महत्वाकाँक्षा की धुरी पर घूमने वाला जीवन वृक्ष ही नरक हैं। महत्वाकाँक्षाओं का ज्वर जीवन को विषाक्त कर देता है। जो इस ज्वर की हवाओं से उद्वेलित हैं, शाँति का संगीत और आत्मा का आनंद भला उनके भाग्य में कहाँ? वे तो स्वयं में ही नहीं होते हैं और शाँति का संगीत एवं आत्मा का आनंद तो स्वयं में होने के ही फल है।
बड़ी सहज जिज्ञासा है, इस महत्वाकाँक्षा का मूल क्या है? इसका उत्तर भी उतना ही सहज है, “हीनता का भाव अभाव का बोध।” हालाँकि ऊपर से दिखने में हीनता का भाव और महत्वाकाँक्षी चेतना परस्पर विरोधी दिखाई देते हैं, लेकिन वस्तुतः वे एक ही भावदशा के दो छोर है। एक छोर से जो जीनता है, वही दूसरे छोर से महत्वाकाँक्षा। हीनता ही स्वयं को ढकने-छिपाने के प्रयास में महत्वाकाँक्षा बन जाती है। अपनी इस कोशिश में वह स्वयं को ढक तो लेती है, पर मिटती नहीं और ध्यान रखने की बात तो यह है कि किसी भी रोग को ढकने भर से कभी भी कोई छुटकारा नहीं है। इस भाँति रोग मिटते नहीं वरन् पुष्ट ही होते हैं।
व्यक्ति जब तक स्वयं की वास्तविकता से दूर भागता है, तब तक वह किसी न किसी रूप में महत्वाकाँक्षा के ज्वर से ग्रसित होता रहता है। स्वयं से दूर भागने की आकाँक्षा में वह स्वयं जैसा है, उसे ढकता है और भूलता है, लेकिन क्या आप की विस्मृति और उसका विसर्जन एक ही बात है? नहीं। हीनता की विस्मृति हीनता से मुक्ति नहीं है। इससे पहले स्वयं को जानकार ही है, क्योंकि स्वयं से भागना ही वह मूल और केंद्रीय भाव है, जिससे सारी हीनताओं का प्रभाव होता है।
विज्ञान वे अतिरिक्त इस आँतरिक अभाव से और महत्वाकाँक्षा के ज्वर से मुक्ति का कोई उपाय नहीं है। उसमें जीने और जगाने का साहस करते हैं, उनके लिए शून्य ही पूर्ण बनाया गया है। फिर न हीन भावना है और न उससे उपजने वाला महत्वाकांक्षा का ज्वर।
जीवन में भक्ति की प्रतिष्ठा के पीछे सहस्रों वर्षों का इतिहास छुपा है। भक्ति की भावना वेदों से निःसृत हुई, ऐसा विद्वानों का मत है। ‘भज’ धातु से भक्ति शब्द की व्युत्पत्ति हुई है। वैदिक साहित्य में इसका अर्थ है, बाँटना, भाग पाना या लेना अथवा हिस्से का साझीदार बनना। इन अर्थों में भक्त भगवान का साझीदार है। भगवत् संवेदना का साझीदार होने के कारण ही वह भक्त कहलाता है। ऋग्वेद में भक्त भक्ति और भगवन् शब्दों का प्रयोग इन्हीं अर्थों में हुआ है।
इन अर्थों के प्रयोग के पश्चात् भगवन् शब्द को अलौकिक सर्वशक्तिमान परम तत्व के रूप में निरूपित किया जाने लगा। उस तत्व की कल्पना ऐसी शक्ति के रूप में की गई, जिसका समस्त ऐश्वर्य एवं संपदा पर प्रभुत्व था और जो अपने उपासक को उसका एक अंश भक्ति के रूप में प्रदान कर उसे अपना भक्त बना सकता था। इसी वजह से भक्ति और भक्त के प्रारंभिक प्रयोग कर्मव्यापत्व में हुए है। भगवन् के अनुग्रह से उसके एक अंश के प्राप्त कर्ता होने के कारण भक्त और भक्ति शब्द शक्ति के साथ भी प्रयुक्त हुआ है। ये शब्द उस शक्ति की सहभागिता एवं घनिष्ठ आत्मीय भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सर्वथा उपयुक्त थे। इन्हीं कारणों से धार्मिक विचारधारा में भक्ति शब्द एक सशक्त प्रतीक के रूप में परिभाषित हुआ है।
वेदों में भक्ति के तीन सोपान है, स्तुति, प्रार्थना, और उपासना। स्तुति में प्रभु के गुणों का कीर्तन होता है। यह ज्ञान की मीमाँसा है। प्रार्थना में प्रभु से पापों के प्रायश्चित और पुण्य प्राप्ति के लिए कामना की जाती है। पापमयी दानवता का दमन तथा पुण्यमयी दैवी विभूतियों का समावेश प्रचंड कर्म की अपेक्षा रखते हैं। अनवरत कर्म की सिद्धि सतत अभ्यास के द्वारा ही संभव हो सकती है। ज्ञान लक्ष्य का बोध कराता है, तो कर्म उस स्थल तक पहुँचाता है और उपासना उस लक्ष्य के समीप आसीन करा देती है। अतः भक्ति ज्ञान, कर्म एवं उपासना की पावन त्रिवेणी का संगम है। ज्ञान और कर्म संपत्ति का प्रभु अनुग्रह के साथ सामंजस्य ही वैदिक भक्ति का आदर्श है।
वैदिक महर्षिगण भक्त को चेतना के, ज्ञान के उत्तुँग शिखरों तक ले जाते हैं, जहाँ परम आनंद का स्रोत है। प्रभु का प्रकाश या ज्ञान की ध्यान-धारणा से जीवन आनंददायक हो जाता है। यही वैदिक भक्ति का स्वरूप है। इसके साधनों में प्रवृत्ति एवं निवृत्ति, अभ्यास तथा वैराग्य दोनों सम्मिलित हैं, जबकि परवर्तीकाल में निवृत्ति को ही एकमात्र साधन मान लिया गया है। सही कहा जाए, तो वेदों में भक्ति का समग्र स्वरूप झलकता है। वेद ने भक्त के लिए जिन साधनों का प्रतिपादन किया है, वे आत्मा, परमात्मा व प्रकृति ज्ञान से सम्बन्धित हैं। इन साधनों में व्यापकता और गंभीरता की अभिव्यक्ति हुई है, लेकिन बाद के समय में यह स्वरूप दिखाई नहीं देता। यहाँ तक कि भागवत भक्ति के नवधा भेदों में भी वैदिक भक्ति का समग्र रूप समाहित नहीं हो पाता।
वेदों में जीव का प्रभु से विरह अवस्था का अत्यंत करुण, मर्मस्पर्शी वर्णन मिलता है। वैदिक ऋचाओं में भक्तिभाव का अंकुरण देखा जा सकता है। यही भक्ति परवर्तीकाल की भागवत, शैव आदि भक्ति पद्धतियों से कई अंशों में भिन्नता एवं समानता रखती है।
ऐतरेय ब्राह्मण में ज्ञान चेतना की प्रमुखता होने से भक्ति भावना न्यून मात्रा में है। शतपथ ब्राह्मण में कर्मकाँड का प्रभाव अधिक हैं कर्म अपने सूक्ष्म रूप में ज्ञान और उपासना दोनों के अंदर सन्निहित है। अतः इसमें भक्तिभाव अंकुरित होते देखा जा सकता है। शतपथ ब्राह्मण में भक्ति की पर्याप्त विवेचना हुई है। जैसे, द्वेष से दूर रहना, सबसे प्रेम करना, दिव्यता और पवित्रता का प्रयास करना, आत्म-तत्व को प्राप्त करना आदि को प्रधानता दी गई है। ये भक्ति के अनिवार्य अंग कहे जा सकते हैं। गोपथ ब्राह्मण में भक्ति को ज्ञान का रस कहा गया है।
ईसा पूर्व छठी शताब्दी में विकृत कर्मकाँड और यज्ञों के विरोध में कई आँदोलन उठ खड़े हुए। इसी के पुनरुत्थान हेतु एक ओर बौद्ध और जैन धर्मों की स्थापना हुई, तो दूसरी ओर भागवत धर्म का उदय हुआ। भक्ति का प्रचार प्रसार इसके बाद ही संभव हुआ। वेदों के ब्राह्मण ग्रंथ कर्मकाँड को प्रमुखता देते हैं, परंतु उपनिषदों में ज्ञानकाँड की प्रधानता है। यह ज्ञानकाँड विश्व के मूल में निहित आध्यात्मिक सत्य से सम्बन्धित है। इसमें वर्णित आध्यात्मिक भावना ही भक्ति के मूल तक पहुँचती है और तभी यह भक्ति उपनिषदों में बिखरे मोती के रूप में दिखाई पड़ती है।
प्रभु की भक्ति और भगवान अनुग्रह पर कठोपनिषद् तथा मुंडकोपनिषद् दोनों ही उपनिषदों में बल दिया गया है। श्वेताश्वेतर उपनिषद् में भी भक्ति की विवेचना की गई है और ईश्वर भक्ति के साथ गुरु भक्ति को भी मान्यता प्रदान की गई है। भक्ति का मूल आधार प्रभु की कृपा ही है। यही तथ्य आगे चलकर शैव व वैष्णव दोनों ही संप्रदायों में स्वीकृत हुआ। वैष्णवों में आचार्य बल्लभ ने प्रभु के प्रसाद को पुष्टि का नाम दिया, तो शैवों और शाक्तों ने उसे शक्तिपात कहकर पुकारा।
हालाँकि वैदिक भक्ति का विकसित एवं समग्र रूप ब्राह्मण तथा उपनिषद् युग में एकाँगी बन गया। इनमें भक्ति की रेखा काफी क्षीण एवं दुर्बल दिखाई देती है, परंतु इसका आस्तित्व लोप नहीं हुआ। बाद के समय में इस भक्ति भावना का स्पष्ट उद्घोष महाभारत, रामायण एवं पुराणों में मिलता है। इसमें प्रायः सभी देवी देवता भक्तिमयी उपासना के पात्र हैं। पौराणिक देवताओं में प्रायः विष्णु और शिव ही भक्तिमयी उपासना के केंद्र -बिंदु है। महाभारत में भक्ति चेतना का सुस्पष्ट एवं प्रभावपूर्ण प्रतिपादन हुआ है। इसमें वासुदेव कृष्ण के देवत्व की परिकल्पना की गई है और तभी इस महाकाव्य को धर्मग्रंथ की संज्ञा मिली है।
वैष्णव संप्रदाय का प्रारम्भिक इतिहास लिखते हुए हेमचंद्र राय चौधरी ने अपना मत व्यक्त किया है कि बौद्ध धर्म द्वारा वैदिक धर्म का, भूल चुके विकृत कर्मकाँडों का प्रचंड विरोध हुआ। एक अर्थ में यह भागवत धर्म की शुरुआत थी। तभी इस धर्म में महात्मा बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार माना गया। इस आराधना पर केंद्रित भागवत धर्म आगे चलकर वैष्णव धर्म में परिवर्तित हो गया। इन दिनों भक्ति के विभिन्न स्वरूप दिखाई दिए।
तत्कालीन परिस्थितियों में एक और महत्वपूर्ण घटना घटी। इसी घटना के फलस्वरूप पुराणों का अभ्युदय हुआ। वैदिक यज्ञों की कर्मकांडों परंपरा मूलतः पशुपालन एवं कृषि व्यवस्था से सम्बन्धित थी। परंतु शहरी सभ्यता के विकास से व्यापारी एवं शिल्पकारी की उन्नति से ईसापूर्व की कतिपय शताब्दियों में समाज में अनेक नए वर्गों का उदय हुआ। ये वर्ग बढ़ती हुई समृद्धि के भागीदार थे, परंतु समाज में उन्हें पर्याप्त सम्मान एवं आत्मीयता नहीं मिल सकी। इसके विपरीत उन्हें निम्नस्तरीय माना जाता था। ऐसे लोगों में याज्ञिक कर्मकाँड के स्थान पर भक्ति पर आधारित देवी-देवताओं की पूजा ही अधिक लोकप्रिय हुई। इस परिस्थितियों ने अनेक-मनीषियों -विद्वानों को धर्म के स्वरूप पर गहराई से विचार करने की प्रेरणा दी। फलतः महाकाव्य ही धर्मग्रंथ नहीं बने, बल्कि देवी देवता, पूजा भक्ति के केंद्र -बिंदु रूप में स्वीकृति हुए। इससे अनेक पुराणों की रचना भी हुई इन पुराणों ने भक्ति की भावधारा को जन-जन तक पहुँचाने में कारगर भूमिका निभाई।
इस प्रक्रिया को भागवत पुराण में स्पष्टता देखा जा सकता है। टीजे हापकिन्स ने ‘द सोशल टीचिंग ऑफ द भागवत पुराण’ में उल्लेख किया है, भक्ति आँदोलन का नेतृत्व ऐसे संन्यासियों और विद्वानों ने किया था, जो भले ही ब्राह्मण वर्ग के रहे हों, परंतु उनकी भावनाएँ व्यापक और विराट् थी। उनके अधिकाँश अनुयायी शूद्र एवं निम्न जाति के थे। उन्होंने वर्ण व्यवस्था की कट्टरता पर आघात न करते हुए भी उसे भगवद् प्राप्ति हेतु निरर्थक माना। संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान जेएवी. वैन व्यूलेनिन ने भागवत् पुराण की रचना को जनप्रिय आँदोलन के संस्कृतिकरण और वैदिक परंपरा से उसका तारतम्य बिठाने का प्रयास किया है। उनके अनुसार यह आँदोलन भगवद्भक्ति की ओर एक अनोखा प्रयास था।
पुराणकाल में भक्ति भावना का सुँदर विकास देखा जा सकता है। अपने वर्तमान रूप में भगवद्गीता भी भक्ति सिद्धाँत का काफी स्पष्ट निरूपण करती है। गीता के भक्ति सिद्धाँत में शरण्य एवं दास्य भाव प्रधान हैं। इसमें प्रेम के भावुक भाव की अभिव्यक्ति कम ही मिलती है। यहाँ भक्त को अपनी अकिंचनता का बोध है और वह विनम्रतापूर्वक भगवत् अनुग्रह की प्रार्थना करता है। ऋग्वेद की ऋचाओं में जिस प्रकार का एक वर्गहीन समाज के आत्मीय सम्बन्धों की झलक पाई जाती है। ठीक इसी प्रकार एक वर्गबद्ध समाज में अवस्थित गीता का कवि भक्त की कल्पना एक विनम्र दास के रूप में करता है। वह अपने अधिपति या स्वामी के प्रभुत्व से पूर्णतः अभिभूत है और वह उनकी कृपा पर अवस्थित है। गीता की भक्ति कल्पनाशील उपासक के मनोभाव तक ही सीमित नहीं है। उसका प्रबल सामाजिक पक्ष है, जिसमें निष्काम कर्म का उपदेश दिया गया है।
इस तरह भगवद्गीता के माध्यम से भक्ति का यह नया स्वरूप सामने आया। बाद में समाज में भक्ति की भावधारा को आगे बढ़ाने का प्रयास-पुरुषार्थ कई भक्तों एवं संतों के माध्यम से हुआ। इनमें छठी- सातवीं के आलवर एवं नायनार संतों का योगदान महत्वपूर्ण था। भागवत पुराण के माध्यम से भक्ति आँदोलन को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य नाथमुनि, यामुनाचार्य एवं रामानुजाचार्य ने किया। इसमें पंचरात्र की धार्मिक पद्धति को वैदिक भक्ति से जोड़ने का प्रयत्न किया गया।
सत्वगुण प्रधान भक्ति की विचारधारा चैतन्य, मीरबाई, तुलसीदास एवं सूरदास में प्रस्फुटित हुई। इन्होंने भक्ति के द्वारा समाज में प्रेम, सहिष्णुता, दया, करुणा, भ्रातृत्व भावना का प्रचार किया। धन्ना जाट, कबीर, रविदास, दादू आदि ने भी निर्गुण भक्तिधारा के माध्यम से समाज में इन्हीं सब कोमल भावनाओं वर्तमान समय में परमपूज्य गुरुदेव के प्रज्ञा पुराण के माध्यम से जन-जन में प्रवाहित होते देखी जा सकती है। भावी सतयुगी समाज में भावमय भक्ति तत्व की प्रधानता रहेगी, जिसमें वैदिक भक्ति का समग्र स्वरूप प्रकट हो सकेगा। अतः हम सभी को भावभरे हृदय से परमपूज्य गुरुदेव के इस विशेष अभियान में प्राणपण से जुट जाना चाहिए। यह पुण्य कार्य हमारे हृदय की भावनाओं को भावमय भगवान से जोड़ने वाला सिद्ध होगा।
ज्ञान, भावना और कर्म तीनों अपने आपको ज्येष्ठ बताया करते थे इसके लिए झगड़ा हो गया। निपटारे के लिए तीनों ब्रह्माजी के पास गए। ब्रह्माजी बोले, “जो आकाश को छू ले वही बड़ा है।” ज्ञान सूर्य तक पहुँचा। आगे उसकी गति न थी। भावना ने छलाँग लगाई, तो आकाश के दूसरे छोर में पहुँच गई, पर नीचे न उतर पाई, वही लटकी रह गई। कर्म ने सीढ़ियां बनानी शुरू की, पर दोपहर तक ही थक गया। ब्रह्मा ने तीनों को दुबारा बुलाकर समझाया कि तुम्हारी पूर्णता साथ-साथ रहने में ही है, अकेले तीनों अधूरे हैं।
इनमें से एक भी कम अधिक होने पर व्यक्तित्व के उठने गिरने का कारण बन जाता है। कई बार प्रारंभिक जीवनक्रम अच्छा होने पर भी, संवर्द्धन का साधन क्रम न बने रहने से आचरण भ्रष्ट होने लगता है और यह पतन का कारण बनता है। आज बहुसंख्य व्यक्ति इसी समूह के अंतर्गत आते हैं।
एक गाँव में आग लग गई। सभी आदमी तो सुरक्षित भाग निकले, पर दो वृद्ध ऐसे थे, जो भाग नहीं सकते थे, एक अंधा, एक पंगा। दोनों ने एकता स्थापित की, अंधे ने पंगे को कंधे पर बैठा लिया, पंगा रास्ता बताने लगा और अंधा तेज दौड़ने लगा, दोनों सकुशल बाहर आ गए। सहयोग का अर्थ ही है- अनेक तरह की सामर्थ्यों से एक परिपूर्ण शक्ति का उद्भव।
बंदा वैरागी अपने युग की, समय की पुकार की अवहेलना कर संघर्ष में न लगकर एकाँत साधना कर रहे थे। उन्हीं दिनों गुरुगोविंद सिंह की वैरागी से मुलाकात हुई। उन्होंने एकाँतसेवन को आपत्तिकाल में हानिकारक बताते हुए कहा, “बंधु! जब देश, धर्म, संस्कृति की मर्यादाएँ नष्ट हो रही हैं और हम गुलामी का जीवन बिता रहे हैं, आतताइयों के अत्याचार हम पर हो रहे हैं, तब तक यह भजन-पूजन, ध्यान-समाधि आदि किस काम के हैं?” गुरुगोविंद सिंह की युक्तियुक्त वाणी सुनकर बंदा वैरागी उनके अनुयायी हो गए और गुरु की तरह उनने भी आजीवन देश को स्वतंत्र कराने, अधर्मियों को नष्ट करने और संस्कृति की रक्षा करने की प्रतिज्ञा की। इसी उद्देश्य के लिए बंदा वैरागी आजीवन प्रयत्नशील रहे। मुसलमानों द्वारा वैरागी पकड़े गए। उन्हें एक पिंजरे में बंद किया गया। मौत या धर्म परिवर्तन की शर्त रखी गई, लेकिन वे तिल मात्र भी विचलित नहीं हुए। अंततः आतताइयों ने उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। बंदा अंत तक मुस्कराते ही रहे। भले ही बंदा मर गए, परंतु अक्षय यश और कीर्ति के अधिकारी बने।
आर्यों के आदि निवास के रूप में भारतवर्ष एवं उनकी प्राचीनतम वैदिक सभ्यता की प्रामाणिकता एक सर्वमान्य सत्य है। ज्ञान-विज्ञान की विभिन्न धाराएँ भी इस तथ्य को सत्य प्रमाणित करती हैं। इसकी पुरातनता के प्रमाण खगोल विद्या में भी मिलते हैं। डेविड फराँले की पुस्तक ‘गॉड, सेजीस एंड किंग्ज’ के अनुसार वैदिक प्रतीकवाद में संयात/संक्राँति एवं (मुनपदवग) विषुव/सायन जैसी खगोलीय घटनाओं का उल्लेख आता है। जिसकी अवधि 4 से 6 ई. पू. के मध्य बताई जाती है। एक भारतीय खगोलविद् के जी. सिद्धार्थ ने कृष्ण यजुर्वेद में 85 ई. पू. के लगभग एक (वसपेसपबम) का स्पष्ट संदर्भ खोजा है, जो ऋग्वेद को ओर प्राचीन सिद्ध करता है। ब्राह्मण एवं सूत्रों को इसके बाद 3 ई. पू. काल का बताया जाता है।
गणित से भी वैदिक सभ्यता की पुरातनता पर प्रकाश पड़ता है। ‘पॉलीटिक्स ऑफ हिस्ट्री’ नामक ग्रंथ में एन. एस. राजाराम के अनुसार, अमेरिकी गणितज्ञ ए सैदेनवर्ग ने सिद्ध किया है कि प्राचीन मिश्र, बेबीलोन एवं यूनान की ज्यामिती सुलभ सूत्र गणित से ली गई है। मिश्र व बेबीलोन साम्राज्यों में ज्यामिती का प्रथम प्रकटीकरण 2 ई.पू. में हुआ था। अर्थात् सुलभ सूत्रों की रचना 2 ई.पू. से पहले की प्रमाणित होती है, जिसका उपयोग समकालीन सिंधु सरस्वती सभ्यता की अद्भुत नगरीय व्यवस्था एवं पूजा स्थलों में देखने को मिलता है।
धातु विज्ञान से भी वैदिक युग की प्राचीनता का प्रमाण मिलता है। एक अमेरिकी व्यक्ति ने 1956 में दिल्ली में एक प्राचीन सिक्का पाया। जिसे कई प्रयोगशालाओं ने 37-38 ई.पू. का बताया। इस पर एक ऋषि का तेजस्वी चेहरा बना हुआ था।
आर्य आक्राँता मत की निराधारता पर प्रहार करते हुए अमेरिकी पुरातत्ववेत्ता जिम शेफर अपनी पुस्तक ‘द इंडो आर्यन इन्वेजन : कल्चरल मिथ एंड आरकिओलॉजिकल रिएलिटी’ में 1984 में लिखते हैं, “भाषाई आंकड़ों के आधार पर यह मत गढ़ा गया था। जिसके आधार पर आगे चलकर पुरातत्ववेत्तीय एवं नृतत्ववेत्तीय आंकड़ों की व्याख्या की गई। जो सिद्धाँत था वह निर्विवाद सत्य बन गया। अब इस भाषाई निरंकुशता को समाप्त करने का समय आ गया है। वर्तमान की पुरातत्वीय खोजें पूर्व ऐतिहासिक या उत्तर ऐतिहासिक काल के किसी भी खंड में इंडो आर्यन या यूरोपीय आक्राँताओं की बात को पुष्ट नहीं करती। इसके स्थान पर प्रागैतिहासिक काल से ऐतिहासिक काल तक पुरातत्वीय आंकड़ों के आधार पर साँस्कृतिक परिवर्तन की श्रृंखलाओं की व्याख्या संभव है, जिसमें महत्वपूर्ण विकास हुए।”
