क्राँति -बीज

महापूर्णाहुति की वेला। सभी शिष्य साधक ब्रह्ममुहूर्त में ध्यानस्थ। ध्यान की गहराइयों में दिव्य नाद ध्वनित हो उठा। गुरुदेव की वाणी शब्दरूप लेने लगी” मेरे पुत्रों! मैं भी एक किसान हूँ। मैंने भी कुछ बीज बोए थे। उनमें अंकुर आए और फूल भी लगे। उन फूलों की सुगंध से मेरा सारा जीवन भर गया। उस सुगंध ने मुझे रूपांतरित कर दिया। मुझे नया जीवन दिया।”

“ अदृश्य और अज्ञात ने अपने बंद द्वार में मेरे लिए खोल दिए और मैंने उस परम सत्य को देखा, जो आँखों से देखा नहीं जा सकता है। शाश्वत के उस संगीत को सुना, जिसे सुनने में कान समर्थ नहीं होते हैं। मेरी यह दिव्य अनुभूतियाँ अब वैसे ही मुझसे बहने और प्रवाहित होने को उत्सुक है जैसे पहाड़ों के झरने सागर की ओर प्रवाहित होते और भागते हैं।”

“याद रहे अदलियाँ जब पानी से भर जाती हैं, तो उन्हें बरसाना पड़ता है। फूल जब सुवास से भर जाते हैं, तो उन्हें हवाओं को अपनी को अपनी सुगंध लुटा देनी होती है और जब कोई दीया जलता है, तो आलोक उससे बहता ही है।”

“ ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ है। मैंने अपने जीवन के अनमोल रहस्य अपने साहित्य में सँजोए है। मेरे ये विचार क्राँति-बीज है। वे जिसके पास पहुंचेंगे,जो भी इन्हें सँभालेगा-फैलाएगा, उसके जीवन में देवत्व के, अमृत के और प्रभु प्रेम के फूल अवश्य ही मुस्कराएँगे। उसका जीवन भी उसी सुगंध से भर उठेगा, जिससे मेरा भरा था। ये मेरे क्राँति बीज जिस भी खेत में पड़ेंगे, वहाँ की मिट्टी अमृत के फूलों में परिणत हो जाएगी।”

“ जो भी मेरे पास था, उसे क्राँति-बीजों के रूप में तुम सबको सौंप चुका। मेरा प्रत्येक विचार क्राँति बीज है और मेरा समूचा साहित्य इन क्राँति-बीजों का अक्षय भंडार है। सार−संक्षेप मैंने दैवीचेतना के संदेशवाहक के रूप में क्राँति धर्मी साहित्य के रूप में विनिर्मित किया है। मेरे इन्हें तुम्हारे जीवन में बोया, अब तुम सबको इन्हें समूचे विश्व के प्रत्येक मानव के जीवन में बोना है, ताकि हर कही देवत्व के फूल खिल सकें। मेरे इन क्राँति -बीजों को हर कही बोने के साथ ही तुम सब अपने जीवन में भी इनकी देखभाल करना,क्योंकि मैं तो बो चला, देखना तुम कि बीज,बीज न रह जाए। “

ध्यान टूटने के बाद भी साधकों को लगा कि गुरुसत्ता का यह संदेश सतत् ध्वनित हो रहा है कि उनके क्राँति -बीजों की सफलता देवत्व के फूल बनकर मुस्कराने में ही है। जीवन की मिट्टी को सुगंध से भरने में ही है।


साहस और इच्छाशक्ति से ही हुई है मानवी प्रगति

सहस्राब्दी बीत चुकी, पर उसकी रोमाँचक यादें अभी भी जीवंत है। इसमें जो अनूठी उपलब्धियाँ हासिल हुई है, वे नई सदी एवं सहस्राब्दी में भी मानव को कुछ नया कर दिखाने के लिए प्रेरित करती रहेंगी। पिछली सहस्राब्दी में मनुष्य ने धरती, अम्बर और सागर पर अनेकों विजय-अभियान रचे हैं। सहस्राब्दी का शुरुआती साहसिक अभियान लीफ एरिक्सन द्वारा किया गया, जो कोलंबस से लगभग पाँच सदी पूर्व ही उत्तरी अमेरिका पहुँच चुका था ग्रीनलैंड से पश्चिम की ओर चलते हुए वह अंगूरों की बहुतायत वाले इस क्षेत्र में पहुँचा, इसे विनलैंड नाम से जाना जाता है। इस प्रसंग की प्रामाणिकता सन् 1961 ई. के नार्वे अभियान दल ने 1000 ई. के वाइकिंग अवशेषों से पुष्ट की।

13 वीं सदी में वेनिस के खोजी यात्री एवं लेखक मार्कोपोलो एशियाई देशों में भ्रमण करने वाले प्रथम यूरोपीय हुए। सन् 1271 ई. में एक व्यापारी दल के साथ वे समुद्री मार्ग से होते हुए चीन पहुँचे। वहाँ कुबलाई खान के दरबार में उन्होंने अपनी सेवाएँ प्रस्तुत कीं। 25 वर्षों तक पूर्वी एशियाई देशों का भ्रमण करते हुए 1225 ई. में वह वापस धर लौटे। इस दौरान मार्कोपोलो ने चीन, रूस, बर्मा, जावा सुमात्रा, लंका, मेडागास्कर और फारस की यात्राएँ कीं। उनके यात्रा-विवरण 19 वीं सदी तक पूर्वी देशों के बारे में जानकारी देने वाले एकमात्र स्त्रोत रहे।

सन् 1492 ई. में भारतवर्ष की खोज में निकले इटली के साहसी नाविक क्रिस्टोफर कोलंबस की समुद्री-यात्रा सहस्राब्दी की एक रोमांचक यादगार बनी। उसकी अभिलाषा यूरोप के पश्चिमी मार्ग से अटलाँटिक महासागर को पार करते हुए भारत पहुँचने की थी। किन्तु नियति ने उसके लिए दूसरी ही खोज तय कर रखी थी। भारत के बजाय वह बहामा द्वीप के समीपस्थ टापुओं पर जा पहुँचा, जिन्हें आज भी वेस्टइंडीज के नाम से जाना जाता है। इस तरह कोलंबस ने अमेरिका की खोज की।

भारत को खोजने का श्रेय पुर्तगाली नागरिक वास्कोडिगामा को मिला। वह अफ्रीका के रास्ते हिंदमहासागर को पार करते हुए आगे बढ़ा। इस माह की कठिन यात्रा के बाद 18 मई 1498 को वह दक्षिण पश्चिमी तट पर स्थित कालीकट बंदरगाह पर पहुँचा।

अमेरिका की कोलंबस द्वारा खोज के बाद यहाँ यूरोपीय यात्रा अभियान का सिलसिला शुरू हो चुका था। इसी क्रम में 1499 ई. में स्पेन के अलेसोडी ओजेवा ने वेनेजुएला की खोज की। 1499-1501 के बीच इटली के अमेरिगो वेस्पुसी ने अमेरिका महाद्वीप की यात्रा की और वह इसके अंदरूनी हिस्सों तक गया। फरवरी 1500 ई. में स्पेन का संट विजोन दक्षिण अमेरिका के तटीय क्षेत्रों में पहुँचा। अप्रैल 1500 में पुर्तगाल के पैट्रो अल्वरेज ने ब्राजील की खोज की। 1500-1502 के मध्य गैस्कर ने लैबेडार की खोज की। लगभग 1501 ई. में स्पेन के रोड रिगोडी ने मध्य अमेरिका की यात्रा की। 1513 ई. में स्पेन के वास्को डी बल्वोज ने प्रशाँत महासागर की यात्रा की। 1519 ई. में स्पेन अलेसोडी ने मिसीसिपो नदी के उद्गम का पता लगाया। 1519 ई. में ही स्पेन के हर्नेदी कोर्टेस ने मैक्सिको की खोज की।

इस खोज अभियान से आगे बढ़कर मनुष्य की अदम्य जिजीविषा पृथ्वी की परिक्रमा के लिए संकल्पित हुई ऐसे दुस्साहसपूर्ण अभियान के नेता के रूप में पुर्तगाली नाविक मैगनल चिर स्मरणीय बने रहेंगे। 20 सितम्बर 1519 ई. के दिन वह अपने विक्टोरिया जहाज में सेविल शहर से पश्चिम की ओर रवाना हुए। तीन माह की यात्रा के बाद उनका छोटा-सा जहाजी बेड़ा पश्चिमी अमेरिका पहुँचा, इसके पश्चात् इसने प्रशाँत महासागर में प्रवेश किया। 18 दिन की कठिन यात्रा के बाद 1521 ई. में यह फिलीपींस पहुँचा। मार्ग में स्कर्वी रोग के कारण बहुत सारे सहयोगी चल बसे। यहाँ के स्थानीय लोगों के साथ लड़ाई में मैगनल मारा गया। किंतु इस परिक्रमा-अभियान को डेलकोनो ने पूरा किया व 6 सितंबर ....1522 ई. के दिन सकुशल सेविल पहुँचा।

मैगनल के बाद विश्व की परिक्रमा करने वाले दूसरे समुद्री यात्री सर फ्राँसिस ड्रेक हुए। यात्रा 13 दिसंबर 1566 को प्लाईमाउम से शुरू हुई। अभियान पाँच जहाजों के साथ दक्षिण अमेरिका की ओर बढ़ा। महासागर की यात्रा के बाद ड्रेक ने अकेले ही आगे जाने का निर्णय लिया और दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट से होते हुए आगे बढ़ते गए व 3 नवंबर को वापस प्लाईमाउम पहुँचे।

समुद्री यात्राओं को नया आयाम देने वालों में जेम्स कुक का नाम उल्लेखनीय हैं। इन्हें कई खोजों का श्रेय उपलब्ध है। इन्हें पूर्वी आस्ट्रेलिया का खोजी यात्री भी कहा जाता है। इनकी तीन समुद्री यात्राएँ रही। प्रथम यात्रा 1768 ई. में शुरू हुई, जिसमें जोसेफ वैक्स सहित कई वैज्ञानिक भी इनके साथ थे। प्रशाँत महासागर की गहराइयों को पार करते हुए ये ताहिती पहुँचे। कुछ समय बाद यह दल न्यूजीलैंड पहुँचा। आस्ट्रेलिया के पूर्वीतट की यात्रा करते हुए इन्होंने न्चू- साउथवेल्स और बौटनी की खोज की। दूसरी प्रमुख यात्रा अंटार्कटिक वृत्त के अन्वेषण की रही। 1772 ई. में कुक “रेजोल्यूशन” एवं “एडवेंचर” नामक जहाजों में दक्षिणी महाद्वीप की खोज में निकल पड़ा। इस दौरान ईस्टरद्वीप और माकेसास व टोंगा द्वीपों की खोज हुई। तीसरा व अन्तिम अभियान 1776 ई. में रेजोल्यूशन व डिस्कवरी जहाजों के साथ शुरू हुआ। यह अभियान हर्वी हवाई द्वीप-समूहों से होता हुआ वोरिंग स्ट्रेट तक जा पहुँचा। 1779 में लौटते समय कुक आदिवासियों से लड़ाई में मारा गया।

पश्चिम अफ्रीका के अगम्य वन्यप्रदेशों से होकर बहने वाली नाइजर नदी के अज्ञात रहस्यों को स्काटलैंड के खोजी यात्री मंगो फार्क ने अनावृत्त किया। 1795-1797 के बीच यह कार्य सम्पन्न हुआ। हय मार्ग भयंकर दलदल, भयानक जीव-जन्तुओं व खूँखार आदिवासियों से भरा हुआ था। इन सब कठिनाइयों का बहादुरी के साथ सामना करते हुए मंगो ने 18 माह में 2600 मील लंबी नाइजर नदी का सर्वेक्षण किया और इसके उद्गम का पता लगाया। यात्रा के अनुभव एवं शोधपूर्ण जानकारियाँ “ट्रेवल्य इन दी इंटीरियर ऑफ अफ्रीका” नामक ग्रंथ में प्रकाशित हुईं। 1798 में इसके प्रकाशन के साथ अफ्रीका में अंदरूनी क्षेत्रों में यात्रा संभावनाएँ खुली।

विश्व के सबसे बड़े रेगिस्तान सहारा को पार करने का साहस सर्वप्रथम 1822-23 के मध्य ह्यूक्लैपरटन ने किया। विकास की क्राँतिकारी अवधारणा प्रस्तुत करने वाले चार्ल्स डार्विन भी अपनी तरह के एक खोजी यात्री थे। 1831 से 1836 के दौरान इन्होंने दक्षिण अमेरिका एवं गालेपेगस की यात्रा की। अफ्रीका की जीवन-रेखा नील नदी के उद्गम का पता लगाने का श्रेय गिचर्ड बर्टन और जॉन हेनिंग को जाता है, जिन्होंने 1857 ई. में अफ्रीका की यात्रा की।

बर्फीले मरुस्थलों के कारण ध्रुवीय प्रदेशों की यात्रा सदैव ही एक विकट चुनौती रही हैं। अमेरिकी खोजी रॉबर्ट पीयरी और उसके सहायक मैथ्यू हेंसन ने 1909 में इस चुनौती को निरस्त करते हुए उत्तरी ध्रुव पर पहुँचने में सफलता हासिल की। बरफ से ढके दक्षिण महासागर की खोज सर्वप्रथम अमेरिका के नेट पाल्मर ने 1820 ई. में की थी। इसके बाद आयरलैंड के शेकलटन ने 1901 में सबसे पहले अंटार्कटिक महासागर की यात्रा की। 1909 में पियरी द्वारा उत्तरी ध्रुव की खोज के बाद दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचने की होड़ सी लग गई 14 दिसम्बर 1911 को नार्वे के एमंडसन यहाँ पहुँचने में सफल हुए।

पर्वतों की बरफ से ढकी दुर्गम ऊंचाइयां भी सदा मनुष्य के रोमाँच भाव को आरोहण के लिए मूक आह्वान देती रही हैं। मनुष्य भी इसकी विकट चुनौतियों से जूझता हुआ कई हिम-शिखरों पर विजयपताका फहरा चुका हैं।इनमें 8872 मीटर ऊँची एवरेस्ट चोटी सबसे ऊँची हैं। 20 वीं सदी के छठे दशक में इसके आरोहण का अभियान पूरा हो सका। सन् 1921 में प्रथम असफल प्रयास इंग्लैंड की रायल ज्योग्राफीकल सोसाइटी द्वारा किया गया। इसके बाद कई प्रयास हुए, परंतु सफलता अतंतः तब मिली जब न्यूजीलैंड के एडमंड हिलेरी और नेपाली शेरपा तेंजिंग नोर्गे ने इस पर विजयपताका फहराई। जापान की जुँकोतवई व भारत की बछेन्द्री पाल इस पर चढ़ने वाली प्रथम विश्व की महिलाएँ रही।

मनुष्य की अदम्य खोजी वृत्ति सागर की अतल गहराइयों को छूने में भी पीछे नहीं रही। सन् 1860 ई. में वाइविले यामसन ने प्रथम वैज्ञानिक खोज- यात्रा की। वह 3600 फुट नीचे गया। वहाँ उसने अनेक जीव-जंतुओं का अध्ययन किया। सन् 1874-75 ई. के दौरान उसने चीन महासागर की गहराइयों को जानने का प्रयास किया। अगस्त विकार्ड नाम के स्विस वैज्ञानिक 1928 ई. में फैथम गहराई तक जा उतरे व समुद्र के अंदर कॉस्मिक किरणों का पता लगाया। सन् 1962 ई. में जैक्स थस काउस्टैंड ने छह यात्रियों के साथ 22 दिन तक भूमध्य सागर में 100 मीटर गहराई में रहकर विश्व कीर्तिमान स्थापित किया।

जल-थल एवं नभ का मंथन करते हुए मनुष्य की विजययात्रा ग्रह-नक्षत्रों की खोजबीन करती हुई अंतरिक्ष की सुदूर अनंतता की ओर बढ़ चली है। मानवीय इतिहास में अंतरिक्ष युग की शुरुआत सन् 1957 में सोवियत संघ के प्रथम कृत्रिम उपग्रह “स्पूतनिक” के प्रक्षेपण के साथ शुरू हुई। इसके बाद सन् 1958 ई. में अमेरिका ने उपग्रह एक्सप्लोसस छोड़ा। सन् 1961 में सोवियत संघ के यूरी गागरिन प्रथम अंतरिक्ष यात्री बनें। सन् 1965 में सोवियत संघ के ही अलेक्सेई लिओनेव अंतरिक्ष में टहलने वाले प्रथम व्यक्ति हुए। सन् 1966 में लूना चाँद पर उतरने वाला प्रथम यान सिद्ध हुआ।

सन् 1969 ई. में अमेरिका के नील आर्मस्ट्राँग एवं एडविन ई. एल्ड्रिन चाँद पर उतरे। अपने इस कार्य को नील आर्मस्ट्राँग ने मनुष्य का छोटा-सा किन्तु मानवता का एक बड़ा पग बताया। सन् 1971 में पहला स्पेस स्टेशन सेल्यूट-1 लाँच किया गया। सन् 1973 में पायोनियर -10 बृहस्पति तक पहुँचा। 1974-75 में मेरीनर-1 बुध पर पहुँचने वाला पहला अंतरिक्षयान बना। इसने एक बार शुक्र व तीन बार बुद्ध की यात्रा की। सन् 1967 ई.की जुलाई व सितंबर में दो वाइकिंग खोजी अंतरिक्षयान मंगल की सतह पर उतरे। सन् 1981 में पहला स्पेस शटल कोलंबिया छोड़ा गया। सन् 1986 को मीर अंतरिक्ष केन्द्र पृथ्वी की कक्षा पर स्थापित हुआ। सन् 1989 में वोयागर-2 नेपच्यून तक पहुंचा, तीन वर्ष बाद वह यूरेनस तक पहुँचा। 1990 में मैंगनल ग्रह पर जीवन की संभावना की खोज में पहुँचा और इसके 99 प्रतिशत भाग का सर्वेक्षण किया।

मंगल ग्रह पर जीवन की संभावना की खोज में अमेरिका ने 1996 में “मार्स ग्लोबल सर्वेयर” नामक अभियान छेड़ा। इसी उद्देश्य से 1997 में “मार्स पाथ फाइंडर” प्रक्षेपित किया गया, जो 4 जुलाई 97 को मंगल की सतह पर उतरा। सबसे बड़ा ग्रह बृहस्पति के अध्ययन हेतु अमेरिका ने 1989 में गैजीलियों का प्रक्षेपण किया, जो 7 दिसम्बर 1995 के दिन बृहस्पति की कक्षा में पहुँचा। यह वहाँ की भौतिक स्थिति, रासायनिक संरचना, वायुमंडल एवं इसके चार चंद्रमाओं का अध्ययन कर रहा है। यद्यपि मूल गैलीलियो मिशन 1997 में समाप्त हो गया था, किंतु इससे जुड़े अन्य कई अभियान जारी है।

भारत की अंतरिक्ष अभियानों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुका है। सन् 1962 ई. में थूम्बा इक्वेटोरियल राकेट लाँचिंग स्टेशन की स्थापना के साथ भारतीय अंतरिक्ष यात्रा की शुरुआत हो चुकी थी। अगले ही वर्ष यहाँ से पहला राकेट लाँच किया गया। पहला भारतीय उपग्रह आर्यभट्ट 19 अप्रैल 1975 ई. को सोवियत संघ से छोड़ा गया। इसके पश्चात् एस.एल.वी. इनसेट आदि उपग्रहों की श्रृंखलाओं के सफल प्रक्षेपण के साथ भारत इस दिशा में प्रगति-पथ पर है। प्रथम भारतीय पुरुष एवं महिला अंतरिक्ष-यात्री बनने का श्रेय क्रमशः स्क्वार्डन लीडर राकेश शर्मा एवं कल्पना चावला को प्राप्त है। इस सहस्राब्दी में प्रकृति की खोज अन्वेषण एवं विजय अभियानों ने जहाँ मनुष्य के साहस सूझ-बूझ एवं इच्छाशक्ति की श्रेष्ठता को सिद्ध किया है, वही मानव-प्रगति की यात्रा में नए आयाम भी जोड़े है। साहस ही मनुष्यता की विजय का मानदंड हैं।मानव का साहस ही इस तथ्य की उद्घोषणा है कि जीवन के सभी अवरोधों एवं रुकावटों पर विजय पाई जा सकती है। पिछली सदी एवं सहस्राब्दी की तरह ही मनुष्य नई सदी एवं नई सहस्राब्दी में अनूठे कीर्तिमान रचकर यह प्रमाणित करता रहेगा की मनुष्य निश्चय ही महान् हैं।


VigyapanSuchana

सावधान!

अखण्ड ज्योति परमपूज्य गुरुदेव की वाणी एवं मिशन की जन्मदात्री है। समग्र वाङ्मय उनका मूर्तिमान स्वरूप है। उनके सभी शिष्य-मानवपुत्र इनका पठन-पाठन करते एवं अपने जीवन में उतारते हैं। पूज्यवर के अक्षय सद्विचार-समुच्चय इस वाङ्मय को वेद, पुराण, गीता, रामायण, गुरुग्रंथसाहब, कुरान, बाइबिल की भाँति पूजा जाता एवं नवयुग का संविधान माना जाता है। जिनने भी इन्हें पाया है, अपने सौभाग्य को सहारा है।

कुछ महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति अखण्ड-ज्योति एवं परमपूज्य गुरुदेव के वाङ्मय के संबंध में अपना अंतःकलुष व्यक्त करते एवं अनर्गल प्रलाप करते देखे जाते हैं। इनमें से कुछ स्वयं को शिष्य बताते, गुरु-भक्ति का स्वाँग बनाते, मिशन का सदस्य बताते भी देखे जाते हैं। जो गुरुदेव के विचारों का नहीं, वह उनका कैसे होगा? ऐसे गुरुद्रोहियों को स्वयं को तो शिष्य कहने का भी अधिकार नहीं है। ऐसे पाखंडी मिशन विरोधी तत्त्व आत्म-प्रताड़ित, कलंकित जीवन जिएँगे-उनसे परिजन सावधान रहे-बचें।


सिद्धि का मर्म-निष्काम कर्म

“महात्मा जाजलि! निश्चित ही तुमने कठोर तपस्या की है। तुम्हारी साधना भी उत्कृष्ट हैं, फिर भी तुम धर्म के गूढ रहस्य से अनभिज्ञ हों। वाराणसी नगरी के तुलाधार वश्य तत्त्वज्ञानी हैं। वे कभी भी गर्वभरी वाणी नहीं बोलते, जबकि तुम अहंकार के वशीभूत होकर स्वयं की महिमा का झूठा बखान करते फिर रहे हो”। इन वचनों से तपस्वी जाजलि उद्विग्न हो उठे।

उन्होंने अपने शरीर को मिट्टी की तरह मानकर अखंड तपस्या प्रारम्भ की थी। तपस्या करते-करते वर्षा से गीली केश राशि उलझकर वृक्ष की जटाओं जैसी बन गई थी। सालों-साल तक अपनी जगह से जरा-सी भी न हिलने के कारण शरीर पर मोटी धूल की परतें जम गई थी। निर्जल-निराहार तप करते हुए उनकी सुगठित सुडौल देह यश्टि सूखे काष्ठ की भाँति हो गई थी। किंतु तप के तेज से उनका चित सुस्थिर और व्यग्रता से रहित था।

काष्ठ की भाँति वे एक सूखे ठूँठ बन गए थे। उनके सिर की उलझी जटाएँ भी कुछ ऐसा ही आभास कराती थी। तभी तो अवसर पाते ही एक गौरैया ने उसमें घोंसला बना लिया। वहीं गौरैया ने अंडे दिए और फिर उसके नन्हें पक्षी भी वहीं बसेरा करने लगे। यह सब अनुभव करके महात्मा जाजलि अपनी सहिष्णुता पर फूले न समाए। उन्हें अच्छा लग रहा था कि उनके प्रश्रय में वे जीव निर्भय, निश्चित हो निवास कर रहे हैं मुनि जाजलि अपनी जगह से हिले-डुले बगैर उन पक्षियों के सुख में सहयोग देकर अपनी तप-साधना को सफल मानने लगे।

एक समय ऐसा भी आया की बच्चों सहित सभी पक्षी दूर कहीं उड़ गए और लौटे भी नहीं। महामुनि जाजलि के लिए यह उनकी तप-साधना की सफलता थी कि इन पक्षियों का परिवार उनकी जटाओं में इतनी लंबी अवधि तक बना रहा और वे तनिक भी विचलित नहीं हुए। उनकी साधना सर्वथा अविचल एवं अडिग बनी रही। इसी भावना ने उन्हें गर्व के उन्माद से भर दिया और वे आत्मप्रशंसा करते हुए अपने अंतर्मन की बातें कहने लगे, “अकेला मैं ही हूँ,जिसने इस धरती पर धर्म का रहस्य जान लिया है। सहस्रों किरणों वाले सूर्य की तेजस्विता से बढ़कर भी मेरी तप-साधना का तेज है। मेरी इस धर्म साधना की महिमा और महात्म्य को समूचे संसार में प्रसिद्ध होना चाहिए। आखिर मैंने विपरीत क्षणों में कठोर तपस्या करके विजय पाई है। कोई भी कठिनाई, किसी तरह की बाधा मेरे तप में विघ्न-व्यवधान नहीं डाल सकी। अतः अब अपनी इस तपस्थली से मैं सीधे मनुष्य-समाज में पहुँचूँगा और उन सभी को धर्म के रहस्य और अपनी महिमा से परिचित करवाऊँगा, साथ ही यह भी पता लगाऊँगा कि समूचे विश्व में क्या कोई मेरे जैसा दूसरा भी हैं ? “इस आत्मप्रशंसा एवं अहंभाव से उनका समूचा अंतःकरण ओत-प्रोत था। तभी उन्हें आकाशवाणी से ये वचन सुनने को मिले-

“महात्मा जाजलि! तुलाधार तुमसे कहीं अधिक श्रेष्ठ है। तुम वाराणसी जाकर उनसे धर्म के सच्चे स्वरूप की शिक्षा प्राप्त करो।”

इस देववाणी को सुनकर महात्मा जाजलि क्षुब्ध हो उठे। ईर्ष्या, क्रोध और क्षोभ से उनकी मुखाकृति विकृत हो उठी। इतनी घोर-कठोर साधना! रात-दिन, वर्षा-धूप शीत-ग्रीष्म किसी की भी चिंता किए बगैर अविचल भाव से महारण्य में उन्होंने निराहार तपोमयी जीवन बिताया और वाराणसी के साधारण से एक दुकानदार तुलाधार वैश्य की तुलना में उनकी समूची तप-साधना निष्फल है। वह साधारण सा वैश्य तुलाधार उनसे कहीं श्रेष्ठ है। अंतर्द्वंद्व से उनके मन-अंतःकरण में कुहराम मच गया। उनकी तप साधना की समूची स्थिरता-एकाग्रता जल के फेन की भाँति न जाने कहाँ विलीन हो गई।

वे सोचने लगे, जैसे भी हो शीघ्र ही मुझे वाराणसी पहुँचकर उस तुलाधार से भेंट करनी चाहिए। आखिरकार क्या है उस साधारण से विक्रेता के पास, जिसकी वजह से आकाश के स्वर्गस्थ देवगण भी उसका इतना कीर्तिमान कर रहे है।

बीहड़ वनपथ को पार करते हुए वे शिवनगरी वाराणसी की ओर चल पड़े। अपने स्वभाव के अनुसार वे एक बार फिर से दृढ़ निश्चयी बने। बिना रुके, बिना थके उस पथ पर भूखे-प्यासे तब तक चलते रहे जब तक देवनदी गंगा किनारे बसी वाराणसल न पहुँच गए। वाराणसी में तुलाधार का नाम अपरिचित न था। यशस्वी तुलाधार के जीवन से सभी परिचित थे। जिससे भी उन्होंने पूछा, उसी ने उनको तुलाधार का निवास बता दिया। महात्मा जाजलि भी बिना कोई देर लगाए उनके निवास पर पहुँच गए।

अपने निवास पर ग्राहकों से घिरे तुलाधार अपने सामान की बिक्री कर रहे थे। महामुनि जाजलि मौनभाव से वहीं पास में जा खड़े हुए। दुकान और व्यापारी देखकर उनका मन क्षोभ से भर गया। वह खड़े-खड़े सोचने लगे, कहाँ निविड़ वन में एकाँत कठोर तप-साधना से धर्म के तत्त्व को प्राप्त करने वाला महासाधक मैं और कहाँ साँसारिक वस्तुओं को खरीदने -बेचने में जुटा यह महासंसारी वणिक तुलाधार! यह तो लाभ-हानि से भरे लोभ-लिप्सा से मग्न क्षणों का ही जीवन बिता रहा है।द्वंद्व से विचलित उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। वे चुपचाप उसी स्थान पर खड़े रहे और तुलाधार से एकाँत में वार्ता की प्रतीक्षा करने लगे।

“महामुनि! मुझे मालूम है कि आप दुर्गम-बीहड़ पथ को पार करके मेरे पास आए हैं। रास्ते में आपको अनेक कष्ट उठाने पड़े है, भूख-प्यास की व्यथा झेलनी पड़ी है यह भी मुझे पता है कि स्वयं को अकेला तत्त्वज्ञानी समझने के कारण आप आकाशवाणी सुनकर मेरे समीप आए हैं।” तुलाधार के इस कथन के प्रत्येक शब्द में उनकी विनम्रता का प्रकाश था। बातें करते हुए वे उतरकर उनके समीप आ गए थे। उन्होंने महात्मा जाजलि से कहा, “आप मेरे समीप ही कुछ समय विश्राम करें, फिर मैं आपकी जिज्ञासा का समाधान करूंगा।”

तुलाधार की शाँत और प्रेम से सनी वाणी सुनकर जाजलि को बड़ा आश्चर्य हुआ। लेकिन तुलाधार एक बार फिर अपने कार्य में व्यस्त हो चले थे।

साँझ का सुरमई रंग धरती पर उतर आया था। दैनिक संध्योपासना से निवृत्त होकर तुलाधार अब निश्चिंत भाव से आसन ग्रहण कर चुके थे। तपस्वी जाजलि भी वहीं उनके पास बैठे थे।

तुलाधार ने शाँत-संयमित वाणी से अपनी बातचीत का क्रम प्रारंभ किया, “हे महामुने! मुझे अच्छी तरह से मालूम है कि निरंतर कठोर तप से आपने महती सिद्धी प्राप्त की है। मुझे यह भी पता है कि स्थाणु बनी आपकी देह में पक्षियों ने भी घोंसले बना लिए थे। यह पक्षी-परिवार बहुत समय तक आपकी जटाओं में पलता रहा, किंतु आप रंचमात्र भी विचलित नहीं हुए। यहाँ तक तो सारी बातें सच हैं, लेकिन आपकी यह मान्यता कि अकेले आप ही इस धरती पर धर्म के मर्मज्ञ है, यह मिथ्या गर्व आपके लिए अनिष्टकर बन गया। साधना रूपी कल्पवृक्ष को छिन्न-भिन्न करने वाला अहंकार कुठार दीर्घ साधना के बाद भी आप में छिपा रहा। इसी घोर शत्रु से छुटकारा दिलाने के लिए देववाणी सुनाई दी और आप यहाँ आए। अब आप ही बताएँ कि मैं आपका कौन सा प्रिय कार्य करूं, जिससे आपका कल्याण हो ?”

