होली आई है, तो इसकी हिलोरें भी उठेंगे ही । इनकी छुअन हर एक के मन को अपने रस में भिगो देती है, डुबो देती है । अंतराल में स्नेहानुभूति के अक्षय स्रोत से खुलने लगते हैं । ये हिलोरें जिन्हें भी छूती है उन्हीं को लगता है कि वे किसी हिंडोले में झूल रहे है । होली के उल्लास के महासिंधु में खुद भी हिलोरें ले रहे है । कुछ ऐसा लगता है जैसे जीवन के हार अंखुवे से नई शाख फूट पड़ी हो । उमंग में उमगते हुए मन आतुर-आकुल होने लगता है, इस उल्लास को बाँटने के लिए । बस क्या दे डालूँ ? यही व्याकुलता-व्याकुल करने लगती है सभी को ।
प्रेमानुभूति में सनी-मस्ती में डूबी यह व्याकुलता अति दुर्लभ है । जीवन में अनेकों भाव पनपते हैं और तिरोहित हो जाते हैं । इनके प्रभाव व सीमाएँ भी सीमित होती है । खुशियाँ अन्य दिनों में भी आती है, प्रेमरस में अन्य दिनों भी मन भीगता है, पर इसकी परिधि प्रायः व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन तक सिमटी-सिकुड़ी रहती है । पर होली में तो जैसे प्रेमभरी मस्ती का महासिंधु हिलोरें लेता है । जिसकी प्रत्येक लहर के छूने भर से जाति, धर्म, वंश, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब आदि सभी भेद-भाव की दीवारें टूटती-ढहती-विनष्ट होती चली जाती है । होली की उमंगें बढ़े और विकसित हो, यह आवश्यक है, पर जितनी प्रबल वह हो, उतनी ही सबल जीवनसाधना भी होनी चाहिए । प्रबल धारा को सबल किनारे ही दिशा दे सकते हैं । धारा धीमी हो अथवा कूल कमजोर, दोनों ही अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति में बाधक है । दोनों सबल और सशक्त मों तो प्रेम की महाशक्ति का महाप्रयोग हो सकने की व्यवस्था बनती है ।
प्रेम की महाशक्ति का अमर्यादित उपयोग अथवा उसका सीमाबद्ध रह जाना अकल्याणकारी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है । होली की हिलोरें जीवनसाधना के स्पर्श से सुनियोजित और सुव्यवस्थित हो जाती है । फिर उन्हें जहाँ जितनी मात्रा में प्रवाहित करना हो किया जा सकता है । ऐसा यदि बन सके तो संसार की विविधता-विषमता के रूप में नहीं, होली की रंग-रंगीली मस्ती के रूप में सामने आएगी । मन के मलाल धुल जाएँगे स्नेह का गुलाल सब पर छा जाएगा, बस आनंद आ जाएगा । जो सामने आए, मन का मैल मिटाकर उसी पर अपना प्रेम उड़ेल दें । दोनों सराबोर हो जाएँ, होली की हिलोरें यदि इस तरह हमें भिगो दे, तो जीवन पहेली नहीं एक रंगोली बन जाए ।
उस साल लड़के की सरदी थी । इस सरदी के साथ ही तुषारापात होने से वन-उपवन, पेड़-पौधे सभी सुख गए । हरियाली का एक तिनका भी नजर नहीं आता था । ऐसे में भला देवमंदिरों में पूजा-अर्जुन के लिए पुष्प कहाँ से मिलते ? सभी हताश थे और साथ में हतप्रभ भी । किसी की समझ में ही नहीं आ रहा था कि वे अपने गुरु एवं इष्ट की अर्चना कैसे करें ?
किन्तु न जाने कैसे सुदास माली के सरोवर में एक कमल खिल उठा । ऐसा विहँसता हुआ कमल तो कभी शरदऋतु में भी नहीं खिला था । सुदास का हृदय प्रसन्नता से उमंग उठा, क्योंकि अब उसे मनमाना मूल्य पाने का अवसर सुलभ हो रहा था ।
प्रातः होते ही उसने कमल का फूल तोड़ लिया । उसे लेकर वह राजमहल की ओर चल पड़ा । राजभवन के द्वार पर पहुँचकर उसने राजा को संदेश भेजा । संदेश में कहलवाया कि वह एक ऐसा कमलपुष्प लाया है, जो बेजोड़ और बहुमूल्य है ।
तभी एक आगंतुक उधर से आ निकला । कमल पुष्प पर नजर पड़ते ही वह उस पर मुग्ध हो गया । उसने माली से पूछा-”क्या यह बिक्री के लिए है ?” माली बोला “मैं तो इसे महाराज को अर्पित करने के लिया लाया हूँ ।”
“पर मैं तो इसे महाराजाधिराज को अर्पित करना चाहता हूँ ।” आगंतुक ने कहा ।
“मैं आपका तात्पर्य नहीं समझा ।”
“दरअसल बात यह है कि भगवान् तथागत आज इस नजर में पधारे है । तुम तो अपने इस पुष्प का मूल्य बताओ ।”
“मैं तो इसके बदले एक सुवर्ण मुद्रा पाने की आशा लेकर आया हूँ ।”
“मुझे यह मूल्य स्वीकार है ।” आगंतुक के स्वर में उत्साह आ गया ।
उसी समय अचानक महाराज प्रसेनजित नंगे पाँव राजमहल से निकले । वे भी भगवान् तथागत के दर्शनों के लिए जा रहे थे ।
सुदास माली के हाथों में यह अनोखा कमलपुष्प देखकर वे बड़े आनंदित हो गए । वहीं रुकते हुए उन्होंने पूछा-”माली इस पुष्प का क्या मूल्य लगाते हो ?”
“राजन ! पुष्प तो मैं इन्हें बेच रहा हूँ ।”
“किस मूल पर ?”
“एक सुवर्ण मुद्रा के बदले ।”
“मैं तुम्हें इस सुवर्ण मुद्रा देता हूँ ।”
“तो मैं बीस दूँगा ।” आगंतुक महाराज का अभिवादन करते हुए बोला ।
कोशल नरेश भौचक्के रह गए । उन्हें चकित होते देखकर आगंतुक कहने लगा-”आज हम दोनों ही भगवान बुद्ध के दर्शन हेतु जा रहे है । इस समय हम दोनों ही उनके भक्त है । न राजा, न प्रजा, अतएव आप मेरी इस धृष्टता को क्षमा करेंगे ।”
उदारमना महाराज प्रसेनजित के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई । वह बोले-”सच कहते हो भक्तराज, किंतु मैं चालीस सुवर्ण मुद्राएँ दूँगा ।”
“तो मैं अस्सी दूँगा ।”
कमलपुष्प की इस तरह बढ़ती हुई कीमत देखकर माली चकित था । उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह पुष्प अचानक ही इतना कीमती कैसे हो गया । अगले ही पल उसके मस्तिष्क में न जाने क्या विद्युत-सा कौंध गया और निश्चय के स्वर में उसने कहा-”आप लोग मुझे क्षमा करें । मैं किसी भी मूल्य पर यह बिक्री नहीं करूंगा ।”
इतना कहकर वह चल पड़ा । नगर के बाहर निकलकर वह सोचने लगा, जिन भगवान बुद्ध के लिए एक साधारण पुष्प की इतनी अधिक कीमत चुकाने के लिए उनके भक्त तैयार है । क्यों न मैं यह पुष्प उनके हाथों बेचकर मुँह माँगा मूल्य पाऊँ ।
भगवान बुद्ध की खोज करते-करते वह उस जगह आ पहुँचा, जहाँ वे वटवृक्ष के नीचे पद्मासन में बैठे हुए थे । अहो ! क्या अलौकिक सौंदर्य है ! क्या नेत्र है इस तपस्वी के !! इन नयनों से तो करुणा झर रही है । सुदास माली विस्मय−विमुग्ध हो एकटक उस महातपस्वी को देखता ही रह गया । फिर जैसे होश आते ही वह आगे बढ़ा और उस कमलपुष्प को उसने उस परमतेजस्वी तपस्वी के चरणों में अर्पित कर दिया ।
भगवान् बुद्ध मुस्कराए । बोल उठे-”क्या चाहते हो वत्स ?” “भगवान ! मेरी अब और कोई कामना नहीं है ।” माली ने अवरुद्ध कंठ से कहा, “बस आप मुझे अपना लें।” प्रभु की मुस्कान जैसे स्वीकृति का संदेश थी । वह उनका होकर सब कुछ पा गया । आज उसे कमलपुष्प का ही नहीं, अपने जीवन का सार्थक मूल्य मिल गया । अब वह तथागत की करुणा से स्नात था ।
जिस प्रकार जलीय जंतु सरोवर और सागर में रहते हैं, उसी प्रकार हम ऊर्जा के महासागर में रह रहे है । यहाँ का प्रत्येक पदार्थ ऊर्जावान है । उसके कण-कण से यह निस्सृत होती और समस्त प्राणियों को प्रभावित करती है ।
ऊर्जा के संदर्भ में पदार्थों की दो प्रकार की प्रकृति होती है-लाभकारी एवं हानिकारक । कुछ पदार्थ ऐसे है, जिनसे लाभकारी ऊर्जा निकलती है, फलतः मनुष्य के लिए उनका सान्निध्य उत्तम माना जाता है, जबकि कई पदार्थ अपनी नकारात्मक ऊर्जा तरंगों के कारण कष्टकारक होते हैं, इसलिए ऐसे पदार्थों से परहेज करना और दूरी बनाए रखना आवश्यक होता है । दैनिक जीवन में आदमी यदि इस तथ्य की उपेक्षा करे, तो स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से उसे दो-चार होना पड़ सकता है ।
यों तो वस्तुओं की अच्छी-बुरी तरंगें काफी हद तक मनुष्य की समझ पर निर्भर है, अतएव यह कहना गलत न होगा कि साधारण बुद्धि द्वारा उसमें हेर-फेर संभव है । कमरे में ढेर सारी चीजें पड़ी रहती है-कुछ अव्यवस्थित । अरविंद आश्रम की श्री माँ कहा करती थी कि व्यवस्थित ढंग से रखी हुई वस्तुओं से उत्पन्न होने वाली तरंगें मन को सरसता और शाँति प्रदान करती है । इसके विपरित इधर-उधर अस्त−व्यस्त पड़ी चीजों से निकलने वाली ऊर्जा तरंगें निषेधात्मक प्रकृति की होती है, इसलिए ऐसे स्थानों पर निवास करने वाले लोगों के मन में वह उमंग और उत्साह नहीं दिखाई पड़ता, जो आमतौर पर दिखलाई पड़ना चाहिए । इसी कारण से सज्जा, सुव्यवस्था और स्वच्छता को अध्यात्म का एक अविच्छिन्न अंग माना गया है और उसे सुविकसित व्यक्तित्व के अनुरूप बतलाया गया है ।
जिस प्रकार वस्तुओं की अस्तव्यस्तता नकारात्मक तरंगें पैदा करती है, उसी प्रकार कई बार स्थान विशेष भी अपनी अप्रिय तरंगों के लिए कुख्यात होते हैं । मरघट, कब्रिस्तान आदि ऐसी ही जगहें है । उनके आस-पास रहने या उधर से होकर गुजरने से मन में भय, रोमाँच, शंका, निराशा जैसी मनःस्थिति पैदा होती है, जो उस सीमाक्षेत्र को पार करते ही स्वतः शाँत हो जाती है । ऐसे ही मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे जैसी उपासना स्थलियों में निवास करने से मन उत्फुल्लता से ओतप्रोत रहता है । चेतना विज्ञानियों का इस संबंध में मत है कि दीर्घकालीन मानवी गतिविधियाँ स्थानीय तरंगों की प्रकृति को अपने स्वभाव के अनुरूप प्रभावित-परिवर्तित करती या यों कहें कि उन पर हावी हो जाती है, तो अत्युक्ति न होगी । इस प्रकार किसी स्थान पर लंबे काल तक चलने वाले जप, तप, ध्यान, व्रत, अनुष्ठान वहाँ की तरंगों को अपने अनुरूप मोड़ लेते हैं । इसके विपरीत जहाँ हर प्रकार की दुरभिसंधियाँ रची जाती या हत्या, व्यभिचार, अत्याचार, उत्पीड़न जैसे पाप किए जाते अथवा उनकी योजनाएँ बनाई जाती है, वहाँ की अवाँछनीय तरंगें व्यक्ति के मन-मस्तिष्क पर सवार होकर उन्हें तद्नुरूप दुरित करने के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करती है ।
पृथ्वी से निकलने वाली ऊर्जा तरंगें या विकिरण समान प्रकृति वाली स्थानीय तरंगों से मिलकर और प्रबल हो उठती है और वहाँ निवास करने वाले मनुष्यों को ही नहीं, पशुओं एवं वनस्पतियों तक को प्रभावित करती है ।
सन् 1980 में जर्मन भौतिकशास्त्री अन्स्ट हार्टमैन ने धरती से निकलने वाले इस ऊर्जा ग्रिड को मापने के लिए एक अति सुग्राहक यंत्र बनाया । इसका नाम ‘लोब एंटीना’ रखा गया । इस उपकरण के माध्यम से पिछले दिनों यह जाना जा सका कि जैवविद्युत, चुँबकीय ऊर्जा ग्रिडस् बीस प्रकार के होते हैं, जिनमें से चार मनुष्य के लिए अत्यधिक उपयोगी और महत्वपूर्ण है । पृथ्वी के धरातल से संवाहित होने वाली ऊर्जा को ‘टेलुरिक ऊर्जा’ कहते हैं । चुँबकीय दृष्टि से यह ऊर्जा तरंगें उत्तर-दक्षिण तथा पूरब-पश्चिम दिशा में संकेंद्रित होती है । वास्तुशास्त्र वास्तव में इन्हीं ऊर्जा तरंगों के दोहन और स्वास्थ्यसंवर्द्धन, सफलता, शाँति एवं उन्नति की दिशा में उनके उपयोग का नाम है । प्राचीनकाल में इसलिए भवननिर्माण के समय उक्त तथ्य का बराबर ध्यान रखा जाता था, ताकि नकारात्मक ऊर्जा तरंगों से सुरक्षा और सकारात्मक तरंगों से लाभान्वित हुआ जा सकें । लंबे अध्ययनों से यह विदित हुआ है कि समय के प्रहर विशेष से इस ऊर्जा-प्रवाह का गहन संबंध है और उस दौरान इसकी तीव्रता अत्यंत उच्च तथा सकारात्मक होती है । कदाचित् इसी कारण से शास्त्रों में ब्रह्ममुहूर्त में जागने पर इतना बल दिया गया है और उसके मध्य पूजा-उपासना की इतनी महत्ता बताई गई है, ताकि उस प्रवाह का अधिकाधिक उपयोग स्वास्थ्य संवर्द्धन और आत्मिक उन्नयन की दिशा में किया जा सकें । मानवेत्तर प्राणी इस ऊर्जा ग्रिडस् के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं । अनुसंधानों से ज्ञात हुआ है कि चींटी, दीमक, सर्प जैसे जीवधारी सदा नकारात्मक ऊर्जाक्षेत्र में रहते हैं, जबकि कुत्ते, घोड़े, गाय, बकरी जैसे पालतू जीव सदैव सकारात्मक ऊर्जाक्षेत्र को पसंद करते और उसमें सुख अनुभव करते हैं । अध्ययनों से यह भी पता चला है कि भूकंप आने से लगभग बारह घंटे पूर्व टेलुरिक ग्रिडस् पृथ्वी के अंदर की भूकंपीय हलचलों को ग्रहण कर लेते हैं, जिसके कारण उसमें स्पष्ट रूप से परिवर्तन आ जाता है । मानवेत्तर प्राणी इस सूक्ष्म परिवर्तन को पकड़ लेते हैं । यही कारण है कि भूकंप से पहले उनमें एक अजीब बेचैनी दिखाई पड़ने लगती है । इसलिए भवननिर्माण के समय इस बात पर विशेष रूप से विचार किया जाता है । साथ-साथ यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि उसमें कोई ऐसी सामग्री या पदार्थ न लग जाए, जो नकारात्मक ऊर्जा-स्रोत हो । विशेषज्ञ बताते हैं । कि ग्रेनाइट, क्वार्ट्ज एवं कुछ विशेष प्रकार के रत्नों से ऐसी तरंगें उद्भूत होती है, जो काया पर अप्रिय प्रभाव डालती और रक्तसंचरण से लेकर मस्तिष्कीय गतिविधियों तक में अवरोध पैदा करती है, किन्तु विडंबना यह है कि आज ये बड़प्पन के प्रतीक बने हुए है और आदमी सब कुछ जानते-समझते हुए भी इन्हें मकानों, दुकानों और गहनों में लगाकर गौरवान्वित अनुभव करता है । यह ठीक नहीं । इसके विपरित कई ऐसे पदार्थ भी है, जो ऐसे ऊर्जाक्षेत्र का निर्माण करते हैं, जिन्हें लाभकारी कहा गया है । बालू,, पत्थर, संगमरमर आदि ऐसी ही वस्तुएँ है । इनका सामीप्य स्वास्थ्यवर्द्धक होता है । यही कारण है कि साधना-उपासना, ध्यान जैसे आत्मोत्थानपरक उपचार नदियों, पहाड़ों पर करने का आप्तवचन है । आजकल इसकी उपेक्षा हो रही है, अतः उस लाभ से वंचित रह जाना पड़ता है ।
सूर्यकिरणें प्राकृतिक ऊर्जा की अजय स्त्रोत है । इसी प्रकार अग्नि और दीपक भी सकारात्मक ऊर्जा के उत्तम उद्गम है यह असीम ऊर्जा संवहन करते हैं, अतएव भारतीय संस्कृति में पूजा-आरती एवं दूसरे धार्मिक कर्मकाँडों के समय दीप प्रज्वलित करने एवं हवन-यज्ञ करने का प्रावधान है । विषम संख्या में दीप प्रज्ज्वलन से ऊर्जामय वातावरण का निर्माण होता है-इस तथ्य की जानकारी ही वास्तव में उस प्रचलन के मूल में सन्निहित है, जिसमें प्रत्येक धार्मिक किया-कृत्य में विषम संख्या में दीप जलाने का विधान है । लौ की संख्या सम होने पर ऊर्जा-संवहन निष्क्रिय हो जाता है-इस बात का भी भलीभाँति ज्ञान हमारे पूर्वजों को था । अखण्ड दीप, अखण्ड अग्नि जैसे प्रावधानों के पीछे भी यही निहितार्थ है कि उनसे निकलने वाली सूक्ष्म ऊर्जा-तरंगों से लाभान्वित हुआ जा सके । जहाँ इस प्रकार की व्यवस्थाएँ है, वहाँ के वातावरण में हर कोई कुछ असाधारण अनुभव कर सकता है । यह कहने की नहीं, अनुभव करने की बात है ।
फूल, धूपबत्ती, अगरबत्ती जैसे तत्व भी ऊर्जा के अच्छे ओर उच्च संवाहक है । ऐसे वातावरण में रहने वालों के जैव विद्युत चुँबकीय ऊर्जा में अद्भुत वृद्धि देखी गई है । किरलियन फोटोग्राफी द्वारा किए गए अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि रंग-बिरंगे ओर सुगंधित पुष्पों वाले उद्यान में कुछ समय बिताकर बाहर आने वाले लोगों का प्रभामण्डल असामान्य रूप से बढ़ जाता और शरीर के चारों ओर उसका विस्तार अधिक व्यापक हो जाता है । यही बात धूपबत्ती, अगरबत्ती जैसे सुगंधित द्रव्यों के संदर्भ में भी देखी गई है । भीनी सुगंध वाली धूपबत्ती-अगरबत्ती के संपर्क में थोड़े समय तक रहने पर भी आभामंडल में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है, जो इस बात की प्रतीक है कि उसके जैव विद्युत चुंबकीय ऊर्जाक्षेत्र में अभिवृद्धि हुई है । शायद इसीलिए सुगंधित पुष्पों से युक्त प्राकृतिक वातावरण स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है । इतना ही नहीं, जप-ध्यान के कक्ष में इन्हें रखने पर संभवतः इस कारण से बल दिया जाता है , ताकि इनसे निस्सृत होने वाली ऊर्जा तरंगों से जप-ध्यान द्वारा उद्भूत ऊर्जा को बढ़ाने में अतिरिक्त सहायता मिले और साधक थोड़े-से प्रयास से अधिक ऊर्जावान बन सकें ।
अब आसपास के वातावरण में ऊर्जा क्षेत्र के विभिन्न स्तरों को मापना संभव हो गया है । इसके लिए लेसर एंटीना एवं बायोमीटर नामक दो प्रकार के यंत्र इस्तेमाल किये जाते हैं । दोनों में बायोमीटर अधिक प्रचलित एवं प्रसिद्ध है । इसे दो फ्राँसीसी वैज्ञानिक अंतायेन बोविस तथा आँद्रे सिमाँटन ने विकसित किया था, अस्तु ऊर्जा की इकाई ‘बोविस’ प्रचलित हो गई । उक्त उपकरण द्वारा किसी भी स्थान, वस्तु या व्यक्ति से संबंधित ऊर्जा आसानी से मापी जा सकती है । इस स्केल में एक स्वस्थ मानवी काया को ऊर्जा 9500 बोविस मापी गई है । इससे अधिक ऊर्जा उसके योगाभ्यासी होने की सूचक है और कम इस बात की ओर संकेत करती है कि वह बीमार है । उक्त यंत्र द्वारा जब षट्चक्रों के ऊर्जास्तर को नापा गया, तो उनमें 9900 बोविस से लेकर 14000 बोविस तक ऊर्जा देखी गई । विभिन्न धर्मों के उपासनास्थलों का जब तुलनात्मक अध्ययन किया गया, तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ा कि उनमें से हरएक में सकारात्मक ऊर्जापुँज विद्यमान था और उनका स्तर सामान्य स्थानों की तुलना में काफी बढ़ा-चढ़ा था । उदाहरणार्थ, चर्च में क्रॉस के गिर्द लगभग 10000 बोविस ऊर्जा का पता चला । चर्च के घंटे से भी करीब इतनी ही ऊर्जा निकलती है । यह ऊर्जास्तर मानव−शरीर में हृदय के आसपास ‘अनाहत चक्र’ के समीप देखा गया । मस्जिदों में इसका स्तर 11000 बोविस रिकार्ड किया गया है, जो गले में स्थित ‘विशुद्धि चक्र’ की ऊर्जा के बराबर है । तिब्बती मंदिरों के गर्भगृह में यह माप लगभग 15000 बोविस के करीब होता है । यही भ्रूमध्य स्थित आज्ञाचक्र का ऊर्जास्तर है । तिब्बती परंपरा के प्रार्थनाचक्र यंत्र की स्थिति ऊर्जा की दृष्टि से काफी उच्च मानी गई है । शोध-अध्ययनों के दौरान यह 12000-14000 बोविस ऊर्जा उत्सर्जित करता पाया गया । शिव मंदिरों में शिवलिंग के निकट ऊर्जास्तर सर्वोच्च होता है । अनुसंधानों में यह 19000 बोविस एवं उससे अधिक प्राप्त हुआ । यही स्तर ‘शून्य चक्र’ अथवा सहस्रार का है ।
इसी प्रकार धार्मिक प्रतीकों, चिह्नों का जब अध्ययन किया गया, तो उनमें विद्यमान् ऊर्जा की प्रकृति न सिर्फ सकारात्मक थी, अपितु उसका स्तर भी अत्यंत उच्च था । स्वस्तिक चिह्न में यह ऊर्जा दस लाख बोविस पाई गई, जबकि उलटे बने स्वस्तिक में ऊर्जा-परिमाण तो उतना ही था, पर वह नकारात्मक था । इसके विपरित हिटलर द्वारा प्रयुक्त स्वस्तिक में ऊर्जास्तर अपेक्षाकृत कम था और वह एक हजार बोविस के बराबर था। इससे स्पष्ट है-क्यों भारतीय संस्कृति में इस चिह्न का इतना महत्व है और क्यों इसे धार्मिक कर्मकाँडों के दौरान, पर्व-त्यौहारों में, अल्पनाओं एवं मुँडन के उपराँत छोटे बच्चों के मुँडित मस्तक पर, गृहप्रवेश के दौरान दरवाजों पर और नए वाहनों की पूजा-अर्चा के समय वाहन पर इसे पवित्र प्रतीक के रूप में अंकित किया जाता है ।
इतना स्पष्ट हो जाने के उपराँत अब यह असमंजस करने की तनिक भी गुंजाइश नहीं है कि क्यों किन्हीं मकानों, स्थानों, दुकानों, पदार्थों और प्रतीकों के संपर्क में आकर व्यक्ति की मनःस्थिति गड़बड़ाने लगती है, जबकि किन्हीं अन्य वस्तुओं, व्यक्तियों, तीर्थों और भवनों के सान्निध्य में रहकर उसका मन उल्लास से भर उठता है । कारण एक ही है-उनके द्वारा विकीर्ण होने वाली उत्कृष्ट या निकृष्ट स्तर की ऊर्जा तरंगें ।
मानव−शरीर एक रेडियो रिसीवर की तरह है । अन्य जीवधारियों की तरह वह पदार्थ और प्रकृति में संव्याप्त ऊर्जा तरंगों को महसूस तो नहीं कर पाता; पर उसकी हर कोशिका उस सान्निध्य से प्रभावित होती है
उस दिन सिंगापुर के फरेरा पार्क में प्रवासी भारतीयों ने एक विराट् सभा का आयोजन किया था । यह सभा भारतमाता के बहादुर सपूत, देशभक्तों के सिरमौर, आजादी के दीवाने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के स्वागत में आयोजित की गई थी । नेताजी उन दिनों दक्षिण पूर्व एशिया का तूफानी दौरा कर रहे थे और कर रहे थे और देशभक्ति भारतीयजनों का ज्यादा-से-ज्यादा धनदान करने के लिए प्रेरणा दे रहे थे ।
आज नेताजी के लिए एक ऊँचा मंच सजाया गया था । वे उस मंच पर अपने मंत्रियों और आजाद हिंद फौज के अफसरों से घिरे खड़े होकर भाषण दे रहे थे । उपस्थित जनसमुदाय मंत्रमुग्ध होकर उनका भाषण सुन रहा था । हर किसी में स्वदेश की सेवा के लिए अपार उत्साह और जबरदस्त जोश दिखाई पड़ रहा था । तालियों की गड़गड़ाहट और नेताजी अमर रहें, इंकलाब जिंदाबाद, आजाद हिंद फौज जिंदाबाद आदि नारों से सारा आकाश गूँज रहा था ।
इन आकाशभेदी नारों के बीच नेताजी के पवित्र उद्गार अग्नि की भाँति प्रखर शब्दों में प्रकट हुए-मेरे प्यारे भारत माँ के सपूतों ! अपने देश की आजादी अब ज्यादा दूर नहीं है । लेकिन उस तक पहुँचने के लिए आपको अपना सर्वस्व लुटाना होगा । पूरी फकीरी के बिना आजादी मिल नहीं सकती । अतः मैं चाहता हूँ कि आप लोग अपने सर्वस्व का उत्सर्ग करें । भारतमाता ने आपको-अपनी लाड़ली संतानों को पुकारा है । क्या उनकी कराह आपके कानों में प्रवेश नहीं करती ? क्या उनका रुदन आपके दिलों को नहीं बेधता ? अपनी आहुति दिए बिना, कष्ट-बलिदान के बिना देश की स्वाधीनता महज एक सपना बनकर रह जाएगी । मुझे आप लोग अपना धन और खून दीजिए, मैं आप सबको आजादी दूँगा ।
नेताजी के मुख से शब्दों के रूप में धधकते अग्नि-पिंड अभी भी झर रहे थे-यह आजादी ऐसी होगी, जिसमें हमारी संस्कृति और हमारी मान-मर्यादा सुरक्षित होगी। ऐसी आजादी, जिसमें लोगों को रहने के लिए आवास, शरीर ढकने के लिए आवश्यक कपड़े और खाने के लिए पर्याप्त भोजन की सहूलियत होगी । सारे देशवासी अपने पर्याप्त भोजन की सहूलियत होगी । सारे देशवासी अपने जातीय विद्वेष एवं मजहबी अलगाव को भूलकर देशप्रेम एवं इनसानियत के प्रबल प्रवाह में बह जाएंगे । मित्रो ! देश की स्वाधीनता का मार्ग फूलों की सेज नहीं है । इस पथ पर चुभने वाले ढेरों काँटे बिछे है । किन्तु इन सभी के अंत के आजादी का पूर्ण विकसित फूल है, जो अपनी ओर आने वाले थके यात्री की प्रतीक्षा कर रहा है । अतः मैं आप सबका, भारतमाता के पुत्र और पुत्रियों का आह्वान करता हूँ कि आजादी के इस पावन संघर्ष में आप अपना सर्वस्व न्यौछावर करें । जयहिंद !
आजादी के महानायक सुभाषचंद्र बोस अपना भाषण समाप्त करके एक ऊँची-सी कुरसी पर बैठ गए । उनकी वाणी में पता नहीं कैसा जादू था कि देखते-ही-देखते आजाद हिंद फौज के लिए धनदान करने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी । सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों की संख्या में लोग आकर रुपये, गहने दान में देने लगे । अपरिमित उत्साह के बावजूद सभी अनुशासनबद्ध थे । वे सबके सब करताबद्ध होकर नेताजी के पास बारी-बारी से आ रहे थे और उन्हें यथाशक्ति दान देकर प्रसन्न मन से लौटे रहे थे ।
अजीब समा था । देश की स्वाधीनता के लिए अद्भुत आत्मत्याग का मानो महासिंधु उमड़ चला था । लाखों-लाख रुपये दान में मिल रहे थे । नारियाँ भी इस क्रम में पीछे नहीं थी । धन देने के साथ वे अपने बेशकीमती आभूषण उतारकर दे रही थी । दाताओं की कतार लगातार बढ़ती ही जा रही थी । जो जहाँ था, नेताजी का आवाहन सुनते ही अपना सब कुछ लिए उन्हें सौंपने के लिए भागा बड़ा उत्साह, सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए इतना उल्लास, विश्व के इतिहास में शायद खोजने पर भी न मिले ।
महान् सेनानी सुभाषचंद्रबोस प्रवासी भारतवासियों की इस अपूर्व देशभक्ति से विमुग्ध थे, अभिभूत थे । तभी अचानक उन्होंने भीड़ को चीरकर मंच पर चढ़ने का प्रयास करती हुई एक स्त्री को देखा । वह बिलकुल फटेहाल थी । उसके कपड़े प्रायः तार-तार हो रहे थे । उसकी काया भी अति दुर्बल थी । किन्तु उसी आँखों में एक चमक थी । वे गंभीर हो गए । उनके चेहरे पर भावों की अनेक लकीरें बनने-मिटने लगीं । उपस्थित जनसमुदाय भी अपनी साँसें रोके उस गरीब नारी को देखे जा रहा था । नेताजी के साथ आजाद हिंद फौज के अधिकारी भी अचरज में थे । सभी के मनों में यही कुतूहल था कि देखें, यह स्त्री क्या कहती है । क्या देती है !!
वह स्त्री धीरे-धीरे चलते हुए नेताजी के पास आई ओर उसने फटेहाल धोती के आँचल से एक के बाद एक कई गाँठो को खोलकर तीन रुपये निकाले और भावविह्वल होते हुए उसने ये रुपये नेताजी के पाँवों के पास रख दिए । नेताजी भावविमुग्ध, विस्मय−विमुग्ध से उस परमदरिद्र नारी के महान् त्याग एवं परम उज्ज्वल देशप्रेम से चकित और अभिभूत हो, उसे देखते रह गए । एक पल-दो पल तीन पल इसी तरह न जाने कितने पल-क्षण बीत गए । वह चित्रलिखित से खड़े उसे अपलक निहारते रहे । तभी उस भावप्रवण नारी के साथ जोड़कर उनसे कहा-नेताजी, इसे आप स्वीकार कर लीजिए । आपने राष्ट्रदेवता के लिए सर्वस्व दान करने के लिए कहा है । मेरा यही सर्वस्व है, इसके अलावा मेरे पास और कुछ भी नहीं । मैंने जिस किसी तरह पेट काटकर इन्हें बचाया है । मैं आपको अपनी जीवन भर की कमाई सौंपने आई हूँ ।
सभा में उपस्थित जनसमुदाय स्तब्ध था । लगा जैसे समूचे वातावरण की हवा तक थम गई है । कुछ यूँ लग रहा था जैसे वह फटेहाल महिला अनवरत प्रकाशित रहने वाले ज्योतिपुंज में बदल गई है । और आयोजन का हर कोना उसी से आलोकित हो रहा है ।
फिर भी महानायक सुभाष मौन रहे । उन्हें इस स्थिति में देखकर उस नारी की आँखें भर आई । वह कुछ निराश होते हुए बोली-”क्या आप मुझे गरीब के इस तुच्छ से दान को स्वीकार करेंगे ? क्या भारत माँ की सेवा करने का गरीबों को अधिकार नहीं है ?” इतना कहते हुए वह नेताजी के पाँवों में लिपट गई ।
नेताजी के धैर्य की दीवार रेत की मानिंद ढह गई । उनकी आंखों से आँसू झरने लगे । उन्होंने बिना कुछ कहे अपना दाहिना हाथ बढ़ाकर रुपये उठा लिए । उस स्त्री की खुशी का ठिकाना न रहा । उसकी आँखें चमक उठीं, गर्व से छाती फूल उठी और वह उन्हें प्रणाम करके चली गई ।
उसके जाने के बाद नेताजी की विचित्र मनःस्थिति और उनके अंतर्द्वंद्व को पास खड़े एक अधिकारी ने भाँप लिया । उसने जानना चाहा-नेताजी ! उस गरीब और विपन्न महिला से तीन रुपये लेते हुए आपकी आँखों से आँसू क्यों झरने लगे थे ?
