संयम का संगीत

जीवन का सत्य संगम के संगीत से प्रकट होता है। जो किसी भी दिशा में अति करते हैं, वे मार्ग से भटक जाते हैं। भटका हुआ मानव-मन अतियों में डोलता और चलता है। एक अति से दूसरी अति पर उसे ले जाना बहुत आसान है। उसका स्वभाव ही कुछ ऐसा है। शरीर के प्रति जो बहुत आसक्त है, वही व्यक्ति प्रतिक्रिया में शरीर के प्रति बहुत क्रूर और कठोर भी हो सकता है। इस कठोरता और क्रूरता में भी वही आसक्ति छिपी होती है। जैसा वह पहले शरीर से बँधा था, वैसा ही अब भी-हाँ, पर विपरीत दिशा में शरीर से ही बँधा होता है। उसका मन पहले भी शरीर के ही चिंतन में लगा था और अब बदली हुई विपरीत दशा में भी उसका चिंतन शरीर पर ही केंद्रित होता है। इस भाँति विपरीत अति पर जाकर मन धोखा दे देता है। इस धोखाधड़ी में वह अपनी मूलवृत्ति को बचा लेता है। सदा ही अतियों में चलते रनहे की इस मानसिक वृत्ति का कारण यही है। विपरीत अतियों में चलने की यह मन की प्रवृत्ति ही असंयम है।

जबकि संयम दो विपरीत अतियों के बीच मध्य बिंदु की खोज है। इस मध्य बिंदु पर स्थिर होने की कला का नाम ही ‘संयम’ है। शरीर के प्रति राग और विराग का मध्य खोजने और उसमें स्थिर होने से वीरता का संयम उपलब्ध होता है। संसार के प्रति आसक्ति और विरक्ति का मध्य खोजने और उसमें स्थिर होने से संन्यास का संयम उपलब्ध होता है और इस भाँति जो समस्त अतियों में संयम को साधता है, वह अतियों से अतीत हो जाता है और उसके जीवन में संयम का सुरीला संगीत गूँजने लगता है।

संयम के इस सुरीले संगीत में जीवन का समस्त कोलाहल विलीन हो जाता है। इस कोलाहल को जन्म देने वाली ईर्ष्या, द्वेष एवं प्रपंच की सारी वृत्तियाँ और इन सबका जन्मदाता मन भी संयम के इस सुहाने संगीत में अपना अस्तित्व खो बैठता है। फिर तो केवल वही निनादित होता है, जो सदा सदैव से ही स्वयं की भीतर निनादित हो रहा है। संयम के संगीत का यह सुरीलापन ही तो निर्वाण है, मोक्ष है, परमब्रह्म है। यही जीवन का सत्य है।


कालजयी समृद्धिशाली भारतीय इतिहास

इतिहास जीवाश्म नहीं जीवंत होता है। इतिहास के साथ वर्तमान का गहरा संबंध है। किसी भी राष्ट्र एवं उसकी संस्कृति की समृद्धि उसके अतीत के इतिहास पर निर्भर करती है। साँस्कृतिक सौंदर्य की अपूर्व झलक इतिहास के सार्थक बोध के बगैर असंभव है। भारतवर्ष की ऐतिहासिक धरोहर यहाँ की साँस्कृतिक संपदा ही है। ऐसे इतिहास के बारे में पूर्वी एवं पश्चिमी दृष्टिकोण में पर्याप्त भिन्नता है। इसे क्रमशः एकाँगी एवं समग्र कहा जा सकता है। कुछ भी हो, इतिहास को समझने एवं जाने के लिए इतिहास-बोध का होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है।

प्राचीनकाल में इतिहास और पुराण दोनों शब्दों से इतिहास का बोध होता था। इतिहास यानि कि ठीक ऐसा हुआ था। इतिहास शब्द की व्याख्या वेदों में भी की गई है। शौनक ऋषि के अनुसार वृहद देवता ग्रंथ में अधिक स्पष्ट रूप से लिखा है, ऋषियों द्वारा कही गई प्राचीनकाल की बात इतिहास है। देवासुर संग्राम के विषय में जो आख्यान है, वह भी इतिहास है। शतपथ ब्राह्मण में भी इसी सत्य को प्रकट किया गया है।

एतिथ्य परंपरागत कथन को कहते हैं। यह इतिहास के कथन का ढंग है। पराकृत्य भी पूर्वकाल की बात को कहने का एक ढंग है। पराकृत्य भी पूर्वकाल की बात को कहने का ढक ढंग है। इसी तरह पराकृति, इतिवृत्त, उपाख्यान, अनुचरित, कथा, परिकथा, अनुवंश, गाथा आदि शब्द भी इतिहास से संबंधित माने जाते हैं। रामायण, महाभारत, पुराण, राजतरंगिणी आदि सभी इतिहास के ग्रंथ हैं। इतिहास के इन सब प्रकारों का नाम गिनाने का अभिप्राय यह है कि भारत के प्राचीन वाङ्मय में ये सब प्रकार और कदाचित् इससे भी अधिक प्रकार थे, जिन्हें इतिहास कहा जाता था। सच तो यही है कि इतिहास-बोध की सार्थकता उसके यथार्थ स्वरूप में निहित है।

इतिहास भले ही अतीत की कथा कहे, लेकिन वर्तमान से उसका अनन्य संबंध है। वर्तमान में जो कुछ हैं, उसके कार्य-कारण की एक लंबी और बहुसूत्री परंपरा हैं इसे केवल आपात स्थिति में जानने का प्रयास किया जाता है। इसे जानने से घटना, क्रिया, वस्तु और विचार सभी के चरित्र अत्यंत स्पष्ट हो जाते हैं। प्रत्येक वर्तमान अपने पीछे इतिहास को छिपाए रखता है। इसकी जानकारी वर्तमान को और अधिक महत्ता एवं विशेषता प्रदान करती है। कोई भी वर्तमान अपने अतीत का समग्र योग नहीं होता है, बल्कि इतिहास के किन्हीं अवशिष्ट अंशों के संधि-बिंदुओं पर एक नई परिघटनावली की उद्भास प्रक्रिया का अंग होता है। यह कार्य होने के साथ ही कारण में बदल जाता है। अतः इतिहास और वर्तमान का संबंध सर्वथा अविच्छिन्न होता है।

यदि वर्तमान का जन्म इतिहास से ठीक उसी तरह से होता, जैसे बच्चे का जन्म माँ के गर्भ से होता है, तो संभव है वर्तमान के होने और वर्तमान में जीने से लाभ-हानि का आकलन भी हो पाता। परंतु इतिहास का चरित्र केवल मनुष्य के निर्णयों और बातों पर निर्भर नहीं करता। वर्तमान हो या फिर इतिहास, यह सब बहुत सारे लोगों के निर्णय-अनिर्णय, क्रियाशीलता और निष्क्रियता का समन्वय होता है। हालाँकि इन बहुत सारे लोगों के कार्यों और निर्णयों का मूल्याँकन संभव नहीं है। फिर भी इस अनंत वैविध्य के समन्वित प्रभाव से वर्तमान का सामान्य चरित्र निर्धारित होता है।

वर्तमान लंबाई-चौड़ाई से शून्य बिंदु या मोटाई से रहित रेखा की तरह एक संकल्पना है, जिसके बिना हम अपनी स्थिति को समझ नहीं पाते। जहाँ वर्तमान चरित्र परिवर्तमान है और भविष्य मात्र एक संभाव्य कल्पना है, वही अतीत अकेला ऐसा है, जो ठोस यथार्थ के रूप में हमें उपलब्ध होता है। किसी वस्तुपरक चिंतन, जिससे भविष्य की तस्वीर गढ़ी जा सकती है या इसकी चुनौतियों का सामना किया जाता है, इसी ठोस सामग्री के आधार पर संभव है।

किसी व्यक्ति या राष्ट्र के जीवन में ऐसे विषम पल भी आते हैं, जब वह अपने इतिहास को भूलना चाहता है। प्रायः यह अपने ही कर्मों के लिए आत्मग्लानिवश होता है। वह महाकवि जयशंकर प्रसाद की कामायनी के मनु की तरह कहता है, “विस्मृति का अवसाद घेर ले, नीरवता बस चुप कर दे।” उसे अपने अस्तित्व से डर लगने लगता है। कभी-कभी वर्तमान भी इतना भयावह हो उठता है कि पीछे मुड़कर देखने का अवकाश नहीं मिलता। हमारी पूरी मानसिक ऊर्जा आत्मरक्षा में व्यय हो जाती है। आगे कोई भविष्य नहीं दिखाई देता। इसी कारण जो भी सुख का क्षण मिलता है, उसे पूरा भोग लेने की अदम्य लालसा उमड़ पड़ती हैं। परिणामतः अराजकता की स्थिति पनपने लगती हैं। क्षण में जीने वाला व्यक्ति सही ढंग से वर्तमान में भी नहीं जी पाता। वर्तमान से कटकर और भविष्य को समाप्त मानकर जीने वाले ऐसे व्यक्ति का जीवन अपने अंत की प्रतीक्षा मात्र होता है। हालाँकि इस क्षण भर के भोग में भी उसे एक असह्य मानसिक यंत्रणा ही मिलती है।

आज का जीवन प्रायः इसी इतिहासहीनता और भविष्यहीनता के बीच सरक रहा है। ऐसी स्थिति के कारण ही कालबोध पीड़ादायक व त्रासजनक तथा देशबोध विघटन-वादी, अनियंत्रित एवं संकीर्ण हो चला है। आज के वर्तमान समग्र में झाँककर यदि कहा जाए कि भारतीय इतिहास की हमारी पहचान खतरे में हैं, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसके मूल में जाने पर पता चलता है कि पिछले समय में इतिहास के संबंध में पूरे समाज की भागीदारी न्यून रही है। कतिपय तथाकथित बुद्धिजीवियों ने इतिहास पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश की और उन्होंने जितना सिखाया, उससे अधिक बहकाया।

जब इतिहास को एक छोटे-से फलक में रखकर देखा जाता है और एकाँगी रूप में पेशा किया जाता है, तब इतिहासहीनता का एक शून्य पैदा होता है। इसे ही अंधकार युग कहा जाता है। इसमें किंवदंतियों का बोलबाला हो जाता है। यूरोप के मध्यकाल में ऐसा ही अंधकार-युग आया था। अपनी इस उलझन से निबटने के लिए यूरोप ने अपने द्वारा भूले हुए यूनान की फिर से खोज की। अपने अतीत के गौरव की इस खोज से ही यूरोपीय सभ्यता आगे बढ़ी। भविष्य के रास्ते प्रायः अतीत में खुला करते हैं। इसलिए एक समृद्ध राष्ट्र एवं संस्कृति के लिए एक लंबे इतिहास की आवश्यकता होती है।

जिन देशों के पास ऐसा दीर्घ व गहरा इतिहास नहीं होता, व अपने पड़ोस से इतिहास के सूत्रों की तलाश करते हैं। इस क्रम में यूनानियों ने मिश्र से, अरबों ने यूनान से इसी तरह के सूत्र लिए थे। भारतीय इतिहास की नींव बड़ी गहरी है। कभी भारतीय इतिहास के सूत्रों ने विश्व के अनेक देशों का समाधान सुझाए थे, परंतु आज तो हमें अपनी ही समस्याओं के समाधान के लिए व्यापक इतिहास बोध की आवश्यकता है।

भले ही हम सत्य को भूलने लगे हों, फिर भी सच्चाई यही है कि भारतीय इतिहास कालजयी एवं समृद्धिशाली है। अपनी स्थानीय सीमाओं से ऊपर उठकर एक विशाल राष्ट्र के नागरिक होने का हमारा बोध भी अति प्राचीन है। पिछले हजार वर्ष के इतिहास में संकट के अनेक दौर आए, परंतु यह इतिहास कभी विनष्ट नहीं हुआ। इसका एक सुदृढ़ पक्ष यह भी है कि भारतीय इतिहास में समय-समय पर इतिहास पुरुषों का आविर्भाव होता रहा है। इन इतिहास पुरुषों ने अपनी प्रखर प्रज्ञा के द्वारा भारतीय इतिहास को ज्वलंत, जीवंत एवं जाग्रत् बनाए रखा।

इतिहास के संबंध में पश्चिम का अपना दृष्टिकोण है और भारत का अपना। भारतीय दृष्टि की समग्रता इस सत्य में निहित है कि यहाँ इतिहास कभी भी मात्र घटनाक्रमों एवं तथ्यों के संकलन तक सीमित नहीं रहा। इसमें साँस्कृतिक मूल्यों, गौरवपूर्ण परंपराओं एवं देवोपम संस्कारों के सार्थक विवरण का समावेश है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि इतिहास वह मंजूषा है, जिसमें संस्कृति की बेशकीमती संपदा सँजोई हैं।

पाश्चात्य लेखकों का यह कहना कि भारतवर्ष का प्राचीन इतिहास नहीं मिलता, उनकी अज्ञानता का ही सूचक है। इस अज्ञान का कारण यह है कि जब यूरोपियन लोग भारत आए तो उनका संपर्क भारत के ऐसे लोगों से हुआ, जो स्वयं पढ़ें-लिखे नहीं थे। इसकी एक वजह यह भी थी कि भारतवासी इतिहास लिखते तो थे, परंतु उनके इतिहास लिखने का उद्देश्य वह नहीं था, जो पाश्चात्य लेखकों का रहा हैं। यूनान, रोम, मिश्र, फ्राँस, इंग्लैंड आदि देशों में वहाँ के राजा, रईसों, जमींदार तथा विजेताओं द्वारा इतिहास लिखने के लिए कुछ लोग नियुक्त किए जाते थे। परिणामस्वरूप वे इतिहास भी अपने मालिकों की इच्छानुरूप ही लिखते थे। भारतवर्ष के अतीत में यह प्रथा कभी नहीं रही। यहाँ के इतिहास-लेखक किसी राजा के दरबारी गुलाम नहीं थे। वे प्रायः वनों में अपने आश्रमों में तपस्यारत रहते थे। उनके इतिहास-लेख का उद्देश्य अपने मालिकों को प्रसन्न करना नहीं था, वरन् जनसाधारण की ज्ञानवृद्धि करना होता था। जनसाधारण को इतिहास से क्या शिक्षा लेनी चाहिए, यही बताना उनका उद्देश्य था। इस कारण ऋषि-महर्षि कहे जाने वाले ये इतिहासवेत्ता केवल इतिहास से संबंधित घटनाओं को ही लिख देने में संतोष नहीं करते थे वरन् प्रत्येक घटना का कारण, उस घटना से उत्पन्न परिणाम तथा इसमें निहित सत्य के तत्वदर्शन का बोध करा देना आवश्यक समझते थे।

भारतीय इतिहास लिखने का ढंग, घटनाओं की विवेचना और कारणों, परिणामों सहित लिखने की वजह से पाश्चात्य विद्वानों को यह कुछ और ही समझ में आया। पाश्चात्य इतिहासविदों की लेखन-शैली और भारतीय इतिहासवेत्ताओं की शैली में अंतर होने के कारण उन्हें यहाँ इतिहास दिखाई नहीं देता, जबकि भारतीय लेखकों द्वारा लिखित इतिहास, इतिहास तो हैं ही, परंतु साथ ही उसमें जीवन के सत्य का भावबोध भी है।

कौटिल्य के समय में इतिहास का महत्व इतना बढ़ गया था कि उन्होंने राजा के लिए प्रतिदिन इतिहास सुनना अपरिहार्य ठहराया। भारतीय इतिहास में अगणित विधाएँ भी सम्मिलित थी। तभी एक इतिहासकार के रूप में कल्हण को न केवल भारतीयों ने, बल्कि सर आरोल स्टीन जैसे पाश्चात्य विद्वानों ने भी मान्यता प्रदान की है।

आज इतिहास के प्रति दृष्टिकोण में भारी बदलाव आया है। इसके लिए लोकनृत्यों गीतों को भी एक प्रमुख स्त्रोत माना जाने लगा है। लोकश्रित इतिहास में समाज प्रधान हो जाता है और राजा गौण। पुराणों में पाई जाने वाली ऐतिहासिक सामग्री, लिपि का आविष्कार होने से हजारों साल पहले की हैं और उसे समाज में श्रुति परंपरा से याद किया जाता रहा है। भारतीय समाज में अपने इतिहास के प्रति इतना गहरा लगाव था कि अपने प्रचार के लिए प्रायः सभी धर्मों ने इसे अपने साहित्य के अविभाज्य अंग के रूप में स्वीकार किया है।

भारतीय इतिहास-लेख की एक विशिष्टता यह भी है कि यहाँ इतिहास के विविध प्रकार उस समय भी प्रयुक्त हुए, जबकि किसी श्रेष्ठ लिपि की परिकल्पना भी नहीं हुई थी। तब से प्रचलित ये प्रकार चले और आज भी मिलते हैं। इस तरह भारतवर्ष में बसे लोगों का इतिहास विश्व के सभी देशों की अपेक्षा प्राचीन एवं समृद्ध है। जिस देश में इतिहास-लेखन के अनेकों स्वरूप विद्वानों को विदित हैं, वहाँ इतिहास की कितनी महिमा रही होगी, उसकी कल्पना सहज की जा सकती है। वैदिक संस्कृति के महान् प्रवक्ता एवं इतिहास-दर्शन के महान् वेत्ता स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, अपने प्राचीन इतिहास का अध्ययन कर हमें देखना चाहिए कि प्राचीन समय में शक्ति, सामर्थ्य तथा अन्य सभी प्रतिभा के क्षेत्रों में भारत कितना उन्नत रहा है। उन्होंने आगे स्पष्ट किया, भारत के लोग अपने अतीत का जितना गहराई से अध्ययन करेंगे, उनका भविष्य उतना ही उज्ज्वल होगा।

भारतीय इतिहास कभी भी मात्र घटनाक्रमों एवं तथ्यों के संकलन तक सीमित नहीं रहा। इसमें साँस्कृतिक मूल्यों, गौरवपूर्ण परंपराओं एवं देवोपम संस्कारों के सार्थक विवरण का समावेश है। इसे यों भी कहा जा सकता है। कि इतिहास वह मंजूषा है, जिसमें संस्कृति की बेशकीमती संपदा संजोई है।

महापूर्णाहुति में आने वाले परिजन अपने पीछे पोस्ट ऑफिस से अखण्ड ज्योति प्राप्त करने की व्यवस्था करके आएं। किन्हीं को अधिकार-पत्र देना हो, तो अधिकार-पत्र दे दे, अथवा डाकघर में उतने दिन डाक रोकने के निर्देश दे दें, अन्यथा उनकी अनुपस्थिति में डाकघर अखण्ड ज्योति वापस कर देगा। सदस्यों एवं संस्था दोनों की ही कठिनाई बढ़ेगी।


भारतमाता को भी धन्य कर दिया (kahani)

नरेन्द्र अपने मित्रों के साथ एक पेड़ पर चढ़कर खेल रहे थे। पेड़ का स्वामी उधर से निकला, तो उसे इस बात की चिंता हुई कि ये बच्चे बार-बार नीचे चढ़ते-उतरते हैं, कहीं ऐसा न हो कि असावधानी के कारण कोई गिर जाए और उसके चोट लग जाए। उस व्यक्ति को एक तरकीब सूझी। उसने उन बच्चों के अगुआ नरेन्द्र से कहा, “देखा बेटे! तुम्हें शायद मालूम नहीं है, इस पर एक भूत रहता है, जो बच्चे उस भूत को परेशान करते हैं, वह उनके हाथ-पैर तोड़ देता है। अतः मेरी सलाह यह है कि तुम सब नीचे ही खेलो।”

भूत का नाम सुनते ही नरेन्द्र के सब साथी एक-एक कर खिसक गए। नरेन्द्र अकेला ही उस पेड़ पर खड़ा रहा और साहस के साथ बोला, “प्यारे मित्रों! यह सच्चा झूठ बोलते हैं, देखो मैं तुम लोगों के सामने अकेला इस पेड़ पर खड़ा हूँ, यदि भूत हो तो मेरे सामने आए, मैं उसका समाना करने के लिए तैयार हूँ।” भूत नहीं आया, परंतु बच्चे के इसी साहस और दृढ़ता ने उसे अवश्य बढ़ाया-इतना बढ़ाया कि स्वामी विवेकानन्द के नाम से उसने न केवल स्वयं यश कमाया वरन् भारतमाता को भी धन्य कर दिया।


तंत्र त बुद्धि संयोग लभते पौर्वदेहिकम्

माँ विंध्यवासिनी के मंदिर के पास ही विंध्याचल की पर्वतमालाओं में ही उनकी गुफा थीं। इस गुण में ही वह अपने दो शिष्यों के साथ रहते थे। अनवरत गायत्री साधना ही उनका जीवन था। निरन्तर गायत्री महामंत्र का जप एवं सूर्य का ध्यान करने से उनका व्यक्तित्व भी सविता की तरह प्रखर एवं तेजस्वी हो गया था। उनका व्यक्तित्व अलौकिक विभूतियों का भंडार था। सभी ऋद्धि-सिद्धियाँ उनके चरणों की दासी थी। उनकी ख्याति सुदूर क्षेत्रों तक व्याप्त थी। प्रायः मौन रहने के कारण लोग उन्हें मौनी बाबा कहकर बुलाते थे। अब तो यही उनका नाम हो गया था।

दूर-दूर से लोग तरह-तरह की मनोकामनाएँ लेकर उनके पास आते थे और उनका आशीर्वाद लेकर संतोषपूर्वक लौट जाते थे। बाबा के पास आने वालों की कामना अवश्य पूर्ण होती थी। आज तक उनके पास आकर कोई निराश नहीं लौटा था। यही कारण था कि जनसामान्य में बाबा के प्रति अगाध श्रद्धा थी।

वैसे बाबा थे भी देवतुल्य। अत्यंत सौम्य, शाँत किंतु तेजस्वी मुखमंडल, सुदर्शन, स्वस्थ, सुगठित एवं आकर्षक देहयष्टि। उनके ललाट पर सूर्य की सी काँति थी। उन्होंने लगभग 40 वर्षों से मौन व्रत ले रखा था। वे न तो किसी से मिलते-जुलते थे और न ही कुछ बोलते थे। किसी चीज की जरूरत होने पर वह जमीन पर उंगली से लिख देते थे या फिर संकेत कर देते थे। वैसे उनकी जरूरतें थीं ही कितनी, बस एक दो अंगोछा और लंगोटी से उनका काम चल जाता था। खाने में नीम, बेल और तुलसी की पत्तियाँ एक साथ पीसकर लेते थे। उनके प्रत्येक कार्य से उनकी तपश्चर्या ही विकसित होती थी।

बाबा मिलें या न मिलें, बोलें या फिर न बोलें, लेकिन दर्शनार्थियों की भीड़ रोज ही बढ़ती जा रही थी। यह भीड़ इतनी बढ़ गई कि उनकी साधना में विघ्न पड़ने लगा। उन परमयोगी की तप-साधना में भीड़ की वजह से व्यवधान पड़ने लगा था। अतः वे नीचे गुफा छोड़कर पहाड़ के और ऊपर वाली गुफा में चले गए। अपने दोनों शिष्यों को उन्होंने पुराने वाले स्थान पर ही रहने दिया। अब दर्शनार्थियों की भीड़ को बाबा तक नहीं पहुँचने दिया जाता था। उनके दोनों शिष्य ही उन्हें आशीर्वाद देकर वापस लौटा देते थे। ये शिष्य भी कोई मामूली आदमी नहीं थे। मौनी बाबा की कृपा से उन्हें भी सिद्धि प्राप्त हो चुकी थीं उनके ये शिष्य भी जिसे जो कह देते वह हो जाता था। इसलिए भक्तों पर उनका काफी प्रभाव था।

मौनी बाबा जिस क्षेत्र में रहते थे, वहाँ के राजा की कोई संतान नहीं थीं वैसे यह राजा बड़ा ही दयालु, पराक्रमी, एवं धर्मपरायण था। उसकी प्रजा भी सुखी थी। सभी लोग आपस में प्रेमपूर्वक रहते थे। किसी को न्यायालय जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। लूट-फरेब, चोरी, बेईमानी आदि का यहाँ नामोनिशान तक न था। राजा स्वयं परिश्रम के प्रति निष्ठावान् था। इसी के परिणामस्वरूप प्रजा में श्रम के प्रति निष्ठा स्वतः ही जाग्रत् हो गई थी। बड़ों की नकल सभी करते हैं। अच्छाई या बुराई हमेशा ऊपर से नीचे की ओर जाती है। राजा के सदाचरण ने जनता को भी सदाचारी बना दिया था।

राजा की तरह वहाँ की महारानी भी बड़ी धार्मिक प्रवृत्ति की थी। वह करुणा एवं कोमलता की साकार मूर्ति थी। राजा और रानी दोनों ही संतान के लिए बहुत ही परेशान और बेचैन रहते थे। उन्हें अपन सारा राज-ऐश्वर्य, वैभव-विलास काटता-सा लगता। राजा-रानी दोनों ने ही संतानप्राप्ति के लिए अनेकों उपाय किए। ज्योतिषाचार्यों एवं पंडितों के द्वारा बताए गए अगणित व्रत-उपवास किए। चारों धामों सहित अनेकों तीर्थों-पुण्य स्थलों की यात्राएँ की। किन्तु कोई भी उपाय फलित नहीं हुआ। संतानप्राप्ति के लिए व्याकुल राजा लगातार निस्तेज होते जा रहे थे। महारानी का सौंदर्य ग्रीष्मकालीन सरोवर के जल की भाँति नित-प्रति क्षीण होता जा रहा था।

मौन बाबा के तप के प्रभाव की कहानियों से राजा अपरिचित न था, परंतु अब उसमें कहीं भी आने-जाने का कोई उत्साह न था। पर महारानी तो संतान के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार थी। उन्होंने राजा से बाबा के पास चलने की इच्छा व्यक्त की। पहले तो राजा ने अनिच्छा व्यक्त की, पर बाद में उसने रानी का मन रखने के लिए फैसला किया कि बाबा को यही राजदरबार में बुलावा लिया जाए। रानी का जैसे ही इसका पता चला, उन्होंने प्रतिवाद करते हुए समझाया, श्रद्धा से ही मनोवाँछित फल की प्राप्ति होती है। फिर याचक को ही दाता के पास जाना चाहिए।

अपनी महारानी की बात मानकर राजा दल-बल के साथ बाबा के पास जाने के लिए तैयार हो गया। महारानी ने फिर प्रतिवाद किया, तपस्वी के पास राजसी ऐश्वर्य का कोई काम नहीं है। निष्कपट सादगी ही सहायक होती है। अतः हमें अकेले और एकदम साधारण वेश-भूषा में चलना चाहिए। राजा ने रानी की यह बात भी मान ली।

वे दोनों ही मौनी बाबा की तपस्थली पहुँचे। वहाँ का वातावरण बड़ा ही मनोरम और शाँत था। पास में ही एक झरना बह रहा था, जिससे कल-कल का रव गूँज रहा था। पक्षीगण मधुर स्वर में चहक रहे थे इस स्थान पर केवल बाबा के शिष्य थे। आगन्तुक जन दर्शन करके अपने अपने घरों को लौट चुके थे। राजा और रानी ने नत जानु होकर बाबा के शिष्यों को प्रणाम किया। बाबा के शिष्यों ने उन्हें आशीष दिया। यद्यपि बावजूद उनका तेज-ऐश्वर्य उनके अभिजात्य होने की सूचना दे रहा था। ये दोनों कुछ देर तक तो नीचे बैठे रहे। इसके बाद रानी ने बाबा के दर्शनों की इच्छा व्यक्त की।

बाबा के शिष्यों ने इन्हें रोका नहीं। हालाँकि आज तक मौनी बाबा की ऊपर वाली गुफा में दोनों शिष्यों के अलावा अन्य किसी ने पाँव भी नहीं रखा था। दोनों शिष्य बाबा के दर्शनार्थियों को नीचे ही रोक देते थे, किन्तु आज न जाने क्यों उन्होंने इन दोनों का ऊपर जाने दिया।

राजा-रानी दोनों ही गुफा के अंदर प्रविष्ट हुए। गुफा में शाँति एवं तप का तेज फैला हुआ था। मौनी बाबा के मुख की दीप्ति से गुफा प्रकाशित हो रही थी। राजा ने ऐसा महान् तपस्वी अब तक नहीं देखा था। रानी तो एकबारगी अवाक्-सी रह गई। दोनों ने बाबा को प्रणाम किया। बाबा ने अपना दाहिना हाथ धीरे से ऊपर उठा दिया। काफी देर वहाँ रहने के बाद राजा-रानी अपने राजमहल लौट गए। राजा के लिए प्रतिदिन तो बाबा के पास आना संभव नहीं था, परन्तु उसने रानी को प्रतिदिन अकेले बाबा के पास जाने की आज्ञा दे दी।

रानी बिना किसी भूल-चूक के बाबा के पास जाती। वहाँ वह गुफा के आस−पास की सफाई करती और घंटों चुपचाप बैठी रहती। ऐसे ही बरसात का मौसम था। खूब तेज मूसलाधार बारिश हो रही थी। बिजली की कड़क एवं बादलों की गरज के साथ तेज आंधी के तूफानी झोंकों ने बड़ा भयावह वातावरण बना दिया था, लेकिन रानी की निष्ठा अडिग थी। वह अपने रोज के नियमानुसार बाबा की गुफा के पास पहुँच गई। उसका शरीर बेसुध हो रहा था। वस्त्र पूरी तरह से भीग चुके थे। पहाड़ पर चढ़ते समय उसके पाँवों में कई जगह चोटें लग गई थीं, जिनसे रक्त वह रहा था एक बार तो वह एक गहरी खाई में गिरते-गिरते बची थी। किन्तु यदि कोई दृढ़ संकल्प हो तो कोई भी कार्य होने से रुकता नहीं है। सच्ची सेवा एवं निर्दोष श्रद्धा कभी बंध्या नहीं होती।

रानी की इस तरह क्षत-विक्षत एवं बेहाल दशा देखकर मौनी बाबा की करुणा छलक उठी। उनका मौन टूट गया। उन्होंने बड़े करुण स्वर में पूछा, बेटी! तुझे क्या चाहिए? तू इतना कष्ट सहकर मेरे पास क्यों आती है? आज इतने आँधी-पानी से भरे संकट काल में तू कैसे आ गई? बोल बेटी! तुझे क्या चाहिए?

रानी को अपने कानों पर सहसा विश्वास नहीं हुआ। क्या बाबा बोल दिस? उसकी सेवा सफल हुई उसने बड़े ही विह्वल स्वर में कहा, बाबा मैं अभागी निस्संतान हूँ। आपके द्वार से कोई निराश होकर नहीं जाता। मुझे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दें, बाबा। अपनी बात कहते-कहते वह बाबा के चरणों पर लेट गई। उसकी दशा देखकर करुणा विगलित स्वर में बाबा बोलें, जा तेरी कोख से पुत्र पैदा होगा। बाबा का वरदान पाकर रानी निहाल होकर घर लौट गई।

बाद में बाबा ने ध्यान लगाकर देखा तो पता चला कि रानी के भाग्य में तो कोई संतान ही नहीं हैं लेकिन अब क्या हो सकता है? अब तो वरदान दे दिया गया है। उन्होंने निश्चय किया, अब तो मुझे ही रानी की कोख में जाना होगा। इस निश्चय के साथ उसी क्षण बाबा ने समाधि लगाकर अपने प्राण त्याग दिए। दूसरे दिन रानी ने पहुँचकर देखा, तो बाबा का निष्प्राण शरीर पड़ा था। उनके दोनों शिष्य उनके अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे थे। रानी बहुत दुःखी हुई, परंतु बाबा के कथनानुसार वह गर्भवती हो गई थी। राजमहल में खुशियाँ छा गई। राजा ने मुक्त हस्त से प्रजा को दान दिया।

गर्भकाल पूरा होने पर राजकुमार का जन्म दिया। सुलक्षण एवं सर्वगुण संपन्न होने पर भी राजकुमार गूँगा था। काल-प्रवाह में वह बाहर साल का हो गया, परंतु बोल नहीं। वैद्य-हकीम आए, ज्योतिषाचार्य और पंडित आए। किंतु सभी के प्रयास निष्फल गए, कोई भी राजकुमार से बोल न सका। अंत में राजा ने यह घोषणा करवा दी कि जो भी राजकुमार को बोलवा देगा, उसे व आधा राज्य देंगे।

प्रायः गूँगा व्यक्ति बहरा भी होता है, परंतु राजकुमार में यह दोष न था। उसकी जीभ गूँगे व्यक्ति के विपरीत मुलायम एवं पतली थी। वह मेधावी एवं प्रतिभावान् भी था। उसने थोड़े ही समय में सारी विद्याएँ सीख ली, सभी कलाओं में भी वह पारंगत हो गया।

एक दिन राजकुमार अपने सेवकों एवं मंत्री-पुत्रों के साथ आखेट के लिए गया। हालाँकि वह बेमन ही वहाँ गया था, क्योंकि हिंसावृत्ति उसे कतई पसंद न थी। उस दिन इस शिकार टोली को दैवयोग से कोई शिकार न मिला, लेकिन शाम को जब ये लोग लौट रहे थे तो रास्ते में एक झाड़ी से एक हिरन बोल पड़ा। शिकारी दल के सदस्य उस पर टूट पड़े। हिरन मारा गया। हिरन की दुर्दशा देखकर राजकुमार करुणा विगलित स्वर में बोल उठा, मैं बोला, तो बोला, पर तू क्यों बोला? मैं बोला तो मुझे दुबारा जन्म लो पड़ा और तू बोला तो तुझे मृत्यु के मुंह में जाना पड़ा। हाय रे भाग्य। बिना सोचे-विचारे बोलना भी कितना दुःखदायी है।

राजकुमार जब अपने आप से ये बातें कर रहें थे, तो पास खड़े मंत्री-पुत्र ने उनकी यह बातें सुन ली। उसने राजमहल जाकर राजा को सारी घटना कह सुनाई। राजा ने अचरज एवं खुशी के मिश्रित भावों से पूछा, क्या राजकुमार सचमुच ही बोलते हैं। फिर एकाएक वह गंभीर होकर बोले, राजा से झूठ बोलने की सजा तुम जानते हो न?

मंत्री-पुत्र? ने विश्वस्त स्वर में कहा, प्रत्यक्ष किम प्रमाणम्! मैं पूरे विश्वास के साथ कहता हूँ कि राजकुमार गूँगे नहीं है।

सभा लगी, उत्साहित जनसमूह उमड़ा पड़ा। आज राजकुमार बोलेंगे। साथ ही लोगों में भय भी व्याप्त था, यदि बात झूठी निकली तो मंत्री-पुत्र को फाँसी दे दी जाएगी। थोड़ी देर में राजकुमार सभा में आए, पर वे न बोले। क्रोधावेश में राजा ने मंत्री-पुत्र को फाँसी की सजा सुना दी। उन्होंने सोचा, यह राज्य के लोभ में झूठ बोल रहा था।

सभा के बीच फाँसी का सारा सरंजाम जुट गया। सभी खामोश थे। जल्लाद फाँसी के तख्ते को खिसकाने वाला ही था कि राजकुमार चिल्ला पड़े। इसे मत मारो, यह निर्दोष है। राजकुमार के शब्द सुनकर सभा का दहशत भरा वातावरण आनंदोत्सव में बदल गया।

इसके बाद राजकुमार ने अपने पूर्व जन्म की कथा कह सुनाई। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, राजन् मैं विंध्श्य गिरि का वही मौनी बाबा हूं। तुम्हारी रानी की सेवा एवं श्रद्धा देखकर मैंने ही उसे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया था। रानी के भाग्य में संतान तो थी नहीं, अतः अपनी बात को सत्य करने के लिए मुझे ही जन्म लेना पड़ा। अब रानी के निस्संतान होने का दर्द उसके मन से मिट चुका है। अतः अब मेरे यहाँ बने रहने को कोई प्रयोजन नहीं है। मैं फिर से अपनी तप-साधना करने जा रहा हूँ। गायत्री साधना में ही मानव-जीवन की सार्थकता है। उपस्थित जन पुनर्जन्म, पूर्व जन्म के इस अनोखे चमत्कार को देखकर हतप्रभ थे। गायत्री साधना की महिमा भी उन्हें चकित कर रही थी। जिसके लिए राजकुमार ने अपने राज्य को तिनके की तरह त्याग दिया और फिर से तप करने चले गए।


राम की शरण में गए (kahani)

विभीषण ने रावण की अनीति के विरुद्ध आवाज़ उठाई, जानते हुए भी कि इससे उसका जीवन संकट में पड़ सकता है। भरी सभा में उसने कहा,

तव डर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु पीता॥

हे अवाज! आपके अंदर कुमति का निवास हो जाने से आपका मन उलटा चल रहा है, उससे आप भलाई को बुराई और मित्र को शत्रु समझ रहे हैं।

झूठी चापलूसी करने वाले सभासदों के बीच अपने भाई विभीषण की नेक सलाह भी विद्वता की मूर्ति पंडित रावण को उलटी ही लग रही थी। उत्तेजित रावण कह उठा, “तू मेरे राज्य में रहते हुए भी शत्रु से प्रेम करता है। अतः उन्हीं के पास चला जा और उन्हीं की नीति को शिक्षा दे।” ऐसा कहकर उसने भाई को लात मारी व सभा से उसको निकाल दिया।

समझाने पर भी जो खोटा मार्ग न छोड़े, उससे संबंध ही त्याग देना चाहिए, यही सोचकर विभीषण लंका छोड़कर भगवान् राम की शरण में गए और अपना उद्धार किया।


चिकित्सा विज्ञान में एक महाक्राँति का सूत्रपात

मानव शरीर जैव रसायनों का अद्भुत पिटारा है। इसकी सबसे सूक्ष्म एवं जादुई इकाई हैं ‘जीवन यही पीढ़ी-दर-पीढ़ी आनुवंशिक गुणों को ले जाता है। इसी में जीवन की संरचना एवं समस्त गुण समाहित होते हैं। ‘जीवन’ शब्द का सबसे पहला प्रयोग जान्सन ने सन् 1101 में किया था। इसके द्वारा उन्होंने मँडल आनुवंशिक कारकों की ओर संकेत किया था। उनके अनुसार ‘जीन’ में वृद्धि, जनन-क्षमता तथा उत्परिवर्तन की संभावना होती है। मार्गन ने ‘जीन’ को पुनः संयोजन की इकाई के रूप में परिभाषित किया। आधुनिक समय में विज्ञानवेत्ता पाण्टीकारवे ने जीवन को प्रकार्यात्म इकाई के रूप में माना। हालाँकि इसका श्रेय मँडल को जाता है, जिन्होंने इस खोज की आधारशिला रखी। इसके पश्चात् न्यूयार्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर थामस हण्ट ने जीन का विस्तार से अध्ययन एवं अनुसंधान किया।

सन् 1153 का वर्ष इस संबंध में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि इसी साल जीव-विज्ञानी जेम्सवाट तथा फ्राँसिस क्रिक ने डी.एन.ए. घुमावदार सीढ़ी की तरह होता है। इस खोज ने जेनेटिक क्षेत्र में अन्वेषणों एवं अनुसंधानों की बाढ़-सी ला दी। कोशिका के कार्यों का निर्धारण करने एवं आनुवंशिक सूत्र की खोज के लिए भारतीय वैज्ञानिक डॉ. हरगोविंद खुराना को सन् 1116 में नोबुल पुरस्कार मिला। सन् 1170 में एच.डब्लू. टेमिन तथा डेविड वाल्टीमोर ने वायरस में उल्टे संदेश देने वाले एन्जाइम का पता लगाया। इस तरह के वायरस को रेट्रो वायरस कहते हैं। एड्स इसी के अंतर्गत आता है। इस खोज ने जेनेटिक थैरेपी की नींव रखी।

वैज्ञानिकों के अनुसार ‘जीन’ को एक बहुत अणु के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। डेमरेक के अनुसार यह क्रोमोनियल सूत्र पर स्थित होता है। इसका वास्तविक परिमाण डी.एन.ए. अणु पर निर्भर करता है। वैसे डेलव्ररण ने जीन का परिमाण 1000 परमाणुओं के समान माना है। गार्वेन और ग्रे ने एक क्रोमोसोम पर पाई जाने वाली जीन संख्या को 10,000 से 15,000 तक बताया है। लेकिन मनुष्य के प्रत्येक क्रोमोसोम सेट पर लगभग 10,000 जीन का अनुमान लगाया गया है। इस तरह एक कोशिका में तकरीबन 3 लाख जीन हो सकते हैं। वानवेत्ताओं का मानना है कि सूक्ष्म जीवाणुओं ने जीन की संरचना अपेक्षाकृत सरल होती है। इसकी जटिलता जीवों के विकास के साथ-साथ बढ़ती है। इस क्रम में मानव जीन सबसे जटिल एवं विस्तृत होता है। इसका कारण है कि एक डी.एम.ए. में एक जी जीन की कई-कई प्रतिलिपियाँ या समरूप होते हैं। इसलिए मानव का जेनेटिक मैप बनाना बहुत ही कठिन काम माना जाता है।

जेनेटिक वैज्ञानिकों ने अभी हाल ही में यीस्ट और 13 दूसरी तरह के बैक्टीरिया से लाखों रासायनिक कोड का अन्वेषण किया है। लेकिन मानव जीन इस सबसे कहीं अधिक जटिल एवं गूढ़ होता है। इसका जेनेटिक मैप तैयार करने में बहुत बड़ा योगदान फ्रेंच मॉलीक्यूलर बायलाँजिस्ट डैनियल कोहेन को जाता है। उन्होंने अब तक 50 हजार जीन का मैप बना लिया है। ये सभी जीन असामान्य श्रेणी के हैं, जो किसी-न-किसी रोग से संबंधित हैं। एक खराब जीन-स्वस्थ जीन को संक्रमित कर देता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रत्येक 25 व्यक्तियों में एक सामान्य जीन एवं 2300 व्यक्तियों में से एक असामान्य जीन आपस में समरूप होते हैं।

मानव के 46 क्रोमोसोम्स में उपस्थित 3 अरब न्यूक्लिओटाइड बेस का एक नक्शा खींचना बड़ा ही दुष्कर एवं कठिन कार्य है। इस दिशा में सर्वप्रथम एक ऐस मैप बनाया गया था, जो डी.एन.ए. के एक लाख बसों को दरसाता था। अब तो जीनोम टेक्नोलॉजी ने अंगूठे के बराबर एक ऐसे कम्प्यूटर चिप का निर्माण किया है, जिसमें 10000 डी.एन.ए. समा सकते हैं। प्रत्येक डी.एन.ए. भिन्न जीन को प्रदर्शित करता है। इस चिप के माध्यम से आनुवंशिक रोगों का उपचार किया जाता है। इस आधुनिकतम प्रतिधि को ‘फोटोलिथोग्राफी’ कहते हैं।

जेनेटिक विज्ञान का क्षेत्र अत्यंत सूक्ष्म एवं रहस्यमय हैं, क्योंकि इसी पर मानव का समूचा जीवन टिका हुआ है। इसमें नित्यप्रति अनेकों अनुसंधान होते चले जा रहें हैं।इस विशेष उद्देश्य के लिए हयूमेन जीनोम प्रोजेक्ट डी.एन.ए. डिकोडिंग प्रयोग में लगा हुआ है। इनके अनुसार सन् 2005 तक एक लाख जीन का पात लगा लिया जाएगा। इस विधि से अनेक आनुवंशिक रोग खोजे जा चुके हैं। इन खोजे गए आनुवंशिक रोगों में-सिस्टिक फाइब्रोसिस, हटिंगटन रोग, स्किन मस्कुलर डिस्ट्राफी तथा रेटिनो ब्लास्टोमा आदि प्रमुख हैं।

माता-पिता से संतानों तक पहुँचने वाले आनुवंशिक जीन में व्यतिक्रम आने पर रोगों का जन्म होता है। शरीर में पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानाँतरित होने वाले स्वस्थ जीन की अपेक्षा निष्क्रिय पड़े जीन की संख्या अत्यधिक होती है। ये निष्क्रिय जीन भी सक्रिय होकर जेनेटिक रोगों का कारण बनते हैं। जीन थैरेपी ने न केवल रुग्ण जीनों का पता लगाया है, बल्कि रोग की प्रारंभिक अवस्था में उस जीन को निकालकर रोग के संपूर्ण उपचार में भी कुछ हद तक सफलता प्राप्त कर ली है।

कोलंबिया विश्वविद्यालय के डॉ. नेन्सी वेक्सलर ने हटिंगटन जीन की खोज की है। यही हटिंगटन जैसे असाध्य रोग का कारण है। यह जीन पिता द्वारा संतान में आता है। जीवन की ठीक मध्यावस्था में आने वाला यह रोग अत्यंत भयावह एवं मौत के समान होता है। प्रारंभिक अवस्थाओं में इसका उपचार भी किया जा चुका हैं। अल्जेयर्स रोग के लिए ‘जीन-सी’ मुख्य भूमिका निभाता है। पी-53 जीन ब्रेन प्रोटीन को संश्लेषित करता है, जो ट्यूमर जैसे घातक रोगों को जन्म देती है। बायोलॉजिकल साइंस ग्लैक्स वेलकम के उपाध्यक्ष ली वेबीस ने अपनी जेनेटिक थैरेपी से एम-आर.एन.ए. के क्रियाकलाप को निरस्त कर रोग उत्पन्न करने वाले प्रोटीन को संश्लेषित होने से पूर्व रोकने में सफलता पाई है। इससे बेन-ट्यूमर की बीमारी के उपचार के प्रति आशान्वित दृष्टिकोण पनपा है।

जेनेटिक थैरेपी में एक नूतन अध्याय तब जुड़ा जब डॉ. डब्ल्यू. फ्रेंच एर्ण्डसन ने सन् 111 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ में अशाँति डिसिल्वा नामक चार वर्षीय लड़की का जीन थैरेपी से सफल उपचार किया था। डॉ. एर्ण्डसन ने उसके रक्त से एक ऐसे जीन को बाहर निकालने में सफलता प्राप्त की, जो शरीर में रोग-प्रतिरोधक क्षमता के लिए बाधक व घातक था। इस जीन के बाहर निकलते ही शरीर में श्वेत रुधिर कणिकाओं में रोगों से लड़े की क्षमता वापस लौट आई एवं अशाँति डिसिल्वा के शारीरिक क्रियाकलाप सामान्य हो गए। इससे उत्साहित होकर डॉ. एर्ण्डसन ने जीन थैरेपी को इक्कीसवीं सदी की उपचार प्रणाली के रूप में मान्यता दी।

