सच्ची साधना

आज साधु तो बहुत हैं, पर साधना नहीं है। साधन के बिना साधुता कागज के फूलों की तरह है। जिनमें बहुरंगी आकर्षण तो भरपूर है, लेकिन सुगंध का एकदम अभाव है। सब तरफ आज ऐसे ही कागज के फूल दिखाई देते हैं। इसी वजह से धर्म की प्रखरता-तेजस्विता मंद पड़ गई है। साधन के अभाव में धर्म असंभव है।

धर्म की जड़े साधना में हैं। साधना के अभाव में साधु का जीवन या तो मात्र अभिनय हो सकता है या फिर दमन हो सकता है। ये दोनों ही बातें शुभ नहीं है। तप-साधना का मिथ्या अभिनय पाखंड है। जबकि कोरा दमन और भी महाघातक है। उसमें संघर्ष की यातना तो है, पर उपलब्धि कुछ भी नहीं। जिसे दबाया जाता है, मरता नहीं, बल्कि और गहरी परतों में सरक जाता है। साधनाविहीन साधु को एक ओर वासना की पीड़ाएँ सताती है; उनकी ज्वालाओं में उसका जीवन तपता-झुलसता रहता है; तृष्णा की दुष्पूर दौड़ उसे हर पल दुःख देती रहती है; दूसरी ओर उसे दमन और आत्म उत्पीड़न की अग्निशिखाएँ जलाती है। एक ओर कुआं है तो दूसरी ओर खाई। सच्ची साधन के बिना इन दोनों में से किसी एक में गिरना ही पड़ता है।

सच्ची साधना न तो भोग में है और न दमन में। यह तो आत्मजागरण में है। इन दोनों अतियों के द्वंद्व में से उबरने और परमेश्वर में स्वयं को विसर्जित करने में है। साधना वेश-विन्यास की विविधता या कौतुक भरे प्रदर्शन का नाम नहीं है। यह नर से नारायण बनने की अंतर्यात्रा है, जो पशु-भाव का दमन करके नहीं, उसे सर्वथा छोड़कर परमात्मा-भाव में प्रतिष्ठित होने में ही संपन्न होती है।

सच्ची साधना का अर्थ किसी को पकड़ना नहीं है, वरन् सारी पकड़ को एक साथ छोड़ना है। सारी अतियों से, सभी द्वंद्वों से ऊपर उठना-उबरना है। इस सच्ची साधना से जो अपनी चेतना की लौ को द्वंद्वों की आँधियों से मुक्त कर लेते हैं, वे उस कुँजी को पा लेते हैं, जिससे सत्य का द्वार खुलता है और तभी वह साधुता प्रकट होती है, जिसकी अलौकिक सुगंध से अनेकों दूसरी सुप्त और मुरझाई आत्माएँ भी जाग्रत होकर मुस्कराने लगती है।


प्रथम मानव जन्मा था देवात्मा हिमालय में

सर्वप्रथम मानव की सृष्टि कहाँ हुई ? उसका मूल स्थान कहाँ है ? उसके आदि देश का नाम क्या है ? ये ज्वलंत प्रश्न आज इतिहासविदों से लेकर नृतत्वशास्त्रियों के बीच शोध का विषय बने हुए है। इस विषय में अनेकों मत-मताँतर हैं। कुछ विद्वान इसका समाधान विदेशी भूमि में ढूंढ़ते हैं, तो कुछ इसके लिए एशिया महाद्वीप एवं हिमालय की ओर संकेत करते हैं। इस संबंध में जो भी साक्ष्य-प्रमाण उपलब्ध हैं, उन्हें देखते हुए यही तर्कसंगत प्रतीत होता है कि मानव की उत्पत्ति हिमालय-क्षेत्र में हुई।

सर्वप्रथम मानव हिमालय में पैदा हुआ। नृतत्वविज्ञानियों एवं इतिहासवेत्ताओं ने इसके लिए अनेकों प्रमाण दिए है। उनका कहना है कि हिमालय पर फल, अन्न और शाक आदि सभी खाद्यपदार्थ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं। स्वभावतः मानव का मूल आहार यही है। प्रसिद्ध समाज विज्ञानी कालचेंटर के अनुसार, मनुष्य प्राकृतिक रूप से फल और अनाज पर निर्भर करता है। अतः हिमालय का क्षेत्र ही मानव की स्वाभाविक जन्मस्थली है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण हैं, यहाँ जीवाश्म का पाया जाना, जो विश्व में अन्य जगहों पर पाए गए दूसरे सभी जीवाश्मों की अपेक्षा कहीं ज्यादा पुराना है।

नृविज्ञानियों का मानना है कि विश्वभर में मानव की चार मुख्य जातियाँ पाई जाती है। ये जातियाँ - 1. श्वेत-काकेशस, 2. पीले-मंगोलियन, 3. काले-नाग्रो, 4. लाल, रेड इंडियन-अमेरिकन। इन चारों के अलावा एक पाँचवीं जाति हैं, जो भारतीयों की है। इस जाति में उपर्युक्त चारों जातियों का मिश्रण है। ये भारतीय संकर नहीं हैं, अपितु यह इनकी मौलिकता है। इन भारतीयों में उपर्युक्त सभी विशेषताएँ पाई जाती है। भारत की संरचना एवं बनावट ऐसी है, जहाँ नित्य छहों ऋतुएँ विद्यमान रहती है। इसी भूमि में सब रंग-रूप के आदमी निवास करते हैं। ये सारे लक्षण भारतवर्ष में स्थित हिमालय के निवासियों में पाए जाते हैं। जिससे यह सिद्ध होता है कि मानव ने हिमालय में जन्म लिया और समूचे देश में अपना विस्तार किया।

इस आदिमानव ने कालक्रम में अपने व्यक्तित्व का बहुआयामी विकास किया। इसी की संतति आर्यों के नाम से समूचे विश्व में जानी गई। संस्कृति में आर्य शब्द का अर्थ हैं, श्रेष्ठ-पवित्र विकसित मन, विशाल हृदय व आध्यात्मिक मूल्यों से संपन्न मनुष्य। वैदिक संस्कृति में यही आयै का अभिप्राय हैं आर्य जिस क्षेत्र में बसते थे, उसे उनका आवर्त अर्थात् कहा जाता था। आर्यों का आदि देश यही आर्यावर्त क्षेत्र है।

इस आर्यावर्त में सरस्वती, गंगा आदि सप्तसिंधु की समस्त सरिताएँ प्रवाहित होती थी। आर्यावर्त का आर्य जगत् में आध्यात्मिक महत्व था, जो आज भी विद्यमान है। सप्तम जलप्लावन तक आर्यावर्त के अस्तित्व में आने से पूर्व आर्य इसी सप्तसिंधु एवं ब्रह्मावर्त में रहते थे। जलप्लावन के अवसर पर प्राकृतिक आपदा आई, जिससे तराई-भाभर के समुद्र खुल गए और पाँचाल आदि देश पृथ्वी के गर्भ से ऊपर निकल आए। यह समूचा क्षेत्र आर्यावर्त कहलाता है। यहाँ प्राचीन सभ्यता के अवशेष भी प्राप्त हुए है। सुविख्यात नृतत्वविज्ञानी कनिंघम ने भी इसकी पुष्टि की है। ऋग्वेद में भी आर्यों के इस आदि देश का ऐसा ही वर्ण मिलता है। ऋग्वेद के अनुसार, आर्यों का आदि देश शीतप्रधान था। वहाँ दस महीने सरदी तथा दो महीने गरमी पड़ती थी। वैवस्वत मनु उस शीतप्रधान प्रदेश के प्रथम नरेश थे।

आर्यों का आदि देश आर्यावर्त ही था, इस संबंध में और भी कई तथ्य मिलते हैं। वैदिक वाङ्मय में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता, जो आर्य जाति के बाहर से आकर यहाँ भारत में बसने की कल्पना की पुष्टि कर सके। इसके विपरीत इस साहित्य में ऐसे अनेकों प्रमाण उपलब्ध हैं, जिनसे प्रमाणित होता है कि आर्यजनों का मूल स्थान आर्यावर्त ही है। आर्य संस्कृति के भाषा-परिवार की भाषाओं की शब्दावली में सबसे अधिक शब्द वैदिक संस्कृति और उनसे निकली भारतीय भाषाओं के मिलते हैं। यदि आर्य जाति का मूल स्थान यूरोप आदि देशों में होता तो वहाँ की भाषाओं के कुछ शब्द अवश्य आर्यों की भाषाओं में मिलते।

हालाँकि इतिहासविदों ने आर्यों के संबंध में जो खोज की है, उनके मतों की समीक्षा भी यहाँ आवश्यक है। इतिहासविदों के निष्कर्ष को इन पाँच बिंदुओं के अंतर्गत जाना जा सकता है- 1. यूरोप का उत्तरी मैदान, 2. मध्य एशिया, 3. उत्तरी ध्रुव, 4. सप्तसिंधु (पंजाब), 5. सरस्वती के काठें अर्थात् मध्य एशिया में बद्रिकाश्रम के निकट सरस्वती नदी का तटवर्ती क्षेत्र, जिसका प्राचीन नाम ब्रह्मावर्त, हिमवंत, कैलास, सुमेरु, स्वर्ग, गंधमादन, केदाखंड एवं वर्तमान गढ़वाल है।

विलियम जोंस के अनुसार, यूरोप में यूराल पर्वत से उत्तर जर्मनी होते हुए अंधमहासागर तक फैला हुआ मैदान आर्यों का आदि देश था। कुछ इतिहासकार केस्पियन सागर के पास आर्य जाति का मूल स्थान मानते हैं। लोकमान्य तिलक ने ‘अवर आर्कटिक होम इन द वेदाज’ में उल्लेख किया है कि आर्य उत्तरी ध्रुव में रहते थे। वहाँ से भयंकर हिमपात के कारण वे इस भूभाग को छोड़कर अन्यत्र चले गए। श्री नारायण पावगी ने ‘फ्राम द क्रेडल टु द कालोनीज’ में आर्यों का सप्तसिंधु से उत्तरी ध्रुव की ओर जाने का उल्लेख किया है।

महर्षि दयानंद ने सुमेरु-कैलास के निकट त्रिविष्टप (तिब्बत) को आर्यों की जन्मभूमि माना है। उनके अनुसार तिब्बत में मनुष्य की आदि सृष्टि हुई और आर्य लोग सृष्टि के आदि में कुछ काल के पश्चात तिब्बत से सीधे आकर इस प्रदेश में बसे थे। प्रोफेसर बैनफे इससे सहमत है। वे लिखते हैं कि आर्य कुछ समय तिब्बत में रहे और बाद में गढ़वाल, कुमायूँ की उपत्यिकाओं से होकर भारत में आए। हर्नले और प्रो. बेकर ने भी इस तथ्य का समर्थन किया है। एटकिन्सन ने अपने ग्रंथ ‘हिमालयन डिस्ट्रिक्ट्स’ में ऋग्वैदिक गढ़वाल का महत्व स्वीकारा है। वे इस ग्रंथ में स्पष्टतः लिखते हैं कि वेदों में जो संस्मरण आए हैं, वे पूर्णतः गढ़वाल पर लागू होते हैं।

इतिहासकार अलबरूनी ने हिमालय को आर्यों का आदि देश माना है। सुविख्यात मनीषी भगतदत्त ने अपनी कृति ‘वैदिक वाङ्मय का इतिहास’ में विश्व की भिन्न-भिन्न जातियों को आर्यों के मूल स्थान हिमालय के ही प्रवासीजनों के रूप में माना है। उनकी यह भी मान्यता है कि आर्य हिमालय से सीधे भारत में बसे। मध्य एशियावाद के समर्थक मैक्डोनाल्ड भी ‘इंडिया व्हाट इट कैन गिव अस’ के अंत में इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि आर्यावर्त ही आर्यों का प्राचीन देश है और भारत भूमि ही मानवजाति की माता और विश्व की समस्त परंपराओं की उद्गम स्थल है।

भूगर्भशास्त्री मेडलीकट ने ‘मैन्युअल ऑफ इंडियन जियोलाजी’ में स्पष्ट किया है कि कुमायूँ के उत्तर में ‘सिलूरियन फासिल्स’ पर्याप्त मात्रा में पाए गए है। ये फासिल्स भी इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं। उनके अनुसार पृथ्वी के शीतल एवं जीवन के पोषण योग्य हो जाने के पश्चात् सर्वप्रथम मध्य हिमालय के इस समशीतोष्ण शिवालिक पर्वत क्षेत्र में प्रवाहित सरस्वती खेत्र मानव-जीवन का उत्पत्ति स्थल है। स्व. जयचन्द्र विद्यालंकर अपने ग्रंथ ‘इतिहास प्रवेश’ में उद्धृत कर कहते हैं, भारतीय वाङ्मय में कहीं भी किसी स्थान पर कोई उल्लेख नहीं मिलता कि आर्य उत्तर-पश्चिम से भारत आए, बल्कि इस सत्य का स्पष्टतः उल्लेख है कि आर्यजन सरस्वती क्षेत्र से भारत के अन्य भागों की तरह उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़े।

कैलास-मानसरोवर प्रदेश और मध्य हिमालय के स्थानों का वर्णन भारतीय आर्यों की प्राचीन जनश्रुतियों में है, परंतु उत्तर भारत में बसने के बाद उन प्रदेशों की ओर फैलने का कोई प्रमाण नहीं है। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि आर्यों की एक शाखा पूर्वी मध्य एशिया से नए चरागाहों की खोज करती हुई पश्चिमी तिब्बत की ओर बढ़ी और उसके दक्षिण छोर तक पहुँचने के बाद 3000 ई. पूर्व हिमालय के नीचे उत्तरगंगा, यमुना तथा सरस्वती काँठे से आई। बाद में वे लोग अलकनंदा से गढ़वाल हिमालय ओर कश्मीर तक फैल गए।

लार्ड एलफिंस्टन ने अपनी पुस्तक ‘भारत का इतिहास’ में आर्यों की उत्पत्ति भारत से बाहर होने की बात को पूरी तरह से अस्वीकार किया है। उनके अनुसार, आर्य बाहर से भारत आए, यह विचार तथ्यहीन है। सर वाल्टर रेले ने ‘हिस्ट्री ऑफ द वर्ल्ड’ में स्पष्ट संकेत किया है कि जलप्रलय के अनंतर भारतवर्ष में ही मनुष्य, वृक्ष एवं लताओं की उत्पत्ति हुई। यह भी पूरी तरह से प्रमाणित है कि मानव से पूर्व वनस्पति की उत्पत्ति एवं विकास हुआ। मेडलीकट और बलंफडे ने ‘मेनुअल ऑफ इंडियन थियोलाँजी’ में इस बात को स्पष्ट किया है कि भारत भूमि में प्राचीनकाल से समशीतोष्ण तापक्रम के चिन्ह मिलते हैं। अतः यहाँ सर्वप्रथम जीवन के आरंभ की पुष्टि होती है। विख्यात अंग्रेज इतिहासकार कर्नल टाड ने ‘एनेल्स ऑफ राजस्थान’ में आर्यावर्त को ही आर्यों का आदि देश माना है।

तथ्य और प्रमाण यही बताते हैं कि देवात्मा हिमालय की गोद में ही मानव जन्मा और विकसित हुआ। उसने अपनी इस विकास प्रक्रिया और परंपरा से जो सभ्यता एवं संस्कृति विकसित की, वही आर्य सभ्यता एवं भारतीय संस्कृति कहलाई। इसी का प्रचार-प्रसार करके भारत चक्रवर्ती एवं विश्वगुरु बना। आज परिस्थितियाँ भिन्न है। पराई संस्कृति के मोह में हम अपने अतीत को, उसके गौरव को भूल चुके है। वर्तमान में हमें न तो उस वसीयत की याद है, जो हमारे पूर्वज वैदिक महर्षियों ने वैदिक वाङ्मय के रूप में हमारे लिए लिखी थी और न ही उस विरासत को हम समझ पाते हैं, जो उन्होंने हमारे लिए छोड़ी।

यह ध्यान रखना चाहिए कि जिन देशों और जातियों ने अपने पूर्वजों की वसीयत एवं विरासत की उपेक्षा की है, वे कभी भी आगे नहीं बढ़ सकी है। इक्कीसवीं सदी में यदि हम उज्ज्वल भविष्य को साकार करना चाहते हैं तो हमें इस सत्य को समझना होगा और इसे तथ्य के रूप में प्रमाणित करना होगा। हम भारतवासियों का कर्त्तव्य है कि देवात्मा हिमालय का गौरव केवल इतिहास के पन्नों में ही न बंद रहे, हम सबके जीवन में भी प्रकाशित हो। इसी के साथ हमारा देश जो मानव सभ्यता की आदि भूमि है, वर्तमान में भी उसकी महिमा समूचे विश्व में संव्याप्त हो यह सब तभी संभव है जब हम भारत जननी की श्रेष्ठ संतान बनें, जैसे कि हमारे पूर्वज थे।


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देवात्मा हिमालय की गोद में ही मानव जन्मा और विकसित हुआ। उसने अपनी इस विकास-प्रक्रिया और परंपरा से जो सभ्यता एवं संस्कृति विकसित की, वही आर्य सभ्यता एवं भारतीय संस्कृति कहलाई। इसी का प्रचार-प्रसार करके भारत चक्रवर्ती एवं विश्वगुरु बना।


असली संपत्ति सादगी ही (kahani)

महाराष्ट्र के पेशवा माधवराव के गुरु, मंत्री एवं न्यायाधीश जैसे उच्च पदों पर श्रीराम शास्त्री नामक एक कुलीन ब्राह्मण थे। विद्वता एवं उच्च पदों से संपन्न होकर भी शास्त्री जी का जीवन सादगी का मूर्त रूप था। एक दिन शास्त्री जी की धर्मपत्नी आवश्यक कार्यवश राजमहल में रानी के पास गई। रानी ने गुरुपत्नी को जनसाधारण से भी सादा वस्त्रों में देखा, तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। गुरुपत्नी की यह स्थिति उसे अपने और स्वयं महाराज माधवराव के सम्मान में एक कमी मालूम हुई। उसने सोचा, गुरुपत्नी को सुँदर-सुँदर बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण पहनाए और सम्मान के साथ कहारों द्वारा पालकी में बैठाकर घर भिजवाया।

कहारों ने द्वार पर जाकर किवाड़ खटखटाए। शास्त्री जी आए, किवाड़ खोले, किंतु यह कहकर बंद कर दिए, भाई यह बहुमूल्य वस्त्राभूषणों से अलंकृत देवी कोई और है, आप लोग भूल से यहां आ गए। इन्हें तो किसी भव्य महल या राजप्रासादों में ले जाओ। शास्त्री जी की धर्मपत्नी उनके स्वभाव को भली प्रकार जानती थी। वह राजमहल में लौट गई और वहाँ उन वस्त्राभूषणों को छोड़कर अपने पूर्व वस्त्र धारण किए और पैदल ही राजमहल से अपने घर तक आई। घर पर आई, तो दरवाजा खटखटाना नहीं पड़ा दरवाजा खुला था। स्वागत करते हुए रामशास्त्री बोले, “भद्रे ब्राह्मण तो अन्यों को मर्यादा पालन सिखाता है। उसकी असली संपत्ति सादगी ही है।”


शैतान से मुकाबला

शैतान अपने तीनों चेलों की कारगुजारियाँ देखकर फूला नहीं समाता था। उसके हर मंसूबे को ये तीनों बखूबी पूरा करते थे। शैतानियत में अपने गुरु से भी बढ़-चढ़कर कारनामे दिखाने वाले इन तानों का नाम राग, द्वेष एवं अहंकार था। एक दिन ये तीनों अपने गुरु के साथ कहीं जा रहे थे। आगे राग था, उसके पीछे द्वेष और उसके पीछे अहंकार और सबसे पीछे शैतान स्वयं। थोड़ी दूर चलने पर राग को कोई चमकती हुई चीज दिखाई दी। वह दौड़ा हुआ उस चीज के पास गया और उसे उठाकर अपनी जेब में रख लिया। द्वेष यह सब नजारा देख रहा था। वह भागकर आया और राग से पूछने लगा, भरे भाई ! अभी-अभी तुमने क्या उठाकर जेब में रखा है ?

धर्म ! राग ने उनके प्रश्न का समाधान किया।

उसकी यह बात सुनकर द्वेष गुस्से से आग-बबूला हो गया। अपने गुरु शैतान से जाकर बोला- देखिए यह कितनी बुरी बात है, हम लोग इतने दिनों से धर्म का नाश करने की कोशिश कर रहे है और यह है कि अपने उसी दुश्मन को बचाने की कोशिश कर रहा है।

तुम नहीं समझते। शैतान ने अपनी शैतानी मुस्कान बिखेरते हुए का। राग ने बड़ी अक्ल का काम किया है। हमने धर्म को कुचलने की हर संभव कोशिश की, पर हुआ ठीक उलटा, धर्म की ताकत बढ़ती गई। अब जबकि धर्म राग की जेब में आ गया है, तो वह किसी को रोशनी नहीं दे सकेगा। अब तो सभी राग को धर्म का मित्र मानेंगे और उसकी रखा को ही धर्म की रक्षा मानेंगे। ऐसे में नाम धर्म का होगा-काम हमारा।

द्वेष थोड़ी देर तक खड़ा सोचता रहा, फिर कहने लगा- मुझे भी एक तरकीब याद आ गई। अब मैं भी धर्म पर सीधा प्रहार नहीं करूंगा। इसकी जगह पर उन लोगों को आपस में लड़ाया करूंगा, जो धर्मात्मा होने का दावा करते हैं। सामान्यजन अपने इन धर्मगुरुओं की बातों में आकर पारस्परिक निंदा, आक्षेप, प्रत्याक्षेप एवं दंगा फैलाने -भड़काने में लग जाएँगे। इस काम में तलवारें चलेंगी, बारूदी धमाके होंगे, खून की नदियाँ बहेंगी, किंतु इन सभी बातों को धर्म समझा जाएगा और फिर तो मेरा सारा काम अनायास ही होने लगेगा।

तीसरा चेला अहंकार, जो अब तक की सारी बात-चीत खड़ा-खड़ा सुन रहा था, खुश होकर बोल पड़ा-तुम लोगों की सूझ-बूझ भरी बातों से मेरा काम भी बन गया। अब तक धर्म सभी को विनयशीलता का पाठ सिखा रहा था और मुझे चुप रहना पड़ता था, किंतु अब मेरी कारगुजारी से उसका रंग बदल जाएगा। कुछ लोग विशेष तरह के कपड़े पहन लेंगे और स्वयं को औरों से श्रेष्ठ मानेंगे। उनके अंध अनुयायी भक्त उनके गीत गाएँगे। वे अपनी अहंता के नशे में डूबे रहेंगे। इतना ही नहीं जब दो गुरुओं, परंपराओं के अनुयायी आमने-सामने आएँगे तो उन पर भी मेरा नशा छा जाएगा। प्रत्येक पंथ अपने को सर्वोच्च समझेगा और दूसरे को नगण्य। अपने का गुणगान करेगा। और दूसरे की भर्त्सना, निंदा। इस तरह देखते-देखते मैं सब पर छा जाऊँगा।

शैतान अपने इन तीनों चेलों की बात सुनकर फूला नहीं समाया। वह शैतानी हंसी हंसते हुए बोला, शाबाश मेरे शिष्यों, अब मेरी विजय निश्चित है। अब से हम अपना सारा काम धर्म के नाम पर करेंगे। काम, क्रोध, लोभ आदि सैनिक भी उसी तरह काम करते रहेंगे, हाँ उनकी वेशभूषा अवश्य धार्मिकजनों की होगी। राग साँप्रदायिकता के रूप में सामने जाएगा। द्वेष विधर्मी की निद्रा के रूप में और अहंकार तथाकथित धर्मगुरुओं की अहंता-अस्मिता के रूप में, मिथ्या आडंबर प्रचार के रूप में।

सारे चेले शैतान की ओर एकटक देखते रहे। फिर कुछ सोचकर वे सभी अपने गुरु से कहने लगे, क्या हमारी इस कार्ययोजना का नाश भी संभव है। शैतान इस प्रश्न पर थोड़ा गंभीर हुआ और बोला, हाँ, यदि धार्मिक जन सामान्य स्वयं सेवक के रूप में रहने पर अडिग हो जाएँ। यदि वे अपने सद्गुरु के चरणों में अपने सर्वस्व का समर्पण कर दें, तो फिर ऐसे सच्चे भक्तों का हम कुछ नहीं बिगाड़ सकते। तुममें से कोई भी उनके पास नहीं जाना अन्यथा तुम्हें नष्ट होना पड़ेगा। मैं स्वयं भी उनसे दूर रहूँगा, क्योंकि उनके समीप जाने पर मेरा नाश भी अवश्यंभावी है।


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आस्तिकता शुभ संस्कारों की जननी है। घर के हर सदस्य को आस्तिक बनाने के लिए परिवार का वातावरण धार्मिक बनाया जाए। इसके लिए नित्य ही प्रातः अथवा सायंकाल सामूहिक प्रार्थना व स्वाध्याय का क्रम चलाया जाए।


मानवी चेतना बनाम आज का कंप्यूटर

मस्तिष्क दैवीय कृति है और कंप्यूटर मस्तिष्क की उपज। पर अनेक क्षेत्रों में यह सामान्य मस्तिष्क से ज्यादा सक्रिय एवं कुशल है। तभी तो वर्तमान युग कंप्यूटर का युग बन गया है। हालाँकि मस्तिष्क एवं कंप्यूटर दोनों ही इलेक्ट्रॉनिक मशीन की तरह हैं, इनकी रचना में काफी कुछ साम्य हैं। लेकिन मस्तिष्क सजीव और सचेतन है, जबकि कंप्यूटर एक यंत्र मात्र है। इससे उतनी ही जानकारियों का मिल पाना संभव है, जितनी कि उसमें भरी गई हों, पर मस्तिष्क की गतिविधियों की विस्तार अनंत एवं बहुआयामी है।

महान् विज्ञानवेत्ता हिलेरी प्यूटनेम की आइडेंटिटी थ्योरी के अनुसार, मस्तिष्क एक क्रियात्मक मशीन है, जो शरीर रूपी एक बड़ी मशीन को संचालित एवं नियंत्रित करती है। वैज्ञानिक अनुसंधान के अनुसार, मस्तिष्क के समस्त क्रियाकलाप जैवविद्युत चुँबकीय क्षेत्र में संपन्न होते हैं। कंप्यूटर इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है। यह डिजिटल संरचना को ग्रहण करता है। इसकी क्रिया पूर्व निर्धारित होती है। इसे इलेक्ट्रॉनिक डाटा प्रोसेसिंग भी कहते हैं। जो चार तरह की होती है- इनपुट, आउटपुट, सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट और स्टोरेज उपकरण। सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट को कंप्यूटर का हृदय एवं मस्तिष्क कहा जा सकता है। यही उसका मुख्य भाग है। इस क्षेत्र में डाटा इनपुट के माध्यम से आता है। आउटपुट यहीं से सूचना प्राप्त कर आवश्यकतानुसार रूपांतरित होता है। इस सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट और मेमोरी होती है। यहाँ पर कई तरह के रजिस्टर भी होते हैं। जो अपने-अपने ढंग से महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।

कंप्यूटर में बुस प्रोसेसिंग यूनिट और परिधि के बीच सूचना का आदान-प्रदान करता है। यह बुस तारों का समूह है, जो विट्स को संचारित करता है। कंप्यूटर में स्टोरेज दो प्रकार का होता है-क्रियात्मक एवं सहायक। क्रियात्मक स्टोरेज सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट के अंदर होता है। यही कंप्यूटर की प्रारंभिक मेमोरी है। इससे प्रोग्राम का निर्देशन होने के बावजूद इसकी कार्यक्षमता सीमित होती है। सहायक स्टोरेज कंप्यूटर के बाहरी उपकरणों में होता है और इसकी क्षमता असीम होती है।

कंप्यूटर शब्दों या वाक्यों को नहीं समझता। यह शून्य से दस तक गिनती भी नहीं कर सकता। यह केवल ‘0’ और ‘1’ दो अंकों को पहचानता है। इन दो अंकों को वह एक साथ समझ भी नहीं सकता। यदि ‘0’ कार्य करेगा तो ‘1’ बंद रहेगा। इसी तरह ‘0’ विद्युत सुचालक होगा तो ‘1’ कुचालक। ये शून्य और एक दोनों कभी भी एक अवस्था में नहीं हो सकते। कंप्यूटर इन्हें भिन्न-भिन्न अवस्था में ही पहचान सकता है। कंप्यूटर की भाषा में बिट बाइनेरी डिजिट 0 या 1 को कहते हैं। 4 बिट्स को निबल और 8 बिट्स को बाइट कहते हैं। कंप्यूटर में कई ट्राँजिस्टर होते हैं। आजकल इनकी तकनीक अत्यंत विकसित हो चुकी है। 6 वर्ग मिलीमीटर के एक चिप में हजारों-लाखों की संख्या में ट्राँजिस्टर समा सकते हैं। जिसमें कई एनसाइक्लोपीडिया को अंकित किया जाना संभव है।

कंप्यूटर में जिस तरह इनपुट एवं आउटपुट की व्यवस्था है, उसी तरह मस्तिष्क से जुड़ी पाँचों इंद्रियों को इनपुट कह सकते हैं। मस्तिष्क स्वयं अपने आप में सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट है। न्यूरॉन्स इसके ट्राँजिस्टर हैं। इन न्यूरॉन्स की अक्रिया अवस्था में संदेश का संचार कम होता है। परंतु सक्रिय अवस्था में इनकी गति अत्यंत तीव्र होती है। कंप्यूटर में तारों एवं ट्राँजिस्टरों की संख्या निश्चित होती है, परंतु न्यूरॉन्स की संख्या की गणना करना आसान नहीं है।

मस्तिष्क में न्यूरॉन्स के अंतर्संबंधों में आवश्यकतानुसार परिवर्तन होता रहता है। न्यूरॉन्स के अंतिम शीर्ष पर पाए जाने वाले डेंड्राइट्स स्पाँइस आवश्यकतानुसार घटते-बढ़ते रहते हैं। मस्तिष्क की यह सुघटयता कंप्यूटर में नहीं हो सकती। इसे यों भी कह सकते हैं कि मस्तिष्क एक ऐसा कंप्यूटर है, जो सदैव परिवर्तन की असीम क्षमता एवं संभावना रखता है।

मस्तिष्क के र्कोर्टक्स में दस अरब न्यूरान्स होते हैं। इसके पिछले भाग को यदि जोड़ा जाए तो यह संख्या सौ अरब के आसपास होती है। सन् 1993 में बने कंप्यूटर में 101 ट्राँजिस्टर थे। भविष्य में यह संख्या बढ़ भी सकती है। सुपर कंप्यूटर में यह संख्या बहुत अधिक है। फिर भी इनमें आउटपुट और इनपुट अपेक्षाकृत कम होते हैं।, जबकि न्यूरॉन्स में यह अत्यधिक होते हैं। सेरीबेलम के परकिंजी कोशिका के न्यूरान से एक से दस हजार सिनाप्सिस बना सकता है। मस्तिष्क में इनकी समूची संख्या की गणना की जाए तो यह खरबों में जा पहुँचेगी।

मस्तिष्क में 1015 सिनाप्सिस होते हैं। यदि इसकी दो अवस्थाओं को देखा जाए तो ये सिनाप्सिस 2 X 1015 हो सकते हैं। यह संरचना एवं संख्या किसी भी सुपर कंप्यूटर से बहुत अधिक है। मस्तिष्क में न्यूरॉन्स आपस में समानाँतर संबंधित होते हैं, जबकि कंप्यूटर में ट्राँजिस्टरों का विन्यास श्रेणीबद्ध होता है। विशेषज्ञों के अनुसार समानाँतर विन्यास अधिक विकसित एवं लाभदायक होता है। कंप्यूटर में इस तरह की संरचना अभी तक नहीं बन पाई है। यदि बनी भी है तो सफल नहीं हो पा रही है। कंप्यूटर में यदि एक सर्किट खराब हो जाए तो यह कार्य करना बंद कर देता है। मस्तिष्क में ऐसा नहीं होता है। मस्तिष्क में प्रतिदिन लगभग एच लाख न्यूरॉन्स समाप्त होते हैं। फिर भी व्यक्ति वृद्धावस्था तक मानसिक रूप से कार्य करता रहता है। इसके कई भाग क्षतिग्रस्त हो जाने के बावजूद यह सक्रिय रहता है। काँर्टक्स के कई भागों में तो अन्य अनेक कार्यों को करने की इमरजेंसी व्यवस्था भी होती है।

यह ठीक है कि कंप्यूटर आज की आवश्यकता का इतना बड़ा अंग बन गया है कि इसके बगैर आज की कार्यात्मक व्यवस्था असंभव है-सी लगती है। परंतु क्या यह मानवीय बुद्धि को लाँघ सकता है ? रेत, लोहे या ताँबे से विनिर्मित सिलिकन चिप्स रूपी कंप्यूटर क्या मानवीय विचारों की सूक्ष्मता, भावनाओं की कोमलता एवं कल्पना का विकल्प बन सकता है ? यह सवाल आज सबके मन में कौंध रहा है। इसी परिप्रेक्ष्य में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के गोडार्ड इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर राबर्ट जैस्ट्रो एवं मीट के कंप्यूटर विज्ञानी मार्विन मिंस्की का कहना है कि कंप्यूटर क्राँति एक दिन मानवीय बुद्धि के पार जा सकती है, जबकि मीट (M E E T) के कंप्यूटर इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर एडवर्ड फ्रेडकिन के अनुसार क्राँति अवश्य आ सकती है, परंतु यह विचार और बुद्धि में नियंत्रण में ही आएगी।

मानव विनिर्मित कोई वस्तु भला मानवीय विचार बुद्धि से आगे कैसे बढ़ सकती है ? इस संदर्भ में भौतिक विज्ञानी हैज पैनल्स का मत बड़ा महत्वपूर्ण लगता है। उनके अनुसार कंप्यूटर की मानवीय मस्तिष्क से तुलना करना संभव नहीं है। यह तो मनुष्य के हाथों में उसी के द्वारा बनाया गया एक खिलौना है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रख्यात गणितवेत्ता रोजर पेनरोज अपनी रचना ‘द अंपाय ऑफ न्यू माइंड’ में साफ−तौर पर बताया है कि मानवीय मस्तिष्क विश्वचेतना से संबंधित है। इसकी बराबरी की कल्पना किसी पार्थिव वस्तु से नहीं की जा सकती। पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक रोचेल जेलमैन ने -कोटेड बाई हंट’ में मानव मस्तिष्क को विकास का अप्रतिम मानदंड एवं इसे ईश्वर की आश्चर्यजनक एवं अद्भुत कृति के रूप में माना है।

रोचेल जेलमैन का मत है, कंप्यूटर से इस संसार में बड़े-बड़े कार्य किए जा सकते हैं। भौतिक जीवन के लिए यह अतीव आवश्यक एवं आश्चर्यजनक ढंग से उपयोगी भी है, परंतु मानवीय मस्तिष्क में निवास करने वाली चेतना इससे अनंत गुना अनूठी है। वह मस्तिष्क में अपने अनूठे ढंग से संचालित करके पदार्थ जगत् को झाँकते हुए उच्चस्तरीय चेतना में प्रवेश कर सकते है। मानवीय जीवन में ईश्वरीय विभूतियों का अवतरण करा सकती है।


भविष्य उज्ज्वल बनाने की नीति (kahani)

एक भिक्षुक किसी सद्गृहस्थ के दरवाजे पर भिक्षा की याचना कर रहा था। पुत्रवधू ने उसे यत्किंचित् देते हुए कहा, हमारे पास कुछ कमाई नहीं है, दे कहाँ से ? भिक्षुक ने कहा, फिर आप लोग खाते क्या हैं ? वासी--बूसा जो भी पड़ा है, उसी को खा-पीकर काम चलाते हैं। भिक्षुक ने कहा, जब यह वासी-बुसा समाप्त हो जाएगा, तो क्या करोगे ? पुत्रवधू बोली, तब हम लोग आप की तरह मांगेंगे-खाएँगे। भीतर बैठा श्वसुर सब सुन रहा था। वधू पर बहुत क्रोध किया और कहा, भिक्षुक के सम्मुख हमारी बदनामी कराती है।

पुत्रवधू बड़ी शीलवान थी। उसने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया, घर में जो-जो संपदा है, वो आपके पूर्व संचित पुण्यों के फलस्वरूप है। उसी को पूरा परिवार खा रहा है। यह वासी-बुसा नहीं है तो क्या है ? नया पुण्य न करने के बाद में हमें भिक्षुक की तरह माँगना खाना पड़ेगा। श्वसुर की आंखें खुल गई। उसने दान पुण्य करके भविष्य उज्ज्वल बनाने की नीति अपनाई।


ज्ञान और विज्ञान के भाँडागार हमारे वेद

वेदों को अपौरुषेय कहा गया है। भारतीय धर्म, संस्कृति एवं सभ्यता का भव्य भवन इसी मजबूत आधारशिला पर प्रतिष्ठित है। वेद शाश्वत एवं यथार्थ ज्ञानराशि के समुच्चय हैं। इन्हें महान् तपसी ऋषियों ने अपने प्रतिभा-चक्षु से देखा है, अनुभव किया है। वैदिक ऋषियों ने अपने मन या बुद्धि से कोई कल्पना न करके शाश्वत, अपौरुषेय सत्य की अपनी चेतना के उच्चतम स्तर पर अनुभूति की और उसे मंत्रों का रूप दिया। इन्हीं मंत्रों का बहुमूल्य कोष ही वेद हैं, जिनकी महत्ता एवं महिमा गाई गई है।

वेदों को श्रुति भी कहा जाता है। जिसका शाब्दिक अर्थ है, दिव्य वाणी से सुना गया सत्य। परंतु इसका भावात्मक अर्थ हैं, स्वयं साक्षात्कार किए गए ज्ञान का भंडार। आदि पुरुष मनु के अनुसार, वेद पितृगण, देवता तथा मनुष्यों का सनातन, सर्वदा विद्यमान रहने वाला चक्षु है। पाश्चात्य मनीषी मैक्समूलर के अनुसार, विश्व के इतिहास में वेद ऐसी रिक्तता की पूर्ति करता है, जिसे किसी अन्य भाषा की कोई भी साहित्यिक कृति पूर्ण नहीं कर सकती। साने गुरुजी के विचारों में, जीवन को सुँदर बनाने वाला प्रत्येक विचार ही मानो वेद है। युगद्रष्टा वेविद् स्वामी विवेकानंद कहते हैं, वेदों का अर्थ है, भिन्न-भिन्न कालों में, भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा आविष्कृत आध्यात्मिक सत्यों का संचित कोष। महर्षि अरविंद ने वेदों को भारतीय संस्कृति का आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक बीज कहा है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि वेद मानवजाति के आदि ज्ञान ग्रंथ हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इस चतुर्वर्ग या पुरुषार्थ-चतुष्टय के आदि शिक्षक वेद ही हैं। सहस्रों वर्षों तक वेदों की शिक्षाओं ने ही मनुष्य के सर्वतोमुखी कल्याण का पथ प्रशस्त किया। ये आज भी मानवजाति के मार्गदर्शक है। इस प्रकाशपुँज का आश्रय लेकर ही प्राचीन आर्यों ने ज्ञान की ज्योति विश्वभर में फैलाई थी।

वेदों के ज्ञान का आश्रय लेकर ही अनेक धर्मों के धर्मग्रंथ बने है। वेद रूपी वटवृक्ष की ये धर्मग्रंथ विविध शाखाएँ हैं। इससे वेदों की महिमा बहुत अधिक बढ़ जाती है। इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘अतुलित महिमा वेद की’ कहकर इसकी महत्ता को प्रतिपादित किया है।

स्वयं वेदों में भी वेदों की महिमा का बखान किया गया है। ब्राह्मणों और उपनिषदों में वेदों को ईश्वरीय ज्ञान माना गया है। वृहदारण्यकोपनिषद् में उल्लेख है कि ऋग्वेद सहित चारों वेद उस महान् परमेश्वर के निःश्वास रूप हैं। शतपथ ब्राह्मण ने इसे कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया है, प्रजापति परमेश्वर ने अपने तप एवं पूर्ण ज्ञान से वेदों का निर्माण किया, जिसे त्रयी विद्या कहा जाता है। मुँडकोपनिषद् ने वेद को ईश्वरीय वाणी कहा है। ताँड्य ब्राह्मण तथा छाँदोग्योपनिषद् में छंदों के नाम से वेदों की महत्ता प्रदर्शित होती है।

षड्दर्शनों में भी वेदों की विशेषता वर्णित है। न्यायदर्शन के सूत्रों में सर्वत्र व्याप्त परमेश्वर का वचन होने और असत्य, परस्पर विरोध एवं पुनरुक्ति आदि दोषों से रहित होने की वजह से वेदों को परम प्रमाणित माना गया है। वैशेषिक दर्शन में वेदों को “तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्” कहा गया है। साँख्यकार कपिल मुनि ने वेदों को ईश्वरीय शक्ति से अभिव्यक्त होने के कारण मुनि ने वेदों को ईश्वरीय शक्ति से अभिव्यक्त होने के कारण इन्हें स्वतः प्रमाण माना है। योगदर्शन में भी इसकी महत्ता परिलक्षित होती है। वेदाँत दर्शन वेद की नित्यता का प्रतिपादन करता है।

महाभारत में वेदव्यास जी ने वेद को नित्य और ईश्वरीय बताया है। उनके अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में स्वयंभू परमेश्वर ने वेद रूप नित्य दिव्य वाणी का प्रकाश किया। श्रीमद्भागवत् गीता में वेदों की उत्पत्ति स्वयं अविनाशी परमेश्वर से बताई गई है। श्री रामानुज भाष्य की अमृत-तरंगिणी टीका में भी वेद की नित्यता का वर्णन है। मध्यकाल में शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, वल्लभाचार्य, निम्बार्काचार्य, स्कंदस्वामी, भरतस्वामी, सायणाचार्य, उब्बट, महीधर आदि सभी ने वेदों को ईश्वरीय ज्ञान के रूप में स्वीकार करते हुए उन्हें परम प्रमाण माना है।

इसी तरह वेद, ब्राह्मण, उपनिषदों के अलावा अन्य धर्मों एवं दूसरे विद्वानों ने वेदों की महिमा एवं गरिमा को स्वीकार किया है। बुद्ध की वाणी में वेदों की यह विशेषता साफ-साफ झलकती है। सुत्त निपात में महात्मा बुद्ध ने कहा है, जो विद्वान वेदों के द्वारा धर्म का ज्ञान प्राप्त करता है, उसकी अस्थिर अवस्था नहीं रहती। आचार्य कुमुदेंदु नाम जैन विद्वान ने ‘मूवलय’ नाक कन्नड़ ग्रंथ में ऋग्वेद को भगवद् वाणी कहा है। इसके अलावा पारसी विद्वान फर्दून दादा चानजी ने ‘फिलासफी ऑफ जोराष्ट्रयनिल्म एँड कंपरेटिव स्टडी ऑफ रिलीजन’ नामक सुप्रसिद्ध ग्रंथ में वेद की महत्ता का इस तरह वर्णन किया है, वेद ज्ञान की पुस्तक है, जिसमें प्रकृति, धर्म, प्रार्थना, सदाचार आदि सभी विषय सम्मिलित हैं। वेद का अर्थ है, ज्ञान और वास्तव में वेद में सारे ज्ञान-विज्ञान का तत्व भरा हुआ है।

सिख गुरुओं की वाणी में भी वेदों की विशेषता झलकती है। गुरुनानक के अनुसार ईश्वर ने वेद बनाए। उनके अनुसार वेद का महत्व कोई नहीं बता सकता। वे आगे और भी स्पष्ट करते हुए कहते हैं, वेद अमूल्य और अनंत है। चार वेद चार ज्ञान कोष के समान है। इतना ही नहीं वेद के ज्ञान से अज्ञान मिट जाता है और उसके पाठ से बुद्धि शुद्ध हो जाती है। असंख्य ग्रंथ होते हुए भी वेदों का पाठ सबसे मुख्य है। इन्हें पढ़ने से उत्तम विद्या की प्राप्ति होती है। गुरु ग्रंथ साहेब में उद्धृत कबीर वाणी स्मरण योग्य है, “वेद कतेब कहहु मत झूठे, झूठा जो न विचारे।”

