जीवन का सच्चा सदुपयोग ही जीवन का महामंत्र है। जब भी मन में कोई उदात्त प्रेरणा जागे तो उसे बलपूर्वक थाम लो। कहीं ऐसा न हो कि भूल जाने के दोष के कारण वह सदैव के लिए लुप्त हो जाए। किसी भी सिद्धांत की सार्थकता उसकी व्यावहारिक अनुभूति में है। आदर्श चिंतन श्रेष्ठ है, तो आदर्श कर्म श्रेष्ठतम । आध्यात्मिक सत्य की अनुभूति- तत्वचिंतन और धारणा की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। साधनात्मक पुरुषार्थ थोड़ा सा ही क्यों न हो, हजार बड़ी-बड़ी बातों से ज्यादा उत्तम है। बातों से भावनाएँ जाग सकती हैं, किंतु उस सिद्धाँत की अनुभूति के लिए यदि आवश्यक पुरुषार्थ न किया गया, तो समझो समय तथा भावना बेकार नष्ट हुई। आदर्शोन्मुखी आध्यात्मिक कर्म में ही तो जीवन का सच्चा सदुपयोग है।
यह तभी संभव है, जब हृदय में कपट न हो। अपनी लालसाओं-वासनाओं पर बड़े-बड़े सिद्धांतों का आवरण डालकर उन्हें ढका न जाए । अपनी अकर्मण्यता पर सोने की चादर डालकर उसे शरणागति का नाम देना उचित नहीं। शरणागति तो निष्काम कर्म के तीव्र वेग से उपजी सात्विक भावना है, अकर्मण्यता नहीं। निश्चित जान लो कि आध्यात्मिक साधना न हो पाने का कारण शारीरिक सुख-सुविधाओं की चिंता और इंद्रियभोगों की लालसा ही है। क्योंकि जैसे ही मन में आध्यात्मिक साधना में संलग्न होने की, कठोर तप में प्रवृत्त होने की बात बैठती है, इंद्रियाँ विरोध करने लगती हैं। शरीर पूछने लगता है, “रे मन भला क्या यह आरामदायक होगा ?”
सच तो यह है कि साँसारिक उपलब्धियों के लिए जितने साहस और संघर्ष की आवश्यकता है, आध्यात्मिक जीवन के लिए उससे भी कहीं अधिक संघर्ष और साहस आवश्यक है। कृपण व्यक्ति धनसंग्रह के लिए जितना अध्यवसाय करता है, वीर सैनिक शत्रु पर आक्रमण करने के लिए जितना साहस रखता है, आध्यात्मिक ऊर्जा को पाने के लिए, सदैव के लिए जीवन की समस्त दुर्बलताओं को जीत लेने के लिए उतने ही अध्यवसाय की, उतने ही महान् साहस की आवश्यकता है। किसी भी प्रकार की आध्यात्मिक अनुभूति के पीछे रहस्य है-अदम्य साहस, सर्वथा भयहीन साहस। इस सत्य को पहचानने पर ही जीवन का सच्चा-सार्थक सदुपयोग संभव है। जीवन के सच्चे सदुपयोग अर्थात् जीवन के महामंत्र की साधना करके ही जीवन के रहस्य को जाना जा सकता है। समस्त दुर्बलताओं पर विजय पाई जा सकती है।
सन् 1949 में 46 वर्षीय एडमंड विलबोर्न को निमोनिया का तीव्र अटैक हुआ। जिसमें वह असहनीय पीड़ा से अचेत हो गया और जब साँस लेने में अत्यधिक तकलीफ होने लगी, तब उसे इंग्लैंड के मेनचेस्टर नगर के एक अस्पताल में भरती कराया गया। अस्पताल में उसकी हालत और चिंताजनक हो गई। चिकित्सकों ने उसे बचाने के लिए भरसक प्रयत्न किये, लेकिन उसकी दशा बिगड़ती ही गई। आखिर में निराश होकर डॉक्टरों ने उसे डेंजर लिस्ट का रोगी घोषित कर दिया। इस बीच ‘विलबोर्न’ ने स्वयं भी अपनी संकल्पशक्ति का प्रयोग करते हुए जीवित रहने का भरपूर प्रयत्न किया, परंतु उसकी एक न चली । वह चल बसा। डॉक्टरों ने भी उसकी मौत का प्रमाणपत्र जारी कर दिया और लिखा कि उसकी मौत निमोनिया के कारण हुई।
उसे दफनाया जाता, इसके पहले वह अचानक जी उठा और अपनी पत्नी जोन एरथ के साथ लंदन में हँसी खुशी के दिन बिताने लगा। उन दिनों वह चर्च आर्मी में कैप्टन था। इस घटना का जिक्र करते हुए उसने कहा, “इसमें रत्तीभर भी संदेह नहीं है कि मैं मर गया था और मैंने अपनी अपनी आत्मा को शरीर छोड़ते हुए देखा था। उस समय मैं अपनी आत्मा को शरीर छोड़ते हुए देखा था उस समय मैं अपने अंतःचक्षुओं से देख रहा था कि नर्स मेरे मुरदा शरीर को मुरदाखाने में भिजवाने की व्यवस्था कर रही है और मेरी आत्मा लाल रंग के डोरे से मेरे नश्वर शरीर से जुड़ी है। फिर मैंने देखा कि पास ही अस्पताल में एक कर्मचारी ट्राली ढकेलता हुआ मेरे शरीर के पास आया। फिर कुछ आदमियों ने मिलकर मुझे उठाया और ट्राली पर लिटा दिया। ट्राली के हरकत में आते ही वह लाल डोर टूट गई, जिसने मेरी आत्मा को मेरे शरीर से बाँध रखा था।
जिस समय वह इस घटना को बयान कर रहा था, उस समय इस घटना को हुए 36 वर्ष बीत चुके थे। घटना के समय उसकी उम्र मात्र 23 वर्ष की थी। घटना को बयान करते हुए उसने अपने मस्तिष्क पर जोर देते हुए बताया- “मैं शून्य में अकल्पनीय गति के साथ उड़ता हुआ दूसरे लोक में जा पहुँचा। वहाँ मुझे आत्मिक आनंद और प्रसन्नता का अहसास हुआ, क्योंकि वहाँ चारों ओर प्रकाश और रंग की अनोखी छटा थी । शाँति, कोमलता और पवित्रता की आनंददायक अनुभूति थी। जिसने मुझे अपने सुख भरे आलिंगन में लपेट लिया। हर ओर सौंदर्य फैला था। मधुर संगीत से वातावरण आनंदमय हो रहा था। वहाँ प्रेम और आत्मीयता की भरमार थी।”
“फिर भी इस साँसारिक जीवन से मेरा संबंध नहीं टूटा था। एक आवाज थी, जिसने इस संसार से मेरा संबंध जोड़ रखा था। वह आवाज एक निरंतरता के साथ सुनाई दे रही थी। वह किसी स्त्री की आवाज थी, जो बड़े ही करुणापूर्ण स्वर में दोहरा रही थी-हे दयालु ईश्वर इस युवावस्था में एडमंड को क्यों तूने पास बुला लिया। अभी उसे यही रहने दे। अभी उसे संसार में तेरे लिए बहुत से काम करने हैं। उसे यहीं रहने दे। पता है यह किसकी आवाज थी? यह मरी लैंड लेडी की आवाज थी। वह मेरे पलंग की पट्टी से लगी मेरी वापसी के लिए प्रार्थना कर रही थी।
जब एडमंड इस भौतिक संसार में दोबारा वापस आया, तो उसने अपने आपको पत्थर की एक चौड़ी सिल पर लेटे हुए पाया और यह चौड़ी सिल अस्पताल के मुरदाघर की थी। तीन घंटे मौत से साक्षात्कार करने के बाद आखिरकार उसने आँखें खोल दी । अपनी इस अनुभूति का उपसंहार करते हुए एडमंड ने दृढ़ स्वर में कहा-मेरा ख्याल है कि लैंड लेडी की भक्तिपूर्ण प्रार्थना के कारण मुझे दोबारा जीवन मिल सका।
क्या यह सचमुच ही संभव है कि लोग मरकर जीवित हो जाएं ? इस संदर्भ में चिकित्सकों की एक प्रसिद्ध पत्रिका ‘पल्स’ के चीफ एडवाइजर डॉक्टर टॉम स्मिथ ने कुछ विस्मयकारी घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा है कि चिकित्साविज्ञान के रूप में इसकी कोई विशेष व्याख्या नहीं प्रस्तुत की जा सकती । लेकिन इसमें संदेह नहीं कि ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं और मैं उनका अवलोकन कर चुका हूँ।
ऐसी ही एक घटना क्रिस्टोफर के संदर्भ में है । उसका अटल विश्वास है कि वह एक दरिया में डूबकर मर गया था। यह घटना सन् 1974 ई. की है। क्रिस्टोफर उस समय अपनी अठारहवीं सालगिरह के समारोह के सिलसिले में साउथ वेल्स के दरिया ‘टाफ’ के किनारे अपने साथियों के साथ उछलकूद कर रहा था। कि अचानक उसे ठोकर लगी और वह लुढ़कता हुआ दरिया में जा गिरा। पानी गहरा था और सख्त सरदी के कारण अति शीत हो रहा था। जब उसके साथी उसे दरिया से बाहर निकालने में असफल रहे, तब पुलिस को फोन किया गया। कोई 20 मिनट बाद पुलिस के प्रयास से क्रिस्टोफर मिल गया। अस्पताल में उसे बचाने का भरसक प्रयास किया गया, जो व्यर्थ गया। वह मर चुका था। डॉक्टरों ने भली प्रकार जाँच के बाद उसे मुरदाघर पहुँचाने का निश्चय किया। तभी एक डॉक्टर एकाएक हैरान हो उठा। आखिर क्रिस्टोफर की नाड़ी अचानक चलने कैसे लगी ? हालाँकि उसकी गति अभी भी बहुत धीमी थी।
कमरे में मौजूद सभी व्यक्ति दम साधे खड़े थे । क्रिस्टोफर धीरे धीरे जाग्रत होता गया और अंत में उसने आँखें खोल दीं। डॉक्टर विस्मित रह गए, क्योंकि उनके अनुसार तो वह मर गया था। क्रिस्टोफर ने बताया कि मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब मैं बरफ की तरह ठंडे पानी में गिरा, तो पहले कुछ सेकिण्ड मैंने बेहद शारीरिक कष्ट अनुभव किया। लेकिन उसके बाद मैं अपने को गरम महसूस करने लगा और यह तपिश इतनी उल्लासपूर्ण और आनंददाई थी कि मरे अंग अंग से खुशी के गीत फूटने लगे। यों लगता था जैसे मैं सपनों के सुनहरे संसार में प्रवेश कर गया हूँ। क्रिस्टोफर ने एक बहुत विचित्र बात बताई ।उसने कहा-”मरने के अनुभव से व्यावहारिक रूप से गुजरने के बाद मुझे मौत का कोई भय नहीं रहा, क्योंकि मैं जान चुका हूँ कि मौत कैसी होती है।”
शिकागो विश्वविद्यालय के मनोविज्ञानवेत्ता डा. राल्फग्रीन की भी गणना उन लोगों में होती है, जो इस बात को एक वैज्ञानिक सच्चाई मानते हैं कि जीवन सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं है। शरीर से तो मात्र उसकी इस संसार में अभिव्यक्ति होती है। नश्वर शरीर में अनश्वर आत्मा का वास ही हमें इस दुनिया की अनुभूति कराता रहता है। उनका कहना है कि यही कारण है कि लोग मरने के बाद भी जीवित हो सकते हैं। ऐसी कई घटनाओं का उल्लेख उन्होंने अपने अध्ययन-अनुसंधान में किया है।
सन् 1961 ई॰ की बात है कि लंदन क्लीनिक में विश्वविख्यात अभिनेत्री एलिजाबेथ टेलर की एक खतरनाक बीमारी के दौरान साँस रुक गई । वह बताती है, मैंने उठकर बिस्तर की चेष्टा की, लेकिन मैं इतनी कमजोर हो चुकी थी कि मेरे लिए हरकत करना संभव नहीं था। फिर अचानक मेरी नजरों के सामने एक शून्य प्रकट हुआ और मैं अपने आपको बेहद शाँत और सहन की रेशमी गोद में महसूस करने लगी। यूँ लगता था जैसे मैं गरम पानी के एक समुद्र की हलकी हलकी लहरों पर तैर रही हूँ। इसके साथ ही मैं अपने शरीर को बिस्तर पर लेटा हुआ भी महसूस कर रही थी। दरअसल इस समय मैं अपने शरीर से पूर्ण रूप से अलग हो गई थी और मैं अपने शरीर पर यूँ मंडरा रही थी जैसे कोई पंछी अपने बच्चे पर मँडराता है। बाद में मुझे पता चला कि मेरी साँस कुछ देर के लिए रुक गई थी और एक इमरजेंसी आप्रेशन के द्वारा मेरी श्वास नली खोली गई, जिससे मेरे प्राण बच गए थे, लेकिन सच पूछा जाए तो मैं कुछ देर के लिए मैं मर गई थी।
एक और व्यक्ति ह्नयूग्रीन का कहना है कि कुछ वर्ष पूर्व वह एक कार दुर्घटना में मर गया था अपने इस अनुभव को बताते हुए उसने कहा कि मुझे अच्छी तरह से याद है कि असहनीय पीड़ा के कारण मैं कार की पिछली सीट पर पड़ा हुआ तड़प रहा था कि अचानक पीड़ा का अहसास जाता रहा और फिर बाहर निकलकर मैं अपने शरीर को देखने लगा। शरीर से बाहर निकलने के बाद के क्षणों में मुझे किसी भी तरह की पीड़ा नहीं महसूस हुई। यहाँ तक कि मुझे कोई भय भी नहीं रहा। लेकिन मैं महसूस कर रहा था कि मुझे असहनीय यातना से मुक्ति मिल गई है। उसके बाद एकाएक चारों ओर अंधेरा छा गया और जब मुझे होश आया, तो मैं चिकित्साधीन था। मुझे पूरा विश्वास है कि मैं थोड़ी देर के लिए मर गया था और मैंने स्पष्ट अनुभव किया कि शारीरिक अवस्था से परे कोई आत्मिक अवस्था भी है।
अमेरिका की एक अध्यापिका श्रीमती आइरिस जेलमैन ने भी कुछ इसी तरह का अनुभव किया। उन दिनों उनकी तबियत खराब थी। अचानक उनको दिल का दौरा पड़ा और वे मर गईं। मृतावस्था में उन्होंने सुना, डॉक्टर कह रहा था-मैंने इसे खो दिया। जेलमैन ने आगे बताया कि मुझे लगा कि कोहरे जैसी धुँध में मेरा सारा अस्तित्व घिर गया है और मैं छत की तरफ उठ रही हूँ।पहले तो मैं उस अपरिचित धुँध के कारण कुछ देख नहीं पाई, फिर मैंने पाया कि मैं बिस्तर पर पड़े अपने शरीर को देख रही हूँ। मैं हैरान थी कि मैं तो होश में हूँ, फिर यह सब क्या है ? फिर मैंने पाया कि मैं ऐ लंबी अंधेरी गुफा जैसी सुरंग के भीतर चली जा रही हूँ। मैं उन क्षणों में दूर दिख रहे एक उज्ज्वल प्रकाश की ओर बढ़ रही थी और कुछ सम्मोहक आवाजें मेरे कानों में पड़ रही थीं। उस उज्ज्वल प्रकाश से एकाकार होने के लिए मैं तेजी से आगे बढ़ी जा रही थी और तभी अचानक मुझे अपने पति का ख्याल और उनकी याद सताने लगी। मैं समझ रही थी कि या तो मैं उस प्रकाश में लीन हो जाऊंगी या फिर वापस लौट जाऊंगी। कुछ अजीब-सी आकृतियाँ मेरे चारों ओर चक्कर काट रहीं थीं । मैं रुक गई और मैंने वापस लौटने का निर्णय कर लिया था। इतने में मेरे कानों में एक गंभीर सी आवाज टकराई, “तुमने ठीक निर्णय लिया है। तुम लौट जाओगी।” और मैंने आँखें खोलीं, तो देखा मेरे सामने डॉक्टर खड़े थे।
उक्त घटनाएँ यही सत्य उद्घाटित करतीं है कि पारलौकिक जगत के अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता। उसका पारलौकिक जगत की सत्ता और सत्य को स्वीकार कर लिया है । उनका कहना है कि इस दुनिया से भी कहीं सुँदर, रमणीक और आकर्षक वह दुनिया है। मगर वह है कहाँ, यह नहीं बताया जा सकता। हाँ एक बात अवश्य है कि मनुष्य की जैसी विचारधारा, व्यक्तिगत धारणा और जैसा उसका सामाजिक-धार्मिक संस्कार होता है, उसी के अनुसार मरणोपरान्त उसे अनुभव होता है और होता है पारलौकिक जगत का साक्षात्कार भी। इन अनुभवों में विविधता भले ही हो, पर एक सत्य शाश्वत, सार्वकालिक एवं सबके लिए है कि आत्मा अमर है, अविनाशी है । सभी अवस्थाओं में उसका अस्तित्व बना रहता है, इसमें संदेह नहीं।
नरेंद्र स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास दक्षिणेश्वर अक्सर जाते थे। त्रिकाला परमहंस तो नरेंद्र का भावी स्वरूप जानते थे, पर अपने शिष्य को साँसारिक जाल से निकालकर आत्मबोध कराने में उन्हें कुछ समय लगा। जब समय आ ही पहुँचा तो उन्हीं की प्रेरणावश नरेंद्र ने अपनी नौकरी की समस्या उनके समझ रखी। परमहंस ने उसे काली की शरण में जाने का निर्देश दिया। काली के समक्ष जाकर उसका विराट् स्वरूप साक्षात् सामने देखकर वे मात्र आत्मशक्ति व भक्ति की याचना के और कुछ नहीं माँग सके। काली के इस साक्षात्कार व रामकृष्ण के मार्गदर्शन ने नरेंद्र को विवेकानंद उसी दिन बना दिया था, शक्ति भले ही गुरु से उन्होंने अवसान के पूर्व पाई हो।
सद्गुरु की प्राप्ति एक बहुत बड़ा सौभाग्य है। यह जिस-जिसको मिला है, वह परमलक्ष्य की ओर बढ़ सकने में सफल हुआ है, मार्ग में आने वाले अवरोधों से मोरचा लेने की सामर्थ्य भी उसे ही मिलती रही है।
अनंत काल पूर्व ऊपर खगोल में एक आवाज उठी-”तू कौन है ?” सारा जीव-संसार चकित होकर ऊपर देखने लगा। खगोल गूँजा-”तू कौन है ?” अबकी बार सारे प्राणी खगोल की ओर देखकर कुछ सोचने लगे। खगोल ने फिर प्रश्न किया-”तू कौन है ?” संसार प्रश्न को अनसुना कर अपना काम करता रहा, किंतु मनुष्य चिंतित हो उठा, विचार करने लगा-”मैं कौन हूँ ?” एक-दूसरे की ओर देखता ओर प्रश्न करता, “मैं कौन हूँ?”
उस अज्ञात पूर्व काल का वह साधारण प्रश्न आज तक प्रश्न बना हुआ मनुष्य की विचारक्रिया को गतिमय बनाए हुए है। नियति के उस एक प्रश्न ने फैलकर असंख्यों प्रश्नों का रूप धारण कर लिया है और एक उत्तर, मैं यह हूँ” ने अनेकता से प्रभावित होकर अपना मौलिक रूप खो दिया।
कितना अच्छा होता-आकाश के “तू कौन है ?” जैसे साधारण प्रश्न का साधारण उत्तर देकर मनुष्य निश्चित हो जाता, “जो तू है वहीं मैं हूँ।”
पारलौकिक जगत के अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता । उसका अस्तित्व है । अब तो वैज्ञानिकों एवं परामनोवैज्ञानिकों ने भी पारलौकिक जगत की सत्ता और सत्य को स्वीकार कर लिया है। उनका कहना है कि इस दुनिया से भी सुँदर, रमणीक और आकर्षक वह दुनिया है।
शिक्षा जीवन को सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् से समन्वित करती है। इसके द्वारा बुद्धि का शिवत्व, हृदय का सौंदर्य और आत्मा का सत्य स्वरूप झलकता है। शिक्षा अंतःप्रकाश को व्यवहार में उतारने का कार्य करती है। यह चरित्र में समुज्ज्वलता, चिंतन में उत्कृष्टता एवं व्यवहार में उदात्त भाव भरती है। एक ओर जहाँ इससे भौतिक पक्ष समृद्ध होता है, वहीं दूसरी ओर यह आत्मिक उत्थान की ओर अग्रसर होने का भी उचित एवं श्रेष्ठ माध्यम है। शिक्षा ‘शिक्ष’ धातु से आगे ‘गुरोश्च हलः’ सूत्र से ‘अ’ प्रत्यय होकर स्त्रीलिंग में ‘शिक्षा’ शब्द का प्रयोग होता है। इसका तात्पर्य है-जिसके द्वारा विद्या ग्रहण की जाए, उसे शिक्षा कहते हैं। ‘सा विद्यया विमुक्तेये’ कहकर विद्या की महत्ता प्रतिपादित की जाती है। अर्थात् शिक्षा वह जो सन्मार्ग प्रदान करे, सन्मार्ग की प्राप्ति अज्ञान के अभाव से ही संभव है, जो कि सत्ता, ज्ञान और लाभ अर्थवाची ‘विद’ धातु से बनी है। सत्-चित-आनंद प्रदात्री ही विद्या है। अतः जिसके माध्यम से व्यक्ति का सर्वांगीण विकास यानि भौतिक एवं अध्यात्मिक विकास हो, वह विद्या ही शिक्षा कहलाती है।
शिक्षा में नैतिकता एवं आत्मिक विकास का स्वाभाविक समावेश होता है। इसके कारण ही राष्ट्र संपन्न और समृद्ध बनता है। इसे कल्पलता के सदृश माना गया है। शिक्षा अज्ञान का निवारण करती है तथा व्यवहार जगत् में सहिष्णुता एवं कर्मठता का पाठ पढ़ाती है। इसकी महत्ता नीति शतक में कुछ इस तरह से अभिव्यक्ति हुई है-
जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यम् मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिम। किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या॥
निश्चित रूप से शिक्षा को अपने स्वरूप का बोध कराती है। यह मानव में मानवता का रहस्योद्घाटन करती है। यह मानवीय अंतःकरण का ऐसा शृंगार है, जिससे भावना एवं संवेदना जाग्रत होती है। इसके संवेदन सूत्रों से ही व्यक्ति एवं समाज आपस में जुड़ते हैं। इसी कारण शिक्षित समाज में प्रेम एवं सामंजस्य का सौहार्दपूर्ण वातावरण स्वयमेव बना रहता है।
भारतीय मनोविज्ञान ने मानव की मूल प्रकृति को आध्यात्मिक माना है। अपनी इसी आध्यात्मिक प्रकृति के कारण मनुष्य सचेतन से आत्मचेतन होने की ओर उन्मुख होता है। इसी लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए वह अविज्ञात के अनावरण की जिज्ञासा करता है। परम सत्य को जानने के लिए वह निरंतर अनुसंधान एवं अनवरत खोज में लगा रहता है। महर्षि अरविंद के अनुसार “मानव की सबसे बड़ी विशेषता है कि उसमें एक ऐसी चेतना विद्यमान है, जिसमें वह अपने सीमित भौतिक अस्तित्व से ऊपर उठ सकता है। यही विशेषता मनुष्य को पशु से भिन्न ठहराती है।”
मनुष्य अपनी इसी आध्यात्मिक प्रकृति के कारण ही कला, संस्कृति, सदाचार और धर्म के स्वरूप को अभिव्यक्ति कर सका है। उसने अपने व्यावहारिक जीवन को भी इसी परिप्रेक्ष्य में ढाला, संवारा, और गढ़ा । तत्ववेत्ता मनीषियों ने इसी गढ़ने-सँवारने की प्रक्रिया को ही शिक्षा एवं विद्या के रूप में निरूपित किया है। वस्तुतः ये दोनों ही आपस में एक-दूसरे से संबंधित हैं। एक में जहाँ लौकिक जीवन की गुत्थियों को सुलझाया जाता है, तो दूसरे में आँतरिक जगत् का अन्वेषण किया जाता है। हालाँकि दोनों में ही आत्मा के ज्ञानरूप का साक्षात्कार किया जाता है। मनीषियों के अनुसार, ज्ञान का यह स्रोत कहीं बाहर नहीं है, प्रत्युत आत्मा के अनावरण से ही इसका प्रकटीकरण होता है। महर्षि अरविंद के शब्दों में, मस्तिष्क को ऐसा कुछ भी नहीं सिखाया जा सकता, जो जीव की आत्म में सुप्तज्ञान के रूप में पहले से विद्यमान न हो।
युगद्रष्टा स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा अंतर्निहित सत्य को बताते हुए कहा है, मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्ति करना ही शिक्षा है। ज्ञान मनुष्य का स्वभाव सिद्ध है। कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता, सब अंदर ही हैं। हम जो कहते हैं कि मनुष्य जानता है, यथार्थ में मानव शास्त्र-संगत भाषा में हमें कहना चाहिए कि वह आविष्कार करता है, अनावृत या प्रकट करता है। अतः समस्त ज्ञान चाहे वह भौतिक हो अथवा आध्यात्मिक, मनुष्य की आत्मा में है। बहुधा वह प्रकाशित ने होकर ढका रहता है और उसका आवरण धीरे-धीरे हटने लगता है, तब हम कह सकते हैं कि हम सीख रहे हैं। युगनायक स्वामी विवेकानंद ने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा है -”शिक्षा से आत्मविश्वास जगता है और आत्मविश्वास से अंतर्निहित ब्रह्मभाव जाग उठता है। शिक्षा का सुशिक्षा होना मात्र पाठ्यक्रम पाठ्यपुस्तकों तथा परीक्षाओं के घेरे में बंद नहीं हैं, यह जीवन, धर्म, विश्वास, सेवा एवं प्रेम की शिक्षा का समन्वित रूप है। आज ऐसा न समझे जाने के कारण ही इतनी वैमनस्यता, विषमता एवं वितंडावाद पनप उठा है। शिक्षा भावात्मक होनी चाहिए, निषेधात्मक नहीं। भावात्मक विचार संस्कारों के नियंत्रक हैं। वे जीवन निमार्ण तथा चरित्र निमार्ण में सहायक होते हैं। आज ऐसे ही शिक्षा की आवश्यकता है।
स्वामी रामतीर्थ शिक्षा को स्वतंत्रता तथा मोक्ष की प्राप्ति का साधन मानते हैं। संत तिरुवल्लुवर के अनुसार अनश्वर महान संपत्ति केवल शिक्षा ही हो सकती है। कविवर रवींद्रनाथ ठाकुर कहते हैं, श्रेष्ठ शिक्षा वह नहीं, जो जानकारी दी, सच्ची शिक्षा वह है, जो हमारे जीवन और वातावरण में सामंजस्य स्थापित करे। जो भी हो, इतना सच है कि शिक्षा जीवन को अभिव्यक्त करती है। इसके द्वारा जीवन जीवंत एवं जाग्रत हो उठता है। इसी कारण दिव्य जीवन संघ के संस्थापक स्वामी शिवानंद ने शिक्षा के सत्य को निरूपित करते हुए कहा हैं, वास्तविक शिक्षा का उद्देश्य मन को नियंत्रित करना, अहंकार नष्ट करना, दैवी गुणों का संवर्द्धन करना और ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करना होता है। मनीषी एडीसन ने कहा है, मानव-जीवन के लिए शिक्षा वैसी ही है, जैसे किसी संगमरमर-खंड के लिए मूर्तिकला।
इस तरह देखा जाए तो शिक्षा का लक्ष्य कुछ निर्माण करना नहीं, बल्कि मनुष्य में पूर्व संचित शक्तियों का जागरण, अनावरण और विकास करना है। महान् दार्शनिक डा. राधाकृष्णन ने शिक्षा को मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता का विकास माना है। उन्होंने शिक्षा का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा है कि समस्त शिक्षाओं, विद्याओं और अभ्यासों का अंतिम उद्देश्य मनुष्य-निमार्ण है। वेदों में भी शिक्षा का उद्देश्य एवं लक्ष्य मानव को प्रबुद्ध, सुसंस्कृत, उन्नत, निरोगी, विकसित एवं पूर्ण बनाना ही माना गया है। वेदकालीन शिक्षा में ज्ञान को आत्मसात करने, नवीन-सृष्टि करने तथा भावधारा आदि का समावेश था। इस तरह शिक्षा का मूल उद्देश्य मानवता का विकास एवं उसकी पूर्णता ही सिद्ध होता है। अतः इसका स्वरूप पूर्ण वैज्ञानिक है।आधुनिक शिक्षा के तीन प्रमुख आधार माने गये हैं ये हैं-दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक-साँस्कृतिक। शिक्षादर्शन में शिक्षा की आवश्यकता एवं अनिवार्यता पर बल दिया गया है। शिक्षा मनोविज्ञान के अंतर्गत शिक्षा के सिद्धाँतों, प्रतिमानों, विधियों तथा प्रणालियों का विस्तार से वर्णन किया जाता है। मनोविज्ञान के अनुसार, व्यक्ति के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास शिक्षा का परम लक्ष्य है। शिक्षा के सामाजिक साँस्कृतिक पहलू में उसके विषय एवं सामयिकता पर प्रकाश डाला गया है। शिक्षाविदों ने आधुनिक शिक्षा के तीन प्रमुख घटकों का उल्लेख किया है-शिक्षक, शिक्षार्थी और शिक्षणप्रक्रिया व विषय। प्राचीनकाल में भी शिक्षा इन्हीं तीन मूल बिंदुओं पर आधारित थी। परंतु इसके स्वरूप व क्रियान्वयन में उत्कृष्टता एवं ग्राह्यता का आग्रह था।
शिक्षा देने वाला शिक्षक या गुरु वह व्यक्ति है, जो शिक्षा को सहज एवं सरल ढंग से छात्र के मन-मस्तिष्क में उतार देता है, प्राचीनकाल में चार प्रकार के शिक्षकों का वर्णन मिलता है-आचार्य, प्रवक्ता, श्रोत्रिय एवं उपाध्याय। विद्यार्थी को संस्कार-सूत्रों से जो आबद्ध करे उसे आचार्य कहते थे। आचार्य शिक्षार्थी के अंदर संस्कार एवं शिक्षा को बीजारोपण करता है। आर्षग्रंथों के गूढ़ एवं सूत्र रूप में भरे बड़े ज्ञान भंडार की सरल, सहल एवं सुँदर भाषा में व्याख्या करने वाले को प्रवक्ता कहा जाता है। हालाँकि वर्तमान समय के प्रवक्ताओं में वह बात नहीं है, जो प्राचीनकाल में होती थी। छंद अर्थात् वेदों की शाखाओं को कंठस्थ रखने वाले एवं शिक्षार्थी को कंठस्थ कराने वाले शिक्षक श्रोत्रिय कहलाते थे, लौकिक एवं वैज्ञानिक साहित्य का अध्ययन-अध्यापन करने वालों को अध्यापक या उपाध्याय कहा जाता था।
अध्यापक का ज्ञान, शैली, संप्रेषण एवं व्यवहार बड़ा ही महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इसी के माध्यम से वह अपने विद्यार्थियों को ज्ञान का बोध करा सकता है। आधुनिक शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षकों की विशेषताओं का इन बिन्दुओं के अंतर्गत आकलन किया है-सम्यक् ज्ञान, कुशल शैली, सरल एवं सुबोध भाषा, मधुर व्यवहार, सत्यवादिता, निष्पक्षता, न्यायप्रियता एवं विद्यार्थियों के प्रति स्नेह व सद्भावपूर्ण दृष्टिकोण । विनोबा भावे ने शिक्षकों में तीन गुणों को रेखाँकित किया है-शिक्षक के मन में शिक्षार्थी में तीन गुणों को रेखाँकित किया है-शिक्षक के मन में शिक्षार्थी के प्रति प्रेम और वात्सल्य की भावना, शिक्षक की निरंतर अध्ययनशीलता एवं शिक्षक का वर्तमान राजनीति में सक्रिय न होना। इन गुणों से युक्त शिक्षकों को डा. राधाकृष्णन ने समाज का प्रकाशस्तंभ कहा है। पूर्व राष्ट्रपति डा. जाकिर हुसैन का कहना है कि सच्चे शिक्षक ही हमारे भाग्य-विधाता है।
सच तो यह है कि शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों ही एक दूसरे के पूरक होते हैं। इनके मध्य पवित्र ज्ञान का संबंध होता है। श्रद्धापूर्वक शिक्षा ग्रहण करने की इच्छा रखने वाला शिक्षार्थी होता है। छात्र के गुणों के बारे में सिद्धांत कौमुदी में इस तरह कहा गया है-”गुरुर्दोषाणानावरणं छत्रम् ततशीलम् अस्थ इति छात्रम्।” इसी को उपनिषद् इस तरह से कहता है-’यानि अस्माकम अनवद्यानि तानि त्वया उपाखनिनो इतराषि।” प्राचीन काल में छात्र शिक्षक के पास श्रद्धाभाव से पहुँचता था। शिक्षक उसे संस्कारों की भट्टी में गला-ढलाकर अपने अंतर्निहित विद्या गर्भ में प्रविष्ट कराता था। इसी उदात्त भावना से शिक्षक को अंतेवासी शब्द से अलंकृत किया जाता था। शिक्षक शिक्षार्थी को उसके अनुकूल शिक्षा प्रदान करता था।
आज के आधुनिक परिदृश्य में भी इसे तीन रूपों में परखा जा सकता है-(1) ज्ञानात्मक (2) भावात्मक तथा (3) क्रियात्मक । ज्ञानात्मक उद्देश्यों में समझना, रचना करना वे मूल्याँकन पर जोर दिया जाता है। भावात्मक पहलू के अंतर्गत विद्यार्थियों में सकारात्मक अभिवृद्धि को जाग्रत कर अध्ययन हेतु प्रेरित किया जाता है। क्रियात्मक प्रक्रिया प्राप्त ज्ञान व प्रेरणा को व्यावहारिक जीवन में उतारने पर बल देती है। वर्तमान युग में कम से कम समय में अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया चल पड़ी है। इसलिए प्राथमिक स्कूलों से महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों तक ऐसी ही विधियाँ प्रयोग में लाई जा रही हैं। प्रयोग में लाई जाने वाली विधियों में भाषण या वाचिक विधि, सामूहिक विवेचना या संगोष्ठी विधि, सामूहिक प्रदर्शन विधि एवं पत्राचार विधि मुख्य है। इन्हें और सरल, सुबोध एवं व्यापक बनाने के लिए रेडियो, टेलीविजन एवं कंप्यूटर की सहायता ली जा रही है।
शिक्षा जगत् के वर्तमान परिदृश्य में उच्चस्तरीय सिद्धांतों एवं अत्याधुनिक व्यवस्थाओं के बावजूद प्रतिपल विफलता एवं व्यक्तिक्रम बढ़ता जा रहा है। इस तथ्य की गहराई में जाने पर निष्कर्ष यही निकलता है। कि आज की शिक्षा अर्थ एवं काम पर प्रतिष्ठित है। यह केवल जीविकोपार्जन या आजीविका का साधन बनकर रह गई है। जो शिक्षा वैभव-विलास से जुड़कर तप से मुँह मोड़ ले, वह भला चरित्र चिंतन एवं व्यवहार में कैसे परिवर्तन ला सकती है। सत्य यही है कि आज का शैक्षिक परिदृश्य एकदम दिग्भ्रमित है।
वर्तमान शिक्षा को यदि सृजनशील बनाना है तो शिक्षा के मूल्य, महत्व एवं उद्देश्य को सही ढंग से समझना होगा और प्राचीन भारतीय परंपरा को सामयिक रूप से प्रतिष्ठित करना होगा। शिक्षणप्रक्रिया में ऋषि-चेतना का समावेश करके ही उपर्युक्त विसंगतियों को दूर किया जा सकता है। वर्तमान शिक्षा में जीवन जीने की कला या अध्यात्मविद्या का समावेश आवश्यक है। इसके बिना सच्चे जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती । आज पाश्चात्य जगत के शिक्षाशास्त्रियों जैसे पैंटर, डेवी, फ्रीबेल, जेम्स विवेकानंद, महर्षि अरविंद, लोकमान्य तिलक, ब्रह्मर्षि दयानंद आदि के विचारों का समन्वय आवश्यक है। क्योंकि आज समाज को ऐसी शिक्षा चाहिए, जो मानव का निर्माण कर सके एवं समाज व राष्ट्र को विकसित एवं गतिशील बना सके।
विधाता ने अपने सेवकों को बुलाकर धरती से एक -एक उपहार लाने का आदेश दिया। उन्होंने कहा-”जिसका उपहार सर्वश्रेष्ठ होगा, उसी को प्रधान सेवक के पद नियुक्त किया जायगा।” आज्ञा मिलने की देर थी, सभी सेवक अच्छे उपहारों की तलाश में पृथ्वी की ओर दौड़ने लगे। एक-से बहुमूल्य उपहार सेवकों ने लाकर सामने रखे, पर विधाता के चेहरे पर कहीं प्रसन्नता और संतोष की रेखा तक न थी। हिसाब लगाया गया, तो एक सेवक का आना शेष था। उसकी प्रतीक्षा बड़ी आतुरता से की जा रही थी।
आखिर प्रतीक्षा की घड़ियाँ पूरी हुई और वह सेवक भी आ गया। वह कागज की एक पुड़िया विधाता को देकर नीचे डरते-डरते बैठ गया। विधाता ने पुड़िया खोली, “अरे, यह क्या इस पुड़िया में मिट्टी बाँध लाए।” सेवक ने हाथ जोड़कर कहा, “हाँ भगवान मैंने पृथ्वी का चप्पा-चप्पा छान मारा । शायद ही कोई स्थान रह गया हो, जहाँ मैं नहीं गया। मैंने इस बात की बड़ी कोशिश की कि ऐसा उपहार ले चलूँ, जो आपको पसंद आ जाए। प्रभु है तो यह मिट्टी ही, पर किसी साधारण स्थान की नहीं है। यह वह मिट्टी है, जहाँ के लोगों ने संस्कृति और मानवता की रक्षा के लिए खुशी-खुशी अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।”
विधाता ने वह मिट्टी बड़ी श्रद्धा से अपने मस्तक पर लगाई और कहा, “सेवकों जब तक पृथ्वी पर ऐसे संत और सज्जन पुरुष बने रहेंगे, तब तक धरती पर सुख-शांति की संभावनाएँ की कम न होंगी।”
मोहि मुकति सुगति की चाह नहीं जो पे जीवते पीव न पाइए जू ‘वली’ अंत समय जहाँ जावना तहाँ जीवते क्यों नहीं जाएइ जू।
वह बड़े ही आनंदविभोर होकर इन पंक्तियों को गाते हुए चले जा रहे थे। ये पंक्तियाँ भी उनके जीवन में समा गई थीं। इनके अर्थ और भाव उनके चेहरे पर छाए हुए थे। वह सचमुच ही जीते जी, सशरीर परमात्मा से एकाकार-भावलीन हो गए थे। तभी तो उन्हें वसाली कहा जाता था। वस्ल यानि कि मिलन और जो मिल चुका हो, उसे वसाली ही तो कहेंगे। वह सूफी थे, खुदा के हुस्न के आशिक। अपने इस अनोखे इश्क की मस्ती में सराबोर वह अपने मूल देश खुरासान से भ्रमण करते हुए पंजाब आ गए थे।
आज भी भ्रमण करते हुए मुल्तान शहर के समई चबूतरे के पास जा पहुँचे। यहाँ प्रकाँड पंडित टेकचंद रामकथा सुना रहे थे। उस दिन राम-लक्ष्मण के द्वारा जनकपुर के उद्यान में पुष्प चुनने जाने का वर्णन हो रहा था। पंडित जी की मधुर वाणी में प्रभु का सौंदर्य अलौकिक हो उठा था। वह कह रहे थे, “सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा।” सभी श्रोतागण मंत्रमुग्ध थे। सूफी फकीर तो खुदाई नूर के दीवाने थे। उनके मुख से पंडित जी की प्रशंसा में निकल गया-”किसी की आँख में जादू, तेरी जुबाँ में है।”
उस दिन की कथा समाप्त हुई । पंडित जी आरती करके घर जाने लगे। रास्ते में पाँव रखते ही देखा कि ये सूफी संत दोनों हाथ जोड़े बड़ी विनम्रता से उनके सामने खड़े हैं। पंडित जी ने हतप्रभ होते हुए कहा-अरे शाह साहब आप। हाँ, उनका पूरा नाम शाह जलालुद्दीन वसाली था। उनकी आत्मिक शक्तियों, चमत्कारी सिद्धियों की चारों ओर ख्याति थी। सभी उन्हें जानते थे पर यह भेंट पहली थी। पंडित जी की सवलिया आँखों के जवाब में उन्होंने कथानायक राम का परिचय पूछा।
पंडित जी भी चलते चलते बताने लगे-”हजरत यह रामचरितमानस अयोध्यापुरी के राजा दशरथ के सुपुत्र मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र का पावन चरित्र है।” शाह साहब बोले-”पंडित जी मुझे बड़ा आनंद आता है यह रामकथा सुनने में। रोज सबसे पहले आता हूँ और सबके बाद जाता हूँ। मुसलमान होने के कारण मुझे कोई बैठने नहीं देता, फिर भी घंटों मैं पाँव पर खड़े-खड़े ही तुम्हारी मधुर वाणी सुनता हूँ।” पंडित जी ने उन्हें आश्वासन दिया, “शाह साहब कल से मैं आपको सबसे आगे अपने पास ही बिठा लिया करूंगा, आप जरूर पधारें।
