नववर्ष का नया संकल्प

नववर्ष की पहली सुबह का सूर्य हिमालय के हिमशिखरों पर उदित हुआ। श्वेता शिखरों की शुभ्रता स्वर्णिम हो उठी। ध्यान में रत साधक के अंतर्जगत में भी सवितादेव उदित हुए। समूचा अंतःकरण उनके दिव्य आलोक से भर उठा। प्रेरक पुँज के प्रेरणा स्वर गूँजने लगे- “आलस्य और शिथिलता में पिछले काफी वर्ष बीत चुके। पिछला साल भी कुछ यूँ ही गुजरा। अब नए संकल्प की आवश्यकता है। अब तक तुम अपने चिंतन को पूर्णतः आचरण में नहीं ला सके। पिछला साल भी कुछ यूँ ही गुजरा। अब नए संकल्प की आवश्यकता है। अब तक तुम अपने चिंतन को पूर्णतः आचरण में नहीं ला सके। इसके लिए निराश होने की बजाय मन में वज्र संकल्प करो। वर्ष 2000 तुम्हारे जीवन की नई राहें खोल रहा है। उन पर वीरतापूर्वक आगे बढ़ो। जिसने अपने जीवनलक्ष्य की प्राप्ति का दृढ़ संकल्प कर लिया है, उसके मार्ग में कौन बाधा डाल सकता है।

“जब तुम संकल्पवान् होओगे, तब महाकाल स्वयं तुम्हारा सहचर होगा। परमसत्ता मित्र होगी, सर्वस्व होगी। ईश्वर के सान्निध्य का आर अधिक बोध हो सके, इसके लिए अन्य सभी प्रकार की दुर्बलताओं का त्याग कर देना ही अच्छा है। जब तुम अपनी निम्न प्रवृत्तियों का त्याग कर दोगे, तब प्रकृति स्वयं अपने सौंदर्य को तुम्हारे सामने प्रकट कर देगी। ऐसे में तुम्हारे लिए सभी कुछ आध्यात्मिक हो जाएगा। फिर घास का एक तिनका भी तुमसे आध्यात्म की ही बात कहेगा।

“दूसरों के मतों की चिंता करते हो? इस मनोवृत्ति का क्या लाभ? जब तुम दूसरों के मत की अपेक्षा करते हो, तब जान लो कि तुम्हारे अंदर संकल्प का अभाव है। सुदृढ़ संकल्प के स्वामी बनो। फिर दूसरे लोग कुछ भी कहें, तुम उनकी चिंता नहीं करोगे। दूसरों पर निर्भर मत रहो, अपने संकल्प के स्वामी बनो। फिर दूसरे लोग कुछ भी कहें। तुम उनकी चिंता नहीं करोगे। दूसरों पर निर्भर मत रहो, अपने संकल्प के स्वामी बनो। फिर दूसरे लोग कुछ भी कहें, तुम उनकी चिंता नहीं करोगे। दूसरों पर निर्भर मत रहो, अपने संकल्प की पूर्ति करो। जीवन लक्ष्य प्राप्ति का यह नया संकल्प ही तुम्हें राह दिखा सकता है। अपने समय को व्यर्थ की चर्चा में नष्ट न करो। इससे तुम्हें कुछ भी लाभ न होगा। मार्गदर्शन के लिए ध्यान की गहराई में उतरो, स्वयं अपनी ही आत्मा में निमग्न हो , यही सच्चा मार्ग है-भटकन से कोई लाभ नहीं।”

“जीवन लक्ष्य को पाकर रहोगे। नववर्ष का यह नया संकल्प तुम्हें दृढ़ता प्रदान करेगा। तुम्हें लक्ष्य पर पहुँचा दगा। तुम्हारी संकल्पनिष्ठा तुम्हें दृढ़प्रतिज्ञ भी करेगी तथा तुम्हें सभी प्रकार की बाधाओं पर विजय प्रदान करेगी। सवितादेव से उभरती प्रेरणा की इस अनुगूँज में नववर्ष का नया संकल्प आकार लेने लगा- जीवनलक्ष्य प्राप्ति का संकल्प -उसके लिए अपने सर्वस्व की आहुति का संकल्प -गुरुसत्ता के प्रति समग्र समर्पण का संकल्प।


चेतना जगत् के रहस्यों का उद्घाटन करता है प्रतीकों का विज्ञान

प्रतीक जीवन का मनोविज्ञान सत्य है। ज्ञान -विज्ञान का अंबार, शिक्षण -प्रशिक्षण का विस्तार , अगर कहीं अपने को समेट-सिकोड़कर संक्षिप्त एवं बोधगम्य बनाता है तो प्रतीकों के रूप में सत्य चाहे वैज्ञानिक हो, सामाजिक हो अथवा फिर धार्मिक-आध्यात्मिक, हमें उसे हृदयंगम करने के लिए प्रतीकों का सहारा लेना ही पड़ता है। कार्बन डाइऑक्साइड के स्वरूप एवं गुणों को समझने के लिए CO2 पर्याप्त है। इसी तरह जल के संगठन एवं गुण H2O कहने भर से जान लिए जाते हैं। युगद्रष्टा स्वामी विवेकानन्द के अनुसार , यह अनिवार्य आवश्यकता दार्शनिक ज्ञान एवं आध्यात्मिक उपासना के क्षेत्र में भी है। उनके अनुसार उपासना के लिए प्रतीक ऐसे हों, जो ब्रह्म के स्वरूप का बोध करा सकें। उस परमसत्य की ओर इंगित कर सकें। सच तो यह है कि परमात्मा का सबसे सार्थक प्रतीक तो स्वयं विश्व ही है, जिसके द्वारा हम उसके परे विश्वात्मा को जानने , उसका बोध पाने का प्रयत्न किसी -न किसी रूप में, अपनी किसी न किसी क्रिया के माध्यम से करते रहते हैं।

आचार्यों ने प्रतीकोपासना की व्याख्या अपने-अपने ढंग से करने की कोशिश अपने-अपने ढंग से करने की कोशिश की है। ब्रह्मसूत्र के श्री भाष्य में आचार्य रामानुज कहते हैं- “अब्रह्मणि ब्रह्मदृष्टया अनुसंधानम्” अर्थात् जो वस्तु ब्रह्म दृष्टि करना ब्रह्म का अनुसंधान है। आचार्य शंकर कुछ इस तरह इस सत्य का विवेचन करते हैं -

मनो ब्रह्मोत्युपासीतेत्यध्यात्म अदाधि दैवात्मा काशौ ब्रंह्मति तथा आदित्यो ब्रंह्मत्योदशः स य नाम ब्रंतयुपास्ते इत्येवमादिपु प्रतीकोपासनेषु संशयः।

अर्थात् मन की ब्रह्म रूप से उपासना करो, यह आभ्यंतर उपासना है और आकाश की ब्रह्मरूप से उपासना अधिदैविक है। मन आभ्यंतर प्रतीक है और आकाश ब्रह्म । इन दोनों की उपासना ब्रह्म के रूप में करनी होगी। श्री अरविंद के अनुसार प्रत्येक पदार्थ किसी उच्चतर सत्य का प्रतीक है।

संसार के प्रत्येक पदार्थ किसी उच्चतर सत्य का प्रतीक हैं संसार के प्रायः सभी धर्मों में उपासक बिना किसी आपत्ति के प्रतीकों का उपयोग करते हैं। केवल इस्लाम और प्रोटेस्टेंट ये ही दो ऐसे पंथ हैं, जो इसकी सहायता की आवश्यकता नहीं मानते। वैसे समग्र रूप से देखा जाए तो विश्व की संपूर्ण मानवजाति किसी -न किसी रूप में प्रतीकों का उपयोग करती है।

प्रतीकों का इतिहास काफी लंबा एवं विस्तृत है। जनार्दन मिश्र ने अपना रचना भारतीय प्रतीक विद्या में बताया है कि युगीन सृष्टि के आरम्भ के साथ ही प्रतीक की संकल्पना आरंभ हुई। गुफावासी आदिमानव भी अच्छे लगने वाले मृग-पक्षियों के रूप को रंगीन पत्थरों से अपनी गुफाओं की दीवारों आदि पर अंकित करते थे। यहीं से प्रतीकों का विकासक्रम शुरू हुआ। ज्यों ज्यों मनुष्य के विचार विकसित होते गए, प्रतीकों का जुड़ाव तो मानव-स्वभाव के साथ है। समुन्नत प्रतीक तो उस जाति के विकसित होने का प्रमाण है। महाभारत , रामायण , वेद उपनिषद् प्रतीकों से भरे पड़े हैं।

वेदों में प्रयुक्त हुआ “प्रतीक“ शब्द सामान्य धारणाओं के अर्थ में नहीं बल्कि वह सतह और मुख के अर्थ में व्यवहृत होता है। वेदों में देवताओं का स्वरूप ऋषि-मंत्रों में गुँथे सहज व्यंजक , अर्थ सब कुछ प्रतीकात्मक दिखता है।

विचारों के विकास के इतिहास को पलटने से जाहिर होता है कि मनुष्य पहले अपना काम चिन्हों और संकेतों के द्वारा ही चलाता था। उसके पास भाषा का अभाव था। श्री सुदर्शनसिंह ने हमारी संस्कृति में उल्लेख किया है कि सारे कल्पित प्रतीक पुराने नित्य प्रतीकों के आधार पर ही निश्चित होते हैं। प्रतीक की उत्पत्ति के बारे में भले ही मताँतर हो, पर इतना सच है कि इसका आविर्भाव भारत में हुआ और बाद में यह समस्त देशों में प्रसारित हुआ। भारतीय दर्शन में प्रतीक -प्रतीकवाद , संकेत वाद, प्रतीक प्रक्रिया , प्रतीक विज्ञान आदि अनेक रूपों में मिलता है। पश्चिमी दर्शन में इसे सिंबालिज्म , सिग्निफिक्स , सीमियोसिस, सीमियोलाँजी व सीमियोरिल्स आदि अवधारणाओं में व्यक्त किया गया है। प्रतीकवाद प्रतीक के दार्शनिक , भाषिक , मनोवैज्ञानिक , सामाजिक तथा साँस्कृतिक पहलुओं को समाहित कर लेता है।

महर्षि अरविंद के अनुसार प्रतीक निम्न प्रकार के होते हैं। 1. रूढ़ प्रतीक - वे जो वैदिक ऋषियों ने आसपास के पदार्थों से गढ़े थे । इस प्रकार का प्रतीक प्रकट होते ही जीवंत हो उठता है। ऋषियों न इसमें प्राण फूंके और वह उनकी उपलब्धि का एक अंग बन गया। वह उनके अंतर्दर्शन में आध्यात्मिक प्रकाश की मूर्ति के रूप में प्रकट हुआ। 2. जीवंत प्रतीक - ये प्रतीक व्यावहारिक जीवन में अथवा उन परिस्थितियों से स्वभावतः विकसित होते हैं, जो जीवन के साधारण मार्ग को प्रभावित करती हैं। 3. वे प्रतीक जिनमें एक सहज औचित्य होता है। आकाश अथवा आकाशीय देश सनातन ब्रह्म का प्रतीक है। किसी भी जाति में इसका अर्थ एक समान होगा। सूर्य अखिल विश्व में अतिमानस प्रकाश का दिव्य विज्ञान की व्यक्त करता है। 4 दृ मानसिक प्रतीक, इनके उदाहरण हैं अंक या वर्ण । ये मान्य होते ही कार्य करने लगते हैं प्राचीन लोग अंकों के विषय में भी इसी प्रकार विचार करने में दक्ष थे। एक ही प्रतीक से कई तरह के भाव भी व्यक्त किए जा सकते हैं।

युग नायक स्वामी विवेकानंद की मान्यता है कि प्रतीकों को मुख्य रूप से दो तरह से समझा जा सकता है - नित्य प्रतीक एवं कल्पित प्रतीक। नित्य प्रतीक अपने भाव या पदार्थ से सतत् संबंध बनाए रखता है। उस भाव को किसी अन्य प्रकार से सूचित करना संभव नहीं है, जैसे आकाश का प्रतीक शून्य है। कल्पनाओं के द्वारा कल्पित प्रतीक प्रकाश में आए। जैसे शक्तियों के नाम, राष्ट्रों के ध्वज तथा अन्य चिह्न कल्पित होते हैं। कल्पित प्रतीक किसी भाव , घटना या बहुलता को सूचित करता है। जब कोई देश , संस्था या व्यक्ति अपने ध्वज , पदक या चिह्न निश्चित करता है तो उस चिह्न में उसका भाव सन्निहित होता है। ईसाई धर्म में क्रास ईसामसीह की शूली का स्मारक है। रूस का भालू , अमेरिका का साँड , आस्ट्रेलिया का कंगारू तथा भारत का सिंह इसी भाव का प्रदर्शित करते हैं। तेजोवलय देवताओं के आभामंडल का सूचक है। जब कोई जाति किसी श्रेष्ठ प्रतीक को अपनाकर उसका दुरुपयोग या अत्याचार करती है तो वह प्रतीक उसके अत्याचार का द्योतक हो जाता है। हिटलर की क्रूरता ने हिन्दू संस्कृति के माँगलिक स्वस्तिक को कलंकित कर डाला। इसी तरह प्रेम -शौर्य का प्रतीक लाल ध्वज रूस में नास्तिकता तथा जड़ साम्यवाद के प्रतीक में परिवर्तित हो गया।

भारतीय संस्कृति में प्रतीक यथार्थ एवं वास्तविक हुआ करते थे। दृष्टा ऋषि अपनी अनुभूति एवं साक्षात्कार द्वारा आकाश में इन प्रतीकों को देखते थे, फिर इन्हें समाज में प्रसारित करते थे। अक्षर वर्ण रंग प्रकाश आदि लाक्षणिक प्रतीक उन्हीं की देन है। उपासना के लिए प्रयुक्त भिन्न देवी देवताओं के चित्र एवं मूर्तियों के पीछे यही तथ्य काम करता है। ऋषिगण स्थूल सीमाओं का अतिक्रमण कर गए थे तथा मन के उस पार भाव जगत् के सत्यों को उनके प्रतीकों से संबंधित करते थे। इस प्रकार जिस प्रतीक का जिस भाव से संबंध है। वह उसी भाव का नित्य प्रतीक है, क्योंकि मन में उस प्रतीक से वही भाव का नित्य प्रतीक है। नित्य प्रतीक कई प्रकार के होते हैं- चिह्न प्रतीक , शस्त्र प्रतीक, वृक्ष प्रतीक , वेश प्रतीक आदि।

चिह्न प्रतीक में तंत्र उपासना के यंत्र सामुद्रिक शास्त्र के त्रिभुज , चतुर्भुज अक्षर आदि आते हैं। ये प्रकृति के मूल अर्थ से संबंधित हैं। तंत्र में वज्र शक्ति को अभिव्यक्ति करता है।

भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक सर्वप्रधान चिह्न है। जिस प्रकार समस्त अक्षर अकार से उत्पन्न हुए है। उसी प्रकार सारी रेखाकृतियाँ स्वस्तिक के अंतर्गत आ जाती हैं। प्रणव ॐ की आकृति नाद रहित होने पर स्वस्तिक मानी जाती है। स्वस्तिक की संख्या में केंद्र के चारों ओर प्रगति , रक्षा और उन्मुक्त द्वार दिखलाई पड़ता है। यह कल्याण के अर्थ में प्रयुक्त होता है। स्वस्तिक बुद्धिदाता गणेश जी का यंत्र है। इस मंगल चिह्न को पारसियों ने उलटा कर अपस्तिक का प्रतीक माना। ईसाइयों का क्रास भी इसी का संक्षिप्त रूप है।

चिह्न प्रतीक की ही भाँति रंग प्रतीक का भी महत्वपूर्ण स्थान है। इसका प्रयोग मुख्यतः उपासना पद्धतियों में किया जाता है। सत, रज, तम - त्रिविध गुणों के आधार पर रंग। प्रतीक होते हैं। श्वेत रंग मतोगुणी है और यह प्रतिभा , यश शाँति सत्य व धर्म का प्रतीक है। लाल रंग रजोगुण का संकेत करता है। तमोगुण का सूचक काला रंग है, जो अभाव अंधकार , मृत्यु आदि का बोध कराता है। दो या दो से अधिक गुणों से मिलकर बने कार्य का रंग मिश्रित होता है। क्रोध में रजस एवं तमस् का मिश्रण होता है, परंतु इसमें रजोगुण का विशेष प्रभाव होता है। अतः इसका रंग कालिमा लिए हुए नीललोहित माना गया है। मुस्कान का प्रतीक हलका गुलाबी रंग माना गया है । श्री अरविंद के अनुसार रंग और प्रकाश हमेशा एक दूसरे के आस पास होते हैं । रंग अधिक साँकेतिक होता है और प्रकाश अधिक गतिशील । रंग उत्तप्त होकर प्रकाश बन जाता है। सत्ताओं के अलग रंग नहीं होते। मन का रंग पीला होता है तथा हृदय का गुलाबी एवं प्राण का साँकेतिक रंग बैंगनी होता है।

पदार्थ प्रतीकों में शंख मंगलकारी प्रतीक माना जाता है। यह पवित्रता का सूचक है। पदार्थ प्रतीक केवल भाव का मूर्त रूप है। समष्टि कर्त्ता के भाव ही पदार्थों में परिवर्तित हुए, जिनके प्रतीक भिन्न-भिन्न होते हैं। स्वर्ण दृढ़ता एवं स्थिरता का प्रतीक है। दूध उच्चतर चेतना के प्रवाह का प्रतीक है। नदी चेतना की गति का संकेत करती है। पर्वत आरोहण शील चेतना को दर्शाता है। पृथ्वी क्षमा का भाव दर्शाती हैं। प्राणी प्रतीकों में गाय, हंस अश्व आदि आते हैं। अध्यात्म जगत् में इनका विशेष महत्व है। साधक अपन गहन ध्यान में देखे गए इन प्रतीकों से अपनी स्थिति का आकलन करता है। वेदों में गाय का अर्थ है -दिव्य प्रकाश । वृषभ सामर्थ्य एवं धर्म का द्योतक है। अश्व एवं गज बल के द्योतक है। हंस ज्ञान के भाव को प्रदर्शित करता है।

नाग प्रकृति में ऊर्जा का प्रतीक है। अनंत नाग असीम दिक्−काल में निस्सीम ऊर्जा है, जो विश्व को थामे हुए है। हरिण आध्यात्मिक पथ में तीव्रता को सूचित करता है। हंस मुक्त अंतरात्मा है एवं पुरुष का प्रतीक है। सफेद कबूतर शाँति , मोर विजय सूचक सारस सुख का संदेशवाहक तथा शुतुरमुर्ग गति की तीव्रता के रूप में प्रयुक्त होते हैं। सुअर राजसिक सामर्थ्य और प्रचंडता की ओर संकेत करता है। भैंस अविचारी और अंधकारमय प्राणिक शक्तियों के स्वभाव का एवं स्वभाव की तामसिक उग्रता के भाव को सूचित करता है। बकरा कामुकता का द्योतक है। कुत्ता स्वामिभक्ति से भरे अनुराग और आज्ञाकारिता का प्रतीक है। मेढ़क विनम्रता , उपयोगिता तथा मछली हमेशा सभी प्रकार की रचनाएँ करने वाला चंचल प्राणिक मन है। मक्खियाँ क्षुद्रतम प्राण की कोई छोटी-सी वस्तु हैं। दीमक भौतिक सत्ता में क्षुद्र परंतु विनाशक शक्तियों का प्रतीक है।

पुष्प प्रतीकों में कमल ऐश्वर्य व सुख का सूचक हैं । यह खुली हुई चेतना की ओर इंगित करता है। लाल कमल प्रतीक है पृथ्वी पर भगवान् की उपस्थिति का। सामान्यतः कमल शृंगार , शोभा और क्रीड़ा के लिए बराबर प्रयुक्त होता रहता है। वृक्ष प्रतीकों में दूर्वा , कुश, तुलसी , अश्वत्व , वट, आँवला , पलाश , अशोक , बिल्व आदि वृक्षों को देवताओं के प्रतीकों के रूप में पूजा जाता है। वैसे वृक्ष अवचेतन प्राण को भी दर्शाता है। वृक्षों की तरह वाद्ययंत्र भी प्रतीक हैं। इनमें से शंख आध्यात्मिक पुकार तथा बाँसुरी भगवान् की पुकार है। शंख विजय की भी घोषणा है। वीणा सामंजस्य सूचक है। मृदंग नृत्य एवं डमरू उद्दाम नृत्य का प्रतीक है। भेरी युद्ध की ओर इशारा करती है। बाण लक्ष्य का संकेत करता है। गदा शक्ति , तलवार शस्त्रबल और त्रिशूल बेधन करने का सूचक है। ढाल का अर्थ है -संरक्षण। चक्र प्रकृति पर क्रिया करती हुई शक्ति है। सुदर्शनचक्र श्रीकृष्ण की शक्ति की क्रियाशीलता का द्योतक है।

शिखा, यज्ञोपवीत, मेखला, तिलक , माला , दंड, गेरुआ एवं पीत वस्त्र आदि वेश प्रतीक के अंतर्गत आते हैं। यज्ञोपवीत गायत्री की स्थूल प्रतीक है। उसकी तीन ग्रंथियाँ क्रमशः ब्रह्मग्रंथि एवं रुद्रग्रंथि का संकेत करती हैं। मेखला संयम का सूचक है। तिलक निष्ठा , शोभा शृंगार एवं विभूति को दर्शाता है। गैरिक वस्त्र वैराग्य के सूचक हैं। वासंती रंग मन की चंचलता एवं असंयम को दूर कर उल्लास का संचार करता है। दंड का अर्थ है- मन , वाणी तथा शरीर से उत्पीड़ित होने पर भी किसी को दंड न देना। इसीलिए संन्यासी दंड व्रतस्थ होने का परिचायक है।

इनके अलावा भी अन्य प्रतीक हैं। जिनका अर्थ भिन्न भिन्न होता है। सूर्य का अर्थ है - आँतरिक सत्य। चंद्रमा आध्यात्मिक आनंद का द्योतक है। तारे का तात्पर्य है- सृजन या निर्माण अथवा इसके लिए आश्वासन या सामर्थ्य। अग्नि शक्तिशाली क्रिया को सूचित करती है। इंद्रधनुष शाँति और मुक्ति का चिह्न है। बादल अंधकार का प्रतीक है -पाताल पृथ्वी के नीचे अचेतना को दर्शाता है। बरफ भगवान् की कृपा का अवतरण है, जो वैभव अर्थात् आध्यात्मिक समृद्धि का उद्गम है।

प्रतीकों का यह विज्ञान मानव मन के रहस्यों को ही नहीं ,समस्त सृष्टि में गतिशील चेतना के रहस्यों का भी बोध कराता है। प्रतीक विज्ञान की ही वजह से सागर जितने विशाल ज्ञान को गागर जितने लघु आकार में संजोया जा सका है। समुचित जानकारी के अभाव में प्रतीक विज्ञान का अधिकाँश रहस्यमय भाग विकृत होकर मात्र कल्पना बनकर रह गया है। आज जरूरत है - इस समृद्ध विज्ञान को फिर से उजागर करने की। इसके उजागर होने का मतलब है, जीवन के मनोवैज्ञानिक सच का सही अर्थों में बोध पाना।


Quotation

आदरपूर्वक जीने का तरीका यह है कि जैसा अपने को दिखाना चाहते हैं, वस्तुतः भीतर से भी वैसा ही बनें।


राजगुरु का पद (kahani)

सिकंदरिया का राजा टालेमी, यूक्लिड से ज्यामिती सीख रहा था, किंतु यह कठिन विद्या उसके पल्ले ही नहीं पड़ रही थी। एक दिन टालेमी अपना धैर्य खो बैठा। उसने अपने गुरु से पूछा -”क्या ज्यामिती सीखने का कोई सरल मार्ग नहीं हैं? यूक्लिड ने गंभीरता से कहा -राजन् ! आपके राज्य में जनसाधारण और अभिजात वर्ग के लिए कोई राजमार्ग नहीं है। “ बात टालेमी ज्यामिती सीखने के लिए कठोर परिश्रम करने लगा।

राजा ज्ञानी गुरु की तलाश में थे।कोई उपयुक्त गुरु न मिला, तो खोज के लिए एक घोषणा की गई। राजा जमीन मुफ्त देंगे, सबसे जल्दी और सबसे बड़ा महल बनाकर दिखाने वाले को राजगुरु माना जाएगा। इस प्रलोभन में अनेक संत आए। जमीन ली। चंदा किया और महल बनाने में जुट गए। राजा रोज प्रगति देखने जाया करते। निर्माणकार्य तेजी से चल रहा था। एक संत को दी गई जमीन पर यथास्थान प्रतिदिन बैठे रहते पाया। पूछा -”आप क्यों नहीं आश्रम बनाते? “ उन्होंने उत्तर दिया। “यह विराट् विश्व मेरा ही घर है। इससे बड़ा और क्या बनाऊँ? बनाने का उद्देश्य सँभालना -सजाना होता है, सो इस विश्व -वसुधा को ही सँभालने-सजाने में लगा रहता हूँ। नया बनाकर क्या करूं? “ राजा को तत्वज्ञान का मर्म समझ में आया। राजा ने उन्हीं को सच्चा ज्ञानी पाया और राजगुरु का पद प्रदान किया।


एक सद्गृहस्थ -सद्गुरु

उन दिनों हिमालय के रानीखेत अंचल में फौजी छावनी के निर्माण की बात चल रही थी। उसी सिलसिले में सामरिक आपूर्ति विभाग के एक युवा कर्मचारी को दानापुर से वहाँ भेजा गया था। वह आया और तंबू में रहने लगा। काम कुछ खास था नहीं। जो थोड़ा-बहुत था, उसे वह कुछ ही समय में निपटा लेता। बाकी समय में इधर उधर घूम लेता, कुलियों व अरदलियों से गप-शप कर लेता ।

उसे मालूम था कि हिमालय महज तपस्वी , सिद्ध महायोगियों की तपोभूमि है, किंतु अपनी गप-शप के दौरान जब उसे यह मालूम पड़ा कि यहाँ से 15 मील की दूरी पर स्थित द्रोणागिरि में आज भी अलौकिक शक्तिसंपन्न महायोगी निवास करते हैं तो उसका मन नाच उठा। द्रोणागिरि - पता नहीं इस नाम में क्या जादुई शक्ति थी, जो उसे बलात् खींचने लगी। अतः एक दिन सुबह होने से पहले ही वह निकल पड़ा।

रास्ता पहाड़ी था। पथ के दोनों ओर चीढ़ और देवदार के लंबे -लंबे पेड़ आकाश की ओर निहार रहे थे। सघनता का विस्तार लिए इस वन की अनुपम शोभा को निहारता हुआ चलते चलते वह यह भी भूल गया कि उसे वापस भी लौटना है। जब वह द्रोणागिरि के निकट पहुँचा तो सूर्यास्त होने वाला था। संध्या छटा सामने स्थित नंदादेवी के हिमशिखर पर छिटक कर एक अपूर्व दृश्य की सृष्टि कर रही थी। वह विस्मय विमूढ हो उसी ओर देखता रह गया।

अचानक उसके कानों में किसी के पुकारने की आवाज आई। “श्यामाचरण ! अरे ओ श्यामाचरण लाहिड़ी “यह तो कोई उसे ही आवाज दे रहा है। वह अचरज से चारों ओर देखने लगा।भला , इस बियाबान और अनजानी जगह में उसे पुकारने वाला कौन हो सकता है? यहाँ तो उसे कोई पहचानता भी नहीं है। सरकारी टेलीग्राम पाकर दानापुर से 500 मील दूर इस इलाके में आए हुए उसे अभी दो ही दिन तो हुए है। मन में भय जागा और कुतूहल भी। फिर भी अनायास ही उसके कदम बढ़ते ही पहाड़ी गुफा के द्वार पर उसने एक महायोगी को देखा। वे ही वहाँ खड़े हुए उसे पुकार रहे थे।

जैसे ही वह उनके निकट पहुँचा, महायोगी आनंद से पुलकित हो उठे और प्रेम भरे स्वर में कहने लगे - तुम आ गए श्यामाचरण ! आओ, बैठो, विश्राम करो। मैं तुम्हें ही बुला रहा था।

वह तो हैरान और हतप्रभ था। सोच ही नहीं पाया कि इन्हें क्या कहे। बस, एक शुष्क -सा प्रणाम कर वहीं पास में खड़ा हो गया, हालांकि उसके मन में प्रश्नों का ज्वार उठ रहा था। सबसे बड़ा सवाल तो यही था कि इन्हें उसका नाम कैसे मालूम हो गया? अपनी इसी उधेड़बुन में उसने आँख ऊपर उठाई तो देखा कि महायोगी उसकी ओर घनिष्ठ परिचित की भाँति देखते हुए मंद मंद मुस्करा रहे हैं।

मुस्कराते हुए वे कहने लगे - “बेटा ! तेरे विषय में मैं सब कुछ जानता हूँ। तेरा नाम श्यामाचरण है, तेरे पिता का नाम गौरमोहन है। तेरा घर कृष्णनगर के घुर्णी गाँव में है। बचपन में ही तेरी माँ मर गई थी। उसके बाद तुझे लेकर तेरे पिता काशी आ गए। अठारह वर्ष की उम्र में तेरा विवाह हो गया। तेईस वर्ष की उम्र में तुम इस नौकरी में आए। क्यों मैं ठीक कह रहा हूँ न?”

वह तो उनके इस विस्तृत ज्ञान पर हतप्रभ -सा रह गया। बोला -”आश्चर्य है, आपको यह सब कैसे ज्ञात हुआ?”

मुझे नहीं होगा तो और किसे ज्ञात होगा? इतने दिनों से मैं यहाँ तुम्हारी ही प्रतीक्षा में बैठा हूँ । अच्छा , जरा सोचकर बताओ पहल कभी यहाँ आए थे?”

श्यामाचरण ने उत्तर दिया -”नहीं तो , मैं तो यहाँ पहली बार ही आया हूँ।”

महायोगी खिलखिलाकर हँस पड़े। बोले -”अच्छा, मेरे साथ तुम इस गुफा में आओ।” उनका अनुसरण करता हुआ श्यामाचरण गुफा के अंदर गया। देखा, गुफा के एक कोने में एक निर्वापित धृन के समीप व्याघ्र चर्म और दंड-कमंडल पड़े है।

उन्होंने उन वस्तुओं को दिखाते हुए कहा-”ये सब चीजें तुम्हारी हैं। अब याद आया कुछ?” श्यामाचरण ने थोड़ा हैरान होते हुए कहा -”नहीं तो”

तब वे देवपुरुष उसके एकदम बगल में खड़े हो गए और उसकी रीढ़ की हड्डी को दबाया। दबाने के साथ ही “श्यामाचरण की विस्मृति का आवरण क्षणभर में छँट गया और वह अपना पूर्वजन्म स्पष्टतः देखने लगा। अरे हाँ ये सब वस्तुएँ तो मेरी हैं। यह व्याघ्र चर्म ,ये दंड-कमंडल ये , जो उसकी बगल में खड़े हैं , ये तो उसके पूर्वजन्म के गुरु हैं।

श्यामाचरण अश्रुपूरित नेत्रों एवं रोमाँचित देह लिए उनके पाँवों में लोट गया। उसे उठाते हुए उन देवपुरुष ने कहा- “श्यामाचरण अब तो तुम जान गए न कि तुम कौन हो? साधना के उच्च मार्ग में अवस्थान के समय ही तुमने अपना वह पूर्व शरीर छोड़ दिया था, परंतु ईश्वर की इच्छा है कि तुम संसार में कुछ करो, अतः तुम्हारी साधन-संपदा न्यास के रूप में मेरे पास रखी हुई है । तुम्हें फिर से साधनापथ में दीक्षित करने के लिए ही मैं यहाँ आया हूँ।”

श्यामाचरण ने पुनः उन देवपुरुष के पाँव पकड़ लिए। कहा-गुरुदेव अब मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा। मुझे अब अपन से अलग मत करिए प्रभु । “

वे देवपुरुष हँसने लगे, बोले -”अरे अभी तो तुम्हें संसार में लौटना है। तुम्हें संसार में योगसाधना का प्रचार करना है। थोड़े ही दिनों में तुम्हें दानापुर लौट जाना पड़ेगा। तुम दुःखी मत होओ। देखो , मैंने ही तुम्हें यहाँ बुलवाया है। तुम अपने साहब का टेलीग्राम पाकर यहाँ बुलवाया है। तुम अपने साहब का टेलीग्राम पाकर यहाँ जो आए हो, वह बड़े साहब की भूल के कारण और वह भूल उनसे मैंने ही करवाई थी। मत भूलो श्यामाचरण कि तुम आफिस के कारण यहाँ नहीं आए हो, बल्कि ऑफिस द्रोणागिरि के पास ले गया सवेरे वह अपना काम निपटाता आर दिन भर अपने गुरु के साथ रहता। गुरु जो खाने को देते, वही खा लता।

तीसरे दिन गुरु ने एक पात्र का अपने हाथ में लेकर देखा, उसमें तेल की तरह का कोई पदार्थ था। सोचा, शायद कोई भूल हो गई हो, अतः उसने गुरु की ओर देखा। गुरु ने कहा - “मेरा मुँह क्या देख रहे हो, सब पी लो।”

श्यामाचरण ने गुरु आज्ञा को शिरोधार्य कर उसे पी डाला।

तब गुरु ने अगला आदेश दिया- “अब जाओ और पास की नदी के किनारे पड़े रहो।”

श्यामाचरण पास की नदी के किनारे पहुँचा ही था कि उसे दस्त और वमन होने लगे। इतने दस्त और वमन हुए कि शरीर शिथिल हो गया। उठने की शक्ति तक न रही तो नदी के तट पर बाल व कंकड़ों पर ही पड़ा रहा।

यहाँ पड़े हुए उसके कितनी देर हो गई, कुछ भान ही न रहा। हठात् नदी में बाढ़ आई और उसे बहाकर ले जाने लगी। श्यामाचरण को कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि ऐसे में वह क्या करे? फिर भी अपने बचाव के लिए जल से जूझने लगा। जूझते-जूझते बुरी तरह से थक गया। शरीर में थोड़ी -सी भी ताकत न रही। तभी देखा कि नदी अचानक शाँत हो गई है और देह में एक नवीन स्फूर्ति का संचार हो गया है।

श्यामाचरण वहाँ से उठा और उन देवपुरुष के पा जाकर खड़ा हो गया। उसे देखते हुए उन्होंने कहा - “श्यामाचरण यह बहुत ही अच्छा हुआ कि देह की सारी मलिनता स्वच्छ हो गई। आज दिन भी अच्छा है। शाम को मैं पुनः इस जन्म की दीक्षा दूँगा।

शाम होते ही गुरु न उसे दीक्षा दी और योगसाधना की प्रक्रिया समझाई। वह उत्तम अधिकारी उचित सत्पात्र तो था ही , अतः सहज ही योग−साधना में गति होने लगी।

कुछ दिनों के पश्चात् गुरुदेव ने कहा -”श्यामाचरण अब तुम्हारे लौटने का समय हो गया है। आज से सातवें दिन टेलीग्राम आएगा और तुम्हें दानापुर लौट जाना पड़ेगा।

“गुरुदेव अब मैं कुछ और नहीं चाहता। मुझे आप अपने श्रीचरणों में ही रहने दें।” श्यामाचरण के स्वरों में गहरी विह्वलता थी।

“अरे , यह क्या कहते हो तुम? मैंने पहले ही कह दिया था कि तुम्हें योग साधना का प्रचार करना है। तुम गृहस्थ ही रहोगे, साधु नहीं बनोगे। यदि तुम साधु बन गए तो जो बहुत से व्यक्ति तुम से लाभान्वित होने वाले हैं, वे कैसे होंगे।

श्यामाचरण चिंता में पड़ गया। बोला-” अच्छा गुरुदेव तब एक वचन दें मैं जब भी आपका पुकारूं, आप आएँगे?” गुरुदेव ने कुछ सोचकर कहा -ठीक है।”

सातवें दिन टेलीग्राम आया और गुरु से विदा लेकर वह दानापुर के लिए रवाना हो गया। रास्ते में मुरादाबाद में ठहरा, क्योंकि उसे कुछ आत्मीयजनों में मिलना था।

बातों ही बातों में साधुओं की चर्चा चल निकली। वे सब के सब कहने लगे - “सच्चे साधु अब भला कहाँ है?”

श्यामाचरण ने उन सभी के कथन का प्रतिवाद किया-”हैं, अभी भी है और मैंने उन्हें देखा भी है।” इस के साथ उसने उन्हें अपनी कहानी सुना डाली।

वे कहने लगे - “जब तुमने उन्हें देखा है तो हमें भी दर्शन कराओ अन्यथा हम तो यही समझेंगे कि यह भी तुम्हारी कोई नई गप्प है।”

श्यामाचरण बड़े ही धर्मसंकट में पड़ गया। एक सामान्य सी बात पर अपने आराध्य गुरुदेव को बुलाना उचित नहीं था और यदि नहीं बुलाता है तो इन अविश्वासियों को विश्वास किस तरह दिला सकता है? अतः वह कमरे का द्वार बंद कर उन्हें बुलाने बैठ गया।

श्यामाचरण के बुलाते ही महागुरु सूक्ष्मशरीर से उस कमरे में आए और स्थूल शरीर धारण कर बगल में रखे आसन पर बैठ गए। कहने लगे- “श्यामाचरण तुम्हारे बुलाने पर मैं आ तो गया, किंतु क्या इस सामान्य -सी बात के लिए मुझे यहाँ बुलाना उचित है? जानते हो , मुझे कितनी दूर से यहाँ आना पड़ा है। क्या मैंने तमाशा दिखाने के लिए तुम्हारे भीतर शक्ति का संचारण किया है? योग विभूति का अधिकारी बनाया है?”

गुरुदेव की बात सुनकर वह भय एवं लज्जा से प्रकंपित हो उठा। उसके स्वर थम गए, कुछ बोल ही नहीं सका। गुरुदेव ने कहा - “सुनो श्यामाचरण अपने वचन एवं तुम्हारे सम्मान की रक्षा के लिए मैं आज यहाँ आ गया हूँ पर भविष्य में तुम्हारे बुलाने पर नहीं आऊँगा। जब समुचित आवश्यकता होगी, तब मैं स्वयं ही आ जाऊंगा।”

श्यामाचरण गुरुचरणों में गिरकर रोते हुए क्षमा माँगने लगा। बोला - गुरुदेव इस बार क्षमा कर दें। मैंने इन अविश्वासियों के मन में श्रद्धा उत्पन्न करने के लिए ही आपको बुलाया था। अब, जब आप आ ही गए हैं, तो इन्हें दर्शन दे दें।”

गुरु की सम्मति पाकर श्यामाचरण ने दरवाजा खोला, उसके आत्मीय मित्रों ने भी उन देवपुरुष की वंदना की और वे समझ गए कि यह कोई इंद्रजाल नहीं है। ऐसे विभूति संपन्न महापुरुष आज भी पृथ्वी पर विचरण करते हैं।

श्यामाचरण दानापुर आए और काम में जुट गए। दिन में काम और रात में योगसाधना। फलतः धीरे-धीरे एक के बाद एक उन्हें सभी शक्तियाँ प्राप्त होती गई। वे चेतना के शीर्षतम स्तर पर आरुढ हो गए। 1885 ई. में जब वे सरकारी नौकरी से मुक्त हुए, तोकाशी के बाबा व योगीराज के रूप में सर्वत्र प्रसिद्ध हो गए।उन्होंने बहुतों को दीक्षा दी। उनके अनेक गृहस्थ एवं साधु शिष्य हुए। इनके साधु-शिष्यों में स्वामी प्रणवानंद एवं मुक्तेश्वर गिरि का नाम उल्लेखनीय है, किन्तु स्वयं उन्होंने कभी भी संन्यास नहीं लिया। गुरु के आदेश का अक्षरशः पालन यही साधना का मूलमंत्र है। इसी को उन्होंने हमेशा -हमेशा अपनाया। यह मार्ग हमारे और आपके लिए भी है।


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ज्ञान वैभव और आनंद को बाँटो, वह अनेक गुना होकर वापस लौटेगा।


शक्तियों के सुयोजन का संकल्प (kahani)

अनावृष्टि से संकटग्रस्त जनता की सहायता के लिए छत्रपति शिवाजी एक बाँध बना रहे थे। मजूरी करके सहस्रों व्यक्ति उदरपोषण का आधार प्राप्त कर रहे थे।

शिवाजी ने एक दिन ये देखा तो गर्व से फूले नहीं समाये कि वे ही इतने लोगों को आजीविका दे रहे हैं। यदि व यह प्रयास न करते तो उतने लोगों को भूखा मरना पड़ता।

समर्थ गुरु रामदास उधर से निकले। शिवाजी ने उनका सम्मान -सत्कार किया और अपने उदार अनुदान की गाथा कह सुनाई।

समर्थ उस दिन तो चुप हो गए, पर जब दूसरे दिन चलने लगे तो शाँत भाव से एक पत्थर की ओर संकेत करके शिवाजी से कहा -”इस पत्थर को तुड़वा दो।”

पत्थर तोड़ा गया तो उस बीच एक गड्ढा निकला। उसमें पानी भरा था। एक मेंढकी कल्लोल कर रही थी।

समर्थ न शिवाजी से पूछा - “इस मेंढकी के लिए संभवतः तुमने ही पत्थर के भीतर यह जीवनरक्षा की व्यवस्था की होगी?”

शिवाजी का अहंकार चूर -चूर हो गया और वे समर्थ के चरणों पर गिर पड़े। समर्थ ने उन्हें अपनी भूमिका का बोध कराया और आततायियों से संघर्ष हेतु नीति बनाने कि लिए बाध्य किया। समर्थ गुरु रामदास का मार्गदर्शन एवं कृपा ही थी जिसने शिवाजी को समय समय पर सही सूत्र देकर आपत्ति से बचाया व श्रेयपथ पर अग्रसर किया।

चित्रगुप्त के यहाँ समाधान न हो पाने से समस्या धर्मराज के सामने लाई गई। एक संत अपने त्याग के बदले सद्गति चाहते थे। जबकि चित्रगुप्त के हिसाब में उन्हें केवल कुलीन कुल में जन्म देने की व्यवस्था थी। धर्मराज ने विवरणों का सर्वेक्षण किया और बोले -”संत जी, आपका यह कथन ठीक है कि आपने साँसारिक पद -प्रतिष्ठा का मोह नहीं किया आर समय एवं शक्ति उसमें नष्ट नहीं की। त्याग के इस साहस के पुण्य से आपका श्रेष्ठ कुल व सत्परिस्थितियाँ में जन्म मिलेगा। किंतु आपने त्याग के द्वारा बचाई ईश्वरीय विभूतियाँ का किसी ईश्वरीय विभूतियों को किसी ईश्वरीय उद्देश्य में लगाया नहीं , उन्हें सही दिशा में गति नहीं दी इसलिए आप सद्गति के अधिकारी नहीं बने।” संत का समाधान हो गया और अगले जीवन में त्याग के साथ शक्तियों के सुयोजन का संकल्प लेकर विदा हुए।


परोक्ष की सुनियोजित विधि - व्यवस्था का द्योतक है - संयोग

जीवन असंख्य घटनाओं की एक अंतहीन शृंखला है। इसमें यदा-कदा ऐसे घटनाक्रम भी आते हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से आपस में कोई संबंध न रखते हुए भी परस्पर अद्भुत समानता रखते हैं। इन्हें हम संयोग नाम देकर आश्चर्य व्यक्त करते हैं। इनमें किसी तरह की सारगर्भित कार्य कारण की शृंखला या युक्ति बद्धता स्पष्ट न होने के कारण इन्हें चमत्कार तक मान बैठते हैं, किंतु वास्तव में इस सृष्टि में संयोग या चमत्कार नाम की कोई चीज नहीं है, भले ही हम अपनी स्थूल दृष्टि से इसकी अगम गहराइयों में न झाँक सके।

ये संयोग सदियों से मनुष्य के लिए रहस्य एवं रोमाँच के विषय रहे हैं। कई शताब्दियों तक इन्हें मानव के, सृष्टि एवं प्रकृति के साथ निगूढ़ संबंधों के प्रतीक के रूप में माना जाता रहा, किंतु 17 वीं सदी में न्यूटन, कैप्लर व गैलीलियो की वैज्ञानिक खोजों के साथ मनुष्य एवं प्रकृति संबंधी जो याँत्रिक दृष्टिकोण पनपा, उसमें खंड खंड विश्लेषण को प्रधानता दी गई, परंतु यह प्रक्रिया अपने स्थूल दृष्टिकोण के कारण संयोगों में छिपे सत्य को समझने में सर्वथा असमर्थ थी। 20 वीं सदी में अनिश्चितता से सिद्धान्त के साथ संयोगों में निहित गूढ़ अर्थपूर्णता की धारणा को एक और धक्का लगा, जिसने आश्चर्यजनक संयोगों को भी गणितीय सूत्रों में बाँधकर उन्हें स्थूल रूप देने का प्रयास किया।

20 वीं सदी में ही प्रख्यात मनोवैज्ञानिक कार्लजुँग एवं भौतिकशास्त्री वुल्फ गौगे ने संयोगों में विद्यमान अर्थपूर्ण गुणवत्ता एवं इनके गूढ़ मनोवैज्ञानिक सत्य पर प्रकाश डाला। कार्लजुँग ने इसे सिंक्रोनिसिटी अर्थात् समकालिकता या समक्रमिकता का नाम दिया। उनके अनुसार समकालिक घटनाएँ कुछ अर्थपूर्ण होती है और कुछ नहीं भी। इनमें अर्थपूर्ण संयोग न केवल अचेतन मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया से जुड़े होते हैं, बल्कि ब्रह्माँडीय मन से भी जुड़े होते हैं अर्थात् संयोग रूप से प्रकट होने वाली दृश्यमान घटनाओं के पीछे गूढ़ मनोवैज्ञानिक सत्य सक्रिय होते हैं। स्वयं कार्लजुँग ऐसी अनेक घटनाओं के साक्षी रहा है। एक बार जुग किसी रोगी को मिस्र के सक्रैव कीट के प्रतीक का अर्थ समझा रहे थे। यह कीट उस रोगी के स्वप्न में बराबर आता रहता था। ठीक उसी समय उसी तरह का एक चमकीला कीट उड़ते हुए उस कमरे में आ गया था।

ऐसा ही संयोग अभिनेता एंथोनी हापकिंस के साथ घटा - जब वे वर्ष 1973 में अपनी फिल्म “द गर्ल फ्राँम पेट्रोबका” के संदर्भ में विएना जा रहे थे। यह फिल्म जॉर्ज फेफर की पुस्तक पर आधारित थी। दुर्भाग्य से पार्श्व टिप्पणियों से युक्त मूल प्रति दो वर्ष पूर्व इंग्लैण्ड में चोरी हो गई थी, अतः फिल्म के उपयुक्त महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ को पुनः तैयार किया जाता था। फिल्म साइन करने के बाद हापकिंस पुस्तक की एक प्रति के लिए लंदन रवाना हो गए, किंतु कहीं भी पुस्तक उपलब्ध न हो सकी, अतः निराश होकर हापकिंस अपने घर की ओर चल पड़े। तभी अचानक अपनी सीट के किनारे उन्हें एक खुला पार्सल दिखा जिसमें वही मूल प्रति थी जो दो वर्ष पूर्व चोरी हो गई थी। इस संयोग को हापकिंस ने अचेतन मन द्वारा वातावरण पर प्रभाव की परिणति माना।

लिविंग विद द किमालयन मार्स्टस में स्वामी राम से संबंधित एक रोचक संस्मरण का प्रस्तुतीकरण है। वर्ष 1955 में एक जर्मन मनोचिकित्सक को स्वप्न में एक भारतीय योगी के दर्शन हुए, जो उन्हें भारत बुला रहे थे। एक सप्ताह के अंदर ही मनोचिकित्सक उस योगी की खोज में घर से निकल पड़े । फ्रेककर्ट हवाई अड्डे पर टिकट छूट गया। जब नींद खुली तो उन्हें स्वामी राम के दर्शन हुए जो जर्मनी में पाश्चात्य मनोविज्ञान के अध्ययन हेतु आए हुए थे। दोनों के बीच परिचय होने के बाद डॉक्टर ने स्वामी राम से अपने स्वप्न की चर्चा की। इसी के साथ उसने स्वप्न में देखे गए उस योगी का चित्र भी बनाकर दिखाया जिसे देखते ही स्वामी राम तत्काल पहचान गए। यह चित्र उनके गुरु का था। इस तरह यह संयोगपूर्ण मिलन दोनों के लिए ही फलदायी रहा। उक्त जर्मन डॉक्टर ने स्वामी राम को पश्चिमी मनोविज्ञान संबंधी अध्ययन हेतु कई विश्वविद्यालय में घुमाया और स्वामी राम ने उसे अपने गुरु से भी मिलवाया।

अगस्त 1997 में काफी चर्चित हुई वेल्स की राजकुमारी डायना की कार-दुर्घटना भी काफी संयोगों से जुड़ी हुई है। मानो, घटना का ताना बाना सूक्ष्मजगत् में काफी पहले से ही बुना जा चुका हो। दुर्घटना के समय ही एक फिल्म डायना एण्डी निकलने ही वाली थी, उसमें उसका एक सनकी चाहने वाला पापराजियो से मिलकर डायना के पीछे पड़ा हुआ था। वास्तव में डायना की मृत्यु पापराजियो से भागते हुए ही हुई थी। इस तरह डायना पर लिखी गई पुस्तक रायल वर्ल्ड प्रकाशित होने पर रोक लगा दी गई थी क्योंकि इस पुस्तक में एक मुस्लिम से शादी के विरोध में दक्षिणपंथी उग्रवादी डायना की हत्या की योजना बना रहे थे। कार दुर्घटना में मृत्यु के समय डायना के साथ उसका अंतरंग मित्र डोडी अल्फेयड था, जो कि मिश्र के अरबपति मुहम्मद अल्फेयड नामक एक मुस्लिम का बेटा था।

चर्चित पुस्तक नोट्स फ्रॉम स्मॉल आइसलैंड के लेखक विल्ली ब्रायसन 1980 में स्वतंत्र लेखन कर रहे थे। कोइंसिडेंस विषय पर पर्याप्त वैज्ञानिक एवं तथ्यपूर्ण सामग्री एकत्रित होने के बावजूद लेख के लिए उपयुक्त उदाहरणों का अभाव था। उन्हें इस लेख को एक दिन के अंदर ही द टाइम पत्रिका के पास भिजवाना था। अतः ब्रायसन के मस्तिष्क में लेख के लिए उदाहरण सामग्री की खोज का विचार हावी रहा। उसी दिन जब ब्रायसन द टाइम के ऑफिस में किसी काम से जा रहे थे, तो फिफ्ट में उनके सहयोगी के हाथ में रिमार्केबल टू कोइसिडेंस पुस्तक दिखी जो समीक्षा के लिए जा रही थी। बस, ब्रायसन को अपने लेख के लिए आवश्यक सामग्री का स्त्रोत संयोगवश मिल गया था।