नेताजी विह्वल स्वर में कहने लगे-”मैं सचमुच बहुत असमंजस में पड़ गया था । उसे देखते ही मैं जान गया था कि यह अत्यंत दीन महिला है । इन तीन रुपयों के अलावा उसके पास कुछ भी नहीं होगा । सचमुच यही इसका सर्वस्व होना चाहिए । यदि मैं इन्हें भी ले लूँ तो इसका सब कुछ छिन जाएगा । फिर कैसे यह अपना जीवन काटेगी और यदि नहीं लूँ तो इसकी भावनाएँ आहत होंगी । देश की स्वाधीनता के लिए यह अपना सब कुछ देने आई है । इसे इनकार करने पर पता नहीं वह क्या-क्या सोचती ? हो सकता है, वह यही सोचने लगती कि मैं केवल अमीरों के ही धन को स्वीकार करता हूँ । यही सब सोच-विचार करके मैंने यह दान-महादान स्वीकार कर लिया । उसका यह दान अब तक के समस्त दानों से कई गुना बढ़-चढ़कर है ।”
आयोजन समाप्त हो गया । परंतु नेताजी का हृदय भावनाओं में भीगा था । वह सोच रहे थे कि अपने देशवासियों में बहुसंख्यक जन यदि इस महिला के हृदय में उठने वाली भावनाओं का स्पर्श पा सकें, तो भारतमाता फिर से अपना खोया गौरव वापस पा जाए ।
सृष्टि की संरचना एवं उसकी गतिविधियाँ इतनी अनोखी और अचरज भरी है कि इसके सृजेता की महिला को सिर नवाकर स्वीकारना ही पड़ता है । समूचा ब्रह्मांड ही महाशून्य में स्थित है । इसी में अपना सौरमंडल है, जिसमें धरतीमाता भी एक छोटी-सी सदस्य है । इस अनंत ब्रह्मांड में असंख्य आकाशगंगाएँ, नक्षत्र, तारे, ग्रह-उपग्रह, निहारिकाएँ एवं आकाशीय पिंड सतत् घूम रहे है । सबके सब अपनी-अपनी स्थिर कक्षाओं में स्थापित है । यही है उस महान् जादूगर की जादूगरी । परन्तु इनके बीच जरा-सा भी व्यतिक्रम आ जाने से प्रलयंकारी दृश्य आ खड़े होते हैं । आकाश में ऐसे अनेकों आकाशीय पिंड है, जो अपनी मस्ती में आवारागर्दी करते रहते हैं । यही यदा-कदा विनाश व विध्वंस का कारण बनते हैं । इसके बावजूद धरती व जीवन का सुनियोजित चक्र चलना किसी महाचमत्कार से कम नहीं है ।
अपना सौरमंडल शून्य-सागर में तैर रहा है । सूर्य के पश्चात् सर्वाधिक निकट तारा चार प्रकाशवर्ष की दूरी पर है । चार प्रकाशवर्ष यानि 200 खरब मील की दूरी । अपना सूर्य भी एक खास तरह का तारा है, जो आकाशगंगा के विशिष्ट भाग में रहता है इस आकाशगंगा में लगभग 100 अरब तारे है, जिसमें कई तो सूर्य से भी भी सैकड़ों गुना बड़े है । इस क्षेत्र में गैसीय बादल, धूल, धूमकेतु, ग्रह, उपग्रह तथा ब्लैकहोल भी है आकाशगंगा इन अंतरिक्षीय पदार्थों से भरी रहती है । बीच-बीच में यह उभरी हुई-सी लगती है । इसके कई सर्पिल अंग है, जो गैस व तारों के बने रहते हैं । अपना सूर्य भी इसके एक ऐसे ही सर्पिल अंग पर अवस्थित है । आकाशगंगा के केंद्र से इसकी दूरी तीस हजार प्रकाशवर्ष है । अपने सौरमंडल से आकाशगंगा के दृश्य भाग की दूरी इस लाख प्रकाशवर्ष है ।
इस विराट् ब्रह्मांड में लाखों आकाशगंगाओं का अनुमान किया गया है । जिनकी आकृति सर्पाकार, दीर्घ वृत्ताकार तथा अन्य विभिन्न प्रकार की होने का आकलन है । इनका विस्तार ब्रह्मांड के विशाल क्षेत्र में है । पर दूरी इतनी है कि इनका प्रकाश अपनी धरती तक आने में करोड़ों प्रकाशवर्ष लग जाते हैं । हाँ इन्हें विशिष्ट वैज्ञानिक उपकरणों से जरूर देखा-जाना जा सकता है । अपनी सबसे निकटतम आकाशगंगा का नाम ‘एंड्रोमेटा’ है । इसकी दूरी 20 लाख प्रकाशवर्ष है । यह एंड्रोमेटा तारामंडल की दिशा में स्थित है । इसका धुँधला प्रकाश आँखों से भी देखा जा सकता है । एम-100 आकाशगंगा पृथ्वी से 400 लाख प्रकाशवर्ष की दूरी पर है । 29 नवंबर 1883 को इसके बारे में विस्तृत जानकारी मिली थी । आकाशगंगा जब अपनी बाल्यावस्था में होती है, तो यहाँ पर सुपरनोवा की घटनाएँ तेजी से होती है । यह प्रक्रिया दस लाख वर्ष में 20,000 बार होती है । अपनी आकाशगंगा में अब तक करोड़ों सुपरनोवा दृश्य उपस्थित हो चुके है । यह संख्या साढ़े चार अरब पूर्व जब सूर्य की उत्पत्ति हुई थी, उस काल को दर्शाती है । ऐसे विस्फोट अधिकतर आकाशगंगा के सर्पिल अंगों पर ज्यादा होते हैं ।
ये आकाशगंगाएँ भी स्थायी न होकर परिवर्तनशील है । इनके तारे नाभिक की परिधि में आते हैं और ये घूमने लगती है । सूर्य अपने सौरमंडल के ग्रहों के साथ आकाशगंगा का एक चक्कर लगाने में 20 करोड़ वर्ष का समय ले लेता है । यह परिभ्रमण बड़ा ही अद्भुत होता है । मार्ग में आने वाले तारे धूमकेतुओं के बादलों को साफ कर देते हैं और कुछ को सूर्य की ओर बिखेर देते हैं । धूमकेतु सौरमंडल के अंदर से निकलता है, इस कारण सूर्य उसके भीतर स्थित वाष्पशील पदार्थों को भाप बना देता है । इतना ही नहीं सौरपवन इसकी लंबी पूँछ के कुछ भाग को उड़ा देता है । तारों एवं धूमकेतु में आपसी टकराहट की संभावना बहुत कम रहती है, परंतु इसके निकटवर्ती निकलने वाले तारों से होती है बृहस्पति का विशाल पिंड उपग्रहों एवं आकाशीय पिंडों की परिधि में विघ्न पैदा करता है । यह किसी एक को सूर्य की ओर धकेल देता है, जिससे पृथ्वी पर भयंकर संकट होने की संभावनाएँ बन जाती है ।
आकाशगंगा के रास्ते में अन्य पिंड भी मिल जाते हैं । यहाँ गैस के विशाल बादल भी उड़ते रहते हैं । ये बादल सौरपवन की दिशा को बदलने में भी समर्थ होते हैं । इतना ही नहीं ये सूर्य से आने वाली ऊष्मा के प्रवाह को भी प्रभावित करते हैं । अंतरिक्ष के विस्तार में न्यूट्रोन तारे, आकाशीय पिंड, ब्लैकहोल आदि समाए रहते हैं । ये अचानक ही सौरमंडल में प्रवेश का संकट उपस्थित कर देते हैं । ‘डेथस्टार’ के नाम से जाने जाने वाले आकाशीय पिंड तो अपनी प्रबल गुरुत्वाकर्षण शक्ति के द्वारा धूमकेतुओं को भी खंडित कर देते हैं । यह भयावह दुर्घटना समूचे अंतरिक्ष के लिए घातक परिणाम उपस्थित कर देती है । भू-वैज्ञानिकों के अनुसार प्रत्येक 30 करोड़ वर्ष के पश्चात् भयंकर अंतर्ग्रहीय परिवर्तन होता है, जो पर्यावरण विनाश का कारण बनता है इन विज्ञानविदों के अनुसार यह समय सन् 2000 के आसपास हो सकता है । आज से चार अरब वर्ष पूर्व जब जीवन की उत्पत्ति हुई थी, उस समय ऐसे ही परिवर्तन से धरती पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो गई थी ।
365 दिनों में सूर्य की एक परिक्रमा लगाने वाली पृथ्वी को सबसे अधिक संकट आवारागर्दी करने वाले आकाशीय पिंडों से होता है । ये उल्कापिंड कभी भी पृथ्वी से टकरा सकते हैं । सन् 1908 में साइबेरिया के ताँगुस्का क्षेत्र में पाँच मील का एक विशाल धूमकेतु गिरा था । इसकी विस्फोटक क्षमता 20 मेगाटन थी । इससे 700 वर्ग मील का समूचा जंगल विनष्ट हो गया था । नासा के एक नवीनतम सर्वेक्षण के अनुसार एक हजार से चार हजार पिंड पृथ्वी के कक्ष के आसपास मँडरा रहे है । इनका क्षेत्रफल आधे मील से भी कम है । इनमें से मात्र 150 पिंडों की ही पहचान हो सकी है । नासा के ही एक अन्य वैज्ञानिक दल के अनुसार पृथ्वी के दायरे में तकरीबन 3 लाख पिंडों में से तीन सौ ऐसे है, जो ताँगुस्का सदृश भीषण तबाही मचा सकते हैं इतना ही नहीं लगभग 10 प्रतिशत उल्का पिंड पृथ्वी के लिए घातक एवं विध्वंसक हो सकते है । एक किलोमीटर व्यास के एक पिड में लाखों मेगाटन की ऊर्जा हो सकती है इनकी टकराहट पृथ्वी के पर्यावरण तंत्र के विनष्ट करने में समर्थ है ।
इन उत्पाती पिंडों का पता लगाने के लिए एरिजोना विश्वविद्यालय के अंतरिक्ष विभाग के टाम गहेरल्स ने एक विशेष टेलिस्कोप का निर्माण किया है । इसके माध्यम से वह अनेकों आकाशीय पिंडों का अध्ययन कर चुके है गहेरल्स का सर्वेक्षण अत्यंत भयप्रद है । इनके अनुसार सन् 2024 तक इनकी गति तेजी से पृथ्वी की ओर होगी । गहेरल्स का मानना है कि 100 मीटर व्यास के लगभग 3 लाख तथा 20 मीटर व्यास 10 करोड़ पिंड है अगर इनकी टकराहट धरती के साथ होती है, तो ये काफी कुछ परिवर्तन कर सकते हैं जो कुछ भी हो, ये पिंड शाँत एवं समुन्नत धरती को हमेशा आँखें दिखाते रहते है एरिजोना के ही यूजीन शूमेकर ने अपनी पत्नी कैरोलीन के साथ मिलकर लगभग तीन सौ उल्काओं का पता लगा है इन्होंने इनका नाम अपने परिवार के सदस्यों के नाम पर रखा है । सन् 1973 में शूमेकर ने भूगर्भशास्त्री इलिनर हेजलीन के साथ विश्व के सुनियोजित वेग वाले पहले पिंड का पता लगाया ।
16 से 22 जुलाई 1994 के दिन, अंतरिक्षीय घटनाओं के इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज करा गए । इस दौरान अपने विराट् सौरमंडल के सबसे विराट् ग्रह बृहस्पति से 21 पर्वताकार पिंड लगातार छह दिनों तक टकराए । इनकी क्षमता लाखों मेगाटन के बराबर थी । ये पिंड 60 किमी. प्रति सेकेंड के वेग से टकराए एवं वहाँ 24 किमी. का गहरा गड्ढा बना गए । इससे 400 किमी. की गैसपट्टी समाप्त हो गई । इन 21 विस्फोटों की संयुक्त ऊर्जा 200 लाख मेगाटन के बराबर थी । शूमेकर नामक यह पिंड सात जुलाई 1992 को बृहस्पति से 25,000 किमी. की दूरी पर था । फिर बृहस्पति के वायुमंडल से टकराकर यह 21 खंडों में बँट गया । इनका टकराव इतना भयावह था कि यदि यह घटना बृहस्पति के बजाया पृथ्वी पर होती तो पृथ्वी का विनाश हो गया होता ।
सन् 1992 में मेक्सिको का यूकेटेन प्रायद्वीप का 176 किमी. क्षेत्र ऐसे ही अंतर्ग्रहीय परिवर्तन के कारण अचानक प्रभावित हो गया था । संभवतः 650 लाख वर्ष पूर्व ऐसे ही उल्कापात से हुए परिवर्तन के कारण डायनासोर्स का अस्तित्व मिट गया था । नासा के अनुसार 1993 में 3.4 किमी. की एक उल्का धरती से 350 लाख किमी. दूरी पर थी । अचानक इसकी दिशा पृथ्वी की ओर मुड़ गई इससे एक भीषण दुर्घटना होती, तभी इसकी दिशा में पुनः परिवर्तन हुआ और यह धरती के पास से गुजर गई । सन् 1997 में ऐसे ही एक अन्य पिंड का पता लगाया गया था, जो पृथ्वी की ओर 56,000 मील प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ रहा था । परन्तु अचानक ही इसकी दिशा में परिवर्तन हुआ और यह कहीं गायब हो गया । सन् 1932 में सूर्य और पृथ्वी के बीच के कक्ष में घूमने वाले एक पिंड की पहचान हुई थी । इसका वेग 54,000 मील प्रति घंटा था । इसमें 5 लाख मेगाटन शक्ति होने की संभावना है, जबकि हिरोशिमा में गिराए गए बम की क्षमता 0.95 मेगाटन थी । अगर यह धरती पर आ गिरे तो वायुमंडल में 5 मील गोलाई का छेद हो जाएगा । इसकी सीमा के आने वाले पत्थर, वृक्ष, वनस्पति, प्राणी सभी गैस बनकर उड़ जाएंगे ।
दिसंबर 1997 में अंतरिक्षवेत्ता इलिनर हेलीन ने स्वच्छ आकाश में एक पिंड को धरती की ओर अग्रसर होते देखा । इसका नाम ग्थ् 11 रखा गया । यह अकेले 108 पिंडों की विध्वंसक क्षमता रखता है । इलिनर का मानना है कि ग्थ्11 ‘मिस डिसटेंस् ऑफ जीरो’ के तहत पृथ्वी के टकराया तो पृथ्वी के पर्यावरण में तीव्र परिवर्तन हो सकते हैं, संभव है कि पृथ्वी के पर्यावरण में तीव्र परिवर्तन हो सकते हैं, संभव है कि पृथ्वी फिर से आदिम सभ्यता की ओर मुड़ जाए । एरिजोना यूनिवर्सिटी के जीन स्काटी के अनुसार ग्थ् 11 प्रति 21 माह में सूर्य के अति निकट से गुजरता है । यह सन् 2028 में पृथ्वी से 5 लाख मील दूर होगा ओर 26 अक्टूबर 2028 के दिन 1.30 बजे 23,000 मील तक आ जाएगा । इस दूरी में यह पृथ्वी से टकराकर विस्फोट कर सकता है । वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सन् 2126 में 10 किमी. चौड़ा धूमकेतु ‘स्वीफ्ट टटल’ धरती से टकरा सकता है । यदि ऐसा हुआ तो पृथ्वी को 10,000 से 1,00,000 वर्ग मील का सफाया हो जाएगा । लास आल्मोरा नेशनल लैबोरेटरी के जेकहिल्स के मतानुसार यदि ग्थ् 11 अटलाँटिक में जा गिरा तो हजारों मील के तटीय क्षेत्र 8 से 10 किलोमीटर का अतिक्रमण कर जाएँगे और वहाँ केवल कीचड़-ही-कीचड़ नजर आएगा ।
कैलीफोर्निया की लारेंस लिवरमोर लैबोरेटरी के वैज्ञानिकों ने ‘कॉस्मिक बंबाईमेंट’ नामक एक शोधपत्र में उल्लेख किया है कि इन उल्कापातों एवं आकाशीय पिंडों से धरती कभी भी विनष्ट हो सकती है । परन्तु इतने भयावह संकटों से घिरकर भी पृथ्वी में जीवन का अस्तित्व है । यह तथ्य आश्चर्यजनक किंतु सत्य है, जो सृष्टिकर्त्ता की नियामक शक्ति एवं विधि व्यवस्था का प्रमाण प्रकट करता है । ब्रह्मांडीय संरचनाएँ एक ओर तो चकित करती है, परंतु दूसरी और यहाँ होने वाली विलक्षण-विनाशकारी घटनाएँ डरा-सहमा भी जाती है वस्तुतः विनाश तो सृष्टिकर्त्ता का कालदंड है जो अपने इंगित से हमें सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित और विवश करता है । इस सन्मार्ग पर चलने का सुफल ही उज्ज्वल भविष्य है, जिसकी हम सभी धरतीवासी इक्कीसवीं सदी के आगमन के साथ ही प्रतीक्षा कर रहे है । यह प्रतीक्षा तभी सार्थक एवं सफल होगी, जब हम यह समझ सकें कि इस अनंत एवं विराट् ब्रह्मांड के छोटे-से ग्रह में निवास करने वाले इनसान को उस समर्थ सृजेता की महिमा पहचाननी ही होगी, ताकि उसका अहंभाव नष्ट हो और वह परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ बना रहे । यह कृतज्ञता हमारे समुज्ज्वल जीवन का आधार एवं पर्याय है ।
नारी की कोमल संवेदना के बिना जीवन ही नहीं जग भी अधूरा है । उसका अस्तित्व केवल आधी दुनिया तक ही सिमटा नहीं है, बल्कि समूची दुनिया उसी के गर्भ से जन्मती और उसी के हाथों उसका लालन-पालन होता है । यों तो उसे अबला कहने और समझने का प्रचलन रहा है, इतना ही नहीं अपने असीम भावभरे अनुदानों के बदले उसे प्रायः शोषण-उत्पीड़न ही सहना पड़ा है । किंतु उसमें प्रतीक्षा, कौशल, शौर्य, बलिदान एवं तपत्याग की कमी नहीं है । जब भी उसे अवसर मिले है, उसने नए प्रतिमान कायम किए है । सहस्राब्दी के इतिहास में नारी चेतना का यह गौरव अपनी विशेष चमक लिए हुए है । इसका आकलन इस बात का भरोसा दिलाता है कि भविष्य में भी वह समूची मानवजाति को उत्कृष्ट दिशाबोध एवं समर्थ संबल-संरक्षण देने में समर्थ है ।
इतिहास के पृष्ठ बताते हैं कि सहस्राब्दी की प्रथम सदी में देश की उत्तरी राज्य काश्मीर का कुशल प्रशासन रानी दिद्दा के हाथों में था । दक्षिण भारत में अक्का देवी ने 1015 ई. में, रानी मैला देवी ने 1050 ई. में, रानी कुमकुम देवी ने 1079 ई. में, तथा रानी लक्ष्मीदेवी ने 1100 ई. में चालुक्य प्रशासन में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई । राजपूताने राजकुमारियाँ एवं रानियाँ प्रशासन के साथ युद्ध−कौशल में भी प्रवीण थी । महारानी कुर्मा देवी ने 1195 ई. में कुतुबुद्दीन के आक्रमण के समय उससे डटकर लोहा लिया था । राणासाँगा की विधवा महारानी कर्मवती ने बहादुरशाह के विरुद्ध घमासान युद्ध किया था । राणासाँगा की ही अन्य विधवा रानी जौहरबाई दुर्ग की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुँई थी । अन्य राजपूत वीराँगनाओं में संयोगिता, पहृनी, कर्णावी आदि नारियों के शौर्य एवं बलिदान के किस्से आज भी लोगों की जुबान पर है ।
बारहवीं सदी के आसपास काव्य क्षेत्र में उत्तर भारत की कई महिलाओं ने अपना योगदान दिया । इनमें शिला महणोकर, बीज भाणका, प्रभुदेवी, सुभदा, मारुला आदि के नाम प्रमुख है । दक्षिण भारत में अक्का महादेवी महान् वैष्णव संत होने के साथ कई धर्मग्रथों की सृजेता भी थी । इसके अतिरिक्त रानी शाँतल एवं नयाकुशल आदि ने भी अपनी उत्कट संवेदना को शब्दरूप दिए ।
संक्राँति के प्रथम पर्व पर संत कबीर की अगुवाई में जो भक्ति की लहर उठी थी, इसमें नारीशक्ति ने भी अपनी महती भूमिका निभाई । मीराबाई इस युग की प्रमुख नारी संत थी । उनके अतिरिक्त लल्ला, गंगाबाई, कमाली, माताबाई, दयाबाई आदि नारियाँ इस युग में प्रवाहित हुई नारी चेतना की संवाहक बनी । कला-साहित्य के क्षेत्र में विहार के मिथला अंचल की तीन प्रख्यात महिलाएँ लछिमा देवी प्रथम, लछिमा देवी द्वितीय ओर धीरमती उल्लेखनीय है । कला के क्षेत्र में चंद्रकला देवी, मृगनयन एवं रूपमती भी इसी काल में चर्चित रहीं । दक्षिण भारत में भी कवयित्रियों की एक लंबी शृंखला रही । इनमें चेनम्मा, भंगम्मा आदि प्रमुख रहीं ।
संक्राँति के द्वितीय पर्व में समर्थ सद्गुरु रामदास की पावनभूमि में जीजाबाई ने अपना बलबूते प्रशिक्षित किया । जिन्होंने औरंगजेब के 19 वर्षीय दमनचक्र के बीच देश के साँस्कृतिक गौरव को न केवल प्रदीप्त रखा, बल्कि उसका विस्तार भी किया । अपनी वीरता और कौशल के लिए अहिल्याबाई एवं ताराबाई के नाम आदरणीय है भक्तिचेतना का अलख जगाने वाली नारियों में मुक्ताबाई, जनाबाई, सखुबाई, बेनबाई आदि प्रमुख है । गुजरात-सौराष्ट्र क्षेत्र में कृष्णबाई, गबरीबाई, पुरीबाई, राधाबाई, जानीबाई आदि ने अपनी सार्थक भूमिका निभाई । पूर्वी भारत में प्रशासन के क्षेत्र में विश्वास देवी एवं चाँविग ने असम में, चंद्रप्रभा एवं राजी भवानी ने बंगाल में अपना योगदान दिया । चैतन्य महाप्रभु के भक्ति आँदोलन को तीव्र गति देने में शचीदेवी, विष्णुप्रिया, जाहन्ना, इच्छादेवी एवं हेमलता का योगदान भुला नहीं जा सकता ।
सल्तनत एवं मुगलकाल की मुस्लिम महिलाओं में भी कुछ नाम उल्लेखनीय है । राजकाज के क्षेत्र में रजिया सुलतान, गुलबदन बेगम, नूरजहाँ जहाँआरा बेगम जेबुन्निसा; धार्मिक क्षेत्र में बीबी फातिमा, बीबी जसिरना और वीराँगनाओं में चाँदबीबी प्रमुख रूप से अग्रणी रहीं ।
19 वीं सदी में 1857 में हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नायिका महारानी लक्ष्मीबाई के शौर्य से भला कौन अपरिचित है । स्वयं अंगरेज सेनापति के उद्गार थे-”शी बाज द बेस्ट एण्ड ब्रेव एमंग देम” अर्थात् वह उन सब में सबसे योग्य और बहादुर थी । इसी सदी में ही गौरी पार्वतीबाई एवं मैसूर की रानी केंपनन्जमनी अबरु भी उल्लेखनीय है । उन्नीसवीं सदी में पुनर्जागरण के दौर में जो परिवर्तन की लहर आई, उससे नारीशिक्षा एवं उत्थान का मार्ग और भी प्रशस्त हुआ । इस दिशा में अग्रणी महिलाओं में पंडिता रमाबाई, तारुदत्त, सरलादेवी चौधरी, लेडी अबला बोस, कामिनीराय, स्वर्णकुमारी देवी एवं सरोजनी नायडू आदि ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई । तृतीय संक्राँति के नाक श्रीरामकृष्ण परमहंस की सहधर्मिणी माँ शारदा का उल्लेख किए बिना 19 वीं सदी में महिलाओं की भूमिका की कहानी अधूरी रह जाएगी ।
विश्वपटल पर, पश्चिमी दुनिया में सहस्राब्दी का पूर्वार्द्ध नारियों के लिए नरक का सृजन कर रहा था । जो सोलहवीं सदी में डायन हत्या के रूप में अपने चरम तक जा पहुँचा था । वैसे भी ईसाई धर्मशास्त्रों में नारी को पाप-पतन का कारण मानकर उसे दूसरे दरजे में समेट रखा था । इसके बावजूद इस दौरान अपनी प्रशासनिक कुशलता का लोहा मनवाने वाली महिलाओं में सेक्सन की राजकुमारी एल्गिफू (1010 ई. ), विजेंटिम साम्राज्य की रानी जी )1028 ई.), जेरूसलम की रानी मेलेसेंड (1105 ई.), फ्राँस की रानी ब्लैच (1226 ई.), एवं फ्राँस-इंग्लैंड युद्ध में फ्राँस की किशोरी जॉन ऑफ आर्क के नाम अविस्मरणीय है । इस संदर्भ में इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया के जीवन को भी भुलाया नहीं जा सकता ।
यूरोप में पुनर्जागरण के दौर से नारी के प्रति दृष्टिकोण में तो बदलाव आने लगा, परंतु आम नारी की स्थिति यथावत बनी रही । 18 वीं सदी के अंत में हुई फ्राँस की सामाजिक क्राँति ने स्वतंत्रता, समता एवं लोकतंत्र के आदर्शों को मुखर किया । इससे नारी जगत् भी अछूता न रहा । इसके साथ हुई राजनीतिक, औद्योगिक एवं वैज्ञानिक क्राँतियों ने मिलकर आधुनिक नारी आन्दोलन की नींव रखी । ‘वूमेन एंड पावर इन हिस्ट्री’ में ‘अमीरी दि रिएनफोर्ट’ लिखते है-यह नारी की अपनी नई पहचान की खोज थी । हालाँकि नारी की व्यथा-वेदना एवं अधिकार संबंधी विचारों के 1792 ई. में ब्रिटेन की मेरी वाल्स्टन क्राफ्ट की रचाना ‘ए विंडीकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वूमेन’ में अभिव्यक्ति मिल चुकी थी । परंतु नारी मुक्ति आँदोलन को यथार्थ गति 19 वीं सदी के दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल ने दी ।
उन्होंने तो नारी को बराबरी का दरजा दिए जाने के लिए जंग छेड़ दी । 1830 ई. में अमेरिका में दासप्रथा के विरुद्ध हुए विरोध ने भी महिला आँदोलन को प्रेरित किया । 1858 ई. में प्रथम बार महिला अधिकार सम्मेलन का अमेरिका में आयोजन किया गया । इन सब प्रयासों के परिणामस्वरूप न्यूजीलैंड में सर्वप्रथम 1893 ई. में शुरुआत से ही 1908 व 1911 में यह आँदोलन क्रमशः अमेरिका व इंग्लैंड की गलियों तक आ गा था । परिणामस्वरूप 1920 ई. में अमेरिका व 1928 ई. में इंग्लैण्ड में महिलाओं को मत का अधिकार मिला । भारत में भी सन् 1917 ई. में ‘दि इंडियन वूमेंस सोसाइटी’ बनी । इन्हीं दिनों यहाँ स्वाधीनता आँदोलन जोर पकड़ रहा था ।
स्वाधीनता आँदोलन में भारत में नारियों की भूमिका बढ़-चढ़कर रही । 1925 ई. में सरोजनी नायडू काँग्रेस की अध्यक्ष बनी । 1930 ई. में नमक आँदोलन व 1952 ई. के भारत छोड़ो आन्दोलन में हजारों-हजार महिलाएँ अपनी बलिदानी भावनाओं के साथ आगे आई । इस दौर में अरुणा आसफ अली एवं राजकुमारी अमृतकौर जैसी महिलाओं ने कुशल नेतृत्व किया । दुर्गा भाभी एवं नागारानी गिडालू ने भी इस समय अपने क्राँतिकारी साहस का परिचय दिया ।
बीसवीं सदी में नारी जागरण का जो अंकुर निकला, वह बढ़ता ही चला गया । इसकी पृष्ठीय शारद हैरियट स्टो न तैयार की थी । उन्होंने टाम काका की कुटिया लिखकर दासप्रथा के विरुद्ध जो संवेदना उभारी, वह नारी जागरण की प्राणचेतना भी बन गई । इस दौर में फ्लोरेंस नाइटेंगल ने रेडक्राँस को जन्म देकर सेवा का अद्वितीय काम किया । 1912 में मारिया माँटेसरी ने बालशिक्षा में अपना योगदान दिया । अंधी और बहरी होते हुए भी हेलन कीलर ने अपने जीवन से यह प्रमाणित किया कि नारी कभी हारती नहीं । मैडमक्यूरी ने सन् 1902 एवं 1911 ई. में दो बार नोबुल पुरस्कार जीता ।
इस सदी में नारियों ने अलग-अलग देशों में अपने अनूठे प्रतिमान कायम किए । रूस की वेलेंटिन टेरेरकोवा आकाश में जाने वाली प्रथम महिला बनी । स्वाधीनता के पश्चात् विजय लक्ष्मी पंडित रूस में भारत की राजदूत बनी । राजकुमारी अमृतकौर देश की प्रथम महिला थी, जो केंद्रीय मंत्री बनी । सुचेता कृपलानी ने पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में उत्तरप्रदेश का शासन संभाला । लक्ष्मी एन.मेनन 1957 ई. में भारत की पहली महिला विदेश मंत्री बनी । सरोजनी नायडू देश की पहली महिला राज्यपाल नियुक्त हुई । अन्नाराजम चार्ज 1950 ई. में पहली आई.ए.एस. अधिकारी बनी । ब्रिटेन की रोसलीन हिगिंस पहली महिला हुई, जो अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट की जज बनी । जेरी माक ने 1965 में पहली महिला पायलट के रूप में समूचे विश्व की परिक्रमा लगाई । मारिया एस्टेल परसन ने पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में पदभार सँभाला । 1953 ई. विजयलक्ष्मी पंडित संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला प्रधान बनी । अन वेंक्राफ्ट वह पहली महिला है, जो उत्तरी ध्रुव पहुँची । लिव अर्नसेन इस परम्परा का निर्वाह करते हुए दक्षिण ध्रुव पहुँचने वाली पहली महिला बनी ।
अपने देश में जिन महिलाओं ने योग्यता के प्रतिमान स्थापित किए, उनमें सर्वप्रथम एवं सर्वप्रमुख श्रीमती इंदिरा गाँधी है, जो अपने जीवनकाल में एवं मृत्यु के बाद भी शौर्य एवं प्रशासकीय योग्यता के लिए याद की जाती है । कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने अपने आकलन एवं सर्वेक्षण के बाद उन्हें शताब्दी की महानतम महिला भी घोषित किया । उनका अनुकरण करते हुए अन्य महिलाएँ भी आगे बढ़ी । प्रेममाथुर पहली महिला पायलट बनी । दुर्वा बनजी ऐसी पहली महिला पायलट हुई, जिन्होंने इंडियन एयरलाँइस के विमान उड़ाए । बछेंद्रीपाल माउंट एवंरेस्ट विजेता बनी, तो सौदामनी देशमुख जेट कमाँडर । किरन बेदी पहली महिला आई.पी.एस. है । आरती साहा देश की पहली महिला के रूप में इंग्लिश चैनल विजेता बनी । कमलजीत संधु ने देश की पहली महिला के रूप में सन् 1950 में एशियाड स्वर्णपदक जीता । हरिता कौर दिओल ने 1994 ई. में महिला पायलट के रूप में अकेले उड़ान भरी और अभी कुछ ही समय पहले डॉ. कल्पना चावला अंतरिक्ष में जाने वाली अपने देश की प्रथम महिला बनी ।
नारी चेतना ने सहस्राब्दी में इतनी उपलब्धियाँ अर्जित की है कि अब निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि भावी सदी नारी के विकास की सदी नहीं, नारी के वर्चस्व की सदी होगी । उसकी संवेदना उसकी प्रत्येक उपलब्धि में घुलकर, जीवन को एक अनूठी भावमयता-तरलता प्रदान करेगी । उसके इसी सद्गुण एवं मौलिकता के बल पर ही तो विधाता ने उसे भावी युग की निर्मात्री घोषित किया । इक्कीसवीं सदी में नारीशक्ति के जागरण का-नारीसदी का उद्घोष स्वयं सृजेता की पुकार है, जो समूची विश्वचेतना में स्पंदित होने लगी है ।
मंत्रजप के समय अर्थ की भावना और चिंतन भी आवश्यक है । साधारण स्थिति में यह स्वाभाविक रूप से भी चलता रहता है । उदाहरण के लिए, ॐ का जप करने पर निर्गुण-निराकार परमात्मा का स्मरण होता है, राम नाम जपने पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की छवि मन में आनी चाहिए, महामृत्युँजय जप में शिव के ब्रह्मस्वरूप की झाँकी का ध्यान किया जाता है और दैवीमंत्रों में भी संबंधित इष्ट की भावना उत्पन्न होती है । लेकिन यह अर्थ की भावना है, मंत्र का अर्थ नहीं है । अर्थचिंतन उस मंत्र के शाब्दिक अनुवाद और उसमें निहित प्रेरणाओं की अनुभूति का नाम है । गायत्री मंत्र का जप करते समय जैसे तीनों लोकों के स्रष्टा ईश्वर के तेज का ध्यान करने और सद्बुद्धि की प्रार्थना का चिंतन चलता है । महामृत्युँजय मंत्र में मृत्यु का भय निवारण करने वाले अर्थ का चिंतन किया जाता है ।
प्रारंभिक स्थिति में मंत्रजप के साथ उसके अर्थ का चिंतन सहायक है । साधना की उच्च कक्षा में पहुँचने पर अर्थविचार की आवश्यकता प्रायः नहीं रह जाती । एक स्थिति आने पर उसका निषेध भी किया जाता है । इसका कारण चित्त की एकाग्रता का ध्यान रखना नहीं है, मंत्र-विज्ञान के सूक्ष्म नियम मुख्य कारण है । जिनके चलते मंत्रजप के साथ उसके अर्थ पर ध्यान नहीं देने का निर्देश दिया जाता है ।
यों अर्थचिंतन का अपना महत्व है । गायत्री मंत्र का अर्थ सर्वविदित है । परमपूज्य गुरुदेव श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने इसके अर्थचिंतन को ध्यान विधि और संकल्प से कितने ही साधकों ने अपने व्यक्तित्व का पुनर्गठन किया, उसे सुदृढ़ बनाया और विकसित किया । अर्थचिंतन एक सीमा तक साधक के स्तर को ऊपर उठाता है । उसके बाद मंत्र की ध्वनि ही काम करती है। यह सभी जानते हैं कि मंत्रों के गठन में ध्वनि और कंपन का विशेष महत्व है ।
मंत्र को जीवंत और जाग्रत करने में उन सिद्ध साधकों का बल भी अपना प्रभाव उत्पन्न करता है, जिन्होंने मंत्र−साधना से उच्च आत्मिक स्थिति प्राप्त की है । इस तथ्य को समझाने के लिये हथियारों का रूपक दिया जाता है । उपयोग से शस्त्र की मारक क्षमता या धार तेज होती है । जितने लोग उसे चलाते हैं, उतनों का बल और प्रयोग शस्त्र को समर्थ बनाता है । मंत्र को भी साधकों की प्राणचेतना माँजती रहती है उसे समर्थ बनाती है ।
किसी समय मंत्र की सामर्थ्य निरूपित करने के लिए उसके जापकों की सिद्धि-सामर्थ्य का उदाहरण दिया जाता था । अर्थ दृष्टि से गायत्री मंत्र में परमात्मा से सद्बुद्धि की प्रार्थना की गई है । चारों वेदों के बीस हजार मंत्रों में सौ से भी ज्यादा मंत्र है, जिनमें सद्बुद्धि की कामना है । छंदशास्त्र की दृष्टि से मंत्र ज्यादा निर्दोष और परिपूर्ण है । लेकिन संध्या उपासना में गायत्री मंत्र का ही उपदेश दिया गया है । क्यों ? एक मुख्य कारण, अब तक करोड़ों साधकों द्वारा किया गया जप है, उन साधकों के जप से उद्भूत प्राणशक्ति का अंश आकाश में विद्यमान् रहता है । वह सतत् जप करने वाले साधकों को अनुप्राणित करता है ।
व्याप्त अग्नितत्व के रूपक से भी मंत्र की सामर्थ्य समझाई जाती है । अग्नि सर्वव्यापी है । उसे प्रकट करने के लिए दियासलाई की एक तीली पर्याप्त है । प्रकृति ने व्याप्त अग्नि सामान्य स्थिति में अप्रकट रहती है । रगड़ और दियासलाई का मेल होते ही वह प्रकट हो जाती है । अपने आप में इन साधनों और क्रियाओं का कोई अर्थ नहीं होता । मंत्रजप साधक के चित्त में घर्षण उत्पन्न करता है । उससे चेतना में मंत्र के देवता अथवा इष्ट की सामर्थ्य प्रकट होती है ।
योगशास्त्र में भी जप के साथ अर्थचिंतन एक सीमा तक ही आवश्यक बताया गया है । पतंजलि ने योगसूत्र में एक स्थान पर कहा है, “तज्जस्पतदर्शभावनः” (1/24) इस सूत्र की टीका करते हुए स्वामी हरिहरानंद आरण्यक ने लिखा है-साधकों को पहले सावधानी से वाच्यवाचक भाव को मंत्र में जाग्रत करना पड़ता है । शब्द का जप तथा उसके अर्थ की भावना करते-करते मन अभ्यस्त हो जाता है । अभ्यास से जब चित्त कुछ स्थिर, निश्चित तथा ईश्वरीय भाव में स्थित होने में समर्थ हो जाए तब हृदय में स्वच्छ-शुभ्र-असीम आकाश की धारणा करनी चाहिए । हृदय -आकाश में स्थित ईश्वर के साथ अपने चित्त को मिलाकर निश्चित, संकल्पशून्य और तृप्तभाव से रहने का अभ्यास करना होता है ।
जप में शब्दों के उच्चारण की अपेक्षा मौन जप को ज्यादा महत्व दिया गया है । उसके साथ भाष्यकार यह भी मानते हैं कि अर्थ की भावना साधक के चित्त को तुरीय अवस्था तक पहुँचने में बाधक बनने लगती है । स्वाध्याय से इष्टदेवता के साथ मिलन होता है । (1/44) सूत्र का अर्थ करते हुए टीकाकार लिखते हैं, एक अवस्था में जप के समय अर्थ की भावना ठीक नहीं रहती । मन विषयाँतर में दौड़ता रहता है । स्वाध्याय स्थिर होने तक ही अर्थभावना अविच्छिन्न रहनी चाहिए । उसके बाद जप आरंभ होते ही इष्ट की छवि में चित्त का लय हो जाना चाहिए । इस स्थिति में किया गया जप अनहद स्तर का होता है ।
जप का एक स्तर सिद्ध होने के बाद, सामान्य स्थिति में भी साधक अपने इष्ट से तादात्म्य अनुभव करने लगता है । शरीर निश्चल, आसन पर स्थित और इंद्रियाँ विषयों से विरत होने के बाद ध्यान सिद्ध होने लगता है । शरीर निश्चल होने का अर्थ यह नहीं है कि वह जड़ और निष्क्रिय हो जाता है अथवा इंद्रियाँ अपना कार्य कर देती है । शरीर की सामान्य गतिविधियाँ अपनी गति से चलती रहती है । परिवर्तन सिर्फ यह होता है कि राग-द्वेष या हर्ष-अमर्ष के रूप में होने वाले प्रभाव बंद हो जाता है ।
वैदिक मंत्रों और पौराणिक मंत्रों के अर्थ अनुभव किए जा सकते हैं, हालाँकि इनकी आवश्यकता नहीं है, लेकिन ताँत्रिक मंत्रों का स्वरूप ही इस तरह है कि उनका न अर्थ किया जा सकता है और न ही उनका मर्म समझा जा सकता है । आध्यात्मिक दर्शन को अब तक के सभी स्तरों से ऊपर ले जाने के लिए प्रख्यात मनीषी श्री अरविंद ने भी अर्थ के पचड़े में ज्यादा नहीं उलझने की सलाह दी है । कुछ वेदमंत्रों का अर्थभाष्य करने के बाद उन्होंने यह कहते हुए विराम दे दिया था कि इतना ही पर्याप्त है । वैदिक मंत्रों का अर्थ नहीं, उनका पाठ महत्वपूर्ण है । विधिपूर्वक पाठ करना ही व्यक्ति के चित्त में उस मंत्र के देवता को अवतरित कर देता है । भलीभाँति उच्चारण सीख लिया जाए, यह ज्यादा आवश्यक और उपयोगी है ।
मंत्रों ही नहीं, विभिन्न स्तुतियों और शस्त्रों के भी पाठ पर ही ज्यादा जोर दिया जाता है । बारंबार उनका उच्चारण चित्त को संस्कारित करता है । कुएं से पानी खींचते हुए कोमल रस्सी की रगड़ से पत्थर पर भी निशान पड़ जाते हैं । इसके लिए किसी व्याख्या-विवेचना की आवश्यकता नहीं पड़ती । मंत्रजप या स्तोत्रपाठ को भी उस आवर्तन की तरह कहा गया है, जिसका कोई अर्थ या भाव नहीं है । ध्यान नहीं रखें जाने पर भी वह अपना प्रभाव देता है, बल्कि ज्यादा अच्छी तरह देता है, क्योंकि इस प्रकार प्रक्रिया ज्यादा कुशलता से चलती है ।
अर्थ पर ही ध्यान केंद्रित करने से कई बार-भ्रम-भटकाव की आशंका भी होती है । एक ही मंत्र के विद्वानों ने कई अर्थ किए है । दर्शन और चिंतन-मनन के स्तर पर उनका महत्व है । वे विद्वानों की बौद्धिक और आँतरिक स्थिति को व्यक्त करते हैं । उस स्थिति में भावभरी और एकाग्र पुकार ही अंतस् के द्वार खोलती है । उस द्वार से साधक का अपना इष्ट प्रकट होता है ।
जलप्रवाह की दिशा को इच्छानुसार मोड़ा-मरोड़ा और आवश्यकतानुसार कहीं-से-कहीं ले जाया जा सकता है । यही बात कालप्रवाह के साथ भी है । प्राण कंपन के वेग को तीव्र करते हुए यदि उसकी गति को काफी बढ़ा दिया जाए, तो हम दूर अनागत में चले जाएँगे । ऐसे ही कंपन को कम करके उसकी गति घटा देने से दिशा सुदूर भूत की ओर मुड़ जाती है । सर्वसाधारण लोग इस जटिल प्रक्रिया से अनभिज्ञ होते हैं, इसलिए ऐसा नहीं कर पाते; किन्तु योगी-यति के लिए ये सब सामान्य बातें है । वे क्षणार्द्ध में ही काल की गति को आगे-पीछे करके विगत-अनागत संबंधी ज्ञान प्राप्त कर सकते है; लेकिन कई बार कुछ विशिष्ट शारीरिक-मानसिक स्थिति में यह सब अनायास ही संपन्न हो जाता है ।
ऐसी ही एक घटना की चर्चा प्रख्यात इतिहासकार जॉन फोरमैन ने अपनी पुस्तक ‘दि मास्क ऑफ टाइम’ में की है । घटना सन् 1968 की है और पी.जे.चेज नामक एक व्यक्ति से संबंधित है । एक दिन वे सरे, वैलिंगटन के एक बस अड्डे पर बस का इंतजार कर रहे थे । बस आने में अभी देर थी, इस कारण टहलते हुए वे कुछ आगे निकल गए । शीघ्र ही उन्होंने स्वयं को फुस की दो सुँदर झोंपड़ियों के सम्मुख पाया । उसके चारों ओर आकर्षक उद्यान था, जिसमें भाँति-भाँति के रंग-बिरंगे मोहक पुष्प खिले थे । बगीचे में एक मेज पर उन्होंने कुछ धार्मिक पुस्तकें रखी देखी । उपवन के एक कोने में एक माली काम कर रहा था और दूसरा पौधों की सिंचाई कर रहा था । झोंपड़े के द्वार पर एक वृद्धा अधलेटी स्थिति में धूप सेंक रही थी, जबकी दूसरे झोंपड़े से बातचीत की धीमी-धीमी आवाज आ रही थी । इसके दरवाजे पर एक तख्ती लगी थी, जिस का उसका निर्माणकाल-1837 लिखा हुआ था । इसे देखकर चेज कुछ चौंके कि फूस की झोंपड़ी की आयु इतनी लंबी कैसे हो सकती है ! किंतु इस विषय पर ज्यादा माथापच्ची न कर वे वहाँ से चल पड़े, क्योंकि बस आने का समय हो चुका था ।
अगले दिन चेज ने इन झोपड़ियों के संबंध में अपने एक सहकर्मी से उल्लेख किया । थोड़ी देर विचार करने के पश्चात् उसने अस्वीकृति में सिर हिला दिया । उसका कहना था कि उस क्षेत्र में ईंटों के दो मकान तो है, पर झोंपड़ियाँ नहीं । दूसरे दिन सायंकाल चेज पुनः उस स्थान पर पहुँचे ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि उस रोज जो कुछ भी देखा था, वह सत्य था भ्रम । वहाँ पहुँचकर वे आश्चर्यचकित रह गए । वहाँ वास्तव में ईंटों के दो मकान ही थे, झोंपड़ियों नहीं; लेकिन चेज इतने स्पष्ट दृश्य को भ्रम नहीं मान पर रहे थे । उनका मन इसी उधेड़बुन में पड़ा हुआ था कि यदि यह भ्रम था, तो द्वारा पर अंकित सन् ‘1837’, बाग में कार्यरत माली, धूप सेंकती वृद्धा, बातचीत की आवाजें-यह सब क्या थे ? वह किसी निश्चय पर नहीं पहुँच पाए, तो उस ईट के मकान में निवास करने वाले एक वृद्ध से इस बारे पूछताछ की । उसने बताया कि लगभग 80 वर्ष पूर्व वहाँ दो टूटी-फूटी झोंपड़ियाँ अवश्य थी । इसके अतिरिक्त उस संबंध में उसे और कुछ पता नहीं । उसमें निवास करने वाले लोगों और उसके चारों ओर स्थित पुष्पवाटिका के बारे में वह कुछ भी नहीं बता सकता । केवल इतना भर कहा कि वे झोपड़ियाँ शायद बहुत पुरानी थी । इससे चेज आश्वस्त हुए । उन्हें लगा कि जो कुछ भी देखा, वह भ्रांति नहीं, वास्तविकता थी ओर यहां ‘टाइम स्लिप’ संबंधी कोई घटना थी, जिसमें वह कई दशाब्दी पीछे चले गए थे ।
ऐसी ही एक अन्य घटना की चर्चा मूर्द्धन्य जीव-विज्ञानी इवान सैंडरसन ने अपनी रचाना ‘मोर थिंग्स’ में की है । ग्रंथ के अंतिम अध्याय में इसका उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं कि गुह्य विज्ञान की उनकी कभी कोई रुचि नहीं रही; पर उक्त प्रसंग के बाद इस क्षेत्र में उनका रुझान बढ़ा एवं काफी अध्ययन-अनुसंधान किए । घटना का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं । कि एक बार उन्हें जीववैज्ञानिक सर्वेक्षण के सिलसिले में हैती जाना पड़ा । साथ में पत्नी भी थी । एक दिन दोनों वहाँ की प्रसिद्ध अजूए झील देखने के लिए निकले कि शार्टकट के चक्कर में अपनी गाड़ी दलदल में फँसा बैठे । सारी रात उन्हें पैदल चलना पड़ा । पति-पत्नी साथ-साथ चल रहे थे, जबकि उनके सहायक फ्रेडरिक जी. आँलसाप उनसे कुछ आगे । आकाश स्वच्छ था और शुक्ल पक्ष की रात थी, अतः सब कुछ स्पष्ट दीख रहा था एवं चलने में किसी प्रकार की कोई कठिनाई महसूस नहीं हो रही थी । चलते-चलते अचानक सैंडरसन की गरदन ऊपर उठी, तो सड़क के दोनों और विभिन्न आकार-प्रकार की तीन मंजिली इमारतें दिखलाई पड़ी । एलिजाबेथ काल की लग रही थीं, किंतु कुछ कारणों से वे इंग्लैण्ड में न होकर पेरिस में स्थित प्रतीत हो रही थी । उनकी छतें ढलुआ थीं, ड्योढ़ी लकड़ी की तथा छोटी खिड़कियों वाली थी । खिड़कियों में छोटे काँच लगे हुए थे । इनके पीछे हलके लाल रंग का प्रकाश यहाँ-वहाँ चमक रहा था, मानो मोमबत्तियाँ जल रही हो । कुछ मकानों पर लोहे की चौखट वाली लालटेंने लटक रही थी । वे सभी हवा में झूल रही थी, किंतु बाहर तनिक भी हवा चलती प्रतीत नहीं हो रही थी ।
सैंडरसन यह सब देखकर चकित थे, तभी उनकी पत्नी उनकी ओर देखते हुए रुक गई और हाँफने लगी । सैंडरसन तत्काल उसके निकट पहुँचे और तबियत के बारे में पूछा, किंतु तब तक उसका बोलना बंद हो चुका था, पर यह अवस्था अधिक देर नहीं रही और तुरंत ही वह सामान्य हो गई । इसके बाद उसने पति का हाथ थामा एवं इमारतों की ओर संकेत करते हुए हूबहू वही वर्णन किया, जो सैंडरसन ने दिखा था ।
पति ने पूछा कि वह क्या सोच रही है, यह सब कैसे हो गया ? पत्नी ने जो कुछ उत्तर दिया, उससे वे हैरान रह गए । सैंडरसन लिखते हैं थ्क वह वाक्य उन्हें अभी भी याद है । पत्नी का प्रतिप्रश्न था कि वे लोग पाँच सौ वर्ष पूर्व के पेरिस में कैसे पहुँच गए ?
