संस्कृति पुरुष- परमपूज्य गुरुदेव

सजल भावनाओं एवं प्रखर विचारों के राशि राशि सितारों से भारतवर्ष की देवसंस्कृति का आकाश भरा पड़ा है। अनंत-अनगिनत सितारे हैं। उन सबकी उज्ज्वल ज्योति जब घनीभूत हो संस्कृति पुरुष की भव्य मूर्ति गढ़ती है, तो परमपूज्य गुरुदेव का दिव्य स्वरूप साकार होता है।

संस्कृति पुरुष परमपूज्य गुरुदेव में देवसंस्कृति के सभी तत्त्व अपने मौलिक, किन्तु सार रूप में समाहित हैं। उनके व्यक्तित्व में भावनाओं की सजलता है, तो कृतित्व में विचारों की प्रखरता। वे सजल श्रद्धा और प्रखर प्रज्ञा दोनों एक साथ हैं। वंदनीया माताजी उन्हीं की छाया हैं, उन्हीं में समाहित हैं। उनमें संस्कृति की मधुरिमा एवं सम्मोहन दोनों ही हैं।

पूज्य गुरुदेव के विचारों में तप की इतनी प्रबल शक्ति है कि उनका साहित्य बढ़ते समय भी उनका तप-प्राण निरन्तर आस-पास मँडराता रहता है। उनके शब्द कभी बड़े प्यार से हमें अपनी बाँहों में भर लेते हैं, सहलाते हैं, प्रेमभरा आश्वासन देते हैं। कभी हमारा आवाहन करते हैं और हमारे अहसास को प्रखर करते रहते हैं। उनके शब्दों में जीवंतता है, अधिकार है, आत्मविश्वास है, और है निर्भयता। यह सारी सामर्थ्य उनकी आध्यात्मिक साधना से उद्धृत है। उन्हें पढ़ने वाला या सुनने वाला इस अनोखेपन का अहसास पाए बिना नहीं रहता।

उनकी भाषा अत्यन्त सरल, रसमयी, अर्थ को सटीक अभिव्यक्ति देने वाली और हृदयस्पर्शी है। जीवन एवं संस्कृति, अतीत एवं वर्तमान, धर्म एवं विज्ञान, प्राच्य एवं पाश्चात्य के किसी भी पहलू के भीतर बैठते समय जब वह उसके एक-एक रहस्य को उजागर करते हैं, विश्लेषण एवं समन्वय करते हैं, तो ऐसा लगता है, मानो किसी गीत की कड़ी को बार-बार नए-नए स्वरालंकारों से सजा रहे हों। वे देवसंस्कृति के हर रहस्य को हमारे दैनंदिन जीवन में घटने वाले, हम सब जाने-पहचाने उदाहरण देकर तर्कसंगत रूप से प्रस्तुत करते हैं। परमपूज्य गुरुदेव निश्चित ही इस युग के संस्कृति पुरुष हैं। उनमें भारतीय संस्कृति के अस्तित्व एवं अस्मिता का गौरव संपूर्ण रूप से प्रकाशित है। मनुष्य में देवत्व एवं धरा पर स्वर्ग के अवतरण का संकल्प उन्होंने किया है। इस संकल्प को साकार करना प्रत्येक मनुष्य का दायित्व है।


VigyapanSuchana

प्रस्तुत अंक संस्कृति पुरुष अंक के रूप में लिखा गया है। सृजन-संकल्प विभूति महायक्ष की बेला में इसका प्रकाशन देवसंस्कृति के निर्धारणों को समर्पित परमपूज्य गुरुदेव के जीवन के महत्त्वपूर्ण दुर्लभ अंशों के साथ किया जा रहा है। आशा है कि अधिक-से-अधिक पाठकों तक इस व आगे के अंकों को पहुँचाने का संकल्प परिजन लेंगे। आगामी अंक में 9 पृष्ठ रंगीन सहित विस्तार से महापूर्णाहुति का वर्णन होगा।


संस्कृति के पुण्य प्रवाह को मिला नवजीवन

हिमालय की गहनता में ऋचाएँ गूँजीं, मंत्र मुखरित हुए और संस्कृति का पुण्य प्रवाह चल पड़ा। वैदिक संहिताएँ, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, पुराण, तंत्र, दर्शन आदि मिलकर इस प्रवाह को तीव्रगामी बनाते रहे। महर्षियों ने अपनी कठोर तप-साधनाओं के माध्यम से जीवन एवं अस्तित्व के विविध आयामों की खोज की। जीवन के सदुपयोग एवं सम्भावनाओं के मार्ग ढूँढ़े और सबका सार-निष्कर्ष बताते हुए कहा, “मनुष्य देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते” अर्थात् मनुष्य की देह क्षुद्र कामों के लिए नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि जब क्षुद्र कामों और कामनाओं के पीछे भागते हैं, तो दुःख हमें लपेट लेता है, अवसाद हमें घेर लेता है, संताप का कुहासा हमारे समूचे जीवन पर छा जाता है।

संस्कृति के वेगपूर्ण पुण्य प्रवाह में एक समय समूचे भारत महादेश में रहने वाले नर-नारियों ने स्नान किया और इस संस्कृति सरिता में स्नान का सुफल “काक होहिं पिक, बकऊ मराला” के रूप में सामने आया। मनुष्यों में देवत्व उपजा, उभरा और निखरा। देवपुरुषों एवं महादेवियों को जन्म देने वाली संस्कृति देवसंस्कृति कहलाई। समूचे विश्व में इस तथ्य को सत्य के रूप में परखा गया कि इस संस्कृति की गोद में जो भी पला-बढ़ा, वह देव हुए बिना नहीं रहा।

भारत के इतिहास में वह सबसे शक्तिशाली समय था, जब समूची कौम अपनी पूरी मेधा में जलती थी और जब कोई कौम अपनी पूरी आत्मा में प्रगट होती है, तब वह कमजोर नहीं होती। उसमें बलशाली व्यक्तित्व एवं समर्थ-सक्षम तत्त्व पनपते हैं। हो भी क्यों न ? जब भी कोई कौम युवा होती है, ताजी होती है, बढ़ती होती है, शिखर की तरफ उठती होती है, जब किसी कौम के प्राणों में सूर्योदय का क्षण होता है, तब मनुष्य में देवत्व एवं धरा पर स्वर्ग के अवतरण की साक्षात् अनुभूति होती है। संस्कृति के पुण्य प्रवाह की पावनता के सान्निध्य में भारत देश ने उस युग को देखा और जिया। तब उसमें इतनी सामर्थ्य थी कि वह जहर को भी स्वीकार करे तो अमृत हो जाए। वह जिसको भी छाती से लगा ले, तो वह काँटा भी हो, तो फूल हो जाए और जिस रास्ते पर पाँव रखे, वहीं स्वर्ण बिछ जाए।

अपने देश में यह देवी सामर्थ्य तब तक रही, जब तक देशवासी देवसंस्कृति के सूत्रों को अपनाते रहे। अपनी अनूठी संस्कृति जननी की गोद में पलते-बढ़ते रहे और जब इन्होंने अपनी संस्कृति की उपेक्षा की, दिव्य गुणों ने, दैवी सामर्थ्य ने भी इन्हें ठुकरा दिया। संस्कृति का पुण्य प्रवाह भी मिलन हो गया। इसमें प्रदूषण की भरमार हो गई। इसका तेज लुप्त हो गया।

और इसी का परिणाम है कि भारतवर्ष कोई पिछले हजार वर्षों से बहुत कमजोर और दीन क्षणों में जी रहा है। जैसे सूर्यास्त हो गया। बस सिर्फ याद रह गई है, सूर्योदय की। सब ओर अँधेरा छा गया है। मन दीन-हीन हो गया है। पाँव रखते डर लगता है। नए मार्ग पर चलने पर भय होता है। पुरानी लीक पर ही घूमते रहना अच्छा मालूम पड़ता है। रूढ़ियां और मूढ़ताएँ ही आज सब कुछ हो गई हैं। नया सोचने में, नए विचार में, नई उड़ान में कहीं भी हिम्मत नहीं जुटती। ऐसे कमजोर क्षण में अमृत भी पीने में डर लगता है। पता नहीं जहर हो, अपरिचित, अनजान ! फिर पता नहीं इससे मैं बचूँगा कि मरूंगा ? हर तरफ दिखाई पड़ती है, एक भयातुरता।

ऐसे में संस्कृति के पुण्य प्रवाह के परिशोधन का संकल्प लेकर, नए सूर्योदय का देश लेकर एक स्वर मुखरित हुआ। हिमालय की गहनताओं में तप-साधना की प्रभा फिर से फैली। वेदों की सार, साधना-शक्ति के रूप में गायत्री का फिर से अवतरण हुआ। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के रूप में संस्कृति के पुण्य प्रवाह में फिर से पावनता आई। उसमें आया ठहराव फिर से तीव्रगामी हुआ। सच ही है कि ऋषियों की वाणी को कोई ऋषि ही उद्भासित कर सकता है और ऋषि तो वही है, जिसने अपने भीतर विद्यमान परात्पर को जान लिया, अंतस् की भगवत्ता का बोध पा लिया। ऋषि-ग्रंथों की भाषा में कहें, तो चारों ओर बहते, भीतर बहते ‘ऋत्’ को पहचान लिया, विराट् अस्तित्व के कण-कण को जोड़ने वाले परम विराट् अस्तित्व के कण-कण को जोड़ने वाले परम अंतर्सूत्र को खोज लिया, पा लिया।

शाश्वत ऋचाओं की व्याख्याओं में पूज्य गुरुदेव ने जो कहा, वे स्वयं भी ऋचाएँ ही हैं। जैसे कोई निरंतर प्रवाहित अदृश्य ऊर्जाधारा, जो कभी भी, किसी भी युग में प्रकट होती है, तो केवल सम्यक् संबुद्ध पुरुषों की वाणी में ही। धारा एक ही है, जो कभी वेदों में, परम ग्रंथों में उत्ताल तरंगों-सी तरंगित हुई, तो आज अंतःसलिला से तीर्थमयी नदी बनती हुई प्रवाहित हुई है पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के इन लयबद्ध, गहनतम लेकिन सुस्पष्ट विचारों में जिन्होंने संस्कृति के पुण्य प्रवाह को परिशोधित एवं परिष्कृत स्वरूप दिया है।

उनके ये वचन शाश्वत तो हैं ही, साथ ही समसामयिक भी हैं, क्योंकि आज के समय में जब अध्यात्म साँप्रदायिकता के जाल में उलझकर मोहरा भर बनकर रह गया है। धर्म आज राजनीति की घुसपैठ के कारण आँतरिक नहीं, आतंकी हो गया है। ऐसे में यह सवाल अपनी पूरी विकरालता के साथ सामने आ खड़ा होता है कि मात्र बाहरी यात्रा मनुष्य को आखिर ले जाएगी, तो कहाँ ? ........यंत्र मानवों की दुनिया में या परमाणु युद्ध से जली हुई जीवनविहीन धरती पर !

और मजे की बात तो यह है कि इन तमाम खतरों से अब पश्चिम में तो फिर भी कभी कहीं सच्चे अर्थों में भीतर की यात्रा में उतरकर किसी वास्तविक धर्म-संस्कृति को खोज लेने की तपस-सी उठती है, लेकिन अपने देश में जहाँ हर कोई स्वयं को ज्ञानी योगी मान बैठता है, तो वहाँ किसी खोज की कोई प्रेरणा ही नहीं उठती, क्योंकि गीता-उपनिषद् के सुने सुनाए सूत्र हैं तो सच में ही बड़े गूढ़, बड़े अर्थवान्, लेकिन उन्हें पढ़-सुनकर ही यह मान लेना कि हम सब जानते हैं, बड़ा घातक अहंकार है और यह अपने देश की छाती पर चट्टान-सा आ जमा है, जो अंतस् ऊर्जा को तरल नहीं होने देता, प्रवाहित नहीं होने देता।

और जब प्रवाह में ही जड़ता होगी, तो कैसे नए-नए मार्गों पर अन्वेषण के फूल खिलेंगे, कैसे प्रवाहित होंगे बाहरी सतह की शुष्कता के नीचे छुपे संस्कृति संवेदना के स्त्रोत, जो सह-अनुभूति की तरल ऊष्मा से विलीन कर देते हैं तमाम दंगे-फसाद, जो ढहा देते हैं कितने शोषण, कितने युद्ध, कितने महायुद्ध! तो बहुत जरूरी है, भीतर की रोशनी के साथ जीना और यह रोशनी परमपूज्य गुरुदेव के ‘वाक्य-विचार’ बहुत सहजता से बरसा देते हैं। गुरुदेव के वाक्य आज के समय में मार्ग दिखाते हैं ऐसी मनुष्य चेतना के निर्माण का, जिसमें देवत्व की सुगंध हो, स्वर्गीय मुस्कान हो।

संस्कृति पुरुष परमपूज्य गुरुदेव ने संस्कृति के पुण्य प्रवाह को नई चेतना दी है। उन्होंने निष्प्राण होती जा रही भारतीय युवा मानसिकता में नवप्राणों का संचार किया है। रूढ़ियों के प्रति विद्रोह की चिनगारी के साथ ही उन्होंने धर्म एवं संस्कृति के सत्य स्वरूप को जानने की भावभूमि भी दी है। भारत के सुदीर्घ इतिहास में, मनुष्य जाति के सदियों-सदियों के इतिहास में संस्कृति के पुण्य प्रवाह को नवजीवन देने की यह अनूठी घटना घटी है कि लाखों-करोड़ों लोग पूरी तरह समर्पित हैं किसी सद्गुरु के प्रति और उन्हें सच्चे अर्थों में सन्मार्ग दिखाया है उनके सद्गुरु ने। इस पर सहल ही पूरे आकाश में इन सद्पंक्तियों को गुँजा देने को जी चाहता है, “बलिहारी गुरु आपकी संस्कृति लियो बचाय।”


आगे की बात सोचना (kahani)

कुछ व्यक्ति एक वटवृक्ष के नीचे बैठे वार्त्तालाप कर रहे थे। सभी दुनिया के झंझटों से परेशान होकर भाग आए थे और साधु होने जा रहे थे। तक एक ने कहा, “हम सब मिलकर जंगल में रहेंगे और तपस्या करेंगे, लेकिन यह तो सोचो कि जब ईश्वर वरदान माँगने को कहेगा, तो माँगोगे क्या ?” दूसरे ने कहा, “अन्न माँगेंगे। उसके बिना जीवित रहना सम्भव नहीं।” तीसरे ने कहा, “बल माँगेंगे। बल के बिना सभी कुछ निरर्थक है।” चौथे ने कहा, “बुद्धि माँगना ज्यादा उचित है। बुद्धि की आवश्यकता प्रत्येक कार्य को करने से पूर्व होती है।” पाँचवा बोला, “ये सब वस्तुएँ तो साँसारिक हैं। आत्मशांति मांगेंगे, जो अंतिम लक्ष्य है मनुष्य का।”

तब पहले व्यक्ति ने कहा, “तुम सब मूर्ख हो। क्यों न हम स्वर्ग ही माँग लें। वहाँ समस्त उपलब्धियाँ एक साथ ही मिल जाएँगी।” यह सुनकर विशाल वटवृक्ष ठहाका लगाता हुआ बोला, “मेरी बात मानो, तुम लोगों से न तपस्या होगी, न उपलब्धियाँ प्राप्त होंगी, क्योंकि यदि इतना ही मनोबल होता, तो संसार से घबराकर न भागते! भगवान् के पास जाने के लिए असाधारण आत्मबल चाहिए, पहले उसकी साधन करो, फिर आगे की बात सोचना।”


Quotation

श्रवण और कथन से दिशा तो मिलती है, पर आत्मकल्याण के मार्ग पर पर्वतों जैसी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है।


देव पुरुष का अवतरण

ब्रजमंडल अपने आप में भारतीय संस्कृति की सारी मधुरता संजोए है। चैतन्य महाप्रभु, वल्लभाचार्य, रूप गोस्वामी, जीव गोस्वामी आदि संतों की साधना भूमि यही है। मीरा यहीं विह्वल हुई थीं। भक्त रसखान तो हर जन्म में ब्रजभूमि में ही रहना चाहते थे, भले ही उन्हें पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति यहाँ तक कि पाषाण होकर ही क्यों न रहना पड़े। ब्रज की धरती का यह साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक अनूठापन निश्चित ही विधाता को भी भा गया। तभी तो नियति ने अपनी अकाट्य लिपि लिखी। देवशक्तियों ने नवयुग की साँस्कृतिक चेतना के रूप में संस्कृति पुरुष परमपूज्य गुरुदेव के अवतरण का विधान बनाया।

दशरथ एवं कौशल्या, वसुदेव एवं देवकी की ही तरह पं. रूपकिशोर शर्मा एवं देवी दानकुँवरि को ऋषियों एवं देवों ने मिलकर चुना। पं रूपकिशोर शर्मा आगरा जनपद के आँवलखेड़ा ग्राम में रहने वाले जमींदार थे और देवी दानकुँवरि उनकी सहधर्मिणी थीं। इन ब्राह्मण दंपत्ति में ब्राह्मणत्व सच्चे अर्थों में साकार हुआ था। पं. रूपकिशोर जहाँ एक ओर भारतीय संस्कृति के प्रति अगाध निष्ठावान् थे, वहीं वह संस्कृति के ज्ञान-विज्ञान के विविध पक्षों में निष्णात भी थे। संस्कृत के असाधारण पाँडित्य के साथ ज्योतिष विद्या एवं आयुर्वेद शास्त्र पर उनका परिपूर्ण अधिकार था। भागवत के कथावाचक के रूप में देश के अनेक राजा-महाराजा उनका सम्मान करते थे। आस-पास के सामान्य जनों में भी उनके प्रति एक आँतरिक श्रद्धाभाव था।

देवी दानकुँवरी परम तपस्विनी नारी थीं। पवित्रता उनमें लिपटी सिमटी थी दाँपत्य जीवन के अनेक सुखद वर्षों के बाद उन्हें एक दिन लगा कि जैसे कोई ज्योतिर्मय चेतना उनके गर्भ में प्रवेश कर गई है। उस दिन से उन्हें अपूर्व उल्लास की अनुभूति होने लगी। उनके मुखमण्डल पर एक अलौकिक आभा आ गई। घर परिवार एवं अड़ोस पड़ोस की महिलाओं को उसने शरीर से यदा-कदा सुगंध का अहसास भी होता। इन महिलाओं में से प्रायः सभी को माँ बनने का अनुभव हो चुका था। वे गर्भ के लक्षणों से परिचित थीं, पर ये लक्षण तो कुछ और ही थे। इन महिलाओं में ऐ एक आध तो उनको जब-तब टोक भी देतीं, “लगता है तुम्हारी कोख में कन्हैया स्वयं आए हैं, तभी तो तुम्हारी ओर आजकल नजर टिकाकर देखना भी मुश्किल हो गया है। चेहरे पर नजर ही नहीं टिकती।”

देवी दानकुँवरि भी अपने में आए परिवर्तनों से चकित थीं। उनके मन में हर समय आध्यात्मिक पवित्रता की तरंगें उठती रहती थीं। जब से उनका गर्भकाल शुरू हुआ, उन्हें विचित्र सपने आने शुरू हो गए थे। ये सपने उनकी दृष्टि में विचित्र इसलिए थे, क्योंकि वह इनका अर्थ नहीं खोज पाती थीं। हालाँकि इन स्वप्नों को देखने के बाद वह गहरी आध्यात्मिक तृप्ति एवं उल्लास से भर जाती थीं। वह अपने स्वप्नों में प्रायः हिमालय के हिमशिखरों को देखतीं। यदा-कदा उन्हें यह लगता कि हिमालय के आँगन में तेजस्वी महर्षि बैठे यज्ञ कर रहे हैं। यज्ञ-मंत्रों की सस्वर गूँज से उनके मन-प्राण गूँज उठते थे।

कभी-कभी अर्द्ध निद्रा में उन्हें लगता कि सूर्यमण्डल से गायत्री महामन्त्र की ध्वनि तरंगें निकलकर उनके रोम-रोम में समा रही हैं। गायत्री महामन्त्र का इतना सस्वर एवं सम्मोहक पाठ उन्होंने कभी न सुना था। दोपहर को जब वह घर-गृहस्थी के कामों को निबटाकर थोड़ी देर के लिए विश्राम करतीं, तो उन्हें लगता कि अनेक देवी देवता उनके आस पास हाथ जोड़े खड़े हैं। जैसे वे सब उनकी स्तुति कर रहे हों। अपने इन स्वप्नों की चर्चा वह अपने पति से भी करतीं। उनके पति भी उनमें आए इन परिवर्तनों को देखकर चकित थे। वह उनको समझाते हुए कहते, लगता है तुम किसी देवशिशु की जननी बनने जा रही हो। यह कहकर पं. रूपकिशोर किसी अनजानी गहनता में खो जाते।

परन्तु ये तो जैसे सामान्य स्वप्न थे जो रोज-रोज दिखाई पड़ते थे। इनके अलावा उन्होंने गर्भकाल के नौ महीनों में नौ विशेष स्वप्न देखे। गर्भ के पहले महीने में उन्होंने देखा कि वह यमुना नदी पर गईं, जहाँ उन्हें चाँद तैरता हुआ दिखा। उन्होंने अपनी हथेलियों में चाँद लेकर नदी का पानी पिया और फिर उन्हें लगने लगा कि वही चाँद उनकी कोख में उतर गया है। दूसरे महीने में उन्होंने देखा कि किसी ने उनकी कोख को एक नीड़ बना लिया है और जब वह अन्तर में देखती हैं, तो हैरान देखती रह जाती हैं, क्या माँ को ईश्वर का दीदार कोख में से होता है।

तीसरे महीने में उन्हें सपना आया कि वह दही बिलोने बैठी हैं, तो दही की मटकी से मक्खन की जगह सूरज का गोला निकलकर आ जाता है। चौथे महीने जो सपना आया, उसमें उन्होंने देखा कि वह अपने घर के आँगन में बैठी गेहूँ फटक रही हैं, तो पूरा छाज सितारों से भर गया है। गर्भकाल के पाँचवे महीने में उन्हें सपने में एक ध्वनि सुनाई दी, जो जल-थल से उठ रही है। वह सपने में ही सोचने लगीं, क्या यह ममता का गीत है या ईश्वर की काया का गीत है ? और उन्हें हिरणी की तरह अपनी नाभि से कस्तूरी की सी सुगंध आती लगी। जब वह जागीं, तब भी उन्हें अपनी देह से सुगंध आती महसूस हो रही थी।

छटवें महीने में उन्होंने सपने में हिमालय स्थित मानसरोवर देखा, जहाँ से एक हंस उड़ता हुआ आता है और जगने पर उन्हें लगा कि हंस का पंख उनकी कोख में हिल रहा है। सातवें महीने में उन्होंने एक सपना देखा, जिसमें उनके आँचल में सूर्यमंडल से एक नारियल आ गिरा और घर के दरवाजे पर लोग-ही-लोग दिखाई दे रहे हैं, जो नारियल की गिरी का प्रसाद लेने के लिए आए हैं। आठवें महीने के स्वप्न में उन्हें जैसे एक अन्तर दृष्टि मिली। उन्होंने देखा कि वह बच्चे को पहनाने के लिए किरणों का कपड़ा बुन रही हैं। कपड़ा बुनते हुए उन्हें लगने लगा कि यह तो सच-सी वस्तु है। चाँद-सूरज की किरणें भी इसके लिए कोई कपड़ा नहीं बुन सकतीं।

और धीरे-धीरे गर्भकाल का नवाँ महीना भी लग गया। इस महीने भी उन्होंने एक सपना देखा। इस सपने में उन्हें लगा कि वह अपनी कोख के सामने माथा नवा रही हैं। देवी दानकुँवरि को इस स्वप्न में लगने लगा कि जो भी अपनी कोख में है, वह न अपना है, न पराया है, वह तो अजल का योगी है, सदाशिव है, संस्कृति पुरुष है, जो थोड़े समय के लिए मेरी कोख को धन्य करने आया है। स्वप्न में ही उन्हें लगा कि हवाओं में गीता के स्वर गूँज रहे हैं-”अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।”

यह गूँज उनकी आत्मा में समाती गई। इसका सम्मोहन इतना प्रबल था कि वह प्रसव-पीड़ा भी भूल गईं। जब तंद्रा टूटी, तब घर-परिवार के सदस्य उन्हें पुत्र-जन्म की बधाई दे रहे थे। पं. रूपकिशोर को जब पुत्र-जन्म का समाचार मिला, तो उन्होंने उसका नाम ‘श्रीराम’ रखा। उनकी ज्योतिष गणना के अनुसार बालक को भगवान् राम की तरह मर्यादाशील, महान् तपस्वी एवं देव संस्कृति का उद्धारक होना था। बालक श्रीराम की जन्म तिथि थी आश्विन कृष्ण त्रयोदशी वि. संवत् 1967। आज के कैलेंडर के अनुसार 20 सितंबर, 1911। यह दिन नवयुग की साँस्कृतिक चेतना के अवतरण का दिन बन गया। अब संस्कृति पुरुष के जीवन में देवसंस्कृति के विविध आयामों का विकास होना था।


Quotation

धनुर्धर वे नहीं, जिनका तीर निशाने पर लगता है, वरन् वे हैं जो लक्ष्य बेधकर दिखाते हैं।


दुःखियों की सेवा (kahani)

नदी के किनारे संत ज्ञानेश्वर जा रहे थे। समीप में ही एक लड़का स्नान कर रहा था। एकाएक लड़के का पैर फिसल गया और वह तेज बहाव में चला गया। लड़का सहायता के लिए चिल्लाया, पर किनारे पर बैठे महात्मा अपने जप में लगे रहे। एक बार डूबते बालक को दिख लिया और फिर आँख बंद कर लीं। संत ज्ञानेश्वर बिना विलम्ब किए नदी में कूद पड़े और डूबते बालक को बाहर खींच लाए। किनारे पर जप कर रहे महात्मा से संत ज्ञानेश्वर ने पूछा, आप क्या कर रहे हैं ? महात्मा ने कहा, जप कर रहे हैं और पुनः आंखें बंद कर लीं। संत ने पूछा, क्या ईश्वर के दर्शन हुए ? महात्मा ने उत्तर दिया, नहीं। मन स्थिर नहीं हो रहा है। संत ज्ञानेश्वर ने कहा, तो उठो पहले दीन-दुःखियों की सेवा करो, उनके कष्टों में हिस्सा बँटाओ, अन्यथा उपासना का कोई विशेष लाभ नहीं मिलेगा। महात्मा को अपनी भूल मालूम हुई कि सच्चा जप तो यह था कि डूबते हुए बच्चे को बचाया जाता। उस दिन से वे महात्मा उपासना के साथ-साथ दीन दुःखियों की सेवा में लग गए।


उपनयन संस्कार ने जगाई साधक की अभीप्सा

संस्कार ही संस्कृति का निमार्ण करते हैं। शिशु श्रीराम संस्कारपूर्ण वातावरण में धीरे-धीरे बड़े होने लगे। पिता पं. रूपकिशोर एवं माता दानकुँवरी ने अपने पुत्र के बचपन में होने वाले सभी संस्कार सम्पन्न कराए। जातकर्म से जो संस्कार प्रक्रिया शुरू हुई थी, वह नामकरण, निष्क्रमण से होती हुई चूड़ाकरण और विद्यारम्भ तक पहुँच गई। माता-पिता तो उन्होंने विविध संस्कारों से संस्कारित कर ही रहे थे, पर उनकी जन्म-जन्माँतरों से अर्जित की हुई संस्कार संपदा कम न थी। बहुत बाल्यावस्था से ही उन्हें जीवनतत्त्व का बोध था। वह स्वयं में जाग्रत् थे और विश्व को जागृति का देश देने आए थे।

प्रत्यूष की उज्ज्वल रक्तिम आभा देखकर आने वाले दिन के सम्बन्ध में एक निर्भ्रांत धारणा बनती है। बचपन के गुणों को देखकर भावी मंगलमय जीवन का भी एक सुन्दर पूर्वाभास पाना सम्भव होता है। कम-से-कम श्रीराम, जो बाद में हम सबके पूज्य गुरुदेव बने, के सम्बन्ध में यह बात निःसंकोच रूप से कही जा सकती है। उनकी सुगठित सुन्दर देह थी, गौर वर्ण था। दोनों नेत्र बड़े-बड़े और उज्ज्वल थे। अंग-प्रत्यंग से लावण्यमंडित और सम्पूर्ण मुखमंडल पर एक अपूर्व प्रभा छाई रहती। देखते ही प्यार करने की इच्छा होती। उनका मन सैकड़ों सुन्दर कल्पनाओं से पूर्ण था, हृदय स्नेहसिक्त, बुद्धि कुशाग्र, साहस अमित, अचिंतनीय उद्भावनी शक्ति, कार्यक्षमता असीम और उत्साह अदम्य और सबसे बढ़कर थी उनकी ईश्वर के प्रति उन्मुखता। जन्म से ही थे वे ध्यानसिद्ध, आत्मज्योति में सदा निमग्न। पूजा-प्रार्थना, आत्मानुसंधान में बचपन से ही उनकी रुचि एवं अधिकार थे। इन अनन्य-असाधारण संस्कृति पुरुष के जीवन के विविध अध्याय पढ़ने पर हम लोग पाएँगे कि ये सारी बातें अतिरंजित नहीं, बल्कि सत्य की तुलना में बहुत कम हैं।

बाह्य संस्कारों ने उनके आँतरिक संस्कारों को और अधिक प्रदीप्त-उद्दीप्त किया। बचपन में वे खेल-खेल में अपने संगी-साथियों के साथ ध्यान करने लग जाते। कभी-कभी तो यह ध्यान-निमग्नता इतनी बढ़ जाती कि वे घंटों अपने में डूबे रहते। जब उनका ध्यान टूटता, तो पता चलता कि साथ्रा के सारे बच्चे जा चुके हैं, पर उनके मुख पर गहन संतोष की आभा तैरती रहती। यज्ञ के प्रति भी उनकी अभिरुचि असाधारण थी। अपने घर से थोड़ी दूर वह जल से भूमि को पवित्र करके अपने साथियों के साथ बैठ जाते। संगी-साथी उनके निर्देश पर छोटी-छोटी लकड़ियों के रूप में समिधाएँ जुटाते और यज्ञ का कार्यक्रम प्रारम्भ हो जाता। इस बाल-क्रीड़ा का अंत बालक श्रीराम के हाथों प्रसाद-वितरण से होता। इस प्रसाद-वितरण के लिए वह अपने घर में दी जाने वाली खाने-पीने की वस्तुओं को बचाकर रखा करते थे।

जाति-भेद उनमें बचपन से ही न था। कभी-कभी तो वे अपने बाल मित्रों को समझाते हुए कहते, देखो! पैदा तो हम सभी शूद्र के रूप में होते हैं। न अच्छे का ज्ञान, न बुरे का ज्ञान, दृष्टि भी एकदम देह केंद्रित। सारी चिंता शरीर तक ही सीमित, बस सिर्फ खाने-खेलने का ध्यान, लेकिन माता-पिता के दिए गए संस्कारों से हम इस अवस्था से ऊपर उठते हैं। यज्ञोपवीत संस्कार के बाद द्विजत्व मिलता है। इस द्विजत्व में पुरुषार्थपरायणता हमें क्षेत्रीय बनाती है। अर्थोपार्जन करते हुए हम वैश्य का जीवनयापन करते हैं और यदि जीवन में सच्चे अर्थों में तपस्या-साधना का समावेश हो, तो फिर ब्राह्मणत्व पनपता है। अपनी बातें कहते-कहते वे एकदम जोश में आ जाते, देखना मैं एक दिन सच्चा ब्राह्मण बनूँगा। उनके बाल मित्रों को ये बातें प्रायः समझ में न आतीं और उन्हें समझाने लगते, तुम तो ब्राह्मण हो ही, अब और क्या ब्राह्मण बनोगे।

पर वह दिन भी आया, जब उन्होंने देखा कि पिताजी, माँ उप पारिवारिक जनों से कुछ सलाह-मशविरा कर रहे हैं। ध्यान से बातें सुनने पर पता चला कि यह चर्चा उन्हीं के बारे में हो रही थी। पिताजी कह रहे थे, अपना श्रीराम अब बारह साल का हो गया है, अब उसका यज्ञोपवीत हो जाना चाहिए। यूँ तो गाँव के प्रायः सभी ब्राह्मण परिवारों में बच्चों के यज्ञोपवीत वहीं गाँव-घर में सम्पन्न हो जाते हैं। यह यज्ञोपवीत संस्कार एक रस्म अदायगी की तरह हो जाता। इस रस्म में छुपी प्रेरणा एवं भाव अर्थहीन ही रह जाते।

पं. रूपकिशोर की चाहत थी, उनके पुत्र का यज्ञोपवीत संस्कार कोई ब्रह्मर्षि कल्प महान् व्यक्तित्व द्वारा सम्पन्न हो, ताकि यज्ञोपवीत की प्रेरणाएँ एवं भाव उनके पुत्र के जीवन में उतर सकें। इस क्रम में उनका ध्यान अपने पुराने सहपाठी एवं मित्र पं. मदनमोहन मालवीय की ओर गया। मालवीय जी को समूचा देश महामना के रूप में जानता था। वे थे भी ठीक वैसे ही। सच्चे अर्थों में ब्राह्मण एवं भारतीय संस्कृति की साक्षात् सजीव मूर्ति। बस बात तय हो गई। बालक श्रीराम को जब इसका पता चला, तो उनका चित्त उल्लास से भर उठा।

पिता-पुत्र दोनों अपने कुछ नजदीकी संबंधियों के साथ भगवान् शिव की नगरी काशी पहुँच गए। यहीं यज्ञोपवीत होना निश्चित हुआ था। महामना ने शुभ मुहूर्त का शोधन किया और बड़ी ही पवित्र घड़ी में यज्ञोपवीत एवं गायत्री दीक्षा सम्पन्न की। महामना मालवीय स्वयं उच्च कोटि के साधक एवं ऋषि थे। उन्होंने बालक में छिपे महासाधक एवं ब्रह्मर्षि को परख लिया। उन्होंने श्रीराम को पहले यज्ञोपवीत का मर्म समझाया, “यह यज्ञोपवीत कच्चे-पक्के सूत के धागे भर नहीं है। यह वेदमाता गायत्री की सजीव प्रतिमा है। जिसे छाती से लगाकर रखना, अपनी संस्कृति के प्रति निष्ठावान् प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है। इसकी तीन लड़ों में त्रिपदा गायत्री सँजोई है। यज्ञोपवीत के नौ धागे गायत्री के नौ शब्द हैं। यज्ञोपवीत संस्कार का अर्थ इस महासंकल्प को धारण करना है कि अब से हमारा जीवन गायत्री मंत्र के आदर्शों पर ही चलेगा। इन आदर्शों पर हम सदा ही अडिग एवं अविचल रहेंगे।”

महामना ने इसके बाद श्रीराम को गायत्री महामंत्र की महिमा बताते हुए कहा, “यह ब्राह्मण की कामधेनु है। इसे बिना व्यतिरेक के जपते रहना। पाँच माला अनिवार्य, अधिक जितनी हो जाएँ उतनी उत्तम।” श्रीराम ने मालवीय जी का आदेश अपने हृदय में धारण कर लिया। उनने कसम खाई कि जीवनपर्यंत अपनी देवसंस्कृति के प्रति निष्ठावान् रहेंगे। यद्यपि चूड़ाकरण संस्कार के समय ही शिखाधारण सम्पन्न हो गया था, परन्तु यज्ञोपवीत के समय फिर से उसकी पुनरावृत्ति हुई और सबसे बड़ी बात कि महामना पं. मदनमोहन मालवीय सरीखे ब्रह्मर्षि ने उन्हें सूत्र के साथ शिखा का भी महत्व समझाया। उन्होंने बताया कि यह शिखा हमारी संस्कृति का ध्वज है, जिसे हम अपने सिर पर धारण करते हैं। शिखाधारण शिखर व्यक्तित्व बनने का, गढ़ने का संकल्प है।

महामना मालवीय की इस संस्कृति शिक्षा ने उनके बाल-मन में एक धुन जगा दी। देवसंस्कृति के शाश्वत प्रतीक शिखा एवं सूत्र को धारण करने के बाद उनमें एक तीव्र लगन लग गई कि वे अपना समूचा जीवन अपनी संस्कृति के अध्ययन-अनुसंधान में लगाएँगे। ऋषियों द्वारा प्रेरित-प्रवर्तित संस्कृति के रहस्यों का अनुभव करेंगे। उनकी यह अभीप्सा दिनों-दिन तीव्र होने लगी। उनका हृदय अपने जन्म-जन्मान्तर के मार्गदर्शक एवं परम सद्गुरु को पुकारने लगा।


समग्र रूप से जाना (kahani)

रामकृष्ण परमहंस के अवसान के तुरन्त बाद शिष्यगणों में व्याप्त अवसाद को विवेकानन्द ने अपनी विवेक दृष्टि से देखा और उनका समाधान करते हुए कहा, “भाइयों ! हमारे गुरु हमें कोई आश्रम, मठ, संपत्ति, ट्रस्ट देकर नहीं गए, पर एक दृष्टि दे गए हैं कि हमें कैसा जीवन जीना चाहिए। यदि हमें सामर्थ्यवान् वैभववान् बनना है, तो लोक-कल्याण के लिए, गुरु के देश को विश्वव्यापी बनाने के लिए गुरुदेव ने जो संयम रूपी शिक्षा हमें दी है, वही हमारे लिए बहुत है। संस्कृति के पुनर्जीवन हेतु अनिवार्य साधन हम उसी से एकत्र कर लेंगे।”

गुरुभाई के देश में जैसे जादू था, अवसाद दूर हुआ। सभी संगठित हो जुट पड़े, समय आने पर अलग-अलग दिशाओं में फैल गए और प्रत्येक ने एक वैभव साम्राज्य खड़ा कर दिया, जो देश-विदेश में रामकृष्ण मिशन नाम से समग्र रूप से जाना जाता है।


Quotation

समाज का सहज प्रवाह एक अभ्यस्त ढर्रे के रूप में है। इस ढर्रे को बदलना ही साहसिकता है। मछली धारा को उलटा चीरकर चलती है और ऊपर पहुँच जाती है। धारा प्रवाह में तो शरीर से बलिष्ठ, पर बुद्धि से अल्प हाथी जैसे प्राणी भी बहुत देखे जाते हैं। बुद्धिमत्ता इसी में है कि जो भी अनुचित है, उसे पलट डालने में जरा भी असमंजस न बरतें। इस साहस के अभाव में ही अनीति व्यक्ति पर हावी हो जाती है।


गुरुदेव परब्रह्म

यज्ञोपवीत संस्कार के बाद से ही बालक श्रीराम की अंतरात्मा अपने सद्गुरु से मिलने के लिए विह्वल हो उठी। उन्होंने शास्त्रों-पुराणों के मर्मज्ञ अपने पूज्य पिता से सुन रखा था कि देव संस्कृति का वैभव-विकास सद्गुरुओं की देन है। इनकी तप-साधना का ही परिणाम है कि भारतीय धर्म एवं संस्कृति के साथ शाश्वत-सनातन जैसे विशेषण जोड़े जाते हैं। इन्होंने ही संस्कारों की भट्टी में गलाई-ढलाई कर सामान्य मानवों को देवमानव बनाया और जिनमें पिछले जन्मों की संस्कार सम्पत्ति थी, उन्हें गढ़-सँवार कर देवदूत, युगपुरुष एवं अवतार का स्वरूप प्रदान किया। गोरखनाथ को गढ़ने में मत्स्येंद्रनाथ की ही कुशलता थी। ज्ञानेश्वर का भव्य स्वरूप सोपानदेव के हाथों निखारा गया था। भगवान् श्रीराम एवं देवकीनंदन श्रीकृष्ण की दिव्यता के पीछे महर्षि वशिष्ठ, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र और गुरु संदीपनि की तप-साधना आसानी से देखी-परखी जा सकती है। इसलिए तो अपनी संस्कृति ‘गुरुदेव परब्रह्म’ कहकर गुरु-चरणों में श्रद्धा से शीश नवाती है।

पिता के पावन मुख से यह गुरु-महिमा सुनकर उनके मन में अपने अदृश्य गुरु के प्रति श्रद्धा जाग उठी थी, पर उनके मन में पात्रता के सिद्धाँत के प्रति गहन आस्था थी। उनका सोचना था कि यदि कोई सुपात्र सत्पात्र है, तो उसे प्रकृति कभी वंचित नहीं करती। सद्गुरु सत्पात्रों को स्वयं ही ढूंढ़ निकालते हैं। कुपात्रों को भटकन ही पल्ले पड़ती है। अपने मुँह में नमक का टुकड़ा दबाए हुए चींटी की भाँति वे शक्कर के पहाड़ के समीप पहुँचकर भी उसकी मिठास से वंचित रह जाते हैं। पात्रता ही प्राप्ति की कसौटी है। लौकिक वैभव एवं आध्यात्मिक विभूतियाँ सत्पात्रों को ही मिलती हैं। शेष अपनी वंचना के चलते वंचित रह जाते हैं।

इस गहन आस्था को लिए वे नियमित संध्यावंदन व गायत्री जप में लगे थे। घर की एक छोटी-सी कोठरी को उन्होंने अपना उपासना गृह बना रखा था। रात्रि को एक-डेढ़ बजे के आस-पास वह उठकर स्नान आदि नित्य कर्मों से निवृत्त हो जाते। इन सब कामों में उन्हें डेढ़-दो घंटा लग जाता था। तदुपराँत संध्यावन्दन के अनंतर गायत्री उपासना का क्रम चलता, जो सूर्योदय के काफी समय बाद तक चलता रहता और सूर्योपस्थान, सूर्यार्घदान के पश्चात् वह अध्ययन एवं अन्य गृह कार्यों में लग जाते। सायं संध्योपासना एवं गायत्री जप भी उनकी नित्य गतिविधियों में शामिल था।

इस क्रम को चलते तकरीबन तीन वर्ष बीत गए। अब वह पन्द्रह साल के हो चले थे और तभी वह देवदुर्लभ मुहूर्त आ पहुँचा, जिसके लिए उनकी आत्मा चिर अभीप्सित थी। बसन्त पंचमी का पावन पर्व था। वातावरण में ऋतुराज बसंत की कृपा बरस रही थी। माता प्रकृति अपना पुरातन परिधान उतारकर नया पहनने की तैयारी कर रही थी। सभी जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, प्राणि-वनस्पति सबके सब एक नवीन प्राण चेतना से अनुप्राणित हो रहे थे। किशोर हो चले श्रीराम आज भी सदा की भाँति अपनी नित्य उपासना में संलग्न थे।

उनके सामने रखी पूजा की चौकी पर एक घृतदीप जल रहा था। जिसकी मद्धिम ज्योति उस छोटी-सी कोठरी को एक सात्विक प्रकाश से भर रही थी। पूजा की चौकी पर गुलाब, गेंदा एवं मोगरा के फूल सजे थे, जिनकी भीनी-भीनी सुगंध पूजा-गृह की पावनता को और भी अधिक पावन बना रही थी। उनके होठों से अस्फुट स्वरों में गायत्री महामंत्र उच्चरित हो रहा था। गायत्री महामन्त्र के चौबीस अक्षर उनकी समूची प्राण चेतना को स्पंदित कर रहे थे।

साधक और साधना परस्पर एकाकार हो चले थे कि तभी साध्य के रूप में एक ज्योतिपुंज प्रकट हुआ। इस ज्योतिपुँज में स्वर्गीय उजास थी और इसकी शीतल प्रभा में जीवात्मा के भय-तापों को हरने की क्षमता थी। धीरे-धीरे ज्योतिपुँज में स्वर्गीय उजास थी और इसकी शीतल प्रभा में जीवात्मा के भय-तापों को हरने की क्षमता थी। धीरे-धीरे ज्योतिपुँज ने मानव का आकार लिया। यह आकृति किसी आलौकिक तपस्वी एवं महायोगी की थी। साधनारत श्रीराम अपनी बंद कोठरी में इन देवपुरुष की अद्भुत उपस्थिति को देखकर निर्वाक् थे। उन्हें सूझ ही नहीं रहा था कि वे क्या बोलें और क्या करें ? फिर भी उनके मन-प्राण किसी अनजाने आध्यात्मिक प्रभाव से शीतल हो रहे थे। उनकी आत्मा अपने चिर सखा एवं परम स्नेही को पहचानने का प्रयास कर रही थी।

अभी वह कुछ और सोच पाते कि उस छवि ने बोलना प्रारम्भ किया व कहा, “हतप्रभ न हो पुत्र! हम तुम्हारे अपने हैं। सदा-सदा से अपने। देह के सम्बन्ध तो देह की परिधि में रहते हैं। देह के जन्मने पर पनपते और देह के विनष्ट होने पर नष्ट हो जाते हैं। मेरा तुम्हारा सम्बन्ध तो अन्तरात्मा का सम्बन्ध है। शाश्वत, अनादि और अनन्त, देश-काल की सीमाओं से परे। मैं ही वह हूँ जिसे तुम्हारी आत्मा ने पुकारा था। तुम मुझे ही पाना चाहते थे और मैं तुम्हें ही ढूंढ़ रहा था। बस प्रतीक्षा एवं विलम्ब इतना भर था कि तुम्हारा बचपन बीते, तो तुम्हें तुम्हारे दायित्वों का ज्ञान एवं भान कराया जाए।

उन महायोगी के ये शब्द आत्मा से निकले एवं आत्मा में प्रविष्ट हुए। जब सद्गुरु ने अपने शिष्य को पहचान लिया, तो सत्शिष्य को भला अपने सद्गुरु को पहचानने में देर कैसे लगती ? सद्गुरु देने के लिए आतुर थे, तो शिष्य ग्रहण करने के लिए तत्पर। एक अलौकिक भाव चेतना में दोनों ही प्रतिष्ठित थे। अंतरात्मा कह रही थी, अंतरात्मा सुन रही थी। विलक्षण संवाद था। जब अंतर्चेतना का सायुज्य हो चले, तो ऐसा ही संवाद होता है। ऐसी दशा में विवाद की गुंजाइश ही कहाँ रहती है ?