संयोगों का अंकों से भी गहरा रिश्ता रहा है। कीरो की अंक विज्ञान की पुस्तक में इस संदर्भ में रोक उदाहरण मिलता है। प्रख्यात ब्रिटिश कलाकार सर अल्मा टडेमा के अनुसार उसका महत्वपूर्ण अंक 17 था। 17 वर्ष की आयु में उसका होने वाली पत्नी से प्रथम मिलन हुआ। पहले घर का अंक भी 17 था। 17 अगस्त को ही उसने नवनिर्माण का काम शुरू हुआ। 17 नवंबर को उन्होंने इसमें प्रवेश किया। टडेमा की दूसरी शादी 1871 में हुई थी। दूसरा घर भी 17 अंक का था। सर टडेमा का जन्म आठ जनवरी को हुआ था, जो कि संयुक्त अंक 17 के ही योगफल वाला एकल अंक है। ऐसे ही सम्राट् एडवर्ड-सप्तम का जन्म 9 नवंबर को हुआ था। यह माह मंगल का दूसरा घर भी है, जिसका अंक 9 है। एडवर्ड की शादी 1863 को हुई थी, जिसका योग 9 बनता है। 27 जून को उनका राज्याभिषेक होना था, जिसका योग भी 9 है परंतु यह वास्तव में 9 अगस्त को हुआ।

दो व्यक्तियों के बीच अंकों के संयोग का सबसे रोचक उदाहरण फ्राँस के सम्राट् सेंटलुइस और लुइस - 16 वें का है, जिनके जीवन की अद्भुत साम्यता भरी घटनाओं से बीच 539 अंक का अंतर था , मानो इतिहास स्वयं को दुहरा रहा हो। संटलुइस का जन्म 23 अप्रैल 1215 को हुआ था और लुइस -16 वें का जन्म 23 अगस्त 1754 (1215 + 539) को हुआ था। सेंटलुइस की बहन इजावेल का जन्म 1225 का हुआ था जबकि लुइस 16 वें की बहन लिजाबेथ का जन्म 1764 (1225+ 539) का हुआ था। सेंटलुइस के पिता की मृत्यु 1226 को हुई थी, लुइस 16 वें के पिता मृत्यु 1765 (1226+ 539) सेंटलुईस की शादी 1231 में हुई थी, जबकि लुइस -16 वें की शादी 1770 (1231+ 539) को हुई थी।

सेंटलुइस ने हेनरी -3 के साथ शाँति समझौता 1243 में किया था, जबकि लुइस 16 ने जॉर्ज तृतीय के साथ शाँति समझौता 1782 (1243+ 539)में किया था। एक पूर्वी राजकुमार ने ईसाई धर्म अपनाने के उद्देश्य के लिए अपना दूत लुइस 16 के पास 1788 (1241+ 539) को भेजा। सेंटलुइस 16 को 1789 (1250+ 539) में सत्ताच्युत किया गया। सेंटलुइस की माँ रानी ब्लाँचे का निधन 1253 में और लुइस 16 की माँ हृइट लिली की मृत्यु 1792 (1253+ 539) में हुई। सेंटलुइस द्वारा जेकाँबिन बनने की इच्छा 1254 में वलुइस 16 द्वारा जेकाँबिन के हाथों जीवन का अंत 1793 (1254+ 539) में हुआ। इन दोनों का ही जन्म क्रमशः 23 अप्रैल व 23 अगस्त को हुआ था, जिनका एकल योगाँक 5 बनता है और अंक 5 फ्राँस की नियति से जुड़ा हुआ महत्वपूर्ण अंक रहा है।

द सेलेस्टाइनन प्रोफेसी के लेखक जेम्स टेडफील्ड संयोगों के संदर्भ में अनिश्चितता के सिद्धान्त को नकारते हुए कहते हैं कि जीवन का एक दूसरा पक्ष भी है, जिसमें दृश्य के पीछे अदृश्य शक्तियाँ सक्रिय हैं। आज जीवन की अर्थपूर्ण खोज में चेतना के नए-नए रहस्य खुल रहे हैं। अधिकाधिक लोग संयोगों में निहित गूढ़ रहस्य खुल रहे है। अधिकाधिक लोग संयोगों में निहित गूढ़ सत्य को जीवन की महत्वपूर्ण शक्ति मान रहे है। सृजान वैनफेल नामक महिला अपने जीवन को संयोगों से इतना भरा हुआ मानती है कि मानो वह एक पूर्व लिखित नाटक की पात्र भर हो। उसकी माँ का नाम शिर्ली डेविस है। दोनों के चार चार बच्चे हैं, जिनमें दो लड़के व दो लड़कियाँ हैं। शिर्ली दो बार तलाक के बाद तीसरी शादी कर चुकी है। सुजान के भी दो तलाक हो चुके हैं और उसे लगता है कि समक्रमिकता के अनुरूप उसकी भी तीसरी शादी भाग्य में है। दोनों के जीवन में 10 अंक का विशेष महत्व है। शादी की तारीख भी क्रमशः 16 मार्च 1613 एवं 22 जून 2216 हुई, जिस जोड़कर 10 अंक बनता है। शादी से पूर्व वह 1027 नंबर घर में रहती थी। इसी तरह बैंक व अन्य खात अपन जोड़कर 10 अंक पर जा टिकते हैं। इस सबको देखते हुए सुजान के अनुसार जीवन की घटनाओं में एक स्वाभाविक लयबद्धता है। जिसका निर्देशन कहीं परदे के पीछे चल रहा है।

एक्स्ट्रार्डिनरी कोइंसिडेंस में मनीषी एलीन ग्रीनवुड ने दो ऐसे व्यक्तियों का उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो दोनों पेशे से कसाई थे। एक का नाम फ्रेडरिक हेनरी बटलर था । दोनों का जन्म 1 अप्रैल 1930 को हुआ था व दोनों की ही मृत्यु पिस्तौल की गोली लगने पर हुई। इन दोनों में परस्पर किसी तरह का कोई संबंध नहीं था। ये दोनों ही कार के किनारे पड़े हुए मिले थे। इस संयोग के पात्रों का नाम सुनते ही एलीन की स्मृति कौंध उठती है और वे एक अन्य संयोग को इससे जुड़ा देखते हैं। 1 अप्रैल 1930 को ही उनकी पड़ोसिन बटलर का जन्म हुआ था। उसका दूसरा पति फ्रेडरिक था व भाई हेनरी उसका एकमात्र पुत्र डेविड था। उसका पहला पति कार के किनारे गोली से मरा पाया गया।

संयोगों को अतींद्रिय क्षमता एवं पराभौतिकी से संबंधित बताने का साहसिक प्रयास विख्यात शोध विज्ञानी आर्थर कोस्लर द्वारा किया गया है। उसके अनुसार कोई आधार भूत सिद्धाँत इन तीनों को ही जोड़ता है, जिसको समझाने का प्रयास उन्होंने अपने ग्रंथ द रुटस ऑफ काइंसिडेंस में किया है, जिसे वे अंधेरे कमरे में एक कदम से अधिक नहीं मानते क्योंकि संयोगों में निहित सत्य चेतना की गहराइयों में जन्म लेता है। यहाँ तक तर्कबुद्धि की पहुँच नहीं है। मात्र अंतर्दृष्टि संपन्न व्यक्ति ही इस सत्य की झलक पा सकते हैं। अपने व्यावहारिक सुझाव देते हुए व कहते हैं कि हमारी क्रियाएँ तर्क की बजाय भावनाओं पर आधारित होनी चाहिए। यदि अचानक कुछ करने की इच्छा हो तो उसे अवश्य करो, हाँ ध्यान रहे कि वह अमर्यादित एवं अवाँछनीय न हो। इस तरह शायद जीवन की गहराइयों में निहित कोई गूढ़ सत्य तरंगित हो उठे।

“द कोइंसिडेंस “ फाइल की लेखिका केन एंडरसन के अनुसार हम स्वजागरुकता द्वारा जीवन में घटित होने वाले संयोगों के संदर्भ में विज्ञ हो सकते हैं। इसके लिए वह नियमित डायरी लेखन का सुझाव देती है।यह कार्य समय साध्य एवं श्रमसाध्य अवश्य है, किंतु इस प्रक्रिया द्वारा व्यवस्थित रूप से संचित अनुभव जीवन के प्रति एक गहन अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। संयोगों के आध्यात्मिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए । “वर्ल्ड पीस प्रेयर सोसाइटी” के अध्यक्ष “मसामी साओनजी” अंतर्दृष्टि के विकास पर बल देते हैं जो कि बिना किसी तर्क का प्रयोग किए सीधे सत्य का बोध कराने में सक्षम होती है। इसके विकास के संदर्भ में सुझाव देते हुए उनका कहना है कि मन को हमेशा हमें अपने सत्यस्वरूप (आत्मा) में केंद्रित करने पर जब चित्त शुद्ध होने लगता है तो विचार सीधे अस्तित्व की गहराइयों से उभरते हैं व जीवन अर्थपूर्ण संयोगों से भरने लगता है, मानों कोई अदृश्य शक्ति नीरस एवं बोझिल जीवन में नूतन रंग भर रही हो। तब संयोगपूर्ण घटनाएँ कोई आश्चर्यजनक चमत्कार नहीं लगतीं, बल्कि सूक्ष्म व्यवस्था की सुनियोजित कार्य-कारण शृंखला का अभिन्न अंग प्रतीत होती हैं।


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जो देखे हुए पड़ोसियों से प्यार नहीं कर सकता , वह अनदेखे ईश्वर से क्या प्यार करेगा?


यश और सुख (kahani)

एक भला खरगोश था। सभी पशुओं की सहायता करता और मीठा बोलता था। जंगल के सभी जानवर उसके मित्र हो गए। एक बार खरगोश बीमार पड़ा । उसने आड़े समय के लिए कुछ चारा-दाना अपनी झाड़ी में जमा कर रखा था। सहानुभूति प्रदर्शन के लिए जिसने सुना वही दौड़ा आया। और आते ही संचित चारे दाने में मुँह मारना शुरू किया। एक ही दिन में उस सबका सफाया हो गया। खरगोश अच्छा तो होने लगा पर कमजोरी में चारा ढूंढ़ने के लिए जा न सका और भूखों मर गया। उथली मित्रता और कुपात्री की सहानुभूति सदा हानिकारक ही सिद्ध होती है। दुर्घटना का समाचार सुनकर दौड़े आने वाले सहानुभूति प्रदर्शनकर्त्ता प्रायः यही करते हैं। सच्चे मित्र थोड़े ही हो पर भले हों , वक्त पर काम आ सकें।

एक बार एक अमीर के लड़के ने समीपवर्ती गाँव के गरीब आदमी की सुँदर लड़की से ब्याह करने का प्रस्ताव भेजा। गरीब ने पूछा - “लड़का क्या करता है?” उत्तर मिला - बाप की प्रचुर संपदा को बैठा बैठा खाता है। बेटी वाल ने विवाह से इनकार कर दिया। जो हाथ से कमाई नहीं कर सकता, उसे बेटी नहीं दूँगा। उसका भविष्य अंधकारमय है।

लड़के को बात चुभ गई। उसने दूसरे दिन से ही कृषि -व्यापार करना और अपने हाथ से सँभालना आरंभ कर दिया तो उसकी स्वस्थता और बुद्धिमत्ता बढ़ गई।

बेटी वाले ने आग्रहपूर्वक विवाह का प्रस्ताव भेजा और शादी हो गई। बेटी भी श्रमजीवी परिवार से आई थी, तो उसने भी पति के कार्यों में कंधा लगाया और वे लोग स्वावलंबनपूर्वक संपन्नता प्राप्त करने का यश और सुख कमाने लगे।


विश्वास करें, न करें भूत-प्रेत होते तो हैं ।

सुनकर हम हैरान और चकित भले ही हो जाएँ , पर भूत तो होते हैं। इस शरीर के मृत हो जाने, नष्ट को जाने के बावजूद भी अस्तित्व समाप्त नहीं होता। चेतना किसी-न-किसी रूप में अपना परिचय कराती रहती है। लाइट पत्रिका के संपादक जॉर्ज लेघम ने -मैं परलावादी क्यों हूँ? शीर्षक से एक धारावाहिक लेखमाला प्रकाशित की थी। अपनी इस लेखमाला में एक स्थान पर उन्होंने लिखा था कि उनका पुत्र जॉनी महायुद्ध में मारा गया था। तोप के गोले से उसके टुकड़े टुकड़े उड़ अंतराल तक अपने पिता से संपर्क बनाए रखा। इस समय का उल्लेख करते हुए लेघम के शब्द हैं - “मेरा पुत्र जॉनी स्वर्गीय माना जाता है, परंतु मेरे लिए वह अभी भी उसी प्रकार जीवित है, जैसे वह किसी अन्य शहर में रहता हो और बराबर अपने संदेश देता रहता हो।”

सन् 1868 ई. में लंदन में एक विशेष समारोह के अवसर पर डी.डी.होम नामक व्यक्ति अचानक ही कमरे के फर्श से उठकर छत पर जा लगे। उसके बाद वे उड़ते हुए तीसरी मंजिल की खिड़की से बाहर निकल गए और बीच हवा में उड़ते हुए दूसरी खिड़की से अंदर आ गए। उनके इस अनोखे कारनामे को देखकर वहाँ उपस्थित सभी विशिष्ट लोग आश्चर्यचकित रह गए थे। वैज्ञानिकों के लिए यह अत्यंत अविश्वसनीय एवं अलौकिक चमत्कार था। जिन वैज्ञानिकों न इस विलक्षण दृश्य को देखा था, उनमें से एक थे के टी. किंग और दूसरे थे विलियम क्रुक्स । इन दोनों महानुभावों के घर में प्रेतात्माओं ने आविर्भूत होकर जो उत्पात मचाया, उससे विवश होकर उन्हें भी एक स्वर से मरने के बाद भी जीवन के अस्तित्व को स्वीकारना पड़ा।

कुछ ऐसी ही घटना 22 जून 1893 ई. को घटी । वाइस एडमिरल सर जॉर्ज टाइरन की पत्नी लेडी टाइरन न अपने सगे-संबंधियों एवं मित्रों को चाय पर बुलाया। सभी मेहमान खाने-पीने में मग्न थे कि अकस्मात् ऊपरी मंजिल की सीढ़ियों परखटपट की आवाज आई और कुछ सेकेंड बाद लेडी टाइरन ने देखा कि उनके पति सर जॉर्ज नेवी की यूनीफार्म पहने मुस्कराते हुए नीचे आ रहे हैं। लेडी साहिबा की तो चीखें निकल गई और मेहमान भी विस्मय-विमूढ़ होकर रह गए। क्योंकि उस समय सर जार्ज लंदन से मीलों दूर टिरोपोली के समुद्र तटों के पास अपने समुद्री जहाज विक्टोरिया में थे। सर जॉर्ज अपने घर में कुछ सैंकड़ों तक नजर आए और फिर लोप हो गए। कुछ दिन पश्चात् पता चला कि उसी समय विक्टोरिया दुर्घटनाग्रस्त हुआ था और सर जॉर्ज दूसरे संसार में जाने से पूर्व अपनी पत्नी से मिलने के लिए आए थे।

वर्ष 1964 ई. में इंग्लैंड की संसेक्स नामक जगह में कई ड्राइवरों ने रात के समय एक भूरे बालों वाली लड़की को देखा । उस लड़की को देखकर बहुत से ड्राइवर भयभीत हो गए, क्योंकि लड़की कुछ क्षणों तक नजर आने के बाद गायब हो जाती थी। यह क्रम वर्षों चलता रहा। 1962 तक बहुत सारे लोगों ने उसका पीछा करना चाहा, उसे पकड़ना चाहा, पर हर बार वे असफल हो जाते। बाद में काफी छान बीन करने पर पता चला कि काफी समय पूर्व एक दुर्घटना में एक भूरे बालों वाली लड़की मर गई थी। यह भूत उसी लड़की का था। लड़की दुर्घटना में एक भूरे बालों वाली लड़की मर गई थी, यह भूत उसी लड़की का था। लड़की दुर्घटना के समय पीले रंग की बरसाती पहने हुए थी। यह भूत भी उसकी अंदाज में नजर आता था।

लगभग इसी तरह नोटिंधम मध्य इंग्लैण्ड में रहने वाले एक परिवार के कई सदस्यों ने 1970 ई. में अपने घर में यूनीफार्म पहने हुए एक व्यक्ति को देखा । यह व्यक्ति अचानक प्रकट होता और अचानक ही गायब हो जाता।परिवार के सभी सदस्य उसे देखकर भयभीत हो जाते थे। कभी कभार वह नजर न आता, तो विचित्र -विचित्र आवाजें सुनाई देने लगती। उन लोगों ने परामनोविज्ञान के एक विशेषज्ञ से संपर्क कायम किया। उसने लगातार के अन्वेषण -अनुसंधान के बाद बताया कि नजर आने वाला व्यक्ति एक भूत है और यह भूत उस व्यक्ति का है, जो बहुत पहले सीढ़ियों से गिरकर अपंग हो गया था और बाद में उसने आत्महत्या कर ली थी।

सुविख्यात अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहमलिंकन के बारे में भी अनेकों रहस्यपूर्ण घटनाएँ सौ वर्षों से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी प्रचलित हैं। लिंकन को वाशिंगटन के एक थियेटर में अप्रैल 1865 में गोली मार दी गई थी। लिंकन का ताबूत एक विशेष गाड़ी में रखकर दफन करने के लिए ले जाया गया। यह गाड़ी हर स्टेशन पर आठ मिनट के लिए रुकती थी और लोग पंक्तिबद्ध हो अपने प्रिय नेता का अंतिम दर्शन करते थे। कुछ दिनों के बाद एक विचित्र घटना घटित हुई। रात को एक गाड़ी विभिन्न स्टेशनों से गुजरती और हर स्टेशन पर आठ मिनट के लिए रुक जाया करती थी।

इसके बाद यह भी देखा गया कि व्हाइट हाउस के उस कमरे में साए, जो कभी लिंकन का विभिन्न कमरों में और हॉल में स्वयं चलते फिरते देखा है। एक अन्य अमेरिकी राष्ट्रपति आइजन हावर का कहना था कि उन्होंने कईबार लिंकन की मौजूदगी का अहसास किया है। इसी प्रकार व्हाइट हाउस की एक स्टाफ ऑफिसर मेरी एवन को एक रोज महसूस हुआ कि दूसरी मंजिल पर स्थित शयन कक्ष में कोई व्यक्ति मौजूद हैं वह वहाँ पहुँची तो देखा कि एक व्यक्ति बिस्तर पर बैठकर जूते उतार रहा हैं उस व्यक्ति के चेहरे पर नजर पड़ते ही मेरी पर जड़ता छा गई। वह व्यक्ति अब्राहम लिंकन थे।

हॉलैंड की महारानी जब अमेरिका आई तो विशिष्ट अतिथि होने के नाते उन्हें व्हाइट हाउस में ठहराया गया। बहुत रात गए उनके कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई। सम्राज्ञी विल्हमिना ने दरवाजा खोला तो उन्होंने अपने सामने लिंकन को स्पष्ट खड़े हुए देखा। डरकर उन्होंने फौरन दरवाजा बंद कर लिया। और सवेरे अपने मेजबान राष्ट्रपति रुजवेल्ट का सारी घटना बताई। इस पर रुजवेल्ट ने बताया कि लिंकन के भूत के कारण ही श्रीमती रुजवेल्ट को अपना शयनकक्ष बदलना पड़ा, क्योंकि वहाँ पर लिंकन महाशय अक्सर आ पधारते थे।

इसी तरह की एक घटना और भी है। टेलीविजन के सुप्रसिद्ध धारावाहिक कोजेक ने अपने समय में दुनिया भर में काफी धूम मचाई है। लंबे कद और गंजे सिर के अभिनेता मि. टेलीसेवालास न अपने इस अभिनय से काफी ख्याति भी अर्जित की। उनकी जिंदगी में एक ऐसी घटना घटी जिसे याद करके उनके रोंगटे आज भी खड़े हो जाते। हुआ यूँ कि वह रात को तीन बजे न्यूयार्क आ रहे थे। हाई-वे पर उन्हें अनुमान हुआ कि उनकी कार में ईंधन खत्म हो चुका है। निकट ही स्थित कॉफी हाउस के पास उन्होंने गाड़ी पार्क की। वह अंदर गए और पहले तो गरम-गरम कॉफी पीकर सरदी के प्रभाव को कम करने का प्रयत्न किया, फिर निकटवर्ती गैस स्टेशन का पता मालूम करके पैदल ही उस ओर चल पड़े। अभी वह थोड़ी ही दूर गए थे कि उनके निकट काली कैडलिक कार आकर रुकी। कार में सवार व्यक्ति ने उन्हें लिफ्ट की पेशकश की, जिसे मि. टेलीसेवालास ने स्वीकार कर लिया। कार में बैठने के बाद उन्हें अंदाजा हुआ कि उनका बटुआ कहीं गिर गया है, जिसमें रुपये थे।

इस कहानी का आशय समझाते हुए ऋषि ने कहा - परलोक ही वह द्वीप है, जहाँ हर किसी को जाना पड़ता है। वहाँ सुविधा उत्पन्न करने वाला परमार्थ कमाया जाता रहे, तो जीवन के उपराँत भी सुख शांति की कोई कमी न रहे।

उनकी परेशानी भाँपकर कार वाले ने उनको एक डॉलर दिया, जिसे उन्होंने इस शर्त के साथ लिया कि वह पहली फुरसत में उसे वापस कर देंगे। फिर उन्होंने उस आदमी से एक कागज पर उसके घर का पता और नाम लिखवा लिया। उस आदमी का नाम हैरी एंगास था। अगले दिन मि. टेली सेवालास ने उस आदमी के घर फोन किया। एक महिला ने फोन रिसीव किया और बताया कि हैरी एंगास उसके पति का नाम है जिनका तीन वर्ष पूर्व देहाँत हो चुका है। यह सुनकर मि. टेलीसेवालास विस्मय में पड़ गए। वे सोचने लगे, यदि यह व्यक्ति मर चुका है तो फिर वह कौन था, जिसने पिछली रात उनको कागज पर अपना नाम व पता लिखकर दिया था। वह उस महिला से मिलने स्वयं गए औरउस व्यक्ति की लिखावट उसे दिखाई। महिला ने स्वीकार किया कि यह लिखावट उसके स्वर्गीय पति की है फिर उन्होंने उस महिला से उस व्यक्ति के लिबास के बारे में बताया, तो वह बोली-हाँ इन्हीं कपड़ों में उन्हें दफन किया गया था। हैरत में पड़ते हुए उन्होंने कहा-मैंने अपनी जिंदगी में बड़े बड़े केस निपटाए, पर यह केस शायद कभी न सुलझेगा।

ब्रिटिश सेना के एक अधिकारी जेराल्ड पोलर ने अपने अनुभव के आधार पर यह आत्मस्वीकृति दी कि दूसरे महायुद्ध के दौरान एक भूत ने उनका जीवन बचाया। उन दिनों वह बर्मा के युद्ध क्षेत्रों में एक मोरचे पर थे। मोरचे पर जापानी तोपखाना बुरी तरह गोलाबारी कर रहा था। पोलर ने चाहा कि कुछ पल विश्राम कर ले। सहसा उसे महसूस हुआ कि उसके निकट कोई मौजूद हैं उसने गरदन घुमाकर देखा तो एक सिख सिपाही खड़ा था। उसने पोलर से कहा कि कैप्टन उससे मिलना चाहिये हैं वह तत्काल सिग्नल ऑफिस पहुँचा। वहाँ पहुंचकर उसने देखा कि उसे किसी ने नहीं बुलाया था। वह विस्मय की अवस्था में अपने मोरचे पर वापस पहुँचा । वहाँ पहुँचकर देखा कि गोलों के फटने से हर चीज तहस-नहस हो चुकी हैं पोलर ने बाद में कहा-विस्मयकारी बात यह थी कि हमारे हेडक्वार्टर में कोई सिख सिपाही नहीं था।

एक अन्य घटना 2 मार्च 1948 ई. को घटी। इसमें लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर एक डी.सी.थ्री वायुयान तबाह हो गया। इस दुर्घटना में 22 यात्री मारे गए, जिनमें अधिकतर व्यापारी लोग थे। इसके पश्चात् कई बार लोगों ने वहाँ एक आदमी का देखा , जो रनवे पर खड़ा नोट गिन रहा होता। जब वह उसके पास जाते तो वह एकदम लोप हो जाता। बाद में खोजबीन करने पर ज्ञात हुआ कि यह एक व्यापारी का भूत था , जो उस दुर्घटना में मारा गया था।

इसी तरह की एक दूसरी घटना 29 दिसम्बर 1972 ई. को घटित हुई। इसमें दो अमेरिकी विमान चालक कैपटेन रॉबर्ट लाफ्ट और सेकेंड ऑफिसर रीपू ईर्स्टन एयरलाइन के एक वायुयान में फ्लोरेडा जा रहे थे कि रास्ते में उनका विमान धरती पर गिरकर तबाह हो गया। दोनों यान चालक मर गए, लेकिन उनके भूत काफी दिनों तक लोगों को नजर आते रहे। पहले ईर्स्टन एयरलाइन के एक वाइस प्रेसीडेन्ट ने कैप्टेन लाफ्ट के भूत को देखा। वह विमान में सेन फ्रांसिस्को जा रहा था कि उसके पास से एक यान चालक गुजरा। उसने यान चालक को पास बुलाया तो उसके होश उड़ गए। वह कैप्टेन लाफ्ट का भूत था। कैप्टन कुछ क्षणों तक उसके पास खड़ा रहा, फिर अकस्मात् विलीन हो गए।

इसके पश्चात् फरवरी, 1972 में इसी विमान कंपनी का एक विमान मैक्सिको जा रहा था। एक एयरहोसटेस ने विमान की एक सीट पर डाँन रीपू को बैठे हुए देखा। उसने यह बात अपने फ्लाइट इंजीनियर को बताई तो उसने कहा कि मैंने भी उसे कई बार देखा है। फिर उसने अपना एक संस्मरण भी सुनाया कि एक बार जब वह पहले एक विमान से मैक्सिको जा रहा था तो इस रीपू ने उसे सचेत किया कि विमान में आग लगने वाली है। उसकी यह बात सच साबित हुई। जब विमान मेक्सिको नगर के हवाई अड्डे से उड़ने लगा तभी उसके एक इंजन में आग लग गई, किंतु सौभाग्यवश उसे बुझा दिया गया। इसके पश्चात् भी ये दोनों यान चालक कई बार विमान कंपनी के कर्मचारियों को नजर आए।

अनुभव और प्रमाण सभी स्वीकारते हैं कि यह शरीर ही जीवन का पर्याय नहीं है। इसकी समाप्ति को अस्तित्व की समाप्ति नहीं कहा जा सकता। चेतना अपनी उपस्थिति शरीर के मरने-नष्ट होने के बाद भी बनाए रखती है। भूत प्रेतों की उपस्थिति यही जताती है। यह इस ओर भी स्पष्ट इंगित करती है कि देह का प्रयोजन तो चेतना का उन्नयन एवं उत्कर्ष हैं । इसे भूलने पर तो भूत-प्रेत बनकर ही भटकना पड़ता है।


वह द्वीप सुविधा संपन्न (kahani)

आस्ट्रिया का एक छात्र डाक्टरी पढ़ रहा था। नाम था उसका -पैस्टोला। उसे रास्ते चलते एक बच्चा मिला। उसके अभिभावकों को ढूंढ़ने , पुलिस में सूचना देने के उपराँत उसे अनाथालय भेज दिया गया। पैस्टोला को एक दिन के साथ से ही उस बच्चे से मुहब्बत हो गई। वह जब तब उसे देखने जाया करता। कुछ उपहार भी ले जाता। पैस्टोला ने गंभीर दृष्टि से देखा कि अनाथालय में निर्वाह और शिक्षा व्यवस्था तो है पर कर्मचारियों के पास प्यार नाम की कोई वस्तु नहीं, जिसे पाकर बच्चों का अंतःकरण खिलता हो।

पैस्टोला ने पढ़ाई समाप्त करते ही यह आँदोलन चलाया कि जिनकी छोटी गृहस्थी है, वे अनाथ बच्चों का अपने परिवार में सम्मिलित कर लें और उसी लाड़ चाव से पालें। खोजने पर ऐसे उदार व्यक्ति भी मिल गए और असहाय बच्चे भी। आत्मीयता के वातावरण में बच्चों का मन विकसित होने लगा।

पैस्टोला ने विवाह नहीं किया। अनाथ बच्चों को अपना बेटा माना। परित्यक्ताएँ , वृद्धाएँ उसकी बहन और माँ की तरह उसी घर में रहने लगीं। अपनी निज की आमदनी वह इसी कार्य में लगा देता। उसकी देखा−देखी अनेक उदार मन वाले लोगों ने अपने परिवारों में निराश्रितों को सम्मिलित किया। पैस्टोला का आँदोलन दूर दूर तक फैला। उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला। यह राशि भी उन्होंने इसी प्रयोजन में लगा दी।

उन दिनों श्रद्धाँजलि यज्ञ चल रहा था। धर्मचक्र प्रवर्तन की बढ़ी हुई आवश्यकता को अनुभव करते हुए , बुद्ध के सभी शिष्य अपने-अपने अनुदान प्रस्तुत कर रहे थे। जमा राशि का लेखा-जोखा लिया गया। किसका धन सबसे अधिक है, इसकी प्रशंसा सुनने के लिए सभी उत्सुक थे। बिंबसार की राशि सर्वाधिक थी। चर्चा गोष्ठी में बुद्ध ने एक वृद्धा का सौंप दिया और अब उसके पास तन के कपड़े और मिट्टी के पात्र ही शेष है।, जबकि औरों न अपनी संपदा के थोड़े-थोड़े अंश ही प्रस्तुत किए हैं।

उन दिनों श्रद्धाँजलि यज्ञ चल रहा था। धर्मचक्र प्रवर्तन की बढ़ी हुई आवश्यकता को अनुभव करते हुए , बुद्ध के सभी शिष्य अपने-अपने अनुदान प्रस्तुत कर रहे थे। जमा राशि का लेखा-जोखा लिया गया। किसका धन सबसे अधिक है, इसकी प्रशंसा सुनने के लिए सभी उत्सुक थे। बिंबसार की राशि सर्वाधिक थी। चर्चा गोष्ठी में बुद्ध ने एक वृद्धा का सौंप दिया और अब उसके पास तन के कपड़े और मिट्टी के पात्र ही शेष है।, जबकि औरों न अपनी संपदा के थोड़े-थोड़े अंश ही प्रस्तुत किए हैं।

एक देश का रिवाज था कि जो राजा चुना जाता, उसे दस वर्ष राज्य करने दिया जाता। इसके बाद उसे ऐसे निर्जन द्वीप में उतार दिया जाता, जिसमें निर्वाह के कोई साधन न थे। बेचारा भूखा-प्यासा दम तोड़ता। अनेकों राजा इसी प्रकार दुर्गतिग्रस्त होते रहे। एक बुद्धिमान् राजा उस गद्दी पर बैठा। पता लगाया दस वर्ष बाद किस द्वीप में जाना है। अगले ही दिन उसने उसमें सुविधाएँ उत्पन्न करने की आज्ञा देदी। इस अवधि में वह द्वीप सुविधा संपन्न देश हो गया। नियत समय पर राजा को वहाँ जान में और बसने में कोई कठिनाई नहीं पड़ी।


बंधनमुक्त विज्ञान अध्यात्म के और निकट होगा

प्रकृति के दो स्तर हैं -एक ‘परा’ दूसरा ‘अपरा’। अपरा वह, जिसे पंचभौतिक कह सकते हैं अर्थात् इंद्रिय चेतना से जो अनुभूति की जा सकती है अथवा यंत्र-उपकरणों की सहायता से जो प्रत्यक्ष हो सकती है। भौतिक विज्ञान का कार्यक्षेत्र यहीं तक सीमित है। कुछ समय पूर्व तक वैज्ञानिक इतने को ही सब कुछ मानते थे और पराशक्ति अथवा ब्रह्माँडीय चेतना से इनकार करते थे।

किंतु अब जैसे-जैसे उसकी गति स्थूल से सूक्ष्म की ओर होती जा रही है, वे इस बात को परोक्ष रूप से स्वीकार करते जा रहे हैं कि पदार्थ की परा-प्रकृति जैसी कोई सत्ता अवश्य है। यह सत्ता आणविक गतिविधियाँ नहीं कही जा सकती, न ही ताप, प्रकाश शब्द जैसे कंपनों से इसकी तुलना की जा सकती है। वह इनसे कुछ और भिन्न एवं सूक्ष्म है। अध्यात्म -विज्ञान में इसे ही ‘समष्टि चेतना’ या ‘समष्टि मस्तिष्क’ नाम दिया गया है। विज्ञान कहता है कि जो विद्युत से यह अंतरिक्ष भरा पड़ा है। बरसात के दिनों में हम उसी को चकाचौंध के रूप में देखते और गर्जन -तर्जन के रूप में सुनते हैं। बल्ब की रोशनी तो उसकी एक चिनगारी मात्र है। दोनों में याँत्रिक और प्रकृतिगत आधार भूत भिन्नता होने पर भी परस्पर सघन संबंध है - इस तथ्य को वैज्ञानिक अब दबी जुबान से स्वीकार करने लगे हैं।अध्यात्म में इसी के अनुरूप व्यष्टि और समष्टि मन की सत्ता को स्वीकार किया गया है। व्यक्तिगत मस्तिष्क की अपनी सत्ता और क्षमता है, किंतु वह सर्वथा स्वतंत्र नहीं है, वरन् समष्टि मस्तिष्क का एक अंग है, जिसे इन दिनों वैज्ञानिक क्षेत्र में ‘ब्रह्माँडीय चेतना’ नाम दिया गया है। व्यक्ति समाज का एक अविच्छिन्न अंग है। एकाकी रहने लगे, तो भी वह समष्टि से पृथक होने का दावा नहीं कर सकता । उसे अब तक जो ज्ञान अनुभव संस्कार कौशल आदि मिला है, शरीर पोषण हुआ है, वह सब समाज का ही अनुदान है। एकी निर्वाह में भी आखिर कुछ उपकरण तो साथ रखे ही गए हैं। माला आसन , अधोवस्त्र जैसे साधनों के बिना तो गुफा में रहने वाले भी काम नहीं चला पाते। अग्नि का आविष्कार किसी एकाकी व्यक्ति ने स्वयं नहीं किया है, उसमें भी अदृश्य की स्फुरणा का ही प्रमुख हाथ रहा है। इस प्रकार एकांतवासी कहलाने वाले के भूतकालीन और वर्तमान क्रियाकलाप समाज-संबद्ध रहे। आगे भी अंतरिक्ष में चलने वाले असंख्य व्यक्तियों की असंख्य विचार तरंगें अप्रत्यक्ष रूप से उसे प्रभावित करेंगी और वह स्वयं दूसरों को भी अपनी मनः तरंगों से प्रभावित करेगा। यह भी सामाजिक आदान-प्रदान हुआ। व्यक्ति का शरीर निर्वाह एवं विकास पर आश्रित है आर अविच्छिन्न रूप से संबद्ध है। ठीक इसी प्रकार व्यक्ति -मस्तिष्क स्वतंत्र दिखने पर भी वह समष्टि मस्तिष्क का एक अंग है।

‘सामूहिक मस्तिष्क’ के आस्तित्व आर उसक व्यक्तिगत मस्तिष्क’ के साथ आदान प्रदान की बात अब दिन -दिन अधिक स्पष्ट होती और अधिक प्रामाणिक बनती चली जा रही है। प्रसिद्ध अँगरेज भौतिकीविद् पॉल डेविस अपनी पुस्तक ‘सुपरफोर्स ‘ में लिखते हैं कि जब कोई व्यक्ति किसी संकटग्रस्त के पास किसी अज्ञात प्रेरणा से खिंचा चला जाता है तो यह स्वीकार करने के लिए विवश होना ही पड़ता है कि दोनों व्यक्तियों के बीच संपर्क जोड़ने वाला कोई सूक्ष्म स्तर का सशक्त माध्यम अवश्य है। इसी बात का और अधिक स्पष्ट करते हुए एच. मोरोविज अपने ग्रंथ ‘ अदर वर्ल्ड्स’ में लिखते हैं कि प्रत्यक्ष इंद्रियगम्य जगत् वह है जिसे हम आँखों से देखते हैं, पर उसकी सामर्थ्य उन अनेकानेक इंद्रियातीत लोकों की तुलना में अति न्यून है, जा हमें दिखाई नहीं पड़ते। वे कहते हैं कि उनके अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि हमारा भौतिक विज्ञान लगातार उन उन स्तरों की ओर अग्रसर होता चला जा रहा है। और हम शनैः-शनैः सूक्ष्म से सूक्ष्मतर लोकों से अधिकाधिक संबद्ध होते जा रहे हैं। उनके अनुसार पाषाणकाल में आदिमानवों ने प्रस्तर के जो हथियार विकसित किए, उसमें उनकी ही बुद्धिमत्ता का हाथ था, ऐसी बात नहीं है। वह तो उपकरण मात्र थी । उसे चलाने वाली चेतना और दिशा देने वाली प्रेरणा तो अदृश्य की ही थी। विकास के क्रम में मनुष्य जैसे-जैसे सभ्य, सुशिक्षित और बुद्धिमान बनता गया, वैसे-वैसे उसका संपर्क अधिकाधिक सूक्ष्मलोकों से होता चला गया। वहाँ से उसे अधिक उन्नत व विकसित स्तर की पदार्थपरक प्रेरणाएँ मिलती चली गई। इस प्रकार विज्ञान का विकास पदार्थ की सूक्ष्मता की ओर चलता चला गया। इस क्रम में आज वह इस स्थिति में पहुँच गया है, जहाँ उसने चारों भौतिक शक्तियों (स्ट्राँग न्यूक्लियर फोर्स, वीक न्यूक्लियर फोर्स ) को एक सूत्र में पिरोकर समग्र (ग्राँड यूनिफिकेशन ऑफ फोर्सेज) बना दिया और कहा कि अति आरंभकाल मं सारी शक्तियाँ में शक्तियाँ एक थी। वे लिखते हैं कि पाँच दशक पूर्व यह विचार किसी के मस्तिष्क में नहीं उठा, क्योंकि तब हमारा वैज्ञानिक विकास उस स्तर का नहीं था कि आगे के विकास के लिए किसी अन्य स्तर का नहीं था कि आगे के विकास के लिए किसी अन्य उन्नत लोक ही प्रेरणा मिले। उनके अनुसार एक लोक की भूमिका से हमारी चिंतनशक्ति , ज्ञान और बुद्धि के ऊपर उठ जाने पर ही आगे के लोक से आगे की उन्नति के लिए संपर्क स्थापित हो पाता है। यदि बात ऐसी नहीं होती तो दुनिया में क्रमिक और क्रमबद्ध विकास के स्थान पर छलाँगने जैसी प्रक्रिया दिखलाई पड़ती, जो न केवल अनबूझ होती वरन् अनुपयोगी भी।

एक समय था, जब परमाणु को पदार्थ का सबसे छोटा कण माना जाता था और उस आधार पर उसका नाम ‘एटम’ रख दिया गया अर्थात् जो और आगे अविभाज्य हो। तब इसी को सत्य मानकर सारे अन्वेषण और अनुसंधान किए गए। जब इस स्तर का संपूर्ण वैज्ञानिक विकास हो चुका तो आगे की प्रेरणा मिली और इलेक्ट्रॉन, प्रोट्रान, न्यूट्रान एवं अन्य अनेकानेक मूल कणों की खोजें हुई। इस प्रकार भविष्य में बढ़ते बढ़ते विज्ञान यदि पदार्थसत्ता से परे उस क्षेत्र में -परोक्ष जगत् के केंद्र में प्रविष्ट हो जाए, जहाँ से हर प्रकार के सूक्ष्म संकेत आते हैं तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। जिस दिन यह संभव हुआ, उसके आगे यह सिद्ध करने की तनिक भी आवश्यकता न रहेगी कि स्थूल जगत् सूक्ष्म की ही प्रकाश प्रेरणा है।

स्पष्ट है - चेतना मन की बुद्धि , क्षमता का अपना महत्व है, पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण अचेतन की सामर्थ्य है। चेतन मन तो उसके आगे सागर के समक्ष बूँद जैसा है। इसी प्रकार अंतरिक्ष में मनुष्यों के छोड़े हुए विचार और उनके आदान-प्रदान की जानकारी भी ऐसी ही उथली और कम महत्त्व की समझी जाने लगी है तथा रहस्यमय उस प्रवाह का माना जान लगा है, जो समष्टि की अचेतन चेतना से संबद्ध है। मानवी चेतना मोटेतौर से शरीर निर्वाह एवं अहंता की तुष्टि तथा विस्तृति में संलग्न हलचल मात्र दृष्टिगोचर होती है। उसका प्रयोजन शरीर को सुखी तथा सक्रिय बनाए रखना भर होता है। लगता है, शरीर मुख्य है और उसकी तृप्ति तुष्टि सुरक्षा एवं प्रगति के लिए सरंजाम जुटाने भर के लिए उसका सृजन एवं उदय हुआ है उपयोग भी इसी स्तर पर होता है। मस्तिष्क का शरीर सुख के लिए जितना अधिक उपयोग हो सके। उतनी ही सफलता एवं सार्थकता मानी जाती है।

गहराई में उतरने पर बात कुछ दूसरी ही दृष्टिगोचर होती है। मस्तिष्क चेतना के निवास का केंद्रीय शक्ति संस्थान है। यहाँ ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ जीवचेतना का मिलन संगम होते हैं और इस आदान -प्रदान के आधार पर प्राणि जगत् को अनेकानेक सुविधाएँ एवं संवेदनाएँ उपलब्ध होती है। यह मस्तिष्कीय केन्द्र इतना अधिक शक्तिशाली है कि इसके माध्यम से पिंड और ब्रह्माण्ड की एकता का अनुभव एवं लाभ आश्चर्यजनक मात्रा में उपलब्ध किया जा सकता है।

योग-साधनाओं में यही किया जाता है। उसका प्रयोजन अपनी मसीमता को असीमता के साथ जोड़ देना है। इस उद्देश्य में जितनी सफलता मिलती जाती है उतनी ही मात्रा में मनुष्य उस वैभव पर आधिपत्य जमाता जाता है, जिसके प्रभाव को हम जड़ चेतन जगत् में अपने चारों और फैला हुआ देखते हैं। सीमाबद्ध स्थिति में हम तुच्छ और दरिद्र होते हैं, पर असीम के साथ जुड़ जाने में-महानता प्राप्त करने में कोई कमी नहीं रहती। अध्यात्म इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है। जबकि विज्ञान अब भी अपनी ससीमता के बंधन से मुक्त नहीं हो पाया है। आइंस्टीन ने एक बार कहा था कि जिस दिन विज्ञान इस बंधन को तोड़ लेगा तो फिर वह विज्ञान न रहकर अध्यात्म -तत्वज्ञान -बन जाएगा। बनना भी चाहिए, क्योंकि दोनों अपने-अपने ढंग से एक ही सत्य के शोध में लगे हुए हैं। उनका उद्देश्य और लक्ष्य भी समान होना चाहिए।


धर्म धारणा का प्रशंसनीय (kahani)

बंगाल के राजा गोपीचंद युवावस्था में अनेक व्यसनों में फँस गए थे। उन्होंने अनेक विवाह किए और मद्यपान जैसी आदतों का अपने को अभ्यस्त कर लिया।

उनकी माता निरंतर एक ही बात सोचती रहतीं कि लड़के को किसी प्रकार कुमार्ग से हटाकर सन्मार्ग पर लगाया जाए। उसकी क्षमता को इस प्रकार बरबाद न होने दिया जाए। उसके व्यक्तित्व को परमार्थ प्रयोजनों के लिए नियोजित किया जाए। वे चाहती थीं कि वह तपस्वी बने और जनकल्याण के कोई महत्त्वपूर्ण कार्य संपन्न करे। इसके लिए उन्होंने स्वयं शिक्षा देना और जीवन का महान् उद्देश्य समझाना प्रारंभ किया। इस कार्य में उनके मामा ने भी महत्त्वपूर्ण परामर्श दिए। माता भर्तृहरि थे और वे पहले ही तपस्वी बन चुके थे। माता और मामा की शिक्षा का प्रभाव पड़ा। साथ ही योगी जालंधर नाथ के संपर्क में आकर वे उनके शिष्य भी हो गए।

गोपीचन्द के जीवन में आमूल परिवर्तन हो गया। वे संयम -साधना से पिछले दुर्गुणों से मुक्ति पा गए। राज प्रबंध उनकी माता और साथियों ने सँभाला। गोपीचंद , भर्तृहरि और जालंधर नाथ का त्रिगुट सुदूर क्षेत्रों में परिभ्रमण करता रहा और धर्म धारणा का प्रशंसनीय वातावरण निर्मित किया।


ऐसे हुआ समाधान जिज्ञासा का

महाराजा वीर विक्रमदेव जितने नीतिकुशल थे, उतने ही रणकुशल । प्रजा उनके न्याय पर अभिमान करती थी। सभी को इस बात पर अभिमान था कि अन्यायी कोई भी हो - भले ही वह राजपरिवार का सदस्य ही क्यों न हो - महाराज का न्यायदंड उसे बख्शेगा नहीं। उनकी नीति कुशलता के कारण ही पड़ोसी राज्यों से उनके मधुर संबंध थे। यही वजह थी कि व्यापार और वाणिज्य की अबाध प्रक्रिया राज्य को उत्तरोत्तर समृद्ध बना रही थी। महाराज के रणकौशल के सम्मुख विरोधी नतमस्तक होते थे और दस्यु -गिरोह स्वतः ही समर्पण कर देते थे। उनका दरबार नीतिज्ञों , विद्वानों का रत्नकोष था। वहाँ हर समय सद्ज्ञान की धाराएँ प्रवाहित होती रहती थीं। नित्य−नवीन जिज्ञासाएँ एवं सरल सुबोध समाधान -यही क्रम था राजदरबार का।

आज तो महाराज स्वयं ही जिज्ञासु थे। उन्होंने अपनी तीन जिज्ञासाएँ दरबार में उपस्थित विद्वानों के सामने प्रकट की - 1. किसी काम को शुरू करने का ठीक समय क्या है?

2. किन लोगों की बात सुननी चाहिए, किनकी नहीं? 3. संसार का उत्तम पदार्थ क्या है, जिससे मैं जो चाहूँ कर सकता हूँ?

पहले सवाल के जवाब में किसी न कहा कि मनुष्य को काम करने के वास्ते दिनों , महीनों और वर्षों का एक सूची पत्र बना लेना चाहिए। किसी ने कहा कि कार्य आरंभ करने का पहले से ठीक समय निश्चित करना असंभव है। मनुष्य का चाहिए कि वृथा समय न गँवाए, जो कर्तव्य हो उसे सदा करता रहे। किसी ने कहा कि राजा कितना भी चतुर और सावधान क्यों न हो, वह अकेला प्रत्येक कार्य आरंभ करने का ठीक समय नहीं जान सकता। उसे बुद्धिमान लोगों की सभा बनाकर उनसे सम्मति लेनी चाहिए।

इसी प्रकार अन्य लोगों ने दूसरे प्रश्न के भी अनेक उत्तर दिए। किसी ने कहा कि राजा के मंत्री अति उत्तम होने चाहिए। कोई बोला वैद्य , किसी ने कहा माँत्रिक-ताँत्रिक इत्यादि। तीसरे प्रश्न का उत्तर भी इसी प्रकार मिला। कोई कहता था पदार्थ विद्या सबसे उत्तम है कोई कहता था , शस्त्र विद्या, कोई बतलाता था पूजापाठ।

महाराजा वीर विक्रमदेव को इनमें से कोई भी उत्तर ठीक मालूम न हुआ। अतएव उन्होंने अपनी राजधानी में डाँड़ी पिटवा दी कि जो पुरुष इन तीन सवालों का जवाब देगा, उसे बहुत-सा इनाम दिया जाएगा। अब अनेक बुद्धिमान् पुरुष आकर महाराज को इन प्रश्नों के उत्तर देने लगे। उनके उत्तरों में बौद्धिक कुशलता रहती, तर्क प्रवणता रहती, परंतु साथ ही अनुभव शून्यता भी दिखाई देती। उत्तर देने वालों के मनों में भारी इनाम पाने का लोभ भी था। इनमें से कुछ ऐसे भी थे, जो राजदरबार में स्थान पाना चाहते थे।गहरी जीवन -साधना से उपजा समाधान इनमें से किसी के पास भी न था।

दिन बीतते गए, साथ ही महाराज की जिज्ञासा भी तीव्र से तीव्रतर होती चली गई। हर नए दिन कोई नया व्यक्ति आता। अपनी बात को तरह-तरह की नवीन युक्तियों से पुष्ट करने की चेष्टा करता, परंतु इन नए-नए तर्कों से वीर विक्रमदेव का समाधान न हो पाता।

एक दिन एक गृहस्थ ने महात्मा रामानुज से प्रश्न किया कि “महात्मन् ! क्या कोई मार्ग नहीं है कि यह संसार भी न छोड़ना पड़े और स्वर्ग भी पा लूँ।” रामानुज हँसे और बोले -”हाँ , है ऐसा मार्ग। तुम जो कुछ कमाओ, दूसरों की भलाई के लिए करो।” गृहस्थ को संदेह हुआ उसने पूछा- “मगर ऐसे कठिन मार्ग पर कौन चल सकता है?” रामानुज ने दृढ़ विश्वास के साथ कहा “जो नारकीय यातनाओं से बचना चाहता होगा और जिसे ईश्वरप्राप्ति की सच्ची लगन होगी।”

अपनी इसी चेष्टा में एक दिन उन्हें यह पता चला कि राजधानी से काफी दूर एक जंगल में महर्षि आयुष रहते हैं। उनकी तप साधना एवं योगविद्या उत्कृष्टतम है। उनके पास जो ज्ञान है, वह तपोधन महर्षि को लोग स्वयं भगवान् का प्रतिनिधि मानते हैं। आसपास की ग्रामीण जनता इन्हें देवपुरुष समझती है।राजा ने सोचा- इन महर्षि से ही अपने प्रश्नों का समाधान पाया जाए।

ये महर्षि कुटिया छोड़कर कहीं बाहर नहीं जाते थे। उनका मिलना जुलना भी किन्हीं यशस्वी-वर्चस्वी एवं राजा महाराजाओं से नहीं बल्कि दीन, दुःखी, पीड़ितजनों से होता था। इसी वजह से महाराज वीर विक्रमदेव ने साधारण वस्त्र पहने और इन महर्षि आयुष की कुटिया के पास जा पहुँचे। उन्होंने देखा कि महर्षि आयुष कुटिया के पास जमीन को फावड़े से खोद रहे हैं। राजा को देखते ही महर्षि ने उन्हें प्रणाम किया और फिर अपना काम करने में जुट गए। महर्षि शरीर से बहुत दुबले-पतले एवं कमजोर थे। वह फावड़ा चलाते -चलाते हाँफने लगते थे।

महाराज ने उनके प्रणाम का प्रत्युत्तर देते हुए कहा-ऋषिवर ! मैं आपसे तीन बातें पूछने आया हूँ। पहली बात यह कि मैं ठीक कम करने का ठीक समय किस प्रकार जान सकता हूँ? दूसरी बात यह कि मेरे लिए किन लोगों का संग साथ करना उचित है? तीसरा प्रश्न यह कि कौन सा विषय सबसे उत्तम है ?