वेदों की महिमा भारत में ही नहीं सुदूर देशों के विद्वानों द्वारा भी गई गई है। अखताब के पुत्र और तुर्फा के पौत्र लाबी नामक अरबवासी कवि ने अपनी रचना में वेदों की महत्ता का वर्णन इस प्रकार किया है, ईश्वरीय ज्ञान रूपी चारों वेद मानस चक्षु को दिव्य और पवित्र ज्योति से भर देते हैं। परमेश्वर ने हिंदुस्तान में ऋषियों के हृदयों में इन चार वेदों का प्रकाश किया। परमेश्वर ने ही वेदों का ज्ञान दिया है। ऐ मेरे भाइयों ! वेदों का तुम आदर करो, क्योंकि ये मुक्ति का शुभ संदेश देते हैं। ये तो ज्योति स्तंभ हैं, जो मनुष्य को अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए सजग और सतर्क करते हैं।

पाश्चात्य विद्वानों ने भी मुक्त कंठ से वेदों की प्रशंसा की है। डार्विन के समकक्ष विकासवाद के आविष्कारक डॉ. रसेल वैलस के अनुसार, वेद में पवित्र एवं श्रेष्ठ शिक्षाओं की एक सुँदर व उत्कृष्ट पद्धति पाई जाती है। इसके कवियों एवं द्रष्टाओं ने संसार में ईश्वरीविषयक विचारों को प्रचारित एवं प्रसारित किया था। इनमें अत्यधिक उन्नत एवं प्रगतिशील धार्मिक विचारों की मुख्य शिक्षाएँ समाहित है। वेदों के रचयिता एवं कवि हमारे उच्चतम धार्मिक शिक्षकों और मिल्टन, शेक्सपियर तथा टेनीसन जैसे कवियों से भी उच्च थे।

रेवरेण्ड मौरिस फिलिप नामक पादरी ने वेदों को प्रारंभिक ईश्वरीय ज्ञान बताया है। प्रो. हीरेन नामक विख्यात इतिहासविद् ने वेदों के विषय में कहा है, वेद संस्कृत के प्राचीनतम ग्रंथ है। ये मनुष्य मात्र की उन्नति के लिए अपनी अद्भुत ज्ञानसंपदा के द्वारा दिव्य प्रकाश स्तंभ का काम करते हैं। 14 जुलाई, 1884 को पेरिस में आयोजित ‘इंटरनेशनल लिटेररी ऐसोसिएशन’ के सम्मुख एक निबंध पढ़ते हुए लेओदेल्बा नामक एक फ्राँसीसी विद्वान ने घोषणा करते हुए कहा कि ऋग्वेद मानवजाति की प्रगति की आदर्शतम कल्पना है।

नोबेल पुरस्कार विजेता श्री मेटर्लिक ने अपनी कृति ‘दे ग्रेट सीक्रेट’ में वेदों के प्रति अत्यंत आदर-भाव दर्शाते हुए लिखा है, वेद के विशाल भंडार हैं, जिनको मानव सृष्टि के प्रारंभ में ऋषियों द्वारा प्रकाशित किया गया।


साधता का अपरिहार्य अंग (kahani)

वेद मानवजाति के आदि ज्ञान ग्रंथ है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इस चतुर्वर्ग या पुरुषार्थ-चतुष्टय के आदि शिक्षक वेदों की शिक्षाओं ने ही मनुष्य के सर्वतोमुखी कल्याण का पथ प्रशस्त किया। ये आज भी मानवजाति के मार्गदर्शक है। इस प्रकाशपुँज का आश्रय लेकर ही प्राचीन आर्यों ने ज्ञान की ज्योति विश्वभर में फैलाई थी।

भावावेश में कितने ही परिव्राजकों ने भिक्षुदीक्षा ली थी और उन्होंने अपरिग्रह का व्रत लिया था, पर समय गुजरते पुराने प्रलोभन फिर लौट आए। उनने चीवर संग्रह करने आरंभ कर दिए। सभी के पास परिधानों गट्ठर थे। तथागत इस शील-शैथिल्य पर बहुत दुःखी हुए। इतनी जल्दी व्रत भूल जाने पर ये लक्ष्य तक कैसे पहुँचेंगे ? उस दिन तथागत खुले में सोए। ठंड के दिन थे, सो एक चादर ओढ़ी, अर्द्धरात्रि को ठंड पड़ी, तो दूसरी चादर ओढ़ी, अंतिम प्रहर में शीत का प्रकोप अधिक हुआ, तो उसने तीसरा चीवर ओढ़कर नींद का आनंद लिया। समाचार सारे संघाराम में फैल गया। भिक्षुओं ने तीन चीवर गुजारे के लिए पर्याप्त समझे और शेष, सभी आश्रम के भंडार में जमा कर दिए। उनने अनुभव किया कि साधता का अपरिहार्य अंग अपरिग्रह है।


चेतना के उभार से होते हैं चमत्कार

पूर्वाभास की घटनाएँ जीवन की पवित्रता से अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। इस क्रम में जैसे-जैसे उसमें परिवर्तन-परिष्कार होता जाता है, वैसे-ही-वैसे अघटित को जानने-समझने की योग्यता व्यक्ति में आती चली जाती है। वह पूर्ण रूप से परिमार्जित होने पर मनुष्य ईश्वर के समतुल्य बन जाता है। यह सामान्य बात हुई है। अनेक बार साधारण जीवन जीने वालों की चेना में ऐसे उफान आते हैं कि उन्हें कई अवसरों पर कुछ व्यक्तियों अथवा स्थानों को देखकर ऐसा लगता है, मानो उनके बीच कोई अदृश्य स्तर का संबंध है। बाद में जब वह तादात्म्य स्थापित हो जाता है, तब पता चलता है कि आखिर ऐसा क्यों अनुभव होता था। इसे भी एक प्रकार का पूर्वाभास कहते हैं।

ऐसे ही एक पूर्वाभास का उल्लेख करते हुए मूर्द्धन्य मनीषी आर्थर डब्ल्यू. ओसबोर्न की पत्नी अपने भावी पति के अनुभव के बारे में कहती हैं कि एक बार उनने राबर्ट ब्राउनिंग पर एक शोधपत्र तैयार किया; किंतु अस्वस्थ होने के कारण उसके दूसरे के द्वारा पढ़े जाने की व्यवस्था कर दी। कक्ष में लगभग तीन सौ लोग बैठे थे और वह सबसे पीछे बैठी थी।

व्याख्यान समाप्त हो जाने के पश्चात् प्रश्नोत्तर का क्रम चला। अनेक लोगों ने अनेक प्रश्न पूछे। एक व्यक्ति मंच के बिल्कुल सामने बैठा था। उसने एक ऊटपटाँग प्रश्न किया और पत्र में व्यक्त विचार को चुनौती दी। यद्यपि वह व्यक्ति एकदम अजनबी था तथा उसकी सिर्फ पीछे से पीठ ही दिखाई पड़ रही था; किंतु ओसबोर्न की भावी पत्नी को ऐसा महसूस हो रहा था कि उन दोनों के बीच संबंध-सूत्र अवश्य है, जिसे वह समझ नहीं पा रही है। यों प्रश्न के कारण वह निराश थी; किंतु फिर भी उसे प्रसन्नता हो रही थी। इस प्रसन्नता का कारण वह स्वयं भी नहीं समझ पा रही थी। बाद में उसे पता चला कि वह व्यक्ति इंग्लैण्ड से उसी दिन आया था और आस्ट्रेलिया जा रहा था। कई महीने पश्चात् उनकी शादी हो गई। यद्यपि इस विवाह के लिए वह तैयार नहीं थी; किंतु इस बीच परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनीं कि दोनों को इस पवित्र बंधन में बंधना पड़ा। शादी के उपराँत अपने विवाह पर विचार करती हुई वह कहती है कि शोधपत्र पढ़े जाने के दौरान वह विचित्र अनुभूति शायद भावी वैवाहिक संबंधों का पूर्वाभास ही था।

ऐसी ही एक अन्य घटना की चर्चा जे.बी.प्रीस्टले ने अपनी पुस्तक ‘मैन एँड टाइम’ में की है। वे लिखते हैं कि श्रीमती ‘बी’ एक बड़े विभाग की शाखा प्रभारी थी। उनके हस्ताक्षर युक्त प्रतिवेदन डॉक्टर ‘ए’ को प्राप्त होते रहते थे। यह सभी पत्र व्यक्तिगत न होकर शासकीय ही होते थे। डॉ. ‘ए’ श्रीमती ‘बी’ के विषय में कुछ नहीं जानते थे। दोनों ने एक-दूसरे को देखा तक नहीं था। श्रीमती ‘बी’ की ओर से जैसे-जैसे इन प्रतिवेदनों की संख्या बढ़ती गई, वैसे-ही-वैसे डॉ. ‘ए’ की उत्तेजना भी बढ़ती गई। वे स्वयं नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर यह उत्तेजना क्यों बढ़ती चली जा रही है। यह इतना स्पष्ट था कि उनके सेक्रेटरी ने भी इस संबंध में उनसे कुछ कहा था। डॉ. ‘ए’ के जीवन में ऐसा अनोखा प्रसंग पहले पहले कभी नहीं उपस्थित हुआ। वे इससे हैरान थे।

एक वर्ष पश्चात् दोनों की भेंट हुई, साथ के तीसरे व्यक्ति ने उनमें शादी का प्रस्ताव रखा और आश्चर्य की बात कि दोनों ने इसे आसानी से स्वीकार कर लिया। उल्लेखनीय है कि साथ वाले व्यक्ति को डॉ. ‘ए’ के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। प्रीस्टले लिखते हैं कि संभव है उक्त उत्तेजना, जिसके पीछे प्रत्यक्ष कोई कारण नहीं था, उनके भावी संबंधों की जानकारी दे रही थी, जिसे समझा नहीं जा सकता। बाद में स्वीकारते हुए कहते हैं कि वे स्वयं डॉ. ‘ए’ हैं और श्रीमती ‘बी’ उनकी होने वाली पत्नी उद्गार प्रकट किए हैं, “मैंने वेदों के जो उद्धरण पढ़े हैं, वे मुझे एक उच्च और पवित्र ज्योतिपुँज के सदृश जान पड़ते हैं, जो एक उत्कृष्टतम मार्ग का वर्णन करता है। वेदों के उपदेश सरल, सुबोध और सार्वभौम हैं। इनमें ईश्वरीय विषयक युक्तियुक्त व तर्कसंगत विचार दिए गए है।”

डॉ. जेम्स कजिंस नाम आयरलैंड के कवि, कलाकार और दार्शनिक ने ‘पाथ टू पीस’ नाम अपनी कृति में वैदिक आदर्श व सिद्धाँतों का सुँदर वर्णन किया है। उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति इस तरह दी है, वेद सार्वभौम होने कारण विरोध को विनष्ट करते हैं। वेद के माध्यम से ही धरती में स्वर्ग के अवतरण की परिकल्पना साकार हो सकती है। डॉ. जेम्स एवं उनकी पत्नी वैदिक आदर्श से इतने अधिक प्रभावित थे कि उन्होंने अपने समूचे जीवन को इसी उद्देश्य के लिए लगाया।

प्रसिद्ध रूसी विचारक लियो टॉलस्टाय ने भी वेदों के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया है। टॉलस्टाय के इस वैदिक ज्ञान पर मुग्ध होते हुए एक अन्य विद्वान अलेक्जेन्डर शिप्रमान ने उल्लेख किया है कि टॉलस्टाय को वेदों की विषयवस्तु ने सर्वप्रथम आकर्षित किया। वे वेदों के उन भागों पर विशेष ध्यान देते थे कि जिनका संबंध आचारशास्त्र से है। एक अन्य मनीषी जे. भारकरों ने वेद को हिमालय की आत्मा कहकर इसकी महत्ता का प्रतिपादन किया है। उनके अनुसार, यदि भारत की कोई बाइबिल संकलित की जाती और संस्कृत भाषा के लिए ऐ ही श्रद्धालु और निष्ठावान अनुवादकों का वर्ग मिल पाता, जिनका ध्यान भाषा-सौंदर्य पर केंद्रित होता तथा मूल मंत्रों के साथ उनका वैसा ही प्रेम होता, तो वैदिक ज्ञान से वर्तमान युग समृद्ध बन पाता। डब्ल्यू. डी. ब्राउन नाम अंग्रेज विद्वान ने कहा है कि वैदिक धर्म केवल एक ईश्वर का प्रतिपादन करता है। यह एक पूर्णतया वैज्ञानिक धर्म, है, जहाँ धर्म एवं विज्ञान दोनों ही एक-दूसरे के परिपूरक हैं। इसके धार्मिक सिद्धांतों में विज्ञान एवं दर्शन का अनोखा समन्वय है।

वेदों की यह महिमा शाश्वत है और नित्य−नवीन भी। इसके भावों को ग्रहण करके कोई भी अपने जीवन में देवत्व को साकार कर सकता है। इस महिमान्वित सत्य को समझकर ही युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव ने वर्तमान युग के अनुरूप वेदों का भाष्य किया। शाँतिकुँज से प्रकाशित सरल-सुबोध भाष्य को पढ़कर कोई भी वेदों की महिमा और महत्ता को अनुभव कर सकता है। यह महिमा और गरिमा अपरंपार है। इस अनुभूति को राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में कुछ यूँ कह सकते हैं-

जिसकी महत्ता का न कोई पा सका है भेद ही। संसार में प्राचीन सबसे हैं हमारे वेद ही॥


कहने से बचा जाए (kahani)

चेतना का आकस्मिक उभार पूर्वाभास जैसे प्रसंगों को जन्म दे सकता है। तो यदि उसे सुनियोजित ढंग से जगाया , उभारा और परिमार्जित-परिष्कृत किया जा सके ना वह कितनी विस्मयकारी सिद्ध होगी, यह बोलने-बखानने की नहीं, कर गुजरने और अनुभव करने की बात है।

प्रख्यात दार्शनिक और वैज्ञानिक वरट्रेण्ड रसेल ने अपनी जीवनगाथा में लिखा है कि सत्य के जुनून ने किस प्रकार दो जिंदगियाँ तबाह कर दी।

वे लिखते हैं कि मेरी पहली पत्नी इतनी भली थी कि उसकी स्मृति कभी मस्तिष्क पर से उतरी ही नहीं। दोनों के बीच अगाध प्रेम था; पर एक दिन किसी बात पर अनबन हो गई। नाराजी में दफ्तर गया। रास्ते में विचार बने, उन्हें पत्नी को बता देने में सच्चाई समझी। वापस लौट आया। पत्नी ने कारण पूछा, तो कहा, “तुम्हें बिना छिपाए वस्तुस्थिति बताने आया हूँ कि अब तुम्हारे लिए मेरे मन में तनिक भी प्रेम नहीं रहा।”

पत्नी उस समय तो कुछ नहीं बोली; पर उसके मन में यह बात घर कर गई कि मैं कपटी हूँ। अब तक व्यर्थ ही प्रेम ही दुहाई देता रहा।

खाई दिन-दिन चौड़ी होती गई। बिना टकराव के भी उदासी बढ़ती गई। मेरे सफाई देने का कुछ असर न हुआ और परिणति तलाक के रूप में सामने आई।

अब मैं महसूस करता हूँ कि जीवन में बन पड़ी अनेक भूलों में से यह एक बहुत बड़ी भूल थी, जिसमें मन की बात तत्काल उगलने की उतावली अपनाई गई। उस सत्य को यदि छिपाए रहता तो शायद वह असत्य भाषण की तुलना में हलका पाप होता।

कभी-कभी अपवाद रूप में ऐसा भी होता है; पर यहाँ वह उक्ति याद रखी जानी चाहिए, जिसमें अप्रिय सत्य की तुलना में प्रिय सत्य को वरीयता दी गई। यह व्यावहारिक शिष्टाचार है कि जो बात जीवनसाथी के मन में चुभती हो, उसे कहने से बचा जाए।


टेलीपैथी करेगी अब रोगों का उपचार

टेलीपैथी का तात्पर्य है-संप्रेषण। इस संप्रेषण की प्रक्रिया से विचारों और भावनाओं को दूरस्थ व्यक्ति तक पहुँचाया जा सकता है। इसके द्वारा सुदूर बैठे व्यक्ति को नीरोग एवं स्वस्थ करना भी संभव है। इन दिनों टेलीपैथी द्वारा रोगों के उपचार पर काफी गहन अनुसंधान हो रहा है। उपचार की इस प्रणाली में शरीर के अलावा मन भी प्रभावित होता है। आधुनिक चिकित्साविज्ञानी भी इसके वैज्ञानिकता को मान्यता देने लगे है।

प्राचीन भारत में यह पद्धति काफी लोकप्रिय थी। ऋषि-महर्षिगण इस प्रणाली से एक स्थान पर बैठे हुए व्यापक क्षेत्र में लोकसेवा किया करते थे। अन्य दूसरे देशों में भी इसका प्रमाण मिलता है। अफ्रीका के आदिवासियों में ‘वुडू’ ना की एक प्रथा है। ‘वूडू’ के द्वारा किसी दूरस्थ व्यक्ति को मौत की नींद सुलाया जा सकता है। इसके द्वारा किसी को नीरोग किया जाना भी संभव है। अमेरिकी मनोरोग विशेषज्ञों ने ‘वुडू’ को टेलीपैथी के समान एक प्रक्रिया माना है।

विशेषज्ञों का मानना है मनुष्य में दृश्य स्थूलशरीर के अलावा विचारों के पुँज के रूप में सूक्ष्मशरीर एवं भावना प्रधान कारणशरीर का भी अस्तित्व है। विचार और भावना की पवित्रता एवं प्रखरता पर इन शरीरों की क्रियाशीलता निर्भर करती है। सामान्यता टेलीपैथी मन के द्वारा ही संचालित एवं नियंत्रित होती है। मन ही शरीर को संचालित करता है। अतः टेलीपैथी में मन की आवृत्ति को संबंधित एवं दूरस्थ व्यक्ति तक संप्रेषित किया जाता है और इसमें वाँछित सफलता भी मिलती है।

विश्व की विख्यात टेलीपैथी विशेषज्ञ बेट्टी राइन ने अपनी रचना ‘माइंड वैव्स’ में इस संदर्भ में विस्तृत विवेचना की है। वे स्वयं इस प्रक्रिया में प्रवीण हैं। उन्होंने इन प्रयोगों को निरापद एवं अद्भुत बताया है। वे अपने कमरे में बैठे हुए दूरस्थ व्यक्ति का सफलतापूर्वक उपचार करती है। उन्होंने इसी माध्यम से अलेक्स नाम के लड़के का सफलतापूर्वक उपचार किया। यह लड़का लंदन के एक अस्पताल में ब्रेन वाइरस नाम के रोग से पीड़ित था तथा वह अपने इस रोग की वजह से जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा था। अलेक्स का स्थान बेट्टी राइन के निवास से 50 कि.मी. दूर था। प्रारंभिक अवस्था में राइन ने अलेक्स को अपने पास बुलाया एवं परीक्षण किया। चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया था, क्योंकि रोग असाध्य था और शरीर का तापमान भी 105 डिग्री को पार कर गया था। राइन ने अपनी उपचार-प्रक्रिया से उसे रोग को नियं.ण में किया और उसे अपने घर वापस भेज दिया। इसके पश्चात् राइन ने अलेक्स के पिता जेरेमी से टेलीपैथी संपर्क स्थापित किया। जेरेमी इस पद्धति पर विश्वास नहीं करता था, परंतु जब उसने इसी रीति से अपने पुत्र को पूर्णतया स्वस्थ होते हुए देखा तो उसे इसके आश्चर्यजनक प्रभावों को मानना पड़ा।

इस रीति से मनुष्य के अलावा जानवरों का भी सफलतापूर्वक उपचार किया गया है। यह प्रयोग प्रायः अंधी हो चुकी एक बिल्ली पर किया गया। किसी कारणवश उसकी आँखों की रोशनी चली गई थी। यह बिल्ली प्रयोग-स्थल से लगभग 75 कि.मी. दूर थी। टेलीपैथिक हीलिंग से वह बिल्ली स्वस्थ हो गई। उसे स्वस्थ होने में एक सप्ताह का समय लगा, जबकि उस पर वर्षों की दवा कारगर नहीं हो पाई थी।

बेट्टी राइन ने अपनी पुस्तक में साइकिक सर्जरी पर भी विशद विवेचन किया है। उनके अनुसार जीवन एक शक्तिपुँज है। शरीर के माध्यम से इसमें निरंतर परिवर्तन होता रहता है। इसी के परिणामस्वरूप व्यक्ति रोगी, नीरोगी एवं ऊर्जावान बनता है। शरीर के बाहर विकसित इस अतिसूक्ष्म ऊर्जा को आभामंडल कहते हैं। इसी आभामंडल के माध्यम से बेट्टी राइन साइकिक सर्जरी के माध्यम से पित्त की थैली के पत्थरों का ऑपरेशन करने में भी सफलता पाई है। अनेक प्रख्यात चिकित्साविदों ने उनके प्रयोग की सफलता की पुष्टि की है।

अपनी वैज्ञानिकता सिद्ध कर चुके इस आध्यात्मिक प्रयोग की सामर्थ्य का रहस्य मानव-मन में है। पवित्र एवं ऊर्जावान मन से कुछ भी संभव है। समस्त आध्यात्मिक साधनाओं का केंद्रबिंदु भी मन को पवित्र एवं ऊर्ध्वगामी बनाए रखना है। ऐसे प्रखर साधनावान व्यक्ति अपने मन की अपरिमित शक्ति से भी अद्भुत एवं आश्चर्यजनक कर सकने में समर्थ हो सकते हैं। टेलीपैथी उपचार प्रक्रिया भी इन्हीं में से एक है। जैक्विटा हाँक्स, जो ब्रिटेन महोत्सव के लिए पुरातत्व परामर्शदात्री थी एवं प्रीस्टले भी उसमें सहयोगी थे।

एक अन्य प्रसंग का वर्णन करते हुए प्रीस्टले लिखते हैं कि एक व्यक्ति बस में बैठकर जब कभी एक नियत मकान के सामने से गुजरता, तो उसे बड़ी विचित्र अनुभूति होती थी। उसे यह पता न था कि उसमें कौन रहता है; पर यह आभास अवश्य होता था कि किसी भी प्रकार उस मकान एवं स्वयं के बीच संबंध अवश्य है। बाद में वह उस महिला से मिला, तो उसने अचानक की विवाह प्रस्ताव रख दिया, जिसे उसको स्वीकारना पड़ा। जल्दी ही दोनों विवाहबंधन में बंध गए। पीछे इसी ने समय-समय पर पड़ने वाले स्नायविक आघातों से उसे बचाया था। शायद भावी पति-पत्नी के इसी संबंध के रण उसे उक्त मकान के सामने से होकर गुजरने में यह विलक्षण अनुभव होता था।

प्रीस्टले ने इन घटनाओं को पूर्वाभास की एक विशेष श्रेणी में रखा है तथा उनको एफ.आई.पी. (फ्यूचर इन्फ्ल्यूएन्सिंग दि प्रेजेण्ट) नाम दिया है। उनका मानना है कि जीवन की बहुत सारी घटनाएँ भविष्य से प्रभावित होती है। एक उदाहरण द्वारा उन्होंने इसे और स्पष्ट किया है। वे लिखते हैं कि एक व्यक्ति हमेशा मिचली तथा उलटी से पीड़ित रहता था। इस दशा में वह अक्सर सिर दर्द की शिकायत करता तथा एक अंधेरे कमरे में पड़ा रहता। इसके अतिरिक्त रोग के हर दौरे के साथ उसे लाल, नीले, हरे और बैंगनी रंग का तीक्ष्ण प्रकाश दिखाई पड़ता। पीछे वह बिखरकर अदृश्य हो जाता। तत्पश्चात उसे उल्टियां होती और फिर धीरे-धीरे वह स्वस्थ हो जाता। अनेक उपचारों के उपराँत भी उसकी यह अनोखी बीमारी ठीक न हो सकी। इसके वर्षों बाद द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हुआ। तब यह व्यक्ति मलाया में था। एक दिन जापानी फौजों ने इसके काफिले पर हमला कर दिया और तोप के गोले बरसाने लगी। वह एक छोटी खंदक में कूद पड़ा।तभी एक बम विस्फोट हुआ, जिसमें से लाल, नीली, हरी तथा बैंगनी रंग की लपटें निकल पड़ी। इसके बाद वह गंभीर रूप से बीमार हो गया और इसके साथ ही मिचली और उलटी की उसकी शिकायत सदा के लिए समाप्त हो गई।

पीटर ट्रेडमैन अपनी पुस्तक ‘दी सिरियल यूनीवर्स’ में एक घटना का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि जिन दिनों वे लक्समबर्ग में थे, उन दिनों अक्सर जैबोज हारवलिक नामक एक भौतिकविद् उनके पास आया करते थे। उनसे घंटों विज्ञान, परामनोविज्ञान, दूरश्रवण, दूरबोध जैसे विषयों पर गंभीर चर्चाएँ होती। इसी क्रम में एक दिन उनने पूर्वाभास की एक विचित्र घटना सुनाई।

अनेक वर्षों तक वे अमेरिकी सेना में सलाहकार के पद पर कार्य कर चुके थे। जब वे वहाँ नियुक्त थे, तब कार्यालय के कार्य से उन्हें वाशिंगटन के निकटवर्ती क्षेत्रों का प्रायः दौरा करना पड़ता था। ऐसे ही एक दौरे के दौरान उन्हें एक बार शहर के बाहरी हिस्से में जाना पड़ा। वहाँ एक छोटा सा मैदान था। आसपास कोई मकान नहीं था। दूर-दूर पर बिखरे हुए इक्के-दुक्के भवन थे। उस मैदान के निकट पहुँचते ही उनको एक विलक्षण आकर्षण का अनुभव हुआ। काफी देर तक वे उस मैदान के एक छोर से दूसरे छोर तक आते-जाते रहे। यों प्रत्यक्ष रूप में उस भूमि से लगाव का कोई कारण नहीं था। वहाँ कोई बहुत आकर्षक पेड़-पौधों से आच्छादित भूखंड भी नहीं था। उसमें जगह-जगह जंगली झाड़-झंखाड़ उगे हुए थे, फिर भी उनका मन वहाँ से जाने को क्यों नहीं हो रहा था, यह स्वयं उनकी भी समझ से परे था। कई वर्ष पश्चात् निजी मकान बनाने हेतु उन्हें जमीन के टुकड़े की आवश्यकता पड़ी। वह शहरी कोलाहल से दूर रहना चाहते थे, इसलिए उन्हें ऐसे भूखंड की तलाश थी, जो शहर से बाहर हो। इसे संयोग कहें या अदृश्य का निर्धारण, उनके पास उसी जमीन का प्रस्ताव आया, वह उनने खरीद ली। अब उनकी समझ में आया कि क्यों उस रोज उसके प्रति ऐसा विचित्र खिंचाव महसूस हो रहा था। वास्तव में यह एक प्रकार का पूर्वाभास ही था, जो परोक्ष में उन्हें जबर्दस्त आकर्षण के रूप में खींच रहा था।

इस प्रकार के घटनाक्रम यह साबित करते हैं कि चेतना का आकस्मिक उभार जब पूर्वाभास जैसे प्रसंगों को जन्म दे सकता है, तो यदि उसे सुनियोजित ढंग से जगाया, उभारा और परिमार्जित-परिष्कृत किया जा सके, तो वह कितनी विस्मयकारी सिद्ध होगी, यह बोलने-बखानने की नहीं, कर गुजरने और अनुभव करने की बात है।


Quotation

सत्प्रवृत्तियों को स्थान मिले, इसके लिए अनिवार्य है कि ऐसा वातावरण पारिवारिक परिसर में बनाया जाए कि अधोगामी प्रवृत्तियाँ अपने पैर ही न जमा सके।


भाव संवेदनाओं का रसायन शास्त्र

भाव कर्म के मूल प्रवर्तक हैं। विषयों का बोध होने पर ही उनमें संबंध रखने वाली इच्छा उत्पन्न होती हैं। इस इच्छा की अनेकरूपता के अनुसार ही अनुभूति के भिन्न-भिन्न योग संगठित होते हैं। इन्हीं में भावों का इंद्रधनुषी स्वरूप झलकता है। भावों के इन विविध स्वरूपों पर पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने गंभीर शोध-अनुसंधान किए हैं। उनके अनुसार इनका जन्म मस्तिष्क में होता है। जिसका सीधा संबंध मन से है।

हिंदी साहित्य के सुविख्यात समालोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भाव के स्वरूप पर अपना मत प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मन के प्रत्येक आवेग को भाव नहीं कह सकते हैं। मन का वही आवेग भाव कहला सकता है, जिसमें अंतश्चेतना का स्फुरण स्पष्ट रूप में प्रतिबिंबित हो। आचार्य श्री शुक्ल ने भाव में तीन प्रधान तत्वों का होना बताया है। उनके अनुसार ये तीन तत्व बोध, अनुभूति और आवेग है। इन तीनों का मिलन-सम्मिश्रण ही भाव है। बोध के अंतर्गत विषय के स्वरूप की धारणा आती है। अनुभूति में विषय के सुखात्मक एवं दुःखात्मक पहलुओं का समावेश होता है। आवेग का तात्पर्य अंतश्चेतना की स्फुरणा और उत्तेजना से है।

आचार्य श्री शुक्ल ने अपने साहित्य भाव का बोध कुछ इस तरह कराया है-वह स्फुरण जो जीवन में प्रकृति या संस्कार के रूप में अंतर्प्रज्ञा में रहता है। जीवन की सहज प्रवृत्ति होने के कारण यह मनोविज्ञान के अध्ययन की विषयवस्तु है। यह तत्व विषयबोध के रूप में अंतर्चेतना में रहता है। साहित्य में इसका संबंध काव्य-शास्त्र और रस-सिद्धाँत से है। इसका वह स्वरूप जो मनुष्य के आचरण में अभिव्यक्त होता है और बाहर देखा जा सकता है, नीतिशास्त्र से संबंधित है।

विशेषज्ञों का मत है कि भाव मन की सूक्ष्म तरंगें है। अतः इनका वर्गीकरण बड़ा कठिन और जटिल कार्य है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, भाव दशा के अंतर्गत आने वाली भाव की विविधता को मनोविकार कहा जाता है। यहाँ विकार का अर्थ किसी विकृति से नहीं वरन् स्थिति-परिवर्तन से है। सामान्यतया भाव तीन तरह के होते हैं, प्रवृत्ति, प्रवृत्ति-निवृत्ति एवं निवृत्ति। प्रवृत्ति के अंतर्गत सुख के भाव आते हैं। श्रद्धा, भक्ति, उत्साह, करुणा, लज्जा आदि प्रवृत्ति भाव है। इसके अलावा इसके संचारी भाव गर्व, हर्ष, आशा, संतोष, चपलता, मृदुलता, धैर्य आदि हैं।

प्रवृत्ति और निवृत्ति में उभयपक्ष अर्थात् सुख और दुख का मिश्रण होता है। लोभ और प्रीति इसके श्रेष्ठ उदाहरण है। इसके संचारी भाव आवेग, स्मृति, विस्मृति, दैन्य, जड़ता, स्वप्न, चित्त की चंचलता आदि है। निवृत्ति भाव केवल दुःखपरक होता है। अमर्ष, कष्ट, विषाद, शंका, चिंता, निराशा, उग्रता, मोह, उन्माद, असंतोष ग्लानि आदि इसके संचारी भाव है। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे भाव भी होते हैं, जो इस वर्गीकरण के अंतर्गत नहीं आते हैं। इन्हें उदासीन भाव कहते हैं। वितर्क, मति, निद्रा आदि उदासीन भाव कहलाते हैं।

संचारी भाव के अंतर्गत मानसिक हलचलें और आवेग ही नहीं बल्कि शारीरिक और मानसिक अवस्थाएँ तथा अंतःकरण की वृत्तियाँ भी आ जाती है। जो भाव जाग्रत् और सक्रिय होते हैं तथा जिन्हें शारीरिक क्रियाकलापों में देखा जाता है, उन्हें उद्वेग कहते हैं। ‘इमोशन’ में भाव और उद्वेग दोनों का ही समावेश माना गया है। पाश्चात्य दार्शनिक स्पिनोजा कहते हैं, उद्वेग से मेरा अभिप्राय जीवन की ऐसी तरंगों से है, जिनसे शरीर की क्रियाशक्ति बढ़ती या घटती है, सहायता पाती या रुकती है।

स्पिनोजा ने उद्वेग के तीन मौलिक रूप माने है- सुख, दुख और द्वंद्व। इस तथ्य को और अधिक स्पष्ट करने के लिए इनके 47 विभाजन भी किए गए हैं। इच्छा, सुख, दुख, आश्चर्य, घृणा, प्रेम, द्वेष, झुकाव या रुझान, विमुखता, भक्ति, आशा, भय, विश्वास, निराशा, आनंद, मायूसी, दया, प्रशंसा, पक्षपात, तिरस्कार, ईर्ष्या, सहानुभूति, संतुष्टि, दीनता, पश्चाताप, अभिमान, अभिलाषा, कृतज्ञता, परोपकार, क्रोध, बदला, निर्दयता, कायरता, साहस, भीरुता, व्याकुलता, विनयशीलता, लालसा, चटकोरापन, मरमत्तता, लोभ और कामवासना।

भावों का क्षेत्र बड़ा विस्तृत एवं व्यापक है। हाँफस्ट्रा विश्वविद्यालय के मनोविद राबर्ट प्लूटीक ने इन्हें मुख्यतः आठ प्रकार का माना है। ये हैं, दुख, उदासी, क्रोध, अपेक्षा, हर्ष, ग्रहणशीलता, भय और विश्वास। शेष भाव इन्हीं के मिश्रण से बनते हैं। प्लूटीक के अनुसार, भय और विस्मय के मिलने पर चौकन्ना होने या सजग होने का भाव पैदा होता है। पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, इमोशन का उद्गम स्थल मस्तिष्क है। आज से तीन दशक पूर्व मस्तिष्क के एक भाग न्यूरोसेंट्रिक को इमोशन का उद्गम केंद्र माना जाता था, जबकि आधुनिक अन्वेषणकर्ताओं ने इमोशन का वास्तविक केंद्र लिंबिक मस्तिष्क को माना है। इस केंद्र के मुख्य भाग हैं, अमाइगल हिप्पोकैंपस तथा लिंबिक कॉर्टेक्स। सन् 1920 ई. में वाइडर पेनफील्ड ने लिंबिक कॉर्टेक्स के ऊपरी भाग पर स्थित अमाइगल से इमोशन की तरंगों की झलक देखी थी। यहाँ विद्युत तरंग प्रवाहित करने पर उदासी, क्रोध, हर्ष, स्मृति जैसे विविध भाव जन्मे।

इस अनुसंधान को वर्तमान स्वरूप पाल मैथलीन ने दिया। उन्होंने इसे लिंबिक सिस्टम से जोड़कर देखा। वैज्ञानिक क्षेत्र में इसे अत्यंत आधुनिक शोध के रूप में जाना गया। अब तो लिंबिक सिस्टम को ही इसका केंद्र माना जा रहा है। इसके पूर्व वैज्ञानिकों के लिए इमोशन बड़ा पेचीदा सवाल था। पहले कुछ वैज्ञानिकों ने शरीर के कुछ विशिष्ट स्थानों को भावोद्वेग का केंद्र माना था। इस परिकल्पना के पीछे हृदय की धड़कन, मांसपेशियों का खिंचाव, शरीर में झुरझुरी पैदा होने जैसी प्रतिक्रियाएँ निहित थी। फिर भी इतना तो कहा जा सकता है कि भाव शरीर में मांसपेशियों आदि में कार्बनिक परिवर्तन का मुख्य कारण है। शरीर क्रिया विज्ञानी वाल्टर केनन ने ‘विण्डम ऑफ द बॉडी’ में उपर्युक्त तथ्य को इस तरह से प्रतिपादित किया है कि हाइपोथैलेमस से उत्पन्न भव ही शरीर में प्रतिबिंबित होते हैं।

वाल्टर केनन के अनुसार, हाइपोथैलेमस ही भावों का केंद्र है। हाइपोथैलेमस और शरीर के बीच तंत्रिकीय संबंध होता है। डॉ. जेम्स का विसरल इमोशनल सिद्धाँत भी लगभग इस तथ्य को पुष्ट करता है। सुविख्यात चिकित्साविज्ञानी डॉ. एल्मर ग्रीन का मत है कि प्रत्येक शारीरिक और मानसिक परिवर्तन चेतन या अचेतन रूप से एक-दूसरे को अवश्य ही प्रभावित करते हैं। मस्तिष्क के केंद्र में उठा भाव शरीर में अवश्य ही संचरित होता है और शरीर को प्राप्त सुख या दुख मन को भी अवश्य ही प्रभावित करता है।

आज से तीन दशक पहले भावनात्मक अनुसंधान के क्षेत्र में एक और कड़ी जुड़ी न्यूरोट्राँसमीटर्स का आविष्कार हुआ। इसके बाद से ही भावनाओं को न्यूरोट्राँसमीटर से जोड़कर देखा जाने लगा। विज्ञानवेत्ता आरपीड कार्लसन और स्वीडीफ के समन्वित प्रयास से नारएपीनेफ्रीन की खोज हुई। मस्तिष्क के पिछले हिस्से में एक छोटी-सी दानेनुमा रचना होती है। इसे लोकस कोरेलियस कहते हैं। इसी से नाँरइपीनेफ्रन स्रवित होता है। मनोविज्ञानी लैरी स्टीन एवं वीथ लैब ने इस भाग को आनंद एवं हर्ष का केंद्र माना है। उनके अनुसार यहीं से आनंद की हिलोरें उठती हैं। विज्ञानवेत्ता माइकेल हर्फमैन का मत इससे थोड़ा भिन्न है। उनका कहना है कि न्यूरान में पेप्टाइड का संचार मा. दो प्रतिशत होता है, जबकि पेप्टाइड समूचे शरीर में पाए जाते हैं। वैज्ञानिकों का मत है कि भावों की उत्पत्ति एवं संचार के लिए ये न्यूरोपेप्टाइड काफी हद तक जिम्मेदार होते हैं। शरीर में भावों का संचार न्यूरोमीटर, पेप्टाइड, हार्मोन तथा प्रोटीन कारकों के मध्य से होता है। डॉ. स्मिथ के अनुसार, ये कण शरीक के भावोद्वेग वाले क्षेत्र में भावों को पहुँचाते हैं, उन्होंने इस तंत्र को पैरासिनाप्सिस तंत्र कहा है।

यह प्रामाणिक सत्य है कि मस्तिष्क शरीर का नियमन एवं संचालन करता है। मस्तिष्क इस कार्य को कुछ विशिष्ट रसायनों द्वारा संपादित करता है। इन्हें वैज्ञानिक भाषा में पेप्टाइड कहा जाता है। ये पेप्टाइड मस्तिष्क एवं शरीर के बीच भावों का आदान-प्रदान करते हैं। इस क्षेत्र में अनुसंधानरत एक महिला वैज्ञानिक रीटा वैलंटीनो ने अद्भुत कार्य किया है। पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय में कार्यरत रीटा ने पेप्टाइड को मालिक्यूल ऑफ इमोशन की संज्ञा दी है। उनके इस शोध के कारण विज्ञान जगत् में उन्हें व्यापक सराहना भी मिली।

वैज्ञानिकों के अनुसार शरीर के जिस भाग पर भावों का आवेग अनुभव किया जाता है, उस भाग को ‘सोपेटो सेंसरी’ कहते हैं। आज के मूर्द्धन्य वैज्ञानिकों ने प्राचीन वैदिक महर्षियों की पंच ज्ञानेंद्रिय कल्पना को सही ठहराया है। ये पाँच ज्ञानेंद्रियाँ चक्षु, स्पर्श, श्रवण, स्वाद एवं गंध को अनुभव करने वाले केंद्र हैं। वैज्ञानिकों के अनसार इन केंद्रों में न्यूरोपेप्टाइड काफी अधिक मात्रा में होते हैं। उन्होंने इन्हें नोडल प्वाइंट भी कहा है। एक्जान एवं डेंड्राइट्स तंत्रिकाएँ इन केंद्रों से भावों के संचार करते हैं। ये अतिसंवेदनशील क्षेत्र होते हैं। इन पाँचों इंद्रियों से भावों के अलग-अलग स्वरूपों को अनुभव किया जाता है।

भावों का शारीरिक संवेदना से गहरा संबंध है। यह क्रिया−व्यापार अचेतन में चलता रहता है। किसी विशेष परिस्थिति में इनके प्रति सचेतन भी हुआ जा सकता है। भावों के इन ‘नोडल पइंट’ के प्रभाव को बढ़ाया भी जा सकता है। वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में यही पाया है कि न्यूरोपप्टाइड भाव एवं व्यवहार के मुख्य कारक है। स्मृति त्वचा के अंदर एक परत में सुरक्षित रहती है। इसे गैंगलिया कहते हैं। शरीर में भावों का संचार इन्हीं के द्वारा संभव होता है। गैंगलिया की ग्रहणशीलता को बढ़ाकर स्मृति एवं अंतरसंवेदना को काफी कुछ बढ़ाया जा सकता है।

‘मालिम्यूल्स ऑफ इमोशन’ पुस्तक की लेखिका कैंडेन बी. पर्ट का कहना है कि शाँत एवं प्रसन्न अवस्था में भाव संवेदना का स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है। पर्ट कहती है कि शाँत मनःस्थिति में न्यूरोपेप्टाइड का संचार व्यवस्थित एवं नियंत्रित होता है। अतः ऐसी अवस्था में भाव एवं उद्वेग के संचारी भाव सहजता से अनुभव किए जा सकते हैं। मस्तिष्क का हिप्पोकैंपस न्यूरोपप्टाइड का नोडल प्वाइंट है। यह मन से प्रभावित होता है और इसका सीधा प्रभाव चेहरे पर पड़ता है। भाव एवं संवेदना की सूक्ष्म तरंगों की चेहरा अच्छी तरह से प्रदर्शित करता है।

कैंडने पर्ट स्पष्ट रूप से मानती हैं कि योग-साधना द्वारा न्यूरोपेप्टाइड को काफी मात्रा में बढ़ाया जा सकता है। वैज्ञानिकों की मान्यता है कि किसी विशेष परिस्थिति में न्यूरोपेप्टाइड बढ़ जाते हैं। अतः योग के माध्यम से न्यूरोपेप्टाइड को बढ़ा संभव है। इससे व्यक्ति की भाव-संवेदना का प्रभावित होना तय है। मन को शाँत एवं प्रसन्न रखकर जीवनयापन करते हुए भाव-संवेदना का जागरण संभव है। स्वयं को प्रसन्न रखते हुए दूसरों को प्रसन्न रखने की कामना ही इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।


संकल्प-पुरुषार्थ की परिणति (kahani)

भरत ने राम-वनवास के समय उन्हीं की तरह साधुवेश बनाकर व्रतपूर्वक चौदह वर्ष काटे। इसका रहस्य बताते हुए सूत जी ने शौनक जी से कहा, “हे शौनक, चारों बालक जब छोटे थे तब मिल-जुलकर गेंद खेलते और दूसरी प्रतिद्वंद्विताओं द्वारा विनोद करते थे। राम बड़े थे और बलिष्ठ भी, तो भी उनका यह प्रयत्न रहता था कि भाइयों को जिताने हेतु स्वयं हारने का उपक्रम करें। उससे छोटों का साहस-उत्साह बढ़ता और उन्हें श्रेय मिलता था। भाइयों ने उनकी इस उदारता को ताड़ लिया और सच्चे भ्रातृ-भक्त बन गए। बड़े होने पर वही बीजाँकुर लक्ष्मण और भरत के आदर्श भाई के रूप में विकसित करने के निमित्त कारण बने और लक्ष्मण ने स्वेच्छापूर्वक वनवास लेकर उनका साथ दिया।”

