महापूर्णाहुति की वासंती उमंगें

पूर्णता की चाहत ही सक्रियता की प्रेरणा हैं। इसी ऊर्जा से प्रत्येक जड़-चेतन गतिशील है। सागर से मिलने हेतु नदियाँ अहर्निश दौड़ने लगाती हैं। मानव शीलता का ध्येय भी हैं। समूची प्रकृति की सतत् विकासयात्रा इसीलिए हैं। वह सबको अपने आँचल में समेटे परमपुरुष से मिलकर अपनी पूर्णता पाने के लिए आतुर-आकृष्ट हैं।

सबको नियंत्रित करने वाला काल महेश्वर महाकाल में विलीन होकर पूर्णता पाना चाहता है। यह अवश्य है कि ये यात्राएँ छोटी-मोटी पूर्णताओं को पाती-लाँघती महापूर्णता में विसर्जित हो जाती हैं। वासंती उमंगों के बीच ऐसा आभास हो रहा हैं कि कुछ विशिष्ट होने जा रहा हैं। पिछले वसंतपर्वों की अपेक्षा यह वासंती आभा कहीं अधिक मोहक एवं सुरम्य हैं।

वसंत महोत्सव के साथ ही महापूर्णाहुति वर्ष की शुरुआत हो रही हैं। महाकाल की यज्ञवेदी में आहुति देकर दशाब्दी, शताब्दी एवं सहस्राब्दी स्वयं को पूर्ण कर रही हैं। वर्ष 1988 में अनिष्टों के निवारण एवं नवसृजन के लिए प्रारंभ की गई युगसंधि महापुरश्चरण साधना भी अपनी पूर्णता को पा रही हैं। नववर्ष 2000 इस साधना महोत्सव की पूर्णता का वर्ष हैं। वसंतपर्व से प्रारंभ हो रहा महापूर्णाहुति का यह उत्सव अपनी दृश्य व्यापकता से कहीं अधिक व्यापक हैं। इनका समूची शताब्दी-सहस्राब्दी में किए गए वे प्रयास-तप−साधनाएं शामिल हैं, जिनका उद्देश्य उज्ज्वल भविष्य की वासंती उमंगों को विस्तारित करना रहा हैं।

इसी वसंत से शुरू होने वाले प्रत्येक महापूर्णाहुति उपक्रम में भागीदारी प्रत्येक को महाकाल के लीला संदोह में साझीदार बनाने के साथ ही उन तपोनिष्ठ महान् आत्माओं के अक्षय तप एवं पुण्य का भागीदार बनाएगी, जो सहस्राब्दी में समय-समय पर मानवता के उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रयत्नशील रहे। यह महापूर्णाहुति उन सबकी सम्मिलित तप−साधना की पूर्णाहुति भी हैं। इसमें भागीदार अपने जीवन में महेश्वर महाकाल के अलौकिक अनुदानों के साथ वासंती उल्लास एवं उमंग लाने वाली सिद्ध होगी।


युग वसंत का साक्षी अखण्ड दीप

सन् 1926 के वसंत पूर्व प्रज्वलित अखण्ड घृतदीप वसंत पंचमी 2000 पर अपने पिचहत्तरवें वर्ष में प्रवेश कर रहा हैं। महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का साक्षी यह अखण्ड दीपक हमारे आराध्य के आध्यात्मिक जन्मदिवस का ही नहीं, बोध दिवस का ही नहीं, इस विराट् गायत्री परिवार की विकासयात्रा का भी द्योतक हैं। जीवन में सद्भावना का प्रकाश प्रज्वलित किए रहने से कैसे क्राँतिकारी तूफान उठ खड़े होते हैं, सहस्राब्दी की पूर्ण वेला में आया सन् 2000 हम सबको उस तप-त्याग-प्रखरता की याद लाता है, जिससे इसके अंतिम कुछ दशक संक्राँति की वेला में एक अभिनव स्थापना कर गए। विचारक्राँति अभियान दीपक के प्रकाश में ही वेग पकड़ता चला गया। लाखों-करोड़ों के मन-मस्तिष्क बदलते चले गए। संभव हैं, कई व्यक्ति निराश मनःस्थिति के हों। लेखा-जोखा लेते हुए यह सोचते हों कि एक वर्ष बीता, एक दशक, एक शताब्दी बीती एवं एक सहस्राब्दी की समापन वेला आ पहुँची। फिर भी नैतिक पतन ज्यों-को-त्यों हैं, मारकाट, विद्वेष यथावत् हैं, अराजकता वैसी ही बनी हैं। जिनके पास दूरदर्शिता का अनुदान हो, विवेकशील हों- अंतःचक्षु खुले हो, वे देख सकते हैं कि परिवर्तन निश्चित ही हो रहा हैं एवं बड़े व्यापक स्तर पर हो रहा हैं।

अगले पृष्ठों में एक सहस्राब्दी का सफरनामा पाठकगण पढ़ेंगे। क्रमशः चार संक्राँति पर्वों के चार अध्यायों के माध्यम से ही सब यह समझ पाएंगे कि विश्व के भारतीय संस्कृति से ओत−प्रोत होने की वेला किन विषम परिस्थितियों से यात्रा करके अब आई हैं। परिवर्तन का चक्र यों तो विगत दो सौ वर्षों से सतत् चाल आ रहा हैं, किन्तु एक अखण्ड दीपक ने निरंतर जलकर मानो उस परिवर्तन−प्रक्रिया का पटाक्षेप ही कर डाला एवं हम सभी को नए युग की अगवानी हेतु ला खड़ा किया हैं। जिस प्रज्ञापुरुष एवं जगज्जननी की शक्ति उस दीपक को जलाए रखने-प्रखरता के शिखर तक पहुँचाने में लगी, उसने सतत् एक कार्य किया। विचारों को ऊँचा उठाए रखना-क्षुद्रता की कीचड़ में कुलबुला रहे कीड़ों को ऊपर उठकर अपना जीवन उबारने की, नरपशु से देवमानव-महामानव बनने की, व्यक्तित्व के कायाकल्प की प्रेरणा देने का कार्य उस महाशक्ति ने ही किया। हमारी आराध्यसत्ता के क्राँतिकारी विचारों ने ही लाखों लोगों की मनोभूमि को बदला हैं एवं करोड़ों में उल्लास की उमंगों को हिलोरें दी हैं। ऐसी बदली हुई मनोभूमि में ही महान् जीवन और समर्थ समाज की असीम संभावनाएं समाविष्ट रहती हैं। अंशावतार के रूप में ऐसे अगणित नरपुँगव-महामानव को मूर्त रूप देते रहते हैं।

यह अखण्ड दीपक पहले आँवलखेड़ा (आगरा) में जला, फिर अखण्ड ज्योति-संस्थान, घीयामंडी, मथुरा में एवं अब यह शाँतिकुँज हरिद्वार में विगत 29 वर्षों से सतत् प्रज्ज्वलित हैं। 24 लक्ष के 24 महापुरुष इसकी ही साक्षी में संपन्न हुए। परमवंदनीया माता जी भी इसे सँवारने,प्रखर बनाने, रक्षा करने हेतु तत्पर हो 1943 में मथुरा पूज्यवर के साथ आ जुटी। इसी अखण्ड दीपक के प्रज्ज्वलन (1923) वाले वर्ष में उनका शरीर से जन्म भी तो निमित्त हुआ था। प्रखरता व सजलता ने प्रामाणिकता को खोजा-तराशा व एक विराट् गायत्री परिवार बना दिया। 1953 का शतकुँडी नरमेध यज्ञ तथा गायत्री तपोभूमि की स्थापना का कार्य इसी दीपक की उपस्थिति में संपन्न हुआ। होमात्मक यज्ञों की शृंखला चलती रही एवं 1958 में जपात्मक-होमात्मक एवं ज्ञानयज्ञ के समन्वय के रूप में एक सहस्रकुँडी महायज्ञ मथुरा में संपन्न हुआ। इसने संगठन के आधार को खड़ा कर दिया। इसी अखण्ड दीपक ने ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका को 1937 से आरंभ होकर ज्ञानयज्ञ का प्रकाश लाखों लोगों तक पहुँचाते देखा हैं। गायत्री महाविज्ञान की रचना, आर्षग्रंथों का भाष्य एवं युगनिर्माण योजना के सूत्रपात का उद्घोष इस अखण्ड दीपक के प्रज्ज्वलन की वासंती वेला में ही हुआ हैं। महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया से लेकर मथुरा से विदाई की घोषणा, हिमालय यात्रा के बाद ऋषि परंपराओं की स्थापना का संकल्प, शाँतिकुँज गायत्रीतीर्थ के रूप में एक कल्पवृक्ष के निर्माण से लेकर इसकी शाखा-प्रशाखाओं के रूप में चौबीस सौ शक्तिपीठों के निर्माण के संकल्प भी इसी दीप प्रज्ज्वलन के दिन वसंत पंचमी की उल्लास के समन्वय को संकल्पित ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की स्थापना से लेकर बीस वर्षीय युगसंधि के विशिष्ट साधना अभियान की शुरुआत एवं प्रज्ञापुराण रूपों अद्वितीय 19वाँ पुराण भी इसी वेला में लिखा गया। (शेष पृष्ठ 6 पर)


एक सहस्राब्दी का सफर

सन् 2000 का आगमन हो चुका हैं। इसी के साथ हममें से हर एक मन सवाल भी अंकुरित हो रहा है कि कैसा रहा अब तक का इस सहस्राब्दी का सफर? 20001 का आरंभ हो इसके पूर्व सोचें कि इन पिछले एक हजार सालों में हम कहाँ से चलाकर कहाँ जा पहुँचे हैं? निस्संदेह दस शताब्दियों की यात्रा कई दृष्टियों से रोमाँचक रहीं हैं। इस दौरान यूरोपीय देशों की तरह हमारा विकास क्षैतिज नहीं हुआ। हमें दो-दो सभ्यताओं-संस्कृतियों की चुनौती का सामना करना पड़ा। विडंबना यह है कि उन्नीसवीं शताब्दी के अंत से पहले तक हमारे राजनीतिक तंत्र की भूमिका इसका सामना करने में गौरवपूर्ण नहीं रही। हालाँकि इन राजनीतिक विषमताओं के दौरान भी हमारा साँस्कृतिक तंत्र पर्याप्त व्यापक एवं सुदृढ़ रहा हैं। तभी अपने ऊपर होने वाले प्रत्येक आपात एवं सुदृढ़ रहा हैं। यह उत्तरोत्तर निखरता चला गया और इन आघात करने व्यापकता में से भी, बिना किसी भेदभाव के सबको अपनी व्यापकता में सम्मोहित करने की चेष्टा की।

सन् 1000 में महमूद गजनी के आक्रमण से इस सहस्राब्दी की शुरुआत हुई थी। उस समय बँटे-निखरे राजतंत्र के बावजूद वह साँस्कृतिक एकता अवश्य थी, जिसे आचार्य शंकर ने इस सहस्राब्दी में मात्र एक सदी पहले स्थापित किया था। आचार्य शंकर द्वारा छोड़ी गई विरासत के बलबूते यहाँ का सामाजिक बिखराव एवं विद्वेष के चलते यहाँ गोरी एवं गुलाम, खिलजी, तैमूर और लोदी आते गए और 16 मई 1527 को बाबर ने इस देश के इतिहास को एक नया मोड़ दिया। इस बीच भारतवर्ष के साँस्कृतिक क्षितिज पर रामानुज, गौरख-व्यक्तित्व उभरे, जो लोकजीवन को

अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा एवं साँस्कृतिक संवेदना से नवप्राण देते रहे।

बाबर ने यहाँ आकर जिस शासनतंत्र की स्थापना की, उसका खात्मा अँगरेजों ने किया। एक विदेशी शासन का अंत दूसरे विदेशी शासन द्वारा होना भारत के इतिहास की सबसे बड़ी दुःखद घटना हैं। मुगल गए, अंग्रेज आए। मुगलों की तुलना में अंग्रेजी शासन ज्यादा पूर्व, ज्यादा शक्तिशाली और ज्यादा महत्त्वाकांक्षी थे हालाँकि उनकी यह महत्वाकांक्षा ही भारत की राजनीतिक एकता का आधार बनी। आधार बनी। लेकिन मुगल शासन अंग्रेजी शासन में एक खास फर्क था। मुगल शासन में प्रजा से लिया गया धन देश में ही खरच होता था, पर अंग्रेजी शासन में भारत का धन इंग्लैंड जाने लगा। इससे जहाँ मुगल शासन में भारत की आर्थिक स्थिति निरंतर बेहतर होती गई, वहीं अंग्रेजी शासन में भारत निरंतर दरिद्र होता गया। मुगलों के काल में देश के साँस्कृतिक क्षितिज पर समर्थ गुरु रामदास, तुकाराम जैसे देवपुरुष अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा बिखेरते रहे। अँगरेजों के समय यह कार्य श्री रामकृष्ण परमहंस ने संपन्न किया, जिनके महान् शिष्य विवेकानंद की विचारधारा ने देश को आलोड़ित-आँदोलित किया और राष्ट्रीय स्वाधीनता संघर्ष ने तीव्रता पाई।

भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के महानायक महात्मा गाँधी ने जिस अभूतपूर्व जन-आंदोलन को जन्म दिया, उसकी महाशक्ति के सम्मुख अँगरेजों को झुकना पड़ा। सहस्राब्दी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि संघर्ष के स्वर किसी शासक और शासक के बीच नहीं, शासक एवं जनता के बीच मुखर हुए। विजय देश की जनता की हुई। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। हालाँकि अँगरेजों की फूट डालो नीति यहाँ भी अपना काम कर गई और देश को राजनीतिक तौर पर ही नहीं, सामाजिक तौर पर भी बँटना पड़ा। हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बँटवारे में ही विभाजन की इतिश्री नहीं हुई। जातीय, क्षेत्रीय, साँप्रदायिक दीवारें भी उठ खड़ी हुई। इन्हीं विषमताओं के बीच हमारे गुरुदेव-आराध्य संस्कृति पुरुष आचार्य श्रीराम शर्मा जी के महान् व्यक्तित्व का उदय हुआ। उनका व्यक्तित्व नवयुग के अभ्युदय की घोषणा थी। उनके स्वरों में इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य मुखर हुआ। उन्होंने आधी सदी से भी अधिक समय किए अपने प्रयासों एवं अपनी अभूतपूर्व तप−साधना से प्राप्त दिव्य क्षमताओं के बल पर इस सत्य का उद्घाटन किया कि अगली सहस्राब्दी की प्रथम सदी में ही भारत अपने खोए गौरव को पुनः प्राप्त करके ही रहेगा। सहस्राब्दी के इस सफर के बारे में यह असंदिग्ध रूप से कहा जा सकता है कि आचार्य शंकर द्वारा सौंपी गई विरासत को लेकर देश ने सन् 1000 में अपनी जिस संघर्ष यात्रा की शुरुआत की, उसकी परिसमाप्ति एवं सतयुग की वापसी की प्रक्रिया आचार्य श्रीराम शर्मा की तप-साधना से प्रारंभ हुई सृजनात्मक में संपन्न होगी।


ज्वालाएँ बनी, मतों-पंथों के बीच की दीवारें

सहस्राब्दी की शुरुआत आचार्य शकर के अद्वैत अर्थात् परम एकत्व के संदेश को लेकर हुई जरूर, पर यह एकत्व टिका न रह सका। ज्यों-ज्यों काल देवता के पाँव आगे बढ़े, विभिन्न मत एवं विभिन्न पंथ में उपजे-पनपे। यह सच हैं कि आठवीं सदी में जन्मे आचार्य शंकर के आध्यात्मिक पुरुषार्थ से वेदाँत दर्शन सर्वोच्च में प्रतिष्ठित हो गया था, परंतु सहस्राब्दी का प्रारंभ ही विदेशी आक्राँतियों के आक्रमण से हुआ और ये हमले थमे नहीं, लगातार होते ही चले गए। ऐसे में देश के जन-जीवन का विचलित होना स्वाभाविक था। और यह हुआ भी। शंकर का ब्रह्म तो एक परम निरपेक्ष सत्ता थी, जिससे की जाने वाली सारी प्रार्थनाओं का कोई अर्थ न था।

दुःखी-संतप्त लोकमानस को ऐसे ईश्वर की खोज थी, जो उसे साँत्वना दे सके, सुरक्षा दे सके। बौद्ध एवं जैनदर्शन ने तो ऐसे भगवान को मार ही दिया था। जैमिनी की मीमाँसा एवं कपिल के साँख्य की स्थिति भी बेहतर नहीं थी। न्याय-वैशेषिक की भगवान भी स्रष्टा से अधिक कुछ नहीं था। अतएव एक नए पंथ की खोज थी। इस क्रम में ग्यारहवीं सदी में रामानुज ने शंकर के ज्ञान सिद्धांत एवं ब्रह्म सिद्धान्त की जगह अपने विशिष्टाद्वैत मत की स्थापना की। सगुण ब्रह्म की चर्चा चल पड़ी। बारहवीं सदी तेलगू आचार्य निंबार्क ने द्वैताद्वैत मत की स्थापना की। शंकर एवं रामानुज की तरह अंतिम सत्य यहाँ भी एक ब्रह्म ही था, किन्तु जीव एवं जगत् की सत्ता को भी स्वीकारा गया। तेरहवीं सदी में केरल के माधवाचार्य ने द्वैतमत का प्रतिपादन किया। चौदहवीं एवं पंद्रहवीं सदी में बल्लभाचार्य ने शुद्धद्वैत मत का प्रतिपादन कर अपनी एक कड़ी और जोड़ी इन दार्शनिक मतों के अलावा शैव एवं शक्तिमत भी थे। इसमें से शैवमत का आविर्भाव तो बहुत पहले हो गया था। आदिकाल से ही शिव उपासना का प्रचलन महादेव तथा पशुपति के पूजन-अर्चन के रूप में रहा हैं। परंतु दूसरी सहस्राब्दी का प्रारंभ होने तक तो शैवमत भी अनेक मताँतरों में बँट गया। यही हाल शाक्तमत का भी हुआ। ये भी किसी से पीछे न रहे। कालचक्र की तेज गति के अनुरूप इसकी भी शाखा-प्रशाखाएँ होती गई। हालांकि इन दोनों से कहीं अधिक प्रभावी वैष्णव भक्ति आँदोलन रहा जो दक्षिण से उमड़कर महाराष्ट्र से गुजरात और राजस्थान होता हुआ समस्त भारत में फैल गया था।

हिंदुत्व के दायरे के भीतर उपासना भेद एवं वैचारिक मतभेद के आधार पर पनपे इन अनेक मत एवं पंथों के अलावा बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म का भी अस्तित्व था। जैन धर्म के “शायद यह-शायद यह नहीं” का प्रतिपादन करने वाले स्यादवाद एवं बौद्धिमत के शून्यवाद ने और कुछ भले ही न किया हो, पर प्रचलित मतों की संख्या बढ़ाने में अपना योगदान तो किया ही था। इसमें भी जैनधर्म श्वेताँबर एवं दिगंबर के रूप में अपने को विभाजित कर चुका था। बौद्धमत में महायान, हिनयान, सहजायान एवं वज्रयान आदि अनेक नामों से बँटवारा हो गया था।

प्रायः इन सभी मतों के अपने-अपने ताँत्रिक समुदाय थे, जो वामाचार को बढ़ावा देने में लगें थे। बौद्धों के वज्रयान से ही नाथपंथ का उदय हुआ, जिसने परिष्कृत चिंतन एवं चरित्रनिष्ठ जीवन को महत्व दिया, लेकिन बाद में इसमें भी मत-मताँतर होने लगे।

बाहर से अपने वालों में इस्लाम एक संगठित एवं प्रबल मत था। यह अपना प्रचार करने में उतारू और उतावला था। उसे राजनीतिक समर्थन भी प्राप्त था। इस इस्लाम के अंतर्गत दो धाराएँ प्रमुख थीं। एक धारा कट्टर मुल्ला-मौलवियों द्वारा अनुशासित मुसलमानी मजहब की थी और दूसरी उन्हीं के साथ आए हुए सूफियों की। इन सूफियों का समाज पर शुरुआती दौर में अच्छा प्रभाव पड़ा। ये सीधे-साधे थे व ईश्वरोन्मुखी प्रेमसाधना में लीन रहते थे। इनका पंथ अद्वैत चिंतन से प्रभावित था।

सबसे बड़ी विडंबना इस बात की हुई कि इन सभी मतों एवं पंथों में समय के साथ बाह्याडंबर बढ़ता गया। इस बाह्याडंबर के साथ ही इनमें पारस्परिक टकराव के स्वर भी मुखर होते गए। सामान्य जनता तो इन सभी को आदर देती थी, परंतु उसका बौद्धिक स्तर सामान्य होने कारण उसमें भ्रम एवं संदेहों में बढ़ोतरी हो गई। वह टोना-टोटका, शगुन-अपशकुन, भूत-प्रेत, झाड़-फूँक,तंत्र-मंत्र, और जादू-मंतर के चक्कर में कुछ इस कदर उलझ गई कि उसमें ने तो राष्ट्रीय भावना बची न ही साँस्कृतिक चेतना। धर्म के नाम पर वह प्राणोत्सर्ग अवश्य कर सकती थी, पर धर्म का मर्म समझने में असमर्थ थी।

इन विभिन्न मतों एवं विभिन्न पंथों में टकराव इतना बढ़ गया कि भेद एवं विद्वेष की चिनगारियाँ सर्वत्र फैलने लगी। अभेद एवं अद्वैत, प्रेम एवं करुणा की राह दिखाने वालों के अनुयायियों के पास केवल भेद एवं विद्वेष, घृणा एवं जुगुप्सा ही बची रह गई। गोरक्ष के नादयोगी जिन पर चरित्रवान् नागरिक बनाने की जिम्मेदारी थी, छोटे-मोटे चमत्कार प्रदर्शित करके जनता को प्रभावित करने लगे। बाहर से आने वालों के मजहब में हिंसा, स्वार्थ एवं कट्टरता का प्राधान्य था। जैन अहिंसा का महत्व देते थे, किन्तु हिंसा से बचने के लिए वे जो कुछ करते थे, वह स्वयं प्रदर्शन की वस्तु बन गया था।

बौद्ध सिद्धों में अनेक प्रकार के अनाचार प्रविष्ट हो गए थे। उनका सहजयान गुतय साधना का केन्द्र बन गया था और वहाँ मद्य-मैथुन की पूर्ण स्वतंत्रता थी। ब्रह्मवादी ब्राह्मण संध्या, तर्पण एवं षट्कर्म में लीन रहते थे। उनमें ब्रह्मचर्य का इतना बाहुल्य था कि वे जीवन जीने की कला से विमुख हो चुके थे। शैवों में अनेक संप्रदाय हो चुके थे और वे योगियों के अभ्युदय के पूर्व ही अपनी गतिमयता खो चुके थे। सूफी संत भी यहाँ आकर झाड़-फूँक करने लगे तरह-तरह के चमत्कारों एवं करामातों पर उनका विश्वास बढ़ गया। वैष्णवों में भी छाप-तिलक लगाकर जनता को मात्र वैशिष्ट्य से प्रभावित करने की वृत्ति बढ़ रही थी।

यह स्थिति केवल भारतवर्ष तक ही सीमित नहीं थी। पश्चिमी देश भी मत व मतवाद के चक्रव्यूह में फँसते-उलझते जा रहे थे। वहाँ ईसाईयत जहाँ एक ओर बढ़ी वहीं दूसरी ओर बँटी भी। यह दूसरी शताब्दी का प्रारंभिक दौर था, जब आधुनिक यूरोप की नींव रखी गई। यह समय कुछ ऐसा था कि कालचक्र भारत महादेश को अपनी धुरी बनाकर समूचे विश्व में एक संक्राँति को जन्म दे रहा था।

सहस्राब्दी की प्रथम से विभिन्न मतों एवं पंथों के बीच जो दरारें पनपीं, वे मिटी नहीं, उत्तरोत्तर बढ़ती चली गई। इनका टकराव इनके समुदायों तक ही सीमित न रहा, समूचा जनमानस आँदोलन-आलोड़ित होता चला गया। सामान्यजन को जिनसे मार्गदर्शन-पथप्रदर्शन की आशा-अपेक्षा थी वे या तो लड़ने में जुड़े थे या फिर अपने उद्धत अहं को प्रदर्शन करने में। सहस्राब्दी की चौथी-पांचवीं सदी के आने तक विद्वेष की ये चिनगारियाँ ज्वालाओं में बदल गई। ये ज्वालाएँ सहस्राब्दी की प्रथम संक्राँति की ज्वालाएँ थी, जो अदृश्य के किसी पीयूष स्रोत को आमंत्रित कर रही थी।

राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों की भारतव्यापी शृंखला के बाद दीपयज्ञों के विराट् आन्दोलनों की घोषणा, क्राँतिधर्मी साहित्य के निर्माण के शुभारंभ के साथ ही बाहर वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण की विधिवत् शुरुआत तथा महाकाल के वासंती संदेश के साथ अपनी स्थूल काया को निर्धारित अवधि में महाप्रयाण द्वारा सूक्ष्म में विलीन करने की घोषणा भी इसी अखण्ड दीपक की साक्षी में हुई हैं। अखण्ड दीपक युगपरिवर्तन के इतिहास का, नई सहस्राब्दी के परिवर्तन वेला के आगमन का एवं नवयुग-सतयुग के शुभारंभ का साक्षी हैं। महापूर्णाहुति वर्ष की इस वेला में यह विशेषाँक इस अखण्ड दीपक के 75वें वर्ष में प्रवेश के साथ उस गुरुसत्ता के चरणों में समर्पित हैं, जो श्रद्धा एवं प्रज्ञा का समन्वित रूप हैं, जिसने युगपरिवर्तन की पृष्ठभूमि विनिर्मित कर श्रेय लूटने के लिए हम सभी को निमित्त बना दिया है। उस पावन प्रज्ञापुरुष को शत-शत नमन हैं।


Quotation

करो या मरो-हम निश्चित रूप से इन दिनों विषम परिस्थितियों के बीच रह रहे हैं। पौराणिक विवेचन के अनुसार इस असुरता के हाथों देवत्व का पराभव होना कहा जा सकता है। कभी हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यप, वृत्तासुर, भस्मासुर, रावण और कंस आदि ने जो आतंक उत्पन्न किए थे वह आज की परिस्थितियों के साथ पूरी तरह तालमेल खाता है। पुनरावृत्ति स्पष्ट परिलक्षित होती हैं। उन दिनों शासकवर्ग का ही आतंक था, पर आज तो राजा-रंक, धनी-निर्धन, शिक्षित-अशिक्षित, वक्ता-श्रोता सभी एक राह पर चल रहे हैं। छद्म और अनाचार ही सबका इष्टदेव बन चला हैं। नीति और मर्यादा का पक्ष दिनोंदिन दुर्बल होता जाता है। उपाय दो ही हैं। एक यह कि शुतुरमुर्ग की तरह आंखें बंद करके भविष्यता के सामने सिर झुका दिया जाए। जो होना हैं उसे होने दिया जाए। दूसरा यह कि जो सामर्थ्य के अंतर्गत हैं उसे करने में कुछ उठा न रखा जाए।


संक्राँति का प्रथम पर्व

सन् 1000 ई. भारत के भाग्यनिर्माण में निर्णायक वर्ष था। इसी साल महमूद गजनी ने अपना पहला आक्रमण किया। उसके इस पहले आक्रमण ने भारतवर्ष में सहस्राब्दी की प्रथम संक्राँति का बीज बोया। इतिहासकारों ने इस घटना को प्राचीन व मध्यकालीन ऐतिहासिक परिस्थितियों के बीच विभाजक रेखा माना। इस घटना के पूर्व जगद्गुरु शंकराचार्य के प्रयासों से देश की साँस्कृतिक चेतना अखंड रूप से विकसित हो रही थी। बीच में सिकंदर के विजय अभियान, यूयानी, कुषाण, शक, हूणों आदि के आक्रमण व सिंध में अरबों की घुसपैठ आदि से इसमें व्यवधान अवश्य आए, किंतु ये सभी घटनाक्रम अस्थायी थे। इसके समाप्त होते ही देश की सामाजिक एवं साँस्कृतिक चेतना ने इनके प्रभाव को सरलता से अपनी जीवनधारा में आत्मसात् कर लिया।

सन् 1000 ई. के बाद के कुछ दशकों में महमूद गजनी का अंतिम आक्रमण होने तक हुई भारी उथल-पुथल के बीच राष्ट्रीय चेतना लुप्त होने लगी थी। उत्तरी भारत को 150 वर्षों तक स्थिरता देने वाला कन्नौज का साम्राज्य विखंडित हो चुका था। पूर्वी भारत में पाल, चंद्र वर्मन और गंग आपस में संघर्ष कर रहे थे। दक्षिण में दो शतक तक शासन करने वाली राष्ट्रकुल की सत्ता भी बिखर चुकी थी। सामाजिक जड़ता एवं क्षेत्रीय आकाँक्षाओं के कारण राजा लोग अलग-अलग बँटे हुए थे। सन् 1178 ई. में पृथ्वीराज चौहान ने दिल्ली का शासन सँभाला इतना ही नहीं 11191 ई. में तराई के पहली लड़ाई में मोहम्मद गोरी को बुरी तरह पराजित भी किया, लेकिन 1192 में उन्हें आपसी फूट एवं विद्वेष के चलते गोरी से पराजित होना पड़ा। यद्यपि 1203 ई. में गजनी लौटते समय सिन्धु नदी के पास खोखर समूह के लोगों ने गोरी को हराने के साथ उसकी हत्या कर दी और इसी वर्ष 24 जून को कुतुबद्दीन ऐबक दिल्ली का पहला मुस्लिम सम्राट बना।

‘स्टोरी ऑफ सिविलाइजेशन’ में विल डूरेंट लिखते हैं-”भारत पर विदेशी आक्रांताओं की यह विजय विश्व इतिहास की सबसे रक्तरंजित कहानी हैं। आक्रांताओं ने सोमनाथ प्रभृति देवालयों का ही ध्वंस नहीं किया, यहाँ की साँस्कृतिक भावधारा को भी प्रदूषित करने की चेष्टा की।” इस बीच पश्चिमी जगत् में रोमन साम्राज्य के खंडित भग्नावशेषों के ऊपर आधुनिक यूरोप की नींव रखी जा रही थी। सन् 1000 ई. में अर्द्ध सभ्य यूरोप स्वयं को सुसभ्य बनाने की कोशिशों में जुट गया था। 11वीं, 12वीं, 13वीं शताब्दी में यूरोप में तो धर्मयुद्धों के नाम पर भीषणतम मारकाट की शृंखलाएं भी चलीं।

भारतवर्ष में तेरहवीं शताब्दी शुरू होने के बावजूद उथल-पुथल में कोई कमी नहीं आई थी। 1236 से 1240 ई. तक रजिया बेगम का शासनकाल रहा। 1247 से 1266 ई. में नसिरुद्दीन महमूद ने शासन किया। 1266 से 1287 ई. तक शासनसत्ता गयासुद्दीन बलवन के हाथों में रही। उसके अवसान के साथ ही अंततः गुलाम वंश का पतन हो गया।

इसके बाद शासनसत्ता खिलजियों के हाथ लगी। 1296 ई. में बलवन के पोते कैकोबाद की हत्या के साथ ही जलालुद्दीन खिलजी ने शासन सूत्र सँभाला। 3 अक्टूबर 1296 ई. को अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली के शासन पर कब्जा जमाया और 2 जनवरी 1306 ई. को अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु होने के साथ खिलजी वंश का अवसान हो गया। इसके कुछ वर्षों बाद 8 सितम्बर 1320 ई. को गाजी मलिक तुगलक ने तुगलक वंश के शासन की स्थापना की। 1325 में मुहम्मद बिन तुगलक गद्दीनशीन हुआ। जिसके द्वारा अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद, बाद में दौलताबाद से दिल्ली लाने-ले-जाने के किस्से आज तक मशहूर है। इसी बीच दक्षिण भारत में 1336 ई. में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हुई। इसी के कुछ वर्षों के अंतराल में दक्षिण भारत में ही बहमनी सल्तनत की स्थापना 1345 ई. में अलाउद्दीन बहमनीशाह ने की। इधर का तख्त 1351 ई. में मुहम्मद तुगलक का सिंध में निधन होने से खाली हो गया। देश की स्थिति लगातार की उलट-पुलट एवं हेर-फेर से बाद से बदतर होती जा रही थी।

इसी समय 1398 ई. में तैमूर वंश का जोरदार आक्रमण हुआ और चारों और तबाही के नजारे दिखाई देने लगे। तभी 14वीं सदी के प्रवेश के दूसरे दशक में खिर्जा खान ने सैयद वंश का शासन स्थापित किया, लेकिन यह ज्यादा समय तक टिक न सका और 1451 ई. में पहले अफ़गान सुलतान के रूप में बहलोत लोदी गद्दीनशीन हुआ, इसके बाद सिकंदर लोदी का शासन आया। सिकंदर लोदी के बाद शासनसत्ता इलराहिम लोदी के हाथों में आई 21 अप्रैल 1526 को इलराहिम लोदी और बाबर के बीच पानीपत की पहली लड़ाई हुई। इसमें इलराहिम लोदी को पराजित होना पड़ा। 16 मई 1527 को हुई कनवाह की लड़ाई में मेवाड़ के राणासाँगा की भी हार हुई। 6 मई 1429 को घघरा की लड़ाई में महमूद लोदी को भी बाबर के हाथों पराजित होना पड़ा। बाबर की इस विजय से ही मुगल साम्राज्य की नींव मजबूत हुई।

मुगल साम्राज्य की स्थापना से कुछ पहले सिकंदर लोदी के समय कबीर का आविर्भाव 15वीं सदी में हुआ। भारतीय इतिहास में यह समय राजनीतिक उथल-पुथल और संक्राँति का समय माना जाता है। यूरोप में भी यह समय पर्याप्त उथल-पुथल से भरा था। 1336 से 1443 ई. तक इंग्लैंड और फ्राँस के बीच लगभग सौ वर्षीय युद्ध लड़ा गया। इस सौ वर्षीय युद्ध के अंत तक फ्राँस राजतंत्र काफी सशक्त हो गया, लेकिन इंग्लैंड की शक्ति भी कुछ कम नहीं हुई। भारत की स्थिति इन दिनों कुछ ज्यादा ही विषम थी। इस समय उत्तर भारत के राजपूत वंश प्रायः अपना प्रभाव खो चुके थे। दिल्ली में मुसलमानों का शासन स्थापित हो चुका था। उत्तर भारत में केन्द्रीय शक्ति का अभाव था। जौनपुर, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, कामरूप, मालवा, गुजरात, कश्मीर, मेवाड़, मारवाड़, और, ग्वालियर, आदि कई स्वतंत्र राज्य कायम हो चुके थे।

दिल्ली की राजसत्ता भी आखिर इन सदियों में कहाँ स्थिर रह सकी। कुछ वर्षों में पाँच राजवंश-गुबमवंश, खिलजीवंश, तुगलकवंश, सैयदवंश, और बेदीवंश स्थापित और विघटित हुए। दिल्ली सल्तनत में गुबमवंश का काल इसका ऊषाकाल, खिलजीवंश का काल इसका मध्यतनकाल, तुगलकवंश का काल इसका पतन काल एवं बेदीवंश का काल इसके अंधकारगमन काल साबित हुआ। संक्राँति का जो पहला स्पंदन गजनी के आक्रमण के समय उठा था, वह थमा नहीं, उत्तरोत्तर बढ़ता गया। संक्राँति की पहली लहर जो सोमनाथ के मंदिर के ध्वंस के समय में उठीं थी वह और व्यापक एवं विशाल होती गई।

उथल-पुथल की यह भयावहता राजनीतिक परिदृश्य तक ही सीमित न रही, इसका असर समाज एवं संस्कृति पर भी पड़ा। परस्पर घृणा एवं विद्वेष उत्तरोत्तर बढ़े, छुआछूत और अधिक पनपा। संकीर्णता की खाइयाँ पटने के स्थान पर अधिक चौड़ी हुई। अपने को बड़ा मानकर औरों को छोटा दिखाने की प्रवृत्ति इतनी अधिक पनपी कि पूरा समाज ही इससे घिर गया। यह वह समाज था, जिसे समन्वय के संदेश की आवश्यकता थी। इस समय ऐसे महामानव की आवश्यकता थी, जो सभी को, हिन्दू-मुसलमान को प्यार से समझाए और फटकार कर सही राह पर ले जाए, जो हिन्दू और मुसलमान दोनों का ही हो। इतना ही नहीं जो हिन्दू और मुसलमान से बढ़कर एक इनसान हो। महात्मा कबीर कुछ ऐसे ही थे। नियति ने उन्हें संक्राँति के इस प्रथम पर्व का पुरोधा बनाया था।


Quotation

जनमानस का परिष्कार करने की महती आवश्यकता को पूरा करने में जिनका मन उपयुक्त भूमिका निबाहने के लिए हुलसित हो, उन्हें प्रयास का आरंभ अपने आप से करना होगा। दूसरों से कुछ करने के लिए कहा जाए तो यह आवश्यक नहीं कि वह परामर्श को मान ही ले और मार्गदर्शन के अनुरूप अपनी गतिविधियों को मोड़ ही ले, किंतु उस अनुशासन का परिपालन अपने आप के लिए, हर मनस्वी के लिए तो सहज संभव हो सकता है। अपने ऊपर तो अपना अधिकार पूरी तरह हैं हैं, फिर उसमें अवज्ञा का प्रश्न सामने आ ही नहीं सकेगा। अपने को सुधार लिया जाए तो अन्यायों को उसका अनुसरण करने के लिए प्रस्तुत वातावरण ही दबाने-दबोचने में पूरी तरह समर्थ हो सकता है। साँचे में ढलकर ही खिलौने और पुरजे बड़ी संख्या में ढलते-विनिर्मित होते चल जाते हैं। दूसरों को उपदेश देकर उन्हें इच्छित दिशा में चलाया जा सका होता तो अब तक न जाने कब की सारी दुनिया सुधर गई होती।


युगनायक कबीर का समन्वय संदेश

‘समन्वय का संदेश’ कबीर के व्यक्तित्व का यही सार्थक पर्याय हैं। अगले इसी वैशिष्ट्य की वजह से वह सहस्राब्दी के प्रथम संक्राँति पर्व के नायक बने। हाँ यह अलग बात है कि महात्मा कबीर के समन्वय का ढंग भी उनके अनुरूप ही निराला था। अपने इस समन्वय के लिए उन्होंने कभी भी किसी पक्ष के दोष-दुर्गुणों से, उसके अवगुणों से कोई कमियों को छिपाया-लाख्शा, बल्कि उन्होंने बेबग फक्कड़पन से इन सबको तार-तार कर डाला। रुई की तरह समाज के सभी वर्गों को धुनकर रख दिया। एक सच्चे जुलाहे की भाँति गुणों (धागों) को उकेरा-निकाला और फिर अपनी अद्भुत रीति से समन्वय-सद्भाव की चादर बनाई।

इनके समक्ष चुनौती के आकार और आयाम भिन्न थे। उनके जन्म वर्ष के आसपास ही तैमूर लग का आक्रमण हुआ था। तुगलक सुलतान मोहम्मद पर तैमूर ने जिहाद बोला था। इस्लामी समाज आततायियों के जुल्म पथभ्रष्ट हो गया था। कबीर ने देखा कि बेदी बादशाह ने इटावा के सुलतान मोहम्मद शर्की और जौनपुर के शासक मोहम्मद सुलतान को इस्लाम के नाम पर हराया। प्रतिक्रिया में आतंकित हिंदुओं ने रक्षातंत्र रचा जिसने धर्मांधता और रूढ़िवादिता को बढ़ावा दिया। मजहब जुल्म का पर्याय हो गया तो धर्म कायरता का प्रतीक। ऐसे समय में बेकास्था को पटरी पर लाने का काम कबीर ने किया। आर्थिक तौर पर भी समाज कंगूरों और पायदानों में बँट गया। तभी अमीरी और गरीबी से अलग फकीरी का प्रचार कबीर ने किया।

खरी कहने में उनका कोई सानी न रहा था। समय ने उनके सामने जो भी चुनौती रखी थी, उससे वे भागे नहीं, जूझे। उन्होंने बेकजीवनी को चेताते हुए कहा-क्यों तुम हर छोटी-बड़ी बात के लिए पंडितों और मुल्लाओं का मुँह देखते हो। अरे खुद भी कुछ करो। उनके शब्द हैं।

पंडित मुल्क जो लखि दिया, वो ही रटा तुम किछु न किया।

उनकी प्रखरता की धार पंडितों एवं मुल्लाओं के सामने ही नहीं स्वयं बादशाह के सामने भी कुँद न पड़ती थी। ऐसी ही खरी सुनाने के कारण ही तो कहते हैं कि बादशाह सिकंदर बेदी ने उन्हें जंजीरों में बाँधकर गंगा में फिंकवा दिया था, पर ईश्वर कृपा ने उन्हें बचा लिया। इस घटना की याद दिलाते हुए उनके ही पद का एक अंश हैं-गंग गुसाइन गहिर गंभीर, जंजीर बाँधी करि डरे कबीर। गंगा को लहरि मेरी टूट जंजीर, मृगछाल पर बैठे कबीर।

उन्होंने एक नहीं अनेक कष्ट सहे, पर सच्चाई कहने से चुके नहीं। उनका झगड़ा तो समाज को गुमराह करने वालों से था, हिन्दू-मुसलमान से नहीं। यही कारण हैं कि दोनों ही उनके अपने हुए। दोनों ने ही उन्हें अपनाया। आज के दौर में भी जब हम इक्कीसवीं सदी की देहली पर आ खड़े हुए हैं, उनके समन्वय के संदेश का महत्व कम नहीं हुआ हैं। तब से अब तक व्यवस्थाएँ भले ही अनेकों बार बदल चुकी हो, पर जातीय आग्रह, कुबें का अमानवीय दर्प, वर्गवैषम्य कहाँ कम हुआ हैं? इस दौर का समाज केवल जातीय विषमताओं, क्षेत्रीय

ईसा का क्रूस पर चढ़ना, सुकरात का विष पीना, कृष्ण को तीर लगना, पाँडवों का हिमालय में गलना, गाँधी का गोली खाना, आद्य शंकराचार्य को भगंदर होना यह बताता है कि अगलेा महान् प्रयोजनों के लिए जिन्हें स्थूल से सूक्ष्म में प्रवेश करना होता है, वे उपलब्ध शरीर का इस प्रकार अंत करते हैं जिसे बलिदान स्तर का, प्रेरणा प्रदान करने वाला और अपने चलते समय की पवित्रता, प्रखरता प्रदान करने वाला कहा जा सके।

असमानताओं और विद्रूप सामाजिक संस्कारों से ही नहीं घिरा, बल्कि धार्मिक गुरुओं, संकीर्ण मन विचारकों और स्वयंभू देवों, पैगम्बरों द्वारा स्थापित की गई समक्ष की संवेदनहीन सीमाओं और कर्मकाण्डों की अनन्य परिपाटियों से उसी तरह ग्रस्त हैं, जिस तरह विज्ञान और संचार तकनीक विहीन मध्ययुगीन समाज ग्रस्त था। मनुष्य मात्र के प्रति सहज करुणा के विरुद्ध मात्र बाह्योपचार के आधार पर शत्रुभाव जगाने वाली प्रवृत्तियां आज भी उसी तरह जीवित हैं, जिस तरह उनके अपने काल में थी। हिन्दू और मुसलमानों से आज भी वही कहा जा सकता है। जो उन्होंने अपने समय में कहा था।न जाने तेरा साहब कैसा?