महर्षि आयुष न काई उत्तर नहीं दिया, वह आत्मनिमग्न हो खुदाई करते रहे। वीर विक्रमदेव बोले - महर्षि! आप थके मालूम पड़ते हैं, लाइए मुझे फावड़ा दीजिए और आप विश्राम कर लीजिए।

महर्षि आयुष ने राजा को धन्यवाद दिया और फावड़ा उनके हाथ में दे दिया और स्वयं जमीन पर बैठ गए।

महाराज जब दो क्यारियाँ खोद चुके तो रुक गये और उन्होंने फिर से अपने तीनों सवाल दोहराए। महर्षि ने सिर्फ एक शब्द कहा- हाँ और फावड़ा जमीन पर रख दिया और बोले -ऋषिवर! मैं तो आपसे अपने सवालों के जवाब लेने आया था। यदि आप उत्तर नहीं दे सकते तो मैं लौट जाता हूँ।

तभी महर्षि अचानक बोले -देखो कोई भागा हुआ चला आ रहा है।

विक्रमदेव ने मुँह फेरकर देखा कि एक दाढ़ी वाला मनुष्य जंगल की ओर दौड़ता हुआ आ रहा है। उसने अपने पेट को हाथ से दबा रखा था और हाथ के बीच से रुधिर बह रहा था। राजा के पास पहुँचकर वह बेसुध होकर गिर पड़ा। राजा और महर्षि ने कुरता उठाकर देखा तो उसके पेट में बड़ा घाव पाया। राजा ने घाव को पानी से धोकर अपना रुमाल उस पर बाँधा, रुधिर बंद हो गया। कुछ काल उपराँत उसे सुधि आई तो पानी माँगा। राजा ने तुरंत जल लाकर पिलाया। इतने में सूर्यास्त हो गया। राजा ने महर्षि की सहायता से उस व्यक्ति को कुटिया में लिटा दिया। घायल व्यक्ति को नींद आ गई। विक्रमदेव भी थके होने के कारण सो गए। भोर होने पर वह उठे तो घायल ने कहा -राजन् ! आप मुझे क्षमा कीजिए।

विक्रमदेव बोले -क्षमा कैसी? मैं तो तुम्हें जानता भी नहीं।

उस व्यक्ति ने कहा -आप मुझे नहीं जानते, परंतु मैं आपको जानता हूँ। आपने मेरे भाई को एक अपराध में दंड दिया था। तभी मैंने प्रतिज्ञा की थी कि मैं आपसे बदला लूँगा। मैं जानता था कि आप महर्षि से मिलकर संध्या समय अकेले लौटेंगे। इसी उद्देश्य से मैं जंगल में छिप गया था। आपके सिपाहियों ने मुझे पहचान लिया और मुझ पर वार किया। यदि आप मेरा घाव न बाँधते तो मैं अवश्य मर जाता। आपने मुझ पर दया की। मैं आपको मारना चाहता था, परन्तु आपने मेरी जान बचाई। अब भविष्य में मैं आपका सेवक बनकर रहूँगा।

विक्रमदेव बड़े प्रसन्न हुए कि ऐसा प्राणघातक शत्रु सहज में ही मित्र बन गया। उन्होंने अपने राजवैद्य को उसकी दवा करने के लिए बुला भेजा। उसकी सब प्रकार से व्यवस्था करके राजा ने महर्षि से विदा माँगते हुए कहा -ऋषिवर ! आपने मेरे प्रश्नों के उत्तर नहीं दिए, कोई बात नहीं। अच्छा प्रणाम , अब हमें आज्ञा दें।

महर्षि ने कहा - देखो, यदि कल तुम मुझे थका देख सहज सौजन्यवश धरती न खोदते और शीघ्र लौट जाते तो वह मनुष्य राह में तुम्हें कष्ट देता और तुम पछताते कि महर्षि के पास क्यों बेकार में गया। इसलिए विदित हुआ कि उत्तम समय वह था , जब तुम खुदाई कर रहे थे और उचित मनुष्य मैं था, अतः मेरा भला करना तुम्हारा परम कर्त्तव्य था।

महर्षि आयुष ने अपनी बात का साराँश बताते हुए कहा कि सदैव वर्तमानकाल ही उचित समय है, क्योंकि केवल वर्तमान पर ही मनुष्य का अधिकार है। जो मनुष्य मिल जाए वही उचित मनुष्य है। कौन जानता है, पल में क्या हो जाए और कोई मिले अथवा न मिले। सर्वोत्तम कर्त्तव्य परोपकार है, क्योंकि उपकार के लिए ही मनुष्य इस मृत्युलोक में शरीर धारण करता है।


अपनी हीनता समझी (kahani)

सराय के एक ही कोठे में तीन मुसाफिर टिके। एक था भिखारी, दूसरा किसान, तीसरा चोर। रात्रि में तीनों ने अपनी-अपनी गठरी ऊपर खूँटी पर टाँग दी और सो गए।

स्तब्धता देखकर पोटलियों की संपदा आपस में वार्त्तालाप करने और धुल-मिल जाने की इच्छा प्रकट करने लगी।

किसान की पोटली ने कहा -मिलने में कोई आपत्ति नहीं , पर फिर ईमानदारी , नीतिनिष्ठा और श्रमशीलता का भविष्य क्या होगा?

दोनों ने अपनी हीनता समझी और मौन हो गई।


अन्तर्भावों की अभिव्यक्ति के विभिन्न रूप

संवेदन शीलता ही अभिव्यक्ति का कारण है । शरीर के विभिन्न क्रिया कलापों में इसी के विविध रूप दिखाई देते हैं। जब व्यक्ति प्रसन्न होता है तो वह मुस्कराता एवं हँसता है। आँखों व चेहरे पर वह भाव झलक उठता है। अतः अंगों को देखकर किसी की अभिव्यक्ति प्रत्येक मनुष्य में ही नहीं, जानवरों तक में होती है, भले ही उसके स्वरूप में भिन्नता हो। हँसने का आँसू से भी गहरा संबंध माना गया है। विशेषज्ञों का मत है कि संवेदना ज्यों -ज्यों परिपक्व एवं स्थायी होती जाती है। भाव गंभीर एवं क्रियाकलापों में परिवर्तन दिखाई देने लगता है। प्रेम , सहानुभूति एवं भक्ति इसी की उन्नत अवस्थाएँ हैं।

हँसना या मुस्कराना अंतर-अभिव्यक्ति का स्वरूप है। ये सूक्ष्म मनोभाव हैं। इसीलिए जर्मन मनोवैज्ञानिक विलिबेल्ड ने स्पष्ट किया है कि अभी तक कोई भी पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक हँसने वाले इस विचार को सही ढंग से प्रतिपादित नहीं कर पाया है। यह उम्र के साथ बदलता है। मुस्कराना एवं हँसना संवेदनशीलता की तीव्रता पर निर्भर करता है। सुविख्यात मनोवैज्ञानिक प्रिशोफ की मान्यता है कि मुस्कराहट हँसने का हास नहीं है। प्रत्युत यह भिन्न अभिव्यक्ति है। जे लिस्टर ने अपने अनुसंधान में पाया कि बच्चे हंसने के दौरान उनका संपूर्ण शरीर हिलता है। इसी प्रकार एंथ्रोपायड बंदरों में देखा गया है। यही नहीं, शरीर के कुछ संवेदनशील अंगों का स्पर्श करने पर भी हँसी आती है। सात वर्ष के बच्चे के इन विशिष्ट अंगों का स्पर्श करने पर उसकी माँसपेशियों में तीव्र परिवर्तन होता है। कुछ लोगों में इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप उनके शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। विज्ञानवेत्ता ग्रेटी ओलेट ने काँख, अँगूठे की पोर एवं पैर के तलवे को काफी संवेदनशील बताया है। उनके अनुसार ये ऐसे संवेदनशील अंग हैं, जिनका स्पर्श करने पर हँसी आती है। बच्चों में इन अंगों के अलावा गला , ठुड्डी के नीचे का भाग, कमर पसली एवं गाल भी काफी संवेदनशील होते हैं। इस क्रम में स्त्रियाँ भी काफी संवेदनशील होती हैं। चिंपैंजी में भी इसी तरह का व्यवहार देखा जा सकता है। बेबून के हँसने पर उसका निचला जबड़ा तेजी से ऊपर-नीचे होता है। इतना ही नहीं, हँसने पर चेहरे की माँसपेशियों में विशेष प्रकार की क्रियाएँ होती हैं।

चिकित्साविज्ञानी डचीन ने हँसने पर आँखों की माँसपेशियों में होने वाले परिवर्तनों का गहन अध्ययन किया है। उनके अनुसार पाँच माह के बच्चे को जब उसकी माँ हँसाती है तो उसका मस्तिष्क सक्रिय हो उठता है, बच्चों की आँखों की चमक बढ़ जाती है, परंतु माँ के स्थान पर किसी अजनबी चेहरे के होने पर बच्चे की आँखों में भी विशेष चमक होती है। निराशा या अन्य अवस्था में आँखों की चमक बढ़ जाती है, परन्तु माँ के स्थान पर किसी अजनबी चेहरे के होने पर बच्चे की आँखें वह भाव प्रदर्शित नहीं कर पाती हैं। इसी तरह नवदंपत्ति की आँखों में भी विशेष चमक होती है। निराशा या अन्य अवस्था में आंखों की माँसपेशियाँ उतनी सक्रिय व सजग नहीं हो पाती। जिससे वह मूलभाव दृष्टिगोचर नहीं होता है। इसका कारण स्पष्ट करते हुए डचीन ने कहा है कि प्रसन्नता अति सूक्ष्म अभिव्यक्ति है, जिसे उसी क्षण देखा जा सकता । वैज्ञानिक जगत् में इसे डचीन मुस्कराहट के नाम से जाना जाता है। इस दौरान भौहें नीचे झुक जाती हैं।

तेज व ठठाकर हँसने पर गाल तथा ऊपरी होंठ फैल जाते हैं, नाक सिकुड़ जाती है और ऊपरी जबड़े के दाँत चमकने लगते हैं। सर सी.बेल अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘एनाटॉमी आफ एक्सप्रेशंस’ में स्पष्ट करते हैं कि तेज व चमकीली आँखें प्रसन्न व हर्षित मनःस्थिति की द्योतक हैं। अधिक हँसने पर आँखों में आँसू आ जाते हैं। यद्यपि यह रोने पर भी होता है, परंतु इस समय आंखें चमकने की बजाय धुँधली दिखाई देती हैं। तनाव के समय भी आँखें बुझी बुझी सी रहती है। डॉ. पिडरीठ के अनुसार तनाव की अवस्था में आँखों की पुतली खून एवं अन्य द्रव्यों से भर जाती है। क्रोध या उत्तेजना की स्थिति में ये और भी लाल हो उठती है। प्रख्यात दार्शनिक हर्बर्ट स्पेंसर के अनुसार यह संभवतः अत्यधिक स्नायु ऊर्जा के प्रवाह के कारण होता है, परंतु जब व्यक्ति प्रसन्न होता है तो यह ऊर्जा उल्लास बनकर आँसू के रूप में टपक पड़ती है।

तेजी से हँसने पर श्वास अनियंत्रित , चेहरा आशक्त एवं शरीर काँपने लगता है। हिंसा के दौरान हँसी अट्टहास में बदल जाती है मनीषी स्वीनहू ने अपने अनुभव के आधार पर बताया है कि चीनी व्यक्ति जब गहरी उदासी में चले जाते हैं तो वे हिस्टीरिया के दौरे के समान विचित्र प्रकार से हँसने लगते हैं। जर्मन के सैनिकों का हँसना खतरनाक माना जाता है। ये किसी भी छोटी-सी बात में हँसते-हँसते उग्र एवं हिंसक हो उठते हैं एवं हँसी का नजारा युद्ध और हिंसा में बदल जाता है। मलायास तथा मलक्का प्रायद्वीप की आदिवासी महिलाएँ जब अति प्रसन्नता के कारण हँसती है तो उनकी आँखें आँसुओं से तर हो जाती हैं। बोर्निया केडूयाक्स में यह घटना सामान्य है। वहाँ लोगों के हँसते ही आँसू आने लगते हैं। आस्ट्रेलिया के आदिवासी प्रसन्न होने पर अट्टहास के साथ ताली बजाते हैं। वहाँ पर प्रायः कम लोगों की आँखों में आँसू आते हैं। विक्टोरिया के सुदूर क्षेत्र में एक व्यक्ति हँसता है तो पूरा समुदाय हँस पड़ता है। यूरोप में ऐसा कम देखने को मिलता है।

ऐसी घटनाएँ अन्य देशों एवं क्षेत्रों में भी देखी जा सकती हैं। दक्षिण अफ्रीका की काफी मूल निवासियों की महिलाओं में हँसने के दौरान उनकी आँखें पानी से भरी होती है। एंड्यूस्मिथ के अनुसार हाटेंटाट महिलाओं में ऐसे समय में इनकी आँखों में आँसू इतने अधिक निकलते हैं कि चेहरा बड़ा भयंकर लगता है। उत्तरी अफ्रीका के एबिसिनीयनों में भी ऐसा ही नजारा देखने कसे मिलता है। उत्तरी अफ्रीका के कुछ मूल निवासी भी इसी तरह का दृश्य प्रस्तुत करते हैं। वहाँ, मुख्यतः महिलाओं में ऐसी स्थिति आती है। एक अन्य जाति में हँसने के एक विशेष अवसर पर ही उनकी आँखों में आँसू आते हैं।

प्रसन्नता एवं हँसने या मुस्कराने के दौरान आवाज व श्वास में भी परिवर्तन आ जाता है। इस समय आवाज में लोच व मिठास आ जाती है। यह अक्सर किसी घनिष्ठ मित्र या संबंधी से वार्तालाप के समय होता है। संभवतः इसके पीछे श्वास का आना जाना प्रमुख कारण होता है। रोते समय निश्श्वसन लंबा एवं सतत् होता है तथा अंतःश्वसन छोटा एवं खंडित होता है। इसके विपरीत हर्षध्वनि में निश्श्वसन अल्प एवं खंडित तथा अंतःश्वसन लंबा होता है। मुस्कराहट में आवाज नहीं आती, एक लम्बी सी निश्श्वास होती है। इस दौरान ऊपरी आर्विक्यूलर माँसपेशी के हलके से संकुचन के कारण भौहें थोड़ी सी झुक जाती है और ऊपरी होंठ जरा सा फैल जाता है। मुस्कान के हँसी में परिवर्तित होते ही मुँह के दोनों किनारे सिकुड़ने लगते हैं तथा अंतरभाव की सूक्ष्म अभिव्यक्तियाँ चेहरे पर झलकने लगती है। विशेषज्ञों के अनुसार नवजात शिशु 45 दिन बाद ही ठीक ढंग से मुस्कराता है। यह समय कम ज्यादा भी हो सकता है, परंतु प्रथम बार शिशु का मुस्कराना बड़ा ही आकर्षणीय दृश्य प्रस्तुत करता है। जिस व्यक्ति का हृदय जितना निर्मल एवं पवित्र होता है, वह उतनी ही निर्दोष व बालसुलभ हँसी हँस सकता है। बच्चे इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं।

सर सी.बेल के अनुसार अत्यधिक प्रसन्नता में भौहें, नाक, तथा मुँह की आकृति बदल जाती है। तनाव में इसकी प्रतिक्रिया ठीक विपरीत होती है। गहरी उदासी में पलकें बोझिल , गाल व चेहरा मुरझाया हुआ, आँखें भारी व सांसें मंथर हो जाती हैं जबकि हर्ष एवं प्रसन्नता में चेहरा खिल उठता है तथा निराशा में चेहरा लंबा हो जाता है। सदा प्रसन्न रहने वाले व्यक्ति के चेहरे में आकर्षण एक स्थायी अभिव्यक्ति बन जाता है। वह उन्नत मस्तक, चमकती आँखें , प्रसन्न वदन तथा सहज एवं सरल दिखाई देने लगता है। तपस्वी व प्रेमी की आँखें लाल व चेहरा आशक्त व आकर्षक दिखता है । मनन व चिंतन करने वाले व्यक्तियों की आँखों में चमक दिखाई देती है। चार्ल्स डार्विन न अपनी विख्यात ग्रंथ ‘एक्सप्रेशन ऑफ इमोशन’ में उल्लेख किया है कि संसार में केवल हिंदू जाति के व्यक्तियों में ये समस्त विशिष्टताएँ परिलक्षित होती है, हालांकि इसकी झलक मलायास , न्यूजीलैंड तथा बोर्निया के डूयाक्सके निवासियों में भी दिखाई देती है।

प्रसन्नता की अभिव्यक्ति शरीर के विभिन्न क्रिया कलापों के माध्यम से दिखाई देती है, यह बात लगभग हर विशेषज्ञ ने कही है। वेजबुड ने ‘ए डिक्शनरी ऑफ एटीमोलॉजी’ में स्पष्ट किया है कि ऊपरी नील के निवासी पेथ्रीक जाति के लोग ज्यादा प्रसन्न होने पर पेट को मलते हैं। लिकार्ड के अनुसार आस्ट्रेलिया के लोग घोड़े, बैल व कंगारुओं के समान मुँह से चटखारे लेकर अपनी खुशी जाहिर करते हैं। ग्रीसलैंड के व्यक्ति इस दौरान एक विशेष आवाज के साथ एक ऐसी साँस लेते हैं जैसे वे किसी स्वादिष्ट व्यंजन का आनंद उठा रहे हों। यूँ तो कभी -कभी अपने अंतर्द्वंद्व को दबाने के लिए भी हँसना पड़ता है। अभिनय हेतु भी मुस्कराहट का आवरण ओढ़ना होता है। हँसने के और भी कारण हो सकते हैं, किंतु ऐसी अवस्था में वह सहज भाव प्रस्फुटित नहीं हो पाता जो कि स्वभावतः होता है।

हास्य की अपेक्षा प्रेम की अभिव्यक्ति कहीं अधिक जटिल होती है। पाल एंकमेन इस तथ्य को स्वीकारते हुए कहते हैं कि प्रेम संवेदना की उच्चतर अवस्था है। अतः इसमें संवेदना के कई उतार चढ़ाव प्रदर्शित होते हैं। प्रेम का भाव अपने प्रियजन के सान्निध्य में उत्पन्न होता है। हालांकि यह दैहिक धरातल से परे आत्मा का अलंकरण है, परंतु सामान्यतः इस लौकिक प्रेम के रूप में लिया जाता है। यह भाव किसी प्रिय व्यक्ति के स्पर्श से भी जाग्रत हो उठता है। किसी के द्वारा हृदय के तार झंकृत कर देने पर भी प्रेम की तरंगें उठने लगती हैं, जो आँखों एवं चेहरे पर दिखाई देने लगती है।

प्रेम का सबसे सहज एवं सरल स्वरूप है - माता का अपने शिशु के प्रति प्रेमभाव। महान् वैज्ञानिक डार्विन ने अपने ग्रंथों में प्रेम के लिए किसी विशेष संकेत या चिह्न का उल्लेख नहीं किया है। कोमलता एवं सहृदयता भी एक आनंददायक अनुभूति है।इनसे हृदय प्रेम से भर उठता है। इसी भाव से प्रेरित होकर माँ अपने बच्चे को पुचकारने लगती है। इस अनुभव को शब्दों में विवेचित-विश्लेषित करना बड़ा कठिन है। दीर्घ अंतराल के पश्चात् किसी प्रियजन से मिलने पर यह प्रसन्नता होती है और आँखों से आँसू झरने लगते हैं। इसके ठीक विपरीत प्रियजन से विछोह एवं विदाई भी व्यक्ति को आंसुओं से तर कर देती है।

संवेदनशीलता का यह भाव अन्य प्राणियों में भी दिखाई देता है। प्रेम की अभिव्यक्ति विविध देश एवं भिन्न संस्कृति के अनुरूप भी विविधता लिए होती है। पश्चिमी देशों में प्रेम को जाहिर करने के लिए आलिंगन एवं चुँबन का प्रचलन है, परंतु पश्चिमी दुनिया का यह प्रभाव फ्यूजीयन, न्यूजीलैण्ड, ताहितीयन, पापुआन , आस्ट्रेलियन , इसकीमेक्स तथा अफ्रीका की सोमाली की जनजातियों में नहीं पाया जाता। वहाँ पर गले मिलने व हाथ मिलाने का प्रचलन है। न्यूजीलैण्ड एवं लेपलैंड्स के लोग भी हाथ मिलाकर अपने प्रेम को प्रकट करते हैं।

संवेदना से ओतप्रोत सहानुभूति की अभिव्यक्ति भी व्यक्ति को रुला देती है। किसी घटना -कहानी -फिल्म आदि से भावनाओं के स्तर पर एकाकार हो जाने से भी इसी तरह की अभिव्यक्ति होने लगती है। सहानुभूति के सहज स्वर आँखों में आँसू बनकर झरने लगते हैं। सामान्यतः कष्ट के क्षणों में ऐसा होता है। बच्चों को थोड़े से कष्ट में सहानुभूति देने पर वे रोने लगते हैं।यह भाव किसी अपार कष्ट कठिनाई में मरहम का काम करता है। भावना का स्वरूप कोई भी क्यों न हो, इसका हृदय एवं आँखों से गहरा संबंध है। हृदय में भावनाओं का तीव्र प्रवेग उठते ही आँखें भरने लगती हैं। भक्ति इसकी से ही जीवन हास्य , संवेदना एवं प्रेम का पर्याय बन जाता है। संवेदनशीलता को चरम दरजे तक विकसित करके भक्ति की उन्नत अवस्था भी पाई जाती है। इस अमृत एवं दिव्य भाव को पाने का सहज उपाय यही है कि हम अपनी संवेदना को अपने क्षेत्र एवं परिकर में वितरित करें। सुख बाँटें-दुख बँटाएँ , यही अपनी संवेदनशीलता को अभिव्यक्त करने का सार्थक एवं सहज तरीका है।


महापुरुषों का दृष्टिकोण (kahani)

क्राँतिकारी सरदार भगतसिंह को उन दिनों निर्वाह में कठिनाई अनुभव हो रही थी। भाई शार्दूलसिंह अमृतसर काँग्रेस के प्रमुख थे। उन्होंने काँग्रेस दफ्तर में ही 150/- मासिक की नौकरी दिला दी।

भगतसिंह ने मात्र 30/-मासिक ही स्वीकार किए और कहा - “पैसा न बटोरना है, न उड़ाना । औसत भारतीय निर्वाह की दृष्टि से हमें इतने में ही काम चलाना चाहिए।”

सारी विश्व−वसुधा का एक परिवार मानने वाले महापुरुषों का दृष्टिकोण ऐसा ही उच्चस्तरीय होता है।


Quotation

हँसते और हँसाते रहो, पर यह कार्य व्यंग्य-उपहास के आधार पर मत करो अन्यथा मैत्री के स्थान पर दुर्भाव बढ़ेगा ।


वयोवृद्ध पति की सेवा (kahani)

एक सेठ के यहाँ गुणसुँदरी नामक कन्या थी। वह अपना जीवन साधना-स्वाध्याय में लगाना चाहती थी, किंतु मानसिक धरातल पर वह अपरिपक्व ही थी। वयस्क होने पर भी वह विवाह के लिए तैयार न होती थी। पिता का बहुत आग्रह पर उसने एक विद्वान् वयोवृद्ध से विवाह की स्वीकृति दे दी, ताकि उसका व्रत भी निभता रहे और लोकापवाद भी वन रहे। वयोवृद्ध पति की सेवा करते और उनसे ज्ञान-अनुदान का पाते बहुत समय बीत गया।

एक रात घर में चोर घुस आया। वह बड़ा रूपवान् था। गुणसुँदरी का मन विचलित हुआ और उस पर आसक्त होकर घर में रख लिया। एक दिन विचार आया कि क्यों न पति को मार दिया जाए, ताकि कोई कंटक ही न हरे। दोनों ने मिलकर बूढ़े को गला दबाकर मार डाला। चोर प्रातः होते ही नित्य की भाँति घर से जान लगा तो ऊपर से दरवाजा टूट पड़ा और उसकी भी वहीं मृत्यु हो गई।

गुणसुँदरी को मन की चंचलता पर बड़ा दुःख हुआ। उसने दोनों पतियों के साथ चिता में शरीर को जला देने का निश्चय किया। वह मन की दुष्टता पर बार-बार पछताती और अपने कुकृत्य का विवरण सभी को बताती हुई प्राण त्याग गई।

सभी लोग कहने लगे-मन की उच्चता और निकृष्टता का कोई ठिकाना नहीं। उसे तनिक भी ढील नहीं मिलनी चाहिए।हर समय कड़ा अंकुश रखने से ही काम चलता है।

गृहस्थ का निर्वाह ऐसे ही कठिन उत्तरदायित्वों से बँधा है, जिसमें अनुबंध , अनुशासन , आत्मनियंत्रण को सर्वोपरि महत्त्व दिया जाना चाहिए।


गहराता जाता है बरमूडा त्रिकोण का रहस्य

प्रकृति रहस्यों का पिटारा है। यह ऐसी अमुक घटनाओं को जन्म देती है, जिन्हें आश्चर्य एवं चमत्कार से कम नहीं कहा जा सकता। इन्हीं में बरमूडा त्रिकोण क्षेत्र की घटनाएँ शामिल हैं। कभी यह क्षेत्र व्यावसायिक और सामरिक जहाजों के लिए आवागमन का मुख्य जलमार्ग था। उन दिनों यहाँ किसी रहस्य की कल्पना किसी के भी मन में नहीं उठी थी, परंतु एकाएक बरमूडा संसार के आश्चर्यजनक स्थानों में सर्वप्रथम गिना एवं जाना जाने लगा। इस क्षेत्र से होकर जाने वाले जलयान एवं वायुयान अचानक किसी रहस्य के साए में गुम होने लगे। एक नहीं, अनेक ऐसी घटनाएँ घटी, जिनकी खोजबीन निरर्थक सिद्ध हुई। कोई भी उनके परिणाम एवं निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाया, हालाँकि वर्तमान में भी वर्तमान में भी विज्ञानवेत्ता प्रयासरत है।

इन वैज्ञानिक आंकलनों के अनुसार बरमूडा की भौगोलिक स्थिति त्रिभुजाकार है। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी अटलाँटिक महासागर के अक्षाँश 25 डिग्री से 45 डिग्री उत्तरी और देशान्तर 55 से 85 डिग्री पश्चिम के बीच फैली यह जगह काफी रहस्यमय है। इसका क्षेत्रफल लगभग 390000 वर्ग किमी. है। एक काल्पनिक रेखा मेलबोर्न से बरमूडा, बरमूडा से पुतौरिका और वहाँ से फ्लोरिडा को जाती है। यह क्षेत्र एक त्रिभुजाकार आकृति लिए हुए है। इसके तीन कोण बरमूडा, मियामी और

सेनजुआना पुतौरिका को स्पर्श करते हैं। अपने रहस्यमय क्रियाकलापों के बाद से यह बरमूड़ा ‘मौत के त्रिकोण ‘ के नाम से पूरे विश्व में जाना जाता है। यहाँ पर कंपास की चुँबकीय क्षेत्र की यह विशेषता ही अपने आप में सबसे अनोखा आश्चर्य है।

आवागमन के सुलभ मार्ग के रूप में समझा जाने वाला बरमूडा सन् 1854 में अचानक रहस्यमय घोषित हो गया। सहज-सामान्य सा बरमूडा का क्षेत्र विश्व के अनेक आश्चर्यों में से अग्रणी गिना जाने लगा, क्योंकि इसी ...... से यहाँ वायुयानों एवं जलयानों का लोप होना प्रारंभ हो गया। अनेक अन्वेषण -अनुसंधानों के बावजूद प्रकृति के इस रहस्य को अनावृत नहीं किया जा सका। यहाँ अनेक दुर्घटनाओं के बाद सर्वप्रथम जनवरी, 1880 में बरमूड़ा से इंग्लैण्ड की ओर रवाना हुआ विशाल जलयान ‘द ब्रिटिश फाइडोट’ के गुम होने का समाचार मिला। अक्टूबर 1902 में जर्मनी का जहाज क्रेया भी यहाँ पर एकाएक कहीं गायब हो गया। मई 1925 मेंहवाना की ओर जा रहा जहाज एस.एस.कोटोपक्सी जैसे ही बरमूडा क्षेत्र का स्पर्श करते हुए आगे बढ़ा उसके अस्तित्व का लोप हो गया। अप्रैल 1932 में बरमूडा में दक्षिण में 50 किलोमीटर की दूरी पर जान आर मेरी नामक दो जहाज डूब गए। फरवरी, 1940 में बरमूडा से 62 किलोमीटर दूर दक्षिण में मेरीन सल्फर क्वीन नामक प्रसिद्ध जहाज समुद्र की अतल गहराई में विलीन हो गया। इस जहाज के ठीक पीछे-पीछे टी.वी.एम.एवेंजर का पूरा सैन्य दल रवाना हुआ था। परंतु यह भी गुम हो गया। अथक प्रयासों के बाद भी इस रहस्य का रंचमात्र भी उद्घाटन नहीं किया जा सका।

इसी तरह बरमूडा क्षेत्र में हवाई जहाजों की या तो दुर्घटनाएँ हो गई या फिर ये प्रकृति के किसी गहरे रहस्य में डूब गये। 5 दिसम्बर 1945 को टी.वी.एम. एवेंजर के पाँच बमवर्षक विमान फोर्ट लाउंड्रेला नौसेना हवाई पट्टी में प्रशिक्षण उड़ान पर थे। कुछ देर पश्चात् बरमूडा के क्षेत्र में प्रवेश करते ही इनका रेडियो संपर्क स्वतः समाप्त हो गया। दो घंटे के बाद ये पाँचों वायुयान लापता हो गए। 3 जुलाई 1947 में बरमूडा से 100 मील पूरब दिशा में अमेरिकी सेना कासुपर फोर्ट सी -54 विमान भी इसी प्रकार से गुम हो गया। 29 जनवरी, 1948 को चार इंजन वाला स्टार टाइगर गुडार -4 विमान का बरमूडा से उत्तरी-पूर्वी दिशा से 380 मील दूरी पर रेडियो संपर्क टूट गया। इस विमान में आठ विमान कर्मचारी और 39 यात्री थे, जो सभी के सभी किसी अदृश्य रहस्य में खो गए। 9 जनवरी, 1949 को एक पी.वी.एम.मार्टिन बमवर्षक विमान 13 उड़ान कर्मचारियों के साथ इसी क्षेत्र में लापता हो गया।

2 फरवरी 1942 को जेमेकी की ओर आ रहा विमान ‘यार्क ट्राँसपोर्ट ‘ इस क्षेत्र की उत्तरी दिशा में ऐसा उलझा कि कहीं उसका पता तक नहीं चल पाया। 30 अक्टूबर 1945 का बरमूडा त्रिभुज के उत्तर में नौसेना के विमान सुपर कंसल्टेशन का भी ठीक यही हश्र हुआ। 5 जून 1965 की तारीख भी कुछ ऐसा हादसा अपने साथ लाई। इस दिन दक्षिण पूरब बहामास में सी - 199 फ्लाइंग बाक्सर नाम वायुयान उड़ान भरने के पश्चात् एकाएक गायब हो गया। जिसका बाद में कहीं कोई पता नहीं चल सका। 5 अप्रैल 1966 को दक्षिण-पूर्वी बहामास में बी-25 माल वाहक वायुयान गुम हो गया। 11 जनवरी 1967 को ग्राँड बहामास बहामास आर पामबीच के मध्य 7-सी कार्गो विमान इसी खाड़ी में लापता हो गया। इसी प्रकार मई 1968 का अमेरिकी पनडुब्बी ‘स्कोरपियन’ इस क्षेत्र के रहस्यमय सागर की अतल गहराई में समा गई। कई महीनों तक इस दुर्घटना की जाँच -पड़ताल व छानबीन चलती रही, परंतु इसका कोई सुराग नहीं मिल सका। कोई नहीं बता सका कि आखिर इन जहाजों एवं वायुयानों के लापता होने का रहस्य क्या है?

हालाँकि बरमूडा के इस अनुत्तरित रहस्य को अनावृत करने के लिए अगणित प्रयास -पुरुषार्थ होते रहे हैं। इस क्षेत्र ने अनेक वैज्ञानिकों , प्रकृति एवं समुद्रविदों तथा विचारकों को अपनी ओर आकर्षित किया है। वैज्ञानिकों ने जहाँ इसकी अपने प्रयोगों के माध्यम से खोजबीन की है, वहीं साहित्यकारों के लिए यह क्षेत्र रोचक कथाओं की विषयवस्तु सिद्ध हुआ है। सन् 1964 ई. में प्रख्यात लेखक चार्ल्स विर्लीज ने तो इस पर एक रोचक पुस्तक लिख डाली , जो काफी लोकप्रिय सिद्ध हुई। अनुमान के आधार पर इसे ब्रह्माण्डीय चमत्कार से भी जोड़ा जाता है। आधुनिक विज्ञानवेत्ता इसे धरती का ब्लैकहोल भी मानते हैं। वैज्ञानिक आकलन के अनुसार ब्लैक होल में गुरुत्वाकर्षण शक्ति इतनी तीव्र होती है कि बड़े-बड़े खगोलीय पिंड एवं बड़ी बड़ी वस्तुएं इसके उदर में समा कर विलीन हो जाती हैं। वैज्ञानिक अनुमान यह भी कहते हैं कि संभवतः सुदूर ब्रह्माँड के किसी अन्य ग्रह के निवासी ब्रह्माँड के अन्यान्य ग्रहों में जाने के लिए ब्लैकहोल का प्रयोग करते हैं। बरमूडा त्रिकोण को इसी संभावना से जोड़ा गया है। समुद्र विद्या कि वैज्ञानिकों के अनुसार बरमूडा त्रिकोण में अचानक सागर खौलने लगता है और उस समय इसकी सतह पर से अथवा इसके ऊपर से जो कुछ गुजर रहा होता है , वह गायब हो जाता है। इस बारे में एक और कल्पना की जाती है कि जब कोई अदृश्य अंतरिक्षयान यहाँ आता है, तब उसके अपरिमित वेग से समुद्र खौलने लगता है और वह यान यहाँ से गुजरने वाले जहाज या विमान को पलक झपकते ही उठाकर ले जाता है।

अंततः इस ब्रह्माँडीय चमत्कार का रहस्य रसायनविदों की प्रयोगशाला तक भी जा पहुँचा है। रसायनविदों ने इस रहस्य को ‘मीथेन हाइड्रेड ‘ नामक रसायन के द्वारा सुलझाने एवं समझाने का प्रयास किया है। बरमूडा त्रिकोण के इस रहस्य को रासायनिक तत्वों से सुलझाने वाला यह प्रयोग अत्याधुनिक है। रसायन शास्त्रियों के अनुसार पर्याप्त गैस, जल, ठंड व उच्चदाब की स्थिति में हाइड्रोजन , होलियम तथा नियोन गैसों के अलावा सभी गैसें जल से क्रिया करती है। इससे हाइड्रेट यौगिक का निर्माण होता है। हाइड्रेड काफी ठंडा एवं दाबयुक्त यौगिक है। जीवन वायु आक्सीजन के अन्वेषक जोसेफ प्रीस्टले ने 1780 के दशक में ऑक्सीजन हाइड्रेट नामक यौगिक का निर्माण किया था। सन् 1810 में सर हम्फ्री डेवी ने क्लोरीन हाइड्रेट बनाया था। ये सभी हाइड्रेट यौगिक अत्यंत ठंडे थे। सन् 1928 में सोवियत श्रमिकों ने समुद्र के अंदर बिछाई गई प्राकृतिक गैस की पाइप लाइनों में शीत से सनसनाती अद्भुत बरफ जमी देखी । इसके ठीक छह वर्ष बाद अमेरिकी रसायनवेत्ता ई.जी.हेमरस्मिथ ने इस बरफ को मीथेन हाइड्रेट के रूप में पहचाना। यही वह रसायन है, जिसके माध्यम से रसायनशास्त्री बरमूडा के रहस्य को सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं।

ई. जी. हेमरस्मिथ ने प्रयोग के दौरान देखा कि मीथेन हाइड्रेट या मीथेन जल परमाणुओं में दबे रहते हैं। ये यहाँ पर गैस के उच्चदाब और अत्यधिक ठंड के कारण बने रहते हैं। सन् 1920 में वैज्ञानिकों ने कजाकिस्तान के समुद्र में गैस पाइपों के अंदर जमी सरद मीथेन हाइड्रेट की एक लीटर मात्रा को जब सामान्य ताप पर लाकर रखा, तो इसका विस्तार 137 मीटर मटमैली गैस और कीचड़ सदृश पानी के रूप में हुआ। ई. जी. हेमरस्मिथ ने अपने अनुसंधानों के दौरान पाया कि चिरतुषार ही वह स्थान है , जहाँ मीथेन हाइड्रेट बनने के लिए अनुकूल तापमान व दबाव की स्थितियाँ होती है। समुद्र में मीथेन हाइड्रेट बनने के कई और भी कारण होते हैं। हेमरस्मिथ ने जब समुद्र तल पर ड्रिल किया तो एक आश्चर्यजनक घटना देखी। वास्तविकता तल से कुछ सौ मीटर नीचे एक और समुद्रतल की छाया का आभास हुआ। इस तल का आभास होने का तात्पर्य था - हाइड्रेट गैस परतों की उपस्थिति का संकेत । वैज्ञानिकों ने इसे ‘तल रूपधारी प्रतिबिंबक’ (वाटर सिमुलेटिंग रिफ्लेक्टर अथवा बी.एस.आर) का नाम दिया है। यह बी.एस.आर. समूचे विश्व में महाद्वीपीय समुद्री ढलानों के इर्द-गिर्द पाया जाता है।

मीथेन गैस को अत्यधिक सावधानीपूर्वक निकाला जाता है अन्यथा यह भरमाकर अपनी ताँडव लीला प्रदर्शित करती है। सन् 1981 में भू-रसायनविद् मैकलेवर ने पहली बार इसका संबंध बरमूडा क्षेत्र से जोड़ा । समुद्र में जहाज के लिए जल एक परिवर्तनशील माध्यम है। यह परिवर्तनशीलता जल के उछाल , खारेपन और तापमान पर निर्भर करती है। इसी कारण भारीभरकम जहाज तैरता हुआ अपने गंतव्य तक पहुँचता है। जहाज नदी में गहरा डूबकर चलता है, जबकि समुद्र के जल में यह काफी उथला डूबकर गति करता है। यह उसके घनत्व पर निर्भर करता है। ऐसी स्थिति में जब मीथेन हाइड्रेट विस्फोट होकर अचानक समुद्र जल से उठकर समुद्र में फैल जाता है तो वह अपने चपेट में जहाज को डुबा सकता है।

ऐसी स्थिति में गुबार के कारण सतह के नीचे का जल अत्यंत पतला हो जाता है अर्थात् घनत्व के एकाएक घट जाने से जहाज क्षणमात्र में ही अतल गहराइयों में चला जाता है। डूबा हुआ जहाज या विमान समुद्र की गहराइयों में खिच जाता है और वह्म्र्र्र्रँ पर मुक्त गैस के कारण उठे तलछट से ढक जाता है । इसी तरह अब तक चालीस जहाज समुद्र का गहराइयों में समा चुके हैं।यह गैस ऊपर उड़ते वायुयान को भी अपने उदर में समा लेती है। मीथेन के मुक्त होने के पश्चात् यह अनवरत वायुमंडल में फैलती रहती हैं विमान दो तरह से इस गैसीय बादल की उलझन में फँसता है। पहला तो मीथेन साँद्र होने के कारण विमान में ऑक्सीजन का अभाव पैदा कर देती है और विमान का इंजन काम करना बंद कर देता है। इसी के साथ यह विमान प्राणहीन पंछी के समान समुद्र में गिरकर उसकी गहराई में खो जाता है। दूसरा संकट है कि सतह से ऊपर उठने वाले गुबार में 5 से 10 प्रतिशत मीथेन होती है। यह ज्वलनशील ने के कारण इंजन का एकदम गरम करे निष्क्रिय कर देती है। अंततः विमान का वही हाल होता है।

परंतु यह सब होता क्यों है? इस सवाल का यथार्थ जवाब तो प्रकृति के अनसुलझे रहस्यों में ही निहित है। प्रकृति सदा ही परिस्थितियों को परिवर्तित करती रहती है।भू-स्खलन भी एक परिवर्तन है, जो न केवल पहाड़ों पर्वतों में होता है, बल्कि समुद्र की तलहटी में भी होता है। यह मीथेन हाइड्रेट गैस की परतों को तोड़कर मीथेन को मुक्त करता है। अमेरिकी भौगोलिक सर्वेक्षण के अनुसार बरमूड़ा की समुद्र तलहटी में मीथेन का अकृत भंडार भरा पड़ा है। यही प्राकृतिक विभीषिकाओं का रूप धारण कर विपदाओं का न्योता देता रहता है। फिर भी अपने अनुसंधानों के निष्कर्ष पर अभी तक सारे वैज्ञानिक एकमत नहीं हो पाए हैं - अगणित वैज्ञानिक प्रयोगों के पश्चात् भी कई तरह के प्रश्न मुँह बाए खड़े हैं, जिनका कोई हल-समाधान नहीं मिल पा रहा है।विज्ञानविद् भी मानते हैं कि प्रकृति के रहस्यों का भेदना अति कठिन है। बरमूडा त्रिकोण इस बात का प्रमाण है , जो इस सच्चाई का बोध कराता है कि मानवीय बुद्धि से परे भी बहुत कुछ है, जो अदृश्य -अनजाना होने के बावजूद हमें सत्य की झलक देता है।


असंतोष दूर हो गया (kahani)

वन में खड़े एक पौधे के साथ लिपटी हुई एक लता भी धीरे-धीरे बढ़कर पौधे के बराबर हो गई। पौधे का आश्रय लेकर उसने फलना -फूलना आरंभ कर दिया। बेल को फलते-फूलते देखकर वृक्ष को अहंकार हो गया कि मैं न होता तो लता कब की नष्ट हो गई होती। उसने धमकाते हुए कहा -”ओ री बेल! मैं तो तुझे मार भगा दूँगा।”

अभी वह लता को डाँट ही रहा था कि दो पथिक उधर से निकले। एक बोला -”बंधु ! देखिए, यह वृक्ष कसा शीतल और सुँदर है। इस पर कैसी अच्छी लता पुष्पित हो रही है। आओ यहाँ कुछ देर बैठकर विश्राम करें।”

अपना सारा महत्व लता के साथ है, यह सुनकर वृक्ष का सारा अभिमान नष्ट हो गया, उस दिन से उसने लता का धमकाना बंद कर दिया।

कथा का मर्म समझाते हुए संत बोले - “भक्तों ! नारी के साथ जुड़ा होने से ही नर का महत्व हैं। दोनों एक दूसरे के सहयोगी सहचर हैं। ऐसे में किसी एक का कनिष्ठ-वरिष्ठ नहीं माना जाना चाहिए।”

वनवास काल में पाँडव काम्यक वन में थे। श्रीकृष्ण सत्यभामा समेत उनसे मिलने गए। सत्यभामा ने द्रौपदी के प्रति पाँडवों की अत्यधिक संतुष्टि और प्रसन्नता देखकर उन्हें एकाँत में ले जाकर कारण पूछा और कहा -”हम इतनी पत्नियाँ होते हुए भी कृष्ण का मन जीत नहीं पाती?”

द्रौपदी ने कहा- “तुम लोग हास-विलासिता को प्रसन्नता का माध्यम मानती हो, जबकि मैं व्यवस्था और परामर्श देकर उनके अनेक समाधान करती रहती हूँ। इसीलिए काले वर्ण की होने पर भी एक नहीं पाँचों पतियों और छठी सास की प्राणप्रिय हूँ। तुम लाग आलस्य आर विलास अपनाकर उपयोगिता की दृष्टि से घटिया हो गई हो।”

सत्यभामा ने बात गाँठ बाँध ली और वापस लौटने पर यह रहस्य अपनी अन्य सहेलियों को बता दिया। असंतोष दूर हो गया।


Quotation

परिवार बहुमुखी प्रेम का अभ्यास गुरुकुल है। उसे तपोवन बनाकर स्वर्ग तुल्य बनाया जा सकता है।


मन की तल्लीनता ही है ‘चित्तवृत्ति ‘ निरोध की धुरी

मन को वश में रखने के लिए अध्यात्म प्रसंगों में सदा कहा और दोहराया जाता है, पर यह नहीं बताया जाता कि यह किस प्रकार किया जाए? इसके लिए ध्यान, प्राणायाम जैसी विधियाँ बताई जाती है , पर देखा गया है कि इन विधाओं को अपनाने पर भी मन एकाग्र नहीं होता, पकड़ पकड़कर बिठाने पर भी मेंढक की तरह उछल जाता है । क्षणभर का अवसर मिलते ही कहीं से कहीं पहुंचता है। इस पकड़ -धकड़ में प्रयत्न क्र्र्र्र्र्र्र्र्र 0217 ही थकता है। चंचलता तो मन का स्वभाव ही ठहरा। वह पवन की तरह एक जगह स्थिर नहीं रह सकता। पखेरू की तरह उसके उड़ते रहने जैसी आदत जा है। हिरन को पकड़कर बाँधना उसे हाथ पाँव तोड़ लेने के लिए बाध्य करता है।

मन रस की खोज में मारा-मारा फिरता है। उसे उसी की लगन और ललक है। कस्तूरी हिरन को उस गंध के प्रति अत्यधिक लगाव होता है। उसी को खोजने के लिए, पाने के लिए वह लालायित होता है। जिधर भी मुँह उठता है, उधर ही दौड़ पड़ता है। यह भाग दौड़ तब तक जारी रहती है, जब तक कि उसे गंध के उद्गम का पता नहीं चल जाता।

मन को सरसता चाहिए- ऐसी स्थिति , जिसमें रसास्वादन का अवसर मिले, आनन्द की अनुभूति हो। नीरस क्रियाकलापों में उसे रुचि नहीं हो पाती, इसलिए वह अपना अभीष्ट तलाशने दूसरी जगह चल पड़ता है।तितलियाँ , भौंरे जहाँ तहाँ उड़ते फिरते हैं, पर जब उन्हें सुगंध भर फूल मिल जाते हैं, तब शाँति के साथ स्थिरतापूर्वक बैठ जाते हैं और प्रमुदित होकर समय गुजारते हैं । फिर उन्हें उचटने-उखड़ने की आवश्यकता नहीं रहती। यहाँ बंधन उसके लिए कारगर होता है कि जिसकी तलाश है, उसे उपलब्ध करा दिया जाए। डोरी से जकड़ने पर तापशु भी अपने हाथ-पैर तुड़ा लेते हैं। विवशता में ही कोई कैद में रहना स्वीकार करता है। हथकड़ी बेड़ी बैरक , ताला संतरी आदि की व्यवस्था न हो तो कोई कैदी जेल में रहना स्वीकार न करे। खिड़की खुलते ही तोता पिंजरे से निकल भागता है। और फिर पीछे की ओर देखता तक नहीं। यही बात मन के संबंध में भी कही जा सकती है। उसे नीरसता पसंद नहीं, इसलिए उसे जिस-तिस खूँटे से बाँधने पर भी स्थिरता अपनाते नहीं बनती। उसे उन्मुक्त आकाश के मनोरम दृश्य देखने का चाव जो है। “

मन को वश में करने के अनेकानेक लाभ हैं। वह शक्तियों और विभूतियों का पुँज है। मन जिस काम में भी लगता है उसे जादुई ढंग से पूरा करके रहता है। कलाकार , वैज्ञानिक , सिद्धपुरुष , महामानव , सफल , संपन्न सभी को वे लाभ मन की एकाग्रता और तन्मयता के आधार पर मिल हुए होते हैं। इस तथ्य को जानने वाले इस कल्पवृक्ष का पूरा-पूरा लाभ उठाते हैं। भला दुधारू गाय को , अरबी घोड़े को कोई क्यों नहीं चाहेगा? पर वह हाथ आए तब न।

आमतौर से कामुकता, जिह्वा-स्वाद , सैर-सपाटे विलास वैभव यश सम्मान पान की सभी की इच्छा होती है। उन्हीं को खोजने की मन कल्पनाएँ करता और उड़ानें उड़ता रहता है। विकल्प जब दूसरा नहीं दीखता तो उसी कुचक्र में उलझे रहना पड़ता है। जहाज के मस्तूल पर बैठे कौवे को कोई और गंतव्य भी तो नहीं दीखता। मन का कोई ऐसा स्थान या ऐसा काम जो उसकी रुचि का हो, उसे सुहाए, मिलना चाहिए।

अधिक के पास मनुष्य वही थकता। थकता है अन्यमनस्कता और अस्तव्यस्तता से।

रुचियाँ न किसी की सदा एक-सी रही हैं, न आमतौर पर रहती है। वे बदलती रहती हैं या बदली जा सकती है। छोटे बच्चे खिलौनों के लिए मचलते हैं। कुछ बड़े होने पर सामर्थ्यों के साथ खेल-खिलवाड़ के लिए उत्सुक रहते हैं। तरुण होने पर धन कमाने गृहस्थ बनने की इच्छा होती है। बूढ़े होने पर विश्राम करना और चैन से दिन काटना सुहाता है। ये परिवर्तन बताते हैं कि मन का कोई एक निश्चित रुचि-केन्द्र नहीं है। व्यक्तित्व के विकास और परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ वह अपना रुझान बदलता रहता है। जमीन के ढलान के अनुरूप नदी -नाले अपनी दिशा मोड़ते और चाल बदलते रहते हैं। मन का भी यही हाल है। वह चट्टान की तरह हठीला नहीं, मिट्टी की तरह उसे गीला किया जा सकता है और चतुर कुम्हार की तरह किसी भी साँचे में ढाला जा सकता है। इस बदलाव में आरंभिक अड़चने तो आती हैं, पर सिखाने साधने पर सरकस के जानवरों की तरह ऐसे तमाशे दिखाने लगता है , जो उनकी जन्मजात प्रकृति के अनुरूप नहीं होते। मन को भी इसी प्रकार एक दिशा से दूसरी दिशा में ले जाया जा सकता है। एक प्रकार के अभ्यास से विरत करके दूसरे प्रकार के स्वभाव का बनाया जा सकता है।

जंगली वन्य पशु अनाड़ियों की तरह भटकते हैं, पर जब वे पालतू बन जाते हैं तो मालिक की इच्छानुसार अपनी गतिविधियों को बदल देते हैं। मन के संबंध में भी यही बात कही जा सकती है। उसकी रँगीली उड़ानें वासना तृष्णा की जन्म-जन्मांतरों से अभ्यस्त रही है, इसलिए इस जन्म में भी वही पुराना-पहचाना मार्ग ही जाना पहचाना, समझा-बुझा लगता है, अतएव स्वेच्छाचार के लिए वह आतुर फिरता है। किंतु मनुष्य पर अनेक बंधन है। पशुओं की तरह वह कुछ भी कर गुजरने के लिए स्वतंत्र रहने के लिए विवश करती हैं ।मर्यादाएँ वर्जनाएँ जिम्मेदारियाँ एक सीमा तक ही उसे स्वतंत्र रहने के लिए विवश करती हैं। अस्तु, एक जगह काम बनता न देखकर मन दूसरी जगह दौड़ता है।मृग तृष्णा में भटकने वाले हिरन की तरह उसकी कुलाँचे मार्ग कुमार्ग पर भटकती रहती है। कल्पनाओं के अंबार छाए रहते हैं। बंदर जैसी उछल कूद जारी रहती है। किसी डाली पर दर तक बैठे रहने की अपेक्षा उसे जिस-तिस का रंग-ढंग देखने और उन्हें हिलाने पर मिलने वाले चित्र विचित्र अनुभव की तरह विभिन्नताएँ और विचित्रताएँ देखने की उमंग उठती रहती है। यही है मन की भगदड़ जिसे रोकने के लिए मूलभूत आधार बदलने की आवश्यकता पड़ती है।

मन का केंद्र बदला जा सकता है। पशु -प्रवृत्तियों की पगडंडियाँ उसकी देखी भाली हैं, पर मानवी गरिमा का स्वरूप समझने और उसके शानदार प्रतिफल का अनुमान लगाने का अवसर तो उसे इसी बार इसी शरीर में मिला है, इसलिए अजनबी मन की अड़चन होते हुए भी तर्क , तथ्य, प्रमाण तथा उदाहरणों के सहारे उसे यह समझाया-जताया जा सकता है कि पशु -प्रवृत्तियों की तुलना में मानवी गरिमा की कितनी अधिक श्रेष्ठता है? विवेकशीलता के आधार पर यह निर्णय निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आदर्शवादिता और कर्त्तव्यपरायणता अपनाने पर उसके कितने उच्चस्तरीय परिणाम प्रस्तुत हो सकते हैं?