गणेश एवं कार्तिकेय जैसे अजेब देवपुरुषों-अवतार शक्तियों को जन्म देने वाली माता पार्वती अपनी निष्ठा के बल पर, संकल्पशक्ति के कारण ही शिवजी को पा सकी। यह उनके धैर्य एवं तपश्चर्या की शक्ति है, जो असंभव को भी संभव कर दिखा सकी।

पार्वती जी ने शिव-विवाह के लिए कठोर तप किया। शिवजी का मन तो पसीजा, पर अपने उपयुक्त साथी होने, ने होने की बात जाँचने के लिए सप्त ऋषियों को परीक्षक के रूप में भेजा।

परीक्षकों ने शिव की बहुत निंदा की और हजार वर्ष में समाधि खुलने की बात भी कही। इसके अतिरिक्त अन्य देवताओं के सौंदर्य तथा विपुल साधनों का वर्णन करते हुए कहा, “तुम उनमें से किसी को भी पसंद करो, तो हम सरलतापूर्वक विवाह करा देंगे।”

पार्वती जी ने अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने की बात कहते हुए यह कहा-

कोटि जनम लगि लगन हमारी। वरहुँ शंभु न तु रहहुँ कुमारी॥

ऐसी दृढ़प्रतिज्ञ और लंबे समय तक प्रतीक्षा करने के धैर्य को सुनकर शिवजी ने स्वीकृति दे दी और उनका विवाह पार्वती के साथ हो गया। इस संकल्प-पुरुषार्थ की परिणति स्वरूप ही शिव-पंचायतन के रूप में एक परिवार उभरकर आया।


अतींद्रिय सामर्थ्य से कोई वंचित नहीं

ऐसा अनुमान है कि कम-से-कम अस्सी प्रतिशत लोग भीतर अतींद्रिय क्षमता लिए होते हैं। उनमें आधे से ज्यादा ऐसे होंगे जा इन क्षमताओं का जाने-अनजाने में उपयोग कर लेते हैं। पूर्ण योग के प्रखर साधक और श्री अरविंद के निकट सहयोगी रहे नीरोदबरन ने तो यहाँ तक कहा है कि अतींद्रिय क्षमताओं से संपन्न लोगों का हिसाब लगाते समय बीस प्रतिशत भी नहीं छोड़ना चाहिए। यह एक तथ्य है कि शत-प्रतिशत लोग इस तरह की सिद्धियों और संभावनाओं से संपन्न हैं। यह बात अलग है कि किसी में ये निरंतर दीप्त होती रहती हैं और कई लोगों में बिजली की तरह कौंधती, जलते-बुझते प्रकाश की तरह विकीर्ण होतीं या जुगनू की तरह चमकती और फिर लुप्त हो जाती है।

अपने निजी जीवन में ही कुछ अवसरों को याद किया जा सकता है। पिछली स्मृतियों को उलटे-पुलटे तो प्रत्येक को ऐसी एक नहीं कितनी ही घटनाएँ याद आ जाएँगी, जिनमें उन्हें होने वाली घटनाओं का पहले ही आभास हो गया। इस तरह की अनुभूतियाँ स्वप्नों के रूप में ज्यादा होती है। रात सोते हुए स्वप्न दिखाई दिया कि बरसों या महीनों पहले बिछड़ा कोई मित्र अचानक कहीं दिखाई दिया। दिन में वह अचानक ही सामने आ गया। यह भी हो सकता है कि बहुत दिनों से आ-जा नहीं रहा कोई संबंधी आ जाए।

दुर्घटनाओं का पहले से ही अंदाज लग जाने और उस रास्ते पर नहीं निकलने की प्रेरणा अनायास उठती हुई कितने ही लोगों ने अनुभव की होगी। उस प्रेरणा का पालन किया तो बाद में पाया कि उस रास्ते पर सचमुच दुर्घटना हुई और किसी-न-किसी रूप में विनाश हुआ। किसी व्यक्ति से व्यवहार करते अथवा व्यावसायिक संबंध निश्चित करते हुए बहुतों को अचानक लगा होगा कि यह व्यक्ति धोखा दे सकता है। इस आभास का कोई तार्किक कारण नहीं ढूंढ़ा जा सकता, न ही वह समझ आता है, लेकिन बाद के अनुभव बताते हैं कि जो आभास हुआ था वह चेतावनी के तौर पर था। उसकी उपेक्षा कर कोई निर्णय लिया गया होता तो सचमुच ही हानि हो जाती या हानि हो चुकी है।

संपर्क में आने वाले किसी व्यक्ति के बारे में पहली ही नजर में लगता है कि यह व्यक्ति लाभ पहुँचा सकता है। बहुत बार ऐसे लोग औसत श्रेणी के या दुष्ट स्वभाव वाले भी हो सकते हैं। उनका अतीत और दूसरे लोगों से संबंधों को देखें तो उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता, लेकिन अपना अंतस् कहता है कि विश्वास किया जाना चाहिए। वह आँतरिक अनुभूति या प्रेरणा अक्सर सही निकलती है।

सामान्य जानकारी, व्यवहार, अनुभवों अथवा बुद्धि से विश्लेषण किए जाने पर जो निष्कर्ष आते हैं, उनसे सर्वथा अलग किस्म के अनुभव अतींद्रिय क्षमताओं की झलक है। उन अनुभूतियों या निष्कर्षों का श्रेय अपनी किसी भी लौकिक योग्यता को नहीं दिया जा सकता। श्रद्धा भरे अंतःकरण उन अनुभूतियों और आश्वासनों को ईश्वर का अनुग्रह मान लेते हैं। बुद्धिवादी मन उन्हें संयोग कह लेते हैं। संसार को अपनी समझ और पहुँच से परे मानने वाले विनम्र विद्वान उन्हें उपलब्ध ज्ञान और सीमाओं का अतिक्रमण समझते हैं। अस्तित्व में इस तरह के नियम भी काम करते हैं, जिन तक विज्ञान अभी नहीं पहुँच पाया है।

तंत्र चेतना के स्तर पर उन्हीं नियमों की खोज का विज्ञान है। तंत्र का सामान्य अर्थ है, विधि या उपाय। रामचंद्र योगी के शब्दों में, विधि या उपाय कोई सिद्धाँत नहीं है। सिद्धाँतों को लेकर मतभेद हो सकते हैं। विग्रह और विवाद भी हो सकते हैं। विग्रह और विवाद भी हो सकते हैं, लेकिन विधि के संबंध में कोई मतभेद नहीं है। डूबने से बचना है तो तैरकर ही आना पड़ेगा, बिजली चाहिए तो पानी-कोयले का या अणु का रूपांतरण करना ही पड़ेगा, दौड़ने के लिए पाँव आगे बढ़ाने ही होंगे। पर्वत पर चढ़ना है तो ऊँचाई की तरफ कदम बढ़ाए बिना कोई चारा नहीं है। यह क्रियाएँ विधि कहलाती हैं।

कर्मकाँड और पूजा-प्रार्थना की विधियाँ सब धर्मों में अलग हैं, लेकिन तंत्र के संबंध में सभी एकमत है। सभी धर्म मानते हैं कि मनुष्य के भीतर अनंत ऊर्जा छुपी हुई है। उसका पांच−सात प्रतिशत हिस्सा ही काम आता है। भोजन, शयन, व्यवसाय, कामकाज, व्यवहार, अध्ययन-मनन और दिनचर्या की समस्त गतिविधियाँ उसी ऊर्जा के बूते पर संपन्न होती है। जो लोग औरों से ज्यादा सफल होते हैं , जीन के किन्हीं क्षेत्रों में ऊँचे शिखरों पर चढ़ते हैं, वे अपनी ऊर्जा का दस-बारह प्रतिशत भाग उपयोग कर पाते हैं। शेष नब्बे प्रतिशत भाग बिना उपयोग के ही पड़ा रहता है। सभी धर्म-संप्रदाय इस तथ्य को स्वीकार करते हैं। अपने हिसाब से उस भाग को जगाने का मार्ग भी बताते हैं। उन धर्म-संप्रदायों के अनुयायी अपनी छिपी हुई शक्तियों को जगाने के लिए प्रायः एक समान विधियाँ ही काम में लाते हैं। उनमें जप, ध्यान, एकाग्रता का अभ्यास और शरीरगत ऊर्जा का सघन उपयोग शामिल है।

तंत्र मनुष्य की पहली आध्यात्मिक खोज है। स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने लिखा है, “यह किसी व्यवस्था-आयोजन या विधि-व्यवस्था के अनुसार आरंभ नहीं हुई, बल्कि मनुष्य की स्वाभाविक आवश्यकता के रूप में जन्मी। उदाहरण के लिए, भूख मनुष्य की निजी आवश्यकता है। उसे तृप्त करने के लिए वह कोई-कोई उपलब्ध साधन अपनाता है। किसी वृक्ष के नीचे उसे भूख लगी तो उसने फल तोड़कर खाया। जंगल में भूख लगी तो जानवर का शिकार किया और क्षुधापूर्ति की। इसी भाँति तंत्र का विकास व्यक्तिगत माँग और आवश्यकता के अनुसार हुआ।”

तंत्र विकास-यात्रा के बारे में उन्होंने लिखा है, मनुष्य का विकास हुआ तो उसने विचित्र अनुभवों से आश्चर्यचकित होकर आगे सोचना शुरू किया। उदाहरण के लिए, स्वप्न में अगर कोई दृश्य दिखाई दिया और व्यवहार में वह सही उतरा तो उसे आश्चर्य के साथ उसने जानने की कोशिश की कि यह कैसे हुआ और जान लिया। उदाहरण के लिए, अगर स्वप्न में किसी आगामी घटना का संकेत पाया और बाद में वह चरितार्थ हो गई तो उसे आश्चर्य हुआ कि वह कैसे आगामी घटना को जान सका। उस समय के विचारशील लोगों ने अपनी अतींद्रिय क्षमा के संबंध में विचार शुरू कर दिया। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि उच्च और उच्चतर चेतना का निश्चित ही अस्तित्व हैं वह चेतना समय और सीमा से बाधित नहीं है। मानसिक सीमाओं का अतिक्रमण करने, अपने अंदर की उच्च आध्यात्मिक चेतना को अनुभव करने की उसकी जिज्ञासा बलवती होने लगी। इस कार्य की सफलता के लिए उसने कुछ अभ्यासों को विकसित किया, जिससे व्यक्तिगत चेतना का स्तर ऊँचा हुआ। अब वह अतींद्रिय ज्ञान से युक्त होने लगा और उसकी सजगता का विस्तार हुआ।”

अतींद्रिय क्षमताएँ अन्य उपायों से भी जाग्रत होती है। भक्ति ज्ञान, सत्संग, पूर्वजन्मों के अर्जित संस्कार और विविध उपाय इस जागरण में सहायक होते हैं। इन उपायों में लौकिक उपादानों की प्रायः अवहेलना की गई अथवा उन्हें पवित्र और शुद्ध बनाने पर ही जोर दिया। शक्ति के जागरण में शरीर का सीमित उपयोग किया गया। भक्ति और ज्ञानयोग आदि साधनों में शरीर एक निमित्त भर है। तंत्र की दृष्टि में शरीर प्रधान निमित्त है। उसे बिना चेतना के उच्च शिखरों तक पहुँचा ही नहीं जा सकता। कुछ व्याख्याकारों ने ‘तंत्र’ शब्द का अर्थ ही ‘तन’ के मध्य से ‘आत्मा का त्राण’ या अपने आप का उद्धार माना है। यह अर्थ एक सीमा तक ही सही है। वस्तुतः तंत्र में शरीर-मन और काय-कलेवर के सूक्ष्मतम स्तरों का समन्वित उपयोग होता है। यह जरूर सही है कि तंत्र शरीर को भी उतना ही महत्व देता है, जितना कि मन, बुद्धि और चित्त को।

व्युत्पत्ति शास्त्र के अनुसार तंत्र शब् ‘तन्’ धातु से बना है। तन् धातु का अर्थ है, विस्तार। शैव सिद्धाँत के ‘कायिक आगम’ में इसका अर्थ किया गया है, वह शास्त्र जिसके द्वारा ज्ञान का विस्तार किया जाता है, --तन्यते विस्तार्यते नमनेन इति तंत्रम्।” तंत्र की निरुक्ति ‘तन्’ (विस्तार करना) और ‘त्रै’ (रक्षा करना), इन दोनों धातुओं के योग से सिद्ध होती है। इसका अर्थ है, तंत्र अपने समग्र अर्थ में ज्ञान का विस्तार करने के साथ उस पर आचरण करने वाले का त्राण भी करता है।

तंत्रशास्त्र का एक प्रख्यात नाम ‘आगम’ भी है। वाचस्पति मिर ने योगभाष्य की तत्व वैशारदी व्याख्या में ‘आगम’ शब्द का अर्थ करते हुए लिखा है कि जिससे अभ्युदय (लौकिक कल्याण) और निःश्रेयस (मोक्ष) के उपाय बुद्धि में आते हैं। वह ‘आगम’ कहलाता है। शास्त्रों का एक स्वरूप और भी है ‘निगम’। इस श्रेणी में वेद-उपनिषद् आदि आते हैं। इनमें कर्म, उपासना और ज्ञान का स्वरूप बताया गया है। इसलिए वेद-शास्त्रों को निगम कहते हैं। उस स्वरूप को व्यवहार, आचरण और जीवन में उतारने वाले उपायों का रूप जो शास्त्र बताता है वह है, ‘अगम’।

कहा जा चुका है कि तंत्र का सामान्य अर्थ है, उपाय। विभिन्न शास्त्रीय उद्धरणों और मनीषियों-आचार्यों के प्रतिपादन भी प्रकाराँतर से यही बात कहते हैं। तंत्र अथवा आगम में व्यवहार पक्ष ही मुख्य रहता है। वह क्रिया और अनुष्ठान पर बल देता है। वाराही तंत्र ने इस शास्त्र के जो सात लक्षण गिनाए है, उनमें भी व्यवहार ही मुख्य है। वे सात लक्षण हैं, सृष्टि, प्रलय, देवार्चन, सर्वसाधन, (सिद्धियाँ प्राप्त करने के उपाय), पुरश्चरण, (मारण, मोहन, उच्चाटन आदि क्रियाएँ), षट्कर्म (शाँतिम, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन और मारण के साधन) तथा ध्यान (इष्ट के स्वरूप का एकाग्र तल्लीन मन से चिंतन)।

विषय को स्पष्ट करने की दृष्टि से तंत्रशास्त्र भले ही कहीं सिऋँत की बात करते हों, अन्यथा आगम का तीन-चौथाई भाग विधियों का ही उपदेश करता है। तंत्र के सभी ग्रंथ शिव और पार्वती के संवाद के रूप में रचे गए या प्रकट हुए हैं। देवी पार्वती प्रश्न करती हैं और शिव उसका उत्तर देते हुए एक विधि का उपदेश करते हैं। प्रश्न ज्यादातर समस्या के रूप में ही हैं। सिद्धाँत के संबंध में भी कोई प्रश्न पूछा गया तो शिव उसका उत्तर कुछ शब्दों में देने के बाद विधि का ही वर्णन करते हैं।

शास्त्र उपाय के रूप में हैं। इस तथ्य के साथ देवी और शिव संवाद रूप में होने का आशय भी स्पष्ट करना चाहिए। देवी अर्थात् शक्ति, श्रद्धा, प्रज्ञा। शिव अर्थात् चैतन्य, ज्ञान, कल्याण। आगम शास्त्र का उद्घाटन करने वाली परब्रह्म चेतना को सामान्य धरातल पर लाकर समझें। वह चिंतन इस निष्कर्ष पर पहुँचाएगा कि शक्ति प्रकट होने के लिए आतुर है। देवी को चेतना के रूप में समझें तो वह प्रश्न पूछती है, “हे प्रभु आपका सत्य क्या है ?” शिव अर्थात् मार्गदर्शक सत्ता इस प्रश्न का सीधे उत्तर नहीं देती। वे एक विधि बता देते हैं। देवी अर्थात् चेना अर्थात् साधन उस विधि से यात्रा कर लें तो उत्तर मिल जाएगा। उत्तर परोक्ष है।

आगम शास्त्र के अनुसार करना ही जानना है। और कोई जानना ज्ञान की परिभाषा में नहीं आता। जब तक कुछ किया नहीं जाता, साधना में प्रवेश नहीं होता तब तक कोई उत्तर या समाधान नहीं है। समाधान करने से आते हैं। संक्षेप में यह कि तंत्र समाधान नहीं देता, वह समाधान की विधि देता है। यह समाधान बौद्धिक नहीं, प्रायोगिक है। उदाहरण के लिए, अंधे व्यक्ति से प्रकाश के बारे में कुछ कहा जाए तो वह निरा बौद्धिक होगा। उसे दृष्टि प्राप्त करने का उपाय दिया जाए, उपचार किया जाए, ऐसी कोई व्यवस्था हो जिसमें वह देख सके तो प्रकाश के संबंध में कुछ कहना आवश्यक नहीं है। वह स्वयं ही प्रकाश को समझ लेगा और उससे अपना कल्याण कर सकेगा।

आगम शास्त्र का उपदेश शिव और पार्वती के संवाद के रूप में हुआ है। शिव पति हैं और पार्वती उनकी अर्द्धांगिनी। लौकिक दृष्टि से इन संबंधों के अर्थ दाँपत्य, गृहस्थ, संसार आदि होंगे। लेकिन आध्यात्मिक अर्थों में यह गहन आश्वासन अगाध श्रद्धा का संदेश है। पार्वती श्रद्धा हैं, समर्पण है। उनकी तर्क में कोई रुचि नहीं है। शिव चैतन्य हैं, ज्ञान हैं, विधि हैं, मार्ग है। वे उपदेश को तर्क या प्रतिपादन के आया से पहुँचाने की रत्ती भर चिंता नहीं करते। इन प्रसंगों का सार यह है कि चित्त ग्रहणशील हो तो ही बताए गए उपाय काम आते हैं।

पति-पत्नी के संबंधों से गुरु और शिष्य की सार्थकता बताते हुए योगी रामप्रसाद लिखते हैं, “शिष्य को पत्नी जैसे स्त्रैण मन वाला होना चाहिए तभी वह सीख पाएगा। स्त्रैण मन का अर्थ है, ग्रहणशीलता, समग्र ग्रहण करने वाला भाव, समर्पण। शिष्य को उसी स्त्रैण मन की आवश्यकता है। स्त्रैण ग्राहकता का अर्थ है, गर्भ जैसी ग्राहकता। स्त्री गर्भ धारण करती है और गर्भाधान के साथ ही बच्चा उसके शरीर का अंश बन जाता है। शिष्य को गर्भ जैसी ग्राहकता की जरूरत है। जो कुछ भी ग्रहण किया जाए, उसे मृत ज्ञान की तरह इकट्ठा नहीं कर लेना है। उसे भीतर क्रमशः बढ़ाना चाहिए। यह वृद्धि ही रूपांतरण लाएगी।

तंत्रसाधना में शिव को अर्द्धनारीश्वर कहा गया है। संसार के किन्हीं और साधना संप्रदायों या धर्म-धारणाओं में इस तथ्य का प्रतिपादन नहीं मिलता। अर्द्धनारीश्वर भारतीय धर्मपरंपरा की अनूठी धारणा है। आधुनिक मनोविज्ञान ने इस धारणा की एक तरह से पुष्टि की है कि मनुष्य न तो अकेला पुरुष ही है और न ही स्त्री, बल्कि उसके कलेवर में स्त्री और पुरुष दोनें है। जो तल ऊपर होता है, वही दिखाई देता है, अन्यथा मन की दृष्टि से तो प्रत्येक व्यक्ति उभयलिंगी है। तंत्र ने हजारों साल पहले इस तथ्य को जानकर शिव के अर्द्धनारीश्वर रूप को अनुभव किया, उसकी आराधना की।

देवी प्रिया ही नहीं है। वे शिव की अर्द्धांगिनी भी है। तंत्र के आचार्य कहते हैं कि जब तक शिष्य गुरु का दूसरा अर्द्धांग नहीं बन जाता, तब तक गुह्य विद्याओं की शिक्षा नहीं दी जा सकती। दी जाए तो भी शिष्य उन्हें ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह उन विधाओं की तकनीकी, बारीकियों में उलझ जाएगा। करें या न करें, क्यों करें ? क्या करने से क्या लाभ होगा, आदि प्रश्नों में उलझकर अपनी विद्या को नष्ट कर लेगा। गुय की बताई विधियों को ऊहापोह में ही गंवा देगा।

मनुष्य ने जिस प्रथम अनुभव में अपने भीतर छिपी अतींद्रिय, अलौकिक क्षमता को जाना, उसे हजारों-लाखों वर्ष हो गए। तब से अब तक तंत्र के कितने ही गुह्य आयाम खोज लिए गए है। उनकी ऊँचाइयाँ छुई जा चुकी हैं और प्रत्येक ऊँचाई की एक ही शर्त है, कोई श्रद्धा या कोरा ज्ञान का संचय करने के लोभ में न पड़ा जाए, बल्कि उसे व्यवहार में उतारने की चेष्टा की जाए। यह चेष्टा जितनी सघन होगी, साधना उतनी ही सफल होगी।


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मनुष्य ने जिस प्रथम अनुभव में अपने भीतर छिपी अतींद्रिय, अलौकिक क्षमता को जाना, उसे हजारों-लाखों वर्ष हो गए। तब से अब तक तंत्र के कितने ही गुह्य आयाम खोज लिए गए है। उनकी ऊँचाइयाँ छुई जा चुकी हैं और प्रत्येक ऊँचाई की एक ही शर्त है-सक्रिय व सतत् अभ्यास।


प्रकृति के दुलारे ये चित्र-विचित्र पक्षी

प्रकृति ने जीव-जंतुओं की विचित्र दुनिया रची है। पक्षियों का रंग-बिरंगा संसार भी इसी दुनिया का अंग है। इनकी हजारों किस्में व प्रजातियाँ पाई जाती है। ये स्वयं जितने मनमोहक होते हैं, इनका रहन-सहन और खाने-पीने की रुचियाँ भी उतनी ही अनोखी व रोचक हैं। इन पक्षियों में शुतुरमुर्ग को सबसे बड़ा पक्षी माना जाता है। शुतुरमुर्ग के संबंध में एक रोचक तथ्य प्रचलित है कि जब वह चारों ओर से घिर जाता है तो बालू में अपना सिर छुपा लेता है, पर यह सत्य नहीं है। वास्तव में परेशान होने या तंग किए जाने पर शुतुरमुर्ग जमीन पर लेट आता है और सिर व गरदन आगे निकालकर लेटे-लेटे ही चारों ओर देखता है, ताकि उसकी ओर किसी का भी ध्यान न जाए।

जब संकट एकदम सिर पर आ पड़ता है तो शुतुरमुर्ग भी अन्य पक्षियों की तरह भाग खड़ा होता है। पंख छोटे होने के कारण वह उड़ नहीं सकता, पर एक वयस्क शुतुरमुर्ग 80 कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकता है। इसकी दृष्टि इतनी प्रखर होती है कि कई कि.मी. दूर तक देखने की क्षमता रखता है। इसकी लंबी टाँगों में इतनी शक्ति होती है कि एक ही बार में आदमी के बाजू तोड़ दे। ये ‘एक पति-एक पत्नी’ के दर्शन में विश्वास रखते हैं और आजीवन एक-दूसरे के वफादार रहते हैं। शुतुरमुर्ग पेड़ों की पत्तियाँ-बीज-फल से लेकर छिपकली जैसे जीवों का भी निगल जाता है। यह कंकड़-पत्थर खाने का भी शौकीन होता है। दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन में आउडशोर्न नाम एक कस्बा है, जो विश्व के शुतुरमुर्ग की राजधानी मानी जाती है।

पक्षियों की दुनिया की सबसे छोटी चिड़िया हमिंग बर्ड का वजन 1.5 ग्राम के करीब होता है। इसके घोंसले का व्यास एक इंच का तीन-चौथाई होता है। इसके पंखों के रंग-पन्ना, माणिक आदि रत्नों की भाँति चमकते हैं। जो इसकी शोभा को शतगुणित कर देते हैं। इस चिड़िया का उड़ने का ढंग भी निराला है। इसके पंखों की औसतन फड़कन एक मिनट में 500 बार होती है। यह हवा में बिना किसी सहारे के काफी समय तक ठहरी रह सकती है। फूलों का रस ही इनका भोजन है।

अपने देश में तोता पालने का शौक सदियों पुराना है। संसार भर में प्रायः 160 किस्म के तोते पाए जाते हैं। अभी तक सबको यही बात मालूम है कि तोते बोली की नकल करने में माहिर होते हैं, पर कम लोग ही इस सत्य से परिचित हैं कि यह आसपास की बातें व आवाजें सुनने में भी माहिर होते हैं। तोते दूर-दराज की बातें मनोयोगपूर्वक सुन लेते हैं। इसी का ध्यान में रखकर प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान पेरिस में उन्हें एफिल टावर पर बिठाया गया था, ताकि वे हवाई हमले की पूर्व चेतावनी दे सकें।

मनुष्य ही नहीं, पक्षी भी फलों के बेहद शौकीन होते हैं। गाने वाली चिड़िया के नाम से विख्यात बुलबुल बड़े चाव से फल खाती है। अपने बच्चों से बहुत प्यार करने वाली यह चिड़िया उन्हें गाना एवं उड़ना सिखाती है। सदा गाने वाली इस बुलबुल का उर्दू व फारसी के साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है और इसे ‘बुलबुल हजारदास्ताँ’ का खिताब भी मिला हुआ है। एक अन्य चिड़िया जिसका नाम कैसोवरी है वह सफेद अंडों की जगह हरे अंडे देती है। यह कैसोवरी अपनी बड़ी आकृति के बावजूद दिखने में बेहद सुंदर होती है, पर इसे गुस्सा बहुत जल्दी आ जाता है और गुस्से के दौरान यह मनुष्य का पेट तक चीर डालती है। इनमें नर कैसोवरी ही बच्चों के पालन-पोषण का दायित्व सँभालता है।

भारतीय चिड़ियों में सबसे सुँदर चिड़िया है ‘सनबर्ड’। इनको घरेलू बाग-बगीचों, हरे-भरे वनप्रदेशों, फूलों की घाटियों, झाड़ीदान वनों, अधिक रसीले फलों वाले बगीचों में देखा जा सकता है। इसके घोंसलों की बनावट अद्भुत होती है। इसके अंदर जाने के लिए एक छेदनुमा दरवाजा होता है, जिसके ऊपर छज्जा-सा बना होता है। भारत के बारहमासी पक्षियों के वर्ग में आने वाली एक अन्य चिड़िया है अबाबील। यह अपना घोंसला वृक्षों पर नहीं बनाती, बल्कि निर्जन इमारतों पर बसेरा करती है। इसके मुँह से लार जैसा पदार्थ निकलता है, जिससे यह मिट्टी, घास, फूल और तिनकों को मकान की दीवार या छत से चिपका देती है। इस सामग्री से जो घोंसला तैयार होता है, वह प्याले के आकार को होता है।

मनुष्यों में जिस प्रकार कुछ जातियाँ ‘घुमक्कड़’ प्रकृति के कारण विख्यात हैं, उसी प्रकार पक्षी समाज में भी ऐसे पक्षी होते हैं, जिनका सारा जीवन यात्रा या प्रवास में बीत जाता है। ऐसे पक्षियों में जंगली बतख सर्वाधिक प्रसिद्ध है। सर्दियों में यूरोप, उत्तरी एशिया, लद्दाख, तिब्बत से चलकर अनेक प्रकार की बतखें भारत के जलपूर्ण मैदानी इलाकों में आ जाती है। इस प्रवास प्रिय पक्षी को लंबी यात्राओं में अनेक कष्ट भोगने पड़ते हैं। इतना ही नहीं इन्हें बड़े-बड़े खतरों का सामना भी करना पड़ता है। ये बतखें 80-90 कि.मी. प्रतिघंटे की रफ्तार से सहज उड़ान भर लेती हैं। ‘टर्न’ पक्षी भी प्रवासी पक्षी के रूप में प्रसिद्ध है। ये प्रतिवर्ष कम-से-कम 20,000 मील की यात्रा कर लेती है। गिनीज बुक के अनुसार 5 जुलाई 1955 को कंडलक्ष सेंचुरी में एक आर्कटिक टर्न को इसके घोंसले में छल्ला पहनाया गया। बाद में 16 मई 1956 को एक मछुआरे ने जब इसे पश्चिमी आस्ट्रेलिया में जीवित पकड़ा तो इस समय वक यह चिड़िया 1,92,000 कि.मी. की दूरी तय कर चुकी थी।

साइबेरिया की सफेद सारस भी सर्दियों में प्रतिवर्ष भारत प्रवास पर आती है। लगभग 7,000 कि.मी. रास्ता तय कर ईरान, अफगानिस्तान व पाकिस्तान की झीलों में पड़ाव डालते हुए ये ‘भरतपुर पक्षी विहार’ में पहुँचते हैं। पूर्णतः शाकाहारी ये सफेद सारस पक्षी विहार में उगी वनस्पति ‘सइप्रस रोटेंटस’ की जाड़ों का खाना ज्यादा पसंद करते हैं। पक्षियों में हरियल पक्षी बेहद शर्मीला होता है और सारा जीवन पेड़ों पर ही बिता देता है। पूर्ण शाकाहारी यह पक्षी सिर्फ पीपल जाति के पेड़ जैसे, बड़ गूलर, पीपल, अंजीर आदि वृक्षों के पत्ते ही खाता है। पेटू प्रकृति के इस पक्षी को फलों में बेर, चिरौंजी व जामुन ज्यादा पसंद हैं। हरियल की तरह ‘चाहा’ पक्षी भी बेहद शर्मीला होता है, पर बसंत के मौसम में यह प्रकृति के सौंदर्य का आनंद लेने के लिए ऊँचे आकाश में विचरण करता है और जल्दी ही 40 या 50 डिग्री का कोण बनाते हुए तेजी से नीचे की ओर आता है। नीचे उतरते समय यह एक तीखी आज करता है, जिसे एक किलोमीटर की दूरी तक भी सुना जा सकता है। यह ‘चाहा’ पक्षी बिना रीढ़ की हड्डी वाले छोटे जीव जंतुओं को अपना भोजन बनाता है।

पक्षी मौसम विशेषज्ञ भी होते हैं। इनकी मौसम के बारे में जानकारी को आश्चर्यजनक श्रेणी में भी रखा जा सकता है। ‘सी-गल’ ऐसे पक्षियों में प्रमुख है। ‘सी-गल’ यदि मछलियों के शिकार के लिए समुद्र में जाती है, तो समझो कि मौसम निश्चित रूप से अच्छा रहेगा, परंतु यदि वह अपने ही क्षेत्र में लगातार उड़ती रहे तो समझना चाहिए कि मौसम शीघ्र ही खराब होने वाला है। वैसे तो सामान्यतया सभी समुद्री पक्षियों में कोई-न-कोई विशेषता पाई जाती है, लेकिन पफिन अपनी विशेषताओं में कुछ ज्यादा ही विशेष है। इसे समुद्री तोता भी कहा जाता है। ये अपने आप में कुशल तैराक व गोताखोर होते हैं। इन्हें 200 फीट की गहराई तक गोता लगाते हुए जाँचा गया है।

अपनी चोंच में एक ही बार में ढेर सारी मछलियाँ पकड़ने के लिए पफिन विख्यात है। एक पफिन की चोंच में 72 मछलियाँ भी देखी गई है। यह पफिन बहुत ही जिज्ञासु व सामाजिक प्रवृत्ति का पक्षी है। तटवर्ती चट्टानों के क्षेत्र में इनके घोंसलों की विशाल कालोनियां देखी जा सकती है। प्रजननकाल में इनकी कालोनियों में इनकी संख्या हजारों में नहीं बल्कि लाखों में होती है। पफिन पाँच वर्ष की उम्र से अपने जोड़े बनाने लगते हैं और इनके ये जोड़े जीवनभर के लिए होते हैं। ये घंटों तक एक-दूसरे को निहारते रहते हैं, मानो एक-दूसरे के लिए इनसे बढ़कर मोहक कोई भी न हो।

पेन्गुइन पक्षी का जीवन भी समुद्र किनारे शुरू होता है। ये समुद्र में ऐसे तैरते हैं माने उड़ रहे हों। यानि कि अंदर डुबकी ये बहुत देर तक रह सकते हैं। पेन्गुइन के पंख एक निश्चित समय के पश्चात् झड़ जाते हैं, कुछ समय के पश्चात् फिर नए पंख निकल आते हैं। जब तक इनके नए पंख नहीं आते, ये पानी में नहीं जाते। ये अपने पारिवारिक जीवन को मिलजुलकर जीते हैं। मादा अंडा देती है तो नर भोजन का इंतजाम करता है। वह समुद्र से मछलियाँ व झींगे इत्यादि निगलकर पेट में एकत्र कर लेता है, फिर मादा के पास आकर उगल देता है। इस प्रकार मादा अंडों पर बैठे-बैठे ही भोजन कर लेती है। मादा पेन्गुइन मातृत्व का एक भावपूर्ण उदाहरण है। यह अंडों से बच्चा निकलने के दो से चार महीनों के अंतराल में अपने अंडों से हटती नहीं, चाहे जितनी बरफ पड़े या बर्फीली हवाएँ चलें।

पक्षियों की इस रंग-बिरंगी दुनिया में एक और खूबसूरत पक्षी है ‘हनी ईटर’ जिसकी लगभग 170 प्रजातियाँ सारी दुनिया में पाई जाती हैं। इसके नाम से ही स्पष्ट है इन्हें फूलों का रस बेहद प्रिय होता है ये पक्षी कई बार फूलों का रस पीने से नशे में चूर भी हो जाते हैं। ऐसा तब होता है जब वर्षा या सूर्य की किरणों के कारण फूलों का रस मादक हो जाता है। अफ्रीका के जंगलों में पाए जाने वाले ‘शहद पक्षी’ को यह नाम उसके कार्य के अनुरूप वहाँ के स्थानीय निवासियों ने दिया हुआ है। मनुष्य के बुलाने पर यह पक्षी झाड़ियों से चहकते हुए मनुष्य के पास आ जाता है और मधुखोजी व्यक्ति के आगे उड़ता हुआ उसे शहद के छत्ते तक मार्गदर्शक के रूप में ले जाता है। इस पक्षी को बुलाने का तरीका भी विचित्र है। मधुखोजी व्यक्ति अपने हाथ में लकड़ी के दो टुकड़ों को लेकर आपस में रगड़ने लगता है। इस इशारे को समझकर यह पक्षी प्रसन्नतापूर्वक मनुष्य के नजदीक आ जाता है। इसके संबंध में एक रोचक बात यह है कि यह स्वयं शहद नहीं खाता, अपितु मधुमक्खियों के उजड़े हुए छत्तों की मोम को खाता है।

जहाँ तक पक्षियों के दुश्मनों की बात है, तो मनुष्य के अलावा स्वयं पक्षी भी एक-दूसरे के प्रबल दुश्मन हैं। इनमें बाज का नाम प्रमुख है। यह आक्रामक पक्षी घोंसला बनाता नहीं, बल्कि दूसरे बड़े पक्षियों के घोंसलों पर जबरन कब्जा कर लेता है। यह अपने शिकार पर पूरे जोश के साथ झपटता है। बाज में भागने की बजाय आक्रमण करने की प्रवृत्ति होती है। बाज के संबंध में एक रोचक तथ्य यह है कि जिसे हम ढलती उम्र कहते हैं, वह उसके सौंदर्योत्कर्ष का समय होता है। बाज में देखने की अद्भुत क्षमता होती है। यह आकाश में उड़ते हुए आधा मील दूर से भी किसी झुरमुट में छिपी हुई टिड्डी को देखने की क्षमता रखता है। न्यूजीलैंड के राष्ट्रीय पक्षी ‘किवी’ के पाँवों में गजब की शक्ति होती है। कुत्ते के पाँवों जैसे अपने मोटे पैरों से यह पक्षी तेजी से उड़ सकता है। कड़ी जमीन पर भी अपने रहने के लिए यह खोह खोद लेता है और किसी से मुठभेड़ हो जाए तो घोड़े जैसी दुलत्ती मारकर उसके हौसले भी पस्त कर सकता है।

अपनी अनेक विशेषताओं के साथ ही पक्षियों में मेकअप करने की कला भी होती है। विश्व के अधिकाँश शीतोष्ण कटिबंध क्षेत्रों में पाई जाने वाली बिटर्न नाम की चिड़िया मेकअप करने वाली चिड़िया के नाम से प्रसिद्ध है। बिटर्न के परों से एक प्रकार का पाउडर गिरता है, जिससे वह अपनी गरदन और सिर को साफ करती है। इसके तुरंत बाद एक तेल अपने पंखों पर मिलती है, जो इसकी प्रीन ग्रंथि से निकलता है। इस प्रकार पाउडर व तेल के इस्तेमाल से यह अपना संपूर्ण मेकअप करती है।

पक्षियों की अद्भुत दुनिया के ये बहुत सीमित उदाहरण हैं, जो ये बताते हैं कि प्रकृति को अपनी संतानों से उतना ही प्यार-दुलार है, जितना कि मनुष्य से। हाँ, मनुष्य ज्येष्ठ अवश्य है, इस वजह से उसकी यह जिम्मेदारी भी बनती है कि सभी के साथ हिल-मिलकर रहे। यदि मनुष्य अन्य जीव-जंतुओं के वैभव व विभूतियों को जान सके तो फिर प्रकृति में असंतुलन की समस्या ही बाकी नहीं रहेगी।


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पक्षियों की अद्भुत दुनिया के ये उदाहरण बताते हैं कि प्रकृति को अपनी संतानों से उतना ही प्यार-दुलार है, जितना कि मनुष्य से। हाँ, मनुष्य ज्येष्ठ अवश्य है, इस वजह से उसकी यह जिम्मेदारी भी बनती है कि सभी के साथ हिल-मिलकर रहे। यदि मनुष्य अन्य जीव-जंतुओं के वैभव व विभूतियों को जान सके तो फिर प्रकृति में असंतुलन की समस्या ही बाकी नहीं रहेगी।


इसमें क्या आश्चर्य (kahani)

सादगी की साकार प्रतिमा रामकृष्ण परमहंस की माँ अपने जीवन के अंतिम दिनों में बेटे के पास ही रहने आ गई थी। परमहंस ने निष्ठावान् शिष्य और सेवक श्री मथुरा बाबू माता और पुत्र दोनों की यथेष्ट सेवा करते। एक दिन की बात है, उन्होंने माँ से कहा, माँ आपको जिस किसी भी चीज की जरूरत हो मुझे बता दें। मैं अभी तुरंत आपकी सेवा में उपस्थित कर दूँगा।

माँ ने जवाब दिया, सब कुछ तो है बेटा, मेरा आशीष लो और प्रसन्न रहो। परंतु मथुरा बाबू इस उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए और बार-बार आग्रह करते रहे। जब माँ ने देखा कि मथुरा बाबू इस प्रकार नहीं मानने वाले हैं तो उन्होंने कहा, ठीक है अगर तू कुछ देना ही चाहे तो मेरे लिए थोड़ी सुँघनी मँगवा दे। मथुरा बाबू की आँखों में आँसू आ गए और वे निस्पृह, निष्काम देवी के प्रति नतमस्तक होकर मन-ही-मन कहने लगे, ऐसी माँ को रामकृष्ण जैसा पुत्र मिले तो इसमें क्या आश्चर्य है।


कृत्रिम सौंदर्य-प्रसाधन हमें क्रूर-निर्दयी बनाते हैं।

प्रदर्शन और दिखावा आज के युग की संस्कृति बन गई है। इस उपभोक्तावादी संस्कृति के बढ़ने-पनपने के कारण दिखावे पर पैसा खर्च करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने देश में बाजार का सर्वेक्षण करने के बाद भारतवासियों की कमजोरी को जाँच-परख लिया। उन्होंने यह समझ लिया कि यहाँ के लोग बहुधा साँवले होते हैं और वे पश्चिम की नकल करके किसी भी तरह गोरे होना चाहते हैं। सर्वेक्षण का निष्कर्ष यही निकला कि गोरा होना यहाँ के लोगों की मुख्य कमजोरी है और सुँदर बनना और दिखना तो शायद पूरी मानवजाति की कमजोरी है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इन दिनों इस कमजोरी का भरपूर फायदा उठाया है और उन्होंने पूरे जोश के साथ अपने देश पर धावा बोल दिया है। इसी का परिणाम है कि नित्य -नई प्रसाधन-सामग्रियां बाजार में आ रही हैं। इनमें कई प्रकार की क्रीम, शैंपू, हेयर डाई, लोशन, काँपैक्ट, फेस पाउडर, आई लाइनर, क्लोजिंग मिल्क, आई शैडो, लिपिस्टिक, लिपगलास, नेल पॉलिश, पॉलिश रिमूवर, हेयर रिमूवर, हेयर स्प्रे, परफ्यूम आदि न जाने कितनी ही चीजें हैं।

ज्यादातर महिलाओं में इन सौंदर्य प्रसाधनों के लिए भारी आतुरता है। अपनी इस आतुर-व्याकुलता में वे अपनी त्वचा पर कितने अत्याचार कर रही है, इसकी उन्हें परवाह ही नहीं है। अगर यही स्थिति रही तो शायद वह दिन जल्दी ही आ जाए जब उनकी त्वचा और अधिक अत्याचार न सहन कर पाए एवं विद्रोह कर दे। सौंदर्य प्रसाधनों की दुनिया को करीब से जानने वाली आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. वीणा श्रीवास्तव के अनुसार, सभी सौंदर्य प्रसाधन माइक्रो आर्गनिज्म यानि बैक्टीरिया, वायरस, फफूँदी तथा अन्य छोटे-छोटे व दिख सकने वाले कीटाणुओं के बेहद अच्छे वाहक होते हैं। खासतौर पर क्रीम व माइश्चरइजर आदि। डॉ. वीणा के अनुसार, कोई पदार्थ या तत्व त्वचा के मौलिक रंग को बदल नहीं सकता। त्वचा का काला या गोरा रंग त्वचा में उपस्थित एक पिगमेंट मैलानिन के कारण होता है। यह मैलानिन जितनी भी मात्रा में त्वचा में होता है, त्वचा का रंग उतना ही गहरा होता है। किसी भी उपाय द्वारा मैलानिन को कम नहीं किया जा सकता।

यही हाल झुर्रियों का भी है। आज तक उम्र को कम करने की कोई वस्तु दुनिया में नहीं बनी है। मालिश आदि से भले ही झुर्रियाँ कम हो जाएँ, परंतु किसी क्रीम से इनका कम होना समझ में नहीं आता। चिकित्सक भी झुर्रियाँ कम करने के लिए हमेशा खुश रहने तथा व्यायाम करने की सलाह देते हैं। हाँ, कुछ क्रीम ऐसी भी बाजार में आ रही है। जो त्वचा की ऊपरी सतह की कोशिकाओं को मृत करके हटा देती हैं और उससे अंदर वाली सतह ऊपर आ जाती है। इससे भी कुछ समय के लिए रंग गोरा होने तथा झुर्रियों के कम होने का भ्रम पैदा होता है, लेकिन यह कोरा भ्रम ही है, क्योंकि अंदर वाली सतह में भी मैलानिन उतनी ही मात्रा में होता है।

विश्व की अनेक सभ्यताओं में चेहरे, होंठ, आँख, केश, नाखून एवं त्वचा-सौंदर्य को सुरक्षित रखने और बढ़ाने के उद्देश्य से अनेक प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल होता रहा है। यहाँ तक तो गनीमत थी, पर जैसे ही आधुनिक वैज्ञानिक युग ने हमें चकाचौंध करना शुरू किया कि तमाम रसायनों, नए यौगिकों ने हमारे जीवन में प्रवेश किया। नतीजा कृत्रिम सौंदर्य प्रसाधनों के सैलाब के रूप में सामने है। इनके दुष्प्रभाव एवं जहरीले असर अपने शुरुआती दौर से ही सामने आते रहे है। 17 वीं सदी में तो यूरोप में एक ऐसी महामारी फैली, जिसने डॉक्टरों और विशेषज्ञों को चकित कर दिया। यह महामारी आर्गेनिक युक्त सौंदर्य घोल के आम प्रयोग से फैली थी। उस समय विशेषज्ञों ने इन सौंदर्य प्रसाधनों के इस्तेमाल के विरुद्ध चेतावनी दी थी। मगर ठोस उपायों की तरफ सोचा नहीं जा सकता।