मस्जिद भीतर मुल्क पुकारे, क्या साहब तेरा बहिरा है? चिउंटी के पग नेवर बाजे, सो भी साहब सुनता है। पंडित होय के आसन मारे, लंबी माला जपता है। अंदर तेरे कपट-करतनी, सो भी साहब लखता है।

महात्मा कबीर भेदभाव एवं विषमता पैदा करने वाले बाह्योपचार पर निरंतर आघात करते रहे। वह इन्हें मनुष्य को वास्तविक जीवनलक्ष्य से भटकाने का कारण मानते रहे। अपने-अपने पक्ष में अल्लाह, विष्णु, कृष्ण महादेव, गोरख, गोविंद, केशव, ईश्वर, राम हरि, ब्रह्म, खुदा, रब, करीम आदि के नाम पर दिए गए तर्कों वादों और विवादों, समर्थकों और विरोधियों, असहिष्णुताओं और शत्रुताओं से विभाजित समाज को प्रेम का पाठ पढ़ाने की कोशिश करते रहे। उनका यह प्रेम किसी अगम अगोचर के प्रति दिखते हुए भी मनुष्यमात्र के प्रति था और इसे ही वह श्रेष्ठ जीवन का बेहतर मूल्य मानते रहे। उनके अपने समय में जितने भी मत एवं पंथ प्रचलित थे। सभी के बीच समन्वय स्थापित करने का आधार उन्होंने प्रेम को ही बनाया। आज के दौर में भी हम उनके स्वरों को फिर से दोहरा सकते हैं-

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित हो॥

अपने युग की संक्राँति के नायक कबीर मनुष्य को अलग करने वाले, मनुष्य और मनुष्य के बीच भेद स्थापित करने वाले तथा मनुष्य को विराट् प्रेम की प्रतीति से विमुख करने वाले किसी भी व्यक्ति, भाव या विचार को स्वीकार नहीं करते। वह साफ शब्दों में कहते हैं-

हमारे राम-रहीम करीमा, कैसो अलह राम सति सोई। बिसमिल मेटि बिसंभर एकै, और न दूजा कोई ॥

दरअसल, उनकी बातों से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि उनका संदेश उस काल के लिए भी था, इस काल के लिए भी है। वह तो शाश्वत और सर्वकालिक है तभी तो इन दिनों मनाई जा रही उनकी 600वीं जयंती पर जहाँ एक और उनकी जन्मस्थली लहरतारा (काशी) में हजारों श्रद्धालु और साधु एकत्र हो रहें हैं, वहीं पिछले दिनों जर्मनी के हाइडर्लवग विश्वविद्यालय में दुनिया भर से एकत्र विद्वानों ने इक्कीसवीं सदी में इस क्राँतिकारी एवं आस्थावान् महान् संत की प्रासंगिकता की चर्चा की। कबीर जयंती का आयोजन इस विश्वविद्यालय के लिए विशेष महत्व का इसलिए भी था, क्योंकि इसकी स्थापना भी 613 वर्ष पहले हुई थी।

मैक्सिको के विद्वान डेविड बरेनेन ने लिटन अमेरिका के बुद्धिजीवियों पर कबीर के असर को स्वीकारा। ‘मारिओब ओफरीडी’ उनके साधनापक्ष को प्रभावकारी ढंग से बताया। लरिटेन के विद्वान थामस डाहनहार्ट कबीर से सूफी अंदाज से प्रभावित हैं जर्मन विद्वान बेटार लत्से ने तो कबीर के दोहों का जर्मन अनुवाद भी कर डाला है। स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय की लिडाहेस यह साफ−तौर पर कहती हैं कि अब कबीर अकेले भारत के लिए ही नहीं, समूची दुनिया के हो गए उनके अनुसार सहस्राब्दी की प्रथम संक्राँति के नायक कबीर का महत्व सहस्राब्दी की इस अंतिम महासंक्राँति के समय कही अधिक बढ़ गया हैं। जग−जाहिर बात यह भी है कि मनीषी और बुद्धिजीवी ही नहीं, सामान्यजन भी उनके दोहों एवं पदों को उत्साह के साथ अपना रहा हैं। अपने यहाँ के सांई, जोगी, मलंग, नट, भाट आदि लोक गायकों के कंठ स्वरों से होते हुए उनके पद अब पश्चिमी पॉप धुनों की भी शान बनते जा रहे हैं। कुमार गंधर्व की तरह वे भी अब कबीर के निर्गुण गाने लगे हैं। समाज के सभी वर्गों में प्रीति ही तो महात्मा कबीर का समन्वय संदेश था। इसी वजह से ही तो उनके दार्शनिक चिंतन से उस जमाने में भी नए युग की स्थापना हुई।


उन्हें जनसम्मान भी मिलता (kahani)

एक बार वाराणसी में गंगाघाट पर एक वृद्ध नहाने उतरे, पर पाँव फिसल गया और डूबने लगे। एक युवक तुरंत कूदा और वृद्ध बच गया। वृद्ध की प्रार्थना पर भी युवक ने कोई पुरस्कार लेना स्वीकार न किया। इस पर वृद्ध ने कहा, तो आवश्यकता पड़ने पर कलकत्ता आना, मैं अवश्य तुम्हारी सहायता करूंगा और उन्होंने पता युवक को दे दिया।

कुछ मास बाद युवक वृद्ध से मिले और कुछ कविताएँ सामने रखता हुआ बोले- इन्हें आप अपनी पत्रिका में छाप दें। कविताओं का स्तर देखकर व युवक की अनुचित माँग को देखते हुए वे बहुत दुखी हुए और बोल-एक बात कहूँ? सहमे युवक ने उत्तर दिया-कहिए। वृद्ध ने कहा- मैं इन्हें नहीं छाप सकता। तुम चाहो तो उस उपकार के बदले में मुझे फिर गंगा में धकेल दो। यह हैं आदर्शवादिता, सिद्धान्तों के प्रति निष्ठा। ऐसे व्यक्ति जीवन व्यापार में भले ही असफल रहें, उनका अंतःकरण उन्हें सदा आशीष देता है तथा उन्हें जनसम्मान भी मिलता है।


आगमन नए युग का समन्वय की दिशाधारा का

नया दर्शन ही नया युग बता है। कुरीतियों, मूढ़-मान्यताओं एवं अंधविश्वासों के अँधेरों से घिरे समाज की चेतना जब मंद लगती हैं, तो उसमें दार्शनिक चिंतन ही प्रखरता बता है। यद्यपि महात्मा कबीर की चेतना मूलतः आध्यात्मिक थी, परंतु वे समाज से विमुख न थे। अपने समय की सामाजिक चुनौतियों को स्वीकारने एवं इसके दायित्वों को निभाने को उनमें अपूर्व उत्साह था। हाँ यह वे अवश्य मानते थे कि प्रश्न चाहे निजी जीवन के हों या फिर सामाजिक जीवन के, उनका एकमात्र सही सार्थक एवं सटीक हल ‘अध्यात्म’ में ही निहित हैं। उनके दर्शन को आध्यात्मिक समाजवाद का नाम देना पूरी तरह समयोचित होगा। इस तरह आध्यात्मिक समाजवाद की दार्शनिक चिंतन प्रणाली के वे पहले द्रष्टा एवं संस्थापक थे इसी के आधार पर उन्होंने नवयुग के अभ्युदय की कल्पना की थी।

वह कहा करते थे कि यह सारा जगत् एक ही तत्व से उत्पन्न हैं इसलिए सभी प्रकार की भेद दृष्टि मिथ्या हैं। मानव-मानव में भेद तो परम अज्ञान का द्योतक हैं। अपनी इसी आध्यात्मिक दृष्टि से प्रेरित होकर उन्होंने जाति-पाँति, छुआछूत, ऊँच-नीच, और ब्राह्मण-शूद्र के भेद का जमकर विरोध किया। आज भी दुनिया के प्रायः सभी विख्यात समाजशास्त्री इस सत्य से एकमत हैं कि सभी तरह के भेदभाव को दूर कर ही एक सुँदर समाज का सृजन संभव हैं। हालांकि कोरा सामाजिक ज्ञान रखने वालों के लिए यह बता पाना निताँत असंभव हैं कि भेद मिटाने और एकता-समता लाने का वास्तविक आधार क्या होगा? महात्मा कबीर के लिए यह आधार मनका आध्यात्मिक ज्ञान था, जिसे वह सर्वजन सुलभ संभव मानते थे। वह अपनी धुन में गाते थे- “एक बूँद तैं सृष्टि रची हैं, को ब्राह्मण को सूदा।” यानि कि परमात्मा ने एक ही बूँद से सारी सृष्टि रची हैं ब्राह्मण और शूद्र का भेद क्यों?

उनका दार्शनिक चिंतन तो यही कहता था कि “एक नून तै सब जग कीआ, कौन भल कौन मंदे” अर्थात् एक ही नूर से सारा संसार रचा गया हैं, फिर भला कौन अच्छा है और कौन बुरा। छुआछूत का भेद भी उन्होंने इसी स्तर पर किया हैं। वह कहते हैं।

कहु पंडित सूचा कवन ठाऊ। जहां बैसि हउं भोजन खाऊ॥

माता जूठा पिता भी जूठा जूठे ही फल बगे। आवहिं जूठे जाँहि भी जूठे जूठे मरहिं अभागे॥

अगिनि भी जूठी पानी जूठा जूठे बैसि पकाया। जूठी करछी अन्न परोसा जूठै जूठा खाया॥

गोबरु जूठा चउका जूठा जूठै दीनी कारा। कहैं कबीर तेई जन सूचे जे हरि भजि तजेहि विकारा॥

अर्थात् पंडित तुम कहते हो कि पवित्र स्थान पर भोजन करना चाहिए। बताओ कौन-सा स्थान पवित्र हैं? विचार करने पर तो माता-पिता भी जूठे हैं और वृक्षों में लगने वाले सारे फल भी झूठे हैं। अग्नि और जल भी जूठे हैं। गोबर और चौका भी जूठा हैं और जूठी करछी से ही अन्न परोसा जाता है। वस्तुतः पवित्र और शुद्ध तो वे ही लोग हैं, जिन्होंने श्री हरि की भक्ति करके अपने मन के विकारों को दूर कर लिया हैं।

महात्मा कबीर के इस आध्यात्मिक समाजवादी चिंतन ने सामान्य जनता के साथ समकालीन संतों-विचारकों को भी प्रभावित किया। एक प्रसंग के अनुसार संवत् 1553 या 1554 में सिख पंथ के प्रवर्तक गुरुनानक देव जी की भेंट स्नान करते समय किसी नदी के किनारे उनसे हुई। इस भेंट ने नानकदेव जी को बहुत प्रभावित किया। वह कबीर का प्रभाव ही हैं कि गुरु ग्रंथ साहिब में कबीर की अनेकों रचनाएँ आज भी पढ़ी जा सकती हैं। इसके अलावा संत रैदास, दीपा, धन्ना, एवं सेन जैसे कबीर के समसामयिक संत उनके प्रति श्रद्धा भाव रखते थे। कबीर के परवर्ती संतों में दादू, रज्जब, सुँदरदास, मलकदास, हरिदास, निंरजनी, उदादास, धर्मदास, दरियादास, गरीबदास, बूबसाहब, गुबल साहब आदि अनेक दासों ने कबीर को अपना आदर्श माना और उनके मत एवं पंथ का स्वीकार किया।

कई विख्यात इतिहासवेत्ताओं के अनुसार संत कबीर द्वारा प्रेरित-प्रवर्तित इस नए दर्शन की स्वीकारोक्ति दिनों-दिन बढ़ती गई। लोकमत ही नहीं राजमत भी इससे प्रभावित होने लगा। बाबर तो यहाँ आया ही था आक्राँता बनकर, उसने तो किसी भी प्रकार की सहिष्णुता की आशा ही नहीं थी। हुमायूं को अधिक दिनों तक शासन का मौका ही नहीं मिला। अकबर के विचार कबीर के दार्शनिक चिंतन से प्रभावित हुए बिना न रहे। यह महात्मा कबीर की चिंतनधारा ही थी, जिसमें निमग्न होकर शहंशाह अकबर धीरे-धीरे मुल्लाओं के प्रभाव से मुक्त हो गया। उसने हिंदुओं के प्रति सहिष्णुता की नीति अपनाई। इतना ही नहीं, उसने युद्ध बंदियों को दास और मुसलमान बनाने की प्रथा पर 1562 ई. में रोक लगाई। हिंदुओं को तीर्थयात्रा कर से मुक्त कर दिया। वह हिंदुओं के प्रति इतना सहिष्णु हो गया था कि 1564 ई. में उसने जजिया समाप्त कर दिया। उसने अपनी भेदभावपूर्ण सभी नीतियों के समान ही हिंदुओं को भी दरजा दिया। उसने हिंदुओं की भावनाओं को ध्यान में रखकर स्वयं गौमाँस का प्रयोग और सार्वजनिक रूप से गौवध वर्जित कर दिया।

यह महात्मा कबीर के दार्शनिक चिंतन का ही चमत्कार था, जिसने अकबर के शासनकाल में नवयुग के अभ्युदय की कल्पना को साकार किया। कतिपय प्रख्यात इतिहासवेत्ता भी इस सच को स्वीकार करते हैं कि कबीर साहब के दार्शनिक चिंतन को स्वीकार करके ही अकबर ने परंपराओं की तुलना में विवेक को महत्व दिया। यही नहीं उसने धर्मान्ध व्यक्तियों के घृणाभाव को दूर करने के लिए और धार्मिक विद्वेष को समाप्त करने के लिए विभिन्न धर्मों में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया और इसका नाम तवहीदेइबही (दैवी एकेश्वरवाद) रखा। यह विभिन्न धर्म के लोगों को सन्निकट बनाकर सामाजिक-धार्मिक भ्रातृ-संप्रदाय स्थापित करने का प्रयास था। इसकी रचना सुलहे कुल के सिद्धांत को आधार मानकर की गई थी। इसमें सभी धर्मों की अच्छी बातों को समावेश था।

सम्राट् अकबर के समय ही इतिहास लेखक मोहसन फानी के अनुसार इसी क्रम में बादशाह ने एक और प्रयास किया- ‘दीन-ऐ-इबही’ की स्थापना। यह सभी संप्रदायों में एकता और उनमें पारस्परिक समन्वय का प्रयास था। दीन-ऐ-इबही के प्रवर्तक के रूप में उसने सार्वजनिक सहिष्णुता की नीति अपनाकर राष्ट्रीय आदर्शवाद का उदाहरण प्रस्तुत किया। इतिहासकार मोहसन फानी ने अपने ग्रंथ ‘दबिस्तान ए मज़हब’ में दीन-ऐ-इबही के कुछ मुख्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया हैं-1. उदारता और उपकार 2. साँसारिक इच्छाओं से विरक्ति 3. अपराधी को क्षमा करना 4. प्रत्येक के लिए विनीत, कमोल और मधुर शब्दों का प्रयोग, 5. संपर्क में आने वाले सभी लोगों के साथ सद्व्यवहार करना 6. आत्मा को ईश्वरीय प्रेम में समर्पण करना। कबीर के दार्शनिक चिंतन को आत्मसात् करने वाले यह अच्छी तरह अनुभव कर सकते हैं कि दीनं-ऐ-इबही की उपर्युक्त सभी बातें इस निराले संत के कथन को दुहराने के सिवा कुछ नहीं हैं।

इन बातों को मानने, स्वीकार करने एवं प्रयास करने से समूचे देश में सहिष्णुता एवं सद्भाव का वातावरण तो बना ही, साथ ही कब-संस्कृति एवं ज्ञान-विज्ञान की थी खूब प्रगति हुई। संपन्नता एवं समृद्धि की दृष्टि से भी यह काल सर्वोपरि साबित हुआ। इतिहासकारों ने अकबर के काल को भारतीय इतिहास में साँस्कृतिक पुनरुत्थान का युग कहा। असंदिग्ध रूप से यह एक नए युग की शुरुआत थी। इसकी प्रभा जहांगीर एवं शाहजहां के शासनकाल में भी दिखाई देती रही। इतिहासकार अलदुल हमीद बहौरी एवं चंद्रभान ब्रह्मन ने शहंशाह शाहजहां के काल को मुगल का स्वर्णयुग भी कहा। इसी समय शाहजहां के ज्येष्ठ पुत्र दारा ने उपनिषद् भगवद्गीता एवं योगवासिष्ठ आदि ग्रंथों का अनुवाद किया, परंतु औरंगजेब के आगमन के साथ ही अकबर के शासनकाल में प्रारंभ हुआ नवयुग अब अस्त होने लगा। अभ्युदय के उजाले को रात का अँधेरा ढँकने लगा। इतिहास के वे फल फिर से किसी की प्रतिक्षा में आतुर हो उठे।

हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा

जो दूसरों से कहना और कराना हैं, उसे कार्यान्वित करने के लिए शुभारंभ अपने साथ से ही करना चाहिए और जो निश्चय किया हैं, उस पर दृढ़तापूर्वक आरुढ़ रहना चाहिए। बेपैंदी के लोटे की तरह इधर से उधर लुढ़ककर अपने को उपहासास्पद नहीं बनाना चाहिए। संकल्पों को, निर्धारित निश्चयों को उस दिशा में तो पूरा किया ही जाना चाहिए, जब वे सुधार, संयम जैसे आदर्शवादी पक्ष के साथ जुड़े हों। रामायण की यह चौपाई हर प्रामाणिक व्यक्ति को ध्यान में रखे ही रहना चाहिए, जिसमें कहा गया हैं “प्राण जाहिं पर वचन न जाहिं” नित नई प्रतिज्ञाएँ करने वाले और जोश ठंडा होते ही गिरगिट की तरह कुछ-से कुछ बन जाने वाले लोग अपनी हँसी कराते और अविश्वास का वातावरण बनाते हैं

परिवर्तन के क्षणों में सतत् मुखरित कबीर के स्वर

वह नए मानव का विद्रोह था। स्वतंत्रता बुद्धि की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए मनुष्य ने पहली पुकार उठाई थी। विचारक्राँति के स्वर में परिवर्तन के क्षण मुस्कराए थे। वद दीन जनता का पहला स्पष्ट स्वर निनाद था। उसे लोगों ने दबाने की बहुतेरी कोशिशें कीं, पर वह दब सका। दबता तो भी कैसे?

वह तो मेहनत की कमाई पर पलने वाला आदमी था। जाति भी नहीं, कुल भी नहीं, धनहीन, परंतु अपराजित। उस दिन वह खाने बैठा था। पत्नि रोटी लेकर आई। सिर्फ दो रोटियाँ थी। उसमें से एक छोटे बेटे को दी। आधी खुद ली और आधी उसे दी। पति को रोटी का आधा टुकड़ा देते समय उसके चेहरे पर संताप गहरा गया। जैसे वह कह रही हो, ऐसे कब तक चलेगा, आधी रोटी और पूरा दिन.......?

रोटी को हाथों में लेते हुए वह हँसे, जैसे उन्होंने पत्नि के मन की बात समझ ली हो। बोल तुम दुःखी क्यों होती हों बेटी? सुनो

आधी अरु रूखी भली, सारी सों सन्ताप। जो चाहेगा चुपड़ी, बहुत करेगा पाप॥

बेटी भी उनकी इस बात पर मुस्करा दी। तीनों ने पानी के साथ रोटी खाई। रोटी खाकर अभी वह उठे ही थे कि बाहर से आवाज आई-कबीर! लगता है किसी ने पुकारा था। उन्होंने बाहर झाँककर देखा, चह तो मंझन थे, उन्हीं के अपने पड़ोसी। इन्हें देखकर वह कहने लगे अरे मंझने भाई, बीच दोपहर कहाँ पड़े पड़े?

गली के उस मोड़ पर जोगी तमाशा कर रहें हैं। सुनते हैं उनमें से एक तो आसन लगाकर उड़ जाता है। एक कहता हैं-यह सब जोग की शक्ति है, परंतु जोग करना है तो नारी से दूर रहो। नारी तो नरक की खान है। तुम भी चले कबीर! उनकी बातें सुनेंगे और मजेदार तमाशा देखेंगे।

कबीर फक्कड़ हंसी हँसे। अरे! तमाशे में तमाशा क्या देखना भाई, यह दुनिया भी तो एक तमाशा है। पर जब मंझन नहीं माने तो पड़े पड़े। कुछ दूर चलने के बाद देखा-सचमुच में कुछ जोगी पास खड़ी भीड़ को अपने चमत्कार दिखा रहे थे। थोड़ी देर तो वह भी मजे से देखते रहे, फिर बोल पड़े -

आसन उड़ए कौन बड़ाई। जैसे काग चील्ह मँडराई॥

जैसी मिस्त तैसी हैं नारी। राजपाट सब गिनै उजारी॥

जैसे नरक तस चंदन माना। बाउर तस रहै सयाना॥

के लिए बहिश्त का प्रयोग उन नारी विरोधियों के लिए उठा। उनके मार्ग को उन्होंने विनाशमार्ग कहा। उन्हें बुद्धिहीन तक कह दिया। कहा-कबीर साहब ठीक कहते हैं। इन में क्या धरा हैं। असली चीज तो भगवान् से प्रेम हैं मन की निर्मलता और जीवन की पवित्रता है। जनमानस बदले रहा था। काशी में परिवर्तन तरंगें उठ रही थी।

बुद्ध से आनंद ने कहा-जहां हम जा रहे हैं, वहाँ तो बहुत विरोधी हैं। हम कैसे उनका सामना करेंगे? बुद्ध ने कहा- भदंत! अधिक से अधिक वे गाली देंगे। बस चल, तो मारेंगे। पर यदि हम आत्मबल संपन्न हैं, अपने उद्देश्य पर दृढ़ हैं तो बिना हमारे आवेश में आए हमारे विरोधी शाँत हो जाएँगे। इन शब्दों ने शिष्यों का मनोबल बढ़ा दिया व वे दुगुने साहस से परिव्रज्या पर पड़े पड़े।

वहाँ की राहों पर कबीर की ललकारें रोज ही गूँजती आबाल-वृद्ध सुनते। उनमें विद्रोह-सा जाग उठता। कबीर के शब्द पुराने विश्वासों को झकझोर उठते। नए भावों के सिंह अंधकारमयी दिमागी गुफाओं में भूखे से गरजने लगते और बाहर आकर रूढ़ियों के शिकार करने को व्याकुल हो उठते। सारी काशी उनकी बात सुनकर झूमती थी। परंतु मुल्ला और पंडित नहीं सुनते। यह जुलाहा। नीच! धर्म और मज़हब के विरुद्ध बोलता है। पर कबीर तो अक्खड़ थे। भरी सड़क पर भीड़ के बीच गाने लगे-

मेटहूँ काहु ने वेद पढ़ाया, सुनति कराय तुरक नहिं आया।

नारी गोचित गर्भ प्रसूती, स्वाँग करै बहुतै करतूती।

तहिया हम तुम एकै बेहू, ऐकै प्राण बियायल मोहूँ।

पथ पर लोगों में हलचल मच गई। पंडित चिल्लाया-पापी है। मुल्ला चिल्लाया-काफिर भी नहीं, दोखला का रास्ता है। और जनता में विचारक्राँति का झंडा फहराने लगा। कबीर ने आदिनाथ किया था।

उन्होंने गर्जन किया कि इस देश में कोई हिन्दू और मुसलमान नहीं। उन्होंने पुराने अहंकार और नए अहंकार दोनों पर समान रूप से चोट की। उन्होंने कहा मनुष्य-मनुष्य हैं। उन्होंने नारा दिया-मानव एक समान है। उनके इन स्वरों के समर्थन में प्रचंड जन-रच आ मिला।

भीड़ को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा-यह देश अपना हैं। हम विदेशियों के रंग में रंगेंगे नहीं, क्योंकि वे भटके हुए हैं, यह देश कुलीन उच्चवर्णों की संस्कृति का भी नहीं हैं, जिसे ही सब कुछ मान लिया जाए, जिनके अन्याय और पाप को धर्म संस्कृति के नाम पर बचाया जाए। हमें तो एक नए मनुष्य के लिए नई जमीन तैयार करनी हैं। जिसमें विदेशियों की विलासिता और प्रदर्शन न हो। जहां उच्चवर्णों का दंभ न हो। जहां ऊँच-नीच की जगह सिर्फ इनसान हो।

कबीर ने जो कहा, वह सत्य था जनता का। मनुष्य का। अपराजित मनुष्य का।

जो पिस रहा था, पर कबीर की फौलादी आवाज ने समाज की रूढ़ियों, अन्धविश्वासों, मूढ़मान्यताओं, जातिधर्म की दीवारों और अत्याचारियों की तलवारों को दिग्भ्राँत कर दिया।

कबीर की पुकार जनता की रोटी के साथ बढ़ने लगी। और फिर गजब हुआ। वे निम्न कहीं जाने वाली जातियाँ जो इस्लाम के अधिकार की चकमक में मुसलमान हो गई उन्होंने भी फिर से अपनी पुरातन गरिमा को पहचाना। उन्होंने स्वीकार किया कि वे भटक गई थीं और फिर वे कबीर के विचारों की छाप में आने लगीं। वहीं क्यों नए-पुराने हिंदू-मुसलमान, अमीर-गरीब जो भी इंसान थे, जिन्हें सच्चाई की तलाश थी, वे सब उनके सान्निध्य में आने लगें। जन-जन में नई चेतना फैलने लगी।

काशी उस समय भारत का हृदय भी थी। वहाँ सब धर्म अपने-अपने मठ किए बैठे थे। केवल कबीर के पास कुछ नहीं था, केवल शब्द था। वह इसी शब्द को ब्रह्म कहा करते थे-शब्दब्रह्म की ही तरह उनके शब्दों का विस्तार अनंत था। इसमें समाई उनकी चेतना भी ब्रह्म की ही भाँति अनंत थी, अमिट और अजर-अमर थी। इसे न मरना था, न मरी। न मिटना था, न मिटी। यह तो चिरयुवा और शाश्वत थी। वह कहा करते-

राम मरै तो मैं मरुं, नाही मरैं बबय। मैं तो राम का बालका, जो मरै न मारा जाय॥ उनके शब्दों के दीप से उनकों दीप जल।

मंझन को भी उनकी संगत ने साधु बना दिया। तमाशायी वृत्ति से अब उसमें जिज्ञासावृत्ति जाग-उठी। एक दिन उसने कबीर से पूछा-आप जिस परिवर्तन की बात कहते हैं, जिस एकता-समता के नए युग की अलख जगाते हैं, वह कब आएगा।

एक बार एक भक्त ने नानक से पूछा-आप कहते हैं कि सब पैसे वाले एक से नहीं होते। इसका क्या तात्पर्य हैं? नानक बोल-उत्तम लोग वे हैं जो उपार्जन को सत्प्रयोजनों के निमित्त खरच कर देते हैं, जमा करते हैं, पर सदुपयोग करना भी जानते हैं। तीसरी श्रेणी उनकी हैं, जो कमाते नहीं-कहीं से पा जाते हैं और उड़ा जाते हैं। ऐसे वेग संसार में पतन का कारण बनते हैं।

मंझन के इस सवाल ने कबीर को गंभीर कर दिया। जिस कबीर को लोग अक्खड़ और फक्कड़ कहते थे, उनकी आँखों में युगद्रष्टा की चमक आ गई। मुखमंडल पर ब्रह्मर्षि का सा तेज झलक उठा। वह कहने लगे-विचारों से ही क्राँति होती हैं। नया दर्शन ही नया युग बता है। परिवर्तन तो होकर रहेगा।

परंतु कब तक? कब तक देश के आँगन में आहें और सिसकियाँ गूँजती रहेंगी? कब तक नारी को अपमानित होना पड़ेगा?

मेरे न रहने के पाँच सौ सालों का समापन आते-आते सब कुछ बदले जाएगा। देश बदलेगा, जमाना बदलेगा, नया युग आएगा, परंतु चिंता न करो, मंझन बीच में भी अच्छा समय आएगा।

सन् 1518 में कबीर ने अपना शरीर त्याग दिया। परंतु परिवर्तन के इन क्षणों में उनके स्वर अभी भी वैसे ही हैं-तेजोदीप्त, प्रखर, अनिंद्य, अपराजित....।


इस सहस्राब्दी का अंधकार युग

अँधेरा दबे पाँव आया और छा गया। मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर की मृत्यु 26 दिसंबर 1530 ई. को हुई। उसके बाद इतिहास को कई अँधेरों-उजाले से गुजरना पड़ा। बाबर की मृत्यु बाद हुमायूं ने शासन सूत्र संभाला, किंतु 26 जून 1539 को उसे चौसा की लड़ाई में शेरशाह सूरी से पराजित होना पड़ा। 17 मई 1540 को भी शेरशाह ने उसे बिलग्राम (कन्नौज) की लड़ाई में बुरी तरह हराया। 22 मई 1545 को कलिजर की लड़ाई में हुए एक विस्फोट में शेरशाह की मृत्यु हो गई। इसके बाद 23 जुलाई 1555 को हुमायूं ने दिल्ली पर फिर से कब्जा कर लिया, लेकिन 24 जनवरी 1556 को सीढ़ियों से गिर पड़ने की वजह से उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद लगभग 4 सालों तक शासनसूत्र मुगल प्रधानमंत्री बैरम खाँ के हाथों रहा। 1560 ई. में बैरम खाँ के हाथों से शासनसूत्र अकबर ने स्वयं अपने हाथों में लिखा।

यही वे पल थे, जब रोशनी का जमाना आया। यह वही नवयुग था, जिसकी चर्चा पहले की जा चुकी हैं। 21 अक्टूबर 1605 ई. को अकबर का निधन हुआ और 3 नवंबर 1605 ई. को जहांगीर गद्दीनशीन हुआ। 11 जनवरी 1613 ई. को जहांगीर के हुक्म से अँगरेजों ने सूरत में अपनी फैक्टरी स्थापित की। 10 जनवरी 1627 ई. में श्री टामस रो मुगल दरबार में पहला अंग्रेज राजदूत नियुक्त हुआ। 7 नवंबर 1627 ई. को कश्मीर के पास जहांगीर की मृत्यु हो गई। 6 फरवरी 1627 ई. को शाहजहां ने शासन संभाला। 7 जून 1631 को उसकी बेगम मुमताज महल का निधन हुआ। 1646 ई. को ई. मुगल राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानाँतरित हो गई। इसी के कुछ वर्षों बाद अँधेरे ने अपने पाँव पसारे। 8 जून 1658 ई. को औरंगजेब ने आगरा के किले में शाहजहां को कैद कर लिया और 21 जुलाई 1658 को खुद शासन संभाल लिया।

औरंगजेब ने हिंदुस्तान की बादशाहत हासिल करने के लिए अपने पिता को जेल में डाल था। उदार हृदय दाराशिकोह सहित अपने अन्य सभी भाइयों की हत्या की थी। अगणित व्यक्तियों से रँगी-सनी सल्तनत उसने पाई थी। सल्तनत हासिल करने के बाद न तो उसका व्यवहार बदला और न ही उसके तौर-तरीकों में कोई बदलाव आया। कबीर और नानक के स्वरों का सहारा लेकर अकबर ने जो नीति बनाई थी, वह अब मटियामेट हो गई। रहीम, रसखान, सूर, तुलसी की सिखावन के साथ शासन करने वाले जहांगीर एवं शाहजहां की बातों का पूरी तरह से खात्मा हो गया।

अकबर से लेकर शाहजहां तक सभी मुगल बादशाहों ने हिंदुस्तान की जिस सामाजिक संस्कृति को पाल-पोसकर खड़ा किया था उसे औरंगजेब ने एक ही झटके में तहस-नहस कर दिया। वह हिन्दुओं का ही नहीं, हर उदारवादी का दुश्मन हो गया। अपनी कट्टरता की धार

संस्कृत का उद्भट विद्वान वरदराज विद्यालय के सबसे बुद्ध लड़कों में गिना जाता था। बहुत पढ़ने पर भी उसे कुछ याद न होता। एक दिन दुःखी होकर वह घर से भाग गया। रात एक सराय में बिताई। वहाँ उसने देखा कि एक टूटे पंखों वाला पतंगा दीवार पर चढ़ता और गिर जाता है, बीस बार असफल रहने के बाद इक्कीसवीं बार वह दीवार पर चढ़ने में कामयाब हो गया। इस दृश्य को देखकर वरदराज को एक नई दिशा मिली। वह हिम्मत बटोरकर घर बैठा और पढ़ाई में जुट गया। इस बार उसकी असफलता सफलता में बदले गई।

से उसने सूफी संतों को भी नहीं लाख्शा। सरमद जैसे महान् संत को उसने सूली पर चढ़ा दिया। उजाले के बाद यह जो अँधेरा आया था, उस पर उस दौर के किसी शायद ने कहा-

बेकसी मुद्दत तलक बरसा की अपनी गोर पर। जो हमारी खाक पर से होके गुजरा रो गया।

सचमुच में ही उस काल के भयावह अँधेरे में जो भी सौंदर्य पहले का था, वह खाक हो गया। यह खाक बची और उस पर रोने बचे। सिंहासन पर बैठते ही उसने मंदिरों को गिरवाना और उनकी मूर्तियों को तुड़वाना आरंभ कर दिया। उस समय काशी में विश्वनाथ, गुजरात में सोमनाथ और मथुरा के केशवदेव के मंदिर बहुत प्रसिद्ध थे, जो बुरी तरह से ध्वस्त कर दिए गए। 1680 ई. में उसकी आज्ञा से अंबर के सभी मंदिरों को गिरवा दिया गया। उसने यह आज्ञा निकाल दी कि हिंदू लोग न तो पुराने मंदिरों की मरम्मत और न नए मंदिरों का निर्माण कर सकते हैं। इतना ही नहीं, उसने वैदिक संस्कृति को विनष्ट करने का भरपूर प्रयत्न किया। उसकी आज्ञा से मुल्तान व बनारस में स्थित सभी शिक्षा संस्थानों को विनष्ट कर दिया गया। हिंदुओं पर जजिया कर को फिर से लगा दिया गया। पंजाब में सिखों के गुरु तेगबहादुर ने औरंगजेब की इस नीति का विरोध किया। बादशाह के खिलाफ बगावत फैलाने के अपराध में बड़ी क्रूरता के साथ गुरु तेगबहादुर का वध कर दिया गया। गुरु के वध का हाल जानकर सिखों के सनसनी फैल गई।

औरंगजेब से पहले के मुगल शासन में जा उन्नति-प्रगति हुई थी, वह अवनति और अवगति में बदलने लगी। मानवीय जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र न बचा, जो हाहाकार और चीत्कार ने अछूता रह गया। सामाजिक तौर पर समन्वय व सामंजस्य का वातावरण बिलकुल विनष्ट हो गया। हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग फिरकों में ही नहीं बंटे, एक-दूसरे को दुश्मन की नजर से भी देखने लगे। साँप्रदायिक घृणा के साथ जातीय घृणा भी फैली। उच्चवर्ण और निम्नवर्ण के लोगों के बीच पहले कभी जो सौहार्द्र पनपा था, वह अब बिल्कुल भी नहीं बचा। अँधेरे की आँधी इस काल में चली ही नहीं, सब और बढ़ती और फैलती भी गई।

पारिवारिक जीवन हालांकि उन दिनों संयुक्त ही था परंतु इसमें नारी की स्थिति अत्यंत विचित्र एवं दयनीय थी। वह मनुष्य होते हुए भी मनुष्येत्तर प्राणी की तरह जीवन बिताते के लिए विवश थी। उसके सार स्वप्न स्वयं को पतिव्रता सिद्ध करने और पति को प्रसन्न रखने में ही केंद्रित रहते थे। दूसरी ओर पुरुष उसे निर्बल बुद्धि वाली और महत्वपूर्ण मामलों में विश्वास के लिए अयोग्य समझता था। सामाजिक विधान एवं परंपराओं में उसे एक प्रकार से मानसिक रूप से अविकसित माना जाने लगा। नारी को मात्र उपभोग की वस्तु और केवल दासी मानने की रीति इन्हीं दिनों पड़े पड़ी। स्त्रियों, कुमारी कन्याओं को उठा ले जाना, बलात् उनका शीलहरण कर लेना शासकवर्ग के लिए बड़ी आम एवं सामान्य सी बात हो गई थी।

शिक्षा एवं संस्कृति के भग्नावशेष ही शायद उन दिनों बचे रहे रह गए थे। सामान्य ग्रामीण जनता के लिए ये दो शब्द स्वप्न सदृश ही थे। जब-तब जहां-तहाँ चारों ओर लूटमार का ही बोलबाला था। खड़ी फसलों को उजाड़ देना, उनमें घोड़े दौड़ना, फसलों-घरों में आग लगा देना उन दिनों ग्रामीण जीवन के लिए आम बातें हो गई थी। अराजकता एवं दमनचक्र का ही शोरगुल था। औरंगजेब की इन नीतियों के खिलाफ विद्रोह किया। सतनामियों का विद्रोह मुखर होकर प्रखर बना। सिखों एवं मराठों के विद्रोह की तो किंवदंतियां उस युग में गाई जाने लगीं।

इसी आपसी संघर्ष से राष्ट्रीय भावना तो विनष्ट हुई ही, भी टुकड़ों-टुकड़ों में बँट गया। मुगल सम्राट् की नीतियों ने राष्ट्र के गौरव एवं वैभव को बुरी तरह तहस-नहस किया। आपस की इसी फूट का ही तो शायद विदेशियों को इंतजार था। यूरोपीय समुदाय के लोग जो इसी ताक में बैठे थे, अब धीरे-धीरे अपनी संख्या को बढ़ाने के साथ अपना प्रभाव भी बढ़ाने लगे। पुर्तगाली डच एवं अंग्रेज इस देश को लूटने में जुट पड़े। भारत की संस्कृति को एक बार फिर पाश्चात्य संस्कृति से चुनौती मिलनी शुरू हो गई। यह फिर संक्राँति के द्वितीय पर्व का आगमन था। देश के व्यापक अस्तित्व के फलक पर नए प्रश्न उभरने लगे। संक्राँति की वेला फिर आ पहुँची।


उपदेशक की पात्रता

उपदेशक इन दिनों प्रायः सर्वथा असफल इसीकारण हो रहे हैं कि उपदेशक जो दूसरों से कराना चाहते हैं, उसे निजी जीवन में समाविष्ट करके यह सिद्ध नहीं कर पाते कि जो कहा गया हैं, वह व्यावहारिक भी हैं। उपदेश यदि उचित, व्यावहारिक और लाभप्रद रहा होता, तो उपदेशों के अनुरूप प्रवक्ता ने सर्वप्रथम उस विधा को अपनाकर लाभान्वित किया होता। इस संदेह-असमंजस का निराकरण न कर पाने पर ही उपदेशकों के द्वारा बार-बार दिए जाने वाले भाषण भी विडंबना बनकर रह जाते हैं, श्रवणकर्ताओं के गल नहीं उतरते। ऐसे भाषण परामर्शों से भावुकों को अवाँछनीयता की दिशा में भड़कना, उत्तेजित करना तो संभव हैं, पर वह संभावना बनेगी ही नहीं कि उत्कृष्टता अपनाकर संयम बरतने और परामर्श-व्यवहार में लाने के लिए किसी को अग्रणी किया जा सके। यही कारण हैं कि इन दिनों तथाकथित नेताओं को अभिनेताओं की संज्ञा देकर लोग कौतुक जैसा मजा लेते हैं और इस कान सुनकर उस कान निकाल देते हैं, पल्ला झाड़ कर पड़े देते हैं।


या द्वितीय संक्राँति पर्व

संक्राँति दो युगप्रवाहों का मिलन हैं। यह अतीत हो रहे वर्तमान और भविष्य होने वाले आगत का संगम हैं। जब दो युगप्रवाह मिलते हैं तो वे पल बड़े ही अद्भुत, विचित्र और विलक्षण होते हैं। इन पलों में बहुत कुछ टूटता-दरकता है। न जाने कितनी मान्यताएं-परम्पराएँ ध्वस्त होती हैं। बहुत कुछ ऐसा भी होता है, जिसे नया होने के बावजूद स्वीकारा एवं अपनाया जाता है। सहस्राब्दी के द्वितीय संक्राँति पर्व जो दो प्रवाह मिल, या यों कहें कि आपस में टकराए, उनमें से एक अपनी चिर-परिचित भारतीयता की भावधारा थी, जो औरंगजेब की कुटिल नीतियों से अपना ओज और तेज खोने लगी थी। दूसरा आने वाला प्रबल प्रवाह था। यूरोपवासियों की संस्कृति-सभ्यता और उनकी महत्वाकांक्षाओं का। इन्हीं दिनों यूरोप में नवजागरण करवटें ले रहा था। इस जागरण ने उनमें अपूर्व उमंग-उत्साह एवं अपरिमित शक्ति भर दी थी और बहुत कुछ पाने, अपना आधिपत्य जमाने के लिए भारत की और पड़े पड़े थे।

अभी तक भारतवर्ष में जितनी जातियाँ आई थीं, वे सब उत्तर-पश्चिम के पर्वतीय मार्गों से आई थीं परंतु यूरोप में रहने वालों ने समुद्री मार्ग से भारत आना आरंभ किया। इनमें सबसे पहले वास्कोडिगामा नामक पुर्तगाली यात्री चार जहाजों के साथ भारत आया। उसने मई 1498 ई. में कालीकट के उत्तर में भारतभूमि पर प्रवेश किया। वहाँ पर उन दिनों जमोरिन का शासन था, जिसकी सहृदयता के बदले पुर्तगाल के राजा ने कालीकट को अपना उपनिवेश माना लिया और पुर्तगाल से एक बड़ा जहाजी बेड़ा भेजते हुए हुक्म दिया-”उस देश में ईसाईयत का प्रसार करो और वहाँ जबरन शासन करने की भी कोशिश करो।”

इसी के परिणामस्वरूप 1503 ई. में अल्बुकर्क पुर्तगाली गवर्नर बनकर भारत आया। सुरक्षित स्थान की दृष्टि से उसकी नजर गोवा पर पड़ी, जो समुद्रतट के निकट एक द्वीप था। 1510 ई. में पुर्तगालियों ने आक्रमण कर उस पर कब्जा कर लिया। अल्बुकर्क के बाद भी उसके द्वारा निर्धारित नीति का अनुकरण पुर्तगाली करते रहे। उन्होंने 1534 ई. में बेसीन के द्वीप पर अपना अधिकार कर लिया और इस तरह धीरे-धीरे हिंद महासागर तथा बंगाल की खाड़ी के समुद्रतट पर उन्होंने अपनी धाक जाम ली।

पुर्तगाली के बाद डच लोग भारत आए। ये लोग हालड निवासी थे। भारत में व्यापार से ये लोग उतना ज्यादा आकृष्ट नहीं थे, जितना मसाल के द्वीपों के व्यापार से। डच लोगों का पहला जहाजी बेड़ा 1595 ई. में मलाया द्वीप समुह के लिए आया। 1602 ई. में उन्होंने भारत में व्यापार करने के लिए डच ईस्ट कंपनी की स्थापना कर ली और सूरत, चिन्सुरा आदि स्थानों पर अपनी कोठियाँ भी बना ली। 1641 ई. में उन्होंने पुर्तगालियों से मलक्का द्वीप छीन लिया। धीरे-धीरे दूसरी कई जगहों पर अपना अधिकार जमाते गए।

डच लोगों के बाद अंग्रेज भी भारत में व्यापार करने के लिए आए। इन लोगों ने स्वतंत्र व्यापारियों की एक कंपनी बनाई, जिसका नाम ईस्ट इंडिया कंपनी (ग्रेट लरिटेन) रखा। अंग्रेज जाति का कौन आदमी पहले पहले भारत आया, इसका तो ठीक पता नहीं हैं, लेकिन जो अंग्रेज सबसे पहले भारत में आया बसा, उसका नाम टामस स्टीफन था। और वह ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए सन् 1579 ई. में गोआ आया था, जबकि ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1600 ई. में हुई। 1608 ई. में जहांगीर ने कंपनी को सूरत में तंबाकू की कोठी खोलने की आज्ञा दी। तभी से तंबाकू का भारत में एक नाम ‘सूरती’ प्रचलित हुआ।

यह 17वीं सदी का भारत मुगलों का भारत था, जो सोने से चमचमा रहा था। यूरोप के कुछ यात्रियों ने भारत का जो विवरण यूरोप में उपस्थित किया-उससे वहाँ के लोग दंग रह गए। यूरोप वालों के मन में भारत सोना-चाँदी, हीरे-जवाहरात और रेशम-किमखाब से सुसज्जित देश हो उठा। मिल्टन की कविताओं में भी भारत के इस अपूर्व वैभव का उल्लेख आया हैं। इससे आकर्षित होकर अंग्रेज आते ही पड़े गए। मुँलाई, मद्रास, हुगली, पटन में उनकी कोठियाँ बनती चली गई। 1694 ई. में ब्रिटिश पार्लियामेंट ने बाकायदा एक नियम बनाकर सभी व्यापारियों को भारत में व्यापार करने का अधिकार दे दिया।