जप-तप द्वारा मन को निग्रहित तो किया जा सकता है, पर आज हथेली पर सरसों जमाने की तरह उसका प्रतिफल लोग तत्काल चाहते हैं। धैर्य और निष्ठा के अभाव में यह असंभव है । इसके अतिरिक्त जप ध्यान की कुछ परंपराओं में यहाँ तक कहा जाता है कि मन को अपना कार्य करे। उनका तर्क है कि मन का अपना रास रचाते रहने देने की छूट देकर हम उसके विकार और विकृति को निकलने देने में सहायक होते हैं। इससे उसे बलपूर्वक रोकना उसकी शुद्धि प्रक्रिया में बाधा डालता और विकृति को निकलने देने में सहायक होते हैं। इससे उसे बलपूर्वक रोकना उसकी शुद्धि प्रक्रिया में बाधा डालता और स्वाभाविकता का भंग करता है। यह तो वैसी ही बात हुई, जैसे किसी साधक को असंयम की छूट मिल जाए। वह यौनाचार भी बरते और साधन भी करे। यौन सुख चाहने वालों को साधना में सफलता नहीं मिल सकती । इसी प्रकार जो सिद्ध -साधक बनना चाहते हैं, उन्हें यौन इच्छा को तिलाँजलि देनी होगी। इतना ही नहीं, हर प्रकार से मन को नियंत्रित करना पड़ेगा।ये दो विपरीत और विरोधाभासी स्थितियाँ हैं। इससे असमंजस पैदा होता और दुविधा उत्पन्न होती है, अतएव वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मानसिक निरोध के लिए कोई सरल और सुविधाजनक उपाय ढूंढ़ना पड़ेगा। यह कर्मयोग के अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं हो सकता।

पुराने ढंग की ईश्वरभक्ति में मन लगाने और साधनाओं में रुचि लेने के लिए परामर्श दिया जाता है, किंतु पुरातन तत्वज्ञान को हृदयंगम कराए बिना उस दिशा में न तो विश्वास जमता है , न मन टिकता है। बदली हुई परिस्थितियों में हम कर्मयोग का ईश्वरप्राप्ति का आधार मान सकते हैं। कर्त्तव्य को, संयम को, नीति-नियम एवं पुण्य -परमार्थ को ईश्वर का निराकार रूप मान सकते हैं। कार्यों के साथ आदर्शवादिता का समावेश रखा जा सके तो वह सम्मिश्रण इतना मधुर एवं सरस बन जाता है कि उस पर मन टिक सके। बया अपने घोंसले को प्रतिष्ठा का प्रश्न मानकर तन्मयतापूर्वक बनाती है। हम भी अपने क्रियाकलापों में मानवी गरिमा एवं सेवाभावना का समावेश रखें तो उस केंद्र पर भी मन की तादात्म्यता स्थिर हो सकती, उसे इस प्रकार भी नियमित-नियंत्रित किया जा सकता है।


आदर्श अर्द्धांगिनी (kahani)

सुकरात की पत्नी कर्कश स्वभाव की थी। पति को भी परमार्थ कार्यों से रोकती और जो मिलने आते, उन्हें भी कोसती। सोचती इसमें लाभ नहीं होता, घाटा पड़ता है।

एक दिन सत्संग गोष्ठी चल रही थी। पत्नी ने छत पर से उन सबके ऊपर गंदा पानी उलीच दिया और गंदी गलियाँ सुनाई। वातावरण में आक्रोश पनपा। आगंतुकों ने इसे अपमान माना।सुकरात ने सूझबूझ से काम लिया। उन्होंने क्रोध को विनोद में बदला। हँसते हुए कहा -”आज वह किंवदंती मिथ्या हो गई, जिसमें कहा जाता है कि जो गरजते हैं वे बरसते नहीं, आज तो गरजना -बरसना साथ-साथ हो रहा है। “ क्रोध , हँसी में बदल गया। गीले कपड़े सुखाने के लिए डाल दिए गए और विचारगोष्ठी फिर उसी संतुलित वातावरण में चलने लगी। चलते समय सुकरात ने सिखाया - “प्रतिकूलता में भी संतुलन बना लेना दूरदर्शिता की कसौटी है।” उनके इसी गुण के कारण उनका दाँपत्य जीवन अच्छी तरह निभा। पत्नी ने क्रमशः अपने को सुधारा एवं एक आदर्श अर्द्धांगिनी बनकर रहीं।


चरैवेति -चरैवेति सिद्धाँत को अपनाते ये परिव्राजक पशु -पक्षी

जीवन का मूल मंत्र है- “चलते रहो- चलते रहो” इसे मानव ही नहीं , अन्य जीवों को भी अपनाना पड़ता है। जीवन उत्कृष्ट एवं सुखी हो, वातावरण के साथ शारीरिक स्थिति का समुचित तालमेल बैठ सके, इसके लिए यात्रा इतनी जोखिम भरी और इतने दूरस्थ क्षेत्रों के लिए होती है कि हैरत में रह जाना पड़ता है। सर्वसाधन संपन्न मानव ऐसी यात्राएँ करें तो समझ में आता है , परंतु साधनविहीन पक्षी एवं अन्य जीव यह कार्य संपन्न करें तो यही कहना पड़ेगा कि निश्चित ही प्रकृति ने इन्हें कुछ अलौकिक और अनूठे अनुदान दिए हैं। पक्षियों की यह रोमाँचक प्रव्रज्या मानवीय बुद्धि के लिए चुनौती से कम नहीं है।

देखा यही जाता है कि ज्यादातर जीव-जंतुओं को वातावरण और मौसम के परिवर्तनों से जूझना पड़ता है। इसी के अंतर्गत इन्हें प्रजनन एवं नवजात के पोषण व विकास के लिए उचित स्थान की खोज रहती है और ऐसी ही खोज में कुछ तो हजारों किलोमीटर लंबी यात्रा पर निकल पड़ते हैं। ह्वेल मछली की देशाँतर प्रव्रज्या कुछ इसी प्रकार की हैं, जिसे ठंडे ध्रुवीय क्षेत्रों से गर्म भूमध्य रेखीय क्षेत्रों की ओर देशाँतरण करना पड़ता है जा कि प्रजनन-पाषण के लिए सर्वथा उपयुक्त है। धूसर ह्वेल मैक्सिको के शाँत समुद्रतल में प्रजनन करती है, किंतु बसंत तक जब शिशु बड़े व सशक्त हो जाते हैं, तब वह आर्कटिक की लंबी यात्रा शुरू करती है आर पतझड़ तक वापस आ जाती है। यह यात्रा कुल मिलाकर 18000 किलोमीटर लंबी हो जाती है।

विश्व की सबसे आश्चर्यजनक एवं अपूर्ण प्रव्रज्या मैक्सिको एवं कनाडा के बीच होती है। इसकी नायिका है छोटा सा जीव मोनार्च तितली। मजेदार बात यह है कि इस यात्रा में इसकी कई पीढ़ियां खप जाती हैं। सर्दियां ये मैक्सिको की पहाड़ियों में बिताती हैं। लाखों की संख्या में यहाँ ये शीतनिद्रा की समाधि में चली जाती है। बसंत के आते ही सक्रिय हो उठती है। व जोड़ा बनाकर उत्तर की ओर उड़ान भरती हैं और संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिणी प्रांतों में विश्राम करती हैं। यहाँ अंडे देती हैं व शिशुओं का पालन पोषण करती हैं। बस इनका काम यहीं समाप्त हो जाता है। नई पीढ़ी अपनी यात्रा उत्तर की ओर जारी रखती है और वाशिंगटन डी.सी.तक पहुंचने में एक पीढ़ी और खप जाती है। वापसी की 3000 किमी. लंबी यात्रा कनाडा की गरमी में जन्में नवजातों द्वारा शुरू होती है, जिनके परदादे छह माह पूर्व मैक्सिको से चल पड़े थे।

अफ्रीका के मैदानों में विचरण करने वाले चितकबरे ‘ग्नू’ की प्रव्रज्या वर्षभर आहारपूर्ति के उद्देश्य से चलती रहती है। दिसंबर से अप्रैल तक दक्षिण -पूरब के मैदान हरी घास से ढके रहते हैं और जल भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहता है, जहाँ नवजात बछड़ों का भरण−पोषण भली भाँति हो जाता है, किंतु मई -जून का गरमी में मैदान बंजर हो जाते हैं और पानी के स्त्रोत भी सूख जाते हैं। जल एवं खाद्य के इस संकट के समाधान में ग्नू के झुँड विक्टोरिया झील की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। मार्ग की कोई बाधा इन्हें नहीं रोक सकती। थकान , तीव्र प्रवाहिनी नदियाँ , शेर -चीतों के हमलों की परवाह न करते हुए ये अपनी यात्रा उत्तर की ओर जारी रखते हैं और अगस्त तक विक्टोरिया पहुँच जाते हैं, जहाँ जल एवं घास पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहते हैं। नवंबर के तूफानी बादल वापसी का संदेश लेकर आते हैं और ये वर्षा का अनुसरण करते हुए अपनी प्रिय जन्मभूमि की ओर चल पड़ते हैं।

परिव्राजक जीव-जंतुओं में सबसे लंबी उड़ान उत्तरी ध्रुव का आर्कटिक पक्षी टर्न भरता है। जो एक वर्ष में 25000 किलोमीटर से भी लंबी यात्रा करता है। यह वसंत के बाद के मौसम में अंडे देता है व गरमी के मौसम में नवजात चूजों का पुष्ट करता है। पतझड़ के आते ही असाधारण तितिक्षा का परिचय देते हुए दक्षिणी ध्रुव की ओर लंबी यात्रा पर निकल पड़ता है और भूमध्यरेखा को पार करते हुए दक्षिण ध्रुवीय प्रदेश अंटार्कटिका पहुँच जाता है । यहाँ पर उपलब्ध प्रचुर खाद्य सामग्री का लाभ लेते हुए सर्दियां यही बिताते हैं और बसंत आते ही अपनी दूरस्थ यात्रा पर निकल पड़ता है तथा गरमी से पहल ही आर्कटिक के उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र में पहुँच जाता है।

इसी तरह प्रत्येक वर्ष सरदी शुरू होते ही 300 से भी अधिक प्रजातियों के पक्षी अत्यधिक ठंड वाले मध्य एशियाई , पूर्वी यूरोप एवं साइबेरियाई क्षेत्रों से उड़ान भरकर यहाँ पहुँचते हैं। इनमें चार फीट ऊँची गरदन वाले सारस एवं नन्हें पाइप्स क्वैक कार्बलर्स झुँड के झुँड शोर मचाते जलपक्षी , लंबी टाँगों वाले पक्षी एवं रेड स्टार्ट जैसे सभ्य आगंतुक यहाँ आते हैं।इनकी प्रव्रज्या का प्रमुख कारण कड़ी सर्दियों में पर्याप्त भोजन की तलाश होती है। जाड़ों में उत्तरी गोलार्द्ध के मैदान , जहाँ ये पक्षी प्रजनन करते हैं, जम जाते हैं और पौधे एवं कीट मर जाते हैं।इस प्रकार इन पक्षियों के पास दक्षिण के गरम एवं आरामदायक मौसम की ओर जाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होता। बाद में फिर वसंत आता है और इन उत्तरी मैदानों में जीवन मुस्कराने लगता है , तब ये पक्षी वापस जाते हैं।

अटलाँटिक महासागर में रहने वाली सालमन मछली की प्रव्रज्या इनमें से सबसे अधिक दुष्कर मानी जाती है। यह अपनी प्रव्रज्या जीवन में सिर्फ एक बार ही कर पाती है क्योंकि प्रव्रज्या का उद्देश्य पूरा होते ही उसके प्राण पखेरू भी उड़ जाते हैं। सागर में रह रही मछली अपना मार्ग खोजने में अपनी घ्राणशक्ति का उपयोग करती है। मार्ग की गंध का अहसास उसने केवल एक बार किया होता है। जब वह जन्म के बाद नदियों के शीतल क्षेत्र से सागर की यात्रा पर निकली थी। मुहाने में प्रवेश करते ही सालमन नदी की धारा चीरते हुए अपनी कठिन यात्रा शुरू करती है। उसका अदम्य उत्साह दस फीट तक ऊँचे जलप्रपातों को कूदकर पार कर जाता है। यहीं कुछ, सालमन के शिकार की प्रतीक्षा में बैठे ध्रुवीय भालुओं का भोजन बन जाती है। सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करते हुए अपने गंतव्य स्थल में पहुँचने पर ही सालमन विश्राम करती है। यहाँ के जमने वाले, किन्तु साफ पानी में मादा अंडे छोड़ती है और नर अपने शुक्राणु । थकी-हारी एवं जीर्ण शीर्ण अवस्था में सालमन जल्दी ही दम तोड़ देती है। यहाँ उसके मृत शरीर का अपघटन नदी के पोषक तत्वों की वृद्धि करता है व यह युवा सालमन के काम आता है। नवजात सालमन में प्रजनन शक्ति का विकास तीव्रगति के साथ अपने शारीरिक विकास के साथ शुरू हो जाता है। कुछ महीनों के बाद खुले सागर की तलाश में ये नदी प्रवाह के साथ यात्रा शुरू कर देते हैं। प्रौढ़ावस्था के तीन -चार वर्ष बाद पुनः उसी पथ से नदियों की सुदूर शीतल एवं स्वच्छ प्रजनन भूमि की ओर श्रमसाध्य प्रव्रज्या का लंबा दौर शुरू होता है।

पशु-पक्षियों , मछलियों की ये दूरस्थ व विकट यात्राएँ क्यों और कैसे संपन्न होती हैं? ये प्रश्न अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। गंतव्य स्थान की ओर बिना किसी सिग्नल के कैसे यात्रा तय ही जाती है, यह एक जटिल विषय है। लेदर बैंक कछुआ अंतर्जलीय पर्वत एवं घाटियों के सम्मोच नक्शे के साथ मार्गदर्शन पाता है। ईल व सालमन कुछ जलीय प्रवाह व कुछ सागर के तापमान व संरचना में परिवर्तन पर निर्भर करती हैं। वैसे सालमन में घ्राणशक्ति प्रमुख रहती है, क्योंकि उसका नासिका छिद्र यदि किसी तरह बंद हो जाए तो वह मार्ग भटक जाती है। चितकबरा ग्नू घ्राण व दृष्टि , दोनों शक्तियों की सहायता लेता है।

सबसे ध्यानाकर्षक किस्सा उन युवा पक्षियों का है, जो बिना किसी प्रौढ़ के संग के पहली बार दूरस्थ प्रव्रज्या पर निकलते हैं। परिव्राजक टर्न की प्रव्रज्या में भू-चिह्न का सहयोग भी नहीं दिखता , क्योंकि ये रात को उड़ते हैं और सागर को पार करते हैं, जहाँ ऐसे संकेत सूचनाएँ उपलब्ध नहीं होतीं। इस संदर्भ में कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि इन पक्षियों में ‘जेनेटिक कोड’ के रूप में यात्रा का समग्र आकाशीय चार्ट विद्यमान होता है। ये शायद इसके साथ अपनी दिशासूचक चुँबकीय सुई का उपयोग करते हैं, जो उनकी आँख मस्तिष्क के मध्य छोटे से ऊतक समूह के रूप में विद्यमान होती है। इन दोनों के सहयोग से ये पृथ्वी के चुँबकीय क्षेत्र के अनुरूप अपना मार्ग तय करते हैं, साथ ही यह भी रहस्योद्घाटन हुआ है कि ये पक्षी आकाश में ध्रुवीय प्रकाश को पकड़ने में सक्षम होते हैं, जो इनके मार्ग-बोध में सहायता करता है। वैज्ञानिक सत्य जो भी हो पर प्रकृति ने इन्हें अनूठा और अलौकिक उपहार अवश्य दिया है जिससे ये अपने जीवन सत्य का बोध पाते हैं -निरालस्य होकर अपने जीवन की चुनौतियाँ का सामना करते हैं। एक हम बुद्धिमान् एवं क्षमतावान् कहे जाने वाले मनुष्य हैं , जो तमोगुण और आलस्य में घिरकर, चरैवेति-चरैवेति का वैदिक सत्य भूल बैठे, जिसे हमारे पूर्वज महर्षियों ने दिया था।


Quotation

बुद्धिमत्ता एक ही है कि संसार को उसके यथार्थ रूप में देखना और जैसा भी कुछ वह है उससे निपटना।


सफाई की संभावना कैसे (kahani)

शमीन यहूदी साहूकार था, साथ ही धर्मात्मा भी। ईसा को उसने अपने यहाँ भोजन पर बुलाया और वे गए भी। उसी गाँव में एक वेश्या भी रहती थी। नाम था मेरी। मेरी भी ईसा के चरणों में पहुँची और आतिथ्य स्वीकार करने का आग्रह करने लगी।ईसा ने उसे स्वीकार कर लिया और दूसरे दिन उसके यहाँ गए भी ।

यह प्रसंग शिष्यमंडली में चर्चा का विषय बन गया। कानाफूसी होने लगी। वेश्या के यहाँ संत-भगवान् का जाना अनुचित है। बात ईसा के कानों तक पहुँची , उन्होंने शिष्यों को बुलाया और कहा- जो प्रायश्चित करता है , सो पवित्र है। पापी तो वह है, जो दृष्टता पर अड़ा रहे। मन बदलने के बाद कोई वैसा नहीं रहता, जैसा पहले था।” वेश्या ने व्यवहार बदला और सज्जनों की तरह रहने लगी। कुछ दिन बाद ईसा ने मंडली को बुलाया और मेरी का प्रसंग बताते हुए कहा- “यदि बुहारी गंदगी तक न पहुँचे , तो सफाई की संभावना कैसे बने?”


प्राण विद्या पर आधारित एक निरापद चिकित्सा पद्धति -रेकी

प्राणविद्या से उपचार की पद्धति अति प्राचीन परंपरा है। दुनिया के अनेक देशों में इसके अलग प्रयोगों एवं परीक्षण की जानकारी मिलती है। अपना देश भारत तो सदा से इसका उद्गम स्त्रोत रहा है।इसी क्रम में इन दिनों रेकी चिकित्सा की बहुचर्चित एवं बहुप्रचलित होती जा रही है। जहाँ तक ‘रेकी’ शब्द का संबंध है, यह जापानी भाषा का शब्द है। इसका अर्थ है -विश्वव्यापी जीवनी शक्ति । रेकी में ‘रे’ का तात्पर्य है -विश्वव्यापी तथा ‘की’ में जीवनीशक्ति का बोध निहित हैं। रेकी अर्थात् वह शक्ति जो सभी पदार्थों में स्थित रहकर उसकी क्रिया का कारण हैं। यह समस्त जड़−चेतन में व्याप्त है। यह प्राणशक्ति का एक स्वरूप है। इस प्राणशक्ति के नियोजन से ही इस चिकित्सा के अंतर्गत विभिन्न रोगों का उपचार किया जाता है। समस्त विश्व में इसका प्रचलन चल पड़ा है।

इन दिनों इसे प्राणशक्ति के माध्यम से उपचार की एक नवीन प्रणाली माना जा रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि कालप्रवाह में यह लुप्त हो गई थी। इस लुप्त विधि के पुनर्जागरण का श्रेय जापान के डॉ.मेकाओं उशी को जाता है। इन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में इस चिकित्सा विधि का नाम दिया। दरअसल यह एक सचेतन शक्ति है। भारत में इसे प्राणशक्ति के नाम से जाना जाता है। डॉ. दृ उशी इस परंपरा की नींव डालने से पूर्व भारत आए थे। यहाँ आकर उन्होंने प्राणशक्ति का विशद् अध्ययन एवं अन्वेषण किया। इसके पश्चात् वे जापान लौटे और पीड़ा निवारण का अपना महत्कार्य संपन्न किया। उनके शिष्यों ने बाद में इसे नूतन स्वरूप एवं गति प्रदान की।

सन् 1940 में डॉ. मेकाओं उशी की सहयोगी शिष्य डॉ. चिजिरो हमाशी ने पहले पहल टोकियो में एक प्राइवेट रेकी क्लीनिक की स्थापना की।इस क्लीनिक में अनेक असाध्य रोगों का उपचार किया जाता था। इसके पश्चात् हवायोतकाताने वर्ष 1980 में अमेरिकन रेकी एसोसिएशन की स्थापना की। सन् 1982 में फिलिप ली फूरो मोतो ने एक दूसरी संस्था रेकी एलायंस की नींव डाली। इस संस्था ने बाद में आध्यात्मिक रूप धारण किया। इस संस्था की मान्यता है कि किसी का हृदय उसके स्वयं के प्रति खुला हो तो सत्य अपना मार्ग स्वयं खोज लेता है। सन् 1982 में डॉ. बारबरा बेयर ने अमेरिकन इंटरनेशनल रेकी एसोसिएशन की स्थापना की। भारत में इसका प्रसंग सन् 1989 में एक महिला रेकी मास्टर पाँला होरेन ने किया। यह धीरे धीरे अहमदाबाद व मुंबई से आरंभ होकर देश के अन्य भागों में फैल गई है अभी भी इसका काफी प्रचार विस्तार हो रहा है।

डॉ. मेहाओ उसी ने रेकी देने वाले व्यक्ति के लिए पाँच सिद्धाँत निश्चित किए हैं। ये सिद्धान्त है - 1. क्रोध न करना 2. चिंता से मुक्त होना, 3. कर्त्तव्य के प्रति ईमानदार होना 4. जीव मात्र के प्रति प्रेम व आदर का भाव रखना 5. ईश्वरीय कृपा के प्रति आभार मानना। ये नियम व्यक्ति के स्वयं के अपने मानसिक संतुलन को बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं। मानसिक विकृतियाँ ही मन का असंतुलित करती है। जिसकी वजह से प्राण प्रवाह में अनियमितता आती है और शरीर में रोगों का जन्म होता है। इन नियमों का पालन करने वाला ही सफल उपचारक हो सकता है।

रेकी विधि में अंतरिक्ष में सर्वव्याप्त प्राण शक्ति का उपयोग किया जाता है। प्राणऊर्जा अंतरिक्ष में व्याप्त है। पृथ्वी के लिए इसका मुख्य स्त्रोत सूर्य है। सूर्य से विभिन्न प्रकार के तापीय एवं विद्युत् चुंबकीय तरंगें निकलकर पृथ्वी पर अपना प्रभाव डालती है। ठीक इसी तरह प्राणशक्ति भी एक जैव विद्युतीय तरंग है, जो धरती में सभी जड़ जंगम एवं जीवों में संचरित होती है और इन्हें क्रियाशील व गतिशील बनाती है। इसी कारण धरती उर्वर बनती है और वनस्पति तथा जीव जगत में समृद्धि बनी रहती है। यह सब और कुछ नहीं, बस प्राणशक्ति का चमत्कार है। मनुष्य भी अपनी आवश्यकतानुसार इसी प्राणशक्ति को अंतरिक्ष से ग्रहण करता रहता है। इसमें अवरोध एवं रुकावट ही बीमारी का कारण बनता है। रेकी चिकित्सा के माध्यम से रुग्ण व्यक्ति का अतिरिक्त प्राणशक्ति दी जाती है। भारत में भी प्राणविद्या के आचार्य सूर्योपासना एवं अन्य अनेक विधियों का इसके लिए सफल प्रयोग करते रहे हैं।

वैज्ञानिकों ने इस क्रम में न्यूरान्स तंत्र को सूक्ष्मशरीर के सदृश माना है। ये न्यूरान्स ब्रह्माँडीय ऊर्जा को ग्रहण करने में सक्षम हैं। ये अपनी क्षमता के अनुरूप विद्युत चुंबकीय तरंगों का सृजन उत्पादन भी करते हैं और वातावरण से उनको ग्रहण एवं उसमें संप्रेषण भी करते हैं और वातावरण से उनको ग्रहण एवं उसमें संप्रेषण भी करते हैं। शरीर के विभिन्न स्थानों पर साइनेप्सिस के द्वारा इस ऊर्जा को प्रवाहित करते हैं। रेकी चिकित्सा में प्राणशक्ति का आहरण इन न्यूरान्स की लयबद्धता की स्थिति में लाया जाता है। इसे एट्यूनमेंट कहते हैं। न्यूरान्स का सर्वाधिक केंद्रीकरण मस्तिष्क के सेरिब्रल कार्टेक्स में होता है। यह सहस्रार चक्र के आसपास होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह चक्र नयूराँस द्वारा गृहीत या सृजित विद्युत चुंबकीय तरंगों के विभिन्न तरंग दैर्ध्य के शक्ति केन्द्र हैं। रेकी चिकित्सा में एट्यूनमेंट के दौरान प्राप्त चार प्रकार के अनुभव का आधार , इन न्यूरान्स की विभिन्न शक्ति और क्षमताओं को बताया गया है।

रेकी चिकित्सा से स्वयं के साथ दूसरों का भी उपचार होता है। इससे मानसिक शाँति मिलती है तथा शरीर में तत्त्वों का संतुलन बना रहता है ।यह चिकित्सा मानसिक तनाव को दूर करती है। इसी के साथ इससे शारीरिक -मानसिक एवं आत्मिक शक्ति में अभिवृद्धि होती है। इससे न तो किसी को किसी तरह का नुकसान पहुँचाया जा सकना संभव है और न ही इससे शरीर में किसी प्रकार का साइड इफेक्ट होता है। इसे निरापद पद्धति माना जाता है। रेकी से प्रेमभावना विकसित होती है। इसे विधायक एवं रचनात्मक शक्ति की संज्ञा दी जा सकती है यह रोगी की आवश्यकतानुसार शरीर में प्रवेश करती है। इसके प्रवेश से शारीरिक कार्यक्षमता में वृद्धि होती है शरीर में नवस्फूर्ति आती है और मन प्रसन्न रहता है।

सृजनशक्ति होने के कारण रेकी से स्थूलशरीर की क्रिया को त्वरित गति मिलती है। इस शक्ति को ग्रहण एवं धारण करने से घाव शीघ्रता से भरते हैं एवं सहज आराम मिलता है। इस चिकित्सा के द्वारा विषाणु नष्ट होते हैं और शरीर से दूषित पदार्थों का परिष्कार होता है। इस प्रकार यह शारीरिक क्रियाप्रणाली को सुचारु रूप से चलाने में सहायता करती है। शरीर के विकारग्रस्त क्षेत्र को प्रभावित कर उस विकार को मुक्त करती है। यह मनोविकारों का कम करने में भी सहायक है। इस तरह रेकी चिकित्सा से रचनात्मकता व चेतना का विकास , शक्ति संतुलन व संवर्द्धन,संवेगों पर प्रभाव आदि स्वयमेव नजर आने लगते हैं।

रेकी विशेषज्ञों के अनुसार यह दूर बैठे किसी व्यक्ति को भी दी जा सकती है। इस क्रम में मानसिक तरंगों का ईश्वर में संप्रेषित किया जाता है। टेलीपैथी के समान इसमें भी विचारों का संप्रेषण किया जाता है। हाँ इसमें दूर के उस व्यक्ति को इसकी जानकारी होना आवश्यक है। इस चिकित्सा के माध्यम से पशुओं को भी आरोग्य लाभ मिलता है। पौधों को रेकी देने से वे अच्छी तरह फलते फूलते हैं। बीजों पर रेकी का अच्छा प्रभाव देखा गया है। चूँकि यह वैश्विक प्राणशक्ति है, अतः सभी पर यथाक्रम में इसका प्रभाव पड़ना वाजिब एवं लाजिमी हैं, परंतु यह सब रेकी देने वालों के आत्मबल एवं प्राणशक्ति पर निर्भर करता है। रेकी विशेषज्ञ इसका समन्वय योगविद्या के साथ करते हैं। योगविद्या के साथ समन्वय करने से रेकी द्वारा व्यक्ति दूरश्रवण सृजनात्मक शक्ति का विकास दिव्यदर्शन का आभास एवं अनुभूति भी प्राप्त करने की क्षमता रख सकता है।

रेकी चिकित्सा के अलावा भी अन्य उपचारों की विधियाँ विश्व में प्राचीनकाल से प्रचलित हैं। इसके अंतर्गत फेथहीलिंग संकल्पचिकित्सा, स्पर्शचिकित्सा , मंत्रचिकित्सा, आदि प्रमुख तौर पर आती है। लंदन के हैरी एडवर्ड्स ने फेथहीलिंग पर महत्वपूर्ण कार्य किया था। ये अपने सूक्ष्म शरीर से रोगी के पास पहुँचकर उसका उपचार कर दिया करते थे। इन्होंने अपनी अतींद्रिय क्षमताओं को विकसित करके विलक्षण एवं आश्चर्यजनक उपलब्धि प्राप्त की थी। वे इसका उपचार कष्ट पीड़ितों की सेवा सहायता में करते थे। एडवर्ड्स न इसका नाम ‘एक्सेट हीलिंग’ रखा था। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द साइंस ऑफ स्प्रिट हीलिंग’ में इसकी विशद् व्याख्या एवं विवेचना की है। एडवर्ड्स भारत भी आए थे और यहाँ आकर उन्होंने श्री अरविंद एवं रमण महर्षि से भेट की थी।

थियोसॉफी की एक शाखा ‘थियोसॉफिकल ऑर्डर ऑफ सर्विस’ के अंतर्गत रोगोपचार की विधि का प्रयोग किया जा रहा है। वहाँ इसे ‘द ऑर्डर ऑफ हीलिंग’ के नाम से जाना जाता है। इस विधि में दैवीय शक्तियों का सहयोग लेते हैं। इसके अनुसार मनुष्य की इच्छा अति बलवान एवं शक्तिशाली हो सकती है। इच्छा प्रबल हो तो वह सूक्ष्म शक्तियों को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है॥ इस प्रबल इच्छाशक्ति का ही संकल्प कहते हैं। संकल्प बल के माध्यम से भी रोगों का उपचार किया जा सकता है। इन उपचार विधियों के अलावा और भी अनेक उपचार विधियाँ प्रचलित हैं। इन सभी का एक ही उद्देश्य एवं मकसद है - व्यक्ति में चुक रही प्राणशक्ति को पुनः प्रदत्त करना एवं उसे निरोग स्वस्थ एवं सुखी बनाना।

इस प्राणशक्ति को यदि चुकने , रीतने , नष्ट होने से बचा लिया जाए, तो शायद हममें से कोई कभी बीमार हीन पड़े। हमारी प्राणशक्तिके नष्ट होने -बरबाद होने का सबसे बड़ा कारण है असंयम फिर वह इंद्रियों का हो या फिर विचारों का।यदि इस असंयम को रोक लिया जाए तो पल पल क्षण क्षण बरबाद हो रहा प्राणशक्ति का भंडार बरबाद होने से बच सकता है। इसी के साथ रेकी विधि से अथवा योगविद्या में बताई गई ध्यान पद्धति से यदि वैश्वप्राण को प्रचुर मात्रा में ग्रहण कर लिया जाए, तो औरों के जीवन का भी स्वस्थ, सुखी एवं नीरोग किया जा सकता है। प्राणचेतना सर्वव्यापी -विश्वव्यापी है। यही वह सर्वमान्य कारण है। जिसकी वजह से इस विधि से किए जाने वाले उपचार में रोगी का पास होना या दूर होना कोई विशेष महत्त्व नहीं रखता है। इसमें महत्त्वपूर्ण होती है -प्राण स्पंदनों की पारस्परिक समरसता, जो ध्यानयोग के अभ्यासी या रेकी विद्या में प्रवीण व्यक्ति के लिए सहज संभव है। यह निरापद चिकित्सा प्रणाली ही भविष्य को समुज्ज्वल के साथ स्वस्थ बनाने में सक्षम है ऐसा कहना कोई अत्युक्ति न होगी।


महा का मूर्द्धन्य (kahani)

कोर्टमार्शल के सम्मुख तात्या टोपे को उपस्थित करने के बाद अँगरेज न्यायाधीशों ने पूछा -”यदि तुम चाहो तो अपने बचाव में कुछ कह सकते हो।” तात्या टोपे का स्वाभिमान जाग उठा।उनने कहा- “मैंने ब्रिटिश शासन से टक्कर ली है।मैं जानता हूँ कि इसके बदले में मुझे मृत्यु दंड प्राप्त होगा। मैं केवल ईश्वरीय न्याय और न्यायालय में ही विश्वास रखता हूँ, इसलिए अपने बचाव के लिए मैं कुछ नहीं कहना चाहता।” तात्या को जब फाँसी स्थल पर ले जाया गया, तो उसने कहा- “तुम लोग कष्ट क्यों करते हो, लाओ, फाँसी का फंदा मैं स्वयं ही अपने गले में डाल लूँ।” इन अंतिम शब्दों के साथ सन् सत्तावन के स्वतंत्रता संग्राम का वह सेनानी अमर हो गया।

एक छोटी नदी तालाब के किनारे से बह रही थी। तालाब बरसात भर भरा रहता, इसके बाद सूख जाता। नदी थी तो छोटी , पर उसका स्त्रोत हिमालय था, आगे चलकर गंगा में मिलती और विशाल सागर में विलीन हो जाती। तालाब नदी को समझाता -इतनी लंबी और कष्टसाध्य यात्रा क्यों करती हो? मेरा घर क्यों नहीं बसा लेती? हम दोनों मिलकर रहें, तो क्या हर्ज है? नदी ने कहा-तुम तक सीमित होने के बाद मैं अन्यत्र कहीं न जा सकूँगी और किसी के काम न आ सकूँगी। इसलिए मुझे रोको मत। प्रवाहित होते रहने में मेरा और संसार का कल्याण है।

एक चिड़ियाघर के जानवरों ने इकट्ठे होकर विचार किया कि निरस्त्रीकरण की नीति पर चलना चाहिए। गैंडे ने कहा -दाँत और पंजे सबसे अधिक खतरनाक होते हैं, उन पर प्रतिबंध लगाया जाए, सींग तो केवल रक्षा के साधन मात्र है। भैंसा और हिरन से लेकर काँटों वाली सेंई तक ने गैंडे का समर्थन किया। शेर ने दाँत और पंजों को खाने और चलने का साधारण साधन बताते हुए कहा -”सींग ही निरर्थक वस्तु है, सर्वसम्मति से उसी का प्रयोग निषिद्ध किया जाए।” बाघ, चीता और सियार से वन विलाव तक ने इस तर्क की प्रशंसा की। रीछ की बारी आई तो उसने कहा - “सींग और दाँत , पंजे यह सभी हानिकारक हैं। जरूरत पड़ने पर आलिंगन करने के मित्रतापूर्ण ढंग पर छूट रखी जानी चाहिए। “ जो लोग रीछ की आदत जानते थे, वे उसकी चालाकी को ताड़ गए और मन ही मन बहुत कुढ़े। अपने पक्ष का समर्थन और प्रतिपक्षी का विरोध करने के जोश में बहुत शोर मचने लगा, एक दूसरे पर गुर्राने लगे, यहाँ तक कि टूट पड़ने की बात सोचने लगे। चिड़ियाघर के मालिक न यह शोर सुना तो उसने उन सबको अपने अपने बाड़े में खदेड़ दिया और कहा - मूर्खों ! तुम भलमनसाहत से अपनी-अपनी मर्यादाओं का पालन करो, तो बिना निरस्त्रीकरण का भी काम चल सकता है।

आशा करनी चाहिए कि मनुष्य में सद्बुद्धि आएगी एवं विनाश का यह वातावरण पारिवारिक की मनःस्थिति के विकसित होते ही बदलेगा। सन्मति ही प्रज्ञा है। चिंता की भ्रष्टता एवं आचरण की दृष्टता चारों ओर समझदारी का वातावरण बनने पर ही मिटेगी। इस दिशा में मनीषियों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। ऋषिसत्ता का यह आश्वासन है कि महा का मूर्द्धन्य प्रतिभाओं के माध्यम से सारे विश्व को एक सूत्र में अगले दिनों आबद्ध करके ही रहेगा।


सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा

भारतीय संस्कृति वह विज्ञान -विधान है, जो जीवन से उसकी विकृति को दूर कर उसकी प्रकृति को संस्कारवान् बनाता है। इस क्रम में न तो देश की दूरियाँ अवरोध बनती हैं और न ही काल की सीमाएँ कोई बाधा उत्पन्न करती है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति-विश्व संस्कृति के रूप में पहचानी जाने के साथ सनातन एवं शाश्वत बनी हुई है।इसी वजह से विदेशी विद्वानों ने भी इसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। डी.ओ.ब्राउन ने ट्रिव्यून पत्रिका में लिखा था-”पक्षपात रहित होकर यदि हम विचार करें और सत्य का विवेचन करें तो स्वीकार करना पड़ेगा कि समस्त संसार के साहित्य , धर्म और संस्कृति में भारतीयता अद्वितीय एवं महान् है।” कर्नल स्लीमेन ने लिखा है कि पुरातनकाल में भारतवासियों की पंचायतें इतनी न्यायनिष्ठ थी कि कोई अपराधी कितना भी बड़ा दंड एवं भय होने पर भी झूठ नहीं बोलता था। यह इसकी साँस्कृतिक महानता का परिचायक है।

प्रो. बेवर और कोलब्रुक ने अपने सतत् अध्ययन एवं अनुसंधान के निष्कर्ष के रूप में यही प्रतिपादित किया कि चीन और अरब में ज्योतिष का जो विकास हुआ है, उसका मूल संकेत भारत से ही वहाँ पहुँचा। अलबरूनी का मत है कि समस्त संसार को भारत ने ही गणित शास्त्र की शिक्षा दी। अमेरिकी विद्वान् डेलमेर ने अपने दीर्घकालीन शोध के निष्कर्ष को प्रतिपादित किया था। उनके इस लेख में भारतीय संस्कृति का स्वर किया था कि पश्चिम को जिन विधाओं को विकसित करने का अभिमान है, वस्तुतः वे भारत से ही वहाँ गई है।

दार्शनिक जगत् ने भी भारतीय संस्कृति के ज्ञान की विशिष्टता को स्वीकारते हुए भारतीय दर्शन को उत्कृष्ट एवं अनुपमेय माना है। दार्शनिक विलियम्स और प्लेटो, दोनों ने ही अपने ग्रंथों के बारे में लिखा है - इन मान्यताओं के प्रति हम भारत के चिर ऋणी हैं। प्रख्यात तत्त्ववेत्ता लैथव्रिज ने भारत को दार्शनिक तत्त्वज्ञान के अन्वेषक के रूप में घोषित किया है। जर्मन विद्वान् मैक्समूलर ने लिखा है -मुझसे कोई पूछे कि विद्या और गुणों की दृष्टि से अतीत में कौन -सा देश समुन्नत रहा है, तो मैं यही कहूँगा -भारतवर्ष।

प्रो.हटर धर्म -दर्शन और विज्ञान दोनों के ही विकास के लिए एकमात्र भारत को ही उत्तरदायी मानते हैं। उनके अनुसार इन विषयों में जो भी सत्य एवं कथ्य है, उस सबको भारतीय संस्कृति के अन्वेषक महर्षिगणों ने बहुत पहले ही प्रतिपादित कर दिया था। मैगस्थनीज ने लिखा है कि सिकंदर जब भारत आया तो एक संन्यासी से उनकी झोपड़ी में मिला। वार्त्तालाप के बाद सिकंदर के मुख से यह स्वीकारोक्ति निकली कि जिस सिकंदर ने अनेक देश फतह किए, वह आज एक कौपीनधारी के सामने परास्त हो गया।

प्रो. विलियम के मतानुसार , यूरोप एवं अन्य एशियाई देशों में गोला-बारूद का प्रचार होने से पहले ही भारत में उसका आविष्कार का श्रेय यूरोपवासी लेते हैं, वस्तुतः उनमें से अधिकाँश का प्रचलन भारतवर्ष में पूर्वकाल में था। डॉ. गिबसन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हैल्थ कल्चर’ में इस सत्य का स्पष्ट उल्लेख किया है कि वेदकाल के महर्षिगण शारीरिक रोगों के साथ मानसिक रोगों का भी उपचार करते थे।

कैट जोंस जैनी ने भारत को सभ्यता की जन्मस्थली कहा है। इन्होंने अपनी कृति ‘हिंदू देवताओं की वंशावली ‘ में इसका विस्तार से वर्णन करते हुए कहा है -भारत मात्र हिंदू देवताओं को जन्मभूमि नहीं है,वरन् वह विश्व की समस्त सभ्यताओं का सूत्रधार है। सर टामस रो की प्रसिद्ध उक्ति तो और भी कुछ अधिक कहती है। उनके अनुसार सूती ही नहीं, ऊनी और रेशमी वस्त्रों के कला विकास में भारत ही चिरकाल से अग्रणी रहा है। अब्दुल रज्जाक ने अपनी सर्वोष्ट रचना ‘मुतालुल सादौन‘ में साफ तौर पर लिखा है - कालीकटके समूचे बाजार में घूमने पर मुझे हैरत हुई कि बिना मालिक के ही दुकानें खुली पड़ी रहती थीं, पर कोई किसी के माल को हाथ नहीं लगाता था।

यूरोप के तत्त्ववेत्ता हर्वर्ट स्पेंसर ने भारतीय संस्कार पद्धति को वैज्ञानिक , बुद्धिसंगत और मानवी व्यक्तित्व में आमूलचूल परिवर्तन करने वाला विधान बतलाया है। उनके अलावा विदेशों के अधिकाँश संस्कृति का सस्वर गौरवगान किया गया है। इनमें से कुछ प्रमुख निम्न हैं -

मैक्समूलर -इंडिया हृट इट कैन टीच अस , हीरेन - हिस्टोरिकल रिसोर्सेज मरे- हिस्ट्री ऑफ हिंदूज एरियन -इंडिका, यूलियम्स -मॉर्डन इंडिया इंडिया एंड द इंडियंस वैरन हम्बल्ट्स-हिंदू माइथोलॉजी पोलक इंडिया इन ग्रीस हार्डी -इर्स्टन मानार्किज्म स्वयाट-सर्पेंटासिंबल, तिलियम जोंस-एशियाटिक रिसर्चेज मिसमैनिंग-एशियंट एंड मेडिवल इंडिया, एल्विनस्टोन हिस्ट्री ऑफ इंडिया , मैक्स उन्कर- हिस्ट्री ऑफ इंडियन एंड ईर्स्टन आर्कीटेक्चर, बेवर-विल्सन वर्क्स विलियम हंटर-इंपीरियलइंडियन गजेटियर मैफी -हिस्ट्री ऑफ लिटरेचर माँनियर विलियम-इंडियाविजडम, तालस-एडिनवर्ग रिव्यू, श्लेगल-हिस्ट्री ऑफ लिअरेचर, टेलर-जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसाइटी डूबो बाइबिल इन इंडिया, हर्बर्ट स्पेंसर -ऑटोबायोग्राफी , राँबर्टसन-डिस्वीजिकन कन्सर्निंग इंडिया इन पुस्तकों के अध्ययन से यह पता चलता है कि विदेशी भी भारतीय संस्कृति के संस्पर्श से कितना अभिभूत होते रहे हैं।

यूनानी हो या चीनी ईरानी हो अथवा अरबवासी , कोई भी विदेशी यात्री जिसने भी भारत भ्रमण किया, भारतीय संस्कृति से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा। भारत और भारतीयों के बारे में जानकारी देते हुए प्रथम यूनानी लेखक एवं विख्यात चिकित्सक क्तेशियस ने भारतीय न्याय व्यवस्था का विश्व की सर्वोपरि न्याय व्यवस्था कहा।

दूसरी सदी में एपिक्टेक्टस के शिष्य एरियन भारतीय समाज व्यवस्था से बेतरह प्रभावित हुए थे। इन्होंने कहा कि भारतीय का मूल चित्र गाँवों में बसता है। भारत में पहुँचने वाले चीनी यात्रियों का स्थान कालक्रम से दूसरे नंबर पर है। इन लोगों ने भी हिन्दुओं व हिंदू संस्कृति की ईमानदारी , निष्पक्षता, न्यायप्रियता तथा सत्यवादिता के लिए वैसा ही सर्वसम्मत प्रमाणपत्र दिया है।

हृनसाँग ने भारतीयों को स्पष्टवादिता और ईमानदारी जैसे चारित्रिक गुणों के कारण सर्वश्रेष्ठ माना है। उनके अनुसार यहाँ के लोग न्याय के मामले में अत्यधिक उदार थे और स्पष्टवादिता उनके प्रशासनिक गुणों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता रही है। ग्यारहवीं शती में इदरीस नामक मुस्लिम लेखक ने अपने भूगोल में भारतीयों के बारे में अपनी सम्मति देते हुए कहा है कि भारत के लोग स्वभावतः सत्यप्रिय एवं न्यायशील हैं। अपने कार्य के प्रति उनकी दृढ़निष्ठा, ईमानदारी और भक्ति सर्वविदित है। यह सब उनकी महान् संस्कृति की देन है। तेरहवीं शताब्दी में शम्सुददीन अब्दुल्लाह ने बेदी अजर जैना के विवरण में से उद्धरण देते हुए कहा है कि भारतीयों की जनसंख्या अधिक होने के बावजूद वे लोग धोखाधड़ी लड़ाई -झगड़े या आपसी संघर्ष जैसी बुराइयों से सर्वथा अछूते हैं। अपने कर्त्तव्यपालन के लिए व जीवन-मरण से कभी भी नहीं डरते।

मार्कोपोलो के अनुसार भारतीय ब्रह्मांड विश्व में अत्यंत सत्यप्रिय हैं, क्योंकि इस धरती पर किसी भी वस्तु के लिए वे कदापि झूठ नहीं बोल सकते। चौदहवीं शती में फेयर जोर्डेस ने अपने ग्रंथ में कहा था कि दक्षिण और पश्चिमी भारत के लोग अपनी बात के सच्चे और न्यायनिष्ठा के धनी हैं । इन दोनों क्षेत्रों के बारे में इसलिए है, क्योंकि जोर्डेस यहीं पर गया था। कर्नल स्लीमैन ने मीर सलामत का अपनी रचनाओं में समाजसेवी की संज्ञा दी है। इन मीर सलामत के अनुसार एक हिंदू किसी मुसलमान को संरक्षण देने के काम की जिम्मेदारी अपने ऊपर बड़ी खूबी के साथ ले सकता है और इसे निभाने में उसे उचित गर्व भी होता है।

अँगरेजों के शासन में भारत में वायसराय के रूप में काम कर चुके बारेन हेस्टिंग्स ने भी भारतीय संस्कृति की सराहना करते हुए यहाँ के निवासियों को सौम्य , सुशील एवं परोपकारी बताया है। उनके अनुसार इस भूमंडल पर विद्यमान संपूर्ण मानवजाति इस महान् संस्कृति की ऋणी है। विशप हेबर ने भारतवासियों के बारे में विशद्-विवेचना की है। उनके अनुसार यहाँ के लोग बहादुर , अतिथि सत्कार प्रिय, बुद्धिमान तथा ज्ञान -विज्ञान एवं आत्मपरिष्कार के लिए सदा प्रयत्नशील रहने वाले हैं। वे माता-पिता के प्रति विनम्र सदाचार परायण पुरुषार्थी और गंभीर प्रकृति के हैं। साथ ही व निरपवाद रूप से सुशील और धैर्यवान् हैं। हमारे यहाँ के शकरों और कस्बों में जितने गिरे हुए लोग दिखाई देते हैं, हिंदुओं के किसी भी वर्ग के लोग उतने गिरे हुए नहीं हैं। भारत के ग्रामवासी सौहार्दपूर्ण , अपने परिवार के प्रति ममतामय एवं कर्त्तव्यपरायण होते हैं। व विशेष रूप से सदैव ईमानदार और सत्यनिष्ठ रहते हैं। सर जॉन मालक्रम ने इसे इस ढंग से स्पष्ट किया है, मुझे ऐसा कोई विवरण या वृत्ताँत याद नहीं आता, जबकि भारत के जनसाधारण से शाँति और निर्भयता के साथ बातचीत की गई हो और विश्वस्त माध्यम (दुभाषिए) के द्वारा अंग्रेजी भाषा में , व्यक्त किए गए विचारों को सही ढंग से समझाया गया हो और उसका निष्कर्ष यह न निकला हो कि पहले जो कुछ असत्य कहा गया था, वह या तो भय के कारण अथवा बात को ठीक से न समझ पाने के कारण ऐसा हुआ था।

विदेशी आगंतुक या विचारक यहाँ के जीवन से जो मोहित हुए, उसका कारण यहाँ की सद्गुण -संपत्ति एवं ज्ञान-विज्ञान को समृद्धि रही है। भव्य अतीत यदि वर्तमान में धुंधला एवं धूमिल नजर आने लगा है, तो उसका एकमात्र कारण यहीं है कि हम अपनी साँस्कृतिक विरासत को भूल गए हैं, विस्मृत कर बैठे हैं। उस विज्ञान -विधान की जाने अनजाने अवहेलना हुई है जो हमारी वैयक्तिक एवं सामाजिक विकृतियों को परिष्कृत कर हमें सुघड़ व सुसंस्कृत बनाता था। धुँधले वर्तमान को यदि समुज्ज्वल भविष्य में रूपांतरित करना है तो उसका सर्वमान्य सूत्र यही है कि हमारी संस्कृति हमारे अपने जीवन का अभिन्न अंग बने। इस तरह पनपी देवत्व की बहुलता ही देवसंस्कृति को विश्वसंस्कृति का स्वरूप प्रदान कर सकेगी।


अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रगति (kahani)

गरुड ने अपने बच्चे को पीठ पर बिठाया और उसे अपने साथ दूसरे सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया। दिन भर दोनों दाना चुगते रहे, सायंकाल घर लौटे। गरुड़ अपने बच्चे को यातायात प्रयोजन में भी साथ दिया करता था। यह क्रम बहुत दिन चला। गरुड़ ने बहुतेरा कहा, पर बच्चे ने उड़ना न सीखा। उसकी धारणा थी-जब तक निःशुल्क साधन उपलब्ध हो , तब तक स्वयं श्रम क्यों किया जाए? गरुड़ बच्चे की इस दुर्बलता का बड़ी सतर्कता से देखता रहा। एक दिन जब चह आकाश में उड़ रहा था, तब धीरे से अपने पंख खींच लिए। बच्चा गिरने लगा, तब चेत आया -पंख फड़फड़ाए। गिरते -गिरते बचा। पर अब उसने उड़ना सीखने की आवश्यकता अनुभर कर ली। सायंकाल बालक गरुड़ ने माँ से कहा -”माँ आज पंख न फड़फड़ाए होते तो पिताजी ने बीच में ही मार दिया होता।” मादा गरुड़ हँसी और बोली-”बेटे! जो अपने आप नहीं सीखते, स्वावलंबी नहीं बनते, उन्हें सिखाने -समझाने का यही नियम है।”

सुभाषचंद्र बोस आजीवन कुँवारे रहे। अपनी सामर्थ्य को उन्होंने पारिवारिक झंझटों में से बचाकर उच्च प्रयोजनों में लगाए रहने के लिए सुरक्षित रखा। उनकी आजाद हिंद फौज का निर्माण और विश्वमत का भारत के पक्ष में करने का प्रयास सर्वविदित है। अपनी संपत्ति का वेट्रस्ट बना गए ताकि विदेशों में भारतीय पक्ष को उजागर करने का प्रचार कार्य उस धन से होता रहे।

थाईलैण्ड संसार का एकमात्र देश है, जहाँ बौद्धधर्म -राजधर्म भी है । अन्य देशों ने तो भारत की परंपरा व संस्कृति इन थोड़े ही दिनों में गँवा दी, पर यह अकेला देश ऐसा है जिसमें वर्तमान भारत की परिधि से आगे जाकर यह देखा जा सकता है कि प्राचीनकाल में भारत की रीति-नीति का क्या स्वरूप था? वहाँ जो देखने का इन दिनों भी मिलता है, उससे यह पता लगाया जा सकता है कि भारत किन मान्यताओं और आदर्शों के कारण उन्नति के उच्चस्तर पर पहुँचा था और शाँति का संदेश सुदूर क्षेत्रों तक पहुँचाने में किन परंपराओं के कारण सफल हुआ?