तुलाधार के इस कथन से जाजलि स्तब्ध हो गए। वे हतप्रभ थे कि निर्जन अरण्य में उनके साथ जो भी हुआ, उसका रहस्य इतनी दूर बैठे इन महानुभाव को किस तरह ज्ञात हुआ। इसी आश्चर्य और विस्मय से अभिभूत हो उन्होंने तुलाधार से प्रश्न किया, “हे तपोनिष्ठ महानुभाव आप वैश्य-पुत्र हैं और गृहस्थ भी, किंतु आपने ऐसी अलौकिक सिद्धी कहाँ से प्राप्त की ? निरंतर साँसारिक कर्म में लगे रहकर, तरह-तरह के पदार्थों, वस्तुओं का क्रय-विक्रय करते हुए आपको यह धर्म-बुद्धि किस तरह और कहाँ प्राप्त हुई ? मुझे धर्म के इस मर्म को स्पष्ट करने की कृपा करें।

महात्मा जाजलि की वाणी में अब पर्याप्त विनम्रता थी। उनका गर्व अब तक छँट चुका था “

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खेल का मैदान

स्वावलंबन की कोई योजना हो तो उसका विवरण

आवास है अथवा नहीं। कोई और जानकारी जिसे आप देना चाहें।

तुलाधार ने पहले कि तरह शाँत स्वर में धर्म का रहस्य महात्मा जाजलि के सामने रखा, “जो समस्त प्राणियों से मित्र भाव रखता है और सबका हित-चिंतन करता है, वही सच्चा धर्मज्ञ है। किसी भी प्राणी से द्रोह भाव विहीन जीवनवृत्ति ही श्रेष्ठ धर्म है। मैं जीवन के लिए उपयोगी वस्तुएँ दूसरों से क्रय करके बेचता हूँ। जीवन को हानि पहुँचाने वाली वस्तुओं को नहीं बेचता। छल-कपट से दूरी सभी को अपना मित्र मानता हूँ और सभी के हित-चिंतन में लगा रहता हूँ। मेरी यह तुला सभी के लिए समान है। किसी के साथ मेरा कोई भेदभाव नहीं है। मैं सदा ही सबके साथ समान व्यवहार करता हूँ।

महात्मा जाजलि विस्मय-विभोर हो तुलाधार वैश्य के उपदेशों में डूबे थे। किसी परम योगी महर्षि की भाँति ज्ञान का संदेश देती तुलाधार की वाणी देवनदी गंगा की भाँति अविराम प्रवाहित थी।

“मैं सदा ही निष्काम कर्म करता हूँ, औरों की निंदा-प्रशंसा से परे निश्चिंत भाव से मेरा मन इंद्रिय-विषयों से भी परे रहता है। यह भी जानो कि जो सबको अभयदान देता है, वही निर्भय रहता है। परब्रह्म की प्राप्ति संपूर्ण और निष्काम अभयदान से ही संभव है।”

महामुनि जाजलि का हृदय इन अलौकिक उपदेशों से अभिभूत हो उठा। वैश्य तुलाधार ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “सच्ची आस्तिकता और धार्मिकता निष्काम भाव से भगवान् को अर्पित करके कर्म करने में है। सत्कर्म रूपी हविष्य से ही देवगण संतुष्ट होते हैं। श्रद्धापूर्वक एवं निष्काम बुद्धि से किया गया यह धर्म-यज्ञ ही मनुष्य को जीवन के लक्ष्य तक पहुँचाता है। सद् चिंतन एवं सद्कर्म ही जीवन का राजपथ है।”

धर्म के इस अनूठे तत्त्वज्ञान से जाजलि का अहं खंड-खंड होने लगा। उनकी जिज्ञासा और बढ़ चली। उन्होंने फिर पूछा, “अज्ञानी व्यक्ति यदि आत्मपरिष्कार के शुभ संकल्पों से आत्मयज्ञ का संपादन नहीं कर पाते, तो उन्हें किस तरह आत्मसुख प्राप्त हो सकता है ?”

“मन में अश्रद्धा-शंका होने से यज्ञ और कर्म अपना महत्त्व खो बैठते हैं। श्रद्धावान् मनुष्य ही धर्म का तत्त्व जान सकता है। हे तपस्वी श्रेष्ठ! प्रधान तीर्थ, प्रधान धर्म हमारी अपनी ही अंतरात्मा हैं। जब अंतर ही तीर्थ बन सकता है, तो फिर उसके लिए भटकन कैसी! सद्कर्म करते हुए आत्मज्ञान की प्राप्ति ही धर्म का सबसे बड़ा रहस्य है। इसे कठोर तप से नहीं पाया जा सकता। यह तो आत्मपरिष्कार और आत्मसाधना से ही संभव है। यही मेरा उत्तम व्रत है और मेरी जीवन-साधना का मूलमंत्र है अपने गृहस्थ-धर्म का पालन करते हुए मैं नित्य-निरंतर आत्मपरिष्कार में लीन रहता हूँ। यही मेरी सिद्धी और यही मेरा धर्मतत्त्व हैं।”

तुलाधार के इन वचनों से जाजलि की आत्मा प्रकाशित हो उठी। उनका अहं लोप हो चुका था। अब वह जान चुके थे कि आत्मपरिष्कार में ही धर्म का रहस्य निहित है।


VigyapanSuchana

दक्षिण भारतीय भाषाओं का विशिष्ट प्रशिक्षण

गायत्री परिवार द्वारा संचालित विद्यालयों के शिक्षकों, व्याख्याताओं को तमिल, तेलगू एवं कन्नड़ भाषाओं में डिप्लोमा प्राप्त करने के लिए भारतीय भाषा संस्थान मैसूर भेजा जाना हैं।

इस डिप्लोमा कोर्स की अवधि इस माह (जुलाई से अप्रैल) होगी। इस प्रशिक्षण में भेजने के लिए सभी प्राँतों से ऐसे शिक्षकों, व्याख्याताओं का चयन किया जाएगा, जो प्रशिक्षण प्राप्त करने के पश्चात् शाँतिकुँज के निर्देशन में समय-समय पर दक्षिण भारत में समयदान कर सकेंगे।

प्रशिक्षण- अवधि में प्रशिक्षणार्थियों को उनका वर्तमान वेतन तथा उसके अतिरिक्त 800 रु. स्टाइपैड के रूप में भारतीय भाषा संस्थान मैसूर प्रदान करेगा। स्थान सीमित हैं।

(1) शिक्षक-व्याख्याता का नाम (2) विद्यालय जहाँ कार्यरत है पते सहित (3) शैक्षणिक योग्यता (4) विषय-स्नातक स्तर एवं स्नातकोत्तर स्तर (5) अध्यापन का अनुभव वर्षों में (6) गायत्री मिशन से कब से जुड़े है?

चयनित शिक्षक/व्याख्याताओं को जुलाई 2000 में भारतीय भाषा संस्थान मानव गंगोत्री मैसूर में उपस्थित होना होगा। जानकारी उन्हें पत्र द्वारा शाँतिकुँज से मिलेगी।


परमचेतना का चुना हुआ देश भारत

ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी के प्रसिद्ध यूनानी इतिहासकार हिरोडोटस ने भारत के संबंध में अधिकारपूर्वक लिखा है। साहित्य, संस्कृति, धर्म, दर्शन और यहाँ की भौगोलिक विशेषताओं का वर्णन करते हुए उसने कहा है, “यह देश ज्ञात राष्ट्रों में सबसे समृद्ध और महान है। प्रकृति ने इसे इतना साधनसंपन्न बनाया है कि दुनिया के सभी देशों से यहाँ की जनसंख्या ज्यादा है।” ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी में जनगणना का चलन नहीं था। हिरोडोटस ने निश्चित ही देश के कुछेक हिस्सों का भ्रमण किया होगा और विद्वानों से चर्चा के आधार पर यह धारणा बनाई होगी। लेकिन यह धारणा गलत नहीं थी। इन दिनों भी भारत संसार की घनी आबादी वाले देशों में पहले स्थान पर है। आबादी के हिसाब से चीन दुनिया का सबसे बड़ा देश है। वहाँ की आबादी 126.68 करोड़ है, लेकिन विस्तार की दृष्टि से वह भारत से करीब तीन गुना बड़ा है।

शुरू से ही संसार की सबसे ज्यादा जनसंख्या भारत में रही है। इससे यह तो निश्चित है कि भारत में प्रकृति ने इतनी साधन -संपदा बिखेर रखी है कि करोड़ों लोगों का निर्वाह आसानी से संभव हो सकें। निर्वाहोपयोगी साधन नहीं होते तो इतने लोगों का बने रहना संभव ही नहीं था। इस प्रतिपादन को जनसंख्या-वृद्धि के पक्ष में तथ्य या तर्क की तरह उद्धृत नहीं किया जाना चाहिए। मध्यकाल के बाद आया पतन और पराभव, भारत की संतानों में दैन्य दारिद्रय बढ़ते जाने का एक कारण बना है। जिन दिनों भारत में प्रचुर साधन-संपदा थी, उन दिनों बड़े परिवार समस्या नहीं थे, बल्कि उनसे समृद्धि बढ़ती ही थी, क्योंकि काम करने वाला हाथ, सोचने वाले मस्तिष्क और प्रतिभाओं की संख्या भी तब ज्यादा होती थी। गुलामी आई और दरिद्रता बढ़ने लगी तो अधिक संतति और जनसंख्या अभिशाप सिद्ध हुई। पतन के गर्त और गहरे होने लगे।

आशय सिर्फ यह है कि दुनियाभर से आने वाले लोगों को आश्रय देने में तो भारतवर्ष समर्थ रहा ही है, वह विचार, विज्ञान और प्रतिभा की दृष्टि से भी संसार को बहुत कुछ देने में सक्षम रहा है। कोई सभ्यता-संस्कृति तभी उन्नति के शिखरों को छू पाती है, जब वहाँ जीवन सहज और उपयोगी आवश्यक साधन सुलभ-प्रचुर हों।

भारत को यह स्थिति प्रकृति से वरदान की तरह मिली है। सुरक्षा-संपदा, वैभव और ऋतुओं को परखें तो पाएँगे कि प्रकृति ने इसे विशेष योजना के साथ रचा है। पुराण-ग्रंथों में भारत का उल्लेख “चतुः संस्थान संस्थितम्” के रूप में उल्लेखित है। इस देश के दक्षिण, पश्चिम और पूर्व में महासागर है। पूर्व में हिमालय धनुष की प्रत्यंचा की तरह फैला है। उत्तर की ऊँची पर्वतमाला में हिमालय की हिम-आच्छादित चोटियाँ तो हैं ही, पश्चिम की सुलेमान और किरथार पहाड़ियाँ भी शामिल हैं। ये पर्वतमालाएँ समुद्र की ओर जाती हैं। इरावती की तराई और ईरान की पहाड़ी उपत्यिका से अलग करती भारत (अविभाजित) के लिए सुरक्षापंक्ति सी बनाती हुई चलती है।

ग्यारहवीं शताब्दी के बाद आए पतन और पराभव के दौर की मीमाँसा कई तरह से की जाती है। इनमें राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों से लेकर धर्म-संस्कृति के पराभव को भी गिनाया जा सकता है। आरोप लगाए भी जाते हैं कि धर्म-अध्यात्म की बहुलता ने भारत को विदेशियों के आगे घुटने टेकने के लिए विवश किया। विवश ही नहीं किया, उन्हें आमंत्रित भी किया। इन विद्वानों के अनुसार धर्म-अध्यात्म पलायनवादी बनाता चला गया। इस कारण हम आक्रमणों और चुनौतियों का सामना नहीं कर सके। दूसरी सभ्यताएँ ज्यादा बलवान थी और हम संसार के प्रति उपेक्षा भाव से भरे थे, इसलिए हम पराजित होते गए। यह सतही और आसानी से समझ में आने वाली दृष्टि है। अंतर्दृष्टि संपन्न विद्वान पतन को दूसरी तरह से समझते हैं। उनके अनुसार संसार के अन्य क्षेत्रों में भी ज्ञान-विज्ञान का प्रकाश फैलना था, इसलिए नियति ने भारत का विकास अवरुद्ध कर दिया।

श्री अरविंद ने लिखा है कि भगवान ने अपनी प्रकृति के तमस पक्ष को व्यक्त करना चाहा तो भारत की नियति पर कुछ देर के लिए हाथ रख दिया। यह देश निरंतर प्रगति करता रहा, तो पृथ्वी के दूसरे क्षेत्र बंजर और शुष्क ही रह जाते। उनका विकास नहीं दिखाई देता। भारत की महिमा को व्यक्त करने वाली एक दृष्टि यह भी रही है कि वर्तमान कल्प में इस भूखंड को विशेष दायित्व सौंपे गए हैं इस दृष्टि के अनुसार राजसत्ता का प्रभाव और शासन देश, प्रदेश के सभी भागों में दिखाई देता है। उनके नियम, विधान और निर्णय सभी नागरिकों को मानने होते हैं। सत्ता देशव्यापी दिखाई देने पर भी उसके सूत्र एक सुनिश्चित केंद्र में निहित होते हैं। उस केंद्र को राजधानी कहते हैं। राजधानी में भी राजभवन, महल, निवास, संसद, सचिवालय, न्यायालय, विधान मंडल जैसी संस्थाएँ होती हैं। इस रूपक का संदेश यह है कि ईश्वर की सत्ता सर्वव्यापी है। विश्व-वसुँधरा के कण-कण में वह व्याप्त है। भारत वह देश है, जिसे विश्व-वसुधा को शासित, संचालित और प्रेरित करने के लिए सारे विश्व की राजधानी के रूप में चुना गया है।

वर्तमान काल में भारत को परम चेतना का चुना हुआ देश मानने वाले संत-मनीषियों के अनुसार, अपने देश में सर्वाधिक संत-महात्मा, विचारक, ज्ञानी, मुनि, कवि, विद्वान और प्रतिभाएँ होने का कारण भी यहीं है। किन्हीं और कल्पों में कोई और देश चुने जाते होंगे। इस कल्प में ईश्वर अपने पूरे वैभव के साथ भारत में ही व्यक्त हुआ है। किन्हीं और क्षेत्रों में विकास को बढ़ावा देना हो तो राजधानी में विशेष हलचल होती है, आवश्यक होने पर वहाँ की प्राथमिकताओं को भी कुछ समय के लिए विराम देना पड़ता है। राज्यों के विकास के लिए केंद्र ने कई बार अपनी प्राथमिकताएँ उनके लिए छोड़ी या बदली हैं। अध्यात्मविद् भारत के कुछ समय तक पीछे रह जाने का कारण भी कुछ इसी तरह समझा जाना चाहिए।

किसी व्यक्ति के जीवन में कुछ महीनों का जो महत्त्व होता है, देश के मामले में वह कुछ वर्षों का होता है। सभ्यताओं के इतिहास में सैकड़ों सालों का महत्त्व भी लगभग उसी स्तर का है। भारत आठ सौ वर्षों तक पिछड़ा रहा और इनमें बीच के दो सौ साल घोर तमिस्रा के वर्ष रहे। इनसे पहले के शतक पतन के आरंभ के वर्ष थे और बाद की दो शताब्दियाँ निवारण के आरंभ की। इन दो सौ वर्षों में तैमूर का आक्रमण, दिल्ली राजधानी में अस्थिरता, विनाश, पुर्तगालियों की घुसपैठ और दावेदारी, पानीपत की दो भयंकर लड़ाइयाँ आदि प्रमुख घटनाएँ हैं, जिन्होंने हर बार भारत की नियति को पीछे धकेला। उत्तर भारत में जगह-जगह रक्तपात, दक्षिण में निरंतर चलते रहे विजय अभियान और उनसे कृषि, वाणिज्य, उद्योग आदि के नाश जैसी बीसियों घटनाएँ घटी। विनाश ने इतिहास के पन्ने-दर-पन्ने पलटे।

जिन दिनों भारत विनाश के गहन अंधकार से गुजर रहा था, उन दिनों विश्व के कई देश भौतिक और आध्यात्मिक वैभव की ऊँचाइयाँ छू रहे थे। इंग्लैंड ने अँगरेजी को राजभाषा घोषित करने जैसे कुछ महत्त्वपूर्ण फैसले उन्हीं दिनों लिए, जिनसे भारत की अस्मिता प्रभावित हुई। संसद का विकास, किसानों की स्थिति में सुधार, लोकतंत्र के आधुनिक स्वरूप का उदय, मध्य एशियाई देशों में वैभव-संपदा की बाढ़, फ्राँस में स्वतंत्रता का उदय, कोलंबस द्वारा पश्चिमी द्वीप-समूह की खोज, वास्कोडिगामा और अमेरिगो द्वारा नए क्षितिजों में प्रवेश, उद्योगों का विकास और मार्टिन लूथर के धार्मिक सुधार जैसी ऊँचाइयाँ इन्हीं दिनों अर्जित की गईं। पिछले आठ सौ वर्ष भारत को छोड़कर शेष विश्व के लिए अभूतपूर्व प्रगति के वर्ष हैं। अपने देश ने इस अवधि में प्रगति नहीं के बराबर की। आक्रमणों और उपद्रवों के अंधड़ में अपने आपको सिर्फ बचाए रखा। अपने बचाव के लिए किया गया पुरुषार्थ ही प्रचंड था। बारीकी से समझने वाले आलोचकों की दृष्टि में यह पुरुषार्थ भी कम नहीं था। आठ सौ वर्षों में कई देश छोटे-मोटे आक्रमणों का सामना नहीं कर पाए और कुछ ही समय में बिखर गए। भारत इसलिए बचा रहा कि परमचेतना इसके माध्यम से विश्वभर में अपनी महिमा को व्यक्त करना चाहती थी। वह समय बीत गया जब परमचेतना ने उस पर हाथ रखकर कुछ देर थम जाने के लिए कहा था। अब वह फिर ऊपर उठा रही है।

यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि भारत अपनी उस भूमिका के लिए तैयार हो रहा है, जो अगले दिनों उसे निभानी है। यह भूमिका विश्व के नेतृत्व और मार्गदर्शन करने के रूप में है। कमोवेश हजार वर्ष के अनुभवों ने सिद्ध कर दिया है कि भौतिक सभ्यता का एकाँगी विकास, क्लेश, द्वंद्व और हिंसा के सिवा कुछ नहीं देता। उससे लौकिक शक्ति का संचय तो किया जा सकता है, लेकिन सृजन नहीं। अध्यात्म के बिना अर्जित की गई शक्ति उत्पीड़न और दमन ही लाती है। सृजन और समृद्धि के लिए भौतिक शक्ति के साथ अध्यात्मबल भी चाहिए। भागवत चेतना द्वारा इस कल्प के लिए चुने गए देश भारत को दोनों क्षेत्रों का समन्वित अनुभव है। श्री माँ कहा करती थी कि भारत का पुनर्जन्म हो रहा है। भारत फिर से जन्म ले रहा है। वह भारत जिसके पास आत्मा और समृद्धि दोनों है। शक्ति और शाँति, अनुशासन और स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय के समन्वय की अपनी प्रतिभा द्वारा नए युग की नई चुनौतियों का सामना करने के लिए भारतवर्ष फिर तैयार है।


हो जीवन के तार तरंगित की स्वर-लहरियों से

संगीत की स्वर लहरियोँ का जादू जीवन में उल्लास की अनोखी सृष्टि तक ही सीमित नहीं है। इसका स्पर्श रोग निवारक भी है। आधुनिक वैज्ञानिक जगत में चले रहे शोध-आधुनिक वैज्ञानिक जगत में चल रहे शोध अनुसंधान इसके दर्द-निवारक एवं चिकित्सकीय पक्ष को भी उभार रहे है। जर्मनी के डॉ राल्फ स्पिंटगे ने अपने दर्द-निवारक चिकित्सालय में 90000 रोगियों पर संगीत के प्रभाव का अध्ययन किया है। राल्फ के अनुसार संगीत रोग के पुनर्सुधार की गति को बढ़ाता है। दर्द भरी शल्यक्रिया में पंद्रह मिनट का प्रशामक संगीत बेहोश करने वाली दवाइयों की मात्रा को 50 प्रतिशत तक कम कर देता है। अपनी पुस्तक अवेकनिंग में तंत्रिकाविज्ञानी ओलिवर सेक संगीत के सकारात्मक प्रभावों पर लिखते हैं कि संगीत की चिकित्सकीय उपयोगिता अद्भुत है। यह रोगी में वह शक्ति भरती है, जो सामान्यतया असंभव प्रतीत होती है। इस क्रम में चीन के वैज्ञानिकों ने ऐसी म्यूजिक मशीन का निर्माण किया है, जिसकी मधुर स्वर लहरियों से हृदय एवं पाचन-संस्थान संबंधी बीमारियों एवं मानसिक विकारों का उपचार किया जाता है।

नई दिल्ली स्थिति ‘शक्ति विकास प्रकल्प के संस्थापक व अध्यक्ष ई. कुमार ने संगीत चिकित्सा पर गहन शोध किया है। उनका दावा है कि वे संगीत की स्वर लहरियों से सैकड़ों रोगियों को ठीक कर चुके है। श्री कुमार का कहना है कि संगीत प्रकंपनों से जटिलतम रोगों को ठीक किया जा सकता है और पागलपन की सीमा तक जा चुके रोगियों को भी स्वस्थ किया जा सकता है। इससे दर्द मुक्त प्रसव भी कराया जा सकता है। उनके अनुसार तनाव ही रोगों का मूल कारण है। तनाव से बायोरिदम में असंतुलन आ जाता है जिससे तरह तरह की विसंगतियाँ जन्म लेती है। संगीत द्वारा विशेषकर शास्त्रीय एवं संकीर्तन आदि से बायोरिदम स्थापित हो जाती है और रोगों से राहत मिलती है।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाँइसेज (निमहंस) बैंगलोर की डॉ.वी.एन. मंजुला न्यूरोसिस एवं साइकोसिस में संगीत की चिकित्सकीय उपयोगिता को अलग अलग रूप में व्यक्त करती है। डॉ. मंजुला के अनुसार अवसाद में स्वयं रोगी के स्वर में गीत अधिक उपयोगी होता है, जबकि एंग्जाइटी न्यूरोसिस में तारयुक्त वाद्ययंत्र में बजाया गया सुमधुर संगीत विशेष रूप से लाभदायक पाया गया है। मोनिया (उन्माद) के संदर्भ में तीव्र संगीत को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यह सुझाव देते हुए वे कहती है कि सभी संगीत उपयोगी हो सकते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि संगीत से व्यक्ति का संबंध जुड़ना चाहिए और संगीत सुनने से बेहतर होगा कि रोगी स्वयं गीत गाए या वाद्य यंत्र बजाए।

मनोचिकित्सक चुघ भी संगीत की अवसाद निरोधी क्षमता को स्वीकारते हुए इसे उपचारार्थ परामर्श देते हैं। उनके अनुसार वोकल एवं इंस्ट्रूमेंटल दोनों ही मधुर संगीतों से मस्तिष्क से कुछ रसायनों का उत्सर्जन होता है। जो अवसाद या मन की निषेधात्मक अवस्था को निरस्त करते हैं। शोध अध्ययन के अनुसार संगीत स्त्रोत से उत्पन्न होने वाली तरंगें बाह्य स्तर पर शुरू होते होते क्रमश शरीर के गहनतम में प्रवेश कर जाती है। और शरीर के विविध अंग अवयवों में विशेष तरह का स्पंदन स्थापित करती है, विशेष रूप से मस्तिष्क के दांये गोलार्द्ध में। इसी आधार पर मंदबुद्धिता डिमेंशिया आदि में संगीत की उपयोगिता समझी जा सकती है।

मनोवैज्ञानिक एवं संगीतज्ञ डॉ. जॉन ऑप्टिज का कहना है कि संगीत न केवल गूढ विकार को ठीक करता है बल्कि यह स्वास्थ्य को भी सुधारता है। अपनी पुस्तक ‘द’ ताओ ऑफ म्यूजिक में उन्होंने अलग-अलग तरह की समस्याओं से राहत पाने कि लिए विशेष तरह से विविध संगीत का परामर्श दिया है। जार्जिया के पिडमोंट अस्पताल के गहन चिकित्सा केंद्र में कार्यरत डॉ फेड स्वार्ज बच्चों के जन्म पूर्व एवं जन्मोत्तर चिकित्सा के विशेषज्ञ है। उन्होंने समय से पूर्व जन्म लेने वाले शिशुओं को चुप कराने के लिए जन्म लेने वाले शिशुओं को चुप कराने के लिए गर्भाशय संगीत आविष्कृत किया है। यह उन्होंने बहुत ही संवेदनशील माइक्रोफोन की सहायता से गर्भवती पत्नी के गर्भाशय में होने वाले शोर को रिकार्ड कर व उसके साथ स्टूडियो में हलकी संगीतमय धुनों एवं महिलाओं की आवाजों को मिश्रित कर रचा है। इसका प्रभाव जानने के लिए स्वार्ज ने समय से पूर्व जन्मे शिशुओं पर प्रयोग किया। पाया गया कि इस संगीत के प्रभाव से वे पहले से अधिक शाँत हो गए व अधिक देर तक सोए। इन बच्चों का विकास भी संगीत के प्रभाव से बहुत तीव्रता से होता देखा गया।

आधुनिक रॉक म्यूजिक के संदर्भ में न्यूयार्क के सिनाय हॉस्पिटल के डॉ. जॉन डायमंड का मानना है कि यह संगीत दिल को दुरुस्त रखने के बजाय धड़कनों को बढ़ाकर रोगों को न्योता दे सकता है। इसी विषय पर अमेरिका के ही ओहियो विश्वविद्यालय के पैथालॉजी के प्राध्यापक डॉ हरिशर्मा और उनके साथी कॉफमैन एलन व स्टीफेन की शोध के अनुसार रॉक संगीत हृदय की ही नहीं कैंसर जैसी असाध्य एवं पीड़ादायक बीमारियों को भी भड़काने वाला है। सामवेद की ऋचाओं एवं ब्लैक एंड ब्लैक संगीत के शरीर पर प्रभाव के तुलनात्मक अध्ययन में उन्होंने देखा कि कैंसर कोशिकाओं में 25 प्रतिशत की न्यूनता आई। इन शोध निष्कर्षों से दो बाते स्पष्ट हुई कि तेज हार्टबीट की स्वर लहरियाँ स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होती है। म्यूजिकोजेनिक मिरगी में तो ये जानलेवा भी सिद्ध हो सकती है। दूसरा तथ्य यह भी है, जो ध्यान आदि यौगिक प्रक्रियाओं की होती है।

मैसूर के श्री गणपति सच्चिदानंद स्वामी नाद चिकित्सा के अंतर्गत राग रागिनी विद्या के पुनरुद्धार का कार्य कर रहे है। भारतीय रागों एवं उनके चिकित्सकीय प्रभाव पर चैन्नई स्थित राग रिसर्च सेंटर भी कई संगीतज्ञ चिकित्सकों एवं मनःचिकित्सकों के साथ अध्ययन में जुटा हुआ है। इस शोध के अंतर्गत आनंद भैरवी एवं नासिका भूशनी पर अनुसंधान दर्द निवारक व बुढ़ापे से जूझने वाले रागों पर भी काम चल रहा है।

इसी सेंटर में विहैवियरल एनालिसिस एंड मैनेजमेंट विभाग के अध्यक्ष डॉ गौतमदास दारा भावनात्मक रूप से असंतुलित 90 प्रतिशत व्यक्तियों पर 20 मिनट का संगीत प्रयोग किया गया। इनमें प्रथम 30 के समूह को शंकर मरनम् (कर्नाटक) व द्वितीय 30 व्यक्तियों को फिल्मी संगीत सुनाया गया व तीसरे समूह को कुछ भी नहीं सुनाया गया। दो सप्ताह तक किए गए इस अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि प्रथम समूह में 22 व्यक्तियों का तनाव स्तर तीव्रता से कम हुआ। दूसरे समूह में मात्र 8 व्यक्तियों में कुछ सुधार हुआ, जबकि तीसरा समूह यथावत रहा।

विविध रागों को भिन्न भिन्न रोगों में अपने चिकित्सकीय प्रभाव के लिए उपयुक्त माना गया है। कफ के कुपित होने से संभावित रोगों के लिए राग भैरवी मानसिक चंचलता एवं क्रोध की स्थिति में मल्हार एवं जैजैवंती रक्तचाप में राग असावरी श्वास संबंधी रोगों तपेदिक खाँसी दमा आदि में राग भैरवी और उदर संबंधी रोगों में पंचम राग का प्रयोग बतलाया गया है। पागलपन की स्थिति में राग खंबुज अनिद्रा रोग में राग नीलाबंरा का उपयोग लाभदायक है। श्री राग से पाचनक्रिया ठीक होती है। राग वर्धिनी शरीर पीड़ा को दूर करता है। शरीर के क्रियाकलाप सामान्य एवं सहज ढंग से कार्य करें। इसके लिए राग तोड़ी को उपयुक्त बताया गया। इन प्रयोगों के लिए संगीत चिकित्सकों को राग, रोग व रोगी की मनः स्थिति का सही ज्ञान होना अति आवश्यक है। संगीत की अलौकिक विशेषताओं को समझकर अच्छा यही है कि हम ध्वनि प्रदूषण फैलाने वाले थकाऊ संगीत को तिलाँजलि दे डाले। कर्णप्रिय, सुमधुर स्वर लहरियों के साथ अपने जीवन के तार तरंगित करें। निश्चित तौर पर संगीत की जादुई छुअन हमारे जीवन को स्वस्थ एवं उल्लास से परिपूर्ण बना देगी।


Quotation

गंगा जब गोमुख से निकली तो संकीर्ण धारा के रूप में धीरे-धीरे वे अपने अंदर सबको समाहित करती हुई,सतत् आगे बढ़ती चली गई भू संपदा को अभिसिंचित करने की आकुलता उन्हें रोक न पाई व हिम पर्वत शृंखलाओं का बंधन तोड़कर वे मैदान में उतरी और अपनी विशालता में सबको घुलती मिलाती अंततः समुद्र से जा मिली। जिस गंगा ने हमेशा देना ही सीखा लेना नहीं, वह अपनी पारमार्थिक आकुलतावश ही जनसम्मान पा सकी। ऐसे परमार्थी निश्छल व निर्मल हैं, इसीलिए गंदा नाला भी गंगा में मिलकर तद्रूप बन जाता है।


इतना आसान नहीं है कुंडलिनी जागरण

साधकों का एक समूह बंद सभागार में बैठा है। उनकी संख्या सौ सवा सौ के आसपास होगी। मंच पर भगवा या सफेद वस्त्र पहने दाढ़ी मूँछ वाला कोई व्यक्ति विशिष्ट भंगिमा बनाए आसीन है। सभागार में सभी साधक जमीन पर ही बैठे है। ऐसे स्थान का चुनाव जानबूझकर किया गया है। गुरु जैसा दिखाई देने वाला व्यक्ति सामने बैठे लोगों को निर्देश देता है। पालथी मारकर बैठ जाएँ। कमर सीधी रखें। गहरी साँस लें। कुछ देर साँस को भीतर ही रोके रहे और अब गहरी साँस छोड़ें।

पाँच बार इस तरह का निर्देश देकर वे सज्जन कहते हैं कि अब हम कुँडलिनी जागरण के प्रयोग में उतरेंगे। दिए जा रहे निर्देशों का पालन करें । पहले चरण में शरीर को शिथिल छोड़ दें। किसी भी अंग में कोई तनाव न रहे। पहले पाँव के अँगूठे को शिथिल करें। पिंडली,जंघा, पेडू, उदर, पीठ, सीना, हाथ, आदि अंगों को शिथिल करते करते सिर तक आएँ। गरदन,ठोड़ी, छोड़ते जाएँ। पूरा शरीर शिथिल हो रहा है। अपने आपको शिथिल अनुभव करें। पूरी तरह शिथिल।

पंद्रह मिनट इन निर्देशों को दोहराने के बाद गुरु कहता है अब पंद्रह मिनट का दूसरा चरण शुरू होता है। इस चरण में अपने शरीर को गति करने दो। नाचे जैसा मन को भाए उसी तरह नाचें। अपनी ओर से कोई प्रयास नहीं करें। शरीर अपने आप जैसी गति करे करने दें। अनुभव करें कि ऊर्जा उत्पन्न हो रही है। पाँव से उठाकर वह ऊपर की ओर बढ़ रही है। अपना नियंत्रण छोड़ दें और शरीर जो भी गति करना चाहे करने दें।

तीसरे चरण में गुरु/ मास्टर कहता है कि अब आंखें बंद कर ले। थम जाएँ । निश्चल बैठे या खड़े रहे। जो भी हो उसके केवल साक्षी बने रहें। अपनी ओर से कोई प्रतिक्रिया न हो न ही जो हो रहा है उसमें भागीदार बनें। चौथे चरण में नीचे गिर जाने, लेटने और निश्चल पड़े रहने के लिए कहा जाता है।