दोनों खड़े-खड़े विस्मय-विमूढ़-से उस दृश्य की परस्पर चर्चा कर रहे थे, जो सामने दिखलाई पड़ रहा था । उसकी बारीकियों और उसकी एक-एक वस्तु पर विस्तार से बातचीत कर रहे थे । तभी उन्हें ऐसा मालूम पड़ा, जैसे वे झूम रहे हों और इसी के साथ गहरी थकान महसूस होने लगी । फ्रेडरिक काफी आगे चल रहे थे । सैंडरसन ने उन्हें आवाज लगाई ।
इसके उपराँत उन्हें यह याद नहीं कि क्या हुआ ? शायद वे उनकी ओर दौड़ने लगे थे और फिर चक्कर आने के कारण एक लंबे-टेढ़े पत्थर पर बैठ गए । तत्पश्चात् फ्रेडरिक दौड़कर आये और परेशानी का कारण पूछा, किंतु वे तत्काल कोई जवाब न दे पाए । उसके पास सिगरेटें थी । दोनों को एक-एक दी, लाइटर जलाया । उसके प्रकाश में सैंडरसन की आँखों के आगे प्रत्येक वस्तु स्पष्ट हो चुकी थी । वहाँ पंद्रहवीं शताब्दी का पेरिस न होकर कँटीली, झाड़ियों और जंगली पौधों से युक्त विस्तृत मैदान था । उनकी पत्नी भी लाइटर के प्रकाश को देखकर पूर्व स्थिति में वापस आ गई । फ्रेडरिक को कुछ भी दिखलाई नहीं पड़ा । बाद में पूछताछ के ज्ञात हुआ कि हैती कभी फ्राँस का उपनिवेश था, अतः संभव है, इस सूनी देहाती सड़क पर उन दिनों फ्राँसीसी वास्तुशिल्प की प्रधानता वाले मकान पर उन दिनों फ्राँसीसी वास्तुशिल्प की प्रधानता वाले मकान रहे होंगे ।
काँलिन विल्सन ने अपने ग्रंथ ‘वियोंड दि आँकल्ट’ में ‘टाइम स्लिप’ से संबंधित एक अन्य प्रसंग का उल्लेख किया है । घटना सन् 1973 के वंसत की है और केंब्रिज की जेन ओ नींल नामक एक शिक्षिका से संबंधित है । एक बार जेन अपनी एक मित्र के साथ फोदरिधें चर्च देखने गई, जहाँ कभी ‘मरी क्वीन ऑफ स्काँटस्’ को फाँसी दी गई थी । वहाँ वह वेदी के पीछे एक क्रूसारोपण के चित्र को देखकर अत्यंत प्रभावित हुई । बाद में जब इसका उल्लेख अपनी मित्र से किया, तो उसने ऐसी किसी चित्र के वहाँ मौजूद होने से स्पष्ट इनकार किया । तदुपराँत जेन ने चर्च की व्यवस्थापिका को फोन किया ओर वस्तुस्थिति की जानकारी चाही । उसने बताया कि चर्च में इस प्रकार की कोई तस्वीर नहीं है । एक वर्ष पश्चात् दोनों महिलाएँ पुनः फोदरिंधे चर्च गई है । अब और तब के चर्च की अंतःस्थिति में जमीन-आसमान जितना अंतर देखकर जेन चौंक पड़ी और इतनी जल्दी इतना व्यापक फेरबदल का कारण जानना चाहा । व्यवस्थापिका ने बताया कि एक साल पूर्व भी गिरजाघर की अंतःव्यवस्था आज जैसी ही थी । उसमें कोई अंतर नहीं हुआ है । इस पर वह और ज्यादा हैरान हुई । ऐतिहासिक अध्ययनों से बाद में ज्ञात हुआ कि सन् 1973 में जेन को जिस चर्च के दर्शन हुए थे, वह वास्तव में वही था, जिसे सन् 1553 में गिरवा दिया गया था, अर्थात् जेन अचानक चार शताब्दी पूर्व के कालख्ड में पहुँच गई थी । यह सब कैसे हुआ ? इस बारे में जेन कुछ न बता सकी । यह कालचक्र का गुह्य पक्ष ही है, जिसे विज्ञान सुलझा नहीं पाता ।
प्रसिद्ध साहित्यकार हरिवंश राय बच्चन ने अपनी आत्मकथा (‘दशद्वार से सोपान तक’) में अपनी एक अनुभूति को उद्धृत करते हुए लिखा है कि जब वे विदेश मंत्रालय में अवर सचिव के पद पर कार्यरत थे, तब उनका निवास 219, डी. 1, डिप्लोमैटिक इन्क्लेव, सफदरजंग था । यहीं रहकर उन्होंने गीता का पद्यानुवाद ‘जनगीता’ के नाम से किया था । जब वे यह अनुवाद कार्य कर रहे थे, तो अनेक बार उन्हें ये स्पष्ट अनुभव हुआ कि जहाँ वे बैठे है, वहाँ कभी द्वारिका से हस्तिनापुर जाते हुए भगवान् कृष्ण का रथ खड़ा हुआ था । इस क्रम में यदा-कदा रथ की, रथ में जुते थके घोड़ों की, सवार और सारथी दोनों रूपों में रथ पर बैठे भगवान् श्रीकृष्ण की स्फुट झलकी मिलती थी; मानो वह साक्षात् द्वापर में उपर्युक्त तथ्य के साक्षी के रूप में विराजमान हों ।
गाय प्लेफेयर अपनी कृति ‘दि इनडेफिनिट बाउंड्री’ में लिखते हैं कि एक बार वे अपने एक मित्र के साथ डर्बीशायर से पोंडफ्रैक्ट जा रहे थे । रास्ते में उन्हें एक पार्क दिखाई पड़ा । वह बड़ा ही आकर्षक था । जगह-जगह उसमें चित्ताकर्षक फूल खिले थे । विशेष प्रकार के आकार दिए हुए वृक्षों के कारण उसकी सुषमा का चार चाँद लग गए थे । प्लेफेयर के मित्र एक स्थान पर बैठकर पार्क की शोभा निहारने लगे, जबकि स्वयं प्लेफेयर टहलते-टहलते पार्क के दूसरे छोर पर जा पहुँचे । पार्क के उस पार पुरानी शैली के कुछ मकानों को देखकर वे थोड़े चौंके, सोचने लगे इतनी पुरानी शैली की इमारतों के बारे उन्होंने सिर्फ पढ़ा भर था, आज उन्हें देखने का मौका मिल गया । वे भवनों की रचना और स्थापत्य कला का सूक्ष्मतापूर्वक अध्ययन करने लगे । उनमें स्थान-स्थान पर छोटे-छोटे कंगूरों को निर्माण जिस कुशलता से किया गया था, वह अद्वितीय था । छतों से झूलते नक्काशीदार छज्जे उस काल की वास्तुकला के उत्कर्ष को दर्शा रहे थे । तभी अचानक वे कुछ सतर्क हुए । उनकी बुद्धि कुछ गणना लगाने लगी-अभी सन् 1966 का मई महीना है, जबकि इंग्लैण्ड का इतिहास इस डिजाइन के मकानों को 14 वीं सदी के आस-पास का बताता है । इसका मतलब यह हुआ कि इन भवनों को बने लगभग छह सौ वर्ष गुजर चुके है । इतने लंबे कालखंड के बीत जाने पर भी इमारतें ज्यों-की-त्यों सुरक्षित है, मानो अभी-अभी उनका निर्माण हुआ हो । यह कैसे हो सकता है ? उनका कोई छोटा-सा हिस्सा भी इस विशाल अवधि में क्षतिग्रस्त नहीं हुआ-यह बुद्धिगम्य नहीं लगता । अभी वह इसी ऊहापोह में थे कि दूर से मित्र की आवाज सुनाई पड़ी । वे उन्हें बुला रहे थे । काफी देर हो चुकी थी । गंतव्य पर जल्दी पहुँचना था, अतः इस विषय पर बाद में विचार करने की सोचकर वे तेज कदमों से आगे बढ़ने लगे । मित्र के साथ गाड़ी में सवार हुए, तो उनके ज्ञानतंतु पुनः सक्रिय हो उठे । वे उसी संबंध में फिर सोचने लगे । दोस्त से इसकी चर्चा की, तो कुछ क्षण विचारकर उन्होंने कहा कि पार्क के आसपास कोई मकान नहीं है । प्लेफेयर इसे मानने को तैयार नहीं थे । जिसे प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देखा हो, भला उसे कोई कैसे झुठला सकता है ! असहमति के निवारण के लिए लौटते सम एक वार पुनः पार्क तक चलकर तथ्य-सत्य का पता लगाने का निर्णय किया गया । वापस आते सम जब वे पार्क में पहुँचें, तो दोनों ने चारों और घूम-घूमकर देखा, वहाँ सचमुच कोई इमारत नहीं थी, पर प्लेफेयर के इस दर्शन को भ्रम भी नहीं कहा जा सकता । वे छह सौ वर्ष पूर्व के कालखंड में प्रवेश कर उन भवनों को देख रहे थे, जो तब वहाँ मौजूद थे । इतिहासवेत्ताओं ने पीछे इस बात की पुष्टि की कि उन दिनों यहाँ एक विकसित शहर था ।
तरल प्रवाह की तरह समय भी एक प्रवाह है ओर उसकी स्वाभाविक गति पीछे से आगे की ओर-वर्तमान से भविष्यत् की ओर है । जलप्रवाह की तरह घेर-बाँधकर उसे भी दिशा बदलने के लिए विवश किया जा सकता है पर यह एक उच्चस्तरीय विज्ञान है । इसके जानकार ही ऐसा कर सकने में सफल होते हैं । सर्वसाधारण के लिए इतना ही पर्याप्त है कि वे अपने चरित्र, चिंतन और व्यवहार को परिष्कृत भर कर लें । इतने से ही वे आज के इस दैवी मुहूर्त में वह सब कुछ हस्तगत कर सकते हैं, जिसके लिए जन्म-जन्माँतरों जितना समय चाहिए ।
वह अत्यंत वृद्ध थी । फिर भी इस वृद्धावस्था में भी उसे बोझा ढोने का काम करना पड़ता था । पेंट पालने के लिए शायद उसके पास और कोई रास्ता भी न था । इस समय वह सड़क के किनारे इस आशा में खड़ी थी कि कोई उसके भारी गट्ठर को उठाने में उसकी सहायता कर दे । तभी एक व्यक्ति उसी सड़क से उसके पास से होकर गुजरा । वृद्धा मजदूरनी ने उससे सहायता की याचना की । उस व्यक्ति के चेहरे पर कुछ अजीब से भाव उभरे और उसने नाक-भौं सिकोड़ते हुए कहा- “अभी मुझे समय नहीं है, मुझे बड़ा काम करना है, बड़ा बनना है ।” और वह आगे बढ़ गया ।
थोड़ी दूर आगे एक वृद्ध गाड़ीवान् ने उसके हृष्ट-पुष्ट शरीर को देखते हुए कीचड़ में फँसी अपनी गाड़ी का पहिया निकलवाने के लिए उससे अनुनय की । वह झल्लाकर बोला-”वाह जी वाह ! बड़े बेवकूफ हो तुम ! मैं भला अपने कपड़ों को क्यों खराब करूं ? मुझे बड़ा काम करना है, बड़ा आदमी बनना है ।”
थोड़ा आगे बढ़ने पर उसे एक अंधी बुढ़िया दीख पड़ी । उसकी आहट पाकर उसने उस व्यक्ति से बड़े ही दयनीय भाव से कहा-”अरे भाई क्या तुम मुझे बायीं ओर वाली झोंपड़ी तक पहुँचाने में मेरी मदद करोगे ? तुम्हारा बड़ा अहसान होगा ।” वह व्यक्ति तिलमिलाकर बोला-”तेरा दिमाग खराब हो गया है क्या ? तुझे नहीं मालूम मुझे बड़ा काम करने जाना है, बड़ा आदमी बनना है । मुझे जरा जल्दी है ।”
इस तरह चलते-चलते वह महर्षि रमण के आश्रम में पहुँच गया । महर्षि अपनी ध्यान−साधना में निमग्न होने ही जा रहे थे कि वह शीघ्रता से उनके सम्मुख जा पहुँचा । उनको अभिवादन कर वह वहीं उनके पास बैठ गया और बोला-”मैं आ गया हूँ महर्षि, आप बताएँ, मेरे लिए क्या सेवा है ? मैं आपके लिए क्या करूं ?” उसके इन स्वरों में उसका अहं ध्वनित हो रहा था ।
महर्षि ने उसी ओर देखा और हलके-से मुस्कराए । महर्षि की इस मुस्कान में उनके रहस्यमय अंतर्ज्ञान की झलक थी । इस मुस्कान के साथ ही उन्होंने पूछा-”हाँ तो तुम ही वह व्यक्ति हो, जिसने कल के सत्संग में बड़ा काम करने के मेरे आह्वान पर अपनी स्वीकृति प्रकट की थी ।”
“जी हाँ भगवान् !” उसने कहा ।
“अच्छी बात है, थोड़ी देर बैठो । मुझे एक व्यक्ति की और प्रतीक्षा है । उसने भी सत्संग के विसर्जन के बाद मुझसे ऐसा ही कहा था । लेकिन अब तक तो उसे आ जाना चाहिए ! यही तो समय दिया था उसने !” महर्षि के चेहरे पर प्रतीक्षा का भाव झलक उठा ।
वह व्यक्ति जोर से हँस पड़ा-”जो व्यक्ति समय का भी ध्यान न रखे, उससे भला क्या अपेक्षा की जा सकती है ?”
महर्षि रमण उसकी बातों में छुपी व्यंग्य की तीक्ष्णता समझकर बोले-”फिर भी हमें उसकी कुछ देर प्रतीक्षा करनी चाहिए ।”
महर्षि ही पहले बोले-”कहो वत्स, शायद तुम्हें कुछ विलंब हो गया है । यह हालत कैसे हुई ?”
दूसरे व्यक्ति के स्वर में विनयभाव फूटा-
“भगवान् ! वैसे तो मैं समय पर पहुँच ही जाता, किन्तु रास्ते में एक बोझ उठाने वाली वृद्ध महिला की सहायता करने में, एक वृद्ध गाड़ीवान् की गाड़ी का पहिया कीचड़ से निकालने में और एक अंधी वृद्धा को उसकी झोंपड़ी तक पहुँचाने में विलंब के लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ ।”
अब महर्षि ने मुस्कराते हुए पहले आने वाले व्यक्ति की ओर देखा और निर्णयात्मक स्वर में बोले-
“वत्स ! निश्चित ही तुम्हारी राह भी वही थी, जिससे यह आया है । तुम्हें सेवा के अवसर मिले, पर तुमने उनकी अवहेलना की । बड़े काम के मोह में तुमने यह न जाना कि छोटे-छोटे कामों का समायोग ही तो बड़ा काम है । बड़ा बनने के लिए कभी भी छोटों का तिरस्कार नहीं किया जाता । जो दूसरे का भार हलका करने में सहायक हो, जो किसी को कठिनाइयों से निकलने में सहायता दे और जो किसी को कठिनाइयों से निकलने में सहायक हो, जो किसी को लक्ष्य पर पहुँचने में सहयोग दे, वही बड़ा आदमी है । तुम अपना निर्णय स्वयं ही दो वत्स, क्या तुम सेवाकार्य में मेरे सहायक बन सकते हो?”
खिसियाया हुआ पहला व्यक्ति मौन था । वह निरुत्तर था, उसके पास कोई जवाब नहीं था।
गायत्री महामंत्र का जप करते समय आदित्य का-सविता का ही ध्यान किया जाता है । सावित्री का तो यह सविता युग्म ही । गायत्री -सावित्री उपासना के माध्यम से साधक में इसी सविता शक्ति का अवतरण होता है । इसी से ब्रह्मतेजस् की प्राप्ति होती है ।
जिस प्रकार दीपक को ज्ञान का, राष्ट्रीय ध्वज को राष्ट्र की अस्मिता का, प्रतिमा को देवता का प्रतीक माना जाता है, उसी प्रकार आकाश को निरंतर ज्योतिर्मय बनाए रहने वाले सूर्य को तेजस्वी परब्रह्म का प्रतीक माना और सविता कहा गया है । सूर्य सिद्धाँत में कहा गया है -
आदित्योहृयादिभूतत्वात्प्रसूत्या र्सू उच्यते । परं ज्योतिस्तमःऽपारे सूर्याऽयं सवितेति च ॥
अर्थात् वह समस्त जगत् का आदिकारण है, इसलिए उसे ‘आदित्य’ कहते हैं । सबको उत्पन्न करता है, प्रसव का कारण है, अतः प्रसविता-सविता कहते हैं । अंधकार को दूर करता है, इससे उसे ‘सूर्य’ कहा जाता है ।
अमरकोश के अनुसार-
सर्वलोक प्रसवनात् सविता स तु कीर्त्यते । यतस्तद् देवता देवी सावित्रीत्युच्यते ततः ॥
अर्थात् वे सूर्य भगवान् समस्त जगत् को जन्म देते हैं, इसलिए ‘सविता’ कहे जाते हैं । गायत्री मंत्र के देवता सविता है, इसलिए उसकी देवी शक्ति को ‘सावित्री’ कहते हैं ।
ब्रह्मपुराण के अनुसार-”सवितुरितिसविता आदित्या यो यः” अर्थात् सवितुः का अर्थ सविता है, जिसे ‘आदित्य’ कहते हैं । जगत् का स्रष्टा अर्थात् परमेश्वर अर्थ में सविता ‘सू’ धातु से ‘तुच’ प्रत्यय होकर बनता है ।
सूर्य को ही ‘सविता’ कहते हैं । इसे ही जगत् की आत्मा कहा गया है । शास्त्रों में उल्लेख है-
सविता सर्वभूतानाँ सर्वभावाश्च सूयते । सवनात्प्रेरणाच्चैव सविता तेन चोच्यते ॥
अर्थात् सब प्राणियों में सब प्रकार के भावों को सविता ही उत्पन्न करता है । उत्पन्न और प्रेरणा करने से ही यह ‘सविता’ कहा जाता है ।
बुद्धे बोधयिता यस्तु चिदात्मा पुरुषों विराट् । सवितुस्तद्धरेण्यन्तु सत्यधर्माणमीश्वरम् ॥
अर्थात् बुद्धि को सन्मार्ग पर लगाने वाला जो विराट् चिदात्मा पुरुष है, वही सत्य धर्म वाला ईश्वर रूप वंदनीय सविता है । महर्षि अगस्त्य ने भी इसी तथ्य की पुष्टि की है । यथा-
यो देवः सविताऽस्माँक धियो धर्मादिगोचरः । प्रेरयेत्तस्य तर्द्भगस्तध्वरेण्यमुपास्महे ॥
अर्थात् “सविता नामक जो देवता हमारी बुद्धि को धर्मादि में लगाते हैं, उनके वंदनीय तेज की हम उपासना करते हैं ।”
वरेण्यं वरणीयन्च संसार भय भीरुभिः । आदित्यार्न्तगत यच्च भर्गाख्यं वा मुमुक्षुभिः ॥
अर्थात् संसार के भय से भयभीत और मोक्ष की कामना वालों के लिए सूर्यमंडल के अंतर्गत जो श्रेष्ठ तेज है, वह वंदनीय है । यह सूर्य ही सविता है । गायत्री महामंत्र को एक प्रकार से सूर्य का मंत्र भी कहा जाता है । “पुनातु माँ तत् सवितुवरिण्म्” इस अंतिम पद वाले स्तोत्र में सूर्यदेवता का ही स्तवन किया गया है । इसके अंतर्गत ही समूची सृष्टि, समस्त देवशक्तियाँ, ऋषि, गंधर्व, चारोंवेद आदि सन्निहित है । श्रुति कहती है-
उद्यन्तंवादित्यमग्निरनु समारोहति । सुषुम्नः’ सूर्यरश्मिः चंद्रमा र्गधर्वः ॥
अर्थात् इस सूर्य के अंतर्गत ही अग्नि, सुषुम्न, चंद्र, गंधर्व आदि है ।
ऋगभिः पूर्वाहृदिवि देवि ईयते यजुर्वेदेतिष्ठति मध्य अहः । सामवेदेनास्तये महीयते वेदेरसून्यस्विभिरेति सूर्यः ॥
अर्थात् इस सूर्य प्रातः ऋक् से, मध्याह्न को यजुः से और सायंकाल साम से युक्त होता है ।
सूर्यासिद्धाँत में भी उल्लेख है-
ऋचोऽस्य मण्डलं सामान्युस्रा मुर्त्तिर्यजूषि च । त्रयीमयाऽस्यं भगवान् कालात्मा कालकृद्विभुः ॥
अर्थात् ऋक् सूर्य का मंडल और यजुः तथा साम उसकी मूर्ति है । दही कालरूप भगवान् है ।
सूर्यपुराण में भी कहा गया है-
नत्वा सूर्य पंरधाम ऋग् यजुः सामरुपिणम् ।
अर्थात् ऋक्, यजुः, साम रूपी परंधाम सूर्य को नमस्कार है ।
“अथोत्तेरेण तपसा ब्रह्मचर्येण, श्रद्धा विद्ययात्मा नमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते ।”
अर्थात् तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा ओर विद्या के द्वारा आत्मा की खोजकर उस समस्त विद्याओं की आत्मा आदित्य देव को भजना चाहिए । गायत्री महामंत्र का जप करते समय आदित्य का-सविता का ही ध्यान किया जाता है । सावित्री का तो यह सविता युग्म ही है । गायत्री-सावित्री उपासन, के माध्यम से साधक में इसी सविता शक्ति का अवतरण होता है । इसी के ब्रह्मतेजस् की प्राप्ति होती है ।
गायीत्री भावयेद्देवी सूर्यासारकृताश्रयाम् । प्रातमध्याहृसन्ध्याँ ध्यानं कृत्वा जपेत्सुधीः ॥
अर्थात् बुद्धिमान मनुष्य को सूर्य के रूप में स्थित गायत्री देवी का प्रातः, मध्याह्न और साँय त्रिकाल ध्यान करके जप करना चाहिए ।
गायत्री स्मरेद् धीमान् हृदि वा सूर्य्रमंडले । कल्पोक्त लक्षणेनैव ध्यात्वाऽर्भ्यच तयो जपेत् ॥
अर्थात् बुद्धिमान पुरुष को हृदय में और सूर्यमंडल में गायत्री का स्मरण करना चाहिए और कल्पोक्त्त लक्षण से ही ध्यान तथा अर्भ्यचन करके उसके पश्चात् जप करना चाहिए । कहा भी है-
देवस्य सवितुर्यच्च भर्गमतर्गत विभुम । ब्रह्मवादिन एवाहुर्वरेण्यं तच्च धीमहि ॥
अर्थात् सविता देवता के अंतर्गत तेज को ब्रह्मज्ञानी वरेण्य अर्थात् श्रेष्ठ कहते हैं, उसी का हम ध्यान करते हैं ।
सविता की भौतिक और आत्मिक क्षेत्र में महती भूमिका का शास्त्रकारों ने उल्लेख किया है ओर ब्रह्मतेजस् प्राप्त करने के लिए सविता एवं उसकी शक्ति गायत्री-सावित्री के साध संबद्ध होने को निर्देश दिया है । गायत्री पंजर में कहा गया है-
आदित्यमार्गगमनाँ स्मरेद् ब्रह्मस्वरुपिणीम् ।
अर्थात् सूर्यमार्ग से गमन करने वाली ब्रह्मस्वरुपिणी गायत्री का ध्यान करना चाहिए । शौनक ऋषि कहते है-
आदित्यमंडले ध्यायेत्परमात्मानमिवं ।
अर्थात् उस अविनाशी परमात्मा का ध्यान सूर्यमंडल में अवस्थित स्थिति में करना चाहिए ।
मार्कंडेय पुराण (70/5-6) में उल्लेख है-
सर्वकारणभूताय निष्ठाय ज्ञानचेतसाम् । नमः सूर्यस्वरुपाय प्रकाशात्मस्वरुपिणी ।
भास्कराय नमस्तुभ्यं ! आप ही ज्ञान चित्त वाले पुरुषों के लिए निष्ठा स्वरूप तथा सर्वभूतों के कारण स्वरूप है । आप ही सूर्यरूपी प्रकाश और आत्मारूपी भास्कर है । आज दिनकर को नमस्कार है ।
महीधरं भाष्य में उल्लेख है- हे तात ! वह जो सूर्य मंडल में ब्रह्मदेव स्वरूप पुरुष विद्यमान् है, जो प्रकाशमान, प्रेरक तथा प्राणियों की अंतःस्थिति को जानता है, समस्त विज्ञान से विभूषित वह आत्मस्वरूप है । वेदाँतों में उन्हीं का प्रतिपादन हुआ । वह समस्त सृष्टि का संहार करने में समर्थ है । वही वरण करने तथा प्रार्थना करने योग्य सत्य स्वरूप है । हम उनका ध्यान करते हैं, जिससे हमारी अंतरात्मा में ज्ञान और आनंद प्रदान करने वाला दिव्य तेज बढ़ता हुआ चला जाता है ।
श्वेताश्वेतर उपनिषद्-1/17 में कहा गया है-
एषा देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानाँ हृदये संनिविष्टः । हृदा मनीषा मनसाऽभिल्कृप्तो य एतद्विदरमृतास्ते भवन्ति ॥
अर्थात् यह देवता विश्व को बनाने वाले और महान् आत्मा है, सदा लोगों के हृदय में सन्निविष्ट है। हृदय, बुद्धि और मन के द्वारा पहचाने जाते हैं । जो इसे जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं ।
विभिन्न शास्त्रों में सूर्य की-सविता देवता की भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रार्थना की गई है और उन्हें सद्बुद्धि प्रदान करने वाला बताया गया है । इसलिए कितने ही उपासक गायत्री-सावित्री उपासना के साथ ही उदीयमान स्वर्णिम सविता का ध्यान करते हैं ।
धीमाहृँह स वैतद्वदब्रहृद्वैत स्वरुपणीम् । धियो योनस्तु सविता प्रचोदयादुयासिताम् ॥
अर्थात् हम ध्यान करते हैं कि सूर्य मध्य स्थित वह गायत्री ब्रह्मस्वरूपिणी है । सविता हमारी बुद्धि को उपासना के लिए प्रेरणा देता है ।
छाँदोग्योपनिषद् (3 प्र. 19/1) के ऋषि कहते है-
“आदित्यों ब्रहृमेतदेशस्तस्योपव्याख्यानम्” अर्थात् सूर्य ही ब्रह्म है, यह महर्षियों का आदेश है । सूर्य को परब्रह्म की संज्ञा देते हुए कहा गया है कि इनसे बढ़कर कोई देव नहीं है । हमें इन्हीं की उपासना करनी चाहिए ।
प्रपंचसार भी कहता है-
दृश्यों हिरण्मयो दंव आदित्ये नित्यसंस्थितः । हीनता रहितं तेजो यथा स्यात् स हिरण्मयः ॥
अर्थात् वह हिरणमय देव का दृश्य है, जो कि आदित्य में नित्य स्थित है । उस तेज में किसी प्रकार की हीनता नहीं है, इसलिए उसे हिरण्मय कहा जाता है । इसमें जो तेज है, जिसे ‘भर्ग8 कहते हैं, ब्रह्मज्ञानी उसे ही वरेण्य कहते हैं और उसका ध्यान करते हैं । सात अग्नि तथा सप्त किरणों वाले, कालाग्नि के रूप वाले तथा प्रकाश देने वाले रूप के कारण ही सूर्य का नाम ‘भर्ग’ पड़ा है । पाराशर ऋषि सविता के इसी ते का ध्यान करने का आदेश देते हुए कहते हैं -
देवस्ये सवितुर्भगों वरणीयन्च धीमहि । तदस्माँक धियो यस्तु ब्रह्मत्वेत प्रचोदयात् ॥
अर्थात् सविता देवता के प्रशंसनीय तेज का हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को ब्रह्मत्व में प्रेरित करे । हम इसलिए भी सविता का ध्यान करते हैं कि-
चिन्तायामों वंयं भर्गो धियो यो नः प्रचोदयात् । धर्मार्थकाममोक्षेषु बुद्धिवृती पुनः पुनः ॥
अर्थात् हम उस तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की बार-बार प्रेरणा करता है ।
गायत्री की साधना अनिवार्यतः सविता शक्ति के तेज को अंदर धारण करने की प्रार्थना से जुड़ी हुई है । गायत्री उपासक इस रहस्य को समझते हुए सूर्योपस्थान, सूर्यार्घदान आदि क्रियाकृत्य संपन्न करते हैं और बदले में सद्बुद्धि का अनुदान प्राप्त करते हैं ।
कद से छोटा होने पर किसी को नगण्य मान बैठना भारी भूल के सिवा कुछ भी नहीं । क्योंकि पता नहीं उसके छोटेपन में गुणों का कितना बड़प्पन समाया हो । अब चींटी को ही लें, देखने में धरती का नन्हा-सा अकिंचन जीव, पर अनेकों विशेषताओं ने उसे विश्व का सबसे विलक्षण जीव बना दिया है । कर्मठता, बुद्धिमत्ता एवं सामूहिक जीवनपद्धति जैसे सद्गुणों के साथ अन्य अनेकों विचित्रताओं से भरी इसकी दुनिया को देखकर हतप्रभ होना पड़ता है ।
विश्वभर में चींटियों की लगभग साढ़े तीन हजार प्रजातियाँ पाई जाती है । सभी चींटियां आकार को छोड़कर लगभग एक जैसी होती है । आकार में ये न्यूनतम एक मिलीमीटर से चार सेंटीमीटर तक हो सकती है । हम जिनसे सबसे ज्यादा परिचित है, वे है काली चींटी, मकोड़ा, पेड़ों पर रहने वाली, काटने के लिए चर्चित लाल चींटी और छोटी काली चींटी जो गुड़ जैसी मीठी चीजों के प्रति अद्भुत आकर्षण रखती है । बहुत छोटा होने पर भी यदि इसे विश्व का सबसे ताकतवर प्राणी कहें तो अतिशयोक्ति न होगी, क्योंकि इसमें अपने शरीर के भार की अपेक्षा पचास गुना अधिक भार उठाने की क्षमता होती है । मनुष्य तो अपने भार दो गुना भार उठा ले यही बहुत है ।
चींटियों की सबसे ज्यादा खासियत इनका सामाजिक जीवन है । इसीलिए इसे सामाजिक प्राणी भी कहा जाता है । इनके समुदाय में पाँच लाख तक चींटियां रह सकती है । इनका सामूहिक घर कई प्रकार का होता है । और वह कहीं भी बनाया जा सकता है । मकानों की नींव में, दीवारों में, वृक्ष की छाल के पीछे, जमीन-पत्थर और पेड़ों की गिरी शाखाओं के नीचे । सुपरिचित लाल चींटियों अपना घर प्रायः किसी ऊँचे पेड़ पर बसाती है । चींटियों के डिंबकों द्वारा बनाए गए रेशम जैसे धागों की सहायता से चींटियां पास-पास स्थित पतों को चिपका देती है । अफ्रीका की दरजी चींटी भारत की लाल चींटी का ही एक वर्ग है, किन्तु उनके द्वारा बनाए गए घर वृक्षों की शाखाओं को जोड़ते हैं ।
वृक्षों पर रहने वाली काली चींटी टहनियों पर पगोड़ानुमा बड़े-बड़े घोंसले बनाती है । जिसकी ऊँचाई दस मीटर तक हो सकती है । ये दूर से देखने में रेत के बने लगते हैं, किन्तु वास्तव में ये पत्तों के बने होते हैं । ये चींटियां पत्तों की सतह पर अपने शरीर से एक तरल पदार्थ स्रवित करती है, जो इन्हें जलरोधक बना देता है । कठफोड़वे की एक जाति चींटियों के घोंसले में ही अपना नीड बनाती है । उसके अंडे-बच्चों को ये खूँखार चींटियां कोई नुकसान नहीं पहुँचाती है । ऐसा भी नहीं लगता कि इन पक्षियों के कारण चींटियों को कोई लाभ होता है । फिर भी ये क्यों इन पक्षियों को अपने घर में रहने देती है, यह एक पहेली बनी हुई है ।
वैज्ञानिकों के अनुसार चींटियां लगभग 10 करोड़ से भी अधिक वर्षों से दुनिया में है । आमतौर पर चींटियाँ भूमिगत बाँबियों में रहती है और एक बाँबी में हजारों-लाखों चींटियाँ रहती है । प्रत्येक बाँबी में तीन प्रकार की चींटियां रहती है, जिनकी अलग-अलग अपनी जिम्मेदारियाँ होती है । सबसे बड़ी को रानी चींटी कहते हैं । रानी चींटी का मुख्य काम हजारों की संख्या में अंडे देना होता है । दिए गए अंडों के फटने तक रानी चींटी कुछ भी नहीं खाती है । उसके शरीर में मौजूद चरबी और उड़नपेशियों के गलने से उसे पर्याप्त ऊर्जा मिलती है । उसका अधिकाँश समय अंडे देने में ही बीतता है, जिनमें नई रानी चींटियाँ, मादा श्रमिक चींटियाँ व नर चींटी उत्पन्न होती है ।
चींटियों की दुनिया में नर की भूमिका प्रजनन तक ही सीमित रहती है । उनका जीवनकाल भी अल्प ही होता है । प्रायः मादा के समागम के बाद उनकी मृत्यु हो जाती है । रानी चींटी हर वर्ष हजारों अंडे देती है । यदि इसी गति से अंडे दे और उनमें भी मादा उत्पन्न हों, तो इस विश्व में कदाचित चींटियाँ-ही-चींटियां नजर आएँ । किन्तु ऐसा होता नहीं है, क्योंकि रानी चींटी अन्य मादा चींटियों को बाँझ बना देती है । रानी चींटी के शरीर से एक गाढ़ा स्राव निकलता है, जिसे खाकर मादा चींटियां बाँझ हो जाती है । यह प्रकृति की व्यवस्था है ।
चींटी समाज में लालन-पालन से लेकर सुरक्षा-व्यवस्था एवं श्रमसेवा का सारा दारोमदार मादा श्रमिक चींटियों पर रहता है । इनमें कुछ तो इसी की देखभाल में लगी रहती है, तो कुछ घोंसले के रखरखाव का जिम्मा अपने ऊपर ले लेती है । जब रानी चींटी आहार ग्रहण करना आरंभ करती है, तो श्रमिक चींटियां एकत्र किए गए भोज्यपदार्थों में से सबसे स्वादिष्ट टुकड़े रानी को खिलाती है । श्रमिक चींटियों का प्रमुख कार्य भोजन की तलाश करना होता है और वे नन्ही चींटियों की देखभाल भी करती है। अंडे से निकलने के बाद लार्वा एवं प्यूपा अवस्था में जब ये चींटियाँ उनकी देखभाल करती है । श्रमिक चींटियों में कुछ बड़े सिर व मजबूत जबड़े वाली सैनिक चींटियाँ भी होती है, जो अपने घर की रखवाली करती है । ये श्रमिक चींटियों की मदद भी करती है, जैसे भोजन के बड़े टुकड़ों को छोटे टुकड़ों में तोड़ने में ।
चींटियों की बाँबी में अलग-अलग प्रकोष्ठ होते हैं । विशेष प्रकोष्ठ (रायल चेंबर) में रानी अंडे देती है । श्रमिक चींटी इन अंडों को पालन प्रकोष्ठ में ले जाती है । इनसे लार्वा निकलते हैं । लार्वा बढ़कर प्यूपा बनते हैं । तब श्रमिक चींटी इन्हें अलग प्रकोष्ठ भोजन संग्रह व कबाड़ रखने के काम आते हैं ।
अलग-अलग क्षेत्रों में पाई जाने वाली चींटियों में अपनी-अपनी तरह की विशेषताएँ पाई जाती है । यूरोप में पाई जाने वाली चींटियों को स्वभाव निराला होता है। आक्रामक स्वभाव की ये लाल चींटियाँ आसपास की काली चींटियों के बिलों पर धावा बोलकर उन्हें बंधक बना देती है । इसके अतिरिक्त कई चींटियों की मादाओं द्वारा दिए गए अंडों पर भी कब्जा जमाकर उनके बच्चे के निकल आने की प्रतीक्षा करती है । बच्चों के निकल आने पर लाल चींटियाँ उन्हें श्रमिकों के रूप में काम पर लगा देती है । वस्तुतः लाल चींटियों को यह सब मजबूरन अपनी आवश्यकता के अनुरूप ही करना पड़ता है । क्योंकि इनमें श्रमिक वर्ग अधिकाँशतः सैनिक होते हैं, जो न तो भोजन संग्रह कर पाते हैं और न ही नन्हें-मुन्नों का पालन-पोषण ।
आस्ट्रेलिया में पाई जाने वाली चींटी ‘मेलोशोकस’ फूलों के रस की शौकीन होती है । इसकी बुद्धिमत्ता देखने लायक होती है । यह भूख के समय रस का सेवन तो तुरंत कर लेती है और विपरित समय के लिए फ्रीज या कोल्ड स्टोरेज का आविष्कार भी कर लेती है । इस रस को यह चींटी एक विशेष कीड़े को पिलाती है और पिलाती ही जाती है । इसे यह रस इतना पिला देती है कि इसका पेट मटर के दाने जैसा हो जाता है । पारदर्शी रस भरे इस कीड़े को ये चींटियाँ उल्टा लटका देती है और भविष्य में उस रस का उपयोग अपनी क्षुधातृप्ति के लिए करती है ।
चींटियाँ गाय पालती है और बाग लगाती है । ये बातें सुनने में अटपटी लग सकती है । किन्तु कुछ चींटियां इन विलक्षण कारनामों को अपने ढंग से अंजाम देती है । चींटियों की एक प्रजाति ‘एपिडस’ नामक मक्खियों को पालती है और इसके शरीर से निकलने वाले हनी ड्यू नामक मीठे रस को बड़े चाव से पीती है । चींटियां ‘एपिडस’ को वैसे ही दुहती है जैसे किसान गाय को दुहता है ।
बाग लगाकर अपने भोजन की व्यवस्था करने वाली चींटियाँ अनिट्स दशईब अट्टीशी नामक जाति की होती है, जो अधिकाँशतः पश्चिमी गोलार्द्ध के गरम देशों में पाई जाती है । इनके बाग फफूँद के होते हैं, जो कि इनका भोजन होता है । श्रमिक चींटियाँ बाग में विशेष रूप से सेवा करती है । व पूरी लगन के साथ उस पर ध्यान देती है अपने बाग के लिए ये फूलों के परागकण, गली-सड़ी फूल-पत्तियों के टुकड़े आदि इकट्ठा करती है । और उनको बारीक काट-काटकर बाग में डाल देती है । इनसे उगने वाली फफूँद को ये लंबे समय तक अपने भोजन के रूप में प्रयुक्त करती है ।
इन नन्हें-से प्राणी की सूझबूझ बुद्धिमान कहे जाने वाले इनसान को भी दाँतों तले उँगली दबाने के लिए मजबूर करती है । ये अपनी बातों एक-दूसरे तक पहुँचाने के लिए भी समर्थ होती है । दीवार की पिछली तरफ से अपने पिछले भाग से खास अंदाज से थपकी देती है, जिससे बाकी चींटियां सतर्क होता है । दुश्मनों से सतर्क रहने के लिए भी कुछ खास संकेत इस्तेमाल किए जाते हैं । जब चींटियां एक-दूसरे से मिलती है, तो ये सिर के प्रमुख भाग एंटीना से सूँघकर पहचान लेती है ।
चींटियों की इस रोचक दुनिया का उल्लेख खतरनाक चींटियों की चर्चा किए बिना अधूरा ही रह जाएगा । एसिटान व डारिलस प्रजाति की ये चींटियां अन्य चींटियों की तरह न तो घर बनाती है और न ही बिल में रहती है । ये आजीवन भोजन की तलाश में घूमती रहती है। दक्षिणी अमेरिका व अफ्रीका में मिलने वाली इन चींटियों को अमेरिका में ‘सोल्जर आंट्स’ व अफ्रीका में ‘ड्राइवर आंट्स’ नाम दिया गया है । करोड़ों की संख्या में काफिला लेकर चलने वाली ये चींटियां शिकारी प्रवृत्ति की होती है । लाल व काले रंग की ये चींटियां चलते समय वर्षा पड़ने की-सी ध्वनि करती हुई चलती है और रास्ते में मिलने वाली हर वस्तु एवं प्राणी को चट कर जाती है ।
इन चींटियों में काफिले का मार्गदर्शन करने वाली चींटियों द्वारा कोई शिकार ढूँढ़ते ही पूरा काफिला उस पर टूट पड़ता है और कुछ ही देर में उस जीव का नामोनिशान मिट जाता है । हजारों-लाखों की संख्या में चींटियों का काफिला आता देखकर बड़े-से-बड़ा जानवर भी भाग खड़ा होता है । यदि जीव भागने में असफल रहा, तो ये चींटियां मच्छर से लेकर मगरमच्छ अथवा फिर स्वयं घायल सिंह ही क्यों न हो, उसे सफाचट कर जाती है । अफ्रीका के गाँवों के समीप जब यह काफ़िला गुजरता है, तो ग्रामीण आनन-फानन में घरों को छोड़कर गाँव से दूर किसी सुरक्षित स्थान की ओर अड़े होते हैं । जब इन चींटियों का काफिला चला जाता है, तो ग्रामीण घर आने पर पाते हैं कि घर की सभी खान की चीजों के साथ तिलचट्टे, छिपकली आदि भी लापता है, दुर्भाग्य से भागने की जल्दबाजी में कोई नवजात शिशु या असहाय व्यक्ति छूट जाए, तो उसे भी ये चींटियां अपना भोजन बना लेती है । कुछ कबीलेवासी वर्षा का सा शब्द सुनते ही बस्ती के आसपास आग लगा देते हैं, जिसकी वजह से ये चींटियां बस्ती के अंदर नहीं घुस पाती है ।
अमेरिकी उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली चींटी सेना केवल छोटी वस्तुओं का ही भोजन करती है । इन्हें लीजमरी चींटियाँ भी कहते हैं । ये मध्य व दक्षिण अमेरिका तथा दक्षिणी संयुक्त राज्य अमेरिका में पाई जाती है । जब ये हजारों की संख्या में कतार बनाकर चलती है, तो लोग इनके आगमन की सूचना पाते ही घर छोड़कर चले जाते हैं । ये चींटियाँ फिर घर में बचे चूहों, छिपकलियों व कीड़े-मकोड़ों को चट कर जाती है ।
अन्य चींटियां के समान इनकी रानी चींटी भी एक बार में लाखों अंडों देती है, जिनसे लाखों बच्चे निकलते हैं, जो जल्दी ही काफिले में शामिल हो जाते हैं । इनके वंश को चलाने वाली रानी चींटी के अंडे देने के समय ये अपने शरीर से एक शानदार जीवित घर का निर्माण करती है । लाखों की संख्या में ये चींटियाँ एक-दूसरे से जुड़कर किसी झुके हुए पत्थर के सहारे एक बड़ी गेंद के सदृश लटक जाती है । इस जीवित घर के अंदर गलियारा आदि भी बना होता है । जिसमें रानी चींटी शान से घूमती-फिरती है । मधुमक्खी के छत्ते के समान उल्टे लटके ये घर अंडों से बच्चों के निकलते ही उजड़ जाते हैं । अपने काफिले में लाखों की वृद्धि कर ये चींटियां फिर से अपने शिकार की तलाश में चल पड़ती है । यदि इनके मार्ग में कहीं कोई नदी पड़ जाए, तो ये चींटियां आसपास में गुंथकर बड़ी-बड़ी गेंदों का आकार ले लेती है ओर पानी के बहाव के साथ वही किनारे लग जाते हैं ।
चींटियों के दुश्मन भी कम नहीं है । मक्खियां, मेढ़क, टोड, छिपकली, चिड़ियों आदि तो इनके जानी दुश्मन, लेकिन चींटियों को अपने स्तर पर दुश्मनों से निपटना भी आता है । अपने बचाव के लिए वे काटती है या फिर एक खास तरह का एसिड छोड़ देती है । कुछ चींटियां दर्दनाक विष छोड़ने की भी क्षमता रखती है ।
सबसे अधिक महत्वपूर्ण है- चींटियों की कार्यक्षमता, लगन ओर मिलजुलकर काम करने की प्रवृत्ति, जो अपने को बुद्धिमान कहने वाले मनुष्य के लिए भी अनुकरणीय है । आपसी सहयोग की यह प्रवृत्ति चींटियों में जितनी अधिक है, उतनी शायद ही कहीं अन्य हो । एक भूखी चींटी जब दूसरी पेट भर खाई हुई चींटी के पास जाकर श्रृंगिका से इशारा करते हुए कुछ खान को माँगती है, तो दूसरी अपने शरीर से एक बूँद तरल पदार्थ देकर उसे तृप्त कर देती है ।
इस तरह नगण्य समझा जाने वाला यह छोटा-सा जीव मनुष्य को सभ्य एवं सुव्यवस्थित सामाजिक जीवन के न जाने कितने पाठ बिन बोले अपने आचरण से पढ़ा देता है । इसके अद्भुत रंग-रूप व कारनामे भी यही बताते हैं कि इनसान कितना ही दंभ क्यों न कर ले, पर परमेश्वर को वे भी कम प्यारे नहीं है, जिसे उसने क्षुद्र समझ रखा है । तभी तो इस क्षुद्रता में उसने न जाने कितनी क्षमताएँ सँजो रखी है । सच तो है कि सीखने की पहली शर्त विनम्रता को यदि हम अपना लें तो चींटियों से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है ।
ये कोटिशः धन्य है, जिन्होंने पहले अर्वती नरेश के रूप में दुर्जेय संग्रामों में हजारों-हजारों शूरमाओं-महारथियों को परास्त किया, वही अब राजर्षि के रूप में स्वयं को तपा रहे है । ये तपोमूर्ति इस बात के जीवंत प्रतीक है कि सच्ची वीरता किसी अन्य को नहीं, अपने आप को जीतने में है । कितनी प्रभापूर्ण और प्रभावपूर्ण है इनकी योगमुद्रा, इनकी तप−साधना ! क्या कोई है इनके तुल्य अन्य राजर्षि ? विचारों की यह भोर हुई थी कोशल नरेश के अंतर क्षितिज में ।
महाराज प्रसेनजित चले जा रहे थे अपनी अंगरक्षक सेना के साथ कोशल देश के ही दूसरे छोर पर बने संघाराम की ओर। मार्ग में उन्होंने दर्शन किए-वटवृक्ष की छाया में एक पाँव पर खड़े प्रगाढ़ ध्यानावस्थित राजर्षि अजितसेन के । ये राजर्षि ध्यानमग्न थे उस निर्जन वनप्राँतर की एकाँत गोद में । दिखाई दे रहा था । राजर्षि अजितसेन का एक पाँव पहले पाँव के घुटने से सटा हुआ । हाथ ऊर्ध्वाकाश की ओर उठे हुए । देह बाँस-सी सीधी खड़ी खड्गासन की मुद्रा में । आँखों अर्द्धोन्मीलित, श्वास गति मंद-मंद । महाराज प्रसेनजित कुछ विचारमग्न से हो गए । वे उनकी तपस्या, त्यागशीलता, सौम्यता एवं प्रशाँतता से प्रभावित हुए बिना न रहे सके । उनके मन के रेगिस्तान में राजर्षि के प्रति श्रद्धा का मरुद्यान मुस्करा उठा । अंकुवाने लगे मन-ही-मन उनकी अभ्यर्थना के बीज । अंगरक्षक सेना का दल आगे बढ़ता रहा, किंतु महाराज प्रसेनजित का मन जहाँ-का-तहाँ टिक रहा, राजर्षि के ध्यानमग्न सौम्य मुख पर ।
तभी हठात् रथ रुक गया । प्रसेनजित की विचार-शृंखला की कड़ियाँ टूटी और उन्होंने देखा कि रथ संघाराम के पास आ पहुँचा है । वे रथ से नीचे उतरे ओर नंगे पैर जा पहुँचे संघाराम में विराजित भगवान् तथागत का चरणवंदन करने । उनके दर्शन और सत्संग का लाभ पाने । प्रसेनजित ने प्रभु का दर्शन पाकर स्वयं को कृतार्थ समझा । उन्हें सविधि वंदन कर कोशल नरेश ने अपना आसन ग्रहण किया ।
संघाराम का हर कण ज्योतिर्मय था । प्रभु का ज्ञानदीप नष्ट कर रहा था-जन-जन के अज्ञानतमस को । लोग आते, प्रभु का सामीप्य पाने और अपने जीवन की रहस्यों से उलझी गुत्थियों को सुलझाकर चले जाते । लहरा उठता था उनके अंतरविश्व में आत्मसंतोष का महासागर ।
कोशल नरेश प्रसेनजित भगवान् तथागत के दायीं ओर आसीन थे । उनके पीछे था-सत्संग-प्रेमीजनों का विशाल समुदाय । प्रसेनजित ने बोधिज्ञान में निमग्न महात्मा बुद्ध से निवेदन किया-”भगवन् ! आज मैं कृतकृत्य हुआ । मार्ग में मैंने परम साधनारत राजर्षि अजितसेन का दर्शन किया । मैंने उनमें समग्रता की शक्ति, अनावेगशीलता की स्थिति ओर समता की दृष्टि का विकास पाया । वे काट रहे थे ध्यान रूपी कुठार से भववृक्ष को । सचमुच प्रभो ! भावविभोर कर दिया था उनकी वृषभ सी भद्रता, वायु-सी निस्संगता, सूर्य-सी तेजस्विता और मेरु-सी निश्चलता ने मुझे ।”
भगवान् तथागत ने कहा, “एक तपस्वी साधक की ध्यानरत छवि को देखकर तुम्हारे मन-अंतःकरण में सहृदयता के सुमन महके, यह प्रसन्नता की बात है ।”
प्रसेनजित बोले, “मैं इसे प्रभु की कृपा मानता हूँ ।”
तथागत ने कहा, “प्रसेनजित ! आत्मविकास किसी की कृपा पर नहीं, स्वयं अपने मन के परिणामों पर आधारित है । भले ही स्वयं साधक अपनी अंतरात्मा के प्रकाश के ऊपर आए आवरणों को क्षय करने में पदच्युत हो गया हो, किंतु तुमने साधक का गुणानुवाद करके स्वयं अपने भावों को स्वच्छ-निर्मल बना लिया ।”
प्रसेनजित को प्रभु की वाणी रहस्य में डूबी लगी । पूछा-”पर प्रभो ! जिस क्षण मैंने राजर्षि अजितसेन के दर्शन किए, उसी क्षण यदि उनका निधन हो जाता, तो उनकी क्या गति होती ? उन्हें कौन-सा लोक प्राप्त होता ?”