भारतीय परंपरा में वेद हजारों वर्ष पुराने है। मैक्समूलर ने आधे-अधूरे तथ्यों के आधार पर इन्हें 12 ई. पू. तक ला दिया था, लेकिन सिंधु सरस्वती सभ्यता का असंदिग्ध वैदिक चरित्र इसे कम से कम 4 ई.पू. का बताता है। कुछ भाषाविज्ञानी इसे 5 ई. पू. तक का बताते हैं। खगोल विद्या तो इसे और भी पुरातन 9 ई.पू. तक का बताती है।
भारतीयों की पुरातनता के संदर्भ में वाल्टेयर ने अपने सहज बोध के आधार पर कहा था कि जब उनके पूर्वज जंगलों में बर्बर जीवन जी रहे थे तब भारतीय लोग सभ्य जीवन जी रहे थे।
लेकिन हमारी सभ्यता की पुरातनता ऋग्वेद से भी पूर्व की है, जैसा कि इसके स्रोतों में पितर मनुष्य के रूप में प्राचीन ऋषियों का उल्लेख आता है। महर्षि अरविंद के अनुसार, हमारी वास्तविक संहिता अवधि के अंत का प्रतिनिधित्व करती है, न कि इसके आरंभ या मध्यकाल का। वेदव्यास द्वारा संकलित वृहद् ग्रंथों का संग्रह अधिक समृद्ध आर्य पूर्वजों के मौखिक ज्ञान का एक चुनाव भर हो सकता है। विश्व में हमारी सबसे पुरानी परंपरा है, जिसमें 6 से 8 या इससे भी अधिक वर्षों तक मौखिक रूप से श्रुति -स्मृति के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान का हस्ताँतरण होता रहा है।
क्या पूर्वकाल में भी कोई विकसित सभ्यता रही है? विज्ञान इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर देता है, जिसके अनुसार मानव समाज का विकास आदिमानव से एक सरल रेखा में हुआ है। लेकिन यह श्री अरविंद के अनुसार यूरोपीय विद्वानों की एक धारणा से अधिक कुछ भी नहीं है, जो मानव सभ्यता का आरंभ काल फीजी द्वीपवासियों से शुरू कर आज के हेकल व रॉकफेलर तक का समय मानती है व पुरातन संस्कृति को आदिमानव करार देती है, वह भी अर्द्धसभ्य। यह आधुनिक विचारों का अंधविश्वास भर है कि ज्ञान की यात्रा अपने समग्र रूप में आगे की ओर ही हुई है। कम से कम उनका यह मानना है कि विकसित सभ्यता का एक महान वैदिक युग हुआ है, जो समय व परिस्थितिवश खंडित हुआ। यह संभव है कि इसके पास आज की तरह भौतिक सुख साधन न रहे बेहतर-श्रेष्ठ कुछ चीज थी। शायद यह संकेत आध्यात्मिक संपदा की ओर हो रहा है। विविध क्षेत्रों में पुरातन भारत की उपलब्धियों व उनका समस्त विश्व पर प्रभाव विचारणीय है, जो उसके विकसित स्वरूप पर प्रकाश डालता है।
बेबीलोन व पुरातन यूनानियों ने गणित ज्ञान भारत से सीखा था, जो 3 ई. पू. तक इस क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ चुके थे। भारत में खगोल विद्या भी बहुत प्राचीनकाल से विकसित रही, जिसे पाश्चात्य लोग कुछ शताब्दी ई. पू. की मानते हैं। (पदकवसवहपेज) भारत-विद्या शास्त्री सुभाष काक ने ऋग्वेद के सूत्रों में खोज से नए-नए तथ्यों को उजागर किया है। अपनी पुस्तक एस्ट्रोलॉजिकल कोड ऑफ ऋग्वेद में वे लिखते हैं कि ऋषि लोग जानते थे कि सूर्य एवं पृथ्वी के बीच दूरी सूर्य के व्यास का 38 गुणा अधिक होती है। वे पाँच ग्रह, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पतिवार एवं शनि के परिक्रमण-काल से परिचित थे। मिस्र, बेबीलोन व यूनान के वासियों से कई हजार वर्षों पूर्व भारतीय ऋषियों को सौरवर्ष की अवधि का ज्ञान था। जिसे वे 365-365 दिन के बीच मानते थे। भाषाई क्षेत्र में यह प्रमाणित हो चुका है कि सदियों के विकासक्रम में सिंधु सरस्वती लिपि एक ओर सेमेटिक लिपि और दूसरी ओर ब्राह्मी लिपि में विकसित हुई। इस तरह स्पष्टतः यह लिपि प्रायः अन्य सभी लिपियों की उत्पत्ति स्रोत बनती है।
इस तरह गणित हो या खगोल विज्ञान, भाषा लिपि हो या शून्य, दशमलव ज्ञान, तथाकथित अरबी संख्याएँ (मूलतः भारतीय) हों या वर्णमाला ज्ञान सभी भारत से उत्पन्न हुए। 18वीं सदी के यूरोपीय विचारक/विद्वान पुरातन आर्ष ग्रंथों की गहराई में ज्ञान विज्ञान की समृद्धता को देखकर रोमाँचित एवं आश्चर्यचकित हो उठे थे। तभी तो जर्मन विद्वान डोहम कह उठे थे कि भारत मानव जाति का पालना है, सभ्यता का जन्म स्थल है। विलियम मैकिन्टरो की उक्ति, “सारा इतिहास भारत को ज्ञान विज्ञान एवं कला की माँ बताता है।” फ्राँसीसी प्रकृतिविद् पियरे सॉनेरट लिखते हैं, “ हम भारतीयों में अधिकतम सुदूर पुरातनता के अवशेष पाते हैं। सभी लोग यहाँ ज्ञान पिपासा शाँत करने आए। भारत ने अपने गौरव काल में समूचे विश्व को अपने धर्म व ज्ञान से आलोकित किया। मिश्र व यूनानवासी अपने ज्ञान के लिए भारत के ऋणी है।”
वाल्टेयर 1773 में अपने ग्रंथ ‘फ्रेगमेन्टस हिस्टोरिक्यूज सर इन्डे’ में लिखते हैं, यह महत्वपूर्ण है कि 35 वर्ष पूर्व पाइथागोरस सामोस से गंगातट पर ज्यामिती सीखने गया। वह इतनी लंबी यात्रा न करता, यदि भारत के विज्ञान की ख्याति यूरोप में पहले से स्थापित न होती। हम पहले से ही यह मानते हैं कि भारतीयों के बीच अंकगणित, ज्यामिती, खगोल विद्या पढ़ाई जाती थी। अनंतकाल से वे विषुव (मुनपदवग) के अयन (चतमबमेपवद) से परिचित थे। भारत में कई वर्ष बिताने वाले फ्राँसीसी खगोलविद् ले जेंटिल भारतीयों के विज्ञान के प्रशंसक थे व आश्चर्यचकित थे कि भारतीयों को इस ज्ञान तक पहुँचने में कितना समय लगा होगा, जिसके बारे में चीनी लोगों को भी कोई मान न था। जिसमें मिश्रवासी व चाल्डियन तक अनभिज्ञ थे मुझे दृढ़ विश्वास है कि खगोल विद्या, ज्योतिष विज्ञान, पुनर्जन्म आदि सभी कुछ हमारे यहाँ गंगा के तट से आया है। ये सब उद्गार आर्यों की मौलिकता को स्पष्ट करते हैं। उनके विदेशी आक्राँता होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
‘द इन्वेजन देट नेवर वाज’ के विख्यात लेखक माइकल डेनिनो आर्य आक्राँता सिद्धाँत का विधिवत खंडन करते हुए, सिंधु-सरस्वती सभ्यता पर व्यापक प्रकाश डालते हुए भारतीय संस्कृति की पुरातनता, एकता एवं अखंडता की बात करते हुए कहते हैं कि भारतीय इतिहास का नैरंतर्य युगों तक रहा है। वैदिक युग 4 ई. पू. से बहुत पहले अपनी प्रौढ़ावस्था में था। इसके बाद सिंधु- सरस्वती सभ्यता आई, जो इसका स्वाभाविक रूप से विकसित रूप था। सरस्वती नदी के सूखने के बाद यह गंगा सभ्यता के रूप में प्रकट हुई। भौगोलिक एवं पारिस्थितिक परिवर्तनों के बीच कोई स्पष्ट विभाजन नहीं रहा। आर्य व द्रविड़ों में भी भाषा, सभ्यता व इष्ट देवताओं के बीच कोई स्पष्ट विभाजन नहीं हैं। सिंधु सरस्वती के कुछ स्थलों ने 4 वर्षों तक अनवरत विकास को दर्शाया है। कही भी प्राकृतिक आपदाओं के अतिरिक्त युद्ध व आकस्मिक व्यवधान का चिन्ह नहीं है। भावी खोजें भी इसी तथ्य की ही पुष्टि करेंगी। श्री अरविंद ‘द फाउंडेशन ऑफ इंडियन कलचर’ में लिखते हैं, “भारत में बहुत पहले से आध्यात्मिक एवं साँस्कृतिक एकता पूर्णता पा चुकी थी और हिमालय तथा दो सागरों के बीच की मानवता भी जीवन प्राण बन चुकी थी।”
यह सुनिश्चित सत्य है कि भारत का अपना गौरवमयी अतीत रहा है, जिसकी ज्ञान-विज्ञान की उपलब्धियाँ स्वयं में अद्वितीय थी व जिसके आलोक में विश्व की अन्य सभ्यताएँ भी प्रकाशित हुई। आज समूची मानव जाति घोर अंधकार एवं अनास्था के दौर में भटक रही है। हम आत्म-विस्मृति के कारण दीन-हीन एवं पतन पराभव की स्थिति में पड़े है। समय आ गया है कि हम अपने अंदर विद्यमान श्रेष्ठता एवं दिव्यता के पक्षधर आर्यत्व को जगाएँ अपने खोए हुए वर्चस्व को पुनः प्राप्त करके न केवल अपने देश को गौरवशाली बनाएँ, बल्कि विश्व -कल्याण के उस उत्तरदायित्व का भी वहन करें, जिसे इस देश ने सहस्राब्दियों तक अपने कंधे पर उठाए रखा था।
जगद्गुरु शंकराचार्य से माँधाता ने पूछा, “भगवन् सर्वोपरि देव कौन है, जिनकी उपासना से लोक -परलोक दोनों सधते हों।”
शंकराचार्य ने कहा, “ वह है गायत्री! गायत्री की महिमा का वर्णन करना मनुष्य की सामर्थ्य से बाहर है। सद्बुद्धि का होना इतना बड़ा कार्य है। जिसकी समता संसार में और किसी से नहीं हो सकती। आत्मज्ञान प्राप्त करने की दिव्य दृष्टि जिस बुद्धि से प्राप्त होती है, उसकी प्रेरणा गायत्री द्वारा होती है।”
यज्ञेषु देवास्तुष्यन्ति यज्ञे सर्व प्रतिष्ठितम्। यज्ञेन ध्रियते पृथ्वी यज्ञस्तारयति प्रजाः॥ अन्नेन भूता जीवन्ति यज्ञे सर्व प्रतिष्ठिम। पर्जन्यें जायते यज्ञात सर्व यज्ञमयं ततः॥
यज्ञों से देवता संतुष्ट होते हैं, यज्ञ ही समस्त चराचर जगत् का प्रतिष्ठापक है। यज्ञ पृथ्वी को धारण किए हुए है, यज्ञ ही प्रजा को पापों से बचाता है। अन्न से प्राणी जीवित रहते हैं। वह अन्न बादलों द्वारा उत्पन्न होता है और बादलों की उत्पत्ति यज्ञ से होती है। अतः यह संपूर्ण जगत् यज्ञमय है।
-कालिकापुराण 23-7-8
मंदिर के जिस प्रकोष्ठ में भगवान सुब्रह्ण्यम की मूर्ति थी, उसी के सामने वाले भाग में एक सुँदर वीणा रखी हुई थी। मंदिर में कई लोग तो वीणा के दर्शन कर लेते और चले जाते। कुछ उसे बजाने की इच्छा करते, पर वहाँ बैठा हुआ मंदिर का रक्षक उनसे मना करता और वे वहाँ से चल देते। इस प्रकार सुँदर स्वरों वाली वह वीणा जहाँ थी, वही रखी रहती थी उसका कभी कोई उपयोग न होता था।
एक दिन एक व्यक्ति आया, उसने वीणा बजाने की इच्छा व्यक्त की, पर उस व्यक्ति ने उसे भी मनाकर दिया। वह व्यक्ति वहाँ चुपचाप खड़ा रहा। थोड़ी देर में सब लोग मंदिर से निकलकर बाहर चले गए, तो उस व्यक्ति ने वीणा उठा ली और उसका लयपूर्वक वादन करने लगा। वीणा का मधुर स्वर लोगों के कानों तक पहुँचा, तो लोग पीछे लौटने लगे और उस मधुर संगीत का रसास्वादन करने लगे। वाद्य घंटों चला और लोग मंत्रमुग्ध सुनते रहे। जब वह बंद हुआ तब भी लोग ईश्वरीय आनंद की अनुभूति करते रहे। लोगों ने कहा आज वीणा सार्थक हो गई।
भावार्थ यह है कि भगवान काया तो सबको देता है, पर कुछ लोग अज्ञानवश व कुछ अभिमानवश इस वीणा रूपी यंत्र का सदुपयोग नहीं कर पाते। यदि इन दो दोषों से दूर रहकर कोई शरीररूपी वीणा से मधुर लहरियाँ निकाले, तो उस आनंद से न केवल वह वरन् संपर्क के सैकड़ों लोग उसमें ईश्वरीय आनंद की झलक पाते हैं।
महर्षि अत्रि की एकमात्र संतान थी, उनकी पुत्री अपाला। स्वभाव से सुशील और नम्र तथा बुद्धि में अपने पिता की प्रतिमूर्ति। केवल एक बार सुनने से उसे सब कुछ कंठस्थ हो जाता। महर्षि अत्रि वेदों की ऋचाएँ उसे याद करने के लिए देते और वह उन्हें एक बार पढ़कर ही अपने मस्तिष्क में सुरक्षित रख लेती। पिता श्री के पूछने पर वह बिना किसी हिचकिचाहट के सब कुछ सुना देती। इतना ही नहीं, महर्षि अत्रि नित्यप्रति अपने शिष्यों को बतलाते तो अपाला भी उसे भलीभाँति सुनती और उसे सुनकर कंठस्थ कर लेती। धीरे-धीरे उसे चारों वेद और उनके अर्थ कंठस्थ हो गए। वेदों का उसे गहरा ज्ञान भी था। ऋचाओं के गहन अर्थ वह ढूंढ़ती और उनके बारे में जब अपनी आशंकाओं को पिताश्री के सामने रखती, तो महर्षि अत्रि भी उसकी प्रतिभा को देखकर गदगद हो उठते।
महर्षि अत्रि के लिए अपाला जहाँ गर्व और गौरव की वस्तु थी, वही वह उनके लिए चिंता का भी कारण बनी हुई थी। अपाला को बचपन से ही चर्म रोग था। उसके शरीर में यत्र तत्र श्वेत कुष्ठ रोग के चिन्ह थे महर्षि अत्रि ने निकटवर्ती सभी वैद्यों को अपने आश्रम में बुलाया और उसके रोग के निदान का प्रयत्न किया। निदान अनवरत चल रहा था, मगर सफलता के लक्ष्य से अति दूर।
बचपन में तो अपाला को अपने रोग के बारे में कोई ज्ञान ही नहीं हुआ। वह पक्षियों की तरह कलरव करती हुई आश्रम में स्वच्छंद विहार करती और वात्सल्य रस से अभिभूत महर्षि उसे देखकर अपने सभी दुख दर्दों को भूलकर आत्मविभोर हो उठते मगर ज्यों-ज्यों वह किशोरावस्था को प्राप्त करने लगी, त्यों-त्यों उसे अपने रोग की भयानकता का अहसास होने लगा। इससे उसे मानसिक पीड़ा हुई, मगर उससे भी कही अधिक चिंता उसे इस बात की थी कि उसके पिता श्री भी दुखी रहते हैं तथा स्वाध्याय में दत्तचित्त नहीं हो पाते। पिता को चिंतित देखकर वह तरह-तरह की बातें करके उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करती और जब इसमें वह असफल हो जाती, तो उनके पास जाकर वह धैर्य बँधाने लगती, पिता श्री क्यों चिंता करते हैं? यह रोग तो अपने आप ही निर्मूल हो जाएगा। औषधियाँ भी चल ही रही है। यदि निर्मल नहीं भी हो तो चिंता करने से क्या लाभ? वस्तुस्थिति को स्वीकारना ही पड़ेगा।
अपाला ने धीरे-धीरे यौवनावस्था में पदार्पण किया, तो महर्षि को उसके विवाह का चिंता सताने लगी। महर्षि ने कई युवकों के मन को टटोलने की कोशिश की, परंतु श्वेत कुष्ठ चिन्हों के कारण कोई भी युवक अपाला से विवाह के लिए तैयार नहीं हुआ। इस स्थिति ने महर्षि को और भी झकझोर दिया।
युवावस्था मनुष्य के अनेक शारीरिक दोषों पर परदा डाल देती है। अपाला पर जब युवावस्था गहराने लगी, तो श्वेत कुष्ठ के चिह्न धीरे-धीरे हलके पड़ने लगे। अब पूर्ण जानकारी होने पर ही वे चिन्ह दृष्टिगत होते थे। सामान्यतः अपाला का चेहरा काफी आकर्षक था और वह किसी व्यक्ति को इतना अवसर ही नहीं देता था कि उसकी दृष्टि शरीर के दोषों की ढूंढ़ सके। ऐसे ही अवसर पर एक दिन कृशाश्व नाम के एक ऋषि और ब्रह्मवेत्ता का महर्षि अत्रि के आश्रम में आगमन हुआ। कृशाश्व ने सहज दृष्टि से कुसुमित अपाला को निहारा, तो स्तंभित से रह गए। यौवन काँति की चकाचौंध में वे कुष्ठ चिन्हों का आभास ही नहीं कर पाए। उन्होंने महर्षि से अपाला के परिणय की माँग की, तो महर्षि प्रसन्नता से झूम उठे। महर्षि ने शुभ दिन और शुभ मुहूर्त ज्ञातकर वेदोक्त पद्धति से सौंदर्य प्रतिमा अपाला का विवाह ऋषि कृशाश्व के साथ कर दिया। सौंदर्योपासक कृशाश्व ने नवोढ़ा अर्द्धांगिनी अपाला के साथ अपने आश्रम की ओर प्रस्थान किया।
कुछ समय तक तो अपाला और कृशाश्व का वैवाहिक जीवन बड़े ही प्रेमपूर्ण वातावरण में व्यतीत हुआ। मगर ज्यों-ज्यों युवावस्था ढलने लगी, त्यों-त्यों ही श्वेत कुष्ठ के चिन्ह उभरने लगे। कृशाश्व ने जब देखा, तो मन में प्रेम के स्थान पर घृणा के अंकुर फूटने लगे। वह सौंदर्योपासक अब अपाला के वीभत्स रूप को सहन नहीं कर पाया। उसकी बार-बार इच्छा हुई कि अपाला को महर्षि के आश्रम में छोड़ आए, परंतु महर्षि का सामना करने का साहस वह नहीं जुटा पा रहा था। वस्तुस्थिति को समझकर अपाला स्वयं कृशाश्व की स्वीकृति लेकर अपने पिता के आश्रम की ओर चल दी।
महर्षि अत्रि ने अपनी पुत्री अपाला को देखा तो उनके दुख और वात्सल्य एक साथ ही आँखों की आस फूट निकले। उन्हें इस प्रकार की कुछ आशंका तो पहले से थी ही। फिर भी उस स्थिति का सामना करके वह शाँत न रह सके।
महर्षि अत्रि ने अपनी पुत्री को धैर्य बँधाया और उसे निश्चित होकर आश्रम में रहने के लिए कहा। आश्रम का वातावरण लगभग वैसा ही था जैसा अपाला छोड़ गई थी। समय का प्रभाव अवश्य ही सब कही था। महर्षि भी अब कुछ वृद्ध हो चले थे। अभी भी उनकी कर्मठता चुकी नहीं थी। अपाला आश्रम के वातावरण में शीघ्र ही घुल-मिल गई, पर उसकी वेदना रह -रहकर उसके चेहरे पर उभर आती। उसे विशेष रूप से यह सोचकर कष्ट होता है कि उसी के कारण कृशाश्व का जीवन संकटमय हुआ और पिता श्री को तो वह सदैव कष्ट देती ही रही है।
महर्षि अत्रि अपनी पुत्री के चेहरे के भावों को पढ़ते रहते। उन्होंने एक दिन अपाला को अपने निकट बुलाया और कहा, “बेटी! नियमित आहार, अध्ययन, उपासना और शयन से तेरा उपकार होगा। तू तपस्या कर। उसी से तेरा उद्धार होगा।”
अपाला ने अपने पिता की आज्ञा मानकर इंद्र की तपस्या करनी प्रारंभ कर दी। उसकी तपस्या पूर्ण निष्ठा और लगन से चल रही थी। वह नित्य सूर्य को अर्घ्य देती और शनैः शनैः सभी मानवीय दुर्बलताओं से मुक्त होती जा रही थी।
अपाला की तपस्या से इंद्र प्रभावित हुए। वे अपाला के सामने आए, तो वह श्रद्धा से नत हो गई। वह वेदों की ज्ञाता थी, इसलिए वह जानती थी कि इंद्र को सोमरस प्रिय है। उसके पास सोम बेल थी, पर आस-पास इसे निकालने के लिए कोई साधन नहीं था। वह निराश सी इधर-उधर दृष्टि दौड़ने लगी। साधन हीन होकर भी सोमबेल को अपने दाँतों में दबाकर उसी से सोमरस एक पात्र में निकालने लगी। इस प्रकार सोमरस निकालकर इंद्र को प्रस्तुत किया, तो अपाला की निश्छल भावना को देखकर वे भाव-विभोर हो उठे। उन्होंने प्रेम से सोमरस का पान किया और अपाला से वरदान माँगने के लिए कहा।
अपाला ने वरदान माँगा, हे इंद्र! मुझे आप सुलोम बनाइए। मेरे अंगों को देखकर दोषरहित और श्रेष्ठ त्वचा वाले बनाइए। तभी मैं अपने ऊपर आरोपित आरोपों से मुक्त हो सकती हूँ और अपने पिता एवं पति को प्रसन्न रख सकूँगी।
इंद्र ने अपाला पर अपनी विद्या का प्रयोग किया और तीन बार उसकी त्वचा का शोधन किया। इससे अपाला की त्वचा अत्यंत आकर्षक और दोषरहित बन गई। उसने इंद्र का स्तवन किया और आभार माना।
उधर कृशाश्व भी अपाला के जाने के बाद प्रसन्न नहीं थे उन्हें लग रहा था जैसे उन्होंने भी अपाला के साथ अन्याय किया हो। वह जैसी भी थी उनकी पत्नी थी, जिसका उन्होंने स्वयं अपनी इच्छा से वरण किया था। सो वे अपाला को पुनः लेने के लिए महर्षि आश्रम में आ पहुँचे। ठीक उसी समय अपाला भी तपस्या में सफलता प्राप्त करके वहाँ आई। अपाला के नए रूप को कृशाश्व ने देखा, तो उसकी प्रसन्नता की कोई सीमा न रही। नारी के तप की गरिमा के सामने उनके पौरुष की आँखें नीची हो गई थी। वह समझ चुके थे कि वास्तविक सौंदर्य तप में है, शरीर में नहीं।
दिव्य आत्मा कौन?