यह अभ्यास कुँडलिनी जागरण का सुगम मार्ग बताते हुए कराया जाता है। योग तंत्र और गुहा शक्तियों के प्रति बढ़ते आकर्षण के कारण इन अभ्यासों से कुँडलिनी जागरण के संबंध में भ्रम और भटकाव ही ज्यादा फैले है। यदि घंटे आध घंटे के अभ्यास साधकों की कुँडलिनी जगा सकते होते तो हजारों लाखों लोग दिव्य अलौकिक क्षमताओं से संपन्न होते । क्योंकि कुँडलिनी जागरण व्यक्ति के सीमित आकाश को असीम में बदल देता है। उसकी क्षमताओं को विस्फोट की तरफ जगा देता है।

कुँडलिनी जागरण का एक और लोकप्रिय अभ्यास शक्तिपात के रूप में है। इस अभ्यास में गुरु अथवा सिद्ध व्यक्ति मंच पर बैठ जाते हैं। सामने सैकड़ों और विशिष्ठ आयोजनों में हजारों लोग सुखासन से बैठे होते हैं। सिद्ध शिक्षक शरीर मन बुद्धि चित और अहंकार के शाँत होने का निर्देश देता है। कुछ देर तक इन निर्देशों को दोहराने के बाद सीधे कहा जाता है कि अपने मूलाधार चक्र से बिजली की तरह कौंधती हुई शक्ति का अनुभव करो। अनुभव करें कि वह जाग रही है और लपलपाती हुई आज्ञाचक्र या सहस्रार की ओर दौड़ रही है। कुंडलिनी जाग रही है, जाग चुकी है। अब साधकों को विशेष कुछ करना आवश्यक नहीं है। जिन्हें ऐसा अनुभव नहीं होता उन्हें भी मानना पड़ता है कि ऐसा कुछ हुआ अवश्य है।

एक अन्य अभ्यास में दो चार साधक इतने ही सिद्ध शिक्षकों के साथ बैठते हैं। पालथी मारकर सुखपूर्वक कमर सीधी रखकर बैठे साधकों को सामने जल रहे दीपक ली लौ पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा जाता है। बहुत बार सामने प्रमुख गुरु का चित्र भी होता है। साधक के पीछे बैठे शिक्षक रीढ़ की हड्डी से चार इंच की दूरी रखते हुए सहलाते हुए से हथेली ऊपर ले जाते हैं, नीचे लाते हैं और फिर ऊपर ले जाते हैं। यह क्रिया ऊपर उठाने का निर्देश देती हुई प्रतीत होती है। बीस मिनट के इस अभ्यास के बाद शिक्षक आश्वस्त करता है, तुम्हारी कुँडलिनी की निद्रा टूट गई है। वह जाग रही है, सक्रिय हो गई है, इस अभ्यास को चालीस दिन तक जारी रखो। पूर्ण जाग्रत हो जाएगी और तुम्हें धन्य बना देगी।

तंत्रविद्या और गुह्य साधनाओं के अलावा सिद्ध संतों की खोज में पूरा जीवन बिता देने वाले महामहोपाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज एवं परमपूज्य गुरुदेव ने कुँडलिनी जागरण के इन अभ्यासों को छलावा कहा है। दोनों के अनुसार सिर्फ मान लेने या कल्पना करने से ही कुँडलिनी जाग्रत नहीं हो जाती व्यक्ति में दिव्य क्षमताओं का परिचय भी मिलना चाहिए। इन क्षमताओं में सृजन की क्षमता साहित्यिक व कलात्मक प्रतिभा का उदय संकल्प सिद्धि दूसरों के मान की बात जान लेना,अतींद्रिय क्षमताएँ जाग्रत हो जाना सूक्ष्मशरीरधारी जीवों से संपर्क बना लेना और मोक्ष प्राप्त कर लेने जैसी सिद्धियां मुख्य है। सिद्धियों को साधना के मार्ग में उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जाता । वे मात्र यह संकेत देती है कि साधना के मार्ग पर प्रगति हो रही है। सिद्धियां उस मार्ग पर मील के पत्थर की तरह है। साधक के लिए शास्त्र और गुरु का निर्देश है कि इन सिद्धियों में अपने आपको भूले नहीं। उन्हें देखकर उत्साह बढ़ता अनुभव करें और मुक्ति तक पहुँचकर ही विराम लें। परमपूज्य गुरुदेव ने साधना से सिद्धि में इस संबंध में विशेष निर्देश दिये है।

कुँडलिनी जागरण के जो लक्षण क्रमश गिनाए जाते हैं, वे अथवा उनका थोड़ा भी अंश साधक में नहीं है,तो साधना सिद्धि को अपने आप से छलावा ही कहेंगे। घंटे आधा घंटे के अभ्यास से महीने पंद्रह दिन में कुँडलिनी जगाने के आश्वासन साधक के लिए प्रवचन मात्र ही है। पंडित गोपीनाथ कविराज लिखते हैं कि महीने पंद्रह दिन के अभ्यास में इतना व्यतिक्रम आने से वापस सो भी सकती है। जो पात्र मामूली प्रयत्न से चमक उठता है, वह थोड़ी सी गंदगी के कारण मलीन भी हो सकता है। यह अनुभूत तथ्य है कि महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्रचंड पुरुषार्थ और निरंतर साधना से ही प्राप्त हो सकती है। प्रयत्न उसी स्तर के होने चाहिए।

कुँडलिनी की अर्थ कुँडल फेरा या लपेटा किया जाता है। तीन चार आवृत्ति में घूमे वर्तुल को कुँडलिनी कहते हैं। यह शब्द सामान्य स्थिति में शरीर को लपेटे मारकर बैठी सर्पिणी के प्रतीक का बोध कराने के लिए चुना गया है। कुँडलिनी का अर्थ फेरा तो है, लेकिन वह इतना ही नहीं है। सही अर्थ है- गहरा स्थान या गड्ढा। अगर एक गड्ढा बनाया जाए और वह कुछ गहरा बन जाए, तो उसे कुँड कहते हैं। उस कुंड से संबंधित चीज को कुँडलिनी कहेंगे।

योगशास्त्र के मर्मज्ञ कहते हैं कि मस्तिष्क में एक गहरा गड्ढा है। वहाँ दिव्यशक्ति छिपी पड़ी है। यह गड्ढा सिर को छेदकर या दिमाग का आपरेशन कर नहीं ढूंढ़ा जा सकता। इसका अस्तित्व स्थूल मस्तिष्क में नहीं सूक्ष्मशरीर में है। इस केंद्र को योगसाधनाओं से निर्मल हुए चित्त में केवल अनुभव ही किया जा सकता है। स्वामी सत्यानंद के अनुसार मस्तिष्क में विद्यमान उस गहर अथवा कुँड को जगा दिया जाए तो व्यक्ति के संपूर्ण अस्तित्व में स्थित शक्तिकेंद्र जाग उठते हैं। सामान्य स्थिति में ये केंद्र सोए पड़े रहते हैं।

सिद्ध योगी या गुरु साधक पर जब शक्तिपात करते हैं,तो मस्तिष्क का यही केंद्र जागता है। गुरु अपने शिष्य पर अनुग्रह करते हुए उसके सिर पर हाथ रखते हैं। आशीर्वाद के उस क्रम में ही शक्ति का संचार हस्ताँतरण या जागरण होता है। शक्ति यों पूरे व्यक्तित्व में ही व्याप्त है। कुछ केंद्र इसके नियंत्रण की भूमिका में होते है। वहाँ से इसका संचालन जागरण और निष्क्रमण होता है। दैनंदिन जीवन में किसी भी यंत्र को चलाने के लिए स्विच ऑन या ऑफ करने के उदाहरण से इस तथ्य को समझा जा सकता है। बिजली सभी जगह व्याप्त है, लेकिन उसका कोई लाभ नहीं उठाया जा सकता है। बिजली का उपयोग करना हो तो एक प्रक्रिया से गुजरते हैं। उसके लिए बिजली के उत्पादन और वितरण तंत्र से संपर्क स्थापित करते हैं। उस संपर्क को जाग्रत और प्रसुप्त करने के लिए स्विच ऑन या ऑफ किया जा सकता है। मानवी चेतना में व्याप्त शक्ति को ऊर्जा के विराट सागर से जोड़ने अथवा उसे अपने भीतर उद्घाटित करने के लिए अवतरण या जागरण संपन्न होने के बाद संकल्प मात्र से अभीष्ट केंद्रों को सक्रिय किया और रोका जा सकता है।

मस्तिष्क में शक्तिकेंद्रों के शिखर सहस्रार में अपूर्व ऊर्जा भरी हुई है। कुछ सिद्ध योगियों का अनुभव है कि इस के इस केंद्र तक पहुँचने का मार्ग मूलाधार चक्र से आरंभ होता है। छह,सात आठ नौ,इक्कीस अथवा चौसठ चक्रों में से प्रथम चक्र मूलाधार है। समझा जाता है कि महाशक्ति यही पर सर्पाकार कुँडली मारकर बैठी हुई है। यहाँ कुँडली से आशय मूलाधार चक्र पर पलेटे मारकर बैठना है। अनुभवी योगियों ने इस स्थान पर बैठी कुँडली को सर्पिणी भी कहा जाता है। उनके अनुसार मूलाधार केंद्र में बैठी सर्पिणी सामान्य स्थिति में सुप्त अवस्था में होती है।

कुँडलिनी को सर्पिणी के रूपक से समझाया गया तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह नाग या नागिन है। आशय सिर्फ इतना है कि महाशक्ति चमकती हुई लपलपाती और सधी हुई अवस्था में जीवनदायिनी अन्यथा प्राणलेवा भी है। जिस युग के योगियों ने कुँडलिनी महाशक्ति का अनुभव किया, उस युग में किसी सीमित स्थान में सीमित शक्ति के लिए सर्प ही उपयुक्त प्रतीक था। उसमें दीप्ति, स्फूर्ति, ऊर्जा और विष की जो क्षमताएँ है, वे मूलाधार चक्र में प्रसुप्त शक्ति की विशेषताओं से मेल खाती है। शक्ति का स्वयं कोई आकार या रूप नहीं सर्प या सर्पिणी का उपयोग किया गया।

आज के युग में किसी को कुँडलिनी का प्रथम अनुभव होता तो संभव है दूसरे प्रतीक चुने जाते। आज की स्थिति और काल के अनुरूप कोई प्रतीक चुनना होता, तो कुँडलिनी को विद्युत के रूपक से समझाया जाता। निराकार, दीप्तिवान, कौंधती हुई ऊर्जा और संभालकर चलें तो निहाल कर देने वाली क्षमता बिजली में विद्यमान है। बिना संभाले, असावधानी से इस्तेमाल किए जाने पर बिजली सर्प से भी ज्यादा घातक सिद्ध होती है। कुँडलिनी जागरण के अनुभव से गुजरे विभिन्न योगी इस शक्ति को आकाश में कौंधती और घरों में अकस्मात चमक उठने वाली बिजली की तरह देखते भी है। शक्तिपात के समय भी कुछ शिष्य-साधकों को इसी तरह का अनुभव हुआ है।

विज्ञान के विद्यार्थी और योग के साधकों ने कुँडलिनी की तुलना अणुशक्ति से की है। अणु का विखंडन संभाला न जाए तो विनाश कर देता है और उसका व्यवस्थित उपयोग किया जाए, तो कई शहरों को निरन्तर बिजली दे सकता है।

कुँडलिनी यदि महाशक्ति है, तो उसे जगाने के उपाय बहुत आसान नहीं हो सकते। कम से कम बाजीगरी की तरह तो उसे जगाने का चमत्कार नहीं किया जा सकता। माचिस की तीली जलाकर थोड़ी देर के लिए तो रोशनी की जा सकती है। लेकिन उससे मशीनें नहीं चलाई जा सकती। तीली से निकली हुई लौ वसन, भूषण और छप्पर में आग लगा सकती है। बड़ा अग्निकाँड भी हो सकता है। लेकिन उससे सृजन के बड़ उद्देश्य पूरे नहीं होते। बड़े उद्देश्यों के लिए व्यवस्थित तैयारी और धैर्य चाहिए। कुँडलिनी महाशक्ति के रचनात्मक उपयोग के लिए भी वैसी ही निष्ठा ओर तन्मयता भरे उद्यम की आवश्यकता है। अध्यात्म की व्यवहार-भाषा में इसे संयमपूर्वक की गई निरन्तर, अनथक और नैष्ठिक साधना नाम देंगे।

योगियों ने मिथ्या- जागरण, भ्रम या आत्मवंचना के खतरे भी बताए है। इस स्थिति में साधना अवरुद्ध हो जाती है। लक्ष्य तक पहुँचे बिना ही वहाँ पहुँचा मान लिया जाए तो प्रगति का रुक जाना स्वभाविक है। आत्मवंचना की यह स्थिति साधना शक्तिपात के ‘शार्टकट’ से उत्पन्न होती है एकाधबार के नृत्य ध्यान से ही जिस चमत्कार का आश्वासन दिया जाता है, वह प्रायः वंचनामूलक ही होता है। गुरु लोग ‘कुँडलिनी जग गई ओर जागी रहेगी। कहकर साधक का भारी अहित कर देते हैं। उसकी भारी संभावनाओं पर भी रोक लगा देते हैं।

कुँडलिनी जागरण के लिए किए जा रहे त्वरित (इंस्टाँट) आधुनिक प्रयोगों में उन्मत्त स्थिति भी दिखाई देती है। योगशास्त्रों के अनुसार जब यह महाशक्ति जागती है, तो साधक चीखने-चिल्लाने लगता है, कभी वह गुमसुम, उदास होकर बैठ जाता है। वह निरर्थक प्रलाप भी करने लगता है। इस तरह की अभिव्यक्तियों के भिन्न-भिन्न कारण है। उनकी विवेचना के लिए अलग विस्तार चाहिए। संक्षेप में इन अभिव्यक्तियों को उन्मत्त प्रलाप कह सकते हैं। आधुनिक प्रयोगों के दौरान भी साधक इस तरह की अभिव्यक्तियाँ करते दिखाई देते हैं लेकिन ये अभिव्यक्तियाँ जागरण के लक्षण नहीं है। ये लक्षण ही महाशक्ति का चिन्ह होते तो उन सभी रोगियों को सिद्धि की और बढ़ता बताना चाहिए था, जो अपनी मनश्चिकित्सा करवा रहे है।

स्वामी सत्यानंद जी ने इस अंतर को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि भ्रम, पागलपन ओर आध्यात्मिक जाग्रति की स्थितियों में प्रायः एक जैसी स्थिति होती है अंत सिर्फ यह होता है कि आत्मनिष्ठ व्यक्ति अपनी चेतना द्वारा मार्गदर्शन पाता है, विक्षिप्त व्यक्ति में ऐसा कुछ नहीं होता। वह अपने मनोवेगों से ही संचालित होता है। सामान्य या इंस्टीट साधनों से कुँडलिनी जागरण का जैसा अनुभव होता है, वह मनोवेग प्रधान ही है। अनुभव या अभिव्यक्ति बीत जाने के बाद साधक उसी लोक में पहुंच जाता है। जिस चेतना में महाशक्ति का अवतरण होता या जहाँ कुंडलिनी शक्ति जाग्रति है, वहाँ व्यक्तित्व में आमूलचूल परिवर्तन आ जाता है। यह परिवर्तन स्वभाव, संस्कृत, प्रतिभा, मेधा, प्रभाव और वैभव आदि सभी पक्षों में दिखाई देता है। कहना न होगा कि परिवर्तन शुभ और कल्याणकारी ही होता है। अपने लिए भी और संपर्क में आने वालों के लिए भी।


आज भी देखे जा सकते हैं अष्टावक्र

स्वास्थ्य की महिमा बताने के लिए जो भी कहा जाए, कम है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन या आत्मा का निवास होता है- यह उत्साहवर्धक कथन है, पर ऐसा नहीं समझाना चाहिए कि यह आत्यंतिक सत्य है शरीर के बिना तो मन काम नहीं कर सकता पर वह टूटा-फूटा, रुग्ण, अपंग, असमर्थ शरीर होने पर भी अपनी विलक्षणता न सिर्फ यथावत बनाए रहता है, वरन् उसे अधिक सजग सक्षम सक्रिय बना सकता है- इस प्रतिपादन के उदाहरण भौतिक जगत में भी विद्यमान है।

पुरातनकाल में च्यवन, बाल्मीकि ओर दधीचि जैसों के ऐसे कथानक मिलते हैं, जिन्होंने तप करते हुए शरीर को निष्क्रिय बना लिया था और उसके ढाँचे में मात्र आत्मा ही काम करती है। समाधि अवस्था में ऐसा ही होता है उसका प्रयोगात्मक प्रदर्शन करने वाले हृदय ओर मस्तिष्क की गति बंद होने पर भी जीवित बने रहते हैं ओर निर्धारित समय पर उस निष्क्रियता को समाप्त करके पूर्ववत सक्रिय हो उठते हैं।

यह अध्यात्म-प्रसंगों की चर्चा हुई। एक भौतिक उदाहरण अभी भी हमारे सामने है, जिसमें शरीर जीवित रहने भर के लिए सक्रिय है, अन्यथा उससे कोई उपयोगी कार्य नहीं बन पड़ता है। यह ब्रिटेन के एक मूर्द्धन्य खगोलविद् स्टीफन हाँकिन्स है, जिनके बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है इन्होंने सृष्टि की उत्पत्ति के पुरातन सिद्धान्तों की इस प्रकार व्याख्या की है, जिसके आधार पर अब तक की मान्यताओं में भारी उलट पुलट करनी पड़ सकती है। इसके अतिरिक्त ब्लैक होल के संबंध में भी नवीन व्याख्याएँ दी है। इन्होंने ही पहली बार यह बतलाया कि छोटे से छोटा श्याम विवर मटर के दाने बराबर हो सकता है और इस प्रकार के कितने ही ब्लैक होल्स ब्रह्मांड में अस्तित्व में है भी।

अष्टावक्र की तरह काया वाले पचास वर्षीय इस वैज्ञानिक को लगभग पंद्रह वर्ष पूर्व ऐसे विचित्र पक्षाघात घेरा, जिसके संबंध में योग्य और उच्च शिक्षित चिकित्सकों को भी विशेष जानकारी न थी और वे ऐसे ही अनुमान के आधार पर चिकित्सा करते रहे। कैंब्रिज विश्वविद्यालय के यह गणितज्ञ अपनी नियुक्ति के उपराँत ही संसार के मूर्द्धन्य खगोलविदों में गिने जाने लगे थे, विशेषकर ब्रह्मांड संरचना के रहस्यों के नूतन संदर्भों के संबंध में।

पक्षाघात का असर तब भी बहुत हद तक हो चुका था, किन्तु उनकी प्रतिभा से प्रभावित विज्ञान की एक छात्रा ने उनसे विवाह कर लिया था, जिसके उदर से एक बालिका भी जन्मी, पर वे अब पत्नी की सेवा-सहायता पर भी निर्भर नहीं है। एक विशेष प्रकार की पहियेदार कुर्सी उनके लिए बना दी गई है। उस पर वे सदा सवार रहते हैं। अब उनके हाथों ने ही साथ नहीं छोड़ा है, अपितु वाणी भी दगा दे गयी है। उन्हें कुछ कहने में बहुत जोर लगाना पड़ता है। फिर भी उच्चारण अस्पष्ट ही रहता है। मेज पर लगे कम्प्यूटर की सहायता से ही वे अपने चिंतन का प्रकट कर पाते हैं। उनके अभ्यस्त सहायक उनका मंतव्य समझ लेते हैं और जिन वैज्ञानिकों के साथ वे काम कर रहे है, उन्हीं के समक्ष प्रस्तुत कर देते हैं।

कहा जाता है कि वे इस अर्द्धशताब्दी के दूसरे आइंस्टीन है। उन्होंने ब्रह्माँड की गुत्थियों को इस नए ढंग से सुलझाया है, जिसके बारे में पूर्ववर्ती वैज्ञानिकों को कल्पना तक न थी। यदि उनका प्रयास पूरी तरह सफल हो गया, तो प्रकृति की अनेकों अनबूझ पहेलियों पर नया प्रकाश पड़ेगा। उक्त वैज्ञानिक अभी अधेड़ आयु के है। करीब डेढ़ दशक से शरीर -आहार निद्रा जैसी कामचलाऊ हरकतें ही कर पाता है। मशीन की कुरसी और कंप्यूटर ही उन्हें जीवित कहे जाने योग्य ही नहीं, संसार की अद्भुत मानसिक क्षमता की स्थिति में बनाए हुए है। ऐसी दशा में शरीर को महत्व देने वालों से पूछने का मन करता है कि मन अधिक प्रबल है या शरीर ? भारतीय अध्यात्म सदा से ही मन की सामर्थ्य को ही सब कुछ मानता रहा है। स्टीफन हाँकिन्स इसके जीते जागते प्रमाण है।


Quotation

मनुष्य का गौरव इस बात में है कि वह नेक राह पर चले और अपने पीछे ऐसी परंपरा छोड़ जाए जिसका अनुकरण करते हुए पीछे आने वाले लोग अपना रास्ता खोज सकें। हिम्मत और बहादुरी की खरी पहचान यह है कि वह कठिनाइयों और प्रलोभनों के बीच जरा भी विचलित न हो। जिसने इनसानियत के आदर्शों को छोड़ दिया, उसके पास बचा ही क्या? भले ही ऐसा व्यक्ति अमीर सत्ताधारी या विद्वान क्यों न हो, उसे खोखला ही समझना चाहिए।


असमर्थों को भी पार लगाती सामूहिक उपासना

श्री कृष्ण द्वारा कनिष्ठा अंगुली पर गोवर्द्धन पर्वत उठा लेने के प्रसंग की अलग अलग व्याख्याएँ है। इंद्र का आतंक नहीं मानने श्रमदेवता की आराधना करने किसी बाह्य सता की जगह अपने कर्म पर भरोसा करने और वैदिक देवताओं को निरस्त कर लोकदेवता की प्रतिष्ठा करने जैसे कई अर्थ किए जाते हैं। आध्यात्मिक अर्थ इन सबसे अलग है और साधना उपासना के क्षेत्र में वही ग्रहण किया जाना चाहिए। आध्यात्मिक अर्थ यह है कि सामान्य मनोभूमि सामान्य संकल्प और औसत अभीप्सा के लोग एक साथ संकल्प करें तो भी भगवान की शक्तियाँ सक्रिय हो उठती है। उनके अनुग्रह अनुदान बरसने लगते हैं और सामान्य लोगों के लिए वह आच्छादन मिल जाता है। जो नहीं मिलता तो संभव है कि भारी अनर्थ हो जाता।

निजी एकाकी प्रयत्नों से यत्किंचित् उपाय हो सकते हैं। उनके कुछ परिणाम भी सामने आ सकते हैं। सामान्य स्थितियों में उन परिणामों के सहारे आ सकते हैं। सामान्य स्थितियों में उन परिणामों के सहारे कुशलतापूर्वक आगे बढ़ते रहा जा सकता है। लेकिन चुनौतियों का समय हो तो सम्मिलित प्रयास करना पड़ता है। साधना के क्षेत्र में इस तरह के प्रयत्नों को सामूहिक उपासना का नाम दिया जा सकता है। इन दिनों मानव सभ्यता आस्था संकट के दौर से गुजर रही है। इस कारण तनाव कुंठा निराशा क्षोभ हिंसा विग्रह रोग शोक जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही है। उन्हें आसमान फट पड़ने की तरह देख जा सकता है। विनाश चारों ओर से उमड़ रहा है। सामूहिक उपासना एक उपाय है, जिसे समाज पर संरक्षक चेतना का आच्छादन लाने के लिए प्रयुक्त किया जाना चाहिए । इन प्रयत्नों को ग्वाल बालों की अलग अलग शक्ति का समुच्चय और उस रूप में किया गया एक आहान समझना चाहिए।

आहान सुनकर दिव्यचेतना अपनी कनिष्ठा अँगुली उठाती है और समस्त आपदाओं को प्रभावहीन कर आध्यात्मिक वैभव से संपन्न कर देती है। सामूहिक उपासना का अपना एक विज्ञान है। बड़े यज्ञों और धर्म अनुष्ठानों में इसका विज्ञान पक्ष स्वयं सिद्ध होता है। गहन आस्था संकट के दौर में विशिष्ट प्रयासों का भी विधान है। इन प्रयासों के सहारे पूरा समाज जाति और राष्ट्र भी तर जाते हैं। यह तरना सम्मिलित प्रयत्नों से नाव बनाकर पार उतरने जैसा है। दो सौ लोगों में हो सकता है कि कुछ लोग इतने कुशल नहीं होते हैं। कि अपने बलबूते पर उतर जाएँ लेकिन दस पाँच लोग मिलजुलकर नाव बनाएँ दो चार लोग उसे पानी में उतारने चलाने के लिए तैयार हो तो किनारे खड़े सभी यात्री उफनती हुई नदी पार कर सकते हैं। सामूहिक उपासनाओं में भी यही नियम काम करता है।

सभी की आध्यात्मिक सामर्थ्य एक समान नहीं होती। कमजोर लोग अकेले साधना समर में उतरे तो हो सकता है कि चार कदम चलने पर ही लड़खड़ा जाएँ। लेकिन सामूहिक उपासना में कमजोर लोग भी सहज ही विकास करने लगते हैं। कोई वाहन या चालक यह तो नहीं देखता कि अमुक यात्री कमजोर है, इसलिए उसे धीरे धीरे ले जाएँ और कोई ज्यादा समर्थ है, तो उसे जल्दी मंजिल तक पहुंचा दे। सामूहिक उपासना को जीवंत और गतिमान बनाया जा सके, तो वह अक्षम -कमजोर साधकों का विकास भी उसी तेजी से करने लगती है, जितना की समर्थ साधकों को आगे बढ़ाती है। वाहन में सवार होना पर्याप्त नहीं है, उसमें गति भी आनी चाहिए। साधना में गति और ऊर्जा लाने के आपने नियम -विधान है, उन्हें संपन्न किया जाये, तो सामूहिक उपासना भी प्राणवान हो उठती है।

यद्यपि दिये जा रहे उदाहरण सर्वथा उपयुक्त नहीं है लेकिन मिले-जुले प्रयत्नों के चमत्कार आधुनिक जीवन सर्वत्र अनुभव किये जा सकते हैं। व्यक्तिगत रूप से वाहन रखना हर किसी के लिए सम्भव नहीं है। बहुतों की सामर्थ्य तो डेढ़-दो हजार की साइकिल रखने की भी नहीं होती लेकिन सामूहिक या सार्वजनिक वाहनों का उपयोग कर निताँत हैसियत का व्यक्ति भी अपने गंतव्य पर आसानी से पहुँच सकता है।

आध्यात्म क्षेत्र में सामूहिकता का प्रयोग वैदिक काल से ही जा रहा है। आंतरिक शक्तियों के विकास और आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रचंड साधनाएँ निजी स्तर पर की जाती रही है। निजी स्तर पर संध्यावंदन, ध्यान,जप,पूजन,अग्निहोत्र जैसे कर्म भी किया जाते रहे है। साथ ही राष्ट्र या समाज में चेतना जगाने के लिए सामूहिक अनुष्ठान आरम्भ से ही किये जा रहे है। वेद मंत्रों का सामूहिक सस्वर पाठ, स्वाध्याय,आध्यात्मिक व्यायाम और प्रार्थना आदि कृत्य सभी कालों में चले रहे है। प्राकृतिक विपदाओं के निवारण के लिए विभिन्न आध्यात्मिक प्रयोगों का स्वरूप भी सामूहिक ही रहा है।

भावात्मक मानसिक और दिव्य शक्तियों का सहयोग तो अपनी जगह है ही, सामूहिक उपासना में निजी स्तर पर चलने वाली साधना-प्रक्रिया को विलक्षण ढंग से सरल बना दिया है। साधकों के लिए एकाँत में रहने वही भजन पूजन करने और आहार में सात्विकता के समावेश के लिए अपना भोजन स्वयं तैयार करने जैसे अनुशासन अपनाये जाते हैं। इन अनुशासन नियमों का एक ही उद्देश्य है कि साधक दुनियादारी अथवा बाहरी प्रभावों से यथासंभव बच्चा रहे। बाहरी प्रभाव ध्यान में विक्षेप लाते हैं। एकाँत में रहने की बात इसलिए कही जाती है। कि आसपास का वातावरण और उसका कोलाहल भ्रम भटकाव न लाए। सामूहिक उपासनाओं ने इन आवश्यकताओं को अनायास ही पूरा कर दिया। एकाँतसेवन विजातीय प्रभावों से मुक्त रहने के लिए किया जाता है। सामूहिक उपासना में शामिल सभी साधक एक ही उद्देश्य के लिए एकत्र होते हैं। सबकी मनः स्थिति प्रायः एक ही दिशाधारा लिए होती है। आँतरिक स्तर में भले ही अंतर हो,लेकिन संकल्प चिंतन और चर्या का निर्धारण समान ही रहता है। सब मिलकर उपासनास्थली में जैसा वातावरण बनाते हैं। वह एकाँत सेवन की तुलना में कई गुना लाभकारी है। सूक्ति की तरह कहना हो तो एक घंटा की गई सामूहिक उपासना महीने भर तक किए गए एकाँत सेवन के बराबर परिणाम उत्पन्न करती है।

एक ही स्थान पर ज्यादा साधकों का एकत्र होना और आत्मिक व्यायाम करना सामूहिक उपासना का एक प्रकार है। एक अन्य स्वरूप एक ही समय में असंख्य लोगों द्वारा उपासना के लिए बैठने का भी है। सूर्य के उदय और अस्त होते समय किया जाने वाला संध्यावंदन गायत्री जप इसी स्तर का है। संध्या उपासना के सूक्ष्म रहस्य अलग है, लेकिन सामूहिकता की दृष्टि भी यह क्रम अपनी तरह का है। बाद में दूसरे धर्म संप्रदायों ने भी सामूहिकता का यह स्वरूप अपनाया । गिरजों में रविवार के दिन अलग अलग स्थानों पर की जाने वाली प्रार्थनाएँ इसी आवश्यकता की पूर्ति करती थी। बौद्ध धर्म मानने वाले एशियाई देशों में वहाँ के भिक्षुओं स्थविरों लामाओं और योगियों ने प्रातः सायं ध्यान पर जोर दिया। इस्लाम के अनुयायी शुक्रवार के दिन मस्जिद में इकट्ठे होकर नमाज पढ़ते हैं। सामूहिक उपासना का वह पहला स्वरूप में पाँच वक्त या तीन वक्त या दो वक्त की नमाज के लिए समय निश्चित है। पाँचों वक्त की नमाज सभी जगह निश्चित समय पर ही पढ़ी जाती है।इस तरह की सामूहिक उपासनाओं में स्थान का लोप होने पर भी काल और क्रिया का लोप नहीं होता। तीन में से दो आधार पूरे होने पर विधान का पूरा पालन हुआ मान लिया जाता है।

कुछ अध्यात्मविज्ञानियों ने सामूहिक उपासना के क्षेत्र में नए प्रयोग भी किए है। भावातीत ध्यान आँदोलन के प्रवर्तक महर्षि महेश योगी के अनुसार एक निश्चित समय पर निश्चित लोग निश्चित पद्धति से ध्यान करने लगें तो सूक्ष्मजगत में अनुकूल परिवर्तन किए जा सकते हैं। उनके अनुसार कुल संख्या के दो प्रतिशत लोग भी इस प्रयोग के लिए तैयार हो तो नई सभ्यता के विकास की आशा की जा सकती है। पूर्ण योग के आविष्कर्त्ता श्री अरविंद ने कई बार लिखा है कि अतिमानस (दिव्यचेतना का विशिष्ट स्तर) के अवतरण कि लिए सभी लोग प्रयास करें यह जरूरी नहीं है। थोड़ी से लोग पूरी संकल्पशक्ति आकांक्षा करें और थोड़ी देर के लिए ध्यान के प्रयोग में उतरे तो अपनी सभ्यता को उच्चशिखरों पर पहुंचाया जा सकता है। उनके अनुसार ज्यादा नहीं सिर्फ कुछ हजार लोग इस प्रयोजन के लिए पर्याप्त है। इन स्थापनाओं में उत्साहवर्द्धक स्थिति यह है कि गिने चुने लोग निष्ठा और विधान के अनुसार सुनिश्चित साधनाक्रम शर्त किसी न किसी रूप में जरूर पूरी करें। इसी तरह का एक विशिष्ठ विधान बारह वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण रहा है। लाखों करोड़ों की उसमें भागीदारी रही है। परमपूज्य गुरुदेव ने उसे ब्रह्मामण अनुष्ठान नाम दिया है। उसी की महापूर्णाहुति इस वर्ष संपन्न हो रही है। इसके सूक्ष्म प्रकृति पर मानव प्रकृति पर होने वाले सत्परिणामों की मात्र कल्पना ही की जा सकती है। निश्चित ही समूह साधना युगपरिवर्तन जैसा कार्य कर दिखाती है। बिना किसी संदेश के हर साधक को इसमें अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।