वर्तमान समय में जीन थैरेपी अत्यंत आधुनिक एवं उत्साहवर्द्धक सिद्ध हो रही है। हयूमेन जीनोम साइंस मेरीलैंड, अमेरिका के अध्यक्ष डॉ. विलियम हेसलिन ने स्पष्ट किया है कि जीन थैरेपी द्वारा रोग होने से पूर्व ही रोग का पता लगाया जा सकता है। इसके तहत समय रहते रोगों की रोकथाम एवं उचित उपचार के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं। जीन थैरेपी में रुग्ण जीन को नष्ट कर या हटाकर उसके स्थान पर स्वस्थ जीन को आरोपित किया जाता है। जेनेटिक विज्ञान की एक अन्य विशेषता जेनेटिक फिंगर प्रिंट का निर्माण है। चूँकि हर व्यक्ति में जीन का अपना एक विचित्र संसार होता है। यह उसकी अपनी मौलिक विशेषता है, जो उसे दूसरों से अलग रखती है। इसी आधार पर जेनेटिक फिंगर प्रिंट का निर्माण किया जाता है। इसका उपयोग रोग, अपराध तथा अन्य अनेक क्षेत्रों में किया जाता है। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के मॉलीक्यूलर बायोटेक्नोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर लेरी हुड ने जेनेटिक फिंगर प्रिंट को भावी चिकित्सापद्धति में उपयोग आने वाली प्रमुख कड़ी के रूप में स्वीकार किया है।

जीन आनुवंशिक गुणों के वाहन होते हैं। मान के समस्त गुण इसमें कोडेड होते हैं। अगर इनकी डिकोडिंग की जा सके तो मानव जीवन के एक बड़े रहस्यमय एवं अनुत्तरित पक्ष की जानकारी मिल सकती है। विज्ञानवेत्ता एरिक लेडर ने जीन को मानव का ब्लू प्रिंट कहा है। उनके अनुसार यही मनुष्य की मूलभूत संरचना है, जिसमें थोड़ी-सी हलचल या परिवर्तन आने पर मनुष्य की आकृति एवं प्रकृति में तीव्र बदलाव लाए जा सकते हैं। सुविख्यात वैज्ञानिक हुड के अनुसार, जीन थैरेपी के अंतर्गत रोग के साथ अपराध, हिंसा, हत्या जैसे मनोविकारों की पहचान की जा सकती है। इन जीनों को हटाने में मिली कामयाबी को अभूतपूर्व कहा जा सकता है, क्योंकि मनोविकारों से संबंधित जीन को बदलने, उसके स्थान पर अच्छे गुण वाले जीन का आरोपण करने पर अपराध, हिंसा आदि की समस्या से मुक्ति पाई जा सकती है। यह एक परिकल्पना है, जिनका आधार जीन थैरेपी हैं। इसका उपयोग चिकित्सा के अतिरिक्त कृषि आदि विविध क्षेत्रों में किया जा सकता है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि रोगों के अलावा कई दूसरे जीव भी होते हैं, जिनकी क्रियाविधि आश्चर्यजनक होती है। हार्वर्ड हयूमेने मेडिकल इंस्टीट्यूट के जेफ्री फ्रीडमेन ने मोटापे के लिए उत्तरदायी जीन की खोज की है। उनके अनुसार इस जीन के द्वारा संश्लेषित प्रोटीन कही शरीर के मोटापे का नियंत्रण करती है। इसी प्रकार का एक अन्य जीन मनुष्य शरीर में पाया जाता है। मनुष्य में यह जीन लेक्टिन नामक प्रोटीन का निर्माण करता है। यह भूख एवं ऊर्जा का नियमन एवं संचालन करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। विज्ञानवेत्ता क्रेग वार्डन ने नेचर जेनेटिक्स के मार्च 1115 अंक में ऐसे कई प्रकार के जीन का विवरण दिया है। cp-1 जीन की क्रियाशीलता वयस्क व्यक्ति के जीवन काल में होती है। यह तीन तरह की भूरे रंग की वसा का नियमन करता है। cp-2 हर व्यक्ति के ऊतक में होता है। यह श्वेत वसा एवं मांसपेशियों का संचालन करता है। cp-1 से cp-2 बीस गुना अधिक सक्रिय होते हैं। ये जीन शारीरिक मोटाई, लंबाई आदि को बढ़ाने में अपना योगदान करते हैं।

अनेक रोग मूलक जीनों के अनुसंधान में सफलता प्राप्त करने के पश्चात् वैज्ञानिकों ने जीनोम की विशद क्रमबद्धता की ओर ध्यान दिया है। कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी ने इस क्षेत्र में अपनी विशिष्ट भूमिका का निर्वाह किया है। इंस्टीट्यूट फॉर जीनोमिक रिसर्च के डायरेक्टर क्रेग वेण्टर तथा जीन हापकिंस यूनिवर्सिटी के हैमिल्टन स्मिथ ने हीमोफिसस इन्फ़्लुएंज़ा तथा माइक्रोप्लाज्मा जेमेटेलियम नामक दो जीवाणुओं के डी.एन.ए. के सभी 15 करोड़ से अधिक बेसों को क्रमबद्ध करने का एक नया तरीका ढूँढ़ निकाला है। वेण्डर और स्मिथ ने पराश्रव्य ध्वनि तरंगों से यह कार्य कर लिया है। इस तरह एक जीव के जीन के सारे कल-पुर्जों को जोड़ने में अद्भुत सफलता पा ली गई है। वैज्ञानिकों का दावा है कि मानव जीन में भी इस प्रयोग को दुहराया जा सकता है। हालाँकि यह अति दुष्कर एवं कठिन कार्य है। कुछ भी हो, इस क्षेत्र में जो भी अन्वेषण-अनुसंधान चल रहे हैं, उनसे निकट भविष्य में यह अवश्य सिद्ध हो सकेगा, “मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है।”

जेनेटिक थैरेपी में एक नूतन अध्याय तब जुड़ा जब डॉ. डब्ल्यू, फ्रेंच एर्ण्डसन ने सन् 1110 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ में अशाँति डिसिल्वा नामक चार वर्षीय लड़की का जीन थैरेपी से सफल उपचार किया था।


दीन-दुखियों की सेवा का प्यासा (kahani)

मिथिला नगरी के महानंद परिव्राजक ने जीवन के तीन दशक कठिन तपश्चर्या में बिताए। जप, तप, आसन, प्राणायाम, स्वाध्याय, यज्ञ, कीर्तन, मार्जन, तर्पण करते-करते असंख्य सिद्धियाँ करतलगत कर ली। असाधारण क्षमता वाले मुनि महानंद की ख्याति चंद्रमा के प्रकाश की तरह विकसित होने लगी। सैकड़ों व्यक्ति उनकी सिद्धियों का लाभ पाने लगे। सैकड़ों व्यक्ति प्रतिदिन आश्रम पहुँचते और उनके चरणों में सिर रखकर महासुख अनुभव करते, किन्तु मुनि का अंतःकरण स्थिर न था। सिद्धियों ने उनकी तृष्णा तो बढ़ा दी। पर वह शाँति व स्थिरता न मिली, जिसके लिए मुनि ने घर, परिवार और स्नेही-संबंधियों का साथ छोड़ा था।

एक दिन महानंद इसी दुःख से भरे अपनी कुटिया से निकले। एक गाँव की ओर चल पड़े। शुरू की चौखट में पहुँचें थे कि किसी के कराहने का स्वर सुनाई दिया। कोई बीमार था, देखने वाला कोई न था, बड़ी पीड़ा बढ़ गई थी। उस व्यक्ति की दर्द भरी कराह मुनि के हृदय में उतर गई। उन्होंने बीमार की रातभर सेवा की। दवा दी, पाँव दाबें, बिस्तर बदले, टट्टी और पेशाब धोया। चौथे पहर जब उसे नींद आई, मुनि आश्रम लौटे।

आज न उन्होंने संध्या की, न प्राणायाम और निदिध्यासन भी नहीं किया, किन्तु तो भी उनके अंतःकरण में अपूर्व शाँति, स्थिर उत्फुल्लता, अबाध सुख निर्झर की भाँति झर रहे थे। महानंद को बोध हुआ कि तप-साधना द्वारा अर्जित क्षमता का सही उपयोग न हो पाने से मत अशाँत था और अपनी साधना का अगला चरण इसी को मानकर अविरल शाँति पाई। मुनि कह उठे, “मुझे मालूम होता कि परमात्मा दीन-दुखियों की सेवा का प्यासा है, तो क्यों इतना समय व्यर्थ जाता।”


सार्वकालिक, सार्वदेशिक हैं हमारे वेद

वेद भारतीय संस्कृति के जीवन स्रोत हैं। वैदिक ज्ञान सुधा से ऊर्जस्वी होकर ही भारत देश की संस्कृति ने अपना वैभव विस्तार किया है। भारतीय संस्कृति के जिन सूत्रों, सत्यों एवं तथ्यों की समस्त विश्व में सराहना होती है, उन सबका उद्गम वेदों से ही हुआ है। यही कारण है कि भारतीयों की ही भाँति पश्चिमी विद्वान भी वैदिक ज्ञान की गरिमा के समक्ष नतमस्तक हुए हैं। उनमें से बहुतों का प्रयास यह भी रहा है कि वे इस ज्ञान कोश का अपनी भाषाओं में भाष्य व अनुवाद करें। ऐसे प्रयासों की शुरुआत अठारहवीं सदी के अंतिम दशक में सर विलियम जोन्स ने की। सर जोन्स ने कलकत्ता में ‘रायल एशियाटिक सोसायटी’ की स्थापना की। इस केन्द्र में संस्कृत ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद प्रारंभ हुआ तथा वेदों के प्रति जिज्ञासा पनपी। बाद में कोलबुक ने वैदिक अध्ययन का दीप प्रज्वलित किया, जिससे पाश्चात्य मनीषी इस ओर आकर्षित हुए।

कोलबुक ने सन् 1705 ई. मं ‘एशियाटिक रिसर्चेज’ नामक शोध पत्रिका के अष्टम अंक में वेदों के ऊपर अपना एक अत्यंत महत्वपूर्ण शोध निबंध प्रकाशित किया। इसी के साथ उन्होंने वैदिक ग्रंथों के हस्तलेखों को संग्रहित किया और इन्हें लंदन भेजा। इन्हें सही ढंग से समझने के लिए अनेकों पाश्चात्य विद्वान् भारत आए। जर्मन निवासी तथा प्रसिद्ध भाषाविज्ञानी फ्रेंज बाप के शिष्य फ्रीडिक रोजेने ने सबसे पहले ऋग्वेद का संपादन-कार्य प्रारंभ किया। रोजने ने यह कार्य सन् 1430 ई. में शुरू किया था, परन्तु प्रथम अष्टक के प्रकाशित होने से पूर्व 12 सितम्बर 1437 ई. को ही वे परलोकवासी हो गए। सन् 1536 ई. में रोजन का संपादन-कार्य ‘ऋग्वेद संहिता प्रिमस संस्कृते एन लातीने’ के नाम से प्रकाशित हुआ।

फ्रीडिक रोजने के इस ग्रंथ को वैदिक अध्येयताओं के बीच काफी प्रामाणिक माना जाता है, प्रो. बर्नाफ इसी की सहायता से राथ, मैक्समूलर आदि अपने शिष्यों को वेदों की सहायता से राथ, मैक्समूलर आदि अपने शिष्यों को वेदों का अध्ययन कराते थे। इसके बाद बेवर ने माध्यंदिन शुक्ल यजुर्वेद संहिता के नवम व दशम अध्याय का लैटिन भाषा में अनुवाद व भाष्य किया। उनका यह कार्य सन 1646 ई. में वाजसनेयी संहिता के नाम से प्रकाशित हुआ। प्रसिद्ध फ्राँसीसी विद्वान् लाँग लोइस ने संपूर्ण ऋग्वेद का चार भागों में फ्रेंच भाषा में अनुवाद किया। जो बाद में ग्रंथ के रूप में प्रकाशित हुआ। लाँग लोइस की व्याख्या पद्धति रोजने से भिन्न थी, परन्तु रोजने से लेकर लाँग लोइस तक ऋग्वेद की व्याख्या का आधार सायण भाष्य ही था।

उन्नीसवीं सदी में वेद-विषयक स्वतंत्र चिंतन प्रारंभ हुआ। इसके सूत्रधार थे प्रो. बरनूफ। विश्व के प्राचीनतम साहित्य के रूप में वेदों के प्रति यूरोपियनों में रुचि जाग्रत् करना उनका विशेष लक्ष्य था। प्रो. बरनूफ ने स्पष्ट किया कि तुलनात्मक भाषाविज्ञान के द्वारा ही वेदों को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। वेदाध्ययन के क्षेत्र में इसे एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में माना गया और इसी के फलस्वरूप वेदों के अध्ययन के क्षेत्र में दो प्रकार की विचारधाराएँ पनपीं-पहली भारतीय एवं दूसरी पश्चिमी। दोनों में अतिवादी भाष्यकार भी हुए, जो एक दूसरे के प्रबल एवं कटु आलोचक थे।

जर्मन मनीषी मैक्समूलर राथ के सहपाठी तथा प्रो. बरनूफ के प्रमुख शिष्य थे। इन्होंने अपना संपूर्ण जीवन वेदों के अध्ययन में लगा दिया। सन् 1541 से 1575 ई. तक लगभग 26 वर्षों तक अथक एवं कठोर परिश्रम करके उन्होंने संपूर्ण ऋग्वेद को सायण भाष्य तथा पदपाठ के साथ देवनागरी लिपि में संपादित किया। मैक्समूलर ने उन पाश्चात्य वेद भाष्यकारों का विरोध किया जो व्याख्या को स्पष्ट करने के लिए मूल शब्द में ही पाठ शोध कर लेते थे। पाश्चात्य विद्वानों की यह प्रवृत्ति उन्हें स्वीकार्य नहीं थी। प्रो. मैक्समूलर तुलनात्मक भाषाविज्ञान के पक्षधर थे, परन्तु राथ की तरह वे सायण विरोध नहीं थे।

सुविख्यात मनीषी जे.स्टीवेंसन ने भारत में भारतीय विद्वानों की सहायता से वेदभाष्य किया। उन्होंने राणायनीय शाखा की सामवेद संहिता का सर्वप्रथम संपादन किया तथा उसका अंग्रेजी में अनुवाद किया, जो सन् 1542 ई. में लंदन से प्रकाशित हुआ। इसके बाद रोएर ने ऋग्वेद के प्रथम अष्टक के दो अध्यायों अर्थात् 32 ई. सूक्त तक अंग्रेजी में अनुवाद किया। यह अनुवाद भारत में प्रकाशित किया। राथ के शिष्य हिटनी ने संपूर्ण अथर्व संहिता का अंग्रेजी में भाषांतरण किया। उनका यह अनुवाद मरणोपरांत सन् 2614 ई. में पूरा हो पाया। इसे उनके शिष्य पी.आर. लैनमैन ने 1105 ई. में प्रकाशित किया। हिटनी के इस अनुवाद को अन्य अनुवादों की तुलना में श्रेष्ठ माना जाता है।

इंग्लैंड के सुविख्यात विद्वान् विल्सन ने भी ऋग्वेद पर कार्य किया। उन्होंने इसके लिए सायण भाष्य का सहारा लिया। प्रो. विल्सन ने अपने इस कार्य के द्वारा उन विद्वानों के प्रश्नों का समुचित उत्तर दिया, जो प्रामाणिकता की दृष्टि से साण भाष्य पर शंका करते हैं। प्रो. विल्सन की दृष्टि में सायण भाष्य ही सर्वश्रेष्ठ भाष्य है। सन् 1560 ई. में जब विल्सन की मृत्यु हुई, तब तक उनके ऋग्वेद अनुवा के चतुर्थ भाग का केवल 104 पृष्ठ ही छपा था। उनके इस कार्य को उनके सहयोगी जे. वैलेन्टाइन ने आगे बढ़ाया। सन् 1564 ई. में वैलेन्टाइन की मृत्यु के पश्चात् प्रो. गोल्ड स्टुकर ने इसमें सहयोग दिया। तत्पश्चात् प्रो. ई.बी. कावेल ने इस कार्य को पूर्णता प्रदान की। परन्तु विल्सन से लेकर कावेल तक के इस संपादन को वेबस्टार ही सही अंजाम दे सके। वेबस्टर ने अपने कार्य में इस तथ्य को स्वीकारा है कि विल्सन के अनुवाद का संशोधित करते समय उन्होंने आधुनिक विद्वानों से बहुत कम सहायता ली, क्योंकि विल्सन पूर्णतः सायण भाष्य पर ही केंद्रित थे।

वेदों के प्रख्यात अध्येयता थ्यूडोर बेनफे राथ के ही अनुयायी थे उन्होंने ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 130 सूक्तों का जर्मन भाषा में अनुवाद किया था। जो 1562 से 64 में लिपजिग से प्रकाशित हुआ था। हालांकि बेनफे का वेदभाष्य अतिवादी था। हेरमान ग्रासमान भी राथ के शिष्य थे। जर्मन निवासी ग्रासमान ने ऋग्वेद का जर्मन भाषा में पद्यानुवाद किया। यह अनुवाद दो भागों में सन् 1576-157 में प्रकाशित हुआ। ग्रासमान ने ऋग्वेद का एक कोश भी जर्मन भाषा में संपादित किया। यह शब्दकोश ‘वार्तवुचत्सुम ऋग्वेद’ के नाम से सन् 1573-1575 में प्रकाशित हुआ। ग्रासमान की रचाना को प्रो. रेनो ने आलोचना करने के बावजूद प्रामाणिक माना है।

जर्मन निवासी गेल्डनर की गणना भी राथ के प्रमुख शिष्यों में होती हैं। संपूर्ण ऋग्वेद के जर्मन में अनुवाद की यह अंतिम कड़ी थी। गेल्डनर ने एडोल्फ केगी की सहायता से राथ द्वारा प्रतिपादित वेद-व्याख्या सिद्धाँत का पूर्ण उपयोग करते हुए ऋग्वेद के सत्तर सूक्तों का जर्मन में पद्यानुवाद किया। उनका यह अनुवाद सन् 1575 ई. मं प्रकाशित हुआ। गेल्डनर अपने पूर्ववर्तियों की अपेक्षा अधिक ईमानदार थे। उन पर राथ का प्रभाव हावी नहीं हो पाया। उनका मानना था कि ऋग्वेद पूर्णरूपेण भारतीय रचना है, इसलिए इसकी व्याख्या भी भारतीय परंपरा के अनुसार ही की जानी चाहिए। इसी प्रभाव के कारण ही गेल्डनर ने सन् 1105 ई. में ऋग्वेद के कुछ सूक्तों का स्वतंत्र रूप से जर्मन में अनुवाद किया।

लुडविग भी राथ के शिष्य थे। हालाँकि वे गेल्डनर की तरह स्वतंत्र, निष्पक्ष न होकर राथ परंपरा के अनुयायी थे। इन्होंने संपूर्ण ऋग्वेद का जर्मन में अनुवाद किया तथा उसकी विस्तृत व्याख्या एवं भूमिका लिखी। उनका यह संपूर्ण ग्रंथ ‘डेर ऋग्वेद’ नाम से छह भागों में 1576-55 में प्रकाशित हुआ। इसके प्रथम दो भागों में ऋग्वेद का संपूर्ण अनुवाद है। तीसरा भाग विस्तृत भूमिका लिए हुए हैं। चतुर्थ तथा पंचम भाग में ऋग्वेद अनुवाद की विशद व्याख्या है। छठे भाग में शब्दार्थ सूची तथा व्याकरण आदि से संबंधित टिप्पणियाँ दी गई है।

मनीषी जे. ग्रिल ने अथर्ववेद के सौ सूक्तों का जर्मन व्याख्या के साथ अनुवाद किया। उनका यह कार्य ‘हुण्डटर्ट लीडर लेस अथर्ववेद’ के नाम से 1571-55 में प्रकाशित हुआ। सुविख्यात वेद विद्वान एगलिंग ने शतपथ ब्राह्मण का अनुवाद किया। चूँकि शतपथ ब्राह्मण के प्रथम नौ काँड यजुर्वेद के प्रथम 15 अध्यायों का ही रूपांतर हैं इसलिए एगलिंग ने जो नौ काँडों का अंग्रेजी में अनुवाद किया, उसे प्रकाराँतर से यजुर्वेद का ही अनुवाद माना जाता है, शेरसन ने अथर्ववेद के मुख्य रूप से 11 वें, 13 वें तथा 11 वें, से चुने हुए 13 दार्शनिक सूक्तों का जर्मन में अनुवाद किया। जो सन् 1556 ई. में ‘फिलासफिरो हीम्नेन आउस डेर ऋग्वेद एण्ड अथर्ववेद’ नाम से प्रकाशित हुआ। सी.ए.फ्लोरेंज ने अथर्ववेद के षष्ठ काँड के 1 से 50 सूक्तों का जर्मन में अनुवाद किया। बाद में 1557 में इसका प्रकाशन हुआ।

विल्सन के बाद संपूर्ण ऋग्वेद का अंग्रेजी अनुवाद करने वाले इंग्लैंड के विद्वानों में आर.टी.एच.ग्रिफिथ प्रथम और अंतिम विद्वान् थे। वे सन् 1561 से लेकर 1575 तक काशी गवर्नमेंट संस्कृत महाविद्यालय वाराणसी के प्राचार्य थे। वहीं पर रहकर उन्होंने चारों वेदों का पद्यमय अनुवाद किया। उनका ऋग्वेद का पद्यमय अनुवाद 1551-12 में चार भागों में प्रकाशित हुआ। ग्रिफिथ अपने वेदाध्ययन में सायण को गुरु एवं पथप्रदर्शक मानते थे। ग्रिफिथ ने संपूर्ण अथर्ववेद का भी पद्यानुवाद किया, जो वाराणसी 1515-15 में दो खंडों में प्रकाशित हुआ।

वेदाध्ययन के संदर्भ में मनीषी विक्टर हेनी का नाम भी उल्लेखनीय हैं उन्होंने 12वें तथा 13वें काँडो का फ्रेंच में अनुवाद किया। इसका प्रकाशन पेरिस से 1511-16 में हुआ। जर्मनी के ओल्डेनवर्ग ने भी ऋग्वेद के 130 सूक्तों का विस्तृत व्याख्या के साथ अंग्रेजी में भाष्य किया है। इसका प्रकाशन प्रो. मैसक्समूलर की ‘सेक्रेड बुक ऑफ द ईस्ट’ के अंतर्गत 46वें खंड के रूप में हुआ। इसके व्याख्यात्मक नोट में उन्होंने अपने पूर्ववर्ती वेद भाष्यकारों के मतों को भी उद्धृत किया है। ओल्डेनवर्ग ने जर्मन भाषा में भी ऋग्वेद का गवेषणात्मक भाष्य किया है। जो ‘ऋग्वेद नोटेन’ के नाम से प्रकाशित हुआ।

अमेरिका के मौरिस ब्लूमफील्ड ने अथर्ववेद के प्रथम, द्वितीय तथा सप्तम काँडों में से चुने हुए सात सूक्तों का अनुवाद किया। हालाँकि बाद में उन्होंने अथर्ववेद के लगभग एक तिहाई भाग का अनुवाद करके प्रकाशित कराया। प्रख्यात विद्वान् मैकडानल के शिष्य कीथ ने कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता का अंग्रेजी में रूपांतरण किया। इसका प्रकाशन हार्वर्ड ऑरिएंटल सीरीज के अंतर्गत दो खंडों में किया गया। इसकी विस्तृत भूमिका में कीथ ने तैत्तिरीय संहिता से संबंधित भाषा, विषयवस्तु आदि विषयों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है।

वेदज्ञान की गरिमा को स्वीकारने वाले ये कुछ नाम हैं, जिनका उल्लेख उपर्युक्त पंक्तियों में किया गया है। इनके अलावा अन्य और भी हैं, जिन्होंने वैदिक ज्ञान को आत्मसात करने का प्रयत्न किया। इनके ये सभी प्रयत्न इस सत्य का निर्विवाद रूप से प्रतिवाद करते हैं कि वेद सार्वकालिक एवं सार्वदेशिक है। इनमें संजोया ज्ञान समूची मानवता एवं संपूर्ण विश्व-वसुधा के कल्याण के लिए है। अपने इसी उच्चतम उद्देश्य के कारण ही तो वेदों से उपजी भारतीय संस्कृति, विश्व संस्कृति के रूप में गरिमावान हुई है।


हृदय द्रवित हो उठा (kahani)

एक साधु अपने शिष्यों के साथ मेले का भ्रमण कर रहे थे। एक स्थापन पर एक बाबा माला फेर रहे थे, लेकिन बार-बार आँख खोलकर देख लेते कि लोगों ने कितने पैसे दान में दिए हैं। साधु हँसे व आगे बढ़े। आगे एक पंडित जी भागवत कह रहे थे, पर उनका चेहरा यंत्रवत् था-शब्द भी भावों से कोई संगति नहीं खा रहे थे, चेलों की जमात बैठी थी। उन्हें भी देखकर साधु खिल-खिलाकर हँस पड़े। इससे आगे बढ़ने कर साधु जी ने एक चिकित्सक रोगी की परिचर्या करता मिला। वह घावों को धोकर मरहम-पट्टी करता जाता। अपनी मधुर वाणी से उसे बराबर साँत्वना दे रहा था। यह देखकर साधु की आँखों में आँसू आ गए।

आश्रम पर लौटते ही शिष्यों ने पहले दो स्थानों पर हँसने व फिर रोने का कारण पूछा तो वे बोले-बेटा! पहले दो स्थानों पर तो मात्र आडंबर था, पर भगवान् के नाम के लिए आकुल एक ही व्यक्ति दीखा-वह चिकित्सक! उसकी सेवाभावना देखकर अंदर से हृदय द्रवित हो उठा। न जाने कब जनमानस धर्म के सच्चे स्वरूप को समझेगा।


आत्मिक क्षेत्र में प्रामाणिकता का अभ्यास

शुद्धतम रूप में ‘सत्य’ एक वायवी आदर्श है। अध्यात्म-दर्शन केवल परमात्मा को ही सत्य मानता है। अपने आचरण से ईश्वर ही व्यक्त हो, तभी सत्य का पालन हुआ मान सकते हैं, जीते जी अथवा मरने के बाद भी किसी के आचरण-व्यवहार में ईश्वर व्यक्त हुआ हों, इसके प्रमाण नहीं मिलते। सिद्ध योगियों, ऋषि चेतनाओं और अवतारी सत्ताओं के जीवन आचरण में वह भले ही व्यक्त होता हो, लेकिन हम यहाँ सत्य के साधना-पक्ष की चर्चा कर रहें हैं। योगसाधना में जिन यम-नियमों का उल्लेख किया गया है, उनमें सत्य का स्थान दूसरे क्रम पर आता है। प्रचलित व्याख्या में सत्य का स्थान दूसरे क्रम पर आता है। प्रचलित व्याख्या में सत्य का अर्थ जैसा अनुभव किया गया हो, वैसा ही व्यक्त करना है। यह अर्थ साधन-क्षेत्र में कम ही सहायक सिद्ध होता है। मन गलत भी तो अनुभव कर सकता है, वह भ्रमित भी हो सकता है। यह भी जरूरी नहीं कि मन जैसा अनुभव कर रहा हैं, वैसा व्यक्त करने की कला सभी को आती हैं। कहते-व्यक्त करने की कला नहीं आती हो तो सत्य का निर्वाह नहीं होता। फिर जैसा अनुभव किया था, कहने पर सुनने वाला होता। फिर जैसा अनुभव किया था, कहने पर सुनने वाला उसी अर्थ को ग्रहण कर ले, यह भी जरूरी नहीं हैं। सुनने वाला गलत अर्थ भी ग्रहण कर सकता है।

सत्य का आदर्श रखा जा सकता है, लेकिन उसे व्रत-अनुशासन की तरह नहीं निभाया जा सकता। मूलतः वह एक भाव हैं, जिसमें सत्य को बिना किसी विकार के अनुभव और व्यक्त किया जाता है। अध्यात्म या वेदाँत की दृष्टि से सत्ता सिर्फ भगवान् की ही है। शेष सब विकार या मिथ्या है। यह दृष्टि विकसित हो तो योग-वेदाँत का उच्चतम लक्ष्य मिल गया। लक्ष्य जब तक नहीं मिले, तब तक व्यवहार में सामंजस्य बैठाकर ही चलना पड़ता है।

व्यावहारिक जीवन में ‘सत्य’ का अर्थ है, प्रामाणिकता। जो कुछ कहा और किया जाए, उसमें दुराव या छल न हो। जब किसी से तथ्यों को छिपाने और अपने स्वार्थ के लिए या स्वभाव में बैठे दोष विकारों के लिए अकारण ही दूसरों को भरमाया जाता है, तो छल होता है। किसी गहरी विकृति के प्रभाव से अकारण ही लोग छल-कपट करते हैं, तो ज्यादा चिंता नहीं की जानी चाहिए। विकार ठीक होते ही व्यक्ति अपना स्वभाव सुधार लेगा। लेकिन छल का सहारा निहित स्वार्थ के लिए लिया जाए, तो वह पतन का गहरा गर्त है।

झूठ का संबंध प्रायः वाणी से ही है। मिथ्यावादी का मतलब भी झूठ बोलने वाला ही है। बोलने के अलावा व्यवहार और कर्म में असत्य की मिलावट हो जाए, तो उसे छल कहते हैं। आरंभ वाणी की साधना से ही करना पड़ता है आरंभ अपने और दूसरों के बारे में चर्चा से करना चाहिए। बातचीत के तीन-चौथाई विषय वार्तालाप में लगे दो व्यक्तियों में प्रत्येक स्वयं और तीसरा कोई अन्य ही होता है। चर्चा का स्वरूप अपनी स्थापना और दूसरों को रद्द करने जैसा होता है। बातचीत कर रहे व्यक्ति या तो अपनी प्रशंसा कर रहे होंगे अथवा दूसरे या वहाँ अनुपस्थित व्यक्ति की निंदा।

जब हम अपनी प्रशंसा करते हैं तो अपनी मामूली सफलताओं और गुणों को बढ़ा-चढ़ाकर देखते हैं। घटनाओं और स्थितियों को अतिरंजित कर देखने को वृत्ति दूसरों को भ्रम-भुलावे में डालती हैं या नहीं, अपने आपके बारे में स्वयं को जरूर भरमा देती है। बढ़ा-चढ़ाकर की गई अपनी चर्चा आसपास ‘पाखंड’ की रचाना कर देती है। जो नहीं हैं, उसे व्यक्त करने के जाल-जंजाल में एक बार उलझ गए तो यथार्थ जगत् में वापस लौटना मुश्किल हो जाता है। किए गए दावों और तारीफों के पुल कायम रखने के लिए नित-नई तिकड़म लड़ानी पड़ती है।

सत्य को व्यवहार में उतने, ‘चित्त-वृत्तियों के निरोध’ रूप योग के लक्ष्य को प्राप्त करने अथवा ईश्वर को अपने जीवन में प्रतिष्ठित करने का प्रारंभिक नियम यह है कि जहाँ तक हो अपनी प्रशंसा कभी नहीं करना। इसी नियम का दूसरा भाग हैं, दूसरों की निंदा नहीं करना। अपनी प्रशंसा और दूसरों की निंदा नहीं करने का नियम यमनियमों की साधना का शुभारंभ है। इस अभ्यास को ‘क’ ‘ख’ ‘ग’ हटने और अच्छी तरह समझ-सीख लेने के बाद आगे बढ़ने की तरह महत्व दिया जाना चाहिए। ‘क’ ‘ख’ ‘ग’ नहीं सीखेंगे, तो अगले कोई पाठ नहीं पढ़े जा सकेंगे, ‘आत्मप्रशंसा’ और ‘परनिंदा’ से नहीं बचेंगे तो सत्य के अगले चरणों में भी प्रवेश संभव नहीं होगा।

अपनी प्रशंसा में जिस तरह अपने गुणों को बढ़ा-चढ़ाकर देखा जाता है, उसी तरह परनिंदा में दूसरों की विशेषताओं और कृत्यों को काट-छाँटकर देखा जाता है। दोषों को बढ़ा-चढ़ाकर कहने और गुणों को अनदेखा करते हुए ही परनिंदा संभव होती है। निंदा-आलोचना का उद्देश्य ही दूसरे को छोटा करके देखना और अपना महत्व-मूल्य बढ़ना है। बड़प्पन की एक विधि तो यह है कि अपने भीतर गुणों और योग्यताओं का विकास किया जाए। उस आधार पर अपने आपको बड़ा सिद्ध किया जाए। यह रास्ता कठिन है। आसान यही लगता है कि दूसरों को छोटा, हेय, दुर्गुणी बताया जाए। अपनी प्रशंसा और दूसरों की निंदा-आलोचना से बड़ा बनने का ‘शोर्टकट’ किसी कक्षा में नहीं पहुँचाता। आत्मिक प्रगति की दिशा में कुछ कदम बढ़ाने के बजाय यह प्रवृत्ति हजारों कदम पीछे धकेल देती है।

अपनी प्रशंसा और दूसरों की निंदा करने पर वृत्ति पर थोड़ा अंकुश लगा लिया जाए, तो प्रामाणिकता की मंजिल एक हद तक पा ली गई समझना चाहिए। ‘जान-बूझकर’ असत्य नहीं बोलने’ का नियम इसके बाद आता है। आत्मप्रशंसा और परनिंदा पर यथासंभव नियंत्रण कर लेने के बावजूद झूठ बोलने के कई अवसर आते हैं। किसी वस्तु, उत्पादन और उपाय के बारे में अनावश्यक दावे कना भी गलत है। कहा जा सकता है कि वस्तुओं और उत्पादों में जो गुण नहीं है, उनका विज्ञापन किए बिना बाजार में काम नहीं चलता। बाजार में टिकने के लिए झूठ बोलना और झूठी विज्ञापनबाजी करना बेहद जरूरी है।

व्यापार-व्यवसाय में विज्ञापनबाजी या झूठी तारीफें करने की बात बहुत आगे की है। प्रारंभिक स्तर पर इतना ही अभ्यास कर लिया जाए कि सामान्य व्यवहार में झूठ न बोलें। लोग सामान्य दिनचर्या में भी मिथ्या बोलने लगते हैं। सोने, जागने, काम करने, आमदनी बताने, कोई सूचना देने में भी कई बार चालाकी बरती जाती है दिए गए वक्तव्य तब खोखले और झूठ ही साबित होते हैं।

प्रयत्न किया जाए कि अपने पास जो सूचना उपलब्ध है, वह उसी रूप में दी जाए। उसमें न कुछ मिलाया जाए और न ही अनावश्यक रूप से काट-छाँट की जाए। किसी विषय में यदि कोई जानकारी नहीं हो तो उसका दावा नहीं किया जाए। गलत जानकारी देने के बजाय ‘नहीं मालूम” कह देना अच्छा है। यह नीति गली-मोहल्ले में किसी का पता बताने से लेकर दर्श्यान और अध्यात्म के क्षेत्र में सूक्ष्म चर्चाओं तक सभी विषयों में अपनानी चाहिए।

क्रोध आने पर चुप रह जाना या किसी और रूप में व्यक्त नहीं करना आमतौर पर मनोवेगों पर नियंत्रण की साधना में आता है। सत्य की साधना में इस अभ्यास को सम्मिलित करने का अर्थ हैं, आँतरिक सुदृढ़ता का विकास। मानसिक दृष्टि से बली हुए बिना सत्य के तेज को धारण नहीं किया जा सकता। क्रोध आने पर चुप रह जाने का नियम मानसिक शक्ति को इस तरह ढालता है कि वह अप्रिय स्थितियों को झेल सके।

विचार किया जाना चाहिए कि क्रोध क्यों आता है? अपने अनुकूल स्थिति न होने पर, अप्रिय व्यवहार देखकर या आशा-अपेक्षा के विपरीत घटनाएँ घटने पर चित्त उबल पड़ता है। सत्य यह है कि औरों को अपने हिसाब से चलाने की इच्छा और इस इच्छा में बाधा पड़ने पर ही मन कुपित होता है। दूसरों को अपनी इच्छा-अपेक्षा के अनुसार चलाने का किसी को कोई अधिकार नहीं है। यह अधिकार जताया जाता है, तो संसार जिन नियमों से चल रहा है, उन्हें उलटने की कामना की जाती है। यह कामना सत्य के आदर्श की अवहेलना ही कही जानी चाहिए।

शुरुआत में ही क्रोध को त्याग देने का कठिन परामर्श नहीं दिया जा रहा। अप्रिय स्थितियों में मन क्षुब्ध हो रहा हो, रोष उत्पन्न होता हो या उथल-पुथल मचा देने का आवेश उमड़ने लगे तो चुप होकर बैठ जाएँ। न कुछ बोले, न प्रतिक्रिया व्यक्त करें। पाँच मिनट, दस मिनट, पंद्रह मिनट तक शाँत होकर ही बैठे रहें। बहते हुए साफ पानी में किसी पशु के छलाँग लगाकर निकल जाने पर तह में जमी हुई गंदगी उठ आती है। वह कुछ देर तक पानी में छाई रहती है। कुछ समय बीतने पर मलीनता वापस बैठ जाती है और पानी पहले की तरह ही स्वच्छ-निर्मल बहने लगता है। भगवान् बुद्ध ने चित्त के विक्षेपों को शाँत पानी में मची हुई उछल-कूद का प्रभाव बताया है। प्रवाह अपने आप उस जल को स्वच्छ कर देता है। अप्रिय स्थितियों की प्रतिक्रिया भी चुपचाप सहन कर ली जाए। कुछ मिनटों में चित्त पहले की तरह शाँत-निर्मल हो जाएगा। इस स्थिति को प्राप्त हुआ चित्त सत्य की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ गया होगा।


संन्यास इतना आसान नहीं

स्वामी तुरीयानंद उन दिनों अल्मोड़ा के पास एक गाँव में रहकर तपस्या कर रहे थे। स्वामी जी की ता-साधना की ख्याति आसपास के गाँवों में भी फैल गई। पुष्प खिल गया हो तो सुरभि अपने ही आप चारों और फैलने लगती है। स्वामी तुरीयानंद की तप-साधना का विकास भी इसी तरह हो चुका था। अपने गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस के महाप्रयाण के बाद उनकी दिनचर्या, जीवन के सारे क्रिया-कलाप तप-साधना के इर्द-गिर्द सिमट गए थे। स्वामी विवेकानन्द सहित सारे गुरुभाई उन्हें सच्चे संन्यास की उज्ज्वल प्रतिमा के रूप में देखते और मानते थे। निश्चित ही वे सच्चे संन्यासी थे।

इन दिनों जहाँ वे तप कर रहे थे, वहाँ यदा-कदा आसपास के कुछ ग्रामीण लोग भी आ जाते। गाँव के ये लोग उनकी बातें सुनकर अपने को धन्य मानते। स्वामी जी की ज्ञान और तप से ओत प्रोत वाणी में उन्हें अपने दैनिक जीवन की समस्याओं का समाधान मिल जाता। सुनने वालों को नई जीवनदृष्टि मिलती। इनमें से कई लोगों में तो आध्यात्मिक जाग्रति भी होने लगी थी, लेकिन कुछ ऐसे भी थे जिनका अध्यात्म सिर्फ उनकी वाक् कुशलता तक ही सीमित था।

बृजलाल नौटियाल के साथ कुछ ऐसा ही था। कहने को तो वह लगभग रोज ही स्वामी जी के पास आता था, पर उसकी गृहकलह यथावत थी। ऐसा नहीं कि उसकी पत्नी में कोई दोष था। उसकी पत्नी विद्या सुँदर, सुशील, सुलक्षण एवं सहृदय थी। वह हर हमेशा भरसक कोशिश करती कि उसका पति उससे किसी भी तरह संतुष्ट रहें, पर आज तक ऐसा हो नहीं पाया था। उनकी आपसी कलह की वजह दरअसल बृजलाल की चटोरी प्रकृति थी। भोजन करते समय उनमें रोज झगड़ा होना एक सामान्य-सी बात थी। कभी रोटी थोड़ी-सी कड़ी हो गई तो वह विद्या पर बरस पड़ता, आज रोटी तो ऐसी सिकी है जैसे-रोटी नहीं लकड़ी का किवाड़ हो। यदि किसी दिन रोटी नरम रह जाती, तो बृजलाल चिल्ला पड़ता, आज तो तुमने कच्चा आटा घोलकर रख दिया है।

भोजन के समय की कलह उनमें अब एक आम बात हो गई थी विद्या बेचारी परेशान रहती कि पतिदेव को कैसे खुश किया जाए? एक दिन तो भोजन के बारे में झगड़ा करते-करते बृजलाल का गुस्सा इतना बढ़ गया कि उसने चेतावनी दे डाली, इस तरह तुम्हारे साथ रहने से तो यही बेहतर है कि मैं संन्यासी बन जाऊँ। बृजलाल की इस बात से विद्या चिंतित हो गई कि कहीं यह सचमुच ही संन्यासी न हो जाएँ।

दूसरे दिन भोजन के समय बृजलाल ने पुनः कोहराम मचा दिया। आज मामला चटनी में नमक कम होने का था। बोध के अभाव में क्रोध तो होता ही है। बृजलाल चीख पड़ा, बस बहुत भोग चुके गृहस्थी का सुख, अब तो साधु ही बन जाना श्रेयस्कर है। ऐसा कहते हुए बृजलाल ने घर छोड़ दिया। गाँव से निकलते हुए उसे जब होश आया, तो उसे भूख व्याकुल कर रही थी। आखिर उसने निश्चय किया कि पास में एक दुकान तक चला जाए। वह पैदल ही वहाँ गया और उसने अपना मनपसंद भोजन पेटभर किया। मगर विद्या उस दिन बड़ी दुखी हुई। सारा दिन उसने निराहार रहकर गुजारा, आखिर वह भारतीय नारी जो थी।

काफी रात बीतने पर बृजलाल आया और चुपचाप कमरे में जाकर सो गया। अगले दिन फिर वही हाल। आज की शिकायत थी कि रायता खट्टा ज्यादा हो गया है। शिकायत भले ही नई हो, पर धमकी वही पुरानी थी, अब मुझे नहीं रहना तेरे साथ। इस घर से तो यही अच्छा है कि स्वामी तुरीयानंद के साथ रहकर मैं भी तप-साधना करूं।

बेचारी विद्या ने परेशान होकर सोचा कि अच्छा यही है कि मैं स्वयं स्वामी जी महाराज के पास जाऊँ और उन्हीं से अपनी विपदा कहूँ। शायद वही मेरी जिंदगी का कोई समाधान निकाल सकूँ। यहीं सोचकर वह स्वामी तुरीयानंद की कुटी पर पहुँची और उनके पाँवों में पड़कर जोर-जोर से रोने लगी। स्वामी जी सोच में पड़ गए। उन्होंने पूछा, बहन! इस तरह रोने का कारण क्या है?

तप-तेज का अपना बल होता है। विद्या संतवाणी सुनकर संभल गई और बोली, महाराज! बात यह है कि मेरे पति को मेरे हाथ का भोजन नहीं रुचता। कहते हैं कि वे आपके पास आकर संन्यासी बन जाएँगे।

स्वामी तुरीयानंद को विद्या की बात समझते देर न लगी। वह जान गए कि विद्या बृजलाल नौटियाल की पत्नी है। बृजलाल उनके पास रोज आता था। उसकी अस्थिर प्रकृति से वह परिचित थे। उन्होंने विद्या को समझाते हुए कहा, बहिन! तुम यह डर अपने मन से निकाल दो। तुम डरो मत, मैं उसे देख लूँगा कि वह किस तरह साधु बनने वाला है, अबकी बार जब भी वह तुम्हें धमकी दे, तो उससे कहना कि इस तरह रोज-रोज धमकी क्या देते हो। साधु बनना है तो जाकर बन क्यों नहीं जाते। कम से कम रोज-रोज के इस झगड़े से तो हमें छुट्टी मिलेगी।

अगले दिन जब फिर वैसा प्रसंग आया तो बृजलाल ने अपना कथन दुहराया, इससे तो अच्छा है कि मैं संन्यासी बन जाऊँ।

पहले से निर्धारित योजना के अनुसार विद्या ने कह दिया, सुनिए जी! रोज-रोज संन्यासी बनने का डर दिखलाने से क्या लाभ? यदि आपको संन्यासी बनने से सुख मिलता है, तो बन जाइए संन्यासी। मैं भी कभी-कभी आपके दर्शन करने आ जाया करूंगी।

बृजलाल के अह को भारी चोट लगी। वह तड़क-कड़ककर कर बोला, अच्छा यह बात है। अब मैं अवश्य संन्यासी बन जाऊँगा। यह कहकर वह चल पड़ा और सीधा स्वामी तुरीयानंद की कुटिया पर जा पहुँचा। स्वामी तुरीयानंद उस समय ब्रह्मपुत्र के शारीरिक भाष्य का अध्ययन कर रहे थे। काफी देर बाद बृजलाल को अपनी बात कहने का अवसर मिल पाया।

बृजलाल की बाते सुनकर स्वामी जी मुस्कराए और बहुत अच्छा कहकर अपने काम में लग गए। इधर बृजलाल भूख के कारण परेशान हो उठा था। लाचार होकर उसने संत से कहा, स्वामी जी आज क्या आपने भोज कर लिया है?

स्वामी तुरीयानंद बोले, वत्स! वैसे तो आज हमारा वत है, लेकिन तुम क्यों पूछ रहे हो?