यह क्रम कुछ ही दिन चला और शाह साहब के द्वारा भक्तिपूर्वक रामकथा सुनने की चर्चा शहर के मौलवियों में पहुँच गई । हुकूमत का सहारा लेकर तुरंत मौलवी अब्दुल्ला के स्थान पर बड़ी सभा आयोजित की गई। उसमें शाह जलालुद्दीन वसाली को भी बुलाया गया। उन्होंने वहाँ पहुँचकर मौलवी की बातों पर ध्यान ही नहीं दिया, उसकी तरफ देखा तक नहीं। उलटे रामभक्ति की उमंग में सबके सामने निर्भय होकर गाने लगे-काफिरे इश्क मुसलमानी मारा दरकारा नेस्त। अर्थात् मैं तो प्रेमपंथ का पथिक हूँ, मुझे धर्म की नाकेबंदी की कोई जरूरत नहीं है। इसी के साथ अपनी रामभक्ति के आवेश में शाह रामकथा के संबंध में यह कहते हुए विदा हुए-
हसरत मेरी यही है मेरा अरमान है यही
वो आ जाएँ नजर तो उन्हें देखता रहूँ।
विचारों की शक्ति को समझो, क्योंकि वे ही तुम्हें अपने प्रवाह के अनुरूप चलने के लिए बाधित करेंगे और ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करेंगे, जो आश्चर्यचकित कर दें।
ये सूफी संत वसाली रामकथा सुनते-सुनते प्रेमाश्रु धारा बहाने लगते थे और तन-मन की सुधि भूल जाते थे। इधर मौलवी साहब के भेजे हुए कई मुसलमान जो उन्हें ढूंढ़ने आए, उनका यह हाल देखकर सोचने लगे कि जरूर इस पंडित ने गलत रास्ता दिखाकर उन्हें मुसलमान से काफिर बना दिया है। अतः खबर पाकर मौलवी स्वयं वहाँ पहुँचे और क्रोध में तमतमाकर पंडित जी से कहने लगे-”खबरदार जो कल से यहाँ कथा बाँचने आए। तुम स्वयं समझदार हो, इसका नतीजा खुद ही सोच लेना।”
मौलवी के पास सत्ता का जोर था । सत्ता से भय खाकर सीधे-सादे पंडित जी को विश्वास दिलाना पड़ा कि मैं कल से यहाँ कथा नहीं कहूँगा। बालकाँड उस दिन पूर्ण हुआ था। अतः उनके लिए एक अवसर भी था कि वे रामकथा यहीं समाप्त कर दें। कुछ भयवश, कुछ उपद्रव न भड़के, इस कारण पंडित जी ने अपना कार्यक्रम समाप्त घोषित कर दिया।
दूसरे दिन संध्या-पूजा कर पंडित जी को जाते-जाते रास्ते में शाह साहब मिल गये। शाह साहब ने पंडित जी को बदहवासी में भागते देखकर पूछा, “कहाँ भागे जा रहे हैं पंडित जी ? जरा दिलदार यार का पूरा पता तो बताते जाओ।” पंडित जी ने घबराते हुए इधर-उधर देखकर छोटा सा जवाब दिया, “यदि आपके पास खड़ा रह गया, तो पकड़ा जाऊँगा हजरत और तब....... । “ पंडित जी ने बस आगे संकेत भर किया, बोले कुछ नहीं। वे जानते थे कि दीवारों के भी कान होते हैं और सत्ता के खिलाफ बोलना कितना कठिन होता है।
शाह साहब महान् तपस्वी, अलौकिक शक्तियों से संपन्न सिद्ध फकीर थे। वे कहने लगे, “ बस इतनी सी बात, डरो मत, यह लो मेरी लाठी, कितने ही लोग आवें, तुम इसे जमीन पर पछाड़ते रहना। तुम ज्यों -ज्यों पछाड़ोगे, यह लाठी बढ़ने लगेगी और दुष्ट तुरंत डरते हुए भाग जाएंगे। दुष्टों के भाग जाने पर इसे फिर से जमीन पर पटकते ही यह ऐसी ही छोटी हो जायगी। उसने मुझ में इतनी ताकत दी है, तो मेरे उस दिलदार में कितनी शक्ति होगी। उस पर मुझे भरोसा है, पर तुम्हें नहीं। तुम डरो मत, यहीं बैठकर यह बताओ कि अवध का शहजादा कितना हसीन है।”
पंडित जी बेचारे कर भी क्या सकते थे। उनमें थोड़ी हिम्मत आई। रामचरितमानस खोलकर वहीं बैठ गए और प्रभु श्रीराम की अपूर्व सुंदरता का वर्णन करने लगे। सारे जनकपुर की स्त्रियाँ उन पर किस तरह से मोहित हो गई। धनुषयज्ञा में देश-देश के राजा प्रभु के अतुलनीय सौंदर्य को देखकर किस तरह बेदाम बिक गए। वर्णन करते-करते पंडित जी स्वयं भी आनंदमग्न हो गाने लगे-
पृथ्वी का भार हरने यही श्री राम अब बने हैं पापों का घन उड़ाने घनश्याम भी बने हैं
विष्णु यही विश्वंभर यही नीलकंठ त्रिपुरारी यही परब्रह्म परमेश्वर, विनती सुने हमारी।
शाह साहब के आनंद का तो पूछना ही क्या। श्रीराम भक्ति के सामने उन्हें अपनी कठिन तपस्या, प्राप्त अलौकिक सिद्धियां सभी कुछ फीकी लगने लगीं। कथा की समाप्ति पर उन्होंने पंडित जी से कहा, “आपने मरे दिलदार की कथा सुनाकर मुझे बेदाम खरीद लिया है। यूँ तो मेरे पास कुछ नहीं है, फिर भी आपने जिसकी कथा सुनाई, उसी के बल पर मैं आपको कुछ दक्षिणा देना चाहता हूँ। आप कुछ भी माँग लें।”
उन परमसिद्ध फकीर से पंडित जी ने तीन चीजें माँगी- (1) मैं पुत्रविहीन हूँ, मुझे पुत्र चाहिए। (2) मृत्यु बीमार पड़े न हो। (3) प्रभु श्रीराम के चरणों में मेरी प्रीति सदा बनी रहे। “ऐसा ही होगा पंडित जी, आप तनिक भी फिक्र न करें। “ इतना कहते हुए वे श्रीराम गुण गाते चल पड़े। बाद में वह कहा करते थे, “प्रार्थना, जप-तप, पूजा की विधि न मालूम हो, तो कोई हर्ज नहीं। जरूरत है तो श्रीराम भक्ति की। इससे सब कुछ अपने ही आप हो जाएगा। इन्होंने उर्दू में रामायण भी लिखी। सचमुच श्रीराम तो सबके हैं, हिंदू या मुसलमान, जो भी उन्हें भजता है उसी को वे मिलते हैं।”
अमरदास सिख संप्रदाय के तृतीय गुरु थे, उन्होंने अपने अनुयायियों को सामूहिक लंकर में भोजन करने की प्रथा का सूत्रपात किया। उन दिनों हिंदुओं में ऊँच-नींच, बड़े-छोटे का भाव अत्यधिक विकृत रूप धारण कर चुका था। गुरु अमरदास की धारणा थी कि इस प्रथा से मनुष्य -मनुष्य के बीच ऊँच-नीच की खाई पटेगी, इसलिए ही उन्होंने अपने अनुयायियों को इस प्रथा से बाँध दिया था।
उनकी विद्वत्ता और गौरव से प्रभावित होकर एक दिन अकबर उनसे मिलने गया। अधिकारियों ने उन्हें सूचना दी- शहंशाह अकबर आपके दर्शन करना चाहते हैं। अमरदास जी ने संदेश भेजा कि यहाँ सब नागरिक समान हैं, एक ही ईश्वर के पुत्र भाई-भाई हैं। भाइयों-भाइयों में मतभेद नहीं होता। अकबर यहाँ आ सकते हैं, पर एक शहंशाह की तरह नहीं सामान्य नागरिक की तरह। यदि वे यहाँ आकर सब आश्रमवासियों के साथ भोजन करें। शहंशाह ने वैसा ही किया, तब कहीं गुरु के दर्शन पा सके और उनके सत्संग का लाभ लिया।
प्रकृति की यह विचित्र व्यवस्था है कि दो समान लगने वाली वस्तुओं में भी न जाने कितनी असमानताएं होती हैं। दो व्यक्ति शक्ल-सूरत से एक जैसे लग सकते हैं, पर उनकी अभिरुचि, इच्छा, पसंद, व्यवहार, चाल-ढाल में जमीन-आसमान जितना अंतर होता है। मतलब यह कि दो वस्तुओं या व्यक्तियों की बाह्य समरूपता भीतरी सदृश्यता को भी प्रकट करे-यह जरूरी नहीं, पर चूँकि इस विश्व-वसुधा के हर क्षेत्र में अपवाद मौजूद हैं, अतः इसके दर्शन यहाँ भी हो जाते हैं। सर्वसाधारण में तो नहीं पर जो जुड़वें बच्चे होते हैं, उनके व्यवहार, विचार, तर्क पसंद जैसे व्यक्तित्व के भीतरी उपादानों में ही नहीं, वरन् जीवन के महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में भी आश्चर्यजनक समानता होती है। इसे साधारण नहीं, असाधारण और अद्भुत कहना चाहिए।
जुड़वा बच्चों पर इस प्रकार का अध्ययन सर्वप्रथम सन् 1970 में एक अंग्रेज सामाजिक कार्यकर्त्ता जॉन स्ट्रारइड पर किया गया। अध्येता थे-मिनिसोटा विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक टिम बुचर्ड। लंबे काल के अनुसंधान के उपराँत उन्होंने पाया कि जुड़वा लोगों के जीवन में जितनी समानताएं पाई जाती हैं, वे उतनी सरल और सामान्य नहीं होतीं, जितनी समझी जाती हैं। जटिल समानताओं के अंतर्गत उन घटनाक्रमों की व्याख्या करने में उनकी बुद्धि चकराने लगी कि आखिर क्यों किसी एक भाई की टाँग टूटने पर दूर स्थित दूसरे जुड़वें भाई को भी उसी दुखद स्थिति से गुजरना पड़ता है और एक के बीमार पड़ने पर दूसरा भी क्यों अस्वस्थ हो जाता है।
इस अद्भुतता का ज्ञान उन्हें सबसे पहले तब हुआ, जब ‘अमेरिकन ऐसोसिएशन फॉर दि एडवाँसमेंट ऑफ साइंस’ नाम संस्था से प्रकाशित ‘साइंस’ पत्रिका में बारबार हर्बर्ट नामक उनतालीस वर्षीय महिला के संबंध में एक रोचक घटना पढ़ी। बारबरा डोवर, इंग्लैंड की रहने वाली थी। उसकी माँ फिनलैंड निवासी थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उसकी दोनों जुड़वा बेटियों को दो पृथक-पृथक लोगों ने गोद ले लिया था। इसके बाद किसी अज्ञात कारण से उसने आत्महत्या कर ली। बारबरा को अपनी जुड़वाँ बहने के बारे में तब जानकारी मिली, जब वह अपना जन्म प्रमाण पत्र ले रही थी। उसका पता लगाने के लिए पहले माँ का पता लगाना जरूरी था। अतः पहले वह फिनलैंड गई। वहाँ ज्ञात हुआ कि उसकी माँ की मृत्यु हो चुकी है। इसके बाद वह उसाधाय का पता लगाने की कोशिश करने लगी, जिसकी सहायता प्रसव के दौरान ली गई थी। उसी ये यह विदित हुआ कि डफिन गुडशिप नामक उसकी जुड़वा बहन बेकफील्ड, योर्कशायर, इंग्लैंड में रह रही है। बारबरा जब डफिन से मिलने हेतु किंग्सक्रास स्टेशन पहुँची, तब वह मटमैले रंग की पोशाक तथा मखमल की जैकेट पहनी हुई थी । जब वह डफिन से मिली, तो उसके आश्चर्य को ठिकाना न रहा। यह मात्र संयोग नहीं था कि उसने भी हू-ब-हू वैसी ड्रेस पहन रखी थी। इसके अतिरिक्त बातचीत के दौरान कितनी ही और समानताओं का पता चला। दोनों बहनें तथा उनके पति सरकारी कर्मचारी थे। अपने-अपने पतियों से उनकी भेंट एक नृत्य कार्यक्रम के दौरान लगभग 16 वर्ष की आयु में हुई थी, तब मार्च का महीना था। दोनों के तीन संतानें हुई, जिनमें शुरू के दो लड़के और अंत में लड़की हुई । दोनों की प्रथम संतान को गर्भपात हो गया। पंद्रह वर्ष की अवस्था में दोनों के साथ एक ही प्रकार की दुर्घटना घटी। दोनों के सीढ़ियों से गिर पड़ने के कारण घुटने कमजोर हो गए। दोनों ने ही कुछ समय तक गर्लगाइड का काम किया। बालरुम नृत्य में दोनों पारंगत थीं। कुछ समय तक उनका सिलचिस्टर इंग्लैंड में रहना हुआ। दोनों महिलाएं एक विशेष पत्रिका को ही पढ़ती थीं। उनका प्रिय लेखक भी समान था।
आचार लक्षणो धर्म संतष्चारित्र लक्षणाः। साधूनाँ च यथावृत्तमेतदाचार लक्षणम्॥
धर्म का स्वरूप आचार है। सदाचार रो युक्त पुरुष ही संत हैं । संतों का जो जीवनक्रम हैं, वही आचार है।
ऐसे ही दो अन्य जुड़वें भाई आहियों, अमेरिका में रहते थे। इनमें से एक जिम आहियों लीमा में रहता था। जब वह नौ वर्ष का था, तब उसे ज्ञात हुआ कि उसका एक जुड़वा भाई भी है, जिसे जन्म से किसी ने गोद ले लिया। वह न्यायालय की शरण में गया और अपने भाई की तलाश में सहायता की याचना की । बाद में विदित हुआ कि उसका भाई डेटन, ओहियो में रहता है तथा उसका नाम जिम स्प्रिंगर है। जब दोनों एक दूसरे से मिले और उनमें तथ्यों का आदान-प्रदान हुआ, तो वे अपने बीच अद्भुत समानता से भौंचक्के रह गये। दोनों की पत्नियों का नाम लिंडा था। दोनों ने ही अपनी-अपनी पत्नियों को तलाक दे दिया, तत्पश्चात जिन लड़कियों से शादी की उनमें से दोनों को ही नाम बैट्टी था। उनके एक-एक पुत्र हुआ, उनका नाम संयोगवश दोनों ने ही जम्स एलन रखा। उनको कुत्ते पालने का शौक था। दोनों के कुत्तों का नाम टाँप था। दोनों मैकडोनाल्ड हैमबर्गर शृंखला के लिए काम करते थे। इससे पूर्व वे पेट्रोलपंप में सहायक के रूप में कार्य करते थे। वे एक ही सागरतट-फ्लोरिडा बिच पर अपनी छुट्टियाँ बिताने जाते और प्रायः तीन सौ गज की दूरी पर अपना अवकाश मनाते। उनकी प्रिय गाड़ियाँ शेवरलेट थीं। दोनों के उद्यानों में एक ही प्रकार के वृक्ष लगे थे। इसके अतिरिक्त दोनों बगीचों में एक-एक बेंच बनी थी। बेंचों का रंग दोनों जगह श्वेत था। उनका अपना अपना निजी व्यवसाय था। दोनों फर्नीचर बनाने का धंधा करते थे। दोनों फर्नीचर बनाने का धंधा करते थे। दोनों के कारखाने भूमिगत थे। दोनों ने ही नसबंदी करा रखी थी। उनका बीयर-ब्राँड भी एक ही था तथा सिगरेट भी समान ब्राँड की पीते थे। कार-रेस दोनों को अत्यंत प्रिय थी, पर बेसबॉल को दोनों ही नापसंद करते थे। फुटबाल के प्रति दोनों को ही रुचि थी और यदा-कदा समय मिलने पर उस खेल में हिस्सा लेकर मन बहलाते थे।
जुड़वें भाइयों में ऑस्कर स्टोहर तथा जैक यूफ अध्ययन के दौरान काफी चर्चित जोड़े रहे। उल्लेखनीय है कि दोनों का पालन पोषण बचपन से ही दो भिन्न संस्कृति और विचारधारा वाले देशों में हुआ। इसके बावजूद दोनों की अभिरुचियों और इच्छाओं में जो समानता थी, वह चौंकाने वाली थी। जैक की शिक्षा-दीक्षा अमेरिका के एक कट्टर यहूदी परिवार में हुई, जबकि ऑस्कर बचपन में ही जर्मनी चला गया। सन् 1971 में विछोह के बाद जब वे प्रथम बार न्यूयार्क हवाई अड्डे पर मिले, उनकी कमीजों में वर्गाकार फ्रेम वाले चश्मे पहन रखे थे। दोनों अपनी-अपनी कलाइयों पर रबर बैंड लगाए हुए थे। उनकी बातचीत की शैली एक ही जैसी थी। अंतर था तो बस इतना कि उनमें से एक अंग्रेजी बोलता था, जबकि दूसरा जर्मन । बोलने में दोनों की ही पलकें तेजी से झपकती थीं। दोनों का ही कार-दुर्घटना में बायाँ पाँव टूट गया था, जिसके कारण बाद में भी वे लंगड़ाकर चलते थे। रोचक बात यह थी कि उनमें से कोई एक बीमार पड़ता, तो दूसरा भी साथ-साथ अस्वस्थ हो जाता था, दस वर्ष की आयु में दोनों को निमोनिया हो गया था, जबकि वे दो भिन्न देशों में निवास कर रहे थे। इसके अतिरिक्त उनमें छोटी-बड़ी और भी कितनी ही समानताएं थीं, जिनमें से सभी की सरलतापूर्वक व्याख्या कर पाना संभव नहीं था।
हैरी कौनले एवं मार्ग्रेट रिचर्डसन बचपन में ही एक दूसरे से पृथक हो गए थे। 40 वर्ष की अवस्था में वे जब मिले, तो विदित हुआ कि आश्चर्यजनक ढंग से उन दोनों का विवाह एक ही वर्ष, एक ही दिन एवं एक ही समय में संपन्न हुआ था, जबकि वे एक दूसरे से प्रायः आठ सौ किलोमीटर दूर रह रहे थे। इसे मात्र संयोग कहकर टाला भी जा सकता है, किंतु उनके जीवन में और भी कितने ही ऐसे घटनाक्रम घटित हुए थे, जिनके साथ संयोग की संगति बिलकुल ही नहीं बैठती थी। एक बार जब वे अपनी अपनी कार चला रहे थे, तो दोनों का ही अलग बायाँ पहिया निकल गया और भयंकर दुर्घटना होते होते बची। फिर भी वे अपनी अपनी बायीं आँख गंवा बैठे। दोनों फ्लोरिडा तट पर तैरते हुए एक ही दिन एक घेटे के अंतर से डूबते-डूबते बचे। दोनों की रक्षा मछुआरों ने की। दोनों के दायें हाथ की अनामिका अँगुली चोटग्रस्त हो जाने के कारण पूरी तरह सीधी नहीं हो पाती थी।
जुड़वें भाइयों के इतिहास में इंग्लैंड के इरिक बुकाँक एवं टाँमी मैरियट अपने विलक्षण साम्य के लिए खूब प्रसिद्ध हुए । दोनों ने बकरे जैसी दाढ़ी रख रखी थीं। दोनों बिना एक दूसरे से परामर्श किए अपने बालों का रंग परिवर्तित करा लेते थे। शार्क मछलियों का शिकार करना दोनों को प्रिय था। दोनों को दांया पैर इसमें घायल हो गया था। बिलियर्ड का खेल दोनों को अत्यधिक पसंद था। दोनों की साहित्य के प्रति विशेष रुचि थी । स्कीइंग के दौरान दोनों ने ही अपनी अपनी दायीं टाँग तुड़वा ली थी। विचित्र बात यह थी कि दोनों को भूख और नींद साथ साथ सताती थी, पर ऐसा नहीं देखा गया कि एक के खा या सो लेने से दूसरे को तृप्ति या ताजगी मिलती हो। दोनों बैंककर्मी थे। दोनों ही टेलीविजन में आशंकालिक न्यूज रीडर का कार्य करते थे। उनमें से एक लंदन के केन्द्रीय प्रसारण सेवा में था तथा दूसरा बर्मिघंन के क्षेत्रीय प्रसारण सेवा में। दोनों की यह तीसरी शादी थी। पहली दो पत्नियों से उनका तलाक हो चुका था। दोनों से उनके एक एक संतान थी।
जुड़वें बच्चे और उनके जीवन से संबंधित घटनाक्रम अब वैज्ञानिक के लिए आश्चर्य का विषय बने हुए हैं। वे यह तो स्वीकारते हैं कि दो जुड़वें भाई बहनों में आहार, विचार, व्यवहार और बीमारी संबंधी सभ्यता हो सकती है। कारण कि वे ‘मोनोजाइगोटिक’ होते हैं अर्थात् उनका निमार्ण एक ही डिंब के दो में विभाजित हो जाने के कारण होता है। अध्ययन के दौरान इंग्लैंड के दो जुड़वें भाइयों जैनेट हैमिल्टन और ईरानी रीड में देखा गया कि वे दोनों क्लस्ट्राँफोबिया रोग से ग्रस्त थे और उन्हें पानी से अरुचि थी । वे समुद्र तट पर सागर की ओर पीठ करके बैठते थे तथा सरदी के मौसम में दोनों के पाँव में एक ही स्थान पर दर्द होता था। विज्ञानवेत्ताओं के अनुसार यह बिलकुल सामान्य बात है , किंतु उनके जीवन के घटनाक्रमों में सदृश्यता आश्चर्यजनक है।
डा. डानहा जोहर अपनी पुस्तक ‘थ्रू दि टाइम बैरियर’ में लिखती है कि दो जुड़वाँ संतानें, जो जन्म के समय ही अलग कर दी गईं और जिनमें से एक को न्यूयार्क और दूसरे को लंदन भेजा दिया गया हो, यदि उनका तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो उनके जीवन की घटनाओं में अद्भुत साम्यता मिलेगी । वे कहती हैं कि यह तो अनुसंधान से ही जाना जा सकता है कि उनमें से एक को यदि लंदन में सीढ़ियों पर धक्का दे दिया जाए, तो क्या न्यूयार्क में रहने वाला बालक भी जीने पर से गिर पड़ेगा? विज्ञानवेत्ता इसका उत्तर -हाँ में देते हुए कहते हैं कि ऐसा इसलिए संभव है, क्योंकि जुड़वें बच्चों के इलेक्ट्रोन्स के मध्य एक अदृश्य स्तर का संबंध होता है।
सन् 1974 में स्टुअर्ट फ्रीडम एवं जॉन क्लौसर द्वारा तथा सन 1970 में पेरिस विश्वविद्यालय के मूर्द्धन्य विज्ञानवेत्ता एलिन आस्पैक्ट द्वारा किए गये प्रयोगों से यह स्पष्ट हो गया है कि एक ही पदार्थ के दो कण दूर संवेदी होते हैं अर्थात् दोनों के बीच की भौतिक दूरी चाहे जितनी भी हो, उनमें से किसी एक पर आरोपित गति, दिशा एवं अन्य प्रकार के परिवर्तन दूसरे दूरस्थ कण पर भी स्वतः आरोपित हो जाते हैं। यह विज्ञानी बेल का ‘असमानता का सिद्धांत कहलाता है।
इस प्रकार अब यह असमंजस करने की तनिक भी गुंजाइश नहीं है कि दो जुड़वें बच्चों के मध्य घटनाक्रमों में इतनी अद्भुत एकरूपता क्यों होती है ? जिस प्रकार समानधर्मी विचारधारा एक दूसरे को प्रभावित आकर्षित करती और एक ही प्रकार के कर्म करने के लिए प्रेरित करती हैं, वहीं बात जुड़वीं संतानों के साथ भी है। उनमें प्रवाहित होने वाली प्राणचेतना एक ही प्रकार की होती है। अस्तु, उनके जीवन में घटने वाली घटनाएँ भी एक समान होती है। ऐसा चेतना विज्ञान के आचार्यों का मत है।
जो कुछ सत्य है उसका अन्वेषण और जो उचित है उसकी कार्य में परिणति, दर्शन के ये दो महान ध्येय हैं।-वाल्टेयर
संत रैदास मोची का काम करते थे। काम को वे भगवान की पूजा मानकर पूरी लगन एवं ईमानदारी से पूरा करते थे। एक साधु को सोमवती अमावस्या के दिन साथ-साथ गंगास्नान करते के लिए उन्होंने आश्वासन दिया था। अमावस्या के स्नान का दिन निकट था। साधु रैदास के पास पहुँचे । गंगास्नान की बात याद दिलाई । रैदास लोगों के जूते सीने का काम हाथ में ले चुके थे। समय पर देना था। अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए रैदास ने कहा, “महात्मन् । आप मुझे क्षमा करें। मेरे भाग्य में गंगा का स्नान नहीं है। यह एक पैसा लेते जाएँ और गंगा माँ को चढ़ा देना।
साधु गंगास्नान के लिए समय पर पहुँचे । स्नान करने के बाद उन्हें रैदास की बात स्मरण हो आई। मन-ही-मन गंगा से बोले, ‘माँ यह पैसा रैदास ने भेजा है, स्वीकार करें। इतना कहना था कि गंगा की अथाह जलराशि से दो विशाल हाथ बाहर उभरे और पैसे को हथेली में ले लिया। साधु यह दृश्य देखकर विस्मित रह गए और सोचने लगे , “मैंने इतना जप-तप किया, गंगा में आकर स्नान किया, तो भी गंगा माँ की कृपा नहीं प्राप्त हो सकी, जबकि गंगा का बिना स्नान किए ही रैदास को अनुकंपा प्राप्त हो गई।
वे रैदास के पास पहुँचे और पूरी बात बताई। रैदास बोले, “महात्मन् यह सब कर्त्तव्य-धर्म के निर्वाह का प्रतिफल है। इसमें मुझ अकिंचन के तप, पुरुषार्थ की कोई भूमिका नहीं।”
देख रहा हूँ आपकी राह, जीवन के एकाँत में । खोज रहा हूँ आपकी छवि जीवन की अंतहीन अंतर्वेदना में। सोच रहा हूँ कि सूर्य के सामने अंधेरा कैसा । आप जिसके रक्षक हैं, विपत्तियाँ ही उसकी सहचरी बनी रहें, यह न संगत है और न संभव ही। क्या मुझ में कर्मठता, परिश्रम, धैर्य और साहस की कमी है अथवा मेरा विश्वास कमजोर है। तेजी से घूमने वाला उलझा हुआ घटनाक्रम-विपरीत और संघर्षशील घोर दैन्य, मायावी, छली और वंचनाशील परिस्थितियों को सतत् सामना करने की स्थिति में मेरी निष्ठा को डिगाने से बचाना । अपनी कृपा से निराश नहीं होने देना। असंतुलित मन से क्रंदन किए जाना ही बुद्धिमानी तो नहीं हैं । परन्तु निरुपाय और सर्वथा असुरक्षित मनोदशा में करूं तो क्या करूं ? लोग उपहास की दृष्टि से देखें, अर्थ लगा-लगाकर हँसें, इसमें मेरा क्या वश।
साधु संतों की झोंपड़ी देखी, महंतों-मठाधीशों के खेमे-डेरे देखे। विद्वानों की गलियाँ झाँकी, ग्रंथालयों के चक्कर काटे। उजड़े हुए खंडहरों तथा बीहड़ वन पर्वतों को कोना कोना छाना । सदियों की पीड़ा का प्रकरण पलों में कह देने वाली सजल सूनी निगाहों से सबको निहारा। परंतु हे दयालु गुरुदेव सब जग मुझे उपेक्षा-तिरस्कार और निराशा के सिवा और कुछ भी नहीं मिला। सब जगह से हार-थककर जब मैं आपकी शरण में आया, तब आपने ही मुझे अपनी ममता के जल से सींचा, अपने आशीष की छाँव में रखा।
दीन प्रतिपालक दयाधाम। ये स्वप्न-स्मृतियाँ, आशा-प्रतीक्षा, कामना-कल्पना, अँधेरे और अज्ञान की पीड़ाएं मुझे अनाथ की भाँति सता रही हैं । प्रभो मेरी आर्त प्रार्थना की आपने कभी अनसुनी नहीं की। मेरे तन कि से दुःख से आपको बिलख उठते अपनी इन्हीं आँखों से मैंने न जाने कितनी बार देखा है। आज जो ये असहनीय पीड़ाएं मुझे घेरे हैं, क्या ये मेरी मिथ्या धारणा हैं अथवा असत्याभास है।
हे परम सद्गुरु मेरे दुर्गुणों-दोषों-दुष्प्रवृत्तियों को, एक-एक को गिनकर रखना और सभी का बदला इसी जन्म में चुकाकर आगे का रास्ता साफ कर देना। मुझे पवित्र होने का वरदान भी तो आप ही ने दिया है। अपने उसी वरदान को साकार करना। आपके सिवा पहले भी कोई नजर रहीं आया और आज भी कोई नजर नहीं आता। जो मिलते हैं वे चले जाते हैं। समस्या का समाधान तो आपके ही वरद हाथों में है। प्रभो जीवन से मोह नहीं है और मृत्यु का भय नहीं है। कष्ट जो कुछ है, शरीर को है। अपमान-तिरस्कार, उपेक्षा-अवमानना तो एक तरह से शुभ ही हैं, क्योंकि इनसे अहंकार नष्ट होता है। हाँ, बस मेरी अंतर्वेदना पर ध्यान देना । मुझे अपने चरणों से वंचित मत होने देना।
आपसे सभी ने कुछ न कुछ माँगा ही है। आपसे कुछ न चाहना भी सब कुछ चाहता है और यह भी सच है कि आपका कुछ न देना भी सब कुछ देना है। हे परम दयालु अंतर्यामी। मेरी दर-दर भटकती-ठोकर खाती, मिटती और बरबाद होती हुई, आकुल-अशाँत और अंधेरों से घिरी जिंदगी के लिए, मेरे लिए कुछ करें-यह मेरी वाणी से निकल नहीं पाता। आपकी याद आते ही शब्द मूक हो जाते हैं, मन निस्पंद हो जाता है और हृदय चक्षु घटों से अपनी पीड़ा का अश्रु-अर्घ्य आपको अर्पित करता रहता है।
मेरी इस अकथ-अवर्णनीय अंतर्वेदना की व्यथा कथा का कोई अंत नहीं। इसकी गरिमा ही कहाँ ? मैं भला क्या जानूँ ? अंतर्वेदना में भी तो आप ही व्याप्त हो, फिर जानना क्या ? हाँ यह मानता हूँ कि मेरी यह व्यथा मुझ अकेले की नहीं, सभी शिष्य-संतानों की व्यथा गाथा है। सिर्फ शब्द मेरे हैं, भाव तो उन सभी के हैं। युग को भले ही धारे-धीरे बदलने दो, पर हम सबके जीवन को शीघ्र परिवर्तित कर दो प्रभु। हममें से हर एक यह अनुभव कर सके कि उसने ज्योर्तिमय स्पर्श पाया है।
ध्वंस सरल है। उसे छोटी चिनगारी एवं सड़ी कील भी कर सकती है। गौरव सृजनात्मक कार्यों में हैं। मनुष्य का चिंतन और प्रयास सृजनात्मक प्रयोजनों में ही निरत रहना चाहिए। जीवन की गरिमा इस कसौटी पर आँकी जाती हैं कि उसमें किस स्तर का कितना सृजनात्मक कार्य सफल हुआ। क्रिया-कौशल की जो भी प्रतिभा-प्रखरता है, उसकी प्रशंसा इस बात में है कि उसके द्वारा सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन में सहायता मिल या नहीं।-परमपूज्य गुरुदेव
जिन लोगों की चेतना परिमार्जित और उन्नत है, उन्हें ध्यान के लिए विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता । सामान्य प्रयासों से ही वे चित्त को एकाग्र कर, अपने भीतर डुबकी लगा जाते एवं आत्मचेतना में रमण करने लगते हैं। चेतना की इस स्थिति को प्राप्त साधकों का उदाहरण देकर यह नहीं सोचना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति आसन लगाकर बैठते ही ध्यान में प्रवेश कर जाएगा। जो इस स्थिति में पहुँच चुके हैं, उन्हें भी लंबा श्रम करना पड़ा है। वर्षों तक साधना करने के बाद ही वह परिपक्व स्थिति आती है कि ध्यान सधने लगे। शास्त्र तो यहाँ तक कहते हैं कि कई जन्मों तक साधना करनी पड़ती है, तब ध्यान और समाधि की स्थिति सिद्ध होती है। गीताकार ने इसी तथ्य को निरूपित करते हुए कहा है-अनेक जन्मों के संस्कार बल से इस जन्म में संसिद्धि होती है।
निराश होने की आवश्यकता नहीं है कि कई जन्मों बाद ध्यान सिद्धि होगा, इसलिए अभी प्रयत्न करने में कोई सार नहीं है। तुरंत सिद्ध न होते हुए भी ध्यान -साधना के अपने लाभ हैं। श्रीपाद दामोदर सातवलेकर ने गीता के इस वचन का आशय स्पष्ट करते हुए लिखा है, “सोलह-सत्रह वर्षों तक स्कूल-कॉलेज जाते रहने पर ही शिक्षा पूरी होती है। स्नातकोत्तर कक्षाएं पास कर लेने के बाद ही छात्र अपने को पूर्ण शिक्षित कह पाता है॥ शिक्षा आरंभ करते हुए बच्चा भी यह जानता है और उसके अभिभावक भी सोलह-सत्रह वर्षों की इस अवधि को छात्र कितने धीरज, शाँति और आनंद से व्यतीत कर लेते हैं। जिन्हें ध्यान अथवा योग से परमपद प्राप्त करना है, उन्हें भी धीरज रखना चाहिए। फिर इस मार्ग पर चलते हुए संसिद्धि तक खाली हाथ नहीं रहना पड़ता। साधना के मार्ग में तरह तरह की श्रेयस्कर उपलब्धियाँ मिलती रहती है। उनका आनंद लौकिक सुखों की तुलना में कई गुना महत्तर होता है।”
श्वेताश्वर उपनिषद् में ध्यान मार्ग में मिलने वाली उपलब्धियों, सफलताओं और आनंद-अनुभूतियों का उल्लेख किया गया है। ऋषि कहते हैं, “ध्यान से पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पाँच महाभूतों का उत्थान होता है। इनके उत्थान से पाँच प्रकार के योग संबंधी गुणों की सिद्धि होती है। सिद्धि से साधक को शरीर पर नियंत्रण प्राप्त होता है। और उसका क्षरण नहीं होता।” (अध्याय 2 मंत्र, 12)
“शरीर का हलकापन, किसी प्रकार के रोग का नहीं होना, विषयासक्ति की निवृत्ति, शारीरिक वर्ण की उज्ज्वलता स्वर की मधुरता, शरीर में सुगंध और मलमूत्र कम हो जाना। योग की पहली सिद्धि के लक्षण हैं।” (अध्याय 2 मंत्र, 13)।
योग के ग्रंथों में और भी कई सिद्धियों का वर्णन है। संकल्पसिद्धि, वाक् सिद्धि, आसन में उत्थान, शरीर का हलका होना, थोड़ी देर सो लेने से ही पर्याप्त विश्राम मिल जाना आदि ध्यान की सफलता के लक्षण कहे गये हैं, लेकिन इन्हें ध्यान की सर्वोच्च सिद्धि नहीं कहा जा सकता । स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य में साधना कर रहे एक साधक को वाक् सिद्धि प्राप्त हुई थी। वह जो कहता था, वैसा ही हो जाता था। रोगी को स्वस्थ होने का आशीर्वाद देता तो बीमार चंगा हो जाता । दरिद्र व्यक्ति संपन्न होने की बात कहते ही उस व्यक्ति में आत्मविश्वास जागता और वह दीन-हीन स्थिति से ऊपर उठने लगता। उसकी कही बातें सही होने की ख्याति फैलने लगी। कई लोग आने लगे। परमहंस देव से किसी शिष्य ने शिकायत की, तो वे चुप रहे। वाक् सिद्धि को प्राप्त साधक की स्थिति चालीस दिनों बाद समाप्त होने लगी। उसकी कही बातें पहले की तरह चरितार्थ नहीं होती। धीरे-धीरे असत्य होने लगीं। उसके आशीर्वाद खोखले होने लगे। परेशान होकर वह परमहंसदेव के पास गया। गुरु ने कहा, “तुमने साधना के कच्चे फल तोड़ने का अपराध किया है। अब वह वृक्ष सूख गया । फिर साधना करो और वैसी गलती मत करना।” लेकिन बहुत प्रयत्न करने के बाद भी साधक का मन फिर ध्यान-धारणा में नहीं लगा।
परमहंसदेव के दूसरे शिष्य नरेंद्र ने, जो बाद में स्वामी विवेकानंद के नाम से विख्यात हुए, अपने गुरु से उस साधक पर कृपा करने का अनुरोध किया। यह भी कहा कि आपने समय रहते उसे संकेत क्यों नहीं किया ? परमहंस देव का उत्तर था कि साधक को स्वयं ही सावधान रहना चाहिए। दूसरा कोई भी व्यक्ति, यहाँ तक परमात्मा भी उसे नहीं रोक सकता, क्योंकि इस प्रकार की रोक-टोग साधक की स्वतंत्रता का हरण करती है।
योगशास्त्रों में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति प्राकाम्य, ईशित्व आदि सिद्धियों के वर्णन आते हैं। यह भी कि इन सिद्धियों को प्राप्त करने के बाद साधक प्रकृति पर विजय प्राप्त कर लेता है। लेकिन इस प्रकार की सिद्धियाँ अथवा उनकी आकाँक्षा आत्मिक प्रगति में बाधक ही बनती हैं। महर्षि रमण ने इस प्रकार की सिद्धियों को मूल्यवान् कंकड़ पत्थर कहा है। सिद्धियों में उलझ रहे एक साधक को उन्होंने समझाया था कि थोड़ा और आग बढ़ो, तो तुम्हें हीरों की खदान मिलेगी, बल्कि हीरे तुम्हारे सामने ही बिखरे मिलेंगे। जब तक अपने हाथ से रंगीन कंकड़-पत्थर नहीं फेंकोगे, उन हीरों को अपनी मुट्ठियों में नहीं भर सकते। मूल्यवान उपलब्धि को प्राप्त करने के लिए कम मूल्य की वस्तुओं का मोह छोड़ना पड़ेगा।
एक सत्संग-प्रसंग में महर्षि रमण से ही किसी साधक ने पूछा था कि सिद्धियाँ बाधक हैं, तो परमसत्ता उन्हें प्रस्तुत क्यों करती है ? क्या वह चाहती है कि हम उन सिद्धियों में उलझ जायँ और अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँचें ? महर्षि रमण ने इसका उत्तर दिया था कि सिद्धियाँ, तुम्हें अध्यात्म-मार्ग में आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से आती हैं । मार्ग में सुगंधित फूल इसलिए खिलते हैं कि उनकी सुवास से प्रेरित होकर तुम मंदिर तक पहुँच जाओ। मार्ग यदि शुष्क और ऊबड़-खाबड़ रहा, उसके दोनों ओर रम्य स्थितियाँ नहीं हुई, तो तुम आगे बढ़ने से इनकार कर सकते हो।
अच्छा स्वास्थ्य, निर्मल मन, संतुलित मस्तिष्क और स्थिर मनोयोग ध्यान -साधना के प्रारंभिक परिणाम हैं संकल्प-सिद्धि, कार्यसिद्धि और अतींद्रिय क्षमताएं इन प्रारंभिक लक्षणों के बाद ही मिलती हैं। साधकों को सावधान किया जाता है, वे सफलता के इन लक्षणों पर ही मुग्ध होकर ठहर न जाएँ, साधना-सिद्धि को अंधविश्वास बताने वाले आलोचक इन लक्षणों को कोरी बकवास बताते हैं, लेकिन प्रारंभिक सफलताएं अथवा सिद्धियाँ एक निश्चित प्रक्रिया के अंतर्गत मिलती है।
प्रारंभिक या साधनामार्ग में मिलने वाली सफलता को यों समझा जा सकता है। अनुभव किया जाता है कि ध्यान-धारणा भली-भाँति चल रही है, शरीर में स्वास्थ्य का अनुभव होने लगता है। ऐसा नहीं कि यह किसी चमत्कार के कारण होता है। वस्तुतः ध्यान-धारणा चित्त को संतुलित करती है, उसमें चलने वाले उद्वेगों और विक्षोभों को भी नियंत्रित करती है। चित्त शाँत, संतुलित और उद्वेगरहित होने पर आहार-विहार भी संतुलित होने लगता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए संतुलित और सात्विक आहार से ज्यादा उपयोगी कुछ नहीं है।
ध्यान विधि का उपदेश करते हुए गीतकार ने सम्यक् आहार-विहार के लिए है। दूसरे शास्त्रकारों ने भी आहार-विहार को संयमित रखने का उपदेश दिया है। यह आत्मिक प्रगति के मार्ग पर चलने के लिए दोहरी तत्परता और सावधानी है। शाँत और एकाग्र चित्त से आहार-विहार में संयम की प्रेरणा मिलती है और ध्यान के आचार्य ही नहीं मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि चित्त शाँत हो तो उलटा सीधा खाने और अनियमित जीवनचर्या पर अपने आप अंकुश लगने लगता है। मन स्वस्थ हो तो भूख से ज्यादा खाया ही नहीं जा सकता । चिंता और उद्वेग में प्रायः ज्यादा खाने में आता है। अथवा भूख एकदम गायब हो जाती है। दोनों ही स्थितियाँ स्वास्थ्य-संतुलन गड़बड़ाने वाली है।
आहार के प्रभाव का अध्ययन करना हो तो कुछ स्वादों के माध्यम से किया जा सकता है। मिर्च मसालेदार भोजन करने वालों को क्रोध जल्दी आता है। वे विषम परिस्थितियों को देर तक नहीं झेल सकते, जल्दी घबरा जाते और हार मान लेते हैं। मीठा और रसयुक्त भोजन करने वालों में आलस्य प्रमाद की बहुलता देखी गई है। उनके भोजन में शामिल शर्करा तत्व शरीर को बोझिल बनाता है। खट्टा, अम्लीय और तीक्ष्ण स्वाद वाला आहार राजसी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देता है। ध्यान मार्ग के साधक को इसी लिए सात्विक आहार लेने का निर्देश दिया गया है। सात्विक आहार अर्थात् ताजा, सुपाच्य पौष्टिक और रुचिकर भोजन। ऐसे भोजन में स्वाद की नहीं संस्कार की प्रधानता रहती है।