पुण्य धर्म की खेती है - सत्य

सत्यमेव जयते - हमारा राष्ट्रीय आदर्श है। सही मायने में सत्य की अजेय और अमिट है। मानवीय सभ्यता एवं संस्कृति के इतिहास में न जाने कितने नियम बनाए और बिगाड़े गए परंतु सृष्टि के आदि में सत्य की जो प्रतिष्ठा थी, वह आज भी उसी रूप में विद्यमान है। इसी से सत्य की महत्ता का पता चलता है। निश्चय ही सत्य समस्त साधनों का आधारशिला है। जिस सुँदरतम एवं श्रेष्ठतम आधार पर मनुष्य को अपना जीवन अवस्थित करना चाहिए वह एकमात्र सत्य है।

सत्य सृष्टि का मूल है। सत्य ही सबसे बड़ा तप सबसे बड़ा धर्म सबसे पुण्यशाली कर्म और सबसे बड़ी सिद्धि है। अपकर्म अवसाद अपयश, अशाँति असंतोष और अपमान के झंझावातों से सत्यनिष्ठ व्यक्ति बचा रहता है। जीवन में उन्नति एवं उत्कर्ष की प्राप्ति के लिए सत्य ही सबसे सच्चा मार्ग है। निर्विकार निर्भय, एवं निश्चित जीवन जीने के लिए इससे बढ़कर कोई दूसरा उपाय नहीं है। सभी धर्मों में जिन नियमों गुणों एवं आचारों की प्रधानता है, उनमें सत्य का स्थान सर्वोपरि है।

सत्य की महिमा इतनी विराट है कि उसका ठीक- ठीक शाब्दिक विवेचन शाब्दिक विवेचन विश्लेषण करना संभव नहीं है। लेकिन सबसे आसान बात यह है कि सत्य बोलने में हमें कुछ भी खरच नहीं करना पड़ा। बस मन वचन एवं कर्म को एकाकार कर सम्यक् समभाव से अपने कर्त्तव्य का निर्वाह करना होता है। उर्पान्वदृ के ऋषि इसकी महिमा को अनुभव करते हुए सत्यवद का उपदेश देते हैं। कहने योग्य बात जो प्रमाणिक हो उसे बिना किसी हेर-फेर के उसी प्रकार कहना चाहिए। मनीषियों का मत है, सत्यान् प् प्रमदितव्यम् अर्थात् सत्य बोलने में प्रमाद नहीं करना चाहिए। पद्मपुराण में कहा गया है कि सत्य से पवित्र हुई वाणी बोलें तथा मन से जो पवित्र जान पड़े उसी का आचरण करें। सत्य एक समग्र भाव है।, संपूर्ण तत्व है। आचार, विचार एवं वाणी से सत्य आचार करना चाहिए। मन वचन एवं कर्म के एकरूप हो जाने पर ही सिद्धि की कामना की जा सकती है। सत्य वह है, जिसमें किसी प्रकार का कपट न हो, जो निर्दोष प्राणी का अहित न करता हो। सत्य के साथ सरलता व अहिंसा का अटूट संबंध है। युगद्रष्टा स्वामी विवेकानंद कहते थे,” महानतम सत्य सरलतम होता है।

सत्य को जितना हमने जाना है हमारी समझ एवं दृष्टि के अनुसार वह सत्य हो सकता है। किंतु इससे आगे बढ़कर यदि यह सोचा जाने लगे कि अन्य लोग जो सोचते हैं, वह सिर्फ असत्य है, तो यह पूर्वाग्रहपूर्ण मान्यता सत्य की अवमानना होगी। एक ही उद्देश्य के लिए कई तरह से सोचा जा सकता है। एक ही लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कई रास्ते हो सकते हैं। एक ही कार्य को विभिन्न तरीके से संपन्न किया जा सकता है।एक ही भाव को कई भाषाओं में कई तरह से अभिव्यक्त किया जा सकता है। इन भिन्नताओं के बने रहने पर भी तात्विक एकता बनी रहेगी। जैसे सूर्य विभिव्यक्त स्थानों पर वहाँ की परिस्थितियों के कारण कई रंगों का और कई आकारों का दिखता है। कोहरे में हिमप्रदेश में रेगिस्तान में ग्रहणकाल में उसी आभा अलग अलग तरह की दिखाई देती है, परंतु ये विभिन्नताएँ सूर्य की नहीं, अपितु स्थानीय परिस्थितियों की होती है।

सत्य के संबंध में भी यही बात है। कौन सी मान्यता कौन सी क्रिया सत्य है? इसका निर्णय कर पाना इतना सरल नहीं है, जितना कि समझ लिया जाता है। यदि हम बाह्य क्रियाकलाप की अपेक्षा कर्त्ता के उद्देश्य को समझने का प्रयास करें, तो संभव है कि हम यथार्थता के निकट पहुँच जाएँ। संसार में अनेकों धर्म प्रचलित है। उनके रीति-रिवाजों और दिशा निर्देशों में काफी अंतर पाया जाता है, फिर भी उनका मूल उद्देश्य एक है अनुयायियों को संयमी सदाचारी का उद्देश्य एक था, सत्य के निकट पहुँचना और पहुंचाना।

जिस पदार्थ में जिस रूप में सत्ता विद्यमान है उसे वैसा ही जानना सत्य ज्ञान है। उसको उसी रूप में मानना सत्य श्रद्धा है और उसका वैसा ही वर्णन सत्य वचन है। सत्यनिष्ठ को सदा सत्य एवं हितकारी शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। यदि किसी परिस्थितिवश ऐसा संभव न हो तो मौन रहना चाहिए। हमें अपने धरातल के हर अज्ञान को मिटाना होगा और वस्तुओं के आँतरिक सत्य तक उतर जाना होगा। हमें भीड़ का सत्य नहीं आत्मा का सत्य जीना चाहिए। हम अकेले है, किन्तु हमारे अंदर सत्य का दीप जल रहा है, तो कोई हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। परन्तु हम झूठे है और हमारे साथ हजारों की भीड़ है, तो भी अंततः हम पराजित ही होगे।

समस्त शक्तियों का स्रोत सत्य है। अच्छा यही है कि हम सत्य के उपासक बने। अपने अस्तित्व के सत्य को जाने । इस जगत के सत्य को पहचानें। सर्वांगीण प्रगति का एकमात्र आधार सत्य है। अतः सत्यपथ पर ही चलने का संकल्प लेना चाहिए। सत्य का वास्तविक अर्थ परब्रह्म है। श्रुति कहती है,” सृष्टि के मूल में यही ब्रह्म सत्य रूप में विद्यमान् था। अन्य त्रिगुणात्मक संसार इसके पश्चात बना। समस्त जगत का जो विवत है, वही सत्य है। वह सत् चित एवं आनंदस्वरूप है। असत्य में इसके विरुद्ध खड़े होने की सामर्थ्य हो ही नहीं सकती। यही सत्य जीवन का आधार है। हमें इसी की उपासना करनी चाहिए। विचार एवं श्रद्धापूर्वक असत् पदार्थों का बोध करके केवल अविनाशी सत्य में यत्नपूर्वक परिनिष्ठित होना चाहिए।

सत्य सिर्फ भौतिक ही नहीं प्राणिक, ऐंद्रिक मानसिक और बौद्धिक है। इन सबसे परे यह अपनी अपूर्व निर्मल आध्यात्मिक अवस्था में भी है। हमें भौतिक सत्य से आध्यात्मिक सत्य की दिशा में यात्रा करनी चाहिए। इसी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए सत्यद्रष्टा स्वामी विवेकानंद कहते थे, हम असत्य से सत्य की ओर नहीं उठते वरन् निम्नतर सत्य से उच्चतर सत्य में आरोहण करते हैं। शरीर निम्नतर सत्य है, आत्मा उच्चतर सत्य है। संसार निम्नतर सत्य है। भगवान उच्चतर सत्य है। हम शरीर से आत्मा की ओर मुड़ें। संसार से भगवान की ओर उठें-उन्मुख हों, यह तभी संभव होगा, जब हमारे अंदर विवेक होगा। इस विवेक का प्रकाश जितना अधिक तीव्र और प्रभावी होगा, हमारी मूल्याँकन क्षमता उतनी ही सम्यपरक होगी। हमारे विकास की संभावनाएँ उतनी ही अधिक होगी।”

यह सत् और असत् का विवेकसम्मत आध्यात्मिक साधनाओं का मूलतत्व है। इसे जीवन -विद्या भी कह सकते हैं और जीवन जीने की कला भी। यह हमारे हाथों में टार्च की तरह है, जिसके सहारे हम असत् के अंधेरे को पारकर स्वप्रकाशित परम सत्य तक पहुंचते हैं। यद्यपि यह यात्रा किंचित दुष्कर अवश्य है, पर असंभव चैतन्य एवं आनंद से परिपूर्ण है, क्योंकि असत् ही अज्ञान है और इस अज्ञान में ही अभाव है। इस अभाव में ही सारे दुःख दैन्य अपने आप ही हट-मिट जाते हैं।

इसे हम यों भी कह सकते हैं कि जैसे ही हम अपने अज्ञान को हटाते हैं, जीवन में अंतर्निहित सत्य स्वयमेव ही प्रकट हो जाता है। हमें इसी आँतरिक सत्य को पहचानना- सीखना होगा। मनुष्य की क्षमताएँ अनंत है। सत्य के प्रति समर्पित होकर मनुष्य अपनी इन दिव्य शक्तियों की थाह स्वयं ही पा सकता है। सत्य निश्चित रूप से अनमोल विभूति है। यह ऐसी पुण्यधर्म की खेती है, जहाँ प्रारंभिक कठिनाई अवश्य है, पर इसकी परिणति जीवन में लौकिक एवं अलौकिक सिद्धियों के रूप में प्रतिफलित होती है। जो इस पथ पर चले है, उन सबका यही सम्मिलित निष्कर्ष है कि सत्य मानव-जीवन को श्रेष्ठता और समर्थता के शिखर तक ले जाने वाला सर्वाधिक निरापद एवं प्रशस्त राजमार्ग है।


Quotation

एक दरिद्र मनुष्य एक सुँदर राजकन्या पर मुग्ध हो गया और उसे पाने के लिए पुरुषार्थ करने लगा। असंभव लक्ष्य, पर संकल्प दृढ़। अंत में सोचा, साधु होकर, तपस्या करूंगा व जो आत्मबल अर्जित करूंगा, उससे राजकन्या प्राप्त हो जाएगी। इस प्रकार संसार त्याग कर वह उग्र तपस्या करने लगा। सारे राज्य में उसकी ख्याति बढ़ी। धनी-दरिद्र सभी उसके दर्शनों के लिए आने लगे। एक दिन वह स्वयं राजकन्या तपस्वी के दर्शनार्थ आई। उसे अपने सामने देखकर तपस्वी के अंतर्चक्षु खुल गए। उसने सोचा,जिस प्रभु के प्रति श्रद्धावश यह मेरे दर्शनार्थ आई है, उसे मैं छोड़ दूँ, तो मेरी क्या गति होगी? तपस्वी के अंतर्चक्षु खुले, उसने वास्तविकता को जाना और अपनी सामर्थ्य को शाश्वत सौंदर्य परमात्मशक्ति को पाने हेतु नियोजित कर दिया ।


दमन दान और दया

देवों और असुरों की आपस की आपस में कभी नहीं पटती थी। हर रोज वे एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए कुछ न कुछ उपद्रव करते रहते थे। उनकी प्रतिदिन की इस कलह से सृष्टि की व्यवस्था असंतुलित हो उठी। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भी अपनी उस संतानों से परेशान हो गए। इसी बीच एक विलक्षण घटना हुई, सृष्टि में मनुष्य का आविर्भाव हुआ। मानव में उज्ज्वल भविष्य की अपार संभावनाएँ देखकर देव ओर असुर दोनों ही घबराए। उन्होंने कुछ दिन शाँति से रहने का निश्चय किया। फिर तो सृष्टिकर्ता की तीनों संतानों में परस्पर सौहार्द्र स्थापित हो गया। ये सभी आनंदपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगे।

एक दिन तीनों परिवारों के कुल वृद्धों ने यह विचार किया कि इस पारस्परिक सौहार्द्र को स्थायी रूप मिलना चाहिए। अतः हम सबको प्रजापति ब्रह्मा के पास जाकर शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। यह विचार सभी को बेहद पसंद आया। वे सभी सृष्टिकर्ता के पास पहुंचे। प्रजापति भगवान ब्रह्मा ने आश्चर्यमिश्रित विस्मय के साथ पूछा, “ हे भद्रजनों! आप लोगों का यहाँ आने का क्या प्रयोजन है? कृपया मुझे सब कुछ साफ-साफ बताने का कष्ट करें।”

देवों असुरों और मनुष्यों ने विनम्र भाव से हाथ जोड़कर अपने मंतव्य प्रकट किए। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने उनके प्रति प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा, “ आप लोगों के मन में यह शुभ संकल्प उत्पन्न हुआ, यह बड़ी प्रसन्नता की बात है, परन्तु मुझसे शिक्षा ग्रहण करने से पूर्व आप लोग एक वर्ष तक संयम से इंद्रियों को वर्ष में करके तप- साधना करें। एक वर्ष की अवधि पूर्ण होने पर मैं तुम सबको अमृत तत्व की शिक्षा दूँगा।”

उन सभी ने विनम्रभाव से प्रणाम करते हुए प्रजापति से कहा, “ हे भगवान! आपकी आज्ञा हमें शिरोधार्य है। आपकी कृपा से हमें सच्ची शाँति मिल सकेगी” इतना कहकर वे सभी साधना में लीन हो गये। तप-साधना के प्रभाव से देवों, असुरों और मनुष्यों की स्वभावानुसार भोगेच्छा, हिंसा और साँसारिक आसक्ति की भावनाएँ समाप्त होने लगी। विरक्तभाव से वे सभी अध्यात्म-चिंतन में लग गए।

एक वर्ष व्यतीत होने पर सृष्टिकर्ता ने देखा कि अब वे सभी अपनी पुरानी प्रवृत्ति भूलकर सन्मार्गपथ के अनुगामी बन गए है। अतः उन्होंने उन पर दया करने की भावना से शिक्षा देने का निश्चय किया। देव, असुर ओर मनुष्य भी समूचा साल बीत जाने पर इस प्रतीक्षा में थे कि प्रजापति से निवेदन करें कि वे उन्हें शिक्षा दें। यही चिंतन करते हुए वे उनके पास पहुंचे और निवेदन किया, हे भगवान! आपसे शिक्षा ग्रहण करने का उपयुक्त समय अब आ पहुंचा है। कृपया हमें उपदेश दीजिए।

प्रजापति ब्रह्मा कुछ देर गंभीर मुद्रा में मौन रहकर उन सबकी ओर निहारते रहे, एक क्षण बाद केवल एक अक्षर ‘द’ बोलकर चुप हो गए। घंटे की अनुरणन ध्वनि की तरह वह देव-असुरों और मनुष्यों के मन-मस्तिष्क में गूँजता रहा और वे सभी सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के चरणों में बैठकर एकाग्रचित्त से ‘द’ का अर्थ लगाने लगे।

सबसे पहले देवों की बारी आई। उन्होंने ब्रह्मदेव से कहा, “ भगवन् हम ‘द’ का अर्थ समझ गए है। आपने हमें ‘दाम्पत्य‘ अर्थात् इंद्रियों का दमन करो, यह उपदेश दिया है। दरअसल हम अजर-अमर होकर इंद्रियों के पाश में बंधे हैं। इंद्रिय-सुख को ही हमने सब कुछ मान लिया है। अतः आपका इंद्रिय-


चिरपुरातन, फिर भी चिरनवीन वास्तुशास्त्र

भारतीय संस्कृति का पुरातन अतीत आध्यात्मिक ज्ञान की आभा से प्रदीप्त रहा है। जिसकी प्रकाश रश्मियाँ सारे विश्व में उजियारा किया करती थीं। यहाँ के महर्षिगणों का पुरुषार्थ केवल आत्मोत्कर्ष तक सीमित न था, बल्कि वे मानवीय जीवन को भौतिक रूप से भी सुँदर व समुन्नत बनाने के लिए प्रयासरत थे। इसी के अंतर्गत उन्होंने नानाप्रकार की विद्याओं व कलाओं का सृजन किया था। इनमें से वास्तुकला अर्थात् भवननिर्माण के ज्ञान विज्ञान की खोज उनकी उल्लेखनीय उपलब्धि थी।

वैदिक काल में वास्तुशास्त्र को उपवेद के रूप में मान्यता मिली थी। इसे स्थापत्य वेद भी कहा जाता था। वास्तुकला का सर्वप्रथम उल्लेख विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में मिलता है। इसमें वास्तु -स्थापत्य का उल्लेख कई जगह पर हुआ है। ऋग्वेद में कई जगह ( ) वास्तोस्पति नामक देवता का उल्लेख है। जिसका गृह निर्माण से पूर्व आह्वान किया जाता था। मत्स्यपुराण एवं वृहतसंहिता में वास्तु के 26 आचार्यों का उल्लेख है। जिनमें प्रायः सभी वेदकालीन महर्षि है। इनके नाम भृगु, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नग्नजित, विपालाक्ष, पुरंदर ब्रह्म कुमार, नदीश, शौनक, गर्ग, वासुदेव, अनिरुद्व, शुक्र, बृहस्पति, मनु, पराशर, कश्यप, भारद्वाज, प्रहाद, अगस्त्य और मार्कण्डेय है।

इनमें विश्वकर्मा और मय सर्वाधिक प्रचलित आचार्य है। विश्वकर्मा को देवताओं का वास्तुविद् और मय को असुरों का वास्तुविद् माना गया है। वैदिक काल में जन्में वास्तुशास्त्र का रूप वेदाँत के समय स्थिर हुआ। पुराणों और आगमों में इसका विकास हुआ। बाद में वास्तुविद्या के आचार्यों ने इसे अलग शास्त्र का रूप दिया। महाभारत काल में इसके पूरी तरह से विकसित होने के प्रमाण है। वैदिक काल में इसे पूरी तरह से विकसित होने के प्रमाण हैं। वैदिक काल में रचित इस शास्त्र की दिशा व दशा 13 वीं शताब्दी तक अच्छी रही । इसके बाद इसमें भटकाव का दौर आया और यह विद्या लुप्तप्राय सी हो गई।

पिछले दो तीन दशकों से यह उपेक्षित कला पुनः प्रकाश में आ रही है। आज इसकी उपयोगिता एवं वैज्ञानिकता पर नए सिरे से व्यापक शोधकार्य चल रहा है। इसी के परिणामस्वरूप आज पूरे विश्व में स्थापत्य वेद के महत्व को नई दृष्टि से देखा व समझा जा रहा है। 20 जनवरी 1114 ई.में लास एंजेल्स (संयुक्त राज्य अमेरिका) के कारीगरों ने अथर्ववेद के स्थापत्यशास्त्र पर आधारित विश्व का प्रथम भवन-निर्माण करने का दावा किया। इस भवन के इंजीनियर श्री मोरिस थिंलडर हैं और इसके स्वामी श्री किरीट कुमार पटेल है। अग्नि पुराण, मयतत, भुवन प्रदीप, विश्वकर्मा प्रकाश, नारदशास्त्र आदि ग्रंथों पर यहाँ व्यापक शोधकार्य चल रहा है। डेढ़ सौ वर्ष पूर्व टाबलर हेमल्टिन ने भारतीय वास्तुविद्या पर सात सौ पृष्ठों का एक ग्रंथ लिखा था, ‘आर्किटेक्टर थ्रू एज’ जो बाद में 1163 में प्रकाशित हुआ। इस ग्रंथ को आज भी पश्चिम के वास्तुविद् शास्त्र की तरह पढ़ते हैं।

भारत के अतिरिक्त अन्य एशियाई व अफ्रीकी देशों में वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों को प्राचीनकाल से ही मान्यता मिलती आई है। लैटिन में वास्तुशास्त्र को ‘जिमोमेंशिया’ कहा जाता है। अरब में इसे ‘रेत का शास्त्र कहा जाता है। तिब्बत में वास्तुशास्त्र को बागुवातंत्र कहा गया है। अफ्रीका के वास्तुशास्त्र में वायु,अग्नि,पृथ्वी व जल का विचार ब्रह्मांड के चार मूल रूपों में किया गया है। चीन, हाँगकाँग और दक्षिण पूर्व एशिया में वास्तुशास्त्र को फेंगसुई कहते हैं। वहाँ की 10 प्रतिशत जनता फेंगसुई के आधार पर ही अपने भवन, दुकान व होटलों का निर्माण करती है। चीनी भाषा में ब्रह्मांड की शक्ति ‘द्वि’ है और व्यक्ति की आत्मिक शक्ति का नाम ‘ची’ है। इन दोनों को जोड़ने वाले सुम का नाम ‘ताओ’ है। इन दोनों शक्तियों का परस्पर संतुलन ही जीवन का प्राणतत्व है। द्वि ही भूमि वन कक्ष आदि की शक्ति -स्रोत मानी जाती है। चीनी वास्तुशास्त्र ‘फेंगसुई’ में दोनों शक्तियों ‘याँग’ और ‘यिन’ का भी उल्लेख है। याँग ब्रह्मांड में व्याप्त धनात्मक शक्ति है, ‘जिसका संबंध स्वर्ण पौरुष (घनत्व) और ऊष्मा से है। ‘यिन’ ब्रह्मांड की ऋणात्मक शक्ति है। इसका संबंध नारीत्व, पृथ्वी, शीतलता व तमस से है। चीनी विचारकों के अनुसार यिन-याँग का संतुलन ही पारिवारिक जीवन की सुख -समृद्धि का आधार है।

भारत में वास्तुशास्त्र पंचमहाभूतों (अग्नि, जल, आकाश,पृथ्वी और वायु) तथा आठ दिशाओं पर आधारित है। इन पंचमहाभूतों से उचित तालमेल बिठाते हुए भवन के माध्यम से कैसे इनसे अधिकाधिक लाभान्वित हुआ जाए यही वास्तुविद्या का प्रमुख विषय है। भवन निर्माण का आधार भूमि है। अतः भवननिर्माण के लिए उत्तम भूखण्ड के चयन पर विशेष ध्यान दिया जाता है। निवासस्थल का भूखंड तक अपनी स्थिति के अनुरूप वास्तु के प्रभावों को ग्रहण करते हैं। अफ्रीका का ही उदाहरण लें। इसका भूखंड त्रिकोणात्मक है। पूर्वोत्तर भाग खंडित है। और उत्तर दक्षिण भी कटा हुआ है। मध्य -पश्चिम में असंतुलित फैलाव है। दक्षिण व पश्चिम दिशा में महासागर है,जो दूर-दूर तक फैले हैं। पूर्व और उत्तर में पर्वत है,कही मैदान भी है, तो वहाँ की भूमि ऊबड़ खाबड़ है। वास्तु के अनुसार इन दोषों का परिणाम कलह क्लेश होना चाहिए। वस्तुस्थिति भी यही है अफ्रीका में जब तब युद्ध हिंसा अकाल, महामारी, जैसी आपदाएँ आती है। जहाँ भूखंड के आकार -प्रकार शुभ है, तो वहाँ इसके शुभ परिणाम भी है।

वास्तुशास्त्र के अनुसार भूखंड के चुनाव पर विशेष ध्यान देना चाहिए। वास्तु सिद्धांतों में भवन के चारों ओर तथा भवन के मध्य खुला आकाश रहना आवश्यक कहा गया है। इसके अनुसार भवन में जल संसाधनों के स्थानों पर भी ध्यान दिया गया है। इस क्रम में अग्नि के सभी उपकरणों की स्थापना आग्नेय कोण में निर्देशित है। वायु के उचित आगमन के लिए खिड़कियों व रोशनदानों का भी बाहुल्य होना चाहिए। इन तत्वों की परस्पर क्रिया प्रतिक्रिया के अनुरूप इनमें संतुलन बिठाया जाता है। यदि विपरीत तत्वों में संतुलन न बिठाया गया, तो अशुभ परिणाम आते हैं।

पंचतत्वों के प्रभाव को अनुकूल करने के साथ दिशाओं के निर्धारण में उत्तरी ध्रुव से आने वाले चुँबकीय प्रवाह और पूर्व से आने वाली सूर्य रश्मियों को घर के भीतर समेटने और उससे लाभ उठाने की कला का विचार भी इस शास्त्र में निहित है। भवननिर्माण इस तरह किया जाता है कि चुँबकीय शक्ति उत्तरी ध्रुव की ओर प्रवाहित होती है। इसी सिद्धांत के अनुसार वास्तुशास्त्र के अनुरूप भवननिर्माण में समस्त वजनी वस्तुएँ पश्चिम में रखने का विधान है।

भवन निर्माण में दिक् सामुख्य कि अंतर्गत पूर्व दिशा सर्वाधिक महत्व की है। जिसका सूर्योदय से सीधा संबंध है। प्रातः कालीन सूर्य रश्मियों में अल्ट्रावायलेट किरणों का बाहुल्य रहता है। मध्याह्न में रेडियोधर्मितापूर्ण किरणों का सूर्यास्त के समय इन्फ्रारेड किरणों की प्रधानता रहती है। प्रातः कालीन किरणें लाभदायक होती है। मध्याह्न व सूर्यास्त कालीन किरणें क्रमशः हानिकारक जिनसे बचाव के लिए पूर्व उत्तरी हिस्सा नीचा बनाने का विधान है। पूर्व उत्तर में अधिक खिड़की-दरवाजे अभीष्ट है व दक्षिण पश्चिम में कम। आग्नेयकोण में रसोई घर बनाने का विधान है,क्योंकि इस दिशा में सूर्य रश्मियों और शुद्ध वायु का बाहुल्य रहता है।

वास्तुशास्त्र में चुँबकीय उत्तर क्षेत्र को कुबेर का स्थान माना गया है। यह भी सलाह दी जाती है कि जब कोई व्यापारिक वार्ता या परामर्श में भाग ले तो उत्तर की ओर मुख करना सर्वाधिक लाभप्रद होगा। इसका कारण यही है कि इस ओर चुँबकीय तरंगें विद्यमान रहती है, जो मस्तिष्क को अधिक सक्रिय करती है और शुद्ध वायु की उपलब्धि के कारण ऑक्सीजन की अतिरिक्त मात्रा मस्तिष्क को सक्रिय कर स्मरणशक्ति बढ़ाती है, जो सब मिलकर व्यक्ति की व्यापारिक व अन्य तरह की प्रगति को अधिक सुनिश्चित करती है।

वास्तुशास्त्र की वैज्ञानिक से कही अधिक महत्वपूर्ण इसमें निहित धार्मिक एवं आध्यात्मिक तत्व है। यही भारतीय संस्कृति का जीवन प्राण भी है। यतोडभ्युदयनिः श्रेयससिद्वि स धर्म अर्थात् जिससे मानव की साँसारिक उन्नति और आध्यात्मिक प्रगति सिद्ध हो, वही धर्म है। यही कारण है कि वास्तुविद्या में भूमिपूजन से लेकर गृहप्रवेश तक सभी क्रियाओं में धार्मिक भावनाएँ जुड़ी है। आखिर वैज्ञानिकता एवं आध्यात्मिकता के मेल मिलाप से ही तो संपूर्ण सुख शाँति और समृद्धि संभव है।

तिरूपति में भगवान वेंकटेश का मंदिर ऐश्वर्य की दृष्टि से संसार का सबसे बड़ा धर्मस्थल हैं । इसके अन्य जो भी कारण हों वास्तुविदों के अनुसार प्रमुख कारण उसका निर्माण वास्तु सिद्धांतों के अनुसार हुआ है। तीन ओर पहाड़ियों से घिरा यह मंदिर पूर्वमुखी है। मंदिर के अधिष्ठाता देव बालाजी की मूर्ति पश्चिम में प्रतिष्ठित है। वह भी पूर्वोन्मुखी है। उत्तर में आकाशगंगा तालाब है। अर्थात् मंदिर का निर्माण शत प्रतिशत वास्तु नियमों के अनुसार किया गया है।


करुणा और विवेक से जनकल्याण

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यह प्रतिपादन निराधार है कि बुद्ध ने यज्ञ तथा आस्तिकता की विचारधारा का विरोध किया। प्रसिद्ध विद्वान रामधारी सिंह दिनकर ने ‘भारतीय संस्कृति के चार अध्याय’ में बौद्ध धर्म का स्थान नियत करते हुए लिखा है, “वे वैदिक धर्म से दूर नहीं गए, न ही उन्होंने वैदिक धर्म की कुरीतियाँ और कमजोरियाँ थीं। यह मानना ज्यादा युक्तियुक्त है कि बौद्ध धर्म हिंदुत्व का ही परिमार्जित रूप था, जो उसने अपनी बुराइयों से लड़ने के लिए धारण किया था।”

वैदिक सिद्धाँतों को जब जड़ता के साथ जोड़ दिया गया, तो बुद्ध ने विवेक का आश्रय लेने पर जोर दिया। साधना, संस्कार और शुचिता के मार्ग का आग्रह रखते हुए साधकों के लिए एक स्थिति में वेद और शास्त्र को ही प्रमाण मानना ठीक था, लेकिन आग्रह ने जब अंधानुकरण का रूप ले लिया, तो उसका विरोध आवश्यक था। यह विरोध वेद-शास्त्रों का नहीं मन-मस्तिष्क में आ बैठी जड़ता का था।

यज्ञ-यागों के निषेध में भी यही तथ्य लागू होता है। भगवान् बुद्ध ने अपने उपदेशों में यज्ञ, सुयज्ञ और अयज्ञ शब्दों का प्रचुर उपयोग किया है। उनके अनुसार, वे यज्ञ निरर्थक है, जिनमें वैभव का प्रदर्शन किया जाता है, धन का अपव्यय होता है और पशुओं की हिंसा होती है। श्रावस्ती में प्रवास करते हुए बुद्ध द्वारा यज्ञ के संबंध में दी गई देशना उल्लेखनीय है। यह देशना ‘कोसल संयुक्त’ में संकलित है। प्रसंग का अनुवाद इस प्रकार है, बुद्ध भगवान् श्रावस्ती में रहते थे। उस समय कौशल राजा का यज्ञ आरंभ हुआ। उसमें पाँच सौ बकरे और पाँच सौ बैल, पाँच सौ बछड़े, पाँच सौ बछिया, पाँच सौ बकरे और पाँच सौ मेढे बलिदान के लिए यूपों में बाँधे हुए थे। राजा के दास, दूत और कर्मचारी दंड से भयभीत होकर आँसू बहाते हुए रोते-रोते यज्ञ के सभी कार्य कर रहे थे।

वह सब देखकर भिक्षुओं ने भगवान् को बताया। तब भगवान् बुद्ध बोले, बकरे, मेढे और गायों जैसे विविध प्राणी जिन यज्ञों में मारे जाते हैं, वे फलदायक नहीं होते। उस यज्ञ के लिए सदाचारी महर्षि नहीं जाते। जिन महायज्ञों में प्राणियों की हिंसा नहीं होती, वे लोग को प्रिय लगते हैं। जिनमें बकरे, मेढे, गायें आदि प्राणी नहीं मारे जाते उनमें सदाचारी महर्षि सदैव उपस्थित रहते हैं। अतः विज्ञ पुरुष को चाहिए कि वह ऐसा यज्ञ करे, जिससे सभी प्राणियों का कल्याण होता हो। बहुत से लोग एकत्र होकर सर्द्धम के विस्तार की चर्चा करते हैं। ऐसा यज्ञ महा फलदायक होता है। यह यज्ञ वृद्धि पाता है और इससे देवता प्रसन्न होते हैं। इससे यजमान का कल्याण होता है।