तरह-तरह के शैंपू, खिजाब, कंडीशनर आदि के बढ़ते इस्तेमाल ने गंजेपन की रफ्तार को काफी बढ़ाया है। यदि बालों पर ऐसे हमले जारी रहे तो 21 वीं सदी के उतार पर अधिकाँश मानवजाति गंजी हो जाएगी। वंशानुगत गंजेपन के बदले रसायनजन्य गंजापन ज्यादा खतरनाक स्थिति है। सन् 1950 में जन्मी वर्तमान लिपिस्टिक दुनिया के पच्चीस प्रतिशत चर्म रोगों के लिए जिम्मेदार है। अब तो वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह भी सिद्ध हो गया है कि त्वचा पर लगाए गए रासायनिक प्रसाधनों का कुछ अंश मूत्र के जरिये बाहर निकलता है। अतः यह कहना कि त्वचा, होंठ, आँख और बालों पर प्रयोग किए जाने वाले रसायन शरीर में प्रवेश नहीं करते, एक धोखा है।

मलेशिया के कंज्यूमर एसोसिएशन ने तो गहन अध्ययन के बाद यह चेतावनी जारी की है कि हेयर डाई का अत्यधिक प्रयोग कैंसर को निमंत्रण देने जैसा है। अध्ययन में कहा गया है कि ऐसी महिलाएँ जो हेयर डाई इस्तेमाल करती हैं उनमें ‘हाजकिंस लिंफोमा’ का खतरा पचास प्रतिशत ज्यादा होता है। पी.जी. आई. चंडीगढ़ के आप्थेल्मोलाँजी विभाग के अध्ययन से पता चला है कि रासायनिक पदार्थयुक्त हेयर डाई से मोतियाबिंद होने के खतरे बढ़ गए है। प्रसिद्ध उपभोक्ता पत्रिका ‘दी उत्सान कंज्यूमर’ के अनुसार ‘प्रकृति’ के नाम पर बिक रही हेयर डाई में हानिकारक रसायन ‘पैराफेनाइलेनीडियामीन’ मिलाया जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि नेल पॉलिश और लिपिस्टिक ये दोनों सौंदर्य प्रसाधन इस कारण सर्वाधिक घातक सिद्ध होते हैं, क्योंकि इनके विषैले तत्व मुँध के द्वारा सीधे पेट में पहुँचते हैं। जिससे आँतरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

महिलाओं द्वारा रसोईघर में हाथ से किए जाने वाले कार्य, जैसे-आटा गूँथना आदि से भोजन-निर्माण की प्रक्रिया के दौरान ही नेल पॉलिश में प्रयुक्त रसायनों से खाद्यपदार्थ दूषित हो जाते हैं। खाद्यपदार्थों का विषाक्त होना स्वास्थ्य के लिए सर्वाधिक घातक होता है। नेल पॉलिश से होने वाले घातक प्रभावों के बारे में जो शोध-निष्कर्ष प्राप्त हुए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। नेल पॉलिश में प्रयुक्त होने वाले रसायन केवल त्वचा के लिए ही हानिकारक नहीं हैं, बल्कि नेल पॉलिश का प्रयोग करने वाली महिला एवं उसके शिशु की श्वसन क्रिया, यकृत आदि पर भी बुरा असर पड़ता है। सस्ती किस्म की नेल पॉलिश में मिलाया जाने वाले फिनायल रसायन तो इतना विषाक्त होता है कि कैंसर रोग की संभावना ही पैदा हो जाती है।

टाइटेनियम डाई ऑक्साइड तथा वैनजोइन नामक रसायनों से निर्मित लिपिस्टिक एक बार होठों को सजीला अवश्य बनाती है, लेकिन इसे अत्यधिक गाढ़ा करने के लिए भेड़ एवं खरगोश की चरबी मिलाई जाती है। कई बार तो यह चरबी इतनी बढ़ जाती है कि इससे होठ जलकर काले तक हो जाते हैं और रसायन युक्त होने की वजह से सूजन एवं खुजली भी होने लगती है। इसी तरह चेहरे पर लगाए जाने वाले ‘रुज’ में प्रयुक्त होने वाले वर्गामोट से रोमछिद्र ढक जाते हैं। फलतः त्वचा कुपोषण का शिकार हो जाती है। ऊपर से त्वचा को सुँदर एवं चिकना बनाने वाला ‘पाउडर’ भी अनेक त्वचा रोगों के लिए जिम्मेदार है। इसमें तारकोल जैसा खतरनाक पदार्थ होता है। आई ब्रो पेंसिल और मस्कारा जैसी सौंदर्य सामग्रियों में ग्रेफाइट एवं लेड जैसे घातक पदार्थ होते हैं। इनके प्रयोग से पलकों के बाल झड़ने लगते हैं। आँखों पर सूजन आ जाती है और कभी-कभी डरमाडिस नाम का रोग भी हो जाता है। चेहरे पर लगाई जाने वाली तरह-तरह की क्रीम में एमीनो एसिड व मरक्यूरिक क्लोराइड जैसे कुछ ऐसे खतरनाक रसायन होते हैं जो त्वचा के जरिए शरीर में पहुँचकर किडनी को प्रभावित करते हैं। इसके फलस्वरूप हमारा उत्सर्जन तंत्र गड़बड़ा जाता है।

एक ओर इन सौंदर्य-प्रसाधनों की कृत्रिमता स्वास्थ्य का नाश करती है, दूसरी ओर इनके निर्माण के लिए अगणित पशु-पक्षी एवं जीव-जंतु निर्ममता से मौत के घाट उतारे जाते हैं। इस संदर्भ में कतिपय शोध करने वालों ने आत्मग्लानि से भर देने वाले तथ्य प्रस्तुत किए हैं। इनके अनुसार लोशन में ‘गिनीपिग’ की खाल डाली जाती है। लिपिस्टिक में कई जानवरों का रक्त मिलाया जाता है। पाउडर में बंदर की आँख और दिल के कुछ तत्व मिलाए जाते हैं। सेंट में लोसले नाम तत्व के लिए बिच्छू के शरीर को बुरी तरह से पीसा-खरोंचा जाता है। अनेक सौंदर्य प्रसाधनों में चिकनाई लाने के लिए कछुए का तेल मिलाया जाता है। खरगोश की आँख के पास की चरबी शैंपू तैयार करने के काम में लाई जाती है। इस निर्मम हिंसा की चादर से लिपटी प्रसाधन-सामग्री को लगाकर क्या सचमुच हम मनुष्य कहलाने योग्य बने रह सकते हैं ?

वैसे भी यदि किसी चिकित्सक से पूछा जाए तो वह कभी भी किसी प्रसाधन के प्रयोग की सलाह नहीं देगा। त्वचा को स्वस्थ और काँतिमय बनाने के लिए चिकित्सक खानपान में सुधार लाने की बात सुझाते हैं। बेशक विटामिन हमारी त्वचा को फायदा पहुँचाते हैं, लेकिन विटामिन युक्त क्रीम हमें कभी भी फायदा नहीं पहुँचा सकती, क्योंकि विटामिन के परमाणु इतने छोटे नहीं होते की त्वचा में स्थित रंध्रों से होते हुए त्वचा के भीतरी भाग तक पहुँचकर अपना असर दिखा सकें। इस तरह विटामिनयुक्त क्रीम की बातें एक भ्रम और छलावा ही है। त्वचा को स्वस्थ बनाए रखने के लिए उत्तम यही है कि विटामिन युक्त भोजन किया जाए और पूरी नींद ली जाए।

यदि चेहरे पर कुछ लगाने की आवश्यकता पड़ती भी है, तो अपने रसोईघर में ही ऐसा बहुत कुछ मिल जाता है, जो त्वचा को अच्छी तरह निखार कर संवार देता है। इन सैंकड़ों सहज सुलभ प्राकृतिक व घरेलू उपयोग की चीजों से स्वास्थ्यप्रद सौंदर्य पाया जा सकता है। ये सारी चीजें अलग-अलग तरह के सौंदर्य-प्रसाधनों की कमी को पूरा करने में पूर्णतया सक्षम है। उदाहरण के लिए क्रीम की जगह मलाई या कच्चे दूध का प्रयोग किया जा सकता है। शहद भी एक शक्तिशाली प्राकृतिक माइश्चराइजर है। यह त्वचा की नहीं को नष्ट नहीं होने देता और उसे तरावट पहुँचाता है। हल्दी का उपयोग सौंदर्य में चार चाँद लगाने के लिए प्राचीन नुस्खों में से एक है। ‘गुलाब जल’ भी त्वचा को पुष्ट एवं कोमल बनाता है। इसका नियमित इस्तेमाल करने से त्वचा की झुर्रियाँ भी कम होती है।

प्राचीन युग में लोगों को ऐसे प्राकृतिक उपायों की जानकारी थी, जिससे वे स्थायी सौंदर्य प्राप्त करते थे। आज भी महाराष्ट्र के कई इलाकों में दीपावली पर अीयंगादि लगाने की प्रथा है। इसी तरह बेसन का उबटन भी प्राचीनकाल से महिलाओं के द्वारा उपयोग में लाया जा रहा है। प्रायद्वीप की महिलाएँ बेसन व गेहूँ का चोकर दूध में मिलाकर उबटन के रूप में त्वचा पर लगाना अधिक लाभप्रद समझती है। गेहूँ की भूसी त्वचा को बेकार के तत्वों से रहित करके साफ व चमकदार बनाती है। संसार भर के लोग एशियाई महिलाओं के घने-चमकीले बालों से ईर्ष्या करते हैं, परंतु उन्हें धोने का प्राकृतिक तरीका यानि कि शीकाकाई व रीठा ही उनका राज है।

आँवला एशियाई ‘गूस बैरी’ है। इसमें प्राकृतिक ढंग से बालों को काला करने की क्षमता है। इसीलिए आँवले से कई जड़ी-बूटी वाले हेयर ऑयल बनाए जाते हैं। इस संबंध में मेंहदी उतनी ही पुरानी हैं, जितना कि बालों का इतिहास। पाश्चात्य देशों में मेंहदी का कंडीशनर व शैंपू के रूप में भी प्रयोग होता है। तथ्य यही है कि स्वास्थ्य एवं सुँदरता को प्राकृतिक जड़ी-बूटियों की संपदा का अनोखा भंडार भी है। ऐसे में अच्छा यही है कि हमारे यहाँ के लोग इन प्राकृतिक वनौषधियों एवं घरेलू नुस्खों को ही अपनाएँ। ऐसा करने से सौंदर्य में तो निखार आएगा ही, साथ ही रासायनिक वस्तुओं की हानियों से भी बचा जा सकेगा।


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विश्व की अनेक सभ्यताओं में चेहरे, होंठ, आँख, केश, नाखून एवं त्वचा-सौंदर्य को सुरक्षित रखने और बढ़ाने के उद्देश्य से अनेक प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल होता है। यहाँ तक तो गनीमत थी, पर जैसे ही आधुनिक वैज्ञानिक युग ने हमें चकाचौंध करना शुरू किया कि तमाम रसायनों, नए यौगिकों ने हमारे जीवन में प्रवेश किया। नतीजा कृत्रिम सौंदर्य प्रसाधनों के सैलाब के रूप में मानते हैं। इनके दुष्प्रभाव एवं जहरीले असर अपने शुरुआती दौर से ही सामने आते रहे हैं।


विजयी हुए (kahani)

भिक्षु पूर्ण तथागत से जन-समाज में धर्मोपदेश करने की आज्ञा माँगी। भगवान् बुद्ध ने शिष्य से कहा, “वत्स ! वहाँ के लोग बड़े कठोर हैं, तुम्हें गालियाँ देंगे।” शिष्य ने कहा- “भगवन् फिर भी अच्छा है कि वे मारेंगे तो नहीं।” “और यदि मारने ही लगें तो ?” “तो क्या हुआ भगवन् ! वे मेरे प्राण तो न ले लेंगे।” “कदाचित् ऐसा ही हो गया तो ?” बुद्ध ने पूछा। “भगवन् ! यह शरीर परोपकार में नष्ट हो जाए तो यह जीवन सार्थक ही होगा।” पूर्ण का उत्तर सुनकर भगवान बुद्ध बहुत प्रसन्न हुए। बोले, “जाओ वत्स ! धर्म तुम्हारी अवश्य ही रक्षा करेगा।” लोकसेवी में ऐसा ही सत्साहस होना चाहिए।

प्रतापभानु कैकय देश के राजा श्वेतकेतु के पुत्र थे। उन्होंने अपने समस्त शत्रुओं को पराजित कर वैभव बटोरा और संपन्नता को सारे राज्य के नागरिकों हेतु बिखेर दिया। इस सीमा पर पहुँचकर उन्हें अपने कीर्तिवान-यशस्वी होने का अहंकार हो गया। चिंतन की यही विकृति उन्हें ले डूबी। उनका शत्रु कालकेतु व अन्य राजा कपट से उन्हें अपने वश में कर ब्राह्मणों का श्राप दिलाने में सफल हो गए और उन्हें अगले जन्म में रावण बनना पड़ा। उनने मंत्री व छोटे भाई ने कुँभकरण व विभीषण के रूप में जन्म लिया। लगभग सभी असुरों का इतिहास यही बताता है कि उन्हें चिंतन व चरित्र की विकृतियों ने ही गिराया है। देवगणों ने इस विभूति को खोया नहीं, अतः जब भी वे संगठित हुए, विजयी हुए।


नियति को बदलने का सूक्ष्म विज्ञान

किसी भी ज्योतिषी, भविष्यवक्ता रहस्यदर्शी और अंतर्ज्ञानी की भविष्यवाणी शत-प्रतिशत सही सिद्ध नहीं होती। कारण भविष्यकथन करने वाले का अपना दोष या उस विद्या में अधूरी गति का होना हो सकता है। लेकिन सफलतम भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणियाँ भी गलत निकलती हैं। उदाहरण के लिए, इस शताब्दी में ज्योतिष विद्या को नया आयाम देने वाले डॉ. वी.वी. रमन ने बैंगलूर में एक उद्योगपति की जन्मकुँडली देखी। कहा कि यह व्यक्ति अपनी अगली समुद्र-यात्रा में डूबकर मर जाएगा।

उद्योगपति ने महीने भर बाद ही समुद्री यात्रा की। वह सकुशल गंतव्य स्थान पर पहुँचा। जिस होटल में वह ठहरा वहाँ भोजन में उसने मछली पसंद की। खाते समय मछली के शरीर में गलती से छूट गया काँटा उसके गले में फँसा। उसे निकालने के लिए किए गए आपरेशन के दौरान उद्योगपति की मृत्यु हो गई। इस प्रसंग में भविष्यवाणी को न तो गलत हुआ कहेंगे और न ही सही। गलत इसलिए नहीं कि मृत्यु समुद्री यात्रा संपन्न होने के बाद हुई और उसके कारणों में जलचर प्राणी भी था। सही इसलिए नहीं कि उसके लिए समुद्र में डूबकर मरना बताया था। बहुत कुशल, निष्णात और अप्रतिम दिव्यदर्शियों की भविष्यवाणियाँ भी इसी तरह गलत होती देखी गई है।

साधारण ज्योतिषी या अंतर्ज्ञानी अपनी विद्या का सही इस्तेमाल नहीं कर पाने के कारण कई बार चूक जाते हैं। यहाँ तक ठीक है, लेकिन अचूक भविष्यकथन करने वाले क्यों चूकते हैं ? इसका उत्तर यही हैं कि नियति को पूरी तरह भाँप लेने की सामर्थ्य अभी विकसित नहीं हो सकती है। वर्तमान को ही ठीक से नहीं देखा-समझा जा सकता, जो सामने हैं। फिर भविष्य तो अनागत है, उसे समझना और भी कठिन हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भाग्य-भविष्य की कोई सत्ता ही नहीं है।

भाग्य और नियति को अपने पूर्वकृत कर्मों के परिणाम के रूप में देख सकते हैं। ज्योतिषियों के स्थान पर ज्योतिर्विद्या को केंद्र में रखें तो यह निष्कर्ष निकलता है कि यह विद्या मनुष्य के पिछले कर्मों का दंड-पुरस्कार बताने वाला विज्ञान है। प्रो. वी.वी. रमन से किसी ने पूछा कि कर्मों का परिणाम अटल है। भाग्य में जो लिख है वह होना ही है तो उसे जानने से क्या लाभ ? अवश्यंभावी को जानकार उसके तनाव में अपना वर्तमान क्यों खराब किया जाए ? प्रो. रमन ने उत्तर दिया कि उस जानकारी के आधार पर अपने भविष्य को सुधारा जा सकता है। कम-से-कम यह तो किया ही जा सकता है कि हम अपने किए हुए कर्मों का परिणाम भुगतने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहें। आगे सड़क खराब है, रास्ते में लोग हमला करेंगे या किसी रोग के पूर्व लक्षण प्रकट होने लगे हैं तो उनसे निपटने की तैयारी की जा सकती है। दुखद संभावनाएँ टाली नहीं जा सकती तो कम-से-कम उनसे निपटने और पार हो जाने का धीरज ही अपना लिया जाए। इन सावधानियों के लिए भविष्य में झाँकने का व्यायाम किया जाए।

प्रो. रमन कहते थे कि भविष्य को जान लेने के बाद उसे बदला भी जा सकता है। निचली अदालत में कोई जुर्म सिद्ध होने और सजा सुनाई जाने के बाद ऊँची अदालतों में अपील की जाती है। वहाँ भी अपराध सिद्ध हो जाए तो दो स्थितियाँ होती हैं। एक सजा बहाल रहे और दूसरे उसमें कुछ छूट मिल जाए या दंड का स्वरूप बदल जाए। निचली अदालतों में फाँसी की सजा सुनाए लोगों को बड़ी अदालतों में अक्सर राहत मिलती है। उनकी फाँसी अक्सर आजीवन कारावास में बदल जाती है। भाग्य में उलट-फेर की संभावना इसी तरह मौजूद रहती हैं। उस संभावना का उपयोग किया जाना चाहिए।

भाग्य-भविष्य की सत्ता निश्चित रूप से हैं। उसे नकारा नहीं जाना चाहिए। लेकिन यह प्रतिपादन आधा सच है। प्रतिपादन का शेष अंश यह है कि भाग्य-भविष्य को बदला भी जा सकता है। चेतना के एक स्तर पर पहुँचने के बाद भावी घटनाओं का न केवल पूर्वाभास होता है, बल्कि उन्हें नियंत्रित भी किया जा सकता है। उनकी दिशाधारा बदली भी जा सकती है। प्रो. एस.के. सुब्रह्मण्य स्वामी ‘एस्ट्रो डेस्टिनी एँड विलनेस’ पुस्तक में लिखते हैं, मान लो कि तुम एक बहुत ऊँचे स्थान पर हो जहाँ से सब कुछ देख सकते हो। पूर्व की दिशा में तुम एक मोटर को आते देखते हो और दूसरी दिशा से एक गाड़ी को। एक मोड़ है जहाँ पहुँचने तक किसी भी वाहन चालक को दूसरा वाहन नहीं दिखाई देता। तुम देखते हो कि उस मोड़ पर पहुँचने तक इन दोनों गाड़ियों रोका न जा तो वे आपस में अवश्य टकराएँगी। ऊँचे स्थान पर बैठकर इस संभावना को देखना भविष्य जानने का एक तरीका है। पूर्व निर्देश को समझकर रास्ता निश्चित करने वाले संकेत या रोशनी की व्यवस्था उस नाजुक मोड़ पर की जा सके तो दुर्घटनाएँ टल सकती है।अपने भीतर ऊँचाई पर चढ़कर देखने जैसी क्षमता विकसित कर ली जाए तो घटनाओं का रुख मोड़ा-मरोड़ा जा सकता है।

प्रो. स्वामी ने लिखा है कि कई बार भाग्य-भविष्य जैसी कोई चीज नहीं होती। हम मान लेते हैं कि ऐसा होगा और वह हो जाता है। कभी किसी को स्वप्न दिखाई देता है कि दफ्तर में बाँस से झगड़ा हो रहा है और दिन में झगड़ा हो जाता है। एक बार स्वामी ने सपना देखा कि बस में उनकी जेब कट गई है। उनके पास फियेट गाड़ी थी, शहर और बाहर उसी गाड़ी से वे सफर करते थे। चिंता की कोई जरूरत नहीं थी, लेकिन प्रो. स्वामी ने सोचा कि ऐसा हो सकता है। सपने सच होते हैं। कुतूहल रहा कि सपना सही कैसे होता है। दिन में अपने काम पर निकलते हुए उन्होंने पर्स निकालकर सीट पर रख या। रेड लाइट पर एक जगह गाड़ी रुकी। पास ही एक सिटी बस भी रुकी। पलक झपकते ही सिटी बस से एक आदमी उतरा। उसने खिड़की के भीतर हाथ डाला। सीट पर रखा पर्स झपटकर चला गया।

वर्षों तक प्रो. स्वामी मानते रहे कि उनके सपने सही होते हैं। एक बार उन्होंने अपने पुत्र को लेकर बहुत बुरा स्वप्न देखा। उस स्वप्न में पुत्र दुर्घटना का शिकार हो जाता है। उसके दोनों पाँव काट देने पड़ते हैं। प्रो. स्वामी चिंतित हो उठे। उन्होंने कुँडलिनी विद्या के आचार्य पंडित गोपीनाथ कविराज से इस स्वप्न के बारे में बताया और कहा कि ऐसा उपाय बताएँ, जिससे यह स्वप्न सही न निकले। पंडित जी ने कुछ पल के लिए आँखें मूंदी, ध्यान लगाया और कहा, “आपके सपने इसलिए सही होते हैं कि आप ऐसा मानते हैं। अगर आप अपनी इस मान्यता से पिंड छुड़ा लें तो दुर्घटना को टाला जा सकता है।”

प्रो. स्वामी ने विवशता जताई कि इस मान्यता से पिंड छुड़ाना कठिन है। अनुभव तो यही कहता है कि सपनों के माध्यम से पूर्वाभास होता है। पंडित गोपीनाथ कविराज ने विवशता से उबरने का उपाय सुझाया। उन्होंने कहा कि अपने उन सपनों के बारे में सोचो जो गलत निकलते हैं या उनके बारे में सोचो जो अनर्गल से हैं। जिनकी कोई संगति नहीं बैठती। प्रो. स्वामी ने अपने सपनों की समीक्षा शुरू की और पाया कि सही नहीं उतरने वाले सपनों का अनुपात तीन-चौथाई है। कुछ सपनों के बारे में इस निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद उन्होंने इस अभ्यास को आगे बढ़ाया। यह मान्यता थोड़ी ढीली हुई कि सपने सही होते हैं। प्रो. स्वामी लिखते हैं कि वह दृश्य देखे आठ वर्ष हो गए। सपना गलत सिद्ध हुआ।

निष्कर्ष यह है कि स्वप्न भविष्य का बोध कराते हैं, यह बात सही है। उतनी ही सही बात यह भी है कि देखे गए स्वप्नों को सही करने वाली शक्ति भी अपने ही भीतर है। मन से उत्पन्न हुई वह शक्ति निरी कल्पना को भी सच कर दिखाती है। प्रो. स्वामी लिखते हैं कि ज्योतिषी को इसलिए दुखद भविष्यवाणियाँ करने से बचना चाहिए, हो सकता है नियति का विधान किसी और तरह काम करे और होनी जिस रूप में दिखाई दे रही है, वह टल जाए। लेकिन एक बार दुखद भविष्यवाणी कर दी गई और जातक ने उसे मान लिया तो दुःख की आशंका और भी घनीभूत हो जाती है। वह संभावना टल रही हो तो भी वापस बुला ली जाती है।

रोग, नुकसान, मृत्यु, विग्रह आदि भविष्यवाणियों के सही होने में सिर्फ होनहार ही कारण नहीं है, उनकी घोषणा भी एक अंश में जिम्मेदार है, जो दुर्घटनाओं के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि रचती है। इस तरह की घोषणाएं कभी कभार जातक के मन में प्रतिरोध क्षमता उत्पन्न करती हैं। वह उन्हें रोकने के लिए कमर कसता है, उन्हें टालता भी है। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर ‘भूत’ की कल्पना करने वाले व्यक्ति के सामने सचमुच भूत के आ जाने और निगल जाने के मिथक की तरह व्यक्ति अपनी मान्यता से भी अपना विनाश रच लेता है।

भाग्य को जान लेने के बाद उसे बदलने का उपक्रम किया जा सका तो यह ज्योतिष का सही उपयोग है। सवाल हो सकता है कि भाग्य को बदला कैसे जाए ? बहुत बार सिद्धपुरुषों का अनुग्रह भी काम आता है, बशर्ते कि वह प्राप्त किया जा सके। देवरहा बाबा के संबंध में एक वृत्ताँत प्रसिद्ध है कि वाराणसी की उनकी किसी भक्त महिला ने ज्योतिषी को अपनी कुँडली दिखाई। ज्योतिष्ज्ञी ने कहा वैधव्य योग है। तुम्हारे पति के साथ दुर्घटना हो सकती है और उनके प्राण संकट में फँस जाएँगे। वह महिला घबराई, क्योंकि अनुभव था कि इस ज्योतिषी की प्रायः सही निकलती है। अपनी जन्मपत्री लेकर वह महिला देवरहा बाबा के पास गई। उनके सामने अपनी समस्या रखी, बाबा ने जन्मपत्री माँगी, कुछ देर अपने हाथ में रखी, मंच पर बैठे-बैठे ही उन्होंने जन्मपत्री पर अंगुली से कुछ लिखने का उपक्रम किया और महिला से एक मंत्र बुलवाया। पत्री वापस करते हुए उन्होंने कहा, तुम्हारे सौभाग्य में वासुदेव की प्रतिष्ठा हो गई। जा, कुछ नहीं बिगड़ेगा। कुछ महीनों पहले उस महिला का निधन हुआ। मरते समय उसने अपने पति को सामने खड़ा रखा और उसे अपलक निहारते हुए प्राण छोड़े। आत्मबल संपन्न दिव्यदृष्टा सद्गुरु में वह शक्ति है, जो कि भवितव्यता को टाल भी सकती है, उसे हलका भी कर सकती है।

सिद्ध संतों के, सद्गुरुओं ने अनुग्रह के अलावा भी उपाय है। उनका अनुग्रह प्राप्त करने के लिए पात्रता आवश्यक है। उसे सिद्ध किए बिना सिद्धों को भी प्रकृति के विधान में हस्तक्षेप के लिए राजी नहीं किया जाता। निजी स्तर पर किए जाने वाले प्रयत्नों में भी पात्रता विकसित करनी पड़ती है। नियति किसी गंभीर और आश्वस्त करने वाले कारणों के आधार पर ही अपने निर्धारण बदलती है। नियति को बदलने वाले उपायों में तीन प्रमुख हैं-एक इच्छाशक्ति, दूसरा विनय और तीसरा नियति को समझने और तद्नुकूल अपने आपको ढाल लेने वाला ज्ञान। तीसरे उपाय को एक ही शब्द में ‘गुह्य ज्ञान’ भी कहा जा सकता है।

इच्छाशक्ति अर्थात् अपने आप को बदली हुई नियति के योग्य सिद्ध करने का संकल्प। संसार में किसी भी व्यक्ति को इसलिए छूट नहीं दी जाती कि उसने बहुत कष्ट भोग लिया। अकारण दया और क्षमा का नियम बना लिया जाए तो प्रत्येक अपराधी और पापी को मनमाना आचरण करने की छूट मिल जाएगी। वह इस आधार पर गलत रास्ते पर चलता रहेगा कि क्षमा तो मिल ही जाएगी। क्षमा नहीं किए जाने के पीछे कठोरता कारण नहीं है। प्रकृति या नियति में अकारण क्षमा नहीं करने का विधान दरअसल उदारता और हित की भावना से ही है। क्षमा को यदि एक सामान्य नियम मान लिया जाए तो किसी को अपना सुधार करने, विकसित होने और योग्य बनने की प्रेरणा ही नहीं मिलेगी। अहैतुकी क्षमा के बाद फिर व्यक्ति अपना कल्याण भी नहीं कर सकेगा। अस्तु ‘इच्छा-शक्ति’ का इतना ही मतलब है कि हम अपने आपको बदलने का संकल्प करते हैं। इसलिए संकल्प करते हैं कि अपनी दूसरी योग्यताओं के बल पर समाज का अधिक हित कर सकें। मानवीय आधार पर डॉक्टरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और प्रतिभाओं को उनकी छोटी-मोटी भूलों के लिए कालाँतर में क्षमा कर दिया जाता है। उस स्थिति में न्यायाधीश का विवेक क्षमा का निर्णय इस आधार पर करता है कि प्रतिभा अपने आप को बदलने के लिए तैयार है। दूसरे उसकी योग्यता और प्रतिभा से समाज की बेहतर सेवा हो सकती है। वह सेवा दंड या कारावास भोगते रहने पर संभव नहीं होती।

अपने आपको बदलने और विश्व को अधिक सुँदर, उन्नत, व्यवस्थित बनाने के लिए समर्पण का मन बना लिया जाए तो नियति में बदलाव आने लगता है। तब प्रकृति एक अवसर देती है। ऊपर सिद्ध कृपा के जो उदाहरण दिए गए हैं, उनके पीछे भी यही रहस्य है। जिन लोगों की नियति में बदलाव आया, उनके लिए नियति ने उद्देश्यपूर्ण उदारता ही बरती। योगी सदानंद ने इस उदारता की व्याख्या करते हुए लिखा है, “यदि हम अपने आपको दिव्य प्रयोजनों के लिए समर्पित कर सकें तो भागवत् चेतना हमारी नियति अपने हाथ में ले लेती है। इससे कर्म-बंधन छूट जाते हैं, पिछले जन्मों में किए गए कर्म केंचुली की तरह उतर जाते हैं और व्यक्ति अधिक तेजस्वी होकर चमकने लगता है।”

ध्यान नपहे इच्छाशक्ति का उपयोग कुटिल भावना से नहीं किया जा सकता। बदलने या सुधरने का ढोंग कर अपने लिए क्षमा नहीं बटोरी जा सकती। बाहरी दुनिया में काम करने वाली न्याय−व्यवस्था को झाँसा देना कितना ही आसान हो, दिव्य प्रकृति में कोई झाँसेबाजी नहीं चलती। दिव्य जगत् में काम कर रही शक्तिधारा को समझकर, उससे सामंजस्य बिठाते हुए काम किया जाए तो नियति में स्वतः परिवर्तन आने लगता है। उसके लिए कामना करने की आवश्यकता भी नहीं रह जाती।

नियति में बदलाव की संभावना का उपयोग करने के लिए ‘विनय’ दूसरा आवश्यक गुण है। विनय का अर्थ सामान्य व्यवहार में बरती जाने वाली शिष्ट भाषा, सम्मान और शालीनता नहीं है। यह तो अपने आपको भागवत् चेतना के हवाले छोड़ देने और अकिंचन हो जाने की मनःस्थिति है। उस स्थिति में अहंकार का नाम-निशान नहीं बचता। एकबारगी तो यह परवाह भी छोड़ देनी पड़ती है कि नियति में उदार परिवर्तन भी आएँगे। अपने आपको कठोर तथा और अधिक क्रूर परिवर्तनों के लिए भी उसी कृतज्ञभाव से तैयार रखना पड़ता है, जैसा कि उदार परिवर्तनों के लिए तैयार किया जाता है। स्वयं को नियामक सत्ता का ‘यंत्र’ मान लेने और जैसा वह चाहे उपयोग करने देने की बेशर्त तैयारी इसी ‘विनय’ भाव में आती है। इस तैयारी के बाद नियति में परिवर्तन के लिए गुह्य ज्ञान का आश्रय लिया जा सकता है।


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यदि हम अपने आपको दिव्य प्रयोजनों के लिए समर्पित कर सकें, तो भागवत् चेतना हमारी नियति अपने हाथ में ले लेती है। इससे कर्मबंधन छूट जाते हैं, पिछले जन्मों में किए गए कर्म केंचुली की तरह उतर जाते हैं और व्यक्ति अधिक तेजस्वी होकर चमकने लगता है।


दृढ़ संकल्प से क्या कुछ संभव नहीं

‘मेघा’ हाँ यही नाम उसे उसके माता-पिता ने दिया था। जानवरों को चराना उसका काम था। वह सुबह जल्दी उठता, गायों का चारा डालता, काम निपटाकर खाना खाता। फिर अपनी कुपड़ी पानी से भरता। पोटली में गुड़ और बाजरे की रोटी बाँधता। पोटली कंधे पर लटकाकर अपनी गायों को लेकर जंगल की ओर निकल पड़ता था। जंगल में गायें चरतीं और मेघा पास में टीले पर बैठ जाता। अपनी जेब से मोरचंग निकालता और बड़े ही चाव से बजाता। साँझ होते ही वह अपनी गायें लेकर घर लौट आता। यही उसकी दिनचर्या थी। इस दिनचर्या में यदि कुछ और तत्व दूध में शक्कर की तरह से मिले थे तो वह थी, उसके भजन गाने की आदत और परसेवा की वृत्ति। इसी वृत्ति के कारण गाँव के लोग उसे मेघो जी या मेघा भगत कहते थे। एभी के मन में उसके लिए आदर था।

एक दिन मेघा घर लौटने की तैयारी में था, उसकी कुपड़ी में थोड़ा-सा पानी रह गया था तभी पता नहीं उसे क्या सूझा, उसने फटाफट एक गड्ढा खोदा। आक के चार-पाँच पत्ते तोड़ लाया। कुपड़ी का पानी गड्ढे में डाल दिया। पत्तों से गड्ढे को अच्छी तरह से ढक दिया और निशानी के लिए ऊपर छोटा-सा पत्थर रख दिया। इतना सब करने के बाद मेघा ने पीछे मुड़कर देखा, सूर्य धारों में डूब रहा था। उसने गायों को गाँव की तरफ हाँका।

अगले दो दिनों तक उसकी नजर में वह गड्ढा नहीं आया। तीसरे दिन जब वह गायें लेकर जंगल की ओर जा रहा था, तभी अचानक उसकी नजर उसी जगह पर पड़ी। उसने आक के पत्तों को हटाया, देखा तो वहाँ पानी नहीं था, परंतु उसके चेहरे पर ठंडी ठंडी भाप लगी। उसके मस्तिष्क में कुछ विद्युत् की तेजी से प्रकाशित हुआ और वह कुछ सोचने लगा।

इस सोच विचार के उपक्रम में उसके दिमाग में विचार आया कि जब चौथाई ‘कुपड़ी’ पानी से यहाँ नमीं बनी रह सकती है, तो फिर इस जमीन पर तालाब भी बन सकता है। वह पास ही खेजड़ी की छाया में बैठ गया और तालाब की बात को लेकर गाँव की खुशहाली के सपने देखने लगा।

साँझ को जब वह अपने घर लौटा तब उसने गाँववालों को सारी कहानी बताई और मिलकर तालाब खोदने की बात कही। पर उसकी बात पर किसी ने भी गौर नहीं किया। सभी कहने लगे कि इस रेगिस्तान में तालाब खोद पाना असंभव है-भगत जी। ऐसी बातें कल्पनाओं में ही अच्छी लगती हैं और कल्पनाएँ कभी साकार नहीं होती।

मेघा गाँववालों के असहयोग से हतोत्साहित नहीं हुआ। उसने दृढ़ संकल्प किया कि वह अकेला ही तालाब बनाकर दिखाएगा, भले ही इस कार्य में उसे कितना ही समय लगे। पुरुषार्थ और भगवत्कृपा पर विश्वास, यही मेघा की जीवन-नीति थी। भगवन् की याद कर उसने काम शुरू किया। वह हमेशा कुदाली-फावड़ा लेकर जाता। गायें एक ओर चरती रहती और वह खुद तालाब की खुदाई करता रहता। इस काम को करते हुए उसे कई वर्ष हो गए। पर वह थका नहीं था। श्रम जारी था।

समय के साथ मेघा का कठिन परिश्रम और संकल्प का परिणाम गाँववालों को दिखने लगा। थोड़ी बरसात हुई। पानी इकट्ठा हो गया। गाँववाले पानी देखकर फूले नहीं समा रहे थे। हर कोई मेघा के गुण गाने लगा। अब तो असंभव कहने वाले गाँव के लोग भी इस काम में साथ देने लगे। बड़े, बुजुर्ग, बच्चे, औरतें सभी मिलकर तालाब को पूरा करने में जुट गए। काम बारह वर्षों तक चलता रहा।

एक दिन काम करते वक्त मेघा की मृत्यु हो गई। लेकिन तब तक तालाब का काम भी पूरा हो चुका था। वर्षा हुई तालाब लबालब भर गया। मेघा का संकल्प गाँव की खुशहाली बन गया। गाँववालों ने तालाब के किनारे मेघा की यादगार स्थायी रखने के लिए कलात्मक छतरी बनवाई और ‘मेघा’ मेघो जी देवता के रूप में पूजे जाने लगे।

आज भी यह तालाब जैसलमेर-बीकानेर सड़क मार्ग पर बाय (भाप) गाँव में है। हालाँकि इसे बने हुए अब पाँच सौ वर्ष बीत चुके हैं, परंतु 500 वर्ष पुरानी होने पर मेघा जी की यह बात अभी भी नई है कि पुरुषार्थ और भगवान् की कृपा के मिलन से असंभव भी संभव हुआ करता है। इसके लिए जरूरत है तो सिर्फ मेघा जी के समान दृढ़ संकल्प की।


गीत गाते हैं ये पत्थर

जड़ हों या चेतन, सभी प्रकृति की रहस्यमय डोर से बँधे हैं। इन सभी का संचालन प्रकृति की अदृश्य ऊर्जा द्वारा होता रहता है। संचालन और नियमन की यह क्रिया बड़ी रहस्यमयी है। इसीलिए प्रकृति को रहस्यों का पिटारा कहा गया है। इसके रहस्यों का अंत नहीं है। तभी तो प्रकृति के आँगन में जड़ और बेजान समझे जाने वाले पत्थर भी यदा-कदा विचित्र तरह की हरकतें करने लगते हैं।

सामान्यतया पत्थर एक जड़ वस्तु है। वैसे तो परम चेतना सभी प्राणियों-पदार्थों में व्याप्त है, परंतु जड़ में यह प्रायः सुप्त एवं निष्क्रिय अवस्था में होती है। तभी तो जीवित वस्तुओं के समान ये चेतन नहीं होते। इसी वजह से पत्थरों को बेजान चीजें माना जाता है, परंतु ये पत्थर जब विशिष्ट हरकतें करने लगते हैं, तो बड़ा आश्चर्य होता है। आश्चर्यजनक होते हुए भी यह सत्य है कि पत्थरों की दुनिया में कुछ पत्थर ऐसे भी हैं जो गति करते हैं। ऑक्सफोर्ड शायर के एनस्टोन में ‘होरस्टोन’ नामक एक विशेष पत्थर है। जब भी लिडस्टोन चर्च की घड़ी रात को ठीक बारह बजे की घंटी बजाती है, तो यह पत्थर अपने पास बहने वाली नदी के किनारे गोल गोल घूमते हुए पहुँचता है और अन्य जीवों के समान पानी पीने का दृश्य उपस्थित करता है। यह क्रिया मुर्गे के बाँग लगाने, दोपहर अथवा वर्ष की किन्हीं निश्चित तिथियों में भी देखी गई है।

उत्सवों या बारातों में लोग खुशी से नाचते-गाते हैं। मनुष्यों की तरह यदि निर्जीव कहे जाने वाले पत्थर भी नाचते-गाते दिखाई देने लगें तो बड़ा ही अचरज लगता है। किंवदंती-सी लगने वाली यह घटना एवन के स्टेटनड्यू में पत्थरों की खदानों में होती है। एक विशेष अवसर पर इस खदान के कुछ पत्थर नृत्य करने लगते हैं। इस संबंध में आस पड़ोस में रहने वाले लोगों ने अनेकों जनश्रुतियाँ व्याप्त है। परंतु इस अनहोनी घटना की पुष्टि विख्यात वैज्ञानिक जेनैट और कालीनयार्ड ने सन् 1975 में स्वयं देखकर की थी।

सुविख्यात मनीषी ग्रीनसेल ने ब्रिटेन में एक स्थान का उल्लेख किया है। जहाँ पर बिखरे पड़े पत्थरों को उठाकर कभी भी गिना जाना संभव नहीं है। जब भी कोई कुछ पत्थरों को लेकर गिनने लगता है तो उनकी गिनती होने से पहले ही एकाएक कई पत्थर उसमें और मिल जाते हैं और गणनाकार्य रुक जाता है। अगणित प्रयासों के बावजूद इस संबंध में वहाँ कोई सफलता नहीं प्राप्त कर सका है।

लेजली ग्रीनसेल ने ब्रिटे के राल राइट पत्थरों का एक और रोचक उदाहरण प्रस्तुत किया है। क्राँपटन गाँव में इन पत्थरों की संख्या सत्तर है। परंतु ये पत्थर जब गोल घेरा बनाकर घूमने लगते हैं, तो इनकी सही संख्या बता पाना मुश्किल है। नए वर्ष मध्य रात्रि में ये पत्थर गोल घेरा या वृत्त बनाते हैं और बच्चों के समान उछलकूद करते गोल-गोल घूमने लगते हैं। घूमने की अवस्था में इनकी स्पष्ट संख्या की जानकारी नहीं मिलती। जब ये घूमना बंद कर देते हैं तो फिर से बेजान पत्थरों की तरह ही पड़े रहते हैं।

‘किंगस्टोन’ भी एक आश्चर्यजनक पत्थर के रूप में प्रसिद्ध है। इस पत्थर के बारे में एक प्रसिद्ध लोकमान्यता है कि यदि रात्रि के समय विवाहित युवतियाँ इसे अपनी छाती से लगाएँ तो उन्हें सुसंतति प्राप्त होती है। इसी तरह कार्नवाल के मेन एन ताल में कुछ ऐसे पत्थर भी हैं, जिनके बारे में यह कहा जाता है कि यह बीमारियों में लाभदायक होते हैं। इन्हें हीलिंग स्टोन कहा जाता है। खासकर इससे बच्चों के रोगों को ठीक होते देखा गया है। इस पत्थर के ऊपर ताँबे के पिन को गुजारने पर पिन में विचित्र तरह की हरकतें होती है। लोग इन हरकतों में अपने प्रश्नों का समाधान खोजते हैं।

पत्थरों से अनेक दूसरे लाभ और चमत्कार भी देखे गए है। स्कॉटलैंड में नवविवाहित दंपत्तियों को सुखी जीवन हेतु ........ के केंपल स्टोन का स्पर्श कराया जाता है। वार्निश टोल्वोन पत्थर बीमार बच्चों को आराम देता है। सन् 1972 ई. में जेनैट और कालीनयार्ड ने इस पत्थर का प्रयोग किया और तमाम मान्यताओं को सिद्ध होते देखा। आयरलैंड के काउंटी पार्क में एक पत्थर हैं, जो अनेक रोगों में लाभदायी होता है। लिंकोशायर में मान्यता है कि वहाँ के कुछ विशिष्ट पत्थरों को पीटने पर फसल अच्छी होती है। फसल बोने से पूर्व पारंपरिक ढंग से उसका पूजन भी किया जाता है।

श्रीमती एल. चेपमेन ने अपने ग्रंथ ‘द ले हंटर’ में पत्थरों से संबंधित अनोखी घटनाओं का वर्णन किया है। उन्हीं के शब्दों में, “मैं एक गाँव पहुँची। वहाँ पर पत्थरों के संबंध में अजीबोगरीब मान्यताएँ प्रचलित थी। मुझे इन पर विश्वास नहीं हुआ। मैं स्वयं तथ्य से अवगत होना चाहती थी। जैसे ही मैंने एक पत्थर को छुआ तो बड़ा तेज झटका लगा। हाथ और उँगलियाँ थरथराने लगी। यह थरथराहट बाद में दो दिनों तक बनी रही। अंत में मुझे अविश्वसनीय तथ्यों पर विश्वास करना पड़ा। श्रीमती चेपमेन ने इस तरह के अनेकों रोचक तथ्यों का संकलन किया है।