ध्यान-साधना के प्रबल प्रचारक और बिहार योग विद्यालय के संस्थापक स्वामी सत्यानंद परमहंस ने लिखा है कि दस मिनट, सिर्फ दस मिनट भी यदि निश्चल, शाँत बिना हिले-डुले चुपचाप बैठा जा सके तो ध्यान आरंभ हो जाता है। ध्यान आरंभ होने के बाद साधक अनुपयुक्त आहार-विहार के प्रति अनायास ही उदासीन, विरक्त होने लगता है। उसकी रुचि असंयमित और कृत्रिम जीवन से हटने लगती है। अच्छा हो इस दिशा में स्वयं ही प्रवृत्त हुआ जाए अर्थात् अपने आहार-विहार को संयमित किया जाए। उसके बाद सफलता के अगले लक्षण प्रकट होने लगते हैं।
सफलता का अगला लक्षण अंतःदर्शन कहा गया है। इसमें दूसरों के मन की बात जाने और अनागत का आभास होने जैसी विशेषता आती है। संयमित और संतुलित जीवन स्वास्थ्य के तुरंत बाद निर्मल और पारदर्शी मनः स्थिति में पहुँचता है। मन कायिक चेतना का ही सूक्ष्म रूप है। उसकी उपमा दर्पण में जिस तरह स्वच्छ और स्पष्ट छवि दिखाई देती है, उसी प्रकार निर्मल मन में सामने आई परिस्थितियों का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई देने लगता है। प्रस्तुत व्यक्तियों अथवा स्थितियों का स्पष्ट आभास जिसे हो रहा हो, उसे कोई धोखा दे ही नहीं सकता। वह किसी छल-प्रपंच को क्रीड़ा-कौतुक में सहन कर ले तो बात अलग है, अन्यथा बेधक और पारदर्शी दृष्टि, अंतःदृष्टि रखने वाले व्यक्ति को बहलाना, फुसलाना या ठगना संभव ही नहीं है।
अनागत का आभास होने की स्थिति भी चेतना के निर्मल और पारदर्शी होते जाने का लक्षण है इसे भविष्य दर्शन भी कहते हैं। कालतत्व का मर्म समझने वाले ज्ञान-गुणीजन मानते हैं कि समय का विभाजन नहीं किया जा सकता। हम समय को भूत, भविष्य और वर्तमान में मापने या बाँटने के अभ्यस्त भले ही हो गए हों, वस्तुतः ऐसा है नहीं। बोध की क्षमता सीमित-संकुचित होने के कारण ही समय तीन भागों में दिखाई देता है, अन्यथा है नहीं । उदाहरण के लिए, सड़क पर खड़े होकर आधा किलोमीटर दूर आ रहे वाहन को नहीं देखा जा सकता । लेकिन पेड़ पर चढ़कर अथवा किसी ऊँचे स्थान से देखें तो वह आसानी से दिखाई देता है। ऊँचाई पर खड़ा व्यक्ति सहज ही कह सकता है कि कुछ देर बाद इस जगह से एक वाहन गुजरने वाला है। समतल जमीन या सड़क पर खड़े व्यक्ति के लिए या घोषणा भविष्यकथन होगी, लेकिन वस्तुतः वह भविष्यवाणी या भविष्यदर्शन नहीं हैं। कालतत्व के विवेचक बताते हैं कि जिनकी चेतना ऊँची अवस्था में पहुँच गई है, वे समय को दूर तक देख सकते हैं और सामान्य स्थितियों में जो अनागत है, उसकी घोषणा कर सकते हैं। कहना नहीं होगा कि ध्यान-धारणा में गति कर रहे साधकों की चेतना उच्चस्थिति में पहुँची होती है। वह सामान्य लोगों को नहीं दिखाई देने वाली स्थितियों को भी अनुभव करती और बता सकती है।
उच्चस्थितियों में पहुँची और परिष्कृत चेतना किन्हीं भी स्थितियों की ज्यादा गहराई और व्यापक रूप से देख समझ सकती है। ऐसे साधकों की स्मरणशक्ति विलक्षण हो सकती है वे किसी भी बात को तुरंत समझ सकते हैं, क्योंकि उनकी ग्रहणशीलता बढ़ जाती है। कहते हैं कि स्वामी विवेकानंद किसी भी पुस्तक को पन्ने पलटकर ही पढ़ लेते थे और उसे शब्दशः सुना सकते थे। महावीर के साधना-मार्ग में जैन आचार्य अवधान नामक एक क्रिया सिखाते हैं। उसमें चौबीस और बत्तीस अंकों तक की संख्या के गुणा भाग और भिन्न आदि सवाल पलक झपकते हल किए जा सकते हैं। यह मानसिक क्षमता के अधिक सजग और ग्रहणशील होने का ही द्योतक है। गंभीरता और नियमपूर्ण किया गया ध्यान इस स्तर की कुशलता की विकसित कर देता है। चाहे तो इसे सिद्धि कह सकते हैं और चाहें तो कुशलता ।
साधक को क्या इन सफलताओं में रम जाना चाहिए? इनसे संतुष्ट हो जाना चाहिए अथवा इन्हें छोड़कर आगे बढ़ जाना चाहिए ? साधकों के लिए ही नहीं, ध्यान-धारण और समाधि को प्राप्त कर चुके योगी के लिए सिद्धियों के उपयोग अथवा प्रदर्शन का निषेध है। उपनिषद् और योगशास्त्र के वचनों की व्याख्या करते हुए मनीषी कहते हैं, “ध्यान-साधना का प्रयोजन आत्मज्ञान की प्राप्ति और चेतना का उच्चतम विकास है, सिद्धि प्राप्त करना बिलकुल ही नहीं। चेतना के विकास की तुलना में सिद्धियों का स्थान बहुत ही तुच्छ है। विभूतियाँ अथवा सिद्धियाँ सही है। ध्यानमार्ग पर चल रहे साधक के पास वे अवश्य आती हैं। इन सिद्धियों को प्राप्त करने वाले अगणित साधक हुए हैं और होते रहे हैं। उनके संबंध में उदासीन ही रहना चाहिए। उदासीन रहते हुए साधक आध्यात्मिक शक्तियों का अक्षुण्ण भंडार एकत्र कर सकता है। वह स्वयं भी अपना कल्याण करता और दूसरे साधकों को भी आध्यात्मिक विकास के मार्ग पर अग्रसर करने में भरपूर सहयोग दे सकता है।”
पवित्र विचारों से ओत -प्रोत व्यक्ति की ईश्वर व प्रकृति के नियम भी सहायता करने लगते हैं।
नारी जगत् की एक पवित्र स्वर्गीय ज्योति है, त्याग उसका स्वभाव, प्रदान उसका धर्म, सहनशीलता उसका व्रत और प्रेम उसका जीवन है।-चतुरसेन शास्त्री
“आलीजाह। “ “कहो यह हमारे आराम फरमाने का वक्त है“ बादशाह के स्वर में तल्खी। “खता मुआफ हो हुजूर। जहाँपनाह से कल अर्ज़ कर दूँगा। “ “नहीं-नहीं कहो जी कहना चाहते हो” “यही तय करना था जहाँपनाह कि कल दरबार में कौन-कौन से फनकार पेश किए जाएँ ?” “कोई नहीं। कल हम सिर्फ गाना सुनेंगे।” “बहुत नेक ख्याल है बंदा परवर का। मौसम भी माकूल है। तब तो हुजूर अपने मरी मुँशी घनानंद को भी तलब कर लिया जाए।” “हाँ। हाँ । क्यों नहीं, सुनते हैं वे भी इस फन में माहिर हैं, लेकिन मैं ज्यादातर यह बात भूल जाता हूँ।” “ तो हुजूर । कल के लिए उन्हें इत्तला दे दूँ ?” “ठीक है दे दो।”
यह मुगल बादशाह मुहम्मदशाह रंगीले का जमाना था। दिल्ली नाच-गाने वालों से भर गई थी।दरबार में भी जी हजूरी करने वालों और खुशामदियों की ही भरमार थी।इन्हीं दिनों हिंदुस्तान पर दूसरे नए हमले के लिए मुहम्मदशाह अब्दाली अपनी फौजें सजा रहा था। लेकिन मुगल बादशाह इससे बेखबर था। उसे अपनी ऐय्यासी-खुमारी से फुरसत ही नहीं थी।दिल्ली के लोगों पर भी अब्दाली के संभावित हमले के कोई भी आसार नहीं जाहिर हो रहे थे।
घनानंद कवि थे, गायक भी, लेकिन पेशेवर नहीं, उनका गायन प्रभु के लिए था । वह उन दिनों बादशाह के मीर मुँशी थे। काम के एकदम पाबंद । लेकिन उसके बाद मीर मुँशी थे। काम के एकदम पाबंद । लेकिन उसके बाद वे अपना पूरा समय भगवान के ध्यान लगाते। कृष्ण ही उनका वर्चस्व था। प्रेम की यही पीड़ा उनकी कविता कविता में छलकती थी। घनानंद की यह कृष्णप्रेम-चर्चा पूरे दरबार में रहती थी । मुगल दरबारी उनसे जलते थे। तभी तो उन्होंने आज ऐसी चाल चली थी कि बादशाह घनानंद पर कुपित हों और वे दंडित और निर्वासित हो, क्योंकि सभी जानते थे कि घनानंद दरबार में गाएंगे नहीं। हाँ, उन्हें उपस्थित तो होना ही था।
दूसरे दिन दरबार लगा हुआ था। बादशाह तख्ते शाही पर आसीन थे। खुशबू के गुबार उठ रहे थे। रेशमी कपड़ों पर जरी के बेल-बूटों की चमक चकाचौंध पैदा कर रही थी। तभी बादशाह ने घनानंद से गाने के लिए कहा-
घनानंद शील-विवश मुस्कराकर बोले, “मुझे कुछ आता नहीं हुजूर ।”
दरबारीगण बनावटी अदब से बोले, “हुजूर अपने मरीमुँशी जहाँपनाह के लिए नहीं, कृष्ण के लिए गाते हैं।’8
“कोई बात नहीं, कृष्णप्रेम का ही कोई गीत सुनाओ मीरमुशी।” घनानंद एक क्षण के लिए मौन रहे ।उनकी मुखमुद्रा गंभीर हुई और स्वरलहरी बह निकली । लेकिन उनकी आँखें शून्य में कृष्ण की अदृश्य छवि पर टिकी थीं। संगीत ने समा बाँध दिया। लंबी साधना का परिणाम जादू बनकर छा गया।
बादशाह खुश हुआ। “मीर मुशी इस फन के भी माहिर हैं।” उसने कहा। लेकिन मुगल दरबारियों ने बादशाह को उकसाया, “हुजूर। कितना ही अच्छा गाते हों मुँशी जी, हुई तो जहाँपनाह की तौहीन ही। हुजूर के लिए गाने से इनकार कर उस किशन के लिए गाना।”
चापलूसी पसंद बादशाह भड़क उठा। बोला-”ओह यह तो बगावत हैं । मीर मुँशी। तुम हमारी निगाहों से दूर हो जाओ। हुकूमत में तुम्हारे लिए जगह नहीं। तुमने हमारी तौहीनी-हुक्म उदूरी की है।”
घनानंद का मुख मलिन नहीं हुआ। दिल्ली छूटी, नौकरी छूटी, उन्हें कृष्ण याद आए। कृष्ण का वंशीवट, उनका मोर-मुकुट खींचने लगा यमुना तट के निभृत निकुँजों की तरफ और घनानंद ब्रज में आ रमे। वृंदावन की गलियों में यमुना तट के पुलिन में घूमने लगे। मन वंशी वाले के लिए तड़पने लगा।
जे घनानंद की ऐसी रुची तो कहा बस है अहो प्राननि पीरों।
अंततः अब्दाली के आक्रमण से मथुरा भी लुटी। किसी ने आक्रमणकारियों को उनके बारे में भड़काते हुए कहा-”यह बादशाह का मीर मुँशी रहा है, काफी बड़ा खजाना है इसके पास।”
अब्दाली के सैनिकों ने उन्हें यमुना की रेती पर आ घेरा। वे कहने लगे, “जर (धन) दो ऐ मुँशी। हमें जर दो, वरना कत्ल कर देंगे।” सुनकर घनानंद जोर से हँसे, फिर एक मुट्ठी रेत वहीं से उठाकर सिपाहियों से बोले-”लो रज-रज-रज।” अब्दाली के क्रूर सिपाहियों ने उन पर तलवार से कई बार किए । वे घायल हो गए। सिपाही तो चले गए, पर घनानंद पीड़ा के इन चरम क्षणों में भी गुनगुनाने लगे-अधर लगे हैं आनि करिकै पयान प्रान। और उस पावन रेत में उनकी अंतिम साँस टूट-टूटकर बिखर गई। उनके प्राण अपने प्राण-प्यारे कृष्ण से जा मिले । उनके प्रेम की सच्चाई सार्थक हो गई।
प्रत्येक कृति में प्रकृति ने अपनी अलौकिकता संजोई है। यह अलौकिकता कभी तो रहस्य की गहराइयों में ले जाती है, तो कभी अपनी अनूठी विचित्रता से अचरज में डाल देती है। मान की साहित्य संवेदना ने ‘जल बिन मीन’ को असंभव कल्पना माना है, परंतु प्रकृति ने इस असंभव को भी सहज संभव कर दिखाया है। हाँ, यह सच है कि सामान्य रूप में मछलियाँ जल में ही रहती हैं। यदि यह कहा जाए कि ऐसी भी मछलियाँ हैं जो पेड़ पर चढ़ने में समर्थ हैं, तो शायद कोई विश्वास नहीं करेगा। लेकिन यह अविश्वसनीय लगने वाला तथ्य भी सत्य है। पेड़ों पर चढ़ने वाली मछलियाँ भी हैं और वे विश्व के कई भू-भागों में पाई जाती हैं। इसमें दक्षिणी भारत भी शामिल हैं। वहाँ के स्वच्छ जलाशयों में पेड़ पर चढ़ने वाली ये मछलियाँ मिलती हैं। वैज्ञानिक भाषा में इनका नाम ‘एनाबास’ है।
जलाशयों के किनारे स्थिति छोटे-छोटे झाड़ीनुमा पेड़ों पर अक्सर ये चढ़ती हुई दिखाई दे जाती हैं। पानी के अलावा वे मछलियाँ गीली भूमि व धान वगैरह के खेतों में भी चलती-फिरती नजर आ जाती हैं। इस तरह इनकी विशेषता को कुछ यूँ भी कहा जा सकता है। वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन-अनुसंधान में यह भी पता लगाया है कि यह जल-जीव खुले वातावरण की वायु में भी साँस लेकर जीवित रह सकता है। इसे प्रकृति का अनूठा वरदान ही कहा जाएगा।
इस ‘एनाबास’ मछली का आकार अन्य मछलियों की तुलना में थोड़ा अलग होता है। इसका रंग गहरा हरा या कुछ मटमैला-सा होता है। इसके शरीर की बनावट ही नहीं बुनावट भी औरों से अलग होती है। समूचा शरीर शल्कों से ढका होता है। इस मछली का भोजन पानी में रहने वाले छोटे जीव-जंतु होते हैं। कई बार यह अपने से छोटी मछलियों को भी अपना ग्रास बना लेती है। इस मछली की बनावट की एक अन्य खासियत यह है कि इसके लंबे पृष्ठ पंख व गुदा पंख काँटे पाए जाते हैं। ये कुछ समय पानी में रहकर ये मछलियाँ किनारे स्थित झाड़ीनुमा पेड़ों पर चढ़ जाती हैं, मानो सैर सपाटा करते हुए आराम फरमा रही हों।
‘मछली’ शब्द ज्यादातर लोगों के मन में वही चिर-परिचित आकृति बनाता है, जो पानी में तली और सतह के बीच तैर रही है। लेकिन वास्तव में मछलियों का संसार इतना विविध, विशाल और दिलचस्प है। कि हमें यदि इन्हें अलग-अलग देखने का अवसर मिले तो हमारे आश्चर्य की सीमा नहीं रहेगी।
जिस तरह जंगलों में रहने वाली ‘साही’ को प्रकृति ने अपनी रक्षा के लिए नुकीले काँटों का आवरण प्रदान किया है, उसी तरह समुद्र में पाई जाने वाली मछली है-’पोर्क्यू पाइन’। इसके पूरे शरीर पर काँटों की परत चढ़ी होती है। साही के नाम पर ही इसका नाम साही मछली पड़ा है। जब इसका दुश्मन इस पर हमला करने की कोशिश करता है या इसके क्षेत्र में घुसपैठ करता है, तब यह किसी छिद्र या चट्टानी दरारों में पहुँचकर अपने शरीर को पानी भरकर फुला देती है। जिसके इसकी शक्ल फुलाए हुए गुब्बारे की तरह हो जाती है और इसके काँटे खड़े हो जाते हैं। यदि इसे पानी से बाहर निकाल दिया जाएं, तो यह हवा भरकर ही अपने शरीर को फुला लेती है। ऐसी स्थिति में इसका दुश्मन इसके सामने कमजोर पड़ जाता है।
इसकी 14 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। ज्यादातर का रंग नीला-भूरा, स्लेटी और सफेद होता है। इन मछलियों में काले धब्बे होते हैं। इनकी लंबाई 30 सेंटीमीटर तक बढ़ती है।सभी प्रकार की साही मछलियों में सामने के दो दाँत बढ़े होते हैं। यह सी-आर्चिन का नाश्ता और सैकड़ों का भोजन करती है।
बंसी और काँटे से मछली पकड़ने के बारे में हम सभी जानते हैं, लेकिन एक मछली ऐसी भी है, जो खुद बंसी और काँटे से शिकार करती है। प्रकृति ने इस अनोखी विचित्रता के रूप में इसे शिकार पकड़ने का साधन प्रदान किया है। इसे एंगलर फिश या काँटा मछली कहते हैं। यह इतनी खूबसूरत होती हैं कि लोग इसे अपने घरों के एक्बेरियम में सजाकर रखते हैं। इनकी कुछ प्रजातियों की आकृति प्याले की तरह होती है॥ इनकी अभी तक 60 प्रजातियों का पता चला है, जिनमें तीन दक्षिण अफ्रीका के मीठे जल में भी पाई जाती हैं। इनकी लंबाई 20 सेंटीमीटर तक और रंग भूरा-सफेद और पीला होता है। क्रिप्टिक एंगलर मछली में शिकार पकड़ने की डंडी और उस पर लगा चारा उसके थूथन पर लगे खाँचे में छिपा होता है। शिकार की तलाश में यह काई आदि किस्म की घास में छिपकर चारा लगी डंडी को बाहर निकाल देती है। जैसे ही कोई समुद्री कीट या मछली चारे को भोजन समझकर निगलने की कोशिश करती है, यह झट ये उसे अपने मुँह के अंदर खींच लेती है।
मछलियों की एक किस्म ऐसी भी है, जिसे तारों को निहारने वाली मछली भी कहा जाता है। इनकी आँखें सिर पर स्थित होती हैं। इन्हें देखकर कुछ ऐसा लगता है, मानो ये आकाश को निहार रहीं हों। इनकी विशेषता यह है कि ये अपने शरीर को रेत के नीचे छिपा लेती हैं और केवल मुँह और आँखें ही रेत की सतह पर खुली होती हैं। इनकी उपस्थिति से अनजान जैसे ही कोई शिकार इनके ऊपर से गुजरता है, वैसे ही ये उन्हें अपने मुँह में दबोच लेती हैं। इनका रंग रेत से इतना मेल खाता है कि रेत में ये कहाँ पर हैं, पता ही नहीं चल पाता है। इनकी कुछ प्रजातियों में शिकार को धराशायी करने के लिए बिजली के झटके का भी इस्तेमाल किया जाता है। ये मछलियाँ अपने शरीर से निकलने वाली विद्युत तरंगों को शिकार पर लक्ष्य करती हैं, जिससे इनका शिकार एक ही झटके में गिर जाता है।
कुछ मछलियाँ भी चिड़ियों की तरह अपने घोंसले बनाती हैं। है न अचरज की बात। घोंसलों का निमार्ण करने वाली मछलियों की यूँ तो अनेकों प्रजातियां देखने को मिलती हैं, मगर ‘स्टिलबैक’ एवं ‘ट्यूब नोज’ मछलियाँ इस प्रकार की मछलियों में घोंसले निर्माण के लिए अधिक प्रसिद्ध मानी जाती हैं। स्टिलबैक मछलियाँ आर्कटिक समुद्री तटों के आस-पास पाई जाती हैं तथा ‘ट्यूब नोज’ मछलियों का प्राप्ति स्थान कैलीफोर्निया का घोंसले का निमार्ण केवल नर मछली ही करती है। उसमें मादा मछली का बिलकुल भी सहयोग नहीं होता ।
घोंसला बनाने वाली इन मछलियों का आकार ज्यादा बड़ा नहीं होता ये ज्यादातर पाँच या छह इंच तक लंबी होती हैं। जब इनका प्रजनन काल आता है, तब नर मछलियाँ सक्रिय हो उठती हैं और घोंसला बनाने के लिए उपयुक्त स्थान की खोज में निकल पड़ती हैं। घोंसला बनाने के लिए ये मछलियाँ प्रायः जल में डूबी हुई चट्टानों में खोह जैसी जगह की तलाश करती हैं। उपयुक्त स्थान मिल जाने के बाद ये उसमें घास-फूस आदि के लंबे-लंबे रेशों को एकत्र कर गोल आकार का घेरेदार घोंसला बनाती हैं। जब घोंसला बनाने को काम पूरा हो जाता है, तब नर मछली अपने शरीर से एक विशेष प्रकार का चिपचिपा सा लेसदार पदार्थ स्रवित कर घोंसले लपेट देती हैं। इससे घोंसले को मजबूती मिलती है और यह अंडों-बच्चों के लिए अधिक सुरक्षित-लाभदायक बन जाता है।
प्रत्येक नर मछली अपना घोंसला बनाती है। घोंसला तैयार करने के बाद नर मछली-मादा मछली की तलाश में निकल पड़ती है और उसे अपने घोंसले में लाकर जोड़ा बनाती है। समय आने पर मादा मछली उसी घोंसले में अंडे देती है और अंडे देकर वह प्रायः भाग जाती है। इसके बाद नर को ही अंडों की देखभाल करनी पड़ती है। जब अंडों से बच्चे निकल आते हैं और वे घूमने-फिरने में सक्षम हो जाते हैं, तभी नर मछली अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो पाती है।
विचित्रताओं-विलक्षणताओं से भरा मछलियों का यह संसार इस सत्य को उद्घाटित करता है कि प्रकृति सचमुच आदि माता है। इसने बिना किसी भेदभाव के अपनी हार संतान को उसके अनुरूप अनूठे अनुदान दिए हैं। मनुष्य की यदि अपनी विशेषताएं हैं तो मछलियों की अपनी। ये सभी अपने वातावरण में सुखद ढंग से रह सकें, इसके लिए प्रकृति ने इन्हें अलौकिक रीति से संवारा है। प्रकृति का यह सृजन-कौशल मानवीय बुद्धि एवं शक्ति से परे उस सर्वमय चैतन्य सत्ता की ओर संकेत करता है, जिसके इंगित से प्रकृति आदि माता के रूप में सक्रिय है।
जिसने इंद्रियों को उच्छृंखल और मन को बिना लगाम का छोड़ रखा है, उसे जल्दी ही खड्ड में गिरकर दुर्दशाग्रस्त होना पड़ेगा।
एक जिज्ञासु ने पूछा-भगवन् मनुष्य जीवन को अलंकृत करने वाले देवता कौन हैं। ज्ञानी ने उत्तर दिया-हृदय और जीभ। पतित करने वाले दो असुर ? ज्ञानी ने इस बार वही उत्तर दिया- हृदय और जीभ। सो कैसे ? जिज्ञासु ने समाधान जानना चाहा। ज्ञानी ने कहा-मधुर संभाषण और सुसंस्कृत आचरण जीभ और हृदय के ही अनुदान हैं। यदि ये जीवन को ये दो वस्तुएं दे देते हैं, तो जीवन कृतार्थ हो जाता है, पर यदि जीभ बोलने लगे कटु और हृदय में छा जाए कुत्सा, तो वही मनुष्य को नारकीय परिस्थितियों में झोंक सकते हैं।
सापेक्षता के इस सिद्धांत ने विज्ञान को अध्यात्म के एकदम करीब पहुँचा दिया है कि समय कुछ और नहीं व्यक्ति की अपनी प्रतीति मात्र हैं। हम जिन तिथियों, तारीखों, वारों और घटनाओं को समझते हैं, वे भी प्रतीति मात्र हैं। व्यक्ति अथवा अनुभव करने वाला पात्र बदल जाता है, तो प्रतीति भी बदल जाती है। उदाहरण के लिए मनुष्य का जीवन सत्तर वर्ष निर्धारित है। शरीरयात्रा लगभग इतने वर्ष चलकर पूरी हो जाती है। व्यवस्थित और संतुलित जीवन जीएँ तो शरीर सौ वर्ष तक चलता रह सकता है, अन्यथा साठ के आसपास भी सिमट जाता है। पूर्ण आयु का औसत सत्तर वर्ष ही है। इस अवधि में मनुष्य बचपन, किशोर, युवा, प्रौढ़ और जरा के जितने अनुभवों से गुजरता है। चौबीस घंटे में अपनी जीवनलीला पूरी करने वाला मच्छर भी इतने ही अनुभव कर लेता है। उसकी चारों अवस्थाएँ चौबीस घंटों में संपन्न हो जाती हैं। अर्थात् मनुष्य के अस्सी वर्ष एवं कीट-भृंगी के चौबीस घंटे बराबर हुए।
प्रतीत पर निर्भर समय की सत्ता का एक उदाहरण सुख-दुःख की अनुभूति के रूप में दिया जाता है। प्रिय परिस्थितियों से घिरे रहने पर समय पंख लगाकर उड़ता अनुभव होता है। क्षण, दिन, हफ्ते, महीने देखते-देखते बीत जाते हैं। इसके विपरीत दुःखद परिस्थितियों में समय काटे नहीं कटता। इस तथ्य को लोग मृत्यु की घटना से भी समझाते हैं। जिस घर से शाम को कोई मौत हुई हो, वहाँ की रात बहुत लंबी अनुभव होती है।
समय-सापेक्षता के सिद्धांत को चलताऊ भाषा में विद्वानों ने इस तरह भी समझाया है। उनके अनुसार गरम तवे पर क्षण भर के लिए रखा गया हाथ प्रतीति की दृष्टि से सुख में बिताए हजार क्षणों से भी ज्यादा भारी होता है। हाथ की जलन का क्षण प्रेयसी के साथ बिताए घंटों से भी ज्यादा लंबा हो जाता है। प्रतीति पर निर्भर होने के कारण ही समय को किसी परिभाषा में बाँधा नहीं जा सका, न ही उसकी व्याख्या हो पाई।
पल, निमिष, सेकेंड, मिनट, घंटे और दिन को विभाजन सुविधा के लिए है। वस्तुतः समय यह भी नहीं है। किसी घटना को स्मृति में अंकित करने के लिए यह एक काम चलाऊ व्यवस्था है। इन दिनों हम सेकेंड, मिनट और घंटों में समय को समझते हैं। किसी समय पल और विपल में गणना की जाती थी। यह प्रचलित मानदंडों से भी सूक्ष्म है। ज्योतिष का अध्ययन करते समय पल, घड़ी और नक्षत्र आदि का ही उपयोग किया जाता है। दिन और वर्ष की गणना के लिए भी विभिन्न पद्धतियां जाती हैं। मानवीय वर्ष से कई गुना बड़ा होता है देव वर्ष । दैव वर्ष से भी सौ गुना बड़ा होता है ब्रह्मा का वर्ष । उल्लेख मिलते हैं कि ब्रह्मा का एक दिन मनुष्य के एक हजार वर्ष के बराबर होता है। रात भी इतनी ही लंबी होती है। उनके एक दिन और रात में सृष्टि का जन्म और लय हो जाता है।यह अवधि एक कल्प कही जाती है। ब्रह्मा का एक कल्प पूरा होने पर सृष्टि का प्रलय हो जाता है। सृष्टि के उद्भव और विलय की अवधि को हजारों करोड़ों वर्ष में आँका गया है।
मनुष्य वर्ष, दैव वर्ष, ब्रह्मा का आहोरात्र, उनकी आयु और कल्प आदि का मान अकल्पनीय है। सामान्य बोलचाल में जब किसी संख्या को अगणित बताना हो तो उसे हजारों-करोड़ कहते हैं। असीम, असंख्य आकाश में तारों के बराबर जैसे पर्याय भी प्रचलित हैं। उनका आशय इतना ही है कि काल अथवा समय को अवधि में नहीं बाँधा जा सकता है। वह असीम और अनंत है। वेदाँतशास्त्र उसे भी विस्तार की भाँति ही भ्रम बताता है। दिशा अथवा स्थान की जैसे कोई सत्ता नहीं है।, उसी तरह समय की सत्ता भी वेदाँत ने ‘माया’ की ही प्रतीति मानी है।
इस शती के आरंभ तक यह समझा जाता था कि समय दो घटनाओं के बीच की दूरी का माप है । घड़ी में सेकेंड की सुई, एक रेखा से दूसरों रेखा तक पहुँचने में जितनी गति करती है उसे सेकेंड कहते हैं। कल्पना कीजिए कि जिस समय घड़ी का आविष्कार हुआ होगा उस समय सुई की गति थोड़ी तेज होती तो सेकेंड का मान अबकी तुलना में छोटा होता ।सुई की गति कुछ धीमी होती तो सेकेंड का मान बड़ा हो जाता। सेकेंड को दिन के चौबीस घंटों की एक सूक्ष्म इकाई माना गया है। तत्व से बना होता है। विद्युत प्रवाह, बल, आघात और ऊर्जा की तरह यह भी स्थूल आँखों से नहीं दिखाई देता, लेकिन प्रभावी होता है। महत्व और शक्ति की दृष्टि से यह ठोस, तरल और वायवीय पदार्थों की तुलना में ज्यादा सूक्ष्म होता है। इसे अदृश्य पदार्थों या वायवी तत्वों से बना भी कह सकते हैं। खुली आँखों से इसे नहीं देखा जा सकता, कोई सूक्ष्मदर्शी यंत्र भी इसे नहीं पकड़ सकता। किर्लियन फोटोग्राफी जानने वाले विशेषज्ञों ने जरूर इसकी धुँधली आकृति अपने कैमरों में उतारी है। वे मनुष्य-शरीर ही नहीं, पेड़-पौधों और दूसरे जीवों के आभाशरीर को भी रील पर उतारने में सक्षम हुए हैं।
‘प्राणिक हीलिंक’ के जानकार बताते हैं। कि स्थूलशरीर में प्रकट होने से महीनों पहले आभाशरीर में लक्षण दिखाई देने लगते हैं रोग-बीमारियों के अनुसार, यह अवधि हफ्तों और कुछ दिनों पहले भी हो सकती है। जब आभाशरीर बीमार होता है। तो उसके विशेष भाग से प्राणशक्ति कम होने लगती है। पीड़ित अंग के पास ऊर्जा शरीर दो से पाँच सेंटीमीटर सिकुड़ जाता है। वहाँ का रंग भी बदलने लगता है। उदाहरण के लिए, आँखों में कोई तकलीफ पैदा होने के पहले आँखों के आसपास की आभा घटने लगती है। कुछ मामलों में पीड़ित अंग के आसपास की आभा घनीभूत भी हो जाती है। ‘प्राणिकक हीलर’ अपनी अंतःदृष्टि से आभाशरीर में आए विकारों को पकड़ लेता है। उस आधार पर वह बता देता है कि अमुक बीमारी आने वाली है। अंतःदृष्टि से समझने की कला प्रशिक्षण और अभ्यास द्वारा विकसित की जाती है। प्राणिक हीलिंग के क्षेत्र में इस कला को ‘स्कैनिंग‘ कहते हैं।
प्रशिक्षण और अभ्यास ‘हालर’ अथवा ‘उपचारक’ को मनः स्थिति ताड़ने में भी समर्थ बना देता है। नई दिल्ली में वर्षों से इस क्षेत्र में काम कर रही आशिमा सिंह का कहना है कि यह सिद्धि-वरदान नहीं है। मन को निर्मल और पूर्वाग्रहों से मुक्त कर एकाग्रता से कोई भी व्यक्ति अपने भीतर यह क्षमता विकसित कर सकता है। आशिमा सिंह सूक्ष्मशरीर में आए विकार और परिणामों का निदान आसानी से कर लेती है। उससे लाभान्वित होने की पुष्टि करने वाले ढेरों उदाहरण हैं । लाभ नहीं होने की शिकायतें भी कम नहीं हैं। कुल आए केसों में साठ प्रतिशत से ज्यादा लोग प्राणिक हीलिंग से लाभ मिलने की पुष्टि करते हैं। यह प्रतिशत किसी भी विद्या के कारगर होने का प्रमाण देने के लिए काफी है। मेडिकल साइंस भी एक स्थिति के बाद साठ-सत्तर प्रतिशत से ज्यादा कामयाब होने का दावा नहीं करता।
अपने अनुभव सुनाते हुए आशिमा सिंह ने कहा कि वर्षों पहले सूने घर में चोर घुसे। उस समय मैं बाहर गई हुई थी। परिवार के अन्य सदस्य भी शहर से बाहर थे। मेरे घर लौटने से पहले ही चोर घर में घुसकर छुप गए थे। शायद मेरे आने का इंतजार कर रहे थे। रात दस बजे के आसपास मैं घर लौटी तो दरवाजा खोलते ही उन्हें सामने खड़ा पाया। वे आक्रामक तेवर लिए हुए थे। उन्हें देखते ही मुझे ने जाने क्यों लगा कि कितने ही आक्रामक दीखें, पर वे मुझ पर हमला नहीं कर पाएंगे। उनके ऊर्जा शरीर से मुझे यह आभास हुआ। वे भीतर बुरी तरह काँप रहे थे। उनके ऊर्जा शरीर में पत्ते की तरह थरथराहट देखकर मुझे जोर की हंसी छूटी। मुझे हंसता देख उनके हाथों से हथियार गिर गए। वे माफी माँगने लगे और अपने आप बताने लगे कि उन्हें किसी ने पैसे देकर डाकेजनी के लिए भेजा है। वे पेशेवर बदमाश थे, लेकिन महानगर के एकाँत हिस्से में मुझ अकेली स्त्री को देखकर भी लूटपाट नहीं कर सके। उन्हें असमर्थ कर देने का श्रेय अपने भीतर विकसित हो गई प्राणऊर्जा को दिया जा सकता है। लेकिन मुझे उनके निस्तेज होने का आभास क्षणभर में ही संपन्न हो गई स्कैनिंग के कारण ही हुआ था।
राजधानी में कार्यरत एक पत्रकार के 1997 में एक दिन चेहरे पर छोटी-सी फुँसी उभरी। दूसरे दिन वहाँ तीन फुँसियाँ उठी और कमजोरी महसूस होने लगी। शरीर का तापमान भी बढ़ गया। रात सोने के बाद सुबह उठे तो चेहरे का दांया हिस्सा फुँसियों से भरा हुआ था। आशिमा सिंह ने दूर बैठे ही विश्लेषण (स्कैंनिग) कर बता दिया कि यह किसी ताँत्रिक प्रयोग का परिणाम है। वह प्रयोग किया किसी और के लिए गया था, लेकिन लक्ष्य चूक गया और पत्रकार चपेट में आ गए। दो सप्ताह में चार हीलिंग दी गईं। औषधि उपचार भी हुआ और रोग ठीक हो गया। उस बीमारी का निदान डाक्टर आखिर तक नहीं कर पाए थे।
आभाशरीर की जाँच या विश्लेषण ‘प्राणिक हीलिंग’ की अगली कक्षाओं में ही सीखी या सिद्ध की जा सकती है। इस कला में पारंगत होने के बाद हीलर दूर बैठकर भी व्यक्ति के रोग और स्वभाव को समझ सकता है। बहुत उपचारकों में यह सिद्धि प्राणिक हीलिंक का अभ्यास शुरू करने से पहले ही होती है। उसे पूर्व जन्म के संस्कारों का फल कहेंगे। आभाशरीर के बारे में चो कोक सुई ने लिखा है-”सामान्य शरीर में जिस तरह रक्त के संचार के लिए नाड़ियां या रक्त नलिकाएं होती हैं, इसी प्रकार आभाशरीर में भी न दिखाई देने वाली बारीक शिरोबिंदु या नाड़ियाँ होती हैं। इनके द्वारा प्राणशक्ति पूरे शरीर में प्रवाहित होती है।”
“आभाशरीर में कोई विकार या रोग प्रवेश करता है, तो संबंधित अंगों के आसपास की नाड़ियाँ आँशिक रूप से अवरुद्ध हो जाती हैं। प्राणऊर्जा उन अंगों में आसानी से न तो प्रवेश कर पाती है और न ही बाहर निकल पाती है। प्रभावित क्षेत्र हलके भूरे या गहरे भूरे रंग के दिखाई देते हैं।”
मास्टर चो ने आभाशरीर को स्थूलशरीर के रूपक से समझाया है। उसी तरह उपचार की विधियाँ भी दी हैं। योगविद्या की भाषा में उस उपचार को प्राणशक्ति का अनुदान देने, आशीर्वाद भेजने और संकल्प मात्र से व्यक्ति के शरीर, मन तथा स्थितियों में अभीष्ट परिवर्तन ले आने की कला कह सकते हैं। मास्टर चो मानते हैं कि प्राणिक हीलिंग में दक्षता के एक विशेष स्तर पर पहुँचे व्यक्ति में भी यही सामर्थ्य विकसित हो जाती हैं। लेकिन उस स्तर तक पहुँचने के लिए रुकना नहीं चाहिए।
किलनर ने लिखा है कि विशेषज्ञों की जरूरत जटिल समस्याओं और गुत्थियों के लिए ही पड़ती हैं। नब्बे प्रतिशत रोग सामान्य श्रेणी के होते हैं और मामूली उपचारों से ठीक हो जाते हैं। उनके लिए खास योग्यता नहीं चाहिए। प्राणिक हीलिंग के क्षेत्र में औसत प्रशिक्षण लेकर भी काम चलाया जा सकता है। भविष्य में इसी तरह के लोग ज्यादा होंगे। गली-मुहल्लों और कस्बों में साधारण वैद्य-हकीमों और फिजीशियन ही बस्ती का स्वास्थ्य-संतुलन बनाए रहते हैं। किलनर के अनुसार, अगले दिनों इसी तरह प्राणिक हीलर भी जगह-जगह होंगे और लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं को सूक्ष्म स्तर पर सुलझाएंगे।
प्राणिक हीलिंग ने स्वास्थ्य संबंधी प्रचलित धारणाओं में क्राँतिकारी उलट-फेर किए हैं। अब तक विज्ञान इसी सिद्धांत के समर्थन में खड़ा था कि शरीर में विजातीय तत्वों के बढ़ जाने से ही रोग होते हैं। दवाओं के जरिए अथवा शल्य चिकित्सा से विजातीय द्रव्यों का निष्कासन कर दिया जाए तो रोग ठीक हो जाते हैं। इस सिद्धांत पर काम करते हुए स्थूलशरीर को ही सब कुछ मानने वाली चिकित्सापद्धति चालीस-पचास प्रतिशत रोगों को ही ठीक कर पाती हैं। ‘प्राणिक’ के जरिये सत्तर प्रतिशत मामलों में आराम मिलता दिखाई देता है।
सिर्फ स्थूलशरीर और अंगों का ही उपचार करने पर ठीक हुए पचास प्रतिशत रोग भी वास्तव में जड़-मूल से नहीं मिटते । बीमारी में आराम मिलता जरूर दिखाई देता है। वह आराम एक भ्रम ही होता है। असल में औषधियों के दबाव से शरीर में रोग कुछ देर के लिए दब जाते हैं। उनकी पीड़ा कुछ समय के लिए शाँत हो जाती है। औषधि का प्रभाव दूर होते ही रोग फिर उभरने लगता है। प्राणिक विशेषज्ञों के अनुसार रोगों की जड़ें कहीं गहरी होती हैं। उन्हें वहीं से उखाड़ा जाए तभी संपूर्ण उपचार होता है।
मास्टर चो ने इन जड़ों को इंगित करते हुए लिखा है कि रोगों के बीज मनोभावों से अंकुरित होते और अपना विष फैलाते हैं। क्रोध, भय, लंबे समय तक बना रहने वाला चिड़चिड़ापन और कुँठा जैसे अनियंत्रित अथवा दबाए गए आवेग आभाशरीर पर अवाँछित प्रभाव डालते हैं। क्रोध और कुँठा से पेट के आसपास की प्राणशक्ति कम होने लगती है। हृदय-चक्र प्रभावित होता है। शरीर पर उसका पहला प्रभाव अपच और पेचिश के रूप में होता है। लंबे समय तक यह स्थिति बने रहने पर अल्सर या पित्ताशय की समस्या में बदल जाता है। दूसरे मामले में हृदय संबंधी समस्याएँ उत्पन्न होती है।
वासना का आवेग मानसिक और शरीर के उत्सर्जन अंगों से संबंधित बीमारियों को आमंत्रित करता है। ईर्ष्या का भाव देर तक बना रहे तो चर्म रोगों की आशंका बढ़ जाती है। किसी के निजी जीवन में बेवजह दखल आँख और कान संबंधी बीमारियों को जन्म देता है। ‘प्राणिक हीलिंग’ के पाठ्यक्रम में इस तरह की कई बारीकियाँ पढ़ाई जाती हैं। विद्यार्थियों को समझाया जाता है कि वे रोगी का इलाज करते हुए उसे अपने व्यवहार और मनोभावों पर संयम रखना भी सिखाएं। बहुत सी समस्याएँ तो आत्मशोधन और चित्त में उदार वृत्ति का विकास करने से ही दूर हो जाती है।
हँसमुख चेहरा एक जादुई आकर्षण है, जो हर किसी को मोहता और मित्र बनाता है।
इस दुनिया में रहस्य बुद्धि के सापेक्ष हैं। तीक्ष्ण और विकसित बुद्धि वालों के लिए रहस्य तद्नुरूप उच्चस्तरीय होते हैं, जबकि निम्न, मंद और अविकसित मेधा वालों को छोटी से छोटी चीज भी रहस्यमय जान पड़ती है। एक वनवासी के लिए विज्ञान का साधारण सा यंत्र भी आश्चर्यजनक हो सकता है, लेकिन वही किसी विज्ञानवेत्ता को सामान्य प्रतीत होगा। एक निपट देहाती के लिए चाँद की धरती, वहाँ का वातावरण, 14 दिवसीय दिन-रात की जानकारी-यह सब अद्भुत हैं, किंतु विज्ञान के विद्यार्थी को इसमें कोई अचंभा नहीं होता,कारण कि उसकी बुद्धि अपेक्षाकृत विकसित है, वह इसे भलीभाँति जानता है कि यह सब कैसे संभव हुआ।