तथागत का उत्तर था, “सप्तम नरक ।”
“क्या कहा प्रभो ! सप्तम नरक ?”
“हाँ प्रसेनजित ! ठीक सुना तुमने सप्तम नरक ।”
तथागत के अंतरदर्पण में संसार की सारी गतिविधियाँ स्वयमेव प्रतिबिंबित हो रही थी । पर उनकी वाणी ने आज सबको आश्चर्यचकित कर डाला । प्रसेनजित के तो आश्चर्य की सीमा न रही । प्रभु की वाणी पर शंका कभी किसी ने भी नहीं की । पर आज स्वयं प्रसेनजित के मुख पर अविश्वास की भावरेखाएँ झलकने लगी । उनका मन, उनके नेत्र साक्षी थे राजर्षि अजितसेन की तप−साधना के । वे सोचने लगे-भला जिस साधक को मैंने अपनी आँखों से ध्यान−साधना में डूबा हुआ पाया । जिन्हें देखकर मेरे हृदय में अपार श्रद्धा उमड़ी । क्या उस समय उनकी स्थिति सातवें नरक में जाने जैसी थी ? नहीं ऐसा नहीं हो सकता, पर भगवान् का कथन भी तो कभी निष्फल-निरर्थक नहीं हो सकता । तो क्या जो मैंने देखा वह निरा भ्रम था ? मैं तो राजर्षि की गति बहुत ऊँची सोच रहा था, किन्तु प्रभु तो सर्वाधिक नीची बता रहे है ।
प्रसेनजित के मन में उथल-पुथल होने लगी । चिंतन के सागर में ऊहापोह का ज्वारभाटा मच रहा था । भगवान् तथागत का उत्तर उनके लिए सम्यक् समाधान न बन पाया । अपितु और अधिक समस्या की गुत्थियों को उलझाने वाला लगा । प्रसेनजित ने साहस कर पुनः प्रश्न किया, “प्रभो ! उस समय तो राजर्षि को सातवें नरक में स्थान मिलता, किंतु यदि इस समय मृत्यु हो जाए तो ?”
प्रतिष्ठित होने जा रहे है । आखिर साधुता की नींव पर ही सिद्धता का महल खड़ा होता है । बिना साधुता के सिद्धता पाने की कल्पना आकाश में फूल खिलाने जैसी है ।’ में रोशनी की चंदन-सी बौछार होने लगी । हिलोरे लेने लगा जनसमुदाय के हृदय में आनंद का महासागर ।
लगा एक मधुरिम संगीत, देव-दुँदुभियों के सुदूरव्यापी सुरीते स्वर । अंधे-अभिशप्त गलियारों
भगवान् तथागत ने तत्काल कहा, “अब वे सेवार्थ सिद्ध होने जा रहे है । अब तक जिन्हें तुम मात्र साधु समझ रहे थे, वे ही अब निर्वाप्न में के इस कथन के समापन के साथ ही स्तब्ध सभा ने देखा कि आकाश जगमगा उठा । हवा में दिव्य सुरभि महक उठी । कानों में सुनाई देने
एक साधक की गति के गिरते चढ़ते आयाम असंतुलितता के बोधक थे । कहाँ सप्तम नरक और कहाँ सर्वोच्च देवलोक-यह कैसी तथागत
यह सब देख-सुनकर प्रसेनजित हक्के-बक्के रह गए । समझ न पाए इस सारी लीला का, लीला के रहस्य को । पूछ बैठे, “भंते,
“हाँ, प्रसेनजित ! पहला और अब दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवाँ, छठा और अब सर्वोच्च देवलोक ।”
तो राजर्षि को सातवें नरक में प्रथम स्थान मिलता, किन्तु यदि इस समय मृत्यु हो जाए तो ?”
भगवान् बुद्ध ने कहा-”षष्ठ नरक।”
प्रसेनजित को बड़ी हैरानी हुई । उन्हें भगवान् की वाणी गिरगिट की तरह रंग बदलती हुई उन्होंने पुनः जिज्ञासा की, “इस समय ?”
भगवान बुद्ध का प्रत्युत्तर था, “पंचम नरक ।”
प्रसेनजित ने अगले क्षण फिर पूछा-”इस समय ?”
भगवान् तथागत ने कहा, “चतुर्थ नरक ।”
सभी स्तब्ध होकर सुन रहे थे । प्रसेनजित एक-एक क्षण के अंतराल से प्रश्न पूछते गए और तथागत उत्तर देते गए ।
“इस क्षण ?”
“तृतीय नरक ।”
“अब ? अब ?”
“द्वितीय, प्रथम नरक ।”
“ओर अब ?”
“प्रथम देवलोक ।”
विस्मय है, यह सब क्या है ! कैसे हुआ !! और क्यों हुआ !!!”
तथागत ने कहा, “प्रसेनजित ! महर्षि अजितसेन ने अपने जीवन की उन सभी चट्टानों
को हटा दिया, जिनसे अंतरात्मा का झरना अवरुद्ध था । फलतः आत्मस्रोत के अमृतस्रावी जल ने उनका अभिषेक किया है । भगवंता ने की है । यह दृश्यमान आभा राजर्षि अजितसेन की चेतना के ऊर्ध्वारोहण की परिचायिका है
प्रसेनजित ने कहा, “किंतु भगवन् ! जिस साधक के लिए आपने कुछ क्षण पहले नरकलोक की संभावनाएँ जताई, क्या वह इतने शीघ्र निर्वाण के पुष्प प्रस्फुटित कर सकता है ?”
तथागत बोले, “क्यों नहीं! राजर्षि अजितसेन भावों के उतार-चढ़ाव मूलक स्थिति के प्रतीक हैं और उनके भाव नरक-स्वर्गमूलक स्थिति के।”
“प्रभो! स्पष्टीकरण करें, इस उलटबांसी का अवगुँठन उघाड़े।” प्रसेनजित ने विस्मयमिश्रित लहजे में कहा।
तथागत बोले, “प्रसेनजित! जिस समय तुमने अजितसेन को देखा, उसके कुछ क्षण पहले उन्होंने तुम्हारी अंगरक्षक सेना कीं अग्र पंक्ति में चल रहे वीरसेन और भद्रसेन नामक दो सैनिकों का यह वार्त्तालाप सुना, कि महाराज अजितसेन ने अपने छोटे पुत्र को राज्यभार सौंपकर और संन्यास ग्रहण करके भारी भूल की है। उनके मंत्रियों ने उनके पुत्र और परिवार की हत्या करने के लिए षड्यंत्र रचा है। राजकुमार अपना राजमहल छोड़कर और कहीं भाग गए हैं।”
“तत्पश्चात् इस चर्चा ने ध्यानस्थ तपस्वी को कुद्ध कर दिया। जो भावधारा अब तक संयम सागर की और जा रही थी, वही अब हिंसा के दुर्गंधित नाले की और बहने लगी। आखिर मन तो है खाली हवा में पड़े दीपक की लौ जैसा। मन की सृजनात्मक ऊर्जा विकेंद्रित हो गई और अपनी वास्तविकता को भूलकर उतार-चढ़ाव के दायरे में डगमगाने लगी। लगाम छूट चुकी थी- उनके हाथ से, उनके मन के अश्व की। फलतः वह भटक गया विचारों के बीहड़ वन में”
“पर जिस समय मैंने राजर्षि को देखा, उस समय वे ध्यानमुद्रा में थे।”
“थे, पर वह ध्यान अशुभ था”।
“और संन्यासी का वेश?”
“वेश पहचान का प्रतीक है, संन्यास का नहीं। वेश धारण करने मात्र से मन मौन नहीं होता। मात्र वेश जीवन के प्रश्नचिह्नों का समाधान करके समाधि नहीं देता। मन का मौन-एकाग्रता ही ध्यान है और ध्यान की प्रगाढ़ता में ही समाधि मिलती है।”
“उस चर्चा को लेकर अजितसेन ने मन-ही-मन मंत्रियों एवं शत्रुओं से लड़ाई शुरू कर दी”
“हाँ, प्रसेनजित! साधु की परिधि में द्वेष, क्रोध एवं युद्ध आदि नहीं आते। जो यह सब करता है वह साधु नहीं, साधुत्व का व्यंग्य है, मात्र अभिनय है।”
“अपने मन में ही यह युद्ध लड़ते-लड़ते अजितसेन का धनुष टूट गया। वे अन्य शास्त्र न पा सके। उन्होंने स्वयं को विपक्षी शस्त्रास्त्रों से घिरा हुआ पाया। सहसा उन्हें अपने तीक्ष्ण शिरस्त्राण की स्मृति हो आई। वे उसे उतारकर शत्रुदल में त्राहि-त्राहि मचाने के लिए उद्यत हुए। मस्तक पर हाथ पड़ते ही उनकी चेतना में दस्तक हुई। उन्होंने स्वयं को पथच्युत पाया। जो भिक्षु पहले मात्र वेश के थे, अब होश के हो गए। पहले वे अपनी भिक्षु मर्यादा का अतिक्रमण कर बैठे थे, किन्तु अब तुरंत वापस लौट आए अपनी मर्यादा की सीमारेखा में। प्रतिक्रमित हुए स्वयं में और प्रतिक्रमण की उस प्रक्रिया में बाहर फेंक दिया अस्वच्छताओं का समुद्र। वे सोचने लगे, अरे! मैं कहाँ है अवंती? क्या ऐसे अस्वच्छ कलुषित भाव ही हैं। मेरी साधना के मानदंड? मेरा स्वरूप तो संन्यासी का है, राजा का नहीं।”
“अर्थात् अजितसेन ने अपने कुद्ध संकल्पों एवं विचारों की आलोचना की। उनका भावसिंधु राग-द्वेष के द्वंद्वमूलक ज्वारभाटे से विनिर्भुक्त हो गया। फूट पड़ा फिर से वीतरागता का झरना, अंतरमन के शिखर से, उपशम गिरि से। भावों के जिन आयामों से वे नीचे गिरे थे, उन्हीं से वे वापस ऊँचे चढ़े। और प्रसेनजित! ऊँचे भी इतने कि जिसकी समाप्ति परमज्ञान के सर्वोच्च शिखर पर आत्मविजय के ध्वजारोहण के साथ हुई। परिपूर्ण आनंदमय विश्राँति देने वाली समाधि में हुई।”
भगवान् तथागत के इस समाधान से प्रसेनजित के ज्ञानचक्षु उन्मीलित हो गए थे और खुले ये विस्मय के कोहरीले द्वारा। सर्वबोधगम्य हो गया था भावों का श्लेष प्रधान काव्य। सभा ने जान लिया था साधक होने की बाहरी-भीतरी परत-दर-परत को। समाधि व सिद्धत्व के रंग-बिरंगे रहस्य को।
आखिर मनुष्य बीमार क्यों पड़ता हैं? स्वास्थ्य विज्ञान के आचार्य बरनर मेकफडन का कथन है कि स्वस्थ रहने के नियम बहुत थोड़े और बहुत ही आसान हैं। उनको सीखने के लिए न कोई शास्त्र पढ़ने की जरूरत है और न किसी प्रयोगशाला में जाने की। जरूरत इस बात की है कि हद से ज्यादा जो अक्ल बढ़ गई है, उसको प्रकृति पर न आजमाया जाए और अप्राकृतिक खानपान करके अपने साथ जोर-जबरदस्ती न की जाए, क्योंकि अप्राकृतिक खानपान ही मनुष्य की अस्वस्थता का मूल कारण हैं। खानपान के आधुनिक तौर-तरीके ही घातक रोगों को आमंत्रण दे रहे हैं। जैव तकनीक खासतौर पर जेनेटिक इंजीनियरिंग से जिस तरह खाद्यपदार्थों का स्वरूप बदला जा रहा है, उससे अनेक समस्याएँ जन्म ले रही हैं।
इन तकनीकों से कतिपय बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ऐसे बीज तैयार कर रही हैं, जो उनके द्वारा तैयार किए गए खरपतवार नाशक को सह जाए। इस सहने की क्षमता को देखते हुए यह संभावना बढ़ी है कि खरपतवारनाशक रसायनों का उपयोग अधिक मात्रा में किया जाएगा, पर इसका भोजन के रूप में सफल की गुणवत्ता पर क्या असर पड़ेगा? यह अलग से सोचने का विषय है। संभावना तो यह बनती है कि इन दवाओं के अधिक उपयोग से अधिक जहरीले तत्त्व हमारे शरीर में पहुँचेंगे। रिचर्ड डाउथवेट अपनी पुस्तक ‘द ग्रोथ इल्यजन’ में लिखते हैं कि खाद्यान्न एवं फल सब्जी के उत्पादन में अत्यधिक रासायनिक दवाओं के प्रयोग से फसलों में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ जाती है। ये अधिक नाइट्रेट भोजन करते समय मुँह में पाए जाने वाले बैक्टीरिया से मिलकर नाइट्रोसेमाइन बना लेते हैं।
जैवतकनीक द्वारा वनस्पति आधारित भोजन में जीव-जंतुओं के आनुवाँशिक गुणों के प्रवेश का भी प्रचलन बढ़ चला है। जैसे सोयाबीन में मछली के गुणों को आरोपित करना एक सहज बात होती जा रही हैं। ऐसे में खान वालों को यह पता ही नहीं चल सकता है कि वे क्या खा रहे हैं और क्या नहीं। जिन लोगों के कुछ विशेष खाद्यसामग्री से एलर्जी है, उन्हें तो भीषण स्वास्थ्य समस्याएँ झेलनी पड़ सकती हैं, साथ ही उन्हें यह भी पता नहीं चलेगा कि क्या खाने से यह एलर्जी हुई अमेरिका में राष्ट्रीय वन्य जीव फेडरेशन की जैव तकनीक नीति में कार्यरत मागरेल मेलन ने इस तरह की समस्याओं की ओर ध्यान दिलाते हुए लिखा है कि कुछ वर्ष बाद आप बाजार में आलू या टमाटर खरीदने जाएंगे, तो आपको पता नहीं होगा कि इसमें कोई बाहरी जीन है या नहीं और है तो कहाँ से आया है? यह किसी मनुष्य से लिया गया है या ऊँट से या फिर किसी जीवाणु से। यह बहुत आपत्तिजनक स्थिति है।
प्रकृति में विकृति के औचित्य से पूरी तरह से इनकार करने के कारण ही अपने देश में माँसाहार से परहेज किया जाता रहा है। अब जैवतकनीक एवं पाश्चात्य नकल से स्थिति बड़ी विषम एवं विपन्न हो चली है। माँसाहार की संलिप्तता इतनी बढ़ चली है कि परिस्थिति को यदि बदला न गया, तो आज के प्रदूषित वातावरण में 35 से 40 वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते विषाक्तता के संग्रहित प्रभाव से होने वाले गंभीर घातक रोगों से बच पाना कठिन, बल्कि असंभवप्राय हो जाएगा।
किसी भी दृष्टि आहार में विकृति का समावेश उचित नहीं है, क्योंकि वनस्पति-पदार्थ और पशु-पक्षियों के रुधिर-माँस आदि में कोई समानता नहीं है। उनके घटकों-कोशाओं, रूस-रस-गंध आदि की संरचना और गुणधर्म अलग प्रकार के होते हैं। उनकी रासायनिक प्रतिक्रियाएँ भी भिन्न होती हैं। कार्बोज तो पशु ऊतकों में होता ही नहीं। प्रोटीन व वसा के गुणा भी भिन्न होते हैं। पशु ऊतकों में यूरिक एसिड बनाने वाला पदार्थ प्रोटीन होता है, जो अनेक रोगों का कारण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की बुलेटिन संख्या 637 में 960 ऐसे रोगों का वर्णन है, जिनका कारण सिर्फ माँस खाना है। माँसाहार जनित रोगों में रक्तप्रवाह इतना विषाक्त हो जाता है कि कितने ही रोग आनुवंशिक होकर भावी पीढ़ियों में संक्रमित हो जाते हैं।
खाद्यपदार्थों के रूप में माँसाहार का सेवन जैवतकनीक से दूषित किए गए खाद्यपदार्थों की तरह ही है। विशेषज्ञों के अनुसार दोनों से ही शरीर ही नहीं मन-विचार व भावनाएँ तक दूषित हो जाती हैं। मनीषियों का मत है कि कर्म भावनाओं का ही रूपांतरण है। अतएव हिंसा-क्रोध-तनाव-अशाँति जैसे ध्वंसकारी आवेगों से बचना-मुश्किल हो जाता है वैज्ञानिकों का दल भी अब यह मानने लगा है कि हिंसक व्यवहार का शरीर के रासायनिक असंतुलन से सीधा संबंध है। अध्ययन से पता चला है कि हिंसक लोगों में ताँबे की मात्रा अधिक एवं जस्ते की मात्रा कम होती है। विज्ञानवेत्ताओं के अनुसार ये तत्व आचरण को प्रभावित करते हैं। क्योंकि शरीर इनका इस्तेमाल मस्तिष्क के रासायनिक ट्राँसमीटरों के निर्माण के लिए करता है। ताँबा व जस्ते की मस्तिष्क के हिप्पोकैंपस नामक हिस्से में जमा होने की प्रवृत्ति है।
हार्टकेयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया नामक स्वास्थ्य संख्या के संचालक डॉ. के.एल. चोपड़ा एवं डॉ. के.के. अग्रवाल ने अपने लम्बे समय के शोध-अध्ययन के पश्चात् प्रदान करता है, वरन् मस्तिष्क को भी शाँत करता है। इससे क्रोध नहीं आता। चिकित्सकों का मत है कि क्रोध मस्तिष्क की नकारात्मक भाव वाली स्थिति हैं और मानसिक स्वास्थ्य के लिए इसे नियंत्रित करना जरूरी है। सात्त्विक पौष्टिक आहार को क्रोध का मुख्य नियंत्रक माना गया है।
नेवरविल इलिनाँयस स्थित ‘हैल्थ रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के प्रमुख डॉ. विलियम वाल्श ने भी अपने शोध के बाद यही निष्कर्ष निकाला है कि हिंसक व्यक्तियों की खुराक में तब्दीली करके उनके व्यवहार में सुधार लाया जा सकता है।
डॉ. वाल्श ने अपने इस प्रतिपादन को सच्चाई की कसौटी पर कसने के लिए लम्बे समय तक अगणित प्रयोग किए। उन्होंने अपने प्रयोग के इस क्रम में आहार या खाद्यपदार्थों को तीन श्रेणियों में बाँटा। प्रथम श्रेणी में प्रकृति द्वारा स्वाभाविक रूप से प्राप्त होने वाले फल-शाक-अन्न आदि को रखा, द्वितीय श्रेणी में उन्होंने माँसाहार को लिया, जबकि तृतीय श्रेणी में उन्होंने उन सभी खाद्यपदार्थों को लिया, जो जैवतकनीक विधि द्वारा तैयार किए गए थे। उन्होंने जेल के सजायाफ्ता कैदियों पर आहार संबंधी इस प्रयोग का क्रियान्वयन किया। प्रयोग के दौरान उन्होंने पाया कि जिन कैदियों को सात्विक पोषक आहार दिया गया, दो-तीन महीनों में ही उनके हिंसक व्यवहार में परिवर्तन आने लगा, जबकि जिन्हें माँसाहार दिया गया, उनकी स्वाभाविक उग्रता में और तेजी आई, इसी प्रकार जिन लोगों को जैवतकनीक से विनिर्मित खाद्यपदार्थ खिलाए गए, उनमें अवसाद एवं एलर्जी को प्रत्यक्ष देखा गया।
अपने दीर्घकालीन अध्ययन के पश्चात् डॉ. वाल्श एवं उनके वैज्ञानिक सहयोगियों को यही लगा कि प्राकृतिक स्रोतों से ही पोषक तत्त्व शरीर में पहुँचने चाहिए। यहाँ यह सत्य भी ध्यान रखने योग्य है कि प्रकृति को जैवतकनीक से विकृत करने की अनावश्यक चेष्टा न की जाए। ऐसी कुचेष्टाओं में प्राणपण से जुटे बुद्धिजीवी प्रकृति में निहित यह महान् सत्य भूल जाते हैं कि प्रकृति का सर्वमान्य सिद्धान्त समग्रता-सर्वांगीणता है। वह हमें अपने स्वाभाविक स्रोत से जो भी उपलब्ध कराती है, वह अपने आप में पूर्ण होता है। भले ही उसकी इस पूर्णता को हम समझ पाएँ या नहीं। उसकी इस गुणवत्ता को ठीक से न आकलन कर पाने के कारण ही विभिन्न तकनीकों से उसे विकृत करते रहते हैं। फलस्वरूप उसके स्वाभाविक गुणों से वंचित रह जाते हैं एवं आरोपित अवगुणों से नुकसान उठाते हैं। इस संबंध में आवश्यकता गंभीरतापूर्वक आत्मनिरीक्षण करने की है कि हम कहाँ लापरवाही कर रहे हैं। प्रकृति के आदेश बहुत ही स्पष्ट होते हैं। उन्हें सुनने-समझने में कोई कठिनाई नहीं होती है। रूखे-सूखे भोजन को भी ‘अमृतमिदम्’ की भावना के साथ खाया जाएगा, तो वह बड़ा मधुर लगेगा और आधुनिकता से भरे आहार से कहीं अधिक उपयोगी होगा।
अध्यात्मशास्त्रों में मन को ही बंधन और मोक्ष का कारण बताया गया है। मनोवेत्ता भी इस तथ्य से परिचित हैं कि मन में अभूतपूर्व गति, दिव्यशक्ति, तेजस्विता एवं नियंत्रणशक्ति है। इसकी सहायता से ही सब कार्य होते हैं, मन के बिना कोई कर्म नहीं हो सकता। भूत, भविष्य और वर्तमान सब मन में ही रहते हैं। ज्ञान, चिंतन, मनन, धैर्य आदि इसके कारण ही बन पड़ते हैं। परिष्कृत मन जहाँ अनेक दिव्य क्षमताओं का भाँडागार है, वहीं विकृत मनःस्थिति रोग-शोक एवं आधि-व्याधि का कारण बनती है। आध्यात्मिक साधनाएँ, योग-तप आदि मन को साधने एवं परिष्कृत करने के विविध उपाय-उपचार हैं।
महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन में चित्तवृत्तियों के निरोध को योग कहा है। अनियंत्रित, अस्त−व्यस्त और भ्रांतियों में भटकने वाली मनःस्थिति को मानवी क्षमताओं के अपव्यय एवं भक्षण के लिए उत्तरदायी बताया है और इसे दिशाविशेष में नियोजित रखने का परामर्श भी दिया है। गीताकार ने भी मन को ही मनुष्य का मित्र एवं शत्रु ठहराया है और इसे भटकाव से उबारकर अपना भविष्य बनाने का परामर्श दिया है। इस संदर्भ में महर्षि वशिष्ठ का कहना है कि जिसने मन को जीत लिया उसे त्रैलोक्य विजेता कहना चाहिए। इन प्रतिपादनों से एक ही संकेत मिलता है कि मनोदशा की गरिमा शारीरिक स्वस्थता से भी बढ़कर मानी जाए और समझ जाए कि अनेकानेक समस्याओं के उद्भव समाधान का आधार इसी क्षेत्र की सुव्यवस्था पर निर्भर है।
इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानी हेक ड्यूक ने अपनी खोजपूर्ण पुस्तक -माइंड एण्ड हेल्थ’ में शरीर पर पड़ने वाले मानसिक प्रभाव का सुविस्तृत पर्यवेक्षण प्रस्तुत किया है। उनका निष्कर्ष है कि शरीर पर आहार के व्यक्तिक्रम का प्रभाव तो पड़ता ही है, अभाव व पोषक तत्त्वों की कमी भी अपनी प्रतिक्रिया छोड़ती हैं। काया पर सर्वाधिक प्रभाव व्यक्ति की अपनी मनःस्थिति का पड़ता है। यह प्रभाव-प्रतिक्रिया नाड़ी मंडल पर 36 प्रतिशत, अंतःस्रावी हार्मोन ग्रंथियों पर 46 प्रतिशत एवं माँसपेशियों पर 8 प्रतिशत पाया गया है। अनुसंधानकर्त्ता चिकित्साविज्ञानियों ने अनेक रोगियों का पर्यवेक्षण करने के पश्चात् निष्कर्ष निकाला है कि कोई ऐसा स्थूल कारण नहीं ढूंढ़ा जा सका, जिसके कारण उन्हें गंभीर रोगों का शिकार बनना पड़े, फिर भी वे अनिद्रा, अपच, उच्च रक्तचाप, हिस्टीरिया, कैंसर, कोलाइटिस, हृदयरोग जैसी घातक बीमारियों से ग्रस्त पाए गए। सबसे खास बात यह देखी गई कि किसी भी औषधि-उपचार से उन्हें कोई राहत नहीं मिली। देखा गया कि जब मनोवैज्ञानिक तरीके से उनका चिंतनप्रवाह मोड़ा गया तो सकारात्मक परिणाम सामने आए। बिना औषधि-उपचार से ही वे बहुत कुछ स्वस्थ हो गए।
आज की प्रचलित तमाम उपचार विधियाँ-पैथियों के बावजूद नानाप्रकार के रोगों हेक के अनुसार ऐसी परिस्थितियों में रोगनिवारण का सबसे सस्ता, सुनिश्चित और हानिरहित निर्धारण करना होगा। इसके लिए रोगोत्पत्ति के मूल कारण मनःस्थिति की गहन जाँच-पड़ताल करके तद्नुरूप उपाय-उपचार अपनाने पर ही रुग्णता पर विजय पाई जा सकती है। अब समय आ गया है, जब ‘होप’ अर्थात् आशा, ‘फेथ’ अर्थात् श्रद्धा, ‘कान्फीडेन्स’ अर्थात्, आत्मविश्वास, ‘विल’ अर्थात् इच्छाशक्ति एवं ‘सजेशन’ अर्थात् स्वसंकेत जैसे प्रयासों को स्वास्थ्यसंवर्द्धन के क्षेत्र में प्रयुक्त किया जाना चाहिए। मन की अलग गहराई में प्रवेश करके दूषित तत्त्वों की खोजबीन कर, उन्हें निकाल बाहर करने में यही तत्त्व समर्थ हो सकते हैं। अन्य कोई नहीं।
शारीरिक आधियों और मानसिक व्याधियों से छुटकारा पाने एवं अवाँछनीय आदतों के कारण उत्पन्न होती रहने वाली विषम परिस्थितियों से निपटने के लिए परिष्कृत मनोभूमि चाहिए। महामानवों में से प्रत्येक को अंतः चेतना की उत्कृष्टता को किसी न किसी प्रकार अर्जित करना ही पड़ा है। बलिष्ठता के लिए व्यायाम, विद्वता के लिए अध्ययन, उपार्जन के लिए पुरुषार्थ की जिस प्रकार आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार मनस्वी बनने के लिए योगाभ्यास परक तप−साधना का विचार परिष्कार का अभ्यास आवश्यक है।
काया के बाद आज के विज्ञजनों ने बुद्धि को अधिक महत्व दिया है। बुद्धि मनुष्य की प्रतिभा-प्रखरता को निखारने, योग्यता बढ़ाने के काम आती हैं। प्रत्येक क्षेत्र में इसी का बोलबाला या वर्चस्व है। अभी तक मानवी व्यक्तित्व की इन दोनों स्थूल परतों-शरीर और बुद्धि को ही सर्वत्र महत्व मिलता रहा है। मन इन दोनों की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म है। प्रत्यक्ष रूप से उसकी भूमिका नहीं दिख पड़ने से अधिसंख्य व्यक्ति उसे महत्त्व भी नहीं देते, जबकि बुद्धि एवं शरीर न केवल मन के इशारे पर चलते हैं, वरन् उसकी भली-बुरी स्थिति से असामान्य रूप से प्रजावित भी होते हैं। इस तथ्य की पुष्टि अव अनुसंधानकर्त्ता मनोवेत्ताओं ने भी की है कि बीमारियों की जड़ शरीर में नहीं, मन में छिपी होती है। उसके विकास एवं परिष्कार से ही स्वस्थता एवं मनस्विता प्राप्त की जा सकती है।
पोषण अथवा आहार-विहार के संतुलन के अभाव में काया रुग्ण बन जाती है और अपनी सामर्थ्य गँवा बैठती है। इस तरह वैच्रिक खुराक न मिले, तो बुद्धि की प्रखरता मारी जाती है। अधिक से अधिक वे जीवन शकट को किसी तरह खींचने जितना सहयोग ही दे पाते हैं। उपेक्षा की प्रताड़ना मन को सबसे अधिक मिली है। फलतः उसकी असीम संभावनाओं से भी मनुष्यजाति को वंचित रहना पड़ा है। निरुद्देश्य भटकती एवं मचलती हुई इच्छाओं-आकाँक्षाओं का एक नगण्य स्वरूप ही मन की क्षमता के रूप में सामने आ सका है। मनोबल, संकल्पबल इच्छाशक्ति की प्रचंड सामर्थ्य तो यत्किंचित् व्यक्तियों में ही दिखाई पड़ती है। अधिकाँश व्यक्तियों से मन की प्रचंड क्षमता को न तो उभारते बनता है और न ही लाभ उठाते। मन को सशक्त बनाना, उसमें सन्निहित क्षमताओं को सुविकसित करना तो दूर, उसे स्वस्थ एवं संतुलित रखना भी कठिन पड़ता है, फलतः रुग्णता की स्थिति में वह विकृत आकाँक्षाओं-इच्छाओं को ही जन्म देता है।
इच्छाएँ-आकाँक्षाएँ मानवी व्यक्तित्व की, स्वास्थ्य-संतुलन एवं विकास की प्रेरणास्रोत होती हैं। उनका स्तर निकृष्ट होने पर मनुष्य के चिंतन, चरित्र और व्यवहार में श्रेष्ठता की आशा भला कैसे की जा सकती है? रुग्ण मानस रुग्ण समाज को ही जन्म देगा। मन रोगी हो, तो काया भी अपना स्वास्थ्य अधिक दिनों तक स्थिर नहीं रख सकती। वैज्ञानिक क्षेत्र के नए अनुसंधानों ने कितने ही सिद्धाँतों का खंडन किया है। कितनी ही नई प्रतिस्थापनाएँ हुई हैं तथा कितने ही सिद्धान्तों में उलट-फेर करने के लिए विवश होना पड़ा है। अब धीरे-धीरे स्थूल के ऊपर से विश्वास टूटता जा रहा है। पदार्थ ही नहीं, कायिक स्वास्थ्य के संबंध में भी प्रचलित धारणाओं में क्राँतिकारी परिवर्तन होने की संभावना नजर आने लगी है। अब वह दिन दूर नहीं, जब तन की अपेक्षा मन को सजाने-सँवारने और उसे उत्कृष्ट बनाने को महत्त्व दिया जाने लगेगा।
अनुसंधानकर्त्ता मूर्द्धन्य मनोविज्ञानियों ने मन की रहस्यमय परतों का विश्लेषण करते हुए, यह रहस्योद्घाटन किया है कि मनःसंस्थान में कितने ही शारीरिक रोगों की जड़ें विद्यमान् हैं। मन का उपचार यदि ठीक ढंग से किया जा सके, तो उन रोगों से थी मुक्ति मिल सकती है, जिन्हें असाध्य एवं शारीरिक मूल का कभी ठीक न होने वाला रोग माना जाता रहा है। भारतीय मनीषी इस तथ्य से प्राचीनकाल से ही परिचित रहे हैं। अब पाश्चात्यविज्ञानी भी इसकी पुष्टि करने लगे हैं। रायल मेडिकल सोसायटी के निष्णात चिकित्साविज्ञानी डॉक्टर ग्लौस्टन का इस संदर्भ में कहना है कि शारीरिक रोगों के उपजने-बढ़ने से लेकर अच्छे होने या कष्टसाध्य बनने में मानसिक स्थिति की बहुत बड़ी भूमिका होती है।
मन को सशक्त एवं विधेयात्मक बनाकर कठिन से कठिन रोगों पर विजय पाई जा सकती है और दीर्घजीवन का आनंद उठाया जा सकता है। विकृत मनः स्थिति मनुष्य को राक्षस या जिन्दा लाश बनाकर छोड़ती है। यह सब हमारी इच्छा-आकाँक्षा एवं विचारणा पर निर्भर करता है कि हम स्वस्थ-समुन्नत बनें अथवा रुग्ण एवं हेय।
रोगोत्पत्ति या रोगों के उतार-चढ़ाव में जितना गहरा संबंध शारीरिक कारणों अथवा परिस्थितियों का माना जाता है, उससे कहीं अधिक गहरा प्रभाव मनोदशा का पड़ता है, यदि व्यक्ति मानसिक दृष्टि से सुदृढ़ हो, तो फिर रोगों की संभावना बहुत ही कम रह जाती है। आक्रमण करने पर भी रोग बहुत समय तक ठहर नहीं सकेंगे। इसलिए चिकित्सकीय औषधि-उपचार पर जितना ध्यान दिया जाता है, उससे कहीं अधिक यदि मनःस्थिति को सही बनाने, मानसिक परिष्कार करने, चिंतन-चरित्र व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाने का प्रयत्न किया जा सके तो नीरोगी काया के साथ ही व्यक्तित्व परिष्कार का दुहरा लाभ उठाया जा सकता है। मन ही प्रगति या अवगति का, रुग्णता या नीरोगता का मूल है। इस तथ्य को जितना जल्दी समझा जा सके उतना ही बेहतर है।
वह किशोरवय का बालक था। उसकी अवस्था यह कोई बारह साल रही होगी। अभी वह अपने घर की छत तले दहलीज में बैठा हुआ सामने की राह को निहार रहा था। रहा से गुजरते हुए अपने हमउम्र बालकों को अपने पिता के साथ जाते हुए देखता, तो उसका भी नन्हा सा दिल पिता का प्यार पाने को मचल उठता। जब कभी उसके गाँव के आप-पास मेले लगते या हाट-बाजार होता, तो सभी बच्चों अपने माता-पिता के साथ जाते। वह मेले से लौटते हुए इन बच्चों के हाथों में फिरकी, लट्टू या खिलौने लिए हुए देखता, तो यह मासूम बालक भी अपने आप में गहरी तड़प-सी महसूस कर लेता।
वह बार-बार अपनी माँ से अपने पिता के बारे में पूछता। तब माँ कहती- ‘बेटे! तुम्हारे पिता बहुत बड़े शिल्पकार हैं। हम लोग बहुत गरीब है, इसलिए अर्थोपार्जन हेतु तुम्हारे पिता सुदूर नगर में गए हैं। लेकिन वे जब जल्दी ही लौट आएँगे। तब देखना वे तुम्हारे लिए ढेर सारे खिलौने व मिठाई भी लाएँगे।”‘ माँ की प्यारी-प्यारी बातें सुनकर उसका मन जैसे-तैसे बहल जाता, पर स्वयं माँ के चेहरे पर एक वेदना भरी उदासी की धुँध छा जाती। इन्हीं बातों में समय बीतता जा रहा था। वह रोज ही अपने पिता के बारे में सवाल करता और माँ कोई नया बहाना बनाकर उसे खुश करने की कोशिश करती। उसे कहानियाँ सुनाती या फिर उसके हाथों में छोटी-सी छैनी-हथौड़ी थमाकर, उसको अनगढ़ पत्थरों से खेलने के लिए भेज देती और वह खेल ही खेल में उन पत्थरों को तराशकर उन्हें कोई नया ही रूप दे डालता। माँ अपने बेटे की कारीगरी देखकर खुश हो जाती। वह सोचने लगती कि आखिर वंशानुगत गुण पुत्र में विद्यमान् हैं। शिल्पकार का बेटा शिल्पकार ही बने, यह स्वयं उसकी भी इच्छा थी।
अपने पिता के बारे में जिज्ञासा करते, उनकी चर्चा सुनते उसे काफी साल हो गए थे। अब तो वह बारह वर्ष का भी हो चुका था। एक दिन उसने अपने पिता के बारे में सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए भोजन-पानी का त्याग कर दिया और अपनी माता से इस बात के लिए जिद ठान ली कि वह भी अपने पिता के पास जाएगा। माँ घबरा गई। आखिर घर का यही तो एक चिराग है, भला इसकी लौ को वह कैसे कँपकँपाने दे।
वह कहने लगी- बेटा! तुम्हारे पिता तुम्हारा जन्म होते ही कलिंग के एक नगर कोणार्क गए हैं। वहाँ सूर्य-मंदिर का निर्माण हो रहा है। अब तो बारह साल भी बीत चुके। तुम्हारे पिता अपना काम समाप्त करके आने वाले ही होंगे। तुम वहाँ जाकर क्या करोगे? फिर वहाँ का रास्ता भी बहुत लम्बा और भयानक है। जंगल में हिंसक जानकर भी रहते हैं। कितने ही नदी-नाले और पहाड़ हैं। तू तो छोटा-सा बालक है, ऐसी परेशानियों के बीच वहाँ कैसे जा सकता है?”