थाईलैंड में धर्म -आस्था अन्य देशों की तरह डगमगाई नहीं है। वहाँ के नागरिकों को अभी भी प्राचीनकाल के धर्मनिष्ठ और कर्त्तव्यपरायण लोगों की तरह जीवनयापन करते हुए देखा जा सकता है। जनता अपनी धर्मश्रद्धा की अभिव्यक्ति एक बार अनिवार्य रूप से भिक्षु दीक्षा लेने की प्रथा है। थोड़े समय के लिए लोग भिक्षु बनते हैं और फिर अपने सामान्य साँसारिक जीवन में लौट जाते हैं। थाईलैंड के प्रत्येक बौद्ध धर्मानुयायी का विश्वास है कि “एक बार भिक्षु बने बिना उसकी सद्गति नहीं हो सकती। उसके बिना उसकी धार्मिकता अधूरी ही रहेगी।” इस आस्था के कारण देर सवेर में हर सुयोग्य नागरिक एक बार कुछ समय के लिए साधु अवश्य बनता है। घर छोड़कर उतने समय विहार में निवास करता है। बुद्ध संघ इन भिक्षुओं का व्यवस्थित, नियंत्रित एवं परिष्कृत कर सृजनात्मक कार्यों में नियोजित करता है। सीमित समय के लिए साधु-दीक्षा लेने वाली प्रव्रज्या पद्धति छोटे से देश के लिए बहुत अधिक उपयोगी सिद्ध हुई है। यही कारण है कि इस देश को अपने ढंग से अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रगति करने का अवसर मिला है।


पर्यावरण संरक्षण की एक सुदीर्घ एवं अति प्राचीन परंपरा

जीवनदायी तत्त्वों की शुद्धता संरक्षित हो तो जीवन भी शुद्ध और सुरक्षित रहता है। समूची सृष्टी पंचमहाभूत अर्थात् पंचतत्त्वों से विनिर्मित है। अग्नि , जल, पृथ्वी , वायु और आकाश यही किसी न किसी रूप में जीवन का निर्माण करते हैं, उसे पोषण देते हैं। इन सभी तत्वों का सम्मिलित , स्वरूप ही पर्यावरण है। ‘पर्यावरण संरक्षित तो जीवन सुरक्षित ‘ यह उक्ति मात्र एक कहावत भर नहीं बल्कि अनिवार्य एवं अकाट्य सत्य है। पर्यावरण का संतुलन ही जीवनचक्र को नियंत्रित करता है और इसमें गतिरोध आते ही जीवन संकट में पड़ जाता है। यही कारण है कि इसकी सुरक्षा की चिंता प्राचीनकाल से होती आ रही है। वेदकालीन महर्षिगणों ने इसकी आवश्यकता एवं महत्ता को ध्यान में रखकर इसे शुद्ध एवं संरक्षित रखने हेतु नियम बना लिए थे। धर्म इन्हीं नियमों का व्यावहारिक रूप है।

वेदों को सृष्टि विज्ञान का मुख्य ग्रंथ माना गया है। इनमें सृष्टि के जीवनदायी तत्वों की विशेषताओं का काफी सूक्ष्म व विस्तृत विवरण है। ऋग्वेद में अग्नि के रूप, रूपांतर और उसके गुणों की व्याख्या की गई है। यजुर्वेद में वायु के गुणों , कार्य और उसके विभिन्न रूपों का आख्यान मिलता है। अथर्ववेद पृथ्वीतत्व का वर्णन सभी वेदों में हुआ है। वैदिक महर्षियों ने इन प्राकृतिक शक्तियों को देवता स्वरूप माना इसीलिए उन दिनों जड़-चेतन , सभी रूपों की उपासना व अभ्यर्थना की जाती थी और इसीलिए निश्चित तौर पर समस्त सृष्टि में सुख-शाँति व समृद्धि का वातावरण था।

यजुर्वेद का अध्ययन इस तथ्य का संकेत करता है कि उसके शाँतिपाठ में पर्यावरण के सभी तत्त्वों को शाँत और संतुलित बनाए रखने का उत्कट भाव है, वहीं इसका तात्पर्य है कि समूचे विश्व का पर्यावरण संतुलित और परिष्कृत हो। इसमें उल्लेख है कि द्युलोक से लेकर पृथ्वी के सभी जैविक -अजैविक घटक संतुलन की अवस्था में रहें। अदृश्य आकाश पृथ्वी एवं उसके सभी घटक , जल औषधियां वनस्पतियाँ संपूर्ण संसाधन एवं ज्ञान शाँत रहें। पर्यावरण के प्रति इतना गहन एवं सूक्ष्म ज्ञान का दिग्दर्शन अन्यत्र दुर्लभ है।

ऋग्वेद में वायु के महत्त्व को भेषज गुणों से युक्त स्वीकारा गया है। ऋग्वेद की ऋचा कहती है-हे वायु! अपनी औषधि ले आओ और यहाँ से सब दोष दूर करो, क्योंकि तुम ही सभी औषधियों से भरपूर हो। ऋग्वेद का एक अन्य मंत्र जल की शुद्धता का वर्णन करते हुए कहता है, ओह! प्रशंसा के गीत गाएँ -प्रवाहित जल के , जो हजारों धाराओं से स्फटिक की तरह बहकर आँखों को आनंद देता है। ऊर्जा के अपरिमित स्त्रोत सूर्य को ‘जगत् की आत्मा ‘ कहकर उसकी अभ्यर्थना की गई है। उपनिषद्कारों ने सूर्य को प्राण की संज्ञा दी है। यज्ञों के माध्यम से वायुमंडल को शुद्ध करना भी वेदों का विषय रहा है। वैदिककाल में पर्यावरण के परिष्कार के लिए यज्ञ-हवन संपन्न किए जाते थे।

सामवेद में जीवन की मंगलकामना और प्रकृति की अविरल उपासना के भाव वर्णित हैं। इसमें वनस्पतियों और पशुजगत तथा औषधि विज्ञान के सुँदर मंत्रों के उद्धरण हैं। सामवेद कहता है -इंद्र ! सूर्य रश्मियों और वायु से हमारे लिए औषधि की उत्पत्ति करो। हे सोम! आपने ही औषधियों, जलों और पशुओं को उत्पन्न किया है। अथर्ववेद में भी पर्यावरण संरक्षण और संवर्द्धन संबंधी चिंतन का गौरवगान हुआ है। अथर्वण ऋषि अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में धरा की महानता उदारता , सर्वव्यापकता आदि अनंत गुणों पर विस्मय−विमुग्ध हो कह उठे, हे माता! आपके लिए ईश्वर ने शीत वर्षा तथा वसंत ऋतुएँ बनाई हैं।दिन-रात के चक्र स्थापित किए हैं। इस कृपा के लिए हम आभारी हैं। मैं भूमि के जिस स्थान पर खनन करूं , वहाँ शीघ्र ही हरियाली छा जाए। आपसे प्रार्थना है कि मुझे ऐसी सद्बुद्धि दें जिससे मैं आपके हृदय स्थल को न तो आहत करूं और न ही आपको दुःख पहुँचाऊँ। इस तरह अथर्ववेद मानव जगत के अधिक सन्निकट है। व्यक्ति स्वस्थ, सुखी दीर्घायु रहे, नीति पर चले और पशु वनस्पति एवं जगत् के साथ साहचर्य रखे, यही अथर्ववेद की विशेषता है।

वैदिक कर्मकाँडों की अनेक विधाओं ने भी पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा का दायित्व निभाया है। अरण्यों में रहकर पर्यावरण के प्रति विशेष जागरुक रहने वाले ऋषियों ने आरण्यक साहित्य का सृजन कर विश्व में पर्यावरण के महत्व को रेखांकित किया है। आरण्यक ब्राह्मण ग्रंथों एवं उपनिषदों के बीच की कड़ी हैं। ‘अरण्ये भवमेति आरण्यकम्’ कहकर आरण्यक का अर्थ स्पष्ट किया गया है। बृहदारण्यक भी ‘अरण्येनूत्यमानत्वात् अरण्यकम्’ के रूप में इसका समर्थन करता है। इसका विषय प्राणविद्या है। अंतरिक्ष और वायु से प्राण का संबंध अन्योन्याश्रित है। पर्यावरण के जैविक और अजैविक तत्वों में भी वायु और अंतरिक्ष का विशेष योगदान रहता है। सृष्टि के सभी तत्वों में इन दोनों का समावेश है। इन्हीं गुणों के कारण सृष्टि के सभी तत्वों का प्राणशक्ति मिलती है। जिससे विकास की गति अग्रसर होती है।

उपनिषदों में भी जल वायु पृथ्वी और अंतरिक्ष का विशद् वर्णन हुआ है। इसमें प्रकृति की महत्ता को पर्याप्त मान्यता प्रदान की गई है। इनके अनुसार पदार्थ की उत्पत्ति एवं जीव-जगत् की सृष्टि अग्नि जल और पृथ्वी के विनियोग से हुई है। श्वेताश्वेतर उपनिषद् ने इस त्रिगुणात्मक प्रकृति की विवेचना की है। छाँदोग्य उपनिषद् स्पष्ट करता है कि सात्विक ओर से परिष्कृत में का सीधा संबंध है। इसमें आगे और स्पष्ट करते हुए उल्लेख है कि पृथ्वी जल और पुरुष सभी प्रकृति के घटक हैं।पृथ्वी का रस जल है और जल का रस औषध है। औषधियों का पुरुष , रस है , पुरुष का रस वाणी , वाणी का ऋचा, ऋचा का साम और साम का रस उद्गीथ हैं, अर्थात् पृथ्वीतत्व में ही सब तत्वों को प्राणवान बनाने के प्रमुख कारण है।

रामायणकाल में भी पर्यावरण चेतना पर्याप्त सक्रिय थी। वाल्मीकि रामायण में राम के वन गमन के समय प्रकृति के मनोरम दृश्य का उल्लेख किया गया है-इस समय पर्वत प्रदेश, घने -जंगल एवं रम्य नदियों के किनारे सारस और चक्रवाक पक्षी आनंद में विचर रहे थे। सुँदर जलाशय में कमलदल खिले हुए थे। जंगलों में में झुँड के झाँड हिरन , गैंडे वाराह और हाथी निर्भय घूम रहे थे अर्थात् उन दिनों पर्यावरण अत्यंत समृद्ध था। इस काल का चित्रण करने वाले महाकवि भवभूति ने भी प्रकृति का अत्यंत हृदयग्राही चित्रण करते हुए कहा है किसी ता का आवास स्थल हरियाली से भरापूरा था। यहाँ यहाँ वे हरिणों को हरी-हरी घास देती थी। रामायण कालीन सभी ग्रंथों में जड़ व चेतन सभी तत्त्वों को चेतना संपन्न बताया गया है। रामचरितमानस के उत्तरकांड में वर्णन मिलता है कि चरागाह तालाब हरित भूमि , वन उपवन के सभी जीव आनंद पूर्वक रहते थे। इस तरह रामायणकाल में पर्यावरण एवं प्रकृति को मानव से घनिष्ठ मानत हुए इसे विशेष संरक्षण प्रदान किया गया था।

महाभारतकालीन मनीषियों ने पर्यावरण की गौरवगरिमा को सहज रूप से स्वीकारा था। इस काल में भगवान् कृष्ण द्वारा गाई गीता में प्रकृति को सृष्टि का उपादान कारण बताया गया है प्रकृति के कण -कण में सृष्टि का रचयिता समाया हुआ है। प्रकृति के समस्त चमत्कारों को परमेश्वर का स्वरूप बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके सभी भूत-प्राणियों को धारण करता हूँ।चंद्रमा बनकर औषधियों का पोषण करता हूँ महाभारतकाल में प्रत्येक तत्व को देवता सदृश स्वीकार कर उनकी अभ्यर्थना की जाती थी। उन दिनों वृक्षों की पूजा का प्रचलन था।वृक्षों को काटना महापाप समझा जाता था।

महाभारत के आदिपर्व में वर्णन है कि गाँव में जो जगह पेड़ फूल और फलों से भरपूर हो वह स्थान हर तरह से अर्चनीय है। इसमें प्रकृति का अनेक उपमाओं से अलंकृत किया गया है। नदियों के पानी को स्फटिक के सदृश स्वराज्य आँदोलन के दिनों की बात है। राजकोट में काठियावाड़ राज्य प्रजा परिषद् का अधिवेशन हो रहा था। बापू अन्य नेताओं के साथ मंच पर बैठे थे। तभी उनकी दृष्टि दूरी पर बैठे एक वृद्ध पर पड़ी। वे गाँधीजी का कुछ जाने पहचाने से लगे। स्मरण शक्ति पर जरा जोर देने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि ये तो मेरे बचपन के अध्यापक हैं। बापू शीघ्र ही मंच से उतरकर उनके पास गए और प्रणाम करके उनके चरणों के समीप बैठ गए। गुरुजी ने बापू से कहा- “अब आप मंच पर पधारिए। नेतागण आपकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।” बापू बोले -”नहीं नहीं मैं यहीं पर ठीक हूँ । अब मैं मंच पर नहीं जाना चाहता। यहीं बैठकर सारा कार्य देखूंगा। आप चिंता न कीजिए। “ सभी समाप्त होने पर चलने लगे, तो अध्यापक ने गदगद होकर आशीर्वाद दिया - जो व्यक्ति तुम जैसा अहंकार रहित हो , महान् कहलाने का अधिकारी वही हो सकता है। “

स्वच्छ और सुँदर बताया गया है। महाभारतकाल में पवित्र और शीतल जलाशय तथा जंगल पहाड़ व पर्वतों आदि को प्रकृति व पर्यावरण के अद्भुत प्रसंगों से महाभारत के प्रायः सभी पर्व भरे पड़े है। कालिदास ने भी अपने नाटकों एवं काव्यों में पशु -पक्षी वृक्षादि से मानवीय जीवन का अपूर्व संबंध स्थापित किया है। अभिज्ञान शाकुँतलम् ने तो इन रिश्तों व संबंधों को सजीव कर दिया है। कण्व आश्रम में पली बढ़ी शकुंतला अपने चारों ओर के परिवेश एवं वातावरण से इतना एकात्म एवं तदाकार हो गई थी कि उसका विछोह सभी को विह्वल कर रहा था। उसकी विदाई के समय पशु पक्षी ही नहीं वनस्पति जगत् भी उदास हो गया था।

काव्य की ही भाँति दर्शन , दार्शनिक एवं दार्शनिकता भी पर्यावरण की चिंतन चेतना से ओतप्रोत रहे हैं। साँख्य दर्शन में प्रकृति और पुरुष के समवाय का सृष्टि का कारण माना है। प्रकृति जड़ एवं स्थूल होते हुए भी अति सूक्ष्म है। अतः प्रकृति समस्त सृष्टि की उत्पत्ति का प्रमुख कारण है। चूँकि प्रकृति को यहाँ इतना सूक्ष्मातिसूक्ष्म दर्शाया है, इसलिए इसमें पर्यावरण अनायास ही जीवंत हो उठा है। न्यायदर्शन में ईश्वर एवं जीव के साथ प्रकृति भी महत्वपूर्ण घटक है। वैशेषिक दर्शन में पंचमहाभूत तत्वों का वर्णन है। यही तत्त्व सृष्टि के मुख्य कारक तत्त्व हैं। योगदर्शन भी साँख्य की तरह ही प्रकृति का विवेचन और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अतः सभी दर्शन प्रकृति के रूप में पर्यावरण के महत्व को प्रतिपादित करते हैं।

वैदिक एवं दार्शनिक साहित्य की ही भाँति पुराणों में भी पर्यावरण के घटकों को पूजनीय माना है, प्रकृति के इन घटकों में देवत्व का भाव भी दर्शाया गया है। यहाँ मिट्टी प्रस्तर के पहाड़ को देवात्मा हिमालय बताया है तो नदियों को देवी का पर्याय माना है, जिसमें पुण्यतोया गंगा का स्वरूप तो अवर्णनीय है। पुराणों के अनुसार ईश्वर संसार के कल्याणार्थ कभी मत्स्य का आकार ग्रहण करते हैं तो कभी कछुआ, हंस बनकर इनकी महत्ता प्रतिपादित करते हैं। सिंह और वाराह के रूप में आकर सभी जीवों की श्रेष्ठता घोषित करते हैं। इसी लिए भारतीय संस्कृति में सभी जड़-चेतन का दिव्य माना है। पुराणों की रचना का आधार भी सृष्टि के तत्वों को लेकर बना है। अनेक पुराणों का नामकरण भी इन तत्त्वों के नामों को लेकर हुआ है। अग्निपुराण , वायुपुराण आदि में यही भाव दिखाई देता है। इन सभी पुराणों में दिव्य प्रकृति का सहज वास है।

ब्रह्मानंदपुराण ने अपने एक श्लोक में जलतव की महत्ता प्रतिपादित की है। गंगाजल की विशेषता इसमें खासतौर पर परिलक्षित होती है। वृक्ष मानवमात्र के लिए सतत् प्राणदायक वायु का संचार करते हैं। यही वजह है कि भारतीय ऋषियों महर्षियों न वृक्षों के प्रति अगाध अनुराग भावना प्रदर्शित की है। यहाँ पर वृक्ष पूजा का प्रचलन अति प्राचीन है। देवदार का देवताओं का प्रिय वृक्ष कहा जाता है । तुलसी को वायुशोधन एवं पवित्रता के लिए हर आँगन में रोपने की प्रथा है। पौराणिक मान्यता के अनुरूप ही अपने यहाँ पीपल, पलाश , नीम अशोक बरगद कदंब आँवला आदि अनेक वृक्षों को देवता के सदृश पूजा जाता है। प्राचीनकाल में तो वृक्षों के साथ वनों की भी पूजा होती थी। इसीलिए मधुवन , वृहदवन बहुलवन , कुमुदवन , श्रीवन, नंदनवन आदि वनों का वर्णन मिलता है। इन सभी उपक्रमों एवं प्रयासों के पीछे पर्यावरण को संरक्षित करने की विशेषता ही झलकती है।

पुराणों का उदयकाल वेदकाल से प्रारम्भ होकर सोलहवीं शताब्दी के अंतिम कालखंड तक माना गया है। अतः इस दीर्घावधि में पर्यावरण के प्रति पर्याप्त सजगता एवं जागरुकता का रुझान मिलता है। इसके अलावा इतिहास के पृष्ठों में दब तमाम तथ्यों का उभारने पर पता चलता है कि इन दिनों भी पर्यावरण के प्रति दृष्टिकोण विधेयात्मक था। सिंधु सभ्यता के युग में द्रविड़ों की जीवनशैली न पर्यावरण प्रेम को दर्शाया है। वे विशेष रूप से वृक्ष पूजा करते थे। द्रविड़ों के द्वारा प्रारम्भ की गई यह प्रक्रिया एवं परंपरा बाद में भी जीवित रही। चंद्रगुप्त मौर्य के समय वन की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में अभ्यारण्यों की पाँच श्रेणियाँ होती थी। सम्राट अशोक के शासनकाल में सर्वप्रथम वन्य जीवों के संरक्षण हेतु नियम बनाए गए थे। इसके पश्चात् भी यह सिलसिला चलता रहा।

पर्यावरण संरक्षण की इस सुदीर्घ एवं अतिप्राचीन परंपरा का आधुनिकता की आग ने भारी नुकसान पहुँचाया है। दोहन और शोषण , वैभव एवं विलास की रीति नीति से पर्यावरण को संकट में डाल दिया है, फलतः जीवन भी संकटग्रस्त है, सब ओर विपन्नता है, प्राकृतिक आपदाओं का क्रूर ताँडव है। वैज्ञानिक हो या राजनेता ,सभी प्रकृति के क्रोधावेश से डरे-सहमे हैं। समाधान की खोज के इन पलों में सार्थक निदान के लिए जरूरी है कि हम अपनी विरासत को सँभाले। पर्यावरण संरक्षण की टूट-बिखर रही कड़ियों को पुनः जोड़े। हममें से प्रत्येक मन-वाणी-कर्म से इस सत्य का वेदकालीन महर्षियों के स्वर-में-स्वर मिलाकर सस्वर उद्घोष करें-ॐ द्यौ शाँतिः अंतरिक्ष शाँति पृथ्वी शाँतिः आपः शाँतिः। जब हम अपने आचरण व्यवहार से माता प्रकृति के कोप को शाँत करेंगे, तभी हमारा अपना जीवन भी शाँत और सुखी होगा।


Quotation

गीता में कहा गया है -” न हि ज्ञानेन सदृश पवित्रमिह विद्यते “ अर्थात् इस संसार में ज्ञान से बढ़कर और कोई श्रेष्ठ पदार्थ नहीं है। आत्मनिर्माण की , सुसंस्कार की, सत्प्रवृत्तियों की भावनाएँ जाग्रत करने वाले सद्विचारों को ही सच्चा ज्ञान कहा जा सकता है। यही जीवन को सफल बनाने वाला सर्वश्रेष्ठ पदार्थ है। ज्ञान लाभ का उद्देश्य पूर्ण करने वाला सर्वसुलभ साधन ‘स्वाध्याय’ ही है।


लड़कों का समाधान (kahani)

बेटे नास्तिक होते जा रहे थे। अक्सर वे कहते-”ईश्वर यदि है तो भी पक्षपाती है। किसी को सुख देता है, किसी को दुःख। ऐसे ही अनीति बरतने वाले पर श्रद्धा जमती ही नहीं। “ बाप को पता चला, तो उसने बेटों को बुलाया। कहा तो कुछ नहीं, पर सामने वाले एक ही खेत में कई तरह के पेड़ -पौधे लगान में उन्हें साथ ले जिया। बोया हुआ समयानुसार फलित हुआ।गन्ना मीठा, चिरायता कडुआ, गुलाब पर फूल, कँटीली पर काँटे, गुलाब से सुगंध, मरुआ से दुर्गंध जैसी भिन्नता थी। बाप ने बेटों को बुलाकर पूछा - “बच्चों , हम लोगों ने एक ही दिन, एक ही भूमि पर पौधे लगा थे, पर उनमें यह भिन्नता से ही पौधों के स्वाद में अंतर आया है। पिता ने हँसते हुए कहा- “बच्चों , भगवान् न अन्यायी है न पक्षपाती । मनुष्य अपने कर्म बीज बोता है और वैसा ही भला बुरा काटता है। भिन्न परिस्थितियों का कारण भगवान् नहीं, कर्त्ता का अपना स्तर एवं पुरुषार्थ ही होता है।” लड़कों का समाधान हो गया, उनकी आस्था फिर वापस लौट आई।


बचें चाय से , पिएँ प्रज्ञापेय

चाय ठंड के दिनों का प्रचलित गरम पेय है इसके सेवन से चुस्ती और स्फूर्ति आती एवं आलस्य दूर भागता है। यह सर्वसुलभ और सस्ती भी है। इसका प्रयोग प्रायः हर वर्ग और हर क्षेत्र के लोग करते देखे जाते हैं।

वर्तमान समय में स्वागत का यह सर्व सरल साधन है। जल के बाद आतिथ्य हेतु इसी का इस्तेमाल होता है। यों तो यह चीन देश का उत्पाद है, पर उसे पृथक कर पाना अब संभव नहीं।

भारत में इसका प्रचार और प्रचलन सर्वप्रथम अंग्रेजों ने किया। वे इंग्लैण्ड जैसे शीतप्रधान देश के निवासी थे। उन्हें चाय लेने की आदत-सी थी, इसलिए गरम देश होने के बावजूद उन्होंने यहाँ इसको बढ़ावा दिया।

किंतु कई कारणों से अब यह सुरक्षित नहीं रही।इनमें पहला है, इसमें विद्यमान लेड धातु की घातक मात्रा। हैदराबाद उपभोक्ता शोध संस्थान द्वारा की गई जाँच से ज्ञात हुआ है कि भारत में पाए जान वाले चाय के करीब 50 ब्राँडों में से कोई भी ऐसा नहीं है , जो पूर्णतः लेडरहित हो। ऐसा कदाचित हो भी नहीं सकता, कारण यह कि चाय के प्रसंस्करण के दौरान इसकी कुछ मात्रा डालनी आवश्यक होती है।शरीर में पहुँचकर यही नुकसान पहुँचाती है। यों तो यह मात्रा खाद्य सुरक्षा कानून द्वारा निर्धारित सीमा के अंतर्गत ही होती है, पर हाल के वर्षों में हुए शोधों में अब यह सीमा भी सुरक्षित नहीं रही। परीक्षणों से विदित हुआ है कि भारत में पाई जाने वाली विभिन्न किस्मों में एक भाग प्रति दस लाख से लेकर 1.5 भाग प्रति दस लाख तक लेड मौजूद होता है। जाँच के दौरान चाय के गोल दाने और पाउडर में इसकी सर्वाधिक मात्रा देखी गई। पंद्रह अन्य ब्राँडों में यह एक भाग से लेकर 4.2 भाग तथा दूसरे अठारह ब्राँडों में 2.8 भाग से 9.5 भाग प्रति दस लाख के हिसाब से पाई गई । इसके अतिरिक्त सात पत्तीदार किस्मों में कुछ नशीले तत्त्व भी वर्तमान थे। इनकी मात्रा 3 भाग से 4.8 भाग प्रति दस लाख थी। ब्रिटेन में लेड की स्वीकृत मात्रा 5 भाग प्रति दस लाख है।

वर्तमान अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि पिछले दिनों रक्त में लेड की जितनी मात्रा निरापद मानी जाती थी। अब वही स्तर घातक साबित हुआ हैं। ऐसी स्थिति में चाय जैसे लोकप्रिय और प्रचलित पेय में उसकी मान्य मात्रा पर पुनर्विचार की आवश्यकता है और उसे इतनी न्यून किए जाने की जरूरत है कि उसका अवाँछनीय प्रभाव शरीर पर न पड़े।

ऐसा पाया गया है कि लेड की बढ़ी हुई मात्रा से सर्वाधिक नुकसान गुर्दे, यकृत, श्वसन नलिका, स्नायुतंत्र, हृदय, रक्तवाहिनियों एवं आँतों को पहुँचता है। प्रातःकाल खाली पेट चाय के साथ जब यह खून में मिलता है तो इससे रक्त में लौह और कैल्शियम तत्त्वों की कमी हो जाती है। इसके कारण रक्त एवं अस्थि संबंधी तरह तरह के विकार पैदा हो सकते हैं। गर्भवती महिलाओं में यह प्लासेंटा को हानि पहुँचाती है।

इसके अतिरिक्त चायपत्ती में डी.डी.टी., टैनिन, कैफिन, नमी एवं दूसरी धातुओं की उपस्थिति की भी जाँच होती है। कीटों से सुरक्षा के लिए चाय के पौधों में डी.डी.टी का छिड़काव किया जाता है, जो पत्तियों द्वारा अवशोषित होकर उसमें धुल-मिल जाती है।वर्तमान समय में भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा इसकी निर्धारित सीमा 5 भाग प्रति दस लाख है। इसे भी घटाने की जरूरत है। टैनिन और कैफिन चाय के मौलिक तत्व हैं। टैनिन से चाय की खुशबू और रंग निश्चित होता है, किंतु इसकी मात्रा कितनी हो? इस संबंध में कोई नीति-निर्धारण नहीं है। इसी प्रकार कैफिन चाय के मौलिक तत्व है। टैनिन से चाय की खुशबू और रंग निश्चित होता है, किंतु इसकी मात्रा कितनी हो? इस संबंध में कोई नीति निर्धारण नहीं है। इसी प्रकार कैफिन की सीमा भी तय नहीं है, लेकिन ईराक आदि देशों में इसका मानक एक प्रतिशत तक निर्धारित है।

चाय का सिरमिक (चीनी मिट्टी) प्याला में रखकर पीने से उसमें लेड का प्रतिशत और अधिक बढ़ जाता है। तथा चाय विषाक्त हो जाती है। कारण यह कि प्यालों में चमक लाने के लिए लेड धातु की पालिश चढ़ाई जाती है, जो चाय गरम पेय के संपर्क में आकर घुलने लगती और चाय को विषैला बनाती है। अस्तु , अधिक निरापद यही है कि चाय अथवा दूसरे गरम पेय काँच या स्टील के कपों में पिए जाएँ।

चाय पत्ती में विद्यमान लेड धातु की हानियों से बचने के लिए उसका कोई उपयुक्त विकल्प हो सकता है। एक कप पानी में एक छोटी चुटकी पाउडर के साथ कुछ तुलसीपत्र एक-दो कालीमिर्च , थोड़ा अदरक एवं जराँकुश डालकर बनाया गया पेय स्वाद और सुगंध की दृष्टि से अति उत्तम है। अधिक पेय के लिए इसी अनुपात का इस्तेमाल करना चाहिए।

चाय एक उद्दीपक है। इसे लेने से सुस्ती मिटती और आलस्य घटता है किंतु साथ−साथ नींद और भूख भी कम लगने लगती है। अस्तु , इसके सेवन से जितना बचा जा सके बचना चाहिए।


Quotation

सम्मानित उन्हें किया जाएगा, जो कर्त्तव्य के साँच में अपने क्रियाकलापों को ढालते रहेंगे।


बिनु सत्संग विवेक न होई

सेठ मूलराज ने जीवनभर धन-संपत्ति का अर्जन किया। उनके उत्कट पुरुषार्थ एवं भगवान् की कृपा से उन्हें घर -परिवार के सारे सुख -साधन उपलब्ध थे। परिवार के सभी सदस्य उन्हें भरपूर प्यार और सम्मान देते थे। परिवार के सदस्यों के साथ नगरवासी भी उनके अपने थे । उनका इंगित ही हर किसी के लिए आदेश था। अनवरत कर्मरत रहते हुए उनके जीवन के 60 वर्ष कैसे निकल गए, इसका उन्हें भान ही नहीं हो पाया। लंबे-चौड़े कारोबार के स्वामी होने के नाते वे सदा व्यस्त रहे और ज्यादा से ज्यादा अर्जन उपार्जन को ही व जीवन की सफलता मानते रहे। शायद धन का चक्कर ही ऐसा होता है कि उसके सामने बाकी सारी चीजें गौण हो जाती है।

उनके साठवें जन्मदिन पर हमेशा की ही तरह लोगों ने शुभकामनाएँ प्रकट की। सेठ जी मुस्कराते हुए सभी की मंगल कामनाएँ स्वीकार कर रहे थे। पर न जाने क्यों इस बार उन्हें लग रहा था कि शुभेच्छा लेना और आभार मानना ही तो सब कुछ नहीं है- जन्मदिन तो शायद इससे कुछ अधिक की अपेक्षा रखता है। यह तो जीवन का वह पुण्य दिवस है, जबकि गहराई से आत्मनिरीक्षण एवं आत्मसमीक्षा की जानी चाहिए, साथ ही कुछ ऐसा भी हो, जिससे कि जीवनलक्ष्य के प्रति संकल्पबद्धता अधिक तीव्र एवं उत्कट हो।

अबकी बार आत्मा के स्वर उन्हें पुकार रहे थे कि सेठ तुम पर अब वृद्धावस्था हाव हो चुकी है। यह असीम संपत्ति समूचा धन -वैभव, सारी चकाचौंध यही धरी रह जाएगी और हंस अकेला उड़ चलेगा। और तब?

इसी चिंतन मंथन में उलझे सेठ मूलराज को नींद नहीं आई। तर्क-वितर्क चलते रहे। उनका मन गहरी ग्लानि से भर गया। जीवनभर कुछ नहीं किया- न दूसरे का ही कुछ विशेष भला किया और न स्वयं के सार्थक हितचिंतन में तत्पर हुए। अब तो लड़के भी बड़े और समझदार हो गए है। वे व्यापार सँभाल ही रहे है। फिर न जाने क्यों मैं इतना आसक्त हो रहा हूँ। उन्होंने आखिर निर्णय ले ही लिया कि कल ही वे किसी आध्यात्मिक गुरु की शरण प्राप्त कर अपने शेष जीवन को परमेश्वर के गुणानुवाद और लोकहित में खपा देंगे। इसी सोच-विचार में चाँद कब अपनी तारों वाली बारात लेकर चला गया , पता ही न चला।

भोर होते ही, नित्यकर्म से निपटकर सबको आश्चर्य में डालते हुए वे यात्रा पर निकल पड़े। उनको सच्चे गुरु की तलाश थी और इस खोज में वे अनेक तीर्थों में गए। जो भी संत मिलता, वहीं अपने प्रश्न रखते और समाधान माँगते। इस प्रक्रिया में उन्हें एक अद्भुत एवं विलक्षण संत से मुलाकात हो ही गई।

सेठ जी ने उनसे पूछा- “महात्मन् ! आनंद क्या वस्तु है?”

प्रश्न सुनकर वे योगीराज मुस्कराए और फिर बोले-”सेठ जी ‘आ’ का अर्थ है अन्य, ‘न’ का अर्थ है नहीं और ‘द’ कस अर्थ है दर्शाना अर्थात् दिखाई देना। आनंद का अर्थ है ‘जब अन्य कोई दिखाई न दे। मैं का अस्तित्व समाप्त होकर जब तू ही तू रह जाए। तब समझो कि आनंद की भूमि में प्रवेश हुआ है। “

सेठ जी काफी प्रभावित हुए। वे बोले- “आजकल तो लोग चमत्कार को ही नमस्कार करते हैं। ऐसे में सच्चे आनंद की खोज कैसे हो?”

“सेठ जी ! लोग करामातों अर्थात् सिद्धियों का प्रयोग करते हैं। परंतु इसमें धरा ही क्या है! आप लोग अँगूठियाँ लेते फिरते हो, यह तो बाजार में कुछ रुपयों में मिल जाती है। मदारी सरेआम लोगों के सामने आम लगा देता है, किंतु उसका मूल्य दो-चार रुपये है। पर उस ईश्वर की लीला बड़ी अनोखी है। गोपियाँ उसको छछिया भर छाछ पर नाच नचाती थीं? क्या वह छाछ का भूखा था? क्या उसे मक्खन नहीं मिलता था? यह उसकी लीला थी। गोपियाँ उसकी बन गई। तो आनंद भी आ गया। “ महात्मा जी ने अपनी बात की स्पष्ट रूप से व्याख्या की।

“नाम तो हम लोग भी उसका दिन रात लेते हैं। पूजा-पाठ करते हैं, फिर भी जीवन में आनंद का नामोनिशान नहीं है।” सेठ मूलराज ने अबकी बार अपने हृदय की जिज्ञासा प्रकट की।

“अरे भई! आनंद तो आता है। वह परमात्मा तो बरतन में अमृत ही डालता है, परंतु यदि बरतन ही फूटा हो तो अमृत डालने वाले का क्या दोष है? शराब सदा बोतलों में भरी रहती है। पर बोतलों को कभी भी नशा नहीं आता। नशा उसी को चढ़ता है, जो शराब पीता है। एक बार शराब पी लेने पर, फिर पीने वाला कुछ नहीं करता, जो कुछ करती है , वह तो शराब ही करती है। इसी प्रकार उस प्रभु का नशा सभी शरीरों में लबालब भरा है। जो भी उसको समझ लेता है , उसी को आनंद मिलता है।” उन संत ने अपनी बात विस्तार से समझाई।

तीर्थयात्रा करते करते सेठ जी काफी ज्ञानी हो गए थे।अतः उन्होंने पुनः पूछा। “भाव व कर्म का भेद क्या है?”

महात्मा जी कहने लगे- “यह भेद तो कुछ यूँ है कि कर्म दिखने में आ जाता है, जबकि भाव दिखने में नहीं आता। डॉक्टर ऑपरेशन करता है। कर्म उसका काटने का है, जिसमें मरीज का कष्ट होता है , परंतु उसका भाव है कि मरीज किसी भी तरह स्वस्थ हो जाए। भगवान् तो भाव का भूखा है । हर समय उसका भाव से स्मरण करते रहना चाहिए।”

“महात्मन्! प्रेम क्या है?”

“जब प्रभु के अलावा कोई अन्य दिखाई न दे, तब समझना चाहिए कि प्रेम है। प्रेम किसी को दिखाकर करने का नहीं है। प्रेम तो अपने प्रियतम से भी छिपाया जाता है। प्रेम बताने पर दूषित हो जाता है।पर वासना और कामना रहित प्रेम ही सच्चा प्रेम है।” उन्होंने समझाया।

“तर्क कहाँ तक रहता है?”

“जब तक उस प्रभु से पूरा नहीं है, तभी तक तर्क है।”

“मैंने कई प्रश्न पूछे और आपने स्नेह उपयोगी व सामयिक उत्तर दिए। अब मैं एक उलझन भरा प्रश्न पूछ रहा हूँ।”

“पूछिए” महात्मा जी के गंभीर मुख पर मुस्कान खेल रही थी।

मन का रहस्य क्या है?

संत बड़े रहस्यपूर्ण ढंग से हँसते हुए बोले- “मन में सारे रहस्य रहते हैं और आप मन का ही रहस्य जानना चाहते हैं खैर सुनिए। मन के तीन रूप हैं, लुब्धमन, मुग्धमन और बुद्धमन। लुब्धमन -अर्थ को ही जीवन का आधार मानता है। मुग्धमन -विकार को ही अमृत की धार मानता है।” अपनी बातों को सूत्र रूप में कहकर महात्मा जी ने एक प्रश्नवाचक दृष्टि से सेठ मूलराज की ओर देखा- मानो, वे पूछना चाह रहें हों-कोई प्रश्न और?

तब तक सेठ जी स्वयं ही कहने लगे - “महात्मन् ! अब मैं एक अंतिम प्रश्न और पूछ रहा हूँ। कृपा करके यह बतलाएँ कि इस संसार में सभी ज्ञान के पीछे भाग रहे है। ऐसे में जानने योग्य वस्तु क्या है?”

इस बार महात्मा जी ने जोर का ठहाका लगाया। ठहाके की यह गूँज समूचे वातावरण में बिखर गई। इस बिखरती गूँज के बीच ही वह कहने लगे-”सेठ मूलराज की ओर देखा-मानों वे पूछना चाह रहे हों-कोई प्रश्न और?

तब तक सेठ जी स्वयं ही कहने लगे -”महात्मन्!अब मैं एक अंतिम प्रश्न और पूछ रहा हूँ। कृपा करके यह बतलाएँ कि इस संसार में सभी ज्ञान के पीछे भाग रहे है। ऐसे में जानने योग्य वस्तु क्या है?”

इस बार महात्मा जी ने जोर का ठहाका लगाया। ठहाके की यह गूँज समूचे वातावरण में बिखर गई। इस बिखरती गूँज के बीच ही वह कहने लगे- “सेठ मूलराज, आप तो यहाँ भी व्यापारी की ही तरह नाप तौल कर पूछ रहे है, सुनिए जानने योग्य वस्तु वही है, जिसके जानने से आनंद की अनुभूति होती हो। जो अस्थायी , नाशवान् व अनित्य है तथा जिसके जानने से दुःख पैदा होता है, ऐसी वस्तु जानने योग्य नहीं होती। अतः ऐसी वस्तु न जानने में ही लाभ है। यही वजह है कि महापुरुषों ने बुद्धिवाद को भ्रम मूलक बताते हुए कुछ न जानने को ही अच्छा बताया है। यदि जानना ही चाहते हो तो उस परम प्रभु के विराट स्वरूप को पहचानो, जो सत्यस्वरूप, अविनाशी नित्य एवं आनंद देने वाला है।

सेठ मूलराज सच्चा ज्ञान प्राप्तकर पुनः घर लौट आए और अपनी पूँजी के मात्र ट्रस्टी बन गए। गरीबों एवं पीड़ितों, अभावग्रस्तों के लिए उन्होंने खजाना खोल दिया। सच्चा आत्महित एवं लोकहित ही अब उनका प्राप्य था। अब वे सच्ची पूँजी का संग्रह करने में जुट गए, जिससे उनकी जन्म-जन्माँतर की प्यास बुझ सकती है।

जब कोई उनसे उनके इस आश्चर्यजनक परिवर्तन का रहस्य पूछता तो वे गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की यह अर्द्धाली बड़े भावपूर्ण स्वर में गाकर सुनाते”

बिनु सत्संग विवेक न होई।” हाँ उन्हें सच्चा सत्संग प्राप्त हुआ था। इस सत्संग ने ही उन्हें ऐसा विवेक दिया था। जिससे वे जीवन जीने की कला जान गए थे।


महानता के बीज (kahani)

एक शेर ने कुछ सियारों के सहयोग से बारहसिंगा मारा। माँस के बँटवारे का निपटारा सिंह को ही करना था। उसने शिकार के टुकड़े किए। कहा- एक टुकड़ा राजवंश का कर। दूसरा टुकड़ा अधिक पुरुषार्थ करने से मेरा। तीसरा स्वयंवर जैसा है। उसे पाने के लिए जो प्रतिद्वंद्विता में आना चाहे, सो संघर्ष के लिए तैयार हो। सियार चुपचाप खिसक गए। सिंह ने पूरा बारहसिंगा खा डाला। शिक्षा यही है कि धूर्त के साथ सहयोग भी हितकारी नहीं होता। जहाँ तक हो, उससे बचना ही चाहिए।

राष्ट्रमंडलीय प्रधानमंत्रियों के सम्मेलन में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री को लंदन जाना था। उनके पास कोट दो ही थे। उनमें से एक में काफी बड़ा छेद हो गया था। शास्त्रीजी के निजी सचिव श्री वेंकटरमण ने नया कोट सिलवाने का आग्रह किया, पर शास्त्री जी ने इनकार कर दिया। फिर भी वंकटरमण कपड़ा खरीद लाए और दरजी काबुलवालिच। जब कोट कानापलिचा जाने लगा तो शास्त्रीजी हँसे और बोले -”इस समय तो इसी पुराने कोट को पलटवा लो। नहीं ठीक जमा तो दूसरा सिलवालूँगा।”

जब कोट दरजी के यहाँ से आया तो कोट की मरम्मत का पता तक नहीं चला। तब शास्त्री ने कहा-”जब कोट की मरम्मत का पता हमें ही नहीं चल पा रहा है, तो सम्मेलन में गलन वाले भला क्या पहचानेंगे!”