बृजलाल को तो एक-एक क्षण प्रहर जैसा लग रहा था। उसने कहा, महाराज! मैं तो भूख से बहुत आकुल-व्याकुल ही रहा हूँ। अपने लिए न सही तो मेरे लिए ही सही, कुछ तो भोजन की व्यवस्था कीजिए।

स्वामी जी बोले, अच्छा तो ऐसा करो कि नीम की कुछ पत्तियाँ तोड़ लाओ और उन्हें पीसकर लड्डू बना लो।

संत के आदेशानुसार बृजलाल ने नीम के पत्ते पीसकर लड्डू बना लिए हालाँकि बनाते समय वह यही सोच रहा था कि नीम कोई खाने की वस्तु तो हैं नहीं। फिर भी स्वामी जी महाराज अद्भुत तपस्वी हैं, उनके प्रभाव से यह लड्डू जरूर खाने योग्य हो जायेंगे।

लड्डू तैयार हुए तो संत बोले, जितना खाना है तुम खा लो। नीम बहुत अच्छी चीज है। बीत पंद्रह दिनों से मैं इसी पर निर्वाह कर रहा हूँ।

बृजलाल ने नीम का लड्डू उठाकर जैसे ही अपने मुँह में रखा, उसे वमन हो गया। स्वामी जी बोले, देखा वमन करना ठीक नहीं, ढंग से खाओ। बृजलाल से अब न रहा गया। वह कुछ चिढ़कर बोला, महाराज! यह तो नीम है, कडुआ जहर, इसे मैं तो क्या कोई भी मनुष्य नहीं खा सकता।

यह सुनकर स्वामी तुरीयानंद ने नीम का एक लड्डू उठाया और बड़े ही निर्विकार भाव से खा लिया। यह देखकर बृजलाल बड़ी मायूसी से बोला, स्वामी जी! आप तो खा गए, लेकिन यह मेरे वश की बात नहीं।

स्वामी जी हँसने लगे, क्यों भाई, इसी बल पर तुम संन्यासी बनने चले थे? व्यर्थ ही रोज पत्नी को तंग किया करते थे कि संन्यासी बन जाऊँगा, साधु हो जाऊँगा, जीभ के चटोरे कहीं साधु बनते हैं। अब बृजलाल को वस्तुस्थिति का ज्ञान हुआ। उसने घर जाकर पत्नी से क्षमा माँगी और गृहस्थ को तपोवन मानकर रहने लगा।


संतों की मूल विशेषता (kahani)

एक आदमी संत तुकाराम का कीर्तन सुनने को नित्य ही आता, पर उनसे बहुत ही द्वेष रखता। वह मन ही मन किसी अवसर पर संत तुकाराम को नीचा दिखने की ताक में रहता था। एक दिन तुकाराम की भैंस उसके बाग के कुछ पौधे चर आई। बस वह आकर लगा गालियाँ सुनाने। इस पर भी जब संत उत्तेजित न हुए तो उसे और भी गुस्सा आया। और एक कांटों वाली छड़ी लेकर तुकाराम को इतना पीटा कि रक्त बहने लगा। फिर भी तुकाराम को न क्रोध आया न प्रतिरोध ही किया।

संध्या समय जब वह व्यक्ति नित्य की भाँति कीर्तन में नहीं आया, तो संत तुकाराम स्वयं उसके घर गए और स्नेहपूर्वक भैंस की गलती की क्षमा माँगते हुए उसे कीर्तन में ले आए।

उसके बाद उसका जीवनक्रम ही बदल गया और वह उनका प्रिय भक्त बन गया। अपने प्रति किए गए दुर्व्यवहार पर भी उस व्यक्ति पर निरंतर अपना स्नेह बरसाते रहना ही संतों की मूल विशेषता रही है।


धर्म परिवर्तन की राजनीति और अध्यात्म

जीवन का आरंभ न तो शरीर के जन्म के साथ होता है और न ही देह के नष्ट हो जाने पर वह खत्म होता है। शरीर-यात्रा को ही जीन मानें तो बात अलग है। जिन परंपराओं में पुनर्जन्म की मान्यता नहीं है अथवा जिन्हें आत्मचेतना के शरीर-सापेक्ष होने का बोध नहीं है, वही मानती हैं कि जन्म-मृत्यु जीवन का आरंभ और अंत है। भारतीय धर्म परंपरा जीवन को अनादि-अनंत प्रवाह मानती है। शरीर नष्ट होने पर वह क्षणभर के लिए ठहरता है, बल्कि ठहरता भी नहीं हैं, यात्रा जारी रखने के लिए दूसरे वाहन की तलाश में जुट जाता है। शरीर को जीवन का अथवा आत्मचेतना का वाहन भी तो कहा गया है। इस आध्यात्मिक सत्य को भारत की सभी धर्म-परंपराओं ने माना है। सनातन, बौद्ध, जैन, वैदिक, शैव, साक्त वैष्णव सभी परंपराएँ जीवन के अविच्छिन्न प्रवाह को स्वीकार करती हैं। इसीलिए भारत में धर्मों के विभिन्न फूल खिले और संसार को सुगन्धित करते रहे हैं।

भारत में बीसियों संप्रदाय और मत-मताँतर प्रचलित हैं। यह एक विशेषता है। दूसरी विशेषता यह है कि किसी भी संप्रदाय ने दूसरे मत में दीक्षित साधक को अपनी परंपरा में बलात् खींचने की चेष्टा नहीं की उसे अपने मार्ग पर स्वतंत्र और निर्बाध चलते रहने की छूट दी। पृथ्वी के दूसरे भूखंडों से आए प्रचारकों ने अपने धर्म संप्रदाय का गुणगान किया, तो उनका भी विरोध नहीं किया। उनकी बात को गंभीरता से सुना और कोई अच्छाई हुई तो उसे ग्रहण करने की चेष्टा की। उदाहरण के लिए, ईसाई धर्म-प्रचारकों से सेवा की शिक्षा ली और भूखों, दरिद्रों, रोगियों के उपचार पर ध्यान दिया। इस्लाम में संगठित होने की प्रेरणा ली, सामूहिक प्रार्थना-उपासना का महत्व समझा और उसे अपनाया, लेकिन इसे कभी उचित और न्यायसंगत नहीं समझा कि दूसरों का धर्म अपना लिया जाए। उन्हें अपने धर्म में दीक्षित करने के प्रयत्न हों। हिंदू भारतीय परंपरा में धर्म-दीक्षा देने जैसा कोई संस्कार भी नहीं है। उन्नीसवीं शताब्दी में हिंदुओं को ईसाई और मुसलमान बनते देख स्वामी दयानन्द सरस्वती ने शुद्धि-संस्कार का प्रचलन अवश्य गढ़ा था। वह दीक्षा नहीं थी, बल्कि घर छोड़कर गए व्यक्ति की वापसी थी। उसे परावर्तन नाम भी दिया गया।

एक समय तो ऐसा भी था कि अपनी धर्म-परंपरा छोड़कर गए व्यक्तियों पर भी आचार्यों ने ध्यान दिया। उन्हें अज्ञानी और पथभ्रष्ट कहकर भुला दिया। इस प्रवृत्ति से भारतीय समाज की हानि भी हुई हैं, लेकिन इतना ही कहा जा रहा है कि धर्म-परिवर्तन भारतीय परंपरा के स्वभाव में कभी नहीं रहा। यह भूमिका धर्म-परिवर्तन के नए संदर्भ को ध्यान में रखकर बाँधी जा रही है। ईसाई धर्म के सर्वोच्च गुरु, अधिष्ठाता पोप जॉन पाल ने पिछले वर्ष भारत-यात्रा के दौरान समूचे एशिया में ईसाइयत फैला देने का आह्वान किया। आशय स्पष्ट है कि एशिया के तमाम देशों धर्म-परिवर्तन के प्रबल प्रयत्न किए जाएँ और वहाँ रह रहे हिंदू, बौद्धों, मुसलमानों को ईसाइयत में दीक्षित किया जाए। परंपरा से प्राप्त उनके धर्म को छोड़ने के लिए कहा जाए, मनाया जाए, तैयार किया जाए और अंततः मत-परिवर्तन कराया जाए।

पोप जॉन पाल के इस आह्वान की व्यापक प्रतिक्रिया हुई है। वे एक धर्म परंपरा का सर्वोच्च सत्ता होने के साथ संसार के सबसे छोटे देश ‘वेटिकन’ के शासन प्रमुख होने के नाते भी भारत आए थे। इसी कारण उन्हें राजकीय अतिथि का मान मिला। ईसाई धर्मगुरु होने के नाते आए होते और धर्मांतरण पर वक्तव्य देते तो शायद इतनी आलोचना नहीं होती। उनके वक्तव्य का विरोध सिर्फ इसलिए हुआ कि वे राजनीतिक प्रमुख के तौर पर आए और यहाँ रह रहे लोगों की आस्था बदलने का आह्वान कर चले गए। धर्मांतरण वैसे भी चर्चा और विवाद का विषय रहा है। पोप जॉन पाल के भारत आने से पहले ही विभिन्न धार्मिक, सामाजिक संस्थाएँ यह प्रश्न उठाती रही हैं। उनके अनुसार दूसरी धर्म-परंपरा में दीक्षित कर लोगों को अपनी परंपरा से ही नहीं तोड़ा जाता, उनकी निष्ठा और राष्ट्रभक्ति को भी कमजोर करने की चेष्टा की जाती है। पूर्वोत्तर राज्यों के साथ केरल, तमिलनाडु और तटवर्ती प्रदेशों में उठते रहने वाले उपद्रवों का कारण भी यही निरूपित किया जाता है कि वहाँ बड़े पैमाने पर धर्म-परिवर्तन का चक्र चला है और लोग अपनी पूजा-पद्धति के साथ जीवन पद्धति से भी अलग हुए है।

धर्म-परिवर्तन के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव हुए भी हैं। उस कारण विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएँ उत्पन्न भी हुई हैं। तथ्य तो यह भी है कि 1147 में भारत को स्वतंत्रता के वरदान के साथ विभाजन का अभिशाप भी मिला। इसका कारण भी पिछली सदियों में शासकों के दबाव और प्रलोभन के कारण होता रहा धर्मांतरण है। भारतीय धर्म-समाज ने सावधानी बरती होती, संगठित प्रयत्न किए होते और लौकिक दृष्टि से सजग रहा होता तो यह स्थिति नहीं आती। लेकिन उस अतीत की चर्चा से कोई लाभ नहीं है। हाल का संदर्भ धर्म-परिवर्तन की आँधी ला देने वाला आह्वान है।

धर्मांतरण के राजनीतिक-सामाजिक अर्थ जो भी हो, भारतीय परंपरा मानती है कि आध्यात्मिक दृष्टि से यह असंभव कर्म है। स्वतंत्रता आँदोलन के दिनों में महात्मा गाँधी ने इस विषय पर विस्तृत चिंतन किया था। गाँधी वाङ्मय में उनके तद्विषयक विचार बिखरे पड़े है। स्वतंत्रता आँदोलन में धर्म परिवर्तन का सीधा कोई संबंध नहीं दिखाई देता, लेकिन गाँधी जी मानते थे कि धर्म बदलने का अर्थ है, व्यक्ति की अंतरात्मा को बदलना। अंतरात्मा कोई वस्त्र या आभूषण नहीं है कि उसे बदला या पहना और उतारा जा सके। वह पिछले जन्मों के संस्कारों का समुच्चय है। उसमें परिवर्तन होगा तो कई जन्मांतर चाहिए और विकास होता तो भी कई जनम चाहिए।

महात्मा गाँधी ने लिखा है कि माता-पिता की भाँति धर्म भी व्यक्ति को जन्म के साथ ही मिलता है। जनक-जननी को जैसे नहीं बदला जा सकता, उसी प्रकार धर्म भी नहीं बदला जा सकता। यदि कोई धर्म-परिवर्तन का प्रयास करता है, तो वह प्रकृति के विरुद्ध जाता है। प्रयत्न सफल नहीं होते और व्यक्ति कहीं का नहीं रह जाता। महात्मा गाँधी ने यह बात अपने छोटे पुत्र हरिलाल के संबंध में कही थी। हरिलाल महात्मा गाँधी के अन्य पुत्रों से एकदम भिन्न और विपरीत स्वभाव के थे संगति-दोष के कारण उनमें कई बुरी आदतें घर कर गई थी। दुर्व्यसनों ने हरिलाल का सुख-चैन हर लिया था। उनके कारण महात्मा गाँधी भी हरिलाल को पसंद नहीं करते थे। कुछ अवसरों पर तो उन्होंने अपने इस बेटे को स्वीकार करने से भी मना कर दिया था। दुर्व्यसनों और कुटेवों के कारण हरिलाल पर कर्ज भी चढ़ गया। कर्ज से मुक्ति पाने की उनकी स्थिति नहीं थी।

धर्म-परिवर्तन के काम में जुटी संस्थाओं ने हरिलाल को इस शर्त पर आर्थिक सहायता की कि वह अपना धर्म छोड़कर दूसरा धर्म अपना लेगा। हरिलाल ने यह शर्त स्वीकार कर ली थी। महात्मा गाँधी से उस अवसर पर पत्रकारों ने पूछा था कि अब आपका क्या कहना है, आपका पुत्र धर्म बदल रहा है। गाँधी जी ने कहा था कि जो लोग धर्मांतरण को सही मान रहे हैं, वे गलत हैं। हरिलाल यदि किसी प्रलोभन के कारण धर्मांतर कर रहा है, तो कल कुछ और संस्थाएँ उसे वापस भी ला सकती है। सचमुच कुछ महीनों बाद सनातन धर्म सभा के नेताओं ने हरिलाल को समझा-बुझाकर वापस हिन्दु बना लिया। ‘धर्मांतरण’ और ‘परावर्तन’ के काम में लगी संस्थाओं को महात्मा गाँधी ने समानधर्मी कहा है। उनमें भी ‘परावर्तन’ करने वाली संस्थाओं को सराहा है, क्योंकि वे एक गलती का परिहार करने या भूल सुधारने में लगी हुई है।

जिन आध्यात्मिक कारणों से महात्मा गाँधी ने धर्म-परिवर्तन को असंभव, प्रकृति-विरुद्ध कर्म और अपराध कहा है, उनमें संस्कार मुख्य है। उनकी चर्चाओं के एक संकलन ‘डायलॉग विद क्रिश्चियनिटी’ पर चर्चा करते हुए प्रसिद्ध चिंतक और साहित्यकार निर्मल वर्मा ने कहा था कि गाँधी जी कि दृष्टि में मोक्ष जीवन का परम लक्ष्य हैं वे राजनीतिक में भी अपने इसी लक्ष्य की साधना के लिए प्रवृत्त हुए थे। स्वयं गाँधी जी ने कई अवसरों पर यह बात कही है। मोक्ष एकाध जन्म में सिद्ध होने वाला लक्ष्य नहीं है। उसके लिए कई जन्मों की साधना चाहिए।

साधना-संस्कार ही व्यक्ति की आत्मचेतना को अगली कक्षा के द्वार तक पहुँचाते हैं। एक जन्म को एक कक्षा माने तो नौवीं कक्षा में पढ़े विषय ही दसवीं में भी पढ़ने होते हैं। परीक्षा, परिणाम और नई कक्षा में प्रवेश को तैयारी तथा नया जन्म कह सकते हैं। नई कक्षा में पहले अर्जित की हुई शिक्षा को ही आगे बढ़ाने के रूप से नए जन्म में मिले धर्म को समझा जा सकता है। निर्मल वर्मा ने महात्मा गाँधी की चिंतन की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रकृति स्वयं किसी भी चेतना को पूर्ववर्ती संस्कार और स्तर के अनुरूप वातावरण में भेजती है। अर्थात् एक व्यक्ति शैव मार्ग का साधक है, तो पंचानवे प्रतिशत संभावना यही है कि अगले जन्म में वह किसी शिव-भक्त परिवार में ही जन्मेगा। वहाँ पिछले जन्म में प्राप्त संस्कार और पुण्य को बढ़ाता हुआ यात्रा को आगे बढ़ाता है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने इस तथ्य को बहुत सूक्ष्म रूप में समझाया है। योगभ्रष्ट व्यक्ति की गति, स्थिति का वर्णन करते हुए वे कहते हैं कि किसी कारण इस जन्म में किए प्रयत्न सफल नहीं होते, तो भी कोई हर्ज नहीं। असफल कर्मों के संस्कार व्यक्ति को अगले जन्म में अनुकूल वातावरण में ले जाते हैं। वहाँ पूर्व अर्जित संस्कारों के बल पर व्यक्ति आगे बढ़ता है।

बौद्ध धर्म के प्रसिद्ध विद्वान और तिब्बत की निर्वासित संसद के अध्यक्ष प्रो. सामदेग रिनपोचे ने धर्म-परिवर्तन को उन्होंने कहा है। बौद्ध धर्म की मान्यताओं के आधार पर उन्होंने कहा कि अपने धर्म की शिक्षा देने एक बात है। उसके लिए व्यक्ति और संगठन स्वतंत्र है, लेकिन किसी का धर्म बदलने की चेष्टा उसे अपने मार्ग से भ्रष्ट करने की तरह अपराध है। दिल्ली से मुँबई जा रहे व्यक्ति को नागपुर पहुँच जाने पर चैन्नई ले जाने और फिराकर मुँबई ले जाने की तरह किया गया छल है। बौद्ध-परंपरा को यहाँ तक कहती है कि जब तक कोई व्यक्ति याचना न करे, तब तक धर्म की शिक्षा भी नहीं देनी चाहिए। कम-से-कम तीन बर प्रार्थना करने पर ही धर्म का उपदेश दिया जा सकता है।

ढाई हजार साल पहले भगवान् बुद्ध के आविर्भाव और बौद्ध धर्म के अवतरण को वे कोई नया मत या संप्रदाय नहीं मानते। उनके अनुसार बौद्ध धर्म भारतीय परंपरा की ही एक घटना थी, जो उस प्रवाह में आ गई मलीनताओं को दूर करने के लिए सम्पन्न हुई थी। बुद्ध ने अपने उपदेशों में ब्राह्मणों की भी कहीं निंदा नहीं की है, बल्कि ब्राह्मण होने का सच्चा अर्थ बताया है। उन्होंने वेदों का विरोध भी नहीं किया जैसा कि पश्चिम के आलोचक और नवबौद्ध बताते हैं। पिटक ग्रंथों में बुद्ध के कई वचन संग्रहित हैं, जिनमें यह मार्ग वेद सम्मत है अथवा यह वेदवाणी का ही विस्तार है, जैसे विचार व्यक्त किए गए हैं। कालाँतर में भारत से बौद्ध-परंपरा का स्वतंत्र अस्तित्व इसलिए तिरोहित हो गया कि यहाँ की परंपरा शुद्ध और परिमार्जित हो गई। जिन देशों में धर्म-अध्यात्म की दृष्टि से दैन्य फैला हुआ था, वहाँ बौद्ध धर्म के रूप में भारतीय परंपरा का प्रवाह पहुँचा और प्रतिष्ठित हुआ।

भारत में व्यक्ति के आत्मिक विकास के लिए विभिन्न प्रयोग हुए हैं। भिन्न-भिन्न रुचि-प्रकृति के लोगों के लिए उनकी आवश्यकता के अनुसार निर्धारण किए गए हैं। यही कारण है कि अन्य मत-संप्रदायों की तरह यहाँ एक ग्रंथ, एक पंथ या एक चैत्यालय का प्रश्न नहीं है। कम-से-कम 105 साधन मार्ग और परंपराएं है, जिन्हें विभिन्न स्तर के लोग अपनाते हैं। उन्हें संप्रदाय, गुरु परंपरा, कुल धर्म, जाति धर्म जैसे नामों से सम्बोधित किया गया है। एक विचारधारा के अनुसार तो वर्ण व्यवस्था भी व्यक्ति की साधना-संपदा को समृद्ध करते रहने के लिए नियत की गई। यद्यपि वह एक सामाजिक व्यवस्था ज्यादा है, लेकिन कर्म को ही साधना और जीवन को ही यज्ञ अनुष्ठान मानने वाले विचार में वर्ण धर्म भी मोक्ष की दिशा में अनवरत यात्रा ही हैं।

वर्ण-व्यवस्था का स्वरूप अब बहुत विकास है। अपने मूल रूप में वह अंश मात्र भी नहीं है। मनीषी वर्तमान व्यवस्था को विकृत ही नहीं सड़ा हुआ रूप मानते हैं। नाली में बहती हुई गंदगी को देखकर जिस तरह अनाज और व्यंजन की कल्पना नहीं की जा सकती। खेतों में लहलहाती फसल का अनुमान नहीं होता, उसी तरह वर्ण या जाति के वर्तमान रूप को देखकर उसके मूल स्वरूप का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इस व्यवस्था के मूल रूप को समझने वाले मनीषी कहते हैं कि यह व्यक्तित्व के अनुरूप मनुष्य के कर्म का निर्धारण, प्रकृति और साधना संसार का विज्ञान था। गीता में श्रीकृष्ण जिसे स्वधर्म कहते हैं, वह अपने व्यक्तित्व और संस्कार के अनुरूप कर्म का चुनाव ही है। वर्ण-धर्म चुनना नहीं पड़ता था। वह जन्म से ही सिद्ध होता था। कभी-कभार अपवाद होते थे, जिसमें ब्राह्मण क्षत्रिय का धर्म अंगीकार कर लेते या क्षत्रिय और दूसरे वर्ण के लोग अतिक्रमण कर जाते थे। पश्चिम के रहस्यवादी विद्वान एंड्रू हारेन ने लिखा है कि ऊँच-नीच का भेद नहीं आया होता तो वर्ण व्यवस्था मनुष्य को मोक्ष के द्वार तक ले जाने वाला सबसे आसान रास्ता था।

उन्होंने कहा है कि सभी व्यक्ति समान नहीं होते। सबके समान और एक रूप होने की मान्यता व्यक्तित्व को नष्ट कर देती हैं। हमें व्यक्तियों के बीच भिन्नता के तथ्य को स्वीकार करना चाहिए। भिन्नता का अर्थ ऊँच-नीच नहीं है। वह भिन्नता की स्वीकृति है। इस स्वीकृति के साथ ही समाज में चेतना के विकास की संभावना बनती है। अमेरिकी समाज का उल्लेख करते हुए एंड्रू ने कहा कि वहाँ भारत जैसी वर्ण-व्यवस्था नहीं हैं लेकिन वर्ण है। नाम कुछ भी हो, व्यक्तित्व की भिन्नता और महत्व को स्वीकार किया गया। भारतीय प्रत्ययों में समझें तो आइंस्टीन ब्राह्मण है वैज्ञानिक और ब्राह्मण की प्रतिभा में कोई अंतर नहीं है। दोनों सत्य की खोज के लिए सब कुछ छोड़ने को तैयार हैं। राकफेलर और मार्गन जैसे उद्योगपतियों को वैश्य कहा जा सकता है। हिटलर, लेनिन, माओ, स्टालिन आदि क्षत्रिय हैं। वे और उनके साथी-सहयोग युद्ध के लिए आतुर हैं। इन व्यक्तियों का उल्लेख प्रतीक रूप में किया गया है। जिन लोगों में भी सृजन-उत्पादन-संघर्ष और सेवा की प्रतिभा है, उन्हें चारों वर्णों में बाँटा जा सकता है। एंड्रू ने कहा है कि आज नहीं तो कल हमें इस विभाजन को स्वीकार करना ही पड़ेगा। उसे स्वीकार किए बिना व्यक्ति की चेतना का निर्बाध विकास नहीं हो सकता।

भारतीय संदर्भ में जाति के विभाजन को वे वर्ण-व्यवस्था का और भी सूक्ष्मीकरण बताते हैं। लेकिन यहाँ भी सावधानी बरतनी पड़ेगी। जाति के वर्तमान स्वरूप से उसके मूल रूप का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। ये व्यवस्थाएँ व्यक्ति के पुण्य आर संस्कारों को जन्मांतरों तक संचित करने का प्रयास रही हैं। इनके समुच्चय अर्थात् धर्म की कल्पना तो और भी विराट् है, उसे बदलना असंभव तो है ही, प्रयत्न की दृष्टि से अपराध भी। दूसरे के धर्म को भयावह बताते हुए अपने धर्म में मरना भी श्रेयस्कर बताते हुए गीताकार का आशय स्वभाव सिद्ध प्रवृत्ति से रहा है। उसे जन्म, वंश और परिवेश से प्राप्त धर्म के रूप में भी समझा जा सकता है। उस अर्थ में वह सही और प्रासंगिक है।


लुप्त हो गई, लेकिन प्रचंड-समर्थ थी तंत्र विद्या

तंत्र-साधनाओं से मिलने वाली सिद्धियों और सफलताओं के रोमाँचकारी वर्णन पुराण ग्रंथों से मिलते हैं। योगियों, सिद्धों और ताँत्रिक परंपराओं में जैसे आश्चर्यजनक उल्लेख आते हैं, उन पर विश्वास करना कठिन है। सीधे उन्हें परी कथाएँ कहकर या कल्पना-लोक की उड़ान बताकर छोड़ देना पड़ता है। इस युग के प्रसिद्ध ताँत्रिक विद्वान् महामहोपाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज का मानना था कि पुराण ग्रंथों में मिलने वाले उल्लेख कपोल कल्पित नहीं है। वे संभावनाएँ है, जो इसी मनुष्य शरीर में जगाई जा सकती हैं। उन्हें जगा लिया जाए, तो व्यक्ति चमत्कारी क्षमता से संपन्न हो सकता है।

आज की स्थितियों में वे वर्णन काल्पनिक क्यों लगते हैं? पंडित कविराज का कहना है कि उनके संदर्भ-सूत्र खो गए है। वह व्यवस्था-तंत्र नष्ट-भ्रष्ट गया है। जिससे सिद्धि-सामर्थ्य के अर्जन साधारण प्रयत्नों से ही हो जाता है। टेलीविजन के परदे पर घर बैठे देश-दुनिया के किसी भी कौने में हो रही घटना को सीधे देखा जा सकता है। इंटरनेट के जरिए पलभर में अपनी बात संसार के किसी भी कोने में पहुँचाई जा सकती है। कुछ साल पहले तक किसी दूसरी जगह बात करने के लिए टेलीफोन के भारी भरकम तंत्र का उपयोग करना पड़ता था। जगह-जगह तारों के जाल बिछे होते थे। समुद्र में केबिल डाले जाते थे और किसी एक जगह तार कट जाता तो बातचीत नहीं हो पाती थी। अब यह जाल-जंजाल जरूरी नहीं हैं। जेब में सौ-सवा सौ ग्राम का एक हैंडसेट रखकर दुनिया में कही भी बात की जा सकती है। संदेश भेजे जा सकते हैं और बोलने वाले की तस्वीर भी देखी जा सकती है।

विज्ञान के चमत्कारों पर लोग अब दाँतों तले अंगुली नहीं दबाते। उनके बारे में पढ़-सुनकर रोमाँचित और प्रफुल्लित भर होते हैं, लेकिन एक स्थिति ऐसी भी आ सकती है कि ज्यादा नहीं सिर्फ पचास साल बाद ही लोग इन्हें भूल जाएं और बचे-खुचे उपकरणों को कबाड़ की तरह इस्तेमाल करें। उपलब्धियों के बारे में कोई सूचना देने वाले सूत्र बचें भी, तो लोग उन पर विश्वास नहीं करें। इस संभावना को स्पष्ट करने के लिए कविराज जी ने लिखा है कि मान लीजिए अचानक परमाणु-युद्ध छिड़ जाए। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में पच्चीस-पचास परमाणु बमों का विस्फोट हो जाए। बड़ी आबादी वाले तमाम विकसित शहर नष्ट हो जाएं। युद्ध जब होते हैं, तो उन्नत और सम्पन्न बस्तियों के साथ उन्हें कायम रखने वाली प्रतिभाएं ही नष्ट होती हैं। संसार की अधिकाँश आबादी, सभ्यता और तकनीक नष्ट होने के बाद गाँव-गंबई की बस्तियाँ और आदिवासी लोग ही बचेंगे। हो सकता है कस्बों में भी थोड़े-बहुत लोग बचे रह जाएं। परमाणु-युद्ध के बाद जो भी लोग बचेंगे, वे अपनी संतानों को दूरदर्शन, संचार की मौजूदा तकनीक और परिवहन आदि उपलब्धियों के बारे में बताएंगे तो कोई विश्वास नहीं करेगा, क्योंकि वह तंत्र या नेटवर्क कहीं नहीं होंगे, जिसके बूते पर विलक्षण लगने वाली बातें संभव होती है। तब कही कोई टीवी सेट पड़ा मिल जाएगा, तो लोगों के लिए उसकी तुलना में एक खाली कनस्तर ज्यादा उपयोगी होगा। टीवी सेट के बारे में कोई कहेगा कि इसके परदे पर दुनिया भर की बाते दिखाई देती थी, तो लोग हंसेंगे। कहेंगे कि क्या मजाक है।

विज्ञान की वर्तमान उपलब्धियों के लिए पचास वर्ष में यह स्थिति आ सकती है कि वे अविश्वसनीय कही जाने लगें। तंत्र और योग की उपलब्धियों के बारे जो विवरण दिए जाते हैं, वे अधिकाँश सही होते हुए भी केवल इसलिए विश्वसनीय नहीं है कि उनका प्रबंध या नेटवर्क गड़बड़ा गया है। निश्चित ही व्यक्तियों या स्थानों के बारे में बताई जाने वाली सभी विलक्षणताएँ सही नहीं होगी। उनमें अतिरंजना के साथ कल्पनाओं का मिश्रण भी होगा, लेकिन संभावना की दृष्टि से विवरण गलत नहीं है। हो सकता है गणेश प्रतिमाओं द्वारा दूध पीने की घटना किसी प्रचार-प्रोपेगैंडा का परिणाम हो, लेकिन संभावना की दृष्टि से यह गलत नहीं हैं, देव-प्रतिमाओं के रुदन करने और आहार लेने से शस्त्र उठाने, स्थान बदल देने की घटनाएँ हुई हैं। उन घटनाओं का उल्लेख जिन लोगों ने किया, उन पर संदेह नहीं किया जा सकता।

जिन दिनों तंत्र विद्या का उपयोग कम्प्यूटर और यान-विमानों की तरह किया जाता था, उन दिनों दैनंदिन जीवन में इसके प्रमाण देखे जा सकते हैं। सिक्का डालकर बरतन में दूध निकालने जैसी व्यवस्था आज चमत्कार नहीं लगती। सभ्यता के उस दौर में भी गुरुत्वाकर्षण से मुक्त होकर तेजी से कहीं भी पहुँच जाने और अग्नि, वायु, जल, आकाश, पृथ्वी आदि से उनके गुण-धर्म के विपरीत काम लेने के प्रयोग संभव थे उस सभ्यता का परिचय देते हुए मनीषी लिखते हैं, कि आधुनिक सभ्यता के लिए उस स्तर तक पहुँचना अभी शेष हैं। वह सभ्यता स्थूल उपकरणों का आश्रय लिए बिना चमत्कार कर दिखाती थी। युद्ध में आजकल अनेक प्रकार के बहुमूल्य अस्त्र-शस्त्रों का उपयोग होता है। युद्ध इतने महंगे पड़ते हैं कि दो देश महीने-पंद्रह दिन लड़ लें तो उनकी अर्थ-व्यवस्था दो-तीन साल पिछड़ जाती हैं। सूक्ष्म जगत् में व्याप्त ऊर्जा का उपयोग कर जिन दिनों युद्ध लड़े जाते थे, उन दिनों आज की तरह अर्थतंत्र पर दबाव नहीं पड़ता था। उनके लिए प्रचंड आत्मशक्ति जगानी पड़ती थीं। आत्मशक्ति का उपार्जन आर्थिक साधन जुटाने से ज्यादा श्रम और प्रतिभा की अपेक्षा रखता है। यह अर्जित कर ली जाती तो युद्धों में वरुणास्त्र, आग्नेयास्त्र, सम्मोहन अस्त्र, नागपाश आदि का उपयोग सहज ही कर लिया जाता।

आशय यह नहीं है कि पुराणों और काव्यग्रंथों में जो लिखा गया वह इतिहास की दृष्टि से भी सच हो। योगीजन बताते हैं कि वे वर्णन कल्पना-लोक की ही उपज नहीं है। सचमुच उनका अस्तित्व रहा है। उनका उल्लेख करते हुए तंत्र-मार्ग के आचार्य पूछते हैं कि वैसी सिद्धियाँ और विलक्षणताएँ आज कहीं दिखाई भी देती हैं क्या? वरुणास्त्र जो जल की भारी वर्षा कर दे, आग्नेय अस्त्र जो अग्नि-ज्वालाओं का दावानल प्रकट कर दे, सम्मोहनास्त्र जो लोगों को संज्ञाशून्य बना दे, आज कहाँ है? इंजिन, भाप, पेट्रोल आदि ईंधन के बिना जल-थल-नभ में समन रूप से गति करने वाले यान कहीं दिखाई भी देते है? मरीच की तरह मनुष्य से पशु बन जाता, नल-नील की भाँति पानी पर तैरने वाले पत्थर तैयार करना और उनसे पुल बनाना, युद्ध में अदृश्य हो जाना, संजीवनी विद्या से मृत शरीर में प्राण फूँक देना क्या संभव है? नहीं।

वैदिक काल से विकसित हुई इस विद्या का लोप नागार्जुन, गोरखनाथ, मत्स्येंद्रनाथ आदि सिद्धि पुरुषों के बाद होने लगा। सिद्ध योगियों ने अपनी सूक्ष्म सामर्थ्य का उपयोग जनहित के लिए किया। यह विद्या फलीभूत होती गई। कहा भी गया हैं ‘सा विद्या या विमुक्तये’, विद्या वह है जो मुक्त करती है। तंत्र विद्या जब मोक्ष के स्थान पर भोग का साधन बनने लगी, तो उसमें विकार आना स्वाभाविक ही था। विकार ने विद्या को अविद्या बनाया और वह घोर अंधकार में भटकाने का कारण बनी। जो लोग विदेशी आक्रमणों और आततायी हमलों को पतन-पराभव का कारण मानते हैं, वे आधी बात करते हैं। पूरी बात यह है कि विद्या-विभूति का उपयोग क्षुद्र स्वार्थों के लिए शुरू हुआ तो हमारा समाज दीन-हीन बनने लगा। परमाणु-युद्ध छिड़ जाने के बाद जिस तरह के विनाश की कल्पना की जा सकती है, विद्या-विभूति का वैसा ही लोप निजी राग-द्वेष और इंद्रिय सुखों पर जोर देने के बाद होता गया।

तंत्र विद्या के टूटे-फूटे अवशेष ही अब बचे हैं। उन अवशेषों से विद्या के समग्र वैभव की कल्पना नहीं की जा सकती। फिर भी परिचय तो प्राप्त किया ही जा सकता है। तंत्र विद्या के बाकी बचे स्वरूप में एक अंश दूसरों पर अच्छा या बुरा प्रभाव डालने की सामर्थ्य है। थोड़ी-बहुत एकाग्रता और मंत्रों के विशिष्ट जन-अनुष्ठान के बाद यह सामर्थ्य अर्जित की जा सकती है। अभिचार और उपशमन क्रियाओं के रूप में यह विद्या इन दिनों नए सिरे से लोकप्रिय हो रही है। एक समय इन क्रियाओं को अंधविश्वास और पिछड़ापन बताकर लोग नाक-भौं सिकोड़ते थे, लेकिन अस्सी के दशक के बाद प्रचन में बदलाव आया है। लोग इन विद्याओं में रुचि लेने लगे है।

‘अभिचार’ कर्म आत्मशक्ति के घातक उपयोग का नाम है। अभिचार कर्म से स्वस्थ व्यक्ति की रोगी बनाया जा सकता है। किसी रोग-बीमारी का तेज या हलका प्रक्षेपण किया जा सकता है। प्रयोग की तीव्रता के अनुसार व्यक्ति धीरे-धीरे घुलता है और महीनों-वर्षों तक कष्ट भोगता है, बिस्तर पकड़ लेता है या तुरंत चल बस भी सकता है। अभिचार से किसी की बुद्धि में उलट-फेर किया जा सकता है। वह सही निर्णय नहीं ले पाता। बुद्धि-विपर्यय से निरंतर गलत निर्णय लेता और अपने लिए तबाही बुला लेता है। मस्तिष्क पर किए गए प्रयोगों से लोग विक्षिप्त भी होते देखे गए हैं। आक्रमण इतना तीव्र नहीं हो तो व्यक्ति मंद प्रभाव से भ्रम, भय, संदेह, आशंका और बेचैनी के गहरे दलदल में फँस जाता है।

‘उपशमन’ कर्म अनिष्टकारी प्रभावों को दूर करने वाला उपचार है। नजर लगने, उन्माद ग्रस्त होने, मारण प्रयोग का शिकार होने भूतोन्माद, बुरी शक्तियों का प्रभाव, शाप आदि से मुक्ति के लिए इन क्रियाओं का सहारा लिया जाता है। स्वरूप में उपशमन कर्म कल्याणकार है, दूसरों को हित पहुँचाने की दृष्टि से किए जाते हैं, इसलिए प्रयोग करने वालों को उनका पुण्य मिलता है। वे अपनी सामर्थ्य के शुभ प्रयोग में दूसरों को राहत दिलाते और स्वयं भी प्रसन्न होते हैं, लेकिन अभिचार कर्म करने वालों को प्रायः हानि ही उठानी पड़ती है। किसी पर प्रहार करने वाला व्यक्ति अपनी शक्ति और आघात से चोट भले ही पहुँचा दे, लेकिन प्रसन्न वह भी नहीं रहता। आहत व्यक्ति के चित्त से निकला प्रतिकार अभिचार करने वालों को भी नोंचता-निचोड़ता रहता है। इसलिए ताँत्रिक प्रयोग करने वालों को सुखी-प्रसन्न नहीं देखा गया। वे रोते, कलपते, कराहते और कोसते ही रहते हैं।

मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि प्रयोगों में सभी इन दिनों प्रचलित नहीं है। सम्मोहन के रूप में प्रचलित दूसरों को मुग्ध करने वाले प्रयोग इन दिनों नहीं किए जाते। मनश्चिकित्सक और जादूगर इस तरह के प्रयोग करते हैं, लेकिन वे तंत्र के नहीं मनोविज्ञान के प्रयोग होते हैं। ताँत्रिक प्रयोग में भी मानसिक शक्ति का प्रयोग किया जाता है। वह आवरण की तरह है। मुख्य काम अपने चारों और व्याप्त सूक्ष्म ऊर्जा का संचय और उसके व्यवस्थित प्रयोग से ही सम्पन्न होता है। ऊर्जा के संव्याप्त भंडार में से साधक कणों या तरंगों को पकड़ता है, उन्हें उपत्यिका, कृत्तिका या कृत्या भी कहते हैं। समझने के लिहाज से चेतना-ग्रंथि कह सकते हैं, ग्रंथियाँ चेता की विशेष गुच्छक है, जो पकड़ी जा सकती है। उदाहरण के लिए, घी से भरे पात्र में प्रत्येक बूँद घी की विशेषताओं और गुणों से सम्पन्न होती है। अच्छे पके हुए घी में कुछ रवे बन जाते हैं, उन्हें अंगुली से उठाया और दाने की तरह हथेली पर रखा जा सकता है। चेतना-ग्रंथियों को भी इस उदाहरण से समझा जा सकता है।

तंत्र साधना में इन चेतना-ग्रंथियों, उपत्यिकाओं अथवा कृत्याओं में से अपने लिए विशिष्ट अंशों को जगाया, चैतन्य बनाया और सक्रिय किया जाता है। सक्रिय होने के बाद में ग्रंथियाँ अनुचर की तरह काम करने लगती है। लोक व्यवहार में इन ग्रंथियों के समुच्चय को मसान, पिशाच, भैरव, छाया−पुरुष, बेताल, महि, प्रेत आदि की सिद्धि बताया जाता है। ग्रंथियाँ अथवा सूक्ष्म शक्तियों के गुच्छक सिद्ध ताँत्रिक के लिए इस तरह परिणाम उत्पन्न करते हैं, जैसे कोई आज्ञाकारी सेवक काम कर रहा हो। शक्तियाँ उस सिद्ध साधक के वश में रहती हैं और व्यक्ति उससे अपनी इच्छा अनुसार काम लेता है।

कहाँ जा चुका है कि तंत्र विद्या के कुछ ही अंश इन दिनों उपलब्ध हैं। जो अंश उपलब्ध हैं, उनसे बड़े भारी प्रयोजन सिद्ध नहीं किए जा सकते। निजी और बहुत व्यक्तिगत स्तर पर ही उनसे लाभ उठाया जा सकता है। दुर्बुद्धि और ईर्ष्या-द्वेष से भरे समाज में उसका दुरुपयोग ही ज्यादा हो रहा है। इस तरह के दुरुपयोग या हमलों से हर किसी को डरने की आवश्यकता नहीं है। ईर्ष्या, बैर, अमर्ष और निष्ठुर प्रकृति के लोगों को इसी तरह के हमले ज्यादा सताते हैं। शुद्ध, सात्विक, कोमल और संवेदनशील व्यक्तियों पर इनका असर नहीं होता। बहुत शक्तिशाली हमला हुआ तो भी व्यक्ति अपने शुद्ध, सात्विक बल के आधार पर कुछ ही देर में उबर आता है। उसकी अपनी आत्मिक स्थिति स्वस्थ, सुदृढ़ और पुष्ट जो रहती है।

तंत्र-मार्ग के अपने खतरे हैं। इन साधना-विधियों की खुले आम चर्चा नहीं की जातीं किसी समय में वह परमाणु बम जैसी शक्तिशाली रही होगी, आज तो गोला-बारूद की तरह ही है। गोला-बारूद ही नहीं छुरी-तलवार जैसी हो तो भी उनके अभ्यास और उपयोग की छूट नहीं दी जाती। कारण गलत हाथों में पड़ने से उस व्यक्ति का अपना और दूसरों का अनिष्ट होने की आशंका ही रहती है। तंत्र को इसीलिए अधिकार और अधिकारी के विवेक से समझाया गया है। यह भी सावधान किया गया है कि ये साधनाएँ हर कोई नहीं कर सकता। कारण यह हैं कि सिद्धियाँ मिलती है, शक्ति आती है, तो उनकी अपनी शर्तें भी होती हैं। शर्तों का अथवा नियम-अनुशासन का पालन किया जाना अनिवार्य हैं। उसी में शुभ और कल्याण हैं जो उन कठोर नियम-अनुशासनों को निभा सकें, उन्हें ही तंत्र-मार्ग पर चलने की बात सोचनी चाहिए।


वेदों का भाष्य (kahani)

आचार्य महीधर आत्मज्ञान की इच्छा से घर छोड़कर विरक्त हो गए। उनकी माँ घर में कष्ट उठा रही है, इसका भी ध्यान न रहा। बहुत दिन तप-साधना करने पर भी उन्हें पूर्णता प्राप्त न हुई, तब वे घर लौट आए। बेटे को पाकर माँ के हर्ष का ठिकाना न रहा। उन्होंने कहा, बेटा! तूने दुःखी का दुःख पहचान लिया, तुझे पूर्णता प्राप्त होगी। माँ के आशीर्वाद का ही फल था कि महीधर को वेद-ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने चारों वेदों का भाष्य करने का गौरव प्राप्त किया।


अनुभूतियों की चैतन्यमयी-रहस्यमयी दुनिया

मूल चेता यों तो शुद्ध, बुद्ध, पवित्र है, पर वह जब जीवसत्ता के रूप में अभिव्यक्त होती है, तो जीवात्मा की मलीनताओं और कुसंस्कारों के कारण उसका वह स्वरूप वैसा प्रखर नहीं रह जाता, जैसा वास्तव में वह है। इसी कारण मनुष्य का व्यवहार, विचार और शक्ति साधारण प्रतीत होती है, किन्तु कई बार कुछ विशिष्ट स्थितियों में जब वह अपने मूल स्वरूप को प्राप्त होती है, तो आश्चर्यचकित करने वाली अनुभूतियों की उद्गम बन जाती हैं। आए दिन घटने वाली घटनाएँ इसकी साक्षी हैं।

प्रसंग सन् 1164 का है। प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक मुज मरे विश्व-भ्रमण पर निकले हुए थे। उन्हीं दिनों अचंभित करने वाली एक घटना घटी, जिसकी चर्चा अपनी पुस्तक ‘शेयरिंग दि क्वेस्ट’ में करते हुए लिखते हैं कि यात्रा के दौरान वे बहुत ही मानसिक विक्षोभ से गुजर रहे थे। इसी क्रम में एक दिन साइप्रस के लीमासोल बंदरगाह पहुँचे।

क्षणार्द्ध में ही वे ग्रह-नक्षत्रों के बीच मौजूद थे, तभी उन्हें अपने दिव्य अस्तित्व का भान हुआ। वे लाखों-करोड़ों मील ऊपर अंतरिक्ष में चक्कर काट रहे थे, जहाँ ग्रह-पिंडों को देखा जा सकता था। रहस्य परत-दर-परत खुलते चले जा रहे थे।

तब तक शाम हो चुकी थी। उन्होंने एक ग्रीक भोजनालय में भोजन किया और सागर की ओर चल पड़े। अन्य दिनों की तुलना में वे आज अधिक शाँति और प्रसन्नता महसूस कर रहे थे। समुद्र-तट पर पहुँचकर वे अस्ताचल की ओट में छिपे सूर्य से निस्सृत होने वाली रश्मियों को सागर-जल में निहारने लगे, तभी उन्हें मस्तिष्क में आश्चर्यजनक दबाव अनुभव हुआ, ऐसा लगा जैसे किसी ने उसकी खोपड़ी सुन्न कर दी हो। अब अस्तित्व संबंधी उनका बोध परिवर्तित हो गया। वह स्वयं को द्रववत् सत्ता वाले महसूस करने लगे। इसी क्षण अवर्णनीय रोमांच के साथ ऐसी प्रतीत हुआ, माना सम्पूर्ण विश्व उनके अंदर समा रहा हो या शायद अंतस्तल के किसी केन्द्र-बिंदु से वह बह निकल रहा हो। उनकी चेतना जल, थल, हर दिशा में व्यापक होकर संपूर्ण अंतरिक्ष में व्याप्त हो गई। क्षणार्द्ध में ही वे ग्रह-नक्षत्रों के बीच मौजूद थे, तभी उन्हें अपने दिव्य अस्तित्व का भान हुआ। वे लाखों करोड़ों मील ऊपर अंतरिक्ष में चक्कर काट रहे थे, जहाँ ग्रह-पिंडों को देखा जा सकता था। रहस्य परत-दर-परत खुलते चले जा रहे थे। इसकी गति इतनी तीव्र थी कि उनका सामान्य मस्तिष्क उन्हें अपने अंदर सहेज सकने में असहाय और असमर्थ था। वह केवल उस उत्फुल्लता को ही अनुभव कर सका, जो इस दौरान उद्भूत हुई।

इसी प्रकार के एक अनुभव का उल्लेख काँलिन विल्सन ने अपनी कृति ‘बियोण्ड दि ऑकल्ट’ में किया है। वे लिखते हैं कि पूर्व में ऐसा तीव्र और अभिभूत करने वाला अनुभव उन्हें कभी नहीं हुआ। हाँ, बचपन से ही उनमें एक विशेषता अवश्य थी कि वे अक्सर ऐसी मनोदशा में पहुँच जाते थे, जहाँ इतनी प्रफुल्लता और आनन्द का एहसास होता, जिसे साधारण नहीं कहा जा सकता था। अब्राहम मैस्लों ने इसे ‘चरम अनुभव’ की संज्ञा दी है। ऐसे ही एक क्षण वर्णन करते हुए वे लिखते हैं कि तब वे उन्नीस वर्ष के थे और स्ट्रासबर्ग की यात्रा कर रहे थे एक भोजनालय में ताजा भोजन किया और थोड़ी शराब पी। अब तक उन्हें यह बात खाए जा रही थी कि इतने कम पैसों में विदेश-भ्रमण कैसे होगा, लेकिन जैसे ही भोजनालय से भोजन कर वे बाहर निकले एवं सामने के गाँव के उस पार पर्वत को देखा, तो एक अद्भुत आनंद की अनुभूति हुई। वह इतनी संपूर्ण थी कि उसमें उनकी सारी चिन्ताएँ और परेशानियाँ विलीन हो गई। उन्हें ऐसा महसूस हुआ, जैसे व शरीर से पृथक होकर अपने जीवन का पर्यवेक्षण कर रहे हो, वे कहते हैं कि हो सकता है इसमें शराब का भी कुछ योगदान हो, पर जो कुछ उन्हें आभास हुआ, उसे वे ‘अनुभव’ की तुलना में ‘दर्शन’ कहना ज्यादा पसंद करते हैं, कारण कि वह अनुभव से आगे कुछ और भी था, ऐसा उनका मानना है।