“नहीं माँ-मैं जरूर जाऊँगा। अगर राह में किसी जंगली जानवर ने मेरी राह रोकी तो मेरे पास मेरा हथियार छैनी- हथौड़ी है। मैं उनको मारकर अपनी राह सुगम बना लूँगा। नदी-नाले-पहाड़ मैं हँसते-हँसते पार कर लूँगा और देखना वह दिन बहुत दूर नहीं, जब मैं अपने पिता जी को साथ लेकर लौटूँगा। अब तुम तुरंत अपने घर को सजाना-सँवारना शुरू कर दो। अब हमारे घर में खुशियाँ-ही-खुशियाँ होंगी।”
इस बालहठ के सामने माता की एक न चली और उसने मार्ग में खाने की पोटली देते हुए आँसू भरी आँखों से अपने बेटे को विदा कर दिया। कोणार्क के बारे में अनेकों कहानियाँ-किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। पौराणिक आख्यानों के अनुसार सूर्यदेव एवं भगवान् शिव ने यहाँ पर कठोर तपश्चर्या की थी।
लागुँला राजा नरसिंहदेव इन दिनों यही पर एक भव्य मंदिर का निर्माण करा रहे थे। कहा जाता है कि नरसिंह देव का जन्म उनके माता-पिता के द्वारा सूर्य की आराधना करने से हुआ था। जब ये राजगद्दी पर बैठे, तब उनकी माता ने आदेश दिया कि तुम्हारे पिता अनंगदेव ने पुरी के मंदिर का फिर से जीर्णोद्धार कराया था। तुम भगवान् सूर्यदेव का मंदिर बनाकर अपनी कीर्ति और यश का ध्वज फहराओ। अपनी माता की इस आज्ञा से प्रेरित होकर नरसिंहदेव उन दिनों यह निर्माण करा रहे थे। उन दिनों इस क्षेत्र को आकर क्षेत्र कहा जाता था। पहले इस गाँव का नाम भी कण-कण था, पर धरती के कोने में स्थित होने के कारण कोण + आरक संधि से इनका नाम कोणार्क हो गया। इसके अलावा यह भी एक सच्चाई है कि ‘अर्क’ शब्द सूर्य का पर्याय है। यानि कि ‘अर्क’ सूर्य भगवान् का ही एक नाम है। इस तरह कोण+अर्क होकर इसका नाम कोणार्क हुआ।
इस भव्य निर्माण से पहले यहाँ सूर्य प्रतिमा का एक छोटा सा देवालय था। कोणार्क सूर्य मंदिर के निर्माण के लिए जगह-जगह से शिल्पकार बुलाए गए थे। बारह सौ शिल्पकारों में इस बालक आर्जव का पिता वसुषेण भी था, जो इन शिल्पकारों का मुखिया था। इस मंदिर को बनाने में बारह वर्ष लग गए थे। शिल्पकला एवं वास्तुकला के नमूनों से इसे सजाया गया।
सारा मंदिर तो तैयार हो गया, पर शिखरकलश नहीं बन पा रहा था। सारे शिल्पकार मिल-जुलकर अथक कोशिश करके उसे बनाते, पर रात भर में वह ध्वस्त हो जाता। उनकी समझ के अनुसार वे कहीं भी भूल नहीं कर रहे थे, पर कलश था कि ठीक ही नहीं रहा था।
उस दिन शाम की देवी अपनी सुरमई रथ पर सवार होकर धरती पर आने की तैयारी कर रही थी। तभी किशोरवय के आर्जव ने कोणार्क की धरती को प्रणाम किया। सामने उत्तुँग लहरों से अपनी जलराशि को उड़ेलता विशाल महासागर और उसके किनारे पर यह विराट् मंदिर देखकर वह विस्मय-विमुग्ध हो गया।
मंदिर से बाहर पास के परिसर में बारह सौ शिल्पकार सिर झुकाए बैठे थे। उनके मुख पर उदासी एवं भय की स्याही पुत रही थी। किसी के चेहरे पर हर्ष का नामोनिशान नहीं था। आर्जव ने अपनी माँ द्वारा बताए गए लक्षणों से अपने पिता को पहचाना और चरणरज मस्तक से लगाते हुए पूछा- “पूज्यवर! आप सभी ऐसे क्यों बैठे हैं? क्या कुछ अघटित घट गया है! प्रकृति का सबसे सुँदर दृश्य आपके सामने उपस्थित है। डूबते हुए सूर्य ने मानो समुद्र पर स्वर्णराधि बिखेर दी हैं। ऐसा मोहक दृश्य आपके सामने है और आप लोग उदास और चिंतातुर! हो सके तो कृपया अपनी परेशानी मुझे भी बताइए। आप सबको ऐसे बैठे हुए देखकर मेरा मन भी उद्वेलित और विक्षुब्ध हो रहा है।” बच्चे की मधुर वाणी ने मुखिया वसुषेण को बोलने पर विवश कर दिया।
वह कहने लगा- “बेटा! तुम छोटे-से बालक हो। तुमको बता देने भर से हम सबकी यह विपदा टलने वाली नहीं है, फिर भी तुम्हारा आग्रह है, तो तुम्हें बता देते हैं। यह जो सामने विराट् मंदिर है, उसका निर्माण करने-बनाने-सँवारने में हम बारह सौ शिल्पकारों को पूरे बारह वर्ष लग गए। हमारे परिश्रम ने इस मंदिर शिल्पकला का एक अद्वितीय रूप दिया है। फिर भी एक कमी रह गई है, जो हमारे लगातार के प्रयासों के बावजूद किसी भी तरह पूरी नहीं हो पा रही है।”
“हम लोग मंदिर का शिखरकलश बनाते हैं, पर वह ढह जाता है। कलिंग के अधिपति महाराज नरसिंहदेव ने हमें आज की रात और बख्शी है। कल सूर्योदय होने तक अगर शिखरकलश नहीं बना, तो हम सबको फाँसी दे दी जाएगी। हम अपनी घर-गृहस्थी से दूर, यहाँ बारह वर्षों से पड़े हैं। सोचा था मंदिर पूर्ण होते ही हम सब अपने-अपने घरों को लौट जाएँगे, उनके सुख-दुःख में साझीदार बनेंगे। मैं तो जब घर से चला था, तब मेरे घर पुत्र ने जन्म लिया था। अब तो वह तुम्हारे उम्र का हो गया होगा। उसे देखने की कितनी उमंग है। पर लगता है कि सारी उमंग धरी रह जाएगी। सुबह की पहली किरण के साथ हमारी देहलीला समाप्त हो जाएगी। संभवतः हमारे प्रारब्ध में यही सब लिखा था। होनी को भला कौन टाल सकता है। मुखिया ने गहरी साँस लेते हुए कहा।
इस बालक की बातें सुनकर मुखिया के उदास चेहरे पर हलकी-सी मुसकराहट तैर गई। वह कहने लगा- “तुम भी अपना मन बहला सकते हो, बेटा! पर जो काम हम निपुण शिल्पकार नहीं कर सके, वह तुम्हारे छोटे-छोटे हाथ किस तरह और कैसे पूरा करेंगे? यह भी प्रभु की लीला है, जो एक नन्हा-सा बालक आज हमें साँत्वना दे रहा है, कोई बात नहीं तुम भी कोशिश कर देखो, बेटे!”
आर्जव अपनी छैनी-हथौड़ी ले मंदिर के शिखर पर चढ़ गया और सभी शिल्पियों की तरफ से विश्वकर्मा को नमन करता हुआ अपने काम में जुट गया।
पता नहीं, कितनी अनजान पहेलियाँ काल के गर्भ में छुपी हैं, कोई नहीं जानता। पूर्णिमा की उज्ज्वल चाँदनी में शिखरकलश चमकने लगा। सुबह होने तक आर्जव ने मंदिर का शिखरकलश बनाकर मंदिर को एक नई छटा दे दी। सारे शिल्पकार चकित रह गए। मुखिया ने अपने सारे औजार आर्जव के चरणों में रखते हुए गदगद स्वर में कहा- “छोटे विश्वकर्मा! हम तुम्हें प्रणाम करते हैं। हमारी मौत तो निश्चित है, पर हमें मरते हुए भी खुशी है कि हमारा अधूरा कार्य तुमने पूरा किया। लोग युगों-युगों तक तुम्हारा नाम याद रखेंगे।”
अब ऐसा क्या बाकी रह गया है, पूज्यवर, जो आप इतनी निराशा की बातें कर रहे हैं। अब तो आप सबको अपने परिवार एवं प्रियजनों से मिलने से कोई नहीं रोक सकता है।” नन्हें-से आर्जव ने बड़ी बात कही।
“हमारी मृत्यु फिर भी निश्चित है। पुत्र! जब सुबह राजा को मालुम होगा कि जो काम हम सब मिलकर नहीं कर पाए, उसे एक छोटे से बालक ने पूरा कर दिया, तो वह हमारी नियत पर संदेह करेगा अथवा हमारी कार्यकुशलता पर, दोनों ही हालत में हमें मरना पड़ेगा, पर अब हमें मरने का कोई दुःख नहीं है। हमारी साधना सफल हो गई हैं। मंदिर का निर्माण पूर्ण हो गया है।”
आर्जव को लगा, जैसे मंदिर का शिखरकलश उसी के सिर पर आकर गिरा है। मैं तो अपनी माँ को कितनी आशाएँ बाँधकर आया था। वह घर में बैठी हर पल हमारी बाट जोह रही होगी। मेरी कार्यदक्षता अकारथ जाएगी और मेरे सामने मेरे पिता को फाँसी होगी। इतना ही नहीं, पिता के साथ ग्यारह सौ निन्यानवे शिल्पकार भी बेकार में मारे जाएँगे। नहीं मैं ऐसा नहीं होने दूँगा। फिर उसने एक वज्र की तरह कठोर निर्णय लिया, स्वयं के लिए। इन बारह सौ शिल्पियों की जीवनरक्षा के लिए उसके मन में एक दृढ़ निश्चय उभरा। वह मंदिर के शिखरकलश पर चढ़ गया और उसने मुखिया को संबोधित करते हुए कहा- ‘पिता जी! प्रणाम!!” इसी के साथ उसने समुद्र में छलाँग लगा दी। सागर अपनी लहरों की बांहें फैलाए उसके स्वागत के लिए तैयार था। सागर ने उसे बाँहों में लपककर अपनी गोद में छुपा लिया। इसके थोड़ी ही देर में आर्जन की माँ द्वारा भेजे गए सामान के माध्यम से मुखिया वसुषेण ने उसका यथार्थ परिचय जान लिया।
सुबह महल के झरोखे से राजा नरसिंहदेव ने मंदिरकलश देखा, तो उनकी खुशी का पारावार न रहा। जब वह मंदिर के प्राँगण में पहुँचे, तो सभी शिल्पकार खुशियाँ मना रहे थे, सिवाय मुखिया वसुषेण के। उसकी आत्मा चीत्कार कर रही थी, पर होंठ भिंचे हुए थे। राजा को कुछ संदेह हुआ। उसने पूछताछ करके जब वस्तुस्थिति जानी, तो उसका अंतर्मन बिलख उठा। नन्हें से बच्चे ने अपना बलिदान देकर इन सबको बचा लिया और मैं कितना अधम और नीच हूँ, जिसने इन सबको फाँसी का भय दिखाया। अगर फाँसी का यह भय न होता तो आर्जव भी जीवित होता।
राजा नरसिंहदेव का मन गहरी ग्लानि से भर गया जिस पूर्व अपूर्व उत्साह से उन्होंने मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर की समाप्ति ने उनके मन में वितृष्णा भर दी उन्होंने आदेश देकर तुरंत बड़ी-बड़ी शिलाओं से मंदिर का द्वार बंद करवा दिया और कहा- “आज से इस मंदिर में कोई पूजा-अर्चना नहीं होगी।” तभी से वह मंदिर शिलाओं से बंद है।
इस मंदिर की बाहरी दीवारों पर अद्वितीय शिल्पकला के बेजोड़ नमूने हैं। यहाँ की दीवारों पर सूर्य के तीन प्रतीक चित्र उकेरे गए हैं। बाल सूर्य, मध्याह्न का युवा सूर्य और ढलता हुआ सूर्य। सूर्य के ये तीनों रूप इतनी सजीवता लिए हुए हैं कि देखने वाले शिल्पकला की सराहना किए बिना नहीं रह सकते। इस सूर्यमंदिर की वास्तुशिल्प संकल्पना अद्भुत है। पूरा मंदिर एक विशाल रथ पर खड़ा है, जिसमें सात घोड़े जुते हुए हैं, बारह पहिए हैं, प्रत्येक पहिए में तीस शहतीरें हैं। सूर्य की छाया के सहारे पहियों से समय का ज्ञान, एक घड़ी के समान ज्ञात किया जा सकता है।
मंदिर के भग्नावशेष अपनी उत्कृष्ट शिल्पविधा का बेजोड़ उदाहरण हैं। हजारों पर्यटक रोज ही यहाँ आते हैं हालाँकि अब तो अनेकों वृत्तियाँ यहाँ से गायब हो गई हैं, पर जो बाकी बची हैं वह कम मोहक नहीं हैं।
पुरी से तकरीबन 34 किमी. दूर उत्तरपूर्व में स्थित यह कोणार्क अपने आप में इतिहास समेटे हुए है- मानवीय संवेदना का इतिहास, त्याग और बलिदान का इतिहास, किशोरवय के बालक आर्जव की औरों के हित जीने-मरने वाली उत्सर्गपूर्ण भावनाओं का इतिहास।
समूची दुनिया प्रदूषण के भयावह दंश से व्यथित है। इसका सबसे खास कारण है- बढ़ते नाना प्रकार के वाहनों के कारण उत्पन्न वायु प्रदूषण। साधन और सुविधा के नाम पर ये वाहन रोज ही हमारी साँसों में जहर घोलते जा रहे हैं। यह सब है कि आज दुनिया की दूरियाँ सिमट गई हैं, परन्तु उसके दुष्परिणाम से आँखें कैसे बंद की जा सकती है। इन वाहनों से उत्पन्न वायुप्रदूषण एवं ध्वनि प्रदूषण ने हमारे रोजमर्रा की जिंदगी की सुख-शाँति हरण कर ली है। इनकी बढ़ती तादात से प्राकृतिक ईंधन भंडार भी समाप्ति की और हैं। ऐसी परिस्थिति में साइकिल ही एक विकल्प है, क्योंकि यह सहज-सुगम एवं सस्ती होने के साथ-साथ प्रदूषणरहित भी है।
मोटरगाड़ियों की बढ़ोत्तरी के कारण इधर हाल में वायु एवं ध्वनिप्रदूषण बेतहाशा बढ़ा है। 1992 की विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट से जाहिर होता है कि संसार के आधे से अधिक सर्वाधिक प्रदूषण शहरों में भारत के भी अनेक शहरों के नाम आ जुड़ें हैं। इनमें दिल्ली, मुँबई, कलकत्ता, चैन्नई एवं कानपुर अग्रणी हैं। वर्तमान समय में दिल्ली पूरे विश्व का चौथा प्रदूषित महानगर है। ये महानगर ध्वनिप्रदूषण उत्पन्न करने में भी कम नहीं हैं। सन् 1989 में अपने देश में दुपहिया स्वचालित वाहनों की कुल संख्या 25 लाख थी। तक पहुँच गई। सन् 1991 में कुल वाहनों की संख्या 2 करोड़ 90 लाख से भी अधिक हो गई। इनमें दुपहिया वाहनों की संख्या 9 करोड़ 80 लाख, कार की संख्या 29 लाख और डीजल से चलने वाले भारी वाहन 17 लाख 80 हजार थे। इसके साथ ही प्रतिवर्ष इन वाहनों की संख्या में 20 से 30 प्रतिशत की दस से वृद्धि हो रही है।
अकेले दिल्ली में स्वचालित वाहनों से पैदा होने वाले प्रदूषण में प्रतिदिन 649 टन कार्बन मोनो आक्साइड, 289.47 टन हाइड्रोकार्बन, 926.46 टन नाइट्रोजन आक्साइड, 6.16 टन सल्फर-डाइ-आक्साइड तथा 10.30 टन कण हैं। इस तरह दिल्ली में प्रतिदिन 1046.60 टन प्रदूषण पैदा होता है। यह आँकड़ा मुँबई में 649 47 टन, बैंगलोर में 304.47 टन, कलकत्ता में 293.71 टन, अहमदाबाद में 292.73 टन, पुणे में 243.31 टन, चैन्नई, 227.24 टन, हैदराबाद में 202.84 टन, जयपुर में 88.11 टन, कानपुर में 83.17 टन, लखनऊ में 63.81 टन तथा नागपुर में 47.37 टन है। इन महानगरों में जो भी वायुप्रदूषण होता है, उसका 70 से 75 प्रतिशत यंत्रचालित वाहनों से होता है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि इन वाहनों की वृद्धिदर इसी स्तर पर होती रही तो कुछ समय बाद वाहनों से ब्व्डडडडडडडडडडडडडडडडडड की मात्रा में तीन गुना, हाइड्रोकार्बन और नाइट्रो कार्बन और नाइट्रोजन आक्साइड में चार गुना वृद्धि हो जाएगी।
इस प्रदूषण से सड़क के किनारे लगी फसलों में 70 से 75 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है। अपने देश में ही वायुप्रदूषण से 40 से 60 हजार लोगों की मौतें हो चुकी हैं। ऑटोमोबाइल और डीजल इंजन से निकले धुएँ में सीसा होता है। यह कैंसर का जनक है। शहरों की सड़कों की धूल-मिट्टी में 2 ग्राम सीसा प्रति किलों धूल में पाया जाता है। इससे भी ज्यादा कारों से निकला धुआँ साँस के द्वारा शरीर के अंदर प्रवेश कर जाता है और आसानी से मस्तिष्क, लीवर, गुरदे एवं रक्त में अवशोषित हो जाता है। यह धीरे-धीरे संचयी बिंब बनकर दिमाग की कमजोरी, लकवा और मृत्यु का कारण बनता है। इसका सर्वाधिक प्रभाव बच्चों और किशोरों पर होता है।
प्रदूषण के अतिरिक्त जो दूसरा पहलू उससे जुड़ा हुआ है। वह पेट्रोलियम पदार्थों का उत्पादन और खपत। जिस दर से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन चल रहा है उससे पता चलता है कि निकट भविष्य में सारा संसार इससे वंचित हो जाएगा। उत्पादन के अनुपात में खपत में भारी वृद्धि हो रही है। 1970-71 में 104 लाख टन खनिज तेल का उत्पादन हुआ था। सन् 1990 तक यह आँकड़ा 386 लाख टन तक जा पहुँचा। इसके साथ ही खपत एवं माँग भी अतिशय बढ़ी। जहाँ 1971 में कुल 960 लाख पेट्रोलियम पदार्थों की खपत थी, वही 1990 में 436 लाख टन हो गई। देश के नियोजक, भविष्य में दुगनी से पाँच गुनी खपत के आँकड़े प्रस्तुत कर रहे हैं। कुल पेट्रोल का 60 प्रतिशत से अधिक व्यय इन वाहनों पर होता है।
इस प्रदूषण एवं आर्थिक व्यय के महासंकट ने एक नया विकल्प तलाशने पर मजबूर किया है। जो प्रदूषण मुक्त हो एवं आर्थिक रूप से सस्ता भी हो। इस क्रम में सबका ध्यान साइकिल को वाहन के रूप में उपयोग में लाने के लिए आकर्षित हुआ है। इसका मुख्य कारण है प्रदूषण मुक्ति, आर्थिक सुगमता, ग्रामीण जीवन से लेकर व्यस्त शहरी जीवन में उपयोगी होना, शारीरिक स्वास्थ्य में वृद्धि करना एवं पार्किंग में सुविधाजनक होना है। इन्हीं विशेषताओं के कारण आज केक तकनीकी विशेषज्ञों ने साइकिल को इक्कीसवीं सदी का वाहन माना है। उनके अनुसार आवागमन को सुगम एवं सुचारु बनाने के लिए साइकिल ही एकमात्र विकल्प हो सकता है। संसार में साइकिलों की संख्या अन्य किसी वाहन की अपेक्षा हमेशा ज्यादा रही है। आज दुनिया में फिर से साइकिल की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने साइकिल के बारे में कहा है कि यह सबसे सस्ता, प्रदूषणरहित, सुगमता एवं सरलतापूर्वक पार्क किया जाने वाला वाहन है।
इक्कीसवीं सदी के मान्य वाहन के रूप में उभर रही इस साइकिल का इतिहास भी बड़ा रोचक है। इसका आविष्कार स्काटलैंड के लोहार किलपेट्रिक मैकमिलन ने सन् 1630 में किया था। सन् 1890 में साइकिल का पहिया हिन्दुस्तान की धरती पर घूमा। उस समय भारी-भरकम साइकिल की कीमत 85 रुपए थी। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान इसकी कीमत में भारी वृद्धि हुई और यह 500 रुपए में बिकने लगी, परंतु युद्ध के पश्चात् यह घटकर 34 रुपए हो गई। इसका कारण था भारत में इंग्लैण्ड से निर्मित साइकिलों का आयात होना। जापान से आयातित साइकिलों का मूल्य उस समय सिर्फ 14 रुपए था। भारत में साइकिल बनाने का पहला कारखाना सन् 1936 में मुँबई में स्थापित हुआ। अब तो भारत, साइकिल उद्योग में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है एवं सर्वाधिक उत्पादन भी करता है। सबसे अधिक साइकिलें बनाने का विश्व रिकॉर्ड भी एक भारतीय कंपनी के नाम है।
सन् 1996 में साइकिल में साइकिल का सालाना उत्पादन मोटर वाहनों के 20 लाख की तुलना में पाँच गुणा अधिक था। इसमें अभी भी सात प्रतिशत की दर से तादाद पाँच करोड़ से ऊपर आँकी गई है। इसमें से 74 प्रतिशत साइकिलें ग्रामीण क्षेत्रों में प्रयुक्त की जाती हैं। 20 प्रतिशत साइकिलें शौक एवं मनोरंजन हेतु निर्मित होती हैं। भारत में दो प्रकार की साइकिलों का उत्पादन होता है। एक तो मजबूत फ्रेम वाली पारंपरिक साइकिलें और दूसरी फैंसी व सुँदर साइकिलें। पहले प्रकार का उपयोग वाहन एवं दूसरे तरह की साइकिलों का उपयोग मनोरंजन एवं खेल के लिए किया जाता है। फैंसी साइकिलों का फैशन सन् 1970 के दशक से प्रारम्भ हुआ। आज यह बच्चों तथा नवयुवकों के बीच जबरदस्त लोकप्रिय है।
एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्राँसपोर्ट डेवलपमेंट के सीनियर फेलो डॉ. वाई. पी. आनंद ने अपनी सर्वेक्षण रिपोर्ट में दर्शाया है कि साइकिल पर्यावरण हितैषी है। एवं कुछ सालों से इसका प्रचलन बढ़ा है। इस रिपोर्ट में साइकिल रिक्शा को भी महत्व देने का प्रस्ताव किया गया है। नई दिल्ली स्थित नेशनल कौंसिल का एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च द्वारा 10 गाँवों में और विकास केंद्रों में किए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि साइकिल ओर रिक्शा आय के बहुत बड़े साधन हैं। यह प्रदूषण रहित परिवहन के उत्तम साधन हैं।
साइकिल-रिक्शा का आविष्कार अमेरिका के एक पादरी जोनाथन ग्लोबल ने पिछली सदी के मध्य में किया और इसे नाम दिया ‘जिन राकीशा’ अर्थात् मनुष्य की शक्ति से चलने वाला वाहन। रिक्शा उसी का परिवर्तित नाम है। परिवहन हेतु रिक्शा का प्रचलन सन् 1930 में भारतवर्ष में हुआ और यह जल्दी ही लोकप्रिय हो गया। आज देश में रिक्शाचालकों की संख्या 50 लाख के आस-पास है। गाँवों और कस्बों में तो यह सार्वजनिक परिवहन और मालवाहन का प्रमुख साधन है। चैन्नई, कलकत्ता और दिल्ली जैसे महानगरों में भी इसका अस्तित्व अभी भी है। वैसे विश्व में रिक्शे का प्रयोग बंगलादेश की राजधानी ढाका में सर्वाधिक होता है। यहाँ पर विश्व में सबसे अधिक रिक्शे हैं। इसकी नई तकनीक विकसित करने के लिए भी प्रयास जारी हैं। इस क्रम में मुम्बई आई. आई. टी. के औद्योगिक डिजाइन केन्द्र के प्रोफेसर बी. बी. बापट ने साइकिल रिक्शे का एक नया डिजाइन विकसित किया है।
विश्व के अन्य देशों में भी साइकिल का काफी प्रचलन है। इस दिशा में चीन सबसे आगे है। इस समय पूरी दुनिया में साइकिल को सबसे ज्यादा महत्त्व और सम्मान चीन में दिया जाता है। यहाँ साइकिलों की संख्या सर्वाधिक है। चीन में तकरीबन 27 करोड़ साइकिलें हैं। चीन की राजधानी बीजिंग में ही 70 लाख साइकिलें हैं। चीन में मोटरकार और साइकिल का अनुपात एक और ढाई सौ का है। शहरी क्षेत्र में तो प्रति हजार आबादी पर पाँच सौ साइकिलें हैं। अर्थात् प्रति दो व्यक्तियों में से एक के पास साइकिल उपलब्ध है। नगरों का 50 से 90 फीसदी परिवहन साइकिल चलाने के लिए अलग ट्रैक की व्यवस्था है। वर्ल्ड वाच इंस्टीट्यूट के निदेशक सुश्री मार्शियालों के अनुसार चीन में सन् 1984 में तीन करोड़ साइकिलें थी। ये आँकड़े स्पष्ट करते हैं कि यहाँ साइकिल की लोकप्रियता बढ़ी है।
जापान और नीदरलैंड जैसे औद्योगिक देशों में साइकिल को रेल परिवहन से जोड़ने की भी व्यवस्था है। जापान में लोग छोटी दूरी साइकिलों से और लम्बी दूरी रेलों से तय करते हैं। यहाँ की 95 प्रतिशत जनसंख्या साइकिल का उपयोग करती है। इस दिनों जापान में पौने सात करोड़ साइकिलें हैं अर्थात् प्रति एक हजार आबादी पर 434 साइकिलें। इंग्लैण्ड में भी साइकिल के प्रति लोकप्रियता बढ़ रही है। जर्मनी, हंगरी, यूगोस्लाविया, पोलैंड आदि देशों में भी साइकिल के प्रति रुझान बढ़ा है। जर्मनी में साइकिल चलाना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद माना जाता है। यहाँ साइकिलों को कार की डिक्की में रखने लायक बनाया जाता है, ताकि कभी इसका उपयोग किया जा सके।
अंतर्राष्ट्रीय साइकिल रेसों के लिए फ्राँस सारे संसार में विख्यात है। फिनलैंड की 50 लाख आबादी में 32 लाख साइकिलें हैं। नीदरलैंड की डेढ़ करोड़ जनसंख्या में 10 प्रतिशत लोगों के पास साइकिलें हैं। यहाँ इनकी संख्या 9 करोड़ 80 लाख है, जबकि मोटर वाहनों की संख्या 44 लाख है। नीदरलैण्ड में साइकिल के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए साइकिल मास्टर प्लान बनाया गया है। अमेरिका में प्रति हजार जनसंख्या में 75 साइकिलें हैं। इसका अधिकतर उपयोग वहाँ कालोनी के अंदर या पार्किंग प्लाट तक किया जाता है। वहाँ इसे और लोकप्रिय बनाने हेतु एक अधिनियम बनाए जाने का प्रस्ताव है। पर्यावरण के प्रति सजग एवं संवेदनशील नगर जैसे टोरंटो, बैंकूवर, सीटल आदि में साइकिलों के इस्तेमाल में भारी वृद्धि हो रही है।
इटली में साइकिल को काफी सम्मानजनक वाहन माना जाता है। वहाँ राष्ट्राध्यक्ष से लेकर साधारण जनता तक सभी साइकिलों का उपयोग करते हैं। अमेरिका में पुलिस विभाग के पास सैकड़ों वाइक स्क्वेड (साइकिल दल) हैं, जिससे अपराधी को पकड़ने का काम लिया जाता है। यही नहीं यहाँ 5 में से एक व्यक्ति साइकिल को पसंद करता है।
बात इतने तक सीमित नहीं है, साइकिल और साइकिल रिक्शे का परिवहन-अर्थशास्त्र में योगदान चौंकाने वाला है। इसमें यदि सवारी ढोने की लागत 40 पैसे सवारी प्रति किलोमीटर मानी जाए तो इसका योगदान 101.40 अरब रुपये प्रतिवर्ष होता है। इस अनुपात के आधार पर साइकिल एवं रिक्शा प्रतिवर्ष 203 अरब रुपये की कमाई करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 90 मील से कम 90 प्रतिशत यात्रा साइकिल से तय की जाए तो अपने देश में प्रतिवर्ष 9.5 करोड़ बैरल पेट्रोल की बचत हो सकती है। इसके अलावा साइकिल उद्योग 50000 परिवारों की आय का साधन जुटाता है। इतना ही नहीं शरीर की स्वास्थ्य-क्षमता भी इसके उपयोग से बढ़ती है। ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रति सप्ताह 32 किमी. साइकिल चलाने से दिल की बीमारी होने की संभावना में 50 फीसदी की कमी आती है।
स्वास्थ्य में प्रगति हो या प्रदूषण के विषदंश से उबरने की बात, साइकिल की उपयोगिता हर दृष्टि से अधिक है। आज की इस विषम वेला में इसके उपयोग से प्रदूषण के दावानल से झुलसते राष्ट्र एवं विश्व को बचाया जा सकता है। यह कहना और मानना किसी भी तरह अतिशयोक्ति न होगी कि इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर खड़ी दुनिया में स्वचालित वाहनों के उपयोग में कमी करके साइकिल का इस्तेमाल करना मानवीय एवं सामाजिक कर्त्तव्य है।
प्रस्तुत धारावाहिक लेखमाला देवसंस्कृति के वास्तुविज्ञान पर आधारित हैं। आज इस-विद्या के विशेषज्ञ’ घरों में तोड़-फोड़ करा- परिवर्तन करके काफी राशि कमा रहे हैं। हमारा इस लेखमाला का उद्देश्य जन-जन को इस बहुमूल्य ज्ञान से परिचित कराना है। घर जैसा भी हो, किंचित हेरफेर से अंतर्ग्रही धाराओं-चुम्बकीय धाराओं का परिपूर्ण लाभ लिया जा सकता है। न करने से कोई नुकसान नहीं है। नए निर्माणों में ध्यान रखा जा सकता है। शयनकक्ष की स्थिति के विषय में पढ़ें, इस अंक में।
वास्तुशास्त्र में आवासीय भवनों के निर्माण में प्रत्येक कक्ष हेतु एक सुनिश्चित दिशा एवं सुनिश्चित स्थान बताया गया है। इसके लिए भवननिर्माण वाले भूखंड को सोलह भागों में विभक्त करके अलग-अलग कार्यों के लिए अगल-अलग कमरों का निर्माण करने के लिए दिशानिर्देश दिया गया है। यों तो अपने-अपने ढंग से हर व्यक्ति मनचाहे आकार-प्रकार के घर घरौंदे से लेकर विशालकाय भवन का निर्माण करता है, किंतु यदि उन्हें वास्तु नियमों के अनुसार निश्चित दिशा एवं स्थान में बनाया जाए, तो वे ही घर सभी प्रकार की उन्नति व सुख शाँति प्रदान करने वाले होते हैं। लेकिन अगर मनमाने ढंग से वास्तु नियमों के प्रतिकूल उनका निर्माण किया जाता है, तो वे निवासकर्त्ता के लिए दुःखों का निमित्त कारण बनते हैं, महाराजा भोजदेव ने अपनी अनुपम कृति- ‘समराँगण सूत्राधार’ के पहले अध्याय के आरंभ में ही इस संदर्भ में कहा है-
सुधंधनानि ऋद्धिश्च संततिः सर्वदा नृणाम्। प्रियाष्येषाँ तु संसिद्धयै सर्व स्याच्छुभलक्षणम्॥
यच्च निंदित लक्ष्यमात्र तदेतेषाँ विधातकृत्। अतः सर्वमुपादेयं यद् भवेच्छुभलक्षणम्॥
कहने का तात्पर्य यह है कि सही ढंग से बनाए गए मकान में उत्तम स्वास्थ्य, सुख-शाँति-संपदा-ऋद्धि तथा उत्तम संतान का निवास होगा और वह गृहस्वामी के यश एवं कीर्ति को सर्वत्र फैलाएगा, किंतु वास्तु नियमों के विपरीत निर्मित भवन इसके ठीक विपरीत परिणाम प्रस्तुत करेगा।
अन्य शास्त्रों में भी उल्लेख हैं-
“शास्त्रमानेन या रम्यो स सम्यों नान्य एव हि।”
अर्थात् कोई भी सुँदर वस्तु या रचना तभी पूर्ण तथा सुखद-प्रसन्नता प्रदान करने वाली होती है, जब वह शास्त्रों में बताए हुए नियमों व अनुपात के अनुसार बनाई जाती है। यों तो आवासीय भवन का हर कक्ष महत्त्वपूर्ण हैं, किन्तु उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है, बेडरुम अर्थात् शयनकक्ष। विशालकाय राजमहल हो या आलीशान भवन या फिर छोटे-बड़े, कच्चे-पक्के मकान, उन सबमें यही एकमात्र ऐसा स्थान है, जहाँ व्यक्ति दिनभर की भागदौड़ एवं काम काज की थकान उतारने, मानसिक चिंताओं एवं परेशानियों से कुछ देर मुक्ति पाने के लिए आराम करता है और सात-आठ घंटे सुख−चैन की नींद सोता है। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारे जीवन का एक तिहाई भाग इसी कक्ष में व्यतीत होता है। यदि व्यक्ति की सक्रिय आयु सत्तर वर्ष मान ली जाए तो सात-आठ घंटे के हिसाब से प्रतिवर्ष हम चार महीने नींद लेने में गुजारते हैं। इस तरह सत्तर वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते 23-24 वर्ष बिस्तर पर सोने में समय गुजर जाता है। जीवन की इस बहुमूल्य अवधि में अच्छी नींद लेने के लिए आवश्यक है कि शयनकक्ष के लिए ऐसे उपयुक्त दिशा एवं स्थान का चयन किया जाए, जहाँ पहुँचते ही मीठी नींद के झोंके आने लगें। शयनकक्ष यदि उपयुक्त स्थान पर नहीं बना है, तो तनाव-अनिद्रा-अवसाद जैसी कई स्वास्थ्य समस्याएँ खड़ी कर सकता है।
शयनकक्ष बनाते समय दिशाओं का विशेष ध्यान रखा जाता है। वास्तुशास्त्र में शयनकक्ष के लिए उत्तम स्थान दक्षिण व पश्चिम दिशा मानी गई है। वास्तु रत्नावली के अनुसार भवन के दक्षिण में शयनगृह सर्वश्रेष्ठ माना गया है। महर्षि वशिष्ठ इस संदर्भ में कहते हैं-
ऐन्द्रायाँ स्नानगृहं कार्यमाग्नेयाँ पचनालयः। याम्यायाँ शयनं वेश्म नैऋत्याँ शस्त्रमंदिरम्॥
महर्षि कश्यप के अनुसार-
प्राच्याँ दिशि स्नानगृहमाग्नेय्याँ पयनालयः शयनं याम्यदिग्भागे नैऋंत्याँ शास्त्रमंदिरम्॥
अर्थात् पूर्व में स्नानघर, आग्नेयकोण में रसोईघर या पाकशाला, याम्य दिशा- यानी दक्षिण में शयनगृह एवं नैऋत्यकोण में शास्त्रागार बनाना चाहिए। पड़ जाती है। देखा गया है कि इस क्षेत्र में शयनकक्ष होने से परिवार में कन्यासंतति की अभिवृद्धि होती है। यदि किन्हीं कारणवश भवन के ईशानकोण वाले कमरे में शयनकक्ष बनाने की बाध्यता हो, तो इसे बच्चों का शयनकक्ष बना सकते हैं, विशेषकर पढ़ने वाले लड़के-लड़कियों के लिए यह दिशा बहुत शुभ होती हैं। इस कक्षा में पलंग की व्यवस्था इस तरह से की जानी चाहिए कि वह दक्षिणी दीवार की ओर हो और सिरहाना दक्षिण या पूर्व दिशा की ओर।
1.पूर्व-दिशा इस दिशा में बने शयनकक्ष स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने वाले होते हैं। पूर्व दिशा के इस कमरे को यदि शयनकक्ष बनाना अनिवार्य हो, तो उसे मेहमानों के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। जो कुछ समय के लिए ठहरते हैं। बच्चों के लिए भी पूर्व का शयनकक्ष बना सकते हैं। तथा उसी से सटा हुआ ईशानकोण का कमरा अध्ययन के लिए प्रयुक्त कर सकते हैं। बच्चों के लिए यह दोनों ही शुभ व अच्छे परिणाम प्रस्तुत करने वाले होते हैं। घर के पूर्व दिशा वाले कमरे में बड़ों का शयनकक्ष होने से यह उनके लिए अस्वास्थ्यकर होने के साथ ही दाँपत्य जीवन में कलह उत्पन्न करते हैं। संततिहानि का भी भय बना रहता है।
2.दक्षिणपूर्व दिशा अर्थात् आग्नेयकोण-भवन में आग्नेयकोण अग्नि का स्थान है। इस दिशा में निर्मित कमरे को शयनकक्ष बनाने से निद्रा में बाधा पड़ती है। अग्नि का वास होने से इस कमरे में सोने एवं रहने वाले व्यक्ति का मिज़ाज गरम व क्रोधी हो जाता है, जिससे पारिवारिक सौमनस्य बिगड़ता है। मानसिक तनाव एवं चिड़चिड़ापन बना रहता है, फलतः नींद कम आती है। पति-पत्नी में तनाव बना रहता है। क्रोधी स्वभाव, अशाँत मन, बुरी चित्तवृत्ति गृहकलह का कारण बनती है। बच्चों का मन पढ़ाई में कम लगता है। लोग लालची हो जाते हैं। आग्नेयकोण में शयनकक्ष होने से घर के सभी प्रकार के ऊष्मीय संतुलन बिगड़ जाते हैं। लोग जल्दबाजी में निर्णय लेते हैं, फलतः काम बनने की अपेक्षा बिगड़ जाते हैं। इस कोण में रहने वाले व्यक्तियों को सदैव अग्निभय बना रहता है, साथ ही कोर्ट-कचहरी के मामले भी आए दिन परेशान करते रहते हैं।