‘परमार्थ प्रयोजनों के लिए बहुत कुछ कर गुजरने की अभिलाषा’ एक ऐसा तत्व है, जिसे ईश्वरीय प्रकाश एवं पूर्व जन्मों के संचित उत्कृष्ट संस्कारों का प्रवाह कह सकते हैं। जिसके भीतर जितनी ईश्वरीय प्रयोजनों में सहयोगी बनने की तड़पन हैं, वह उतना ही दिव्य आत्मा है। तड़पन पानी के स्रोतों की तरह है, जो पहाड़ जैसी कठोरता को चीरकर बाहर निकल आती है। साधारण परिस्थिति के लोग भी उपयुक्त अवसर पर अपनी तड़पन क्रियान्वित करने का साहस कर बैठते हैं, तब वह साहस ही ईश्वरीय अवतरण के रूप में उन्हें सूर्य चंद्रमा की तरह चमका देता है। तड़पन का फूट पड़ना, इसी का नाम अवतरण है।
-वाङ्मय 28, पृ. 2.87
इंद्रियों की सामर्थ्य सीमित होती है। इनकी पहुँच स्थूल जगत् के कुछ क्षेत्रों तक ही है। इससे परे भी कई अज्ञात लोक है। यह ज्ञान अतींद्रिय सामर्थ्य द्वारा जाना जाता है। इसी के माध्यम से देवों का दर्शन, स्वप्न द्वारा पूर्वाभ्यास आदि अलौकिक अनुभूति प्राप्त होती हैं। साधक-तपस्वियों का जीवन इसी तरह अलौकिक घटनाओं से भरा होता है। सामान्यजन भी अपनी मनःस्थिति को सात्विक रखकर इस तरह की अनुभूतियों से साक्षात्कार कर सकते हैं। आजकल इसे मात्र कल्पना नहीं माना जाता, वरन् यह विषय आधुनिक परामनोविज्ञान के अंतर्गत आता है, जिसमें कई प्रकार के अनुसंधान-अन्वेषण हो रहे है।
इस क्षेत्र में कई प्रमाणित शोध ग्रंथ भी उपलब्ध है, जिसमें अगणित सच्ची घटनाओं का वर्णन किया है। इस परिप्रेक्ष्य में सीजर डी वेस्मी की पुस्तक ‘ल हिस्टारि एंड स्पिरिट्स इन एनशिएंट वर्ल्ड’ काफी महत्वपूर्ण है। इन पुस्तकों से प्राप्त उद्धरणों से पता चलता है कि इंद्रियों से परे भी एक ज्ञान है, जिसे अतींद्रिय बोध आदि कहा जा सकता है।
यूनानी दार्शनिक प्लूटार्क ने अपनी कृति ‘द जोनियो सोक्रेटिस’ में सुकरात के जीवन से सम्बन्धित कई घटनाओं का जिक्र किया है। इस पुस्तक से पता चलता है कि सुकरात के अंदर एक डेमन रहता था। यह डेमन उन्हें समय-समय पर आगामी घटनाओं की पूर्व सूचनाएँ देता रहता था। प्लेटो की ‘थीसीज’ में सुकरात के डेमन का रोचक प्रसंग है। एक शाम सुकरात तिमार्कस नामक एक व्यक्ति व अपने कुछ अन्य साथियों के साथ बैठे खाना खा रहे थे। कुछ समय बाद तिमार्कस कही जाने को अपने स्थान से उठ खड़ा हुआ। “अपने स्थान से तनिक भी नहीं उठना,” सुकरात तुरंत बोल पड़े। सुकरात ने इसे और स्पष्ट करते हुए बस इतना कहा, मुझे अभी-अभी खतरे की सूचना मिली है। तिमार्कस बैठ गया। थोड़ी-थोड़ी देर बाद जब-जब भी तिमार्कस उठने लगता, सुकरात उसे पुनः बिठा दिया करते। आखिरकार तिमार्कस से नहीं रहा गया और वह चुपचाप उठकर चल दिया। वहाँ से चलने के बाद वह षड्यंत्रकारियों के दल से मुठभेड़ के कारण मारा गया। पूर्वाभास स्वप्न में माध्यम से भी होते हैं। कइयों ने इसे माना और लाभान्वित हुए और जो इसे मात्र कल्पना लोक की उड़ान समझे, खतरे में पड़े। एक ऐतिहासिक प्रसंग में स्वप्न के माध्यम से पूर्वाभास का वर्णन है। जूलियस सीजर की पत्नी को एक रात स्वप्न आया कि उसके पति की प्रतिमा में खून टपक रहा है। दूसरे दिन उसने सीजर को सीनेट में जाने से बहुत रोका। सीजर ने अपनी पत्नी को इतना विचलित कभी नहीं देखा था। वह स्वप्न के प्रभाव के कारण अत्यंत क्षुब्ध थी और एक बार तो सीजर जाने से रुक भी गया था। किंतु आखिर वह चला भी गया अपने अदृष्ट की ओर। वहाँ से भारी हानि उठानी पड़ी।
विश्व के महान इतिहासकार हिरोडोट्स ले लाडा के राजा कोशस का उल्लेख किया है, जिसमें अतींद्रिय प्रत्यक्षण का वर्णन है। 56-546 ई. पू.र्व अपने शासनकाल के दौरान जब राजा अपने शत्रुओं की बढ़ती हुई ताकत से आतंकित होने लगा, तो इसके उचित समाधान हेतु किसी भविष्यवक्ता की इच्छा की। इसके लिए सात भविष्यवक्ता जाँच के लिए चुने गए। सातों में से डेल्फी की भविष्यवाणी ही सही निकली। जिसका विवरण सुनकर राजा अत्यंत प्रभावित हुआ। डेल्फी के पास आए राजा के संदेशवाहक को उसने कहा, “तुम्हारा राजा पीतल के बड़े बरतन में जिस पर पीतल का ही ढक्कन था, एक कछुए व भेड़ को साथ-साथ भून रहा था।” यह एक आश्चर्यजनक सत्य था। इसके पश्चात डेल्फी ने अपने प्रति विश्वस्त राजा को अपनी अतींद्रिय सामर्थ्य के माध्यम से बहुत लाभ पहुँचाया।
भविष्यज्ञाता एलेशा के बारे में कहा गया है कि वह सीरिया के सैनिक भेद जानने हेतु इसी अतींद्रिय ज्ञान का प्रयोग करते थे। इसी ज्ञान को जानने के कारण महाभारत में संजय धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र में लड़े जा रहे युद्ध का समाचार इस तरह सुना रहे थे मानो वह प्रत्यक्ष देख रहे हों। स्वीडन बोर्ग ने भी अपने मित्रों को सैकड़ों मील दूरस्थ अपने गाँव में हो रहे भीषण अग्निकाँड का विवरण इसी प्रकार दिया, मानो सभी कुछ उसकी आँखों के सामने हो रहा है।
दार्शनिक काँट अतींद्रिय प्रत्यक्षण को सत्य मानते थे। इस बारे में उन्होंने अपनी पुस्तक ‘ड्रीम ऑफ ए बिलीवर’ में सुविख्यात गणितज्ञ विद्वान वैज्ञानिक स्वीडन बोर्ग के एक अनुभव का जिक्र किया है। उनके अनुसार, एक शनिवार की शाम को करीब चार बजे स्वीडन बोर्ग इंग्लैंड से गोहनर्ब पहुँचे ही थे कि एकदम बेचैन हो गए। अपने सहपाठियों को छोड़कर वे बाहर जाकर घूमने लगे। लौटने पर उन्होंने बतलाया कि अभी अभी स्टाक होम में उनके मकान के निकट भीषण अग्निकाँड हुआ और आग की लपटें बड़ी तीव्र गति से बढ़ती जा रही हैं। स्वीडन बोर्ग उस समय अत्यंत उद्विग्न व परेशान रहे। करीब आठ बजे वे कुछ शाँत हुए और बोले, ईश्वर का धन्यवाद है कि आग हमारे मकान से बीस मकान पूर्व ही बुझा दी गई। काँट इस घटना से अत्यंत प्रभावित हुए।
बोकाकियो द्वारा रचित दाँते की जीवनी में भी ऐसा ही एक रोचक प्रसंग मिलता है। इसमें दाँते की मृतात्मा ने अपनी पुस्तक के रुके हुए भाग को पूरा करने में सहायता प्रदान की थी। ‘द डिवाइन कॉमेडी’ के महान रचनाकार की मृत्यु के बाद यह पाया गया कि उसके अंतिम भाग पेराडिसों के कई अंतिम छंद नहीं मिल रहे हैं। बहुत खोजने पर भी जब वह छंद नहीं मिले, तो उनके सुपुत्रों ने स्वयं लिखकर कृति को पूरा करने का निश्चय किया। इस दौरान दाँते के एक पुत्र जाकोया ने रात में दाँते को स्वप्न में देखा चिंतित जाकोया ने तुरंत पिता से छंदों के बारे में पूछा। दाँते उसे पुराने मकान के एक कमरे में ले गए और उसकी दीवार को स्पर्श करते हुए बोले, जिसके लिए तुम इतने परेशान हो, वह इसमें विद्यमान है। जाकोया तुरंत उठा और अन्य व्यक्तियों को साथ लेकर उस मकान में गया, जहाँ मृत्यु के पूर्व उसके पिता रहते थे। दाँते द्वारा इंगित दीवार पर एक चित्र टँगा हुआ था। जब उसे हटाया गया तो पीछे तेरह छंद मिले, जिनसे कि वह अधूरी पड़ी कृति पूर्ण हो सकी। इस पाँडुलिपि की हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि यदि वे कुछ दिन वही पड़े रह गए होते, तो पूर्णतः सड़-गल जाते।
स्वप्न द्वारा प्राप्त इस तरह की जानकारी सचमुच में अद्भुत और आलौकिक है। ऐसी और भी कई घटनाएँ हैं।1956 की एक घटना में एम राँवेल नामक एक व्यक्ति ने ‘एलेन कोर्डेक’ के नाम से अदृश्य प्रेतात्माओं द्वारा लिखाई गई एक पुस्तक ‘द बुक ऑफ द स्पिरिट्स’ प्रकाशित की। इस पुस्तक का विश्व की लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। इसी तरह शिवरामिकंकर योगत्रयानंद के बारे में कहावत है कि पाणिनि की आत्मा ने स्वयं आकर उन्हें व्याकरण के सूत्र सिखाए थे।
अतींद्रिय सामर्थ्य से पूर्वी पूर्णतः परिचित है, बल्कि यह कहने में जरा भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह ज्ञान यही की देन है। पाश्चात्य जगत् भी इससे अछूता नहीं है। काँट, गेटे, शैलिंग, हीगल, शोपेनहावर, सदृश दार्शनिकों ने भी इस सत्य को हृदयंगम किया है। 1816 में डॉ. वलूग व डॉ. वाँलफाँट ने अपनी पुस्तक ‘डेर मेग्नेटिज्मस’ में इसके अनोखे विवरण प्रस्तुत किए हैं। 1829 में डॉ. करनर ने एक लेख ‘टू सीअर ऑफ प्रोवोर्स्ट’ में अतींद्रिय क्षमतासंपन्न फ्रेडरिका हाफे नामक महिला का उल्लेख किया है। फ्रेडरिका बचपन से ही होने वाली घटनाओं की पूर्व सूचना दे देती थी। ईसा के जीवनी लेखन डेविड स्ट्राँस ने भी इस सत्यता की पुष्टि की है।
उपर्युक्त विवरणों एवं वर्णनों को मात्र कौतुक -कल्पना नहीं कहा जा सकता है। यह प्रक्रिया सच्ची है। इसका संपूर्ण आधार मन है। मन यदि सात्विकता से ओत-प्रोत है। तो स्वप्न में भावी जीवन एवं घटनाओं की पूर्व सूचना मिल सकती है। सच्चे मन से साधना करने पर भी इन अनुभूतियों से एकाकार हुआ जा सकता है। यह पूर्वाभास जाग्रत अवस्था में भी प्राप्त हो सकता है। यदि साधना, पुण्य एवं संकल्प प्रगाढ़ और प्रबल हो तो सचेतन व जाग्रत अवस्था में भी दिव्य दर्शन संभव है। मनुष्य जिस मनःस्थिति में रहता है, उसी के अनुरूप से आभास मिलते हैं। शरीर एवं मन को सात्विकता का आगार बनाकर साधना द्वारा अनेकों अलौकिक अनुभूतियों से साक्षात्कार किया जा सकता है।
निष्ठुरता से बढ़कर कुरूपता और कहीं कोई नहीं।
जाग्रत आत्माओं एवं महापुरुषों का एक ही चिन्ह है कि वे संकीर्ण क्षेत्र में सीमित नहीं रहते। शरीर, घर और धन इतना ही सब कुछ है, ऐसा वे नहीं मानते और उसके अतिरिक्त और कुछ कर्तव्य भी उनका है, ऐसा वे सोचते हैं। अपने समय की, देश धर्म, संस्कृति एवं समाज की जिम्मेदारियाँ वे समझते हैं और उनकी सामयिक आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए वे कुछ करते भी हैं।
आधुनिक कही जाने वाली जीवन शैली ने जीवन चेतना को क्षत-विक्षत कर दिया है। यही वजह है कि आज मनोरोगों की भरमार हो चली है। इन सभी मनोरोगों का सम्बन्ध मन से है। मन एक भावबोधक शब्द है, जो मस्तिष्क के जटिल क्रियात्मक पहलू को उजागर करता है। मन के मुख्य रूप से दो क्रियात्मक स्तर हैं, (1) ऊपर का या सतही मन, (2) गहराई वाला अवचेतन मन।
सामान्य क्रम में व्यक्ति को सिर्फ चेतन मन का ही ज्ञान होता है। अवचेतन मन का अनुभव तब होता है, जब कोई बेधक विचार कौंधता है या फिर आत्मविश्लेषण किया है और उसी की इच्छा के अनुरूप जीवनयापन करते हैं। अवचेतन मन की इच्छाओं आकाँक्षाओं की ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता। यदि कभी ऐसा होता भी है, तो उसे बलपूर्वक दबा दिया जाता है अवचेतन मन पर पड़ने वाला यह आवश्यक दबाव भी कालाँतर में मानसिक रोग का कारण बन जाता है।
मनुष्य के अपने मन की विकृतियाँ ही मानसिक रोगों का प्रमुख कारण होती हैं। अपनी सामान्य अवस्था से विचलित होना ही विकृति कहलाती है। मन की विकृति के कई लक्षण हैं, जैसे अत्यधिक चिंता या बेवजह का डर, बेचैनी और अनिद्रा, आवेशों की अधिकता, अवास्तविकता अथवा काल्पनिक विचारों में खोए रहना, असामान्य व्यवहार, अपनी और अपने आश्रितों की देखभाल में लापरवाही आदि। मन की ये विकृतियाँ कायिक एवं क्रियात्मक दो रूपों में परिलक्षित होती हैं। कायिक विकारों से मस्तिष्क प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होता है, जबकि क्रियात्मक विकारों से मस्तिष्क तो सामान्य रहता है, लेकिन उसके कार्य में बाधाएँ पहुँचती है। मन की विकृति का काया पर पड़ने वाला प्रभाव उन्माद, मिरगी आदि रोगों के रूप में दिखाई पड़ता है। इन रोगों से ग्रस्त व्यक्ति की मेधा शक्ति क्षीण होने लगती हैं। जिसके कारण वह भुलक्कड़ अस्त-व्यस्त मंद बुद्धि एवं एक ही क्रिया को बार-बार दुहराने वाला हो जाता है। इस रोग की चरम अवस्था में उपचार असंभव हो जाता है, परंतु प्रारंभिक अवस्था में उचित उपचार द्वारा रोगी ठीक हो सकता है।
क्रियात्मक विकारों से आवेशों, विचारों और व्यवहार पर बहुत ज्यादा पड़ता है। रोगी के मन में आवेशों की एक असामान्य लहर उमड़ती है, जिसमें उत्साह या अवसाद होता है। उत्साह के कारण आवेशित व्यक्ति बेचैन, निद्राहीन, बातूनी और कई बार हिंसात्मक भी बन जाते हैं। अवसाद से आवेशग्रस्त होने वाला व्यक्ति दुःखी, बेचैन, निराश और आत्महत्या की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं। ये दोनों कई बार अपने आप ठीक भी हो जाते हैं, पर इनकी आवृत्ति प्रायः होती रहती है।
चिंता, हिस्टीरिया, स्क्रिजोफ्रेनिया, आब्सेसिव-कंपल्सिव आदि कुछ अन्य प्रमुख मानसिक विकार हैं। चिंता की अवस्था में व्यक्ति अपने स्वास्थ्य एवं सुरक्षा को लेकर अत्यधिक चिंतित रहता है। पूर्ण स्वस्थ होते हुए भी काल्पनिक रोगों के भय से स्वयं को इतना परेशान कर लेता है कि चिकित्सक द्वारा आश्वासन दिए जाने पर भी उसे विश्वास नहीं होता। हिस्टीरिया में भी व्यक्ति अपने आपको रोगग्रस्त मानकर लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने की कोशिश करता है। इन मनोरोगों की दशा में व्यक्ति का मन पूरी तरह संदेहों और अनिश्चितता से भर जाता है। इनका इलाज बहुत कठिन होता है और धीरे-धीरे स्थायी बनता चला जाता है। चिंता और हिस्टीरिया का उपचार आरंभिक अवस्था में मनोचिकित्सकों द्वारा किया जा सकता है। इसकी आवृत्ति भी प्रायः कम होती है।
स्क्रिजोफ्रेनिया अर्थात् विखंडित मनोविक्षिप्त का प्रमुख लक्षण सोचने एवं बातचीत में आई गड़बड़ी है। रोगी की मानसिक कार्यप्रणाली के विभिन्न अवयवों से तालमेल समाप्त हो जाता है। विचारों और संवेगों के बीच तारतम्य का लोप हो जाता है। अतः रोगी की बातचीत एवं कार्यकलाप एक दूसरे से परस्पर विरोधी या असंबद्ध हो जाते हैं। कुछ रोगी परिस्थिति एवं समय से परे लगातार निरर्थक बातें करते रहते हैं। इसके विपरीत कई रोगी बोलते ही नहीं, बस एकदम भावविहीन नेत्रों से टकटकी लगाए देखते रहते हैं। रोगी की संवेगात्मक अनुभूति की क्षमता में अत्यधिक परिवर्तन आ जाता है। वे न तो खुशी का अनुभव कर पाते हैं, न दुख का। कुछ मरीज बिना किसी कारण के हँसते या रोते दिखाई पड़ते हैं या फिर अचानक गुस्से में भरकर मारपीट करने लगते हैं। इस रोग की कैटाटोनिक अवस्था में कुछ रोगी हफ्तों बिना कुछ खाए-पिए चुपचाप एक विचित्र मुद्रा में पड़े रहते हैं। इस रोग के लिए ई.सी.टी. चिकित्सा सामान्यतया दी जाती है, जो कि नुकसानदायक होती है।
आब्सेसिव कंपल्सिव रोग एक ऐसी मानसिक बीमारी है, जिसमें व्यक्ति के मस्तिष्क में लगातार एक चेन की तरह न समाप्त होने वाले विचारों के आने की प्रक्रिया सतत रूप से चलती रहती है, जो स्वयं व्यक्ति के लिए काफी कष्टकारी होती है। रोगी उन विचारों की निरर्थकता के प्रति जागरुक होता है। वह उन्हें रोकने की कोशिश भी करता है, परंतु असफल रहता है। इन्हीं विचारों को रोगी जब व्यवहार में करने लगता है, तो वह असामान्यता कंपल्शन के नाम से जानी जाती है। कंपल्शन के रोगी अपने विभिन्न व्यवहारों को एक निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर करने के लिए बाध्य होते हैं। इस तरह के असामान्य व्यवहारों में मुख्य रूप से कई’-कई बार और काफी-काफी देर तक रोगी द्वारा अपने हाथ धोना, बार-बार खिड़की दरवाजे और सिटकनी चेक करना, बिजली के स्विच चेक करना या किसी चीज को बार-बार छूना गिनती का कंपल्शन होने पर रोगी कई बार पैसों की गिनती करता है, चौराहों से गुजरने वाली गाड़ियों एवं व्यक्तियों की भी गिनती घंटों तक करता रहता है। कई बार तो रोगी कुछ काम शुरू करने से पहले एक खास नंबर तक की गिनती गिनता रहता है।
आब्सेशन के रोगी को बहुत अधिक उद्विग्नता का सामना करना पड़ता है, जिससे उसके मस्तिष्क में एक द्वंद्व सा चलता रहता है। ऐसी स्थिति में रोगी कुछ निरर्थक अतर्किक व्यवहार करते हैं, जिससे उनके तनाव एवं घबड़ाहट में कमी आ जाती है। ऐसा करके रोगी कुछ देर के लिए अपने को आरामदायक स्थिति में रख पाता है।
मनोरोग विशेषज्ञों एवं अन्य चिकित्साशास्त्रियों ने अपने विभिन्न शोध-परिणामों के आधार पर यह प्रमाणित कर दिया है कि आब्सेशन एक विशुद्ध मनोवैज्ञानिक रोग हैं। इसके उपचार में मुख्य रूप से दो तरह की पद्धतियाँ प्रभावी पाई गई है, (1) औषधि द्वारा एवं (2) बिहेवियर थेरेपी द्वारा।
मिरगी भी एक प्रमुख मानसिक रोग है। जब मस्तिष्क की स्नायु प्रणाली जो अत्यधिक संवेदनशील है, पर कोई अनावश्यक दबाव पड़ता है, तब ऐसी अवस्था में शरीर के अंगों में अकड़न, प्रकंपन एवं अचेतना तथा कुछ हद तक दृष्टिदोष भी उत्पन्न हो जाता है। इसी स्थिति को मिरगी के दौरा के रूप में जाना जाता है। आयुर्वेद में इस रोग के कारणों पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि चिंता, शोक, क्रोध, मोह आदि से कुपित हुए दोष वातपित्त-कफ हृदय में स्थित नाड़ी के साथ मिलकर ज्ञान शक्ति का नाश करके मिरगी या अपस्मार को उत्पन्न करते हैं। अच्छी नौकरी, अधिक धन प्राप्त करने की चिंता, पारिवारिक कलह, अनुचित खान-पान एवं उत्तेजक औषधियों के सेवन से मस्तिष्क विकृत हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप ही लोग मिरगी रोग के शिकार हो जाते हैं। इस रोग के उपचार के सम्बन्ध में ध्यान रखने योग्य सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस रोग से जुड़े अंधविश्वासों से बचा जाए और किसी अच्छे मनोरोग चिकित्सक द्वारा इसका उपचार कराया जाए।