आखिर ऐसा क्यों होता है? इस संबंध में काँलिन विल्सन का मन है कि कदाचित् ये दिव्य क्षण इस बात के सूचक हों कि यह ज्ञान-प्राप्ति का एक ऐसा तरीका है, जो अनुभव द्वारा ज्ञान-ग्रहण की सामान्य विधि से भिन्न हैं और जिसमें चेतना का सीधा हाथ हो। जब व्यष्टि चेतना में यह प्रतिभा अचानक विकसित होती है, तब वह पदार्थ और प्राणी संबंधी उस यथार्थ ज्ञान की गहराई तक पहुँचने में समर्थ होती हैं, जो साधारणतः प्रच्छन्न होता है।

एक अन्य घटना सन् 1161 की है। इसका वर्णन करते हुए नोना काँक्सहेड अपने ग्रंथ ‘दि रिलिवैन्स ऑफ ब्लिस’ में लिखनी हैं कि डेरेक गिब्सन नामक एक व्यक्ति मोटरसाइकिल से अपने काम पर जा रहा था, तभी उसे लगा कि इंजन की ध्वनि अकस्मात् एकदम कम हो गई हैं। अभी वह इसके प्रति सतर्क हुआ ही था कि मालूम पड़ा, सब कुछ बदल चुका है। उसे पहले की ही तरह सब साफ-साफ दिखाई पड़ रहा था, किन्तु अब वह वस्तुओं के भीतर भी झाँक सकता था। उसने पेड़ों पर दृष्टिपात किया, तो वल्कल के नीचे और तने के अन्दर की संरचनाएं भी स्पष्ट होने लगी। घास वृहदाकार दिखलाई पड़ रही थी, उसकी आँतरिक बनावट हस्तामलकवत् स्फुट थी। माइक्रोस्कोप से देखे जाने योग्य सूक्ष्म जीवन भी बड़े आकार के प्रतीत हो रहे थे। वरन् वह स्वयं को उनके अन्दर स्पष्ट रूप से अनुभव कर रहा था।

उसकी दुनिया परी-लोक बन चुकी थी, जिसमें हरे और भूरे रंगों को बाहुल्य था। रंगों को देखने की तुलना में उनकी अनुभूति वह अधिक अच्छी तरह कर पा रहा था। उसे इस बात का भी स्पष्ट आभास हुआ कि उसका मन जो कुछ देख रहा है, वह वास्तव में अवलोकन नहीं, अपितु वह स्वयं उसे जी रहा है। ‘मैं’ का लोप हो गया तथा उसके मन में शक्ति एवं ज्ञान की धाराएँ तरंगित होने लगी। ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे वह सब कुछ जानता हो। ऐसा कुछ भी नहीं, जिसका उत्तर न दे सके, कारण कि वह भी इन्हीं का एक हिस्सा है।

एक मिलती-जुलती घटना प्रख्यात प्रोटेस्टेंट रहस्यवादी जैकव बोएहम से संबंधित है। उनके जीवनचरित ‘जैकब बोएहम, स्टडीज इन हिज लाइफ एंड टीचिंग्स’ में वेशप हैन्स एल. मार्टिन्सन लिखते हैं कि एक दिन वे अपने कमरे में बैठे हुए थे, तभी उनकी दृष्टि जस्ते की एक चमकती प्लेट पर पड़ी। सूर्य के प्रकाश में वह इतना अधिक चमक रही थी कि वे एक अद्भुत आंतरिक आनन्द जैसी मनोदशा में पहुँच गए। अब उन्हें ऐसा लगने लगा कि वे वस्तुओं के गहन अंतराल में उतर सकते और झाँक सकते हैं। इस स्थिति में पहले उन्हें लगा कि यह सब भ्रम है, पर पीछे जब मस्तिष्क से इस भ्राँति को निकालने के लिए वे बाहर आए, तो सामने ही हरा-भरा मैदान था। उसमें भाँति-भाँति की वृक्ष-वनस्पतियाँ और घास उगी थी। उन्होंने देखा कि वे उनके हृदय में भी निहार और प्रवेश कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त प्रकृति की वास्तविक समस्वरता के भी उसे वहाँ दर्शन हुए।

सन् 1157 में रूसी दैनिक ‘इजवेस्विया’ में एक समाचार छपा। यूलिया नामक एक महिला एक दिन अपने स्नानागार में नहा रही थी, तभी उसे सब कुछ घूमता नजर आया। उसे लगा जैसे स्नानागार चक्कर काट रहा हो। वह दीवार पकड़कर तत्काल बैठ गई। अब उसे प्रतीत हुआ कि वह स्वयं भी तेजी से घूम रही है। इसके उपराँत उसकी दृष्टि ऐसी हो गई कि वहाँ बैठे-बैठे संपूर्ण दुनिया को निहार रही हो। उसे सुदूर अंतरिक्ष के खगोलीय पिंड बिल्कुल स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहे थे। काफी समय तक वह नभमंडल के भिन्न-भिन्न ग्रह-गोलकों को देखती रही।

इस दौरान इच्छा करने पर वह हर एक ग्रह के अन्दर की खनिज-संपदा का भी ज्ञानार्जन कर लेती। वह उन्हें वैसे ही देख पाती, जैसे सामने रखी चीज को आँख बिना किसी असुविधा के देख लेती है। इस समय तक उसे कुछ होश नहीं था। अब एक बार फिर उसे अपने स्थूल शरीर का भान हो आया। इस स्थिति में उसने बंद बाथरुम के बाहर देखना चाहा, तो उसकी अप्रतिहत दृष्टि उसे न सिर्फ वस्तुओं के बाह्य कलेवर के दर्शन कराती, अपितु प्रत्येक की आत्मा का भी स्पर्श करती। कुछ समय बाद उसकी वह दृष्टि न रही और व पुनः सामान्य हो गई।

व्यष्टि चेता मनुष्य देह में सरोवर की तरह है। जब कभी उसके शुद्ध स्वरूप का उत्साह फूट निकलता है, तो सृष्टि रहस्य उजागर होते देर नहीं लगती। तब यह आसान से समझ में आ जाता है कि यहाँ के कण-कण में ब्राह्मी चेतना का ही प्रकाश संव्याप्त है और वही सृष्टि, स्थिति एवं लय का कारण भी है।

आत्मश्लाघा और आत्मप्रवंचना में मनुष्य अहंकारी होकर गरम हवा भर गुब्बारे की तरह फूलता तो जाता है, पर उसमें दृढ़ता और स्थिरता तनिक भी नहीं होती।


रहस्यों की पिटारी हमारी पीनियल ग्रंथि

अब तक शरीर-विज्ञान संबंधी जितनी खोजें हुई हैं, उनमें अवयवों की प्रत्यक्ष हलचलों को ही मुख्य आधार माना जाता रहा है। जो भी सूक्ष्मदर्शी यंत्रों से दृष्टिगोचर हो, उसे ही विज्ञान प्रामाणिक मानता आया है। इतना सब होते हुए भी शरीरगत अनेकानेक संदर्भ ऐसे है, जिन्हें मनुष्य अभी तक नहीं जान पाया है। इन पर रहस्य के परदे अभी भी पड़े हैं। वे तब ही हटेंगे, जब स्थूल की हलचलों के पीछे झाँक रही सूक्ष्म सत्ता की लीला को समझने के प्रयास किए जाएंगे।

अंतःस्रावी ग्रंथियाँ, वंशानुक्रम प्रक्रिया, भ्रूणावधि में जीव का समन्वित विकास-क्रम, जीवकोष की अनंत संभावनाओं से भरी क्षमताएँ, अचेतन मन की रहस्यमय गतिविधियाँ, प्रभावशाली तेजोवलय जैसे संदर्भ ऐसे हैं, जिनका स्थूल शरीर की सामान्य हलचलों से कोई संबंध नहीं हैं। शरीरशास्त्रियों की विशद खोजबीन इसके कुछ ही रहस्य पता लगा पाई है। ऐसी अद्भुतताएँ जिनका तालमेल जैन-रासायनिक हलचलों से नहीं बैठता, उन्हें सूक्ष्मशरीर की शक्ति कह सकते हैं। यह क्षेत्र अत्यंत सुविस्तृत है, जिसकी थाह पाने का प्रयास अध्यात्मवेत्ता युगों-युगों से करते आए हैं एवं आधुनिक वैज्ञानिक अब इस दिशा में भी अग्रसर हुए है।

इस क्षेत्र का परिचय देने में अग्रणी है, शरीर की अंतःस्रावी ग्रंथियाँ। इस दिशा में विशेष अनुसंधान करने वाले डॉ. क्रुकशेंक ने इन स्रावों की आधार-ग्रंथियों को जादुई ग्रंथियां कहा है। वे कहते हैं कि व्यक्ति का स्तर एवं व्यक्तित्व इन स्रावों के क्रिया-कलापों का निरीक्षण कर ही जाना जा सकता है। शरीर की आकृति ही नहीं, उसकी प्रकृति का निर्धारण भी इन हार्मोन रसों द्वारा ही होता है।

वैसे तो अपने-अपने स्थान पर सभी ग्रंथियों का महत्व है, पर इन सभी की नियामक सत्ता जहाँ विराजमान् है, उन्हें मास्टर ग्लैण्ड्स कहा गया है। इनमें मुख्य हैं, पीनियल एवं पिट्यूटरी। इनकी संरचना भी अपने आप में अनोखी हैं एवं दोनों का ही परस्पर गहन संबंध है।

जिस ग्रंथि को शरीर विज्ञान पीनियल कहते हैं, उसे पौराणिक वर्णन के अनुसार तृतमीय नेत्र कहा गया है, जबकि तंत्र और योगशास्त्र उसे आज्ञाचक्र की संगति देते आए हैं। कुछ समय पहले तक वस्तुतः वैज्ञानिकों की यह मान्यता थी कि यह ग्रंथि मनुष्य के लिए अनावश्यक हैं तथा यह मानवी सभ्यता के विकास के प्रारंभिक चरणों का बचा हुआ अवशेष है, परंतु अध्यात्म ने इसको प्रारंभ से ही अत्यंत महत्वपूर्ण अंग माना हैं अध्यात्म चेतना का विज्ञान है। इसीलिए अध्यात्मवेत्ताओं की दृष्टि स्थूल पर नहीं, अपितु उसके अंतराल में छिपी सूक्ष्म सत्ता पर जाती है। पीनियल की शरीर-विज्ञान क्षेत्र में बढ़ती ख्याति एक इसी तथ्य से जानी जा सकती है कि कई राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन पिछले दो दशकों में इसकी गुत्थियां सुलझाने हेतु ही आयोजित किए गए।

शारीरिक दृष्टि से पीनियल मानव-शरीर का सबसे छोटा घटक है। यह एक-चौथाई इंच लंबा एवं सौ मिलीग्राम भारी होता है। इतना छोटा अंग शायद ही कभी इतनी उत्तेजना का कारण बना हो। गरदन और सिर के मिलन बिंदु पर मेरुदंड के ठीक ऊपर स्थित यह ग्रंथ भूमध्य भाग में मस्तिष्क की दीवार से जुड़ी है।

ऐसा नहीं कि पीनियल पर वाद-विवाद पहले न चला हो। ग्रीक वैज्ञानिक हीरोबिस जो ईसा से चार शताब्दी पूर्व शरीर-विज्ञान की अपनी व्याख्याओं के कारण काफी प्रसिद्ध हुए थे, पीनियल संबंधी अपने विचारों से विवादास्पद भी रहे। वे इस ग्रंथि को विचार-प्रवाह का नियामक मानते थे। उनके अनुसार यह ग्रंथि शारीरिक एवं मानसिक क्षेत्र के मध्यस्थ के रूप में कार्य करती है। प्रारंभिक लैटिन संरचना शास्त्रियों ने भी इसे स्वामी ग्रंथि की संज्ञा दी थी। सोलहवीं शताब्दी के फ्राँसीसी दार्शनिक एवं स्नायु विज्ञानी रैने डेस्कार्टिस ने इसे आत्मा का निवास स्थान बताया था। सन् 1100 में दो वैज्ञानिकों एच. डब्ल्यू ग्राफ तथा ई. बाल्डविन स्पेन्सर ने पीनियल पर गहन शोध की। उनके शोध-निष्कर्षों ने यह प्रमाणित किया कि यह ग्रंथि वातावरण के प्रकाश से सीधे और चर्म चक्षु के स्नायु मार्ग द्वारा दोनों ही तरह से प्रतिक्रिया करती है। यह निष्कर्ष अध्यात्मवेत्ताओं की इस घोषणा से साम्य रखता है। कि पीनियल ग्लैंड ही तृतीय चक्षु है। हाल के वर्षों में मेलाटोनिन तथा सेरोटोनिन नामक दो हार्मोन पीनियल ग्रंथि से पृथक किए गए हैं। इन दोनों रसस्रावों के गुणों एवं कार्यों के संबंध में किया गया अनुसंधान स्थूल शरीर की रहस्यमय परतों के संबंध में कई नए तथ्य उजागर करता है।

येल स्कूल ऑफ मेडिसिन में कार्यरत मूर्द्धन्य वैज्ञानिक डेनिस लिचेन ने सन् 1160 में पीनियल से मेलाटोनिन नामक हार्मोन पृथक किया। यह पदार्थ मेढ़क तथा मछलियों में वातावरणीय प्रकाश परिवर्तन की प्रतिक्रिया स्वरूप त्वचा में रंग-परिवर्तन हेतु जिम्मेदार है और मनुष्य में यही भावनात्मक बदलाव का तथा क्रोध एवं भय के आवेगों का नियंत्रणकर्त्ता समझा जाता है। वयः संधि के प्रारंभ में तथा मनुष्य के यौन विकास में इसकी विशिष्ट भूमिका हैं। जैसे-जैसे बच्चे वयः संधि काल में प्रवेश करते हैं, उनकी पीनियल ग्रंथि का आकार और कार्य-क्षमता घटती जाती है। ऐसा माना जाता है कि उक्त ग्रंथि यौन विकास के प्रारंभ को अपने नियंत्रण में रखती है और जब उसका नियमन हट जाता है, तो यही कार्य पिट्यूटरी अपने जिम्मे ले लेती हैं। कामेंद्रिय को पिट्यूटरी ग्लैंड के माध्यम से नियंत्रित करने में इस तरह का सक्रिय योगदान पीनियल की महत्वपूर्ण भूमिका प्रतिपादित करता है। आज्ञाचक्र का जागरण क्या है? इसे यदि सरल शब्दों में समझा जाए, तो यह विवेक का अनावरण कहलाएगा। इस विवेक का सहारा लेकर जब मनुष्य अपनी समस्त क्षमताओं को रचनात्मकता की ओर मोड़ लेता है, तो अचेतन की सुप्त संपदा के हीरे-मोती उसे प्राप्त हो जाते हैं। यही प्रसुप्त का जागरण है। इसे अंतः का परिमार्जन साधना का आधारभूत अंग यहीं है। शिवजी और दमयंती द्वारा क्रमशः कामदेव और बहेलिये को तीसरे नेत्र द्वारा जलाकर भस्म करने का जो पौराणिक आख्यान मिलता है, वह कोई आलंकारिक उल्लेख मात्र नहीं है, वरन् उसमें इसी ग्रंथि की शक्ति और सामर्थ्य को दर्शाया गया है।

सर्वसामान्य में इस अवयव की सक्रियता उतनी ही होती है, जितने से शरीरगत क्रियाप्रणाली सुचारु रूप से चलती रह सके। यह साधारण स्थिति और इसका भौतिक स्वरूप हुआ। इस दशा में इसका क्रिया-कलाप शरीर-तंत्र को नियमित-नियंत्रित भर करने तक सीमित होता है, किन्तु जब इसे उत्तेजित कर जाग्रत् किया जाता है, तब यह अपनी सूक्ष्म शक्ति के साथ प्रकट होता और साधक के व्यक्तित्व एवं दृष्टिकोण में ऐसा आमूलचूल परिवर्तन लाता है, जिसे किसी भी प्रकार कायाकल्प स्तर से कम का नहीं कहा जा सकता। दूरदर्शी विवेकशीलता इसका प्रथम लक्षण है। जिस व्यक्ति में यह दिखलाई पड़े, उसके बारे में असंदिग्ध रूप से कहा जा सकता है कि उसमें पीनियल की सूक्ष्म शक्ति जाग्रत् हो चुकी है। जब यह शक्ति संपूर्ण रूप से उद्बुद्ध होती है, तो आदमी में अनेक प्रकार की आध्यात्मिक विभूतियों का प्रादुर्भाव होता और वह साधारण से असाधारण बन जाता है।

भौतिक स्तर पर इसे प्रभावित करने का कोई उपाय नहीं है, पर आध्यात्मिक स्तर पर इसको उद्दीप्त करने के कितने ही उपाय-उपचार बताए गए है, जिनमें अगोचरी मुद्रा, शाम्भवी मुद्रा, खेचरी मुद्रा, त्राटक, ध्यान-धारणा आदि प्रमुख है।

हार्मोन्स में हमारे शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास की अनंत संभावनाएँ भरी पड़ी हैं। योगाभ्यास द्वार, मनोमय कोश का जागरण और तृतीय नेत्र उन्मीलन का महत् उद्देश्य व्यक्तित्व का परिमार्जन और चिंतन का परिष्कार हैं। शारीरिक बल-वृद्धि तथा मानसिक स्वास्थ्य के रूप में शेष अनुदान स्वतः मिलते चले जाते हैं। हमारा शरीर स्रष्टा की अनुपम देन है। यहाँ जीवकोष से लेकर जीन्स तक तथा न्यूरान्स से लेकर हार्मोन्स तक सभी अनंत क्षमताओं से सम्पन्न हैं। केवल इनकी संभावनाओं को पहचानना एवं उनका सदुपयोग करना मनुष्य को आना चाहिए।


Quotation

जिस व्यक्ति में दूरदर्शी विवेकशीलता दिखलाई पड़े, उसके बारे में असंदिग्ध रूप से यह कहा जा सकता है कि उसमें पीनियल की सूक्ष्म शक्ति जाग्रत हो चुकी है। जब यह शक्ति संपूर्ण रूप से उद्बुद्ध होती है, तो वह साधारण से असाधारण बन जाता है।

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जो जिम्मेदारियों से बचेगा, वह पिछड़ी स्थिति में ही पड़ा रहेगा।


पूर्वाग्रहों से मुक्त हो, आत्महीनता से उबरें

विभिन्न प्रकार की अवधारणाओं में इतनी तो गुंजाइश होनी ही चाहिए कि समय और परिस्थिति के अनुरूप उनमें सुधार-संशोधन किया जा सके। यदि ऐसा नहीं हुआ और वह पूर्वाग्रह ग्रस्त बनी रही, तो समझ लेना चाहिए कि विकास का मार्ग अवरुद्ध हो गया।

मान्यताएँ सामाजिक भी हो सकती हैं और वैज्ञानिक भी, पर प्रगतिशीलता की माँग यह है कि उनमें लचीलापन हो। ऐसा नहीं कि एक धारणा के स्थापित हो जाने के बाद उसे शाश्वत और सनातन मान लिया जाए। यहाँ स्थिर और पूर्ण सत्य एक ही है, वह है, ईश्वर। शेष सब परिवर्तनशील और अर्द्ध सत्य स्तर के है, इसलिए उनके बारे में कोठ्र स्थायी मत कायम नहीं किया जा सकता।

वर्षों पूर्व चेचक को देवी-देवताओं का प्रकोप माना जाता था और उसका उपचार भी उसी प्रकार मान-मनौतियों द्वारा किया जाता था। संयोगवश कुछ इससे ठीक हो जाते, किंतु अनेकों को असफलता हाथ लगती और कष्ट भुगतना पड़ता। बाद में जब उस संदर्भ में वैज्ञानिक शोधें हुई, तब ज्ञान हुआ कि वह एक प्रकार के रोगाणु के कारण होता है। एक बार जब निमित्त विदित हो जाए, तो फिर निवारण मुश्किल नहीं रह जाता। पीछे उसके टीके विकसित किए गए, जिसके कारण आज समाज उससे लगभग मुक्त हो चुका है।

ऐसे ही अकाल और अनावृष्टि को पहले वरुण देवता से जोड़ा जाता था। समझा जाता था कि मनुष्य को उनकी ओर से दिया गया यह एक प्रकार का दंड है। बाद में जब वर्षा और वृक्षों के बीच संबंध ज्ञान हुआ, तब यह नासमझी दूर हुई कि इसमें वरुण देव की अकृपा नहीं, मनुष्यों की अदूरदर्शिता ही प्रमुख है। देवताओं के अनुग्रह के लिए भी माध्यम की आवश्यकता पड़ती है। बिना इसके वे भी निरुपाय बने रहते हैं। मरने के बाद चेतना देह से मुक्त हो जाती है, पर जीवित रहते वह जितना और जैसा कुछ कर लेती थी, इस स्थिति में कहाँ कर पाती है? करना तो अब भी चाहती, बातचीत से लेकर सगे-संबंधियों की सहयोग सहायता तक के लिए मचलती है, पर शरीर के अभाव में उसकी वह आकाँक्षा ज्यों-की-त्यों रह जाती है। इसके विपरीत जब वह शरीर में निवास करती है, तो अनेकों की सेवा-सहायता से लेकर अनुग्रह-अनुदान बरसाती रहती है। इसमें विशेषता काया की नहीं, चेतना की है। उसी की प्रेरणा से वह कठपुतली की भाँति कार्य करती रहती है।

वरुण देव और वर्षा के संबंध में जो आख्यान है, उस बारे में भी उपर्युक्त बात ही चरितार्थ होती है। वह कृपा कर भी दें, पर उस कृपा को धारण करने वाले वृक्ष तो हों। आखिर रेगिस्तानों में बरसात क्यों नहीं होती? क्योंकि वहाँ पेड़-पौधे नहीं होते। आकाश में उड़ने वाले बादल धरती तक उतरें तो कैसे उतरें? उन्हें बुलाने-आकर्षित करने वाला तो कोई हो। आज यदि वर्षा घटती जा रही है। इसे अब लोग आसानी से समझने लगे हैं।

इस प्रकार की कितनी ही मान्यताएँ समाज में अब भी बद्धमूल है। विज्ञान और वैज्ञानिकों के संबंध में भी ऐसी अवधारणाओं की कमी नहीं। हमारे वैज्ञानिक किस स्तर के है आर उनमें कितनी प्रतिभा है, यह कोई छुपा तथ्य नहीं है। समय-समय पर इसके प्रमाण और उदाहरण समाने आते ही रहते हैं। किन्तु दुर्भाग्य यह है कि हमने अब तक एक पर विश्वास नहीं किया और सदा उनकी क्षमता को कम कर आँकते रहे। यही कारण है कि अधिकाँश प्रौद्योगिकी के लिए हमें पश्चिमी देशों के आगे हाथ फैलाना पड़ता है। यह तो वैसा ही हुआ, जैसे कोई सरोवर के समीप रहकर भी पानी के लिए दर-दर भटके। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है? हम पहले भी ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी थे और अब भी हमारी योग्यता में कमी नहीं आई है। यह तो हमारे योजनाकार है, जो अपने ही विज्ञानियों को पश्चिमी विज्ञानवेत्ताओं के समा बौना समझते है- प्रतिभा और मेधा दोनों क्षेत्रों में, जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। पिछले दिनों ‘टाइम’ पत्रिका में बुद्धिलब्धि संबंधी एक सर्वेक्षण छपा था, जिसमें भारतीयों की आई.क्यू. सर्वाधिक दर्शाई गई थी। इसके बावजूद क्या कारण है कि विज्ञान के क्षेत्र में हमारी प्रगति अपेक्षित नहीं हो पाई है और हम प्रौद्योगिकी जैसे महत्वपूर्ण मामलों में अब भी आत्मनिर्भर नहीं बन पाए है? इसका सबसे प्रमुख कारण शायद अपनी आत्महीनता ही है। धन की कमी, साधन-सुविधा का अभाव, प्रोत्साहन की कमी जैसे दूसरे तत्व भी न्यूनाधिक रूप में इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं, पर एक बार अपनी प्रतिभाओं पर यदि भरोसा हो जाए तो यह बाधाएँ हमारी प्रगति को अधिक समय तक अवरुद्ध नहीं कर सकेगी।

समय साक्षी है, जब-जब हमारे मार्ग में रोड़े अटकाए गए, तब-तब हम उसे सफलतापूर्वक पार कर आगे बढ़ते गए। कुछ वर्ष पूर्व की बात है। हमें मौसम संबंधी जानकारी के लिए सुपर कम्प्यूटर की आवश्यकता पड़ी। अमेरिका ने उसे देने के लिए इतनी कड़ी शर्तें रखीं कि उसका मिलना मुश्किल हो गया। अंततः साढ़े चार वर्ष के अथक प्रयास से भारतीय विज्ञानवेत्ताओं ने उससे भी श्रेष्ठ स्तर का सुपर कंप्यूटर ‘परम 10000’ तैयार कर लिया और कनाडा आदि कई देशों को बेच भी दिया।

इसी तरह उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए भारत को शक्तिशाली क्रायोजेनिक इंजन की जरूरत थी, लेकिन विकसित राष्ट्रों ने उस पर भी अड़ंगे लगाए। रूस से इस संबंध में सौदा होने के बावजूद उसकी टेक्नालॉजी नहीं मिल पाई। हारकर यह योजना निजी हाथों में लेकर भारतीय वैज्ञानिकों ने सन् 1114 में इसे विकसित कर लिया।

हमारा अंतरिक्ष कार्यक्रम पूरी तरह स्वदेशी प्रौद्योगिकी पर आधारित है। इसमें हम दिन-दिन आगे ही बढ़ते जा रहे हैं। अब चाँद की धरती पर यान भेजने की योजना बन रही है। शायद एक-दो वर्ष में यह भी पूरी हो जाए।

प्रतिरक्षा के क्षेत्र में मिसाइलों का विकास देश के लिए गर्व का विषय है। नाग, त्रिशूल, पृथ्वी, अग्नि, आकाश जैसी मिसाइलें अचूक निशाने के साथ लक्ष्य पर वार करने की अद्भुत क्षमता रखती हैं। आगे ‘सूर्य’ नामक एक महत्वाकाँक्षी प्रक्षेपास्त्र पर काम करने की योजना बनाई जा रही है। यह आयुध अपने लक्ष्य पर प्रहार कर पुनः अपने ठिकाने पर लौटने की क्षमता से सम्पन्न होगा। यदि यह सफल हो गया, तो एक बार फिर महाभारत कालीन विद्या को प्रत्यक्ष होते देख सकेंगे। इसी क्रम में ‘मृत्युकिरण’ नामक एक नए अस्त्र का विकास किया जा रहा है। इसका प्रायोगिक परीक्षण हो चुका हैं। बताया जाता है कि यह अत्याधुनिक घातक हमलावर विमानों के लिए भी प्रलयंकर साबित होगा और क्षणमात्र में ही धराशायी कर भूल चटा देगा।

कारगिल युद्ध लोग अभी भूले नहीं होंगे। फ्राँसीसी मिराज विमान में सामयिक हेर-फेर करके जब उसे बम ढोने लायक बनाया गया और हजारों फुट ऊँची हिमाच्छादित चोटियों पर स्थिति दुश्मनों पर बमबारी की गई, तो युद्ध के इतिहास में यह एक प्रतिमान बन गया। इससे पूर्व इतनी ऊँचाई पर सफल हवाई आक्रमण विश्व में कहीं नहीं हुआ था।

यह है हमारा वैज्ञानिक कौशल और क्षमता। जब हमारे वैज्ञानिक इतने निपुण और मेधावान् है, तो फिर हम उस आत्महीनता से उबर क्यों नहीं पा रहें कि हमारी प्रौद्योगिकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की बराबरी नहीं कर सकती? आखिर यह पूर्वाग्रह कब तक बना रहेगा और हम कब तक दूसरों के आगे हाथ पसारते रहेंगे? यह समीक्षा का वक्त है और यह तलाशने का समय भी कि उक्त अवधारणा क्योंकर और कैसे पनपी? इसे देखना चाहिए और इस संभावना की खोज करनी चाहिए कि इसमें किसी बाहर शक्ति का कोई कुचक्र तो नहीं था भीतर की ही भ्रष्टता अपनी क्षमता का घुन की तरह खाए जा रही है? इसका यदि जल्द निर्णय न हुआ, तो अपना राष्ट्र दशाब्दियों पीछे चला जाएगा। यह न हमारे लिए हितकर होगा, न विश्व के लिए, कारण कि भारत एक शाँतिप्रिय देश है और दुर्बल का शाँति प्रलाप कोई नहीं सुनता। इसलिए उसे हर प्रकार से सबल-सुरक्षित होना ही पड़ेगा। कहा भी गया है-’शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्र चर्चा प्रवर्तते’ अर्थात् राष्ट्र जब शस्त्रों से सुरक्षित होता है, तभी वहाँ शास्त्रीय चर्चा और विकास संभव है।

किसी मान्यता की अनुपयुक्तता समझ न आई हो, तब तक तो क्षम्य है, किन्तु जानबूझकर ऐसी अवधारणाओं से जकड़े रहना समझदारी नहीं। हमें जितनी जल्दी हो सके इन पूर्वाग्रहों से पिंड छुड़ा लेना चाहिए।


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अध्यात्म में ‘शार्टकट’ नहीं

अध्यात्म में शार्टकट खोजने की जल्दी किसी को भी नहीं करनी चाहिए। सिर पर हाथ रखकर कुँडलिनी जगाने वाले, आंखें बंद करके भगवान् का दर्शन कराने वाले, मंत्र-तंत्र के बदले ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त कराने वाले, रिश्वत, खुशामद से देवताओं का बरगलाने, फुसलाने की तिकड़म में जितनी जल्दी समाप्त हो सकें, उतना ही उत्तम है। इनमें जालसाजी के अतिरिक्त वास्तविकता का नामोनिशान भी नहीं है।

(वाङ्मय-28, पृ. 1.11)


सर्वप्रथम अपने आप को स्वीकार करें

राजधानी के एक प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित पब्लिक स्कूल में किसी नटखट छात्र ने लगातार तीन बार शरारत की। शरारतें इतनी गंभीर थी कि तीसरी बार चेतावनी देकर नहीं छोड़ा जा सकता था। प्रिंसिपल ने उसे स्कूल से निकाल दिया। छात्र आठवीं कक्षा में पढ़ता था। इस स्तर तक पहुँचने के बाद नए स्कूल में प्रवेश मिलना आसान नहीं था। उस पब्लिक स्कूल जैसे प्रतिष्ठित विद्यालय से निकाले जाने का कारण हर नए स्कूल में पूछा जाता और कारण बताया जाता तो किसी भी हालत में प्रवेश नहीं मिलता।

छात्र के पिता ने अपने शरारती पुत्र को नियति और अपनी मजबूरी समझकर चुप्पी साध ली। स्कूल से निकाले जाने के बाद विद्यार्थी को अपनी गलती का एहसास हुआ। वह पश्चाताप से भर उठा और अपना निष्कासन रद्द कराने के लिए खुद ही यहाँ-वहाँ भटकने लगा। प्रबंध समिति के विभिन्न सदस्यों के द्वार खटखटाए, अध्यापकों से मिला, स्वयं प्रिंसिपल के पास भी गया, लेकिन कहीं से उम्मीद पूरी होती नहीं दिखाई दी। कहीं से पता चला कि प्रिंसिपल का एक पत्रकार मित्र है और वह पत्रकार मित्र समझाए तो निष्कासन रद्द हो सकता था। पत्रकार का नाम था अनंत कुमार। उसने दात्र की व्यथा और पश्चात्ताप की सच्चाई को अनुभव किया। अपने मित्र प्रिंसिपल से बातों ही बातों में निकाले गए छात्र की चर्चा छेड़ी। उस छात्र का नाम आते ही प्रिंसिपल ने तपाक से कहा, माफ करना मित्र, लेकिन तुम उस बदमाश लड़के को वापस लेने के लिए मत कहना।

अनंत कुमार ने कहा, नहीं कहूँगा। लेकिन जरा अपने पीछे तो देखो। किसकी मूर्ति लगी हुई है, जिसकी मूर्ति तुमने लगा रखी है, उस (ईसा) ने अपने शरीर में कीलें गाड़ने वालों को भी माफ कर दिया था। प्रिंसिपल ने अपनी कुरसी के पीछे लगी ईसा की मूर्ति को निहारा। अनंत के कहे हुए शब्दों ने हृदय को छू लिया। कुछ क्षण चुप रहने के बाद प्रिंसिपल स्वतः बोले, क्या सचमुच वह लड़का सुधरने को तैयार है। कुछ आश्वासन और पड़ताल के बाद छात्र को तैयार है। कुछ आश्वासन और पड़ताल के बाद छात्र को वापस प्रवेश मिला गया। आगे का काम उन पत्रकार ने संभाला। प्रेम, आत्मीयता ओर उदारता ने छात्र में आत्मविश्वास के साथ जिम्मेदारी की भावना भी भर दी। आठवीं कक्षा में वह अव्वल आया। उसके बाद सफलता के रिकॉर्ड कायम करता गया। अगले दो वर्षों में वह अपने स्कूल के सबसे होनहार छात्रों में था।

नए मनुष्य के विकास की दिशा में काम कर रहें मिशनरियों और मनोविज्ञानियों का मानना है कि बचपन में हो ध्यान दिया जाए, तो पंचानवे प्रतिशत बालक प्रतिभाशाली सिद्ध होते हैं। परिस्थितियों का दबाव उन्हें कुँठित नहीं करता, बल्कि अभिभावकों की उपेक्षा ही उनके विकास में बाधक बनती है। यह ठीक हैं कि कोई भी माता-पिता अपने बच्चों को पिछड़ा अयोग्य, दब्बू और असफल देखना नहीं चाहते। अपनी स्थिति और समझ के अनुसार बच्चे के विकास के लिए सभी प्रयत्न करते हैं। नासमझी या निजी कुँठाओं के चलते चूक उन प्रयत्नों में ही हो जाती है।

प्रयत्नों की चूक भी एक बार क्षम्य है। मुख्य गलती यह होती है कि माता-पिता अपने व्यवहार से बच्चों के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचा देते हैं। कई बार उनका व्यवहार इतना सनक भरा होता है कि बच्चा अपने आपको स्वीकार करने से भी झिझकने लगता है। मुँबई में एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार का बच्चा मनोहर सातवीं कक्षा में फैल हो गया। पिता इससे बहुत नाराज हुए। इतना नाराज कि उन्होंने बेटे को अपनी नजरों से दूर ही रहने के लिए कहा। कह दिया कि मुझे तुम्हें अपना पुत्र कहते हुए शर्म आती हैं। जून के महीने में पिता को कोई मित्र कुछ दिन सपरिवार उनके घर आया। वे लोग तीन-चार दिन रुककर मुँबई घूमना चाहते थे। पिता ने मनोहर को उसके मामा के यहाँ भेज दिया। भेजते हुए भी जता दिया कि मैं तुम्हारा परिचय अपने बेटे के रूप में नहीं दे सकूँगा, क्योंकि तुम सातवीं कक्षा भी पास नहीं कर सके हो। इस तरह के तिरस्कार ने बच्चे के मन में टूटन और विखंडन की भावन भर दी। वह अपनी उम्र के आवारा लड़कों के साथ घूमने लगा। दस-बारह साल के भटके हुए बच्चों में जिस तरह की कुटेव पड़ जाती है, वैसी बुरी आदतें उसमें भी आने लगी। माँ इस बात से बहुत परेशान रहने लगी।

संयोग से उसी क्षेत्र में संपर्क अभियान पर निकले स्वाध्यायी डॉ. राघव घर आए। माँ ने डॉ. राघव को अपने बेटे की परेशानी के बारे में बताया। पूरा वृत्ताँत जानने के बाद उन्होंने मनोहर के पिता से कहा कि आप अपने बचपन को याद कीजिए, जिन दिनों आप पाँचवीं कक्षा में पढ़ते थे और स्कूल से भाग आया करते थे, तो पिता ने तब आपको किस तरह स्वीकार किया था। तरह-तरह से समझाने पर बात पिता के गले उतरी। उन्होंने बेटे को स्वीकार किया। डॉ. राघव को कहा कि सिर्फ छह महीने तक बच्चे की गलतियों को अनदेखा करो। जब भी वह गलती करे उसे समझाओ। सुबह उठाते ही मनोहर से हौसला बढ़ाने वाली दो-चार बातें कहो। इसके बाद दिन में एक घंटे के लिए मेरे पास छोड़ देना।

डॉ. राघव बाल-विकास की एक छोटी-सी संस्था चलाते थे। उसमें बातचीत से बच्चों का मन टटोला जाता और अभ्यास कराया जाता कि वे अपने आपको स्वीकार करें। मनोहर के लिए भी इसी तरह के प्रयास किए गए। इन प्रयत्नों या सावधानियों का अच्छा असर हुआ। मनोहर सुधर गया। अब वह अपने इलाके में बिजली के सामान का स्टोर चलाता है। मनोहर के पिता एक निजी संस्था में क्लर्क थे। पिता सालभर में जितनी कमाई करते थे, उतनी आय वह हफ्ते भर में कर लेता है। डॉ. राघव हाल ही में उस परिवार से मिलकर आए हैं। पिता ने उन्हें बहुत धन्यवाद दिया और यह उलाहना भी सुना कि अपने बेटे से अब भी शर्म आती है या उसकी सफलता पर गर्व अनुभव होता है। निश्चित ही मनोहर ने चमत्कृत कर देने वाली ऊँचाइयाँ नहीं छुई हों, लेकिन वह अपने पिता से बहुत आगे गया है, उसकी सफलताओं पर परिवार को गर्व हैं।

वयस्क व्यक्ति जैसा भी हो, उसे पूरा खिला हुआ फूल मानें तो बच्चों को कली की तरह माना जा सकता है। यह नहीं हो सकता कि कली को नकारा जाए और उससे स्वस्थ विकसित पुष्प बनने की आशा भी करें। जो व्यक्ति दब्बू, पहल करने में अक्सर चूक जाने वाले और कुछ देर प्रयत्न करने के बाद ही थक जाने वाली दुर्बलता के शिकार होते हैं, उनका बचपन निश्चित रूप से अस्वीकार, उपेक्षा और लाँछन से बिंधा हुआ होता है। बिंधे हुए व्यक्तित्व में जीवन ऊर्जा टिक नहीं पाती और व्यक्ति निरंतर असफल होता चला जाता है।

बच्चों के विकास की दिशा में काम कर रही संस्था ‘अंकुर’ के निदेशक संजय पुरी का अनुभव है कि लाड़-प्यार का अर्थ बच्चों में सम्मान और स्वीकार का भाव भरना नहीं है। बहुत बार माता-पिता अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कर पाने की स्थिति में भी अनावश्यक लाड़-प्यार करते हैं। जिम्मेदारी का अर्थ बच्चों के व्यक्तित्व विकास पर ध्यान देना है। पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाने की ग्लानि से उबरने के लिए माता-पिता बच्चों की अनुचित माँग भी पूरी करने लगते हैं। अनाप-शनाप माँगें मानते जाने पर एक स्थिति ऐसी आती हैं कि किसी-न-किसी बिंदु पर मना करना ही पड़ता है। बच्चा जब मना करने का कारण पूछता है, तो कोई संतोषजनक उत्तर देते नहीं बनता। बार-बार कारण पूछने पर बच्चे को फटकारते हुए जान छुड़ानी पड़ती है। उस फटकार से अब तक बनाया हुआ ‘ताश का महल’ ढह जाता है और व्यक्तित्व में हट, जिद, दुराग्रह जैसी विकृतियाँ आ जाती है। यह विकृति गहरे नकार का ही विद्रूप है।

आत्मविश्वास बहुत आगे की स्थिति है। किसी भी क्षेत्र में महत्वपूर्ण सफलता अर्जित करने के लिए यह आधारभूत गुण है। इस गुण से पहले आत्मसम्मान और आत्मस्वीकार की भावना आनी चाहिए। अदम्य ऊर्जा से भरे व्यक्तित्व में आत्मविश्वास का भाव दुस्साहस की तरह भी उद्भूत हो सकता है। प्रतिकूलताओं और बाधाओं को निरन्तर चीरते हुए निकल जाने और शिखर पर पहुँच जाने की क्षमता बिरले व्यक्तियों में ही होती है। वह क्षमता विशिष्ट स्तर की है। निन्यानवे प्रतिशत लोग सामान्य स्तर के ही होते हैं। उनमें आत्मविश्वास की भावना ठीक से जग सके, तो वे भी विशेष सफलताएँ अर्जित कर सकते हैं।

डॉ. संजय पुरी ने ढाई सौ से ज्यादा अभिभावकों को विमर्श दिया है। ये अभिभावक अपने बच्चों की किसी-न किसी समस्या, दोष या अवगुण के लिए चिंतित थे। उन्हें लगता था कि बच्चे में यह दोष रहा तो आगे चलकर उसे जगह-जगह धक्के खाने पड़ेंगे। उसे किसी का सहयोग नहीं मिल सकेगा। डॉ. पुरी ने इन अभिभावकों से बच्चों के बारे में नहीं, उनके अपने व्यवहार के बारे में ज्यादा पूछताछ की। पचासी प्रतिशत मामलों में यह निष्कर्ष सामने आया कि अभिभावक की भावना के शिकार थे। उसके अभाव में वे आत्मसम्मान के स्थान पर दंभ और आत्मविश्वास की जगह उद्दंड हठ या दुराग्रह से ग्रस्त हो गए थे। वही जहर बच्चों में फैल रहा था। पहले अभिभावकों को अपने सुधार की सलाह दी गई। सुधार की दिशा में लगे माता-पिताओं को उसी अनुपात में शुभ परिणाम भी मिले।


विधाता का अनमोल अनुदान, वनौषधि विज्ञान

वनस्पतियों की संख्या अगणित है। आहार एवं औषधि प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होने वाली प्रायः सभी वनस्पतियां अपने आप में परिपूर्ण हैं। इनमें से प्रत्येक की संरचना अनेक यौगिकों, क्षारों, रसायनों एवं खनिजों के सम्मिश्रण से हुई है। इसलिए उनमें से प्रत्येक को परिपूर्ण कह सकते हैं। जिस तरह से मनुष्य अपने आप में परिपूर्ण है। विधाता ने रक्त-माँस, अस्थि, बस, त्वचा, पाचक द्रव्य आदि सभी आवश्यक तत्वों को उसके शरीर में इस प्रकार संजोया है कि उसे अपनी गतिविधियाँ संचालित करने में सुविधा रहे। ठीक यही बात वनस्पतियों के संबंध में भी है। पत्तियों, फलों कंदों के रूप में उनका उपयोग होता है। इनका गहन विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि इनमें से प्रत्येक में अनेकानेक रासायनिक घटकों का समावेश है। वे जिस शरीर में प्रवेश करती है, उसकी सभी आवश्यकताओं को भली भाँति पूरा कर देती हैं।

इन वनस्पतियों के औषधीय गुणों का विज्ञान ही आयुर्वेद है। इस आयुर्वेद का इतिहास खोजे तो ज्ञान होता है कि इसका उद्भव ईसा से भी सैकड़ों साल पहले हुआ। यह विज्ञान भारत से तिब्बत होता हुआ चीन पहुँचा। एक तिब्बती पाँडुलिपि, जो ल्हासा संग्रहालय में पाई गई है, में इस सत्य का उल्लेख मिलता है। इसमें उद्धृत दस हजार से भी अधिक औषधियों में स्थान-स्थान पर चरक एवं सुश्रुत के संदर्भ है। उस ग्रंथ का नाम है, रिगयुदब्झी। इस शब्द में दो शब्द सम्मिलित रूप से ध्वनित होते हैं। एव को सन् 820 ई. का माना जाता है।

अपराह्न चिरपुरातन आयुर्वेद विज्ञान चीन में अभी भी जीवित है। इसके लिए अपना जाने के परिणाम वहाँ के जन जीवन में स्पष्टतः नजर आते हैं। वहाँ अधिकाँश रोगों में शल्य क्रिया आवश्यक नहीं समझी जाती। केवल वनौषधियों या जड़ी-बूटियों के उपचार से ही आँत्र-अवरोध जैसी आपातकालीन व्याधि को मिटाने में चीनी चिकित्सक सफल हुए है। इन जड़ी-बूटियों के प्रत्यक्ष सत्परिणाम सारे विज्ञान जगत् के समक्ष है। आज मूर्द्धन्य चिकित्साविज्ञानी भी विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि चिकित्सा के उन्हीं आधारों को जीवित किया जाना एवं जीवंत बनाए रखना चाहिए, जो मानव की जीवनी शक्ति को बढ़ाने में सहायक हों, वैज्ञानिकों का मत है, इसके लिए मानव को प्रकृति का शरण में जाना होगा।

वनौषधियाँ प्रकृति का अपना स्वरूप है। इनमें रोग-निवारण की सामर्थ्य है और शरीर की कमियों को दूर करने वाले पौष्टिक तत्व भी है। समूचे प्रकृति जगत् में प्रायः 4 लाख से भी अधिक पौधे हैं। इनमें से एक भी ऐसा नहीं है कि चिकित्सा की दृष्टि से किसी-न-किसी प्रकार से उपयोगी न हो। इस संबंध में एक प्राचीन आख्यान बहु-प्रचलित है।

एक बार ब्रह्माजी ने महर्षि जीवक को आदेश दिया कि पृथ्वी पर जो भी पत्ता-पौधा, वृक्ष-वनस्पति व्यर्थ दिखाई दें, उन्हें यहाँ ले आओ। लगातार 12 वर्षों तक पृथ्वी पर घूमने के बाद महर्षि लौटे और ब्रह्माजी के समक्ष नतमस्तक होकर बोले, प्रभो! मैं इन 12 वर्षा में पूरी पृथ्वी पर भटका हूँ प्रत्येक पौधे के गुण दोष को परखा है। पर पृथ्वी पर एक भी ऐसे वनस्पति नहीं मिली जो किसी न किसी व्याधि के उन्मूलन में सहायक न हो।

इन औषधीय गुणों वाली वनस्पतियों में कुछ तो ऐसी हैं, जो हमारे घर के आस−पास और हम सबके जीवन में बहुत घुली-मिली हैं। इन्हीं में से एक नाम है, तुलसी। इसे वनस्पति शास्त्र में औसिमम सैक्टम नाम से जाना जाता है। लोक-भाषा में इसे राम तुलसी, श्याम तुलसी, तुलसी वृंदा, तुलसी महारानी, श्यामा, सुखल्ली आदि कितने ही नामों से पुकारा जाता है। रूप-गुण के अनुसार तुलसी की कई किस्में होती है। अधिकतर पूजन में राम तुलसी प्रयोग में लाई जाती है। सामान्यतः यह तुलसी का पौधा छोटा ही रहता है, पर कभी-कभी चार फुट की ऊँचाई तक बढ़ जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी आयु प्रायः एक साल रहती है, पर मैदानी इलाकों में यह चार से पाँच सालों तक भी जीवित रहती है।