वास्तुविद्या विशारदों के अनुसार, आग्नेयकोण में बेडरुम-शयनकक्ष होने पर प्रायः पति-पत्नी के बीच मनोमालिन्य देखा जाता है। अतः इस कमरे को रसोईघर या स्टोररुम के रूप में प्रयुक्त किया जाए तो अच्छा रहता है। अगर ऐसा संभव न बन पड़े और शयनकक्ष के रूप में प्रयोग करना अनिवार्य हो तो इस कमरे में बीच से पार्टीशन करके बाहर वाले भाग में रसोई या स्टोररुम तथा अंदर वाले हिस्से में शयनकक्ष बना सकते हैं। लड़कियों के लिए यह कक्ष बहुत उपयोगी रहता है। वे इसमें प्रसन्न रहती और बौद्धिक प्रगति करती हैं।
3.दक्षिण दिशा- दक्षिण दिशा का शयनकक्ष सबसे अच्छा माना गया है। पृथ्वी की चुँबकीय शक्ति अनुकूल पड़ने के कारण इस दिशा में बनाए गए शयनकक्ष जीवनदायी एवं स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध होते हैं। यह दिशा शुभ एवं शाँतिदायक होती है।
4.दक्षिण- पश्चिमकोण अर्थात् नैऋत्यकोण- मास्टर बेडरुम अर्थात् मुख्य शयनकक्ष के लिए यह कोना सर्वश्रेष्ठ होता है। इस दिशा में गृहस्वामी का शयनकक्ष होना चाहिए।
5.पश्चिम दिशा- इस दिशा में भी शयनकक्ष बनाए जा सकते हैं। परिवार के कनिष्ठ सदस्यों एवं बच्चों के शयनकक्ष इस दिशा में विशेष शुभदायक होते हैं। पश्चिम दिशा में बनाए गए शयनकक्ष में इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि उसकी छत का ढलान पश्चिम की ओर न होकर पूर्वोत्तर की तरफ हो।
6.पश्चिम-उत्तर दिशा अर्थात् वायव्यकोण- इस दिशा में मेहमानों का शयनकक्ष शुभदायक होता है। यह बालिकाओं के लिए भी उपयुक्त है। परिवार के अन्य सदस्यों को इस दिशा में बने कक्ष में सोने से मानसिक परेशानियों एवं अशाँति का सामना करना पड़ता है। वायव्यकोण मानसिक चिंता, गृहकलह एवं अनावश्यक प्रवास आदि का कारण बनता है।
7.उत्तर-दिशा-वास्तु नियमों के अनुसार उत्तर दिशा का शयन वर्जित है। उत्तर दिशा धन के स्वामी कुबेर का स्थान है। जहाँ भंडारकक्ष का निर्माण किया जाता है, किंतु यदि इसे शयनकक्ष के रूप में प्रयुक्त किया जाए तो इससे आर्थिक हानि होने एवं फालतू खरच बढ़ने की संभावना रहती है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी इसे अच्छा नहीं माना जाता। उत्तर दिशा में सोने से मानसिक अशाँति बनी रहती है। हाँ, वायव्य कोण एवं उत्तर दिशा के मध्य में शयनकक्ष बना सकते हैं। नवदंपत्ति के लिए यह कक्ष सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
काया का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हृदय संस्थान है। रक्तसंचरण एवं प्राण-प्रवाह का तो यह केंद्र है ही, अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार इसी क्षेत्रविशेष को भाव-संस्थान, अंत करण, कारणशरीर आदि विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है। भावना, आस्था, प्रेरणा, साहस, आत्मीयता, आदर्श जैसे तत्त्व इसी क्षेत्र में उभरते हैं। किसी को महामानव स्तर तक विकसित करने की अलौकिकता इसी क्षेत्र में प्रस्फुटित होती है। इसके विपरीत यदि इस क्षेत्र पर अनैतिक अवाँछनीयताएँ आधिपत्य जमा लें, तो व्यक्ति को आततायी असुरों जैसे स्तर का बनते देर नहीं लगती।
भाव-संवेदनाएँ अंतराल से ही विकसित होती और बीज से वटवृक्ष बनकर आत्मीयों को नहीं, समस्त प्राणिसमुदाय को अपनी चपेट में लेती हुई उन्हें तद्नुरूप सोचने-समझने और कुछ करने के लिए विवश करती हैं। जिस किसी का यह क्षेत्र जाग जाता है, हृदय ग्रंथि खुल जाती है, उसे आत्मसाक्षात्कार का-ईश्वरदर्शन का परम लाभ प्राप्त करने और दिव्य विभूतियों से सराबोर होने का अवसर भी उपलब्ध हो जाता है।
योगशास्त्रों में हृदयस्थान को अनाहतचक्र कहा गया है। नीचे से ऊपर की ओर क्रमशः चलने पर मूलाधार, स्वाधिष्ठान एवं मणिपुर चक्रों के बाद इसी का नंबर आता है। तप-साधना द्वारा चक्रों के उन्नयन से प्राण-ऊर्जा का ऊर्ध्वीकरण होता और साधक पशु-प्रवृत्तियों से ऊपर उठकर पेट-प्रजनन से आगे की बात सोचता एवं प्रगति की दिशा में अग्रगमन करता है, परन्तु आत्मोन्नति का मार्ग इतने से ही प्रशस्त नहीं हो जाता। इससे आगे का मुख्य सोपान है- गुण-कर्म-स्वभाव को परिष्कृत करना एवं हृदय की अंतः मलिनता को धोना, उसकी जटिल गाँठों को खोलना। हृदयग्रंथि यदि परिष्कृत हो जाए, तो फिर मनुष्य, मनुष्य नहीं रह जाता, वह देवमानव- महामानव बन जाता है। बुद्धत्व और नारायणत्व की ओर बढ़ने का राजमार्ग यही है। जब तक अंतर में वासनाओं का दुर्भावनाओं का घटाटोप छाया रहता है, मनुष्य क्षुद्र स्थिति से ऊपर नहीं उठ सकता, पुण्यपरमार्थ की- उदार सहकार की बातें नहीं सोच सकता, किंतु जब हृदय में ईश्वरप्रेम की, उच्चादर्शों एवं सिद्धाँतों की स्थापना कर ली जाती है और उसके परिपालन की ओर मानवी मन उन्मुख हो जाता है, तो यहीं से उसके ग्रंथियों की गांठें खुलनी प्रारंभ हो जाती हैं, हृदयचक्र की ओर बढ़ने और हृदय गुफा में निवास करने का मार्ग खुल जाता है। अष्टावक्र गीता के अष्टादश प्रकरण के 88वें श्लोक में इसी तथ्य का रहस्योद्घाटन करते हुए अष्टावक्र ने राजा जनक को संबोधित करते हुए कहा है कि जिसकी हृदयग्रंथि टूट जाती है। अर्थात् अहंभाव परमात्मभाव में विलीन हो जाता है, वर रज-तम गुणों से मुक्त होकर आत्मा में ही रमण करने लगता है। श्रीमद्भागवत् गीता में भगवान् ने अर्जुन से कहा है कि मैं हृदयक्षेत्र में निवास करता हूँ।
प्रख्यात दार्शनिक एवं ज्योतिर्विद् एग्रीपा ने जीवात्मा के केन्द्र- हृदय की तुलना सृष्टि के केन्द्र से की है, जिसमें सौरमंडल के समस्त ग्रह अपने सूर्य के तथा विश्वब्रह्माँड के सूर्य महासूर्य की परिक्रमा की परिक्रमा करते हैं। उसकी अनुकृति होने के फलस्वरूप ही संकल्प स्थल हृदय में विविध प्रकार की विश्व-ब्रह्मांडीय घटनाचक्र, अविज्ञात प्राकृतिक रहस्य एवं भूत-भविष्य की जानकारियाँ उद्भूत होती रहती हैं। उनके अनुसार जिस प्रकार मनुष्य विश्व-ब्रह्माँड के केंद्र में स्थित है, उसी तरह सारी सृष्टि सूक्ष्म रूप में उसके हृदय में अवस्थित है, अतः ईश्वर और मनुष्य दोनों में समानता है। दोनों की अनुरूपता एवं मिलन का स्थान उसका हृदय ही हो सकता है। यही जगत् का केन्द्र भी है। परमात्मा एवं जीवात्मक की अभिन्नता, समरूपता एवं मूलभूत एकता होने के कारण ही सभी धर्मों एवं तत्त्वदर्शनों में हृदय की पवित्रता-शुचित पर बहुत जोर दिया गया है। हृदयगुहा में प्रवेश करके ही व्यक्ति अपनी वर्तमान स्थिति से ऊँचा उठकर श्रेष्ठतम सोपानों तक पहुँच सकता है। यह अध्यात्म साधना का लक्ष्य भी है।
लोकसेवा के लिए मन में उमंग और उत्साह उठने के तत्काल बाद उस ओर प्रवृत्त नहीं हुआ जा सकता। इसके लिए अपना दृष्टिकोण बदलना पड़ता है। मान्यताओं में आवश्यक परिवर्तन कना पड़ता है, तब कही जाकर सेवा-साधना संभव होती है। मनुष्य के पास थोड़ी-सी शक्तियाँ और छोटा-सा जीवन है। उसे लौकिक प्रयोजनों में लगा दिया जाए अथवा पारमार्थिक प्रयोजनों में, यह निश्चित स्वयं ही करना पड़ता है। अपने स्वार्थों के लिए हर कोई प्रयत्न करता है। लोकसेवी अपनी शक्तियों का सुनियोजन जनसेवा के लिए, परमार्थ कार्यों के लिए करता है। अतः उसे अपनी आवश्यकताओं और सुविधाओं के लिए दूसरे से भिन्न दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और अपना जीवनस्तर, आवश्यकताओं तथा साधनों के उपयोग की रीति-नीति भिन्न रखनी चाहिए।
प्रायः दृष्टिकोण न बदलने के कारण ही सेवाधर्म कठिन जान पड़ता है और उसका निर्वाह नहीं हो पाता। उदाहरण के लिए आवश्यकताओं को ही लें। बहुत से व्यक्ति यह सोचते हैं कि संपन्नता और समृद्धि ही जीवन का लक्ष्य है और उसे प्राप्त करने में जो सफल हो गया वही धन्य है। लोकसेवी का दृष्टिकोण इससे भिन्न होना चाहिए। उसे साधनों की विपुलता नहीं, व्यक्तित्व की श्रेष्ठता को बड़प्पन का आधार मानना चाहिए। यदि ऐसा न हो सका, तो लोकसेवी उसी गोरखधंधों में उलझकर रह जाएगा, जिसमें कि दूसरे लोग उलझ जाते हैं। सर्वसाधारण की दृष्टि में सुविधाएँ और विलासिता के साधन ही जीवन की सार्थकता है। और विलासिता के साधन ही जीवन की सार्थकता है। यद्यपि वे सभी को उपलब्ध नहीं होते, परंतु उसकी गतिविधियों का केंद्रीय आधार वही रहता है। इच्छित स्तर की साधन संपन्नता हर कोई अर्जित नहीं कर पाता, लेकिन लक्ष्य सभी का वही रहता है। लोकसेवी को सर्वसाधारण से भिन्न रीति-नीति अपनानी चाहिए।
अपने निर्वाह के लिए लोकसेवी को कम से कम आवश्यकताएँ रखने का दृष्टिकोण विकसित करना चाहिए। समझा जाता है कि हम जितनी शान- शौकत और मौज-मजे में विलासितापूर्ण साधनों का उपयोग करेंगे, उतना ही बड़प्पन मिलेगा। वस्तुतः यह सोचना गलत है। इसके लिए अपनी बड़प्पन की परिभाषा बदलनी चाहिए। बड़प्पन धन-संपत्ति या शान-शौकत से नहीं, उत्कृष्ट और आदर्श व्यक्तित्व तथा महान् बनने वाले सद्गुणों से मिलता है। प्राचीनकाल में लोकसेवी परंपरा के अंतर्गत जितने भी संत, ऋषि, विचारक, मनीषी और महापुरुष हुए, उन्होंने यही दृष्टिकोण अपनाया। ऋषियों के रहन-सहन की सादगी इतनी सुविख्यात है कि उस संबंध में कुछ भी कहना पुनरुक्ति ही कहलाएगा। चाणक्य, जिन्होंने भारत को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने लिए चंद्रगुप्त का मार्गदर्शन किया, हमेशा एक कुटिया में रहे। यदि वे चाहते, तो अपने लिए प्रचुर साधन-सुविधाएँ जुटा सकते थे और सुविधासंपन्न जीवन व्यतीत कर सकते थे। लेकिन लोकसेवियों की आदर्श परंपरा की रक्षा के लिए उन्होंने न्यूनतम आवश्यकता की मर्यादा का ही पालन किया।
इस युग में भी न्यूनतम आवश्यकताओं को रखते हुए जीवन व्यतीत करने वाले महापुरुष हुए हैं और उन्हें भरपूर श्रद्धा मिली है। गोपालकृष्ण गोखले, महर्षि अरविन्द, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, गाँधी आदि मनीषी महामानवों का जीवन तो तीस-चालीस वर्ष पूर्व की ही बात हैं। उन्होंने अच्छी संपन्न स्थिति में रहते हुए भी न्यूनतम साधनों का उपयोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया। गोपालकृष्ण गोखले अच्छी संपन्न स्थिति के थे और आमदनी भी उन्हें पर्याप्त होती थी। पर उन्होंने अपने लिए यह मर्यादा बना ली थी कि परिवार के लिए तीस रुपये से अधिक खरच नहीं करेंगे। उन्होंने आजीवन इसी मर्यादा का पालन किया। महर्षि अरविंद जब इंग्लैण्ड से शिक्षा प्राप्त कर लौटे, तो उनकी नियुक्ति बड़ौदा के एक कॉलेज में 500 रुपये माहवार पर हुई।
चाहते तो वे अच्छा ठाठ-बाट बाद का जीवन व्यतीत कर सकते थे। लेकिन उन्होंने निश्चित किया कि पचहत्तर रुपये में अपना गुजारा चलाएँगे ओर वास्तव में उन्होंने अपने निश्चय के अनुसार ही जीवनस्तर रखा। ईश्वरचंद्र विद्यासागर को पाँच सौ रुपये प्रतिमाह मिलते थे, लेकिन उन्होंने अपने लिए पचास रुपये की ही व्ययसीमा रखी और आजीवन उसी स्तर को कायम रखते हुए सेवाधर्म का पालन करते रहे।
महात्मा गाँधी एक सस्ता-सा कपड़ा-धोती ही पहनते थे और सादे-से-सादे भोजन करते थे। इसी में उन्हें संतोष की अनुभूति अपने लिए पचास रुपये की ही व्ययसीमा रखी और आजीवन उसी स्तर को कायम रखते हुए सेवाधर्म का पालन करते रहे।
महात्मा गाँधी एक सस्ता-सा-कपड़ा-धोती ही पहनते थे और सादे-से-सादा भोजन करते थे। इसी में उन्हें संतोष की अनुभूति होती थी और जनसाधारण से निकट की आत्मीयता की अनुभूति भी प्राप्त होती रही थी। अपने बीच का अपनी स्थिति का व्यक्ति मानकर लोगों ने उन्हें जो सम्मान दिया, वह बीसवीं शताब्दी में शायद ही किसी व्यक्ति को मिला है।
यहाँ दो-चार महापुरुषों की ही चर्चाएं की गई हैं, अन्यथा संसार में जितने भी महान् व्यक्तित्व हुए हैं, उन्होंने आवश्यकताओं के संबंध में अनिवार्यता का दृष्टिकोण अपनाया। सुकरात के संबंध में अनिवार्यता का दृष्टिकोण अपनाया। सुकरात के संबंध में कहते हैं, जब भी वे कोई वस्तु खरीदते या कोई नया साधन जुटाते, तो उसके पहले अपने आप से यह प्रश्न करते कि क्या इस वस्तु के बिना मेरा काम नहीं चल सकता है? यदि उत्तर हाँ में मिलता तो वे खरीदते अन्यथा उस विचार को छोड़ देते थे। कम साधनों में निर्वाह, गौरव और गरिमा की बात है, यह दृष्टिकोण विकसित किया जा सके, तो न अभावों की समस्या रह जाती है और न किसी बात की कमी होने की शिकायत रह जाती है।
यह समझा जाता है कि यदि साधारण स्तर का जीवन व्यतीत किया जाए, तो लोग हमें घटिया, दरिद्र या कंजूस समझेंगे। लोगों की मान्यताएँ बनती और बिगड़ती रहती हैं, अन्यथा न सादगी का कभी अपमान हुआ है और न उसके प्रति किसी में घृणा उत्पन्न हुई है। बल्कि सादगीपूर्ण कम आवश्यकताओं में ही अपना गुजारा चला लेने वाले व्यक्तियों को असाधारण सम्मान मिला है। महात्मा गाँधी खद्दर की एक धोती भर पहनते थे और जनसाधारण जिन्हें अनुपयोगी ओर निम्नस्तरीय साधन-उपकरण समझते हैं, उनका प्रयोग करते थे। लेकिन इससे उनके सम्मान में कोई कमी नहीं आई। अपितु सर्वसाधारण भी उन्हीं साधनों को अपनाने में गौरव अनुभव करने लगे।
सामान्य रूप से लोग फूहड़पन और गंदे रहन-सहन को जरूर घृणा की दृष्टि से देखते हैं, किन्तु सादगी को सम्मान देते हैं। छोटे तबके के लोगों को लोग गिरी हुई निगाह से इसलिए नहीं देखते कि उनके पास पर्याप्त वस्त्र नहीं होते अथवा और दूसरे साधनों का अभाव रहता है, उनके प्रति असम्मान की भावना तब उभरती है, जब वे आलसी होने के कारण, गंदे और मूर्ख होने के कारण अव्यवस्थित रहते हैं। कम वस्त्र या कम साधन होने से कोई छोटा या गिरा हुआ नहीं हो जाता। गिरावट आती है- अस्वच्छता और अव्यवस्था से। इस प्रकार लोकसेवी को बड़प्पन की मान्यता परिष्कृत करनी चाहिए। अपना जीवनस्तर सादा, स्वच्छ तथा सुव्यवस्थित रखना चाहिए। सादगीपूर्ण वेशभूषा और न्यूनतम आवश्यकताएँ, यह सिद्धान्त अपने जीवन में समाविष्ट कर लेना चाहिए। सुरुचिपूर्ण सादगी को ही अपनी गौरवगरिमा समझने की दृष्टि विकसित की जानी चाहिए।
लोकसेवियों को अपने स्वरूप की गौरवगरिमा का ध्यान रखने के लिए उज्ज्वल चरित्र और धवल व्यक्तित्व की आवश्यकता अनुभव करनी चाहिए। इस संबंध में यह मान्यता बनाई और अपनाई जाए कि हम जो कुछ भी करना चाहें, जो कुछ भी शिक्षा दें वह वाणी से कम और व्यक्तित्व से अधिक उद्भव हो। कहने का अर्थ यह है कि लोकसेवी अपनी गरिमा को समझें और उसे अक्षुण्ण बनाएँ। अपने स्वरूप और वेष के गौरव को प्राचीनकाल में साधु-ब्राह्मण-लोकसेवियों की परंपरा में मानते थे, किंतु आजकल ये शब्द रूढ़ हो गए हैं और वर्गविशेष का अर्थबोध कराते हैं, क्योंकि इस नाम से संबोधित व्यक्तियों ने भी वही रीति-नीति अपनाना आरंभ कर दिया, जिसे कि सर्वसाधारण अपनाता रहा। बल्कि इस दृष्टि से तो उनकी रीति-नीति और भी विकृत हो गई। कारण कि यह वर्ग जनश्रद्धा का भी दोहन करने लगा, अन्यथा एक समय था, जबकि साधु वेश का अर्थ ही निस्पृह, अपरिग्रही और सेवाभावी व्यक्ति समझा जाता था। उस बहरूपिये की कहानी प्रसिद्ध है, जिसने एक राजा के कहने पर कोई बड़ा कमाल दिखाने और बड़ा इनाम लेने की बात कही थी। उस कमाल के लिए बहरूपिया साधु बनकर बैठ गया था और राजा ने उस साधु के सामने सिक्के, अशर्फियों तथा मुहरों का ढेर लगा दिया, पर साधु बने बहरूपिये ने उस ओर आँख तक उठाकर नहीं देखा। बाद में जब रहस्य खुला और राजा ने पूछा- तुम्हारे सामने इतनी संपदा का ढेर लगा हुआ था, यदि तुम चाहते, तो उसे ले सकते थे, अब तुम्हें कितना इनाम मिल सकता है? इनाम की तुलना में तो वह भेंट कई गुना ज्यादा थी।
बहरूपिये ने उत्तर दिया था कि- यदि मैं वह भेंट स्वीकार कर लेता तो उससे साधु वेश की मर्यादा समाप्त हो जाती और अब लोगों के हृदय में साधु के प्रति जो श्रद्धा है, वह कम हो जाती। कहने का अर्थ यह कि साधु ब्राह्मण-लोकसेवा ही जिनका जीवनलक्ष्य था, अपनी मर्यादाओं और नियमों के प्रति इतनी दृढ़निष्ठा रखते थे कि जनसामान्य उस वेश को देखकर ही श्रद्धानत हो उठता था। लोकसेवी को भी अपना स्वभाव, अपना रहन-सहन और अपना आचरण इस स्तर का रखना चाहिए कि उसे देखकर ही लोगों में लोकसेवी के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो।
इसके लिए आत्मनिर्माण की साधना करनी पड़ेगी। अपनी कमियों को खोजना और दूर करना, दुष्प्रवृत्तियों को हटाना तथा सत्प्रवृत्तियों को आने स्वभाव का अंग बनाना होगा। व्यक्तित्व की दृष्टि से लोकसेवी को अपना विकास इतना प्रखर और उच्च करना चाहिए कि उसकी वाणी से अधिक उसके कर्म प्रेरक बनें।
व्यक्तिगत रूप से अपने दृष्टिकोण को साफ करने और उसमें उज्ज्वलता, धवलता का समावेश करने के साथ ही परिवार के संबंध में भी अपने दृष्टिकोण और रीति-नीति को परिष्कृत कर लेना चाहिए। कहा जा सकता है कि हम तो कष्टसाध्य जीवन जी लेंगे, लेकिन परिवार के लिए तो पर्याप्त साधन चाहिए। लोकसेवा का व्रत ग्रहण करने के नाते अपनी आवश्यकताओं को तो कम किया जा सकता है, लेकिन बच्चों की सुविधाओं में तो कटौती नहीं की जानी चाहिए।
यदि यह दृष्टिकोण अपनाया गया, तो सादगी नाममात्र की चिह्न−पूजा बनकर रह जाएगी। सेवा-साधना के लिए सादगी जिन कारणों से आवश्यक है, वे कारण भी पूरे नहीं हो सकेंगे- जैसे सादगी के कारण जनसाधारण में अपनत्व की भावना जागती है। कहना नहीं होगा कि लोग लोकसेवी के साथ-साथ परिवार के संपर्क में भी आएँगे। परिवार के संपर्क में आने पर जब ठाठ-बाट और वैभव-विलास ही दिखाई देगा, तो लोकसेवी के रहन-सहन को नाटकीय समझने लगेंगे। यह भी हो सकता है कि से सोचें-अपने और परिवार के लिए तो इन्होंने सारे साधन जुटा लिए हैं और सादगी से रहने का उपदेश दे रहे हैं।
वैसी भी परिवार के लिए साधन-संपत्ति इकट्ठी करना या पर्याप्त सुविधाएँ जुटाना अनावश्यक है। न केवल अनावश्यक, वरन् अनेक दृष्टि से तो घर के बच्चों और स्वजनों के संस्कार बिगाड़ने जैसा है। उदाहरण के लिए, आज परिवार में इतनी संपत्ति है या इतना धन इकट्ठा कर लिया गया कि बच्चों को कभी पैदल चलने की जरूरत ही न पड़े। साइकिल, रिक्शा या स्कूटर जैसे साधन जुटा दिए गए, सभी सुविधाएँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने से, एक तो बच्चे को शरीरश्रम से जी चुराने की आदत पड़ेगी, दूसरा कभी संघर्ष पूर्ण परिस्थितियाँ आई, तो उन परिस्थितियों में निर्वाह बड़ा ही मुश्किल हो जाएगा।
परिवार के लिए सुविधा जुटाने और धन-संपत्ति इकट्ठी करने के स्थान पर सदस्यों में सद्गुणों का संवर्द्धन और उत्कृष्टता का अभिवर्द्धन किया जाए, तो अधिक श्रेयस्कर है। धनसंचय और संपत्तिसंग्रह कर घर के बच्चों को निकम्मा और आलसी बना देने की अपेक्षा अच्छा है कि उन्हें परिश्रमी, पुरुषार्थी और जीवन वाला तथा सद्गुणी बनाया जाए। संतान सुयोग्य हो या अयोग्य, दोनों ही स्थिति में उनके लिए धन-संपत्ति एकत्रित कर छोड़ जाना व्यर्थ है। किसी संत ने इसी को लक्ष्य कर कहा है- ‘पूत सपूत तो क्यों धन संचय। पूत कपूत तो क्यों धन संचय॥” अर्थात् संतान यदि सुयोग्य है, तो उसके लिए संपत्ति संग्रह की क्या आवश्यकता, क्योंकि अपने निर्वाह लायक उपार्जन तो वह अपनी योग्यता द्वारा ही कर लेगी और संतान यदि अयोग्य है, तो उसके लिए भी संपत्ति संग्रह व्यर्थ है, क्योंकि वह सारी संपत्ति अपनी अयोग्यता के कारण शौक-मौजों में नष्ट कर देगी।
अपना आदर्श, परिवार के लिए भी प्रेरक बनता है। प्रायः अभिभावक स्वयं अपनी आवश्यकताओं में कटौती कर बच्चों के लिए सुविधा-साधन एकत्र करते हैं। यदि बच्चों को अपने आदर्शों के अनुरूप ढालने की चेष्टा की जाए, उनके व्यक्तित्व को परिष्कृत और संस्कारित बनाने के लिए प्रयास किए जाएँ, तो उसके सुखद भविष्य की संभावना अधिक रहती है। धनसंपत्ति से नहीं, गुण और योग्यताओं से ही भविष्य का निर्माण होता है। इस दृष्टि से परिवार के सदस्यों को परिमार्जित करने में समय लग सकता है। उसके लिए मूर्तिकार का-सा धैर्य रखना चाहिए। एक साधारण से पत्थर को मूर्ति का रूप देने में मूर्तिकार लंबे समय तक परिश्रम करता है और अनोकल्पित स्वरूप को साकार हुआ देखने के लिए कोई पूर्वक प्रतीक्षा करता है। लोकसेवी को चाहिए कि वह भी संतान को, परिवार के सदस्यों को आदर्शों के साँचे निकलने के लिए धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करता रहे, स्वयं भी वैसा जीवन जिए एवं घर में भी वैसा वातावरण विनिर्मित करता रहे।
तेज बयार का झोंका आकर एकबारगी कँपा गया। बरफ सी छुअन थी हवा में। हो भी क्यों न! आखिर दिन भी तो जोड़ो के थे। भगवान् सूर्य अपना किरणजाल समेटकर कब के जा चुके थे। अब तो साँझ अपनी धुंधली-सी चादर सब ओर फैलती जा रही थी। तभी एक नारी मूर्ति छाया-सी दिखाई पड़ी। वह बरामदे से उतर कर कुंए की ओर बढ़ रही थी। उसके बढ़ते पाँवों के साथ ही उसके मन में अनेकों सवाल उठ खड़े हुए। ये प्रश्न कुछ ऐसे अटल और अविचल थे कि इनके सामने वक्त भी थम-सा गया।
स्मृतियों के झरोखे से नजर आने लगी आज से चालीस वर्ष पूर्व की वह खुशनुमा रात। शयनकक्ष को खूब सजाया गया था। पुष्पशरुया बनाई गई थी। आखिर यह सुहागरात कोई रोज-रोज थोड़े ही आती है। उनके दोस्त समरेख ने क्या-क्या सपने नहीं देखे थे, इस दिन के लिए। इस पल भी उसके दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी, जरा घूँघट की बदउली हटे और चाँद दिखाई दे। शारदा भी एक-दो पल के लिए माँ से धकेली जाने पर वहाँ आई थी। घूँघट की ओट से समरेश का मुंह देखा था। भीतर से कुछ उमड़ा था, फिर संकोच ने उसे जकड़ लिया था। समरेश ने लाख चाहा कि वह खुले,पर वह बड़ी तेजी से दरवाजा खोलकर निकल गई थी।
उसकी सहेलियों को सुबह पता चला कि वह रातभर माँ के पास सोती रही। सुहागरात नहीं मनाई जा सकी। अगले दिन ही घर भी वापस लौटना था। गाँव का पिछड़ा इलाका। लाज-संकोच, पुराने रीतिरिवाज। परिणाम यही रहा कि समरेश विदा के समय भी शारदा को देख नहीं पाया था।
समय बीतता गया और आकाश बादलों से भर गया। इधर सावन की मूसलाधार वर्षा और उधर हैजे का भीषण प्रकोप। लोग धड़ाधड़ा मरने लगे। समरेश भी एक दिन इस महामारी की लपेट में आ गया। उसके पिता ने डॉक्टर वैद्य बुलाए, मनौतियाँ मानी, पर कोई उसे बचा नहीं पाया। यह आघात उनका हृदय सह नहीं पाया, दौरे-पर-दौरे पड़ने लगे। पागल जैसे नहीं बल्कि पिता पूरी तरह पागल ही हो गए। सारा जीवन बिखर गया।
शारदा पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा। सद्यः विवाहिता, सहज सोलह वर्ष की सुँदरी घुटती। घुटनों तक लहलहाते काले बाल। सुँदर नाक-नक्शा और उस पर वैधल्य का वज्र प्रहार। साल भर बाद वह अपनी ससुराल लाई। जो बाल कल तक खूबसूरती के मानदंड थे, जिन आँखों के सामने झील की गहराई भी कम लगती थी, व अब ताने और व्यंग्य के आधार बन गए। राक्षसी, कुलक्षणी, डायन इन्हीं शब्दों से उसके जीवन का परिचय होने लगा।
ताने, व्यंग्य, उलाहने, मार के अलावा भला उसे और मिलना भी क्या था? जो उसकी ओर सहानुभूति की नजर फेंकना चाहता, वही बदनाम हो जाता। वह रात के एकांत में रोती-बिसुरती और यौवन को कोसती। पर वह क्या करे! यह सोच नहीं पा रही थी। हालाँकि उसने साज-शृंगार कब का त्याग दिया था। फिर भी आग को राख के भीतर चाहे जितना छिपाकर रखा जाए, फिर भी उसका तेज नहीं छिपता है। वह अपना ताप फैलाकर ही रहती है। उसकी जिंदगी भी अपने ही ताप में जलकर स्वाहा होने लगी।
उसकी अवस्था मैथिल कवि विद्यापति के काव्य में वर्णित उस कीड़े के समान हो गई, जो लकड़ी के बीच पड़ा है और दोनों ओर से लकड़ी धू-धू जल रही है। उसके हर पल संघर्ष के पर्याय बन गए। घर में ही विरानी बनी रही अशोकवाटिका में सीता के समान कैद रही। होती रही पग-पग पर उसकी परीक्षा और वह सीता के समान निर्विकार बनी रही।
नारी कुसुम सी कोमल होती है, तो वज्र के समान कठोर भी। पता नहीं परिस्थिति के ताप में उसकी कोमलता कहाँ खोती चली गई। उसकी जगह कठोरता आती गई। भयंकर तूफान जब आता है, तो बड़े-बड़े वृक्षों को धराशायी कर देता है। लेकिन लंबे समय तक वह भी नहीं रहता। परिस्थिति के वात्याचक्र में पिसती शारदा शाँति के आकाश के नीचे रहने लगी। धीरे-धीरे रामायण, सुखसागर, महाभारत, गीता का पारायण होने लगा। पिता प्रसिद्ध रामायणी थे, राधेश्याम कथावाचक की तरह कीर्तन करने वाले। बचपन में जब उसकी उम्र आठ साल की थी, तो पिता ने कहा था-”धार्मिक संस्कार की जड़े जितनी गहरी होंगी बेटी, तुम्हारा जीवन उतना ही सुखमय होगा।” घुट्टी के समान पिलाया गया यह संस्कार शारदा के लिए परम औषधि बन गया।
एक ओर धर्म के प्रति निष्ठा का संगीत गूँजने लगा, तो दूसरी ओर उसके श्वसुर की हालत में सुधार होने लगी। इन्हीं दिनों समरेश के दोस्त राजेंद्र बाबू महात्मा गाँधी के क्षरा चलाए जा रहे स्वाधीनता आँदोलन में कूद पड़े थे। उनके सान्निध्य ने इन श्वसुर-बहु पर भी अपना प्रभाव डाला था। शारदा के जीवन के अब दो ही पहलू थे- कठोर तप और देशसेवा। अधिकाँश दिन पर्व, एकादशी, उपवास, प्रभु का स्मरण।
तभी अचानक एक झटका-सा लगा स्मृतियात्रा को। उन्होंने देखा कि शारदा कुंए में कुछ कर ही है। थोड़ी देर बाद वह जाड़े में कांपती-ीगती निकली। ध्यान से देखने पर पता चला, वह अपने शरीर को सफेद खादी की चादर से ढके है। वह एकटक देखते रहे और पूछ ही बैठे-
“अच्छा शारदा भाभी! अभी नहाने का कौन-सा समय है, जब शीत लहरी चल रही है।” उसने उनकी ओर एक्सरे की सी पैनी दृष्टि से देखा, मानो वह उनके मन की थाह लेना चाहती हो। फिर किंचित उत्साह और पर्याप्त गंभीरता लिए धीरे-धीरे बोली- “राजेंद्र बाबू! इस शरीर से जितना तप कर लिया जाय, उतना ही अच्छा।”
“सो कैसे? इससे तो आपका दुःख बढ़ेगा, शरीर भी टूटेगा।”
“आप उलटा सोचते हैं। तप में प्रवृत्ति व्यक्ति बाहर से दुःखी और अभावग्रस्त लगता है, पर वस्तुतः वह आँतरिक तौर पर परम संतुष्ट होता है। जीवन के सारे दुःख तो तप की आग में जलकर भस्म हो जाते हैं।” उस समय शारदा उन्हें एक प्रतिमा लगने लगी, भारतीय नारी के आदर्श की प्रतिमा। बाबू राजेंद्र प्रसाद सोचने लगे- भारतीय नारी के प्राचीन आदर्शों की यह जीवंत प्रतिमा कितनी आकर्षक व मोहक है। अपने अनगढ़पन के विरुद्ध कितना आँदोलन, कितना संघर्ष झेला है शारदा भाभी ने, तभी तो वह प्रतिमा होगा। अपने रूप को कितनी बार गलाया होगा, मिटाया होगा।
सफेद खादी की चादर में लिपटी शारदा उन्हें प्रतिमा ही लग रही थी और वह किंकर्तव्यविमूढ़ से उसे देखे जा रहे थे। तभी उसने उनका ध्यान बँटाया।
“क्या सोचने लगे राजेंद्र बाबू?”
“मैं आपकी हिम्मत की सराहना करता हूँ, पर सोचता हूँ कि परमात्मा ने क्यों भेजा आपको इस धरती पर? क्या कष्ट भर झेलने को?”
“ऐसी बात कभी मुँह से भी नहीं निकालिए। उसकी सारी योजना विवेकसम्मत है। हम उस पर टीका-टिप्पणी करने के अधिकारी नहीं है।”
“तब आप ही बताइए? कैसे गुजरता है आपका एकाकी जीवन?”
“वही रास्ता जो बापू जी ने बताया और आपने मुझे सिखाया।” यह कहते हुए पहली बार उसके होठों पर एक मंद-सी मुस्कान झलकी।
वह आगे बोली-”मैंने अपने पास-पड़ोस की निरक्षर महिलाओं को साक्षर बनाया है। वे रामायण और महाभारत आराम से पढ़ लेती है। इतना ही नहीं, मैंने अनुभव किया कि नारी को सर्वप्रथम आर्थिक संरक्षण मिलना चाहिए, जिसके लिए पूरा प्रशिक्षण जरूरी है।”
राजेंद्रबाबू उसकी बात सुनकर विस्मय-विमुग्ध होते गए। शारदा ने अपनी बात आगे बढ़ाई-”बापू द्वारा बताए गए उपाय से एक चरखा केंद्र चला रही हूँ। इसी के साथ गृह उद्योग का भी संचालन हो रहा है। जिसमें कुमारियाँ और मुझ जैसी अनाथ बहने है। मैं। अब बहुत खुश हूँ मेरा अभाव भरता जा रहा है। सूनापन मिटता जा रहा है। मेरी उपयोगिता की सीमाएँ बढ़ती जा रही है।”
“आप तो दार्शनिक हो गई हैं, शारदा भाभी।”
“सच कहती हूँ। मैं समझने लगी हूँ कि ईश्वर ने मुझे मानवता की सेवा के लिए जन्म दिया है। इसीलिए ऐसा भाग्य दिया। मुझे एक की सेवा के स्थान पर जन-जन की सेवा के लिए रचा गया है।”
राजेंद्र बाबू को भारतीय नारी के आदर्श की यह प्रतिमा और भी आकर्षक लगने लगी। श्रद्धेय और पूज्य! उसे वह भारतवर्ष के प्रथम राष्ट्रपति होने के बाद भी नहीं भूले। इन बाद के दिनों में भी एक अवसर पर उन्होंने कहा कि यदि भारतीय नारी अपने सच्चे स्वरूप को पहचान ले, तो कोई भी जीवन की विषमता, उसके मार्ग का अवरोध नहीं बन सकती। बीसवीं सदी में नारी की यह संकल्पित भावना ही, इक्कीसवीं सदी में नारी अभ्युदय के नवयुग को मूर्त करेगी। सच भी तो है, अगले सालों में राजेंद्र बाबू का यह विश्वास फलित होने को है।
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियों ! भाइयों!!
