वह लंबे-से लंबे समय तक यह कार्य करते रह सकें । उनका मत हैं तो कदाचित् उससे बढ़चढ़कर नहीं होगा जैसे कि वे हर मरीज को विकार-मुक्त करने के बाद अनुभव करते हैं।

उपचार के निमित्त वे जिस ऑपरेशन थियेटर का उपयोग करते हैं, वह एकदम कामचलाऊ और साधारण किस्म का है। उसमें दो मेजें, कुछ कुर्सियां और थोड़े-से अत्यंत आवश्यक उपकरण हैं। उनकी सहायता के लिए हर वक्त दो महिला सहयोगी वहाँ मौजूद रहती हैं। वे ऑपरेशन के दौरान उनका हाथ बँटाती हैं।

प्रतिदिन 30 से लेकर 35 ऑपरेशन करने के पश्चात् वे इतने थक जाते हैं कि आराम की आवश्यकता महसूस होती है। इसके बावजूद यदि कोई उनसे अपनी सर्जरी उसी दिन कर देने का आग्रह करता है, तो वे उसे टालते नहीं, पर ऐसा प्रायः कम हो है। इन ऑपरेशनों पर आमतौर से 15 से 20 हजार रुपये के बीच खर्च आता है, लेकिन मरीजों से एक पाई नहीं ली जाती। इलाज तक रहने-खाने का व्यय उनका अपना होता है और इलाज पूरा होते ही उन्हीं छुट्टी दे दी जाती है। इस प्रकार के धर्मार्थ इलाज में प्रतिवर्ष हजारों डालर उनका निज का खर्च हो जा है। इसके बाद भी वे बीस वर्षों से भी अधिक समय से इस सेवा को जारी रखे हुए है। कारण पूछने पर इतना ही कहते हैं कि ध्यान और समाधि का आनंद बड़ा अद्भुत है, ऐसा पढ़ा-सुना है, किंतु अपने कार्य से जितना आत्मिक संतोष मिलता है, वह किसी भी प्रकार उस सुख से कम होगा, ऐसा नहीं लगता। उनका निजी अनुभव है विराट् ब्रह्म की उपासना उस ईश्वरोपासना से अनेकों गुना चमत्कारिक है, जिसे हम व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए मंदिर-मस्जिद में आए दिन करे हैं। धर्मस्थलों में सिजदा करने और सिर नवाने से उनका कोई विरोध नहीं, आस्तिक होने के नाते वे भी ऐसा करते हैं, पर वे कहते हैं कि जिस प्रकार ‘परीक्षा-परीक्षा’ रटने मात्र से कोई विद्यार्थी पास नहीं हो सकता, उसी प्रकार केवल भगवान् का नाम जपकर उसे प्राप्त नहीं या जा सकता। उसके लिए उसका काम करना पड़ता है। यह काम मानवता की सेवा से बढ़कर दूसरा कोई हो नहीं सकता, ऐसा उनका मत है।

इस विधि की विडंबना ही कहनी चाहिए कि जो व्यक्ति अपना वैभव लुटाकर दूसरों को स्वस्थता और खुशियाँ बाँट रहो है, वही आज अनेक रोगों का शिकार है। डॉ0 शरद कुमार दीक्षित कैंसर के मरीज हैं। उन्हें दिल की भी बीमारी है। इतना ही नहीं, कोढ़ में खाज की तरह ते पक्षाघात से भी ग्रस्त हैं वर्षों पूर्व उनकी वाक्शक्ति भी प्रभावित हो चुकी है। इन सब रोगों के बाद भी वे जिस समर्पण भाव से अपनी सेवा साधना में जुटे हैं, वह वास्तव में स्तुत्य है। ऐसे व्यक्ति इहलोक में ही स्वर्ग-मुक्ति के उस आयाम को प्राप्त कर लेते हैं, जिसके लिए शास्त्रों में अन्य लोकों की चर्चा हैं।

सेवा प्रकाराँतर से एक साधना है। जो इसे भली प्रकार संपन्न कर लेता है, समझना चाहिए उसने सब कुछ पा लिया । यों ईश्वरप्राप्ति जीवन का चरम लक्ष्य है, पर जहाँ निर्दोष और निर्विकार सहयोग, सम्मान,यश, कीर्ति आदि हो, वहाँ भी ईश्वरीय अंश प्रकाशित हो रहा होता है, ऐसा आप्तवचन हैं। ऐसे में वह व्यक्ति चमत्कारिक ईश-विभूतियों को भले ही न पा सके , पर आत्मिक ऋद्धि और भौतिक सिद्धियों का स्वामी तो हो ही जाता है। इसीलिए सेवा को सर्वोपरि ईश्वर-उपासना कहा गया है। इसे हर हालत में हर एक को करनी ही चाहिए।


आत्मा का आहार है - प्रार्थना

अध्यात्म-साधना के क्षेत्र में निरंतर प्रगति करने के लिए प्रार्थना का महत्वपूर्ण स्थान हैं। श्रद्धासिक्त समर्पचा इसी का नाम हैं । प्रार्थना करना जिन्हें आ है वे योग, जप , तप आदि जैसे कष्टसाध्य उपक्रमों के बिना ही ईश्वर से वार्तालाप करने की सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक प्रणाली है, जिसमें न किसी मंत्र की , छंद की आवश्यकता पड़ती है और न किसी कर्मकाँड की । वह तो हृदय की, अंतःकरण की निश्छल पुकार है, जो सीधे परमात्मा तक पहुँचती हैं और बदले में प्रार्थी को कृतकृत्य करके छोड़ती है।

प्रार्थना का अर्थ है कि में अकेला हूँ । अकेला होकर भी बिलकुल असहाय हूँ। यदि परमसत्ता का सहारा न मिले तो मुझसे कुछ भी न हो सकेगा । इस तरह प्रार्थना असहाय अवस्था की बोधक हैं। प्रार्थना पुकार है अस्तित्व के प्रति कि तेरा सहारा चाहिए, तेरा हाथ चाहिए, प्रत्युत्तर भी इसी का मिलता है। इस संदर्भ में तीन हजार वर्ष पूर्व राजा डेविड ने एक प्रार्थना-पुस्तक लिखी है, जिसके आरंभ में ही बताया है, मेरी ताकत जवाब दे रही है। आँखों में अँधेरा छाने लगा है।तब मैं प्रार्थना करने बैठा हूँ हृदय से मानो ध्वनि उठती है, तुम्हें परास्त नहीं होना चाहिए। तुम उठकर फिर से चलने लगोगे । इस दुनिया में हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तुम्हें सँजोया गया हैं हर कठिनाई आने वाली सफलता का नया सोपान है। जीवन जलती हुई एक दीपशिखा है, जो स्वयं जलकर दूसरोँ को प्रकाश देती हुई अपने मन के अँधेरे का भी विनाश करने में संलग्न है। यह रोशनी दिव्य चेतन सता ने प्रदान की है। तुम इसका अपने विकास के लिए उपयोग करो और अपने अनुगामियों के लिए साहस की धैर्य की विरासत छोड़कर जाओ।

ईश्वर प्रेम का स्वरूप है, बुद्धि का स्वरूप है। वह सर्वभूतमय है। ईश्वर का ज्ञान शाश्वत है, जिसके लिए एकाग्रता, विश्वास भी गहन ऊर्जा ओर तीव्रतर ललक की आवश्यकता है। यहाँ प्रश्न उठता है कि जब ईश्वर सर्वशक्तिमान् है, सर्वत्र संव्याप्त है, अपरिमित है, सर्वज्ञ है, तो फिर अपनी प्रार्थना के द्वारा हम उसको सूचना क्यों देते हैं? वस्तुतः हमें जो कुछ स्रष्टा से प्राप्त हुआ है, उसके लिए प्रार्थना के द्वारा उस सर्वशक्तिमान् के प्रति हम अपनी कृतज्ञता प्रदर्शन करना उत्तम होता है । ऐसा करने से हमें उच्चस्तरीय दैवी अनुदान एवं वरदानों की प्राप्ति संभव हो सकेगी।

यदि हम वास्तविक रूप से उस महान् सता के प्रति अपने जीवन, सत्य ओर फिर भी हम कृतज्ञता का प्रदर्शन करते हैं, ता यह हमारा दिखावा मात्र है, ढोंग है। जब तक हमारे हृदय में सत्य और प्रेम नहीं होगा, तो हम जीवन की नीरसता को छिपा नहीं सकेंगे। ईश्वर की आज्ञाओं पर चलना ही सच्ची प्रार्थना और पूजा हैं। उसकी आज्ञा मानना ही उसके प्रति प्रेम है।

(अपने अहं को गलाकर समर्पण की नम्रता स्वीकार करना और उद्धत उच्छृंखल मनोविकारों को ठुकराकर परमेश्वर का नेतृत्व स्वीकार करने का नाम प्रार्थना है। गहन अंतस्तल से निकली हुई प्रार्थना, जिसमें आलपरिवर्तन की आस्था जुड़ी हुई हो , भगवान् का सिंहासन हिला देती हैं ऐसी प्रार्थना के परिणाम ऐसे अद्भुत होते हैं, जिन्हें चमत्कार कहने में कुछ हर्ज नहीं हैं।)

प्रख्यात मनोवेत्ता डॉ0 एमेली केडी के अनुसार, प्रार्थना मात्र परमात्मा को धन्यवाद देने, कोरी कृतज्ञता व्यक्त करने या उससे कुछ याचना करने की प्रक्रिया का नाम नहीं है, वरन् यह वह मनःस्थिति है, जिससे व्यक्ति शंका ओर संदेहों के जाल-जंजाल में से निकलकर श्रद्धा की भूमिका में प्रवेश करता है। अपने अहं को गलाकर समर्पण की नम्रता स्वीकार करना और उद्धत-उच्छृंखल मनोविकारों को ठुकराकर परमेश्वर का नेतृत्व स्वीकार करने का नाम प्रार्थना है। इसमें यह संकल्प भी जुड़ा रहता है कि भावी जीवन परमेश्वर के निर्देश के अनुसार पवित्र और परमार्थी बनाकर जिया जाएगा । ऐसी गहन अंतस्तल से निकली हुई प्रार्थना , जिसमें आत्मपरिवर्तन की आस्था जुड़ी हुई हो , भगवान् का सिंहासन हिला देती है। ऐसी प्रार्थना के परिणाम ऐसे अद्भुत होते हैं, जिन्हें चमत्कार कहने में कुछ हर्ज नहीं हैं।

घटना सोलहवीं शताब्दी की हैं। मुगल सम्राट बाबर का पुत्र हुमायू बीमार पड़ गया। चिकित्सकों-वैद्यों ने अनेकों उपाय-उपचार किए, फिर भी उसका स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन बिगड़ा ही गया। हुमायू की यह दशा देखकर युद्ध की थकावट एवं चिंता के कारण पहले से ही अस्वस्थ बाबर और भी अधिक चिंतित हो उठा, संकट की इस घड़ी में भी उसकी धर्मनिष्ठा, आत्मविश्वास एवं संकल्प-दृढ़ यथावत् बनी हुई थी। उसने संकल्प किया कि वह अपने प्राण के बदले, जीवन के बदले ईश्वर से हुमायू की प्राणरक्षा की भीख माँगेगा।

कहते हैं कि संकल्पी होकर बाबर ने हुमायू के पलंग की तीन बार परिक्रमा की और आँखें बंद करके एकाग्रचित्त हो पूर्ण समर्पित भाव से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर। यदि मेरे प्राण के बदले में हुमायू स्वस्थ हो सका है और जीवित रह सका है, मैं इसे उस पर निछावर करने को पूर्णरूपेण प्रस्तुत हूँ। हुमायू का सारा रोग मेरे ऊपर आ जाए और वह पूर्ण स्वास्थ्य हो जाए।” ईश्वर की लीला विचित्र है। वह अपने उपासक की करुण पुकार को अवश्य सुनता है। हुआ भी यही। अगले ही दिन से हुमायू क्रमशः स्वास्थ्य होने लगा और धर्मनिष्ठा पिता का स्वास्थ्य गड़बड़ाने लगा। ईश्वर ने उसकी पुकार जो सुन ली थी। यह इतिहास-प्रसिद्ध घटना है कि उसके बाद ही 26 दिसंबर सन् 1560 को बाबर का आगरा में निधन हो गया।

शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान् भाव के भूखे हैं। उनके निकट भावना का महत्व सर्वोपरि है। श्रद्धा, विश्वास एवं भावना की गहना ही प्रार्थना का फलवी बनाते हैं। छाँदोग्योपनिषद् में उल्लेख है, “यदेव श्रद्धया जुहोत तदेव वीर्यवत्तरं भवे” अर्थात् श्रद्धापूर्वक की गई प्रार्थना ही फलवती होती है। अतः भावना जितनी सच्ची, गहरी और श्रद्धापूर्ण होगी, उतना ही उसका सत्परिणाम भी होगा। इसलिए शब्दों को रटने की, चिह्न−पूजा करने की अपेक्षा समुचित श्रद्धा के साथ प्रार्थना की भावनाओं को अंतः करण में बैठा अनुभव करते हुए ईश्वर के सम्मुख अपने मनोभाव प्रस्तुत करना चाहिए। भगवान् जब सृष्टि के कण-कण में समाया हुआ है, तो वह अपने रोम-रोम में भी समाया हुआ है। साँसों के साथ थिरकता हुआ वह बाहर आता और बाहर जाता रहता है। हृदय समेत समस्त नस-नाड़ियों में उसी की धड़कन और रक्त में उसी की गरमी काम कर रही है। प्राण−चेतना और भावना के रूप में वही तो अपनी प्रेरक शक्ति बना बैठा है। ऐसे अभिन्न हृदय मित्र से, स्वजन-स्नेही से जी खोलकर बातें करने में संकोच ही क्यों होना चाहिए उसके साथ जी खोलकर बातें करने में भय ही क्या है प्रार्थना यदि भावनापूर्ण है तो वह बिना पूजा-साधना के भी उतनी ही प्रभावशाली हो सकी है। जितनी कि विधि-विधान के साथ किए गए नियमित उपासना-साधना की।

प्रार्थना एक प्रकार का प्रायश्चित है। अध्यात्मशास्त्रों में जितने प्रकार के प्रायश्चों का उल्लेख है, उन सब में प्रार्थना सबसे अधिक शक्तिशाली है। प्रार्थना के द्वारा हम अपने अहंकार, पाप, कषाय-कल्मष एवं दुखों के अंधकार को छिन्न-भिन्न कर सकते हैं और अंतर्मन में छिपी हुई दुर्भावनाओं, दुराग्रहों एवं समस्त कमजोरियों का मूलोच्छेदन कर सकते हैं। मन का साधने एवं शिक्षित करने की सबसे पहली सीढ़ी प्रार्थना है। अपने किए हुए दुष्कर्मों के लिए पश्चाताप करना और दुबारा किसी तरह से पापकर्म में संलिप्त न होने के लिए संकल्पशक्ति की अभिवृद्धि के लिए ईश्वर से प्रार्थना करना सुधार का प्रथम सोपान है। दूसरा सोपान आत्मसुधार का है।

ईश्वर से तादात्म्य स्थापित करने में प्रार्थना से बढ़कर और कोई साधना-मार्ग नहीं है। सूर, तुलसी, मीरा, तुकाराम, समर्थ रामदास, चैतन्य महाप्रभु, नरसी भगत आदि संत-महात्माओं की प्रार्थनाएं प्रख्यात हैं। श्रद्धा-भक्ति से ओत-प्रोत होकर हृदय की गहराई से विश्वासपूर्वक थोड़े समय के लिए भी की गई प्रार्थना उतना ही प्रतिफल प्रदान करती है जितना कि योगी, यती, तपस्वी लंबे समय तक कष्ट-साध्य साधना-तपश्चर्या के द्वारा प्राप्त करे हैं। सच्ची प्रार्थना से अंतरात्मा के गहनतर भाग से एक आंतरिक दिव्य चैतन्य प्रकाश प्रस्फुटित होता है, जिस के लिए शास्त्रों में कहा गया है, “तमेव भान्तमनुमति सर्व तस्य भासा सकलं विभा” अर्थात् यही वही गूढ़ आँतरिक प्रकाश है, जो जगत् के समस्त चराचर प्राणियों को आलोक प्रदान करता है। प्रार्थना असय से सय की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाने वाली दिव्य प्री है। इसके द्वारा हम ईश्वर से अपना संबंध जोड़कर महान् विभूतियों के स्वामी बन सके है और समस्त आधि-व्याधियों, कष्ट-कठिनाइयों एवं रोग-शोकों से मुक्ति पा सकते हैं।

योग-शास्त्र में यम-नियमों के नाम से जिन दस अनुबंधों का निर्देश दिया गया है, उनमें सभी धर्मशास्त्रों, सत्प्रेरणाओं, मानवीय गुणों और आध्यात्मिक भावों का समावेश हो जाता है। कर्मकाँड और विधि-विधान की बारीकियों में नहीं जाना पड़े, इन आदर्शों के याद किसी धर्म−संप्रदाय की आवश्यकता नहीं रह जाती। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, शैच संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्राणिधान को साध लिया जाए, तो समूचा धर्म-अध्यात्म सध गया। यह मानने की जरूर नहीं है, इसे प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सका है। मनीषियों ने इन दस गुणों अथवा भावों को सार्वभौम धर्म कहा है।

जिस ग्रंथ में इनका उपदेश किया गया, उस पातंजलि योगसूत्र में धार्मिक कर्मकाँडों का विस्तार नहीं है, उनका प्रतिपादन भी नहीं है। योगसूत्र मनुष्य की प्रवृत्ति, आँतरिक स्थिति और संभावनाओं के तालमेल के साथ दुःख की आत्यंतिक निवृत्ति का मार्गदर्शन करता है। कोई विधि-व्यवस्था नहीं देता। समाजशास्त्र, राजनीति, भौतिक विज्ञान, मनोविज्ञान, चिकित्सा, मौसम, कृषि विज्ञान, नक्षत्र-विद्या और उत्खनन, निर्माण आदि विज्ञानों में सिद्धाँत-नियम बदलते रहते हैं। इन विद्याओं में आए दिन नई खोजें होती हैं। नए निष्कर्ष सामने आते हैं। उनके कारण प्रचलित मान्यताएँ बदलनी पड़ती है, लेकिन गणित के नियमों में कहीं कोई फेर-बदल नहीं किए जाते। कारण कि वे ध्रुव सत्य है। योगसूत्रों के संबंध में भी यही बात कही जा सकती है।

अध्यात्म-दर्शन की स्थापनाओं और अनुभूतियों-अभिव्यक्तियों में अंतर हो सकता है। भारतीय दर्शन की मान्यताएं ईसाई या इस्लाम की दार्शनिक अवधारणाओं से भिन्न हो सकती है। भारतीय दर्शन में ही वेदाँत, भक्ति, शैव, शाक्त आदि दार्शनिक धाराओं में अंतर है। उनकी स्थापनाएँ एक-दूसरे से विरुद्ध होंगी, लेकिन योग सिद्धाँतों और सूत्रों का किसी दार्शनिक विचार से कोई विरोध नहीं है, वे सार्वभौम हैं। उन्हें सभी देश-कालों में सिद्ध किया जा सकता है। सिद्ध कर लिया जाए, तो चेतना को सर्वोच्च लक्ष्य तक विकसित किया जा सका है।

यम-नियमों के रूप में जिन आदर्शों का निर्देश दिया गया है, वे कर्मकाँड प्रधान नहीं है। उनका सिद्धाँत ऐसा नहीं है कि पालन करने के लिए बारीकियों का ध्यान रखना पड़ेगा। सभी गुण आँतरिक हैं। उनके प्रति श्रद्धा जगा ली जाए, तो व्यवहार में उतारने के लिए सावधानी और सजगता रखना भर पर्याप्त है। अहिंसा, सत्य आदि यम-नियम व्यवहार से सिद्ध होने लगे, तो आत्मिक प्रगति अबाध रूप से होने लगती है।

दस गुणों या आदर्शों को बोलचाल की भाषा में व्रत कहा जाता है। योगसूत्र के ऋषि ने इन्हें दो वर्गों में बाँटा है, यम और नियम। वर्गीकरण का उद्देश्य उनका सूक्ष्म और स्थूल रूप है। उन्हें आंतरिक और व्यवहार में दिखाई देने वाले बाहरी व्रत भी कह सकते हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह को विभिन्न संप्रदायों में पंच महाव्रतशील और धर्म के रूप में भी निरूपित किया है। इन व्रतों के प्रति निष्ठा और धारणा पर जोर दिया जाता है निष्ठा जमा ली जाए , संकल्प कर लिया जाए, अपनी आस्था में इन व्रतों को सामेट लें, तो व्रत अस्सी प्रतिशत सिद्ध हो जाते हैं। बीस प्रतिशत भाग व्यवहार में अपने आप प्रकट होने लगता है। समुद्र में तैरने वाले हिमखंडों की तरह इन व्रतों का तीन-चौथाई हिस्सा आँतरिक चेतना में स्थिर होता है। स्मरण रहे व्यवहार में दिखाई देने वाले स्वरूप का आंतरिक स्थिति के बिना कोई आधार भी नहीं है।

शौच, संतोष,तप स्वाध्याय और ईश्वर-प्राणिधान के पाँच व्रतों को नियम की संज्ञा दी गई है। योगशास्त्र को व्यवस्थित विज्ञान का रूप देते हुए महर्षि पतंजलि के इन निर्धारणों का स्वरूप आँतरिक और बाह्य दोनों हैं। आस्था क्षेत्र में जिस गहराई तक ये स्थिर होते हैं, उसमें कई गुना विस्तार बाह्यजगत में होता है।

विभिन्न आचार्यों-उपदेशकों ने यम -नियमों को शुष्क शास्त्रीय ढंग से ही समझाया है। अध्यात्म और योग के प्रति प्रगाढ़ रुचि हो तो संकेत रूप में समझाया गया शास्त्र और सिद्धाँत भी पर्याप्त है। लोग उसे अपनी लगन से ही ग्रहण कर लेंगे। लेकिन चारों ओर प्रमाद व्याप्त हो , लौकिक जीवन में इतनी ज्यादा उलझनें और आपाधापी हो कि उनसे सिर उठाने की फुरसत ही न मिले,तो महाव्रतों का व्यावहारिक स्वरूप स्पष्ट करना जरूरी है। यम-नियमों को, दस महाव्रतों को चित, बुद्धि -व्यवहार में किस तरह उतारा जाए, यह बताए बिना समाधान नहीं होता ।

सामान्य अर्थों में दस महाव्रत गूढ़ नहीं है। शब्दकोश में अथवा योगदर्शन की साधारण टीकाओं में देखकर इनके अर्थ समझे जा सकते हैं, बहुत सरल है। उदाहरण के लिए टीकाओं में लिखा मिलेगा कि अहिंसा का अर्थ है, प्राणिमात्र को मन, वचन और कर्म से किसी भी प्रकार कष्ट नहीं देना। सत्य अर्थात् जैसा देखा, सुना और समझा गया है, उसे उसी रूप में प्रकट कर देना। चोरी नहीं करने का नाम अस्तेय है। इस व्रत में दूसरों के स्वत्व पर मन में रुझान भी नहीं आने देना चाहिए। जननेंद्रियों का संयम ब्रह्मचर्य है। ममत्व-बुद्धि से पदार्थों के संग्रह का नाम परिग्रह हैं। वस्तुओं में ममत्व का भाव न रखा जाए और न ही उन्हें इकट्ठा किया जाए । यह अपरिग्रह हुआ। पाँच यमों के बाद पाँच नियमों का विवेचन भी इस शैली में किया गया है। शौच का अर्थ है, शरीर ,मन और आसपास के क्षेत्र की स्वच्छता । जो मिल जाए उससे अधिक की कामना नहीं करें यह संतोष हुआ । अपने धर्म का पालन करने के लिए कष्ट सहने का अभ्यास तय कहा गया हैं। स्वाध्याय का अर्थ है, भक्ति,ज्ञान वैराग्य में रुचि जगाने वाले शास्त्रों और ग्रंथों का अध्ययन। दसवें व्रत या अंतिम नियम के रूप में ईश्वर का स्मरण, चिंतन और ध्यान करना ईश्वर-प्राणिधान है।

दस व्रतों के साँकेतिक अर्थों ने साधकों के मन में उलझनें खड़ी की है। जिन दिनों डेढ़-दो घटे प्रतिदिन शास्त्र-चिंतन किया जाता था, चर्चाएं चलती थीं और विद्वज्जनों की गोष्ठियाँ होती थी, उन दिनों एक दो पंक्ति में की गई परिभाषाएँ पर्याप्त थी। लेकिन आज ये परिभाषाएँ जटिल ही हैं । व्यवहार -क्षेत्र में इनसे कोई सहायता नहीं मिलती, इसलिए पढ़-सुनकर लोग नाक भौं ही सिकोड़ते हैं। उनके प्रति श्रद्धा जागने के स्थान पर उपेक्षा के भाव ही आते हैं। आठ-दस रुपये में मिलने वाली टीकाओं से खीझकर कुछ आलोचकों ने तीखी टिप्पणियाँ की है। उनके अनुसार इस तरह की पुस्तकें आठ-दस रुपये में भगवान् तक पहुँचने का टिकट है । भगवान् तक पहुँचने का कोई टिकट नहीं हो सकता, इसलिए छलावा हैं।

ये नियम सिर्फ आँतरिक अनुशासन ही नहीं है, लौकिक जीवन में सफलता , समृद्धि और यश भी इनसे प्राप्त किया जा सकता है। महाभारतकार ने जिस धर्म को मोक्ष का ही नहीं अर्थ और काम को भी सिद्ध कराने वाला विज्ञान बताया है, वह इन व्रतों में गुँथा हुआ है। सही भी है, जो चाबी ईश्वर या मोक्ष जैसे परम पुरुषार्थ का द्वार खोलती है, वह लौकिक जीवन के द्वार कैसे छोड़ देगी। यह जीवन परमात्मसत्ता का प्रारंभिक परिचय ही तो है। अहिंसा , सत्य , अस्तेय आदि व्रतों की तुलना उन संख्याओं से की गई है, जिनके मिलाने पर नंबर से संचालित ताले और द्वार खल जाते हैं। जरूरी है कि इनका उपयोग और बारीकियाँ समझी जाएँ।

दसों महाव्रतों को क्रम से समझने के लिए व्यावहारिक जीवन की कठिनाइयों को ध्यान में रखना चाहिए। उदाहरण के लिए, कहना आसान है कि प्राणिमात्र को किसी भी प्रकार कष्ट नहीं दिया जाए। यह स्थिति है जिसे प्राप्त करना हैं। लेकिन इसे व्यवहार में कैसे उतारें । दैनिक जीवन में पग-पग पर इस व्रत की अवहेलना होती है। सुबह जल्दी उठकर काम पर जाना हो, तो परिवार के लोगों को कष्ट पहुँचाने के रूप में ही व्रत टूटने लगता है। दफ्तर या कारोबार में कोई निर्णय लेना पड़े,तो उससे कुछ लोगों को सुविधा होगी और कुछ को कष्ट । इन विरोधाभासों का क्या समाधान है? दस महाव्रतों का शाब्दिक या साधारण अर्थ मानने पर इस तरह के कितने ही प्रश्न खड़े होंगे।

अपने आसपास की परिस्थितियों ओर आवश्यकताओँ के अनुरूप दस महाव्रतों का निर्वाह किस तरह हो सकता है, यह मंथन जरूरी है। मंथन किया जाए, तो संजीवनी विद्या की वह सिद्धि हो सकती है जिसमें अपना, दूसरों का और पूरे समाज का हित है। सभी को प्रसन्न और संतुष्ट नहीं किया जा सकता , यह सही है, लेकिन यह भी सही है कि दूसरों को खिन्न और रुष्ट किए बिना स्वयं प्रसन्न रहा जा सकता है। आत्मिक प्रगति का यह राजमार्ग दस महाव्रतों के चिंतन-मनन से खुलता है अखंड ज्योति के पन्नों पर क्रम से इस विषय में पथ के प्रदीप प्रस्तुत है।


अहिंसा अर्थात् सबके प्रति भगवद्भाव

अहिंसा के निषेधपरक अर्थ से हम ज्यादा परिचित है। मन, वचन और कर्म से किसी को भी किसी प्रकार कष्ट नहीं देना अहिंसा का लक्षण है। जब कोई सबके प्रति वैर-भाव से मुक्त हो जाता है, तो यह लक्ष्मण चरितार्थ होता है। अहिंसा की यह पूर्ण स्थिति है। व्यवहार में इसे साधते चलेंगे, तो पग-पग पर इतनी सावधानियां बरतनी पड़ेगी कि शेष क्रियाकलाप अधूरे छूट जाएंगे। मसलन सुबह बिस्तर से उठें, तो आसपास यह देखे कि काई कीट-पतंग न हो। घर के लोगों को कुछ कहने से पहले देखें कि वे किसी और काम में व्यस्त तो नहीं है। स्वजन, परिजन किसी व्यसन का मजा लेने में जुटे है, तो उन्हें इसलिए नहीं टोकें कि उन्हें असुविधा होगी या मजा किरकिरा हो जाएगा ।

कुछ संप्रदायों ने अहिंसा के निषेधपरक अर्थ को अत्यधिक महत्व देकर साधना के दूसरे पक्षों को अनदेखा सा कर दिया हैं रोशनी नहीं करने, मुँह पर पट्टी बाँधकर रहने, वाहनों में नहीं बैठने, बीमार पड़ने पर औषधि उपचार नहीं लेने जैसे विषयों पर इतना जोर दिया गया कि अहंकार, मात्सर्य, दर्प, क्रोध जैसे विकार अछूते ही छूट गए।

भगवान् बुद्ध के बाद उनका धर्म पूर्वी एशिया और वहाँ से पुरे विश्व में फैलने लगा । बुद्ध ने मूलतः करुणा का संदेश दिया बौद्ध धर्म की मान्यताओं के अनुसार अहिंसा करुणा का ही एक रूप है बुद्ध के अनुयायियों ने व्यवहार में अहिंसा को उतारने के लिए करीब ग्यारह सौ नियम बनाए। बौद्ध विहारों में इनके पालन पर जोर दिया जाता है , लेकिन दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि बौद्ध भिक्षु दूसरों को कष्ट नहीं पहुंचाते।

अहिंसा एक भव है और वह पुरी तरह जगा लिया जाए, तो दूसरों को कष्ट नहीं देने की स्थिति सिद्ध होती हैं वह भाव जागा हुआ हो, व्यवहार में किसी को कष्ट पहुँचने पर भी अहिंसा का आदर्श बाधित नहीं होता । पौराणिक चरित्रों में अवतारी सत्ताओं ने अपने लीलाओं से असुरों का वध किया। अधर्म, अन्याय का पक्ष लेने वालों को पराभूत किया और भक्त दिखाई देने वाले पात्रों को भी कष्ट पहुँचाया। उनके संबंध में कोई नहीं कहता कि उन्होंने हिंसा की । विचार करें , तो कुछ उपदेश उनके अपने कृत्यों के विपरित भी जाते हैं। उदाहरण के लिए, भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को लड़ने के लिए तैयार करने का संदेश है। उसी उपदेश में अहिंसा के ज्ञान का साधन, दैवी संपदा और सात्विक तप में सम्मिलित किया गया है ।

विधेयात्मक अर्थों में विचार करें तो अहिंसा का संदेश जीवन का संदेश जीवन का सम्मान है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह विश्व में व्यक्त हुई परमात्मसत्ता के प्रति श्रद्धा-समर्पण हैं साधकों से अपेक्षा की जाती है। साधकों से अपेक्षा की जाती है कि वे संसार को अपने इष्ट आराध्य की प्रतिमा अभिव्यक्ति समझें और तदनुकूल व्यवहार करें । भाव जगत् में यह मान्यता स्थिर कर लेने के बाद व्यक्ति जो भी कुछ करता है, वह इष्ट-आराध्य की सेवा आराधना बन जाता है।

संपर्क में आने वाले प्रतीक, व्यक्ति या वस्तु में भगवद्भाव का अर्थ यह नहीं है कि दिखाई देते ही उनकी चरण-वंदना की जाए, पूजा स्तुति करें और अर्घ्य-पात्र आसन आदि दें । भगवद्भाव एक दीपक की तरह धारण किया जाता है ओर उसके प्रकाश में संबंध निभाए जाते हैं, औरों से व्यवहार किया जाता है । एक बार किसी के प्रति भगवद्भाव अपना लिया जाए, तो उसके प्रति बुरा व्यवहार करना असंभव हो जाता है।

(जहाँ तक बने, जिस किसी से व्यवहार करना पड़े उसमें भगवद्भाव करना।

माता,पिता, गुरु और वृद्धजनों को प्रतिदिन प्रणाम करें । चरणस्पर्श से उनका अभिवादन करें , घर से दूर हों तो मन से प्रणाम किया जाए। जान-बूझकर किसी का अहित नहीं करना। )

शिष्टाचार के भारतीय तौर-तरीकोँ में भी भगवद्भाव का ध्यान रखा जाता था। अब भी लोग मिलते हैं, तो राम- राम “हरे कृष्ण” जय श्री राधे” या प्रणाम”आदि संबोधनों से अभिवादन करते हैं। जब राम-राम कहा जाता है, तो वह केवल प्रभु का स्मरण ही नहीं हैं। स्मरण गौण है, वस्तुतः अभिवादन करते हुए संपर्क में आए व्यक्ति के भीतर विराजमान् अपने इष्ट या ईश्वर की झाँकी ली जाती है। दिन में एक बार आप किसी के सामने नतमस्तक हो जाएँ तो उसके प्रति कटु व्यवहार की आशंका कम हो जाती हैं। ऐसा नहीं कि कटुता आ नहीं सकती। विषम स्थितियों में यह दुर्घटना हो सकती है, लेकिन प्रणाम किए जा चुके व्यक्ति के प्रति दुर्व्यवहार की आशंका सामान्य स्थितियों की तुलना में बहुत कम रह जाती है।

‘प्रणाम “नमस्कार” नमस्ते ‘ आदि अभिवादन सूचक शब्दों में आदर ही नहीं है, झुकना भी है। यह झुकना किसी आतंक या चापलूसी के कारण नहीं, वरन् सामने आए व्यक्ति में देखी जा रही भागवत् चेतना के प्रति नमन है। निकट संबंधों में अभिवादन के समय चरणस्पर्श का प्रचलन भी रहा है। यह व्यवहार अत्यंत घनिष्ठ और आयु स्थिति में पूज्य स्तर के संबंधों में किया जाता है।

माता, पिता, गुरु, ताऊ,ताई ,चाचा चाची, बड़े भाई बहन और दादा दादी के चरण छूने का विधान रहा हैं। वृद्धजन यदि एक ही आवासीय परिसर में हों, तो मन से प्रणाम करने की प्रेरणा दी जाती हैं जिन परिवारों में ये संस्कार दिए जाते हैं,वहाँ के सदस्यों में दूसरों का अहित करने , कष्ट देने और निरादर करने के दोषों का अभाव है यह व्यवहार मात्र सामान्य शिष्टाचार ही नहीं हैं उद्देश्य अपने भीतर भगवद्भाव जगाना है। अपने आसपास के वरिष्ठ वयोवृद्ध जनों में यदि पूज्य भाव आ जाए, तो दूसरों के प्रति भगवद्भाव रखना आसान हो जाता है।

नहीं, यह नहीं सोचिए कि जिस किसी के भी संपर्क में आना पड़े,उसमें भगवद्भाव किया जाए, तो व्यावहारिक जीवन में कठिनाई होगी । अनीति, अन्याय करने वालों का प्रतिकार नहीं किया जा सकेगा। क्योंकि वे भी भगवद्भाव से भावित दिखाई देंगे । इस तरह की आशंकाएँ मानसिक उलझनें भर है। आरंभ कर दिया जाए, तो उलझनें अपने आप सुलझने लगती हैं।यशोदा अपने बाल-गोपाल के हाथ बाँध देती थी, घर में बंद कर ताला लगा देती थी यह सब करते हुए गोविंद के प्रति उनके मन में भगवद्भाव की कहीं कमी नहीं आती थी।

गलत रास्ते पर जा रही संतान को माता-पिता डांटते डपटते हैं। दुत्कारते-फटकारते हुए भी अभिभावकों के मन में वैर-प्रतिशोध का भाव नहीं रहता । संपर्क में आने वाले व्यक्ति यदि अनीति-अन्याय कर रहे हों ,तो उनका प्रतिकार करने के लिए भगवद्भाव आड़े नहीं आएगा । संभावना तो यह है कि उस स्थिति में प्रतिकार ज्यादा सक्षम होगा। क्योंकि तब आप वैर, प्रतिशोध, क्रोध, अमर्ष आदि विकारों से ग्रस्त नहीं होंगे। ये भाव प्रतिकार का पैनापन कम कर देते हैं, उसमें लगने वाली ऊर्जा को विकार खुद चट कर जाते हैं। तब अनीति-अन्याय का सही मायने में प्रतिकार हो सकेगा ।

देखा गया है कि क्रोध, वैर और आवेश में किए गए प्रयोगों का बल क्षीण हो जाता है। इन भावों से बचकर प्रयोग करने के कारण ही गिने-चुने सुरक्षाकर्मी आवेश में उबल रही भीड़ को कुछ ही मिनटों में तितर-बितर कर देते हैं। इस तरह के जागतिक उदाहरण वैर और आवेश से रहित प्रतिकार की सामर्थ्य समझाने के लिए पर्याप्त हैं। इनके बाद किसी को यह आशंका नहीं करनी चाहिए कि भगवद्भाव के कारण लोकव्यवहार में कोई असुविधा होगी।

किसी को कष्ट नहीं पहुँचाने के लिए बहुत बारीकियों में जाना जरूरी नहीं है। न ही कोई मानसिक व्यायाम जरूरी है कि दर्द से कराह रहे किसी पशु को जीवित रहने दें या कत्लगृह में भेजकर उसे कष्टों से मुक्ति दिला दें। महात्मा गाँधी ने एक बार किसी बछड़े को जहर का इंजेक्शन दिलाकर शारीरिक कष्ट से मुक्ति दिला दी थी । काका कालेलकर आदि विद्वानों ने गाँधी जी के निर्णय को बुद्धिमत्तापूर्ण ठहराया था । आचार्य विनोबा भावे ने आपत्ति की थी, बछड़ा कितना ही कष्ट उठा रहा हो, उसके जीवन का निर्णय लेने का हमें क्या अधिकार ? जीवन-चेतना यदि असमर्थ हो रही है, तो खुद जाएगी और परमात्मा यदि उसे जीवित नहीं रखना चाहता है, तो वह स्वयं प्राण हर लेगा। गाँधी जी ने विनोबा के तर्क को स्वीकार किया था और अपनी गलती मानी थी। यह बात अलग है कि उन्हीं विनोबा भावे ने अन्न-जल त्याग कर इच्छामृत्यु का वरण किया। उनके इस कृत्य की भी लोगों ने आलोचना की, लेकिन ज्यादातर ने इस निर्णय को सराहा है।

इन प्रसंगों की चर्चा इसलिए है कि व्यवहार के आधार पर हिंसा, अहिंसा की बारीकियाँ निश्चित नहीं की जा सकतीं, सिर्फ इतना ही ध्यान रखना पर्याप्त है कि जान-बूझकर किसी का अहित हो जाए, उसके लिए प्रायश्चित और क्षतिपूर्ति के विधान हैं। उनका पालन किया जा सा है, लेकिन यह बहुत दूर की बातें है। अहिंसा के सामान्य साधक को भाव, आचार और व्यवहार से ऊपर बताई गई तीन बातों का ध्यान रखना ही काफी हैं। इतना भर कर लिया जाए, तो पतंजलि की परिभाषा के अनुसार अहिंसा की वैसी प्रतिष्ठा हो जाती है, जिसमें साधक के समीप आकर प्रत्येक प्राणी मित्रवत् व्यवहार करने लगता है।


मौलिक-अलौकिक विधाता की सृष्टि

सृष्टि में व्याप्त सृजन-सौंदर्य उसके सृजेता की कुशलता की ओर इंगित करता है, इसकी विचित्रताएँ-विलक्षणताएं यह बाती हैं कि सृजेता के उच्चतर आयाम मानवीय बुद्धि की सभी सीमाओं से परे हैं। उसकी यह अलौकिकता मानव में ही नहीं मछलियों में भी झलकती है। एक मछली ऐसी भी है, जिसने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को हैरत में डाल रखा है। उसका मस्तिष्क अपेक्षाकृत काफी अधिक सक्रिय है। अति सक्रिय मस्तिष्क वाली यह मछली अफ्रीका के समुद्र में पाई जाती है। इसे हाथी सूंड़ या एलीफैंट नोज नाम से जाना जाता है। इस मछली पर वैज्ञानिकों ने काफी प्रयोग किए हैं। शोधरत वैज्ञानिकों में स्वीडिश वैज्ञानिक गोर नीलसन प्रमुख है। वैज्ञानिकों का काम है कि .......... सेमी की छोटी-सी इस मछली की खोपड़ी में स्थित नन्हा-सा मस्तिष्क अत्यधिक सक्रिय होता है। यहाँ तक कि इसके कारण वह अँधेरे में भी अपना मार्ग ढूँढ़ लेती है और बाधाओं से साफ बच निकलती है।

वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि इस मछली के मस्तिष्क में ऑक्सीजन की काफी ज्यादा खपत होती है। पता चला है कि ये मछलियाँ अपनी कुल ऑक्सीजन खपत का ............ प्रतिशत अपने मस्तिष्क में ही खर्च कर लेती हैं, जबकि मानव-मस्तिष्क में कुल खपत की मात्रा ......... प्रतिशत ऑक्सीजन खर्च होती है। इस प्रकार इस एलीफैंट नोज मछली में ऑक्सीजन की खप का प्रतिशत मानव से तीन गुना ज्यादा है। यह भी आश्चर्य की बात है कि ............ सेमी लगभग आकार वाली अन्य मछलियों की तुलना में इसका मस्तिष्क भी लगभग ............ गुना ज्यादा बड़ा है।

सृजेता का कुशल कौशल असीम है। उसने हर प्राणी को अनुपमेय एवं अद्वितीय बनाया है। ‘फ्यूगू’ मछली के बारे में भी कुछ ऐसा ही है। सामान्य क्रम में पोटैशियम सायनाइड को ऐसा विष माना जाता है, जिसे सुई के नोक के बराबर भी यदि जीभ पर रखा जाए, तो व्यक्ति की मृत्यु सुनिश्चित है। फ्यूगू का विष इस प्राणलेवा सायनाइड से भी ................ गुना अधिक तीव्र है। वैज्ञानिक अनुसंधान के मुताबिक इस फ्यूगू का विष विश्व के सारे विषों में सबसे ज्यादा जहरीला हैं। फ्यूगू मछली की करीब .............. प्रजातियाँ पाई जाती है। इनमें से सिर्फ ................... प्रजातियाँ जहरीली हैं, शेष नहीं। फ्यूगू हिंद महासागर एवं प्रशांत महासागर के दक्षिणी भाग में मिलती है। उत्तरी अमेरिका व फ्लोरिडा के समुद्र वयस्क फ्यूगू ढाई-तीन फीट लंबी होती है। इसका वजन ................ किलो होता है। इसकी त्वचा में पानी सोखने और इसे वापस निकालने का विशेष गुण होता है। खतरे का अंदेशा होते ही यह अपनी त्वचा में पानी भर फुटबाल की तरह फूल जाती है और जब खतरा टल जाता है, तब वापस अपने मूल रूप में आ जाती है।

जहाँ तक इसके खास विष की बात है, तो वह एक सामान्य फ्यूगू मछली में लगभग ............. मिलीग्राम होता है। इसका रासायनिक नाम टेट्रडोटाँक्सिन रखा गया है और इसकी संरचना पर खोजबीन जारी है। मानव−शरीर पर होने वाले घातक प्रभावों की प्रतिक्रिया एवं उसके बचाव के लिए प्रतिविष बनाए जाते हैं। मगर इसके बनाने में तमाम जटिलताएँ हैं। हालाँकि टोक्यो विश्वविद्यालय के रसायन विभाग में इस पर अनुसंधान जारी है। पर अभी तक कहीं भी इसका एंटीडोट नहीं बन पाया है। इस विष का सबसे घातक प्रभाव तंत्रिका तंत्र पर पड़ता है और थोड़ी ही देर में शरीर की समस्त क्रियाएँ बंद हो जाती हैं।

मछलियाँ तीरंदाज़ भी होती हैं। यह बात आश्चर्यजनक भले ही हो, किंतु है सत्य। इस विशेषता के कारण इन्हें अँग्रेजी में आर्चर फिश भी कहा जाता है। यह भार से फिलीपींस के तटीय क्षेत्रों और सुदूर आस्ट्रेलिया तक खारे पानी में पाई जाती है। इनमें सबसे बड़ी प्रजाति लगभग दस इंच तक होती है, जबकि इसकी अन्य प्रजातियाँ आठ इंच से बड़ी नहीं होती। अपने छोटे आकार के बावजूद यह मछली पानी की सतह से कई फीट दूर बैठे शिकार पर सटीक निशाना लगाती है। जिससे शिकार नीचे गिर जाता है। छह फीट की दूरी तक इसका निशाना कभी बेकार नहीं जाता। कई बार तो आर्चर फिश को 12 फीट दूर बैठे शिकार को गिराते हुए देखा गया है।

इस मछली का अध्ययन करने वालों ने एक अवसर पर पाया कि पानी की सतह से कुछ इंच ऊपर पौधे की टहनी पर बैठी एक छोटी-सी छिपकली को आर्चर फिश ने पानी की कई बूंदें दनादन दागदन दागकर नीचे गिरा दिया। आर्चर फिश की इस अद्भुत क्षमता के कारण यह सोचना स्वाभाविक है कि इस मछली के मुँह का विकास अन्य मछलियों के मुँह से कुछ अलग तरह से हुआ होगा। बाद में इसके अध्ययन से यह पता चला कि जहाँ ज्यादातर मछलियों में जीभ मुँह के तलवे में जकड़ी होती है, वहीं इसमें यह सामान्य रूप से ढीली होती है, जिससे आगे की तरफ एक खाँचा-सा बन जाता है। यह खाँचा और जीभ साथ-साथ एक नलिका बनाते हैं। जिसका इस्तेमाल फूँकनी की तरह पानी की बूँदों को बाहर फेंकने में या जा सकता है। छोटे-सी आर्चर फिश पानी की बूंदें दागने अभ्यास तब शुरू करती है, जब वह केवल एक इंच ी होती है। चूँकि यह तब केवल दो या तीन इंच तक ही बूंदें फेंक सकती है, इसीलिए इसे अपने बचपन में पानी के कीटों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। बाद में बड़े होने पर अपना शिकार खुद करने लगती है।

मछलियों में विचित्रताएं ही नहीं सौंदर्य भी होता है। स्वर्ण मीन यानि के गोल्डफिश ऐसा ही उदाहरण हैं। गोल्डफिश का सिर्फ रंग ही मनमोहक नहीं होता, बल्कि इसका रूप और आकार भी विचित्र एवं दिलचस्प होता है। इनमें से किसी का सिर शेर जैसा और पूँछ झालरदार और आँखें दूरबीन जैसी, नो किसी का मुँह घड़े जैसा और पूँछ झालरदार। कुल मिलाकर इन छोटी और खूबसूरत मछलियों का आकर्षण इतना ज्यादा है कि हर कोई इन्हें अपने घर के एक्वेरियम में सजाने की चाह रखा हैं। इनमें से कुछ मछलियों को लायन हेड, फेनटेल्स, बबल आइस आदि नामों से जाना जाता है।

जब कभी हमें किसी होने वाली दुर्घटना या घटना आदि का अनायास ही पूर्वाभास हो जाता है, तो प्रायः इसे काल्पनिक रूप में छठी इंद्रिय का कमाल माना जाता है। परंतु अभी तक इस संबंध में कोई ठोस जानकारी सामने नहीं आई हैं मगर मछलियों के मामले में छठी इंद्रिय पूरी तरह से स्पष्ट है और इसके प्रयोग भी हो चुके हैं। मछलियों में छठी इंद्रिय से संबंधित अंग उसके शरीर के दायें एवं बायें ओर स्थित होते हैं। इस इंद्रिय से संबंधित अंगों का कार्य श्रवण एवं स्पर्श इंद्रियों के माध्यम से हो है। स्पष्ट रूप से देखे जा सकने वाले ये अंग मछलियों को पर्यावरण की पूरी जानकारी देते रहते हैं। इन अंगों से प्राप्त संवेदनाओं और सूचनाओं के आधार पर ये मछलियाँ अपने को उसी स्थिति-परिस्थिति के अनुरूप ढाल लेती है। जिससे वे आस-पास के वातावरण में परिवर्तन होने के उपराँत अपने को बचा लेती हैं।

महाकवि रहीम ने सृष्टि-सृजन की इसी अनुपमेय विशेषता को देखकर कहा था, “रहिमन देखि बड़न को लघु न दीजिए डारि,” अर्थात् बड़े को देखकर छोटे को उपेक्षित नहीं कर देना चाहिए। क्योंकि छोटे में भी कुछ ऐसी विशेषताएँ हो सकती हैं, जिसके लिए बड़ा तरसा ही रहे। विधाता ने अपनी सृष्टि में सभी को मौलिक और अलौकिक बनाया है। हर कहीं उसी की चेतना की अभिव्यक्ति है। जीव और प्रकृति की सारी विचित्रताएँ-विलक्षणताएँ एक उसी परमचेतना की ओर संकेत करती हैं।


Quotation

( भज् गोविंदम् का नारा लगाते हुए शंकराचार्य निकल पड़े और भगंदर के फोड़े के बावजूद संस्कृति प्रचार हेतु भारत भर में भ्रमण किया, धर्म संबंधी विकृतियों का खंडन किया तथा धनाध्यक्षों के वैभव को भी जनहित की ओर मोड़ने में सफल हुए। अपने कष्ट की चिंता न कर दूसरों का ही भला सदा सोचने वाले हमेशा पूजे जाते हैं। )


पात्रता विकसित हुए बिना (kahani)

भगवान् बुद्ध के पास एक सेठ आत्मज्ञान-प्राप्ति की आकाँक्षा से पहुँचा। पहुँचकर आने का मंतव्य स्पष्ट किया। दूसरे दिन उसके घर पर आकर ही उत्तर देने का आश्वासन देकर बुद्ध ने उसे विदा किया। स्वयं भगवान् बुद्ध घर आ रहे हैं, यह सोचकर सेठ ने अच्छी खीर बनवाई। कमंडलु लिए दूसरे दिन तथागत पहुँचे। “भगवन् ! आपके लिए खीर तैयार की है। प्रसाद ग्रहण करें।” सेठ ने निवेदन किया। बुद्ध ने खीर के लिए अपना कमंडलु आगे कर दिया। सेठ खीर देने के लिए आगे बढ़ा। ध्यान से देखो उसमें गोबर भरा हुआ था। बोला, “देव! इसमें तो पहले से गोबर भरा हुआ है। इस पात्र में देने पर तो खीर भी बेकार हो जाएगी।” तथागत हँसे और बोले, “ वत्स! तुम्हारे कल के प्रश्न का यही उत्तर है। आत्मज्ञान-प्राप्ति के लिए पहले पात्रता विकसित करो। अपने कषाय-कल्मषों का परिशोधन करो। आत्मज्ञान जैसी महान् उपलब्धि पात्रता विकसित हुए बिना नहीं प्राप्त हो सकती। “


ध्यान से होगा अब रोगों का उपचार

बीमारियों का प्रमुख कारण प्रायः रोगाणुओं-विषाणुओं के आक्रमण, अपच एवं कुपोषण आदि को माना जाता है। इनसे बचने-बचाने के उपाय-उपचार का तारतम्य भी चिकित्साविज्ञानी एवं पोषण विज्ञानी तद्नुरूप ही बिठाते हैं। देखा गया है कि इस तरह की बीमारियों शिकार अधिकतर पिछड़े लोग ही बनते हैं। जबकि विकसित एवं साधन संपन्न लोग शिक्षा, संपन्नता एवं बुद्धि का दुरुपयोग करने के कारण उपजे मानसिक विक्षोभजन्य तनाव से ग्रसित होते तथा असमय ही अपनी प्राणहानि करते देखे जाते हैं। तथापि संपन्नों के कारण पनपी पतनोन्मुखी आदें न केवल व्यवहार, वरन् चिंतन-मनन एवं गुण, कर्म, स्वभाव पर भी छाई रहती हैं। फलस्वरूप शरीर और मन दोनों की शक्तियों अंधाधुँध अपव्यय होता रहता है और दोनों क्षेत्रों पर छाई रहने वाली उत्तेजना, आवेशग्रस्तता अंततः चित्र-विचित्र रोगों के रूप में फूटती है। महँगे टाँनों, दवाइयों से इन पर नियंत्रण पाना आसान नहीं है। इनसे छुटकारा पाने के लिए हमें मनोकायिक एवं योगपर मनो-आध्यात्मिक उपाय-उपचारों का आश्रय लेना पड़ेगा। समग्र स्वास्थ्य संवर्द्धन की दिशा में तभी आगे बढ़ा और जीवन का सच्चा आनंद उठाया जा सकता है, जब गुण, कर्म, स्वभाव एवं चिंतन, चरित्र, व्यवहार में उत्कृष्टता तथा सदाशयता का समावेश किया जा सके।

‘योर पावर टू हील’ नामक अपनी प्रसिद्ध कृति में हेरोल्ड शेरमेन ने कहा है कि आज के अविवादी भौतिक विकास का ही यह परिणाम है कि मनुष्य अनुदारता और उच्छृंखलता की दिशा में तेजी से बढ़ता-भागता चला जा रहा है। नशेबाजी, विलासिता, आपाधापी, शेखीखोरी जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ एक प्रकार से सरल-स्वाभाविक जीवन के साथ विद्रोह हैं। इस कुचक्र में फँसने से शारीरिक और मानसिक संतुलन गड़बड़ाने लगता है। यही कारण है कि अति समृद्धों तथा नव धनाढ्यों के हिस्से में तनाव आया है।

दुर्भाग्यवश उसकी शाखा-प्रशाखाएँ और जटिलताएँ अभावजन्य रोगों कहीं अधिक है। इस प्रकार अपेक्षाकृत तथाकथित समृद्ध लोगों को ही अधिक घाटे में रहना पड़ा है। इन दिनों पचानवे प्रतिशत से अधिक रोगी तनाव की प्रतिक्रिया स्वरूप रोगग्रस्त पाए जाते हैं। लगातार सिरदर्द, चक्कर आना, आँखें सुर्ख रहना, काम में मन न लगना, स्मृति ह्रास, लकवा आदि जैसे रोगों का आक्रमण हो जाना, ये सभी अत्यधिक तनाव के ही दुष्परिणाम हैं। इसी प्रकार हृदय-रोग, रक्तचाप की अधिकता, अल्सर, कोलाइटिस आदि रोग प्रकाराँतर से तनाव के कारण ही पैदा होते हैं। तनाव की अधिकता मनुष्य का प्राणाँत करके छोड़ती है।

इस संदर्भ में अध्ययन एवं अनुसंधानरत मनोवैज्ञानिकों एवं अध्यात्मवेत्ताओं का कहना है कि तनाव की अधिकता व्यक्ति के अपने चिंतन-मनन एवं विचारधारा के अनुरूप होती हैं। निषेधात्मक, निराशावादी, संशयात्मक चिंतन एवं दृष्टिकोण तनाव को बढ़ावा देते हैं। सुप्रसिद्ध स्नायविक तनाव विशेषज्ञ डॉ0 एडमंड जेकबसन के अनुसार ब्लडप्रेशर, हृदय रोग आदि अब मध्यम वर्ग के लोगों में भी पनप रहा है। इसका मूल कारण उन्होंने अज्ञा भय, चिंता जो अंतर्मन में व्याप्त हो जाती है, को बताया है। इसके फलस्वरूप व्यक्ति की स्वाभाविक खुशी व प्रफुल्लता छिन जाती है। इसी तरह जो लोग अधिक आराम का, विलासी जीवन जीना चाहते हैं, परिश्रम से बचना चाहते हैं, आमदनी से अधिक बढ़ चढ़कर खर्च करते हैं, वे अपने चारों ओर मकड़जाल की रह अत्यधिक चिंताओं का घेरा बुन ले हैं। ये सभी तनाव बढ़ाने में सहाय होते हैं। मोटापा, मधुमेय, दमा, आर्थराइटिस आदि तनाव की ही देन हैं। विश्व के प्रायः सभी मूर्द्धन्य चिकित्साविज्ञानियों एवं मनोरोग विशेषज्ञों का यही निष्कर्ष है कि पचहत्तर प्रतिशत रोगों का मूल कारण उद्वेगजन्य मनः स्थिति-तनाव ही है।

(मन की अमोघ शक्ति को यदि सर्वनात्मक एवं विधेयात्मक दिया में लगाया जा सके तथा सृष्टि के कण-कण में समाई चेतन-सा से संबंध जोड़ा जा सके, तो कठिन से कठिन बीमारियों पर भी विजय पाई जा सकती है।)

अब प्रश्न उठता है कि इस महाव्याधि से छुटकारा कैसे पाया जाए ? विशेषज्ञों का कहना है कि जब इस रोग का मूल कारण शरीर नहीं मन है, तो इलाज भी मन का ही करना उचित होगा। प्रख्यात मनोवेत्ता पादरी नार्मन विन्सेंट पील का कहना है कि मेडीडेट एवं मेडीडेट दोनों शब्दों का एक ही उद्गम है, अर्थात् दवा करना एवं प्रक्रियाओं तक ही समिति हैं। मन सूक्ष्म है, जहाँ तक ध्यान के द्वारा ही पहुँच जा सकता है और उस क्षेत्र में जमी पड़ी बीमारियों की जड़ों को खोदकर बाहर निकाला जा सकता है।

इस संदर्भ में वोरेन दंपत्ति के नाम से विख्यात एक मनोचिकित्सक द्वय व उनके दल ने बहुत ही सराहनीय कार्य किया है। इस संबंध में एंब्रोस बोरेन ने हेरोल्ड शेरमेन के नाम से बीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित की है। इनमें से योर पावर टू हील नामक उपर्युक्त पुस्तक में उन्होंने लिख हैं। कि समग्र शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिए चेतनसत्ता के साथ मिलकर उसका सहयोग लेना ही एकमात्र उपाय है। केवल चिकित्सकीय उपाय-उपचार ही पर्याप्त नहीं है।

श्री एंब्रोस वोरेन पेशे से एक इंजीनियर थे और अमेरिका की प्रसिद्ध फोर्ड मोटर कंपनी में औद्योगिक परामर्शदस्ता के रूप में काम करते थे। संयोगवश सन् 1920 में उन्हें एक असाध्य बीमारी ने घेर लिया और वे मरणासन्न स्थिति में जा पहुँचे। इसी बीच अमेरिका में मनःचिकित्सा एवं दर्शनशास्त्र में अग्रणी माने जाने वाले थोमस जे0 हडसन की एक पुस्तक उनके हाथ लगी । उसके आधार पर उनकी प्रभावोत्पादक मनोकायिक चिकित्सा का उन्होंने अपने ऊपर प्रयोग करने का साहस किया और रोगमुक्त हुए। इस घटना का वर्णन करते हुए उन्होँने लिखा है कि मन की अमोघ शक्ति को यदि सृजनात्मक एवं विधेयात्मक दिशा में लगाया जा सके तथा सृष्टि के कण-कण में समाई चेतनसत्ता से संबंध जोड़ा जा सके, तो कठिन बीमारियों पर भी विजय पाई जा सकती है। स्वयं का सृजनात्मक शुभ चिंतन एवं लोगों की सद्भावनायुक्त सम्मिलित ईश-प्रार्थना की शक्ति चमत्कारी ढंग से अपना प्रभाव दिखाती है।

उक्त घटना ने बॉडी-माइंड स्पिरिट हीलिंग वर्कशॉप, अर्थात् शारीरिक-मानसिक-आध्यात्मिक हीलिगं कार्यशाला को जन्म दिया। एब्रोस बोरेन ने सर्वप्रथम अतींद्रिय अनुसंधान एसोसिएट्स फाउंडेशन की स्थापना की । इसी एसोसिएशन के माध्यम से उनकी भेंट एक समाजसेवी एवं अतींद्रिय क्षमता संपन्न रूसी युवती ओल्गा से हुई और दोनों ने परिणयसूत्र में बँधकर लोकमंगल के लिए कार्य करने का संकल्प लिया। इन्होंने प्रचलित चिकित्सा के साथ-ही-साथ धार्मिक परंपराओं एवं मनोवैज्ञानिक तथ्यों का सहारा लेते हुए मनुष्य के भीतर प्रसुप्त पड़ी हुई शक्तियों को जाग्रत् करने का कार्य हाथ में लिया । सृष्टि के आरंभ से ही मनुष्य ने रोग एवं कष्टों से मुक्ति पाने के लिए किसी न किसी शक्ति का सहारा लिया है, चाहे वह देवी-देवता के रूप में हो, मंत्र-तंत्र हो अथवा अतींद्रिय क्षमता संपन्न मानव हो । यों तो प्रत्येक वस्तु का अच्छा और बुरा उपयोग हुआ करता है । इस तथ्य के अनुसार चिकित्सा के नाम पर कर्मकाँड, मंत्रोच्चार, स्तुति, बलिदान, उपहार आदि रोग-मुक्ति या कष्ट-निवारण में कहाँ तक अपने आप में सक्षम है, यह अलग बात है। किंतु जहाँ तक श्रद्धा या विश्वास के माध्यम से मन को प्रभावित किया गया हो , वहाँ सफलता अवश्य मिलती है। यह निर्विवाद तथ्य है।

वोरेन दंपत्ति ने इसी तथ्य का आश्रय लिया । बिना किसी की आस्था को डगमगाए उसकी कमियों को दूर करते हुए सर्वप्रथम रोगियों को पाँच-दस मिनट से लेकर आधे घंटे तक शिथिलीकरण एवं ध्यान कराना आरंभ किया । संगीतमय वातावरण में शिथिलीकरण करवाया व बताया जाता कि रोग के कारण मन में जो भय एवं चिंता उत्पन्न हो गई है, उसे विधेयात्मक एवं उत्कृष्ट विचारों से आप्लावित करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करें। प्रार्थना का स्वरूप भी निर्धारित कर दिया गया था। रोगी का मनोबल बढ़ाने और निषेधात्मक चिंतन दूर करने के सभी उपाय किए जाते इसका सत्परिणाम देखकर उन्होंने अपनी मातृभूमि के अतिरिक्त कई अन्य देशों में यह कार्यशाला चलाई और लाखों व्यक्तियों का रोगमुक्त किया । अमेरिका में यह संस्था अभी भी कार्यरत है।

भारतीय ऋषि-मनीषियों ने प्राचीनकाल से ही इस संदर्भ में योगोपचार विधा को उपयुक्त पाया और सबके लिए सुगम बनाया। भारतीय ध्यानयोग पद्धति अब चिकित्साविज्ञान में एक विधा के रूप में प्रतिष्ठा पा चुकी है और भविष्य में इसके माध्यम से तनाव सहित अनेक असाध्य रोगों के उपचार और संभावित रोगों की रोकथाम की संभावना भी बनी है। किंतु ध्यान-साधना का यह भौतिक पक्ष है, जो स्वास्थ्य-संवर्द्धन एवं प्राण उन्नयत तक सीमित है। ध्यान की गहराई में प्रवेश करने से न केवल जीवनी शक्ति के अभिवर्द्धन एवं संतुलित मनःस्थिति का लाभ मिलता है, वरन् विश्वव्यापी दिव्यसत्ता के साथ घनिष्ठता बना लेते और उसके साथ संपर्क-सान्निध्य साध सकने वाले आत्मिक चुंबकत्व का भी विकास होता है। आत्म-विकास ही ध्यानयोग का वास्तविक लक्ष्य है।


करुणामूलक जीवन शैली का प्रतीक है, शाकाहार

शाकाहार एक प्राकृतिक आहार है। इनके उत्पादन में न तो कहीं कोई क्रूरता है, न बर्बरता , न शोषण और न ही हिंसा। यह किसी जीवधारी के प्राण लेकर उत्पन्न आहार नहीं हैं इससे न तो वातावरण प्रदूषित होता है और न ही काई रोग फैलता है। शाकाहार सही मायने में जीवन की गुणवत्ता को समृद्ध करने वाला आहार है। शाकाहार करने वाले मनुष्यों में स्वतः ही सहज रूप से प्रेम, मैत्री सहृदयता, क्षमा, सहिष्णुता रचनाधर्मिता कला, विश्वास, संयम, संतुलन जैसे महान् जीवनमूल्यों और सृजनशील वृत्तियों का विकास हुआ है। इस तथ्य को आधुनिक वैज्ञानिक भी सत्य रूप में स्वीकार करते हैं।

शाक’ शब्द संस्कृत की ‘शक’ धातु से निष्पन्न शब्द है। जिसका अर्थ है, योग्य होना, सहन करना। शक धातु शक्नोति आदि रूपों में चलती है। इसी से शक्ति, शक्त शक्तिमान् आदि शब्द बने है। शक्त का अर्थ है , योग्य ,समर्थ , ताकतवर। इस तरह शाकाहार का शब्दार्थ या वाच्यार्थ हुआ, एक ऐसा आहार, जो मनुष्य की योग्यताओं का विकास करे और उसे बलशाली तथा पराक्रमी बनाए।

जहाँ तक शाकाहार के उदय और उद्भव का प्रश्न है, तो यह किस नवीन जीवनशैली का अंग नहीं है, बल्कि यह उतना ही प्राचीन है, जितना कि मनुष्य स्वयं है, यह कोई क्षणिक वृति नहीं है। यह तो एक जीवनशैली है, जो सदियों के अनुभवों व प्रयोगों के बाद अस्तित्व में आई है। जान हापक्सि विश्वविद्यालय के नृतत्वविज्ञानी प्राध्यापक डॉ0 आलन वाकर के अनुसार मनुष्य के पूर्वज शाकाहारी थे। डॉ0 वाकर ने मनुष्य की दंत रचना का 1 करोड़ 20 लाख वर्षों में फैले कालपटल पर गहन अध्ययन किया है और इस अपने अनुसंधान से यही निष्कर्ष पाया है कि मनुष्य ईसा पूर्व 12,00,000 वर्ष पहले भी फलाहार ही किया करता था । वेजीटेरियनिज्म : ए ह्मूमन इंपेरेटिहृ नामक सुविख्यात ग्रंथ में इस सत्य का स्पष्ट उल्लेख है कि मिश्र, सुमेरिया , भारत ,चीन तथा रोम एवं ग्रीस के लोग पूरी तरह से शाकाहारी हुआ करते थे।

वेजीटेरियन, शब्द सर्वप्रथम 1842 ईसवी में प्रयोग में आया।यह शब्द लैटिन भाषा के वेजीटस शब्द से जन्मा है। जिसका अर्थ हैं, स्वस्थ, समग्र ,समर्थ , विश्वस्त , परिपक्व, ताजा, जीवंत। फ्राँसीसी भाषा का वेजीटेरियन शब्द परवर्ती लैटिन के वेजीटेबल शब्द का विकास है। जिसका अर्थ है, जीवन-संचारक या जीवन से भरपूर। इस शब्द की व्युत्पत्ति जिस लैटिन भाषा के शब्द से हुई, उस लैटिन भाषा में यह शब्द अपने मूल रूप में ‘वेजीटेरे’ नाम से जाना जाता है। इसका तात्पर्य है, अनुप्राणित करना, गति देना। इन शब्दों से सहज ही शाकाहार की विशेषताओं का अनुमान लगाया जा सकता है। सन् 1847 ईसवी में शाकाहार को प्रसारित-प्रवर्तित करने वाली एक धर्मनिरपेक्ष संस्था का इंग्लैंड के मेनचेस्टर शहर में जन्म हुआ । उन दिनों इसका नाम रखा गया द वेजीटेरियन सोसायटी। सन् 1908 ई॰ में विश्व के सबसे बड़े अंतर्राष्ट्रीय संगठन इंटरनेशनल वेजीटेरियन यूनियन की स्थापना हुई। आज भी इस संगठन की समूचे विश्व भर में अनेकों शाखाएं है।

(विश्वभर के चिकित्साविज्ञानियों एवं उनके शोध निष्कर्षों ने यह साबित कर दिया है कि शाकाहार ही स्वास्थ्य के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है। जो चिकित्साविज्ञान पहले मनुष्य शरीर को पूर्ण स्वस्थ रखने के लिए एनिमल प्रोटीन को बहुत आवश्यक मानता था, वही सब इस तथ्य का प्रतिपादन करने लगा है कि इसके बगैर श्री मनुष्य स्वस्थ रहकर अपना शारीरिक विकास कर सकता है। )

वेजीटेरियन शब्द यूरोप में भले ही उन्नीसवीं शताब्दी में आविष्कृत हुआ हो, पर भारत एवं यूनान में इसका उद्घोष स्वयं ईसा से सैकड़ों ईसवी पूर्व हो चुका था । भारतवर्ष के आदिग्रंथ ऋग्वेद के साथ ही अथर्ववेद, मनुस्मृति, महाभारत आदि में शाकाहार को सर्वोत्तम आहार बताया गया है। जैनधर्म के प्रवर्तक भगवान् महावीर एवं बौद्धधर्म के प्रवर्तक भगवान् बुद्ध ने भी जीवन के प्रति सम्मान की भावना को पुनर्जीवित किया तथा स्वयं भी वैसा ही कर दिखाया। इनके द्वारा प्रवर्तित अहिंसा में शाकाहार के महत्व की स्पष्ट झलक देखी जा सकती हैं भारतीय समाज व संस्कृति में शाकाहार की जड़े अत्यंत गहरी और सघन हैं। यूनानवासी भी मूलतः शाकाहारी ही थे। उनकी पुनर्जन्म में अडिग आस्था थी। यूनानी विचारकों का यह मानना रहा है कि शाकाहार में विकारों के विरेचन की विलक्षण शक्ति है एवं जो व्यक्ति पुनर्जन्म में आस्था रखा है, वह माँसाहारी हो ही नहीं सकता। वहाँ के महान् गणितज्ञ पाइथागोरस का जीवन शाकाहार का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने अपने अनुभवों का वर्णन करते हुए कहा है कि शाकाहार चित के निर्मलीकरण का बहुत बड़ा आधार हैं।

मानव की शारीरिक संरचना की दृष्टि से भी शाकाहार ही स्वाभाविक भोजन है। उदाहरण के लिए, मनुष्य के दाँत सपाट बने होते हैं। इसी प्रकार मनुष्य अपने भोजन को चबाकर खाता है, जिससे उसे पचाने में सुविधा रहती है और पचाने के लिए मनुष्य की आँत की लंबाई उसके शरीर की तुलना में 12 गुनी लंबी होती है। माँसाहारी जीव भोजन को चबाने की बजाय सीधे निगल जाते हैं उनकी आंतों की लंबाई भी उनकी लंबाई से मात्र तीन गुणा ही अधिक होती है।

इन तथ्यों के अतिरिक्त अब तो विश्वभर के चिकित्साविज्ञानियों एवं उनके शोध-निष्कर्षों ने यह साबित कर दिया है कि शाकाहार ही स्वास्थ्य के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है। जो चिकित्साविज्ञान पहले मनुष्य शरीर को पूर्ण स्वस्थ रखने के लिए एनिमल प्रोटीन को बहुत आवश्यक मानता था,वही अब इस तथ्य का प्रतिपादन करने लगा है कि इसके बगैर भी मनुष्य स्वस्थ रहकर अपना शारीरिक विकास कर सकता है। यदि एनिमल प्रोटीन की जरूरत है भी , तो यह दूध के सेवन से पूरी की जा सकती है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान के अनुसार गले, मुख ,पेट व बड़ी आँत के कैंसर के बारे में इस बात के निश्चित प्रमाण मिले हैं कि शाकाहार में मौजूद रेशे, विटामिन सी तथा प्रोटीन पचने से प्राप्त होने वाले नाइट्रोजन यौगिक कैंसर पैदा करने वाले पदार्थों को सोखकर या तो शरीर से बाहर निकाल देते हैं। अथवा उन्हें ऐसे यौगिकों में बदल देते हैं, जो निरापद होती है। स्तन कैंसर के बारे में विश्वभर में किए गए सर्वेक्षणों से पता चला है कि भारत जैसे शाकाहार प्रधान देशों की तुलना में माँसाहारी देशों की महिलाओं में स्तन कैंसर का अनुपात ज्यादा है। शाकाहार में कम चिकनाई , कम प्रोटीन और रेशों की अधिकता स्तन कैंसर को पनपने नहीं देती।

गुरदे व पित्ताशय की पथरी भी शाकाहारियों में कम बनती हैं दरअसल पथरी बनती है कैल्शियम आँक्सलेट जमा हो जाने से । शाकाहारियों में यूरिक एसिड, कैल्शियम और आँक्सलेट तीनों ही मूत्र त्याग के साथ ही शरीर में से बाहर निकल जाते हैं। इसके अतिरिक्त शाकाहारियों में मधुमेह का अनुपात भी बहुत कम होता है। क्योंकि शाकाहारी भोजन में रेशों के कारण ग्लूकोज धीरे धीरे बनता है । रेशों की वजह से ही आँतों में जी0आई0पी0 नामक हार्मोन निकलता है, जो इंसुलिन ज्यादा बनने नहीं देता और सोमेटोस्टेटिन की मात्रा बढ़ा देता है।

(लोभ-मोह के भव-बंधन आदर्शवादिता के आध्यात्मिकता के मार्ग पर चलने वालों के लिए हथकड़ी बेड़ी जैसे अवरोध उत्पन्न करते हैं लालची , संग्रही , विलासी व्यक्ति को लोभ लिप्सा इस कदर जकड़े रहती है कि उसे परमार्थ में कोई रस ही नहीं आता । अपनी तराजू पर अपने बाटों से तौलने पर स्वार्थ वजनदार प्रतीत होता है । और परमार्थ हलका इसलिए लालच में राई-रत्ती कमी पड़ते ही वह परमार्थ से हाथ खींच लेता है मनीषियों ने उत्कृष्टता के क्षेत्र में प्रवेश करने वालो के लिए वित्तेषणा, पुत्रेषणा ओर अहंता (लोभ, मोह और बड़प्पन ) की त्रिविध ऐषणाओं का परित्याग करने के उपराँत ही श्रेय मार्ग पर पैर बढ़ाने की सलाह दी है। इस निर्मलता को प्राप्त किए बिना भक्ति नहीं बनती है। स्वच्छ निर्मल होने पर ईश्वर दूर नहीं रह जाता , अपने अंदर बैठा दिखाई देने लगता है। )

सेव अर्थ फाउंडेशन ने जो आँकड़े प्रकाशित किए है, उनके अनुसार शाकाहार आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इसके संचालकों के अनुसार आज जीवन की गुणवत्ता तथा प्राकृतिक एवं पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखने में शाकाहार एक निर्णायक भूमिका निभा सकता है। अर्थ शास्त्रियों का स्पष्ट कथन है कि धरती पर खाद्य स्रोतों का इतना सुनियोजित और संतुलित वितरण है कि यदि हम चाहे तो कृषि के वर्तमान उत्पादन स्तर पर अब से आठ से दस गुनी ज्यादा आबादी का पेट आसानी से भर सकते हैं। परंतु आधी से ज्यादा अन्न फसलें पशुओं को खिला दी जाती है ,ताकि उनका माँस ज्यादा स्वादिष्ट हो सके। अर्थशास्त्रियों की ही भाँति समाज मनोवैज्ञानिकों के अपने निष्कर्ष है। उनके अनुसार आज विश्व में सबसे बड़ी समस्या हिंसा और आतंकवाद की है। मनोवैज्ञानिकों का मत है कि मनुष्य के स्वभाव को अहिंसा और शाकाहार की ओर प्रवृत्त करके ही इन्हें रोका जा सकता है। विभिन्न मनोवैज्ञानिक प्रयोगों से यह तथ्य उभरकर आया है कि दुर्दांत अपराधियों के व्यवहार भी शाकाहार से परिवर्तित किए जा सकते हैं इन वैज्ञानिक प्रयोगों से यह सिद्ध हो चुका है कि शाकाहार से विश्वशाँति का प्रसार हो सकता है, साथ ही मानव को अधिक स्वस्थ और रोगमुक्त रखकर जीवन को अपेक्षाकृत अधिक आनंदमय बनाया जा सकता है।

सुविख्यात पत्र द संडे आर्ब्जवर ने सुप्रसिद्ध शाकाहारियों की एक सचित्र सूची हाल ही में प्रकाशित की है। इस सूची में विश्वप्रसिद्ध समाजसेवी, राजनेता, उद्योगपति, खिलाड़ी, चिकित्सक, ड्रेस डिजाइनर, पत्रकार, गणितज्ञ ,विधिवेत्ता , अभिनेता अभिनेत्रियाँ नृत्याँगनाएँ एवं पहलवान सभी शामिल है। इस सूची से यह तथ्य स्वयं ही स्पष्ट हो जाता है कि शाकाहार से बहुमुखी प्रतिभा का विकास संभव हैं। हो भी क्यों नहीं , पूर्वकाल के मनीषी , अरस्तू , प्लेटो , शेक्सपियर , डार्विन , पी0ए॰ हक्सले , इमर्सन, आइंस्टीन, जार्ज्र बनोर्ड शाँ , लियो टॉलस्टाय सभी तो शाकाहारी ही थे। भारत तो प्रारंभिक काल से ही शाकाहार के मामले में अग्रणी रहा है, यहाँ महावीर एवं गौतम बुद्ध से लेकर महात्मा गाँधी नोबुल पुरस्कार विजेता सी ॰ वी0 रमन, भूतपूर्व राष्ट्रपति एवं दार्शनिक डॉ0 राधाकृष्णन जैसे अगणित नाम है, जो आजीवन शाकाहारी रहे।

अमेरिका की एक बाजार शोध कंपनी ‘रोपर स्टार्च वर्ल्ड वाइड ‘द्वारा विश्वव्यापी स्तर पर किए गए सर्वेक्षण से यह तथ्य उभरकर आया है कि भारत में 82 प्रतिशत लोग प्रतिदिन शाकाहार करते हैं। इंग्लैंड में प्रति सप्ताह 3,000 व्यक्ति शाकाहार बन रहे है। अमेरिका में डेढ़ करोड़ लोग शाकाहारी है। सच तो यह कि आज हर बुद्धिजीवी व्यक्ति शाकाहारी प्रणाली को ही अधिक आधुनिक, प्रगतिशील और वैज्ञानिक मानता है और स्वयं को शाकाहारी कहलाने में अधिक गर्व महसूस करता है।

शाकाहार का सीधा-सा अर्थ है, सदा-सीमित आहार, संयत रहन- सहन, सरल, निश्छल अहिंसामूलक जीवन और पूरी दुनिया के साथ कुटुँबवत् व्यवहार। सत्य यही है कि शाकाहार एक करुणामूलक जीवनशैली है, जो प्रत्येक जीवधारी के सम्मान के प्रति गहन आस्था की द्योतक है। अतः इससे मनुष्य सहज ही समृद्ध , शक्ति शाली एवं बहुमुखी प्रतिभा का धनी बनता है, साथ ही उसमें स्वतः ही सद्गुणों सद्वृत्तियों का विकास होता है।


उदासीनता तथा चिताओं से मुक्त (kahani)

एक राजा दुखी और उदास, चिंतित इतना कि रात को नींद तक नहीं आती । राज्य के मंत्री तथा निजी चिकित्सक उसे प्रसन्न रखने के लिए तरह-तरह के प्रयत्न करने लगे। प्रयत्न क्यों न करते ? राजा जो ठहरा राज्य का। किसी ने कहा, यदि राज्य के सबसे सुखी और प्रसन्न व्यक्ति को ढूँढ़कर उसका उतरीय वस्त्र राजा को पहना दिया जाए , तो उसकी खोई हुई प्रसन्नता लौट सकती है। अनेक मंत्री तथा नौकर-चाकर सुखी व्यक्ति की खोज में निकल पड़े। सब सोचते जो यह कार्य सबसे पहले कर दिखाएगा, उसकी कार्यक्षमता का प्रभाव राजा पर पड़ेगा और राजा खुश हो गया, तो मुँह माँगा पुरस्कार मिलेगा।

एक दिन सड़क के किनारे अपने राम में मस्त एक सज्जन मिल गए। यद्यपि उन्होँने राजा के सम्मुख जाने को बहुत आनाकानी की , पर विवश थे जाना पड़ा । राजा के सम्मुख उपस्थित हुए। जब वह राज्य के सबसे प्रसन्न व्यक्ति से मिले, तो उनकी भी खुशी का ठिकाना न रहा। वह तो चिल्ला पड़े, अच्छा तुम हो सबसे सुर्खी व्यक्ति। फिर तो कितने ही लोग तुमसे ईर्ष्या करते होंगे। लाओ। लाओ!! तुम्हारा उतरीय वस्त्र कहाँ है,मैं भी उसे पहनकर अपनी उदासीनता तथा चिताओं से मुक्त हो जाऊँ।

राजन् ! आप उतरीय वस्त्र की बात कहते हैं, मेरे पास तो ओढ़ने की , पहनने की एक धोती के सिवाय कुछ नहीं। रमता योगी और बहता पानी जैसा मेरा जीवन है। राजा समझ गया कि सुख वस्तुओं में नहीं संतोष में है।


सबसे बड़ा खजाना

अँधेरी रात में वह फकीर आकाश के तारों को देख रहा था। रात जैसे-जैसे गहरी होती जाती, थी वैसे-वैसे आकाश में तारे बढ़ते जाते थे। धीरे धीरे तो पूरा आकाश ही उनसे जगमग हो उठा था और आकाश के तारों को देखते-देखते उसका मन भी उस मौन सौंदर्य से भर गया। वह एक वृक्ष से टिका इस सौंदर्य में खोया ही था कि तभी किसी न पीछे से आकर उसके कंधे पर अपना ठंडा हाथ रख दिया। आने वाले की पगध्वनियाँ भी उसे सुनाई पड़ी थीं । वे ऐसी नहीं थी। जैसी किसी जीवित व्यक्ति की होनी चाहिएं उसका स्पर्श तो इतना निर्जीव था कि अँधेरे में भी उसकी आँखें में भरे भावों को समझने में उस फकीर को देर न लगी । उसके शरीर का स्पर्श उसके मन की हवाओं को भी उस फकीर तक ले आया था। हालाँकि वह व्यक्ति तो जीवित था और युवा था, लेकिन जीवन कभी का उससे विदा ले चुका था ओर यौवन तो संभवः उसके मार्ग में कभी आया ही नहीं था।

वे दोनों तारोँ के नीचे बैठे थे। उसके मुरदा हाथों को फकीर ने अपने हाथों में ले लिया था, ताकि वे थोड़े गरम हो सकें और थोड़ी सी जीवन ऊष्मा उनमें भी प्रवाहित हो सके। निश्चय ही ऐसे समय में बोलना उचित नहीं था, शायद इसीलिए वह फकीर चुप रहा। हृदय मौन में ही कहीं ज्यादा निकटता पाता है और शब्द जिन घावों को नहीं भर सकते , मौन उन्हें भी स्वस्थ करता है । शब्द और ध्वनियाँ तो जीवन-संगीत में विघ्न और बाधाएँ ही है।

रात्रि मौन थी और हो गई । उस शून्य संगीत ने उन दोनों को घेर लिया । वे दोनों अब अपरिचित नहीं रहें। फिर आगंतुक की पाषाण जैसी जड़ता टूटी और उसके आँसुओं ने खबर दी कि वह पिघल रहा है।वह रो रहा था और उसका शरीर कंपित हो रहा था। उसके हृदय में जो हो रहा था उसकी तरंगें उसके शरीर के तंतुओं तक आ रही थी। वह रोता रहा, रोता रहा और निराश हूँ। मेरे पास कुछ भी तो नहीं है।”

फकीर थोड़ी देर चुप रहा, फिर मुस्कराते हुए बोला, ऐसा क्यों कहते हो, तुम्हारे पास तो एक बहुत बड़ा खजाना है। वह युवक हैरान हुआ, उसने कहा, खजाना? मेरे पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं है।

इस पर फकीर हँसने लगा और बोला, मेरे साथ बादशाह के पास चलो। बादशाह बड़ा समझदार हैं । छिपे खजानों पर उसकी सदा से गहरी नजर रही है।

युवक की समझ में कुछ नहीं आया । वह उलझन में पड़ गया और हैरान होते हुए कहने लगा, आखिर मुझे भी तो पता चले कौन-सा खजाना है मेरे पास?