वर्तमान समय में अधिकाँश मानसिक रोगों के उपचार के लिए ‘ध्यान’ एक सफल चिकित्सापद्धति के रूप में उभरकर आया है। भारतीय ऋषि-महर्षियों द्वारा प्रणीत ध्यान की शैली का प्रयोग कर विभिन्न देशों के मनोचिकित्सकों ने मानसिक रोगियों का सफल उपचार किया। तभी से आधुनिक चिकित्सा विज्ञानी यह मानने लगे कि मानसिक विकृति को दूर करने के लिए ध्यान एक सशक्त माध्यम है। कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ साइको फिजियोलॉजिकल मेडिसिन में साइकियाट्री के डायरेक्टर हेरल्ड एच ब्लूमफील्ड एमडी ने मानसिक विकृतियों से जुड़े एक सौ दो रोगियों पर ध्यान का सामूहिक परीक्षण किया। परिणाम अत्यंत उत्साहपूर्वक रहा। इनमें कुछ रोगियों को आदर्शजनक ढंग से लाभ हुआ। 25 वर्षीय स्नातक छात्रा जान 17 वर्ष की उम्र से मिरगी एवं अन्य कई मानसिक विकृतियों की शिकार थी। एक वर्ग तक लगातार ध्यान करने के बाद वह पूरी तरह रोगमुक्त हो गई। 28 वर्षीय जार्ज भी अनेक मानसिक रोगों से पीड़ित था। 14 महीने के ध्यान उपचार के बाद वह भी पूर्ण स्वस्थ हो गया।
मन की अस्त-व्यस्तता ही मानसिक विकृतियों का कारण होती है। ध्यान द्वारा मन एकाग्र होता है। उसकी चंचलता धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। ध्यान के क्षणों में मिलने वाला आत्मिक सुख एवं गहन शाँति मन की सारी ग्रंथियों को तोड़ देते हैं और व्यक्ति अपने आपको हल्का-फुल्का महसूस करने लगता है।
जीवन परमात्मा का अनमोल उपहार है। यह स्वयं में ही इतना दिव्य, पवित्र और परिपूर्ण है कि संसार का कोई भी अभाव इसकी पूर्णता को खंडित करने में असमर्थ है। आवश्यकता सिर्फ इतनी है कि हम अपने मन का गहराई से अध्ययन कर उसे उत्कृष्टता की दिशा में उन्मुख करें। ईर्ष्या, द्वेष, लोभ एवं अहं के दोषों से मन को विकृत करने की बजाय अपनी जीवन शैली को बदल कर सेवा, सहकार आदि गुणों के सहारे न केवल मानसिक रोगों से बचा जा सकता है, बल्कि अपनी भरपूर मानसिक क्षमताओं को विकसित किया जा सकता है।
श्रुतायुघ के पास शंकर जी के वरदान से प्राप्त एक गदा थी। शर्त मात्र यही थी कि वह उसका अनीतिपूर्वक प्रयोग न करे। यदि करेगा, तो लौटकर वह उसी को नष्ट करेगी। महाभारत युद्ध में क्रोध के आवेश में उसने उस गदा का प्रयोग सारथी की भूमिका निभा रहे भगवान कृष्ण पर कर डाला। गदा बीच से ही वापस लौटकर श्रुतायुध पर ही आ गिरी और उसे क्षत-विक्षत कर गई। भस्मासुर ने भी यही वरदान माँगा था कि वह जिसके सिर पर हाथ रख देगा। वही भस्म हो जाएगा। जब उसने वरदान का दुरुपयोग आरंभ किया, तो भगवान ने माया रची और उसकी दुर्बुद्धि ने उसे स्वयं अपने ऊपर हाथ रखवाकर भस्म कर डाला। यह चयन की दिशाधारा ही है, जो मनुष्य का गंतव्य भवितव्य निर्धारित करती हैं।
एक सभा में वाद-विवाद चल रहा था। एक पक्ष ने कहा, “मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, क्योंकि वह सभी जीवधारियों को वश में कर लेता है।” दूसरा पक्ष कहता था, “प्राणी श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे जिंदगी भर बिना कुछ माँगे मनुष्य की सेवा करते हैं।” निर्णय नहीं हो पा रहा था। विवाद बढ़ता ही गया। एक ज्ञानी उधर से जा रहे थे। सबने उनकी सम्मति माँगी। ज्ञानी ने दोनों पक्षों की बात सुनी और बोले, “भाई! मानवी स्वतंत्रता की भी अपनी सीमा है। हर कोई जीवन जीने का मर्म नहीं जानता। मनुष्य जब तक सत्कर्म करता है, तब तक ही श्रेष्ठ है और जब वह दुष्कर्म करने लगता है, तो वह नीचे गिर जाता है। जब भी ऐसे चयन के अवसर आए हैं, मानवी बुद्धिमता की पूरी परीक्षा हुई है।”
मगध के एक धनी व्यापारी ने बहुत धन कमाया। उसे अपनी संपन्नता पर इतना गर्व हुआ कि वह अपने घर के लोगों पर ऐंठा करता। फल यह हुआ कि उसके लड़के भी उद्दंड और अहंकारी हो गए। पिता पुत्रों में ही ठनने लगी। घर नरक बन गया।
उद्विग्न व्यापारी ने महात्मा बुद्ध की शरण ली और कहा, “भगवन्! मुझे इस नरक से मुक्ति दिलाइए, मैं भिक्षु होना चाहता हूँ।”
तथागत ने कुछ सोचकर उत्तर दिया, “भिक्षु बनने का अभी समय नहीं है। तात! तुम जैसा संसार चाहते हो वैसा आचरण करो, तो घर में ही स्वर्ग के दर्शन कर सकोगे। उपवन में भी तुम्हें शाँति नहीं मिलेगी, जब तक मन अशाँत है। यह नरक तुम्हारा अपना ही पैदा किया हुआ है।”
व्यापारी घर लौट आया। उसने जैसे ही अपना दृष्टिकोण व्यवहार-आचरण बदला, सबके हृदय बदले व उसे घर में ही स्वर्ग के दर्शन होने लगे।
प्रगति दुर्गति तथा स्वर्ग नरक मनुष्य स्वयमेव ही रचता है।
रामनवमी मर्यादाओं और आदर्शों का अवतरण दिवस है, साथ ही शाश्वत, सनातन और चिरंतन सत्य की अभिव्यक्ति का पुण्य क्षण भी आर्ष साहित्य और लोक साहित्य की प्रवहमान चिंतन धारा में यही सत्य विविध रूपों में वर्णित हुआ है। यह तथ्य स्पष्ट है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम एवं आद्यशक्ति सीता आदर्शों की स्थापना के लिए तो अवतरित हुए ही थे, परंतु साथ ही सनातन ब्रह्मा एवं शक्ति भी राम एवं सीता के रूप में लीला करने इस भूतल पर आए थे।
राम और सीता दो होते हुए भी एक थे। गोस्वामी जी कहते हैं-
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बंदउँ सीता राम पद जिन्हें परम प्रिय खिन्न॥
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को भारतीय धर्म साधना मूलतः ब्रह्म के रूप में इस सचराचर जगत् में परिव्याप्त मानकर सर्वोच्च सनातन होने में अपनी आस्था को व्यक्त करती है, वही एक सूक्ष्म धारणा राम तथा ॐ की तात्विक एकता की ओर भी सूक्ष्म संकेत करती है।
वस्तुतः ‘राम’ शब्द जब निराकार एवं सकल ब्रह्म के रूप में व्यवहृत होता है, तो आश्चर्यजनक रूप में राम ही ‘ऊँ’ हो जाता है। व्याकरणविदों एवं भाषाशास्त्रियों के अनुसार राम शब्द में आने वाली ‘आ’ तथा ‘अ’ स्वर ध्वनियाँ इस शब्द में आने वाली ‘र’ तथा ‘म’ व्यंजन ध्वनियों के उच्चारण की दृष्टि से ही आती हैं।
‘माँडूक्योपनिषद्’ में आया एक प्रामाणिक सूत्र कहता है, ‘ओमित्येदक्षरम’ जिससे राम तथा ॐ की तात्विक एकता प्रमाणित होती है। महाकवि तुलसीदास भी रामचरित मानस में इसी तथ्य को पुष्ट करते हुए कहते हैं-
एकु छत्र एकु मुकुटमनिसब वरननि पर जोउ। तुलसी रघुबर नाम के बरन विराजत दोउ॥
यही सत्य आदिकवि वाल्मीकि ने रामायण के ‘युद्धकाँड’ में राम को भगवान विष्णु (ऊँकार स्वरूप) से अभिन्न मानते हुए कहा है-
अक्षरं ब्रह्रा सत्यं च मधेवाँते च राघव, लोकाँनाँ त्वं परोधर्मो विश्वक्सेनश्चतुर्भुजः।
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय मनीषा मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को सच्चिदानंद ब्रह्म मानकर उन्हें सर्वोच्च सनातन सत्ता के रूप में पूजती रही है। इसी तरह वह सीता को आद्यशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करके सर्वोच्च सम्मान देती रही है। ‘युद्धकाँड’ में ही उल्लेख आता है-
एषः सीता हरेर्माया, सृष्टिस्थित्यंतकारिणी। सीता साक्षात जगदधेतुश्चित्छवितर्जगदात्यिका॥
अर्थात् विश्व की सृष्टि, स्थिति, अंत की सूत्रधारिणी, आद्यशक्ति साक्षात महामाया सीता, जगत् का कारण और चेतना शक्ति और जगत् का रूप हैं। यही सत्य मानस के ‘बालकाँड’ में कवि तुलसी अत्यंत श्रद्धापूर्वक व्यक्त करते है-
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्। सर्वश्रेयस्करी सीता नतोऽहं रामबल्लभाम्॥
भाषाशास्त्रियों के अनुसार भी सीता शब्द का अर्थ पृथ्वी से उत्पन्न है। जो निश्चय ही सृष्टि के सृजन, पोषण एवं संहार की सूत्रधार शक्ति के लिए आया है। व्याकरणविदों
एवं दार्शनिकों ने सीता शब्द की विशिष्ट व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि राम की शक्ति बनकर ही सीता अवतरित हुई है। इसी शक्ति की स्वीकृति आदि महाकवि वाल्मीकि ने रामायण में तथा महर्षि वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत में सीता को ‘महालक्ष्मी’ कहकर दी है।
महाकवि तुलसीदास ने दर्शन के इसी सूक्ष्म तत्व को मनोहारी रूप में व्यक्त करते हुए ब्रह्म एवं शक्ति के सनातन ऐक्य को यूँ व्यक्त किया-
सीयाराम मय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
आइए, हम भी भगवान राम की पावन जयंती रामनवमी के इस पुण्य पर्व पर युगों से हमारे सनातन विश्वास एवं आस्था के केंद्र ब्रह्मस्वरूप भगवान राम एवं आद्यशक्तिस्वरूपा भगवती सीता के अभिन्न युगल को श्रद्धापूर्वक स्मरण करें। जब समस्त प्राणियों में सियाराम बसे हुए हैं, तब मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि में भेदभाव कैसा? क्यों न हम घृणा-द्वेष के खूनी मार्ग को छोड़कर स्नेह-आत्मीयता की राह अपनाएँ और ‘सीयाराम मय सब जग जानी का अमृत बाँटें।
जीवन का वास्तविक आनंद सरलता और मधुरता में सन्निहित है।
अपने सरलतम और सबसे आदिम रूप में प्रार्थना मनुष्य की गहनतम इच्छा की अभिव्यक्ति है, जिसमें आत्मनिवेदन द्वारा ईश्वरीय शक्ति को प्रभावित करने का सचेष्ट प्रयास किया जाता है। यह इच्छा कुछ कामनाओं की पूर्ति के रूप में हो सकती है या किसी भय या खतरे से रक्षा की गुहार के रूप में हो सकती है और अपने श्रेष्ठतम रूप में यह अपने इष्टदेव से संवाद की प्रक्रिया है, जिसमें आत्मा बोलती है, तो विश्वात्मा सुनती है। सुनती ही नहीं, इसका प्रत्युत्तर भी देती है। स्पेन की संत टेरेसा (16वीं सदी) के शब्दों में, प्रार्थना अपने अनन्य इष्ट के साथ सघन आत्मीयता एवं सतत संवाद की स्थिति है।
प्रार्थना की इसी गूढ़तम अवस्था में समस्त धर्मों का अलौकिक उद्भव हुआ है। वेदों की ऋचाएँ प्रार्थना की इसी स्थिति में ऋषियों के अंतरंग में गूँजी थी। गीता का महाप्रसाद श्रीकृष्ण ने इसी अवस्था में अर्जुन को दिया था। मीरा के गिरिधर गोपाल, रामकृष्ण की काली माँ इसी की उच्चतम अभिव्यक्तियाँ है। इस्लाम का उद्भव भी प्रार्थना से ही हुआ है। मुस्लिम का तो अर्थ ही प्रार्थना है। कुरान को प्रार्थना का ग्रंथ कहा गया है। इस्लाम में नमाज, प्रार्थना का ही एक रूप है, जो प्रत्येक मुस्लिम के लिए आवश्यक मानी गई है। ईसाई धर्म में हर रविवार को प्रार्थना का क्रम रहता है। जापान का प्रसिद्ध धर्म शिन्तों पूर्णतः प्रार्थना पर आधारित है। ईसाई संत आगस्टीन द्वारा प्रवर्तित ‘कन्फेशन’ स्रष्टा के साथ संवाद के रूप में एक लंबी प्रार्थना ही है।
यह सुनिश्चित तथ्य है कि धर्म भावना का उद्भव प्रार्थना से ही होता है। अमेरिकी दार्शनिक विलियम जेम्स के शब्दों में, बिना प्रार्थना के धर्म की कल्पना भी नहीं की जा सकती। धर्म में प्रार्थना का वही केंद्रीय स्थान है, जो दर्शन में युथ्कतपरम विचारशीलता का 19वीं सदी के जर्मन दार्शनिक लुडविग फ्यूरवेच अपने सारगर्भित निष्कर्ष को प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि धर्म का सबसे उच्चतम सार उसकी सबसे सरल क्रिया द्वारा व्यक्त होता है, जो है- प्रार्थना।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, यह प्रक्रिया अव्यक्त मन से उठी एक चेतना की लहर मात्र है, जिसे प्रगाढ़ आत्म संकेत (ऑटो सजेशन) भी कह सकते हैं और इसका आधार व्यक्ति का गुप्त मन है। विलियम जेम्स एवं मनोविद् जाँस सेंग्रंड ने प्रार्थना को अचेतन मन के भावनात्मक बहाव के रूप में परिभाषित किया है और इसे मन की अदृश्य सत्ता से संवाद में आने का अंतःस्फोट कहा है। समाजशास्त्री धार्मिक वातावरण को इसका प्रमुख कारक मानते हैं, जो कि व्यक्ति के आध्यात्मिक व्यवहार को प्रेरित करता है।
सर्वसामान्य एवं व्यावहारिक अर्थों में प्रार्थना हृदय की आकुल पुकार है। जब व्यक्ति जीवन के दुख कष्टों, घात -प्रतिघातों एवं दुरूह जटिलताओं से क्लाँत हो जाता है, जब उसके पुरुषार्थ एवं आशा की सीमाएँ टूट जाती है। और कोई सहारा नहीं दिखता, तो वह शक्ति प्रेम और करुणा के उच्चतम आदर्श (इष्ट देव -भगवान -गुरु- देवशक्ति) की मन में स्थापना करता है। उससे अपनी अंतर्व्यथा को निवेदित करता है। मन के गुह्यतम क्षेत्र में परमात्मा की अनंत, अद्भुत एवं अतुलित शक्ति सामर्थ्य निवास करती है। प्रार्थना से हम इसी आँतरिक शक्ति केंद्र की ओर उन्मुख होते हैं। यही से एक ऐसा बल एवं उत्साह प्राप्त होता है, जो शरीर के अणु-अणु में अद्भुत बल का संचार करता है, आत्म की ज्योति जगा देता है, मन को पुरुषार्थ से भर देता है। एक ऐसी शाँतिदायिनी लहर को प्रसारित करता है, जो प्रार्थी को चैतन्य और अभय बना देती है। ऐसे में इएच चौमिन के शब्दों में प्रार्थना किए बिना मनुष्य रह नहीं सकता, यह हृदय से उठने वाली सहज एवं स्वस्फूर्त पुकार है। स्वेचीन के शब्दों में, हताशा में, किंतु भावों की गहराई से उठी पुकार उस अदृश्य चैतन्य सत्ता से आत्मा का एक सहज निवेदन होता है, एक प्रार्थना होती है।
इस तरह प्रार्थना जीवन का सहज, किंतु महान अवलंबन है। यह विषम संकटों, दुर्भाग्य, दुर्योगों, हृदय विदारक एवं असह्य कष्टों में जाने की शक्ति देती है और आशा की ज्योति को जलाए रखती है। इसीलिए महात्मा गाँधी कहा करते थे, प्रार्थना ने कई अग्निपरीक्षाओं में मेरा उद्धार किया है। जिस क्षण मैंने स्वयं को प्रभु के हाथों में छोड़ दिया, उसी क्षण एक प्रशाँत लहर मेरी अंतःचेतना में दौड़ पड़ी और मुझे सब कुछ सहन करने की शक्ति मिल गई। मेरी ईश्वर की प्यास को मात्र एक भावभरी प्रार्थना ही संतुष्ट कर पाती है।
प्रार्थना की अद्भुत शक्ति जीवनरूपी वृक्ष की जड़ों को भरपूर पोषण करती है, क्योंकि यह जीवन के आदि स्नेह में व्यक्ति का सम्बन्ध जोड़ती है। इसी कारण मनीषी अलेक्स कैरल ने कहा है, प्रार्थना सबसे शक्तिशाली ऊर्जा है जिसे मनुष्य पैदा कर सकता है। शरीरशास्त्री भले ही मानवीय शरीर एवं मस्तिष्क पर इसके प्रभाव को ग्रंथियों के स्राव के रूप में दर्शाएँ, पर इसके परिणामस्वरूप शारीरिक सशक्तता, बौद्धिक प्रखरता, नैतिक साहस और मानवीय सम्बन्धों में अंतर्निहित गहन सार्थकता सब कुछ जीवंत हो उठती है। प्रार्थना जीवन को विधेयात्मक ढंग से जीने का एक तरीका है। सच्चा जीवन वस्तुतः प्रार्थना से भरा हुआ जीवन है। निश्चित रूप से प्रार्थना आत्मा के लिए टॉनिक की तरह काम करता है और जीवन को जीवंत एवं सार्थक बनाता है। प्रार्थना के बिना जीवन की क्या नियति एवं क्या गति होती है, अँगरेजी कवि टेनीसन के शब्दों में सुनें, “बिना प्रार्थना मनुष्य पशु-पक्षियों जैसा निर्बोध है। प्रार्थना जैसी महाशक्ति से कार्य न लेकर अपनी थोथी शान में रहकर सचमुच हम बड़ी मूर्खता करते हैं। यही हमारी विडंबना है।”
इस विडंबना से उबरने के लिए हर व्यक्ति को इसका अवलंबन लेना चाहिए। इस दृष्टि की रचयिता, इसका लालन-पालन करने वाली, हमारी आदि कारण महाशक्ति से संपर्क साधने का यही एक तरीका है। यही अलौकिक साम्राज्य में प्रवेश का एक मात्र माध्यम है। टी.एस.ब्रुक्स के शब्दों में, “स्वर्ग के सबसे मधुर एवं श्रेष्ठ पुष्प उपहार में भगवान अपने बंदो को तब देता है, जब वे घुटनों के बल होते हैं, अर्थात् प्रार्थना कर रहे होते हैं। प्रार्थना स्वर्ग का द्वार है, यह अलौकिक सौंदर्य एवं आनंद की उस दिव्य भूमि में प्रवेश है।” जिसे प्रार्थना करना आ गया, वह बिना जप-तप, मंत्र तंत्र के ही उस पराशक्ति से तादात्म्य स्थापित कर लेता है।
इस रूप में प्रार्थना का केंद्रीय तत्व अंतः की गहराई की उपजी भावना है। व्यक्ति की श्रद्धा भावना संयुक्त प्रार्थना बिना शब्दों के हो सकती है, किंतु बिना हृदय के नहीं। गाँधी जी के शब्दों में, “प्रार्थना में भावहीन शब्दों में, शब्दहीन हृदय बेहतर है।” जीवन को प्रार्थना के महान अवलंबन से भरा पूरा बनाने के लिए बस आवश्यकता हृदय के भावक्षेत्र को जगाने की है, जिसकी आकुलता में प्रार्थना का मर्म छिपा हुआ है।
अज्ञान के साथ भय, भ्रम, कष्ट और जंजाल जुड़े रहते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण के पास दुर्योधन व अर्जुन दोनों पहुँचे। महाभारत युद्ध के पूर्व कौरव व पाँडव दोनों ही कृष्ण को अपने पक्ष में करना चाहते थे। दुर्योधन पहले पहुँचे व अहंकारवश सो रहे श्रीकृष्ण के सिरहाने बैठ गए। बाद में अर्जुन आए व अपनी सहज श्रद्धा भावनावश पैरों के पास बैठ गए। श्रीकृष्ण जागे। अर्जुन पर उनकी दृष्टि पड़ी। कुशल क्षेम पूछकर अभिप्राय पूछने ही जा रहे थे कि दुर्योधन बोल उठा, “पहले मैं आया हूँ, मेरी बात सुनी जाए।” श्रीकृष्ण असमंजस में पड़े। बोले, “ अर्जुन छोटे है इसलिए प्राथमिकता तो उन्हीं को मिलेगी, पर माँग तुम्हारी भी पूरी करूंगा। एक तरफ मैं हूँ, दूसरी तरफ मेरी विशाल चतुरंगिणी सेना। बोलो अर्जुन? तुम दोनों में से क्या लोगे?” चयन की स्वतंत्रता थी, यह विवेक पर निर्भर था, कौन क्या माँगता है, भगवान की कृपा अथवा उनका वैभव?