उपासना की महत्ता अपरंपार है। भगवान के नजदीक आप बैठें, उपासना करें, तो देखेंगे कि उनके सारे गुण आप में आते चले जाते है। बिजली को जो छूता है, तो उसके अंदर करेंट आ जाता है। भवान् को जो छुएगा, भगवान् से उसमें करेंट आ जाएगा। दो तालाबों को आपस में जोड़ दें, तो नीचे वाले तालाब का लेवल बढ़ता हुआ चला जाता है और दोनों का तल एक हो जाता है। भगवान और भक्त एक हो जाते हैं। सच तो यह है कि भक्त का उत्साह बढ़ाना चाहते हैं। और दूसरे कामों में उपयोग करना चाहते हैं। शबरी ने जूठे बेर भगवान् ने खाए थे न! गोपियों के यहाँ भगवान छाछ माँगने गए थे न बलि के दरवाजे पर बावन अंगुल के बन करके भगवान गए थे न! कर्ण के दरवाजे पर सोना माँगने के लिए साधु और भिखारी का रूप बनाकर गए थे न! ये बड़प्पन है! भक्त का बड़प्पन!! भृगु ने भगवान के सीने में लात मारी थी, कहाँ कैसे भगवान ने महर्षि भृगु की लात के निशान को अपनी मूर्तियों में महर्षि भृगु की लात का निशान बना रहता है। महर्षि भृगु बड़े थे, भगवान से। भक्त बड़ा होता है भगवान से; पर सही भक्त होना चाहिए। सही भक्त की हम आपको पहचान बात चुके हैं और ये बता चुके है कि भक्त को भगवान के अनुशासन पर निर्भर रहना चाहिए; भगवान को अपनी मरजी पर चलाने की बात नहीं सोचनी चाहिए। अपनी मनोकामना की बाबत ध्यान नहीं रखना चाहिए कि हमारी मनोकामना खत्म कर दी गई। भक्त अपनी मनोकामना खत्म कर देते हैं। और भगवान् की मनोकामना को अपने ऊपर बनाए रहते हैं।
नारद एक बार मनोकामना माँगने के लिए भगवान के पास गये और कहने लगे- एक युवती का स्वयंवर होने वाला है। मुझे आप राजकुमार बना दीजिए, सुँदर बना दीजिए, ताकि मेरी अच्छी लड़की से शादी भी हो जाए और मैं संपन्न भी हो जाऊँ। दहेज जो मिलेगा, उससे मालदार भी हो जाऊंगा। मालदार बनने की और संपन्न बनने की दो ही तो मनोकामनाएं है और क्या मनोकामना है? एक लोभ की मनोकामनाएं है, एक मोह की मनोकामना है। दोनों के अलावा और कोई तीसरी मनोकामना दुनिया में है ही नहीं। इन दोनों मनोकामनाओं को लेकर जब नारद भगवान् के यहाँ गए, तो भगवान के अचंभे का ठिकाना नहीं रहा। भक्त कैसा? जिसकी मनोकामना हो। मनोकामना नहीं होगी। दोनों का निर्वाह एक साथ नहीं हो सकता। जहाँ अँधेरा नहीं होगा। दोनों का एक साथ जोड़ कैसे होगा? इसलिए भगवान सिर पर हाथ रख करके जा बैठे। अरे! तुम क्या कहते हो नारद! लेकिन नारद ने अपना आग्रह जारी रखा-नहीं, मेरी मनोकामना पूरी कीजिए, मुझे मालदार बनाइए, मेरी विषयवासना पूरी कीजिए। भगवान चुप हो गए। नारद ने सोचा-भगवान ने चुप्पी साध ली है, शारद मेरी बात को मान लिया होगा। भगवान को माननी चाहिए भक्त की बात, ऐसा ख्याल था। बस वो चले गए स्वयंवर में। स्वयंवर में जाकर बैठे। राजकुमारी ने देखा-कौन बैठा है? नारद जी का और भी बुरा रूप बना दिया-बंदर जैसा। राजकुमारी देखकर मजाक करने लगी, हँसने लगी। यह बंदर जैसा कौन आ करके बैठा है? बस, उसको माला तो नहीं पहनाई और दूसरे राजकुमार को माला पहना दी। नारद जी दुःखी हुए फिर विष्णु भगवान के पास गए, गालियाँ बकने लगे। विष्णु ने कहा-अरे नारद! एक बात तो सुन। हमने किसी भक्त की मनोकामना पूरी की है क्या आज तक! इतिहास तो ला भक्तों का उठा करके। जब से सृष्टि बनी है और जब से भक्ति का विधान बना है, तब से भगवान् ने एक भी भक्त की मनोकामना पूरी नहीं की है। हर भक्त को मनोकामना का त्याग करना पड़ा है और भगवान् की मनोकामना को अपनी मनोकामना बनाना पड़ा है। बस, कल हम यह बता रहे थे कि आप अगर उपासना कर सकते हो, तो भगवान भी आपके बराबर हो सकते हैं। उसने बड़े भी हो सकते हैं। भगवान के गुण और आपके गुण एक बन सकते हैं आप महापुरुष हो सकते हैं, महामानव हो सकते हैं, ऋषि हो सकते हैं, देवात्मा हो सकते हैं और अवतार हो सकते हैं, अगर आप उपासना का ठीक तरीके से अवलंबन ले तो। कल का यह विषय था।
आज दूसरी बात बताते हैं आपको। अपनी पात्रता का विकास करना पड़ेगा, पात्र इसके लिए बनना पड़ेगा। पात्र अगर न होंगे तब? शादी कोई लड़की करना चाहे किसी अच्छे लड़के से और वह बुड्ढी हो तब? गूँगी बहरी, अंधी हो तब? तो कौन शादी करेगा? इसीलिए पात्रता बहुत जरूरी है। कल हमने कहा थान- उस दिन आपसे कहा था, गड्ढा होना जरूरी है, बादलों की कृपा प्राप्त करने के लिए। बादल तो बरसते ही रहते हैं। उनकी कृपा तो सबके ऊपर है। गड्ढा जहाँ होगा, वही तो पानी जमा होगा न। गड्ढा न होगा तब? सूरज कृपा तो हरेक के ऊपर है; लेकिन जिसकी आंखें खराब हो गई हो, उसके लिए क्या कर सकता है सूरज! दुनिया में एक से-एक सुहावने दृश्य दिखाई पड़ते है; पर एक-से एक सुहावने दृश्य को देख कौन सकेगा? जिसकी आंखों का तिल साबुत होगा, वही तो देखेगा? जिसकी आंखों का तिल साबुत नहीं है तो कैसे देखेगा जरा आप ही बताइए। जिसके कानों की झिल्ली खराब हो गई है, निया में एक-से-एक बढ़िया संगीत और आवाज निकलती है, पर कानों की झिल्ली खराब हो जाए, तब दुनिया के संगीत सुनने के लिए आदमी की कोई सहायता-सेवा नहीं कर सकता। आदमी का दिमाग खराब हो जाए तब? एक से-ऐ बढ़िया परामर्श देने वाले, एक-से-एक सहायता देने वाले क्या कर सकते है? कोई सहायता नहीं कर सकता। किसकी? जिसका दिमाग हो गया है। क्या करेंगे? अपना दिमाग तो सही हो, अपनी झिल्ली तो सही हो, अपनी आँखें का तिल तो सही हो। ये सही होंगे तो फिर सूरज भी सहायता करेगा, वायु भी सहायता करेगी। पाँच तत्व दुनिया में है जिसमें से हवा भी है, रोशनी भी है, सूरज भी है-ये सब आदमी की सहायता करते हैं। इन्हीं की सहायता से तो आदमी जिंदा है, लेकिन आदमी जिंदा तो होना चाहिए। मर गया होगा तब, साँस क्या करेगी? बहुत अच्छी प्रातः काल की हवा है; हवा फेफड़ों को मिलनी चाहिए, पर लेगा तो तभी, जब वह जिंदा हो। जिंदा नहीं हो, तो क्या करेगी हवा? एक से एक बढ़िया आहार है और भोजन है, लेकिन आहार और भोजन के होते हुए अगर किसी आदमी का पेट खराब हो जाए तब? आप क्या खिला करके करेंगे? और उलटा पेट में दर्द हो जाएगा। आप पौष्टिक पदार्थ दीजिए, मलाई मिठाई दीजिए। अगर पेट खराब है, पचता नहीं है तो मलाई मिठाई क्या करेगी? और जहर पैदा कर देगी। मेरा मतलब पात्रता से है।
आप ध्यान दीजिए और गौर कीजिए। पात्रता का विकास किए बिना न संसार में रास्ता है और न पात्रता का विकास किए बिना आध्यात्मिक क्षेत्र में कोई रास्ता है। आपको अफसर बनना है? पब्लिक सर्विस कमीशन के सामने जाइए और अपनी पात्रता साबित कीजिए। अच्छा डिवीजन लाइए और अच्छे नंबर लीजिए। आपको अच्छा स्थान मिल सकता है। नहीं साहब! हम तो परीक्षा से दूर रहेंगे, हम तो भगवान जी की आरती गाएँगे, हम तो पब्लिक सर्विस कमीशन की आरती गाएँगे हमको अफसर बना दीजिए। नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। पात्रता विकसित करना बहुत जरूरी है। पात्रता का इससे क्या मतलब है? पात्रता का अर्थ होता-जीवन को परिष्कृत करना। जीवन को परिष्कृत करने के लिए साधना करती पड़ती है। भगवान को प्राप्त करने के लिए उपासना और अपने आपको पात्र बनाने के लिए साधना। साधना किसकी? अपनी। अपनी से क्या मतलब? अपनी से मतलब यह है कि जो हमारे भीतर जन्म-जन्माँतरों के कुसंस्कार जमे पड़े हैं, उनका परिशोधन करना पड़ेगा, बचकानापन दूर करना पड़ेगा। बच्चों को तो कोई कह नहीं सकता। बच्चा कहीं भी पेशाब कर देता है, कहीं भी खड़ा हो जाता है, कुछ भी करने लगता है, कोई भी चीज फैला देता है, लेकिन बड़ा आदमी तो न केवल स्वयं सँभल के रहता है, वरन् दूसरों की चीजों को भी सँभालकर रखता है। ये बड़प्पन की निशानियाँ है पात्रता से मेरा मतलब इसी से है। चिंतन की दृष्टि से सज्जन और सभ्य-इन दो विशेषताओं को अपने भीतर पैदा करे आदमी, तो ये माना जाएगा कि उसने पात्रता का विकास कर लिया। पात्रता का विकास अगर कर लिया है, तो संसार में भी इज्जत और भगवान के यहाँ भी इज्जत। पात्रता का अगर आपने विकास नहीं किया, तो संसार में भी उपहास और तिरस्कार और भगवान् के यहाँ भी नाराजगी। आप कहीं भी, कुछ भी नहीं पा सकते। पात्रता की ओर ध्यान एकाग्र कीजिए। पात्रता आपके हाथ की बात है। उपासना भगवान का अनुग्रह, भगवान के हाथ की बात है; पर साधना तो आपके हाथ की बात है। आपने आपको सुसंस्कारी बनाने के लिए जो भी मुमकिन हो, आप पूरी शक्ति से और पूरी ईमानदारी से मेहनत कीजिए। आपको अनगढ़ और सुगढ़ बनाना है। हमारा जीवन अनगढ़ है; चौरासी लाख योनियाँ घूमने के बाद में न जाने कितने कुसंस्कार हमारे पास जमा है। और वे कुसंस्कार अगर इसी तरीके से जमा रहे, तो दीवार के तरीके से खड़े रहेंगे और फिर हमको आगे नहीं बढ़ने देंगे और ये हथकड़ियों और बेड़ियों के तरीके से रास्ता रोक लेंगे, न हमको ऊँचा उठने देंगे, न आगे बढ़ने देंगे। इसलिए कुसंस्कारों के विरुद्ध जद्दोजहद करना-यह हमारा काम है। साधना इसी का नाम है। साधना करने से आपने देखा है न, कितनी घटिया-घटिया चीजें, मामूली चीजें, क्या से क्या बन जाती है। आदमी पेड़ों को काटता है, छाँटता है, कलम लगाता है। जंगली पेड़ और माली के बगीचे के लगाए हुए पेड़, उनको आपने देखा नहीं है क्या? कैसे बढ़िया-बढ़िया गुलाब के फूल आते हैं। रंग-बिरंगे फूल आते हैं ये माली के हाथ की करामात है। क्यों? उन्हीं गुलाबों को जो जंगल में रहते हैं, खुशबू भी नहीं आती, बहुत छोटे-छोटे फूल होते हैं, उन्हीं गुलाबों को ऐसा बना देता है। इसका नाम क्या है? इसका नाम कलम लगाना कहिए, सुसंस्कारिता कहिए अथवा माली की साधना पौधे के साथ और आपकी जीवात्मा की साधना अपने जीवन के साथ। जीवन को अगर परिष्कृत बना ले, व्यक्तित्व को अगर ऊँचा आप उठा ले, फिर मजा आ जाएगा। फिर देखिए आपकी हैसियत कितनी बड़ी हो जाती है और आपकी जितनी हैसियत है, उसी हिसाब से आपको कीमत मिलनी शुरू हो जाएगी। आप एम॰ए॰ तक पढ़े है, तो ज्यादा पैसा मिलेगा-मैट्रिक तक पढ़े है, तो कम पैसा मिलेगा और बिना पढ़े आदमी है, तो उससे भी कम पैसा मिलेगा। पात्रता बढ़ाइए न, कीमत बढ़ाइए न अपनी। और जो चाहते हैं पाइये। कीमत आप बढ़ाना नहीं चाहते, माँग करके लेना चाहते हैं। प्रार्थना करेंगे- मांगेंगे! मांगेंगे!! मांगेंगे!!! अरे बाबा! मांगने से तो पाँच पैसे भी नहीं मिलते; उसमें भी पात्रता की जरूरत होती है। अंधा कोढ़ी होगा, तो शाम तक उसकी भीख में दो रुपये आ जाएंगे, हट्टा-कट्टा होगा, तो कोई देगा नहीं, गालियां और सुनाएगा तुझे शर्म नहीं आती बेशरम! भीख मांगने चला आया। काम, मेहनत, मजदूरी क्यों नहीं करता? पात्रता तो भिखारी को भी चाहिए, फिर सामान्य लोगों का तो पात्रता के बिना दुनिया में कुछ नहीं चलता। इसलिए पात्रता के लिए अपने गुण, अपने कर्म, अपने स्वभाव इन तीनों चीजों को परिष्कृत करना हर आदमी के लिए बेहद जरूरी है।
आध्यात्मिकता के रास्ते पर, जहाँ भगवान का पल्ला पकड़ना पड़ता है वहाँ दूसरा वाला कदम यह उठाना पड़ता है कि हमारी जीवन की साधना क्रमबद्ध है कि नहीं हमने अपने को साध लिया है कि नहीं। साध लेने से आदमी का मूल्य बढ़ जाता है। आप जानते हैं न! साँप को मदारी लोग पाल लेते हैं और सिखा लेते हैं। वह साँप जो आमतौर से हर आदमी को काट खाता है, वही साँप मदारी के बाल-बच्चों के गुजारे का माध्यम बन जाता है। बंदर के बारे में आप जानते हैं न। बंदर कितना वाहियात! किसी के कपड़े उठा के भाग जाता है, किसी को काट खाता है, किसी को क्या करता है, लेकिन वही बंदर पाल लिया जाता है, सिखा लिया जाता है, साध लिया जाता है, वो मदारी के बाल-बच्चों का गुजारा करने के लिए वही सबसे बड़ा स्त्रोत हो जाता है। रीछ जानते हैं कैसा खौफनाक होता है। लेकिन रीछ तब पाले लिए जाते हैं, साध लिए जाते हैं तब रीछ ही अपने पालने वाले का गुजारा कर देता है। सर्कस के बारे में आप जानते हैं। न! शेर कितना भयंकर और दूसरे जानवर कितने भयंकर लेकिन रिंगमास्टर के द्वारा जब साध लिए जाते हैं, तो सर्कस के मालिक को एक-एक दिन में हजारों रुपये कमा करके देते हैं। शेर, जो किसी को भी मार डाल सकते हैं, मालिक को दो-दो हजार रोज कमा करके देते हैं। ये कैसे हो सका? साधना के द्वार। साधना जैसे जंगली जानवरों की, की जा सकती है, उसी के तरीके से जीवन की भी जा सकती है। साधना अगर न की जाए तब? आदमी प्राकृतिक रूप से बड़ा वाहियात है, वनमानुष है। डार्विन ने कहा था कि इनसान बंदर नहीं है, वह बंदर का भाई बंधु है। वनमानुष होते हैं, जंगलों में रहते हैं, देखो है न आपने? न इनको कपड़ा पहनना आता है, न इनकी कोई सभ्यता है, न इनकी कोई बातचीत है। ऐसे किसी तरीके से जैसे बंदर पाल लिए जाते हैं, ऐसे एक वनमानुष के तरीके से वे लोग भी गुजारा कर लेते हैं, जिनको लोग जंगली कहते हैं जंगली लोगों को नर-पशुओं में गिना जाता है।
रामू के बारे में सुना है न आपने! रामू नाम का एक लड़का था। आगरा जिले के भेड़ियों की माँद में पाया गया? इनसान का बच्चा था। भेड़िए उठा कर ले गया, पर खाया नहीं पाल लिया उन्होंने। शिकारियों ने भेड़ियों को मार करके उस मनुष्य के बच्चे रामू को पकड़ लिया। फिर क्या हुआ? वह जंगली जानवरों के तरीके से रहता था। बोलता भी वैसे ही था, चलता भी वैसे ही था। कच्चा माँस खाता था। उसको कुछ भी नहीं आया। उसको लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में भरती कर दिया गया। चौदह वर्ष की उम्र तक जिया, लेकिन बहुत कोशिश करने पर भी उसे कुछ नहीं आया, कुछ बन नहीं सका। क्यों? क्योंकि छोटी उम्र में संस्कार नहीं डाले गए थे। संस्कार डालना आदमी के लिए बेहद जरूरी है। संस्कार के बिना आदमी स्वभाव का कैसा हो सकता है? फूहड़ है अनगढ़ है, बेहूदा है। इसलिए आपको, अपने आपको संस्कारवान स्वयं बनाना चाहिए। कौन बनाएगा? दूसरा कहाँ तक बनाएगा? बचपन में तो होता भी है। गुरुकुलों में ऋषि लोग छोटे बच्चों को महापुरुष बनाने की शिक्षा देते थे। आरण्यकों में वानप्रस्थों की भरती करने के बाद में शिक्षण देने की बात भी चलती है, पर सामान्य जीवन कैसे चले? बताइए आप। सामान्य जीवन में कौन पीछे लगेगा आपके? एक-एक गलती, एक-एक विचारधारा, एक-एक भूल के बारे में कौन सुधार करेगा? इसलिए ये काम आपको स्वयं ही करना पड़ेगा। आप ही अपने गुरु है आप ही अपने शिक्षक है और आप ही अपने साधक है, आप ही अपने मार्गदर्शक है। अगर आप यह समझ ले, तो आपके जिम्मे एक ही काम रह जाता है कि आप अपने आपको सुधारिये आप अपने आप को सँभालिए, आप अपने आप को ठीक कीजिए और अपने भगवान को नजदीक जाइए।
भगवान क्या है? बताइए आप। एक भगवान तो वह है, जो सारे विश्व में छाया हुआ है, सारे नियमों की व्यवस्था बनाते हैं। वे एक तरह के नियम है, कायदा और कानून है, जिसको हम परब्रह्म कहते हैं। एक और भी ब्रह्म है, जिसको आपको अपने ढंग से बनाने हैं; वह कौन-सा परब्रह्म है? अंग्रेजी में इसको सुपर-काँशस (सुपर चेतन) कहते हैं। वेदाँत की भाषा में इसको स्व कहा गया है, आत्मा कहा गया। आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः मंतव्यः निदिध्यासितव्यः। अरे लोगों! अपने आप को जानो, अपने आपको समझो, अपने आपको सुधारो, आपने आपको ठीक करो। यह कैसे हो सकता है? अपने आप। अपने आपसे क्या मतलब? आपने आपसे मतलब है-सुपर चेतन से, जो हमारे भीतर है, जिसके बारे में शुरू में बता या गया है। भीतर के अंतःकरण में व्यक्तित्व है, जिसमें कि गुण, कर्म और स्वभाव भरे पड़े है, जिसमें विश्वास और मान्यताएँ भरी पड़ी है, जिसमें आदतें भरी पड़ी है। आदतों को आपको ठीक करना है। अपनी मान्यताओं में, जिसमें घिनौनेपन घुसे बैठे है उनमें आपको सुधर करना है, शुरू से लेकर अंत तक देखभाल करनी है, उनको ठीक करना है। आपको आत्मदेव की करनी है, उनको ठीक करना है। आपको आत्मदेव की उपासना करती है। उपासना के बारे में जो हम कल कह रहे थे, वास्तव में वह आपको आत्मदेव है। अपने आपकी उपासना किया कीजिए। अपने आपकी उपासना जो कर लेते हैं वह अपने आप ही अपनी साधना से ही, अपने ही दबाव से भगवान बना लेते हैं। मीरा ने अपने ही दबाव से पत्थर को गिरिधर गोपाल बना लिया ओर एकलव्य ने अपने दबाव से ही मिट्टी के पुतले को द्रोणाचार्य बना दिया था और रामकृष्ण परमहंस ने अपने ही व्यक्तित्व के दबाव से पत्थर को काली बना दिया था। अपने आपके व्यक्तित्व का उजागर होना और स्वच्छ, निर्मल होना यह बहुत बड़ी बात है। इसके लिए आपको क्या करना चाहिए? चौबीसों घंटे आपको ध्यान रखना चाहिए। क्या ध्यान रखना चाहिए? यह कि हमारा जीवन किस तरीके से ठीक बन सकता है? आपको अपने कर्त्तव्यों पर ध्यान देना चाहिए। आपको अपने ज्ञान को परिष्कृत करना चाहिए और अपनी भक्ति-भावना का विकास करना चाहिए। तीन योग हैं न! एक योग का नाम है-ज्ञानयोग। इसका अर्थ है-आप वास्तविकता को समझे। अपने बाहर को समझा है, बीजों को समझा है, खेती-बाड़ी को समझा है, पैसे को समझा है, दुकान को समझा है, मुहल्ले वालो को समझा है, संतान को समझा है, फिर आपने आपको क्यों नहीं समझा? अगर आप जीवन को और अपने आपको समझ सकते हो तो इसका मान ‘ज्ञान योग’ होगा। अगर आपने आपने फर्ज और कर्त्तव्यों को समझ रखा हो तब? फर्ज का ज्ञान नहीं, कर्तव्य का ज्ञान नहीं, कोल्हू के बैल के तरीके से सारे दिन मरते रहते हैं, दूसरों की देखा-देखी वासनाओं के दबाव में। मेहनत कम नहीं करते। बहुत मेहनत करते है पर कर्त्तव्यपालन? कर्त्तव्यपालन अलग चीज है। हमारे फर्ज और हमारी ड्युटियाँ कहाँ है? ड्युटियाँ और हमारे फर्ज जहाँ कहीं भी हमको बुलाते हैं, वहाँ हमको जाना चाहिए। इसका नाम कर्मयोग है और भक्ति भावना? भक्ति-भावना मुहब्बत को कहते हैं, प्यार भगवान को किया जाता है। उपासना भगवान की की जाती है। प्रेम भगवान को किया जाता है पर भगवान तक सीमित नहीं रखा जाता। अखाड़े में कसरत करते तो है पर अखाड़े तक, उसकी कसरत की जो शक्ति-संचय है, उसको खर्च थोड़े ही कर देते हैं वह तो बाजार में करना पड़ता है, कही और करना पड़ता है भगवान की भक्ति का अभ्यास करते हैं, भगवान से हम प्रेम करते हैं, उपासना करते हैं। अगर उपासना के बाद में हमारी भक्ति का विकास हुआ हो, तब प्राणियों में इसका उपयोग करना पड़ेगा, मनुष्यों में उपयोग करना पड़ेगा, सबमें उपयोग करना पड़ेगा। प्यार से अपने आप को हरेक को सराबोर कर देना पड़ेगा। प्यार अपने शरीर से कीजिए, ताकि इसको अच्छे तरीके से सुरक्षित रख सकें। प्यार अपनी अंतरात्मा से कीजिए। ताकि इसका कल्याण करने में आप समर्थ हो सके। प्यार अपने मस्तिष्क के चिंतन की मशीन से कीजिए, ताकि प्यार द्वार सही विचार करे और अपने आप को तहस-नहस न होने दें। प्यार अपनी बीबी को कीजिए, ताकि उसका व्यक्तित्व आप निखार सके। प्यार आप बच्चों से कीजिए, ताकि उनको संस्कारवान बना सके। प्यार अपने मुल्क को कीजिए, देश को कीजिए, धर्म और संस्कृति को कीजिए, ताकि उनको इस लायक बना सके कि वह सम्मानास्पद हो, उनका मजाक नहीं उड़ाया जाए। हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति के बारे में लोग तरह-तरह के लांछन न लगा सकें, ऐसा कीजिए न! भक्ति का अर्थ प्यार होता है। प्यार का अर्थ सेवा होता है। सेवा कीजिए, सेवा। अगर भक्ति को समझ सकते हो, तब फिर यह क्या हो जाएगा? फिर यह भक्तियोग हो जाएगा। आपने जीवन की वास्तविकता को समझ सके, तो ये ज्ञानयोग हो जाएगा। जब अपने फर्ज और ड्यूटी को सब कुछ मान ले, इस बात पर ध्यान नहीं दें कि दूसरा आदमी क्या कहता है और क्या सलाह देता है, तब इसको कर्मयोग कहेंगे। इन तीनों बातों का ध्यान रखेंगे, तब आपका व्यक्तित्व निखरता हुआ चला जाएगा। जीवन की साधना के लिए इन बातों पर ध्यान रखना बहुत जरूरी है।
हमारा जीवन पारस है, हमारा जीवन कल्पवृक्ष है, हमारा जीवन अमृत है , हमारा जीवन कामधेनु है। आप जो भी चाहे इस जीवन को बना सकते हैं, लेकिन बनाना तो आपको ही पड़ेगा। आप ही बनाएँगे, तभी बनेगा। अपनी साधना आप कीजिए। अपने आपके विरुद्ध बगावत खड़ी कर दीजिए। अपने जन्म-जन्मान्तर को तोड़-मरोड़कर फेंक दीजिए और जो अच्छाई आपके भीतर नहीं है, जो विशेषताएं अभी तक पैदा नहीं कर सके है, उन गुणों, कर्म और स्वभाव के बारे में आप अभी तक अभावग्रस्त है, कृपा करके वे ठीक कीजिए, उनको सुधारिए। यह पुरुषार्थ कीजिए। बुराइयों को छोड़ने का पुरुषार्थ, अच्छाइयों को बढ़ाने का पुरुषार्थ। पराक्रम अगर आप करेंगे, तो किस तरीके से? आगे बढ़ने के लिए दो कदम बढ़ाने पड़ते हैं। एक कदम के बाद दूसरे के बाद फिर पहला। ऐसे ही आपको अपनी कमजोरियों और बुराइयों को दूर करने की जद्दोजहद करनी पड़ेगी और अपनी अच्छाइयों को प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करना पड़ेगा। यह दो काम करते हुए चले जाएँगे तो आपकी जीवन साधना पूर्ण को जाएगी। जीवन साधना जिस हिसाब से आपकी पूर्ण होगी आप देखेंगे सारा समाज आपका सहयोग करता है, अंतरात्मा आपका सहयोग करता है, भगवान आपका सहयोग करते हैं, पात्रता जैसे ही विकसित होती चलेगी। इसलिए मैंने कल कहा था- आपके भीतर फूल जैसे ही खिलना शुरू हो जाएगा, वैसे ही आपके ऊपर भौंरे अपने शुरू हो जाएँगे, तितलियां आनी शुरू हो जाएगी बच्चे आपको ललचाई आंखों से देखने लगेंगे। भगवान अपेक्षा करेंगे कि ये फूल हमारे गले में है, सिर पर होते तो कैसा अच्छा होता? कृपा करके कीजिए, साधना कीजिए साधना के चमत्कार देखिए। साधना से सिद्धि मिलती है- इस सिद्धाँत को आपको जीवन में प्रयोग करके दिखाना है, तभी फायदा उठा सकेंगे, जिसके लिए कल्पसाधना में आप आए है। हमारी बात समाप्त।
“इस संसार में वही बुद्धिमान है, जो जीवन और मरण के रहस्य को जानता है; भय एवं आसक्तिरहित होकर जीवन जीता है और उसी आधार पर अपनी गतिविधियों को नियोजित करता है।” गायत्री गीता के अंतर्गत गायत्री मंत्र के प्रथम पद ‘तत्’ की विवेचना करते हुए उपर्युक्त सार निकलकर आता है। सामान्यतया देखा जाता है कि लोग जीवन से बहुत प्यार करते हैं और मृत्यु से बहुत डरते हैं। असाध्य रोगों से ग्रस्त रोगियों से मिलने पर उनके अंतस्तल की दशा-वेदना को समझने वाले जानते हैं। कि लोग मृत्यु से कितना डरते हैं। कभी खतरे की संभावना सामने आए, सिंह-व्याघ्र सर्प-चोर-डाकू आदि का भय सामने आने पर प्राण संकट अनुभव करके लोग थर-थर काँपने लगते हैं, होश उड़ जाते हैं। मृत्यु चाहे प्रत्यक्ष रूप से सामने न हो पर उसका कल्पना मात्र से इतना भय मालूम होता है, जो मृत्यु के वास्तविक कष्ट से किसी भी प्रकार कम नहीं होता।
प्राणों का भय सामने उपस्थित होने पर अधिकाँश लोग अपने कर्त्तव्य-उत्तरदायित्व, धर्म-आचार, आत्मगौरव आदि को तिलाँजलि देने में नहीं झिझकते। हम ऐसे धर्मप्राण बनने वाले व्यक्तियों को जानते हैं, जिन्होंने डॉक्टरों द्वारा रोग को प्राणघातक बता देने पर शरीर जाने के भय से माँस, अंडे, मछली का तेल, मद्य आदि का सेवन किया। पिछले समय धर्मोन्मादी व्यक्तियों द्वारा जो पैशाचिकताएँ बरती गई, उनका सबको पता है। अत्याचारियों के चंगुल में फँसने पर कितनों ने ही अपना आत्मगौरव, धर्म, कर्त्तव्य, उत्तरदायित्व आदि को छोड़कर बड़े-से-बड़ा अत्याचार अपनी आँख से देखते हुए भी प्राणी भिक्षा के लिए गिड़गिड़ाते हुए आत्मार्पण किया।
मृत्यु का भय साधारण भय नहीं है। अविकसित, क्षुद्र हृदय व्यक्ति तो उससे भयभीत रहते ही हैं, पर वे लोग जो अपने सिद्धाँतवादी, वीर, कर्त्तव्यनिष्ठ और धर्मप्रेमी समझते हैं, परीक्षा का समय आने पर विचलित हो जाते हैं। ईसामसीह ईश्वर से प्रार्थना करते थे “हे प्रभु! हमें बुराइयों से बचा, पर परीक्षा में न डाल।” क्योंकि वे जानते थे कि मनुष्य बड़ा डरपोक है। प्राण त्याग तो दूर- शारीरिक कष्ट, आर्थिक क्षति या इच्छापूर्ति में प्रतिरोध दिखाई ही वह विचलित हो जाता है।
जीवन का निर्माण इस प्रकार हुआ है कि निरंतर खतरे उपस्थित होते रहते हैं। निर्माण और विनाश दोनों ही एक-दूसरे से प्रगाढ़ रूप से संबद्ध है। बीज गले बिना वृक्ष नहीं होता और फल टूटे बिना बीज नहीं बनता। नया जीवन धारण तब होता है, जब किसी की मृत्यु होती है और मृत्यु तब होती है, जब कोई जीवन नष्ट होता है। रात्रि और दिन की भाँति, सुख-दुख, हानि-लाभ का भी जोड़ा है। लोग सुखकर अवसरों का तो प्रसन्नतापूर्वक उपभोग कर लेते हैं, पर डरते-काँपते-भयभीत होते रहते हैं।
विघटनात्मक, विनाशात्मक स्थितियों से डरने-घबराने का कारण मनुष्य की एक आध्यात्मिक भूल है। वह भूल यह है कि वह शरीर को ही ‘मैं’ मान बैठता है। अपने आपको शरीर समझने के फलस्वरूप आत्मलाभ, आत्माँद, आत्मरक्षा, आत्मपरायणता, आत्मप्रतिष्ठा, जैसी वृत्तियों का परिवर्तित स्वरूप शरीर लाभ, शारीरिक आनंद, शरीर रक्षा, शरीर परायण, शरीर प्रतिष्ठा बन जाता है। जब ऐसा हो जाता है, तो वही अज्ञान संभव परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिससे आज जनसाधारण ग्रस्त है।
स्वार्थ मनुष्य की सर्वप्रिय वस्तु है। ‘अपनापन’ सबको प्यारा है। संसार का जो भी पदार्थ प्रिय लगता है, वह अपनेपन की भावना के कारण ही प्रिय लगता है। जब शरीर को ‘स्व’ मान लिया गया, तो उसके नष्ट होने का भय आत्मनाश के समान लगना चाहिए। जब शरीर ही ‘स्व’ है, तो शारीरिक इंद्रियों के भोग विलासों को आत्मानंद समझा ही जाना चाहिए। ऐसे व्यक्तियों के लिए शारीरिक-साँसारिक सुख पाने के लिए धर्म-कर्त्तव्य आदि शारीरिक-सांसारिक सुख पाने के लिए धर्म-कर्त्तव्य आदि को छोड़ देना और हत्या, डकैती तथा खतरे से भर दुस्साहसी कार्य कर डालना साधारण बात होती है।
आत्मा और प्रकृति के समन्वय का नाम ही जीवन है। जीवन इतना आनंदमय, इतना उल्लासमय, इतना सरस है कि उसका रसास्वादन करने के लिए जीवन संसार में बार-बार आता है। बार-बार जन्म लेता है। यदि ऐसा बात न होती, जीवन का मूल रूप दुःख, भय चिंता और क्लेशमय होता, तो निश्चय ही परमात्मा का अमर युवराज आत्मा उसे ग्रहण करने को कदापि तैयार न होता।
गायत्री मंत्र का प्रथम ‘तत्’ हमें बताता है कि हम जीवन और मरण के रहस्य को समझें, भय और आसक्तिरहित जीवन जिएँ और वास्तविकता के सुदृढ़ आधार पर अपनी गतिविधियों का निमार्ण करें।
श्री माव जी महाराज की भविष्यवाणी से संबंधित संर मरणात्मक कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ परिजन जनवरी माह की पत्रिका में पढ़ चुके है। श्रीमाव जी महाराज के शिष्य संत श्री देवापुरी जी महाराज ने अपनी गुरुसत्ता द्वारा वि॰ संवत् 1974 में की गई भविष्यवाणियों को वि॰ संवत् 2011 में अपने भक्तजनों को आगमवाणी (भविष्यवाणी) के रूप में स्थानीय भाषा में लिपिबद्ध किया है। इसे पूरे आसपूर (डूँगरपूर-राजस्थान) व आसपास के क्षेत्र के परिजन लोक शैली में गाते हैं व अपनी गुरुसत्ता के संदेश का निष्कलंक अवतार का प्रचार-प्रसार करते हैं।
विगत डूँगरपुर-बाँसवाडा के राजस्थान प्रवास पर अपनी इन्हीं आँखों से जब सब कुछ देखा-सुना-समझा तो विश्वास और पक्का हो गया कि युगपरिवर्तन की भविष्यवाणी जिस समय के लिए की गई थी, वह यही है। हम भले ही समझ न पाएँ- वह सूक्ष्म चेतनसत्ता उसे मूर्त रूप में लाने के लिए संकल्पित है। बेणेश्वर धाम जो माव जी महाराज की स्थापित मुख्य पीठ है, तीन ओर से नदियों से धिर, दुर्भिक्ष से ग्रस्त राजस्थान में आज भी एक हरा-भरा एवं पावन क्षेत्र है। इसी पर एक युवा संत श्री अच्युतानंद जी माव जी महाराज के उत्तराधिकारी के रूप में विराजते हैं। उनके द्वारा भी हमारी व्यक्तिगत मुलाकात में इन भविष्यवाणियों की सत्यता पर मुहर लगा दी गई।
स्थानीय बोली कुछ गुजराती-कुछ वागड़ क्षेत्र कुछ-कुछ मेवाड़ की मिश्रित भाषा है। इसकी भाषा में कुछ भजन भावार्थ व टिप्पणी सहित यहाँ प्रस्तुत है।
उत्तराखंड थी आलम आवसे, धेली वाव ऊपर कुँआरी कन्यानु मंदिर मंडासे। दुदिया काड़ में लिला-पिला तम्बु तणा से, दूध पाणी ना न वेड़ा थासे। गोल आसपूर एक थसे अने थासे हाला बोल॥
भावार्थ कुछ इस प्रकार है-”उत्तरप्रदेश से भगवान का आदेश आएगा और धोली बावड़ी पर कुँआरी कन्या का मंदिर बनेगा। दुदिया काड़ (मंदिर से सटे हुए खेतों वाले क्षेत्र का नाम) में नीले-पिले टेंट लगेंगे। सत्य-असत्य का न्याय होगा। गोल (एक मील दूर स्थित एक गाँव) एवं आसपुरी एकम होंगे। मानवमात्र-जाति-पाँति एक होंगे, ऊंच-नीच का भेद मिटेगा।”
टिप्पणी- अभी विगत 5 फरवरी इसी बोली वागडी परन बजे गायत्री मंदिर के पास महाकाल के मंदिर की स्थापना की गई। आसपुर के गायत्री शक्तिपीठ की प्राणप्रतिष्ठा का समारोह 27-4-1974 को आज से सोलह वर्ष पूर्व हो चुका है। जहाँ कुँआरी कन्या के मंदिर की बात कही गई है, उसका उल्लेख इसी गायत्री शक्तिपीठ के विषय में हुआ है। आसपास के पूरे क्षेत्र में इस शक्तिपीठ ने क्रमशः विस्तार लेकर बड़ा विराट् रूप ले लिया है। आश्वमेधिक प्रयाजों के अंतर्गत रंजवंदन समारोहों व अनुयाजों के अंतर्गत संस्कार महोत्सवों से वस्तुतः वातावरण ऐसा ही बना, जिसका चित्रण ऊपर किया गया। ऐसा ही उस क्षेत्र का वातावरण भी है, जो हमने स्वयं देखा। बावड़ी का जीर्णोद्धार कर उसमें गंगाजल डालकर उसकी अब एक पावन तीर्थ हिमालयवासी परमपूज्य गुरुदेव की सत्ता के मार्गदर्शन में ही यह सब हुआ है।
अगला भजन है-
धरती माते तो हेमर हाल सेस, सूना है नगर ने बाजार, लोक तेणी लसमी लूटाय के, जिनी दाड न फरियाँद।
अर्थात् “धरती पर प्राकृतिक विपदाएँ आएँगी, जिससे नगर व बाजार सूने पड़े रहेंगे। लोकों की लक्ष्मी लुट जाएगी, जिसकी फरियाद की कोई सुनवाई नहीं करेगा, ऐसा समय आएगा।”
उपर्युक्त गीत में वर्तमान परिस्थितियों का चित्रण है, जिसे कोई नकार नहीं सकता। आगे कि पंक्तियाँ है-
अरे भाई! झूठारे पुस्तक ने झुठारे पुस्तक ने झुठारे पानड़ा, झूठा हे काजी ने कुराण। जती के सती ने साबरमति जो तया होशे संरासंग्राम। काया में कारंगा ने मार जो, घर से निष्कलिंक मान॥
भावार्थ यह है कि “जब निष्कलंक अवतार होगा, तब साबरमती रूपी मानव मन में देवासुर संग्राम होगा, जिसके फलस्वरूप कलियुग का अंत होगा। कजी-मौला-पंडित लोग भ्रमित करने वाले साहित्य की रचना करेंगे। जिसका प्रतिकार करने हेतु जती एवं सती दोनों में संग्राम होगा। मानव देवत्व को धारण करेगा और मानवमय में बैठे क्रोध रूपी असुर को मारेगा। सतयुग की स्थापना होगी।”
टिप्पणी- आज की परिस्थितियों में यही हो रहा है कि धर्मतंत्र के संप्रदायवादी स्वरूप से मनुष्य दिग्भ्रमित है। सभी ओर अंतर्जगत में एक देवासुर संग्राम चल रहा है। सत्विंतन-प्रगतिशील विचारप्रवाह एवं दुष्चिंतन-निषेधात्मक विचारो में एक प्रकार से युद्ध हो रहा है। यही इस युग विचारक्रांति है, जो देवत्व को मानव मन में उत्कृष्ट अरइयर्रपरइरे लिर्ण्रीएररे केस्न में स्थापित कर रही है। गायत्री परिकर और उसकी युग निमार्ण योजना जिस तरह क्रियाशील है, एक परिष्कृत प्रगतिशील सर्वधर्म समभाव वाले धर्मतंत्र का स्वरूप क्रमशः स्पष्ट होता जा रहा है। गायत्री मंत्र जन जन तक पहुँचा है एवं सद्बुद्धि के विस्तार के साथ-साथ एक जाति विहीन समाज की ओर मानवजाति अग्रसर हो रही है। क्रोध-आवेश उत्तेजना-तनाव ने ही आज मनुष्य को नारकीय जीवन उत्तेजना-तनाव ने ही आज मनुष्य को नारकीय जीवन जीने को मजबूर कर दिया है। इनसे मोरचा ले रहा है गायत्री मंत्र की सामूहिक साधना का अभियान ज्ञानयज्ञ की क्राँतिकारी प्रक्रिया एवं संस्कारों का घर-घर विस्तार। तभी तो सतयुगी समाज की स्थापना होगी।
अगला भजन है-
अरे भाई! ढोल ढमको वाग सेस, ब्रह्माण्ड डोल वाय रे चतुर भमरा संत चढे, गामे दिवा लाग से दीवाली नवी आव से, ढोले एम को वाग से, ब्रह्माँड डोल वाय रे। अरे भाई घर घर घेडिला घुम से, जीव जराया हाथ रे कायम लेखो माँग से निष्कलिंग लेखो माँरग से जुग चौथा मार रे।
भावार्थ-”‘चौथे युग में (सतयुग में) ऐसा शंखनाद होगा, जिसमें ब्रह्मांड की सारी देवशक्तियाँ हिल जाएंगी निष्कलंक अवतार से अनुप्राणित होकर शक्ति पाकर शिष्य लोग घोड़े के रूप में घर-घर, गाँव-गाँव जाएँगे तथा नई दीपावली की तरह नए युग की स्थापना करेंगे। इनका जीवन निर्वाह दूसरों के भरोसे रहेगा।”
टिप्पणी- निश्चित ही यह भविष्यवाणी सतयुग की वापसी के बारे में है आसुरी शक्तियाँ देवसत्ताओं का शंखनाद सुनकर हिल गई। अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रही है। गायत्री परिवार के कार्यकर्त्ता घर-घर गाँव-गाँव मंथन करने पहुँच रहे है। इस वर्ष सारे भारत का जो गहन मंथन गांव से जिले व संभाग स्तर पर हो रहा है, देवदक्षिणा में एक बुराई छोड़कर एक अच्छाई ग्रहण करने की बात जो कही जा रही है, उसी का संकेत ऊपर किया गया है। सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के कार्यक्रम जिस सघन स्तर पर चल रहे है, उसी की ओर संकेत कभी माव जी महाराज एवं बाद में उनके शिष्य देवापुरी जी कर गए है। दीपयज्ञों की शृंखला अनवरत चल रही है एवं सारे भरत व विश्व में यह 1978-77 के बाद से संतत संपन्न हो रही है। गायत्री परिवार ने ही यह शृंखला आरंभ कर ब्रह्म दीपयज्ञ, विराट् दीपयज्ञों से लेकर छोटे-छोटे कुछ दीपों द्वारा सुसंस्कारों को मनाने की परिपाटी आरंभ की। आज घर-घर, गाँव-गाँव दीपयज्ञ हो रहे है। हर वर्ग के जाति के नर-नारी इसमें भागीदारी कर रहे है। महापूर्णाहुति भी 151,501,1001 एवं 24,000 दीपों द्वारा सारे भारत में गाँव, ब्लॉक, जिला एवं संभाग स्तर पर क्रमशः संपन्न होने जा रही है, जिसमें जाना चाहिए कि निष्कलंक अवतार की अंशावतार सत्ता का संकेत कितना स्पष्ट था। जो नहीं समझ पाए, उनके लिए सिर धुनकर पछताना ही एकमेव नियति है।
अगला भजन है-
अरे भाई पदम पाटन प्रकट होय से, थानक पुरे वाप रे निष्कलंक चरणे तलक चढसे, आलम चरणे तलक चढसे, जुग चौथा मार रे, अरे भाई ग्यारसी अववारी होसे, त्रिगुणी पाखरे रे। तरकस तीर ताजणा वाये ढलकती ढाल रे॥
भावार्थ यह कि ”तीन पद वाली (त्रिपदा गायत्री की ओर संकेत) पर सवार होकर निष्कलंक अवतार प्रकट होगा। उसके शिष्यगण सद्साहित्य रूपी तीरों के समान ज्ञानरूपी विचार लेकर अपने कंधों पर झोला रूपी तरकश में भरकर ढपली रूपी ढाल के सहयोग से ज्ञानगंगा बहाएँगे और पाटन (आसपुर का पौराणिक नाम) में पद्म रूपी निष्कलंक की चरणपादुका की स्थापना होगी। लोग उनके चरणों पर तिलक लगाएँगे और पूजन करेंगे।”
टिप्पणी- बड़ा ही स्पष्ट वर्णन है। तीन पद वाली त्रिपदा गायत्री की ओर स्पष्ट संकेत है। परमपूज्य गुरुदेव ने गायत्री परिवार की धुरी ही गायत्री उपासना को बनाया है। ऋतंभरा-प्रज्ञा के अवतरण को पूज्यवर ने निष्कलंक अवतार का चेतनारूप में अंतरण बनाया है। उलटे को उलटकर सीधा करने वाली क्राँति विचारक्राँति सद्विचारों के क्राँतिधर्मी साहित्य के प्रचार-प्रसार से ही हो रही है। ढपली माध्यम बनी है। लोक गायन के माध्यम से धर्मधारणा के विस्तार में। श्रेष्ठ साहित्य लिए झोला पुस्तकालय लेकर जनक्रांति के अग्रदूत युगशिल्पी गुरुकार्य मानकर जन-जन तक जा रहे है। अभी 5 फरवरी को आसपूर में प्रखर-प्रज्ञा, सजल-श्रद्धा की शक्तिपीठ पर ऐतिहासिक बावड़ी के समीप स्थापना हो चुकी । समय बस वही आ गया है, जिसकी घोषणा एक संत-अवतारी सत्ता 275 वर्ष पहले कर गए थे। जो चेत गए सो ठीक, जो नहीं चेत- नहीं बदल जाए- अवतारी चेतना के स्वरूप को नहीं समझ पाए, उनके लिए पश्चाताप के अलावा कुछ हाथ नहीं लगने वाला। हम सभी इस समय की विशिष्टता को समझ ले, इसलिए ये प्रमाण दिए गए है।