और वे उसी कोट को पहनकर लंदन राष्ट्रमंडलीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए गए।ऐसी थी शास्त्रीजी की सादगी। यह वृत्ति राष्ट्र को अपना एक परिवार मानने व स्वयं को उसका एक अभिन्न अंग मानने के कारण विकसित होती है। क्षुद्र व्यक्ति इसे कृपणता समझ सकते हैं, पर सत्य यही है कि इस सादगी में अपव्यय की रोकथाम में ही महानता के बीज छिपे पड़े हैं।


न विधि , न संस्कार, यह कैसा परिवार

महानगरों में दाँपत्य जीवन की स्थिति पर किए गए अध्ययन में चौंका देने वाले निष्कर्ष सामने आए हैं। अध्ययन ज्योतिषीय है और एस्ट्रोविजन नामक संस्था ने किया है, लेकिन इसकी निष्पत्तियाँ समाजशास्त्रीय दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। पिछले दस वर्षों में हुए विवाहों में बारह प्रतिशत लोगों ने बिना किसी संस्कार और विधि के गृहस्थ जीवन आरंभ कर लिया। उन्होंने न तो कोई शास्त्रीय विधि अपनाई, न बड़े बूढ़ों का आशीर्वाद लेकर गृहस्थी की चौखट में पाँव रखा और न ही कानून के अनुसार शपथ लेकर या अदालत में पंजीयन कराकर दंपत्ति बने। बस यों ही साथ रहना शुरू किया और वे युगल माता-पिता भी बने।

प्रचलित भाषा में इस तरह के विवाह को ‘सहजीवन’ कहते हैं। पश्चिमी देशों में यह पद्धति खासी लोकप्रिय है। परंपरागत पारिवारिक मूल्यों से रहित वहाँ के समाज में स्त्री−पुरुष वैसे भी सुख विलास के लिए परस्पर संपर्क में आते हैं। साथ रहते हैं और जब तक निभता है साथ निभाते हैं, वरना साल दो साल, चार छह साल बाद अलग हो जाते हैं। भारत जैसे देश में परिवार अथवा दाँपत्य को इस तरह हलके फुलके ढंग से नहीं लिया गया। यहाँ विवाह का अर्थ जनम जन्माँतरों का बंधन है। जन्म-जन्मांतर नहीं तो कम से कम जीवनभर चलने वाला साथ तो है ही। एस्ट्रोविजन संस्था के कराए अध्ययन में जिन जोड़ो ने आपसी रजामंदी और समझ के अनुसार साथ रहना शुरू किया, उनमें सत्तर प्रतिशत लोग एक-दूसरे को कोसते-कलपते हुए अलग होकर रहे हैं। जो अलग नहीं हो पा रहे, वे एक वृक्ष की शाखा पर बैठे दो विजातीय पक्षियों की तरह बेरुखी जिंदगी जी रहे हैं अथवा अलग होने की तैयारी में हैं।

संस्था ज्योतिष से संबंधित है और उसने अध्ययन में सभी युगलों की जन्मकुण्डली को भी जाँचा -परखा है। ज्योतिष की सामान्य जानकारी रखने वाले विद्यार्थी भी जानते हैं कि कुँडली में सातवाँ भाव जीवनसाथी की स्थिति और विवाहित जीवन के रंग-ढंग बताता है। ‘सहजीवन’ या लिविंग विदक प्रयोग से गुजर रहे इन युगलों की वैवाहिक स्थिति शास्त्रीय दृष्टि से ‘गंधर्व’ श्रेणी में आती है। गंधर्व विवाह का अर्थ है-परस्पर आकर्षण के वशीभूत होकर किए गए प्रणय संबंध और उनका प्रवाह। इन युगलों की कुँडली में सातवाँ भाव या तो राहु से दृष्ट था अथवा उसके अधीन साथ ही वह शनि से भी प्रभावित था। राहु मतिभ्रम लाने वाला ग्रह है। ‘एस्ट्रोविजन ‘ के संयोजक आचार्य वाचस्पति के अनुसार संस्कार और विधि की उपेक्षा-अवज्ञा मतिभ्रम के कारण ही हो सकती है। कुछ नहीं तो अदालत में जाकर विवाह का पंजीयन कराने में कौन-सा खर्च आता है कहाँ के सरंजाम जुटाने पड़ते हैं और कैसी बाधाएँ आ सकती है।

मर्यादा और लोकाचार की उपेक्षा कर यूँ ही साथ रहने लगना यह कोई क्राँतिकारी कृत्य नहीं है। इस तरह का प्रणय व्याभिचार की श्रेणी में आता है। बड़े शहरों में जहाँ युवक-युवती अकेले रहते हैं, एक-दूसरे के संपर्क में आने के बाद आवेश और आकर्षण के चलते करीब आते हैं। अभिभावक उनसे प्रायः दूर रहते हैं। उनका कोई नियंत्रण नहीं होता। शारीरिक और बौद्धिक आकर्षण उन्हें एक छत के नीचे इकट्ठा करता है। ऐसे युगलों की कुँडली में चंद्रमा आमने-सामने देखे गए है। ज्योतिषी के अनुसार चंद्रमा मन का अधिपति ग्रह है। वह आकर्षित भी करता है और व्यथित भी। जिन कुँडलियों में यह ग्रह आमने-सामने नहीं हैं, उनके जातक राहु की दशा या अंतर्दशा निकलते ही रोते पीटते अलग हो जाते हैं। लेकिन कुछ मामलों में सहजीवन फिर भी चलता रहता है । उन युगलों की संतानें भी होती है।

‘सहजीवन‘ बिता रहे अथवा गंधर्व श्रेणी का विवाह करने वाले दंपत्तियों में पहली संतान के बाद तनातनी शुरू हो जाती है।आचार्य पराशर के अनुसार उनकी कुँडली में नहीं तो गोचर में शनि की दृष्टि सातवें भार पर पड़ने लगती है।

शनि क्रूर ग्रह माना गया है। उसकी दृष्टि अशुभ-अमंगल है और प्रायः दुःख ही देती है। डॉ. उमेश कौशिक के अनुसार शनि अनुशासन का देवता है। धर्म-मर्यादा में रहने वालों को वह ज्यादा कष्ट नहीं देता । बहुत बार तो वह उन्हें सुख आर स्थिर प्रगति भी देता है। गंधर्व श्रेणी का दाँपत्य जी रह युगलों न यदि संस्कार और विधि दोनों की उपेक्षा की है वो शनि की दृष्टि उन्हें अनिवार्य रूप से पीड़ित करती है। ऐसे लोगों का दाँपत्य रोते-झींकते चलता रहता है और एक अवस्था आने पर संबंधों का दारुण अंत होता है। डॉ. उमेश कौशिक ने तनाव से बेहद पीड़ित ऐसे युगलों को सलाह दी कि वे अपने संबंधों को वैधानिक बना लें, उन्हें धर्म -मर्यादा में बाँध ले। इस तरह का परामर्श मानने वाले आठ युगलों में से छह के आपसी संबंधों में सत्तर प्रतिशत तक सुधार आया थोड़ा बहुत तनाव तो चलता ही रहता है।

गुरु से दृष्ट प्रणय संबंधों में युगलों ने आवेग और आकर्षण से प्रेरित होकर साथ रहना शुरू कर दिया, लेकिन देखा गया कि उन्होंने धर्म-मर्यादा में जल्दी ही अपने आपको बाँध लिया। ज्यादा औपचारिकताएं नहीं की तो मंदिर या अदालत में जाकर ही अपने संबंधों की घोषणा कर दी- गृहस्थ धर्म के पालन की प्रतिज्ञा कर ली -उस स्थिति में राहु का आधिपत्य और प्रभाव कुछ नहीं बिगाड़ पाया।

समाजशास्त्री इस तरह के विवाह संबंधों को लेकर चिंतित है। उनके अनुसार सहजीवन की बढ़ती हुई लोकप्रियता परिवार संस्था के आस्तित्व पर प्रश्नचिह्नों लगा रही है। अलग होने के बाद पति -पत्नी तो किसी तरह जीवन काट लेते है अथवा नया साथी चुन लेते हैं। समस्या बच्चों के लिए हो जाती है। उनकी देखभाल का प्रबंध हो जाए तो माता-पिता के लाड़-दुलार का अभाव उनके विकास को कुँठित कर देता है।

ज्योतिष के साथ समाजशास्त्र में भी दखल रखने वाले डॉ. कौशिक मानते हैं कि गंधर्व विवाहों का बढ़ता हुआ चलन मनुष्य को आदिम स्थिति में ले जाकर छोड़ेगा- उस स्थिति में जब स्त्री पुरुष दैहिक कारणों से संपर्क में आते थे और कुछ समय साथ रहने के बाद अलग हो जाते थे। उस आदिम स्थिति में होने वाली वंशवृद्धि मनुष्येत्तर प्राणियों की तरह संख्या ही बढ़ती रहेगी, सभ्यता की दृष्टि से तो हम उसी बिंदु पर खड़े होंगे, जहाँ से आरंभ किया गया था।

कानूनी दृष्टि से सहजीवन बिता रहे दंपत्तियों में कोई किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं है। दो-तीन बच्चों को जन्म देने के बाद पति अलग हो जाए तो पत्नी उसे पालन -पोषण के लिए बाध्य नहीं कर सकता। विवाह -विच्छेद, अलगाव और भरण पोषण का उसका कोई दावा नहीं बनता, न ही पति इस तरह के किसी अधिकारी अथवा दायित्व की अपेक्षा कर सकता है। कुछ मामलों में तो यह भी हुआ कि पाँच छह साल तक साथ रहे दंपत्ति में पति या पत्नी की दुर्घटना में मृत्यु हो गई। दिवंगत जीवनसाथी की जमापूँजी पर दूसरे सहचर का कोई अधिकार नहीं माना गया। मृत पति या पत्नी के रिश्तेदार और जमा पूँजी के साथ भविष्य की रकम भी समेटकर चले गए। असल उत्तराधिकारी के हाथ कुछ नहीं लगा।

सामाजिक और राजनीतिक जीवन में इस तरह के संबंध निंदा और तिरस्कार की दृष्टि से ही देखे जाते हैं। हिर है उसका प्रभाव संतान पर भी पड़ता है। एस्ट्रोविजन के अध्ययन में यह निष्कर्ष आश्चर्यजनक है कि सहजीवन बिता रहे दंपत्तियों की संतानें और जोड़ों की संतानों की तुलना में ज्यादा बीमार, अल्पायु और असामान्य होती है। तीन उदाहरणों से इस निष्कर्ष की पुष्टि की गई। उनमें एक बच्चा बेहद गुमसुम रहता था। अपने साथ के बच्चे की तह पढ़ने -लिखने में नहीं चल पाया। आठ वर्ष की उम्र में उसे मामूली बुखार हुआ और चल बसा। दूसरे उदाहरण में बच्चे को अपने माता पिता का साथ कभी नहीं सुहाया । पाँच साल की उम्र में वह दादा दादी के संपर्क में आया। उनके साथ ऐसा हिलमिल गया कि बाप का भूल ही गया। तीसरे उदाहरण में बच्चा लगातार बीमार रहा। उसके उपचार में कोई कमी नहीं रही लेकिन न रोग का निदान हो पाया और न ही औषधियाँ लग पाई। अनेकानेक अपराधी भी ऐसे ही बच्चों में निकलते देखे गए। विधि और मर्यादा की आज्ञा अपने निजी जीवन को ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों को भी बुरी तरह प्रभावित करती है। विचारशील व्यक्तियों को सहजीवन परिवार संस्था के लिए चुनौती और सभ्यता -संस्कृति के पहिए को विलोम गति देने वाला लगता है। यह स्वाभाविक ही है।


सैकड़ों गुनी वृद्धि (kahani)

एक मच्छर शहद की मक्खियों के छत्ते पर पहुँचा और बोला -”वह बड़ा संगीतज्ञ है। मक्खियों के बच्चों को संगीत सिखाना चाहता है। बदले में थोड़ा सा शहद लिया करेगा।” रानी मक्खी तक समाचार पहुँचा , तो उन्होंने स्पष्ट इनकार कर दिया। कहा- “जिस प्रकार संगीत का ज्ञाता बनकर मच्छर हमारे दरवाजे पर भीख माँगने आया है, उसी प्रकार हमारे बच्चे भी परिश्रम छोड़कर भीख माँगने लगेंगे। मैं नहीं चाहती कि संस्कारों के स्थान पर सस्ते में कुछ पाने का लालच भरा शिक्षण इन्हें मिले। इन्हें अपने आप ही सब कुछ सीखने दो, तभी ये जीवन साधना में खरे उतरेंगे।”

सम्राट अशोक ने आधे मन से नहीं पूर्ण समर्पण भाव से बुद्ध की शरणागति ग्रहण की थी। उन्होंने धर्मचक्र प्रवर्तन की आवश्यकता को देखते हुए अपना वैभव पहले ही समर्पित कर दिया था। स्वयं उसी कार्य में अहर्निश लगे रहते थे । अशोक की दो संतानें थी- एक पुत्र महेंद्र दूसरी कन्या संधमित्रा। दोनों का ही उन्होंने दीक्षित करा दिया। संघमित्रा सिंहल द्वीप गई। वहाँ की राजकुमारी अनुला अपनी पाँच सौ सहेलियों समेत दीक्षित हुई और उस देश में महिला बुद्ध सभी ने उस पूरे देश को बुद्ध का अनुयायी बनाया। महेंद्र कामलाया देश में भेजा गया। इस प्रकार वह पूरा परिवार तन मन धन से उस महान् प्रयोजन के लिए समर्पित हुआ। उनके कारण उस अभियान की सैकड़ों गुनी वृद्धि हुई।


विषाक्त होता जा रहा है हमारा खानपान

जिंदगी जब भाग-दौड़ से भरी हो तो सब कुछ उलट पुलट जाता है। इस अस्त−व्यस्त उलट-पुलट में हर एक को हर काम के लिए समय है। नहीं है समय तो सिर्फ खाना पकाने और निश्चितता से खाने का। ऐसा लगता है कि व्यस्तता भरी भागदौड़ ने अपनी सारी चोटें मिलजुलकर भोजन पद्धति पर की हैं, आहार प्रक्रिया को तहस-नहस कर डाला है, जबकि जीवन को स्वस्थ एवं नीरोग बनाए रखने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण आहार ही है। शरीर की ज्यादातर बीमारियाँ असंगत आहार से ही पनपती और बढ़ती है। आहार संयम स्वास्थ्य रक्षा का मूल आहार है। यदि पथ्य-अपथ्य पर ध्यान रखते हुए पोषक आहार ग्रहण किए जाए तो रोगों से पूरी तरह बचाव संभव है। चरक संहिता में महर्षि चरक के वचन हैं -

षटत्रिशतं सहस्त्राणि रात्रीणाँ हितभोजनः। जीवत्थानातुरो जंतुर्जितात्मा संमतः शताम्॥

अर्थात् -संतुलित पथ्य भोजन ग्रहण करने वाला संयमी व्यक्ति छत्तीस हजार रात्रि अर्थात् सौ वर्ष तक पूर्ण नीरोग अवस्था में जीवित रह सकता है।

आज तो यह बात जैसे पूरी तरह से भुला दी गई है। फैशन , स्वाद एवं अभिजातीय सुविधा के कारण ऐसे आहार का प्रचलन बढ़ रहा है। जो स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत हानिकारक है।इन दिनों खाने-पीने की ज्यादातर वस्तुएँ टीन या प्लास्टिक के डिब्बों में अथवा बोतलों में बंद आती है। खानपान की यह संस्कृति बड़ी तेजी से समाज के सभी वर्ग के लोगों में फैलती जा रही है।समाजशास्त्रियों के अनुसार हमारी इस नई शैली पर पश्चिम का प्रभाव है, परंतु वहाँ सरकार एवं उपभोक्ताओं तक सही वस्तु ही पहुँचती है। निर्माण प्रक्रिया में हर स्तर पर गुणवत्ता की कड़ी जाँच होती है। उसे कब किस निर्माता ने , किन किन चीजों का कितना-कितना मिलाकर रखना चाहिए और कब तक खा लेना चाहिए आदि बात साफ साफ लिखी होती है। यदि कोई किसी चीज को खाकर बीमार पढ़ जाए तो निर्माता की बहुत बदनामी होती है। कई बार तो उसे अपना व्यवसाय बंद करने पर विवश होना पड़ता है।

अपना देश तो इस संदर्भ में सोया हुआ है। उसकी यह आलस्य निद्रा कब टूटेगी, पता नहीं? ट्रेड -नामों से बिकने वाले पेयजल की शुद्धता की गारंटी नहीं दी जा सकती। एक गणना के अनुसार देश में करीब साढ़े तीन हजार प्रकार के बोतल बंद पेय पाए जाते हैं। इनके अतिरिक्त छोटे-छोटे शहरों के अपने शीतल पेय हैं, जो अत्यंत हानिकारक ढंग से बनाए जाते हैं। खाने पीने की जो चीजें डिब्बों में बंद की जाती है, उनमें एथिल सोडियम क्लोराइड, एसिटिक एसिड तथा संक्रास आदि तत्व मिलाए जाते है। जिस एक खास मिश्रण का प्रयोग ज्यादा मात्रा में किया जाता है। उसे प्रिजर्वेटिव कहते हैं। इससे खाने की चीज बहुत दिनों तक बिगड़ने से बची रहती है।कुछ खाद्य पदार्थों में नाइट्रइड का इस्तेमाल होता है। तो कुछ में टाँक्सिक व आर्गेनिक रसायन होते हैं। कुछ चीजों में ऐसी एंटीबायोटिक दवाओं का भी इस्तेमाल होता है,जो डिब्बों में बंद कीटाणुओं का नाश तो करती है, पर उसके सेवन से बीमार हुए मनुष्य का उपचार करना मुश्किल हो जाता है।इन बनावटी पदार्थों के इस्तेमाल से कितना नुकसान हो सकता है। यह तो उपभोक्ता भी नहीं जान पाते।

फास्टफूड का प्रचलन जिस तेजी से पनपा है, उसी तेजी से उसकी कमियाँ भी उभरकर आई हैं। इसके उपयोग से पाचनतंत्र अत्यंत दुष्प्रभावित होता है। फास्टफूड यानि बर्गर सैंडविच चाऊमिन आदि अनेक बीमारियों को जन्म देते हैं। इन खाद्यपदार्थों में डाले जाने वाले रेडीमेड मसालों से तरह तरह के चर्मरोग एवं एलर्जी पैदा होती हैं, जिसमें रेशे का नामोनिशान नहीं होता। इस संदर्भ में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि मैदे से निर्मित चीजें खाने से वे आँतों में चिपक जाती हैं।

कुछ चिकित्सकों ने तो इसके जमने की तुलना सीमेंट से की है। जिस तरह सीमेंट का जमने के बाद छुड़ाना आसान नहीं होता, उसी तरह मैदे से बनी चीजें भी आँतों में जग जाती है। एवं उनकी कार्यक्षमता पर विपरीत प्रभाव डालती है।इससे आंतों की अवशोषण क्षमता तथा इसके आकुँचन -प्रकुँचन बुरी तरह प्रभावित होते हैं। कभी−कभी तो इस चक्कर में आँतों की अंकुर संरचनाएँ अपनी कार्यक्षमता पूरी तरह से खो बैठती है। फलस्वरूप पित्त की थैली में पथरी , हृदय रोग बद्ध कोष्ठ, मधुमेह आँतों का कैंसर तथा बवासीर जैसे रोगों के होने की संभावना प्रबल हो जाती है।

इन खाने पीने की चीजों का आकर्षक बनाने के लिए, उनमें तरह तरह के स्वाद व सुगंध उत्पन्न करने के लिए अनेक रंग व रसायनों का उपयोग किया जाता है। जो काफी हानिकारक होते हैं। इनमें से अनेक पदार्थ एक दूसरे से रासायनिक क्रिया भी करते हैं। इससे नए रासायनिक पदार्थ बनते हैं। जा अपन मूल रूप में अधिक खतरनाक होते है। हालाँकि इस सिलसिले में 1954 में इसमें कुछ परिवर्तन करके इस सूची में कुछ और रंग जोड़ दिए गए, लेकिन फास्टफूड निर्माताओं एवं विक्रेताओं द्वारा प्रायः इन सभी वर्जित रंगों का इस्तेमाल बहुतायत में किया जा रहा है। शुरू-शुरू में तो इसकी हानियों का पता नहीं चलता, पर कुछ समय बाद इसके गलत नतीजे हमारे रक्त में दिखाई देने लगते हैं। मिठाइयों में पीले रंग का प्रयोग एवं बोतल बंद अचार में लाल रंग का मिश्रण आम बात है।विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार इन रंगों के प्रयोग से विभिन्न प्रकार की एलर्जी दमा व मानसिक दुर्बलता पैदा होती है।

आहार इनसानी जिंदगी की निहायत अनिवार्य जरूरत है। इसके महत्व को समझते हुए इसकी पूर्ति उचित तरीके से ही की जानी चाहिए। ऐसी भी बहुत सी वस्तुएँ हैं, जो आज की भाग दौड़ से भरी जिंदगी में आहार की जरूरत को सही तरीके से पूर्ण कर सकती है। इस क्रम में डिब्बे में बंद सब्जियों के स्थान पर हरी सब्जियों का उपयोग किया जा सकता है। फलों का सेवन न सिर्फ आहार की आवश्यकता पूरी करता है वरन् सेहतमंद रहने का भी अद्भुत नुस्खा है। अभी हाल में हुए नवीनतम शोध -अनुसंधानों से यह पता चला है कि फलों का सेवन न सिर्फ आहार की जरूरत पूरी करता है बल्कि इसके नियमित इस्तेमाल से कैंसर, हृदयरोग और मानसिक तनाव जैसे रोगों का खतरा कम होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं के माध्यम से नहीं बल्कि प्राकृतिक स्रोतों से ही विटामिन व अन्य खनिज पदार्थ शरीर में पहुँचने चाहिए।

बोतलबंद पेय के स्थान पर अच्छा हो, गाय का दूध उपयोग में लाया जाए। यह अपने आप में पूर्ण आहार भी है। आयुर्वेद का भी मत है-

गोक्षीरमनभिष्यंदी स्निग्धं गरुरसायनम् । रक्तपित्तहरं शीतं मधुरं रसपाकयो॥ जीवनीयं तथा वातपित्तध्नं परमं स्मृतम्।

अर्थात् गौ का दुग्ध अभिष्यंदी नहीं (रसबहा नाड़ियां को नहीं रोकता) स्निग्ध है, भारी है, रसायन है, रक्त पित्त दूर करता है। शीतल ह रस व विपाक में मीठा है, जीवनदाता है। वायु व पित्त को शाँत करने वाला है।

यदि हम गौर कर सकें तो ऐसा नहीं है कि फास्टफूड के विकल्प हमारे आसपास मौजूद नहीं है। बस आवश्यकता थोड़ी स्वचेतनता की है, तभी हम आहार के महत्व को समझकर आज के विषाक्त खानपान से बच सकते हैं।


कर्म से ब्राह्मण बना (kahani)

गोस्वामी तुलसीदास ब्राह्मण वृत्ति से गुजारा करते थे। तभी उनका विवाह रत्नावली से हो गया। गृहिणी में उनकी असाधारण आसक्ति थी । एक बार वे बरसात के दिनों अपने पितृगृह थी। तुलसीदास उनसे मिलने को व्याकुल हो उठे। रात में ही तैरकर नदी पार की। पीछे की छत पर लटकती हुई एक रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ गए। पत्नी को जगाया, तो वह लज्जा में डूब गई। उन्होंने भर्त्सना की और परामर्श भी दिया कि वे इतना प्रेम भगवान से करें और कर्मक्षेत्र में उतरे तो उनकी और संसार का कितना कल्याण हो? पत्नी का उपदेश उनके गले उतर गया और उन्होंने जीवन की धारा बदल दी। रामचरितमानस लिखकर संसार की बड़ी सेवा कर सके और धन्य हो गए। इस महान् परिवर्तन का श्रेय उनकी पत्नी रत्नावली को ही है।

इतरा यों तो शूद्रकुल में उत्पन्न हुई थी, पर उसे महर्षि शाल्विन की धर्मपत्नी बनने का सौभाग्य मिल गया। उसके एक पुत्र भी था। एक बार राजा ने बड़ा यज्ञ आयोजित किया। उसमें सभी ब्राह्मणों और ब्रह्मकुमारों का सत्कार हुआ। सभी को दक्षिणा मिली, किंतु इतरा के पुत्र को शूद्र कहकर उस सम्मान से वंचित कर दिया गया। शाल्विन बहुत दुःखी हुए। इतरा को भी चोट लगी, बच्चा भी उदास था। इस असमंजस ने एक नया प्रकाश दिया। तीनों ने मिलकर निश्चय किया कि वे जन्म से बढ़कर कर्म की महत्ता सिद्ध करेंगे। शिक्षण का नया दौर आरंभ हुआ।इतरा पुत्र ऐतरेय को धर्मशास्त्रों की शिक्षा में प्रवीण पारंगत कराया गया। देखते देखते वह अपनी प्रतिभा का अद्भुत परिचय देने लगा।

एक बार वेद ऋचाओं के अर्थ की प्रतिस्पर्द्धा हुई। दूर देश के विद्वान् और राजा एकत्रित हुए । प्रतियोगिता में सभी पांडुलिपियां जाँची गई। सर्वश्रेष्ठ ऐतरेय घोषित किए गए। इतरा शूद्र थी। उनके पुत्र ने, पिता के नाम पर नहीं, माता की कुल परंपरा प्रकट करने के लिए, अपना नाम ऐतरेय घोषित किया। ऐतरेय ब्राह्मण वेद ऋचाओं को प्रकट करने वाला अद्भुत ग्रंथ है। उसका सृजेता जन्म से शूद्र होते हुए भी , कर्म से ब्राह्मण बना।


मनोविकारों की चिकित्सा हेतु विशिष्ट उपचार

अंतर्मौन अर्थात् भीतर की शाँति। यह ध्यान की उपलब्धि का एक सशक्त साधन है। बौद्ध परंपरा में इसे विपश्यना कहते हैं। इसके अभ्यास से अनेक प्रकार की मानसिक समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है। आँतरिक प्रक्षालन का यह सर्वोत्तम उपाय है।

मानवी मन दमित इच्छाओं का आगार है। बचपन से ही उसमें अगणित बुरे और अप्रिय विचार दबी-छुपी स्थिति में पड़े रहते हैं। विधि-निषेधोँ को सामाजिक स्वीकृति नहीं मिल पाती और अमर्यादित आचरण आचार संहिता का उल्लंघन माना जाता है। अपवादों को यदि छोड़ दिया जाए तो साधारण लोग ऐसे विचार व्यवहार से परहेज करते हैं। उनमें ये वासनाएँ मन की गहराइयों में चली जाती और दमित स्थिति में पड़ी रहती हैं। समझा यह जाता है कि कुटेवों से छुट्टी पा ली गई, पर कुत्सा के बीज अचेतन मन में पलते रहते हैं और समय समय पर सक्रिय होकर निराशा , दुःख शोक उदासी उद्विग्नता जैसी मानसिक विपन्नताओं को जन्म देते हैं। खंडित व्यक्तित्व यही है।

यों तो अखंडता मनुष्य का चरम गुण है, पर उस अवस्था को प्राप्त करने से पूर्व हर एक का व्यक्तित्व न्यूनाधिक अंशों में खंडित होता है। अंतर्मन इससे उपजने वाले क्लेशों का सर्वश्रेष्ठ उपचार है। हमारे अंदर जब भी कोई अवाँछनीय विचार उठता है तो हम उससे लड़ने लगते हैं। मन के दो हिस्सों के बीच संघर्ष छिड़ जाता है। एक भाग उक्त विचार का समर्थन करता है बाकी दूसरा उसका विरोध करता है। अंतर्मन की साधना इससे मुक्ति का उपाय है। यह साधना उस सिद्धाँत पर आधारित है, जो यह प्रतिपादित करता है कि गंदगी के निष्कासन से स्वच्छता का संपादन स्वतः हो जाता है। उसे निकलने से रोकना अथवा उस पर आवरण चढ़ा देना थोड़े समय के लिए सफाई की भ्राँति पैदा कर सकता है। पर यह एक प्रकार से कीड़े को ढ़ककर सड़ने और बदबू पैदा करने देने जैसी ही प्रक्रिया हुई। इसीलिए इस साधना में साक्षी भाव से मन की क्रिया का निहारना पड़ता है। विचार शुभ हों अथवा अशुभ , अंतर्मन में जैसा कुछ घटित हो रहा हो, उसे अंगीकार करना पड़ता है। बाह्य हस्तक्षेप सर्वथा निषिद्ध है। मन को एकाग्र करने का प्रयास भी आरंभ में वर्जित है। साधक को बिलकुल निरपेक्ष रहते हुए सावधानी पूर्वक उस पर नजर रखनी पड़ती है। मन के उस हिस्से को भी देखना पड़ता है, जहाँ से निषेधात्मक विचार उठ रहे हैं एवं उसके उस भाग पर भी दृष्टि रखनी पड़ती है जो उन्हें अमान्य करता है। इसे मन का अवलोकन कह सकते हैं।

उक्त अभ्यास के मध्य यदि काई व्यक्ति आता है, नेत्रों के सम्मुख कोई घटना घटती है, आसपास में वायुयान मँडराता है अथवा अन्य कोई बाधा उपस्थित होती है तो भी साधक को तटस्थ रहना पड़ता और उससे उत्पन्न होने वाली मानसिक प्रतिक्रिया पर ही केवल ध्यान केंद्रित करना पड़ता है। इस साधना में साधक एक साथ अपने विचारों दृश्यों आवाजों अनुभूतियों तथा अपने इर्द-गिर्द के लोगों एवं वस्तुओं के प्रति सजग रहता है। यह प्रत्याहार की दिशा में पहला कदम है।

दिन के समय हमारा मन बहिर्मुख रहता है। हम बाहरी घटनाओं के प्रति सजग रहते हैं।किंतु अपने अंदर की प्रक्रियाओं के प्रति बिलकुल अनजान रहते हैं। अंतर्मौन के अभ्यास द्वारा आत्मचेतना विकसित होती है। हम अपने मन की प्रक्रियाओं को जान सकते तथा उनपर नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं।

हमारे मन की गहराइयों में जन्म जन्माँतरों के कितने ही संस्कार जमे रहते हैं। चेतनतल पर यह हमारे व्यवहार, व्यक्तित्व तथा नियति को प्रभावित करते हैं। इसलिए अंतमौन द्वारा इनका निष्कासन आवश्यक होता है। इस निष्कासन की प्रक्रिया का प्राणायाम द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो संस्कारों के विस्फोट की तीव्रता का झेल पाना आसान नहीं होगा। अतएव सुयोग्य मार्गदर्शक इस अभ्यास से पूर्व नाड़ी शोधन -प्राणायाम जैसे कितने ही उपचारों का निर्देश करते हैं, ताकि साधक को मानसिक कष्ट कम से कम हो। वास्तव में साधक जब अंतर्मौन की साधना प्रारंभ करता है तो उसका सीधा संपर्क अवचेतन स्तर से हो जाता है जिससे पुरानी और विस्मृत स्मृतियाँ , घृणा , भय द्वेष क्रोध उभर उभर कर सामने आने लगते हैं। इनका आवेग इतना प्रबल होता है कि अभ्यासी को असह्य कष्ट की अनुभूति होती और वह तड़प उठता है। यों चेतन तल पर आकर ये स्मृतियाँ अपनी सत्ता क्षीण और कमजोर कर अंततः स्वयं को समाप्त कर लेती हैं, फिर भी एक बार में ही ऐसा नहीं हो जाता।अस्तु अंतर्मौन की साधना द्वारा उन्हें बार बार अवचेतन परत से बाहर आने का मौका दिया जाता है। इस क्रम में एक ऐसी स्थिति आती है, जब अवचेतन मन एकदम खाली एवं दमित इच्छा आकाँक्षाओं , वासनाओं एवं पूर्व संचित संस्कारों से रहित हो जाता है। इसी अवस्था में एकाग्रता सधती है। अतएव अंतर्मौन का प्रत्याहार की प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ उपचार बतलाया गया है। धारणा और ध्यान की उपलब्धि इसी के बाद होती है।

आत्मिक प्रगति में आत्मशुद्धि और चरित्र शुद्धि को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। इसके बिना उत्कर्ष की गाड़ी अवरुद्ध हो जाती है और चेतना का स्तर ऊँचा नहीं उठ पाता। इस स्थिति में यदि सीध आत्मोत्थान संबंधी साधना प्रारंभ करदी गई और भीतरी स्वच्छता और सफाई का ध्यान नहीं रखा गया तो साधना का संपूर्ण प्रयास भीतरी गंदगी का निरस्त करने में ही खपता रहेगा। इससे प्रगति यात्रा बहुत लंबी और समयसाध्य बन जाती है। इसीलिए साधना विज्ञान के आचार्यों ने कुछ ऐसे उपाय उपचार सुझाए हैं। जिन्हें यदि साथ−साथ जारी रखा गया तो आत्मविकास अपेक्षाकृत कम समय में सरलतापूर्वक संपन्न हो जाता है। अंतर्मौन का अभ्यास इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है। इसे कई चरणों में संपादित किया जाता है।

प्रथम चरण में साधक इंद्रियों की सजगता को विकसित कर अपने को बाह्य जगत् के साथ संयुक्त करता है। आँखें बंद रहती हैं ताकि ध्वनियों का कानों के माध्यम से ग्रहण किया जा सके। वह धीरे−धीरे द्वितीय चरण के अभ्यास के लिए स्वयं को तैयार कर लेता है।

द्वितीय अवस्था में अपनी एकाग्रता को बाहरी जगत् से हटाकर मन के क्रियाकलापों पर केंद्रित करना पड़ता तथा यह देखना पड़ता है कि हमारा मन क्या सोच रहा है एवं अवचेतन में से उठने वाले विचारों तथा दृश्यों के प्रति उसकी प्रतिक्रिया क्या है? इसके अभ्यास से न्यूरोसिस , भय तनाव तथा उद्विग्नता दूर होती है। साधक भूतकाल के अनुभवों से मुक्त होता तथा दमित वासनाओं के विस्फोट को देखता है। उक्त अभ्यास का तब तक करना चाहिए। जब तक मन पर्याप्त रूप से शाँत एवं स्थिर नहीं हो जाता।

तृतीय स्तर के अभ्यास में विचारों को ऊपर आने तथा निकल जाने दिया जाता है। इसका उद्देश्य , अवचेतन मन के संस्कारों का क्षय करना है। प्रत्येक ऐसा अनुभव जिसे भलीभांति देखा परखा नहीं जाता, अवचेतन तल में जमा हो जाता है। अतएव इस अभ्यास द्वारा उसे वहाँ से निकाल बाहर करना पड़ता है। आगे चलकर मन के समक्ष स्वेच्छापूर्वक कोई वस्तु लाई जाती है।और उसके चारों और विचारों तथा कल्पनाओं का जाल बुनते हैं। इसके बाद उसे हटा देते हैं। और उसके स्थान पर कोई दूसरी वस्तु या विचार लाते हैं। कल्पनाओं का तानाबाना बुनकर मानस से उसे भी निकाल बाहर करते हैं। आगे चलकर यह अभ्यास इतना पुष्ट को जाता है कि साधक को आत्मनिरीक्षण में सहायता करता है।

इस चरण में निरपेक्ष भाव अपनाकर मन में उठने वाले विचारों का दर्शक बनकर देखना पड़ता और अधिक शक्तिशाली विचारों का विश्लेषण कर हटा दिया जाता है। किंतु स्वयं उन्हें निर्मित नहीं किया जाता। अभ्यास का तब तक जारी रखना पड़ता है। जब तक विचारों का प्रवाह थमने न लगे। परिपक्व होने पर यह अवस्था विचारशून्य होने में मदद करती है।

पंचम क्रम के अभ्यास में अपेक्षाकृत निर्बल और कमजोर विचार उठेंगे। वे उठते और निकलते जाएँगे। यहाँ किसी प्रकार का हस्तक्षेप ठीक नहीं। इसके द्वारा मन निर्विचार होकर प्रत्याहार के तल में पहुँच जाता है।

अंतिम चरण में मन को अपने प्रतीक अथवा इष्ट पर टिकाना पड़ता और बार बार चिदाकाश पर देखना पड़ता है।निरंतर के अभ्यास से प्रतीक मानस पटल पर अमिट बन जाता है और किसी भी स्थिति में वहाँ से ओझल नहीं होता। इस दशा में साधक गहरे ध्यान की अवस्था में पहुँच जाता है।

अंतर्मौन का अभ्यास पद्मासन , सिद्धासन , वज्रासन सुखासन अथवा शवासन किसी भी स्थिति में अपनी सुविधानुसार किया जा सकता है। इसके प्रारंभिक अभ्यास कहीं भी और कभी भी किए जा सकते हैं, पर उत्तरार्द्ध अवस्था के अभ्यास रात्रि में सोने से पूर्व अथवा प्रातःकाल के नीरव वातावरण में ही करना उपयुक्त है।इससे मानसिक और आत्मिक दोनों प्रकार के लाभ साथ-साथ मिलते हैं।


इतिहास में प्रसिद् (kahani)

महत्त्वाकाँक्षी जोशुआ लेवमेन की भावी रूपरेखा के संदर्भ से अनेकों योजनाएँ बनाकर विद्वान युकाची के पास ले गया और उनसे पूछा - वह उन्हें पूरा करने के लिए क्या तैयारी करे? युकाची ने वह सूची ध्यानपूर्वक देखी और मुसकराते हुए उसे वापस लौटा दिया। उन्होंने कहा- “बच्चे ! इन सब योजनाओं में पहली योजना बिना तुम्हारा बढ़-चढ़कर सोचना व्यर्थ है।” जोशुआ ने चकित होकर पूछा-”भला वह क्या योजना होनी चाहिए?” उन्होंने कहा -”अपने स्वभाव और चरित्र का निर्माण जिसके बिना कोई व्यक्ति न बड़ा बन सकता है और न बड़ा काम कर सकता है।”

थानेश्वर की रानी महादेवी राजश्री का विवाह राजा गृहवर्मा के साथ हुआ था। दस्युओं ने राजा की हत्या कर दी। रानी सती होने की तैयारी करने लगी। उनका भाई हर्ष आ पहुँचा और उसने इस निरर्थक आत्महत्या से रोककर समझाया कि शेष जीवन सत्प्रयोजनों में लगाया जाए। बहन का समझा दिया, फिर जिन लोगों ने गृहवर्मा को मारा था, उनको ढूंढ़ ढूंढ़ कर सफाया किया। बहन-भाई मिलकर बौद्ध धर्म का विस्तार करने लगे। दोनों राज्यों का धन इसी प्रयोजन में लगने लगा। राजा हर्ष ने धर्मसेवा के लिए जो जो काम किए, वे इतिहास में प्रसिद्ध हैं। बहन भी हर कार्य में उनके साथ रही।


वास्तु विज्ञान पर लेखमाला घर में रसोईकक्ष की स्थिति क्या हो।

रसोईकक्ष में सामान रखने के लिए टाँड आदि यों तो आवश्यकतानुसार चारों ओर की दीवारों पर बनाए जा सकते हैं, किंतु उसे दक्षिणी एवं पश्चिमी दीवार में बनाना सबसे उपयुक्त माना गया है। मात्र पूर्वी तथा उत्तरी दीवारों पर टाँड नहीं बनाना चाहिए। वास्तुदोष होने के कारण इससे कई प्रकार की हानियाँ होती हैं। इसी तरह उत्तर -पश्चिम की ओर बरतन आदि रखने की आलमारी बनाई जा सकती है। स्लैब या गैस पट्टी के ऊपर विशेषकर चूल्हे के ऊपर कोई रैक या आलमारी नहीं रखनी चाहिए। इससे सामान निकालते समय बरतन आदि गिरने और दुर्घटना घटित होने की सदैव आशंका बनी रहती है।

रसोईघर में यदि फ्रिज या रेफ्रिजरेटर रखना हो तो इसे आग्नेयकोण, दक्षिण , उत्तर, पश्चिम दिशा या वायव्यकोण में स्थापित किया जा सकता है। ईशान एवं नैऋत्य कोण में इन्हें कदापि नहीं रखना चाहिए अन्यथा ये बराबर खराब होते रहेंगे। यदि इन कोनों में रखना ही पड़े तो इन्हें कोनों से दो तीन फीट के अंतर से रखना चाहिए । माइक्रोओवन , मिक्सी ग्राइंडर आदि की व्यवस्था दक्षिण वआग्नेयकोण के बीच की जा सकती है। हलका सामान पूरब अथवा उत्तर में तथा भारी सामान पश्चिम यादक्षिण में रखे जाने चाहिए। सिल-बट्टा, मूसल, झाडू व इस तरह के दैनिक उपयोग की अन्य वस्तुएँ नऋत्य कोण में रखनी चाहिए।किंतु भूलकर भी इन्हें ईशानकोण में नहीं रखना चाहिए। इसी तरह ओखल, चक्की आदि भारी वस्तुएँ दक्षिण तथा नैऋत्यकोण में या संबंधित कमरों में सुविधानुसार इन्हीं दिशाओं में रखी जा सकती है।उत्तर पश्चिम की ओर या नैऋत्य कोण में रसोई का छोटा सास्टोर रूम बनाया जा सकता है जहाँ चावल, दाल, गेहूँ, आटा आदि का भंडारण किया जा सकता है। अन्नादि के भारी डिब्बे कभी नहीं रखने चाहिए। उनमें कुछ-न-कुछ दो चार दाने अवश्य पड़े रहने चाहिए। इससे घर में अन्न आदि की कम नहीं होने पाती। ईशान और आग्नेयकोण की मध्य पूर्वी दीवार के सहारे खाद्य भंडार करना भी उपयुक्त रहता है।

दूध दही धी तेल मथानी आदि का प्रबंध प्राचीनकाल में अलग कमरे में रसोईकक्ष के समीप पूरब-आग्नेय दिशा में किया जाता था।किंतु आजकल इन्हें रसोईघर में ही रखा जाता है। ऐसी दशा में दूध -दही सदैव उत्तर पूर्व में रखने चाहिए। छाछ या मक्खन निकालने की रई यामथानी का प्रबंध भी यदि रसोई में ही करना हो तो पूर्वी दीवार से सटाए बिना पूरब व आग्नेयकोण के बीच खूँटी गाड़कर अथवा दीवार में कीलें या हुक गाड़कर किया जा सकता है। इस प्रकार बिलोने वाले का मुँह पूरब की ओर रहेगा जो कि शुभ दिशा है।

रसोईघर का शुभ-अशुभ होना बहुत कुछ उसके द्वार व खिड़कियों की स्थिति पर भी निर्भर करता है। वास्तु नियमों के अनुसार रसोई कक्ष का प्रवेशद्वार पूरब, पश्चिम या उत्तर में से किसी भी दिशा में रखा जा सकता है। दक्षिण दिशा में रसोई का प्रवेश द्वार नहीं होना चाहिए। इस ओर दरवाजा रखने पर हमेशा संघर्ष होता रहेगा और मुसीबतें झेलनी पड़ेगी, साथ ही साथ इस दिशा में खुलने वाले दरवाजे युक्त रसोई में खाने वालों को तृप्ति नहीं मिलती। इतना किया जा सकता है कि समानाँतर स्लैब वाले रसोईघर में आग्नेयकोण की तरफ एक अतिरिक्त दरवाजा हो जिसका निकास डाइनिंग हाँल -भोजनकक्ष-की ओर हो। रसोईकक्ष ठीक प्रवेशद्वार के सामने भी शुभ नहीं माना जाता।

रसोईघर के कमरे में उत्तर और पूरब की ओर खिड़कियों का होना जरूरी है, जिससे सूर्य किरणों का लाभ मिलता रहे। दक्षिण में खिड़की नहीं होनी चाहिए। यदि दक्षिण में खिड़कियां रखना अनिवार्य हो तो कम से कम संख्या में छोटी खिड़कियाँ बनाई जा सकती है। रसोई में आमने सामने खिड़कियों को होना अधिक अच्छा होता है। इससे आसानी से अशुद्ध वायु बाहर निकलती एवं शुद्ध वायु भीतर प्रवेश करती रहती है। ड्राइंगरूम बैठक की खिड़की के ठीक सामने रसोई की खिड़की नही रखनी चाहिए। रोशनदान या धुँआ निकलने की चिमनी ईशानकोण में स्थापित की जा सकती है। इसी तरह रसोईकक्ष में उत्तर या पूरब दिशा में एक एक्जास्टफैन अवश्य लगाना चाहिए, जिससे दूषित वायु बाहर निकलती रहे और खाना बनाने वाले के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव न पड़े। एक्जास्ट फेन चूल्हे की लपट भभककर ऊपर उठ सकती है और भोजन बनाने वाले को हानि पहुँचा सकती है। अतः इसे दरवाजे के पास या चूल्हे से हटकर दीवार में ऊपर लगाना चाहिए।

रसोईकक्ष से संबंधित कुछ छोटी छोटी बातें औरभी हैं जिन्हें यदि ध्यान में रखा जाए तो घर का वातावरण सुख शाँतिमय बना रहता है। तथा समृद्धि के नए स्त्रोत हाथ लगते हैं। उदाहरण के लिए आग्नेयकोण में बने रसोईकक्ष के ऊपर पानी की टंकी कभी भी नहीं बनानी चाहिए। ऐसा करने पर स्वास्थ्यसंकट का खतरा मँडराता रहता है। स्नानघर एवं रसोईघर अथवा डाइनिंग हाँल एवं बाथरुम आमने सामने नहीं होने चाहिए और न इनकी खिड़कियाँ ही एक दूसरे के सामने पड़े। रसोईकक्ष में या उसके सामने मेकअप रूप अर्थात् प्रसाधन कक्ष नहीं होना चाहिए। इससे बीमारियों के संक्रमण का भय बना रहता है। पूजाकक्ष, शयनकक्ष एवं शौचालय के सामने या ऊपर रसोईकक्ष नहीं बनाना चाहिए। रसोई में गैसपट्टी अथवा सिंक के नीचे पूजास्थल भी नहीं बनाना चाहिए। स्थानाभाव या अन्य किन्हीं आवश्यक कारणों से रसोईघर में पूजास्थली बनानी ही पड़े तो उसे उसी कक्ष के ईशानकोण में अथवा पूरब में, पश्चिम में या वायव्य में स्थापित करना चाहिए। उत्तर दक्षिण एवं नैऋत्य में पूजास्थल नहीं बनाए जाते ।

रसोईकक्ष में सदैव आपातकालीन प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था रखना बहुत जरूरी है। अनहोनी कभी सूचना देकर घटित नहीं होती। अतः कटने ज जाने पर फर्स्ट एड जैसी व्यवस्था अवश्य रखनी चाहिए, जिसमें बरनाँल डिटोल, गाजपट्टी रुई आदि की व्यवस्था हो। आग बुझाने की छोटी अग्निशमन जैसी आपात्व्यवस्था भी रसोई में रखनी चाहिए। कीटाणुनाशक दवाइयाँ रसोई में न रखी जाएँ ता ही अच्छा है। इन्हें बच्चों की पहुँच से सदा दूर ही रखा जाए। इस तरह छोटी छोटी बातों को ध्यान में रखने से किसी भी दुर्घटना से सहज ही बचा जा सकता है।

रसोईकक्ष की दीवारों का रंग-रोगन भी व्यक्ति को प्रभावित करता है। अंतः इस कक्ष की दीवारों तथा छत का रंग हलका नीला भूरा या ग्रे होना चाहिए। लाल रंग तो भूलकर भी न कराएँ । पीला रंग भी रसोई के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता।

रसोईकक्ष के फर्श की सतह अन्य कमरों की सतह की अपेक्षा कुछ ऊँची रखना शुभ दायक माना जाता है। प्रायः लाग रसोईघर भोजनकक्ष एवं ड्राइगरुम अर्थात् अतिथि कक्ष आदि के फर्श की सतह अन्य कमरों की सतह से नीची रखते है। वास्तु नियमों के अनुसार ऐसा करना हानिकारक होता है, क्योंकि नैऋत्य वायव्य आग्नेय दक्षिण एवं पश्चिम दिशा में कोई भी कमरा नीची सतह वाला नहीं होना चाहिए। जहाँ तक हो सके सभी कमरों को उत्तर या पूरब की ओर ढलान लिए हुए समान तल वाला बनाना चाहिएं । पश्चिम या दक्षिण की तरफ भवन के फर्श का ढलान नहीं रखा जाता, ऐसा नियम है।

प्राचीन भारतीय परंपरा रही है कि परिवार के सभी सदस्य एवं अतिथि भोजनकक्ष में ही बैठकर भोजन करते थे। वास्तुशास्त्र में उल्लेख भी है - भोजन पश्चिमायाँ च वायव्याँ धन संचयम्। अर्थात् भोजनकक्ष पश्चिम दिशा में तथा धनसंग्रह कक्ष वायव्यकोण में होना चाहिए, किंतु आज के बदलते परिवेश में भोजनकक्ष का स्थान ‘डाइनिंग हाँल-ड्राइंगरुम ने ले लिया है।वास्तुशास्त्र में ऐसे कक्षों की कोई व्यवस्था नहीं है। अतः ऐसी स्थिति में पूरब में ड्राइंगरुम-अतिथिकक्ष की व्यवस्था हो सकती है अथवा पश्चिम दिशा में ड्राइंगरुम एवं डाइनिंगहॉल का निर्माण किया जा सकता है। आग्नेयकोण सिित रसोई में भोजन बनाने के बाद पश्चिम में या पश्चिम वायव्य में भोजन किया जा सकता है।यदि भोजन करने की व्यवस्था रसोईकक्ष में ही करना हो तो इसी कक्ष के पश्चिमी भाग में की जा सकती है। भोजनकक्ष की टेबल-मेज चौकोर , वर्गाकार या आयताकार होनी चाहिए। गोलाकार, अंडाकार तिरछी या तिकोनी मेजों को प्रायः अशुभ व अकल्याणकारी पाया गया है। अतः इनके उपयोग से बचना चाहिए। डाइनिंग टेबल की व्यवस्था पश्चिम दिशा में की जानी चाहिए। पूरब या उत्तर दिशा में भी टेबल स्थापित की जा सकती है। टेबल की ऊँचाई इतनी ही हो जो बैठने वाले की नाभिस्थल से थोड़ी ऊँची हो। टेबल को दीवार से सटाकर रखने की अपेक्षा सदैव कक्ष के मध्य में रखना चाहिए। कुर्सियों की संख्या सम हो अर्थात् दो, चार, छह, आठ इस प्रकार की संख्या में हो।

भवन के कक्षों का निर्माण वास्तु नियमों के अनुसार इस प्रकार करना चाहिए। जो संबंधित क्रियाकलापों के प्रति प्रवेश करते ही सहज भावना का उद्रेक करें। उदाहरण के लिए जिस तरह बैठक में प्रवेश करते ही सामूहिकता की भावना अध्ययनकक्ष में जागरुकता एवं निरालस्य तथा शयनकक्ष में प्रवेश करते ही विश्राम की अनुभूति होने लगे। हमेशा पूरब की ओर मुँह करके भोजन करना अहितकर एवं अस्वास्थ्यकर माना गया है। पश्चिम दिशा में पूर्वाभिमुख होकर भोजन करने में जितना अधिक सुख -शाँति संतोष व तृप्ति मिलती है। उतना अन्य दिशाओं में बैठकर नहीं मिलतीं।

भोजनकक्ष में वाशबेसिन की व्यवस्था के लिए उत्तर या पूरब का कोना सबसे उपयुक्त स्थल माना गया है। यदि ऐसा न बन पड़े तो पश्चिम की ओर भी रख सकते है। शौचालय को भोजनकक्ष से जोड़कर नहीं बनाना चाहिए।

यदि भोजनकक्ष पश्चिम के अतिरिक्त किसी अन्य दिशा में बना हो ता उस कक्ष में पश्चिम की ओर बैठकर पूरब की ओर मुँह करके भोजन करना चाहिए। भोजन हमेशा शाँत एवं प्रसन्नचित होकर करना चाहिए। प्राचीनकाल में हाथ पाँव धोकर एवं कुल्ला करके तब भोजन करने के लिए बैठा जाता था। भोजन की थाली का पट्टे पर रखकर अन्न देवता को सम्मान देते हुए ईश्वर अर्पित करके तब भोजन ग्रहण किया जाता था।ऐसा करने से शरीर और मन स्वस्थ एवं स्फूर्तिवान् बने रहते हैं। भोजन करने एवं रसोईकक्ष के निर्माण की यही उक्त प्राचीन परंपरा रही है। हमें भी इन वास्तु नियमों का यथा संभव पालन करना चाहिए और सुख-शाँति एवं समृद्धि का भागीदार बनना चाहिए।


Quotation

परिश्रम की अधिकता नहीं, काम की अनियमितता आदमी का मार डालती है।


सेवाधर्म के मार्ग में बाधाएँ और भटकाव

लोकसेवियों के लिए दिशाबोध-8

सेवा का महत्व और जीवन विकास के लिए उसकी आवश्यकता समझ लेने के बाद सेवाधर्म की उमंग उठना स्वाभाविक है। अधिकाँश लोगों में इस तरह की उमंग उठती है। व उस उमंग के अनुरूप सेवा के मार्ग में प्रवृत्त भी होते हैं, किंतु उस पथ पर अधिक समय तक नहीं चल पाते। इसका कारण यह है कि लोकसेवा के प्रति आवश्यक उत्साह और निष्ठा का जागरण नहीं हो पाता। कुछ लोग प्रवृत्त भी होते हैं, पर कठिनाइयाँ आती देखकर उसे झमेला समझकर छोड़ बैठते हैं अथवा असफलता से डरकर चुप बैठ जाते हैं।

बहुत से कारण है जिनसे सेवाकार्य में संतोषजनक प्रगति नहीं हो पाती। लोग या तो गलत बातों को सही समझकर विचलित हो जाते हैं। अथवा सफलता का अहंकार उन्हें दिग्भ्राँत कर देता है। इन सब बाधाओं और भटकाव की परिस्थितियों को पहले से जान - समझकर चला जाए तो सेवाधर्म का निर्वाह, लन किया जा सकता है। होता यह भी है कि सेवाधर्म अपना लेन के बाद उसे अपना जीवनलक्ष्य बनाने तथा उसे साधना स्तर पर करने में भूल हो जाती है। भूलें स्वभावगत हों या परिस्थितियों के कारण , लोकसेवी को उसके साधनापथ से दूर हटाती है।

हमें यह तथ्य स्मरण रखना चाहिए कि मार्गदर्शक बनना हो तो नेतृत्व का कौशल नहीं,चरित्र चाहिए। प्राचीनकाल में लोकमानस के परिष्कार का महान् कार्य जो लोग हाथ में लेते थे, वे कार्यक्षेत्र में प्रवेश करने से पूर्व ब्राह्मणों जैसी संयमशीलता और साधु जैसी उदार आत्मीयता का अभ्यास करते थे। इस परीक्षा में वे जितनी ऊँची कक्षा उत्तीर्ण करते थे, उसी अनुपात से उनकी सेवा साधना सफल होती थी। यदि सच्चे मन से उच्चस्तरीय दृष्टिकोण लेकर सेवाधर्म अपनाया जाए ता उसका परिणाम लोकमंगल से भी अधिक आत्मोत्कर्ष के रूप में उपलब्ध होता है। इन तथ्यों का ध्यान में रखते हुए प्रज्ञापरिजनों का युगशिल्पी की भूमिका निभाने के लिए अग्रसर होते समय इस बात को गिरह बाँधकर रखना है कि उन्हें अपन स्तर से , व्यक्तित्व की दृष्टि से सामान्य लोगों के तुलना में कहीं ऊँचा उठकर रहना है।

इसके लिए क्या करना होगा? इस संबंध में प्रत्यक्ष कर्तव्य उतना नहीं है, जितना कि दृष्टिकोण में परिवर्तन करने का प्रबल अभ्यास अपनाना। सर्वविदित है कि लोभ-मोह के भवबंधन आदर्शवादिता के, आध्यात्मिकता के मार्ग पर चलने वाले के लिए हथकड़ी -बेड़ी जैसे अवरोध उत्पन्न करते हैं। लालची , संग्रही , विलासी व्यक्ति को लोभ-लिप्सा इस कदर जकड़े रहती है कि उसे परमार्थ में कोई रस ही नहीं आता। अपनी तराजू पर अपने बाटों से तुलने पर उसे स्वार्थ वजनदार प्रतीत होता है और परमार्थ हलका, इसलिए लालच में राई रत्ती कमी पड़ते ही वह परमार्थ से हाथ खींच लेता है और कुछ आडंबर करता भी है तो उतना ही जिससे कम खरच में लोकसेवी पुण्यात्मा की अधिक ख्याति खरीदी जा सके। इसमें भी वे तौलते रहते हैं कि कितना गँवाया और कितना कमाया।

दूसरा अवरोध है -व्यामोह । शरीर और परिवार के साथ अत्यधिक ममता जोड़ने वाले उन्हें प्रसन्न रखने के लिए उचित अनुचित कुछ भी करते रहते हैं। उन्हें यह छोटी परिधि लोक-परलोक सभी से बढ़कर प्रतीत होती है और उसी के निमित्त कोल्हू की तरह पिसते , आग की तरह जलते और बरफ पिघलते रहते हैं। परिवार का उत्तरदायित्व निभाना, परिजनों के प्रति कर्त्तव्यपालन करता एक बात है किंतु उन्हें सुविधाओं से लाद -लादकर अनुचित दुलार से व्यक्तित्व की दृष्टि से हेय हीन बना देना सर्वथा दूसरी। मोहग्रस्त लोग दूसरी को अपनाते हैं और पहली की ओर से आँखें बंद किए रहते हैं। इसके लिए कभी रोका झिड़का जाए कि उन पर अशर्फियां लुटाते रहने की तुलना में कही अधिक हित इसमें है कि वे उन्हें श्रेष्ठ चिंतन देने का प्रयास करें। मात्र लाड़ दुलार न दे तो यह बात कोई पोहाँध सुनता नहीं। पर कहे कौन किससे? ज्ञान वैराग्य की कथा कहने रहने वाले ही जब श्रोता भक्तजनों से भी अधिक गए-गुजरे सिद्ध होते हों , तो ‘सत्य वचन, महाराज ‘ की विडंबना ही सिर हिलाती रहेगी।