इसी बीच फ्राँस से दो यात्री टबर्नियर और बर्नियर भारत आए। उन्होंने भारत की धन–धान्यता का कुछ ऐसा प्रचार किया कि फ्राँस वाले भी भारत की ओर पड़े पड़े। 1664 ई. में अपने राजा की आज्ञा से इन्होंने भी फ्राँसीसी ईस्ट कंपनी की स्थापना कर ली और 1668 ई. में उन्होंने भी सूरत में कोठी बना ली। फिर तो धीरे-धीरे मछलीपट्टम, पाँडिचेरी, चंद्रनगर, माही, कालीकट आदि स्थानों पर उनने अपना कब्जा जमा लिया। पहले तो ये सबके सब केवल व्यापार करने और धन कमाने के मकसद से ही यहाँ आए थे, परंतु बाद में पुर्तगाली, डच, अंग्रेज एवं फ्राँसीसी चारों की ही महत्वाकांक्षाएं जाग उठीं और वे यहाँ शासन करने का सपना सँजोने लगे। यही टकराव की शुरुआत थी। उनके इन इरादों को भाँपते हुए किसी कवि ने कहा-

व्यापारी बनकर आयें थे, लगे यहाँ शासन करने। अपहर्ता बन गए देश के, लगे रक्तशोषण करने॥

वास्कोडिगामा के यहाँ आने और अँगरेजों के यहाँ वर्चस्व जमाने तक का यूरोप उमंगों और महत्वाकांक्षाओं का यूरोप था। इन क्षणों में यदि भारत संक्राँति के संघर्ष से जूझ रहा था तो यूरोप नवजागरण की सुहानी सुबह में अपने आँखों खोल रहा था। एक व्यापक दृष्टि से देखें तो सन् 1401 से 1800 के बीच पुरी दुनिया में ताकतवर साम्राज्यों का उदय हुआ और एक-दूसरे से जुड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई। यूरोपीय नाविकों ने लंबी-लंबी यात्राएँ कर नए मार्ग खोजे। अफ्रीका और एशिया के बीच व्यापारिक संबंध प्रगाढ़ हुए। यही वह दौर हैं, जब अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था ने पहली बार आकर लेना शुरू किया। यूरोप में पड़े नवजागरण के दौर ने कब-संस्कृति एवं विज्ञान को नए आयाम दिए। लयोनार्दो द विंसी जैसे कलाकार और निकोलस कोपरनिकस जैसे खगोलशास्त्री इसी युग की देन हैं। तुर्की के ओटोभन साम्राज्य ने अपना विस्तार अफ्रीका व यूरोप तक किया। 18वीं सदी आते-आते यूरोपीय देशों ने पूरी दुनिया को अपने प्रभाव में ले लिया। अमेरिका, एशिया, अफ्रीका, प्रशाँत सभी महाद्वीपों में यूरोपीय देशों ने अपने उपनिवेश स्थापित किए, लेकिन इस सदी ने जाते-जाते नई व्यवस्थाओं, नए मूल्यों के बीज बो दिए। फाँस की क्राँति ने पूरी दुनिया को नया संदेश दिया और अमेरिका ने लरिटेन के औपनिवेशिक शासन को उखाड़ फेंका।

भारतवर्ष की दृष्टि से 17वीं एवं 18वी सदी संक्राँति के तूफानी संघर्ष की जन्मदात्री बनी। औरंगजेब के ही काल में विद्रोहों के स्वर पनपने लगे। भारत की राजसत्ता विघटित और विखंडित होने लगी। राजनीतिक बिखराव के साथ सामाजिक-साँस्कृतिक बिखराव भी कम नहीं था। हम कौन? हमारी संस्कृति क्या?? जैसे प्रश्नचिह्न भी इस युग में उठ खड़े हुए थे। आध्यात्मिक ज्ञान और ऊर्जा का प्रवाह भी मंद पड़ने लगा था। साधना थी, साधक भी थे, पर सब बिखरें हुए बँटे हुए। जो भारतवासी हैं, भारतीयता की प्रकृति को पहचानते हैं, उन्हें यह भी मालूम है कि इस देश की ऊर्जा का मूल स्रोत आध्यात्म हैं, आध्यात्मिक साधनाएँ हैं। यहाँ साधन से ही संस्कृति का निर्माण होता है। यह संस्कृति ही समाज को गति देती थी और गतिशील समाज ही राष्ट्र को उसका गौरव देता है।

जब आध्यात्मिकता के ही स्रोत सूखने लगे, तब स्वभावतः अपनी संस्कृति की पहचान करनी मुश्किल हो जाती हैं। सहस्राब्दी के इस द्वितीय पर्व में कुछ यही होने लगा था। भारत की क्षय हो रही जीवनी शक्ति पर यूरोपीय प्रवाह प्रबल और भारी पड़ने लगा था। अनेकों युगप्रश्न उठ खड़े हुए थे, जो अपना उत्तर तलाश रहे थे। यूरोप भारत का सर्वस्व लूटने के लिए आतुर-आकुल हो रहा था शक्ति खोज रहा था। साधना के सुर बिखर रहे थे- अध्यात्म का संगीत मद्धिम पड़ गया था। इन बिखरे सुरों को किसी नए संगीतकार की तलाश थी, जो संक्राँति के पर्व में अर्थ खोज सके।


कन्हैयालाल माणिकलाल मुँशी (kahani)

पढ़ाई की ललक उन्हें मुँलाई ले पहुँची, किंतु पास में कुल बीस रुपये, उसी में खाना, उसी में पुस्तकें और मकान का किराया भी। सारा काम इतने पैसों में कैसे पड़े? एक व्यक्ति सूझ पड़ी। चार साथी मिलकर एक कमरा लिया। सामूहिक खाना बन जाता। पढ़ने के लिए एक रुपया मासिक देकर पीटर पुस्तकालय की सदस्यता स्वीकार की। इसी सूझबूझ मुँलाई से उच्च शिक्षा प्राप्त की और अभावों में पला यही बालक एक दिन उत्तरप्रदेश का राज्यपाल भी बना एवं भारतीय विद्याभवन का संस्थापक। उसका नाम कन्हैयालाल माणिकलाल मुँशी।


Quotation

जो दूसरों से कराना चाहते हो, उसे कहकर समझाने से काम न चलेगा, पहले स्वयं करके दिखाना होगा। साँचे के अनुरूप खिलौने ढलते हैं।


पुनः लय पाते साधनात्मक आँदोलन के बिखरे स्वर

आध्यात्मिक साधना भारतवर्ष की राष्ट्रीय जीवनी शक्ति का मूल स्रोत हैं। किसी भी राष्ट्र का प्राणसंचार सामान्यक्रम में जिन नस-नाड़ियां से प्रवाहित होता है, वे हैं-शासन की शक्ति सैन्यशक्ति भी पुली-मिली रहती हैं और संक्षेप में यही राजनीतिक चेतना का पर्याय हैं। इसके अलावा आर्थिक शक्ति, सामाजिक शक्ति एवं साँस्कृतिक शक्ति के प्राणप्रवाह को एक छोर से सुदूर दूसरे छोर तक प्रवाहित किए रहता है। इसके चलते देश का कोई भी अंग-अवयव सूखने या मुरझाने नहीं पाता। हर जगह जीवन की उमंगें मुस्कराती रहती हैं। भारतीय परिवेश, परिदृश्य एवं परिप्रेक्ष्य में एक और महान् सत्य और शक्तिस्रोत अंतर्निहित हैं। एक ऐसी चेतना, जिससे सभी आध्यात्मिक चेतना हैं, जो भारत देश का अपना वैशिष्ट्य हैं।

जिन्होंने भारत एवं विश्व के इतिहास का सतही अध्ययन किया हैं, उनकी बात तो जाने दें, परंतु जो गंभीर अध्येता एवं प्रखर इतिहासवेत्ता है, ऐतिहासिक चेतना की प्रकृति एवं इसके सूक्ष्म तत्वों की जिन्हें परख हैं, वे इस तथ्य से भलीप्रकार सुपरिचित हैं। वे इस सत्य को पूरी तरह से जानते हैं कि भारत की नैसर्गिक प्रकृति आध्यात्मिक हैं। भारत में हमेशा से आध्यात्मिक राष्ट्रवाद ही पनपा एवं फल-फूल हैं। आध्यात्मिक चेतना की प्रखरता ने ही राष्ट्र को प्रखर जीवन दिया हैं। इसमें होने वाली अवगति ही राष्ट्रीय अवगति एवं अवनति का कारण बनी हैं। औरंगजेब ने अपनी क्रूर शासनपद्धति से राष्ट्र के इसी आध्यात्मिक प्राणप्रवाह को कुंठित और रुद्ध किया और समूचा राष्ट्रीय ढाँचा ही चरमरा गया।

इस चरमराए हुए सामाजिक एवं साँस्कृतिक जीवन में यदि कुछ प्राण बचे थे, वो भी महान् संतों की आध्यात्मिक साधनाओं के कारण। ये सभी संत अपने-अपने क्षेत्र और अंचल के अध्यात्म का प्राणदीप जलाए हुए थे। यह युग भक्ति का युग था। लगातार हो रहे अनाचारों-अत्याचारों एवं अन्यायी चीख-पुकारों के बीच ज्ञानचेतना का मंद पड़ना स्वाभाविक था। सामान्य जनता को जो नित्यप्रति लट-खसोट और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था, उसे वे भ्रम मानकर ब्रह्म की दुहाई कैसे दें? उन्हें तो उस ईश्वर की तलाश थी जो उनकी आर्त्त पुकार के सुने और जवाब दें, फिर वह चाहे निर्गुण हो या सगुण।

जनमानस की पीड़ा, कराह व व्यथा भरी पुकार को आध्यात्मिक चेतना से अनुप्राणित करने वाले दो तरह के साधनात्मक आँदोलन इस युग में सक्रिय हुए। इनमें से पहला था निर्गुण भक्ति का प्रचार करने वालों में नानक देव का पंथ अग्रणी था। हालांकि बाद के दिनों में इसमें भी सगुण भक्ति का प्रवेश हो गया। यह प्रवेश यों तो गुरु अमरदास के समय में ही हो गया था, परंतु बाद में यह तो एकदम साफ तौर पर नजर आने लगा। दादू ने

वनपर्व (महाभारत) में ‘यक्ष-युधिष्ठिर संवाद’ में एक प्रश्न यक्ष पूछते हैं-जिनके समाधान में महाप्राज्ञ के इस विवेचन का सार निहित हैं। यक्ष पूछते हैं, हे यूधिष्ठिरी ब्राह्मणत्व किससे सिद्ध होता है, युधिष्ठिर उत्तर देते हैं-कुल, स्वाध्याय, शास्त्रश्रवण इनमें से कोई भी ब्राह्मणत्व का कारण नहीं हैं। आचार मात्र ही ब्राह्मणत्व का कारण नहीं हैं। जिसका सदाचार अक्षुण्ण हैं, उसने आना आत्मबोध कर लिया हैं, अज्ञान से वह दूर हैं, अतः उसे ही द्विज कहना चाहिए।

भी निर्गुण साधना की अलख जगाई हाबँई उन्होंने यह भी कहा कि परमात्मा सगुण हैं या निर्गुण इस चक्कर में मत उलझो। तुम तो उसे पुकारों। अपनी आत्मशक्ति जगाओ। अपनी आत्मचेतना को पहचानो तभी तुम्हारे कष्ट दूर होंगे

छादू पंथ की तरह ही निरंजन पंथ ने भी घायल जन-चेतना को मरहम लगाया, विद्वानों के अनुसार यह नाथ परंपरा की ही एक शाखा हैं। यह शाखा 17 सदी में उड़ीसा एवं सिलहट की भूमि में व्यापक तौर पर फैल गई। इस पंथ का आद्य आचार्य जगन को माना जाता है। एक नया पंथ हरिदास जी का उभरा। जिसे ‘करड़ा’ नाम से जाना गया। निर्गुण मत में इन्हीं दिनों बावरी साहिबा का एक नया स्वर फूटा। ये परम भक्तिमती महिला थीं। उन्होंने नारियों की व्यथा जानी और उसे दूर करने के लिए कटिबद्ध हुई। उनका पंथ बावरी पंथ के नाम से जाना गया। बावरी पंथ की ही भाँति मलक पंथ एवं सत्तनामी संप्रदाय भी इस साधनात्मक आँदोलन में शामिल हुए। प्रणामी संप्रदाय धरनीश्वरी संप्रदाय, दरियादासी संप्रदाय, बाबा, बली संप्रदाय, शिवनारायणी संप्रदाय, चरणदासी पंथ, गरीब पंथ, रामस्नेह संप्रदाय, सरभंगी पंथ आदि सभी को मानने वालों ने अपने निकटस्थ जनजीवन के बीच कष्टपीड़ित लोगों को ईश्वरीय चेतना की ओर उन्मुख-अभिमुख करने का प्रयास किया।

निर्गुण मत के माध्यम से अध्यात्म चेतना की दीप-शिखा जलने वाले संतों की भावनाएँ कितनी ही नेक क्यों न रहीं हों, परंतु सामान्य जन उनसे यही पूछता रहा ‘निर्गुण कौन देश को वासी?” निराकार भगवान् उनकी कैसे सुनेगा? किस तरह समझेगा और उन्हें कैसे प्रत्युत्तर देगा? ये पहेलियां हल नहीं हुई। इन्हीं पहेलियों को हल करने को सगुण भक्ति का प्रचलन चला। संक्रांति के दिनों में सगुण भक्ति ने जनचेतना को एक अपूर्व ऊर्जा एवं अद्भुत विश्वास प्रदान किया।

सगुण साधना का प्रचार करने वालों में रामनंद और उनका रामानंदी संप्रदाय सबसे अवतरित हुआ। इस क्रम में रसिक संप्रदाय, वल्लभ संप्रदाय एवं महाप्रभु चैतन्य द्वारा प्रेरित-परिवर्तन गौड़िय संप्रदाय ने मुरझाए जनजीवन को अपने भक्तिरस से नवचेतना देने का काम किया। निंबार्क संप्रदाय, मध्य संप्रदाय आदि संप्रदायों के प्रवर्तक आयार्च एवं उनकी परंपरा को मानने वाले साधक, संत भी सगुण भक्ति का प्रचार करने में पीछे नहीं रहे। तुलसी और सूर इस काल के संत भले ही न रह हों, परंतु उनकी तपचेतना इस युग में भी अपना प्रकाश-प्रभाव बिखेरती रही। इसी तरह राजस्थान की भक्तिमती संत मीराबाई भी काल की सीमा का अतिक्रमण कर इन दिनों भी नारी चेतना की प्रखर ज्योतिपुंज बनीं रहीं।

महाराष्ट्र में वारकरी संप्रदाय ने सगुण भक्ति की ज्योति जलाई। वारकरी संप्रदाय के संतों एवं भक्तों ने आध्यात्मिक साधना को जो गति दी, वह इस युग में ही नहीं हर युग के लिए उदाहरण हैं। नामदेव, एकनाथ, ज्ञानेश्वर, जनार्दन पंत, विसोबा खेचर, सावंतामाली जैसे वंदनीय संत इसी भूमि में हुए। मुक्ताबाई, जानबाई, सहजोबाई जैसी धर्मप्राण नारियों ने भी अपनी साधना से आध्यात्मिक चेतना को नई प्रखरता दी। संक्राँति के इस द्वितीय पर्व पर वारकरी संप्रदाय के संतों में जो सबसे अग्रणी रहे, वे हैं-तुकाराम जी अपनी भगवद्भक्ति से स्वयं भक्ति का एक अनुपम आदर्श बन गए।

आध्यात्मिक साधना के ये स्वर समूचे भारत में, इसके उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम के कोने में फैल-बिखरें थे। इनमें ऊर्जा तो थी, पर संगठन नहीं था। साधना के इन स्वरों में ज्ञान था, भक्ति की वितनलता थी, जनजीवन में समाई तड़प थी, प्रत्येक हृदय से उठाने वाली पुकार का दरद था, परंतु परिस्थितियों की चुनौती को स्वीकार करने का साहस नहीं था। इसमें अत्याचार और अनाचार को ललकार की क्षमता न थी। साधना के इन स्वरों में हुँकार का वह गर्जन न था, जिसे सुनकर अत्याचारियों के कलेजे काँप उठें। उसके दिल दहल जाएँ, सीने फट जाएँ उनके पाँव के नीचे की जमीन खिसक जाए और वे पीछे मुड़ने और भाग निकलने को विवश हो जाएँ। यह ललकार और हुँकार ही समर्थ गुरु रामदास के तपस्वी जीवन का पर्याय थी, जिन्होंने इस युग में अध्यात्मिक साधना को नए स्वर दिए। उनके स्वरों में वह ओज था, जिसका स्पर्श पाकर मराठा शिवाजी जननायक बन गए। उनका व्यक्तित्व प्रत्येक भारतीय का आदर्श बन गया। समर्थ के पुरुषार्थ में वह समर्थ गर्जन था, जिसने औरंगजेब की कमर झुका दी। समर्थ सद्गुरु रामदास का समूचा जीवन-संगठन का संदेश था। उनके इस संदेश को सुनकर साधनात्मक आँदोलनों के बिखरें स्वरों को पुनः अपनी लय मिलने लगी और भारत देश की राष्ट्रीय जीवनी शक्ति फिर से सक्रिय होने लगी।

अपनी साधना की सफलता का श्रेय आप किसे देते हैं, एक व्यक्ति ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस से पूछा। उन्होंने उत्तर दिया- हर असफल साधक को। सौ कैसे? उस व्यक्ति ने पुनः प्रश्न किया। परमहंस ने कहा-मैंने जब भी देखा तो यह मालूम करने की कोशिश की कि वह किन कारणों से असफल हुआ। पीछे उन अनुभवों का लाभ उठाकर मैं उन अवरोधों से बचता और साधनामार्ग पर आरुढ़ होता चला गया।


‘समर्थ’ के आविर्भाव से उपजा संगठन का संकल्प

संगठन’ के महामंत्र ने संक्राँति के दूसरे पर्व पर अपनी महाशक्ति प्रकट की। समर्थ की अद्भुत सामर्थ्य को स्रोत उनकी कठोर तप−साधना थी। लोकमंगल की साध एवं उत्कट ईश्वरप्रेम ने उन्हें तपस्वी बनाया था। बारह वर्ष की आयु में विवाहवेदी छोड़कर उठे नारायण पंचवटी के पास गोदावरी के तट पर टाकली गाँव में तपोलीन हो गए। उनकी एकनिष्ठा एवं कठोर तपस्या की कहानियाँ-किंवदंतियाँ गाँव में फैल गई। यह तपस्या बारह वर्षों तक अनवरत चली। इसके बाद राष्ट्रीय जीवन की दशा जानने के लिए उन्होंने कन्याकुमारी से हिमालय तक की यात्राएँ कीं पूर्व में जगन्नाथपुरी एवं पश्चिम में द्वारका पैदल गए। अपनी इन पदयात्राओं में उन्होंने गाँव देखे, समूचा लोकजीवन ही उन्हें क्षत-विक्षत नजर आया।

अपनी इन यात्राओं में उन्होंने जो अनुभव पाए, उसे अपनी चौदह पद्यों की कविता में कुछ इस तरह लिखा- “लोग शासन के अत्याचारों से दुःखी हैं। बहुत लोग भूखों मर रहें हैं। जीवन और संपत्ति खतरे में हैं। जबरदस्ती धर्म परिवर्तन कराया जाता है। लाशों के ढेरों की कोई परवाह नहीं करता। जिन्दा आदमियों के पास तन ढँकने का कपड़ा तक नहीं हैं।” इस हालत को देखकर उनका हृदय कराह उठा। उनके तपस्वी मन में निश्चय के यही स्वर उभरे कि जनशक्ति ही संगठित होकर अत्याचारी शासकों के प्रबल सैन्यबल को कड़ी टक्कर दे सकती हैं। प्रबल और प्रचंड पुरुषार्थ में उनका विश्वास था। धर्म के नाम पर कायरता और पलायनवाद उन्हें पसंद न था।

“निसिचर हीन करौ महि भुज उठाहि प्रन कीन्ह” का उद्घोष करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम प्रबल पराक्रमी श्री राम उनका आदर्श थे। “ राम काजु कीन्हें बिना मोहि कहाँ विश्राम” के व्रती महावीर हनुमान का वज्रसंकल्प ही उनका संकल्प था। इस महासंकल्प से संकल्पवान् समर्थ गुरु ने 1648 ई. में चाफल गाँव-गाँव घूमते, कीर्तन करते, संगठन का संदेश देते। इस क्रम में उन्होंने 1100 मठ स्थापित किए, जिनमें से 42 अभी भी मौजूद हैं। इसी बीच उन्होंने जनता में जाग्रति लाने के लिए मराठी में मनाचे श्बेक, करुणाष्टेक और दासबोध लिखा। यह दासबोध ही उनका प्रधान ग्रंथ हैं। इसके बीस अध्यायों में धर्मदास एवं नीति का विशद् विवेचन हैं। संस्कृत में उन्होंने अभंग शतक एवं पंचक आदि लिखे।

समर्थ गुरु ने अपने संगठित संघर्ष के अभियान में अपने असंख्य शिष्यों को दीक्षित की किया। उसमें शिवाजी महाराज भी एक थे। शिवाजी की गुरु-भक्ति एवं समर्थ-शिवा की जोड़ी गुरु-शिष्य संबंधों का आदर्श बन गई। शिवाजी महाराज अपने समर्थ सद्गुरु के प्रति कितने अधिक श्रद्धावान् थे, इसका प्रकट प्रमाण उन्हीं पत्र में उन्होंने लिखा-

श्री रघुपति श्री मारुति! श्री स्वामी गुरुवार।

मैं आपके चरणों की धूल शिवाजी आपको नमस्कार करता हूँ। परमश्रद्धेय अपने मुझे राज्य और धर्म स्थापित करने, ब्राह्मणों और देवताओं की पूजा करने और जनता की रक्षा करने, उनके दुखों को दूर करने का आदेश दिया। आपने मुझे चरमतत्व की खोज का उपदेश दिया और विश्वास दिलाया कि श्री रामकृपा से मुझे हर कार्य में सिद्ध मिलेगी। अतः मुझे हर कार्य में दुष्टों के दलन में, संपत्ति-समृद्धि प्राप्त करने में और कठिन दुर्गों के निर्माण में आपके चरणों में अर्पित किया और आपकी सबसे बड़ी सेवा यह है कि मैं ठीक तरह से अपने कर्त्तव्यों का पालन करूं...। आपकी कृपा से ही यह सब संभव हो पा रहा हैं।

कतिपय लोग समर्थ गुरु रामदास एवं शिवाजी महाराज के संबंधों को काल्पनिक मानते हैं, परंतु इस मान्यता के पीछे उनके इतिहास संबंधी विशद् ज्ञान का अभाव ही है। डॉ. बुद्ध प्रकाश डी.लिट्. जो भारतीय विधा संस्थान के निदेशक रहे हैं, उन्होंने अपने ग्रंथ ‘भारतीय धर्म एवं संस्कृति’ में इन संबंधों की भावनात्मक गहराई को ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकारा हैं। इसके अलावा रणजीत देसाई जैसे अन्य अनेकों विज्ञजनों की कृतियाँ इस ऐतिहासिक सत्य और तथ्य का प्रमाण हैं। यह सुनिश्चित एवं असंदिग्ध सत्य हैं कि शिवाजी का व्यक्तित्व अपने समर्थ सद्गुरु की तप−साधना से ओत–प्रोत था। समर्थ की यह ललकार-

धर्मासाठीं मरावें, अवध्याँसि मारावें। मरताँ मरताँ ध्यावे, राज्य आपुल ॥

धर्म के लिए मरो, मरते हुए भी सब शत्रुओं को मारो, मर-मरकर अपना राज्य लो। उनके परमशिष्य शिवाजी में गूँजी थी।

संगठन ही समर्थ गुरु का नारा था। यही उनका महामंत्र था। एक स्थान पर वह कहते हैं-

बहुत बेक मेल वावे एक विचारें भरायें कष्टें करुन धसरावें। म्लच्छाँवरी।

बहुत लोगों को मिलाओ, उनमें एक विचार भरो पूरी कोशिश करके म्लच्छों पर टूट पड़ो।

समर्थ के इन स्वरों ने मराठों में अपूर्व प्राण भरे। मराठा साम्राज्य कायम हुआ। औरंगजेब के अत्याचार की चूल हिलने लगीं। वह काँप उठा। शिवा के व्यक्तित्व को समर्थ ने अपनी तपशक्ति से कुछ ऐसा गढ़ा कि प्रख्यात इतिहासवेत्ता भी उनके बारे में यह लिखने पर विवश हुए-”एक व्यक्ति का प्रचंड पुरुषार्थ इस संसार में क्या कुछ कर सकता है, यह शिवाजी के जीवन से स्पष्ट होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि शिवाजी प्रतिभा के दैवीय वरदान से युक्त थे, जो विश्लेषकों की बुद्धि को चकरा देती हैं।” शिवाजी की मृत्यु पर उनके सबसे प्रबल शत्रु औरंगजेब ने जो कहा वह कम उल्लेखनीय नहीं हैं। डॉ. जदूनाथ सरकार ने अपने ग्रंथ में औरंगजेब के इन शब्दों को यथावत् प्रस्तुत किया है- “वह एक महान् सेनानायक था और एकमात्र उसमें एक नए राज्य को खड़ा करने का दमखम था। जबकि मैं भारत की पुरातन सत्ता को नष्ट करने पर उतारू हूँ। मेरी सेनाएँ उसके विरुद्ध 19 वर्षों से जुटी हुई हैं और उसका राज्य बढ़ता ही जा रहा हैं।” इन ऐतिहासिक तथ्यों को इतिहासवेत्ता वर्नियर सहित खारिक खान, ग्राँट डफ एल्फिस्टोन, टेंपल, एर्क्वथ, डलल. एस. एम. एडवर्ड्स आदि अन्य इतिहासवादी ने भी स्वीकार हैं।

समर्थ सद्गुरु के इस अनुकरणीय उदाहरण से अन्य तपस्वीजनों ने भी साधना के बिखरे सुरों को लय दी। इनमें सिखों के दशम गुय गोविंद सिंह सबसे अग्रणी रहे। उन्होंने भी अत्याचार के खिलाफ जंग छेड़ते हुए ऐलान किया-सवा लाख तें एक लड़ाऊँ, चिड़ियन ते में बाज तुडाऊँ, तब गोविन्दसिंह नाम कहाऊँ। और हुआ भी ऐसा ही। उनके परमशिष्य बंदावैरागी आक्राँतियों के लिए कहर बन गए इसी तरह बुँदेलखंड में बावा प्राणनाथ ने बुँदेब राजा छत्रसाल में प्राण भरें। वे भी इस युगसंघर्ष के लिए उठ खड़े हुए। इस क्रम में जाटों के सरदार गोकुल और राजपूत शिरोमणि राणा राजसिंह भी पीछे न रहे। यह सब संगठन की शक्ति का चमत्कार था, जो समर्थ की तपशक्ति से उत्पन्न हुआ था, परंतु उचित एवं योग्य उत्तराधिकारियों के अभाव में यह स्थिर न रह सका। 14

मुझे उस क्षण का भान नहीं जब पहली बार उस जीवन की देहली पर पैर रखा। वह कौन-सी शक्ति थी जिसने मुझे वन आधी रात में खिलाने वाली करी की तरह खिला दिया। प्रभात में जब मैंने उस आलोक पर दृष्टि डाली तो देखा-विश्व में मैं अजनबी नहीं हूँ। अनाम रूप अज्ञेय माँ मुझे अपने अंक में समेटे हुए हैं।

अब तो मुझे पूरा भरोसा हैं, जो जीवन की पहली किरण के साथ मेरा चिरपरिचित अज्ञेय मृत्यु के समय भी मेरे साथ होगा। अतः अब मृत्यु का मुझे कोई भय नहीं वह तो मुझे नवजीवन तक ले जाने वाली संगिनी-मार्गदर्शिका होगी। रविंद्रनाथ ठाकुर

अप्रैल 1680 में शिवाजी महाराज नहीं रहे। इसके एक ही वर्ष बाद समर्थ स्वामी ने भी अपना शरीर छोड़ दिया। 3 मार्च 1707 में औरंगजेब की मृत्यु हुई। इसके बाद 1713 से 1719 तक फरुखसियर का शासन रहा। में नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया और भयंकर लूटपाट की। 1731 में हुई पानीपत की तीसरी लड़ाई में अहमदशाह अलदाली ने मराठों को पराजित कर दिया इसके बाद अँगरेजों की कुटिल चालों का युग आने लगा। इन कुटिल चालों में फँसकर देशवासी संगठित न रह सके और भारतमाता बंदिनी होने लगी।


Quotation

सत्य बोलने तक सीमित नहीं, वह चिंतन और कर्म का एक प्रकार हैं, जिसके साथ ऊँचा उद्देश्य अनिवार्यतः जुड़ा होता है।


युगपरिवर्तन के लिए उमंगा महापराक्रमण

वह महाराष्ट्र का एक बीहड़ वनप्रदेश था। बाँस वनों और लता–विटपों से संकुल इस क्षेत्र में मानवाचरण कभी-कभार ही भटक पाते थे। ऊँची पहाड़ियों, गहरी घाटियों और अगणित नदी-नालों ने इस इलाके की और भी दुर्गम बना दिया था। यहीं एक बड़ी गुफा लता-गुल्मों से इस तरह परिवेष्ठित थी कि दूर से किसी प्रवेशद्वार का आभास नहीं हो पाता था। गुफा के बाहर की भूमि समतल और साफ थी। वृक्षों की जड़ों में निर्मित वेदियाँ और उन पर निवेदित पूजा के फूलों की रंग–बिरंगी छटा मन को बाँध लती थी। वृक्षों की डालियों पर सूखते गेरुए वस्त्र और रज्जुओं से झूलते कमंडल और तूँबे अत्यंत मोहक और प्रभावकारी दृश्य उपस्थित कर रहे थे। यत्र-तत्र प्रज्वलित कुँडों से निस्सृत हवन सुगंध पूरे वातावरण को पूत-पुनीत कर रही थी, पर सबसे आश्चर्य में डालने वाले थे वृक्षों की जड़ों से दूर बने कुछ अखाड़े, जिनकी चूर्ण हो आई मिट्टी इनमें संपादित-नियमित मल्लयुद्ध की सूचना दे रही थी। कुछ वृक्षों से सटे खड़े काष्ठ निर्मित मुद्गल और भारोत्तोलन के लिए पड़े पाषाण–खंड सूचित कर रहे थे कि यह स्थान आत्मबल के साथ शरीरबल का भी साक्षी हैं।

कौन हैं वह अद्भुत तपस्वी, जो अपने शिष्यों के तन और मन दोनों को एक साथ माँजने को कृतसंकल्पित हैं? क्या हैं उसका लक्ष्य, जो अंदर और बाहर की समृद्धि के संगम पर ही प्राप्त हो सकते है? कैसा हैं उसका महाअभियान? और कौन है उसका सूत्रधार, जिसने इस एकाकी वन को अपने संचालन केंद्र के लिए चुन रखा हैं? ऐसे तमाम सवाल यहाँ किसी भी आने वाले को आलोड़ित करने लगते थे, हालांकि यहाँ तक आ पाना जनसामान्य के लिए इतना सुगम नहीं था।

फिर भी इन सबका उत्तर उस गुप्त गुफा में प्रवेश करने के पश्चात् स्पष्ट होने लगता था।

गुफा के बीचोंबीच एक गौरवर्ण, किचित प्रौढ़ साधक समाधिस्थ था। उसके तेजो दीप्त तन से फूटता प्रकाश-पुँज उस संपूर्ण गुफागतनर को आलोकित कर रहा था। मेरुदंड को किसी काष्ठदंड की तरह लबाकार किए अर्द्ध-उन्मीलति नेत्रों को नासिकाग्र पर टिकाए, पद्मासन में आसीन इस साधक को देखते ही मन अनायास श्रद्धापूर्ण हो जाता था। निश्चित ही यही वह व्यक्ति था, जिसके इंगित पर यहाँ के सारे क्रिया–कलापों का नियोजन होता था।

लगता था कि इन महायोगी को समाधिरथं हुए काफी देर हो गई थी। सामने ये दो वलष्इि व्यक्ति, जो निश्चित ही इनके शिष्य थे। और वे आतुरता से उनकी समाधि की समाप्ति की प्रतीक्षा कर रहे थे।

बाहर आम्र, वट और शीशम, शाल वृक्षों का शाखाओं को अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें ने अंतिम स्पर्श किया था। नीड़ों को वापस बैठते पक्षियों का सायं कलरव वातावरण को संगीतमय कर रहा था। आश्रम की रँभाती गौएँ अपने नवजातों को निशापान निमंत्रण देने लगी थीं।

शिष्यों में से एक अत्यंत मंद स्वर में दूसरे से कह रहा था, लगता है अब समर्थ प्रभु की समाधि टूटने वाली हैं श्वास-प्रश्वास की प्रक्रिया जो पूर्णतया समाप्त हो गई थी, अब तीव्रता पकड़ रही हैं। समर्थ स्वामी आज दोपहर के पूर्व से ही समाधिस्थ हैं। मैं तो उन्हें शिवाजी महाराज के आगमन की सूचना देने आया था, पर यहाँ आकर देखा वे समाधिलीन हैं। लगता है कुछ विशेष बात हैं तभी..........।

“ठीक कहा तुमने।” ठीक उसी समय समर्थ गुरु रामदास प्रकृतिस्थ हो आए थे। बोल-”अफजल खाँ बड़ा भारी संकट बनकर आया हैं वत्स! वह हरे-भरे खेतों को उजाड़ रहा हैं। उसके बर्बर सैनिक नारियों कन्याओं का बलात्कार करते हैं, शिशुओं को संगीतों पर उछाल देते हैं। बड़ी दुस्सह स्थिति हो चली हैं .........।” समर्थ स्वामी जी से यह बातें कर रहे थे, तभी खबर आई कि शिवाजी महाराज पधार गए हैं।

समर्थ स्वामी के होंठों पर एक रहस्यात्मक मुस्कान तैर गई। उन्होंने अपनी आँखों से शिवाजी को अंदर लाने का और पहले से उपस्थित दोनों शिष्यों को बाहर जाने का इंगित किया।

कुछ देर में शिवाजी अंदर आ गए। भूमि पर माथा रखकर समर्थ को प्रणाम निवेदित किया और उनके आदेश पर जमीन पर पड़े कुशासन पर बैठ गए। मोहक व्यक्तित्व था शिवाजी का। कसी हुई माँसपेशियाँ। चौड़ा दमकता ललाट। आग के समान चमकता गौरवर्ण, सिर पर उलटे हुए घने काल केश और उन पर चढ़ी हुई पगड़ी, उनकी प्रभा को शतगुणित कर रहे थे। आसन पर बैठे हुए उनकी आंखें समर्थ स्वामी की ओर टिकी थी।

“तुम बहुत अच्छा कर रहे हो शिखा।” समर्थ सद्गुरु कहने लगे-”युगपरिवर्तन प्रबल पराक्रम से होता है। देश और जाति की इस अधोगति से व्यथित होकर ही मैंने अपना यह अभियान चलाया हैं, जिसके द्वारा मैं इस आर्यभूमि के उद्धार के लिए कृतसंकल्प हूँ। केवल शरीर से कुछ नहीं बनता वत्स, न केवल मन और आत्मा से, तन, मन और आत्मा तीनों का संस्कार करो, तो व्यक्ति संस्कारित होता है। जब व्यक्ति संस्कारित होता है हैं तो समाज समृद्ध होता है। जब समाज समृद्ध होता है तो राष्ट्र कालपुरुष की तरह विराट् और महान् बन जाता है। पुष्ट शरीर के अंदर ही स्वस्थ मन बनता है और स्वस्थ म नहीं निष्कलुष आत्मा का आश्रय हैं। इसीलिए मैंने हनुमान का आदर्श स्वयं अपनाया हैं और जन-जन के सामने रखा हैं। हनुमान शरीरबल, मनोबल, आत्मबल तीनों का साक्षात् स्वरूप हैं। वे वज्रदेह, महाज्ञानी और प्रभू के प्रियभक्त हैं। तभी तो वे ‘दनुज वन कृशानुँ ‘ दैत्यों के वन को जलने वाली आग हैं, वत्स! तुम अफजल खाँ की सेना पर ‘दनुज बन कृशानुँ’ बनकर टूट पड़ो।

“आपको सब पता है गुरुदेव,” शिवाजी को आश्चर्य हो रहा था कि समर्थ स्वामी को अभी से तुरंत की बातें कैसे पता चली।

समर्थ मुस्कराए और कहने लगे-”हमने अपनी समाधि में अफजल खाँ की सारी बर्बर करतूतें देख ली हैं। तुम्हारे आगमन का कारण भी हमें समाधि में ज्ञात हो गया था। चिंता मत करो शिवा! देश को तुम्हारी चिंता की नहीं, शौर्य की आवश्यकता है। समय की धारा को युगप्रवाह को मोड़ने के लिए महापराक्रम की जरूरत हैं। मेरे लिए यह पराक्रम कठोर तप−साधना में प्रवृत्त रहना है, तुम्हारे लिए यही पराक्रम अत्याचारियों-अन्यायियों से महासंघर्ष हैं। इस संघर्ष में तुम्हारी विजय होगी। अफजल का वध तुम्हारे हाथों होगा। अब जाओ शिवा, कर्तव्य तुम्हें पुकार रहा हैं। भवानी तुम्हारा मंगल करे- “शुभास्ते सन्तु पन्थानः” तुम्हारा मार्ग निष्कंटक रहे। यह कहकर समर्थ उठ खड़े हुए।

शिवाजी ने भूमिक होकर अपना प्रमाण निवेदित किया और कर्त्तव्य पर पड़े पड़े। अब उनका व्यक्तित्व समर्थ की तपसामर्थ्य से ओत-प्रोत था। महायोगी समर्थ सद्गुरु की तप क्तत्व समर्थ की तपसामर्थ्य से ओत-प्रोत था। महायोगी समर्थ सद्गुरु की तप ऊर्जा उनमें प्रवाहित हो रही थी। उनकी तपशक्ति को शौर्यपुँज बन दिया था। उनके महापराक्रम की प्रचंड ज्वाला में अफजल खाँ पतंगे की तरह भस्म हो गया। युगपरिवर्तन के लिए उमंगे उनके इस महापराक्रम की महिमा महाकवि भूषण स्वरों में मुखरित हो उठी-

इंद्र जिमि जेभ पर बाड़व सुअंब पर, रावण संदर्भ पर रघुकुल राज है। यौन वारिपाह पर शंभु रतिनाह पर, ज्यों सहस्रबाहु पर राम द्विजराज हैं। दावा द्रुमदंड पर, चीता मृग झुँड पर, भूषण वितुँड पर जैसे मृगराज हैं। तेजतम अंस पर, कान्हा जिमि कंस पर, ज्यों म्लच्छ वंश पर शेर शिवराज हैं।

अशोक ने कंलगि विजय तो की, पर उसके अतः का हाहाकार शाँत नहीं हुआ। भारी रक्तपात व विनाश से प्राप्त यह सफलता उसे शाँति नहीं दे पाई। बुद्ध की शरण में जाते ही उसका जीवनक्रम बदले गया। धर्मचक्र प्रवर्तन के शुभ प्रयोजन में उसने स्वयं को नियोजित कर दिया। अहंता की विकृति पर कठोर अंकुश ने जिस समर्पण भाव को जन्म दिया, उसने उसे बुद्ध रूपी आदर्शवादी परमात्मसत्ता से जोड़कर महान् चक्रवर्ती-सम्राट् अशोक के रूप अमर कर दिया।


दीप से प्रस्फुटित प्रकाश (kahani)

पर्वत शिखर पर बने मंदिर की प्रतिमा ने एक दिन समाने वाली पगडंडी से सहानुभूति दिखाते हुए कहा-भद्रे! तुम कितना कष्ट सहती हो, यहाँ आने वाले कितने लोगों का बोझ उठाती हो? यह देखकर हमारा जी भर आता है। पगडंडी मुस्कुराती हुई बोली-भक्त को भगवान् से मिलने का अर्थ भगवान् से मिलना ही तो हैं देवी।

प्रतिमा पगडंडी की इस महानता के आगे नतमस्तक हुए बिना न रह सकी।

अंदर के अंधकार में और वृद्धि हुई थी। एक शिष्य ने उठकर दीवार से लगे दीपाधार के दीप को प्रज्ज्वलित कर के दीप से प्रस्फुटित प्रकाश किरणें एकाकार हो आई थीं।


सुनियोजित षड्यंत्रों ने बनाया भारतमाता को बंदिनी

भारतमाता बंदिनी कैसे बनी? इसका उत्तर अंग्रेजी शासकों की समय-समय पर हुई उन चर्चाओं का जानकर मिल सकता है कि यहाँ की शासनपद्धति किस प्रकार की हो, उसकी नीति और अंतिम ध्येय क्या हो और यहाँ के निवासियों के साथ उनका व्यवहार कैसा हो, उनके प्रति हमारा भाव क्या हो? इस पर उनकी आपस में जो बातें हुई, जो विचार, विमर्श हुआ, उसे जानने-समझने से सच्चाई सामने आ जाती हैं। अहमदशाह अलदाली द्वारा मराठों के पराजित होने के बाद, घटनाक्रम तेजी से बदले। इतिहास में अप्रत्याशित मोड़ आए। 23 अक्टूबर 1764 ई. को हुई बक्सर की लड़ाई में अँगरेजों द्वारा शाह आलम द्वितीय, शुजाउद्दौब और मीरकासिम पराजित हो गए। 1767 से 1769 के बीच प्रथम मैसूर युद्ध हुआ। 1780 से 1782 के बीच पहला मराठा युद्ध लड़ा गया। 14 सितंबर 1803 को द्वितीय मराठा युद्ध हुआ और अँगरेजों ने दिल्ली पर अपना कब्जा जमा लिया। हालांकि इसके पूर्व उन्हें 1790 से 1792 में महाराजा रणजीतसिंह और अँगरेजों के बीच अमृतसर की संधि हुई। 1814 ई. आते-आते पेशवाई नष्टप्राय हो गई। इसी के साथ अँगरेजों यह निश्चय होने लगा कि अब वे समूचे हिंदुस्तान पर अपना कब्जा जमा लगे।

अँगरेजों ने भारतवर्ष की जिन रियासतों अथवा जिन प्रान्तों पर विजय पाई, वह उन पर खूब आक्रमण करके नहीं अर्जित की, बल्कि आपस में फूट डालकर बाद में किसी एक दल का पक्ष लेकर अपनी कुटिल नीति के सहारे अपनी जड़े जमाई। भारतवर्ष के किसी भी प्रथम श्रेणी के राज्य पर चढ़ाई करके उस पर अपना स्वामित्व जमाने की हैसियत उनमें नहीं थी। उन्होंने तो कुटिलतापूर्वक रियासती शासन में फूट डाली और जब राज्य में दो पक्ष हो गए तो कमजोर पक्ष को अपना बल देकर उसे सत्ताधारी बन दिया। इसी तरह माँडलकों को सार्वभौम सत्ता के खिलाफ खड़ा कर दिया। सरदारों को राजा-नवाबों के खिलाफ भड़काया और कहीं-कहीं तो नामधारी राजा को अपनाकर प्रजा में ही फूट डलवा दी। अपनी भेदनीति द्वारा उन्होंने अधिकाँश राज्यों को पराजित किया। बंगाल विजय करने में तो उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं का और सरदार-सामंतों के खिलाफ व्यापारी वर्ग का दुरुपयोग करके धर्मद्वेष और वर्गद्वेष तक का भी उपयोग किया।

माउंट स्टुअर्ट एल्फिंस्टन ने 1818 में पेशवाई को खत्म करके हिंदुस्तान में अँगरेजों की सार्वभौमिकता स्थापित करने की और कदम बढ़ाए। वह मुँलाई प्राँत का पहला गवर्नर हुआ। इसी समय सर टामस मनरो मद्रास का गवर्नर था। इनमें से 1819 में एल्फिंस्टन ने सर जॉन मालकन को लिखा-”आज या कल सारा देश हम अपना बना ल यही वाँछनीय हैं।” अंग्रेज राजनीतिज्ञ इस बात को जानते थे कि भारतीय सद्गुण संपन्न हैं, उनमें बौद्धिक क्षमता है, शौर्य हैं, पराक्रम हैं। अगर यहाँ राज्य करना है तो आपस में लड़ाते रहना होगा। इनके संगठन को तोड़ना फिर संगठित न होने देना ही ब्रिटिश सत्ता को कायम रखने का उपाय हैं।

स्वामी रामतीर्थ से एक व्यक्ति ने पूछा-क्या संसार की विपत्तियाँ टालने और स्वर्गीय परिस्थितियों के अवतरण का कोई उपाय हैं?