कई बार कुछ ऐसे प्रसंग सामने आ जाते हैं, जो विज्ञान विशारदों के भी मस्तिष्क को चकराकर रख देते हैं। ऐसी ही एक झील दक्षिण अफ्रीका स्थित पैण्डूजी हैं। उत्तरी ट्राँसवाल प्राँत में पाई जाने वाली इस झील के संबंध में यों तो अनेक प्रकार की किंवदंतियाँ हैं, पर यह सच हैं कि इसके पानी को पीने वाला आज तक कोई जिंदा नहीं रहा। इसका यह मतलब नहीं कि यहाँ का जल प्रदूषित है। यथार्थ तो यह है कि मुटाली नामक जिस नदी का प्रवाह इसमें आता है,वह एकदम स्वच्छ है। फिर इसमें कौन सा ऐसा तत्व है, जो प्राणघातक है? इसे जानने के लिए समय-समय पर कई प्रयास हुए हैं, पर कोई सफल नहीं हो सके। हर कोशिश के साथ कोई न कोई दुर्घटना घट जाती । आरंभ में इसे मात्र संयोग कहकर टाल दिया जाता,किंतु जब प्रत्येक अन्वेषक के साथ इस प्रकार के प्रसंग सामने आने लगे, तो जाँचकर्त्ता सतर्क हो गए और झील से किसी भी तरह की छेड़खानी करने से कतराने लगे।
अंतिम घटना सन् 1946 की है, जो एंडी लेविन नामक एक दुस्साहसी रसायनवेत्ता से संबंधित है। उसके मस्तिष्क में यह सनक सवार हो गई कि वह उसके जल का रासायनिक विश्लेषण कर रहस्य का अनावरण करेगा। मित्रों और संबंधियों को जब यह बात मालूम हुई तो उन्होंने लेविन को ऐसा करने से रोकने के लिए हर तरह से समझाया, पर वह नम माना। अपने एक सहयोगी को साथ लेकर चल पड़ा। इस कार्य में सहायता लेने के उद्देश्य से उसने स्थानीय कबीले के लोगों से संपर्क साधा, किंतु पैंडुजी झाल का नाम सुनते ही उन्होंने किसी भी प्रकार की मदद करने से इनकार कर दिया। यहाँ तक कि झील तक मार्गदर्शन करने के लिए भी वे तैयार न हुए, तब लेविन और उसके मित्र अकेले ही उस ओर बढ़ गए। कबीले के वयोवृद्ध मुखिया ने ऐसा करने से मना किया, पर उन पर इसका कोई प्रभाव न पड़ा।
जब वे वहाँ पहुँचे, तब तक रात हो चुकी थी। दोनों ने मिलकर वहीं एक पेड़ के नीचे रात्रि गुजारी। प्रातः होते ही वे उठे और साथ लाई बोतलों में जल भरने लगे। पानी कुछ गहरे मटमैले रंग का था। लेविन ने उसकी एक बूँद जीभ पर डाली, तो उसका स्वाद कुछ विचित्र जान पड़ा। पानी का नमूना इकट्ठा कर लेने के बाद उन्होंने झील के आसपास के कुछ पौधों और झाड़ियों को भी एकत्र किया और उन्हें साथ ले जाने के लिए सुरक्षित रख लिया।
वापस लौटते समय उनके साथ अजीबोगरीब घटनाएँ घटती रहीं। उन्हें उत्तर से पूरब की ओर वाले उस मार्ग पर बढ़ना था, जिससे वे आए थे, पर वे चल पड़े पश्चिम के रास्ते पर। आधे से अधिक रास्ता पार कर लेने के उपराँत उन्हें महसूस हुआ कि वे गलत दिशा में बढ़ रहे हैं। लौटकर पुनः झील तक आए और वहाँ से पूरब की ओर बढ़े।
अब तक रात घिर आई थी, अतः वे एक स्थान पर रुक गए। सवेरा हुआ, तो पुनः प्रस्थान किया। कुछ दूर आगे जाने पर फिर लगने लगा कि वे गलत मार्ग पर जा रहे हैं । एक बार पुनः दोनों वापस लौटे। इस बार अधिक सतर्कता बरतते हुए सावधानीपूर्वक पूरब के मार्ग पर बढ़े, किंतु नतीजा वही निकला, जिसका डर था । वे फिर भटक गए। अबकी बार खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे। पानी से भरी बोतलें झील में डाली, पौधों को वहीं फेंका और सजग रहते हुए बढ़ चले । इस बार वे सफल हुए और सुरक्षित घर पहुँच गए। अब तक लेविन की तबियत काफी बिगड़ चुकी थी। अस्पताल में एक सप्ताह बाद उसकी मृत्यु हो गई। उसका मित्र एक कार दुर्घटना में मारा गया। झील से संबंधित यह तेरहवीं घटना थी। इसी तरह अन्यों में भी सकुशल कोई नहीं बचा।
रहस्य और बौद्धिकता का परस्पर गहन संबंध है, पर यह अनेक संबंध स्थूल जगत तक ही सीमाबद्ध है। सूक्ष्म रहस्यों के अनावरण के लिए ऋतम्भरा-प्रज्ञा स्तर की मेधा चाहिए। इससे कम में न तो इन्हें समझा जा सकता है, न जाना।
जीव-जंतुओं की ही तरह पेड़-पौधों में भी प्राणचेतना विद्यमान है। वे चलते-फिरते भले न हों, पर उनके अंदर भी भाव-संवेदनाएं हिलोरें मारती हैं। अपनी स्कूल बोध क्षमता के कारण मनुष्य भले ही उनकी मूक भाषा को न समझ सके, किंतु पौधे हमेशा अपनी भावनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। वे मानवीय क्रियाकलापों यहाँ तक कि उनके विचारों एवं भावतरंगों से भी प्रभावित होते हैं। प्राचीनकाल में भारतवासी ऋषि-महर्षिगण अपनी संवेदनशील एवं सूक्ष्मचेतना शक्ति द्वारा इस सत्य से अवगत थे। आज का वैज्ञानिक जगत् भी अपने प्रयोग-परीक्षणों द्वारा इस तथ्य को पुष्ट एवं प्रमाणित कर रहा है।
संयुक्त राज अमेरिका की संस्था सी आई.ऐ. के पूर्व पूछताछ एवं पॉलीग्राफ विशेषज्ञ क्लीव वेक्सटरने अपने कई प्रयोगों से यह निष्कर्ष पाया कि पौधे भी मनुष्य की ही तरह संवेदना व्यक्त करते हैं। एक प्रयोग के अंतर्गत इन्होंने एक ड्रेकाइना पौधे के पत्तों में पॉलीग्राफ के इलेक्ट्रोड लगाए। इसका उद्देश्य पौधे की जड़ों से पत्तों में बढ़ने वाली पानी की गति का मापन करना था। पॉलीग्राफ द्वारा मनुष्य में भावनात्मक परिवर्तन के कारण श्वास-रक्तचाप , नब्ज़ गति आदि में होने वाले बदलाव का मापन किया जाता है। इसे गैल्वैनिक स्किन रिसपान्स (जी.एस. आर.) के या साइको गैल्वैनिक रिफलेक्स ( पी.जी.आर.) के नाम से नापा जाता है। विषय की विद्युतीय हलचलों के अनुरूप पॉलीग्राफ के चार्ट पेपर पर एक पेन द्वारा रेखाएं अंकित होती हैं।
नियम के अनुसार जब पानी पौधे के पत्तों में पहुँचता है, तो प्रतिरोध कम हो जाता है और अनुरोखण ऊपर हो जाता है। लेकिन प्रयोग के तहत वेक्सटर ने इस नियम के विपरीत घटित होते देखा । चार्ट मानवीय भावनात्मक उद्वेलन के अनुयप् मापन दे रहा था। वेक्सटर को सहसा विश्वास नहीं हो पाया कि पौधा कैसे भावनात्मक जवाब दे रहा है। उन्होंने अपनी तीव्र जिज्ञासा के समाधान के लिए प्रयोग को आगे बढ़ाया। जिसके अंतर्गत पौधे को आग लगाकर डराया जाना था। वेक्सटर ने जैसे ही माचिस जलाने की बात सोची, पी.जी.आर में अद्भुत परिवर्तन आ गया। वह पौधे से कई फुट दूर था और माचिस जलाई तक नहीं थीं, किंतु पॉलीग्राफ चाट पर पौधे की क्रियाशीलता अंकित हो रही थी।
इसके बाद वेक्सटर ने समुद्री झींगे को वहीं पास ही में उबलते पानी में डाला। पुनः पौधे ने बहुत खीझ एवं रोष व्यक्त किया। वेक्सटर आश्चर्यचकित थे कि क्या कोशिकाएं दूसरी जीवित कोशिकाओं को तनाव के संकेत देने में समर्थ होती हैं? क्या पौधे पशुओं की भावनाओं से भी प्रभावित होते हैं ? किसी तरह की मानवीय त्रुटियों से बचने के लिए एक अन्य प्रयोग पूरी तरह याँत्रिक रूप से किया गया, जिसमें झींगे को निर्धारित समय पर मारना था। कोई भी मनुष्य इसके आसपास नहीं रहा। मारे जाने वाले झींगे से दूर तीन अलग-अलग पौधों को अलग अलग कमरों में इलेक्ट्रोड से युक्त किया गया। पॉलीग्राफ के चाट से पता चला कि तीनों पौधों ने झींगे की मृत्यु के समय अपनी भावनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की । इसी प्रयोग को वेक्सटर व अन्यों ने कई बार और अधिक संवेदनशील यंत्रों के माध्यम से किया, किंतु हर बार वही परिणाम सामने आए।
वेक्सटर ने पाया कि अपरिभाषित संवेदी तंत्र या कोशिका जीवन की बोध क्षमता को, विद्युतीय प्रवेश को रोकने वाली फाराडे स्क्रीन द्वारा भी नहीं रोका जा सकता। पौधों द्वारा प्रेषित संकेत इलेक्ट्रोडाइनैमिक स्पैकट्रम से परे की शक्ति द्वारा चलित थे। इन प्रयोगों से वेक्सटर की यह धारण बनी कि समस्त प्राणी कोशिकीय स्तर पर चेतना द्वारा जुड़े हैं। इतना ही नहीं, पौधे, मनुष्य एवं जीव-जंतु एक दूसरे से अब तक के ज्ञात दूर संवेदी संवाद के तरीकों से भी उच्चतर स्तर पर संवाद कर सकते हैं।
इसमें दूरी भी कोई बाधा नहीं है। एक मित्र के घर का पौधा वेक्सटर के पास छोड़ा गया। देखा गया कि यह उस समय बेहद उत्तेजित हो गया, जब इसका स्वामी चिंचिटी के हवाई अड्डे में उतरते समय तनाव की स्थिति में आ गया था। वेक्सटर जब भी न्यूयार्क स्थिति अपनी प्रयोगशाला से दूर होते थे तो उनके आश्चर्य, उत्तेजना व तनाव आदि के क्षण उनके पौधों के पॉलीग्राफ चार्ट से मेल खाते थे। चाहे वह कितनी भी दूर क्यों न हों ? जब वह अपनी प्रयोगशाला में आने की सोचते तो पौधे आवेग के साथ प्रतिक्रिया करने लगते। मजेदार बात यह भी है कि पौधे अपने स्वामी व देखभाल करने वालों के प्रति विश्वास तथा अपनत्व के भाव प्रदर्शित करते हैं। और अपरिचितों तथा नुकसान पहुँचाने वालों के प्रति भय व्यक्त करते हैं। वेक्सटर ने इस प्रयोग को कई बार स्वयं को एक अच्छे व्यक्ति की भूमिका में लाकर व अपने सहयोगी बाँब हनेसम को एक खलनायक की भूमिका में रखकर सत्यापित किया। जब कभी प्रयोगशाला में कार्य के दौरान वेक्सटर की उंगली कटती या उन्हें किसी तरह से चोट पहुँचती है तो पौधे अपनी संवेदनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करते। संक्षेप में उन्होंने अपने प्रयोगों से सिद्ध किया कि बिना स्नायुतंत्र के भी पौधे विश्वास, भय, दुःख और समझ जैसे भावों को व्यक्त करते हैं।
भारत के सुविख्यात वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बसु ने बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में पौधों की संवेदनशीलता को प्रमाणित किया था। उनके अनुसार उत्प्रेरकों के प्रभाव से प्रेम, घृणा, भय, प्रसन्नता, दर्द विस्मय आदि संवेदनात्मक प्रतिक्रियाएं पौधों में उतनी ही सार्वभौम हैं, जितनी कि पशुओं में । उत्तेजित प्रतिक्रियाओं के संप्रेषण की गति मापन करने वाले रेजोनेन्ट रिकार्डर और पौधों के कंपन रिकार्ड करने वाले आँपिलेटिंग रिकार्डर द्वारा बोस ने पौधों के आवेगों और पशुओं के हृदय धड़कने की साम्यता को सिद्ध किया।
‘आटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’ में परमहंस योगानंद ने लिखा है कि उन्होंने डा. जगदीशचंद्र बसु के इन प्रयोगों को स्वयं देखा। ऐसे ही एक प्रयोग के दौरान उन्होंने डा. बोस को फर्न के एक हिस्से में एक तीखे यंत्र को चुभाते देखा। पेड़-पौधों की सूक्ष्म गतिविधियों को दस हजार गुना बढ़ाकर प्रदर्शित करने वाले क्रेस्कोग्राफ यंत्र की स्क्रीन पर फर्न की छाया देखकर उन्होंने पाया कि फर्न चोट के समय अनियमित ढंग से काँप रही थी और जब आचार्य बोस ने इसे काट दिया तो यंत्र ने मृत्यु की संवेदना का परिचय दिया। स्वामी योगानंद ने अपने मंतव्य को स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है कि चेतना सर्वव्यापी है। जीव-जंतुओं के साथ वह अपने को पेड़-पौधों में भी अभिव्यक्ति करती है।
हमला होने पर पौधे अपना बचाव करते हैं। यह शोधनिष्कर्ष विज्ञानवेत्ता अनुराग अग्रवाल ने अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध पत्रिका ‘साइंस’ में स्पष्ट हुआ है कि पौधों में भी प्रतिरक्षा प्रणाली होती है। पर यह असर तभी करती है जब कोई कीट उसकी पत्तियों को चबाना शुरू करता है। इस प्रवृत्ति को ‘इनड्यूस्ट रेजिस्टेन्स’ अर्थात् प्रेरित प्रतिरोध की संज्ञा दी गई है। शोध के अनुसार, जैसे ही कोई इल्ली पत्तियों को चबाना शुरू करती हैं, पौधों से जासमोनिक अम्ल निकलना शुरू होता है। इससे एक ऐसा रसायन बनता है, जिसका स्वाद कीट को नहीं भाता और वह पीछे हटने के लिए विवश होता है।
वरिष्ठ शोध रसायनविद् डा. मार्कल वोगेल ने मनुष्य व पौधों के बीच ऊर्जा के हस्ताँतरण व संवाद विषय पर गहन शोध-अनुसंधान किया है। अपने प्रयोगों से वे यह सिद्ध कर चुके हैं कि मन के अच्छे भाव व विचारों द्वारा संप्रेषित ऊर्जा पौधे की प्राणशक्ति को सीधे प्रभावित करती है। इस प्रयोग के अंतर्गत तोड़े गए चिराबेल के पत्ते को चार सप्ताह तक हरा-भरा व जीवित रखा गया, जबकि उसी समय तोड़े गए अन्य पत्ते जल्दी ही सूखकर पीले पड़ गए।
वोगेल ने मनुष्य के साथ पौधों के संवाद के सही क्षणों को जानने का प्रयोग भी किया। इस प्रयोग के अंतर्गत उन्होंने गैल्वेनोमीटर फिट किया। इसी के साथ स्वयं को वृक्ष के सामने गहरी विश्रामावस्था में लाकर पौधे के प्रति अच्छे व सौहार्दपूर्ण विचारों को संप्रेषित किया, जैसा कि वे अपने मित्रों के साथ करते थे। प्रत्येक बार जब भी वोगेल ने यह प्रयोग किया, चार्ट पर पेनहोल्डर ने अपनी सक्रियता दर्ज कराई। वोगेल इन क्षणों में अपने हाथ की हथेलियों में पौधों से उमड़ता ऊर्जा प्रवाह अनुभव कर रहे थे। उन्होंने पाया कि पौधे भी सक्रियता एवं निष्क्रियता के दौर से गुजरते हैं। कभी तो वे बहुत ही ऊर्जा संपन्न होते हैं, तो कभी बहुत ही ढीले-ढाले एवं निस्तेज।
अपने इस प्रयोग में वोगेल को यह भी स्पष्ट हुआ कि चेतना की कुछ केंद्रित स्थितियों में पौधों को विशेष रूप से प्रभावित किया ज सकता है। पौधों को अच्छे, अपनत्व व प्रेम के तीव्र विचारों द्वारा उनींदेपन की स्थित से जगाया जा सकता है। अपने अनुसंधान के द्वारा वोगेल यह भी सिद्ध कर चुके हैं कि मनुष्य वनस्पति जीवन से संवाद कर सकता है। पेड़-पौधों में संवेदना कम नहीं हैं। भले ही वे भावों को समझने में पूरी तरह से सक्षम हैं। पौधे उस ऊर्जा को भी प्रसारित करते हैं , जो मनुष्य के लिए लाभदायक होती हैं।
अपने देश में वृक्षों व पौधों के इन ऊर्जामंडल का ज्ञान रहा है। तभी तो यहाँ अपनी ऊर्जा पूर्ति के लिए चीढ़ देवदार के वृक्ष को गले लगाने या पीठ सटाकर बैठने की लोकपरंपरा रही है। पहाड़ी इलाकों में यह लोकपरंपरा अभी भी देखी जा सकती है। न्यूयार्क के मनोचिकित्सक जान पियरकोस ने मनुष्य व पौधों के ऊर्जा-स्पंदनों का मापन किया है। उनके अनुसार स्प्रूस व देवदार के वृक्षों के इर्द-गिर्द स्पंदित ऊर्जा 19-22 इकाई प्रति मिनट होती है, जबकि यह मनुष्य में 14 से 14 स्पंदन प्रति मिनट। मनोवैज्ञानिक पियरकोस अपने रोगियों की शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की जाँच व सुधार में पौधों की सहायता लेते हैं। रोगियों को जाने और बातचीत लिए बिना वे उनके घर पर रखे पौधों पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हैं। जिनकी प्रभामंडल के स्पंदन रोगियों के स्पंदन के अनुरूप घटते या बढ़ते हैं।
समस्त वैज्ञानिक शोध-निष्कर्ष अविकल रूप से पौधों की संवेदनशीलता एवं मानव के साथ उनके अभिन्न सहचरी जीवन को प्रमाणित करते हैं। अपने भारत देश में प्राचीन महर्षिगणों ने भी इसी सत्य को तथ्य रूप में प्रतिपादित किया था। लोकमानस में भी उनके उपदेशों के अनुरूप वृक्षों की पूजा एवं सम्मान के भावन पनपे। प्राचीन शास्त्रकारों ने तो यहाँ तक लिखा है-पेड़ पौधे तो स्वयं ही इस अपनेपन के बदले में अपने फल-फूल पत्तियाँ मनुष्य को अर्पित करने में हर्ष अनुभव करते हैं । हाँ, इतना अवश्य है कि अपने अजस्र अनुदानों के बदले वे भी हमसे प्यार चाहते हैं ये भी सुख-दुख, कष्ट -पीड़ा को अनुभव करते हैं। अपनत्व व उपेक्षा, अपमान की भाषा को समझते हैं । इनकी मूक चीत्कार या आशीर्वाद से प्रभावित हुए बिना हम नहीं रह सकते । पर्यावरण का वर्तमान असंतुलन इनकी मूक चीत्कार ही है, जबकि आवश्यकता इनके आशीर्वाद की है। हम अपने उत्कर्ष के साथ ही इनके संरक्षण व विकास पर भी समुचित ध्यान दें, तभी हम पर्यावरण व अपने जीवन को शुद्धता, शाँति व सात्विकता से भरा-पूरा बनाने की कल्पना को साकार कर सकेंगे।
एक ब्राह्मण ने चार यज्ञ किए,पर अंतिम समय उसकी अवस्था बड़ी दयनीय हो गई। वह धर्मराज के पास अपना एक यज्ञफल बेचने चल दिया। रास्ते में एक जगह वह भोजन करने बैठा, उसी जगह कई दिन का भूखा एक संत पड़ा था, ब्राह्मण ने आधा भोजन उसे दे दिया। पर इससे उसकी संतुष्टि नहीं हुई। इस पर ब्राह्मण ने उसे सारा भोजन खिला दिया और धर्मराज के पास चल दिया। धर्मराज ने पूछा-तुम्हारे चार यज्ञ और एक अक्षय यज्ञ जमा हैं, इनमें से कौन सा यज्ञफल बेचते हो? ब्राह्मण पाँचवे यज्ञ की बात सुनकर आश्चर्यचकित हुआ। तब धर्मराज ने उसे बताया कि स्वयं कष्ट सहकर दूसरों की सहायता करना यज्ञ नहीं वरन् अक्षय यज्ञ है। तब ब्राह्मण ने शेष जीवन परोपकार में लगाने का निश्चय कर लिया।
वस्तुतः पिछड़े हुए और दुखियों की सहायता करना, गिरे हुए को उठाना सबसे बड़ा यज्ञ कार्य है।
पाँच पाँडव-सौ कौरव द्रोणाचार्य की पाठशाला में पढ़ने गए। सभी शिष्य एक पाठ रोज याद कर लेते, पर युधिष्ठिर को कई दिन से एक ही पाठ को रटते हो गए। गुरुजी ने झल्लाकर इसका कारण पूछा। ‘सत्यं बद’ इस पहले पाठ को शब्दों से याद नहीं कर रहा हूँ। जीवन में उतारने का ताना-बाना बुन रहा हूँ। जब एक पाठ हृदयंगम हो जाएगा, तब दूसरा आरंभ करूंगा।
सृजन का मूल्य
ऐतिहासिक महाभारत में भारते देश को विशाल भारत के रूप में विकसित करने की योजना थी। आज का लक्ष्य एवं प्रसंग ऊँच नीच अब मनुष्य को महामानव, धरातल को स्वर्ग लोक बनाने की तैयारी है। पतन की दिशा में प्रवाहमान लोकमानस को मानवी गरिमा का गला घोंट डालने से कठोरता पूर्वक रोकना है। पतनोन्मुख प्रवाह को उलटना कितना कठिन है, इसे उस प्रयोजनों में संलग्न शक्तियाँ ही जानती हैं । सृजन किसे कहते हैं, उसे हर कोई नहीं जानता, जिसने पाया जैसा मनोयोग जुटाने, पराक्रमियों जैसे श्रम स्वेद बरसाने का अभ्यास है। उन्हीं को सृजन का मूल्य समझने की भी जानकारी है। किसी को भी दो नावों पर एक साथ चढ़ने की, दो घोड़ों पर ही समय में सवारी गांठने की बात कल्पना का परित्याग कर ही देना चाहिए। यह प्रौढ़-प्रखरों को शोभा नहीं देता।
(वाङ्मय 29 पृ. 6.23)
हर व्यक्ति का कोई न कोई शौक अवश्य होता है। कुछ लोगों के लिए यह समय बिताने का साधन हो सकता है, तो कुछ धनाढ्य रईसों के लिए शाही विलास को माध्यम। कुछ लोग कुछ अद्भुत कर गुजरने की तमन्ना के लिए अपने अनोखे शौक पाल लेते हैं, तो कुछ सहज मनोरंजन के लिए अपने विचित्र शौक में मग्न रहते हैं। यदा-कदा ये शौक सनक की हद को भी पर कर जाते हैं।
ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ऐसे ही शौकीन थे। उन्हें भाँति-भाँति के सिगार और हैट इकट्ठा करने का शौक था। वे जिस किसी भी देश में जाते वहाँ से तरह तरह के सिगार और हैट अपने संग्रह के लिए ले आते । उनका यह शौक इस सनक की हद तक था कि एक बार तो वे शिष्टाचार की सारी सीमाएं ही पार कर गए। अपने यहाँ आए एक मेहमान के हैट पर उनका मन आ गया, और उन्होंने इसे जबरन उतरवाकर अपने संग्रह के लिए रख लिया। मेहमान को यह व्यवहार बहुत बुरा लगा और वह वहाँ से चला गया। लेकिन चर्चिल तो अपने संग्रह के लिए नए हैट पर इतना प्रसन्न थे उन्होंने मेहमान की अप्रसन्नता की तनिक भी परवाह नहीं की।
लंदन के एक हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर महोदय को रेलवे टिकटों के संग्रह का शौक था। अपने इस शौक में उन्होंने पचास हजार से भी अधिक टिकट इकट्ठा किए। किंतु आश्चर्य इस बात का रहा कि उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी रेलयात्रा नहीं की, क्योंकि उन्हें रेल में बैठने से डर लगता था। जोजडन नामक एक व्यक्ति को अजीबोगरीब चीजों को एकत्र करने का शौक था। वह भयानक चेहरों, खालों और डरावने चित्रों से अपने कमरे को सजाया करता था और अपने दरवाजे पर बैठकर जोर-जोर से चीखा करता था। उसकी इस हरकत से पड़ोसी परेशान थे। जर्मनी के मोल्क रिश्टर को ब्लेड एकत्र करने का शौक है। अब तक वे दस हजार से भी अधिक ब्लेड इकट्ठा कर चुके हैं।
अपने देश में भी इस तरह के शौकीन लोगों की कमी नहीं है। अपने ही यहाँ के एक पुलिस इंस्पेक्टर के पास तरह-तरह की मूँछों का संग्रह है। संग्रह में सबसे लंबी मूँछ दो फीट की है, जो चंबल के किसी डाकू की बताई जाती है। बड़ौदा के महाराज खंडेराव गायकवाड को कबूतरों का विवाह करवाने का विचित्र शौक था। कबूतरों की शादी वे बड़ी धूमधाम से करवाते थे। इस क्रम में विवाह की सारी रस्म-क्रियाएँ पूरी की जातीं। सभी राज्य-निवासियों को आमंत्रित किया जाता और वे भी अपनी सामर्थ्य अनुसार उपहार भेंट करते थे। अपने चौदह वर्ष के शासनकाल में महाराज ने लगभग 92 लाख रुपए खर्च किए।
जूनागढ़ के नवाब महावत खाँ को कुत्ते पालने का शौक था। इन कुत्तों के लिए उन्होंने कुत्ता महल का निर्माण किया था। इस महल में ढाई हजार कुत्ते रहते थे। इनके रहने की व्यवस्था शाही ढंग से की गई थी। सभी कुत्ते अलग-अलग कमरों में रहते थे। प्रत्येक कमरे में पानी के नल, बिजली व पंखे का प्रबंध था। हर कुत्ते की सेवा में दो नौकर भी हाजिर रहते थे। नवाब ने एक बार अपनी शाही कुतिया रोशनआरा का विवाह शाही खरच से करवाया। इस अवसर पर ढाई लाख अतिथियों को आमंत्रित किया गया था। इसमें कुल सात लाख रुपए खरच हुए थे।
इंग्लैंड के गार्नर नामक एक बच्चे को फौजियों की वरदी के बटन एकत्र करने का शौक था। फौजी लोग भी अपनी वरदियों के बटन उसे सहर्ष दे देते थे। गार्नर का यह संग्रह काफी बड़ा हो गया था और बाद में उससे अमेरिका के एक बटन संग्रह के शौकीन करोड़पति ने उसे पचास हजार पाउंड में खरीद लिया। इसी लंदन के एक व्यक्ति का सिगरेट के खाली पैकेट इकट्ठा करने का शौक था। उसे विभिन्न देशों और ब्राँडों के चार हजार से अधिक पैकेट इकट्ठे कर लिए थे। इनमें कुछ तो बहुत पुराने और दुर्लभ थे।
एंतरियों के एक पुलिस अफसर को तितलियाँ इकट्ठा करने का शौक था। उसने भिन्न-भिन्न प्रकार की 6000 रंग-बिरंगी तितलियाँ इकट्ठा कर रखीं थीं। जर्मनी के एक रिक्शाचालक मि. जानक्यूटा को दरवाजे के कुँडे इकट्ठे करने का शौक है। इसके अतिरिक्त वे दिन में कई बार नहाने का भी शौक रखते हैं। इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ डाक टिकट संग्रह की शौकीन थीं। इनके पास 49 लाख पाउंड से भी अधिक मूल्य के डाक टिकट एकत्र हो गए थे।
स्वीडन के हेलिन नामक एक व्यक्ति को तरह-तरह के कपड़े इकट्ठा करने का विचित्र शौक है। इस शौक को अंजाम देने के लिए हेलिन साहब कभी-कभी तो सारी सीमाएं तोड़ देते हैं। एक दिन एक स्थानीय होटल में नाश्ते के दौरान टी. वी. समाचार में कपड़ों की नीलामी की खबर सुनी तो वे आपे से बाहर हो गये ।नाश्ता टेबल छोड़कर बाहर खड़ी टैक्सी में जबरन घुसे और उसे सीधा नीलामघर चलने को कहा। वहाँ पहुँचकर उन्होंने 17000 डालर में एक लबादा खरीदकर ही चैन की साँस ली। यह लबादा सुपरमैन की शृंखला वाली फिल्म में अभिनेता किटोकारीब ने पहना था। एक क्रम में उनका अगला दौर रूस का लगने वाला है। उन्हें पूरा विश्वास है कि वे प्रसिद्ध रूसी अंतरिक्षयात्रियों द्वारा पहने गए स्पेससूटों की खरीद पाने में सफल होंगे।
जर्मनी के एक स्थान में प्राचीनकाल से लेकर आज तक की रोटियों के नमूनों का संग्रहालय है। इसी प्रकार का एक संग्रहालय मिश्र की राजधानी काहिरा में भी है। जहाँ पर 4000 वर्ष पूर्व की गेहूँ की रोटी सुरक्षित हैं। मिश्र के ही एक नाई को अपने धंधे से इतनी रुचि है कि उसने इससे संबंधित पुराने-से पुराने लेख, चित्र, औजार आदि का एक संग्रहालय तैयार किया है। उसके इस काम के लिए मिश्र के नाई समुदाय ने उसे सम्मानित भी किया है।
विख्यात अंगरेजी विद्वान डा. जान्सन खंभे गिनने के बहुत शौकीन थे। वह जब कभी घूमने जाते तो हाथ की छड़ी सड़क के किनारे खड़े खंभों में मारते जाते और गिनती करते रहते। यदि इस बीच गिनना भूल जाते तो वापस लौटकर फिर से गिनना शुरू करते । वे इस कार्य में इतना खो जाते कि अन्य सभी कार्यों यहाँ तक कि अपने प्रिय लेखनकार्य को भी भूल जाते। जान्सन की ही भाँति फ्राँस के प्रसिद्ध उपन्यासकार एमिल जोला को भी सड़क पर चलते हुए खंभों को गिनने का विचित्र शौक था।
सेवाइल के राजा अबादेल मोतादिल गुलदस्तों के बड़े शौकीन थे। इनके पास गुलदस्तों का विशाल संग्रहालय था। लेकिन ये गुलदस्ते साधारण फूलदान नहीं थे, बल्कि मौत के घाट उतार दिए गए दुश्मनों की खोपड़ियों के थे, जिन्हें साफ करके गुलदस्तों की शक्ल दी जाती थी। राजा इन गुलदस्तों में फूल सजाकर बड़े गर्व से अपने मेहमानों को दिखाता था। ऐसे ही एक मुगल बादशाह को कल्ला मीनार बनाने का शौक था। यह कल्ला मीनार खोपड़ियों से बनाई जाती थीं। मुगलों की ओर से बैरम खाँ ने जब सिकंदर शाह की सेनाओं को परास्त किया, तो उसके सम्मान में बादशाह ने दस हजार दुश्मनों की खोपड़ियों की कल्ला मीनार बनवाई थी।
पटियाला के राजा भूपेंद्र सिंह खाने-पीने के बहुत शौकीन थे। उनके बावर्चीघर में 142 खानसामे थे, जो हमेशा नए-नए व्यंजन बनाने में व्यस्त रहते थे। इसमें सोलह रसोइये तो केवल ‘एगकारी’ बनाने के लिए नियुक्त थे। उनकी रसोई में व्यंजन इतने प्रकार के होते थे कि प्रत्येक व्यंजन को चखने भर से महाराज का पेट भर जाया करता था। ऐसी ही रोम के सम्राट मेक्सीमरन भी खाने-पीने के बहुत शौकीन थे, लेकिन वे खूब पेटू भी थे। एक दिन में वे अठारह किलो माँस और करीब एक सौ बीस गैलन शराब पी जाया करते थे।
ब्रिटेन के मि. राबर्ट को नहाने का अद्भुत शौक है । ये स्नान तो दिन में एक बार ही करते हैं, लेकिन लगातार नौ घंटे तक स्पेन की इतिहास-प्रसिद्ध सुँदरी मोनिका द वडिल्ले उम्दाकिस्म की शराब से भरे टब में स्नान करने की शौकीन थी फ्राँस की ही मादाम द मेसेप तरह तरह के सुगंधित इत्रों से नहाया करती थी। नेपोलियन की पत्नी जोसेपलाइन को स्ट्राबेरी के फूलों के रस से नहाने का शौक था। रोम के बादशाह नीरो की रानी स्नान के लिए गधी के दूध का प्रयोग करती थी। रानी के इस शौक को पूरा करने के लिए साढ़े चार सौ गधियाँ राजमहल में पाली हुई थीं। ऐसे ही महारानी क्लियोपेट्रा भी दिन में दो बार गधी के दूध से स्नान किया करती थीं।
चीन के बिरिया क्बान लिनमिंग का साँपों के साथ रहने का अद्भुत एवं खतरनाक शौक है। जहाँ सामान्य व्यक्ति साँपों को खतरनाक समझकर उनसे दूर रहते हैं, वहीं लिनमिंग साँपों के बिना रह नहीं सकती। उसने सारा जीवन साँपों के साथ रहने का प्रण लिया है। वह अपनी सहेली जुममाँग के साथ 12 दिन तक आठ सौ अट्ठासी विषैले साँपों के साथ सर्पगृह में रह चुकी हैं।
ब्राजील के लुईस जेजार को भयानक साँप, जहरीले मकड़े और बिच्छू पालने का शौक है। ये जानवर उसे इतने प्रिय हैं कि उसने उन्हें अपने शयनकक्ष में जगह दी हुई है। अपने इन प्रिय मित्रों की संख्या बढ़ाने के लिए वह हर तरह से खतरे उठाने के लिए तैयार हैं। एक दिन मौका पाकर जेजार स्थानीय सर्प म्यूजियम में जा घुसा। जब वह बढ़िया किस्म के साँपों को चुराकर भाग रहा था तो सुरक्षा गार्ड ने उसे पकड़ लिया और पुलिस स्टेशन के इंचार्ज के सामने पेश किया। जब लुईस ने चोरी के माल की थैली को उसके टेबल के ऊपर पलटा तो इंचार्ज के होश उड़ गए। अंततः मामला वहीं रफा-दफा हो गया।
आस्ट्रेलिया की कुमारी सैनी को भी साँप पालने का विशेष शौक है। वह जहरीले साँपों को माला की तरह पहनती है। इतना ही नहीं वह कमर में बेल्ट की बजाय साँप बाँधती है। एक नन्हा सर्प हमेशा ही उनकी जेब में पड़ा रहता है। रात को वह अजगर का तकिया लगाकर सोती है। पोर्ट एलिजाबेथ में जॉन नामक एक व्यक्ति चिड़ियाघर के साँपों की देखभाल करता है। उसे भी साँपों के साथ रहने का अद्भुत शौक है। उसकी कोठरी में एक जहर के लगभग एक से बढ़कर एक खतरनाक साँप हैं। वह 49 घंटे तक उनके साथ रह भी चुका है।
अमेरिका के बील्फ डेविड को तरह-तरह के विचित्र एवं खतरनाक जीव-जंतु पालने का शौक हैं। उसने आठ अजगर, बारह नाग, इसके अलावा अनेक छोटे-बड़े साँपों, अनेक कछुओं व बहुत सारे बंदरों से अपने घर को आबाद कर रखा है। डेविड इन जीव-जंतुओं को सिखाता-पढ़ाता भी है। उसके इन मित्रों में से कुछ फिल्मों में भी काम कर चुके हैं।
अपने ही देश के एक स्थान नगीना के 40 वर्षीय सईद अहमद भी सर्पों के अद्भुत प्रेमी हैं। उन्हें न केवल सांपों को पालने का बल्कि कटवाने का भी अद्भुत शौक है। वे साँपों से अब तक इतना कटवा चुके है कि उनके अनुसार अब वह विषपुरुष बन गए हैं। गत बीस वर्षों में वह हजारों साँप पकड़ चुके हैं, लेकिन वे इन्हें मारते नहीं हैं । वे तो इन्हें पकड़कर हिमालय के तराई क्षेत्रों के वनों में छोड़ आते हैं। ये अपने इस शौक में इतना मशगूल हैं कि उनका अच्छा-खासा कारोबार भी चौपट हो चुका है। सईद का कहना है कि वे स्वयं भी नहीं जानते कि उन्हें साँपों से इतना प्रेम क्यों है।
इस संबंध में इतना कह सकते हैं कि यह संसार विचित्र एवं आश्चर्यजनक शौकीनों से भरा पड़ा है। इनमें से अधिकाँश तो मनुष्य की बुद्धिमत्ता एवं समझदारी पर ही प्रश्नचिह्न लगा देते हैं। मात्र कौतुक, दिखावे, वाहवाही लूटने व विलासिता के लिए चित्र-विचित्र शौक पालने का औचित्य समझ में नहीं आता। अच्छा यही हो कि मनुष्य जीवन की गरिमा को समझकर अपने समय, श्रम एवं प्रतिभा का उपयोग किया जाए। उचित यही है कि स्वयं सार्थक जीवन जिए और दूसरों को सार्थकता की प्रेरणा दें।
जब आत्मा हर कर्त्तव्य का तुरंत पालन करना चाहे तो उसे ईश्वर की उपस्थिति का भान है।
एक बार ब्रह्म सरोवर ने शिकायत की-”भगवन् आप भगवती गंगा की इतनी सराहना करते हैं, हम भी तो लोगों को शीतलता और सद्गति प्रदान करते हैं, वह पुण्य हमें क्यों नहीं मिलता ?” भगवान विष्णु ने गंभीर होकर उत्तर दिया-”भगवती गंगा स्थान-स्थान, घर-घर में जाकर लोगों की प्यास बुझाती और सद्गति प्रदान करती हैं, जबकि आप तो केवल उन्हें देते हैं जो आपके पास आते हैं।”
ब्रह्म-सरोवर ने अनुभव किया भगवती गंगा सचमुच महान् हैं। उन्हें अपने भीतर कभी-कभी विकार पैदा होने का कारण भी ज्ञात हो गया है।
एक गीदड़ एक दिन गड्ढे में गिर गया। बहुत उछलकूद की, किंतु बाहर न निकल सका। अंत में हताश होकर सोचने लगा कि अब इसी गड्ढे में मेरा अंत हो जाना है। तभी एक बकरी को मिमियाते सुना। तत्काल ही गीदड़ की कुटिलता जाग उठी। वह बकरी से बोला-बहिन बकरी । यहाँ अंदर खूब हरी-हरी घास और मीठा-मीठा पानी है। आओ जी भरकर खाओ और पानी पियो। बकरी उसकी लुभावनी बातों में आकर गड्ढे में कूद गई।
चालाक गीदड़ बकरी की पीठ पर चढ़कर गड्ढे से बाहर कूद गया और हंसकर बोला-तुम बड़ी बेवकूफ हो, जो मेरी जगह करने गड्ढे में आ गई हो। बकरी बड़े सरल भाव से बोली-गीदड़ भाई, मेरी उपयोगितावश कोई न कोई मुझे निकाल ही लेगा, किंतु तुम अपने ही दुर्गुणों के कारण विनाश-बीज बो लोगे।
थोड़ी देर में मालिक ढूँढ़ता हुआ बकरी को निकाल ले गया। रास्ते में जा रही बकरी ने देखा, वहीं गीदड़ किसी के तीर से घायल हुआ झाड़ी में कराह रहा है।
भगवान कृष्ण की अनन्य भक्ति ही उनका जीवन बन गई थी। कृष्ण नाम में उनकी तल्लीनता-तन्मयता औरों को भी कृष्णप्रेम में विभोर कर देती । प्रभु से प्रेम करना उन्हें किसी ने सिखाया नहीं था। यह तो उनका अंतः स्फुरित भाव था, जो बचपन में ही जग पड़ा था। सौराष्ट्र के घोघावरर गाँव में जगदयाल एवं उनकी धर्मप्राण पत्नी शामबाई की वह लाड़ली संतान थे। माता-पिता ने उन्हें बहुत प्यार से पाला-पोसा। वे अपने पुत्र की हर इच्छा पूरी करने की कोशिश करते। परंतु वे तो जैसे किसी अन्य लोक में विचरते थे। कृष्ण-स्मरण में न तो उन्हें अपनी देह की सुधि रहती और न ही खाने-पीने की। उनके ये हाल देखकर उनके माता-पिता ने यह अनुमान लगा लिया कि उनके बालक के पूर्व जन्म के संस्कार उसे निर्दिष्ट दिशा में लिए जा रहे हैं। उन्होंने भी निश्चय किया कि वे अपने पुत्र की तप-साधना और ईश्वर प्रेम में बाधक नहीं बनेंगे।
उनके गाँव में एक दिन श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। वे भी गए। कथावाचक महोदय कह रहे थे-कृष्ण -प्रेम तो अहंशून्य अंतर्चेतना में पनपता है और यह अहंशून्यता तो सद्गुरु के कृपाप्रसाद से मिलती है। उन्हें लगा मानो उन्हें जीवनदृष्टि मिल गई । अब उन्हें सद्गुरु की खोज थी। इसी खोज ने उन्हें जामनगर के संत मोरार साहब के पास पहुँचाया।
संत मोरार साहर जामनगर के राजा रणमल के राजगुरु विभूषित संत थे। वे महान तपस्वी, अंतःदृष्टि संपन्न एवं योग-ऐश्वर्य से विभूषित संत थे। पर वे एक बहुत बड़ी रियासत के राजगुरु थे, इसीलिए अनेक लोग, विशेष करके धर्माधिकारी उनकी ख्याति से मन-ही मन गहरी ईर्ष्या करते थे। इस ईर्ष्या ने उनकी मानसिक वृत्तियों को कलुषित एवं प्रदूषित कर दिया था। इसी दूषित मनोवृत्ति की वजह से वे सदा ही उनकी हत्या का प्रयास करते रहते थे। एक के बाद एक अनेक प्रयास करते, परंतु भगवत्कृपा से वे सभी असफल हो जाते और मोरार जी का बाल भी बाँका न होता। इन प्रयत्नों के लिए शायद यही कहना होगा कि धर्म का शुद्ध स्वरूप, धर्म के ध्वजा धारकों, ठेकेदारों को कभी पसंद नहीं आया।