यज्ञ के तत्वदर्शन का उपदेश करते हुए भगवान् बुद्ध ने विभिन्न अवसरों पर कहा कि आचार में ‘सत्’ तत्व का समन्वय ही यज्ञ है। काम द्वेष और मोह से प्रेरित होकर किया गया यज्ञ अशील एवं तामसी है। उनका परित्याग किया जाना चाहिए। ‘ अ्रगुतर निकाय’ के ‘सुतक निपात’ में उल्लेखित प्रसंग का सार इस प्रकार है, जैतवन में प्रवास करते हुए भगवान् बुद्ध के पास एक आचार्य आया। उद्गत नामक यह ब्राह्मण महायज्ञ की तैयारी कर रहा था। वह भगवान् के पास आकर बैठ गया और कुशल प्रश्न पूछने के बाद बोला, “हे गौतम ! यज्ञ के लिए अग्नि सुलगाना और यूप खड़ा करना अति फलदायक होता है।”

भगवान् बुद्ध ने कहा, “मैंने भी यह सुना है।” उद्गत ने अपना कथन दो बार और दोहराया। भगवान् ने दोनों बार अपनी वही बात कह दी। इसके बाद उद्गत ने अपने लिए जो कल्याणकर है, उसका उपदेश देने के लिए कहा। भगवान् बुद्ध ने कहा, “जो प्राणियों का वध करने वाले यज्ञ का संकल्प करता है, उसकी योजना बनाता है और उस पर आचरण करता है, वह दुःख उत्पन्न करने वाले तीन अकुशल कर्म करता है। जो इस तरह के यज्ञ के लिए अग्नि सुलगाता और यूप खड़े करता है, वह दुःख उत्पन्न करने वाले तीन शास्त्र उठाता है। वे शस्त्र कौन से है ? कायशस्त्र, वाचाशस्त्र और चितशस्त्र। जो यज्ञ का प्रारंभ करता है, उसके मन में यह अकुशल (तामसी) विचार आता है कि इतने बैल, इतने बछड़े, इतने बकरे और इतने मेढे मारे जाएँ। इस प्रकार वह सर्वप्रथम चितशस्त्र उठाता है। फिर वह अपने मुँह से इन प्राणियों की हत्या के लिए आज्ञा देता है और उससे दुःख उत्पादक अकुशल वाचाशस्त्र उठवाता है। अनंतर उन प्राणियों को मारने के लिए स्वयं ही उन प्राणियों को मारना शुरू कर देता है। इस प्रकार वह दुःख उत्पन्न करने वाला कायशस्त्र उठाता है।”

“कुशल यज्ञ वह है जिसमें अग्निहोत्र के साथ प्रतिदिन तीन अग्नियों का सत्कार किया जाए। उनका सम्मान किया जाए और उनकी पूजा अर्चा भली भाँति की जाए। ये तीन अग्नियाँ कौन सी हैं ? इन अग्नियों के नाम है, आह्वनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि। माता-पिता के लिए आह्वनीय अग्नि को संधान करना चाहिए। उसका सम्मान करना चाहिए, सत्कार से माता-पिता की पूजा करनी चाहिए। पत्नी और बच्चे, सेवक आदि के लिए गार्हपत्य अग्नि का विधान है। उनका आदरपूर्वक लालन-पालन करना चाहिए। श्रमण (संन्यासी, भिक्षु) और ब्राह्मणों को दक्षिणाग्नि समझना चाहिए। इनका भी सत्कार किया जाना चाहिए।”

दीर्घनिकाय के ही कूटदंत सुत में एक अवसर पर भगवान् बुद्ध ने सुयज्ञ का उपदेश दिया है। महाविजित नामक एक राजा एक महायज्ञ की योजना बना रहा था। उसके राज्य में भारी उपद्रव हो रहे थे, बटमारियाँ होती एवं चोरी-चकारी होती थी। महाविजित ने अपने अमात्य को बुद्ध की सम्मति जानने के लिए भेजा। भगवान् बुद्ध ने महाविजित को परामर्श दिया, “राज्य में सुख-शाँति के लिए प्रयत्न करना प्रथम आवश्यक है। राज्य में उपद्रवों के छाए रहते किए गए यज्ञ याग के फल निश्चित मिलेंगे। उसके लिए प्रजा पर न तो कर लगाना चाहिए और न ही उपहार ग्रहण करना चाहिए।”

महाविजित ने राज्य में न्याय और सुरक्षा के लिए सुनिश्चित उपाय किए। उसके बाद एक विराट् यज्ञ किया। भगवान् बुद्ध की बताई विधि के अनुसार राजा ने किसी से उपहार आदि नहीं लिए। जो लोग उपहार लेकर आए उनसे कहा कि इस धन को लोकहित में खरच करना चाहिए। धनिकों ने अपने उपहारों का उपयोग यज्ञशाला के चारों ओर धर्मशालाएँ खुलवाने, गरीबों को दान देने, रोगियों के लिए चिकित्सालय खोलने और अनाथों के लिए शरण की व्यवस्था में किया। इस आयोजन की सूचना भगवान बुद्ध को मिली तो उन्होंने “बहुत अच्छा यज्ञ-बहुत अच्छा यज्ञं” कहकर महाविजित को आशीर्वाद भिजवाया।

भगवान बुद्ध ने वर्ण या जाति का आधार कर्म माना है। संस्कार और प्रवृत्तियों के अनुसार वे किसी को ब्राह्मण या क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र आदि ठहराते हैं। ‘सुत्त निपात’ और ‘मज्झिम निकाय’ में वे दो शिष्यों को समझाते हैं, “यदि कोई ब्राह्मण गाये पालकर निर्वाह करता हो उसे ब्राह्मण नहीं ग्वाला कहना चाहिए। जो शिल्पकला से जीविका चलाए वह ‘कारीगर’ है। जो व्यापार करे वह बनिया, दूत का काम करने वाला दूत, चोरी से निर्वाह करने वाला चोर, यज्ञ-यागों से निर्वाह करने वाला याजक और राष्ट्र के आधार पर जीवनचर्या करने वाला राजा है। इनमें कोई भी जन्म के कारण ब्राह्मण, शिल्पी या राजा नहीं है।”

ब्राह्मण की परिभाषा करते हुए वे इन्हीं शिष्यों को समझाते हैं, “जो सारे संसार के बंधनों को काट डालता है, किसी भी साँसारिक दुःख से नहीं डरता, जिसे किसी भी बात की आसक्ति नहीं होती, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। औरों द्वारा दी गई गाली-गलौज, वध, बंध आदि को जो सहन करता है, क्षमा ही जिसका बल है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। कमलपत्र पर विद्यमान जलबिंदु की तरह जो इहलोक के विषय सुखों से अलिप्त रहता है, उसी को मैं ब्राह्मण कहता हूँ।” कितनी सुँदर परिभाषा है ब्राह्मण की।

‘अस्सलायन सुत्त’ में बुद्ध की एक चर्चा आती है। उसमें आश्वलायन नामक स्नातक को भगवान बुद्ध समझाते हैं, “क्या तुमको ऐसा नहीं लगता कि यदि क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र प्राणघात, चोरी, व्यभिचार, असत्य भाषण, परनारी का अपहरण और दूसरे कुकर्म करें, तो वे नर्क में जाएँगे। ब्राह्मण यदि इस तरह के कुकर्म करे, तो वह नरक नहीं जाएगा ? आश्वलायन इस युक्ति को स्वीकार करते हुए कहता है, “किसी भी वर्ण का मनुष्य इन पापों को करे, तो वह निश्चित ही नरक जाएगा। ब्राह्मण हो या अब्राह्मण सभी को अपने पापों का प्रायश्चित करना ही होगा।”

इसी उपदेश में भगवान बुद्ध आगे पूछते हैं, “हे आश्वलायन ! दो ब्राह्मण भाइयों में एक ने वेदों का अध्ययन किया। अच्छा शिक्षित है और दूसरा अशिक्षित है। उन दोनों में किस भाई को यज्ञ आदि कार्यों में आमन्त्रित किया जाएगा ?” आश्वलायन कहता है, “जो शिक्षित होगा उसे ही प्रथम आमंत्रण दिया जाएगा।”

भगवान बुद्ध पूछते हैं, “अब मान लो कि उन दोनों भाइयों में एक बहुत विद्वान किन्तु दुराचारी है दूसरा विद्वान नहीं है, लेकिन अत्यंत सुशील है। इस स्थिति में उन दोनों में किसे आमंत्रित किया जाना चाहिए ?” आश्वलायन का उत्तर था, “जो शीलवान होगा उसी को प्रथम आमंत्रण दिया जाएगा। दुराचारी मनुष्य को दिया गया दान कैसे फलदायक होगा।”

बुद्ध के इस संवाद को ‘चातुर्वर्ण्यं शुद्धि’ का प्रतिपादन बताया गया है। ‘चातुर्वर्ण्यं शुद्धि’ अर्थात् प्रथम बुद्धि महत्वपूर्ण है। कुल के बाद विद्या और शील का स्थान आता है। इनमें शील सर्वोपरि है। मनुष्य न किसी कुल वंश या वर्ण में जन्म लेने के कारण श्रेष्ठ है, न ही विद्या आदि के कारण, उसके शील-संस्कार ही उसे उच्च अर्थात् निम्न बनाते हैं।

बौद्ध-परंपरा के प्रसिद्ध विद्वान और स्थविर ............ पोछे ने सामाजिक संदर्भों के अलावा दार्शनिक संदर्भों के माध्यम से निरूपित किया है कि भगवान बुद्ध एक परंपरा की कड़ी थे। वे किसी परंपरा का आरंभ, अंत या उच्च नहीं थे। भारतीय धर्म-परंपरा में इस तरह के संशोधन आए दिन उठते हैं। उन्हें शुद्धिकरण के रूप में देख सकते हैं। अलगाव की तरह नहीं आगे चलकर भारतीय धर्म में उन्हें विष्णु के नवें अवतार के रूप में स्वीकृत किया गया। फ्रेंच विद्वान देल पूसिन ने लिखा है, “हिंदुओं के यहाँ ईश्वर की जो कल्पना त्राता या रक्षक के रूप में चल रही थी, उसने बौद्ध मत की महायान शाखा को ज्यों का त्यों अपना लिया। भारत में बुद्ध विष्णु के अवतार मान लिए गये। वे वेद-शास्त्रों में ही रमे जा रहे लोगों को मोहनिद्रा से जगाते हुए आए और हजार वर्ष से ज्यादा समय तक छाया रहने वाला प्रभाव छोड़ गए। उनका स्थापनाओं और शिक्षाओं में ऐसा कुछ नहीं था जिसे सीधा बौद्ध मत का आविष्कार कहा जा सके। विद्या और साधना के क्षेत्र में वह पहले से स्थित था। भगवान बुद्ध ने उन्हें ऊर्जा प्रदान की।”


Quotation

विद्वान वह है जिसने आत्मज्ञान पाया और अपने को उत्कृष्ट बनाया।


मानव-जीवन एक पवित्र धरोहर

चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद मानव-जीवन तभी मिलता है, जब कृपा निधान भगवान जीवात्मा के उद्धार के निमित्त अहैतुकी कृपा करते हैं। मानव-जीव की गरिमा अनुपमेय है। मानव-शरीर स्वयं में ब्रह्माण्ड का प्रतिरूप है। बाह्यजगत से लेकर अत्यंत गहरे पाताल राज्य के गूढ़तम अंधकार तथा ऊर्ध्वतम महाव्योम का चिदालोक तक मानव-शरीर में विराजित हैं। इसमें प्रकृति के सभी तत्व निगूढ़ रूप में मौजूद है। किसी तत्व का यहाँ अभाव नहीं है। ऐसी दुर्लभ संपदा का उपयोग बहुत सोच-समझकर ही किया जाना चाहिए।

मानव-जीवन हमें इसलिए नहीं मिला कि अनंतकाल तक के लिए अपनी अवनति के साधन इकट्ठा करते रहे। मनुष्य जीवन जैसे सुरदुर्लभ सौभाग्य का सदुपयोग करने की बजाय निरर्थक बातों में उलझकर रह जाएँ। मानव-जीवन अद्भुत एवं विलक्षण है। यहाँ से ऊर्ध्व में भी जाया जा सकता है और अधःपतन की ओर भी उन्मुख हुआ जा सकता है।जो अपने को सत्कर्मों की क्रियाशीलता में समर्पित कर देते हैं, वे स्वतः ही उस परम सत्ता की पूर्ण अभिव्यक्ति के आधार बन जाते हैं बंगाल के भक्तप्रवर रामप्रसाद ने इस भाव को कुछ इस तरह व्यक्त किया है-

मन रे ! तुमि कृषि काज जानन।

ए मन मानव जमिन रइल पतित

आबाद करले फलत सोना।

अर्थात् हे मन ! तुम खेती करना नहीं जानते। मानव जीवन रूपी जमीन परती रह गई। अगर सत्कर्मों की खेती की होती तो सोना फलता यानि कि भगवान मिलते।

उपनिषद्कार महर्षि कहते हैं, “उठों ! जागो !” जागने का अभिप्राय यह है कि समस्त चराचर जगत ईश्वर का अंश होने से ईश्वर का स्वरूप है। ऐसा समझकर उसकी सेवा करना और सर्वव्यापक परमात्मा को तत्व से जानकर उसकी प्रेममयी स्मृति सदैव ही बनाए रखना। ऐसे जाग्रत व्यक्ति जहाँ भी होते हैं वहां के जन-मन पर उनका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। सद्विचारों व सद्भावों के विद्युत प्रवाह का प्रभाव उनके आस-पास के लोगों पर सूक्ष्म रूप से पड़ता रहता है। फलस्वरूप वहाँ अनायास ही सौभाग्य-समृद्धि की वृष्टि होती रहती है।

मनुष्य चेतना के जिस धरातल पर खड़ा है, वहाँ दासता कम, स्वतंत्रता अधिक है। वह जिस परिस्थिति में जन्मा है वहीं समाप्त हो जाने के लिए बाध्य नहीं है। वह इतना स्वतंत्र है कि प्रत्येक क्षण नए संकल्प कर सकता है। चेतना के उच्चतर लोकों को जी सकता है। ‘चेतना’ शब्द में व्यापक-विराट अर्थ निहित है। चेतना से यह आशय है कि मनुष्य में जड़ जगत से भिन्न कुछ शक्तियाँ है। वह वस्तु और सत्य को देख-सुन सकता है। अनुभव कर सकता है, सोच-विचारकर निर्णय ले सकता है। और अनेकों प्रकार की क्रियाएँ कर सकता है। यह सब इस कारण संभव हो पाता है क्योंकि उसमें चेतना है। जड़ जगत शरीर, प्राण, इंद्रियाँ मन, बुद्धि, अहंकार यह सब एक प्रकार से चेतना की स्थूल अभिव्यक्तियाँ है। यही चेतना रूपांतरित होने पर महाचेतना, दिव्यचेतना, अतिमानसिक चेतना में उठ सकती है। श्री अरविंद के अनुसार, यदि मानव अपनी अपूर्णताओं को प्रेम करना छोड़ दे तो उसके आध्यात्मिक रूपांतरण में समय नहीं लग सकता।

विडंबना यह है कि अधिकाँश मनुष्य इंद्रियों द्वारा रची जीवन की परिभाषा के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं। इंद्रियाँ जिस सत्य को उनके मन तक लाती हैं, वहीं उनके लिए परम सत्य बन जाता है। मनुष्य उसी सत्य को जीने के लिए उन्हीं अनुभूतियों को भोगने के लिए बाध्य रहता है, जो इंद्रियाँ देती है। इंद्रियाँ साँसारिकता के अतिरिक्त और कुछ नहीं छू पाती। जिस दिन ये साँसारिक वासनाओं से स्वयं को ऊपर उठा लेती है। उसी दिन भागवत चैतन्य को प्राप्त कर लेती हैं। तब मनुष्य किसी का दास नहीं बनता सब उसके दास बन जो हैं। जहाँ जीवन का सारा अंधकार समाप्त हो जाता है, जहाँ दुःख, आनंद बन जाता है, जहाँ दुर्बलताएं नष्ट हो जाती है, वहीं से मनुष्य जीवन का स्वर्णिम रूपांतरण प्रारंभ हो जाता है।

मानव-जीवन की गरिमा इसी में है कि मनुष्य अपने जीवन को दिव्यभूमिका में स्थापित कर तद्नुरूप आचरण करे। इसके लिए श्रीमद्भागवत् गीता में भगवान कृष्ण ने योग की विधि सुझाई है। यह योग शब्द ‘युज्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है जोड़ना। अतः स्पष्ट है कि हम कहीं से बिछुड़ गए हैं अथवा टूट गए हैं और इसे मिलाने अथवा जोड़ने की आवश्यकता है। इस जोड़ने की प्रक्रिया को तन, मन व बुद्धि के स्तर पर क्रमशः कर्मयोग, भक्तियोग एवं ज्ञानयोग कहा जाता है। योग के ठीक विपरीत है ‘भोग’ जहाँ मनुष्य अपनी निरंकुश माँग की पूर्ति में अहर्निश डूबा रहता है। आश्चर्य यह है कि इस भोग कला में मनुष्य दक्ष हो जाता है पर योग के शाश्वत तत्व से अनभिज्ञ बना रहता है।

सामान्यतः मनुष्य तीन प्रकार के कम करता है। पहला वह जो अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए करता है। दूसरा निस्वार्थ वृत्ति से एवं तीसरा जो बिना किसी प्रयोजन के किया जाता है। पहले श्रेणी के कार्य कर्मयोग नहीं कहे जा सकते। कर्मयोग तो सभी संभव है, जब कामना तो हो, पर निजी स्वार्थ की न हो। इसी तरह निष्प्रयोजन कर्म भी मूढ़ता का परिचायक है। स्वार्थ के दायरे से ऊपर उठकर महत् प्रयोजन के लिए कर्म करने वाले की चेतना भी महत् चेतना से तदाकार हो जाती है।

भावभरे भक्तिमय जीवन से भी यही उपलब्धि पाई जा सकती है। जन्म से मनुष्य को जीवन की अनिवार्य सुविधाएँ बिना माँगे मिलती हैं। अपने अजस्र अनुदानों से प्रतिपल सराबोर करते रहने वाले स्रष्टा के प्रति शरणागति एवं भक्तिवृत्ति को जब मनुष्य अपने हृदय में धारण कर लेता है, तब भक्तियोग का उदय होता है। इसकी चरम परिणति परम तत्व से भावमय ऐक्य के रूप में होती है।

प्रभु से जुड़ने का तीसरा तरीका ज्ञान योग का है। यह ज्ञान मात्र विद्वता से नहीं मिलता। गहन आत्मचिंतन से जब मनुष्य इस लक्ष्य को समझ लेता है कि प्रत्येक आत्मा निश्चय ही वहीं है, जो विश्व की आत्मा है। सभी आध्यात्मिक नाते से परस्पर आबद्ध है। प्रत्येक की दिव्यसत्ता हमारे भीतर ही संस्थित है तथा हम अपने भीतर दिव्य स्वरूप की अनुभूति कर सकते हैं, जो विश्वात्मा का शाश्वत अंश है, तब ज्ञानयोग की सार्थकता सिद्ध होती है।

प्रत्येक श्वास के साथ हम सब अपने जीवन की समाप्ति की ओर अग्रसर हैं। जब इसके पूर्ण हो जाने का समय आता है, तब मूल्यवान संपत्ति या रत्नराशि देकर भी एक श्वास भी नहीं पाया जा सकता। बीता हुआ क्षण कभी वापस नहीं आता। इतने पर भी न जाने क्यों माया रूपी मदिरा का पान कर हम ऐसे सम्मोहन जाल में उलझे हैं कि उसका नशा उतरता ही नहीं। जीवन का संपूर्ण अमय व श्रम इसी वृथा नियोजन में चला जाता है। मानव-जीवन के रूप में जो अमूल्य संपदा हमें प्रभु की ओर से मिली थी। वह क्षय होती चली जाती है। सच तो यही है कि मानव जीवन एक पवित्र धरोहर है, जिसे विनष्ट किया जाना चाहिए और न ही इसका दुरुपयोग होना चाहिए। इसकी सार्थकता तो योग के कर्म, ज्ञान व भक्तिपथ पर आरुढ़ होकर मानवीय चेतना को परमचेतना से तदाकार करने में है। मानव जीवन की गरिमा भी इसी में निहित है।


पवित्र कार्य का माना गया (kahani)

एक व्यक्ति बहुत-बहुत दिनों तक बाहर रहता और लौटता। कई बार तो पड़ोसियों को भी पता नहीं लगता कि वह कब चला गया। उसके पड़ोसी ने एक बार पूछा, “आजकल आप क्या कर रहे हैं ? यहाँ बहुत कम दिखाई देते हैं।” उसने उत्तर दिया, “भाई अब शरीर की तीसरी अवस्था चल रही है। भगवान की सेवा और पूजा-परमार्थ भी करना चाहिए, वही कर रहा हूँ।”

पड़ोसी को संदेह हुआ कि कहीं वह अनुचित काम तो नहीं कर रहा है। वह तो घर में रहकर भी की जा सकती है। उसने छिपकर तलाश किया, तो पता चला कि वह गाँव-गाँव जाकर व्यायामशालाएँ खुलवाता है। लौटने पर पूछा, “आप तो कहते हैं कि पूजा-पाठ करते हैं, जबकि तथ्य यह है कि आज लोगों को व्यायाम की शिक्षा देते हैं।” जब यह चर्चा चल रही थी, उधर से समर्थ गुरु रामदास गुजर रहे थे। उन्होंने कहा, “भाइयों ! जो अपनी सामर्थ्य को सत्प्रयोजनों में लगा देता है, राष्ट्र को समर्थ-सशक्त बनाने की पीड़ा अंतः में लिए परमार्थरत रहता है, वह भगवान का सबसे बड़ा भक्त है। नाम जपने से भी बड़ा पुण्य इस पवित्र कार्य का माना गया है।”


सक्षम-सबल है, आज की नारी

नई सहस्राब्दी में नारी की एक सर्वथा नई छवि उभर रही है। पिछली सदियों में जो बेड़ियाँ उसे जकड़े थी, उन्हें तोड़कर आज वह अपनी नई पहचान बनाने में जुटी है। विगत कल तक जो क्षेत्र केवल पुरुषों के ही क्षेत्र माने व समझे जाते थे, वहाँ पर भी नारी-चेतना ज्वलंत रूप से प्रदीप्त हो उठी है। शिक्षा, खेल, शासन, प्रशासन, कला, विज्ञान, अनुसंधान के क्षेत्र हो अथवा समाज, संस्कृति या राजनीति के हर किसी क्षेत्र में वह प्रवेश पा चुकी है। कुछ विशिष्ट विभागों में तो सबसे आगे निकल चुकी है।

घर की घुटनभरी चारदीवारी अब प्रायः टूट चुकी है। कल की साधारण-सी गृहिणी आज कुशल प्रबंधक बनकर अपने कार्यों-दायित्वों का निर्वहन कर रही है। उसकी इस भूमिका में नवीनता है, सृजनशीलता की आभा है। हालाँकि नारी में यह प्रतिभा जन्मजात थी, परंतु पुरुष प्रधान समाज की निरंकुश मानसिकता में वह दबी-पड़ी गल रही थी। जैसे ही यह प्रतिरोध कुछ कम हुआ कि नारी-प्रतिभा पुष्पित पल्लवित होने लगी।

शिक्षा ने नारी-जीवन में काफी कुछ गुणात्मक परिवर्तन किया है। आज स्थिति यह है कि शिक्षा ग्रहण करने के मामले में वह अपेक्षाकृत अधिक ग्रहणशील नजर आती है। शिक्षा व विद्या का प्रभाव महिलाओं में स्पष्ट देखा जा सकता है। इसी वजह से उसका वर्चस्व बना एवं आगे बढ़ने की राह ढूंढ़ पाई। समझदारी, साहस एवं सक्रियता जैसे अनुदान इसी का परिणाम है। आज की नारी परंपरागत मूल्यों का निर्वाह करते हुए भी अपनी विशिष्ट पहचान बना रही है। जीवन की विभूतियों के आदान-प्रदान में वह संवेदनशील एवं जागरुक है। वर्तमान समय में नारी-जीवन में आत्मनिर्भरता का आना एक क्राँतिकारी परिवर्तन है।

आज तो नारी की स्थिति घर एवं बाहर दोनों ही स्थानों पर सुदृढ़ हुई है। वह घर की व्यवस्था से लेकर अन्य अनेक उच्चस्तरीय एवं तकनीकी क्षेत्रों में दक्षता प्राप्त कर चुकी हैं। आज के नये दौर में महिलाएँ नित नए कदम बढ़ा रही हैं, क्योंकि इस नए समय में विचारों के साथ भावना का समन्वय ही सफलता को सुनिश्चित करता है। महिलाओं में यह समन्वय एवं सामंजस्य पुरुषों की अपेक्षा काफी अधिक मात्रा में होता है। इसीलिए कंप्यूटर तथा शोध-अनुसंधान जैसे क्षेत्र में भी वह प्रवीण हो गई है। प्रबंधन में तो वह दक्ष है ही। इस तरह नए युग की नारी एक नवीन भूमिका में प्रस्तुत हो रही है। वर्तमान जीवन को जीते हुए वह भविष्य के प्रति जागरुक नजर आने लगी है।

इस तथ्य को हाल में ही हुए एक सर्वेक्षण से प्रमाणित किया गया है। ‘एरिक्सन’ नाम की एक संस्था ने भारत के चार महानगरों में व्यापक सर्वेक्षण किया है। यह संस्था समय-समय पर नगरों एवं महानगरों में मध्यमवर्गीय भारतीय महिलाओं पर पड़ने वाले सांस्कृतिक बदलाव के प्रभाव का अध्ययन अनुसंधान करती है। इस संस्था द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट से पता चलता है कि आधुनिक नारी नए परिवेश के लिए तैयार हो रही है। वह अब और ज्यादा सक्रिय और सजग दिखाई देने लगी है।

भीड़-भाड़ महानगरों की बसों में बस कन्डक्टर बनकर तथा ट्रेन के ड्राइवर के रूप में उसने अपने साहस का परिचय दिया है। मुँबई महानगरी की ‘बेस्ट’ बसों में महिलाएँ कन्डक्टर नियुक्ति हुई है। प्रथम महिला पायलट दूबी बनर्जी ने उड़ान भरकर सबको चमत्कृत कर दिया है। जिसका अनुकरण एवं अनुसरण कर सौदामिनी देशमुख जैसी अन्य अनेकों महिलाएँ भी इस दिशा में अग्रसर हुई। आजकल तो महिलाएँ वायुसेना में भी पायलट होने लगी है। यह अप्रतिम शौर्य एवं पराक्रम का कार्य है, जहाँ नारी ने अपनी उपस्थिति की झलक दी है।

निश्चित ही निष्ठा और श्रम से कुछ भी असंभव नहीं है। सतारा के एक किसान की लड़की सुरेखा जाधव अपनी मेहनत एवं लगन से मालगाड़ी की ड्राइवर है। एक मुस्लिम युवती मुमताज काणवाला देश की पहली डीजल इंजन का ड्राइवर बनी है। इन युवतियों ने चुनौती भरे व्यवसाय को अपनाकर एक मिसाल पेश की है, नारी अबला है, यह मिथक अब टूट चुका है। आज तो वह शौर्यपूर्ण आदर्श का मानदंड है।

अणुशोध संस्थानों के अलावा प्रक्षेपास्त्रों की टेक्नोलॉजी में भी महिलाओं ने अपना विशेष योगदान दिया है। इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल प्रोग्राम के जनक ए.पी.ज. अब्दुल कलाम के अनुसार, वर्तमान समय में आर.डी.ओ. में 500 महिला वैज्ञानिक कार्यरत हैं। बहुचर्चित अग्नि प्रक्षेपास्त्र को सफल बनाने में रोहणी देवी का भी श्रम काम आया है। अणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष श्री आर॰ चिदंबरम ने अपने एक साक्षात्कार में स्पष्ट किया है कि भाभा अणु शोध केंद्र के अलावा इसमें संबंधित संस्थानों में भी लड़कियां अधिक संख्या में प्रौद्योगिकी विषय का अध्ययन कर रही है। आकाश प्रक्षेपास्त्र के निर्माण में भी महिलाओं की भूमिका रही है। .........................................................................................................