है अवश्य! स्वामी जी बोले- बलिदान से विपत्ति टलती हैं-यह कहावत आज भी उतनी ही सच्ची हैं, जितनी प्राचीन पुण्यकाल में, ऐसा यज्ञ हमें इसी संसार में स्वर्ग दिला सकता है जिसमें देवताओं की तृप्ति के लिए किए गए यज्ञ में विद्वेष, ईर्ष्या, क्रोध और कृपणता का बलिदान दिया जाए।

फ्रेड्रिक जॉन शीअर नामक एक अंग्रेज लेखक ने सन् 1835 ई. में अपने ‘इंडियन आर्मी’ नामक लख में इसी बात का प्रतिपादन किया। उसने इसमें लिखा है कि “हिंदुस्तानियों में राष्ट्राभिमान तो हैं, पर वे कभी एक नहीं हो सकते, यह हमारे साम्राज्य की सामर्थ्य है।” इसी क्रम में उसने आगे लिखा- ‘परंतु यदि वे एका कर ले तो बहुत आसानी से हमारा नामोनिशान मिटा सकेंगे। ऐसा मुझे भय हैं।” यह भेदनीति एवं फूट डालने की कुटिलता अंत तक ब्रिटिश साम्राज्य का सर्वश्रेष्ठ हथियार बनी रही, यह बात सभी जानते हैं।

भारत को लंबे समय तक गुलाम बनाए रखने के लिए अंगरेजों ने एक और कुटिल नीति का आश्रय लिया यह नीति थी ब्रिटिश शिक्षापद्धति को बढ़ावा। इसके अंतर्गत उन बातों को पढ़ाया जाने लगा जो भारतीय ज्ञान और गौरव को भूलकर मन को यूरोपीय रंग में रँग दें। हालांकि पहले अंग्रेज शिक्षाप्रसार एवं मुद्रण स्वतंत्र दिए जाने के बारे में भयभीत थे। उन्हें यह लग रहा था कि पढ़-लिखकर भारतवासी उनके खिलाफ बगावत न कर दें। परंतु मेटकाफ ने उन्हें बताया कि डरने की बात नहीं हैं। भारतीयों को इस ढंग से पढ़ाओ कि वे हमेशा-हमेशा के लिए ब्रिटिश राजसत्ता के सेवक बने रहें। हुआ भी यही, मेटकाफ की नीति कारगर रही। जिन्होंने अंग्रेजी शिक्षा पाई, वे इस बात का प्रचार करने लगे कि अंग्रेजी राज्य हमारे लिए बहुत जरूरी हैं। किसी भी बुद्धिमान मनुष्य को यह इच्छा नहीं करनी चाहिए कि अंग्रेज का राज्य यहाँ से चला जाए। अंग्रेज पढ़े-लिखे लोग 18वीं सदी के पूर्वार्द्ध में ब्रिटिश साम्राज्य के प्रामाणिक प्रचारक बन गए। हिन्दी, संस्कृत व क्षत्रिय मुख्य भाषाएँ पृष्ठभूमि में चली गई। यह क्रम बाद भी चलता रहा।

अँगरेजों की यह भेदनीति यानि कि संगठन को विघटन में बदलने की कुटिल नीति तीव्रगति से चलती रही और उसी तीव्रगति से उनका साम्राज्य भी बढ़ता गया। परंतु 19वीं सदी के मध्य के आसपास स्थिति अचानक बिगड़ गई। इस बीच सन् 1845 में अँगरेजों और सिखों के बीच प्रथम युद्ध हुआ। 1848 ई. में द्वितीय युद्ध हुआ, परंतु स्थिति बिगड़ने का कारण अँगरेजों की वह गलती थी जो उन्होंने सन् 1857 में कर डाली। यह गलती अथवा भूल थी- भारतवर्ष की धर्मभावना के साथ छेड़छाड़ करना। इससे यहाँ के हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदाय उनसे नाराज हो गए। नानासाहब, तात्याटोपे, महारानी लक्ष्मीबाई, कुँवरसिंह जैसे राष्ट्रवादियों ने इस नाराजगी को प्रबल राष्ट्रवाद का स्वरूप दिया।

यह भारतवर्ष की स्वतंत्रता के लिए पहला व्यापक महाअभियान था। इसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी गई। 1857 ई. में ब्रिटिश सत्ता पर प्रबल मर्माघात हुआ। परंतु जहां तात्याटोपे और महारानी लक्ष्मीबाई जैसे देशप्रेमी व्यक्तित्व थे, वहीं अँगरेजों का सहयोग करने वाले विघटनकारी तत्व भी थे। यह महासंग्राम सफल न हो सका। 1857 ई. को बर्ड कैनिंग ब्रिटिश साम्राज्य के वायसराय के रूप में सत्तासीन हुए। अब भारत ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बन गया।

1857 ई. में हुए स्वतंत्रता के इस संग्राम से ब्रिटिश राज्य कैसे बच गया, इसकी मीमाँसा सर जॉन सीली ने कुछ इस प्रकार की-”एक जाति के खिलाफ दूसरी जाति को लड़ाकर ही बहुताँश में यह गदर मिटाया हैं।” जॉन सीली ने अपने ये उद्गार अपने ही एक ग्रंथ ‘द एक्सपैन्शन ऑफ इंग्लड’ में व्यक्त किए हैं। उसने आगे लिखा-”जब तक यहाँ के लोग सरकार की आलोचना करने और उसके खिलाफ बगावत करने के आदी नहीं हो जा सकती हैं, परंतु यदि हालत बदले गए और किसी भी तरह यहाँ के लोगों में संघर्ष की भावना पैदा हो गई, उन्हें संगठित होकर रहना, संगठित होकर काम करना आ गया तो मैं इतना ही नहीं कहता कि हमारा प्रभुत्व के कायम रहने की आशा भी बिल्कुल छोड़ देनी चाहिए।”

वीरभद्रों की जरूरत है

अगले दिनों अनेकों दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन की आवश्यकता पड़ेगी। उसके लिए ऐसे गाँडीवधारियों की, जो अर्जुन की तरह कौरवों की अक्षौहिणी सेनाओं को धराशायी कर दे आवश्यकता पड़ेगी। ऐसे हनुमानों की जरूरत होगी, जो एक लाख नाती वाली लंका को पूँछ से जलाकर खाक कर दे। कलाकारों की आवश्यकता है, जो चैतन्य महाप्रभु, मीरा, सूर, कबीर की भावनाओं को इस प्रकार लहरा सकें, जैसे सपेरा साँप को लहराता है। धनवानों की जरूरत हैं जो अपने पैसे को विलास में खरच करने के लिए लुटा सकें। राजनीतिज्ञों की जरूरत हैं जो गाँधी, रूसो और कार्लमार्क्स तथा लेनिन की तरह अपने संपर्क के प्रजाजनों को ऐसे मार्ग पर चला सकें, जिसकी पहले कभी भी आशा नहीं की गई थी।

यहाँ समरसता उत्पन्न करने, विभिन्न जातियों के बीच भावनात्मक ऐक्य स्थापित करने का एक ही सूत्र था-साँस्कृतिक क्राँति। ऐसी साँस्कृतिक क्राँति जो आध्यात्मिक भावापन्न हो। नवजागरण काल में राजा राममोहन राय, केशवचंद्र सेन आदि ने यही सूत्र खोजने शुरू किए थे। उनके इन प्रयासों से भारतीयता अंगड़ाई लेने लगी थी। एक नई संक्राँति के स्वर सुने जाने लगे थे। यह वर्तमान सहस्राब्दी की तृतीय संक्राँति थी, जो भारतव्यापी ही नहीं विश्वव्यापी होने का अभियान रच रही थी।


तृतीय संक्राँति नवजागरण का संदेश लेकर आई

उन्नीसवीं सदी भारत में एक नई संक्रांति लेकर आई। यह वह युग था, जब देश में इंग्लैंड की सत्ता राजनीतिक प्रभुत्व पूरी तरह से स्थापित कर चुकी थी। पराजित जाति सुलभ कई दोष भारतीय संस्कृति के प्रयास और गाँभर्य ने क्रमशः सिकुड़-सिमटकर तथा विनष्टप्राय होकर एक विकट परिस्थिति उत्पन्न कर दी थी। एक के बाद एक अत्यंत शक्तिशाली विदेशी भावों के घात-प्रतिघात से उन दिनों भारतवासियों का जीवन भयभीत हो गया था। ऐसी परिस्थिति में आत्मरक्षा के लिए वे अनेक अस्वाभाविक एवं अवाँछनीय उपायों का सहारा लेने के लिए बाध्य हो गए थे। साथ ही साथ बहरी देशों द्वारा भी भारत के ऊपर बहुत कुछ आरोपित हो गया था। इस क्रिया-प्रक्रिया में अनेकों कुप्रथाएँ देश में जन्म ले चुकी थीं अथवा लेने लगी थीं। धर्मांधता ने आध्यात्मिकता का आसन ग्रहण कर लिया। पुरोहितों को सामाजिक संरक्षण के लिए जातिभेद प्रथा के अलावा कुछ और नहीं सूझा। इसी तरह नारियों की परदाप्रथा भी अनिवार्य घोषित हो गई।

भारी विपत्ति के क्षण बन गए थे। धर्म के नाम पर एक अंतर्घाती अनाचार भारतीय समाज में आसीन हो और भोग व्यवस्था में मन लगाने से भारत में दरिद्रता बढ़ गई। रोग, अकालमृत्यु, दुर्भिक्ष आदि बढ़ने लगे और धर्म, शिक्षा, समाजव्यवस्था, उद्योग, वाणिज्य, संस्कृति आदि सभी क्षेत्रों में उन दिनों भारत पतित और पथभ्राँत हो गया। कुछ ऐसा लगता था मानो भारतीयों की भारतीयता शीघ्र ही पूरी तरह मिट जाएगी। पश्चिमी शासन ही नहीं पश्चिमी विचारधाराएँ भी भारत-भारतीयों एवं भारतीयता के ऊपर अपना वर्चस्व स्थापित करने, उन्हें पूरी तरह आक्राँत करने में जुटी थीं। पश्चिमी विज्ञान का भारतवासियों के आध्यात्मिक ज्ञान एवं नीतियों का उपहास उड़ाने के लिए उतारू था। अंग्रेज चाहते भी यही थे कि साँस्कृतिक दृष्टि से पूर्वी देशवासियों के द्वारा पश्चिमी संस्कृति के सामने अपनी हीनता स्वीकार कराकर केवल ब्रह्म जगत् में ही नहीं, बल्कि मनोजगत में भी सदा लिए अधिकार जमा ले। अंग्रेज के साँस्कृतिक अभियान का उद्देश्य यही था कि भारतवासी अपने-अपने घर में भाषा और आकार अलग अस्तित्व बचाए रखकर भी अखिल भारतीय स्तर पर तथा अँगरेजों के साथ सामाजिक व्यवहार के समय हर प्रकार से पश्चिमी संस्कृति का अनुकरण करें और उनके पिछलग्गु बन जाएँ। हो भी कुछ ऐसा ही रहा था।

उन्नीसवीं सदी में यूरोप में भी बहुत कुछ घटित हो रहा था। फ्राँस की राजक्राँति से नैपोलियन युग का आगमन हुआ था। साहित्य के क्षेत्र में बायरन, शैली, कीट्स अपना प्रभाव जमाए हुए थे। 1815 के बाद आधुनिक राजनीति के स्वर उभरे। 1848 ई. के आस-पास यूरोप में कई असफल क्राँतियों ने जन्म लिया, जो अंततः मानवीय इतिहास के लिए एक युगाँतरकारी घटना बनी। न्यूटन के सिद्धान्तों ने इसी काल में मशीनीयुग को जन्म दिया। 1859 ई. में चार्ल्स डार्विन की पुस्तक ‘द ओरिजन ऑफ स्पीसिज’ प्रकाशित हुई। इसके विकासवाद के क्राँतिकारी सिद्धाँत ने एकबारगी समूची दुनिया में वैचारिक

उथल-पुथल मचा दी। यद्यपि आधुनिक विज्ञान के कतिपय सिद्धांतों ने उन्नीसवीं सदी के काफी पहले ही जन्म ले लिया था, परंतु उनको अपनाने-व्यवहार में लाने की प्रक्रिया इसी युग में शुरू हुई। फ्राँस में जन्मे रूसो एवं वाल्टेयर के सिद्धाँत इन वैज्ञानिक सिद्धान्तों से मिलकर एक व्यापक हलचल को जन्म दे रहे थे। चारों ओर एक मस्तिष्कीय भूकंप आया हुआ था।

भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। वैज्ञानिक बातों के अलावा हाँलस, मिल, स्पेंसर आदि के विचार भी यहाँ प्रचलित हो रहे थे। इसका प्रभाव यह हुआ कि अधकचरी बौद्धिकता की वजह से भरत देश का वायुमंडल कई प्रकार की विरोधी आलोचनाओं, भौतिकवाद और नास्तिकता के द्वारा विषाक्त हो गया था। एक ओर ईसाई मिशनरियाँ हिंदू धर्म की निंदा बार-बार उत्साह में भरकर कर रही।

थीं तथा छल-बल कौशल से हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करने में दृढ़प्रतिज्ञ होकर लगी हुई थी। दूसरी ओर धर्म विमुख श्रद्धा-भक्ति, गुरुपरंपरा, इतिहास-पुराण, रीति-नीति आदि सबको लुप्त कर देने को जैसे निश्चय कर चुका था। पश्चिमी की दार्शनिक विचारधाराएँ भी कुछ ऐसा ही करने पर उतारू थीं इस पश्चिमी धर्म-दर्शन एवं विज्ञान के तिहरे आक्रमण के समक्ष टिके रहना आसान नहीं था। तथापि भारत एक प्राचीन देश हैं। यह पृथ्वी पर परमेश्वर के अवतरण की भूमि हैं। समूची धरती में संव्याप्त आध्यात्मिक चेतना का ध्रुवकेन्द्र हिमालय यहीं हैं। इसने अपने हृदय में हजारों वर्षों से अतीत गौरव को संजोए रखा हैं तथा पूर्वकालीन ब्रह्मर्षियों-महर्षियों के द्वारा दिखाए गए पथ पर चलकर युगोपयोगी नई साधन पद्धतियों का आविष्कार किया है। यह देश किसी भी तरह नष्ट नहीं हो सकता। भारत के भाग्यविधाता-परमेश्वर ऐसा होने नहीं देंगे।

इस वजह से संक्राँति की इस वेला में एक नए युगप्रवाह ने जन्म लिया। ‘संभवामि युगे-युगे’ के स्वर पुनः मूर्त हुए। यह उसी प्रखर चेतना का जन्म था, जो पहले कबीर के रूप में आकर युगसमस्याओं के समाधान प्रस्तुत कर चुकी थी। जिसने सहस्राब्दी की द्वितीय संक्राँति के अवसर पर समर्थ गुरु रामदास के रूप में आकर राष्ट्रीय पौरुष को ललकारा था। अपनी सामर्थ्य से समूचे देश को समर्थ बनाया था। अबकी बार फिर से वही दिव्य सत्ता बंगाल के एक छोटे से गाँव में सन् 1836 ई. में अवतरित हुई। उसकी अवतारलीला की पृष्ठभूमि पहले से बनाई जा रही थी।

इसी प्रयास के रूप में राजा राममोहन राय ने 1815 ई. में ‘आत्मीय समाज’ की स्थापना की। यही बाद में 1828 ई. में ‘युनिटेरियन एसोसिएयन’ बनी तथा और भी बाद में इसको ही महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर ने ब्रह्मसमाज नाम दिया। परवर्तीकाल में केशवचंद्र सेन एवं विजयकृष्ण गोस्वामी के नेतृत्व में इसकी दो धाराएँ साधारण ब्रह्मसमाज एवं नवविधान समाज का रूप लेकर प्रवाहित हुई। इसके अलावा और भी अन्य धार्मिक-सामाजिक आँदोलन सक्रिय हुए। उनमें नेटिव एज्यूकेशन सोसाइटी, गुप्त समाज, प्रार्थना समाज, आर्य समाज, थियोसोफिकल सोसायटी, नामधारी आँदोलन, सैयद अहमद खाँ का मुस्लिम जागरण, सत्यव्रत समाश्रमी का वैदिक सभ्यता का पुनर्जागरण, सर्वमंगल सभा, आर्यधर्म प्रचारिणी सभा, सनातन पंथियों का आँदोलन काफी अग्रणी रहे। सभी के सम्मिलित प्रयासों से भारत की जनचेतना में एक अनूठी जागरण की लहर छाने लगी। संक्राँति का युग जागरण का युग बनने लगा। यह जागरण भारत के अस्तित्व एवं अस्मिता का जागरण था।

हालांकि ये सभी स्वर जागरण के थे, परंतु इनमें पारस्परिक मेल–मिलाप न था, स्वाभाविक लय न थी। प्रायः इन सभी में आध्यात्मिक भावधारा अंतर्निहित थी, परंतु समन्वय न था। उलटे कभी-कभी तो विरोध मुखर हो उठता था। इस प्रयास में एक बहुत बड़ी कमी यह भी थी कि उनमें प्रायः बहुसंख्यक जनों के स्वरों में उतनी बातें उनके अनुभूति का ओज और तेज न था। उनकी बातें उनके अपने शास्त्रवचनों, धर्मग्रन्थों के पन्नों में लिखे वाक्यों पर आधारित थीं। स्वाभाविक हैं, ऐसे में उस महान् व्यक्तित्व की खोज होती, जो इन सबको एक साथ अपनी अनुभूति का बल दे सके। इन सभी आँदोलनों में अपने तप से प्राण उड़ेल सके। जो यह बताए कि धर्म केवल कहने अथवा प्रचारित करने की बात नहीं, बल्कि अनुभूति की वस्तु हैं और यह अनुभूति ही सामाजिक, आर्थिक एवं साँस्कृतिक आदि सभी मानवीय व्यवस्थाओं में नई चेतना उड़ेलती हैं, उनमें नए प्राण का संचार करती हैं। सन् 1836 ई. में बंगाल के कमारपुकुर गाँव में गदाधर के नाम से अवतार लने वाली वह दिव्यसत्ता ठाकुर श्री रामकृष्ण के नाम से दक्षिणेश्वर में यही अनुभूति सँजो रही थी। अपनी कठोर तप−साधना से वह सभी साधनापद्धतियों में समन्वय की स्थापना करने जुटी थी, ताकि इस संक्राँतिकाल में एक नया अभ्युदय जन्म ले सके। नया युग मुस्करा सके।


भाग लेने के लिए उठना चाहिए (kahani)

नागार्जुन सुप्रसिद्ध रसायनज्ञ थे, पर वे संपर्क में आने वालों को धर्मोपदेश भी दिया करते थे। इस पर एक व्यक्ति ने कहा-आप रसायन शास्त्र पढ़ाया करें तो आपका नाम भी बढ़ेगा। आपकी विद्या का भी विस्तार होगा।

नागार्जुन बोल-रसायनज्ञ तो कभी भी बना जा सकता है, बात तो तब हैं जब अच्छे आदमी बनें। जिन्हें धार्मिक उत्तरदायित्व वहन करते पड़ते हैं, उन्हें तो इस तथ्य को अनिवार्य ही मानना चाहिए। जो जाग्रत हैं उन्हें स्वयं भी इस युगचेतना में भाग लेने के लिए उठना चाहिए। ऐसे अवसर इतिहास में बार-बार नहीं आते।


Quotation

भक्तिभावना अंदर तक ही सीमित न रह। वह परमार्थ हेतु सत्कर्मों के रूप में अभिव्यक्त हो तो ही वह सार्थक हैं। वृत्ति कृपण जैसी हो तो कुबेरों का खजाना भी व्यर्थ हैं। उदार के लिए तो प्रतिकूल परिस्थिति में भी परमार्थ की आकुलता रहती हैं।


सहसा किरणों का सूर्य चमका श्री रामकृष्ण के रूप में

साधनापद्धतियों में समन्वय तार्किक विश्लेषण या बौद्धिक प्रतिपादन की विषयवस्तु नहीं हैं। यह तो विभिन्न साधनापद्धतियों की गहन साधनाओं के अंतस् से उपजे निष्कर्षों के सरलीकरण से ही संभव हैं। श्री रामकृष्ण परमहंस अपने जीवनकाल में इन्हीं आध्यात्मिक प्रयोगों में संलग्न रहे और निष्कर्ष रूप में उन्होंने कहा साधन भिन्न हो सकते हैं, किन्तु सभी लोग उसकी खोज तक पहुँचने का प्रयत्न करते हैं। सभी लोग उसकी खोज में हैं चाहे वे भिन्न से ही उसे खोजते हों। उसका यह कथन किसी दार्शनिक का वैचारिक प्रतिपादन मात्र नहीं हैं, बल्कि एक आत्मद्रष्टा, ईश्वरभावोन्मत, महान् ध्यानस्थ योगी का सत्यपुँज हैं, जिसका साक्षात् संबंध उस आदिशक्ति से था जिसे ब्रह्मशक्ति, काली, गॉड या अल्लाह आदि नामों से जाना जाता है।

वह शक्ति उनसे अभिन्न थी। इससे वे वार्त्तालाप किया करते हैं और सब कुछ भूलकर समाधिमग्न हो जाते थे। विभिन्न साधनाओं के करने के पश्चात् उनकी यह निश्चयात्मक वाणी उच्चरित हुई कि समस्त धर्मों-मतों का मिलन बिन्दू वह एक ही ईश्वर हैं जिसमें विभिन्न धर्मावलंबी लोग अपने धर्म की पूर्णता पाते हैं। उनका समूचा जीवन “एकं सद्विपाः बहुधा वदंति” के वैदिक महामंत्र को प्रमाणित करने वाला महाप्रयोग था। उन्होंने प्रत्येक धर्म-संप्रदाय एवं मतों के संघर्ष को अपने जीवन में समन्वय एवं एकता के द्वारा निस्सृत किया। इस प्रसंग में उनके कठोर साधनामय जीवन की झलक देखना अनिवार्य हैं।

श्री रामकृष्ण ने दक्षिणेश्वर के मंदिर में पुजारी बनने के बाद अपनी साधना की शुरुआत की। इस क्रम में उन्होंने साधना में बाधक सभी वस्तुओं एवं भावों का परित्याग कर दिया। अभिमान को समाप्त करने के लिए उन्होंने भंगी रसिक के घन का मैल साफ किया। वैराग्य एवं व्याकुलता की इसी भावदशा में उन्हें माँ काली के दर्शन हुए। इस दर्शन के पश्चात् वह द्वैतभाव के साकार सगुण, निराकार-सगुण एवं अद्वैतभाव के निराकार-निर्गुण की साधना में संलग्न हुए। द्वैतभाव की साधना में उन्होंने अपने कुल के इष्टदेव श्री रघुवीर की साधना दास्य भक्तिभाव से करना शुरू की। इसके लिए उन्होंने रामभक्त हनुमान का भाव अपने ऊपर आरोपित किया। वे महावीरमय हो गए। इस साधना अवधि में उन्होंने पहले सीता जी के दर्शन किए। बाद में इसी भावानुराग में उन्होंने श्री रघुवीर के दर्शन पाए। हनुमान भाव के साथ ही उन्होंने भगवान् राम की बालभाव में साधना की और प्रभू की बालमूर्ति का दर्शन किया।

सकार सगुण द्वैतभाव की साधना के अगले चरण में उन्होंने मधुर स्वर भाव की साधना की। वह स्वयं को व्रज की गोपी रूप में अनुभव कर श्रीकृष्णप्रेम में डूब गए। इस साधना के अनुभवों को बताते हुए उन्होंने कहा भी राधारानी की अंगक्राँति को मैंने नागकेसर पुष्प के केसरों की भाँति गौरवर्ण देखा था। छह माह चली इस साधना की उत्कट अवस्था में वह महाभाव में पहुँच गए और सच्चिदानंद श्रीकृष्ण का पावन दर्शनलाभ किया। अन्य मूर्तियों की ही भाँति श्रीकृष्णमूर्ति भी उनमें लीन हो गई।

युगचेतना ने जाग्रत् आत्माओं से एक ही माँग की हैं- नवसृजन के लिए समयदान। भगवान ने समय-समय पर अपने प्राणप्रिय भक्तों से विविध प्रकार की याचनाएँ की हैं। इसलिए नहीं कि वे दरिद्र, अपंग या असमर्थ हैं, वरन् इसलिए कि भक्तों ने इस बहाने अपनी प्रसुप्त उत्कृष्टता को प्रखर बनाने के अवसर मिल सके। याचना और अनुदान का परीक्षण न चलता तो भक्तपरंपरा में मात्र पाखंडी ही भर गए होते और सच्चे-झूठे की परख ही संभव न रहती।

द्वैतभाव की साधना के बाद उन्होंने बहुविधि तंत्र साधनाएँ कीं। इस प्रसंग में उन्होंने भैरवी ब्राह्मणी द्वारा तंत्रमार्ग की दीक्षा ली। तंत्रमार्ग में उन्होंने अनेक भावों एवं विविध मार्गों की सभी साधनाएँ पूर्ण कीं और उस परम चित् शक्ति का साक्षात्कार किया। साधना अवधि में स्पष्ट अनुभव किया कि यह समस्त सृष्टि उसी महाशक्ति की क्रीड़ा-कल्लोल हैं। इन साधनाओं के निष्कर्ष रूप में वे समस्त स्त्रीजाति को मातृभाव में ही भावी नारीयुग के अभ्युदय के संकेत निहित थे।

द्वैतभाव की साधना में सिद्ध श्री रामकृष्ण अब तोतापुरी नामक संन्यासी के निर्देशन में अद्वैत साधना में संलग्न हुए। विधिवत् दीक्षा लेने के बाद जल्द ही उनका मन निर्विकल्प समाधि में डूब गया। उनका ज्ञाता, ज्ञेय एवं ज्ञान का भेद समाप्त हो गया। इस अवस्था में वह छह माह तक रहे। अद्वैत भावभूमि में आरुढ़ श्री रामकृष्ण ने समझ लिया था कि समस्त साधनाओं को अंतिम लक्ष्य अद्वैतभाव हैं। समस्त धर्मों की साधनाएं इसी लक्ष्य की ओर अग्रसर होती है।

अद्वैत की निर्गुण निराकार साधना के बाद उन्होंने निराकार सगुण साधनाएँ भी की। इसके अंतर्गत उनकी इस्लाम तथा ईसाई धर्म की साधना प्रमुख हैं। वे उस समय की साधना के बारे यदा-कदा बताया करते तब मैं अल्लाह का जाप किया करता था। पाँच बार नमाज पढ़ता। इस साधना में सर्वप्रथम लंबी दाढ़ी युक्त एक गंभीर ज्योतिर्मय पुरुष का दिव्य दर्शन हुआ। तदंतर सगुण विराट् ब्रह्म की उपलब्धि के पश्चात् तुरीय निर्गुण ब्रह्म ने उनका मन लीन हो गया। ईसाई धर्म की साधना के समय वह बाहबिल सुना करते। गिरजाघर भी जाते। उनकी यह भावधारा साधनाकाल में बनी रही। एक दिन उन्होंने एक सुँदर गौरवर्ण देवमानव को अपनी ओर आते हुए देखा। उन्हें देखते ही उनके अंतःकरण में प्रतिध्वनित होने लगा-ईसामसीह! डनके इस प्रकार सोचते ही देवमानव ईसा श्री रामकृष्ण का आलिंगन कर उनके शरीर में लीन हो गाए। उनकी बातयचेतना लुप्त हो गई और उनका मन सगुण विराट् ब्रह्म के साथ एकाकार हो गया।

अनय भावों एवं पंथों की भी उन्होंने साधनाएँ कीं। बौद्ध भाव में डुलाकर एक बार उन्होंने कहा-श्री बुद्धदेव निश्चित ही ईश्वरावतार थे। उनके प्रवर्तित मत तथा वैदिक ज्ञानमार्ग में कोई भेद नहीं हैं। जैन तीर्थंकरों के प्रति भी वे श्रद्धावान् थे। उनके मरे में महावीर की पाषाण मूर्ति होना एवं उसको धूप देना इस तथ्य के स्पष्ट प्रमाण हैं।

वेदाँत के विभिन्न संप्रदायों अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत आदि सभी साधनाओं के फलस्वरूप उन्हें इस सत्य की स्पष्ट अनुभूति हो गई कि उनमें कोई मूल विरोध नहीं हैं। किसी भी धर्म या संप्रदाय के मत अंततः एक ही गंतव्य स्थल तक पहुँचते हैं। मनुष्य की आध्यात्मिक स्थिति के अनुसार इन मार्गों को अपनाने की आवश्यकता साधक को पड़ती हैं। समस्त प्रचलित धर्मसाधनाएँ करके भी रामकृष्ण ने यह सिद्ध कर दिया कि समस्त धर्मों का धर्ममत अनेक मार्ग हैं। सारे मत-संप्रदाय एक ही सत्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील हैं।

अपने इस महान् प्रयोग एवं इसके निष्कर्ष से एकाकार होकर श्री रामकृष्ण समस्त धर्मों के सजीव विग्रह बन गए। समस्त धर्मों की पूर्णता उनमें परिलक्षित होने लगी। वैज्ञानिक युग के आविर्भाव से विभिन्न धर्मों के प्रति जब मनुष्य की निष्ठा कम होती जा रही थी और उस अभूतपूर्व परिस्थिति में बातय आडंबर को बनाए रखने के लिए जब प्रायः सभी धर्म अंत-सार शून्य हो रहे थे, तब श्री रामकृष्ण का आगमन निश्चित रूप से एक युगाँतरकारी घटना बनी। उस समय प्रायः सभी धर्मप्रचारक अपने-अपने धर्म की बढ़ाई करने में लगे हुए थे, जो किसी भी विचारशील व्यक्ति के लिए ग्रहण करना असंभव हो रहा था। नव्यशिक्षित वर्ग में से किसी को अपने भाव में अनुप्राणित कर पाना असंभव हो रहा था। ऐसे समय श्री रामकृष्ण ने समस्त साधनापद्धतियों में समन्वय के साथ धर्म में नए प्राण भरे। उन्होंने अपनी जीवनसाधना से यह प्रमाणित किया कि वास्तव में सभी धर्मों का सारतत्व मानव धर्म हैं और इसके अनुशीलन की यथार्थ उपलब्धि हैं- मानव में देवत्व का जागरण रामकृष्ण परमहंस परस्पर चर्चा में शिष्यों को बता रहे थे- मनुष्यों में कुछ देवता पाए जाते हैं, शेष तो नरपिशाच ही होते हैं।

नरेन्द्र ने पूछा-भला इन नरपिशाचों और मनुष्यों तथा देवताओं की पहचान क्या हैं।

परमहंस ने कहा- वे मनुष्य देवता है जो दूसरों को लाभ पहुँचाने के लिए स्वयं हानि उठाने को तैयार रहते हैं, मनुष्य वे हैं जो अपना भी भला करते हैं और दूसरों का भी। नरपिशाच वे हैं जो दूसरों की हानि में सोचते और करते हैं, भले ही इस प्रयास में उन्हें स्वयं ही हानि सहनी पड़े।

प्राचीन ऋषि, महर्षियों द्वारा प्रणीत भारतीय संस्कृति का सार मर्म भी यही हैं। तभी तो भारतीय संस्कृति देवसंस्कृति कहलाती हैं। इस देवसंस्कृति के प्रसार एवं प्रशिक्षण के लिए उन्होंने अपने शिष्य वृंद को सन्नद्ध किया। अपने परम अनुगत एवं गुरुगत प्राण शिष्य स्वामी विवेकानंद को उन्होंने इसका विशेष दायित्व सौंपते हुए कहा “नरेन शिखा दिवे” अर्थात् नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद) जन-जन को शिक्षा देंगे। उनका महान् संदेश ही परवर्तीकाल में स्वामी विवेकानंद के मुख से दिग्विजय का शंखनाद बनकर विश्वगगन में गूँजा। यह दिग्विजय भारत की संस्कृति एवं साधना की विजय थी, महर्षियों के सतानत संदेश की विजय थी, जिसमें श्री रामकृष्ण देव के तापमान भी ओत–प्रोत थे।


गूँजा देवसंस्कृति दिग्विजय का शंखनाद

यह दिग्विजय का शंखनाद था, जो सन् 1893 ई. में अमेरिका के शिकागो शहर में हुए विश्वधर्म सम्मेलन में गूँज उठा। गूँज और प्रतिध्वनि की दृष्टि से यह विजयघोष अभूतपूर्व एवं आश्चर्यजनक था। भारत की सनातन संस्कृति श्री रामकृष्ण परमहंस की अलौकिक धर्म साधना यहाँ स्वामी विवेकानंद के रूप में साकार हुई थी। शिकागो सम्मेलन में स्वामी जी ने जिस ज्ञान, जिस उदारता, जिस विवेक और जिस वाग्मिता का परिचय दिया, उससे समस्त विश्व चमत्कृत हो उठा। वहाँ के सभी लोग मंत्रमुग्ध होकर भारतीय संस्कृति के सनातन स्वरों में विभोर होने लगे। उनके प्रखर एवं ओजस्वी भाषणों पर टिप्पणी करते हुए ‘द न्यूयार्क हैराल्ड’ ने लिखा कि धर्मों की पार्लियामेंट में सबसे प्रखरतम एवं महान् व्यक्ति स्वामी विवेकानंद हैं। उनका भाषण सुनकर अनायास ही यह प्रश्न उठा खड़ा होता है कि ऐसे ज्ञानी देश को सुधारने के लिए धर्मप्रचारक भेजने की बात कितनी मूर्खतापूर्ण हैं। बाद के दिनों में महर्षि अरविंद ने कहा स्वामी विवेकानंद के द्वारा अमेरिका में किए गए साँस्कृतिक पुरुषार्थ को करने के लिए लंदन काँग्रेस जैसी सैकड़ों का सम्मिलित प्रयास भी कम पड़ जाएगा।

स्वामी जी ने वहाँ बड़े संक्षेप किंतु सारगर्भित रूप में वैदिक संस्कृति, दर्शन मनोविज्ञान, अध्यात्म साधना, परिचय दिया था। इस प्रकार वैदिक चिंतनराशि को एक अखंड-सुसंबद्ध भाषा में इसके पूर्व कभी किसी ने विदेशियों, प्राचीन वैदिक सत्यद्रष्टा महर्षियों के समान श्रोताओं को ‘अमृत के पुत्रों’ कहकर संबोधित करते हुए महान् ब्रह्मर्षि के स्वर तथा भाषा में कहा- ‘अमृत के पुत्रों!’ कैसा मधुर और आशाजनक संबोधन हैं यह। बंधुओं! मैं इसी मधुर नाम से तुम लोगों को संबोधित करना चाहता हूँ। तुम अमृत के अधिकारी हो। हिंदू तुम्हें पापी कहने से इनकार करता है। तुम तो ईश्वर की संतान हो चिर आनंद के भागी हो, पवित्र और पूर्ण हो। मृत्युलोक के देवता हो तुम। तुम वह अजर-अमर आत्मा हो, जो कतिपय नियमों का भयावह संघात नहीं हैं और न ही कार्यकारण का अनंत कारागार हैं, अपितु इन समस्त नियमों के परे प्रत्येक परमाणु शक्ति में ओत-प्रोत हैं। इन उन विराट् पुरुष के अभिन्न अंश हो, जिनके आदेश से वायु प्रवाहित होती हैं, अग्नि दहकती हैं, मेघ बरसते हैं और समूची प्रकृति पृथ्वी पर अपना खेल रचती हैं।

विश्वधर्म सम्मेलन में स्वामी जी की व्याख्यानमाला के महत्व का वर्णन करते हुए भगिनी निवेदिता ने लिखा, “धर्म महासभा में प्रदत्त स्वामी जी के व्याख्यान के संबंध में कहा जा सकता है कि जब उन्होंने भाषण देना आरंभ किया तो उनका विषय था-’हिंदुओं के धार्मिक विचार’परंतु जब उनका भाषण समाप्त हुआ, तो अभिनव मानव धर्म कीं-हिन्दू संस्कृति अपनी आभा को प्रखर कर चुकी थीं।”

भगिनी निवेदिता आगे कहती हैं, भारत की सांस्कृतिक चेतना, उसके संपूर्ण अतीत द्वारा निर्धारित संपूर्ण देशवासियों का संदेश ही उनके माध्यम से मुखरित हो उठा था। जब वे पश्चिम के यौवनकाल-मध्यातन के समय में व्याख्यान दे रहे थे, तभी प्रशाँत के दूसरी ओर तमसाच्छन्न गोलार्द्ध की छायाओं में निद्रित एक राष्ट्र आशान्मुख हो उस संदेश की बाट जोह रहा था, जो अरुणोदय के पंखों पर आकर अपनी महिमा व शक्ति के गूढ़ रहस्य को उद्घाटित करने वाला था। उसी मंच पर स्वामी जी के पास अन्य संस्कृति, मतों व संघों के प्रवक्ता भी उपस्थिति थे परंतु एक ऐसी संस्कृति का प्रचार करने का गौरव उन्हीं को प्राप्त हुआ, जिसकी उपलब्धि के लिए उन्हीं की भाषा में उनमें से प्रत्येक, विभिन्न नर-नारियों की विभिन्न अवस्थाओं तथा परिस्थितियों से होकर एक ही लक्ष्य तक पहुँचने की यात्रा, अग्रसर होने का प्रयास मात्र हैं। स्वामी जी कहना था कि वैदिक संस्कृति की दृष्टि में मनुष्य भ्रम से सत्य की ओर नहीं जाता है, अपितु उच्चतर सत्य की ओर। मानव इतिहास के सुदीर्घ काल में जटिलतम अनुभूतियों द्वारा प्रमाणित इस संस्कृति को भारतवर्ष ने स्वामी विवेकानंद में माध्यम से आज के पाश्चात्य जगत् के सम्मुख प्रस्तुत किया।”

महासभा के पहले दिन से ही देवसंस्कृति दिग्विजय का शंखनाद करने वाले विवेकानंद विश्ववंद्य बने। शिकागो में उनकी उपस्थिति के बारे में श्रीमती एनीबेसेंट ने लखि, “अमेरिका के धूम्रमलनि क्षितिज पर भारतीय सूर्य के समान दीप्तिमान, सिंह के समान उन्नत सिर, अंतर्भेदी दृष्टि, चंचल होष्ठ द्वय, मनोहर तथा द्रुतचाल, गैरिक वस्त्रों में विभूषित एक महिमायम मूर्ति स्वामी विवेकानंद प्राचीनतम जीवन एवं संस्कृति के प्रतिनिधि थे। वे जो संस्कृति संदेश लेकर आए थे, उसके अनुपम सौंदर्य के सामने, भारत के हृदयस्वरूप व भारत के प्राणस्वरूप प्राच्य के उस अतुलनीय संदेश के सामने, उस अद्भुत आत्मविद्या के गाँभीर्य के सामने शेष सब फीका पड़ जाता था। विशाल जनसमुदाय भावविभोर होकर उनके मुख्य से उच्चरित शब्दों के लिए कान खड़े रखता था कि कहीं एक भी शब्द से वंचित न रह जाए।”

अमेरिका की एक कवियत्री हैरियट मनरो इस धर्म महासभा में उपस्थित थीं और बाद में उन्होंने अपनी विवेकानंद की महिमामय उपस्थिति ने वस्तुतः धर्म महासभा और पूरे नगर को जीत लिया था। उनका प्रबल और आकर्षण व्यक्तित्व, काँसे के घंटा ध्वनि के समान उनका गंभीर और मधुर कंठ स्वर, उनके संयत भावोच्छास उच्च्रित उनके संदेश का सौंदर्य इन सबने मिलकर हमारे जगत् के लिए चरम अनुभूति के एक विरल अवसर की सृष्टि की थी।”

निस्संदेह स्वामी जी ने अपने भाषणों, वार्तालापों लेखों, कविताओं और वक्तव्यों के द्वारा भारतीय संस्कृति के सार को सारे पाश्चात्य जगत् में फैला दिया। प्रायः डेढ़ सौ वर्षों से ईसाई धर्मप्रचारक संसार भर में हिंदुत्व की जो निंदा फैला रह थे, उन पर अकेले स्वामी विवेकानंद के कर्तव्य ने रोक लगा दी। इससे भारतवासी भी अपनी प्राचीन संस्कृति के प्रति गौरव का अनुभव तीव्रता से करने लगे। यह वर्तमान सहस्राब्दी की सबसे मूल्यवान एवं युगाँतरकारी घटना थी। भारतीय संस्कृति को लीलने के लिए अंग्रेजी भाषा, ईसाई धर्म एवं संस्कृति और यूरोपीय बुद्धिवाद के पेट से जो तूफान उठा था, वह स्वामी विवेकानंद के हिमालय जैसे विशाल यक्ष से टकराकर बैट गया। इसी दिन से भारत का नवजागरण अभियान नवीन उत्साह के साथ नवीनतर सफलता की ओर प्रारंभ हुआ। एक प्रकार से संन्यासी योद्धा के रूप में स्वामी जी राष्ट्र की स्वतंत्रता के अग्रदूत बनकर निखरे।

स्वामी विवेकानंद के दिग्विजय घोष ने भारत के अंग-प्रत्यंग में सिहरन ला दी। भारतमाता के इस वरदपुत्र ने अपने देश का सांस्कृतिक संदेश जिस ढंग से पाश्चात्य जगत् में प्रचारित किया, उसके द्वारा परतंत्र भारत की अंतरात्मा को एक नए प्रकार से आत्मविश्वास मिला और इसके फलस्वरूप भारत देश में एक प्रबल बलिदान और निर्भयता की शिक्षाएँ भी संस्कृति से निकाली। उनके विचारों से राष्ट्रवाद का जन्म हुआ। एक ऐसा प्रचंड राष्ट्रवाद जो अपने मजबूत एवं सुदृढ़ आध्यात्मिक आधार पर उठ खड़ा हुआ। स्वामी जी ने देशवासियों से आतनान किया-”मैं भारत में बेहे की मांसपेशियाँ और फौलाद की नाड़ी-धमनियाँ देखना चाहता हूँ, क्योंकि इन्हीं के भीतर वह मन निवास करता है, जो झंझाओं और व्रजों से निर्मित होता है। शक्ति, पौरुष, क्षात्रवीर्य और ब्रह्मतेज इनके समन्वय से ही भारत में नई मानवता का निर्माण होना चाहिए।

स्वामी विवेकानंद के इन स्वरों में राष्ट्र के आँगन में अखण्ड ज्योति प्रज्वलित हो उठी। यह स्वाधीनता की संघर्ष ज्योति थी। जिसे अखंड रूप से प्रज्वलित बनाए रखने के लिए बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, मोहनदास करमचंद गाँधी, रविन्द्रनाथ टैगोर, महर्षि और महातपस्वी अपना सर्वस्व अर्पित करने उठ खड़े हुए। देवात्मा हिमालय की ऋषिसत्ताएँ भी इन्हीं दिनों उत्तर भारत के छोटे-से गाँव में इस महाअभियान को ऊर्जा देने वाली अखण्ड ज्योति प्रज्वलित कर रही थीं। राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य जन्म ले रहा था।

सम्राट् पुष्यमित्र के एक सेनापति पर महाभियोग लगा। आचार्य मार्तंड न्यायाधीश बनाए गए। अगले दिन दरबार होना था। सेनापति स्वयं भारी धनराशि लेकर आचार्य मार्तंड के पास उपस्थित हुआ और बोला-महाशय, आप चाहें तो अशरफियों की यह थैलियां लेकर अपना दारिद्रय दूर कर सकते हैं। इन्हें रखिए और न्याय हमारे पक्ष में कीजिए। विश्वास रखें यह बात हम दोनों के अतिरिक्त और कोई नहीं जान पाएगा।

आचार्य ने एक उपेक्षित दृष्टि थैलियों पर डाली और हँसकर बोल-महापरमात्मा की जानकारी में जो बात आ गई, वह छुपी कहाँ रही। इन्हें ले जाइए, कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व को प्रलोभन में झुठलाना मेरे लिए संभव नहीं। जिस समाज में ऐसे आदर्श के बदले धनी और तात्कालिक लाभ देखने की अपेक्षा आत्मकल्याण की बात सोचने वाले लोगों का बहुमूल्य हो, वही सुखी और समुन्नत रहते हैं।


शक्तिपात, जिसने राष्ट्रीयता अस्मिता के जागरण की नींव रखी

श्री श्री परमहंस देव आज बिलकुल बोल नहीं रहे थे। कोई कुछ कहता तो उनकी आँखों की पुतलियां उसकी और घूम जातीं। वे सारी बातें सुनकर या तो थोड़ा-सा मुस्करा देते-वेदनामय, कष्टपूर्ण मुस्कान या फिर अपने गल पर हाथ रखकर बता देते कि वे बोल नहीं सकते। आज उन्होंने लेखन सामग्री भी नहीं माँगी थी कि लिखकर ही किसी को छोटा-मोटा आदेश देते। बीच-बीच में वे आत्मलीन भी हो जाते थे। यह न तो भावसमाधि थी, न अचेतावस्था। लगता था जैसे चेहरे पर प्रायः शाँति थीं।

थोड़ी ही देर में शाम घिरने लगी। भगवान् सूर्य अपना किरणजाल समेटकर वापस लौटने की तैयारी कर रहे थे। काशीपुर योगोद्यान भवन का ऊपरी हिस्सा उनकी किरणों के अंतिम स्पर्श से अभी भी स्वर्णिम था। साँझ के सूरज की बली भी परमहंस देव के कमरे की खिड़की से दिखाई दे रही थी। मानो सूर्यदेव अस्तांचल वापस लौटने से पहले ईश्वरावतार ने एक नजर साँझ के इस ढलते सूरज को देखा-फिर कुछ पलों तक मौन रहे। इसके बाद उन्होंने नरेंद्र को बुलाने के लिए कहा-नरेंद्र आए तो उन्होंने शेष लोगों को संकेत से बाहर जाने के लिए कह दिया।

कमरे के कपाट भीतर से बंदकर नरेंद्र जब उनके निकट आए तो वह बोल, “ध्यान के लिए पद्मानसन लगाकर बैठ जा।”

नरेन्द्र पद्मासन लगाकर उनकी और एकटक देखने लगे।

“आँखें मूँदकर ध्यान कर।” वह बोल।

नरेन्द्र ने आंखें मूँदने से पहले देखा कि श्री रामकृष्ण देव भी समाधिस्थ होने की तैयारी में हैं। नरेन्द्र ने जब आंखें बंद कीं, तो सदा के समान वृत्तियाँ अंतर्मुखी हो गई, किन्तु बातय चेतना के लुप्त होने से पहले कुछ ऐसा लगा कि आज का अनुभव अपेक्षाकृत भिन्न हैं। उसके सारे शरीर में फिर से विद्युत की धारा प्रवेश कर रही थी। विद्युतधारा का सा अनुभव उसे पहले भी कई बार हुआ था, किंतु वह उसके अपने शरीर के भीतर का अनुभव था। यह धारा तो जैसे बाहर से उसमें प्रवेश कर रही थी और उसके अपने अस्तित्व का अंग बनती जा रही थी...। यह उसे समाधि की ओर नहीं, अचेतावस्था की ओर ले जा रही थी।

नरेंद्र की मन हुआ कि वह आँखें खोल दे और देखे कि यह सब क्या हैं। कही ठाकुर कोई और प्रयोग तो नहीं कर रहे हैं.......किंतु उसकी इंद्रियाँ आज जैसे उसके नियंत्रण में नहीं थीं। उनकी आँखें न तो उसकी इच्छा से खुल रही थीं और न ही बंद हो पा रही थीं। वह तो अचेत और असहाय होता चला जा रहा था।

इस विचित्र स्थिति के बाद जब उसकी चेतना लौटी, तो उसे स्मरण हो आया कि परमहंस देव ने उसे ध्यान करने के लिए बैठने को कहा था, किंतु उसका तो जैसे ध्यान नहीं टूटा था, मूर्च्छा टूटी थीं। वह ध्यान की भूमि से नीचे नहीं उतरा था, संज्ञा हीनता से अकस्मात् संज्ञा के क्षेत्र में आया था।

पहली बार जब वह श्री श्री ठाकुर के पास दक्षिणेश्वर गया था, तब उन्होंने अपने दायिने पाँव से उसके शरीर को छुआ था।

उस समय भी उसकी विचित्र स्थिति हो गई थी। वह समझ नहीं पाया था कि उन्होंने यह क्यों किया? किसी के शरीर पर अपना पैर...........पर यह कैसा स्पर्श था? वह सिहर उठा। वह अपनी खुली आँखों से देख रहा था कि कमरे की दीवारों के साथ-साथ सारी वस्तुएँ कहीं शून्य में विलीन होती जा रही हैं। क्या था वह? यह क्या सारे ब्रह्मांड के साथ उसका क्षुद्र अहंभाव भी सर्वव्यापक शून्य में विलीन होता जा रहा था? वह घबरा गया था। ..........अहम भाव का नाश ही तो मृत्यु थीं और वह मृत्यु उसके सामने अत्यंत निकट आ गई। .......वह स्वयं को और रोक नहीं पाया था। चिल्लाकर बोला था, यह क्या कर रहे हैं। आप? घर पर मेरे तो माँ-बाप हैं।

ठाकुर खिलखिलाकर हँस पड़े थे, जैसे कोई बालक अपने खेल की सफलता पर हँसता है। उन्होंने उसका हाथ पकड़ लिया और उसके वक्ष को सहलाते हुए बोल अच्छा तो फिर अभी रहने दे। एकदम ही होने की कोई आवश्यकता भी नहीं हैं। समय आने पर ही सब होगा और फिर सब सामान्य हो गया था। हालांकि इस घटनाक्रम में एक सवाल अनुत्तरित रह गया था, वह समय कब आएगा और क्या होगा?