लेकिन वे तो अपनी सच्ची श्रद्धा एवं निश्छल भक्ति को लेकर मोरार साहब के पास गए थे। मोरार साहब ने भी उनके बालक मन में ईश्वरप्रेम की सच्ची प्यास देखी थी। वे तो गुरु-भक्ति को ही ईश्वर भक्ति मान अपने सद्गुरु मोरारसाहब की सेवा किया करते । उन्हीं के साथ देवदर्शन करने जाते और गुरु की गायों को जंगल में चुराने ले जाते।
एक दिन ईर्ष्यालु धर्माधिकारी और उसके कुछ चाटुकारों ने मोरारसाहब के पूजा-पुष्पों में एक जहरीला नाग छिपा दिया। शाम के समय अनेक स्थानों से फूलों की टोकरियाँ सबेरे की पूजा के लिए आती थीं। मोरारसाहब भी प्रत्येक टोकरी में से थोड़े-थोड़े फूल लेकर देवमंदिर में चढ़ा आते थे।
उस दिन एक बड़ी सी टोकरी में चंपे का हार देखकर वे बोले, देख बेटा जीवण, यह हार कितना सुँदर है।
जीवण उस समय गायों को घास खिला रहा था। उसने वहीं से जवाब दिया, बहुत सुँदर है, महाराज ।
ले, सुँदर है तो तू ही इसे पहन ले। कहकर मोरारसाहब ने उनके गले में हार डाल दिया।
हार जब गले में आया, तब उन्हें पता चला, यह हार नहीं, बल्कि फूलों में छिपा हुआ नाग है। किंतु उनमें अपने गुरु के प्रति अपूर्व विश्वास था, उन्होंने सोचा कि गुरु ने प्रेम से जो पहना दिया, उसे निकाला कैसे जा सकता है।वे तो निर्भयतापूर्वक हार को पहने हुए गुरु के साथ मंदिर की ओर चल पड़े । मंदिर में दाखिल होकर जैसे ही उन्होंने शिवजी को दंडवत प्रणाम किया, नाग झटपट दौड़कर शिवलिंग से लिपट गया। जीवण मंत्रमुग्ध होकर प्रणामी मुद्रा में यह अद्भुत दृश्य देखते रह गए।
संत मोरारसहाब ने उन्हें उठाकर अपने सीने से लगा लिया और वे उनके साथ अपने निवास की ओर चल पड़े। चलते हुए गुरु और शिष्य दोनों के ही नेत्रों में भावबिंदु छलक रहे थे।
एक दिन सद्गुरु की प्रेरणा से जीवण ने आस-पास के पाँच गांवों की ओर से मिला हुआ पूजा का निमंत्रण स्वीकार कर लिया। पर जब प्रस्थान का समय आया, तो अपने गुरुदेव को आराम से लेटे हुए देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ। जब गुरुदेव खर्राटे लेने लगे, तब वे धैर्य खो बैठे और गुरुदेव की कीर्तरक्षा के लिए घोड़ी पर सवार होकर पास वाले गाँव में पहुँच गए।
गांव में पहुँचकर तो उनका आश्चर्य दुगना हो गया। वहाँ उन्होंने देखा कि उनके गुरुदेव एक खाट पर बैठे इकतारा बजा रहे थे। वह तुरंत वहाँ से दूसरे गाँव की ओर चल पड़े। इस दूसरे गाँव में पहुँचकर उनका आश्चर्य और बढ़ गया। यहाँ उनके सद्गुरु पूजा करने में लगे थे। इस अचरज से परेशान जीवण ने फिर से घोड़े की पीठ पर सवारी की और थोड़े ही समय में तीसरे गाँव पहुँच गए। नियत स्थान पर पहुँचने पर देखा कि उनके श्रद्धेय गुरु यहाँ भक्तों के साथ कीर्तन कर रहे थे।
अब तो उनका आश्चर्य सारी सीमाएं पार कर गया। फिर भी वह चौथे गाँव की ओर चल पड़े । यहाँ जब वे आमंत्रित स्थान पर पहुँचे तो देखा कि गुरुदेव श्रोताओं को भागवत कथा सुना रहे थे। अब पाँचवें स्थान की बारी थी। यहाँ पहुँचने पर उन्होंने देखा कि गुरुदेव श्रद्धालुओं के साथ भगवान की आरती कर रहे हैं। इस प्रकार पाँचों गाँवों का परिभ्रमण कर जब वह आश्चर्यचकित मन से जामनगर अपने गुरुदेव के निवासस्थान पर पहुँचे तो उन्होंने देखा कि गुरुदेव संत मोरारसाहब वहाँ पर भी प्रसाद का थाल लिए दरवाजे पर खड़े-खड़े स्नेह से उसे देख रहे हैं।
बहुत थक गया होगा, बेटा। जीवण को घोड़े से उतरते हुए देखकर मोरारसाहब कहने लगे-ले थोड़ा सा जलपान कर ले।
जीवण लज्जित होकर गुरुदेव के चरणों में गिर पड़े। वह अपने परम सद्गुरु के विराट स्वरूप को देखकर जहाँ भावविभोर थे वहीं उन्हें अपनी अज्ञानता पर लज्जा आ रही थी। वह उनसे हाथ जोड़कर क्षमायाचना करने लगे।
बेटा जीवण मोरारसाहब ने अपने शिष्य के माथे पर हाथ रखते हुए कहा, “तू परेशान क्यों है ? आखिर इतनी सारी भागदौड़ तूने मेरे ही काम के लिए की।”
“नहीं प्रभु “ जीवण श्रद्धा के अतिरेक में सिसकते हुए बोले, “शिष्य का सबसे बड़ा अपराध उसकी अहमन्यता तब होती है, जब वह यह समझ लेता है कि वह गुरु का महत्वपूर्ण काम कर रहा है अथवा उसके बिना गुरु का काम नहीं होगा। हे सद्गुरु। शिष्य तो गुरु के पास अहं शून्य होने के लिए आता है और मैं तो अपने अहं का पोषण करने लगा था।
मेरारसाहब जीवण की इस भक्ति से प्रसन्न हो गए, बोल, “बेटा जीवण तुम शोक न करो। तुम्हारी सभी परीक्षाएं पूरी हुईं। मेरे आशीष से तुम अबसे सर्वथा अहंशून्य होगे और तुम्हें प्रभु श्रीकृष्ण का निर्मल प्रेम प्राप्त होगा।” सद्गुरु के ये वाक्य उनके जीवन में पूरी तरह सार्थक हुए। उन्होंने भी अपनी सारी उपलब्धियों का श्रेय ‘गुरुकृपा’ को ही दिया। उनके प्रत्येक भजन की समाप्ति ‘गुरु प्रताप’ से ही होती है।उनका अनमोल वचन है, ‘गुरुकृपा’ ही शिष्य के जीवन में ईश्वरकृपा बनकर अवतरित होती है।
जयपुर के राजा मानसिंह गुजरात की तरफ से आ रहे थे। मार्ग में उन्होंने मेवाड़ में पड़ाव डाला और चित्तौड़ के महाराज के मेहमान बने। उस समय चित्तौड़ में महाराणा प्रताप शासन करते थे। राजा मानसिंह के साथ भोजन पर उन्होंने अपने पुत्र अमरसिंह को भेज दिया और स्वयं नहीं गए। इस पर मानसिंह ने पूछा तो प्रताप ने कहला भेजा जिसे अपने धर्म, जाति, संस्कृति को गौरव ने रहा हो, जो आततायियों से मिल गया हो, उन्हें अपनी बुआ दे दी हो, उसके साथ मैं भोजन नहीं कर सकता।
अपमानित मानसिंह दिल्ली लौट गया। बादशाह के कान भर, अपने ही स्वजातीय वीर महाराणाप्रताप के विरुद्ध मुगलों की भारी सेना लेकर आया। प्रसिद्ध हल्दीघाटी के युद्ध में मुट्ठी भर राजपूतों ने शत्रु के दाँत खट्टे कर दिए। प्रताप ने परिस्थिति के अनुसार जंगलों में रहकर संघर्ष करना स्वीकार किया, पर कभी भी, किसी भी शर्त पर अपना स्वाभिमान न छोड़ा। संधि की सभी शर्तें नामंजूर कर वे आगामी पीढ़ी के लिए एक प्रेरणापुँज बन गए।
एक साधु ने अपने सो सकने जितने आकार की एक झोंपड़ी बनाई । अकेला रहता था। वर्षा की रात में एक और साधु कहीं से आया। उसने जगह माँगी। झोंपड़ी वाले ने कहा-इसमें सोने की जगह एक के लिए है, पर बैठे तो दो भी रह सकते हैं। आधी रात काटी। इतने में एक तीसरा साधु और कहीं से भागता हुआ आ गया। वह भी आश्रय चाहता था। झोंपड़ी वाले साधु ने फिर कहा-जगह तो कम है, पर खड़े होकर हम तीनों रात काट सकते हैं। तीनों खड़े रहकर वर्षा से बचाव करते रहे। यदि अंदर उदारता हो, वसुधैव कुटुँबकम् का भाव हो तो कम साधनों में भी अधिक व्यक्तियों का निर्वाह होता रह सकता है।
न जाने क्यों ऐसे अनचाहे क्षण आ ही जाते हैं, जब हम दुःखी एवं निराश हो जाते हैं। हमारा मन उदास हो जाता है। यों तो यह उदासी जीवन का एक सहज भाव है, यदा-कदा आ ही जाता है, परंतु उदासी का यह भाव जब बिना किसी कारण मन की गहराइयों में उतरकर इस तरह छा जाए कि कुछ भी अच्छा न लगे, जीवन बिलकुल नीरस व व्यर्थ लगने लगे, तब समझो कि हम अवसाद या डिप्रेशन के कुहासे से बुरी तरह घिर गए।
‘डिप्रेशन’ एक आम प्रचलित शब्द है। किसी का कोई नुकसान हो जाए, किसी को कोई परेशानी हो अथवा कोई दिमागी तनाव हो तो लोग तुरंत अपने आप को डिप्रेशन को शिकार मान लेते हैं, जबकि बात ऐसी नहीं है। चिकित्सा-विज्ञान खासतौर पर मनोरोग विज्ञान में डिप्रेशन उस बीमारी का नाम है, जिसके साथ लक्षणों को एक समूह जुड़ा होता है।ये सभी लक्षण मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-मानसिक लक्षण एवं शारीरिक लक्षण।
इनमें मानसिक लक्षण ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। तनाव, याददाश्त की कमी, मन की परेशानी , किसी काम में मन का न लगना, हर वक्त किसी न किसी निषेधात्मक विचार से घिरे रहना मुख्य मानसिक लक्षण हैं। दिमाग में विचारों का प्रवाह कुछ इस तरह चलता रहता है, जैसे कोई टेप चल रहा हो। ऐसी मनोदशा में किसी अखबार या पुस्तक को पूरा पढ़ लिया जाता है, पर बाद में कुछ भी याद नहीं रहता। निराश रहना, सदा रोने का मन करना, कहीं अकेले जाने की हिम्मत न कर पाना, किसी बीमारी का डर महसूस होना डिप्रेशन के ही लक्षण हैं। शारीरिक लक्षणों में बिलकुल भूख न लगना, नींद न आना, कब्ज या बदहजमी हो जाना ही मुख्य हैं। रोग ज्यादा बढ़ जाने की स्थिति में रोगी पानी पीना बंद कर देता है। व्यक्ति का वजन कम होने लगता है एवं कमजोरी आने लगती है।
प्रायः देखा जाता है कि डिप्रेशन का एक अटैक चार से छह महीने तक चलता है। उसके बाद डिप्रेशन अपने आप ही ठीक हो जाता है। हालाँकि यह कह पाना मुश्किल है कि डिप्रेशन के अटैक कितने दिनों के अंतराल में होंगे ? वैसे सामान्यतया माइनर डिप्रेशन के अटैक हर दो या तीन वर्ष के अंतराल में या कुछ मरीजों में दस साल के अंतराल में भी हो सकते हैं। जब अटैक बार-बार होने लगे, तो यह लक्षण मेजर डिप्रेशन का होता है। डिप्रेशन या अवसाद की शिकार ज्यादातर महिलाएँ होती हैं। एक शोध-अनुसंधान के अनुसार 12 प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी अवसाद का शिकार होती हैं, जबकि पुरुषों के यह सिर्फ 9 प्रतिशत पाया गया है। पहले यह समझा जाता था कि बच्चे अवसाद के शिकार नहीं होते, परंतु नवीनतम वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह साबित हो चुका है कि आज के दौर में बच्चे भी अवसादग्रस्त रहने लगे हैं।
विज्ञानवेत्ताओं का मानना है कि हमारे दिमाग में कई तरह के न्यूरोट्राँसमीटर्स होते हैं, जो संदेशवाहक का काम करते हैं। इनके बनने और नष्ट होने की प्रक्रिया में जब गड़बड़ी पैदा हो जाती है, तब यही गड़बड़ी डिप्रेशन कहलाती है। वैज्ञानिकों का आकलन है कि यह किसी भी देश में और किसी भी व्यक्ति को हो सकती है। फिर भी कई ऐसी बातें होती हैं, जो आमतौर पर इसका कारण बनती हैं। पहला कारण प्रतिक्रियागत है, जैसे किसी मानसिक आघात से, निकट संबंधी की मृत्यु से, आर्थिक हानि या प्रेम अथवा परीक्षा में असफलता से एवं किसी अपमान से। दूसरा कारण शारीरिक व्याधि है। यह किसी शारीरिक रोग का लक्षण भी हो सकता है। जैसे -ब्रेन ट्यूमर, यकृतशोध आदि लंबी असाध्य बीमारी भी इसका कारण बन सकती है। इतना ही नहीं कुछ औषधियां, विशेष रूप से रक्तचाप कम करने की औषधियां भी इसका कारण हो सकती हैं। तीसरा कारण अंतर्जनित है। वंशगत एवं अंतर्निहित असामान्य रासायनिक प्रक्रियाओं के कारण भी डिप्रेशन हो सकता है।
इन सबके अलावा हमारी जीवनशैली की कई सामान्य बातें भी गंभीर अवसाद का कारण बन जाती हैं। जैसे कई बार ऐसा होता है कि हम सोने में देरी कर देते हैं अथवा उठने में बहुत जल्दी कर जाते हैं। लगातार कई दिनों तक यदि हमारे शरीर को पूरा आराम नहीं मिल पाता तो हम अवसाद के शिकार हो सकते हैं। इसी तरह अपनी कमियों को लेकर हीन-भावना से ग्रस्त रहना या जरूरत के ज्यादा असंतुष्ट रहना भी अवसाद को आमंत्रित कर सकता है। संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार प्रणाली का प्रचलन इन दिनों बढ़ा है। ऐसे परिवार में सिर्फ युवा पति-पत्नि व अवयस्क बच्चे होते हैं, जहाँ किसी विपरीत परिस्थिति में कोई मदद करने वाला नहीं होता। इससे असुरक्षा की भावना पैदा होती है, जो अवसाद का कारण बन जाती है।
उम्र के अनुसार भी इसके अलग-अलग कारण हैं। एक छोटे बच्चे के लिए माता-पिता के प्यार-दुलार का अभाव या उनके आपसी मतभेद और लड़ाई-झगड़े अथवा माता-पिता में से किसी का निधन ऐसे हालात हैं, जो उदासी की अभिव्यक्ति वह खाना-पीना छोड़ने, तुतलाकर बोलने, रात में बिस्तर गीला करने जैसी हरकतों से करता है। किशोरावस्था में बच्चों के हृदय में एक प्रकार का द्वंद्व रहता है। वह एक ओर जहाँ अधिक से अधिक स्वतंत्रता चाहता है, वहीं दूसरी ओर माता पिता व अन्य स्नेहीजनों का प्यार भी नहीं खोना चाहता । इस अंतर्द्वंद्व में फंसा किशोर-मन अवसाद की कड़वी सच्चाइयों से होता है। तीस से पचास की उम्र में बच्चों की समस्याएं, नौकरी व व्यवस्था को लेकर असंतोष, घर-परिवार में भावनात्मक असंतुष्टि, वैवाहिक संबंधों में बिखराव, शरीर पर उम्र का असर मन को गहरे अवसाद में डुबोने का कारण बन सकता है।
महिलाओं में प्रसूति के बाद तनाव ज्यादा होता है। मनोचिकित्सकों के अनुसार 40 प्रतिशत महिलाओं को प्रसव के बाद नार्मल या क्रोनिक डिप्रेशन हो जाता है। नॉर्मल डिप्रेशन बच्चा होने के बाद प्रथम सप्ताह में ही शुरू हो जाता है और स्वयं ठीक भी हो जाता है। क्रोनिक डिप्रेशन ज्यादा खतरनाक होता है, क्योंकि इसकी शिकार महिलाओं में आत्मविश्वास की कमी आ जाती है। वे बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहने लगती हैं। हमेशा ही नकारात्मक विचारों में डूबी रहती है। भविष्य को लेकर सशंकित रहती है। प्रसव के पश्चात क्रोनिक डिप्रेशन होने का कारण हार्मोन्स में ‘सेरोटोनन’ नामक केमिकल का कम या ज्यादा होना होता है।
अभी कुछ समय पूर्व हुए एक मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार प्रति हजार व्यक्तियों में लगभग 16 व्यक्ति इस मानसिक रोग से पीड़ित हैं। विदेशों में तो यह स्थिति और भी चिंताजनक है। सिर्फ अमेरिका में लगभग दो करोड़ व्यक्ति डिप्रेशन से प्रभावित हैं। अवसाद की यह बीमारी न सिर्फ मानसिक बाधा उत्पन्न करती है, बल्कि ज्यादातर आत्महत्याओं का मुख्य कारण भी यही है। अतः इसका उपचार आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।
पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ मेडिकल साँइसेज के प्राध्यापक डा. डेविड वर्न्स ने अपनी पुस्तक ‘फीलिंग गुड’ में लिखा है कि डिप्रेशन का मुख्य कारण त्रुटिपूर्ण विचार होते हैं। इन विचारों पर नियंत्रण करके हम व्यर्थ की उदासी से बच सकते हैं। इसके लिए उन्होंने ‘संज्ञात्मक चिकित्सा का सिद्धांत’ विकसित किया है। इसके अनुसार चिकित्सा के दौरान चिकित्सक रोगी को उत्साहित करते हैं कि वह अपने नकारात्मक विचारो को सुने और उस पर ध्यान दे। इसमें रोगी को पूरी तरह प्रशिक्षित किया जाता है कि वह विध्वंसक विचारक्रम के उठते ही उन पर काबू पाने के लिए क्या करे? यह रीति-नीति एक प्रकार से ‘अपनी मदद आप करें’ की है। इसके अंतर्गत नकारात्मक विचारों के उठते ही उन्हें दिल में बसाने की बजाय कागज पर उतार लेना चाहिए और ऐसे विचारों को हृदय में स्थान देना चाहिए, जो उद्देश्यपूर्ण हों, जीवन के करीब हों।
कलात्मक अभिव्यक्ति जैसे-नृत्य, संगीत, साहित्य लेखन आदि से भी अवसाद पर काबू पाया जा सकता है। अनेक वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है और यह बात पूरी तरह से साबित हो चुकी है कि कलात्मक गतिविधियों में अभिरुचि बढ़ाने से मानव−शरीर में कुछ ऐसे परिवर्तन होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप वह स्वयं को चुस्त-दुरुस्त महसूस करता है। यहाँ तक कि उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाती है। कलात्मक अभिरुचि एवं अभिव्यक्ति से मस्तिष्क के बायें एवं दायें गोलार्द्ध के आपसी संबंधों में मजबूती आती है। जिससे कठिनाइयों से जूझने की शक्ति का विकास होता है, साथ ही समस्याओं का सही हल ढूंढ़ने में आसानी होती है।
विभिन्न व्यायाम भी अवसाद की स्थिति से उबरने में सहायक होते हैं। ‘मानसिक आरोग्य राष्ट्रीय संस्थान अमेरिका’ के अनुसंधानकर्त्ताओं ने अपने विभिन्न शोधनिष्कर्षों से यह प्रमाणित कर दिया है कि व्यायाम से व्यक्ति का सारा अवसाद दूर हो जाता है। प्रयोगों से पता चला है कि अवसादग्रस्त व्यक्ति में नारएपिनैफाइन, डोपामाइन आदि न्यूरोट्राँसमीटरों की कमी पाई जाती है। विभिन्न व्यायामों से इन्हें संतुलित रखने में मदद मिलती है।
जहाँ तक इसके निदान के तौर-तरीकों का सवाल है, परिस्थितियों के मुताबिक ये कई है। मनोचिकित्सक औषध परामर्श भी देते हैं। इलेक्ट्रो कन्डयूसिव थैरेपी भी प्रयोग में लाई जाती है। इसके अंतर्गत विद्युत तरंगों को एक निश्चित पैमाने पर दिमाग में प्रविष्ट कराया जाता है। ‘साइकोथेरेपी’ भी इसके निदान का एक तरीका है। इसमें व्यक्ति की मानसिकता को समझकर उसकी परेशानी के समाधान सुझाए जाते हैं। कुछ रोगी ऐसे होते हैं, जिनके व्यवहार में अवसाद घर का जाता है। ऐसे रोगियों को कागनिटिव बिहेवियर थैरेपी द्वारा यह समझाता जाता है कि उनके व्यवहार में क्या असामान्य बाते हैं, जिन्हें उन्हें बदलना है।
अवसाद मूलतः एक मनोभाव है और मनोभाव हमारे विचारो का ही प्रतिबिंब होता है। यदि हम अपने विकृत विचारों के उन्मूलन का साहस जुटा सकें, तो निश्चय ही हम कभी अवसादग्रस्त नहीं होंगे। अपनी कमियों को आत्महीनता का कारण बनाने की बजाय हममें उन्हें दूर करने का आत्मबल होना चाहिए। बेहतर यही होगा कि हमारी नियमित दिनचर्या भी खुशी व उल्लास से परिपूर्ण हो। हर स्थिति में हमें घुटन से बचने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में आई विपरीत परिस्थितियाँ पानी के बुलबुलों की तरह होती हैं, जो स्वयं ही समाप्त हो जाती हैं। मन की शाँति पर उनका प्रभाव पड़ने देना किसी भी तरह से बुद्धिमत्ता नहीं कही जा सकती। सहनशक्ति की कमी व आत्मदृढ़ता का अभाव ही हमें छोटी-छोटी बातों पर उदास कर देता है। हमें इस बात को जान लेना चाहिए कि जीवनयात्रा में उतार-चढ़ाव एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी स्वयं को शाँत व प्रसन्न रख पाते हैं, वही अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होते हैं।
जीभ की क्षमता को अनर्गल बातें कहने में नष्ट न करो। उससे वह कहो जिससे तुम्हारा गौरव और सुनने वाले का भविष्य बने।
कौशांबी राज्य में एक बार भयंकर अकाल पड़ा। लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए। अभावग्रस्त मनुष्य मृत्यु के मुँह में जाने लगे। नगर के नगर और गाँव के गाँव खाली हो गए। इसी नगर में चंपक नामक एक ईमानदार मजदूर रहता था । उसकी पत्नी भी उसी के समान धर्मपरायण थी। दिनभर वे कड़ी मेहनत करते, शाम को जो कुछ मिलता, बच्चों को खिला देते, बचता तो खाते, नहीं तो स्वयं भूखे सो जाते। कुछ ही दिनों में यह भी मिलना बंद हो गया। दोनों बच्चे अकाल देवता की भेंट चढ़ गए।
एक दिन भूखा-प्यासा चंपक हव्या के साथ घर लौट रहा था। उसने रास्ते में सोने का एक कड़ा पड़ा देखा। पत्नी को कहीं उसका मोह न जाग पड़े, इसलिए उसने उस कड़े के ऊपर धूल डाल दी।
हव्या अभिप्राय समझ गई। उसने कहा-”स्वामी नाहक ही धूल पर धूल डाल रहे हैं, आप इतने निर्लाभी हैं, तो आपकी हव्या क्या आपके आदर्श से डिग सकती है ?”
भगवान ये सब देख रहे थे। दोनों के आत्मसंतोष व निर्लाभता को देखकर उन्होंने कहा-जहाँ ऐसे देवता रहते हों वहाँ अकाल नहीं रह सकता। उस रात खूब जलवृष्टि हुई।
एक पुजारी नियत समय पर पूजा करने आता और आरती करते-करते भावविह्वल हो जाता। घर आते ही अपनी पत्नी-बच्चों के पति कर्कश व्यवहार करने लगता है। एक दिन उसका छोटा बच्चा भी साथ लगा चला आया । पुजारी स्तुति कर रहा था-’हे प्रभु तुम सबको प्यार करने वाले, सब पर करुणा लुटाने वाले हो।”
अभी वह इतना ही कह पाया था कि बच्चा बोल उठा-”हे पिता। जिस भगवान के पास इतने दिन रहने पर भी आप करुणा और प्यार करना न सीख सके, उसे भगवान के पास रहने न रहने से क्या लाभ ?” पुजारी को अपनी भूल मालूम पड़ गई और वह उस दिन से आत्मनिरीक्षण व आत्मसुधार में लग गया।
तब जीवराम भाई काठियावाड़ के एक छोटे से राज्य के पुलिस विभाग में नौकरी करते थे। काम तो उन्होंने बड़े मामूली ओहदे से शुरू किया था, पर तरक्की करते-करते उस समय तक वह फौजदार के पद पर पहुँच चुके थे। गाँव छोटा था, राज्य भी छोटा था अधिकारी थोड़े थे। जीवाराम भाई भी अपनी नौकरी में सुखी थे। ग्रामीणजनों के मन में उनके प्रति आदर था।उस जमाने में सत्तर पचहत्तर रुपये की छोटी सी नौकरी में भी उनके दिन आनंद से गुजर रहे थे। वह खुद को सुखी मानते थे।
यह मान्यता उनके अकेले की कहाँ थी ? दूसरे लोग भी उन्हें कुछ ज्यादा ही सुखी मानते और समझते थे।यह कुछ अच्छी बात न थी, क्योंकि दूसरों को ऐसा मानना उनके प्रति ईर्ष्या उपजाता था और ईर्ष्या का परिणाम अच्छा नहीं होता, यह तो सभी जानते हैं । ईर्ष्या करने वालों में खासतौर पर उनके ही विभाग में काम करने वाला एक काठियावाडी भाई था। उसका नाम था करमचंद भाई। फौजदार के गौरवमय पद की तनख्वाह थी-पचहत्तर रुपये । करमचंद भाई की सोच थी कि यह पद उन्हें मिल जाए तो ? तो ......... तो फिर स्वर्ग का राज्य भी पाया जा सकता है और यदि जीवाराम भाई की तरह रियासत के स्वामी की कृपादृष्टि भी मिल जाए तो फिर क्या कुछ ही किया जा सकता ।
पर यह सब हो कैसे ? करमचंद भाई हमेशा इसी उधेड़बुन में उलझे रहते । जीवाराम भाई यह पद छोड़े , तभी यह मुमकिन था। पर जीवाराम भाई ऐसा क्यों करते? वे जवान थे। हट्टे-कट्टे और कद-काठी से मजबूत थे। राजा और प्रजा दोनों के ही चहेते थे और सबसे बड़ी बात, अपने काम में होशियार थे। उन्हें भला पद छोड़ने के लिए कौन कह सकता था। फिर ऐसी बात कोई मानता भी क्यों और किस लिए ? बस एक ही तरीका था, उनसे पद छुड़वाने का कि वे किसी भी तरह राजा की नजर से गिर जाएँ।
क्रमचंद भाई भी जवान थे, शरीर से भी मजबूत थे। उनमें महत्वाकाँक्षा तो थी, पर मेहनत की भी कोई कमी न थी। जीवाराम भाई को राजा की नजर से गिराने के लिए हर संभव उपाय उन्होंने आजमा लिए। तरह-तरह की चालें .चलीं। अपनी खोटी बुद्धि की हर तिकड़म लड़ाई, पर उनमें किसी भी तरह से कोई सफलता न मिली। अपनी इन कोशों को करते-करते करमचंद भाई को साल दर साल गुजरते चले गए, लेकिन उनका हाल वही का वही रहा, बल्कि कई बार तो उन्हें खुद ही नीचा देखना पड़ा। जीवाराम भई का आसन तो ज्यों का त्यों ही रहा बल्कि शायद थोड़ा सा ऊपर ही उठ गया।
करमचंद भाई भी उनमें से नहीं थे, जो हार मानकर बैठ जाते हैं। उन्होंने भी आखिरकार एक मार्ग तलाश लिया । उनकी अपनी समझ में यह अंतिम और सुनिश्चित सफलता का मार्ग था।
गीगा उसी गाँव का रहने वाला था। अभी हाल ही में वह जेल से छूटकर आया था। बड़ा ही शातिर बदमाश था वह । सभी उससे डरते-दबते थे। जिधर से भी वह निकल जाता, लोग सहम जाते । इन दिनों सुना यही जा रहा था कि उससे अपराध कबूल करवाने के लिए उसे जेल में बड़ी बड़ी यातनाएं दी गई थी। उस पर लाठियों की बारिश करने वाले फौजदार जीवाराम भाई ही थे। गीगाराम को जेल में दी गई यातना के बारे में तरह-तरह की अनेक कहानियाँ लोगों में फैली हुई थी । करमचंद भाई को गीगा अपने काम के लिए सबसे उपयुक्त आदमी लगा । वह उससे जाकर मिले। उसे तरह-तरह से समझा-बुझाकर बहलाया-फुसलाया और कई तरह के लालच देने के साथ उसके मन के वैरभाव को जाग्रत किया।
आखिरकार वह अपने मकसद में सफल ही ही गए । गीगा जीवाराम भाई से बदला लेने को राजी हो गया उन्होंने गीगा को वचन दिया कि इस काम के बदले वह उसे पचास रुपये देंगे। ये पचास रुपये उन दिनों काफी बड़ी रकम होती थी। यदि उसे कुछ हो गया या वह जेल चला गया, तो उसके परिवार वालों का ध्यान रखेंगे। पाँच रुपये की परेशानी देकर, उन्होंने चैन की साँस ली।
गीगा इसके लिए तैयारी करने लगा ।वह अपने हथियार की धार तेज करता और करमचंद उसका उत्साह बढ़ाते अंत में एक दिन उनके मन की मुराद पूरी होने की रात आ पहुँची।
करमचंद भाई ने उसे अंतिम हिदायत दी, हिम्मत भी बढ़ाई, देखना गीगा, आखिरी वक्त पर डर मत जाना। गीगा बोला-आप निश्चिंत रहें करमचंद भाई । इस गीगा को कुछ भी बिताने-समझाने की जरूरत नहीं है। ज्यों ही रात घनी हुई, वह अपने काम के लिए निकल पड़े।
रात घनी और अंधेरी थी रास्ता सुनसान और वीरान था। किसी अपराध की जाँच करने गए हुए जीवाराम भाई का घोड़ा उन्हें लिए हुए अपने परिचित रास्तों से वापस लौट रहा था। गाँव अभी काफी दूर था । तभी किसी ने घोड़े को रोका। थके-माँदे जीवाराम भाई अचानक आई इस रुकावट से सावधान हो गए । एक चेतावनी उन्हें सुनाई दी-होशियार रहो, जिसकी कल्पना न करमचंद ने की थी और न ही जीवाराम भाई ने।
गीगा ने अपना उठाया हुआ हथियार जीवाराम भाई के हाथों में सौंप दिया। फौजदार साहब । आपका अहसान भूला तो मेरे रोम-रोम से कोढ़ फूट निकले, मेरे शरीरी से रक्त-पित्त बहे। मैं भला यह नीच कर्म किस तरह से करता । पर मैं अभागा यदि मना करता तो यह काम किसी दूसरे को सौंप दिया जाता और जरूर कुछ अनर्थ हो जाता । इसीलिए मैंने यह मनहूस जिम्मेदारी ले ली। आप अब सँभल जाएँ और मैं भागता हूँ। इतनी बात सुनाकर गीगा उस घने अंधेरे में गायब हो गया। सिर्फ जीवाराम भाई अभी भी भगवान की असीम कृपा को याद करते हुए आश्चर्य और आनंद से गदगद खड़े थे।
छोटे से काम का कितना बड़ा बदला भगवान कैसे देता है। जीवाराम भाई सोच रहे थे, गीगा पर किए गए उपकार में तो ऐसा कुछ कहने लायक था ही नहीं।
गीगा जब सरकारी जेल में बंद था, तब उस पर बड़े गंभीर आरोप और आक्षेप थे। ऊपर से सरकारी हुक्म था कि चाहे जैसे बन पड़े, उससे अपने अपराध कबूल करवाने हैं। वह बड़ा ही शातिर बदमाश हैं। सीधी तरह से न माने तो उसे डंडे का जोर दिखाओ। लेकिन बहुत देर तक दरियापत करने पर उन्हें कुछ ऐसा लगा कि शायद गीगा गुनहगार नहीं है, तो फिर मार-पीट से क्या होना ? लेकिन सरकारी हुक्म की अवमानना भी संभव नहीं थी। क्योंकि गीगा ने इस बार भले ही कोई जुर्म न किया हो, पर था तो वह नंबर एक का बदमाश ही। एक शातिर और नामचीन बदमाश के रूप में ही वह जाना जाता था। वह जो न कर गुजरे, वह थोड़ा था।
बहुत सोचने पर भी उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था । बार बार वे यही सोच रहे थे कि ऐसे स्वस्थ जवान इनसान को मार-मारकर भुरता बना दिया जाए, भला यह कहाँ तक ठीक है ? अचानक ही उन्हें एक रास्ता सूझ गया। उन्होंने गीगा से कहा कि सरकारी हुक्म के अनुसार बिना मारे छुटकारा नहीं है, लेकिन तुम भगवान को साक्षी मानकर वचन दो कि भविष्य में अपराध नहीं करोगे, तो मैं तुम्हें बचा लूँगा।
गीगा को यह बात पसंद आई । उसने फौरन ही मान लिया। बस फिर क्या था। अंधेरा होने के बाद उसकी कोठरी में डंडों की बौछार शुरू हो गई। गाली-गलौज की मूसलाधार बरसात भी होने लगी। गीगा की करुणा चीखों से पूरा वातावरण भर गया। सिर्फ गीगा को छोड़कर गाँव और जेल के हर आदमी को लगने लगा कि गीगा पर भारी मार पड़ रही है। मन ही मन हंसते जाते फौजदार साहब और चीख-पुकार मचाता गीगा ही जानते थे कि मार पड़ रही थी जरूर पर गीगा के शरीर पर नहीं ।
इस छोटे-से काम का बदला भगवान ने इस तरह जिंदगी बचाकर जीवाराम भाई को दिया। वे गदगद मन से सोच रहे थे कि भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में बिलकुल सही कहा है-’6न हि कल्याणकृत्कश्चिददुर्गति तात गच्छति” (6/40) । यानि कि किसी भी भले काम को करने वालों को कभी दुर्गति नहीं होती।
हाँ, इस घटना के बाद उन्हें करमचंद भाई पर दया आने लगी। वह अपने घर पहुँचने के बाद भी बार-बार यही सोचते रहते कि देखो तो करमचंद भाई बेचारा कितनी छोटी-सी बात के लिए कितना बड़ा पाप करने के लिए तैयार हो गया। हालाँकि उन्होंने इस घटना का जिक्र कभी किसी से नहीं किया। जीवाराम भाई को इस बात का पता है या नहीं, करमचंद भाई ने इस सच्चाई को जानने के लिए कई कोशिशें जरूर कीं। लेकिन पहले की अपेक्षा अपने प्रति उनके आदर व्यवहार में मिठास और भी अधिक आ गई है, इसके सिवा उन्हें कुछ पता नहीं चला।
कुछ ही समय के बाद जीवाराम भाई ने यह नौकरी छोड़ दी। अपनी नौकरी छोड़ते समय उन्होंने रियासत के स्वामी से योग्यता का बखान करते हुए उन्होंने इस बात की सिफारिश और गुजारिश की कि हो सके तो यह फौजदार का ओहदा उन्हीं को दिया जाए। इसके बाद उन्होंने अपनी मित्र-मंडली और सारे गाँव से विदा ली, उतनी ही मधुरता से करमचंद भाई से भी।
राज्य के नौकर छोड़ने के बाद वह अपने वतन राजकोट आकर रहने लगे। आर्थिक तंगी का होना तो स्वाभाविक था ही। क्योंकि कमाई का और कोई साधन नहीं जुट पाया था। ऐसे में ही एक दिन करमचंद भाई का राजकोट आना हुआ। अब वह फौजदार थे और जीवाराम एक साधारण गरीब-गृहस्थ । जीवाराम भाई ने बड़े आनंद से उनका स्वागत-सत्कार किया और रसोई में जाकर पत्नी से बोले-आज हलुवा बनाना।
पत्नी ने काफी धीमी आवा में कहा, तुम हुक्म तो दे रहे हो, पर तुम्हें मालूम भी है, अपने घर में कत से घर नहीं है। आखिर कौन आया है, ऐसा, जिसके लिए इतना परेशान हो रहे हो।
अपने करमचंद भाई आए हैं।
अरे वह मुआ ? पत्नी ने कहा तो दबी आवाज में, पर उसके चेहरे में तीव्र कड़वाहट उभर आई । करमचंद भाई के पिछले कारनामे उसे अभी भी याद थे। वह कहने लगी-खानी होगी तो रोटी खा लेगा। उसने ऐसा क्या किया है जो................।
पागल हो गई हो तुम ............ जीवाराम भाई हँसे। इतने सालों तक मेरे साथ रहीं, फिर भी समझ नहीं पाईं । अरे, भलाई करने वाले की तो सभी सेवा करते हैं, पर बुराई करने वाले को जो प्यार से सेवा करता है, वही सच्चा मनुष्य है और ईश्वर का सच्चा भक्त भी। घी नहीं है तो कोई बात नहीं, पड़ोसी से उधार माँग लाओ। पर आज हलुवा ही बनाना। जीवाराम भाई इतने प्यार से समझाते थे कि तर्क की कोई गुँजाइश ही नहीं रहती थी। पत्नी ने मौन भाव से पति की बात मान ली।
घी से तर-ब-तर हलुवा और गरम-गरम पकौड़ियाँ जीवाराम भाई ने आग्रह कर-करके करमचंद भाई को खिलाईं। फिर आनंदपूर्वक बातें करके जब करमचंद भाई चले गए, “प्रभु जीवाराम भाई भगवान से प्रार्थना करते हुए बोले, “प्रभु मुझे अपना सच्चा भक्त बनाना, मेरे हाथों से कभी किसी को बुरा न हो। मुझे और कुछ नहीं चाहिए उनका समूचा जीवन लोकसेवा का पर्याय था। साधारण जीवनयापन करते हुए अहिर्निश लोकसेवा-यही उनके जीवन का मूल मंत्र बन गया।
आँगन में दो मिट्टी के घड़े रखे थे। एक का मुँह आसमान की ओर, दूसरे का धरती की ओर। वर्षा आई । जो पात्र ऊपर की उन्मुख था, भर गया। जो औंधे मुँह लेटा था, खाली रह गया। खाली घड़े को बहुत गुस्सा आया। उसने भरे घड़े को भी गालियाँ दीं, वर्षा को भी कोसा। बहुत रात बीतने तक भी जब बकवास बंद न की तो वर्षा बोली-अभागे चिढ़ मत, ईर्ष्या भी मत कर । हमारे यहाँ पात्र को सब कुछ मिलता है, तू भी ऊपर को मुँह कर लेता तो मुझे भी मिलता । बावले अब भी प्रयत्न कर सिर उठा, इस बार तुझे भी दूँगी। घड़े ने बात समझ ली। भूल स्वीकार कर ली।
प्रज्ञा-परिवार की परंपरा रघुकुल जैसी रहे तो ही उसकी शान है, अन्यथा वचन का महत्व न समझने वाले और कभी भी कुछ कह गुजरने वाले समय का तकाजा सामने आने पर ऐसे ही दाँत निपोरते और कंधे मटकाते, गए गुजरे स्तर का परिचय देते हैं। स्मरण रहे कि अध्यात्म और धर्म के क्षेत्र में श्रद्धा ही
सर्वोपरि हैं। जहाँ निष्ठा न हो वहाँ समझना चाहिए कि कर्मकाँडों की औंधी-सीधी विडंबना से भी कुछ प्रयोजन बनने वाला नहीं है।
स्वामीनारायण संप्रदाय के अनुयायी स्वामी सहजानंद के चरणों में सूरत निवासी आत्मराम नामक दरजी ने एक सुँदर अँगरखा भेंट किया तो उपस्थित भक्तगण उसे देखत ही रह गए।
पास में ही भावनगर के राजा विजयसिंह जी बैठे थे । उन्हें वह अँगरखा बहुत पसंद आया। उन्होंने दरजी से कहा-”क्या तुम इससे भी अच्छा एक अँगरखा मेरे लिए बना सकते हो।” दरजी ने कहा-”राजन् इससे अच्छा बन सका होता तो पहले ही बना दिया होता। मैं जो भी काम करता हूँ, सर्वश्रेष्ठ जानकर पूर करता हूँ।
कर्म-कौशल हर स्वाभिमानी के लिए गौरव का विषय होता है। हर अच्छे काम ऐसे ही व्यक्तियों द्वारा संपन्न हुए हैं। जिन्होंने अपनी क्रिया-कुशलता का उत्कृष्टता की सीमा तक पहुँचाने का श्रम किया है।
गताँक से आगे (उत्तरार्द्ध)