फकीर ने कहा, जैसे तुम्हारी आंखें, तुम्हारा हृदय, मस्तिष्क। इनमें से किसी एक के भी हजार दीनार मिल सकते हैं तुम्हें।

वह युवक हैरान हुआ और कहने लगा, मैंने तो सुना था कि फकीर जुन्नैद एक आला दरजे के आलिम है, उनके पास रूहानी ताकत है। पर आप तो पागल है। भला कोई अपना, हृदय, मस्तिष्क भी कभी बेचना चाहेगा।

फकीर हँसने लगा और बोला ,मैंने तो सुना था कि फकीर जुन्नैद एक आला दरजे के आलिम है, उनके पास रूहानी ताकत है। पर आप तो पागल हैं भला कोई अपना हृदय, मस्तिष्क भी कभी बेचना चाहेगा।

फकीर हँसने लगा और बोला, मैं पागल हूँ या तू ? जब तेरे पास इतनी बेशकीमती चीजें हैं, जिन्हें तू हजारों में तो क्या लाखों में भी नहीं बेच सकता, तो झूठ-मूठ का गरीब क्यों बना हुआ है, अपने को निर्धन क्यों कहता है , इनका उपयोग कर। जो खजाना उपयोग में नहीं आता, वह भरा हुआ भी खाली है और जो उपयोग में आता है, वह खाली भी हो तो भर जाता है। परमात्मा खजाने देता है, अकूत खजाने देता है, लेकिन उन्हें खोजना और खोदना स्वयं ही पड़ता है। जीवन से बड़ी कोई संपदा नहीं है। जो उसमें ही संपदा नहीं देखता, वह संपदा नहीं हैं जो उसमें ही संपदा नहीं देखता, वह संपदा को और कहाँ पा सकता है?

रात्रि आधी से ज्यादा बीत चुकी थी। फकीर जुन्नैद उठे और उस युवक से कहने लगे, अब घर जाओ और सो जाओ। सुबह एक दूसरे व्यक्ति की भाँति उठो। जीवन वैसा ही है जैसा कि हम उसे बनाते हैं। वह मनुष्य की अपनी सृष्टि है। उसे हम मृत्यु भी बना सकते हैं। और अमृत भी। सब कुछ स्वयं के अतिरिक्त और किसी पर निर्भर नहीं हैं। फिर मृत्यु तो अपने आप आ जाएगी । उसे बुलाओ अमृत को । पुकारो परम जीवन को । वह तो तप से, शक्ति से , संकल्प से और साधना से ही मिल सकता है।


बौद्धिक कुशाग्रता अर्जित की जा सकती है।

बुद्धि ईश्वरीय विभूति है। यह हर एक मनुष्य को मिली हुई है। यहाँ सर्वथा बुद्धिहीन आदमी शायद कोई भी नहीं । जिसे हम मूर्ख या बुद्धिहीन कहते हैं, उसमें बुद्धि का बिलकुल अभाव नहीं होता । एक अध्यापक की दृष्टि में किसान मूर्ख है, क्योंकि वह साहित्य के विषय में कुछ नहीं जानता, किंतु परीक्षा करने पर मालूम होगा कि किसान को खेती के संबंध में पर्याप्त होशियारी, सूझ और योग्यता है। इसी प्रकार एक वकील की दृष्टि में अध्यापक मूर्ख समझे क्योंकि वह यह भी नहीं जानता कि जुकाम हो जाने पर उसकी क्या चिकित्सा करनी चाहिए। इन सब बातों पर विचार करते हुए ऐसा मनुष्य मिलना कठिन है, जो पूर्णतः निर्बुद्धि कहा जा सके।

यहाँ जानने योग्य बात यह है कि प्रत्येक के अपने अपने निजी विषय अलग होते हैं। एक वकील है, तो दूसरा किसान। एक पढ़ा-लिखा है, जबकि दूसरा अशिक्षित । दोनों को ही अपने अपने विषयों की योग्यता होगी। न्यूनाधिकता तो इस सृष्टि का नियम है। किसी की किसी से समानता तो हो नहीं सकतीं जिस प्रकार सब मनुष्यों की आकृति भिन्न-भिन्न है, उसी प्रकार योग्यता भी पृथक-पृथक हैं। जो जितना प्राप्त कर सकता है, उतना पदार्थ उसके पास है। प्रयत्न करने पर उसे बढ़ा लेगा या प्रमाद में गँवा देगा । बुद्धिहीन शब्द का जब प्रयोग किया जाता है, तो कहने वाले का तात्पर्य उसकी बुद्धि शक्ति से नहीं होता , क्योंकि पागलों को छोड़कर असल में कोई भी बुद्धिहीन नहीं है। जब किसी व्यक्ति को सामाजिक नियमों का ज्ञान नहीं होता , दूसरों से किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए, यह नहीं जानता , तो आम प्रचलन में उसे जंगली अथवा ‘मूर्ख कह दिया जाता है, किंतु वास्तविक मूर्ख यथार्थ में वह है, जा अपनी योग्यता को नहीं समझता ओर बिना सोचे समझे कार्य करके असफलता प्राप्त करता है। कार्य कोई भी असंभव नहीं है, लेकिन अपनी योग्यता ,वर्तमान साधन और परिस्थिति आदि का ध्यान रखे बिना जो आरंभ होता है, वह असफल की और ले जाता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जो सामाजिक नियमों का पालन करना जानता है, वह बुद्धिमान् कहा जाएगा । चतुर वह है, जो अपने व्यवसाय में बाहरी परिस्थितियों का ठीक प्रकार समन्वय करना जानता है। किसी विषय विशेष का ज्ञान प्राप्त करना तीव्र इच्छा और उचित शिक्षा क्रम पर निर्भर है, जो मनुष्य अपूर्ण या रोगी नहीं है,वह उस स्थिति को थोड़े से ही प्रयत्न से प्राप्त कर सकता है, जिसमें उसको बुद्धिमान् कहा जा सके।

यों तो बुद्धि ईश्वर ने हर एक को दी है। इतने पर भी प्रयास, अभ्यास और लगन द्वारा उसे प्रखर बनाए रखने की निरंतर आवश्यकता पड़ती है। जो इस दिशा में कृपणता बरतते, उनकी बुद्धि कुँद पड़ जाती और जंग लगे लोहे की तरह निकम्मी साबित होती हैं इसलिए मनःशास्त्रियों ने कुछ ऐसे उपाय-उपचार सुझाए है ,जिनके संपादन से बुद्धि तत्व की तीक्ष्णता को प्रभावित-उत्तेजित किया जा सकना संभव है। इनमें से प्रथम है, कल्पनाशीलता। जिस मस्तिष्क में इनका अभाव है एवं जो अपनी दीन-दयनीय स्थिति से समझौता करके उससे ही संतुष्ट हो जाता तथा आगे की बात सोचने की जरूरत नहीं समझता, उसे एक प्रकार से पशु ही समझना चाहिए । पशुओं में इस क्षमता का अभाव होता है, अतएव वे बुद्धि कौशल में आदमी के समकक्ष नहीं होते । काल्पनिक चित्र बनाना ओर योजनाओं की मानसिक रूपरेखा तैयार करना ऐसे कार्य है, जो मस्तिष्क पर दबाव डालते और बुद्धि को उद्बुद्ध ओर विकसित होने के लिए विवश करता है। यहाँ कल्पनाशीलता का तात्पर्य शेखचिल्लियों जैसी कल्पना- जल्पना से नहीं हैं। इससे तो आदमी बहकता और अनावश्यक शक्ति-क्षरण होता है । यहाँ इसका संबंध अपने कार्यक्षेत्र के क्रियाकलापों एवं भविष्य की योजनाओं के उन मानसचित्रों से है, जिन्हें क्रियान्वित करने से पूर्व मानसपटल पर उन्हें साकार करना पड़ता और तर्क एवं तथ्यपूर्ण ढंग से बार बार यह विचारना पड़ता है कि इसमें सफलता असफलता की कितनी संभावना सन्निहित है। किसी को यदि कोई व्यापार करना हो, तो उसकी कल्पनाशक्ति ऐसे मानस-चित्र बनाएगी कि यह व्यापार करने से अमुक को इतना लाभ हुआ, इस वस्तु के ग्राहक अमुक महीनों में अमुक प्रकार की वस्तुओं की बिक्री बढ़ जाती है और अमुक प्रकार की घट जाती है अतएव समयानुसार आवश्यक वस्तुएं ही खरीदना चाहिए, इस प्रकार की सारी व्यवस्था के कल्पनाचित्र आरंभ में वह बनाएगा ओर यदि निर्णयशक्ति ठीक हुई ,अनुभव के आधार पर इस कल्पना में ठीक संशोधन कर सका , तो एक उत्तम योजना बन जाएगी और उसे कार्यरूप में लाकर लाभ उठाया जा सकेगा , किंतु जिसके मन में इस प्रकार की उड़ानें नहीं उड़ती वह मजदूरी करने या ढर्रे के काम पर चलने रहने के अतिरिक्त और कुछ न कर सकेगा । इसीलिए बुद्धि को कल्पना का एक संस्कारित स्वरूप कहा गया हैं।

दूसरा तत्व है, एकाग्रता। एकाग्रता के बिना ज्ञान, संपादन नहीं हो सकता और बिना ज्ञान के विद्वान् या बुद्धिमान् बनना संभव नहीं। अस्तु एकाग्रता को बुद्धि का एक अनिवार्य अवयव कहना उचित है, कारण कि उत्तम-से उत्तम मस्तिष्क वाले यदि चंचल चित हों , तो वे उतने और उस स्तर के काम नहीं कर सकेंगे, जितने कि साधारण मस्तिष्क के , किन्तु स्थिर चित्त वाले कर सकते है। कोई मनुष्य कितना ही चतुर क्यों न हो, यदि उसके मन को उचटने की आदत है और इच्छित विषय में एकाग्र नहीं होता, तो उसकी चतुरता किसी काम न आएगी और उसके निर्णय अपूर्ण एवं असंतोषजनक होंगे।

चित की एकाग्रता का संबंध रुचि से है। रूखे और अरुचिकर विषयों में मन नहीं लगता और वहाँ से बार-बार उचटता है, इसलिए जिस विषय पर मन लगता है , उसे रुचिकर बनाना चाहिए। विद्यार्थियों की ज्योमेट्री और गणित के विषय रूखे जान पड़ते हैं, इसलिए वे इससे बचते हैं, किन्तु जिन विषयों में सरलता होती है, उन्हें खूब दिलचस्पी के साथ पढ़ते हैं। यहाँ यह न सोचना चाहिए कि अमुक विषय सरस है और अमुक नीरस। संसार में कुछ भी नीरस नहीं हैं केवल मन को उनके अनुकूल बनाने की योग्यता में अंतर हैं। एक राज कर्मचारी के लिए खाट बुनने का काम कुछ भी दिलचस्पी का नहीं है, किंतु जिन्हें इसमें रुचि होती है, वे चारपाई बनने में बड़ी खूबसूरत फूल-पत्तियाँ निकालकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं । संभव है कि धोबी को अध्यापक का काम नीरस मालुम पड़े , पर उसके लिए वही आसान कार्य बहुत मनोरंजक हैं। तपस्वी लोग भूखे-प्यासे निर्जन स्थानों पर रहते हैं, शीत, धूप के कष्ट सहते हैं, यह सब उनकी रुचि के अनुकूल होता है, इसलिए उस दशा में भी उन्हें प्रसन्नता ही रहती हैं । दूसरे मनुष्य को यदि उसमें रुचि नहीं है, तो वही उसके मन उचटने का कारण है।

एकाग्रता से कार्यशक्ति को बड़ी उत्तेजना मिलती हैं कमजोर मस्तिष्क को भी एकाग्रता की प्रेरणा अद्भुत प्रतिभा संपन्न बना देती है। इसे यों समझें। एक नदी दो सौ गज चौड़ी और पाँच गज गहरी है। यदि उसकी चौड़ाई दस गज कर दी जाए , तो निश्चय ही गहराई पहले की अपेक्षा बहुत अधिक हो जाएगा। एकाग्रता की शक्ति ऐसी ही होती है। चिंतन के विस्तार को समेटकर उसे किसी एक विषय पर केंद्रीभूत कर लेने पर उस विषय के एक से एक रहस्य उजागर होने लगते हैं और चिंतन को उसमें वरिष्ठता और विशिष्टता प्राप्त हो जाती है । ऐसा एकाग्रता के अभाव में शक्य नहीं है, अस्तु बुद्धिमान् बनने के लिए एकाग्रता संपादन अनिवार्य है ।

जिज्ञासा -जानने, समझने और सीखने की इच्छा यदि मनुष्य में न होती, तो शायद वह आज की उन्नत स्थिति में न होकर मूढ़ ही बना रहता । किसी चीज के प्रति इच्छा का होना या न होकर मूढ़ ही बना रहता । किसी चीज के प्रति इच्छा का होना या न होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह किसी की प्रगति को विकसित या बाधित कर सकती है। वह किसी की प्रगति को विकसित या बाधित कर सकती है। इसकी उपादेयता को स्वयं प्रजापति ब्रह्मा ने भी एकोऽहम् बहुस्याम’कहकर प्रकाराँतर से स्वीकार ही किया है। आज उस महान् इच्छा का ही परिणाम है कि यह बहुरंगी सृष्टि बन पड़ी और अनेकानेक प्रकार की सत्ताएँ अस्तित्व में आई । ऐसा न हुआ होता , तो अब की यह सुँदर पृथ्वी वीरान और बंजर पड़ी रहती। न यहाँ वृक्ष वनस्पतियाँ होती, न पहाड़-पर्वत, सर्वत्र शून्य ही पसरा रहता । न यहाँ वृक्ष-वनस्पतियाँ होती, न पहाड़-पर्वत , सर्वत्र शून्य ही पसरा रहता। अतएव इच्छा की महत्ता का बखान करने के लिए उपर्युक्त आदि वाक्य ही पर्याप्त है। ज्यादा कुछ कहने सुनने की आवश्यकता नहीं । फिर भी इसकी विशेषताओं पर चिंतन -मनन करने पर ज्ञात होता है कि जिस अंतराल में यह विकसित होती है, उसका मस्तिष्क एक प्रकार का चुँबकीय गुण प्राप्त कर लेता है, जिससे उसका इच्छित विषय अपने आप खिंचता रहता है। कहते हैं कि वैध को रोगी हर जगह मिल जाते हैं । एक दूसरी कहावत है कि बेगारी को स्वर्ग में भी बेगार मिलेगा। इन उक्तियों में सत्य का अंश यह है कि उसका मानसिक चुँबकत्व अपने अनुकूल स्थितियाँ आकर्षित कर लेता है । निखिल विश्व- ब्रह्माँड में अनंत ज्ञान भरा हुआ हैं । उसमें से हर व्यक्ति उतना ही प्राप्त कर सकेगा, । जिसे कुछ सीखने की इच्छा नहीं होती, वह कभी सीख भी न सकेगा । नहीं सीखना, नहीं होती, वह कभी सीख भी न सकेगा। नहीं सीखना , नहीं जानना और ज्ञानार्जन करने का कोई उपाय न करना, इसे बुद्धिहीनता के अतिरिक्त और क्या कहेंगे।

संगति-इसमें इतनी क्षमता है कि वह व्यक्ति में अपने समान विशिष्टता पैदा कर देती हैं । यह विशिष्टता संगति के अनुसार अच्छी या बुरी दोनों प्रकार की हो सकती है, जो वास्तव में उसकी बुद्धि कुशलता को ही बरसाती है, कारण कि बुद्धि की सहायता के बिना किसी क्षेत्र में वरिष्ठ या विशिष्ट बनने की कल्पना नहीं की जा सकती । जेबकतरों के साथ रहकर व्यक्ति इतना निष्णात जेबकट बन जाता है। कि उसे सामने वाले के हाव-भाव को देखकर यह अनुमान लगाने देर नहीं लगती कि उसके पास मोटी रकम है। इसके बाद वह अपने अभ्यास और कौशल का इस्तेमाल कर इतनी सफाई से उसकी जेब खाली कर जाता है कि व्यक्ति को उसका आभास तक नहीं मिलता । झाडू लगाने का काम करने वाला बालक एडीसन एक वैज्ञानिक के सान्निध्य में रहकर महान् वैज्ञानिक एडीसन वन गया। दूसरी ओर भेड़ियों के झुँड में पलने वाला रामू रामू भेड़िया बन गया। उसमें मानवीय व्यवहार वाला एक भी गुण विकसित नहीं हो सका । इसमें विपरीत वह भेड़ियों जैसा गुर्राना, खाना और रहना सीख गया। यहाँ तक कि दो पैरों से चलने की मनुष्य की नैसर्गिक चाल भी भूल गया और चौपायों की तरह भागने लगा। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि बुद्धि तो हर एक के पास है,पर बिना उसे प्रशिक्षित और पैना किए वह निकम्मी पड़ी रहती है। संगति उसके इस निकम्मेपन को दूर करती और उसमें प्रखरता पैदा करती है।

जड़ मूर्ख यहाँ कोई भी नहीं । यदि ऐसा कोई दीखता है, तो उसका एक ही कारण है कि बुद्धि को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिल सका। जब जिस डाल पर बैठे, उसी को काटने वाला कालिदास जैसा वज्र मूर्ख भी विद्वान् कवि बन सकता है तो कोई कारण नहीं कि दूसरे वैसी स्थिति प्राप्त न कर सके। मनोयोग, रुचि वातावरण, एकाग्रता कल्पनाशीलता , सान्निध्य आदि कुछ ऐसे तत्व हैं, जिनकी सहायता से आदमी बौद्धिक कुशाग्रता अर्जित कर वह उपाधि प्राप्त कर सकता है, जिसे आमतौर पर विद्वान् या बुद्धिमान् कहते हैं।

“शाब्द-शाब्द में अंतर, कोई हीरा-कोई पत्थर” वाली कहावत चिरकाल से चली आ रही है। तात्पर्य यह कि शब्दब्रह्म की महत्ता से लोग अनादिकाल से ही परिचित हैं । भौतिक जगत् की अनेकानेक शक्तियों में ध्वनि की गणना प्रमुख रूप से की जाती है। चेतन जगत् में ब्राह्मी चेतना के मूल में भी एक ही शक्ति सक्रिय है, जो भिन्न-भिन्न रूपों में चेतना घटकों में गतिशील देखो जाती है। यह मूल शक्ति है - शब्दब्रह्म की। प्रत्यक्षतः इसे वार्त्तालाप के रूप में देखा जा सकता है। शब्द एक से होते हुए भी उनकी प्रतिक्रिया इस आधार पर भिन्न हो सकती है कि उन्हें किस स्तर के व्यक्ति ने किस भाव से प्रकट किया।

घटना उन दिनों की है, जब एक नवयुवक स्वामी दयानंद जी के पास पहुँचा। उस समय स्वामी जी नाम स्मरण संदर्भ में उपस्थित जनसमुदाय के समक्ष भक्तियोग का उपदेश दे रहे थे। तार्किक, शंकालु एवं अहंकार से परिपूरित उस नवयुवक को यह सब कुछ अच्छा नहीं लगा। प्रवचन के बीच में ही प्रतिवाद करते हुए वह बोल उठा, “स्वामी जी! भक्ति और भगवान् क्या होते हैं नाम स्मरण से होने वाला फायदा क्या है यह शब्दों का ही जाल-जंजाल मात्र है। इससे किसी को कुछ मिलने वाला नहीं है

स्वामी दयानंद चाहते तो अपना उपदेश जारी भी रख सकते थे, किंतु उस जिज्ञासु की शंका का समाधान तब कैसे होता अतः वे बड़े जोश-खरोश के साथ बोले, “पागल कहीं का, जाने क्या बक रहा है जानता भी नहीं और मानता भी नहीं। अहंकार इतना बढ़ा-चढ़ा है कि न जाने कोई प्रकाँड पंडित हो।”

स्वामी जी के इन अपशब्दों को सुनकर नवयुवा तिलमिला उठा। उसे अपना अपमान सहन न हुआ तो कहने लगा,”आप एक संन्यासी की भाँति लगते हैं, फिर भी आपको बोलने-चालने का सही ढंग नहीं आया है। “

स्वामी जी सहज स्वभाव में बड़े शाँत में बोले, “अरे भाई! आपको क्या हो गया मैंने तो आपसे कुछ भी नहीं कहा है दो-चार शब्द ही तो निकले है। इससे क्या आपको कोई विशेष चोट पहुँची है। यह कोरे शब्द ही तो हैं, पत्थर तो नहीं, जिनसे चोट लगती और हड्डी टूट जाती है। आप स्वयं भी तो कह रहे थे कि भक्ति और भगवान् शब्दाडंबर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जब शब्दों से कुछ बनता-बिगड़ता ही नहीं तो फिर आए इतना आगबबूला क्यों होते जा रहे हैं। तनिक गहराई से सोच-विचार कीजिए तो पता चलेगा कि बुरे शब्दों की चोट ने जिस प्रकार से आपको मर्माहत कर घायल किया है, ठीक उसी प्रकार भगवान् के पवित्र नाम स्मरण से व्यक्ति के सद्गुण विकसित होते हैं और भक्तिरस से सराबोर होने पर दुख-दर्द के घाव शीघ्र ही भर जाते हैं। संतप्त मन शीतल और शाँत बनता है। शब्दों के प्रयोग से ही व्यक्ति में आक्रोश उभरता है और वह अशाँत दिखने लगता है। “

“शब्दों का स्थूल उपयोग भाषा में है। ज्ञान और अनुभव के आदान-प्रदान में, वार्त्तालाप में सत्यता, नम्रता और शिष्टता का अपना प्रभाव है और कटु या स्वार्थपूर्ण वार्ता का अपना। परिशोधित-परिष्कृत होने पर ही शब्द अमृत बन सकते हैं और विकृ होने पर विष का भी काम कर डालते हैं। “ स्वामी दयानंद जी के इस उपदेश का उस नवयुवक पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि श्रद्धासिक्त होकर वह उनके पैरों में गिर पड़ा और बोला, “गुरुदेव! आपके कथन से मेरी शंका पूरी तरह मिट गई और वस्तुस्थिति समझ में आ गई कि मंत्रजप, स्तोत्रपाठ, नाम स्मरण आदि भाषा का विषय नहीं, वरन् व्यक्ति के अंतराल की भाव-संवेदनाओं को जगाने वाली ऐसी अलौकिक शक्ति-सामर्थ्य है, जिसके फलस्वरूप अहंकार एवं अन्य विकारों को विसर्जित होने में जरा भी देर नहीं लगती।”

परिशोधित वाणी ही वाक्शक्ति का अनूठा प्रमाण है। जो इस तथ्य को जानते और हृदयंगम करते तथा तद्नुरूप प्रयास-अभ्यास करते हैं, वही हर क्षेत्र में सहयोग-सहकार अर्जित कर पाते हैं। बाह्य परिमार्जन और आँतरिक परिष्कार के उपराँत ही जिह्वा से निकले शब्दों में वह सामर्थ्य पैदा होती है, जो महामानवों में दिखाई पड़ती है।


Quotation

यों तो बुद्धि ईश्वर ने हर एक को दी है। इतने पर भी प्रयास , अभ्यास और लगन द्वारा उसे प्रखर बनाए रखने की निरंतर आवश्यकता पड़ती है। जो इस दिशा में कृपणता बरतते , उनकी बुद्धि कुँद पड़ जाती और जंग लगे लोहे की तरह निकम्मी साबित होती है।

(न अकेला ज्ञान पर्याप्त है, न केवल तप। दोनों के समन्वय से ही आत्मिक प्रगति का आधार बनता है।


पाने के आनंद से बड़ा (kahani)

भगवान् बुद्ध का अभियान थोड़े से बौद्ध भिक्षुओं ने चलाया और एक दिन वह सारे भारतवर्ष और एशिया में छा गया। कंस दुर्धर्ष था, बालकों में कृष्ण ने सत्याग्रह जगाया व सक्रिय हुए, तो चेतन शक्ति ने उसका संहार कर दिखाया। आततायी असुर रावण के प्रति देवताओं का आक्रोश समवेत उत्साह के रूप में उभरा एवं वानर यूथों ने चेतन-शक्ति के सहारे उसका संहार कर डाला । थोड़े व्यक्तियों के प्रयत्नों से अर्जित सफलता को ईश्वरीय ही कहा जाना चाहिए।

स्वामी रामतीर्थ के जीवन की एक घटना हैं भ्रमण एवं भाषणों से परिश्राँत स्वामी जी अपने निवासस्थान पर लौटे । उन दिनों वे एक महिला के यहाँ ठहरे थे । वे अपने ही हाथों भोजन बनाते थे । अपने स्वभाव के अनुसार वे भोजन करने की तैयारी ही कर रहे थे कि कुछ बच्चे पास में आकर खड़े हो गए। उनके पास बहुत बच्चे आया करते थे।

बच्चे भूखे थे। स्वामी जी ने अपनी सारी रोटियाँ एक-एक करके बच्चों में बाँट दी। महिला वही बैठी सब देख रही थी । बड़ा आश्चर्य हुआ उसे । आखिर पूछ ही बैठी, आपने सारी रोटियाँ तो उन बच्चों को दे डाली , अब आप क्या खाएँगे ?

स्वामी जी के अधरों पर मुस्कान दौड़ गई । उन्होंने प्रसन्न होकर कहा, माता रोटी तो पेट की ज्वाला शाँत करने वाली वस्तु है। यदि इस पेट की ज्वाला शाँत करने वाली वस्तु हैं । यदि इस पेट में न सही, तो उस पेट में सही। देने का आनंद पाने के आनंद से बड़ा है।


परिष्कृत चेतना पकड़ लेती है संवेदनशील कंपनों को

मानवीय चेतना इतनी संवेदनशील है कि यदि उस और तनिक भी ध्यान दिया जा सके, तो वह प्रिय-अप्रिय हर प्रकार की तरंगों को पकड़ती और बताती है कि उस वस्तु या स्थान का इतिहास कैसा है एवं क्योंकर वह किसी के लिए लाभकारी या हानिकारक है ?

यों तो चेतना प्रत्येक जीवधारी में विद्यमान् है,पर कंपनों को पकड़ने और समझने की क्षमता सिर्फ मनुष्य को ही मिली हुई है। इसे उसका सौभाग्य कहना चाहिए कि प्राणियों में सर्वोच्च स्तर की चेतना उसे प्राप्त है, किंतु दुर्भाग्य यह है कि औरत आदमी उसका लाभ उठाने में विफल रहा है। वह अब तक उसका क्षुद्रतम उपयोगी ही करता रहा है इस दृष्टि से विचार किया जाए, तो वह सामान्य जीवधारी स्तर का ही साबित होगा, लेकिन उसकी बुद्धि-कुशलता उसे शिरोमणि सिद्ध करती है। वास्तविकता भी यही है। वह असाधारण है, उसकी चेतना अद्भुत और क्षमता अपरिमित है। समय-समय पर प्रकाश में अपने वाली घटनाएँ इसकी पुष्टि करती है।

टीं सी लेथव्रिज ने अपनी पुस्तक दि प्लूरलिटी ऑफ वर्ल्ड्स में एक घटना की चर्चा की है। वे लिखते हैं कि एक बार वे अपनी पत्नी मीना के साथ लैडरैम के समुद्री तट पर आयोडीन की प्रचुरता वाली एक विशेष प्रकार की घास इकट्ठी कर रहे थे । कार्य संपन्न करने के उपराँत स्थल भाग में वे कुछ उपयोगी पौधोँ की तलाश में इधर-उधर घूमने लगे। इसी क्रम में दोनों जंगल में एक निर्झर के निकट पहुँच गए। वहाँ एक विशाल शिलाखंड था। चट्टान इस प्रकार ढलुआ थी कि उस पर एक ही ओर से चढ़ा जा सकता था । दूसरी ओर से वह धरातल से लगभग बीस फुट ऊँची थी, इसलिए उस ओर से उस पर चढ़ना- उतरना दोनों ही असंभव था। मीना जब इस प्रस्तर खंड पर पहुँची , तो एक तीव्र आत्मघाती भावना ने उसे झकझोर डाला । उसको बार-बार यह लगने लगा , जैसे चट्टान से नीचे कूद पड़े। आवेग इतना प्रबल था कि कब वह उससे छलाँग लगा दे , कहना मुश्किल था। घबराकर उससे उतर पड़ी और लेथव्रिज से उसकी चर्चा की। दोनों तत्काल वहाँ से चल पड़े और पास के आदिवासी कबीले के निकट पहुँचे। चट्टान के बारे में पूछताछ की, तो ज्ञात हुआ कि एक वर्ष पूर्व उससे कूदकर एक युवक ने आत्महत्या की थी। उसी की प्राणचेतना वहाँ पर घनीभूत होकर प्रायः हर व्यक्ति को आत्मघात के लिए प्रेरित - प्रोत्साहित करती है। दूसरे शब्दों में, इसे यों भी कह सकते हैं कि आगंतुकों की प्राणचेतना वहाँ संव्याप्त तरंगों को पकड़ने में सफल रहीं इसका यह मतलब कदापि नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति को वहाँ की अप्रिय तरंगें प्रभावित - उत्तेजित करती हों या हर आदमी वहाँ के कंपन को ग्रहण कर पाने में समर्थ होता है। वास्तव में यह व्यक्ति की योग्यता या कंपन की तीव्रता पर निर्भर करता है। वस्त्र यदि बहुत गंदा हो, तो चाहे उस पर कोई भी रँग चढ़ा दिया जाएं , कोई अंतर नहीं पड़ेगा। उसी प्रकार एकदम हलके रंग की स्पष्टता के लिए उससे भी हलके वर्ण का कपड़ा चाहिए। तात्पर्य यह कि तरंग की तीव्रता-मंदता, यह सापेक्षित स्तितियाँ है और आँतरिक स्वच्छता-अस्वच्छता तर निर्भर हैं। अंतराल की शुद्धता बढ़ने पर ग्रहण-सामर्थ्य बढ़ती है और वह हर प्रकार के कंपन को पकड़ पाने में सफल होता है।

ऐसी ही एक अन्य घटना का वर्णन जीन फोरमैन ने अपने ग्रथ दि मास्क ऑफ टाइम में किया है। वे लिखती हैं कि एक बार जब वह हेम्पटन कोर्ट की दीर्घा से होकर शाही मंच की ओर जा रही थी, तो उनका मन अचानक बिना किसी कारण के भारी हो गया एवं वेदना ओर अवसाद से भर गया। वे इस आकस्मिक मनोवेदना का निमित्त जानने का प्रयास करती है रही, पर कुछ समझ नहीं पाई । बाद में पता चला कि सन् 1541 में इसी स्थान पर हेनरी अष्टम की पत्नी कैथरीन को चरित्रहीनता का दोषी पाकर बंदी बनाया गया था वह सुरक्षा गार्डों से बचकर दीर्घा की सम्राट् से मिलने चिल्लाती हुई भागी, जो उस समय न्यायमंच पर विराजमान् थे, पर वह वहाँ पहुँच नहीं सकी, कारण कि उसका द्वार बंद था, । अगले वर्ष उसे फाँसी दे दी गई।

जीन फोरमैन ने दीर्घा से होकर गुजरने वाले अनेक लोगों से इस बारे पूछताछ की, पर तीन को छोड़कर किसी ने भी कोई विचित्रता का उल्लेख नहीं किया । स्पष्ट है, चेतना की संवेदनशीलता ही कंपनों को पकड़ती और समझती है।

काँलिन विल्सन अपनी कृति दि साइकिक डिटेक्टिव में लिखते हैं। कि एक बार उनकी पत्नी अपने दो छात्रों के साथ वोड़मिन जेल देखने गई । घूमते-घूमते वे एक परित्यक्त कमरे के पास पहुँचे। वहाँ आते ही विल्सन की पत्नी को ऐसा लगने लगा, जैसे वह खूब रोए। तुरंत ही वह वहाँ से आगे बढ़ गई। पीछे पता चला कि एक दुर्दांत कैदी को उसी कमरे में रखकर इतनी भीषण यातना दी गई थी कि उसने रोते तड़पते प्राण त्याग दिए। कैदी की वही पीड़ा उनके संवेदनशील प्राण में संचरित हो गई, फलतः उन्हें भी वही अनुभूति होने लगी ।

आग बढ़ने पर उन्हें एक टीनशेड मिला । मानसिक अवस्था में एक बार फिर , परिवर्तन आया। इस बार मन गहरी उदासी से भर गया । उसने उस पर काबू पाने का असफल प्रयास किया, लेकिन बेकार रहा। संपूर्ण कारागृह देखने के पश्चात् वे जेलर के पास पहुँचीं और उक्त टीनशेड के संबंध में जानकारी चाही। जेलर ने बताया कि वहाँ वैरनान भूहर नामक एक हत्यारा रहता था जिसने एक साथ चाल लोगों को मार डाला था । मरने वालों में उसकी माँ , भाई तथा फार्म हाउस के दो नौकर थे।

भूहर एडमाँटन, एल्व्रेटा का रहने वाला था। वह फार्म हाउस में काम करने वाले एक मजदूर की पुत्री से विवाह करना चाहता था। माँ इसका विरोध कर रही थी। किसी मजदूर-कन्या से उसका पुत्र शादी करे, इसे वह बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। इस बात को लेकर एक दिन दानों में तू तू मैं हो गई । भूहर को क्रोध आ गया । उसने माँ को गोली मार दी । भाई गोली की आवाज सुनकर वहाँ आया, तो उसे भी नहीं छोड़ा । दो मजदूर यह सब दृश्य देख रहे थे, उन्हें भी मौत की नींद सुला दिया। बाद में उसे फाँसी की सजा हो गई ।

जेलर ने बताया कि भूहर जितने दिन इस टीनशेड में रहा, बराबर पश्चाताप करता रहा। वह अपराध-बोध से इस प्रकार ग्रसित था कि हमेशा एकाँत में गुमसुम बना रहता । जब मन करता, भोजन कर लेता, अन्यथा यों ही पड़ा रहता। उसे बार-बार यही कचोट रहा था कि उसने माँ- भाई की हत्या क्यों की ? इसकी विषण्णता इतना गहरा थी कि जब से वह यहाँ आया था, स्वयं कभी किसी से कोई बात नहीं की थी। जितना और जो कुछ उससे पूछा जाता, बहुत कुरेदने पर उसका संक्षिप्त सा उतर देता । उसकी यही उदासी वहाँ के वातावरण में सवार थी और जिस तिस को इसी मानसिक भूमिका में घसीट लाती । यह घटना महात्मा आनंद स्वामी के पुत्र श्री रणतीर के साथ जेल में हुई अनुभूति से बहुत मेल खाती है। उनका भोजन एक वार्डन बनाता था, जिसने खून किया था व अब व्यवहार ठीक होने के कारण वार्डन बना दिया गया था। जब भी वे उसके बने हाथ का भोजन लेते, उन्हें खून करने के ही स्वप्न आते थे।

विज्ञान भी अब इस प्रकार की घटनाओं की सत्यता स्वीकारने लगा है। उसका कहना है कि यह संपूर्ण विश्व तरंगमय है। यहाँ का हर जड़-चेतना तरंगयुक्त है । इसकी विशद व्याख्या विज्ञान का ‘क्वाँटम सिद्धांत’ करता है। उसके अनुसार पदार्थ की मूल सता कंपायमान है, अस्तु जब पदार्थ का लय होता है, तो वह अपनी मूल प्रकृति तरंग रूप में आ जाता है। उसका सर्वथा लोप नहीं होता, सिर्फ रूपांतरण होता है। अतएव संसार में जितनी घटनाएँ घटती है, घटने के बाद वह बिल्कुल समाप्त नहीं हो जाती, वरन् तरंग रूप में अपना अस्तित्व बनाए रहती है। इन्हीं सूक्ष्म तरंगों को मानती चेतना का सर्वोच्च संस्थान- मस्तिष्क पकड़ता एवं तत्संबंधी जानकारी प्राप्त करता है, तो विज्ञानवेत्ता कहते हैं कि जब मस्तिष्कीय तरंगों की आवृत्ति घटनाक्रमों की तरंगीय आवृत्ति के आस पास होती है, तो मनुष्य को स्थान या वस्तु संबंधी घटनाओं का कुछ-कुछ आभास होने लगता है, किन्तु जब दोनों की आवृत्तियां एक दूसरे के समतुल्य हो जाती हैं, तब घटनाएँ साकार हो उठती है, मानो सब कुछ सामने घट रहा हो।

योगी-यती साधनाओं के माध्यम से स्वयं को एक ऐसी भूमिका में प्रतिष्ठित कर लेते हैं कि इच्छानुसार अपने प्राण- कंपन परिवर्तित कर सकें । ऐसी स्थिति में वस्तु, व्यक्ति या स्थान संबंधी भूतकालीन घटनाएँ उनके समक्ष मूर्तिमान् हो उठती है। इसे चेतना की परिष्कृति कह लें , उसकी संवेदनशीलता या प्राण-कंपन की उच्चता , बात एक ही हैं।