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प्रज्ञा परिजनों के लिए सात प्रतिबंध

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द्बख्ञ्ज; फ्ह्न:ठ्ठह्यश ष्द्दह्नह् रुद्ब"क स्रद्भ फ्, द्दस्ड्ड द्धस्र ह्लस्द्यह्य द्धद्य[द्मद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ट्टफ्भ्ड्डस्नद्म द्यद्मद्दष्ट्ट ह्स्नद्मद्म द्भद्म"कऊद्ध; रुश;ड्डद्यह्यशस्र द्यड्ड?द्म द्गह्यड्ड ट्ट/शह्लट्ट स्रद्मह्य द्दद्ध फ्ह्न::ढ्ढद्म द्गह्यड्ड रुशद्धस्रद्मद्भ द्धस्र;द्म फ्;द्म द्दस्] द्वद्यद्ध द्बभ्स्रद्मद्भ फ्द्म;=द्ध द्बद्धद्भशद्मद्भ&;ह्नफ् द्धह्वद्गर्द्मं.द्म क्द्ध॥द्म;द्मह्व स्रह्य क्ड्डर्ह्फ्ह् ट्टब्द्मब् द्गज्द्मद्मब्ट्ट स्रह्य द्बभ्ह्द्धस्र स्रद्मह्य द्दद्ध फ्ह्न::ढ्ढद्म द्गह्यड्ड द्गद्म;ह्द्म ठ्ठद्ध ह्लद्म,्न ;ह्नफ्ज्द्मद्धष्ठह् स्रह्य :ढ्ढद्म द्गह्यड्ड क्शह्द्धद्भह् क्द्मद्धठ्ठ 'द्मद्धष्ठह् फ्द्म;=द्ध स्रद्ध ठ्ठद्धम्द्मद्म फ्ह्न:ह्नश स्रह्य ड्ढद्यद्ध द्बभ्ह्द्धस्र स्रह्य द्गद्म/;द्ग द्यह्य ठ्ठद्ध ह्लद्मह्द्ध द्भद्दह्यफ्द्ध्न ड्ढद्य द्यड्डठ्ठ॥र्द्मं द्गह्यड्ड ;द्द द्यख्= /;द्मह्व ठ्ठह्यह्वह्य ;द्मह्यंग; द्दस्ड्ड& द1ड्ट ठ्ठद्धम्द्मद्म फ्द्म;=द्ध द्गद्दद्मद्धशस्त्रद्म स्रद्ध ठ्ठद्ध ह्लद्म,फ्द्ध्न द2ड्ट शह्यठ्ठद्गद्मह्द्म&ठ्ठह्यशद्गद्मह्द्म फ्द्म;=द्ध स्रद्मह्य द्धशज्शद्गद्मह्द्म स्रह्य :ढ्ढद्म द्गह्यड्ड द्यष्स्रह्य द्धब्, द्यह्नब्॥द्म ष्ह्वद्मह्वह्य शद्मब्ह्य ड्ढद्य ;ह्नफ् स्रह्य द्धशज्शद्मद्धद्ग= शह्यठ्ठद्गख्द्धह् ह्द्बद्मह्यद्धह्व"क्च ;ह्नफ्ट्ठद्ध"द्म द्बड्ड0 क्द्मश्चर्द्म; छ्वद्धद्भद्मद्ग 'द्मद्गर्द्मं ड्ढद्य द्धशस्त्रद्म स्रह्य क्द्मश्चर्द्म; द्दस्ड्ड्न छ्वत्त्द्मब्ह्नक्द्मह्यड्ड द्यख्म्द्ग ,शड्ड स्रद्मद्भ.द्म द्यनद्मद्म स्रद्म द्यड्डद्भम्द्म.द्म द्बभ्द्मढ्ढह् द्भद्दह्यफ्द्म क्द्मस्द्भ द्वद्दद्धड्ड स्रह्य द्बभ्द्म.द्म] ह्द्ब ,शड्ड द्बह्न.; स्रह्य क्ड्डज्द्म द्दद्ध छ्वत्त्द्मब्ह्नक्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्धठ्ठह्र; श्चह्यह्ह्वद्म स्रद्ध स्रब्द्ग ब्फ्द्मह्वह्य ह्लस्द्यह्य श्चद्गक्रस्रद्मद्भद्ध द्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग द्वक्रद्बह्व स्रद्भह्यड्डफ्ह्य्न द3ड्ट रुस्नद्मख्ब् :ढ्ढद्म द्यह्य स्रर्द्गंस्रद्मड्डरु द्यड्डद्बह्व स्रद्भद्मह्वह्य शद्मब्ह्य&द्गड्ड= ठ्ठह्नद्दद्भशद्मह्वह्य शद्मब्ह्य द्बद्धद्भह्लह्व ड्ढद्य द्धश/द्मद्म द्गह्यड्ड ;द्मह्यफ्ठ्ठद्मह्व स्रद्भह्वह्य शद्मब्ह्य द्यश्वद्गद्मह्वह्वद्ध; द्यद्द;द्मह्यफ्द्ध ॥द्मद्भ स्रद्दह्य ह्लद्म,फ्ह्य्न

द3ड्ट ;ह्नफ्द्धह्वद्गर्द्मं.द्म द्यश्वद्गह्यब्ह्व श्चद्मद्दह्य द्धस्रह्ह्वह्य द्दद्ध द्धशज्द्मद्मब् ष्ठ;द्मह्यड्ड ह्व द्धस्र, ह्लद्म,] द्बद्भ द्वह्वस्रह्य द्यद्मस्नद्म ह्लह्नरु+ह्य फ्द्म;=द्ध ;य़ क्द्मद्गह्द्मस्द्भ द्यह्य 1 स्रह्नरु+ द्यह्य ष्रु+ह्य ह्व द्धस्र, ह्लद्मह्वह्य श्चद्मद्धद्द,्न ह्लद्दद्मँ स्रद्मह्यर्ड्ढं द्धशज्द्मह्य"द्म स्रद्मद्भ.द्म द्दद्मह्य] क्द्ध/द्मस्र ष्रु+द्म ;य़ स्रद्भह्वद्म क्द्धह्वशर्द्म; द्दद्मह्य ह्द्मह्य द्वद्यह्य स्रह्यड्डठ्ठभ् स्रद्ध द्धशज्द्मह्य"द्म रुशद्धस्रक्वद्धह् द्यह्य द्दद्ध द्धस्र;द्म ह्लद्म,्न ष्रु+ह्य ;य़द्मह्यड्ड स्रह्य ह्लद्दद्मँ ष्रु+ह्य ब्द्म॥द्म द्दस्ड्ड] शद्दद्मँ द्वह्वद्गह्यड्ड ष्रु+द्ध फ्रु+ष्द्धरु+;द्मँ ॥द्मद्ध ठ्ठह्य[द्मद्ध फ्ड्ढ द्दस्ड्ड्न ड्ढद्यद्धब्, ;द्द स्नद्मद्मह्यरु+ह्य स्रह्नड्डरु+द्मह्यड्ड स्रद्म द्ग/;शह्द्ध द्गद्मफ् क्द्बह्वद्मह्वद्म द्दद्ध ठ्ठख्द्भठ्ठद्धज्द्मह्द्म द्बख्.र्द्मं द्दस्ड्ड्न

;य़द्म;द्मह्यह्लह्वद्मह्यड्ड स्रह्य द्बद्धहृह्य द्बख्ञ्ज; फ्ह्न:ठ्ठह्यश स्रह्य स्रह्नहृ द्यह्नद्धह्वद्धज्श्चह् द्वठ्ठ−ठ्ठह्यज्; द्भद्दह्य द्दस्ड्ड] ह्लस्द्यह्य & द1ड्ट ;य़द्ध; य़द्मह्व ,शड्ड द्धशय़द्मह्व स्रद्मह्य ब्ह्नढ्ढह् द्दद्मह्यह्वह्य द्यह्य ष्श्चद्मस्रद्भ ह्लह्वद्मह्यद्ब;द्मह्यफ्द्ध ष्ह्वद्मह्वद्म द2ड्ट ;य़द्म;द्मह्यह्लह्वद्मह्यड्ड स्रह्य द्गद्म/;द्ग द्यह्य ह्लद्धशह्व स्रह्य ;य़द्ध; क्ह्वह्नज्द्मद्मद्यह्वद्मह्यड्ड स्रद्म ह्लह्वद्यद्मद्गद्म; स्रद्मह्य द्बद्धद्भश्च; ,शड्ड द्बभ्द्धज्द्मम्द्म.द्म ठ्ठह्यह्वद्म्न द3ड्ट ;य़द्मह्यड्ड स्रह्य द्यद्मस्नद्म ह्लह्वद्यश्वद्गह्यब्ह्व स्रद्भस्रह्य य़द्मह्व;य़ स्रह्य द्गद्म/;द्ग द्यह्य द्धशश्चद्मद्भ&यद्मड्डद्धह् स्रद्म द्धशरुह्द्मद्भ स्रद्भह्वद्म्न

रुद्मद्मद्गख्द्धद्दस्र ;य़द्म;द्मह्यह्लह्वद्मह्यड्ड स्रह्य द्वष्ठह् द्वठ्ठ−ठ्ठह्यज्;द्मह्यड्ड स्रद्ध द्बख्द्धह् ह्द्मह्य द्दद्मह्यह्द्ध द्भद्दह्द्ध द्दस््न ड्ढद्यद्धब्, द्बख्ञ्ज; फ्ह्न:ठ्ठह्यश ह्वह्य क्ड्डह्ह्त्न द्यद्गद्मह्ल स्रद्मह्य ;य़द्ध; द्बभ्ह्यद्भ.द्मद्म, ठ्ठह्यह्वह्य स्रह्य द्धब्, ठ्ठद्धद्ब;य़द्मह्यड्ड द्यद्धद्दह् द्यश्वद्गह्यब्ह्वद्मह्यड्ड स्रद्ध द्बद्धद्भद्बद्मंकद्ध श्चब्द्मह्वह्य स्रद्म द्धह्वठ्ठर्ह्यंज्द्म द्धठ्ठ;द्म्न ठ्ठद्धद्ब;य़द्मह्यड्ड त्त्द्मद्भद्म ;द्द द्वठ्ठ−ठ्ठह्यज्; स्रह्नड्डरुद्ध; ;य़द्मह्यड्ड स्रद्ध क्द्बह्यम्द्मद्म क्द्ध/द्मस्र द्बभ्॥द्मद्मशद्ध द्ब्रद4ड्ट ;य़द्मश्चद्म;द्मह्यर्ड्डं स्रद्म क्ब्फ् द्बठ्ठ ह्व द्भद्दह्य्न ;ह्नफ् द्धह्वद्गर्द्मं.द्म द्यश्वद्गह्यब्ह्वद्मह्यड्ड द्यद्धद्दह् ह्लद्मह्य ;य़ द्दद्मह्यड्डफ्ह्य द्वह्वस्रद्म द्यख्म्द्ग :ढ्ढद्म द्गह्यड्ड द्दद्ग द्यड्डद्भम्द्म.द्म स्रद्भह्यड्डफ्ह्य्न द्धक्तद्भ ड्ढद्यस्रह्य द्धब्, द्धस्रद्यद्ध ;य़द्मश्चर्द्म; ष्भ्हद्म क्द्मद्धठ्ठ स्रद्ध ह्ल:द्भह् ह्व द्भद्दह्यफ्द्ध्न द्धह्लद्दह्यड्ड द्धशद्ध/द्म&द्धश/द्मद्मह्व क्चद्धस्र ह्द्भद्द क्द्मह्ह्य द्दद्मह्यड्ड द्वह्वद्गह्यड्ड द्यह्य स्रद्मह्यर्ड्ढं ॥द्मद्ध स्रक्वक्र; स्रद्मह्य द्बभ्द्यह्वह्द्मद्बर्ख्शंस्र स्रद्भद्म द्यस्रह्द्म द्दस््न

द5ड्ट ह्लब्;द्म=द्म] द्धशद्यर्ह्लंह्व क्द्मद्धठ्ठ स्रह्य ह्लह्नब्ख्द्यद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड फ्द्म;=द्ध द्गद्मह्द्म] ब्द्मब् द्गज्द्मद्मब् स्रह्य द्बभ्ह्द्धस्रद्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्दद्ध द्यह्नद्यञ्जह्लद्म स्रह्य द्यद्मस्नद्म द्धह्वस्रद्मब्द्म ह्लद्म,्न ह्र;द्धष्ठह्;द्मह्यड्ड स्रद्म ह्लह्नब्ख्द्य ह्व द्धह्वस्रब्ह्य्न ड्ढद्य द्बभ्द्धह्ष्ड्ड/द्म द्यह्य क्ह्वद्मशज्;स्र क्द्दड्डस्रद्मद्भ ,शड्ड र्ड्ढं";र्द्मं] त्त्ह्य"द्म स्रद्मह्य द्बभ्छ्व; ह्व द्धद्गब्ह्यफ्द्म्न

द6ड्ट क्द्मज्द्मर्द्धंशद्मठ्ठ शद्भठ्ठद्मह्व ठ्ठह्यह्वह्य द्गद्मँफ्ह्वह्य स्रद्म द्धद्यब्द्धद्यब्द्म ह्र;द्धष्ठह्फ्ह् :ढ्ढद्म द्यह्य ह्व श्चब्द्म;द्म ह्लद्म,्न र्ड्ढंज्शद्भ क्द्मस्द्भ ह्र;द्धष्ठह् स्रह्य ष्द्धश्च द्गह्यड्ड स्रद्मह्यर्ड्ढं द्ग/;रुस्नद्म ह्व ष्ह्वह्यड्ड्न द्धह्लह्वद्गह्यड्ड द्यद्मद्गर्स्न; ह्वद्दद्धड्ड द्दस् शह्य ;द्धठ्ठ शद्भठ्ठद्मह्व&क्द्मज्द्मद्धशर्द्मंठ्ठ स्रद्म द्धद्यब्द्धद्यब्द्म श्चब्द्मह्ह्य द्दस्ड्ड ह्द्मह्य ;द्द ,स्र क्चफ्द्ध द्दद्ध द्दद्मह्यफ्द्ध्न द्दद्गद्मद्भह्य क्ह्वह्न;द्मद्ध;;द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्यह्य स्रद्मह्यर्ड्ढं ,ह्यद्यद्म द्धद्गस्न;द्म द्बभ्ब्द्मह्य॥द्मह्व ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य ठ्ठह्यस्रद्भ द्वद्दह्यड्ड ॥द्मभ्द्धद्गह् स्रद्भह्वह्य स्रद्म द्बभ्;क्रह्व ह्व स्रद्भह्य्न द्धह्लद्दह्यड्ड ॥द्मद्ध स्रद्दह्वद्म द्दद्मह्य शह्य द्गद्मह्द्म द्यह्य द्बभ्द्मस्नर्द्मंह्वद्म स्रद्भह्वह्य स्रद्ध ष्द्मह् ह्स्र द्दद्ध द्यद्धद्धद्गह् द्भद्दह्यड्ड्न

द7ड्ट ठ्ठद्मह्व ठ्ठद्धम्द्म.द्मद्म & ह्र;द्धष्ठह्फ्ह् :ढ्ढद्म द्यह्य स्रद्मह्यर्ड्ढं ठ्ठद्मह्व&ठ्ठद्धम्द्म.द्मद्म ह्व ब्ह्य्न द्धह्लद्दह्यड्ड क्द्मशज्;स्रह्द्म द्दस्ड्ड शह्य द्यड्ड?द्म स्रह्य द्गद्म/;द्ग द्यह्य ब्ह्यड्ड क्द्मस्द्भ द्धह्लद्दह्यड्ड ठ्ठह्यह्वद्म द्दद्मह्य शह्य ह्र;द्धष्ठह् स्रद्मह्य ह्व ठ्ठह्यस्रद्भ द्यड्ड?द्म स्रद्मह्य ठ्ठह्यड्ड्न ड्ढद्य द्बभ्स्नद्मद्म द्यह्य द्ध॥द्मम्द्मद्मशह्नद्धनद्म] द्बद्धद्भफ्भ्द्द] ठ्ठद्धह्वह्द्म] ह्ड्डफ्द्ध क्द्मद्धठ्ठ क्ह्वह्यस्र ठ्ठह्न"द्बभ्शक्वद्धनद्म;द्मँ द्बह्वद्बह्वह्य द्यह्य :स्र ह्लद्म,फ्द्ध्न

घद्मह्यफ् छ्वत्त्द्मद्बर्ख्शंस्र ह्लद्मह्य ठ्ठद्मह्व ठ्ठह्यह्यह्ह्य द्दस्ड्ड] द्वद्दह्यड्ड ब्द्मह्यस्रद्गड्डफ्ब् स्रह्य द्वठ्ठ−ठ्ठह्यज्;द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्दद्ध ब्फ्द्म;द्म ह्लद्मह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न ह्र;द्धष्ठह्फ्ह् क्द्मशज्;स्रह्द्म&द्बख्द्धह् स्रह्य द्धब्, ठ्ठद्मह्व ब्ह्यह्वह्य स्रद्ध द्बड्डद्भद्बद्भद्म ह्वह्य द्दद्ध ब्द्मह्यस्रद्यह्यशस्रद्मह्यड्ड स्रद्मह्य छ्वत्त्द्म स्रह्य द्बद्म= स्रह्य रुस्नद्मद्मह्व द्बद्भ ठ्ठ;द्म स्रद्म द्बद्म= ष्ह्वद्म;द्म द्दस् क्द्मस्द्भ द्वह्वस्रद्ध द्यद्म/द्मह्वद्म&द्यठ्ठद्मज्द्म;ह्द्म द्बद्भ द्यह्य ब्द्मह्यस्रद्यह्यद्धश;द्मह्यड्ड स्रद्ध द्बभ्द्मद्गद्मद्ध.द्मस्रह्द्म ष्ह्वद्म, द्भ[द्मस्रद्भ ॥द्मद्ध द्धह्वशर्द्मंद्द स्रद्ध ह्र;शरुस्नद्मद्म द्यद्दह्ल द्दद्ध स्रद्ध ह्लद्म द्यस्रह्द्ध द्दस््न ड्ढद्य क्स्नर्द्मंद्बभ्/द्मद्मह्व ;ह्नफ् द्गह्यड्ड क्स्नद्मर्द्मंह्वह्नज्द्मद्मद्यह्व स्रह्य ड्ढद्य द्यख्= स्रद्मह्य द्धशज्द्मह्य"द्म ह्लद्मफ्:स्रह्द्म स्रह्य द्यद्मस्नद्म क्द्बह्वद्म;द्म ह्लद्मह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न

,स्र ष्द्मद्भ द्भद्मह्लद्म ॥द्मद्मह्यह्ल स्रह्य ठ्ठद्भष्द्मद्भ द्गह्यड्ड द्यद्मह्यद्गठ्ठनद्म ह्वद्मद्गस्र ,स्र ष्भ्द्मह.द्म क्द्म;द्म क्द्मस्द्भ द्वद्यह्वह्य द्वञ्जह्लस्ह्व ह्वफ्द्भद्ध द्गह्यड्ड ॥द्मद्मफ्शह् स्रस्नद्मद्म स्रद्दह्वह्य स्रद्ध क्द्मय़द्म द्गद्मँफ्द्ध्न ॥द्मद्मह्यह्ल ह्वह्य स्रद्दद्म] ट्टट्टद्गद्दद्मद्भद्मह्ल! ञ्जद्मद्मड्ढ, स्रह्नहृ द्धठ्ठह्व ॥द्मद्मफ्शह् द्बद्मक्च स्रद्भस्रह्य क्द्मड्ढ,्नट्टट्ट द्य॥द्मद्मद्यठ्ठद्मह्यड्ड स्रद्मह्य ,ह्यद्यद्म ब्फ्द्म ॥द्मद्मह्यह्ल स्रद्ध /द्मर्द्गंष्ह्नद्धत्त् ह्द्मह्य ह्वद्दद्धड्ड द्यद्गद्मढ्ढह् द्दद्मह्य फ्ड्ढझ्र द्बद्भ शह्य स्रह्नहृ ष्द्मह्यब्ह्य ह्वद्दद्धड्ड्न स्रह्नहृ द्धठ्ठह्व ष्द्मठ्ठ ष्भ्द्मह.द्म द्बह्नह्वत्न क्द्म;द्म्न ष्द्मह्यब्द्म] द्गद्दद्मद्भद्मह्ल क्ष् द्गस्ड्डह्वह्य ॥द्मद्मफ्शह् द्ब<+ ब्द्ध द्दस्] द्बद्भ ड्ढद्य ष्द्मद्भ ॥द्मद्ध द्वद्यह्य द्वद्बह्यम्द्मद्म द्दद्ध द्धद्गब्द्ध्न ष्द्दह्नह् द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड ह्स्र ह्लष् ष्भ्द्मह.द्म ह्वद्दद्धड्ड क्द्म;द्म] ह्द्मह्य ॥द्मद्मह्यह्ल ह्वह्य रुशड्ड; द्वह्वस्रद्ध [द्मद्मह्यह्ल स्रद्भद्मर्ड्ढं्न य़द्मह् द्दह्नक्द्म द्धस्र शह्य ॥द्मद्मफ्शह् द्गह्यड्ड द्भद्ग फ्, द्दस््न क्ष् द्वद्दह्यड्ड द्बस्द्यह्य स्रद्ध श्चद्मद्द ह्वद्दद्धड्ड द्भद्दद्ध्न ॥द्मद्मह्यह्ल ह्वह्य ड्ढद्य ष्द्मद्भ द्वद्दह्यड्ड रुशड्ड; क्द्मफ्भ्द्दद्बर्ख्शंस्र ष्ह्नब्द्म;द्म] स्रस्नद्मद्म स्रद्दब्द्मर्ड्ढं] द्वद्दह्यड्ड द्यश्वद्गद्मह्व द्धठ्ठ;द्म श /द्मह्व ॥द्मद्ध्न /द्मह्व द्वद्दद्मह्यड्डह्वह्य द्धह्व/र्द्मंह्वद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ष्द्मँक द्धठ्ठ;द्म्न क्ष् द्भद्मह्लद्म ह्वह्य द्वद्दह्यड्ड द्बख्द्भह्य द्यश्वद्गद्मह्व द्यह्य द्भद्मह्लद्बह्नद्भद्मह्यद्धद्दह् द्बठ्ठ द्बद्भ द्धह्व;ह्नष्ठह् स्रद्भ द्धठ्ठ;द्म्न क्द्बह्वद्ध श्चद्मद्द ॥द्मष्ठह् द्धद्गंकद्म ठ्ठह्यह्द्म द्दस्] ह्द्मह्य र्ड्ढंज्शद्भ रुश;ड्ड द्वद्यस्रह्य ह्लद्धशह्व द्गह्यड्ड ?द्मह्नब् ह्लद्मह्ह्य द्दस्ड्ड्न द्धक्तद्भ द्धस्रद्यद्ध द्बभ्स्रद्मद्भ स्रह्य शस्॥द्मश स्रद्ध द्वद्यह्य ह्ल:द्भह् ह्वद्दद्धड्ड द्बरु+ह्द्ध्न


आत्मिक प्रगति का ककहरा


आत्मिक प्रगति का उच्चस्तरीय मार्गदर्शन है इन पत्रों में

(गायत्री जयंती पर विशेष)

हर किसी की यह आँतरिक अभिलाषा रहती है कि वह आत्मिक प्रगति के राजमार्ग पर चले। कोई सच्चा सही माइनों में पग-पग पर मार्गदर्शन करने वाला गुरु उसे मिले। लौकिक प्रयोजनों के लिए तो मित्र भी मदद कर देते हैं, किंतु आत्मिक प्रगति के लिए, जिस उच्चस्तरीय सत्ता की आवश्यकता पड़ती है, वह भूमिका मात्र एक सद्गुरु ही निभा सकते हैं। सद्गुरु उपासना-साधना-आराधना का त्रिविध अवलंबन लेने की बात आदिकाल से कहते रहे हैं। उपासना का उद्देश्य है- आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ देना। आत्मा अर्थात् अंतःकरण, भाव-संस्थान जिसके साथ मान्यताएँ, आकाँक्षाएँ लिपटी रहती हैं। परमात्मा अर्थात् उत्कृष्ट आदर्शवादिता। इन दोनों के मिलन में यदि को सहायक हो समता है, तो वह सद्गुरु ही हैं। ऐसे ही सद्गुरु का मार्गदर्शन जब-जब भी गायत्री साधकों को मिला है, उनका उच्चस्तरीय विकास होता ही चला गया है। परमपूज्य गुरुदेव न केवल ‘गायत्री चर्चा’ शीर्षक से प्रकाशित अपने संपादकीय के माध्यम से अखण्ड ज्योति पत्रिका द्वारा अपने साधक शिष्यों का मार्गदर्शन करते थे, बल्कि पत्रों द्वारा वे समय-समय पर उचित परामर्श भी अपने अनुभवों के आधार दिया करते थे। उनके ऐसे प्राण संचार करने वाले पत्रों में से एक यहाँ उद्धृत करने से हम स्वयं को रोक नहीं पा रहे हैं। यह पत्र 27/10!1949 को श्री शिवशंकर गुप्ता को लिखा गया था।

“अपना एक अनुभव है, वह यह कि जब कोई मार्ग न सूझ पड़ता हो, चारों ओर अंधकार छाया हुआ हो, निराशा-ही-निराशा दिखाई पड़ती हो, तब वेदमाता गायत्री का आश्रय लेना चाहिए। उनका जप और ध्यान करने से अंतःकरण में एक दैवी स्फुरणा उत्पन्न होती है और उस प्रकाश के सहारे मनुष्य उस मार्ग को ढूँढ़ लेता है, जिस पर चलने से उसका दुःख दूर हो सकता है। अगर आप विश्वास कर सकें, तो हम सलाह देंगे कि आप गायत्री का जप और ध्यान आरंभ कर दें। आपको शीघ्र ही प्रकाश मिलेगा।”

आपको नहीं लगता कि किसी प्रारंभिक साधक के लिए एक सरल-सा उपचार गुरुसत्ता ने कैसे अनुभवों के साथ जोड़कर एक नन्हें शिशु को दी जाने वाली घूँटी की तरह दे दिया है! यही पत्रलेखन की शैली हमारे हृदय को स्पर्श कर जाती है व हमारी गुरुसत्ता के पग-पग पर दिए गए मार्गदर्शन की हमें याद दिलाती रहती है।

कभी-कभी साधक-शिष्य, गृहस्थ-विरक्त के भ्रम में पड़ जाते हैं। बड़े परेशान हो जाते हैं कि अगर साधना ही करनी थी, तो गार्हस्थ्य में प्रवेश ही क्यों किया? अपने आप पर, अपने जीवनसाथी पर झल्लाते हैं कि इस के कारण हम आत्मिक प्रगति नहीं कर पा रहे। व्यावहारिक अध्यात्मवाद की प्रणेता, हर किसी का सूक्ष्म अध्ययन कर उसका सच्चा मार्गदर्शन करने वाली गुरुसत्ता अपने पत्रों द्वारा उस संबंध में बड़ा स्पष्ट मार्गदर्शन करती थी।

“चि. कृष्णा बेटी, आशीर्वाद 16-12-58 तुम्हारा पत्र मिला, कुशल समाचार पढ़कर बड़ी प्रसन्नता हुई। तुमसे जितनी कुछ साधना आसानी से बन पड़े, उतनी कर लिया करो। घट-घटवासिनी माता सब कुछ जानती हैं। तुम्हारी आत्मा में जो श्रद्धा-भक्ति है उसे वे भली प्रकार पहचानती हैं। गृहस्थ में रहकर तुम तपस्वी की भाँति जीवनयापन करती रहो। इसमें जीवन का लक्ष्य पूरा हो जाएगा।”

ऐसा ही एक पत्र कृष्णा बहन के पति को 21-6-54 को लिखा गया था, जो इस प्रकार है-

“आपके भीतर आत्मकल्याण की प्रचंड अग्नि दीप्तिमान है। इसे गृहस्थ के झंझट बुझा नहीं सकते। गृहस्थ के उत्तरदायित्वों को पूर्ण करते हुए आप बड़ी सरलतापूर्वक जीवनलक्ष्य को प्राप्त करेंगे। हठयोगियों को होने वाले विचित्र एवं विलक्षण अनुभव आपके लिए आवश्यक नहीं हैं।”

तरह-तरह के छलावे, तरह-तरह के साधना संबंधी आकर्षण, तरह-तरह की अनुभवों की चर्चा किसी को भी अपनी गुरुसत्ता से जिज्ञासाएँ पूछने को विवश कर देती हैं। ऐसा ही कुछ इस सज्जन के साथ भी हुआ व उनको स्पष्ट परामर्श मिल गया कि उनका पथ क्या है व गृहस्थ में रहकर उसे ही तपोवन बनाते हैं।

बैकुँठपुर सरगुजा के श्री बृजेन्द्रलाल गुप्ता एडवोकेट भी थे एवं एक राजनेता भी। सतत् पूज्यवर का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन पाने वालों में से वे एक हैं। क्षणिक वैराग्य का भाव उनके मन में भी पैदा हुआ था व सोचा था कि सब कुछ छोड़कर, गृहस्थाश्रम छोड़कर अब हिमालय चले जाना चाहिए। 15-07-1966 को लिखे एक पत्र में पूज्यवर लिखते हैं-

“वानप्रस्थ में अधिक काम हो सकता है, पर गृहस्थ में रहकर भी यदि अभिरुचि हो तो बहुत कुछ हो समता है। स्वाधीनता संग्राम की पूरी लड़ाई गृहस्थों ने ही लड़ी थी। भावनात्मक नवनिर्माण के लिए भी हम गृहस्थ लोग कम उपयोगी नहीं हैं।”

जैसा रोगी वैसी औषधि- जैसी मनोभूमि वैसा परामर्श। एक राजतंत्र से जुड़े व्यक्ति के मन में वैराग्य आया तो उस नाजुक क्षण को उन्होंने पहचाना एवं आजादी के लिए संग्राम का स्मरण दिला उन्हें पुनः मोरचे पर खड़ा कर दिया। गृहस्थ जीवन में भावनात्मक नवनिर्माण का रण-संग्राम बड़े आराम से लड़ा जा सकता है, यह आश्वासन भी दे दिया।” पत्रों में यही बात हमारे गुरुदेव को औरों से भिन्न एवं मात्र लेखनी के चितेरे नहीं-एक गहन सूक्ष्म अध्येता मनोवैज्ञानिक के रूप में स्थापित करती है। यही तो चह विशेषता है, जिसने इतना बड़ा मिशन-विराट् गायत्री परिवार खड़ा कर दिया है।

एक और पत्र 1-2-53 का लिखा उपलब्ध हुआ है, जिसे उद्धृत करने का मन है। अतिवाद से पूज्यवर अपने शिष्यों को सतर्क करते रहते थे। एक अतिवाद तो यह कि घर-परिवार से कोई संपर्क न रख, साधना-मार्ग पर ही चलेंगे। दूसरा अवसाद यह कि अब साधु बनकर हिमालय चले जाएँगे। परमपूज्य गुरुदेव का अभिमत होता था कि ऐसे में विवेक का आश्रय लें, समझदारी से काम कर अपनी पत्नी-परिवार को साथ लेकर चलें। श्री रामदास जी जो कानपुर के निवासी हैं, को लिखा पत्र यहाँ प्रस्तुत है।

हमारे आत्मस्वरूप, 1-2-53

आपका पत्र मिला। कुशल समाचार जाने। आप घर हो आए, यह बहुत ही उचित तथा आवश्यक था। आगे भी त्योहारों तथा विवाह आदि में घर जाते रहें। ऐसा न करना अपने आवश्यक कर्त्तव्यों से विमुख होना होगा।

आपका साधु होने का स्वप्न ठीक है। आपकी आत्मा सच्चे अर्थों में साधु बनती जा रही है। कपड़े रँगने या वेश बनाने से कोई व्यक्ति साधु नहीं हो सकता। साधुता दूसरी बात है, जो गृहस्थ में रहकर भी राजा जनक की भाँति आसानी से प्राप्त की जा सकती है। आप पूर्ण साधु बनेंगे। आपका स्वप्न पूर्ण सत्य होगा। परंतु वह स्थिति न आएगी कि आपकी पत्नी को शोक या चिंता करनी पड़े या पिताजी दुखी हों। उनके प्रति आपके अनेक कर्त्तव्य अभी बंधे हुए हैं। उन्हें पूरा न करेंगे, तो आगे अनेक जन्मों में उन्हें चुकाने के लिए आपको फिर लौटना पड़ेगा। इसलिए आपको दोनों काम साथ-साथ करने हैं-(1) ऋण चुकाना और (2) मुक्ति कमाना। यह कार्य गृहस्थ योग की साधना द्वारा ही होना संभव है।

गुरुसत्ता द्वारा एक व्यक्ति को आज की साधु-संन्यासी परंपरा संबंधी सशक्त मार्गदर्शन भी है। आदमी कपड़ों से नहीं आत्मा से साधु बनता है। उसका दिखावा जो करते हैं, उनमें से अधिकाँश ढोंगी ही होते हैं। उस स्थिति से बचकर गृहस्थ योग की साधना कर कर्मयोग करते हुए पत्नी व पिता-माता सभी को साथ लेकर चलने का मार्गदर्शन कितना व्यवहारिक है, भलीभाँति समझा जा सकता है। मानवी चिंतन के रुझान के अनुरूप उँगली पकड़कर दिग्दर्शन कराना, यही तो सद्गुरु का कार्य रहा है। आज गायत्री जयंती की पुण्यवेला में जब हम पूज्यवर को स्मरण करते हैं, तो उनकी ये पंक्तियाँ अंदर तक स्पर्श कर जाती हैं। लाखों सद्गृहस्थों का निर्माण कर उन्हें धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की दिशा में अग्रगामी बनाने वाली सत्ता जिस लक्ष्य को लेकर आई थी, उसकी पूर्ति हेतु काफी पूर्व आज से पचास साल पहले ही तत्पर हो गई थी।

इसी आशय का एक और पत्र है, जो श्री बद्रीप्रसाद पहाड़ियां जी को परमपूज्य गुरुदेव ने 24-7-55 को लिखा था। पहाड़ियां जी ने अपने पत्रों में किन्हीं बाबाजी व उनके चमत्कारी प्रदर्शनों की चर्चा की थी। ‘गायत्री’ के संबंध में भी उन्होंने कुछ ऊल-जलूल कहा था। इस पत्र के जवाब में पूज्यवर लिखते हैं-

“हमारे आत्मस्वरूप 24-7-55

आजकल अनेक रंग-रूप के बहरूपिया अपनी ढपली-अपना राग फिरते हैं। लोगों को प्रभावित करना एक कला है। इसे कोई भी चतुर आदमी आसानी से प्राप्त कर सकता है और किन्हीं को भी प्रभावित कर सकता है।

आप इस प्रकार के व्यक्तियों से तनिक भी विचलित न हों। वेदमाता गायत्री का महत्त्व और आधार इतना दुर्बल नहीं है कि वह किसी रेशमी कपड़े पहनने वाले की ऊल-जलूल बातों में ही नष्ट हो जाए। वेद और वैदिक संस्कृति का मूल आधार गायत्री है। यह प्रत्येक द्विज की अनिवार्य उपासना है। हमें वेद के लुप्तप्राय रहस्यों को पुनः जनता के सामने रखना है। सत्य सदा सत्य है। भारतीय संस्कृति के मूलभूत आधार को हमें अब प्रकाश में लाने का तत्परता-पूर्वक प्रयत्न करना है। ऐसे बरसाती मेढ़क उस गंगा की धारा को रोकने में तनिक भी समर्थ नहीं हो सकते। आप उत्साहपूर्वक अपना कार्य जारी रखें।”