अर्जुन बोले, भगवन्! मैं तो आपको ही लूँगा। भले ही आप युद्ध न करें, बस साथ भर बने रहें। दुर्योधन मन ही मन अर्जुन की इस ‘मूर्खता’ पर प्रसन्न हुआ और श्रीकृष्ण की विशाल अपराजेय सेना पाकर फूला न समाया। अनीतिवादी दुर्योधन, ईश्वरीय समर्थन वाले अर्जुन जिसके पास श्रीकृष्ण भी निःशस्त्र थे, से हारा ही नहीं महाभारत के युद्ध में बंधु-बाँधवों सहित पास भी गया। दुर्योधन जैसे अनीति का चयन करने वाले एवं अर्जुन जैसे ईश्वरीय कृपा को ग्रहण करने वाले तत्व हर मनुष्य के भीतर विद्यमान हैं, एक को विवेक या सुबुद्धि एवं दूसरे के विवेक या दुर्बुद्धि कह सकते हैं। किसका चयन व्यक्ति करता है, यह उसकी स्वतंत्रता है।
हवा जब तक गेंद में भरी रहती है, तब तक उसे विस्तृत और विशाल वायुमंडल से एकाकार होने का मौका नहीं मिलता, किंतु उसके ऊपर के मोटे आवरण को ढीला करते ही वह बाह्य वायु से मिलकर अधिक व्यापक और विराट् हो जाती है। मनुष्य के साथ भी यही बात है। वह जब तक स्थूलता में जीता है, हाड़ माँस का पुतला भर बना रहता है, पर जैसे -जैसे यह बंधन ढीला होता जाता है, वैसे ही वैसे उसकी सूक्ष्मता बढ़ती है और अंततः वह स्थिति पैदा होती है, जहाँ उसकी सूक्ष्म सत्ता सूक्ष्म जगत् में प्रवेश कर नवीन जानकारियाँ अर्जित करने लगे। यही वह अवस्था है, जिसमें समय से पीछे चलकर विगत का ज्ञान प्राप्त कर सकना संभव होता है।
यों तो समय के तीन कालखंडों में से मनुष्य सामान्य स्थिति में केवल वर्तमान में जीता है, भूत और भविष्य उसके लिए अविज्ञात स्तर के रहस्य जैसे बने रहते हैं। इतने पर भी सच यह है कि वह एक साथ इन तीनों में जीता है या दूसरे शब्दों में कहे, तो वर्तमान शेष दोनों को अपने में सँजोए रहता है। अंतर मात्र इतना है कि विगत और अनागत के सूक्ष्म भूमिकाओं में होने के कारण मनुष्य उन्हें वर्तमान की तरह ग्रहण नहीं कर पाता; किंतु इतने से ही सत्य बदल नहीं सकता। शब्द और ध्वनि उच्चारण के बाद विलुप्त होते प्रतीत होते हैं। ऐसा लगता है कि उनका अस्तित्व समाप्त हो गया; पर विज्ञान के विद्यार्थियों को यह भलीभाँति मालूम है कि उनका नाश नहीं होता। सिर्फ अपनी स्थूलता और अभिव्यक्ति खोकर अव्यक्त स्थिति में चले जाते हैं। काया मरती है; पर आत्मवेत्ता जानते हैं कि जीवन एक सतत प्रवाह है। वह मरता कहाँ है! अग्नि जलती है, फिर भी उसकी ऊर्जा अक्षुण्ण बनी रहती हैं। घटनाओं के संदर्भ में भी यही बात है। वह एक बार अस्तित्व में आने के बाद समाप्त हो जाती है, सो बात नहीं, मात्र व्यक्त से अव्यक्त बनती है।
भौतिक जगत् में समय को घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में देखने का आम प्रचलन हैं। इस आधार पर जो कुछ सामने दृष्टिगोचर होता है, समय के उस भाग को वर्तमान कह दिया जाता है और जो बीत गया उसे ‘भूत’ एवं अनागत वाले हिस्से को ‘भविष्यत’ कहा जाता है। इतने पर भी ‘समय’ न तो केवल भूत है, न भविष्य, न वर्तमान। वह एक संघर्ष इकाई है, जिसमें एक साथ तीनों उपस्थित होते हैं। विज्ञानवेत्ताओं का कहना है कि जब रैखिक समय के मध्य भाग (वर्तमान) को मनुष्य जान सकता है, तो कोई कारण नहीं कि उसके आगे (भविष्य) और पीछे (भूत) वाले हिस्से को वह न ग्रहण कर सके। सिद्धाँत रूप में वैज्ञानिकों ने इसे संभव बताया है और इसके लिए कई उपाय सुझाए हैं।
फ्राँसीसी विज्ञानवेत्ता अपनी पुस्तक ‘इन दि डेड पास्ट’ में आशा व्यक्ति करते हुए लिखते हैं कि आने वाले समय में काल के विगत और अनागत वाले हिस्से में पहुँच पाना न केवल यथार्थ सिद्ध होगा, वरन् वैज्ञानिक विधियों द्वारा लोग उसमें आ जा सकेंगे। विगत में पहुँचने संबंधी एक परिकल्पना का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि चूँकि समय स्थिर है और गति हम सब कर रहे हैं, इसलिए भूत में पहुँचने के लिए यह जानना जरूरी होगा कि विगत की उक्त तिथि में पृथ्वी अंतरिक्ष के किस बिंदु पर स्थित थी। चूँकि वह सूर्य के चारों ओर एक कुँडलाकार पथ में परिभ्रमण कर रही है और संपूर्ण सौर तंत्र स्वयं भी कृतिका नक्षत्र की परिक्रमा कर रहा है, अतः बीते समय के एक निश्चित दिन अपने ग्रह की वास्तविक स्थिति का पता लगा पाना बहुत ही मुश्किल काम होगा। अतएव यह यात्रा भी असंभव स्तर की है या यों कहना चाहिए कि मात्र सैद्धाँतिक है।
इसी प्रकार परिभ्रमणशील ब्रह्मांड में आइंस्टीन के सापेक्षवाद का सिद्धाँत भी भूत भ्रमण की संभाव्यता प्रकट करता है। इसको आधार मानते हुए कुर्ट गोडेल नामक एक आस्ट्रियन विज्ञानविद् एवं तर्कशास्त्री ने तो यहाँ तक कह डाला है कि यदि यह संभव हुआ, तो यात्रा के दौरान हर व्यक्ति अपनी ही युवा अनुकृति से मिल सकेगा।
मूर्द्धन्य भौतिकीविद् जॉन ह्वीलर का ‘वर्महोल सिद्धाँत’ भी इस बात की संभावना दर्शाता है कि यदि दो ब्रह्मांडों को जोड़ने वाली इस सुरंग में से किसी उपयुक्त में प्रवेश कर पाना शक्य हुआ, तो संभव है कि हम कही सुदूर भूत में बाहर निकलें।
किंतु यह सब संभावना मात्र है। संभावना भी ऐसी, जो शायद ही साकार हो सके। ऐसे में विज्ञान लगभग निराश हो चुका था और मानने लगा था कि इस प्रकार की सफलता शायद इस विधा द्वारा संभव नहीं। इसी बीच एक घटना घट गई। 17 अगस्त 1958 को ‘मियार्म’ हेराल्ड’ नामक समाचार पत्र ने एसोसिएटेड प्रेस के हवाले से एक ऐसे प्रयोग का समाचार छापा, जो उन दिनों यूनाइटेड स्टेट्स एयरफोर्स में चल रहा था। विवरण का उल्लेख करते हुए अखबार लिखता है कि एक विशिष्ट प्रकार के अवरक्त (इन्फ्रारेड) कैमरे से एक बार सर्वेक्षण विमान के माध्यम से एक ऐसे भूखंड का चित्र खींचा गया, जो गाड़ियाँ खड़ी करने के काम आता था; पर तस्वीर लेते समय भूमि बिल्कुल खाली थी; वहाँ कोई भी वाहन नहीं था। कुछ घंटे पूर्व जो कारें खड़ी थी। वह सब जा चुकी थी। फोटो जब बन कर आया, तो सब यह देखकर हैरान रह गए कि उसमें असंख्यों मोटरें खड़ी दिखाई पड़ रही थी। इसका अर्थ यह हुआ कि कैमरे ने कुछ घंटे पूर्व के दृश्य को भी अपने अंदर कैद कर लिया था। यही महत्वपूर्ण सूत्र साबित हुआ, जिसका कि बाद में सहारा लिया गया।
इस संपूर्ण प्रसंग का वर्णन एण्ड्र थामस ने अपने चर्चित ग्रंथ ‘बियाँण्ड दि टाइम बेरियरत्त् में विस्तारपूर्वक किया है। उक्त घटना के उपरांत विज्ञानी यह मानने के लिए विवश हो गए कि समय के बीते भाग में इस प्रकार का प्रवेश संभव तो है, पर ऐसा मानसिक धरातल पर ही हो सकता है, शारीरिक स्तर पर नहीं। उनका विचार था कि सामान्य कैमरे से इस प्रकार के चित्र नहीं आने का एक ही मतलब हो सकता है। कि साधारण प्रकाश भूत और वर्तमान के मध्यवर्ती अवरोध को चीरकर भूतकाल के गर्व में प्रवेश पाने की क्षमता नहीं रखता, जो अपेक्षाकृत सूक्ष्म इन्फ्रारेड में विद्यमान है। अतः वह कुछ घंटे पूर्व की घटना का फिल्माँकन करने में सफल होता है। इस सफलता के उपराँत वैज्ञानिक यह जानने का प्रयास करने लगे कि क्या ऐसा सुदूर भूत के दृश्यों और घटनाओं के साथ भी संभव हो सकता है? इस निमित्त उनने भिन्न-भिन्न स्थानों के कई ऐसे चित्र खींचे, जहाँ सदियों पूर्व सुविकसित सभ्यताएँ थीं, पर आज वे बीहड़ों जंगलों और रेगिस्तानों में परिवर्तित हो चुके हैं। तस्वीर जब बनकर सामने आई, तो उसमें वही सारे दृश्य देखे गए, जो तब साकार रूप में वहाँ मौजूद थे अर्थात् चित्रों में झाड़ झंखाड़ के अतिरिक्त कोई ऐसी विलक्षणता नहीं दिखलाई पड़ी, जो इन स्थानों में उस समय दृश्यमान न हो। इससे शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि समय के साथ-साथ घटनाएँ और दृश्यावलियाँ अपेक्षाकृत अधिक सूक्ष्म स्तरों में प्रवेश करती जाती हैं, फलतः वे विशिष्ट प्रकार के इन्फ्रारेड कैमरों की पकड़ से ही बची रहती हैं। यदि कोई और वेधक सामर्थ्य वाली संभव है, पर विशेषज्ञ अभी ऐसी कोई रोशनी या कैमरा ढूंढ़, पाने में सफल नहीं हो सके हैं। ऐसी स्थिति में भूतकालीन जानकारियाँ उपलब्ध करने के लिए अनुसंधानकर्ता सूक्ष्म चेतना के महत्व से इनकार नहीं करते।
‘टाइम-दि अल्टीमेट एनर्जी’ पुस्तक की विद्वान लेखिका मेरीहोप अपने उक्त ग्रंथ में लिखती हैं कि चूँकि चेतना विश्व का सर्वाधिक सूक्ष्म तत्व है, अतएव वह समय के अवरोध को पार करते हुए किसी भी कालखंड में प्रवेश करने में समर्थ होती है। सुषुप्ति की अवस्था में हर एक के साथ ऐसा इसलिए संभव हो पाता है, क्योंकि इस दशा में चेतना और शरीर के बीच का बंधन ढीला पड़ जाता है, फलतः वह भूत-भविष्य के किसी भी भाग में जाकर स्वप्नों के माध्यम से स्वप्नद्रष्टा को अनागत -विगत की ऐसी सूचनाएं देने लगती है, जिससे वह सर्वथा अनभिज्ञ होता है। कई बार यह जानकारियाँ इतनी स्पष्ट होती है और बार-बार आती हैं कि द्रष्टा भयभीत हो उठता है और किसी अनिष्ट की आशंका से चिंताग्रस्त हो जाता है।
मेरीहोप ने उपर्युक्त पुस्तक में विगत का ज्ञान कराने वाले ऐसे अनेक स्वप्नों का उल्लेख किया है, जिसके बारे में सम्बन्धित व्यक्ति को कोई जानकारी नहीं थी। स्वप्न संकेतों के पश्चात जब सम्बद्ध स्थानों में पहुँचा गया, तभी उनके बार-बार आने का रहस्य समझा जा सका।
इतना स्पष्ट हो जाने के बाद अन्वेषणकर्ता यह तो मानने लगे कि सुषुप्तावस्था में बीते काल की उदरदरी में गति कर पाना संभव है, पर फिर भी वे इस संभावना से इनकार करते रहे कि जाग्रत अवस्था में भी ऐसा कुछ संभाव्य है। इसका कारण वे एक ही बताते रहे कि इस दशा में चेतना काया से इस बुरी तरह आबद्ध रहती है कि दोनों को परस्पर पृथक कर पाना सरल नहीं। जिन दिनों विज्ञान जगत् में इस विषय पर गंभीर चिंतन चल रहे थे, उन्हीं दिनों कुछ विलक्षण घटनाएं घट गई, जिससे वैज्ञानिक इस पर पुनर्विचार के लिए मजबूर हो गए।
घटना स्वीडेन की है। म्यूरेरा परिवार की वहाँ बड़ी जागीर थी। परिवार का मुखिया पेडिगो म्यूरेरा था। जागीर की देखभाल वही करता था। बच्चे उसमें सहायता करते थे पेडिगो को प्रातः भ्रमण का बहुत चाव था, अतः वह भाँति उस दिन भी वह भ्रमण के लिए निकला। आज मौसम अत्यंत सुहावना था। हल्की -फुलकी बूँदा-बाँदी के बाद बहने वाले शीतल पवन के झोंके मन को बरबस किसी अन्य तल में ले जाते थे। ऐसा प्रतीत होता था, मानो चेतना आज अपना सामान्य धरातल खो चुकी हो। उसके अंदर का उल्लास किसी ध्यानी के ब्रह्म साक्षात्कार से उपलब्ध होने वाले आनंद से संप्रति कम न था। वह अपनी धुन में चला जा रहा था, मन की यह उन्मनी अवस्था आज उसे काफी आगे तक ले आई थी, फिर भी वह उस दिव्य मादकता की स्थिति में रुकने का नाम न ले रहा था, बढ़ता ही जा रहा था। अगणित खेत-मैदानों को पार करते हुए वह एक स्वेडिश मुहल्ले के समीप पहुँचा, तो अचानक उसे होश आया, वह कहाँ पहुँच गया! कहीं अन्यत्र तो नहीं? पीछे दृष्टि दौड़ाई, तो पता चला कि वह अपनी जागीर वाले भूभाग में ही है, बस थोड़ा आगे निकल आया है, किंतु यह मुहल्ला तो पहले कभी नहीं देखा! उसका चिंतन तंत्र सक्रिय हो उठा, पर यह सोचकर कि शायद आज की विशिष्ट मनोदशा के कारण ही वह पूर्व में देखे गए दृश्यों को भूल रहा हो, उस पर विशेष ध्यान न दिया। वहाँ एक तालाब था, जिसमें अनेक बतखें और हंस जलक्रीडा कर रहे थे। थोड़ी देर रुककर वह उनकी अठखेलियों को निहारता रहा, फिर आगे बढ़ गया। झोंपड़ियों के बाहर अनेक लोग धूप सेंक रहे थे और परस्पर वार्तालाप में संलग्न थे। उसने उनमें से एक दो से बात करने की कोशिश की, पर सुलह न हो सका। ऐसा लगा, जैसे वे बहरे हों और उसके शब्द उन्हें सुनाई ही न पड़े हों। उनकी पोशाकें प्राचीन युगीन लग रही थीं। उस मुहल्ले का एक चक्कर लगाने के उपराँत पेडिगो वापस लौट आया। घर पहुँचकर उसने उस बस्ती के बारे में लोगों को बताया, पर सब यही कहते रहे कि जागीर के उस भाग में कही कोई बस्ती नहीं है। जब दुबारा पेडिगो उन्हें साथ लेकर वहाँ पहुँचा, तो हैरान रह गया। वहाँ सचमुच बस्ती तो क्या, कोई झोंपड़ी तक न थी, पर वह उसे आँखों का धोखा या भ्रम मानने के लिए कदापि तैयार नहीं था।
इस घटना के बाद अनुसंधानकर्ता यह अनुमान लगाने लगे कि क्या जाग्रतावस्था में भी देह का बंधन किसी प्रकार ढीला होने पर चेतना शरीर परिधि से बाहर समय के दूसरे कालखंडों में भी प्रवेश कर सकती है? इस संभावना से उनने सर्वथा इनकार नहीं किया है, पर इसकी कोई सुनिश्चित प्रक्रिया बता पाने में वे अब तक विफल रहे हैं। विज्ञान भले ही इसकी कोई विधा नन बता पाया हो, पर अध्यात्म में इसका सुनिश्चित उपाय है, जिसका यदि निष्ठापूर्वक परिपालन किया गया, तो इस पथ का कोई भी पथिक इस विभूति को करतलगत कर भूत-भविष्य के अविज्ञात हिस्सों में प्रवेश पर सकता है। उदात्त चरित्र, उत्कृष्ट चिंतन और शालीन व्यवहार के मूलभूत अनुबंध को जिसने पूरा कर लिया, उसके लिए समय के अवरोध को पार कर सकना कठिन नहीं, ऐसा तत्ववेत्ताओं का सुनिश्चित मत है।
सफलता का एकमात्र रहस्य है- दृढ़ संकल्प और कठोर परिश्रम।
वीतराग शुकदेव जी के मुँह से राजा परीक्षित ने भागवत् पुराण की कथा सुनकर मुक्ति प्राप्त की थी। यह बात एक धनवान व्यक्ति ने सुनी तो उसके मन में भागवत पर बड़ी श्रद्धा हुई और वह भी मुक्ति के लिए किसी ब्राह्मण से कथा सुनने के लिए आतुर हो उठा।
खोज की तो भागवत के एक बहुत बड़े विख्यात पंडित जी मिले। कथा-आयोजन का प्रस्ताव किया तो पंडित जी बोले, यह कलियुग है। इसमें धर्मकृत्यों का पुण्य चार गुना कम हो जाता है, इसलिए चार बार कथा सुननी पड़ेगी। चार बार कथा-आयोजन की सलाह देने का कारण था पर्याप्त दान-दक्षिणा। पंडित जी को फीस देकर धनी व्यक्ति ने चार भागवत सप्ताह सुने, परंतु लाभ कुछ नहीं मिला। धनी एक उच्चकोटि के संत से मिला। भागवत सुनने का लाभ परिक्षित कैसे ले सके और मुझे क्यों नहीं मिला। संत ने इसका कारण बताया, “परीक्षित मृत्यु को निश्चित जानकर संसार से पूर्णतया विरक्त होकर कथा सुन रहे थे और मुनि शुकदेव सर्वथा निर्लोभी रहकर कथा सुना रहे थे। उस कसौटी पर तुम दोनों ही असफल रहे।”
जिस किसी को भी ज्ञान-उपदेश उपदेश अथवा सत्परामर्श के रूप में सुनने को मिला है, वही श्रेय पथ पर चल सका है।
प्रकाँड विद्वता और अनुपम शास्त्रीय ज्ञान के कारण अनमीषि को ‘अक्षर महर्षि’ कहा जाता था। वे आश्रम में ब्रह्मचारियों का शिक्षण करते और अपने ज्ञान का निरंतर दान करते रहते। उनके आश्रम के लिए नागरिक अन्नादि की व्यवस्था जुटा देते थे।
एक दिन अनमीषि के आश्रम में एक संत का आगमन हुआ। संत ने प्रार्थना की, हमें कुछ अन्नदान दें, जिससे निर्धनों- भूखों के लिए सदावर्त चलाए जा सकें। ब्रह्मर्षि ने कहा, श्रीमान! मेरे पास ज्ञानधन है, उसका ही दान करता हूँ। अनाज तो सीमित ही है, उसका दान मैं कैसे करूं?
संत ने कहा, ऋषिवर! ज्ञान का दान तो श्रेष्ठ कर्म है ही, पर व्यक्ति के पास इसके अलावा भी अन्न एवं श्रम आदि के रूप में कुछ धन रहता है, परंतु अन्न भी तो आपके द्वारा उपार्जित धन ही है। उसका भी एक अंश लोकमंगल के लिए समर्पित होना ही चाहिए। मात्र अपने निहितार्थ उपयोग करने वाले को स्वार्थी की संज्ञा दी गई है। विद्वान ऋषि को यह शास्त्रोक्त कथन उचित और उपयुक्त लगा। विनयपूर्वक उन्होंने संत से क्षमा माँगी और कहा, मैं आपके इस उपदेश को जीवन में उतारुँगा।
जीवन सहचरी से महर्षि ने मंत्रणा की। उस धर्म परायण ने सहर्ष स्वीकृति दे दी। महर्षि दंपत्ति नित्य किसी क्षुधा पीड़ित का भोजन कराकर ही अन्न जल ग्रहण करते। यह उनका नित्य नियम बन गया और उन्हें यह करते हुए असीम आनंद मिलता था।
लंबे समय बाद एक दिन ऐसा हुआ कि कोई भी आश्रम के द्वार पर नहीं आया। प्रतीक्षा में दिन ढल चला। ऋषि दंपत्ति को लगा कि आज यह क्रम भंग हो जाएगा। निरंतर एवं अनवरत चल रहे इस क्रम के भंग होने की आशंका से वे अत्यंत व्यग्र हो उठें। किसी सत्पात्र की खोज में ऋषि दंपत्ति आश्रम के बाहर निकल पड़े। कुछ दूर जाने पर उन्होंने एक वृक्ष के नीचे एक वृद्ध कुष्ठ रोगी को पीड़ा से कराहते हुए लेटे देख। उसके शरीर में जगह-जगह घाव थे। घाव से खून रिस रहा था और उस पर मक्खियाँ भिनभिना रही थी। बड़ा ही वीभत्स दृश्य था। इसे देख ऋषि करुणा से भर उठे। वे तत्क्षण वृद्ध के पास पहुँचे और उसे अपने आश्रम में भोजन कराने एवं सेवा सुश्रूषा हेतु ले चलने का अनुरोध किया।
पीड़ा भरे स्वर में वृद्ध ने कहा, आर्यश्रेष्ठ! मैं चाँडाल हूँ। आश्रम में कैसे जाऊँ? आप करुणामूर्ति है। प्रभु आपका मंगल करें। आप कुछ बची-खुची सामग्री यही भेज दें, तो मैं उसे खाकर तृप्त हो जाऊँ।
ऋषि दयार्द्र हो उठे। उनकी कोमल भावना नेत्र से अश्रुधार बन बहने लगी। उन्होंने विनम्र एवं दृढ़ शब्दों में कहा, तात! हम ऐसी मिथ्या मर्यादाएँ नहीं मानते, जो मानवी स्नेह सौजन्य में बाधा पहुँचाती हैं। हम सभी एक ही परमात्मा के अंश हैं। हममें और आपमें कोई भेद नहीं। आप कृपा कर आश्रम चलें व हमें सेवा का अवसर दें।
महर्षि दंपत्ति के आग्रह को टाल पाना वृद्ध के वश में नहीं था। वे दोनों उसे आश्रम ले गए। उसके हाथ-पैर धुलाए और प्राथमिक उपचार किया तथा भोजन कराकर अपना व्रत पूर्ण किया।
रात की गहरी निद्रा में निमग्न महर्षि को लगा कि प्रभु उनसे स्नेह कर रहे हैं, “अनमीषि! यही है सच्चा सेवा धर्म। इसी को अपनाने से आत्मा की प्राप्ति तथा ब्रह्म का साक्षात्कार होता है।” प्रातः जगने पर ऋषि को अनुभव हुआ कि उनके और उनकी धर्मपत्नी के मुखमंडल पर ब्रह्मतेज झलक रहा है, गहरी तृप्ति, आँतरिक आह्लाद एवं प्रसन्नता के भाव छाए हैं।
जीव विशुद्ध रूप में जल की बूँद के समान एक धरती पर आता है। एक ओर जल की बूँद धरती पर गिरकर कीचड़ बन जाती है व दूसरे ओर जीव माया में लिप्त हो जाता है। यह तो जीव के ऊपर है, जो स्वयं को माया से दूर रख समुद्र में पड़ी बूँद के आत्मविस्तरण की तरह सर्वव्यापी हो मेघ बनकर समाज पर परमार्थ की वर्षा करे अथवा कीचड़ में पड़ा रहे।
मनुष्य को जीवन सबसे प्रिय है। मृत्यु की सामान्यतः कल्पना करने तक से वह घबराता है। यक्ष के पूछे जाने पर युधिष्ठिर ने जीवन के मोह व मृत्यु के भय को सबसे बड़ा आश्चर्य बताया था कि मनुष्य मृत्यु के अटल सत्य को जानते हुए भी मृत्यु से भागता फिरता है। किंतु आज यह सबसे बड़ा आश्चर्य एक सामान्य -सी बात होती जा रही है, जब हम प्रतिदिन अखबारों में ऐसी कितनी ही घटनाओं को सहज क्रम में पढ़ लेते हैं, जिसमें व्यक्ति स्वयं की आत्महत्या जैसे जघन्य कृत्य द्वारा अपनी जीवन-लीला समाप्त कर देता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष सात लाख से अधिक लोग आत्महत्या द्वारा मरते हैं। अर्थात् प्रतिदिन लगभग 2 व्यक्ति आत्महत्या करते हैं। इसी की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1984 से 94 के दौरान भारत में आत्महत्या करने वालों के पीछे यह दर 6.8 से 9.9 तक बढ़ी है। गत एक दशक में आत्महत्या का प्रयास करने वालों में नौ गुना वृद्धि हुई है। महानगरों में चैन्नई व बेंगलोर में सर्वाधिक 12.2 प्रतिशत की दर सही। इसके पश्चात मुँबई की प्रतिशत दर 14.65 रही। महानगरों में जयपुर की 1.4 प्रतिशत पर न्यूनतम रही।