Quotation

संसार में जितनी घटनाएँ घटती है, घटने के बाद वह बिलकुल समाप्त नहीं हो जाती ,वरन् तरंग रूप में अपना अस्तित्व बनाए रहती है। इन्हीं सूक्ष्म तरंगों को मानवी चेतना का सर्वोच्च संस्थान- मस्तिष्क पकड़ता एवं तत्संबंधी जानकारी प्राप्त करता है ।


आत्मिक प्रगति के लिए उपयुक्त आहार

उच्चस्तरीय साधनाओं में आहार पर बारीकी से ध्यान देना होता है। आत्मशक्ति के प्रबल जागरण, इच्छाशक्ति के प्रयोगों अथवा अलौकिक सत्ताओं से संबंध स्थापित करने के लिए भोजन के एक एक ग्रास का निर्धारण किया जाता है । इच्छाशक्ति या अशरीरी सत्ताओं को लौकिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए लगाना हो , तो ग्रास के आकार की चिंता भी करनी पड़ती है। तंत्रशास्त्रों में ग्रास के आकार की चिंता भी करनी पड़ती है । तंत्रशास्त्रों में ग्रास के भिन्न परिणाम बताएं हैं। इनमें बेर के आकार का, पक्षियों के अंडे के आकार का या चरु ओर यज्ञ आहुति के बराबर ग्रास लेने के निर्देश भी निर्धारण किए गए हैं। उन बारीकियों का ध्यान नहीं रखने पर विपरीत परिणामों के खतरे भी हैं। लेकिन सात्विक और सौम्य साधनाओं में इस तरह की बारीकियों पर ध्यान देना जरूरी नहीं है, उन साधनाओं में आहार के संबंध में जागरुकता बरतने, सावधानी रखने और आत्मिक प्रगति में सहायक सिद्ध होने वाला आहार लेने पर ही जोर दिया गया है।

किस व्यक्ति को कितना भोजन करना चाहिए, इस बारे में कड़े नियम नहीं बनाए जा सकते। सौम्य साधनाओं में इतना ही ध्यान रखना पर्याप्त है कि भूख से काफी कम भोजन किया जाए। इतना नहीं खा लिया जाए कि उसके बाद शरीर भारी होने लगे। आलस्य आ जाए या स्थिरता से बैठा न जाए। ध्यान की विधि बताने के बाद भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत आहार के संबंध में सावधानी बरतने के लिए कहते हैं। भगवद्गीता का अध्ययन करने वालों ने इन श्लोकों को कई बार दोहराया होगा, जिनमें कहा गया है कि वस्तुतः योग उसके लिए नहीं है, जो बहुत अधिक खाता है और न उसके लिए जो बिलकुल नहीं खाता। हे अर्जुन ! यह उसके लिए भी नहीं है, जो बहुत अधिक सोता है या बहुत अधिक जागता रहता है, जो व्यक्ति परिमित मात्रा में आहार-विहार करने वाला है, जिसने चेष्टाओं को नियम में रखा हुआ है, जिसकी निद्रा और जागरण नियमित हैं, उसका योग सिद्ध हो जाता अर्थात् दुखों का नाश होने लगता है।

सौम्य साधनाओं में आहार के संतुलन का तात्पर्य यही है कि वह शरीर-पोषण के लिए ही लिया जाए। स्वाद, लिप्सा, दिखावा या कोई और प्रयोजन उसके साध न जोड़े जाएँ। इन प्रयोजनों में किसी का आतिथ्य स्वीकार करने के लिए पार्टियों में जाना, दावतें उड़ाना और आमोद-प्रमोद के लिए होटलों में खाना भी शामिल हैं। घर आए आगंतुक का स्वागत-सत्कार करने के लिए समय के अनुसार चाय-पानी करना या भोजन परोसना अलग बात है। कहीं जाने पर स्वयं भी इस तरह चाय-नाश्ता और भोजन आदि किया जा सका हैं। यह अलग बात है। योग−साधकों के लिए मनाही इस बात की है कि मित्र-परिचितों या ग्राहकों को भोजन पर बुलाने के लिए ही अतिथि बनाया जाए। उस तरह का आहार भी योग में बाधक है, क्योंकि तब आप के सामने साधना के अनुकूल भोजन चुनने का विकल्प नहीं रह जाता। स्वादिष्ट, मधुर चिकना और तला-गला जो भी भोजन तैयार किया जाता है वही ग्रहण करना होता है। दावतों में इसी तरह गरिष्ठ भोजन बनाया भी जाता है।

साधना की पहली शर्त है, आहार का अनुशासन। अनुशासन में सर्वप्रथम यह आता है कि भोजन जहाँ-तहाँ नहीं किया जाए और जब भी इच्छा, सुविधा और अवसर मिल न किया जाए। क्या खाया जाता है यह जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि कब खाया जाए और किन परिस्थितियों में खाया जाए। शुरुआत में साधकों को माँस-मदिरा और नशीली चीजों के सेवन की मनाही की जाती है। भगवान् बुद्ध ने अपने अनुयायियों को जिन दस व्रतों का पालन करने के लिए कहा था उनमें एक आहार के चुनाव से संबंधित भी था। उस नियम से मद्य-माँस का स्पष्ट निषेध किया गया गया है। सात्विक आहार की पहली सीढ़ी चढ़ते ही समय, स्थान और पात्र के चुनाव पर जोर दिया जाता है। आहार संबंधी बाकी सावधानियों का क्रम समय, स्थान और पात्र के बाद आता है।

योग ग्रंथों में भोजन की आवर्तिता निश्चित करने के लिए संक्षिप्त सूत्र का उपदेश दिया गया है। उस सूत्र के अनुसार दो बार के भोजन में, वह पूर्ण हो या स्वल्प, दो प्रहर का अंतर होना चाहिए। एक प्रहर तीन घंटे का होता है। दो बार के भोजन में इस तरह छह घंटे का अंतर रहना चाहिए। अधिक-से-अधिक तीन बार खाने का नियम इस सूत्र के आधार पर ही निश्चित किया जा सकता है।

दूसरी महत्वपूर्ण शर्त स्थान के संबंध में है। आधुनिक जीवन की शैली में स्थितियाँ और आवश्यकताएं बदल गई हैं। फिर भी यह नियम तो निभाया ही जाना चाहिए कि घर में बैठकर दफ्तर या काम करने की जगह पर भोजन करना पड़े तो वहाँ भी निश्चित भाव बनाए रखें। जब भोजन कर रहे हों, तो आसपास ऐसा माहौल बिलकुल न हो, जिसमें ध्यान बँटे। उपनिषदों ने आहार को भी यज्ञ कहा हैं। मुख यज्ञ कुँड है, उसमें अन्न की आहुति दी जा रही है, जठराग्नि उस आहुति को ग्रहण करती और तृप्त होकर शरीर को पुष्टि का आशीर्वाद दे रही है।

नैष्ठिक साधकों के लिए घर अथवा अत्यंत आत्मीयजनों के अलावा कहीं भी भोजन करने की मनाही है। कुछ साधनाओं में माँ और पत्नी के अलावा किसी के हाथ का बना खाना पूरी तरह वर्जित है। साधना के एक स्तर पर पहुँचने के बाद साधक से स्वपोशी बनने की अपेक्षा भी की जाती है कि वह अपने हाथ से बना हुआ भोजन ही करे। लेकिन सौम्य और सहज साधनाओं में अपने आत्मीयजनों के हाथ का बना भोजन ही करने का नियम है। यह नियम अपने सत्परिणामों के साथ दिनचर्या में अनुशासन को भी साधता है। अनुशासन का अपना लाभ है। असल बात भोजन को विजातीय संस्कारों से बचाना है। सामान्य स्थिति में किया गया किसी भी तरह का भोजन मात्र उदरपूर्ति करा है। उसमें किस तरह के संस्कार संक्रमित हुए हैं, इसका कोई महत्व नहीं होता। लेकिन चित्त जब निर्मल होने लगता है, तो इन बातों से बहुत फर्क पड़ता है। गंदे मैले पानी में कुछ और गंदगी पड़ जाए, तो क्या बिगड़ा है। स्वच्छ जल में गंदगी के कुछ अंश भी दिखाई देते हैं और वे जल को विकृत कर देते हैं।

भोजन निश्चित समय पर किया जाए, निश्चित स्थान पर व्यवस्थित ढंग से किया जाए और वह परिचित-परखे हाथों से ही तैयार किया हुआ हो। पके हुए भोजन के संबंध में यह सावधानी विशेष रूप से बरती जाती है, अन्यथा साधकों को फल, कंद-मूल और दूध आदि से ही गुजारा चलाने के लिए कहा जाता है प्रकृति द्वारा उत्पन्न किया गया भोजन दूसरे हाथों से तैयार आहार की तुलना में लाख गुना बेहतर है। संस्कार की दृष्टि से वह ज्यादा शुद्ध है।

आधारभूत बातों का ध्यान रखने के बाद भोजन के चुनाव की बारी आती है। वह हिंसा से अर्जित किया हुआ तो कतई नहीं होना चाहिए। तंत्रमार्ग के उपास माँस, मदिरा और अनाज में भी तामसी प्रकृति के फल या अन्न ग्रहण कर लेते हैं। दक्षिणमार्गी साधकों के लिए इस तरह का भोजन सख्त मना है। अनाज में भी कुटे-पीसे धान्य की बजाय अक्षत भोजन ज्यादा सात्विक है। अनाज पीसकर रोटी बनाने की तुलना में खिचड़ी, अंकुरित अनाज, दालें आदि ज्यादा गुणकारी है। लेकिन सीधे इन बारीकियों में नहीं जाना चाहिए। आहार-संयम साधते समय उसके सात्विक होने पर ही ध्यान देना पर्याप्त है।

साधक के लिए उपयुक्त आहार की मीमाँसा करे हुए गीताकार ने निशिद्ध भोजन के संबंध में स्पष्ट निर्देश दिया हैं। भगवान् श्रीकृष्ण के इस उपदेश को सिद्ध और साधन समान रूप से उद्धत करते हैं कि जो भोजन जीवन, प्राणशक्ति, बल, स्वास्थ्य, आनंद और उल्लास को बढ़ता है और जो मधुर, चिकनाई से युक्त, पोषक और रुचिकर है वह सात्विक हैं। स्वाद में तीखा, खट्टा नमकीन, बहुत गरम, चटपटा, तला हुआ और गले या पेट में जलन उत्पन्न करने के साथ दुःख, रोग, शोक लाने वाला भोजन राजसी प्रकृति का है। तामसी भोजन वह है, जो बेस्वाद हो, सड़ गया हो, बासी हो, जूठा और गंदा हो तथा बिगड़ गया हो। (गीता 177-9) साधक को राजसी और तामसी भोजन से बचाना चाहिए।

शुद्ध सात्विक आहार की आवश्यकता इसलिए है कि ध्यान, भजन, कीर्तन और स्मरण आदि उपायों में साधक को देर तक एक ही स्थिति में बैठे रहना पड़ता है। स्थिर और सुख आसन से बैठने पर शरीर का तापमान गिरता है। स्वाभाविक ही इससे पाचन-संस्थान प्रभावित होता है। साधक यदि कठिनाई से पचने वाला भोजन लेता है, तो उससे भूख मरने, रक्तचाप और गठिया जैसी बीमारियाँ हो सकती है। गरिष्ठ भोजन श्वास रोग को भी जन्म देता है। वे सभी बीमारियाँ हो सकती है। गरिष्ठ भोजन श्वास रोग को भी जन्म देता है। वे सभी बीमारियाँ ध्यान, भजन और चित की एकाग्रता में विक्षेप उत्पन्न करती है।

शरीरशास्त्र की दृष्टि से हलका-फुलका और सुपाच्य भोजन क्यों जरूरी है? योगविद्या के व्याख्याकार पंडित श्रीपद दामोदर सातवलेकर लिखते हैं, भोजन को पचाने के लिए पाँच प्रकार के पाचक रसों का परिपाक और निश्चित तापमान शरीर को योगसाधना के उपयुक्त बनाता है। दोनों ही स्थितियाँ आहार-विवेक से बनती हैं । जब ध्यान को यदि अपनी दिनचर्या का अंग बनाना हो तो इस विवेक को अपनाना ही पड़ेगा ।

आहार-विवेक को व्यवहार में उतारने का खुलासा करते हुए श्री सातवलेकर ने लिखा है, सर्वप्रथम सब्जियों को अच्छी तरह उबालकर काम में लाना चाहिए । कच्ची सब्जियाँ ठीक से हजम नहीं होतीं। हजम हो भी जाती है, तो समय लेती है। इससे शरीर में आलस्य आता है। सब्जियों में आवश्यक मसाले उचित मात्रा में मिलाए जाने चाहिए, ताकि वे उनके वात, पित्त और कफकारी गुणों को संतुलित कर सकें। इस तरह शरीर में शक्ति का हास नहीं होगा, पपीता, अनानास ,सेब ,संतरा , अमरूद आदि में पर्याप्त पाचक रस होते हैं। सब्जियों में धनिया, कालीमिर्च , हल्दी , जीरा, सौंफ सरसों या मूँगफली का तेल भी पाचनक्रिया को सक्रिय-सुचारु रखने में सहायक होते हैं । कुछ जड़ी बूटियाँ भी भोजन को सुपाच्य बनाती है।

साधक को अपनी स्थिति , आवश्यकता और प्रकृति के अनुसार आहार का चुनाव करना चाहिए । इस संबंध में थोड़ी-सी सजगता बरती जाए, तो पता चल जाता है कि अपने लिए किस तरह का भोजन चाहिए । सजगता भोजन से पूर्व ही होनी चाहिएं। उसकी विधि यह है कि भोजन शुरू करने से दस मिनट पहले शाँत होकर बैठा जाए। हो सके तो आसान लगाकर, आंखें बंद कर ध्यानमुद्रा में बैठें । पाँच बार गहरी साँस छोड़ने के बाद कुछ देर फिर ठहरे । यह एक प्राणायाम हुआ। इस प्राणायाम हुआ। इस प्रकार पाँच बार गहरी साँस ले और छोड़े । प्राणायाम के समय अपने इष्ट के स्मरण पूर्वक यह संकल्प करें कि अपने लिए उपयुक्त भोजन का चुनाव करना है। अभी जो भोजन सामने आ रहा है, उसके अधिष्ठाता देव यह बताने का अनुग्रह करें कि वे मुझे पोषण देंगे या नहीं ।

भोजन को संस्कारित करने का एक उपाय उसे भगवान् को समर्पित करना भी है। भगवान् को समर्पित करने के बाद आहार प्रसाद रूप हो जाता है। उसकी प्रकृति, स्वभाव, संस्कार जो भी हो सभी में प्रसाद-भाव का समावेश हो जाता है। प्रसाद का अर्थ है, अनुग्रह के रूप में प्राप्त हुआ। इष्ट-आराध्य से जो प्रसाद रूप में आता है, वह कल्याणकारी ही होता है । सभी साधना संप्रदायों में भोजन को समर्पित करने का विधान है। ताँत्रिक साधनाओं में तो इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है। वहाँ देवी, शिव अथवा भैरव को भोजन केवल समर्पित ही नहीं किया जाता, थाली में रखे व्यंजनों को नए सिरे से सजाया जाता है। उन व्यंजनों से त्रिकोण, चतुर्भुज ,व्यास ,षट्कोण और स्वस्तिक जैसी आकृतियाँ बनाई जाती है। कुछ ताँत्रिक साधक भोजन को छुरी या अँगुली से लकीर खींचकर भी संस्कारित करते हैं।इन उपायों के जरिये समझा जाता है कि अब भोजन विजातीय संस्कारों से मुक्त हो गया । वह ग्रहण किया जा सकता है। ताँत्रिक साधनाओं में आहार के माध्यम से अभियार कर्म किए जाने की आशंका प्रबल रहती है । योग्य गुरु इस तरह के उपायों द्वारा अनर्थकारी प्रभावों के निवारण का उपाय सुझाते हैं । दक्षिणमार्गी साधनाओं में यह काम स्मरण और निवेदन से ही संपन्न कर लिया जाता है।

साधना के क्षेत्र में गति होने ओर उच्च स्थिति की ओर अग्रसर होते जाने के साथ विवेक का उदय भी होता चलता है। सजगता सिद्ध हो जाने के बाद ज्यादा सावधानी रखने की आवश्यकता नहीं रह जाती। आहार सामने आने के बाद आँतरिक विवेक स्वयं ही निर्धारण कर लेता है। यह स्थिति प्राप्त करने के लिए एक न्यूनतम अनुशासन को तो अभ्यास में लाना ही पड़ता है। वह अभ्यास सिद्ध होने के बाद आहार शुद्ध होने लगता है और छाँदोग्य के ऋषि के अनुसार आहार-शुद्धि के बाद सत्व शुद्ध होने लगता है। आहार शुद्धौं सत्वशुद्धि । सत्व शुद्ध होने लगता है, तो चेतना की उस निश्छल, निर्मल और प्रकाशपूर्ण अवस्था में परमात्मसत्ता का प्रतिबिंब भी उतर आता है । उसके आलोक में श्रेयमार्ग पर सहज गति होने लगती है।


पति को पुत्र बना लेने का आशीष

सामान्य अर्थों में विवाह का उद्देश्य एक-दूसरे का वरण, निर्वाह, साथी-सहचर बनकर रहना और संतान का जन्म देना, उसका पालन-पोषण और विकास करना है। शरीर और मन की निजी आवश्यकताओं को साथी-सहचर के माध्यम से पूरा करते हुए सभ्यता ओर समाज के क्रम को आगे बढ़ाना पारिवारिक जीवन की सफलता है। विभिन्न सभ्यता-संस्कृतियों ने परिवार के संबंध में अलग अलग तरह से इसी मान्यता का प्रतिपादन किया है। अभिव्यक्ति और व्याख्या का स्वरूप भिन्न हो सकता है, लेकिन स्वर एक ही है,स्त्री पुरुष साथ रहें, उल्लास मनाएँ, वंश-परंपरा को आगे बढ़ाएँ और एक दूसरे की आवश्यकता सुविधा का निर्वाह करें।

विवाह के सामान्य उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ही दुनियाभर की सभ्यताओं ने नवदंपत्ति के लिए आशीर्वाद या शुभकामनाएँ रची है। उनमें सुखी रहें, धन धान्य बढ़े ,यशस्वी बनने जैसे भावों के अलावा यह भाव भी अनिवार्य और मुख्य होता है कि बहुत सी संतानों का जन्म दो, सौभाग्यवती रहो और दोनों एक दूसरे से प्रसन्न- दूसरे से प्रसन्न-संतुष्ट रहो । बहुत सी संतानों को जन्म देने का आशीष जिन दिनों दिया जाता था, उन दिनों आबादी कम थी और चुनौतियाँ बहुत अधिक थी। युद्ध , अकाल, महामारी, प्राकृतिक विपदा और असुरक्षा के माहौल में व्यक्ति किसी भी समय जीवन से हाथ धो बैठ सकता था । असमय और अकस्मात् मृत्यु की घटनाएँ आज जितनी होती है, बीस गुना ज्यादा घटनाएं सौ साल पहले तक होती थी। पचास वर्ष पहले तक भारतीय परिवारों में दस बारह बच्चों का जन्म होता था। उनमें से दो तीन ही पचास साठ साल तक जी पाते थे। आज स्थिति भिन्न है चार पाँच बच्चे जन्म लेते हैं, तो लगभग सभी जी जाते हैं । इसलिए आज के समय में बहुत सी संतानों को जन्म देने का आशीर्वाद नहीं दिया जाता, परिवार सीमित रखने और बच्चों को सुयोग्य नागरिक बनाने का आशीर्वाद दिया जाता है। आशय यह कि परिवार की कल्पना में संतान अब भी अनिवार्य रूप से शामिल है।

विवाह, परिवार और संतान की कल्पना में स्त्री-पुरुष के संबंधों का स्वरूप पूरे जीवन में एक ही स्तर पर चलता है। किन्हीं सभ्यताओं में पुरुष की सता प्रमुख है, तो किन्हीं में स्त्री की । पितृसतात्म या मात्सतात्मक सभ्यताओं के अलावा घरों में भी स्थिति और स्वभाव के अनुसार पति या पत्नी में से किसी एक की सता मुख्य होती है। सामान्यतः शारीरिक स्थिति,स्वभाव और कठोर प्रकृति के कारण पुरुषों का प्रभाव ही ज्यादा रहता है। लेकिन चर्चा यह नहीं हैं। विवाह के समय वर वधू की जो स्थिति होती है, वह आपसी संबंधों और घरेलू सामाजिक परिवेश में थोड़े बहुत अच्छे बुरे बदलाव के साथ हमेशा चलती रहती है । यानी पति पत्नी दोनों एक दूसरे से अनुशासित और बच्चों के संदर्भ में माता पिता है । स्वजन संबंधियों से भी उनका रिश्ता, निश्चित प्राय है। संबंधों में दूरी , निकटता , मधुरता और कड़वाहट आती जाती रहती है, मूल आधार में कोई परिवर्तन नहीं आता ।

(वैदिक दृष्टि स्त्री की परिणति मातृत्व में मानती है। पुत्री , बहन , पत्नी , मित्र आदि संबंध स्त्री हृदय में खिलने वाले भावों के पड़ाव कह सकते हैं। सभ्यता और संस्कृति उसे एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में देखती है। निजी जीवन में वह पत्नी , सखी ,सहचर के रूप में ज्यादा पसंद की जाती है। प्रेम,त्याग सेवा और उत्सर्ग के भाव पत्नी या सहचर की भूमिका में ही पूरी तरह खिलने लगते हैं।)

वेदों ने पति-पत्नी के संबंधों की सफलता का अलग मानदंड निश्चित किया है । विवाह के समय ऋषि नवदंपत्ति के लिए दिए जाने वाले आशीर्वाद में न केवल यह कामना व्यक्त करते हैं , बल्कि दिव्य शक्तियों से प्रार्थना भी करते हैं कि वर वधू इस भावना की चरितार्थ करें । ऋग्वेद में विवाह के समय वधू को आशीर्वाद दिया गया है, ‘दशास्याँ पुत्रन धेहि पतिमेकादशं कृधि ‘ (10.85,45) अर्थात् हे इंद्रदेव ! इस स्त्री को दस पुत्र हों , जिससे पति इसका ग्यारहवाँ पुत्र होवे ।

दस पुत्रों को जन्म देने का अर्थ मातृत्व का विकास है। वैदिक दृष्टि स्त्री की परिणति मातृत्व में मानती है। पुत्री , बहन ,पत्नी , मित्र आदि संबंध स्त्री हृदय में खिलने वाले भावों के पड़ाव कह सकते हैं। सभ्यता और संस्कृति उसे एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में देखती है। निजी जीवन में वह पत्नी , सखी सहचरी के रूप में ज्यादा पसंद की जाती है। प्रेम, त्याग ,सेवा और उत्सर्ग के भाव पत्नी या सहचरी की भूमिका में ही पूरी तरह खिलने लगते हैं। समझा लिया जाता है कि कोई स्त्री पत्नी के रूप में सफल सिद्ध हुई , तो उसका व्यक्तित्व सार्थक हुआ। अन्य क्षेत्रों में वह कितनी ही उन्नति कर ले, गृहिणी या पत्नी के रूप में कहीं भी चूकी तो वह नाकाम है।

यह दृष्टि अधूरी है और स्त्री को दासी , रमणीय, पशुधन समझने वाली स्थिति की ओर धकेलती है। स्त्री की सार्थकता गृहिणी और पत्नी मात्र बने रहना ही मान लिया जाए, तो सभ्यताएँ ठहर जाती है। उनका विकास रुक जाता है। उदाहरण के लिए, अपने देश में एक समय क्रूर, कर्कश, निरक्षर, असभ्य और निष्ठुर स्त्री को भी सिर्फ पतिव्रता होने के आधार पर ही आदरणीय मान लिया जाता था। उसकी तुलना में सभ्य, सुसंस्कृत, शिक्षित और सहृदय महिलाओं को भी इसलिए हेय बता दिया जाता था कि उनमें खुलापन है, लोगों से मेल-जोल बढ़ाने और समाज में आने जाने से उन्हें कोई उनकी यौन-शुचिता पर अँगुली उठा दे तो कुलटा, व्यभिचारिणी , कलंकिनी और पतिता जैसे कितने ही आरोप मढ़ दिए जाते । गलतफहमी से भी स्त्री के शील पर किसी ने संदेह कर लिया, तो उसकी सभी उपलब्धियाँ और सेवाएँ नकार दी जातीं। यदि वह किसी के लिए स्वार्थ साधने लायक स्थिति में ही तो ठीक, अन्यथा समाज में उसका कोई स्थान नहीं रह जाता ।

स्त्री की भूमिका पत्नी, गृहिणी या रमणी तक ही सीमित मान लेने का दुष्परिणाम यह हुआ कि वे संतान को जन्म देने में तो समर्थ हुई , उनका विकास नहीं कर सकीं। उनके पास मातृत्व देने और हृदय से सत्पात्र को अनुशासित करने जैसी क्षमता नहीं रही। ऋषि जब यह आशीर्वाद देते हैं। कि इस स्त्री के दस पुत्र उत्पन्न हों और पति ग्यारहवां पुत्र बने तो उसमें मातृत्व का ही आह्वान है। मंत्र का भाव यह है कि मातृत्व परिपक्व हो । परिपक्वता की कसौटी यह है कि संतान को देखकर तो वात्सल्य भाव आए ही, पति भी संतान की तरह दिखाई दे। यह कसौटी प्रचलित मान्यताओं से मेल नहीं खाती ।

समाजशास्त्रीय दृष्टि से पारिवारिक जीवन का उद्देश्य परस्पर सहयोग, स्नेह ,सेवा और अवलंबन है।जीवन का क्रम अबाध चलता रहें, देश, समाज में योग्य नागरिक विकसित हों और व्यक्ति क्योंकि मरणधर्मा है, इसलिए उसकी शृंखला बनी रहे । जीवधारी अथवा व्यक्ति का अभाव न हो । इसलिए परिवार आवश्यक हैं । समाजशास्त्र के अलावा एक जैविक दृष्टि भी है, जिसके अनुसार एक दूसरे की शारीरिक मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लोग विवाह करते हैं। घर बसाते और वंश चलाते हैं। बहुतों की दृष्टि में विवाहित जीवन का उद्देश्य यौन इच्छाओं की संयत पूर्ति और निष्ठा या सुरक्षा का आश्वासन भी हैं।

पारिवारिक जीवन की आध्यात्मिक दृष्टि सर्वथा भिन्न हैं। उसमें जैविक और सामाजिक आवश्यकताएँ तो पूरी होती हैं । लेकिन अध्यात्म वहीं तक सीमित नहीं हैं। उस आस्था को ग्रहण कर लिया जाए, तो जैविक, सामाजिक आधार गौण हो जाते हैं। अध्यात्म ही प्रमुख हो जाता है। किसी पक्ष की उपेक्षा होनी हो तो जैविक और सामाजिक पक्ष की ही बारी आती है। मान्यता और व्यवहार में स्थापित होने के बाद आध्यात्मिक भाव की उपेक्षा नहीं हो सकती । ऋषि ने अपनी शुभकामना आशीर्वाद में अध्यात्म भाव को ही वरेण्य माना है।

पति पत्नी के संबंधों में यौन-सुख ही महत्वपूर्ण है। यदि वंश-वृद्धि ही आधार है, तो उसके लिए धर-गृहस्थी बसाए बिना प्रकृति की प्रेरणा से संसार के क्रम को चलाते रहते हैं। परिवार को समाज-संस्था की नींव समझा जाए और उसके तकाजों से सभ्यता के विकास का दावा किया जाए तो भी बात गले नहीं उतरती । सभ्यता और प्रगति का जो सुख इन दिनों लोग भोग रहे है, वह परिवार का अतिक्रमण करने वाली प्रतिभाओं और जातियों के कारण ही संभव हो सका है। जिन आविष्कारों ने मनुष्य के श्रम को घटाया, सुविधाओं के नए नए रूप खोजे और आँतरिक दृष्टि से समृद्ध करने वाले चिंतन को नए आयाम दिए, वे घरेलू किस्म के व्यक्तियों का पुरुषार्थ नहीं है। वैसे आविष्कार घर परिवार की जिम्मेदारियों से मुक्त या उनकी उपेक्षा करने वाली प्रतिभाओं से ही संभव हो सके है।

वैज्ञानिक प्रगति या विज्ञान की नई नई खोजें पश्चिमी देशों में ही संभव हुई हैं। सत्रहवीं अठारहवीं शती में हुई औद्योगिक और वैचारिक क्राँतियों ने सभ्यता के वर्तमान स्वरूप की नींव रखी। वे क्राँतियाँ ब्रिटेन, फ्राँस और पुर्तगाल आदि देशों में हुई । इन सभी देशों में परिवार संस्था भारत की तरह सुदृढ़ साँचे में ढली और अविचल नहीं है । वहाँ ढीले ढाले परिवार हैं। लोग विग्रह या टकराव का नारकीय होने की हद तक झेलते रहने के बजाय अलविदा कहना पसंद करते हैं। यदि समाज की प्रगति और विकास को सिर्फ परिवार संस्था के आधार पर ही संभव मानें तो पश्चिमी देशों के स्थान पर भारत को भौतिक दृष्टि से सर्वाधिक संपन्न होना चाहिए था। ब्रिटेन की नहीं भारत की प्रभुता इतनी विस्तीर्ण होनी चाहिए थी कि उसके राज्य में सूरज नहीं डूबता।

अध्यात्म की दृष्टि से विवाह न तो निजी जीवन को सुखद सरल बनाने के लिए आवश्यक है और न ही समाज की स्थिरता के लिए। वह मनुष्य की अंतर्निहित संवेदना को पूर्णता तक पहुँचाने के लिए है। रतिसुख, संतति, सुरक्षा, स्थिर जीवन और स्वजन संबंधियों का निर्वाह संवेदना को पूर्णता तक पहुँचाने के कुछ पड़ाव है। इन्हें यात्रा के साथ निभ जाने वाली दूसरी आवश्यकताएँ भी कह सकते हैं। वैदिक ऋषि के अनुसार ये लक्ष्य तक पहुँचने वाली सीढ़ियों है। इनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती, लेकिन इन पर निर्भर भी नहीं हुआ जा सकता ।

दस पुत्रों को जन्म देने और पति को ग्यारहवाँ पुत्र बना लेने वाले आशीर्वाद को तंत्र ने भी अपनाया है। वेद मंत्रों की नैतिक, मनोवैज्ञानिक और आदर्शवादी व्याख्या करने वालों के अनुसार मंत्र का आशय कामभावना का अतिक्रमण है। विवाह का उद्देश्य यौन -जीवन में संयम-संतुलन रखते हुए कामभाव का परिमार्जन करना और उससे मुक्त हो जाना है। रागात्मक संबंधों में यदि काम की प्रधानता न हो तो वे एक दूसरे की देखभाल, सुख-सुविधाओं की चिंता करने और उसकी व्यवस्था बनाने के रूप में ही निभते हैं। शरीर असमर्थ हो जाए, थक जाए निष्क्रिय हो जाए, तो भी कामभाव का लोप नहीं होता । शरीर के असमर्थ हो जाने पर वह और विकृत हो जाता है। साठ-पैंसठ साल के बाद कई वृद्धजनों के व्यवहार में अश्लील टिप्पणियाँ घृणित और कुत्सित रूप में व्यक्त होती है। उसका कारण मन के स्तर पर पड़ने वाले दबाव ही है। अध्यात्मविद् कहते हैं कि गृहस्थधर्म का भलीभाँति पालन किया गया हो तो उसकी परिणति कामभाव से मुक्ति के रूप में ही होगी।

तंत्र की मान्यता है कि कामभाव का सही उपयोग किया जाए, मूलाधार केंद्र में बैठी कुँडलिनी शक्ति को ऊर्ध्वगामी बनाया जाए, यौन संबंधों के रतिसुख को साक्षी भाव से देखे और उसका अतिक्रम कर जाएँ, तो ऋषि का आशीर्वाद फलीभूत होता है । ऋषि ने वधू को आशीर्वाद दिया है कि वह दस पुत्रों की माँ बने और ग्यारहवाँ पुत्र उसका पति हो । इसी आशीर्वाद में पुरुष के भी कामभाव से मुक्त होने की कामना है। पत्नी यदि माँ बन जाएगी , तो पति में भी स्त्री के प्रति मातृत्व का भाव विकसित होगा। नैसर्गिक दृष्टि से संतान का संबंध माँ से ही होता है। स्थूल दृष्टि से पिता एक सामाजिक आवश्यकता भर है। स्थूल दृष्टि से माँ के संबंध में यह बात नहीं कही जा सकती। वह शरीर और समाज की दृष्टि से भी संतान की जाननी अभिभावक है। मंत्र में स्त्री का उल्लेख कर उसी मातृत्व को प्रतिष्ठा दी गई है।

कुँडलिनी जागरण, चक्रवेधन, योगिनी , भैरवी आदि साधनाओं में कामभाव का प्रत्यक्ष का परोक्ष उपयोग किया जाता है । उस तरह के प्रयोग उलझनों से भरे हुए है। दक्षिणमार्गी साधनाओं में साधक सहज सामान्य जीवन जीते हुए भी ऋषि की शुभकामना-आशीर्वाद या दिव्य शक्तियों से प्रार्थना को पुरी कर सकता है। इस युग में भी कई विभूतियों ने पत्नी को माँ के रूप में देखने या पति को पुत्र बना लेने वाली सिद्धियाँ हस्तगत की है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने विवाहित जीवन आरंभ करते ही पत्नी को महाशक्ति के रूप में देखा। उन्होंने संतान की कभी कामना नहीं की । लीलाप्रसंग में किसी ने उनसे पूछा भी सही कि माँ (शारदामणि) के मन में कभी संतान की इच्छा नहीं हुई। परमहंस ने कहा, माँ से ही पूछो न बाबा । मुझसे पूछते हो तो यही उतर है कि मैं उसका ही शिशु हूँ। महात्मा गाँधी जीवन के उत्तरार्द्ध में कस्तूरबा को माँ कहने लगे थे। उनसे प्रेरणा लेकर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और साधकों ने अपने दाम्पत्य जीवन से कामभाव को विदा कर दिया। वे पत्नी को माँ और पति को पुत्र समझने लगें। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आवेश में भी यह व्रत लिया। वे अध्यात्म की उन ऊँचाइयों तक भले न पहुँचे हों , लेकिन औसत स्तर से ऊपर उठे है। मन को मारकर लिए गए व्रत ने बाद में परेशान भले ही किया हो, लेकिन उन कठिनाइयों को जीवन में होने वाली दूसरी कठिनाइयों के साथ रखकर देखें तो वे भारी नहीं थी ।

शास्त्रों और साधकों ने शक्ति की कामना स्त्री और माँ के रूप में की है। कोई भी साधक महाशक्ति को पत्नी या पुत्री के रूप में नहीं देखता । शक्ति के प्रति यह भाव जीवन-चेतना के सामान्य-स्वाभाविक आवेगों को पार कर संवेदना के उस क्षीरोदधि को पा लेने का भाव है जहाँ ममता, वात्सल्य, अनुग्रह और करुणा ही व्याप्त है। विविधता है, तो इन्हीं के तरल सघन रूपों में अन्यथा सर्वत्र एक स्नेहिल भाव है। वह भाव समर्पण और उसकी समुद्र समाना बूँद में जैसी सिद्धि तक पहुँचाता है।


साधना और सिद्धि का सहन मार्ग -मर्यादा

सोवियत संघ को विघटित हुए करीब बीस वर्ष हो गए। राज्य राष्ट्रों के इस महासंघ का विघटन एक प्रयोग की विफला के रूप में इतिहास में दर्ज किया जाएगा। प्रसंग विफलता के रूप में इतिहास में दर्ज किया जाएगा। प्रसंग उस देश की एक पुरी पीढ़ी क एक छत्र नायक रहे ब्रेझनेव से संबंधित है। वे जब भारत आए तो राजधानी में विभिन्न विशिष्ट लोगों ने उनसे मुलाकात की । रामकथा के प्रसिद्ध विद्वान् और वाचक पंडित कपींद्र जी भी उनसे मिलें। उन्होंने ब्रेझनेव को रामचरितमानस भेट की ओर कहा कि इस ग्रंथ में जहाँ राम है वहाँ साम्यवाद रख देना ।सीता के स्थान पर ‘शक्ति’ और असुर के स्थान पर पूँजीपति फिर आपको इस ग्रंथ की महत्ता का पता चलेगा।

पता नहीं ब्रेझनेव ने मानस को पढ़ा या नहीं , लेकिन 1992 में दिल्ली के विज्ञान भवन में हुए एक कार्यक्रम में रूस से आए मानस के एक विद्वान् प्रो0 पोदिल्मीर चेन्स्की ने उस प्रसंग का उल्लेख किया। कहा कि मानस रूसी युवकों को रास आ रही हैं। वे लोग भी मानस का अध्ययन कर रहे है, जो अध्यात्म की ओर उन्मुख हुए है। प्रो0 चेन्स्की ने कहा कि कपींद्र मुनि जी का सुझाव साम्यवादी आस्थाओं वाली पीढ़ी को अपील कर रहा हैं।

रामकथा का मूल आधार वाल्मीकि रामायण है। उसकी उपादेयता और महत्व है। विश्व में जहाँ भी रामकथा का विस्तार हुआ, उसका स्त्रोत रामायण को माना जा सकता है। दशरथ जातक, प्रसन्न राघव ,योग वसिष्ठ और अध्यात्म रामायण आदि ग्रंथों का भी विधा-विभूति और संस्कार की दृष्टि से महत्व है, लेकिन गोस्वामी तुलसी दास ने इस कथा को विलक्षण ढंग से युगीन संदर्भ दिया। तुलसी की रामकथा किसी भी समय, परिस्थिति और समस्या में उपचार की तरह सामने आती है।

गोस्वामी तुलसीदास होते तो रामकथा को सार्वकालिक बना देने का श्रेय देने पर संकोच के साथ किनारे हो जाते। वे कहते, “मो सम कौन कुटिल खलकामी।” मैं तो दृष्ट , कुटिल और लंपट हूँ , यह भी कह सकते थे । कहते कि राम नाम का प्रताप है, जिसने मुझ काँच के टुकड़े को हीरा बना दिया अथवा मैथिलीशरण गुप्त की भाषा का उपयोग करते तो कहते कि “राम तुम्हारा नाम स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाए यह सहज संभाव्य है। “ गोस्वामी तुलसीदास अपने समय की चुनौतियों और समस्याओं को अच्छी तरह समझते थे। वे उनसे जूझने का प्रयत्न भी कर रहे थे। लोकसभा में रामकथा की रचना, रामलीला का प्रवर्तन, कथावाचन का नवोन्मेष आदि विधाओं का उपयोग उन्होंने अपने समय के ठूटते हुए मानस को संबल देने के लिए किया।

रामकथा उनसे पहने भी प्रचलित थी , लेकिन संस्कृत में ही । भाषा (लोक भाषा) में उसे कहना, सुनना , लिखना हेय समझा जाता था । रामचरित का मंचन भी होता था, लेकिन समाज के श्रेष्ठी वर्ग के लिए ही। जनसाधारण को उससे न तो प्रेरणा मिलती थी और न ही दिशा, क्योंकि वह उन्हें सुलभ ही नहीं थी । कथा उपदेश भी भव्य अट्टालिकाओं और महलनुमा मकानों में ही संपन्न होते थे।गोस्वामी जी ने रामकथा के इर्द-गर्द खींची गई इन रेखाओं को मिटाया और उसे सार्वजनीन बनाया।

उन दिनों सामंती राज था। शासक और शासित में अलंघ्य खाई थी और उसे सिर्फ शासक वर्ग ही अपनी लिप्सा- लालसा के अनुसार पाट सकता था। लोगों को लूटना-खसोटना हो तब , सिर्फ दो ही स्थितियों में शासक जनता के बीच जाते थे। शिक्षा, संपन्नता, रोजगार और सुरक्षा की दृष्टि से कहीं कोई आश्वासन नहीं था। अपने धर्म और कुल, जाति , समुदाय की परंपराओं को निभाने की भी रंचमात्र छूट नहीं थी। तुलसी ने उन विषम परिस्थितियों में रामकथा को संबल बनाया और उसमें आश्रय ग्रहण करने की प्रेरणा दी । लोगों ने उस आश्रय को ग्रहण भी किया।