पत्थर भी अन्य जीवधारियों की तरह बढ़ते हैं, इसे स्वीकार कर पाना असंभव भले ही हो, पर यह है पूरी तरह से सच। काउंटी विकला आयरलैंड के एजाबोले चर्च में एक पत्थर 1.5 मीटर तक बढ़ गया था। डेनमार्क में टामरवार्ड नामक एक स्थान है। वहाँ पर भी इसी तरह की एक घटना में एक पत्थर में 3 मीटर यानि कि लगभग दस फुट की वृद्धि दर्ज की गई थी।

पत्थरों के साथ अनेकों रहस्यमयी बातें भी जुड़ी हुई हैं। वैसे भी चट्टानों को खोदने, छेड़ने पर प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना ही पड़ता है। सन् 1841 ई. में हियरफोर्ड में डीन मेरेवेदर एवं उनकी टीम सिल्वरी पहाड़ी में खुदाई कर रही थी। तभी उन्हें कुछ विशिष्ट एवं विचित्र पत्थर दिखाई दिए। जब उन्हें खोदकर निकालने का प्रयास किया गया तो अचानक वहाँ पर जबरदस्त तूफान उठा। कई बार के प्रयासों के बावजूद उन पत्थरों को निकाला न जा सका। इससे मिलती-जुलती एक घटना सन् 1940 ई. की है। लेपटर वेल्स के निकट हाबगोबलीन नामक एक प्रसिद्ध पत्थर है। इसे खोदने का प्रयास लेवीस एडवार्ड ने किया था। जैसे ही उन्होंने उस पत्थर पर हथौड़ा चलाया, एक तेज अंधड़ उठ खड़ा हुआ। वह अंधड़ अत्यंत भयावह था और वह जीवनभर लेवीस का पीछा करता रहा।

पत्थरों के संबंध में एक अनोखी बात यह भी है कि कुछ पत्थरों से प्रकाश निकलता है और कुछ पत्थर आपस में वार्त्तालाप भी करते हैं। काउंटमायो के केस्टलवियर में पत्थरों से विनिर्मित एक किला है। वर्ष के विशेष अवसर पर इन पत्थर खंडों से तरह तरह का प्रकाश निकलता है। लेस्टर से पाँच किलोमीटर दूर सिथत हंबला स्टोन की कथा भी बड़ी रोचक है। गरमी की तपती दुपहरी में सुरंग में इस पत्थर के पीछे सूर्य की चमक का आभास होता है।

‘किंग स्टोन’ जो एक घेरे में पड़े रहते हैं। कभी कभी इनमें फुसफुसाहट की आवाजें भी सुनाई देती है। जैसे कई व्यक्ति आपस में धीमी आवाज में बातें कर रहे हों। इस अविश्वसनीय बात को प्रमाणित करने के लिए रोडनी हेल ने 4 अप्रैल 1981 को प्रातः साढ़े नौ बजे अपने अत्यंत संवेदनशील उपकरण द्वारा इस आवाज को रिकार्ड करने का प्रयास किया। उन्हें काफी हद तक इसमें सफलता भी मिली।

ये समस्त तथ्य सही सत्य प्रमाणित करते हैं कि प्रकृति में कोई पदार्थ पूर्णतः निर्जीव नहीं है। सभी परम सत्ता द्वारा बनाई गई अद्भुत-अनोखी रचनाएँ हैं और सभी में वही परमात्मा संव्याप्त है, जिसके लिए कुछ भी असंभव नहीं। वह कही भी और कभी भी अपनी अनोखी अभिव्यक्ति प्रस्तुत कर सकता है।


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पत्थर एक जड़ वस्तु है। वैसे तो परमचेतना सभी प्राणियों-पदार्थों में व्याप्त है, परंतु जड़ में सुप्त एवं निष्क्रिय अवस्था में होती है, तभी तो जीवित वस्तुओं के समान ये चेतन नहीं होते। इसी वजह से पत्थरों को बेजान चीजें माना जाता है, परंतु ये पत्थर जब विशिष्ट हरकतें करने लगते हैं, तो बड़ा आश्चर्य होता है। आश्चर्यजनक होते हुए भी यह सत्य है कि पत्थरों की दुनिया में कुछ पत्थर ऐसे भी है, जो गति करते हैं।


स्वर्ग में भी कोई सुख नहीं (kahani)

एक गुरु के दो शिष्य थे। दोनों किसान थे। भगवान् का भजन-पूजन भी दोनों करते थे, किंतु एक बड़ा सुखी था, दूसरा बड़ा दुःखी। गुरु की मृत्यु पहले हुई, पीछे दोनों शिष्यों की भी। संयोग से स्वर्गलोक में तीनों एक ही स्थान पर आ मिले, पर स्थिति यहाँ भी पहले जैसी थी। जो पृथ्वी में सुखी था, यहाँ भी प्रसन्नता अनुभव कर रहा था और जो पृथ्वी में अशाँत रहता, यहाँ भी अशाँत दिखाई दिया।

दुःखी शिष्य ने गुरुदेव से कहा, “भगवन् ! लोग कहते हैं, ईश्वरभक्ति से स्वर्ग में सुख मिलता है, पर हम तो यहाँ भी दुःखी के दुःखी रहे।” गुरु ने गंभीर होकर उत्तर दिया, “वत्स ! भक्ति से स्वर्ग तो मिल सकता है, पर सुख और दुःख मन की देन हैं। मन शुद्ध हो तो नरक में भी सुख ही है और मन शुद्ध नहीं हो तो स्वर्ग में भी कोई सुख नहीं है।”


जन-जन की भागीदारी ही बचाएगी पर्यावरण को

मनुष्य ने जब से अपने को सृष्टि का मुकुटमणि मानकर वनस्पति एवं प्राणिजगत का जिस तेजी से विनाश करना आरंभ किया है, इसे देखते हुए मनीषियों का चिंतित होना स्वाभाविक है। विनाश का क्रम यदि यही रहा तो वह कहाँ जा पहुँचेगा, कहा नहीं जा सकता। इस संदर्भ में विश्वविख्यात तत्वचिंतक बरट्राँड रसेल ने अपनी कृति ‘दी साइंटिफिक आउटलुक’ में लिखा है कि विज्ञान के विकास से पूर्व मनुष्य प्राकृतिक तत्वों, जैसे-वर्षा, आँधी, तूफान, भूकंप अकाल आदि की अधीनता स्वीकारने में अभ्यस्त था। लेकिन विज्ञान के माध्यम से इस अधीनता से छुटकारा पा लेने के बाद वह उन कमजोरियों को प्रदर्शित करने लगा है, जो गुलाम से मालिक बनने वाला व्यक्ति दर्शाता है और अंततः औंधे मुँह खाई-खड्डे में जा गिरता है। अतः अब एक नए नैतिक दृष्टिकोण को विकसित करने की आवश्यकता दृष्टिगोचर होने लगी है, जिससे प्राकृतिक तत्वों की दासता के स्थान पर मानवेत्तर सृष्टि के प्रति मानव के अंतःकरण में निहित उत्कृष्टता के प्रति आदर का प्रतिष्ठापन हो। वैज्ञानिक तकनीकी विकास के साथ आज इसी सद्गुण की कमी पाई जाती है।

वनस्पति जगत् को ही लें तो मनुष्य के प्रति उसके अनेकों अनुदान हैं, जैसे कि अपने लिए खाद्यान्न, पालतू जानवरों के लिए घास चारा, वन्यपशुओं से रक्षा हेतु निवास आदि, ईंधन, औषधियाँ, सौंदर्य-प्रसाधन के विभिन्न पदार्थ और धार्मिक कर्मकाँडों के लिए आवश्यक हव्य-सामग्री आदि वनस्पति जगत् से ही उपलब्ध होती है। यही कारण है कि प्रकृति के प्रति आदर की भावना प्राचीनकाल से ही देखी जाती है। इस संबंध में विख्यात प्रकृति प्रेमी और वृक्ष-वनस्पतियों से प्रेमभरा व्यवहार कर विपुल मात्रा में फसल एवं फल-फूल आदि प्राप्त करने वाले वैज्ञानिक जेइम्स फरगुसन ने अपनी पुस्तक ‘ट्री एँड सर्पेंट वरशीप’ में विस्तृत विवरण प्रकाशित किया है। उनका कहना है कि हम अपनी धार्मिक मान्यताओं से संपर्क करने में वहाँ भूल करते हैं, जब हम यह प्रश्न करते हैं कि किसी के लिए यह आशा करना कैसे संभव है कि एक वृक्ष के प्रति की हुई प्रार्थना का उत्तर कैसे मिलेगा ? या फिर किसी वृक्ष की पूजा करने से उसकी संतुष्टि कैसे होगी ? वस्तुतः वृक्ष आदि के पूजन के पीछे उसमें निहित चेतनसत्ता के प्रति आभार या कृतज्ञता प्रकट करना होता है, जो अपना सर्वस्व लुटाकर भी हमारी हर तरह से सहायता करते हैं।

अपने देश में जो प्रकृति के प्रतीकों की पूजा प्राचीन काल से प्रचलित हैं, उसमें उपयोगिता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का समन्वय किया गया है। भारत में वृक्ष-वनस्पतियों आदि में देवी-देवताओं का निवासस्थान माना गया है। इस मान्यता के साथ इनमें संरक्षात्मक शक्ति की भी कल्पना की गई है। यह मान्यता भी परंपरा से चली आ रही है और इस शक्ति का अतिक्रमण करने से वही संरक्षात्मक शक्ति विषाक्तता, प्रदूषण आदि के रूप में घातक भी हो सकती है। इस तथ्य की जानकारी ऋषि-मनीषियों को प्राचीनकाल से ही थी। अथर्ववेद के काँड-4, सूक्त-3 के प्रथम श्लोक में बताया गया है कि प्रकृति की जीव सृष्टि का विनाश करने वाले व्याघ्र, चोर और भेड़ियों से हमारी रक्षा हो। वन्यप्रदेश, झरने एवं वायु को प्रदूषित करने वालों से हम सुरक्षित रहें। वृहदारण्यकोपनिषद् के अध्याय-3, ब्राह्मण-9, मंत्र-28 में तो मनुष्य और वृक्ष के विभिन्न अंगों की तुलना इस प्रकार से की गई है-

“मनुष्य की तरह वृक्षों का राजा है। मनुष्य के बाल उसके पत्ते हैं। उसकी त्वचा वृक्ष की बाह्य छाल है। जिस प्रकार मनुष्य की त्वचा से रक्त निकलता है, उसी प्रकार वृक्ष की छाल से रस निकलता है। घायल मानव के अंग से रक्तस्राव होता है, इसी तरह वृक्ष को काटने से रस बहने लगता है। मानव माँसपेशियों की तुलना वृक्ष के काष्ठ के साथ की जा सकती है। नसों की तुलना वृक्षों की अंतःछाल से की जा सकती है। मजबूत हड्डियों की तुलना काष्ठ के अंतःसार भाग से की जा सकती है। मानवी मज्जा की तुलना वृक्ष के गूदे से की जा सकती है।”

इस संदर्भ में उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के चार्ल्स डार्विन, जगदीशचंद्र बसु एवं राउल फ्राँस जैसे विश्वविख्यात अनुसंधानकर्त्ताओं ने वनस्पति एवं प्राणिजगत का गहन अध्ययन करके जो जानकारियाँ प्राप्त की थी, वे सभी जानकारियाँ ऋषि-मुनियों को प्राचीनकाल से ही थी। मूर्द्धन्य मनीषी एफ. डब्ल्यू. विलसन ने इस संबंध में ‘हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ के दूसरे खंड में लिखा है कि वे वृक्ष-वनस्पतियों आदि के अंतः और बाह्य गुण, धर्म, संरचना आदि के अति सूक्ष्म ज्ञान से अवगत थे। इतना ही नहीं इनकी विशेषताओं से, औषधीय गुणों से एवं अन्य उपयोगों से भी पूरी तरह अवगत थे। उन दिनों पेड़-पौधों का जंगलों का आज की तरह विनाश करके वातावरण को विषाक्तता से भरकर पारिस्थितिकीय संतुलन को बिगाड़ा नहीं जाता था। इतिहास के पन्ने-पन्ने पर इस बात के प्रमाण भरे पड़े है।

‘भारतीय कला’ नामक अपनी कृति में श्री वासुदेवशरण अग्रवाल ने इस संबंध में बताया है कि सिंधु घाटी सभ्यता के समय की जो मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं, इनमें वृक्ष-वनस्पतियों की विभिन्न प्रकार की नक्काशी पाई जाती है। हड़प्पा संस्कृति की एक मुद्रा पर एक वृक्ष-लता एवं एक नारी बनाई गई है, जो उर्वरता एवं हरीतिमा संवर्द्धन की प्रतीक है। चरक संहिता के विमान स्थान 3/11 में बताया गया है कि वनों का विनाश या जंगलों का कटते जाना राष्ट्र के लिए सर्वाधिक भयावह है, विशेषकर मानव-स्वास्थ्य के लिए। महाभारत के सोलहवें पर्व-राजधर्म, अनुशासन पर्व में स्पष्ट उल्लेख है कि पर्यावरण प्रदूषण के कारण मनुष्य दो प्रकार के रोगों का शिकार होते हैं। इनमें से एक रोग शरीर से संबंधित है तो दूसरा मन से। वस्तुतः ये दोनों तंत्र परस्पर घनिष्ठता से जुड़े हुए है। एक के बाद दूसरा अवश्य रुग्ण बना जाता है।

आयुर्वेद के महान् व्याख्याता महर्षि चरक ने अपनी संहिता के विमान स्थान के तीसरे अध्याय के दूसरे श्लोक में विस्तारपूर्वक बतलाया है कि पर्यावरणीय प्रदूषण के कारण ऋतुएँ अपने शीत, ग्रीष्म, वर्षा आदि धर्म से च्युत होने लगेंगी। पृथ्वी के रस सूखने लगेंगे, जिससे औषधीय पौधे अपने प्रभाव से वंचित होने लगेंगे और भिन्न-भिन्न प्रकार की नवीन बीमारियों से मनुष्य ग्रसित होता जाएगा। पदार्थ, मिट्टी आदि अपने सामान्य गुण, धर्म, रंग, गंध, स्वाद, स्पर्श आदि से विपरीत पाए जाएँगे। आवश्यकता से अधिक नमी पाई जाएगी। हानिकारक प्राणियों, जीव-जंतुओं-विषाणुओं की अभिवृद्धि से प्राणी तथा वनस्पति जगत् नए-नए प्रकार की बीमारियों से त्रस्त रहेंगे।

इस तरह महाभारत के अठारहवें पर्व के दसवें अध्याय के चौदहवें श्लोक में उल्लेख है कि वृक्ष-वनस्पतियों पर प्रदूषित वातावरण का प्रभाव पड़ने से वे मुरझा जाते हैं। परिणामस्वरूप विषाक्तता की अधिकता वातावरण में चहुँओर भरती जाती है। पेड़-पौधों की अधिकता न केवल आरोग्यकर शुद्ध वायु वितरित करके स्वास्थ्य-संवर्द्धन में सहायक होती है, वरन् जलवृष्टि का संतुलन बनाए रखने में भी सहायक होती है। शाँतिप्रदायक यज्ञों की सुगंधित वायु इसमें चार चाँद लगा देती है।

अमेरिका में केनेडा के गुलेप विश्वविद्यालय में कार्यरत सुप्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक प्रोफेसर ओ.पी. द्विवेदी ने अपनी कृति ‘एनवायरनमेंटल क्राइसिसि एँड हिंदू रिलीजन’ में कहा है कि वर्तमानकाल में प्राकृतिक पदार्थों, वनस्पति एवं जीवजगत के अंधाधुँध शोषण के कारण ही पर्यावरण का इस हद तक अपकर्ष हो रहा है, जो स्वयं मानवी अस्तित्व के लिए एक भयावह संकट बन गया है। उनने इसके मूल में मनुष्य की पर्यावरणीय नीति में अतीव लापरवाही बरतना और समाज के लिए नए मानदंडों की रचना करने में विफलता को माना है।

हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो के उत्खनन में प्राप्त प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि तत्कालीन निवासियों को जल एवं वातावरण प्रदूषण की पूरी जानकारी थी और नागरिक स्वास्थ्यरक्षा के लिए हर प्रकार के प्रबंध की व्यवस्था थी। भारतीय साहित्य में रामायणकाल से लेकर कुमारगुप्त एवं सम्राट अशोक के काल में नागरिक स्वास्थ्यरक्षा प्रत्येक का कर्त्तव्य माना गया था और लापरवाही के लिए अपराध संहिता थी। कौटिल्य अर्थशास्त्र के दूसरे अध्याय में वातावरण प्रदूषित करने वालों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रदूषणों के लिए दंड विधान निर्धारित था। इतना ही नहीं नगरों को प्रदूषण से बचाने के लिए विभिन्न स्थानों में पेड़ विशेष लगाने का प्रावधान था। आज के पर्यावरण में प्रदूषण से बचने का उपाय कुछ इसी तरह के प्रावधानों को अपनाने से हो सकता है, जिसमें जन-जन की भागीदारी हो। केवल सरकारी प्रयत्नों से यह संभव नहीं है।


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प्राकृतिक पदार्थों, वनस्पति एवं जीवजगत के अंधाधुँध शोषण के कारण ही पर्यावरण का इस हद तक अपकर्ष हो रहा है, जो स्वयं मानवी अस्तित्व के लिए एक भयावह संकट बन गया है। उनने इसके मूल में मनुष्य की पर्यावरणीय नीति में अतीव लापरवाही बरतना और समाज के लिए नए मानदंडों की रचना करने में विफलता को माना है।


विज्ञापनों के जरिए उजड़ता स्वास्थ्य-सौंदर्य

स्वास्थ्य, सौंदर्य और व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने के लिए प्रचुर साधन इन दिनों उपलब्ध है। बाजार विविध उत्पादनों से भरे पड़े है। पच्चीस-तीस साल पहले जितनी तरह की साबुन, उबटन, शृंगार आदि मिलते थे, उसे सौ गुना ज्यादा चीजें इन दिनों बाजार में भरी पड़ी हैं, लेकिन स्वास्थ्य, सौंदर्य और सुगढ़ता की दृष्टि से औसत स्थिति पिछड़ी ही है। बीमारियों के नए-नए इलाज इन दिनों खोज लिए गए हैं, लेकिन नई-नई तरह की बीमारियाँ लोगों को अपना शिकार बनाने लगी है। सौंदर्य संवारने के लिए साबुन, तेल, सुगंधित पदार्थ, विटामिन, शैंपू आदि उपलब्ध हैं, लेकिन स्वास्थ्य जिस तरह लड़खड़ाया है, उससे सारे उपाय बाहरी चमक ही दर्शाते हैं। जर्जर काया और चुकती जा रही जीवनी-शक्ति के कारण व्यक्तित्व खोखला ही होता चला जा रहा है।

बाजार में उपलब्ध साधनों और लोकजीवन में उनके प्रभाव-परिणामों का अध्ययन करने पर विचित्र विरोधाभास सामने आया है। एक सर्वेक्षण के अनुसार इन दिनाँक साठ से ज्यादा सौंदर्यवर्द्धक साबुन मिलते हैं। सभी की गुणवत्ता और संरचना के बारे में बढ़ चढ़कर दावे किए जाते हैं। फिल्मी सितारों से लेकर खिलाड़ी, कलाकार और बुद्धिजीवी तक जिनका काम व्यक्तित्व के आकर्षण से चलता है, इनका विज्ञापन करते देखे जाते हैं। प्रायः सभी साबुन सौंदर्य के रक्षक, प्रहरी और त्वचा को चिकना, कोमल रखने वाले विज्ञापित होते हैं। सन् 1970 तक आठ प्रकार के नहाने के साबुन प्रचलित थे। गाँवों-कस्बों में लोग इन साबुनों के उपयोग के अलावा मुल्तानी या काली मिट्टी से भी नहा लिया करते थे। अब इन परंपरागत उपायों का प्रचलन खत्म-सा हो गया है। लोग बीसियों तरह के साबुन इस्तेमाल करते हैं।

नमूने के तौर पर उत्तरप्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश के आठ गाँवों का सर्वेक्षण किया गया। वहाँ के लोगों के तीस साल पहले के रहन-सहन और जीवनशैली के साथ अब के रहन-सहन और जीवन-पद्धति के तुलनात्मक अध्ययन में विचित्र निष्कर्ष सामने आए हैं। इन गाँवों की आबादी 1970 की तुलना में ढाई गुना हो गई है। उस समय औसत आमदनी चालीस रुपये थी। अब 110 रुपये हो गई। पहले लोग प्रायः मोटा अनाज खाते थे, अब गेहूँ, पालिश किया चावल का प्रचलन हो गया है। घरों में मनोरंजन के साधन के नाम पर इक्का-दुक्का रेडियो-ट्राँजिस्टर थे, अब अधिकाँश घरों में छोटा-बड़ा टीवी सेट है। अर्थात् जीवन पहले से समृद्ध ही हुआ है।

सौंदर्य प्रसाधनों और साबुन-तेल के मामले में भी इन गाँवों में लोगों की रुचियाँ बदली हैं। अध्ययन करने वाली स्वयंसेवी संस्था ‘प्रयास’ के निष्कर्षों के अनुसार इन गाँवों में 1970 में लोग बहुधा नारियल का तेल इस्तेमाल करते थे, उबटन उगाते और दस में से दो घरों में ‘स्नो’ पाउडर आदि का इस्तेमाल करते थे। अब नारियल के डिब्बाबंद तेल का प्रचलन बढ़ा है। खुला मिलने वाले तेल किसी को नहीं रुचता। आर्निका, आर्निका प्लस, केयो कार्पिन, ब्राह्मी, मेरिको, पैराशूट जैसे उत्पादन गाँव-गाँव में बिकते हैं।

बिकने वाले सभी तेल प्रसाधन बालों को लंबे, घने और कोमल रखने वाले तत्वों को मिलाकर बनाए जाते हैं। विज्ञापनों के मुताबिक निर्माण के समय इन विशेषताओं के सम्मिश्रण का विशेष ध्यान रखा जाता है। होना यह चाहिए था कि लोगों के बाल स्वस्थ और सुँदर होते, लेकिन ‘प्रयास’ ने पाया कि हर घर में तीन-पैंतीस की उम्र के बाद बालों के झड़ने की शिकायत आम पाई गई है। पच्चास की उम्र से आगे बढ़े लोगों में हर चौथा व्यक्ति गंजेपन का शिकार हुआ है।

प्रचार माध्यमों पर आने वाले हर पाँचवे छठे विज्ञापन में दाँतों की देखभाल के लिए अलग-अलग टूथपेस्ट का संदेश होता है। तीन दशक पहले लोग दातुन, मंजन, काली मिट्टी और पिसे हुए कोयले या राख से दाँत साफ करते थे। इन चीजों का इस्तेमाल प्रचार माध्यमों के जरिए अवैज्ञानिक और हानिकारक ठहरा दिया गया है। गाँव-कस्बों में भी दर्जनों प्रकार के टूथपेस्ट और ब्रश मिलने लगे है। दिन में चार-पाँच बार पेस्ट करने की हिदायत दी जाती है। सुबह उठते समय और रात को सोने से पहले ब्रश या मंजन करने की बात फिर भी समझी जा सकती है। विज्ञापनदाता दो बार के खाने और नाश्ते के बाद भी ब्रश और माउथवाश की सिफारिश करते हैं। डेंटिस्ट एसोसिएशन के अखिल भारतीय सम्मेलन में पिछले दिनों यह रेखाँकित किया गया कि लोग पहले की तुलना में दाँतों पर चार गुना ज्यादा ध्यान देते हैं। इसके पीछे दाँतों के प्रति कोई अतिरिक्त सजगता कारण नहीं है, बल्कि विज्ञापनों में दाँतों की देखभाल के बजाय अमुक प्रकार का टूथपेस्ट, ब्रश और माउथवाश को अपनाने और निश्चित हो जाने का ही संदेश दिया जाता है। लोग उस संदेश को पढ़-सुनकर वास्तव में निश्चित हो जाते हैं और दाँतों की जरूरी देखभाल नहीं करते।

विज्ञापन और व्यापार पर ज्यादा ध्यान नहीं देने वाले विशेषज्ञों की राय में कोई भी फार्मूला दाँतों को स्वस्थ-निरोग नहीं रख सकता। उनकी दैनिक देखभाल तो जरूरी है ही, जिसमें सफाई और कुछ पोषक औषधियों का ज्यादा-से-ज्यादा दो बार इस्तेमाल पर्याप्त है। औषधियों का भी लेप और मालिश या मंजन ही। असल में पूरे शरीर का स्वस्थ और नीरोग होना, खानपान की नियमितता और अजीर्ण-कब्ज आदि की ‘मुक्ति से ही दाँतों का स्वास्थ्य संभला रहता है। नैसर्गिक जीवन जीने वालों का स्वास्थ्य इतना अच्छा होता है कि उन्हें अलग से दाँतों की देखभाल की जरूरत ही नहीं पड़ती।

सुँदरता के संबंध में कई मानदंड इन दिनों स्थापित हो चले है। उनमें स्वस्थ-सुडौल शरीर के स्थान पर छरहरा शरीर, रंगी-पुती काया और फैशन डिजाइनरों द्वारा रचे विज्ञापित किए गए वस्त्र मुख्य हैं। यह धारणा पुरानी, रूढ़िवादी और पिछड़ी करार दी गई है कि वस्त्र शरीर ढ़कने या मौसम के प्रभाव से बचने के लिए हैं यों पश्चिमी वेशभूषा, कोट, पेंट, टाई आदि भारतीय परिवेश के अनुरूप नहीं हैं। यहाँ के बहुरंगी मौसम के लिए भारतीय परिधान ही उपयुक्त है। लेकिन आज के समय में यह बात कहना घोर पिछड़ेपन का परिचायक है। पश्चिमी वेशभूषा को आधुनिक और वैश्विक करार देने वाली के सामने फिलहाल चुप रहा जाए। लेकिन वे भी मानते हैं कि नई-नई फैशन, नए डिजाइन किए गए वस्त्र और शरीर को ढकने के बजाय उघाड़ने-उभारने वाले कपड़े न स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त हैं और न ही सभ्यता के। जिन वस्त्रों को पहनकर निकलते हुए आसपास के माहौल, दूसरों के मूड़ और अभीष्ट काम पर ध्यान देने के बजाय, वेश विन्यास को संभालने पर ही केंद्रित रहना पड़े, उन्हें समझदारी तो नहीं ही कहेंगे।

प्रदर्शनप्रियता का ही दूसरा रूप शरीर को जबर्दस्ती छरहरा और दुबला-पतला रखने के लिए किए गए तरह-तरह के उपाय हैं। शरीर स्वस्थ और सुडौल हो, इसके लिए संतुलित आहार-विहार और श्रम-विश्राम ही काफी है। लेकिन इन दिनों डाइटिंग से लेकर वजन कम करने के लिए भाँति-भाँति के रस-रसायनों का उपयोग, कष्टकर व्यायाम और शरीर को कमजोर कर देने वाली नाममात्र की खुराक का फैशन चल पड़ा है। सौंदर्य ओर स्वास्थ्य विषय पर दिल्ली में हुई एक कार्यशाला में डॉ. अरविंद श्रीमाली ने अपने शोधपत्र में बताया कि पाँच लाख से ज्यादा जनसंख्या वाले शहरों में बीस प्रतिशत युवतियाँ भूखे रहकर मात्र पच्चीस प्रतिशत भोजन करती हैं। उन्हें आवश्यक कैलोरी की सिर्फ एक तिहाई मात्रा ही मिल पाती है। इस कारण तीस वर्ष की उम्र पार करने के बाद उन्हें सिर चकराने, जल्दी थक जाने और खून की कमी होने, नींद नहीं आने जैसी शिकायतें होने लगती है।

शरीर को धर्म-साधना का प्रमुख आधार कहा गया है। जिन्हें धर्मसाधना में कोई रुचि नहीं, उन्हें भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि लौकिक उद्देश्यों जैसे यश, वैभव, सफलता और सत्ता पाने के लिए शरीर का स्वस्थ-समर्थ होना जरूरी है, ने केवल जरूरी बल्कि अनिवार्य है। किसी भी दृष्टि से कमजोर और रुग्ण शरीर अपने उद्देश्य तक नहीं पहुँचता। उसकी उपेक्षा नहीं ही की जानी चाहिए।

दरअसल बाजार में आने वाले नए-नए साधनों और फार्मूलों का उपयोग करने वाले लोग शरीर की उपेक्षा नहीं करते। वे उपभोक्ता सामग्री बनाने वाली कंपनियों के मकड़जाल में उलझकर रह जाते हैं। स्वास्थ्य, सौंदर्य और प्रभावोत्पादक व्यक्तित्व किन्हीं उपादानों या रेडीमेड चीजों से प्राप्त नहीं होता। इस तथ्य को अपने मन-मस्तिष्क में बिठा लेना चाहिए कि संतुलित आहार-विहार और नैसर्गिक सहज-स्वाभाविक जीवनचर्या ही देह को बलिष्ठ, समर्थ और सक्षम रखती है। उसके लिए विज्ञापन देख-सुनकर तय नहीं किया जा सकता। प्रेरक और मार्गदर्शक साहित्य-संगीत आदि से ही सही रास्ता मिल सकता है।


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स्वास्थ्य, सौंदर्य और प्रभावोत्पादक व्यक्तित्व किन्हीं उपादानों या रेडीमेड चीजों से प्राप्त नहीं होता। इस तथ्य को अपने मन-मस्तिष्क में बिठा लेना चाहिए कि संतुलित आहार-विहार और नैसर्गिक सहज-स्वाभाविक जीवनचर्या ही देह को बलिष्ठ, समर्थ और सक्षम रखती है।


हृदय रोगों को हम स्वयं आमंत्रित करते हैं।

आज के दौर में आक्रामक-प्रतिस्पर्द्धात्मक जीवन-शैली ने भौतिक सुख-सुविधाओं ने भारी वृद्धि की हैं, लेकिन साथ ही मनुष्य की मानसिक-शाँति एवं शारीरिक स्वास्थ्य को भी बुरी तरह नष्ट कर दिया है। उऋ. रक्तचाप से ग्रसित लोगों की बढ़ती संख्या इसी की देन है। नवीनतम वैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार विश्व-जनसंख्या की लगभग 25 प्रतिशत आबादी इसकी चपेट में है। सामान्यतया संकट के समय सामना करने के लिए प्रकृति स्वयं ही हमारा रक्तचाप बढ़ा देती है, लेकिन यह बढ़ा हुआ रक्त-चाप स्थिति सामान्य हो जाने पर स्वतः ही सामान्य हो जाता है। परंतु आजकल क्रोध, भय, उत्तेजना व असंतुष्टि के जाल में उलझे-फंसे व्यक्ति में संकट से लड़ने की क्षमता ही खत्म होती जा रही है। इसके फलस्वरूप यदि रक्तचाप बढ़ता है तो बढ़ा ही रह जाता है।

हमारे शरीर में रक्तसंचार के लिए लिए सिकुड़ता-फैलता रहता है। जब दिल सिकुड़ता है तो बड़े जोर से रक्त को धमनियों में धकेलता है। धमनियां रक्त ग्रहण करते समय फैलती है और फिर रक्त को आगे बढ़ाने के लिए सिकुड़ती है। बारी-बारी से रक्त प्रसार व ग्रहण के निमित्त हृदय में संकुचन या प्रसार-क्रिया होती है। यदि धमनियाँ लचीली, नरम व स्वच्छ होती हैं तो हृदय को रक्त प्रवाहित करने व धकेलने में अतिरिक्त श्रम नहीं करना पड़ता है। लेकिन यदि किसी कारण से धमनियाँ संकरी व कड़ी हो जाएँ तो हृदय को रक्त प्रवाहित करने के लिए अतिरिक्त श्रम करना पड़ता है, जिससे व्यक्ति उच्च रक्तचाप का शिकार हो जाता है।

एक सामान्य व्यक्ति में 80 (निम्न) से 120 (उच्च) मि.मी. ब्लडप्रेशर होता है। 90-100 (निम्न) से 104-150 मि.मी. (उच्च) तक मोडरेटेड ब्लडप्रेशर माना जाता है। व्यक्ति की उम्र, लिंग, शारीरिक व मानसिक श्रम के अनुसार रक्तचाप का सही अनुपात भी भिन्न-भिन्न होता है।

कृत्रिम-अप्राकृतिक जीवन, असंयमित खानपान और आहार-विहार से रक्त में विकार बढ़ता चला जाता है। निजी, घरेलू और कार्यक्षेत्र की समस्याओं से मन-मस्तिष्क में यदि तनाव बना रहता है तो इससे भी रक्त में विकार उत्पन्न होते रहते हैं। विकार युक्त रक्त से धमनियाँ संकरी व कड़ी हो जाती है और रक्त-संचरण में बाधा आती है। रक्तचाप का रोग शरीर की दूषित अवस्था से शुरू होता है और कभी-कभी यह इतना भयंकर रूप ले लेता है कि रोगी के लिए जानलेवा सिद्ध हो जाता है।

उच्च रक्तचाप के अनेक कारणों में शरीर में नमक की अधिकता एक मुख्य कारण है। शुरुआत में जब लगे कि रक्तचाप सामान्य से अधिक हो रहा है, तो समझ लेना चाहिए कि शरीर की आवश्यकता से अधिक नमक ग्रहण किया जा रहा है। नब्बे प्रतिशत मामलों में यही कारण पाया जाता है। यदा-कदा यह बीमारी आनुवंशिक भी होती है। माता-पिता में से एक या दोनों के उच्च रक्तचाप से पीड़ित होने की स्थिति में बच्चे में भी इसके होने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त गुरदे की खराबी, शरीर में हारमोन का असंतुलन, लंबे समय तक गर्भ-निरोधक गोलियों का इस्तेमाल, गर्भावस्था, परिस्थितियों का दबाव, विपरीत मनोदशा एवं आवश्यक आराम का अभाव आदि अनेक ऐसे कारण हो सकते हैं, जो इस बीमारी को जन्म देते हैं। चाय, कॉफी एवं नशीले पदार्थों का अधिक सेवन भी रक्तचाप को बढ़ाता है। चिकित्सकों के अनुसार मात्र एक सिगरेट पीने से रक्तचाप आधे से लेकर एक घंटे तक बढ़ा रह सकता है और दिनभर धूम्रपान करने से पूरे दिन रक्तचाप बढ़ा रह सकता है। मोटापा भी उच्च रक्तचाप का एक बहुत बड़ा कारण है। एक सामान्य आदमी का वजन 45 से 75 किलो के बीच होना चाहिए। यदि वजन लंबाई एवं उम्र के निर्धारित आनुपातिक वजन से ज्यादा बढ़ता है, तो रक्त कोशिकाओं, नालियों व हृदय पर बुरा असर पड़ता है।

उच्च रक्तचाप के शिकार व्यक्ति को सिर में दर्द, चक्कर आना, चिड़चिड़ापन, तनाव, मुँह लाला होना, धमनियों का फूल जाना, साँस फूलना जैसे मुख्य लक्षणों के अलावा दिल में दर्द हो सकता है, जिसे हाईस्ट्रोक कहते हैं। स्थिति ज्यादा खराब होने पर दिमाग की नस फटना, आँखों के परदे पर विकार आ जाने से दृष्टि कमजोर होना एवं गुरदे पर असर होने से इनका कमजोर होना, जैसे घातक लक्षण प्रकट होते हैं। कई बार रक्तचाप के अचानक तीव्र हो जाने से गुरदे भी अचानक नष्ट हो सकते हैं। एक शोध-रिपोर्ट के अनुसार लगभग 15 प्रतिशत उच्च रक्तचाप के रोगी गुरदे के विकार से ग्रस्त होते हैं। उच्च रक्त चाप से गुर्दों पर पड़ने वाले असर को नेफ्रोस्कलोसिस कहते हैं। इस असर को ‘माइक्रो एल्ब्यूमिल विधि’ द्वारा पहचाना जा सकता है।

उक्त रक्तचाप से हृदय की माँसपेशियों में स्थायी रूप से दोष उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे पंपिंग क्रिया प्रभावित होती है व हार्टफेल हो सकता है। मेरीलैंड यूनिवर्सिटी के शोधकर्त्ताओं की एक टीम ने इस आशय की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है। डॉ. डब्लू. जोनाथन लेडरेट के नेतृत्व में किए गए इस शोध-अध्ययन में इन वैज्ञानिकों ने पाया कि दिल की सामान्य धड़कन के लिए हृदय की कोशिकाएँ क्रमशः बढ़ती जाती हैं और इससे कैल्शियम चैनल व आर्गेनल चैनल के बीच की दूसरी भी बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप दोनों कोशिकाओं के बीच कम्यूनिकेशन घटता जाता है और हार्टबीट कमजोर पड़ती जाती है। जिसकी अंतिम परिणति हार्टफेल के रूप में होती है। डॉ. लेडरेट का कहना है कि उच्च रक्तचाप लंबे समय तक रहने से यदि हृदय की पेशियों में यह दोष उत्पन्न हो जाए तो इसे फिर से ठीक करना प्रायः असंभव हैं। ज्यादा से ज्यादा इन पेशियों की बढ़ी हुई स्थिति को स्थिर किया जा सकता है।

उच्च रक्तचाप न हो इसके लिए सबसे जरूरी है खानपान एवं आहार-विहार में संयम। प्रातःकाल ठंडी हवा में टहलना, थोड़ी देर व्यायाम करना भी इसके लिए अत्यंत लाभदायक है। उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों को नमक रहित संतुलित आहार लेना चाहिए। चिकनाई व प्रोटीन युक्त पदार्थों का सेवन कम कर देना चाहिए। कब्ज से बचने का प्रयास करना चाहिए एवं भूख से कुछ कम खाना चाहिए। शोध-अनुसंधान से यह ज्ञात हुआ है कि यदि अधिक वजन वाला व्यक्ति अपना वजन एक किलोग्राम कम करता है तो उसका रक्तचाप बिना किसी औषधि के ही लगभग दो मि.मी. कम हो जाता है। खानपान के इस क्रम में चाय, कॉफी एवं नशीले पदार्थों को पूरी तरह से बंद करना ही अच्छा है।

इसी के साथ ईर्ष्या, द्वेष, भय, झूठ, अहंकार आदि मानसिक विकारों से बचने का प्रयास करना चाहिए। उदाहरण के लिए, झूठ बोलने वाला व्यक्ति हर समय भयग्रस्त रहता है कि कहीं उसका झूठ पकड़ा न जाए। यह द्वंद्व की स्थिति उसका रक्तचाप बढ़ाए रख सकती है। इस द्वंद्व की स्थिति से उबरने व पूर्णतः तनाव मुक्त करने के लिए ध्यान का प्रयोग भी अतीव लाभदायक सिद्ध होता है। इस सत्य को विज्ञानवेत्ताओं ने भी स्वीकार करते हुए कहा है कि ध्यान के नियमित प्रयोग से न केवल मन-मस्तिष्क शाँत व तनाव मुक्त रहता है, बल्कि शारीरिक व्यवस्था में भी समुचित सामंजस्य बना रहता है।

सबसे अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अपनी कमजोरियों से हम बीमारियों को स्वयं आमंत्रित करते हैं। अनियमित, असंयमित जीवनचर्या ने ही हमें बीमारियों से घेर रखा है। यदि हम पुनः प्रकृति के अनुशासन में रहकर जीना सीख सकें, तो स्वस्थ रहना कोई असंभव कार्य नहीं है।

सामान्यतया संकट के समय सामना करने के लिए प्रकृति स्वयं ही हमारा रक्तचाप बढ़ा देती है, लेकिन यह बढ़ा हुआ रक्तचाप सामान्य हो जाने पर स्वतः ही सामान्य हो जाता है। परंतु आजकल क्रोध, भय, उत्तेजना व असंतुष्टि के जाल में उलझे-फँसे व्यक्ति में संकट से लड़ने की क्षमता ही खत्म होती जा रही है। इसके फलस्वरूप यदि रक्तचाप बढ़ता है तो बढ़ा ही रह जाता है।


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कुसंस्कारों के परिशोधन से ही व्यक्तित्व प्रौढ़ बनता है। विचारों की प्रौढ़ता, दृष्टिकोण की परिपक्वता ही मानव-जीवन की वह विशेषता है, जिसे उपलब्ध करने पर व्यक्तित्व प्रतिभाशाली बनता है और बड़ी सफलताएँ प्राप्त कर सकने की संभावना सुनिश्चित होती है। ओछे मनुष्य वे नहीं जो वजन, लंबाई या आयु की दृष्टि से छोटे हैं। जिनकी विचारणा तथा आकाँक्षा उथली और बचकानी है, जो गए-गुजरे लोगों की तरह सोचते और घटिया आकाँक्षाएँ पूरी करने के लिए ओछे हथकंडे अपनाते हैं, उन्हें कोई चतुर भले ही कह ले, पर वस्तुतः वे व्यक्तित्व की दृष्टि से बौने, अपंग, अविकसित लोगों की श्रेणी में ही माने जा सकेंगे।


कहीं ऐसा न हो कि गंगा विलुप्त ही हो जाए

गंगा प्राचीनकाल से ही करोड़ों लोगों की आस्था, भक्ति एवं प्रेरणा का स्त्रोत रही है। ऋषियों, मुनियों एवं तपस्वियों को अपने अध्यात्मचिंतन और तप-साधना के लिए सदैव इसी का तट अभीष्ट रहा है। इसी के किनारे साँसारिक ताप से पीड़ित, मानवता को शाँति-मुक्ति देने वाले प्रमुख तीर्थों का निर्माण हुआ इसी के आँचल में देव-संस्कृति का विकास हुआ और सभ्यताएँ फली-फूली। इसके जल को अमृत की संज्ञा दी गई। सुविख्यात वैज्ञानिकों ने अपने परीक्षणों से इसकी अलौकिक विशेषता की पुष्टि की। भारतवासियों के साथ विदेशियों ने भी इसकी श्रेष्ठता को आश्चर्य विभोर होकर स्वीकारा। भारतीय संस्कारों, इतिहास एवं संस्कृति से अभिन्न रूप से जुड़ी गंगा ऋग्वेद से लेकर गंगालहरी तक हर ग्रंथ में महिमान्वित होती आई है। लेकिन आज प्रगति की अंधी दौड़ में अपने संस्कारों से च्युत, अपनी संस्कृति से भूली-भटकी संतानों ने गंगा मैया को जिस दुर्दशाजन्य स्थिति में ला फेंका है, वह न केवल गंगा नदी के अस्तित्वजन्य खतरे का संकेत दे रही है, बल्कि भारतीय संस्कृति के लिए भी खतरे का संकेत दे रही है।

पौराणिक आख्यान के अनुसार स्वर्ग से गंगा का धरती पर अवतरण विशेष प्रयोजन से हुआ था। इस आख्यान के अनुसार गजा सगर के साठ हजार पुत्र अपने कुकर्मों की आग में जल रहे थे। उनकी कष्टनिवृत्ति गंगाजल से ही हो सकती थी। सगर के वंशज भगीरथ के कार तप एवं पुरुषार्थ से गंगा धरती पर आई। सगरपुत्र इसके शीतल अभिसिंचन से ताप मुक्त हुए, साथ ही असंख्यों के लिए गंगा जीवनदायिनी माँ बनी। अपनी इस अनुपम महिमा के कारण गीता, गायत्री, गौ एवं हिमालय की ही तरह गाँग भी भारतीय संस्कृति के आधारस्तंभों में से एक है। इसके बिना भारतीय संस्कृति एवं इतिहास की कल्पना दुष्कर है। महाभारत की कहानी गंगामाता से आरंभ होती है। गंगा वट पर स्थित बिठूर में रहकर महर्षि वाल्मीकि ने महाग्रंथ रामायण की रचना की थी। सम्राट अशोक, विक्रमादित्य, हर्षवर्धन से लेकर तात्याटोपे आदि के जीवन की अनेकों ऐतिहासिक घटनाएँ गंगातट से जुड़ी रही हैं। राजनीतिक अस्थिरता एवं एक के बाद एक राजवंश बदलने के बावजूद गंगा किनारे बसे शहर व्यापार, शिल्प एवं संस्कृति के लिए विश्वविख्यात रहे हैं।