श्रीराम के रोम-रोम में, मन-प्राण के कण-कण में, अंतर्भावों में, समूचे अस्तित्व में गुरुदेव परब्रह्म गूँज उठा। यह समर्पण का पुण्य क्षण था। बड़े ही मधुर आध्यात्मिक परिणय की घड़ी थी। सार्थक अर्थों में देहातीत दो आत्माओं का मिलन था। यहाँ लौकिक कुछ न था, सब कुछ अलौकिक-ही-अलौकिक था। इन्हीं क्षणों में श्रीराम के मन में समर्पण की मौलिक परिभाषाएँ उपजीं, समर्पण अर्थात् अपने पूर्व परिचय का सर्वथा परित्याग। अब तो सद्गुरु का दिया परिचय ही अपना परिचय। अपनी देह-गुरु के कार्य का माध्यम, अपना मन गुरु की चेतना का वास स्थान, अपनी भावनाएँ गुरु प्रेम में निमग्न। यह परिभाषा विचारों के दायरे में कैद न थी। इसका स्वरूप क्रियात्मक था और था इस समर्पण के प्रति अटूट निष्ठावान् संकल्प।

सद्गुरु अपने शिष्य को पाकर धन्य थे और शिष्य अपने परम आत्मीय सद्गुरु को पाकर कृतज्ञ था। दोनों की चेतना भाव विह्वल थी। शिष्य की आँखों से चिरवियोग के बाद परम मिलन की भावना झर रही थी, तो सद्गुरु के नेत्रों से कृपा की ज्योति बरस रही थी। मिलन के इन प्रगाढ़ क्षणों में गुरु-शिष्य सम्बन्धों की शाश्वतता के ऊपर कालदेवता ने जो धूल डाली थी, वह झड़ने लगी। सब कुछ साफ हो उठा। जन्म-जन्माँतर प्रत्यक्ष होने लगे। पुनर्जन्म का रहस्य अनावृत होने लगा।


सिद्ध पुरुष बने (kahani)

चंडकौशिक ने प्रचंड तप तो किया, पर उन्होंने क्रोध का शमन न किया। वह दुष्ट दुर्गुण उनमें ज्यों-का-त्यों बना रहा। एक दिन उनके पैर से मेंढक कुचलकर मर गया। साथी तपस्वी ने इस प्रमाद की ओर उनका ध्यान आकर्षित किया, तो चंडकौशिक आग बबूला हो गए। वे उस साथी को मारने दौड़े। क्रोध में मनुष्य अंधा हो जाता है। आवेश में उन्हें बीच में खड़ा खम्भा भी न दीख पड़ा। दौड़ते हुए उसी से टकरा गए। यही चोट उनकी मृत्यु का करण बन गई। मोहवश उन्होंने उसी आश्रम में फिर जन्म लिया और साधना के द्वारा उसी के संचालक बने, फिर भी उनका क्रोध गया नहीं।

एक बार कुछ भक्तजन उपहार और पूजा उपकरण लेकर उपस्थित हुए। भक्तों के व्यवहार और उपहार में उन्हें कुछ दोष दीखा और वे क्रुद्ध होकर मारने दौड़े। भक्त भागे, अधिपति पीछे दौड़े। दौड़ तेजी से चल पड़ी। आवेश ने उन्हें पागल जैसा बना दिया था। रास्ते के व्यवधान भी उन्हें सूझ न पड़े। कुएं में पैर पड़ा और उसी में उनकी मृत्यु हो गई।

तीसरी बार भी चंडकौशिक का जन्म उसी आश्रम में हुआ। अब की बार वे भयंकर विषधर सर्प की देह लेकर जन्मे। जो कोई उधर से निकलता, उसी का पीछा करते और जो पकड़ में आ जाता, डसकर उसका प्राण हरण कर लेते। भगवान् महावीर एक बार उस आश्रम में पधारे, तो उन्हें भी चंडकौशिक के क्रोध का भाजन बनना पड़ा। दंशन से उनका पैर क्षत-विक्षत हो चला, फिर भी करुणा की उस प्रतिमूर्ति के चेहरे पर क्रोध न आया। वे मुस्कराते रहे और उस क्षुद्र प्राणी को अपनी अनंत क्षमा का पात्र बनाए रहे। आश्रमवासी उस दुष्ट जीव को मारने आए, तो उन्होंने रोक दिया। भगवान् की दिव्य सत्ता को पहचानकर सर्प योनि में बैठे चंडकौशिक ने पश्चाताप व्यक्त किया। उन्हें भगवान् के उपदेश सुनने के बाद मुक्ति मिली। फिर मानव देह में जन्म लेकर उन्होंने क्रोध शमन हेतु तप किया और सिद्ध पुरुष बने।


पूर्वजन्मों की अनुभूति ने कराया आत्मबोध

जीवन केवल वर्तमान देह तक सीमित नहीं है। वर्तमान देह तो बस चिर अतीत से चली आ रही जीवनक्रम की विविध शृंखलाओं में जुड़ने वाली एक कड़ी है। सूक्ष्मशरीरधारी ज्योतिर्मय सद्गुरु के वचन साधक श्रीराम को गहन आत्मपरिचय के लिए प्रेरित करने लगे। वह अभी भी पद्मासन पर ध्यान मुद्रा में बैठे थे। सामने पूजा की चौकी पर अभी भी घृतदीप अपना प्रकाश बिखेर रहा था। हालाँकि उसकी प्रभा सद्गुरुदेव के सूक्ष्मशरीर से विकरित होते आलोक के समक्ष नगण्य लग रही थी। उन ज्योतिपुँज गुरुसत्ता के अधरों पर हल्का-सा स्मित झलका। इस स्मित में अपने योग्य शिष्य के लिए अपरिमित वात्सल्य की झलक थी और साथ ही एक रहस्यमयता भी परिव्याप्त थी। जैसे वह अपने शिष्य को किसी अनजानी दुनिया में ले जाने के लिए उत्सुक हों।

इन्हीं पलों में उनके ज्योतिधारा वर्षण करते आलौकिक नेत्र साधक श्रीराम के भृकुटि मध्य पर जा टिके। इतना होना था कि पद्मासन पर बैठे श्रीराम के शरीर में एक विद्युत् प्रवाह-सा दौड़ गया। उनकी आँखें इस अनजाने अभाव से बंद हो गईं। मन अंतर्गुहा में प्रविष्ट होने लगा। अंतर्मुखी चेतना के लिए योग्य समाधि के द्वारा उन्मुक्त होने लगे। चेतना देश और काल की सीमाओं का अतिक्रमण कर गई। यद्यपि दृश्य और द्रष्टा का भेद अभी भी था, परन्तु इस तल पर उभरने वाले दृश्य इस लोक के न थे और न ही इन्हें देखने-अनुभव करने वाली सामान्य इंद्रियाँ थीं। यह समाधि में प्राप्त होने वाला साक्षात्कार था। चेतना यहाँ सर्वथा लोकातीत हो गई थी।

इस अपूर्व ढंग से अलौकिक भावभूमि पर उदय होने वाले दृश्य चकित करने वाले थे। साधना की परमावस्था में निमग्न साधक स्वयं में स्वयं को अनुभव कर रहा था। उसने स्वयं को श्री रामकृष्ण परमहंस के रूप में देखा। कामारपुकुर से लेकर दक्षिणेश्वर के गंगातट तक के अनगिन दृश्य उनकी अंतर्लीन चेतना में मुखर हो उठे। माता-पिता, बन्धु-सखा, अनन्य सहयोगिनी-सहधर्मिणी या यों कहें कि स्वयं की चेतना का अर्द्धांश सभी का परिचय यहाँ मिला। बड़ा ही सुस्पष्ट एवं घनिष्ठ परिचय था। जिस तरह सूर्य से उसकी अनगिन किरणें प्रकट होती हैं, उसी तरह शिष्य-समुदाय का परिचय भी प्रकट हुआ। नरेन्द्र, राखाल, गंगाधर, लाट् आदि ये सभी भी तो उनकी स्वचेतना की रश्मियां ही थीं। श्री रामकृष्ण परमहंस की दिव्यदेह को आधार बनाकर ईश्वरीय प्रयोजन के निमित्त जो कुछ भी हुआ था, किया गया था, वह सबका सब अंतर्चेतना में तरंगित हुआ और फिर अंतर्लीन हो गया। एक गहन शून्यता पुनः विराजमान हो गई।

इस शून्य में एक बार फिर से उर्मियाँ उठीं। इस बार ये सबकी सब समर्थ गुरु रामदास के इर्द-गिर्द केंद्रित थीं। बालक नारायण से समर्थ गुरु बनने तक की कथा विविध दृश्यों के रूप में चेतना पट में अंकित होने लगी। पूर-का-पूरा जीवन तप के अनगिन प्रचंड उपक्रमों से भरा दिखाई दिया। इसी तप से तो शिवाजी प्रचंड बने थे। समर्थ और शिवा एक ही चेतना के अभिन्न अंश के रूप में समाधि की इस गहन भावभूमि में अनुभूति हुए। ईश्वरीय प्रयोजन ही इस जीवन का भी कारण था। चेतना पट पर उभरी यह दृश्यावली भी उन्हीं चेतना के एक अन्य जीवन की कथा दिखाकर विलुप्त हो गई। शून्यता पुनः मुखरित हो उठी।

और फिर पुनः इस शून्य में एक अन्य जीवन-कथा स्वयं को प्रकट करने लगी। वह स्वयं में स्वयं को कबीर के रूप में अनुभव करने लगे। अक्खड़-फक्खड़ कबीर एवं परम सती लोई के जीवन का ताना-बाना समाधिस्थ चेतना में अपना आकार बुनने लगा। निर्धन होने पर भी कबीर असहाय नहीं थे। वह समर्थ थे, अध्यात्म एवं ईश्वरपरायणता ही उनकी सामर्थ्य थी। इसी बलबूते उन्होंने रूढ़ियों-कुरीतियों से जोरदार टक्कर ली। लोक को चेताया और उसे सच्ची राह दिखाई। संत कबीर का जीवन भी ईश्वरीय प्रयोजन के लिए था।

इन तीनों जीवनों में एक अद्भुत साम्य था। सूक्ष्म शरीरधारी महायोगी दिव्य गुरु प्रत्येक जन्म एवं जीवन में मार्गदर्शक रहे थे। उन्होंने कभी सूक्ष्म में, तो कभी स्थूल में प्रकट होकर राह दिखाई थी। ईश्वरीय प्रयोजन का पूरा करने के लिए अपना संबल प्रदान किया था और वे अब फिर से उपस्थित हुए थे। इस उपस्थिति के उद्देश्य का ज्ञान पाने के लिए अंतर्लीन चेतना फिर से बहिर्मुख होने लगी। गहन समाधि की इस तल्लीनता में जो संस्कृति सत्य प्रकट हुआ था, वह यह था कि पुनर्जन्म एक ध्रुव सत्य है। हाँ, इतना अवश्य है कि यह पुनर्जन्म प्रत्येक जीवात्मा के कर्मों के स्वरूप के अनुसार अपना अलग-अलग स्वरूप प्रकट करता है। कहीं यह दुष्कर्मों एवं दुष्कृत्यों के दंड के लिए नारकीय परिस्थितियों को रचता है, तो कहीं सत्कर्मों का सत्परिणाम प्रस्तुत करने के लिए स्वर्गीय जीवन का सृजन करता है।

पुनर्जन्म का संस्कृति सिद्धाँत साधक श्रीराम के लिए अनुभव की विषयवस्तु बन गया था। उनकी चेतना अब प्रकृतिस्थ हो चुकी थी। मार्गदर्शक गुरुदेव अभी भी उनके सम्मुख थे और वे बता रहे थे, यह तुम्हारा परम दिव्य जन्म है। इसकी दिव्यता पिछले सभी तीन जन्मों से अधिक हैं इस बार ईश्वरीय प्रयोजन कहीं अधिक व्यापक है। सो शक्ति-सामर्थ्य भी प्रयोजन की व्यापकता के अनुरूप ही व्यापक बनानी पड़ेगी।

गुरुसत्ता के ये शब्द साधक श्रीराम की अंतरसत्ता में सीधे प्रविष्ट हो रहे थे। वहाँ प्रश्न और तर्क न थे, सिर्फ आदेश की अभिलाषा थी। अपने परम सद्गुरु पर सर्वतोभावेन निछावर होने की आकाँक्षा थी। वह गुरु वाणी सुन रहे थे, “वत्स! जिस संस्कृति को महर्षियों ने कठिन तप के बाद जनम दिया। अपने तप-प्राणों से सींचकर उसे पुष्पित-पल्लवित किया। वह तप के अभाव में आज निष्प्राण होने लगी है, मुरझाने लगी है, इसे फिर से हरा-भरा कर पाना तप से ही संभव है। आज संस्कार तो क्या आचार एवं विचार भी मरने लगे हैं। भारतवासियों की यह दुर्दशा देखकर पूर्वकालीन महर्षियों की आत्माएँ संतप्त हैं। संस्कृति न रही तो देश तो क्या मनुष्य भी न बचेगा।”

मुझे क्या करना है गुरुदेव ? शिष्य के मन में अपने गुरु का आदेश पाने की आकाँक्षा चेतना के तटबंध तोड़ने लगी थी।

तप! वत्स, केवल तप! वह भी देवसंस्कृति के परम सूत्र गायत्री महामंत्र को आधार बनाकर। गायत्री महामंत्र केवल चौबीस अक्षरों की लिपी मात्र नहीं है, यह संस्कृति का मौलिक सूत्र है। इसकी सटीक एवं समुचित व्याख्या करने से देवसंस्कृति के सारे आयाम एवं समस्त रहस्य उजागर हो जाते हैं, पर यह सब बौद्धिक विवेचना की विषयवस्तु नहीं है, इसका बोध तो गायत्री महामन्त्र की कठिन तप-साधना से ही सम्भव है। अभी तक तुम जो साधना कर रहे थे, वह गायत्री की सामान्य साधना थी। अब तुम्हें इसकी विशिष्ट साधना में प्रवृत्त होना पड़ेगा। उसी के सत्परिणामस्वरूप तुम्हें गायत्री का देवसंस्कृति की आदिमता के रूप में साक्षात्कार हो सकेगा। शिष्य एवं गुरु के इस अंतरंग संवाद में गायत्री साधना का विज्ञान-विधान प्रकट होने लगा।


संग्राम में महत्त्वपूर्ण भूमिका (kahani)

रामकृष्ण परमहंस की माता एक बार कलकत्ता आईं और कुछ समय स्नेहवश पुत्र के पास रहीं। दक्षिणेश्वर मंदिर की स्वामिनी रासमणि ने उन्हें गरीब और सम्मानास्पद समझकर तरह-तरह के कीमती उपहार भेंट किए। वृद्धा ने उन सभी को अस्वीकार कर दिया और मान रखने के लिए एक इलायची भर स्वीकार की।

उपस्थित लोगों ने कहा, ऐसी निस्पृह माताएँ ही परमहंस जैसे पुत्र को जन्म दे सकती हैं।

गोपालकृष्ण गोखले निर्धन अवस्था में पलकर बड़े हुए। आरम्भिक शिक्षा तो पूरी हुई। कॉलेज की ऊँची पढ़ाई का प्रश्न आया। ऐसे में भाई-भाभी मदद को आगे आए। उन्होंने आभूषण बेचकर प्रारंभिक फीस भर दी। स्वयं भाई को पन्द्रह रुपये मासिक वेतन मिलता था। ऐसे में निर्वाह के लिए आठ रुपये रखकर शेष सात वे छोटे भाई को दे देते थे। पढ़ाई पूरी हुई। गोखले को नौकरी मिली व 35 रुपये प्रतिमाह पर वे अध्यापक बने। रोम-रोम तक उपकार से भरे गोपाल ने कृतज्ञतापूर्वक मात्र 10 रुपये अपने खरच को रख बीस रुपये प्रतिमाह उन्हें जीवन भर भेजे, कर्ज चुकाने के लिए नहीं, समय पर निबाहें कर्त्तव्य ममता की प्रतिक्रियास्वरूप श्रद्धाँजलि रूप में। ऐसे भाई जिसे मिले और ऐसा अध्यवसायी-नैतिक जिसका जीवनक्रम रहा हो, वह व्यक्ति आगे चलकर स्वतन्त्र संग्राम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सका।


वेदमाता उनकी चेतना में अवतरित हुई

देवसंस्कृति की आदिमाता गायत्री है। मार्गदर्शक गुरु ने यह सत्य अपने शिष्य को हृदयंगम कराया। इसी के साथ उन्हें तप-साधना के कठोर अनुबन्धों में बाँधकर वह दिव्य सत्ता अंतर्ध्यान हो गई। अब पंद्रह वर्षीय श्रीराम को चौबीस अक्षर वाले गायत्री महामंत्र के चौबीस लाख के चौबीस महापुरश्चरण सम्पन्न करने थे। यह तप-साधना चौबीस वर्षों में की जानी थी। इस साधना में अखंड घृतदीप के सामने छह घंटे नियमित जप करते हुए मात्र जौ की रोटी एवं छाछ पर निर्वाह करना था। इंद्रिय-संयम, विचार-संयम, समय-संयम एवं अर्थ-संयम इसके ऐसे व्रतबंध थे, जिन्हें पूरा करने के लिए साधक प्रवर श्रीराम की चेतना पहले से ही निष्णात हो चुकी थी।

‘षुभस्य शीघ्रम्’ इस संस्कृत सुभाषित का अनुसरण करते हुए यह क्रम उसी दिन से प्रारम्भ हो गया। पूजा वेदी पर जल रहे घृतदीप ने सन् 1926 ई. की बसंत पंचमी से ही अपनी अखंडता प्राप्त कर ली। दीपशिखा की अखंड अविरामता की ही तरह साधक की गायत्री साधना ने भी अखंड एवं अविराम गति पकड़ ली और इसके परिणामस्वरूप अंतर्यात्रा भी अविराम हो चली। इसमें आने वाले विविध पड़ाव, विभिन्न अनुभूतियाँ गायत्री साधना के रहस्यों को स्वयं ही उद्घटित करने लगीं।

इस सतत् साधना के कुछ ही वर्षों बाद साधक श्रीराम के चैतन्य में सर्वमयता स्थिर हो गई। जो बाहर हो रहा था, वह भीतर होता हुआ प्रतीत होने लगा। अहम् और इदम् के मध्य जो आच्छादन था, दूर हो गया। साधक के कण-प्रतिकण में, अणु-परमाणु में जो अव्यक्त नाद है, वह सुनाई पड़ने लगा। कभी तो भेरी बजती, कभी मृदंग, कभी वीणा, कभी शंख ध्वनि होती और कभी सब मिलकर एक आलौकिक संगीत की सृष्टि करते। साधना में सर्वत्र अणु-परमाणुओं के विद्युत् कणों के नृत्य-घूर्णन होते दिखाई देते। उनके सतत् वेधन, ध्वंस और नए-नए समुच्चयों से अनन्त पदार्थों की सृष्टि, विकास और समाप्ति के सिलसिले अंतःकरण में प्रतिबिंबित होने लगे। जपकाल में साधक के पिंड में अस्यकाँत मणियाँ सक्रिय हो गईं.......। गुरुत्वाकर्षण पहले भी था, चुम्बक सभी में होता ही है, किन्तु अब यह चुम्बक उनमें शतगुणित हो गई।

उनकी ध्यानस्थ चेतना में पर्वत ऊपर उठने लगे, तुषार से ढके शृंग उनके चिदाकष में समाया करते। उनके हृदय प्रदेश में इच्छारूपधारिणी षट् ऋतुएँ अपने रंग दिखातीं और ध्रुव प्रदेशों में साधक की चेतना छह मास के दिन व रात्रि के अद्भुत दृश्यों में खो जाती। उन्हें काल की प्रत्येक धड़कन सुनाई पड़ने लगी। दिन उनकी इच्छानुसार छोटे-बड़े होने लगे। उनका चिंतन प्रवाह धाराक्रमपरक हो गया और विवेक के प्रकाश से विचारणीय विषय स्वयं अपने समाधान खोलने लगे।

गायत्री तप-साधना के इस सतत् क्रम में साधक श्रीराम को वितर्क, विचार,अस्मिता और आनन्द में संप्रज्ञात समाधि लगने लगी। वह जब तक चाहते, प्रकाशमय शून्य में दिव्य पक्षी की तरह भ्रमण करते पक्षी की तरह भ्रमण करते रहते। वृत्ति निरोध से उनके द्वंद्व दग्ध होते गए। अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष, अभिनिवेश ही नहीं स्मृति, ग्लानि, शोक, भय, जुगुप्सा, लज्जा, गर्व, क्रोध आदि तैंतीस संचारी और आठ स्थायी भावादि से भी चित्त मुक्त हो गया। उनमें चेतना सर्वदा प्रशांत शारदीय गंगाधारा-सी बहने लगी।

वह जब तक चाहते, आज्ञाचक्र से दृष्टि संधान कर चैतन्य और प्रक्रियाओं के दर्शन करते हरते। पुनः वह ब्रह्मरंध्र में प्रविष्ट होकर पीयूष पान करने लगते। मैत्री, करुणा, मुदिता, श्रद्धा, आह्लाद और आनन्द की अगाधता में उनका मन किलोलें करता रहता। अब तो मन की वृत्तियाँ ही बदल गईं, वे नकारात्मक न रहकर ज्योतिष्मती और सकारात्मक बन गईं, प्रज्ञा ऋतंभरा बन गई।

गायत्री महामंत्र के प्रभाव से चेतना के क्लेश क्षीण हो गए। सविचार-निर्विचार समाधियाँ सधने लगीं। मैं शरीर नहीं हूँ, साधना प्रारम्भ करते समय यह मात्र एक प्रत्यय थी, अब प्रतीति हो गई। अनित्यता नित्यता में, रूपांतरित हो गया। आदिशक्ति माता गायत्री की अनुकम्पा से सम्यक् ज्ञान हो गया, विद्या की पराकाष्ठा विवेक ख्याति पा गई। उनका राग अब प्राणिमात्र के कल्याण की कामना का पर्याय बन गया। उनकी अंतर्चेतना ब्रह्माण्ड सरोवर में ब्रह्मकमल की तरह खिल उठी। उसकी अलौकिक सुगंध भी चहुँदिष परिव्याप्त होने लगी।

साधक श्रीराम को अब यह भान होने लगा था कि वह शिव हैं, पूर्ण हैं, शुद्ध हैं, अनंत हैं, सत्-चित्-आनंद हैं। उन्हें यह बोध हो गया कि वह भूमा हैं, भव्य हैं और सर्वातीत आत्मतत्त्व हैं। अतः यह सब जो सृष्टि है, प्राणी, पदार्थ हैं, उनका आत्मविस्तार है। इस ज्ञान के स्थायी होने से साधक की चेतना दग्ध बीज कल्प हो गई और उसमें सिद्धियाँ प्रकट होने लगीं। लोक-लोकान्तर उनके लिए अपने ही भवन के विविध कक्ष जैसे हो गए।

अब जब भी वह अपनी नियमित साधना में बैठते, तो उनके सहस्र चक्र में कण-कोशिकाएं और कोष्ठक विद्युत की सतत् गति से इंद्रियातीत अनुभवों, दृश्यों की सृष्टि करते और भूत एवं भविष्य को दर्पण में प्रतिबिंबित प्रस्तुत करते रहते। उनके हृदय पुँडरीक के कुछ ऊपर स्थित सौषुम्न ज्योति स्वयमेव प्रकाशित होती रहती। उनको समूचा ब्रह्माण्ड अपने भीतर विद्युत् बिन्दु और अनाहत नादबिंदु के रूप में अनुभूत होता और वह इस महादृश्य में निमग्न हो जाते। आदिमाता गायत्री के प्रभाव से उनको समग्रता और अद्वैतता स्थायी रूप से प्राप्त हो गई। वह खंड बोध से ऊपर उठकर अखंड ज्ञान में पहुँच गए।

वर्षों की अविराम साधना, अपने गुरु के प्रति गहन श्रद्धा-भक्ति, तप के विलक्षण प्रयोग, इन सबने मिलकर न केवल उनके लिए चेतना जगत् के सभी द्वारा खोले, बल्कि गायत्री का तत्त्वबोध भी प्रदान किया। उनके अनुभव में आ गया कि गायत्री समस्त वेदज्ञान का सार हैं इसके प्रयोग से मानव प्रकृति का समग्र परिशोधन-परिमार्जन सम्भव एवं सुगम है। मनुष्य के आचार-विचार ही नहीं, संस्कार भी गायत्री साधना से परिवर्तित-रूपांतरित होते हैं। अन्य साधना-पद्धतियाँ, अन्य मंत्र लाभप्रद हैं, परन्तु ये लाभ तात्कालिक हैं, सामयिक हैं। इनसे चेतना आंशिक रूप से ही प्रभावित होती है, जबकि गायत्री महामन्त्र का प्रभाव शाश्वत एवं समग्र है।

गायत्री के इसी प्रभाव को वैदिक महर्षियों ने जाना था। अपने अनुभव के द्वारा ही उन्होंने घोषित किया था कि यदि अनगढ़ मानव को सुसंस्कृत बनाना है, उसकी अंतर्चेतना में देवत्व की सृष्टि करनी है, तो गायत्री से बढ़कर कोई अन्य मन्त्र नहीं, कोई अन्य तत्त्व नहीं। वैदिक महर्षियों की यह अनुगूँज श्रीराम की चेतना में भी होने लगी। गायत्री के वैज्ञानिक प्रयोगों की शृंखला भी थी। जिसके द्वारा उन्होंने जाँचा एवं परखा और निष्कर्ष के रूप में प्रतिपादित किया कि सचमुच देवसंस्कृति की आदिमाता गायत्री ही है। इस युगशक्ति का अवतरण यदि जनचेतना पर हो सके, तो मानव एवं मानवीय संस्कृति का सतत् पोषण एवं अभिवर्द्धन आज भी सम्भव है। गायत्री के साथ ही उन्होंने इन्हीं दिनों गौ, गंगा, गीता की महिमा भी अनुभव की अनुभूतियों के ये अक्षर उनकी अंतर्चेतना में धीरे-धीरे लिपिबद्ध होने लगे।


भलाई का मार्ग अपना लिया (kahani)

कवि डेनियल निर्धनों को मिलने वाली सुविधाएँ स्कूल से लेकर आया। उसकी माँ ने कहा, वापस जाओ और इनकार करके आओ। मैं मेहनत-मजदूरी करती हूँ और तुम्हारी फीस तथा पुस्तकें जुटा सकती हूँ। यह सुविधा उनके लिए है जो सर्वथा असमर्थ हैं। हमें असमर्थों की हक नहीं मारना चाहिए।

एक राजकुमार बड़ा अत्याचारी था। राजा ने इस दुर्बुद्धि को सुधारने की बड़ी कोशिश की, लेकिन वह नहीं सुधरा। बुद्ध उसे सुमति देने के लिए स्वयं उनके पास गए। वे उसे नीम के एक पौधे के पास ले गए और बोले, राजकुमार इस पौधे का एक पत्ता चखकर तो बताओ कैसा है ? राजकुमार ने पत्ता तोड़कर चखा। उसका मुँह कडुआहट से भर उठा। उसे तुरन्त थूककर उसने नीम का पौधा ही जड़ से उखाड़ फेंका।

बुद्ध ने पूछा, राजकुमार ! यह तुमने क्या किया ? राजकुमार ने उत्तर दिया, यह पौधा अभी से ऐसा कडुआ है, बढ़ने पर तो पूरा विष-वृक्ष ही बन जाएगा। ऐसे विषैले पेड़ को जड़ से उखाड़ना ही उचित है। बुद्ध ने गम्भीर वाणी में कहा, राजकुमार तुम्हारे कटु व्यवहार से पीड़ित जनता भी यदि तुम्हारे प्रति ऐसी ही नीति से काम ले, तो तुम्हारी क्या गति होगी ? यदि तुम फलना-फूलना चाहते हो, तो उदार, दयावान् और लोकप्रिय बनो। उसी दिन से राजकुमार ने बुराई की राह छोड़ भलाई का मार्ग अपना लिया।


श्रद्धा हुई प्रगाढ़ तीन पावन प्रतीकों से

गौ, गंगा और गीता भारतीय संस्कृति का प्रतीकात्मक बोध कराते हैं। इनमें से गौ सात्विकता का प्रतीक है, तो गंगा तरल-सरल प्रवाहमान पावनता का, जबकि गीता संस्कृति के उच्च आदर्शों एवं अध्यात्म ज्ञान का प्रतीक है। बाल्यावस्था से ही संस्कृति पुरुष श्रीराम का मन-अंतःकरण इन तीनों के प्रति श्रद्धासिक्त था। मार्गदर्शक गुरुसत्ता के मिलन के बाद तो यह श्रद्धा और अधिक प्रगाढ़ हुई। गुरुदेव ने उन्हें जो साधना का विज्ञान-विधान बतलाया, उसके अनुसार तो ये तीनों ही प्रतीक उनकी साधना का अभिन्न अंग बन गए। उन्होंने गौ, गंगा, गीता को गायत्री से अभिन्न जाना और अनुभव किया।

सूक्ष्मशरीरधारी गुरुदेव ने सबसे पहले अपने शिष्य को गायत्री साधना का जो विधि-विज्ञान बतलाया, उसमें गौ कि महिमा स्वयमेव ओत-प्रोत थी। छह घंटे के नियमित साधनाकाल में ही नहीं, बल्कि नित्य अखंड अविराम जो दीप जलाया जाना था, उसमें गौघृत होना अनिवार्य था। मार्गदर्शक सत्ता ने इसकी अनिवार्यता को स्पष्ट करते हुए बतलाया था कि साधनाकाल में सात्विकता का प्रकाश चतुर्दिक् बिखरना चाहिए। यों तो गायत्री जप स्वयं में यज्ञ है, परन्तु जप यज्ञ की यह प्रक्रिया मन-प्राण-अंतःकरण तक ही सीमित रहती है। इसका बहिरंग स्वरूप भी आवश्यक है। जपकाल में घृतदीप इसी हेतु जलाया जाता है।

परन्तु यह तथ्य सामान्य साधना उपक्रम के लिए है। जब प्रयोजन विशेष हो, तब आयोजन भी विशिष्ट होना चाहिए। इसीलिए अखंड दीप अनिवार्य है। इस दीप से उठने वाली ज्योति सात्विकता एवं निष्कामता की ही प्रभा बिखेरे, इसलिए इसमें घृत गौ का ही होना चाहिए, क्योंकि समूची धरती पर गौ ही एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो पूर्णतः सात्विक है। प्राचीनकाल में ऋषि-महर्षियों द्वारा गौ-पालन में सात्विकता की शुभेच्छा ही निहित थी। गौ से जो तत्त्व हमें प्राप्त होते हैं, उनसे भी सात्विक तरंगें ही निकलती हैं। भले ही इसे हमारी सामान्य आँखें न देख पाएँ।

इसी क्रम में सात्विकता की विशेष अभिवृद्धि के लिए विशिष्ट हविष्यान्न जौ की रोटी के साथ गौ के छाछ को लेने का निर्देश हुआ। गौ की महिमा भारतीय संस्कृति में जगह-जगह बखानी गई है। इस महिमा में निहित सत्य को सामान्य आँखें भले ही न देख पाएँ, परन्तु अध्यात्मवेत्ता इसे सतत् अनुभव करते हैं और आत्मसात् करते हैं। संस्कृति पुरुष श्रीराम के जीवन में यह अनुभव प्रारम्भ से ही पग-पग पर समाया रहा। अपनी इस अनुभूति को शब्द देते हुए उन्होंने गायत्री महाविज्ञान के प्रथम खंड में लिखा भी है। उनके अनुसार, “शरीर और मन के अनेक विकारों को दूर करने के लिए गव्यकल्प अभूतपूर्व है। गाय का दूध, गाय का दही, गाय की छाछ, गाय का घी सेवन करना, गाय के कंडों से दूध गरम करना चाहिए। गाय के शरीर से निकलने वाला तेज बड़ा सात्विक एवं बलदायक होता है।”

गौ की ही भाँति गंगा का साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व है। यह महत्त्व भी गायत्री तत्त्व से अभिन्न है। गंगा तरल-सरल प्रवाहमान पावनता का मूर्त रूप है। इसमें चिरप्राचीनकाल से महर्षियों-महायोगियों एवं तपस्वियों का तप-प्राण समाता रहा है। यह स्थूल आँखों से न दिखाई देने पर भी अनुभव करने योग्य सत्य है। साधकप्रवर संस्कृति पुरुष श्रीराम अपनी पूजा-स्थली पर गंगा जल से भरा एक पात्र नियमित रूप से रखा करते थे। उनके अनुसार, नियमित साधना प्रारम्भ करने से पहले गंगा जल से तीन बार आचमन मन-प्राण-अंतःकरण में एक अलौकिक पवित्रता का संचार करता है। इसके प्रभाव से चित्तवृत्तियाँ सहज निरुद्ध होती हैं, एकाग्रता अपने आप सधती है।

गंगा के प्रति उनका यह लगाव जीवन के अंतकाल तक बना रहा। हरिद्वार के सप्तऋषि क्षेत्र में गंगातीर पर शाँतिकुँज की स्थापना इसी का जीता-जागता प्रमाण है। वह शाँतिकुँज के साधना सत्रों में आने वाले साधकों-प्रज्ञा पुत्रों को नियमित गंगा-भ्रमण एवं गंगाजल के पान के लिए प्रोत्साहित किया करते थे। उनका कहना था कि गंगाजल में तप की उर्मियाँ उमंगती हैं। गंगा का किसी भी तरह सान्निध्य, सुवास आध्यात्मिक उत्थान के लिए हितकर है। उन्होंने प्राण प्रत्यावर्तन, कल्पसाधना, चाँद्रायण साधना आदि में भाग लेने वाले साधकों के लिए भोजन निर्माण की व्यवस्था में भी गंगाजल का प्रयोग करवाया, जिसके तद्नुरूप परिणाम भी सामने आए। वह कहा करते थे, गंगा जल की महिमा जितनी वैज्ञानिक है, उससे अनगिन अनन्त गुना साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक है। यदि परिस्थितिवश किसी के लिए गंगा स्नान एवं गंगाजल पान सम्भव न हो, तो मानसिक एवं भावनात्मक रूप से गंगा स्नान एवं गंगाजल पान करना चाहिए। गंगा, गायत्री का ही रूप है। तभी तो शायद गंगा दशहरा एवं गायत्री जयन्ती के रूप में दोनों की अवतरण तिथि एक है।

गीता भी इनसे अलग नहीं है। यह भारतीय संस्कृति का प्राण तो है ही, संस्कृति पुरुष श्रीराम के प्राणों का तत्त्व भी यही था। “गायत्री छंद सामऽहम्” का गीता वाक्य यह स्पष्ट करता है कि गायत्री, गीताकार एवं उनकी कृति का साक्षात् स्वरूप है और साधकप्रवर श्रीराम तो अपनी साधना के प्रारंभिक काल से ही गायत्रीयम होने के साथ गीतामय भी हो गए थे। कर्म, भक्ति एवं ज्ञान के रूप में गीता की यह त्रिवेणी उनके अंतरंग एवं बहिरंग जीवन में शाश्वत एवं सतत् प्रवाहित थी। वह मानव-जीवन में इन तीनों के प्रवाह को सतत् एक साथ महत्त्व देते थे। उन्हीं के शब्दों में कहें, तो भक्ति एवं ज्ञान से विमुख कर्म केवल महत्त्वाकाँक्षा की पूर्ति का साधन व जीवन में भटकन का पर्याय बनकर रह जाता है। इसी तरह कर्म एवं ज्ञान से विमुख भक्ति कोरी भावुकता बन जाती है और यदि ज्ञान, कर्म एवं भक्ति से विमुख हो, तो कोरी विचार तरंगें ही पल्ले पड़ती हैं, जो मात्र दिवास्वप्नों की सृष्टि करती रहती हैं।

वह कहा करते थे कि गीता का महत्त्व गीता-पाठ तक सीमित नहीं है। रटने को तोता भी राम-राम रटता रहता है, किन्तु बिल्ली जैसे ही उस पर झपट्टा मारती है, वैसे ही टें-टें करने लगता है। गीता में निरूपित कर्म, ज्ञान एवं भक्ति जब तक जीवन में नहीं रच-बस जाते, तब तक गीता की यथार्थ महिमा प्रकट नहीं होती। उनके जीवन में यह महिमा क्षण-प्रतिक्षण, पल-प्रतिपल प्रकट थी। जिन्होंने उन्हें नजदीक से देखा और जाना है, उनके लिए यह कथन तनिक भी अतिशयोक्ति पूर्ण न होगा कि वह गीता और गीताकार के मूर्तिमान स्वरूप हो गए थे और तभी तो उन्होंने अपने शिष्यों एवं संतानों को परम वात्सल्यपूर्ण स्नेह से अभयदान देते हुए कहा, “न में भक्तः प्रणश्यति।” इसी के साथ उन्होंने जिज्ञासु साधकों को यह साधना सूत्र भी दिया कि “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” ये सूत्र उनके लिए हैं, जो उनके हैं और उनके होना चाहते हैं। गीता के साथ गंगा एवं गौ में निहित संस्कृति तत्त्व उनके जीवन में सहल परिव्याप्त थे, हालाँकि उनका जीवन ऊपर से दिखने में सामान्य गृहस्थ का था, जिसे उन्होंने तपोवन बना लिया था।


भगवान् बनकर ही लौटे (kahani)

समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी को ढूंढ़ निकाला था, तो भी अपने अनुमान को प्रत्यक्ष परखने के लिए सिंहनी का दूध लाने का आदेश दिया और जब आदर्श के लिए उपयुक्त साहसिकता दिखाने की बात सिद्ध हो गई, तो उन्होंने उन्हें वह सब कुछ दिया जो देना चाहिए था। इन्द्र ने अर्जुन को गांडीव देने और महाभारत जिताने की बात सोची किंतु साथ ही उसकी पात्रता जांचने का भी निश्चय किया, अन्यथा कुपात्र को दिए गए अनुदान ग्रहण करने वाले और देने वाले दोनों को ही संकट में फँसाते हैं। कुपात्र भस्मासुर को वरदान देने वाले शिवजी किस प्रकार विपत्ति में फँसे थे और दोनों को कितना त्रास सहना पड़ा, यह सर्वविदित है। विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को बला-अतिबला विद्या सिखाने पर भगवान् की भूमिका निभा सकने की विशेषता से सम्भव पाया, फिर भी आदर्शों के प्रति यज्ञ रक्षा में सुबाहु, ताड़का, मारीच से निपटने का कष्टसाध्य काम उनके कंधे पर डाल दिया। उत्तीर्ण हुए, तो वे ऋषि आश्रम से भगवान् बनकर ही लौटे।


गृहस्थ ही बना एक तपोवन

गृहस्थ देवसंस्कृति का केंद्र है। संस्कृति के विविध पहलू विभिन्न आयाम इसी केंद्र के सहारे प्रकट-विकसित होते हैं। सामान्यक्रम में गृहस्थ जीवन का जो खाँचा-ढाँचा दिखाई देता है। उसमें यह बात भले ही। अप्रासंगिक या अतिशयोक्तिपूर्ण लगे, परंतु यदि अपनी संस्कृति की मर्यादानुरूप इसे अपनाया जाए तो फिर यहीं तपोवन साकार होता है। साधक प्रवर श्रीराम के जीवन में यही तथ्य खरा, सही और सटीक प्रमाणित हुआ। गृहस्थ के संयमित, मर्यादित एवं आदर्शनिष्ठ आचरण के द्वारा उन्होंने सही मायने में घर-परिवार को तपोवन का स्वरूप प्रदान किया। यही पर संयम सेवा एवं सहिष्णुता की साधना करके वह संस्कृति पुरुष ओर लक्ष-कोटि जनों के परमपूज्य गुरुदेव बने।

साधनाकाल में ही उनके गृहस्थ जीवन की शुरुआत हो गई थी। वंदनीया माताजी ने आकर यहाँ संस्कृति संजीवनी की फसल उगाई। गृहस्थ संस्कारों की पौधशाला ही तो है, जहाँ परिवार के सभी सदस्यों को उनकी स्थिति के अनुरूप संस्कार मिलते हैं। प्यार-सुधार के संस्कारपूर्ण वातावरण में यहाँ परिवार के सभी स्वजन सुसंस्कृत बनते हैं। वंदनीया माताजी एवं परमपूज्य गुरुदेव की गृहस्थी कुछ ऐसी ही रही। उनके गृहस्थ जीवन के अगणित प्रसंग है। असंख्य बातें हैं। इन सभी में यदि एक तथ्य हर कहीं है तो वह है प्यार और संस्कार। हर पहलू से, हर आयाम से इन्हीं दो की झलक मिलती हैं।

गुरुदेव-माताजी इन दोनों में से कौन बड़ा, कौन छोटा, यह चर्चा निरी महत्त्वहीन हैं, क्योंकि ये दोनों, दो दिखते हुए भी दो थे ही नहीं। जीवन एवं प्राण, काया एवं श्वास, सूर्य एवं प्रकाश, चन्द्रमा एवं चाँदनी यही नाता था दोनों में दोनों ही एक-दूसरे के प्रति गहराई से अर्पित-समर्पित थे। उनका सब कुछ तो एक था। यह सचाई उनसे मिलने वाले भी अनुभव करते रहते थे। न जाने कितने प्रसंग हैं, जब परिजनों ने पाया कि जो पहले वंदनीया मिलने वाले भी अनुभव करते रहते थे। न जाने कितने प्रसंग हैं, जब परिजनों ने पाया कि जो पहले वंदनीया माताजी ने कहा, वही बाद में परमपूज्य गुरुदेव ने बताया। अथवा जो पहले गुरुदेव ने कहा, वही बाद में माताजी ने बताया। यह अभेद, एकत्व मात्र आध्यात्मिक या अतींद्रिय प्रसंगों तक सीमित न था। सामान्य जीवनक्रम में रोजमर्रा के कामों में इसकी उतनी ही झलक मिलती थी। दोनों ही नित्य एकता मथुरा के जीवनकाल में वंदनीया माताजी पत्र पढ़कर सुनाती थी। परमपूज्य गुरुदेव जवाब लिखते थे जिस तरह से पत्र-लेखन आदि गुरुदेव के द्वारा किए जाने वाले काम में माताजी सहयोग देती थी, ठीक उसी तरह माताजी के घर-गृहस्थी के सामान्य काम-काज में गुरुदेव भी हाथ बँटा देते थे। ऐसे प्रसंग पुराने परिजनों द्वारा आज भी सुने जा सकते थे। उनके दाँपत्य संबंध दिव्य एवं अतिमानवीय होते हुए भी मानवीय सहृदयता घनिष्ठता, आत्मीयता एवं प्रेम का उज्ज्वल उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

जहाँ तक परिवार की बात है तो उन दोनों के कभी भी अपने परिवार को अपने दो पुत्र दो पुत्रियों तक सीमित नहीं माना। हालाँकि अपने पुत्र-पुत्रियों को उन्होंने अच्छी शिक्षा दिलाई, उत्तम-उत्कृष्ट संस्कार दिए। अपनी वसीयत एवं विरासत के रूप में उन्हें उज्ज्वल प्रेरणाएँ एवं आदर्शनिष्ठा सौंपी, पर उनके मन में परिवार के स्वजनों के प्रति जो कर्त्तव्य भाव था, उसकी सीमा इससे कहीं अधिक बृहत्तर थी। उसकी परिधि अपनी चार संतानों से कही अधिक विशाल एवं विराट् थी।

गुरुदेव माताजी का अपना सबसे छोटा परिवार अखण्ड ज्योति परिवार था। सही मायने में इसे ही उनके गृहस्थ जीवन की शुरुआत कहें तो उचित होगा, क्योंकि अखण्ड ज्योति पत्रिका और अपने हस्तलिखित पत्रों के माध्यम से वे अपने बच्चों को शिक्षा एवं संस्कार देने में ही तो लगे थे। उनके द्वारा विनिर्मित गृहस्थ का तपोवन इसी व्यापक दायरे में फैला था। इस अखण्ड ज्योति परिवार में बात शिक्षा एवं संस्कार तक ही सीमित न थी। प्यार-दुलार, अपनत्व, ममता, झिड़की, फटकार, मनुहार सभी कुछ इसमें शामिल था। बच्चों पर माँ-बाप का अधिकार होता है। तो बच्चे भी माँ-बाप पर अपना पूरा अधिकार जताते थे।

मथुरा के दिनों का ही एक प्रसंग उन दिनों से जुड़े एक परिजन आज भी बड़े चाव से सुनाते थे। उनके अनुसार संस्थान पहुँचे। सब लोग सो चुके थे। दरवाजा खटखटाने पर वंदनीया माताजी ने दरवाजा खोला। बड़े प्यार एवं अपनत्व से उन्हें अंदर बिठाया। घर-परिवार निजी-जीवन की थोड़ी चर्चा के बाद भोजन का उपक्रम हुआ। माताजी ने पराँठे बनाए और उन्होंने खाए। इसके बाद उन्होंने निवेदन किया, माताजी गुरुदेव से मिलवा दो। माताजी ने समझाया, बेटा सुबह मिल लेना। इस पर वह परिजन दुःखी हो गए। कहने लगे, हम तो गुरुजी से मिलने भागे-भागे चले आए लेकिन गुरुजी तो मिलेंगे ही नहीं। तभी गुरुजी अपने कमरे से निकलकर आ गए और बोलें, “कोई बात नहीं, मिल लो। बच्चों का हठ तो माँ-बाप को रखना ही पड़ता है, पर अब तुम सो जाओ बातें सुबह आराम से करेंगे।”

ऐसी पारिवारिक भावनाएँ बोई थी गुरुदेव ने। इन्हीं की व्यापकता-विशालता आज कोटिजनों को अपने में समेटे युगनिर्माण मिशन में दिखाई पड़ रही है। छोटी शुरुआत धीरे-धीरे बड़ी हुई। अखण्ड ज्योति परिवार और अधिक बड़ा होकर गायत्री परिवार बना। गुरुदेव मथुरा से शाँतिकुँज हरिद्वार आए। इसे अन्य शब्दों में कहें तो गुरुदेव का गृहस्थ जीवन और व्यापक हुआ। या यों कहा जाए कि उनके गृहस्थरूपी तपोवन ने अपना और अधिक विस्तार किया। दायरा बढ़ा पर दायित्व वही निभाया जाना था, अपनी संतानों को शिक्षा व संस्कार देने का। अपने बच्चों को गढ़-सँवारकर, उन्हें निखारकर सुसंस्कृत बनाना ही तो उनका मकसद था। वे अनूठे थे उनकी गृहस्थी अनोखी थी और आज भी लाखों-करोड़ों को संस्कार देने वाला ही तो सच्चे अर्थों में संस्कृति पुरुष होगा। यह संज्ञा किसी और ने नहीं उनके बच्चों ने उनको दी है। उन्होंने अपने स्नेही पिता को इसी रूप में पहचाना है।

आज गायत्री परिवार और अधिक बड़ा होकर विश्वव्यापी हो रहा है लेकिन इसके मूल में वही भावनाएँ है जो गुरुदेव ने अपने गृहस्थ जीवन में सँजोई थी। उनके गृहस्थ जीवन के अगणित प्रसंग आज उनकी संतानों के लिए भारतीय संस्कृति में निष्ठा रखने वालों के लिए भी अनमोल प्रेरणाएँ है बात अखण्ड ज्योति संस्थान, गायत्री तपोभूमि मथुरा की हो या फिर शाँतिकुँज की परम स्नेही पिता के रूप में परमपूज्य गुरुदेव एवं वात्सल्यमयी माँ के रूप में वंदनीया माताजी हर कहीं अपना आदर्श प्रस्तुत कर शिक्षा एवं संस्कार देते दिखाई पड़ते है।

अभी भी ऐसे लोग है जो शांतिकुंज के शुरुआती दिनों से आते रहे हैं। उन्हें उनके ऐसे ढेरों प्रसंग याद हैं कि कैसे गुरुदेव-माताजी रात दो बजे जगकर भी किसी आगंतुक परिजन की भोजन व्यवस्था करते थे करवाते थे। रूठ जाने वालों की मान-मनुहार करते थे और गलती करने वालों पर कड़ी फटकार भी लगाते थे यही तो अपनी संस्कृति की पहचान है पर्याय है इसी संस्कृति संवेदना से तो संस्कार पनपते है। सद्गुणों का बीजारोपण होता है वह सब बनता-विनिर्मित होता है, जिसके लिए भारत, भारतीयता एवं भारतवासी चिरकाल से प्रसिद्ध रहे है उन्हें उनकी यह प्रसिद्धि देवात्मा हिमालय ने दी है क्योंकि यही तो है देवसंस्कृति का उद्गम केंद्र ओर संस्कृति पुरुष गुरुदेव की कठोर तप-साधनाओं का साक्षी।

जब भक्त स्वयं को उत्कृष्टता के अनुरूप बना लेता है तो सुपात्र कहलाता है। महात्मा गाँधी और विवेकानन्द ने स्वयं को आदर्शवादिता के अनुरूप बनाया। स्वयं को उन्होंने श्रेष्ठता से जोड़ा तो वे ईश्वर के प्रियपात्र बने और बदले में वैभव अनुदान पाए। बुद्ध ने अमरत्व की प्राप्ति को नहीं, जन-जन में व्याप्त भ्रांतियों को मिटाना तथा आद्य शंकराचार्य ने धर्म चेतना के जन-जागरण को अपना आदर्श माना। नानक ने सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन तथा बापा जलाराम ने परमार्थपरायणता की अपनी वृत्ति के कारण परमात्म सत्ता से जुड़ने का सौभाग्य पाया। ये सभी महामानव ईश्वरीय सत्ता के दिव्य गुणों के अनुरूप स्वयं को विकसित कर सुपात्र कहलाए। इसके लिए उन्हें कोई अगल से कर्मकाँड अथवा उपचार उपक्रम नहीं अपनाना पड़ा।

भगवान की कृपा प्रसन्नता पाने के लिए सुपात्र बनना भी अनिवार्य है यह तथ्य बहुतों के गले उतरता नहीं। ऐसे व्यक्ति दिग्भ्रांत हो भटकते ही रहते हैं।


Quotation

पिछला कदम उठाकर ही अगला बढ़ाया जा सकता है। तुच्छ के छोड़ने पर ही गौरव पाया जा सकता है।


देवात्मा हिमालय था उनका अभिभावक

देवात्मा हिमालय भारत और भारत की संस्कृति का उद्गम केंद्र है। यहीं मानव-जाति ने अपने प्रथम पग रेख। वहीं संस्कृति की पहली किरण ने अपनी उज्ज्वल आभा बिखेरी, जिसके सघन होते प्रकाश से क्रमशः आर्यावर्त अजनाभ वर्ष एवं भारतवर्ष का स्वरूप साकार हुआ। पुरातन ऋषि-महर्षियों ने अगणित आध्यात्मिक प्रयोग यहीं किए देवों और ऋषियों का मिलन यहीं हिमालय के आँगन में हुआ। इन देवों और ऋषियों की पुंजीभूत चेतना का स्वरूप ही तो हिमालय है तभी तो इसे देवात्मा कहा जाता है। इसी देवात्मा हिमालय की प्रतिनिधि ऋषिसत्ता ने संस्कृति पुरुष श्रीराम के जीवन में आध्यात्मिक प्रकाश उड़ेलकर उनका हिमालय से नाता जोड़ा।

यों हिमालय से उनका यह नाता जन्म-जन्माँतर का था, युग-युगीन था, चिरपुरातन था बस इसे नवीन करने की रीति निभाई गई। उनके अंतर हृदय को तो देवात्मा हिमालय की अदृश्य तरंगें बाल्यावस्था से ही आकर्षित करती रहती थी। तभी तो वह आठ वर्ष की आयु में ही एक बार स्वतः ही हिमालय की ओर चल पड़े थे। बाद में जब घर के लोगों को पारिवारिक-स्वजनों को पता चला तब से जिस किसी तरह से उनको समझा-बुझाकर वापस लाए, पर पंद्रह वर्ष की अवस्था में तो देवात्मा हिमालय ने स्वतः ही अपने प्रतिनिधि को उनके पास भेज दिया। मार्गदर्शक गुरुदेव का आगमन उनके लिए हिमालय का आमंत्रण ही था।