वनौषधि विशेषज्ञों का मत है कि तेज बुखार एवं बड़बड़ाहट की हालत में इसका काढ़ा पिलाने से काफी लाभ मिलता है और मन को भी शाँति मिलती है। इन्फ्लुएंजा, मलेरिया, टाइफ़ाइड आदि में भी तुलसी का काढ़ा बहुत फायदा करता है। तुलसी से रक्तचाप के रोगियों को भी फायदा होता है। इसलिए इसे मृतजन्मा कहते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार तुलसी के दर्शन, स्पर्श, रापेण, सिंचन एवं पूजन से सब अनिष्टों का निवारण होता है। घर में सुख-शाँति की अभिवृद्धि होती है। विज्ञानवेत्ता भी इस सत्य को स्वीकारते हैं कि जिस घर में तुलसी के पौधे बहुतायत में हो, वहाँ रोगाणुओं का जमघट नहीं रहता और प्राणशक्ति की बढ़ोत्तरी होती है।

तुलसी की ही तरह नीम भी हम सबके जीवन में बहुत पास-पास नजर आता है। वनस्पतिशास्त्र में इसे अजाडोराक्टा इंडिका कहते हैं। संस्कृत में इसे निम्ब, तिक्तक आदि कहते हैं। उड़िया में नीम, बंगला में निमगाछ, कन्नड़ में बेब, गुजराती में लींबड़ा, तमिल में बेब, तेलुगु में वेपुयमयम कहते हैं। नीम भारत के सभी प्राँतों में पाया जाने वाला भारतवासियों का बहुत ही सुपरिचित वृक्ष है।

औषधीय गुणों की दृष्टि से नीम प्रतीशक, हल्का, ग्राही, चरपरा, वात, ज्वर, पित्त, कफ, कुष्ठ रोगों का नाश करता है। इसके बीज में 40 प्रतिशत तेल होता है। नीम का तेल कडुआ, कृमिनाशक होता है। इस तेल का उपयोग चर्म रोग, यकृत रोग, गलित कुष्ठ पर किया जाता है। नीम की छाल व पत्ते कडुए लेकिन बलकारक, ज्वर-निवारक एवं कमजोरी दूर करने वाले होते हैं। इसकी छाल को पानी में मिलाकर पीने से पेट साफ होता है और आँखों की जलन में भी राहत मिलती है।

नीम से पत्ते नेत्रों के लिए हितकारी, कुष्ठ, कृमि में लाभदायक एवं विषनाशक है। इन्हें चर्म रोगनाशक भी माना गया है। पानी में नीम के पत्ते उबालकर स्नान करने से फोड़े-फंसी, खाज-खुजली आदि विभिन्न चर्मरोगों में काफी फायदा पहुँचता है। नीम के पत्तों का रस कुछ दिन पीने से रक्त-शोधन होता है। पानी में उबाले गए नीम के पत्तों से पाँव धोने से थकान दूर होती है। नीम की हरी पत्तियाँ चबाकर कुल्ला करने से मुँह की दुर्गंध दूर होती है। सोते समय नीम का तेल शरीर पर मलने से कीड़े-मच्छर आदि नहीं काटते। नीम की सुख पत्तियाँ-टहनियाँ जलाकर धुआँ करने से मच्छर एवं अन्य कीट-पतंगे भाग जाते हैं।

वनौषधियों के इस क्रम में आँवला हर कहीं सहजता से मिलने वाली औषधि है। इसका वनस्पति शास्त्रीय नाम ‘एम्बिका आँफिसिनैलिस’ है। फ्रांसिस, चरैया, बनारसी, कृष्णा, कंचन आदि इसकी प्रमुख किस्में है। पौष्टिकता की दृष्टि से भरपूर आँवला में विटामिन-सी काफी मात्रा में विद्यमान रहती है। शरीरविज्ञानियों का मत है शरीर में विटामिन-सी के अभाव से स्कर्वी जैसे घातक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इसकी कमी से मसूड़ों में सूजन आती है तथा उनसे रक्त भी निकलने लगता है। इसके परिणामस्वरूप मसूड़े ढीले पड़ जाते हैं, दाँतों में दर्द होने लगता है तथा पायरिया होने का खतरा बढ़ जाता है। विटामिन-सी ही इन सबकी एकमात्र कारगर औषधि है। विटामिन-सी रक्त में कोलेस्टरोल की मात्रा को कम करती है। यह रक्त की कोशिकाओं को पुष्ट एवं लचीला बनाती हैं।

ताजे आँवले में इस विटामिन-सी की प्रचुरता रहती है। वैसे भी ताजा आँवला स्वयं में एक गुणकारक औषधि है। यह मूत्रप्रणाली को ठीक रखने में सहायक होता है। सुखाए गए आँवले पेचिश एवं डायरिया में बहुत उपयोगी होते हैं। आँवले के फल में सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका विटामिन-सी उबालने और सुखाने पर भी नष्ट नहीं होता। च्यवनप्राश एवं त्रिफला जैसी महत्वपूर्ण औषधियों में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

कच्चे आँवले को दूध एवं नाश्ते के साथ खाना बहुत लाभदायक होता है। ताजे आँवले को दाँत से काटकर खाने से दाँत पुष्ट होते हैं। आँवले के पानी से बाल धोने से बाल लंबे, घने एवं काले होते हैं। कब्ज को दूर भगाने के लिए आँवला का वरदान की तरह है। यह शरीर के बिगड़े हुए आमाशय को ठीक करता है। आँवले के चूर्ण को नियमानुसार भोजन के बाद सेवन करने से दिमाग तेज होता है। नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। इससे श्वास के रोगों में आराम मिलता है और रक्त शुद्ध होता है। आँवला शरीर में रक्त-संचार को प्रभावी ढंग से ठीक करता है। इससे जिगर स्वस्थ रहता है एवं पाचनक्रिया ठीक रहती है।

लौंग जिसे हम अपने सामान्य जीवनक्रम में बहुत अच्छी तरह जानते हैं, एक गुणकारी औषधि भी है। रासायनिक विश्लेषण करने पर प्रति 100 ग्राम लौंग में 45.30 मि.ग्रा. कार्बोहाइड्रेट, 5.5 मि.ग्रा प्रोटीन, 0.74 मि.ग्रा. कैल्शियम, 100 मि.ग्रा. फास्फोरस, 48.8 मि.ग्रा. आयोडीन एवं विटामिन डी. मिलता है। गुणवत्ता के आधार पर अच्छी लौंग उसे माना जाता है, जिससे ज्यादा तेल होता है।

आयुर्वेद शास्त्रों के अनुसार लौंग चटपटी, कड़ुई होने के साथ नेत्रों के लिए लाभकारी, उद्दीपक, पाचक, रुचिकारक, पित्त, कफ दोषों को हरने वाली होती है। यह श्वास, खाँसी, क्षय रोग, रक्तदोष, ज्वर, चमन आदि में भी लाभदायक पाई गई है। यह श्वेत रुध्रि कणिकाओं को बढ़ाने का विशेष गुण रखती है। इसी कारण इसमें घावों को भरने और उन्हें जल्दी ठीक करने की एक विलक्षण शक्ति है। भोजन के बाद लौंग चूसने से मुँह और साँस की दुर्गंध नष्ट होती है। दाँत और मसूड़े मजबूत होते हैं। इससे भोजन ठीक तरह से पचता है। गले की खराश, हिचकी और जी मिचलाने आदि में भी लौंग चूसने से लाभ होता है।

ये तो कुछ उदाहरण भर है, जो ऊपर दिए गए हैं। इनसे हमें यह पता चलता है कि हमारे अपने आसपास पाई जाने वाली वृक्ष-वनस्पतियों में कितनी रोग-निवारक शक्ति है। प्रकृति हमारी अपनी माँ की तरह है, उसने विविध वनस्पतियों के रूप में हमारे सभी तरह के कष्ट-पीड़ाओं के निदान-समाधान हमारे पास ही जुटा रखे हैं। देर है तो बस हमारे अपनाने की, इन्हें प्रयोग में लाने की। विविध वनस्पतियों से अपने रोगों का निदान मात्र लोक-परंपरा भर नहीं है। यह एक उन्नत वैज्ञानिक प्रक्रिया भी है। आधुनिक शोध-अनुसंधान से भी यही निष्कर्ष सामने आए हैं कि खतरनाक समझे जाने वाले रोगों का इलाज भी इन वनस्पतियों से सफलतापूर्वक किया जा सकता है। तभी तो वनौषधि चिकित्सा पाश्चात्य देशों में भी तेजी से लोकप्रिय हो रही है। फिर हम अपनी ही विभूति से अपरिचित क्यों? समझदारी इसी में है कि हम अपने आसपास पाई जाने वाली वनौषधियों के महत्व को समझें और उन्हें उपयोग में लाएँ। इनसे स्वयं भी लाभान्वित हों एवं दूसरों को भी लाभान्वित करें।


अंधकार दूर करता (kahani)

महाराजा सगर की दोनों रानियों ने तप किया और वरदान माँगने के अवसर पर एक ने हजार पुत्र माँगे और दूसरे ने एक। समुचित भावनात्मक पोषण के अभाव में हजारों पुत्र झगड़ालू, उपद्रवी, उद्धत और अनाचारी निकले। अंततः अपने दर्प एवं दुर्बुद्धि के कारण महर्षि कपिल के साथ अन्याय कर बैठे और मारे गए। दूसरी रानी का जो एकमात्र अकेला पुत्र था, उसने समुचित भावनात्मक पोषण, मार्गदर्शन प्राप्त कर महर्षि कपिल को भी प्रसन्न कर लिया तथा राज्य का समुचित संचालन भी किया एवं कीर्ति का भागीदार बना। नीतिशास्त्रों में इसलिए कहा गया है,

वरमेको गुण पुत्रों, न च मूर्खाः शतान्यपि। एकश्चन्द्रस्तों हन्ति, न तु तारा सहस्त्रशः॥

अर्थात् सैकड़ों मूर्ख बेटों की अपेक्षा एक ही गुणी पुत्र श्रेष्ठ हैं। जैसे अकेला चाँद अंधकार को दर करता है, हजारों तारे नहीं। उसी प्रकार एक गुणी पुत्र समाज में अंधकार दूर करता व प्रकाश फैलाता है।


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आत्मनिरीक्षण करें

हम आत्मनिरीक्षण की ओर बढ़े। अपने स्वयं के भूल, वर्तमान और भविष्य से भी ज्ञान उपलब्ध करना चाहिए। देखना अधोगामियों को ही नहीं चाहिए, वरन् वायु और अग्नि की तरह ऊपर की दिशा में ही बढ़ने वालों पर भी ध्यान देना चाहिए। नजर उठाकर उस ओर भी निहारना चाहिए, जिस दिशाधारा को महामानवों ने अपनाया और उत्कृष्ट आदर्शवादिता पर चलते हुए पीछे वालों के लिए ऐसा मार्ग छोड़ा है, जिसका अनुकरण करने पर अपने को और साथी-सहचरों को भी धन्य बनाया जा सके। समझदारी यदि साथ दे सके, तो पहुँचा इस निष्कर्ष पर जाना चाहिए कि पतन से विमुख होकर उत्थान का मार्ग अपना ही श्रेयस्कर है।

(वाङ्मय 28, पृष्ठ 7, 41)


हिंद की शान : बेगम हजरत महल

मार्च महीने के आखिरी सप्ताह के उस रात लखनऊ का शाही महल अंधेरों में डूब वीरान नजर आ रहा था। सन् 1857 ई. की जनवरी से ही लखनऊ ही जमीन क्राँतिकारी वीरों और निर्दोष रियाया के खून से लाल हो रही थी। वीरता से अंग्रेजों के साथ लड़ते हुए, बचे-खुचे अपने क्राँतिकारी साथियों के साथ नवाब अहमदशाह महल छोड़कर किसी अज्ञान स्थान पर जा छिपे थे। इस समय महल असुरक्षित था।

अंग्रेजों की कुटिल चालों से बेगम हजरत महल अपरिचित नहीं थी। किसी भी शहर को तबाह करें वहाँ की भोली-भाली जनता पर बेपनाह अत्याचार करना फिरंगियों की जग-जाहिर नीति थी। अपनी इस दरिंदगी में वे महिलाओं को भी नहीं बख्शते थे। रोज न जाने कितनी किशोरियाँ और सुहागिनें उनकी पाशविक हवस का शिकार हो रही थी। उस दिन तो फिरंगियों ने लखनऊ शहर पर अपनी क्रूर पाशविकता का जो कहर बरपाया, उसे इतिहास के पन्नों में पढ़कर आज भी शिराओं में आग दौड़ जाती है।

बेगम हजरत महल को अंग्रेजों का खौफ न था। अगर उन्हें किसी तरह का खौफ होता तो वे शहादत गंज की लड़ाई में डटकर अंग्रेजों का मुकाबला नहीं करतीं। लेकिन अब जबकि थोड़े-से अंगरक्षक सैनिकों और नौकर-चाकरों के अलावा महल की रक्षा करने के लिए कोई नहीं था, उन्हें महल की स्त्रियों को लेकर चिंता हो गई थी।

वह बहादुर नारी बिलकुल अकेले पड़ गई थी। चिंता से आकुल-आतुर वह महल के अहाते में टहल रही थी। जरा-सी आहट होते ही वह चौंक उठती। इसके बावजूद वह जनानखाने की ड्योढ़ी पर पहरे के लिए स्वयं सन्नद्ध थी। रात गहराती जा रही थी। घने अंधेरे भयावह सन्नाटे की गूँज थी। बेगम साहिबा का मन हर पल आने वाली आपदा की सिहरन से भरता चला जा रहा था।

तभी अचानक दूर कहीं से आने वाली आहट से वह चौंक पड़ी। आने वाली आवाज को सुनकर यही लग रहा था कि कई घुड़सवार महल की ओर बढ़े चले आ रहे हैं। उनका हाथ तलवार की मूठ पर और कस गया। उन्होंने तेज नजर से अपने पास खड़ी अन्य स्त्रियों की ओर देखा। सभी के हाथ में एक-एक खुखरी थी। जिससे किसी भी अवाँछनीय स्थिति में अपनी लज्जा बचाने के लिए आत्मघात किया जा सकता था। लेकिन अगले ही पल उन्होंने मनोबल को संभाला और अपने मन को आने वाली आहट पर केंद्रित किया।

महल के बाहर एक साथ कई घोड़ों की टापें थम गई और फिर सन्नाटा सर्वव्यापी हो गया। हजरत महल के मन में फिर से बेचैनी का तूफान उमड़ा, परन्तु तुरन्त उन्होंने अगले क्षणों में घटने वाली घटना के लिए स्वयं को तैयार किया। कुछ ही क्षणों की खामोशी के बाद पहरेदार ने आकर जनाना ड्योढ़ी के निकट गुहार की, बेगम हुजूर, क्राँतिकारियों के सरदार दलपत सिंह अपने साथियों के साथ आए है। वे आपसे मिलना चाहते हैं।

दलपत सिंह का व्यक्तित्व अपने आप में क्राँति की प्रज्वलित मशाल थी। वे नवाब साहब के दायें हाथ की तरह थे। अंग्रेजों के दिलों के खौफजदा करने के लिए उनका नाम ही पर्याप्त था। उनके आने से बेगम साहिबा को भारी खुश मिली, किन्तु ऐसे क्षणों में हर खुशी संदिग्ध होती है। बेगम ने पहरेदार पर बतौर सावधानी एक सवाल उछाल दिया, दलपत सिंह का निशान।

यह रहा मलिका हुजूर। पहरेदार तस्दीक के लिए पहले से ही उनका निशाल ले आया था। उसने तुरन्त उन्हें वह निशान दिखा दिया। निशान देखकर बेगम साहिबा को भारी राहत मिली। उनके चेहरे पर हलकी-सी चमक आई और वह बोली, दलपत सिंह और उनके साथियों को आदर के साथ बिठाओ। हम अभी उनसे मुलाकात करेंगे।

पहरेदार आदाब बजाकर चला गया। बेगम ने अपने को थोड़ा संयत किया और फिर अपनी सहयोगिनियों को कुछ जरूरी बातें समझाई। इसके बाद वह बैठकखाने की ओर चल पड़ी। जहाँ पर ऊँचे-पूरे और भव्य व्यक्तित्व का स्वामी दलपत सिंह उनका इंतजार कर रहा था। बेगम को अंदर आते देखकर उसने उठकर आदाब बजाया।

इतनी गई रात ................ यहाँ किसलिए दलपत सिंह

मलिका हुजूर मुझे पता चला कि आप खतरे में है,

इसलिए चला आया। नवाब साहब का कुछ पता चला? नहीं! इस एक लफ्ज को बयान करने के साथ ही उनके चेहरे पर मायूसी छा गई। लेकिन एक पल में ही उन्होंने अपने को संभाल लिया ओर फिर संयत स्वर में बोली, कौन जाने नवाब साहब तवनकी राह में कहीं काम आ गए हो। उनके इन शब्दों में जो लरज, कशिश और दर्द था, उससे दलपत सिंह की आँखें भी भर आई।

लेकिन वह अपने को संयत करते हुए बोला, गुस्ताखी माफ हो मलिका हुजूर! फिरंगियों ने निर्दोष जनता पर जो कहर ढाया, उसका बदला लेने के लिए हम सभी के दिल तड़प रहे है।

हमें भी अपनी रियासत की तकलीफ सुनकर भारी रंज है। मगर करें तो क्या करें दलपत सिंह? आज तो हम इतने बेबस हैं कि कुछ करना तो दूर, हम ठीक से कुछ सोच भी नहीं पा रहे। बेगम साहिबा के चेहरे पर दर्द की जर्द छा गई। वह गहरा निःश्वास लेते हुए बोली, लेकिन तुम यहाँ क्यों? अंग्रेजों की फौज किसी भी वक्त महल में आ समाती है और उस भारी-भरकम फौज के सामने तुम सब कैसे टिक सकोगे। तुम सब लौट जाओ, मुल्क को तुम्हारी बहुत जरूरत है। हमारे लिए अपने को खतरे में न डालो।

दलपत सिंह की आँखें सुर्ख हो गई। बदला! बदला! बदला मेरी ख्वाहिश है बेगम हुजूर। मैं आपसे एक इल्ताज करने आया हूँ।

वह क्या?

आप अपने कैदी फिरंगियों को मुझे सौंप दीजिए। मैं उनमें से एक-एक का हाथ-पैर-सिर ओर बोटी-बोटी काटकर अंग्रेजों की छावनी में भेजूँगा। बात पूरी करते करते दलपत सिंह का चेहरा भयंकर हो उठा।

नहीं, हरगिज नहीं! बेगम के लहजे में कठोरता आ गई। हम कैदियों के साथ ऐसा सलूक न तो खुद कर सकते हैं और न किसी को इसकी इजाजत दे सकते हैं। कैदियों पर जुल्म ढाने का रिवाज हमारे हिन्दुस्तान में नहीं है। हम किसी भी तरह अपने उसूलों से फिर नहीं सकते।

मलिका हुजूर, उसूल इनसानों पर लागू होते हैं, जानवरों पर नहीं। ये फिरंगी तो वहशी जानवर हैं।

जिद न करो दलपत सिंह और अब यहाँ से लौट जाओ।

आप अवध की अपनी भोली और मासूम जनता की चीत्कारों को भूल रही है, मलिका हुजूर!

अवध की रियासत की चीखें हमारी भी रगों को झिंझोड़ रही है दलपत सिंह, लेकिन भूलों मत हम उसी नेक-निठ जनता की हिमायती है, जो हर जुल्म हँसते-हँसते सह सकती है, मगर अपने हकीकी एतकाद को अपने खून की रंगत की तरह अपने से जुदा नहीं कर सकती और फिर कैदियों में औरतें भी तो शामिल हैं। उनके साथ बदसलूकी या अल्लाह तौबा! नहीं दलपत सिंह नहीं, सब किसी भी कीमत पर न होगा। तुम चले जाओ यहाँ से।

आप जज्बातों में बह रही है, मलिका हुजूर। क्या आपको पता नहीं है कि फिरंगियों ने हमारी माँ-बहनों को अपनी हविश का शिकार बनाया है। उन दरिंदों ने तो मासूम बच्चों तक को नहीं छोड़ा है।

दलपत सिंह हम सारी कैफियत से वाकिफ है। हम तुम्हारी बहादुरी और मुल्क के लिए तुम्हारे जज्बातों की कदर करते हैं। लेकिन यह कभी भी मत भूलो कि हम हिंद की उस शान के लिए अपनी जान भी दे सकते हैं, जिसकी वजह से इनसानियत का रुतबा कायम है।

पर क्या आपको इल्म नहीं कि अंग्रेजों ने क्या-क्या जुल्म ढाए हैं। हम उनसे हर कीमत पर बदला लेना चाहते हैं। दलपत सिंह अभी भी अपनी जिद पर अड़ा था।

नहीं, किसी भी कीमत पर नहीं। बेगम हजरत महल ने बुलंद आवाज में चेतावनी दी। हमारे जीते-जी फिरंगी कैदियों एवं उनकी औरतों पर जुल्म कभी नहीं होगा। हमारे आका ओ-बुजुर्गों ने औरत को हमेशा ही सीता और पाक बीबी फातिमा का दरजा दिया है और यह हिंद की आन है कि हर हिंदुस्तानी को औरत पर जुल्म करने का ख्याल भी कुफ्र है। इससे पहले तुम्हें हमारी लाश से गुजर कर जाना होगा। बेगम हजरत महल दलपत सिंह के सुगठित और भारी-भरकम शरीर के आगे महबूत चट्टान की तरह खड़ी हो गई। हम तुम्हें किसी भी हालत में हिंद की रवायतों की तौहीन नहीं करने देंगे। उनके लिए मर जाने में भी हम फख्र महसूस करेंगे।

बेगम हजरत महल का यह दुर्गा रूप देखकर दलपत सिंह के पसीने आ गए। अंततः उसे अपनी जिद छोड़नी पड़ी। बुझे मन से वह और उसके साथी महल की सीमा से बाहर निकल गए।

इसके थोड़ी ही देर के बाद अंग्रेजों की विशाल फौज ने महल पर हमला बोल दिया। बेगम और उसकी बहादुर सहेलियों ने डटकर अंग्रेजों का मुकाबला किया। लेकिन इतनी बड़ी फौज के सामने भला ये मुट्ठी भर महिलाएँ कब तक टिकती। अंत में वही हुआ, जिसकी संभावना थी। बेगम हजरत महल को गिरफ्तार कर लिया गया।

उन्हें कैद करने वाले अंग्रेज फौजी अफसर ने बड़े तीखे लहजे में पूछा, क्या अब आपका भी यह ख्याल नहीं है कि यह जंग अब खत्म हो गई है।

जवाब में बेगम हजरत महल के होठों पर गर्व भरी मुसकान आ ठहरी। वह कहने लगी, यह जंग किन्हीं दो या तीन कौमों के बीच छिड़ी जंग नहीं है। इसका मकसद तख्त हासिल करना या तख्ता पलटना भी नहीं है। यह जंग है जुल्मों के खिलाफ, उसूलों के लिए। मेरे गुमराह दोस्त याद रखना कि यह हिंद की पाक सरजमीं है। यहाँ जब भी कोई जंग छिड़ी है, हमेशा जुल्म करने वाले जालिम की ही शिकस्त हुई है। यह मेरा पुख्ता यकीन है। बेकसूरों, मजलूमों का खून बहाने वाला यहाँ कभी भी अपने गंदे और गलीज ख्वाबों के महल नहीं खड़ा कर सकेगा। आने वाला वक्त भी मेरे इस यकीन की ताईद करेगा।

बेगम हजरत महल के इस यकीन के सामने सचमुच उस फौजी अफसर का सिर झुक गया। उसने मन-ही-मन हिंद की इस शान को नमस्कार किया।


Quotation

जो कुछ कर गुजरना चाहते हैं

जिन्हें पेट-प्रजनन की ही गरज है, जो लोभ, मोहर और अहंकार से ऊँचे उठ सकने की आवश्यक ही नहीं समझते, उनके संबंध में तो कही ही क्या जाए? किन्तु जिन्हें कोई महत्वपूर्ण लक्ष्य प्राप्त करना है, उनके लिए एक ही उपाय है कि प्रसुप्त शक्तियों को जाग्रत करके उन्हें उस स्तर का अभ्यास कराएं, जिसके बलबूते बड़े काम किए जाते हैं, बड़े लाभ अर्जित किए जाते हैं। दूसरों की सहायता पाने की बात को अधिक महत्व नहीं देना चाहिए। अपना पुरुषार्थ जगे, तो यह स्वाभाविक है कि खिले हुए फूल को देखकर उसपर तितलियाँ मंडराएँ और भौंरे यश-गीत गाने की झड़ी लगाएँ। (वाङ्मय-28, पृष्ठ 2.16)

राष्ट्र आत्मनिरीक्षण की ओर बढ़े

दीन-दुर्बल स्तर की जनता कभी समर्थ और स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकती। जो राष्ट्र की धाराएँ संभालते और चलाते हैं, वे यदि विकृत और दुर्बल मनोभूमि लिए हुए होंगे तो राष्ट्र किसी भी दिशा में प्रगति न कर सकेगा। हर ओर इज़राइल आदि देशों ने स्वल्पकाल में ही अपना कायाकल्प कर डाला और एक हम है, जो उलटे पीछे फिसलते चले जा रहे है। थोथे वादे करने वाले नेता अपनी आपाधापी में इतने गहने घुसे बैठे हैं कि उनके लिए लोकमंगल के लिए सचमुच कुछ बड़ा काम कर सकना संभव नहीं है। न सामाजिक कुरीतियों का अंत होता है, न अनैतिकता की बाढ़ रुकती है। इस सामाजिक एवं राष्ट्रीय दुर्बलता के लिए एक ही तथ्य उत्तरदायी है और वह है, जनमानस की चिंतनधारा। विकृतियाँ यही से उद्भव होती हैं। व्यक्तित्व इसी निकृष्टता के कारण स्वार्थी और संकीर्ण बनते हैं ओछे व्यक्तियों से भरा समाज विग्रहों, समस्याओं, दुर्बलताओं और अभावों को केंद्र ही बना रहेगा। आज की स्थिति में सबसे बड़ा शौर्य यह है कि हम पूरा मनोबल इकट्ठा करके प्रखर परिवर्तन प्रस्तुत करें, जिसमें विवेक की ही प्रतिष्ठापना हो और अविवेकपूर्ण दुर्भावनाओं एवं दुष्प्रवृत्तियों को पैरों तले कुचल कर रख दिया जाए।

(वाङ्मय-28, पृष्ठ 6.74)


सतयुगी वातावरण ऐसे बनता है।

सतयुगी विशेषताओं से युक्त परिस्थितियों को मनीषीगण ‘यूटोपिया’ भर मानते और उसके मूर्तिमान होने को संदेह की नजरों से देखते हैं पर जिस दिशा में महाकाल का संकल्प उभर चुका हो, वह भला अधूरा कैसे रह सकता है।

चिनगारी से अग्नि प्रकट होती और भयंकर अग्निकाँड रचती है। वैसे ही श्रेष्ठता की सीधी परिधि आज भले ही तुच्छ और उपेक्षणीय लगे, पर कल यदि उसका विस्तार संपूर्ण धरित्री पर हो जाए, तो उसे आश्चर्यजनक नहीं माना जाना चाहिए, कारण कि तिल भर का बीज ही विशाल वट वृक्ष को जन्म देता है। उसी प्रकार घरों से शुरू होने वाली उदात्तता जब एक विराट् परिवार का रूप ले सकती है, तो कोई कारण नहीं कि उस महानता से तद्नुरूप समाज, राष्ट्र और विश्व का अभ्युदय न हो सके। इसका उदाहरण हमें गुजरात के एक गाँव में देखने को मिलता है।

‘राजसमधियारा’ नामक इस गाँव में जाने से ऐसा प्रतीत होता है, जैसे हम किसी सतयुगी वातावरण में आ गए हों। जैसा कि नाम (समाधि) से प्रकट होता है, यहाँ के ग्रामीण समान और श्रेष्ठ बुद्धि वाले हैं। वहाँ घरों में कभी ताले नहीं लगते। चोरी तो एक दुर्लभ घटना के समान है। पिछले दो दशक के मात्र एक चोरी हुई है। कुटेवों से सब मुक्त है। यहाँ के निवासी न शराबी, जुआरी है, न किसी अन्य प्रकार के दुर्व्यसन के शिकार ही। ईमानदारी मानो चेतना के कण-कण में घुली हुई है। परिश्रमपूर्वक धन कमाना और पसीने की कमाई खाना यहाँ का आदर्श है। कामचोरी, हरामखोरी तो उन्हें स्पर्श तक नहीं कर पाई है। सेवा-सहायता को वे अपना धर्म मानते हैं। निराकार ईश्वर की आराधना में ग्रामीण अपना समय लगाते हैं या नहीं, यह तो नहीं मालूम, पर विराट् ब्रह्म की सेवा में किसी प्रकार की कमी नहीं रहने देता। पूछने पर कहते हैं यही उन्हें बचपन से सिखाया और बताया जाता है।

वैसे तो वे ग्रामीण है, समय की रफ्तार के साथ-साथ चलना उन्हें आता है। अपनी प्रगति और प्रगतिशीलता के प्रति वह कितने जागरुक है, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब देश की संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण हेतु बहस चल रही थी, उसे काफी पूर्व ही वहाँ की ग्राम पंचायत में महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिला हुआ था।

उनका पर्यावरण का सजग प्रहरी कहा जा सकता है। वे इस बात से अनभिज्ञ नहीं कि आज पर्यावरण की दुर्दशा क्यों और कैसे हुई है। उन्हें यह भी मालूम है कि पेड़ और पर्यावरण के बीच परस्पर क्या संबंध है और वृक्षों के कटने और घटने से दुनिया को उसका दुष्परिणाम किस रूप में भुगतना पड़ रहा है। इस कारण से वहाँ प्रत्येक परिवार को कम-से-कम पाँच पेड़ अपने घर के आस-पास लगाना अनिवार्य है।

स्वास्थ्य और सफाई के बीच किसी स्तर का संबंध है, यह उन्हें बताने की आवश्यकता नहीं। ग्रामवासी उस कहावत से भलीभाँति परिचित है, जिसमें कहा गया है कि ‘स्वच्छता स्वास्थ की जननी है।’ यह उनका आदर्श वाक्य ही नहीं, वरन् वह इसके हिसाब से आचरण भी करते हैं। गलियों, नालियों, घर, मुहल्लों, की सफाई में वे सदा मुस्तैद रहते हैं।

शिक्षा का महत्व उनके लिए कम नहीं। वहाँ हर बालक को विद्यालय जाना अनिवार्य है। वे मताधिकार के प्रयोग के प्रति भी सजग हैं। वहाँ यह नियम कड़ाई से लागू है कि मताधिकार प्राप्त हर वयस्क प्रत्येक चुनाव में वोट डाले, किसी कीमत पर भी उसकी उपेक्षा न करें।

पंचायत राज का वह गाँव सुँदर उदाहरण है। उसका अपना दंड विधान और न्यायप्रणाली है। किसी अपराध की स्थिति में पुलिस थाने जाने की जरूरत नहीं पड़ती। पंचायत उसका निपटारा स्वयं करती है।

पिछले दिनों जब पड़ोसी गाँव सूखे की भीषण चपेट में थे, तो वहाँ पानी का कोई अभाव नहीं था। ऐसा समुचित जल-प्रबन्ध और आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ते कदम से ही संभव हो सका।

वे इस संपूर्ण उपलब्धि का श्रेय राजकोट जिले के इस गाँव के सरपंच हरदेव सिंह जाडेजा को देते हैं। इससे एक बात स्पष्ट है कि मार्गदर्शक यदि सुलझे हुए विचारों वाला, न्यायप्रिय और उच्च आदर्शों की प्रतिमूर्ति हो, तो कही का भी कायाकल्प होते देर नहीं लगती।

सतयुगी वातावरण श्रेष्ठ चिंतन और उत्कृष्ट आचरण से बनता है। वह समय विशेष का मोहताज नहीं उसे हम कभी और कहाँ भी विनिर्मित कर सकते हैं, इससे दो मत नहीं।


सपनों की आनुवंशिकता

स्वप्न भी आनुवंशिक होते हैं क्या? इस संबंध में मनोविज्ञान सर्वथा मौन है, पर यंत्र-तंत्र प्रकाश में आने वाले प्रसंग इस बात के प्रमाण है कि ऐसा होता है।

यहाँ जिन सपनों की चर्चा की जा रही है, वे सामान्य स्तर के औसत स्वप्न नहीं है। उन्हें असाधारण कहना ही उचित होगा। साधारण स्वप्न तो वे है, जो हर मनुष्य को दीखते हैं, बल्कि यों कहना चाहिए कि वह मस्तिष्क की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जिसमें जाग्रत् स्थिति में आदमी द्वारा एकत्रित जानकारियों में से जो सोद्देश्य और सार्थक होती है, उन्हें रखकर शेष को चित्र-विचित्र दृश्यों के माध्यम से निकला बाहर कर दिया जाता है। ऐसे स्वप्न प्रायः आध-अधूरे, असंबद्ध एवं औंधे-सीधे दृश्यों से युक्त होते हैं, जिनका न तो कोई मतलब होता है, न प्रत्यक्ष जीवन से कोई संबंध ही।

पर कई लोग ऐसे भी होते हैं, जिनके सपने अक्सर सच साबित होते हैं। इस संबंध में स्वप्न-विद्या के आचार्यों का कथन है कि जब रात्रि के चतुर्थ प्रहर में बाह्य वातावरण ही हलचलें एकदम नीरव होती है, तो अनेक बार प्रकृति-प्रवाह की सूक्ष्म तरंगें मानवी मस्तिष्क की पकड़ में आ जाती हैं। उस समय मस्तिष्क भी अपेक्षाकृत अधिक शाँत और स्थिर होता है। इस स्थिति में कई अवसरों पर अदृश्य के गर्भ में पकने वाले घटनाक्रमों की झलक-झाँकी इतनी स्पष्ट और सुसंबद्ध रूप में होती है, मानो सब कुछ आँखों, के सामने घटित हो रहा हो। ऐसे स्वप्न इष्ट-मित्रों, निकट संबंधियों, स्वयं एवं सामाजिक, राष्ट्रीय अथवा प्राकृतिक आपदा से संबंधित हो सकते हैं। इन्हें देखने वालों में एक विचित्र बात यह पाई गई है कि कई प्रसंगों में यह विशेषता उनकी संतति में भी ज्यों-की-त्यों देखी जाती है अर्थात् उनके देखे स्वप्न भी उसी तरह सच साबित होते हैं, जैसे उनके अभिभावकों के । स्वप्नशास्त्रियों ने ऐसे सपनों को ‘वंशानुगत स्वप्न’ कहा है।

पिछले दिनों ऐसे कई प्रसंग प्रकाश में आए है। एक जोरहट, आसाम का है। वहाँ एक रसगोत्रा परिवार रहता है। उसके मुखिया महिपाल रसगोत्रा है। वे आसाम विद्युत बोर्ड में साधारण कर्मचारी हैं। उनके तीन संतानें हैं, दो लड़के, एक लड़की। तीनों की उम्र 18 वर्ष से ऊपर है। महिपाल ने जब से होश संभाला, उन्हें यह बराबर अनुभव होता रहा कि उनके सपने अक्सर सच होते हैं, पर इस ओर उन्होंने विशेष ध्यान नहीं दिया और इसे सामान्य एवं महत्वहीन समझकर विस्मृत कर दिया, किन्तु जब उनके दोनों लड़कों और लड़की ने भी यही बात कहीं, तो वे गंभीर हो गए। सोचने लगे कि आखिर यह कैसे संभव है कि अवचेतन मन की कोई विशेषता पैत्रागत हो जाए और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती जाए?

उन्हें याद आया कि बचपन में उनके पिता भी इसी प्रकार की बाते करते थे, पर तब वे किशोर थे और उनके लिए यह कोई असाधारण बात नहीं थी। प्राणिविज्ञान से स्नातक तक होने के नाते वह यह तो जानते थे कि शारीरिक-मानसिक विशिष्टताएँ माता-पिता से बच्चों में जाती है और फिर वहाँ से उनकी संतानों में, पर हर बालक में जनक-जननी का प्रत्येक गुण प्रकट ही हो, यह आवश्यक नहीं। अनेक बार वह अप्रकट रूप में मौजूद रहता और दूसरी पीढ़ी में जाकर ही अभिव्यक्त हो पाता है, परन्तु वहाँ तो स्थिति ही दूसरी थी। वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाए और इसे विधि की व्यवस्था समझकर शाँत हो गए।

दूसरी घटना ब्लोमशोलम, नावें के सी.जे. ड्रेकेनबर्ग से संबंधित है। वहाँ चार पीढ़ियों से इस तरह के सपनों का क्रम जारी है। इसकी शुरुआत वर्तमान पीढ़ी के परदादा वाले चरण से हुई। पाँचवीं पीढ़ी या उसके आगे के चरणों में वह वंशानुगत हो पाता है अथवा नहीं, यह अध्ययनकर्ता मनोवैज्ञानिकों के लिए जिज्ञासा का विषय है। वे इस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि उक्त परिवार के चौथी पीढ़ी के दो युवकों-फाइंस और फ्लेवियर की शादी कब होती है, ताकि यह जान सकें वह क्रम भंग हुआ या अविच्छिन्न रूप से अब भी जारी है।

उच्चस्तरीय स्वप्न अन्य गुणों की तरह ही यदि पैत्रागत हों, तो इससे एक ही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि ईश्वरीय विभूतियाँ भी वंशानुगत होती है। आज भले ही यह विवाद का विषय हो, पर कल निर्विवाद सत्य के रूप में उभरेगा, यह सुनिश्चित है।


असीम संभावनाओं की पिटारी हमारा मन मस्तिष्क

शरीर के सभी अंगों की अपनी महत्ता और विशिष्टता है। सभी अपने-अपने ढंग से महत्वपूर्ण और उपयोगी है, इतने पर भी वरिष्ठता की दृष्टि से मस्तिष्क की गरिमा सभी अवयवों में सर्वोपरि है। शायद इसीलिए ईश्वर ने उसे शरीर-हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर एवरेस्ट की तरह प्रतिष्ठित किया है। उसके निवास के लिए खोपड़ी के रूप में ऐसा दुर्ग खड़ा है, जिसमें चोट से बचने की ही नहीं, ऋतु-प्रभाव से लेकर अनेकानेक प्रदूषणों और विकिरणों से सुरक्षित रख सकने की पूरी-पूरी क्षमता है। इस दुर्ग की दीवारें बाहरी क्षेत्र के साथ ऐसे महत्वपूर्ण संपर्क साधे रहती है, जो मस्तिष्क के लिए ही नहीं, संपूर्ण शरीर के लिए भी अतीव उपयोगी है।

मनुष्य जब जन्मता है, तब मस्तिष्क मात्र 12 ओंस का होता है, किन्तु वयस्क होते-होते वह प्रायः तीन पौण्ड भारी हो जाता है। वजन की तुलना में उसकी कार्यक्षमता असंख्य गुनी बढ़ जाती है। माइक्रो फिल्मों के माध्यम से विशालकाय ग्रंथ छोटी-सी डिबिया में बंद करके रखे जा सकते हैं। एक स्वस्थ और समुन्नत मस्तिष्क में लगभग एक करोड़ ग्रंथों में लिखी जा सकने जितनी सामग्री संग्रह करके रखी जा सकती है। आवश्यकता पड़ने पर इस क्षमता में सहज ही दूनी अभिवृद्धि भी की जा सकती है। किसी कारणवश मस्तिष्क का कुछ हिस्सा नष्ट हो जाए, तो शेष से भी कामचलाऊ व्यवस्था बन जाती है। एक हाथ, एक पैर, एक आँख वाले अनेकों मनुष्य होते हैं। इसी प्रकार किसी कारणवश एक नष्ट हो जाने पर दूसरा गुरदा एवं फेफड़ा ही दानों का काम अकेले ही करता रहता है। मस्तिष्क दो नहीं है, फिर भी उसके कुछ भाग के कट-फट जाने, चोट लगने, निष्क्रिय हो जाने पर भी शेष हिस्से से जीवन की गाड़ी किसी प्रकार खिंचती रह सकती है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान घायल हुए सैनिकों के ऐसे अनेक प्रकरणों में पाया गया कि उनके ब्रेन का कुछ भाग गोलियों से छिद गया, इतने पर भी वे मरे नहीं। तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराकर उन्हें बचा लिया गया। इससे उनकी कुछ क्षमता प्रभावित अवश्य हुए, पर उनके बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि वे जीवन का भरपूर आनन्द नहीं उठा सके।

शरीर की स्थूलता, आकार और वजन के आधार पर उसके मजबूत और शक्तिशाली होने का अनुमान लगाना किसी हद तक सही हो सकता है, मस्तिष्क के भार या विस्तार को देखकर किसी प्राणी के बुद्धिमान या मूर्ख होने का अंदाज नहीं लगता। विकसित मनुष्य का मस्तिष्क लगभग डेढ़ किलो भारी होता है और हाथी का लगभग 5 किलो, फिर भी हाथी मनुष्य की तुलना में बुद्धिमान नहीं होता। बुद्धि का संबंध कॉर्टेक्स में फैली हुई तंत्रिका कोशिकाओं से है। उसमें भी एक और बात है कि उस क्षेत्र की कोशा कितनी अधिक अपनी सहेलियों के साथ जुड़ी हुई हैं और उनके बीच आदान-प्रदान का कैसा स्फूर्तिवान् सिलसिला चलता है। सहयोग का सिद्धाँत जहाँ प्रगति के हर क्षेत्र में काम करता है, वहाँ बुद्धिमत्ता का आधार भी वही है। यह मनुष्य की मस्तिष्कीय कोशिकाओं की संरचना और प्रखरता को देखते हुए सहज ही स्वीकार किया जा सकता है।

शरीर संचालन से लेकर मानसिक हलचलों तक और भावानुभूतियों से लेकर चित्र-विचित्र कल्पनाओं का ताना-बाना मस्तिष्क के छोटे से क्षेत्र में ही बुना जाता है। अनुभव उसी में एकत्र रहते हैं और योजनाएँ इसी में बैठे बुद्धिमान घटक बनाया करते हैं। शरीर की आकुँचन-प्रकुँचन, श्वास-प्रश्वास, ग्रहण-विसर्जन जैसी अनेकानेक सरल और जटिल क्रिया-प्रक्रियाएँ उसी क्षेत्र में संचालित होती है। दार्शनिक, वैज्ञानिक, व्यावसायिक, व्यापारिक, संगीत, कला, पराक्रम जैसी अगणित प्रवृत्तियों, के उद्भव, अभिवर्द्धन और समापन का केंद्र यही है। काया की संरचना और कार्यपद्धति कुछ भी क्यों न हो, उसके चप्पे-चप्पे का नियंत्रण और संचालन पूरी तरह मस्तिष्क के हाथ में है। कौन किस तरह जीवनयापन करता है और भविष्य में क्या बनने, क्या पाने जा रहा है, इसका सही अनुमान लग सकता है, यदि मनःक्षेत्र की गतिविधियों की समुचित जानकारी प्राप्त हो सके।

खोपड़ी के भीतर भरा हुआ यह थोड़ा-सा पदार्थ अपनी संग्रह क्षमता की दृष्टि से अद्भुत है। समय पर भंडार की वस्तुओं को तुरन्त निकाल लाने की उसकी कुशलता तो और भी अधिक आश्चर्यजनक है। इस दृष्टि से संसार का कोई श्रेष्ठतम पुस्तकालय या मनुष्यकृत कोई भी कम्प्यूटर उसकी तुलना नहीं कर सकता। यंत्रों की रचना ऐसी है कि वे जिस उद्देश्य के लिए बने है और निर्माताओं ने जितने शक्तिसम्पन्न बनाए है, उतना ही काम कर सकते हैं, पर मस्तिष्क के बारे में ऐसी बात नहीं है। वह अपने क्रिया-कौशल में ही नहीं, स्तर में भी निरंतर वृद्धि करता रह सकता है। बचपन से लेकर मरणपर्यंत वह अपना काम करते हुए भी अपनी योग्यता बढ़ाने के लिए वैसा ही प्रयत्नशील रहता है, जैसे कोई अध्यापक स्कूल का काम करने के साथ-साथ अपनी योग्यता वृद्धि के लिए नई-नई परीक्षाएँ भी पास करता चले। मस्तिष्कीय संरचना और क्रियाशक्ति के संबंध में पिछले दिनों बहुत कुछ जाना जा चुका है, किन्तु जो जानने के लिए शेष है, वह उपलब्ध ज्ञान की तुलना में कही अधिक है। सुविदित और व्यवहृत क्रियाशक्ति की दृष्टि से उसकी तुलना किसी भी मानवी कृति से नहीं की जा सकती, फिर भी उसके इतने कोष्ठक बंद पड़े हैं कि यदि उन सबको गतिशील बनाया जा सके, तो मनुष्य की शारीरिक और मानसिक क्षमता इतनी अधिक बढ़ सकती है वह आज की स्थिति से तुलना करने पर देवता या दैत्य जितना बलिष्ठ - समर्थ दिखाई पड़ने लगे।

प्रकृति स्वभावतः अनगढ़ है। पदार्थ में बुद्धि न रहने से वह अस्त-व्यस्त स्थिति में पड़ा रहता है। परमाणुओं और तरंग-प्रवाहों में सामर्थ्य भी है और गतिशीलता भी, किन्तु मस्तिष्क जैसे किसी केन्द्रीय संस्थान के अभाव में उसके लिए व्यवस्था बनाना, सौंदर्य निखारना और कुछ उपार्जन कर दिखाना संभव नहीं। इस तथ्य को वन्य क्षेत्रों, मरु प्रदेशों की भयावह स्थिति को देखकर भली प्रकार जाना जा सकता है। अन्य ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति भी ऐसी अनगढ़ है। बुद्धिमान प्राणी न रहने से वहाँ निस्तब्धता और नीरसता का ही वातावरण बना हुआ है। इसके विपरीत धरती के मनुष्यों ने अपने पराक्रम से उसको इस प्रकार संजो दिया है कि वह कामधेनु की तरह अपनी शोभा और संपदा से स्वयं कृतकृत्य हुई और दूसरे प्राणियों को भी सुख-सुविधा से सम्पन्न कर दिया। यह सब कैसे संभव हुआ? इसका एक ही उत्तर है, मानवी मस्तिष्क के बुद्धि-वैभव का चमत्कार।