गंगा का धार्मिक महत्व जितना है, विश्व में शायद किसी भी नदी का नहीं है। यही विश्व की एकमात्र नदी है, जिसे माता के नाम से पुकारा जाता है। गीता में भगवान् श्रीराम ने ‘स्रोतसामस्मि जाह्नवी’ अर्थात् जल स्रोतों में मैं जाह्नवी (गंगा) हूँ, कहकर इसे अपना स्वरूप बताया है। गंगा का महिमागान करते हुए शास्त्र कहते है-

गंगा गंगेति यो ब्रूयात, योजनाम् शनैरपि। मुन्यते सर्वपापेभ्यो, विष्णुलोके सः गच्छति॥

अर्थात् “जो गंगा का सैंकड़ों योजन दूर से भी स्मरण करता है, उसके समस्त पापों का नाश हो जाता है।”

धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्ता के अतिरिक्त गंगा के किनारे अनेक सुरम्य स्थल है। कृषि की सिंचाई के साथ देश की आर्थिक समृद्धि में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। भारतवर्ष में बहने वाली नदियों में तो यह सबसे बड़ी उद्गम गोमुख से बंगाल की खाड़ी तक यह 2071 कि.मी. का सफर तय करती है। इसका प्रवाह क्षेत्र 471502 वर्ग कि.मी. में फैला है। देश की सिंचित भूमि का 40 प्रतिशत इसी से सिंचित है। 37 प्रतिशत जनता इसके बेसिन में निवास करती है।

गंगा की विशिष्टता एवं इसके प्रति आस्था केवल भारत तक ही सीमित रही हो, ऐसी बात नहीं है। वर्जिल व दाँते जैसे महान् पश्चिमी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में गंगा का उल्लेख किया है। सिकंदर महान् तो गंगा के सम्मोहन में बंध ही गया था। अमेरिका को खोजने वाला कोलंबस गंगा की तलाश में भटकते हुए मार्ग में खो बैठा था। प्रख्यात इतिहास लेखक अबुल फजल ने अपनी पुस्तक ‘आइने अकबरी’ में लिखा है कि बादशाह अकबर पीने के लिए गंगाजल ही प्रयोग में लाते थे। इस जल को वह अमृत कहते थे। हिमालय विजेता एडमंड हिलेरी ने गंगासार से गंगोत्री तक के धरती से सागर तक अभियान की देव-प्रयाग में समाप्ति पर गंगा को ‘तपस्विनी’ संज्ञा दी थी। उसने कहा था कि गंगाजल मात्र साधारण जल नहीं है। इतिहासकार ‘शारदा रानी’ ने मंगोलया यात्रा राजा का वर्णन करते हुए लिखा है कि वहाँ के निवासियों ने उन्हें गंगादेश से आई हुई महिला कहकर साष्टाँग प्रणाम किया।

अगणित जनों की श्रद्धा का केंद्र होने के साथ देश को समृद्धि एवं वैभव प्रदान करने वाली गंगामाता अपनी संतानों का पाप धोते-धोते स्वयं विषैली होती जा रही है। जिसका जल कभी उद्गम स्थल से सागरपर्यंत शुद्ध एवं निर्मल रहता था, आज मार्ग के प्राथमिक पड़ावों में ही प्रदूषित हो रहा है। जिसके औषधीय गुण एवं शोधक-क्षमता को देखकर वैज्ञानिकों से लेकर विदेशी तक आश्चर्य करते थे, उसी का जल आज पीने लायक भी नहीं रह गया है।

स्वतंत्रता की पचासवीं वर्षगाँठ मना चुके राष्ट्र के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि जिस गंगाजल को अब पीने योग्य भी नहीं माना जाता, पच्चीस वर्ष पूर्व तक विश्वभर के वैज्ञानिक यह देखकर हैरान थे कि गंगाजल, जल नहीं अमृत है। विश्व में इतना पवित्र जल केवल उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव में खोजा गया। हालाँकि वैज्ञानिक यह देखकर आश्चर्यचकित हुए कि ध्रुवों के अछूते जल में भी एक वर्ष बाद कृमि दिखाई देने लगे, जबकि सौ साल बाद गंगाजल उन्हें उसी तरह शुद्ध नजर आया।

फ्राँस के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. हैरेन ने गंगाजल पर वर्षों अनुसंधान करके अपने प्रयोगों का विवरण शोधपत्रों के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने आंत्रशोध व हैजे से मरे अज्ञात लोगों के शवों को गंगाजल में ऐसे स्थान पर डाल दिया, जहाँ कीटाणु तेजी से पनप सकते थे। डॉ. हैरेन को आश्चर्य हुआ कि कुछ दिनों के बाद इन शवों से आँत्रशोध व हैजे के ही नहीं अन्य कीटाणु भी गायब हो गए। उन्होंने गंगाजल से ‘बैक्टीरियोफेज’ नामक एक घटक निकाला, जिसमें औषधीय गुण हैं। इंग्लैंड के जाने-माने चिकित्सक सी.ई. नेल्सन ने गंगाजल पर अन्वेषण करते हुए लिखा कि इस जल में सड़ने वाले बैक्टीरिया ही नहीं होते। उन्होंने महर्षि चरक को उद्धृत करते हुए लिखा कि गंगाजल सही मायने में पथ्य है। रूसी वैज्ञानिकों ने हरिद्वार एवं काशी में स्नान के उपराँत 1950 में कहा था कि उन्हें स्नान के उपराँत ही ज्ञात हो पाया कि भारतीय गंगा को इतना पवित्र क्यों मानते हैं।

गंगाजल की पाचकता के बारे में ओरियंटल इंस्टीट्यूट में हस्तलिखित आलेख रखे है। कनाडा के मैकिलन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. एम. सी. हेमिल्टन ने गंगा की शक्त को स्वीकारते हुए कहा कि वे नहीं जानते कि इस जल में अपूर्व गुण कहाँ से और कैसे आए। सही तो यह है कि चमत्कृत हेमिल्टन वस्तुतः समझ ही नहीं पाए कि गंगा की औषधीय गुणवत्ता को किस तरह प्रकट किया जाए। आयुर्वेदाचार्य गणनाथ सेन, विदेशी यात्री इब्नबतूता बर्नियर, अंग्रेज सेना के कैप्टन मूर, विज्ञानवेत्ता डॉ. रिचर्डसन आदि सभी ने गंगा पर शोध करके यही निष्कर्ष दिया कि यह नदी अपूर्व है।

लेकिन इसे नियति की विडंबना के सिवा और क्या कहें कि गंगाजल की स्वयं शुद्ध होते रहने की अद्भुत क्षमता के बावजूद आज गंगा भारत की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक है। नेशनल एन्वायरन्मेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट के दो वैज्ञानिकों ने अपने परीक्षण के उपराँत घोषणा की कि वैज्ञानिक दृष्टि से ऋषिकेश एवं हरिद्वार का गंगाजल भी पीने के योग्य नहीं रह गया है। उनके अनुसार इस पानी में अब अनेकों रोगाणु पनप चुके है। उन्होंने इसका कारण गंगा में बड़ी मात्रा में औद्योगिक इकाइयों द्वारा छोड़े गए रासायनिक अवशेषों तथा बढ़ती आबादी के कारण हुए प्रदूषण को माना है।

गोमुख से निकलने के बाद गंगा पर्वतों से उतरती हुई, मैदानों में बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है। मार्ग में इसके किनारे बसे छोटे-बड़े शहरों का जल-मल सीधा इसी में बहता है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार लगभग 200 करोड़ लीटर कचरा प्रतिदिन गंगा में गिरता है। अकेले वाराणसी में गिरने वाले कचरे की कुल मात्रा 95 करोड़ लीटर से अधिक है। जिन कारखानों का वर्ज्य पदार्थ गंगा में गिरता है, उनमें से कुछ तो बहुत ही खतरनाक किस्म के हैं। जैसे, चमड़ा, उद्योग, डिस्टीलरी उद्योग, थर्मल पावर एवं रासायनिक खादों के कारखाने है। इनके वर्ज्य पदार्थों के गंगा में गिराए जाने के परिणामस्वरूप गंगा के जलजंतुओं का अस्तित्व खतरे में पड़ रहा है। कुल मिलाकर गंगा में प्रदूषण की स्थिति बड़ी विकराल है।

गंगाजल के प्रदूषण मापन का वैज्ञानिक सिलसिला सन् 1934 ई. से चला था। तब वाराणसी के घाटों पर गंगाजल निर्मल था व उसमें किसी भी तरह के हानिकारक बैक्टीरिया नहीं पाए गए थे। सन् 1966 में कानपुर के विभिन्न घाटों पर गंगाजल के नमूनों का परीक्षण किया गया। तब गंगाजल भैरव घाट तक संतोषजनक पाया गया, परंतु यह जलप्रवाह शहर से बाहर होते-होते इतना दूषित हो गया कि प्रयोग के काबिल नहीं रहा। सन् 1975 ई. में पुनः कानपुर के घटों का अध्ययन किया गया और तब पाया गया कि गंगाजल प्रदूषण की मानक सीमाओं को पार कर रहा है। सन् 1983 ई. में कानपुर, इलाहाबाद एवं वाराणसी के गंगाजल नमूनों की वैज्ञानिक जाँचे की गई। इसमें नाइट्रोजन की मात्रा सामान्य से कई गुना अधिक थी। साथ ही इसमें ई. कोलाई के रोगाणु तो प्रस्तावित संख्या से सैंकड़ों गुना अधिक थे।

प्रदूषित गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सरकार ने गंगा एक्शन प्लान का क्रियान्वयन सन् 1985 ई. में किया था। जिसके तहत अरबों रुपये खर्च किए गए, किंतु योजना के उत्साहवर्द्धक परिणाम नहीं आए। जन-जागरुकता के अभाव एवं जनसहयोग के बिना यह योजना असफलप्राय सिद्ध हुई।

विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य ने पारिस्थितिकी तंत्र से जो खिलवाड़ किया है, उससे गंगा नदी का उद्गम स्थल भी अछूता नहीं रह गया है। गंगा का उद्गम आज से कई सौ साल पहले वर्तमान गंगोत्री मंदिर तक फैला था। जो आज 17 कि.मी. खिसक चुका है। जियोलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के सर्वेक्षण के अनुसार, गत पचास वर्षों में गंगा का गोमुख ग्लेशियर प्रतिवर्ष 10 से 30 मीटर की गति से सिकुड़ता है। स्थिति यही रही तो अब से 125 सालों बाद गंगा का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार गंगा के उद्गम पर प्रवाह जिस गति से घट रहा है, उसे देखते हुए अगले कुछ हजार वर्षों में इसके रुकने की संभावना है।

ऐसा न हो, इसके लिए जरूरी है कि देशवासी गंगा को माता का सम्मान दें, उसे प्रदूषित होने से बचाएँ। सच यही है कि विकास की अंधी दौड़ में भटकी गंगामाता की संतानों को विषाक्तता से तड़पती-कलपती गंगा मैया की पीड़ा को समझना होगा। इसमें से हर एक को व्रत लेना होगा कि वह अपने चिंतन व कर्म से गंगा माँ को प्रदूषित नहीं करेगा। तभी पतितपावनी गंगा मैया, इससे जुड़ी संस्कृति जीवित रह पाएगी। प्रदूषण के इस वर्तमान संकट के प्रति समय रहते हुए न चेते तो कहीं ऐसा न हो कि गंगा नदी भी एक दिन आर्यों की पावन सरस्वती नदी की तरह विलुप्त हो जाए।

भारतीय संस्कारों, इतिहास एवं संस्कृति से अभिन्न रूप से जुड़ी गंगा ऋग्वेद से लेकर गंगालहरी तक हर ग्रंथ में महिमान्वित होती आई है। लेकिन आज प्रगति की अंधी दौड़ में अपने संस्कारों से च्युत, अपनी संस्कृति से भूली-भटकी संतानों ने गंगा मैया को जिस दुर्दशाजन्य स्थिति में ला फेंका है, वह न केवल गंगा नदी के अस्तित्वजन्य खतरे का संकेत दे रही है, बल्कि भारतीय संस्कृति के लिए भी खतरे का संकेत दे रही है।


विवेक को स्थापित करेगा (kahani)

एक मनुष्य ने किसी महात्मा से पूछा, महात्मन् ! मेरी जीभ तो भगवान् का नाम जपती है, पर मन उस ओर नहीं लगता। महात्मा बोले, भाई ! कम-से-कम भगवान् की दी हुई एक विभूति तो तुम्हारे वश में हैं इसी पर प्रसन्नता मनाओ। जब एक अंग ने उत्तम मार्ग पकड़ा है, तो एक दिन मन भी निश्चित रूप से ठीक रास्ते पर आएगा। शुभारंभ छोटा भी हो तो धीरे-धीरे मन सत्पथ पर चलने को राजी हो जाता है।

एक वृक्ष पर उल्लू बैठा था, उसी पर आकर एक हंस भी बैठ गया और स्वाभाविक रूप से बोला, आज सूर्य प्रचंड रूप से चमक रहे हैं इससे गरमी तीव्र हो गई है। उल्लू ने कहा, सूर्य कहाँ है ? गरमी तो अंधकार बढ़ने से होती है, जो इस समय भी हो रही है। उल्लू की आवाज सुनकर एक बड़े वटवृक्ष पर बैठे अनेक उल्लू वहाँ आकर हंस को मूर्ख बताने लगे और सूर्य के अस्तित्व को स्वीकार न कर हंस पर झपटे। हंस अपने प्राण बचाकर भाग खड़ा हुआ।

महर्षि पैंगल पक्षियों की भाषा जानते थे। वे त्रिकालदर्शी भी थे। उन्होंने अपने शिष्यों को यह घटना बताते हुए कहा, आज की परिस्थितियों में जो धार्मिक परंपराएँ डाली जा रही हैं, वे कलियुग तक पहुँचते-पहुंचते आडंबर बन जाएँगी और बहुसंख्यक समाज जीर्ण परंपराओं को गले लगाए रहेगा। विवेकवानों की स्थिति इस हंस जैसी ही होगी। शिष्यों ने पूछा, तात ! तब फिर धार्मिक परंपराओं का पुनर्जीवन कैसे होगा ? पैंगल बोले- इसे कोई महाप्रज्ञा शक्ति ही स्थापित करेगी। उस समय वह राजहंस अपने हंस समुदाय के साथ इन उल्लुओं को मार भगाएगा और विवेक को स्थापित करेगा।


संतवाणी-आद्य शंकराचार्य

देह और लोक के अतिक्रमण का विज्ञान-धर्म

संसार के अन्य धर्म-संप्रदायों की तरह भारतीय अथवा हिंदू या सनातन धर्म किसी एक आचार्य, प्रवर्तक या ईशपुत्र की देन नहीं है। एक सुदीर्घ परंपरा के क्रम में इसका वर्तमान स्वरूप उभरकर आया है। इस परंपरा में वैदिक वाङ्मय जिन ग्यारह सौ से ज्यादा ऋषि-मुनियों के अनुभवों का निचोड़ है, के साथ दर्शन, पुराण आदि ग्रंथ, चौबीस अवतार, हजारों देवी-देवताओं को सम्मिलित किया जा सकता है। हिंदू या सनातन धर्म का उल्लेख आने पर जब यह कहा जाता है तो कोई अत्युक्ति नहीं होती कि यह अस्तित्व मात्र का धर्म है। सृष्टि में जहाँ और जिस रूप में भी जीवनसत्ता व्यक्त हुई है, उसका सत्य तथा अनुभव इसमें समाहित है।

ईसाइयत, इस्लाम, पारसी, ताओ आदि धर्म-परंपराओं का समावेश भी हिंदू-परंपरा में होता है, इन धाराओं के लिए भारतीय धर्म परंपरा में कहीं न कहीं स्थान मिल जाता है। सनातन परंपरा के परिप्रेक्ष्य में देखें तो सभी धर्म-संप्रदाय और उनका तत्वदर्शन विराट् भारतीय दर्शन के अंग-अवयव की तरह लगते हैं। अंग-अवयव अथवा स्वजन-संबंधी एक शरीर या परिकर में रह सकते हैं, लेकिन शरीर या परिवार का निर्वाह उन इकाइयों में नहीं होता। दसियों धाराओं और पद्धतियों का समावेश अनादि-अनंत भारतीय धर्म-परंपरा में आसानी से हो जाता है।

आधुनिक युग में उस धर्म-परंपरा का जो सर्वत्र संव्याप्त रूप दिखाई देता है, उसे आदि शंकराचार्य ने अंतिम रूप से परिभाषित किया। योग, वेदाँत, साँख्य, न्याय, मीमाँसा, वैशेषिक दर्शन सहित विभिन्न देवी-देवताओं और विश्वासों को उन्होंने एक क्रम में गूँथा। उनसे पहले धर्म-दर्शन का बिखरा हुआ रूप ही मिलता है। समीक्षक यह मानते हैं कि आदि शंकराचार्य से पहले इस तरह का प्रयत्न महर्षि वेदव्यास ने ही किया था। वैदिक मंत्रों, सूक्तों और संहिताओं के संकलन, पुराणों के संपादन और दर्शन-ग्रंथों को व्यवस्थित करने के प्रचंड पुरुषार्थ ने उन्हें वेदव्यास की उपाधि से विभूषित किया। शंकराचार्य की द्विता, सिद्ध स्थिति और निरंतर संघर्षशीलता ने उन्हें वेदव्यास से भी उच्च आसन पर प्रतिष्ठित किया। उनके संबंध में कथा प्रसिद्ध है कि महर्षि वेदव्यास स्वयं उनसे मिलने आए थे। ब्रह्मसूत्रों की व्याख्या लिखते देख उन्होंने आचार्य शंकर की परीक्षा ली और उनकी प्रतिभा से चमत्कृत होकर आशीर्वाद दिए। उस समय आचार्य शंकर की आयु मात्र सोलह वर्ष थी। थोड़ा-सा जीवन लेकर अवतरित हुई इस विभूति के लिए महर्षि वेदव्यास ने आशीर्वाद दिया कि वे इतना ही जीवन और जिएँ। शेष अवधि में उन्होंने धर्म-संस्कृति की रक्षा के लिए चारों दिशाओं में संगठन खड़े किए।

आदि शंकराचार्य की जीवनलीला संक्षेप में इस प्रकार हैं उनके स्थापित किए मठों की परंपरा मानती है कि शंकराचार्य का आविर्भाव कम-से-कम ढाई हजार वर्ष पहले हुआ। काँची कामकोटि मठ में इसी बीच हुए आचार्यों अर्थात् शंकराचार्य के उत्तराधिकारियों के विवरण भी मिलते हैं, लेकिन इतिहासकार उन्हें प्रामाणिक नहीं मानते। विभिन्न सूत्रों, संदर्भों और प्रमाणों से आचार्य शंकर का समय सातवीं-आठवीं शताब्दी के आखिरी और पहले सोलह वर्ष निश्चित किए हैं। बत्तीस वर्ष जीकर अपनी प्रतिभा से दिग्दिगंत को आलोकित कर गए शंकराचार्य कुल-परंपरा से शैव थे। पिता का निधन पुत्र के जन्म से कुछ समय बाद ही हो गया।

छोटी उम्र में ही उन्होंने संन्यास ले लिया। नर्मदा नदी के तट पर अमरकंटक में उनने गोविंद भगवत्पाद से शास्त्र पढ़े। बारह वर्ष की उम्र में उन्होंने शास्त्र आदि पड़कर विभिन्न तीर्थों की यात्राएँ कर ली। उन दिनों विद्वान, पंडित और आचार्य व्यर्थ के वितंडवाद में ही उलझे रहते थे। शब्दों की खाल निकालना और शास्त्रार्थ में दूसरे को पराजित कर विजय-गर्व से चूर हो जाने तक ही उनकी रुचि युक्ति अपनाई और उन पंडितों, विद्वानों को परास्त कर संगठन-शिक्षण के काम में लगाया। लोगों के मन-मस्तिष्क में छाया हुआ निरा बुद्धिवाद जड़-मूल से नष्ट हो गया।

भाष्य, स्तोत्र, प्रकरण और तंत्र आदि विधाओं में विविध ग्रंथों की रचना के साथ धर्म को संगठित रूप देकर आचार्य शंकर ने सभी स्तरों पर भारतीय धर्म को आत्मनिर्भर बनाया। उसे अपने पाँवों पर खड़ा किया। भगवद्गीता, उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र की कसौटी पर कोई मत या विचार खरे हों तो ही ऋषिसम्मत है, यह मान्यता उन्हीं के समय स्थिर हुई। यह कसौटी निश्चित हो जाने के बाद इच्छा और सुविधा के लिए मनमाने संप्रदाय चला देने की उच्छृंखल प्रवृत्ति पर अंकुश लगा।

आचार्य शंकर के प्रतिपादनों से भारतीय धर्म-संप्रदाय का जो स्वरूप उभरकर आया है, उसे ‘अद्वैत वेदाँत’ कहते हैं। प्रसिद्ध वैज्ञानिक और दार्शनिक अल्बर्ट आइंस्टीन मानते थे कि अद्वैत वेदाँत दर्शन शास्त्र का शिखर है। बुद्धि की कोई भी क्षमता इससे आगे नहीं जा सकती है। वहाँ समस्त प्रतिभा, योग्यता और सिद्धियाँ क्षीण हो जाती है।

अद्वैत वेदाँत की प्रारंभिक कक्षा में साधक को सिखाया जाता है कि सारा संसार परमात्मसत्ता की एक क्रीड़ास्थली है। संसार को माया, स्वप्न, प्रतीति मात्र और प्रवंचना बताने वाली मान्यता का अर्थ वास्तविकताओं से पलायन नहीं है। बहुधा मायावाद का अर्थ यह किया जाता है कि यह संसार माया है, मिथ्या है, इसलिए कुछ भी करना आवश्यक नहीं है। सिर्फ यह जान लेना ही काफी नहीं है कि गंधन और विकार झूठ है। उनका कहीं कोई अस्तित्व नहीं है। इस पलायनवादी वेदाँत का आचार्य शंकर ने अपने प्रतिपादनों से ही नहीं, आचरण और कृतित्व से भी खंडन किया। बत्तीस वर्ष की उम्र में उन्होंने धर्म-दर्शन को, विचार और संगठन के स्तर पर जितना सुसंबद्ध कर दिया, वही अपने आप में कर्मण्यता का विलक्षण प्रमाण है। इतना प्रचंड पुरुषार्थ व्यक्तित्व पलायनवादी दर्शन का प्रवर्तक कैसे हो सकता है ?

आचार्य शंकर ने कहा है कि साधना एक समर है। इसमें साधक को संकल्प और शक्ति के साथ उतरना होता है। स्वामी रंगनाथानंद ने आचार्य शंकर के मत का परिचय देते हुए लिखा है, “वे पूर्णता की यात्रा के रूप में मानव जीवन की क्रियाशील दृष्टि प्रस्तुत करते हैं। यह यात्रा के रूप में मानव जीवन की क्रियाशील दृष्टि प्रस्तुत करते हैं। यह यात्रा दो दिशाओं की है। एक बाहरी जगत् में होती है, देश और काल इसका क्षेत्र है। दूसरी यात्रा अंतर्जगत् में है, यह देश और काल का अतिक्रमण करती है। आचार्य शंकर दोनों ही दिशाओं को संतुलित करते हुए संपूर्ण जीवन की प्रेरणा देते हैं।”

“आचार्य शंकर ने संसार के मित्यात्व का प्रतिपादन करते हुए संसार के उपराम होने पर जोर दिया होता तो वे धर्म का अर्थ अभ्युदय और निःश्रेयस की प्राप्ति का मार्ग कभी नहीं बताते। भगवद्गीता पर भाष्य लिखते हुए आचार्य ने भूमिका में ही कह दिया कि जिससे इस लोक में उन्नति (अभ्युदय) और आँतरिक जगत् में कल्याण (निःश्रेयस) की प्राप्ति हो, वही धर्म है। भगवद्गीता पर शंकर का भाष्य सबसे पुराना है। सात सौ श्लोकों और अठारह अध्यायों में विभक्त टीका के आधार पर ही गीता का पाठ सुनिश्चित हुआ है।”

समस्त समस्याओं का मूल अपने मन में ही है। आचार्य शंकर ने विभिन्न उदाहरणों, प्रमाणों और तर्कों से यह समझाया। कछुआ जिस तरह अपने पैरों को फैलाता और समेटता है, उसी प्रकार मनुष्य भी अपनी इच्छाओं, वासनाओं का विस्तार और संकोच करता है। मकड़ी जैसे अपने भीतर से ही लार निकलती और जाल बुनती है, फिर उसी में फँस जाती है, उसी तरह मनुष्य जिन समस्याओं या स्थितियों से उलझकर उनमें फँस जाता है, वे भी उसके मन से ही निकलती है।

कठोपनिषद् में मानवीय कलेवर को रथ के रूपक से समझाया गया है। उस रूपक के अनुसार शरीर रथ है। इंद्रियाँ घोड़े हैं, बुद्धि सारथी है, मन लगाम है और आत्मसत्ता उस रथ में बैठा हुआ यात्री। आचार्य शंकर कहते हैं कि विषय सुख वह मार्ग है जिससे पर रथ दौड़ा जाता है समझदार सारथी यदि लगाम और घोड़ों को साधे रहे तो शरीर-यात्रा सकुशल संपन्न होती चली जाती है अन्यथा बेलगाम घोड़े शरीर को यहाँ-वहाँ भगाते और बर्बाद करते रहते हैं।

स्वतंत्रता या मुक्ति कहीं बाहर से नहीं आती, वह अपने भीतर ही छुपी हुई है। सिर्फ उसे उद्घाटित करना होता है। आचार्य शंकर ने लिखा है कि मनुष्य अपने अंदर ही उस सुगंध से मुग्ध है, जो सदा से उसके अंदर विद्यमान है, पर वह उसका स्त्रोत नहीं जानता। नाभि में छुपी हुई कस्तूरी को हिरण जिस तरह देख नहीं पाता और उसकी गंध से आकर्षित होता रहता है। गंध से विमोहित हुआ मृग उसे पाने के लिए यहाँ-वहाँ भागता रहता है। उसे पाने के लिए छटपटाता है। मनुष्य को भी उसके भीतर निहित स्वतंत्रता अपनी गंध से अशाँत किए रहती है।

रामकृष्ण मिशन कि स्वामी रंगनाथानंद जी ने लिखा है कि भीतर निहित इस गंध की खोज में ही मनुष्य ने सभ्यता का विकास कर लिया है। खोज की यात्रा में निकले मानवीय चित्त ने हर उपलब्धि को आगे बढ़ने की सीढ़ी बनाया है। एक सीढ़ी चढ़ने या उपलब्धि अर्जित करने के बाद वह आगे चलता चला गया। यद्यपि उसे अपने लक्ष्य का बोध फिर भी नहीं हुआ। यात्रा जारी रही। इस यात्रा के दौरान ही उसने विद्या, गुण, सभ्यता और संस्कृति का विकास कर लिया।

समस्याओं और द्वंद्वों से मुक्ति के लिए मनुष्य को खोज की दिशा बाहर से भीतर की ओर मोड़नी चाहिए। अपने भीतर गहनतर स्तरों में प्रवेश करने के बाद मनुष्य अस्तित्व के वैभवशाली रूपों को प्राप्त करता जाता है। आचार्य शंकर ने कहा है कि जब मनुष्य अपनी इंद्रियों और उससे बंधे मन को शाँत करने में सफल हो जाता है, उसकी आत्मसत्ता उद्घाटित होने लगती है। वह विलक्षण शक्तियों का स्वामी हो जाता है। आत्मचेतना उसके अपने रहस्य खोलने लगाती है। आशय यह है कि अपने आप को केंद्र बनाना चाहिए। आत्मसत्ता में ही कारण और निवारण दोनों तलाशने चाहिए।

धर्म आचार्य शंकर के लिए लौकिक जगत् का नियंता और आँतरिक जगत् का वैभव दोनों ही है। दोनों का परस्पर विरोध नहीं है, बल्कि वे एक-दूसरे के पूरक है। आचार्य शंकर ने इस जगत् को निंदनीय और त्याज्य नहीं बताया, बल्कि वैभव के बीच रहते हुए ही उसके अतिक्रमण का उपदेश दिया। उनके द्वारा स्थापित चार मठों का विधान जिस रचना में मिलता है, उसमें संन्यासी को संसार में रहते हुए भी उसमें लिप्त न हो जाने का निर्देश है। ‘महानुशासन’ में उन्होंने कहा है, “मठों को संपत्ति का संयम करना चाहिए, इतना अन्न होना चाहिए कि असहाय, पीड़ित और दरिद्रजनों को आश्रय दिया जा सके। मठों में दरिद्रता का नाम भी न दिखाई दे। आचार्य और संन्यासी उस वैभव का उपयोग धर्म-संस्कृति की रक्षा के लिए करें, स्वयं निर्वाह के लिए जितना आवश्यक हो, उतना ही ग्रहण करें।”

आत्मा दुर्बल और अशक्त लोगों को नहीं प्राप्त होती। दरिद्र और रोगियों को भी नहीं मिलती। जिनका शरीर स्वास्थ्य, मन पुष्ट, बुद्धि प्रखर और अंतःकरण पवित्र हो उन्हीं को यह मिलती है। शंकराचार्य ने घर-परिवार छोड़कर भाग आए एक शिष्य से पूछा कि तुमने ऐसा क्यों किया। शिष्य ने कहा कि परिवार बंधन है ? उन्होंने पूछा फिर परिवार बसाया किसलिए था ? शिष्य ने कहा, उस समय यह ज्ञान नहीं था। शंकराचार्य ने कहा, अगर तुमने अज्ञान के कारण परिवार बसाया तो उस अज्ञान का दंड भुगता। परिवार बसाना यदि पाप है तो उस पाप का क्या होगा ? उस उलाहने के बाद उन्होंने कहा था कि न तो परिवार और ही यह समाज, बंधना के दायरे में आता है। तुम निर्बलता के कारण परिवार छोड़कर आए हो। जो व्यक्ति परिवार का दायित्व नहीं उठा सकता वह परमात्मा का दायित्व कैसे सह सकेगा ?

आचार्य शंकर छोटी उम्र में ही संन्यासी हो गए थे। उन्होंने माँ से संन्यास की अनुमति ली थी। आरंभ से ही मर्यादा रही है कि व्यक्ति अपने स्वजन-संबंधियों की सहमति से ही संन्यास ले सकता है। इस तरह का निर्णय लेने के लिए वह स्वतंत्र नहीं है। जन्म लेते ही मनुष्य जिन संबंधों और दायित्वों से घिरा होता है, जो शक्तियाँ उसे जगत् में लाने और जीवित रखने में निमित्त बनती हैं, उनका भी अधिकार होता है। व्यक्ति उनके अधिकारों की अवहेलना नहीं कर सकता। इन अधिकारों में माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी और संतान आदि की गणना होती है। शंकराचार्य के परिवार में माँ के सिवाय कोई नहीं था। अतः उन्होंने माँ से अनुमति ली।

विपदा में फँसे शंकर को माँ ने यह सोचकर अनुमति दे दी कि शायद इस तरह जीवनरक्षा हो जाए। माँ के अनुमति देते ही मगरमच्छ ने शंकर का पाँव छोड़ दिया। तट पर आकर शंकर ने माँ को प्रणाम किया और जाने लगा। माँ ने उन्हें विदा देने से पहले वचन लिया कि अंतिम समय में वे माँ के पास रहेंगे। माँ की अंत्येष्टि भी वे स्वयं ही करेंगे। शंकर ने वचन दिया एवं निभाया।

संन्यास लेने के बाद अपने पूर्व आश्रम के संबंधियों से संपर्क की मनाही है। शंकर ने यह जानते हुए भी वचन दिया था। वे अंतिम समय में न केवल माँ के पास आए, बल्कि उनका अंतिम संस्कार भी किया। एक संन्यासी अपनी माँ की अंत्येष्टि कर शास्त्र की मर्यादा तोड़ रहा है, यह कहते हुए आसपास के लोगों ने विरोध या। वे शवयात्रा में भी नहीं गए। आचार्य शंकर ने अपनी माँ के शव को अकेले कंधे पर उठाया। चिता सजाई, उस पर लिटाया और विधि-विधान से मुखाग्नि दी। शंकराचार्य के जीवन में इस तरह की कई घटनाएँ है, जो उनका क्राँतिकारी स्वरूप उजागर करती है। परंपराएँ जब विकास में बाधक बनने लगें तो उन्हें छोड़ देना चाहिए। लेकिन वह त्याग आवश्यक हो तभी किया जाए। उच्छृंखलता या मनमानी के लिए किया गया त्याग न तो प्रगतिशीलता की निशानी है और न ही उपयोगी।

आचार्य शंकर ने अपने समय की उद्भट विद्वान् भारती मिश्र से एक वर्जित विषय पर शास्त्रार्थ किया। संन्यासी के लिए निषिद्ध उस विषय का देहातीत अनुभव किया और भारती का समाधान किया। इसके बाद एक और मर्यादा का अतिक्रमण किया, जिसके अनुसार स्त्री को संन्यास की दीक्षा नहीं दी जा सकती थी। इस वर्जना को एक ओर छोड़कर शंकराचार्य ने भारती मिश्र को संन्यासी वेश पहनाकर अपने शिष्य-समुदाय में सम्मिलित किया।

शंकराचार्य मनुष्य के भीतर विद्यमान महत् तत्व को उद्बोधित करते हैं। अपने प्रतिनिधि ग्रंथ विवेक चूड़ामणि में वे शिष्य से कहते हैं, जाति-नीति-कुल-गोत्र आदि भेदों से अति दूर, नाम-रूप-गुण दोषों से वर्जित, देशकाल और विषयों की सीमाओं से परे ब्रह्म है। वह ब्रह्म तू है। अपने भीतर तू उसी का ध्यान कर।

आगे के उपदेशों में वे यह भी कहते हैं, “ब्रह्म बहुत महान् है, सब से महान्। आश्वस्त हुआ जा सकता है कि मनुष्य का शरीर उसे प्राप्त करने में सक्षम है। प्रकृति ने यह शरीर इसीलिए रचा है। शरीर यदि अनित्य और नाशवान है तो और भी अच्छा। एक बार यह अच्छी तरह समझ लो तो तुम्हें जीवन का सत्य पा लेने की आवश्यकता अनुभव होने लगेगी। मुमुक्षा तीव्र और बलवती हो जाएगी।”


आत्मिक प्रगति का ककहरा - परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

मित्रों ! संयम ही जीवन है। संयम चार तरह के हैं। पहला है, इंद्रिय संयम। इंद्रिय संयम से मतलब है, जीभ का संयम, जिसने आपका पेट खराब कर दिया और आप बीमार रहने लगे। जरूरत से ज्यादा आप खाते चले गए और शरीर में जहर फैल गया। आप ठीक हो सकते हैं, बशर्ते आप अपने पेट पर कृपा कीजिए, जरूरत से ज्यादा मत खाइए।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस विवाहित थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम शारदा था। वे उन्हें भरपूर प्यार करते थे, परंतु कोई जरूरी नहीं कि एक-दूसरे के शरीर को बरबाद किया जाए। एक-दूसरे के शरीर में बीमारी को प्रवेश करा दिया जाए। क्या इसी से आपका प्यार होता है ? क्या मतलब है आपका प्यार से। मदर औरत को खाएगा और औरत मर्द को खाएगी, क्या यही अर्थ है विवाह का ? गाँधी जी ने एक किताब लिखी है, ‘संयम की राह पर’। उसमें लिखा है कि स्त्री और पुरुष बहन-भाई की तरह भी रह सकते हैं। आप पशुओं से भी कुछ सीखिए। साँड गायों के झुँड में रहता है, परंतु बिना गाय की आवश्यकता के वह गायों की तरफ देखता भी नहीं है वह भी ब्रह्मचर्य का पालन करता है। जब पशु संयम से रह सकते हैं, तो आप क्यों नहीं रह सकते ?

मित्रो ! आप अपनी जीभ को बुरे वचन बोलने और अभक्ष्य खाने से रोकिए, क्योंकि इन दोनों से ही जीभ जलती है। जली हुई जीभ से भगवान् का भजन नहीं किया जा सकता। “जैसा खाए अन्न-वैसा बने मन”-आपकी यही नियति बन गई है। अतः आप संयम का आरंभ जीभ से करिए। उससे कहिए कि हम आपको भगवान् की पूजा के लायक बनाना चाहते हैं। स्वाद के लिए हम कोई भी ऐसी चीज नहीं खाएँगे जो हमारे शरीर के लिए हानिकारक हो। हम किसी से ऐसे शब्द नहीं बोलेंगे, जो दूसरों को गुमराह करने वाले हों, दूसरों को पतन के मार्ग पर ले जाने वाले हो। आप संयम जीभ से शुरू कीजिए, फिर देखिए कि आपकी वाणी में चमत्कार कैसे पैदा होता है ?

आप इस संबंध में हमसे पूछते हैं कि गुरु जी ! आपने अपनी वाणी को कैसे शुद्ध बनाया ? बेटे! हमने संयम किया है। चौबीस वर्षों तक जौ की रोटी और छाछ का सेवन किया। इससे हमारी जीभ इस योग्य हुई। नमक हमने बिल्कुल नहीं खाया। इस्लाम धर्म के संस्थापक बिना पढ़ थे, परंतु जीभ के संयम से उन्होंने अपने अंदर अपनी बात मनवाने का गुण पैदा किया। ऋषियों की जीभ से निकले हुए वचन भी मंत्र थे। उन्होंने भी संयम किया था, इसलिए आपको भी उनके बताए मार्ग पर चलना चाहिए। आप भी अपने जीवन के उचित लक्ष्य को प्राप्त कीजिए। धनुष की प्रत्यंचा जितनी खींची जाएगी, तीर उतना ही तेज चलेगा। धनुष से तात्पर्य है, हमारी जीभ से, जो मंत्र उच्चारण के लिए है। ऋषियों की जीभ से निकले हुए मंत्रों ने राजा दशरथ के चार बच्चों को जन्म दिया था। लोमश ऋषि ने राज परीक्षित को शाप दिया था कि जा तुझे सातवें दिन साँप काट खाएगा। उनका शाप इसलिए था, क्योंकि ऋषि संयमशील थे। अक्षरों में कोई ताकत नहीं है। ताकत तो वाणी के संयम से आती है। शक्ति का स्त्रोत संयम ही है।

आप दोनों में से कोई भी चीज ले लीजिए, भौतिक या आध्यात्मिक। दोनों में ही संयम की आवश्यकता है। अतः आप इंद्रियों का संयम कीजिए। इंद्रियों के संयम का अर्थ है कि आपने अपने जीवन में जो चार सूराख कर रखे हैं, उनमें से एक-एक को बंद करना। अगर आपने एक भी सूराख को बंद किया तो आप में ताकत आती चली जाएगी। सूराख बंद करते ही आप यह महसूस कर सकते हैं कि आप में ताकत आनी शुरू हो गई। आपको इसके चमत्कार अच्छे स्वास्थ्य के रूप में, दीर्घजीवन के रूप में दिखाई देने लगेंगे।

आप तो हर समय पराई पत्तल ही चाटने की कोशिश करते हैं। आप अपने ऊपर विश्वास करना सीखिए। अपनी ताकत को पहचानिए संयम की शक्ति का अंदाजा लगाइए। संयम को हम तप कहते हैं। आप खाना खाएँ चाहे न खाएँ। शरीर को धूप में खड़ा रखने से भी कुछ बनता-बिगड़ता नहीं, अनेकों ऋषि धूप में खड़े रहते हैं, परंतु उच्चस्तरीय उपलब्धियाँ संयम के कारण ही मिलती हैं, अन्यथा धूप में खड़े रहने कोई फर्क नहीं पड़ता।

दूसरा संयम है, मन का संयम, विचारों का संयम। यह इस तरह से है जिस तरह से आवारा लड़के मारे-मारे फिरते हैं। यह भी इसी तरीके का है। आपके मन में हमेशा बेकार के विचार आते रहते हैं। यदि आप थोड़ा भी संयम विचार को एकत्र करने में लगाएँ तो आप देखेंगे कि आपके विचार क्या से क्या बन जाएँगे। साहित्यकार एवं वैज्ञानिकों में क्या विशेषता होती है ? कुछ भी नहीं। बस ये विचारों को एकत्र करते हैं मन की शक्ति से। सर्कस में काम करने वाली लड़कियों में बस एकाग्रता की शक्ति होती है। वे अपने मन को भागने से रोके रखती है तभी तो वे ऊँये झूले से झूलकर जाल में कूद पड़ती है और उनको जरा भी चोट नहीं आती। आप यदि एक काम पर पूरा विचार करना सीख जाएँ तो आप क्या बन सकते हैं ? हमने अपने जीवन में स्वाध्याय का नियमित समय एक घंटे के हिसाब से रखा। पंद्रह वर्ष की उम्र से सत्तर वर्ष की उम्र तक हमने सत्तर लाख पन्ने पढ़े हैं। ये सब विचारों का संयम है।

आप रात को पिक्चर देखकर आते हैं और हीरोइनों के सपने देखने लगते हैं। हीरोइनों के फोटो खरीदकर लाते हैं। पहले आप यह बताइए कि आपका वेतन कितना है ? महाराज जी तीन सौ रुपये। अरे ! तीन सौ रुपये तो एक हीरोइन अपने सैंट पर खर्च कर देती है। आप इसी बल पर हीरोइन से दोस्ती करने की सोच रहे थे। अपने विचारों पर संयम करना सीखो। अपने विचारों को समाज-सुधार के लिए अच्छी दिशा दो। आपके दिमाग व शरीर की शक्ति आपको कहाँ से कहाँ पहुँचा सकती है।

मित्रो ! एक और संयम है और वह है समय का संयम। आपने जितनी अधिक समय की बर्बादी की है, यह उसी का परिणाम है कि आप दुखी जीवन जी रहे है। समय भगवान् ने आपको इसलिए दिया है कि समय की कीमत से आप दुनिया की कीमती से कीमती वस्तु खरीद सकते हैं। आप चाहें तो समय की कीमत से लोकसेवी बन सकते हैं, साहित्यकार बन सकते हैं। समाज-सुधाकर बन सकते हैं, परंतु आपने समय के मूल्य को नहीं पहचाना। आपने अपने जीवन का सारा समय वैसे ही व्यर्थ में नष्ट कर दिया। जिन लोगों ने समय का उपयोग किया है, वे उन्नति के ऊँचे शिखर पर चढ़ते चले गए। चमार, धोबी, मोची, भंगी भी रात्रि पाठशाला में जाकर दो घंटे प्रतिदिन के हिसाब से पढ़कर ऊँचे पद पर तरक्की कर जाते हैं। समय का सदुपयोग करने के कारण ही आज वे अनेकों संस्थाओं में कार्यरत है। लेकिन आप तो कहते हैं कि क्या करें साहब ! हमारे पिताजी मर गए थे, इसलिए हम प्राइमरी तक ही पढ़ पाए। तो क्या पिताजी आपने साथ आपका शरीर ले गए ? मित्रो आपने समय की कीमत नहीं पहचानी।

एक ड्राईंग मास्टर थे। साठ वर्ष की आयु में वे रिटायर हुए। रिटायर होने के बाद उन्होंने संस्कृत पढ़ना शुरू किया। संस्कृत पढ़कर वे वेदों के भाष्यकार कहलाए। उन्हें ‘पद्मभूषण’ की उपाधि भी मिली थी। उन्होंने संस्कृत में भी बहुत साहित्य लिखा है। आप क्या करते हैं रिटायर्ड होकर ? हमारा बेटा कमाकर लाता है और हम बेकार बैठे रहते हैं। बताइए हम क्या करें ? बेकार बैठे रहना भगवान् की दी हुई संपदा का तिरस्कार करना है। उसके नियमों की अवहेलना करना है। आदमी जब तक श्रमशील नहीं होगा, तब तक उन्नतिशील नहीं हो सकता। आप अपने श्रम का उपयोग समाज की उन्नति के लिए कीजिए, जिससे हमारा समाज अच्छा और सुँदर बनें।