भारत की अपेक्षा विकसित देशों में व कुछ विकासशील देशों में आत्महत्या की समस्या और भी अधिक गंभीर है। दक्षिण एशिया में शिक्षा एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से विकसित माने जाने वाला देश श्रीलंका इस संदर्भ में सर्वोपरि है। 1991 में यहाँ आत्महत्या करने वालो की संख्या प्रति लाख व्यक्ति 49 थी। गत पचास वर्षों में यहाँ जनसंख्या वृद्धि मात्र 3 प्रतिशत हुई है, जबकि आत्महत्या दर में 5 प्रतिशत वृद्धि हुई मरने वालों में अधिकाँशतः 60 वर्ष की आयु से अधिक के वृद्ध थे। 1983 से अब तक पिछले 15-16 वर्षों में जातीय व गृहयुडडडडडड में लगभग 5, व्यक्ति मारे गए, वही आत्महत्या के कारण इससे कही अधिक 6, व्यक्ति मारे गए।
भूतपूर्व साम्यवादी देशों में भी यह स्थिति बदतर है। सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में तेजी से गिरावट आने के कारण रूस में आत्महत्या करने वालों में चार गुना अधिक वृद्धि हुई है। फिनलैंड की आत्महत्या दर भारत से तीन गुना अधिक व फ्राँस स्विट्जरलैंड की दो गुना अधिक है।
अमेरिका में जनसंख्या का एक प्रतिशत आत्महत्या द्वारा मरता है। यहाँ आत्महत्या मृत्यु के आठ प्रमुख कारणों में से एक है। 15 से 24 वर्षीय किशोर एवं युवाओं में यह मरने का दूसरा प्रमुख कारण है। यहाँ पुरुषों से तीन गुना अधिक महिलाएँ आत्महत्या का प्रयास करती है, किंतु महिलाओं से तीन गुना अधिक पुरुष आत्महत्या द्वारा मरते हैं। गत 15 वर्षों में 15 से 44 वर्षीय युवाओं में दो से तीन गुना वृद्धि हुई है। अमेरिका में 2 लाख व्यक्ति प्रतिवर्ष आत्महत्या का प्रयास कतरे हैं। जिनमें 26 ही सफल हो पाते हैं।
अपने देश में शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आर्थिक रूप से सर्वाधिक विकसित प्राँत केरल एक अद्वितीय उदाहरण है, जिसके विकास का मॉडल चर्चा का विषय रहा है लेकिन यहाँ आत्महत्या करने वालों की संख्या सर्वाधिक है, जो लगभग प्रति लाख के पीछे 25 है। यह देश के औसत से ढाई गुना अधिक है। मनोचिकित्सक डॉ. सूरजमणि के अनुसार, केरल में तीव्रता से बढ़ता शहरीकरण उतनी ही तीव्रता से विलुप्त होता संयुक्त परिवार व अन्य पारंपरिक सहायक ढाँचा इसका प्रमुख कारण है। समाजशास्त्री जॉन कट्कयम के अनुसार केरल में बढ़ती सामूहिक आत्महत्याओं के पीछे मूल कारण गरीबी के साथ बढ़ती भोग लिप्सा है। मध्यम व उच्च आय वर्ग भी इसी कारण आत्महत्या की गिरफ्त में आ रहे हैं। उपभोक्ता संस्कृति ने सभी को धनलिप्सा की अंधी दौड़ में शामिल कर दिया है। वे ऐसी साधन’-सामग्री खरीदते हैं, जिससे वे अपने पड़ोसी, मित्रों व सम्बन्धीजनों के स्तर पर जीने की लालसा पूरी कर सकें। इससे वे या तो कर्ज के बोझ में दब जाते हैं या उस स्तर पर जीने में असफल होते हैं परिणामतः निराशा, हताशा व अवसाद के घोर तमस से घिर जाते हैं और आत्महत्या जैसे वीभत्स कृत्य के रूप में जीवन की इतिश्री कर देते हैं।
केरल के अतिरिक्त त्रिपुरा, तमिलनाडु, पश्चिमी बंगाल, महाराष्ट्र और कर्नाटक की दर भी औसत से अधिक है। बढ़ती सामाजिक- आर्थिक विषमता इसका प्रमुख कारण मानी जा रही है। विकास की त्रुटिपूर्ण नीतियों के कारण एक समूह विशेष के हाथों क्रय शक्ति के केंद्रीकरण से समाज का बृहत्तर भाग हताशा और अवसाद में जी रहा है। बढ़ती जनसंख्या और घटते संसाधनों के साथ उदारवादी आर्थिक नीतियों ने इस सामाजिक स्थिति को और जटिल बना दिया है। इसी कारण जहाँ जितना अधिक भूमंडलीकरण हुआ, वहाँ आत्महत्या की संख्या में उतनी ही वृद्धि हुई। आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, व दो के अन्य क्षेत्रों में किसानों द्वारा आत्महत्या की चौंकाने वाली घटनाएँ इसी प्रकाश में देखी जा सकती हैं। यहाँ विदेशी निवेश खुशहाली के साथ मौत का पैगाम भी लेकर आया है।
गरीबी के साथ शराब को भी आत्महत्या का प्रधान कारण देखा गया है। श्री लंका के मालोन्नयबा जिले में आर्थिक तनाव एक कारण था, किंतु साथ ही शराब भी प्रमुख कारण था। अच्छी उपज के साथ वहाँ किसानों में शराब की लत बहुत बढ़ गई थी। बाद में जब फसल अच्छी नहीं हुई, तो इसी शराब की लत ने आर्थिक तबाही की और शराब की अत्यधिक खपत कई तरह से आत्महत्या का कारण बनीं।
व्यक्ति की शिखा, व्यवसाय एवं सामाजिक स्थिति का भी आत्महत्या से नजदीकी रिश्ता पाया गया है। उच्च प्रशिक्षित व्यवसायियों, इंजीनियर, डॉक्टरों और विश्वविद्यालयों, मेडिकल व इंजीनियरिंग कॉलेजों के छात्रों में आत्महत्याएँ अपेक्षाकृत अधिक देखी गई हैं। शायद विकृत जीवन शैली का दबाव तनाव उनके लिए भारी सिद्ध होता है। दूसरी ओर गांवों में रहने वालो, धर्म में आस्था रखने वालों विवाहितों एवं महिलाओं में आत्महत्या की दर कम देखी गई है। इससे स्पष्ट होता है कि शहर की भागदौड़ भरी जिन्दगी का तनाव, टूटते मानव मूल्य, निताँत एकाकीपन जीर्ण होती सामाजिक दीवारें, आशा की ढहती इमारतें, बिखरती, धार्मिक निष्ठाएँ बढ़ती आत्महत्या की जड़ में हैं। संपन्न वर्ग में बढ़ती आत्महत्या की वृत्ति के पीछे तथाकथित उदारवाद पश्चिमीकरण और आधुनिकता की हवा को देखा जा सकता है।
शायद इसी कारण सर्वाधिक हत्याएँ एवं आत्महत्याएँ चारित्रिक पतन एवं संपत्ति के बर्बर बँटवारे को लेकर हुई हैं। उदाहरणार्थ दिल्ली में 352 महिलाओं और 434 पुरुषों के द्वारा की गई आत्महत्याओं में 1 महिलाओं व 24 पुरुषों के पीछे निहित कारण उनके साथी की चारित्रिक बेवफाई को बताया गया। अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में कहा गया है कि महानगरों के पुरुषों व महिलाओं के दुश्चरित्र होने की घटनाएँ बढ़ रही हैं, फलस्वरूप आत्महत्याओं में तेजी से वृद्धि हुई है। उपभोग की अतृप्त इच्छाएँ व्यक्ति को तेजी से सामाजिक एवं चारित्रिक पतन के मार्ग में ढकेल रही हैं। इन इच्छाओं की पूर्ति के लिए लोग ‘शॉर्टकट’ मार्ग अपनाते हैं और असफल होने पर आत्महत्या का मार्ग पकड़ लेते हैं, जो किसी तरह से ठीक नहीं है।
पर यह तभी समझा जा सकता है, जब यह सुनिश्चित तौर पर जान लिया जाए कि जीवन विधाता का सर्वोत्कृष्ट वरदान है। इसमें गहरी सार्थकता और गहन अर्थ छुपा हुआ है। उसे उजागर करना है। इस उद्देश्य की ओर बढ़ने वाला हर व्यक्ति गीता के स्वरों में यही गुनगुनाता है, यं लब्ध्वा चापंर लाभं मन्यते नाधिकं ततः। सचमुच जीवन अमृत हैं, इसे यूँ ही खोएँ नहीं, बल्कि इसकी सार्थकता की खोज करें।
अर्जुन के हाथ से युद्ध मध्य में गाँडीव छूटते, मुख सूखते देख कृष्ण झुँझला पड़े थे। कथनी और करनी में व्यतिरेक-व्यामोह उनसे सहन नहीं हुआ। भौहें तरेरते हुए वे बोल उठे-
कुतस्त्वा कश्मलमिंद विषमें समुपस्थितम्।
हे अभागे! इस विषम वेला में यह कृपणता तेरे मन मस्तिष्क पर किस प्रकार चढ़ बैठी? दिग्भ्राँत अर्जुन की आँखें खुली और उभरे उत्साह ने गाँडीवधारी अर्जुन को महाभारत विजय का श्रेय दिलाया। कार्य तो ईश्वरीय चेतना ने ही किया पर जाग्रत व उफनकर आए सत्साहस की परिणति ही पूर्व भूमिका बना सकी।
रास्ता रोके खड़े डाकू वाल्मीकि से सप्तऋषियों ने इतना ही तो कहा था कि क्या ये स्वजन-सम्बन्धी तुम्हारे पापों में भी उतने ही भागीदार होंगे, जितना सुख वैभव में हैं? पत्नी व बच्चों तक ने जब अपना उत्तर नकारात्मक दिया, तो उसे अपनी दा का मान हो गया। आत्मप्रगति का मंत्र ऋषिगणों से पाकर उसने अपनी जीवन धारा ही मोड़ दी और वह संत वाल्मीकि बन गया। नरक को उन्मुख हो रहा डाकू, अपनी विवेक-बुद्धि को सत्परामर्श के सहारे प्रयुक्त कर सही दृष्टि पा गया और आदि कवि के रूप में इतिहास में अमर हो गया
(1) सूर्य उदय होने से पहले ही उठ जाना।
(2) आरीं किए काम को समय पर पूरा करना।
(3) दिनचर्या में अनुशासन रखना।
(4) सादा-सुपाच्य और ताजा भोजन ही करना।
सरदी-गरमी, कष्ट-सुविधा, प्रिय-अप्रिय और अनुकूल -प्रतिकूल परिस्थितियों से विचलित हुए बिना अविराम कर्म करते रहा जा सके, तो समझना चाहिए कि जीवन में तप की प्रतिष्ठा हो गई है। ‘तपस्वी’ विशेषण सुनते ही पंचाग्नि तप कर रहे, नंगे बदन, कांटों पर सोने या नंगे पैर चलने वाले साधु-बाबाओं की छवि आँखों के सामने तैर जाती है। साधु-तपस्वियों की यह चर्या दिखावे के लिए भी हो सकती है और इनके पीछे कोई आध्यात्मिक आत्मिक उद्देश्य भी हो सकता है, लेकिन सामान्य साधकों को इन कठिन व्रतों या अभ्यासों पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। पतंजलि ने जिस ‘तप’ का उपदेश दिया है वह शरीर को साधना के अनुरूप समर्थ-सक्षम बनाने के लिए है।
शरीर स्वस्थ रहे, कोई कष्ट-कठिनाई चित्त को विचलित नहीं करे,, सुख-दुख आदि द्वंद्व सामने आएँ तो मन में ऐसा क्षोभ उत्पन्न न हो कि जीवनचर्या में विक्षेप आ जाए। यम-नियम के अंतर्गत आने वाले तप का इतना ही अर्थ है। यही सार्वभौम भी है। श्रीकृष्ण ने तप को व्यापक अर्थ देते हुए, उसमें पूरी जीवनचर्या को ही समाविष्ट कर दिया था। अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए उन्होंने तप की जैसी व्याख्या की है, उसमें पूरी जीवन साधना ही आ जाती है। तप को शरीर, वाणी और मन के खंडों में बाँटते हुए उन्होंने कहा है, “देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा यह शरीर सम्बन्धी तप कहा जाता है। जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है तथा सत्साहित्य के अध्ययन, पाठ और मंत्रजप का अभ्यास है, वह वाणी सम्बन्धी तप है। मन की प्रसन्नता, शाँतभाव, मौन रहकर आत्मचिंतन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अंतःकरण के भावों की भलीभाँति पवित्रता को धन सम्बन्धी तप कहते हैं।” (गीता 17/14-16)
भगवद्गीता के इन श्लोकों के अनुसार तप एक समग्र जीवनपद्धति है। इन विधि निषेधों का उद्देश्य व्यक्तित्व में समरसता लाना, सामंजस्य स्थापित करना और संतुलन साधना है।
योगशास्त्र के यम-नियमों में इन मर्यादाओं का कुछ अलग ढंग से लेकर विस्तृत मार्गदर्शन आ गया है। परिभाषा और कसौटियों को सीधे लागू नहीं किया जा सकता। उन तक पहुँचने के लिए छोटे आरंभ ही सहयोगी होते हैं। तप का अर्थ जीवन को द्वंद्व रहने योग्य बनाना है, तो आरंभ छोटे मोटे अनुशासन से ही करना चाहिए। सामान्यतः हमारा जीवन अस्त-व्यस्त रहता है। तीन -चौथाई काम इसलिए पूरे नहीं होते या उनका आरंभ ही खटाई में पड़ जाता है कि उनकी कोई व्यवस्थित योजना नहीं बन पाती।
तप का व्यावहारिक पक्ष दैनिक जीवन को व्यवस्थित करने के साथ आरंभ होता है। छोटी सी शुरुआत सूर्योदय से पहले उठने के साथ की जा सकती है। स्वास्थ्य, मानसिक आरोग्य और शेष दिन स्फूर्ति बने रहने की दृष्टि से सूर्य उदय होने से पहले ही जाग जाने के कई लाभ है। उनकी चर्चा यहाँ अभीष्ट नहीं है, सिर्फ यही समझना पर्याप्त है कि जल्दी उठना एक अच्छी शुरुआत की दृष्टि से उपयोगी है। देर तक सोते रहने के लिए शहरी जीवन के तकाजों की ओट ली जाती है। कामकाजी या शहरी जीवन की व्यवस्था के कारण देर तक सोने की मजबूरी मुश्किल से आधा प्रतिशत लोगों के साथ ही जुड़ी हुई है। निन्यानवे प्रतिशत से ज्यादा लोगों की व्यस्तता शाम के बाद नौ-दस बजे तक पूरी हो जाती है। भोजन आदि के घंटा आधा घंटे बाद वे सो जाएँ, तो सुबह छह बजे से पहले आसानी से उठा जा सकता है।
जिनके साथ अपरिहार्य स्थितियाँ जुड़ी हुई है, वे नींद खुल जाने के बाद प्रमाद और आलस्य में यों ही पड़े रहने की आदत छोड़ें। आँख खुलने के बाद उठ जाने और दिनचर्या आरंभ कर देने का क्रम अपनाएँ। समय पर उठने और तुरंत बाद दिनचर्या आरंभ करने का प्रभाव पूरे दिन दिखाई देगा। यह बहुत साधारण सी बात लगती है और बहुतों को शायद विश्वास भी नहीं हो कि जल्दी उठने की आदत व्यक्ति को अपने काम तत्परता से पूरा करने की ऊर्जा देती है। जल्दी उठने का अभ्यास शुरू करते समय कुछ दिन के लिए थोड़ी असुविधा भले हो, लेकिन जल्दी ही वह सिद्ध हो जाता है। आरंभ में एक सप्ताह पूरा होने तक यह अभ्यास प्रफुल्लता देने लगता है। वह उत्साह चित्त को स्फूर्तिवान बनाता है।
स्फूर्ति और उत्साह के अभाव में ही दिनचर्या के अधिकाँश काम अधूरे रह जाते हैं। हड़बड़ी में किए गए काम भी अधूरे ही कहे जाएँगे। उदाहरण के लिए, कार्यालय में फाइल पर ठीक से फीता नहीं बँधा है। कुछ कागज बाहर निकल रहे है। घर में या दफ्तर में सामान बिखरा हुआ है। गाड़ी में बैठ रहे है या बस में चढ़ रहे हैं, तो कपड़े उलझ रहे हैं। इस तरह की अस्त-व्यस्तता हड़बड़ी और आधी-अधूरी तैयारियों का ही परिणाम है।
एक समय में एक ही काम करने का अभ्यास भी काम को सावधानी से करने का उपाय है। आमतौर पर लोक एक साथ कई काम शुरू कर देते हैं, उदाहरण के लिए भोजन करते समय लोग अखबार पढ़ने लगते हैं या थोड़ी सी आहट होने पर बाहर झाँकने लगते हैं। पढ़ने-लिखने और घूमने-फिरने के अलावा दूसरे काम करते हुए भी इस तरह का बिखराव आ जाता है। नतीजा यह होता है कि कोई भी काम ठीक से नहीं हो पाता। जो काम करें, मन लगाकर और इधर -उधर ध्यान बँटाए बिना करें।
अभ्यास की पूर्णता आरंभ किए काम को समय पर पूरा करने के रूप में होनी चाहिए। ज्यादातर काम इसलिए अधूरे पड़े रहते या आरंभ होने के बाद टलते जाते हैं कि अब बीच में दूसरे काम शुरू हो जाते हैं। आरंभ किए गए काम को पूरा सम्मान दिया जाए, तो वह मनोयोग से भी होता है और पूरी कुशलता से संपन्न होता है। यह पद्धति किसी उपलब्धि तक पहुँचाती है। वैज्ञानिक फ्रैंकलिन ने सफलता के तेरह नियमों का निर्धारण करते हुए उस मर्यादा को आधार बताया था। अपने व्याख्यानों में वे कहा करते थे कि इस नियम का पालन नहीं किया जाए, तो आप एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकेंगे। आगे बढ़ने के लिए पहला कदम पूरी तरह जमाए बिना ही आप दूसरा कदम उठा देंगे और धड़ाम से नीचे गिर पड़ेंगे।
काम-काज, लोक व्यवहार और दैनंदिन चर्या में नियमित व्यवस्थित होने के लिए सजग रहना जरूरी है। हम जो खरच कर रहे है, जिन लोगों से मिल जुल रहे हैं, समय के जिस तरह व्यतीत कर रहे हैं, उसका औचित्य है या नहीं? समय, साधन और शक्ति के व्यय को नियोजन की तरह समझना चाहिए। उस नियोजन का लाभ आत्मविकास के रूप में होना चाहिए। अपने निजी, पारिवारिक और आस-पास के जीवन में उस नियोजन से सुख शाँति में अभिवृद्धि नहीं होती हों, तो व्यर्थ मानना चाहिए।
फ्रैंकलिन ने लिखा है कि परमात्मा ने आपको जीवन में संपदा के तौर पर जो दिया है वह समय है। समाज आपको साधनों के रूप में संपदा भेंट करता है। समय और साधनों का उपयोग करने से पहले सोचना चाहिए कि यदि यह व्यय नहीं किया जाए, तो क्या नुकसान होगा? आपका विवेक यदि कहे कि कोई हानि नहीं है, तो सच मानिए कि वह अपव्यय है। इस कसौटी को ध्यान में रखकर आप अपव्यय की आदत पर अंकुश लगा सकेंगे।
किन्हीं भी अभ्यासों के लिए सजग रहने का अर्थ हर आचरण के समय ऊहापोह से गुजरना नहीं है। आत्म समीक्षा या ग्रहण किए जा रहे नियमोँ को प्रतिदिन पढ़ने और उस आधार पर दिनभर के कामों का लेखा जोखा लेने से सजगता का उदय होने लगता है। तप-अनुशासन का चौथा नियम आहार से सम्बन्धित है। भोजन का उद्देश्य स्वाद न होकर पोषण मान लिया जाए, तो आहार संयम की आधी मंजिल पूरी हो जाती है।
आहार-संयम का उद्देश्य स्वास्थ्य और पोषण तो है, लेकिन साधकों के लिए वह इससे भी कही ज्यादा है। साधक शक्ति और पोषण के लिए ही नहीं खाता। यह प्राथमिक लेकिन अपेक्षाकृत गौण उद्देश्य है, असल उद्देश्य चेतना को संस्कारित करना है। बल और पोषण देना ही उद्देश्य होता है। साधकों को गरिष्ठ और राजसी भोजन करने के लिए मना किया जाता है। उस भोजन को पचाने के लिए कठोर श्रम करने और पसीना बहाने की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिए साधकों को सादा-सात्विक, आसानी से पचने योग्य हल्का- फुल्का भोजन करने की सलाह दी गई है।
सात्विक भोजन में कुछ आहर ऐसे भी हैं, जो दूसरे पदार्थों की तुलना में बहुत कम पोषण देते हैं, लेकिन उनका प्रभाव चित्त हो हल्का और निर्मल बनाता है। लहसुन प्याज जैसे पदार्थों का औषधीय गुणों के कारण आयुर्वेद में विशेष महत्व दिया गया है, लेकिन दक्षिणमार्गी साधकों के लिए ये वर्जित है। योग के आचार्य इन्हें तामसी मानते हैं, उड़द, चना, अरहर, राजमा, सेम, मटर और विभिन्न अनाज पोषण की दृष्टि से उन्नीस बीस होते हुए भी साधकों के लिए कुछ विहित हैं और कुछ निषिद्ध। आहार का यह सूक्ष्म विवेक बहुत आगे की स्थिति में किया जाता है। आरंभ सादा, सुपाच्य और सात्विक भोजन की मर्यादा से ही किया जाना चाहिएं वह सध जाए तो आगे की यात्रा सहज होने लगती है।
भविष्य के पूर्वानुमान का आधार क्या है? संभाव्य का ज्ञान व्यक्ति को, समूहों को पूर्व चेतावनी अथवा संदेशों के रूप में किस प्रकार मिल जाता है, इसका उल्लेख करने से पूर्व हमें कालचक्र और उसकी संरचना को समझना होगा। उसे प्रायः तीन भागों में बाँटा जा सकता है, भूत, वर्तमान एवं भविष्य। तीनों का संयुक्त स्वरूप ही समग्र और अखंड काल है। तीनों का ही अपना-अपना महत्व है।
सामान्यतया मनुष्य का, घटनाओं का वर्तमान ही सबके परिचय में आता है। भूतकाल की उपयोगिता इतनी भर है कि उन स्मृतियों, घटनाक्रमों और अनुभूतियों के आधार पर वर्तमान को बनाया, सुधारा, सँवारा जा सकता है। किंतु भविष्य में क्या होना है? कैसे संभव होना है? इसको तो मात्र कल्पना के आधार पर आज के क्रिया कलापों को देखते हुए ही जाना जा सकता है। चिंतन क्षेत्र का अधिकाँश हिस्सा भविष्य की कल्पनाओं में ही सदैव निरत रहता है। इसे यों कहना ठीक रहेगा कि भावी निर्धारणों का स्वरूप ही चिंतन क्षेत्र की सबसे बहुमूल्य संपदा है। प्रत्यक्षतः भविष्य दिखाई न पड़ने पर भी शक्ति उन काल्पनिक निर्धारणों में सर्वाधिक खरच होती है, पर सत्य है कि जो जैसा सोचता है, वह वैसा ही बन जाता है। समूहगत चिंतन प्रवाह जिस दशा में बहने लगता है, तदनुरूप ही उसकी नियति बन जाती है। इसी को कहते हैं, भविष्य निर्धारण।
भविष्य निर्धारण में सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग है- पूर्वाभास, पूर्वकथन या भविष्यवाणी। घटनाक्रम घटने के पूर्व ही उसके स्वरूप की, घटने के समय की लगभग सही भविष्यवाणी कर देना, यही भविष्य कथन या प्रोफेसी है। समय को, कालखंड को बहुआयामी मानने वाले मनीषीगण कहते हैं कि भविष्य के बीजाँकुर वर्तमान में निहित होते हैं एवं इन्हें प्रस्फुटित कर उस भावी परिणति को जान पाना तथा वाँछित परिवर्तन कर पाना मनुष्य के लिए संभव है। एक माली बीज का पर्यवेक्षण कर बता सकता है कि वृक्ष का स्वरूप कैसा होगा? कैसे फल देगा? कब फल देगा? इंजीनियर्स कल्पना शक्ति के आधार पर भव्य रचनाओं की, अट्टालिकाओं की आकृति अंकित कर एक प्रकार से संभाव्य को मूर्त रूप दे देते हैं। ऋतु बदलती है, लोग परिवर्तन के पूर्वानुमान के सहारे अपनी तैयारी कर पाना भविष्य ज्ञान तो वह है, जो व्यक्ति को चिर संचित अनुभवों के आधार पर अपनी पूर्व तैयारी की दिशा देता है।
लीवरपूल विश्वविद्यालय के भौतिकीविद् डॉ. अरनोल्ड ओटवे का कथन है कि मनुष्य को भविष्य का आभास इसलिए होता रहता है कि विभिन्न घटनाक्रम ‘टाइम लेस मेंटल पैटर्न’ चिंतन क्षेत्र के निर्धारणों के रूप में विद्यमान रहते हैं। ब्रह्माँड का हर घटक इन घटनाक्रमों से जुड़ा होता है, चाहे वह जड़ हो अथवा चेतन।