भगवान यहाँ कह रहे है। कि स्थितप्रज्ञ एक समुद्र की तरह धीर-गंभीर व्यक्तित्व वाला होता है। जिस तरह से चारों ओर से आने वाले जल को अपने अंदर वह समा लेता है।, फिर भी सीमा का उल्लंघन नहीं करता, उसी तरह अनेकों कामनाओं के-काीवों के अंदर प्रविष्ट होने पर भी स्थितप्रज्ञ विचलित नहीं होता-शाँत बना रहता है। जो कामोपभोगों के पीछे दौड़ता है, उसे शाँति नहीं प्राप्त होती। वह सदैव संक्षुब्ध-विक्षुब्ध बना रहता है। यहाँ जिस ‘काम’ शब्द का प्रयोग भगवान् श्रीकृष्ण ने किया है, वह स्थितप्रज्ञ के लक्षणों के साथ यहाँ बहुवचन में प्रयुक्त हुआ है। “कामा यं प्रविशन्ति” का अर्थ है- उपभोग पदार्थ-बाह्य सुख के विषयों का उपभोग। ऐसा ही ‘काम’ का अर्थ ऋषि ने उपनिषद् में भी किया है, जब वे कहते है- “ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके” अर्थात् “हे नचिकेता जो-जो विषयभोग इस जगत में दुर्लभ हैं, वे सब मैं यम तुझे देता हूँ।” इस प्रकार काम शब्द के तीन अर्थ हुए-एक मूल विकार काम, दूसरा मनोगत कामना एवं तीसरा बाह्य विषयों का उपभोग। एक अर्थ परमपूज्य गुरुदेव दिया करते थे-’काम’ अर्थात् अंतः की उल्लास की वृत्ति, जिसका ऊर्ध्वगमन करने पर वह रचनात्मक ज्ञान की शक्ति बन जाती है। ‘आध्यात्मिक कामविज्ञान’ पुस्तक में इस विषय में बड़े विस्तार से व्याख्या हुई है।
बाह्य विषयों को ‘कामना’ के आधारभूत कहने का कारण यह है कि उनका आश्रय लेने से मन में कामना जाग्रत होती है। ये विषय ही कामनाओं के निमित्त बनने है। अनेक जन्मों के पूर्व कर्म-अनेक नए और पुराने अनुभव व तद्जन्य संस्कार, यही हमारे मन की कामनाओं के मूल कारण है। इन्हीं के कारण बाह्य पदार्थों को विषयभोग पैदा करने वाला ऐसा कहा जाता है।
मन पर विषयों का-बाह्य पदार्थों का असर सहज ही होता रहता है। वे इंद्रियों के द्वारा मन में प्रवेश करते हैं, तो भी स्थितिप्रज्ञ के चित्त पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यही स्थितिप्रज्ञ पुरुष का वैभव है। वह हृदय में स्थित कामनाओं को-भोग करने की इच्छा को मिटा देता है। उसे किसी भी विषय से डरने की-दूर रहने की जरूरत नहीं है। विषयों के बाजार में-मायावी संसार में भी उसे ला खड़ा कर दिया जाए, तो भी वह अपनी स्थिति से डिगता नहीं। यहाँ श्रीकृष्ण के रूप में योगेश्वर से वेदव्यास ने काव्य के माध्यम से ज्ञानी पुरुष के गौरव ली गाथा का गान कराया है।
स्वाद हो या अस्वाद, स्थितप्रज्ञ का मन आहारभोग से कभी विचलित नहीं होता। रसगुल्ला खाते समय मन करता है, हम और खाएं। हम तो स्थितप्रज्ञ है- हमें भोग नहीं व्यापते और रसगुल्ला खाने का मन करता है। स्वामी विवेकानंद यह उदाहरण देकर कहते थे कि ऐसा आदमी जीभ पर छाले हो जाएँ, तो चीखता रहता-चिल्लाता रहता है, तब स्थितप्रज्ञ नहीं बनता। मन का विचलन न हो, तो एक व्यक्ति सभी कुछ ग्रहण करने पर भी कभी विकारयुक्त नहीं होता। रामकृष्ण परमहंस के पास स्वामी विवेकानंद बहुत कुछ अभक्ष्य खाकर आए व कहने लगे कि आप तो प्याज-लहसुन को भी मना करते हैं, मैं तो इतना सब कुछ खाकर आया हूँ। तब ठाकुर कहते थे कि तू इन सबसे परे है। तू इनके समक्ष गलत उदाहरण मत रख। ये तेरी नकल कर लेंगे बिना समझे कि तू कितनी उच्च स्थिति को पहुँचा स्थितप्रज्ञ है, जहाँ तुझे जरा भी नहीं व्यापते।
एक ऐसा उदाहरण परमपूज्य गुरुदेव के जीवन का भी है। वे प्रवास पर थे। भाव से भरे परिजनों ने गलती से दूध में चीनी के स्थान पर नमक डाल दिया। अच्छी तरह मिलाया नहीं था, तो चम्मच लाकर मिलाकर पूज्यवर को दिया, तब तक वे एक घूँट पीकर चख चुके थे। वे उसी भक्त के सामने सारा दूध पी गये-चेहरे पर जरा भी भाव नहीं आने दिया कि दूध में नमक है। साथ चल रहे श्रद्धेय पंडित जी व एक और परिजन के चेहरे पर जब उनने भव देखे तो मूक स्थिति में ही डाँट दिया व पी जाने को इशारा किया। बाद में जब औरों से पता चला, तो वह बहन बहुत रोई कि हम यह क्या कर बैठे। परंतु स्थितप्रज्ञ की स्थिति में पहुँची हमारी उस गुरुसत्ता ने अपनी ओर से जरा-सा भी उस त्रुटि का आभास नहीं होने दिया। ऐसे भोग, ऐसे महामानव में जाकर लय हो जाते हैं।
श्रीरामकृष्ण परमहंस के पास गिरीयश बाबू व नरेंद्रनाथ की बहस चल रही थी की स्थितप्रज्ञ कैसा होता है-उसे कैसे व कहाँ देखे। गिरिश बाबू को ठाकुर ने चर्चा हेतु रोक लिया व नरेंद्रनाथ (स्वामी विवेकानंद) से कहा कि वे पंचवटी में जाकर ध्यान करे। चारों ओर से मच्छरों ने स्वामी जी को ढँक लिया, मानों काली चादर हो, फिर भी उनका मन एकाग्र ही रहा- जरा भी विचलित नहीं हुआ। गिरिश बाबू को रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्र के पास बैठकर ध्यान करने को कहा, तो वे काफी देर तक मच्छरों के आक्रमण से विचलित रहे। बाद में अंदर से एक कंबल लेकर आए, ताकि ध्यान में एकाग्र हो सके। कहीं-न-कहीं से मच्छर कंबल में घूस गए, तो फिर वे अस्थिर हो गए। आठ घंटे सतत् विवेकानंद ध्यानस्थ रहे मच्छरों के सतत् आक्रमण के बाद। गिरिश बाबू मच्छर उड़ाते रहे-आश्चर्य देखते रहे कि इनका ध्यान कैसे लग रहा है। विवेकानंद उठे-अपना हाथ हिलाया, सभी मच्छर उड़ गए। उनने गिरिश बाबू को देखा व कहा कि जीसी (गिरीश बाबू का नाम) आप क्या कर रहे है? वे बोले-हम तो ध्यान करने की कोशिश कर रहे थे, पर कर नहीं पाए। आपने कैसे ध्यान कर लिया-इतने मच्छरों के होते हुए? स्वामी जी बोले कि ध्यान तो आत्मा से किया जाता है। मच्छर तो शरीर को काट रहे थे, आत्मा को थोड़े ही कष्ट दे रहे थे। आप जरा शरीर से गहरे डूबकर ध्यान करके तो देखिए। जब ऐसी स्थिति आ जाती है, आत्मा रूपी समुद्र निश्चल बना रहता है, तो कितने की कष्ट आएँ-कितने ही विषयों के आक्रमण हो-चित्त जरा भी डाँवाडोल नहीं होता। ऐसी स्थिति में किया गया जब ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त करा देता है। इस उदाहरण से ‘समुद्र’ वाली संज्ञा को, जो स्थितप्रज्ञ के विषय में दी गई, भलीभाँति समझा जा सकता है।
स्थितप्रज्ञ की स्थिति का गीता के द्वितीय अध्याय के इस सत्तरहवें श्लोक के परिप्रेक्ष्य में विवेचन करने हुए विनोबा ने ‘स्थितप्रज्ञ दर्शन’ में लिखा है कि स्थितप्रज्ञ अविचल मनःस्थिति व अंतःकरण का होता है। एक ओर उसमें अत्यंत परिशुद्ध कर्म भी असंभव है, तो दूसरी ओर निषिद्ध कर्म भी संभव है। एक ओर शुभाशुभ कर्मों का योग है। सभी स्थितप्रज्ञ स्थिति के व्यक्तियों का आँतरिक लक्षण सदा एक ही रहता है। उनका अंतर्जगत सदैव शाँत बना रहता है। आत्मस्थिति कभी भंग नहीं होती। सदा अविचलित बनी रहती है। जाग्रत विवेकशक्ति के माध्यम से-सत् व असत् का निरंतर भान करते हुए, वह समुद्र की तरह विराट् धीर-गंभीर हृदय वाला होता है- इसमें स्थितप्रज्ञ की परिभाषा को समझना चाहिए। नहीं तो हम सभी यह मान बैठेंगे कि आचार-व्यवहार की कोई रोक-टोक उसे नहीं होती। वह चाहे जो करता है-कर सकता है, पर निर्लिप्त भाव से कर रहा है, अतः क्षम्य है। ऐसा होने पर तो कोई भी इस परिभाषा के बाने में घुसपैठ कर सकता है। वस्तुतः स्थितप्रज्ञ अपने आप को इस तरह विकसित कर लेता है कि उसकी दृष्टि में संसार में शुभ के सिवा कुछ भी नहीं है-यह व्याप्त हो जाता है। इसी कारण वह सदैव शाँति को प्राप्त है। शाँति पाने का यही एकमेव सूत्र भी तो है।
अगला श्लोक है-
विहाय कामान्यः सर्वान्युमाँच्श्ररति निःस्पृहः। निर्ममो निरंहकारः स शंतिमधिगच्छति॥
अर्थात् “जो पुरुष संपूर्ण कामनाओं को त्यागकर मगतारहित, अंहकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वहीं शाँति को प्राप्त होता है अर्थात् वह शाँतिरूप हो जाता है।”
स्थितप्रज्ञ प्रकरण के इस उपसंहारपरक विवेचन में बड़ी महत्त्वपूर्ण बातें कही जा रही है।, जिनमें से कुछ दुहराई जा रही है। लक्षणों की शुरुआत योगीराज श्री कृष्ण ने कामना त्याग से की थी। यहाँ उपसंहार में भी कामना त्याग की बात पुनः कही है। ममता, अहंकार व स्पृहा (वासना अथवा कामना) इन तीनों को छोड़ दे, वह शाँतिरूप हो जाता है। यही प्रकाराँतर से तृष्णा, अहंता व वासना के रूप में; वित्तेषणा, लोकेषणा पुत्रेषणा के रूप में समझाई जाती रही है। यहाँ ‘निःस्पृह’ शब्द को समझना जरूरी है। जब सभी कामनाएँ छोड़ दी, तो फिर स्पृहा (वासना-कामना) नहीं छोड़ी यह बात इस श्लोक में समझने में नहीं आती। “सब कामनाएँ छूट गई तो जीवन विषयक कामना छूटी कि नहीं”- यह आशय यहाँ विहाय कामान् के बाद निस्पृह से है। जीने की अभिलाषा मरने तक शूल की तरह चुभती रहती है। किंतु जो जीने की वासना छोड़ देता है, वह जीवित रहते हुए भी जीवनमुक्त परमहंस हो जाता है। जीवन शुद्ध-आनंदमय हो जाता है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति जीवन से ऊबा हुआ नहीं होता। जीवन की अभिलाषा मिट जाने से मृत्यु का भय मिट जाता है। अर्जुन की मनःस्थिति को देखते हुए भगवान् द्वारा यह यहाँ स्पष्ट किया जाना बड़ा अनिवार्य भी था व युगशिक्षण के लिए भी एक सूत्र इसे बनाना था।
यहाँ ‘चरित’ शब्द आया है-इसका भावार्थ है कि ऐसा व्यक्ति खेलता है-कूदता है-विचरता है। उसके जीवन में दुःख नहीं रहता। बाहर की वासनाएँ-जीने की अभिलाषा मिटते ही भीतर का विशुद्ध आनंद शेष रह जाता है। इस प्रकार वह छोटे बच्चे के निर्मल चित्तमन वाला होकर व्यवहार करता हुआ विचरण करता है। ‘गीता रहस्य’ के अनुसार तिलक ने कहा है कि ‘चरित’ का अर्थ-संयमपूर्वक इंद्रियों का सदुपयोग करते हुए जीना तथा परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं कि इस शब्द का अर्थ-देवमानव की तरह सदैव हँसती-हँसती जिंदगी जीना-औरों को सूख मिले ऐसा इंद्रियों का उपभोग करना। प्रकाराँतर से सभी व्याख्याएं एक ही निष्कर्ष पर ले जाती है किस साधक की स्थिति में जीने पर अहंता ममता चल जाती है-शुभाशुभ कामना चली जाती है, जीवन स्पृहा चली जाती है, तो फिर मात्र शाँति-ही-शाँति रह जाती है।
संख्यायोग का अंतिम श्लोक स्थितप्रज्ञ की समापनापरक व्याख्या करता है-
एषा ब्राह्मी स्थितिः फार्थ नैनाँ प्राप्य विमुह्मति। स्थित्वास्यामतकालेअपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥
अर्थात् “हे अर्जुन! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है। इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानंद को प्राप्त हो जाता है।”
सिद्धपुरुष जिसमें निवास करते हैं। चेतना की इस अवस्था को ब्राह्मी स्थिति कहा गया है। यह उच्च चेतना के जागरण की-भगवान चेतना के अति चेतन में अवतरण की प्रक्रिया का नाम है। यह एक प्रकार से परिवर्तित जीवन दृष्टि का नाम है। यह नित्य व स्थायी व्यवस्था है। इसमें पहुँचकर व्यक्ति कभी लौटना नहीं-लौकिक धरातल पर। यह मन की एक प्रकार से एक क्राँतिकारी छलाँग है। ‘ब्राह्मी स्थिति’ शब्द जहाँ आया है, वहाँ योगेश्वर कृष्ण स्थितप्रज्ञ की मूल धुरी पर केंद्रित होकर रहे है। यह स्थिति ‘स्थितप्रज्ञ’ की हमेशा टिकने वाली सहजावस्था है। इसमें व्यक्ति पर ज्ञान का बोझ नहीं होता। अंतकाल तक टिकी रहने वाली इस स्थिति में सहज हलकापन होता है, जो निरंतर बना रहता है-आपातकाल में भी टिका रहता है। ब्रह्मनिर्वाण का अर्थ है-ब्रह्म में मिलना-घुल जाना, एकाकार हो जाना। व्यापकतम स्थिति है ‘ब्रह्मनिर्वाण’। यहाँ देह का परदा हट जाता है। सभी उपाधियों को छोड़, देहभाव छोड़ व्यक्ति अनंत में-ब्रह्म में लीन हो जाता है। उसका लोकसंग्रह होता है दिखाई देता है। कीर्ति अक्षुण्ण बन जाती है। हमारी वैदिक संस्कृति में ‘ब्रह्मनिर्वाण’ शब्द बड़ी व्यापकता का परिचायक है। हम नष्ट हो गए-हम शून्य हो एक के बजाय हम व्यापक हो गए-हम अनंत हो गए, यह अर्थ उपयुक्त शब्द का बनता है। परमपूज्य गुरुदेव ने स्वयं को सूक्ष्म में विलीन कर अनंत विराट् रूप में लिया, यह हम सभी ने देखा व नित्य देख रहे है। ‘स्थितप्रज्ञ’ का समग्र दर्शन यदि समझना हो तो परमपूज्य गुरुदेव के जीवनदर्शन में हम उसकी झाँकी देखते हैं। वह विस्तार से और कभी। अब हम इस द्वितीय अध्याय का-तीन महत्वपूर्ण प्रसंगों से भरे साँख्ययोग का समापन करते हैं। अगले अंक में ‘कर्मयोग’ नामक तृतीय अध्याय से आरंभ करेंगे युगगीता-अपने ग्यारहवें उपखंड के माध्यम से।
“जर्जर मकान आए दिन गिरते रहते हैं पर भवन कितने ही विशालकाय हो, यदि आधारस्तंभ सुदृढ़ हो,तो वे भयंकर भूचालों में भी अविचलित खड़े रहते हैं। तूफान हो, झंझावात हो समुद्र गहरा हो तो भी कुशल माँझी नाव किनारे पहुँचा ही देते हैं। युद्ध कितना ही भीषण हो, अनेक मोरचों पर लड़ा जा रहा हो, तो भी साहसी और सूझबूझ वाले सेनापति विजयी होते हैं, यश प्राप्त करते हैं। कुल चौदह किंतु मूर्द्धन्य व्यक्तियों से अपनी निहत्थी कांग्रेस ने ब्रिटिश हुकूमत से सत्ता छीन ली थी। अपने शांतिकुंज को इन दिनों एक सौ वैसे ही सुदृढ़ आधार स्तंभों की, कुशल नाविकों की, साहसी सेनापतियों और मूर्द्धन्यों की आवश्यकता है। जाग्रत आत्माएँ इस पुकार को सुनो समझे और युगधर्म निर्वाह के लिए आगे आएँ। माँ की कोख कलंकित करने वाली कायरता यों न दिखाएँ।”
“जिनके मन में राष्ट्रीय हित-सेवाभावना और जातीय स्वाभिमान हो, शिथिल हो, किंतु जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व बहुत बड़े न हों, वे शांतिकुंज से पत्रव्यवहार करें, वहीं निवास की बात सोचें। लिप्साएँ तो न रावण की पूरी हुई, न सिकंदर की, पर औसत भारतीय नागरिक की ब्राह्मणोचित आजीविका में कोई दिक्कत किसी को नहीं आने पाएगी, इसे हमारा आश्वासन माने।”
उपयुक्त भावभरा आह्वान शक्तिस्वरूपा परमवंदनीया माता जी द्वारा देवसंस्कृति दिग्विजय के पुरुषार्थ की पूर्व वेला में राष्ट्र के जाग्रत जीवंतों से किया गया था एवं इसे आज भी उन्हीं की हस्तलिपि में उनके कक्ष में यथावत् रखा देखा जा सकता है। समय तब से आगे बढ़ा है-और विषम हुआ है-परिस्थितियाँ तेजी से बिगड़ी है और अब हम युगपरिवर्तन की घड़ियों की उलटी गिनती की वेला में आ पहुंचे है। प्रतिभाओं की सिद्धी के महायज्ञ की इस महापूर्णाहुति में यदि यह वेदना भरी गुहार प्रतिभाओं को न जगा सकी, उन्हें युगसृजन हेतु नियोजन को प्रेरित न कर सकी, तो संभवतः इसे भी आसुरी चिंतन से विषाक्त परोक्ष जगत् से उपजी हम सबकी नियति ही मानी जाएगी। पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। प्रतिभाओं का-जाग्रत जीवंतों का निताँत अकाल पड़ जाए, राष्ट्र के जागरण हेतु निस्वार्थ भाव से अपनी यथायोग्य शक्ति-समय भावभरा पुरुषार्थ व साधन देने वाले व्यक्ति चुक जाएँ, ऐसा समय न कभी आया है, न कभी आएगा। मात्र यह गूँज उन तक पहुँच नहीं पा रही है। यह पत्रिका परमवंदनीया माता जी की टीस को-परमपूज्य गुरुदेव की अंतर्वेदना से भरे इन शब्दों को दिग्दिगंत तक गुंजायमान करने हेतु ही सतत् पुरुषार्थ कर रही है। इस वर्ष वे स्वयं और भी हृदयस्पर्शी नवचेतना को झकझोरने जैसे हो गए है। लगता है इस एक-डेढ़ वर्ष के भीतर यह पुकार कि ‘या तो अभी या कभी नहीं’ ‘डू और डाई’- ‘करो या मरो’- के रूप में जन-जन को सुनाई पड़ेगी, पुरुषार्थ उभरकर आएगा एवं युग-परिवर्तन जैसा असंभव सा दिखने वाला कार्य पूरा होकर रहेगा।
वस्तुतः व्यक्तित्व का परिष्कार ही प्रतिभा परिष्कार है। सबसे बड़ा सुयोग इन दिनों यह है कि नवसृजन के लिए इसी समय प्रचंड वातावरण बन रहा है। उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में नियंता का सारा ध्यान और प्रयास नियोजित है। जो भी उस दैवी सत्ता का सहभागी इन दिनों बनेगा वह अन्य सत्परिणामों के साथ ही प्रतिभा परिष्कार का लाभ भी हाथोंहाथ नकदधर्म की तरह प्राप्त कर सकेगा। जिन्हें वस्तुतः दूरदर्शिता का सौभाग्य भरा अनुदान प्राप्त है, वे यह अहसास कर सकते हैं। कि यह पारस से सटने का समय है, कल्पवृक्ष की छाया में बैठ सकने का अवसर है, प्रभातपर्व है एवं ऐसे में जागरुकता का परिचय देना ही सबसे बड़ी समझदारी है।
आड़े समय में उच्चस्तरीय प्रतिभाओं की ही आवश्यकता होती हैं ऐसा ही कुछ समय आज भी है। तब परमवंदनीया माता जी ने सौ प्राणवानों की पंजप्यारों की तरह गुहार की थी, आज वही आह्वान ऋषियुग्म की प्राणसत्ता का दो लाख अग्रदूतों-पूरे क्षेत्र के लिए है, जो 2 करोड़ प्राणवानों को युगपरिवर्तन में नियोजित कर सके। महापूर्णाहुति वर्ष के महासमर में से निकलकर युगसृजन का दायित्व 2001 से 2011-12 तक की अवधि में सँभालेंगे। प्राणवान प्रतिभासंपन्नों ने ही इतिहास रचे हैं चाहे वे शिक्षा क्षेत्र के हो या चिकित्सा विज्ञान जगत् के, युवाछात्र हो या नाराशक्ति, सीमा पर लड़ रहे सैनिक हो या किसान, राष्ट्र कोस समर्पित अधिकारी वर्ग के हो-पत्रकार हो अथवा व्यापारी; हर वर्ग को इन दिनों झकझोरा जा रहा है। युगसंधि की इस वेला में आकुल-व्याकुल होकर पेट-प्रजनन से परे युगपरिवर्तन जैसे सृजन और ध्वंस के महान प्रयोजन की पूर्ति के लिए प्राणवानों को ही खोजा जा रहा है। प्रस्तुत वसंत पर्व से आरंभ हुआ समग्र राष्ट्र एवं विश्व का गहन मंथन इसी उद्देश्य के लिए नियोजित है एवं जून 2001 का समय आते-आते यह अपना प्रतिभाओं की महासिद्धि का मूल उद्देश्य पूरा करके रहेगा। ऐसे समय में ये स्वर ‘अभी नहीं तो कभी नहीं, निश्चित ही सब जाग्रतों को सुनाई पड़’ रहे है। जरूरत मात्र संकल्पित होने की है।
पाश्चात्य चिंतन वालों की दृष्टि से नया ‘मिलेनियम’ आ गया, एक सहस्राब्दी बदल गई। बड़े मौज-मजे व जश्न के साथ नए वर्ष में बहुसंख्य व्यक्तियों ने प्रवेश किया। इन सभी के इस रागरंग भरे महोत्सव से अरबों की धनराशि एक रात्रि में ही स्वाहा हो गई, वातावरण प्रदूषित हुआ, वह अलग है। हम पाश्चात्य, अंधानुकरण करने वाले भारतीयों को न जाने कब से पश्चिम का यह रोग लग गया है, जिसका ज्वार थामे नहीं थमता। भारतीय संस्कृति में शक संवत्, विक्रम संवत्सर एवं युगाशब्द को मनाने का प्रचलन है। पिछले दिनों इस संबंध में काफी जागरुकता आई है, पर उसी अनुपात में पश्चिमी नया वर्ष फादर्स डे, मदर्स डे, वेलेन्टाइन डे आदि का प्रचलन भी बढ़ा है। हमारी दृष्टि से इक्कीसवीं सदी कभी की आरंभ हो गई। उसका छप्पनवाँ वर्ष समाप्त होकर अब हम अगली पाँच अप्रैल, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को संवत् 2057 में प्रवेश करेंगे। जब यह सदी आरंभ हुई थी, तब ईसवी सन् 1940 का भार छोड़ो आँदोलन चल रहा था एवं हमारी गुरुसत्ता ने अपनी अखण्ड ज्योति पत्रिका में, जो अभी शैशवावस्था में थी, संवत् 2000 के आगमन के साथ इक्कीसवीं सदी के शुभ आगमन की व नवयुग के शीघ्र ही 60 वर्षों की संघर्ष भरी अवधि के बाद आने की घोषणा लगातार जनवरी से मई 1942 तक के अंकों में की। उनके अनुसार इक्कीसवीं सदी-विक्रम संवत्सर के अनुसार प्रौढ़ता की स्थिति में 50 वर्षों में पहुँचने की शेष आठ-दस वर्ष की अवधि संधिकाल की बताई गई।
इक्कीसवीं सदी की परिभाषा जब परमपूज्य गुरुदेव करते थे, तो कहते थे कि यह महाकाल की दैवी योजना ऋषिसत्ता के महत् संकल्प एवं जन-जन की आकांक्षा व उनकी साझेदारी का समन्वित संस्करण है। इसी को उनने ‘इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य’ नाम दिया व ‘सतयुग की वापसी’ भी इसे कहा। परिष्कृत चिंतन एवं बदलाव के लिए संकल्पित समुदाय के रूप में ही इस युग का चेतनावतार आ रहा है, यह हमारी गुरुसत्ता ही नहीं प्रायः सभी महापुरुषों नोस्ट्राडमस, श्री अरविंद, स्वामी विवेकानंद, गोस्वामी तुलसीदास जी एवं संत सूरदास जी की भी भविष्यवाणी है। बदलाव भरा प्रसव पीड़ा के कष्टों से युक्त युगसंधि का यही समय है। इसी परिवर्तन की प्रक्रिया का उद्घोष करने-युगसंधि महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति द्वारा जन-जन में विधेयात्मक चिंतन की एक लहर पैदा करने हेतु आगामी डेढ़ वर्ष का समय निर्धारित किया गया है। यह समग्र संकल्प हिमालयवासी गुरुसत्ता का ही है।
महापूर्णाहुति के दो चरण, बीत चुके। अब आगामी तीन चरणों में अंतिम महत्वपूर्ण तीसरे व चतुर्थ चरण को विस्तार से जानकर तदनुसार अपना पुरुषार्थ नियोजित करना सभी के लिये अनिवार्य है। भागीदारी व सक्रिय योगदान तभी संभव है। तीसरा चरण 18 फरवरी माघ पूर्णिमा से सारे राष्ट्र में एक साथ चौदह स्थानों से चौबीस निर्धारित क्षेत्रों द्वारा सारी भारतभूमि का मंथन-जागरण करने हेतु तीर्थयात्राओं के रूप में आरंभ होने जा रहे है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक राष्ट्र-जागरण के रथों के निर्माण की-तीर्थयात्रा की उपयात्रा-लघु यात्राओं की सारी तैयारी हो चुकी थी व यह अंक पहुँचने तक वह विभिन्न क्षेत्रों से गुजर रही होगी। इससे पूर्व वासंती उल्लास से साथ गुरुसत्ता का आध्यात्मिक जन्मदिवस 10 फरवरी को विद्यावरण संकल्प, व्यासपूजन, सरस्वती पूजन तथा निर्मल मन व सभ्य समाज की प्रार्थना के साथ सारे भारत व विश्व में सभी वर्गों द्वारा मनाया जा चुका है। यह ऐतिहासिक महापुरुषार्थ 3 दिसंबर की विकलाँगता निवारण दिवस की सामूहिक प्रार्थना से भी कई गुना बढ़-चढ़कर रहा है। इससे आभास होता है कि महापूर्णाहुति अपनी प्रौढ़ता की स्थिति में किस तरह जन-जन को झकझोर रही है।
राष्ट्र जागरण तीर्थयात्राएं एक प्रकार से बदलती फिजा का-वातावरण में संव्याप्त परिवर्तन की हवा का अहसास जन-जन को कराने के लिए संपन्न हो रही है। चौदह रथों द्वारा प्रायः ढाई-तीन लाख किलोमीटर की यात्रा कर अपनी सह यात्राओं द्वारा ये भारत भर के सभी पवित्र स्थानों-महापुरुषों की जन्म व कर्मभूमि विभिन्न सत्प्रवृत्तियों के पोषक संतों की पुण्यस्थलियों को स्पर्श करती चल रही है। यह कार्य मुख्य रथ वाली तीर्थयात्राओं से हो सकता है व सह यात्राओं से भी। सभी को नवयुग की भागीदारी का- महापूर्णाहुति के महा पुरुषार्थ में अपना योगदान देने हेतु भावभरा आमंत्रण देकर ये तीर्थयात्राओं आ रही है व सभी धर्मों पंथों के पवित्र स्थलों के प्रतीकों-पावन चिन्हों को भी ये आदरपूर्वक स्वीकार करती चलेगी और शांतिकुंज हरिद्वार, गायत्री तपोभूमि में लाकर स्थापित करेगी।
राष्ट्र के साँस्कृतिक नवजागरण-भूमि में प्रसुप्त पड़े सुसंस्कारों को जगाने के उद्देश्य से रवाना हुई ये तीर्थयात्राएँ एक ही उद्घोष स्थान-स्थान पर करेंगी-”जमाना बदल रहा है नवयुग की आँधी आ रही है- आप भी इस जमाने के साथ स्वयं को बदले व इस अभियान में भागीदारी करे।” विस्तार से यह क्रम संपन्न कर इन तीर्थयात्राओं का समापन 20 मई से छह चरणों में आरंभ हो रही संभागीय स्तर की पूर्णाहुतियों के द्वारा होगा। प्रत्येक चरण में एक साथ 17 स्थानों पर दीपयज्ञ संपन्न होंगे। इस तरह प्रायः 107 स्थानों पूरे भारतवर्ष में संभागीय स्तर के चुने गए है, जहाँ यह प्रतिभा नियोजन दोषयज्ञ संपन्न होकर अपना अंतिम आयोजन 11 जून गायत्री जयंती को समाप्त कर देंगे। इसके पश्चात सभी वाहन अपने-अपने कलश-साथ में जुड़े पवित्र चिन्हों प्रतीकों प्रदर्शनियों के साथ वापसी यात्रा शाँतिकुँज हरिद्वार की आरंभ करेंगे। मार्ग में ये गुरुग्राम जन्मभूमि आँवलखेड़ा तथा गुरुसत्ता की कर्मभूमि गायत्री तपोभूमि, मथुरा एवं अखण्ड ज्योति संस्थान होली पूजन संपन्न करवाती 16 जून, ज्येष्ठ पूर्णिमा को हरिद्वार में एकत्र होगी। सभी कलश यहीं रख लिए जाएँगे। अखण्ड दीपक की साक्षी में रखे राष्ट्र भर में घूमकर आए, इन कलशों को विराट् विभूति ज्ञानयज्ञ (नई दिल्ली-13 अक्टूबर 2000 जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम) में तथा 6 से 11 नवंबर 2000 को शाँतिकुँज केंद्र में होने वाले 12 वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण के महापूर्णाहुति वर्ष के सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ में मंच पर राष्ट्रीय एकता सद्भाव के प्रतीक के रूप में स्थापित किया जाएगा।
इस पावन तीर्थयात्रा में प्राचीनकाल के रथों की स्मृति दिलाने वाले एक वाहन पर एक कलश विराजमान है। इस महाकलश में गोमुख का जल (अध्यात्म चेतना के ध्रुव केंद्र हिमालय व गंगा के उद्गम के प्रतीक के रूप में) गुरुग्राम जन्मभूमि आँवलखेड़ा की रज तथा गायत्री तपोभूमि मथुरा, गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज हरिद्वार में विद्यमान सजल श्रद्धा-प्रखर प्रज्ञा जैसे पावन प्रतीक से आद्यशक्ति गायत्री के देवालय से स्पर्श किए हुए पुष्प व अक्षत है। इनमें 2000 तीर्थों की जल-रज भी गायत्री तपोभूमि से पूजन के साथ लाई गई है तथा अखण्ड अग्नि की भस्म भी रखी गई है। इन सभी पावन प्रतीकों-जल-रज व पुष्प-अक्षत को सप्तर्षि आश्रम सप्तसरोवर हरिद्वार की गंगा नदी को सप्तर्षि आश्रम सप्तसरोवर हरिद्वार की गंगा नदी के तट की पावन रज में रखा गया है। इस प्रकार यह समग्र प्रतीक पवित्रता, महानता व संस्कार चेतना के समुच्चय बन गए है।
इस महाकलश के पीछे संघशक्ति की प्रतीक लाल मशाल है। दोनों ओर गायत्री परिवार की सूत्र संचालक सत्ता के चित्र है। चारों ओर से सजे इस रथ में केंद्र की गतिविधियों के परिचायक पंच तीर्थों के चित्र लगे है। एक चलित प्रदर्शनी भी इस कलश तीर्थयात्रा के साथ दूसरे वाहन में चल रही है, जो मिशन के वर्तमान व भावी कार्यक्रमों की जानकारी सभी को देगी। इसे यात्रा के अपराहय ठहारावस्थल व रात्रि ठहरावस्थल पर आम आदमियों को देखने के लिए लगा दिया जाएगा। कलश पर मार्ग में सभी अपने पुष्प अर्पित करते चलेंगे एवं बदले में महापूर्णाहुति आमंत्रण के निमित्त-प्रतीक के रूप में पीले चावल व एक आमंत्रण पत्र प्राप्त करते चलेंगे।
तृतीय चरण के अंतर्गत जन-जन को झकझोरने वाली इन तीर्थयात्राओं के साथ एक और कार्यक्रम समानाँतर स्तर पर चलता रहेगा। वह है-क्षेत्रीय मंथन प्रक्रिया। ग्रामीण स्तर पर प्रयाज के पश्चात साधकों की इकाइयों, दीक्षितों, पाठकों, वरणी, भागीदार व शुभेच्छु स्तर के परियोजनों का मंथन होकर 25 फरवरी 2000 से 25 मार्च 2000 तक गाँव-गाँव में 151 दीपों के प्रज्ज्वलन द्वारा पूर्णाहुति संपन्न होगी। 26 मार्च से 5 मई की अवधि में ब्लॉक-तहसील स्तर से आरंभ कर सक्रिय संगठित व समयदानी समूहों के सदस्यों सहित प्रतीओं की भागीदारी हेतु सघन कार्य चलेगा। साथ-साथ नगरीय स्तर पर भी यह कार्य चलता रहेगा। तहसील-ब्लॉक स्तर पर 501 तथा जिला-नगरीय स्तर पर 1001 दीपों द्वारा प्रतिभा यज्ञ संपन्न होकर 5 मई से 20 मई 2000 की अवधि में संभाग स्तर की पूर्णाहुति का प्रयाज संपन्न होगा क्षेत्र की जिम्मेदारियों लेने वालो व समयदानियों का निर्धारण होगा। इसके बाद रथयात्रा के साथ चल रही वरिष्ठ प्रतिनिधियों की बोली द्वारा निर्धारित निधियों में उपयुक्त बताए क्रमानुसार 17 स्थानों पर एक बार, इस तरह छह चरणों में 107 स्थानों पर एक बार, संभागीय स्तर पकी महापूर्णाहुति के साथ 11 जून तक तृतीय चरण पूरा हो जाएगा।
नवसृजन को संकल्पित विचारक्राँति अभियान के प्रबल प्रवाह से जोड़ने हेतु निकली यह राष्ट्र जागरण तीर्थयात्राएँ आम आदमी के लिए एक नौस सूत्री कार्यक्रम लेकर चल रही है। तीन धरातल पर तीन-तीन सूत्री कार्यक्रम लेकर चल रही है। तीन धरातल पर तीन-तीन सूत्रों में से किसी एक से आरंभ कर एक समग्र माननिर्माण कार्यक्रम को पूर्णता दी जा सकती है। इस त्रिस्तरीय कार्यक्रम में व्यक्तिनिर्माण के तीन-सूत्र है- (अ) ध्यान प्राणायाम-योग व्यायाम द्वारा आत्मिक परिष्कार, गायत्री साधना अभियान में भागीदारी। (ब) स्वाध्याय द्वारा श्रेष्ठ चिंतन की प्रवृत्ति को बढ़ावा। (स) व्यसन मुक्ति अभियान में स्वयं व औरों की भागीदारी। परिवार निर्माण के तीन सूत्र है- (अ) परिवार में सुव्यवस्था श्रमशीलता मितव्ययिता शालीनता-सहकार की पंचशील वृत्तियों का पालन। (ब) पुँसवन संस्कार द्वारा माता शिशु का कल्याण-जन्मदिवस व विवाह दिवस संस्कारों का प्रचलन। (स) मला शक्ति के जागरण हेतु प्रयोग उपचार। समाज निर्माण के तीन सूत्र है- (अ) सेवा का कोई एक प्रकल्प आरंभ करना। साक्षरता विस्तार पीड़ा निवारण स्वच्छता -श्रमदान आदि। (ब) पर्यावरण संरक्षण-तुलसी आँदोलन-हरीतिमा संवर्द्धन-कुटीर उद्योग को बढ़ावा एवं (स) दहेज शादियों में अपव्यय व प्रदर्शन का निषेध, आदर्श विवाहों का प्रचलन।
इक्कीसवीं सदी युगपरिवर्तन की संभावना को साकार करती सामने आ खड़ी हुई है। इसमें श्रेष्ठ व्यक्तित्वसंपन्न महामानव ही प्रवेश करें, जो ईश्वरीय सत्ता को समर्पित हो, ऐसी महाकाल की इच्छा है। कुछ ऐसा ही इस तृतीय चरण के माध्यम से महापूर्णाहुति के क्रम में होने जा रहा है।
राष्ट्र जागरण तीर्थयात्राओं के अंतर्गत कुल 14 रथ एक साथ सारे भारत की कुल चौबीस जोनों में भ्रमण कर रहे है। स्थान-स्थान पर इनमें सह यात्राओं जुड़ती चली जा रही है। इन चौदह रथयात्राओं का प्रारूप संक्षेप में नीचे दिया जा रहा है। विशेष जानकारी शांतिकुंज हरिद्वार के महापूर्णाहुति प्रकोष्ठ से ली जा सकती है।
1. बिहार प्राँत- 24 फरवरी से देवघर से आरंभ होकर यह यात्रा पूर्वी सिहंभूमि, पश्चिमी सिहंभूमि गुमलालोहरदगा; राँची बोकारो धनबाद गिरिडीह, कोडरमा, हजारीबाग, चतरा होकर गया में 20 मार्च को बोकारो जोन का समापन करेगी। 21 मार्च को गया से पटना जोन की यात्रा आरंभ होगी जो पूरे मध्य बिहार गंगा के दक्षिण जिलों को स्पर्श कर पटना में 16-17 अप्रैल को विराम करेगी। इसके पश्चात् यही रथयात्रा वैशाली (गाँधी सेतु गंगा के पावन तट) से 19 अप्रैल को मुजफ्फरपुर जोन में प्रवेश करेगी। सभी उत्तर बिहार व नेपाल के जिलों को स्पर्श कर 18 मई को मुजफ्फरपुर में अपनी यात्रा का समापन करेगी। 26 व 27 अप्रैल को भी यह यात्रा मुजफ्फरपुर रहेगी।
2. उत्तरप्रदेश में दो तीर्थयात्राओं एक साथ चलेगी। पहली आंवलखेड़ा से 17 फरवरी को आरंभ होकर हाथरस, अलीगढ़, इटावा, झाँसी आदि होकर मध्यप्रदेश के दतिया, ग्वालियर, भिंड, मुरैना ताि राजस्थान के धौलपुर, करौली, अलवर, भरतपुर होकर आगरा से उ.प्र में पुनः प्रवेश करेगी। 18 से 19 मार्च मथुरा का सघन मंथन कर यह फरीदाबाद होकर दिल्ली 3 से 7 अप्रैल रहेगी। तत्पश्चात हरियाणा व पंजाब का मंथन करती हुई यह 18 अप्रैल को जम्मू में प्रवेश कर जाएगी। वहाँ से हिमाचल प्रदेश को पूरा स्पर्श कर यह मई माह में 2 छोटी उपतीर्थयात्राओं से, जो कुमायुँ व गढ़वाल का मथन कर आएँगी-देहरादून में मिलकर हरिद्वार में समापन करेगी।
तीसरी यात्रा शांतिकुंज से 17 फरवरी को आरंभ होकर मुरादाबाद, बरेली, शाहपूर, तराई के सभी जिलों, कानपुर, लखनऊ, सुल्तानपुर सहित पूरा मध्य व पूर्वी उ.प्र. नेपाल से सभी लगे जिले स्पर्श कर 14 मई को वाराणसी में समापन करेगी।
3. चौथी तीर्थयात्रा राजस्थान व पश्चिमी मध्यप्रदेश के उज्जैन जोन की मिलीजुली है। यह राजसंमद (नाथद्वार) से 18 फरवरी को आरंभ हुई है। मेवाड़ व बागड़ क्षेत्र होकर यह पाली से पश्चिमी राजस्थान के जिलों को स्पर्श कर नागौर 18 मार्च को पहुँचेगी। होगी अवकाश के बाद पश्चिम के गंगानगर, बीकानेर, चुरु क्षेत्र से यह अजमेर होकर 2 से 4 अप्रैल की अवधि में जयपुर रहेगी। हाड़ौती क्षेत्र के सभी जिलों में होकर झालावाड़ से यह नीमच में म.प्र. में प्रवेश करेगी। मंदसौर, रतलाल, धार, झाबुआ, बड़वानी, खरंगाना, खण्डवा, हरता, इंदौर, देवास होकर 17 मई को इसका समापन महाकाल की नगरी उज्जैन में होगा।
4. पांचवीं यात्रा भोपाल से आरंभ होकर पूरे जोन व जबलपुर जोन को स्पर्श करती हुई बालाघाट में समापन कर रही है।
5. छठी यात्रा राजनाँदगाँव (म.प्र.) के डोंगरगढ़ बमलेश्वरी देवी से 20 फरवरी को आरंभ होकर पूरे छत्तीसगढ़ को छूती हुई दंतेवाड़ा-दंतेश्वरी पर समापन करेगी।
6. सातवीं तीर्थयात्रा महाराष्ट्र के नागपुर से गाँव, सेगाँव से औरंगाबाद एवं लातूर-उस्मानाबाद होकर मुबादेवी मंदिर मुंबई में मई में समापन करेगी।
7. आठवीं तीर्थयात्रा गुजरात के सोमनाथ मंदिर से 17 मई को आरंभ होकर पालिताणा (जैन तीर्थ) में समापन कर रही है।
8. नवी तीर्थयात्रा गुजरात की द्वारिकापुरी से आरंभ होकर कच्छ के कोटेश्वर महादेव (भारत-पाकिस्तान सीमा) तक चलेगी। मार्ग में आठवीं यात्रा से बचा सौराष्ट्र व पूरा कच्छ गहन मंथन करती चलेगी।
9. दसवीं तीर्थयात्रा अंबाजी (बनासकाँठा, जिला गुजरात) राजस्थान सीमा से आरंभ होकर डाकोरजी के पावन रणछोड मंदिर पर समापन करेगी।
10. ग्यारहवीं तीर्थयात्रा शामलाजी (साबरकाँठा जिला, गुजरात) से आरंभ होकर पावागए पावन तीर्थ से समापन करेगी।
11. बारहवीं तीर्थयात्रा तीथल तीर्थ (समुद्रतट-बलसाडत्र) से आरंभ होकर कयावरोहण तीर्थ (बड़ौदा गुजरात) में समापन करेगी।
12. तेरहवीं व चौदहवीं रथयात्राएँ मार्च मध्य से आरंभ हो रही है व ये क्रमश प. बंगाल व उड़ीसा तथा दक्षिण भारत के चारों प्रांतों को 2 माह में भ्रमण कर जन-जन को संस्कारित करेंगी।
प्रस्तुत तीर्थयात्राओं के रुट से लेकर सभी आवश्यक सभी जानकारियां महापूर्णाहुति प्रकोष्ठ में उपलब्ध है। अपनी यात्रा में वे मुख्य मार्गों, शक्तिपीठों, प्रज्ञासंस्थानों अन्य प्रमुख तीर्थों, देवस्थलों एवं सार्वजनिक संगठनों के प्रमुख केंद्रों को छूती हुई चलेगी। सभरी को महापूर्णाहुति के सृजनकल्प विभूति महायज्ञ में भागीदारी का आमंत्रण देंगी एवं सभी स्थानों से पावन प्रतीक ग्रहण करती हुई वे चलेगी। सभी तीर्थयात्राओं के साथ एक प्रदर्शनी भी चल रही है जो ठहराव के स्थान पर दस मिनट में लगा दी जाएगी। इसमें इस तीर्थयात्रा का विराट् स्वरूप, महापूर्णाहुति की रूपरेखा व गायत्रीतीर्थ के भावी दस वर्षों के कार्यक्रमों की सचित्र जानकारी है।
है यह सत्य अटल यह दुनिया बदलेगी, आज नहीं तो कल यह दुनिया बदलेगी। बदलेगी, निश्चय ही दुनिया बदलेगी।
होगे तब भी धरती और आकाश यही, अग्नि, वायु, जल का होगा आभास यही,
सूरज, चाँद, सितारे ऐसे ही होगे, दृश्य प्रकृति के सारे ऐसे ही होगे,
केवल दृष्टि बदल जाएगी मानव की, मन होगा निर्मल, यह दुनिया बदलेगी।
उन्नति नहीं रुकेगी आविष्कारों की, रुक जाएगी किंतु होड़ हथियारों की,
वैज्ञानिक जन सृजन-सहायक ही होंगे, साधन फिर सच्चे सुखदायक ही होगे,
होगा युगनिर्माण, रुकेगा युद्धों का भीषण दावानल, यह दुनिया बदलेगी।
नहीं स्वयं को फिर शरीर हम समझेंगे, सत्यसाधक को शूरवीर हम समझेंगे,
आत्मा का आनंद अमर हम जानेंगे हम है। कौन? स्वयं को हम पहचानेंगे,
होगी, मूर्च्छा दूर सगर-संतानों की पाकर गंगाजल, यह दुनिया बदलेगी।
संघबद्ध सब नेक-सदाचारी होंगे सज्जन-संत दुर्जनों पर भारी होंगे,
दुष्ट-दुराचारी में शक्ति नहीं होगी, कर्म करेंगे सब, आसक्ति नहीं होगी,
सदाचार सम्मानित होगा धरती पर, होगा जनमंगल, यह दुनिया बदलेगी।
जरा सोच लें, अब हमको क्या करना है, पाना है अमरत्व कि पल-पल मरना है,
ऐसा जीवन जिएँ कि अपराजेय बनें, पीड़ित मानवता के हित पाथेय बनें,
वर्तमान में प्रभु के सहयोगी हो, फिर है भविष्य उज्ज्वल, यह दुनिया बदलेगी।
*समाप्त*