परिवार पोषण किसी के लिए भी कठिन नहीं होना चाहिए, क्योंकि नई दृष्टि से देखने से इस परिवार के कितने ही सदस्य ऐसे होते हैं, जिनमें आर्थिक स्वावलंबन की ही नहीं, दूसरों को सहारा देने की क्षमता है, किंतु उन्हें मोहवश अथवा नाक कटने के डर से अपंग-अपाहिज बनाकर रखा गया है। एक कमाऊ व्यक्ति ही मरता खपता रहता है दूसरे समर्थ होते हुए भी असमर्थों की बिरादरी से आलसी , प्रमादी बने बैठे रहते हैं। इसी प्रकार फिजूलखर्ची की आदतें जब अभ्यास में आ जाती हैं तो खरच का ढोल इतना भारी हो जाता है कि उसे भी परिवार पोषण की संज्ञा मिलती है । वस्तुतः यह होता परिवार तोषण भर है। पोषण सरल है तोषण अति कठिन है। पुत्रवधु की गोद से छीन छीनकर पोते पोतियों को कंधे फिरने वाले बुड्ढों की भी कमी नहीं। कमाऊ लड़कों के गुलछर्रे उड़ाने में कोई कमी न रहने पर भी बुड्ढा जब उन्हीं के हाथ में पेंशन थमाता जाता है तो उसकी दयालुता देखते ही बनती है। जीवनभर की कमाई का बँटवारा जब समर्थ बेटों की हिस्सेदारी के रूप में कर दिया जाता है तो प्रतीत होता है कि घिनौना व्यामोह किस प्रकार औचित्य एवं प्रचलन का लबादा ओढ़कर अपने को निर्दोष सिद्ध करता है।

इस चक्रव्यूह के कुछ थोड़े से घेरे ही यहाँ उजागर किए हैं। ऐसे-ऐसे और भी अनेकों हैं जिनमें आए दिन बच्चे जनने, उस पर खुश मनाने और सिर पर पर्वतों जैसे बोझ बढ़ाते चलने की भी एक बात सम्मिलित की जा सकती है। इस मोहग्रस्तता को परमार्थ पथ पर अड़ी हुई भारी चट्टान कह सकते हैं। लोभ को प्रथम नंबर दिया जाता है, मोह का दूसरा , पर अभी यह तय किया जाना है कि इनमें से कौन द्वितीय है, वस्तुतः यह रावण , अहिरावण जैसे सगे भाई प्रतीत होते हैं।

आत्मकल्याण और लोककल्याण की साधना में ऐसा कुछ नहीं जिसके लिए शरीर निर्वाह एवं पारिवारिक उत्तरदायित्व निभाने में कोई बाधा पड़ती हो। मात्र लोभ और मोह का मद्यपों जैसा अतिवाद ही एकमात्र अवरोध है, जो वस्तुतः तिनके जैसा हलका होते हुए भी पर्वत जैसा भारी बनकर दिग्भ्रांतों के मनःक्षेत्र पर भूत पिशाच की तरह चढ़ बैठता है और भली-चंगी परिस्थिति होते हुए भी नारकीय उत्पीड़नों की तरह निरंतर संत्रस्त करता रहता है।

बात वस्तुतः इतनी छोटी है नहीं। इस मार्ग में एक और बड़ा अवरोध अहंता का है। यह परोक्ष होती है। - न अपनी पकड़ में आती है, न दूसरों की परख में इसलिए उसकी उखाड़ पछाड़ भी नहीं होती। फलतः मजे में अपने कोटर में बैठी पोषण पाती और जोकि की तरह मोटी होती रहती है।इसकी विनाशलीला इतनी बड़ी जिसकी तुलना में लोभ-मोह से होने वाली हानि को नगण्य जितना ठहराया जा सकता है।

अहंता बड़प्पन पाने की आकाँक्षा को कहते हैं। दूसरों की तुलना में अपने को अधिक महत्त्व गौरव, पद, सम्मान मिलना चाहिए, यही है अर्हता की आकाँक्षा। इस जादूगरनी द्वारा लोगों को चित्र-विचित्र विडंबनाएँ रचते देखा जा सकता है। केश वस्त्र आभूषण सौंदर्य प्रसाधनों की इन दिनों धूम है। फैशन के नाम पर कितना धन और कितना समय नष्ट होता है उसे शरीर सज्जा में रुचि रखने वाले सभी जानते हैं। उस महँगे जंजाल को इसलिए रचना पड़ता है कि अर्हता अपने को सुंदर युवा आकर्षक सभ्य अमीर सिद्ध करने के लिए इस लबादे को ओढ़कर वस्तुस्थिति से भिन्न प्रकार का प्रदर्शन करने को बाधित करती है। इसके बाद ठाठ-बाट का नंबर ता है। इसमें अमीरी का प्रदर्शन है। निवास फर्नीचर वाहन, नौकर तथा विलासिता के उपकरणों का सरंजाम जुटाने तथा रखरखाव में इतना धन तथा मनोयोग लगता है जो वास्तविक आवश्यकता की तुलना में अनेक गुना महँगा होता है। बात-बात में फिजूलखर्ची उस समय की जाती है जब उसे लोग देखें और अनुमान लगाएँ कि यह व्यक्ति धनकुबेर है और अनावश्यक खरचने से भी इसे कोई कमी नहीं पड़ती । बड़प्पन पाने की मृगतृष्णा में लोग कितने पाखंड रचते , धन को पानी की तरह बहाने के उपराँत आवश्यक प्रयोजनों में किस प्रकार कटौती करते हैं, इसे देखकर कोई सूक्ष्मदर्शी आश्चर्य चकित ही रह सकता है। असलियत का अनुमान सहज ही लगा लिया जाता है,फिर भी अहंता का उन्माद विडंबनाएँ रचने से बाज आता नहीं है।

यह तो सामान्य लोगों की बात हुई। अब प्रसंग उन विशिष्ट लोगों का आता है, जो कि आदर्शवादी , त्यागी अध्यात्मवादी योगी लोकसेवी आदि के रूप में प्रख्यात है। विश्लेषण करने पर उनके भीतर भी अहंता का चोर गुप्त दरवाजे से घुसा और तानाशाह की तरह सिंहासनारूढ़ बना बैठा दिखाई पड़ता है। संतों के अखाड़े धर्म संप्रदाय संस्था, संगठन बड़ों की इसी प्रतिस्पर्द्धा में कलह के केंद्र बने रहते हैं कि उनके संचालकों में से कौन बड़ा कहलाए? एक ही संस्था के सदस्य एक ही लक्ष्य की दुहाई देने वाले आखिर इस कदर लड़ते हैं कि उनके संचालकों में से कौन बड़ा कहलाए? एक ही संस्था के सदस्य एक ही लक्ष्य की दुहाई देने वाले आखिर इस कदर लड़ते क्यों है? एक दूसरे को नीचा दिखाने में निरत क्यों है? इसका वास्तविक कारण सामान्य लोगों की समझ से बाहर होता है। उन्हें तो कुछ भी कहकर बहका दिया जाता है। किंतु वास्तविक कारण सामान्य लोगों की समझ से बाहर होता है। उन्हें तो कुछ भी कहकर बहका दिया जाता है। किंतु वास्तविकता इतनी भर होती है कि वे येन केन प्रकारेण अपना बड़प्पन सिद्ध करना चाहते हैं। दूसरा जब आड़े आता है तो मुहल्ले के कुत्तों की तरह अकारण एक-दूसरे पर टूट पड़ते हैं।संगठनों के सर्वनाश में एकमात्र नहीं तो सर्वप्रधान कारण इस अहंता रूपी शूर्पणखा को ही माना जाएगा। सिद्धाँत वाद की दुहाई देते हुए कनामालिन्य आर विग्रह के बहाने तो कुछ भी गढ़े जा सकते हैं, पर यदि भारी बाँध में दरार पड़ने का कारण ढूंढ़ने के लिए गहराई तक उतरा जाए तो प्रतीत होगा कि अहंता की नन्ही सी चुहिया ही दुम उठाए , मुँह मटकाती, पंजे दिखाती अपनी करतूत का करिश्मा दिखा रही है।

व्यवसाय और बच्चों को छोड़कर आने वालों से भी अहंता नहीं छूटती। जिस प्रकार कोई लालची मनोभूमि का मनुष्य भिक्षा-व्यवसाय करके पेट भरने पर भी लगातार कमाता-जोड़ता रहता है और मरते समय चिथड़ों तथा कुल्हड़ों में लाखों की दौलत छोड़ जाता है, उसी प्रकार लोकसेवी , अध्यात्मवादी का कलवर बना लेने पर भी यदि अहंता न छूटी तो पैर पुजाने के लिए अनेकानेक पाखंड रचते, लोगों का ठगते-उलझाते हुए उसे देखा जाएगा। आए दिन कुछ करतूतें, चमत्कारों की डींग हाँकते तथा और भी न जाने उसे क्या क्या करते देखा जाएगा। सार्वजनिक जीवन में ऐसे लोगों का घुस पड़ना वस्तुतः संगठन के लिए एक प्रकार से अभिशाप ही सिद्ध होता है। वे जितना जनहित करते हैं उसकी तुलना में हजार गुना अनर्थ करके रख देते हैं। इसलिए उत्कृष्टता के क्षेत्र में प्रवेश करने वालों के लिए मनीषियों ने वित्तेषणा (लोभ) पुत्रेषणा (मोह)और लोकेषणा (अहंकार-बड़प्पन) की विविध एषणाओं का परित्याग करने के उपराँत ही श्रेयमार्ग पर पैर बढ़ाने की सलाह दी है। लोकसेवी में नम्रता -निरहंकारिता उत्पन्न करने के लिए प्राचीनकाल में दरवाजे-दरवाजे भिक्षा माँगने के लिए जाना पड़ता था। यों घर बैठे भी भोजन मिलने का प्रबंध ऐसे लोगों के लिए कठिन नहीं है, पर अहंकार गलाने का तो कोई न कोई स्वरूप चाहिए ही , इसके बिना साधु कैसा? ब्राह्मण कैसा? लोकसेवी कैसा?

गाँधी जी के आश्रम में निवासियों को टट्टी साफ करने, झाडू लगान जैसे छोटे समझे जाने वाले कार्य परिपूर्ण श्रद्धा और तत्परता के साथ करने पड़ते थे। प्रज्ञा परिवार की परंपरा भी यही है। प्रत्येक आश्रमवासी को श्रमदान अनिवार्यतः करना पड़ता है और उसमें नाली साफ करने, झाडू लगाने, कूड़ा ढोने जैसे कार्य ही करने होते हैं।

कई व्यक्ति सोचते है-हम संस्था से निर्वाह लेकर काम क्यों करे? ‘अपना खाने’ के नाम पर निर्वाह लेने वालों से श्रेष्ठ क्यों न बनें? कुछ लोग इस कारण काम ही नहीं करते। इस असमंजस के पीछे कोई सिद्धाँत कात नहीं करता है, मात्र अहंकार ही उछलता है। हजार रुपये मासिक का काम करके यदि कोई सौय लेता है तो उसका नौ सौ रुपये का अनुदान ही हुआ। शाँतिकुँज परंपरा में हर आश्रमवासी को अन्य सभी की तरह निर्वाह आश्रम से ही लेना पड़ता है। उसकी निजी आमदनी या पेंशन को, उसे आश्रम में दान देते रहने के लिए कहा जाता है।लोकसेवी यदि जनता से ब्राह्मणोचित निर्वाह लेता है तो वह वेतनभोगी कर्मचारी नहीं हो जाता वरन् श्रद्धासिक्त निर्वाह दक्षिणा के रूप में प्राप्त करते हुए गौरवान्वित होता है। सच्चे सेवक के लिए ऐसी नम्रता आवश्यक है।

यहाँ एक और प्रकरण ध्यान देने योग्य है। वह है ऐसे व्यक्तियों से बचना, जो कालनेमि की तरह सतत् अपना षड्यंत्र रचते व लोकसेवी की प्रगति के मार्ग में रीडर बनते हैं। इस प्रकार अनेक तरह के व्यक्ति हैं। ऐसे भी है जो सत्परामर्श देकर मनोबल ऊँचा उठाते व साधना क्षेत्र में सहयोगी बनते हैं किंतु आज बाहुल्य ऐसे व्यक्तियों का है, जो मायावी कालनेमि की भूमिका निभाते अच्छे भले आदमी को पथभ्रष्ट कर देते हैं। हर समाजसेवी संस्था को ऐसे कालनेमियों से बचना पड़ता है। रावण के भाई कालनेमि का अपने काले कारनामे के कारण पुराण-कथाओं में बहुत स्थानों पर वर्णन आया है। वह त्रेता में आया था, पर काल से बद्ध नहीं था। दुर्बुद्धि देने का काम वह हर युग में करता आया है। उसी ने शूर्पणखा को नाक कान कटाने राम के पास भेजा, रावण को सीता हरने की सलाह दी। मारीच कुँभकरण मंथरा, कैकेट की बुद्धि उलटने के मूल में उसकी ही भूमिका थी। उस कालनेमि की कुटिलता अभी भी अपना कुचक्र रचने में लगी हुई है। तपस्वी योगी, महात्मा कोई भी वेश धारण कर उसकी विक्षुब्ध जीवात्मा सतत् भटकती एवं कमजोर मनःस्थिति वाले व्यक्तियों को ढूंढ़ती रहती है। युगशिल्पियों -प्रज्ञा परिजनों का लोभ, मोह अहंता इन तीन की अतिरिक्त कालनेमि परंपरा के व्यक्तियों से भी सावधान रहना चाहिए।


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी फिजा बदल देती है अवतार की आँधी

मित्रों! लोग अपनी अपनी जन्मभूमि की रट लगाते रहते हैं कि यह मेरी जन्मभूमि है , वह मेरी जन्मभूमि है। अरे, जन्मभूमि किसकी होती है? जो केवल शरीर को ही सब कुछ मान लेते हैं, उन्हीं की जन्मभूमि होती है, श्रेष्ठ मनुष्यों की कोई जन्मभूमि नहीं होती। हमारी तो हर जगह जन्मभूमि है। जहाँ कहीं भी हमारी आवश्यकता पड़ेगी , हम वहीं बस जाएँगे। नहीं साहब, हमारी तो अमुक जगह जन्मभूमि है और हम वहीं जाएँगे। नहीं कोई जन्मभूमि नहीं। शंकराचार्य कहाँ पैदा हुए थे? केरल में पैदा हुए थे, परंतु वे सारे हिंदुस्तान में घूमते फिरे । उनकी प्रेरणा से दक्षिण भारत में चले गए। कुमारजीव कश्मीर में पैदा हुए थे और सूडान होते हुए मंगोलिया चले गए और चीन में मर खपकर खत्म हो गए। ईसा कहाँ पैदा हुए थे? कहाँ जन्म लिया और कहाँ से कहाँ चले गए। वहाँ रहे और बाद में उस गाँव को छोड़कर और कहीं चले गए।

नहीं साहब! हम तो अपने गाँव में रहेंगे और गाँव को ही सब कुछ बनाएँगे और वहीं मरेंगे।नहीं मित्रों इसकी कोई जरूरत नहीं है। जहाँ कहीं भी जगह है, जहाँ कहीं भी भूमि है, जहाँ कहीं भी मौका है, जहाँ कहीं भी आपकी आवश्यकता है , आप वहाँ जाइए। नहीं साहब हम तो गाँव में ही रहेंगे। गाँव में ही हमारे बच्चे रहेंगे।हमारे ही गाँव में पुस्तकालय। गाँव गाँव चिल्लाते हैं। यह ’होमसिकनेस’ की औरों से अपने को अलग करने की प्रवृत्ति है। नहीं साहब, इसके कारण तो सब छोड़कर चले गए। चले गए तो चले गए, उनसे क्या मोहब्बत ? मोहब्बत करनी है तो सिद्धाँतों से कीजिए, आदर्शों से कीजिए।गाँव से क्या मोहब्बत क्या रिश्ता? इसका सबसे अच्छा उदाहरण हमें श्रीकृष्ण भगवान् के जीवन में देखने को मिलता है। भगवान् की ये कथाएँ और प्रेरणाएँ हमें यही सिखाती है कि जहाँ हमारी आवश्यकता है , हमें वहीं बादलों के तरीके से जाना चाहिए।

मित्रो! भगवान श्रीकृष्ण की कथाएँ और प्रेरणाएँ हमको जाने क्या-क्या सिखाती हैं। श्रीकृष्ण का जीवन हमें अध्यात्म का जाने क्या क्या अर्थ निकाल रखा है। आपके हिसाब से अध्यात्म हो सकता है-भजन , ध्यान, कुँडलिनी जगाना और आज्ञाचक्र जगाना। दंड कमंडल लेकर ठाले निठल्ले बैठे रहते हैं और बेकार की बातें करते हैं। जब मुसीबत आती है, जो यहाँ वहाँ मारे-मारे भागते फिरते हैं। सनक में जीते हैं। बैठे-बैठे योगीराज बनने का ढोंग करते और चित्र -विचित्र स्वाँग रचते रहते हैं। ऐसे लोग अफीमची की तरह सनकते रहते हैं और फालतू बकवास करते रहते हैं। इसे हम अध्यात्म नहीं कह सकते।

मित्रो! अध्यात्म क्या हो सकता है? अध्यात्म केवल वह है, जो हमारे क्रियाकलाप में शामिल हो। यह बात हमने शुरू में ही बताई है। अध्यात्म का हम आपके क्रियाकलापों में देखना चाहते हैं। आज्ञाचक्र जगने का मतलब आपका जीवन-चक्र धमा कि नहीं घूमा? नहीं महाराज जी, यह तो केवल सिर में घूमेगा , बेटे सिर में कोई चक्र नहीं घूमता । घूमता है तो सारे क्रियाकलापों में घूमता है। केवल घर में ही नहीं, सारे संसार में चक्र घूमता है। भगवान् ने अपनी लीला के माध्यम से धर्म चक्र में घूमता है। पागल कहीं का, सनकता रहता है और बेसिर पैर की बातें करता है। चक्र का जान क्या समझ लिया है।

इसलिए मित्रो! श्रीकृष्ण भगवान् ने गीता में अध्यात्म का सूत्र समझाया। गीता का कर्म गीता बतलाया। गीता के कर्मयोग में उन्होंने कहा कि कर्म करने का अधिकार मनुष्य को है, किन्तु फल प्राप्त करने के लिए हैरान होने की, उतावली करने की आवश्यकता नहीं है। काम करो, ईमानदारी से काम करो, शराफत से काम करो। बस , वही काफी है आपके आत्मसंतोष के लिए। फल मिला या नहीं? हम नहीं जानते कि फल क्या मिलेगा या क्या नहीं मिलेगा? बहुत से आदमी दुनिया में ऐसे हुए हैं जिन्होंने बेहद अच्छे अच्छे काम किए हैं, लेकिन ईसामसीह को फाँसी पर चढ़ा दिया गया, सुकरात को जहर का प्याला पिला दिया गया। न जाने कितने अच्छे अच्छे आदमियों को क्या क्या किया गया। अतः हम सफलता की कोई गारंटी नहीं ले सकते, लेकिन हम आपको शाँति की गारंटी दे सकते हैं।

मित्रों ! अगर आप शराफत के मार्ग पर चलेंगे और यह समझते रहेंगे कि हम नेक काम कर रहे हैं, शराफत का काम कर रहे हैं तो फिर जटायु के तरीके से आपको सफलता मिल जाए तो क्या और न मिले तो क्या -कोई अंतर नहीं पड़ेगा । रावण से सीता को छुड़ाते हुए जटायु मारा गया, उस नेक काम के लिए अपनी जिंदगी देनी पड़ी , लेकिन जटायु को आप हारा हुआ नहीं कह सकते। भगतसिंह का फाँसी लग गई-तख्त पर टाँगा। ईसा को कीलें गाड़ दी गई लेकिन हम ईसा को हारा हुआ नहीं कहेंगे, भगतसिंह को मरा हुआ नहीं मानेंगे, जटायु को मरा हुआ नहीं मानेंगे। सफलता -असफलता से क्या बनता-बिगड़ता है? सफलता -असफलता की कोई कीमत नहीं। आप ने सही काम किया, नहीं किया आपके लिए इतना ही काफी है।

साथियों! कर्मयोग में भगवान् ने यह बताया है कि आप यह मत देखिए कि उसमें फायदा हुआ कि नहीं? हमने जो चाहा था वह मिला कि नहीं मिला? मिलना , न मिलना आपके हाथ की बात नहीं है। यह परिस्थितियों और प्रारब्ध की बात है। यह आपके प्रारब्ध की बात है कि दूसरे लोगों की सहायता या बिना सहायता के आप क्या कर सकते हैं? किसी कार्य का क्या फल मिलता है, आपके हाथ में यह कुछ नहीं है। लेकिन एक बात पूरी तरह से आपके हाथ में है कि आप अपनी जिम्मेदारियाँ निभाएँ और कर्त्तव्य को पूरा करें। आप कर्त्तव्यों की परा करेंगे, जिम्मेदारियों को निभाएँगे, तो यकीन रखिए, आपको वह लाभ मिल जाएगा, जो कि योगी को मिलना चाहिए, संत को मिलना चाहिए और ज्ञानी को मिलना चाहिए। यही गीता का कर्मयोग है। गीता में अर्जुन का भगवान् ने कर्मयोग की शिक्षा दी और उसे कर्म में लगाया। उन्होंने अर्जुन से कहा कि कर्म कर, सारी-की सारी जिंदगी की प्रतिक्रिया को अपना योग मान। गृहस्थ को योग मान। समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को योग मानकर अपने कर्त्तव्य को पूरा करता जा। मित्रों यह उनका कर्मयोग था।

एक बार अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से कहने लगा कि भगवान् मैं तो आपके विराट् स्वरूप का दर्शन करना चाहता हूँ। उन्होंने कहा कि भगवान् के दर्शन इन आँखों से ही हो सकते। इन आँखों से मिट्टी देखी जा सकती है। पत्थर देखे जा सकते हैं। इससे हाड़ माँस देखा जा सकता है। पंचतत्त्वों से बनी आँखें सिर्फ पंचतत्व देख सकती हैं। भगवान् पंचतत्व से बड़ा है, इसलिए कभी किसी ने भगवान् को नहीं देखा और इन आँखों से कोई देख भी नहीं सकता। भगवान् को देखने के लिए आँखें ही काफी नहीं है और आँख से भगवान् को देखने की कोई गुँजाइश भी नहीं है। किसी के लिए भी गुँजाइश नहीं है।

तो फिर भगवान् को कैसे देखा जा सकता है? इस पर भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा- “दिव्यं ददामि ते चक्षुः” अर्थात् मैं तुझे दिव्य आँखें दूँगा, विवेक की आँखें दूँगा, ज्ञान की आँखें दूँगा। मात्र ज्ञान की आँख से ही भगवान् को देखा जा सकता है और किसी तरीके से नहीं। चमड़े की आँख से आप भगवान् को नहीं देख सकते। जब यह चमड़े का विषय ही नहीं तो आप देख कहाँ से लेंगे? आपने क्या ठंडक देखी है, नहीं साहब हमने तो केवल बरफ देखी है, ठंड तक नहीं देखी। तो क्या आपने गरमी देखी है? नहीं गरमी भी नहीं देखी है, आग देखी है।आग की बात हम नहीं पूछते गरमी की बात पूछते हैं। नहीं साहब, गरमी तो नहीं देखी है। अच्छा तो हमारा प्यार देखा है? महाराज जी! प्यार तो आपका नहीं देखा। हाँ आपके चेहरे की स्मिति , मुस्कान देखी है। मित्रो! हम प्यार की बात पूछते हैं मुस्कान की नहीं।

मित्रो! अच्छा बताइए आपने मेरा ज्ञान देखा है? नहीं महाराज जी ज्ञान भी नहीं देखा। ज्ञान आपने देखा नहीं प्यार देखा नहीं गरमी देखी नहीं ठंड देखी नहीं तो फिर आप भगवान् को कैसे देखेंगे? नहीं महाराज जी! भगवान् दिखा दीजिए। पागल कहीं का भगवान् देखेगा। भगवान् भी कोई देखने की चीज है! भगवान् किसी ने नहीं देखा है। अर्जुन भी कह रहा था कि भगवान् को दिखा ही दीजिए। श्रीकृष्ण न कहा चल तुझे दिखाते हैं। उन्होंने अपना विराट् रूप दिखाया और कहा-देख यही है भगवान्। यही स्वरूप उन्होंने अपनी माता यशोदा को भी दिखाया था। राम ने भी अपनी माता कौशल्या को अपना विराट् रूप दिखाया था। उन्होंने काकभुशुँडि का दिखाया था और कहा था कि देख यही मेरा विराट् रूप है।

साथियों ! अगर आप आँखों से भगवान् को देखा चाहते को तो संसार में जितनी दिव्यशक्तियाँ हैं, जितनी दिव्य विचारधाराएँ है ओर जितने दिव्य कर्म दिखाई पड़ते हैं, उनमें आप भगवान् की क्रीड़ा को देख सकते हैं। यही उनके क्रीड़ा करने योग्य स्थल हैं। उनको ही आप अक्षत चढ़ाइए, जल चढ़ाइए, अगरबत्ती जलाइए। उसमें ही अपनी अक्ल लगाइए अर्थात् ध्यान कीजिए। ध्यान करने का मतलब है- भगवान् के लिए अपनी अक्ल खरच करना। ‘अक्षता समर्पयामि ‘ का अर्थ है -अपनी कमाई का एक हिस्सा लोकमंगल में लगा देना। ‘आचमनं समर्पयामि’ एवं स्नानसमर्पयामि’ अर्थात् पानी चढ़ा देने का भी यही मतलब होता है-समाज को श्रेष्ठ बनाने के लिए, लोगों को अच्छा बनाने के लिए, दुनिया में भलाई लाने के लिए अपना पसीना बहाइए, अपनी अक्ल लगाइए, अपना पैसा खरच कीजिए। नहीं महाराज जी, मैं तो तीन चम्मच पानी चढ़ाऊगा , तो पुण्य हो जाएगा।हाँ बेटे चाहे तीन चम्मच चढ़े, चाहे चार इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। अरे चढ़ाना है तो वह चढ़ा जो इसके पीछे कुछ शिक्षा है, प्रेरणा है। नहीं महाराज ! भगवान तो पानी चढ़ाने से ही प्रसन्न हो जाते हैं। तो फिर ठीक है चम्मच से क्यों चढ़ाता है ? सावन के महीन में तीन घड़े पानी भर ले और उनकी पेंदी में सुराख करके भगवान् के ऊपर के ऊपर टाँग दे। चौबीस घंटे पानी टपकता रहेगा। सारे दिन ‘आचमनं समर्पयामि’ का पाठ चलता रहेगा और चौबीस घंटे का स्नान भी। न बार-बार नहलाना पड़ेगा, अपने धुलाना पड़ेगा, न बार बार चममच डालना पड़ेगा अपने आप बैठे-बैठे भगवान् जी नहाते रहेंगे। अरे मूर्ख पानी चढ़ाने का अर्थ है -पसीना बहाना, श्रम करना। अच्छाई के लिए मेहनत करना। पूजा-अर्चना के पीछे, कर्मकांडों के पीछे छिपे हुए भाव शिक्षा एवं प्रेरणाओं को समझना बहुत जरूरी है।

भगवान् ने गीता में हमें यही उपदेश सिखाया और यह कहा कि कोई भी श्रेष्ठ कार्य बिना श्रम और सहयोग के संभव नहीं है। उदाहरण के लिए, जब उन्होंने पहाड़ उठाया, तो ग्वाल−बालों से कहा कि आप जरा हिम्मत कीजिए, हमारे साथ आइए और हमारी मदद कीजिए, अपनी लाठी का सहारा लगाइए। मित्रो! जनता को साथ लिए बगैर आप कुछ भी नहीं कर सकते। अकेले आप समाज को सुधारेंगे? नहीं आप अकेले कुछ भी नहीं कर सकते।आप लोगों को साथ बुलाइए साथ लेकर चलिए। नहीं साहब, हम बड़े ज्ञानी हैं, बड़े विद्वान् हैं। ठीक है , आप विद्वान् है तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन आपके साथ में लोकशक्ति है कि नहीं? आप जनता के पास जाइए और लोकशक्ति का बढ़ाइए। लोकशक्ति को जगाए बिना राम का उद्धार नहीं हो सका, कृष्ण का उद्धार नहीं हो सका। बुद्ध का उद्धार नहीं हो सका और गाँधी का उद्धार नहीं हो सका, किसी का भी उद्धार नहीं हो सका और न कभी हो सकता है।जनशक्ति को जगाइए, जनता के पास जाइए, जनता को साथ लीजिए। जनसहयोग लीजिए। श्रीकृष्ण भगवान् का गोवर्द्धन उठाना, महाभारत में सेना को खड़ा कर देना, इस बात का सबूत है कि उन्होंने जो काम किए,मेहनत से किए और लोगों की सहायता से किए है -जनशक्ति का साथ लेकर किए हैं।

श्रीकृष्ण भगवान् के ब्याह शादी के बारे में कितनी ही किंवदंतियाँ मालूम पड़ती है। अभी जो आपको हम भागवत् कथा बताने वाले थे, उसमें पहला विषय श्रीकृष्ण भगवान् के शादी-ब्याह वाला किस्सा ही था। लोगों न उनके विवाह और रास को इतना घिनौना बना दिया है।जिसे हम नहीं चाहते कि हमारे पिता के ऊपर-हमारे बुजुर्गों के ऊपर ऐसे गंदे और वाहियात आक्षेप लगाए जाएँ। हम इस बकवास को सुनना नहीं चाहते और न इस तरह की रासलीला को देखने का हमारा जरा सा भी मन है और न फुरसत है। नहीं गुरुजी रास देख लीजिए। नहीं बेटे, हम रास नहीं देखना चाहते। हम शिक्षा वाला नाटक देखना चाहते हैं, जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण ने यह करके दिखाया था कि अपना राज्य सुदामा को सुपुर्द कर दिया था और तप करने चले गए। यह हमें पसंद है और इसे हम हजार बार देखेंगे। क्यों महाराज जी, आपने तो गोपियों वाली रासलीला और तप करने चले गए। यह हमें पसंद है और इसे हम हजार बार देखेंगे। क्यों महाराज जी आपने तो गोपियों वाली रासलीला ओर वह कपड़े चुराने वाली लीला देखी है? नहीं बेटे यह रासलीला हमें नापसंद है, क्योंकि यह समाज में अनाचार फैलाती है। हमारे आराध्य की हँसी उड़ाती है और हमारी संस्कृति के ऊपर कलंक लगाती है। यह हमें नापसंद है। इसे न हम देखना चाहते है और न सुनना चाहते हैं।

मित्रो! भगवान् श्रीकृष्ण के दाँपत्य जीवन के बारे जो वाहियात बातें सुनने को मिलती रही हैं, इसके संबंध में जब मैं गहराई में गया तो पता चला कि ये तमाम वाहियात बातें पीछे पंडितों ने मिलाई हैं। असल में उनका एक ही ब्याह हुआ था और रुक्मिणी को वे छीनकर नहीं लाए थे। रुक्मिणी के भाई रुक्म की रजामंदी से यह ब्याह हुआ था। जब महाभारत में यह कथा मैंने पढ़ी तो मुझे बहुत पसंद आई और तब से मैंने भगवान् श्रीकृष्ण की शादी ब्याह के बारे में भी जिक्र करना शुरू कर दिया। पहले मैंने यह फैसला किया था कि श्री कृष्ण के ब्याह के बारे में मैं कुछ लिखूँगा ही नहीं कि उनका ब्याह हुआ या वे कुँवारे रहे अथवा उन्होंने बहुत सी औरतों से ब्याह किया था। यह सब मैं लिखना नहीं चाहता था, जिन्हें साथ लेकर के वे बारह वर्ष तक बद्रीनाथ तप करने चले गए।

बद्रीनाथ किसे कहते हैं? बद्री माने बेर माने बद्री । बेरों का जंगल था वहाँ, जहाँ आज बद्रीनाथ है। वे वहीं चल गए थे आर अपनी धर्मपत्नी के साथ बारह वर्ष तक तप किया था। इसके पीछे सिद्धाँत छिपा हुआ था-आदर्श छिपा हुआ कि हमें एक ऐसी संतान चाहिए, जो कामुकता के संस्कारों से दूर हो। इसके पीछे उद्देश्य यह था कि श्रेष्ठ नागरिक होने के लिए संयम के साथ में तप के साथ में ज्ञान के साथ में एक सुसंस्कारी संतान देनी है। बारह वर्ष तक इसलिए तप करके आए थे।उनके केवल एक पुत्र उत्पन्न हुआ था। उसका नाम प्रद्युम्न था। नहीं बेटे, यह सब बातें गलत हैं और पीछे पंडितों के द्वारा जोड़ी गई है। बेकार की इन बातों से कोई फायदा नहीं है।

मित्रों ! भगवान् श्रीकृष्ण का दाँपत्य जीवन श्रेष्ठ वाला दाँपत्य जीवन रहा है। उसमें इस तरह के बकवास की कोई गुँजाइश नहीं है कि उनकी हजारों रानियाँ थी। उनकी जिंदगी की आखिर वाली दो घटनाएँ कितनी शान दार रही है। पहली घटना वह है जब उन्होंने संपत्ति इकट्ठी की और कहा कि इसका हिसाब होना चाहिए कि कितना धन किस राज्य में कहाँ-कहाँ स्थापित हो? एक बार जब सुदामा जी द्वारका राज्य में आए और कृष्ण भगवान् को बताया कि सुदामा नगरी का हमारा गुरुकुल टूटा -फूटा हुआ पड़ा है। हमारे यहाँ घन की कमी आ गई है। छात्रों के निवास के लिए स्थान की कमी पड़ गई है। पढ़ने के लिए पुस्तकें नहीं है। यह सुनकर उन्होंने सोचा कि पैसे का इससे अच्छा उपयोग और कुछ भी नहीं हो सकता है। आपके पास धन संपदा हो तो आप सोचेंगे कि इसे मेरा बेटा खाएगा, पाता खाएगा तो मैं उसकी जान ले लूँगा। अपनी सारी कमाई किसको देगा ? बेटे-पोते को देगा अगर और किसी को देगा तो तेरी जान निकल जाएगी।

मित्रो! क्या हुआ? भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा कि राज्य इकट्ठा किया, पैसा, इकट्ठा किया, लेकिन इसे खरच करना चाहिए था।आखिर इसे खरच कहाँ किया जाए? यह विचार कर ही रहे थे। कि सुदामा जी आ पहुंचे। उन्होंने सोचा बस हो गया मेरा काम। यही तो मैं तलाश कर रहा था कि कोई ऐसा ठीक स्थान मिले, जहाँ हमारे धन का अच्छे से अच्छा उपयोग हो सके। समझ में नहीं आ रहा था कि मैं किसको दूँ, किसको न दूं? माँगने वाले तो हजारों आते हैं, लेकिन जहाँ आवश्यकता है , ऐसा कोई संस्थान या व्यक्ति नहीं मिला। सुदामा जी आप ठीक समय पर आ गए। चलिए जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब मैं आपको देता हूँ -सब आपके सुपुर्द करता हूँ । उनका जो सारे का सारा धन था, उसे सुदामापुरी भेज दिया और वहाँ का विद्यालय विश्वविद्यालय में बदल दिया गया।

मित्रो ! यह उनके जीवन की निस्पृहता थी, उनका कर्मयोग था। कर्मयोग में आदमी की आसक्तियाँ और मोह कटते जाते हैं और उसे यह दिखाई देने लगता है कि हमें क्या चाहिए? हमारे में कमाने का माद्दा है, लेकिन कमाने के माद्दे की सार्थकता तब है, जब इसे किसी अच्छे काम में लगा सकें । लेकिन आप तो कमाते जाते हैं और बेटों को, पोतों को चालाक बनाने के लिए, चोर बनाने के लिए हैवान बनाने के लिए, व्यसनी बनाने के लिए, और अनाचारी बनाने के लिए, पाप की कमाई उनके ऊपर जमा करते जा रहे है। आप भी क्या यही करते हैं? नहीं महाराज जी! हम ऐसा नहीं करते हैं। यदि आप भी ऐसा ही करते हैं तो अपना विचार बदल दें। मित्रो!प्राचीनकाल में ऐसा ही होता रहा है। भगवान् श्रीकृष्ण ने अपना सारा धन सुदामा को सुपुर्द कर दिया और वे निस्पृह हो गए। ये सारी बातें उन्होंने अपने जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए साथ कर दिखाई।

उनके जीवन की अंतिम कथा यह है कि उन्हें याद आया कि पहल जन्म में हमने बाली को छिपकर मारा था। छिपकर मारना हमारी गलती थी। उसे छिपकर नहीं मारना चाहिए था। यह कोई कायदा नहीं है कि आप छिप करके किसी का मारें। छिपकर के मारने वाले को हत्यारा कहते हैं, कमाई कहते हैं और जल्लाद कहते हैं। लड़ाई का कायदा यह है कि आप सामने वाले को भी हथियार दीजिए और खुद भी हथियार लीजिए, फिर चैलेंज कीजिए कि आइए, आपको भी अपनी रक्षा करने का अधिकार है। इस लड़ाई में जान हमारी भी जा सकती है और आपकी भी जा सकती है। आप हमारे ऊपर हमला कीजिए और हम आपके ताड़ के पीछे से छिपकर के उसे मार दिया। सोए हुए को मार दिया, यह क्या घोटाला किया। रामचंद्र जी थे तो क्या हुआ, उन्होंने ऐसा करके गलती की थी।

मित्रो! भगवान् श्रीकृष्ण ने दिखाया कि गलती करने वाला कोई भी क्यों न हो, चाहे भगवान् ही क्यों न हो गलती की सजा से माफी नहीं माँग सकता। वही बाली इस जन्म में बहेलिया हो गया और आकर के जब श्रीकृष्ण भगवान् पेड़ के नीचे बैठे हुए थे, तब उनको तीर मारा। तीर उनके पाँव में लगा , जिससे सुराख बन गया और सेप्टिक हो गया, ब्बेनस हो गया डाक्टरों ने इंजेक्शन लगाए, बहुतेरा चिकित्सा उपचार किया, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा । भगवान् श्रीकृष्ण वहीं ढेर हो गए। उनकी लाश वहीं पड़ी रही। बलराम ने भी देखा कि मेरा भाई मारा गया। अर्जुन भी वहाँ आ गए और जाकर उनका अंतिम संस्कार किया। इस सारी कथा का महाभारत में विशद् वर्णन है।

मित्रो! इसी के साथ सारी कथा पूरी हो जाती है। रही बात अलौकिकता और चमत्कार की तो महान् व्यक्तियों के साथ इसका कोई लेना देना नहीं है। चमत्कार ता आप जैसे लोगों के लिए है , जो इसे ही सब कुछ मानकर किसी की महानता का आकलन करते हैं और कहते हैं कि यदि चमत्कारी होगा तो महात्मा होगा, चमत्कारी होगा तो भगवान् होगा, चमत्कारी होगा तो गुरु होगा और अगर चमत्कारी नहीं हुआ तो कुछ नहीं, मात्र सामान्य व्यक्ति है। नहीं साहब गुरु गोविंदसिंह ने तो एक से एक बड़े चमत्कार दिखाए थे, आप भी दिखाइए। नहीं भाई साहब गुरुगोविंद सिंह से जब एक व्यक्ति जिद करने लगा और कहने लगा था कि मेरा खुदा बड़ा चमत्कारी है । वह एक बीज से हजारों फल निकालता है। बादलों को पिघलाकर पानी की बूंदें बना देता है। आप भी बालों में से बालू निकाल दीजिए , कानों में से मेढ़क निकाल दीजिए तो हम आपको चमत्कारी मानेंगे। उन्होंने कहा-तू बाजीगरी को चमत्कार मानता है। वास्तविक चमत्कार ता यह है कि आदमी के हृदय में भगवान् पैदा किया जा सकता है। या नहीं। जो आदमी पापी और पतित की जिंदगी जी रहा है। भीरु और परावलंबी जिंदगी जी रहा है, यदि वह अब स्वावलंबी और शानदार जिंदगी जीता है श्रेष्ठ जिंदगी जीता है , लोगों को तारने वाली विकास वाली जिंदगी जीता है तो यही सबसे बड़ा चमत्कार है। इससे बड़ा और कोई चमत्कार नहीं हो सकता।

भगवान् श्रीकृष्ण चमत्कारी थे, लेकिन लौकिक दृष्टि से वे घोर असफल। गोपियों से प्यार करते थे, राधा से प्यार करते थे, लेकिन उन्हें छोड़कर वे कहाँ चले गए? गोपियाँ चिल्लाती रह गई। ब्याह किया , राजपाट बसाया , अर्जुन का राजा बनाया। आखिर में भागकर स्वयं द्वारका चले गए। अपना कुटुम्ब बसाया जो अंत में आपस में लड़ मरकर खत्म हो गए। ये कैसे भगवान् थे जिनके खानदान वाले सब खत्म हो गए। सारा खानदान चौपट हो गया। अर्जुन गोपियों को लेकर जा रहे थे। उनको रास्ते में भील मिल गए और गोपियों को ले गए। राधिका जी जाने कहा चली गई। सब कुछ बिखर गया। आखिर में जो कुछ बचा खुचा था, उसे भी लोग समेट ले गए और भगवान् श्रीकृष्ण खाली हाथ रह गए। आखिरी वक्त में यह भी नहीं हो सका कि कोई मुँह में गंगाजल ही डाल दे या गौदान करा दे। गौदान कराने वाले तो नहीं हुए उलटे उनकी लाश जंगल में पड़ी रही और वह भी अर्जुन को जलानी पड़ी।

मित्रो! इस तरह संसार की दृष्टि से भगवान् श्रीकृष्ण घोर असफल सिद्ध हुए, लेकिन आदर्शों की दृष्टि के -सिद्धान्तों की दृष्टि से घोर सफल सिद्ध हुए। वे भगवान् जो आज के दिन पैदा हुए, जिन्होंने न केवल अपने क्रियाकलापों से कितना शिक्षण दिया वरन् संख्या नी नारियां संसार सागर से पार लगाया। उनका शिक्षण इतना शानदार है कि अगर हम आज की जन्माष्टमी के दिन इन चरित्रों को इन प्रेरणाओं को, इन दिशाओं को अपने जीवन में धारण करने में समर्थ हो जाएँ तो मजा आ जाए और आज का जन्माष्टमी का पर्व सार्थ के हो जाए। हमारा समझाना भी सार्थक हो जाए। अगर ये प्रेरणाएँ जो भगवान् ने अपनी स्थूल जीवन की लीलाओं द्वारा दी थी। इनको हम धारण कर पाए तब-गीता में हमको जो बताया गया है, उसे हम धारण कर सकें। तब । अगर हममें से प्रत्येक के भीतर जीवंत भगवान् का वह सिद्धाँत आदर्शवादिता के रूप में उतर सके, हर क्षण उसकी आवाज और वाणी को हम सुन सकें तो हमारा जीवन धन्य हो जाए और धन्य हो जाए आज का दिन और आज का हमारा लेक्चर। बस , आज की बात यही समाप्त। ॐ शाँतिः।


युगगीता-9 स्थितप्रज्ञ-प्रज्ञावान की सही पहचान

(गीता के द्वितीय अध्याय के ‘स्थितप्रज्ञ’ की विवेचना की अगली किश्त)

श्रीमद्भगवद्गीता की युगानुकूल विवेचना विगत 9 माह से परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के क्राँतिकारी चिंतन के परिप्रेक्ष्य में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में निरंतर प्रकाशित हो रही है। अठारह अध्यायों के विभिन्न श्लोकों में वर्णित विषयों पर यह शृंखला अनवरत प्रकाश डालती रहेगी। विगत अंक में पाठक-परिजन ‘ स्थितप्रज्ञ ‘ की व्याख्या के परिप्रेक्ष्य में आसक्ति से निवृत्ति होकर कैसे परमात्मा का साक्षात्कार करने वाले स्थितप्रज्ञ पुरुष की उच्चतम आध्यात्मिक प्रगति होती है, यह पढ़ चुके हैं। यह विषय अत्यंत गंभीर भी है। एवं आज जब मनीषियों -महापुरुषों का चारों ओर अकाल सा दिखाई देता है-बड़ा महत्वपूर्ण एवं सामयिक भी। बताया गया था कि जिसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित हो-चंचल गतिमान न हो, वही प्रज्ञावान् है। स्थिर बुद्धि वाला है- स्थितप्रज्ञ है। आसक्ति से निवृत्ति मिले तो ही व्यक्ति प्रज्ञा को जाग्रत् कर सकता है। संयम का महत्व बताते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण अपने शिष्य अर्जुन को बताते हैं कि इंद्रियां ्र्र्र्र्र्र0161 अति प्रबल वेग से मन को बलात् भ्रमित कर गलत मार्ग पर चलने को विवश कर देती हैं। जब बुद्धिमान् व्यक्ति भी इनके वशीभूत हो मूर्खता पूर्ण व्यवहार करने लगाता है तो फिर औसत योग्यता या कम बुद्धि वाले की तो स्थिति क्या होगी, यह अकल्पनीय है। बार-बार भगवान् कहते हैं -’तानि सर्वाणि संयम्य’ अर्थात् साधक को संपूर्ण इंद्रियों को वश में करके मेरा ही ध्यान करना चाहिए।विचार विज्ञान के मर्मज्ञ श्रीकृष्ण न केवल सुधीजनों को ध्यान का तरीका सिखाते हैं , अपितु आसक्ति से क्या क्या कठिनाइयाँ पैदा हो सकती है, यह भी बताते हैं। विषयों की कामना, उनमें बाधा पड़ने से क्रोध से मूढभाव -स्मृति भ्रम-ज्ञानशक्ति का नाष एवं अंततः पुरुष के, पतन, ये सभी परिणतियाँ हैं। अध्यात्म इन सबसे उबरने -अपने आपको ऊँचा उठाने की विधा है, जिंदगी का शीर्षासन है। इसी प्रक्रिया से मनुष्य अंतःकरण की प्रसन्नता व दुःखों से निवृत्ति की प्रक्रिया का विकास कर स्थितप्रज्ञ बनता चला जाता है। इसी प्रसंग को द्वितीय अध्याय की व्याख्या परक इस किश्त में सड़सठवें श्लोक की व्याख्या द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है।

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-इन्द्रियाणाँ हि चरताँ यनमनोनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञाँ वायुर्नावमिवाम्भवि॥

अर्थात् “जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है , वैसे ही विषयों में विचरती हुई इंद्रियों में से मन जिस इंद्रिय के साथ रहता है। वह एक ही इंद्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है। “

प्रस्तुत श्लोक बड़े गहरे अर्थों वाला व सही अर्थों में एक औपनिषेदिक शैली में वर्णित काव्य की पराकाष्ठा का द्योतक हैं भगवान् कहते हैं कि नाव जो जल में चल रही है, हवा का प्रवाह आते ही न जाने कहाँ से कहाँ पहुँचाया जा सके। भगवान् ने नाव की उपमा उस मन से दी है,जो किसी भी इंद्रिय से प्रभावित हो,उसके वशीभूत हो , स्वच्छंद बरताव करने लगता है एवं प्रवाह में बह जाता है। वह एक ही इंद्रिय से प्रभावित हो, उसके वशीभूत हो स्वच्छंद बरताव करने लगता है। एवं प्रवाह में बह जाता है। वह एक ही इंद्रिय, इस योगभ्रष्ट पुरुष की बुद्धि को दुर्गति में बदलने हेतु सक्षम है -इतना प्रबल है आसक्ति से जन्मी वासना का वेग -एक ही इंद्रिय काफी है मनुष्य को पतन की दिशा में ले जाने के लिए। वाणी ही काफी है, रसना ही काफी है, कर्णेंद्रियों-ज्ञानेंद्रियों से प्रविष्ट वासनाएँ ही काफी है। इतना सशक्त -प्रबल वेग होते है। चंचल स्वच्छंद इंद्रियों में जो मन का अपनी इच्छानुसार चलने को विवश कर देती हैं । इंद्रियां व मन मिलकर उनका पक्ष प्रबल हो जाता है तो फिर बुद्धि अपना काम नहीं कर पाती। बुद्धि कुबुद्धि बनकर अनर्थकारिणी बन जाती है। इससे विपरीत , बुद्धि के अनुकूल मन और मन के अनुकूल इंद्रियाँ हो जाती हैं तो जीवन का सारा व्यवहार आत्मा के अनुकूल होता चला जात है। संत विनोबा ‘ स्थितप्रज्ञ दर्शन’ में कहते हैं कि बुद्धि नौका की तरह तारक होती है। परंतु मन की पकड़ में आ जाए तो वही मारक होती है। जब सवार के हाथ में लगाम और लगाम के वश में घोड़ा हो, तब सवार बेखटके मुकाम पर पहुँचने की कोई आशा नहीं करनी चाहिए। इसी बात को कठोपनिषद् में भी ऋषि ने समझाया है। लगभग वही प्रतिपादन यहां योगीराज श्रीकृष्ण ने नाव की उपमा देकर समझाया है। बुद्धिरूपी तारक नौका यदि हवा के वश में बहने लगे तो फिर पार नहीं लगा जा सकता। हम कहते भी तो है कि ‘जमाने की हवा ही कुछ ऐसी है’ उसे जमाने की हवा लग गई है, इसीलिए कर्म ऐसे हो रहे हैं।’ इन सबके पीछे उस प्रबल वेग की संभावनाएँ बताई गई है। बुद्धि यदि मन की पकड़ में आ जाए ता फिर उसकी तारक शक्ति नष्ट हो जाती है और वह उस व्यक्ति को डुबोकर ही रखती है।

यह श्लोक कई माइनों में विशिष्ट है। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं-यह श्लोक खतरे की घंटी का सूचक है । बताया गया है कि मनुष्य भले ही लगभग स्थितप्रज्ञ हो गया हो तो भी उसे असावधान नहीं रहना चाहिए । वे लिखते हैं -

प्राप्ते हिपुरुषें।इंद्रिये लालिली जरी कवतिके। तरी आक्रमिला जाण् दुखो। साँसारिके॥

मराठी में वर्णित इस कथन का भावार्थ है कि “पहुँचा हुआ पुरुष (प्राप्त पुरुष) भी यदि कुतूहल से इंद्रियों को दुलराए तो उस पर प्रापंचिक दुःखों का आक्रमण हुआ ही समझो।” कुतूहल का अर्थ है-सहज भाव से असावधानी से या गफलत में आकर। । श्री ज्ञानदेव ने गीता के सड़सठवे श्लोक के साथ सटीक विवेचना के रूप में उपर्युक्त तथ्य लिखा है। भावार्थ यही है कि मानव को किसी भी दशा में अपने मन को खुला नहीं छोड़ना चाहिए। समर्थ रामदास न भी यही बात इस तरह कही है - “मना गूजरे तूज हें राप्त झालें-तरी अंतरी पाहिजे यतन केले।” अर्थात् अरे मन तुझे जो कुछ मिलना था, सो मिल गया है। तू अपने मुकाम पर पहुँच ही गया है । फिर भी गफलत में मत रह। रहस्य पा लेने पर भी तू अपना हाथ कसा हुआ रख। ढीला मत छोड़ ( स्थितप्रज्ञ दर्शनः श्री विनोबा ) कितना सशक्त समर्थन है गीताकार का, बड़ी ही सीधी सादी भाषा में।