इस प्रत्यक्ष आमंत्रण के बाद आवश्यक तैयारी के रूप में उनकी साधनात्मक गतिविधियाँ प्रारंभ हुई। इस साधनाक्रम के मध्य में ही एक दिन उन्हीं की भाषा में, “हमारे हृदय का बेतार का तार बज उठा।” इस एक वाक्य में इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उनकी चेतना हिमालय के स्वरों को साफ−तौर पर सुनने-समझने लगी थी। उनके मार्गदर्शन ने उन्हें बतलाया कि ऋषि सत्ताओं की निवास-स्थली हिमालय का यह दिव्य क्षेत्र सब तरह से गुह्य और अलौकिक है सामान्य मानव मो क्या, अति श्रेष्ठ एवं समर्थ साधक भी यहाँ तक नहीं पहुँच सकते। यह दिव्य स्वरूप मात्र पर्वत शिखरों की सौंदर्य गाथा तक सीमित नहीं हैं पर्वत-शिखरों की ऊंचाइयों को तो हर साल सैकड़ों देशी-विदेशी पर्यटक सैलानी छूते रहते है। समाचार पत्रों में, विभिन्न पत्रिकाओं में उनकी कथा-गाथा छपती रहती है पर यह सब हिमालय का भौतिक सौंदर्य है।

इससे परे हिमालय का दिव्य क्षेत्र है जिसे संस्कृति पुरुष गुरुदेव ने चेतना का ध्रुवक्षेत्र कहा है। यहीं से वह दिव्य आध्यात्मिक ऊर्जा निःसृत होती है। जो देवसंस्कृति का सृजन करती है। इससे घनिष्ठ संबंध सूत्र जोड़कर ही हिमालय के देवात्मा स्वरूप से परिचित हुआ जा सकता है। इसी चेतना ने परमपूज्य गुरुदेव को संस्कृति पुरुष बनाया। स्थूल शरीर से की गई तीन यात्राओं एवं सूक्ष्मशरीर से की गई चौथी यात्रा में उन्होंने यही आकर हिमालय के दिव्य स्वरूप का साक्षात्कार किया और उसे आत्मसात् किया।

प्रथम बार हिमालय जाना तो प्रथम सत्संग था। ऋषिकेश से उत्तरकाशी तक भी उन दिनों सड़क ओर मोटर की व्यवस्था नहीं थी। पगडंडियाँ ही थी। इसके बाद भी पूरा रास्ता पैदल घनघोर चढ़ाई वाला था, लेकिन हिमालय के आँगन में पाँव रखते ही जैसे पूरी थकान गायब हो गई। उत्साह के अतिरेक में उन्हें यही नहीं पता चला कि कितने समय में वह यहाँ आ पहुँचे है। बस ध्यान की गहराइयों में देखी गई दृश्यावली को अपने सामने जीवंत पाकर वह अभिभूत हो गए। नंदनवन की इस सुरम्यता में मार्गदर्शक गुरुदेव प्रकट हुए। इस बार वह स्थूल शरीर में सम्मुख थे। अधिक वार्ता क्या होती। बस उन्होंने स्नेह भरी दृष्टि से उनकी ओर देखते हुए कहा, जो जन्म-जन्माँतर से गुरु−शिष्य रहे हैं उन्हें कुशल-प्रश्न आदि औपचारिक बातों की आवश्यकता नहीं रहतीं।

अपने गुरुदेव की इस सघन कृपा को स्वयं पर अनुभव कर उनके मुख-मंडल पर विस्मय और संतुष्टि के भाव उभर आए। उनका कंठ गदगद हो गया। आँखों में आनंदाश्रु आ गए। अनिवर्चनीय आनंद से उन्होंने आंखें मूँद ली। कपोलों पर आँसू झरने लगे। सहज ही माथा झुक गया। मार्गदर्शक ने दाहिना हाथ उनके माथे पर रखा और आशीर्वाद देकर धीमी गति से निकल गए।

आदि ओर अनंतकाल की गरिमा को सँजोता दिन तालबद्ध गति से बढ़ चला और भगवान् सूर्य अस्ताचल की ओर जा पहुँचे। उनके विराग की छाया सम्पूर्ण धरातल पर विस्तीर्ण हो गई। सम्पूर्ण हिमाच्छादित गिरि-शिखर गैरिकवर्णी वीतरागी संन्यासी के वेष में परिवर्तित हो गए। धीरे-धीरे यह विराग-सात्विकता की चाँदनी में परिवर्तित होने लगा। पूर्णिमा थी। हिमपात भी अधिक नहीं हो रहा था। चंद्रमा की शीतल ज्योत्स्ना समूचे हिमालय पर फैल गई। उस दिन ऐसा लगा कि हिमालय सोने का है। दूर-दूर तक बरफ के टुकड़े तथा बिंदु बरस रहे थे वे ऐसा अनुभव कराते थे मानो सोना बरस रहा है।

तभी मार्गदर्शक गुरुदेव आ पहुँचे। उन महान् ऋषि के आ जाने से गरमी का एक घेरा संस्कृति पुरुष श्रीराम के चारों ओर बन गया। उन्होंने मौन रहकर ही उन्हें एक इंगित किया ओर वह चुपचाप उनके पीछे-पीछे चल पड़े आश्चर्य। उन्हें सचमुच महान् आर्ख्यय हुआ कि उनके पाँव जमीन से ऊपर उठते हुए चल रहे है। आकाशगमन-अंतरिक्ष में चलने की यह सिद्धि उन्हें अनायास ही गुरुकृपा से प्राप्त हो गई थी। उन्हें अनुभव हो रहा था कि उन बर्फीले ऊबड़-खाबड़ हिमखंडों पर चलना इस आश्चर्यजनक क्षमता के बिना कठिन ही नहीं शायद असंभव होता। जैसे-जैसे वह आगे पद-न्यास करते थे उनका शरीर तैरता हुआ आगे-आगे जाता था। अचानक उनका शरीर ऊपर की ओर जाने लगा और वह हिमाच्छादित पर्वतों के एक के बाद अनेक उत्तुंग शिखरों को पार करते हुए एक ऐसे गुह्य क्षेत्र में पहुँच गए, जहाँ कुछ दिव्य गुफाएँ थी।

इन गुफाओं में संस्कृति निर्माता पुरातन ऋषि ध्यानस्थ बैठे थे। वह बड़ी ही पुण्य घड़ी थी यह देवसंस्कृति के वास्तविक उद्गम से साक्षात्कार था। मार्गदर्शक ने उन्हें उनमें से एक-एक का नाम बताते हुए कहा, यही है विशिष्टता और विभूति संपदा इस क्षेत्र की और यही है हिमालय का दिव्य क्षेत्र। अपनी इसी दिव्यता एवं देवत्व के कारण हिमालय के साथ देवात्मा विशेषता जोड़ा जाता है।

मार्गदर्शक के साथ उनके आगमन की बात उन सभी को पूर्व से ही विदित थी। सो वे दोनों जहाँ भी जिस समय पहुँचे उनके नेत्र खुल गए। चेहरे पर हल्की मुस्कान झलकी। वार्तालाप भी हुआ, पर स्थूल वाणी से नहीं। यहाँ तो परावाणी सक्रिय थी। इसके माध्यम से जो कुछ कहा गया, उसके अनुसार संस्कृति के सृजेताओं ने उन पर देवसंस्कृति के नवजीवन की जिम्मेदारी सौंपी। हिमालय यात्राएँ इसके बाद भी हुई। तीन स्थूल एवं चौथी सूक्ष्म यात्रा में संस्कृति एवं चेतना के नए आयाम उद्घाटित हो गए हर बार हिमालय से बसंध और अधिक घनिष्ठ हो गए इतना घनिष्ठ कि उन्हीं के शब्दों में अब हिमालय उनका सच्चा अभिभावक बन गया” और उनने जो कहा, उसका सार अंश इतना ही था कि भारतीय संस्कृति यज्ञमय है। इस यज्ञमय जीवन शैली को अपनाए बगैर देवसंस्कृति की विभूतियाँ प्रकट नहीं होगी।

तक्षशिला पर एक दूसरे राजा ने आक्रमण कर दिया। शत्रु की विशालकाय सेना को देखकर तक्षशिला के सेनापति की हिम्मत टूट गई। तक्षशिला नरेश से सेनापति ने कहा, राजन् शत्रु की सेना विशाल है अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित है संधि कर लेना अपने लिए अधिक अच्छा है। सेनापति की बात सुनकर राजा चिंतित हो उठे उसी राज्य के संत को पूरी बात मालूम हुई। वे राजा के पास पहुँचे और बोले अविलंब सेनापति को निकाल बाहर किया जाए। मैं स्वयं सेना का नेतृत्व करूंगा। राजा थोड़ी देर असमंजस में पड़ा रहा पर संत के परामर्श समय-समय पर उसके लिए लाभकारी सिद्ध हो चुके थे। आत्मसमर्पण करने की तुलना में लड़ना कही अधिक श्रेयस्कर है यह सोचकर संत के हाथों में सेना का नेतृत्व दे दिया।

शत्रु सेना का पड़ाव थोड़ी दूर था। मार्ग ने देवता का मंदिर था। संत ने कहा, पहले देवता से पूछ लेना चाहिए कि विजय किसकी होगी। सेना के समक्ष मंदिर के प्राँगण में सिक्का उछालते हुए संत ने कहा। यदि सिक्का पट गिरता है तो विजय श्री हमें हासिल होगी। संयोग से सिक्का पट गिरा। दैवी, कृपा अनुकूल जानकर सेना के सिपाही पूरी वीरता के साथ लड़े विजय प्राप्त हुई। सैनिकों ने संत से कहा, यह सब मंदिर के देवता की कृपा का प्रतिफल है। संत मुस्कराए। उन्होंने सिक्का दिखाया। सिक्के के दोनों और आकृति एक जैसी थी बोले यह बस आत्मविश्वास का प्रतिफल है। जो पहले सोया हुआ था वह जाग पड़ा। विजय श्री उसकी चेरी बन गई।


यज्ञमय जीवन से उमंगती तप की ज्वालाएँ

“ईद न मम्” यही है यज्ञमय जीवन का सूत्र, जो संस्कृति पुरुष परमपूज्य गुरुदेव के जीवन का पर्याप्त बना। बचपन से ही उनमें देते रहने की नैसर्गिक प्रवृत्ति थी। संगी-साथियों के साथ बाल-बाल-क्रीड़ाओं में इसके विविध रूप उजागर होते रहते थे। खाने-पीने की जो चीजें उन्हें घर में मिलती थी, उनका अधिकाँश भाग वह आग्रहपूर्वक अपने बाल-मित्रों को खिला देते। सतत् देते रहने से ही दान का प्रवाह उमगता है और इसी प्रवाह में देवत्व के कमल खिलते हैं। जिनमें देवत्व की सुरभि है ऐसे मनुष्य ही संघबद्ध होकर समाज का नवनिर्माण करते हैं। यज्ञमय जीवन का यह तत्वज्ञान गुरुदेव के जीवन में शनैः-शनैः अपने नए-नए आयाम प्रकट करता गया।

उन्होंने अपनी साधना-सामर्थ्य से अपने अंतराल में देवत्व का अकूत एवं अक्षय भंडार जुटाया था, जिसे वह सतत् अपने संपर्क में आने वाले स्वजनों परिजनों में वितरित करते रहते थे। यद्यपि सामान्यक्रम में उनके पास लोग जीवन की कष्ट कठिनाइयों का समाधान पाने के लिए जुटते थे। यह समाधान तो उन्हें मिलता ही था, पर साथ में उन्हें देवत्व का अनुदान भी मिलता था। उनके मनों में कुछ अच्छा करने के लिए नई उमंग भी जगती थी। ऐसे लोगों के अगणित घटना-प्रसंग संस्कृति पुरुष गुरुदेव की जीवनगाथा में सिमटे-सँजोए हैं।

ऐसा ही एक घटना-प्रसंग रूपनारायण नाम के एक परिजन का है। उन्हीं के शब्दों में उनकी कहानी कहें तो मैं एक असाध्य बीमारी से पीड़ित था। चिकित्सकों, वैद्य-हकीमों को बहुत दिखाया। इनसे जब कुछ लाभ न मिला तो ओझा-ताँत्रिकों के चक्कर काटे, पर परिणाम वही ढाक के तीन पात। सब तरफ से मन हार-थककर निराश हो गया। तभी कहीं से पता चला कि मथुरा में एक आचार्य जी रहते है जो बड़े सिद्ध-समर्थ है मेरी पत्नी मुझे लेकर जैसे-तैसे घीयामंडी अखण्ड ज्योति संस्थान पहुँची। द्वार पर ही धोती कुरता पहने एक सज्जन खड़े थे उनके मुख पर दैवी प्रेम की आभा थी। उन्होंने बड़े प्यार से मेरा नाम लेकर पुकारा रूपनारायण। अपना नाम एक अजनबी व्यक्ति से सुनकर जितना आश्चर्य हुआ। उससे कहीं अधिक उनके प्रेम को अनुभव पर परितोष हुआ।”

आँखें भर आई। पता चला यही वह आचार्य जी हैं जिनके लिए मैंने इतनी लंबी यात्रा की। वह घर के अंदर ले गए। वहाँ माताजी मिली जिन्होंने बड़े अपनत्व के साथ भोजनादि की व्यवस्था की। ऐसा लगने लगा कि मैं और मेरी पत्नी इन दोनों की अपनी संतान हैं। क्षणों में सब कुछ बदल गए। एक नई हिम्मत जागी। बीमारी तो क्षैर उनके आशीष से भागी हो पर साथ नई जीवन दृष्टि भी मिली गायत्री साधना से जुड़ाव हुआ, देवत्व की ओर जीवन की प्रवृत्तियाँ मुड़ी। जीवन में लौकिक तो पाया ही, अलौकिक भी कुछ ऐसा मिला जिसे बता पाने में मेरे शब्द असमर्थ हैं।”

ऐसे अनुभव अनुभूतियाँ और भी है दो-चार नहीं हजारों लाखों में हैं। जो बताती है कि संस्कृति पुरुष गुछेव के दान ने ही देव-पूजन की सत्प्रवृत्ति पैदा की और बाद में यही देवपूजन निष्ठावान् लोगों के संगतिकरण के रूप में विकसित हुआ। जिन्होंने अपने जीवन में और समाज में यज्ञीय भावनाएँ साकार की। यज्ञीय संस्कृति का विस्तार किया। गुरुदेव के जीवन में यह यज्ञमयता आँतरिक भावनाओं तक ही प्रवाहित रही हो ऐसी बात नहीं है बाह्य जीवन में समाज में इसके इतने विराट स्वरूप प्रस्तुत हुए कि देशवासियों के मन में यज्ञ ही उनकी पहचान बन गई।

इसका प्रथम प्राकट्य सन् 1943 ई. में हुआ। जब उन्होंने वातावरण को दिव्य स्पंदनों से संपादित करने हेतु सहस्रांशु गायत्री यज्ञ आयोजित किया। यह देश के कोने-कोने पर सहस्र ऋत्विजों के सम्मिलित संकल्प से पूरा हुआ। इसके अंतर्गत सवा करोड़ गायत्री जप, सवा लाख आहुतियों का हवन एवं सवा लक्ष उपवास किए गए। इसी के साथ गायत्री तपोभूमि की स्थापना हुई और दो ही सालों बाद सन् 1955 की वसंत पंचमी से 15 महीनों तक चलने वाले विशद् गायत्री महायज्ञ का आयोजन किया गया। इसके अंतर्गत (1) चारों वेदों का पारायण यज्ञ (2) महामृत्युँजय यज्ञ (3) रुद्रयज्ञ (4) विष्णुयज्ञ (5) शतचंडी यज्ञ (6) नवग्रह यज्ञ (7) गणपति यज्ञ (8) सरस्वती यज्ञ (9) ज्योतिष्टोम (10) और अग्निष्टोम आदि अनेक यज्ञों की प्रक्रियाएँ शामिल थी। यह समष्टि हित के लिए संपन्न हुआ आध्यात्मिक प्रयोग था। संस्कृति पुरुष गुरुदेव के शब्दों में “इस यज्ञ का यजमान, संयोजक पूर्णफल प्राप्तकर्ता कोई एक व्यक्ति नहीं है।”

इसके बाद सन् 1948 ई. में सहस्र कुँडी यज्ञ का विराट् आयोजन संपन्न हुआ। इसमें लाखों मनुष्यों के साथ स्वर्गस्थ देवता और हिमालय की ऋषि सत्ताएँ भी पधारी संख्या और व्यापकता की दृष्टि से गायत्री परिवार ने इससे भी बड़े अनेक यज्ञायोजन संपन्न किए हैं परन्तु इसकी विशेषताएँ कुछ ऐसी थी जिन्हें बताने में शब्दशास्त्र के समस्त विशेषण एकजुट होने पर भी असमर्थ है। यह उनकी चौबीस वर्षीय तप-साधना का पूर्णाहुति समारोह था। इससे जो संगतिकरण उभरा, उसी से गायत्री परिवार का संघबद्ध स्वरूप उजागर हुआ।

इसके बाद देश के अन्य पाँच स्थानों बहराइच टाटानगर, महासमुद्र, भीलवाड़ा एवं पोरबंदर में ऐसे ही सहस्र कुँडी यज्ञ आयोजन संपन्न किए गए। पाँच कुँडी, नौ कुँडी एवं चौबीस कुँडी यज्ञ शृंखलाएं भी राष्ट्रीय स्तर पर संपन्न होती रही। प्रारंभ में गुरुदेव स्वयं इन आयोजनों को सम्पन्न कराने जाया करते थे अभी भी ऐसे परिजन हैं, जिनके मनों में उन दिनों की अभूतपूर्व स्मृतियाँ सुरक्षित है। एक परिजन बताते हैं कि किस तरह से गुरुदेव एक टीन का बक्सा और दरी-चद्दर आदि का छोटा सा बंडल लेकर यज्ञों को संपन्न कराने जाया करते थे। ऐसे अवसरों पर उनके मठाधीशों एवं महंतों की तड़क-भड़क न दिखने के कारण तो कई लोग शुरुआत में बड़े निराश भी हो जाते थे। एक-दूसरे से पूछ भी लेते ये कैसे गुरुदेव है जो अपना सामान खुद ही उठाकर चलते हैं।

लेकिन बाद में नजदीक आने पर उन्हें पता चलता कि जिस व्यक्ति के संपर्क में वे आए है उसके पास ठाठ-बाट भले ही न हो, पर तपस्या का दुर्धर्ष तेज अवश्य उनके चारों ओर छाया हुआ है। यह व्यक्ति साक्षात् अमृत-पारस-कल्पवृक्ष है। यह यज्ञ कराने आया हुआ कोई सामान्य पंडित-पुरोहित-महंत, मठाधीश, नहीं बल्कि स्वयं ही यज्ञपुरुष है उसका जीवन स्वयं में ऐसी यज्ञवेदी है जिसमें हमेशा पत की ज्वालाएँ धधकती रहती है। इनमें जो भी अपनी श्रद्धा की आहुति देता है वह वरदान पाए बिना नहीं रहता। इन पंक्तियों में लिखी गई बातें अतिशयोक्ति नहीं बल्कि सच से कुछ कम ही है।

परिवर्तीकाल में यज्ञीय आयोजन गुरुदेव के प्रतिनिधियों द्वारा संपन्न कराए जाने लगे, पर यहाँ भी उनकी सूक्ष्म उपस्थिति रहती थी। यह क्रम अभी भी बरकरार है। वह इन दिनों स्थूलशरीर से भले ही न हो, पर उनके यज्ञमय जीवन से उमंगती तप की ज्वालाएँ अभी भी अपना अहसास कराती है। उसके इस यज्ञमय जीवन से ही उनके जीवनकाल में धर्म, अर्थ काम एवं मोक्ष के रूप में पुरुषार्थ चतुष्टय के चारों फल साकार हुए। इस पुरुषार्थ चतुष्टय के साकार होने में ही तो मानव-जीवन की पूर्णता है जो उनके जीवनकाल में ही चरितार्थ हुई।

शोक-संताप की नारकीय अग्नि में जलते पूर्वजों के परिमाण के लिए गंगा का भूलोक पर अवतरण आवश्यक था। भगीरथ को यह मालूम हुआ कि किसी तरह गंगा पृथ्वी पर आ जाएँ तो पितरों को सद्गति मिल जाएगी। ओर भूलोक के प्राणियों एवं वनस्पतियों की प्यास बुझेगी महलों का भोग-विलास छोड़कर चल पड़े तप करने गंगा पृथ्वी पर जाने के लिए तैयारी हो गई भगवान् शंकर ने गंगा के तीव्र वेग को सँभाला ओर गंगा को पृथ्वी की ओर प्रवाहित कर दिया भगीरथ की अपनी निज की सामर्थ्य नगण्य थी। लोक-कल्याण के लिए उन्हें ईश्वरीय शक्ति भगवान् शिव का सहयोग मिला। गंगा के अवतरण से शाप पीड़ित भगीरथ के पूर्वजों को सद्गति मिली। वे स्वयं यशस्वी हुए और सबसे बड़ी बात यह हुई कि उनके सद् प्रयत्नों द्वारा अवतरित गंगा द्वारा कोटि-कोटि प्राणियों को अपनी प्यास बुझाने का अवसर मिला।


Quotation

कार्य कभी कारणरहित नहीं होते क्रिया कोई परिणामरहित होती। उसी तरह भाग्य कभी अपने आप नहीं बनता बल्कि व्यक्ति के कर्मों की कलम इसे लिखती है।


पुरुषार्थ चतुर्ष्टथ के थे वे साकार भाव विग्रह

देवसंस्कृति जीवन में संतुलन व समग्रता बनाए रखने की सीख देती है। यदि यह सिखावन मानी जाए तो धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के रूप में पुरुषार्थ चतुष्टय का साकार होना इसकी स्वाभाविक परिणति है। संस्कृति पुरुष गुरुदेव के जीवन की शुरुआत प्रगाढ़ धर्म भावना से हुई। सामान्यक्रम में लोग धर्म को छिटपुट कर्मकाँडों, परंपराओं, कट्टरताओं एवं कतिपय रूढ़ियों के रूप में अपनाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते है। परंतु गुरुदेव का मानना था कि नैतिकता, तत्वदर्शन एवं आध्यात्मिक साधना ये तीनों मिलकर धर्म को उसका समग्र स्वरूप प्रदान करते हैं।

होश सँभालते ही उन्होंने अनुभव किया कि नैतिकता, शिष्टाचार एवं सदाचार का मिला-जुला रूप है। पारिवारिक जनों, गुरुजनों के प्रति आदर भाव, मित्रों-कुटुँबियों के प्रति स्नेह-सौहार्द्र प्रारंभ से ही उनके जीवन में घुला-मिला था। बाद के दिनों में आगंतुक, अतिथिगण एवं अपने परिजन इसे सतत् अनुभव करते रहे। कई बार तो उनकी शिष्टता-शालीनता देखकर पास खड़े शिष्य वर्ग को स्वयं पर शर्म महसूस होने लगती थी। ऐसे कई घटना-प्रसंग है, जब उन्होंने बड़ी तत्परता से आगंतुक अतिथियों के लिए स्वयं उठकर कुरसी लाकर रखी। उनकी आध्यात्मिक विभूतियों से परिचित अतिथिगण उनके इस शिष्टाचार को देखकर नतमस्तक होते रहते थे।

सदाचार के तो वैसे वे मूर्त स्वरूप थे। बातचीत के क्रम में, गोष्ठियों में वह बताया करते थे कि शिष्टाचार बाह्य है तो सदाचार आँतरिक। मानसिक संयम एवं शमन से ही सदाचार सधता है। ये दोनों मिलकर नैतिकता की सृष्टि करते है। नैतिकता का तात्पर्य है, बाह्य जीवन में सामंजस्य एवं आँतरिक वृत्तियों का ऊर्ध्वमान। इसके परिपालन से जीवन ऊर्जा का क्षरण रुकता है। ओर आध्यात्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त होता है। उनकी इन बातों से सदा ही अनुभूति का पुट रहता था। नैतिक मर्यादाओं की नींव पर ही उन्होंने अपनी आध्यात्मिकता का भव्य भवन खड़ा किया था। मार्गदर्शक के प्रथम मिलन के बाद से जीवन के अंतिम पलों तक वह गहन आध्यात्मिक साधनाओं में लीन रहे। अध्यात्म के विविध आयाम उनके जीवन में प्रत्यक्ष और प्रकट हुए। इनमें से बहुत कुछ ऐसा था, जिसे अध्यात्म के इतिहास में पहली बार सुना एवं जाना गया। विश्व राष्ट्र की कुँडलिनी का जागरण एवं ब्रह्माँड आनंदमय कोश का जागरण ऐसे ही तथ्य है।

उनके तत्त्वदर्शन का आधार भी उनकी आध्यात्मिक अनुभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ ही रहीं। उनकी आँखिन की देखी ही उनकी कागद की लेखी बनी। यों तो वह नित्य प्रति प्रातः अपने तत्त्वदर्शन को शब्दों में गूँथते-सँवारते रहते थे, पर कुछ ऐसा भी लेखन था जो उन्होंने विशिष्ट साधनाकाल में हिमालय प्रवास में किया। उपनिषदों का भाष्य इन्हीं में से एक है। यह उन्होंने उत्तरकाशी में अपनी विशेष साधना के दौरान संपन्न किया। उन दिनों के एक प्रत्यक्षदर्शी श्री दिगंबर दत्त थपलियाल अभी कुछ दिनों पूर्व शाँतिकुँज आए। उन्होंने अपनी लगभग चालीस वर्ष पुरानी यादों में विभोर होते हुए बताया कि किस तरह परमपूज्य गुरुदेव एक गुफा में साधनारत रहकर उपनिषदों का भाष्य किया करते थे। अनवरत ध्यान और समाधि में निमग्नता, अवकाश मिलने पर उपनिषदों का भाष्य लेखन। ऐसा था तत्त्ववेत्ता का तत्त्वदर्शन लेखन।

धर्म के बाद अर्थ का प्रसंग आता है। संस्कृति पुरुष गुरुदेव कहा करते थे अर्थ का तात्पर्य विपुल संपदा से नहीं, वरन् उन साधनों से है जो जीवित रहने के लिए आवश्यक हैं। जिनके माध्यम से औसत भारतीय स्तर का निर्वाह बन पड़े उनका व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन उनके इन्हीं आदर्शों के अनुरूप था। वंदनीया माताजी के गहने-जेवर उन्होंने गायत्री तपोभूमि के निर्माण में लगा दिए। जो पैतृक संपत्ति मिली, वह लड़के-लड़कियों के लिए महाविद्यालयों के निर्माण में लग गई। निर्वाह के लिए उन्होंने बहुत थोड़ी-सी व्यवस्था जुटाई। जिसमें घर-परिवार की सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाया करती थी। आने-जाने वाले आगंतुक-अतिथियों का स्वागत-सत्कार भी इसी में होता रहता था। संत कबीर की उक्ति,”साईं इतना दीजिए जामें कुटुँब समाय, मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाए।” यही थी उनकी अर्थ-नीति।

जीवन का तीसरा पुरुषार्थ है काम। गुरुदेव कहते थे, काम का अर्थ कामुकता नहीं, वरन् विनोद क्रीड़ा है। जिसका अर्थ होता है हँसते-हँसाते जीना। मिल-बाँटकर खाना। स्नेह ओर सहयोग बढ़ाना और उसकी परिधि में सुनिश्चित समुदाय को लपेटना। उनकी यह नवीन परिभाषा उन्हीं की जीवन शैली के अनुरूप थी। जहाँ में दांपत्य संबंधों की बात है, सो वह तो देह के तल से ऊपर उठक आत्मा के तल पर प्रतिष्ठित हो चुके थे। यहाँ तो लीलामय का भाव राज्य था, पर जैसा वह कहते थे कि काम का अर्थ उल्लास है तो वह पल-पल उल्लास बिखेरते रहते थे।

उनके पास उठने-बैठने का जिन्हें भी अनुभव है, वे अच्छी तरह जानते है कि वह किस तरह हास्य बिखेरते रहते थे। इन अगणित प्रसंगों में एक प्रसंग सन् 1969 के जाड़ों का है। शाम के चार बजे होंगे, चर्चा टिहरी बाँध की चल रही थी। उस दिन के अखबारों ने टिहरी बाँध टूटने के खतरे गिनाए थे। उनमें से यह भी था कि बाँध टूटने पर हरिद्वार सहित अनेक शहर-गाँव बह जाएँगे। पास बैठे एक शिष्य ने हँसी में कहा, तब तो गुरुजी आपका शाँतिकुँज भी नहीं रहेगा। गुरुजी इस पर खूब हँसे और चुटकी लेते हुए बोले, इसी डर से तू अपनी किताबें अपने घर रखता है लेकिन गंगा तो वहाँ भी है। अगर बाढ़ का पानी वहाँ तक पहुँच गया तो, ऐसा कर तू अपनी किताबें मुझे दे दे, मैं राजस्थान में कहीं रखवा दूँगा। गुरुजी ऐसी ने जाने कितनी बातें कहते रहे, चारों ओर निर्मल हास्य बिखरता रहा। फिर पल-दो पल चुप रहकर बोले, बेटा। अगर मेरा सब कुछ बह भी गया, मेरी पुस्तकें सबकी सब बह भी गई तो ऐसी दशा में उनका एक-आध पन्ना जब कभी किसी को मिलेगा, तो वह यह सोचने के लिए जरूर मजबूर होगा कि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य नाम का जो व्यक्ति था उसमें मनुष्य समाज, राष्ट्र एवं संस्कृति के लिए कितनी तड़प थी ? तभी तो उसके विचारों में कितनी क्राँति की आग है ? उसका हर शब्द तभी तो क्रान्ति की चिनगारी है और फिर से इन क्राँति बीजों से नई क्राँति का सूत्रपात हो जाएगा। ऐसा होता था उनका निर्मल हास्य। हँसी के बीच में वह कुछ अनोखा संदेश दे जाते थे।

काम के बाद मोक्ष का प्रसंग आता है। शास्त्रकारों ने इसे परम पुरुषार्थ कहा है। उन्होंने जीवनमुक्त, विदेहमुक्त जैसी श्रेणियाँ भी निभाई है। उन्होंने इनके लक्षण भी गिनाए है। यह बात शपथपूर्वक कही जा सकती है, जिन्होंने शास्त्रों को पढ़ा ओर उन्हें देखा, उनके पास बैठे तो उन्होंने परमपूज्य गुरुदेव में उन सारे लक्षणों को पाया। सच तो यह है कि वह स्वयं मोक्षस्वरूप ही नहीं, मोक्षप्रदाता भी थे। उनके पास रहने वाले अनुभव करते थे कि वह सदा-सर्वदा देहातीत है। देह तो बस उन आलोक पुरुष की छाया मात्र है। यह सत्य है कि धर्म, काम एवं मोक्ष इन पुरुषार्थ चतुष्टय के वह साकार भाव विग्रह थे। उनकी जीवन की यही भावानुभूतियाँ उनकी लेखनी से देवसंस्कृति की ज्ञान-गरिमा के रूप में व्यक्त हुई।

इंद्र का वैभव नष्ट हो चला। वे बड़े चिंतित हुए और राजर्षि प्रह्नाद के पास जाकर उसका कारण पूछा, प्रह्नाद ने बताया, राजन् तुमने अहिल्या जैसी सती-साध्वी का शील नष्ट किया है जब तक उसका प्रायश्चित कर पुनः शील संग्रह नहीं करोगे, अपने वैभव को भी बचा नहीं सकोगे। लोभी इंद्र ने अपने को प्रह्नाद का अतिथि बताकर उन्हीं का शील माँग लिया। प्रह्नाद ने अपना शील दान कर दिया। उनके शरीर से तीन ज्योति पुरुष निकले ओर बोले, हम सत्य, धर्म और वैभव है, तात! जहाँ चरित्र (शील) नहीं रहता, वहाँ हम भी नहीं रहते।

प्रह्नाद ने कहा, मैंने इंद्र को नेक सलाह देकर सत्य का तथा अतिथि को चायित वस्तु दान कर धर्म का ही पालन किया है। अतः आपका जाना उचित नहीं। फिर मैंने शील दान ही तो किया है। जिस जीवन देवता को आराधना से मैंने शील अर्जित किया था, उसे मैं पुनः संग्रह कर लूँगा। जाते हुए सत्य, धर्म और वैभव के चरण रुक गए और प्रह्नाद को अपने खोए चारों देव वापस मिल गए।

महामानव हर स्थिति में नगद भुनाने योग्य इस बहुमूल्य जीवन-संपदा को नष्ट नहीं करते। इसी कारण वे सम्मान पाते थे। तथा प्रतिकूल परिस्थितियों में दैवी अनुदान भी।


Quotation

ईश्वर को न किसी से मनुहार चाहिए न उपहार। चरित्रवान ओर लोकसेवी बनकर ही हम उसे प्रसन्न कर सकते हैं।


उन्होंने सुनी आर्ष साहित्य की पुकार

वेद भारतीय धर्म-परंपरा और ज्ञान-संपदा के वाहक हैं। इनके महत्त्व को ध्यान में रखकर चलें, तो आसानी से समझा जा सकेगा कि पूज्य गुरुदेव ले लुप्तप्राय वैदिक संहिताओं के साथ उपनिषद्, आरण्यक, दर्शन आदि आर्षग्रंथों को जनसुलभ बनाकर शताब्दियों में संपन्न हो सकने वाला कितना बड़ा युगीन कार्य किया। वेदों के संबंध में पहली ध्यान रखते योग्य बात यह है कि अन्य धर्मों के शासन ग्रंथों की तरह न तो ये अलौकिक सत्ता के किसी एक प्रतिनिधि व्यक्तित्व की रचना है ओर न ही अनुयायियों के लिए विधि-निषेध की व्याख्या करने वाली पुस्तकें। भारतीय धर्म-परंपरा का पालन करने वालों के आचार-विचार रहन-सहन, विश्वास और रीतियों को जानने के लिए तो इन ग्रंथों की उपादेयता है लेकिन ये ग्रंथ किसी भी विषय में स्पष्ट नियम-व्यवस्था नहीं देते। वेदों का अध्ययन, उनके मंत्रों का आराधन मानव के भीतर सोई प्रज्ञा को जगाने भर का काम करते हैं। उस प्रज्ञा के आलोक में साधक हित-अहित या शुभ-अशुभ का निर्धारण स्वयं कर लेता है। आचार्य बलदेव उपाध्याय ने इनकी उपयोगिता ज्ञान के रूप में नहीं, नेत्र के रूप में बताई है। उन्होंने लिखा है, “ लौकिक वस्तुओं के साक्षात्कार के लिए जस प्रकार नेत्र की उपयोगिता है उसी प्रकार दिव्य तत्त्वों का रहस्य जानने की सामर्थ्य वेदों से आती है।”

ऋषि सत्ताओं द्वारा गहन समाधि अथवा साक्षात्कार की स्थिति में अनुभव किए गए आध्यात्मिक सत्य का नाम वेद है। प्रसिद्ध है कि वेद-में.ो की रचना छंद शास्त्र के नियमों का ध्यान रखते हुए नहीं की गई, बल्कि इन अपौरुषेय मंत्रों का उद्भव जिस रूप में हुआ, उस आधार पर ही छंद व्याकरण, अलंकार आदि विधाओं का स्वरूप उभरता चला गया। प्रसिद्ध है कि भारत में उद्भूत धर्म-परंपराओं और साधनाओं के विविध रूप वेद-शास्त्रों पर ही निर्भर है। वेद-शास्त्र अर्थात् ऋषिप्रणीत और प्रमाणित प्रज्ञा दृष्टि। बीस हजार मंत्रों में फैली हुई वैदिक संहिता उस प्रज्ञा का स्थूल प्रतीक है। जब तक वह अंतश्चेतना में उद्भूत नहीं होती, तब तक वेद-शास्त्रों से ही प्रमाण लेने होते है। अध्यात्म विद्या या दर्शन शास्त्र की दो विपरीत धाराएँ भी वेदों से ही पुष्टि ओर समर्थन लेती है। अपने पक्ष का समर्थन करते हुए दो विरोधी सिद्धाँतों के प्रतिपादन में लगे हुए आचार्यों को यदि कोई युक्ति वेद-विरुद्ध लगती है तो वे तुरंत उसे वापस लेते हैं। वेद से हटकर जाने का साहस नहीं करते। यही कारण है कि ईश्वर की सत्ता को महत्त्व नहीं देने वाला साँख्य और उसे सब कुछ मानने वाला मीमाँसा, वेदाँत वेद से ही अपने लिए आवश्यक समर्थन जुटाते हैं। । अन्य परंपराओं में नास्तिक का अर्थ भले ही ईश्वर को नहीं मानने वाले के रूप में दिया जाता हो। लेकिन भारतीय परंपरा में वेद का प्रमाण नहीं मानने वालों, अंतर्दृष्टि की उपेक्षा करने वालों को नास्तिक कहा गया है।” नास्तिकों वेद निदंकः” अर्थात् “वेद की निंदा करने वाला नास्तिक है।” ऐसी मान्यता रही है।

कोई समय था जब श्रुति के आधार पर स्थापित वैदिक वाङ्मय के अध्ययन का व्यापक प्रचलन था। चारों वेद, उनका अर्थ-गाँभीर्य समझने के लिए आवश्यक ब्राह्मण आरण्यक, उपनिषद्, सूत्र ग्रंथ व्याकरण निघंट, निरुक्त छंद, ज्योतिष, अनुक्रमणों आदि वेदाँगों का विपुल विस्तार था। उपनिषद्, दर्शन शास्त्र, स्मृति ग्रंथ महाकाव्य और पुराणादि ग्रंथ भी वैदिक ज्ञान के विस्तार-विवेचन के लिए ही थे। अध्ययन-अध्यापन के लिए गुरुकुल आश्रम, देवालय, तीर्थ, आरण्यक, उपाश्रमों जैसी विभिन्न व्यवस्थाएँ थी। ऐसी विभूतियाँ भी थी। जिनके कारण वैदिक अध्ययन प्रतिष्ठित हुआ। उद्गीथ माधवभट्ट, सायण, उब्बट महीघर, कुमारिल, शंकर आदि ने वैदिक वाङ्मय को जीवंत बनाए रखा।

मध्यकाल का अंधकार युग आया। संस्कृतिद्रोहितों के हमलों की बाढ़ से हमारी ज्ञान-संपदा नष्ट होने लगी। बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों, तीर्थों में रखी साहित्य-संपदा और उसके मर्मज्ञ सिद्धांतों पर दोतरफा ध्वंस होने लगा। विद्या परंपरा फिरा भी जीवित रही। अपने जीवन की तुलना में लोक-शिक्षकों ने शास्त्रों को प्राथमिकता दी, विरासत अपने सहयात्री को सौंप आत्मबलिदान करते चले जाने वालों का एक विलक्षण इतिहास हैं। शहीद हुए इन संस्कृति वीरों के कारण ही वैदिक परंपरा के बीच बचा लिए गए।

परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि मध्यकाल के ध्वंस और प्लावन के दिनों में कुछ मनस्वी-तेजस्वी विभूतियों ने शास्त्र विद्या को धारण कर बचाए रखा। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध एवं बीसवीं शताब्दी में मैक्समूलर, विलसन, मेल्डनर जैसे पाश्चात्य तथा महर्षि दयानंद, पंडित जयदेव, रामगोविन्द शास्त्री आदि पौर्वात्य विद्वानों ने वैदिक संहिताओं को फिर से प्रतिष्ठित करने का महती पुरुषार्थ किया।

लोकमान्य तिलक, आनंद कुमार स्वामी, श्री अरविंद, श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, माधवार्चा आदि विद्वानों ने श्री वेदों के अनुशीलन को फिर से प्रचलित करने के सरंजाम रचे। वेदों को समझने-समझाने के लिए इन विद्वानों के पास मौलिक दृष्टि थी। उनके प्रयास भी विलक्षण थे। शास्त्र-परंपरा को बचाए रखने वाली विभूतियों की जब भी चर्चा होगी तो इन विद्वानों का नाम आदर के साथ जरूर लिया जाएगा, लेकिन इन प्रयत्नों की अपनी सीमा थी। स्वामी दयानंद के वेदभाष्यों के सिवाय कोई और टीका-व्याख्या जनसुलभ नहीं हो सकी। साधारण अनुवाद भी लोगों तक नहीं पहुँच पाए। उसके जनसुलभ होने की आशा भी कैसे की जा सकती हैं।

पूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि वेद−शास्त्रों का अनुशीलन इसलिए भी बंद हुआ कि ब्राह्मणों या विद्वानों ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया था। यह व्यवस्था किसी संस्कृति द्रोही ने ही रची और महर्षि गौतम के नाम से समाज में फेंकी होगी कि शूद्रों को वेद का अध्ययन नहीं करना चाहिए। यदि वह चोरी से वेदमंत्र सुनता हुआ पकड़ा जाए तो उसके कान में पिघला हुआ सीसा भर दें। शूद्र अर्थात् श्रम और सेवा से जीविका चलाने वाला समाज का बहुसंख्यक वर्ग। स्वामी दयानंद ने सबसे पहले इस मान्यता का खंडन किया। उन्होंने वेदों की बोधगम्य व्याख्या की। साधारणजन उनसे धर्म, राजनीति, अर्थ, मोक्ष और सफलता के रहस्य समझ सकें, यह ध्यान में रखकर उनका प्रचार किया। बाद में पचास के दशक में परमपूज्य गुरुदेव ने गायत्री तपोभूमि की स्थापना के साथ आर्ष साहित्य के जनोपयोगी भाष्य की योजना हाथ में ली। चारों वेदों का अनुवाद मात्र करने के लिए लोगों का पूरा जीवन खप जाता है ? गुरुदेव ने वेदों के साथ 107 उपनिषद्, छह दर्शन और स्मृति ग्रंथों का अनुवाद, भाष्य और संपादन कुछ ही वर्षों में संपन्न कर दिया। सन् 1931 की गायत्री जयंती को चारों वेदों की टीका सात भागों में और 107 उपनिषद्, तीन खंडों में प्रकाशित हुए। इन ग्रंथों का महत्व दर्शाते हुए पूज्य गुरुदेव ने भूमिका में लिखा,”वेद-उपनिषदों को जीवन का सर्वांगपूर्ण दर्शन कहना चाहिए,”वेद-उपनिषदों को जीवन का सर्वांगपूर्ण दर्शन कहना चाहिए। उनमें जीवन को शाँति ओर आनंद के साथ जीने और प्रगति पथ पर निरंतर बढ़ते रहने की विधा का भलीभाँति विवेचन हुआ है। लौकिक और पारलौकिक, बाह्य और आँतरिक, व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के दोनों ही पक्ष जिस आधार पर समुन्नत हो, वह महत्त्वपूर्ण ज्ञान उनमें भरा हुआ है।”

पूज्य गुरुदेव के संपादित आर्ष साहित्य का महत्त्व कुछ ही पंक्तियों में समझना हो तो डॉ. राधाकृष्णन की टिप्पणी को उद्धृत करना चाहिए। सन् 1961 में वे भारत के राष्ट्रपति थे। आर्ष साहित्य का सैट जब उन्हें भेंट किया गया, तो व्यस्त जीवन में समय निकालकर उन्होंने कुछ दिनों में उसका अवगाहन कर लिया। इसके बाद उन्होंने अपनी सम्मति लिखी, “ यदि यह ज्ञान नवनीत मुझे कुछ वर्ष पूर्व मिल गया होता, तो मैं संभवतः राजनीति में नहीं जाता। मैं इन आत्मसात् कर लेने योग्य ग्रंथों के मनन-चिंतन में ही लीन रहता।” सर्वविदित है कि डॉ. राधाकृष्णन भारतीय दर्शन और विद्या धाराओं के अधिकारी विद्वान थे। ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालय में उन्होंने भारतीय दर्शन पढ़ाया। उनकी अँगरेजी व्याख्याएँ यूरोपीय जगत् में भारतीय दर्शन की प्रामाणिक और प्रतिनिधि रचनाएँ समझी जाती है।

पूज्य गुरुदेव ने आर्ष साहित्य के सुलभ संस्करण कुछ ही वर्षों में प्रस्तुत कर दिए। इसकी भूमिका वे स्वतंत्रता आँदोलन में भागीदारी के दिनों से ही बना चुके थे। अपनी मार्गदर्शक सत्ता से द्वितीय साक्षात्कार के समय ही उनके कंधों पर आर्ष साहित्य के उद्धार का गुरुतर भार आ गया था। आगरा में अखण्ड ज्योति का प्रकाशन आरंभ करते वक्त 1939-97 में गुरुदेव ने इस विषय की सामग्री जुटानी शुरू कर दी थी।

प्रमुख कठिनाई संहिता पाठों को जुटाने की थी। समग्र रूप में चारों वेदों के संहिता पाठ एक स्थान पर कहीं भी उपलब्ध नहीं थे। स्वामी दयानंद ने वेदों के उद्धार के लिए प्रचंड पुरुषार्थ किया, लेकिन उनकी व्याख्या और संहिता भी किसी एक जगह सुलभ नहीं थी। जो संस्करण मिलते थे, उनमें पाठ-भेद थे और विभिन्न वर्ग एक को सही दूसरे को अशुद्ध बताते थे। सार्वदेशिक आर्यसभा, काशी विद्वत्परिषद् और वैदिक शोध संस्थान, होशियारपुर से संहिताओं के पाठ प्रकाशित हुए, लेकिन वे भी समग्र नहीं थे। संपूर्ण संहिता पाठ जुटाने के लिए पूज्य गुरुदेव ने काशी, नदिया, पूजा, अड्यार, नासिक आदि क्षेत्रों की यात्रा की। ये स्थान वैदिक विद्या के केन्द्र कहे जाते हैं। अध्याय, सूक्त, मंत्र ऋचा आदि जिस रूप में जहाँ से मिले, लिए ओर अपनी दिव्य क्षमता से उनके शुद्ध रूप को जाँचा परखने पर रखने के बाद उन्हें व्यवस्थित-क्रमबद्ध किया। उपनिषदों के संकलन-संपादन में भी इसी तरह की कठिनाई आई। दस-ग्यारह उपनिषद् ही प्रसिद्ध हैं। आदि शंकराचार्य ने इतनों का ही भाष्य किया है। पूज्य गुरुदेव के सामने एक सौ आठ उपनिषद् जुटाने का दायित्व था जो पाठ मिलते थे उनमें कुछ तो वेद विरुद्ध और भारतीय अध्यात्म परंपरा का शीर्षासन करा देने वाले प्रतिपादनों से भरे थे। उन्हें पहचानने और अलग रखने की सावधानी भी बरतनी थी गुरुदेव ने तमाम सावधानियाँ बरतते हुए उनके प्रामाणिक संस्करण तैयार किए।

वेद-उपनिषदों के अलावा छहों दर्शन, अठारह, पुराण, बीस स्मृतियाँ चौबीस गीताएँ आरण्यक, ब्राह्मण, रिरुक्त, व्याकरण आदि ग्रंथ भी आते हैं। प्रत्येक खंड के संकलन संपादन की गाथा बहुत विस्तार लेगी। इतना ही समझना चाहिए एक पुराण के संकलन, पंदान प्रकाशन और प्रसार में कई पीढ़ियाँ खप जाती हैं, फिर भी वैसे परिणाम उत्पन्न नहीं होते, जो पूज्य गुरुदेव के आर्ष तप के एक अंश से संभव हुआ है। पूज्य गुरुदेव ने जिस अंतर्दृष्टि से पुराणों को संपादित ओर प्रस्तुत किया, उसे देखकर सभी विद्वान दाँतों तले अँगुली दबाने लगे। विभिन्न संस्थाओं के उपदेशक अब बड़े गर्व से अपने प्रवचनों में पौराणिक घटनाओं का दृष्टाँत के रूप में उद्धृत करते थे। आर्ष साहित्य को सर्वसुलभ कराने के लिए किसी समय आलोचना करने वाले विद्वान् अब यह भी कहते है कि आचार्यजी (गुरुदेव) ने इस युग में वेदव्यास की भूमिका नहीं निबाही होती, तो हम अपने शास्त्रों के लिए भी तरस जाते।