शक्तियाँ किनको मिलती हैं ? उनको मिलती हैं, जो अपना परिष्कार कर लेते हैं, जो अपना आत्मबल ऊँचा उठा लेते हैं। ऐसा व्यक्ति न तो कायर होता है और न बुज़दिल । उसके अंदर करुणा, दया भरी होती है। चाहे अपना परिवार हो, चाहे समाज हो और चाहे राष्ट्र हो, सबके प्रति अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाता है। उसके लिए भरपूर कोशिश करता है। अपने व्यक्तिगत जीवन को तो वह ऊँचा उठाता ही है, साथ ही उससे जो जुड़े हुए है, चाहे वह उसकी पत्नी हों, वह सबकी सेवा-सुश्रूषा करता हुआ चला जाता है। वह माता-पिता से यह नहीं कहता कि तुमने जन्म दिया था तो क्या हमारे ऊपर अहसान किया था। पत्नी को प्रताड़ित नहीं करता, वरन् उसका सम्मान करता है। सम्मान का अर्थ आरती उतारना नहीं होता है। सम्मान का अर्थ यह होता है कि वह दूसरों के सामने उसको बेइज्जत नहीं करता, वरन् उसको समझाने की दृष्टि से प्यार से कहता है कि अमुक गलती थी, इसे सुधार लो तो ज्यादा अच्छा है। सम्मान देने से ही सम्मान मिलता है। प्यार और सम्मान से बढ़कर दुनिया में दूसरी और कोई दौलत नहीं है।
बेटे गुरुजी का उदाहरण आप सबके सामने है। हम दोनों दो एक आत्म, एक ही सिद्धांत, एक ही मारी भावना है। हम दोनों एक-दूसरे के लिए समर्पित मिशन के लिए समर्पित, राष्ट्र के लिए समर्पित हैं। यदि उन्होंने मुझे नहीं बनाया होता, आगे नहीं बढ़ाया होता, तो आज मैं इस स्थिति में नहीं होती कि आप से दो बात भी कह सकती। उन्होंने बनाया और हमने बनने की कोशिश की। हमने पीछे हटने की कोशिश नहीं की। अच्छे काम में हमने अड़ंगा कभी नहीं लगाया। जब गुरुजी सन् 1971 में अज्ञातवास चले गए थे, तो राजस्थान के रहने वाली स्वामी केशवानंद मेरे पास आए। वे एक संत थे। उन्होंने कई विश्वविद्यालय स्थापित किए थे। कई बार एम.पी रह चुके थे। वे आए मुझ से लड़ने के लिए। उन्होंने मुझसे कहा कि माता जी आप ये बताइए कि आपने गुरुजी को जाने क्यों दिया ? देश को उनकी बहुत आवश्यकता है। हमने कहा कि उसी आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए ही तो वे गए हैं। चूँकि यहाँ हर समय जंजाल में पड़ रहते थे, कभी मिलना-जुलना, तो कभी क्या, तो कभी क्या ? इसलिए वे एकाँत में अपनी उपासना करने के लिए, साधना करने के लिए, लेखन करने के लिए गए हैं। अगर मैं उन्हें नहीं जाने देती, तो आपे ये कहते कि माताजी बड़ी स्वार्थी हो गई हैं और उनको आगे नहीं बढ़ने दिया। नहीं ये मेरा कर्त्तव्य नहीं है।
गुरुजी ने हमेशा यही कहा कि तुम अगर मेरे जीवन में नहीं आई होती तो मैं इतना आगे नहीं बढ़ा होता और न इसे मिशन को इतना आगे बढ़ा पाता। मैंने कह कि नहीं, अगर आप मेरे जीवन में नहीं आए होते तो मैं बड़ी दुर्भाग्यशाली होती और जाने कहाँ होती। आपके चरणों में आकर मुझे अपार शाँति और अपार संतोष मिला । उन्होंने कहा कि मेरे पास कुछ नहीं है तो क्या आपको कोई अभाव खटकता है ? मैंने कहा-नहीं मैंने यह कभी नहीं देखा कि आपके पास क्या नहीं है। आपके पास सब कुछ है। जमींदारी थी तो आपने अपनी सारी जमींदारी के बाँण्ड गायत्री तपोभूमि को दे दिए और जमीन आँवलखेड़ा में विद्यालय के लिए दी। माता-पिता की सारी संपत्ति जनकल्याण में लगा दी। मेरे लिए तो आप ही सर्वस्व हैं, आप ही मेरे भगवान हैं। मैंने भगवान नहीं देखा, लेकिन इनसान के रूप में मैंने भगवान को पा लिया है और वह भगवान मेरे रोम-रोम में समाया हुआ है। हर समय मेरा भगवान मुझको प्रेरित करता रहता है, प्रेरणा देता रहता है। वह मेरे साथ सदा रहता है। मेरे आँसू में अपने आँसू बहाता है और मेरी मुस्कान पर मुस्कराता है। मरु भगवान मेरे आगे-पीछे व दायें-बांये हर समय रहता और रक्षा करता है। मुझे किसी का कुछ भी भय नहीं लगता। चिंता रहती है तो बस एक ही बात की रहती है कि जो पौधा वे मेरे हाथ में थमा गए हैं, इसे मैं किस तरह से विकसित करूं और फैलाऊँ। जो इतनी सारी संतानें मुझे दे गए हैं, उन्हें मैं कैसे अपने कलेजे से लगा पाऊँ और अपना सारा प्यार-दुलार, जो भी मेरे पास है, इनकी झोली में डाल दूँ। हर समय मो चिंतन और भावनाएं उमड़ती रहती हैं।
अपने भगवान् से मैं यही प्रार्थना करती रहती हूँ कि मेरा ऐसा कोई काम न होने पाए, जिससे कि आप मुझे धिक्कारें। वरन् मेरी पीठ को थपथपाते हुए चले जाएँ और मैं आगे बढ़ती हुई चली जाऊँ। इस बुढ़ापे में भी मैं कहाँ से कहाँ छलाँग लगाने की कोशिश करती हूँ, जबकि शरीर इतना साथ नहीं देता है, फिर भी हिम्मत के सहारे, उनकी शक्ति के सहारे मैं आपके हर अश्वमेध यज्ञ में जाने के लिए वचनबद्ध हो गई यहाँ भी और विदेशों में भी, जहाँ कहीं भी होता है,वहीं मैं पहुँच जाती हूँ, अपने शरीर को लेकर पहुँच जाती हूँ और दो शब्द जो कुछ आता है, कह देती हूँ। लेक्चर तो इनते बढ़िया से बढ़िया धुआँधार दिए जाते हैं-इंग्लिश में दिए जाते हैं, लेकिन न मैं इंग्लिश में बोली, न आपको श्लोक सुनाए, न चौपाई सुनाई । मैं तो जो अपने हृदय के उद्गार हैं, उन्हें ही अपने परिजनों को सुनाना चाहती हूँ और यह कहती हूँ कि देखो, यह जो चिंगारी सेवा की, साधना की, उपासना की हमारे अंदर जल रही है और जो गुरुजी के अंदर जल रही थी, उसमें से चिंगारी का एक कण छोटा सा आप भी लेकर जाइए, ताकि आप भी धन्य होते चले जाएँ।
मैं आशा करती हूँ कि आपकी यह उपासना सफल तभी होगी, जब आप पूरे मनोयोग से इस वातावरण का लाभ उठाएंगे। आप यहाँ कमियाँ मत देखिए। भोजन में कमियाँ मत देखिए। यह यहाँ का प्रसाद है। इस प्रसाद में आपकी माँ के हाथ का गंगाजल मिला हुआ है। इस प्रसाद को आप ग्रहण कीजिए। यदि आपके शरीर में कोई रोग है, तो इससे कम न हो जाए, तो यहाँ आकर के फिर हमसे कहना कि कम नहीं हुआ। आप भावनापूर्वक इस वातावरण का लाभ लीजिए, जिसे गुरुजी ने अपनी शक्ति से, अपनी उपासना से, अपनी साधना से बनाया है। इस वातावरण के लिए लोग तरसते हैं। आपको जो यहाँ नौ दिन की उपासना के लिए स्थान ही नहीं वरन् पिता और माता की छत्रछाया में आपको उपासना करने को मिली, इसका महत्व क्यों नहीं समझ रहे हैं आप ? आप वहाँ से पत्र डालते हैं कि माताजी हमारा दोष परिमार्जन कर देना, हम अनुष्ठान कर रहे हैं । तो जब आप यहाँ कर रहे हैं हमारे पास तो कितने भाग्यशाली हैं आप। इसे आप क्यों नहीं समझते । आप इसको समझिए। यह हमारी टकसाल है, इसमें व्यक्ति ढाले जाते हैं। हम उपासना के द्वारा आपको ढालना चाहते हैं । आपको हम तपाना चाहते हैं। इसी लिए हम आपसे हर काम स्वयं करने के लिए कहते हैं, जैसे कि अपनी थाली आप धोइये, झाडू अपने आप लगाइए। क्या मतलब है इसका ? इसका एक ही मतलब है कि आपको उसी तरह से तपाना है, जिस तरीके से आग में सोना तपता है, तो तरह-तरह के आभूषण बनते हुए चले जाते हैं।
हम चाहते हैं कि हमारे परिजन उपासना की भट्टी में तपते हुए चले जाएं और ऐसे कुँदन बन जाएँ जिनका कि कहना ही क्या। कहते हैं कि पारस को छूकर लोहा सोना बन जाता है। आप भी बन सकते हैं। उस मंत्र रूपी पारस को छूकर। इस गायत्री मंत्र से आप ऐसे बनते हुए चले जाएंगे जैसे कि एक संत थे। एक याचक ने उनसे कहा कि आप यह बताइए कि लोग कहते हैं कि पारस को छूकर सोना बन जाता है, तो क्या यह सच है ? उन्होंने कहा कि हाँ बिलकुल सच है। याचक ने कहा कि आपके यहाँ लोहे का एक डिब्बा रखा है, तो क्या मैं समझूँ कि यह भी पारस के स्पर्श से सोने का हो जाएगा ? उन्होंने कहा कि तुम्हें इसमें अगर भ्रम है तो डिब्बे को उठाकर मेरे पास लाओ। उन्होंने पारस को डिब्बे के अंदर रख दिया। फिर कहा कि डिब्बे को खोलो । डिब्बे के अंदर जहाँ पारस रखा हुआ था, उसके बीच में कपड़े की एक दीवार थी। उन्होंने कहा कि देखो इसके बीच में कुछ दिखाई पड़ रहा है क्या ? गहराई से देखो । उसने कहा-हाँ देख लिया। इसके बीच में एक दीवार है, जो पारस को लोहे से छूने नहीं दे रहा है और जिस कारण से वह सोना नहीं बन पा रहा है।
इसी तरह जीवात्मा पर कषाय-कल्मषों का परदा पड़ा हुआ है, इन्हें हटाइए। फिर आप देखना कि आप पारस को छूकर सोना बनते हैं कि नहीं। यदि आप हमसे जुड़े रहे तो हम आपको बनाकर ही छोड़ेंगे। फिर चाहे कैसी भी मिट्टी क्यों न हो आपकी। चिकनी मिट्टी होगी तो खिलौने अच्छे बन जाएंगे, पर मैं तो कहती हूँ कि ऊसरी मिट्टी ही क्यों न हो, उसमें भी हम मुल्तानी मिट्टी मिलाकर उससे भी सुँदर खिलौना बना देंगे, यदि आपने अपना मन हमारे हवाले कर दिया तो । आप अपने तन और मन हमारे हवाले कर दीजिए। धन की मैं नहीं कह रही हूँ। धन नहीं चाहिए। आपका धन आपको मुबारक हो, पर आप हमें अपना तन दीजिए, अपना श्रम दीजिए, अपना पसीना दीजिए और फिर देखिए कि हम आपको बनाते हैं कि नहीं।
यहाँ से जरा-जरा से बच्चे क्षेत्रों में जाते हैं, विदेशों में जाते हैं और जाने कहाँ-कहाँ जाते हैं। वहाँ उनकी कैसी तारीफ होती है। तो क्या यह उनकी होती है ? नहीं उनकी नहीं होती है, गुरुजी की होती है, क्योंकि उन्होंने सिखाया है, उन्होंने मार्गदर्शन किया है। वे उनकी प्रेरणा से बना है। यहाँ हमारे परिवार में जो पाँच सौ बच्चे रहते हैं, वे किन के मार्गदर्शन में आए हैं ? नौकरी छोड़कर क्यों आए हैं? उन्हें क्या मिला यहाँ? कुछ नहीं मिला, पर सब कुछ मिल गया। उनको जो जिंदगी भर नहीं मिलना था, वो सबक उनको मिलता हुआ चला गया। उनको सम्मान मिलता हुआ चला गया। उनको श्रद्धा मिलती हुई चली गई, जिसके लिए लोग तरसते हैं। मैं लंदन गई थी, तो वहाँ लड़के आ रहे थे और हमारे बच्चों के पाँव छू रहे थे। उन्होंने कहा कि माताजी कुछ संत आए हैं, जो बाहर खड़े हैं । मैंने कहा कि उन्हें बुला ला, वे सब मेरे ही बेटे हैं।
अभी मैं अपना हवाला दे रही थी कि जुड़ने से कितना लाभ होता है। यदि वास्तविक लाभ लेना चाहते हैं तो उस परब्रह्म से हम जुड़ जाएँ। अभी हम पूरे मन से जुड़े नहीं हैं। इस संबंध में एक उदाहरण देकर मैं अपनी बात खत्म करूंगी कि जुड़ने पर व्यक्ति को कितना मिलता है। एक राजा थे और एक ब्राह्मण थे। ब्राह्मण ने एक सेठ को रुपया दिया हुआ था और कह रखा था कि जब मेरी लड़की की शादी होगी तब मैं आपसे ले जाऊँगा। समय बीतता गया। जब उनकी लड़की सयानी हो गई और उसकी शादी होने को थी तो ब्राह्मण देवता ने सेठ जी से अपना रुपया माँगा।सेठ जी ने मुनीम से कहा कि ‘जरा’ देखना मुनीम जी ? मुनीम जी जरा शब्द का मतलब समझ गए कि इसका अर्थ है-न। उन्होंने कहा-नहीं है सेठ जी, जरा भी नहीं।
ब्राह्मण देवता रोते हुए जा रहे थे , तो रास्ते में राजा की सवारी आती हुई मिली। राजा ने देखा कि एक व्यक्ति रोता हुआ जा रहा है, जबकि मेरे राज्य में कोई रोता नहीं। फिर यह व्यक्ति क्यों रो रहा है ? कोई दिक्कत अवश्य होगी इसे ? उन्होंने उसे अपने दरबार में बुलाया और उससे रोने का कारण पूछा। ब्राह्मण ने सारा वृत्तांत कह सुनाया। राजा ने कहा कि अब ऐसा करना कि कल जब फिर से हमारी सवारी निकले, तब आप वहाँ खड़े मिलना, जहाँ सेठ जी की दुकान है। उन्होंने कहा-अच्छा खड़ा हो जाऊँगा।
ब्राह्मण देवता सोचने लगे कि वहाँ खड़ा होने और मेरे रुपयों से क्या संगति है ? कोई संगति नहीं दीखती। फिर भी वह वहाँ जा खड़े हुए। जब राजा की सवारी पहुँची, राजा उतरा। राजा ने कहा-अरे गुरुदेव । आपके लिए यह स्थान नहीं है। आप आइए, मेरे बराबर बैठिए और हाथी पर बिठाकर चल दिए। थोड़ी दूर जाकर ब्राह्मण को नीचे उतार दिया और कहा-जाइए अब आपका काम हो जाएगा। यह दृश्य देखकर सेठ जी के पेट में खलबली मची कि यह ब्राह्मण तो राजा के बराबर बैठा है। अगर इसके पैसे नहीं दिए तो सिर कलम हो जाएगा। दूसरे ही दिन उसे ब्राह्मण को बुलवाया और कहा कि महाराज जी। हम तो बिलकुल ही भूल गए । यह गलती मुनी की है। आप अपना धन लीजिए और पाँच सौ रुपये और ले जाइए मेरी ओर से कन्यादान कर देना।
राजा से मिलकर जब इतना लाभ हो सकता है, तो उस महाशक्ति से मिलकर कितना लाभ होगा, इस तथ्य को आप समझिए। वह तो शरीरधारी था, किंतु जो सत्ता सारे जगत में समाई हुई हैं, उस सत्ता को हम यदि अपना समर्पण कर दें तब कोई घाटा रहेगा क्या? गुरुजी को कोई घाटा रहा क्या ? लोग एक-एक बच्चे के लिए मरे जाते हैं? और हमारे पास लाखों बच्चे हैं। कितनी बच्चियाँ हैं, इतनी तो यहीं देख लीजिए।ये कौन हैं ? हमारी बेटियाँ हैं। आप कौन हैं ? हमारे बेटे हैं। कितनी संख्या है साहब? लाखों की संख्या है। गुरुजी विनोद में कहा करते थे कि माताजी रानी मधुमक्खी हैं। इनकी संतानों को क्या कहना। हमारे कितनी संतानें हैं? अरे बेटे । गिनने में भी नहीं आएँगी।
और पैसा ? आपको बता देंगे तो आप निकाल ले जाएंगे, इसलिए हमने अपने पास पैसा रखा ही नहीं। हमारा बैंक बैलेन्स भी नहीं है, परंतु बैंक हमारी बहुत हैं। इतनी बैंकें जो आप सभी बैठे हैं, ये हमारी नहीं तो किसी हैं। आप सब हमारी बैंक हैं। जब चाहेंगे तभी हम आपकी जेब से निकाल लेंगे। करोड़ों-अरबों रुपये की तो चार हजार शक्तिपीठें बनी हैं। इनमें कितना पैसा लगा है कि नहीं और ब्रह्मवर्चस् में लगा है कि नहीं लगा है ? गायत्री तपोभूमि में लगा है, आँवलखेड़ा में लगा है। फिर कौन कहता है कि हमारे पास पैसा नहीं है। हमारे पास बहुत दौलत है।उस दौलत को हम जितना खरच करें, उतनी ही हमारी दौलत बढ़ती चली जाती हैं।वह दौलत हैं आप सबकी। आप सब हमारी दौलत हैं।
बेटे। हम आपको अपनी दौलत मानते हैं, इसलिए उस दौलत को हम खरच भी करते हैं और आपको कहते हैं कि चलिए समाजसेवा के लिए, राष्ट्र की सेवा के लिए आपकी बहुत जरूरत है। जब गुरुजी ने सारी जिंदगी सेवा की तो क्या आपको नहीं करनी चाहिए? करनी चाहिए। स्वतंत्रता आँदोलन में गुरुजी पौने चार साल जेल में रहे। वे केवल जेल में ही नहीं रहे, बल्कि उन्होंने आगरा जिले के जितने भी गाँव थे, उन सब किसानों की लगान माफ करा दी थी और जब कोतवाल उन्हें पकड़ने आया था तो वे सीना तानकर खड़े हो गए थे। आँवलखेड़ा में जितने भी स्वतंत्रता सेनानी थे, वे इधर-उधर छिप गए थे, किंतु वे छिपे नहीं। जब उसने उनसे कहा कि हम तो मत्त जी को ढूँढ़ने आए थे, तो बोले कि मैं ही नाचीन मत्त जी हूँ, जो आपके सामने खड़ा हूँ। गुरुजी को नाम मत्त जी तब रखा गया था जब उनके मुँह में दबा हुआ झंडा पाया गया था। वे तीन दिन बेहोश रहे थे, किंतु झंडे को नहीं छोड़ा । तब उनके जो सहयोगी थे, मित्र थे, जगन प्रसाद रावत जी थे आदि सबने मिलकर उनका नाम मत्त जी रख लिया था।
कोतवाल को विश्वास नहीं हो रहा था कि इतना दुबला पतला आदमी ‘मत्त’ कैसे हो सकता है। बार-बार पूछने पर उन्होंने कहा कि मैं ही मत्त जी हूँ। और कोई दूसरा मत्त जी इस गाँव में नहीं है और न अन्यत्र कहीं है। उसने उन्हें छाती से लगा लिया और कहा कि वाह री।बुलंदी, तेरे अंदर कितनी बुलंदी है, कितना साहस है, जो डरा नहीं। उन्होंने कहा कि इनसान से डरना क्या ? डरना है तो उस भगवान से डरना है और ऐसा कोई काम नहीं करना है, जिससे हमारे दामन पर धब्बा लगे और भगवान भी हमें धिक्कारता रहे, उन्होंने जिंदगी भर कोई भी काम ऐसा नहीं किया । उन्होंने हर संभव वही कार्य किए, जिससे जनता को मानव जाति को प्रेरणा मिलती हो, साहस मिलता हो, बल मिलता हो। उन्होंने परदा प्रथा समाप्त कर दिया। लड़कियों के परदे, घूँघट हटवा दिए और कहा-परदा मत करो। लड़कों को भी धमकाया और उनसे कहा कि उनसे दासियों जैसा काम मत लो। इनको भी कुछ समाज सेवा करने दो। इनको भी कुछ नारी-जागरण का काम करने दो। इनको भी आगे बढ़ने दो। इनको अबला मत बनने दो। तुमने इन्हें अबला बना रखा है, भोग्या बना रखा है। नारी को भोग्या, कामिनी बनाकर घरों में मत रखो। इन्हें भी समाज सेवा, राष्ट्रसेवा के क्षेत्र में उतरने दो। इनके साथ बेइंसाफी मत करो, नहीं तो वे बदला लेंगी। आगे चलकर इनको बदला लेने की हिम्मत न आए, इसलिए इनको ऊँचा उठाओ। नारी को ऊँचा उठाने के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किए हैं और आपको भी वही करना चाहिए।
आज नवरात्रि के पावन पर्व पर मैं आपसे एक ही निवेदन करने आई थी, मैंने कही तो अनेक बातें हैं-जैसे समाज-सुधार की बातें कहीं और भी बातें कहीं, लेकिन आपकी उपासना के बारे में मुझे कहना था कि इस नवरात्रि में आप नौ दिन तक यह मानकर चलिए कि आपका न कोई घर है, न गृहस्थी है, केवल आपमी माँ की गोद है। आप उस माँ की गोदी में खेल रहे हैं एक शिशु की भाँति। अपनी कोई भी मनोकामना नहीं है। मनोकामना को आप छोड़ दीजिए।यदि आपकी कोई मदद कर सकते होंगे तो हम अवश्य करेंगे।
आपने यह कहानी सुनी होगी कि एक कबूतर और एक कबूतरी थे। एक बहेलिया आया और उस पेड़ के नीचे भूखा लेट गया। वह कई दिनों से भूखा था। कबूतर और कबूतरी आपस में विचार करने लगे कि इसकी भूख को कैसे शाँत किया जाए ? दोनों ने आपस में विचार किया कि क्यों न हम इसका सहयोग करें? उनमें से एक गया और कहीं से माचिस की तीली ले आया। दूसरा गया कहीं से घास-फूस इकट्ठी करके ले आया। उसमें तीली लगा दी और दोनों उसमें जल गए। बहेलिया उठा और अपने भाग्य को सराहते हुए कहा कि ये मुझे भोजन मिल गया।
बेटा । हम कबूतर-कबूतरी तो नहीं जो जलकर तुम्हारी भूख मिटाएंगे, लेकिन वो चीज हम आपको खिलाएँगे कि आप निहाल हो जाएँगे, साथ ही आपका परिवार, आपके बच्चे भी निहाल होते चले जाएँगे। हम आपको वो संपत्ति देना चाहते हैं, ताकि जिससे आप और आपके परिवार वाले, आपके बच्चे, नाती, पोते, सब उस संपत्ति को खाते पीते रहें, उस संपत्ति को बिगाड़ें नहीं। वो संपत्ति है-ज्ञान की संपत्ति, वो संपत्ति हैं-प्रेरणा की। वे है उपासना की संपत्ति, वो है सेवा की संपत्ति, वो है साधना की संपत्ति वही हम आपको देना चाहते हैं। आप लोगों का नवरात्रि अनुष्ठान सफल हो, इसी कामना के साथ आज ही बात समाप्त।
॥ ॐ शाँतिः॥
(कल्पसाधना सत्र)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्॥
देवियों, भाइयों। ज्ञानयोग, कर्मयोग, कर्मयोग के संदर्भ में मैं आप से पिछले दिनों चर्चा कर रहा था कि आपको दूरदर्शी तथा विवेकवान होना चाहिए। आपको अपने कर्त्तव्य के प्रति सजग होना चाहिए, जैसे के महापुरुष अपने कर्त्तव्यों के प्रति सजग रहते हैं। ज्ञानयोग और कर्मयोग के बाद एक मुख्य योग रह जाता है, जिसका नाम-भक्तियोग है। हम उस योग की बात कर रहे हैं, जो आदमी को भगवान से जोड़ देता है। आत्मज्ञान इनसान को भगवान् से जोड़ देता है। आज हम इसी भक्तियोग के बारे में ही आप से चर्चा करना चाहते हैं।
आज भक्ति के संदर्भ में लोगों के विचार विकृत हो चुके हैं। आज भावसंवेदनाओं को, रोने को लोगों ने भक्तिभाव समझ रखा है। देवी के सामने नाक रगड़ना, उनके सामने रोना-यह भक्ति नहीं कहलाती है। उलटा बैठ जाना, सीधा बैठ जाना, आँसू बहाना-यह भक्ति नहीं है। यह भावुकता है, भक्ति नहीं, जहाँ तक आध्यात्मिक प्रगति एवं भक्ति के स्वरूप का संबंध है, यह सही नहीं है।
भक्ति किसे कहते हैं ? इसका सीधा-सादा मतलब है प्यार-मोहब्बत । जिसके अंदर यह होता है, वह भावना से लबालब भरा होता है। प्यार से जुड़ी कोई चीज नहीं है। इसी की तलाश में जीवात्मा रहता है। आनंद प्राप्त करने के लिए मनुष्य इंद्रियों का भोग करता है, सिनेमा देखता है, कामवासना के फेर में रहता है। परंतु आप तीन घंटे से ज्यादा सिनेमा देखेंगे तो आँखें खराब होने लगेंगी। इसी तरह कामवासना का भी आनंद थोड़े समय चंद मिनटों का होता है। जीवात्मा को जो स्थिर एवं चिरस्थायी आनंद परमात्मा को प्राप्त करने पर मिलता है, उसे भक्ति कहते हैं। आपने अगर इसको अनुभव करके देखा होता तो मजा आ जाता ।
आपकी अपने आप से, अपनों से प्यार होता है। अपनी मोटर से, साइकिल से प्यार होता है। आप इसी तरह हर व्यक्ति को अपना मानिए। अगर पड़ोसी के बच्चे को भी अपना मानेंगे तो आपको आनंद होगा । अगर कोई अपना आदमी घर में आ जाता है, तो आपको मजा आ जाता है। वास्तव में आनंद अपनेपन से होता है। अपना एवं पराये का जो फर्क है, वह बहुत बड़ा है। जहाँ टार्च का प्रकाश पड़ता है, वहाँ की चीजें दिखाई पड़ती हैं। जहाँ प्रकाश नहीं पड़ता है, वहाँ अंधकार छाया रहता है। मित्रो । आप प्यार का टार्च जहां कहीं भी डालेंगे, जिस चीज पर भी डालेंगे, वह चीज आपको प्यार एवं बढ़िया-आनंददायक मालूम पड़ी। लैला-मजनू कोई खास सुँदर नहीं थे, परंतु दोनों एक दूसरे से प्यार था, इसलिए दोनों एक-दूसरे पर मरने-मिटने के लिए तैयार रहते थे।
मित्रो। भगवान एक रस का नाम है, जिसे शास्त्रकारों ने ‘रसो वै सः’ बतलाया है। रस किसे कहते हैं ? आनंद को कहते हैं । यह कहाँ है? भगवान में हैं । अगर आप भगवान के साथ आत्मीयता जोड़ लें तो आपको भगवान की भक्ति का आनंद मिल जाएगा। हम भगवान के हैं तथा भगवान हमारे हैं, यदि ऐसी भावना मनुष्य के भीतर आ जाए तो मजा आ जाता है। मीरा ने भगवान को अपना पति मान रखा था। इस कारण से उस प्यार के लिए भगवान और मीरा दोनों भूखे थे। यही भक्ति है।
मित्रों जरासंध एवं कंस ने कृष्ण भगवान को पराया माना था, इस कारण उसे उनसे राग-द्वेष था। अपने होते हुए भी वे पराए लगते थे, फिर आनंद एवं प्यार कहाँ से उभरता? आनंद एवं प्यार एक ही चीज का नाम है। अगर आपको आनंद पाना है, तो प्यार का माद्दा बढ़ाना पड़ेगा। यह दिखाना नहीं पड़ता, वरन् अंदर से उपजता है और बिना प्रतिपादन की इच्छा के अपना सब कुछ औरों पर उड़ेल देता है। उदाहरण के लिए, अगर आपने अपने शरीर से जरा भी प्यार किया है, तो जब उसमें जरा-सी भी गड़बड़ी हो जाती है, तो आप उसको ठीक करते हैं, दवा खाते हैं, संवारते हैं, बाल बनाते हैं। इसका कारण यह है कि हम अपने शरीर को अपना मानते हैं। अपनेपन का माद्दा जहाँ कही भी होता है, वहाँ आनंद एवं प्यार बरसता रहता है। गेंद जब दीवार पर फेंकी जाती है, तो वह लौटकर आपके पास आ जाती है। गुँबज में जो आवाज लगाई जाती हैं, वैसी ही आवाज लौटकर प्रतिनिधित्व के रूप में हमें पुनः सुनाई देती हैं। अर्थात् वह वापस आ जाती हैं।
मित्रों । ठीक उसी प्रकार जब हम किसी को प्यार करते हैं, मोहब्बत करते हैं, तो वह भी उसी आवाज की तरह हमारे पास वापस आ जाती है। कहने का मतलब यह है कि हम जिसे प्यार करते हैं, वह भी हमें प्यार करता है। इस संसार में अगर आप लोगों को राग-द्वेष के रूप में देखेंगे, तो सारे संसार में आपको राग-द्वेष ही मिलेगा। अगर आप लोगों की उपेक्षा करना आरंभ कर देंगे, तो आपको चारों ओर उदासी, सूनापन तथा उपेक्षा ही मिलेगी। सब माया तथा मिथ्या दिखलाई पड़ेगा। परंतु अगर आपकी भावनाएँ ठीक होंगी तो आपको हर जगह राम एवं सीता दिखलाई पड़ेंगे। जैसा कि तुलसीदास जी ने कहा है-
सीयाराम मय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
साथियों । अभी तक आपने अपना दायरा अपने शरीर तथा अपने कुटुम्ब तक सीमित रखा है। उस दायरे को बढ़ा दीजिये। अपने आपको सारे संसार के रूप में बढ़ा दीजिये। स्वामी रामतीर्थ अपने आपको रामबादशाह कहा करते थे। किसका बादशाह हूँ ? बादलों का, आकाश का बादशाह हूँ, यह कहा करते थे। आप गंगाजी का पानी निहारना चाहें, सड़क पर चलना चाहें, बादलों को निहारना चाहें तो आपके कौन रोक सकता है ? आप किसी के काम आएँ, किसी से मीठे वचन बोलें, चिड़ियों को दाना डाल दें तो आपको कौन रोक सकता है ? यह सत्य है कि अगर किसी के घर में घुसे या किसी का सामान आदि चुरा लें तो आपको कोई रोक भी सकता है, कानून के हवाले कर सकता है, परंतु आप मगर अच्छा काम करेंगे तो काम रोक सकता है ? आप जिससे भी मोहब्बत करेंगे, उसे लिए हमेशा सेवा के लिए तैयार रहेंगे।
मित्रों । प्यार का वास्तविक स्वरूप सेवा में ही दिखलाई पड़ता है। इसके द्वारा ही प्यार में निखार आता है। प्यार करने की पहचान ही यह है कि आप उसकी सेवा करना चाहते हैं या नहीं ? प्यार करने वाला अपना अनुदान दूसरों को देता है। प्यार करने वाला स्वयं कष्ट उठाता है तथा दूसरों को सुखी बनाता है। प्यार सेवा सिखलाता है, प्यार अनुदान देना सिखाता है। देशभक्ति, विश्वभक्ति, भगवान की भक्ति इसी का तो नाम है। अगर आपको हैरानी होती है तो हो जाए, परंतु आप अपने बच्चे, देश, सारे संसार को सुखी बनाने का प्रयास करते हैं, तो वही भक्ति कहलाती है। इस दुनिया की सर्वश्रेष्ठ चीज यही है।
इस प्रकार भक्तियोग न केवल मानसिक तथा भावनात्मक संपदा है, वरन् उसके आधार पर परमार्थ तथा पुण्य को मौका भी मिलता है। आप भक्ति कीजिए तथा सेवा कीजिए, यह दोहरा लाभ प्राप्त होता है। प्यार का वास्तविक अर्थ यही है। मनुष्य का मोह एवं बंधन उसके साथ ही होता है, जिसके साथ उसका प्यार होता तथा मोहब्बत होती है शंकर भगवान की हम उपासना करते हैं तो हमें शंकर भक्ति के साथ भूत-पलीत लोगों की अर्थात् गए-गुजरे लोगों की, गरीब एवं पिछड़े लोगों की भी हमें सेवा करने को लिए तैयार रहना चाहिए। जिनकी समझदारी कम है, उनको ऊँचा उठाना चाहिए। उनकी सेवा करनी चाहिए। शास्त्र में कहा गया है-’भज सेवायाम्’ अर्थात् हमें भजन के साथ सेवा भी करनी चाहिए। दोनों एक ही चीज हैं। अगर हम भक्ति करते हैं तथा समाज की पिछड़े लोगों की सेवा नहीं करते हैं तो हमारा भजन सार्थक नहीं हो सकता है।
सेवा हम किसकी कर सकते हैं ? मित्रों इस दुनिया में व्यक्ति उसकी ही सेवा कर सकता है, जिससे वास्तव में उसकी मोहब्बत है। अतः आप अपने मोहब्बत का दायरा बढ़ाइए। जैसे-जैसे आपका दायरा बढ़ेगा, आप सेवाभावी बनते चले जाएंगे एवं जैसे-जैसे आप सेवाभावी बनते चले जाएंगे, आपकी भक्ति भी बढ़ती चली जाएगी।
भक्ति का अभ्यास हम भगवान से करते हैं । यह व्यायामशाला है। जिस प्रकार पहलवान व्यायामशाला में जाकर कसरत करता है, मशक्कत करता है तथा अपने स्वास्थ्य को ठीक कर लेता है। उसी प्रकार मनुष्य भगवान के साथ भक्ति यानी मुहब्बत करके समाज के बीच में भी जाकर प्यार एवं मोहब्बत करता है, कर सकता है।
भगवान् आदर्शों के-सिद्धाँत के समुच्चय को कहते हैं कि जिनका व्यावहारिक स्वरूप जाकर हम वे चीजें सीखते हैं जिनका व्यावहारिक स्वरूप जाकर हम समाज के बीच प्रस्तुत करते हैं। भगवान कोई व्यक्ति नहीं है। वह तो एक नियामक सत्ता है, एक कायदा है, एक कानून है। ‘भगवान तो सेवा का नाम है। आप उसे मिठाई क्या खिलाएंगे? मुकुट क्या पहनाएंगे ? यह आपकी भूल है। इसे सुधारना आवश्यक है।
पूजा-उपासना के समय, भक्ति के समय आपने कोई मूर्ति या चित्र रखा है तो इसमें कोई हर्ज की बात नहीं है, परंतु आप भगवान को आदर्श एवं सिद्धाँतों का समुच्चय मानिए। आपने अगर भगवान शंकर को व्यक्ति विशेष माना है, तो आप भ्रम जंजाल में पड़ जाएंगे। अगर शंकर भगवान को ऐसा माना है कि वह व्यक्ति है, जो बैल पर बैठकर इधर-उधर घूमता रहता है। बेल का पता, आक का पत्ता, धतूरे का फूल खाता रहता है। उसके माथे पर चंद्रमा है, सिर से गंगा निकल रही है तथा भूत-प्रेत उसके साथ रहते हैं। यदि आप ऐसा मानने लगेंगे, तो आप भ्रम एवं जंजाल में पड़ जाएंगे।
मित्रों आपको शंकर भगवान को आदर्श एवं सिद्धांतों का एक समुच्चय मानना चाहिए, साथ ही आपको यह समझना चाहिए कि शंकर भगवान के सिर से गंगा निकलने का अर्थ -ज्ञान का प्रवाह, गले में मुँडमाला का अर्थ-हमेशा मौत को गले लगाना, बैल की सवारी का अर्थ-परिश्रमी बनना, चंद्रमा का मतलब-मानसिक संतुलन, भूत-प्रेत का मतलब-गए गुजरे एवं पिछड़े लोगों को गले लगाना तथा उनके विकास के बारे में सोचना, श्मशान में निवास का मतलब-वीरान में रहकर भी समाज के विकास के बारे में सोचना है। यही है शंकर भगवान की विशेषता, जिसे हर भक्त को सोचना चाहिए।
इसी प्रकार हर भगवान के बारे में यही बात है। हर भगवान इसी तरह आदर्शों एवं सिद्धांतों का एक समुच्चय हैं, चाहे वह गणेश जी हों, हनुमान जी हों, रामचंद्र जी हों या भगवान श्रीकृष्ण जी हों। इसी प्रकार हर देवी एवं देवता तथा अवतारों को आपको मानना चाहिए। आज जिस भी देवता की भक्ति करते हैं, उसका मतलब समझते हैं, उस देवता के सिद्धांतों एवं आदर्शों को मानते हैं, उस रास्ते पर चलते हैं। वास्तव में यही सच्ची भक्ति कहलाती है। अगर उन सिद्धांतों के प्रति, आदर्शों के प्रति आपकी श्रद्धा, आस्था का विकास होता चला जाएगा, तो आपकी भक्ति भी बढ़ती हुई चली जाएगी। अगर आप वास्तव में ऐसी भक्ति करेंगे तो आपको फायदा होगा। मरने के बाद आप स्वर्ग-मुक्ति में जाएंगे या नहीं, कह नहीं सकता, परंतु आपको इसी जीवन में चारों ओर ऐसा नजारा आएगा कि चारों तरफ स्वर्ग है। आपको चारों ओर दिव्य वातावरण दिखाई पड़ेगा। आप निहाल हो जाएंगे।
मित्रों आप किसी के प्रति नफरत न करें । आप व्यक्ति से नहीं, उसकी बुराइयों से नफरत कीजिए तथा उसमें सुधार लाने का प्रयास कीजिए। आप प्यार के आधार पर भी लोगों को बदल सकते हैं। आप किसी से राग-द्वेष न करें । आप ऐसा काम करें कि उसके व्यक्तित्व की रक्षा भी हो जाए तथा उसकी बुराई भी दूर हो जाए। गाँधी जी ने इसी प्रकार अंगरेजों से प्यार की लड़ाई लड़ी, प्यार का अनुदान दिया। उसके बाद क्या हुआ ? मित्रों अंगरेज भारत छोड़कर चले गए । प्यार बहुत बड़ा संबल होता है, यह आप न भूलें । प्यार से मनुष्य के अंदर शाँति आती है, उसके व्यक्तित्व का विकास होता है।
मित्रों। हमने गायत्री माता से प्यार किया है और सारे समाज की सेवा की है। आप भी चाहें तो इसी प्रकार आनंद की अनुभूति कर सकते हैं तथा सब ओर से प्यार तथा आनंद प्राप्त कर सकते हैं। अगर आप अपने दृष्टिकोण तथा विचार बदल सकते हैं यह अमृत चारों ओर बिखरा पड़ा है। आप चाहें तो उस अमृत को पी सकते हैं तथा दूसरों को भी पिला सकते हैं। यह है भक्तियोग, यह है प्यार-मोहब्बत । आप चाहें तो इसे अपनाकर अपने जीवन को महान बना सकते हैं, आत्मविकास कर सकते हैं। आज ही बात समाप्त।
पारदर्शी वस्तुओं में होकर ही सूर्य की किरणें प्रवेश करती और पार जाती हैं। भगवान का प्रकाश और प्रेम उन्हें ही मिलता है, जिनका हृदय निर्मल है।
हमारा जीवन लक्ष्य
अध्यात्म दर्शन का सार-निष्कर्ष इतना भर है कि अपने को जानो-’आत्मानं विद्वि’। अपने को विकसित करो और ऐसी राह पर चलो, जो कहीं ऊँचे लक्ष्य तक पहुंचाती हो। यह शिक्षा अपने आप के लिए है। इसे स्वीकार-अंगीकार करने के उपराँत ही वह प्रयोजन सधता है, जिसमें दूसरों से कुछ समर्थन, सहायता, अनुदान पाने की आशा की जाए। देवता भी तपस्वियों को ही वरदान देते हैं, बाकी तो फूल-प्रसाद के दोने लिए, देवस्थानों के इर्द-गिर्द चक्कर लगाते रहते हैं। भिखारी कितना कुछ कमा पाते हैं, इसे सभी जानते हैं। उन्हें जीवन भर अभावों की उपेक्षा की शिकायत ही बनी रहती है।
(वाड्यम 17, पृ. 2.16)
लोकसेवी को दूसरों से संपर्क करते समय, उन्हें सत्प्रेरणाएँ प्रदान करते समय निंदा, आलोचना से हमेशा बचना चाहिए। हो सकता है, वह आलोचना सुधार की भावना से की गई हो, पर सुनने वाले के मन पर उससे उलटी ही प्रतिक्रिया होती है।वह अपना अपमान समझने लगता है और बैर को बाँध लेता है, जैसे किसी से कहा जाए “आप बड़े गलत आदमी हैं, ऐसे काम क्यों करते हैं ? तो उस वाक्य में व्यक्ति के प्रति घृणा की भावना ही व्यक्त होती है। कहने वाला भले सदाशयी हो, पर वह अपने मन में शत्रुता की गाँठ बना लेगा। यदि सुधार की भावना से कहना था, तो यों कहना ज्यादा ठीक रहता-”इस क्रम में तो हानियां हैं। ये दोष हैं, ये दुष्परिणाम हैं। आपने भूल के कारण ऐसा कर लिया। भविष्य में बचें तो अच्छा हैं, ताकि इससे होने वाली हानियाँ न उठानी पड़ें। “ आवश्यक लगने पर इस भूल को सुधारने के लिए मार्गदर्शन भी दिया जा सकता है।
लेकिन ऐसे सुझाव भी किसी के सामने दिए जाएं तो वह भी सुनने वाले को ठेस पहुँचाएंगे, इसलिए निंदा-आलोचना तो की ही न जाए, सुधार के उद्देश्य से त्रुटियाँ भी अकेले एकाँत में जहाँ लोकसेवी और वह व्यक्ति हो, ऐसे स्थान पर बताई जाएं। निंदा-आलोचना से बचते हुए समीक्षा और सुझाव एकाँत में दिए जाएँ, पर प्रशंसा-सराहना करने का कोई भी अवसर हाथ से न जाने दिया जाए। सेवाकार्यों में जो भी व्यक्ति कोई सहयोग देने के लिए आते हैं, उनमें अच्छे तत्वों की, परमार्थ निष्ठा की मात्रा रहती ही है। प्रशंसा करने पर व्यक्ति के कार्यों और उसकी निष्ठा को सराहा जाने पर उसे अच्छे तत्वों के विकास की प्रेरणा मिलती है। प्रशंसा सबके समाने की जाए, पर उस प्रशंसा के साथ यह सतर्कता बरती जाए कि व्यक्ति में मिथ्याभिमान न आने लगे।