मध्यकाल के अंधकार युग से आज तक रामचरित मानस उस आश्रय के रूप में प्रतिष्ठित है। रामधारी सिंह दिनकर ने तुलसी की इस लोक सिद्धि का उल्लेख करते हुए ‘संस्कृति के चार अध्याय ‘ में लिखा है, उनका स्थान हिंदू संस्कृति के रक्षक, त्राता ओर उद्धारकर्ता के रूप में है। उतर भारत में किसी को यह जानने की अधिक चिंता नहीं। है कि नैतिक विषयों पर धर्मशास्त्रों का क्या कहना है? वहाँ की जनता प्रत्येक विषय पर केवल तुलसीदास की राय जानना चाहती है । ऐसा सम्मान केवल वही कवि पा सकता है, जिसका हृदय जनता के हृदय से बिलकुल एकाकार हो।

तुलसीदास की रचनाएँ भक्ति-साहित्य की श्रेणी में आती है। एक ही ग्रंथ ‘ मानस ‘ऐसा है, जिसमें ज्ञान भक्ति कर्म का समन्वय हुआ है, जिसमें ज्ञान-भक्ति कर्म का समन्वय हुआ है और इन साधना मार्गों से उन्होंने समाज को संस्कार हुआ है ओर इन साधना-मार्गों से उन्होंने समाज को संस्कार की प्रेरणा भी दी है। समर्थकों का कहना है कि वे अपने समय के शासकों से तनिक भी रुष्ट नहीं थे। उनके साहित्य में तत्कालीन शासन-व्यवस्था के प्रति कही भी रोष या आक्रोश नहीं है। लेकिन यह अधूरा सत्य है। कोई भी साहित्यकार अपने समय की परिस्थितियों से अछूता नहीं रहता। तुलसी ने कलियुग वर्णन के रूप में तो तत्कालीन समाज की विसंगतियों को उजागर किया है, दो मंत्र उद्धत करने ओर एकाध ग्रंथ पढ़कर विद्वान् बने लोगों के दंभ को भी आड़े हाथों लिया है। तुलसी का स्वर क्राँतिकारियों की तरह जोश खरोश से भरा नहीं था, लेकिन वे समय , समाज और व्यवस्था की विसंगतियों के प्रति समान रूप से चिंतित थे।

पर्याप्त प्रमाण मिलता है कि तुलसी ने अपने मित्र टोडरमल से कहकर वाराणसी , प्रयाग और अयोध्या में हो रहे कई उत्पातों को रोका था। ये उत्पात समाज-व्यवस्था को नियंत्रित करने वालों द्वारा ही मचाए जाते थे। प्रसिद्ध है कि टोडरमल तुलसी दास के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। उनके सहयोग से ही गोस्वामी जी ने राम जन्मभूमि स्थल के दक्षिण द्वार के पास बैठकर रामकथा कही थी । उनके कुछ विरोधियों ने मानस को नष्ट करने की चेष्टा भी की , चुराने के लिए चोर भेजे। जनश्रुति है कि चोर जब उनकी कुटिया में घुसने लगे तो दो धनुर्धारियों को पहरा देते देख वापस चले गए । ये धनुर्धारी राम ओर लक्ष्मण ही थे । अपने इष्ट को पहरा देते देख उन्हें कष्ट नहीं होने देने के लिए गोस्वामी जी ने मानस की प्रति राजा टोडरमल के यहाँ रखवा दी। धनुर्धारियों के पहरा देने की बात पर मतभेद हो सकते हैं।, कि विरोध का समाहार करने के लिए गोस्वामी जी को टोडरमल, रहीम, आचार्य मधुसूदन आदि प्रभृतिजनों ने सहायता की थी ।

जनश्रुति तो यह भी है कि अकबर भी गोस्वामी तुलसी दास से मिला था, लेकिन इसका कोई आधार नहीं हैं । कुद्ध लोगों ने तुलसी को सम्राट् अकबर से मिलने की पेशकश की थी। कहते हैं कि उन्होंने स्पष्ट इनकार कर दिया। इस विषय में यह दोहा प्रख्यात है -

हम चाकर रघुवीर के, पट्यो लिख्यौ दरबार। तुलसी अब का होहिगे नर के मनसबदार॥

तुलसी की यह पंक्तियाँ सम्राट् अकबर या व्यक्ति-विशेष की अवज्ञा नहीं, बल्कि राजसत्ता की अवज्ञा है। तुलसीदास परंपराओं और प्रचलित मान्यताओं का अंध विरोध करने के पक्ष में कतई नहीं थे। उनका मानना था कि विरोध के लिए विरोध नहीं करना चाहिए। उनके सच को जानने-समझने वाले मनीषियों को भी लोक-संग्रह के लिए को ही सही उन परंपराओं का निर्वाह करना चाहिए।

परंपराओं और लोक की आस्थाओं पर प्रहार करने वालों को गोस्वामी जी ने आड़े हाथों लिया है। ब्रह्मा की सता निर्गुण -निराकार मानी गई है। उस स्वरूप को पकड़ने वाले साधक कम ही होते हैं। निर्गुण निराकार के ध्यान की विधि भी सामान्यजनों के बस की बात नहीं , प्रारंभिक या सगुण उपासकों की उपेक्षा करने, कोसने वाले कोई संन्यासी सगुण को हेय बयाने और कोरा अलख निरंजन उच्चारने में ही अपनी शान समझते हैं। ऐसे लोगों को तुलसीदास ने बुरी तरह फटकारा है। एक दिन कोई साधु अलख निरंजन का घोष करता हुआ तुलसी दास की कुटिया पर आ गया । वह लगा धनुष - बाण लिए राम कि मूर्ति की आलोचना करने और अलख ब्रह्म की महिमा गाने। गोस्वामी जी ने यह दोहा कहा-

हम लखि लखहि हमार लखि हम हमार के बीच। तुलसी अलखहि का लखहि, राम नाम जप नीच ॥

जाना विद्वान् लोगों को यह सिखाते रहे है कि मंदिर में जाना व्यर्थ है , जप-तप व्यर्थ है , तीर्थयात्रा और व्रत-उपवास में कोई सार नहीं है, साकार की उपासना करना मूढ़ता है। जो साकार की उपासना करते हैं, वे परम लक्ष्य से भटक जाते हैं। भारतीय धर्म साधना की धारा में रहकर ही उसकी मान्यताओं को पानी पी पीकर कोसने वालों के गोस्वामी जी कट्टर विरोधी थे। कबीर, दादू आदि संतों ने साकार उपासना और वेद-शास्त्रों की जमकर निंदा की थी। जायसी , कुतुबन , मंझन और उस्मान आदि सूफी संतों ने कहानी, उपाख्यान आदि से वैसा ही प्रतिपादन किया । गोस्वामी तुलसीदास ने ऐसे संतों के निदावाद की जमकर आलोचना की । उन्होंने कहा है-

साखी सबदी दोहरा कहि कहनी उपखाना । भगत निरुपर्हि भगति कलि निंदहि बेद पुरान॥

एक स्थान पर वे नाथ पंथियों की आलोचना भी करते हैं। नाथ पंथियों और गोरख पंथियों ने योगमार्ग के प्रति लोगों की रुचि तो जगाई , उसका प्रचार भी किया , लेकिन उनके मतवादों से भक्ति की अवहेलना हुई । योगतंत्र और शरीर साधनाओं में ऊर्जावान चित, स्तर मनःस्थिति और सुदृढ़ मनोभूमि चाहिए । सौ में एकाध साधक ही यह स्थिति अर्जित कर पाते हैं। इसलिए जनसामान्य भक्तिमार्ग अपनाकर ही आत्मिक विकास कर सकता है। नाथ पंथियों और योग मार्गी सिद्धों के प्रभाव को क्षोभ से याद करते हुए गोस्वामी जी ने कहा, “ गोरख जगाए योग, भक्ति भगाए लोग।”

गोस्वामी जी भारतीय धर्म-परंपरा के नैष्ठिक प्रहरी थे, लेकिन हिंदू और इस्लाम दोनों ही धर्मों के लोग उनका सम्मान करते थे। अब्दुर्रहीम खानखाना से उनकी मित्रता विख्यात थी। रहीम ने मानस के संबंध में कुछ पद भी रचे और कहा यह काव्य हिंदुओं के लिए वेद और मुसलमानों के लिए कुरान है। ‘हिंदुआन को वेदासम, तुरुकहि प्रगट कुरान।’

अपने समय और समाज को प्रभावित करने की क्षमता से संपन्न होते हुए भी गोस्वामी जी को विनय जैसा स्वभाव सिद्ध था। संत नाभादास के यहाँ हुई समष्टि (भंडारे) में वे जूते रखे जाने की जगह बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। आचार्य मधुसूदन सरस्वती ने वेदाँस का उपदेश सुनने इसलिए नहीं बुलाया कि उन्होंने भाषा में रचना की। गोस्वामी जी फिर भी पहुँचे और उन्हें प्रणाम किया। उनकी विनय से प्रभावित होकर आचार्य ने मानस का अध्ययन किया। जो साधना व्यक्ति को इतना विनम्र बना दे, उससे परिचय पाकर उन्होंने कहा, काशी रूपी आनंदवन में तुलसीदास चलता-फिरता तुलसी का पौधा है। उसकी कविता रूपी मंजरी बड़ी ही सुँदर है, जिस पर श्रीराम रूपी भँवरा सदा मँडराया करता है।

आश्रम-धर्म के प्रति गोस्वामी जी की निष्ठा अनन्य थी। पत्नी की फटकार सुनकर उन्होंने हालाँकि घर-गृहस्थी छोड़ दी थी। आश्रम-धर्म का अतिक्रमण करते हुए वे संन्यासी हो गए। बाद में पत्नी को छोड़ देने का क्षोभ उन्हें हमेशा सालता रहा। रत्नावली जीवन के उत्तरार्द्ध में उनकी कुटिया के पास कुछ दिन रही भी। जनश्रुति है कि उनका देहाँत कुटिया के पास ही हुआ। संन्यासी होने के कारण अंतिम संस्कार में उन्होंने भाग नहीं लिया, लेकिन प्रबंध जरूर कराया। तुलसी ने किसी रचना में नहीं कहा कि पत्नी की फटकार सुनकर संन्यासी हो जाने का उन्हें पछतावा है। प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतलाल नगर ने उनके जीवन-क्रम का विश्लेषण करते हुए यह जरूर कहा कि उन्हें रत्नावली के त्याग का दुःख रहा। इसी कारण उन्होंने राम द्वारा सीता के निर्वासन की कथा अपनी रचना में शामिल नहीं की। सीता के निर्वासन में प्रेम, समर्पण, उत्सर्ग और लोकशिक्षण के कई तत्व खोजे जाते हैं। लेकिन गोस्वामी जी को इस प्रसंग में पत्नी के प्रति बरती गई अपनी निष्ठुरता की याद आ जाती है और भीतर से हूक उठती है कि मेरे इष्ट-उपास्य ऐसे नहीं हो सकते।

गोस्वामी जी के जीवन-प्रसंगों में धर्म-प्रशंसा और अध्यात्म-दर्शन का प्रबल प्रतिपादन पग-पग पर होता है। वे मूर्तिमान धर्म थे। रचनाओं में उसी प्रेरणा प्रत्येक पद और छंद में व्यक्त हुई है। सर्वपल्ली डॉ0 राधाकृष्णन ने उनके एक पद को भारतीय धर्म-संस्कृति और साधना का प्रतिनिधि कहा है। यह पद है -


समाज-व्यवस्था

कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो। श्रीरघुनाथ-कृपाल-कृपातें संत-सुभाव गहौंगो॥

जथालालभसंतोष सदा, काहू सों कछु न चहौंगो। पर-हित-निरत निरंतर, मन, क्रम बचन नेम निबहौंगो॥

परुष वचन अति दुसह श्रवन सुनि तेहि पावक न दहौंगो। बिगत मान, सम सीतल मन, पर-गुन नहिं दोष कहौंगो॥

परिहरि देह-जनित चिंता, दुख-सुख समबुद्धि सहौंगो। तुलसीदास प्रभु यहि पथ रहि अबिचल हरि-भगति लहौंगो॥

समाज-व्यवस्था का जो आदर्श स्वरूप गोस्वामी जी के मन में था, वह रामराज्य वर्णन में चित्रित है। रामचरितमानस के उत्तरकाँड में उनके चित्रण का सार यह है, “ सब लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रम के अनुकूल धर्म में तत्पर रहते हुए सदा वेदमार्ग पर चलते हैं और सुख पाते हैं। उन्हें न किसी का गम है ओर न ही शोक। सब मनुष्य परस्पर प्रीति करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते है। धर्म अपने चारों चरणों में सत्य, शौच, दया और दान से जगत् में परिपूर्ण हो रहा है। पापकर्मों में किसी की भी प्रवृत्ति नहीं हैं। न कोई दरिद्र है, न दुःख है और न ही दीन है। दंभरहित, धर्मपरायण और पुण्यात्माजनों में सभी चतुर और गुणवान् हैं। काल, कर्म, स्वभाव और गुणों से उत्पन्न हुए दुःख किसी को भी नहीं होते।

गोस्वामी तुलसीदास का संदेश विशिष्ट लोगों और उच्चकोटि के साधकों, सहयोगियों या विद्वानों के लिए शायद उतना उपयोगी न हो। शास्त्र, परंपरा और लोक मर्यादा का अतिक्रमण कर जाने वालों को भी वह सतही या रूढ़िवादी लग सकता है। अतिक्रमण करने वालों में सिद्धयोगी और दंभ से चूर हुए जा रहे दोनों तरह के लोग लिए जाने चाहिए। लेकिन उनका संदेश सर्वसाधारण के लिए उपादेय और सुख-शाँति के मार्ग पर ले जाने वाला है।


जीवन को गरिमा देती हैं धर्मश्रद्धा

अमेरिका के तुलसा शहर में एक प्रयोगशाला है लेडरले लैबोरेटरी। उस प्रयोगशाला में अब से चालीस वर्ष पूर्व क्षयरोग के एक टीके का आविष्कार हुआ। टीके ने लाखों रोगियों की जान बचाई। इस मायने में यह मानवजाति की अनुपम सेवा कही जा सकती है। प्रयोगशाला के कंपाउंड में एक भारतीय प्रतिमा लगी हैं। उस प्रतिमा के नीचे लिखा है, “ विज्ञान केवल आयु बढ़ाता है, धर्म उसे गहरा करता है।” यह पंक्ति उस भारतीय की प्रतिमा के रूप में प्रतिष्ठिता वैज्ञानिक प्रतिभा के जीवन-दर्शन का परिचय देती है। चैन्नई की दारुण गरीबी से निकलकर लेडरले लैबोरेटरी पहुँचने और वहाँ एक विलक्षण खोज करने तक इस वैज्ञानिक ने लंबी यात्रा की। उस यात्रा में दुःख, अभाव, कठोर परिश्रम और संघर्ष के सिवा कुछ नहीं था।

उस वैज्ञानिक का नाम है चेल्लप्रगद सुब्बाराव। चैन्नई के पास एक गाँव में जन्मे सुब्बाराव को अपने यहाँ पढ़ने-लिखने की सुविधा नहीं थी। प्राथमिक शिक्षा पाने के लिए भी उन्हें चैन्नई आना पड़ा था। वे रोज पाँच-सात किलोमीटर पैदल चलकर पढ़ने आते और वापस गाँव जाते थे। पढ़ने के प्रति उद्दाम ललक और पुस्तकों में डूबे रहने की वृत्ति उनमें बचपन से ही दिखाई दी। एक घटना ने उनके जीवन की दिशाधारा बदल दी। उनके छोटे भाई को क्षयरोग ने आ घेरा। कुछ महीनों तक वह रोग से जूझता रहा। कोई उपचार काम नहीं आया, उन दिनों क्षयरोग का कारगर उपचार प्रचलित नहीं था।

सुब्बाराव को अपने भाई से बहुत स्नेह था। उसे तिल-तिल कर मरते देखकर वह बहुत व्यथित हुए। व्यथा-वेदना के उन्हीं क्षणों में उन्होंने निश्चय किया कि अपने आपको इस रोग से लड़ने के लिए खपा देंगे। संयोग से उन्हीं दिनों सुब्बाराव को वाल्मीकि रामायण हाथ लगीं। उन्होंने रामकथा पढ़ी और प्रभाव ग्रहण किया कि किसी भी अनिष्ट या आसुरी आतंक से लड़ने के लिए बहुत साधनों की उतनी जरूरत नहीं पड़ती, जितनी संकल्प और अदम्य उत्साह की। राम और लक्ष्मण ने अकिंचन स्थिति में रहते हुए ही रावण के अदम्य आसुरी आतंक को समाप्त किया। जिस रोग ने सुब्बाराम ने उनका भाई छीना था वह भी रावण के आतंक जैसा ही लगा।

सुब्बाराम ने कई अवसरों पर कहा कि रामायण उन्हें संघर्ष करते रहने की प्रेरणा देती रही है। मैट्रिक की पढ़ाई पूरी करने के बाद सुब्बाराव ने आयुर्विज्ञान को चुना। साधना नहीं थे। मित्रों और संबंधियों ने सहयोग किया। आयुर्विज्ञान की पढ़ाई उत्साह से पूरी की। चैन्नई में शिक्षा पूरी करने के बाद वे 1923 में इंग्लैंड गए। वहाँ से कुछ समय बाद अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय की शोधवृत्ति मिल गईं। वहाँ शोध जारी रखते हुए उन्होंने जीव-रसायन की डिग्री भी हासिल की।

1940 में अमेरिका की सिनेमिड कंपनी की लेडरले प्रयोगशाला ने उन्हें अपने यहाँ अपने यहाँ काम करने के लिए आमंत्रित किया। यह कंपनी नई-नई दवाओं की शोध और प्रयोग-परीक्षणों पर विशेष ध्यान देती थी। सुब्बाराम को अपना उद्देश्य पूरा होता दिखाई दिया। उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार करने में पल भर भी देर नहीं की। प्रयोगशाला में वे दिन-रात जुटे रहने लगे। दो साल में ही उन्होंने अपनी लगन और प्रतिभा को सिद्ध कर दिखाया इसका पुरस्कार उन्हें 1942 में प्रयोगशाला में शोध विभाग के प्रमुख का दायित्व सँभालने के रूप में मिला।

डॉ0 सुब्बाराम ने कुछ ही सप्ताहों में युवा वैज्ञानिकों की अच्छी टीम जुटा ली। विभिन्न पदार्थों से फोलिक अम्ल निकालने के ढेरों प्रयोग किए। जिस रोग का उपचार ढूंढ़ने में वे लगे हुए थे, उसमें फोलिक अम्ल का महत्वपूर्ण स्थान है। चार वर्ष के कठिन प्रयोगों ने आशाजनक परिणाम प्रस्तुत किए। खोज पूरी हुई। वह औषधि तैयार होकर सामने आ गई, जिसने बाद के वर्षों में लाखों लोगों को असमय मृत्यु के मुख में जाने से बचा लिया। औरिमाइसिन नामक यह औषधि बाजार में आई तो उस रोग के चंगुल में फँसे लोगों के मन में आशा का संचार हुआ। इसका श्रेय दिए जाने की बारी आई, तो डॉ0 राव अत्यंत विनम्रता से पीछे हट गए। उन्होंने कहा, इस खोज का श्रेय मुझे नहीं मेरे साथियों को मिलना चाहिए। इन लोगों ने दिन-रात एक कर खोज पूरी की है।

औषधि का आविष्कार होने के तीन साल बाद डॉ0 राव चल बसे। डॉ0 राव ने मृत्यु से कुछ दिन पहले ‘अमेरिकन रिपोर्टर’ पत्र को दिए साक्षात्कार में कहा था, अपने जीवन में उन्हें वाल्मीकि रामायण से बड़ी प्रेरणा मिली है। घोर निराशा के क्षणों में यह ग्रंथ उन्हें पर्याप्त प्रकाश देता था और खड़ा रखता था। प्रतिभा और साधना-सुविधाएँ व्यक्ति को सफलता नहीं दिलाती। बड़े और सामाजिक उद्देश्यों में तो ये और भी गौण हो जाती है। लगन और समर्पण की भावना ही व्यक्ति को उच्च उद्देश्य की प्राप्ति कराती है।

साधन-सुविधा और परिस्थितियों का महत्व है, लेकिन वे एक सीमा तक ही सहायक है। लौकिक सफलताओं में वे पर्याप्त भी हो सकती है, लेकिन बड़े लक्ष्यों के लिए हजार गुनी लगन चाहिए। सामान्य काया में जैसी निष्ठा की अपेक्षा होती है उससे लाख गुना साधन और सक्रिय निष्ठा बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए जरूरी है, क्योंकि तब व्यक्ति को प्रेरित करने और स्थिर रखने वाले छोटे मोटे आकर्षण नहीं रह जाते।

लौकिक जीवन में जिन्होंने उल्लेखनीय सफलता अर्जित की , उनकी गाथा अलग हो सकती है, लेकिन जिन लोगों ने भी बड़े उद्देश्य प्राप्त किए है, उनके जीवन में निष्ठा का सतत् निष्ठा और श्रम के बिना नहीं मिलती । निष्ठा की यह गहराई बुद्धि से नहीं भावभरे हृदय से आती है, आस्था से आती है, विश्वास से आती है। आस्था और विश्वास की सुदृढ़ भित्ति धर्म से ही मिलती हैं ।

भारत रत्न से सम्मानित और देश को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनाने की दिशा में उल्लेखनीय योगदान दे रहें वैज्ञानिक अब्दुल कलाम ने अपना जीवन कठिनाइयों में शुरू किया। उनका बचपन रामेश्वरम् में अखबार बेचते हुए बीता । आजादी की लड़ाई के उन दिनों वे अपने देश को महाशक्ति के रूप में देखने का स्वप्न सँजोया रखते थे। परमाणु शक्ति का तब पता चल चुका था और प्रो0 अब्दुल कलाम सोचते थे कि काश अपने देश को उस महाशक्ति से संपन्न कर सके । अत्यंत सामान्य स्थितियों में शुरू कर कठिन संघर्षों की राह गुजरते हुए भी उन्होँने अपने सपने को मरने नहीं दिया। सन् 1997 में पोखरण में दूसरे परमाणु परीक्षण परीक्षण की कमान संभालने हुए प्रो0 अब्दुल कलाम ने अनुभव किया कि स्वप्न एक हद तक पूरा हुआ है। प्रो0 अब्दुल कलाम को भारतीय प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम आरंभ करने का श्रेय भी मिला है। उनके संयोजन में देश न प्रक्षेपास्त्र युग में प्रवेश किया। एक अवसर पर उन्होंने कहा था, देश को परमाणु शक्ति से संपन्न करने की उत्कट लालसा उन्हें कठिन संघर्षों में भी टिके रहने की हिम्मत देती थी । चिंतन के क्षेत्र में भी उनकी गवेषणाएँ देश को आश्वस्त करती है। ‘इंडिया टू थाउजेंड ट्वंटी ए विजन फॉर न्यू मिलेनियम’ में उन्होंने इस बात की प्रबल संभावना व्यक्त की है कि सन् 2020 में भारत अति उन्नत देश हो जाएगा।

आधुनिक भारत के इतिहास में एक और विभूति का नाम लिया जा सकता है, जिसने अकिंचन स्थिति में जीवन-यात्रा आरंभ की। अपनी माँ से स्वाभिमान और लगन की शिक्षा लेकर यह विभूति प्रधानमंत्री पद तक पहुँची। चीन के हाथों मिली पराजय के तीन वर्ष बाद ही उन्होंने एक समर जी ओर देश सिर गर्व से उन्न किया। उस विभूति पहचान लिए इस पैरे की तीन पंक्तियाँ ही पर्याप्त है। लालबहादुर शास्त्री पहले प्रधानमंत्री थे, जो अत्यंत साधारण परिवार से आए। इनसे भी बड़ी बात यह कि प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे अपने गरीबी के दिन नहीं भूले। उनका बेटा कॉलेज पढ़ने के लिए कार से नहीं बल्कि बस से जाता था। मंत्री बनने के बाद भी उनके के पास अपना कहने जैसा घर नहीं था।

शास्त्री जी की सादगी और निष्ठा को मिसाल के तौर पर उद्धृत किया जाता है। यह व्रतशीलता कहाँ से आई, शास्त्री जी कहते थे कि उन्होंने अपना सार्वजनिक जीवन भारत सेवक समाज में स्वयंसेवक के रूप में शामिल होने से किया था। संस्था का नियम पालन करते हुए शपथ ली कि कम-से-कम बीस वर्ष तक निस्वार्थ समाजसेवा करेंगे और पूरा जीवन सादगी से बितायेंगे। यह व्रत इतना आनंददायक लगा कि हमेशा ही निभने लगा। जिन दिनों वे काशी विद्यापीठ में पढ़ते थे, उन दिनों स्वतंत्रता आँदोलन चल रहा था। देशसेवा के लिए अपने आपको होम देने का व्रत उन्हीं दिनों ले लिया और उसे आजीवन निबाहा। यों उच्च पदों पर और लोग भी पहुँचते हैं, लेकिन जीवन की चमक पूरे समाज को रोशन देती है। उच्च भावनाएँ सामान्य कार्य को भी पूजा और यज्ञ की तरह पुनीत बना देती हैं, जबकि सामान्य भावनाएँ पुण्य कार्यों को भी उजड़ा रूप दे देती हैं। इसीलिए कहा गया है कि धर्म-भावना जीवन-उद्देश्य को सार्थकता प्रदान करती हैं।


Quotation

“उच्च पदों पर और लोग भी पहुँचते हैं, लेकिन जिनका जीवन एक आदर्श से प्रेरित होता है, उनके जीवन की चमक पूरे समाज को रोशनी देती है। उच्च भावनाएँ सामान्य कार्य को भी पूजा और यज्ञ की तरह पुनीत बना देती हैं, जबकि सामान्य भावनाएँ पुण्य कार्यों को भी उजड़ा रूप दे देती हैं। इसीलिए कहा गया है कि धर्म-भावना जीवन-उद्देश्य को सार्थकता प्रदान करती है। “


सुनिश्चित भवितव्यता भी बदली जा सकती है

कहते हैं कि भाग्य और भविष्य पूर्व निर्धारित होते हैं, पर समय-समय पर होने वाले स्वप्न-दर्शन इस बात के पक्के सबूत है कि प्रयत्न और पुरुषार्थ द्वारा उन्हें बदला जा सकना संभव है। पत्थर की लकीर की तरह अटल इस दुनिया में शायद ही कुछ है। सतत् सचेष्ट रहकर मनुष्य सुनिश्चित भवितव्यता को भी परिवर्तित कर सकता है।

जे0बी0 प्रीस्टले ने अपनी पुस्तक ‘मैन एंड टाइम’ में डॉ0 लुइसा राइन द्वारा उद्धृत एक ऐसे ही स्वप्न का उल्लेख किया है। वे लिखते हैं कि एक माँ ने एक बार स्वप्न में देखा कि वह एक सँकरी खाड़ी के किनारे अपने मित्रों के साथ ठहरी हुई है। इसी बीच कपड़े धोने के उद्देश्य से वह खाड़ी की ओर नीचे गई। साथ में बेटे को भी ले गईं। तभी उसे याद आया कि वह साबुन तंबू में ही भूल आई हैं, अतः वह बालक को वहीं छोड़कर वापस तंबू में लौटी। बेटा पानी में पत्थर फेंकने लगा। जब वह वापस आई, तो देखा बालक जल में औंधे मुँह पड़ा है। उसने तुरंत उसे पानी से बाहर निकाला, तो पता चला कि वह मर चुका है।

अगले ग्रीष्म में वह कुछ मित्रों के साथ घूमने निकली तथा एक सँकरी खाड़ी के किनारे के स्थान को अपने पड़ाव के लिए उपयुक्त समझकर सबने वहीं तंबू डाल लिए। उसे कुछ कपड़े धोने थे, अस्तु वह बालक को लेकर खाड़ी के किनारे आई, तभी स्मरण हो आया कि साबुन तो वह लाना ही भूल गई। बेटे को वहीं छोड़कर वह उसे लाने वापस लौटी। इसी बीच बालक पानी में पत्थर फेंकने लगा। तत्काल उसके मस्तिष्क में स्वप्न की बात कौंध गई। ठीक वे ही परिस्थितियाँ, पुत्र की वही पोशाक एवं उसकी वही क्रिया, इन सबने मिलकर उसको भयाक्राँत कर दिया। वह चिंतित हो उठी और स्वप्न की सच्चाई को टालने के लिए बालक को अपने साथ ले गई। इस प्रकार सतर्कता ने स्वप्न को साकार होने से रोक दिया।

ऐसे ही दो अन्य स्वप्नों की चर्चा आर्थर डब्ल्यू0 आँस्बोर्न ने अपने ग्रंथ ‘दि फ्यूचर इज नाउ’ में की है। प्रथम घटना ए युव से संबंधित है, जो होबार्ट, तस्मानिया में छुट्टी मनाने गए अपने परिवार से मिलने गया था। जब वह किंग्स्टन वापस लौट रहा था, तो उसकी माँ ने उसे सावधान करते हुए कहा कि उसे पूर्वाभास हुआ है कि घर लौटते समय रास्ते में दुर्घटना होगी, अतएव कार सावधानीपूर्वक चलाई जाए। आधा मार्ग तय कर लेने के उपराँत उसे माँ की चेतावनी का ध्यान आया और उसने गाड़ी की गति घटाकर पच्चीस मील प्रति घंटा कर दी। कुछ पल पश्चात् गाड़ी सड़क पर जमी बरफ पर फिसल गई और किनारे की दीवार को तोड़ने हुए एक गड्ढे में जा गिरी। कार बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई, पर युवक एकदम सुरक्षित बच गया। यदि वह पूर्व की तरह दूनी रफ्तार से गाड़ी चलाना जारी रखता, तो या तो मारा जाता अथवा गंभीर रूप से घायल हो जाता। सजगता ने एक सुनिश्चित दुर्घटना टाल दी। इसे भाग्य या भविष्य का परिवर्तन भी कह सकते हैं।

दूसरी घटना आँस्बोर्न के एक मित्र की है। वह एक स्कूल में संगीत शिक्षक था। एक दिन विद्यालय में संगीत की परीक्षा चल रही थी और वह एक छात्र के पीछे खड़े होकर उसका पियानो बजाना सुन रहा था, तभी अचानक सामने का दृश्य गायब हो गया। अब वहाँ न तो वह छात्र था, नर उसका पियानो। उसकी जगह एक सड़क का दृश्य दिखाई पड़ा। यह वही सड़क थी, जिससे होकर उसे दोपहर बाद कार से जाना था। अकस्मात् एक गाड़ी सामने के मोड़ पर बड़ी तेजी से सड़क की गलत दिशा में आई। इसके बाद दृश्य धुँधला पड़ता हुआ तिरोहित हो गया।

अब पुनः उसकी जगह छात्र और पियानो दिखलाई पड़ने लगे। दृश्य देखने के बाद उसने अनुमान लगाया कि कदाचित् कोई दुर्घटना घटने वाली है। उसी का पूर्वाभास इस रूप में सामने आया। दोपहर बाद जब वह उस रोड से गुजर रहा था, तो उक्त मोड़ के निकट उसे वह दृश्य याद आ गया। बिना एक पल सोचे ही गाड़ी उसने सड़क की दूसरी ओर कर ली। उसका ऐसा करना था कि मोड़ पर सामने से बड़ी तीव्र गति से आती हुई एक कार दिखलाई पड़ी। वह सड़क की गलत दिशा में में थी, ठीक उसी प्रकार जैसा उसने परीक्षा भवन में देखा था। एक संभावित दुर्घटना टल चुकी थी। यदि वह कार दूसरी ओर न ले जाता, तो शायद उसका सुरक्षित बच पाना असंभव था।

ऐसा ही एक प्रसंग सन् 1946 का है। तब एयरमार्शल गोडार्ड शघाई में अपने सम्मान में दी गई एक पार्टी में सम्मिलित थे। वे अपने कुछ मित्रों से बातचीत कर रहे थे कि तभी उनके कानों में पीछे से आवास आई कि माश्रल गोडार्ड मर चुके है। उन्होंने पलटकर देखा, वहाँ ब्रिटिश नौसैनिक कमाँडर कैप्टन जेराल्उ ग्लैस्टोन खड़े थे। ग्लैडस्टोन ने उन्हें तुरंत पहचान लिया तथा आश्चर्यचकित होकर क्षमा-याचना की, तो गोडार्ड ने पूछा कि आखिर किस आधार पर आपने मेरे मरने की बात कही तब ग्लैडस्टोन ने उत्तर दिया कि स्वप्न में ऐसा देखा था। इसके उपराँत उन्होंने स्वप्न की चर्चा की।

उन्होंने देखा कि एक यात्री विमान, संभवतः डकोटा एक पथरीले तट पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया है। ऐसा बर्फीले तूफान के कारण हुआ। उसमें रायफल एयरफोर्स के सदस्यों के अतिरिक्त तीन और व्यक्ति थे। इनमें से दो पुरुष तथा एक महिला थी। वे सभी वायुयान से बाहर निकल आए, किंतु गोडर्ड नहीं निकले सके। जागने पर ग्लैडस्टोन को यह पक्का विश्वास हो गया कि गोडार्ड दुर्घटना में मारे गए।

गोडर्ड यह सुनकर चिंतित नहीं हुए। उन्हें एक डकोटा विमान द्वारा टोकियो जाना था, किंतु जहाज पर कोई गैर-सैनिक यात्री नहीं था। उन्होंने ग्लैडस्टोन के साथ लगभग आधा घंटा बातचीत में बिताया। तब तक रात्रि भोज का समय हो चुका था। अब परिस्थितियाँ आश्चर्यजनक ढंग से बदली। ‘ डेली टेलीग्राफ’ के एक संवाददाता ने जापान की यात्रा हेतु अनुमति चाहीं इसके पश्चात् काउंसिल जनरल ने भी साथ’साथ सफर करने की आज्ञा माँगी और गोडार्ड से कहा कि उसे अभी-अभी आदेश प्राप्त हुआ है कि वे अवलिंब टोकियो पहुँचें, साथ में उसकी महिला सेक्रेटरी भी है। क्या उसके लिए भी कोई स्थान संभव हो सकेगा बड़े असमंजस में पड़कर गोडर्ड अंततः सहमत हो गए। जब वायुयान शंघाई से उड़ा, तो उसे यह बिलकुल आशंका नहीं थी कि जहाज दुर्घटनाग्रस्त होने वाला है।

पर्वतों के ऊपर उड़ते हुए डकोटा घने बादलों में घिरकर भयंकर बर्फीले तूफान में फँस गया। अंत में चालक को जापानी टापू के एक पथरीले तट पर विमान उतारने के लिए विवश होना पड़ा। वायुयान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, पर उसमें बैठे सभी यात्री सुरक्षित बच निकले। इस प्रकार ग्लैडस्टोन का स्वप्न अर्द्धसत्य साबित हुआ।

कर्मविज्ञान में गति रखने वाले आचार्यों का मत है कि हमारे दैनंदिन शुभ-अशुभ कर्मों के आधार पर भाग्य और भविष्य बनते-बिगड़ते रहते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति समाज या राष्ट्र के सुनिश्चित भविष्य की अक्षरशः भविष्यवाणी करना अत्यंत कठिन है। यदि किसी व्यक्ति की भूतकालीन गतिविधियाँ अत्यंत ही घिनौनी हों, उसने अन्य-अत्याचार में संलग्न रहकर अनेकों को प्रताड़ित-उत्पीड़ित किया हो, तो उसका संचित कर्म निश्चय ही पीड़ादायक और कठोर होगा, किंतु पीछे किसी प्रकार उसे सद्बुद्धि आ जाए और वह यह महसूस करने लगे कि अब तक उससे जो कार्य बन पड़े है, वह किसी भी प्रकार सराहनीय नहीं, उनसे लोक-परलोक दोनों बिगड़ेंगे और उसकी पीड़ा इसी जीवन तक सीमित न रहकर अगले जन्म तक पीछा करेगी एवं उसे नारकीय बनाएगी। इस आधार पर बाद में वह अपना दृष्टिकोण और क्रियाकलाप बदल ले, तो इस व्यापक परिवर्तन से उसका भाग्य भी प्रभावित हुए बिना न रहेगा। यह संभव है कि इससे उसके ठोर प्रारब्ध में कुछ हेर-फेर हो जाए और भक्तिव्यता मर्मांतक क्लेशदायी न होकर कुछ मृदु हो जाए। ऐसी स्थिति में भविष्यसूचक स्वप्न शत-प्रतिशत सच नहीं होंगे। जब नियति ही पूर्णरूपेण निर्धारित न हो, तो उसका शब्दशः पूर्वाभास कैसे संभव है आज तक का जो हमारा भाग्य है, चेतना उसकी ही अभिव्यक्ति करेगी। कल उसमें कुछ बदलाव आ जाए, तो फिर वही आँशिक सत्य बन जाएगा। इसलिए भविष्य बताने वाले स्वप्न पूर्णतः सच्चे ही होंगे, ऐसा नहीं कहा जा सकता।

भवितव्यता की झाँकी स्वप्नों के माध्यम से होती है और स्वप्न कर्तृत्वों के साकार रूप हैं। अस्तु, इनमें परिवर्तन लाकर भाग्य का पुनर्निर्धारण संभव है। स्वप्नशास्त्रियों का भी ऐसा ही निष्कर्ष है।


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कर्मविज्ञान में गति रखने वाले आचार्य का गत है कि हमारे दैनंदिन शुभ-अशुभ कर्मों के आचार पर भाग्य और भविष्य बनते-बिगड़ते रहते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति, समाज या राष्ट्र के सुनिश्चित भविष्य की अक्षरः भविष्यवाणी करना अत्यंत कठिन है।


वनवजन्य थकान को दूर करती है योगनिद्रा

विभिन्न प्रकार के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तनावों को दूर कर संपूर्ण शिथिलता और विश्राम की स्थिति उत्पन्न करने में योग की जो प्रक्रिया सबसे प्रभावशाली है, उसे ‘ योगनिद्रा’ कहते हैं। इससे थोड़े ही समय में परिपूर्ण स्फूर्ति और ताजगी प्राप्त की जा सकती हैं। इसका नियमित अभ्यास शरीर एवं मन के मध्य संतुलन स्थापित कर स्वस्थता का विकास करता है। यह मानसिक रोगों और बुरी आदतों से छुटकारा दिलाकर व्यक्ति को आत्मोन्नति की ओर अग्रसर करता और अंततः उस भूमिका में प्रतिष्ठित करता है, जिसे ‘ध्यान’कहा गया है।

आज के आपाधापी वाले युग में मनुष्य की समस्याएँ और चिंताएँ इस कदर बढ़ी हैं कि वह न तो दिन में ठीक से विश्राम कर पाता, न रात में भली प्रकार सो पाता है। फलतः जो निद्रा समग्र स्वस्थता के लिए आवश्यक मानी गई थी, वह अर्द्धचेतन स्तर की स्वप्निल नींद बनकर रह जाती है। शरीर निश्चेष्ट पड़ा रहता है और मन तमाम तरह की उलझनों में फँसा होता है, जिससे नींद उतनी गहरी नहीं आ पाती, जितनी आनी चाहिए। परिणाम यह होता है कि प्रातः जब व्यक्ति सोकर उठता है, तो ताजगी का अभाव महसूस करता है। शरीर में सुस्ती, मन में थकान और भावनाओं में उद्वेग कारण वह अस्त−व्यस्त दिखलाई पड़ता है, जिससे कार्य की मात्रा और स्तर दोनों प्रभावित होते हैं।