गीताकार ने ज्ञानी को विशेष रूप से सावधान इसलिए किया है कि जरा सा प्रमाद हुआ -असावधानी हुई , वह गड़बड़ाया। संयम के आधार पर स्थितप्रज्ञ हुआ व्यक्ति यदि स्वच्छंद आचरण कर बैठा - अहंता , वासना ,तृष्णा की किसी भी एक तेज प्रवाह वाली धारा में वह गया तो फिर उसका कोई ठिकाना नहीं है। संयम व्यवहार आर संयम स्थितप्रज्ञ के आचरण में कण-कण में बस जाना चाहिए, यही गीताकार की अपेक्षा है। इसी लिए श्री कृष्ण इसी बात का स्थापित करने के लिए अगले श्लोक में कहते हैं -

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

अर्थात् “इसलिए हे महाबाहो ! जिस पुरुष की इंद्रियाँ इंद्रियों के विषयों से सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है। ऐसे ही सिद्धपुरुष की बुद्धि स्थिरता का प्राप्त होती है।

बड़ा ही स्पष्ट निर्देश अर्जुन की गुरुसत्ता का है कि संयम में ढिलाई नहीं चल सकती। ‘तस्मात्’ शब्द का अर्थ है -इसलिए अर्थात् अब तक जो बात स्थितप्रज्ञ के लिए-योगी के विषयों में आसक्ति से निवृत्ति के विषय में बताई , उसे हम पुनः दुहराते हैं। तर्कशास्त्र की निगमन पद्धति के अंतर्गत यह बात यहाँ पुनः कहा जा रही है कि बुद्धि की स्थिरता तभी होगी।जब संयम सिद्ध होगा। रेखागणित के ‘इति सिद्धम्’ की तरह का प्रतिपादन है यह जो बात ऊपर 58 वें श्लोक में ‘यदा संहरते चायं कूर्मोड्ढानीव सर्वशः ‘ के रूप में कछुए की उपमा देकर कही गई थी, उसी को ज्यों-का त्यों पुनः उच्चरित किया है श्रीकृष्ण ने। यही गीता की विशेषता है।

लोकसेवा की जब भी बात आती है-चरित्रनिष्ठा सर्वोपरि मानी जाती है। परमपूज्य गुरुदेव -अखण्ड ज्योति’ दिसंबर 1988 में लिखते हैं- “लोकसेवियों की जिस जमाने में कमी पड़ती है, उन दिनों विकास का स्तर घट जाता है। जनसाधारण का भावनात्मक परिष्कार व दृष्टिकोण का उदात्तीकरण निताँत आवश्यक है। इस कार्य को विलासी स्वार्थी एवं घटिया स्तर के लोग नहीं कर सकते, भले ही वे क्रियाकौशल में पारंगत अथवा ऊँचे पदाधिकारी ही क्यों न हों। मात्र सेवाभावना ही उच्चस्तरीय नहीं होनी चाहिए वरन् चरित्रनिष्ठा व आदर्शवादिता भी ऐसी होनी चाहिए, जिसे हर कसौटी पर खरा पाया जा सके।

अर्जुन को एक आदर्श पात्र मानकर एक सच्चा स्थितप्रज्ञ लोकसेवी कैसे बना जा सकता है, यह शिक्षण गीताकार द्वारा दिया जा रहा है। इसी क्रम में भगवान् आगे कहते हैं कि स्थितप्रज्ञ की जीवनचर्या सामान्य से औरों से भिन्न क्यों होती है-उसका दृष्टिकोण कैसा हो ना चाहिए? वे कहते हैं कि “संपूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि है, उसमें संयमी व्यक्ति नित्य ज्ञानस्वरूप परमानंद की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है। जिस नाशवान् साँसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मतत्त्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है।”

या निशा सर्वभूतानाँ तस्याँ जागर्ति संयमी। यस्याँ जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

वस्तुतः इंद्रिय तुष्टि का उत्तेजनामय और विश्राँतिजनक जीवन बिताने वाले सामान्य लोग एक आत्मसंयमी व्यक्ति के पूर्ण सुख व आनन्द की कल्पना भी नहीं कर सकते। मुनेः शब्द मुनि के लिए-मननशील के लिए प्रयुक्त किया गया है। वह कामोद्वेगों के कोलाहलपूर्ण संसार से ऊपर उठ चुका होता है। यहाँ गीताकार ने स्पष्ट कहा है कि योगी जीवनक्रम को पूरी तरह उलट देता है। वह साँसारिक लोगों से ऊपर उठ चुका होता है। यहाँ गीताकार ने स्पष्ट कहा है कि योगी जीवनक्रम को परी तरह उलट देता है। वह साँसारिक लोगों से ऊपर चलता है। योगी की सबसे सटीक व्याख्या वाला श्लोक यही है जो गीता में बिलकुल सही स्थान पर स्थितप्रज्ञ की परिभाषा देता हुआ उद्धत है। श्रीरामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि तीन प्रकार के व्यक्ति रात में जागते हैं -रोगी, भोगी, व योगी। भागी व रोगी को सब जानते हैं कि क्यों व रात में जागते हैं। हमें योगी की पहचान करनी होगी। जो स्थितप्रज्ञ की स्थिति में रहता है सोते रहते हुए भी जागता है, जागरुक करता है जा महानिशा का ध्यान करके सोता है, हमेशा परमसत्ता में स्थिति में रहता है वही योगी है, परमपूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि हर लोकसेवी को थोड़ी देर के लिए महानिशा का -प्रलय की स्थिति का-जब सारा जग सो जाएगा, ध्यान अवश्य करना चाहिए।यह ध्यान रात्रि में सामान्यतः प्रथम पहर में किया जाता है। किंतु जल्दी सोने व उठने वाले इसे ब्रह्ममुहूर्त में संपन्न कर सकते हैं। इससे बड़ी शीघ्र स्थितप्रज्ञ की स्थिति सिद्ध होती है।

उपर्युक्त श्लोक यदि हम सूक्ष्म अर्थों में समझ लें तो ही हम स्थितप्रज्ञ विषय के साथ न्याय कर पाएँगे। स्थितप्रज्ञ की जीवन दृष्टि और अज्ञानी भोग -विलासियों की जीवन दृष्टि में बड़ा अंतर होता है। श्री विनोबा कहते हैं कि जैसे दो समानान्तर रेखाओं का कहीं कोई स्पर्श बिंदु ही नहीं होता, वैसी ही स्थिति इन दोनों की जीवन दृष्टियों की है। मीरा के अनुसार ‘उलट भई मोरे नयनन की’ जैसी स्थिति हो जाती है। संसार की ही दृष्टि उलटी है, किंतु बहुसंख्य व्यक्ति उसी को सही मानते हैं। यदि यह क्रम उलट दिया जाए, तो सही अर्थों में जिंदगी के शीर्षासन के रूप में अध्यात्म चरितार्थ हो जाता है। यही स्थितप्रज्ञ की स्थिति का वर्णन है।

उनहत्तरवें श्लोक में जो वर्णन है, वह शाब्दिक अर्थ में न होकर बड़े ही महत्वपूर्ण सूक्ष्मतम अर्थों में है। सामान्य व्यक्ति भोजन करता है उदरपूर्ति हेतु स्थितप्रज्ञ का भोजन एक यज्ञ है -वह आद्यशंकराचार्य के शब्दों में औषध रूप में आहार ग्रहण करता है। यहाँ भोगवृत्ति नहीं है। इसी प्रकार सामान्य व्यक्ति निद्रा में तो जाते हैं, पर उनकी एक -एक रात ज्ञानक्षय का कारण बन जाती है, जबकि स्थितप्रज्ञ की निद्रा निर्दोष प्रमाद मुक्त और निस्स्वप्न होती है। उसकी नींद में नए-नए विचारों को पोषण मिलता रहता है -नई कल्पनाएं आती है। यह नींद तमोगुणी नहीं, सतोगुणी है। स्थितप्रज्ञ का जीवन व्यवहार स्वाभाविक , सरल और खुलासा होता है जबकि सामान्य व्यक्ति का शिष्टाचार के नाम पर दंभ और बनावटी ढोंग से भरा हुआ।वस्तुतः इस श्लोक का भावार्थ यह है कि दूसरे लोग (सामान्यजन) फल के प्रति जागरुक रहते हैं और कर्त्तव्य के प्रति सोते रहते हैं किंतु स्थितप्रज्ञ केवल फल के प्रति सोता है और कर्त्तव्य के विषय में जाग्रत् रहता है।

इस अति महत्वपूर्ण द्वितीय अध्याय की समापन की स्थिति में अगला श्लोक और भी गहरे अर्थों वाला है। सत्तरवाँ श्लोक कहता है -

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठंसमुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्। तद्वत्कामा यं प्रतिशन्ति सर्वे स शान्तिमापनोति न कामकामी॥

अर्थात् “जैसे नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी भी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परमशाँति को प्राप्त होता है, न कि भोगों को चाहने वाला।”

समुद्र में सारी नदियाँ समाती चली जाती है।, पर समुद्र सदैव शाँत बना रहता है। अशाँत तीव्र प्रवाह वाली नदियाँ आकर एक शाँत समुद्र में अपनी अंतिम नियति को प्राप्त होती हैं। समुद्र अचल है, परिपूर्ण प्रतिष्ठित है। ठीक इसी प्रकार की उपमा स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की भगवान् ने यहाँ दी है।बिना किसी भी प्रकार का विकार उत्पन्न किए, हलचल मचाए इंद्रियभोग जिस महापुरुष में जाकर समा जाएँ , उसमें कोई भी विकृति पैदा न कर पाएँ , ऐसा ही पुरुष पूर्ण पुरुष बन आत्मशाँति को प्राप्त होता है । क्या ऐसा व्यक्तित्व विकसित किया जा सकता है? हाँ यह परमपूज्य गुरुदेव के जीवन में हम देखते हैं। एक कथानक पूज्यवर सुनाते थे। वह यहाँ सटीक बैठता है।

अरुंधती को दुर्वासा ऋषि के पास भोजन प्रसाद लेकर जाना था तो वे अपने पति वशिष्ठ ऋषि के पास आई व बोलीं कि नदी तो प्रबल वेग से उफन रही है। हम कैसे जाएँ? ऋषि बोले -नदी के पास जाकर कहना कि यदि वशिष्ठ ऋषि ब्रह्मचारी हैं तो मुझे रास्ता दे दें। पशोपेश में पड़ गई अरुंधती। हमारे तो बच्चे हैं। हमारे पति ब्रह्मचारी कैसे हुए? फिर भी सोचा कि ऋषि की वाणी हैं मिथ्या, नहीं हो सकती।गई नदी से बोलीं, नदी ने मार्ग दे दिया।दुर्वासा ऋषि को भोजन करा दिया। पूछा अब मैं वापस कैसे जाऊँ। नदी तो पुनः उसी वेग से बह रही है। ऋषि बोले-जाओ नदी से कहना कि यदि दुर्वासा ऋषि निराहारी हो तो मुझे रास्ता दे दा। सोचने लगीं अरुंधती की अभी तो इतना भोजन किया है। निराहारी कैसे हुए? फिर भी चल पड़ी। नदी से बोली और मार्ग मिल गया। लौटने पर वशिष्ठ मुनि ने समझाया कि मर्म तुम समझी कि नहीं? हमारी इंद्रियाँ भोग में लिप्त नहीं हैं। अंतःकरण निर्मल है। देह-व्यापार चलता रहता है। अंतरात्मा अपन विशुद्ध रूप में बनी रहती है। इसलिए हमने अपन विषय में ब्रह्मचर्य पालन की बात कही थी। दुर्वासा इंद्रिय तृप्ति के लिए आहार लेते तो ग्रहण करने वाले कहलाते। ईश्वरीय चिंतन में लीन ऋषि -महापुरुषों को इंद्रियभोग नहीं व्यापते। जहाँ इंद्रियों को तृप्ति मिलती है, वहाँ आदमी के समुद्र में हलचल पैदा हो जाती है। आत्मारूपी समुद्र में हलचल पैदा हो जाती है। आत्मारूपी समुद्र में यदि कोई हलचल न पैदा हो, ऐसा व्यक्ति इंद्रियभोग करता हुआ दिखाई देकर भी वैसा होता नहीं है।

इस श्लोक में एक शब्द आया है’न कामकामी’ अर्थात् जो कामों के पीछे दौड़ता है, उसे शाँति प्राप्त नहीं होती - वह सतत् उद्विग्न विक्षुब्ध -तनावग्रस्त एवं रोगी ही बना रहता है। काम शब्द से यहाँ जो आशय है -वह बाह्य इंद्रिय सुख देने वाले उपभोग्य विषयों से है। यह एक प्रकार का विकार है, जो अधोपतन का कारण बनता है। कामना शब्द काम से भिन्न है, इसीलिए इस भलीभाँति समझ लेना चाहिए। स्थितप्रज्ञ के समीप विश्व के अनंत विषय आते रहते हैं- इंद्रियाँ के सभी स्रोतों से , परंतु समुद्र जिस तरह सारे पानी का अपने स्वरूप में ग्रहण कर आत्मसात् कर लेता है, उसी तरह स्थितप्रज्ञ सारे विषयभोगों को अपने स्वरूप में मिला लेता है।

उपर्युक्त कथानक इसी संदर्भ में था। अभी इस श्लोक की व्याख्या और विस्तार माँगती है। अतः स्थितप्रज्ञ पर समापन परक विवेचन व द्वितीय अध्याय के अंतिम श्लोकों की व्याख्या आगामी मार्च 2000 अंक में पढ़ें। (क्रमशः)


हमारी अतृप्ति और असंतोष का कारण

मनुष्य आवश्यकताओं का पुलिंदा है। उसके जन्म के साथ आवश्यकताओं का संबंध है। और मृत्युपर्यंत आवश्यकता तथा नहीं पूर्ति का कुटिल चक्र अविराम गति से चलता रहता है प्रतिदिन प्रातः उठकर सायंकाल तक अपनी जरूरतों की पूर्ति के विविध साधन एकत्र किए जाते हैं।

इच्छा और आवश्यकता में यथेष्ट अंतर है, यद्यपि अनेक व्यक्ति एक ही अर्थ में इनका प्रयोग करते हैं। इच्छा का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। हम नानाप्रकार की वस्तुएँ देखते हैं और लुभाकर उनकी इच्छा करने लगते हैं। ऐसी ही एक इच्छा है जिसके बिना हम रह नहीं सकते, जिसके लिए हमारे पास पर्याप्त साधन हैं और जिसे प्राप्त करने से हमारी तृप्ति हो सकती है। आवश्यकता और श्रम का भी घनिष्ठ संबंध है।आप जितनी ही अपनी आवश्यकताएँ बढ़ाएँगे। उतना ही उद्योग , परिश्रम और कष्ट आपको रहेगा। आज के इस आधुनिककाल में असंयमी फैशनपरस्त व्यक्तियों ने अपनी आवश्यकताओं में अनाप -शनाप वृद्धि कर ली है। फलतः उन्हें श्रम भी अधिक करना पड़ रहा है। उनकी सारी परेशानियाँ दुःख इसी कारण है॥

आज जो भी कुछ महँगाई दिखाई देती है, उससे बचने का एक ही उपाय है, आप अपनी आवश्यकताओं का अध्ययन करें। आराम विलास या फैशन की वस्तुओं को त्याग दें। अनावश्यक टीपटाप ,दिखावा , सौंदर्य प्रतियोगिता , मिथ्या आडंबर आदि छोड़ दें। अपना काम स्वयं करे।सोने चाँदी के गहने कुछ वर्षों के लिए न बनवाएँ। अनावश्यक पुस्तकें न खरीदकर किसी अच्छे स्थानीय पुस्तकालय के मेम्बर बन जाएँ। जो भी कष्ट -कठिनाइयाँ आज दीख रही है। उनसे क्रमशः मुक्ति मिल जाएगी। क्योंकि आपने अपनी अनावश्यक आवश्यकताएँ कम कर दी है।

भारतवर्ष की जलवायु ऐसी है कि एक कुरता -धोती या नेकर कमीज से संपूर्ण दिन मजे में कट सकता है। बढ़िया सिल्क या रेशम के वस्त्र छोड़कर साधारण खादी के कपड़े पहने जा सकते हैं। आमोद-प्रमोद विशेषतः सिनेमा जाना बिलकुल छोड़ दें। आपको महँगाई नहीं सताएगी। मनुष्य की असली जरूरतें तो इतनी कम है कि बड़ी से बड़ी महँगाई में भी बखूबी पूर्ण हो सकती हैं। जैसे-जैसे समाज में महँगाई में भी बखूबी पूर्ण हो सकती हैं। जैसे -जैसे समाज में महँगाई में भी बखूबी पूर्ण हो सकती हैं। जैसे-जैसे समाज में महँगाई बढ़े आप बढ़ी हुई कृत्रिम आवश्यकताओं को त्यागते जाइए।

खुद परिश्रम कीजिए। आलस्य त्यागकर पुरुषार्थ को खोज निकालिए।

आवश्यकताओं को मर्यादा से बढ़ा देने पर अतृप्ति और दुःख व इन्हें कम करने से सुख व संतोष प्राप्त होगा। मनुष्य कभी भी एक ही प्रकार के सुख से तृप्त नहीं होता, अतः असंतोष सदैव बना रहता है। सुख की ऐसी आकाँक्षा निंदनीय है, जिसमें किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए मनुष्य दिन-रात हाय हाय करता रहे और न पाने पर अतृप्त, असंतुष्ट और दुःखी रहे। तृष्णाएँ सदैव एक के बाद एक बढ़ती चली जाती है। एक की पूर्ति होती है तो दो नई आवश्यकताएँ आकर उपस्थित हो जाएँगी। अतः विवेकशील पुरुष को अपनी आवश्यकताओं पर कड़ा नियंत्रण रखना चाहिएं इसके लिए मनोबल बढ़ाने की-एक विशेष अभ्यास की -मनोनिग्रह की जरूरत है।

एक विचारक का कथन है कि “जो मनुष्य अधिकतम संतोष और सुख पाना चाहते हैं, उनको अपने मन और इंद्रियों को वश में रखना चाहिए। यदि हमारी तृष्णा और वासना में बढ़ोतरी होगी तो वह हमारे असंतोष का कारण बनेगी। “ वास्तविकता यही है कि अनेक प्रलोभन तेजी से हमें वश में कर लेते हैं। हम अपनी आमदनी को भूलकर उनके वशीभूत हो जाते हैं। बाद में रोते-चिल्लाते हैं। जिह्वा के आनंद, मनोरंजन आमोद-प्रमोद के मजे हमें अपने वश में रखते हैं। सिनेमा का भड़कीला विज्ञापन देखते ही हम मन को हाथ से खो बैठते हैं और न केवल कामुक चिंतन करने लगते हैं वरन् अनाप शनाप व्यय भी कर डालते हैं। इन सभी में हमें मनोनिग्रह की निताँत आवश्यकता है। यदि मन पर संयम रख जाए।वासनाओं को नियंत्रण में रखा जाए, पाकेट में अतिरिक्त पैसा न रखा जाए, तो आप इंद्रियों को वश में रख सकेंगे।

आर्थिक दृष्टि से मनोनिग्रह और संयम का मूल्य लाख रुपये से भी अधिक है। जो मनुष्य अपना स्वामी है और इंद्रियों को इच्छानुसार चलाता है। वासना से नहीं हारता, वह आर्थिक दृष्टि से सुखी रहता है, सदैव संतुष्ट बना रहता है। प्रलोभन एक तेज आँधी के समान है , जो मजबूत चरित्र को भी यदि व सतर्क न रहे, गिराने की शक्ति रखता है।जो जागरुक है, वही संसार के नाना प्रलोभनों आकर्षणों मिथ्या दंभ से मुक्त रह सकता है।


गूँगे का गुड़ बन गई , यह अनुभूति

पिछले दिनों प्रवास पर जोधपुर -राजस्थान के प्राँतीय सम्मेलन के दौरान जाना हुआ ।कुछ ऐसी अनुभूतियाँ हुई कि मन किया कि सभी को इसमें भागीदार बनाया जाए।सभी जान सकें कि किस विराट महापुरुषार्थ में कितनी बड़ी चैतन्य सत्ता के साथ हम सभी जुड़े हैं। बात बात में पारस्परिक चर्चा के दौरान डूँगरपुर-बाँसवाड़ा के परिजन बोल उठे कि भाई साहब ! आप कभी हमारे क्षेत्र में तो आइए। आदिवासियों का बाहुल्य है जिस क्षेत्र में एवं जहाँ जंगल जंगल घूमकर एक महाराणा ने राष्ट्र को समर्पित गिरिवासियों के स्नेह से मेवाड़ का शासन चलाया आपको जरूर आना चाहिए। उदयपुर से लगा सिरोही से लेकर सलुँबर-बाँसवाड़ा डूँगरपुर -भीलवाड़ा प्रतापगढ़ का क्षेत्र आदिवासी बहुल क्षेत्र है। हमने और कुरेदा परिजनों से उस क्षेत्र के बारे में विस्तार से जानकारी लेने का प्रयास किया, तो कई ऐसी चीजें पता लगीं कि रोम रोम हर्षित हो उठा। पाठकों का भी बताने का मन है।

उदयपुर के ग्रामीण क्षेत्र में आसपुर -डूँगरपुर क्षेत्र में अपने गायत्री परिवार ने पिछले दिनों बड़े विराट् स्तर पर कार्य किया है। प्रतापगढ़ के खराड़ी जी एवं रामसमंद शक्तिपीठ के परिजनों ने जन-जन तक जाकर वहाँ संदेश पहुँचाया है। आदिवासी समुदाय के मीणा समाज में माव जी महाराज की बड़ी प्रतिष्ठा है । उनकी गद्दी बेणेश्वर धाम में आज भी विद्यमान है, जिसमें स्वामी अच्युतानंद जी विराजते हैं। सफेद पहनने वाले संत समुदाय के ये सभी लाग गायत्री परिवार के कार्यों में पूरी भागीदारी करते हैं। कारण वे बताते हैं कि आज से साढ़े तीन सौ वर्ष पहले अवतरित हुए माव जी महाराज न वेणेश्वर धाम में गायत्री मंत्र के जप से ही सिद्धि पाई। उस अवधि में वे सभी कुछ वे बातें बता गए, जो आज गायत्री परिवार वाले कर रहे हैं या उनके गुरुजी द्वारा की जा चुकी हैं- कहीं जा चुकी हैं। निष्कलंक दशावतार का एक अंश भी माव जी महाराज को माना जाता है। स्थानीय आदिवासी बोली में वे जो कुछ भी काव्य में लिख गए, वह हम अर्थ सहित अगले अंकोँ में प्रकाशित करेंगे। यहाँ हम कुछ अंश ही दे रहे हैं। जिससे परिजन अपने मिशन के माहात्म्य को समझ सकें।

श्रंदाजति समारोह के बाद से ही ज्यों ज्यों आश्वमेधिक प्रयाज्ञों का क्रम चला- हमारे परिजन रजवंदन यात्राओं पर सुदूर गाँवों में पहुँचे। जब उन्होंने ढपली पर गीत प्रस्तुत किए, कलश यात्राएँ निकाली व दीपयज्ञ किए तो आदिवासी समाज की इस सिद्धपीठ के महात्माओं न विस्तार से गायत्री परिवार की गतिविधियों के बारे में पूछा। परमपूज्य गुरुदेव परमवंदनीया माता जी व विराट् गायत्री परिवार के बारे में जानकर वे हर्षोन्मत्त हो उठे व उन्होंने कहा कि हमारे महाराज जी का कथन सत्य होने जा रहा है कि पूर्ण निष्कलंक अवतार के प्रकटीकरण के साथ साथ सतयुग के आगमन की वेला आ पहुँचेगी। हमारे कार्यकर्त्ताओं ने कुछ विस्तार से जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि हमारे महाराज पत्तों पर कूँची से स्केच बनाकर हमें इस जमाने के बारे में बता गए थे कि हवा में चीलें उड़ेगी, बड़े बड़े भवन बनेंगे। आज हवाईजहाज एक देश से दूसरे देश जा रहे हैं व बड़े बड़े भवन बन रहे हैं तो उनका कथन सही हो रहा है। विश्वयुद्ध की विभीषिका का वर्णन भी व लिखकर गए हैं। फिर उन्होंने कहा है कि आसपुर के इस पवित्र नदियों के संगम पर एक कुँआरी देवी का मन्दिर बनेगा, सूर्य की साधना करने वाले -स्थान स्थान पर दीपक जलाकर आहुति देने वाले आएँगे व तब समझ लेना कि नया युग आ गया है। मसीहा आ गया है। परमपूज्य गुरुदेव का चित्र व माथे का चंद्रमा देखते ही उन्होंने कहा कि यही कुछ तो हमें हमारे गुरुदेव भी बता गए है कि ऐसे महापुरुष आएँगे। यों स्पष्ट नहीं लग रहा था किंतु अब, जब आपका आसपुर में शक्तिपीठ बना व वहाँ गायत्री स्तवन के पाठ के साथ साथ दीपयज्ञ हुआ, हमारा विश्वास सुनिश्चित हो गया कि पूर्ण निष्कलंक प्रज्ञावतार के प्रकटीकरण की वेला आ पहुँची है।

माव जी महाराज के शिष्य गण बताते हैं कि डुली बजाते, घर घर शंखनाद करते , संस्कृति का अलख जगाते धर्मप्रेमी सारे भारत का सारे विश्व का नेता बनाएँगे, ऐसा हमारे गुरुजन गद्दी की परंपरा में बताते आए है। अब आपसे सब सुनकर -देखकर विश्वास हो गया कि महाराणा प्रताप के वंशधर उनके संगी सहयोगी के रूप में जन्में हम सभी व आप सभी एक ही अवतारी चेतना के अंश हैं आपके हर कार्य में हमारा सहयोग सहकार है।

नोस्ट्राडेमस हमें फ्राँस से बैठा बताता है तो हम विश्वास करते हैं। हमारे आदिवासी समाज में बैठा एक सिद्धसंत यदि हमें बताता है तो हमें विश्वास नहीं होता भले ही वह सब स्थानीय भाषा में हो-माव जी महाराज के शिष्यगण जो विगत साढ़े तीन सौ चार सौ वर्ष पूर्व से उनकी मान्यताओं को जन-जन तक पहुँचाते रहे हैं अब पूरा विश्वास करते हैं कि यही निष्कलंक प्रज्ञावतार के पूर्व रूप में - विचारधारा के जन-जन तक पहुँचाने के रूप में प्रकट होने की वेला है। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा सेधवा के साली कलाके डेमण्याभील को पीपल के पत्ते पर अपना एवं माँ गायत्री शक्तिपीठ स्थापित होने पर गुरुसत्ता द्वारा दस मील पैदल जाकर प्राण प्रतिष्ठा करने का वृत्ताँत हम सभी को याद है। हमें स्मरण है केन्या -ताँजानिया सीमा पर मसाई कबीले के अफ्रीकी आदिवासियों से उनकी उन्हीं की भाषा में प्रेमभरी वार्ता । इतने सब स्पष्ट चिह्न देखकर भी हम गुरुसत्ता को , जिसने समाज के सबसे पिछड़े वर्ग को अपना दिग्दर्शन करा दिया, पहचान क्यों नहीं पाते, क्यों वह अहसास नहीं जगा पाते?


अपनों से अपनी बाततप−साधना व अपनत्व की संवेदना ही बीज है इस विशाल संगठन का

बारह वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण की समापन वेला आ पहुँची। एक विराट् संकल्प अपनी पूर्णता के अंतिम वर्ष में है। अब मात्र बारह माह बाकी हैं, जब हम 2001 में प्रवेश के माध्यम से एक नई सहस्राब्दी की शुरुआत कर रहे होंगे। इस महापूर्णाहुति का, जो प्रखर साधना वर्ष 1999 के दौरान ही आरंभ हो गई थी, प्रथम चरण भी 3 दिसंबर 1999 को प्रायः एक लाख स्थानों पर न्यूनतम एक करोड़ व्यक्तियों की -सभी संप्रदायों के व्यक्तियों की भागीदारी द्वारा आरंभ हो गया। अब द्वितीय चरण जो वसंत पर्व 10 फरवरी गुरुवार के दिन है, के लिए सभी परिजन प्रथम चरण के दिन है, के लिए सभी परिजन प्रथम चरण के विचारक्राँति प्रधान क्राँतिधर्मी साहित्य की घर घर स्थापना व मिशन की पत्रिकाओं के न्यूनतम पाँच गुना विस्तारपरक अनुयाज के साथ-साथ जुट गए हैं, कमर, कसकर तैयारी में लग गए हैं।

जिस गुरुसत्ता ने एक बीज बोकर विराट् वटवृक्ष खड़ा किया था, उसके विषय में नए-पुराने सभी परिजनों को बहुत कुछ जानकारी है, परंतु इस विराट् महापुरश्चरण के समापन पर हो रहे इस महाकुँभ रूपी महापूर्णाहुति से लेकर पूज्यवर गुरुदेव की जन्मशताब्दी (2011-2012) तक के बारह वर्षीय अभिनव अनुष्ठान को समझने के पूर्व उस पृष्ठभूमि को पुनः समझना जरूरी है, जिसने इस मिशन की नींव रखी।किसी भी भव्य विराट् स्तर पर संपन्न हो रहे महापुरुषार्थ की चकाचौंध में कहीं वह मूल विस्मृत न हो जाए, जिस पर इस विराट् गायत्री परिवार की नींव रखी गई है।

विराट् गायत्री परिवार का जनम हम यों तो सन् 1926 के वसंत पर्व से मानते हैं, जब अखण्ड दीपक के प्रकाश में परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी गुरुसत्ता की पहली झलक देखी व मार्गदर्शन पाया था। परंतु शरीर से परमपूज्य गुरुदेव के जन्म लेने (आश्विन कृष्ण त्रयोदशी विं संवत् 1968 सन् 1911) से पूर्व के वातावरण का एक विहंगावलोकन करना भी प्रासंगिक होगा। भारतभूमि इस सदी के आगमन की वेला में न केवल विदेशी आक्राँताओं के चंगुल में थी, समाज भी पिछड़ेपन के अभिशाप से ग्रस्त था। प्रथम विश्वयुद्ध के बादल घटाटोप बन मँडरा रहे थे एवं एक अति महत्वपूर्ण शताब्दी की शुरुआत हो चुकी थी। यों देखा जाए तो भारतवर्ष का इतिहास एक सहस्राब्दी के परिप्रेक्ष्य में अध्ययन किए जाने पर हमें सही दृष्टि देता है। इस संबंध में विस्तार से तो परिजन अगले अंक में पढ़ेंगे ही, यहाँ कुछ झलक उस पृष्ठभूमि की दी जा रही है, जिसने 1901 से 2000 तक की अवधि को जन्म देने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इस सहस्राब्दी की शुरुआत की भारतभूमि पर बाह्य आक्रमणों से हुई है। यदि इसे चार खंडों में बाँटे तो पहला युग 1001 से कबीर के आविर्भाव -क्रियाकलाप व अवसान तक का आता है। द्वितीय युग आता है समर्थ गुरु रामदास व छत्रपति शिवाजी महाराज का एवं तृतीय युग इसी क्रम से आगे बढ़ते हुए , ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस एवं स्वामी विवेकानन्द से जुड़ा हमें मिलता है। अनेकानेक संत , योद्धा , चिंतक , मनीषी इस बीच जन्मे हैं, पर सभी की भूमिका उस महासागर में विसर्जित होने की रही है, जिसका प्रतीकात्मक संकेत ऊपर किया गया। चतुर्थ व अंतिम युग परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी एवं परमवंदनीया माता भगवती देवी के युग्म के रूप में उद्भूत हुआ माना जा सकता है। जिन्होंने अपने माध्यम से नौ करोड़ की विराट् जनशक्ति वाले इस गायत्री परिवार रूपी संगठन की स्थापना की व नवयुग के आगमन का उद्घोष किया। श्री अरविंद, रमण महर्षि रवींद्रनाथ टैगोर, महात्मा गाँधी आदि सभी इस कालप्रवाह के अंग मान जा सकते हैं, जिन्होंने आज के भारतवर्ष के स्वरूप को स्थापित होने में अपने अपने स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। किसी का भी योगदान कम नहीं, एक दूसरे से इक्कीस ही है।

कबीर का युग सुधारक युग कहा जा सकता है। संत कबीर ने एक जुलाहे परिवार से समाज सुधार का संदेश दिया। धर्म के नाम पर संव्याप्त भ्रष्टाचार -पाखण्ड को मिटाने हेतु संघर्ष किया एवं अपने समय में ही ऐसी स्थापना कर गए, जिससे आज के समाज का स्वरूप उभरकर आया है। महर्षि दयानंद ने निश्चित ही जराजीर्ण हो रहे समाज का कायाकल्प किया, पाखंड खंडिनी पताका फहराई किंतु यह कहा जा सकता है कि शुभारंभ यदि कबीर से न हुआ होता - परंपराओं से टक्कर लेकर विवेक की स्थापना न हुई होती, तो संभवतः अठारहवीं सदी का महर्षि का पुरुषार्थ संभव न हुआ होता। सिकंदर लोधी से मोरचा ले मुगलों का शासन स्थापित होने के पूर्व ही कबीर ने अध्यात्म के प्रगतिशील स्वरूप की झलक विश्वमानस को दे दी थी।

कबीर के बाद का समय मुगलों के आक्रमण से लेकर अकबर के समय एक सहिष्णु , समन्वयवादी विचारधारा के फैलने तथा फिर आततायी आक्रमण होकर दक्षिण भारत में इसका प्रतिरोध मराठों द्वारा किए जाने तक का है। इसी समय समर्थ रामदास अवतरित हुए। उन्होंने अपनी प्रचंड तप−साधना व मानसपुत्र छत्रपति शिवाजी के माध्यम से न केवल दक्षिणी भारत में यवनों के आक्रमण का प्रतिरोध किया वरन् एक अखंड बृहत्तर भारत के निर्माण की नींव रखने में भी वे सफल हुए। स्थान स्थान पर हनुमान मंदिरों की स्थापना कर उन्होंने धर्म चेतना का अलख जगाया। स्वस्थ-सबल-संयमी नागरिक ही राष्ट्र के कर्णधार हो सकता है। यह तथ्य समर्थ रामदास की दृष्टि में थाव उनका सारा पुरुषार्थ इसी निमित्त नियोजित हुआ। समर्थ व छत्रपति शिवाजी के युग्म न वह कार्य किया जो तत्कालीन पराधीन परिस्थितियों में बप्पारावल व राणाप्रताप द्वारा राजस्थान में तथा प्राणनाथ महाप्रभु व छत्रसाल द्वारा मध्य भारत में संपन्न हो रहा था। इन्हीं सबके कारण इक्कीसवीं सदी के अखंड भारत की नींव बनी। अलिंदी की भूमि ने अनेक संतों को महाराष्ट्र की भूमि से राष्ट्रनिर्माण के लिए नियोजित कर दिया एवं भक्तियोग की धारा भी साथ-साथ बहने लगी। समाज सुधार के आँदोलन अनेक दिशाओं से -बंगभूमि पंजाब सिंध उत्कल देश, सौराष्ट्र व विदर्भ से उपजने लगे।जन जन जाग उठा।

महाक्राँति का -संक्राँति का तीसरा युग रामकृष्ण परमहंस के उद्भव से इस सदी के प्रारंभ का है। 1936 में कामारपुकुर (बाँकुड़ा-बंगाल) में जन्मे ठाकुर रामकृष्ण परमहंस के अवतरण से ही श्री अरविंद ने इस कलियुग में सतयुग की शुरुआत मानी है एवं 175 वर्ष का संक्राँति काल तत्पश्चात् बताया है, जिसके अंतिम दशक से मानवजाति गुजर रही है। देखा जाए तो पराधीन भारत की पूरी अठारहवीं व उन्नीसवीं सदी पहले मुगलों फिर अंग्रेजों के आक्रमण एवं आतंक की पराकाष्ठा व तदनुसार भारतवासियों में हुई प्रतिक्रिया की अवधि है। जहाँ इस राष्ट्र को इस अवधि में जमकर दुहा गया, वहाँ प्रतिक्रिया स्वरूप जनविरोध के स्वर मुखरित होने लगे एवं स्वतंत्रता के लिए भारतमाता की इस उर्वर कोख से अनेक संत , राष्ट्रभक्त, तीर योद्धा नर-नारियों जन्मने लगे। यह पूरा समय मनीषियों चिंतकों आदर्शों के लिए अपना सब कुछ होम देने वाले राष्ट्र वादियों को समर्पित माना जा सकता है। महात्मा गाँधी , कवीन्द्र रवींद्र के साथ साथ कलकत्ता में जन्में नरेंन्द्रनाथ दत्त ने मठों से क्राँति का एक नया अध्याय लिख डाला। नरंदनाथ ही ठाकुर रामकृष्ण को समर्पित हो बाद में स्वामी विवेकानंद कहलाए। उन्हें योद्धा, स्वातंत्र्य वीर व संन्यासी कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी। तभी तो दक्षिणेश्वर की मिट्टी हाथ में लिए हजारों युवक अँग्रेजों का प्रतिरोध कर फाँसी पर चढ़ते चले गए। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई से लेकर भारतीय ध्वज की प्रणेता भीकाजी कामा, सरोजिनी नायडू भगिनी निवेदिता आदि ने नारी शक्ति के जागरण का शंखनाद किया श्री अरविंद व रमण महर्षि ने सूक्ष्म वातावरण का प्रचंड झंझावातों से आँदोलित कर वह वातावरण बनाया कि गाँधी जी, सुभाषचंद्र बोस, तिलक गोखले , शहीद भगतसिंह , बिस्मिल आदि अनेकों के पुरुषार्थ एकजुट हुए एवं भारत की आजादी की पृष्ठभूमि बन गई। रामकृष्ण मिशन जो इस अवधि में जन्मा , बीसवीं सदी में अनेकों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन गया एवं सेवा साधना के क्षेत्र में अनेक आयाम स्थापित कर गया। इस युग के महानायक यदि ठाकुर रामकृष्ण परमहंस व उनके मानसपुत्र स्वामी विवेकानंद को माना जाए, तो अत्युक्ति न होगी।

संक्राँति का चौथा व नवयुग के आगमन के पूर्व का युग इस सदी का है, जिसका शुभारंभ हम अपनी गुरुसत्ता के इस धरती पर प्रादुर्भाव से मानते हैं। आश्विन कृष्ण त्रयोदशी संवत् 1968 (20 सितंबर, 1911 ईसवी) को ब्रह्ममुहूर्त में आँवलखेड़ा (जलेसर रोड, आगरा, उत्तरप्रदेश) में जन्में श्रीराम शर्मा आचार्य जी को वह कार्य करना था, जिसे आगे चलकर युगाँतकारी बनना था।बाल्यकाल से ही साधना में जिनकी रुचि रही हो, ऐसे बालक श्रीराम ने बारह वर्ष की आयु में महामना मदनमोहन मालवीय जी से दीक्षा में गायत्री मंत्र पाया। यही उनकी जीवनसाधना की धुरी बन गया। पंद्रह वर्ष की आयु में वसंत पर्व की वेला में सूर्योदय के पूर्व गायत्री उपासना कर रहे साधक श्रीराम के पिताजी की आँवलखेड़ा स्थित हवेली के कक्ष (जो एक स्मारक के रूप में आज विनिर्मित है) में दीपक के प्रकाश से एक ज्योति पुरुष प्रकट हुए व उन्होंने अपने शिष्य को सूक्ष्मशरीर से दीक्षा दी,विगत जन्मों की जानकारी कराई व भविष्य में क्या कुछ किया जाना है, इस संबंध में विस्तृत मार्गदर्शन दिया। उन्होंने तीन महत्त्वपूर्ण निर्देश दिए- 1. अखण्ड दीपक जिसमें से उनका प्रकाश शरीर प्रकटा था, निरंतर प्रज्वलित रखना, अखण्ड यज्ञ के रूप में संचालन किया जाना तथा उसके प्रकाश में ही भविष्य के सभी निर्णय लिए जाना। इसी ज्योति के ज्ञान शरीर रूप में ‘अखण्ड दीपक जिसमें से उनका प्रकाश शरीर प्रकटा था, निरंतर प्रज्वलित रखना, अखण्ड यज्ञ के रूप में उसका संचालन किया जाना तथा उसके प्रकाश में ही भविष्य के सभी निर्णय लिए जाना। इसी ज्योति के ज्ञान शरीर रूप में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका को समय आने पर प्राण चेतना के संदेशवाहक के रूप में क्राँतिकारी चिंतन प्रसारित कर राष्ट्र की स्वतंत्रता की आधारशिला के रूप में प्रकाशित किया जाना।

2. चौबीस -चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण निर्धारित तप−साधना द्वारा आरंभ कर इनकी तपऊर्जा से एक विराट् गायत्री परिवार खड़ा करना। जन्म जन्माँतरों से पुण्य संग्रह करती आ रही देवताओं की पक्षधर जागृतात्माओं को संगठित कर एक ही माला में पिरोया जाना ताकि सतयुग की आधारशिला वे रख सकें।

3. चल रहे स्वतंत्रता संग्राम में दस वर्ष तक सक्रिय भागीदारी, ताकि उसे गति मिल सके। साधनात्मक पुरुषार्थ के साथ यह भूमिका सामयिक ही है - यह बताया गया। तत्पश्चात् जनसंपर्क व साहित्य साधना द्वारा विचारक्राँति अभियान को विश्वव्यापी बनाना है -यह मार्गदर्शन गुरुसत्ता द्वारा दिया गया।

1926 का वर्ष हमारे इस विराट् मिशन गायत्री परिवार रूपी संगठन के बीजारोपण का वर्ष हैं विक्रम संवत् 1983 सन् 1926 की वसंत पंचमी 18 जनवरी , सोमवार के दिन हुआ, यह शुभारंभ ऐतिहासिक बन गया। आगामी 75 वर्षों में इसे ऐतिहासिक भूमिका निभानी थी। संयोग से यह अवधि नवयुग के आगमन के साथ 2001 में अखण्ड दीपक की हीरक जयंती व सारे वर्ष को उसी रूप में मनाने के लिए निर्धारित हो पूरी होने जा रही है। कितना विलक्षण है हम सबका सौभाग्य कि हम इस पल से -इस घड़ी से गुजर सकेंगे व अपना जीवन कृतार्थ कर सकेंगे। अनेक दृष्टियों से 1926 ईसवी का यह वर्ष ऐतिहासिक वर्ष कहा जा सकता है। सर्वप्रथम हमारी गुरुसत्ता का आध्यात्मिक जन्म इसी वर्ष से -गायत्री परिवार का जन्म इसी वर्ष से निरंतर प्रज्वलित है। दूसरे यह परमवंदनीया माता जी द्वारा शरीर से आगरा नगर में जन्म लिए जाने का वर्ष भी है। तीसरे यह कि इसी वर्ष को श्री अरविंद ने भागवत् चेतना के धरती पर अवतरण का वर्ष घोषित किया। उन्होंने जन-जन को बताया कि नवयुग को साकार धरती पर उतारने वाली दैवीचेना का लीला संदोह स्वयंसेवक संघ का विधिवत् गठन व इस नाम से भारत भर में संचालन इसी वर्ष से आरंभ हुआ।चार विलक्षण संयोग कुछ अति महत्वपूर्ण समय के ही द्योतक हैं।

जिस चमत्कारी ढंग से इस मिशन का शुभारंभ हुआ है, उसे आज के विराट् रूप को देखने वाले संभवतः समझ नहीं सकते। समस्त घटनाक्रमों को हम आज जोड़ रहे हैं पर ये सहज ही घटित होते चले गए।शुभारंभ छोटा ही होता है। अंतिम परिणति तथा विस्तार अत्यधिक विराट् व कल्पना से भी परे होता चला जाता है। गोमुख जहाँ से गंगा ग्लेशियर के पिघलने के रूप में निकलती है , अत्यधिक छोटी है। क्रमशः कई नदियों के मिलते -मिलते भागीरथी से गंगा बनकर मैदानी क्षेत्र में ऋषिकेश -हरिद्वार में उतरती है व यहाँ से बढ़कर गंगासागर पर जब समुद्र से मिलती है तो उसका विराट् रूप देखते ही बनता है। हर भव्य परिणति वाले घटनाक्रम की शुरुआत सदैव छोटी ही होती है। एक अखण्ड दीपक से उपजे प्रकाश ने देवसंस्कृति दिग्विजय में लगे करोड़ों सृजन -शिल्पियों के समुदाय का कैसे एकजुट कर एक विराट् गायत्री परिवार की परिधि में बाँध दिया, यह एक बड़ी मर्मस्पर्शी कथा−गाथा है। इसके मूल में परमपूज्य गुरुदेव का कठोर तप व परमवंदनीया माताजी की स्नेह संवेदना है। प्रखर प्रज्ञा व सजल श्रद्धा के इस युग्म ने ही उस पौधे को सींचा है जिसे 1926 से पालन-पोषण कर पूज्यवर अकेले 1943 तक ही यात्रा तक बढ़ाते रहे व फिर दोनों ने मिलकर उसे बड़ा किया। हम सभी उनके अंग-अवयव-घटक मात्र हैं, जिनको विराट् पुरुष रूपी ऋषियुग्म की सहायता हेतु अवतरित होने का सौभाग्य मिला है।

यह कथा−गाथा एक विशेष कारण से कहनी पड़ रही है। आज हम इस अंक द्वारा सन् 2000 का शुभारंभ तब कर रहे हैं जब पाश्चात्य लोगों की निगाह में तकनीकी जटिलताओं से भरी एक सहस्राब्दी आरंभ हो चुकी है। हमारी दृष्टि में अभी एक डेढ़ वर्ष की प्रसव पीड़ा से भरा कठिन समय नवयुग आगमन के पूर्व और शेष है। हम सभी उस विराट् गायत्री परिवार के स्वरूप को भली भाँति समझ सकें, जा कि इस अवधि में एक नहीं, पाँच नहीं वर्तमान परिकर से दस गुना बढ़ने जा रहा है।यह विराट् रूप हमारा हो, उसके पूर्व यदि संगठन के मूल बीज व उसको पोषण देने वाली सत्ता का स्वरूप समझा जा सके तो फिर उस विराट् का निर्वाह करने में भी किसी को कठिनाई नहीं होगी।

परमपूज्य गुरुदेव ने तप साधना की पृष्ठभूमि पर गायत्री परिवार को खड़ा किया है।’अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के 1937 से आरंभ होते समय भी उनका अनुष्ठान चल रहा था एवं जब 1942 में राजनीतिक क्षितिज पर ‘भारत छोड़ो’ आँदोलन की घूम मची थी, तब विक्रम संवत् की 2000 आरंभ होते ही उन्होंने घोषणा कर दी थी कि आज से 55 से 65 वर्ष का समय भारत के उत्कर्ष का -अभ्युदय का समय होगा।भारतभूमि तपस्वियों की भूमि रही है।यहाँ गायत्री साधना का बीज कण-कण में बसा हुआ है। बस, उस पुरातन ऋषि संस्कार को पुनर्जीवित करना भर शेष है। पूज्यवर की घोषणा को बल मिला उनके 24 लक्ष के 24 महापुरश्चरणों की समाप्ति पर हुए एक विराट् अनुष्ठान द्वारा जिसमें 24 लाख आहुतियों का यज्ञ किए जाने की घोषणा हुई। गायत्री तपोभूमि विनिर्मित हुई एवं तदुपरांत ही 1958 के सहस्रकुंडी महायज्ञ का संकल्प घर घर गूँजने लगा। परमवंदनीया माताजी जिनके स्नेह एवं ममत्व ने गायत्री परिवार की धुरी बनने का काम किया, ने कंधे से कंधा मिलाकर परमपूज्य गुरुदेव के साधना समर में भागीदारी की। ऋषि-ऋषिका का युग्म पुरातनकाल में जो भूमिका निभाता चला आ रहा था, उसी की पुनरावृत्ति अब हुई एवं उसी आंवे में तप कर एक विराट् गायत्री परिवार खड़ा होता चला गया है।

गायत्री परिवार के जन्म से लेकर अब तक जब हम प्रखर साधना वर्ष के पूर्वार्द्ध का समापन कर रहे हैं व अगला वर्ष साधना महापूर्णाहुति वर्ष के रूप में आरंभ करने जा रहे हैं - जहाँ देखें, वहाँ तप−साधना एवं संवेदना परस्पर गुँथी देखी जा सकती है। ‘स्वस्थ शरीर -स्वच्छ मन ‘ के विकास से आरंभ हुई हमारी महापूर्णाहुति की पहली मंजिल व उसके अनुयाज की अवधि से हम गुजर रहे हैं एवं सभ्य समाज के विकास हेतु 10 फरवरी 2000 वसंत पंचमी से आरम्भ हो रहे दूसरे चरण की शुरुआत करने जा रहे हैं । यह महापुरुषार्थ अब सतत् चलता रहकर 1 जून 2001 गायत्री जयंती को समाप्त न होकर नई करवटें लगा लेगा एवं 8.2.2011 से 28.1.2012 (वसंत पर्व से वसंत पर्व) तक मनाए जाने वाले महाशताब्दी वर्ष तक चलेगा। इस प्रगति यात्रा में हम सभी प्रखर प्रज्ञा-सजल श्रद्धा के अनुदानों से लाभान्वित तो हों , पर कभी भी तप−साधना ममत्व-संवेदना के मूल बीज को जो कि इस संगठन का प्राण है, भूलने न पाएँ यही परमसत्ता से -कण-कण में समाई गुरुसत्ता से प्रार्थना है।


इक्कीसवीं सदी -आगमन

(मंगल विजय ‘विजयवर्गीय)


इक्कीसवीं सदी -आगमन (kavita)

इक्कीसवीं सदी ! है शुभ आगमन तुम्हारा। ‘युग-साधना-प्रखर’ से शुभ अवतरण तुम्हारा॥

भू पर तुम्हें उतारा, युगऋषि की कल्पना ने। त्म को सतत् सँवारा, सतयुग की कामना ने।

‘उज्ज्वल-भविष्य ‘ लाया, गतिमय चरण तुम्हारा। ‘युग-साधना-प्रखर’ से शुभ अवतरण तुम्हारा॥

आया समय सुनहरा, देवत्व जागने का। आलस्य त्यागने का, असुरत्व त्यागने का॥

सद्भावना से पुलकित अन्तःकरण तुम्हारा। ‘युग-साधना-प्रखर’ से शुभ अवतरण तुम्हारा॥

सद्बुद्धि का सुचिंतन , चंदन महक रहा है।, उत्कृष्ट-आचरण को जन-मन ललक रहा है॥

आदर्श कर रहे हैं , अब अनुकरण तुम्हारा। ‘युग-साधना-प्रखर’ से शुभ अवतरण तुम्हारा॥

गत हैं कुरीतियाँ अब, निःशेष कुप्रथाएँ । पाखंड , अंधविश्वासों की छँटी घटाएँ॥

है सद्विवेक सम्मत् , हर आचरण तुम्हारा। ‘युग-साधना-प्रखर’ से शुभ अवतरण तुम्हारा॥

सहकार, स्नेह, सेवा सद्वृत्तियाँ उभरतीं। मानव में ‘देव’ भू पर है ‘स्वर्ग’को सँवरती॥

वसुधैव कुटुम्बकम् है सद्वत वरण तुम्हारा। ‘युग-साधना-प्रखर’ से शुभ अवतरण तुम्हारा॥

*समाप्त*