अनावश्यक प्रशंसा से व्यक्ति में मिथ्याभिमान भी उत्पन्न होता है और वह प्रशंसा चापलूसी के स्तर की बन जाती है। प्रशंसा और चापलूसी में वहीं अंतर है, जो अमृत और विष में। प्रशंसा से व्यक्ति को प्रोत्साहन मिलता है और वह अपना उत्कर्ष करने की ओर बढ़ने लगता है, जबकि चापलूसी व्यक्ति में मिथ्याभिमान जगा देती है, जो उसे पतन के गर्त में धकेल देती है। और दिग्भ्रमित कर देती है। प्रशंसा और चापलूसी की एक कसौटी है। जब किसी व्यक्ति के गुणों को सराहा जाता है, उसके कार्यों के साथ ही उसकी निष्ठा -भावना को भी संबंधित किया जाता है, तो वह प्रशंसा होती है। उसे साधारण-से-साधारण व्यक्ति भी यह अनुभव करने लगता है कि हमें इन गुणों के कारण प्रशंसा मिल रही है, अतः इन गुणों का विकास करना चाहिए। चापलूस व्यक्ति के स्वर में प्रायः हीनता का भाव रहता है तथा वह जिसकी प्रशंसा की जा रही है उसकी तुलना उसी स्तर के व्यक्ति से भी करता है और तृतीय पुरुष को हर दृष्टि से घटिया सिद्ध करने की चेष्टा करता है।
प्रशंसा से प्रोत्साहन तो मिले, पर उसके कारण अहंकार न जागे, इसलिए प्रशंसित व्यक्ति न किसी से तुलना की जाए और न ही उसके दोषों को गुणों के रूप में बखान किया जाए। इस तरह की प्रशंसा व्यक्ति को अभीष्ट दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। कमियाँ और विशेषताएँ सभी में होती हैं। स्वयं लोकसेवी भी पूर्णतः निर्दोष या समस्त विशेषताओं से युक्त नहीं होता। अपनी कमियों को हम जिस प्रकार दूर करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, साथ ही यह भी पसंद नहीं करते कि उनकी चर्चा सार्वजनिक रूप से हो। जहाँ तक हो सके अपनी ओर से उन्हें व्यक्तिगत लक्ष्य कर न कहा जाए तो ही अच्छा रहता है। सामान्य सिद्धांत के रूप में उनका विश्लेषण अलग बात है, अन्यथा व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी के रूप में उनकी चर्चा करना संबंधित व्यक्ति के मन को सुधारने के साथ गुणों के विकास को प्रोत्साहन दिया जाए, तो लोकसेवी की सुधार-चेष्टा में और भी प्रखरता आ जाती है।
जनसंपर्क के समय शिष्ट और शालीन व्यवहार तथा प्रशंसा और प्रोत्साहन के साथ-साथ लोकसेवी को चर्चा संवाद में धैर्यवान भी होना चाहिए। लोकसेवी को निश्चित रूप से लोगों तक अपनी बात पहुँचानी है व एक संदेश लेकर पहुँचना है, पर लोग उसे अपना प्रतिनिधि तथा मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं। इसलिए वे अपनी समस्याओं और कठिनाइयों को उसके सामने रखना चाहते हैं और लोकसेवी से यह आशा करते हैं कि वे उनकी बातों को धैर्यपूर्वक सुनेगा, उसकी कठिनाइयों पर ध्यान देगा तथा उनका समाधान सुझाएगा। इस जन अपेक्षा की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए तथा न ही अपनी बात कहने के लिए उतावलेपन से काम लिया जाए। लोकसेवी जनसामान्य के पास एक संदेश लेकर पहुँचता है, संदेश सुनाया जाए, अपनी बात कही जाए, पर कहने की सार्थकता तभी सिद्ध होगी, जब सुनने वाला सुनने के लिए तैयार हो।
(कर्मयोग नामक गीता के तीसरे अध्याय की युगानुकूल विवेचना )
युगगीता के अंतर्गत ‘कर्मयोग’ नामक तृतीय अध्याय के प्रारंभिक पाँच श्लोकों की व्याख्या विगत अंक में की गई थी। उनका सार−संक्षेप एक ही है कि कर्मा में न तो उसकी कोई आसक्ति हो, न वह अतिवादी होकर ‘नैष्कर्म्य’ को ही परमसिद्ध मान बैठे। योगेश्वर कृष्ण स अध्याय में प्रारंभिक व्याख्या में ही अर्जुन को ‘निष्पाप’ संबोधन देते हैं। निष्पाप व्यक्ति ही निर्मल मन का होता है। जिसके ‘पाप’ क्षय हो गए हों, जो अति सरल व निर्मल भाव से प्रभु की शरणागति हो जाए, उससे श्रेष्ठ पात्र और कौन हो सकता है-गीता का परमपावन संदेश सुनने के लिए हम पर भी प्रभुकृपा तब ही बरस सकी है, जब हम स्वयं को नियमित उपासना गायत्री-साधना के ‘भर्ग’ पर ध्यान केंद्रित कर कषाय-कल्मषों से मुक्त, पापरहित अंतःकरण वाला बना सके। इसी प्रारंभिक उपदेश में भगवान दो प्रकार की निष्ठाओं की बात करते हैं। ‘निष्ठा’ शब्द को प्रयोग यहाँ साधना की पराकाष्ठा के संदर्भ में किया गया है। निष्ठा ही आस्तिकता का प्राण है। वे कहते हैं कि निष्ठाओं में एक ज्ञानयोग से सधती है, दूसरी कर्मयोग से । पहला मार्ग बुद्धि प्रधान है, विचारतंत्र से संबंधित है ज्ञानतंतुओं को झकझोरता है, तो दूसरा मार्ग सक्रियता का-कर्मठता का है। फिर वे कहते हैं कि न तो कर्मों के त्याग मात्र से सिद्ध हस्तगत होती है, न ही कर्मों को आरंभ किए आदमी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है। दोनों ही मार्ग एक-दूसरे से बड़े गहरे जुड़े हैं। इसके बाद भगवान कहते हैं कि कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। यह किसलिए? क्योंकि सभी को अपनी प्रकृति के अनुरूप विवश होकर कर्म करना ही पड़ता है। “कार्यते हृयवषः कर्म सर्वः प्रकृजिजैर्गुणैः” गीता 3।4।सत, रज, तम इन तीन प्रकार के गुणों से प्रकृति का लीलाव्यापार चलता है। ये ही हमारे कर्मों के मूलस्रोत हैं। इनके वशीभूत हो मनुष्य कर्म करता है। इसका अर्थ यह कि हम कभी निष्क्रिय रह नहीं सकते। सकारात्मक स्वरूप जीवन का सक्रियता से भरा हुआ है। आज की सभी समस्याओं-सभी प्रकार की आसक्ति -तनावों का एक ही समाधान है कि हम “जीवित मृतक’ बनने के स्थान पर सतत् कर्म करें, सक्रिय होकर जिएँ एवं निर्भय होकर जीना सीखें। हंसती-हंसती, मस्ती भरी जिंदगी जिएँ। इसके पश्चात की व्याख्या छठे श्लोक से आरंभ होती है, जो इस बार की प्रस्तुति में पाठकों के समक्ष है।
भगवान आगे कहते हैं कि ‘निष्काम-भाव’ एक उच्चस्तरीय सिद्धि है। इसे सही अर्थों में समझा जाना चाहिए। यदि नहीं समझा गया तो एक निर्दयी मूर्ख व्यक्ति तो यही कहेगा कि कम-से-कम काम और अधिक-से-अधिक भोगमय जीवन ही सबसे आकर्षक है। आज संन्यास के साथ यही विडंबना जुड़ गई है। जहाँ वर्णाश्रम परंपरा में वानप्रस्थ और सक्रिय होकर समाज के लिए जीने की प्रेरणा देता था, वहीं संन्यास और भी सक्रिय हो कर्मों का क्षय कर पूर्णतः विश्वकल्याण को समर्पित जीवन होता था। मूल अर्थ कहीं और रह गया एवं आज के संन्यासियों ने युगधर्म की उपेक्षा कर स्वयं को भोग-विलास से, अकर्मण्यता से जोड़ लिया। सभी ऐसे हैं, यह बात नहीं। किंतु प्रायः देखने में यही आता है कि जिसे पलायन करना हो, जो सक्रिय जीवन जीने से घबराता हो, वह उसी भीड़ में जाकर खड़ा हो जाए। यदि यह संस्था सक्रिय रही होती, गीताकार के उपदेश का पालन कर रही होती तो भारतवर्ष के एक करोड़ से अधिक बाबाजी परमपूज्य गुरुदेव के अनुसार, सारे राष्ट्र को शिक्षित-विद्यावान् स्वावलंबी बना चुके होते।
इसका अर्थ यह कि कर्म करने में ही हमारी शान है। उसका कोई विकल्प नहीं । एक सच्चे कर्मयोगी व निम्न स्तर के मिथ्याचारी में अंतर समझ लेना भी ठीक होगा। भगवान कृष्ण छठे श्लोक में कहते हैं-
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। इन्द्रियार्थान्विमूढ़ज्ञत्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥ 3/6
अर्थात्-”जो मूढ बुद्धि मनुष्य समस्त इंद्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इंद्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दंभी कहा जाता है।”
यही वह शिक्षण है, जो हमें बताता है कि हमें कर्म कैसे अच्छे ढंग से करना चाहिए ? आदर्श जीवन क्या होना चाहिए। एक सच्चे लोकसेवी एवं एक मिथ्याचारी में क्या अंतर होता है ? शारीरिक विषयोपभोग की तुलना में मानसिक कामुकता-विषय चिंतन न केवल हमारी प्राणशक्ति का ह्रास करता है, हमारी कार्य-कुशलता को भी प्रभावित करता है। आँतरिक विषय चिंतन के कारण वह धीरे-धीरे असफलता की आरे बढ़ने लगता है, चाहे वह कितना ही कर्म करता दिखाई पड़े, कितने ही आकर्षक व्यक्तित्व वाला, ऊँचे पद वाला क्यों न हो।
कर्म न करते हुए भी मन-ही-मन कामुक-अश्लील चिंतन करने वाले, द्वेष भरे विचार मन में पालने वाले मिथ्याचारी, दंभी कहे जाते हैं। कर्म मात्र बहिरंग से नहीं, अंतरंग से भी व निष्पाप मन के द्वारा होना चाहिए। श्रीकृष्ण भगवान यहाँ ऐसे लोगों की चर्चा कर रहे हैं, जो समाज की कुछ सेवा नहीं करते, समाज पर भाररूप हैं, मन से विषयों को चिंतन करते रहते हैं, कामना के प्रति आसक्ति भाव अंदर से छोड़ नहीं पाते । ऐसे व्यक्तियों से भिन्न हमें एक आदर्श जीवन बिताने वाला बुद्धिमान, प्रज्ञावान् व्यक्ति बनना है। वे सातवें श्लोक में कहते हैं -
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेउर्जन। कर्मेन्द्रियैः र्कयोगमसक्तः स विशिष्यते॥ 3/7
अर्थात् -” हे अर्जुन जो पुरुष इंद्रियों को मन द्वारा संयत कर निरासक्त हुआ समस्त इंद्रियों द्वारा (शरीर द्वारा) कर्मयोग का आचरण करता है,वही श्रेष्ठ है।”
यही महामानव की परिभाषा है। अनासक्ति का भाव मन में पैदा होना। मन द्वारा इंद्रियों का संयम संभव है। इंद्रियों के माध्यम से ही बहार भागता रहता है। संयत मन द्वारा अपनी इंद्रिय क्रियाओं को संपादित करते हुए-बहिरंग संसार के स्वामी मात्र ही नहीं, अपने उद्विग्नता रहित शाँत मन के स्वामी बनकर जीना ही मनुष्य को शोभा देता है। ऐसे व्यक्ति को अनासक्त मन द्वारा संसार में अपने कर्मों का संपादन करना चाहिए।
इस शब्द ‘अनासक्त’ को यहीं पर भली-भाँति समझ लेना चाहिए। यह शब्द गीतायोग की मूल धुरी है। ‘आसक्ति’ का अर्थ है-मैं (अहंकार) चाहता हूँ। (प्राप्त करने की-भोगने की इच्छा है)। अहंकार और अहं-केन्द्रित इच्छा के युग्म को ही आसक्ति कहा गया है। तब श्रीकृष्ण ‘अनासक्ति’ की बात कहते हैं।, तो वह कहते हैं कि अहंकार और अहंता-केन्द्रित इच्छाओं और वासनाओं से रहित होकर संसार के सेवक बनकर जीना । उसके लिए कर्मक्षेत्र एक ऐसे मंच के समान होता है, जहाँ वह बिना नई वासनाएँ उत्पन्न किए वर्तमान वासनाओं का क्षय करता चलता है।
स्वामी विवेकानंद कहते हैं, “कर्म (सकाम) जब तक क्षय नहीं हुआ हो, तब तक संन्यास किसी काम का नहीं।” आद्यशंकराचार्य विविक चूड़ामणि में कहते हैं, “निष्काम कर्म करते हुए जब हम आगे बढ़ते हैं, तो हमारे कुसंस्कार ऐसे झड़ते हैं, जैसे वृक्ष से पत्ते।” पुराने पीले पड़े पत्ते इस प्रकार झड़ते चले जाते हैं कि पता भी नहीं चलता । निष्काम कर्म, बिना आसक्ति के किया गया कर्म ही सबसे बड़ा तप है, योग है।
हम जितने भी महामानव देखते हैं, सभी कर्म से मान बने हैं, यह विदित होता है। निष्काम कर्म ही उसके जीवन की मूल धुरी रहा है। आद्यशंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद मिल्टन आदि ने थोड़े ही समय में अभीष्ट लक्ष्य को प्राप्त कर अपना नाम इतिहास में लिखाया।परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर निष्काम कर्म किया। युगसाधना में लगे, युगधर्म का पालन किया । जब पूज्यवर ने अपने गुरु के आदेशानुसार 24 लक्ष के 24 महापुरश्चरण आरंभ किए तो एक और आदेश साथ में मिला कि आध्यात्मिक पुरुषार्थ के अतिरिक्त लौकिक दृष्टि से स्वयं को 3 वर्ष के लिए स्वतंत्रता संग्राम के लिए भी नियोजित करना होगा। ऐसे में 24 वर्ष के महापुरश्चरण यदि 27 वर्ष में संभव होते हों तो कोई हर्ज नहीं, किंतु उसे भी वे युगधर्म मानकर करें। बिना किसी कामना के, आसक्ति भाव के, जब तक बताया गया तब तक पूज्यवर ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते भागीदारी की एवं पुनः साधना साधना में लग गए। हम सबके लिए भी आज के समय को स्वतंत्रता संग्राम एक ही है-युगनिर्माण को आँदोलन-विचारक्राँति-ज्ञानयज्ञ अभियान। शरीर बीमार है, मन परेशान है, तो भी कोई दिक्कत नहीं। शरीर धुल जाएगा स्वतः ही, मन भी स्वस्थ हो जाएगा इस तप से। कुसंस्कार रूपी पत्ते यदि इस कर्म के माध्यम से झड़ते रहें, तो निश्चित ही दैवी अनुकंपा महानता के रूप में बरसेगी। कर्मों का संपादन हम सतत् करें, करते रहें एवं बिना आसक्ति के करें।
अब प्रश्न यह उठता है कि कौन से कर्म करें ? किस प्रकृति के वे कर्म हों ? क्या कुछ ऐसे कर्म भी हो सकते हैं, जिनके संपादन से हमारे संवेदनशील मन को आघात पहुँचता हो, हमारी आध्यात्मिक प्रगति में अवरोध आते हों ? तब भगवान कृष्ण अर्जुन के मन को पढ़ते हुए कहते हैं-
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म न्यायो ह्यकर्मणः। शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्वयेदकर्मणः॥ 3/7
अर्थात् “ अर्जुन तू शास्त्विहित कर्म कर। क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।”
जैसा शास्त्र कहता है, जैसा समय की आवश्यकता के अनुसार जरूरी है, वैसे ही कर्म किए जाने चाहिए। सारी तत्परता -सारी इंद्रियों का नियोजन युगधर्म के निर्वाह में हो-यह मंतव्य प्रस्तुत श्लोक से निकलता है। हमारे ऋषियों ने कर्मों के विषय में बड़ा स्पष्ट विभाजन कर हमारा मार्गदर्शन किया है । उन्होंने चार भागों में इन्हें बाँटा है-
(1) निषिद्ध कर्म - जो मानव के विकास के अनुरूप नहीं हैं तथा शास्त्रों में जिनको निंदा की गई है।
(3) काम्य कर्म - जो निजी इच्छाओं-कामनाओं से प्रेरित होते हैं।
(3) नित्य कर्म- दैनिक कर्म, जिनके संपादन की सभी से मानव होने के नाते अपेक्षा की जाती है।
(4) नैमित्तिक कर्म- जिन कर्मों के संपादन की हमसे विशेष और असाधारण परिस्थितियों में अपेक्षा की जाती है।
इनमें से प्रथम दो से हमें बचना चाहिए, क्योंकि न तो वे मानवी गरिमा के अनुरूप हैं और न ही आध्यात्मिक प्रगति में सहायक । शास्त्र मत के अनुसार अगले दो नित्य-नैमित्तिक कर्म ही हमारे कर्त्तव्य-कर्मों को निमार्ण करते हैं। ये दोनों मिलकर वह शब्द बनता है, जिसे योगेश्वर श्रीकृष्ण ने नियत कर्म नाम से संबोधित किया है।
हम इस संसार में एक स्वार्थी की जिंदगी जीने नहीं आए। हम सामाजिक प्राणी हैं, अतः हमसे अपेक्षा की जाती है कि हम अपने परिवार, जाति-समाज-संसार सभी के प्रति अपने कर्त्तव्यों का संपादन करें। नियत कर्मों को हम श्रेष्ठ तरीके से अनासक्ति के भाव से प्रसन्नतापूर्वक संपादित करते रहें, इसी में हमारी शान है। कर्म करते-करते एक और प्रक्रिया होती चली जाती है, हमारे संस्कारों-दबी हुई कामनाएँ, भावनात्मक ग्रंथियों से हमें मुक्ति मिलती है। कर्मठ जीवन आलस्यपूर्ण निष्क्रियता के जीवन से कहीं अधिक श्रेष्ठ है। हम समय व्यर्थ न खोकर उद्यमपूर्वक कर्म करते रहें, यही गीताकार का संदेश है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि शरीर यात्रा भी तो बिना कर्म के नहीं सधेगी। जीवन-व्यापार पूरा उद्यम पर टिका है। इसलिए निर्धारित-नियत कर्मों को निष्ठापूर्वक संपन्न करते रहना ही मनुष्य की सर्वांगपूर्ण प्रगति का आधार बनता है। सारे राष्ट्र जो समृद्ध-संपन्न विकसित कहलाते हैं, इसी कर्मठता की धुरी पर चलकर ही उस स्थिति में पहुँचे हैं। जहाँ भी आलस्य, प्रमाद, अकर्मण्यता है, वहाँ निश्चित ही अविकसित-अर्द्धविकसित-अनगढ़ स्थिति है, यह मानकर चलना चाहिए । हमारे राष्ट्र की भावी प्रगति-आर्थिक महाशक्ति के रूप में सफल होने की कुँजी भी यही है उद्यमशीलता।
परमपूज्य गुरुदेव कहते थे कि कर्म करते रहने से, शारीरिक श्रम से कुसंस्कार कटते हैं। सक्रिय जीवन शारीरिक स्वास्थ्य के लिए स्थूल व सूक्ष्म दोनों ही दृष्टि से अनिवार्य हैं। इसलिए उन्होंने प्रातः जागरण से लेकर संध्या तक कार्यकर्त्ताओं को नियत कर्म में लगे रहने की प्रेरणा दी- श्रमदान के माध्यम से अहंता को गलाने की तथा निरंतर इस प्रक्रिया द्वारा अपनी साधना को प्रखर करने की बात कही। पत्रलेखन, जनसंपर्क, विशिष्ट शोधपरक लेखन हमारे लिए गुरु द्वारा निर्धारित नियत कर्म हैं, तो उसमें श्रमदान नैमित्तिक कर्म है, जो हमारे व्यक्तित्व के उच्चस्तरीय विकास का पथ प्रशस्त करता है। कर्म करते रहने से अंतः करण की शुद्धि होती है एवं हमें इसे योगसाधना मानकर नियमित करना चाहिए।
श्री अरविंद ‘नियतकर्म’ की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि यह शब्द पिछले श्लोक (सातवें) के ‘नियम्य’ शब्द का तात्पर्य लेकर प्रयुक्त हुआ है। अर्थात् मुक्त बुद्धि द्वारा नियत किया हुआ निष्काम कर्म। ‘मनसा नियम्यारभते कर्मयोगम्’ यह उद्धरण सातवें श्लोक में आया है अर्थात् जो कोई मन से इंद्रियों का नियमन करते हुए कर्मेंद्रियों द्वारा कर्मयोग करता है, वही श्रेष्ठ है। इसी का सार अगले श्लोक में ‘नियतं कुरु कर्म त्वं’ के माध्यम से प्रस्तुत है। इसका अर्थ यह कोई वेदोक्त याज्ञिक अनुष्ठानपरक नित्यकर्म व दिनचर्या मात्र से नहीं लिया जाना चाहिए।यह श्रेष्ठ स्तर का निष्काम कर्म ही है, जिसकी व्याख्या गीताकार ने की है। (गीता प्रबंध, पृष्ठ 114)
गीता की शिक्षा अनगढ़ नहीं है-लौकिक स्तर की नहीं है। गीता का शिक्षण अति गंभीर स्तर का व सूक्ष्मतम है, सर्वकालीन है, सब मनुष्यों के लिए है । गीता बहिरंग के ढकोसलों-साँप्रदायिक धारणाओं के बंधनों को तोड़कर मूल सिद्धाँतों की ओर हमारा ध्यान डालती है। गीता व्यावहारिक अध्यात्म का ग्रंथ है, मात्र दार्शनिक सूत्रों और बंधे बंधाए मतवादों का ग्रंथ नहीं ।
गीता की इसी शिक्षा को जो ‘नियत कर्म’ की व्याख्या के माध्यम से बताई गई है, यदि भली भाँति समझ लिया जाए तो कर्मयोग का ककहरा हमारी समझ में आ जाएगा। वह कर्म फिर कामना से मुक्त होकर किया जाएगा। बिना किसी फल की अपेक्षा के संपन्न होगा। परंतु ऐसा तो पाता है क्या। पुण्यसंचय, देशसेवा, मानवसमाज की सेवा-साधना भी कर्म के उत्प्रेरक कारण हो सकते हैं। फिर कर्म कामना से मुक्त कैसे हो, इसकी व्याख्या इस माध्यम सके अगले श्लोकों में है, जहाँ यज्ञार्थाय कर्म करने की बात कही गई है। इसी में आसक्ति से मुक्त होकर यज्ञ के निमित्त कर्म करने की बात बड़े विस्तार से समझाई गई हैं। अब उस प्रकरण को परिजन अगले अंक की युगगीता में पढ़ेंगे, पर यहाँ कर्म के विषय में थोड़ा चिंतन परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है। परमपूज्य गुरुदेव नियत लेखनी के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत हैं परमपूज्य गुरुदेव नियत कर्म की परिभाषा ऐसी जीवनचर्या के रूप में करते हैं।
पूरा आश्वासन है ज्ञानयज्ञ के निमित्त लग जाने को युगऋषि का-”निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्” के रूप में वस्तुतः अखण्ड ज्योति एवं युगनिर्माण योजना पत्रिका का प्रचार-प्रसार-पूज्यवर के क्राँतिधर्मी चिंतन का प्रसार-विस्तार ही अबका युगधर्म है। पत्र की भाषा से इसकी स्पष्ट झलक मिलती है। एक पत्र और यहाँ उद्धृत कर रहे हैं। यह पत्र 10-9-64 को टीकमगढ़ के श्री बैजनाथ शौनकिया जी को लिखा गया था श्री बैजनाथ जी अखण्ड ज्योति के 108 सदस्य बनाने के लिए संकल्प किया था। इस संबंध में ‘युग निर्माण योजना’ में विवरण छपता था ताकि औरों को भी प्रेरणा मिले। इसी संबंध में पूज्यवर लिखते हैं-”आपने 108 सदस्य बनाने के लिए संकल्प क्यों संकल्प किया ? इसमें आपने जनता का क्या हित समझा ? इस संबंध में एक छोटा लेख लिख दें और अपने आधे शरीर का साफ-सा फोटो खिंचवाकर भेज दें। इसे युग निर्माण के किसी अगले अंक में छाप देंगे।”
सद्गुरु की लीला अपरंपार है। विचार जन-जन तक पहुँचे, इसके लिए ही उनका पुरुषार्थ जीवनभर चलता रहा। ‘अखण्ड ज्योति’ ऐसी ही आध्यात्मिक आभा-ऊर्जा संपन्न प्राणचेतना की संवाहक है। आज प्रत्यक्षतः उंगलियाँ किसी की भी चलती हों, मूल प्रेरणा स्रोत सूत्र-संचालक का दिव्य प्राण ही है।
छपे कागज के पुलिंदों के रूप में हजारों पत्रिकाएँ साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक रूप में निकलती हैं। कुछ थोड़े दिन खींचती हैं, कुछ आगे तक चली पाती है व कुछ हलके मनोरंजन की बैसाखी पर चलती हुई घिसटती रहती हैं।मानवी वृत्ति है कि जहाँ उसे हलका-फुलका मन की पाशविक प्रवृत्तियों को भड़काने वाला मसाला मिला, सूखी हड्डी चबाने वाले कुत्ते की तरह वह उसमें रस लेने का प्रयास करता है। ऐसी परिस्थितियों में जब मानवी चिंतन श्रेष्ठता के स्थान पर निकृष्टता के सरल प्रवाह में बहने को उतारू हो, एक आध्यात्मिक पत्रिका का निकलना, सतत् संख्या बढ़ते चले जाना एवं न मिलने पर जन-जन को उसका अभाव खलने लगना, इस तथ्य का परिचायक है कि किसी शक्तिपुँज ने अपनी प्राणचेतना उड़ेलकर हृदय में उमड़ी संवेदना की स्याही के सागर में लेखनी डुबोकर उसे लिखा है एवं बिना किसी लाभ की कामना के उसे प्रकाशित किया गया है।
यहाँ प्रसंग ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का चल रहा है, जिसके प्रतिपादनों ने न केवल अगणित व्यक्तियों के मनोबल को जगाया है, उन्हें मूर्च्छना से उठाया है, उन्हें हस्तामलकवत भविष्य संबंधी मार्गदर्शन देते हुए प्रत्यक्ष गुरु की भूमिका निभाई। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी जिन्होंने अखण्ड दीपक से प्रेरणा लेकर ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका पूर्व में 1937 की वसंत पंचमी से आरंभ की, इसे प्रकाशन के रूप में 1940 की वसंत पंचमी से आरंभ की इसे दैवीचेतना का संदेश ही मानते थे। अनेकानेक व्यक्ति इस पारस के संपर्क में आकर अनगढ़ लौहखंड से स्वर्ण बनते चले गए। जीवन जीने की दिशा मिली, प्रेरक मार्गदर्शन मिला मानों कोई उँगली पकड़कर चलना सिखा रहा हो।
पत्रिका अभी शैशवावस्था में थी। लगातार निकलते मुश्किल से आठ वर्ष हुए थे। एक पाठक श्री मोहनराज भंडारी ( अजमेर) ने उसकी प्रशंसा में कुछ शब्द लिखे, तो पूज्यवर ने उत्तर दिया, जो इस प्रकार है-
“हमारे आत्मस्वरूप,
24-11-47
अखण्ड ज्योति की आपने जो समालोचना लिखी है। सो पढ़ी । कुँजडी अपने बेरों को खट्टे क्यों बताएगी? अखण्ड ज्योति के प्रति तुम्हारी जो आत्मीयता है, उसके कारण वह वस्तुतः तुम्हारी अपनी वस्तु हो गई है। जब अखण्ड ज्योति तुम्हारी अपनी वस्तु है, तो स्वाभाविक है कि तुक इसकी प्रशंसा करो। इसके लिए मैं तुम्हें धन्यवाद क्यों दूँ ?”
पत्र लेखन की कला सीखने वालों को उपर्युक्त उद्धरण से शिक्षण लेना चाहिए। जहाँ समालोचना लिखी है, वहाँ पूज्यवर ने ‘आप’ शब्द प्रयुक्त किया है, किंतु जहाँ अपनत्व की बात आई है,वहाँ वे ‘तुम’ संबोधन पर उतर आए हैं। दूसरे प्रशंसा की बात को कितनी सहजता से अभिव्यक्ति दी है आचार्य श्री ने । उन्होंने लिखा है कि यह पत्रिका आपकी अपनी ही है एवं अपनी की तो हर कोई तारीफ करता है ही। अखण्ड ज्योति पत्रिका को पत्रों के आइने से पढ़ने पर जो भी कुछ समझ में आता है, उसे अनुभव करने के लिए भावनात्मक गहराई चाहिए। यह बुद्धि के स्तर की चीज नहीं है।
एक और पत्र उद्धृत है-
“चि0 माया, आर्शीवार
19-10-1967
पत्र मिला। भावनाओं के आदान-प्रदान की मंजिल का एक चरण अब पूरा हो गया । अब दूसरे उस चरण में प्रवेश करना है, जिससे आत्मा के अवतरण का लक्ष्य पूरा हो। सो अब पत्रों का विषय भी वहीं रहना चाहिए। भावनाओं का आदान-प्रदान काग के नहीं, अंतरिक्ष के माध्यम से होता रहेगा।”
वे मिशन की चिर-परिचित कवयित्री स्व0 माया वर्मा को लिखते हैं कि भावनाओं के आदान-प्रदान मात्र तक अब पत्राचार सीमित न रहे।पत्र उसका एक माध्यम बना, ठीक है, पर वह प्रारंभिक कक्षा थी, वहीं तक सीमित होकर न रह जाएँ। आत्मिक पंक्तियों में अपनत्व के माध्यम से जुड़े परिजनों का कितना सशक्त मार्गदर्शन है। इन्हीं माया वर्मा को सतत् दिशा देते हुए अमरकृति बन गई। उनके भावना संपन्न अंतस्तल को सृजनात्मक मोड़ हमारे गुरुदेव ने दे दिया-पत्रलेखन भी एक माध्यम बना व पास बिठाकर दिया गया मार्गदर्शन भी। अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर उनके काव्य को स्थान मिला। इसी पत्र में आगे पूज्यवर लिखते हैं-
“जनवरी 67 से तुम विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अपनी रचना छपने भेजते रहना। समन 67 के अंत तक तुम इस देश की मूर्द्धन्य कवयित्री होंगी। कलम तुम चलाना-कविताएँ रचते हम चले जाएंगे।”
“तुम्हारे शरीर और मस्तिष्क का-आत्मा का प्रयोजन-लक्ष्य क्या है, यह अक्टूबर अंक (अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1967) में स्पष्ट है। जो बीत गया सो गया-अब शेष समय किसी महान आदर्श के लिए ही व्यतीत होना चाहिए।”
“कविता में तुम्हारी आत्मा का निर्मल चित्रण है, पर अब हमारे लिए नहीं, हमारे मिशन के लिए, सर्वतोभावेन जुट जाना है। कविताएँ भी उसी के लिए लिखो ।”
परमपूज्य गुरुदेव का समस्त लेखन गद्य-पद्य-पत्र-अपनत्व भरा मार्गदर्शन सभी मिशन को समर्पित था एवं यही अपेक्षा वे अपने अनुयायियों विशेषतः विभूतिवान् समीपवर्तियों से रखते थे। अखण्ड ज्योति पत्रिका का लेखन विशुद्धतः लोकमंगल के लिए हुआ, मनोरंजन के लिए नहीं। यही कारण है कि आज वह लाखों-करोड़ों की मार्गदर्शक बनी हुई है। इस तथ्य को स्वयं परमपूज्य गुरुदेव ने जनवरी 1977 की अखण्ड ज्योति पत्रिका में इस तरह लिखा है, “यह पत्रिका मात्र नहीं है। उसमें लेखक का -सूत्र-संचालक का दिव्य प्राण भी आदि से अंत तक घुला हैं, अन्यथा मात्र सफेद कागज को काला करके न कहीं किसी ने इतनी बड़ी युगसृजेताओं की सेवावाहिनी खड़ी की है और न इतने ऊँचे स्तर के इतनी बड़ी संख्या में सहायक, सहयोगी, अनुयायी ही मिल हैं।” “इसे (अखण्ड ज्योति को) एक शब्द में इतना ही समझाया जा सकता है कि यह हिमालय के देवात्मा क्षेत्र में निवास करने वाली ऋषिचेतना का समन्वित अथवा उसके किसी प्रतिनिधि का सूत्र-संचालन है।” (अखण्ड ज्योति पृष्ठ 26-27, जनवरी 1977)
यही प्रेरणा पूज्यवर अपने परिजनों को पत्र में सतत् देते भी रहते थे। श्री ब्रजमोहन दधीचि (तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी मुरैना, म.प्र.) को 26-11-67 में लिखे एक पत्र में पूज्यवर लिखते हैं-
“अखण्ड ज्योति के सदस्य एवं नवनिर्माण साहित्य प्रसार की योजना सब प्रकार उपयुक्त हैं । अपने पुरुषार्थ से जितना बन सके, करते रहें। हम आपकी पीठ पर हैं, भगवान आगे, फिर चिंता किस बात की।
जिसमें आत्मकल्याण और लोककल्याण के दोनों प्रयोजन पूरे होते हों, साथ ही निर्वाह और परिवार-पोषण में भी में किसी को कोई कठिनाई अनुभव न होती हो। वे लिखते हैं, “आठ घंटे कमाने के लिए, सात घंटे विश्राम के लिए लिए, पाँच घंटे घरेलू कामकाजों से निपटने के लिए ठीक प्रकार निकाले जा सकें, तो नित्य कुआँ खोदने-पानी पीने वालों की निर्वाह आवश्यकता भली प्रकार पूरी होती रह सकती है, साथ ही चार घंटे का घंटे का समय सामयिक परमार्थ प्रयोजनों की पूर्ति के लिए नित्य सरलतापूर्वक निकल सकता है।” जो भी अवकाश के दिन मिलते हों, उन्हें युगसृजन में लगाने की व्यवस्था बनाएँ तो कहीं अधिक स्फूर्ति और समय की सार्थकता का आनंद लिया जा सकता है। पूज्यवर की दृष्टि में यह समयदान ही इस समय का नियत कर्म हैं-युगधर्म हैं।
महापूर्णाहुति पुस्तकमाला क्र. 20 के रूप में प्रकाशित पुस्तक ‘समयदान ही युगधर्म’ में महाकाल की अंशधर सत्ता ने लिखा है कि “युगपरिवर्तन के इस पराक्रम में दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन और सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन ये दो ही प्रधान कार्य हैं।” इनके निमित्त नियोजित समयदान इस समय का युगधर्म है, श्रेष्ठतम कर्म है- यज्ञार्थाय किया गया कर्म है। शेष व्याख्या अगले अंक में।
पत्रलेखन एक कला भी है और शिक्षण की एक महत्वपूर्ण विधा भी। महापुरुषों के चिंतन का आकलन करना हो तो उसे बड़ी आसानी से उनके उनके पत्रों द्वारा किया जा सकता है, जिसमें अनौपचारिक रूप में उनकी परामर्श भरी सद्भावना झलकती दिखाई देती है। स्वामी विवेकानंद के साहित्य में जितना जन-जन को रस आता है, उससे अधिक प्रेरणा उनके द्वारा लिखे पत्रों से मिलती है। ‘सलक्टेड लेटर्स ऑफ स्वामी विवेकानंद’ पुस्तक के पन्ने पलटकर देखा जा सकता है कि कितनी विविधता भरा शिक्षण उस देखा जा सकता है कि कितनी विविधता भरा शिक्षण उस महामनीषी ने तत्कालीन स्थितियों को दृष्टिगत रख दिया । इसी प्रकार बापू के पत्रों के वाङ्मय पर दृष्टि डालकर जाना जा सकता है कि उनके विभिन्न विषयों पर विचार क्या थे।
परमपूज्य गुरुदेव के द्वारा लिखे पत्रों पर जब हम दृष्टि डालते हैं, तो उसमें बहुमुखी-वैविध्य से भरा न केवल शिक्षण हमें मिलता है, साधना-विज्ञान को किस रूप में समझना चाहिए, उसका मार्गदर्शन भी मिलता है। पत्र-लेखन के द्वारा आध्यात्मिक प्रगति संबंधी सूक्ष्म स्तर का दिग्दर्शन भी पूज्यवर किस कुशलता के साथ करते थे, इसका नमूना इन पत्रों से मिलता है।
हमारे आत्मस्वरूप
23-12-40
“आपका कृपापत्र मिला। कुशल समाचार पढ़कर संतोष हुआ । आपकी प्रगति बराबर आगे को ही रही है। यह गति मंद भले ही हो, पर है सीधी दिशा में । हमारा विश्वास है कि आप लक्ष्य तक अवश्य पहुँचेंगे। आपको कोई विचलित न कर सकेगा।”
“आत्मसाक्षात्कार तो पूर्णावस्था है, उस तक पहुँचने में देर लगेगी। पूर्णावस्था तो परम सिद्धि हैं। उसे पाने के बाद और कुछ पाना शेष नहीं रहता। ईश्वरदर्शन के लिए ही सब साधनाएँ होती हैं। वह हो जाने पर किसी साधना की आवश्यकता नहीं हैं। आत्मसाक्षात्कार ही तो जीवन लक्ष्य होता है।”
उग्र अनुष्ठान और तपश्चर्या न करके मात्र सौम्य साधना करें, ऐसा प्यार भरा मार्गदर्शन पूज्यवर ने दिया है। पीठ भी थपथपाई है तथा कुछ शब्दों में गूढ़ दर्शन की बात कहकर उन्हें निरंतर गायत्री साधना करते रहने की बात कही हैं यह पत्र न केवल एक गुरु-शिष्य के मध्य का संवाद है, अपितु साधना विज्ञान संबंधी एक गंभीरतम स्तर का प्रशिक्षण भी। यह सही है कि पास बैठकर-उपदेश सुनकर सब कुछ सीखा-समझा जा सकता है, परंतु पत्रों से भी यह कार्य विधि-व्यवस्थापूर्वक संभव है। इसका नमूना है यह पत्र।
इसी प्रकार 17-12-41 का एक पत्र एक साधक के नाम संबोधित है तथा कुँडलिनी संबंधी उनकी जिज्ञासा को परिपूर्ण समाधान देता है। पूज्यवर लिखते हैं-
“सुषुम्ना द्वारा कुँडलिनी जागरण का कार्य आपके लिए कुछ कठिन नहीं है। वह कराया जा सकता है। परंतु एक कठिनाई यह है कि उस आनंद को प्राप्त करने पर मनोदशा विचित्र हो जाती है। साधक अवधूत जैसा बन जाता है।उससे फिर साँसारिक क्रियाएँ ठीक प्रकार नहीं हो पातीं, तदनुसार उसे विरक्त ही कहना पड़ता है। आपके लिए अभी अनेक कर्त्तव्य साँसारिक शेष है। उन्हें पूरा होने तक आप गायत्री साधना द्वारा अपनी अंतःभूमिका का पकाते रहें। जब आप आवश्यक कर्त्तव्यों से छुटकारा पा जाएँगे, तब आप एक सप्ताह की साधना में सुषुम्ना द्वारा कुँडलिनी जागरण को प्रत्यक्ष कर लेंगे।”
परिजन की स्थिति का पूज्यवर को पूरा ध्यान है। परंतु उत्साह में आकर कोई ऐसा प्रयोग कर बैठे, जो आत्मघाती हो, यह सावधानी रखकर वे अपने शिष्य को एक बालक की तरह समझाते भी हैं। कुँडलिनी जागरण आज एक ‘इंस्टेंट’ प्रक्रिया की तरह विज्ञापित होता रहता है। कुँडलिनी का क-ख-ग न जानने वाले भी कुँडलिनी जागरण की कक्षाएँ चलाते , उस दुकान से लाखों कमाते देखे जाते हैं। यह कितनी गूढ़ साधना है। उसके लिए सुपात्र बनना आवश्यक है, यह कोई नहीं समझता। नासमझी के आधार पर धूर्त मूर्खों को ठगते देखे जाते हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने सभी को एक सुव्यवस्थित मार्गदर्शन देते हुए साधना के सभी सोपानों को यथासमय अखण्ड ज्योति पत्रिका में भी दिया एवं पत्रों द्वारा भी उनका मार्गदर्शन किया।
कानपुर के इन्हीं श्री रामदास जी को जिनका पत्र ऊपर उद्धृत किया गया है, 17-9-41 को लिखे एक पत्र में पूज्यवर लिखते हैं-
“आपकी आध्यात्मिक यात्रा ठीक प्रकार चल रही है। साँसारिक झंझट इसलिए चलते रहेंगे कि जिसका जितना आपको देना-लेना है-उसको चुकाने की व्यवस्था करनी है, ताकि आगे के लिए कोई हिसाब-किताब ऐसा न रह जाए, जो बंधनकारक हो। आपका वर्तमानकालीन कोई कर्म बंधनकारक बनने दिया जाएगा। उसका तो हम स्वयं ही परिमार्जन करते रहते हैं। उसकी तनिक भी चिंता नहीं करनी है। चिंता तो केवल पूर्व संचय की है, जिसका लंबा हिसाब-किताब इसी जीवन में बेवाक करना आवश्यक है।”