योगनिद्रा इन सभी प्रकार की समस्याओं से आदमी को उबारती और शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक स्तर पर उसे पूर्ण विश्राम उपलब्ध कराती है। शारीरिक विश्राम के लिए बिस्तर पर लेट जाना पड़ता है। इसके बाद चेतना को शरीर विभिन्न भागों में ले जाना पड़ता है। जैसे पैर की अँगुलियों, पंजा, उसके ऊपर की संधि, संपूर्ण पाँव, घुटना, जाँघ, नितंब आदि। यह क्रिया हमेशा क्रमानुसार ही होनी चाहिए। ऐसा नहीं कि घुटने में चेतना को लाने के पश्चात् सीधे नितंब में पहुँच जाएँ और वहाँ से पुनः पाँव के पंजे में आ जाएँ तथा बीच के भागों को छोड़ दें। इसे सदा आरोहण क्रम में ही करना चाहिए ताकि एक अंग के सभी हिस्से में चेतना बारी-बारी से स्थिर होते हुए आगे बढ़े। ऐसा करते समय मन को भी उन-उन भागों में ले जाना पड़ता है और अपनी संपूर्ण सजगता वहीं बनाए रखनी पड़ी है और अपनी संपूर्ण सजगता वहीं बनाए रखनी पड़ती है। यह अभ्यास वैसा ही है, जैसे कोई घुड़सवार विभिन्न प्रकार की गलियों और चौराहों को द्रुतगति से पार करते हुए गुजर रहा हो। इस प्रकार दो-तीन बार चेतना विविध अंगों में परिभ्रमण कराने के बाद शारीरिक शिथिलता की स्थिति उत्पन्न होने लगती है, पर इसकी पूर्णता तब तक नहीं हो पाती, जब तक अंतरंगों पर भी यही क्रिया न दुहराई जाए। अभी तक चेतना बाह्य संसार से हटार शरीर के बाहरी अवयवों पर लगाई गई थी। उत्तरार्द्ध भाग में यही प्रक्रिया भीतरी संस्थानों पर अपनाई जाती है। इससे मन शांत होकर अंतर्मुखी हो जाता है। इसके साथ ही संपूर्ण विश्राम की स्थिति आ जाती है और मन धीरे-धीरे गहराई में प्रवेश करता जाता है। यह मानसिक विश्राम हुआ। यही वास्तविक योगनिद्रा है। इस दशा में व्यक्ति शरीर से तो पूर्णतः रहता है, परंतु उसकी मानसिक अवस्था ऐसी नहीं होती। वह मानसिक रूप से पूरी तरह सजग रहता है और अपनी कल्पनाशक्ति को इतना प्रखर बना लेता है कि विभिन्न प्रकार के सात्विक दृश्यों की सृष्टि कर सके। यह सृष्टि इतनी जीवंत होनी चाहिए, मानो हम कल्पनालोक में नहीं, प्रत्यक्ष जगत् में विचरण कर रहे हो। देवी-देवता, पहाड़-पर्वत, मंदिर-महात्मा, झील-झरने, खेत-उद्यान, वृक्ष-वनस्पति जैसे दृश्यों में मन को इतना प्रशिक्षित करना पड़ा है कि उनकी कल्पना मात्र से मानसपटल पर वे सब साकार हो उठें। इन कल्पना-चित्रों से मन की आँतरिक संरचना इनके अनुरूप सात्विकता के ढाँचे में ढलने लगती है और वहाँ पहले से मौजूद अवाँछनीय तत्व धीरे-धीरे बारह निकलने लगते हैं। चेतनात्मक विकास को बाधित करने वाले उक्त तत्वों के निकल जाने से व्यक्ति की आत्मोन्नति का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। इसके साथ ही आत्मशाँति बढ़ने लगती है। वह योगनिद्रा का अतिरिक्त लाभ है।

भावनात्मक कायाकल्प के दौरान जब ईर्ष्या-द्वेष, भय-क्रोध, घृणा-हिंसा, दुःख-अवसाद जैसे आँतरिक मल-विक्षेपों का अवसान होकर क्षोभ, कुँठा और हीन-भावनाओं का अंत होता है, तो अंतराल एकदम सरोवर जल की तरह शाँत, शीतल एवं निर्मल हो जाता है, किंतु कई बार कुछ कठिन कुटेवों और बुरी आदतों के कारण द्वंद्व की स्थिति बनी रहती है। व्यक्ति जानता है कि यह लत ठीक नहीं। उसे वह वह छोड़ना भी चाहता है कि यह लत ठीक नहीं। उसे वह छोड़ना भी चाहता है, पर संकल्प की निर्बलता के कारण उसको त्याग नहीं पाता। ऐसी स्थिति में योगनिद्रा के मध्य स्व-संकेत देना बहुत ही लाभकारी होता देखा गया है। यदि किसी के मन में भय की भावना बुरी तरह घर कर गई है, वह उससे पिंड छुड़ाना चाहता है, तो उसे अभ्यास के दौरान अपने अंतर्मन को यह सुझाव देना पड़ेगा, “मैं निर्भय हूँ और हर प्रकार की परिस्थितियों में निर्भर बना रहूँगा। “ इस प्रकार नियमित सुझावों से धीरे-धीरे हमारी आँतरिक संरचना वैसी ही बनने लगती है, जैसा संकल्प किया गया था, किंतु ऐसा करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि संकल्प में शक्ति हो। वह मात्र शब्द-समुच्चय बनकर न रह जाए। उसमें इतनी गहरी भावनाओं का समावेश होना चाहिए कि वैसा प्रतीत होता हुआ स्पष्ट अनुभव हों। स्वस्थता-संवर्द्धन, रोग-निवारण, प्रतिभा-परिवर्द्धन जैसे विषयों में भी यही विधि अपनाई जानी चाहिए। इस प्रकार योगनिद्रा से शरीर, मन और भावना, तीनों स्तरों पर सुधार-संशोधन संभव है।

लंबे अभ्यास के उपराँत उक्त तीनों तलों पर संपूर्ण विश्राम की स्थिति सध जाती हैं ऐसी अवस्था में मन अंतर्मुखी होकर एकाग्र होने लगता है। यह ‘प्रयाहार’ है। प्रत्याहार की दशा प्राप्त होने पर बहुत देर तक मन को उस स्थिति में नहीं रखा जा सकता। शीघ्र ही नींद आ जाती है। अतः योगनिद्रा के साधकों को आत्मोन्नति के अगले सोपान तक सफलतापूर्वक पहुँचने के लिए इष्टमूर्ति गुरु, उगते सूर्य, कमलपुष्प या ऐसी ही किसी सरस-सात्विक वस्तु पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी जाती है। यह ‘धारण’ की स्थिति है। इस अवस्था में जब मन को किसी वस्तु पर केंद्रित किया जाता है, तो भीतर से तरह-तरह के दृश्य, विचार, आकृतियाँ उभर-उभरकर ऊपर आने लगती हैं। यह वास्तव में अर्द्धचेतन मन के ही विचार होते हैं, जो अचानक साकार हो उठते हैं। संस्कारों के रूप में वर्षों से दबे ये अनुभव, घटनाएँ, दमित वासनाएँ, स्मृतियाँ मौके की तलाश में रहती हैं और अवसर मिले ही चेतनतल पर आ धमकती हैं। इन विक्षेपों के रहते ध्यान नहीं सध सका। अस्तु, सबसे पहले उन्हें गलाना पड़ता है । इसके लिए कोई विशेष प्रयास की जरूर नहीं। साक्षी भाव से द्रष्टा बनकर उन्हें देखना भर होता है। आरंभ में ये संस्कार डरावने दृश्यों के रूप में उभरते हैं। कभी भूत, कभी पिशाच, कभी राक्षस, तो कभी साँप, शेर, बिच्छू के रूप में प्रकट होते हैं। पीछे इनका स्वरूप तात्विक और सुँदर हो जाता है। अब यह अपना रूप बदलकर उपवन, तड़ाग, महात्मा, पर्वत, मैदान आदि दृश्यों के रूप में सामने आते हैं, किंतु योगाभ्यासी को किसी भी दृश्य के प्रति आसक्त नहीं होना चाहिए। बस, द्रष्टाभाव से उन्हें देखते भर रहना चाहिए। इससे धीरे-धीरे संस्कार क्षय होने लगेंगे और मानसपटल पर उनका उभरना बंद हो जाएगा। तदुपरांत थोड़े समय के अभ्यास से स्वाभाविक ध्यान की स्थिति पैदा हो जाएगी। यह शुद्ध चेतना की अवस्था है।

इस प्रकार योगनिद्रा के अभ्यास से अभ्यासी प्रत्याहार से लेकर ध्यान की स्थिति तक आसानी से पहुँच सकता है। आगे और परिश्रम करके समाधि-सुध का भी आनंद ले सकता है, पर इसके लिए बिलकुल पृथक प्रयास करना पड़ेगा। जो इतने कठिन अभ्यास से समाधि सिद्ध करने में असमर्थ है, वे सहजता से ध्यान स्तर तक पहुँचकर उनके लाभों लाभान्वित हो ही सकते हैं। इसमें कुछ विशेष कठिनाई नहीं।

योगनिद्रा केवल नींद की कमी से होने वाली हानियों से ही नहीं बचाती, अपितु अपेक्षाकृत कम समय में निद्रा की पूर्ति भी करती है। यह शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक उपद्रवों को शाँत कर व्यक्तित्व के समग्र और संतुलित विकास में सहायक है। इससे मस्तिष्क की अल्फा तरंगें काफी बढ़ जाती और रक्तचाप की शिकायत समाप्त होने लगती है। रक्तवाहनियों का संकुचन ठीक हो जाने से शरीर में रक्तसंचरण की क्रिया दुरुस्त हो जाती हैं समस्त जीवकोषों को ऑक्सीजन की आपूर्ति पर्याप्त मात्रा में होने लगती तथा हृदय-गति संतुलित बनी रहती हैं यह शरीर-मन की तनावजन्य थकान को दूर करके योगाभ्यासी को ध्यान की उच्चस्तरीय कक्षा में प्रतिष्ठित कर देती है। इसमें भौतिकतायुक्त जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए भी लाभ की उतनी ही गुँजाइश है, जितनी अध्यात्म-मार्ग पर चलने वाले आत्मोत्कर्ष के इच्छुकों के लिए। इसलिए इसका अभ्यास हर एक को करना चाहिए।


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योगनिद्रा का नियमित अभ्यास शरीर एवं मन के मध्य संतुलन स्थापित कर स्वास्थ्यता का विकास करता है। यह मानसिक रोगों और बुरी आदतों से छुटकारा दिलाकर व्यक्ति को आत्मोन्नति की ओर अग्रसर करता और अंततः उस भूमिका में प्रतिष्ठित करता है, जिसे ‘ध्यान’ कहा गया हैं।


पारस को छूकर स्वर्ण बन जाएँ - परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियों ! भाइयों !!

आप लोग जिस कल्प-साधना सत्र में आए हुए हैं, उसमें महत्वपूर्ण काम आपको यह करना है कि किसी ऐसी सत्ता के साथ में अपने आपको जोड़ दें, जो बड़ी सामर्थ्यवान् है। अकेले आप सीमित हैं, अकेले आप जो काम करते हैं, उससे गुजारा तो हो सकता है, लेकिन और ज्यादा ऊँचा उठना अकेले के बलबूते पर संभव नहीं है। अकेले प्राणियों को भगवान् ने इतना दिया है, जिससे कि अपना गुजारा कर पाएँ। हर आदमी को इतनी अक्ल दी है, हाथ-पैर भी दिए हैं, शरीर दिया है, जिससे अपने शरीर का गुजारा कर लें और अपने बीबी-बच्चों का गुजारा कर लें और इससे अधिक किसी के पास नहीं है! मनुष्य के पास, इतना तो हर किसी के पास है, प्राणी के पास है, लेकिन इससे ज्यादा की जरूरत पड़े तो फिर आपको भगवान् का सहारा लेना पड़ेगा, ऐसे शक्तिपुँज का सहारा लेना पड़ेगा, जिसके पास शक्तियों के भंडार भरे पड़े हैं। भगवान् कौन भगवान् आप यह मानकर चलते हैं कि एक बहुत बड़ा बिजलीघर है, जिसके साथ में बल्ब लगे हरते हैं, पंखे लगे रहते हैं, छोटी-छोटी मशीनों लगी होती है और जनरेटर के साथ में जुड़ जाने की वजह से यह काम करते रहे हैं। अगर वह जुड़ें नहीं तब तब पंखा कैसे चले बल्ब कैसे जले दूसरे काम कैसे बनें इसलिए इनका जुड़ जाना आवश्यक है। जुड़े बिना बड़ी ति प्राप्त नहीं हो सकती, बड़े काम संभव नहीं हो सकते। मनुष्य बड़े काम करने के लिए किसी बड़ी शक्ति के साथ में जुड़ा रहे, यह बहुत जरूरी है। इस जुड़े रहने की प्रक्रिया का नाम है, उपासना। उपासना माने नजदीक बैठना, पास बैठना। अगर आप पास बैठ जाएँ किसी के, तो उसके गुण, उसके कर्म, उसका स्वभाव व उसकी विशेषताएँ आपके भीतर आना शुरू हो जाएँगी। आग की भट्टी के नजदीक अगर आप बैठने लगें तो, आपका शरीर गरम हो जाएगा। बरफ की फैक्टरी के भीतर अगर आप घुस जाएँ, तो आपका शरीर ठंडा होने लगेगा। ऐसी दृष्टि से आपको किसी के साथ में जुड़ना चाहिए। उपासना का अर्थ है, पास बैठना। आगे चलकर इसी को जुड़ जाना भी कहते हैं। पास बैठने का उदाहरण आप समझिए । चंदन के पेड़ के नजदीक जब उगते हैं बहुत सारे झाड़-झंखाड़ , तो उन झाड़ियों में भी चंदन की विशेषताएँ पैदा हो जाती है। यह उपासना हो गई , नजदीक बैठना हो गया । पारस के नजदीक बैठते ही, स्पर्श करते ही लोहा सोना बन जाता है। महान् शक्ति का साथ छूकर के कौन नहीं बन जाएगा, महान् । आप स्वाति की बूँद के बारे में जानते है? स्वाति की बूँद कितनी महान् होती है ? वह सीप के मुँह में जा पड़ती है, तो मोती पैदा कर सके । यही बात भगवन् के संबंध में भी है। भगवान् को कल्पवृक्ष बताया गया है, भगवान को अमृत बताया है अमृत को पी करके आदमी अजर-अमर हो जाते हैं, कल्पवृक्ष के नीचे बैठे करके आदमी अपनी कामनाओं को पूरा कर लेते हैं । मनुष्य के बारे में भी यही बात है। जस प्रकार से कल्पवृक्ष यानी भगवान् के नीचे आदमी बैठ जाए तब ? तब उसकी वह कामनाएँ, तृप्त हो सकती है । मरते तो वह आदमी है, जो शरीर में जिंदा रहते हैं। जो अपने आपको आत्मा समझते हैं, उनके मरने का सवाल कहाँ, ? क्यों ? फिर मरने की कोई बात ही नहीं हो सकती , मरना कभी संभव नहीं है, जो यह विचार करते हैं कौन -सा ? कि हमारा शरीर दूर है उनसे और जिस दिन भगवान् के नजदीक आ करके आदमी यह अनुभव कर ले कि हमारा जीवात्मा भगवान् का एक अंश है, फिर क्यों मरेगा आदमी ? जीवात्मा कहीं मरता है क्या ? शरीर तो कपड़ों की तरह है। रोज बदलते हैं कपड़ों को । इससे कई लाभ है, भय से आदमी की निवृत्ति होती है, कामनाओं की पूर्ति के अभाव में जो विक्षोभ उत्पन्न होते हैं, उनसे निवृत्ति होती है। आदमी को अपनी कुरूपता और कमजोरियों से जो हैरानी होती रहती है, पारस से छूकर के उसे निवृत्ति मिलती है। यह अनेक निवृत्तियां हो जाती हैं भगवान् के नजदीक जाने से । इसलिए उपासना का बहुत महत्व बताया गया है।

आप पतंग को देखते हैं न ! बच्चे के हाथ में जब पतंग होती है, तो बच्चा झटके से उड़ाता रहता है और पतंग ऊपर चढ़ जाती है। अगर कोई उड़ाने वाला न हो तब ? तब पतंग जमीन पर गिरेगी और मटियामेट हो जाएगी। मनुष्य अपने जीवन की पतंग अगर भगवान् के हाथों में सुपुर्द कर दे , तब फिर जैसा छोटा , घिनौना मनुष्य है, वैसा ही तो रह जाएगा, आगे कहाँ बढ़ेगा ? आगे उसकी उन्नति के लिए कोई संभावना नहीं है ओर न कोई गुँजाइश है। ठीक इसी प्रकार से कठपुतली के बारे में आप जानते हैं न ! कठपुतली नाचती है, कितना सुँदर तमाशा दिखाती है! बच्चे देखकर कितने खुश होते हैं, लेकिन क्या कठपुतली अपने आप नाचती है, नहीं , कठपुतली अपने आप नहीं नाचती । बाजीगर के हाथ में उसके धागे जुड़े हुए होते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि कठपुतली सुँदर तमाशा दिखा पाती है । भगवान् का उद्यान, भगवान् के उद्यान में अगर हम रहें , तब फिर उसी के साथ में लिपटकर चलिए, लिपटकर चलेंगे तो बेल की तरह चढ़ते चले जाएँगे । पेड़ होता है और पेड़ के ऊपर बेल लिपटती चली जाती है, उतनी ही ऊँची हो जाती है, जितना कि पेड़ । पेड़ न मिले तब ? तब फिर मुश्किल है। अगर आप उतने लंबे न हों, जितनी कि बेल, बेल फैल तो सकती है जमीन पर, लेकिन ऊँची नहीं उठ सकती, ऊँचा उठने के लिए जरूरी है कि किसी पेड़ के साथ में बेल को लिपटने का सौभाग्य मिल जाए। भगवान् एक पेड़ के साथ में बेल को लिपटने का सौभाग्य मिल जाए,। भगवान् एक पेड़ की तरह है, जिसके साथ में अगर आप अपने को लपेट देते हैं।तो न जाने कहाँ-से कहाँ चले जाते हैं। ऐसा है यह भगवान्।

इसके साथ-साथ क्या करना चाहिए ? उपासना में क्या करना होता है ? उपासना में नजदीक आते हैं और नजदीक आने के साथ-साथ सबसे पहला काम करना पड़ता है, अपनी सफाई हम कर ले, तब फिर कुछ सारी गुँजाइश मिलेगी। अगर सफाई न करें , तब फिर कुछ नहीं शीशा है, शीशे को अगर आप मैला-कुचैला रख दे, उसमें फिर अपना चेहरा देखना चाहें ,तो दिखना चाहे, बिंब देखना चाहे , तो पानी को साफ होना चाहिए। इसलिए भगवान् के नजदीक जाने के लिए सबसे पहला है। अपनी सफाई के लिए जितने भी कृत्य है, जो प्रारंभिक और धार्मिक कृत्य है, इन सबसे अपने आप की सफाई ,अपना परिष्कार करने की जरूरत पड़ती हैं । जैसे , आप सुबह पूजा करने बैठते हैं। तो क्या करते हैं ? पहले आप पंचकर्म करते हैं, पवित्रीकरण एक, आचमन दो, प्राणायाम तीन, न्यास चार, शिखाबंधन पाँच यही करते हैं न, पवित्रीकरण में जल हथेली पर लेकर शरीर पर छिड़कते हैं न और यह भावना करते हैं कि हमारी मलिनताएं जो बाहर की मलिनताएं हैं, वह हो जाएँ। आचमन तीन बार कहते हैं, उसके पीछे क्या संकल्प होता है, ? उसके पीछे यह संकल्प होता है कि हमारा मन, वाणी या वचन ओर कर्म , इन तीनों की शुद्धता के लिए जल पीते हैं और जीभ पर ही पीते हैं,जीभ पर इसकी स्वाद-इंद्रिय है। इसके अंदर से कटुवचन अगर इसके साथ में चलते हैं, तो दूर हो जाएँ, यह आचमन का उद्देश्य है। प्राणायाम, जो साँस हम ग्रहण करते हैं, साँस हमारे अंग प्रत्यंगों में चली जाती है, तो प्राणायाम में भी हम यह भावना करते हैं कि भगवान् का प्राण लेकर के , भगवान् की शक्ति लेकर के यह हवा हमारे भीतर आए ओर धोकर के साफ कर दे। इसी प्रकार से न्यास में पाँचों ज्ञानेंद्रियाँ है- इनको हमेशा शुद्ध रहना चाहिए अर्थात् इनके द्वारा किए हुए कृत्य शुद्ध और पवित्र होने चाहिए। न्यास, यही उद्देश्य है। शिखावंदन ,शिखा का वंदन अर्थात् संस्कृति का वंदन। सिर के ऊपर जो ध्वजा फहरा रखी है ज्ञान की देवी गायत्री माता की , उसके प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करना,यही शिखावंदन है। यह संसार के सारे कृत्य जो कि पंचकर्म कहलाते हैं, यह सब इस उद्देश्य के लिए हैं कि साधक को यह मानकर चलना चाहिए कि अपने आपको जितना पुनीत और जितना पवित्र बना, सकेगा ,उतना ही भगवान् की किरणें उसके भीतर प्रवेश करेंगी जितना अपने आपको जलील और गंदा बनाकर रखेगा, उसी हिसाब से व्यवधान उत्पन्न होते चले जाएँगे और जो चीज वह चाहता है, उससे वंचित रह जाएगा। आप सामान्य जीवन में देखते होंगे, स्नान न करें तब ! स्नान शरीर को नहीं कराएं तब मैला-कुचैला हो जाएगा और मैल जम जाने से पसीने के छेद बंद हो जाएगा और मैल जम जाने से पसीने के छेद बंद हो जाएंगे, आप बीमार पड़ जाएँगे। इसलिए स्नान करना बहुत जरूरी है और जीव को स्नान कराना भी। शरीर का ही नहीं, आत्मा के ऊपर चढ़े हुए कषाय ओर कल्मषों को हमको दूर करना चाहिए। यही भजन का भी उद्देश्य है। बहार से आप देखते हैं न, बार बार झाडू लगाते हैं। बरतन माँजते हैं न, रिपिटीशन करते हैं, रिपिटीशन करना जप करने का उद्देश्य है, एक तरह का साबुन लगाना है। कपड़ा धोते हैं, तो बार बार साबुन घिसते हैं अथवा बार बार कपड़े को नीचे से ऊपर तक पीटते हैं, दबोचते हैं। इसका अर्थ यह हो गया कि जिस तरीके से राम के नाम से मन के ऊपर साबुन की तरह धोना शुरू करते हैं, तो यही जप का उद्देश्य है। पत्थर पर घिसते हैं, बार-बार रिपीट करते हैं, तो निशन हो जाता है। अगर नहीं करें ,तब फिर नहीं होगा । बार - बार करने का मतलब यही है। बहुत-सी चीज को साफ करने के लिए उसको घिसाव देना पड़ता है। अपने आप को भी किसी से रगड़कर घिसाव देना पड़ेगा । घिसाव देने से हममें जो खुरदरापन है, रूखापन है, वह सब चिकनाई में, स्नेह में, सद्भावना में बदल जाता है। यह है रिहर्सल जप की ।

जप को आप यह मानकर मत चलिए कि भगवान् को अपनी खुशामद की जरूरत है और खुशामद जो कोई करता है, उससे भगवान् प्रसन्न हो जाता है । आप ऐसा ख्याल कभी मत करना । भगवान् को न खुशामद करने की दरकार है और न कोई शानदार शक्ति खुशामद करने की दरकार है और न कोई शानदार शक्ति खुशामद पसंद करती है। भगवान् की चोर खुशामद नहीं करते , तो क्या देखभाल नहीं करता! चिड़िया कहाँ खुशामद करती है? इतने पृथ्वी के जीव -जंतु हैं, इनमें से कौन पूजा - प्रार्थना करता है, तो क्या भगवान् ध्यान नहीं रखते ? तब क्या भगवान् नाराज हो जाते हैं क्या ? जो आदमी जग करेगा, उसी से प्रसन्न होंगे। जो जप नहीं करेगा, उससे प्रसन्न नहीं होंगे। नहीं जप करने का मतलब अगर अपने खुशामद समझा है, तो आप गलती करते हैं। भगवान् को न किसी खुशामद की जरूरत है। भेंट देंगे, पूजा देंगे, प्रसाद बांटेंगे । आप क्या बच्चों की सी बात करते हैं। फूल की जरूरत पड़ेगी , तो भगवान् कही भी किसी के बगीचे में घुस जाएंगे और वहाँ से फल चुनते रहेंगे सारी दुनिया तो उन्हीं की है, जहाँ जरूर पड़ेगी, वहीं सुगंध ले सकते हैं। आपके फूलों से क्या बनता-बिगड़ता है उनका । इसलिए उपहार, इनाम, रिश्वत आदि की दृष्टि से न कोई वस्तु दी जा सकती है उसको और न उसके ऊपर किसी वाणी का असर पड़ता है। प्रार्थना करने का, पूजा करने का इनका कोई असर नहीं पड़ता । तब यह पूजा उपासना, इतना कृत्य जो आप रोज करते हैं,किस लिए किया जाता है ? यह वास्तव में अपने मन की धुलाई है, अपने मन की रँगाई है। पहले आप अपने आपको धोकर रखेंगे , तो रँगना संभव हो जाएगा, फिर आप उपासना जो करेंगे , सफल हो सकती है, साधनाएँ सार्थक हो सकती है। अगर आपने अपनी धुलाई नहीं की, अपने कषाय-कल्मषों को धोया नहीं, तो फिर बहुत मुश्किल है, फिर आपके लिए बहुत कठिन हो जाएगा । खेत को अगर आप जाएगी ? यह खेत की जुताई , राम नाम का जप करना अथवा अन्य किसी तरीके से अपने आपका परिष्कार करना सब एक ही है जोव करके अगर आपने खेत ठीक तरीके से तैयार कर लिया है, तो बुआई में आपको कोई दिक्कत नहीं पड़ेगी , बुआई सरल हो जाएगी , खेत तो जोता हुआ है और अगर जोता हुआ न हो तब ? कंकड़-पत्थर वाला खेत हो तब ? तब आप जो कुछ भी बोएंगे जमीन, में आपका सब बीज भी मारा जाएगा और आप फिर निराश होते फिरेंगे । दीवार को चिनने से पहले, खड़ी करने से पहले जमीन खोदनी पड़ती है, तब खोद करके उसमें नींव भरनी पड़ती है। जप करना, पूजा करना, ध्यान करना, यह अपने आपकी खुदाई करने के बराबर है, ताकि वहाँ राम के नाम की नींव चिनी जा सके ।यह जुताई और बुवाई, रँगाई ओर धुलाई की तरह है, यह बात समझ में आ जाए, तब फिर आपको उपासना -कृत्यों का रहस्य मालूम हो गया, यह समझाना चाहिए ।

नमन हम करे हैं , वंदन करते हैं , सूर्य नारायण को जल चढ़ाते हैं- इनका क्या मतलब है? हम अपने आपको समर्पित करते हैं अपने छोटे-से बरतन में भरा हुआ जल हम सुर्य भगवान् के सामने चढ़ा देते हैं, इसका अर्थ यह होता है प्रकाराँतर से कि हमारे शरीर में जो भी जल भरा हुआ है, जीवन-रस भरा हुआ है , इसको हम विराट् सता को, भगवान् को समर्पित करते हैं और यह आशा करते हैं कि हमारे जल को केंद्रित न रखा जाए, बल्कि इसको हवा में बिखेर दिया जाए, ओस के रूप में , ठंडक के रूप में , नमी के रूप में । यह हमारा थोड़ा-सा जल जो अर्घ्य के रूप में चढ़ाया गया है, सारे समाज के काम आए, देश के काम आ जाए, इस उद्देश्य को लेकर सूर्य अर्घ्य चढ़ाया जाता है सुर्य अर्घ्य में आप पानी तो चढ़ा देते हैं, लेकिन उसका भावार्थ नहीं समझे, तब फिर केवल क्रीड़ा -कृत्य हो जाएगा, फिर एक विडंबना हो जाएगी, उससे कुछ बनेगा नहीं । वह सिर्फ जल को विसर्जन करना होगा। जैसे जल को सूर्य नारायण के सामने विसर्जन करना पड़ेगा अपने आपको। इसका अर्थ है कि उनका अनुशासन अपने ऊपर धारण करना पड़ेगा इष्ट । इष्ट आपने कोई तय कर लिया अर्थात् आपका शिव इष्ट है, इसका मतलब हो गया , कल्याण आपका इष्ट है। गायत्री अगर आपका इष्ट है, तो इसका अर्थ हो गया कि आपने शालीनता की देवी का , पुनीत और पवित्रता की देवी का वरण कर लिया, उसके सामने अपने आपको चढ़ाने का निश्चय कर लिया। इसी प्रकार से यह जो है गायत्री, यह प्रज्ञा की देवी, सदाशयता की देवी , शालीनता की देवी , इसके प्रति अगर अपने आपको समर्पित करते हैं, तो आप मान लीजिए अपने इष्ट निर्धारित कर लिया । यह प्रतीक है। सारे आध्यात्मिक क्रियाकलापों का अर्थ केवल एक होता है कि हम भगवान् में रम जाएँ, भगवान् में तन्मय हो जाएँ भगवान् को साथ लेकर के चलें। इन्हीं को हम पूजा के प्रतीकों के माध्यम से चरितार्थ करते हैं। जल चढ़ाते हैं, भगवान् को कोई पानी की जरूरत थोड़े ही है, बल्कि उसका यह अर्थ है कि हम अपने आपको जल जैसा पुनीत, जल जैसा बहने वाला, जल जैसा पुनीत,जल जैसा नम्र बनाते हैं पुष्प हम भगवान् के ऊपर चढ़ाते हैं, तो इसका अर्थ यह होता है कि फूल जैसा जीवन जिएँगे , सुरभित जीवन जिएँगे ।समन्वित जीवन जिएंगे, हँसता और हँसाता हुआ जीवन जिएँगे । फूल चढ़ाना भगवान् को रिश्वत नहीं है, अपने आपका शिक्षण है। आत्मशिक्षण के लिए हम फूल चढ़ाते हैं हमारा फूल जैसा जीवन ही भगवान् के चरणों पर चढ़ने का अधिकारी बन सकता है। फूल न हो तब ? तब क्या चढ़ेगा भगवान् के चरणों पर स्थान प्राप्त करना है, तो फिर इसका एक ही तरीका रह गया, कौन सा ? कि आप फूल की तरह खिले । भगवान् के लिए और क्या क्या करना पड़ता है? धूप देते हैं, नैवेद्य देते हैं, दीपक जलाते हैं दीपक से आप यह मत सोचिए कि भगवान् को कम दिखाई पड़ता है, इसलिए आप रोशनी कर देंगे , तो उनको रास्ता चलने में सुगमता रहेगी। नहीं , ऐसा नहीं है। भगवान् के तो कितने ही दीपक जलते हैं। उनका सूरज दिन में देखा है न आपने ? रात को चाँद का दीपक देखा है न ? भगवान् के यहाँ कोई दीपक की कमी नहीं हैं हम भगवान् को दीपक नहीं दिखाते हैं। दीपक दिखाने का अर्थ केवल अपने आपको यह सिखाने का है, यह आत्मशिक्षण है कि हम को दीपक की तरह जिंदगी जीनी चाहिए। बस, यही तो उद्देश्य है ओर कोई उद्देश्य नहीं है। इसलिए आप जो पूजाकृत्य में वस्तु समर्पित करते हैं, उसके पीछे आत्मशिक्षण की , जिसका मूल उद्देश्य नहीं है, आत्मपरिष्कार की प्रेरणा ग्रहण करें । नैवेद्य ग्रहण करते हैं, नैवेध को मिठास कहते हैं। भगवान् कोई चींटी थोड़े ही है, जो शक्कर तलाश करते फिरे और शक्कर के लिए भागते फिरें, ऐसा नहीं है। नैवेद्य का अर्थ होता है, मिठास । हम मिठास जैसा जीवन जिएँ , हमारे व्यवहार में मिठास हो , हमारे में विनम्रता हो, सज्जनता हो, दूसरोँ का सम्मान करना सीखें । यह क्या है ? यही नैवेद्य है। पूजा में आप चावल चढ़ाते हैं भगवान् के ऊपर , जिसका अर्थ होता है, अपनी कमाई का एक हिस्सा भगवान् के लिए अर्थात् श्रेष्ठ कामों के लिए हम नियमित रूप से लगाते चलें , तो इसका अर्थ यह हो गया कि आपने भगवान् को नैवेद्य चढ़ा दिया, अक्षत चढ़ा दिए, धूप चढ़ा दी बस, इन सबका चढ़ाने का मतलब आप भूलना मत। इसमें रिश्वत का कोई भाव नहीं है, उपहार और इनाम बाँटने का कोई भाव नहीं है। ऐसा करके हम भगवान् का और अपमान कर देंगे। हमारी हैसियत ही कहाँ है, जो हम भगवान् को अंधेरे में से बचाकर रोशनी में ला पाएँ। यह तो हम अपना शिक्षण करते हैं। तमसो मा ज्योतिर्गमय। हम प्रकाश की ओर चलेंगे , अंधेरे की ओर नहीं । यह शिक्षण करने के लिए हम दीपक जलाते हैं।

इन प्रतीकों के बारे में आप ध्यान रखिए। अगर प्रतीकों के बारे में ध्यान नहीं रखेंगे, तब फिर मुश्किल है। अपने आपका तो शोधन करना ही पड़ेगा । नहीं करेंगे तो मुश्किल पड़ी रहेगी । आपको उस साधु की कथा याद है? जो एक चोर को यह जवाब देता था, भगवान् को देखना कोई कठिन नहीं है , तो एक दिन चोर ने पूछा, स्वामी जी हमें भी दिखा दीजिए स्वामी ने कहा, अच्छा, दिखा देंगे। उसने पूछा, कब दिखा देंगे। ? उन्होंने कहा, जब कहो , तभी दिखा देंगे । चोर दूसरे दिन तैयार होकर आ गया सवेरे ही। उसने कहा, हमको दिखाइए भगवान् । संत ने कहा, अच्छा तो चलो ,साथ साथ चलते हैं ओर इस पहाड़ के ऊपर टीले पर से दिखा पाएँगे । उसने कहा अच्छा तो चलिए । तो उन्होंने कहा, देखो भाई वहाँ कुछ पूजा -पाठ करना पड़ता है। चार पत्थर लेकर चलना पड़ेगा । चार पत्थर लेकर चलने से ही बात बनेगी । चोर तैयार हो गया । उसने चार पत्थर सिर पर रख लिए ओर जब चलने लगा, तो रास्ते में थोड़ी दूर ही चढ़ा हो गा कि थक गया, तो उसने कहा, स्वामी जी,यह तो बहुत भारी पत्थर फेंक दो। उसने एक पत्थर फेंक दिया । थोड़ा और आगे चला, फिर थक गया। स्वामी जी ने कहा, स्वामी जी यह तो तीन पत्थर है, थोड़ा ओर कम कराइए । फिर एक ओर फेंक दिया । दो पत्थर रह गए। उनको लेकर ऊपर चढ़ने लगा। फिर कहने लगा, यह तो बहुत भारी है। एक पत्थर और फेंक दिया। एक पत्थर और रह गया । उसको लेकर जब ऊपर पहाड़ पर चढ़ता चला जा रहा था, तब फिर वह बहुत थक गया। उसने कहा, स्वामी जी आप ऐसी कृपा करें , आप इस पत्थर को भी फिंकवा दीजिए, तब बात बनेगी। अब तो मुझसे चला नहीं जाता । पहले चार पत्थर लाया, फिर तीन लिए, दो लिए, अब में चलते-चलते थक गया हूँ के मेरी गरदन में भी दर्द होता है, आप इसको भी फिंकवा दीजिए , तो बाबा जी ने कहा, अच्छा , तो उसी भी फेंक दो। चारों पत्थरों को फेंक देने के बाद में जब वहाँ ऊपर टीले पर पहुँचा , तब महात्मा भगवान् को दिखाने के बजाय चोर से यह यह पूछा ,जब चार पत्थर लेकर आप टीले पर चढ़ रहे थे तब चढ़ना मुश्किल था न ? अरे साहब। बहुत मुश्किल था, हम चढ़ ही नहीं सकते थे। तब उन्होंने कहा, हमारे सिर के ऊपर पत्थर रखे हुए है,हम उन पत्थरों को एक-एक करके फेंक दें, तब फिर हमारे लिए टीले पर चढ़ना, भगवान् को देख सकना कोई भी चीज कठिन नहीं रहेगी । काम का पत्थर, क्रोध का पत्थर, लोभ का पत्थर, मोह का पत्थर , मद और मत्सर का पत्थर, यह सारे के सारे पत्थर ऐसे घिनौने पत्थर हैं, जो हमारी नाम में दम करते रहते हैं, हमको हैरान करते रहते हैं । अगर इस हैरानी को ओर इन पत्थरों को दूर न करे , तो बहुत मुश्किल हो जाएगी, बस यही तो शिक्षण है। आप सारी उपासना का उद्देश्य बार-बार ध्यान रखिए, इसका एक ही उद्देश्य है कि अपने आपको पुनीत बनाएँ , स्वच्छ करें । दिवाली के दिन घर को साफ करते हैं। ताकि लक्ष्मी जी आएँ, अपने आपकी पहले धुलाई और सफाई कर देना है। बस, आप यह कर पाएँगे , तो समझिए आपकी बहुत सारी मंजिल पार हो गई । मुझे उम्मीद है, आप ऐसे ही करेंगे। आज की बात समाप्त ।


Quotation

चरित्र के अभाव में मनुष्य चापलूस का आश्रय लेता है जिन व्यक्तियों में आत्मविश्वास है ,वे मात्र औचित्य का निर्वाह करते हैं।

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प्राप्ति के आनंद की तुलना में प्रयत्न का पुरुषार्थ अधिक आनंददायक है।

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व्यक्ति का अंत करण वह न्यायालय है, जिसमें परमेश्वर न्यायधीश बनकर विराजमान् रहता है।

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शरीर को देखकर मनुष्य होना पहचाना जाता है और प्रकृति देखकर उसका दैत्य या देवता होना


ऋषित्व के अभिवर्द्धन का पर्व : श्रावणी

सावन की रिमझिम फुहारों के बीच जो उल्लास - वर्षा प्रारंभ होती है, उसका घनीभूत स्वरूप श्रावणी पर्व है। सावन के अंतिम दिन अर्थात् सावन की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह त्योहार यों तो सामान्यतया रक्षाबंधन के रूप में प्रचलित है, किंतु इसमें आत्मिक जागरण के अलौकिक उपचार के साथ, संस्कृति - रक्षा के महत्वपूर्ण संदेश भी सँजोए हुए है । यह पर्व अपनी अनोखी उमंगे - अनूठी तरंगों के बीच जनसामान्य को पर्यावरण- संरक्षण, हरीतिमा- संवर्द्धन का बोध भी करता है।

इस पर्व की अतीत कथाएँ जो भाव बरसाती है, उनसे यही स्पष्ट होता है कि पुरातनकाल में ब्रह्मबल संपन्न ब्राह्मण राष्ट्र के नेता होते थे। जन-जीवन को सन्मार्ग पर चलाना उनका कर्तव्य था। आसुरी विचारों एवं प्रवृत्तियों से रक्षा करने की जिम्मेदारी उन्हीं की थी । ‘वयम् राष्ट्रेंजागृयाम् पुरोहिताः ‘ का व्रत धारण किए हुए ये पुरोहित आचार्यगण अपने यजमानों को रक्षा−सूत्र बाँधते हुए अपने संकल्प को स्मरण करते थे कि मनुष्यता को ऊँचा उठाने के लिए उन्हें क्या करना है, यदि एक वर्ष में उनके कार्यों में कोई शिथिलता आ गई हो ,तो उसे दूर करके पुनः जाग्रत होना है। इन ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणों का कार्य तप के उच्चतम मानदंडों को अपने जीवन में धारण करते हुए सदा-सर्वदा जनकल्याण में निरत रहना था ।

आज के भोगवादी दौर में अतीत का वह पुरातन गौरव खो गया हैं। यह पवित्र पर्व भी मात्र धनोपार्जन का साधन बनकर रह गया हैं पुरोहितगण प्रायः रक्षा−सूत्र के बदले अपने यजमान से धन कमाने की फिक्र में लग गए है । राष्ट्र के पुरोहितों द्वारा कर्तव्य-विस्मरण की यह स्थिति ही देश के सांस्कृतिक पवन एवं पराभव का अहम् कारण है। श्रावणी पर्व संस्कृति रक्षा के पर्व के रूप में राष्ट्र-पुरोहितों को अपने दायित्व के पुनः स्मरण का बोध कराता है।

यज्ञोपवीत-परिवर्तन एवं प्रायश्चित के रूप में हेमाद्रि संकल्प आदि कृत्य इस पर्व से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए है। इस रूप में यह आत्मशोधन या ऋषित्व-ब्राह्मणत्व के निखार का पुण्य पर्व है। श्रावणी पर्व के दिन पुराना यज्ञोपवीत बदला जाता है । शिखा -सिंचन एवं यज्ञोपवीत-नवीनीकरण को एक तरह से इनका वार्षिक संस्कार भी कहा जा सकता है। जिस प्रकार जन्मदिन एवं विवाहदिन मनाए जाते हैं, उसी प्रकार श्रावणी पर्व को आत्मिक कायाकल्प का संकल्प दिन भी कहा सकता है। शिखा के रूप में विवेकशीलता को जीवन में सर्वोपरि प्रतिष्ठा देना और यज्ञोपवीत के रूप में कर्तव्यनिष्ठा को बनाए रखना अर्थात् ज्ञान ओर कर्म के समन्वय के माध्यम से जीवन के प्रगतिपथ पर बढ़ते रहने की रीति−नीति अपनाए रखना इनका मर्म संदेश है। जिसे इस अवसर पर गहराई से हृदयंगम किया जाना चाहिए।