रावण की कथा है। रावण ने एक दिन काल को पकड़ लिया। पकड़कर पाटी से बाँध लिया और फिर काल की पिटाई लगाई। काल चीखने-चिल्लाने लगा। रावण ने कहा कि काल तू मुझे धन दे और विद्या दे। काल ने डर के मरे लंका को सोने की बना दिया और रावण को विद्वान बना दिया। काल का क्या अर्थ है ? आप तो काल को भूत-प्रेत या देवता मानते हैं, परंतु वास्तव में काल समय को कहते हैं। इसका जो सदुपयोग करते हैं वे महान् उपलब्धियों के स्वामी बनते हैं।

बिहार में हजारी नाम का एक किसान था। उसने अपना सारा समय आम के बगीचे लगाने में लगाया। बिहार में उसने एक हजार बाग लगाए। हजार बागों की वजह से उस जिले का नाम ‘हजारी बाग’ रखा गया। आप तो अपना समय गप्पे हाँकने में लगाते हैं। समय की कीमत समझिए। आप अपने समय को आध्यात्मिक उन्नति में लगाइए। जिससे आपका जीवन सफल हो जाए। आप समय की दिनचर्या बनाइए।

साथियों ! आपकी दौलत चार तरह की है। पहली है-इंद्रिय संयम। इसे अपने जीवन में महत्व दीजिए। इंद्रियों का संयम न करने से आप अपने आप को तबाह करते जाते हैं। आप अपने विचारो की संपदा को किन्हीं उपयोगी कार्यों में लगाना सीखिए। यदि आप ने विचारों का संयम करना आरंभ कर दिया तो आपका दिमाग जिसे हम ब्रह्मलोक कहते हैं, सद्विचारों का भंडार हो जाएगा। यही अतींद्रिय क्षमता का मालिक है, आपकी शालीनता का, सुख-समृद्धि का स्वामी है। यह दिमाग एक कंप्यूटर की तरह से है, जिसकी क्षमता असीम है। तीसरा संयम-समय का संयम है। इसके लिए आप अपनी दिनचर्या बनाकर चलिए। गाँधी जी ने देश के लिए अनेकों कार्य किए। अपने समय की दिनचर्या उन्होंने बनाकर रखा थी। सब कार्य वे नियत संयम करवाते थे। समय को बिल्कुल भी व्यर्थ नहीं गंवाते थे। उन्होंने बहुत सारा साहित्य लिखा।

मित्रो ! हम मशीन की तरह से जीते हैं। आठ बजे का समय हमारा सोने का है। मित्र आते हैं और कहते हैं कि हमसे बात कीजिए। हम कहते हैं कि हम नहीं करेंगे आप से बात, यदि आप नाराज होते हैं तो हो जाइए हमारी बला से। हम प्रतिदिन चार घंटे लेखन करते हैं। नौ अखबारों का हम संपादन करते हैं, अखण्ड-ज्योति का संपादन करते हैं, अपने मनोयोग और तन के सहयोग से। हम दोनों काम इसलिए कर लेते हैं कि हमारा अपना मन और तन दोनों एक साथ लगते हैं, परंतु आपकी कभी ‘तन डोले’ तो ‘कभी मन डोले’ वाली स्थिति रहती है। इसलिए आप काम में अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाते हैं।

गुरु जी ! आपकी उन्नति में कौन-कौन सहायक हुआ है ? बेटे ! आध्यात्मिक दृष्टि से गायत्री मंत्र हुआ है, किंतु इन सबके पीछे जो चमत्कार आपको दिखाई देता है, उसका कारण है, संयम। हम समय के गुलाम हैं। हमारी प्रेमिका कौन है, जिसे देखे बिना हमें चैन नहीं पड़ता ? वह है हमारी घड़ी, जो हर समय हमारी मेज पर रखी रहती है। हमारी दृष्टि में हर समय घड़ी की सुइयाँ ही रहती है। आपके पास भी है घड़ी ? हाँ साहब ! हमारे पास और हमारी पत्नी-दोनों के पास घड़ी है। तब तो आपकी पत्नी ने एम.ए. पास कर लिया होगा ? नहीं साहब, उसे तो घर के कामों से ही समय नहीं मिलता है। तो दिखाइए अपनी घड़ी और बताइए कि कितने बज रहे हैं ? साहब, इसमें तो साढ़े उनतीस बज रहे है। समय देखना आता नहीं और घड़ी लिए फिरते हैं।

चौथा एक और महत्वपूर्ण संयम है। उसका नाम है-अर्थसंयम। अर्थ संयम का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। “सादा जीवन-उच्च विचार” उन आदमियों का जीवन है, जिन्होंने अपना जीवन पहले चरण के हिसाब जिया है। जो आदमी जमीन को चूमते हैं, आसमान को चूमते हैं, वे आदमी बेईमान होते हैं, कर्जदार होते हैं। जिन्होंने अध्यात्म में प्रवेश किया है और पैसे की दृष्टि से सामंजस्य नहीं रखा, उन्हें आगे चलकर बहुत कठिनाई उठानी पड़ सकती है। मित्रो ! उन्हें जीवन की उन्नति के लिए कोई रास्ता नहीं मिलेगा। बच्चों की शिक्षा व पालन-पोषण का वे उचित प्रबंध नहीं कर सकेंगे। हमेशा उनके ऊपर फिजूलखर्ची छाई रहेगी। आध्यात्मिक दृष्टि से फिजूलखर्ची एक गुनाह है। कानून चाहे आपके ऊपर मुकदमा चलाए या न चलाए, लेकिन अध्यात्म आपके ऊपर मुकदमा जरूर चलाएगा। जिस देश व समाज में आप पैदा हुए है, उसके औसत के हिसाब से आप खर्च कीजिए। आप कमा तो सकते हैं, लेकिन अपनी कमाई को खर्च नहीं कर सकते। आप अपनी कमाई में से कुछ बचत कीजिए।

अर्थसंयम के बारे में मैं अक्सर ईश्वरचंद्र विद्यासागर का नाम लेता हूँ। उनको पाँच सौ रुपये वेतन मिला था। उन्होंने अपने घरवालों को बुलाया और कहा कि ये लीजिए पचास रुपये। हिंदुस्तान का व्यक्ति इससे ज्यादा खर्च नहीं कर सकता। जो रुपये हमारे पास बच जाते हैं, इसकी हम विद्यार्थियों के लिए खर्च करेंगे। हमारा देश बहुत गरीब है। विद्यार्थियों की भीड़ उनके दरवाजे पर लगी रहती थी। आप तो जरूरत से ज्यादा खर्च करते हैं। आपने अपने जीवन में बेकार की जरूरतों को पाल रखा है। फिजूलखर्ची बंद कीजिए।

मित्रो ! एक बार हमने आपको बताया था कि जब हमारे बाप-दादा करे थे तो जो पैसा हमें मिला था वो सारा हमने गायत्री तपोभूमि पर लगा दिया। हमने अपनी जमीन स्कूल के नाम कद दी। अपने लिए हमने कुछ नहीं बनाया। जब रो हम अखण्ड ज्योति में रहें, हम अपने परिवार में पाँच आदमियों का हमारा खर्च दो सौ रुपये मात्र रहा है। भारत के नागरिकों को बड़े ही किफायत से धन खर्च चाहिए। गाँधी जी ने बहुत कम धन में गुजारा किया।

अमेरिका के एक सज्जन थे। पुराने कपड़े पहनते थे। खाने में भी किफायत करते थे, लेकिन वे करोड़पति थे। उनके पास एक महिला आई और कहने लगी कि हम आप से विवाह करना चाहते हैं। उस सज्जन ने कहा कि विवाह तो हम कर लेंगे, परंतु आप हमें देंगी क्या ? क्या कमाएँगी हमारे लिए ? महिला ने कहा, इस कंजूस के साथ कोई शादी नहीं करेगा। उस व्यक्ति के बारे में विख्यात हो गया कि वह बड़ा कृपण है। एक बार एक विश्वविद्यालय को चंदे की आवश्यकता पड़ी। कमेटी के लोग कंजूस के पास गए और कहने लगे कि साइंस की एक प्रयोगशाला बनाई जा रही है। विद्यार्थियों के लिए आप कुछ धन दीजिए।

कहने को तो उसने नमस्ते कर लिया। उसकी मेज पर तीन मोमबत्तियाँ जल रही थी। उसने एक मोमबत्ती बुझा दी। लोग यह देखकर हँस पड़े। कंजूस ने पूछा कि आपको कितना पैसा चाहिए ? कमेट के लोगों ने डरते हुए कहा पाँच सौ रुपये। कंजूस ने तुरंत पचास हजार रुपये का चेक काट दिया। लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। कहने लगे हमने तो पाँच सौ रुपये माँगे थे और आपने इतना दे दिया। ये क्या किया आपने ? उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था। कंजूस व्यक्ति कहने लगा कि मैं अपने जीवनभर प्रयोगशाला बनाने का सपना देखता रहा, पर पूरा न कर सका। अच्छी बात है जो आप इस काम को करने जा रहे हैं। लीजिए यह पहली किश्त है। मैं आपके विश्वविद्यालय को देखने आऊँगा। अगर काम सही तरीके से हुआ तो आगे भी धन दूँगा। मैं अपनी सारी दौलत आपको देकर जाऊँगा ? मैं इसे रखकर क्या करूंगा ??

मित्रो ! हम व्यक्तिगत जीवन में भी किफायत कर सकते हैं। पैसा तो ऐसी चीज है कि जरा-सी मुट्ठी खुलते ही समाप्त हो जाता है। फिजूलखर्ची को ही चोरी कहते हैं। इससे कभी भी पूरा नहीं पड़ सकता। अतः आप संयमशील बनिए और उतना ही खर्च कीजिए, जिससे आपका शरीर जिंदा रह सके, परंतु अब तो आप शरीर के लिए कम तथा विलासिता के लिए अधिक खर्च करते हैं। हमारे चारों सूराखों में से हमारी उन्नति, अध्यात्म पुण्य और लक्ष्य टपक जाता है।

अध्यात्म-जीवन में संयम को तप कहते हैं। तप चार तरह के होते हैं। यदि आप चारों तरह के तप करना शुरू करेंगे तो तपस्वी को जो सिद्धियाँ मिलती हैं, वे सिद्धियाँ आपको प्राप्त हो जाएंगी। एक बार बाप फिर समझ लें कि तप माने इंद्रियनिग्रह, तप माने मनोनिग्रह, विचारों का निग्रह। तप माने समय का संयम और तप माने अर्थ का निग्रह।

एक बात और, देवताओं के अनुग्रह की बात आप समझ लें। देवता नाम इसलिए रखा गया है कि वे दया करते हैं। देवता का अर्थ हैं, देने वाला। हम माँगते हैं और वे देते हैं। परंतु यहाँ यह विचार करना पड़ेगा कि देवता क्या देते हैं ? देवता के पास जो चीजें होंगी वही तो वह देगा। जिसके पास जो चीज नहीं होगी तो वह क्या देगा ? जो चीज बैंक में मिलती है वह है रुपया और कुछ नहीं मिलता है बैंक में। रुपये के बदले में आपको सब चीज मिल सकती है। रुपये में ताकत तो है, लेकिन देवता में चीज है-वह है- देवत्व। यही देवता हमें दे सकते हैं। देवत्व कहते है-गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता को। गुणों की दृष्टि से श्रेष्ठ, कर्मों की दृष्टि से श्रेष्ठ, स्वभाव की दृष्टि से श्रेष्ठ-इतना काम करने के बाद देवता निश्चित हो जाते हैं, अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं।

मित्रो ! दुनिया में सफलता एक चीज के माध्यम से मिलती है और वह है-उत्कृष्ट व्यक्तित्व। जिस व्यक्ति ने बिना मेहनत के कोई चीज प्राप्त कर ली है, उसे कहते हैं, तरकीब और तिकड़म। यदि इस तरीके से आपने कोई चीज प्राप्त कर ली है तो वह वस्तु आपके पास नहीं ठहरेगी। आप में हजम करने की ताकत हो तो ही आप सब चीज खा सकते हैं। दौलत को हजम करने का तरीका होना चाहिए। जैसे-जैसे आपके पास पैसा बढ़ता जाएगा तो आपके अंदर दोष बढ़ते जाएँगे। आप गरीबों से भी बुरे पड़ेंगे। जीवन में ऐसी विसंगतियाँ बढ़ती जाएँगी जो आपको दौलत का फायदा पहुँचाना तो दूर आपको नुकसान ही पहुँचाएँगी। यह दौलत आपको तबाह कर देगी। संतानें बिगड़ जाएँगी, इससे तो गरीबी अच्छी है।

दौलत को हजम करने की आपके शरीर में ताकत होनी चाहिए। अच्छे विचार मन में होने चाहिए। तब आप दौलत को हजम कर सकेंगे, नहीं तो आप बुरे कार्य करेंगे। हिम्मत से बुराइयों का मुकाबला कीजिए। आपका भीम के तरीके से बलवान् होना समाज के लिए अभिशाप साबित हो सकता है। इसलिए आप अपनी ताकत को उचित कार्यों में लगाइए। मैं मानवता का पुजारी हूँ। दुनिया में तबाही पढ़े-लिखे लोगों ने ही मचाई है। तो क्या हम पढ़ना-लिखना छोड़ दे ? पढ़ाई छोड़ने से हमारे आगे वही हालात पैदा हो जाएँगे जैसे गाँवों में पहले एक ही आदम पढ़ा-लिखा होता था। बाकी सब निरक्षर रहते थे। हम आपसे बार-बार कहते हैं कि किताब वालों के पास जाइए स्वाध्याय करिए। उनके साथ सत्संग करिए।

मित्रो ! मेरा ख्याल है कि यदि सबके सब बिना पढ़े रह जाएँ तो दुनिया में शाँति कायम रह सकती है, क्योंकि तब आदमी की अक्ल का विस्तार सीमित होगा। वह सीमित क्षेत्र में ही बुराइयाँ करेगा, क्योंकि उसकी अक्ल का विस्तार नहीं हुआ है। तो क्या मैं शिक्षा विरोधी हूँ ? क्या मैं साक्षरता विरोधी हूँ ? नहीं, मैं शिक्षा का विरोधी नहीं हूँ, परंतु शिक्षा को अपने अंदर आत्मसात करने का गुण होना चाहिए। शिक्षा के साथ मनुष्य में जिम्मेदारी भी आनी चाहिए। इसका मैं हिमायती हूँ। बहुत सारी चीजें दुनिया में हैं। देवता आपको हजम करने की शक्ति देते हैं। दुनिया की दौलत को हजम करने की भी विशेषता आप में होनी चाहिए। यदि देवत्व आपको प्राप्त हो जाए तो आप संसार की समस्त वस्तुओं से लाभान्वित हो सकते हैं। इन्हीं सब बातों पर चलकर आप पूर्णमिद बन सकते हैं।


गुरुपूर्णिमा पर्व पर विशेष सद्गुरु की कृपा के अवतरण का महापर्व

हम चाहे जो हों, जैसे हों, गुरु हममें से हर एक के जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। अपने जीवन के अतीत के बारे में सोचें, वर्तमान को परखें और भविष्य पर नजर डालें तो समूचा अस्तित्व एक साकार प्रश्न लगेगा। इस गहरी आत्मसमीक्षा में इस सत्य की स्पष्ट अनुभूति होगी कि सार्थक जीवन के लिए हमें एक दिशा, एक उद्देश्य एवं एक लक्ष्य की आवश्यकता है। इसके बिना हमारा समूचा जीवन प्रायः एक भटकन में ही बीत जाता है। हालाँकि हम जीवनभर तरह-तरह के सुखों में जीवन की सार्थकता को खोजने की कोशिश करते हैं, किंतु अंत में हमें इन सुखों की भ्रामक प्रकृति की अनुभूति होती है और बुढ़ापे में ऐसा लगने लगता है कि हम तो ठगे गए। अब तक जो किया, जो पाया वह सब व्यर्थ और अर्थहीन था।

हालाँकि सारा जीवन हम यही कहते रहते हैं कि न तो एक पल को चैन है और न ही एक पल की फुरसत है। जाने-अनजाने कुछ खोजते रहते हैं। अनेकों दरवाजे खटखटाते हैं, पर असफल होकर लौटते हैं। धन-प्रतिष्ठा के पीछे भागते रह जाते हैं। यदि जिस किसी तरह हमें हमारे काल्पनिक सुखी एवं सफल जीवन के सभी साधन-सौंदर्य, सुख, संपत्ति और सफलताएँ उपलब्ध भी हो जाएँ तो भी एक असुरक्षा की भावना हमें रह-रहकर परेशान करती रहती है। इस सभी साधनों के खो जाने का भय, बुढ़ापे और मौत का डर एकाँत के क्षणों में हमें व्याकुल करता रहता है और यह व्याकुलता हमारे मन-मस्तिष्क के टुकड़े-टुकड़े कर देती है।

जीवन की यह भटकन प्रायः सभी के साथ होती हैं केवल ज्ञानीजन ही जीवन के संदेश को समझ पाते हैं वे ही सहजता से यह स्वीकार कर पाते हैं कि भौतिक सुख-सुविधाओं की अपेक्षा अन्य महत्वपूर्ण चीजें भी हैं। यह ज्ञान उन्हें अंतर्मुखी बनाता है तथा वे जीवन के अधिक अर्थपूर्ण संबंधों की खोज करने लगते हैं। यही ज्ञान उन्हें अंतरात्मा की खोज की ओर उन्मुख भी करता है और तभी यह बात समझ में आती है कि समस्या जगत् में एवं गुणों में नहीं, बल्कि हमारे अपने में ही है। हम अपनी सामान्य जीवनशैली के माध्यम से साँसारिक वस्तुओं को अपरिवर्तनशील, स्थायी एवं चिरंतन सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं। पर यह तो हमारे दृष्टिकोण की गलती है। विश्व के साथ स्थायित्व या स्थिरता जैसी कोई बात है ही नहीं। सतत् गतिशीलता ही विश्व का पर्याय है। सृजन, पोषण एवं विध्वंस तो प्रकृति के नियम है। इसे हममें से कोई नहीं रोक सकता।

इसके बावजूद हमें सदा ही एक ऐसा तत्व उपलब्ध है, जो पूर्ण अनंत एवं शाश्वत हैं यह तत्व हमारे स्वयं आपने अंदर ही स्थित है। इसे कहीं बाहर नहीं खोजना है। ज्ञानीजनों ने इसे ही आत्मा कहा है। इस तत्व का संबंध हमारे भौतिक अस्तित्व या अहंकार से नहीं है जिसके साथ हम प्रायः अपना तादात्म्य स्थापित करते रहते हैं। यह तत्व तो वह सत्य है, वह आत्मा है, जो हमें अपने शाश्वत सुख का आमंत्रण देता रहता है।

इसके सतत् आमंत्रण के बाद ही हम इससे वंचित रहते हैं, तो इसका एकमात्र कारण है सद्गुरु का अभाव। क्योंकि अंतरात्मा की यात्रा का यह मार्ग लंबा, संकटापन्न, तलवार की धार के समान तीक्ष्ण तथा गुप्त आपदाओं से भरा है। हम इस पथ को भला कैसे जान सकते हैं। सवाल सिर्फ लंबी एवं आपदाओं से भरी हुई यात्रा पर रवाना होने का नहीं है, सवाल उस जीवनलक्ष्य का भी है, जो हमें मालूम ही नहीं है, ऐसी स्थिति के लिए ही तो गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने कहा है, “गुरु बिनु होहि न ज्ञान” अर्थात् गुरु के बिना इसका ज्ञान नहीं होता।

जिन महनीय जनों ने गुरु-शिष्य संबंधों की खोज की, उन्हें सामाजिक, साँसारिक संबंधों की सीमाओं के बारे में पूरा ज्ञान था। वे जानते थे कि सामान्य संसारी व्यक्ति चाहे वह हमारा कितना ही सगा या घनिष्ठ क्यों न हो, हमारा मार्गदर्शक नहीं हो सकता। इसके लिए परम प्रज्ञावान् एवं अनुभवी व्यक्ति की आवश्यकता है, भले ही वह साँसारिक दृष्टि से धन, पद अथवा प्रतिष्ठा रहित हो।

अनेक लोग तर्क प्रस्तुत करते हैं कि गुरु आवश्यक नहीं है, वास्तविक गुरु तो हमारे अंदर है। यह बात सैद्धाँतिक रूप से सच भी है, परंतु हम में से ऐसे कितने लोग हैं जो अंतःकरण में स्थित सद्गुरु की आवाज को सुनते-समझते हैं। उसके निर्देशों को समझते एवं आचरण में लाते हैं। यह बात ध्यान में रखने योग्य है कि मनुष्य की मानसिक अवधारणाएँ सीमित एवं स्थूल है। मानव-मन विक्षुब्ध वासनाओं, इच्छाओं एवं महत्वाकाँक्षाओं का संगम है। इस हलचल के बीच अंतःस्थिति सद्गुरु की आवाज को सुनना भला कैसे संभव हो सकता है। उसकी आवाज तो नीरवता की, शाँति की आवाज है। यदि हम अपनी नीरवता की इस आवाज को सुनना-समझना चाहते हैं, तो हमें अपने मन के आँतरिक कोलाहल को बंद करना पड़ेगा। परंतु हम तो सामान्यक्रम में अपने मन की संरचना ही नहीं समझते। हमें यह भी नहीं मालूम कि हम आसक्ति, क्रोध, ईर्ष्या, घृणा और वासना का अनुभव क्यों करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि हम कोलाहल को दबाने का जितना प्रयास करते हैं, उसी आवाज उतनी तीव्र होती चली जाती है।

इस आँतरिक अशाँति को रोकने के लिए ही हमें गुरु की आवश्यकता होती है। वे ही उन विधियों के विशेषज्ञ हैं, जिनके द्वारा शरीर, मन एवं अंतरात्मा का नियंत्रण व नियमन होता है। वे ही वह मार्ग दिखा सकते हैं जिस पर चलकर हम अपने मन की उन नकारात्मक प्रवृत्तियों को बदल सकते हैं, जो हमारे आत्मविकास में बाधा है।

गुरु ज्ञान की प्रज्वलित मशाल है। भौतिक शरीरधारी होने पर भी उनकी आत्मा उच्च एवं अज्ञात जगत् में विचरित रहती है। वह अपने लिए नहीं, बल्कि हमारे लिए इस धरती से जुड़े रहते हैं। उनका प्रयोजन स्वार्थ रहित है। उनकी न तो कोई इच्छा होती है और न ही आकाँक्षा। ये गुरु ही हमारे जीवन की पूर्णता होते हैं। वे पवित्रता, शाँति, प्रेम एवं ज्ञान की साक्षात् मूर्ति हैं। वे साकार भी हैं और निराकार भी। देहधारी होने पर भी देहातीत हैं। देहत्याग देने पर भी उनका अस्तित्व मिटता नहीं, बल्कि और अधिक प्रखर हो जाता है।

उन्हें पाने के लिए, उनसे मिलने के लिए आवश्यक है हमारी चाहत। इसके लिए अनिवार्य है हमारे अपने अंतर्मन में उभरती तीव्र पुकार। गुरुपूर्णिमा का महापर्व हममें से हर एक के लिए यही संदेश लेकर आया है कि हमारे गुरुदेव हम सबसे दूर नहीं है। वे देहधारी होने पर भी देहातीत थे और अब देह का त्याग कर देने पर तो सर्वव्यापी हो गए है। उनका सदा ही यह आश्वासन है कि उन्हें पुकारने वाला उनके अनुदानों से कभी भी वंचित नहीं रहेगा।

जीवन में हमारी कोई भी भूमिका हो। हम धनी हों या गरीब, सुखी हाँ या फिर दुखी, स्वस्थ हो अथवा नीरोग, हमारी चेतना विकसित हो या अविकसित, हममें से हर एक के लिए गुरुदेव के पास कुछ-न-कुछ अवश्य है। उनके पास हम सभी लोगों के लिए एक-न-एक संदेशा है। जिस व्यक्ति ने अपने जीवन में कभी भी किसी तरह की कठिनाइयों का अनुभव नहीं किया है, वह भी यह बात दावे के साथ नहीं कह सकता कि उसके जीवन में निराशा, असंतोष व रिक्तता के पल-क्षण नहीं आए। गुरुदेव हम सभी के जीवन की इस रिक्ताता की पूर्ति करने के लिए कृत-संकल्प है। गुरुपूर्णिमा उस तपोमूर्ति गुरुदेव के श्रद्धापूर्वक आह्वान एवं हम सबके जीवन में उनकी कृपा के अवतरण का पर्व है।


धनपति और धन दोनों कलंकित (kahani)

राजा रघु ने लोकमंगल के लिए एक बार सर्वमेध यज्ञ किया। जो कुछ भी राजसंपत्ति थी उन्होंने प्रजा के हित के लिए लगा दी। सब कुछ दान कर देने के बाद संपत्ति के नाम पर एक मिट्टी का जलपात्र और कुश का आसन शेष बचा। ऋषि कौत्स तक राजा की दानशीलता का समाचार पहुँचा। उन्हें गुरुदक्षिणा चुकाने के लिए धन की आवश्यकता थी। धन की आकाँक्षा लेकर ऋषि रघु के पास पहुँचे।

वहाँ दृश्य दूसरा ही था। राजा सब कुछ दान कर चुके थे। स्थिति विपरीत देखकर ऋषि कौत्स ने बिना कुछ कहे वापस लौट आना उचित समझा, किंतु राजा को समझते देन न लगी कि ऋषि किसी विशेष प्रयोजन से आए हैं। राजा ने ऋषि को वापस बुला लिया और आश्वासन दिया कि आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करें, धन की व्यवस्था हो जाएगी। कौत्स ठहर गए। रघु ने कुबेर को संदेश भेजा। कुबेर ने स्वर्ण मुद्राओं की वृष्टि कर दी। राजा ने कौत्स को अभीप्सित धन देकर संतुष्ट किया।

कौत्स ने आश्चर्यान्वित हो तनिक-सी याचना पर राजा को इतना धन मिल जाने का रहस्य जानना चाहा। कुबेर ने कहा, ऋषिवर ! धर्म के प्रति आस्थावान व्यक्ति परमार्थ प्रयोजन के लिए जो प्रयत्न करते हैं उन्हें यदि संपन्न व्यक्तियों द्वारा सहायता न दी जाए तो धनपति और धन दोनों कलंकित होने लगेंगे।


शिक्षण यज्ञ-कर्म के रूप में जीवन जीने के मर्म का

विगत अंक में गीता के तृतीय अध्याय के ‘कर्मयोग’ की व्याख्या के अंतर्गत 9 से 11 तक के तीन श्लोकों के माध्यम से कर्म का मर्म यज्ञ दर्शन के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया गया था। भगवान का आदेश है कि कर्म न केवल कामना से मुक्त हो, वे यज्ञार्थाय ही संपन्न हों। जो इस भाव से कर्म नहीं करता, वह बंधनों में बंधित है। भगवान कहते हैं कि हम सतत् यज्ञ भाव से, भगवान को समर्पित होकर जीवन जिएँ। अहंता, वाना, तृष्णा की गाँठ को क्रमशः ढीली करते चले जाएँ, ताकि बंधन मुक्त हो सकें। यज्ञ को परमपूज्य गुरुदेव ने कहा है, “परमार्थ प्रयोजन के लिए किया गया श्रेष्ठतम कर्म।” उसी व्याख्या को दुहराते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं, कि जो हम निज के स्वार्थ के लिए करते हैं, वह हमें बंधनों में बाँधता है। “लोकोऽयं कर्मबंधनः” का मर्म यही है कि हमारे सभी कर्म पर-हितार्थ हों। यज्ञभाव का अर्थ है, समर्पण भाव से, इदं न ममः के भाव से किए गए कर्म जो वासनाओं के खय का कारण बनें। तृतीय अध्याय से चलकर आगे भी चतुर्थ अध्याय में भी होने वाली यज्ञ की यह व्याख्या बड़े विराट् व्यापक अर्थों में की जा रही है। हमारे कर्म चोग के निमित्त हों, भोग के निमित्त नहीं, इसके लिए हमें विराट् ब्रह्माँड में चल रहे यज्ञ के अर्थ को समझकर उसमें सहभागिता करनी होगी।

योगेश्वर कृष्ण यज्ञ को एक सतत् प्रवाहमान तंत्र के साथ-साथ सृष्टि के नियमित चलने का कारण भी बताते हैं। प्रजापिता ब्रह्मा की बात कहकर वे वेदाँतिक परिप्रेक्ष्य में वैदिक ब्रह्मयज्ञ की बात समझाते हैं। भगवान कहते हैं कि इस यज्ञ से तुम देवताओं को प्रसन्न करो, बदले में देवता तुम्हें समृद्धि प्रदान करेंगे। इस प्रकार परस्पर एक-दूसरे को पुष्ट करते हुए तुम परम लक्ष्य को प्राप्त होओगे। इसी की और व्याख्या वैज्ञानिक चर्चा एवं परमपूज्य गुरुदेव के चिंतन के साथ इस अंक में प्रस्तुत है।

ग्यारहवें श्लोक जिसमें योगेश्वर श्रीकृष्ण ने “परस्परं भावयंतः” की व्याख्या की है, यह बताया गया है कि एक दूसरे को आगे बढ़ाते हुए उन्नत करते हुए हमारे सभी कर्म नियोजित हों। श्लोक पूरा पुनः एक बार समझ लें,

देवन्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥

अर्थात् “तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे का उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे।

ये शब्द ब्रह्मा जी के मुख से कहलवाए गए हैं, एक आदेश की तरह । जब-जब भी मानव-समुदाय के द्वारा बिना अहंभाव के एवं अहं-केंद्रित कामनाओं के प्रयास किए जाते हैं तो प्राकृतिक शक्तियाँ भी, जिनसे मिलकर हमारा वातावरण बना है, उस समाज को अपना पूरा सहयोग देने लगती है। अर्थात् यज्ञीय भावना से कर्म किए जाएँ तो बाह्य वातावरण में भी चमत्कारी परिवर्तन आ जाता है। वातावरण स्वतः वैसा ही ढलता चला जाता है।

बाह्य प्राकृतिक शक्तियाँ ही देव शक्तियाँ के रूप में हमारे आसपास विद्यमान हैं। प्रसन्न होने पर बदले में वे हमारा कल्याण ही करती है। समूह रूप में एक साथ श्रेष्ठ प्रयोजन के लिए सक्रिय सारे समाज को अपनी प्रबल आकाँक्षा की पूर्ति हेतु समर्थ सहयोग व संरक्षण प्रदान करती है। यह एक दैवी विधान भी है, एक सार्वभौम सत्य भी एवं वैज्ञानिक तथ्य भी। वस्तुतः प्रकृति के समस्त कर्मों, यज्ञ और तप के भोक्ता सभी भूतों में संव्याप्त महेश्वर श्री भगवान ही हैं (भोक्तारं यज्ञतपसाँ सर्वभूतमहेश्वरम्) और यही भगवान नित्य यज्ञ में प्रतिष्ठित भी हैं। इन भगवान को जानना-समझना ही सच्चा वैदिक ज्ञान है। वहीं ज्ञान कराने के लिए श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को यज्ञ की व्याख्या आत्मसात करा रहे हैं। इन भगवान को देवशक्तियों व मानव के बीच होते रहने वाले पारस्परिक व्यवहार के रूप में भी जान सकते हैं, ग्यारहवें श्लोक में यही बात भगवान ने समझाई है। बार-बार वे कर्म का विधान समझा रहे हैं कि जीवन और कर्मों का सार तत्व या को ही जानकर मानव संतुष्ट हो, यज्ञावशिष्ट को पाकर ही परितृप्त हो। जो इस विधान के विरुद्ध चलता है और अपने वैयक्तिक स्वार्थ की सिद्धि के लिए ही कर्म करता है, भोग करता है, वह व्यर्थ ही जीता है।

प्रतीकात्मक रूप में भगवान यह समझा रहे हैं कि यज्ञ तीनों लोकों में विद्यमान देवताओं के माध्यम से अंततः परमात्मा को ही प्रसन्नता पहुँचाता है। भूः लोक-पृथ्वी लोक, भुवः लोक -देवलोक एवं स्वर्ग लोक-अंतरिक्ष जगत्। इसी प्रकार मानव के अंदर देखें तो शरीर भूः लोक, प्राण भुवः लोक तथा मन स्वः लोक। इस प्रकार न केवल हम अपने आसपास के वातावरण को सामंजस्य पूर्ण व अपने अनुकूल बनाते हैं, अपने व्यक्तित्व के बिखराव को रोककर व्यवस्थित बनाते हैं। कर्म अच्छे हैं, यज्ञीय भाव से हैं तो व्यक्तित्व परिष्कृत-व्यवस्थित-तनावमुक्त-आनंदमुक्त होता चला जाएगा। भगवान बार-बार कहते हैं कि अर्जुन तू युद्ध कर, यह भी यज्ञीय भाव से किया गया कर्म है। हमें भी परमपूज्य गुरुदेव ने विचार क्राँति अभियान की बागडोर थमाकर यह कह दिया कि यही आज का युगधर्म है, यज्ञभाव से किया जाने वाला कर्म है। बहिरंग के कर्मकाँडी यज्ञ से अधिक यज्ञीय जीवन जीने पर पूज्यवर ने अधिक जोर दिया व बार-बार कहा कि “इदम् न ममः” का भाव रखकर कर्म करते चलो। हमारी युगनिर्माण योजना से जुड़े सभी कार्यों को पूज्यवर ने ‘युगयज्ञ-ज्ञानयज्ञ’ जैसे नाम दिए है।

भगवान अगले श्लोकों में कहते हैं-‘यज्ञ के द्वारा बढ़ाए हुए (परिपुष्ट हुए) देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं के द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिए (बाँटे) स्वयं भोगता है और उन्हें नहीं देता, वह चोर ही है। यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपना शरीर पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं।”

कई व्यक्तियों के सामूहिक पुरुषार्थ के फलस्वरूप प्राप्त लाभों को कोई एक व्यक्ति हड़पने का प्रयास करे तो भगवान के अनुसार उसे सचमुच चोर ही कहना चाहिए (स्तेन एव सः) (3/12 की द्वितीय पंक्ति)। समर्पित सहकारी प्रयासों के परिणामस्वरूप प्राप्त धन या सामग्री में से सभी को समान वितरण होना चाहिए, यह श्रीकृष्ण का आध्यात्मिक साम्यवाद कहता है। संभवतः इस अष्टम अवतार ने बाल्यकाल में इसी भाव के साथ ग्वाल-बालों के साथ मिलकर, सारा दूध-मक्खन राज्य के अधीश्वर को मिलना चाहिए, कंस की इस नीति के विरुद्ध सत्याग्रह किया था। एक उदाहरण प्रस्तुत किया था कि इस समाज में कोई शोषण करके जीने का अधिकार नहीं रखता। सामूहिक लाभों को हड़पने वाले को लुटेरा, पतित, हेय, घृणित ही समझना चाहिए, यह यहाँ योगेश्वर कृष्ण का मत है।

परमपूज्य गुरुदेव का सतयुगी समाज भी इसी तथ्य की व्याख्या करता है। बार-बार वे लिखते हैं कि यज्ञीय जीवन जीने वाले समाज में न कोई छोटा होगा, न बड़ा। सबको प्रकृति की समस्त शक्तियों का विवेकपूर्ण उपयोग करने का समुचित अधिकार होगा। जबर्दस्ती शोषण-भोग करने की नीति से मुक्ति तब मिलेगी, जब ऐसा मानव समुदाय प्रकृति प्रकोपों से दंडित होगा। नवंबर 1988 की अखण्ड ज्योति, जिसमें युगसंधि महापुरश्चरण की घोषणा की गई थी, में पूज्यवर लिखते हैं कि “नवयुग की, इक्कीसवीं सदी की संपूर्ण व्यवस्था एकता और समता के सिद्धाँतों पर निर्धारित होगी, हर क्षेत्र में हर प्रसंग में, उन्हीं का बोलबाला दृष्टिगोचर होगा।” - “वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श अब समाजवाद-समूहवाद-संगठन-एकीकरण का विधान बनकर समय के अनुरूप कार्यान्वित होगा।”

आज के उपभोक्तावाद से भरे युग में श्रीकृष्ण का आदर्श एवं परमपूज्य गुरुदेव की सतयुगी अवधारणा कितनी युगानुकूल है, इसे भली-भाँति समझा जा सकता है। योगेश्वर कृष्ण के संदेश की अवज्ञा का ही परिणाम है कि सारे विश्व में आज प्राकृतिक प्रकोपों की बाढ़ है। सभ्यता के साथ तथाकथित प्रगति की दौड़ में अंधाधुँध दौड़ते मनुष्य को भाँति-भाँति के त्रास झेलने पड़ रहे है। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खींचातानी का जो तमाशा हम आज देख रहे हैं, वह इसी का परिणाम है कि मनुष्य ने प्रकृति या में तो भागीदारी की, पर देवशक्तियों को उनका अंश नहीं दिया, सर्वतोभावेन जीवन नहीं जिया, मात्र उपभोग ही उपभोग किया। पाश्चात्य उपभोक्तावाद-वैश्वीकरण की प्रक्रिया धरती के शोषण से चालू होकर मानव के अंतराल तक पहुँच जाती है एवं ऐसे पुरुषों की संख्या बढ़ा रही है जो सुपात्र को, जिनका ‘ड्यू’ है, उन्हें दिए बिना स्वयं उपभोग कर रहे है। संवेदनाहीन निष्ठुर समाज इसी कारण पनपता है एवं वह कैसा होता है, यह आज के जमाने में आंखें खोलकर चारों ओर निगाहें दौड़ाकर अच्छी तरह देखा जा सकता है।

तेरहवाँ श्लोक जिसमें कहा गया है कि जो चोरी से खाता है, छिपाकर खाता है, ‘अतिथि देवोभव’ की उपेक्षा करके खाता है, वह चारी का अन्न खाता है, अत्याधिक गूढ़ रहस्यों वाला एवं काव्य के लालित्य का एक अनुपम उदाहरण है। कहा जाता है कि ‘यज्ञ’ कर्म से बचा अवशिष्ट सबको समान रूप से बाँट दिया जाता है। यज्ञ की प्रक्रिया में एक प्रकार से सभी कुछ बंटने के निमित्त ही होमा जाता है। हविष्य सामग्री वाष्पीकृत हो धूम्र बनकर वातावरण में बिखर जाती है। जो बचता है वह या भस्म के रूप में सभी ‘एल्केलॉइड्स’ व अन्य खनिज तत्व लिए होता है। इसमें भी बड़े गुण भरे पड़े है। या कार्य में प्रयुक्त घी का अवशिष्ट भी सभी याजकों को शरीर पर लगाने के लिए दे दिया जाता है। भस्म मस्तक (ललाट), कंठ, दाहिनी भुजा व हृदय-स्थल पर लगाई जाती है। जो भी प्रसाद चरु या अन्य मिष्ठान आदि के रूप में बचता है वह सूर्यार्घदान के बाद सभी को बाँट दिया जाता है। क्या यही कर्मकाँडपरक भाग यज्ञ है। ‘सर्वतोभावेन समर्पण?’ ही जिस कर्मकाँड का उद्देश्य है, यह क्या मात्र क्रिया तक ही सीमित रहेगी। श्रीकृष्ण कहते हैं-नहीं, वह जीवन की श्वास में समाहित रहनी चाहिए। उस गूढ़ तत्वदर्शन को समझे बिना हम “मुच्यंते सर्वकिल्बिषैः” वाले मर्म को नहीं जान पाएँगे, जिस में याजक के सभी पापों से मुक्त होने की बात कही गई है।

जब भगवान कृष्ण कहते हैं कि संत लोग यज्ञावशिष्ट ही ग्रहण करते हैं तो उनका आशय है किसी भी कर्मठ समुदाय में श्रेष्ठ-सज्जन लोग सहकारिता के भाव से जीते हुए उत्पादन कर न केवल उन्नति को प्राप्त होते हैं, बिना किसी व्यक्तिगत कामना के उसके प्रतिफल को समान रूप से बाँट भी लेते हैं। ऐसे व्यक्ति समाज का ऋण सतत् चुकाते रहते हैं, अतः वे सामाजिक चोरी के अपराध से बचते हैं तथा बिना किसी अहंकेंद्रित कामना के नियत कर्मों का संपादन करते रहते हैं, तो प्रतिक्षण वासनाओं का क्षय कर जीवनमुक्ति की लक्ष्यप्राप्ति की सिद्धि भी करते हैं। ऐसा जीवन जीना हिंदू समाजवाद की नीति के अनुसार श्रेष्ठतम जीवनशैली हैं। यही भारतीय संस्कृति का आदर्श भी है।

भारतीय अध्यात्म कहता है कि भूमि हमारी माता है, हम पृथ्वी के पुत्र हैं (माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः)। ऐसी स्थिति में हम सबके सामूहिक पुरुषार्थ में ही सबका हित है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि जो अपनी रसोई स्वयं पकाते हैं, खा लेते हैं, वे पापी हैं और पाप का ही उपभोग करते हैं। काव्य में रूपक की पराकाष्ठा वाला यह श्लोक बड़ा ही अद्भुत अर्थ स्वयं में समाए हुए है। पूर्वार्द्ध में भगवान ने कहा कि जो यज्ञावशिष्ट बाँटकर खाते हैं, वे सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं अर्थात् समाज के उन्नयन के निमित्त अपनी सारी क्षमताएँ लगा देने वाले सज्जन पुरुष सब प्रकार के पापों से मुक्ति पा जाते हैं। आगे वे कहते हैं, “ये पचन्त्यात्मकारणात्” जो अपने लिए ही सब कुछ करते हैं, वे वस्तुतः अपने स्वार्थपूर्ण लाभ के लिए ही सारी विधिव्यवस्था जुटाते हैं, व्यापार में प्रवृत्त होते हैं। शीर्ण स्वार्थपरता वाला जीवन जीते हैं। धन का संचय अपने ही पास करते हैं। येन-केन-प्रकारेण धन एकत्र करने में दिन-रात जुटे रहते हैं। उन्हें औरों की चिंता नहीं होती। समाज का कष्ट उन्हें जरा भी प्रभावित नहीं करता। वे सतत् दुर्वासनाओं का ही संग्रह करते रहते हैं। अंततः अशाँति, उद्विग्नता-विषाद-संक्षोभ को प्राप्त होते हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने इन्हीं को नरकीटक-नरपशु-नरपिशाच कहा है व एक ही उपदेश दिया है कि हम उस श्रेणी में जिएँ जो नरमानव से देवमानव की ओर हमें ले जाती है। कैसे ? तो फिर सूत्र वहीं है, समाजनिर्माण में, सेवाकार्य में अपनी क्षमताएँ नियोजित करना, अपनी सभी वासनाओं का क्षय करके जीवन को कलाकार की तरह जीना सीखना।

अभी तेरहवें श्लोक तक हम यज्ञीय जीवन की व्याख्या ही कुछ प्रारंभिक भूमिका के साथ समझ पाए हैं। श्रीकृष्ण भगवान ने अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचकर इस अध्याय में ‘यज्ञकर्म’ की भावपरक शिक्षा अपने शिष्य हिंदू राजकुमार अर्जुन को दी है। वेदाँत के भाव को लेकर दार्शनिक भाषा में अवतारी गुरु ने यज्ञ की अग्नि को ब्रह्माग्नि बताया है। ब्रह्माग्नि बताया है, ब्रह्म की ओर ले जाने वाली ऊर्जा जिसमें आहुति दी जाती है। यह अग्नि है आत्मज्ञान की अग्नि। आत्मार्पण रूपी यज्ञ की अग्निशिखा। इस या से बचा अवशिष्ट अर्थात् दिव्यता व अमरत्व का आनंद देने वाला सोमरस। यह दिव्य कर्म है, जिसमें हर क्रिया जो समाज व विश्व के नवनिर्माण के लिए की जा रही है, हव्य है। यज्ञावशिष्ट का भोग करने वाले सनातन ब्रह्म को प्राप्त करते हैं, उनका साक्षात्कार करते हैं। कितनी सुँदर व्याख्या है अर्जुन के लिए श्रीकृष्ण की। वे कहते हैं कि यज्ञ ही विश्व का विधान है, यज्ञ के बिना कुछ भी हासिल नहीं हो सकता, न इस लोक में प्रभुत्व प्राप्त हो सकता है, न परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति। यह ज्ञान अर्जुन को विशिष्ट उद्देश्यों के साथ दिया जा रहा है, क्योंकि वे ‘यज्ञ-कर्म’ के रूप में उसे जीवन जीने का मर्म सिखा रहे है।