साधक श्री रामदास जी बड़ी जल्दी-जल्दी परेशान होकर पूज्यवर को पत्र लिखते थे, तो तुरंत मार्गदर्शन मिलता था। साँसारिक उलझनों से परेशान-क्षुब्ध साधक को एक मलहम-सा मिलता था इन पत्रों से। ये कष्ट हमें हँसकर झेलना है। हमारे कर्म बंधन न बनने पाएँ, इसका एक नियति का तरीका है-विभिन्न प्रकार के साँसारिक झंझटों का आक्रमण । इनसे जूझते हुए, जीवन-साधना करते हुए यदि श्रेष्ठ कर्म किए जाएंगे, तो क्रियमाण-कर्म काटे जा सकते हैं। संचित-प्रारब्ध का हिसाब-किताब यदि भगवान इन झंझटों के माध्यम से-दैनंदिन जीवन में आती तकलीफों के रूप में ले रहा हो, तो इसे हंसकर स्वीकार करना चाहिए, यह व्यवहारिक अध्यात्म परक शिक्षण इस पत्र से मिलता है। पत्र लिखा तो एक साधक को गया है, वह भी आज से 49 वर्ष पूर्व, किंतु शाश्वत चिंतन के रूप में हम सबके लिए है। आज भी यह तथ्य अपनी जगह है कि हमें कष्टों को तप बनाकर जीवन जीने का अभ्यास डालना चाहिए। आत्मिक प्रगति तो सतत् अभ्यास से होती रहेगी, किंतु थोड़े-बहुत छोटे-मोटे लौकिक अवरोधों से हममें से किसी को भी विचलित नहीं होना चाहिए। साधना-विज्ञान का इतना सरल-सुगम व व्यावहारिक मार्गदर्शन इससे श्रेष्ठ और क्या हो सकता है।
कभी-कभी परिजन अपनी विलक्षण अनुभूतियों का विवरण पूज्यवर को लिख देते थे। उन्हें लगता था कि इनसे जो संकेत मिल रहा है, वह कहीं भ्रम मात्र तो नहीं है। यदि नहीं तो क्या मार्गदर्शन लिया जाए, यह एक सहज जिज्ञासा होती थी। श्रीमती गीता को 7-7-70 को लिखे एक पत्र में पूज्यवर व्यक्त करते हैं-
“तुम्हें इन दिनों जो अनुभूतियाँ हो रही हैं, वे भ्रम नहीं हैं। उन्हें सर्वथा सार्थक ही समझना चाहिए। भगवान् की विशेष कृपा होने पर ही ऐसी अनुभूतियाँ होती हैं।
तुम्हारा आत्मबल और तप-तेज निरंतर बढ़ता रहे, ऐसी सर्वशक्तिमान माता से प्रार्थना है।”
इसी प्रकार एक पत्र में जो 4-12-40 को मुजफ्फरपुर के श्री देवव्रत जी को लिखा गया था,-पूज्यवर गायत्री साधना संबंधी मार्गदर्शन देते हुए उन्हें धैर्य बनाए रखने को कहते हैं। किसी के द्वारा यह कह दिए जाने पर कि आपकी जीवनरेखा छोटी है, अब अंतकाल आ गया है, पूज्यवर करते हुए उन्हें आश्वासन देते हुए हैं कि इसकी वे तनिक भी चिंता न करें। पाठकगण यदि पत्र अच्छी तरह पढ़े तो समझ पाएंगे कि इसमें जीवनदान किस तरह दिया गया है। हस्तरेखा विज्ञान की गहराइयों को न समझने वाले भी बिना भयभीत हुए अपने भाग्य का निमार्ण स्वयं कर सकते हैं। पत्र इस प्रकार है-
“हमारा दीर्घकालीन अनुभव है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती । अभीष्ट मनोरथ पूरे न भी हों तो भी प्रकाराँतर से आत्मिक और सांसारिक सुविधाएं बढ़ने में किसी न किसी प्रकार सहायता अवश्य मिलती हैं। जितना समय, श्रम और शक्ति साधना में खरच होती हैं, उसका मुआवज़ा अवश्य ही मिलकर रहता है। आप अपनी साधना को निष्ठा, धैर्य और स्थिरतापूर्वक जारी रखें । इससे आपकी जीवनदिशा में परम सात्विक परिवर्तन होगा। भविष्य के लिए आप तनिक भी चिंता न करें। लालच की बात न सोचें । वह सोचें जिसके लिए जीवन प्राप्त होता है। आपको जीवनोपयोगी वस्तुओं का कष्ट न रहेगा।”
“जीवनरेखा की चिंता न करें । आपकी अन्य रेखाएँ ऐसी हैं जिनके कारण आपका जीवनकाल कम न होगा। दीपक में थोड़ा तेल होने पर भी उसे व्यवस्थापूर्वक खर्च किया जाए, पतली बत्ती डाली जाए तो दीपक अधिक समय तक जल सकता है।”
क्या बेबाक लेखनी है। जिन सज्जन का हाथ क्या शक्ल भी कभी नहीं देखी थी, कितना सरल मनोवैज्ञानिक उपचार प्रस्तुत किया गया है। यह इस पत्र से समझा जा सकता है कि अभी दिसंबर 99 की मुजफ्फरपुर यात्रा में स्वयं श्री देवव्रत जी हमसे मिले। 49 वर्ष बाद उनका स्वास्थ्य यथावत है। उन्होंने ही हमें ये पत्र सौंपे। किसी को भी डरा देना आसान है, तुम्हारे ग्रह खराब हैं, तु यह साधना मत करो, शनि की शाँति हेतु वह करो, परंतु वास्तव में उसके मनोबल को बढ़ाकर कैसे जीवनरक्षा की जा सकती है, यह मार्गदर्शन हमें पूज्यवर की लेखनी-पाती से मिलता है।
अंत में एक साधिका की लेखनी-पाती से मिलता है। बहन को लिख एक पत्र का अंश यहाँ प्रस्तुत है। साधना की परिपक्वावस्था में क्या स्थिति होती है, उसका संकेत इसमें है व पाठकों के लिए एक प्रेरक मार्गदर्शन भी ।
प्रिय पुत्री केशर आशीर्वाद 16-2-67
“तुम्हारा पत्र मिला । कुशलता जानी। तुम अब पूर्णता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बहुत बड़ी मंजिल पार कर चुकीं। अब तुम्हारी वह स्थिति आ गई है, जो परमहंस संतों की होती है।” इसी पत्र में वे आगे लिखते हैं -
“गाय अपने बच्चे को दूध पिलाकर जिस प्रकार पुष्ट करती है, वैसे ही तुम्हारी आत्मा को विकसित करने और ऊपर उठाने के लिए हम निरंतर प्रयत्न करते रहते हैं।”
पत्र स्वयं में बड़ा ही स्पष्ट है। आध्यात्मिक साधना में भावपक्ष प्रबल हो तो सिद्धि शीघ्र ही मिलती है, इसका परिचायक है। गुरु-शिष्य अनुदानों का आदान-प्रदान कैसे किस स्तर पर होता है, इसका भी संकेत इससे मिलता है। पत्रों को माध्यम बनाकर भावभरा हृदय अनुदानों के लिए बैठा दिखाई देता है। वे अपनी प्रखर मेधा से सतत् लाखों को मार्गदर्शन करते रहे । आज पूज्यवर हमारे बीच सशरीर नहीं हैं, पर उनकी अमूल्य धरोहर ये पत्र हैं जो उनके कथामृत के अंश रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। धन्य हैं वे, जो इन पत्रों को पाते रहे, धन्य हैं वे, जो सतत् इनको पढ़कर अपनी निष्ठा समर्पण को नित्य बढ़ाते हैं।
महापूर्णाहुति वर्ष विभिन्न प्रतिभाओं-नैष्ठिकों के लिए सोद्देश्य कार्यक्रम लेकर आया है। इसी अंक में प्रज्ञापुँजों-प्रकाशस्तंभों द्वारा किए जाने वाले पंचसूत्री कार्यक्रम की चर्चा है। वह विशिष्ट स्तर का पुरुषार्थ उन सात आँदोलनों से उभरकर आएगा, जो प्रारंभिक कसौटी बनेंगे। इस वर्ष की महाक्राँति के इन सात महत्वपूर्ण घटकों के व्यावहारिक स्वरूप को थोड़ा संक्षेप में यहाँ दिया जा रहा है। आगामी अंक में विस्तार से पाठक-परिजन पढ़ सकेंगे।
(1) साधना
महाक्राँति के लिए जो प्रखर व्यक्तित्व तैयार किए जाने हैं और जो वातावरण बनाया जाना है, उसके लिए साधना का सहारा अनिवार्य रूप से लेना पड़ेगा। परिजनों को याद होना चाहिए कि अपना यह विराट अभियान तीन विशिष्ट पुरुषार्थ के संयोग से आगे बढ़ रहा है। वे हैं-
(क) ईश्वर की योजना और शक्ति।
(ख) ऋषियों (पीरों-पैगम्बरों) का संरक्षण एवं मार्गदर्शन।
(ग) मनुष्यों का भावभरा सहयोग और पुरुषार्थ।
इन तीनों को एक साथ नियोजित करना केवल साधना के सहारे ही संभव है। इसलिए इसे प्रारंभ से ही अनिवार्य चरण के रूप में मान्यता दी जाती रही है। साधना अभियान को व्यापक आँदोलन का रूप देने के लिए इस क्षेत्र में विश्वास रखने वाली तमाम प्रतिभाओं को इस दिशा में संकल्पपूर्वक लगाया जाना है। साधक किसी भी संप्रदाय विशेष की उपासनापद्धति को मानने वाला हो,उसे युगसाधना के लिए सहमत करना जरा भी कठिन नहीं है। लेकिन इसके लिए उन्हें जप-पूजा, कर्मकाँड, उपासना और जीवन-साधना का अंतर भली प्रकार समझना होगा। उनसे कहा जाएगा कि वे भले ही उपासना, कर्मकाँड और मंत्र आदि से कोई भी अपनाएं, लेकिन उपासना की शक्ति से आत्मपरिष्कार और लोककल्याण का भाव बनाए रखें । इसके लिए साधनावर्ष के लिए निर्धारित साधनाक्रम की पुस्तिका में दिए गए मार्गदर्शन का लाभ उठाया और दिया जा सकता है। साधकों को उनकी मनः स्थिति और परिस्थिति के अनुसार उपासनाक्रम एवं शेष दिन के लिए सुझाए गए साधना के विभिन्न चरणों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सृजनशिल्पियों-युग साधकों को अपनी क्षमता और कौशल में इतना विकास करना है कि किसी भी उपासनापद्धति से जुड़े नैष्ठिकों को जीवन-साधना हेतु प्रेरित करके उन्हें नवसृजन के लिए विकसित करने का चक्र चला सके।
(2) शिक्षा-
मनुष्य के व्यक्तित्व का स्तर बहुत अंशों में उसे प्राप्त शिक्षा-दीक्षा के आधार पर विकसित होता है। साक्षरता और विभिन्न विषयों की जानकारी को शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग तो कहा जा सकता है, लेकिन उसे वहीं तक सीमित नहीं किया जा सकता। उसके साथ जीवन की विभिन्न-धाराओं को समझने और उनका सदुपयोग करने की कला-विद्या को भी जोड़ा जाना आवश्यक है।
इस आँदोलन को गति देने के लिए विभिन्न, शिक्षण संस्थानों को अपना कार्यक्षेत्र बनाया जा सकता है। वहाँ शिक्षकों और विद्यार्थियों को जीवनविद्या के प्रति जागरुक रहने के प्रेरणा देकर उन्हें मिल-जुल कर सार्थक प्रयास करने के लिए सहमत किया जा सकता है। इस हेतु प्रज्ञा मंडल और महिला-मंडलों की तरह छात्रों और शिक्षकों के संस्कृति-मंडल गठित किए जा सकते हैं। जगह-जगह छोटे सत्रों की व्यवस्था बनाई जा सकती है। उक्त दोनों कार्यों के लिए मार्गदर्शिका के रूप में दो छोटी-छोटी पुस्तिकाएं शांतिकुंज शिक्षा संकाय द्वारा तैयार कर दी गई हैं। शाँतिकुँज से अपनी आवश्यकता के अनुरूप इन्हें मंगाया जा सकता है।
अपने क्षेत्र में प्रौढ़-शिक्षा, निरक्षरता-उन्मूलन जैसे कार्यक्रम अपने संगठन एवं सहयोगियों की क्षमता के अनुरूप बनाए और चलाएं जा सकते हैं। लोकशिक्षण का कार्य गोष्ठी, सत्संग, संगीत, अभिनय आदि के माध्यम से भी किया जा सकता है। इन सब विधाओं में दखल रखने वाले प्रतिभावानों को प्रेरित-प्रशिक्षित करके लोकशिक्षण की दिशा में बहुत कुछ किया जा सकता है।
(3) स्वास्थ्य
जीवन को सुखी और प्रगतिशील बनाने के लिए शरीर और मन का स्वस्थ होना आवश्यक है। अपने देश में लंबे समय से स्वास्थ्य के आवश्यक नियमों के प्रति उपेक्षा बरती जाने लगी है। स्वच्छता, आहार-विहार का संतुलन, उचित व्यायाम एवं श्रम रोगों के कारण और निवारण, वनौषधियों से शरीर की जीवनीशक्ति का संवर्द्धन आदि ऐसे विषय हैं, जो थोड़े-से प्रयास से नर-नारियों को समझाए और सिखाए जा सकते हैं। इस हेतु जन-जन में यह सब सीखने-अपनाने का उत्साह जगाना और इन विषयों के जानकारों को जनहित के लिए थोड़ा समय नियमित रूप से लगाते रहने के लिए प्रेरित-सहमत करना अभीष्ट है।
(4) स्वावलंबन
शांतिकुंज के रचनात्मक संकाय द्वारा ग्राम विकास, कुटीर उद्योग, गौ-संरक्षण आदि विषयों पर समुचित साहित्य प्रकाशित किया जा चुका है । विभिन्न समाजसेवी संगठनों और सरकारी योजनाओं के अंतर्गत भी इस दिशा में तरह-तरह के प्रयास चलाए जा रहे हैं।उनका लाभ-जन तक पहुंचे, इसके लिए सुसंगठित-सुनियोजित प्रयास किए और कराए जाने अभीष्ट हैं।
(5) व्यसन मुक्ति-कुरीति उन्मूलन
अपने देश में व्यसनों और कुरीतियों में इतनी अधिक शक्ति नष्ट हो रही है कि यदि उसे बचाकर सुनियोजित किया जा सके तो जनहित के तमाम सृजनात्मक कार्य पूरे किये जा सकते हैं। साधना एवं स्वाध्याय से उभरे विवेक के आधार पर हर किसी को यह समझाया जा सकता है कि किस प्रकार हम अपने ही साधनों से अपना हित कर रहे हैं और इन्हें सही दिशा में लगाकर हम कितना लाभ और पुण्य कमा सकते हैं। विभिन्न नशों, फैशनपरस्ती, मनोरंजन के नाम पर समय और आदतें खराब करने के चलन, प्रचलित परंपराओं के नाम पर चल रही तमाम कुरीतियों को दूर करने के लिए प्राणवान अभियान विचारशीलों और कर्मठों के द्वारा हर क्षेत्र में चलाए जा सकते हैं।
(6) पर्यावरण
मनुष्य ने अपने थोड़े से सुख और स्वार्थों के लिए स्थूल और सूक्ष्म पर्यावरण को बुरी तरह बिगाड़ा है। इसे ठीक करने के लिए अपने सुख के स्थान पर अपने हित था संकीर्ण स्वार्थों के स्थान पर सबके हित को ध्यान में रखकर अपने स्वभाव और पुरुषार्थ को निखरना होगा। इस दिशा में हर कोई कुछ न कुछ कर सकता है। जैसे-
वृक्षारोपण, हरीतिमा-संवर्द्धन के लिए व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं संस्था स्तर पर लक्ष्य निर्धारित करके पुरुषार्थ करना और कराना। इसके लिए तुलसी स्थापना, घरेलू वाटिका, स्मृति उपवन जैसे तमाम आँदोलन चलाए जा सकते हैं।
(7) महिला जागरण
यह अकेला आँदोलन विश्व की पचास फीसदी जनसंख्या से संबंधित हैं। इस संबंध में अपना संगठन बहुत कुछ कर रहा है, लेकिन अभी बहुत कुछ करना शेष है। इसके लिए आगे भी विभिन्न व्यावहारिक चरण बनाए और क्रियान्वित किए जाते रहेंगे।
कहना न होगा कि राष्ट्र व विश्वनिमार्ण की प्रक्रिया इन सात महत्वपूर्ण आँदोलनों में नियोजित प्रतिभाओं के माध्यम से न केवल गति पकड़ेगी, आगामी दो वर्षों में महाक्राँति के समग्र स्वरूप को ‘वसुधैव कुटुँबकम्’ की परिकल्पना को, बृहत्तर भारत को समस्त विश्व के साँस्कृतिक अगुआ के रूप में स्थापित करेगी। राजनीति आजादी के बाद की यह सबसे बड़ी महाक्राँति है, जिसका संचालन परोक्ष स्तर पर दैवी तंत्र कर रहा है। निमित्त प्रमाण मात्र बनने के लिए आप हम सबको आगे आना है।
प्रज्ञापुँज-प्रतिभावानों का नियोजन अब इसमें होना है।
परमपूज्य गुरुदेव ने कहा है -” मनुष्य शरीर में प्रसुप्त देवत्व का जागरण करना ही आज की सबसे बड़ी ईश्वर पूजा है। युगधर्म इसी के लिए विभूतियों का-प्रबुद्ध आत्माओं का आह्वान कर रहा है। नवयुग-निर्माण की आधारशिला यही है।” हमारा इस वर्ष का महापूर्णाहुति का विशिष्ट पुरुषार्थ इसी निमित्त नियोजित है। इतिहास के पृष्ठों पर दृष्टि डाली जाए तो भारतवर्ष के वर्चस्व का इतिहास उसके आत्मबल की सफलता का उद्घोष है। ऋषिगणों के पास भौतिक साधन कम थे, पर आत्मबल इतना प्रचंड था कि वे जनसमूह को अपने प्रवाह में एक निर्धारित समय में उसी प्रकार बहा ले चलते थे, जिस प्रकार प्रबल वेग से बहती नदियाँ तिनकों को अपने साथ बहते चलने के लिए विवश कर देती हैं। कीचड़ में फँसे हाथी को सहस्रों मेढ़कों की चेष्टा भी उबार नहीं पाती। उसी समर्थ हाथी ही युक्तिपूर्वक मजबूत रस्सों की सहायता से बाहर निकाल पाते हैं।
आत्मबल संपन्न ऋषिगण स्वयं प्रकाशवान् थे, इसी कारण उन्होंने समस्त क्षेत्र को प्रकाशित किया- चाहे वह बृहत्तर भारत हो, चाहे दक्षिण−पूर्वी एशिया, पूर्वोत्तर में स्थित जापान अथवा लैटिन अमेरिका । कहना न होगा कि इस देश के निवासी जिन दिनों उत्कृष्टतावादी आध्यात्मिक मान्यताओं से अनुप्राणित थे, उन दिनों इस धरती पर स्वर्ग बिखरा पड़ा था। हर मनुष्य के भीतर से देवत्व की झलक दिखाई पड़ती थी और उस लाभ-लालसा से समस्त विश्व के लोग भारतवासियों का मार्गदर्शन, सहयोग एवं प्रकाश पाने के लिए लालायित रहते थे। इन्हीं विशेषताओं के कारण भारतीय संस्कृति समस्त विश्व का सर्वोत्तम आकर्षण बनी हुई थी।
जैसे-जैसे आत्मबल संपन्न हस्तियाँ घटती चली गईं, प्रकाशस्तंभ बुझते चले गए। जनमानस में भी उत्कृष्टता मिटती गई । राष्ट्र ही नहीं, विश्व का इतिहास बताता है कि उच्च आत्मबल संपन्न आत्माओं के अवतरण-अवसाद के साथ-साथ जनमानस का भी उत्थान-पतन हुआ है। आज ही नहीं, जब कभी भी नवनिर्माण की बात आएगी, अध्यात्म की ही प्रमुख भूमिका उसमें होगी। नए युग का जो नया निर्माण होने वाला है, उसमें भी अब सन् 2000 व उसके बाद के वर्षों में अध्यात्म की आत्मबल संपन्न उच्चस्तरीय महामानवों की प्रधान भूमिका होगी। प्रत्यक्ष श्रेय इतिहासकार भले ही किन्हीं को भी देते रहें। देवत्व के-प्रसुप्त प्रतिभा के जागरण का हमारा अभियान ही युगनिर्माण योजना है एवं इस महापूर्णाहुति वर्ष में वह सारी धरित्री के भावनात्मक नवनिर्माण हेतु आध्यात्मिक पुरुषार्थ में जुटा है। बारह वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण का यह अंतिम पूर्णाहुति वर्ष इसीलिए हर दृष्टि से विशिष्ट है।
परमपूज्य गुरुदेव ने प्रतिभाओं के तीन वर्ग किए थे। प्रथम वर्ग में प्रज्ञा-परिजन, दूसरे थोड़े वरिष्ठ स्तर पर प्रज्ञापुत्र एवं तीसरे वरिष्ठतम-विशिष्ट प्रज्ञापुँज। पूज्यवर ने कहा था कि युगसंधि महापुरश्चरण का अंत आते-आते मूर्द्धन्यों, प्रतिभावानों, ओजस्वी, तेजस्वी, जीवंतों में ने केवल स्फुरणा आएगी, उनकी बढ़ती संख्या युग परिवर्तन की प्रक्रिया को अंजाम देगी। प्रज्ञापरिजनों के विषय में पूज्यवर ने कहा है कि वे सहयोग जुटाएँगे, प्रज्ञापुत्र नेतृत्व करेंगे और प्रज्ञापुँज साधन जुटाने का वह कार्य संपन्न करेंगे, जैसे शरीर को जीवित रखने में रक्त की महत्ता मानी जाती है।
पाँच सूत्री योजना जो प्रज्ञापुंजों के लिए परमपूज्य गुरुदेव निर्धारित कर गए, हम सभी के लिए आज के इस महापूर्णाहुति वर्ष में और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि समय की माँग है कि अब वे सुनियोजित ढंग से पूरे हों। राष्ट्र व विश्वभर की प्रतिभाओं के समय-श्रम-साधनों का उसमें नियोजन हो तो आज की निराशा भरी परिस्थितियाँ देखते-देखते बदलती नजर आने लगेंगी। निर्धारित कार्यक्रम इस प्रकार हैं-
(1) आत्मशक्ति के उभार के रूप में युगशक्ति का प्रकटीकरण - यह कार्य तपश्चर्या से ही संभव है। साधना की धुरी पर ही यह कार्य हो सकता है। शाँतिकुँज एक जाग्रत तीर्थ-साधना केन्द्र के रूप में ढलकर बीस वर्षों में ऐसी स्थिति में आ गया है कि यहाँ तेजस्वी-मनस्वी ढाले जा सकते हैं। लव-कुश, चक्रवर्ती भरत की ढलाई ऐसे ही वातावरण में होती है। नररत्न साधना द्वारा स्वयं का परिमार्जन कर अपने को सशक्त प्राणवान के रूप में उभारते थे, ऐसे अनेकों तीर्थ-तपोवन प्राचीनकाल में थे। आज भारतीय संस्कृति के विश्वविद्यालय स्तर के निर्माण में साधना को एक स्थापित विधा मानकर जीवनविद्या के सर्वांगीण प्रशिक्षण को बीड़ा जो शाँतिकुँज ने उठाया है, उसे क्षेत्र के कई छोटे-छोटे निर्झर केन्द्र गायत्री शक्तिपीठ, प्रज्ञा-संस्थान पूरा करेंगे। गायत्री तीर्थ-ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के रूप में गायत्री साधना-यज्ञविज्ञान की जो आरंभ की गई थी, उसका अब बहुगुणित बिस्तर होना है।
(2) युगसाहित्य का सृजन और उसे देश-विश्व के हर भाषा-भाषी तक पहुँचाना- विचारक्राँति का आलोक जन-जन तक पहुँचेगा तो ही लोकमानस को बदला जा सकना संभव है। ऋषियों के युग में यह कार्य वाणी से होता था। आज लेखनी-मुद्रण-इंटरनेट के युग में यह कार्य बड़ी तेजी से विस्तार पाकर होता रह सकता है। पुस्तक रूप में-विचार संप्रेषण के रूप में युगाँतरीय चेतना को हर शिक्षित तक पहुँचाया जा सकता है। अशिक्षित को समझाया जा सकता है। यदि इन प्रतिपादनों में तर्क, तथ्य, प्रमाण, न्याय, औचित्य का पुट है, तो जनमानस को हिलाए बिना ये रह नहीं सकते- ऐसा पूज्यवर का विश्वास रहा है। क्राँतिधर्मी साहित्य की गिनी-चुनी बीस पुस्तकें व प्रारंभिक परिचयात्मक पाँच पुस्तकें, इन दिनों भारत की व विश्व की सभी भाषाओं में अनूदित कर फैलाई जा रही हैं। प्रज्ञापुँजों का इनमें विशिष्ट योगदान हो सकता है। इन बीस पुस्तकों के सेट को कार्लमार्क्स के साम्यवाद की दास कैपिटल, हैरियट स्टो की टाम काका की कुटिया समझा जा सकता है। सारे जमाने की विचारधारा को नया मोड़ देने के लिए यह क्राँतिधर्मी साहित्य वह भूमिका निभा सकता है, जो कभी क्राँतिकारियों ने अपने चिंतन के विस्तार के लिए निभाई थीं। क्राँतिधर्मी साहित्य अभी हिंदी, गुजराती, उड़िया, बंगाली, मराठी में उपलब्ध है। तेलगू में प्रकाशित हुई युगशक्ति गायत्री के साथ-साथ यह उस भाषा में तथा दक्षिण की शेष तीन तमिल-मलयालम-कन्नड़ भाषाओं में भी इस वर्ष के अंत तक उपलब्ध होने जा रहा है। इस वर्ष के अंत में होने जा रहे सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ के साथ ही अंगरेजी में संभावित अखण्ड ज्योति के उच्चस्तरीय अनुवाद के प्रकाशन के साथ ही विश्वभर की न्यूनतम पाँच जर्मन, फ्रेंच, स्पेनिश, जापानी व चीनी भाषा में भी इन बीस+पाँच पुस्तकों के अनुवाद प्रकाशित हों, यह प्रयास किया जा रहा है। प्रतिभाओं को इस निमित्त अपना पुरुषार्थ जुटाना होगा।
अनुवाद, मुद्रण, प्रकाशन के इस विश्वव्यापी तंत्र को प्रभावी बनाने के लिए एक नहीं अनेक केंद्र अगले दिनों खड़े होंगे। शाँतिकुँज में स्थापित हो रहे नालंदा-तक्षशिला विश्वविद्यालय स्तर की स्थापना से यह कार्य और गति पकड़ेगा। ऐसी आशा है। शुरुआत तो युगसाहित्य के क्राँतिधर्मी सार अंश से की गई है, किंतु विस्तार के सारे वाङ्मय का विभिन्न भाषाओं में होना है।
(3) कलातंत्र-लोकरंजन से लोकमंगल-इलेक्ट्रानिक मीडिया की क्राँति द्वारा जन-जन को प्रभाव क्षेत्र में लेना-आज टेलीविजन, कलामंच, इंटरनेट वेबसर्फिंग विचार-संप्रेषण के एक विलक्षण माध्यम बन गए हैं। संगीत, अभिनय, एक्शन साँग, चित्रकथाएँ, नाटिकाएँ, फिल्मों ने मनोरंजन की दुनिया को एक क्राँतिकारी आयाम देकर रोजमर्रा की चीज बना दिया है। कामुकता-विलासिता यदि इस माध्यम से फैली है, तो इसके लिए प्रतिभाएँ दोषी हैं, जिन्होंने इस माध्यम का सदुपयोग-सुनियोजन नहीं किया। युगसाहित्य की तरह ही प्रज्ञा अभियान को कलाक्षेत्र में भी प्रवेश करना होगा। छोटे-छोटे रचनात्मक धारावाहिक-फिल्मों को बनाने वाला तंत्र खड़ा करना होगा। जो ‘ब्रेनवाशिंग’ की क्राँतिकारी भूमिका प्रस्तुत कर सके। स्लाइड प्रोजेक्टर से आरंभ हुआ हमारा प्रज्ञा अभियान मल्टीमीडिया प्रोजेक्टर तक, साइबर क्राँति तक पहुँच चुका है। अगले दिनों इस माध्यम को कई गुना विस्तार दिया जाना, विभूतियों का इसमें सुनियोजन होना है।
(4) सृजन शिल्पियों का बड़े स्तर पर प्रशिक्षण और निर्माण- अगले दिनों नवसृजन के असंख्य प्रयोजनों के लिए हजारों-लाखों युगशिल्पियों को मोरचे पर खड़ा होना है। धर्मतंत्र तो शासनतंत्र से भी बड़ा है। इसकी अगणित शाखा-प्रशाखाएँ है। लोकसेवी, समयदानी, वानप्रस्थ, परिव्राजक अब अगणित संख्या में प्रशिक्षित हो भारत व विश्व के कोने-कोने में पहुँचें, यह समय की माँग है। ईसाई चर्च की तरह अपने पादरियों के निमार्ण-प्रशिक्षण निर्वाह-प्रबंध आदि का तंत्र हमें स्वयं खड़ा करना होगा, ताकि भारतीय संस्कृति को विश्वभर में पहुँचाया जा सके। प्रतिभाओं का सुनियोजन इस विराट तंत्र की व्यवस्था बनाने में इस वर्ष लगे, ऐसी पूज्यवर की अपेक्षा रही है।
(5) विश्वराष्ट्र-विश्वधर्म-विश्वभाषा-विश्वसंस्कृति का लक्ष्य पूरा करना- युगाँतरीय चेतना का आलोक सभी धर्मों, भाषा-भाषी नागरिकों में फैले, इसके लिए हमें अपने साँस्कृतिक दूत प्रवासी भारतीयों को धुरी बनाकर विश्वभर में इसके विस्तार हेतु उन्हें प्रयुक्त करना होगा। साँस्कृतिक आत्मीयता के आधार पर भावना क्षेत्र में यदि प्रवासीजनों को बाँध लिया जाए, तो देखते-देखते वहाँ के उस मूल के अगणित प्रतिभाशाली प्रज्ञापुँज आगे आएंगे एवं इस प्रवाह से जुड़ते चले जाएंगे। ये प्रयास बीस वर्ष पूर्व से आरंभ तो हो गए थे, अभी विगत दस वर्षों से इन्होंने गति पकड़ी है। आगामी दो वर्षों में इन्हें उच्चतम वेग तक पहुँचाना है।
मिशन-गायत्री परिवार का विराट तंत्र अपनी प्रौढ़ता की स्थिति में है। आगामी वर्ष हमें अखण्ड दीपक की हीरक जयंती के रूप में युगचेतना का अवतरण वर्ष मनाएंगे। 75 वर्ष का प्रौढ़ यह परिवार भारी-भरकम व्यक्तित्व वाले भावनासंपन्न प्रतिभाशालियों के समुदाय के उभरकर एकजुट होने के रूप में विकसित हो, यही महाकाल की इच्छा है। हम सब तो इसके श्रेयाधिकारी बन रहे हैं, इस सौभाग्य भरे अवसर पर सक्रिय होने-बने रहने में ही हमारी शान है।
विशेष सतर्कता बरतें
परमपूज्य गुरुदेव ने महापूर्णाहुति को विभूति यज्ञ-क्षेत्रीय दीपयज्ञों के सृजन-संगठन समारोहों के रूप में ही करने का निर्देश दिया है। कुछ स्वार्थी तत्व पूज्यवर के अनंतासन का उल्लंघन कर महापूर्णाहुति के नाम से सार्वजनिक चंदा करके अश्वमेध स्तर के यज्ञों के लिए भावनाशीलों को भ्रमित कर रहे हैं। यदि कहीं कोई ऐसी चर्चा होती दिखे या परिपत्र जानकारी में आए तो केन्द्र से परामर्श लें। सक्रिय परिजनों के समर्थ समय व साधनदान से ही क्षेत्रीय कार्यक्रम संपन्न होंगे। किसी भी परिजन को इस संबंध में भ्रम में न पड़कर स्वयं सतर्क रहना, औरों को भी जागरुक बनाए रखना है।
परमपूज्य गुरुदेव का अवतरण नवयुग सृजन के ईश्वरीय संकल्प को साकार रूप देने के लिए ही हुआ । ‘आत्मशक्ति के उद्भव’ का सूत्र उन्होंने हम सभी को दिया। इस आत्मशक्ति को जाग्रत करने वाली युगसाधना पर उन्होंने पर्याप्त बल दिया, ताकि मनुष्य की तमाम शक्तियों को भटकाव से रोककर नवसृजन में लगाया जा सके। इस हेतु उन्होंने हमें शतसूत्रीय युगनिर्माण योजना दी।
युगसंधि के अंतिम महत्वपूर्ण कालखंड (1989 से 2000) में पूज्यवर ने युगसंधि महापुरश्चरण प्रारंभ कराया। लाखों की भागीदारी से आरंभ हुआ यह अभियान करोड़ों तक जा पहुँचा है। सामूहिक साधना की शक्ति से सूक्ष्मजगत् का परिशोधन होकर एक ‘समूह-मन’ के जागरण की प्रक्रिया संपन्न हो, इस निमित्त यह पुरुषार्थ नियोजित हुआ है और बड़ी संख्या में विभूतिसंपन्नों-समर्थ प्रतिभाशालियों में नवसृजन के लिए संकल्पपूर्वक कुछ कर गुजरने को उत्साह जगा रहा है।
इस महापूर्णाहुति वर्ष में हमारे इष्ट-आराध्य के निर्देशानुसार पूरे वर्ष में दीपयज्ञों की शृंखला द्वारा विभूति यज्ञ संपन्न होना है। दो करोड़ प्रतिभासंपन्नों को संकल्पपूर्वक नवसृजन के अभिनव कार्यों में लगाया जाना है। इसके लिए एक लाख संगठन समारोह इस वर्ष होने हैं। इन दो करोड़ विभूतिवानों के सुसंगठित सुनियोजन हेतु ताना-बाना कई लाख प्रज्ञापरिजन एवं प्रज्ञापुत्र स्तर के अग्रदूत बनेंगे।
युगऋषि के निर्देशानुसार पाँच चरणों में निर्धारित महापूर्णाहुति के दो चरण तीन दिसंबर 1999 एवं दस फरवरी 2000 को सफलतापूर्वक संपन्न हो रहा है। प्रथम दो चरण इसी अति महत्वपूर्ण चरण के प्रयाज रूप में संपन्न हुए हैं। युगऋषि के निर्देशानुसार इस चरण में राष्ट्र व विश्वभर में विद्यमान विभूतियों में से दो करोड़ प्रतिभाओं को खोजने-नियोजित करने हेतु सक्रिय प्रज्ञापुत्रों को दिशा-निर्देश दिए जा रहे हैं कई लाख समयदानी प्रज्ञापुत्रों में से दो लाख अग्रदूत स्तर के प्राणवान इसी गहन मंथन से उभरकर आएँगे।
तीसरे चरण के राष्ट्रजागरण तीर्थयात्रापरक एवं क्षेत्रीय संगठनात्मक मंथनपरक कार्यक्रमों की शृंखला का समापन 21 मई से 11 जून के बीच 108 स्थानों पर केंद्रीय टोलियों के द्वारा होने जा रहा है, इसलिए सारे देश के जिला समूहों के संभाग स्तर पर हैं, इसलिए सारे देश के ऐसे 108 स्थान चुने गए हैं, जिनका प्रभाव-क्षेत्र अति व्यापक है। दो दिवसीय इन आयोजनों को स्वरूप कुछ इस प्रकार है-
(1) केंद्रीय टोली आयोजन की पूर्व संध्या पर शाम तक निर्धारित स्थान पर पहुँच जाएगी। इस दिन स्थानीय स्तर पर कलशयात्रा-नगरफेरी का क्रम पूरा हो चुका होगा।
(2) अगले दिन प्रातः 9 बजे से कार्यक्रम आरंभ होगा। संबंधित जिलों के प्रतिनिधित्व तब तक वहाँ आ जाएँगे। 9 से 10 सामूहिक ध्यानशक्ति संचारपरक कार्यक्रम के बाद 1ि0.30 से 12.30 की अवधि में सभी लों के क्षेत्रव्यापी सृजन संगठन-दीपयज्ञों के निष्कर्षों का लेखा-जोखा लिया जाएगा।जिनने भी क्षेत्रीय स्तर पर ग्रामसमूह, ब्लॉक, नगर या जिला स्तर पर अभियान को गति देते रहने की जिम्मेदारी स्वीकार की है। व उसके लिए समय भी दे सकते हैं, ऐसे ही नर-नारी इसमें भाग लेंगे, सामान्य जनता नहीं इसके अतिरिक्त गायत्री तीर्थ से आरंभ किए गए सात आँदोलनों (साधना शक्ति संवर्द्धन, शिक्षा-विद्याविस्तार, जन स्वास्थ्य संवर्द्धन स्वावलंबन, पर्यावरण परिशोधन, महिला-जागरण तथा व्यसन-मुक्ति व कुरीति -उन्मूलन) में से एक या अधिक की जिनने जिम्मेदारी उठाई है, वे भी इसमें भागीदारी करेंगे। इन विधाओं के विशेषज्ञ, जो गायत्री परिवार की विचारधारा से सहमति रखते हैं, भी इसमें सम्मिलित हो सकते हैं।
इन गोष्ठियों में समीक्षा की जाएगी कि जिलों के ग्रामीण व नगरीय क्षेत्रों में कहाँ-कहाँ सृजनशिल्पियों की व्यूहरचना बन गई है, कहाँ शेष है, कितने सहयोगी, समर्थक, नियमित समयदानी हैं। कौन-कौन से आँदोलनों के लिए विभिन्न विभूतियों को संकल्पित किया गया है। इस सारी चर्चा का सार-संक्षेप ही सायंकालीन दीपयज्ञ में रखा जाएगा व प्रतिभाओं द्वारा जिम्मेदारी निभाने के संकल्प लिए जाएँगे।
(3) शाम का सार्वजनिक कार्यक्रम 4.30 से 8.30 के बीच संपन्न होगा। इसमें वर्तमान व भविष्य संबंधी लोकमानस के नवनिर्माण संबंधी मार्गदर्शन, 2001 के अंत तक मिशनरी योजनाओं, प्रातः हुई चर्चा के निष्कर्षों की चर्चा होगी, जनसमूह को मार्गदर्शक उद्बोधन केंद्रीय कार्यकर्त्ताओं द्वारा दिया जाएगा। हर जिले या ब्लॉक के दो-चार जिम्मेदार प्रतिनिधि केंद्रीय टोली से अगले चरण की कार्ययोजना की तैयारी की चर्चा हेतु रुक जाएंगे। शेष सभी परिजन वापस लौट सकेंगे।
(4) अगला पूरा दिन जिले व संभागीय प्रतिनिधियों द्वारा क्रियान्वित की जाने वाली कार्ययोजना को मूर्तरूप देने में निर्धारण हेतु लगाया जाएगा। केंद्र व क्षेत्र के समन्वित प्रयासों की -प्रज्ञासंस्थानों-प्रज्ञामंडलों की उनमें भूमिका की रूपरेखा बनाई जाएगी । तत्पश्चात टोली अगले कार्यक्रम के लिए प्रस्थान करेगी।
मध्यवर्ती इस तीसरे चरण के फलितार्थ कितने महत्वपूर्ण एवं स्थायी होंगे, इसे पाठक-परिजन समझ सकते हैं। प्रज्ञापुत्रों-समर्थ प्रतिभासंपन्नों के नियोजन की प्रक्रिया कैसे साकार होगी, उसकी रूपरेखा इसी चरण से निकल कर आएगी।
क्राँतिधर्मी साहित्य नाम से विख्यात बीस पुस्तकें क्राँतदर्शी प्रज्ञापुरुष पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा 1989 -90 में महाप्रयाण के एक वर्ष पूर्व की अवधि में एक ही प्रवाह में सृजी गई थीं। बीस छोटी-छोटी पुस्तिकाओं में बिखरे इस साहित्य के विषय में स्वयं हमारे आराध्य परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का मत था-”हमारे ये विचार क्राँति के बीज हैं। ये थोड़े भी फैल गए, तो लोगों को हिलाकर रख देंगे। सारे विश्व को नक्शा बदल देंगे।” वस्तुतः इन पुस्तकों में मात्र विचार ही नहीं, क्राँति की आग है, युगपरिवर्तन की दिशाधारा है।
इस अमूल्य साहित्य को मात्र लागत मूल्य पर छापने, वितरित करने का निर्देश स्वयं गायत्री परिवार के अधिष्ठाता परमपूज्य गुरुदेव दे गए हैं। कोई भी इन विचारों को जनहित में प्रकाशित व वितरित कर सकता है। इन्हें जितने अधिक व्यक्तियों तक पहुँचाया जाएगा, उतना ही पुण्य का अधिकारी वह पाठक-परिजन कहाएगा। क्राँतिधर्मी साहित्य की बीस पुस्तकों का महापूर्णाहुति सेट अब गायत्रीतीर्थ शाँतिकुँज हरिद्वार में मात्र 50 में उपलब्ध हैं। पुस्तकों के नाम इस प्रकार हैं-
(1) इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य-भाग (1)
(2) इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य-भाग (2)
(3) युग की माँग प्रतिभा परिष्कार-भाग (1)
(4) युग की माँग प्रतिभा परिष्कार-भाग (2)
(5) सतयुग की वापसी
(6) परिवर्तन के महान क्षण
(7) जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र
(8) महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण
(9) प्रज्ञावतार की विस्तार प्रक्रिया
(10) नवसृजन के निमित्त महाकाल की तैयारी
(11) समस्याएँ आज की समाधान कल के
(12) मनः स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले
(13) स्रष्टा का परम प्रसाद प्रखर प्रज्ञा
(14) आद्य शक्ति गायत्री की समर्थ साधना
(15) शिक्षा ही नहीं विद्या भी
(16) संजीवनी विद्या का विस्तार
(17) भाव संवेदनाओं की गंगोत्री
(18) महिला जागृति अभियान
(19) जीवन देवता की साधना-आराधना
(20) समयदान ही युगधर्म
(शचीन्द्र भटनागर)
झर रही हैं देव संस्कृति की सजल शीतल फुहारें, अब धरित्री पर निराशा से भरा कोई न होगा।
जो प्रवासी जन अभी तक मूल संस्कृति से कटे थे, थे अपरिचित से परस्पर, जो बहुत बिखरे-बँटे थे,
जी रहे थे जो अकेले-से सुरक्षा की कमी में, जो नहीं अपनत्व पाते थे वहाँ के आदमी में,
भूमि से आकाश तक अब यज्ञमय सब कुछ हुआ है, अब कहीं असहाय आतंकित डरा कोई न होगा।
अब न धरती का सुरक्षा-कवच दुर्बल और होगा, माँ समझने का प्रकृति को, एक नूतन दौर होगा,
फिर न उसकी शक्तियों को और दोहन हो सकेगा, वायु जल अथवा धरा का फिर न शोषण हो सकेगा,
जल न पायेंगी वनस्पतियाँ, न झुलसेंगी लताएँ, उपवनों में फूल मुरझाया झरा कोई न होगा।
फिर प्रखरता और पावनता मिलेंगे, एक होंगे, गाँव देवालय बनेंगे, नागरिक फिर नेक होंगे,
शाँति सरिता में बहेगी, प्यार पर्वत से झरेगा, स्नेह-समता-लोकहित का भाव हृदयों में भरेगा,
फिर नहीं होगा कहीं अन्याय का ताँडव भयंकर, हर जगह सद्भाव होगा, दूसरा कोई न होगा।
*समाप्त*