स्वामी प्रतयग्यात्मानंद का मत है कि यूनीवर्स यह सृष्टि जिसे ‘मेक्रोकॉम्स’ नाम से जाना जाता है, अपने गर्भ में अगणित माइक्रोकॉम्स व्यष्टि घटकों को समाहित किए है। ये विभिन्न घटनाक्रमों एवं चलते फिरते जीवों मानवों के रूप में भी हैं तथा जड़ समझे जाने वाले पादप, वृक्ष वनस्पति एवं अन्य घटकों के रूप में भी। अणु में विभु, लघु में महान क्षुद्र में विराट के रूप में इसी संज्ञा को वर्णित किया जाता है। इन व्यष्टि घटकों में समष्टि से सम्बन्ध स्थापित करने, तादात्म्य बिठाने की अभूतपूर्व सामर्थ्य होती है। यही भविष्य विज्ञान को कुछ भी घटित होने वाला है, उसकी झलक झाँकी अपने मन मस्तिष्क में देखने पाने का मूलभूत आधार है।
मूर्द्धन्य दार्शनिक लिबनिज का कथन था कि हर व्यक्ति में यह संभावना छिपी पड़ी है कि वह अपनी अंतर्प्रज्ञा करे जगाकर भविष्य काल को वर्तमान की तरह दर्पण में देते ले। जो भी दिव्य द्रष्टा मनीषी हुए हैं, वे इसी क्षमता का जगाकर भविष्य की संभावनाएँ व्यक्त कर सके एवं उनका आधार पर वर्तमान के ढाँचे को बदलने की, परिष्कृत की सम्मति दे सके। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के भौतिकीविद् प्रोफेसर एड्रियन डॉब्स ने भविष्य कथन सम्बन्धी अपना प्रतिपादन एक सेमीनार में सन 1965 में प्रस्तुत करते हुए कहा था कि भविष्य में घटने वाली हलचलें मानव की वर्तमान में एक प्रकार की तरंगें पैदा करती हैं, जिन्हें ‘साइट्रोनिकवेवफ्रंट’ कहा जा सकता है। इन तरंगों की स्फुरणाओं को मानवी मस्तिष्क के घटक न्यूरॉन्स पकड़ लेते हैं एवं इस प्रकार व्यक्ति भविष्य का अनुमान लगा पाने की स्थिति में आ जाता है। मस्तिष्क की अल्फा तरंगों तथा साइट्रोनिक वेव्स की फ्रीक्वेन्सी एक ही होने से यह एक बड़ी सरल प्रक्रिया है। मात्र मस्तिष्क को सचेतन स्तर पर जाग्रत बनाए रहने की आवश्यकता है, ताकि संभावित घटनाक्रमों का खाका समझा जा सकें।
अपने ग्रंथ ‘सुपरनेचर’ में लायल वाअसन ने ‘प्रिकागनीशन’ शब्द का अर्थ ‘ पूर्वानुमान’ किया है। अर्थात् जो कुछ घटित होने वाला हो, उसकी पहले से जानकारी हो जाना। वे एक पुस्तक ‘आइचिंग‘ अर्थात् ‘दि बुक ऑफ चेंजेज’ जो अब से प्रायः 3 वर्ष पूर्व लिखी गई थी, का हवाला देते हुए लिखते हैं कि भाव निर्धारण एवं वर्तमान में जो किया जा रहा है, उसमें क्या कुछ परिवर्तन कर भविष्य को स्वयं व अन्यों के लिए उज्ज्वल बनाया जा सकता है, यह पूर्णतः ज्यामितीय आधार पर गणना करके जाना जा सकता है। मानवी मस्तिष्क में वे सभी समाधान तथा संभावनाएँ एवं उनके विकल्प विद्यमान है। क्रिस्टल बॉल के द्वारा श्रीमती जीन डिक्सन इसी आधार पर अपनी अंतप्रा को जाग्रत का भविष्य के गर्भ में झाँका करती थी। वे लिखते हैं कि हर मनुष्य भविष्यवक्ता बन सकता है। किंतु कुछ व्यक्ति कभी-कभी शत-प्रतिशत सही भविष्यवाणी बिना किसी पुरुषार्थ के करने की जो योग्यता रखते हैं, वह या तो दैवी अंतः स्फुरणा के आधार पर अथवा व्यष्टि चेतना का समष्टि से सीधे संपर्क होने पर व्यक्ति विशेष, समय विशेष अथवा परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त हो जाने की क्षमता के कारण उनमें विकसित होती है। यह पूर्व जन्मों के आधार पर विशेषता भी हो सकती है। नोस्ट्राडेमस, काँट लुई हेमन (कीरो) तथा महर्षि अरविंद ऐसे ही दिव्यदृष्टि संपन्न व्यक्तियों में गिने जाते हैं।
विलियम काक्स नामक एक अमेरिकी गणितज्ञ एवं दार्शनिक ने एक रोचक सर्वेक्षण कर यह जानने का प्रयास किया है कि क्यों विभिन्न स्थानों पर बैठे व्यक्ति अचानक उन यात्राओं को, जो रेल या हवाई जहाज से की जाने वाली थीं, स्थगित कर देते हैं। पीछे पता चलता है कि वे किसी दैवी प्रेरणा अथवा पूर्वाभास के कारण एक ऐसी अभिशप्त यात्रा से बच गए, जो उन्हें सीधे मौत के मुँह में ले जाती। उन्होंने दुर्घटनाग्रस्त वाहनों का सर्वे करके पाया कि उस दिन उस विशेष यान अथवा रेल से यात्रा करने वालों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम रही एवं कइयों ने अपने रिजर्वेशन निरस्त कराए। दुर्घटनाग्रस्त यान या रेल डिब्बे में बैठने से पूर्व ही उन्हें पूर्व ज्ञान हो जाने से जान-बूझकर उनने यात्रा का स्थगित कर दिया। काक्स कहते हैं कि दुर्घटनाग्रस्त हुई टेऊन अथवा वायुयान में यात्रा करने वालों एवं इनके पूर्व तथा बाद में यात्रा करने वालों की संख्या में इतना बड़ा अंतर था कि इसे मात्र संयोग नहीं कहा जा सकता। आसन्न संकट की यह एक समष्टिगत चेतावनी मानी जा सकती है, जो संभव है, सबको मिली हो, पर जो काल के ग्रास हो गए, ने उसकी अवमानना करके उस ‘डूम्ड’ (अभिशप्त) वाहन में बैठे तथा जो बच गए, उनने उसे गंभीरता से लिया, उसकी उपेक्षा नहीं की और बच गए। इसे वे ‘कलेक्टिव अवेयरनेस’ कहते हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ है, आसन्न भवितव्यता के विषय में समूहगत जागरुकता एवं भावार्थ हुआ, दैवी प्रेरणा, अंतःस्फुरणा, पूर्वाभास। ‘जरनल आुँडडडडड अमेरिकन सोसायटी फॉर साइकिकल रिसर्च’ (1956) में प्रकाशित विलियम काक्स के विवरणानुसार 15 जून 1952 को शिकागो एवं इलिनायस के बीच यात्रा करने ली ‘जार्जियन’ नामक दुर्घटनाग्रस्त हुई टेऊन के यात्री उस विशेष दिन मात्र नौ थे, जबकि उस घटना के 14 दिन पूर्व तथा बाद के 14 दिनों में उनकी संख्या औसतन बासठ से अड़सठ के बीच थी। संख्या का वह विरोधाभास उनने 15 दिसंबर 1952 को दुर्घटनाग्रस्त हुई शिकागो मिलवाऊकी के बीच चलने वाली टेऊन में भी पाया। ऐसी लगभग 10 घटनाओं में से 9 से अधिक में यात्रा करने वालों को, जो जीवित बच गए, घटना का पूर्वाभास हो चुका था।
सन 1966 शुक्रवार 12 अक्टूबर के दिन रात्रि एक बजकर पंद्रह मिनट पर इंग्लैंड के वेल्श खदानों के क्षेत्र में एक भयंकर दुर्घटना हुई। इसमें अबरफान नामक एक गाँव पूरी तरह बर्बाद हो गया। कारण कि भूस्खलन था, जिसमें 5 लाख टन कोयला तथा मिट्टी ने खिसककर घरों को पूर्णरूपेण ढक दिया और वहाँ के एक सौ चालीस ग्रामवासियों को असमय काल का ग्रास बना दिया। कइयों ने इस समाचार को अखबार में पढ़ा। इस दुर्घटना के सम्बन्ध में पूरे इंग्लैंड में अगणित व्यक्तियों को पूर्वाभास कुछ क्षणों से कुछ दिन पूर्व तक सतत होता रहा था। एक व्यक्ति जिसने गाँव का नाम भी नहीं सुना था, स्वप्न में देखी गई स्पेलिंग के आधार पर स्थानीय पेपर को उसका नाम लिख भेजा और स्वप्न का पूरा वृत्तांत भी बताया कि ऐसा कुछ घटित होने वाला है। इसके बारे में दिवंग एरिल जोन्स नामक 9 वर्षीया एक लड़की ने अपनी माँ को एक दिन पूर्व ही बताया था कि उसके स्कूल पर काला पहाड़ गिर पड़ा है एवं स्कूल नष्ट हो गया है, यह स्वप्न उसने देखा है। माँ बच गई, किंतु वह लड़की अपना पूर्वाभास बताकर मौत के मुँह में चली गई। किसी ने लोगों की चीख-पुकार, किसी ने पहाड़ टूटने, किसी ने जमीन में बड़ा गड्ढा होने, ऐसे स्वप्न लगभग दो सप्ताह पूर्व से घटना के दिन तक प्रतिदिन देखे। केंट का एक व्यक्ति, जिसने इस घटनाक्रम को यथावत् देखा, दो दिन पूर्व अपने सहकर्मियों को यह कहता पाया कि शुक्रवार को कुछ भयंकर वेल्श में घटित होने जा रहा है। बाद में किए सर्वेक्षण में भी काफी लोगों ने अपने पूर्वाभास की सूचना दी। यह समूहगत पूर्वाभास की साक्षी देने वाली एक महत्वपूर्ण घटना है।
डेविड बूथ नामक व्यक्ति ओहियो, अमेरिका का रहने वाला था। वह बिजली का सामान बनाने वाली एक कम्पनी में मैनेजर था। मई 1979 में दस दिन तक लगातार उसे यह पूर्वाभास होता रहा कि अमेरिकन एयरलाइंस का एक विमान आकाश में फट पड़ा तथा जलते यान के मलबे में, लपटों में कई शव पड़े है। वे कहते हैं कि यह स्वप्न नहीं था, बैठे-बैठे उन्हें कई बार रोमाँचित कर देने वाली यह लोमहर्षक अनुभूति हुई जैसे वेटी देख रहे हों। 22 मई 1979 को उन्होंने फेडरल एविएशन अथॉरिटी एवं सिनसिनाटी एयरपोर्ट के कार्यालयों में फोन पर यह सूचना भी दी एवं एक मनः चिकित्सक से संपर्क कर उसे भी सारा प्रसंग सुनाया। 26 मई को 4 दिन बाद शिकागो के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अमेरिकन एयरलाइंस का एक डी. सी. 1 जेट विमान जब दुर्घटनाग्रस्त हुआ, तो यह अमेरिका के इतिहास में भयंकरतम घटनाओं में से एक था। इसमें सभी 274 यात्री मारे गए। दुर्घटना के बाद ही सभी ने डेविड बूथ के पूर्वाभास को याद किया। यह पूर्वाभास इतना सही था कि फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन जो इस एयरलाइंस को चलाता था, हैरान हो गया। क्योंकि डेविड बूथ ने उसे भी इस सम्बन्ध में सूचित किया था और आग्रह किया था कि संभावित दुर्घटना को हर हाल में रोका जाना चाहिए। ‘दि अनएक्सप्लेंड मिस्ट्रीज ऑफ माइंड एंड स्पेस’ नामक ग्रंथ में इसका विस्तारपूर्वक उल्लेख है।
अचेतन के ऐसे पूर्वाभास इनमें से अनेकों को होते रहते हैं। कुछ उन्हें गंभीरतापूर्वक लेते और याद रखते हैं, तो कुछ मन की स्वाभाविक उधेड़बुन समझकर उसकी उपेक्षा कर देते हैं। यदि समष्टि चेतना की व्यापकता को समझा जा सके और वह स्मरण रखा जा सके। कि व्यष्टि चेतना कोई स्वतंत्र इकाई नहीं, वरन् उसी का एक घटक है तो इस प्रकार के सामूहिक पूर्वाभास की घटनाओं को अधिक सरलतापूर्वक हृदयंगम किया जा सकेगा। इससे जहाँ अशुभ-अनिष्टों से बचा जा सकना आसान होगा, वही सुखद संभावनाओं से लाभ उठा पाना भी कठिन न रह जाएगा।
सामने आया समय बार-बार नहीं आता। मानव जीवन एक सौभाग्य है, जो बार-बार नहीं मिलता? विडंबना यही है कि इसका सदुपयोग करने वाले कम ही होते हैं। जो जीवन का समुचित उपयोग करना जानते हैं, वे क्रमिक गति से ऊँचे उठते हुए चरम ध्येय को अंततः प्राप्त करके ही रहते हैं।
जो आत्मस्वरूप को भूलते और उत्तरदायित्वों से विमुख होते हैं, वे पतन के गर्त में गिरते हैं।
पुलस्त्य के विश्रवा के यहाँ एक कुरूप संतान ने जन्म लिया। बेडौल आकार का होने के कारण सभी उसकी हँसी उड़ाते। उसे लोगों की मूर्खता पर बड़ा क्षोभ हुआ। ‘कुबेर’ नामक इस पुरुषार्थी ने अपनी हँसी अपने ही घर में उड़ते देख ठान ली कि वह मानव समुदाय को यह बताकर रहेगा कि सभी को प्राप्त मनुष्य जीवन रूपी संपदा का सदुपयोग कर महान से महान बना जा सकता है। शरीरगत सुँदरता नहीं, अपितु गुणरूपी संपदा महत्वपूर्ण है एवं उसे ही अर्जित किया जाना चाहिए, यह सोचकर उसने अपनी योग्यता बढ़ाने के लिए कठोर तप किया। अपनी लगन से उसने पिता व बाबा को भी इस साधना में सम्मिलित कर लिया। देवताओं ने उन्हें अपना धनाधीश लोकपाल बनाया और वे अलकापुरी में राज करने लगे।
वरतंतु कौत्स को बहुत प्यार करते थे। न जाने कहाँ से आकर एक दिन वह उनके द्वार पर खड़ा हो गया था। तब से उन्होंने ही उसे पाल पोस्कर बड़ा किया था। महर्षि का उस पर सच्चा स्नेह था। उन्होंने उसे अपना समस्त ज्ञान प्रदान किया था। अब कौत्स के लिए आरम्भ में रुकना उचित न था। अतः वह गुरु के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। वरतंतु ने आँख उठाकर देखा, उनकी आँखों में प्रश्न था?
कौत्स ने कहा, “ गुरुदेव! यहाँ से जाने से पूर्व मुझसे गुरु दक्षिणा ले लें। गुरु ऋण चुकाए बिना मेरी विद्या व्यर्थ हो जाएगी।”
वरतंतु ने हँसकर कहा, “तुमने स्वयं ही इतनी सेवा की है कि मुझे और कुछ नहीं चाहिए।” कौत्स फिर भी नत-मस्तक खड़ा रहा। उसने फिर वही बात दुहराई, “भगवन्! मुझे कुछ आाडडडड अवश्य दें। बिना आपकी सेवा में कुछ अर्पण किए मुझे कहाँ संतोष होगा?”
गुरु मुस्कराए। उनकी आँखों में अपने शिष्य की एक और परीक्षा लेने का भाव उभरा और उन्होंने कहा, “यदि तुम नहीं मानते हो तो अपनी सीखी हुई चौदह विद्याओं के लिए चौदह सहस्र स्वर्ण मुद्राएँ लाकर दे जाओ।” कौत्स ने गुरु आाडडडड शिरोधार्य की। उसके पाँव सीधे अयोध्या की ओर बढ़ चले।
उन दिनों चक्रवर्ती सम्राट रघु राज्य कर रहे थे। कौत्स को अपनी सभा में आया देखकर राजा रघु ने उठकर दंडवत की, चरण धोए एवं उसका विधिवत पूजन किया। कौत्स निर्विकार भाव से यह सब देखता रहा। पूजन की समाप्ति पर वह उठकर जाने लगा।
राजा रघु हाथ जोड़कर सामने खड़े हो गए एवं बड़े ही विनम्र स्वर में पूछा, “ ऋषिवर! आपने सेवक को कुछ आज्ञा नहीं दी? अवश्य ही मेरी सेवा में कोई त्रुटि रही है।”
कौत्स के आने के कुछ दिन पूर्व ही सम्राट रघु ने जनहित में किए गए विश्वजित् यज्ञ में अपना सर्वस्व दान कर दिया था। यह बात कौत्स को ज्ञात न थी। सम्राट की अभ्यर्थना में मिट्टी के पात्रों को देखकर वह समझ गया कि यहाँ अभीष्ट की पूर्ति संभव नहीं है। अतः वह उठकर जाने लगा था, परंतु राजा के बारंबार आग्रह करने पर अपने आगमन का कारण बताते हुए उसने कहा, “राजन! मैं आपके पास गुरु दक्षिणा के लिए आया था, परंतु आपने तो अपना सर्वस्व दान कर दिया है। यहाँ तक कि अतिथि सत्कार के बरतन भी आपके मिट्टी के पात्र रह गए इस दशा में मैंने आपसे कुछ भी कहना अनुचित समझा। आप संकोच न करें मैं अन्यत्र जा रहा हूँ, मेरे अभीष्ट की पूर्ति हो जाएगी।”
राजा रघु के द्वार से कोई याचक वापस चला जाए, यह असंभव था। सम्राट ने कौत्स से प्रार्थना की, “महात्मन् मुझे तीन दिन का समय दें। मैं आपकी इच्छा को अवश्य पूर्ण करूंगा। रघु ने द्वार से कोई स्नातक निराश लौट जाए, इस कलंक से मेरी रक्षा करें।”
कौत्स ने तीन दिन के लिए उनका आतिथ्य स्वीकार कर लिया। रघु वापस अपने महल नहीं आए। सीधे युद्ध के लिए सजे हुए रथ में सवारी कर युद्ध की तैयारी में जुट गए। उन्होंने सोचा कि मैं पृथ्वी के समस्त राजाओं से कर ले चुका हूँ। दुबारा इतना शीघ्र फिर से उनसे कर की याचना करना अन्याय एवं अनीति होगी। अतः उन्होंने सीधे धनाधीश कुबेर पर चढ़ाई करने का संकल्प किया और उसी रथ पर सो गए।
प्रातःकाल राजा के उठते ही राज्य के कोषाध्यक्ष ने सूचना दी कि कोष में आकाश से स्वर्ण की वर्षा हो रही है। सम्राट मुस्करा उठे। कोषपाल कुबेर ने चुपचाप रघु का खजाना भर देने में ही अपनी कुशलता समझी। अतः उन्होंने स्वर्णमुद्राओं का ढेर लगा दिया।
रघु ने कौत्स को बुलाकर समस्त धन ले लेने का आग्रह किया। कौत्स ने हँसते हुए कहा, “ राजन्! मुझे धन की क्या आवश्यकता? मैं तो केवल चौदह सहस्र मुद्राएँ ही लूँगा, बस। शेष धन आप चाहें तो दान कर दें।” राजा रघु ने शेष सारा धन गाँवों को दान कर दिया। दो महान त्यागियों के बीच का त्याग जीवंत दिख रहा था। कौत्स ने अपना इच्छित धन लेकर गुरु दक्षिणा देने के लिए प्रस्थान किया।
जिसने ज्ञान को आचरण में उतार लिया, उसने ईश्वर को मूर्तिमान कर लिया।
-विनोबा भावह्य
जीवन में प्रयास, पुरुषार्थ, अवरोध एवं संघर्ष का क्रम एक शाश्वत सत्य हैं और इनमें सफलता -विफलता का दौर भी शाश्वत है। इन सबके बीच व्यक्ति की जीवन यात्रा प्रगति उत्थान की दिशा में बढ़ रही है या अवगति पतन की ओर, इसके निर्धारक तत्वों में उसके दृष्टिकोण की भूमिका सर्वोपरि रहती हैं।
व्यक्ति यदि छोटी छोटी असफलता अवरोधों से हिम्मत हार बैठता है और नकारात्मक भावों को जीवन में हावी होने देता है। तो यात्रा का हर एक कदम दूभर एवं कष्टप्रद अनुभव बन जाता है । जीवन एक दुखद घटना एवं दुर्भाग्यपूर्ण मजाक लगने लगता है। जीवन ऊर्जा नकारात्मक भावों में उलझकर कुँठित होने लगती है और अस्तित्व हताशा, निराशा एवं कुँठाओं के बीच दम तोड़ने लगता है। चहुँओर अंधेरा ही अंधेरा दिखने लगता है, अपने पराये लगने लगते हैं। अधिकाँशतः लोग ऐसे में अपने दुख दर्द एवं दुर्भाग्य के लिए भाग्य को कोसते हैं या दूसरों को दोषी मान बैठते हैं और नहीं तो भगवान को कोसने लगते हैं।
किंतु जीवन के प्रति दृष्टिकोण के बदलते ही स्थिति पलटने लगती है। अंतर्मन में पूर्ण सकारात्मक भाव के जागते ही जीवन के क्षितिज पर आशा की किरणें फूटने लगती हैं, निराशा-अवसाद का सघन अंधकार न जाने कहाँ तिरोहित होने लगता है, जीवन में साहस उत्साह का संचार होने लगता है और उमंग उल्लास का झरना बहने लगता है।
वस्तुतः आशापूर्ण विचार ही जीवन की सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है। मनीषी अलेक्जेन्डर के शब्दों में, ‘आशा’ मनुष्य की सबसे बड़ी संपदा है। यदि व्यक्ति इसे खो बैठता है, तो जीवन नैया डूबने लगती है, क्योंकि इसके बिना जीवन में अंधकार, अभाव और अशक्ति के अतिरिक्त कुछ नहीं सूझता। आशा ही घोर अभाव, विषमताओं और संकट के बीच भी जीवन निर्माण के तत्वों की खोज करती है तथा पर भासित अभिशाप को भी वरदान में बदलने का चमत्कार प्रस्तुत करती है। निराशावादी, नकारात्मक दृष्टिकोण के रहते अनुकूल अवसरों में भी प्रतिकूलता को देखते हैं, ताकि आशावादी विषम परिस्थितियों में भी अनुकूल है।
महान वैज्ञानिक एडीसन की प्रयोगशाला एक भीषण अग्निकाँड में पूरी तरह जलकर ध्वस्त हो गई। जीवनभर की बहुमूल्य शोध सामग्री उपकरण सब जलकर खाक हो गए। इसके अतिरिक्त आर्थिक क्षति हुई सो अलग। सामान्य व्यक्ति होता तो इस हादसे से जीवनभर न उबर पाता,किंतु आशा के पुतले एडीसन के उद्गार कुछ और ही थे, जो हर इनसान के लिए एक अमूल्य संदेश दे रहे थे, “ऐसे हादसों का बहुत महत्व है। इनमें हमारी भूलें जलकर नष्ट हो जाती हैं। हमें इसके लिए भगवान का कृतज्ञ होना चाहिए कि अब हम नए सिरे से जीवन को शुरू कर सकते हैं।”
यदि घटनाएँ हमारे अनुरूप नहीं घटती एवं हमें विफलता एवं निराशा का संदेश दे जाती है, तो भी हिम्मत हारने एवं हताश होने की आवश्यकता नहीं। चाहें संघर्ष पथ पर हम गिर भी जाएँ पिट भी जाएँ हमें नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी असफलता अंतिम नहीं होती। यदि लक्ष्य के प्रति अदम्य भाव अंतर में विद्यमान है, तो हर विफलता गिरकर फिर से उठ खड़े होने व दुगने उत्साह के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं।
इसमें महत्वपूर्ण सत्ता यह भी है कि हम जीवन व्यापार की तमाम संभावनाओं को मद्देनजर रखते हुए व्यावहारिक रुख को अपनाए रखें, अन्यथा अपनी क्षमता से बहुत अधिक भारी बोझ उठाने के प्रयास में हम ऐसी बुरी तरह न पिट जाएँ कि उठने का उत्साह ही चुक जाए। अतः अपनी योग्यता एवं क्षमता के अनुरूप ही प्राथमिकताओं का उचित निर्धारण भी आवश्यक है। जिससे हम अभीष्ट लक्ष्य की ओर सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुए उत्साह उमंग के साथ बढ़ते जाएँ, क्योंकि बार-बार के विफल प्रयास व्यक्ति को हताश कर देते हैं। व्यक्ति थक-हारकर आशाहीनता की स्थिति में आ जाता है। ऊर्जा ह्रास के कारण प्रयास को ही छोड़ बैठता है व कई तरह की कुँठाओं व ग्रंथियों से ग्रस्त होकर मनोविकारों का शिकार हो जाता है। जीवन के प्रति आस्था का क्षय कुछ इस हद तक हो जाता है कि इसकी सार्थकता का कोई किनारा सहारा नहीं सूझ पड़ता और घोरतम निराशा की स्थिति में कुछ तो अपनी जीवन लीला को ही समाप्त करने का घातक कदम तक उठा बैठते हैं।
आशावादी व्यवहारिक रुख अपनाते हुए अपने जीवन की छोटी-छोटी सफलताओं से क्रमशः आगे बढ़ता है। अपनी कार्य कुशलता और इच्छाशक्ति को क्रमशः विकसित करता जाता है। उनकी यह पद्धति जीवन में रचनात्मकता की अजस्र स्रोत बनकर उसे आगे बढ़ाती है। निराशावादी जहाँ एक दरवाजा बंद देखते ही प्रयास छोड़ देता है, आशावादी वही दूसरे खुले दरवाजे की ओर देखता है। निराशावादी जहाँ सतत हारता जाता है, वही आशावादी सामयिक विफलताओं के बावजूद भी एक विजेता होता है।