गुह्य विद्या और भारतीय विज्ञान का उद्धार

योग, तंत्र, ज्योतिष, कुँडलिनी, षट्चक्र, सिद्धियाँ ओर निधियाँ साधना को तीव्र गति देने वाली विधाएँ रही है। अनन्य साधना को तीव्र गति देने वाली विधाएँ रही हैं अनन्य भाव से भगवद् जप, प्रभु समर्पित जीवन और संकीर्तन तपादि भी ईश्वर को प्राप्त करने के साधन हैं। जिन्हें ज्यादा झंझट करने की आदत नहीं है, जो सिर्फ आत्मिक शाँति या ईश्वर अनुभूति में ही रुचि रखते हैं उनके लिए ‘भक्ति’ सुलभ मार्ग है। वे उसी का अवलंबन लेते हैं, लेकिन जिन्हें साधना करते हुए ईश्वर का वैभव भी देखना है उसके ऐश्वर्य को भी धारण करना है ओर प्रमाणित करना है कि वे इस सृष्टि से सृजनहार से संबंध स्थापित किए हुए हैं। उनके लिए गुह्य विद्याओं का आश्रम लेना जरूरी है।

योग, तंत्र, कुँडलिनी आदि को परमात्मा से जोड़ने उसमें विलय कर देने वाली साधना भी हैं। परमात्मा में जिन्हें रुचि न हो वे इनका उपयोग प्रकृति के ज्ञात-अज्ञात रहस्यों को खोजने और उनसे लाभ उठाने के रूप में भी करते हैं। तंत्र-मंत्र की साधना करने वालों में आरंभ में ईश्वरीय आभा भले न दिखाई देती हो, लेकिन कतिपय अलौकिक शक्तियाँ उनमें अवश्य आ जाती है। दिव्य शक्तियों से संपन्न होने का दावा कर लोगों को ठगने वाले धूर्तों की बात नहीं की जा रही। जो सचमुच निष्ठा ओर तन्मयता से तंत्र-मंत्र की उपासना करते है उनकी आत्मिक शक्ति प्रबल होने लगती है। बड़े प्रयोजन सिद्ध होने लायक सामर्थ्य आरंभ में नहीं दिखाई देती, लेकिन वाणी में तेज, कही हुई बातें सच होने और आशीर्वाद-अभिशाप जैसी भावनाएँ चरितार्थ होने लगती है। दक्षिणमार्गी साधनाओं में ये विलक्षणताएँ नहीं दिखाई देती। वाममार्गी अथवा तंत्र ओर योग की उच्च कक्षाओं में पहुँचने पर वैसे प्रभाव दिखाई देते हैं।

परमपूज्य गुरुदेव ने आत्मविश्वास, साक्षात्कार, भगवत्प्राप्ति और जीवन में परमात्मा का वैभव प्रकट करने वाली सुलभ साधनाओं का उन्मेष तो किया ही, त्वरित विकास करने वाली विद्याओं का भी विवेचन किया। वह विवेचन फलश्रुति बताने वाला नहीं युक्ति तर्क और विज्ञान के आधार पर इन विद्याओं के रहस्य उद्घाटित करने वाला था। गायत्री की साधनाएँ सौम्य सत्व प्रधान होती है। वे दक्षिणमार्गी श्रेणी में आती है। गुरुदेव ने इस पक्ष के साथ तंत्र, योग, और दिव्य पक्ष को भी उद्घाटित किया। उनके सान्निध्य और मार्गदर्शन में साधना कर तंत्र की उच्चस्तरीय सिद्धियाँ प्राप्त करने वालों की संख्या हजारों में होगी। उन सिद्ध-साधकों की निजी अनुभूतियाँ साधना के विज्ञान पक्ष को प्रमाणित करने के लिए उद्धृत नहीं की जा सकती। गुरुदेव के अनुदान-प्रेरणाओं और परिणामों की चर्चा ही यहाँ अभीष्ट है।

तंत्र अपने आप में गुह्य विज्ञान है। वह सिद्धाँतों और भावनाओं से ज्यादा क्रिया-प्रक्रिया को महत्त्व देता है। सामान्य साधनाओं की सफलता भावना निर्भर है। श्रद्धा-विश्वास के अनुपात से ही उनके परिणाम सामने आते हैं। तंत्र प्रक्रिया है विज्ञान है आपकी श्रद्धा हो या न हो परिणाम होगे ही आग को छुएँगे तो जलन होगी ही, श्रद्धाभाव हो या न हो बिजली, मशीन, हथियार आदि के प्रति किसी भी तरह की भावनाएँ रखी जाएँ सावधानी से प्रयोग करें, तो उपयुक्त परिणाम आएँगे। और असावधानी-लापरवाही बरतेंगे तो हानि उठानी ही पड़ेगी।

ज्योतिष, योग और गुह्य विद्याओं की अन्य धाराओं में क्रिया, विधि और व्यवस्था महत्त्वपूर्ण है। गुरुदेव ने अखण्ड ज्योति के पन्नों पर आरंभ से ही इन तथ्यों का उद्घाटन किया। बाद में तो पत्रिका और गुरुदेव का इतर साहित्य साधना के गूढ रहस्यों के उद्घाटन पर ही केंद्रित हो गया। गुरुदेव ने मथुरा से प्रयाण करने से पूर्व अपने भावी कार्यक्रमों के बारे में लिखा था। परिजनों से संवाद के रूप में अखण्ड ज्योति के स्तंभ “अपनों से अपनी बात” में उन्होंने लिखा, “गायत्री उपासना का सर्वसाधारण के लिए जितना प्रयोग सरल और उपयुक्त था, उसे हम गत कई वर्षों से सिखाते-समझाते चले आ रहे हैं। इस विद्या की उच्चस्तरीय साधना के दो पक्ष है। (1) योग (2) तंत्र। योगमार्ग में उच्चस्तरीय साधना पंचकोशों के अनावरण की है जिसकी थोड़ी-सा शिक्षण अखण्ड ज्योति के माध्यम से कर चुके हैं अभी इस विद्या को साँगोपाँग बताया जाना शेष है। उसी प्रकार तंत्रमार्ग की गायत्री कुँडलिनी कहलाती है। उसकी छिटपुट चर्चा इन दिनों हम कर रहे हैं। अगले दिनों नैष्ठिक साधकों को योगमार्ग की पंचकोशों के अनावरण की साधना और तंत्रमार्ग की कुँडलिनी जागरण की शिक्षा अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर ही मिलेगी। अनुभव के आधार पर प्रस्तुत किया गया यह शिक्षण सर्वथा होगा और उससे अनेक निष्ठावान् भारी लाभ उठा सकेंगे।

मथुरा में विदाई सम्मेलन से पूर्व दिया गया यह आश्वासन अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर ही पूरा नहीं हुआ, शाँतिकुँज में चले साधना सत्रों में भी चरितार्थ हुआ। प्राण प्रत्यावर्तन शक्पात, जीवन साधना कुंडलिनी योग और योगमार्ग का व्यावहारिक अभ्यास सिखाने वाले सत्र परिजनों को आज भी याद हैं। उनमें गुरुदेव स्वयं निर्देश देते थे और अंतर्यात्रा में एक-एक पल के साक्षी बनकर साधकों को गहराई तक ले जाते थे। जिन साधकों ने इन शिविरों में कुछ गति की, वे जानते थे कि जन्माँतरों के पुरुषार्थ से जो विकास संभव नहीं हो सकता था, वह नौ-दस दिन या महीने भर के सूत्रों में सहज ही संभव हो गया। यात्रा मार्ग की बारीकियों को समझते हुए संपन्न हो गई।

साधनाओं के विज्ञान पक्ष की चर्चा में यह कहना जरूरी होगा कि सन् 1969 से ही गुरुदेव ने धर्म और अध्यात्म का प्रतिपादन विज्ञान के आधार पर करना शुरू किया। जाने बिनु होई न परतीती जाने बिना विषय का ज्ञान नहीं हुआ ओर जानकारी के अभाव में उस मार्ग पर चलने का उत्साह नहीं उमड़ता। इच्छा भी नहीं होती। आज का युग तर्क, तथ्य और विज्ञान का युग है। लोग वहीं बात स्वीकार करते है जो युक्तियों और त्यों के आधार पर गले उतरती हो। सन् 1963 में गुरुदेव ने शिक्षण संस्कार की जो पद्धति अपनाई, उसमें यही विशेषताएँ समाहित थी। अपनी शैली को उन्होंने नाम भी दिया। “वैज्ञानिक अध्यात्मवाद’। बाद में देश के कई मनीषियों ने इस प्रत्यय को अपनाया और उस शैली को ग्रहण करने की कोशिश की।

परिजनों के आत्मिक विकास में विज्ञान पक्ष को कितना महत्त्व दिया जाता था ? इसके प्रमाण कुछ उदाहरणों से मिलते थे गुरुदेव कहा करते थे कि व्यक्ति का वर्तमान स्वरूप कुछ महीनों वर्षों या इसी जन्म में उभरकर नहीं आया। वह संस्कारों और प्रभावों का समुच्चय है। उन्हें धोने-परिमार्जित करने में भी इतनी ही अवधि चाहिए। साधना सत्रों में एक सामान्य विधान का पालन कराने के अलावा गुरुदेव ने संचित संस्कारों के निष्कासन-मार्जन की भी विधि-व्यवस्था की। साधकों से वे निजी तौर पर मिलते और सान्निध्य, बोध, अनुभूति मार्जन आदि की प्रक्रिया जब तक गति नहीं पकड़ लेती, उनसे वार्तालाप करते। यों उनकी दृष्टि ही इतनी समर्थ थी कि साधकों का अंतस् जानने के लिए इन उपायों की आवश्यकता नहीं थी लेकिन जिसका मार्जन-प्रक्षालन किया जा रहा है उसे भी बोध रहना चाहिए।

बाद में ज्योतिष के आधार पर साधकों के संस्कारों के विश्लेषण का भी क्रम चला था। इस विद्या का उपयोग भविष्य-कथन, ग्रह-नक्षत्रों का भय दिखाने ओर लोगों का रहा-सहा आत्मबल क्षीण करने में ही होता रहा है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए ‘दुरुपयोग’ भी कह सकते है। गुरुदेव के अनुसार ज्योतिष विज्ञान का महत्त्व आत्मिक प्रगति में सहायता प्राप्त करने की दृष्टि से ही है। अन्य उपयोगी का महत्त्व उन सबके बाद है। किस ग्रह-स्थिति में जन्मा व्यक्ति अपने साथ क्या संस्कार लेकर आया है और उसे क्या उपचार दिया जना चाहिए? शाँतिकुँज में आरंभ ज्योतिर्विज्ञान की गतिविधियों का यही उद्देश्य था। इसके लिए वेधशाला का निर्माण ज्योतिष शास्त्र के विद्वानों का आमंत्रण, उनसे विचार-विमर्श और व्यक्ति को समझने की विधि का निर्धारण कुछ ही सम में संपन्न हो गया। गुरुदेव ने उन्हीं दिनों ‘ब्रह्मवर्चस पंचास का प्रकाशन भी आरंभ कराया था। एक मानक स्थिर हो जाने के बाद वह उस समय स्थगित कर दिया। भारत भर में दर्जनों पंचाँग अब उसी आधार पर प्रकाशित हो रहे हैं अब पुनः विगत तीन वर्षों से पंचाँग प्रकाशित किया जा रहा है।

आर्य प्रणीत ज्ञान-विज्ञान का मर्म यह है कि उनकी सभी विद्याएँ एक-दूसरे की पूरक हों। साधना, उपासना और ज्योतिष की तरह आयुर्वेद भी भारतीय विज्ञान का एक पक्ष है। आधुनिक चिकित्सा पद्धतियां शरीर में होने वाले रोगों को बाहरी विकारों का आक्रमण मानती है। उन्हें विषाणु या जीवाणु की संज्ञा देते है। शरीर में जब इनकी घुसपैठ होती है तो बीमारियाँ जन्म लेती है। उन विकारों को दबा दिया जाए, तो व्यक्ति स्वस्थ हो सकता है। स्वास्थ्य विज्ञान की भारतीय परंपरा मानती है। कि रोगों की जड़ आहार-विहार में असंतुलन और मन, बुद्धि चित्त अहंकार में आए विक्षेपों में हैं। एक मान्यता यह भी है कि पूर्वजन्म में किए गए पाप व्याधि के रूप में प्रकट होते है आयुर्वेद के एक अन्य प्रतिपादन में “प्रज्ञापराध” को सभी रोगों को मूल बताया गया है।

समर्थ और सुलझी आधारभित्तियों पर खड़ा आयुर्वेद इन दिनों टॉनिक और सौंदर्य प्रसाधनों तक ही सिमटकर रह गया। गुरुदेव ने सूक्ष्मीकरण में प्रवेश से पहले आयुर्वेद की लुप्त परंपरा के उन्नयन की योजना बनाई ओर उसे क्रियान्वित किया। औषधि उद्यान लगाने से लेकर अनुभवी वैद्य-चिकित्सकों को बुलाने, जुटाने और समर्थ तंत्र खड़ा करने को उनका अवदान आज आयुर्वेद के पुनरुद्धार के रूप में देखा जा सकता है। शांतिकुंज को उन्होंने प्रयोगशाला की तरह विकसित किया था। वहाँ विभिन्न विधाओं के मानक-मॉडल तैयार किए गए। अब विश्वविद्यालय खड़ा हो रहा है। विधियों का आविष्कार किया, विचार-विमर्श और शिविरों के रूप में उन विषयों के विद्वानों को आमंत्रित किया, वही क्रम आगे गति पकड़ेगा। इन सभी उपायों से गुरुदेव ने प्रतिभाशालियों का मार्गदर्शन किया। आज हजारों लोग ज्ञान-विज्ञान की इस भारतीय परंपरा का निर्वाह करने में जुटे हुए है।


संस्कारों के माध्यम से संस्कृति की प्रतिष्ठा

महर्षि अरविंद कहा करते थे कि मनुष्य इतर प्राणियों और भावी संभावनाओं जिसे वे अतिमानस कहते थे, के बीच की कड़ी है। ऋषि -मुनियों ने प्रवचनों-उपदेशों और शास्त्रों में तरह- तरह से निरूपित किया है कि सिर्फ मनुष्य को ही अपना भविष्य चुनने की स्वतंत्रता है। भविष्य अर्थात् वह चाहे तो मानवी स्तर से ऊपर उठकर देवता बन सकता है ईश्वरीय चेतना से संबद्ध हो सकता है और उसकी सामर्थ्य को अपने भीतर प्रकट कर सकता है। मनुष्येत्तर प्राणी अपने प्रारब्ध और प्रकृति से बँधे हुए हैं। वे एक ही तरह से जीते, विचरण और व्यवहार करते और अपने आपको व्यक्ति किए बिना ही मर जाते हैं। उन्हें इस बँधी-बँधाई व्यवस्था के कारण ही भोग-योनि में जीते बताया जाता है। मनुष्य का जन्म कर्म-योनि में मानते हैं, इसलिए कि इस कलेवर में रहते हुए वह कर्म कर सकता है। अपना अच्छा-बुरा भविष्य चुन सकता है।

स्वाभाविक ही ऋषि सत्ताओं की रुचि मनुष्य के उत्थान में रही। उन्होंने कर्म करने की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए भी प्रेरणा दी कि मनुष्य महामानव, देवमानव और ईश्वरीय अंशों के रूप में स्वयं को विकसित करे। निजी प्रयत्नों से इस क्षेत्र में जो हो सकता था, उसका विधि-विधान ऋषिगणों ने किया। साथ ही ऐसी व्यवस्थाएँ भी रची कि उसे स्वाभाविक ही उत्थान की प्रेरणा मिलती रहे। स्वयं को देवमानव और ईश्वर का अंश सिद्ध करने योग्य बाल मिले। पर्व, त्यौहार संस्कार, कर्मकाँड, यज्ञ-याग, पूजा-पाठ, प्रार्थना आदि उपायों का उद्देश्य यही था। इन्हें सामूहिक और साँस्थानिक व्यवस्था के रूप में रचा गया।

संस्कार व्यवस्था मनुष्य को उत्थान के लिए प्रेरित करने वाले विधानों में एक थी। जन्म से पहले और मृत्यु के बाद तक संपन्न होने वाले इन कर्मकाँडों का प्रभाव व्यक्ति पर गहन रूप से पड़ता था। वैदिककाल से चली आ रही संस्कार व्यवस्था ने किसी समय पूरे समाज को आच्छादित कर रखा था। एक परिवार में विभिन्न सदस्यों के अलग-अलग संस्कार होते रहने से आए दिन किसी-न-किसी धर्म-आयोजन का उपक्रम चलता ही था। किसी का नामकरण हो रहा है तो किसी यज्ञोपवीत, उपनयन, किसी का विवाह, तो किसी का पुँसवन, नामकरण। सोलह संस्कार थे और परिवार में पाँच सदस्य भी हों, तो एक ही पीढ़ी में अस्सी आयोजनों का क्रम बैठता था। एक पीढ़ी की अवधि चालीस वर्ष भी मानें तो वर्ष में दो आयोजनों का औसत बैठ ही जाता है। आयोजनों में विविधता इतनी अधिक है कि प्रत्येक कार्यक्रम से जीवन के विविध पक्षों पर प्रकाश पड़ता है। परिवार के लोगों को ही नहीं, आयोजन में सम्मिलित होने वाले पास-पड़ोसियों और नाते-रिश्तेदारों को भी उन प्रेरणाओं से लाभान्वित होने का अवसर मिलता था।

संस्कार क्या है ? शबर मुनि के भाष्य को उद्भूत करते हुए पूज्य गुरुदेव ने लिखा है, “संस्कार वह प्रक्रिया है जिसे संपन्न करने के बाद कोई व्यक्ति या पदार्थ उपर्युक्त स्थिति में आ जाता है वह अपना अस्तित्व सार्थक करने लगता है। संस्कार एक आध्यात्मिक उपचार है। आयुर्वेदिक रसायन बनाने की प्रक्रिया में औषधियोँ पर कितने ही प्रभाव डाले जाते हैं, उन्हें संस्कार कहते हैं अनेक बार विभिन्न प्रकार के रसायनों को खरल में डालकर, तो कभी तपाकर, गला और जलाकर एक स्थिति तक पहुँचाया जाता है। उन प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद रांगा, जस्ता, ढाँबा, लौह, अभ्रक जैसी साधारण और कम महत्व की धातुएँ चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करने वाली बन जाती है। उनमें संजीवनी सामर्थ्य आ जाती है। और वे मुरदों में भी जान फूँक देती है। मनुष्य को भी समय-समय पर इस तरह के आध्यात्मिक उपचारों से सुसंस्कृत बनाने की पद्धति भारतीय तत्त्ववेत्ताओं ने विकसित की। हजारों वर्षों तक देशवासियों ने उसका लाभ उठाया है।”

किसी युग में घर-घर संपन्न होने वाले ये संस्कार अंधकार युग में लुप्तप्राय हो गए। इस सदी के पूर्वार्द्ध तक लोगों को मुश्किल से दो-तीन संस्कारों का ही ज्ञान था। एक विवाह, दूसरा अंत्येष्टि और उसके बाद मरणोत्तर संस्कार। ब्राह्मण जाति के परिवारों में यज्ञोपवीत का भी कहीं-कहीं प्रचलन रहा। बाकी संस्कार लुप्त ही हो गए थे। लोगों को उनके नाम भी याद नहीं रहे। अब भी लाखों लोगों को नहीं मालूम कि संस्कारों की संख्या सोलह है। कौन-सा संस्कार किस अवसर पर संपन्न किया जाना चाहिए-इस बारे में तो संस्कृत-साहित्य ओर संस्कृति-दर्शन के गंभीर विद्यार्थी भी शायद ही बता पाएँ। गर्भाधान, पुँसवन, सीमाँतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, कर्णवेध, उपनयन, विद्यारंभ, वेदारंभ, के शाँत, समावर्तन, विवाह, अंत्येष्टि, ओर मरणोत्तर संस्कार के सोलह नामों की स्मृति ही लुप्त हो चली। उनके प्रचलन की बात के बहुत दूर है। साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए पूज्य गुरुदेव ने युग निर्माण योजना का सूत्रपात किया, तो उसमें संस्कारों को पुनर्जीवित, पुनः प्रतिष्ठित करने के कार्यक्रम भी सम्मिलित किए गए।

गुरुदेव की दृष्टि में संस्कार आयोजन मात्र व्यक्ति का ही नहीं, पूरे कुटुंब को आत्मिक दृष्टि से विकसित करने वाली व्यवस्था रही है। उस व्यवस्था से गुजरने के बाद लोग एक स्थायी प्रभाव ग्रहण करते हैं। उदाहरण देकर गुरुदेव ने समझाया कि सामान्य ढंग से उथले मूड में दी गई शिक्षा या कही हुई बात की कोई कीमत नहीं है। मजाक में किसी की झूठी कसम भी खाई जा सकती है। लेकिन गंगा में खड़े झूठी कसम भी खाई जा सकती है, लेकिन गंगा में खड़े होकर गीता पर हाथ रखकर खाई गई कसम का महत्व ही कुछ और है। व्यभिचारी लोग अपनी प्रेमिका या प्रिय से लंबे-चौड़े वायदे करते हैं। उनका कोई महत्व नहीं है, पर विवाह, संस्कार के समय अग्नि की परिक्रमा करते हुए संपन्न की गई सप्तपदी ओर संकल्प वर-वधु को जीवन भर के लिए एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान बना देते हैं वे एक-दूसरे की खामियों को सहते हुए भी साथ-साथ जीवन बिता लेते हैं। संस्कार प्रक्रिया अपनी विधि-व्यवस्था और वातावरण के कारण आयोजन को प्राणवान् बना देती है। व्यक्ति उस प्रभाव को जीवन में उतार लेता है।

1960 तक विवाह आदि संस्कारों का ही चलन था। गुरुदेव ने शतसूत्री युग निर्माण योजना का उद्घोष किया, तो यज्ञोपवीत संस्कार को सबसे पहले नई प्रतिष्ठा दी। आद्यशक्ति गायत्री भारतीय धर्म के सभी अनुयायियों की इष्ट-आराध्य है। यज्ञोपवीत उसी शक्ति की ऐसी प्रतिमा है, जो शरीर को आच्छादित करते हुए धारण की जाती है। गुरुदेव ने इसे पारिवारिक आयोजन के दायरे से बाहर निकाल ओर सामूहिक स्तर पर व्यवस्थित किया। गायत्री यज्ञों में लोगों को सामूहिक दीक्षा देना शुरू किया। शास्त्र तो पाँच-सात वर्ष उम्र में ही यह संस्कार करा लेने का निर्देश देते है। इस उम्र में एकाध प्रतिशत बच्चों के संस्कार भी नहीं होते। इसका अथ यह नहीं है कि समय चूक गए तो आगे कभी संस्कार कराया ही न जाए। गुरुदेव ने इस मान्यता को व्यर्थ बताया और जब जागे तभी सवेरा का सिद्धान्त अपनाने के लिए कहा। गायत्री यज्ञों में उन्होंने हर उम्र और स्थिति के लोगों को यज्ञोपवीत धारण कर सकने की व्यवस्था दी। शुरू में इस व्यवस्था का विरोध हुआ। सामान्य और घोर विरोध से लेकर बाधाएँ खड़ी करने के प्रयास भी हुए, लेकिन इससे संस्कृति के नवोन्मेष की प्रक्रिया रुकी नहीं, आगे ही बढ़ती गई। आज गायत्री यज्ञों ओर सामूहिक दीक्षा समारोहों में यज्ञोपवीत धारण करने, यज्ञीय जीवन जीने का व्रत लेने वालों की संख्या प्रायः आठ करोड़ से ऊपर पहुँच गई है। विश्व इतिहास में किसी भी मनीषी और युग प्रवर्तक ने इतनी बड़ी संख्या में लोगों को अपनी मूल परंपरा से नहीं जोड़ा होगा।

यज्ञोपवीत आधारभूत संस्कार है। बाकी पंद्रह संस्कारों में सभी का प्रचलन एक साथ करना व्यावहारिक नहीं था। गुरुदेव ने उनमें से आठ का चुनाव किया और कहा कि जिन्हें सुविधा हो वे सोलहों संस्कार संपन्न कराएँ नौ संस्कारों का चुनाव उनकी उपयोगिता और संभावना की स्थिति को ध्यान में रखकर किया गया है। चुने गए संस्कारों के नाम इस प्रकार हैं पुँसवन, नामकरण, मुँडन, (चूड़ाकर्म), विद्यारंभ यज्ञोपवीत, विवाह, वानप्रस्थ, अंत्येष्टि और मरणोत्तर संस्कार। नौ में से छह संस्कार जीते जी संपन्न कराए जाते हैं। पुँसवन जन्म से पहले और अंत्येष्टि तथा मरणोत्तर शरीर छूटने के बाद। नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन, विद्यारंभ, यज्ञोपवीत, विवाह और वानप्रस्थ (सोलह मान्य संस्कारों में वानप्रस्थ और संन्यास की गणना नहीं की जाती) की नई पद्धति निर्धारित हुई, वानप्रस्थ के साथ परिव्राजक संस्कार भी स्थापित किया गया जिसे पूज्यवर ने नवसंन्यास की संज्ञा दी। गुरुदेव ने उनके विधान में स्मृति ग्रंथों और प्रचलित पद्धतियों की विशेषताएँ तो अपनाई, लेकिन जटिलताएँ छोड़ दी। उनके स्थान पर आज के उपर्युक्त नई विशेषताओं को समावेश और कर दिया। निजी स्तर पर आयोजन की व्यवस्था जुटाना जिन लोगों को झंझट लगता था, उनके लिए सामूहिक यज्ञों में संपन्न कराने का रास्ता दिखाया। यह व्यवस्था बहुत लोकप्रिय हुई है और छहों संस्कार यज्ञ-महायज्ञ में उत्साहपूर्वक कराए जाने लगे। कहीं भी होने वाले छोटे-बड़े यज्ञों में दस-बीस से लेकर दस-बारह हजार विभिन्न संस्कार आराम से हो रहे हैं।

गुरुदेव ने जन्मदिवस और विवाहदिवस के दो नए संस्कारों की व्यवस्था दी। ऋषि और युग प्रवर्तकों को नई व्यवस्थाएँ देने का अधिकार स्वभाव सिद्ध है। नए संस्कारों का उद्देश्य व्यक्ति को अपने जन्म और जीवन का उद्देश्य स्मरण करने के साथ गृहस्थ धर्म की मूल भावना, मर्यादा ओर दायित्वों को भी याद कर लेता है। कहीं कोई भूल हो रही हो तो उसे दूर करना, निजी जीवन में उत्कृष्टता के समावेश के लिए नई योजनाएँ बनाना है। जन्मदिन ओर विवाहदिन मनोरंजन के रूप में तो कई जगह मनाए जाते हैं। संस्कार के रूप में मनाने का महत्व उत्सव के साथ उस अवसर की गरिमा और गंभीरता का निर्वाह करना भी है। इन अवसरों को संस्कार के रूप में मनाने वालों की संख्या बीस लाख से ज्यादा है। नोट किए जाने लायक है। कि नए संस्कारों का प्रवर्तन और परंपरा का पुनरुद्धार इस युग का भगीरथ कार्य हैं। संस्कारों के माध्यम से संस्कृति की गंगा को पृथ्वी पर बहा देने का पुरुषार्थ भगीरथ कार्य में बड़ा ही हो सकता है, जो युग-भगीरथ ने किया।


वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः

“धर्म-संस्कृति की रक्षा के लिए अकाल पुरुष या महाकाल बलिदान माँगता है। खौलता हुआ ताजा रक्त चाहिए किसी में साहस हो, तो आगे आए। अपना सिर कटवाए और अकाल पुरुष को तृप्त करे।” गुरुगोविंद सिंह का था यह आह्वान। चुनौती सुनकर सभा में सन्नाटा छा गया था। एक युवक साहस कर उठा ओर उसके पास आया। गुरु उसे परदे के पीछे ले गए। कुछ क्षण बाद लौटे, तो उनके हाथों में रक्त-रंजित तलवार थी। वही आह्वान फिर गूँजा, “है कोई ओर जो अपना सिर कटा सके।” फिर एक ओर युवक उठा। उसने अपने आपको बलिदान के लिए प्रस्तुत किया। वही प्रक्रिया दोहराई गई। इस तरह पाँच आत्मबलिदानी प्रस्तुत हुए। समारोह संपन्न होने की घोषणा से पूर्व गुरु ने उन पाँचों को पुकारा और एक-एक सभी परदे के पीछे से बाहर आ गए। गुरु ने किसी का सिर कलम नहीं किया था सिर्फ एक परख सामने रखी थी। जो अपने आपका बलिदान करने के लिए प्रस्तुत हो, वही व्यक्ति संस्कृति की रक्षा में समर्थ हो सकता है। अहंकार, कामना, तृष्णा, वासना, मोह-माया और भोग-लिप्सा आदि भावों से मुक्त हुए बिना कोई व्यक्ति राष्ट्र और संस्कृति का काम कर नहीं सकता।

पाँच प्यारों के बलिदान की यह गाथा सुनाते हुए परमपूज्य गुरुदेव युग निर्माण के सृजन सैनिकों को अहंता और ममता के बंधनों से मुक्त होने के लिए ही प्रेरित करते थे। अहंता, ममता का विसर्जन ही वह शिरच्छेद है। जिसके लिए गुरुगोविंद सिंह ने आह्वान किया था। यह विसर्जन अपने आपको मिटा देने की भावना से कम में संपन्न नहीं होता।

सन् 1957 में सहस्र कुँडी गायत्री महायज्ञ में गुरुदेव ने भी अपने आपको विसर्जित कर देने वाले मनस्वी जनों का आह्वान किया। उसके बाद से अब तक उन्होंने हर बार पुकारा। उनकी पुकार पर आँशिक या पूर्ण समर्पण का उत्साह लिए आए कार्यकर्त्ताओं की संख्या अब तक लाखों की संख्या पार कर गई होगी। संस्कृति के उन्नयन और नए युग की संभावनाओं को प्रकट करने के लिए उनके प्रयत्नों की समीक्षा जब भी की जाएगी, तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि इन लोगों ने युग के प्रवाह को उलट दिया।

सन् 1957 के सहस्र कुँडी गायत्री महायज्ञ में गुरुदेव का संकल्प उभरा था। वैदिक मंत्र को उद्धृत करते हुए उन्होंने सृजन सैनिकों की ओर से युग को आश्वस्त किया था। वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः ‘अर्थात् हम पुरोहित राष्ट्र को जीवंत ओर जाग्रत बनाए रखेंगे। पैंतालीस वर्ष पहले दिया यह आश्वासन अभी तक पूरा होता आया है। ‘पुरोहित शब्द का आशय समझाते हुए गुरुदेव कहा करते थे, “पूजा-पाठ, यज्ञ-याग ओर कर्मकाँड आदि करा देने वालों का नाम पुरोहित नहीं है। यह कौशल कोई भी दिखा सकता है। अब ऐसी सुविधा भी है कि कर्मकाँडों ओर पूजा-विधियों के मंत्र विधान, और निर्देशों के कैसेट तैयार किए जा सकते हैं। उन्हें बजाकर अभीष्ट क्रियाकृत्य किए जा सकते है। पौरोहित्य वस्तुतः अलग ही श्रेणी का साहस है। जिसमें वह जागता हैं वह मनस्वी शूरवीर के बंधन ढीले होने लगते हैं जिस अनुपात में ये बंधन ढीले होते है उसी अनुपात में वह राष्ट्र को, समाज को जाग्रत रखने में तत्पर होने लगता है।

साधु, ब्राह्मण, वानप्रस्थ, समयदानी, जीवनदानी, सृजन सैनिक जैसे पद-प्रत्यनों का उपयोग करते हुए गुरुदेव ने संस्कारवान् आत्माओं में पुरोहित भाव का ही आह्वान किया। यह पद नाम समय और समाज की जड़ता के कारण रुढ हो गया और पूजा-पाठ कराने वालों को ही पुरोहित कहा जाने लगा। वस्तुतः ऐसा है नहीं वैदिक काल में अब तक ऐसे अनेक प्रमाण है जिनमें राष्ट्र की आत्मा मूर्च्छित होने लगी, तो पुरोहितों ने ही उसे चेतन रखा। प्राचीनकाल में अश्वमेध, नरमेध, राजसूय, वाजपेय, वावस, राष्ट्र ऐद्रायण आदि विराट् यज्ञों में उस समय की विपत्तियों के निवारण-उपाय ही होते थे। इन उपायों में शास्त्र और मनीषा से विभूषित प्रतिभाएँ समाज का नेतृत्व सँभालती थी। उनके पास किसी तरह की लौकिक सत्ता नहीं होती थी। राज्य या समाज ने उन्हें दंड अथवा पुरस्कार देने का अधिकार नहीं दिया होता था। केवल अपने तप, उत्सर्ग, ज्ञान और निष्ठा के कारण वे लोक-श्रद्धा का अर्जन करते थे ओर उसी आधार पर समाज को उपर्युक्त दिशा देते थे।

लोक-श्रद्धा ही वह शक्ति है जो दूसरों से अपनी बात मनवा लेती है। दंड, पुरस्कार की क्षमता रखने वाली राजसत्ता कितने का सुधार कर पाती है ? वह अपराध और अनीति आदि पर अंकुश तो लगा लेती है। लेकिन अंतस् को नहीं बदल पाती। मौका मिलते ही लोग उन्हीं कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं जिन्हें रोका गया है। परिवर्तन या आँतरिक स्तर पर सुधार की प्रेरणा श्रद्धास्पद व्यक्तित्वों से ही मिलती है आवश्यक बल भी वहीं से आता है। गुरुदेव कहते थे कि पारिवारिक और उत्सर्ग भावना से संपन्न व्यक्तियों को महाकाल माध्यम के रूप में चुनता है। जिनके द्वारा वह कायाकल्प कर देने वाली संजीवनी का वितरण करती है। पुरोहित अथवा सृजन सैनिक इस तथ्य को समझते हैं समझ के आधार पर वे इतने परिपक्व हो जाते हैं कि परिवर्तन प्रक्रिया को श्रेय लेने की भावना को ही वे अनधिकार चेष्टा के रूप में देखने लगते हैं श्रेयभाजन बनने की चेष्टा तो बहुत दूर की बात है।

गुरुदेव ने पहला पुरोहित किसे सुचा ? इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है। वैदिक अर्थों में पुरोहित-परंपरा के नए प्रवर्तन का तथ्यात्मक विवरण भी नहीं है। शोधकर्त्ताओं ने उनसे कभी पूछा, तो यही कहा कि गायत्री परिवार का जन्म ही इस परंपरा से हुआ है। पहला पुरोहित निश्चित करना ही अभीष्ट हो तो सविता देवता को मान सकते हैं स्थूल रूप में यह देवसत्ता पूरे विश्व को अपनी किरणों से जगाता, ऊष्मा देकर ऊर्जावान बनाता और पूरे दिन सक्रिय रखता है। उसके सभी उपासक पहले पुरोहित है।

पहले दूसरे के आधार पर वरीयता के निर्धारण का कोई औचित्य नहीं है। सविता देवता के तेज को जिसने जिस रूप में धारण किया और अपनी विभूतियों को समाज में बाँटा वह उतना ही पुरोहित है। प्रवाह के रूप पुरोहित परंपरा की समझना हो, तो वह महाकाल को पुकार पर उठ खड़े हुए सृजन सैनिकों के रूप में देख सकते हैं शक्ति से नहीं श्रद्धा से समाज को बदलने तत्पर हुए परिजनों के रूप में पुरोहित का नया जन्म हुआ मान सकते हैं आरंभ में गुरुदेव ने अपने समय और उपार्जन का एक अंश युग देवता के चरणों में चढ़ाने के तौर पर ही आह्वान किया था। उस श्रेणी के परिजनों की संख्या ही सबसे ज्यादा हैं। पहले से चले आ रहे प्रचलनों में देखना हो, तो गुरुद्वारों में घंटा-आधा घंटा या थोड़े ज्यादा समय के लिए सेवा के लिए जाने वाले श्रद्धालुओं को देखा जा सकता है। सिखों के गुरुद्वारों में भोजन बनाने, सफाई करने, व्यवस्था सँभालने, पहरेदारी करने जैसे कितने ही काम होते हैं। इनके लिए गृहस्थ लोग अपने व्यस्त जीवन से ही थोड़ा समय निकालकर प्रतिदिन सप्ताह में एक बार या सुविधा अनुसार किसी और क्रम में नियमित रूप से आते हैं अंशदानी कार्यकर्त्ताओं में इस भावना के साथ क्रियाकलापों की विविधता का भी विस्तार होता है युगदेवता की दृष्टि में उस अंशदान का महत्व कम नहीं है।

कार्यकर्त्ताओं में उत्साह, बढ़ने लगा, तो गुरुदेव ने समयदानी, जीवनदानी, और वानप्रस्थों की नई श्रेणियोँ निर्धारित की। वानप्रस्थ स्तर के समयदानी ओर जीवनदानी कार्यकर्त्ताओं की संख्या सहस्र कुँडी महायज्ञ के बाद दिनों-दिन बढ़ी। अगले बीस वर्षों में यह हजारों तक पहुँच गई। इस बीच गुरुदेव ने घर-परिवार के उत्तरदायित्वों से मुक्त या निवृत्त हुए लोगों को पूरा समय समाज की आराधना में लगाने के लिए कहा। उनसे जो पचास के हो चले शीर्षक से उनका आह्वान गायत्री परिवार में ही नहीं दूसरे क्षेत्रों-संगठनों में भी ध्यान से सुना गया। वह पुस्तिका कई सामाजिक संगठनों में कार्यकर्त्ताओं के लिए आज भी दिशा-निर्देश की तरह है।

पुरोहित-परंपरा के अभियान को पूर्णकालिक प्रतिष्ठा 1974 में छेड़े गए वानप्रस्थ आँदोलन से मिलने लगी। प्राण प्रत्यावर्तन अनुदान सत्रों के बाद शुरू हुए वानप्रस्थ विचारों में राष्ट्र को जीवंत और जाग्रत् रखने के लिए कटिबद्ध हो रहे परिजनों की जैसे बाढ़ आ गई। अगले दिनों एक से तीन महीने के वानप्रस्थ शिविरों में लोक-शिक्षण और कर्मकाँड का समन्वित अभ्यासक्रम चला। उस में ढलकर निकले परिव्राजकों ने अनवरत यात्राएँ की। शक्तिपीठों प्रज्ञा संस्थानों में इन्हीं परिव्राजकों, वानप्रस्थों या पुरोहितों ने लोक-शिक्षण का दायित्व सँभाला। अब उस परंपरा का व्यापक विस्तार हो चला है। पारिवारिक दायित्वों को पूरा कर चुके, लौकिक जीवन से निवृत्त हुए व्यक्ति ही नहीं, समाज में सक्रिय ओर व्यस्त जीवन जी रहे युवावर्ग भी पुरोहितों की पंक्ति में अपना नाम लिखा रहा है।

सेवा और शिक्षण की गतिविधियाँ सरकारें भी चलाती है। समाज कल्याण, साक्षरता, म़निषेध ओर दहेज उन्मूलन के लिए कई प्रकोष्ठ बने हुए है। गैर सरकारी स्तर पर स्वयंसेवी संगठन (एनजीओ) भी काम करते है। उनका उतना प्रभाव क्यों नहीं होता ? उत्तर एक ही है कि वे शुद्ध व्यवस्था बुद्धि से चलते हैं प्रबंधन और अनुदान, अर्थ-तंत्र पर निर्भर रहने वाले इन संगठनों या एजेन्सियों के कार्यकर्त्ताओं में लगन ओर निष्ठा की कमी नहीं होती। वे पूरे मन से काम करते हैं फिर भी उनका अपेक्षित प्रभाव नहीं होता। सिर्फ इसलिए कि उसके पास परंपरा की शक्ति नहीं होती।

परंपरा की शक्ति अर्थात् हजारों वर्ष की स्मृति ने लोक-मानस में धर्म क्षेत्र को उत्कृष्ट, सौम्य और आत्मीय भावों से सराबोर कर रखा है। वह अपने ही बीच का संस्थान है, लेकिन ऊँचाई पर बैठा हुआ, अत्यंत सौम्य और उदार है। जिसके सामने प्रणत होना ही पड़ता है और विशिष्ट होते हुए भी अत्यंत अपना-सा प्रतीत होता है। उसके सामने बैठकर अपनी पीड़ा को हल्का किया जा सकता है, रोया-धोया जा सकता है। और कठिनाइयों का समाधान भी पूछा जा सकता है। पुरोहित या श्रद्धा का केंद्र बना धर्म-क्षेत्र का प्रतिनिधि वह चरित्र है जो अगाध समुद्र में अकेली तैर रही नौका के यात्रियों में से ही एक है, लेकिन वह दिशाधारा तय करने में समर्थ है। बल्कि वही तय करता है। इसलिए राष्ट्र और समाज की सामर्थ्य का प्रतीक बना हुआ है। गुरुदेव ने पुरोहित के इस यथार्थ को प्रत्यक्ष, किया उसे आज के युग के अनुरूप आकार दिया। साथ ही अर्थ और गौरव भी।


तीर्थ चेतना के उन्नायक

परमपूज्य गुरुदेव जितनी अवधि तक धराधाम पर रहे उनके प्रयत्न मानवी चेतना को ऊपर उठाने के लिए चलते रहे। आत्मिक क्षेत्र में प्रगति दो तरह से होती है। एक तो व्यक्ति की अपनी निजी साधना-तपस्या से। दूसरे बाहरी परिवेश से। पहले से वह अपने को माँजता तराशता रहा है तो दूसरे से उसे इस कार्य में सहायता मिलती है। निजी प्रयत्नों से व्यक्ति जितना ऊपर उठ सकता है बाहरी वातावरण यदि अनुकूल हो, तो चेतना निजी प्रयत्नों की तुलना में हजार गुना ऊँची उठ सकती है। परमपूज्य गुरुदेव ने निजी प्रयत्नों का साधना-उपासना का व्यावहारिक स्वरूप बताने के साथ साधकों के लिए बाहरी वातावरण बनाने पर भी ध्यान दिया तीर्थों के विकास शक्तिपीठ प्रज्ञापीठ, चरणपीठ आदि स्थापनाओं को इन्हीं प्रयत्नों के रूप में देखा जा सकता है।

यह एक सुविदित तथ्य है कि मिशन के प्रारंभिक उद्भव के समय परमपूज्य गुरुदेव ने महानगरों, राजधानियों और बड़े शहरों की तुलना में उन स्थानों को ज्यादा महत्व दिया जो साँस्कृतिक दृष्टि से पूँजी संपन्न थे। जिनके साथ गर्व करने लायक परंपराएँ थी। इन विशिष्टताओं और परंपराओं में भी उनने मानवी चेतना को ऊँचा उठाने वाली स्थितियों को ज्यादा महत्त्वपूर्ण माना। उदाहरणार्थ उनने साँस्कृतिक जागरण का काम आगरा शहर से आरंभ किया। पहली अखण्ड ज्योति की प्रति 1937-36 में यही से प्रकाशित हुई थी किन्तु फिर कुछ समय बाद ही वे मथुरा (1941-42) आ गए। इतिहास की दृष्टि से आगरा की थाती ज्यादा बड़ी हो सकती है। ताजमहल, लाल किला आदि ने उसे एक पहचान दी है। लेकिन संस्कृति और अध्यात्म-चेतना की दृष्टि से मथुरा ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। वहाँ की पुराणसिद्ध विलक्षणता इतिहास की तथ्यपरक विशेषताओं की तुलना में मनुष्य के लिए ज्यादा सहायक है।

परमपूज्य गुरुदेव ने साठ वर्ष की आयु तक (1941 से 1971) अपनी गतिविधियों का केंद्र मथुरा को बनाए रखा। इसके बाद वे हिमालय और गंगाक्षेत्र में आ गए। हिमालय की छाया एवं गंगा की गोद को ही उन्होंने आगामी बीस वर्षों के लिए अपनी तपःस्थली बनाया। कुछेक अपवादों को छोड़कर बाद में 1990 तक उन्होंने यहीं हरिद्वार में निवास किया। इस तथ्य की ओर कम ही लोगों का ध्यान गया होगा कि आस-पास रहते हुए भी वे दिल्ली दो-चार बार ही गए होंगे। मुम्बई, कलकत्ता, मद्रास महानगरों की यात्रा भी उन्होंने कम ही की। इनकी तुलना में वे छोटे शहरों और तीर्थ-स्थानों में ज्यादा ही गए। छोटे शहरों में गायत्री महायज्ञ युग निर्माण सम्मेलन और शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों की स्थापना के लिए जाने का उद्देश्य वहाँ अध्यात्म-चेतना का विकास ही था। वे कहा करते थे कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है। महानगर भौतिक वैभव और आधुनिक जीवन की भगदड़ के केंद्र है। उनकी निंदा नहीं की जानी चाहिए लेकिन ग्रामीण संस्कृति और तर्भ-चेतना को सँभाल लिया जाए तो महानगर भी सँभाल लिए जाएं ऐसा पूज्यवर का कथन था वे कहते थे कि गाँवों-कस्बों से बहता रहने वाला वैभव निर्झर परिष्कृत होकर युगनिर्माण के उपयुक्त बनता जाएगा।

तीर्थ अर्थात् चेतना के वे घाट, जहाँ बैठकर लोग लोभ-मोह-अहंता के तम, ओर रज के वेग को पार कर सकें। तीर्थ शब्द की व्यत्पतिकारक अर्थ करने वाली परिभाषा में उन्हें घाट की संज्ञा स्पष्ट दी गई है। कहा गया है। कि जहाँ बैठकर विश्राम कर संकल्प और तैयारी के साथ लोग नौका द्वारा भवसागर पार कर जाते हैं वह स्थान तीर्थ है। परमपूज्य गुरुदेव के अनुसार जहाँ पहँते ही मन में उत्कृष्ट भावनाएँ जगने लगें, सत्प्रेरणाएं उभरने लगें और दोष-दुर्गुणों को उखाड़ फेंकने का आसुरी प्रवृत्तियों को ध्वस्त करने का साहस जागने लगे, वह तीर्थ है किन्तु यह सब अनायास नहीं होता। जिस स्थान को साधना और तपश्चर्या के द्वारा ऊर्जावान बनाया गया हो जहाँ प्राचीनकाल में ऋषि-मुनियों ने तप किया हो अथवा संत-महात्माओं ने दीर्घकाल तक वास किया हो, साधना-उपासना की प्रवृत्तियाँ लंबे समय तक चलती रही हो, वहीं तर्भ-चेतना जाग्रत हो सकती है।

अनेक अवसरों पर पूज्यवर ने लिखा है कि मनुष्य की वर्तमान दुर्दशा उसकी आस्था में आई गिरावट के कारण है वे सभ्यता के समाने खड़ी चुनौतियों को आस्था-संकट कहते थे उनका मत था कि इस संकट के कारण मानव-जाति सामूहिक आत्मघात की तैयारी किए बैठी है। वे कहते थे कि बढ़ते हुए मनोरोगों से लेकर हिंसा, भ्रष्टाचार महामारियाँ और अशक्तिजन्य रोगों के बाहुल्य का कारण व्यक्ति का अपनी देवसंस्कृति के प्रति आस्था खो बैठना है। यदि आस्था संकट का उपचार करना है तो व्यक्ति और समाज के मन को उसकी चेतना को संस्कारित करना होगा। यह प्रक्रिया कुछ भावनाओं या प्रवृत्तियों की स्थापना से नहीं, बल्कि पूरी तरह गढ़ने से ही संभव होगी। यह परिष्कार, उपदेश और प्रचार से नहीं, जीवंत-जाग्रत और उच्चकोटि की आत्माओं के संसर्ग से ही संभव होगा। उनके निवास से भूमि में पड़ने वाले संस्कारों के प्रभाव से ही होगा।

परमपूज्य गुरुदेव ने गायत्री तपोभूमि और हरिद्वार के शाँतिकुँज को मुख्य केंद्रों के रूप में चुना। इन स्थानों पर उनका निवास और तीस से पचास वर्ष तक चलाई गई साधनात्मक प्रवृत्तियाँ भी इन क्षेत्रों को जीवंत ऊर्जा केंद्र बनाने के लिए पर्याप्त थी। फिर भी उन्होंने स्थानों का चुनाव करते समय पूर्व पृष्ठभूमि को ध्यान में रखा। मथुरा में जिस जगह गायत्री तपोभूमि स्थित है वहाँ के बारे में पूज्यवर यह जानते थे कि अति प्राचीनकाल में महर्षि दुर्वासा ने यहाँ तप किया था। आज भी दुर्वासा को मेला वहाँ से थोड़ी दूर यमुना नदी के किनारे लगता है। शाँतिकुँज के संबंध में पूज्यवर का मत है कि गायत्री मंत्र के द्रष्टा महर्षि विश्वामित्र ने यहीं तप किया था। सप्तऋषियों की तपस्थली होने के कारण इस समूचे क्षेत्र का नाम सप्तसरोवर अब भी प्रसिद्ध है।

गायत्री तपोभूमि मथुरा की स्थापना के समय परमपूज्य गुरुदेव ने गायत्री तपोभूमि और हरिद्वार के शाँतिकुँज को मुख्य केंद्रों के रूप में चुना। इन स्थानों पर उनका निवास और तीस से पचास वर्ष तक चलाई गई। साधनात्मक प्रवृत्तियाँ भी इन क्षेत्रों को जीवंत ऊर्जा केंद्र बनाने के लिए पर्याप्त था। फिर भी उन्होंने स्थानों का चुनाव करते समय पूर्व पृष्ठभूमि को ध्यान में रखा। मथुरा में जिस जगह गायत्री तपोभूमि स्थित है वहाँ के बारे में पूज्यवर यह जानते थे कि अति प्राचीनकाल में महर्षि दुर्वासा ने यहाँ तप किया था। आज भी दुर्वासा का मेला वहाँ से थोड़ी दूर यमुना नदी के किनारे लगता है। शाँतिकुँज के संबंध में पूज्यवर का मत है कि गायत्री मंत्र के द्रष्टा महर्षि विश्वामित्र ने यहीं तप किया था। सप्तऋषियों की तपस्थली होने के कारण इस समूचे क्षेत्र का नाम सप्तसरोवर अब भी प्रसिद्ध है।

गायत्री तपोभूमि मथुरा की स्थापना के समय परमपूज्य गुरुदेव ने वहाँ न केवल घोर तप किया। अगणित साधकों को भी तप-अनुष्ठान में प्रवृत्त किया। कई साधकों को उच्चस्तरीय अनुभूतियाँ व उपलब्धियों भी हस्तगत हुई पंचकोशी जागरण साधना वहीं से संचालित हुई थी। कठोर तप के साथ गुरुदेव द्वारा यज्ञशाला में अखण्ड अग्नि की स्थापना एवं चौबीस सौ तीर्थ का जल-रज संग्रह भी किया गया। साथ ही ऐसे धर्म-तंत्र का निर्धारण भी किया गया, जिसे अगले दिनों लोक-शिक्षण की महती भूमिका निभानी थी।

शाँतिकुँज में भी प्राण सत्रों (1972-73) से आरंभ कर विभिन्न स्तर के साधकों-परिव्राजकों के शिक्षण संस्कार का उपक्रम चलता रहा। प्रत्येक नौ दिवसीय साधना सत्र में विधि साधनाएँ तथा गायत्री मंत्र का लघु अनुष्ठान जुड़ा रहता था वर्ष भर में ऐसा छत्तीस प्रत्येक माह में तीन सत्र आयोजित होते रहे हैं। 1972 से 1990-94 तक पूज्यवर एवं शक्तिस्वरूपा माताजी का सान्निध्य यहाँ आने वालों के लिए स्वयं एक तीर्थ का अनुभव था। शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित एवं विख्यात हो चला था एवं 1970 तक उसने यह मान्यता प्राप्त कर ली थी सन् 1979 की वसंत पंचमी पर परमपूज्य गुरुदेव ने घोषणा की कि भारतभर में चौबीस गायत्री तीर्थों की स्थापना की जाएगी। ये स्थापनाएँ परंपरा से चले आ रहे शक्तिपीठों से अलग और विशिष्ट स्तर की निर्धारित हुई थी बहुतों के मन में यह प्रश्न उठा कि देश में पहले ही सैकड़ों तीर्थ, हजारों-लाखों मंदिर विद्यमान है फिर इन नए संस्थानों के निर्माण का क्या औचित्य ?