पत्र बड़ा ही स्पष्ट है। वेदमाता गायत्री का आधार कितना सशक्त है, इसे भलीभाँति समझा जा सकता है। अपने शिष्य को, जो संभवतः रंग-बिरंगे कपड़े पहने बाबाजी के प्रभाव में आ गए हों, तथ्य सामने रख बड़ा ही स्पष्ट मार्गदर्शन पूज्यवर ने किया है। हो सकता है यह स्थिति हमारी भी कभी हो। हमें कोई भी भरमा दे। कालनेमि की माया बड़ी विचित्र है। वह भी ऐसे ही साधु वेशधारी बनकर हनुमान जी को संजीवनी बूटी पहुँचाने के मार्ग में बाधक बन जा पहुँचा था। हनुमान जी जैसी रुद्र की अंशधारी सत्ता-अवतारी सत्ता भी जब थोड़ी देर के लिए भगवान् राम के प्रति शंकालु बन सकती है, तो फिर हम आप तो साधारण प्राणी हैं। हम सबके लिए एक सशक्त मार्गदर्शन इस पत्रों से मिलता है। मात्र गायत्री ही नहीं, हमारी गुरुसत्ता व उनके निर्धारणों के प्रति भी मायावी जाल बुनकर संदेहों के बादल आस्था संकट की इस वेला में रचे जा सकते हैं। हमें अपना मन-मस्तिष्क साफ रख अपने को जरा भी दिग्भ्रमित नहीं करना है, यह संकेत उपर्युक्त पत्र देते हैं, जो परोक्ष रूप से पूज्यवर के भाव शरीर की ही झाँकी हमें कराते हैं।


जिनने ब्रह्मकमल को पूरी तरह खिलाया

(गायत्री जयंती पर विशेष)

“आज तो ब्राह्मण बीज ही इस धरती से समाप्त हो गया है। मेरे बेटो! तुम्हें फिर से ब्राह्मण को जगाना और उसकी गरिमा का बखान कर स्वयं जीवन में उसे उतारकर जन-जन को अपनाने को प्रेरित करना होगा। यदि ब्राह्मण जाग गया, तो सतयुग सुनिश्चित रूप से आकर रहेगा।” ये वाक्य परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी उस अंतरंग गोष्ठी में कहे थे, जो उनके महाप्रयाण के मात्र दो माह पूर्व उन्होंने अपने कक्ष में ली थी। ब्रह्मकमल खिलने व अपने जीवन के प्रथम अध्याय के पटाक्षेप की बात भी कही।

ब्राह्मणत्व की परिभाषा करते हुए पूज्यवर ने कहा कि “ब्राह्मण सूर्य की तरह तेजस्वी होता है, प्रतिकूल परिस्थितियों में भी चलता रहता है। कभी रुकता नहीं। कभी आवेशग्रस्त नहीं होता तथा लोभ, मोह, अहंता पर सतत् नियंत्रण रखता है। ब्राह्मण समाज का शीर्ष है। कभी यह शिखर पर था तो वैभव गौण व गुण प्रधान माने जाते थे। जलकुँभी की तरह छा जाने वाला यही ब्राह्मण सतयुग लाता था। आज की परिस्थितियाँ इसलिए बिगड़ी कि ब्राह्मणत्व लुप्त हो गया। इसे पुनः जिंदा करना होगा। ये ब्राह्मण, वंश से नहीं, कर्म से लोकसेवी समुदाय में से ही उभरकर आएँगे।”

गायत्री जयंती (11 जून) की वेला में परमपूज्य गुरुदेव के इन कथनों को उद्धृत इसलिए करने का मन हो रहा है कि आज इक्कीसवीं सदी के शुभारंभ की वेला में सर्वाधिक आवश्यकता ब्राह्मबीज की नर्सरी को खाद-पानी देने की है। अधिक-से-अधिक प्रतिभावान्-विभूतिवान् ब्राह्मण स्तर के लोकसेवी कार्यकर्त्ताओं की इस समय आवश्यकता है, जो अपने कर्मों की सुरभि से समाज रूपी उद्यान को महका सकें, पुण्य की खेती द्वारा सत्कर्मों का विस्तार कर सकें। यह तभी संभव है, जब हम उस आदर्श को स्वीकार कर सकें, जो स्वयं परमपूज्य गुरुदेव ने एक ब्राह्मण के रूप में स्थापित किया।

मात्र दो जोड़ी खादी के धोती-कुरते एवं हाथ में लिखने की दो रुपये लागत की एक कलम, जिससे उन्होंने आग उगलने वाली रचनाएँ लिखीं, यही मात्र हमारी गुरुसत्ता की एकमेव पूँजी थी। ढेरों व्यक्ति आते, भेंट दे जाते जिनमें कीमती पेन से लेकर अगणित उपहार होते थे, किंतु उनके लिए सभी मिट्टी समान था। सारा पास रखी प्लास्टिक की टोकरी में डाल दिया, किसी को बाँट दिया, माताजी के पास भिजवा दिया व उन्होंने भी वितरण कर दिया। निस्पृहता व अपरिग्रह की पराकाष्ठा उनके जीवन में देखी जा सकती है। कई बार भावुक शिष्य ममत्व पाकर उनसे उनकी लेखनी माँग बैठते थे। यह भी भाव रहता था कि पूज्यवर के हाथ से स्पर्श की हुई लेखनी से लिखेंगे, तो हिसाब-किताब में बरकत रहेगी, पैसा आएगा। जो भी लिखेंगे उससे परीक्षा में बच्चे पास होंगे अथवा जो लिखेंगे, वह छपेगा। आशीर्वाद के रूप में सहज ही परिजन माँग बैठते थे। भोला भंडारी-महाशिव की सत्ता अपने हाथ से लिखने वाले कलम बाँट भी देती थी। हम उनके पास रहते थे, तो उनके उस दो रुपये के पेनों के एक दर्जन अतिरिक्त भंडार को सँभालकर रखना पड़ता था। खत्म होते ही तुरंत माँग बैठते। कभी उन्हें महँगा पेन दिया, तो वापस कर दिया। कहा इससे तुम ही लिखो। मुझे तो मेरा वही सस्ता वाला पेन कँगा दो। साधारण-सी रिफील वाला राजकोट का बना एक पेन उन्हें रास आता था, जिसकी कीमत थोक भाव में लगभग पौने दो रुपये प्रति पेन तब पड़ती थी। उसी का एक भंडार हमने अपने पास रखा था, उसी से उन्होंने जीवन भर लिखा। लिखा भी तो इतना जिसकी कोई तुलना आज के युग में किसी से नहीं की जा सकती ।

उपर्युक्त घटनाक्रम लिखा इसलिए कि परिजन परमपूज्य गुरुदेव के विचारशरीर के साथ भावशरीर को समझ सकें। उनकी भाव काया परिपूर्ण ब्राह्मणत्व से ओतप्रोत थी। अपने लिए कठोरता, औरों के लिए उदारता यही ब्राह्मणत्व का चिन्ह है। इसे उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ जीवन में उतारा। ब्राह्मण के चार प्रमुख गुण पूज्यवर ने बताए-रसना पर नियंत्रण, कामुकता पर अंकुश, अपरिग्रह तथा अधिक-से-अधिक का औरों के लिए वितरण। सारी समस्याएँ-शारीरिक, मनोशारीरिक व्याधियाँ, लोकसेवा के क्षेत्र में व्यावहारिक कठिनाइयाँ यहीं से आरंभ होती हैं। कौन कितना कर पाता है, उसी कसौटी पर सच्चे ब्राह्मण को कसा जाता है। यदि हर व्यक्ति के अंदर सोए ब्राह्मणत्व को जगा दिया जाए, तो आज की अगणित समस्याओं का समाधान निकल सकता है।

जीवनभर पूज्यवर लुटाते ही रहे। प्यार लुटाया, साधन लुटाए, अपने विचार लुटाए। किसी का भी परिग्रह करने की कभी भी कोशिश नहीं की। 1926 में अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलन के साथ अपना महापुरश्चरण आरंभ करने से लेकर आँवलखेड़ा गाँव में पारमार्थिक गतिविधियाँ चलाने तथा फिर स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी तक वे अपने पास का सब कुछ न्यौछावर ही करते रहे। घर में सब कुछ होते हुए भी कौन चाहेगा कि वह मात्र एक लोहे का तसला लेकर निकल जाए व अपने परिवारजनों की यह व्यंग्योक्ति सुनकर कि अब जब राज्य तुम्हारा तुम्हें वापस मिल जाए (अर्थात् आजादी मिल जाए) तो हाथी पर बैठकर आना, तुम्हारा तिलक करेंगे, वह फिर कभी लौटकर भी न जाए। जेल में चक्की पीसे, कैदियों को पढ़ाए-स्वयं अंग्रेजी सीखे एवं फिर काँग्रेस (तत्कालीन) का एक विनम्र स्वयंसेवक बनकर श्री कृष्ण दत्त जी पालीवाल के एक सहयोगी तथा श्री केसकर (तत्कालीन सूचना-प्रसारण मंत्री) के निजी सहायक के रूप में कार्य किए। श्री केसकर भी उन्हें तब नहीं पहचान पाए थे कि ये हैं कौन? पता चलने पर उन्होंने बार-बार इसी निजी सहायक केच रण स्पर्श किए थे। मथुरा आकर सारी गतिविधियाँ व योजना विस्तार से समझी थीं। अखण्ड ज्योति पत्रिका जिस स्थिति में प्रकाशित की गई थी, पूँजी के अभाव में लगता नहीं था कि यह चल पाएगी। जो भी कुछ था अपना वह सारा आँवलखेड़ा ग्राम के स्कूल के निर्माण हेतु दे दिया था और कोई पूँजी थी नहीं। थे मात्र जमींदारी के बाँड एवं माताजी के जेवर आदि। वे भी गायत्री तपोभूमि हेतु भूमि क्रय करने के लिए काम आने थे। फिर भी पत्रिका हाथ से बने कागज पर पैरों से चलने वाली छोटी मशीनों द्वारा छपने लगी। पहली प्रति जनवरी 1939 में ढाई सौ छपी। कुछ दिन प्रवाह अवरुद्ध रहा, किंतु फिर फ्रीगंज आगरा से जनवरी 1940 में अखण्ड ज्योति पत्रिका छपनी आरंभ हुई एवं देखते-देखते मत्स्यावतार की तरह गति पकड़ती चली गई।

1947-48 की बात है। आरोग्य पत्रिका को तब गोरखपुर से प्रकाशित होते मात्र एक वर्ष हुआ था। श्री हनुमान प्रसाद पोदार जी से मिलने परमपूज्य गुरुदेव गोरखुपर पहुँचे, तो सहज ही विट्ठलदास जी मोदी (जिनका महाप्रयाण अभी विगत मार्च 2000 की 23 तारीख को हुआ है) से मुलाकात हुई दो संत- ब्राह्मण मिले, सहज अपनत्व बढ़ता चला गया। दो-तीन मुलाकातों के बाद मोदी जी अखण्ड ज्योति संस्थान घीयामंडी आए। परमपूज्य गुरुदेव ने कहा, ब्राह्मणत्व कहता है कि मैं बिना विज्ञापन के पत्रिका निकालूँ, इसलिए आपसे राय ले रहा हूं। वैसे इस अंक से मैं विज्ञापन बंद कर रहा हूँ। “मोदी जी बोले,” आप इस आधार पर तो पत्रकारिता जगत् में जी ही नहीं सकते। आपकी पत्रिका आपको घाटे में ले जाएगी। आपको इसे अंततः बंद करना पड़ेगा। “ पूज्यवर बोले, “ तो हम प्रयोग करके देख लेते हैं। यदि हम सफल होते हैं, तो आपको हमारा लोहा मानना पड़ेगा, हमारे ब्राह्मणत्व की मूल धुरी पर चले जीवन की सफलता को स्वीकारना होगा और यदि आप जीते तो हम मान लेंगे कि इस युग में मात्र विज्ञापनवाद ही चल सकता है। “वर्षों बीत गए। पुनः मुलाकात हुई। अखण्ड ज्योति की प्रगति यात्रा से ब्रह्मलीन श्री विट्ठलदास जी मोदी अति प्रसन्न थे व अंदर से अभिभूत थी।

अखण्ड ज्योति पत्रिका 250 से आरंभ होकर आज लगभग छह लाख की संख्या में छपती है। पाँच गुने पाठक उसे हिंदी में पढ़ते हैं इसी के अनुवाद प्रायः इतनी ही बड़ी संख्या में छपते हैं। बिना विज्ञापन के, बिना किसी लाभ के कोई प्रयोग इतने दिन चल सकता है? 63 वें वर्ष में चल रही पत्रिका अखण्ड ज्योति प्रत्येक के लिए अचरज का विषय नहीं, अपितु ब्राह्मणत्व के चमत्कार एक नमूना है।

जो लोग अखण्ड ज्योति संस्थान के घीयामंडी या गायत्री तपोभूमि वृंदावन रोड मथुरा गए हैं, उन्होंने एक जीते-जागते तपस्वी ब्राह्मण के, आचार्य श्री के अंतर्दर्शन किए हैं इसी एक सिद्धि ने उन्हें सब कुछ दे दिया। परमपूज्य गुरुदेव कहते थे कि हमारे देश की संस्कृति त्याग करने वालों की पूजा करती है। यह बुद्ध व महावीर का, पटेल व गाँधी का देश है हमने उसे ही आधार माना है एवं हमारी यही पूँजी है आज पाँचों संस्थान सहित प्रायः साढ़े पाँच हजार प्रज्ञासंस्थानों के अधिपति परमपूज्य गुरुदेव-परमवंदनीया माताजी के रूप में अरबों की संपत्ति के प्रमुख के रूप में हम उन्हें पाते हैं, तो उसके मूल में उनका ब्राह्मणत्व ही है, जो उन्होंने अंत तक निभाया। अभी पिछले दिनों पावन कुँभक्षेत्र नासिक में हुए महाराष्ट्र के पंचम सम्मेलन में जब पंचवटी क्षेत्र में बनी एक विशाल धर्मशाला श्रीमती रमागुप्ता के द्वारा हमें गायत्री शक्तिपीठ नासिक के निर्माण के लिए सौंपी गई, उसका दानपत्र हमें दिया गया, तो लगा कि प्रायः एक करोड़ से अधिक की यह संपत्ति परमपूज्य गुरुदेव के ब्राह्मणत्व को समर्पित की जा रही है। गोयनका धर्मशाला नाम से प्रख्यात यह भवन गंगा गोदावरी के तट पर है। जब गुप्ता परिवार ने गायत्री परिवार की जानकारी ली तो सर्वप्रथम उन्होंने गुरुदेव के बारे में जाना। कुछ सेकेंड भी नहीं लगे निर्णय लेने में एवं भवन स्थानान्तरित हो गया। आज गायत्री परिवार में परमपूज्य गुरुदेव-माताजी के उत्तराधिकारी लाखों-करोड़ों भाई-बहनों के पास यदि अपार ज्ञानसंपदा है, क्राँतिकारी विचारों वाले पूज्यवर द्वारा लिखे साहित्य के रूप में तो उनके द्वारा स्थापित जन-जाग्रति के केंद्र भी हैं, जो अगले दिनों रचनात्मक क्राँति की धुरी बनेंगे, देव-संस्कृति विश्वविद्यालय के अंग-उपाँग बनेंगे। यह सब हुआ उस महासत्ता के ब्राह्मणत्व के कारण जिस पर जीवन पर चला गया, पूरा निर्वाह किया गया। ऐसी सत्ता को बारंबार नमन है, आज उनके महाप्रयाण के दस वर्ष बाद गायत्री जयंती पर। जिस सत्ता ने अपनी आराध्य माँ गायत्री के अवतरण वाली वेला में अपने स्थूलशरीर से चेतना को समेटा, आज भी अपने परोक्ष शिक्षण-संरक्षण के रूप में हमारे बीच मौजूद है। हमें आश्वासन दे रही है कि यह ब्रह्मकमल इसी तरह सुवास फैलाता रहेगा, सतयुग निश्चित ही लाकर रहेगा।


महाशक्ति गायत्री का साकार विग्रह थे वे

वर्ष 1976 ई॰ के वसंत पंचमी पर्व पर अपने ऐतिहासिक उद्बोधन में परमपूज्य गुरुदेव ने कहा था, “जिसने मुझे जान लिया, समझो उसने गायत्री को जान लिया।” निस्संदेह पूज्यवर का समूचा जीवन गायत्रीमय था। अनवरत गायत्री साधना की निष्ठा ने उन्हें तपोनिष्ठ बनाया और वे वेदमाता के वरद पुत्र होकर वेदमूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित हुए। वेदमाता गायत्री सृष्टि की आदि शक्ति है। सर्वप्रथम ब्रह्माजी ने घोर तप करके इसके तत्त्वज्ञान को जाना था। इसी से वे सृष्टि रचना के लिए आवश्यक ज्ञान-विज्ञान एवं शक्ति-सामर्थ्य प्राप्त करने में सक्षम हुए थे।

ज्ञान और विज्ञान का मूल स्त्रोत होने के कारण ही तो गायत्री वेदमाता कहलाती है। वेदों में जो ज्ञान-विज्ञान भरा पड़ा है, वह सबका सब बीज रूप में गायत्री मंत्री में विद्यमान् है। तमाम देवशक्तियाँ इस महाशक्ति की धाराएँ हैं। उनका प्रादुर्भाव इसी से हुआ है और वे इसी से पोषण पाती है। इस रूप में गायत्री देवमाता है। इतना ही नहीं समूचे विश्व की उत्पत्ति इसी के गर्भ से हुई है, यही कारण है कि गायत्री विश्वमाता भी है।

इस तरह वेदमाता, देवमाता एवं विश्वमाता के रूप में गायत्री सृष्टि की मूल शक्ति है। इसे त्रिपदा भी कहते हैं। सत, रज एवं तम इन तीन गुणों के आधार पर यह सरस्वती, लक्ष्मी एवं काली कहलाती है, जो क्रमशः सद्बुद्धि, समृद्धि एवं शक्ति की अधिष्ठात्री शक्तियाँ हैं उत्पत्ति, पोषण एवं परिवर्तन की पुरुषवाचक शक्तियों के रूप में यही ब्रह्मा-विष्णु और महेश कहलाती है। अपनी प्राणरक्षक क्षमता के कारण इसका नाम गायत्री पड़ा हैं व्यक्ति में सद्बुद्धि एवं सद्भाव जगाने वाली यह महाशक्ति वस्तुतः धरती की कामधेनु है, जो उनका पयपान करने वालों के दुःख संताप एवं अभाव का हरण करती है। उन्हें सुख-शाँति एवं समर्थता का अनुदान देती है।

अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण इसे भारतीय संस्कृति की जननी होने का गौरव प्राप्त है। जो महत्त्व गंगा नदी का भारतीय जीवन में रहा है, वही महत्त्व गायत्री रूपी ज्ञानगंगा का है। पुण्यसलिला गंगा जहाँ शरीर की मलीनता को धोकर इसे स्वच्छ-निर्मल बनाती है, वहीं गायत्री रूपी ज्ञान-गंगा आत्मा को पवित्र करती है। आदिकाल से लेकर आज तक सभी ऋषियों ने एक स्वर से इसकी महिमा का गान किया है। सभी अवतार पुरुषों की यह उपास्य रही है। भारतीय जीवन से जब भी गायत्री के तत्त्वज्ञान का विलोप हुआ, यहाँ की संस्कृति पतन-पराभव के गर्त में जा गिरी। इसके तत्त्वज्ञान उन्नयन में ही भारत की संस्कृति एवं सभ्यता का उन्नयन समाया रहा है।

इस युग में परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी कठोर तप-साधना से गायत्री की विलुप्त शक्तियों को फिर से उजागर किया। गायत्री महाविद्या एवं इसके तत्त्वज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए संकल्पित हुए। चौबीस लाख के चौबीस महापुरश्चरणों की पूर्णता की वेला में अगस्त 1951 की अखण्ड ज्योति में उन्होंने अपने अनुभवों को बताते हुए लिखा, “हमारे जीवन का अधिकाँश भाग गायत्री माता की गोदी में व्यतीत हुआ है। इस महामंत्र के संबंध में हजारों आर्षग्रंथों का अनुसंधान करके हमने यह पाया है कि आध्यात्मिक साधनाओं में गायत्री साधना से बड़ी दूसरी कोई साधना नहीं है।”

गायत्री महामंत्र को तमाम प्रतिबंधों से मुक्त करने और इसे सर्वसुलभ बनाने का काम इस महाशक्ति से एक रूप हो चुकी कोई समर्थ सत्ता ही कर सकती है। इस धरती पर गायत्री महाशक्ति की ज्ञानगंगा को अपनी भगीरथ तप-साधना द्वारा लाने वाले पूज्य गुरुदेव को इस युग का विश्वामित्र कहना अतिशयोक्ति न होगी। गायत्री महामंत्र के साथ आदि ऋषि के रूप में विश्वामित्र का नाम जुड़ा हुआ है। वे ही इसे प्रथम द्रष्टा ऋषि हुए हैं। गायत्री जयंती के महापर्व के दिन ही उन्होंने इसका साक्षात्कार किया था। इसके अवलंबन से वे ब्रह्मर्षि पद पर प्रतिष्ठित हुए थे और सृष्टि के निर्माण व संचालन की शक्ति से संपन्न बने थे। इसी शक्ति के बल पर उन्होंने नई सृष्टि रचने का साहस किया था।

इस युग में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा किया गया नवनिर्माण का युगाँतरीय पुरुषार्थ इसी तरह का एक सत्साहस है। अपना देश 15 अगस्त 1947 के दिन राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हुआ था। यह स्वतंत्रता लंबे संघर्ष एवं भारी त्याग-बलिदान के बाद मिली थी, किंतु पूर्ण स्वतंत्रता गणतंत्र राज्य की घोषणा सन् 1950 में ही हुईं। यही वह वर्ष था जब 1926 की वसंत पंचमी से प्रारंभ हुई गुरुदेव की चौबीस वर्षीय तप−साधना भी पूरी हुई और इसी के साथ सहस्रांशु ब्रह्मयज्ञ के रूप में युगपरिवर्तन का महासंकल्प भी उभरा।

सहस्रांशु ब्रह्मयज्ञ के युगपरिवर्तनकारी प्रभाव को स्पष्ट करते हुए उन्होंने नवंबर 1951 की अखण्ड ज्योति के पृष्ठ 23 में लिखा, “यह बार भली प्रकार समझ लेने की है कि यह महायज्ञ अत्यंत गंभीर सत्परिणाम उत्पन्न कराने वाला है। इसमें युगपरिवर्तन के बीज छिपे हुए हैं। जैसे नवप्रभात की पुण्य संध्या में ब्राह्मी साधना आवश्यक होती है, इसी प्रकार नानाविधि पापों−तापों से त्रास देने वाली इस घनघोर अंधकारमयी नियति का परिवर्तन करके शाँतिदायी सतोगुणी ऊषा के स्वागत में यह महायज्ञ किया जा रहा है।”

अखण्ड ज्योति जून 1953 के पृष्ठ 29 में अपने भावी लक्ष्य को स्पष्ट करते हुए परमपूज्य गुरुदेव ने गायत्री तत्वज्ञान की आवश्यकता को बताते हुए लिखा, “संतप्त मनुष्यता का परित्राण, आध्यात्मिक निष्ठा एवं धर्मधारणा की प्रतिष्ठा, मातृजाति की महानता का प्रकाश-भारतीय संस्कृति का, पुनरुद्धार हमारा लक्ष है। सदाचार, प्रेम, कर्त्तव्य-परायणता, सद्भाव, पवित्रता, संयम, सद्बुद्धि, आस्तिकता एवं मानवोचित जीवन की विधिव्यवस्था हमारा कार्यक्रम है। गायत्री उपासना इन्हीं देव संपत्तियों का केंद्र बिंदु है।”

इसी सत्य को और अधिक स्पष्ट करते हुए उन्होंने अगस्त 1953 की अखण्ड ज्योति के पृष्ठ 19 में लिखा, “राष्ट्रनिर्माण की सच्ची आधारशिला यह है कि नैतिक एवं धार्मिक वातावरण उत्पन्न किया जाए। यह कार्य सरकारें नहीं कर सकती। यह तो संतों और तपस्वियों द्वारा होता है। गायत्री महाशक्ति द्वारा भारत पुनः अपने इस लक्ष्य को प्राप्त करेगा। इस महाविद्या के आधार पर हम अपने खोए हुए रत्न-भंडारों को खोज सकेंगे। तप की राष्ट्रव्यापी समस्याओं को आसानी से हल कर सकेंगे।”

सत्य भी यही है। वस्तुतः भारतीय संस्कृति, धर्म और आत्मविज्ञान की आधार भूमि गायत्री रही है। प्राचीनकाल में ऋषियों ने इसी महाशक्ति की उपासना करके संसार को ज्ञान-विज्ञान की आभा से आलोकित किया था। प्राचीन भारत में जो महानता थी, उसके मूल में साधना से उत्पन्न आत्म-शक्ति ही प्रधान थी। तब यह देश अपने आचरण और आँतरिक बल के कारण संसार का प्रकाश-स्तंभ ध्रुवतारा बना हुआ था और जगद्गुरु कहलाता था। इस रूप में इसकी भावी प्रतिष्ठा का आधार भी यही होगा।

परमपूज्य गुरुदेव का समूचा जीवन इसी महालक्ष्य के लिए समर्पित रहा है। वह स्वयं वेदमाता गायत्री की महिमामय तेजोमूर्ति बने रहे। उन्हें महाशक्ति गायत्री का साकार विग्रह कहना अतिशयोक्ति न होगा। गायत्री का साकार विग्रह कहना गायत्री जयंती, 2 जून 1990 को निराकार के विराट विस्तार में विलीन हो गई। इसी के साथ उनकी तपचेतना और भी अधिक व्यापक-विस्तृत होने लगी। अपने वरद पुत्र को अपने में समाहित कर स्वयं वेदमाता गायत्री भी महिमान्वित हो गई। गायत्री महामंत्र की साधना करके कोई भी इस के माहात्म्य से परिचित हो सकता है। इस साधना में जीवन का अभ्युदय एवं पूज्यवर का आशीष दोनों समाए हैं।


भावभरे पुरुषार्थ के लिए विशेष आह्वान

इन दिनों देश्या के पश्चिमी प्राँतों में कई जगह भयावह सूखे की स्थिति पैदा हो गई। है। कालसर्प योग से लेकर अनेकानेक अंतर्ग्रही प्रभावों ने इस संवत्सर की स्थिति बड़ी कष्टकारी बना दी है। इस बार भी राहत कार्य के लिए प्रत्यक्ष सेवा-सहायता के साथ-साथ गाय? परिवार द्वारा विशिष्ट आध्यात्मिक-साधनात्मक प्रयोगों की रूपरेखा बनाई गई है। राहत सामग्री की कमी नहीं है। कमी है तो कर्मठ, प्रामाणिक चुस्त स्वयंसेवकों की । सरकारी व गैरसरकारी प्रयास प्रभावी हो सकें, इसके लिए परिजनों को कमर कसकर तैयार होना होगा, विशेषकर राजस्थान व गुजरात में। अस्थायी गोशालाएँ, पशुशालाएँ एवं चारा-भंडार स्थान-स्थान पर बने हैं। उनसे संपर्क स्थापित कर उनकी आपूर्ति बनाए रखने का परिजन प्रयास करें, प्रामाणिक व्यक्तियों तक सहायता पहुँचाने में मदद करें। वरुण आवाहन तथा वरुण प्रार्थना के साथ वरुण गायत्री मंत्र का जप एवं दीपया का क्रम चलाने के लिए पाक्षिक व परिपत्र के माध्यम से संकेत परिजनों को पहले ही दे दिया गया है। यह प्रयोग 45 मिनट से एक घंटे में न्यूनतम साधनों से कहीं भी किया जा सकता है। इसके संबंध में विस्तार से 1 व 15 मई का पाक्षिक पढ़ें।


अपनों से अपनी बात-1 - प्रतिभाओं की सिद्धि से महायज्ञ की महापूर्णाहुति

प्रस्तुत महापूर्णाहुति वर्ष में विभूतियों की महासिद्धि का महायज्ञ संपन्न होना है। विभूतियां उस वर्ग में आती हैं जिसे प्रतिभाशाली कहा जाता है। प्रतिभावान-विभूतिवान अपनी नाव अपने बलबूते खेते हैं और उसमें बिठाकर अनेकों को पर करते हैं। युगनेतृत्व ये ही प्रतिभावान करते हैं। ये सूझबूझ के धनी होते हैं, इसलिए जिस क्षेत्र में हाथ डालते हैं, श्रेय पाते हैं। सफलता और प्रशंसा इनके आगे-पीछे फिरती है। किसी भी राष्ट्र-संस्कृति की सच्ची संपदा इन्हीं को समझा जाता है। विश्व इतिहास में ऐ ही महामानवों की यशोगाथा स्वर्णिम अक्षरों में लिखी जाती है।

इन दिनों विशेष समय चल रहा है। एक और जहाँ विनाश की विभीषिका की संभावना नजर आती है, तो दूसरी और इक्कीसवीं सदी सुखद आशावाद से भरी परिस्थितियाँ लेकर आती दिखाई पड़ रही है। महाविनाश की विभीषिका से जूझना व अनुकूल परिस्थितियों को लाने का कार्य हर युग में प्रतिभाओं ने किया है। इस महापूर्णाहुति वर्ष में उन्हीं की खोजबीन हो रही है। एक विराट मंथन प्रक्रिया द्वारा समाज रूपी दूध को उबालकर उस मलाई के तैरने की संभावना साकार की जा रही है, जिसे प्रतिभा कहा गया है। ................................. .................. ....................................... .................. ....................................... .................. ....................................... .................. ....................................... .................. ....................................... .................. .................. .......... ............ ................ यहां से आगे का टाइप किया गया मेटर 2000-07 में भी दिया हुआ है। कृपया चैक करें।........... .............. ............... ............... .................. ..................... .................. .................. ........................ ................... .............................. .................. ..................... .................. .................. ........................ ................... .............................. .................. ..................... .................. .................. ........................ ................... .............................. .................. ..................... .................. .................. ........................ ................... .............................. .................. ..................... .................. .................. ........................ ................... .............................. .................. ..................... .................. .................. ........................ ................... ...............