मस्तिष्कीय क्षमता न तो कोई बाजीगरी है, न ही चित्र-विचित्र कौतुक-कुतूहल उत्पन्न करने वाली नटी, वह तो ईश्वरप्रदत्त एक दिव्य विभूति है, जिसे अनेक उपायों से बढ़ाया और समृद्ध बनाया जा सकता है। शारीरिक परिपोषण के लिए जिस प्रकार व्यायाम और मालिश की एवं रासायनिक परिपोषण के लिए सुपाच्य और पौष्टिक आहार की व्यवस्था की जाती है, वैसे ही मानसिक क्षमताओं को परिष्कृत करने के लिए ऐसे आहार का प्रावधान करना पड़ता है, जो सात्विक तो हो ही, साथ ही ऐसी सूक्ष्म शक्ति से सम्पन्न भी हो, जो बुद्धि चेतना में उपयोगी प्रखरता उत्पन्न कर सकने की सामर्थ्य से युक्त कहा जा सके। मनःसंस्थान में यों उसके अपने स्वसंचालित शक्ति उत्पादन केन्द्र है, पर बाहर से भी उस तंत्र को सहायता पहुँचाने के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। इनमें विभिन्न प्रकार की योगाभ्यासों के अतिरिक्त जप, तप, व्रत, संयम, ध्यान, उपासना आदि प्रमुख हैं। इनसे मानसिक शक्ति बढ़ती, एकाग्रता सधती और उन क्षमताओं के विकास में सहायता मिलती है, जो आमतौर पर असंयम और अनाचरण की भेंट चढ़ जाती है। इन पर अंकुश लगाकर इन्हें मनःक्षेत्र? को सुविकसित करने में नियोजित कर लिया जाए, तो चिंतन-चेता का असाधारण परिष्कार हो सकता है और हम सहज ही मनोबल सम्पन्न बन सकते हैं। कहना न होगा कि मनोबल की गरिमा शरीर-बल, शिक्षा-बल, धन-बल, कौशल-बल आदि से सभी की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है। उसे सहारे मनुष्य उन्नति के उस चरम शिखर पर पहुँच सकता है, जिसकी कल्पना कर सकना भी किसी के लिए कठिन है।

जब सिकंदर भारत पर आक्रमण हेतु निकला, तब उसके गुरु अरस्तू ने उसे आदेश दिया था कि वह भारत से लौटते समय दो उपहार अवश्य लाए, एक गीता, दूसरा एक दार्शनिक संत, जो वहाँ की थाती हैं सिकंदर जब वापस लौटने को था तो उसने अपने सेनापति को आदेश दिया, “भारत के किसी संत को ढूँढ़कर ससम्मान ले आओ।” सैनिक ‘दंडी स्वामी’ जिसका उल्लेख ग्रीक भाषा में ‘डैडीमींग” के रूप में हुआ है, से मिला। दंडी स्वामी से सिकंदर से दूत ने मिलकर कहा, “आप हमारे साथ चले, सिकंदर महान् आपको मालामाल कर देंगे। अपार वैभव आपके चरणों में होगा।” अपनी सहज मुस्कान में दंडी स्वामी ने उत्तर दिया, “हमारे रहने के लिए शस्य-श्यामला भारत की पावन भूमि, पहनने के लिए वल्कल वस्त्र, पीने के लिए गंगा की अमृत धारा तथा खाने के लिए एक पाव आटा पर्याप्त है। हमारे पास संसार की सबसे बड़ी संपत्ति आत्मधन है। इस धन की दरिद्र तुम्हारा सिकन्दर हमें क्या दे सकता है?” शक्ति ऐसी सम्पत्ति के जिसके दर्प से चूर सिकंदर ने सैनिक के वार्त्तालाप को सुना तो विस्मित रह गया। अहंकार चकनाचूर हो गया। आध्यात्मिक संपदा के धनी इस देश के समक्ष नतमस्तक होकर चला गया।


पुरुषार्थी ही विजयी होता है।

सेठ माणिक शाह के पास अकूत धन-संपत्ति थी। देश भर में उनकी हुँडियाँ चलती थी। उनके इस समूचे ऐश्वर्य का वारिस उनका इकलौता पुत्र सुभद्र था। सेठ जी सुभद्र को प्राणों से भी अधिक प्यार करते थे। उनकी चाहत थी कि हर समय उनका पुत्र उनकी आँखों के सामने रहे। सुभद्र गुणशील और धर्मपरायण तो था ही, पर साथ ही वह विवेकवान् एवं अटूट पुरुषार्थी भी था। उसमें नित नया और कुछ विशेष करने की उमंग थी। एक दिन उसने अपने पिता से समुद्र यात्रा करके विदेश में व्यापार करने की अनुमति माँगी। सेठ माणिक शाह पुत्र-वियोग की कल्पना मात्र से दुःखी हो गए। वह आर्द्र स्वर में सुभद्र को समझाने लगे, बेटा! तुझे कुछ करने की जरूरत ही क्या है? भला अपने घर में कौन-सी कमी है, जो तू समुद्री यात्रा का खतरा उठाना चाहता है।

सुभद्र बड़ा उत्साही और परिश्रमी था। उसने विनम्रतापूर्वक कहा, पिताजी! यदि मैं हाथ-पर-हाथ धरे बैठा रहूँ और आप स्नेहवश कुछ न भी कहें, तो भी दुनिया मुझे कपूत ही कहेगी। बिना कमाए खाने की आदत पड़ जाने से मैं आलसी और मंदबुद्धि तो बनूँगा ही, साथ ही मुझमें जो कुछ शरीरबल, मनोबल या बुद्धिबल है, उसका उपयोग न करने के कारण उन्हें जंग लग जाएगी। वे तीनों क्षीण हो जाएंगे और फिर भावनाएँ तो शरीर से परे हैं। आप से दूर रहने पर भी मेरा हृदय आपके स्नेह से भीगा रहेगा। सभी दृष्टिकोण से पुरुषार्थ ही श्रेष्ठ हैं। इसलिए आप कृपा करें मुझ समुद्र पार करके व्यापार करने की आज्ञा प्रदान कीजिए।

अपने पुत्र का साहस, कर्त्तव्यनिष्ठा देखकर माणिक शाह को भी प्रसन्नता हुई। वह कहने लगे, बेटा! मैं तुम्हारे उत्तर से संतुष्ट हूँ। यद्यपि पिता का हृदय, अपने पुत्र को दूर भेजना नहीं चाहता, परन्तु मैं तुम्हारे विकास, रुचि और उत्साह को रोकना नहीं चाहता। पिता की कीर्ति और संपत्ति में वृद्धि करना श्रेष्ठ पुत्र का कर्त्तव्य है। तुम इसी सद्भावना के साथ जा रहे हो। अतएव खुशी के साथ जाओ, मेरा भरपूर आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।

माणिक शाह ने अपने पुत्र के लिए जहाज तैयार करवाया। समुद्री यात्रा में जो भी वस्तुएँ और उपकरण आवश्यक होते हैं, वे सब-के-सब उन्होंने जहाज में रखवा दिए। उन्होंने सुभद्र को यह भी भली प्रकार समझा दिया कि समुद्री यात्रा में इन सबका उपयोग किस प्रकार किया जाता है। उन्होंने अपने पुत्र को भली प्रकार बताया कि समुद्री तूफान में जहाज जब घिर जाता है, तो उसे क्या करना चाहिए। सारी नसीहतें देकर उन्होंने परिवार के साथ सुभद्र को विदाई दी।

जलयान अपनी यात्रा पर चल पड़ा। जब यह जलयान बीच समुद्र में पहुँचा तो अचानक भीषण तूफान उठा खड़ा हुआ। नाविकों के भरपूर प्रयत्न के बावजूद जहाज के डूब जाने की स्थिति बन आई। निराश नाविकों ने जवाब दे दिया कि अब हमारा बस नहीं चलता, जहाज थोड़ी ही देर में डूबने वाला है। जिसे अपने तौर पर बचने का जो भी उपाय सूझे, वह करे।

सुभद्र विवेकवान् था। वह इस आसन्न विपत्ति के बीच में घबराया नहीं। पहले वह शौचादि से निवृत्त हुआ, अपना पेट साफ किया। तत्पश्चात् उसने ऐसे पदार्थ खाए, जो वजन में हल्के किन्तु अधिक समय तक शक्ति प्रदान करने वाले थे। जिससे समुद्र के खारे पानी का प्रभाव न हो। फिर शरीर से चिपका हुआ चमड़े का कपड़ा पहना, जिससे समुद्री जल-जंतु हानि न पहुँचा सके।

इतनी सारी तैयारी करके वह एक लकड़ी का तख्ता लेकर समुद्र में कूद पड़ा। उस तख्ते के सहारे किनारे तक पहुँच जाने के उद्देश्य से वह तैरने लगा। सुभद्र ने अपने विवेक से तत्काल यह निर्णय कर लिया कि इस जहाज की अपेक्षा जीवन कहीं अधिक मूल्यवान् है। विवेक जाग्रत रहे तो कोई-न-कोई रक्षा का उपाय किया जा सकता है। कायरों की तरह इस महा विपत्ति के सामने घुटने टेकने से अच्छा है कि बहादुरी के साथ संघर्ष करते हुए मरा जाए। यद्यपि इस विशाल समुद्र को भुजाओं से तैरकर पार करना दुष्कर है, लेकिन प्राण छूटने तक हाथ-पाँव हिलाते हुए बहादुरों की मौत तो मरा ही जा सकता है।

श्रेष्ठी पुत्र सुभ्रद तख्ते के सहारे हाथ-पैर मारता हुआ समुद्र में बह रहा था। उस समय समुद्र के अधिदेवता उसके पुरुषार्थ को देखकर सोचने लगे, मृत्यु इस युवक के सामने मुँह फाड़े खड़ी है। फिर भी न जाने क्यों यह समुद्र को भुजाओं से पार करने की व्यर्थ चेष्टा कर रहा है? देव ने उससे पूछा, युवक! व्यर्थ परिश्रम करने वाला मूर्ख कहलाता है। समुद्र को तैरकर पार करना किसी भी तरह संभव नहीं है, फिर तूफान के समय यह मौत के साथ खेलने के समान है। अतः जब मौत शीघ्र ही आनी निश्चित है, तब तुम यह बेकार का श्रम क्यों कर रहे हो। अच्छा यही है कि अपने आखिरी समय में तुम भगवान् का नाम लो।

परन्तु सुभद्र इस निराशायुक्त सलाह को सुनकर भी हताश नहीं हुआ। उसने उस विकट परिस्थिति में भी थकी-सी मुस्कान बिखेरते हुए कहा, क्या तुम नहीं जानते, हमारे भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है, ‘मामनुस्मर युध्य च’ अर्थात् मेरा स्मरण करते हुए युद्ध करो। फिर भी आप हमें यह सलाह देने वाले कौन है? इस प्रश्न के जवाब में समुद्र के अधिदेवता कहने लगे, मैं समुद्र का अधिदेव हूँ।

सुभद्र बोला, आप देवता होकर भी क्या हम मनुष्यों से भी गए बीते हैं। जो पुरुषार्थ के लिए प्रेरित करने के बजाय हमें पुरुषार्थहीन होकर डूब मरने का उपदेश देते हैं। अच्छा हो कि आप मुझे पुरुषार्थ करने दें। मन में भगवत् स्मरण एवं शरीर से अटूट श्रम, यही मेरा सिद्धाँत है।

समुद्र के अधिदेवता सुभद्र के इस उत्तर से प्रभावित हुए। वह सोचने लगे, ऐसे विकट समय में भी इसने मुझसे सहायता नहीं माँगी। यह अपने पुरुषार्थ में रत और निर्भय है। फिर भी उन्होंने कुछ और परीक्षा लेनी चाही। इसी उद्देश्य से उन्होंने कहा, युवक! क्या तुम इतना भी नहीं जानते, यहाँ परिणाम की कोई संभावना न हो, वहाँ प्रयास पुरुषार्थ सभी बेकार होते हैं।

सुभद्र कहने लगा, हे देव! पुरुषार्थ कभी भी बेकार नहीं होता। रही बात मेरे पुरुषार्थ की, सो इसका पहला फल तो यही है कि इसके द्वारा मेरी बुद्धि और शक्ति का सदुपयोग होगा। दूसरा फल, आपका दर्शन-लाभ है। यदि मैं जहाज के डूबने के साथ ही डूब मरता, तो न तो मैं अपनी बौद्धिक एवं शारीरिक शक्ति का प्रयोग कर पाता और न ही आपके दर्शन होते। अतः मेरा पुरुषार्थ व्यर्थ तो नहीं है। सुभद्र का उत्तर सुनकर प्रसन्न हुए देवता ने पूछा, तो फिर तुमने मुझसे रक्षा करने की प्रार्थना क्यों नहीं की?

सुभद्र बोला, क्योंकि मैं जानता हूँ कि देवता कभी अपनी प्रार्थना करवाते नहीं है। वे तो सदा अपने कर्तव्य पालन में रत व्यक्ति की स्वयमेव सहायता करते हैं। उस पर प्रसन्न होते हैं। जीवन में अपने कर्त्तव्यों का अच्छी तरह किया गया पालन ही श्रेष्ठतम प्रार्थना हैं यदि मेरे द्वारा प्रार्थना करने पर आप मुझे बचाते, तो आपका गौरव कम हो जाता। मेरी प्रार्थना के बिना ही आप जो उपकार करेंगे, उससे आपके उपकार का मूल्य बढ़ जाएगा।

सुभद्र की बात ने समुद्र के अधिदेवता को प्रसन्न कर दिया। उसने अपनी सहायता से उसे किनारे पहुँचा दिया। और फिर उसे विदा करते हुए कहा, मानवी पुरुषार्थ के चरम बिंदु पर देवकृपा स्वयं ही अवतरित होने के लिए विवश होती है। निश्चित ही तुम जैसा धीर, गंभीर और पुरुषार्थी मनुष्य देवकृपा को स्वतः ही अपने पा आकर्षित कर सफलता पा लेता है और यही हुआ। सुभद्र एक सफल धनवान के रूप में धन अर्जित कर लौटा।


दुःखदायी परिणाम (kahani)

एक व्यक्ति अपने बूढ़े अशक्त पिता को मिट्टी के बरतन में तिरस्कारपूर्वक भोजन दिया करता था। उस व्यक्ति का एक छोटा-सा बच्चा भी था। उसने अपने खेलने के स्थान पर टूटे-फूटे मिट्टी के बरतन जमा करने शुरू कर दिए। पिता ने इसका कारण पूछा तो बच्चे ने कहा, आप और माताजी जब बूढ़े होंगे, तब मुझे भी तो इसी तरह टूटे बरतनों में आप लोगों को भोजन देना पड़ेगा, सो अभी से बरतन इकट्ठे कर रहा हूँ। उस व्यक्ति की आँखें खुली और सम्मानपूर्वक माता-पिता को भोजन देन आरंभ कर दिया, ताकि बुढ़ापे में उसे भी वैसा ही असम्मान न सहना पड़े।

जो पुरुष या स्त्रियाँ अपने आश्रितजनों के साथ उपेक्षा अथवा अपमान का व्यवहार किया करते हैं या बड़ी आयु के वृद्ध व्यक्तियों को निकम्मा समझकर उनके प्रति दुर्व्यवहार करते हैं, उनको भी अंत में दुःखदायी परिणाम सहन करना पड़ता है।


जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ बोलें,

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्।

देवियों और भाइयों! भगवान ने गीता में ‘विभूति यो’ वाले दसवें अध्याय में एक बात बताई है कि जो कुछ भी यहाँ श्रेष्ठ दिखाई पड़ता है, ज्यादा चमकदार दिखाई पड़ता है, वह मेरा ही विशेष अंश है। जहाँ कहीं भी चमक ज्यादा दिखाई पड़ती है, वह मेरा विशेष अंग है। उन्होंने कहा, वृक्षों में मैं पीपल हूँ। छलों में मैं जुआ हूँ। वेदों में मैं सामवेद हूँ। साँपों में वासुकी मैं हूँ। अमुक में अमुक मैं हूँ-आदि। मुझ में ये सारी विशेषताएँ है। मित्रो! आपको जहाँ कही भी चमक दिखाई पड़ती है, वो सब भगवान् की विशेष दिव्य विभूतियाँ है और जहाँ कहीं भी जितना अधिक विभूतियों का अंश है, यह मानकर के हमको चलना पड़ेगा कि यहाँ इस जन्म में अथवा पहले जन्मों में इन्होंने किसी प्रकार से इस संपत्ति का उपार्जन किया है। अगर यह उपार्जन इन्होंने नहीं किया है, तो सामान्य मनुष्यों की अपेक्षा उनमें ये विशेषता क्यों दिखाई पड़ती है? इसलिए उनको उद्बोधन करना चाहिए। उन लोगों को, जिनके अंदर कुछ विशेष प्रभाव और विशेष चमक दिखाई पड़ती है।

संपदा बनाम विभूति

मित्रो! विशेष प्रभाव और विशेष चमक क्या है? वह है जिनको हम विभूतियाँ कहते हैं। कुछ संपदाएँ होती है, कुछ विभूतियाँ होती है। संपदाएँ क्या होती है और विभूतियाँ क्या होती है? संपदा उसे कहते हैं जो कि बाप-दादों की है। वे उसे छोड़कर चले जाते हैं और हम उस कमाई को बैठकर खाया करते हैं। ये संपदाएँ है। ये स्त्रियों को भी मिल जाती है, बच्चों को भी मिल जाती है। ये कोढ़ियों को भी मिल जाती है, अंधों को मिल जाती है और पंगु को भी मिल जाती है, गूँगे-बहरे को भी मिल जाती है। गूँगे-बहरे भी कई बार जुआ खेलते हैं और लाटरी लगाते हैं। लाटरी लगाने के बाद में उनको रुपया भी मिल जाता है। न मालूम किसको क्या मिल जाता है बाप-दादों की कमाई से? बाप-दादों की कमाई से मिनिस्टरों के लड़के-लड़कियों को ऐसे-ऐसे काम मिल जाते हैं, ऐसे-ऐसे धंधे मिल जाते हैं, जिनसे उनको घर बैठे लाखों रुपये की आमदनी होती रहती है। इसे क्या कहते है? इसे हम संपदा कहते हैं।

किसी के पास जमीन है। भगवान् की कृपा से उस साल अच्छी वर्षा हो गई, तो दो सौ क्विन्टल अनाज पैदा हो गया। दो सौ क्विन्टल अनाज बिक गया तो ढेरों पैसा आ गया और उसे बैंक में जमा करा दिया। मकान बन गया, ये बन गया-वो बन गया। पैसे का खेल बन गया। क्या कहता हूँ मैं इनको? इनको मैं संपत्तियाँ कहता हूँ। संपत्ति जमीन में गड़ी हुई मिल सकती है, बाप-दादों की उत्तराधिकार में भी मिल सकती है और किसी बड़े आदमी की कृ एवं आशीर्वाद से भी मिल सकती है। संपत्ति किसी भी तरीके से मिल सकती है, किन्तु संपत्तियों को कोई मूल्य नहीं है। विभूतियों का मूल्य है। विभूतियाँ जहाँ कही भी दिखाई पड़े, उनको आप यह मानकर चलना कि वे भगवान् का विशेष अंग हैं। विशेष अंग जो उनके भीतर है, वह जहाँ कहीं भी हो, उस अंश को जाग्रत करना, उसको उद्बोधन करना और सोए हुओं को जगाना हमारा-आपका विशेष काम है।

साथियों! रावण के घर में ढेरों-के-ढेरों आदमी थे। सुना है एक लाख बच्चे थे और सवा लाख नाती-पोते थे, लेकिन जब रामचंद्र जी से लड़ाई हो गई और दोनों और की सेनाएँ खड़ी हो गई, तो उसने देखा कि हमारे पास एक ही सहायक, एक ही मजबूत और जबरदस्त आदमी है। उसको जगाया जाना चाहिए और उसकी खुशामद की जानी चाहिए। उसकी खुशामद की जाने लगी, उसे जगाया जाने लगा। कौन आदमी था वह उसका नाम था कुँभकरण। वह छह महीने सोया करता था और छह महीने जागा करता था। रावण को यह विचार आया कि कुँभकरण यदि जाग करके खड़ा हो जाए, तो सारे रीछ बंदरों को एक ही दिन में मारकर खा जाएगा। एक ही दिन में सफाया कर देगा और लड़ना भी नहीं पड़ेगा और रामचंद्र जी की सेना का सफाया हो जाएगा। सुना है कि इसीलिए उसके ऊपर बैल, घोड़े, और हाथियों, को चलाना पड़ा था, ताकि कुँभकरण की नींद छह महीने पहले ही खुल जाए और वह उठकर खड़ा हो जाए। अगर वह तुरंत उठकर खड़ा हो गया होता, अगर जाग गया होता तो रामचंद्र जी की सेना के लिए मुसीबत खड़ी कर दी होती, लेकिन भगवान् की कृपा ऐसी हुई, भगवान् का जोश और प्रताप ऐसा हुआ कि वह काफी देर से जगा। तब तक बहुत कुछ नष्ट हो चुका था। इसीलिए रावण मरा गया, मेघनाद मारा गया और सारी लंका तहस-नहस हो गई।

विभूतिवान् जागें

मित्रो! हमको समाज में सोए हुए गड़े हुए कुँभकरणों को जगाना चाहिए। कुंभकरणों की कमी है क्या? नहीं, इनकी कमी नहीं है, पर वे सो गए है। हमारा एक दाम यह भी होना चाहिए कि जहाँ कही भी आपको विभूतिवान् मनुष्य दिखाई पड़े, तो आपको उनके पास बार-बार चक्कर काटना चाहिए और बार-बार उनकी खुशामद करनी चाहिए।

विभूतिवान् लोगों में एक तबके के वे लोग आते हैं, जिनको हम विचारवान कहते हैं, समझदार कहते हैं। समझदार मनुष्य इस ओर चल पड़े तो भी गजब ढा देते हैं और उस ओर चल पड़े तो भी गजब ढा देते हैं। मोहम्मद अली जिन्ना बड़े समझदार आदमी थे और बड़े अक्लमंद आदमी थे। मालवार हिल के ऊपर मुँबई में उनकी कोठी बनी हुई हैं उनके यहाँ चालीस जूनियर वकील काम करते थे और केस तैयार करते थे। मोहम्मद अली जिन्ना केवल बहस करने के लिए हाईकोर्ट में जाते थे और एक-एक केस का हजारों रुपया वसूल करते थे उस जमाने में। मोतीलाल नेहरू के मुकाबले के आदमी थे। उनमें बड़ी अक्ल थी, बड़ दिमाग वाले थे। बड़ा दिमाग वाला, अक्ल वाला मनुष्य इधर को चले तो भी गजब और उधर को चले तो भी गजब। सही भी कर सकता था वह तथा गलत भी। यही हुआ।

मोहम्मद अली जिन्ना एक दिन खड़े हो गए और पाकिस्तान की वकालत करने लगे, पाकिस्तान की हिमायत करने लगे। परिणाम क्या हुआ? परिणाम यह हुआ कि सारे पाकपरस्तों के अंदर उन्होंने एक ऐसी बगावत का मादद् पैदा कर दिया, ऐसी लड़ाई पैदा कर दी, जेहाद पैदा कर दी और न जाने क्या-क्या पैदा कर दिया कि एक ही देश के लोग एक दूसरे के खूनी हो गए, बागी हो गए। खूनी और बागी होकर के जहाँ-तहाँ दंगे करने लगे। आखिर में गाँधी जी को यह बात मंजूर करनी पड़ी कि पाकिस्तान बनकर ही रहेगा। निर्णय सही था कि गलत, यह चर्चा का विषय नहीं है। वास्तविकता यह जाननी चाहिए कि यह जहर किसने बोया? यह जहर उस आदमी ने बोया, जिसको हम समझदार कहते हैं और अक्लमंद कहते हैं। मोहम्मद अली जिन्ना कहते हैं। यह तो मैं उदाहरण दे रहा हूँ। मनुष्यों का क्या उदाहरण दूँ, मैं तो समझदारी का उदाहरण दे रहा हूँ।

कीमत सही अक्ल की

समझदारी जहाँ कहीं भी होगी, न जाने क्या-से-क्या करती चली जाएगी? समझदार आदमी आर्थिक क्षेत्र में चला जाएगा तो वो मोनार्क पैदा हो जाएगा और हेनरी फोर्ड पैदा हो जाएगा। पहले ये छोटे-छोटे आदमी थे। नवसारी गुजरात का एक नन्हा-सा आदमी, जरा-सा आदमी और समझदार आदमी अगर व्यापार क्षेत्र में चला जाएगा। राजस्थान का एक अदना-सा आदमी जुगल किशोर बिड़ला होता चला जाएगा। अगर आदमी के अंदर गहरी समझदारी हो तब? तब एक नन्हा-सा आदमी, जरा-सा आदमी, वो कौड़ी का आदमी जिधर चलेगा अपनी समझदारी के साथ वह गजब ढाता हुआ चला जाएगा।

मित्रो! गहरी समझदारी की बड़ी कीमत है। गहरी समझदारी वाले सुभाषचंद्र बोस गजब ढाते हुए चले गए। सरदार पटेल एक मामूली से वकील। यों तो दुनिया में एक ही नहीं, बहु सारे वकील हुए हैं, लेकिन पटेल ने अपनी क्षमता और प्रतिभा यदि वकालत में खरच की होती, तो शायद अपनी समझदार अक्ल की कीमत एक हजार रुपया महीना वसूल कर ली होती और उन रुपयों को वसूल करने के बाद में मालदार हो गए होते और उनका बेटा शायद विलायत में पढ़कर आ जाता और वह भी वकील हो सकता था। उनकी हवेली थी हो सकती थी और घर पर मोटरें भी हो सकती थी, लेकिन वहीं सरदार पटेल अपनी समझदारी को और अपनी बुद्धिमानी को लेकर खड़े हो गए। कहाँ खड़े हो गए? वकालत करने के लिए। किसकी वकालत करने के लिए? काँग्रेस की वकालत करने के लिए। जब वे वकालत करने के लिए खड़े हो गए, तो कितनी जबरदस्त बैरिस्टरी की और किस तरीके से वकालत की और किस तरीके से तर्क पेश किए और किस तरीके से उनने फिजाँ पैदा की कि हिन्दुस्तान की दिशा ही मोड़ दी और न जाने क्या-से-क्या हो गया?

मित्रो! अक्ल बड़ी जबरदस्त है और आदमी का प्रभाव, जिसको मैं प्रतिभा कहता हूँ, विभूति कहता हूँ, यह विभूति बड़ी समझदारी से भरी है। अगर यह विभूति आदमी के अंदर हो, तो जिसको मैं आदमी का तेज कहता हूँ, चमक कहता हूँ, तो वह आदमी जहाँ कहीं भी जाएगा, वो टॉप करेगा। वह टॉप से कम रह ही नहीं सकता। सूरदास जब वेश्यागामी थे, बिल्वमंगल थे, तो उन्होंने अति कर डाली और सीमा से बाहर चले गए। वहाँ तक चले गए जहाँ तक कि अपनी धर्मपत्नी के कंधे पर बैठकर वहाँ गए, जहाँ उनके पिताजी का श्राद्ध हो रहा था। वहाँ भी पिताजी के श्राद्ध के समय भी वे वेश्यागम के लिए चले गए। श्राद्ध करने के लिए भी नहीं आए। अति हो गई।

प्रतिभाएँ सदैव शीर्ष पर पहुँची

और तुलसीदास? तुलसीदास जी भी जिजीविषा के मोह में पड़े हुए थे। सारी क्षमता और सारी प्रतिभा इसी में लग रही थी। एक बार उनको अपनी पत्नी की याद आई। वह अपने मायके गई हुई थी। नदी बह रही थी। वे नदी में कूद पड़े। नदी में कूदने पर देखा कि अब हम डूबने वाले है और कोई नाव भी नहीं मिल रही है। तभी कोई मुरदा बहता हुआ चला आ रहा था, बस वे उस मुरदे के ऊपर सवार हो गए और तैरकर नदी पार कर ली। उनकी बीबी छत पर सो रही थी। वहाँ जाने के लिए उन्हें सीढ़ी नहीं दिखाई पड़ी, रास्ता दिखाई नहीं पड़ा। वहाँ पतनाले के ऊपर एक साँप टँगा हुआ था। उन्होंने साँप को पकड़ा और साँप के द्वारा उछलकर छत पर जा पहुँचे। कौन जा पहुँचे? तुलसीदास! यही, तुलसीदास जब हिम्मत वाले, साहस वाले तुलसीदास बन गए, प्रतिभा वाले तुलसीदास बन गए, तब वे संत हो गए।

इसी तरह सूरदास, प्रतिभा वाले और हिम्मत वाले सूरदास जब खड़े हो गए और जो भी दिशा उन्होंने पकड़ ली, उसमें उन्होंने टॉप किया। सूरदास ने जब अपने आपको संभाला लिया और अपने आपको बदल लिया, तब उन्होंने टॉप किया। टॉप से कम में तो वे रह ही नहीं सकते। वही बिल्वमंगल जब वेश्यागामी था तो पहले नंबर का और जब संत बना तब भी पहले नंबर का। संत पहले नंबर का क्यों? इसलिए कि वह भगवान का भक्त हो गया। जब वह भगवान् का भक्त हो गया, तो फिर वह ऐसा मजेदार भक्त हुआ कि उसने वह काम कर दिखाए, जिस पर हमको अचंभा होता है। हिम्मत वाला और दिलेर आदमी जो काम कर सकता है, मामूली आदमी उसे नहीं कर सकता। उसने अपनी आँखें गरम सलाखें डालकर फोड़ डाली। हम और आप कर सकते हैं क्या? नहीं कर सकते। ऐसा कोई दिलेर आदमी ही कर सकता है। उसने दिलेरी के साथ और तन्मयता के साथ ऐसी मजबूत भक्ति की कि श्रीकृष्ण भगवान् को भागकर आना पड़ा और बच्चे के रूप में, जिनको कि वे अपना इष्टदेव मानते थे, उसी रूप में उनकी सहायता करनी पड़ी। आँखों के अंधे सूरदास की लाठी पकड़ करके टट्टी-पेशाब कराने के लिए, स्नान कराने के लिए भगवान् ले जाया करते थे और सारा इंतजाम किया करते थे। भगवान् उनकी नौकरी बजाया करते थे।

कौन से सूरदास की? उस सूरदास की, जो प्रतिभावान् था। मैं किसकी प्रशंसा कर रहा हूँ? भक्ति की? भक्ति की बाद में, सबसे पहले प्रतिभा की, समझदारी की। प्रतिभा की बात मैं कह रहा हूँ। प्रतिभा अपने आप में एक जबरदस्त वस्तु है। वह जहाँ कहीं भी चली जाएगी, जिस दिशा में भी चली जाएगी, चाहे वह जहाँ कहीं भी जाएगी, पहले नंबर का काम करेगी। तुलसीदास ने क्या काम किया? तुलसीदास ने जब अपनी दिशाएँ बदल दी, जब उनकी बीबी ने कहा, नहीं तुम्हारे लिए ये मुनासिब नहीं है। क्या तुम इसी तरीके से वासना में अपनी जिंदगी खत्म कर दोगे? तुमको भगवान् की भक्ति में लग जाना चाहिए और जितना हमको प्यार करते हो, उतना ही भगवान् से करो, तो मजा आ जाए और तुम्हारी जिंदगी बदल जाए। उनको यह बात चुभ गई। हमको और आपको चुभती है क्या? नहीं चुभती। हमारी औरतें सौ गालियाँ देती रहती हैं और फिर हम ऐसे ही हाथ-मुँह धोकर के आ बैठते हैं। वह फिर गाली सुनाती है और गुस्सा होकर के चले जाते हैं और कहते हैं कि फिर तेरे घर नहीं आएँगे ओर बस वह जाता है और दुकान पर बैठा बीड़ी पीता रहता है। शाम को घूम-फिरकर फिर आ जाता है। क्यों फिर आ गए? आ गए, क्योंकि उसके अंदर वह चीज नहीं है, जिसे जिंदगी कहते हैं।

जिंदगी वाले इंसान-महामानव

मित्रो! जिंदगी की बड़ी कीमत है। जिंदगी लाखों रुपये की कीमत की है, करोड़ों रुपये की है, अरबों-खरबों रुपये की कीमत की है। तुलसीदास भी जिंदगी वाला इंसान था। वासना के लिए जब व्याकुल हुआ तो ऐसा हुआ कि बस हैरान-ही-हैरान, परेशान-ही-परेशान और जब भगवान् की भक्ति में लगा, तो हमारी और आपकी जैसी भक्ति नहीं थी उसकी कि माला फिर रही है इधर और सिर खुजा रहे हैं उधर। भजन कर रहे हैं इधर और पीठ खुजा रहे हैं उधर। भला ऐसी कोई भक्ति होती है? तुलसीदास ने भक्ति की तो कैसी मजेदार भक्ति की कि बस पीपल के पेड़ पर से, बेल के पेड़ पर से कौन आ गया? भूत आ गया। उन्होंने कहा कि हमको भगवान् के दर्शन करा दो। उस भूत ने कहा कि हमको भगवान् के दर्शन करा सकते, हनुमान् जी के करा सकते हैं। अच्छा! चलो हनुमान् जी के ही करा दो।

हनुमान् जी वहाँ रामायण सुनने जाते थे। उसने उनके दर्शन करा दिए। तुलसीदास ने हनुमान जी को पकड़ लिया और कहा कि हमको रामचंद्र जी का जीवन। उन्होंने क्या किया कि रामचंद्र जी, जिनका कि वे नाम लिया करते थे, उन रामचंद्र जी को पकड़कर ही छोड़ा। उन्होंने कहा कि रामचंद्र जी का भी ठिकाना नहीं है और मेरा भी ठिकाना नहीं है। दोनों को एक होना होगा या तो मैं रहूँगा या रामचंद्र जी रहेंगे? या तो हनुमान जी रहेंगे या रामचंद्र जी रहेंगे? मैं तो लेकर के हटूँगा। भला ऐसे कैसे हो सकता है कि मैं हनुमान चालीस पढूँगा और हनुमान जी भाग जाएँ और पकड़ में नहीं आएं? पकड़ में कैसे नहीं आएंगे? हनुमान को पकड़ में जरूर आना पड़ेगा। हनुमान जी पकड़ में जरूर आ गए। हनुमान जी पकड़ में नहीं आए, हनुमान जी के ताऊ रामचंद्र जी भी पकड़ में आ गए। दोनों को पकड़ लिया उसने। किसने पकड़ लिया? तुलसीदास ने। हम और आप पकड़ सकते हैं क्या? हम और आप नहीं पकड़ सकते। भूत तो पकड़ सकते है? नहीं पकड़ सकते। हनुमान जी को पकड़ लेंगे? नहीं हनुमान जी भी पकड़ में नहीं आएंगे और रामचंद्र जी तो भला कैसे पकड़ में आ सकते है? वे भी नहीं आएंगे।

दिशा जो बदली, तो गजब हो गया

मित्रो! क्या वजह है इसकी? हम में और तुलसीदास जी में क्या अंतर है? एक अंतर है। नाक, आँख, कान, दाँत और हाथ-पाँव सब बराबर है, पर एक चीज जो उनके अंदर थी, वह हमारे अंदर नहीं है। वह चीज है, जिसे मैं जिंदगी कहता हूँ जिसको मैं प्रतिभा कहता हूँ, जिसको मैं विभूति कहता हूँ, जिसको मैं लगन कहता हूँ, तन्मयता कहता हूँ, जीवट कहता हूँ वह जीवट मित्रो! जहाँ कहीं भी होगा, तो वह बड़ा शानदार काम कर रहा होगा और गलत दिशा पकड़ने पर गलत काम भी कर रहा होगा।

अंगुलिमाल पहले नंबर का डाकू था। उसने ये कसम खाई थी कि फोकट में किसी का पैसा नहीं लूँगा। उँगलियाँ काट-काटकर उसकी माला बनाकर वह देवी को रोज चढ़ाया करता था। अगर कोई कहता कि अरे भाई! पैसे ले ले, पर उंगली क्यों काटता है हमारी? वह कहता, वाह! फोकट में, दान में नहीं लेता हूँ। पहले तेरी उंगली काटूँगा, तो मेरी मेहनत हो जाएगी। फिर उस मेहनत का पैसा ले लूँगा। ऐसे मुफ्त में कैसे ले लूँगा किसी का पैसा? इस तरह वह रोज एक साथ उंगलियाँ काट-काटकर उसकी माला देवी को पहनाया करता था? कौन ? खूँख्वार अंगुलिमाल डाकू, लेकिन जब उसने पलटा खाया, तो कैसा जबरदस्त पलटा खाया, आपको मालूम है न? अंगुलिमाल जब तक डाकू था तो पहले नंबर का और जब संत हो गया तो उसने हिन्दुस्तान से आगे जाकर के सारे-के-सारे विदेशों में, मिडिल ईस्ट में वो काम किए कि बस, तहलका मचा दिया। वह जहाँ कहीं भी गया, अपने प्रभाव को दुनिया से बदलता हुआ चला गया।

मित्रो! क्षमताएँ जिनके अंदर है, प्रतिभाएँ जिनके अंदर है, वह कहीं-से-कहीं जा पहुँचता है। आम्रपाली जब तक वेश्या रही तो पहल नंबर की रही। राजकुमार, राजाओं से लेकर सेठ-साहूकार तक उसकी एक निगाह के लिए, उसकी एक चितवन और एक इशारे के लिए ढेरों रुपया खर्च कर डालते थे और उसके गुलाम हो गया करते थे, लेकिन जब आम्रपाली अपनी करोड़ों की संपत्ति को लेकर भगवान् बुद्ध की ओर चली गई, तो न जाने क्या-से-क्या हो गई और सम्राट अशोक जो था, ऐसा खूनी था कि उसने खानदान-के-खानदान समाप्त कर दिए थे। सभी शाही खानदानों को एक ओर से उसने मरवा डाला था। मुसलमानों ने तो एक-आध को मारा था, लेकिन उसने तो किसी को जिंदा ही नहीं छोड़ा। ऐसा खूनी था अशोक। उसने चंगेज खाँ, नादिरशाह और औरंगजेब, सबको एक किनारे रख दिया था। जहाँ कहीं भी हमले किए, वहाँ खून की नदियाँ ही बहाता चला गया।

लेकिन मित्रो! जब उसने पलटा खाया और जब अपने आप में परिवर्तन कर डाला, तो फिर वह कौन हो गया? सम्राट अशोक हो गया, जिसने बौद्ध संघ और बौद्ध धर्म का सारे-का-सारा संचालन किया। आज जो हमारे झण्डे के ऊपर और हमारे सिक्कों-नोटों के ऊपर तीन शेर वाला निशान बना हुआ है, वह सम्राट अशोक की निशानी है। और जो हमारे राष्ट्रीय ध्वज पर चौबीस धुरी वाला और चौबीस पंखुड़ी वाला चक्र लगा हुआ है, यह क्या है? यह सम्राट अशोक के द्वारा पारित किया और प्रतिपादित किया हुआ धर्मचक्र प्रवर्तन है, जिसको हमने राष्ट्रीय झण्डे के ऊपर स्थान दिया हुआ है। ये किसकी हिम्मत, किसकी दिलेरी थी, किसकी बहादुरी थी? उसकी थी जो डाकू था और खूँख्वार था।

प्रस्तुत अमृतवाणी 17 अप्रैल 1974 को गायत्री तीर्थ परिसर में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा दिए गए प्रवचन से ली गई है। जाग्रत प्राणवानों, विभूतियों, प्रतिभाशीलों की पूज्यवर ने सोदाहरण व्याख्या की है एवं अपेक्षा की है कि राष्ट्र, समाज, संस्कृति के पुनरुद्धार हेतु इस संधि वेला में आगे आएँगे। इन्हीं जीवंतों के अग्रगमन से नवयुग-सतयुग का शुभागमन होगा। तीन खंडों में प्रकाशित यह अमृतवाणी विभूति ज्ञान यज्ञ (8 अक्टूबर 2000, नई दिल्ली) एवं सृजन संकल्प विभूति पुरुषमेध महायज्ञ (7 से 11 नवंबर 2000, शाँतिकुँज, हरिद्वार) के परिप्रेक्ष्य में निश्चित ही पठनीय-माननीय है। अंदर से बाहर तक झकझोर कर खड़ा कर देने वाली ओजस्वी वाणी को लिपिबद्ध पढ़ें इस व आगामी दो अंकों में।

जीवंत बनाम मुरदे

मित्रो! भगवान् जहाँ कहीं भी अपना अंश देता है, विभूति देता है, उसके अंदर चमक होती है, लगन होती है, उसके अंदर तड़प होती है और मुरदे? मुरदे हमारे और आपके जैसे होते हैं। साँस लिया करते हैं। भगवान् की जब पूजा करते हैं, तो भी ऐसे-ऐसे सर हिलाते रहते हैं और साँस लेते रहते हैं। सेवा करने जाते हैं, तो वहाँ भी निठल्ले की तरह पड़े रहते हैं। सत्संग करने, शिविर करने आते हैं, तो यहाँ भी मौसी जी-मौसा जी की याद सताती है।

मित्रो! ये क्या होता है? ये मैं किसकी कहानियाँ सुना रहा हूँ? मुरदे की। जिंदा आदमियों की भी कह रहा हूँ। आपके जिम्मे मैं एक काम सुपुर्द कर रहा हूँ कि जहाँ भी आपको जिंदा आदमी मालूम पड़े, जिंदादिल आदमी मालूम पड़े, आप उनके पास जाना। आप उनको मेरा संदेश लेकर के जाना और खुशामद करने के लिए जाना और यह कहना कि भगवान् ने जो विशेषताएं आपके अन्दर दी है, आपके अंदर जो प्रतिमा है, जो क्षमता है और जो आपके अंदर विशेषता है, उसके लिए भगवान् ने निमंत्रण दिया है, समय ने निमंत्रण दिया है। युग ने निमंत्रण दिया है, पीड़ित मानवता ने निमंत्रण दिया है और निमंत्रण दिया है मनुष्य जाति के गिरते हुए भविष्य ने और यह कहा है कि पेट भरने के लिए आपको जिंदा रहना काफी नहीं है। पेट तो मक्खी-मच्छर भी भर लेते हैं, कीड़े-मकोड़े और कुत्ते भी भर लेते हैं। किसी ने जलेबी खा ली तो क्या और मक्का की रोटी खा ली तो क्या? खाने के लिए आदमी को पैदा नहीं किया गया है। खाने के लिए और औलाद पैदा करने के लिए सुअर को पैदा किया गया है, जो एक-एक साल में बारह-बारह बच्चे पैदा कर देता है। गंदी-संदी चीजें खाकर के भी हट्टा-कट्टा होकर मोटा पड़ा रहता है। पेट भर गया, बस खर्राटे भरता रहता है। पेट भरने के लिए इंसान को पैदा नहीं किया गया है।

हमारे संदेशवाहक बनें

मित्रो! इंसान बड़े कामों के लिए पैदा किया है। इंसान की जिंदगी कई लाख योनियों में घूमने के बाद आती है। एकाएक कहाँ आ पाती है? इसलिए मित्रो! वहाँ हमारे संदेश लेकर के जाना, युग की पुकार लेकर के जाना। वक्त की पुकार लेकर के जाना और यह कहना कि आपको समय ने पुकारा है, युग ने पुकारा है, राष्ट्र ने पुकारा है, गुरु जी ने पुकारा है, अगर आप उनकी पुकार सुन सकते हों, अगर आपके कान है, अगर आपके अंदर दिल है, अगर आपके पास कान नहीं है, दिल नहीं है, तो हम क्या कह सकते हैं। फिर कौन आदमी सुनेगा? रामायण की कथा हम सुन लेते हैं और जैसे ही आते हैं, पल्ला झाड़ करके आ जाते हैं। भागवत् की कथा हम सुनकर के आते हैं, व्याख्यान हम सुन करके आते हैं और जैसे ही आते हैं, पल्ला झाड़ करके आते हैं। चिकने घड़े के तरीके से हमारे आपके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

मित्रो! आप वहाँ जाना और लोगों से यह कहना कि अगर कहीं आपके अंदर जिंदादिली हो, तो आपको समय की पुकार सुननी चाहिए और युग की पुकार सुननी चाहिए। समय की माँग को पूरा करना चाहिए और युग की माँग को पूरा करना चाहिए और महाकाल ने, भगवान् ने जहाँ आपको बुलाया है, वहाँ आपको चलना चाहिए। हनुमान जी भगवान की पुकार सुनकर चले गए थे, रीछ और बंद चले गए थे, गिलहरी चली गई थी। आपके लिए क्या यह संभव नहीं है? क्या आप इस लोभ और मोह से, अपने वासना और तृष्णा के बंधनों को काटते हुए अंगद के तरीके से चलने के लिए तैयार हैं?