पूज्यवर ने तर्कशील साधकों के इन प्रश्नों को सराहा। उन्हें संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अगले दिनों सारा वातावरण ही गायत्रीमय होना है। गायत्री उपासना इस देश को चिरकाल से शक्ति-सामर्थ्य प्रदान करती रही है। इस युग के लिए तो वह संजीवनी बूटी की तरह है। मंदिरों की स्थापना के माध्यम से वातावरण को संस्कारित कर लिया गया, तो उससे राष्ट्र और विश्व को संयम, स्वस्थ और समर्थ देवभावनाओं से ओत-प्रोत रखने वाली प्रक्रिया अपने आप चल पड़ेगी। ये मंदिर पारंपरिक नहीं, जन-जाग्रति के केंद्र बनेंगे, ज्ञानक्राँति के संवाहक होंगे।

उपर्युक्त संदेश से समझा जा सकता है कि तीर्थ-चेतना को भारभूत में ही नहीं, विश्वभर में फैलाने का उद्देश्य था पूज्यवर का। उन्होंने शक्तिपीठों, प्रज्ञासंस्थानों को अवतार चेतना का लीला केंद्र निरूपित किया व लिखा कि यह समय युगावतार-प्रज्ञावतार के प्रकटीकरण का है। ऐसे में युगशिथ्म-आद्यशक्ति की उपासना के केंद्र इस धरित्री के कोने-कोने में होने चाहिए। इन स्थापनाओं से आद्यशक्ति के प्रति श्रद्धा-निष्ठा का प्रवाह जाग्रत् होगा और नए युग का अवतरण संभव हो सकेगा।

आरंभ में चौबीस से लिया गया संकल्प बाद में बढ़कर दो सौ चालीस और फिर चौबीस सौ प्रज्ञा मंदिरों, प्रज्ञा संस्थानों, शक्तिपीठों के निर्माण के रूप में परिणत हो गया जब यह संख्या साढ़े पाँच हजार तक पहुँच गई है स्थूल दृष्टि से ये संस्थान छोटे-बड़े मंदिर है जहाँ आद्यशक्ति गायत्री की पूजा-आराधना के साथ-साथ ज्ञानयज्ञ की प्रक्रिया भी चलती है। इन स्थापनाओं में अग्निहोत्र, संस्कार, पर्व एवं विचारों-भावनाओं को परिमार्जित करने वाले कार्यक्रम नियमित चलते हैं। मूल भावना यही रही है कि इनके माध्यम से उस क्षेत्र को संस्कारों से अनुप्राणित कर दिया जाए। इतना भर होने से इन केंद्रों के माध्यम से आध्यात्मिक और साँस्कृतिक क्राँति संभव होती देखी जा सकती है।

स्थापनाओं निर्माणों मात्र से ही तीर्थ की आवश्यकता पूरी नहीं हो जाती। तीर्थ जमीन, नदी, पहाड़ आदि से मिलकर बने भू-भाग नहीं है। तीर्थस्थान वहाँ रहने वाले साधकों, उनकी तपश्चर्याओं, लोक-मंगल के लिए नियोजित उनके क्रियाकलापों, लोक-शिक्षण में निरत, विभूतियों परिव्राजकों, वानप्रस्थों के कारण स्थिर रहते हैं ऐसे एक विशाल गायत्री तीर्थ का गायत्री तपोभूमि रूपी चैतन्य तीर्थ का युगतीर्थ आंवलखेड़ा तथा साढ़े पाँच हजार से अधिक प्रज्ञा संस्थानों के रूप में जीवंत प्राणवान् केंद्रों की स्थापना का महापुरुषार्थ संस्कृति पुरुष परमपूज्य गुरुदेव द्वारा संपन्न हुआ धर्म-तंत्र से लोग-शिक्षण हेतु इससे कम में बात बनने वाली थी भी नहीं।


लोक शिक्षण करने वाले परिष्कृत धर्म-तंत्र के स्थापक

धर्म-तंत्र साँस्कृतिक संवेदना के संचार का उत्कृष्ट माध्यम है। इसके द्वारा लोक-शिक्षण का महत् कार्य व्यापक रूप से संपन्न किया जा सकता है। संस्कृति पुरुष परमपूज्य गुरुदेव की ये उक्तियाँ उनके रोजमर्रा के जीवन में अपनी सुस्पष्ट अनुभूति कराती रहती थी। धर्म-तंत्र का कोई भी पहलू अथवा कोई भी प्रसंग हो, उन्होंने इसे लोक-शिक्षण का समर्थ माध्यम बनाया और इसके द्वारा साँस्कृतिक संवेदना का अपरिमित भाव विस्तार किया। बात चाहे धार्मिक प्रवचन की हो या कर्मकांड की अथवा धार्मिक व्यक्ति के रूप में रहन-सहन की। उनके हर किस आयाम से ऐसा कुछ अनोखापन अभिव्यक्त होता था, जिसे ग्रहण कर सीखकर कोई भी अपना जीवन धन्य बना सके।

गुरुदेव के लेखन से तो अब भारत के जन-जन ही नहीं, विदेशों के बहुसंख्यक जन भी सुपरिचित हो चुके हैं अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना, युगशक्ति गायत्री आदि मासिक पत्रिकाएँ उन्हीं की लेखनी की अभिव्यक्ति हैं संपूर्ण वाङ्मय के शताधिक खंडों में शाँतिकुँज गायत्री, तपोभूमि से प्रकाशित तीन हजार से भी अधिक पुस्तकों में उन्हीं की लेखनी का वैभव विस्तार है और यह उनके धर्म-तंत्र से लोक-शिक्षण को ही प्रकाशित-परिभाषित करता है किंतु इसके अतिरिक्त उनके प्रवचन है जो उन्होंने गायत्री तपोभूमि में शाँतिकुँज में तथा क्षेत्रों के विविध कार्यक्रमों में दिए। ये प्रवचन इधर कुछ वर्षों से अखण्ड ज्योति मासिक में “अमृतवाणी” के रूप में प्रकाशित भी हो रहे है इसके अतिरिक्त इनके आडियो कैसेट्स भी उपलब्ध हैं। इन सबको आज भी क्रमशः पढ़ा और सुना जा सकता है।

परंतु धन्य है वे लोग, जिन्होंने उन्हें प्रत्यक्ष सुना। बड़भागी है वे लोग, जिन्होंने धर्म-तंत्र से लोक-शिक्षण के उनके कौशल से सीधे लाभ उठाया। ऐसे बड़भागी और कृतकृत्य होने वाले अभी भी अनेकों परिजन है। इनकी संख्या एक-दो नहीं, सैकड़ों हजारों में है। इनमें से हर एक के पास अपनी अनुभूतियाँ हैं जो उन्हें गुरुदेव का प्रवचन सुनते हुए। बहुसंख्यक अनुभवीजन यह बात भाव-विभोर होकर सुनाते हैं कि गुरुदेव प्रवचन करते समय उपस्थितजनों का शंका समाधान कर दिया करते थे एक-दो नहीं सबके सब अपने मन में जो प्रश्न लेकर बैठते थे प्रवचनकाल में उन सबका उतर मिल जाया करता था।

ऐसे अनुभवीजनों में से एक बाराँ-राजस्थान निवासी डॉ. फूलसिंह यादव है। डॉ. यादव चिकित्साशास्त्र में एम.डी. है और शाँतिकुँज के प्रारंभिक दिनों से शिविरों में भाग लेते रहे हैं ये अनुभवी एवं सुविख्यात चिकित्सक होने के साथ अपने क्षेत्र में गायत्री परिवार के कर्मठ-समर्पित कार्यकर्त्ता हैं उन्हीं के शब्दों में इन दिनों गुरुदेव दिन में दो बार प्रवचन करते थे। अपने कक्ष से प्रवचन मंच तक आने का उनका स्वरूप बड़ा ही मोहक होता था। उनमें वज्रवत् दृढ़ता एवं विद्युत की तेजी एक साथ दिखाई देती थी वह तेजी से चलते हुए प्रवचन मंच तक आते थे। उनके शरीर के वण् में परिवर्तन होता रहता था, परंतु सर्वदा उनमें सुनहले रंग की आभा दीख पड़ती। प्रचलन आरंभ करने के साथ ही उनका मुखमंडल तेजी दीप्त हो जाता और ऐसा लगने लगता कि मानों उनका पूरा व्यक्तित्व ही परिवर्तित हो गया है।

“उनके प्रवचन के प्रत्येक शब्द से उनकी आत्मिक शक्ति की समर्थता व प्रचंडता अभिव्यक्त होती थी उनके शब्द श्रवण की अपेक्षा अनुभूत ही अधिक होते थे। प्रत्येक प्रवचन में गुरुदेव के शब्दों ने मुझे अस्तित्व के एक ऐसे सागर में उच्चतर अनुभूति के भावों में डुबो दिया कि व्याख्यान समाप्त हो जाने पर वहाँ से लौटना बड़ा पीड़ादायी प्रतीत होता था। प्रवचन करते समय पूज्य गुरुदेव के नेत्र क्या ही अद्भुत होते थे। वे मानो प्रज्वलित नक्षत्रों के समान थे प्रतिक्षण उनसे से आलोक निकलता रहता था। अपने शब्दों से गुरुदेव धर्म की व्याख्याओं के माध्यम से जीवन जीना सिखाते थे। संस्कृति की वर्तमान दुर्दशा का वर्ण करते हुए उनकी आँखों से संस्कृति संवेदना झरने लगती। श्रोताओं के मन और आँखें भीग जाती। उनका हर शब्द बिना किसी प्रयास के आत्मा के समाता चला जाता। उनके प्रवचनों की स्मृतियाँ मेरे मन में अब भी ताजी हैं और चिरकाल तक वैसी ही रहेंगी।

डॉ. यादव की ही भाँति और भी अनेकों हैं, जिन्होंने गुरुदेव से प्रत्यक्ष रूप में धर्म-तंत्र से लोग-शिक्षण का पाठ पढ़ा है। गुरुदेव के प्रवचन ही नहीं, उनका समूचा व्यक्तित्व, उनके जीवन के छोटे-छोटे क्रियाकलाप एक सिखावन देते रहते थे। धार्मिक व्यक्ति का आदर्शतम स्वरूप क्या होना चाहिए, यह उन्हें नजर भर देखने से पता चल जाता था। वह ऐसा उत्कृष्ट साँचा थे। कि उनके अनुरूप जो भी स्वयं को ढाल सके, उसका स्वरूप अपने आप ही निखर आएगा। उनका रहन-सहन, रीति-नीति, लोक व्यवहार सब कुछ लोक-शिक्षण करता रहता था। वह कहा करते थे “लोक-शिक्षण बातों से नहीं, व्यक्तित्व से संभव बनता है।” उनकी यह उक्ति उन्हीं पर खरी प्रमाणित होती है।

धार्मिक कर्मकाँडों को भी उन्होंने अभिनव स्वरूप प्रदान किया। रूढ़ियों में कर्मकाँड किस कदर उलझ गया था, इसे अपने देश का जन-जन जानता है। कर्मकाँड क्यों और किसलिए ये प्रश्न तो जैसे निरर्थक थे बस कर्मकाँड के विधि-विधान एक परंपरा थे, जिनकी रीति निभाई जानी थी न लोक पीटी जानी थी। गुरुदेव ने कर्मकाँड को उद्देश्यपूर्ण एवं भावपरक बनाया। इसके माध्यम से संस्कृति के उच्चतम आदर्शों को जन-जन में प्रतिष्ठित करने की एक विशालकाय परियोजना तैयार की। इस क्रम में कर्मकाँड की जो पहली पुस्तक दो खंडों में प्रकाशित हुई, उसका नाम भी था। धर्म-तंत्र से लोक-शिक्षण।

कर्मकाँड का विधान-विज्ञान अनूठा है। इसका प्रत्येक मंत्र अपने आप में एक निश्चित संदेश लिए हुए है जिसे सुनिश्चित समय में और समुचित रीति-नीति के साथ दिया जाना है। मंत्रों के साथ तद्नुरूप मनोवैज्ञानिक एवं भावनात्मक माहौल भी पैदा करने का विधान है ताकि शिक्षण समुचित एवं उच्चस्तरीय बन सके। पुँसवन संस्कार के मंत्र गर्भवती नारियों को सामयिक एवं उचित रीति से प्रशिक्षण करते थे इसी तरह विवाह संस्कार आदि के बारे में भी यही बात है इनमें से हर एक के लिए नियम समय है और उसी के अनुरूप विधि-विधान है। कहना न होगा कि गुरुदेव ने कर्मकाँड के सभी विज्ञान-विधान को समय के अनुसार स्वयं सँजोया-संकलित किया और युगानुरूप इनकी व्याख्याएँ की हैं।

इस सारे कार्य के साथ उन्होंने पुरोहित भी तैयार किए। पहले के दिनों में तो वह सारा काम स्वयं करते थे, पर बाद में उनके सिखाए लोग धर्म’-तत्र से लोक-शिक्षण के कार्य को गति देने लगे। शुरुआत में कर्मकाँड के इस अभिनव स्वरूप का कट्टरपंथियों ने विरोध किया, पर उनका यह विरोध कारगर साबित नहीं हुआ, क्योंकि बुद्धिजीवी वर्ग के लोग खुलकर सामने आए। उन्होंने गुरुदेव की बातों को, उनके बताए साँस्कृतिक आदर्शों को बड़ी तत्परता से ग्रहण किया। तब तो लगातार ऐसे उदाहरण सामने आ रहें हैं, जिनमें पता चलता है कि कट्टर मान्यता वाले लोग भी संस्कृति पुरुष द्वारा रचे गए कर्मकाँड का ही प्रयोग करने लगे हैं धर्म-तंत्र से लोग-शिक्षण की रीति में उनका विश्वास प्रगाढ़ हो चला है। आखिर संस्कृति पुरुष गुरुदेव का समग्र जीवन इसी का पर्याय जो था। इसी की अभिव्यक्ति तो देवसंस्कृति की उस ज्ञान-गरिमा के रूप में प्रकट हुई, जिसकी अभिव्यक्ति हम आत्मवत् सर्वभूतेषु’ के रूप में पूज्यवर के जीवन में देखते है।

स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद सुभाव ने कॉलेज में दाखिला लिया। उस कॉलेज के अंग्रेज अध्यापकों में एक मिस्टर सी.एफ. औटन भी थे। उनमें एक बुरी आदत थी। वह बात-बात में भारतीय जीवन का मजाक उड़ाते थे। उनके प्रति घृणा पैदा करना वह अपना परम धर्म मानते थे। सुभाष को उनका यह व्यवहार कतई पसंद न था। वह उनकी इस आदत को छुड़ाना चाहते थे। एक दिन उनको मौका मिल गया। रोजाना की तरह ओटन साहब ने भारतीय जीवन का मजाक उड़ाना शुरू किया। पहले तो सुभाष चुप बैठे रहे। सुनते-सुनते उन्हें अपने देश का अपमान सहना असह्य हो उठा। वह तिलमिलाकर अपनी सीट से उठ खड़े हुए। चट से आगे बढ़े और उस गोरे अध्यापक के मुँह पर थप्पड़ जड़ते हुए बोले, “भारतीयों में अभी भी स्वाभिमान जीवित है। जो कोई इस तथ्य को भूलकर उसे चुनौती देगा, उसे इसी तरह मार खानी पड़ेगी।”


जीवन-साधना का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष “आत्मवत् सर्वभूतेषु

‘धर्म-तत्र से लोक-शिक्षण’ के माध्यम से परमपूज्य गुरुदेव अपने विराट् गायत्री परिवार के सदस्यों को यह कहना चाहते थे कि आध्यात्मिकता पूजा-पाठ व कथा-वार्ता तक सीमित होकर न रह जाए। इसे जीवन-व्यवहार में भी स्थान मिले। आत्मकल्याण की साधना और लोक-मंगली की प्रवृत्ति के युग्म द्वारा समग्र उत्थान की बात जन-जन सोचने लगे। अंदर की इसी आग को सँजोए परमपूज्य गुरुदेव ने अखण्ड ज्योति पत्रिका का अगस्त 1969 का अंक ‘विचारक्राँति अंक’ के रूप में लिखा। इस अंक में संस्कृति पुरुष के व्यक्तित्व के दो महत्त्वपूर्ण पहलू दृष्टिगोचर होते हैं पहला विचारक्राँति के माध्यम से युगनिर्माण योजना की संघर्षात्मक-रचनात्मक गतिविधियों को जन्म देने वाले संगठन का, तो दूसरा एक ऐसे अभिभावक का, जो अपने परिजनों से बिछुड़ने की बात मन में सोचते ही द्रवित हो उठता है उसकी व्यथा-वेदना ऐसे प्रकट होती है, “अखण्ड ज्योति परिवार में हमने गिन-गिनकर चुन-चुनकर परख-परखकर मणिमुक्तक खोजे हैं और उन्हें एक शृंखला-सूत्र में आबद्ध किया है। वे हमें भले ही भूल गए हों, पर हमें उन्हें भूले नहीं है। हम उन सभी के पूर्व चित्र और चरित्रों को भी जानते हैं जिनके साथ हमारा अति घनिष्ठ संबंध लगातार कई जन्मों से रहा है। इसलिए वन से लौटती हुई गाय जैसे अपने बछड़े को देखते ही रँभाती, चाटती है। लगभग वैसा ही कुछ अपना मन भी करता है।”

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारे इस अंक के महानायक संस्कृति पुरुष की मथुरा से विदाई लेने की घड़ी में लिखी गई थी परिजनों से प्यार, अनंत परिणाम में स्नेह यह एक संगठक, अभिभावक, परिवार के मुखिया की एक ऐसी विशिष्टता जिस पर उस संगठन, उस समुदाय, राष्ट्र का साँस्कृतिक उत्कर्ष टिका माना जाना चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव ने ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के संपादक के रूप में दो लेख अप्रैल व मई 1939 की पत्रिकाओं में लिखे, हमारी प्रेम-साधना और उसकी परिणति-खंड 1 व 2’। उनमें उन्होंने लिखा है कि उनकी साधना की जो मूल धुरी रही है वह है अंतः करण में प्रेमतत्व का अभिवर्द्धन। यह प्रेम उन्होंने परमात्मा से किया गुरुसत्ता से किया तथा उसकी तीसरी धारा परिवार क्षेत्र में प्रवाहित की। यह परिवार उनका अपना गायत्री परिवार, युग निर्माण परिवार था। वे लिखते थे, “ हमारी उपासना पद्धति के अंतराल में सन्निहित यह प्रेम-साधना ही थी जो सामान्य को असामान्य में, तुच्छता को महानता में परिणत करने का चमत्कार दिखा सकी।” (अखण्ड ज्योति अप्रैल 1969)। वे इसी लेखमाला में लिखते है “ईश्वर भक्ति का अभ्यास हमने गुरुभक्ति की प्रयोगशाला में, व्यायामशाला में आरंभ किया और क्रमिक विकास करते हुए प्रभु-प्रेम के दंगल में जा पहुँचे।

उपर्युक्त पंक्तियों मनन करने योग्य हैं। आज के धर्म-तंत्र के स्वरूप को हम देखते, रूखी कर्मकाँडों से भरी अथवा कपोल-कल्पित मिथकों कथा-गाथाओं की विडंबनाओं से युक्त एक प्राणहीन कलेवर ही नजर आता है। धर्म-तंत्र में प्राण फूंकने का “रसों वै सः” की भावना की सही अर्थों में आत्मस्वत्कर अपनी उपासना को प्राणवान् बनाने का एक सशक्त शिक्षण परमपूज्य गुरुदेव ने अपने जीवन से दिया, यह कहा जाए तो कोई अत्युक्ति न होगी। भक्तियोग का यह पक्ष व्यक्तित्व में समाहित होने पर कैसे उसे परिष्कृत कर मानव को महामानव बना देता है, यह हमें पूज्यवर के माध्यम से जानने को मिलता है।

किसी भी साधक-संगठक की प्रेम-साधना जब तक उच्चस्तरीय लक्ष्य को केंद्रित कर संपन्न नहीं होती, उसका परिणाम सीमित ही होगा। परमपूज्य गुरुदेव ने जीन भर अगणित व्यक्तियों प्यार-ममत्व के माध्यम से जोड़ा उन्हें अपना बनाया व येन-केन प्रकारेण उन्हें श्रेष्ठ आदर्शों के प्रति समर्पित हो जीना सिखा दिया। यही कारण था कि वे अपने विराट् परिवार से अंतिम समय तक भी अतिशय प्रेम करते रहे। जनवरी 1969 की अखण्ड ज्योति में जब वे मथुरा से हिमालय तप-प्रवाह हेतु विदाई की घड़ियां और हमारी व्यथा वेदना। वे लिखते हैं, कोई अपनी चमड़ी उघाड़कर भीतर का अंतरंग परखने लगे, तो उसे माँस और हड्डियों में एक तत्त्व उफनता दिखाई देगा, वह है असीम प्रेम। हमने जीवन में एक ही उपार्जन किया है, प्रेम। एक ही संपदा कमाई है। प्रेम। एक ही रस हमने चखा है और वह है प्रेम का।” आगे वे लिखते है “ज्ञान और वैराग्य की पुस्तकें हमने बहुत पढ़ी है। माया और मोह की निरर्थकता पर बहुत प्रवचन सुने है संसार मिथ्या है, कोई किसी का नहीं सब स्वार्थ के हैं आदि आदि। ब्रह्म चर्चा में भी सम्मिलित होने का अवसर मिला है। जब अपनी ही आत्मा दूसरों में जगमगा रही हो तो किससे मुँह मोड़ा जाए ? किससे नाता तोड़ा जाए ? कुछ भी सूझ नहीं पड़ता। पढ़ा हुआ ब्रह्मज्ञान रत्तीभर भी सहायता नहीं करता...... स्मृति पटल पर स्वजनों की हँसती-बोलती मोह ममता से भरी एक कतार बढ़ती उमड़ती चली जाती है। सभी एक-से-एक बढ़कर प्रेमी सभी एक-से-एक बढ़कर आत्मीय, सभी की एक-से-एक बढ़कर ममता। ..... रात्रि भर आँखें बरसती रहती है और सिरहाने रो वस्त्र गीले होते रहते हैं।

पाठक-परिजन भलीभाँति पढ़ सकते हैं एक गुरुसत्ता विराट् परिवार के अभिभावक के अंतरंग को। उनका हृदय माँ की कोमलता से अभिपूरित था। इसे कोई भावुकता कह सकता है, कोई छलछलाते प्यार से भरी मनोभूमि की अभिव्यक्ति किंतु सतत् ये मनोभावनाएँ एक ही संदेश देती रही कि उनका जीवन एक समिधा की तरह लोकहितार्थाय जीवनयज्ञ में जलता रहा है। उसी विराट् यज्ञ ने एक संगठन खड़ा कर दिया, जिसका नाम था गायत्री परिवार एवं उसी परिवार से उन्होंने प्रेम कर “ आत्मवत् सर्वभूतेषु” की साधना को गति दी अपना आपा और बड़ा कर लिया, इसीलिए वे फरवरी 19 की अपनों से अपनी बात में लिखते है “प्यार-प्यार यही हमारा मंत्र है। आत्मीयता, ममता, स्नेह और श्रद्धा यही हमारी उपासना है।”

अपने दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियों पर पूज्यवर ने मथुरा से विदाई की पूर्व वेला में अपनी अध्यात्म साधना पर प्रकाश डालते हुए लिखा। “हमारी साधना की दो मंजिले पूरी हो चुकी, ‘मातृवत् परदारेषु’ ‘ परद्रव्येषु लोष्ठवत्।’ माता के समान हर परनारी को तथा दूसरे के द्रव्य को अकिंचन-गौण मानकर जीवन-संग्राम में वासना, तृष्णा से मोरचा लेना। अब साधना के तीसरे चरण में प्रवेश करते है वह है ‘6 आत्मवत् सर्वभूतेषु।” मातृवत् परदारेषु परद्रव्येकषु लोष्ठवत् की साधना विवेक के सहारे सध गई। तीसरी साधना थी अपने समान सबको देखना। कहने-सुनने में यह सब मामूली शब्द लगते हैं और सामान्यतया नागरिक कर्त्तव्यों का पालन, शिष्टाचार, सद्व्यवहार की सीमा तक पहुँचकर बात पूरी हो गई दीखती है। पर वस्तुतः उस तत्त्वज्ञान की सीमा अति विस्तृत है उसकी परिधि वहाँ पहुँचती है जहाँ परमात्मसत्ता के साथ घुल जाने की स्थिति आ पहुँचती है (अखण्ड ज्योति फरवरी 1971)।

हमारी साँस्कृतिक गरिमा इसीलिए अक्षुण्ण रही है कि हमारे यहाँ ऐसी भावना रखने वाले अनेक मनीषी समय-समय पर जन्म लेते रहे। हमारी संस्कृति के महासागर में ऐसी विचारधाराएँ विभिन्न प्रकार की उपासना पद्धति वाले अनेक संगठन आते गए एकाकार होते चले गए। इस सामासिकता उदारता का मूल उसी बीज में छिपा है जिसे कहा गया है। “बात्मवत् सर्वभूतेषु।” अपने जैसा ही सबको मानना। किसी में भेद न मानना। कभी संत ज्ञानेश्वर ने ऐसा ही एक प्रदर्शन पाँडित्य के अहंकार से भरे ब्राह्मणों के समूह में कर उन्हें चुनौती दी थी। भैंसे के मुख से वेदमंत्र का पाठ उन्होंने यही कहकर करवाया कि उसके अंदर भी वही जीवात्मा है जो हम सबमें है। रामकृष्ण देव के गालों पर अँगुलियों के निशान उभरकर आना, नाव वाले को मारे गए चाँटे की पीड़ा की समानुभूति इसी आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना की प्रतीक है।

परमपूज्य गुरुदेव ने अहर्निश इसी भाव से विराट् ब्रह्म की, समाज देवता की उपासना की एवं उसका परिणाम इस गायत्री परिवार रूपी विभूतियों के भाँडागार के रूप में देखा जा सकता है। समानुभूति संबंधी एक बड़ी महत्त्वपूर्ण घटना उनके जीवन की भी है। एक परिजन जो दिल्ली में जेवर आदि का व्यवसाय करते थे, गुरुदेव के पास आकर अपनी कृतज्ञता का ज्ञापन करने लगे। वे कह रहे है, “गुरुवर! सड़क पर फिसलकर गिरते ही ताँगा पैर पर से निकल गया। आपकी कृपा से कुछ भी नहीं हुआ आपका ही स्मरण करता रहा।” पूज्यवर ने तुरंत अपनी धोती ऊपर उठाकर कहा “तुझे कुछ होता कैसे ? तेरा कष्ट तो यहाँ आ गया था।” हमने देखा है उनकी जाँघ पर उस लाल निशान को, जो उन्होंने उन भाई को दिखाया। एक-दो-दिन में वह निशान समाप्त हो गया। दो सौ किलोमीटर की दूरी-बेतार का तार आर्तभाव से लगाई गई गुहार ने गुरुसत्ता को विवश कर दिया कि वे अपने भक्त का संकट अपने ऊपर ले ले। आत्मवत् सर्वभूतेषु के ऐसे अगणित उदाहरण परमपूज्य गुरुदेव के जीवन में देखने को मिलते है।

इस अनुभूति में दूसरों के सुख में अपना सुख एवं दूसरों के दुःख में अपना दुःख अनुभव होने लगता है। ऐसा मनुष्य अपनों तक सीमित नहीं रह सकता। स्वार्थों की परिधि में आबद्ध रहना उसके लिए कठिन हो जाता है। दूसरों का दुःख मिटाने ओर सुख बढ़ाने के प्रयास बिलकुल ऐसे लगते हैं, मानों यह सब निताँत अपने व्यक्तिगत प्रयोजन के लिए किया जा रहा हो। पुण्यात्मा युधिष्ठिर का कुछ समय नकर जाना व वहाँ के प्राणियों को आनंद-विभोर कर देना बताता है कि दूसरों को सुख देने का आनंद कितना बड़ा है परमपूज्य गुरुदेव ने सदैव यही कहा कि भारतभूमि इसलिए पुण्यभूमि है कि मनुष्यता को गौरवान्वित करने वाले महामानवों ने बार-बार इस धरती पर जन्म लिया है। इनका अस्तित्व ही इसी जगती को इस योग्य बनाए है कि भगवान् बार-बार नर-तनू धारण कर अवतार लेने के लिए ललचाते हैं।

परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी की जीवन-गाथा इस तथ्य का प्रमाण है कि संस्कृति का गौरव’ आत्मवत् सर्वभूतेषु’ के भाव से जीने वालों ने ही ऊँचा उठाया है। पीड़ित मानवता की विश्वात्मा की व्यक्ति और समाज की व्यथा-वेदना ने ही उन्हें बेचैन कर जीवन भर तिलतिल कर जलाया। इसी आधार पर वह पृष्ठभूमि बनी, जिसे “वसुधैव कुटुँबकम्” की धुरी अगले दिनों बनता था।

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उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम्

जहाँ अपने समान ही मानव सबको लगता है तो उसका और भी विकसित रूप “वसुधैव कुटुम्बकम्” के भाव के रूप में दृष्टिगोचर होने लगता है। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की संवेदना के प्रखर होते ही निष्ठुरता-संकीर्णता गलकर नष्ट हो जाती है जी में अंतः में मात्र करुणा ही शेष रह जाती है। वह दिनों -दिन रत्तीभर कम न होकर बढ़ती ही जाती है। परमपूज्य गुरुदेव संस्कृति पुरुष युगद्रष्टा उस महामानव के जीवनक्रम को हम “वसुधैव कुटुम्बकम्” के भाव से सतत् अनुप्राणित पाते हैं वे अपनी अंदर की बात अपनों के समक्ष लिखते हुए कहते हैं, “ सुना है आत्मज्ञानी सुखी रहते है और चैन की नींद सोते हैं। अपने लिए ऐसा आत्मज्ञान अभी दुर्लभ है। ऐसा ज्ञान मिल भी सकेगा या नहीं इसमें पूरा संदेह है। जब तक व्यथा-वेदना का अस्तित्व इस जगती पर है जब तक प्राणियों को क्लेश और कष्ट की आग में जलना पड़े तब तक हमें भी चैन से बैठने की इच्छा न हो। जब भी प्रार्थना का समय आया, भगवान् से यही निवेदन किया। हमें चैन नहीं, वह करुणा चाहिए जो पीड़ितों की व्यथा को अपनी व्यथा समझने की अनुभूति करा सकें, हमें समृद्धि नहीं, वह शक्ति चाहिए जो आँखों के आँसू पोंछ सकने की अपनी सार्थकता सिद्ध कर सके।” (अखण्ड ज्योति फरवरी, 1971)।

उपर्युक्त पंक्तियों समष्टि के साधक सारी वसुधा को अपना परिवार मानने वाले एवं समाज देवता के आराधक के अंतस् की अभिव्यक्ति है। कितनी पीड़ा है कसक है इन शब्दों में तभी तो थोड़ा-सा ज्वर आने की स्थिति में जब परमवंदनीया माताजी द्वारा पूज्यवर को मुसम्मी का रस दिए जाने पर वे गले में डालकर उसे बाहर निकाल देते है व कहते है “शैलो! जिस दिन सारे अपने कार्यकर्त्ताओं को, इस विश्व वसुधा को यह मैं उपलब्ध करा सका, मैं निश्चित ही इसे पी लूँगा। अभी तो यह मुझे जहर, एक विलासिता मालूम होता है।” तभी तो दहेज के कारण जलने वाली बहुओं का वृत्ताँत पढ़ते ही उनका गला रुँध जाता है एवं वे लिखने लगते हैं, ‘6 विवाहोन्माद के महिषासुर का विचारक्राँति की देवी के तीखे त्रिशूलों से वध होकर ही रहेगा।” (अखण्ड ज्योति नवम्बर 1971)।

जब मानव का विकास इस स्तर पर हो जाए तो सारी धरित्री का कष्ट उसका कष्ट बन जाता है। उसका तप , उसकी समस्त साधना जगत् के निर्मित नियोजित होती है स्वामी विवेकानन्द के जीवन में एक महत्त्वपूर्ण घटना यहाँ उल्लेखनीय है। फिजी के पास प्रशाँत महासागर के एक द्वीप में हुए ज्वालामुखी विस्फोट एवं उससे फैले विषाक्त धुएँ से हजारों नागरिकों की पीड़ा उनकी दैनंदिन साधना में व्यवधान डाल उनके लिए प्रार्थना करने हेतु उन्हें विवश कर देती घटना की जानकारी जनमानस को बाद में होती है किंतु विश्वात्मा के एक घटक होने के नाते वे उसे पहले ही अनुभव कर अपने एक सेवक-शिष्य के समक्ष अपनी मनोव्यथा बेचैनी का बखान कर देते हैं। परमपूज्य गुरुदेव के जीवन के अनेक घटनाक्रमों में विश्व-वसुधा की कष्ट भरी घड़ियों में उनकी सहभागिता व उनकी उस अवधि में विशिष्ट साधना के ढेरों प्रमाण देखने को मिलते हैं।

वे अपने विषय में वास्तविकता उजागर करते हुए लिखते है, “कितनी बार हम बालकों की तरह बिलख-बिलख कर फूट-फूटकर रोए हैं इसे कोई जानता है ? लोग हमें संत, सिद्ध ज्ञानी मानते हैं कोई लेखक, विद्वान वक्ता, नेता समझते हैं पर किसने हमारा अंतःकरण खोलकर पढ़ा-समझा है ? कोई उसे देख सका होता, तो उसे मानवीय व्यथा-वेदना की अनुभूतियों के करुण कराह से हाहाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इन हड्डियों के ढाँचे में बैठी बिलखती ही दिखाई पड़ती है।” (अखण्ड ज्योति फरवरी, 1991) विश्व मानव की तड़पन जब अपनी तड़पन बन जाए, जब जन-जन की व्यथा-वेदना को समाने खड़ा देख अपनी निज की पीड़ा से अधिक कष्ट अनुभव होने लगे तो यही अभिव्यक्ति होती है, “ दर्द और जलन ने हमें क्षणभर चैन से न बैठने दिया तो हम करते भी क्या ? जो दर्द से इठा जा रहा हो, वह हाथ-पैर न पटके, तो क्या करें ? “ (अखण्ड ज्योति फरवरी, 1971)।

एक-एक वाक्य लगता है कि समस्त वसुधा को अपना कुटुँब मानने वाले विश्व मानव की अपनी अंतः व्यथा का परिचायक है। आध्यात्मिक आदर्शों को व्यावहारिक जीवन में तालमेल बिठाते हुए विश्वात्मा की सेवा करते हुए आँतरिक प्रगति के पथ पर कैसे चला जा सकता है संस्कृति पुरुष का जीवन उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। ऐसा ही प्रयोगात्मक जीवन उन्होंने जिया।

नवनिर्माण में अनुरूप व्यक्तित्वों एवं परिस्थितियों का सृजन करने हेतु ही परमपूज्य गुरुदेव की चार हिमालय यात्राएँ संपन्न हुई। पूज्यवर ने इस नवनिर्माण का स्वरूप और तं. “वसुधैव कुटुम्बकम्” के आदर्श को व्यावहारिक रूप देने की आधारशिला पर ही खड़ा किया। ऐसे समाज में जब हम जातिवाद संकीर्ण संप्रदायवाद के आधार पर पूरे समुदाय को टूटता देख रहे थे। उन्होंने लिखा कि समस्त मानव-समाज को अगले दिनों एकता-आत्मीयता के मूल बंधनों के आबद्ध हो जाना है। नए युग के उनने कुछ आधारभूत आदर्श बताए थे। (1) एकता, (2) समता, (3) शुचिता (4) ममता। व्यामोहग्रस्त लोक-मानस को बदलकर न्यास एवं औचित्य के अनुरूप विवेकसम्मत बनाना निस्संदेह ही एक अत्यंत कठिन कार्य था, पर संस्कृति पुरुष ने उसकी पृष्ठभूमि विराट गायत्री परिवार के माध्यम से बनाने का संकल्प किया।

परमपूज्य गुरुदेव ने जून 1936 की अखण्ड ज्योति में लिखा है “नये विश्व का निर्माण एकता, समता, ममता, शुचिता की चार आधारशिलाओं पर निर्भर है। इन चारों को संसार के कोने-कोने में विभिन्न देशों और विचारों के व्यक्तियों में अलग-अलग ढंग से प्रतिष्ठापित परिपुष्ट एवं फलित किया जा रहा है। भारत में शतसूत्री युग निर्माण योजना उसी आधार पर यहाँ की परिस्थितियों के अनुरूप गतिशील की गई है।”

धर्म, संस्कृति भाषा, शासन के बीच अनेक प्रकार की विभिन्नताएँ-खाइयाँ पाटकर एकता की स्थापना करना एक भागीरथी कार्य है। वे लिखते है कि अगले दिनों ऐसे विश्वधर्म का विकास होगा, जो मानवीय आस्थाओं और प्रक्रियाओं को पशुता के स्तर से ऊँचा उठाकर देवत्व की दिशा में विकसित कर सकेगा। ऐसा विवेकपूर्ण धर्म मनुष्य-मनुष्य के बीच प्रेम और आत्मीयता उत्पन्न करने तथा अंतःकरण के दिव्य तत्त्वों के उत्कर्ष में सहायक होगा। धर्म के नाम पर विराजमान मूढ़मान्यताओं, व्यर्थ आडंबरों में लगी ज्ञानवान् शक्ति जब विश्वधर्म की विवेकसम्मत आदर्शवादी प्रतिष्ठापनाओं में नियोजित होगी, तब उसके रचनात्मक परिणाम इतने शानदार होंगे कि यह संसार स्वर्ग जैसा दिखाई देने लगेगा। मालूम नहीं निराशावादी क्या सोचते हैं परंतु आज क्रमशः विवेकवानों का ऐसा तबका उभरकर आ रहा है जो विज्ञानसम्मत धर्म-वैज्ञानिक अध्यात्मवाद को धुरी बनाकर जीने का माहौल बना रहा है।

सुस्थिर मानवी एकता के लिए साँस्कृतिक एकता जरूरी है। “ग्लोबल बिलेज’ बन गए विश्व में विज्ञान के आविष्कारों ने जिस तरह सबको एक-दूसरों के समीप ला दिया है तो साँस्कृतिक स्तर पर भी सर्वोपयोगी अंशों के समुच्चय के रूप में एक विश्व-संस्कृति स्थापित होनी चाहिए। इसी आधार पर जाति-पाँति का भेद मिटेगा। भारतीय संस्कृति में वे सारे मूल्य-गुण मौजूद है जो उसे विश्व संस्कृति बना सकें। ऐसा ही विकास अगले दिनों होने जा रहा है।

विश्व नागरिकता का, विश्व-बंधुत्व की भावना का यदि विस्तार होना है तो एक विश्वभाषा भी उसका आधार बनेगी। संस्कृत भाषा आज की कम्प्यूटर की भाषा के सबसे समीप पाई गई है। कोई आश्चर्य नहीं कि इक्कीसवीं सदी में वह विश्वभाषा बन जाए। राष्ट्रवाद के नाम पर पनप रही संकीर्णता युद्धों का मूल कारण है। अगले दिनों विश्वशासन ही समस्त राजनीतिक, सामाजिक समस्याओं का हल कर सकेगा। आज विश्व बाजार बना है, तो अगले दिनों एक आचार संहिता एक ही व्यवस्था का विकास असंभव नहीं है। ये चारों ही कार्य भावनात्मक परिष्कार पर टिकें है, जिसे परमपूज्य गुरुदेव ने गायत्री परिवार चिंतन की मूल धुरी बनाया, इसी निमित्त सारे कार्यक्रम जुटाए।

मानव-मानव के बीच असमानता आज जाति, लिंग धन, पद इन चार आधारों के कारण हैं। असमानता अस्वाभाविक है अवाँछनीय है। अज्ञान और अन्याय का सम्मिश्रित स्वरूप ही असमानता के रूप में प्रकट होता है। गोरे-कालों का भेद नस्लभेद, वर्णभेद को मिटाकर ही “वसुधैव कुटुम्बकम्” का आदर्श स्थापित किया जा सकेगा। जैसे राजतंत्र जमींदार समाप्त हो गए ऐसे ही अब वर्गतंत्र भी समाप्त होगा ऐसी परमपूज्य गुरुदेव की घोषणा है। आध्यात्मिक साम्यवाद की धुरी पर विश्वभर की व्यवस्था स्थापित होना भी अब अवश्यंभावी प्रक्रिया है उसी प्रकार परमपूज्य गुरुदेव ने ममता-आत्मीयता के विस्तार को तथा शुचिता-पवित्रता के आचरण में समावेश को भावी युग के निर्माण का आधार माना है।

जुलाई 1969 की अखण्ड ज्योति में पूज्यवर लिखते हैं “अपनों से अपनी बात कहते हुए हमें इन पंक्तियों द्वारा यह स्पष्ट कर देना है कि नया युग तेजी से बढ़ता चला आ रहा है। उसे कोई रोक न सकेगा। प्राचीनकाल की महान् परंपराओं की पुनः प्रतिष्ठा होनी है। महाकाल उसके लिए आवश्यक व्यवस्था बना रहे हैं और तदनुकूल आधार उत्पन्न कर रहे हैं युग का परिवर्तन अवश्यंभावी है। हमारा छोटा-सा जीवन इसी की घोषणा करने सूचना देने के लिए है। .... जिस काम के लिए हम आए थे पूरा होने को है। अगला काम महाकाल स्वयं करेंगे। उनकी प्रेरणा से एक-से-एक बढ़कर प्रतिभाशाली और प्रबुद्ध आत्माएँ सामने आएँगी। वे एकता, समता, ममता, शुचिता की मंगलमयी परिस्थितियों का शुभारंभ कर इस धरती पर स्वर्ग का वातावरण संभव कर दिखाएँगी।”

हममें से किसी को युगपुरुष के इस कथन पर अविश्वास नहीं करना चाहिए। ‘अयं निजः’ यह मेरा है, -परोवेति यह उसका गणनाँ लघुचेतसाम्’ ऐसी मान्यता संकीर्ण चिंतन वालों की होती है। उदार चरितानाम् तू’ भावनाशील उदार हृदय व आचरण वालों के लिए तो “वसुधैव कुटुम्बकम्” सारी विश्व-वसुधा ही एक परिवार होती है। ऐसा उदाहरण आज के युग में हम सबके समक्ष परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी के माध्यम से सामने आया। जो हमारा मार्गदर्शन आज भी कर रहा है। यही तो देवसंस्कृति के सृजन सैनिकों साधु ब्राह्मणों की आचार-संहिता बनने जा रहा है।


लोकनायक-निर्माण की परंपरा का नवोन्मेष

जिस आधार पर हमारे साँस्कृतिक मूल्य आज भी अक्षुण्ण बने हुए है, जिस चैतन्य धारा ने आत्मवत् सर्वभूतेषु से लेकर वसुधैव कुटुम्बकम् के प्रवाह को जीवित बनाए रखा है, उसका नाम है, साधु-ब्राह्मण परंपरा, वानप्रस्थ संस्था का हमारे मध्य होना। यह पुण्य परंपरा काल के प्रवाह में लुप्त हो चली थी, किंतु आज के भौतिकवाद के युग में भी इसे जिंदा बनाए रखा गया है एवं सही अर्थों में ऐसे नव संन्यास के प्रतीक परिव्राजक व वानप्रस्थ समाज में विद्यमान् है, तो उसका समूचा श्रेय युगऋषि, वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य को जाता है।

भारतीय धर्म को दूसरे शब्दों में वर्णाश्रम धर्म कह सकते है। चार आश्रमों की सुदृढ़ आधारशिला पर अपनी संस्कृति का भवन खड़ा था। जब तक वे स्तीं बने रहे, तब तक गौरव-गरिमा गगनचुँबी बनी रही। जब उनमें विग्रह-संकट उत्पन्न हुआ, तो सारा ढाँचा ही लड़खड़ा गया। धर्म-संगठनों की, धर्मध्वजी महंतों-मठाधीशों की, कथा-कीर्तनों की, रात्रि जागरण से लेकर देवाराधन कर्मकाँडों की आज धूम है। बड़ी तेजी से मंदिर बनते जा रहे है, पर इतना सब होते हुए भी लगता है धर्म की आत्मा मर गई। उसकी सड़ी लाख की हमारे हाथ रह गई है। अब एक ही वर्ण शेष है ‘वैश्य’ और एक ही आश्रम जीवित है ‘गृहस्थ’। शेष तीन वर्ण समाप्त हो गए, तीनों आश्रमों का अंत हो गया।

वर्णाश्रम धर्म में जहाँ ब्राह्मण की बात आती है, वहाँ अज्ञानी मूढ़ लोग इसे किसी जाति विशेष के साथ जोड़ देते है, जबकि ब्राह्मण संवेदनामूलक समाज का मेरुदंड है। इन्हें लोक-शिक्षक, पुरोहित भी कह लें तो अत्युक्ति न होगी। मनुष्यता के ये शिक्षक जन्म से किसी भी जाति के न होकर ज्ञान के आराधक होते थे। ये ज्ञान बांटते थे। यह विकसित व्यक्तित्व की एक अवस्था थी, जो राष्ट्र को जाग्रत् और जीवंत बनाए रखती थी। ब्राह्मण वह उत्कृष्ट व्यक्तित्व संपन्न महामानव होता था, जिसके हर अणु में विद्या और तप सँजोया होता था। ऐसा ब्राह्मण धारण किए महामानवों की नस्ल समाप्त न हो जाए, इसके लिए सही अर्थों में परमपूज्य गुरुदेव ने एक ब्राह्मण का जीवन जीकर सबके समक्ष एक नमूना रखा। ब्रह्मकमल की तरह जीवन जीकर, अस्सी पुष्प खिलाकर उसकी सुरभि वे चारों ओर बिखेर गए। अपने जैसे अनेक ब्राह्मण तैयार कर गए।