और थोड़े दिनों पहले यहीं काशीपुर योगोधान में जब वह ठाकुर के पास से आकर ध्यान करने बैठा था, तो बैठते ही वृत्तियाँ अंतर्मुखी हो गई। सहसा उसे लगा कि उसके सिर के पिछले भाग के पास एक प्रखर प्रकाश प्रकट हुआ हैं, जैसे किसी ने बहुत तीव्र प्रकाश देने वाला जीवट उसकी पीठ के पीछे, उसके निकट रख दिया हो.....उसे लगा, ऐंद्रिक ज्ञान जैसे वह रस्सी था, जिसने उसे ज्ञान और आनंद के सागर में उन्मुक्त विहार करने से रोक रखा था। ऐंद्रिक ज्ञान जैसे एक पिंजरा था, जिसने उसे ज्ञान भम्र तो ज्ञान का देता था, किंतु वह जैसे अंडे का खोल था, जिसने पक्षी-शावक को अपने भीतर बंदकर विस्तृत संसार में पहुँचाने से रोक रखा था, उस दिन वह रस्सी अकस्मात् ही टूट गई थी।

वह जलयान जो किनारे पर बँधे रहने का बाध्य था, खुल सागर के मध्य जाने के लिए स्वतंत्र हो गया था..... उसकी आत्मा थार्रा देने वाले प्रभंजनयुक्त हर्षोन्माद की स्थिति में पहुँच गई थी। वहीं से वह दिव्य संभ्रम की स्थिति में आ गई थी.....और लगा कि जैसे उसके मस्तिष्क रूपी बरतन में से कबाड़ के रूप भरें हुए विचार, धारणाएँ आस्थाएँ, बिंब इत्यादि बाहर गिर पड़े हैं। मस्तिष्क शून्य की स्थिति में हैं किंतु रिक्त नहीं हैं और तब उसकी आत्मा चरम आनंद की स्थिति में आ पहुँची। उसका सारा व्यक्तित्व जैसे दिव्यता और दिव्य चेतना से आपूरित होने लगा था..... अंततः जैसे व्यक्तित्व विलीन हो गया और दिव्यता का ही अस्तित्व रह गया। आत्मा एक दिव्य प्रकाश के रूप में जैसे हर्षोन्माद की प्रभंजनयुक्त स्थिति से अनंत शाँति में पहुँच गई। ......न कहीं सूर्य था, न सुंदर ज्योति की प्रतिमूर्ति चंद्रमा। यह विश्व निभ्र आकाश में एक छाया के रूप में विद्यमान था। अस्फुट मना आकाश और सारा भासमान विश्व अहंकार की स्रोतस्विनी में डूबता-उतरता तैर रहा था। अहंकार की धारा कुछ मंद हुई और धीरे-धीरे यह छाया दल उसमें लय होने लगा। वह धारा सूख गई और शून्य में शून्य मिल गया......अब सब कुछ ‘आवड्मनसगोचरम्’ हो गया था।

उसका मन जब इस भावभूमि से नीचे उतरा था, तब उसे अपने अस्तित्व की अनुभूति तो हुई थी, पर शरीर की नहीं। वह चिल्लाया था-गोपाल दा! अरे गोपाल दा!! मेरा शरीर कहाँ हैं? घंटों बाद वह प्रकृतिस्थ हो सका था।

उसके बाद उसके ठाकुर प्रसन्न लग रहे थे। बोल-जब माँ ने तुम्हें सर्वस्व का साक्षात्कार कर दिया हैं, तुम्हारा यह सुख संदूक में बंद रहेगा और उसकी कुँजी मेरे पास रहेगी। जब तुम मेरा सारा काम कर दोगे तो तुम्हारा यह सुख तुम्हें बैठा दिया जाएगा।

ठाकुर की ये बातें उस दिन भी एक सवाल छोड़ गई, अनुभव के परिप्रेक्ष्य में न जाने कब तक आँकता रहता, यदि श्री रामकृष्ण देव उसे न पुकारते-नरेन!

उसने देखा कि उसके सम्मुख अपने बिस्तर पर ठाकुर तकियों के सहारे लगभग ऊर्जा शून्य लटे नहीं, पड़े हुए हैं....। क्रमशः वह सजग हुआ। उसके मन में नए प्रश्न जागने लगे। कैसे पड़े हैं ठाकुर? और यह क्या? उनकी आँखों से तो अश्रु गिर रहे हैं.......”क्या हुआ ठाकुर?”

श्री रामकृष्ण देव ने न अपने अश्रु छिपाए, न अपना भाव। गल में फँसती हुई आवाज में बोल-

“नरेन! आज मैंने अपना सर्वस्व तुझे दे डाल। जीवन भर की सारी तपशक्ति तुम्हें सौंप दी। तुझे इस देश की संस्कृति के गौरव को बढ़ाना हैं। संस्कृति की दिग्विजय करनी हैं। जो माँ इस शरीर में निवास करती थी, वे आज से तुझमें निवास करेंगी। आदिशक्ति जगन्माता तेरे माध्यम से इस देश की जनचेतना का जाग्रत करेगी।”

क्ल ने इस सत्य को प्रमाणित किया। श्री रामकृष्ण परमहंस की अनोखी साधना उनके नरेन-जिन्हें विश्व ने स्वामी विवेकानंद के रूप में जाना-के माध्यम से अभिव्यक्त हुई। उनके द्वारा की गई देवसंस्कृति दिग्विजय ने भारत के इतिहास में युगाँतरकारी परिवर्तन कर डाल।


शास्त्रार्थ तथा व्याख्यान (kahani)

एक महात्मा अपने विचार प्रकट करने तथा प्रश्नों का उत्तर देने के लिए एक सभा में बुलाये गए। सभा में ये भाषण देने मंच पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि वहाँ उपस्थिति एक व्यक्ति हाथ की पीड़ा से बहुत कष्ट पाता हुआ कराह रहा हैं। महात्मा तुरंत उसका उपचार करने में लग गए। उनका यह कृत्य देख देख विरोधियों ने समझा कि वे सभा की कारवाई से कतरा रहे हैं। एक आलोचक ने व्यंग्य करते हुए कहा-आप तो शास्त्रार्थ करने आए हैं फिर उस मुख्य कार्य को छोड़कर चिकित्सा कैसे करने लगे?

महात्मा ने बड़े शाँतभाव से उत्तर दिया-क्या तुममें से कोई ऐसा हैं, जिसके एक ही पुत्र हो और वह कुएं में गिर जाए तो वह सारा काम छोड़कर उसे निकालने में न लग जाए?

मेरा मुख्य काम तो पीड़ितों की सेवा करना हैं, लोगों के दुःख-दर्द दूर करना हैं। शास्त्रार्थ तथा व्याख्यान तो जीवन के साधारण कार्यक्रम हैं।


दीप–प्रज्ज्वलन के साथ अवतरित हुई भागवत चेतना

सन् 1926 ई. की वसंतपंचमी को अखण्ड ज्योति प्रज्वलित हुई। भारतवर्ष के बेकलभावन ताजमहल के लौकिक सौंदर्य के पास ही यह अलौकिक एवं आध्यात्मिक सौंदर्य प्रदीप्त हुआ। आगरा जिले के आंवलखेड़ा गाँव की एक छोटी-सी कोठरी में जलाए गए एक अखण्ड दीपक के माध्यम से हिमालय की ऋषिसत्ता ने सूक्ष्मशरीर से आकर एक नवीन शुभारंभ किया। सन् 1911 ई (वि.सं.1968) में जन्मे 15 वर्षीय किशोर श्रीराम शर्मा के साधक जीवन का श्रीगणेश हुआ। उनके चौबीस-चौबीस लाख के चौबीस गायत्री महामंत्र के पुरश्चरणों की यात्रा इसी दिन प्रारंभ हुई। यह नए भारत की शुरुआत थी। नवयुग के उज्ज्वल अभ्युदय का आरंभ था। उस महावट के विशाल विकास का अंकुरण था, जिसकी छाँव में अगले दिनों देश, विश्व एवं समूची मानवजाति को विश्राँति पानी थी। इस महासाधना के शुभारंभ से ही वह प्रचंड ऊर्जा उमंगनी थी, जिसके भारतीय स्वतंत्रता का नया अध्याय लिखा जाना था।

आध्यात्मिक तपशक्ति ही भारत की राष्ट्रीय जीवनी शक्ति हैं। यहाँ जब कुछ विशेष हुआ हैं, जब भी यहाँ के राष्ट्रीय जीवन में युगाँतरकारी मोड़ आए है, उन्हें अध्यात्म ऊर्जा ने ही प्रेरित और प्रवर्तित किया हैं। महर्षि अरविंद ने एक स्थान पर स्वीकार किया हैं कि भारतीय पुनर्जागरण की यह एक विशेषता थी कि उस वक्त के आध्यात्मिक व्यक्ति प्रायः स्वतंत्रता सेनानी या क्राँतिकारी थे। डॉ. नीरोदबरन की पुस्तक ‘टाक्स विद श्री अरविंदों’ के प्रथम भाग में इस तथ्य का उल्लेख हैं कि बातचीत के सिलसिले में श्री अरविंद ने एक बार कहा-”यह कितना आश्चर्यजनक है कि इतने अधिक तपस्वियों ने भारतीय स्वतंत्रता पर ध्यान था। क्रांतिकारी ओज के उत्साहपूर्ण संवेग उनमें बराबर उठते रहे। उन्हें एक बार दिव्यदर्शन भी हुआ, जिसने ये संदेश था कि आध्यात्मिक शक्ति से ही भारत स्वतंत्र होगा। महर्षि रमण के नौजवान शिष्य क्राँतिकारी थे। परमहंस योगानंद के गुरु (श्री युक्तेश्वर गिरी) भी क्राँतिकारी धारणाएँ रखते थे। ठाकुर दयानंद क्राँतिकारी थे। नगाई जप्ता, जिन्होंने उत्तर योगी श्री अरविंद के बार में कहा था, वे भी क्राँतिकारी थे। निश्चित रूप से भारतीय स्वाधीनता के लिए आंदोलित जनचेतना के पीछे महान् तपस्वियों की आध्यात्मिक चेतना सक्रिय रही।

भारत का ऐतिहासिक जीवन भी इन दिनों कई मोड़ों से गुजर रहा था। 1885 ई. में मुँलाई में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का पहला अधिवेशन संपन्न हुआ। 4 जुलाई 1902 में वे विश्रुत स्वामी विवेकानंद स्थूल देह का परित्याग कर ब्राह्मीचेतना में अंतर्लीन हो गए। 1 जनवरी 1903 को किंग एडवर्ड सप्तम भारत के सम्राट् घोषित हुए। 16 अक्टूबर 1906 को मुस्लिम लीग की स्थापन हुई। 1907 को काँग्रेस का सूरत अधिवेशन संपन्न हुआ। 1909

को मिंटोकार्बें ने अपना सुधार प्रस्ताव प्रस्तुत किया। 12 दिसंबर 1911 को दिल्ली में शाही दरबार का आयोजन किया गया, जिसमें बंगाल विभाजन का प्रस्ताव वापस ले लिया गया, इसी वर्ष 1911 के सितंबर माह की बीस तारीख को आचार्य श्रीराम शर्मा का आविर्भाव हुआ। सन् 1912 ई. में 1 अप्रैल को कलकत्ता की बजाय दिल्ली पुनः भारत की राजधानी बनी। 1915 में बहुचर्चित बहौर षड़यंत्र काँड हुआ। 1916 ई. में कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने आपस में समझौता कर लिया। वर्ष 1919 राष्ट्रीय जीवन की परिस्थितियों के लिए बड़ा विषम वर्ष रहा। इस वर्ष राज्यों में सरकार के दो स्वतंत्र सत्ता केंद्र का सिद्धान्त लागू हुआ। 18 मार्च को रोलेट–एक्ट लागू किया गया। इसी वर्ष की 13 अप्रैल को जनरल डायर ने अपनी नृशंस बर्बरता प्रस्तुत करते हुए जलियावाला काँड कर डाल। सन् 1920 में गाँधी जी ने काँग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में असहयोग आन्दोलन का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। सन् 1921 में अली भाइयों द्वारा खिलाफत आँदोलन शुरू किया गया और इसी साल पेशावर षड्यंत्र हुआ। 1922 ई. चोरी–चौरा काण्ड हुआ। इसके विक्षुब्ध गाँधी जी ने अपना असहयोग आँदोलन वापस ल लिया। इसी साल देशबंधु चितरंजन दास एवं मोतीलाल नेहरू ने स्वराज पार्टी की स्थापना की। सन् 1925 ई. में हुए काकोरी–काँड से देश में उत्तेजना की लहर दौड़ गई।

राष्ट्रीय जीवन की तरह अंतर्राष्ट्रीय जीवन में भी कई युगाँतरकारी घटनाएँ जन्म ले रही थीं। सन् 1905 में रूस-जापान युद्ध में जापान ने रूस को हराकर विश्वशक्तियों में अपना स्थान बना लिया। 1905 में ही रूस में प्रथम क्राँति हुई, जो असफल रही। सन् 1911 में हुई चीनी क्राँति में चीन मंचु साम्राज्य का अंत हो गया। डॉ. सुनयत सेन के नेतृत्व में एक गणराज्य की स्थापना हुई। सन 1914 से 1918 ई. के बीच प्रथम जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी तथा लरिटेन, फ्राँस, रूस, के बीच लड़ा गया। इसमें एक करोड़ लोगों की मृत्यु हुई वर्ष 1917 ई. में द्वितीय एवं सफल रूसी क्राँति हुई। जिसमें लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों ने मेटोग्रेड पर कब्जा कर लिया और प्रथम मार्क्सवादी राज्य की स्थापना हुई। सन् 1920 में लीग ऑफ नेशंस की स्थापना की गई। 16 जनवरी फ्राँस की राजधानी पेरिस में इसके 19 सदस्य देशों की बैठक संपन्न हुई। सन् 1921 में ई. में एडोल्फ हिटलर नाजी पार्टी का अध्यक्ष की निर्वाचित व्यवस्था लागू हुई। सन् 1922 में ही हिटलर में मुसोलिनी की तानाशाही व्यवस्था लागू हुई। सन् 1924 ई. में सोवियत संघ में सत्ता जोसेफ स्टालनि के हाथों में आई।

विश्व में यह परिवर्तन केवल राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था। कब-साहित्य, संस्कृति, संस्कृति एवं विज्ञान के क्षेत्र में भी नए-नए प्रतिमान रचे जा रहे थे। डार्विन के विकासवाद, सिगमंड फ्रायड के अवचेतन मन के रहस्यों तथा मार्क्स के राजनीतिक एवं सामाजिक सिद्धान्तों ने समूचे विश्व में उथल-पुथल मचा दी थी। भारत भी इससे अछूता न था। यहाँ के कवि, साहित्यकार एवं विचारक भी इन विचारों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में प्रभावित हो रहे थे। सन् 1903 में विश्वपटल पर पहली बार सिनेमा का उदय हुआ। सन् 1913 में यहाँ पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ के रूप में सामने आई। 1913 में ही अमेरिका में नारी स्वतंत्रता, समता एवं वोट अधिकार को लेकर नारीमुक्ति संघर्ष की जबरदस्त शुरुआत हुई। सन् 1921 में विश्वविख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन को उनके वैज्ञानिक योगदान के नोबुल पुरस्कार मिला। इन्हीं दिनों उनके सापेक्षिता सिद्धाँत को विश्वव्यापी ख्याति मिली।

इन दिनों समूचे भारत में इस वैचारिक उथल-पुथल के साथ राष्ट्रीयता भावनाओं का झंझावात गर्जन कर रहा था। स्वराज्य के बलपिंथों ऋग्वेद के महामंत्र “सहस्त्रं सकमर्चत परि ष्टोभत विंशतिः। शतैनमन्वनोनुवुरिन्द्राय ब्रह्मद्यतमचत्रनु स्वराज्यम्।” देशवासियो। सहस्त्रों मिलकर स्वराज्य की अर्चना करो। बीसियों मिलकर इसे नियंत्रित करो, सैकड़ों मिलकर स्वराज्य के लिए उद्यत बलपिंथी इंद्र की स्तुति करो। सभी स्वराज्य के पुजारी बनो के स्वरों में देशवासियों का आतनान कर रहे थे। भारतमाता के सपूत गा रहे थे।

सार्थक जनम आमार जन्मेछि ए देशे, सार्थक जनम मागों तो भाय भाल वेशे। कौन जानिते फूल, गंधे एत करे आकुल, कोन गगने उठेरे चाँद ए मन हाँशि हेंशे॥ ओ माँ! आँखि मेलितौमार आबे। देख आमार चोख जुड़ा लो, ए आलोके नयन रेखे मुदबो नयन शेबे॥

इस देश में जन्म लेकर मेरा जीवन सार्थक हुआ। माता जन्मभूमि, तुमसे प्रेम करके जीवन सफल हुआ। नहीं जानता कि किसी और कानून के फूलों की गंध नहीं जानता कि किसी और कानन् के फूलों की गंध प्राणों और गगन में चाँद इस तरह की हँसी हँसता है। ओ माँ, तुम्हारे आलोक को आँखों भरने से मेरे चक्षु जुड़ा जाते हैं। इसी आलोक को आँखों में धारण किए हो अंतकाल में नयन बंद करूंगा।

इन बलिदानी स्वतंत्रता वीरों को और अधिक ऊर्जा प्रदान करने के लिए योगिराज महर्षि अरविंद 24 नवंबर 1926 को पाँडिचेरी में पूर्ण एकाँत साधना में पड़े गए। इसी वर्ष को उनने भागवत चेतना के धरती पर अवतरण का वर्ष घोषित किया था। उनकी उत्कट तप−साधना से अखण्ड ज्योति का आलोक और अधिक प्रखर हो गया। अखण्ड ज्योति का आलोक और अधिक प्रखर हो गया महर्षि रमण भी इसी महत् उद्देश्य के लिए तिरुवन्नामलाई में अरुणाचलम् पर्वत की गुफा में तपोलीन थे। महायोगियों की इस तप−साधना से स्वतंत्रता संघर्ष और अधिक तीव्र हो उठा और सफलता सुनिश्चित हो गई। अपनी इस गहन एकाँत तप−साधना के दिनों में सन् 1926 के कुछ समय बाद ही उन्होंने भारत के शीघ्र स्वतंत्र होने की बात कहीं। उन्हीं के शब्दों में-”यह दैवी आज्ञा जारी हो चुकी हैं, उसके क्रियान्वयन में विलंब नहीं होगा।”

संघर्ष की ज्वालाएँ धधकने लगीं। इनसे उड़ते अग्निस्फुल्लिंग जन-जन के मन को दहकाने लगे। समूचा राष्ट्र आँदोलन हो उठा। महर्षि अरविंद की तप−साधना शुरू होने के दस वर्षों बाद ही यानि कि सन् 1920 के बाद ही स्वाधीनता आँदोलन के निर्णयकारी दौर की शुरुआत हो गई। उसकी आकारहीनता समाप्त हो गई और स्वरूप निश्चित हो गया। उनके पूर्ण एकाँत यानि सन् 1926 के बाद तो इसमें आश्चर्यजनक परिवर्तन दिखाई पड़ने लगे। पूर्वाभास बार-बार रेखाँकित होने लगा। इस अवधि में तीन महान् नेताओं का चमत्कारी नेतृत्व सामने आया-महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू एवं नेताजी सुभाषचंद्र बोस।

महात्मा गाँधी आने प्रथम तीन सत्याग्रह के सफल प्रयोगों-चंपराण (1916-17), अहमदाबाद और खेड़ा के आधार पर समस्त भारतीय जनता के हृदयाहार बन गए। जनता को निर्भय होना सिखाया। पहली बार देश के आम नागरिक के मन में अद्भुत साहस की उमंगें उठीं। जिसे अंग्रेज शासन के साधारण सिपाही को देखकर लोग सहम जाते थे, अब उन्हीं के खिलाफ उठ खड़े हुए। “अत्याचार का सामना करेंगे, ब्रिटिश शासन की गलत नीतियों के साथ असहयोग करेंगे।” इन नारों को बुलद करने का साहस जनता को गांधीजी ने दिया। अब वे सिपाहियों से तो क्या गोरे साहबों से भी भय नहीं खाते थे। समुद्री तूफान की तरह उमड़ते-मचलते इस साहस से गोरी सरकार काँप उठी। जेल भर गई। उनकी लाठी-गोली प्रभावहीन होने लगीं।

यह गाँधी जी की आध्यात्मिक चेतना का चमत्कार था। वह सत्य और अहिंसा के अनुगामी थे। ईश्वर पर उनका दृढ़ विश्वास था। उनके कार्यक्रमों को उनकी समग्रता में देखा जाए, तो यह भी सच हैं कि स्वाधीनता के संघर्ष को उन्होंने ऐसा चमत्कारी मोड़ प्रदान किया, जो विश्व इतिहास में अद्वितीय हैं और ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर भी इसका प्रभाव पड़ा। इतनी बड़ी ताकत सत्याग्रह और अहिंसक आँदोलन के सामने झुकती नजर आई। उनके इस आँदोलन ने विश्वव्यापी ख्याति अर्जित करके समूचे विश्व जनमत को अपने पक्ष में कर लिया।

गाँधी जी का दूसरा महान् कार्य था- नारी जाति का उसका खोया हुआ सम्मान लौटना। उन्होंने महिलाओं को आँदोलन में शामिल करके उन्हें पुरुषों के बराबर महत्व दिया। आर्य समाज ने भी नारी उत्थान का कार्य अपने हाथ में लिया था, परंतु गाँधी जी ने उसे कर्मक्षेत्र में उतारकर स्वतंत्र दायित्व सौंपा। उनसे प्रेरित होकर सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली जैसी विदुषी महिलाएं तो आगे आई ही, लक्ष्मीबाई मायेकर जैसी साधारण नारी भी इस आँदोलन की भागीदार बनी, जो महाराष्ट्र के नाँदेड जिल में चूड़ियों बेचकर अपनी रोजी-रोटी चलाती थी। महात्मा गाँधी के इस योगदान से केवल भारत की नारी ही कृत-कृत्य नहीं हुई, बल्कि विश्वभर की नारियों को इससे बल मिला।

पं. जवाहर बल नेहरू एवं वल्लभारी पटेल का व्यक्तित्व भी इन्हीं दिनों उभरकर आया। इस युगल की सबसे बड़ी उपलब्धि थी-दृष्टिकोण की वैज्ञानिकता। जब कभी गाँधी जी के कार्यक्रमों में वायवीपन अथवा कोरी आदर्शवादिता झलकती, पटेल एवं नेहरू उन्हें व्यावहारिकता की ओर मोड़ने की कोशिश करते हैं। वे काँग्रेस को संकीर्णताओं के दलदल से ऊपर उठाने की कोशिश करते। सुभाषचंद्र बोस संघर्ष की ज्वालाओं को और अधिक तीव्र करना चाहते थे। जर्मनी और जापान के सहयोग से उन्हें जो अद्भुत सफलता मिली, उससे ब्रिटिश शासन का मनोबल इस कदर गिर गया कि उसे दिया जा सकता था। वैसे भी द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण लरिटेन पूरी तरह से हिल चुका था। उसकी आर्थिक एवं सामरिक दोनों शक्तियों हिल चुकीं थीं। नेताजी सुभाष के पराक्रम एवं शौर्य ने ऐसे में उसे दहशत में डाल दिया।

स्वाधीनता संघर्ष की दो मुख्य धाराएँ और भी थीं-पहला क्राँतिकारी तथा दूसरा किसान-आदिवासी आँदोलन। ब्रिटिश शासन की शोषण एवं अन्यायपरक नीति से जन-मन में जो आक्रोश था, उसकी अभिव्यक्ति क्राँतिकारी आँदोलन में हुई। रामप्रसाद बिस्मिल, खुदीराम बोस, चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह, राजगुरु, अशफाक–उल्ला–खां और इन जैसे अन्य अनेक। इनकी बलिदानी भावनाओं से ब्रिटिश सरकार ने पहली बार महसूस किया कि इस देश के युवाओं में अतुलनीय शक्ति और साहस हैं “स्वराज्य हमारा जन्म सिद्ध अधिकार हैं, इसे हम लेकर रहेंगे” तिलक का यह महामंत्र इन बहादुरों के हैरतंगेज कारनामों से समूचे देश में गूँज उठा।

किसान और आदिवासियों के आँदोलन ने आजादी के संघर्ष को और अधिक ऊर्जावान् बनाया। ये आँदोलन शोषण का ही उन्मूलन करना चाहते थे, चाहे वह देशी हो या विदेशी। किसानों-आदिवासियों का आक्रोश मुख्यतः उन तत्वों के खिलाफ था जो ब्रिटिश शासन के स्वार्थसाधन में अपनी सक्रिय सहभागिता निभा रहे थे। गुजरात में करमसद के सरदार पटेल, महाराष्ट्र में बलवंत फड़के और बिहार में बिरसामुँडा ने तो समानाँतर तंत्र स्थापित करने की योजना भी खड़ी कर दी।

संघर्ष की यह आग और अधिक तेजी से भड़कती चली गई। इसी के साथ इतिहासचक्र भी नई-नई घटनाएँ रचता गया। 3 फरवरी 1928 को साइमन कमीशन भारत आया। 31 दिसंबर 1929 ई. को रावी नदी के तट पर शपथपूर्वक स्वतंत्रताध्वज फहराया गया। 1930 को गाँधी जी ने दाँडी यात्रा शुरू की। 31 मार्च 1931 को भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव को फाँसी दी गई। इससे समूचे राष्ट्र में पीड़ा, उत्तेजना और क्षोभ की लहर दौड़ गई। 1935 ई. में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट पारित हुआ। 1937 में केन्द्र और प्राँतिय विधायिका के चुनाव हुए। इस वर्ष अंगरेजों ने वर्मा को भारत से अलग कर दिया। सन् 1939 ई. में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने फाँरवर्ड लबँक की स्थापना की। इसी वर्ष लरिटेन एवं फ्राँस ने जर्मनी से युद्ध की घोषणा कर दी, जिसने बाद में विश्वयुद्ध का रूप ल लिया। यह युद्ध ध्रुवीय शक्तियों (जर्मन, इटली, जापान) एवं मित्र राष्ट्रों (लरिटेन, अमेरिका, फ्राँस, रूस, चीन) के बीच हुआ, जो सन् 1945 ई. तक चलता रहा।

इस बीच भारत में सन् 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह प्रारंभ किया गया। 1941 में ई. में नेताजी सुभाष बोस अपनी नजरबंदी से फरार हो गए। 22 मार्च 1942 को क्रिप्स मिशन भारत आया, जिसे नामंजूर कर दिया गया। इसी वर्ष 8 अगस्त को भारत छोड़ो आँदोलन की शुरुआत हुई। सन् 1943 ई. में नेताजी सिंगापुर पहुँचे। 29 दिसंबर को इसी वर्ष उन्होंने अंडमान में राष्ट्रीय ध्वज फहराया। 1944 में मित्रराष्ट्रों ने अपनी विजययात्रा की शुरुआत की। सन् 1945 में हिरोशिमा पर परमाणु हमला हुआ। जिसके नृशंस प्रभावों से दुनिया दहल गई। 1946 ई. में विज्ञानजगत् में कंप्यूटर क्राँति ने जन्म लिया। इसी वर्ष 1946 ई. में नौसेना ने अँगरेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। नौ–सैनिकों की भावनाएँ नेताजी सुभाष बोस के साथ थीं।

स्वाधीनता संघर्ष की ज्वालाएं उत्तरोत्तर मुखर एवं प्रखर होती जा रही थी। अपनी तप−साधना में लीन ग्राम से उभरे युवा ‘श्रीराम मत्त’ भी राष्ट्रीय संघर्ष की यज्ञवेदी में अपनी आहुति देने के लिए बढ़-चढ़कर आगे आए। स्वाधीनता संघर्ष के गौरवगान में उनका स्वर भी मुखर हुआ। अपनी बलिदानी भावनाओं के चलते उन्हें अनेकों यातनाएँ सहनी पड़ी जिनका क्रम 1936-37 तक चलता रहा। जेल की काल-कोठरी में घंटे और दिन नहीं, वर्ष गुजारते पड़े, परंतु संघर्ष के ये समवेत स्वर अब सफलता के निकट जा पहुँचे थे। सन् 1947 की वह घड़ी भी आ गई जब भारत स्वतंत्र हुआ। 15 अगस्त 1947 स्वतंत्र भारत का जन्मदिन बन गया। हालांकि अँगरेजों की कुटिल नीति के कारण यह स्वतंत्रता खंडित एवं आधी-अधूरी मिली। फिर भी अब भारत स्वतंत्र था। उसका स्वतंत्र निशान और स्वतंत्र विधान था। इस स्वाधीन भारत की अपनी समस्याएँ थीं, जिनकी खोज अभी बाकी थीं। अँगरेजों ने राजनीतिक तौर पर ही नहीं सामाजिक-आर्थिक तौर पर भी राष्ट्र को टुकड़े-टुकड़े कर दिया था। स्वतंत्र भारत में अनेकों मौलिक प्रश्न उठ खड़े हुए, जिनके समाधान की खोज की जानी थी। भारत की मौलिक प्रकृति आध्यात्मिक होना आवश्यक था।

एक बार विदर्भ देश में जोर का अकाल पड़ा। एक गाँव में सिकी के पास कुछ भी न बचा। उसी गाँव के एक किसान के पास एक कोठी भरा धान था। वह उससे कई महीने तक अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकता था, लेकिन उसे ध्यान आया कि अगले वर्ष मौसम के समय खेतों में बोने के लिए न मिलेगा तो फिर से सबको अकाल का सामना करना पड़ेगा। किसान ने उस धान के कोष को खाने में खरच नहीं किया और सहपरिवार सहर्ष मृत्यु की गोद में सो गया। लोगों ने देखा कि काफी अन्न होते हुए भी किसान का परिवार क्यों मर गया? लेकिन उसकी वसीयत को पढ़कर सभी किसान की महानता पर हर्ष से आँसू बहाने लगे। उसमें लिखा था, “मेरा समस्त अन्न खेतों में फसल बोने के समय गाँव में बीज के लिए बाँट दिया जाए।” वर्षा हुई और चारों ओर नई लहलहाती फसल से लग रहा था मानों किसान मरा नहीं, अपितु असंख्यों जीवधारी के रूप में हरे-भरे खेतों में लहलहाता फिर से धरती पर उतर आया हो।


आवश्यकता ही शेष नहीं (kahani)

एक बार एक शिष्य द्वारा अपने गुरुदेव से यह पूछे जाने पर कि मनुष्य को पुरुषार्थ क्यों करना पड़ता हैं? भगवान् अपने अनुदान देकर उन्हें पीड़ा -कष्ट से बचाता क्यों नहीं हैं? संत बोल वत्स! यह संसार विधि’-विधानों से चलता है। याचक, भिखारी तो कई हैं, पर यदि विधाता ने कुपात्रों को व्यर्थ वितरण आरंभ कर दिया तो कर्म की स्वावलंबन की आत्मसुधार की कोई आवश्यकता ही शेष नहीं रह जाएगी।


समस्याओं से घिरे भारत को समाधान मिला अध्यात्म से

स्वाधीन भारत की अपनी मौलिक समस्याएँ थीं, अनेकों ऐसे मौलिक प्रश्न थे, जिन्हें सटीक उत्तर एवं सार्थक समाधान की तलाश थी। अँगरेजों ने हमें खंडित भारत दिया था। यह खंडित देश भी पाँच सौ से भी अधिक रियासती खंडों में बँटा था। इस खंडित देश को अखंड बनाना उस समय के राष्ट्रनायकों की तत्कालिक जिम्मेदारी थी। सरदार बल्लभभाई पटेल इन विषम परिस्थितियों में लौहपुरुष बनकर उभरे। उन्होंने समय की इस कीड़ चुनौती को स्वीकार किया, और अपने नीतिकौशल से राष्ट्र को वह स्वरूप प्रदान किया, जिसे आज हम देखते हैं और जिसमें हम सब रहते हैं। देश के बँटे हुए छोटे-से टुकड़े ने, वहाँ के राजनेताओं ने, जो भारतमाता की अपनी संतानें थे, स्वतंत्रता के तुरंत पश्चात् हमला किया। सन् 1947 ई. में जिन घुसपैठियों ने कश्मीर की ओर से आक्रमण किया, वे कोई बाहरी एवं विदेशी नहीं, भारतमाता की ही पथभ्रष्ट संतानें थीं। देश के जाँबाज सैनिकों एवं नागरिकों ने इसका दृढ़ता से सामना किया और आक्रमण विफल हुआ।

परंतु समस्याओं के स्वरूप और विस्तार इतने तक ही सीमित नहीं था। अँगरेजों ने देश की जमीन ही नहीं बाँटी थीं, उन्होंने दिलों को भी बाँटने की कोशिश की थी। बंटवारे की ये लकीरें हिंदू-मुसलमान के बीच खिंची। हिंदुओं में जाति, क्षेत्र, भाषा के नाम पर अगणित दीवारें खड़ी हुई। फिर जाति वाले भी कहाँ एकमत हो रह सके। जातियाँ में भी तो अनेकों उपजातियाँ थीं कुल गोत्र, वंश के नाम पर न जाने कितने टुकड़े थे। स्वाधीनता पाने के लिए राष्ट्रीय तूफान में जो एकजुट हुए थे, वे फिर से अपने-अपने स्वार्थ एवं अहंकार के दायरे में सिमट गए। जितनी जोश और उमंगे त्याग और बलिदान के लिए पनपीं थीं, उससे कही अधिक घृणा एवं बर्बरता दिखाई देने लगीं। आजादी मिलते ही दंगे भड़क उठे। महात्मा गाँधी ने अपनी सात्विक वृत्तियों के द्वारा इनको शाँत करने के लिए अनेकों प्रयास किए। इनसे वे आँशिक रूप से सफल भी हुए, परंतु 30 जनवरी 1948 को ई. को नाथूराम विनायक गोडसे ने उनकी निर्मम हत्या कर दी। ‘हे राम!’ के ईश्वरस्मरण के साथ ही उनका महाप्रयाण हो गया। इसी वर्ष 5 मार्च को चक्रवती राजगोपालाचारी माउंटबेटन के स्थान पर नए गवर्नर जनरल बने। 26 नवंबर 1949 ई. को संविधान सभा द्वारा भारत को संविधान स्वीकृत किया गया। 24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्र के प्रथम राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। 23 जनवरी को इसी वर्ष भारत का संविधान लागू हुआ। 25 अक्टूबर 1951 ई. को 22 राज्यों में पहले आम चुनाव हुए। जवाहर बल नेहरू देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने। 17 नवंबर 1954 ई. को फ्राँसीसी आधिपत्य वाले पाँडिचेरी, कराईकाल, मोहे और यानम का भारत में विलय हो गया। 24 फरवरी 1957 ई. को दूसरे आम चुनाव हुए। नेहरू पुनः प्रधानमंत्री बने। 20 दिसंबर 1961 को पुर्तगाली आधिपत्य वाले गोवा, दमन और दीव का कुछ संघर्ष के बाद भारत में विलय हो गया। इसी के साथ देश ने अपनी सार्वभौम स्वरूप प्राप्त कर लिया।

जिन्होंने राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया था, उनमें प्रायः बहुसंख्यक जन शासनसत्ता में थे। उनकी नजर में अब मूल्यों के संरक्षण से सत्तासुख कहीं ज्यादा आवश्यक बन गया। इसके परिणामस्वरूप नैतिक मूल्य गिरे, शिक्षा प्रचार से बुद्धिवाद तो बढ़ा किंतु बौद्धिक विचारशीलता में तनाव होता चला गया। समाज को अंग्रेज जिस अवस्था में छोड़ गए थे, उसमें और अधिक गिरावट आई। आजादी के कुछ ही वर्षों बाद ऐसा राष्ट्रीय परिदृश्य उपस्थित हुआ, जिससे हमारी अपनी भारतीय अस्मिता या भारतीयता की पहचान ही संशय और दुविधाग्रस्त हो चली। भारतीयों को लेकर विश्व के बहुतेरे जनों के मन में जो कल्पना उठती हैं, वह समय के साथ बढ़ती आर्थिक-राजनीतिक एवं सामाजिक उथल-पुथल में धूमिल पड़ गई। भारतीय समाज टुकड़ों में बँटकर हिंसा, दुराग्रह, भ्रष्टाचार और अविश्वास के बढ़ते मूल्यहीनता के दलदल में फँसता चला गया। प्रकारांतर से सारी समस्याएँ मूल्यहीनता की थी। और समाधान मूल्यों के संरक्षण से ही संभव था। यह समाधान आध्यात्मिक तप−साधना से ही मुमकिन था।

तपोलीन आचार्य जी ने अपनी दिव्यदृष्टि से अपनी तप−साधना प्रारंभ करने के कुछ वर्षों के बाद ही न केवल भारतवर्ष की स्वतंत्रता को देख लिया था, बल्कि यह भी समझ लिया था कि स्वाधीनता के पश्चात् राष्ट्र के सामने कौन-सी मौलिक समस्याएँ उभरकर आएँगी। इसके सार्थक समाधान की खोज में जुटें तपोनिष्ठ आचार्य जी ने अपने साधनाकाल में ही ‘अखण्ड ज्योति’ नामक मासिक पत्रिका (1937 ई. से) का प्रकाशन-प्रवर्तन किया। उनका यह कार्य मात्र साहित्य साधना तक सीमित न था। यह तो उनके नैतिक क्राँति एवं सामाजिक क्राँति रूप त्रिविध संकल्प की अभिव्यक्ति थी, विचारक्राँति के महाचक्र का प्रवर्तन था, युगनिर्माण आँदोलन की शुरुआत थी।

सन् 1926 ई. में उन्होंने जिस महासाधना की शुरुआत की थी, वह 27 वर्षों के बाद 1953 में पूरी हो गई। इस बीच स्वतंत्रता संग्राम में संघर्ष के साथ-साथ वे हिमालय भी गए। उनका हिमालय प्रवास वहाँ की दिव्य सत्ताओं के संरक्षण में किसी अलौकिक साधना के लिए था। अपने महाअनुष्ठान की पूर्णाहुति स्वरूप उन्होंने अपने आध्यात्मिक प्रयोगों की प्रथम प्रयोगशाला के रूप में गायत्री तपोभूमि का निर्माण गायत्री जयंती 1953 ई. में किया। यद्यपि मथुरा में तपोभूमि निर्माण के लिए चुना गया यह स्थान पहले कभी महर्षि दुर्वासा की तपस्थली रह चुका था, लेकिन इसे उच्चस्तरीय आध्यात्मिक प्रयास किए।