शिखा- सिंचन और उपवीत नवीनीकरण के बाद जो कृत्य किए जाते हैं, उनमें आचार्य हेमाद्रिकृत् प्रायश्चित संकल्प प्रमुख है। सावधानी के साथ रहने वाले व्यक्तियों में भी प्रमादवश या अज्ञानवश कुछ - न - कुछ भूलें ही जाती है। यदि इनकी नियमित शुद्धि एवं सुधार न किया जाए, तो इनका बोझ बढ़ता जाता है ओर जीवन अंधेरों से घिरता चला जाता है । बढ़ी-चढ़ी यह पाप राशि ही नानाप्रकार की आधि-व्याधियों , संकट एवं शोक- संताप के रूप में जीवन को नरक स्वरूप बना देती है। इस विकार राशि के शोधन परिमार्जन के निमित्त श्रावणी पर्व का प्रायश्चित विधान एक अचूक उपचार के रूप में आता है। इस प्रायश्चित विधान एक अचूक उपचार के रूप में आता है।इस प्रायश्चित का सार, प्रमाद एवं अज्ञानवश हुई भूलों का सच्चे हृदय से पश्चाताप ओर उन्हें दुबारा न दुहराने का दृढ़ संकल्प है। इसी के साथ वर्षभर में हुई क्षतिपूर्ति के निमित्त अभीष्ट सत्य वृति को धारण करने का व्रत लेना है।

वस्तुतः यह व्रतनिष्ठा ही हम सबको जीवनलक्ष्य की ओर आगे बढ़ाती है। शास्त्रवचन है-

व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नेति दक्षिणाम् । दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते ॥

अर्थात् व्रत से दीक्षा मिलती है, दीक्षा के समय दक्षिणा दी जाती है। दक्षिणा से श्रद्धा बढ़ती है। श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है । इस वक्तव्य से यह सत्य सुनिश्चित हो जाता है । कि व्रत ही वह शक्ति है, जो व्यक्ति की सोई हुई शक्ति को जाग्रत करती है। असंभव कार्यों को संभव बनाने की निष्ठा बढ़ती है। निष्ठा में बुद्धि के साथ वह त्याग की भूमिका में पदार्पण करता है। त्याग द्वारा शक्तियों का विकास होने से श्रद्धा बढ़ने लगती है और श्रद्धा की दृढ़ता के साथ सत्य का मार्ग खुल जाता है। इस तरह श्रावणी पर्व में जीवन को लक्ष्य की ओर ले जाने वाली व्रतनिष्ठा से जोड़ा जाता है, जो व्यक्ति के आत्मिक कायाकल्प के रूप में पर्व का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष हैं।

श्रावणी पर्व का दिन भाई-बहिनों के पवित्र स्नेह-सूत्र के प्रतीक रक्षाबंधन से भी जुड़ा हुआ है। इसके प्रवचन में आने के विषय में एक किंवदंती बहुश्रुत है कि जब भगवान् श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लगी थी तब द्रौपदी ने अपने वस्त्र को फाड़कर उनके हाथ में बाँधा था और ऐसे समय में श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को विपत्ति के समय रक्षा का वचन दिया था। कौरव-सभा में चीरहरण के समय द्रौपदी की लाज बचाकर श्रीकृष्ण ने अपना यही वचन निभाया था।

हमारे प्राचीन ग्रंथों एवं इतिहास में ऐसी अनेक घटनाएँ हैं, जो रक्षा−सूत्र के महत्व को प्रदर्शित करती है। यह धागा बंधन नहीं, बहन-भाई के पवित्र प्रेम और रिश्तों का त्योहार है। इसका महत्व मात्र हिंदुओं ने ही नहीं दूसरे मजहब के लोगों ने भी आँका है। इस संदर्भ में मुगलकाल का यह उद्धरण उल्लेखनीय है। जब रानी कर्णवती ने बहादुरशाह के आक्रमण से अपनी रक्षा के लिए हुमायू को राखी भेजी थी और हुमायू ने इसे सहर्ष स्वीकार कर अपना फर्ज निभाया था। बाद के अन्य बादशाहों ने भी रक्षाबंधन के महत्व को स्वीकार किया, इसका उल्लेख इतिहास के पृष्ठों में अंकित है।

आज मूल्यों के घोर अवमूल्यन के दौर में जब नारी-अस्मिता खतरे में है, इस पवित्र रक्षाबंधन की आवश्यकता अपने मूल रूप में और बढ़ जाती है। वस्तुतः नारी जाती के पवित्र भाव एवं सम्मान की दृष्टि में ही व्यक्ति, समाज एवं संस्कृति का उत्कर्ष निहित है।

इस पर्व के साथ हरीतिमा-संवर्द्धन का पुण्य-प्रयोजन भी जुड़ा हुआ है। जिसके महत्व को आज के पर्यावरण-संकट के युग में भलीभांति समझा जा सकता है। आज जब जंगलों का नाश तेजी से हो रहा है, पृथ्वी के सुरक्षाकवच का ह्रास गंभीर पर्यावरण संकट के रूप में दृश्यमान है। वायु, जल एवं मृदा का प्रदूषण, बाढ़, तेजाबी वर्षा, सूखा, भूस्खलन, बादलों का फटना, बढ़ता तापमान आदि इसी के अलग-अलग रूप हैं।

मनुष्य-जीवन की खुशहाली एवं स्थायी प्रगति के लिए प्रकृति-संतुलन एवं इसके लिए हरीतिमा-संवर्द्धन के विषय में हमारे ऋषि, पूर्वज भलीभाँति परिचित थे। अतः वृक्षारोपण पर वे बहुत जोर देते थे। वृक्षों की महत्ता का उल्लेख करते हुए अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में कहा गया है, वृक्ष-वनस्पतियाँ भी मनुष्य की ही तरह पृथ्वी के पुत्र हैं। वस्तुतः स्वास्थ्यवर्द्धक एवं वायुमंडल शोधक गुणों के कारण हरीतिमा की भूमिका अद्वितीय है। मनुष्य के मानसिक विकास एवं शाँति के साथ भी इसका घनिष्ठ संबंध है। शायद यही कारण है कि वैदिक संस्कृति अरण्यों में विकसित हुई थी और इसका नाम आरण्यक संस्कृति पड़ा था। श्रावणी पर्व वृक्षारोपण के इसी शुभ प्रयोजन की याद दिलाकर इसको क्रियान्वित करने की प्रेरणा देता है।

इस तरह श्रावणी के पुण्य पर्व का पावन दिवस प्रायश्चित पर्व के रूप में आत्मिक विकास-ऋषित्व के अभिवर्द्धन, रक्षाबंधन के रूप में नारी-अस्मिता एवं संस्कृति-पूजा और हरीतिमा-संवर्द्धन के रूप में पर्यावरण-रक्षा का संदेश देते हुए जीवन के आँतरिक एवं बाह्य दोनों मोरचों पर सक्रिय होने का संदेश देता है। जिसे आत्मसात् कर हम सर्वांगीण प्रगति का पथ प्रशस्त कर सकते हैं।


Quotation

बुद्ध को आत्मबोध हुआ। कठोर तपश्चर्या के बाद प्राप्त उपलब्धि से वे निर्वाण-मोक्ष की ओर भी बढ़ सकते थे। पर उनका लक्ष्य था-अनाचार-कुरीति से भर समाज का परिशोधन तथा विवेक रूपी अस्त्र द्वारा जनमानस का परिष्कार। आत्मबोधजन्य ईश्वरीय संदेश को व्यापक बनाने वे निकल पड़े और जन-जन तक पहुँचकर विचार-क्राँति कर सकने में सफल हुए। प्रव्रज्या बौद्ध धर्म का प्रधान अंग मानी जाती थी। भिक्षुगण सतत् चलते रहते थे व बुद्ध के साथ संघ, धर्म शरणम् गच्छामि नारा लगो, भारतवर्ष ही नहीं, सारे विश्व भर में उनका संदेश पहुँचाने का लक्ष्य पूरा कर सके। सिद्धार्थ के अंदर विश्वकल्याण की कामना रूप में जो बीज पला वह गौतम बुद्ध के रूप में विकसित होकर सारी मानवता को धन्य कर गया।

व्रत ही वह शक्ति है, जो व्यक्ति की सोई हुई शक्ति को जाग्रत करती है। असंभव कार्यों को संभव बनाने की निष्ठा बढ़ती है। निष्ठा में वृद्धि के साथ वह त्याग की भूमिका में पदार्पण करता है। त्याग द्वारा शक्तियों का विकास होने से श्रद्धा बढ़ने लगती है ओर श्रद्धा की दृढ़ता के साथ सत्य का मार्ग खुल जाता है इस तरह श्रावणी पर्व में जीवन को लक्ष्य की ओर ले जाने वाली व्रतनिष्ठा से जोड़ा जाता है, जो व्यक्ति के आत्मिक कायाकल्प के रूप में पर्व का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।


युगगीता-25 - लोकशिक्षण के लिए समर्पित हों जागृतात्माओं के कर्म

(तृतीय अध्याय के अंतर्गत कर्मयोग की युगानुकूल विवेचना)

‘इदं न मम्’ के भाव से किए गए कर्म ही जीवन को यज्ञीय बनाते हैं, यह व्याख्या योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा समझाई जा रही है। कर्मयोग नामक इस तीसरे अध्याय के अंतिम महत्वपूर्ण कर्मयोग प्रधान छह श्लोकों (11 से 16 तक) में मूलतः जो बात समझाई गई है, वह बड़े मार्के की है। भगवान् कहते हैं, यज्ञ प्रक्रिया से, देवों के अनुदान से उपलब्ध भोगों को जो पुरुष बिना बाँटे स्वयं भोग लेता है, वह चोर ही है। जो बिना यज्ञीय भाव से जीवन जिए स्वयं के लिए अपनी रसोई पकाते व खाते हैं, वे वास्तव में पाप को ही खो है। यही श्रीकृष्ण का आध्यात्मिक साम्यवाद है, जो बताता है कि सहकारी-सामूहिक प्रयासों से प्राप्त धन या सामग्री का समान रूप से वितरण होना चाहिए। इसका संग्रह नहीं होना चाहिए। उपभोक्ता प्रधान भोगवादी आज के जीवन में सारी बेचैनी-अशाँति यज्ञीय जीवन न जी पाने के कारण है। उपभोग शब्द यज्ञ से उलटा है एवं प्रकृति में जब भी शोषण प्रधान उपभोग होता है, प्रकृति सभी को सामूहिक दंड देती है, आज भी दे रही है। कर्मकाँड प्रधान यज्ञ व दर्शन प्रधान यज्ञ में अंतर भी श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं। एवं बताते हैं कि यज्ञ तो जीवन की हर श्वास में होना चाहिए। स्वार्थ से परे चल परमार्थ की राह सबकी बने, यही प्रभु की इच्छा है। तेरहवें श्लोक में पहुँचते-पहुँचते योगेश्वर वेदाँत की पराकाष्ठा पर पहुँचकर अर्जुन को बताते हैं कि यज्ञ की अग्नि ब्रह्माग्नि है। इसके पश्चात् के दो श्लोकों में भगवान् बताते हैं कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है। यज्ञ रूपी एक महान् चक्र को वे विश्वरुवस्था के रूप में बता रहें है। एवं अन्न, वृष्टि, सभी प्राणी किस तरह उत्पन्न होते हैं, यह समझा रहे हैं,। जब वे वृष्टि शब्द प्रयुक्त करते हैं, तो उसका अर्थ है, प्राणपर्जन्य। यह जिस यज्ञ से जन्म लेता है वह निःस्वार्थ कर्म के एक विराट् चक्र के रूप में गतिशील है। आज हम जिस विराट् बारह वर्षीय महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति कर रहे हैं, यह भी उसी सामूहिक कर्म का ही एक रूप हैं, जिसे श्रीकृष्ण इस श्लोक में समझा चुके हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने महाविनाश को टालने के लिए ही यह नवसृजन का कार्य हमसे कराया। प्रतिभाओं की सिद्धि का महायज्ञ भी यही है। आइए इस अंक में उस श्लोक की व्याख्या से आरंभ कर आगे बढ़ें।

इस अध्याय के सोलहवें श्लोक में भगवान् पार्थ से कहते हैं, “जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परंपरा से प्रचलित सृष्टि चक्र के अनुकूल आचरण नहीं करता, अपने कर्त्तव्यों का पालन नहीं करता, वह इंद्रियों के द्वारा भोगों में रमण करने वाला पुरुष पापमय जीवन ही बिताता एवं एक प्रकार से व्यर्थ ही जीता है। “ यहाँ अर्जुन को और उसके माध्यम से हम सबको परमात्मा-परब्रह्म के रूप में श्रीकृष्ण की सत्ता समस्त मानवजाति को एक चुनौती दे रही है कि यदि मनुष्य स्थिति कर्म चक्र की विधा के विरुद्ध चलेगा, तो उसका परिणाम आत्मघाती-विनाशकारी होगा। प्रकृति मात्र एक नियम, एक विधि-व्यवस्था का नाम है। वह किसी मनुहार से प्रसन्न होने वाली नहीं है, वह तो मात्र नियमन-कंट्रोल जानती है एवं उसके लिए कर्त्तव्यपरायणता-प्रकृति के साथ सामंजस्य, पारस्परिक सहकार की जीवन-साधना सबसे पहली शर्त है। आज हम प्रकृति की विभिन्न शक्तियों का संरचनात्मक नियोजन कर चाहे बाँध बनाकर, चाहे विभिन्न स्रोतों से उसका दोहन कर जनसाधारण जीवन को सुखी-समुन्नत बनाने का प्रयास कर रहे हैं। विगत डेढ़ सौ वर्षों का इतिहास विज्ञान की प्रगति का, प्रकृति के संसाधनों के दोहन व सुनियोजन का इतिहास है। किंतु जो भी इकॉलाजिकल अनुशासन प्रकृतिचक्र के विरुद्ध खड़ा होने की हिम्मत करेगा, वह उस महान् कर्मचक्र द्वारा निर्दयतापूर्वक कुचल दिया जाएगा, यह एक कड़ाई के साथ दी जा रही चेतावनी है, जो भगवान् के श्रीमुख से निकली है। मनुष्य जन्म मात्र भोगवादी जीवन, उपभोग प्रधान जीवन जीने के लिए नहीं है। जब तक हमारे कर्मों में यज्ञभावना का समावेश नहीं होगा, सहकारी कर्म के सार्वभौमिक सिद्धाँतों को हम महत्व नहीं देंगे, हमारा अस्तित्व खतरे में ही रहेगा। मानव सुख से धरती पर रह इसे स्वर्ग समान बना सके, इसी के लिए श्रीकृष्ण का यह शाश्वत संदेश इस श्लोक में मुखरित हुआ है।

आज के इस वैज्ञानिक युग में आश्चर्य भी होता है कि स्पष्ट सुनियोजित विधि-व्यवस्था बनाने के बाद भी मनुष्य को असफलता का मुँह देखना पड़ता है। अहंकेंद्रित इच्छाओं में टकराहट क्यों देखी जाती है। भवबंधनों से छुड़ाने वाले एक चिकित्सक के रूप में योगेश्वर कहते हैं कि मनुष्य की असफलता का कारण है उसका मात्र इंद्रियों में रमण करना।

“इंद्रियारामः” शब्द जो सोलहवें श्लोक में आया है, बड़ी खूबसूरती से यहाँ रखा गया है। इसका अर्थ होता है, एक तुच्छ कामातुर व्यक्ति, एक ऐसा असंयमी जिसके लिए मानो नरकीटक का, नरपशु का जीवन ही सब कुछ है। मानवी गरिमा के अनुरूप जीवन जीने की बात तो बहुत दूर है, वह सम्मानपूर्वक श्रेष्ठ जीवन भी नहीं जी पाता। विषय-वासनाओं से युक्त व्यक्ति पापमय जीवन ही बिताता है, ऐसा वासुदेव का मत है एवं ऐसा जीवन व्यर्थ का ही जीवन है, जिसे वह भोगते-भोगते किस तरह काटता है (मोघं पार्थ स जीवति) पूरा श्लोक सबको पुनः याद दिलाने के लिए इस प्रकार है-

एवं प्रवर्तित चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥

परमपूज्य गुरुदेव ने इसी श्लोक में उद्धृत तथ्यों ‘प्रज्ञा अभियान’ के संयुक्त विशेषाँक (नवंबर, दिसम्बर 1982) में बड़े स्पष्ट ढंग से लिखा है ‘नरपामर और नरमानव की विभाजन रेखा’ शीर्षक से एक लेख में। इसमें पूज्यवर लिखते हैं, “नरपामर और नरमानव की विभाजन रेखा” शीर्षक एक लेख में। इसमें पूज्यवर लिखते हैं, “नरपामर का अर्थ है, पशुवृत्तियों में निरत पेट-प्रजनन की सीमा में सीमाबद्ध स्वार्थांधता। नरमानव का अर्थ है, वह व्यक्ति जिसे पारिवारिकता और सामाजिकता के साथ जुड़े हुए अनुबंधों के प्रति विश्वास और परिपालन का सहास है।” (पृष्ठ 4), आगे वे पृष्ठ 12 पर इसी अंक में लिखते हैं।, “प्रकृति से तो नरपामर, नरवानर, नरमानव, नरपिशाच और नरनारायण सभी के अंग-अवयव एक जैसे होते हैं, किंतु अंतर एक ही समझ में आता है, जब उनकी प्रकृति की जाँच की जाती है। “

उपर्युक्त दो उद्धरणों में मानवी-गरिमा का हवाला देकर वही बात कही गई है, जो सोलहवें श्लोक के उत्तरार्द्ध में भगवान् ने समझाई है। वे लिखते हैं, “मानव गरिमा का क्षेत्र असाधारण महत्व का है। उसे अपनाने वाले स्वयं जलयान की तरह उफनती नदी को चीरते हुए उस पर जा पहुँचते हैं। इतना ही नहीं, वे असंख्यों को अपने ऊपर लादकर पार करने में भी समर्थ हुए है। नरपशुओं के भाग्य में यह सौभाग्य कहाँ “कितना सटीक विवेचन है। मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह स्रष्टा के बनाए नियमों के अनुरूप संयमशील-कर्मनिष्ठ जीवन जिए, यज्ञमय उसके कर्म हों, न उसके कृत्य से किसी को चोट पहुँचे, ने वह अपना ही अहित करें। मानव-देह धारण कर स्वच्छंद कामवासना का पाशविक जीवन जीना हमारे घोर पन का सूचक। मानव-समुदाय की महानता पर एक कलंक है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा मानव व्यर्थ ही जीवन जीता है। धरती पर भारभूत होकर रहता है। अगला श्लोक और भी महत्व लिए हुए कहा गया है।

यस्त्वारतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्य न विद्यते॥

अर्थात् “ जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करता है और आत्मा में ही तृप्त रहता है तथा आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उसके लिए तो करने को कोई भी कर्त्तव्य शेष नहीं है।”

यहाँ श्रीकृष्ण एक अपवाद की बात कहते हैं एवं अर्जुन को बताते हैं कि कर्म के इस विधान में छूट एक ही शर्त पर मिल सकती है। यह वह छूट है जिसमें मनुष्य बड़ी उच्चस्थिति में जाकर संपादन करने योग्य कर्म अपने लिए शेष नहीं रखता। जहाँ वे कहते हैं कि कर्म सभी को करने ही पड़ेंगे, कर्म से कोई बच नहीं सकता, वहाँ यह भी बताते हैं इस अपवाद भरी स्थिति में वह व्यक्ति जो आत्मज्ञानी स्तर का है, विषय-वासनाओं के पतन शीघ्र लाने वाले जीवन से ऊपर उठ गया है और अपने अंदर विराजमान् चैतन्य भावातीत परमात्मा की सत्ता के प्रति जाग्रत् हो चुका है, उसी में वास करता रहता है, उसी की अनुभूतियों में सतत् रमण करता है, उसके लिए सचमुच कोई भी कर्त्तव्य शेष नहीं है। यह वह व्यक्ति है जिसे जागृतात्मा-देवमानव-देवपुरुष की संज्ञा दी जा सकती है।

यह कोई आसानी से उपलब्ध होने वाली सिद्धि नहीं है, यह भलीभाँति समझ लिया जाना चाहिए। नैष्कर्म्य की सिद्धी अनायास ही नहीं मिल जाती। आत्मा में आत्म रूप से ही स्थित जाग्रत-महामानव किसी साँसारिक कर्त्तव्य से नहीं बँधता, यह बात इस श्लोक में वासुदेव भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने शिष्य को भलीभाँति समझाई है। क्रमशः उच्चतर सीढ़ी चढ़ाते हुए भगवान् अपने शिष्य के माध्यम से हम सबको अपने अहंकार को मार ऊपर उठना सिखा रहे हैं। पहले अहं भावनाएँ यह दावा कराती थीं कि कर्म हमारे हैं, वासनाओं के वशीभूत हम कर्म करते थे, किंतु अब सिद्धी ऊँचे स्तर पर हमें चैतन्य ब्रह्म के साक्षात्कार की स्थिति तक ले आई है। अब अहंकार मर गया, तो कर्म हमारे नहीं रहे, प्रकृति के, यज्ञ की अधीश्वर सत्ता के हो गए। ऐसी स्थिति में हम मुक्त पुरुष बन जाते हैं, केवल अकर्म में ही नहीं, कर्म में भी। परंतु इसे स्पष्टतः समझे बिना आगे बढ़ना गीता भावोपदेश के साथ अन्याय करना होगा। इसके लिए अगले दो श्लोक व उनका अर्थ भी पहले पढ़ लें तो ठीक रहेगा।

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन। न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥

तस्मादसक्त सततं कार्य कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरर्न्कम परमाप्नोति पूरुषः॥

अर्थात् “ऐसे महापुरुषों का (आत्मा में रमण करने वाले, तृप्त रहने वाले संतुष्ट व्यक्ति का, जिसका वर्णन सत्रहवें श्लोक में किया गया) इस विराट् विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है अर्थात् उसे कुछ प्राप्त करना नहीं होता, न वह अपेक्षा रखता है तथा कर्म न करने से भी उसकी कोई हानि नहीं होती, वह घाटे में नहीं रहता। न ही ऐसा जाग्रत् महापुरुष किसी वस्तु के लिए स्वार्थ रूप में उस पर आश्रित है। (3/18)। इसलिए हे अर्जुन! तुझे अपने सभी कर्मों का संपादन बिना किसी आसक्ति के करना चाहिए, क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करने वाला मनुष्य ही परम पद को, परमात्मा को प्राप्त होता है।” (3/11)

फिर पूर्व के श्लोक पर चलकर इन दोनों श्लोकों के गूढ़ अर्थों को समझने का प्रयास करें, तो ठीक रहेगा। श्रीकृष्ण कहते हैं, “आत्मतृप्तश्च मानवः” जो आत्मा में ही तृप्ति की अनुभूति कर लेता है, उसकी विषय प्रधान भौतिक जगत् में किसी प्रकार की कामना शेष नहीं रह जाती। वह तो जाग उठा है, उसकी विषय प्रधान भौतिक जगत् में किसी प्रकार की कामना शेष नहीं रह जाती । वह तो जाग उठा है, जागृतात्मा है, उसे अब स्वप्न पदार्थों की लालसा नहीं सताती। सांसारिक भोग्य पदार्थ की कामनाएँ उसे अब व्यथित नहीं करतीं। इस प्रकार आत्मरतिरेव, आत्मतृप्तश्च, आत्मन्येवयसंतुष्टः ऐसे महापुरुष के लिए कोई भी कार्य ऐसा नहीं है, जो उसके लिए कर्त्तव्य शेष है, ऐसा कहा जा सके। इतनी घोषणा करने के बाद येगाचार्य सद्गुरु श्रीकृष्ण अपने शंकालुचि वाले शिष्य अर्जुन की भ्राँयों को जो जन्म लेने वाली है, निर्मूल करते हुए तुरंत कहते हैं, कहते ही नहीं, उसके न पूछे गए प्रश्न का उत्तर भी अनायास ही दे देते हैं, वह (महापुरुष) जानता है कि कुछ प्राप्त करने की कामनाएँ या कर्म न करने से होने वाली हानि से बचने की कामनाएँ ही हमें कर्मों की ओर प्रेरित करती हैं। आत्मा में ही संतुष्ट रहने वाले व्यक्ति को जो तृप्ति प्राप्त होती है, उसके कारण उसे कर्म द्वारा न तो कुछ प्राप्त करना ही शेष रह जाता है, नहीं कुछ खोना ही। (नैव तस्य कृतेनार्थ-नाकृतेनेह कश्चन)

हम सभी समाज में जीते हैं। हमारे सभी कर्मों के पीछे किसी-न-किसी की सहायता भी एक भूमिका रखती है। ऐसे में हम जो इन झूठे संबंधों को साथ लेकर जी रहे है, कई अतिरिक्त कर्त्तव्यों से जुड़ जाते हैं। किंतु जाग्रत् स्तर पर पहुँची आत्मा अपने अंदर की पूर्णता से तृप्त होकर किसी भी व्यक्ति पर, किसी भी पदार्थ के लिए स्वार्थ रूप में आश्रित नहीं होती। ऐसे ज्ञानी बड़े दुर्लभ होते हैं, परंतु यह सिद्धि इतनी विलक्षण है कि इसके बाद उसके हर कर्म भगवत् कर्म बन जाते हैं।

अर्जुन संभवतः इस उच्चस्तरीय दर्शन को न समझा सका हो, इसलिए भगवान् कहते हैं। कि कर्त्तव्य -कर्म तो सभी को करना चाहिए, पर बिना किसी आसक्ति-भाव के। अहंकार भाव की स्थिति में बैठे हम सभी अर्जुनों को अपने लिए एि जाने योग्य कर्मों को करने की रीति-नीति भगवान् बता रहे है, बिना फल की कामना के, बिना किसी प्रकार की आसक्ति के। (तस्माद् असक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर)।

ये कर्त्तव्य-कर्म क्या है जीवनचर्या के साथ दैनंदिन किए जाने वाले कर्म तथा विशिष्ट दायित्व आने पर विशेष अवसरों पर युगधर्म की पुकार पर किए जान वाले कर्म। आसक्तिरहित होने का अर्थ है, अपना अहंकार और अहंकेंद्रित कामनाओं दोनों को ही मूलतः समाप्त कर देना। इस तरह की जीवन जीने की शैली सीखते ही मानवी मन में संव्याप्त वासनाएँ समाप्त हो जाती है, हृदय शाँति व आनंद से भर जाता है इस शाँत मन में ही वह परमात्मसत्ता के दर्शन कर पाता है। क्या आसक्तिरहित होकर मात्र लोककल्याण के भाव से कर्म कर पाना संभव है परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी इसका उत्तर देती है। वे लिखते हैं, “साधु-ब्राह्मणों देव समुदाय से पूछना पड़ेगा कि वे व्यक्ति सुविधाओं में कटौती करके सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन की सेवा-साधना के लिए क्यों अपने को समर्पित करते हैं ऋषिगण भी विलासियों की रह साधन-सामग्री उपार्जित कर सके थे। फिर क्यों उन्होंने गरीबों जैसा बाना पहना इसका उत्तर भी उस समाधान के साथ जुड़ा हुआ है, जिसमें दबाने की तुलना में खिलाने के जायके को अत्यधिक स्वादिष्ट पाया जाता है। “ नाचते हुए शब्दों की तरह लिखा उपर्युक्त कथन भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है।

स्वार्थ के लिए हमारे कर्म न हों, परमार्थ के लिए समर्पित हमारे कर्म हों। आसक्तिरहित होकर कर्म करने से व्यक्ति परमपद प्राप्त करता है। असक्तः ह्माचरर्न्कम परमाप्नोति पूरुषः) इस कथन को योगेश्वर श्रीकृष्ण अगले श्लोक में उद्धृत कर उदाहरण के साथ सिद्ध भी करते हैं।

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। लोकसड्ग्रहमेवापि सम्पश्यर्न्कतुमहंसि॥ (3/20)

अर्थात् “जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्तिरहित कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे। अतः लोकसंग्रह (लोकशिक्षण-मार्गदर्शन) को देखते हुए भी तुझे कर्म करना चाहिए।”

जनक राजा होते हुए भी विदेह कहलाते थे। उन्हें किसी लौकिक पदार्थ से कोई आसक्ति नहीं थी। ऐसे ही ज्ञानीजनों ने सदैव परम सिद्धि प्राप्त की है। ऐसे ही व्यक्ति अपने आचरण से लोकशिक्षण कर पाते हैं, जन-जन को मार्गदर्शन दे पाते हैं। निष्कर्म भगवान् के लिए किया गया कर्म है। यह कैसे किया जाता है, इसके लिए भगवान् को जनक से श्रेष्ठ कोई उदाहरण मिल भी कैसे सकता था। वही उन्होंने दिया है। जनक उत्कृष्ट कोटि के साधक भी थे, जिज्ञासु भी व मिथिला देश के राजा भी। अपने निर्वाह के लिए खेती करके अन्न उपजाते थे। राज्य का एक पैसा भी नहीं लेते थे। उनके दो गुरु थे। एक थे अष्टावक्र और दूसरे याज्ञवल्क्य। अष्टावक्र ज्ञानी थे एवं याज्ञवल्क्य योगी। अष्टावक्र गीता में उनके व जनक बीच संवाद की चर्चा आती है। एक बार मिथिला में सत्संग का आयोजन हुआ। अधिष्ठा थे महर्षि व्यास। सभी ज्ञानी-तपस्वी आए थे। प्रवचन दिए जा रहे थे। देह-माया-वेदाँत-परब्रह्म सभी विषयों पर तर्क सम्मत उक्तियों के साथ चर्चाएँ हो रही थीं। इस बीच महर्षि व्यास ने उठकर कहा कि बिना जनक के सभी फीकी है। उनके आने बाद ही अगला सत्र करेंगे। सभी ज्ञानी ऋषि-मुनियों को लगा कि एक साधारण राजा जनक के लिए व्यास जी सत्र क्यों रोक रहे हैं। एक सामान्य गृहस्थ राजा के लिए ऋषिगण क्यों रुकें। वे व्यास जी से जूझ पड़े। कहने लगे, आप हममें व राजा में अंतर नहीं समझते। महर्षि धैर्य रखते हुए बोले, ऋषिगणों! जनक को आने दीजिए। उनके आचरण से आपको पता लग जाएगा कि क्यों हमने उन्हें विशिष्ट माना है।

जनक आए। चूंकि देरी से आए थे, सब से क्षमा माँगी। जैसे ही वह आकर बैठे, महर्षि व्यास ने योगबल से चारों ओर अग्नि प्रज्वलित कर दी। चारों तरफ आग देखकर ऋषिगण दौड़े, किसी के कोपीन-अंगवस्त्र आदि सूख रहे थे, उन्हें बचाने भागे। व्यास ऋषि बोले, भाई! आप सब दौड़ क्यों रहे हैं। वह शरीर तो एक दिन समाप्त होना ही है, आत्मा कभी मरती नहीं और हम अभी आत्मज्ञान की बातें कर रहे थे। आप सब इन लौकिक पदार्थों के लिए, अपनी शरीर रक्षा के लिए क्योंकर दौड़ रहे हैं। ऋषिगणों ने देखा कि जनक नहीं दौड़े, अपने स्थान से नहीं हटे। महर्षि व्यास ने कहा कि आप जनक की बात सुन ले एक क्षण रुककर। आपको समाधान मिल जाएगा। जनक ने कहा-”मिथिलायाँ प्रदीप्तियाँ न में दहयति किंचन “ मिथिला जल रही है, मैं नहीं जल रहा हूँ। सारे मिथिला में आग लग जाए, तो भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा। राजकाज की व्यवस्था मैं करके आया हूँ। सारे मिथिला में आग लग जाए, तो भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। राजकाज की व्यवस्था मैं करके आया हूँ। काम कोई न कोई करता ही रहेगा। भगवान् ने आग लगाई है, वह मात्र शरीर को ही तो कष्ट देगी। भगवान् देखेगा कि मुझे क्या करना है। योगबल से लगी आग बुझ गई। सभी ऋषि जान गए कि जनक विदेह क्यों कहे जाते हैं, विशिष्ट क्यों है। अनासक्त कर्मयोग का एक सर्वश्रेष्ठ उदाहरण अपने शिष्य के सम्मुख भगवान् ने प्रस्तुत किया है।

बिना आसक्ति के प्रभु की पूजा मानकर हम सभी अपने कार्यों को संपादित करें जैसे जनक करते थे, वह आदेश ईश्वर का है। जनकादयः में उन्होंने जनक जैसे कई औरों का भी संकेत किया है यथा प्रहलाद, अंबरीश, इक्ष्वाँक, अश्वपति आदि। जनक को मॉडल मानकर उनका नाम मात्र ले लिया है। यह महर्षि वेदव्यास के काव्य की पराकाष्ठा का प्रतीक है कि वे किस तरह श्रेष्ठजनों के उदाहरणों से जन-जन को शिक्षण पहुँचाना चाह रहे हैं। अर्जुन युद्ध करे या न करे, भगवान् उससे कह रहे है। कि उसे लोकसंग्रह के लिए लोक-शिक्षण के लिए, अपने लिए निर्धारित मानवी गरिमा के अनुरूप, युगधर्म निमित्त तय कर्मों को संपादित करना चाहिए। समाज का पिछड़ा तबका मार्गदर्शन ऐसे लोकनायकों से ही पाता है। समाज का शिक्षित प्रबुद्ध प्रतिभावान् तबका यदि कर्त्तव्यपथ से हट जाएगा, तो समाज का क्या होगा। “लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन” लोक-शिक्षण के लिए युगानुकूल समस्याओं को हल करने के लिए जीवन जीने की कला का शिक्षण देने के लिए सुलझे हुए व्यक्तित्व वाले महामानवों की आवश्यकता है। धरती पर जीने जो भी आया है, उसे कर्म करना ही होगा, कर्मों की सुगंधि फैलानी होगी एवं शिक्षण हेतु जीना होगा। ऐसे व्यक्तियों के व्यक्तिगत कर्म भी समाज पर एक अमिट प्रभाव छोड़ते हैं। इसलिए वे अर्जुन के माध्यम से सभी जागृतात्माओं को एक उद्बोधन दे रहे हैं, वे लोकहित के लिए निरंतर तपते रहे, कर्म करते रहे। अर्जुन असमंजस में भी है कि मेरे व्यक्तिगत कर्मों का और लोगों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। मैं क्या करा हूँ इससे लोक को क्या मतलब एवं लोक क्या करता है, उससे मुझे क्या मतलब यहाँ भगवान् अंतर करना चाह रहे हैं, अर्जुन जैसी विभूति में तथा अन्य अनेकानेक शिश्नोदर परायण जीवन जीने वालों में। वे बाना चाह रहे है उसी भूमिका विशिष्ट हैं। जैसा आचरण श्रेष्ठजनों का-जागृतात्माओं का होता है, वैसा ही अनुसरण करता हुआ समाज ढलता चला जाता है।

परमपूज्य गुरुदेव कहते थे कि श्रेष्ठ आत्माएँ, सद्गुरु, अवतार वास्तव में लोकशिक्षण के लिए ही, डिमाँस्ट्रेशन देने के लिए ही आते हैं। युगानुकूल समस्याओं का वे स्वयं जीवन में जीते हुए समाधान सबके लिए प्रस्तुत करते हैं। इसी बात को परमपूज्य गुरुदेव अपनी लेखनी से प्रज्ञा-अभियान के अक्टूबर-नवंबर 1981 के अंक में इस रह लिखते हैं, “इन दिनों सबसे बड़ी कठिनाई एक ही है, जीवन के अंतरंग-बहिरंग क्षेत्रों में आदर्शों को ओतप्रोत किए हुए व्यक्तित्वों का उदाहरण भरा मार्गदर्शन। उपदेशकों की धूम है। अखबारों में नाम छपने, लोकसेवी के रूप में क्ष्याति मिलने पर व्यापार पनपाने जैसे कितने ही प्रत्यक्ष लाभ दिखाई देते हैं, जिनका लोभ संवरण करते नहीं बनता। ऐसे विषय समय में जागरुकों का अग्रगमन समय की सबसे बड़ी, सबसे प्रमुख आवश्यकता है। इसकी पूर्ति के लिए प्राणवान् प्रज्ञापरिजनों को ही अपना उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। वे जागेंगे, तो अन्य भी जागेंगे।” (पृष्ठ 24)। इस उद्धरण से लोकसंग्रह वाले परमसत्ता के उपदेश को समझा जा सकता है। इसी से संबंधित और भी विस्तार से चर्चा आगे के इक्कीसवें श्लोक के साथ अगले अंक में।


गुरुकथामृत-13 - उँगली पकड़कर मार्ग दिखाती है उनकी लेखनी

विभूतियाँ, उन उच्चस्तरीय प्रतिभाओं के रूप में वर्णित की गई हैं, जो समय-समय पर समाज में उभरी रही है। एवं युगानुकूल अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करती रही हैं। इसमें हमारी संस्कृति की गुरु-शिष्य परंपरा ने एक बहुत बड़ा योगदान दिया है। आदाल से चली आ रही इस परंपरा ने दैवी मार्गदर्शन के माध्यम से अनेकानेक प्रतिभावानों को निखारा है। स्वयं अपने बलबूते मनुष्य कितना ही पराक्रम कर ले, जब तक परमसत्ता का बल उसके साथ नहीं जुड़ता, तब तक वस्तुतः वह आत्मिक प्रगति के उच्चतम सोपानों पर नहीं चढ़ सकता। लौकिक जीवन में आने वाले व्यवधान भी कुछ ऐसे होते हैं कि वे समय-समय पर परीक्षा लेते रहते हैं एवं सुपात्रों को भी कड़ी परीक्षा से गुजरने पर मजबूर कर देते हैं। ऐसे में सद्गुरु जो भगवत्सत्ता की सीधी नियुक्ति के रूप में मानव मात्र के कल्याण के निमित्त अवतरित होते हैं, भवसागर से पार कराने की महती भूमिका निभाते हैं।

गायत्री परिवार उच्चस्तरीय प्रतिभाओं का, विभूतियों का भाँडागार है। आज नवयुग का स्वप्न इसके बलबूते साकार होते देखा जा सकता है। अगर कहीं आशा की किरणें दिखाई देती हैं, तो जन-जन के मन में आकाँक्षा जगाने का यह कार्य गायत्री परिवार के वैविध्यपूर्ण क्रियाकलापों के माध्यम से होता दिखाई देता है। इतने बड़े परिवार का निर्माण हमारी गुरुसत्ता न कितने यत्न से, किस आत्मीयता के साथ गुँथकर, कितने विलक्षण स्र के पुरुषार्थ द्वारा किया होगा, इसे उनके अस्सी वर्श के ब्रह्मकमल के रूप में जिए गए जीवन रूपी पुरुषार्थ माध्यम से देखा व समझा जा सकता है।

लीलावतारों-भगवद् पार्षदों के जीवन के वृत्तांत से ही यह झलक मिलती है कि कैसे उन्होंने औरों के जीवन को सँवारा। परमपूज्य गुरुदेव पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य श्री एक युगऋषि के स्तर की सत्ता के रूप में अवतरित हुए हम सबके कल्याण के लिए, इसके लिए उनकी लेखनी से प्राप्त लोकशिक्षण को हम प्रमाण रूप में देख सकते हैं। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका उनकी प्राणचेतना की संवाहक के रूप में जन-जन का मार्गदर्शन करती आज 63 वें वर्ष की अपनी यात्रा पूरी कर रही है, तो साथ ही भावप्रवण भाषा में उनके हाथ से लिखे पत्र भी आज हमारा उतना ही शिक्षण करते हैं। इस पत्रिका में समय-समय पर पाठकों को परमपूज्य गुरुदेव द्वारा अपने शिष्यों को दिए गए मार्गदर्शन की झलक हम पत्रों के माध्यम से देते रहे हैं। इस अंक में भी कुछ ऐसी ही भव संवेदना को लेखनी में उड़ेलकर लिखी गई चुनी हुई कुछ पत्तियां प्रस्तुत की जा रही हैं, जो किसी भी साधक-लोकसेवी का उतना ही हित करेंगी, जितना की तत्कालीन समय पर किसी साधक विशेष का उनके द्वारा संपादित हुआ था।