एक व्याख्या के अनुसार, मानवी काया शूद्र वर्ण की है, तो मानवी मन वैश्य है। हर समय श्रम कर शिश्नोदरपरायण जीवन जीना काया की नियति है, तो मन का कार्य है, गाँठ की अक्ल हिसाब-किताब में, अर्थ-संचय में लगाना। पश्चिम का पूरा विकास इन दो वर्णों पर टिका हुआ है। मानवी आत्मा क्षत्रिय है, जो बल संपन्न है व जब वह जाग्रत् होता है, तो व्यक्ति व समाज दोनों की रक्षा करता है। परब्रह्म परमात्मा ही ब्राह्मण है। हम सबके जीवन का लक्ष्य होना चाहिए उस ब्राह्मण तत्व से एकाकार हो जाना। क्षत्रिय धर्म का निर्वाह कर ही ऋषिगण ब्रह्मतत्व को प्राप्त होते थे, यह व्याख्या समस्त भ्राँतियों को मिटा देती है।

पुरुष सूक्त के अनुसार, ब्राह्मण समाज का-विराट् ब्रह्माँड का मुख है। वैदिक समाज ने, क्षुद्र कामनाओं से उबर सकने वाले व्यक्तित्वों को ही ब्राह्मण, पुरोहित नाम से सुशोभित किया था। सच्चा ब्राह्मण वही बताया गया है, जो अहं और आसक्ति से ऊपर उठकर करुणा से लबालब भरा हो। ऐसे पुरोहितों को, अग्रदूतों को समाज में ऋषियों ने साक्षात् अग्नि की उपाधि दी है। उसी प्रकार आश्रम धर्म के अंतर्गत वानप्रस्थ ही था, जिसकी गरिमा प्राचीनकाल में सर्वोत्कृष्ट थी। व्यक्ति अपना आधा जीवन भौतिक प्रयोजनों के लिए रखकर चढ़ते खून के उभारों को सही दिशा में खरच कर लेता था। परिवार संस्था की सेवा करता था। राष्ट्र की भौतिक समृद्धि में योगदान देता था। जीवन का उत्तरार्द्ध परमार्थ प्रयोजनों के लिए निर्धारित होता था। उसका प्रथम सोपान होता था, ब्रह्मविद्या का पारायण करना, उसमें पारंगत होना। ऐसे व्यक्ति ही लोक-निर्माण जैसे महान् प्रयोजन के अधिकारी बनते है। तप-साधना, योगाभ्यास के लिए भी यही आश्रम श्रेष्ठ माना जाता रहा है। दबी हुई आँतरिक प्रखरता इसी मार्ग से निखरती थी। तीसरा सोपान इस आश्रम का होता था, सेवा-साधना। जन-मानस में उत्कृष्टता बोना, उगाना और बढ़ाना। देखा जाना चाहिए कि यह ब्राह्मण वर्ग, यह वानप्रस्थ वर्ग समाज में से कैसे हटता चला गया और क्षति पहुँचाता चला गया।

गहराई से चिंतन करें, तो पाते हैं कि ऋषियों के बताए मार्ग पर न चलने के कारण ही हम वर्तमान स्थिति को प्राप्त हुए है। देवसंस्कृति का ढाँचा खड़ा करने हेतु परमपूज्य गुरुदेव ने आश्रम-व्यवस्था में आई सामयिक विकृतियों में हेरफेर कर लोकजीवन की सबसे सशक्त परंपरा ‘वानप्रस्थ’ का पुनरुज्जीवन किया। अपने समय की यह सबसे बड़ी क्राँति मानी जानी चाहिए कि सामान्य जीवन जीने वाले अगणित व्यक्ति अनायास ही तप प्रधान वानप्रस्थ जीवन की प्रेरणा पाकर इस आश्रम में प्रवृत्त हो गए। गायत्री परिवार इन्हीं साधु-ब्राह्मणों, वानप्रस्थों का समुच्चय है, यह देख-समझने के बाद इस क्राँति के मर्म को जाना जा सकता है। धर्म-तंत्र की विकृतियों को, बौद्धकाल की विडंबना भरी परिस्थितियों को पहले आद्य शंकराचार्य ने बाद में स्वामी विवेकानंद ने काफी सीमा तक ठीक किया। स्वामी विवेकानंद कहते थे, मैं चाहता हूँ कि ऐसा व्यक्ति अगले दिनों विश्व का नेतृत्व सँभाले जिसका हृदय बुद्ध की तरह विशाल हो, करुणा का सागर हो तथा जिसका मस्तिष्क आचार्य शंकर की तरह कुशाग्र हो। ऐसा व्यक्ति ही देवसंस्कृति के निर्धारणों को विश्वभर में पहुँचाकर पुनः उसे विश्वसंस्कृति बना सकता है।” स्वामी विवेकानंद के महाप्रयाग के साठ वर्ष के भीतर ही ऊपर कही गई बात चरितार्थ हो गई। परमपूज्य गुरुदेव जिनके अंतस् में अथाह करुणा थी, अपनी प्रखर प्रज्ञा के माध्यम से सद्गृहस्थों के निर्माण में जुटे रहे, जैसी कि समय की आवश्यकता थी, साथ ही लाखों को वानप्रस्थरूपी युग-धर्म हेतु भी प्रेरित करते रहे, यह उनके जीवन की सर्वोपरि उपलब्धि है।

मथुरा में गायत्री तपोभूमि की स्थापना के साथ-साथ ही ऐसे लोकसेवा परिव्राजकों का प्रशिक्षण पूज्यवर द्वारा आरंभ कर दिया गया था, किंतु उसे व्यवस्थित स्वरूप दिया उन्होंने यहाँ हरिद्वार आकर शाँतिकुँज की स्थापना के बाद। 1872 में पूज्यवर हिमालय प्रवास से लौट आए तथा विधिवत ऋषि परंपराओं के पुनरुज्जीवन हेतु आधारशिला बनाने में जुट गए। पहले उन्होंने प्राण प्रत्यावर्तन शृंखला आरंभ की, जो 1873 के पूर्वार्द्ध में चलती रही। इसके माध्यम से तपस्वी-प्राणवान् साधकों को शक्तिपात स्तर की साधना द्वारा आत्मबलसंपन्न बनाया गया। इसके तुरंत बाद जुलाई 1873 में उन्होंने एक विशेषाँक प्रकाशित किया, जिसकी विषयवस्तु थी, ‘वानप्रस्थ परंपरा का पुनर्जीवन’। परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा, “राष्ट्र निर्माण हेतु सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है, सुयोग्य, भावनाशील, अवैतनिक और सेवा की लगन के साथ जुट पड़ने वाले कर्मठ कार्यकर्त्ताओं की। इस प्रयोजन को वानप्रस्थ परंपरा का पुनर्जागरण करके ही पूरा किया जा सकता है।” (जुलाई पृष्ठ 16)

कितना सशक्त एवं द्रष्टा स्तर का चिंतन था उस युगऋषि का कि उन्होंने आज की सभी समस्याओं का समाधान इस परंपरा के पुनर्जागरण द्वारा बताया। उन्होंने लिखा, “सेवा-साधना के लिए इन दिनों हमें एक ही केंद्र पर केंद्रित होना है। वह है, ज्ञानपज्ञ, ज्ञानयज्ञ। विचारक्राँति, विचारक्राँति, विचारक्राँति। चूँकि अपना कार्य भावनाओं के परिष्कार से संबंध रखता है, इसलिए उसके साथ आध्यात्मिक पृष्ठभूमि अनिवार्य है।.........वानप्रस्थों की सेवा-साधना की दिशा धर्म कलेवर की पृष्ठभूमि बनाकर ज्ञानयज्ञ की ज्योतिर्मय प्रखरता उत्पन्न करना ही हो सकती है। (पृष्ठ 20)।

एक क्राँतिकारी चिंतन प्रस्तुत करते हुए युगऋषि ने कहा, “पारमार्थिक जीवन जीने के लिए व्रत-धारण करने वाले नर-नारी ऐसा भी कर सकते है। कि विवाह तो करें, पर संतानोत्पादन के झंझटों से बचे रहें। ऐसी स्थिति में वे सुविधापूर्वक किसी भी आयु में वानप्रस्थ में प्रवेश कर सकते है। जिन्हें संयोगवश संतान नहीं मिली, उनके सौभाग्य को हजारों मुखों से सराहा जाना चाहिए कि उन्हें देव जीवन जीने का लाभ लेने का अवसर मिला।” (पृष्ठ 24) वस्तुतः समाज-सुधारक स्तर की संस्कृति पुरुष की सत्ता ही यह सब लिख सकती थी। परमपूज्य गुरुदेव का अध्यात्म लोक-शिक्षकों के निर्माण को बढ़ावा देता है एवं यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है। बहुप्रजनन, कामुकता के उभार, जनसंख्या विस्फोट से पीड़ित विश्व-वसुधा के समक्ष साक्षरता विस्तार, ग्रामीण संस्कृति के उत्थान, स्वास्थ्य संवर्द्धन, ग्रामोद्योगों के प्रशिक्षण हेतु वे लोक-शिक्षकों के निर्माण की बात कहते रहे, प्रशिक्षित करते रहे एवं अपने कई विकल्प अपने सामने ही बनाकर चले गए। परिष्कृत धर्म-तंत्र के माध्यम से यह किसी भी महामानव की सबसे बड़ी सेवा है।

वानप्रस्थों के परमार्थ पथ प्रवेश को पूज्यवर ने तीन स्तरों में विभक्त किया। उत्तम, मध्यम व कनिष्ठ पूरा समय परमार्थ प्रयोजनों के लिए लगाने वाले उत्तम कहे गए, मध्यम वे जो घर-परिवार के बीच रहते हुए भी सर्वाधिक समय समाज-सेवा करते रहें। कनिष्ठ वे जो परिवार में तो रहें, जिम्मेदारियाँ न बढ़ाएँ, प्रतिदिन 4 घंटे समाज हेतु दें। यह एक ऐसी अवधारणा थी जो न केवल युगानुकूल थी, क्राँतिकारी भी थी। गृह-कलह से ऊबे हुए, पग-पग पर अपमानित होते हुए, आलस्य और प्रमाद से अपनी आदतों को घिनौनी बनाकर चैन से मुफ्त की रोटी तोड़ने वालों ने, शास्त्रार्थ द्वारा अपने ज्ञान की झंडियाँ गाड़ने की इच्छा रखने वालों ने जो दुर्गति वानप्रस्थ आश्रम की थी, उसे बहुत हद तक गायत्री परिवार के लोकनायकों-परिव्राजकों-वानप्रस्थों का निर्माण कर परमपूज्य गुरुदेव ने पलटने का प्रयास किया। सही अर्थों में भूसुर-पुरोहित-पृथ्वी पर रहने वाले देवताओं ने ही कभी धरती को स्वर्गोपम बनाया था। आज भी यदि प्रतिभाशीलों, विभूतिवानों के जागरण के माध्यम से एक सशक्त तंत्र खड़ा दिखाई देता है, उसके कई गुना होने की संभावनाएँ भी परिलक्षित होती है, तो यह मानना चाहिए कि सतयुगी आधारशिला इसी वानप्रस्थ, साधु-ब्राह्मण परंपरा के पुनरुज्जीवन से ही रखी जाएगी।

ज्ञान-साधना, तप-योग एवं सेवा-साधना के समन्वय से मानव के जीवन के उत्तरार्द्ध का कैसे श्रेष्ठतम उपयोग किया जा सकता है, कैसे उसका नियोजन परमार्थ प्रधान प्रवृत्तियों के, राष्ट्र निर्माण की गतिविधियों के विस्तार हेतु हो सकता है, इसका नमूना है गायत्री परिवार। वेद संन्यास के द्वारा, सामूहिक वानप्रस्थ दीक्षा द्वारा इस पूर्णाहुति वर्ष में इस माह के सौत्रामणी प्रयोग, पुरुषमेध महायज्ञ में उसी प्रक्रिया का पुनरावर्तन किया जा रहा है। यही परंपरा तो देवसंस्कृति के उत्कर्ष का आधार बनी है, जिसके कण-कण में उल्लास-ही-उल्लास छाया दिखाई देता हैं जीवन को जो उत्सवमय बना देती है।


पर्वों को दी चैतन्यता एवं सुसंस्कारिता

भारतीय संस्कृति उत्सवमयी है। सत्-चित्-आनंद इसका संदेश ही नहीं, इसकी प्रकृति भी है। पर्व-त्योहारों के माध्यम से यह साँस्कृतिक चेतना आनंद, निर्मल संस्कार एवं सात्विक उल्लास प्रवाहित करती रहती है। संस्कृति पुरुष परमपूज्य गुरुदेव का स्वरूप व स्वभाव अपनी इसी साँस्कृतिक विशेषता के सर्वथा अनुरूप रहा है। उनके अस्तित्व (सत्) से चैतन्यता (चित्) एवं उल्लाह (आनंद) हर पल झरता-बिखरता रहता है। उन्होंने पर्व-त्योहारों के प्रचलन में आई जड़ता को तोड़ा, उनमें चैतन्यता एवं सुसंस्कारिता का पुट दिया।

प्रचलित परिपाटी के अनुसार पर्व-त्योहारों को धूम-धाम से मनाए जाने की प्रथा है। इस धूम-धाम का अर्थ है फिजूलखर्ची का उन्माद, दुर्व्यसनों को बढ़ावा। गुरुदेव ने पर्व-त्योहारों को सामाजिक संस्कार की प्रक्रिया कहा। उन्होंने बताया कि जन-जन की भावनाओं के परिष्कार हेतु बहुरंगी व्यक्तित्व के बहुआयामी, बहुविध पक्षों के प्रकटीकरण हेतु देवसंस्कृति में त्योहारों का प्रावधान किया गया है। ऋषिगण के दमन व विकृत होने से ही होता है। यदि भावनाओं को परिष्कृत उल्लास में बदलकर समूह की शक्ति का उसमें समावेश किया जा सके व इसे एक आध्यात्मिक उत्सव का रूप दिया जा सके, तो इससे समाज स्वस्थ रहेगा।

बात पर्व-त्योहारों के माध्यम से समाज को संस्कारित करने तक सीमित नहीं है, गुरुदेव के स्वयं के व्यक्तित्व का भी इससे गहरा जुड़ाव था। उनके मार्गदर्शक गुरुदेव वसंत पर्व पर उनसे मिले थे। अपने गुरु से मिलन के इस शुभ दिन को गुरुदेव महापर्व के रूप में मनाया करते थे। वसंत को ऋतुराज कहा गया है। इसके आगमन के अवसर पर प्रकृति का कण-कण उल्लास बिखेरता है। पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति एक नवीन चेतना से अनुप्राणित होते है। मानव-जीवन में साँस्कृतिक चेतना की अधिष्ठात्री माँ सरस्वती का अवतरण दिवस भी यही है। इसे मनुष्य में संस्कृति एवं संस्कार का शुभारंभ दिवस कहना कोई अत्युक्ति न होगी। गुरुदेव के लिए तो यह पर्व जैसे सब कुछ था। उन्होंने से आध्यात्मिक जन्मदिन की संज्ञा दी। इस शुभ पर्व से ही उन्होंने अपने जीवन के प्रायः सारे महत्त्वपूर्ण कार्यों की शुरुआत की।

गुरुदेव के जीवन में प्रथम महिमामय वसंत पंचमी सन् 1916 में आई और अंतिम वसंत पंचमी सन् 1990 में। परिजन भूले न होंगे, इस अंतिम वसंत पंचमी के अवसर पर उन्होंने अपने आत्मीय शिष्यों-स्वजनों को स्वयं बुलाया था। इस अवसर पर हुई भेंट-मुलाकात गुरु का अपने शिष्यों-स्वजनों से लौकिक रूप से अंतिम मिलन था। इस अवसर पर उन्होंने एक संदेश भी दिया था, जो ‘वसंत पर्व’ पर महाकाल का संदेश’ नाम के एक परिपत्र के रूप में प्रकाशित हुआ था। इस परिपत्र के शीर्षक से एक तत्त्व को हम लोग आसानी से समझ सकते है कि वसंत पर्व 1926 ई. को उन्होंने एक शिष्य-साधक के रूप में जो यात्रा प्रारंभ की थी। वह वसंत पर्व 1990 में महाकाल से तद्रूप होकर समाप्त हुई।

वसंत पर्व की ही तरह उनके जीवन में गायत्री जयंती का भी विशेष स्थान था। पर्व-त्योहारों का दृश्य रूप तो प्रायः सबका एक ही रहा है, पर अदृश्य रूप से सबका अपना मौलिक वैशिष्ट्य है। गायत्री जयंती, युगशक्ति गायत्री के अवतरण का पर्व है। संस्कृति पुरुष गुरुदेव की अवराम कठोर तप-साधना से प्रसन्न होकर ही आदिशक्ति गायत्री मानवी चेतना में अवतरित होने के लिए संकल्पित हुईं। गुरुदेव कहा करते थे, मनुष्य के जन्म एवं मृत्यु दोनों ही उल्लास भरे त्योहार है।, उस उसे जीना आना चाहिए। उनकी यह उक्ति उन पर खरी प्रमाणित हुई। वसंत पंचमी से जिन जीवन की उन्होंने उल्लासमय शुरुआत की थी, वह उल्लासपूर्ण ढंग से गायत्री में विलीन हो गया।

जब गुरुदेव अखण्ड ज्योति संस्थान में रहा करते थे, उस समय से जुड़े एक परिजन बताते हैं कि वह एक बार गायत्री तपोभूमि मथुरा गए। उस दिन गायत्री जयंती थीं सब ओर उल्लास-उत्सव का माहौल था। गुरुदेव एक ओर कुरसी पर बैठे थे। आने वाले लोग उनसे मिल रहे थे। इस आगंतुक परिजन ने भी गुरुदेव का चरणस्पर्श किया। प्रणाम के अनंतर बाद में खड़े होने पर उन्होंने कहा कि गुरुजी आज तो सब कुछ स्वर्गीय लग रहा है। गुरुदेव बोले, “बेटा! पर्व-त्योहार आते ही हैं हमारे जीवन में स्वर्ग अवतरित करने के लिए। इन्हें यदि ठीक ढंग से मनाया जाए, तो बाहर ही नहीं, हमारा आँतरिक जीवन भी स्वर्गीय हो जाएगा बस जरूरत पर्व में निहित प्रेरणा को आत्मसात् करने की है।”

गुरुदेव जितने गुरुभक्त थे, उतने ही शिष्यवत्सल भी। इसी की अभिव्यक्ति देने वाला पर्व गुरुपूर्णिमा है। जो उनके जीवन में सतत् अनूठा स्थान बनाए रहा। उन्होंने कई स्थानों पर लिखा है कि मैंने ईश्वर को गुरु के रूप में जाना और पाया है। कहना न होगा कि प्रत्येक वर्ष की गुरुपूर्णिमा हमें भी वैसी ही अनुभूति पाने के लिए प्रोत्साहित करती रहती है। उनकी शिष्यवत्सलता कितनी अद्भुत एवं अपूर्व थी, इसे बताते हुए एक अनुभवीजन का कथन है, बात 1979 की शुरुआत की है। गुरुदेव आलस्य-प्रमाद बरते जाने के कारण लगातार काफी नाराज हो रहे थे। एक दिन जब ये सज्जन मेहनत से अपना नियोजन कार्य करके उनके पास गए। तो उन्होंने बड़ी प्रसन्नता के साथ कहा कि आज तुमने बड़ा जोरदार काम किया है। इस प्रशंसा को सुनकर ये कहने लगे, गुरुदेव ! जब आप नाराज होते हैं, तो बड़ा डर लगता है। यह पंक्ति सुनकर गुरुदेव की आँखें छलक आईं, बोले, बेटा ! तुम सोच नहीं सकते कि मैं तुम सबको कितना प्यार करता हूँ। डाँटता तो बस दिखावटी हूँ, ताकि तुम लोग हमेशा आगे बढ़ते रहो। ऐसे थे शिष्यवत्सल गुरुदेव, गुरुपूर्णिमा जिनका उल्लास बिखेरती है।

इन तीन पर्वों के अतिरिक्त गुरुदेव कुछ अन्य प्रेरणाप्रद पर्वों को मनाए जाने के लिए उत्साहित थे। ये पर्व (1) चैत्र नवरात्रि, (2) रामनवमी, (3) श्रावणी, (4) श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, (5) सर्वपित् अमावस्या, (6) शारदीय नवरात्रि, (7) विजयादशमी, (8) दीपावली, (9) गीता जयंती, (10) शिवरात्रि, (11) होली इन सभी पर्वों में भारतीय संस्कृति के आदर्शों का सार समाया है। गुरुदेव के शब्दों में ये संस्कृति की ऐसी स्थापनाएँ हैं, जो व्यक्ति को सुसंस्कारित करने के साथ समष्टि चेतन सत्ता से एकाकार होने की व्यवस्था जुटाते है।

इन पर्व-त्योहारों के साँस्कृतिक वैभव को पुनरुज्जीवन देने वाले गुरुदेव सच्चे अर्थों में युगऋषि थे। उनमें ऋषि-महर्षियों की समन्वित चेतना कार्यरत थी, तभी तो इसकी अभिव्यक्ति विभिन्न ऋषि-परंपराओं के नवजीवन के रूप में हुई।

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कुछ कर सकने योग्य बना (kahani)

“एक साधु ने अपने सो सकने जितने आकार की एक झोपड़ी बनाई। अकेला रहता था। वर्षा की रात में एक और साधु कहीं से आया। उसने जगह माँगी। झोंपड़ी वाले साधु ने कहा, इसमें सोने की जगह एक के लिए है, पर बैठे तो दो भी रह सकते है। इस प्रकार उन दोनों ने आधी रात काटी। इतने में एक तीसरा साधु और कहीं से भीगता हुआ आ गया। वह भी आश्रय चाहता था। झोपड़ी वाले साधु ने फिर कहा, जगह तो कम है, पर खड़े होकर हम तीनों रात काट सकते है। तीनों खड़े रहकर वर्षा से बचाव करते रहे। यदि अंदर उदारता हो, वसुधैव कुटुँबकम् का भाव हो, तो कम साधनों में भी अधिक व्यक्तियों का निर्वाह होता रह सकता है।”

लोकमान्य तिलक को अंग्रेज सरकार द्वारा 1906 में गिरफ्तार किया गया था ओर उन्हें सजा सुनाकर एक स्पेशल डिब्बे से अहमदाबाद लाया जा रहा था। रास्ते में एक स्टेशन पर साथ आए हुए एक योरोपीय पुलिस अफसर ने उन्हें पाव रोटी और पानी का गिलास लाकर दिया। लोकमान्य ने वे ले लिए और सहज भाव से रोटी खाने लगे। यह देखकर उस अफसर ने कहा, “ मि.तिलक, आप जैसे विद्वान् व्यक्ति को भी इस स्थिति में रहकर मात्र रोटी और पानी पर गुजारा करना पड़ रहा है। आखिर इसमें मजा क्या है ?” लोकमान्य ने शाँतिपूर्वक उत्तर दिया, “मेरे करोड़ों देशबंधु ऐसे है, जिन्हें दो जून पेटभर खाने के लिए रोटी भी नसीब नहीं होती। इस हिसाब से मेरे लिए यह रोटी का टुकड़ा भी बहुत है। मैं उन्हीं के उपयुक्त आहार स्वयं लेकर ही तो उनके लिए कुछ कर सकने योग्य बना हूँ।”


ऋषि-परंपराओं को नवजीवन दिया युगऋषि ने

जून 1971 में हुई संस्कृति पुरुष गुरुदेव की हिमालय यात्रा, पिछली सभी यात्राओं से कही अधिक अनूठी थी। हिमालय की गहन रहस्यमयता एवं सघन दिव्यता के बीच उनके मार्गदर्शक ने उन्हें बड़े विश्वास से निहारते हुए कहा, “इस बार यहाँ की समर्थ ऋषि सत्ताओं ने तुम्हें युगऋषि का दायित्व सौंपने के लिए बुलाया है। अपने समय में संस्कृति सृजेता इन ऋषिगणों ने अपने हिस्से के काम सँभाले और पूरे किए थे। उन दिनों ऐसी परिस्थितियाँ, अवसर और इतना अवकाश भी था कि समय की आवश्यकता के अनुरूप अपने-अपने कार्यों को वे धैर्यपूर्वक उचित समय में संपन्न करते रह सकें, पर अब तो आपत्तिकाल है। इन दिनों अनेकों काम एक ही समय में द्रुतगति से निपटाने हैं।”

“इसके लिए महान् ऋषियों ने तुम्हें चुना हैं ये ही तुम्हें कार्य के अनुरूप प्रेरणा, दिशा एवं सहायता जुटाते रहेंगे। इनकी समन्वित शक्ति-सामर्थ्य तुम्हारे माध्यम से अभिव्यक्त होगी। तुम्हें बस युग के अनुरूप इन समर्थ ऋषिगणों की सुप्त हो चुकी परंपराओं को जाग्रत् एवं जीवंत बनाना है। इसे यों भी कह सकते हैं कि पुरातनकाल में इन महर्षियों द्वारा संचालित-अन्वेषित परंपराओं को नवजीवन देना है। मार्गदर्शक ने बातों-ही-बातों में यह भी बताया कि युग परिवर्तन का जो कार्य किया जाना है, वह होना तो भगवान् की इच्छा-योजना के आधार पर ही है, पर भगवान् हमेशा ही अपने कार्य का श्रेय उस युग की श्रेष्ठतम जीवनमुक्त ऋषिकल्प आत्मा को देते हैं। वर्तमान युग में वह तुम हो और तुम्हारे माध्यम से यह श्रेय तुम से, तुम्हारे विचारों एवं आँदोलन से जुड़े लाखों-करोड़ों नर-नारियों को मिलेगा।”

अपने मार्गदर्शक की यह बात गुरुदेव को अत्यंत प्रीतिकर एवं सुखकर लगी कि श्रेय उनकी शिष्य-संतानों, कर्मठ कार्यकर्त्ताओं को मिलेगा, पर उनके हृदय में पुरातनकाल के ऋषिगणों के बारे में जानने की जिज्ञासा अंकुरित हो रही थी। उनके हृदय में उठते स्पंदन सम्मुख खड़े देवपुरुष से छिपे न रह सके। उन्होंने बताना शुरू किया, अब पुरातनकाल के ऋषियों में से प्रायः किसी का भी स्थूलशरीर नहीं है, पर सूक्ष्मशरीर में उनकी चेतना अभी भी निर्धारित स्थानों में मौजूद है, इन्हीं की कार्यपद्धति अपनानी है। उन्हें यह भी बताया गया कि शाँतिकुँज हरिद्वार में देवात्मा हिमालय का प्रतीक विनिर्मित करना है और वहीं से ऋषि-परंपरा को इस प्रकार क्रियान्वित करना है, जिससे युग परिवर्तन की प्रक्रिया का गतिचक्र सुव्यवस्थित रूप से चल सके।

अब बारी इन महर्षिगणों से मिलने की थी। अपने मार्गदर्शक के साथ गुरुदेव अद्भुत-अकल्पनीय रीति से हिमालय के और भी अधिक गहन व सघन रहस्यमय क्षेत्र में पहुँचे। वहाँ पहुँचने पर ऐसा कुछ लगा कि इन महर्षियों-संतों की आत्माएँ इन गुरु-शिष्य के आगमन से पहले ही अवगत थी। वहाँ विश्वामित्र सहित सभी सप्त ऋषिगण थे। इनके अलावा भगवान् परशुराम, वेदव्यास, देवर्षि नारद, आद्य शंकराचार्य, महर्षि पतंजलि आदि लोकोत्तर देवपुरुष थे। चैतन्य महाप्रभु, संत ज्ञानेश्वर एवं गोस्वामी तुलसीदास आदि संतों की उपस्थिति कार्य की गुरुता एवं उसके अलौकिक महत्त्व को दिखा रही थी।

इन सभी ने जो कहा, उसका सार यही था कि युग परिवर्तन के लिए जितनी आकुलता व उत्साह स्थूल जगत् में है, उससे कहीं अधिक भाव तरंगें सूक्ष्म जगत् में उमंग रही है। कार्यकर्ताओं की कर्मठता व कर्म-कुशलता का जो उफान एवं तूफान स्थूल जगत् व लौकिक रूप में दिखलाई पड़ता है, संतों-महर्षियों व देवपुरुषों की सूक्ष्म सक्रियता इससे अनेकों गुना अधिक हैं सभी कठोरतम तपश्चर्या व गुह्य-गहन साधनाओं के द्वारा प्रभु के संकल्प को मूर्त करना चाहते है। सबने अपने-अपने ढंग से इस बात का आश्वासन दिया कि जो भी हमारी परंपरा को आगे बढ़ाने में सहायक होगा, उसे हम अपनी तप-शक्ति का बहुमूल्य अंश प्रदान करेंगे।

गुरुदेव से कहा गया कि तुम महर्षियों द्वारा अन्वेषित-संचालित परंपराओं का बीजारोपण शाँतिकुँज में करो। हिमालय की दिव्य ऊर्जा उसे पोषित संवर्द्धित करेगी। हिमालय के अलौकिक अनुदानों एवं महर्षियों के दिव्य अनुबंधों को साथ लिए संस्कृति पुरुष गुरुदेव शाँतिकुँज आ गए और उन्होंने विश्वामित्र की गायत्री साधना, महर्षि पतंजलि की योगविद्या, वेदव्यास का लेखन, भगवान् परशुराम का विचारक्राँति अभियान, याज्ञवल्क्य का यज्ञ विधान, देवर्षि नारद का संगीत, महर्षि चरक का आयुर्वेद आदि सभी ऋषि-परंपराओं को नवजीवन देना शुरू किया।

आज ये और ऐसी अनेक ऋषि-परंपराएँ शाँतिकुँज से संचालित हो रही है। हिमालय के समर्थ ऋषिगणों के तप-अनुदानों से इनकी गति अनुदिन बढ़ती जा रही है। इन समर्थ ऋषियों ने युगऋषि गुरुदेव को एक आश्वासन और भी दिया था कि वे स्वयं भी शाँतिकुँज में सूक्ष्म रूप से निवास कर इस परिसर की दिव्यता में अभिवृद्धि करेंगी। महर्षियों के आश्वासन, उनकी परंपराओं के रूप में पुष्पित-पल्लवित हो रहे हैं-इस दृश्य सत्य को तो हम सभी देखते है, पर कतिपय सूक्ष्मद्रष्टा समर्थजन ऐसे भी हैं, जो युगऋषि के साथ समर्थ महर्षियों के सूक्ष्म सत्य को भी देखकर विभोर होते रहे है।

ऐसे ही एक दिव्यदृष्टा समर्थ पुरुष पं. मदनमोहन मिश्र सन् 1990 के अगस्त महीने में पधारे थे। दरअसल इन्हें एक साधनाजन्य अनुभूति इन्हें यहाँ ले आई थी। इन्होंने परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का भगवान् शिव एवं आदिमाता पार्वती के रूप में साक्षात्कार किया था। पं. मदनमोहन मिश्र अपनी तप-शक्ति व योग-सामर्थ्य से कठिन-से-कठिन लौकिक कार्यों को तुरत-फुरत कर देते थे। जब उनसे पूछा गया कि ऐसी अतुलनीय सामर्थ्य के स्वामी होते हुए वह यहाँ क्यों आए हैं, तब उन्होंने अपनी अनुभूति का भेद खोला। उन्होंने थोड़ा दुखी होते हुए कहा, लगता है मेरी तप-साधना में कुछ न्यूनता है, तभी तो गुरुदेव ने अपना रहस्य जीते-जी मेरे ऊपर प्रकट नहीं होने दिया। अब तो मैं वंदनीया माताजी से दीक्षा लेने आया हूँ, ताकि मरने से पूर्व मेरा कल्याण हो सके।

उन्होंने अपने शांतिकुंज आगमन के दूसरे दिन दो अगस्त, सन् 1990 को एक विलक्षण बात कही, अरे शाँतिकुँज तो धरती की अद्भुत जगह है, यहाँ देवता एवं ऋषिगण सूक्ष्म शरीर से भ्रमण करते है। जिससे उन्होंने बताया, उसने उनसे यह पूछा, यह सब आपको कैसे दिखाई दिया, तो वे बोले, इसमें खास बात क्या है, आज्ञाचक्र का पूर्ण विकास होने पर तुम भी इसे देख सकते हो। अपने बातचीत के क्रम में उन्होंने यह भी कहा, गुरुदेव युगऋषि हैं, युगावतार है, शिवस्वरूप साक्षात् महाकाल हैं। उनकी बातों पर शंका करने जैसी कोई बात नहीं है। उनकी बातों को अभी भले ही कोई न समझे, पर इक्कीसवीं सदी का पहला दशक पूरा होते-होते दुनिया जानेगी कि उन्होंने क्या किया पं. मदनमोहन मिश्र ने तो मई 1991 में अपना शरीर छोड़ दिया, पर उनकी अनुभूतियाँ अभी भी सत्य है। इस आध्यात्मिक सत्य को ही बोधगम्य, बुद्धिगम्य बनाने के लिए संस्कृति पुरुष गुरुदेव ने वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का प्रवर्तन किया।


उन्हें ठिकाने लगा दिया (kahani)

“ एक बहुत बड़ा सरोवर था। उसके उत्तर तट पर मोर रहता था, क्षिण रिसे पर मोरनी से एक दिन मोर ने प्रस्ताव रखा कि हम तुम विवाह कर लें, तो कैसा अच्छा रहे? मोरनी ने पूछा, तुम्हारे मित्र कितने है ? उसने ‘नहीं’ में उत्तर दिया, तो मोरनी ने विवाह से इनकार कर दिया।

मोर सोचने लगा सुखपूर्वक रहने के लिए मित्र बनाना भी आवश्यक है। उसने पूर्व तट पर रहने वाले सिंह से, पश्चिम तट पर रहने वाले कछुए से और बगल में रहने वाली सिंह के लिए शिकार का पता लगाने वाली टिटहरी से दोस्ती कर लीं जब उसने यह समाचार मोरनी को सुनाया, तो वह तुरंत विवाह के लिए तैयार हो गई। पेड़ पर घोंसला बनाया और उसमें अंडे दिए, और भी कितने ही पक्षी उस पेड़ पर रहते थे। एक दिन शिकारी आए। दिन भर कहीं शिकार न मिला तो वे उसी पेड़ की छाया में ठहर गए और सोचने लगे, पेड़ पर चढ़कर अंडे-बच्चों से भूख बुझाई जाए। मोर दंपत्ति को भारी चिंता हुई, मोर मित्रों के पास सहायता के लिए दौड़ा। टिटहरी ने जोर-जोर से चिल्लाना शुरू किया। सिंह समझ गया, कोई शिकार है। वह उसी पेड़ के नीचे चला, जहाँ शिकारी बैठे थे। इतने में कछुआ भी पानी से निकलकर बाहर आ गया। सिंह से डरकर भागते हुए शिकारियों ने कछुए को ले चलने की बात सोची। जैसे ही हाथ बढ़ाया कछुआ पानी में खिसक गया। शिकारियों के पैर दलदल में फँस गए। इतने में सिंह आ पहुँचा और उन्हें ठिकाने लगा दिया।

मोरनी ने कहा, मैंने विवाह से पूर्व मित्रों की संख्या पूछी थी, सो बात काम की निकली न, यदि मित्र न होते, तो आज हम सबकी खैर न थी।”


विज्ञान व अध्यात्म के समन्वयन ने दिया संस्कृति को नया मोड़

वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का प्रवर्तन, संपूर्ण विश्व को संस्कृति पुरुष गुरुदेव का दिव्य अनुदान है। सामान्यतया आध्यात्मिक साधनाओं को गुह्य, गहन और गोपनीय मानने की परंपरा रही है। इसी तरह देवसंस्कृति के विविध पहलुओं को श्रद्धा एवं विश्वास के दायरे में सीमित किया जाता रहा है। गुरुदेव ने पहली बार इस क्षेत्र में तर्क, तथ्य एवं प्रमाणसम्मत प्रयोगधर्मिता की आवश्यकता समझी। उन्होंने स्पष्ट किया कि विज्ञान और अध्यात्म की समन्वित शक्ति के आविर्भाव तथा उसकी समग्र प्रगति के लिए उपयोग करने का प्रयत्न जितना ही सफल होगा, उतना ही मानवी गरिमा को सुरक्षित और देवसंस्कृति को जीवित रहने का अवसर मिलेगा।

विज्ञान व अध्यात्म के समन्वयन के प्रयत्न गुरुदेव ने सन् 1972 के बाद से ही प्रारंभ कर दिये थे। इस क्रम में उन्होंने पहले-पहले गायत्री परिवार के उन परिजनों के साथ परिचर्चा की, जिनकी बौद्धिक पृष्ठभूमि वैज्ञानिक थी। इसके अलावा उन्होंने स्वयं आधुनिक विज्ञान के अनेकों ग्रंथों का गहन अध्ययन किया। सन् 1966 ई. अक्टूबर महीने में इस प्रसंग की चर्चा करते हुए उन्होंने स्वयं उन दिनों की गतिविधियों को स्पष्ट किया। उन्हीं के शब्दों में, “वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के प्रवर्तन के संदर्भ में मैं देश के कई विद्वानों से मिला।” वह रामकृष्ण मिशन, रायपुर (म.प्र.) के स्वामी आत्मानंद की वैज्ञानिक अभिरुचि के व्यक्ति होने के साथ तपस्वी साधक एवं लोकसेवी भी थे। इन्होंने गुरुदेव को विज्ञान विषय से संबंधित कई उत्तम ग्रंथ उपलब्ध कराए।

विभिन्न अवरोधों एवं अविषय व्यस्तता के बावजूद उनका यह युगाँतरकारी कार्य चलता रहा, लेकिन इसका यथार्थ विकास उनकी सन् 1971 की हिमालय यात्रा के समय हुआ। हम हिमालय प्रवास का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए उन्होंने मार्च 1989 की अखण्ड ज्योति में लिखा, “हिमालय, गंगातट, एकाँत, जनसंपर्क पर प्रतिबंध जैसी कष्टसाध्य गतिविधियाँ अपनाने के पीछे एक रहस्य यह भी है कि वह प्रदेश एवं वह वातावरण ही उच्च आध्यात्मिक स्तर की शोधों के लिए उपयुक्त हो सकता है। स्थान की दृष्टि से वह स्थान अध्यात्म शक्ति तत्त्वों का ध्रुवकेंद्र या हृदय ही कहा जा सकता है, जहाँ हमें अगले दिनों जाना है। वहाँ ऐसी विभूतियाँ अभी जीवित है, जो इस महान् कार्य में हमारा मार्गदर्शन कर सकें। इस प्रकार की शोध-साधना अपने व्यक्तिगत वर्चस्व के लिए नहीं, विशुद्ध रूप से लोक-मंगल के लिए करने जा रहे है और जो कुछ हमें मिलेगा, उसकी राई-रत्ती सार्वजनिक ज्ञान के रूप में प्रस्तुत करते रहेंगे। जब तक जीवन शेष रहेगा, तब तक यही करना है।”

हिमालय प्रवास से वापसी के बाद गुरुदेव ने अपनी शोध के वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण के लिए विविध प्रयास किए। इन प्रयासों का स्वरूप स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा, “भौतिक विज्ञान का लाभ जनसाधारण को मिल सका और उसने अपनी महत्ता जन-मानस में स्थापित की। आज विज्ञानसम्मत बातों को ही सच माना जाता है, जो उस कसौटी पर खरी नहीं उतरती, उन्हें मिथ्या घोषित कर दिया जाता है। आस्तिकता, धार्मिकता तथा आध्यात्मिकता की मान्यताओं को हमें विज्ञान के आधार पर सही सिद्ध करने का प्रयत्न करना पड़ रहा है। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की एक नई दिशा का निर्माण करना पड़ रहा है।”

इस नई दिशा की विनिर्मिति पहले-पहले अखण्ड ज्योति के लेखों के माध्यम से हुई। बाद में उन्होंने ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की संस्थापना की। इस बारे में उन्होंने नवंबर 1976 की अखण्ड ज्योति में लिखा, “अखण्ड ज्योति परिजनों को यह जानकर हर्ष और गर्व होगा कि अध्यात्म और विज्ञान को जोड़ने वाले जो प्रतिपादन अब तक पत्रिका के पृष्ठों पर किए जाते रहे है, अब उन्हें प्रत्यक्ष प्रमाणित करने के लिए सुसंपन्न प्रयोगशाला खड़ी की जा रही है। अध्यात्म सिद्धाँत विज्ञान की कसौटी पर भी खरे उतरते है। उसमें अनेकानेक पक्षों को प्रयोगशाला में सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाएगा। इस परीक्षण से उन लोगों के मुँह बंद हो सकेंगे, जो अध्यात्म सिद्धाँतों को अंधविश्वास कहने में अपनी शान समझते है।”

बीते वर्षों के ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में वैज्ञानिक ही नहीं, दार्शनिक एवं साहित्यिक शोधकार्य भी व्यापक मात्रा में संपन्न हुआ है। भारतीय संस्कृति के विविध पक्ष यहाँ की शोध के विषयवस्तु रहे है। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के निदेशक के मार्गदर्शन में तकरीबन 30 से अधिक छात्र-छात्राओं ने देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से एम.फिल, पी.एचडी एवं डि.लिट. उपाधियाँ अर्जित की है। वे शोध-उपाधियाँ दर्शन शास्त्र, अँग्रेजी साहित्य, हिंदी साहित्य एवं संस्कृत साहित्य आदि विविध विषयों में अर्जित की गई है। विषयों की विविधता के बावजूद इन सभी शोध-अध्ययनों का उद्देश्य भारतीय संस्कृति के ही किसी सुप्त एवं लुप्त पहल को उद्घाटित करना रहा है। किसी-न-किसी रूप में इनमें संस्कृति पुरुष की चिंतन-चेतना ही सक्रिय हुई है।

प्रायः परिजनों की जिज्ञासा ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान से प्रकाशित होने वाले वैज्ञानिक शोध प्रकाशनों के लिए रही है। गुरुदेव के जीवनकाल में भी यह जिज्ञासा यदा कदा मुखरित होती रहती थी। ऐसी ही एक जिज्ञासा के उत्तर में उन्होंने कहा, अभी समय नहीं आया है। कुछ पल चुप रहने के अनंतर वे फिर बोले, जानता है क्या है ब्रह्मवर्चस् की शोध ? इस प्रश्न का श्रोता से कोई समाधान न पाकर वह कहने लगे, मेरा एक सूक्ष्मशरीर (ज्ञातव्य हो कि गुरुदेव ने अपने पाँच सूक्ष्मशरीर विकसित किए थे, जिसे उन्होंने अपने पाँच वीरभद्रों की संज्ञा दी थी) हिमालय में हमेशा तप करता रहता है। इसके द्वारा मैंने अथर्ववेदीय परंपरा के अंतर्गत अगणित शोध कार्य संपन्न किए हैं इस क्रम में मैंने वैज्ञानिक अध्यात्म का नया स्वरूप गढ़ा है। पूर्णाहुति के बाद तुम लोगों के माध्यम से स्थूल जगत् में इसका प्रत्यक्षीकरण भी करवा लूँगा।

ऋषि वाणी सदा सत्य ही सिद्ध होती है। बुद्धिवादी इसे संयोग कहें या कार्यव्यस्तता, परंतु अनेक वर्षों तक किए गए परीक्षणों व इनसे उपलब्ध विधेयात्मक आंकड़ों के बावजूद इसका प्रकाशन नहीं बन पड़ा। हाँ, अभी कुछ ही दिन पहले शोध कार्य को नया स्वरूप देने के लिए एक रिसर्च प्रोजेक्ट हाथ में लिया गया। यह प्रोजेक्ट हैं, ‘च्ीलेपवसवहपबंस दक ठमींअपवनतंस त्मेचवदबमे विभ्नउंद नइरमबजे विससवूपदह श्रंचंए क्ीलंदं दक मसमबजमक लवहपब मगमतबपेमण्’ (फिजियोलॉजिकल एण्ड विहेवियरल रिसपान्सेज ऑफ ह्यूमन सब्जेक्ट्स फालोइंग जप, ध्यान एण्ड सेलेक्टेड योगिक एक्सरसाइजेस) यह शोध कार्य ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के निदेशक एवं गुरुकुल विश्वविद्यालय के जीवन वान संकाय के प्रोफेसर बी.डी.जोशी के संयुक्त मार्गदर्शन में हो रहा है। इस शोध कार्य के अतिरिक्त ब्रह्मवर्चस के निदेशक के निर्देशन में अध्यात्म एवं यज्ञ विधा व आयुर्वेद के अब तक जुटाए गए शोध आंकड़ों को व्यवस्थित रूप देकर शोध पत्र तैयार किए जा रहे है। परिजन इस कार्य के प्रकाशित होने के बाद अनुभव करेंगे कि यह सब गुरुदेव द्वारा सूक्ष्म रूप में किए कार्य का ही स्थूल प्रत्यक्षीकरण है। सब कुछ उन्हीं के द्वारा नियत समय में, उन्हीं की निर्धारित योजना के अनुसार हो रहा है। वे सचमुच साँस्कृतिक संवेदना के मूर्त स्वरूप है। उनकी चेतना ही वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के रूप में प्रवर्तित हो रही है।


सभी नागरिक समान (kahani)

“उस समय संयुक्त प्राँत के राज्यपाल सर हारकोर्ट बटलर थे। जो आराम-पसंदगी के कारण नवाब साहब के नाम से जाने जाते थे। वह आवश्यकता पड़ने पर राजधानी लखनऊ से प्रयाग भी आते और राजभवन में ठहरते। उनके स्नान के लिए एक बड़े कुँड की व्यवस्था थी, जिसमें पानी भरा रहता था। उन दिनों प्रयाग में पानी की बहुत कमी थी। नलों में बहुत थोड़े समय के लिए पानी आता था। जब पीने के लिए पानी मिलना कठिन हो रहा था, उस समय राजभवन के कुँड के लिए पानी कहाँ से मिलता। राज्यपाल के अंगरक्षक दौड़े-दौड़े नगरपालिका अध्यक्ष के घर गए।

उस समय अध्यक्ष पद पर टंडन जी कार्यरत थे। वह जान्सटनगंज के एक छोटे-से मकान में रहते थे। अंगरक्षकों ने टंडन जी के घर जाकर देखा कि वे जमीन टाट बिछाए काम कर रहे है। चारों ओर कागज फैले हुए हैं। अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित उन अंगरक्षकों को भी वही जमीन पर बैठकर अपनी बात कहनी पड़ी। फर्नीचर की व्यवस्था उनके उस छोटे मकान में थी नहीं। अध्यक्ष महोदय ने उनकी बात बड़ी गंभीरता से सुनी और यह जानते हुए भी कि जिस व्यक्ति के संबंध में निर्णय दिया जा रहा है, उसकी नाराजी कुछ-से-कुछ कर सकती है।, बिना डरे उन्होंने उत्तर दिया, जब मैं नगरवासियों के पीने के लिए पर्याप्त जल की व्यवस्था नहीं कर पा रहा हूँ, तब फिर नवाब साहब के नहाने के लिए व्यवस्था कहाँ से करूं ? व्यवस्था होगी तो सबके लिए समान रूप से होगी। मेरे लिए सभी नागरिक समान हैं।”


साँस्कृतिक संवेदना को मिला मूर्त रूप

संवेदना से संस्कार पनपते है, जिनसे संस्कृति अपना आकार लेती है। संस्कृति पुरुष परमपूज्य गुरुदेव के जीवन में चहुँओर यही सत्य बिखरा हैं जो भी उनसे मिलता गया, उनकी संवेदना का स्पर्श पाकर उनसे जुड़ता गया। श्रद्धासिक्त हृदय में वे संस्कारों का बीज डालते गए और आत्मीयता के सूत्रों में बँधता परिकर, परिवार का रूप लेता गया। इस तरह संस्कार और संवेदना दोनों ने मिलकर विराट् संगठन के रूप में गायत्री परिवार को जन्म दिया।

वस्तुतः परमपूज्य गुरुदेव साँस्कृतिक संवेदना के मूर्त रूप थे। यदि दो शब्दों में उनके व्यक्तित्व रूपी महासागर को समेटना हो, तो वे दो शब्द होंगे, प्रेम व करुणा। करुणा, प्रेम, छलकती संवेदना, उफनती भावनाएँ ही उनके व्यक्तित्व के उपयुक्त पर्यायवाची शब्द है। जो भी उनसे मिला, वही इस प्रेमरस का स्वाद चखकर निहाल हो गया। प्रेम का स्वाद पाकर औरों को भी करा देना, अपने में गहरी और दुःसाध्य साधना का अंतिम परिणाम है। सामान्य व्यक्तियों की बात तो दूर, महामानवों में से बहुत कम ही इस अंतिम सीढ़ी पर चढ़ सकने में सफल होते है।