इस स्थापना के साथ ही गायत्री तपोभूमि में साधना सत्रों का प्रारंभ हुआ। साथ ही गायत्री महाअभियान का आयोजन और गायत्री उपासना के सामूहिक आयोजन किए जाने लगे। राष्ट्रीय आपत्तियों की शाँति के लिए विशद् महायज्ञ का आयोजन किया गया। इसके अंतर्गत 1. चारों वेदों का परायण यज्ञ 2. महामृत्युंजय यज्ञ 3. रुद्रयज्ञ 4. विष्णु यज्ञ 5. शतचंडी यज्ञ 6.नवग्रह यज्ञ 7. गणपति यज्ञ 8. सरस्वती यज्ञ 9. ज्योतिष्टोम 10. अग्निष्टोम आदि अनेक यज्ञों की प्रक्रियाएँ शामिल थीं यह समष्टि हित के लिए संपन्न हुआ एक विराट् आध्यात्मिक प्रयोग था। आचार्य जी के शब्दों में इस यज्ञ का यजमान, संयोजक, पूर्णफल प्राप्तकर्ता कोई एक व्यक्ति नहीं हैं। यह संकल्प समस्त गायत्री उपासकों की ओर से किया गया हैं।

इसके बाद अगलेा प्रयोग उन्होंने ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के रूप में किया, जिसकी पूर्णाहुति 1958 ई. के सहस्र परिवार द्वारा उसके कुलपति वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के निर्देशन में पूरा हुआ। यह सविता शक्ति के संदोहन का प्रयोग था। इस महाप्रयोग में शामिल होने के लिए साधकों ने एक वर्ष पूर्व ही गायत्री के विशेष पुरश्चरण प्रारंभ किए थे और अक्टूबर 1958 में 4 दिन तक यज्ञ कर शरदपूर्णिमा के दिन पूर्णाहुति की। इस प्रयोग के पश्चात् परमपूज्य आचार्य जी ने 5 जून 1960 को दूसरी बार हिमालय के और प्रस्थान किया।

स्वाधीन भारत की समस्याओं की खोज में जुटें आचार्य जी उसी निष्कर्ष पर पहुँचे, जिसे उनके पूर्ववर्ती महातपस्वियों ने पाया था। अर्थात् अध्यात्म में ही वह शक्ति हैं, जिसे राष्ट्रीय ही नहीं, वैश्विक चेतना को ही भी आलोड़ित-आंदोलित किया जा सकता है। स्वाधीनता के आसपास के वर्षों में हुए वैज्ञानिक विकास ने समूचे विश्व को एक कुनबे लाद लेना शुरू कर दिया था। समस्याएँ भी व्यापक हो चली थीं। उनके समाधान के लिए व्यापक तपशक्ति की आवश्यकता थीं। आचार्य जी ने इसीलिए इन दिनों हिमालय के लिए प्रस्थान किया था। उनकी हिमालय यात्रा से वापसी के साथ ही देश और विश्व में एक नई संस्कृति जन्म ले रही थी। यह महासंक्राँति थीं महासंक्राँति के इस महापर्व में समूची दुनिया एक नई युगड्योढ़ी पर आकर खड़ी हो गई।


अग्रगामियों की टोली में (kahani)

एक शिष्य ने आत्मज्ञान का शिक्षण लिया व अपने गुरु से बोला-एकाँत में बैठकर आत्मचिंतन करने में जो आनंद हैं, वह और कही नहीं। हे गुरुवर! उच्चस्तरीय साधना हेतु मैं पहाड़ों जैसी शाँति चाहता हूँ। गुरु ने कहा वत्स! पहाड़ों का परमार्थ अनिश्चित हैं। तू सुदूर क्षेत्रों में जा-जहां अज्ञान का तिमिर व्याप्त है। व्यक्ति दीनहीन स्थिति में अपना जीवनयापन कर रहें हैं। तू नगरों में जा-जहां अज्ञान मानव-मानव के बीच भेदभाव, छल, कपट और विषमता के बीज बो रहा हैं।

शिष्य बोला देव! वहां की संघर्ष यातनाएँ मुझसे झेली न जाएँगी, वहाँ का कोलाहल-क्रंदन मुझसे देखा न जायेगा। मुझे तो हिमालय से दूर ना जानें दें।

गुरुदेव की आंखें छलछला उठीं। तात्! जिस राष्ट्र के नागरिक-नन्हीं-नन्हीं संतानें भटक रहीं हों वहाँ के प्रबुद्ध व्यक्ति अपने आत्मकल्याण भर की, स्वार्थ की बात सोचें, यह अनैतिक हैं। ईश्वर को पाना है तो प्रकाश की साधना करो। जो अंधकार में भटक गए हैं, उन्हें ज्ञान का प्रकाश दो। चारों और अर्जित संपदा बिखेर दो। शिष्य चला पड़ा अपना मोह तोड़कर और मानवता के देवदूत के रूप में अग्रगामियों की टोली में सम्मिलित हो गया।


महासंक्राँति का महापर्व

तीन संक्राँति पर्व पूरे चतुर्थ-अंतिम महासंक्राँति की वेला आ पहुँची। प्रायः सभी ओर से एक-सी आवाज आ रही थी कि नया जमाना आने वाला हैं-नया युग आ रहा हैं, किंतु विश्वस्तर पर चौथे व पाँचवे दशक में जो परिवर्तन हो रहे थे, वे किसी को भी निराश कर सकते थे। चौथे दशक में जहां विश्वयुद्ध चर्चा का विश्व था। तो ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के शुभारंभ ने-अखण्ड घृतदीप की साक्षी में रहे एक प्रचंड तप ने अध्यात्म जगत् में परोक्ष स्तर पर एक विलक्षण भूमिका संपन्न करना आरंभ कर दी। इससे कोई ओर देख भले ही न पाया हो, किंतु तत्ववेत्ता परोक्ष का अध्ययन करने वाले मनीषी श्री अरविन्द रमण महर्षि न केवल देख रहे थे, वरन् ऋषि चेतना द्वारा संचालित इस कार्य में भागीदार भी थे।

भारत की आजादी तो राजनीतिक स्तर पर 1947 में मिली किंतु यह प्रयास बहुत पूर्व 1857 में गदर के माध्यम से 1893 से 1902 तक स्वामी विवेकानंद के सिंहनाद के माध्यम से 1916-17 में गाँधीजी के चम्परान् सत्याग्रह द्वारा बैरिस्टर से महात्मा बनने की प्रक्रिया द्वारा तथा 31 मार्च 1931 को भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु को बहौर में दी गई फाँसी के माध्यम से आरम्भ होकर 1942 में गति पकड़ चुके थे। यह वर्ष था भारत छोड़ो आन्दोलन का, जिसकी घोषणा 8 अगस्त को कि गई एवं इसी वर्ष हमारी आराध्यसत्ता परमपूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा इसे 21वीं सदी (वि.सं. 2000) के आगमन की वेला में सतयुग के नवयुग के आगमन का आगमन कहा गया।जहां जनवरी 1943 का अखण्ड ज्योति अंके ‘सतयुग अंक’ के रूप में प्रकाशित हुआ। वहाँ जनवरी 1943 का अंक संवत् 2000 अंक के रूप में छपा। “संदेश नहीं मैं स्वर्गलोक का लाई इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आई” का उद्घोष करने वाली अखण्ड ज्योति पत्रिका ने अब खुलकर नवयुग के समग्र धरित्री के लिये उज्ज्वल भविष्य के आवागमन का प्रतिपादन प्रस्तुत करना आरंभ कर दिया, जो आने वाले चौबीस वर्षों गति पकड़ते-पकड़ते ‘महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया’ के रूप में परिवर्तित होता चला गया।

1942 की जनवरी के विशेषाँक से एक छोटा सा अंश उद्धृत हैं, “आने वाला आ रहा हैं, वह सचमुच आ रहा हैं, क्योंकि वह अपनी प्रतिज्ञा में आप बंधा हुआ हैं- साधुता का परित्राण करने और दुष्टता का नाश करने की उसकी जिम्मेदारी है।” इससे भी और बुरा समय भला फिर कब आयेगा, जिसकी प्रतिक्षा में वह बैठा रहे। पाप और पशुता के वेदना से पीड़ित, जग-जननी, आद्यशक्ति नयनों से जल वर्षा कर रही हैं। प्रभू उसे आश्वासन देते हुये कह रहे हैं-मैं आ रहा हूँ। स्वार्थ और असत्य का साम्राज्य मिटाने के लिये, प्रबुद्ध आत्माओं में स्फुरणा पैदा कर प्रकाश की सुनहरी आभा प्रकट करने के लिये मैं आ रहा हूँ। भक्तों! घबराओ मत, मैं आ रहा हूँ।” एक प्रचंड संकल्प शक्ति के साथ 21वीं सदी के आगमन की प्रक्रिया के आरंभ होकर प्रायः साठ वर्षों पूरा होने की बात गुरु देव आज से प्रायः अट्ठावन-उन्नसट्ठ वर्ष पूर्व से कहते आ रहे हैं।

निश्चित ही नवयुग के आगमन की वेला में संक्राँति का कुछ वर्षों का समय जो कष्ट और पीड़ा की पराकाष्ठा का होता है। हरियुग जन-जन को झेलना पड़ता है। हमें भी विगत साठ वर्षों में उनका सामना करना पड़ा। पहले ही तीन संक्राँतियों में जो प्रक्रिया चली आ रही थी, उस में बौद्धिक गुलामी राजनीतिक परतंत्रता के चलते क्राँतिकारी गतिविधियाँ समष्टिगत स्तर पर न होकर छुटपुट प्रयासों के रूप में होती रही, लेकिन उन्होंने वातावरण विनिर्मित किया। उस समय जो जन-जन के कष्ट झेला, उससे कहीं अधिक 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध के साठ वर्षों में झेलना पड़ा हैं, तभी तो “अखण्ड ज्योति” के माध्यम से महाकाल का संदेशवाहक कहता हैं-”भगवान् भूतनाथ अपनी चतुरंगिणी सेना को लेकर नए युग के स्वागत की तैयारी में जुटे हैं। गौरीबल्लभ ने आनंद से विभोर होकर अपना तीसरा नेत्र खोल दिया हैं और कल्प–कल्पाँतरों से भरे हुए कालकूट की कुछ बूँद नीलकंठ से निकलकर इस पाप−पंक के ऊपर छिड़क दी हैं, ताकि बढ़े हुए झाड़–झंखाड़ जल भुन जाएँ-कँटीली भूमि साफ हो जाए। कितने ही वीरभद्र अपने आकाश चुँबी फावड़े लेकर जुटे हैं ताकि सफाई हो जाए, क्योंकि अवतार आ रहा हैं। स्वागत के लिए सफाई अनिवार्य हैं।” (अखण्ड ज्योति जनवरी 19’42, पृष्ठ 6)

एक संदेश था कि “इस वेला में हम आत्मशोधन करें-अपनी दुर्भावनाओं को बारीकी से खोजें, निकाल बाहर करें। अपना जीवन यज्ञमय बना लें, श्रेष्ठ साधक बना लें, जिससे सदैव धर्ममय विचार प्रसारित हों एक से दस तक पहुँचकर यह विचार क्राँति कि आग जन-जन तक फैला दे” (अखण्ड ज्योति जनवरी 1943) एक गौर करने की बात हैं। आजादी की पूर्णवेला में जब चारों और उथल-पुथल मची थी। द्वितीय विश्वयुद्ध पराकाष्ठा पर था, साधनों का जो दैनंदिन जीवन में प्रयोग आते हैं अकाल सा होता जा रहा था, एक परोक्ष जगत् आध्यात्मिक क्राँति का सूत्रपात होने जा रहा था। इसी को वह विकल्प बनाना था, जिसके सहारे यह नवयुग आ सके, जो पूरे भारत ही नहीं, सारे विश्व को संस्कृतिमय बना सके। छोटी सी शुरुआत उज्ज्वल संस्कृति के संकल्प के साथ व्यक्तिनिर्माण की प्रक्रिया का बीजारोपण, एक सुसंस्कृत समाज के लिए सही इकाई के निर्माण का कार्य शुरू हो चुका था। बहुत छोटे से स्तर पर होने से इतिहासवेत्ताओं की दृष्टि में तो यह आ नहीं सकी, पर जो भी उसे देख पा रहे थे, अपनी सूक्ष्मदृष्टि से समक्ष भी रहे थे व भागीदारी कर रहे थे।

1947 में भारत को आजादी मिली, जो चिरप्रतीक्षित थी- 1948 में उसे महात्मा गाँधी एवं 1950 में श्री अरविन्द तथा सरदार पटेल के महाप्रयाण से कठोर आघात सहने पड़े। महासंक्राँति के महानायक आचार्य श्रीराम का पुरुषार्थ निर्बाध गति से पड़े रहा था। इसी बीच यहूदी राष्ट्र इजराइल 14 मई 1948 को जन्म ले चुका था एवं भविष्य के पाँच दशकों में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करने वाली ‘नाटो’ की स्थापना 4 अप्रैल 1949 को हो चुकी थी। इसके द्वारा वह शीतयुद्ध आरंभ हो गया था, जिसे भविष्य में एक महाशक्ति के पतन एवं पूर्व के राष्ट्रों विशेषतः भारत-जापान चीन के उत्कर्ष की भूमिका निभानी थी।

1943 का वर्ष बड़ा ही युगाँतरकारी कहा जा सकता है, जहां प्रथम प्रजातंत्र की स्थापना के साथ राष्ट्रवादी आजादी के वातावरण में साँस लेने लगे थे, वहाँ शेरपा तेनजिंग नोर्के एवं एडमंड हिलेरी द्वारा विश्व की सर्वोच्च चोटी हिमालय के गौरीशंकर (माउंट एवरेस्ट) पर आरोहण एक संकल्प-जिजीविषा का प्रतीक बन गया। आध्यात्मिक स्तर पर एक विशिष्ट पुरुषार्थ तब संपन्न हुआ, जब उसी वर्ष गायत्री जयंती के पावन दिन गायत्री तपोभूमि मथुरा की विधिवत स्थापना होकर गुरुसत्ता के चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरणों की पूर्णाहुति संपन्न हुई। प्रथम गुरुदीक्षा यहाँ चौबीस दिन के जल उपवास के बाद परमपूज्य गुरुदेव ने दी एवं गायत्री शक्ति एवं यज्ञविज्ञान के दो स्तंभों द्वारा संस्कृति को दिग्दिगंत तक फैलाने का संदेश भी गुँजायमान हुआ। महर्षि दुर्वासा तक फैलाने की तपःस्थली पर अखण्ड अग्नि एवं चौबीस सौ तीर्थों की जलरज के साथ स्थापित गायत्री तपोभूमि साक्षी बनी, 1958 के सहस्र कुँडी यज्ञ की। यह एक विलक्षण वाजपेय स्तर का आश्वमेधिक अनुष्ठान था, चेतना जगत् में प्रचंड विस्फोट कर सौरशक्ति के संदोहन द्वारा उस ऊर्जा का उत्पादन किया, जिसने विराट् गायत्री परिवार की आधारशिला रख दी। इन दिनों जब अमेरिका व रूस रूपी दो महाशक्तियों अंतरिक्ष में पाँव पसार रही थीं, हमारी गुरुसत्ता सविता देवता की सूक्ष्म हलचलों का अध्ययन कर उसके आधिदैविक एवं आध्यात्मिक स्वरूप के द्वारा अधिक से अधिक व्यक्तियों को उस प्रक्रिया में गतिशील बना रही थी, जिसे युगपरिवर्तन का मुख्य आधार बनना था।

इस महासंक्राँति के प्रारंभिक चरणों की मूल धुरी गायत्री महाविद्या रही हैं, जिसे प्रतिबंधों से मुक्त कर आचार्य श्री ने जन-जन के लिए सुलभ बना दिया। वर्णों जातियों-लिंगभेदों की विषमता से भरे समाज में धर्मदिग्गजों के विरोध के बावजूद गायत्री महामंत्र को हर व्यक्ति के लिए ब्राह्मणत्व अर्जित करने का साधन बना देना इस दशक ही नहीं, इस सहस्राब्दी की एक महत्वपूर्ण घटना एवं उपलब्धि हैं। गायत्री महाविज्ञान के रूप में एक विश्वकोश स्तर के ग्रंथ का निर्माण, संदर्भों-शास्त्रोक्त प्रमाणों सहित सभी को आश्वासन कि जो भी वे कर रहे हैं, उन्हें सन्मार्ग पर-प्रतिभा के उन्नयन के पथ पर ल जाएगा, हमारी अवतारी गुरुसत्ता का प्रचंडतम पुरुषार्थ कहा जा सकता है।

सन् 1960 आते-आते विश्वस्तर पर समस्याएँ बढ़ती जा रही थीं। भारत किसी तरह आजादी की स्थिति में कदम आगे बढ़ा ही रहा था कि दलाई जामा को राजनीतिक शरण (31-3-59) देने के साथ कटू हुए संबंधों के चलते पंचशील के वेश में 19 सितंबर 1962 को को चीन भारत की सीमा पर आक्रमण कर बैठा। भारी नुकसान व भूक्षेत्र की हानि झेलते भारतवर्ष ने इन्हीं दिनों शीतयुद्ध गहराते देखा। 20 अगस्त 1961 को बलिन की दीवार खड़ी हो गई, जिसे अंततः 1989 में गिरना था, किंतु इसके निर्माण के साथ तानाशाही मार्क्सवादी साम्यवाद-सांस्कृतिक क्राँति के तूफान में घिरा चीन, पूँजीवादी अमेरिका व पश्चिमी यूरोप को खुली चुनौती देने लगा था। इन्हीं दिनों सन् 59,60,61 की अवधि में परमपूज्य गुरुदेव हिमालय प्रचंड तप हेतु पड़े गए। आर्षग्रंथों के पुनरुद्धार से लेकर कठोर तपश्चर्या द्वार उन्होंने वातावरण परिष्कार की प्रक्रिया संपन्न की। चीन युद्ध के दौरान भारतवासियों से राष्ट्रधर्म के निर्वाह के साथ विशिष्ट साधनाएँ संपन्न करवाई। पंचकोशी साधनाएँ के प्रशिक्षण सत्र भी इसी बीच गायत्री तपोभूमि पर संपन्न होने लगे। युगनिर्माण योजना के सूत्रधार हमारे परमपूज्य गुरुदेव ने हिमालय की तप अवधि से बैठते ही युगपरिवर्तन की प्रक्रिया के प्राण युगनिर्माण सत्संकल्प की घोषणा की। नवयुग के संविधान के रूप में प्रसारित इस घोषणा पत्र के 18 सूत्रों में युगगीता के अठारह अध्यायों के मर्म छिपा पड़ा हैं। महासंक्राँति के महानायक ने महासमर की घोषणा कर वैश्विक स्तर पर पड़े रहे घटनाक्रमों की पृष्ठभूमि में भारतवर्ष की नई भूमिका दृश्यपटल पर रख दी थी।


इस संक्राँति नर्प के महानायक

वर्तमान सहस्राब्दी के महानायकों में, जिसके चिंतन से सारी जगती प्रभावित हुई, अनेकानेक नाम विगत 3-4 माह से समाचारपत्रों में देखने को मिल रहे हैं। आइंस्टीन से लेकर कार्लमार्क्स, लेनिन से लेकर रुजवेल्ट तथा महात्मा गाँधी के नाम लिए गए। इन सबमें एक ही नाम निरवाद रूप से उभरकर आया हैं, वह हैं गाँधी जी का, जो महात्मा के रूप में प्रसिद्ध हुए। अहिंसा व सविनय अवज्ञा के माध्यम से एक आँदोलन छेड़ पहले दक्षिणी अफ्रीका एवं बाद में भारतवर्ष था। एक आध्यात्मिक संत राजनीति में सक्रिय हो एक महासाम्राज्य, जिसके राज्य में कभी सूर्य अस्त नहीं होता था, के उपनिवेशों को आजाद करने और कराने में सफल रहा, निश्चित ही जिस सहस्राब्दी में पश्चात् संस्कृति का बोलबाला रहा हो, विज्ञान व उपभोगवाद ही चिंतन पर हावी रहा हो, लोग इसे पश्चिमी सभ्यता की सहस्राब्दी ही सिद्ध करने पर तुल हो, एक भारतवासी अधनंगे फकीर द्वारा शिखर पुरुषों की होड़ में शीर्ष स्थान पाना एक गर्व का विषय है।

परंतु शिखरपुरुषों की चर्चा अधूरी हैं, यदि हमारी युगसंक्राँति के तीन वर्षों के तीन नायक कबीर, समर्थ, रामदास, रामकृष्ण, परमहंस के साथ श्री अरविंद, स्वामी विवेकानंद एवं अंतिम महासंक्राँति के महानायक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का नाम उसमें सम्मिलित नहीं किया जाता। जहां पहले तीन महापुरुषों ने महासंक्राँति की आधारशिला रखी, वहाँ स्वामी विवेकानंद एवं योगीराज री अरविंद ने उसे मजबूती प्रदान की। जनसर्वेक्षण, इंटरनेट-पोल क्या कहता है, इससे हम क्यों प्रभावित हो, हमें तो उन विचारों को दृष्टि में रखना हैं जिन्होंने इस सहस्राब्दी की परिवर्तन वेला में सारे विश्व का भाग्योदय कर उसे नवयुग के स्वागत हेतु ला खड़ा किया हैं। यह आने वाली सदी जिन विचारों की शक्ति से प्रभावित मानी जाएगी भविष्य की मनीषा जिनका आकलन करेगी, उनका दिग्दर्शन हम इस महासंक्रांति के महानायक आचार्य श्रीराम शर्मा के रूप में करते हैं, जिन्होंने अपने विराट् अभियान द्वारा सारे विश्व को प्रचंड रूप से आँदोलन किया हैं। आगामी एक दशक में उसका विराट् रूप सभी को देखने को मिलेगा।

एक निष्पक्ष विचारक के रूप में जब भी कोई इस मिशन की, जिसे युगनिर्माण योजना, गायत्री परिवार, युगाँतरकारी चेतना, प्रज्ञा अभियान, अखण्ड ज्योति परिवार जैसे नाम दिए गए हैं, समीक्षा करेगा वह निश्चित ही युगऋषि के विचारों के आलोक में युगपरिवर्तन की प्रक्रिया को साकार होता पाएगा। जहां अनेक आँदोलन आँधी-तूफान की तरह उठते और पानी के बबूल की तरह नष्ट होते देखे जाते हैं, वहीं युगनिर्माण का आँदोलन नित-निरंतर गति पकड़ता ही चला जा रहा हैं। स्थूलशरीर से उनके न रहने पर भी यह आँदोलन कई गुना बढ़ा हैं, क्योंकि यह परोक्षजगत से संचालित हैं, देवी आकाँक्षा के अनुरूप इसका जन्म हुआ हैं। स्वयं पूज्य गुरुदेव जनवरी 1962 की ‘अखण्ड ज्योति’ में लिखते हैं- ‘‘युगनिर्माण की इतनी विशाल योजना, जिसमें जनमानस को उलट-पुलटकर रख देने का हमारा संकल्प हैं, वह आज असंभव जैसी लग सकती हैं, पर हमारा अंतरात्मा बोलता है कि यह सब होने ही वाला हैं।”

युगाँतरकारी चिंतन वाले महापुरुषों के बाल्यकाल के क्रिया–कलाप ही बात देते हैं कि वे किस मिट्टी से बनें हैं। ग्रामोत्थान से राष्ट्रनिर्माण की बातें बीसवें-तीसवें दशक में एक किशोर-श्रीराम मत्त के द्वारा पराधीन भारत में की जा रही थी। बाद में वही चिंतन आचार्य श्री के लेखन में सामाजिक परिवर्तन की चिनगारी के रूप में एवं छोटे से आरंभ होकर विराट् रूप में फैल क्रिया–कलापों में दिखाई देता है। उन दिनों की प्रतिकूल परिस्थितियों में एक विधवा ब्राह्मणी का पुनर्विचार, एक दूसरे धर्म में विवाहित महिला के सामाजिक बहिष्कार से संघर्ष, कर्मकाँडों को परे रख तर्कसम्मत विचारों का प्रस्तुतीकरण, छोटी कहीं जाने वाली जातियों में जाकर उनकी ममत्व भरी सेवा, स्वावलंबन हेतु रोजगार के विकल्प ग्रामोद्योग के रूप में एवं हॉटों में जाकर स्वच्छता विस्तार से लेकर भारत की आजादी का संदेश हैंडबिल से वितरित करने वाले युवा श्रीराम ‘मत्त’ के जीवनवृत्त से ही हम एक ऐसी झलक पाते हैं, जो उनके क्राँतिधर्मी लेखन का आधार बनी।

स्वतंत्रता संग्राम में बिना नाम की कामना के जुटे एक स्वयंसेवी सैनिक के माध्यम से जब कठोर तपश्चर्या भी की जाती हैं- अपनी गुरुसत्ता के निर्देश पर एक अखण्ड घृतदीप जब चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण किए जाते हैं, एक क्राँति की आग लगाने वाली आत्मशोधन व आत्मोत्थान से समाज व राष्ट्रनिर्माण की बात कहने वाली अखण्ड ज्योति पत्रिका आरंभ की जाती हैं, सारा सुख−वैभव एक कोने पर रखकर मात्र समाज के उद्धार हेतु एवं जन-जन में सतयुगी उल्लास बिखेरने का संदेश पहुँचता दिखाई देता है, तो विश्वास सुदृढ़ होने लगता है। आचार्य शकर ही विद्वता, महात्मा बुद्ध की करुणा, कबीर-सा फक्कड़पन, ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस-सी विद्या–विस्तार की योजना एवं विवेकानंद-सा योद्धा संन्यासी हमें समन्वित रूप से आचार्य श्री में देखने को मिलता है।

गायत्री को जन-जन के लिए सुलभ बना एक प्रकार से सारी विश्व को इस अमृतरस रसायन द्वारा अनगढ़ से सुगढ़ बनाने की योजना विश्वमित्र जैसे ब्रह्मर्षि की नूतनसृष्टि के निर्माण की कल्पना से अलग नहीं, उसी का आधुनिक संस्करण हैं। समग्र आर्ष वाङ्मय बहुत सस्ते मूल्य पर सरल भाषा में हर में हर धर्मप्रेमी जिज्ञासु के लिए सुलभ बनाना उनकी इस विषय में गहराई ही नहीं-वैदिक संस्कृति के पुनरुद्धार हेतु संकल्पित एक अवतारी चेतना का प्रतीक भी हैं। ‘सुनसान के सहचर’ एवं हमारी वसीयत और विरासी सहित क्राँतिकारी साहित्य जहां उनकी लेखनी के कायल हो जाने हेतु विवश कर देता है तो ‘वैज्ञानिक अध्यात्मवाद’ रूपी दर्शन की धुरी पर सभी के लिए इक्कीसवीं सदी में एक मानवधर्म का पालन करने की प्रेरणा भी देता है। शाँतिकुँज-ब्रह्मवर्चस्-गायत्री तपोभूमि, अखण्ड ज्योति संस्थान, युगतीर्थ आँवलखेड़ा सहित प्रायः साढ़े पाँच हजार से भी अधिक जनजाग्रति केंद्रों का निर्माण एक ऐसा पुरुषार्थ हैं, जिसका कोई मुकाबला नहीं। देश ही नहीं विदेश के गाँव-गाँव में गायत्री यज्ञ संस्कार की त्रिवेणी पहुँचाना, छोटे-छोटे दीपयज्ञों से लेकर एक पाँच कुँडी गायत्री-यज्ञों, शतकुँडी, सहस्र-कुँडी महायज्ञों, संस्कार महोत्सवों से लेकर आश्वमेधिक धर्मानुष्ठानों द्वारा धर्मधारणा का विस्तार एक युगनायक को आदर्शों के हिमालय पर पहुँचा देता है। 3200 छोटी-बड़ी किताबों का लेखन कर की दिशा में अग्रगामी बनाना हिंदी जगत् व प्रादेशिक स्तर की सभी भाषाओं के स्तर पर एक अकल्पनीय पराक्रम हैं।

एक अभिनव स्तर के प्रत्यक्षवाद के स्तर पर प्रमाणित करने वाली प्रयोगशाला की स्थापना, मानसिक, शारीरिक स्वास्थ्य हेतु योगसाधनाओं, मंत्रविज्ञान, वनौषधि विज्ञान की प्रामाणिकता ठहराने का प्रयास उनको एक उच्चस्तरीय वैज्ञानिक घोषित करता है, तो प्रज्ञापुराण ग्रंथ उनके एक द्रष्टा स्तर के मनीषी होने का द्योतक बन जाता है। उज्ज्वल भविष्य के प्रवक्ता आचार्य श्री अपने जीवन के प्रारंभ काल से ही 1942, जब उनकी ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका मात्र पाँच वर्ष की आयु की थी, सतयुग की वापसी की घोषणा करते हैं-वैसे समाज का निर्माण ही नहीं करते, अपितु अपने अथक् पुरुषार्थ से अपने पाँच करोड़ से अधिक की जनमेदिनी भी आदर्शों के मोरचे पर खड़ी कर देते हैं। इस लाख से अधिक समय-साधन समाज के निमित्त देने वाले युगसैनिकों का निर्माण एवं उनके माध्यम से दो करोड़ प्रतिभाओं का परिष्कार कर उन्हें नवसृजन में झोंक देना किसी को एक कागजी योजना लग सकता है, जब यह समष्टि स्तर पर गतिशील हो, तो लगता है, पर जब सहस्राब्दी के युगनायक द्वारा वस्तुतः एक अभूतपूर्व पुरुषार्थ संपन्न हुआ हैं।

1962 में जब सारा भारत अष्टग्रही योग की विभीषिकाओं से भयभी तथा, आचार्य श्री ने संदेश दिया कि “यह योग विकास का संदेश लेकर आया है। युगपरिवर्तन मात्र एक कलपना नहीं, समय की प्रेरणा हैं। इसके बिना न व्यक्ति का कल्याण, न विश्व का उद्धार संभव हैं। यह योग धार्मिकता, आस्तिकता विस्तार व मानवता का संदेश लेकर आया हैं।” (अखण्ड ज्योति मार्च 1962 पृष्ठ 37) उसी समय युगनिर्माण सत्संकल्प के रूप में नवयुग के संविधान की घोषणा की गई। चीन युद्ध से जूझ रहे राष्ट्र को युगधर्म का आभास कराते हुए उन्होंने अनेकानेक प्रमाणों के माध्यम से जन-जन के मन में उज्ज्वल भविष्य के प्रति उल्लास का संचार किया। विचारों की शक्ति से सामाजिक स्तर पर एक बहुत बड़ी क्राँति आरंभ कर ‘ज्ञानयज्ञ’ नाम देते हुए पूरे समाज राष्ट्र को उसका याजक बना देना एक ऐसा कार्य हैं, जिसका आकलन संभवत नई सहस्राब्दी में मनीषी ही करेंगे। यह महासंक्राँति पर्व आया ही ऐसी वेला में हैं, जब अरुणोदय निकट हैं, नवयुग का सूर्य उदय होने ही वाला हैं, ऊषाकाल के प्रभातकालीन स्वर्णिम सूर्योदय की घड़ियाँ बस अंतिम स्थिति में गिनी ही जा रही हैं। ऐसे में जब हम नई ईस्वी-संवत्सर की इक्कीसवीं सदी के मध्यकाल को पारकर हम सं. 2057-2058 में प्रवेश कर रहे हैं, इस महासंक्राँति के महानायक आचार्य श्रीराम शर्मा जी के पुरुषार्थ को ही स्मरण नहीं कर रहे, उनके द्वारा घोषित सतयुग की अगवानी भी प्रस्तुत महापूर्णाहुति वर्ष आगामी हीरक जयंती (अखण्ड दीपक) वर्ष के माध्यम से करने जा रहे हैं। कौन होंगे हम से अधिक सौभाग्यशाली, जो इन क्षणों के साक्षी बनेंगे?


युगबोध क्राँतिबोध

जो विचारों के इतिहास में क्राँति करे, विज्ञान को दिशा दे और दर्शन संवारे, ऐसे ऋषि-मनीषी की आवश्यकता यह सहस्राब्दी कबीर के बाद से ही अनुभव कर रही थी। ऐसे विचारक ही युगबोध-क्राँतिबोध कराके पीड़ित मानवता को दिशा दे पाते हैं, आचार्य श्रीराम शर्मा जी का व्यक्तित्व ऐसी ही युगाँतरकारी परिस्थितियों में महासंक्राँति का पर्याय बनकर आया हैं, जिनमें ऋषित्व और मनीषा एकाकार हुए। ऐसे विरल प्रज्ञापुरुष के रूप में हम आचार्य श्री का दर्शन करते हैं। दर्शन को बुद्धिवाद के चक्रव्यूह से निकालकर आश्चर्यकारी ऐतिहासिक कार्य किया। समय की दार्शनिक भ्रष्टता को दूरकर उसे उच्चस्तरीय चिंतन तक ले जाना ही अवतारी प्रवाह का लक्ष्य रहा है। इस युग की दार्शनिक भ्रष्टता बड़े अजीबोगरीब स्तर की हैं। उपयोगवाद से ऊब चुके विज्ञान के शिखर पर पहुँचे समाज में चिंतन के स्तर पर जो विकृतियों का कुहासा छाया आज दिखाई दे रहा था, उसे युगप्रवर्तक के क्राँतिकारी विचार ही मिटा सकते थे। यही कार्य उन्होंने किया व अब नई सहस्राब्दी के द्वार पर खड़ी मानवजाति के समक्ष एक ऐसा नूतन दर्शन लाकर रख दिया हैं कि सारी समस्याएँ इसी धुरी पर मिटती चली जाएँगी, नया युग शीघ्र आएगा एवं सारे विश्व का वैचारिक-साँस्कृतिक आध्यात्मिक मार्गदर्शन करेगा।

1936 की अखण्ड ज्योति में वे लिखते हैं “लेखन और प्रवचन हमारा व्यवसाय नहीं, अंतःकरण की इठन है जो निरंतर इसलिए होती रहती हैं कि हमारी अनुभूतियों और उपलब्धियों का लाभ हमारे सहचरों को भी मिलना चाहिए। उपर्युक्त दोनों ही क्रिया–कलाप हम अपनी आँतरिक संपदा दूसरों को हस्ताँतरित करने के उद्देश्य से चलाते रहे हैं। वर्ष 30, अंक 11 पृष्ठ 62 जो विचार इस ऋषिसत्ता के अंतःकरण के माध्यम से जन-जन तक फैल, उन्होंने ही एक प्रचंड क्राँतिकारी प्रवाह गायत्री परिवार के रूप खड़ा किया है। ऋषिचेतना के सूत्र-संचालन में प्रवाहित इस प्रवाह ही व्याख्या करते हुए वे लिखते हैं- “ चेतना के उच्चतम स्तर से अवतरित हुए, अंतःकरण की करुणा में धारण किए गए, बौद्धिक तीक्ष्णता से संवारे गए इन विचारों में कितनी आभा हैं, यह अनुभव करने की बात हैं। रोते हुए आँसुओं की स्याही से जलते हृदय ने इन्हें लिखा है, सो इनका प्रभाव होना चाहिए। (अखण्ड ज्योति वर्ष 30-1969, अगस्त पृष्ठ 41)

विचारक्राँति अभियान की पृष्ठभूमि क्या है, यह उपर्युक्त पंक्तियों को पढ़कर आत्मसात किया जा सकता है। गुरुदेव का दर्शन उनके द्वारा प्रेरित और प्रवर्तित विचारक्राँति का बीज हैं। इसके विषय में विक्टर ह्यूगो ने अपनी एक प्रसिद्ध कृति में कहा हैं कि “क्राँति के बीज एक दो महान् विचारकों के दिमाग में उपजते हैं। वहाँ से फल-फूलकर बाहर आए कि छूतहे रोग की तरह अन्य दिमागों में उपजकर बढ़ते ही जाते हैं। सिलसिला जारी रहता है। क्राँति की बाढ़ आती हैं। चिनगारी से आग और आग से दावानल बन जाता है। बुरे-भले सभी तरह के लोग प्रभाव में आते हैं। कीचड़ और दलदल में भी आग लग उठती हैं।” (सत्रह सौ त्रियानवे नामक उपन्यास से उद्धृत) परमपूज्य के दर्शन के विषय में भी कुछ ऐसा ही सोचा जा सकता है। प्रारंभ से लेकर अब तक का युगबोध क्राँतिबोधपरक चिंतन इसका साक्षी हैं।

किसी भी समाज या राष्ट्र की चिंतन शैली से वैचारिक स्तर से वहाँ की सभ्यता, रहन, सहन, आचार-व्यवहार और जीवनक्रम की भविष्यत् की संभावनाओं की बारीकियाँ जानी जा सकती हैं। वैदिक युग कभी सतयुग था तो एक ही कारण था कि उस युग की चिंतनपद्धति तथा वैचारिक स्तर उत्कृष्ट था। यदि आज वह नहीं हैं तो निश्चित ही कहीं न कहीं विचारों के स्तर में गिरावट आई हैं, यह मानना चाहिए।

परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं कि युगनिर्माण योजना की विचारक्राँति युगगीता गायन एवं पाँचजन्य का तुमुलेनाद हैं। नवनिर्माण का विकल्प केवल सर्वनाश हैं। दोनों में से किसी एक को चुनना होगा। निश्चय ही हम सर्वनाश नहीं चुन सकते। नवनिर्माण की जिम्मेदारी स्वीकार करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। नियति हमें-प्रबुद्धतासंपन्न अंतःकरण वालों को इसी दिशा में नियोजित कर रही हैं, करके रहेगी।” (अखण्ड ज्योति अगस्त 1969, पृष्ठ 17)।

राष्ट्र को साँस्कृतिक-वैचारिक स्तर पर मुक्ति दिलाने को कृतसंकल्प आचार्य श्री का चिंतन बड़ा ही स्पष्ट हैं। वे लिखते हैं-”हम लोग सुषुप्ति की स्थिति में पड़ी राष्ट्रचेतना को कुँभकर्णी निद्रा से जगाने का प्रयास करेंगे।

विश्वास हैं, अगले दिनों राष्ट्र जायेगा और उठ खड़ा होगा। जिस दिन यह जगेगा, उस दिन दिशाएँ काँप जाएँगी। उसके पास अध्यात्म, तत्वज्ञान, शौर्य, साहस, विज्ञान एवं संपन्नता की इतनी अधिक परंपरागत पूँजी विद्यमान हैं, जिसके बल पर वह विश्व की अनुपम शक्ति बनकर रहेगा। हमारा उज्ज्वल भविष्य भी ऐसा होने जा रहा हैं, जिसमें हम प्रत्येक क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व, मार्गदर्शन कर सकने में समर्थ हो सके।” (अखण्ड ज्योति अगस्त 1969 पृष्ठ 17)। बड़ा ही आशावादी-युगप्रवर्तक स्तर का चिंतन हमारी आराध्यसत्ता का रहा हैं एवं उसी ने इस निराशा के कुहासे से उबारकर सतयुगी संकल्प के साथ जोड़ा हैं। इस संकल्प की धुरी दो हैं- मनुष्य में देवत्व एवं धरती पर स्वर्ग का अवतरण। इसे स्वप्न नहीं, एक वास्तविकता बताते हुए युगऋषि ने विचारक्राँति की चिनगारी को दावानल बनाकर हमें नई सहस्राब्दी के द्वार पर ला खड़ा किया हैं।

आज जो विकास दिखाई दे रहा हैं, वह समाज द्वारा संपन्न की गई क्राँतियों का परिणाम हैं। अपने जीवन की शुरुआत से ही मनुष्य क्राँतिधर्मी रहा हैं। पहली क्राँति तब हुई जब वह अपने आरंभिककाल में छोटे-छोटे समूह बनाकर रहता था। ऐसी ही स्थिति में पहली बार धर्म का उदय हुआ। “धर्म ने ही मनुष्य को असुरता की परतों से उबारकर उस स्तर तक पहुँचता है, जिसमें बढ़ी-चढ़ी संपत्ति के आधार पर ही नहीं, सुविकसित सभ्यता के आधार पर भी गर्व करने का अधिकारी हैं।” (अखण्ड ज्योति मार्च 1967, पृष्ठ 50)। इस धार्मिक क्राँति के बाद मानवी सभ्यता के विकासक्रम में दार्शनिक क्राँति ने जन्म लिया। मनीषी नए समय के लिए नए समाधान खोजने लगे। राजतंत्र का ढांचा व्यक्तिवाद का पर्याय बन गया, धर्म ने चेतना के उन्नयन के स्थान पर रूढ़ियों मूढ़मान्यताओं को स्थान देना आरंभ कर दिया, तो दार्शनिक क्राँतियों की श्रृंखला पड़े निकली। सत्य को जब तर्कों-तथ्यों प्रमाणों की कसौटी पर कसने की प्रक्रिया पड़े पड़ी तो पुनर्जागरण काल की वैज्ञानिक क्राँति संपन्न हुई, जिसने औद्योगिक क्राँति के साथ जुड़कर एक नई जीवनशैली को जन्म दिया एवं आज की स्थिति में ला खड़ा किया, जहां वह भोगवाद से आसक्ति भी रखता है व त्रस्त भी हैं। असमंजस में हैं कि क्या करें।

परमपूज्य गुरुदेव ऐसी परिस्थिति में सभी समस्याओं को सुलझाने की एक ही ओषधि बताते हैं-अध्यात्म, परिष्कृत स्तर का जीवन-मूल्यों से जुड़ा अध्यात्म। वे लिखते हैं कि “घूम-फिरकर आदमी उससे भी बदतर हालत में आ पहुँचा है, जहां से उसने अपनी यात्रा आरंभ की थी। अब उसे नई व्यवस्था के सृजन की आवश्यकता पड़ रही हैं। कौन करेगा यह सब? इसके लिए क्राँति के उस नए आयाम को ढूँढ़ना पड़ेगा, जो विगत की भूलों से मुक्त हो, जिसमें व्यक्ति के मनोसामाजिक नवसृजन की अपूर्व क्षमता हो। क्राँति का यही आयाम विचारक्राँति है।” (अखण्ड ज्योति अक्टूबर 92, पृष्ठ 43)

आज के इस संकट को परमपूज्य गुरुदेव आस्ि संकट नाम देते हैं। बुद्धि विपर्यय-दुर्मतिजन्य दुर्गति आस्थाक्षेत्र में घुसी निकृष्टता आकाँक्षाओं में समाविष्ट भ्रष्टता और आचरण में गुँथ गई दुष्टता के रूप में आस्था संकट की व्याख्या करते हैं। इसी ने नास्तिकता को, वर्तमान समस्याओं विभीषिकाओं को भी जन्म दिया हैं। इसका समाधान भी एक ही हैं- उलट को उलटकर सीधा करना, मनःस्थिति से परिस्थितियों में बदलाव बना। यही हैं महान् परिवर्तन प्रस्तुत कर सकने वाली विचारक्राँति, जिसे हम आज की परिस्थितियों में अवतारी चेतना का प्रवाह भी कह सकते हैं। ऋतंभरा प्रज्ञा दूरदर्शी विवेकशीलता के साथ भावसंवेदना का जागरण ही मानवी क्रिया व चिंतन में एक सामंजस्य स्थापित कर युगपरिवर्तन की प्रक्रिया को अमली जामा पहना सकता है। इस विचारक्राँति को अपने समय की सबसे सशक्त महाक्राँति कहना चाहिए।

जीवनभर युगऋषि आचार्य श्री ने इसी विचारक्राँति को युगपरिवर्तन का आधार बनाकर प्रस्तुत किया। प्रायः तीन हजार से अधिक छोटी-बड़ी पुस्तिकाओं के माध्यम से जो प्राणचेतना निस्सृत हुई हैं, उसी ने इस सहस्राब्दी की समापन वेला में चिंतन का ढाँचा बदला हैं एवं जन-जन को सतयुगी मनःस्थिति में जीने की दिशा में अग्रगामी बनाया हैं। समाज की आधी जनशक्ति नारी शक्ति के जागरण-उत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त कर दिखाया हैं। बौद्धिक क्राँति द्वारा चिंतन का, नैतिक क्राँति द्वारा चरित्र का एवं सामाजिक क्राँति द्वारा व्यवहार का परिष्कार उन्हीं का दिया सबसे व्यावहारिक जीवनदर्शन हैं। इन पुस्तकों के विचारों एवं ‘अखण्ड ज्योति’ में प्रकाशित प्रतिमाह संप्रेषित उनकी चिंतनचेतना ने लाखों-करोड़ों को झकझोर कर ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया हैं, जहां परिवर्तन सुनिश्चित दिखाई पड़ रहा हैं। ऐसा ही युगद्रष्टा अपनी ऐतिहासिक क्राँतिधर्मी रचना ‘सतयुग की वापसी’ 1989 में हमें कहता है। ‘‘इक्कीसवीं सदी उपेक्षित क्षेत्र को ही हरा-भरा बनाने में निष्ठावान् माली की भूमिका निभानी चाहिए। यह विश्व उद्यान इसी आधार पर हरा-भरा, फल-फूल एवं सुषमासंपन्न बन सकेगा। आश्चर्य नहीं कि वह स्वर्गलोक वाले नंदनवन की समता कर सके।”


इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री-शाँतिकुँज

शाँतिकुँज को युगऋषि ने इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री नवयुग का सृजनकेंद्र, महाकाल का घोंसला कहा हैं। 1923 से प्रज्वलित अखण्ड घृतदीप यों पहले आँवलखेड़ा, बाद में आगरा (फ्रीगंज) फिर अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा रहा एवं फिर 20 जून 1971 से यह शाँतिकुँज में प्रज्वलित हैं। इस अखण्ड दीप के साथ मिशन की कीर्तिमान स्थापित करने वाली महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ जुड़ी हैं। इसी के संरक्षण में अभिनव संकल्प लिए गए, जो पूरे होते पड़े गए।

1967-68 में ही विश्वामित्र ऋषि की तपःस्थली का सप्तसरोवर क्षेत्र में भविष्य के शाँतिकुँज के रूप में चयन हो चुका था। द्रष्टा स्तर की गुरुसत्ता ने मार्च 1962 की अखण्ड ज्योति पत्रिका में पहले ही लिख दिया कि भावी सवा नौ वर्षों का कार्यक्रम क्या होगा। आयुष्य के 60 वर्ष पूरा होते ही मथुरा से सदा के लिए प्रयाण कर हिमालय की गोद में जा बैठने का निर्धारण वे तभी कर चुके थे जब सप्तर्षि आश्रम के नजदीक शाँतिकुँज के लिए भूमि का चयन हो रहा था, उन दिनों पूज्य गुरुदेव अपनी नित्य की साधना, हजारों से मिलना, समस्याओं का समाधान करना, देशभर में दौरे लगाने के अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण चिंतन में निमग्न थे। वह था 1967 में घोषित महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया, इसके लिए महामानवों की तलाश एवं देव-परिवार बसाने के लिए एक टकसाल विनिर्मित करने के लिए एक सिद्धपीठ का निर्माण।

ज्न 1967 ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में आठ पृष्ठ का लख प्रकाशित हुआ- ‘महाकाल और उसका युग प्रत्यावर्तन।’ लगभग पाँच वर्ष पूर्व घोषित ‘युगनिर्माण सत्संकल्प’ के बाद पुनः यह एक क्राँतिकारी घोषणा थी। ‘महाकाली’ की व्याख्या करते हुए उन्होंने लिखा कि “बोलचाल की भाषा में इसे ‘महाक्राँति’ भी कह सकते हैं। यह विवेकशील देव आत्माओं के सहयोग से ही संभव होती हैं।” इसी के साथ उन्होंने युगपरिवर्तन की भूमिका संपन्न करने वाले चार खंड अवतारों की भी चर्चा की। प्रथम श्री रामकृष्ण परमहंस व स्वामी विवेकानंद के अवतरण के रूप में, जिनकी चर्चा हमने संक्राँति के तृतीयपर्व में की थी। दूसरा अवतरण महायोगी अरविंद के रूप में-उनके तप की उष्मा ने किस तरह सूक्ष्म वातावरण को गरम किया, यह समझाया गया। तीसरा व्यक्तियों के अवतरण के रूप में बताया गया। यह लिखा गया कि लगभग तीस वर्ष की कठिन अवधि के बाद यह प्रकल होगा एवं पैंतीस वर्ष में अपनी पूर्ण कलाओं के रूप में प्रत्यक्ष दिखने लगेगा। परमपूज्य गुरुदेव ने यह भी खा कि “कोई भी व्यक्ति जन्मजात रूप से देवदूत नहीं होता। महाकाल और महाकाली उसे किसी विशेष अवसर पर अपना वाहन बनाते हैं और देहधारी के माध्यम से वे सूक्ष्मसत्ताएँ अपना काम करती हैं।” (पृष्ठ 23, अखण्ड ज्योति जून 1967) इस अंक के 4 महा बाद अक्टूबर 67 में एक विशेषाँक प्रकाशित हुआ जो पूरी तरह से महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया पर केंद्रित था। भावी विभीषिकाएँ और उनका प्रयोजन महाकाल और उनका रौद्ररूप, त्रिपुरारी महाकाल शिव का तृतीय नेत्रोन्मीलन, दशमावतार जैसे शीर्षकों से सज्जित इस अंक को एक विशिष्ट सामग्री के साथ संपादित कर एक पुस्तक में एक लख हैं-’अपना परिवार उच्च आत्माओं का भाँडागार।’ इसी में उन्होंने मध्यावतार व अंशावतार की व्याख्या की थी वह कहा कि हमें इन उच्चस्तरीय आत्माओं के माध्यम से युगपरिवर्तन के विराट् प्रयोजन को पूरा कराना हैं।

इस भूमिका की ‘इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री’ के विवरण के परिप्रेक्ष्य में इसलिए बताया जा रहा हैं कि यही से शाँतिकुँज वस्तुतः क्राँतिकुँज था, जहां से नवयुग के निर्माण का न केवल दिग्दर्शन होना था, जहां से नवयुग निर्माण का न केवल दिग्दर्शन होना था, उन सभी इन ऋषिकाल में सतयुगी व्यवस्था का मूल आधार बनी थीं। इन ऋषि परंपराओं का बीजारोपण एक ऐसे ही तीर्थ के समन्वित संस्करण की स्थापना करने का विचार उनके मन में था, जो कालांतर में शाँतिकुँज की स्थापना के रूप में पुष्पित-पल्लवित हुआ। उन्होंने लिखा कि “युगपरिवर्तन ऐसे अवसर पर आया हैं, जिसमें अनादिकाल से लेकर अब तक की प्रायः सभी साधारण स्थिति में हैं पर अगले ही दिनों उनको असाधारण बनते देर नहीं लगेगी। यह सब महाकाल का युग प्रत्यावर्तन जैसी ही अद्भुत घटना होगी।” (पृष्ठ 38 अक्टूबर 1937 अखण्ड ज्योति)

1971 की बसंत तक प्रारंभिक निर्माणकार्य संपन्न हो चुका था। इसी वर्ष इस एक विदाई सम्मेलन में परमपूज्य गुरुदेव 16 से 20 जून की अवधि में अपना मथुरा का संदेश देकर

1971 से 1972 जून तक की अवधि में गुरुसत्ता द्वारा हिमालय में कठोर तप किया गया। अपने सूक्ष्मशरीरधारी प्रायः 650 वर्ष के गुरुदेव के मार्गदर्शन वे वापस शाँतिकुँज आए। ‘अपनी वसीयत और विरासत’ के माध्यम से लिखी गई जीवनी प्रधान पुस्तक में उन्होंने लिखा “हमारे गुरुदेव ने कहा-हरिद्वार आश्रम को गायत्रीतीर्थ के रूप में विकसित करना होगा और उन प्रवृत्तियों को आरंभ करना होगा, जिन्हें पूर्वकाल में ऋषि करते रहे हैं। वे परंपराएँ लुप्तप्राय हो जाने से उन्हें अब जीवन प्रदान करने की आवश्यकता होगी।” इस कार्य के लिए प्राणवान् कार्यकर्ताओं की आवश्यकता थी। अपने तप की एक प्रखर चिनगारी सुसंस्कृति आत्माओं को देकर प्राण-प्रत्यावर्तन द्वारा उन्होंने श्रृंखला आरंभ की, जो बाद में विभिन्न रूपों में उनके महाप्रयाण तक चलती रही।

देवमानवों को बसाने हेतु गायत्री नगर का निर्माण, नारी जागरण अभियान को गति तथा विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय हेतु-ब्रह्मवर्चस् शोधसंस्थान की स्थापना हिमालय से लौटकर की गई। गायत्री नगर शाँतिकुँज का ही विस्तार हैं, जिसमें चरक परंपरा अंतर्गत आयुर्वेद के पुनर्जीवन की प्रक्रिया, व्यास-परंपरा में युगसाहित्य के साथ चार खण्डों में प्रज्ञापुराण की रचना, नारद परंपरा में संगीत के माध्यम से जन-जन का लोकरंजन से लोकमंगल हेतु प्रशिक्षण, पतंजलि-परंपरा में प्रज्ञायोग से लेकर संजीवनी साधना सत्रों की श्रृंखला तथा विश्वामित्र परंपरा में सिद्धपीठ के रूप में गायत्रीतीर्थ की स्थापना कर संजीवनी विद्या का शिक्षण व नवयुग की पृष्ठभूमि का निर्माण यहाँ की कुछ महत्वपूर्ण स्थापनाएँ बनीं। कणाद परंपरा के अंतर्गत वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर शोध, पिप्पलाद-परंपरा में संस्कारी आहार से कल्पसाधना, सूत-शौनक परंपरा में रामचरितमानस, गीत कथा, प्रज्ञापुराण कथा द्वारा ज्ञानयज्ञ, आद्य, शंकर की परंपरा में चौबीस सौ गायत्री शक्तिपीठों व पाँच प्रमुख केंद्रों की स्थापना तथा बुद्ध-परंपरा के अंतर्गत परिव्राजकों का निर्माण, नालंदा, तक्षशिला विश्वविद्यालय स्तर का युगतीर्थ का विकास कुछ ऐसी भागीरथी संकल्पनाएँ हैं, जो इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री शाँतिकुँज में 1971 से 2000 तक अवधि में पूरी हो गति पकड़ चुकी हैं।

शाँतिकुँज स्थान का नहीं, भवन का नहीं, इस भूलोक के प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष का नाम हैं। प्रखरप्रज्ञा व सजलश्रद्धा के युग्म ने इसे खाद-पानी व गरमी देकर बड़ा किया है। यहाँ के नौ–दिवसीय संजीवनी साधनासत्र, व्यक्तित्व परिष्कार सत्र, एक मास से युगशिल्पी सत्रों में जो गलाई-ढलाई होती हैं, उससे महामानवों की टकसाल के रूप में इसके बनने की भविष्यवाणी सही लगती हैं। पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी सशरीर भले ही यहाँ न हों, पर उन्हीं के आश्वासन के अनुसार शाँतिकुँज के कण-कण में उनकी चेतना का वास हैं। दृश्यमान प्रतीक के रूप में उनकी चेतना विद्यमान हैं। यहाँ आने वाला परिजन अनुभव करता व कण-कण में उस शक्ति का साक्षात्कार कर आनंद से सराबोर हो वापस लौटता है।

भविष्य का संसार कैसा होगा-नवयुग परिष्कृत मनःस्थिति के रूप किस प्रकार आएगा-एक मानव धर्म के रूप में विज्ञानसम्मत अध्यात्म की जन-जन के मनों में स्थापना कैसे होने जा रही हैं, भारतीय संस्कृति कैसे विश्व-संस्कृति का रूप लगी एवं किस तरह यह मार्गदर्शन हिमालय की छाया एवं गंगा की गोद में अवस्थित इस शक्तिकेंद्र से दिया जाएगा, इसे इस वर्ष के महापूर्णाहुति कार्यक्रमों के माध्यम से समझा जा सकता है। प्रतिभाओं की महासिद्धि के महायज्ञ के रूप में डेढ़ वर्ष तक चलने वाली बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति एवं देवसंस्कृति के विश्वविद्यालय स्तर के एक विराट् तंत्र का निर्माण आने वाले बारह वर्षों के क्रिया-कलापों की मूल धूरी बनने जा रहे हैं। प्रतिभा नियोजन सत्रों द्वारा दो लाख समर्पित प्रतिभाशालियों द्वारा दो करोड़ समयदानी प्राणवानों का नवनिर्माण हेतु नियोजन तथा साधना, स्वावलंबन, शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी विधाओं द्वारा देवसंस्कृति के निर्धारण का विस्तार होने जा रहा है। निश्चित ही उज्ज्वल भविष्य से भरे सतयुग के निर्माण में शाँतिकुँज एवं इससे जुड़े हर व्यक्ति की भागीदारी ईश्वरीय संकल्प की पूर्ति का निमित्त बनकर रहेगी।


अपनों से अपनी बात (Kahani)

हिमालय तप हेतु प्रस्थान करने वाले थे। उन्होंने फरवरी 1971 की अखण्ड ज्योति में लिखा-”अखण्ड ज्योति दीपक चौबीस महापुरश्चरणों की समाप्ति के बाद प्राणों से प्रिय बन गया। इसे आजीवन चाल रखा जाएगा। अखण्ड दीपक अखण्ड यज्ञ का ही स्वरूप हैं। धूपबत्तियों को जलाने, हवन सामग्री की, अखण्ड जप-मंत्रोच्चारण की दीपक घी होमे जाने की आवश्यकता पूरी करता हैं-ऐसा हमें लगा। इस तरह अखण्ड हवन की स्वसंचित प्रक्रिया बन जाती हैं। ‘अखण्ड ज्योति’ नाम इसी पर रखा गया। यही अखण्ड दीपक अब आगे माता जी सुरक्षित रखेंगी। हम 20 जून को मथुरा छोड़ देंगे। माता जी भी साथ ही भी साथ ही पड़े पड़ेंगी। हम दोनों हरिद्वार तक साथ रहेंगे। उसके बाद 10 दिन माता जी व्यवस्था शाँतिकुँज में बनाकर अपने गंतव्य स्थान को प्रयास कर देंगे।” (फरवरी, मार्च, अप्रैल, मई, 1971 ‘अपनों से अपनी बात’ अखण्ड ज्योति)।


महाकाल का संकल्प प्रतिभाएँ पूरा करेंगी

जनवरी 1990 में सभी परिजनों को जानकारी मिली कि इस वर्ष वसंत का विशेष संदेश हैं उन सब के लिए। संभवतः इसके बाद परमपूज्य गुरुदेव के स्थूल चक्षुओं से दर्शन न हों। वे छह माह के भीतर अपनी स्थूलकाया की लीला समेटकर सूक्ष्म व कारण में विलीन होने जा रहे हैं। 28 जनवरी 1990 की वासंती वेला में जो परिपत्र पूज्यवर ने लिखा, उसमें जो भी कुछ था उसका सार−संक्षेप इस प्रकार हैं-”यह युगसंधि के बीजारोपण का वर्ष हैं। अभी उनका जो छोटा रूप दिख रहा है, वह अगले दिनों विशालकाय बोधिवृक्ष का रूप लगा। अब से लेकर सन् 2000 तक के दस वर्ष जोतने, बोल उगाने, खाद-पानी डालने और रखवाली करने के हैं। इस वसंत से इक्कीसवीं सदी के आगमन की उलटी गिनती ‘काउंट डाउन’ प्रक्रिया से आरंभ हो चुकी हैं।”

“ऋषिकल्प इस सत्ता के जीवन रूपी दुर्लभ ब्रह्मकमल के अस्सी पुष्प पूरी तरह खिल चुके। सूत्र−संचालक सत्ता के इस जीवन का प्रथम अध्याय पूरा हुआ। यह दृश्यमान स्वरूप था, जिसमें ‘जो बोया सो कोटा’ की नीति अपनाई गई। अब जीवन का दूसरा अध्याय आरंभ होता है। सूक्ष्म व कारण इन दो शरीरों का प्रयोग अब एक शताब्दी तक किया जाना हैं। यहाँ से लेकर सन् 2001 के वसंतपर्व तक की अवधि में, विगत दो हजार वर्षों से जमी हुई गंदगी बुहारकर साफ कर दी जाएगी एवं उज्ज्वल भविष्य की नवयुग की आधारशिला रखी जाएगी।”

उपर्युक्त शब्दों में उस संकल्प की अभिव्यक्ति देखी जा सकती हैं, जिसे गीताकार ने ‘संभवामि युगे-युगे’ के भगवत्सत्ता के आश्वासन के रूप में जन-जन के समक्ष रखी हैं। चारों छाए निराशा के वातावरण में एक तपस्वी-युगद्रष्टा यदि यह कहता है कि महाकाल संकल्पित हैं-नवयुग लाने को। परिवर्तन का चक्र पड़े रहा हैं, सभी बदले जाएँगे। तो निश्चित ही इस कथन के पीछे नियंता की स्थापना का उद्घोष है।

वे पूरी दृढ़ता के साथ जून 1967 की अखण्ड ज्योति में लिखते हैं-”त्रिपुरारी महाकाल ने अतीत में भी त्रिविध गाया मरीचिका को शिक्षण का सहारा व निर्माण के त्रिशूल से तोड़-फोड़कर विदीर्ण किया था। अब वे फिर इसी की महापूर्णाहुति करने वाले हैं। धर्म जीतने वाला है, अधर्म हारने वाला है। लोभ, व्यामोह और अहंकार के कालपाशों से मान्यता को मुक्ति मिलेगी। संहार की आग में तपा हुआ मनुष्य अगले दिनों पश्चाताप, संयम और शालीनता का पाठ पढ़कर सज्जनोचित प्रवृत्तियों अपनाने वाला हैं।”

‘महाकाल ही क्यों?’ तो परमहंस गुरुदेव लिखते हैं- “सतयुग को लाने वाले इस कलयुग में देवता देवाधिदेव तंत्राधिपति महादेव ही हैं। वे परम करुणा वाले और मंगलमय हैं। इसी से उन्हें शिवशंकर भी कहते हैं। महाकाल अभी जो युगपरिवर्तन की प्रक्रिया को गतिशील कर रहे हैं- पिछले हजारों वर्षों की कलंक कालिमा को धोकर मानवता का मुख उज्ज्वल करना। इसी को दसवाँ निष्कलंक अवतार कहा गया है, जो एक युगपरिवर्तन के विश्वव्यापी उद्वेलित भावनाप्रवाह के रूप में अवतरित हो चुका हैं।”

काल समय को कहते हैं एवं जो काल से भी परे है, काल की चाल को बदलने की सामर्थ्य रखता है, वह महाकाल हैं। ध्वंस के देवता महाकाल और सृजन की देवी महाकाली की भूमिका को इस तरह बड़ी अच्छी तरह समझा जा सकता है जब हम आज की परिस्थितियों को सामने रखते हैं। विनाश के उपराँत होने के वाले पुनर्निर्माण में मातृशक्ति का ही प्रमुख हाथ रहता है। इसीलिए महाकाल व महाकाली का युग्म बताया गया है मातृसत्ता की-नारीशक्ति के जागरण की संवेदना के उभार की सदी कहते हैं।

नारीशक्ति के उभरकर आने के साथ-साथ एक वर्ग से महाकाल की अंशधर प्रज्ञापुरुष की बड़ी अपेक्षा हैं वह प्रतिभाशालियों का वर्ग। आज दक्षता-बुद्धिकौशल सृजन में न लगकर विनाश में लग रहा हैं। सत्प्रवृत्तियां मूर्च्छित पड़ी हैं। ‘दक्ष’ की उद्धतता के कारण भी भगवान् महाकाल को-उनके वीरभद्रों को सती अर्थात् अर्थात् सत्प्रवृत्तियों से किए गए दुर्व्यवहार पर दंड देने के लिए विवश होना पड़ा था। तप और त्याग जिनके पास नहीं हैं, अहं ही अहं बुद्धि के कला-कौशल के रूप में समाज में संव्याप्त दिखाई देता है, वैसे ही व्यक्ति भटके हुए तथाकथित प्रतिभाशाली आज समाज में बैठे हैं। जिन्हें मार्गदर्शन करना था, उच्चस्तरीय जीवन जीना था, वे ही भटक जाएँ, तो कोई क्या करे। तभी भगवान् महाकाल ने अपना संबंधी होते हुए भी तंत्र के विशेषज्ञ-वैज्ञानिक ‘दक्ष’ का सिर काटकर लाकर का सिर लगाकर यह जताया था कि अहंकारी चतुरों की यह नियति होती हैं। आज भी प्रतिभावान् पर उसकी कड़ी निगाह हैं-ऐसा परमपूज्य गुरुदेव का मत हैं।

प्रकाशस्तंभों के बूझ जाने पर अंधकार फैलना स्वाभाविक है। जैसे-जैसे उच्च आत्मबलसंपन्न हस्तियाँ घटती चली गई, वैसे-वैसे जनमानस की उत्कृष्टता गिरती चली गई। उच्च आत्मबलसंपन्न आत्माओं के अवतरण अवसाद के साथ जनमानस के उत्थान, पतन का क्रम भी जुड़ा हुआ है। जिन दिनों महापुरुष जन्मे, उन दिनों कोई भी युग बीत रहा हो, वातावरण सतयुगी ही रहा हैं। भावी नवनिर्माण में भी इसी परिष्कृत स्तर की प्रतिभाओं का उभार सतयुग की वापसी करेगा, ऐसा महाकाल की सत्ता का प्रबल विश्वास है। ऐसी विभूतियों के साथ भी यही सबसे बड़ी आवश्यकता है एवं उसे विभूतियों को पूरा करना ही होगा।

विभूतियाँ ईश्वरप्रदत्त होती हैं। व्यक्तियों को वे मात्र धरोहर के रूप में सौंप दी जाती हैं। उनका मनचाहा प्रयोग किया जाना अनैतिक हैं। पूज्य गुरुदेव कहते हैं कि विभूतियों की आवश्यकता युगपरिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए हैं, तो उन्हें उसके लिए लगना ही होगा। महाकाल के संकेत की अवहेलना नहीं की जा सकती इन विभूतियों को सात वर्गों में वर्णित किया हैं 1. भावना क्षेत्र (धर्म एवं अध्यात्म के प्रतिनिधि) 2. शिक्षा एवं साहित्य (शिक्षक, लेखक, साहित्यकार) 3. कलाक्षेत्र (सभी विधाओं से जुड़े कलाकार-संगीतकार) 4. विज्ञान (इससे जुड़े सभी वैज्ञानिक) 5. शासनतंत्र (राजनेता एवं प्रशासकगण) 6. संपदा(पूँजी के उपार्जन व वितरण से जुड़े सभी व्यक्ति) 7. प्रतिभा के विशिष्ट वर्ग से जुड़े बहुमुखी-मेधासंपन्न व्यक्ति।

सातों विभूतियों के माध्यम से गुरुसत्ता ने अपेक्षा की हैं, यही वह वर्ग है जिसके प्रभाव से देश या समुदाय की प्रगति संभव हो पाती हैं। युगसंधि की इस वेला में उच्चस्तरीय प्रतिभाओं को विभूतिवानों को खोजा, उभारा व खरादा जाए, यह आचार्य श्री के चिंतन का केंद्र कहा जाए, तो अत्युक्ति न होगी। वे कहते हैं कि दूध से मक्खन निकालकर घी बनाने के लिए उसे उबाला जाता है, मथा जाता है। इसी तरह युगसंधि पर्व में पूरे समाज के समुद्रमंथन जैसी प्रक्रिया की आज अनिवार्य आवश्यकता है प्रतिभा परिष्कार को युग की महती आवश्यकता बताते हुए। उन्होंने कहा है कि महाकाल को इस समय इन्हीं की सर्वाधिक जरूरत हैं। जन्म-जन्मांतरों से संचित सुसंस्कारों वाली प्रतिभाओं की खोज कर उन्हें युगचेतना से जोड़कर प्रज्ञापरिकर का सदस्य बनाया जाए, यही उस महापूर्णाहुति का लक्ष्य होगा, यह भी महाकाल के अग्रदूत ने अपनी युगसंधि महापुरश्चरण की प्रक्रिया के विस्तार के समय बताया था। इन दिनों विभूति महायज्ञ के रूप में ही सार भारत में वह मंथन पड़े रहा हैं। महापूर्णाहुति के अंतिम चरण में सहस्रकुँडी महायज्ञ के बाद 15 नवंबर 2000 से एक जून 2001 तक संपन्न होने वाले 5 दिवसीय प्रतिभा नियोजन सत्रों में ऐसी ही विभूतियों को आमंत्रण दिया जा रहा है, जो राष्ट्र व समाज के निमित्त अपने आप का नियोजित कर सकें, देवसंस्कृति के विस्तार की प्रक्रिया को गति दें सकें।

1964 में परमपूज्य गुरुदेव ने जिस विश्वविद्यालय का स्वप्न देखा था, उसी का साकार रूप प्रतिभाओं के माध्यम से चार विधाओं के प्रशिक्षण के एक विशालतंत्र के रूप में-शाँतिकुँज के विस्तार में होने जा रहा हैं, जो यहीं समीप स्थित हैं। इसे देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के रूप में जीवनविद्या के आलोक केन्द्र के रूप में विकसित किया जा रहा हैं। प्रायः 11 लाख वर्गफुट (131 बीघे) में बनने जा रहे हैं इस परिसर में साधना, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं स्वावलंबन चार विधाएँ विकसित की जा रही हैं। समस्त धर्मों व भाषाओं का एक शिक्षण तंत्र एवं साधना विज्ञान का विस्तृत प्रशिक्षण केंद्र इसे बनाया जा रहा हैं। अध्यात्म जीवन के जीन की कब का नाम हैं। इसका व्यावहारिक जीवनसाधना वाला सार्वभौम स्वरूप क्या हो, इसे देश व विशेषज्ञ के सभी परिजन यहाँ सीखेंगे। आयुर्वेद एवं समस्त वैकल्पिक चिकित्सातीकरण तथा नंगे पैर चिकित्सकों का निर्माण तंत्र भी यहाँ बन रहा हैं। सार्थक, अनौपचारिक संस्कार प्रधान शिक्षा के विस्तार हेतु प्राणवान् शिक्षकों के निर्माण का तंत्र भी यहाँ स्थापित हो रहा हैं। ग्रामीण स्वावलंबन से लेकर कुटीर उद्योगों द्वारा आर्थिक क्राँति का एक समग्र ढाँचा यहाँ बनाया गया हैं।

उपर्युक्त चारों विद्याएँ परमपूज्य गुरुदेव की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया में प्रतिभाओं की भागीदारी की प्रक्रिया संपन्न करेंगी। जब समाज की सभी प्रतिभाएँ, प्रतिक्षण लेकर परिष्कृत रूप से नवसृजन के लिए समाज में उतरेंगी, तो कल्पना की जा सकती हैं कि सतयुग की वापसी एक सुनिश्चित भवितव्यता बन जाएगी, यह परिवर्तन के महाशताब्दी वर्ष का तक साकार होता अपनी इन्हीं आँखों से देख सकेंगे।

इक्कीसवीं सदी और हमारे कर्तव्य उच्चस्तरीय आत्माएँ कई अदृश्य कार्य सूक्ष्मशरीर द्वारा करती रहती हैं। मरणोत्तर जीवन में नए जन्म से पूर्व तो उन्हें इसके लिए और भी अधिक अवसर मिलता है। कर्मबंधनों से मुक्त रहने एवं अंतकाल में आदर्शवादी उत्कृष्टता के होते हुए वे युगानुरूप अपने कार्यक्रम बनाती रहती हैं। दृश्य और अदृश्य जीवन के क्रिया–कलाप की यही रीति-नीति होती हैं।

आज की परिस्थितियों में इस महासंक्राँति पर्व की वेला में जब हम आचार्य श्रीराम शर्मा जी एवं माता भगवती देवी शर्मा जी की जीवनयात्रा का अध्ययन करते हैं, तो पाते हैं कि दोनों ने दृश्य जगत् में भी असाधारण स्तर का पुरुषार्थ किया एवं दोनों ही स्तर पर सक्रिय रह प्रत्यक्ष व परोक्ष जगत् को, उनकी ही सत्ता ने गायत्री परिवार का मत्स्यावतार रूपी विस्तार किया हैं कि लाखों-करोड़ों के अंतःकरणों को बदलकर उनका भाग्य बदले दिया जाए, उनमें इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य का बीज बोकर सतयुग की अगवानी के लिए उन्हें मोरचे पर लगा दिया जाए।

प्रारंभिक चौबीस लक्ष के महापुरश्चरणों की साधना के बाद हिमालय अज्ञातवास के तप से लौटने पर उन्होंने सन् 62 से 69 तक विभिन्न स्तर की तप−साधनाएं स्वयं कीं, औरों से कराई। जिसकी जैसी पात्रता थी, कर पाने की क्षमता थी उसे सीमा तक परिष्कृत कर साधक बनाया। श्रेष्ठ साधक-चिंतक स्तर के स्वाध्यायशील व्यक्ति ही कर्मठ लोकसेवी संगठन बन पाते हैं। सामूहिक साधना द्वारा सामूहिक मन के जागरण की प्रक्रिया सक्रिय बना एक तीव्र चिंतनप्रवाह को जन्म देना एक अवतारी स्तर की सत्ता का ही काम हैं। हमारी गुरुसत्ता का जीवनक्रम हम देखते हैं, तो बहुआयामी रूप में उनके व्यक्तित्व रूपी विराट् हिमालय का दर्शन करते हैं। इसीलिए वह प्रचंड प्राणप्रवाह वाली लेखनी बनकर कभी लाखों अखण्ड ज्योति पाठकों के मनों को मथती हैं, उन्हें कुछ कर दिखाने के लिए तत्पर करती हैं, एक रचनात्मक घटक बनने को प्रेरित करती हैं। कभी वह उनकी ओजस्वी वाणी के प्रवाह से निस्सृत हो दृश्यजीवन में प्रखर तप व गहन ममत्व से भरी प्राण फूँक देने वाली अपनी इस विधा से अनेकों के जीवन की दिशाधारा बदले देती हैं। आध्यात्म मंच से समाज व राष्ट्र के अभिनव निर्माण के रचनात्मक क्रिया–कलाप जब उस साधक-संगठन के माध्यम से चलते हैं, तो गायत्री परिवार को सरकार के समानाँतर एक विराटतम आदर्श स्वयंसेवी संगठन के रूप में स्थापित कर देते हैं।

दुर्गम हिमालय से लेकर उत्तरकाशी एवं ऋषिकेश की गंगातट पर बनी काली–कमली वाले बाबा की छोटी कुटिया हो अथवा सप्तर्षि आश्रम परिसर में बनी छोटी अंतर्मुखी बना देने वाली साधना कुटीर हो, अखण्ड ज्योति संस्थान व गायत्री तपोभूमि का उनका साधनाकक्ष हो अथवा शाँतिकुँज स्थित मुख्य भवन में ऊपर की मंजिल की उनकी साधनास्थली-हर स्थान पर उस साधना की ऊर्जा की उपस्थिति अनुभव की जा सकती हैं, जिससे उन्होंने इस मिशन के संगठन को खड़ा किया हैं। हिमालय उन्होंने यात्रा से लौटकर विशिष्टों के लिए प्राण-प्रत्यावर्तन सत्र सामान्य वर्ग के व्यक्तियों के लिए जीवनसत्ता-संजीवनी साधना सत्र, 1980 से आरंभ किए गए बीसवर्षीय साधना-अनुष्ठान के अंतर्गत विशिष्ट अभियान साधना-प्राण अनुदान वितरण की महासाधना, सूक्ष्मीकरण साधना की अवधि (1984 से 1986) में विशिष्ट ऊर्जा का उत्पादन-देवात्मा भारत की कुंडलिनी जागरण प्रक्रिया एवं 1988 की आश्विन नवरात्रि से आरंभ किए गए बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण द्वारा अनिष्ट का निवारण एवं इक्कीसवीं सदी का आगमन उनकी सतत् चलती रही। साधनामय जीवनयात्रा के मील के पत्थर हैं। ब्रह्मवर्चस् संपादन-आत्मबल उत्पादन हेतु वे स्वयं सक्रिय रहे, औरों को भी गतिशील करते रहे। परमवंदनीया माताजी ने 1946 में उनके साथ भागीदारी की व 1994 तक उनके हर संकल्प में साथ निभाती रहीं। लोककल्याण के लिए तप-अहर्निश तप की इस प्रक्रिया को क्यों किया गया, किस के लिए किया गया, इसका एक ही जवाब है, मानवमात्र के कल्याण हेतु-आस्थासंकट के दुर्भिक्ष से लड़ने हेतु-जनप्रवाह बनाने के लिए तथा सतयुग की वापसी की प्रक्रिया को गतिशील करने के लिए।

इक्कीसवीं सदी आज के आम आदमी के के लिए क्या हैं, किस रूप में हैं, यह सभी जानते हैं। ‘मिलनियम’ के रूप में करोड़ों व्यक्तियों ने उत्सव मनाकर 31 दिसंबर 1999 से 1 जनवरी 2000 में प्रवेश किया। क्या इससे युग बदले गया? युगपरिवर्तन एक शाश्वत-सनातन प्रक्रिया हैं। एवं उसका कैलेंडर की तारीखें बदलने से कोई संबंध नहीं। इसीलिए आज से 57 वर्ष पूर्व हमारे गुरुदेव संवत् 2000 के आगमन के साथ ही आने वाले साठ वर्षों में नवयुग के आगमन की भविष्यवाणी भी कर देते हैं एवं उसके लिए सही वातावरण बनाने की प्रक्रिया भी युगसाधना के द्वारा हमें समझा जाते हैं। पहली बार किसी ने मानव इतिहास में जीवन और साधना को एकाकार कर प्रस्तुत कर लाखों में उज्ज्वल समझाकर अपने आचरण से प्रस्तुत कर लाखों में उज्ज्वल भविष्य हेतु स्वयं के निर्माण की प्रक्रिया को गतिशील बना दिया।

विश्व जीवन को केंद्र बनाकर किया गया एक विराट् साधनात्मक पुरुषार्थ हमारे पूज्य गुरुदेव के जीवन की एक मुख्य धारा बनकर आया हैं। सामान्यतया साधक स्वयं के जीवन के परिशोधन-मोक्ष या सिद्धि रूप में जीवन लक्ष्य पाने का पुरुषार्थ करते रहते हैं, पर आचार्य श्री ने स्पष्ट कहा-”मेरी साधना का उद्देश्य किसी मोक्ष या निर्वाण की खोज नहीं हैं। इसका मुख्य उद्देश्य जीवन और अस्तित्व का परिवर्तन हैं।” विश्वमानवता के प्रति उफनती संवेदना ने ही विश्वात्मबोध जगाया एवं उन्हीं के शब्दों में जनजीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भागीरथों-शुनिक्षेपों का सृजन करना तपश्चर्या का लक्ष्य रहा हैं।

उन्हें भविष्य तब से ही दिखाई दे रहा था, जब वे अपने गुरु के आदेश पर तप में संलग्न हो पंद्रह वर्ष की आयु में अखण्ड घृतदीप जलाकर गायत्री महाशक्ति की युगविश्वामित्र के स्तर की साधना में लग गए थे। उन्हें यह भी आभास था कि सतयुग-नवयुग के आगमन की पूर्ववेला में ब्रह्ममुहूर्त में उन्हें किस उद्देश्य से ऋषिसत्ताओं ने भेजा हैं। पहले भी भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, गौतमबुद्ध, कबीर, समर्थ रामदास, रामकृष्ण के समय लीलावतार के प्रकटीकरण के समय ऐसे ही अवतरण संपन्न हुए थे। इस बार की विशेषता थी लाखों-करोड़ों की चेतना में प्रज्ञावतार की सत्ता का-विचारप्रवाह का अवतरण। इसी तथ्य को आगे उन्होंने सूक्ष्मीकरण की साधना के दौरान लिखा था-”हम जिस अग्नि में अगले दिनों तपेंगे, उसकी गरमी असंख्य जाग्रतात्माएँ अनुभव करेंगी। भावी महाभारत का संचालन करने के लिए कितने ही कर्मनिष्ठ महामानव अपनी वर्तमान मूर्च्छना को छोड़कर आगे आते हैं, इस चमत्कार को अगले ही दिनों प्रत्यक्ष देखने के लिए सहज ही हर किसी को प्रतीक्षा करनी चाहिए। लोकसेवियों की एक ऐसी उत्कृष्ट चतुरंगिणी खड़ी कर देना जो असंभव को भी संभव बना दे, नरक को स्वर्ग में परिणत कर दे, हमारे ज्वलंत जीवनक्रम का चमत्कार होगा।”

आज हम उस स्थिति में खड़े हैं जहां विज्ञान के शिखर पर पहुँचा हुआ विश्वसमुदाय उसके समस्त अभिशापों का-साइड इफेक्ट्स दुष्प्रभाव का शिकार हुआ। इक्कीसवीं सदी में जीने के लिए पैर रखने की जगह तलाश रहा हैं। देवी आपदाएँ, मानवकृत परिस्थितियों के कारण बाढ़ पर हैं। प्रदूषण-बढ़ती जपसंख्या औद्योगीकरण-शहरीकरण नवीनीकरण की प्रतिक्रिया मनुष्य को भुगतनी पड़ रही हैं। जोड़ने के प्रयास चलते हैं-कुछ समाधान खोजा जाता है, तो किसी ओर से कुछ टूट जाता है। बुद्धिवाद ने सुविधासाधनों के आडंबर खड़े कर दिए हैं, पर उनका उपभोग आज का अशक्त-दुर्बल मनोबल वाला इनसान नहीं कर पा रहा हैं। पैसा बढ़ा हैं, किंतु इसी क्रम से मनःस्थिति जिस तनाव को जन्म दे रही हैं, उसमें अधिकाँश झुलस रहे हैं। पूज्य गुरुदेव ने इक्कीसवीं सदी को भावसंवेदना की सदी कहा। समर्थता, कुशलता, समग्रता से भी परे उन्होंने चौथी शक्ति भावसंवेदना निरूपित की एवं कहा कि इक्कीसवीं सदी आएगी, तो लोकमानस के परिष्कार, आदर्शों के परिपालन, चरित्र और प्रयासों में आदर्शों के परिपालन, चरित्र और प्रयासों में आदर्शों का संपुट लगाने पर ही। भले ही इस कार्य के लिए महाकाल को बलात् लोगों के चिंतन बदलने हेतु कोई क्रिया करनी पड़े तो वह करेगा एवं इस जैसे बीसवीं सदी के समापन पर दिखाई दे रहे थे। भावसंवेदना का सतयुग अध्यात्म तत्वज्ञान के परिष्कृत रूप से ही आएगा। समझदारों की नासमझी-भ्राँतियाँ अवांछनीयताएं इसी से दूर होंगी। समर्थ एवं प्रखर अध्यात्म ही उज्ज्वल भविष्य की संरचना करेगा एवं उसी तंत्र को विनिर्मित करने में ऋषियुग्म का समग्र कर्तव्य नियोजित हुआ हैं।

पूज्यवर फरवरी 1987 के ‘इक्कीसवीं सदी अंक’ में लिखते हैं-”वह दिन दूर नहीं, जब भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा और वह उलझनों के निराकरण में अपनी दैवी विलक्षणता का चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत करेगा।’ “युगपरिवर्तन का स्वरूप जो प्रत्यक्ष देखना चाहते हैं, उन्हें वसंत की उपमा समझनी होगी। वसंत के दिनों में क्रमशः मौसम बदलता है, सर्वत्र फूलों की बहार दृष्टिगोचर होने लगती हैं। जनमानस के परिष्कार और सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन के अनेकानेक कृत्य इस तरह बढ़ते दिखाई देंगे। भावनाक्षेत्र में सुधारकों की एक बड़ी सेना योजनाबद्ध रूप में कार्य करती दिखाई देगी।” हम सभी को धैर्य से इस नवयुग की-इक्कीसवीं सदी की प्रतिक्षा करनी चाहिए।


सहस्राब्दी संदेश समन्वित संक्राँति दर्शन

महासंक्राँति के इस महापर्व में समूचा जीवन ही संक्रांति का पर्याय बन गया हैं। एक गंभीर और भयावह उथल-पुथल सब ओर अनुभव की जा सकती हैं। राजनीतिक स्थिति हो या आर्थिक व्यवस्था अथवा फिर सामाजिक संरचना, हर कहीं तीव्र झटके महसूस किए जा रहें हैं। मान्यताएँ, प्रथाएँ, परम्पराएँ हों अथवा जाति, वर्ग, धर्म, नीति-सब तरफ दरकन और टूटन बढ़ती जा रहीं हैं। चारों ओर अस्थिरता का बोलबाला हैं कोई नहीं जानता कल क्या होगा? आकाँशों की तीव्रता अब आतंक का पर्याय बन चुकी हैं। यह स्थिति किसी एक देश की सीमाओं तक सिमटी नहीं हैं, बल्कि समूची दुनिया इसकी लपेट में आ चुकी हैं। वैज्ञानिक चिंतित हैं, मनीषी व्यथित। उन्हें समझ में नहीं आ रहा हैं कि अचानक यह सब क्या हो गया? मानवीय जीवन ही नहीं प्रकृति एवं पर्यावरण भी क्षुब्ध हो पड़े हैं। मानवीय सभ्यता के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लग गया हैं।

समाधान की खोज में लगी मानव मनीषा इस निष्कर्ष पर पहुँची हैं कि यह संक्रमणकाल की व्यथा हैं। जन्म लती हैं। मानवजीवन की संरचनाएँ और संस्थाएँ ही नहीं, स्वयं प्रकृति भी अपना स्वरूप बदलने के लिए उतारू होती हैं। हर पल और एक क्षण बदलाव ही संक्रमणकाल की नीति हैं-संक्राँति की परिभाषा हैं। इन परिस्थितियों में सार्थक समाधान प्रस्तुत कर पाना प्रचलित दार्शनिक विचारों बौद्धिक प्रणालियों के बूते की बात नहीं हैं। ऐसे में जीवन के सामने जो यक्षप्रश्न आ खड़े होते हैं, उन्हें वही दार्शनिक-विचारक हल कर सकता है, जो स्वयं क्राँतिदर्शी हो, जिसे राष्ट्रीय, सार्थक ज्ञान हो, वर्तमान की दुरूहताओं की बारीक समझ हो, साथ ही हो भविष्य का स्पष्टबोध, तभी वह ऐसे दर्शन को जन्म दे सकता है, जिसमें जीवन के विभिन्न पहलुओं के सार्थक समाधान सँजोए हों।

यही वजह हैं कि विश्व की मानवीय प्रतिभा भारत महादेश की ओर आशाभरी नजरों से देख रही है, क्योंकि यहाँ उन्हें ऐतिहासिक संक्राँतियों बड़ी साफ-साफ नजर आती हैं। यही वह देश हैं, जहां का सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन पहले भी कुछ ऐसी ही विपन्नताओं विषमताओं से गुजर चुका हैं। ऐसी पहली संक्राँति का अवसर उस समय आया जब मुस्लिम सभ्यता का अपने देश में पदार्पण हुआ। मुसलमान इस देश में आकर रहने तो लगे, पर अभी तक वे विदेशी थे। न वे भारत एवं भारतीयता को आत्मसात कर पाए थे और न यहाँ के निवासी उन्हें अपना पाए थे। जोर-जुल्म और दमनचक्र ही उस युग की संस्कृति थी। इसी की प्रतिक्रियास्वरूप सामाजिक समस्याएँ भी थीं, जो सब मिलकर एक नए दर्शन की खोज कर रही थीं।

अंतरिक्ष ने सूर्य से पूछा-देव! आप सत्त ताप की ज्वाला में जलते रहते हैं। एक क्षण भी विश्राम नहीं लेते। इससे आपको क्या मिलता है। सूर्यदेव मुस्कराए और बोल-तात्! मुझे स्वयं जलते हुए भी दूसरों को प्रकाश, ताप और प्राण देते रहने से नहीं की जा सकती। अंतरिक्ष को अपनी भूल ज्ञात हुई तथा मालूम हुआ कि जीवन की सच्ची सफलता स्वयं कष्ट उठाकर भी दूसरों को प्रकाशप्रेरणा प्रदान करते रहने में हैं

संत कबीर के रूप में उस युग में एक सच्चे दार्शनिक का अवतरण हुआ। यद्यपि उस युग में दार्शनिक, संत एवं कवि और भी थे, पर उनमें से किसी ने न तो हिंदू-मुस्लिम ऐक्य पर कुछ कहा और न ही उस काल की सामाजिक समस्याओं के सार्थक हल प्रस्तुत किए। वैष्णव संतों की बात जाने भी दें तो, उस काल के सूफी संत कुतुबन (1521 ई0), मंझन (1504) एवं जायसी (1521) आदि नहीं कहा, पर कबीर मौन नहीं र सके। उन्होंने सच्चे दार्शनिक का कर्तव्य निभाया।

उन दिनों अर्थात् चौदहवीं शताब्दी के अंत और पंद्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतवर्ष के दार्शनिक विचारों में क्राँति हो रही थी। सूफीमत, विशिष्टाद्वैतवाद, अद्वैतवाद,