सबसे बड़ा कार्य है, साधक के मनोबल को उछाल देना, ऐसी स्थिति में पहुँचा देना, जहाँ से वह अपने जीवन-लक्ष्य को निर्धारित कर सकें ऐसे ही एक पत्र में परमपूज्य गुरुदेव श्री हर्ष नारायण सिंह (मुँबई) को एक पत्र में लिखे हैं-

हमारे आत्मस्वरूप,10/2/58

पत्र मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। आपकी आत्मा अपने लक्ष्य की आरे तेजी से बढ़ रही है। पूर्वजन्मों में आपने जो तपस्या छोड़ी थी, उसका शेष भाग अब पूरा हो रहा है। जो अचेतन अवस्था आपको प्राप्त होती है, वह समाधि का पूर्व रूप है। इसे आप रोकें नहीं, इससे डरें भी नहीं। हजारों वर्षों तक साधना करने के बाद यह स्थिति योगियों की आती है। थोड़े ही दिनाँक में आप पूर्ण समाधि-सुख प्राप्त करेंगे। आपकी साधना को पूर्ण बनाने के लिए हम यहाँ से शक्ति प्रेरित करते रहते हैं। आपका यह जन्म अंतिम हो, इसी में पूर्णता प्राप्त करें, ऐसा प्रयत्न हम कर रहे हैं।

परमपूज्य गुरुदेव साधक श्री हर्ष नारायण की मनःस्थिति-आत्मिक प्रगति की स्थिति से भलीभाँति अवगत हैं। इसी कारण एक प्रत्यक्ष मार्गदर्शन देते हैं कि कभी-कभी जो अचेतन अवस्था में वे चले जाते हैं, वह उच्चस्तरीय सोपान समाधि पूर्वार्द्ध है। कही यहीं पर वे रुक न जाएँ, यह न मान बैठें कि यही सर्वोच्च उपलब्धि है, सिद्धि है, पूज्यवर लिखते हैं कि न इस स्थिति से डरें, न स्वयं को रोकें। यह स्वयं उनकी उपार्जित तप-साधना नहीं, न स्वयं को रोकें। यह स्वयं उनकी उपार्जित तप-साधना नहीं, गुरुप्रसाद हैं, पूज्यवर लिखते हैं कि न इस स्थिति से डरें, न स्वयं को रोकें। यह स्वयं उनकी उपार्जित तप-साधना नहीं, गुरुप्रसाद हैं, इसे वे अगली पंक्ति में स्पष्ट करते हैं, जब लिखते हैं कि आपकी साधना पूर्णावस्था में पहुँचे, इसके लिए सारी शक्ति जिस एक केंद्र से प्रवाहित हो रही है, उसके उत्पादक-नियंता वे स्वयं हैं। हम यदि इस पत्र को एक-एक पंक्ति एक-एक शब्द को अपने लिए भी मार्गदर्शन मानकर चलें, तो ऐसे ही उच्चस्तरीय ध्यान-धारणा की उपलब्धियों के आनंददायी सुख हम भी प्राप्त कर सकते हैं। संभवतः इन शब्दों का ही चमत्कार था कि अनेक साधक अपनी जीवन-साधना को प्रखरतम बना सके।

श्री सिंह को यह भ्राँति थी कि मात्र यज्ञोपवीत पहनकर ही गायत्री उपासना की जा सकती है। उन्होंने पत्र में पूछा भी, तो इसी पत्र में आगे पूज्यवर ने लिखा, “जनेऊ गायत्री माता की सूत से बनी मूर्ति मात्र है। मूर्ति के सामने पूजा-उपासना करना सर्वोत्तम है, इसी प्रकार जनेऊ पहनकर गायत्री उपासना श्रेष्ठ है। पर यदि मूर्ति न हो तो भी पूजा की जा सकती है। मूर्ति न हो तो पूजा भी न करें, यह कोई तर्क नहीं। इसी प्रकार जनेऊ पहनना संभव न हो तो गायत्री को छोड़ने की जरूरत नहीं है। ‘

कितना स्पष्ट व व्यावहारिक मार्गदर्शन है। भलीभाँति साधक की मनः स्थिति समझी जा सकती है, किंतु विशिष्ट स्तर की, विश्वामित्र स्तर की सत्ता का मार्गदर्शन मिलते ही सारी राह सुगम हो जाती है।

परमपूज्य गुरुदेव की एक शिष्य रही है, धामपुर बिजनौर की श्रीमती काँती त्यागी। काफी पुराने 1152 में पूर्व तक के लिखे पत्र हमें देखने को मिले हैं। ‘युगद्रष्टा का जीवनदर्शन’ वाङ्मय खंड 1 में हमने उद्धृत भी किए हैं। जिस श्रेष्ठ स्तर की वे साधिका थीं, उसी स्तर का मार्गदर्शन उन्हें मिलता था। उन्हें उत्साह भी बहुत था, कुछ करने की उमंग भी थी कि अधिक-से-अधिक व्यक्ति इस अभियान में जुड़े। पूज्यवर 27-8-56 को लिखे इस पत्र में लिखते हैं।

“तुमने इतने अधिक व्यक्तियों को गायत्री उपासना में लगाकर एक भारी आध्यात्मिक साधना की है। तुम जो साधारण अपनी उपासना करती हो, उसे करती रहो। अब आगे की विशेष, अत्यंत महत्वपूर्ण और सब साधनाओं से अधिक श्रेयस्कर तपस्या यह करो कि जो गायत्री परिवार तुमने वहाँ बना लिया है, उसका मार्गदर्शन, संगठन, प्रेरणा एवं प्रकाश देने के लिए अबकी अपेक्षा और भी अधिक समय लगाना। यह तपस्या किसी भी बड़े योगाभ्यास से कम नहीं है। अभी तुम्हारे गायत्री परिवार में 65 सदस्य हैं, यह बढ़कर 108 होने चाहिए। इनकी सामूहिक उपासना, सामूहिक यज्ञ, सामूहिक प्रार्थना समय-समय पर होती रहे, तो यह एक बहुत बड़ा काम है।”

व्यक्तिगत साधनों जीवन-साधना से आगे बढ़ाकर सामूहिकता की साधना एवं अंतः आराधना बना लेने का इससे उत्तम स्तर का प्रशिक्षण और क्या हो सका है। संभवतः पाठकों को अब समझने में कठिनाई नहीं होगी कि कैसे कुछ गायत्री साधकों से आरंभ हुआ यह परिवार क्रमशः बढ़कर एक विराट् संगठन का विस्तार पाता चला गया।

एक बार काँती बहन को किसी स्वामी जी के स्त्रियों द्वारा गायत्री साधना संबंधी भ्राँति फैलाने पर क्षोभ हुआ, तो उन्होंने पत्र लिखकर समाधान चाहा। उतर तुरंत पहुँचा। 3-11-56 को लिखे इस पत्र में वे लिखते हैं।-

दंडी स्वामी न व्यर्थ ही लोगों में मतिभ्रम पैदा किया है। तुमने हमारी पुस्तक ‘ स्त्रियों का गायत्री अधिकार’ पढ़ी होगी । न पढ़ी हो ता फिर भेज रहे हैं। यह लोगों ऐसे ही ऊटपटाँग बातें करते रहते हैं। साधुवेश में इन्हें धर्मद्वेषी ही कहना चाहिएं तुम अपने मार्ग पर चलनी रहना। जो ओर कोई उपासना करें, उन्हें कराना, जो छोड़ दें, उनकी इच्छा। “

ठीक ही लिखा है कि सभी गायत्री साधना करने लगें, सभी हमारी मान ले, अनिवार्य नहीं । बरस- शास्त्रार्थ में न उलझकर जो सुनें ,उन्हें सुनाएँ। नहीं तो अपनी साधना नियमित करती रहें ।

ऐसे ही एक अज्ञात साधक को 19-4-59 को लिखा पत्र हम सबके लिए प्रेरणादायी है। यह पत्र हमारी एक आध्यात्मिक जिज्ञासा का जवाब देता है, वह है ध्यान-जप के दौरान होने वाली अनुभूतियाँ। कभी लगता है कि क्या वे सही है ? यदि है, तो किस की सूचक है। पत्र पूज्यवर को लिखा तो उतर मिला।

“आत्मज्योति का दर्शन इस बात का चिह्न है कि कि आपकी साधना सफलतापूर्वक आगे चल रही हैं । इसे आप माता का दर्शन ही समझे । मूर्ति के रूप में दर्शन होना सबके लिए आवश्यक नहीं किसी को प्रतिभा के रूप में दर्शन होता है। आपको प्रकाश रूप में जो साक्षत्कार हो रहा है, उसे माता का पूर्ण साक्षत्कार मानें । आपकी साधना सब प्रकार सफल है। उसकी प्रगति एवं सफलता में किसी प्रकार का संदेह न किया करें ।”

इसी तरह एक और साधक को लिखा एक पत्र दृष्टव्य है, जो हमारा साधना संबंधी मार्गदर्शन भी करता है, अध्यात्मपरक लोकशिक्षण पर गुरुसत्ता की लेखनी का द्योतक भी है। 11-8-52 को लिखे पत्र में वे लिखते हैं।

“इस युग में धर्ममार्ग में इतनी प्रवृत्ति होना पूर्व संचित शुभ संस्कारों का फल अथवा ईश्वर की महती कृपा का चिह्न ही समझ जा सकता है। आप जितना आत्मकल्याण के लिए प्रयत्न करते हैं। करोड़ों लोग उतना भी नहीं करते । आप श्रद्धापूर्वक अपनी साधना चालू रखें । “

आग वे लिखते हैं,

“आप लोगों ने हमें अपना गुरु माना है। हम इस योग्य तो नहीं है। पर आपकी श्रद्धा के अनुरूप आप पति-पत्नी का पथ-प्रदर्शन सच्चे हृदय से करते रहेंगे और आप लोगों की आत्मिक उन्नति के लिए जो कुछ भी सहयोग एवं सेवा बना पड़ेगी , वह करते रहने के उत्तरदायित्व को निबाहने के लिए पूरा पूरा प्रयत्न करेंगे। “

उपर्युक्त पत्रों के माध्यम से हम दर्शन करते हैं एक उच्चस्तरीय मार्गदर्शक सत्ता का, जो अति विनम्र है, श्रेष्ठ साधक, पथप्रदर्शक है तथा स्नेह से अभिपूरित है। हम सभी कितने सौभाग्यशाली हैं, जो उन्हें जीवन की डोर थमा सके व उनके बताए मार्गदर्शन पर चल सके।


अखण्ड ज्योति एवं परमपूज्य गुरुदेव (2)

‘अखण्ड ज्योति’ का प्रकाशन ठीक वसंतपर्व के दिन से ही हुआ था। यों दिखने में वह भी एक साहित्यिक प्रयास जैसा लगता है, पर जिन्होंने उसे निकट से देखा है, वे जानते हैं कि यह प्रकाशपुँज है, जिसने एक दीपक से असंख्य दीपक जलने वाले काव्यालंकार को प्रत्यक्ष कर दिखाया है। आत्मा को, अखण्ड ज्योति का दिव्यदर्शन, प्रत्याहार, ध्यान-धारणा, समाधि के क्षेत्र के आगे बढ़ाकर व्यवहार के कार्यक्षेत्र में उतारा जा सकता है। इस अनोखेपन का अभिनव प्रयोग करने का दुस्साहस किया गया और वह सफल होकर रहा, यही है एक शब्द में कहा जा सकने योग्य ‘अखण्ड ज्योति’ का इतिहास। युगाँतरीय चेतना की गंगोत्री उसे माना जा सकता है, उसका सेवा-साधना क्षेत्र युगनिर्माण योजना के रूप में आज अति विस्तृत क्षेत्र में लहलहाता हुआ देखा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति दिसंबर 75, पृष्ठ 62

‘अखण्ड ज्योति’ लगती भर पत्रिका है, वस्तुतः यह एक मिशन है, जो किसी वर्ग, क्षेत्र, धर्म की समिति परिधि में नहीं बँधता और न छुटपुट सामयिक हलचलों तक सीमित होता है। फुँसियों पर मरहम-पट्टी करने की औपचारिकता स्वीकार करते हुए भी उसका लक्ष्य रक्तशोधन प्रक्रिया है। इसके लिए टिटहरी द्वारा समुद्र पाटे जाने वाले दुस्साहस की पुनरावृत्ति करने वाली विनम्र हलचल को अखण्ड ज्योति कहा जा सकता है। आज उसका बाजारू मूल्य थोड़ा ही आँका जा सकता है, पर वस्तुतः है वह अत्यंत गरिमायुक्त एवं बहुमूल्य।

अखण्ड ज्योति दिसंबर 75, पृष्ठ 62

अपना आध्यात्मिक परिवार ही अखण्ड ज्योति के सदस्यों के रूप में बिखरा पड़ा है। कुछ समय पूर्व तक हम लोग परस्पर बिखरे हुए एक-दूसरे से अपरिचित थे। जिस सूत्र से यह मणिमाला के दाने परस्पर इतनी सघनतापूर्वक गुँथ गए उसे ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका कहा जा सकता है। अखण्ड ज्योति क्या है वसंत पर्व की एक स्फुरणा। प्रकाराँतर में हम लोगों के निताँत दूरवर्ती और अपरिचित होते हुए भी एक-दूसरे के अधिकतम निकट शब्दों में सघन आत्मीय बना देने का श्रेय इस स्फुरणा को ही है, जो वसंतपर्व के उपहार के स्वरूप उमगी और जिसके बंधनों में बँधकर हम एक कारवाँ के रूप में किसी महान् लक्ष्य की ओर कंधे-से-कंधा मिलाकर चल पड़े।

अखण्ड ज्योति दिसंबर 77, पृष्ठ 54

अखण्ड ज्योति मनोरंजन के लिए चित्र-विचित्र लेखों का गुलदस्ता बनाकर पाठकों का मन बहलाने वाली पत्रिका नहीं है। इसके पीछे एक उच्चस्तरीय लक्ष्य है। वह है-लोकचिंतन में उत्कृष्टता का समावेश एवं चिंतन-चरित्र और व्यवहार के बहुमुखी पक्षों में आदर्शवादिता का प्रवेश। यह कार्य अत्यंत कठिन है। अंतराल का कायाकल्प करने एवं सर्जरी के समान है। इसमें भावनाओं, मान्यताओं, संवेदनाओं, आकाँक्षाओं के अनेकानेक पक्षों-स्तरों में जनचेतना का संचार एवं इसी हेतु इसमें कितने ही तर्कों, तथ्यों, प्रमाणों और उदाहरणों का समावेश करना होता है। इस संग्रह के लिए मनन और अध्ययन-अवगाहन के मानसरोवर में उतरे हंसों की तरह मोती बीनने पड़ते हैं। हंस तो अपना-अपना ही पेट भरते हैं, पर यहाँ उससे बढ़-चढ़कर काम करना होता है। यह मणिमुक्तक वितरण करने जैसी प्रक्रिया है, जिससे अनेकों को सुसज्जित, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाया जा सके। यही वह प्रयत्न है, जिसमें राजहंस की तरह अखण्ड ज्योति के प्रयास पिछले पचास वर्षों से अनवरत तत्परता के साथ चले आ रहे हैं। इसका परिणाम भी आशातीत हुआ है।

अखण्ड ज्योति नवंबर 87, पृष्ठ 63

अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर काले अक्षर ही नहीं छपते वरन् उसके साथ प्रचंड प्राण प्रवाह भी बहता है। ऐसा प्रवाह जो सोतों को जगाता है, जागों को खड़ा करता है, खड़ों को चलाता है और चलतों को उछाल देता है। उसकी दिव्य क्षमता में कहीं कोई संदेह की गुँजाइश है नहीं।

अखण्ड ज्योति दिसंबर 87, पृष्ठ 62

अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में लिपटी प्राणवान् ऊर्जा और उसके द्वारा बन पड़ने वाली क्रिया-प्रक्रिया हस्तामलकवत् प्रत्यक्ष है। इसकी उपयोगिता एवं क्षमा को हर पारखी ने भूरि-भूरि सराहा है। उसे पारस की उपमा देने वाले कहते हैं, जो भी इसे छूते हैं, वे अपने कल्मष-कषाय धो डालते हैं और ऐसा व्यक्तित्व विकसित करते हैं, जिसे कायाकल्प की उपमा दी जा सके। यदि ऐसा न होता तो सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन और दुष्प्रवृत्ति-उन्मूलन के दुहरे मोरचे पर जो लाखों शूरवीर लड़ रहे हैं, उनका कहीं अता-पा भी न होता। उज्ज्वल भविष्य का जो विश्वास जन-जन के मन में जाग रहा है, उसका बीजाँकुर भी कहीं दृष्टिगोचर न होता। इस दिव्य ऊर्जा की गरिमा और क्षमता को हर कसौटी पर कसा और खरा पाया जा सकता है। उसमें जन-जन को देवमानव में विकसित करने की भागीदारी ललक को युगचेतना के रूप में प्रज्वलित देखा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति दिसंबर 87, पृष्ठ 63

“अखण्ड ज्योति का प्रधान लक्ष्य है, ऋषि परंपराओं का पुनर्जीवन। इसी को आधुनिक परिवेश में अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय भी कह सकते हैं।”

अखण्ड ज्योति जनवरी 88, पृष्ठ 55


अपनों से अपनी बात - महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया अब अंतिम स्थिति में

प्रस्तुत वेला जिससे हम गुजर रहे हैं, बड़ी विषमताओं एवं उलट-फेर की संभावनाओं से भरी हुई है। महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया, जिसकी घोषणा परमपूज्य गुरुदेव ने 1965-66 में इन्हीं दिनों बड़ी तेजी से संपन्न होने के विषय में की, आरंभ हो चुकी है। देवाधिदेव तंत्राधिपति महादेव का ताँडव नृत्य आरंभ हो चुका है। उनकी भृकुटि चढ़ी हुई है उन सभी पर जो इन दिनाँक अनीति, शोषण, आतंक तथा पतन-पराभव लाने हेतु जुटे हुए है। प्रलयंकारी नाद के साथ उनका डमरू बजने लगा है। निष्कलंक प्रज्ञावतार की सत्ता ने शंखनाद कर दिया है कि अब परिवर्तन की वेला आ पहुँची। रण संग्राम के चरमसीमा रोमाँच वाला समय है यह। लोगों को, जनमानस को याो अपना चिंतन, अपनी आस्थाओं को आमूलचूल बदलना होगा या फिर निज के अस्तित्व को बड़ी निर्ममतापूर्वक मिटते स्वयं देखना होगा। इन दिनों मिशन के गीतों में एक गीत बड़ा लोकप्रिय है, “महाकाल की चली सवारी, चलो साथ हो जाएँ, यह परिवर्तन की वेला है युगपरिवर्तन लाएँ।” इसी गीत में एक पंक्ति है, “परिवर्तन का चक्र जल रहा सभी बदल जाएँगे, जो न बदल पाएँगे, अपने आप कुचल जाएँगे” यह पंक्ति जिस बात की घोषणा कर रही है, उसका संकल्प स्रष्टा के श्रीमुख से गीता के ग्यारहवें अध्याय में प्रकट हुआ है।

भगवान् कहते हैं, “कालोडस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो-लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।” अर्थात् “मैं लोकों का नाश करने वाला बना हुआ महाकाल हूँ। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ।” भगवान् के इस स्वरूप को समझना आज की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में बड़ा अनिवार्य है। सृष्टि के आरंभ से अब तक अनेक बार ऐसे अवसर आए हैं, जिनमें विनाश की विभीषिका सामने आई, लगा सर्वनाश होकर रहेगा। असुरता की परंपरा है, अनीति को भड़काना वह अनौचित्य का माहौल बनाना। परमपूज्य गुरुदेव मई 1989 की अखण्ड ज्योति, पृष्ठ 2 में लिखते हैं, “वृत्रासुर, भस्मासुर, महिषासुर, हिरण्यकशिपु, रावण, कंस, दुर्योधन आदि नाम तो हैं ही, उनका अपना समुदाय भी रहा है, जिसमें अनेकों ने उन्हीं के स्तर की अवाँछनीयता को उग्र-उद्धत बनाने में योगदान दिया, किंतु आतंक की चरम सीमा तक पहुँचते-पहुँचते ऐसी व्यवस्था बनी कि अनाचार का शमन करने वाले साधन उभरे, तनकर उठ खड़े हुए और जो आतंक प्रलयंकर दीखता था, वह अपनी मौत मर गया।”

आज का विनाश और कुछ नहीं, मानवी दुर्बुद्धि का प्रतिफल है। मनः स्थिति में अवाँछनीयता भर जाने पर परिस्थिति भी विपन्न स्तर की बनती जाती है। जो बोया है, वह काटना तो पड़ेगा ही। सीधे मार्ग पर चलने वाला झाड़ियों में क्यों भटके भ्रष्ट चिंतन और दृष्ट आचरण ही प्रकाराँतर से दैत्य-दानव को भूमिका निभाता है। गुँबज में अपनी ही आवाज प्रतिध्वनि बनकर लौटती है। आज की सभी छोटी-बड़ी परिस्थितियाँ हमारे अपने द्वारा ही आमंत्रित हैं। क्रम उलट दिया जाए, तो प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदलने में देर नहीं लगेगी। समय-समय पर अनेक बार यही होता रहा है।

एक सबसे बड़ी क्राँति जो पिछले दिनों हुई है, उसे सूचना जगत् की क्राँति कहा जा पिछले दिनों हुई है, उसे सूचना जगत् की क्राँति कहा जा सकता है। विज्ञान के इस आविष्कार ने मानव-मानव की दूरी मिटा दी है। हम सब एक-दूसरे के अति समीप ‘साइबर स्पेस’ में ग्लोबल गाँव में रह रहे हैं। सूचनाओं का आदान-प्रदान अब इतनी तेजी से उपग्रहों के माध्यम से होता है कि कभी विश्वास नहीं होता कि यही मनुष्य आज से पचास वर्ष पूर्व किस तरह जी रहा था। विज्ञान जगत् की इलेक्ट्रानिक्स कंप्यूटर सेमींकंडर्क्टस के क्षेत्र में हुई क्राँतियों ने मनुष्य को सुख-सुविधा के साधन सुगमतापूर्वक उपलब्ध करा दिए हैं पहले कार्य लंबे समय में संपन्न होते थे, पर अब वे कहीं अधिक जल्दी होने लगे हैं। पहले कृषि-विस्तार से लेकर रीति-रिवाजों, साँस्कृतिक मान्यताओं में मंथर गति से बहुत धीमा परिवर्तन हुआ करता था, पर अब ऐसी बात रही नहीं। विचारधाराएँ बड़ी तीव्र गति से व्यापक बनी हैं। हजारों वर्षों में संपन्न होते रहने वाले कार्य अब कुछ दशकों में ही विकसित परिवर्तन हो रहे हैं, यह माना जा सकता है। ऐसा लगता है कि जिन ऋषि-सिद्धियों की चर्चा की जाती है, वे मनुष्य को सहज ही करतलगत हो गई हैं।विज्ञान की इस उपलब्धि पर सभी हतप्रभ भी है, गदगद भी।

यह गतिशीलता यदि विधेयात्मक चिंतन के परिप्रेक्ष्य में ली जाए, तो अगले दिनों और बढ़ेगी । केबल टीवी , दूरसंचारी उपग्रहों से घरों में संप्रेषण, वायरलैस प्रोटोकॉल जैसे मिनीयंत्रों द्वारा कार्यालयों का हाथ में सिमट आना, ‘ ऑनलाइन’ शिक्षण प्रणाली का विकास होना एक संकेत देता है, अगले दिनों परिवर्तन बड़ी तेजी से होंगे। विज्ञान की दिशा में , बौद्धिक प्रगति की दिशा में यदि इसी गति से प्रगति होती रही तो सब कुछ जो वर्षों में होता था, अब कुछ घंटों नहीं,बल्कि कुछ ही क्षणों में होता देखा जाएगा। ऐसी परिवर्तन की वेला में जब सब कुछ तेजी से हो रहा है, सर्वाधिक प्रभावित जो एक महत्वपूर्ण विधा हुई है, वह है मानव की संवेदनशीलता-भावना शक्ति, जो बुद्धि के साथ मिलकर प्रतिभा को जन्म देती है। परिष्कृत प्रतिभाओं का अकाल इसलिए इन दिनों पड़ रहा है कि यह तथाकथित प्रगति एकाँगी हुई है एवं यही हम सबके लिए भस्मासुर की पुनरावृत्ति भी बन सकती है तथा प्रयास किया जाए तो एक रचनात्मक उपलब्धि भी।

हम एक सहस्राब्दी में 2001 के आगमन के साथ प्रवेश करने जा रहे हैं। प्रस्तुत वर्ष तो उसकी पूर्ववेला में आया एक संक्राँति वर्ष था एवं इसके प्रभाव अभी नहीं सहस्राब्दी के प्रथम एक-डेढ़ वर्षों तक देखे जाते रहेंगे। परंतु जैसा कि पूज्यवर सहित सभी भविष्यवक्ताओं-द्रष्टाओं-मनीषियों ने कहा है, यह नई सदी की प्रभातकालीन अरुणोदय की वेला है। प्रभात की वेला आते ही जागरण और पुरुषार्थ का माहौल बन जाता है। विश्वास किया जाना चाहिए कि अशुभ का अंत और शुभ का उदय होने जा रहा है। मनुष्य ने जो कुछ भी किया है, पर्यावरण-संकट व दैवी प्रतिकूलताओं-विभीषिकाओं के रूप में जो कुछ भी आमंत्रित किया है, वह तप की घड़ी के रूप में, उसका सही मार्ग पर चलने की प्रायश्चित की वेला है। इसमें निश्चित ही आश्चर्यचकित कर देने वाले, लोगों के चिंतन व भावना जगत् में अभूतपूर्व परिवर्तन ला देने वाले घटनाक्रम घटेंगे। इस विधेयात्मक विश्वास को जितनी दृढ़तापूर्वक जितनी जल्दी अपना लिया जाए, उतना ही मानव मात्र के कल्याण के लिए हितकारी है। विभिन्न भविष्यवाणियों की संगति जिस समय विशेष से बैठती है, वह यही है 1995 से 2005 तक के बीच का समय। प्रकृति प्रकोपों के साथ उतरने वाली दंड−प्रक्रिया जो ईश्वर का विधान है, किसी हद तक आज की स्थिति से संगति भी खाता है।

इन दिनों भारत में ‘ सामान्य’ मानसून के बावजूद बहुत बड़े क्षेत्र में सूखा पड़ा हुआ है। मात्र भारत ही नहीं, विश्वभर में प्राकृतिक प्रकोपों की मानों बाढ़-सी आ रही है। कहीं भूकंप आ रहे हैं, तो कहीं असमय की बाढ़ की विभीषिका, पैमाने पर भूकंप विगत कुछ वर्षों पूर्व एवं सानफ्रैंर्निया में भयावह बरबादी लाने वाला भूकंप जिस शृंखला में आए थे, इस के पुनः दुहराए जाने की बात भूगर्भ विज्ञानी कह रहे है। उसके लिए वे जिस समय की बात कर रहे है, वह यही है। ऐसा अनुमान है कि एक बहुत बड़ा भूभाग अमेरिकी महाद्वीप से अलग होकर समुद्र में समा जाएगा। बढ़ते हुए धरती के वायुमंडल के तापमान से ग्लेशियर के पिघलने तथा समुद्री तटों के शहरों में जलप्लावन की संभावनाएँ भी बताई जा रही है। वैज्ञानिक बताते हैं कि इस सबके मूल में सूर्य की सतह पर आए विद्युत चुँबकीय तूफान है। ‘नोआ’ (नेशनल ओशिनाँग्राफिक एंड एटमाँस्फियरिक एडमिनिस्ट्रेशन) के वैज्ञानिकों का मत है कि सूर्य के अंदर चल रही गैसों के विस्फोट की प्रक्रिया विगत पाँच वर्षों से बढ़ोत्तरी पर है। इसी कारण उभरी चुँबकीय तूफानों की प्रतिक्रिया स्वरूप सूर्य की लपटें इन दिनों सामान्य से बड़ी व अधिक गरम हैं। सूर्य से बड़ी मात्रा में विकिरण और कणों के रूप में सूर्य के पदार्थ अंतरिक्ष में फैल रहे हैं। सूर्य की सतह हर ग्यारहवें वर्ष वैसे ही सौर−कलंकों-सौरस्फोटों से धरती के वातावरण को प्रभावित करती रहती है इस वर्ष जून 2000 से जून 2001 तक की अवधि 1988-89 के बाद आई वही अवधि है। यह सौर-सक्रियता का समय है जिस विद्युत् चुंबकीय ऊर्जाक्षेत्र ने कवच के रूप में सौर-विकिरण से हमें अभी तक बचाए रखा है, वह क्रमशः झीना होता जा रहा है। यही कारण है कि मानवकृत पर्यावरण-विभीषिका अब तथाकथित अंधाधुँध वैज्ञानिक प्रगति के साथ जुड़कर कहर बरपाएगी। यही समय है जब हम सभी को सावधान रहना है एवं मनोबल तनिक भी नहीं गिरने देना है।

हमारी गुरुसत्ता ने 12 वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण इसीलिए पूरी सक्रियता के साथ 1989 से आरंभ कराया। इस विराट् युगसंधि वेला आध्यात्मिक महापुरुषार्थ की समापन वेला अब चौबीस हजार करोड़ के प्रतिवर्ष गायत्री जप के साथ आ पहुँची। एक विराट् स्तर की महापूर्णाहुति भी आरंभ हो चुकी, जिसके तृतीय चरण का समापन विगत गायत्री जयंती 11 जून रविवार को हो गया। संभागीय पूर्णाहुति के साथ संगठनात्मक दीपयज्ञों की यह शृंखला 108 स्थानों पर संपन्न हुई। बहुत ही सही समय पर यह आध्यात्मिक पुरुषार्थ संपन्न हो रहा है। यदि यह महापुरश्चरण न चल रहा होता तो संभावना है कि बहुत कुछ बिगाड़ हो चुका होता। गायत्री सूर्य की उपासना महामंत्री है। सूर्य के आधिभौतिक (हाइड्रोजन-हीलियम के जलते गोले वाला रूप), आधिदैविक (ग्रहों का अधिपति, चिंतन प्रेरक, जातक की आत्मा) एवं आध्यात्मिक (अतिमानसिक विराट् पुरुष की ज्योति) तीनों स्वरूपों पर प्रभाव के माध्यम से त्रिपदा गायत्री की उपासना सौर-सक्रियता के समय एक दैवी संरक्षण साधक को उपलब्ध कराती है। इस महापूर्णाहुति की वेला में सभी को अपना साधनात्मक पुरुषार्थ प्रखर करना होगा। इसके अलावा कोई और चारा है भी तो नहीं।

समृद्धता के साथ किए गए साधनात्मक पुरुषार्थों के बड़े ही विलक्षण परिणाम होते हैं। समय-समय पर अवतारी चेतना भी देवशक्तियों को संघबद्ध होने, संयमित जीवन जीते हुए साधना प्रधान जीवनचर्या में शक्ति नियोजित करने की प्रेरणा देती रही है। महाकाली की एक ही प्रेरणा है कि सभी बल की उपासना करें, मिल−जुल करें, ताकि अन्य से आगत आसुरी घटाटोप से जूझा जा सके। इन दिनों हमारी गुरुसत्ता के निर्देश के अनुरूप ही न केवल राष्ट्र व विश्व का सघन मंथन करने वाली तीर्थयात्राएँ संपन्न हुई, गाँवों से लेकर सींगीय स्तर तक सृजन संगठन प्रधान एक लाख से अधिक समारोह भी पूरी गरिमा के साथ संपन्न हुए। 108 संभागीय दीप महायज्ञों के माध्यम से परिष्कृत प्रतिभाएं उभरकर आई है। तथा नवसृजन लिए संकल्पित हुई है। इन आयोजनों के रचनाधर्मी संयोजन को, इनकी भव्यता को जिन-जिन ने भी देखा है, सराहा है एवं अपने अंदर सभी कुछ-न-कुछ संकल्प लेकर गए है। निश्चित ही इसके विलक्षण परिणाम होंगे।

अभी हम महापूर्णाहुति की मध्यावधि से गुजर रहे है। इन दिनों सार देश में जहाँ तृतीय चरण का अनुयाज चल रहा है, सातों आँदोलनों में प्रतिभाओं के नियोजन के विषय में रणनीति बनाने हेतु गहन मंथन चल रहा है, वहीं विश्व के प्रायः सभी देशों में विश्वशाँति के लिए तीर्थयात्राएँ एवं संस्कार-महोत्सवों के संभागीय महापूर्णाहुति स्तर के आयोजन भी संपन्न हो रहे हैं। अमेरिका, कनाडा व यूरोप में ये यात्राएँ संपन्न हो चुकी। यूरोप व दक्षिण अफ्रीका, पूर्वी अफ्रीका में इन दिनों चल रही हैं। 16 जून ज्येष्ठ पूर्णिमा से टोरोण्टो में गायत्री महाशक्ति की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा के साथ सेमीनार वर्कशाप, 106 कुँडी महायज्ञ, ज्ञानयज्ञ व दीप महायज्ञ प्रधान ढाई दिवसीय आयोजनों की शृंखला आरंभ हो गई। यह क्रम सितंबर के तृतीय सप्ताह से पश्चिम देशों में तथा अक्टूबर से जनवरी 2001 तक (वहाँ की गरमी में) मुदूर पूर्व आस्ट्रेलिया, माँरीशस, सूरीनाम में चलता रहेगा। इस प्रकार भारतीय संस्कृति का विस्तार आगामी पाँचवे चरण के समापन तक सारे विश्व के कोने-कोने में ही जाने की पूरी-पूरी संभावनाएँ हैं।

16 जून तक सभी टोलियों के सारे देश के विभूति संपन्नों, श्रद्धालु भक्तगणों, मंडल संचालकों, समन्वय समिति के सक्रिय सदस्यों, विशिष्ट साधकों, स 3, स 4 सदस्यों, युगसंधि महापुरश्चरण के नियमित उपासकों, दीक्षितों तथा मिशन की सभी पत्रिकाओं नियमित पाठकों की भागीदारी संभागीय आयोजनों में कराकर लौटने के साथ आँकड़ों का एक विराट् महासागर केंद्र पर एकत्र हो चुका है। अनुयजक्रम में इसी के सुनियोजन की व्यवस्था की जा रही है,ताकि चतुर्थ चरण के पूर्वार्द्ध के 8 अक्टूबर के नई दिल्ली के विभूति महायज्ञ कार्यक्रम तथा उत्तरार्द्ध के सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ के नवंबर माह के कार्यक्रम तक यह सुनिश्चित हो सकें कि प्रतिभाओं का नियोजन कहाँ व कैसे होना है।

तृतीय चरण अनुयाज व चतुर्थ चरण के प्रयाज के क्रम में इन दिनों सारे देश में नगरीय-कस्बे-महानगरीय स्तर पर डेढ़ से दो दिन के ज्ञानयज्ञ प्रधान आयोजन संपन्न हो रहे है। प्रबुद्ध वर्ग भी जाने कि मिशन की देवसंस्कृति विस्तार की योजनाएँ क्या हैं, इसलिए केंद्र से विशिष्ट दल स्लाइड्स व पाठ्य सामग्री के साथ वर्कशाप स्तर के आयोजनों हेतु नगर-नगर भ्रमण कर रहे है। बुद्धिजीवी वर्ग के इन कार्यक्रमों की अक्सर माँग रहती है। इनके प्रभाव भी बड़े विलक्षण पड़ते देखे गए हैं। प्रबुद्ध वर्ग युगचेतना का स्पर्श पा सके, इसके लिए उन्हीं के लिए विशिष्ट व्याख्यान एवं शांतिकुंज की रचनात्मक आयोजनों की रूपरेखा द्वारा यह प्रयास आरंभ किया गया है। सितंबर अंत तक संभावना है कि राष्ट्र का एक बहुत बड़ा भाग जो अभी तक अछूता रहा है, युगचेतना से आंदोलित किया जा सकेगा। इसमें ध्यान-प्रज्ञायोग प्रधान आयोजनों के साथ व्यक्तित्व-परिष्कार के सत्र भी हो रहे है। कार्यकर्त्ताओं की संगठनात्मक चर्चाएँ भी, सुनियोजन हेतु विधि-व्यवस्था का परामर्श भी साथ ही चल रहा हैं इस प्रकार दो दिन के इन आयोजनों का बड़ा व्यापक प्रभाव जन-जन पर पड़ेगा।

8 अक्टूबर रविवार दशमी की वेला में सायं 5 से 9 तक जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम नई दिल्ली में एक विराट् विभूति ज्ञानयज्ञ चौथे चरण के अंतर्गत होने जा रहा है। इसमें भारत भर के 108 स्थानों में से प्रत्येक से 100-100 चुनी हुई प्रतिभाओं तथा प्रवासी परिजनों को शाँतिकुँज से आमंत्रण पत्र जाएँगे, वे ही भागीदारी करेंगे। मिशन के शक्ति प्रदर्शन प्रधान इस कार्यक्रम को सीधा दूरदर्शन नेटवर्क पर प्रसारित किए जाने की संभावना है। गायत्री परिवार की सतयुगी समाज की कल्पना क्या है, कैसे-कैसे, कहाँ-कहाँ, क्या-क्या रचनात्मक गतिविधियाँ चल रही हैं, इसका परिचय मार्च पोस्ट कर रही झाँकियों से तथा विशाल मल्टीमीडिया स्क्रीन पर लोग पा सकेंगे। राष्ट्र के दो प्रधानों, विभिन्न राष्ट्रों के राजदूतों, स्वैच्छिक आध्यात्मिक संगठनों के प्रमुखों की उपस्थिति में एक विराट् दीपयज्ञ भी संपन्न होगा। नवनिर्माण के लिए संकल्पित युगशक्ति के स्वरूप का दिग्दर्शन सभी को होगा।

विगत गायत्री जयंती देवमाता के विश्वमाता बनने की प्रक्रिया वाली वेला में आई थी। इसी गंगादशहरा महापर्व को 1990 में पूज्यवर स्थूल से सूक्ष्म में विलीन हुए थे। दस वर्ष तक वेदमाता का देवमाता वाला स्वरूप जन-जन तक पहुँचा। अब 2000 की 11 जून से पूज्यवर कारण शरीर के रूप में सारे अंतरिक्ष में संव्याप्त हो गए हैं। युगपरिवर्तन सुनिश्चित है, वह इन्हीं दिनों होने जा रहा है, यह विश्वास सभी को करना चाहिए।


शिवत्व की साधना

(शचीन्द्र भटनागर)


शिवत्व की साधना (kavita)

गंगा-गायत्री की धारा कुछ ऐसी लहराए, शिवता की साधना दिनों-दिन प्रबल प्रखरता पाए।

यही पर्व है ऋषिसत्ता के सूक्ष्मरूप होने का, आत्मचेतना का अपार लख रूप, देह खोने का,

किंतु आज वह सूक्ष्म रूप भी कारण रूप हुआ है, सूर्य , विश्व के हर कोने में फैली धूप हुआ है,

उस ऊष्मा से अब सारा ब्रह्माँड प्रभावित होगा, हममें से प्रत्येक वही अब मनोभूमि अपनाए।

है भगवती भवानी श्रद्धा, शिव विश्वास अटल है, दोनों ही मिलकर बन जाते शक्ति -स्रोत अविरल है,

शिव की कृपा , शक्ति से मिलकर जब प्रवाह बन जाती, तब असंख्य निष्प्राणों में वह नूतन प्राण जगाती,

विश्वासी बन सकें , साधना शिव की तभी सफल है, शिव की शक्ति भवानी हम पर कृपा-मेघ बरसाए।

शिव सहयोगी हुए, तभी सुरसरी धरा पर आई , तपे भगीरथ, इसीलिए वह भागीरथी कहाई ,

हम भी तपें, शिवत्व-साधना करें लोकमंगल की , तभी धार हम मोड़ सकेंगे आने वाले कल की ,

गंगा-गायत्री के इस अवतरण-पर्व पर आओ, हर परिजन विश्वास करें, विश्वास सभी का पाए।

गुरु की कारण सत्ता का सान्निध्य वही पाएँगे , जो अपने मन को विशाल आकार बना पाएँगे,

गुरु-निर्वाण-दिवस पर अपने पर विश्वास जगाएँ, विश्वासी बनने की क्षमताएँ मन में विकसाएँ,

जिससे कल आने वाला इतिहास हमारे ऊपर , कहीं न जड़ विश्वासघात का पातक यहाँ लगाए।

*समाप्त*