मित्रों! मैं आपको अंगद के तरीके से संदेशवाहक बनाकर के भेजता हूँ। मेरे गुरु ने मुझे संदेशवाहक बनाकर भेजा। हिन्दुस्तान से बाहर कई बार अंगद की तरह से मैं केवल संदेशवाहक के रूप में गया हूँ। मैंने कोई व्याख्यान नहीं दिए और न संगठन किए। सारे-के-सारे देशों में, विदेशों में और न जाने कहाँ-से-कहाँ गया, लेकिन अपने गुरु का संदेशा लेकर के गया। मैंने लोगों से कहा, देखो अपने को बदल दो। समय बदल रहा है। परिस्थितियाँ बदल रही हैं। धन किसी के पास रहने वाला नहीं है। अगले दिनों में, थोड़े दिनों में आप देखना कि धन किस तरीके से गायब हो जाता है। राजाओं के राज किस तरीके से चले गए, यह हमने और आपने देख लिया। आपने देखा कि थोड़े दिनों पहले जो लोग राजा कहलाते थे, सोने-चाँदी की तलवारें लेकर हाथी पर चला करते थे, आज वे किसी तरीके से अपनी दोनों वक्त की रोटी को जुगाड़ कर रहे हैं।

साथियों! जहाँ कहीं भी जाएंगे, वहाँ आप लोगों से कहना कि समय बहुत जबरदस्त है। समय सबसे बड़ा है। धन बड़ा नहीं है। जहाँ कहीं भी विभूतियाँ आपको दिखाई पड़ती हो, वहाँ आप हमारे संदेशवाहक के रूप में जाना, जैसे कि हमारे गुरु जी ने सारी दुनिया के जबरदस्त आदमियों के पास और भावनाशील आदमियों के पास हमको संदेश दे करके भेजा।

(क्रमशः आगामी अंक में जारी)


गुरुसत्ता के स्फुट विचारअखण्ड ज्योति परिवार एवं युग निर्माण मिशन

“युग निर्माण योजना को व्यावहारिक रूप देने के लिए हम ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ को उसी तरह प्रयुक्त करेंगे, जैसे एक वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में तन्मय हो जाता है या एक माली अपने बगीचे में अपने आप को खो देता है। बगीचे का हर खिलता हुआ फूल माली की अंतरात्मा में प्रसन्नता की लहरें उद्वेलित करता है। हमारी प्रसन्नता का स्त्रोत भी अब अखण्ड ज्योति परिवार से संबद्ध स्वजनों के खिलते और निखरते जीवन के साथ संबद्ध रहेगा।”

-अखण्ड ज्योति सितंबर 1162, पृष्ठ 51

“युग निर्माण योजना कागजी या कल्पनात्मक योजना नहीं है। वह समय की पुकार, जनमानस की गुहार और दैवीय इच्छा की प्रत्यक्ष प्रक्रिया है। इसे साकार होना ही है। इसको आरंभ करने का श्रेय अखण्ड ज्योति परिवार को मिल रहा है, तो इस सौभाग्य के लिए हम में से प्रत्येक को प्रसन्न होना चाहिए और गर्व अनुभव करना चाहिए।”

-अखण्ड ज्योति दिसंबर 1165, पृष्ठ 43

“अखण्ड ज्योति परिवार के रूप में युग परिवर्तन के लिए किया गया छोटा-सा शुभारंभ वट-वृक्ष की तरह पल्लवित हो, ऐसी आशा और प्रार्थना हम सबको करनी चाहिए।”

-अखण्ड ज्योति मार्च 1163, पृष्ठ 41

“गायत्री उपासना और जीवन निर्माण विद्या के दोनों ही माध्यमों से हमारे साथ संबद्ध व्यक्तियों के विशाल जनसमूह को हम अखण्ड ज्योति परिवार के नाम से पुकारते हैं। यह सभी लोग हमें व्यक्तिगत रूप से अपने शरीर के अंगों की तरह प्रिय है और विश्वास है कि वे लोग भी हमें उसी दृष्टि से देखते हैं।”

-अखण्ड ज्योति जून 1163, पृष्ठ 15

“हमारा कार्यक्रम एक ही था, एक ही है और एक ही रहेगा। पशु को मनुष्य और मनुष्य को देवता बनाने का, नर से नारायण और पुरुष से पुरुषोत्तम बनने का मार्ग ही अध्यात्म हैं। हम उसी पर चलेंगे और उसी पर चलने की अपने साथी-सहचरों को प्रेरणा देंगे? युग निर्माण योजना के कार्यक्रमों में नवीन कुछ भी नहीं और न कोई मार्ग परिवर्तन जैसी बात है। स्तर बढ़ने के साथ-साथ जिम्मेदारी बढ़ने भर की बात है। जप करना सिखाकर आरंभ किया गया था, पर उसका अंत इतने संकुचित क्षेत्र में नहीं हो सकता। युग निर्माण का कार्य वाचालों और चातुर्य पारंगत लोगों का नहीं, वरन् निष्ठावानों का है।”

-अखण्ड ज्योति जून 1163, पृष्ठ 11

“अखण्ड जयति का अध्यात्मिक मिशन ईश्वरीय प्रेरणा और निष्ठ के आधार पर ही गतिशील रह सका है। यदि आगे उसे कुछ और सेवाकार्य करने का श्रेय मिलना होगा, तो वह ईश्वरीय शक्ति की सहायता से ही संभव होगा। अखण्ड ज्योति परिवार में सभी सदस्यों को भगवान् से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें ऐसा आत्मबल दें, जिसके सहारे आदर्श का उत्कृष्ट जीवन बिताने और देश, धर्म, जाति और संस्कृति की सेवा कर सकने का अवसर मिले।”

-अखण्ड ज्योति दिसंबर 1163, पृष्ठ 50

“युग निर्माण आँदोलन का लक्ष्य मानवसमाज को स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की महान् उपलब्धियाँ प्रदान करना है। यह तीनों विभूतियाँ भावनात्मक नवनिर्माण के द्वारा ही संभव होगी। धरती पर स्वर्ग अवतरण इन्हीं भागीरथी प्रयत्नों द्वारा संभव होगा। सतयुग एवं रामराज्य की पुनः प्रतिष्ठापना का यह एकमात्र मार्ग है।”

-अखण्ड ज्योति मार्च 1167, पृष्ठ 2

“अखण्ड ज्योति परिवार का संगठन हमारे विशेष प्रयत्नों का फल है। सूक्ष्म दृष्टि से ढूंढ़-ढूंढ़कर हमने देशभर से संस्कारवान् जागृतात्माओं को प्रयत्नपूर्वक एकत्र किया है। इसमें बहुत समय लगा है और बहुत श्रम। परिवार के अधिकाँश सदस्य पूर्वजन्मों की भारी आध्यात्मिक संपदा से संपन्न है।”

-अखण्ड ज्योति नवंबर 1168, पृष्ठ 63

“विडंबनाओं में हम भटकते कितने ही क्यों न रहें, गति और शाँति का लक्ष्य तभी प्राप्त किया जा सकेगा, जब भावनात्मक नवनिर्माण की महती आवश्यकता को पूरा करने के लिए सच्चे, गहरे और व्यापक स्तर पर प्रयत्न किए जाएँ। युग निर्माण योजना द्वारा यही किया जा रहा है। समय ही बताएगा कि जब सब और अंधेरे में भटकना ही बन पड़ रहा था, तब एक सही प्रयास भी चला था और उसने अपने स्वल्प साधनों से ही चमत्कार प्रस्तुत किया था।”

-अखण्ड ज्योति मार्च 1174, पृष्ठ 52

“अखण्ड ज्योति ने अपने प्रयासों के उस उद्गम पर केंद्रित किया है, जहाँ से विकास और विनाश के दोनों ही झरने फूटते हैं। विकृत चिंतन का निवारण व जनमानस में परिष्कृत दृष्टिकोण का प्रतिष्ठापन, यही है हमारा विचारक्राँति अभियान। यही है इस युग का सर्वोपरि महत्वपूर्ण धर्मानुष्ठान ज्ञानयज्ञ। युग निर्माण योजना इन्हीं प्रयत्नों में प्राणपण से संलग्न है।”

-अखण्ड ज्योति जुलाई 1175, पृष्ठ 61


कर्म किए बिना कोई रह ही कैसे सकता है।

योगीराज श्री अरविंद कहते हैं कि गीता के इस तृतीय अध्याय के बीसवें से लेकर छब्बीसवें, इन सात श्लोकों से अधिक महत्वपूर्ण श्लोक गीता में कम ही हैं। वे ‘लोकसंग्रह’ श्याब्द को समझाते हुए कहते हैं कि इसे समाज सेवा- समाज सुधार आदि शब्दों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। यह ईश्वर के विधान के अंतर्गत ईश्वरत्व को जीते हुए शिक्षण देने की प्रक्रिया है। आधुनिक मन की भूमिकाओं से कहीं अधिक ऊँचाई पर गीता भावनाओं और अनुभूतियों की भूमिका में विचरण करती है। इसीलिए वह जिस शब्द का प्रयोग करती है, उसका अर्थ सामान्य नहीं, असामान्य ही लिया जाना चाहिए। लोकसंग्रह की बात को अगले श्लोक में फिर बड़े स्पष्ट ढंग से समझाया गया है। इक्कीसवाँ श्लोक है-

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

“जैसा आचरण एक श्रेष्ठ पुरुष का होता है, अन्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करते हैं। वह जैसा भी कुछ आदर्श उपस्थित करता है, लोग उसी का अनुसरण करते हैं।

अर्जुन, जो इस असमंजस में है कि मेरे व्यक्तिगत कर्मों का समाज से क्या संबंध है, श्रीकृष्ण की इस उक्ति के बाद तुरंत समाधान पाता है कि यह इसलिए जरूरी है कि वह विशिष्ट श्रेणी में आता है। उसका आचरण सारे समाज के उत्थान-पतन का कारण बन सकता है। उसका कोई कर्म व्यक्तिगत नहीं, अपितु सभी कुछ लोकशिक्षण हेतु हैं चूँकि अधिकाँश मनुष्य अपनी जीवनचर्या के लिए भी दृष्टि औरों पर ही डालते हैं, बड़ी ही सावधानी से प्रतिभाशीलों को अपना जीवन जीना चाहिए। हीरो या आइकाँन बनना सरल है, पर जब जीवन के कुछ कुत्सित पक्ष सामने आते हैं, तो सारा समाज तो पहले सिर आँखों पर बिठाता था, थू-थू करता दिखाई देता है।

आज के युग में सबसे बड़ संकट यदि कोई है तो वह है मनीषियों के, प्रकाशस्तंभों के अकाल का संकट। नेता तो बहुत है, पर सृजेता कहीं दिखाई नहीं पड़ते। आज का नैतिक पतन हुआ ही इसलिए है कि जनता भ्रष्ट आचरण ही चारों ओर देखती है, उसे कहीं कोई मार्गदर्शक तंत्र दिखाई ही नहीं देता। युग निर्माण अभियान, गायत्री परिवार का सारा पुरुषार्थ, विभूति महायज्ञ की सारी प्रक्रिया उसी मार्गदर्शक तंत्र को जाग्रत्-जीवंत करने हेतु है, जो कभी समाज का पुरोहित था, अग्रगमन करता था, अपने आचरण से (स्वे-स्वे आचरण शिक्षयेत्) शिक्षण देता था। श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक कितना युगानुकूल है। इसे आज की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में भलीभाँति समझा जा सकता है। यह मनुष्य जाति नैतिक पतन द्वारा नष्ट-भ्रष्ट न हो जाए, इसीलिए श्रीमद्भगवद्गीता युगों-युगों से यह शिक्षण देती चली आ रही है कि ऐसे महामानवों के उत्पादन की प्रक्रिया बंद नहीं होनी चाहिए। राष्ट्र की संगठनात्मक प्रक्रिया नैतिक आधार पर बलती हो और अनुशासन, चारित्रिक महानता, ब्राह्मणोचित जीवन जैसे सद्गुण सामाजिक सीढ़ी के ऊपरी डंडे से निचले डंडे तक उतरे दिखाई दें। क्राँति तब ही हो पाती है। वह नीचे से ऊपर की ओर श्रेष्ठ के अनुकरण की छूत की तरह रुख लेती बढ़ती चली जाती है। विकास ऊपर से नीचे निम्नतम व्यक्ति तक उतरता चला जाता है। आज के युग के विकास का आधार भी यही आदर्श हो सकता है।

भगवान् यहाँ बड़ा स्पष्ट कह रहे हैं कि आम जनता, नेता लोग जो कुछ कहते हैं उसका नहीं, लेकिन जो भी कुछ करते हैं, उसी का अनुकरण करती है, (लोक स्तदनुवर्तते) स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण अपने बारे में भी यही बात अगले श्लोकोँ में कहते हैं कि वे स्वयं को अपवाद न मानते हुए कहते हैं कि यद्यपि संसार में उनके लिए प्राप्त करने को कुछ भी नहीं है, न ही कुछ उन्हें अप्राप्त है, सभी कुछ सुलभ है तो भी वे अथक रूप में निरंतर कार्य करते रहते हैं। यदि वे प्रमाद बरतेंगे तो अन्य लोग भी उनका अनुसरण कर अपना जीवन नष्ट कर बैठेंगे।

न में पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एवं च कर्मणि॥

“हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ (निरत रहता हूँ, विश्वास करता हूँ)।”

कितना स्पष्ट मार्गदर्शन है, राजकुमार अर्जुन के लिए। भगवान् स्पष्ट कह रहे है कि मैं अवतार हूँ। मैं जो चाहूँ वह प्राप्त कर सकता हूँ, फिर भी कर्म करता हूँ। भगवान् जब कर्म से विरत नहीं रह सकते, तो फिर मनुष्य कर्म से कैसे दूर भाग सकता है? वे कहते हैं कि यदि मैं सावधानीपूर्वक हर तरह से सोच-समझकर कर्म न करूं, तो बड़ी हानि हो जाएगी। क्या समाज का नैतिक पतन हो जाएगा? यहाँ यह समझना पड़ेगा कि अवतार को शरीर के स्तर पर उतरकर व्यवहार करना पड़ता है, अवतार बनकर नहीं। क से कबूतर बनाने के लिए शिक्षक को क बनाना पड़ता है, पूरा बनाकर दिखाना पड़ता है। ऐसा नहीं कि कह दिया कि कबूतर तो तुम जानते ही हो। शिक्षक बार-बार बनाता है, इसका मतलब यह नहीं कि उसे आता नहीं। उसे सिखाना है, इसलिए बार-बार शिक्षण देना पड़ेगा। अवतार स्वयं इंसान के स्तर पर उतरकर काम करके दिखाता है कि देखो हम ऐसा कर रहे है, तुम भी ऐसा करो। यही है लोकसंग्रह-लोकशिक्षण। पूर्ण जिंदगी जीकर दिखाना। जीवन को कलाकार की तरह जीना। परमपूज्य गुरुदेव ने घर-गृहस्थी में रहकर जीवन जीकर दिखा दिया। आप वैराग्य नहीं ले सकते, हिमालय नहीं जा सकते, संन्यासी नहीं बन सकते तो कोई बात नहीं। गृहस्थ में रहकर लोकसेवा कैसे की जाती है, गृहस्थ को तपोवन कैसे बनाया जाता है, इसका उदाहरण मैं स्वयं जीकर दिखाता हूँ, यह गुरुदेव ने कहा व किया। कम पैसे में जकीर, ओढ़ी हुई गरीबी वाला जीवन जीकर कैसे जिया जा सकता है, यह भी परमपूज्य गुरुदेव ने सीमित साधनों में युग निर्माण योजना खड़ी करें दिखा दिया। करोड़ों व्यक्तियों के मानस को बदलना, करोड़ों व्यक्तियों, के भाग्य की दिशाधारा को बदल देना और उसके लिए स्वयं नमूना बनकर दिखा देना, यह हमारी गुरुसत्ता के बल का ही कार्य था। वे जानते थे कि वे कौन है, किसलिए आए है, किन्तु हम सबके स्तर उतरकर लोकशिक्षण दे गए कि लोकसेवी ऐसा जीवन जीता है। आज लाखों सद्गृहस्थ आध्यात्मिक प्रगति की दिशा में अग्रगमन कर रहे है, अपना अकेले का नहीं, अपने साथ परिवार संस्था, पूरे समाज का उत्कर्ष कर रहे हैं, यह कितनी बड़ी बात है।

अवतार, गुरु, महामानव वास्तव में डिमाँस्ट्रेशन के लिए आते हैं। जीवन जीने की कला का शिक्षण देने आते हैं। अपने रोजमर्रा के जीवन की समस्याओं का समाधान कैसे खोजा जाए, इसका शिक्षण अपने आचरण से देने आते हैं इसीलिए बार-बर स्वाध्याय के क्रम में हमें कहा जाता है कि हम उनके जीवनक्रम को पढ़ें, मनन करें, भलीभाँति हृदयंगम करें। मनुष्य-मनुष्यता सीख सके, इसके लिए अवतार वह सब करके दिखाता है जिसका समाना किसी भी मनुष्य को करना पड़ सकता है। भगवान् अगले ही श्लोक में कहते हैं कि यदि मैं कर्म न करूं, तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएंगे और मैं संकरता को (व्यक्तियों में भ्रम उत्पत्ति) जन्म देने वाला बन जाऊँगा तथा जाति के रूप में उनके नाश का कारण बनूँगा।

अगले दो श्लोक बड़े महत्वपूर्ण हैं। श्री भगवान् 25वें तथा 26वें श्लोक में कहते है-

सक्ताः कर्मण्यविद्वाँसो यथा कुर्वन्ति भारत। कुयाद्विद्वाँस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसड्ग्रहम॥

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानों कर्मसगिंनाम्। जोषयेर्त्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥

“जैसे अज्ञानी आसक्ति पूर्वक कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को बिना आसक्ति के लोकसंग्रह की दृष्टि से कर्म करना चाहिए। ज्ञानी को चाहिए कि वे कर्मासक्त ज्ञानियों में बुद्धि भ्रम पैदा न करें उन्हें चाहिए कि स्वयं कर्चों को भलीभाँति संपादित करते हैं वे दूसरों को भी कर्म करने की प्रेरणा दे।”

भगवान् कह रहे है कि स्वयंसेवी स्तर के लोकसंग्रह (लोकशिक्षण) के कार्यों का संपादन भी उतनी ही कुशलता और जागरुक मनोयोग के साथ किया जाना चाहिए, जितनी कि जागरुकता और मनोयोग के साथ हम साँसारिक लाभों के लिए प्रयास करते हैं। जितनी लगन के साथ एक अज्ञानी अपनी वासना की तृप्ति में लगा है, पैसा कमाने में लगा है, उतनी ही लगन के साथ ज्ञानी से लोकसंग्रह में लगे रहने की अपेक्षा की है। भगवान् यह भी कहते हैं कि ज्ञानी को चाहिए कि जो व्यक्ति कामनाओं के दबाव में अहंकार के व अभिभूत हो घोर कर्म में लगे हैं, ऐसे व्यक्तियों के हृदय में किसी भी प्रकार की भाँति उत्पन्न करना ठीक नहीं है। ज्ञानी स्वयं अपना कर्म करे, दूसरों को भी कर्म करने की प्रेरणा दें। श्रीकृष्ण का मत है कि कर्मण्यता एक पवित्र शक्ति है। इच्छापूर्ति के लिए उत्साहपूर्वक अहंकार भाव से यदि कोई कर्म करता है, तो उन्हें रोकिए मत। एक बार यदि वे अपने पुरुषार्थ में ढीले पड़ गए, तो वे घोर तम से घिर जाएँगे ज्ञानी जनों को धीरे-धीरे अपना उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उनके साथ मिल-जुलकर प्रयत्न करना चाहिए, उन्हें निस्स्वार्थ पूर्वक समाजसेवा में प्रवृत्त होने के लिए प्रेरित करते रहना चाहिए।

उपर्युक्त दोनों श्लोक बड़े गूढ़ अर्थों वाले हैं। इनमें एक बात बड़े महत्व की आई है, वह है सही अर्थों में ज्ञानी की परिभाषा। ज्ञानी कौन है? परमात्मा के स्वरूप में अटल जो स्थित है वह ज्ञानी है। जो ईश्वरत्व को जानता है, जीता है, वह ज्ञानी है। वह ज्ञानी है, जो निरंतर लोकशिक्षण करता रहता है। अपने आचरण से शिक्षण देता रहता है। यह नहीं देखता कि और लोग क्या कर रहे हैं। जो औरों की उनके कर्मों में अश्रद्धा नहीं पैदा करता, बल्कि सतत् अच्छा काम परोपकार कार्य करने की प्रेरणा देता है, वही सच्चा ज्ञानी है।

हम सभी एक दुर्गुण के शिकार हो जाते हैं। वह है औरों को देखकर उनके बारे में अधिक सोचना। हम क्या कर रहे हैं, यह न सोचकर यह सोचना कि वह यह क्या कर रहा है, क्यों कर रहा है। यदि हम सब अपने कर्म के बारे में सोचने लगें, तो वास्तव में हमारा कल्याण हो जाए, क्योंकि सोचते-सोचते कहीं-न-कहीं तो कर्मों में सुगढ़ता आ ही जाएगी। श्री अरविंद का पांडिचेरी में आश्रम है, वहाँ एक सज्जन हमें मिले। उन्होंने हमें बताया कि आश्रम में आपको चिंतित लोग अधिक दिखाई देते हैं। हमने कहा, हाँ! कई लोगों के माथों पर सिलवटें दिखाई देती हैं। वे बोले, इसलिए चिंतित हैं कि और लोग क्या करते हैं। वे इसलिए चिंतित नहीं हैं कि वे क्या करते हैं। ये मात्र दूसरों को देख-देखकर परेशान होते रहते हैं। लोकसंग्रह करने वाला, लोकशिक्षण करने वाला निरंतर काम करती हैं, औरों को देखकर परेशान नहीं होता।

काम सभी श्रेष्ठ हैं। प्रवचन करना भी, लेखन भी, झाड़ू लगाना भी, बरतन माँजना भी, ढपली बजाकर प्रज्ञागीत गाना भी तथा क्राँतिकारी विचारों को जन-जन तक पहुँचाना भी। रामकृष्ण परमहंस का एक नौकर था रसिक भंगी। वह सफाई करता था, झाड़ू लगाता था। उनके सामने भी लगाता था। क्रमशः ठाकुर समाधिस्थ हो गए। विश्वविजयी यात्रा के बाद आए उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद समाधिस्थ हो गए। अब ब्रह्मानंद जी अध्यक्ष थे रामकृष्ण मठ के। प्रथम अध्यक्ष के रूप में वे बैलूर मठ में रहते थे। रसिक अंगी दक्षिणेश्वर के मंदिर परिसर में यथावत झाड़ू लगाता रहा। बूढ़ा हो गया। अंतिम समय में उसे अनुभूति हुई कि ठाकुर हमें रथ से लेने आए हैं। ऐसा कहते हुए मरणासन्न स्थिति में बोलते-बोलते वह खड़ा होकर ऐसे चला गया, मानो वास्तव में रथ में बैठकर गया हो। ठीक यही अनुभूति उसी समय गंगा-पार बैलूर मठ में स्वामी ब्रह्मनंद जी को भी हुई। उन्होंने तुरंत अपने सामने बैठे लोगों को बताया कि देखो ठाकुर आए हैं, रसिक भंगी को लेकर रथ में बिठाकर ले जा रहे हैं। परमहंस तत्व को वह कैसे प्राप्त हो गया, इस गूढ़ रहस्य को स्वामी जी ने समझाया कि उसकी साधना में गहराई थी। कर्म उसने पूजा मानकर किया, जो उसे पूर्णता की ओर ले गया। सफाई करते-करते जब लक्ष्य प्राप्ति रसिक भंगी को हो सकती है, रैदास को जूता गाँठते-गाँठते हो सकती है, सिखों के गुरु अर्जुन देव जी को बरतन माँजते हुए हो सकती है, तो हम सभी को हो सकती है, यदि हम उसे श्रेष्ठतम कर्म मानकर चलेंगे, गुरु का दिया दायित्व मानकर निभाएँगे।

शांतिकुंज आश्रम में एक भाई हैं, जिनकी पदचाप हमें दो-ढाई बजे उठते ही सुनाई दे जाती है। नियमित रूप से उनकी झाड़ू लगाने की आवाज सुनाई देती है। 1679 से हम उन्हें देख रहे हैं सामने का सारा हिस्सा (जो अब पीछे सप्तऋषि आश्रम की ओर है) अस्पताल की तरह वे साफ करके तब रख देते हैं, जब कोई उठता नहीं है। हमने उनसे पूछा कि आप यह क्यों करते हैं, तो उन्होंने कहा कि गुरुदेव कह गए थे। सबेरे उठकर सबसे पहले झाड़ू लगाना। तब से हम यह कर रहे हैं। यह आदमी परम सत्य को प्राप्त हो जाएगा, निश्चित है, क्योंकि उसने गुरु के दिए कार्य को अपना कर्तव्य मानकर सँभाल लिया। जो पचास तरह की बातें शास्त्रार्थ की झाड़ते हैं, दुनिया भर का प्रवचन देते हैं, हो सकता है उन्हें अभी कई जन्म लेने पड़े। सत्ताइसवें श्लोक से आगे की बात कि कोई कर्म किस विवशता से करता है, अगले अंक में।


सँवारने और तराशने वाला दिव्य वात्सल्य

समाचार किसे कहते हैं ? पत्रकारिता पढ़ने वाले विद्यार्थियों से पूछा जाता है। छात्र जो भी उत्तर देते हैं, उन पर अपनी राय देते हुए व्याख्याता समझाते हैं कि जो विलक्षण है, असहज है और अपवाद है, वही समाचार है। अगर कुत्ता आदमी को काटता है तो यह खबर नहीं हैं। आदमी कुत्ते को काट ले तो वह खबर है। इस परिभाषा को आगे बढ़ते हुए पत्रकारिता के सामान्य विद्यार्थी और विशिष्ट पुरोधा तक सभी अस्वाभाविक, विलक्षण और बहुत कुछ विद्रूप की तलाश करते हैं। उसे उभारने और रोचक ढंग से लिखने का प्रयत्न करते हैं।

पत्रकारिता इसके अलावा सूचना देने का माध्यम भी है। राजनीति, कला, साहित्य, संस्कृति, समाज, खेल, व्यापार आदि क्षेत्रों में जो घट रहा है, उसका प्रामाणिक विवरण देना भी इस माध्यम का एक पहलू है। सूचनाएँ देना और विकृतियों विलक्षणताओं का वर्णन-विश्लेषण करना पत्रकारिता है। मध्यप्रदेश के एक प्राचीन तीर्थ में कस्बाई अखबार से इस क्षेत्र में प्रवेश कर रहे एक नवयुवक से गुरुदेव ने कहा था कि तुम प्रचलित परिभाषाओं में ही मत उलझ जाना। समाज को संस्कार देना भी पत्रकारिता का धर्म है। मनुष्य की चेतना को ऊँचा उठाने वाले जो भी प्रयास हो रहे हों, उन्हें लोगों को बताना भी पत्रकार का कर्म है। एक साधु यदि बहते हुए बिच्छू को बार-बार बचाता है और उसका दर्द सहते हुए भी उसे नहीं छोड़ता, तो यह समाचार क्यों नहीं होना चाहिए। विदाई सम्मेलन से पूर्व परमपूज्य गुरुदेव उस नगरी में आए थे। वहाँ हुए महायज्ञ में ही शिष्य ने अपने संकल्प की सूचना दी थी कि लेखक-पत्रकार बनना चाहता हूँ और अखबार में काम शुरू भी कर दिया हैं।

“अपने संकल्प को महाकाल की युग-प्रत्यावर्तन प्रक्रिया की एक चिंगारी समझ सको तो स्वयं को धन्य पाओगे।” गुरुदेव ने कहा था और फिर यह भी कि भगवान् ने चाहा, तो इस माध्यम को स्नुवा-आचमनी और हवन पात्रों की तरह उपयोग भी कर सकोगे। तब कौन जानता था कि भगवान् ने यह चाह लिया है। गुरुदेव की लीला का गान करते यह आराधन कहीं आत्मश्लाघा न हो जाए, यह डर लगता है। इस साधक की तरह सैकड़ों-हजारों लोगों को उनकी लीला में गीली मिट्टी की तरह उपयोग में आने का सौभाग्य मिला होगा। गुरुदेव ने उन्हें जैसा चाहा, बनाया और दायित्व सौंपे।

महायज्ञ में प्रेरणा या निर्देश के बाद समय आगे बढ़ता है। वह नवयुवक अखबार बेचने, प्रूफ पढ़ने, खबरें लिखने, कंपोज करने जैसे विभिन्न काम करता है। जून 1679 में गुरुदेव मथुरा छोड़कर अज्ञातवास चले गए। वंदनीया माताजी शांतिकुंज से युगदेवता के भिक्षुओं को स्नेह-दुलार बाँटने लगीं। इस युवक ने मान लिया कि गुरुदेव के प्रत्यक्ष दर्शन या संपर्क में आना अपने नसीब में अब शायद नहीं है। अखबार से जुड़े हुए हर तरह के काम करते हुए प्रसन्नता ही होती थी कि उन्हीं का आदेश पालन किया जा रहा है।

1672 में अपने ही क्षेत्र से प्रकाशित एक दैनिक के गणतंत्र दिवस विशेषांक में एक लेख छापा। लेख अपने इष्ट-आराध्य के संबंध में ही था, क्या लिखा था, क्या दृष्टि थी, वह अब याद नहीं है। इतना जरूर याद है कि इसमें गुरुदेव के प्रति शिकायत और थोड़ी-सी आलोचना भी थी। आलोचना का स्वर उस पुत्र की तरह था, जिसे पिता किन्हीं दूसरी जिम्मेदारियों के कारण छोड़ गया हो। होंगी जिम्मेदारियाँ बड़ी, लेकिन पिता के निर्णय से पुत्र का मन तो आहत हुआ है। खैर, स्वर जो भी रहा हो, लेख छपने के सप्ताह भर बाद वंदनीया माताजी का पत्र आ गया।

परमपूज्य गुरुदेव के लीला-प्रसंगों के इस अंक के संस्करण को दो भागों में बाँटा है। प्रस्तुत अनुभूति ‘ज्योतिर्मय’ नामक एक ऐसे साधक की है, जो आगर मालवा से उभरकर आया एवं गुरुदेव का वात्सल्य-मार्गदर्शन पाकर प्रज्ञा अभियान, युग निर्माण योजना का उपसंपादक भी बना। अभी उसी स्तर पर वह शाँतिकुँज के लिए पूर्णतः समर्पित हो दिल्ली में पत्रकार जगत् में सक्रिय है। प्रस्तुत है उन्हीं की लेखनी से उनकी अनुभूति।

आशीर्वाद के साथ आश्वासन भी कि गुरुदेव का संरक्षण-सान्निध्य मिलता रहेगा, हो सके तो अपने आपको उनके हाथ में सौंपने की मनःस्थिति बनाओ। तैयारी करो।

इस निर्देश-आदेश की परिणति शांतिकुंज बुलाए जाने के रूप में हुई। आगे क्या करना है? इस बारे में कुछ भी तय नहीं था। रास्ते में बहुतेरे सवाल उठे। क्या करेंगे? माताजी क्या कहेंगी? वहीं रहना है या कोई शिक्षण-प्रशिक्षण लेकर लौट आना है? गुरुदेव अपने स्पर्श और सान्निध्य से कुछ- का-कुछ बनाकर भेजेंगे या की गई शिकायत के लिए डाँट खानी पड़ेगी। सैकड़ों प्रश्न उठे होंगे, लेकिन सभी धूल कणों की तरह कुछ देर तैरते रहते और अपने आप बैठ जाते थे। प्रश्न जिस तरह उठते, उसी तरह तिरोहित भी हो जाते।

1679 में सितंबर महीने की कोई तारीख थी। शाँतिकुँज में पूज्य गुरुदेव ओर वंदनीया माताजी का एक साथ आदेश हुआ, कुछ समय यहीं रहो। लेखन का अभ्यास करो। उसी तीर्थनगरी में हुए महायज्ञ और उस अवसर पर मिले आश्वासन की याद आ गई। गुरुदेव ने क्या कहा, उसे सुनते हुए मन, बुद्धि, चित और अंतःकरण में कितने ही भाव, विचार, संकल्प-विकल्प और संस्कारों की हिलोरें उठने लगीं। यहीं रहने का मन बना लिया। मन बना क्या लिया वह पहले ही तैयार था।

घर से माता−पिता ने कई बार पत्र लिखकर पूछा। कब तक वहीं रहना है। उस बारे में गुरुदेव से कुछ पूछने का साहस ही नहीं होता। एक ओर यह उद्दंडता का परिचायक भी लगता था, दूसरी ओर यह डर भी था कि कहीं जाने के लिए कह न दें। उधर माता-पिता के पत्रों का दबाव भी था। अजीब असमंजस की स्थिति थी। एक दिन गुरुदेव ने स्वयं ही कहा, तुम्हारे माता-पिता सोचते होंगे कि लड़का कब तक वहाँ रहेगा? फिर उत्तर सुनने के लिए रुके बिना, तुम्हारा अपना क्या मन है? युवक ने कहा, कुछ सोचा नहीं है। मैं लेखक-पत्रकार बनना चाहता हूँ।

गुरुदेव ने कहा, तब तो हम लोगों का अच्छा साथ रहेगा। मैं भी लेखक और पत्रकार ही हूँ। सचमुच स्वयं को यही मानता हूँ सिद्ध योगी मानते हैं, संत समझते हैं, गुरुदेव कहते हैं, आचार्य और विद्वान् कहते हैं, स्वतंत्रता सेनानी और समाज-सुधारक के रूप में भी देखते हैं, लेकिन स्वयं अपने आपको लेखक ही मानता हूँ। उन्नीस-बीस वर्ष के इस युवक का उत्साह बढ़ाने के लिए गुरुदेव जिस तरह व्यथित कर रहे थे, उससे अपने आप पर बहुत शर्म आ रही थी। कोल- किरातों और आदिवासियों का मनोबल बढ़ते हुए भगवान् राम ने जिस तरह अपने आपको उन्हीं की जीवनशैली में ढाल लिया। इसे भगवान् की महिमा और कोल- किरातों का सौभाग्य लिखने- बताने में किसी को संकोच नहीं होगा। लेकिन इस समय उन जंगली लोगों की आँखें धरती में ही क्यों गड़ी जा रहीं थीं, वे नजरें क्यों नहीं उठा पा रहे थे, उसकी अनुभूति गुरुदेव को सुनते हुए हो रही थी। गुरुदेव ने कहा, घर जाकर क्या करोगे? कहीं नौकरी ही करोगे न। पिता के व्यवसाय में हाथ बँटा लोगे। उन पचड़ों में पड़ने के बजाय यहीं रहो। सुख-सुविधाएँ नहीं हैं, लेकिन रूखे-सूखे की कमी नहीं रहेगी, गुजारा कैसा भी हो। यह मान सकते हो कि हम सब एक ही नाव के सवार हैं।

गुरुदेव के ये आश्वासन वरदान की तरह लग रहे थे। माता-पिता को अपने संकल्प के बारे में बता दिया। उन्होंने भी मान लिया। करीब दस वर्ष तक गुरुदेव के प्रत्यक्ष सान्निध्य में रहने का सौभाग्य मिला। उनसे पाया था, उसे दूसरों में बाँटने के लिए उन्हीं के निर्देशानुसार आश्रम से बाहर की दुनिया में प्रवेश किया, जो कुछ हो सका या नहीं हो पाया, उसकी दास्तान सुनाने की जरूरत नहीं हैं घटनाएँ और तथ्य बहुत हैं। उनमें से तीन-चार का विवरण पर्याप्त है।

पूज्य गुरुदेव और वंदनीया माताजी के सान्निध्य में रहते हुए घर जाने का मन बहुत होता था। साल में एकाध बार आठ-दस दिन के लिए जाना होता। माता-पिता का मन नहीं भरता था। कभी-कभार अपने परिवार को देखने वे भी आ जाते। सन् 1679 में पिताजी को एक गंभीर बीमारी ने घेरा। काफी इलाज कराया, लेकिन कोई लाभ नहीं। एक अवस्था यही आ गई कि सब निराश हो चले। बीच-बीच में उन्हें देखने जाना होता था। उनके संबंध में अंतिम संवाद टेलीग्राम के रूप में आया। गाँव-कस्बों की संस्कृति में व किसी की हालत गंभीर होने का तार भेजने का अर्थ था, निधन की सूचना। तार पढ़कर गुरुदेव के सामने ही रुलाई फूट पड़ी। उन्होंने कहा, तुरंत घर चले जाओ। तुम्हारे पिता की मृत्यु नहीं हुई है, तुम उनके साथ चालीस दिन रह सकोगे। उनकी सेवा करना। वे तुमसे संतुष्ट होने के बाद ही संसार छोड़ेंगे। घर जाना हुआ, तो पाया कि पिता रोग से बुरी तरह आक्राँत हैं माँ और भाइयों ने बताया कि अचानक हालत बिगड़ जाने के बाद ही तार किया था। बहुत याद कर रहे थे। अचानक उनकी स्थिति में सुधार आ गया है। अब वे चिंतित और दुखी नहीं हैं। अपने पौत्र को देखकर प्रसन्न हैं। चार-छह दिन बार उन्हें लेकर बाजार भी जाने लगे हैं। शाँतिकुँज से घर आने के करीब पाँच सप्ताह बाद उनकी हालत बिगड़ने लगी। चार-पाँच दिन बाद वे चल बसे।

सन् 1679 में इन पंक्तियों के लेखक को गंभीर हृदय रोग ने आ घेरा। माइटल स्टिनोसिस नाम की इस बीमारी का इलाज ऑपरेशन के सिवा कुछ था ही नहीं। गुरुदेव ने हमेशा यही कहा कि इसकी कोई जरूरत नहीं। जब तक हम इधर हैं, इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। तो भी ऑपरेशन नहीं होगा, एकाध बार कोशिश की भी सही, ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में भरती भी हुआ, लेकिन ऑपरेशन टल गया। 1679 में हृदय में आघात हुआ। तब भी कुछ नहीं बिगड़ा। डॉक्टर ने तब भी कहा कि ऑपरेशन करा लेना चाहिए। गने तब भी कहा, जरूरत नहीं हैं, जिस समय कहते हैं शरीर निष्प्राण था, गुरुदेव ने वक्षस्थल पर हाथ रखा और हलकी धड़कनें लौट आई। उस आघात के तीन-चार दिन बाद शांतिकुंज में गुरुदेव ने अपने कक्ष में बुलाया। तीसरी मंजिल तक आराम से सीढ़ियाँ चढ़ लीं।

गुरुदेव ने कहा, जब तक मैं उस शरीर में हूँ, तब तक रोग तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ जाएगा। उसके बाद भी लंबे समय तक ठीक-ठाक ही रहोगे। आयु पूरी होने के बाद ही जाना है। असमय मृत्यु नहीं होगी। हो सकता है पंद्रह-बीस साल बाद रोग फिर उभरे, लेकिन सब ठीक होगा, चिंता करने की जरूरत नहीं है। अपने काम पर ध्यान दो। सन् 1679 के बाद रोग ने फिर नहीं सताया। गुरुदेव ने 1660 में शरीर छोड़ा। चार-पाँच साल बाद कुछ परेशानी होने लगी। 1669 में एक मामूली ऑपरेशन की जरूरत पड़ी, उसकी व्यवस्था भी सहज ही बन गई। ऐसा लगा मानो सारी व्यवस्था पूज्यवर कर रहें हैं। शरीर फिर अपने ढर्रे पर काम करने लगा। यह रहस्य अभी तक समझ में नहीं आया है कि 1669 में आश्विन नवरात्रि शुरू होते ही रोग ने हमला क्यों किया, तुरत-फुरत इंतजाम हो गए, डॉक्टर जिस ऑपरेशन को जटिल मान रहे थे और कुछ भी होने की आशंका कर रहे थे, वह सहज ही कैसे संपन्न हो गया। ऑपरेशन के समय कुछ दृश्य मानस पटल पर उभरकर आ गए। उनमें एक शांतिकुंज में समाधि के पास खड़े गुरुदेव आश्वस्त करते दिखाई देने का है। दूसरी अनुभूति अपने आस-पास यज्ञ के समय व्याप्त होने बाली सफगंध की है और तीसरा दृश्य स्मित उल्लास बिखेरती हुई एक आकृति का हैं।

गुरुदेव की किसी ऐसी लीला का स्मरण इन पंक्तियों के लेखक को नहीं है, जिन्हें, रोमाँचित करने वालो की श्रेणी में न रखा जा सकें किन्हीं सौभाग्यशालियों को वैसे अनुभव हुए होंगे, लेकिन यह भी कम बड़ा सौभाग्य नहीं है कि गुरुदेव मार्गदर्शक, संरक्षक और उद्धारक के रूप में पल-पतिपल अपने चारों ओर व्याप्त दिखाई दिए। उस लिखी प्रतिनिधि घटनाओं की तरह कितनी ही अनुभूतियाँ हैं। वे सभी इस आस्था को दृढ़ करती हैं कि गुरुदेव ने लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में कुछ दायित्व सौंपे हैं। उन दायित्वों को पूरा करना है। सफलता मिलती है या नहीं, यह गुरुदेव ही जानें।

वर्षों से पत्रकारिता की राष्ट्रीय मुख्य धारा में रहते हुए जो कुछ किया जा सका, उसके लिए स्वयं को संतोष नहीं होता। फिर भी दो-एक बातें कही जा सकती है। एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि अब अखबारों को अपने यहाँ धर्म संवाददाता-संपादक की जरूरत महसूस होने लगी है। लोग ‘रिलीजनय एडीटर’ रख रहे। इसलिए कि समाज के जीवन में बह रही धर्मधारा को अनदेखा नहीं किया जा सकता। उसे नोटिस में लाने योग्य बनाने का श्रेय किसी को जाता है, तो वह आचार्य श्रीराम शर्मा का स्कूल (विद्या परंपरा) ही है। गुरुदेव ने अपने कुछ शिष्यों को इस प्रयोगशाला में गढ़ा और सँवारा हैं। गुरुदेव के सान्निध्य में जिन दिनों लेखन-प्रशिक्षण चलता था, उन दिनों की कुछ बातें अविस्मरणीय हैं। इस अकिंचन ने एक साहित्यिक पत्रिका में ईश्वर की मृत्यु हो जाने की घोषणा करता हुआ लेख लिखा था। लेख छपा और कई लोगों ने हो-हल्ला मचाया। गुरुदेव से शिकायत भी कि हम लोग जो लिखते और कहते हैं, यह उसके विरुद्ध जाता है। लिखने वाले को रोकना चाहिए। गुरुदेव ने लेख पढ़ा, पढ़कर मुस्कराए और कहा, यह किसी के विरुद्ध नहीं है, बल्कि एक वैचारिक बहस का आमंत्रण है। अखण्ड ज्योति में भी इस विषय पर कुछ छपना चाहिए। नास्तिकता, ईष्वरवीयश्वास के दुरुपयोग और प्रच्छन्न वास्तविकता आदि विषयों पर गुरुदेव ने स्वयं तीन-चार लेख हैं। किसी भी अभिभावक, आचार्य अथवा गुरु में है इस तरह का साहस और खुलापन?