परमपूज्य गुरुदेव का समूचा जीवन साँस्कृतिक संवेदना के विकास की दुष्कर तप साधना था। जिसका अंकुरण बचपन में ही उन्हें असहाय, बूढ़ी, कुष्ठ रोग से पीड़ित मेहरबानी की सेवा करने, कसाई के हाथ पड़ी गाय की जीवन रक्षा करने के लिए विवश करने लगा। धीरे-धीरे जीवन की हर चेष्टा संवेदना की कसक बन गई। इस स्थिति में उनकी अंतःभूमि की क्या दशा थी, उन्हीं के शब्दों में, “इन दिनों बहुत करके रात में जब आँख खुल जाती है, तो हमें विदाई का दृश्य दिखाई देने लगता है। स्मृति पटल पर स्वजनों की हँसती बोलती मोह ममता से भरी एक कतार उमड़ती चली आती है। सभी एक से एक बढ़कर प्रेमी, सभी एक से बढ़कर आत्मीय, सभी की एक से एक बढ़कर ममता। इस स्वर्ग में से हमें कोई कहाँ क्यों लिए जा रहा है ? इन्हें छोड़कर हम कहाँ रहेंगे ? कैसे रहेंगे ? कुछ भी तो सूझ नहीं पड़ता। आंखें बरसती रहती है और सिरहाने रखे वस्त्र गीले होते रहते हैं।’ (अखण्ड ज्योति जनवरी, 1971)।

संवेदना के उफान में सुख, सुविधा स्वार्थपरता एवं अपने पन आदि न जाने कहाँ विरोहित होते गए, गुरुदेव के शब्दों में, “अपने को क्या कुछ कष्ट या अभाव है, इसे सोचने को फुरसत ही कब मिली? अपने सुख-साधन चाहिए इस का ध्यान ही कब आया है। विलासिता की सामग्री जहर-सी लगती हैं विनोद और आराम के साधन जुटाने की बात कभी सामने आई, तो आत्मग्लानि से उस क्षुद्रता को धिक्कारा, जो मरणासन्न रोगियों के प्राण बचा सकने में समर्थ पानी एक गिलास को अपने पैर धोने की विडंबना में बिखेरने के लिए ललचाती है। भूख से तड़पकर प्राण त्यागने की स्थिति में पड़े हुए बालकों के मुख में जाने वाला ग्रास छीनकर कैसे अपना भरा पेट और भरे? दर्द से कराहते बालक से मुँह मोड़कर पिता कैसे शतरंज का साज सजाए ?” (अखण्ड ज्योति मार्च, 1971)।

“किसी का मूल्याँकन बहिरंग रूप से नहीं, उसकी संस्कार निधि द्वारा किया जाना चाहिए। किसी ने पूछा कौए का रंग कैसा है?” सीधा उत्तर था, काला पर विचारशील ने कहा,”नहीं, वह लाल और सफेद भी है। बाहर से न दीख पड़ने वाला उसका खून लाल और अस्थि-पंजर सफेद होता है।” बाहर से जो दिखता है वही सब कुछ नहीं है।”

संवेदना का यह जागरण, अपने सर्वस्व के उत्सर्ग का साहस भी साथ ले आता है। इसके बल पर, गुरुदेव के शब्दों में, “जो पाया उसका एक एक कण हमने उसी प्रयोजन के लिए खरच किया, जिससे शोक संताप की व्यापकता हटाने और संतोष की साँस ले सकने की स्थिति में थोड़ा योगदान मिल सके।” यही क्यों, वह तो अपना उदाहरण सामने रखते हुए हम -आपको भी निर्देश देते है, “नव निर्माण की लाल मशाल में हमने अपने सर्वस्व का तेल टपकाकर उसे प्रकाशमान रखा है। अब परिजनों की जिम्मेदारी है कि वे उसे जलते रखने के लिए अपने अस्तित्व के सार तत्व को टपकाएँ।”

साँस्कृतिक संवेदना का विकास एवं विस्तार जब समष्टि में हुआ, तो यह करुणा में बदल गई। यह स्थिति, जंगल की किसी अनजान पगडंडी के किनारे खिले एक गुलाब के फूल जैसी है, जो भी आता है, सम्राट हो या भिखारी, वही उसकी खुशबू एवं प्रेमिल मुस्कान से विभोर होता चला जाता है। कोई नहीं आए, तो भी वह अपनी सुरभि अनंत में फैलता रहता है। सुरभि बिखेरना, मुस्कान लुटाना उसकी स्वाभाविक अवस्था है। यह करुणा से ओत-प्रोत व्यवस्था को प्राप्त व्यक्ति के अंतः करण की भी स्वाभाविक अवस्था है।

परमपूज्य गुरुदेव के अंतःकरण में करुणा का यह उमड़ता सागर पुकार उठता है, “जब तक व्यथा-वेदना का अस्तित्व इस जगती में बना रहे, जब तक प्राणियों को क्लेश और कष्ट की आग में जलना पड़े, तब तक हमें भी चैन से बैठने की इच्छा न हो। जब भी प्रार्थना का समय आया, जब भगवान् से यही निवेदन किया, हमें चैन नहीं करुणा चाहिए, जो पीड़ितों की व्यथा को अपनी व्यथा समझने की अनुभूति करा सके। हमें समृद्धि नहीं, वह शक्ति चाहिए, जो आँखों से आँसू पोंछ सकने की अपनी सार्थकता सिद्ध कर सकें। बस इतना ही अनुदान-वरदान भगवान् से माँगा और लगा कि द्रौपदी को वस्त्र देकर उसकी लज्जा बचाने वाले भगवान् हमें करुणा की अनंत संवेदना से ओत-प्रोत करते चले जाते हैं।”

साँस्कृतिक संवेदना की परमावस्था अपनी व्यापकता में सघन शाँति, अविराम प्रसन्नता एवं गहरी एकात्मता के रूप में प्रकट हुई, जिसे ‘प्रेम’ कहते है। संवेदना के चरमोत्कर्ष की यह स्थिति, रामकृष्ण कहा करते थे, सबको उपलब्ध नहीं होती। उनके अनुसार तीन अतिमानव ही इसके रस को चख पाए। इनमें प्रथम हैं, राधा, दूसरे चैतन्य एवं तीसरे स्वयं रामकृष्ण । वर्तमान युग में पुनः श्री रामकृष्ण ने स्वयं ‘श्रीराम’ के रूप में आकर पुनः एक बार घोषित किया, “हमने एक ही रस चखा है, वह है प्रेम का।”

यह प्रेम ही तो परमात्मा है, जो सृष्टि के कण-कण में समाया है, पर सबसे अधिक जहाँ उन्होंने परमात्मा की घनिष्ठता अनुभव॰ की , इसे उन्हीं के शब्दों में कहे, “परिजन हमारे लिए भगवान् की प्रतिकृति है और उनसे अधिकाधिक गहरा प्रेम प्रसंग बनाए रखने की उत्कंठा उमड़ती रहती है। इस वेदना के पीछे भी एक ऐसा दिव्य आनंद झाँकता है, इसे भक्तियोग के मर्मज्ञ ही जान सकते है” आराध्य सता का यह भाव प्रवाह आज सूक्ष्म जगत् में और भी प्रखरता से विद्यमान् है। अपनी संवेदना थोड़ी भी जाग्रत में और भी प्रखरता से विद्यमान् है। अपनी संवेदना थोड़ी भी जाग्रत है, तो इस प्रवाह को अनुभव किया जा सकता है और यह तब तक बना रहेगा, जब तक कालजयी आत्मचेतना का अस्तित्व है। विश्वास न हो रहा हो, तो सुने उनकी वाणी, “लोगों की आंखें से हम दूर हो सकते है, पर हमारी आँखों से कोई दूर न होगा। जिनकी आंखें में हमारे प्रति स्नेह और हृदय में भावनाएं है। उन सबकी तस्वीरें हम अपने कलेजे में छिपाकर ले जाएंगे और उन देव प्रतिमाओं पर निरंतर आँसुओं का अर्घ्य चढ़ाया करेंगे। कह नहीं सकते, उस ऋण होने के लिए प्रत्युपकार का कुछ अवसर मिलेगा या नहीं, पर यदि मिला तो अपनी इन देव प्रतिमाओं को अलंकृत और सुसज्जित करने में कुछ उठा न रखेंगे। लोग हमें भूल सकते है, पर हम अपने किसी स्नेही को भूलेंगे नहीं।” (अखण्ड ज्योति फरवरी, 1979)।

प्रेम करुणा से भरी आराध्य सत्ता की साँस्कृतिक संवेदना ही गायत्री परिवार के रूप में महापूर्णाहुति के इन क्षणों में परिजनों के श्रद्धासिक्त एवं स्नेहिल हृदयों में छलकती एवं हिलोरें मारती देखी जा सकती है। जिनका प्रत्येक चरण गुरुसत्ता के पग चिह्नों का अनुगमन कर रहा है। गायत्री परिवार के परिजनों का हर प्रयास पूज्यवर की संवेदनामूलक साँस्कृतिक क्राँति को मूर्त रूप देने के लिए आगे बढ़ा है, जो मनुष्य, समाज, राष्ट्र एवं विश्व को एक भाव सूत्र में पिरोने के लिए तत्पर है।


जड़े ही खोखली हो गई (kahani)

“आँधी का तेज झोंका आया और वृक्ष को जड़ से उखाड़कर नीचे गिरा गया । वृक्ष को धरती पर बड़ा गुस्सा आया। बड़बड़ाते हुए बोला ‘आज जो मेरी दुर्गति हुई, उसके लिए तू ही उत्तरदायी है। तूने मेरी खुराक बंद कर दी। एक दो दिन की बात होती, तो मैं सहन कर लेता। मैं भूख और प्यास से तड़प-तड़पकर सूख गया और तूने मेरे साथ यह निर्दयता दिखाई। अब भूमि पर पड़ा देखकर तेरा कलेजा ठंडा गया।”

वृक्ष की यह जली-कटी बाते सुनकर धरी बड़ी दुःखी हुई, वह बोली, “भला माँ अपने बच्चे की दुर्गति देखकर कभी खुश हो सकती है। मैं तो तुम सभी के लिए अपने अंतर में जल तथा अन्य पौष्टिक तत्त्वों को समेट-समेटकर रखती हूँ। जिस प्रकार तुम जैसे वृक्ष-फलों का उपयोग अपने लिए न कर दूसरों को बाँटते रहते हो, वैसे ही एकत्रित खुराक को मैं भी तुम सबके लिए ही रखती हूँ और आवश्यकतानुसार देती रहती हूँ, पर तुम्हारी जड़े ही खोखली हो गई थी, इसके लिए मैं क्या करती ?”


साँस्कृतिक क्राँति के अग्रदूत

भौगोलिक दृष्टि से इनसान एक दूसरे के इतना नजदीक कभी नहीं रहा, जितना कि वह आज है। विज्ञान की प्रगति ने दुनिया को एक गाँव में तब्दील कर दिया है, किन्तु घर, परिवार, राष्ट्र एवं विश्व के कोने में दरारें, टूटन, बिखराव फैला पड़ा है। सभी की दौड़ अलगाव की ओर है। प्रत्येक स्वयं में आतंक से सहमा है और औरों को आतंकित कर रहा है। भौगोलिक समीपता के बावजूद भावनात्मक स्तर पर विश्व की यही दिशा है। दार्शनिकों से लेकर राजनीतिज्ञों तक सभी इसी उधेड़ बुन में है कि बिखरती जा रही मनुष्य जाति को कैसे समेट-बटोरकर एक सूत्र में बाँधा जाएं?

संस्कृति पुरुष गुरुदेव के अनुसार, इतिहास के पन्नों पर गौर करें तो एकता के प्रयास निताँत आधुनिक नहीं है। यूनान और रोम के विजय अभियान रचने वालों ने भी अपना मकसद यही बताया था। सिकंदर का मन विश्वराष्ट्र की सुखद कल्पनाओं से रंगा था। अंग्रेजों ने यही उद्देश्य प्रचारित कर अपने उपनिवेश स्थापित किए थे, विश्व को एक करूंगा हिटलर ने इसी संकल्प की आड में अपना ताना-बाना बुना था। 20वीं सदी के दूसरे दशक में मार्क्स के साम्यवाद का नारा देकर स्टालिन ने रूस में छोटे पैमाने के पर यही करतब दिखाने की कोशिशें की, लेकिन ये ढेरों प्रयास पुरुषार्थ अपनी चरम परिणति में एकता से उतनी ही दूर रहे, जैसे आकाश से धरती।

इतिहास के इन अभियानों का बारीकी से सर्वेक्षण करने पर इनकी विफलता का कारण ज्ञात होता है कि एकता के नाम पर ज्यादातर कोशिशें आधिपत्य की रहीं। छह सौ करोड़ मनुष्य के जगत में ऐसों की संख्या दो-चार मुट्ठी से अधिक न होगी, जिनका एकता की ओर झुकाव रहा हो। अतः मनुष्य को अपने पूर्व अनुभवों से एकता का एक ही अर्थ मालूम हो सका है, स्वतंत्रता का अपहरण व मौलिकता का छिन जाना और अब तक के हुए प्रयासों में यह बात सच भी है, क्योंकि आधिपत्य की इनकी शैली को न तो मानवीय व्यक्तित्व की बारीकियों का पता है और न उसकी मौलिकता के रक्षण की जानकारी।

वस्तुतः ऐसे अधिकाँश प्रयास राजनीतिक क्राँति प्रधान रहे हैं। इसका ऐतिहासिक उदाहरण है, राष्ट्र सीमाओं को लाँघ चुका रोमन साम्राज्य। इसका व्यापक सुरक्षा प्रबंध जहाँ सराहनीय था, वहीं व्यक्ति, नगर, प्रदेश को अपने स्वाधीन जीवन एवं सहज सृजन की विजयशील प्रेरणा का बलिदान कर मशीनी कल-पुरजे बनकर रहना पड़ा था और अंततः व्यक्ति को तुच्छता एवं दुर्बलता के कारण नष्ट होने के लिए विवश होना पड़ा था। रूस में हुए साम्यवादी प्रयोग को इसी का नवीन उदाहरण कह सकते हैं। मार्क्स की नजर में मनुष्य एक आर्थिक प्राणी भर था। कल्पना, स्वतंत्र इच्छाशक्ति, मौलिक क्षमताओं का विकास जैसी चेष्टाएं भी इनसान के अंदर समाई है, शायद इसे सोचने की उसे फुरसत नहीं मिली। परिणामस्वरूप समाजवाद के नाम पर ऐसा शिकंजा तैयार हुआ, जिसे तोड़ फेंकने के लिए जनजीवन शुरू से कोशिश में जुटा रहा और जब तक तोड़ न फेंका, चैन नहीं लिया।

वस्तुतः राजनीतिक क्रांतियों की अपनी सीमा है। इसकी सीमाओं से भली-भाँति अवगत परमपूज्य गुरुदेव के अनुसार “मानवीय भावनाओं को एक - दूसरे में घोलकर क्षत-विक्षत हो रहे समाज को पुनः सौंदर्य-मंडित करने का प्रयास, जिस तकनीक से संभव है, उसका नाम है, सांस्कृतिक क्राँति”। वस्तुतः यहीं एकता को अपना वास्तविक अर्थ मिलता है, जो अपनी व्यापकता एवं विस्तार में पारिवारिक, जातीय एवं राष्ट्रीय सीमाओं को पार करती हुए, विश्वमानव तक आ जुड़ती है। गुरुदेव के शब्दों में, “विश्वानुभूति के लिए साँस्कृतिक संवेदना का उफान चाहिए। इसी का एक नाम आध्यात्मिक संवेदना भी है। जिसका बोध श्वेताश्वेतर उपनिषद् के शब्दों में, “एको देवा सर्वभूतेषु गूढ़ः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा” अर्थात् वे एक ही परम देव परमेश्वर समस्त प्राणियों के हृदय रूप गुहा में घुसे हुए है। वे सर्वव्यापी और समस्त प्राणियों में घुसे हुए हैं। वे सर्वव्यापी और समस्त प्राणियों में अंतर्यामी परमात्मा है। (श्वेता 6/11)” संवेदनाओं की यह व्यापक अनुभूति जब संबंध बनकर प्रकट होती है। तब विश्वमानव के प्रति प्रेम का उफान अस्वाभाविक नहीं रहा पाता। सामंजस्य की इस परम स्थिति में प्रेम झरने लगता है।

इस बोध की व्यापकता एवं सघनता के अनुरूप, एकत्व भी उतना ही विस्तृत होता जाता है। मानवीय हृदयों के बीच की खाई यहाँ सहज ही पट जाती है और मानवीय स्वतंत्रता को भी अक्षुण्ण संरक्षण मिल जाता है, क्योंकि मानव अपनी अंतः भावनाओं की कसक और हुलस के कारण आकुल-व्याकुल होकर स्वतः ही अपने स्वार्थों का उत्सर्ग कर डालता है। इस तरह परमपूज्य गुरुदेव के शब्दों में, “विश्व के जीवन में साँस्कृतिक क्राँति ही एकमात्र वह प्रक्रिया है, जो अपनी चरम परिणति में उसे एकता और स्वतंत्रता दोनों अलभ्य उपलब्धियाँ एक साथ सौंपने में समर्थ है।” यहाँ देवसंस्कृति की भूमिका भारत की सामयिक संस्कृति में है। जैसे भारत ने किसी भी धर्म का दलन किए बिना अपने यहाँ धार्मिक एकता स्थापित की है। जैसे इसने किसी भी जाति की विशेषता को नष्ट किए बगैर सभी जातियों को एक साँस्कृतिक सूत्र में आबद्ध किया है। कुछ इसी प्रकार हम संसार के सभी देशों, सभी जातियों एवं सभी विचारो के बीच एकता स्थापित कर सकते हैं।

साँस्कृतिक क्राँति के अग्रदूत के रूप में परमपूज्य गुरुदेव ने इसी कार्य का अभिनव शुभारंभ किया। 40 के दशक में प्रकाशित हो रही अखण्ड ज्योति सतत् इसी का ताना-बाना बुन रही है। गायत्री तपोभूमि पूज्यवर की प्रथम कर्मस्थली रही। यहाँ पर एक प्रतिष्ठित संस्कृत प्रेमी सज्जन एक बार आए, तो वे गुरुदेव की हर बात को अनसुना करते हुए एक ही बात की रट लगाए रहे कि यहाँ सब कुछ संस्कृत में क्यों नहीं पढ़ाया जाता ? यहाँ सारा जोर संस्कृत पर ही क्यों नहीं दिया जाता। बहुत सुनने के बाद पूज्यवर का दो टूक जवाब था, मेरा सारा जोर संस्कृत की जगह संस्कृति पर है। मैं यहाँ संस्कृत नहीं, संस्कृति का शिक्षण देता हूँ। वस्तुतः तपोभूमि से शुरू किए गए युगनिर्माण आँदोलन के नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनर्जागरण प्रयास से देश भी में एक उल्लास की लहर फैली। इस प्रयास को और व्यापक एवं गतिशील बनाते हुए संस्कृति पुरुष ने शाँतिकुँज से गायत्री यज्ञों, संस्कार महोत्सवों, वैदिक सम्मेलनों एवं अश्वमेध यज्ञों के माध्यम से साँस्कृतिक क्राँति को विश्वव्यापी विस्तार दिया है। युग के सबसे बड़े सामूहिक धर्मानुष्ठान की महापूर्णाहुति के रूप में पुरुषमेध एवं सोत्रामणी प्रयोग द्वारा इसका महास्फोट होने लगा है।

इसके प्रभाव स्वरूप मानवी जीवन में बौद्धिक क्राँति, नैतिक क्राँति एवं सामाजिक क्राँति का ऐसा स्वरूप उभरेगा, जिनसे वशीभूत हुआ सामूहिक मन, मानव-जीवन के समस्त क्षेत्रों में गंभीर एवं अद्भुत परिवर्तन प्रस्तुत करेगा। भावलोक में इसका दिग्दर्शन कर जर्मन दार्शनिक शोपेनहाँवर ने भविष्यवाणी की थी, “शीघ्र ही विश्व विचार जगत में सर्वाधिक शक्तिशाली और दिगंतव्यापी साँस्कृतिक क्राँति का साक्षी होने वाला है। विचारों का यह तूफान उपनिषदों के देश से उठेगा।”

साँस्कृतिक क्राँति के अग्रदूत की प्रचंड तप-साधना एवं अथक पुरुषार्थ की फलश्रुति, यह तूफान उठ चुका है। इसकी वृहद योजना अपने आरंभ से ही विश्व को एक नया रंग और वातावरण एक उच्चतर भावना, एक बेहतर उद्देश्य देने के लिए कटिबद्ध रही है। नवयुग की साँस्कृतिक चेतना के रूप में इसका पुनरोदय हो रहा है। जिसका अंतिम परिणाम होगा, विश्वराष्ट्र का नया युग। व्यवस्थाओं, प्रणालियों, नीतियों की दृष्टि से अद्भुत होने के साथ व्यक्तित्व संरचना की दृष्टि से भी यह अभूतपूर्व होगा। आइए! हम सभी इसका स्वागत करने हेतु कटिबद्ध हों।


नवयुग में संस्कृति पुरुष की चेतना का नवोदय

संस्कृति पुरुष गुरुदेव आज हम सबके बीच स्थूल कलेवर में नहीं है, परन्तु उनकी स्थूल देह का अवसान भी सामान्य प्रक्रिया न होकर चेतना जगत में एक उच्चस्तरीय प्रयोग था। 2 जून 1990 से लेकर 2000 तक सूक्ष्म जगत में इसका विविध रीति से विकास होता रहा, इसके नए नए आयाम प्रकट होते रहे। इसकी पूर्णता भी महापूर्णाहुति के साथ संपन्न हो रही है। अब वह समय आ गया है, जिसके लिए गुरुदेव ने पहले 1968 में लिखा था कि सन 2000 के पास पूर्णावतार प्रकट होगा। दरअसल पूर्णावतार का यह प्राकट्य नवयुग में संस्कृति पुरुष की चेतना का नवोदय है। गुरुदेव के अपने शब्दों में “यह महान् व्यक्तियों के रूप में भी होगा और महान घटनाओं के रूप में भी।” इसकी परिणति व्यक्ति, परिवार एवं समाज में क्या दृश्य प्रस्तुत करेगी, इसका स्पष्ट चित्रण वह स्वयं कर गए है।

मानव प्रकृति में इसके प्रभाव से क्या मौलिक परिवर्तन होंगे, इस संदर्भ में परमपूज्य गुरुदेव लिखते है, “मनुष्य की आकृति तो वैसी ही रहेगी जैसी अब है, पर अगली शताब्दी में उसकी प्रकृति असाधारण रूप में बदल जाएगी। दुर्व्यसन हर किसी को अरुचिकर लगेंगे और न जनसाधारण की उनमें प्रीति रहेगी, न प्रतीत। चोरी, ठगी, निष्ठुरता, क्रूरता, पाखंड, प्रपंच अपने लिए न अनुकूलता पाएंगे न अवसर प्राप्त करेंगे। अधिकाँश लोगों में जब गुण कर्म, स्वभाव में सज्जनता भरी होगी, तो दुष्ट, दुर्जनों की करतूतें न तो बन पड़ेगी और न सफल होंगी।”

आगे पूज्यवर लिखते है कि, “लोग आत्मविश्वासी, स्वावलंबी और पुरुषार्थपरायण होंगे, तो दरिद्रता, अभावग्रस्तता के लिए कोई कारण शेष न रहेगा। मनुष्य की श्रमशीलता और बुद्धिमता यदि काम करें, तो उचित आवश्यकताओं की पूर्ति में कमी क्यों पड़ेगी? उदारता जीवंत हो तो दुखों को बाँट लेने और सुखों को बाँट देने की परम्परा ही चल पड़ेगी। तब न किसी को क्रोध का आवेश ही जकड़ेगा, न प्रतिशोध के लिए हाथ उठेगा, न छोटी लड़ाइयाँ होंगी और न महायुद्ध रचे जायेंगे।”

व्यक्ति के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति कैसी होगी, इस विषय में पूज्यवर लिखते हैं, “तब शारीरिक और मानसिक व्याधियों से सहज ही छुटकारा मिल जाएगा, क्योंकि लोग प्रकृति के अनुशासन में रहकर आहार विहार का संयम बरतेंगे और अन्य प्राणियों की तरह अंतः चेतना का अनुशासन मानेंगे। फलतः न दुर्बलता सताएगी और न रुग्णता। असमय बुढ़ापा आने तथा अकाल मृत्यु से मरने का भी तब कोई कारण न रहेगा। सभी संतोषी, नीतिवान, उदार एवं सरल सौम्य जीवन पद्धति अपनाएंगे, मिल बाँटकर खाएंगे, हंसती-हंसाती जिंदगी जिएंगे, फलतः उन्हें हर परिस्थितियों में आनंद-उल्लास से भरा पूरा पाया जाएगा। सभी के शरीर नीरोग और मस्तिष्क शाँत-संतुष्ट पाए जाएंगे।”

जीवन के मूल्याँकन के आधारभूत मानदंडों के विषय में गुरुदेव लिखते हैं, “संचित कुसंस्कारिता के शमन, समाधान, प्रतिरोध, निराकरण पर नवयुग के विचारशील व्यक्ति पर पूरा ध्यान देंगे। संयम बरतेंगे और संतुलित रहेंगे। शौर्य साहस का केंद्रबिन्दु यह बनेगा कि किसने अपने दृष्टिकोण स्वभाव रुझान एवं आचरण में कितनी उत्कृष्टता का उपयोग किया। प्रतिभा, पराक्रम एवं वैभव को इस आधार पर सहारा जाएगा कि उस उपार्जन का जनकल्याण एवं सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन में कितना उपयोग हो सका। विचारशील लोग इसी आधार पर आत्मनिर्माण करेंगे और पुरुषार्थ का क्षेत्र चुनते समय निजी सुख-सुविधाओं की पूर्ति का नहीं, विश्व-उद्यान को समुन्नत-सुसंस्कृत बनाने की महानता को महत्व देंगे। अमीरी को नहीं, गरिमा को अपनाया-सराहा जाएगा। संकीर्ण स्वार्थपरता में संलग्न व्यक्ति तब प्रतिभा के बल पर कोई श्रेय-सम्मान प्राप्त नहीं करेंगे, वरन् भर्त्सना के भाजन बनेंगे।”

व्यक्ति एवं समाज के मध्य किस तरह के संबंध रहेंगे, इस संदर्भ में पूज्यवर लिखते हैं, “तब हर व्यक्ति अपने को समाज का एक छोटा-सा घटक, किंतु अविच्छिन्न अंग मानकर चलेगा। निजी हानि-लाभ का विचार न करके विश्व हित में अपना हित जुड़ा रहने की बात सोचेगा। अहंता को परम ब्रह्म में समर्पित कर आध्यात्मिक जीवन, मुक्ति का लक्ष्य अगले दिनों इस प्रकार क्रियान्वित होगा कि किसी को भी अपनी चिंता में डूबे रहने की, अपनी ही इच्छापूर्ति की, अपने परिवारीजनों की प्रगति की न तो आवश्यकता होगी, न चेष्टा चलेगा।”

नारी जाति एवं विवाह संस्था की क्या स्थिति होगी, इस विषय में वे कहते हैं, “इन दिनों स्त्रियों को दासी की तरह प्रयुक्त किया जाता है, यह प्रथा उलटकर उन्हें समानाधिकार वाली सहयोगिनी का सम्मान भरा स्थान मिलेगा। शृंगार सज्जा को नारी की आँतरिक हीनता तथा दुर्बलता का चिन्ह मानकर उसे अनुपयुक्त गहराया जाएगा। विवाह कामुकता की तृप्ति के लिए रूप सौंदर्य से खेलने के लिए नहीं, वरन् साथी को स्नेह-सहयोग, सम्मान देकर जीवन की अपूर्णता दूर करने के लिए, मिल-जुलकर अधिक उच्चस्तरीय प्रगति करने की आदर्शवादिता से प्रेरित होकर किए जाया करेंगे।”

परिवार संस्था की स्थिति के संदर्भ में तब व्यक्तित्व को प्रखर, प्रामाणिक एवं परिवार को सुसंस्कारी-स्वावलंबी बनाने के लिए गंभीरतापूर्वक ध्यान दिया जाएगा। परिवार को सुसंस्कारिता प्रशिक्षण की पाठशाला बनाया जाएगा और इस कारखाने में ढल-ढलकर नर-रत्न निकला करेंगे। व्यक्तित्व और परिवार को एक-दूसरे का अगले दिनों पूरक माना जाएगा और संयुक्त परिवार की वैज्ञानिक आचार संहिता विकसित होगी। हर गृहस्थ को धरती पर स्वर्ग की तरह स्नेह-सद्भाव एवं उत्साह-उल्लास से भरा-पूरा पाया जाएगा, क्योंकि उसके सभी सदस्य श्रमशीलता, सुव्यवस्था, मितव्ययिता, उदार सहकारिता और सुसंस्कारी सज्जनता के पंचशीलों को सुख−शांति का आधारभूत कारण होने की बात पर सच्चे मन से विश्वास करेंगे।

आगे पूज्यवर कहते हैं, “अभी जो परस्पर आपाधापी, लोभ-मोहवश संचय और परस्पर विलगाव की प्रवृत्ति नजर आती है, उसको आने वाले समय में अतीत की कड़ुई स्मृति कहा जाएगा। हर व्यक्ति स्वयं में एक आदर्श इकाई होगा एवं हर परिवार उससे मिलकर बना समाज का एक अवयव।”

संस्कृति पुरुष की चेतना का नवोदय व्यक्ति, परिवार एवं समाज की ऐसी आदर्श संरचना के रूप में होने वाला है। इस चित्रण को उनके शब्दों में, “यह मात्र कल्पना या यूटोपिया न माना जाए, वरन् ऋषितंत्र की समर्थ तप साधना की प्रभावकारी परिणति मानी जाए, जो आगामी कुछ दशकों में ही साकार होकर रहेगी।”

एक तपस्वी ने इंद्र देव की आराधना की। वे प्रसन्न हुए और वरदान देने पहुँचे। तपस्वी ने उनका वज्र माँगा, ताकि संसार को आतंकित करके चक्रवर्ती शासन कर सके। इंद्र देव रुष्ट होकर वापस चले गए। वरदान न पाने के दुख से तपस्वी ने निराशाग्रस्त मनःस्थिति में शरीर त्याग गया। इंद्र को यह समाचार मिला, तो वे दुखी हुए और सोचने लगे, तपस्वी को कष्ट देने की अपेक्षा उसकी मनोकामना पूर्ण करना उचित है। कुछ समय बाद किसी तपस्वी ने फिर इंद्र की वैसी ही आराधना की। निदान उन्हें वरदान देने के लिए जाना पड़ा।

अब की आर वज्र साथ ही लेकर गए और पहुँचते ही बिना मांगे वज्र तपस्वी के आगे रख दिया। तपस्वी ने आश्चर्यचकित होकर उस निरर्थक वस्तु को देने का कारण पूछा, तो इंद्र ने पूर्व तपस्वी का सारा वृत्तांत कह सुनाया। वज्र को लौटाते हुए उसने निवेदन किया, देव ऐसे वरदान से क्या लाभ, जिसे पाकर अहंकार भरी तृष्णा जगे और न मिलने पर निराशाग्रस्त मरण का वरण करना पड़े। मुझे तो ऐसा वर दीजिए कि उपलब्ध तप शक्ति को सत्प्रयोजनों के निर्मित नियोजित कर सकूँ।

उपासना इस स्तर के श्रेष्ठ उद्देश्य को लेकर की जाए, वहीं सार्थक हैं। यही विभिन्न उपासकों को मिलने वाले प्रतिफलों का कारण बनती है।


सबसे बड़ा पुण्य (kahani)

रैक्य मुनि गाँव-गाँव गाड़ी ले जाते और उसमें विराजमान् भगवान् के सबको दर्शन कराते। राजा जनश्रुति ने कहा, आपके लिए सुविधाजनक रथ का प्रबंध किए देते है। इतना कष्ट न उठाएं। रैक्य मुनि ने कहा, गाड़ी खींचने से रास्ता चलने लोगों को भी दर्शन कराता रहता है। अपनी उदारता का कहीं अन्यत्र उपयोग कीजिए। जनश्रुति निरुत्तर थे। ज्ञान मंदिर के रूप में प्रतिमा स्थापित कर गाँव-गाँव घूमना, अन्यों को दर्शन के साथ ज्ञान का लाभ देना भी सबसे बड़ा पुण्य है।


साँस्कृतिक महानुष्ठान की महापूर्णाहुति

12 वर्ष पूर्व संस्कृति पुरुष परमपूज्य गुरुदेव के निर्देशन में शुरू किया गया साँस्कृतिक महानुष्ठान आज अपनी महापूर्णाहुति के अंतिम दौर से गुजर रहा है। कुँभ नगरी हरिद्वार के प्रायः चालीस मील की परिधि के क्षेत्र में इसकी व्यापक तैयारियाँ पूरे जोरों पर है। इसके उभर रहे विराट् स्वरूप का विहंगम दूरदर्शन मात्र कितना रोमांचक एवं आश्चर्यचकित करने वाला है, यह तीर्थ नगरी से गुजरने वाला हर व्यक्ति अनुभव कर रहा है और इसके सरेआम जुटाने में लगे परिजनों के हृदय तो विशेष रूप से आह्लादित एवं रोमाँचित है। चहुँओर युग के मत्स्यावतार की विराट् लीला देखते ही बनती है। समूचे वातावरण में युगपरिवर्तनकारी साँस्कृतिक क्राँति की हवा छाई हुई है और इस महानुष्ठान में भाग लेकर धन्यभागी बनने की अंतःप्रेरणा उभर रही है।

महापूर्णाहुति यज्ञ का यह ऐतिहासिक आयोजन गायत्री परिवार के युग संधि महापुरश्चरण की 12 वर्षीय दुर्धर्ष सामूहिक साधना एवं पुरुषार्थ-पराक्रम का चरमोत्कर्ष है। 12 वर्ष के इन विकट समय में विराट् श्रद्धांजलि समारोह, शपथ समारोह, देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत 18 अश्वमेध महायज्ञ, 800 से अधिक विराट् संस्कार महोत्सव, विराट् वाजपेय यज्ञ जैसे साँस्कृतिक क्राँति का अलख जगाने वाले विशाल आयोजन किए। युगमानस भी संस्कृति के युगानुकूल उपयोगी एवं प्रगतिशील स्वरूप को देखकर इसे अपनाने के लिए आगे बढ़ा है। इस दौरान 250 करोड़ गायत्री मंत्र जप का प्राथमिक लक्ष्य भी बढ़ते-बढ़ते 25000 करोड़ प्रतिवर्ष तक जा पहुँचा है। इसकी महापूर्णाहुति के अंतर्गत तीन चरण पूरे हो चुके व चौथे का अंतिम चरण पूरा होने वाला है।

इसका प्रथम चरण महापूर्णाहुति के पूर्वाभ्यास की सामूहिक साधना एवं दीपयज्ञ आयोजन के रूप में 3 दिसंबर 11 को सारे भारत में एक साथ, एक ही समय संपन्न हुआ। भारत में पोलियो उन्मूलन अभियान के राष्ट्रीय कार्यक्रम के साथ जुड़कर यह जनचेतना जागरण के रूप में रहा। पूरे भारत एवं विश्व में सभी धर्म संप्रदायों एवं पारमार्थिक संगठनों की इसमें भरपूर भागीदारी रही। शारीरिक विकलाँगता के साथ इससे कहीं अधिक भयंकर तनाव, मनोरोगजन्य मानसिक विकलाँगता से भी मुक्ति एवं सबके लिए उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के साथ यह कार्यक्रम एक लाख स्थानों पर लगभग एक करोड़ व्यक्तियों द्वारा सम्पन्न किया गया। इस सामूहिक आध्यात्मिक प्रयोग से सूक्ष्म जगत् में जो जबरदस्त स्फोट हुआ है, वह निश्चित रूप से सबके उज्ज्वल भविष्य की दिशा में एक ठोस कदम रहा है। अब हर वर्ष 3 दिसम्बर को पीड़ा निवारण दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

दूसरा चरण, परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्मदिवस (वसंत पर्व, 10 फरवरी) के पुण्य अवसर पर पूरा हुआ। इस दिन भारत एवं विश्वभर की सभी शाखाओं, धर्मस्थलों, विभिन्न उपासना गृहों, क्लबों, संगठनों एवं शक्तिपीठों में देवसंस्कृति का परिचय करवाने वाले एवं नवयुग की चेतना का अलख जगाने वाला पुरुषार्थ संपन्न हुआ। इसके अंतर्गत 3 दिसम्बर की तरह दीपयज्ञ एवं स्वच्छ-निर्मल मन के साथ स्वस्थ समाज हेतु उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना की गई। इसमें भागीदारी प्रथम चरण से बढ़ी-चढ़ी ही रही, जिससे उत्पन्न आध्यात्मिक ऊर्जा के प्रभाव की कल्पना की जा सकती है।

तीसरे चरण के अंतर्गत (10 फरवरी, 2000 से गायत्री जयंती 11 जून, 2000) एक व्यापक मंथन विभूतियों के स्तर पर चला, जिसमें गाँव से लेकर नगर, जिले तक एवं फिर 105 संभागों के स्तर पर गहन विश्लेषण कर मिशन का संगठनात्मक ढाँचा तैयार किया गया। राष्ट्र के आध्यात्मिक उत्कर्ष एवं प्रतिकूलताओं के शमन हेतु विशिष्ट प्रार्थनाएं की गई। संभागीय महापूर्णाहुतियों से पूर्व सारे राष्ट्र एवं विश्व भर में जागरण यात्राएं चलीं। अकेले भारत में ही चप्पे-चप्पे के प्रसुप्त संस्कारों को जगाने एवं जन-जन में नवचेतना उभारने के लिए 14 रथों द्वारा प्रायः ढाई लाख किमी. की राष्ट्र जागरण तीर्थयात्रा सम्पन्न की गई। 107 संभागीय स्थलों पर हुई पूर्णाहुतियों में राष्ट्र का कोई भी कोना नहीं छोड़ा गया। दक्षिण में जहाँ चैन्नई, बेंगलोर, हैदराबाद में कार्यक्रम हुए, वहीं पूर्वोत्तर में सिलिगुडी, कलकत्ता, वीरगंज, पश्चिम में जम्मू, श्रीगंगानगर जोधपुर में तथा उत्तर में शिमला, पालमपुर, टिहरी, अल्मोड़ा आदि क्षेत्रों में ये पूर्णाहुतियाँ सम्पन्न हुई।

अमेरिका की पाश्चात्य सभ्यता प्रधान धरती पर भी ये यात्राएं सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई। पश्चिमी तट पर सानडियागो से बैंकुवर (कनाडा) तथा सिएटल से एरीजोना, ह्यस्टन, टेक्सास से होकर यात्रा का समापन लॉस एंजेल्स में हुआ। इसी प्रकार पूर्वी तट पर शिकागो से आरम्भ होकर अटलाँटा तक एवं फिर पूर्वी छोर से होकर मिशिगन तक ये यात्राएं सम्पन्न हुई है, इसी प्रकार की शृंखलाएं यू.के. दक्षिण एवं पूर्वी अफ्रीका में चल चुकी है। इस प्रकार भारतीय संस्कृति का विस्तार आगामी पाँचवे चरण के समापन तक पूरे विश्व के कोने-कोने में हो जाने की संभावना है।

तीसरे चरण के अनुयाज एवं चतुर्थ चरण के प्रयाज के क्रम में सारे देश के नगरीय, कस्बे, महानगरीय स्तर पर गहन मंथन चला। इससे ढेरों प्रतिभाएं उभरकर सामने आई और नवसृजन के लिए संकल्पित हुई।

चौथे चरण के अंतर्गत विराट् विभूति महायज्ञ जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, दिल्ली में सम्पन्न हुआ। लगभग सवा लाख ऊर्जस्वी प्रतिभाएं एवं परिजन इसमें भागीदार बने थे। गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने जहाँ प्रतिभावों के पलायन पर चिंता जताई, वहीं गायत्री परिवार के कार्यों की महत्ता को व्यक्त करते हुए कहा, “स्वयंसेवी संस्थाएं सेवा के कार्य करके भारत में अध्यात्म का प्रचार कर सकती है। आध्यात्मिक साधना से उठी ऊर्जा को राष्ट्रोत्थान और जनकल्याण के लिए गायत्री परिवार ने जिन आँदोलनों का सूत्रपात किया है, वे बहुत ही महत्वपूर्ण है।” परिवार के सात रचनात्मक आँदोलन है, साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, पर्यावरण, नारी जागरण, व्यसन एवं कुरीति निवारण। मानव संसाधन मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने भी शाँतिकुँज के समाज एवं युगपरिवर्तन के लिए किए जा रहे आध्यात्मिक प्रयासों की सराहना की। दैनिक जागरण के संपादक एवं मनीषी नरेन्द्र मोहन देवत्व का प्रत्यक्ष अवतरण होते देख भावविभोर थे और परमपूज्य गुरुदेव के स्वप्न को साकार होते देख रहे थे। वस्तुतः विभूतियों को राष्ट्र, समाज हित एवं नवसृजन के लिए नियोजित करने की दिशा में यह अभूतपूर्व आयोजन था। विद्यमान सभी विचारशील वर्ग एकमत था कि सामाजिक क्राँति के लिए बौद्धिक एवं नैतिक क्राँति का सबल आधार बनाया ही जाना चाहिए।

चौथे चरण का अंतिम चरण महापूर्णाहुति यज्ञ के रूप में नवंबर 6 से 11 के दौरान होने जा रहा है। सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ के रूप में यह विशिष्ट अर्थ लिए हुए है, जिसे पिछले अंक में बहुत ही सरल एवं स्पष्ट ढंग से समझाया गया है। इसी तरह इसके सौत्रामणी प्रयोग विधान एवं पुरुषमेध महायज्ञ प्रयोगों का विस्तार से गत दो अंकों में स्पष्ट किया गया है। संक्षेप में सौत्रामणी प्रयोग बुराइयों-पापों से बचाने वाला व प्रतिभा, पराक्रम एवं ऐश्वर्य को बढ़ाने वाला और राष्ट्र की रक्षा करने वाला है। पुरुषमेध महायज्ञ, यजनकर्ता की प्रतिभा, पुरुषार्थ को जगाकर प्रखरतम ऊंचाइयों तक ले जाने वाला है। तथा राष्ट्र की कीर्ति अक्षुण्ण बनाने वाला तथा उसे सर्वोच्च स्तर पर स्थापित करने वाला है। सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ के अंतर्गत अपनी विभूति (धन, योग्यता, भाव, प्रतिभा, श्रम, प्रभाव) को जनकल्याण हित सृजन कार्यों में लगाने, अर्पित करने की संकल्पित भागीदारी निहित है।

युग के इस विशालतम साँस्कृतिक महानुष्ठान में 2 करोड़ लोगों की भागीदारी अनुमानित है व इनमें 2 लाख सृजन के लिए संकल्पित-समर्पित विभूतियों एवं प्रतिभाओं का उभरकर आना अपेक्षित है। महापूर्णाहुति के इस यज्ञ से नवयुग के आगमन को सुनिश्चित करेगा, जिसके स्वागत समारोह के रूप में वसंत पंचमी, 2001 का पंचम चरण संपन्न होना शेष है। महापूर्णाहुति के इस समापन के साथ सृजन का नवीन अध्याय खुलेगा।


अग्निकाँड की दुर्घटनाओं (kahani)

उस साल राज्य में लू का प्रकोप अधिक था। प्रजा के झोंपड़े फूँस के बने थे। मजबूत सामग्री उपलब्ध न थी। न जाने क्यों लोग लापरवाह भी रहने लगे थे, सो आए दिन अग्निकाँड की घटनाओं के समाचार दरबार में पहुँचते। बिंबसार जैसे दयालु राजा के लिए स्वाभाविक था कि वह पीड़ितों की सहायता करे। बहुत अग्निकाँड हुए, तो सहायता राशि का खर्च भी पहले की तुलना में बहुत बढ़ गया। लोगों की लापरवाही रोकने के लिए राजाज्ञा हुई कि जिसका घर जलेगा, उसको एक वर्ष श्मशान में रहने का दंड भुगतना पड़ेगा। लोग चौकन्ने हो गए। एक दिन राजा के भूसे के कोठे में आग लगी और देखते-देखते वह जल गया। समाचार मिलने पर दरबार से राजा को श्मशान में रहने की आज्ञा हुई। दरबारियों ने समझाया, नियम तो प्रजाजनों के लिए होता है, राजा तो उन्हें बनाता है, इसलिए उस पर वे लागू नहीं होते। बिंबसार ने किसी की न मानी। वे फूँस की झोपड़ी बनाकर श्मशान में रहने लगे। समाचार फैला, तो सतर्कता सभी ने अपनाई और अग्निकाँड की दुर्घटनाओं का सिलसिला समाप्त हो गया।


संस्कृति पुरुष की वसीयत और विरासत

“अपने अनन्य आत्मीय प्रज्ञापरिजनों में से प्रत्येक के नाम हमारी यही वसीयत और विरासत है कि हमारे जीवन से कुछ सीखें। कदमों की यथार्थता खोजें। सफलता जाँचे और जिससे जितना बन पड़े, अनुकरण का, अनुगमन का प्रयास करे। यह नफे का सौदा हैं, घाटे का नहीं।” प्रस्तुत पंक्तियाँ उस अद्वितीय कृति का अंतिम पैराग्राफ है, जिसे हम ‘हमारी वसीयत और विरासत’ ‘माय लिगेसी एण्ड मेसेज’ नामक उनकी जीवन-कथा के रूप में जानते हैं। यह एक क्राँतदर्शी ऋषि की आत्मकथा, जीवन वृत्तांत के अंतरंग पक्ष खोलकर जन-जन के समक्ष रखे गए थे एवं अपने आचरण से शिक्षण देने का प्रयास किया गया। यह पुस्तक जिस-जिसने पढ़ी है, उसकी सोच में आमूल - चूल परिवर्तन आया है। 1976 में प्रकाशित इस पुस्तक ने लाखों के जीवन की दिशाधारा बदली है।

संस्कृति पुरुष परमपूज्य गुरुदेव की एक ही सबके लिए वसीयत-विरासत थी कि प्रत्येक परिजन संस्कृति दूत का गरिमामय दायित्व निभाएं। यदि वे अपनी चिरपुरातन भारतीय संस्कृति के आदर्शों को अभिमानपूर्वक जीवन में उतार सकेंगे, उस परम्परा के निर्वाह के लिए अपनी भूमिका निभा सकेंगे, तो भारतीय संस्कृति निश्चित ही विश्व-संस्कृति बनकर रहेगी।

प्रस्तुत अंक ‘सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ’ की वेला में परिजनों के पास पहुँच रहा है। यह अंक संस्कृति पुरुष परमपूज्य गुरुदेव को समर्पित है, जिनके संकल्पों के आधार पर ही एक साधनात्मक पुरुषार्थ की महापूर्णाहुति इस वर्ष सम्पन्न हो रही है। परमपूज्य गुरुदेव ने भारतीय संस्कृति के खोए आदर्शों को, जीवन-मूल्यों को पुनः स्थापित किया। जीवन साधना को जन-जन के जीवन का एक अंग बना दिया। उन्होंने एक ही बात कहीं, “तुम मुझे अपनी क्षुद्रता, संकीर्णता दे दो, मैं तुम्हें महानता से लाद दूँगा।” यही होता चला गया। आज भारत व विश्वभर के सौ से अधिक राष्ट्रों में यदि नवजागरण का अलख गूँज रहा है, साँस्कृतिक मूल्यों के प्रति जन-जन के मन में अनुराग बढ़ रहा है तो उसका पूरा श्रेय उन आदर्शों को जाता है, जो पूज्यवर स्थापित कर गए।

प्रस्तुत अंक संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में हमारी गुरुसत्ता की जीवनी है, तो एक अनुभूतियों के गुँथन से किया गया ऐसा प्रयास भी, जो इस महापूर्णाहुति के चौथे चरण के उत्तरार्द्ध में परिजनों के समक्ष उद्घाटित किया जा रहा है। इस अंक में उनके जीवन संग्राम के कई पक्ष ऐसे दिए गए हैं जो आगे विस्तृत विवेचन करने पर नवयुग के आधार - स्तंभ बनेंगे। इतना बहुआयामी व्यक्तित्व उस युगपुरुष का रहा है कि यदि उसका एक अंश भी हमें स्पर्श कर जाए, तो हम उनके विराट् स्वरूप का दर्शन कर लेते है। जिसने उन्हें समग्र रूप से जान लिया, उसके लिए तो फिर यह साक्षात् ब्रह्म-मिलन जैसा रसास्वादन है। उनका उज्ज्वल भविष्य के प्रति दृढ़ विश्वास इतना बड़ा आधार बन गया 8 करोड़ के इस प्रज्ञा परिवार का, कि धीरे-धीरे सभी को अहसास होने लगा है कि वास्तव में समय बदल रहा है।