परमपूज्य गुरुदेव ने सर्वप्रथम विशिष्ट चेतना-संपन्न व्यक्तियों के रूप में विभूतियों का आह्वान 1966-67 में किया था, जब उन्होंने, ‘महाकाल और उसकी युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया’ शीर्षक से एक अप्रतिम ग्रंथ रचा। आज भी लगभग 160 पृष्ठों की यह पुस्तक हर अग्रदूत के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है। इस पुस्तक में पौराणिक उपाख्यानों के साथ समय की विषमता, दशावतार के रूप में निष्कलंक की भूमिका से लेकर विभूतियों की नवसृजन हेतु भागीदारी के विषय में पूज्यवर ने बड़ी भावोत्तेजक शैली में अपनी वेदना लिखी थी। उस समय का उनका विभूतियों आह्वान जिन-जिनसे था, वह वर्गीकरण आज की परिस्थितियों में भी उतना ही व्यावहारिक है, जितना कि तब था। जब दूरगामी परिस्थितियों की संभावनाओं का वर्णन था। आज तो हम साक्षात् प्रलयंकर उस घड़ी से गुजर रहे हैं, जिनमें चारों ओर त्राहि-त्राहि मची है। ऐसी परिस्थिति में उनका वही आह्वान युगानुकूल मानते हुए पुनः प्रस्तुत किया जा रहा है, ताकि परिजन तृतीय चरण के समापन व चतुर्थ चरण के जुलाई से नवंबर तक की संपन्न होने वाली वेला में अपना मूल्याँकन कर सकें, सभी प्रतिभाशीलों की पहचान उन्हें ‘सृजन संकल्प विभूति कहा यज्ञ’ एवं ‘विभूति ज्ञानयज्ञ’ में अपने संकल्पों के साथ सम्मिलित कर सके।

जिन सात विभूतियों को झकझोरने का, सन्मार्गगामी बनाने कार्य गुरुसत्ता ने हमें सौंपा, उनको इस प्रकार विभक्त किया जा सकता है।

भावना क्षेत्र (धर्म-अध्यात्म) 2. शिक्षा एवं साहित्य 3. कलामंच के भा स्पंदन 4. भौतिकी एवं विज्ञान का तंत्र 5. शासनतंत्र (सत्ताधारी) 6. सम्पादावान् 7. विशिष्ट प्रतिभासंपन्न (बहुमुखी)।

तब परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा था कि युगनिर्माण आँदोलन का प्रथम प्रयास था जनजागरण। अब अगला कदम है विभूतियों को झकझोरना, उन्हें उलझी हुई स्थिति से निकालकर जीवन अथवा मरण में से किसी एक को चुने के लिए विवश करना। आगे वे यह भी लिखते हैं कि अब तक यह अभियान भारत तक विशेषतया हिंदू वर्ग के प्रगतिशील लोगों तक सीमित रहा है। अब इसकी परिधि विश्वव्यापी बनाई जा रही है। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि इसके प्रायः चार वर्ष बाद परमपूज्य गुरुदेव अपने विदेश प्रवास पर गए थे, अगणित प्रवासी भारतीयों को समत्व भरा स्पर्श देकर आए थे। वही समय था, जब हमारे यहाँ से गए पढ़े-लिखे परिजन अपने-अपने देशों में जड़ें जमाने लगे थे। मूल को संस्कारित पूज्यवर कर गए। हम सभी तो सतह से ऊपर का सारा बना-बनाया काम अब श्रेय रूप में संपन्न कर रहे है।

प्रथम विभूति भावना क्षेत्र (धर्म एवं अध्यात्म)-

धर्म-धारणा एवं अध्यात्मिक-साधना का सारा कलेवर खड़ा ही इसलिए किया गया है कि व्यक्तित्व को उत्कृष्ट एवं गतिविधियों को आदर्श बनाया जाए। धर्म, चरित्र गठन का नाम है, तो अपनी क्षमताएँ लोकमंगल के लिए समर्पित करने की पृष्ठभूमि का नाम अध्यात्म है। भावनाएं श्रेष्ठतम हों व लोकमंगल के लिए अर्पित हो तो ही उनकी सार्थकता है।

प्रयास होना चाहिए कि सभी धर्म-संप्रदायों में परस्पर सहिष्णुता और समन्वय की प्रवृत्ति पैदा हो। वे अपने स्वरूप में रहें, पर विश्वधर्म के घटक बनकर रहें। प्रथा-परंपराओं वाले कलेवर को गौण समझें। अपनी परंपराओं में से सभी उत्कृष्ट मानवता, आदर्श सगाज की रचना के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़े। धर्म अध्यात्म क्षेत्र में लगी प्रचुर पूँजी जनशक्ति, भावप्रवणता व प्रभावशीलता का उपयोग सृजनात्मक हो। भावनाशील धर्मधारणा प्रधान लोग अपनी भौतिक व आत्मिक क्षमताओं का उपयोग मानव हितार्थ करें।

द्वितीय विभूति शिक्षा एवं साहित्य का क्षेत्र -

विचारप्रक्रिया पर मानव की गरिमा टिकी है। इस जीवन-प्राण के मर्मस्थल को शिक्षा एवं साहित्य के माध्यम से ही परिष्कृत बनाया जा सकता है। व्यक्ति और समाज के नवनिर्माण में शिक्षा और साहित्य की सृजनात्मकता का नियोजन होना चाहिए। भावपरिष्कार की पूरक धर्मशिक्षा, नैतिक शिक्षा, नवनिर्माण की शिक्षापद्धति का संचालन जनता के स्तर पर होना चाहिए। प्रौढ़ शिक्षापद्धति का संचालन जनता के स्तर पर होना चाहिए। प्रौढ़शिक्षा का कार्य साक्षरता विस्तार भी जनता अपने हाथ में ले। ये सरकारी स्तर पर नहीं, जनस्तर पर ही हल हो सकती है। जनस्तर के विद्यालय-अनौपचारिक विश्वविद्यालय बनें, जिनमें दृष्टिकोण परिष्कार आज की परिस्थितियों में चरित्र-निर्माण का व्यवस्थित पथ, समाज-संरचना की अगणित समस्याओं का हल, विश्व-परिवार के लिए बाध्य करने ले प्रचंड वातावरण का निर्माण करने वाले कार्य संपन्न हों। सरकार से अनुदान न माँगकर भावनात्मक स्तर पर जनता से इसकी पूर्ति की जाए। लाखों जाग्रत आत्माएं लिए शिक्षक इसके लिए खड़े किए जा सकते हैं। हर गाँव-मुहल्ले-बस्ती में लोकशिक्षण की आवश्यकता पूरी करने वाले विद्यालय खड़े हों।

साहित्यकार रचनाधर्मी लेखन करें। कवि मूर्च्छित जनता को जाग्रति में परिणत करने वाले अग्निगीत लिखें। पत्रकार अपने पत्रों में-पत्रिकाओं में रचनात्मक क्राँतिधर्मी लेखों को स्थान दें। भारत की मान्यता प्राप्त 14 एवं विश्वभर की 600 भाषाओं में यह साहित्य प्रकाशित हो। इसके लिए प्रकाशक भी इस क्षेत्र में उतरें।

तृतीय विभूति कलामंच (लोकरंजन से लोकमंगल)-

चित्र, मूर्तियाँ, नाटक, अभिनय, संगीत, धारावाहिक, फिल्में, लोकगीत सभी इस तंत्र में आते हैं। सरल संगीत के ऐसे पाठ्यक्रम बनें, जो वर्षों में नहीं, मात्र कुछ माह में सीखे जा सकें। संगीत विद्यालय जगह-जगह खुले। प्रचंड प्रेरणा भरे गीतों का हर नुक्कड़, हर मंच, टेलीविजन, केबल आदि पर प्रसारण हो। प्रत्येक हर्षोत्सव पर प्रेक गायनों-प्रेरणादायी नुक्कड़ नाटकों की ही प्रधानता हो। संगीत सम्मेलन, गोष्ठियाँ, सहगान कीर्तन, एक्शन साँग, लोकनृत्य व गायन जैसे अगणित सहगान कीर्तन बनें, लोकरंजन की आवश्यकता पूरी करें। प्रेरक प्रसंगों बनें, लोकरंजन की आवश्यकता पूरी करें। प्रेरक प्रसंगों वाले चित्र छपें, चित्र प्रदर्शनी स्थान-स्थान पर लगें। गीतों के ऑडियो कैसेट्स, सी.डी. जन-जन तक पहुँचे। प्रेरक धर्मप्रेरणा प्रधान धारावाहिक एवं फिल्में बनें।

चतुर्थ विभूति विज्ञान तंत्र (भौतिकी)-

नूतन शोधें सृजनात्मक प्रयोजनों तक सीमित रहें। ध्वंसात्मक उपकरण जुटाने में जितने साधन खपाए जा रहें है उन्हें अभाव, शोक-संताप की निवृत्ति हेतु लगा दिया जाए। समुद्री खारा पानी मीठा बनाया जा सकता है। भूगर्भ का मीठा विशाल परिमाण में जल धरती पर लाया जा सकता है। प्रकृति के प्रकोपों से मोरचा लेने हेतु विज्ञान के साधन लगें। वाहनों को सरल व सस्ता बनाया जाए, संचार साधनों का विस्तार हो। विज्ञान अध्यात्म के साथ संगति बिठाकर सिद्ध करें कि शक्तिस्रोत चेतना संकल्पों व आत्मबल में सन्निहित है।

पंचम विभूति शासन तंत्र (सत्ता)-

संकीर्ण राष्ट्रीयता के अपने प्रिय क्षेत्र तथा वर्ग के लोगों को लाभान्वित करने की बात छोड़कर राजतंत्र समस्त विश्व की समान रूप से सुख-शाँति की बात सोचे। वर्गभेद-वर्णभेद की जड़ें उखाड़े तथा युद्धों की भाषा में सोचना बंद कर न्याय का आधार स्वीकार करें। सरकारें अनीति, शोषण, अपराध, रिश्वत, भ्रष्टाचार के वास्तविक शत्रु से जूझे। अपने सरकारी कर्मचारियों में, सत्ता-संचालकों में घुसी अनैतिकता व स्वार्थपरता को जड़-मूल से उखाड़ फेंके व बेकारी, बीमारी, गरीबी दूर करने की दिशा में योजनाएँ बनाएँ। मतदाता अपने दायित्व समझें कि सुयोग्य प्रतिनिधि चुने जा सकें।

षष्ठ विभूति संपदावान-

सर्वोपरि मान्यता इन दिनों पूँजी को मिली है। संग्रहित पूँजी को लोकमंगल के लिए लगाने की दूरदर्शिता धनपति दिखाएँ। संग्रहवाद-अमीरी के दिन लद गए, अब जमाना एकता व समता का है, यह समझाया जाए। जनसाधारण की बचत पूँजी (अंशदान) तथा पूँजीपतियों की धन-संपदा युगपरिवर्तन के प्रवाह में अनुकूलता उत्पन्न करने हेतु नियोजित हो। पूँजी की सुरक्षा के साथ-साथ लाभाँश की सुनिश्चितता समझाई जा सके, तो व्यवसायबुद्धि से संपन्न अगणित व्यक्ति विचारक्राँति अभियान में उल्लेखनीय सहयोग दे सकते हैं।

सप्तम विभूति परिष्कृत प्रतिभा-

स्फूर्तिवान्, सूक्ष्मदर्शी, क्रियाकौशल संपन्न प्रभावशाली व्यक्ति समाज में अगणित हैं। सूझबूझ, आत्मविश्वास, कर्मठता उनमें कूट-कूटकर भरी हैं। ऐसे ही व्यक्ति सफल संत, राजनेता, समाजसेवी, चिकित्सक, व्यवस्थापक होते देखे गए है। सेनानायक, दुस्साहसपूर्ण कार्य करने वाले, क्राँतिकारी स्तर के व्यक्ति इसी तबके से निकलते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने ईश्वरीय अनुदान निरर्थक विडंबनाओं में न खरच कर, नवनिर्माण के प्रयोजन में लगा दें।

निश्चित ही युगपरिवर्तन एक सचाई है एवं उपर्युक्त सातों विभूतियों के आगे आकर सक्रिय होने व उत्तरदायित्व संभालने पर वह साकार होकर रहेगी। महाकाल की सूक्ष्मप्रेरणा भी इन दिनों ऐसी है कि इन सभी विकृतियों को वह झकझोर रहा है। हम-आप उनका एकत्रीकरण कर उन्हें सृजन प्रयोजन में लगा भर दें।


अपनों से अपनी बात-2 - जलते दीपक संपन्न करेंगे यह महापूर्णाहुति

सारा राष्ट्र व विश्व इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। समझदारी इसी में है कि इस समय का उपयोग अपने राष्ट्र के भाग्य और भविष्य का निर्माण करने के लिए किया जाए। श्री अरविंद ने 1904 में एक पुस्तिका लिखा थी ‘भवानी मंदिर’। इसमें उन्होंने चेताया था कि “भारतमाता जो आदि जननी है, असल में पुनर्जन्म लेने का प्रयास कर रही है। असह्य वेदना और आँखों में आँसू लिए है। उसे कठिनाई किस बात की है ? इतनी विशाल होते हुए भी वह अशक्त क्यों है ? अवश्य ही हममें कोई भारी दोष होगा। हमारी पास बाकी सभी चीजें है। बस हम शक्तिशून्य हैं, ऊर्जा का हममें अभाव है। हमने शक्ति को त्याग दिया अथवा शक्ति द्वारा हम त्याग दिए गए। हमारी माता का वास हमारे अंतःकरण में, मस्तिष्क में, भुजाओं में नहीं है।” श्री अरविंद की चेतावनी इस विषय में थी कि बल हमारे अंदर से स्वतः स्फूर्ति हो प्रकटे एवं हम सही माइनों में राजनैतिक-सांस्कृतिक स्वातंत्र्य प्राप्त करें।

आई.सी.एस. की पढ़ाई पूरी कर चुके श्री अरविंद घोष की भारतमाता के विषय में यह बड़ी स्पष्ट मान्यता थी। 30 अगस्त 1905 को उनके द्वारा अपनी पत्नी मृणालिनी देवी को लिखे एक पत्र को यहाँ उद्धृत करने की इच्छा हो रही है, जिसमें उन्होंने राष्ट्रचिंतन को और अधिक स्पष्ट करते हुए लिखा था, “लोग अपने देश को एक जड़ पदार्थ का टुकड़ा समझते हैं-खेत, वन और पहाड़ियों-नदियों के रूप में, लेकिन मैं आपने देश को अपनी माता मानता हूँ। मैं उसकी आराधना करता हूँ, माता के रूप में उसकी पूजा करता हूँ। यदि कोई राक्षस किसी पुत्र की माता की छाती पर चढ़कर उसका खून चूसने लगे, तो वह पुत्र क्या करेगा ? मैं यह जानता हूँ कि मुझ में इस गिरे हुए राष्ट्र को उबारने की ताकत है। शारीरिक शक्ति की बात नहीं, मैं कोई तलवार या बंदूक उठाकर लड़ने नहीं जा रहा, पर मैं ज्ञान की शक्ति से विजय प्राप्त करूंगा।” यह है सही मायने में आस्था-विश्वास, वह भविष्य-दृष्टि जो किसी भी संस्कृति को, राष्ट्र को अमरत्व प्रदान करती है।

आज के भ्रष्ट, नैतिक मूल्यों से रहित समाज को, अविश्वास से भरे सामाजिक जीवन को जब हम देखते हैं, तो मन में संशय उठता है कि कैसे बनेगा यह राष्ट्र भारतवर्ष महान् ? कैसे करेगा यह मार्गदर्शन सारे विश्व का और कैसे उबरेगी मानवजाति ? लगता है कि हम सभी को पुनः भारतवर्ष के प्राण अध्यात्म को, ज्ञान की शक्ति को, जिसकी चर्चा श्री अरविंद ने ऊपर की, पुनर्जागृत करना होगा, इसी प्रेरणा को जन-जन के रग-रग में भरना होगा, तभी होगा खंडहरों में से भारत का पुनर्जन्म। हाँ, इस शीर्षक से लिखी श्री अरविंद की पुस्तक भी साररूप में यही कहती है कि यही भारत की मूल ताकत है एवं विज्ञान की शक्ति के साथ मिलकर यह एक नए वाद ‘वैज्ञानिक अध्यात्मवाद’ की भूमि पर, हमारे परमपूज्य गुरुदेव श्रीराम शर्मा आचार्य जी के शब्दों में, एक नए सशक्त जगद्गुरु के रूप में भारतवर्ष को पुनः इसी इक्कीसवीं शताब्दी में (2057 वि. संवत् से 2065 तक) स्थापित करके रहेगी। क्या यह संभव हो सकेगा ?

इन दिनों सारा विश्व एक अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। जहाँ एक ओर विज्ञान की खोजों ने, उपग्रहों व इंटरनेट के जाल ने उसे एक ‘ग्लोबल ग्राम’ बना दिया है, वहीं व्यक्ति-व्यक्ति के बीच की भावनात्मक दूरी भी बढ़ा दी है। 1902 की 4 जुलाई को स्वामी विवेकानंद के महाप्रयाण से लेकर 1950 की 5 दिसंबर को श्री अरविंद के ब्रह्मलीन होने एवं 2 जून गायत्री जयंती 1990 को परमपूज्य गुरुदेव के सूक्ष्म में विलीन होने तक का समय इसी सहस्राब्दी के अंतिम शतक में बीता, जिसके अंतिम वर्ष से हम गुजर रहे हैं। एक असीम शतक में बीता, जिसके अंतिम वर्ष से हम गुजर रहे हैं। एक असीम संभावनाओं को लिए एक नया वर्ष, एक नई शताब्दी, एक नई सहस्राब्दी हमारा स्वागत करने को तैयार खड़ी है, मात्र दो सौ दिन बाद। इस 98 वर्ष में न जाने कितना जल गंगा में बह गया, वह एक पुण्यतोया सदानीरा भागीरथी से एक छोटे-से गंदे नाले के प्रवाह में बदल गई। न जाने कितना रक्त बह गया इस धरती पर सारे विश्वयुद्ध व सर्वाधिक मौतें इसी एक सदी में हुई। एक प्रश्न पूछती है भारत की एक अजन्मी आत्मा कि क्या मैं सुरक्षित रहूँगी नई सहस्राब्दी में भारतभूमि में जन्म लेकर। हमें उसे आश्वासन ही नहीं देना है, वह वातावरण भी देना है, जिसमें वह जी सके, घुट-घुटकर मर न जाए, जैसा कि उच्चस्तरीय आत्माओं के साथ सदैव होता रहा है।

वस्तुतः यह मानव मात्र के भाग्यनिर्माण की, विश्व के भविष्य निर्माण की वेला है। पिछले अंधकार युग की विभूतियाँ इन दिनों वैज्ञानिक, बौद्धिक, आत्मिक प्रगति का ईंधन पाकर दावानल की तरह भड़क उठी है। ज्वालामुखी संकटों की तरह ऐसे संकट उभर रहे है, जिनके समाधान नहीं सूझते। एक जगह से सीना पूरा हो नहीं पाता, इसके पूर्व दूसरे दस जगह से कथरी फट जाती है। सड़े-गले को गलाने की, ढालने की इन घड़ियों में महाकाल की युगाँतरीय चेतना अधिकाधिक प्रखर होती चली जा रही है। जिनके पास आँखें हों, वे ही आज इस महान् परिवर्तन के पुण्य पर्व का महात्म्य और महत्व समझ सकेंगे अन्यथा इतिहासकार तो इस परिवर्तन काल के घटनाक्रम का उल्लेख करेंगे ही और भावी पीढ़ियाँ इसे रुचिपूर्वक पढ़ेगी भी।

आपत्तिकाल में सामान्य नियम नहीं चलते। इन दिनों विशेष निर्धारण होते हैं, विशेष क्रियाकलाप चलते हैं। मुहल्ले के किसी मकान में आग लगी हो तो सामान्य दैनिक कृत्यों में नहीं उलझा जाता। उस समय विशिष्ट परिस्थितियों का सामना करने के लिए जाग्रतों को जुटना पड़ता है। हानि-असुविधा कुछ भी सहनी पड़े लगना तो पड़ता ही है। जाग्रत् आत्माओं को भी ऐसी संधिवेला में अपना विशिष्ट दायित्व निभाने आगे आना होगा।

साहसिक शूरवीरों की तरह अब नवयुग के अवतरण में जागृतात्माओं की भगीरथ भूमिका आवश्यक हो गई है। इसके बिना तपती भूमि और जलती आत्माओं को तृप्ति देने वाली, सगरपुत्रों को शाप से उबारने वाली गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतरने के लिए सहमत न किया जा सकेगा, यह वस्तुतः देवत्व की प्रतिष्ठा का समय है, जिसमें समूह का बल ही सक्रिय भूमिका निभा सकेगा। नवयुग की योजनाओं को बनाते रहने का समय अब बीत गया। अब तो करना ही शेष है। विचारणा को तत्परता में बदलने की घड़ी आ पहुँची है। भावनाओं का परिपाक सक्रियता में होने की प्रतीक्षा की जा रही है। असमंजस में जीने का समय नहीं है यह।

किया क्या जाए ? कैसे नवसृजन के इस पावन यज्ञ में अपनी आहुति डाली जाए ? इसके लिए ज्ञानयज्ञ की, विचारक्राँति की लाल मशाल जो जनमानस के परिष्कार के लिए प्रज्वलित की गई थी, के प्रकाश को प्रखर बनाने हेतु तत्पर होना पड़ेगा। यह प्रखरता इस मशाल में जिस तेल से आएगी, वह आग्रतात्माओं के भावभरे त्याग-बलिदान से ही प्राप्त किया जा सकेगा। व्यक्ति, परिवार और समाज की अभिनव रचना के लिए न तो साधनों की आवश्यकता है और न परिस्थितियों के अनुकूल होने तक प्रतीक्षा करने की। उसके लिए तो ऐसी प्रखर प्रतिभाएँ चाहिए, जिनकी नसों में भावभरा ऋषिरक्त प्रवाहित हो रहा हो। उनके लिए जिस धातु की आवश्यकता है, वह आदर्शों के प्रति अटूट आस्था की भट्ठी में ही तैयार होती है। इससे कम में भावनात्मक नवसृजन हो नहीं सकता। अष्टधातु के ढले प्राणवान् व्यक्तियों की ही इन दिनों आवश्यकता पड़ रही है। वे छद्मवेशधारी लूटने-खसोटने वालों की अनगढ़ भीड़ में कहीं दुबके पड़े हैं या आत्मविस्मृति के गर्त से उबरे हेतु सही समय की राह देख रहे हैं। विचारक्राँति अभियान की प्रतिभा परिष्कार योजना, विभूति नियोजन प्रक्रिया इसी निमित्त एक विराट् धर्मानुष्ठान के समापन पर एक महापूर्णाहुति की वेला के रूप में सामने आई है। लोकसेवा के व्यापक क्षेत्र में न जाने कितने पाखंडी घात लगाए बैठे दिखाई पड़ते हैं, एन.जी.ओ. के नाम पर सेवा का दंभ भरते दिखाई पड़ते हैं। पर प्रकाश तो हमेशा जलते दीपकों से ही होता है। ऐसे जलते दीपकों को महापूर्णाहुति के विभिन्न चरणों में दीपयज्ञों की आभा में टटोला व पुनः प्रज्वलित किया जा रहा है, स्नेह का घृत डालकर उनकी प्रखरता को जीवंत रखने का प्रयास युगचेतना द्वारा संपन्न हो रहा है।

गायत्री परिवार के अब तक के इतिहास में ऐसा महापराक्रम से भरा अवसर पहली बार आया है, जब सारे राष्ट्र ही नहीं, विश्व को मथा जा रहा है। प्रतिभाओं का गहन मंथन कर नवनीत निकाला जा रहा है। यह वर्ष महापूर्णाहुति वर्ष है, गुगसंधि महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति, एक शताब्दी के सामरिक पुरुषार्थ की महापूर्णाहुति। अगला वर्ष युगचेतना के भरती पर अवतरण के 75 वें वर्ष की रजतजयंती के रूप में मनाया जाने वाला है। सभी जानते हैं कि ‘अखण्ड दीपक’ के रूप में युगचेतना नए युग का संदेशा लेकर धरती पर 1923 की वसंत पंचमी 18 जनवरी की ब्रह्ममुहूर्त की पावन वेला में आई। साथ ही परमवंदनीय माताजी भी धरती पर इसी वर्ष आश्विन कृष्ण चतुर्थी के पावन दिन अवतरित हुई। इस वर्ष को तीसरा सौभाग्य मिला श्री अरविंद के द्वारा भागवत् चेतना के धरती पर अवतरण का वर्ष घोषित करने के रूप में। इस वर्ष के अंत के आते-आते श्री अरविंद ने अपने को पूरी तरह बहिरंग गतिविधियों से खींच लिया था।

महापूर्णाहुति का अंतिम चरण 29 जनवरी वसंत पंचमी 2001 से आरंभ होकर 1 जून गायत्री जयंती तक चलेगा। यह समय आते-आते भारतवर्ष अपने विराट रूप में अपनी संतानों के माध्यम से पुनः प्रतिष्ठित होगा। युगचेतना के अवतरण की रजतजयंती निश्चित ही भारत ही नहीं, सारे विश्व के पुनर्जागरण का पावन संदेश लेकर आ रही है। उसके पूर्व का समय हम सबके लिए भारी जिम्मेदारी भरा, विशिष्ट अवसरों से युक्त एवं समूह मन की उच्चस्तरीय साधना का समय है। कोई भी जागृतात्मा इस पावन सुयोग से वंचित न रहने पाए।


अपनों से अपनी बात-3 - संभागीय महापूर्णाहुति के बाद अब है तीन स्तरों वाला अति महत्वपूर्ण चतुर्थ चरण

इस पत्रिका के पाठकों के पास पहुँचने तक संभागीय स्तर की राष्ट्रव्यापी 108 महापूर्णाहुतियाँ समाप्त हो चुकी होंगी। भारत से बाहर विदेश की धरती पर ऐसे विराट् चौबीस आयोजन संपन्न होने हैं, जो वहाँ की परिस्थितियों के अनुरूप 18 जून 2000 से 22 जनवरी 2001 तक की अवधि में लगभग चौबीस देशों में आयोजित हो चुकेंगे। राष्ट्रव्यापी 108 संभागीय पूर्णाहुतियाँ एक प्रकार से पूरे राष्ट्र की संघनात्मक मंथन प्रक्रिया के प्रथम चरण का समापन है। इन 108 स्थानों में राष्ट्र का कोई भी कोना छोड़ा नहीं गया है। जहाँ दक्षिण भारत के चैन्नई, बैंगलोर, हैदराबाद में ये कार्यक्रम हुए हैं, वहीं पूर्वोत्तर के सिलिगुड़ी, कलकत्ता, वीरगंज में, पश्चिम के जम्मू, श्रीगंगानकर, जोधपुर, भुज में भी ये संपन्न हुए हैं। उत्तर में पालमपुर, शिमला, टेहरी, अलमोड़ा आदि क्षेत्रों में भी पूर्णाहुति संपन्न हुई है। राष्ट्रजागरण तीर्थयात्रा जो प्रायः चौदह रथों द्वारा 90 दिन में प्रायः पचास हजार से भी अधिक मील की यात्रा संपन्न कर पूरे राष्ट्र के चप्पे-चप्पे में गायत्री महाशक्ति का बीजारोपण कर चुकी थी, का इससे सुँदर समापन क्या हो सकता था।

अपने-अपने क्षेत्र की जिम्मेदारी उठाने के संकल्प जिन जाग्रत् प्रज्ञापुत्रों ने लिए हैं, उन्हीं को अब अगले मोरचे के लिए तैयार होना पड़ रहा है। सात आँदोलनों के माध्यम से समाज व राष्ट्र के नवनिर्माण को संकल्पित युग निर्माण योजना, उन प्रतिभाओं की बाट जोह रही है, जिन्हें इस वर्ष गाँव, ब्लॉक, जिला व संभाग स्तर पर चली मंथन प्रक्रिया के माध्यम से खोजा गया है। कभी संस्कृति की सीता को खोजने भगवान् श्रीराम ने हनुमान को भेजा था एवं वे अपने स्वामी की कसौटी पर खरे उतरे, ठीक उसी तरह इस युग के श्रीराम ने अपने प्रज्ञापुत्रों व प्रज्ञापुँजों रूपी हनुमानों को उन प्रतिभावानों की तलाश हेतु गहन आध्यात्मिक पुरुषार्थ करने को प्रेरित किया, जो समाज की विभिन्न जिम्मेदारियाँ अपने कंधों पर उठा सकें। महापूर्णाहुति में जलते दीपों की ऊष्मा से बारह वर्ष से गरम हो रहे प्रत्यक्ष व परोक्ष जगत् में वे प्रचंड हिलोरे जन्म ले रही है, जो उस चक्रवात को जन्म देंगी, जिसका नाम प्रज्ञावतार है। समष्टिगत विभूतियों का, वरिष्ठ स्तर के प्राणवानों के परिष्कृत चिंतन के रूप में ही इस युग का निष्कलंक अवतार, ऋतंभरा प्रज्ञा की स्थापना के रूप में आ रहा है।

गायत्री जयंती या ज्येष्ठ पूर्णिमा तक समाप्त हुए इस तृतीय चरण के बाद अब चतुर्थ चरण गति पकड़ेगा। इसमें तीन पुरुषार्थ संपन्न होने है। 1 जुलाई से 1 अक्टूबर तक की तन माह की अवधि में पूरे भारत में स्थान-स्थान पर डेढ़ दिवसीय प्रतिभा-परिष्कार प्रधान बुद्धिजीवी वर्ग के एवं संगठनात्मक प्रज्ञामंडलों के कार्यक्रम संपन्न होने है। इन कार्यक्रमों को चुने हुए स्थानों पर किया जाएगा। जहाँ कहीं तृतीय चरण ने गति पकड़ी होगी, कहीं संभावनाएँ दिखाई पड़ेंगी, वहीं पर विभिन्न समाजसेवी संगठनों के समूहों, रोटरी कल्ब, लायन्स क्लब, भारत विकास परिषद्, फिक्की, चेंबर ऑफ कॉमर्स, आय.एम.ए. विद्यार्थी संघ, शिक्षक संघ, प्रज्ञामंडल, स्वाध्याय मंडलों के माध्यम से ये कार्यक्रम संपन्न होंगे। उनसे तृतीय चरण में हुए कार्य को स्थायित्व मिलेगा, साथ ही स्थान-स्थान की अनछुई प्रतिभा को नए सिरे से युगचेतना के प्रवाह में जुड़ने का अवसर भी प्राप्त होगा।

इसके तुरंत बाद 13 अक्टूबर शुक्रवार को शरद् पूर्णिमा के पावन दिन सायं 5 से 9 जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम नई दिल्ली में एक विशिष्ट विभूति ज्ञानयज्ञ समारोह होना है। इसमें 108 स्थानों में से प्रत्येक से चुनी हुई 100-100 विभूतियाँ एवं प्रायः पच्चीस हजार विशिष्ट जिम्मेदारी उठाने वाले कार्यकर्त्ता सम्मिलित होंगे। भारत के राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री महोदय की गरिमामय उपस्थिति के साथ सभी धार्मिक व स्वैच्छिक संगठनों के प्रमुख जो रचनाधर्मी कार्य से जुड़े हैं, इसमें सम्मिलित होंगे। सभी देशों के राजदूतों को भी उसमें आमंत्रित किया जा रहा है। इसी अंक में वर्णित सात विभूतियों के प्रमुख कर्णधारों को भी इसमें आमंत्रित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण विभिन्न चैनलों से हो, यह भी प्रयास हो रहा है। लक्ष्य एक ही है एक ही मंच से सभी जाने कि उज्ज्वल भविष्य किस तरह आ रहा है।

चतुर्थ चरण का अंतिम समापनपरक समायोजन समारोह 7 से 11 नवंबर की तारीखों में ‘सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ’ के रूप में शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ हरिद्वार एवं इसके आसपास के प्रायः चौबीस मील के क्षेत्र में संपन्न होगा। 28, 29, 30 अप्रैल को शाँतिकुँज में विशिष्ट कार्यकर्त्ताओं के एक सम्मेलन में इसकी विस्तृत रूपरेखा बना ली गई है। यह आयोजन भी आमंत्रित विशिष्टों के लिए होगा, जो अपने क्षेत्र की महती जिम्मेदारी अगले दिनों सँभालने जा रहे हैं। वे कुछ विशिष्ट समयदान, श्रमदान, साधनादान मिशन के उद्देश्यों की पूर्ति के निमित्त करने जा रहे हैं।

एक विषमता से भरे समय की समापन वेला समीप आ रही है। संभागीय, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर के तीन समारोहों से निश्चित ही नूतन इक्कीसवीं सदी का सतयुगी स्वरूप उभरकर आएगा।


आत्मदीपक जल रहे हैं।

(माया वर्मा)


आत्मदीपक जल रहे हैं (kavita)

आत्मदीपक यह प्रभो ! तुमने जलाए जल रहे हैं। कर्म का जो पथ दिखाया, प्राण उस पर चल रहे हैं॥

पूज्यवर तुमने कहा था, अंश अपना दे रहा हूँ। कष्ट में घबरा न जाना, नाव तो मैं खे राह हूँ॥

साथ हो हरदम इसी विश्वास में हम पल रहे हैं। कर्म का जो पथ दिखाया, प्राण उस पर चल रहे हैं॥

हम जहाँ जाते वहीं संदेश देते सुदृढ़ मन से। त्याग दो दुष्प्रवृत्तियां साथी ! रहो सुख से अमन से॥

रहो बचकर विविध आकर्षण सभी को छल रहे हैं। कर्म का जो पथ दिखाया, प्राण उस पर चल रहे हैं॥

है जहाँ फैला अँधेरा ज्योति लेकर चल रहे हैं। ज्योति को रखने अखंडित स्नेह से हम जल रहे हैं॥

मेट देंगे कलुष वह विषवृक्ष बन जो फल रहे हैं। कर्म का जो पथ दिखाया, प्राण उस पर चल रहे है॥

है सक्रिय संजीवनी जो हमें दीक्षा में पिलाई। जल रही है ज्योति जो मन-प्राण में तुमने जगाई॥

लालिमा दिखने लगी है, तिमिर के कण गल रहे हैं। कर्म का जो पथ दिखाया, प्राण उस पर चल रहे हैं॥

मार्ग जो तुमने बताया उसी पर चलते रहेंगे। स्नेह से जलते रहेंगे, बीज से गलते रहेंगे॥

सृजनहित बलिदान होने, हृदय नित्य मचल रहे हैं। कर्म का जो पथ दिखाया, प्राण उस पर चल रहे हैं॥

*समाप्त*