काली परछाइयों से मत डरो। वे बताती हैं आसपास ही कहीं प्रकाश की सत्ता मौजूद हैं।


हम कहीं भी रहें, सभी पर प्यार उड़ेलते रहेंगे

(परमवंदनीया माताजी के महाप्रयाण दिवस पर विशेष)

आश्विन मास प्रायः सितंबर माह में ही आता है। यही वह समय है, जिसे हर वर्ष पारिवारिक स्तर पर शक्ति-स्वरूपा माताजी आश्विन कृष्ण त्रयोदशी को परमपूज्य गुरुदेव के जन्मदिवस के रूप में तथा परमवंदनीया माताजी के जन्मदिवस के रूप में आश्विन कृष्ण चतुर्थी को पूज्यवर साँकेतिक ढंग से मनाते थे। दोनों ही दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त के दो घंटे प्रतीकात्मक भेंटों के आदान-प्रदान तथा उसे पूज्य-प्रक्रिया में निकलते, जिसे बाहर बहुत कम लोग जानते हैं। दो महान् सत्ताओं का एक−दूसरे के प्रति समर्पण कितना उच्चस्तरीय होता है, उसे हमने देखा व आत्मसात किया है। एक कष्ट की बात यह कि हमारी मातृसत्ता ने इसी मास के शुभारंभ महालय भाद्रपद पूर्णिमा को अपने स्थूल शरीर के महाप्रयाण हेतु भी चुन लिया। सारा निर्धारण पूर्व से हो गया था। शारीरिक कष्ट से लेकर पीड़ित-उपचार के प्रयास निमित्त मात्र बने थे। आज छह वर्ष बीतने पर भी सभी कुछ मानो आँखों के सामने एक दृश्यचित्र-फिल्म की रील की तरह घूम जाता है।

कुरुक्षेत्र अश्वमेध यज्ञ के पूर्व एक सप्ताह की लंबी दूरी तब बड़ी कष्टप्रद लगने लगी थी, जब 1664 के मार्च माह में अमेरिका प्रवास पर जाना पड़ा था। लौटते समय सीधे कुरुक्षेत्र आने का आदेश मिला, जहाँ पंद्रहवाँ अश्वमेध यज्ञ अप्रैल माह के प्रथम सप्ताह में आयोजित था। नई दिल्ली उतरते ही सीधे कुरुक्षेत्र पहुँचना था, जहाँ परमवंदनीया माताजी पूर्व से ही जीजी से साथ पहुँच चुकी थीं। प्रायः बीस दिन बाद उन्हें देखा तो लगा कि परमवंदनीया माताजी इस बीच काफी बदली-सी लग रही हैं। शरीर में उत्साह तो वैसा ही है, जैसा पूर्व में था। प्रभा मंडल भी बढ़ा हुआ है, परंतु मन बार-बार कहीं और चला जाता है। काफी देर तक वे परमपूज्य गुरुदेव के चित्र को देखती रहतीं। मौन बैठी रहतीं। दो-तीन बार पूछा भी तो उनने हाथ आगे कर दिया। कहा, सब ठीक है, तुम नब्ज़ देख लो। हँसी वही, मस्ती वही, ममत्व वही, परंतु लगता था मन उचट-सा हो रहा है, बार-बार कहीं और चला जाता है।

अश्वमेध यज्ञ कुरुक्षेत्र में ही आज के कई दिग्गज राजनीतिज्ञ आशीर्वाद प्राप्त करने परमवंदनीया माताजी के पास पहुँचे थे। आज वे सभी कहीं भी दृश्य रंगमंच पर नहीं दिखाई देते, तो मात्र इसी कारण कि परमवंदनीया माताजी के पाँच मिनट के एक अंतरंग परामर्श को वे आत्मसात नहीं कर पाए। इसी महायज्ञ में एक अवधि ऐसी मिली, जिसमें समय थोड़ा खाली था। सोचा, पास में चंडीगढ़-पिंजौर बाग जैसा क्षेत्र है, उसे दिखा लाते हैं, तो माताजी स्वयं बोलीं कि प्रणव! कहीं पास में कोई ऐतिहासिक स्थान और है क्या! याद आया स्वयं कुरुक्षेत्र एक ऐतिहासिक स्थल है। वह जगह भी है जहाँ श्रीकृष्ण ने गीता का संदेश दिया, एक स्थान पर महादेव का मंदिर भी है, महाबली कर्ण के द्वारा बनाई गई एक झील भी है। वंदनीया माताजी के अनुसार कर्ण की बनाई झील ही जाने का उनका मन था, जहाँ अधिक

भीड़ न हो, बस अपने ही कुछ परिजन हों। प्रायः पचास किलोमीटर दूर स्थित इस नीरव सुँदर स्थान पर पहुँचते- पहुँचते काफिला थोड़ा लंबा हो गया। दस-बारह गाड़ियाँ हो गई व जब वहाँ जाकर किनारे बैठे तो माताजी का मन हुआ कि नाव में सभी को वे घूमते देखना चाहती हैं। परिवर्तन के लिए हमने वंदनीया स्नेह-सलिला माँ से प्रार्थना की कि वे भी हमारे साथ नाव में चलें। आपने आग्रह मान लिया और करीब पौन घंटे वे पैडल ‘बोट में झील में आनंद लेती रहीं। सभी कुछ बहुत हलकेपन से भरा-अवतारी चेतना के दैवी लीला संदेह का एक अंग लग रहा था, पर कहीं कुछ ऐसा था, जिससे आभास होता था कि माताजी यहाँ न होकर कहीं और हैं। थोड़ी देर वहाँ एकाँत मिला। पूछा तो वे बोलीं कि कुछ नहीं बेटा! अब हर क्षण उन्हीं की (परमपूज्य गुरुदेव की) याद आती रहती है। उन्हीं पलों की प्रतीक्षा कर रहीं हूँ कि कब उनसे जा मिलूँ। हमने कहा, माताजी! आप यह क्या कह रही हैं। अभी तो हमने चलना भी नहीं सीखा। आपका आँचल पकड़कर खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में आप इस तरह सोचेंगी तो कैसे काम चलेगा। माताजी ने देखा, वातावरण भारी हो रहा है, तो तुरंत हलकापन लाते हुए बोली, शैलो! कुछ खाने-जीने की चीजें साथ नहीं लाई क्या। जो कुछ भी था, वह चालीस-पचास लोगों में बाँट दिया। मुक्त हस्त से हँसते हुए कखजामं रनिनों, सलाह पर अपना प्यार लुटाने का वह स्वरूप पुनः जीवंत हो गया। थोड़ी देर में लौट आए। शप को दीप यज्ञ के बाद ही हरिद्वार लौट गए।

स्मृतियाँ बार-बार रुलाती हैं। लौट-लौटकर वे न आएँ यही उचित है, ऐसा मानकर कहा जाता है कि उस समय दिमाग कहीं और नियोजित कर दिया जाए। पर यह सब कैसे संभव हो, जब अपनी आराध्य सत्ता-जग जननी वंदनीया माताजी की बात आती हो। कुरुक्षेत्र अश्वमेध एवं चित्रकुट अश्वमेध के बीच मात्र 10-12 दिन का अंतर था। कुरुक्षेत्र? तो हरिद्वार के पास था, सड़क से ही यात्रा हो गई थी। चित्रकूट तो इसी प्राँत में, पर दूसरे कोने पर मध्यप्रदेश व उत्तरप्रदेश की सीमा पर सतना (म॰प्र॰) व बाँदा (उ॰प्र॰) जिने ककी लगती हुई सरहदों पर। व्यवस्था की गई कि शासकीय विमान हवाई जहाज परमवंदनीया माताजी को अतिथि के रूप में लेकर सतना उतरेगा एवं यहीं फिर वापस लाएगा। कुरुक्षेत्र से आने के बाद ही परमवंदनीया माताजी बहुत कुछ अपने में लीन रहने लगी थीं। अक्सर वे संगीत वाले कार्यकर्ताओं को बुलाकर भजन रिकॉर्ड कराने लगने लगती। बहुत से गीत जो अब प्रातः चरण पादुकाओं पर प्रणाम के समय अथवा पर्वों पर परमवंदनीया माताजी के स्वर में सुनाई देते हैं, ये सभी उनकी उस भाव प्रधान स्थिति में रिकॉर्ड किए गए हैं। “हे नाथ! याद तेरी पल-पल सता रही है”, “प्रभू तुझ में मैं मिल जाऊँ”, “तुम्हीं हो प्राण हम सबके, हमारी चेतना हो तुम”, “मेरा उपाय तो प्रतिपल मेरे पास है”, “आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है”- जैसे गीत जब भी बजे तक हैं, मातृसत्ता के अंदर की पीड़ा की याद दिला देते हैं। प्रायः ढाई सौ से अधिक गीता वंदनीया माताजी के स्वरों में रिकॉर्डेड हैं। इससे ही ज्ञात होता है कि गुरुवर से विलग होने के बाद उनका अंतरतम कितना तादात्म्य उनकी सूक्ष्म सत्ता के साथ ले चुका था।

चित्रकूट अश्वमेध यज्ञ 16 से 20 अप्रैल 1334 की तारीखों में था। हवाई जहाज छोटा-सा था, लगभग चार सीटों का। विमान जाँल ग्राण्ट हवाई पट्टी से दिल्ली होकर सतना जा रहा था। अचानक विमान के हवा में पहुँचते ही परमवंदनीय माताजी बोल उठीं, यह मेरी अंतिम यात्रा है। अब संभवतः मैं किसी कार्यक्रम में नहीं जा पाउँगी। हमने बिना समझे सुधारते हुए कहा, हाँ! माताजी विमान से यह अंतिम यात्रा हैं। इसके बाद तो भिण्ड (म॰प्र॰) एवं शिमला दोनों ही स्थानों पर सड़क मार्ग से ही जाया जा सकेगा। माताजी बोलीं, “बेटा! अब इन आयोजनों से जाना नहीं होगा, यह कह रही हूँ। यह अंतिम कार्यक्रम है।” बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह कैसे होगा ? सभी जगह प्रचार हो चुका है कि परमवंदनीय माताजी पहुँच रही हैं। माताजी को भी अहसास हुआ कि वे जो कह रही हैं, उससे आघात लगेगा। उनने माहौल को हलका बनाते हुए कहा कि अभी तो चित्रकूट जा रहे हैं। बाद की चर्चा से क्या करना। देखो! भगवान् राम पुष्पक विमान से अयोध्या लौटे थे, तो उन्हें हनुमान् जी सब बताते लाए थे कि कहाँ-कहाँ उनने क्या किया। तुम बताओ जितना ऊपर से देख सको, कहाँ-कहाँ क्या है? चर्चा का प्रवाह बदल गया एवं बात मिशन के लघु से विराट् तक पहुँचे स्वरूप पर जा पहुँची।

सतना पहुँचने के बाद से वापस आने तक परमवंदनीया माताजी की मनःस्थिति भाव प्रधान ही रही। चित्रकूट तीर्थ का एक स्थान उनने जी भरकर देखा। प्रत्येक में अपने आराध्य की झलक पाई। शारीरिक अशक्तता के बावजूद वे कामदगिरी भगवान् की ड्यौढ़ी तक गईं, मंदाकिनी के तट पर बैठीं एवं गुप्त गोदावरी गई। जब गुप्त गोदावरी में ऊपर जाने की इच्छा परमवंदनीया माताजी ने प्रकट की, तो परिजनों ने जल्दी से एक डोली की व्यवसायिक की व अपने कंधों पर उठा लिया मातृशक्ति की आँखों में आँसू थे बार-बार कहतीं, “मेरे बच्चों! तुम्हें बड़ा कष्ट हो रहा है। अब यहीं उतार दो।” ऐसा कहते-कहते बोल उठीं, “अब उठा तो लिया है, ऐसे ही कंधों पर सीधे अपने आराध्य के पास शीघ्र जाना भी तो है।”

आज छह वर्ष बाद ये सब बातें याद आती हैं, तो अंतरात्मा अंदर तक भग जाता है। कितना कष्ट उठाया उनने औरों की पीड़ा अपने पर ओढ़कर। यह कल्पनातीत बात है। परमवंदनीया माताजी 20 अप्रैल को लौटने के बाद धीरे-धीरे अपनी चेतना की शक्ति को सूक्ष्मीकृत करती रहीं व अंततः 13 सितंबर को उनने भी इसे स्थूल काया से महाप्रयाण कर स्वयं को सूक्ष्म में विलीन कर दिया। इसी वर्ष अगस्त माह में प्रकाशित एक संपादकीय ‘एक माँ की अंतः वेदना एवं अपेक्षा भरी गुहार’ के माध्यम से पाठकों-परिजनों तक परमवंदनीया माताजी की अभिव्यक्ति पहुँची। इसके तुरंत बाद ही पटाक्षेप हो मया।

इस वर्ष की भाद्रपद पूर्णिमा (23 सितंबर, बुधवार) आ पहुँची। परमपूज्य गुरुदेव के 1671 में दृश्यपटल से पीछे जाने के बाद उनने एक ही चीज बाँटी, प्यार-अपनत्व-ममता। बिना किसी प्रतिफल-अनुदान की अपेक्षा के कोई इतना प्यार भी कर सकता है, यह शक्तिस्वरूपा माताजी के जीवन में देखा जा सकता है। उनकी एक ही बात याद आती है जो विरासत में वे हमें दे गई हैं, “हम कहीं भी रहें, शरीर रहे अथवा न रहे, धरती पर रहें या किसी और लोक में, अपने बच्चों पर ममत्व-करुणा उड़ेलते रहेंगे।” महापूर्णाहुति की वेला में इन्हीं शब्दों की याद कर क्या हम थोड़ा-वाणी व व्यवहार में डाल सकते हैं। यही तो होगी, सच्ची श्रद्धाँजलि शक्ति-संवाहिका मातृसत्ता के प्रति।


राष्ट्र की राजधानी में एक अधविशिष्ट आध्यात्मिक सामूहिक प्रयोग

‘विभूति ज्ञान यज्ञ’! जिज्ञासा मन में उठती है कि इसकी चर्चा शास्त्रों में कहाँ है, किसने की है व इसका उद्देश्य क्या है? गायत्री परिवार अखिल विश्व में फैला है। इसने निर्णय लेकर अपनी गुरुसत्ता के निर्देशों पर इसे राजधानी नई दिल्ली में प्रायः एक लाख लोगों की उपस्थिति में संपन्न करने का सोचा है, तो निश्चित ही उसके पीछे कोई विशिष्ट उद्देश्य रहा होगा। इसका क्या कोई वैज्ञानिक आधार है? यदि है तो क्या है। तीन घंट में संपन्न होने वाले इस महा प्रयोग से दिल्ली महानगरी राज्य एवं भारत राष्ट्र के जन-जन पर इसका क्या प्रभाव होगा यह जानने की इच्छा है? इस प्रकार की कई चर्चाएँ सामने आई। आगामी माह आठ अक्टूबर रविवार की वेला में नवरात्रि संपन्न होने के ठीक अगले दिन यह विराट् समागम नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में संध्या 5 से 9 बजे होने जा रहा है। परिजनों के अनेकानेक मनुहार पत्र भी आ रहे हैं, नित्य आते चले जा रहे हैं। कई व्यक्ति विभूतियों को लेकर आना चाहते हैं। कुछ सहज इस विराट् समागम में हिस्सा लेने आ रहे हैं, कुछ विशेष प्राप्ति-उपलब्धि हेतु आना चाह रहे हैं।

आइए! पहले इन जिज्ञासाओं का समाधान करें। विभूति योग की चर्चा भगवान् कृष्ण ने गीता के दशम अध्याय में की है। विभूति योग नामक इस दसवें अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण के श्रीमुख से उस विराट् भगवत्तत्व का वर्णन आया है, जो उनके अंश रूप में सर्वत्र कण-कण में विद्यमान है। भगवान् कहते है-

एताँ विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः।

सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संषयः॥

“जो पुरुष मेरी इस परमैर्ष्वय रूप विभूति को और योग शक्ति को तत्व से जानता है, वह निश्चल भक्ति योग से युक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है।” भगवान् ने अर्जुन की जिज्ञासा के समाधान हेतु अपनी योगशक्ति व विभूति को विस्तार से बीसवें श्लोक से बयालीसवें श्लोक में वर्णित किया है। इसी में भगवान् ने स्वयं को समस्त विद्याओं में आत्मिकी-अध्यात्म विद्या के रूप में, छंदों में गायत्री मंत्र के रूप में, समस्त जीवों में उनकी जीवनी शक्ति के रूप में तथा समस्त ऐश्वर्य-काँति-युक्तियुक्त वस्तुओं में उनके अंश के रूप में उपस्थित बताया है। इसे विभूति योग के मर्म को जो भी जान ले, वही समझ सकता है, समाज में ईश्वरीय तत्व जनमानस में प्रतिभावानों के रूप में जहाँ भी विद्यमान हैं, उसे उभारना-परिष्कृत कर समाज-राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए सामने लाना ही अपने इस नई दिल्ली के विराट् समागम का लक्ष्य है।

‘ज्ञान यज्ञ’ शब्द की चर्चा भी भगवान् ने गीता में ही चौथे अध्याय में तैंतीसवें श्लोक में की है। वासुदेव श्रीकृष्ण कहते हैं, “हे परंतप अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अत्यंत श्रेष्ठ है।” (श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाजानयज्ञः परंतप) इस ज्ञान यज्ञ की महत्ता बताते हुए भगवान् कहते हैं कि ज्ञान के समान पवित्र इस धरती पर कुछ भी नहीं। इस ज्ञानरूपी नौका में बैठकर पाप-समुद्र से मनुष्य भलीभांति तर सकता है। ज्ञान रूपी अग्नि संपूर्ण कमी को भस्म कर देते हैं एवं यह ज्ञान मात्र संयमी-साधना में लगे श्रद्धावान् मनुष्य को ही प्राप्त होता है।

आज के तर्क प्रधान-बौद्धिकता प्रधान युग में इतनी लंबी व्याख्या अनिवार्य हो जाती है। यज्ञ शब्द की जब भी कहीं चर्चा चलती है, तो जनमानस जो अभी भी मध्य युग की विकृतियों से भरी परंपराओं से घिरा पड़ा है, इससे अधिक कुछ नहीं सच जाता कि जैसे अन्य स्वाहा प्रधान यज्ञ होते हैं, ऐसा ही कुछ यह भी है। जब ‘विभूति ज्ञान यज्ञ’ नाम लिया जाता है, तो इसका परिपूर्ण अर्थ बनता है, भगवान् की एकेश्वर्यवान् विभूति जो समाज में प्रतिभाओं के रूप में बिखरी पड़ी है, के द्वारा श्रद्धाभाव से उस ज्ञान की चर्चा, उस ज्ञान गंगा में अवगाहन, जो सारी विश्व-वसुधा को आज की विडंबना भरी परिस्थितियों से उबार सके। राष्ट्र भर से चुने हुए प्रायः एक लाख प्राणवान् जीवंत प्रतिभावान् जब एक उद्देश्य के लिए एकत्र होंगे एवं राष्ट्र को अपनी सामर्थ्य-प्रभाव-साधन एवं समय-संपदा का एक अंश देने के लिए व्रत लेंगे साथ में अगणित प्राणवानों की, जो उस आयोजन में सूक्ष्म रूप में भागीदारी कर रहे होंगे, वहाँ भी होंगे इस यज्ञ में मानसिक रूप से जुड़े होंगे, तो यह विश्वास किया जाना चाहिए कि इसके फलितार्थ अद्भुत होंगे।

इस विभूति ज्ञान यज्ञ के साथ समस्त उपस्थित एवं श्रोता-दर्शकों (टेलीविजन-संचार संप्रेषण तंत्र-ऑल इंडिया रेडियो- बी॰बी॰सी॰- ब्रोडकास्टिंग) द्वारा एक विलक्षण प्रार्थना प्रयोग में भागीदारी भी संपन्न होगी, जिसमें एक विराट् दीपयज्ञ स्टेडियम के प्राँगण में ही नहीं, जन-जन के घरों में शक्ति पीठों में, प्रज्ञामंडलों में, देवालयों में एक साथ संपन्न होगा। एक ही समय होने वाले प्रयोग-उपचार व मनन्वित मनःशक्ति का अद्भुत परिणाम होता है। दीप यज्ञ परमपूज्य गुरुदेव के द्वारा प्रणीत एक समूह-मन के जागरण का दिव्य प्रयोग है, जो उनने 1397-99 में अपनी जीवनावधि के अंतिम दो-तीन वर्षा में जन-जन के सम्मुख रखा। चेतना के विस्फोट से लेकर एक मन से की गई उज्ज्वल भविष्य की, सबके लिए सद्बुद्धि की प्रार्थना का चमत्कार सभी इन दीप यज्ञ प्रधान आयोजनों में देख चुके हैं ऐसा ही एक प्रयोग आठ अक्टूबर को संध्या विशिष्ट अभ्यागतों की उपस्थिति में सात बजकर बीस मिनट से आठ बजे तक संपन्न होगा एवं उसमें सारे विश्व की भागीदारी होगी।

नई दिल्ली भारतवर्ष की राजधानी ही नहीं, निर्णायक केंद्र स्थली भी है। भारत का दिल दिल्ली को कहा जाता है। दिल की धड़कन यदि सही चलें, हृदय यदि समर्थ पंप के रूप में क्रियाशील हो, तो सारा शरीर स्वस्थ रहेगा। राष्ट्र की इस हृदय स्थली में इस प्रयोग को किए जाने के पीछे मूल चिंतन यही है कि यदि राजधानी जहाँ सारा प्रशासकीय तंत्र, प्रतिभाओं का तंत्र, राष्ट्र की सर्वोच्च साँसद विद्यमान है, से यह प्रयोग आरंभ होगा, तो सबल-सशक्त नाड़ियों से इसका विधेयात्मक प्रवाह सारे विश्व को एक नई ऊर्जा देगा। इतनी बड़ी-बड़ी रैली दिल्ली में होती रहती हैं, पर उनका परिणाम नहीं निकलता। सभी भाषणबाजी, घोषणाओं में समाप्त हो जाती हैं। अपना यह महायज्ञ कोई रैली नहीं, अखिल विश्व गायत्री परिवार के व्यक्ति-परिवार -समाज निर्माण की दिशा में किए गए सफलतम प्रयोगों की जन-जन को जानकारी कराने हेतु प्रतिभाओं को, विभूतियों को उनके कर्तव्यों की याद दिलाने हेतु एवं नवयुग के आगमन का तुमुलनाद करने का लक्ष्य लेकर एक विराट् आध्यात्मिक प्रयोग है, जो कि महापुरश्चरण (बारह वर्षीय युगसंधि अनुष्ठान) की महापूर्णाहुति की वेला में किया जा रहा है। सभी जानते हैं कि महापूर्णाहुति पाँच चरणों में विभाजित की गई थी। तीन चरणों के संपन्न होते-होते सारे राष्ट्र का व विश्व भर का बड़े गहन स्तर का मंथन संपन्न हुआ है एवं विभिन्न स्तर के प्रतिभावान् संकल्पित हो सामने आए हैं। लक्ष्य है दो लाख प्रतिभावानों के द्वारा दो करोड़ व्यक्तियों का राष्ट्र के साँस्कृतिक नवजागरण हेतु नियोजन। इन्हीं प्रतिभावानों का एक छोटा-सा अंश दिल्ली में भागीदारी करेगा, शेष अपने यहाँ रहकर अथवा केंद्र में समयदान देते हुए चतुर्थ चरण के सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ (पुरुषमेध महायज्ञ-सौत्रामणी प्रयोग) की तैयारी के साथ जुटे रहेंगे।

समन्वित जनसमूह की संकल्प शक्ति का अद्भुत प्रभाव होता है। विधेयात्मक चिंतन से भरे प्रतिभावानों के मन मिलकर एक विराट् मन बन जाते हैं। जब इस विराट् मन (कलेक्टिव माइंड) के द्वारा शब्द शक्ति का प्रयोग किया जाता है, संकल्पों के साथ जुड़कर कुछ उद्घोषणा की जाती है, तो उसका प्रभाव उस स्थान विशेष नहीं, सारी धरती पर पड़ता है, इस महायज्ञ में भी पड़ने जा रहा है। भारतवर्ष के सारे विश्व का सिरमौर बनने की भविष्य वाणियाँ उस प्रयोग के बाद निश्चित ही सफल होती दिखाई देंगी, ऐसा हमारा विश्वास है।

यह विराट् आध्यात्मिक सामूहिक प्रयोग धर्म -संप्रदायों, राजनीतिक पार्टियों, वर्ग-भेदों से परे एक आयोजन है। इसका लक्ष्य है, विभिन्न विभूतिसंपन्नों (नेतृत्व क्षमता-भाव संवेदना -विचारणा-कला-अर्थ आदि) को अपनी गरिमामय कर्तव्यों का बोध कराकर उन्हें नवसृजन के किसी उल्लेखनीय कार्य में नियोजित कर देना। यह सारा आयोजन दीखता तो शाँतिकुँज हरिद्वार से संचालित है, किंतु इसमें योजना एवं शक्ति ईश्वर की, मार्गदर्शन एवं संरक्षण ऋषियों का तथा पुरुषार्थ व सहकार सभी प्रतिभावानों-श्रेष्ठ मनुष्यों का है। परमपूज्य गुरुदेव पं॰ श्रीराम शर्मा आचार्य इसके संरक्षक-प्रणेता- प्रवर्तक हैं।

इस आयोजन के द्वारा प्रज्ञा के जागरण-गायत्री के चिंतन में समावेश से नवयुग का एक आधार खड़ा किया जाएगा। आत्म शक्ति जागेगी, तो युगशक्ति निषेचित ही अवतरित होगी। यह आयोजन सभी को यह बोध कराएगा कि सहकार की ताकत सरकार से बड़ी होती है। राष्ट्र का साँस्कृतिक जागरण विभूतियों की सृजनात्मक कार्यों में भागीदारी द्वारा संभव है। यह आशावादी उमंगें जगें, उसके लिए सात आँदोलनों को गति देने के लिए विशिष्ट कार्यक्रम इस महायज्ञ में सभी को दिए जाएँगे। राष्ट्र के प्रधान, धर्मतंत्र के धर्मगुरुओं एवं समाज के जाग्रत् मनीषी तंत्र की उपस्थिति में हो रहा यह विराट् धर्मानुष्ठान दक्षिण दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में सायं 5 बजे आरंभ होकर दीपयज्ञ के साथ 9 बजे समाप्त होगा। ‘न भूँतो न भविष्यति’ जैसे इस प्रयोग में भागीदारी हेतु सभी को भावभरा आमंत्रण है।


चतुर्थ चरण का समापन होगासौत्रामणी याग एवं पुरुषमेध महायज्ञ द्वारा

आज की प्रतिकूलताओं, बढ़ती अनैतिकता-अपराधों-अराजकता को देखकर किसी का भी मन निराश हो सकता है। वह कह सकता है कि विज्ञापन के चमत्कारी आविष्कारों से भरी बीसवीं सदी के समापन की इस वेला में इक्कीसवीं से भरी बीसवीं सदी के समापन की इस वेला में इक्कीसवीं सदी के उज्ज्वल भविष्य से भरा होने की बात कहना, सत्य को झुठलाना है, मात्रा एक यूटोपिया है, झूठा आश्वासन है, स्वप्न मात्र है। सही भी हैं। परिस्थितियों के आधार पर तो यही आकलन किया जा सकता है। ग्रामीण परिवेश से लेकर शहरों-उपनगरों तक व राष्ट्र की सीमा से नेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूरे विश्व में जहाँ देखें, अस्थिरता ही में दिखाई देती है। कहीं आशा का कोई चिह्न नहीं दिखाई देता। कोई मनीषी तंत्र ऐसा नहीं दिखाई देता, जिसे देखकर कहा जा सके कि हाँ, ऐसा आशा का संचार करने वाला कोई एक प्रकाश स्तंभ है, जो चारों दिशाओं में प्रकाश-विस्तार कर आज के निविड़ अंधकार को मिटाने में सक्षम है।

निराश-अवसाद की इन घड़ियों में भी यदि चारों ओर परिवर्तन हेतु बेचैनी है, अंदर से अकुलाहट है, जन-जन के मन में चिढ़ खीज बढ़ती जाती है। जन-आक्रोश उबलता प्रतीत होता है, तो यह एक शुभ संकेत है। यह बेचैनी सभी उपर्युक्त उद्धरण इसलिए दिया गया कि हम आश्वस्त हो सके कि नवयुग के अरुणोदय की इस वेला में सुनिश्चित रूप से प्रज्ञावतार का प्रकटीकरण होने जा रहा है। अभी का अंधकार अरुणोदय के पहले घने अंधकार का क्षणिक समय मात्र है। इसे देखकर इस अवधि से गुजरते हुए हमें तनिक भी अधीर नहीं होना चाहिए। प्रसव पीड़ा होती ही कष्टभरी है एवं जब नवयुग जन्म लेने जा रहा हो, पूरी धरती उस प्रसव-पीड़ा से गुजर रही हो, तो हममें से कोई चैन से रह भी कैसे सकता है?

जरा देखें, आज से बारह वर्ष पूर्व युगसंधि महापुरश्चरण आरंभ होते समय हमारी गुरुसत्ता ने क्या कहा था, “वर्तमान समय विश्व इतिहास में अद्भुत एवं अभूतपूर्व स्तर का है। इसमें एक ओर महाविनाशी प्रलयंकर तूफान अपनी प्रचंडता का परिचय दे रहा है, तो दूसरी ओर सतयुगी नव निर्माण की उमंगें भी उछल रही हैं।” (अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1399, पृष्ठ 42) “युग परिवर्तन की, नवसृजन की, नवसृजन की संभावना तो पूरी होने ही वाली है, क्योंकि उसके न बन पड़ने पर ‘महाप्रलय’ ही होश रह जाती है, जो कि स्पष्ट को अभी स्वीकार नहीं।” (पृष्ठ 51 अखण्ड ज्योति की अक्टूबर 1399) “सामूहिक जीवन मनुष्य की नियति है। इन दिनों सामूहिकता

एक प्रकार से अनिवार्य हो गई है। अपने मतलब से मतलब रखने की नीति अपनाने वाले यह नहीं समझते कि गूलर के एक फल को आँच आने पर उसके भीतर रहने वाले सभी भुनगे अपनी जान गँवा बैठते हैं।” (पृष्ठ 52 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1399) “पूर्वार्ध और पाश्चात्य दिव्यदर्शियों ने ऐसी भविष्य वाणियाँ की है, जिनसे प्रतीत होता है कि कुसमय का अंत आते-आते कहर बरपेगा, किंतु इसके बाद ऐसा समय आएगा, जिसमें पिछले समस्त घाटे की पूर्ति हो जाएगी।” (अखण्ड ज्योति नवंबर 1399, पृष्ठ 51) “सूक्ष्म जगत् के परिशोधन एवं भविष्य को उज्ज्वल बनाने (हेतु एक दिव्य उपासना है यह बारह वर्षीय महापुरश्चरण। इसका उद्देश्य है, मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव बनाने के लिए सामूहिक महासाधना का नियोजन। इसे नाम दिया गया है युगसंधि महापुरश्चरण। यह आयोजन शाँतिकुँज हरिद्वार के अंतर्गत बारह वर्ष तक सन् 2000 तक चलता रहेगा। इक्कीसवीं सदी के आरंभ के साथ ही इसकी महापूर्णाहुति होगी।” अखण्ड ज्योति नवंबर 1399, पृष्ठ 61 बाद में परमपूज्य गुरुदेव ने फरवरी 133 की अखण्ड ज्योति में सभी को संबोधित करते हुए कहा, “एक ही व्रष्सेजप के लिए, एक ही सूत्र में संबद्ध होकर, एक ही दिन में एकरूपता वाली साधना चलती है, तो उससे बिखराव वाली अस्तव्यस्तता की तुलना में अनेक गुना सत्परिणाम हस्तगत होता है। प्रस्तुत युगसंधि महापुरश्चरण को उसी स्तर का, जिसमें देवताओं की बिखरी शक्ति से प्रजापति द्वारा महाकाली का सृजन किया गया था, एक सामयिक प्रयोग समझा जा सकता है।” (पृष्ठ 25)

बड़ा स्पष्ट परिस्थिति का विवेचन है। दिवंगत दस वर्षों में धरती ने बहुत झेले, विभीषिकाएं आईं, दैवी प्रकोप बरसे तो साथ-ही-साथ विज्ञान के आविष्कार भी विकास की चरम स्थिति में पहुँचे, प्रतिभाओं का एक विराट् परिकर उभरकर आता दिखाई पड़ा एवं अब एक बड़े व्यापक स्तर पर बेचैनी के रूप में परिवर्तन की आँधी आती दिखाई पड़ती है। ऐसी ही वेला में गायत्री परिवार द्वारा एक विराट् श्रद्धाँजलि समारोह, एक भूपति संकल्प समारोह, भारत व विदेश में सत्ताईस आश्वमेधिक विराट् आयोजन, एक वाजपेय स्तर का विराट् महायज्ञ तथा 400 से अधिक संस्कार महोत्सव पूरे देश व विदेश की धरती पर संपन्न हुए। प्रखर साधना वर्ष (1333) आते-आते इस विराट् महापुरश्चरण की परिधि बड़ी व्यापक हो गई एवं प्रायः चौबीस हजार करोड़ का गायत्री जप प्रतिवर्ष संपन्न होने लगा है। विगत वर्ष दिसंबर में विकलांगता निवारण दिवस से आरम्भ हुई, इस विराट् अनुष्ठान की महापूर्णाहुति अब चौथे चरण में जा पहुँची, जहाँ दो आयोजन सम्पन्न होने है। पहला विभूति महायज्ञ, जो नई दिल्ली में आठ अक्टूबर रविवार को सायं 5 से 6 की अवधि में संपन्न हो रहा है तथा सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ जो नवम्बर माह में देवोत्थान एकादशी (9 नवंबर) से आरम्भ होकर कार्तिक पूर्णिमा (11 नवंबर) को समाप्त हो रहा है। पहले की व्याख्या विगत लेख में कि जा चुकी अब समझें कि यह नवंबर का अनुष्ठान किसी स्तर का है।

सृजन हेतु संकल्प लिए जाने के लिए विभूतियों के माध्यम से यह महायज्ञ संपन्न हो रहा है। दो लाख प्राणवान् नियोजकों के द्वारा राष्ट्र को दो करोड़ विभूतियों के अर्पण के रूप में यह एक विराटतम प्रयोग-उपचार है। राष्ट्र का नवसृजन, विश्व का नवनिर्माण, साँस्कृतिक जागरण एक विराट् संकल्प प्रधान महायज्ञ द्वारा ही सम्भव है, जो अभूतपूर्व स्तर का हो, इस युग में पहले कही भी सम्पन्न नहीं हुआ हो।

अपनी यह महापूर्णाहुति जिस वेला विशेष में आई है, स्वयं बड़ी अद्भुत है। जप एवं यज्ञ का युग माना जाता है। बारह वर्षीय युग संधि महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ के रूप में एक विराट् यज्ञशाला में संकल्पित प्रतिभावो के द्वारा अपने क्षेत्र की जिम्मेदारी उठाने से लेकर स्वयं के परिष्कार के राष्ट्र के उत्थान-नवोन्मेष हेतु आहुतियों सहित की जानी है। प्रतिभावो की सिद्धि का महायज्ञ है। जब इसे श्रैतयज्ञों की परिपाटी का शास्त्रोक्त संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में अध्ययन किया गया, तो कई अद्भुत संयोग सामने आए। परमपूज्य गुरुदेव के रूप में द्रष्टा स्तर की अवतारी ने जिस समय विशेष में विकेंद्रित सम्भागीय पूर्णाहुतियों के बाद इक्कीसवीं सदी के आगमन की वेला में एक विराट् महापूर्णाहुति की बात कही है, वह समय यही है, जो नवंबर माह, 2 के प्रथम पखवाड़े में आ रहा है। देवोत्थान एकादशी (7 नवंबर 2) से लेकर कार्तिक पूर्णिमा (11 नवंबर 2000) तक का समय एक विशिष्ट समय है, परिजनों को स्मरण होगा की ऐतिहासिक 1359 का सहस्र कुँडीय महायज्ञ भी इसी माह इसी वेला में आयोजित हुआ था। 37 वर्षों बाद 1335 में आंवलखेड़ा में संपन्न विराट् स्तर पर प्रथम पूर्णाहुति भी 6 से 4 नवंबर, किंतु इन्हीं तिथियों में संपन्न हुई। आप अपना यह अनुष्ठान 7 से 11 नवंबर में इन्हीं तिथियों में आया है।

भारतीय संस्कृति के इतिहास पर नजर डालते हैं, तो जानकारी मिलती है कि ऐसे प्रयोग सौत्रामणी प्रयोग विधान के रूप में जाने जाते रहे, जिसमें विशिष्ट उद्देश्य को लेकर एक विराट् स्तर पर यज्ञ महायज्ञ एवं आश्वमेधिक पराक्रम सम्पन्न हुए हों। सौत्रामणी प्रयोग के विषय में महर्षि दयानंद का मत है कि स्वाध्याय रूपी यज्ञ में जो यज्ञोपवीत आदि सूत्र, मणी, ग्रंथि आदि के सहित शिष्य द्वारा धारण कराया जाता है, वही सौत्रामणी यज्ञ है

सूत्रणी यज्ञोपवितदिनी मणीना ग्रंथिना भूवानि धियन्ते यस्मिन् इति सौत्रमणी। ‘सूत्रात’ शब्द का अर्थ होता है, बुराइयों से बचाना। इस प्रकार सुत्रात शब्द सौत्रामणि शब्द बन गया।

यजुर्वेद के 13 वें 21 वें अध्याय, शतपथ ब्राह्मण एवं कात्यायन श्रौतसूत्र में भी इसका वर्णन मिलता है। शतपथ ब्राह्मण में सौत्रामणी याग को यज्ञ शरीर का आत्मा कहा गया है।

आत्यम वै यज्ञस्य सौत्रामणी बाहू ऐन्द्रश्च वयोधाश्य। (शतपथ-12॰4॰5॰26) यदि यज्ञ के विराट् अर्थ को हम समझा सकें, तो सौत्रामणी उसकी आत्मा है, यह व्याख्या ऋषिगणों ने की है। यह यज्ञ राष्ट्र के ब्रह्मणत्व की वृद्धि हेतु किया जाने वाला एक विराट् अनुष्ठान है। ऋषि कहते हैं-

जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम नई दिल्ली में होने जा रहे ‘विभूति ज्ञान यज्ञ’ में मात्रा नब्बे हजार से एक लाख व्यक्ति भागीदारी कर सकेंगे। उन्नीस हजार कुर्सियों पर दस दरवाजों द्वारा तथा प्रायः 75 हजार व्यक्ति सीमेंट की बनी सीढ़ियों पर छप्पन दरवाजों द्वारा प्रवेश कर सकेंगे। पाठक-परिजन सुनिश्चित कर ले कि कौन कितनी संख्या में भागीदारी करेंगे। आमंत्रण पत्र जिनमें गेट संख्या व उसकी स्थिति अंकित होगी, शांतिकुंज से भेजे जा रहे हैं।

सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ अब निकट आ पहुँचा तब तस्मादेष ब्राह्मण यज्ञ एवं यव्सौत्रामणी। यहाँ ब्राह्मण शब्द का अर्थ परोपकार की वृति का विकास करने वाले प्रतिभावानों से है। ज्ञान का अर्जन कर वितरण करने वाले दैवी शक्तिसंपन्नों से। परमपूज्य गुरुदेव ने कहा कि गायत्री ब्राह्मणत्व का अभिवर्द्धन कर व्यक्ति को दैवी अनुदानों- परिष्कृत व्यक्तित्व रूपी वरदान हेतु सुपात्र बना देती है। इसी अर्थ में यहाँ ब्राह्मण शब्द आया है। सौत्रामणी याग में इंद्र संकल्प के देवता के रूप में, अश्विनी कुमार स्वास्थ्य संरक्षण के निमित्त प्रतीक, संकटों से बचाने वाले तथा सरस्वती मेधा-प्रतिभा की देवी के रूप में पूजे जाते हैं। इसमें ‘इंद्र’ इसके प्रधान देवता है। इस यज्ञ से गायत्री छंद के जुड़ने पर आत्मा को तेज, बल एवं आयु प्राप्त होते हैं, ऐसा शास्त्रों का मत हैं शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, पाप से अच्छी प्रकार रक्षा करने कारण ही इस याग को सौत्रामणी याग कहते हैं।

सुत्राम् इयं सौत्रामणी, सुत्रामा शब्द का अर्थ इंद्र। जिस यज्ञ का प्रधान देवता इंद्र हो, जो चारों दिशाओं को प्रकाशित करे, वही सौत्रामणी याग कहलाता है। लौकिक-पारलौकिक दोनों ही दृष्टि से इस याग का बड़ा महत्व है, क्योंकि यह यवन करने वाले को यश प्रदान करता है, धन-संपत्ति के अयन खोल राष्ट्र को ऐश्वर्यशाली बनाता है। प्रतिभावानों को उभारकर उन्हें नेतृत्व सँभालने योगाय बनाता है। पराक्रम की अभिवृद्धि कर यह राष्ट्र को दिग्विजयी बनाता है। शास्त्र के अनुसार, इस यज्ञ को चार दिन में संपन्न किया जाता है, शुक्ल पक्ष की द्वादशी से पूर्णिमा तक ।

सौत्रामणी प्रयोग के साथ दक्षिण के क्रम में गौ का वत्स दिया जाता है। प्रतीकात्मक रूप से इसे ऐसे समझा जा सकता है कि गौ संवर्द्धन हेतु संकल्पित हुआ जाता है गायत्री परिवार के गौरक्षा अभियान, गौ केंद्रित ग्राम व्यवस्था आँदोलन को इस सौत्रामणी प्रयोग से जोड़ा जाए, तो लगता है कि यह पूर्व निर्धारित एक उपक्रम है, जो अभी महापूर्णाहुति के साथ संपन्न होने जा रहा है।

श्रौत यज्ञों के इस विलक्षण प्रयोग के अंतर्गत ही प्रस्तुत महापूर्णाहुति के सृजन संकल्प महायज्ञ को पुरुषमेध महायज्ञ के रूप में संपन्न किया जा रहा है। पुरुषमेध इस सौत्रामणी प्रयोग का ही एक अंग है, जिसका वर्णन शतपथ ब्राह्मण में बड़े विस्तार से आया है। पुरुषमेध का अर्थ यह नहीं कि किसी की बलि दी जाती हो अथवा वध किया जाता हो। अश्वमेध संपन्न करने वाले हमारे पाठक-परिजन 1332 के नवंबर माह की अखण्ड ज्योति विशेषांक में मेध शब्द की व्याख्या से पूर्णतः परिचित हैं। यहाँ मेध शब्द का अर्थ है परस्पर मिलना, संगति करना, जोड़ता, परस्पर प्रेमभाव बढ़ाना। पुरुष शब्द का अर्थ स्त्री-पुरुष, मानव जाति है। शतपथ ब्राह्मण में इस संदर्भ में बड़ा सुँदर वर्णन मिलता है। अध्याय 3 वे 31 में इस संदर्भ में विस्तार से पढ़ने को मिलता है। पुरुषमेध का प्राकट्य कैसे हुआ, इस संबंध में उल्लेख है,

पुरुषो हे नारायणोऽकायमत। भतितिष्ठे यथ सर्वाणि भूतान्यहमेवेदथ सर्वथ स्यामिति सं एतं पुरुषमेधं पंजरात्रंयज्ञक्रतुमपश्यत, माहरतेनायजत तेनेष्ट्वत्यतिष्ठत्सर्वाणि भूतानीद था सर्वमभवदतितिष्ठित सर्वाणि भूतानीद था सर्वं भवति य एवं विद्वान्पुरुषमेधेपन यपते यो वैतदेवं वेद। (शतपथ 13॰6॰1॰1)

पुरुष नारायण ने चाहा कि मैं जीवों में सर्वोपरि हो जाऊँ। मैं ही सब कुछ हो जाऊँ। उन्होंने इस पुरुषमेध पंचरात्र यज्ञक्र्रतु को देख। उसको ले लिया। उससे यवन किया। उस यज्ञ को करके जीवों में सर्वोपरि हो गया और उस संसार में वही सब कुछ हो गया। जो मनुष्य इस रहस्य को समझता है या समझकर पुरुषमेध यज्ञ करता है, व है सब जीवों में बड़ा तथा सब कुछ हो जाता है।

अथ यस्मात्पुरुषमेधो नाम। इमै वै लोकाः पूरयमेव पुरुषो योऽयपवतेसोऽस्याँ पुरिशेते तस्मात्पुरुषस्तस्य यदेषु लोकेष्वन्नं तदस्यान्नं मेधस्तद्यदस्यैतदत्रंमेधैस्तस्मात्पुरुषमेधोऽथो यदस्मिन्मेध्यानपुरुश्षानलालभ्तेतस्माद्देव पुरुषमेधः। (शतपथ॰ 13॰6॰2॰1)

इसका पुरुषमेध नाम इसलिए पड़ा कि ये लोक पुरुषमेध नाम इसलिए पड़ा कि ये लोक ‘पुर’ हैं और पुरुष वह है, जो बहता है (वायु)। वह इस पुर में लेटा है, इसलिए वह पुरुष है। इन लोकों में जो अंत है, वह इसका मेध है, इसलिए इसका नाम पुरुषमेध है। चूँकि इसमें मेध पुरुष का आलंभन होता है, इसलिए भी इसका नाम ‘पुरुषमेध’ है।

पुरुषमेध यज्ञ का विस्तृत विवरण तो विस्तार से पाठक अगले अंक में पढ़ सकेंगे, परंतु यहाँ यही लिखना पर्याप्त होगा कि अपने-अपने क्षेत्र के प्रतिभावानों के एकत्रीकरण द्वारा राष्ट्र को श्रेष्ठतम ऊँचाई तक पहुँचाई तक पहुँचा सकने के लिए सामूहिक शव में प्रतिभाओं को संकल्पित कर उन्हें समाज, राष्ट्र विश्व के कल्याण हेतु नियोजित करने के लिए सौत्रामणी प्रयोग के अंतर्गत इस पुरुषमेध याग की व्यवस्था ऋषियों ने बनाई है। प्राचीनकाल में सामूहिक वानप्रस्थ, वेद-संन्यास का कर्म भी इस यज्ञ के साथ संपन्न होता था।

कुछ ऐसा ही क्रम प्रस्तुत महापूर्णाहुति में होने जा रहा है, जब राष्ट्र के साँस्कृतिक नवजागरण के लिए बड़े स्तर पर मनुष्य, प्रतिभावान् इस संस्कार दीक्षा में भागीदारी करें। भागीदारी करेंगे। आशक्ति व पूर्ण समय दे सकने वाले अनेक लोकसेवी राष्ट्र-स्तर की स्थापना ही इस लक्ष्य के साथ की जा रही है कि आने वाले दिनों में केंद्रीय तथा क्षेत्रीय स्तर पर इसका एक अंग बनकर वे कार्य करने हेतु संकल्पित हों। यदि अश्वमेध संस्कार महोत्सव इस सौत्रामणी प्रयोग के समान थे, तो अनुयाज रूप में प्रतिभा परिष्कार की सत्र शृंखला चलेगी, जो अनुयाज रूप में 2001 के अखण्ड दीपक एवं युगचेतना के अवतरण के हीरक जयंती वर्ष में सम्पन्न होगी।

आज की परिस्थितियों में युगसंधि महापुरश्चरण रूपी विराट् अनुष्ठान की महापूर्णाहुति हेतु इससे श्रेष्ठ और क्या हो सकता था कि राष्ट्र की चुनी हुई विभूतियाँ उसके उत्कर्ष के लिए सृजनात्मक संकल्प लें। यही है हमारा नवंबर माह का ऐतिहासिक आयोजन।

तृतीय अध्याय के कर्मयोग की युगानुकूल विवेचना का क्रम इस स्तंभ के अंतर्गत विगत कई अंकों से चल रहा है। इस अति महत्वपूर्ण तीसरे अध्याय के हर श्लोक में बड़ा गूढ़ शिक्षण छिपा पड़ा है। अगस्त 2000 की अखण्ड ज्योति में श्लोक क्रमाँक 16 से 20 तक की व्याख्या विस्तार से प्रस्तुत की गई थी। इसमें भगवान् श्री कृष्ण राजा जनक का उदाहरण देते हुए, आसक्ति रहित कर्म कैसे किए जाने चाहिए, यह अर्जुन को समझाते हैं। भगवान् कहते हैं कि लोकशिक्षण-मार्गदर्शन (लोकसंग्रह) को देखते हुए भी (ध्यान में रखकर भी) तुझे कर्म करना चाहिए। जनक के साथ भगवान् आदि शब्द का प्रयोग करते हुए प्रहाद, अंबरीश, इक्ष्वाकु, अश्वपति आदि को भी शामिल करते हुए उनके द्वारा जिए गए जीवन का अनुसरण करने की बात कहते हैं। भगवान् चाहते हैं कि लोक-शिक्षण हेतु उसे मर्यादित आचरण करना चाहिए, मानवी गरिमा के अनुरूप निर्धारित कर्मों को संपादित करना ही चाहिए। प्रबुद्ध-प्रतिभाशाली-पराक्रमी अर्जुन से भगवान् को नहीं, पांडव समुदाय को ही नहीं, सारे समाज को अपेक्षा है। सुलझे हुए व्यक्तित्वसंपन्न महामानव यदि असमंजस में पड़ जाएंगे, तो कैसे काम चलेगा। भगवान् विभूतिसंपन्न महामानवों में व शिश्नोदरपरायण जीवन जीने वालों में अंतर स्थापित कर स्पष्ट करते हैं कि उसकी भूमिका विशिष्ट है, उसके आचरण के अनुरूप ही तत्कालीन समाज ढलेगा, इसके लिए उसे अपने कर्तव्य से तनिक भी पीछे नहीं हटना चाहिए। सद्गुरु की भूमिका ऐसी ही होती हैं जैसी भगवान् कृष्ण की रही है। विगत अंक में हमने पूज्यवर की लेखनी का हवाला देते हुए प्राणवान् प्रज्ञावानों के कर्तव्यों की चर्चा की थी व बताया था कि जागरुकों का अग्रगमन समय की महती आवश्यकता है। इसी व्याख्या को अब आगे बढ़ाते हैं।


पुण्यतिथि पर विशेष भावाँजलि - करुणावतार जगदम्बे


पुण्यतिथि पर विशेष भावाँजलि - करुणावतार जगदम्बे (kavita)

आप अवतरित हुई धरा पर, तो करुणा साकार हो गई। स्नेह-सरसती जीवन-धारा, संवेदन की धार हो गई॥

तरस रहा था मनुज, स्नेह बिन, माता के बिन शिशु का जीवन निश्छल-नेह नहीं मिलता था। तो सूना-’सूना होता है।

और किसी के स्नेहाँचल का, सुख के सब साधन रहते भी, निर्मल-गेह नहीं मिलता था।सूनापन, दूना होता है।

मातृ हृदय से छलकी ममता, हे जगदम्बे! गोद आपकी, तो जन-जन का प्यार हो गई॥1॥ जगभर का आधार हो गई॥2॥

कोटि-कोटि शिशुओं ने, निश्छल,साथ-साथ ही मातु! आपने, निर्मल स्नेह सदा पाया है। शिशुओं को संस्कार दिए हैं।

पीड़ा पीकर, प्यार पिलाना, शिल्पक्रिया, अनगढ़ शिशुओं का, यह जगदम्बे की माया है। माँ! कितने उपकार किए हैं।

गूँगे शिशुओं की पीड़ा भी, एक आँख फटकार गई तो मातृ हृदय के पार हो गई॥3॥ तो दूजी जीभर प्यार दे गई॥4॥

पुण्य दिवस पर याद आपकी, फिर भी छाती पर पत्थर धर, रोक नहीं रुका करती है। यह विश्वास दिलाते हैं माँ।

बदली-सघन सजल-श्रद्धा की, स्नेह आपका, उपेक्षितों के, आँखों बीच झुका करती है। घावों पर छलकाते हैं माँ।

श्रद्धा सदा छलकते रहना, दीनों, दुखियों की दुनिया अब, शिशुओं का अधिकार हो गई॥5॥ सेवा का संसार हो गई॥6॥

*समाप्त*