शैव, शाक्त, गोरख सिद्धांत और बौद्धमत की विभिन्न सिद्धाँत शाखाएँ एक-दूसरे से उलझ रही थी और जब महात्मा कबीर ने अपने युग की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने के लिए एक नवीन दर्शन की रचना की, तो उन्होंने अपने दृष्टिकोण के अनुसार इन सभी सिद्धांतों से उपयुक्त बातें नए ढंग से चुनकर अपने दर्शन में मौलिक तर्कसम्मत बनाया उतना ही समायोजित भी। गहरी से गहरी भावनाओं को उन्होंने इतना सरल रूप से सजाया कि साधारण जनता भी असली तत्व के निकट पहुँच गई, वे अपने समय के जितने बड़े दार्शनिक थे, उतने ही अधिक प्रचारक भी।

इनका दार्शनिक व्यक्तित्व बहुआयामी हैं, लेकिन प्रायः विभिन्न मनीषियों ने उसे एक आयाम में बाँधने की चेष्टा की है। अकबरकालीन इतिहासकार मोहसीन फरनी ने अपने प्रसिद्ध इतिहासग्रंथ दलरिस्तान में कबीर को मुवाहित (एकेश्वरवादी) कहा हैं। रेवरेंड जी. एच. केस्ट फास्ट ने इस शब्द पर टिप्पणी करते हुए कहा हैं कि कोई भी मुसलमान कभी भी किसी मूर्तिपूजक को मुवाहित नहीं कह सकता। इससे प्रमाणित होता है कि कबीर ईश्वरवादी थे, सर्वेश्वरवादी नहीं। बाबू श्यामसुंदर दास से ने कबीर की ब्रह्मवादी माना हैं अद्वैत, भेदाभेद और विशिष्टाद्वैत की स्थिति लक्षित करते हुए कबीर को अद्वैत विचारधारा वाले संतों में प्रमुख स्थान दिया हैं। डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार, अद्वैतवाद और सूफीमत में ईश्वर की जो भावना हैं, वही उन्होंने अपने दर्शन में रखी। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस क्रम में एक नवीन योगियों के द्वैताद्वैत विलक्षण रामतत्व के रूप में देखा। श्री अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔद्य’ ने कबीर को वैष्णव भक्ति से प्रभावित होते हुए ‘स्वाधीन चिंता का पुरुष’ कहा जबकि वास्तविकता यह हैं कि उनके दर्शन में एक साथ सभी आयामों का समन्वय हैं। वह तो संक्राँति काल के प्रतिनिधि दार्शनिक थे, जिन्होंने अपने दर्शन में युगानुरूप समाधान किए।

कबीर के बाद दूसरी ऐतिहासिक संक्राँति सत्रहवीं शताब्दी में हुई, जबकि भारत में यूरोपियन सभ्यता प्रवेश कर चुकी थी। मुस्लिम सभ्यता का अवसान एवं यूरोपियन सभ्यता का उत्कर्ष इस काल की विशेषता रही। राष्ट्रीय जीवन में एक बार फिर से संक्राँति का दौर आया। राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक संरचना सब कुछ अस्त−व्यस्त होने लगी। विरोधी विचारधाराओं एवं विपरीत सभ्यताओं में तुमुल संघर्ष छिड़ गया। ऐसे में समन्वय-सामंजस्य से कहीं अधिक आवश्यकता भी राष्ट्रीय गौरव को जगाने की, साथ ही जीवन का पथ प्रदर्शित करने की। महाराष्ट्र में जन्मे समर्थ स्वामी रामदास ने अपने समय की इसी दार्शनिक आवश्यकता को पूरा किया।

उसका प्रधान दार्शनिक ग्रंथ दासबोध हैं। दासबोध की एक विशेषता है कि इसमें वेदाँत के सिद्धाँत का निरूपण उस समय की परिस्थिति के अनुरूप किया गया हैं। दासबोध किसी अन्य ग्रंथ का अनुवाद, टीका या आधार पर लिखा हुआ ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि अपने समय के समाज की नैतिक, धार्मिक और राजनीतिक दशा को पूरी तौर से ध्यान में रखकर समर्थ ने यह ग्रंथ बनाया हैं। उपनिषद् गीता आदि संस्कृतग्रंथों के वेदाँत विषयक सिद्धाँतों को उन्होंने प्रमाणभूत अवश्य माना हैं। परंतु प्राचीन सिद्धाँतों का जो विपरीत अर्थ समाज में भर एक विशेषता यह भी हैं कि इसमें दार्शनिकों को उनके सामाजिक कर्त्तव्यों का बोध कराया गया हैं।

समर्थ का दर्शन उनके आध्यात्मिक अनुभवों की देन हैं। वह अपने दार्शनिक चिंतन में यह सत्य स्वीकार करते हैं कि अपने आत्मरूप में सब जन मुक्त हैं, बस माया के भुलावे में आ गए हैं। उन्हीं के शब्दों में ‘कोणासींच नाही’ बन्धन भ्रान्तिस्तव भूलल जन।’ वह चाहते थे सभी इसी भ्राँति से उबरें। दार्शनिक विचारों से पतनोन्मुखी समाज का उन्नयन करना था। राष्ट्र की निर्बल नसों में नई शक्ति, नई चेतना, नवस्पूर्ति और नवजीवन का संचार करना था। उन्होंने राष्ट्र की जो स्थिति देखी उसका उल्लेख करते हुए लिखा है कि मौलिक दृष्टि से देश निस्सत्व निर्धन हो गया हैं। अनेक लोग संकटापन्न हैं। अनेकानेक लोग अपने प्रदेशों से निर्वाचित हुए है, अनेक गाँवों में ही मारे गए, शेष अपनी जीवनयात्रा को जैसे-तैसे समाप्त करने के लिए जी रहें है। उनके पास न खाने के लिए अनाज हैं , न ओढ़ने-बिछाने के लिए वस्त्र, न घर बनाने के लिए सामग्री। कई लोग अनाचार से पीड़ित हैं और अनेक जाति धर्म से भ्रष्ट। सारे लोग दुःखी हैं, मानो सारे राष्ट्र में मूर्तिमान उद्विग्नता खड़ी हो गई हो। संक्रमणकालीन समस्याओं से घिरे राष्ट्र को आश्वासन देते हुए उन्होंने कहा-

धीर्धरा धीर्धरा तकपा। हड़बड़े गड़बड़ नका।

काल देखोनि वर्तावे। सोड़ावे मय पोटिंचे॥

धैर्य रखो, धैर्य रखो, देखो घबराओं मत हिम्मत से काम लो। समय को देखकर बरताव करो। मन से सारे भय दूर करो।

इस के साथ उन्होंने दार्शनिकों को उनके राष्ट्रीय एवं मानवीय कर्त्तव्य का बोध कराया और वे स्वयं भी जीवनभर अपने इस कर्त्तव्य के प्रति सन्नद्ध रहें। उन्होंने दार्शनिक इतिहास में शायद पहली बार जोरदार शब्दों में कहा-दार्शनिक होने का अर्थ बौद्धिक भूल-भुलैया में उलझे रहना नहीं है, बल्कि सत्य का दर्शन करके, जनसामान्य के सामने उसे युगानुरूप प्रस्तुत करना हैं। उन्हें यथार्थ बोध कराना हैं। राष्ट्रीय जीवन के सामने ये जो दूसरी ऐतिहासिक संक्राँति आई, इसमें समर्थ स्वामी रामदास एक सच्चे दार्शनिक के रूप में उभरे और अपने युग के प्रतिनिधि दार्शनिक बने।

तीसरी ऐतिहासिक संक्राँति उन्नीसवीं शताब्दी में आई उस समय तक समूचा देश यूरोपीय रंग में रंग चुका था। समूचा राष्ट्रीय जीवन धार्मिक, सामाजिक एवं साँस्कृतिक आदर्शों से च्युत होकर चरम अद्य-पतन की ओर पहुँच रहा था। राजनीतिक पराधीनता से जीवन के सभी क्षेत्रों में पराधीनता व्याप्त हो रही थी। सामाजिक भेदभाव, धर्मांधता, वर्णविद्वेष आदि ने समाज में हर ओर विखंडन और विश्रृंखलता ही थी। इसी के परिणामस्वरूप विभिन्न वर्गों में विद्वेष एवं घृणा का भाव व्याप्त हो रहा था। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक संक्रमण के साथ ही उस युग में बौद्धिक संक्राँति भी व्याप्त हो रही थी। लोग उन दिनों पाश्चात्य विचारों से हतप्रभ हो रहे थे। जीवन के प्रश्नों के हल के लिए धार्मिक-आध्यात्मिक ग्रंथों की आवश्यकता समाप्त सी होने लगी थी। पाश्चात्य शिक्षा अपने साथ नई-नई यूरोपियन विचारधाराएँ लेकर भारत में प्रवेश पा चुकी थीं न्याय, वैशेषिक एवं वेदाँत के स्थान पर अब भारतवर्ष में हालस, रूस व बँक को पढ़ाने का उत्साह था। सभी की रुचि काँट, तयूम एवं हेगल की ओर मुड़ने लगी थी। संक्राँति के इन्हीं पलों में सन् 1836 ई. में श्री रामकृष्ण परमहंस का आविर्भाव हुआ।

उन्होंने संभवतः पहली बार इस सत्य का सार्थक ढंग से उद्घोष किया कि दार्शनिक और आधारित होती हैं। उन्होंने अपने जीवन में समस्त संप्रदायों एवं मतमताँतरों के अंतर्निहित तत्वों की खोजकर उनमें सामंजस्य तथा ऐक्य स्थापित किया। उन्होंने एक ओर अद्वैत, वैष्णव, शाक्त, शैव आदि प्राचीन संप्रदायों की साधना की और दूसरी ओर बौद्ध, इस्लाम, ईसाई, सिख आदि धर्मों के गूढ़ रहस्यों का अनुभव भी किया। उनके जीवन का प्रधान प्रतिपाद्य विषय था। अभिनव समाज को प्रायोगिक रूप से विभिन्न धर्मानुभावों के मूल ऐक्य पर प्रतिष्ठित करना। यह स्पष्ट करना कि सभी मत एक दूसरे के विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं।

दार्शनिक ज्ञान एवं विवेचना के साथ ही श्रीरामकृष्ण परमहंस ने अपने शिष्यों को ‘शिव भावे जीव सेवा’ का मर्म भी समझाया। उनके दार्शनिक चिंतन एवं आध्यात्मिक अनुभवों को ही स्वामी विवेकानंद एवं उनके गुरुभाइयों ने अपने कर्म में मूर्त किया। स्वामी विवेकानंद के माध्यम से उनके दार्शनिक चिंतन को आत्मसात कर राष्ट्रीय चेतना में नवस्फूर्ति का संचार हुआ। नवजागरण की वेला शुरू हुई। राष्ट्रीय अवसाद का दूर होना प्रारंभ हुआ। सभी ने इस सत्य को स्वीकार किया कि स्वतंत्रता पूर्व भारत में राष्ट्रीय जागरण का जो महान् कार्य हुआ उसके केंद्र में स्वामी विवेकानंद के माध्यम से व्यक्त होने वाला श्रीरामकृष्ण का दार्शनिक ज्ञान ही सक्रिय रहा हैं। अपने समय की संक्रमण वेला वे सर्वोपरि प्रतिनिधि दार्शनिक थे।

रावण दुर्वचन बोल रहा था, तब तक राम चुपचाप खड़े रहे। विभीषण ने कहा-भगवत्! आए शस्त्रप्रहार क्यों नहीं करते? राम बोल-क्षत्रिय मृतकों पर शस्त्र प्रहार नहीं करते। लेकिन रावण तो जीवित है भगवन्-विभीषण बोल। इस पर राम ने हँसकर उत्तर दिया-आवेशग्रस्त मनुष्य व मृतक मृत्यु के समान ही ज्ञानशून्य हो जाता है।

राष्ट्रीय स्वतंत्रता के पश्चात् राष्ट्र में एक नई संक्राँति ने जन्म लिया। देश फिर से भ्रष्टाचार व कुरीतियों के पंक में डूबने लगा। अलगाव, आतंक, अस्थिरता और यंत्रीकरण व औद्योगीकरण की प्रगति में छुपी अवगति साफ झलकने लगी। विज्ञान व अंतर्राष्ट्रीय विधान स्वयं की असमर्थता का अहसास करने लगे। ये वर्तमान के वे क्षण हैं, जिनका अहसास और अनुभव हममें से प्रत्येक को हो रहा हैं। समय ने फिर से संक्रांति वेला में समाधान के लिए दार्शनिक स्वरों का आतनान किया। इसी उद्देश्य के लिए 1911 ई. में आचार्य श्रीराम शर्मा का अवतरण हुआ, जो पंद्रह वर्ष की अवस्था से अपनी चौबीस वर्षीय आध्यात्मिक साधना में तत्पर हुए। सन् 1950 ई. में उन्होंने दार्शनिक एवं आध्यात्मिक शक्तियों को प्राप्त कर अपनी साधना को पूरा किया। इसी के साथ प्रारंभ हुई उनकी विधिवत् दार्शनिक लेखन यात्रा।

महासंक्राँति की वेला में उनका व्यक्तित्व युगबोध के साथ क्राँतिबोध बनकर उभरा। उन्होंने बताया कि अपने युग में अनाचार की गतिविधियाँ पूर्वकाल की अपेक्षा भिन्न हैं इस समय दार्शनिक भ्रष्टता ने जिस दिशा में बहना शुरू किया हैं, वह भूतकालीन दिशा से भिन्न हैं। इसलिए सुधार की प्रक्रिया भी भिन्न होनी चाहिए। उसमें सामयिक विषयों की समीक्षा और निराकरण के सामयिक आधार रहने चाहिए। दार्शनिक जगत् में आचार्य जी इसी की आर्तावस्था, विपन्न मानसिकता को अपने हृदय की धड़कनों में अनुभव किया और पानी रचनात्मक प्रतिभा के बलबूते समाधान की शोध में तत्पर हुए। उनके दार्शनिक विचारों का उद्देश्य बौद्धिक महत्वाकांक्षा से उपजे किसी मत या वाद की महत्ता का प्रतिपादन नहीं हैं, बल्कि जीवनभर किए गए महत्वपूर्ण प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों का जिज्ञासुओं में वितरण हैं। इसी उद्देश्य से उन्होंने विचारक्राँति अभियान व युगनिर्माण आँदोलन की शुरुआत की, जो भारत महादेश के अतिरिक्त विश्व के अन्य देशों में फैल हजारों केंद्रों के माध्यम से सक्रिय हैं।

आज के राष्ट्रीय, वैश्विक एवं मानवीय परिप्रेक्ष्य में दार्शनिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन के बाद संत कबीर, समर्थ रामदास, श्री रामकृष्ण परमहंस एवं आचार्य श्रीराम शर्मा सर्वाधिक समीचीन एवं युगानुरूप लगते हैं। इनके विचारों का गंभीर अध्ययन करने के बाद अंतर्मन में इस तत्व की स्पष्ट आध्यात्मिक एवं दार्शनिक होती हैं कि एक ही महान् आध्यात्मिक एवं दार्शनिक आत्मा ने स्वयं को विशिष्ट राष्ट्रीय, मानवीय एवं दार्शनिक कर्त्तव्य के लिए स्वयं को इन चार रूपों में अभिव्यक्त किया हैं। यदि इन चारों के दार्शनिक विचारों का समन्वय हो सके तो निश्चित रूप से एक सार्वभौम संक्रांति दर्शन का जन्म हो सकेगा, जिसकी उपादेयता एवं उपयोगिता भारत की सीमाओं से परे समूचे विश्व के लिए समान रूप से होगी।

होगी भी क्यों नहीं? अब जबकि इक्कीसवीं सदी अपनी झलक दिखाने लगी हैं। बहुत सी धाराएँ, बहुत से विचार, बहुत से धर्म, बहुत-सी जातियाँ, ज्ञान-विज्ञान की अगणित प्रविधियाँ, शासनतंत्र की बहुत-सौ शैलियां अगलेी सदी में प्रवेश करेंगी। इन सबसे जुड़ी विभूतियों के नाम भी आने वाले समय में लिए जाएंगे। मगर छह शताब्दियां पार कर जाने के

बावजूद जो व्यक्तित्व अपने मूलस्वरूप में सबसे अलग दिख रहा होगा, वह फक्कड़ कवि, निराल संत, अक्खड़ गुरु, अटपटे दार्शनिक, बेबग वक्ता और विद्रोहियों के खरे दोस्त कबीर के सिवा और कौन होगा? उनकी यह अक्खड़ आवाज-”हम वासी उस देश के जहां जाति वरन् कुल नाँहि।” ही तो इक्कीसवीं सदी में सारी संकीर्णताओं से ऊपर उठकर मानवीय समुदाय और विश्वराष्ट्र कस भावबोध कराएगी।

इसी तरह से जब अनाचार से लोहा लेने, अत्याचार के विरुद्ध संगठित होने का सवाल उठेगा, तो समर्थ स्वामी रामदास से सार्थक उत्तर भला और कौन दे सकता? बात जब सभी मतों, सभी पक्षों में अंतर्निहित सत्य के खोज की होगी तो श्री रामकृष्ण परमहंस ही अपनी आध्यात्मिक अनुभूति को ‘जतोमत-ततों पथ’ के शब्द दे पाएंगे। उन्हीं के स्वर स्वामी विवेकानंद का भव्य स्वरूप लेकर देवसंस्कृति की पताका विश्व गगन में फहरा सकते हैं अपने अंतिम और चतुर्थ चरण में परमपूज्य आचार्य जी ही कबीर के फक्कड़, अक्खड़पन एवं समर्थ गुरु का प्रबल पौरुष, श्री रामकृष्ण परमहंस की आदिशक्ति जगन्माता की साधना के साथ अवतरित होकर निराश हताश समूचे विश्व को उज्ज्वल भविष्य का संदेश दे सकते हैं। इक्कीसवीं सदी में इन चारों देवपुरुषों के चार ही संदेश होंगे-इनमें से संत कबीर का स्वर होगा-1. साँप्रदायिक सद्भाव समर्थ गुरु की ललकार होगी- 2. संगठित होकर अनाचार का प्रतिरोध। श्री रामकृष्ण परमहंस की पुकार होगी- 3. देवसंस्कृति की दिग्विजय के रूप में देवत्व की विजय एवं वेदमूर्ति तपोनिष्ठ आचार्य श्री की विचारक्राँति के साथ-साथ उद्घोषणा है-सबके लिए सद्बुद्धि सबके लिए उज्ज्वल भविष्य। यही इन चारों देवपुरुषों के समन्वित संक्राँति दर्शन का सार हैं और इनकी ओर से सहस्राब्दी संदेश हैं, जो भारत देश के वासियों को ही नहीं समूची विश्वमानवता को इस महासंक्राँति की वेला में दिया जा रहा हैं।

भिक्षु विनायक को वाचालता की लत पड़ गई थी। जोर-जोर से चिल्लाकर जनपद के लोगों को जमा कर लता और धर्म की लंबी-चौड़ी बातें करता।


अर्थों में समग्रता (kahani)

तथागत को समाचार मिला तो उन्होंने विनायक को बुलाया और स्नेहभरे शब्दों में पूछा-भिक्षु! यदि कोई ग्वाला सड़क पर निकलने वाली गायें गिनता रहे तो उनका मालिक बन जाएगा? विनायक ने सहज भाव से कहा-नहीं भंते! ऐसा कैसे हो सकता हैं? गौओं के स्वामी ग्वाल को तो उनकी संभाल और सेवा में लगा रहना पड़ता है। तथागत गंभीर हो गए। उनने कहा-तो तात्! धर्म को जितना से नहीं, जीवन से व्यक्त और जनता की सेवासाधना में संलग्न रहकर उसे प्रेमी बनाओ। इस तरह सत्कर्म को पाठ तक नहीं, कर्त्तव्य में उतार लिया जाए तो जीवन में सच्चे अर्थों में समग्रता आ जाती है।


वसंतपंचमी (1991) का संदेश- मातृवाणी

परमवंदनीया माताजी का वसंतपंचमी (1991) का संदेश

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ बोल

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

हमारे आत्मीय परिजनो! श्रद्धाँजलि का यह प्रथम वसंतपर्व हैं। पूज्य गुरुदेव की विरह की कसक, पीड़ा एवं दरद हमारे दिल में अत्यंत वेदना उत्पन्न कर रहा है। यह वसंतपर्व हमें अपनी जिम्मेदारियों की याद दिलाता है। यह उनका आध्यात्मिक जन्मदिन है। यों तो आश्विन महीने के कृष्णपक्ष में जो श्राद्धपक्ष आता है, उसमें त्रयोदशी के दिन उनके शरीर का जन्मदिवस आता है। परंतु उन्होंने वसंतपर्व को अपना जन्मदिन माना, क्योंकि इसी दिन उन्होंने गुरुदीक्षा ली थी। गुरुदीक्षा आपने भी ली है। आप से अधिकाँश कलावा तो बँधवाते हैं, एक दो दिन नशा भी रहता है, लेकिन थोड़े दिनों में ही वह सब भूल जाते हैं और जो संकल्प किए थे, वे सब अधूरे रह जाते हैं। तो क्या निष्ठावान के भी संकल्प अधूरे रह जाते हैं? नहीं, उनके संकल्प अधूरे नहीं रहते। अपने अंदर में जो संकल्पशक्ति हैं, वही उसे चलाती रहती हैं।

परमपूज्य गुरुदेव को हम भूला नहीं पा रहे हैं। बार-बार आँखों में आँसू आ जाते हैं, लेकिन जब हम शरीर से हटकर आत्मा से जुड़ते हैं, तो सारा ब्रह्मांड हमें गुरुमय लगता है। प्रत्येक दीन-दुःखी में उन्हीं का स्वरूप दिखाई देता है और कहता है कि क्या इस एक शरीर के लिए ही आँसू बहाते रहेंगे? कुछ और भी नहीं करना है क्या? आँसू उनको कभी भी अच्छे नहीं लगते थे। कई बार ऐसा अवसर आया, जब हम गायत्री तपोभूमि से आए ही थे तो एक माँ का हृदय रोने लगा। माँ की ममता उमड़ आई, तो उन्होंने कहा कि देखो यदि जीवन में आगे बढ़ना है, तो पीछे मुड़कर मत देखना। यदि तुम्हें अभी भी बच्चों कि आपने मुझे बाध्य नहीं किया था, मैं तो स्वयं ही आपके साथ आई थी। जहां आप हैं, वही मैं हूँ।

बेटे! यह भी एक खेल है। वे संकट भी-वे काँटे भी मैंने अपनी झोली में डाल लिए। अपने फर्ज और कर्त्तव्य में मैंने यह माना कि मेरा भगवान मुझे आज्ञा दे रहा है जब सुख होता है, तो व्यक्ति हँसकर झेलता है, परंतु दुःख में रोता है, जबकि यह नहीं होना चाहिए। दुःख में भी फूल की भाँति हँसते हुए रहना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता, तो यह हमारी कमजोरी है मोह है, यदि कमजोरी नहीं है, तो हम उस विशालता को क्यों नहीं देख पा रहे है? हमें चाहिए कि जो विशेषता-जो शक्तिपुंज समस्त विश्वब्रह्मांड में मिल गई, हम उसको देखें और यह मानें कि वह हमारे क्रिया–कलापों को देख रही हैं और परख रही है कि जिन कार्यक्रमों को हम छोड़कर आए थे, उसमें वृद्धि हुई तो आशीर्वाद के पात्र हैं।

आज के इस पुनीत वसंतपर्व के दिन उनके गुरु ने उनके अंदर एक बीज बोया था, जो इतने दिनों में विकसित होकर कल्पवृक्ष बन गया। यह उनका आध्यात्मिक जन्मदिन हैं। उन्होंने अपने गुरु के निर्देशानुसार जीवन जीकर दिखा दिया कि आध्यात्मिक जीवन क्या होता है। आपको याद होगा कि पिछले वर्ष उन्होंने महाकाल के संदेश में अपनी कलम से लिखा था कि मेरे अस्सी वर्ष-अस्सी फूल-ब्रह्मकमल ऐसे खिल कि दूसरों को सुगंध देते हुए पड़े गए। अंत में उन्होंने लिखा कि अब ये फूल मुरझाने जा रहा हैं। अब इस फूल के शारीरिक जीवन का अंतिम समय निकट आता जा रहा हैं। यदि आपको याद न हो तो ‘महाकाल के संदेश’ में पृष्ठ 1-3 तक पढ़ लेना, जिसमें कहा गया है कि “हम युगपरिवर्तन का बीजारोपण करने जा रहे हैं। वह बीजारोपण हो गया हैं, बस उसमें खाद और पानी देने की आवश्यकता है। मैंने वह बीज बो दिया हैं, जो फूलेगा, फलेगा, और पनपेगा। आगामी जीवन में लाखों-करोड़ों व्यक्ति शाँति और संतोष का अनुभव करेंगे। पुण्यकार्यों में अब हमारा शरीर बाधक होता चला जा रहा हैं। हम इस शरीर से निकलना चाह रहे हैं। सूक्ष्मशरीर में जाकर हम करोड़ों गुना अधिक कार्य कर सकेंगे। यदि स्थूलशरीर के लिए हमने ज्यादा सोचा तो जितना हम करना चाहते हैं, वह कर नहीं पाएंगे।”

अभी एक बच्चे ने मुझसे पूछा कि आप तो यहाँ से पड़े जाएँगे, तब इस मिशन का क्या होगा? जो जवाब गुरु जी ने मुझे दिया, वही जवाब मैंने उसे दिया। उन्होंने कहा कि “यह मिशन हजारों-लाखों साल तक चलेगा। दैवीशक्ति हमारे साथ है। हमें इसे पूर्ण करना है। तुम्हारा बस यही कार्य है कि तुम बच्चों को ममता और दुलार देते रहना चाहिए। कहीं ये अज्ञानता के मार्ग पर न जाएँ अगर कहीं वे डगमाने लगें, तो इन्हें एक माँ की तरह बचाना। कहीं ये अपने आपको असहाय न समझ लें। शक्ति तुम्हें मिलती रहेगी। मैंने वायदा किया कि मैं पूरी मुस्तैदी से अपने कार्यक्षेत्र में जमीं रहूँगी। मैं आपकी आज्ञा को संपूर्ण रूप से शिरोधार्य करती हूँ। मेरे लिए तो आप ही भगवान् हैं।

उन्होंने कहा- हमारे मिशन के बारे में किसी भी बच्चे को कोई शंका नहीं होनी चाहिए। किसी भी बच्चे की श्रद्धा एवं निष्ठा में कमी नहीं आनी चाहिए। आगे चलकर उन्होंने अनेक व्याख्याएँ कीं। वे कहते थे कि प्रत्येक वस्तु का अपना एक महत्व होता है। संसार में मानवशरीर सत्कर्मों का माध्यम है, क्यों न इसका लाभ उठाया जाए।

कहते हैं कि नालंदा और तक्षशिला भगवान् बुद्ध ने स्थापित किए थे। उनका क्या उद्देश्य था? उनका उद्देश्य था-भारत और समस्त एशियाई देशों को शिक्षण। गुरु जी का उद्देश्य देवसंस्कृति को मानव−संस्कृति को सारे विश्व में फैलाना था। इसमें कोई शक नहीं है। यह कार्य तो व्यक्ति पर टिका ही नहीं हैं। यदि व्यक्ति पर टिका होता तो उसके साथ ही समाप्त हो गया होता, परंतु यह तो एक अपार शक्ति के इशारे पर पड़े रहा हैं। यदि इस शक्ति को अनुभव कर पाएँ, तो हमारा प्रत्येक बच्चा विवेकानंद हो जाए, हमारी प्रत्येक लड़की निवेदिता हो जाए, परंतु अभी हमने उस शक्ति को समझा नहीं।

बेटे! उन्होंने देवसंस्कृति की स्थापना के लिए शाँतिकुँज की स्थापना की थी। जिस प्रकार बसें चलाने के लिए बसअड्डा होता है, उसी प्रकार देवसंस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए एक जाग्रत स्थान की जरूरत पड़ी। जिस स्थान पर यह शाँतिकुँज बना हुआ हैं, यहाँ सात ऋषियों ने तपस्या की हैं। उससे पहले गुरु जी ने क्या किया था? उसे पहले अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय का संकल्प अखण्ड ज्योति में किया था। जब संकल्प होता है, तो साधन का फल करा रहा हैं। गायत्री तपोभूमि इसी का फल हैं। गायत्री तपोभूमि जिन हाथों में सौंपी गई, वह अनेक गुनी बढ़ती गई। इतना बड़ा तंत्र उन्होंने खड़ा किया कि ढेरों बच्चे उसमें विद्या अध्ययन करने लगे। ऐसे ही एक मशीन की जगह ढेरों मशीनें हो गई।

बेटे! गुरु जी जब वहाँ से आए तो उन्होंने कहा कि बड़े लक्ष्य के लिए बड़ी जगह चुननी पड़ेगी। इसके लिए उन्होंने शाँतिकुँज की स्थापना की ताकि यहाँ देवमानवों का परिष्कार किया जा सके। लोग आएँ, चिंतन मनन करें और आग के गोल की भाँति तेजस्वी होकर समस्त विश्व में व्याप्त हो जाएँ। कभी नालंदा विश्वविद्यालय के शिक्षक विद्यार्थियों को तराशा करते थे। गुरु जी ने सार जीवन यही किया। प्रत्येक व्यक्ति को ऊँचा उठाने में उन्होंने अपना समस्त जीवन लगा दिया। कोई भी हमारा परिजन यह नहीं कह सकता कि गुरु जी के पास से हम खाली हाथ बैट आए हैं। गुरु जी ने जिसको भी अपना शिष्य मान लिया, उसकी समस्त कठिनाइयों को अपनी कठिनाई समझकर उसे दूर करने की कोशिश की। पुत्र समान उस पर स्नेहवर्षा की। उन्होंने यह बोध कराया कि सारा विश्व हमारा अपना हैं। हमारे बच्चे ही क्या हमारे अपने हो सकते हैं, दूसरे के नहीं? नहीं, दूसरों के बच्चे भी हमारे अपने बच्चे हैं। हमारे लिए सारा संसार अपना हैं।

एक बार एक लड़के ने मुझसे पूछा कि माता जी हमें गुरु जी का अभाव व्यापता है, तो उसकी पूर्ति माता जी से हो जाती है, परंतु जब आप नहीं रहेंगी, तो किससे होगी? मैंने कहा- बेटे, तुमने हमें मात्र शरीर मान लिया, इससे आगे नहीं सोचा। भगवान् राम, भगवान् कृष्ण, अभी जिंदा हैं। उनको अपने हृदय में धारण करना चाहिए। आप जिस धागे से जुड़े हुए हैं, वह गुरु और शिष्य का मजबूत धागा, है, वह कभी नहीं टूट सकता। वह चाणक्य और चंद्रगुप्त का धागा हैं, जिसमें शिष्य की श्रद्धा और गुरु की जिम्मेदारी होती हैं। गुरु शिष्य को नारकीय जीवन से मुक्ति दिलाकर कल्याण का मार्ग दिखाता है। उसे भगवान् के समीप पहुँचाता है। गुरु अज्ञानता के अंधकार से निकालता है और ज्ञान के प्रकाश में शिष्य को स्नान कराता है। एक कहावत हैं-”पानी पीजै छानकर, गुरु कीजै जानकर।” गुरुतत्व बहुत बड़ा है। गुरुतत्व को हम जीवन में धारण कर लें, तो जैसे हम आज हैं, वैसे नहीं रह सकते। फिर हम ऊँचे कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए ज्योतिस्तंभ का कार्य करेंगे।

आज मैंने आपको संक्षिप्त शब्दों में गुरुतत्व की महत्ता बताई। आज गुरु जी का बोधदिवस हैं। आज उनका जन्मदिवस है। उनके लिए सच्ची श्रद्धाँजलि का स्वरूप क्या हो सकता हैं? मैं समझती हूँ कि भावना और श्रद्धा से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता है। आप संकल्प कीजिए कि हमको आजीवन गुरु जी के पगचिन्हों पर चलना है। गुरु जी ने तो अपना सर्वस्व त्याग दिया था। अपने लिए कुछ रखा ही नहीं। वे गायत्री माता के पुजारी थे, बेटे थे। लोग यह कहा करते थे कि गुरु जी की जितना पर सरस्वती विराजमान् हैं। जो एक बार उन्होंने कह दिया वह सही होता था। यदि वैसा नहीं हुआ, तो जान की बाजी भी लगानी पड़े, तो भी उनके लिए कम थी। उन्होंने इतना साहित्य लिखा कि उनके बराबर भला कोई लिख सकता है क्या? वे संगीत के पुजारी थे, मर्मज्ञ थे। संगीत में पी-एच.डी. करके भी कोई इतनी बारीकियों में नहीं जा सकता, किंतु गुरु जी को संगीत की सभी बारीकियों का ज्ञान था।

आप सभी जानते हैं कि वसंत आने पर पक्षी चहचहाने लगते हैं, नई कोपल फूटने लगती है, पौधों पर फूल विकसित होने लगते हैं। वातावरण में एक अजीब उल्लास छा जाता है। इसी प्रकार गुरु जी का वसंतपर्व के दिन बहुत मस्ती आती थी। वह मस्ती होती थी उनके नए संकल्प की, नए क्रिया–कलापों की और जो कहा हैं, उसे पूरा करके दिखाने की। वह उमंग होती थी कि लोकमंगल के लिए हम अधिक से अधिक क्या कर सकते हैं, यह कर दिखाने की। प्रत्येक वसंतपर्व पर उनके नए-नए कार्य संकल्पित होते हुए पड़े गए। दीपयज्ञों से लेकर गायत्री तपोभूमि बनाने तक अनेकों कार्य संपन्न हुए।

अब हमारी और आपकी बारी है नए निर्धारण करने की और उन्हें पूरा करने की। इन्हीं के आदेश और निर्देशानुसार हमें विद्या–विस्तार का कार्य तेजी से करना चाहिए। अज्ञानता का अंधकार ज्ञान के सूर्य के निकलने से ही दूर होगा। हमारा एक ही लक्ष्य है और वह हैं विद्या–विस्तार का। गुरु जी के विचार प्रत्येक घर में पहुँचाने चाहिए। जिस घर में देवस्थापना होगी, उसी घर में हम पानी पिएँगे, अन्यथा नहीं पिएँगे, हमारा यह संकल्प होना चाहिए। हम प्रज्ञारथ को प्रत्येक जगह भेजना चाहते हैं।

गुरु जी ने कहा है कि आगे के दस वर्ष बड़े भयंकर आएंगे। यह बहुत विनाशकारी समय होगा। आप देख ही रहे हैं? हिंदुस्तान में अपने घर में ही आग लग रही है। इस युगसंधि में होगा यह कि कंकड़, मिट्टी सब छँट जाएंगे और गुणवत्ता रह जाएगी। हमारे अंदर सृजनशक्ति सृजनशीलता है, वह प्रत्येक व्यक्ति को ऊँचा उठाइए। कायर मत बनिए, योद्धा बनिए।

भगवान् हमारा पति है। पति-पत्नि का संबंध जन्म-जन्माँतर का होता है। वह तो आत्मा का आत्मा से संबंध होता हैं। ये हमारा प्रारब्ध है कि कौन आगे जाता है, और कौन पीछे। वे हमसे अलग नहीं हैं। दूध और पानी की तरह हम आपस में घुल हुए हैं। बेटे! हमारे साथ गुरु जी हैं, भगवान् हैं। अर्जुन के साथ यदि भगवान् कृष्ण नहीं होता, तो क्या वे युद्ध जीत पाता? नहीं। उन्होंने धर्म की स्थापना की। जब तक धर्म हैं, अधर्म उसके आगे नहीं टिक सकता हैं। उसे भागना ही पड़ेगा। इस भारतभूमि पर धर्म ही रहेगा, अधर्म नहीं रहेगा। गुरु जी ने एक नए महाभारत की रचना की। उन्होंने कहा हैं कि रामराज्य आकर रहेगा। कृष्ण की तरह से उन्होंने रथ की लगाम को पकड़ रखा हैं और अपने पाँडवों को युद्धक्षेत्र में छोड़ दिया हैं अब पाँडवों की बारी आती हैं कि वे कायर बनेंगे या योद्धा बनेंगे। कायर बनेंगे, तो कृष्ण की तरह से वही चेतावनी देनी पड़ेगी। जब अर्जुन यह कहने लगा था कि ये तो सब मेरे संबंधी है, मैं किससे युद्ध करूं। ये समस्त मेरे परिजन है, मैं इन्हें कैसे मारूं? जब कृष्ण ने कहा था-”अर्जुन तू विवेकशील नहीं हैं। तू जनखों की तरह बात कर रहा हैं।”

जनखा-नपुँसक शब्द कहकर कृष्ण ने अर्जुन की शक्ति को ललकारा, तभी वह कामयाब हुआ। आप लोग पाँडव बनिए। अपने अंदर से दुर्गुणों से युद्ध करिए। समाज की विकृतियों को निवारण सूझ-बूझ से करिए। अपने चरित्र को उज्ज्वल बनाइए। ईमानदारी का जीवनयापन करिए। गाँधी जी बनिए। आपको स्वयं यज्ञमय जीवन जीना चाहिए, साथ ही दूसरों को भी यज्ञमय जीवन जीने की प्रेरणा देनी चाहिए मातम के लिए लगा दिया। वे त्रिकालदर्शी थे। भगवान् उनके कण-कण में निवास करते हैं थे, तभी तो शांतिकुंज में शाँति मिलती हैं।

देवत्व के संदर्भ में मैं आपको एक व्यक्ति सुनना चाहती हूँ। इसे आप कविता मत समझिए, वरन् इसमें जो भावनाएँ हैं, उनको आप अपने अंतर में उतारना। कविता हैं-”अंतर के निर्मल भाव हो तम, भगवान मरा संसार हो तम......। यह कविता गुरु जी की सन् 1940 के बाद की हैं। यह हमें सिखाती हैं कि भगवान के प्रति समर्पित जीवन हीरे की तरह चमकता हैं। भगवान की भक्ति का द्वार सभी के लिए खूब हैं। यह हमारे हृदय की विशालतम पर निर्भर करता है। हमारा यह दृढ़ संकल्प होना चाहिए कि हमें तो भगवान् के आदेशानुसार होना चाहिए हैं। इसी में हमारे और आपके जीवन के सार्थकता है।

आज वसंत के इस पावनपर्व पर गुरु जी और हमारी ओर से आप सभी को आशीर्वाद हैं गुरु जी हमसे-आपसे दूर नहीं हैं। वह हमारे समीप ही हैं। हमको प्रत्येक क्षण उनके निर्देशों का पालन करना हैं। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करती हूँ।

साथ एक साथ भारत भर में भ्रमण करेंगी व लगातार तीन माह चलकर प्रायः 108 चुने गए स्थानों पर छह खंडों में प्रादेशिक स्तर की विराट् दीपयज्ञ पर छह खंडों में प्रादेशिक स्तर की विराट् दीपयज्ञ के साथ पूर्णाहुति संपन्न कर इस चरण को पूरा करेंगी। रथयात्रा सारे भारत के शक्तिपीठों, पावन तीर्थों, देवालयों, विभिन्न धर्मों की प्रसिद्ध पावनस्थलियों को स्पर्श करती हुई चलेगी। इनके साथ-साथ गाँव-ब्लॉक-जिला व क्षेत्रीय इकाई स्तर पर मंथन होते-होते एक समर्थ संगठन के खड़े होने की एवं समर्पित समय व साधन देने वालों के संकल्प एकत्र करने की प्रक्रिया संपन्न हो चुकी होगी। रथयात्रा व क्षेत्रीय संगठन-दीपयज्ञ एक एक साथ चलेंगे। इस तरह इन तीन माहों में विराट् परिमाण में ऊर्जा का उत्पादन होकर गायत्री परिवार अपने शीर्ष तक पहुँच चुका होगा।

ज्ञानयज्ञ की प्रक्रिया साथ चलती रहेगी। बड़ी सरल भाषा में पाँच पुस्तिकाओं का दस रुपये का एक सेट लागत मूल्य पर जन-जन के लिए ‘महापूर्णाहुति साहित्य सेट’ के रूप में 15 मार्च के बाद उपलब्ध होगा। इसे विभिन्न भाषाओं में भी उपलब्ध कराया जाएगा। चतुर्थ चरण आरंभ होने से पूर्व सभी केन्द्रों पर एक साथ गायत्री जयंती 11 जून 2000 को समर्पण दीपयज्ञ संपन्न होगा। नए बनकर खड़े हो चुके इस परिवार की कार्यविधि की रूपरेखा सुस्पष्ट करते हुए प्रतिभाओं को व्यवस्थित संगठन बद्ध करने की प्रक्रिया शहरी क्षेत्रों को जगाने की विधि-व्यवस्था इसके बाद चलते रहेंगे। 13 अक्टूबर शुक्रवार के दिन एक विराट् ज्ञानयज्ञ इस चतुर्थ चरण में नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में आयोजित किया जा रहा हैं। इसमें राष्ट्र व विश्व की शीर्ष प्रतिभाओं सहित देश-विदेश के 75000 प्रतिनिधि भाग लगे। भारतीय संस्कृति के विश्वसंस्कृतिरूपी विस्तार का व्यवस्थित कार्यक्रम सायं 5 से 9 तक होने वाले इस अभिनव आयोजन में घोषित किया जाएगा।

चतुर्थ चरण में ही 7,8,9,10,11 नवंबर को शांतिकुंज हरिद्वार में एक विराट् सहस्रकुंडी यज्ञशाला में संकल्पित प्रतिभाओं द्वारा विशिष्ट समय व साधनदान, साधना संपादन की घोषणा के साथ महापूर्णाहुतिसंपन्न होगी। इसमें आम जनता नहीं, चुने हुए विशिष्ट प्रतिभाशाली ही भाग लेंगे। यज्ञक्षेत्र ऋषिकेश से रुड़की तक गंगा जी के दोनों ओर बनाया जा रहा हैं।

इसी चरण में 15 नवंबर से एक विशिष्ट ‘प्रतिभा नियोजन सत्र श्रृंखला’ पड़े पड़ेगी, जो पाँच दिवसीय होगी एवं प्रायः दो लाख प्रतिभाओं के परिपूर्ण प्रशिक्षण तक जून 2001 तक चलती रहेगी। इसमें दस वर्ष के कार्यक्रम सभी संकल्पित प्रतिभाशीलों को सौंपे जाएँगे। इसी बीच 19 जनवरी 2001 वसंतपंचमी के दिन एवं 2 अप्रैल रामनवमी के दिन सारे भारत व विश्व में एक साथ सतयुग की आरती उतारने के निमित्त सामूहिक दीपयज्ञ व प्रार्थनाएँ पुनः इसी तरह रहेगी।

इस प्रकार यह विराट् महापूर्णाहुति अपने पूर्ण रूप में आने पर एक संक्राँति को जन्म देगी, जिसके प्रवाह में अनौचित्य के मिटाने एवं औचित्य की-न्याय की स्थापना को सभी स्वयं देखेंगे। ऐसे सौभाग्यशाली क्षण इतिहास में कभी-कभी आते हैं। इस महापूर्णाहुति वर्ष में कोई भी साधक स्वयं को किसी-न-किसी निमित्त नियोजित करने से नहीं चूकेगा, ऐसा हमारा दृढ़ विश्वास है।

एक मित्र ने कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि “पुस्तक राज्य के लिए लिखी जाती हैं, इसलिए उसमें तल राज्य का जलतम हैं और पूजा मेरी व्यक्तिगत है, इसलिए इसमें निजी तल जबतम हूँ।” सच्चे मन और धर्म से उपार्जित साधनों से संपन्न किए गए सत्कर्म ही फलित होता है।


दूसरे को जलाया (kahani)

मनीषी जीबनी के जीवन का एक प्रसंग हैं। वे रात्रि के पहले प्रहर में राज्य के आदेशानुसार एक पुस्तक लिखा करते थे। दोनों काम वे रात में ही करते थे। दिन दूसरे कामों में बीत जाता था। उनके पास दो दीपक थे। तब पुस्तकें लिखते तो एक दीपक जलता और जब पूजा का समय आता तो दूसरे को जलाया करते थे।


Quotation

पराक्रम ने भाग्य को बनाया है। जो भाग्य की आशा पर बैठते हैं, वे अंधेरों में जुआ खेलते हैं।

*समाप्त*