इसी उद्देश्य से वे अगले दो श्लोकों में पते की बात बताते हैं।

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मार्त्सवगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥

अर्थात् “संपूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ की उत्पत्ति निःस्वार्थ कर्म से होती है। कर्म समुदाय को हे अर्जुन। तू वेद (ब्रह्म) से उत्पन्न जान और वेद को अविनाशी अक्षर परमात्मा से उत्पन्न। इससे प्रमाणित है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है।”

भगवान् श्रीकृष्ण एक कुशल शिक्षक की तरह अर्जुन जैसे शिष्य के लिए मंजिल-दर-मंजिल शिक्षण के नए आयाम स्थापित कर रहे हैं। स्वार्थरहित-प्रभु समर्पित कर्म अर्जुन कैसे करना सीखे, कर्मयोग के आदर्श को आत्मसात् कर किस तरह उस क्षेत्र में गति बढ़ाए, इसीलिए भगवान् को उसे यज्ञरूपी एक महान् कर्मचक्र के रूप में समग्र दिव्य-व्यवस्था को समझाना जरूरी लग रहा है। अर्जुन जैसे वैज्ञानिक चिंतन वाले नवयुवक के लिए यही रीति-नीति जरूरी है।

भगवान् कहते हैं कि जिस अन्न से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती हैं, उससे उनका आशय है इंद्रियों द्वारा ग्रहण और उपयोग किए जाने वाले तमाम विषय पदार्थ। किसी भी समाज की जीवनी-शक्ति को बढ़ाने के लिए इन पदार्थों की जरूरत पड़ सकती है। अब यह पदार्थ उत्पन्न होते हैं वर्षा से। वर्षा से आशय जल वाली वर्षा से नहीं बल्कि प्राणपर्जन्य से है, जो कि किसी भी भौतिक पदार्थ में उसका कारण तत्व समाहित करना है। यह वर्षा स्वतः ही होती है, सूक्ष्म जगत् का वातावरण अनुकूल होने पर होती है, संभव है दिखाई भी न पड़े व ‘प्लाज्मा’ रूपी सूक्ष्म सोम तत्व के बरसने से अपना उद्देश्य पूरा कर देती है। वातावरण को मानसिक धरातल पर सही बनाना ही ‘पर्जन्य’ के बरसने की सहायक परिस्थितियाँ विनिर्मित करना है। अब यह पर्जन्य बरसता कब है ? श्रीकृष्ण कहते हैं यज्ञ से। यज्ञ ‘स्वाहा’ वाला नहीं, बिना किसी स्वार्थ के समर्पण भाव से सहकारी स्तर पर किए गए सामूहिक प्रयास से। किसी भी समुदाय में मानसिक अनुकूल वातावरण अर्थात् वर्षा तो यज्ञ जैसे निःस्वार्थ स्तर के परमार्थ के लिए किए गए श्रेष्ठतम कर्म द्वारा ही हो सकती है।

‘पर्जन्य’ के बरसने में सहायक अर्थात् मनःस्थिति के अनुकूलन में यज्ञ की अर्थात् निष्काम कर्म की आवश्यकता समझना यहाँ बहुत जरूरी हैं। तब ही हम समझ पाएँगे कि “यज्ञाद्भवतिम पर्जन्यः” से श्रीकृष्ण का आशय क्या है ? ऐसे कार्य जब समष्टि स्तर पर होते हैं तो अन्न में भी प्राण रहता है एवं उपभोग करने वाले जीवों में भी प्राण रहता है एवं उपभोग करने वाले जीवों में भी प्रचुर मात्रा में प्राण शक्ति विद्यमान होती हैं। यज्ञीय वातावरण बनता है, निःस्वार्थ किए गए समाजोत्थान के उद्देश्य से निष्पादित सामूहिक कर्म द्वारा। (यज्ञः कर्मसमुद्भवः)। यह समग्र सृष्टि का एक चक्र हुआ। इसे ही यज्ञ की उपमा देकर श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहें हैं।

यज्ञ की जब हम मात्र कर्मकाँड मान लेते हैं तो उसके पीछे छिपी भावनाओं का, सृष्टि यज्ञ कर इकॉलाजिकल साइकल का अर्थ नहीं समझ पाते। यज्ञ का अर्थ है- निष्काम कर्म। यह हर किसी को, आप्तकाम पुरुष को भी करना पड़ता है। परमपूज्य गुरुदेव प्रतिदिन छह घंटे लेखनी चलाते थे। जीवन भर के पुरुषार्थ से 3200 किताबें लिखीं, अपने वजन से पाँच गुना अधिक साहित्य लिखा। क्या जरूरत थी उनके जैसे महापुरुष को लिखने की। हर आप्तकाम पुरुष को भी निःस्वार्थ कम करके एक उदाहरण जगत् के समक्ष रखना पड़ता है। जैसे श्री रामकृष्ण परमहंस को काली की पूजा करने की जरूरत पड़ी, जबकि वे परमहंस थे, उसी तरह प्रत्येक को यज्ञीय जीवन जीने की जरूरत पड़ती है। यही कर्म, यज्ञीय जीवन औरों के लिए उदाहरण बनते हैं।

हरि महाराज रामकृष्ण मिशन में एक स्वामी जी हुए हैं, जिनका नाम बाद में स्वामी तुरीयानंद जी रखा गया। बनारस में प्रवचन कर रहे थे। विदेशियों ने उनसे पूछा, “एक पंक्ति में अध्यात्म की परिभाषा बताइए।” उनने कहा, “नियमित सतत् परहितार्थाथ कर्म करो, उदाहरण बनकर जियो।” जियो तो ऐसे जियो कि तुम औरों के लिए एक मिसाल बन सको। अध्यात्म की यह परिभाषा हमारी समझ में आ जाए तो कर्म करते-करते आप्तकाम कैसे हुआ जाता है, यह भी हमें आत्मसात् हो जाएगा। जीवन के अंतिम काल तक आद्य शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद, परमपूज्य गुरुदेव जैसे महापुरुष सतत् कार्यरत रह यही उदाहरण हमारे समक्ष रख जाते हैं।

भगवान् की वाणी जो यज्ञ के विषय में प्रकट हुई है, उस यज्ञीय संस्कृति का शिक्षण दे रही है, जो भारतीय धर्म-अध्यात्म का मूल प्राण है। वे बता रहे हैं कि मनुष्य शरीर के तल पर जीने तक सीमित न रहे। कर्मकाँड तो भावनाओं की सवारी मात्र है। यज्ञ एक कर्मकाँड नहीं है, यह निःस्वार्थ कर्म का एक चक्र है, जो सतत् गतिशील है। यह कर्म कहाँ से जन्मा। श्रीकृष्ण पंद्रहवें श्लोक में कहते हैं, ब्रह्माजी, वेदों के ज्ञान से। स्वयं ब्रह्म अनंत अक्षर तत्व की सृजनात्मक शक्ति के अभिव्यक्ति स्वरूप ही तो है (ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्)। इस प्रकार निष्कर्ष निकालते हुए भगवान कहते हैं कि सर्वव्यापी ब्रह्म यज्ञ-कर्म में सदैव प्रतिष्ठित हैं अर्थात् हर उस सामूहिक पुरुषार्थ में परमात्मा की सत्ता ही स्पष्ट उपस्थित है, जिसमें सदस्य स्वार्थ की, कामना की भावना से ऊपर उठकर यज्ञीय जीवन के भाव से, एक टीम भावना से मिल-जुलकर पुरुषार्थ करते हैं। तस्मार्त्सवगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्। सर्वव्यापी ब्रह्म यज्ञ में सदैव प्रतिष्ठित हैं। यह हमें भली-भाँति समझना होगा।

परमपूज्य गुरुदेव ने विचार क्राँति को अपने समय की सबसे बड़ी आवश्यकता, एक मास्टर चाबी कहा है, जिससे वे सभी ताले खुल सकते हैं, जिनमें सुखद संभावनाओं के मणि-माणिक्य तिजोरी में बंद स्थिति में पड़े है। इस विचार क्राँति को हमने प्रतिभाओं के उभार, सद्विचारों के प्रवाह एवं युगचेतना के तद्भव से संभव होना बताया जो मानव समुदाय की ऋषिकल्प सामूहिक तपश्चर्या द्वारा होगी, ऐसा लिखा है। 12 वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण की महत्ता को एक विराट् यज्ञ में भागीदारी के रूप में एक विशाल टीम द्वारा किए गए सामूहिक महापुरुषार्थ के रूप में भली-भाँति समझा जा सकता है। यह महापुरश्चरण किस स्तर पर हो रहा है एवं कैसे वातावरण का अनुकूलन कर प्राणपर्जन्य के बरसने की स्थितियाँ बना रहा है, यह समझा जा सकता है। महाविनाश की स्थिति टालने व नवसृजन का कार्य करने के लिए यज्ञीय भाव से जिस कर्म को संपादित किया जाना था, उसे हमारे परिजन न केवल संपन्न कर रहे है, अपितु इस महापूर्णाहुति वर्ष में उस विराट् यज्ञ अभियान की महापूर्णाहुति भी करने जा रहे हैं। तब सतयुग की वापसी पर किसी को संदेह क्यों होना चाहिए।

सृष्टि का यह नियम है कि हर मानव को कर्मचक्र के अनुरूप ही अपने जीव की रीति-नीति बनानी चाहिए। जो ऐसा नहीं करता वह वस्तुतः व्यर्थ ही जीता है, पापमय जीवन में लिप्त होता चला जाता है। यह व्याख्या है सोलहवें श्लोक की, जिसमें कर्त्तव्यपालन की उपेक्षा के दुष्परिणाम, इंद्रिय-भोगों में लिप्त रहने वालों की दुर्गति आदि के विषय में श्रीकृष्ण का उपदेश है। यह व्याख्या व आगे के लोकसेवी का जीवन कैसा होना चाहिए-यह शिक्षण अगले अंक में। ............ .......... ............ ................ यहां से आगे का टाइप किया गया मेटर 2000-06 में भी दिया हुआ है। कृपया चैक करें।........... .............. ............... ............... .................. ..................... .................. .................. ........................ ................... .............................. .................. ..................... .................. .................. ........................ ................... .............................. .................. ..................... .................. .................. ........................ ................... .............................. .................. ..................... .................. .................. ........................ ................... .............................. .................. ..................... .................. .................. ........................ ................... .............................. .................. ..................... .................. .................. ........................ ................... ...............

परमपूज्य गुरुदेव ने सर्वप्रथम विशिष्ट चेतना-संपन्न व्यक्तियों के रूप में विभूतियों का आह्वान 1966-67 में किया था, जब उन्होंने, ‘महाकाल और उसकी युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया’ शीर्षक से एक अप्रतिम ग्रंथ रचा। आज भी लगभग 160 पृष्ठों की यह पुस्तक हर अग्रदूत के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है। इस पुस्तक में पौराणिक उपाख्यानों के साथ समय की विषमता, दशावतार के रूप में निष्कलंक की भूमिका से लेकर विभूतियों की नवसृजन हेतु भागीदारी के विषय में पूज्यवर ने बड़ी भावोत्तेजक शैली में अपनी वेदना लिखी थी। उस समय का उनका विभूतियों आह्वान जिन-जिनसे था, वह वर्गीकरण आज की परिस्थितियों में भी उतना ही व्यावहारिक है, जितना कि तब था। तब दूरगामी परिस्थितियों की संभावनाओं का वर्णन था। आज तो हम साक्षात् प्रलयंकर उस घड़ी से गुजर रहे हैं, जिनमें चारों ओर त्राहि-त्राहि मची है। ऐसी परिस्थिति में उनका वही आह्वान युगानुकूल मानते हुए पुनः प्रस्तुत किया जा रहा है, ताकि परिजन तृतीय चरण के समापन व चतुर्थ चरण के जुलाई से नवंबर तक की संपन्न होने वाली वेला में अपना मूल्याँकन कर सकें, सभी प्रतिभाशीलों की पहचान उन्हें ‘सृजन संकल्प विभूति कहायज्ञ’ एवं ‘विभूति ज्ञानयज्ञ’ में अपने संकल्पों के साथ सम्मिलित कर सके।

जिन सात विभूतियों को झकझोरने का, सन्मार्गगामी बनाने कार्य गुरुसत्ता ने हमें सौंपा, उनको इस प्रकार विभक्त किया जा सकता है।

भावना क्षेत्र (धर्म-अध्यात्म) 2. शिक्षा एवं साहित्य 3. कलामंच के भा स्पंदन 4. भौतिकी एवं विज्ञान का तंत्र 5. शासनतंत्र (सत्ताधारी) 6. संपदावान 7. विशिष्ट प्रतिभासंपन्न (बहुमुखी)।

तब परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा था कि युगनिर्माण आँदोलन का प्रथम प्रयास था जनजागरण। अब अगला कदम है विभूतियों को झकझोरना, उन्हें उलझी हुई स्थिति से निकालकर जीवन अथवा मरण में से किसी एक को चुने के लिए विवश करना। आगे वे यह भी लिखते हैं कि अब तक यह अभियान भारत तक विशेषतया हिंदू वर्ग के प्रगतिशील लोगों तक सीमित रहा है। अब इसकी परिधि विश्वव्यापी बनाई जा रही है। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि इसके प्रायः चार वर्ष बाद परमपूज्य गुरुदेव अपने विदेश प्रवास पर गए थे, अगणित प्रवासी भारतीयों को समत्व भरा स्पर्श देकर आए थे। वही समय था, जब हमारे यहाँ से गए पढ़े-लिखे परिजन अपने-अपने देशों में जड़ें जमाने लगे थे। मूल को संस्कारित पूज्यवर कर गए। हम सभी तो सतह से ऊपर का सारा बना-बनाया काम अब श्रेय रूप में संपन्न कर रहे है।

प्रथम विभूति भावना क्षेत्र (धर्म एवं अध्यात्म)-

धर्म-धारणा एवं अध्यात्मिक-साधना का सारा कलेवर खड़ा ही इसलिए किया गया है कि व्यक्तित्व को उत्कृष्ट एवं गतिविधियों को आदर्श बनाया जाए। धर्म, चरित्र गठन का नाम है, तो अपनी क्षमताएँ लोकमंगल के लिए समर्पित करने की पृष्ठभूमि का नाम अध्यात्म है। भावनाएं श्रेष्ठतम हों व लोकमंगल के लिए अर्पित हो तो ही उनकी सार्थकता है।

प्रयास होना चाहिए कि सभी धर्म-संप्रदायों में परस्पर सहिष्णुता और समन्वय की प्रवृत्ति पैदा हो। वे अपने स्वरूप में रहें, पर विश्वधर्म के घटक बनकर रहें। प्रथा-परंपराओं वाले कलेवर को गौण समझें। अपनी परंपराओं में से सभी उत्कृष्ट मानवता, आदर्श साज की रचना के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़े। धर्म अध्यात्म क्षेत्र में लगी प्रचुर पूँजी जनशक्ति, भावप्रवणता व प्रभावशीलता का उपयोग सृजनात्मक हो। भावनाशील धर्मधारणा प्रधान लोग अपनी भौतिक व आत्मिक क्षमताओं का उपयोग मानव हितार्थ करें।

द्वितीय विभूति शिक्षा एवं साहित्य का क्षेत्र -

विचारप्रक्रिया पर मानव की गरिमा टिकी है। इस जीवन-प्राण के मर्मस्थल को शिक्षा एवं साहित्य के माध्यम से ही परिष्कृत बनाया जा सकता है। व्यक्ति और समाज के नवनिर्माण में शिक्षा और साहित्य की सृजनात्मकता का नियोजन होना चाहिए। भावपरिष्कार की पूरक धर्मशिक्षा, नैतिक शिक्षा, नवनिर्माण की शिक्षापद्धति का संचालन जनता के स्तर पर होना चाहिए। प्रौढ़ शिक्षापद्धति का संचालन जनता के स्तर पर होना चाहिए। प्रौढ़शिक्षा का कार्य साक्षरता विस्तार भी जनता अपने हाथ में ले। ये सरकारी स्तर पर नहीं, जनस्तर पर ही हल हो सकती है। जनस्तर के विद्यालय-अनौपचारिक विश्वविद्यालय बनें, जिनमें दृष्टिकोण परिष्कार आज की परिस्थितियों में चरित्र-निर्माण का व्यवस्थित पथ, समाज-संरचना की अगणित समस्याओं का हल, विश्व-परिवार के लिए बाध्य करने ले प्रचंड वातावरण का निर्माण करने वाले कार्य संपन्न हों। सरकार से अनुदान न माँगकर भावनात्मक स्तर पर जनता से इसकी पूर्ति की जाए। लाखों जाग्रत आत्माएं लिए शिक्षक इसके लिए खड़े किए जा सकते हैं। हर गाँव-मुहल्ले-बस्ती में लोकशिक्षण की आवश्यकता पूरी करने वाले विद्यालय खड़े हों।

साहित्यकार रचनाधर्मी लेखन करें। कवि मूर्च्छित जनता को जाग्रति में परिणत करने वाले अग्निगीत लिखें। पत्रकार अपने पत्रों में-पत्रिकाओं में रचनात्मक क्राँतिधर्मी लेखों को स्थान दें। भारत की मान्यता प्राप्त 14 एवं विश्वभर की 600 भाषाओं में यह साहित्य प्रकाशित हो। इसके लिए प्रकाशक भी इस क्षेत्र में उतरें।

तृतीय विभूति कलामंच (लोकरंजन से लोकमंगल)-

चित्र, मूर्तियाँ, नाटक, अभिनय, संगीत, धारावाहिक, फिल्में, लोकगीत सभी इस तंत्र में आते हैं। सरल संगीत के ऐसे पाठ्यक्रम बनें, जो वर्षों में नहीं, मात्र कुछ माह में सीखे जा सकें। संगीत विद्यालय जगह-जगह खुलें। प्रचंड प्रेरणा भरे गीतों का हर नुक्कड़, हर मंच, टेलीविजन, केबल आदि पर प्रसारण हो। प्रत्येक हर्षोत्सव पर प्रत्येक गायनों-प्रेरणादायी नुक्कड़ नाटकों की ही प्रधानता हो। संगीत सम्मेलन, गोष्ठियाँ, सहगान कीर्तन, एक्शन साँग, लोकनृत्य व गायन जैसे अगणित सहगान कीर्तन बनें, लोकरंजन की आवश्यकता पूरी करें। प्रेरक प्रसंगों बनें, लोकरंजन की आवश्यकता पूरी करें। प्रेरक प्रसंगों वाले चित्र छपें, चित्र प्रदर्शनी स्थान-स्थान पर लगें। गीतों के ऑडियो कैसेट्स, सी.डी. जन-जन तक पहुँचे। प्रेरक धर्मप्रेरणा प्रधान धारावाहिक एवं फिल्में बनें।

चतुर्थ विभूति विज्ञान तंत्र (भौतिकी)-

नूतन शोधें सृजनात्मक प्रयोजनों तक सीमित रहें। ध्वंसात्मक उपकरण जुटाने में जितने साधन खपाए जा रहें है उन्हें अभाव, शोक-संताप की निवृत्ति हेतु लगा दिया जाए। समुद्री खारा पानी मीठा बनाया जा सकता है। भूगर्भ का मीठा विशाल परिमाण में जल धरती पर लाया जा सकता है। प्रकृति के प्रकोपों से मोरचा लेने हेतु विज्ञान के साधन लगें। वाहनों को सरल व सस्ता बनाया जाए, संचार साधनों का विस्तार हो। विज्ञान अध्यात्म के साथ संगति बिठाकर सिद्ध करें कि शक्तिस्रोत चेतना संकल्पों व आत्मबल में सन्निहित है।

पंचम विभूति शासन तंत्र (सत्ता)-

संकीर्ण राष्ट्रीयता के अपने प्रिय क्षेत्र तथा वर्ग के लोगों को लाभान्वित करने की बात छोड़कर राजतंत्र समस्त विश्व की समान रूप से सुख-शाँति की बात सोचे। वर्गभेद-वर्णभेद की जड़ें उखाड़े तथा युद्धों की भाषा में सोचना बंद कर न्याय का आधार स्वीकार करें। सरकारें अनीति, शोषण, अपराध, रिश्वत, भ्रष्टाचार के वास्तविक शत्रु से जूझे। अपने सरकारी कर्मचारियों में, सत्ता-संचालकों में घुसी अनैतिकता व स्वार्थपरता को जड़-मूल से उखाड़ फेंकें व बेकारी, बीमारी, गरीबी दूर करने की दिशा में योजनाएँ बनाएँ। मतदाता अपने दायित्व समझें कि सुयोग्य प्रतिनिधि चुने जा सकें।

षष्ठ विभूति संपदावान-

सर्वोपरि मान्यता इन दिनों पूँजी को मिली है। संग्रहित पूँजी को लोकमंगल के लिए लगाने की दूरदर्शिता धनपति दिखाएँ। संग्रहवाद-अमीरी के दिन लद गए, अब जमाना एकता व समता का है, यह समझाया जाए। जनसाधारण की बचत पूँजी (अंशदान) तथा पूँजीपतियों की धन-संपदा युगपरिवर्तन के प्रवाह में अनुकूलता उत्पन्न करने हेतु नियोजित हो। पूँजी की सुरक्षा के साथ-साथ लाभाँश की सुनिश्चितता समझाई जा सके, तो व्यवसायबुद्धि से संपन्न अगणित व्यक्ति विचारक्राँति अभियान में उल्लेखनीय सहयोग दे सकते हैं।


अपनों से अपनी बात-2 - जलते दीपक संपन्न करेंगे यह महापूर्णाहुति

सारा राष्ट्र व विश्व इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। समझदारी इसी में है कि इस समय का उपयोग अपने राष्ट्र के भाग्य और भविष्य का निर्माण करने के लिए किया जाए। श्री अरविंद ने 1904 में एक पुस्तिका लिखा थी ‘भवानी मंदिर’। इसमें उन्होंने चेताया था कि “भारतमाता जो आदि जननी है, असल में पुनर्जन्म लेने का प्रयास कर रही है। असह्य वेदना और आँखों में आँसू लिए है। उसे कठिनाई किस बात की है ? इतनी विशाल होते हुए भी वह अशक्त क्यों है ? अवश्य ही हममें कोई भारी दोष होगा। हमारी पास बाकी सभी चीजें है। बस हम शक्तिशून्य हैं, ऊर्जा का हममें अभाव है। हमने शक्ति को त्याग दिया अथवा शक्ति द्वारा हम त्याग दिए गए। हमारी माता का वास हमारे अंतःकरण में, मस्तिष्क में, भुजाओं में नहीं है।” श्री अरविंद की चेतावनी इस विषय में थी कि बल हमारे अंदर से स्वतः स्फूर्ति हो प्रकटे एवं हम सही माइनों में राजनैतिक-सांस्कृतिक स्वातंत्र्य प्राप्त करें।

आई.सी.एस. की पढ़ाई पूरी कर चुके श्री अरविंद घोष की भारतमाता के विषय में यह बड़ी स्पष्ट मान्यता थी। 30 अगस्त 1905 को उनके द्वारा अपनी पत्नी मृणालिनी देवी को लिखे एक पत्र को यहाँ उद्धृत करने की इच्छा हो रही है, जिसमें उन्होंने राष्ट्रचिंतन को और अधिक स्पष्ट करते हुए लिखा था, “लोग अपने देश को एक जड़ पदार्थ का टुकड़ा समझते हैं-खेत, वन और पहाड़ियों-नदियों के रूप में, लेकिन मैं आपने देश को अपनी माता मानता हूँ। मैं उसकी आराधना करता हूँ, माता के रूप में उसकी पूजा करता हूँ। यदि कोई राक्षस किसी पुत्र की माता की छाती पर चढ़कर उसका खून चूसने लगे, तो वह पुत्र क्या करेगा ? मैं यह जानता हूँ कि मुझ में इस गिरे हुए राष्ट्र को उबारने की ताकत है। शारीरिक शक्ति की बात नहीं, मैं कोई तलवार या बंदूक उठाकर लड़ने नहीं जा रहा, पर मैं ज्ञान की शक्ति से विजय प्राप्त करूंगा।” यह है सही मायने में आस्था-विश्वास, वह भविष्य-दृष्टि जो किसी भी संस्कृति को, राष्ट्र को अमरत्व प्रदान करती है।

आज के भ्रष्ट, नैतिक मूल्यों से रहित समाज को, अविश्वास से भरे सामाजिक जीवन को जब हम देखते हैं, तो मन में संशय उठता है कि कैसे बनेगा यह राष्ट्र भारतवर्ष महान् ? कैसे करेगा यह मार्गदर्शन सारे विश्व का और कैसे उबरेगी मानवजाति ? लगता है कि हम सभी को पुनः भारतवर्ष के प्राण अध्यात्म को, ज्ञान की शक्ति को, जिसकी चर्चा श्री अरविंद ने ऊपर की, पुनर्जागृत करना होगा, इसी प्रेरणा को जन-जन के रग-रग में भरना होगा, तभी होगा खंडहरों में से भारत का पुनर्जन्म। हाँ, इस शीर्षक से लिखी श्री अरविंद की पुस्त भी सार रूप में यही कहती है कि यही भारत की मूल ताकत है एवं विज्ञान की शक्ति के साथ मिलकर यह एक नए वाद ‘वैज्ञानिक अध्यात्मवाद’ की भूमि पर, हमारे परमपूज्य गुरुदेव श्रीराम शर्मा आचार्य जी के शब्दों में, एक नए सशक्त जगद्गुरु के रूप में भारतवर्ष को पुनः इसी इक्कीसवीं शताब्दी में (2057 वि. संवत् से 2065 तक) स्थापित करके रहेगी। क्या यह संभव हो सकेगा ?

इन दिनों सारा विश्व एक अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। जहाँ एक ओर विज्ञान की खोजों ने, उपग्रहों व इंटरनेट के जाल ने उसे एक ‘ग्लोबल ग्राम’ बना दिया है, वहीं व्यक्ति-व्यक्ति के बीच की भावनात्मक दूरी भी बढ़ा दी है। 1902 की 4 जुलाई को स्वामी विवेकानंद के महाप्रयाण से लेकर 1950 की 5 दिसंबर को श्री अरविंद के ब्रह्मलीन होने एवं 2 जून गायत्री जयंती 19990 को परमपूज्य गुरुदेव के सूक्ष्म में विलीन होने तक का समय इसी सहस्राब्दी के अंतिम शतक में बीता, जिसके अंतिम वर्ष से हम गुजर रहे है। एक असीम शतक में बीता, जिसके अंतिम वर्ष से हम गुजर रहे हैं। एक असीम संभावनाओं को लिए एक नया वर्ष, एक नई शताब्दी, एक नई सहस्राब्दी हमारा स्वागत करने को तैयार खड़ी है, मात्र दो सौ दिन बाद। इस 98 वर्ष में न जाने कितना जल गंगा में बह गया, वह एक पुण्यतोया सदानीरा भागीरथी से एक छोटे-से गंदे नाले के प्रवाह में बदल गई। न जाने कितना रक्त बह गया इस धरती पर सारे विश्वयुद्ध व सर्वाधिक मौतें इसी एक सदी में हुई। एक प्रश्न पूछती है भारत की एक अजन्मी आत्मा कि क्या मैं सुरक्षित रहूँगी नई सहस्राब्दी में भारतभूमि में जन्म लेकर। हमें उसे आश्वासन ही नहीं देना है, वह वातावरण भी देना है, जिसमें वह जी सके, घुट-घुटकर मर न जाए, जैसा कि उच्चस्तरीय आत्माओं के साथ सदैव होता रहा है।

वस्तुतः यह मानव मात्र के भाग्यनिर्माण की, विश्व के भविष्यनिर्माण की वेला है। पिछले अंधकार युग की विभूतियाँ इन दिनों वैज्ञानिक, बौद्धिक, आत्मिक प्रगति का ईंधन पाकर दावानल की तरह भड़क उठी है। ज्वालामुखी संकटों की तरह ऐसे संकट उभर रहे है, जिनके समाधान नहीं सूझते। एक जगह से सीना पूरा हो नहीं पाता, इसके पूर्व दूसरे दस जगह से कथरी फट जाती है। सड़े-गले को गलाने की, ढालने की इन घड़ियों में महाकाल की युगाँतरीय चेतना अधिकाधिक प्रखर होती चली जा रही है। जिनके पास आँखें हों, वे ही आज इस महान् परिवर्तन के पुण्य पर्व का महात्म्य और महत्व समझ सकेंगे अन्यथा इतिहासकार तो इस परिवर्तन काल के घटनाक्रम का उल्लेख करेंगे ही और भावी पीढ़ियाँ इसे रुचिपूर्वक पढ़ेगी भी।

आपत्तिकाल में सामान्य नियम नहीं चलते। इन दिनों विशेष निर्धारण होते हैं, विशेष क्रियाकलाप चलते हैं। मुहल्ले के किसी मकान में आग लगी हो तो सामान्य दैनिक कृत्यों में नहीं उलझा जाता। उस समय विशिष्ट परिस्थितियों का सामना करने के लिए जाग्रतों को जुटना पड़ता है। हानि-असुविधा कुछ भी सहनी पड़े लगना तो पड़ता ही है। जाग्रत् आत्माओं को भी ऐसी संधिवेला में अपना विशिष्ट दायित्व निभाने आगे आना होगा।

साहसिक शूरवीरों की तरह अब नवयुग के अवतरण में जागृतात्माओं की भगीरथ भूमिका आवश्यक हो गई है। इसके बिना तपती भूमि और जलती आत्माओं को तृप्ति देने वाली, सगरपुत्रों को शाप से उबारने वाली गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतरने के लिए सहमत न किया जा सकेगा, यह वस्तुतः देवत्व की प्रतिष्ठा का समय है, जिसमें समूह का बल ही सक्रिय भूमिका निभा सकेगा। नवयुग की योजनाओं को बनाते रहने का समय अब बीत गया। अब तो करना ही शेष है। विचारणा को तत्परता में बदलने की घड़ी आ पहुँची है। भावनाओं का परिपाक सक्रियता में होने की प्रतीक्षा की जा रही है। असमंजस में जीने का समय नहीं है यह।

किया क्या जाए ? कैसे नवसृजन के इस पावन यज्ञ में अपनी आहुति डाली जाए ? इसके लिए ज्ञानयज्ञ की, विचारक्राँति की लाल मशाल जो जनमानस के परिष्कार के लिए प्रज्वलित की गई थी, के प्रकाश को प्रखर बनाने हेतु तत्पर होना पड़ेगा। यह प्रखरता इस मशाल में जिस तेल से आएगी, वह जागृतात्माओं के भावभरे त्याग-बलिदान से ही प्राप्त किया जा सकेगा। व्यक्ति, परिवार और समाज की अभिनव रचना के लिए न तो साधनों की आवश्यकता है और न परिस्थितियों के अनुकूल होने तक प्रतीक्षा करने की। उसके लिए तो ऐसी प्रखर प्रतिभाएँ चाहिए, जिनकी नसों में भावभरा ऋषिरक्त प्रवाहित हो रहा हो। उनके लिए जिस धातु की आवश्यकता है, वह आदर्शों के प्रति अटूट आस्था की भट्ठी में ही तैयार होती है। इससे कम में भावनात्मक नवसृजन हो नहीं सकता। अष्टधातु के ढले प्राणवान् व्यक्तियों की ही इन दिनों आवश्यकता पड़ रही है। वे छद्मवेशधारी लूटने-खसोटने वालों की अनगढ़ भीड़ में कहीं दुबके पड़े हैं या आत्मविस्मृति के गर्त से उबरे हेतु सही समय की राह देख रहे हैं। विचारक्राँति अभियान की प्रतिभा परिष्कार योजना, विभूति नियोजन प्रक्रिया इसी निमित्त एक विराट् धर्मानुष्ठान के समापन पर एक महापूर्णाहुति की वेला के रूप में सामने आई है। लोकसेवा के व्यापक क्षेत्र में न जाने कितने पाखंडी घात लगाए बैठे दिखाई पड़ते हैं, एन.जी.ओ. के नाम पर सेवा का दंभ भरते दिखाई पड़ते हैं। पर प्रकाश तो हमेशा जलते दीपकों से ही होता है। ऐसे जलते दीपकों को महापूर्णाहुति के विभिन्न चरणों में दीपयज्ञों की आभा में टटोला व पुनः प्रज्वलित किया जा रहा है, स्नेह का घृत डालकर उनकी प्रखरता को जीवंत रखने का प्रयास युगचेतना द्वारा संपन्न हो रहा है।

गायत्री परिवार के अब तक के इतिहास में ऐसा महापराक्रम से भरा अवसर पहली बार आया है, जब सारे राष्ट्र ही नहीं, विश्व को मथा जा रहा है। प्रतिभाओं का गहन मंथन कर नवनीत निकाला जा रहा है। यह वर्ष महापूर्णाहुति वर्ष है, युगसंधि महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति, एक शताब्दी के सामरिक पुरुषार्थ की महापूर्णाहुति। अगला वर्ष युगचेतना के भरती पर अवतरण के 75 वें वर्ष की रजतजयंती के रूप में मनाया जाने वाला है। सभी जानते हैं कि ‘अखण्ड दीपक’ के रूप में युगचेतना नए युग का संदेशा लेकर धरती पर 1923 की वसंत पंचमी 18 जनवरी की ब्रह्ममुहूर्त की पावन वेला में आई। साथ ही परमवंदनीय माताजी भी धरती पर इसी वर्ष आश्विन कृष्ण चतुर्थी के पावन दिन अवतरित हुई। इस वर्ष को तीसरा सौभाग्य मिला श्री अरविंद के द्वारा भागवत् चेतना के धरती पर अवतरण का वर्ष घोषित करने के रूप में। इस वर्ष के अंत के आते-आते श्री अरविंद ने अपने को पूरी तरह बहिरंग गतिविधियों से खींच लिया था।

महापूर्णाहुति का अंतिम चरण 29 जनवरी वसंत पंचमी 2001 से आरंभ होकर 1 जून गायत्री जयंती तक चलेगा। यह समय आते-आते भारतवर्ष अपने विराट रूप में अपनी संतानों के माध्यम से पुनः प्रतिष्ठित होगा। युगचेतना के अवतरण की रजतजयंती निश्चित ही भारत ही नहीं, सारे विश्व के पुनर्जागरण का पावन संदेश लेकर आ रही है। उसके पूर्व का समय हम सबके लिए भारी जिम्मेदारी भरा, विशिष्ट अवसरों से युक्त एवं समूह मन की उच्चस्तरीय साधना का समय है। कोई भी जागृतात्मा इस पावन सुयोग से वंचित न रहने पाए।


अपनों से अपनी बात-3 - संभागीय महापूर्णाहुति के बाद अब है तीन स्तरों वाला अति महत्वपूर्ण चतुर्थ चरण

इस पत्रिका के पाठकों के पास पहुँचने तक संभागीय स्तर की राष्ट्रव्यापी 108 महापूर्णाहुतियाँ समाप्त हो चुकी होंगी। भारत से बाहर विदेश की धरती पर ऐसे विराट् चौबीस आयोजन संपन्न होने हैं, जो वहाँ की परिस्थितियों के अनुरूप 18 जून 2000 से 22 जनवरी 2001 तक की अवधि में लगभग चौबीस देशों में आयोजित हो चुकेंगे। राष्ट्रव्यापी 108 संभागीय पूर्णाहुतियाँ एक प्रकार से पूरे राष्ट्र की संघनात्मक मंथन प्रक्रिया के प्रथम चरण का समापन है। इन 108 स्थानों में राष्ट्र का कोई भी कोना छोड़ा नहीं गया है। जहाँ दक्षिण भारत के चैन्नई, बैंगलोर, हैदराबाद में ये कार्यक्रम हुए हैं, वहीं पूर्वोत्तर के सिलिगुड़ी, कलकत्ता, वीरगंज में, पश्चिम के जम्मू, श्रीगंगानकर, जोधपुर, भुज में भी ये संपन्न हुए हैं। उत्तर में पालमपुर, शिमला, टेहरी, अलमोड़ा आदि क्षेत्रों में भी पूर्णाहुति संपन्न हुई है। राष्ट्रजागरण तीर्थयात्रा जो प्रायः चौदह रथों द्वारा 90 दिन में प्रायः पचास हजार से भी अधिक मील की यात्रा संपन्न कर पूरे राष्ट्र के चप्पे-चप्पे में गायत्री महाशक्ति का बीजारोपण कर चुकी थी, का इससे सुँदर समापन क्या हो सकता था।

अपने-अपने क्षेत्र की जिम्मेदारी उठाने के संकल्प जिन जाग्रत् प्रज्ञापुत्रों ने लिए हैं, उन्हीं को अब अगले मोरचे के लिए तैयार होना पड़ रहा है। सात आँदोलनों के माध्यम से समाज व राष्ट्र के नवनिर्माण को संकल्पित युग निर्माण योजना, उन प्रतिभाओं की बाट जोह रही है, जिन्हें इस वर्ष गाँव, ब्लॉक, जिला व संभाग स्तर पर चली मंथन प्रक्रिया के माध्यम से खोजा गया है। कभी संस्कृति की सीता को खोजने भगवान् श्रीराम ने हनुमान को भेजा था एवं वे अपने स्वामी की कसौटी पर खरे उतरे, ठीक उसी तरह इस युग के श्रीम ने अपने प्रज्ञापुत्रों व प्रज्ञापुँजों रूपी हनुमानों को उन प्रतिभावानों की तलाश हेतु गहन आध्यात्मिक पुरुषार्थ करने को प्रेरित किया, जो समाज की विभिन्न जिम्मेदारियाँ अपने कंधों पर उठा सकें। महापूर्णाहुति में जलते दीपों की ऊष्मा से बारह वर्ष से गरम हो रहे प्रत्यक्ष व परोक्ष जगत् में वे प्रचंड हिलोरे जन्म ले रही है, जो उस चक्रवात को जन्म देंगी, जिसका नाम प्रज्ञावतार है। समष्टिगत विभूतियों का, वरिष्ठ स्तर के प्राणवानों के परिष्कृत चिंतन के रूप में ही इस युग का निष्कलंक अवतार, ऋतंभरा प्रज्ञा की स्थापना के रूप में आ रहा है।

गायत्री जयंती या ज्येष्ठ पूर्णिमा तक समाप्त हुए इस तृतीय चरण के बाद अब चतुर्थ चरण गति पकड़ेगा। इसमें तीन पुरुषार्थ संपन्न होने है। 1 जुलाई से 1 अक्टूबर तक की तन माह की अवधि में पूरे भारत में स्थान-स्थान पर डेढ़ दिवसीय प्रतिभा-परिष्कार प्रधान बुद्धिजीवी वर्ग के एवं संगठनात्मक प्रज्ञामंडलों के कार्यक्रम संपन्न होने है। इन कार्यक्रमों को चुने हुए स्थानों पर किया जाएगा। जहाँ कहीं तृतीय चरण ने गति पकड़ी होगी, कहीं संभावनाएँ दिखाई पड़ेंगी, वहीं पर विभिन्न समाजसेवी संगठनों के समूहों, रोटरी कल्ब, लायन्स क्लब, भारत विकास परिषद्, फिक्की, चेंबर ऑफ कॉमर्स, आय.एम.ए. विद्यार्थी संघ, शिक्षक संघ, प्रज्ञामंडल, स्वाध्याय मंडलों के माध्यम से ये कार्यक्रम संपन्न होंगे। उनसे तृतीय चरण में हुए कार्य को स्थायित्व मिलेगा, साथ ही स्थान-स्थान की अनछुई प्रतिभा को नए सिरे से युगचेतना के प्रवाह में जुड़ने का अवसर भी प्राप्त होगा।

इसके तुरंत बाद 13 अक्टूबर शुक्रवार को शरद् पूर्णिमा के पावन दिन सायं 5 से 9 जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम नई दिल्ली में एक विशिष्ट विभूति ज्ञानयज्ञ समारोह होना है। इसमें 108 स्थानों में से प्रत्येक से चुनी हुई 100-100 विभूतियाँ एवं प्रायः पच्चीस हजार विशिष्ट जिम्मेदारी उठाने वाले कार्यकर्त्ता सम्मिलित होंगे। भारत के राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री महोदय की गरिमामय उपस्थिति के साथ सभी धार्मिक व स्वैच्छिक संगठनों के प्रमुख जो रचनाधर्मी कार्य से जुड़े हैं, इसमें सम्मिलित होंगे। सभी देशों के राजदूतों को भी उसमें आमंत्रित किया जा रहा है। इसी अंक में वर्णित सात विभूतियों के प्रमुख कर्णधारों को भी इसमें आमंत्रित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण विभिन्न चैनलों से हो, यह भी प्रयास हो रहा है। लक्ष्य एक ही है एक ही मंच से सभी जाने कि उज्ज्वल भविष्य किस तरह आ रहा है।

चतुर्थ चरण का अंतिम समापनपरक समायोजन समारोह 7 से 11 नवंबर की तारीखों में ‘सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ’ के रूप में शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ हरिद्वार एवं इसके आसपास के प्रायः चौबीस मील के क्षेत्र में संपन्न होगा। 28, 29, 30 अप्रैल को शाँतिकुँज में विशिष्ट कार्यकर्त्ताओं के एक सम्मेलन में इसकी विस्तृत रूपरेखा बना ली गई है। यह आयोजन भी आमंत्रित विशिष्टों के लिए होगा, जो अपने क्षेत्र की महती जिम्मेदारी अगले दिनों सँभालने जा रहे हैं। वे कुछ विशिष्ट समयदान, श्रमदान, साधनादान मिशन के उद्देश्यों की पूर्ति के निमित्त करने जा रहे हैं।

एक विषमता से भरे समय की समापन वेला समीप आ रही है। संभागीय, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर के तीन समारोहों से निश्चित ही नूतन इक्कीसवीं सदी का सतयुगी स्वरूप उभरकर आएगा।


आत्मदीपक जल रहे हैं।

(माया वर्मा)


आत्मदीपक जल रहे हैं (kavita)

आत्मदीपक यह प्रभो ! तुमने जलाए जल रहे हैं। कर्म का जो पथ दिखाया, प्राण उस पर चल रहे हैं॥

पूज्यवर तुमने कहा था, अंश अपना दे रहा हूँ। कष्ट में घबरा न जाना, नाव तो मैं खे राह हूँ॥

साथ हो हरदम इसी विश्वास में हम पल रहे हैं। कर्म का जो पथ दिखाया, प्राण उस पर चल रहे हैं॥

हम जहाँ जाते वहीं संदेश देते सुदृढ़ मन से। त्याग दो दुष्वृत्तियाँ साथी ! रहो सुख से अमन से॥

रहो बचकर विविध आकर्षण सभी को छल रहे हैं। कर्म का जो पथ दिखाया, प्राण उस पर चल रहे हैं॥

है जहाँ फैला अँधेरा ज्योति लेकर चल रहे हैं। ज्योति को रखने अखंडित स्नेह से हम जल रहे हैं॥

मेट देंगे कलुष वह विषवृक्ष बन जो फल रहे हैं। कर्म का जो पथ दिखाया, प्राण उस पर चल रहे हैं॥

है सक्रिय संजीवनी जो हमें दीक्षा में पिलाई। जल रही है ज्योति जो मन-प्राण में तुमने जगाई॥

लालिमा दिखने लगी है, तिमिर के कण गल रहे हैं। कर्म का जो पथ दिखाया, प्राण उस पर चल रहे हैं॥

मार्ग जो तुमने बताया उसी पर चलते रहेंगे। स्नेह से जलते रहेंगे, बीज से गलते रहेंगे॥

सृजनहित बलिदान होने, हृदय नित्य मचल रहे हैं। कर्म का जो पथ दिखाया, प्राण उस पर चल रहे हैं॥

*समाप्त*