महर्षि अरविंद ने ‘ह्यूमन साइकल’ ग्रंथ में लिखा है “दक्षिणेश्वर में जो काम शुरू हुआ था, वह पूरा होने में अभी कोसों की दूरी पार होनी है। वह समझा तक नहीं गया है। विवेकानंद ने जो कुछ प्राप्त किया और जिसे अभिवर्द्धन करने का प्रयास किया, वह अभी तक मूर्त नहीं हुआ है। अगले दिनों वह आँदोलन के रूप में उठेगा और गति पकड़ेगा।” वस्तुतः यही बात स्वामी विवेकानंद भी भारत का भविष्य नामक अपने उद्बोधन में 100 वर्ष पूर्व 1919 ई. में कह गए थे। सतयुग की वापसी को उन्होंने भवितव्यता बताया था। यह भी कहा था कि यजुर्वेद का वाक्य “सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा” निश्चित रूप से मूर्त रूप लेगा एवं यह इक्कीसवीं सदी के आरम्भ में स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगेगा।

इक्कीसवीं सदी संवेदनामूलक समाज के विकास की अवधि है, नारी जागरण की अवधि है, साँस्कृतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की अवधि है। योजना एवं संकल्पना सारी ईश्वर की है, तप एवं पुरुषार्थ ऋषियों का है, हम सब को तो मात्र श्रेय अर्जित करना है। इस अवधि में जो 1977-79 से आरम्भ एवं सन् 2000 के प्रथम दशक के समापन तक चलेगी। नवयुग के आगमन की प्रक्रिया को हम सभी गतिशील होते देखेंगे। मात्र देखेंगे ही नहीं, उसमें सक्रिय भूमिका भी निभा रहे होंगे। प्रज्ञापरिजनों को पूज्यवर ने अंशावतार-मध्यावतार की संज्ञा दी थी। उन्होंने कहा था 1967 में, कि देखते-देखते सामान्य से नजर आने वाले इन लोगों में समयदान, साधनदान, अंशदान की ललक पैदा होगी व देखते-देखते आत्मबल द्वारा अवतारी चेतना का लीला-संदोह दृश्यमान रूप में दिखाई देने लगेगा। आज पूज्यवर की चेतना कारणशरीर में सक्रिय हो, दिग्दिगंत व्यापी हो गई है। ढेरों संगठन श्रेष्ठ कार्यों में लगे दिखाई देते है। संस्कृति विस्तार हेतु संगठनों का संगतिकरण ही वास्तव में अब सतयुग लाएगा, इसमें किसी को जरा भी अविश्वास नहीं होना चाहिए।


एक अद्भुत छाप छोड़ गया विराट् विभूति ज्ञानयज्ञ

अप्रतिम, अद्भुत, अभूतपूर्व। बस यही शब्द थे सबके मुख पर। नई दिल्ली के सबसे पॉश कहे जाने वाले दक्षिण दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में 6 अक्टूबर को संपन्न विराट विभूति ज्ञानयज्ञ एवं अद्भुत छाप सब छोड़ गया। यह अद्भुत उपलब्धियों एवं विलक्षणताओं से भरा एक समागम था, जिसमें राष्ट्र के कोने-कोने से आए गायत्री परिजनों, विभूतियों ने भागीदारी की। इसे एक संयोग कहा जाए या नियति के 26 वर्ष के जीवनकाल में एशियाड 62 के लिए बनाया गया यह स्टेडियम पहली बार खचाखच भरा था एवं वह भी पीतवस्त्रधारी रणबाँकुरों से। ये मरजीवडे जाए थे एक ही संकल्प लेने कि वे राष्ट्र को जाग्रत-जीवंत बनाकर रहेंगे, संस्कृति का अलख सारे विश्व में फैलाकर ही चैन लेंगे।

एक मशाल को पूज्यवर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर गए थे। एक स्टेडियम में उस विशाल मशाल व उसके नीचे जनसमुदाय का प्रत्यक्ष दर्शन सभी ने किया। पूरे स्टेडियम को बैनर्स व प्रगतिशील संकल्पों से भरे होर्डिंग्स से सजाया गया था। स्थान-स्थान से जीपों, बसों, ट्रेनों से आए परिजनों ने समय पर स्थान ग्रहण कर लिया था। ठीक चार बजे सरस्वती वंदना एवं प्रज्ञावतार के रूप में एक एकाँकी के मंचन से कार्यक्रम शुरू हो गया। सृजन सैनिक संगठित रूप से पूरे आयोजन में जो 8 से 6.30 तक चला, अपने स्थानों पर बैठे रहे एवं मंत्रमुग्ध हो रसास्वादन करते रहे।

फरवरी, मार्च 2000 में इस आयोजन का संकल्प संचालक मंडल ने लिया था। नई दिल्ली के प्रज्ञापरिजनों ने अद्भुत संगठन शक्ति का परिचय दे यह दायित्व अपने कंधों पर लिया। मात्र दिल्ली ही नहीं, पूरे महानगर विस्तार, नेशनल केपीटल रिजन को यह जिम्मेदारी दी गई थी। इसमें फरीदाबाद, पलवल तथा गुड़गांव, रिवाडी भी शामिल था, तो बुलंदशहर, सिकंद्राबाद, गाजियाबाद, मुरादनगर, मोदीनगर, मेरठ भी। सोनीपत, पानीपत की भी इसमें भागीदारी थी, तो बागपत-बडौत-रोहतक की भी। इन सबका मार्गदर्शन करने के लिए श्री ए एस अवस्थी (रजिस्ट्रार, इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय एवं निदेशक उच्च शिक्षा, दिल्ली) के मार्गदर्शन में एक चौदह सदस्नीय समन्वय समिति बनाई गई। श्री वी एस चौहान, सुलोचना शर्मा, डॉ मुरलीधरन, श्री के सी गुप्ता श्री अमरनाथ गर्ग, श्री पी के तिवारी, श्री धर्मवीर आनंद, श्री एवं श्रीमति जड़िया, राजेन्द्र बित्थर, श्री शीलू शान सागर, डॉ एस पी मिश्रा, श्री ओ पी सोनी तथा श्री गुलशन नवीन इसके सदस्य बने। दिल्ली कार्यालय, जो शाँतिकुँज के कैंप ऑफिस के रूप में ईस्ट ऑफ कैलाश में हैं, इसमें पूरी भूमिका बखूबी निभाई।

मीडिया के शांतिकुंज के सदस्यों एवं दिल्ली के परिजनों के सम्मिलित प्रयासों से एक व्यापक मंथन राष्ट्र की राजधानी में हुआ। अनेकानेक छोटे-बड़े कार्यक्रम हुए। सभी छोटे-बड़े राजनैतिक प्रतिभावानों तक आमंत्रण पहुँचा एवं सभी कार्यक्रम में आए। सबसे बड़ी चुनौती थी भोजन के एक लाख से अधिक पैकेट बनाना एवं उनका वितरण। श्री वीरेन्द्र एवं संतोष चौहान के अथक प्रयासों से यह भी सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। भव्य द्वारों से सजी दिल्ली दुल्हन की तरह सभी का स्वागत कर रही थी। रैलियों से भी अप्रवाहित रहने वाली दिल्ली को बिना अव्यवस्थित किए एक लाख वास्तविक संख्या वाला समूह आकर बिना हल्ला-गुल्ला किए चला जाए एवं किसी को कोई शिकायत न हो, इसका नमूना बना यह कार्यक्रम।

स्टेडियम के केन्द्र में था साँस्कृतिक मंच। चारों ओर सजे थे 28000 दीपक। चार बड़े स्क्रीनों द्वारा कार्यक्रम का सीधा टेलीकास्ट किया जा रहा था। पश्चिम की ओर था विशिष्ट अभ्यागत मंच, जिस पर विराजमान थे भारत सरकार के गृह एवं आँतरिक सुरक्षा मंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी, मानव-संसाधन मंत्री श्री मुरली मनोहर जोशी, सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री श्री रमेशबैस, ‘जागरण’ समूह के प्रमुख श्री नरेन्द्र मोहन तथा शाँतिकुँज-गायत्री परिवार के प्रतिनिधि श्रीमती शैलबाला पण्ड्या एवं डॉ. प्रणव पण्ड्या। एक प्रदर्शनी का अवलोकन कर दीप प्रज्ज्वलन से कार्यक्रम आरम्भ हुआ शाँतिकुँज के लगभग पचास कलाकारों की विशाल टोली ने ‘प्रज्ञावतार’ एवं ‘युग की पुकार’ दो नाट्य प्रस्तुतियाँ दी। भावप्रवण अभिनय एवं संदेश ने जन-जन के हृदय को स्पर्श किया। समारोह संचालक श्री कालीचरण शर्मा जी ने आए सभी प्रतिभावानों का स्वागत किया, तो प्राथमिक परिचयात्मक उद्बोधन में महापूर्णाहुति के प्रथम तीन चरणों सहित इस आयोजन की महत्ता पर प्रकाश डाला। मल्टीमीडिया की एक 24 मिनट की फिल्म द्वारा आंकड़ों के माध्यम से प्रस्तुति दी गई, जो पूरे स्टेडियम में देखी गई। बीच-बीच में प्रेरक प्रज्ञागीतों ने सभी को स्थिर बैठाए रखा व उल्लास के भाव से भर दिया।

चौथे चरण की विधि-व्यवस्था विभूति ज्ञानयज्ञ के फलितार्थों एवं हरिद्वार के विराट् कार्यक्रम पर डॉ. प्रणव पण्ड्या ने प्रकाश डाला, तो शैलबाला पण्ड्या (जीजी) ने परमपूज्य गुरुदेव से जुड़े संस्मरण सुनाकर प्रतिभावानों से राष्ट्र-निर्माण हेतु भावभरा आह्वान किया। श्री नरेन्द्र मोहन ने कहा कि हम देख रहे है कि भविष्य आपका है, गायत्री परिवार का है। साक्षात् देवत्व का अवतरण दिखाई दे रहा है। श्री रमेश बैस ने गायत्री परिवार के एक परिजन के रूप में अपने को बताया, तो मुरली मनोहर जोशी जी ने आध्यात्मिक उभार के लिए गायत्री परिवार को साधुवाद दिया। श्री लालकृष्ण आडवाणी जी दीपयज्ञ के समापन के बाद भावभरे हृदय से बोले कि मैं यहां न आता, तो एक बहुत बड़ी उपलब्धि से वंचित रह जाता।

कार्यक्रम युगनिर्माण सत्संकल्प के पाठ के साथ जलते दीपों की साक्षी में सृजन संकल्प के साथ समापन हुआ, पर पूरे महानगर पर एक अभिनव छाप छोड़ गया।


त्याग-बलिदान की संस्कृति-देवसंस्कृति

जून 1976 में शाँतिकुँज परिसर में दिया गया प्रवचन

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियों, भाइयों! दैवीय सभ्यता पर जब कभी मुसीबतें आई है, लोगों ने जीवन में कठिनाइयाँ उठाकर भी उसकी रक्षा की है। उच्च आदर्शों के लिए त्याग की, बलिदान की संस्कृति रही है यह देवसंस्कृति। उन दिनों जब लंका की आसुरी सभ्यता का आतंक सब ओर छाया हुआ था, सब जगह त्राहि-त्राहि मची हुई थी। मालूम पड़ता था कि अब न जाने क्या होने वाला है और न जाने क्या होकर रहेगा? अनीति जब बढ़ती है, अवाँछनीयताएँ जब बढ़ती है, दुष्टताएँ जब बढ़ती हैं, स्वार्थपरताएँ जब बढ़ती है, तो मित्रो ! सारे विश्व का सत्यानाश हो जाता है। आदमी स्वार्थी होकर के यह सोचता है कि हम अपने लिए फायदा करते है, लेकिन वास्तव में वह अपने लिए भी सर्वनाश करता है और सारे समाज का भी सर्वनाश करता है। ये है आसुरी सभ्यता इसमें पहले आदमी स्वार्थी हो जाता है और स्वार्थांध होने के बाद में दुष्ट हो जाता है, पिशाच हो जाता है। स्वार्थी जब तक सीमित रहता है, तो वहाँ तक ठीक है, वहाँ तक फायदे में रहता है। लेकिन जहाँ एक कदम आगे बढ़ाया, फिर आदमी नीति छोड़ देता है, मर्यादा छोड़ देता है, सब शालीनताएँ छोड़ देता है और सत्यानाश पर उतारू हो जाता है। यह है आसुरी सभ्यता का क्रम।

लंका की आसुरी सभ्यता उस जमाने में सब जगह आतंक फैला रही थी ओर सारा विश्व, सारे देश त्राहि-त्राहि कर रहे थे कि अब क्या होने वाला है ? हर आदमी अनीति के मार्ग पर चलने का शिक्षण प्राप्त कर रहा था और अनाचार के लिए कदम बढ़ाता हुआ चला जा रहा था और अनाचार के लिए कदम बढ़ाता हुआ चला जा रहा था रावण के राज्य में। रावण की इस सभ्यता और संस्कृति में देवसंस्कृति के पक्षधरों को यह विचार करना पड़ा कि इसका प्रतिरोध कैसे किया जाएगा? इसकी रोकथाम कैसे की जाएगी? संतुलन कैसे बिठाया जाएगा? भगवान् ने भी यह प्रतिज्ञा कर रखी थी कि हम धर्म की स्थापना के लिए और अधर्म के विनाश के लिए वचनबद्ध हैं इसके लिए वे विचार करने लगे कि क्या करना चाहिए ? अंत में फैसला हुआ कि अयोध्या से लंका की तुलना में एक ऐसा मोरचा खड़ा करना चाहिए, जो अनीति से लोहा ले सके।

लंका विजय

मित्रों ! अयोध्या में लंका के विरुद्ध मोरचा खड़ा किया गया। एक तो मोटी-सी बात यह थी कि रावण बड़ा खराब आदमी था। एक बंदूक लेकर जाइए और उसे मार डालिए, खत्म कर दीजिए। यह क्या है ? यह बहुत छोटा सा तरीका हैं इससे कोई संस्कृति नष्ट नहीं हो सकती, परंपराएँ नष्ट नहीं हो सकतीं। व्यक्ति मरते हैं और फिर नए व्यक्ति पैदा हो जाते हैं। रावण के बारे में तो कहावत भी थी कि रामचंद्र जी जब उसके तीर मारते थे, तो नया रावण बनकर खड़ा हो जाता था बेटे! संस्कृतियाँ मारने से नहीं मरती है। वे दूसरे तरीकों से मरती है। आसुरी संस्कृति को हम किसी एक व्यक्ति को मारकर नहीं मार सकते।

रावण को मारना तो था जरूर। विचार किया गया। भगवान् ने विचार किया, देवताओं ने विचार किया कि मारने से काम नहीं चलेगा लंका को नष्ट कर देंगे, रावण को मार देंगे, अमुक को मार देंगे, पर इससे काम नहीं बनेगा, क्योंकि परशुराम जी बहुत दिनों पहले ऐसा एक प्रयोग कर चुके थे। ऐसे लोगों को उन्होंने एक बार मारा, दो बार मारा, तीन बार मारा, पर मारने से काम नहीं चला। दैत्यों को इक्कीस बार मारकर ये यह कोशिश करने लगे कि पृथ्वी से असुरों को हम मिटा देंगे, तो काम चल जाएगा, परंतु काम चला नहीं। आखिर में परशुराम जी ने कुल्हाड़ी नदी में फेंक दिया और उसके स्थान पर फावड़ा उठा लिया। फावड़ा उठाया और नए-नए उद्यान लगाने लगे, बगीचे लगाने लगे। उनकी हार और पराजय ने स्वीकार किया कि कुल्हाड़ी के द्वारा हम वह कार्य नहीं कर सकते कि राक्षसों और असुरों को मारकर दुनिया खाली कर दें। इसके लिए एक और काम करना पड़ेगा, हमको हरियाली लगानी पड़ेगी। यही फैसला अयोध्या के संबंध में हुआ।

देवसंस्कृति का उदय

अयोध्या में देवसंस्कृति का उदय आरंभ हो गया। आसुरी संस्कृति से मुकाबला करने वाली देवसंस्कृति। देवसंस्कृति का उदय कैसे हुआ? वास्तव में अयोध्या में लंका के विरुद्ध मोरचाबंदी शुरू हो गई थी। कैसे हुई थी ? बेटे! वे परंपराएँ आरंभ की गई, जिनको देख करके दूसरों की हिम्मत बढ़ती है, हौंसले बढ़ते है। हौंसले बढ़ाने के लिए बेटे, व्याख्यान एक तरीका तो है और हम काम में भी लाते है, लेकिन उपदेश करने से, व्याख्यान देने से प्रेरणाएँ नहीं मिलती, दिशाएँ नहीं मिलती, आवेश नहीं आते, उत्साह नहीं बढ़ते, जीवन नहीं आते, जोश नहीं आते। तो सत्संग से गुरुजी ? नहीं, बेटे ! सत्संग से भी नहीं, और कलम से ? कलम से तो आप बहुत अच्छा लिखते है। बेटे, हम अभी और अच्छा लिखेंगे पर अगर आपका ये ख्याल है कि कलम से लिख करके आप अपना काम चला सकते हैं, तो अगर ऐसी बात रही होती, तो अब तक संपन्न लोगों ने ये काम, जो दुनिया चाहती है, बना सकते थे। अखबार प्रतिदिन लाखों की संख्या में छपते हैं। जापान, शिकागो में एक-एक अखबार करीब-करीब पचास लाख रोज छपता है। अपने हिंदुस्तान में सबको मिलाकर पचास लाख तादाद होगी। एक ही अखबार जब इतना छपता है, तो इतने आदमियों तक विचार एक ही दिन में पहुँच जाते होंगे ? हाँ, बेटे! पचास लाख आदमियों तक अखबार के विचार एक ही दिन में पहुँच जाते है, लेकिन अगर कलम की दृष्टि से और छापेखाने की दृष्टि से लोगों का विचार-परिवर्तन संभव रहा होता, तो वह हमने कब का कर लिया होता।

और गुरुजी! वाणी के द्वारा ! वाणी के द्वारा संभव रहा होता तो बेटे रेडियो स्टेशन जिनके पास हैं, उनको वाणी के द्वारा व्याख्यान करने की जरूरत नहीं थी। दिल्ली से लेकर और कितने रेडियो स्टेशन है, वही पर एक-एक आदमी आराम से बैठा दिया होता और एक-एक ‘स्पीच’ झाड़नी शुरू कर दी होती, तो सारे-के-सारे देश के लोगों तक आवाज पहुँच सकती थी और उससे आसुरी सभ्यता का, अनाचार का, अनावश्यक परिस्थितियों का निवारण कर सकना संभव रहा होता। क्या ऐसा संभव हो सकता है ? नहीं, ऐसा संभव नहीं हो सकता।

स्वे स्वे आचरेण शिक्षयेत्

इसीलिए मित्रों ! देवताओं को क्या करना पड़ा कि अयोध्या से दैवी सभ्यता की शुरुआत करनी पड़ी। कैसे शुरुआत करनी पड़ी ? वहाँ जो आदमी छोटे से खानदान में थे, उन्होंने कहा कि हम अपने नमूने पेश करेंगे लोगों के सामने कि दैवी सभ्यता कैसी हो सकती है और हम इस सभ्यता का विकास क्यों करना चाहते है? दैवी सभ्यता के पीछे क्या परिणाम निकल सकते है ? ये साबित करने के लिए दशरथ के कुटुँब ने, परिवार ने उसी तरह के नमूने पेश करने शुरू कर दिए, जैसे कि लंका वालों ने किए थे। उन्होंने क्या पेश किए ? बेटे, सबके सब एक दिन इकट्ठा हो गए और फैसला करने लगे कि हम बड़े काम करके दिखाएँगे, ताकि दुनिया समझे कि दैवी सभ्यता क्या हो सकती है और दैवी सभ्यता का अनुकरण करने के लिए जोश और जीवट कैसे उत्पन्न किया जा सकता है ?

विश्वामित्र जी ने वहाँ से शुरुआत की और राजा दशरथ से कहा कि आप अपने बच्चे हमारे हवाले कीजिए उन्होंने कहा कि बच्चे तो हमको जान से भी प्यारे है। उन्हें हम आई.ए.एस. बनाएँगे, पी.सी.एस. बनाएँगे। आप इन्हें कहाँ ले जा सकते है ? विश्वामित्र ने कहा, आई.एस.एस., पी.सी.एस. तो पीछे बनते रहेंगे, पहले इन्हें मनुष्य बनना चाहिए और देवता बनना चाहिए। विश्वामित्र और दशरथ जी के बीच जद्दोजहद तो बहुत हुई, लेकिन दैवी सभ्यता की, संस्कृति की शुरुआत तो कहीं से करनी ही थीं विश्वामित्र ने रजामंद कर लिया और कहा, बच्चे हमारे हवाले कीजिए। क्या करेंगे इनका ? दैवी सभ्यता का शिक्षण करेंगे और ये दोनों अनीति के विरुद्ध संघर्ष करेंगे। अरे गुरुजी, ये तो छोटे बच्चे हैं नहीं, ये छोटे बच्चे नहीं हो सकते। जो व्यक्ति सत्य का हिमायती हुआ, वह कभी छोटा नहीं हुआ। सत्य का हिमायती हमेशा बलवान रहा है और जोरदार रहा है। उसके सामने चाहे वह मारीचि ही क्यों न हो, सुबाहु ही क्यों न हो, चाहे वह खर-दूषण ही क्यों न हो, कोई भी क्यों न हो, वह कमजोर ही रहेगा और उसको हारना पड़ेगा, झख मारनी पड़ेगी। विश्वामित्र जी ने राजा दशरथ को समझा दिया और वह शिक्षण देने के लिए, जो योगियों और तपस्वियों के आश्रम में रह करके पाया जाना संभव है, दोनों बच्चों को ले गए।

शुरुआत व्यावहारिक जीवन से

ये क्या होता है? बेटे! ये दैवी सभ्यता की शुरुआत होती है। यह न तो व्याख्यान से हुई, न कथा से हुई और न सत्संग से हुई। कैसे हुई ? व्यावहारिक जीवन से हुईं इससे कम में नहीं हो सकती। कोई श्रेष्ठ परंपरा स्थापित करने के लिए व्यक्तिगत जीवन का आदर्श उपस्थिति किए बिना दुनिया इधर-उधर नहीं हो पाएगी। कथा, व्याख्यान, सत्संग आदि सब खेल-खिलौने है। इनसे हम उसी तरह रास्ता बनाते है जिस तरह रेलगाड़ी के लिए पटरी बनाते है। लेखनी के द्वारा, वाणी के द्वारा, प्रचार माध्यमों के द्वारा, जनसाधारण की शिक्षा के द्वारा, सत्संगों के द्वारा, कथाओं के द्वारा हम रेलगाड़ी की पटरी बनाते है बस। फिर रेलगाड़ी कहाँ से चलेगी ? रेलगाड़ी तो बेटे, अपने व्यक्तिगत आदेश उपस्थित करने से पैदा होती है। इससे कम में ही नहीं सकतीं इस तरह उन्होंने पटरी बनाई ओर वहीं से शुरुआत हुई । पीछे सबने फैसला लिया कि हम दैवी संस्कृति, दैवी सभ्यता का स्वरूप क्या हो सकता है, उसको बताने के लिए एक-से-एक बढ़िया त्याग करेंगे और बलिदान करेंगे। सारी-की-सारी उस कंपनी ने, कमेटी ने फैसला कर लिया कि हम दुनिया को बताते हैं कि रामराज्य कैसे हो सकता है।

रामराज्य कैसे आया ?

मित्रो ! रामराज्य का बीज अयोध्या में बोया गया और वह भी एक छोटे-से खानदान में। कैसे बो दिया गया ? बेटे! ऐसे बो दिया गया कि थोड़े-से आदमी थे, लेकिन वे एक-से-एक बढ़िया त्याग करने पर उतारू हो गए रामचंद्र जी ने कहा कि राजगद्दी क्या होती है ? इससे तो वनवास बेहतरीन है। इनसान को क्या चाहिए ? पैसा चाहिए, विलासिता चाहिए, नौकरी में तरक्की चाहिए, प्रमोशन चाहिए, लेकिन उन लोगों ने कहा कि हमें त्याग चाहिए, बलिदान चाहिए। त्याग और बलिदान से आदमी महामानव बनता है, महापुरुष बनता है, तपस्वी बनता है, ऐतिहासिक पुरुष बनता है और पैसे से? पैसे बढ़ने से आदमी बनता है धूर्त और ढोंगी। और क्या बनता है ? न जाने क्या-क्या बनता है।

मित्रो ! क्या हुआ ? उन्होंने त्याग और बलिदान के लिए, आदर्श उपस्थित करने के लिए ये फैसले किए कि हमको अब बड़े कदम उठाने चाहिए, ताकि रावण की लंका को नीचा दिखा सकें। रामचंद्र जी ने कहा कि हम ऋषियों के आश्रम में जा करके वनवासी जीवन जीने के लिए, तपस्वी जीवन जीने के लिए रजामंद है और राजपाट छोड़ने के लिए रजामंद है। परिस्थितियाँ ऐसी बन गई थी और रामचंद्र जी जटा-जूट बाँधकर नंगे पैर जंगलों में चलने और वनवास में रहने के लिए उतारू और आमादा हो गए। लक्ष्मण जी ने कहा कि भाई-भाई के बीच में कैसी मोहब्बत होनी चाहिए, इसका आदर्श उपस्थित करने के लिए मुझे भी रामचंद्र का अनुकरण करना चाहिए। वह औरंगजेब वाल अनुकरण नहीं, जिसने बाप को कैद कर लिया था और भाइयों को मार डाला था। वह नहीं बेटे, दूसरा वाला आदर्श। उसके लिए क्या करना पड़ेगा ? उसके लिए दैवी संस्कृति की सभ्यता की स्थापना करनी पड़ेगी, ताकि लोगों के भीतर से उमंगे, लोगों के भीतर से जोश, लोगों के भीतर से जीवट, एक-दूसरे के नमूने देख करके पैदा हो सके।


युगपरिवर्तन नवसृजन हेतु पुरुषमेध एवं सौत्रामणी प्रयोग

नवयुग के सृजन के लिए विराट् महापुरुषार्थ की महापूर्णाहुति। कितना महत्वपूर्ण समय है यह ? यह भी कहा जा सकता है कि आज से प्रायः 75 वर्ष पूर्व युगचेतना के अभ्युदय, अखण्ड दीप प्रज्ज्वलन के साथ जो संकल्प लिया गया, उसकी महापूर्णाहुति। अथवा एक विराट् समुदाय द्वारा लगातार बीस वर्षों से,किंतु प्रखरता के साथ विगत बारह वर्षों से किए जा रहे साधनात्मक पराक्रम की महापूर्णाहुति। जो भी हो, चतुर्थ चारण आते-आते राष्ट्र-साधना परिपक्व स्थिति में दिखाई दे रही है। चारों ओर उससे वातावरण में उल्लास को, शक्ति को, सृजन प्रक्रिया की गतिविधियों को सक्रिय देखा जा सकता है। उस पर भी शास्त्रोक्त पुरुषमेध महायज्ञ एवं सौत्रामणी प्रयोग। ऐसा श्रौतयाग का अभिनव प्रयोग, जो अभूतपूर्व हो, विगत 2000 वर्षों में कहीं संपन्न न हुआ हो, किंतु इस विराट् अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा संपन्न किया जा रहा हो, उस विराट् पुरुष के जागरण हेतु, जो नवयुग लाने को संकल्पित है।

पुरुषमेध क्या है ?

यजुर्वेद के अध्याय 30 का नाम पुरुषमेध है। पुरुषमेध, नरमेध, नृमेध, मनुष्य-यज्ञ, नृयज्ञ आदि शब्द एक ही भाव रखते है। ‘मेध’ शब्द का अर्थ शास्त्रकारों ने कई प्रकार से बताए है -मिलना, परस्पर मैत्री-भाव बढ़ाना, एकता स्थापित करना, पवित्रता का संचार करना, एक-दूसरे को जोड़ना, सत्त्व बल एवं उत्साह बढ़ाना। इस प्रकार ‘नरमेध’ या ‘पुरुषमेध’ का अर्थ हुआ, मनुष्यों में परस्पर मैत्री-भाव बढ़ाना, मनुष्यों को पवित्र बनाना, मनुष्यों में सत्व, बल, उत्साह की वृद्धि करना, मनुष्यों में सत्कार और परस्पर औदार्य बढ़ाना। पारंपरिक रूपों में ‘मेध’ का अर्थ ‘हिंसा’ से जोड़ा जाता है, जो कि गलत है। हमारे वेदज्ञ महानुभावों का मत है कि उन्नति के विरोधी दस्यु भावों का नाश करना ही यज्ञ हिंसा है, यानि ‘मेध’ है। मेध तो मेधावृद्धि का एवं संगम-संगतिकरण का पर्याय है। यज्ञ का एक वाचक शब्द अध्वर भी है। “न ध्वरः अध्वरः अहाँसमयं कर्म” (निध.2/19) अर्थात् जिसमें हिंसा नहीं होती, उस कर्म का नाम अध्वर है। इस प्रकार मेध शब्द की व्याख्या से ही स्पष्ट हो जाता है कि हम पुरुषमेध से क्या हस्तगत करना चाह रहे है।

वैदिक मंत्रों के आध्यात्मिक अर्थ जैसे ब्राह्मण और आरण्यक ग्रंथों में उपलब्ध होते है, वैसे किसी अन्य ग्रंथ में नहीं है। इसीलिए शतपथ ब्राह्मण को यजुर्वेद के साथ अध्ययन कर अर्थों को वास्तविक रूप में प्रस्तुत किया जाता हैं। सबको सत्कर्म करने की प्रेरणा देना, सबकी ज्ञान से शुद्धि करना, एक ईश्वर की सामुदायिक उपासना करना, दुष्ट भावों को दूर हटाना, ज्ञान, बल, धन, कौशल इन चारों का सभी में समान वितरण, कर्म का उत्साह और कर्म-कौशल का विस्तार पुरुषमेध का वास्तविक लक्ष्य होता है। नरमेध का वैदिक आशय कितना सुँदर रहा है और मध्यकाल के कर्मकाँडियों ने किस सीमा तक गिराया, इसे भलीभाँति समझा सकता है।

यजुर्वेद के अध्याय 61 में ‘पुरुष’ शब्द आया है। इस ‘पुरुष मेध’ में पुरुष शब्द से आशय है, परमेश्वर, परमात्मा, परब्रह्म है। इस ईश्वर की समग्र समुदाय द्वारा मानस पूरा किया जाना ही पुरुषमेध है। पुरुष अर्थात् पुरि+वसति, पुरि अर्थात् नगरी में बसने वाला मनुष्य-नागरिक। मेध अर्थात् बुद्धि का विकास। नागरिक मनुष्यों की बुद्धि का विकास करना ही पुरुष मेध का लक्ष्य है। ज्ञान-प्रचार के लिए ज्ञानी को नियुक्त किया जाता है, ब्रह्मणे ब्राह्मणं आलभते, यह वाक्य ही यह बताता है कि सद्ज्ञान के विस्तार के लिए, सभी के उज्ज्वल भविष्य के लिए इस यज्ञ में प्रार्थना की जाती है। इसमें सविता देवता से प्रार्थना की जाती है कि परमेश्वर सबको सत्कर्म करने की, सत्कर्मों का संरक्षण करने की बुद्धि प्रदान करें। सबके अंदर पवित्रता का संचार हो एवं सभी की वाणी मधुर बने, यह प्रार्थना भी पुरुषमेध के प्रथम मंत्र में की गई है। दूसरा मंत्र हमें ईश्वर के पापनाशक तेज का ध्यान करने की प्रेरणा देता है, जो कि गायत्री मंत्र की ही प्रार्थना है। तीसरा मंत्र बुराइयों को दूर कर अच्छाइयों को पास लाने की बात कहता है। चौथा मंत्र राष्ट्र में विषमता का भाव मिटाकर मनुष्य मात्र की सर्वांगपूर्ण उन्नति, वैभव विस्तार की बात कहता है। पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर जी ने बड़े विस्तार से एक-एक शब्द की व्याख्या करते हुए इस महायज्ञ को एक अति पुण्यकारी कर्म बताया है।

कात्यायन श्रौतसूत्र कहता है (21/1/1) कि पुरुषमेध सब भूतों का अतिक्रमण करके सबसे ऊपर स्थित होने की कामना से किया जाता है। सर्वोत्कर्ष की प्राप्ति के लिए प्रतिभावानों द्वारा राष्ट्र के वर्चस्व को बढ़ाने के लिए पुरुषमेध किए जाने का महात्म्य बताया गया है। ऐसे विद्वान् पुरुषमेध के पश्चात् अरण्य में जाकर तप करते है और वेद संन्यास ले लेते है, जो कि एक प्रकार से वानप्रस्थ संस्कार है। तपस्वी ब्राह्मणोचित जीवन एवं ज्ञान का विस्तार ही फिर उनका लक्ष्य होता है।

पुरुषमेध महायज्ञ जो शाँतिकुँज हरिद्वार द्वारा होने जा रहा है, मैं साँकेतिक बंधनों के प्रतीक रूप में श्रेष्ठ कर्म करने के लिए संकल्पित पुरुषों को यूप के समक्ष बिठाया जाएगा एवं फिर उन्हें सामूहिक वानप्रस्थ की दीक्षा देकर प्रथम तीन मंत्रों की आहुतियों के बाद मुक्त कर दिया जाएगा। इससे राष्ट्र का ऐश्वर्य, बल-ज्ञान इससे बढ़ेगा। “अपने-अपने वैयक्तिक स्वार्थों को छोड़कर राष्ट्र के ही उत्थान के लिए अपना जीवन अर्पित कर देना ही पुरुषमेध यज्ञ है।” यह जनवरी 1958 में अखण्ड ज्योति पत्रिका में स्वामी श्री अभयदेव जी द्वारा उद्धृत है। व्यष्टि पुरुष, राष्ट्र पुरुष, विराट् पुरुष की समग्र साधना एवं इनके द्वारा सर्वस्व की प्राप्ति के लिए किया गया उपक्रम ही पुरुषमेध है।

सौत्रामणी क्या है ?

यह श्रौतयाग शुक्ल यजुर्वेद संहिता के 19वें, 20वे, 21वें अध्यायों में वर्णित है। सोमयाग संस्था का एक अंग है सौत्रामणी प्रयोग। इसका लक्ष्य है राष्ट्र की विषतियों से रक्षा। यह मानव को भी हिंसा, ऋण व पाप से बचाता है। असत् से रखा को भी सौत्रामणी कहा गया है। सरस्वती, इंद्र और अश्विनी कुमार तीन देवताओं को इसमें आहुति दी जाती है। ये दुःखों के तीनों कारणों को मिटाते है। अज्ञान, अभाव व अशक्ति ही दुःखों के तीन मूलभूत कारण है। अज्ञान का निवारण सरस्वती, विद्या की देवी की उपासना द्वारा तथा यज्ञ में आहुति देकर साधक सारस्वत बनता है। अभाव इंद्र की उपासना, उन्हें आहुति देने से मिटता है एवं साधक ऐंद्र बनता है, ऐश्वर्यशाली बनता है। अशक्ति का निवारण अश्विनी कुमारों की उपासना, आहुति द्वारा होकर साधक सबल, समर्थ, सशक्त बनता है।

“सुत्रामा इंद्रों देवता अस्याः” जिस यज्ञ का प्रधान देवता हो इंद्र, जो चारों दिशाओं को प्रकाशित करे, वह सौत्रामणी याग कहलाता है। ‘सुत्रामा’ शब्द का अर्थ है इंद्र। अमरकोष के अनुसार, “सुत्राम्न इयं सौत्रामणी” सुत्रामा शब्द से सौत्रामणी नाम पड़ा है। ‘सुत्रात्’ अर्थात् बुराइयों से बचाना। सौत्रामणी का यह सौत्रामणीत्व है कि वह आत्मा को पाप से, मनुष्य को मृत्यु से बचाता है। इस यज्ञ से वीर्य और पराक्रम की उपलब्धि होती है, इसलिए इसे करने का माहात्म्य बताया गया है। राष्ट्र में ब्राह्मणत्व एवं सुसंस्कारिता के अभिवर्द्धन हेतु भी इसे करने का प्रावधान बताया गया है।

यह यज्ञ माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी से आरंभ होकर, चार दिन तक चलता है। हमारे सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ में भी यह देवपूजन के पश्चात् द्वादशी (कार्तिक शुक्ल) से आरंभ होकर पूर्णिमा तक चलेगा। इस यज्ञ के समस्त कृत्य दर्श-पौर्णमास याग की ही तरह है। इस याग की दक्षिणा गौ का वत्स है अर्थात् गौमाता-बछड़े सहित दान में दी जाए, गौ-संवर्द्धन के लिए संकल्पित हुआ जाए, तो इसका पूरा पुण्य मिलता है।

अश्विनी कुमार एवं सरस्वती के उपचार ने नमुचि नामक राक्षस द्वारा हर ली गई समस्त शक्ति को इंद्र में पुनः स्थापित कर दिया और दोनों देवताओं ने इंद्र को (सुत्रात्) अर्थात् पाप से बचाया, इसीलिए इसका नाम सौत्रामणी हो गया ।इस यज्ञ में स्विष्टकृत के पूर्व यजमानों का अभिषेक किया जाता है, ताकि वे भी पापमुक्त हो इंद्र की तरह ऐश्वर्यवान, संकल्पवान् बन सकें। इस यज्ञ का माहात्म्य सर्वाधिक बताया गया है। क्योंकि ज्ञानवान्, श्रेष्ठ, ब्राह्मणत्व अभिवर्द्धन की कामना वालों द्वारा इसे निष्काम भाव से संपन्न किया जाता है एवं यह श्रेष्ठता की ही उपलब्धि कराता है। ऐतरेय ब्राह्मण लिखता है, “सर्वाभ्यों वा एव देवताभ्य आत्मानमालभते।” अर्थात् यज्ञकर्त्ता समग्र देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अपने अहंकार को समर्पित करता है। जीवात्मा को पशु मानकर उसे समर्पित किया जाए, यही सबसे बड़ा यज्ञ है। इसी कारण श्रौतयागों का महत्त्व माना गया है।

यह यज्ञ इंद्ररूपी संकल्प देवता, राष्ट्र देवता के क्षीण वीय, क्षीण सामर्थ्य होने पर उसे परिपूर्ण, स्वस्थ, जीवनी शक्तिसंपन्न बनाने का अश्विनी कुमार द्वारा तथा मेधासंपन्न बनाने का सरस्वती द्वारा किया गया एक प्रयोग है। इससे राष्ट्र में विद्यावान्-प्रतिभावानों की संख्या बढ़ती है, ऐश्वर्य, सैन्य बल में भी अभिवृद्धि होती है। कात्यायन श्रौतसूत्र इसकी विस्तार से व्याख्या करता है, जिसे सूक्ष्म अर्थों में ही समझा जा सकता है।

यह उपर्युक्त विवरण विस्तार से सभी याजकों, संस्कृति साधकों की जिज्ञासा पूर्ति हेतु दिया गया है, ताकि वे भलीभाँति यज्ञ का माहात्म्य समझकर इस प्रयोग के महत्व को समझ सकें। पुरुषमेध एवं सौत्रामणी दोनों जब संपन्न होते है, विशेष रूप से संधिवेला में, तो युग के नवनिर्माण की प्रक्रिया को गति प्रदान करते हैं, प्रतिभाओं के अभ्युदय हेतु वातावरण बनाते है तथा राष्ट्र के विद्यावानों का वर्चस्व सारे विश्व में बढ़ाते हैं। यही तो है युगपरिवर्तन की प्रक्रिया का वह महायज्ञ, जो हम नवंबर माह की 7 से 11 की तिथियों में संपन्न कर रहे है।


न केवल इस बढ़े भार को बँटाएँ, सदस्य संख्या भी बढ़ाएँ

‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका 86 वर्षों से सतत् प्रकाशित होती रही है। यह परमपूज्य गुरुदेव की प्राणचेतना की संवाहिका है। हाथ से बने कागज पर , हाथ से चलने वाली मशीन की श्रम-साध्य प्रक्रिया से इसकी छपाई गई थी। यह अपनी लंबी यात्रा अनेकानेक व्यवधानों के बावजूद पूरी करती रही है, क्योंकि इसके पीछे इसके प्रति परिजनों का श्रद्धाभाव जुड़ा है। युगऋषि, वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा कठोर तप के नवनीत द्वारा आत्ममंथन के माध्यम से जो भी कुछ सार निकला, ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के रूप में जनाजन के सम्मुख आया। चूँकि परोक्षजगत से संचालित प्राणीशक्ति का पुँज है यह , परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण (1990), परमपूज्यनीया माताजी के भी उन्हीं में लय होने (1994) के बाद भी इसके पाठकों में अनवरत वृद्धि होती रही है एवं विगत दस वर्षों में इनकी संख्या ढाई गुना बढ़ी है।

आधुनिक प्रेस उपकरणों को जिन्हें जानकारी है, वे जानते है कि कितनी तेजी से उनके मूल्य बढ़े हैं। प्रायः साढ़े छह लाख पत्रिका की छपाई पूर्णतः स्वावलंबी भाव से होती है, फिर भी छपाई की लागत, कागजों के बढ़ते मूल्य, स्याहियों की बढ़ती कीमतों ने इतने अवरोध खड़े कर दिए है कि अब इसे वर्तमान मूल्य पर इसी कलेवर में प्रकाशित करने में कठिनाई हो रही है। बिना किसी लाभ या हानि के मशीनरी स्तर पर चल रहे इस प्रयोग को किसी तरह विगत दो वर्षों से तो निताँत हानि में ही चलाया जा रहा है। जिस मिशन की दैवी सेवाएं संचालित करें, वह रुक कैसे सकता है, फिर भी परिजनों के सहयोग के अभाव में आर्थिक आक्रमण कहीं इस ज्योति का विलियित न कर दे, इसलिए लौकिक स्तर पर तो प्रयास किए ही जाने चाहिए। कलेवर बढ़ता जा रहा हैं, फोटो रंगीन छप रहे हैं, सामग्री का उच्चस्तरीय बनाया गया है तथा कागज की क्वालिटी भी अच्छी की गई है। बढ़े कलेवर व इन्हीं दामों में लगातार इसे पाँच वर्ष किसी तरह चलाया जाता रहा है। अब अपनी जेब से संस्थान को लगाने की स्थिति बिलकुल नहीं रह गई है।

इस बीच प्रायः सभी मासिक, साप्ताहिक, पाक्षिक अखबारों के दाम बढ़ते चले गए है। काँदिनिली, इंडिया टुडे (हिन्दी) , दोनों ने ही कीमतें बढ़ाई है। कादंबिनी मासिक का एक अंक का मूल्य पच्चीस रुपये है एवं वार्षिक चंदा 230 रुपये । विज्ञापनों से वे अन्य खरच भी उठा लेते हैं इंडिया टुडे हिन्दी पिछले दिनों काफी लोकप्रिय हुई है। 10 रुपये प्रति पत्रिका इसका मूल्य है। तदनुसार प्रायः पाँच सौ बीस रुपये प्रतिवर्ष माना जाना चाहिए, पर वार्षिक चंदा है 699 रुपये अन्य कई पत्रिकाएँ जो हिंदी में प्रकाशित होती थी, बंद होती चली गई। संस्कृति से इतर फिल्मी पन्नों वाले तो ढेरों दैनिक, पत्रिका बिकते ही रहते है। इनसे निताँत भिन्न है। ‘अखण्ड ज्योति’। जिसने जन-जन की सुयचित को बढ़ाया है एवं एक विधेयात्मक स्वाध्याय की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। विज्ञापन उपर्युक्त सभी पत्रिकाएं लेती है व अपनी अधिकाँश आय उन्हीं से इस उपभोक्ता प्रधान जगत् में लेती है। अपनी नीति शुरू से ही संस्थापक, आराध्य सता के निर्देशानुसार वैसी ही चलती रही हैं, चलती रहेगी। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका मूलतः परिजनों के अंशदान से चलती है, ज्योति प्रज्वलित बनी रही है इसी में इसकी शुचिता भी है, गरिमा भी ।

गेटअप यथावत रहे, शोध-निष्कर्षों को चित्रों के साथ छापा जाए, लेजर प्रिंटिंग से लेकर कागज की गुणवत्ता बढ़ाई जाए व विषयवस्तु की गुणवत्ता भी बनी रहे, तो एक ही उपाय है कि इसका चंदा बढ़ा दिया जाना चाहिएं। हर वस्तु जहाँ महँगी होती जा रही हो, वहाँ लागत ही नहीं, हानि पर निकलने वाली अपनी प्राणों से प्रिय पत्रिका को महँगे मूल्य पर भी परिजन अपनाएंगे, स्वीकार करेंगे, ऐसा विश्वास रखा गया है। अन्य कोई विकल्प बचा भी तो नहीं।

इसलिए सन् 2001 की जनवरी से अखण्ड ज्योति का चंदा बढ़ाकर साठ से बहत्तर रुपये वार्षिक किया जा रहा है। विगत पाँच वर्षों से यह कीमत बढ़ाई नहीं गई थी, कलेवर बढ़ गया व रंगीन चित्र भी आने लगे। अब यह बढ़ी कीमत पर और भी आकर्षक रूप से प्रकाशित हो, ऐसी योजनाएँ बनाई जा रही है। इतनी वृद्धि आशा है सभी स्वीकार करेंगे। इस बढ़ी हुई चंदे की कीमत में छह रुपये मासिक की दर पर जो पत्रिका उनके पास आएगी, उसमें प्रतिवर्ष संस्कृति, अध्यात्म, राष्ट्र साधना प्रधान एक या दो विशेषाँक होंगे। जनरुचि के सामान्य ज्ञान के विषय अधिक होंगे टाइप ऐसा होगा कि हर वय के व्यक्ति को पढ़ने में आसानी हों हर लेख के साथ चित्र भी हो, यह प्रयास किया जा रहा हैं रंगीन पृष्ठ चार प्रत्येक पत्रिका में होंगे सतयुगी संभावनाओं से भरे तथा वैज्ञानिक अध्यात्मवाद प्रधान लोक-शिक्षण के ज्ञान-क्राँति लाने वाले लेखों की भरमार होगी।

गुरुसत्ता की प्राणचेतना जिसमें गुँथी हो, उस जीवंत ऊर्जावान लोक-शिक्षक की भूमिका निभाने वाली पत्रिका की पाठक संख्या में जितनी अभिवृद्धि की जाएगी, उस पुण्य प्रयोजन में और मदद मिलेगी। जिसके लिए यह पत्रिका प्रकाशित हो रही। परिजन वोट कर लें, अब दिसंबर में महापूर्णाहुति विशेषाँक के साथ चंदा बढ़कर वार्षिक 72 रुपये, आजीवन 900 रुपये तथा विदेश के लिए 750 रुपये होगा । इसी बढ़े चंदे में पत्रिका मंगाएं और पाठक संख्या बढ़ाएं। अनुयाज वर्ष की यह सबसे बड़ी पुण्य भरी प्रक्रिया होगी।


सृजन सैनिकों के प्रति भावभरी अभिव्यक्ति

शचींद्र भटनागर


सृजन सैनिकों के प्रति भावभरी अभिव्यक्ति (kavita)

नींव के पत्थरों! यह मिशन का भवन, युग-युगों तक तुम्हारा रहेगा ऋणी।

मानते है कि तुम भूमि के गर्भ में, कर सकोगे न अनुभव पवन की छुआन, मंदिरों की मधुर घंटियों की गमक, भोर की गोद में मुस्कराती किरन, दिख सकेगी न तुमको बसंती छटा, छू न पाएगी तुमको घट सावनी।

सत्य है, सामने भव्यता के कभी, तम नहीं आ सकोगे किसी ध्यान में, कोई उत्सव-समारोह अथवा सभा, भी न होगी तुम्हारे सुसम्मान में, गीत-स्तुति-प्रशंसा तुम्हारे लिए, लिख सकेगी नहीं कोई भी लेखनी।

यह भवन अब भले ही गगन चूम ले, किंतु उसको जनाधार तुमसे मिला, खुद अपरिचित रहे, पर मिशन की प्रखर, कीर्ति को विश्व-विस्तार तुमसे मिला, छा गई छाँह बनकर मिशन के लिए, साथियों! भाव-श्रद्धा तुम्हारी घनी।

नींव होती तुम्हारी सबल यदि नहीं, तो मिशन भव्यता प्राप्त करता नहीं, जुड़ न पाते जड़ों से करोड़ों विटप, विश्व-उद्यान इतना सँवरता नहीं, सुरसरी इस मिशन की न बनती कभी, त्रस्त संसार के हित तरण-तारिणी।

नींव के पत्थरों! पात्रता का कहीं, मिल सकेगा तुम्हारा न सानी कभी, एक पल भी नहीं भूल पाएँगे हम, त्याग-तप की तुम्हारी कहानी कभी, स्वार्थ को त्यागकर, बीज से तुम गले, दीप-से तुम जले, भावना के धनी!

कोई देखे-न-देखे, तुम्हारे लिए, पूज्य गुरुदेव की दृष्टि से प्यार है, अब तुम्हारे लिए दिव्य अनुदान से, छलछलाती हुई गुरु-कृपाधार है, कल नया युग प्रतिष्ठित करेगा तुम्हें, हो मिशन के तुम्हीं वास्तविक अग्रणी।

*समाप्त*