वास्तव में जब तक हम अपने जीवन के अर्थ एवं सुख की खोज के लिए बाहरी वस्तु, व्यक्ति एवं परिस्थितियों पर निर्भर रहते हैं, निराशावादी भाव जीवन में एक प्रभावी तत्व बनते जाते हैं और जब दृष्टि अपने अंदर के मूल स्रोत की ओर मुड़ने लगती है, तो निराशा का कुहासा छँटने लगता है। आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार एवं आत्मनिर्भरता के बल पर ही हम आशा के अंतर्निहित स्रोत की ओर बढ़ते हैं, जो हमें बाहरी जीवन में भी अंतर्संबंधित ठोस उपलब्धियों से संपन्न बनाता है और प्रगति पथ पर निरंतर आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित करता है।
यही पर हमें परमात्मा की कृपा एवं वरदान की भावभरी अनुभूति होती है, जो हर कर्तव्यपरायण व्यक्ति के लिए सुरक्षित है। अपने ईमानदार प्रयास के साथ प्रभु प्रेम एवं उसके अचूक न्याय विधान के प्रति आस्था को धारण कर हम अनायास ही आस्तिकता एवं धार्मिकता के पथ पर बढ़ जाते हैं। यही हमें जीवन की सफलता-सार्थकता के बोध की ओर ले चलती है।
एक बार एक ब्राह्मण ने युधिष्ठिर के पास जाकर दान की याचना की। युधिष्ठिर राज्य कार्यों में व्यस्त थे, इसलिए ब्राह्मण को दूसरे दिन आने को कह दिया। भीमसेन को यह बात अच्छी न लगी। उन्होंने सेवकों को बुलाकर सभी मंगल वाद्य बजाने की आज्ञा दी और स्वयं भी दुँदुभि बजाने लगे। वाद्यों की आवाज सुनकर युधिष्ठिर दौड़े आए। उन्होंने भीम से इसका कारण पूछा। भीमसेन ने कहा, “महाराज! आपने काल जीत लिया है। इस खुशी में यह कर रहे हैं। कल ब्राह्मण को बुलाने का तात्पर्य यही है कि कल तक का समय आपके वश में हैं।” युधिष्ठिर ने अभिप्राय समझा और कहने लगे, “सचमुच भीम! अच्छे कार्यों में देर नहीं करनी चाहिए।”
एक राजा वन भ्रमण को गया। रास्ता भूल जाने पर भूख प्यास से पीड़ित वह एक वनवासी की झोंपड़ी पर पहुँचा। समय पर मिले रूखे सूखे आतिथ्य ने उसे तृप्त कर दिया। चलते समय उसने उस वनवासी से कहा, हम इस राज्य के शासक हैं। तुम्हारी सज्जनता से प्रभावित होकर चंदन का एक बाग तुम्हें देते हैं। तुम्हारा शेष जीवन आनंद से बीतेगा।
चंदन का वन तो उसे मिल गया, पर चंदन का क्या महत्व है और उससे किस प्रकार लाभ उठाया जा सकता है, इसकी जानकारी न होने से वनवासी चंदन के वृक्ष काटकर उनका कोयला बनाकर नगर में बेचने लगा इस प्रकार किसी तरह उसके गुजारे की व्यवस्था तो बन गई।
धीरे-धीरे सभी वृक्ष समाप्त हो गए। एक अंतिम पेड़ बचा। वर्षा होने के कारण कोयला न बन सका, तो उसने लकड़ी बेचने का निश्चय किया। लकड़ी का गट्ठा लेकर जब बाजार में पहुँचा, तो सुगंध से प्रभावित लोगों ने उसका भारी मूल्य चुकाया आश्चर्यचकित वनवासी ने इसका कारण पूछा, तो लोगों ने कहा यह चंदन काष्ठ है, बहुत मूल्यवान है। यदि तुम्हारे पास ऐसी ही और लकड़ी हो तो उसका प्रचुर मूल्य प्राप्त कर सकते हो।
वनवासी अपनी नासमझी पर पश्चात्ताप करने लगा कि उसने इतना बड़ा बहुमूल्य चंदन वन, कौड़ी मोल कोयला बनाकर बेच दिया। पछताते हुए नासमझ को साँत्वना देते हुए एक विचारशील व्यक्ति ने कहा, मित्र पछताओ मत, यह सारी दुनिया तुम्हारी ही तरह नासमझ है। जीवन का एक-एका क्षण बहुमूल्य है, पर लोग उसे वासना और तृष्णाओं के बदले कौड़ी मोल में गँवाते हैं। तुम्हारे पास जो एक वृक्ष बचा है, उसी का सदुपयोग कर लो तो कम नहीं। बहुत गँवाकर भी अंत में यदि कोई मनुष्य सँभल जाता है, तो वह भी बुद्धिमान ही माना जाता है।
आंसुओं का मनोभावों से सीधा रिश्ता है। कभी खुशी में तो कभी गम में आँसू बरबस आंखों से टपक ही पड़ते हैं। किंतु प्रचलित मान्यताओं के प्रभाव में हम आँसुओं को छलकने से प्रायः रोक देते हैं कि कही लोग हमें बचकाना, भावुक या दुर्बल न समझ बैठें। आँसुओं के रूप में भावों का यह दमन विशेषज्ञों के अनुसार स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। उनके अनुसार आँखों से आँसुओं का सहज एवं मुक्त बहाव शारीरिक एवं मानसिक हर दृष्टि से स्वास्थ्य के लिए अति उत्तम है।
मिनिसोटा विश्वविद्यालय के डॉ. विलियम फ्रे ने सबसे पहले यह सुझाव दिया था कि भावनात्मक दमन शरीर में विषाक्त तत्वों का उत्पादन करता है और रोना चिल्लाना इसके निष्कासन में सहायक होता है। आँसुओं को रोकने से दमित भाव कई रूपों में विकृत होकर अधिक गंभीर रूप लेने है। इसी संदर्भ में डॉ. राबर्ट प्लचिक अपनी पुस्तक ‘इमोशन ए साइको इवोल्यूसरी सिंथेसिस’ में लिखते हैं कि आँसुओं के साथ रोना या चिल्लाना मदद की पुकार का एक संकेत होता है, जो प्रायः सुना जाता है। इसका दमन अन्य आहत क्षणों में भय, क्रोध, या उद्विग्नता जैसे मनोभावों के दमन की ओर ले जाता है, जिससे अवसाद, कुँठा, द्वंद्व तनाव व अन्य दिमागी विकृतियाँ पैदा होती हैं। आँसुओं के जबरन रोकने से दिल व दिमाग पर बोझ पड़ने लगता है और शरीर में अल्सर एवं कोलाइटिस जैसी व्याधियों का कारण बन सकता है।
घोर विपत्ति या दुख के समय यदि किसी व्यक्ति की आँखों में आंसू न आएँ, तो चिकित्सकों के अनुसार व्यक्ति अस्वस्थ माना जाता है। यदि किसी महिला की आँखों में घोर शोक अथवा संकट की घड़ी में आँसू न आएँ, तो वह शुष्काग्नि रोग से ग्रसित होती है, जिसे असाध्य माना जाता है। अभी हाल में ही बच्चों में ‘फेमिलियल डिसटोनिया’ नामक एक वंशानुगत रोग की खोज हुई है। इसमें बच्चे रोते हैं तो उनके आँसू नहीं निकलते या बहुत कम निकलते हैं। इसे एक घातक रोग माना गया है। इसके कारण बच्चों को समुचित विकास नहीं हो पाता है और वे बड़े होने पर प्रायः आक्रामक वृत्ति के होते हैं।
आँखों से आँसू न आने के कारण कई तरह की विकृतियाँ आँखों में चुभन या जलन, दिखने में कठिनाई होना, जोड़ो में दर्द, श्वासनली में खुश्की, मुँह फटना, नाक का सूखा रहना, सरदर्द आदि हो सकते हैं। इसी कारण आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सकों का मत है कि आँसुओं के बहने से रुका हुआ जुकाम, गरदन की अकड़ आँख व सिर के दर्द से छुटकारा मिलता है।
नवीन अनुसंधान के अनुसार आँसू भी असली और नकली होते हैं। अलग-अलग स्थिति में निकलने वाले आँसुओं की संरचना अलग-अलग होती है। अमेरिकी नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. जेम्स के अनुसार धुँआ लगने, प्याज काटने या आँखों में कुछ गिर जाने से निकलने वाले आँसू नकली तथा दुख दर्द में बहने वाले आँसू असली होते
संत अरिष्टनेमि की भक्ति से प्रसन्न होकर इंद्र ने देवदूत को उन्हें सादर स्वर्ग में लाने के लिए भेजा। देवदूत संत के पास आकर बोला, “महाभाग! मुझे सुरपति इंद्र ने भेजा है। उनका आग्रह है कि आप मेरे साथ स्वर्ग चलें और वही निवास करें।”
‘स्वर्ग!” संत ने तो परमार्थ से आत्मकल्याण की बात सुनी थी, जब स्वर्ग बीच में आ टपका तो उनको कहना ही पड़ा, “भाई अपना स्वर्ग तो मैंने यही बना रखा है। मैं क्या करूंगा, उन सुविधाओं का? हो आनंद मुझे उन उपभोगों में मिलता, वही यहाँ धरती पर जन-जन की सेवा करने में मुझे प्राप्त होता है। इसके समक्ष तुम्हारा स्वर्ग मेरे लिए फीका है।”
संत अरिष्टनेमि की भक्ति से प्रसन्न होकर इंद्र ने देवदूत को उन्हें सादर स्वर्ग में लाने के लिए भेजा। देवदूत संत के पास आकर बोला, “महाभाग! मुझे सुरपति इंद्र ने भेजा है। उनका आग्रह है कि आप मेरे साथ स्वर्ग चलें और वही निवास करें।”
‘स्वर्ग!” संत ने तो परमार्थ से आत्मकल्याण की बात सुनी थी, जब स्वर्ग बीच में आ टपका तो उनको कहना ही पड़ा, “भाई अपना स्वर्ग तो मैंने यही बना रखा है। मैं क्या करूंगा, उन सुविधाओं का? हो आनंद मुझे उन उपभोगों में मिलता, वही यहाँ धरती पर जन-जन की सेवा करने में मुझे प्राप्त होता है। इसके समक्ष तुम्हारा स्वर्ग मेरे लिए फीका है।”
राजा उदावर्श्र बहुमूल्य रत्नराशि लेकर महर्षि कणाद के आश्रम में पहुँचे और उनसे ब्रह्मविधा का उपदेश करने की प्रार्थना की। महर्षि ने धन अस्वीकार कर उनसे एक वर्ष बाद पुनः आने पर उपदेश की संभावना व्यक्त की और कहा, इस बीच आप अंतर्मुखी होने की साधना करें। वृत्तियों से अपना मुँह मोड़ें।
राजा निराश लौटे, बुरा भी लगा और क्षुब्ध भी थे। मंत्री द्युतकीर्ति ने उनकी खिन्नता दूर करते हुए कहा, “राजन् भूखे को ही अन्न पचता है। जिज्ञासु को ही ज्ञान का लाभ मिलता है। ऋषि ने एक वर्ष की अवधि देकर आपकी जिज्ञासा को परखा है। अनाधिकारी में ज्ञान को पचाने की सामर्थ्य नहीं होती। मनोरंजन के लिए कुछ कहने में समय की बर्बादी समझकर ऋषि ने आपको लौटाया है। उसमें बुरा न मानें।”‘ ऋषि का अभिप्राय उदावर्श्र की समझ में आया। एक वर्ष ब्रह्मचर्य पालनकर अपनी वृत्तियों पर नियंत्रण कर आत्मिक ज्ञान के अधिकारी बनकर वे आश्रम पहुँचे, तो कणाद ने उन्हें गले से लगा लिया, बोले, “धैर्यवान, श्रद्धावान, जिज्ञासु ही ब्रह्मज्ञान के अधिकारी होते हैं। अब आप ब्रह्मविद्या का लाभ उठा सकेंगे।”
दिल्ली में सेठ हरभजन वणिकों में अग्रगण्य थे। उन्होंने दिल्ली में अपना एक नया आलीशान भवन बनवाना शुरू किया। इस भवन की चर्चा चारों ओर फैली। सेठ हरभजन शाह के प्रतिद्वंद्वी व्यापारी श्रीचंद को जब इस निर्माण का समाचार मिला, तो उन्होंने कटाक्ष किया,”पितरों की नगरी तो उजड़ रही है और सेठजी यष के लिए यहाँ संपत्ति पानी की तरह बहा रहे हैं।”
सेठ हरभजन को इस कथन का पता चला। उन्होंने हवेली का निर्माण रुकवा दिया और सारी धन-संपदा लेकर अग्रोहा को चल दिए। सेठजी ने अग्रोहा पहुँचकर चारों ओर खबर फैला दी, अग्रोहा में आकर बसने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सेठ हरभजन सभी आवश्यक साधन एवं सुविधाएँ प्रदान करेंगे। लखी नामक बनजारा भी अग्रोहा पहुँचा। उसने व्यापार करने के लिए सेठ हरभजन शाह से रुपया माँगा। सेठ ने पूछा,”किस जन्म में इस कर्ज को चुकाओगे?”
लखी सेठजी के इस प्रश्न पर चौंका और बोला,”मैं आपका आशय नहीं समझा, सेठजी।” “भाई इस जन्म में चुकाने का वायदा करते हो तो हिसाब करके रोकड़िया से रुपये ले लो और अगले जन्म में चुकाना हो तो ऊपर वाले खंड में चले जाओ और जितना चाहे ले लो। हम उस रुपये की कोई लिखा-पढ़ी नहीं करते।”
लखी ने सोचा, अगले जन्म में कौन किससे मिलेगा? नई मंडी हैं, व्यापार में घाटा हुआ, तो सेठजी को रुपये कैसे लौटाऊँगा? उसने कहा, मुझे तो अगले जन्म में चुकाना है।
सेठजी ने उसे हवेली के ऊपर वाले खंड पर भेज दिया। वहाँ से उसने एक लाख रुपया लिया और अपने डेरे पर आया। वह मन-ही-मन प्रफुल्लित हो रहा था कि सेठ भी कैसा मूर्ख एवं नासमझ है। अगले जन्म में उसे कौन चुकाएगा? वह तो यूँ ही अपना रुपया बर्बाद कर रहा है।
अपने डेरे के बाहर बैठा वह यही सब कुछ सोच रहा था कि सामने से एक संत निकले। महात्माजी को देखते ही वह उठ खड़ा हुआ और बोला, महाराज! आप आज मेरे यहाँ विश्राम कर मुझे सेवा का मौका प्रदान करें। संत लखी के इस निश्छल आग्रह को ठुकरा न सके, स्नेहपूर्वक बोले, क्या बात है लखी! आज कोई विशेष बात है क्या?
लखी ने अपना सारा वृत्तांत कह सुनाया और बोला, महाराज अब आप ही बताइए कि क्या अगले जन्म में मुझे और सेठ हरभजन शाह को मानव चोला ही मिलेगा? क्या यह भी निश्चित है कि हम दोनों एक ही जगह पैदा होंगे और हम दोनों की स्मृतियाँ भी अक्षुण्ण रहेंगी?
महात्मा जी ने उसे पुनर्जन्म का विधान बताया और कहा, कर्म अविनाशी है, ये कभी नष्ट नहीं होते। जन्म-जन्मान्तर तक अच्छी-बुरी परिस्थितियों के रूप में इन्हें भुगतना पड़ता है। अपनी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए उन्होंने कुछ पौराणिक प्रसंग बताते हुए कहा कि तुम्हें बैल बनकर यह कर्जा चुकाना पड़ेगा। महात्मा जी की बात सुनकर वह घबराया और रुपया लेकर वापस हरभजन शाह की हवेली पर पहुँचा।
वहाँ जाकर उसने सारा धन सेठ के समक्ष रखा और बोला,”सेठजी अगले जन्म में यहां रुपया चुकाने की क्षमता मेरे पास नहीं है। इसे आप वापस ले लें।”
सेठजी ने रुपया लेने से इन्कार कर दिया। लखी ने बहुत अनुनय-विनय की, लेकिन वे नहीं मानें। लखी वापस महात्माजी के पास आया और उन्हें सारी बात बताई।
महात्माजी ने उसे सुझाव दिया कि अग्रोहा में कोई सरोवर नहीं है। अतः तुम इन रुपयों से एक सरोवर का निर्माण शुरू कर दिया। सरोवर देखकर सारे नगरवासी प्रशंसा करने लगे। लखी ने वहाँ दो चौकीदार नियुक्त कर दिए और आदेश दिया कि इस सरोवर में किसी को जाने न दें।
नगरवासी लखी के पास गए। लखी ने कहा, सरोवर तो सेठ हरभजन शाह का है, वे ही उसको खुलवा सकते हैं। सेठजी तक बात पहुँची तो उन्होंने कहा, एक निताँत असत्य बात है। सरोवर मेरा नहीं है।
सेठजी तत्काल लखी के पास पहुँचे। लखी से कहा, लखी! यह सरोवर तुम्हारा है। तुम्हें इसे जनता के उपयोग के लिए खोल देना चाहिए। लखी बोला, सेठजी अपराध के लिए क्षमा चाहूँगा। आपसे अगले जनम में चुकाने के लिए एक लाख रुपया उधार लिया था। आपको रुपया वापस लौटाना चाहा, तो आपने लेने में असमर्थता दिखाई। उसी रकम से मैंने यह सरोवर बनवाया है। आपकी संपदा हैं, आप ही इसके स्वामी है। सेठजी बात समझ गए। उन्होंने उसी क्षण शेष रुपयों की भरपाई कर दी।
सेठजी ने उस सरोवर का नाम ‘लखी सरोवर’ रखा और कहा, जब तक यह सरोवर रहेगा, लखी के कायाकल्प की कहानी लोगों को प्रेरणा देती रहेगी कि कर्मफल विधान सृष्टि का एक अनिवार्य सच है।
जैव विविधता प्रकृति का अनुपम एवं अद्भुत शृंगार है। वृक्ष-वनस्पति एवं जीव-जन्तु प्रकृति में नूतन प्राण का संचार करते हैं। इन्हीं के कारण पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहता है। प्राकृतिक संतुलन ही प्रकृति को समृद्ध एवं विकसित कर सकता है। सृष्टि के सबसे बुद्धिमान प्राणी मानव पर ही इसके संरक्षण का उत्तरदायित्व था। परंतु दुर्भाग्य से वह रक्षक की जगह भक्षक सिद्ध हुआ। मानव ने अपने तथाकथित आधुनिक विकास की नींव जैव विविधता के विनाश पर रखी। शहरीकरण, औद्योगीकरण आदि मानव उद्यमों से जैव विविधता की विनाश-लीला चल पड़ी और आज संसार के समस्त पादप एवं जीव-जंतु तथा सभी जंगल व वन इससे प्रभावित हैं।
जैव विविधता का विनाशचक्र आधुनिकता के विकास एवं विस्तार के साथ ही प्रारंभ हो गया था। पहले यह दर अपेक्षाकृत बहुत कम थी, लेकिन देखते-देखते इस विनाश में भारी वृद्धि हुई हैं। सन् 16 से 17 के बीच प्रत्येक चार साल में एक प्रजाति विलुप्त हुई थी। इसके पश्चात् सन् 1975 तक मानवी निरंकुशता ने इसमें एक हजार से 1 हजार गुना वृद्धि की है। इस तरह सन् 22 तक इस विनाश की दर प्रति घंटे एक प्रजाति होने की संभावना है। रेड डाका बुक के अनुसार प्राणियों में 35 प्रजातियाँ तथा पादप में 22 प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में है। जैव विविधता का सर्वाधिक विनाश बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही हुआ है।
जैव विविधता का उद्गम एवं आश्रयस्थल वन एवं जंगल होते हैं। वन विनाश के साथ ही इनका अस्तित्व संकट में पड़ जाता है। पश्चिमी एंडियन तलहटी में बसा ‘सेंटेनेला’ जैव विविधता के लिए विश्वप्रसिद्ध घाटी के रूप में विख्यात है। सन् 1978 में जेंड्री और हडसन ने इस सुरम्य और मनोरम घाटी का दौरा किया था। एंडीज पर्वत के दोनों ओर 42 वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल में फैले इस वन में स्पर और सैड्लस वृक्षों की भरमार थी। हडसन के अनुसार यहाँ पर 1 पादप प्रजातियाँ मौजूद थीं। दुर्लभ प्रकार के आर्किड्स एवं इपीफाट्स यहाँ की विशेषता थी। 1983 तक इस वन के 16 प्रतिशत भाग को काटकर कृषि योग्य भूमि में परिवर्तित कर दिया गया। इससे जैव विविधता का व्यापक अवसान हुआ, जिसे ‘सेंटेनलीयन अवसान’ के रूप में जाना गया है। अब तो यहाँ की प्रायः समस्त प्रजातियाँ समाप्त हो गई हैं।
‘सैंटेनेलीयन अवसान’ किसी एक क्षेत्र विशेष का उदाहरण मात्र नहीं हैं, वरन् इसे समस्त विश्व में देखा जा रहा है। पैसीफिक द्वीप में पक्षियों के जीवाश्म का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों स्टार आल्सन, हेलेन जेमेन और डेविड स्टीडमेन के अनुसार यहाँ पर पिछले दस वर्षों में पक्षियों का अत्यधिक विनाश हुआ। इन दस सालों में हुए विनाश का अनुपात पिछले सैकड़ों सालों के बराबर है। इस द्वीप में मॉडर्न पोलीनेषीयन जाति के पूर्वज लापिता जाति के लोग निवास करते हैं। प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए ये लोग 3 वर्ष पूर्व फिजी, टोंगा व सोमाओ में आकर बस गए। बाद में इनका प्रवास हवाई द्वीप में हुआ। तोंगा में 1 वर्ष पूर्व जब ये आदिम जाति पहुँची, तो वहाँ पक्षियों की 25 प्रजातियाँ थीं, परंतु आज केवल आठ प्रजाति ही शेष हैं। न्यूजीलैंड और हैंडरसन के 19 कि.मी. के लंबे मोतियों के द्वीप में भी जैव विविधता का अस्तित्व संकट में हैं।
हवाई द्वीप में 1778 में कैप्टन कुक के प्रथम बार आगमन के समय यहाँ पर 5 प्रकार की प्रजातियाँ थीं दो शताब्दी बाद अब केवल 15 प्रजातियाँ बच पाई हैं। शेष 35 प्रकार के पक्षियों की पहचान जीवाश्म के द्वारा होती है। इसमें दुर्लभ किस्म के गिद्ध, बतख, उल्लू आदि शामिल हैं। मानव की बर्बरता एवं नृशंसता ने इन जीवों पर कहर ढाया है। सेटेंनेलीयन अवसान का परिदृश्य अफ्रीका एवं यूरोपियन देशों में भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उत्तरी अमेरिका में 12, वर्ष पूर्व पेलियो इंडियन शिकारी जाति के लोग रहते थे। इन्होंने वनों को काटना प्रारंभ किया। सभ्यता के विकास ने कृषि एवं शहरों की संख्या में वृद्धि की। इसके परिणामस्वरूप जैव विविधता में गंभीर संकट पैदा हो गया। यहाँ अब तक स्तनधारियों को 76 प्रतिशत जातियाँ लुप्त हो चुकी है। दक्षिण अमेरिका में यह संख्या 7 प्रतिशत को पार कर गई हैं। ये विभिन्न प्रजातियाँ प्लिस्टोसीन के अंतिम काल में बहुतायत में थीं। 12, साल पहले पेलियो इंडियन शिकारी प्रतिवर्ष औसतन 16 किसी, जंगल को काटते चले गए और वर्तमान समय में विद्यमान कोलंबियन, इम्पिरीयल तथा वूली नाम के शिकारी लोगों ने तमाम तरह के दुर्लभ पक्षियों का शिकार कर इन्हें समाप्तप्रायः कर दिया है।
‘द डायर्विसीटी आफ लाइफ’ के लेखक एडवर्ड ओविल्सन की मान्यता है कि जैव विविधता की क्षति प्राकृतिक कारणों की अपेक्षा मानवीय नृशंसता के ही कारण होती है। इन्होंने इसकी पुष्टि के लिए बहुत वर्षों पूर्व के काल को उद्धत किया है। उस समय अमेरिका में क्लेवीस जाति के लोग रहते थे। इन बर्बर जातियों ने शताब्दियों तक वन्य जीवों का सफाया किया है। इसके परिणामस्वरूप अधिकांश जीव समाप्त हो गए। पाल मार्टिन के अनुसार न्यूजीलैंड, मेडागास्कर और आस्ट्रेलिया में भी कानव के विकास के साथ-साथ जैव विविधता का विनाश चक्र प्रारंभ हो गया था।
न्यूजीलैंड में 1 एडी में मनुष्य का पदार्पण हुआ। इस दौरान वहाँ पर बड़ी संख्या में पक्षी थे। इसमें से 13 प्रजातियाँ भारी भरकम थीं। इसमें एक मोआ पक्षी का वजन 23 कि.ग्रा. था। लेकिन 18 ई. में अंग्रेजों ने इस द्वीप के ‘फलोराकाना’ को तहस-नहस कर डाला।
मेडार्गास्कर दुनिया का चौथा सबसे बड़ा द्वीप है। यहाँ पर मानव का विकास लगभग 5 एडी पूर्व हुआ। यह द्वीप भी जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध था। यहाँ पर दुर्लभ किस्म के पक्षी पाए जाते थे। इतिहास प्रसिद्ध ऐपियार्निस के मैक्सीमस नामक पक्षी इसी क्षेत्र का देन है। तीन मीटर ऊँचे इस पक्षी का अंडा फुटबाल जैसा होता था। लेकिन आज अंग्रेजी जीवाश्म ही मिलते हैं। इसी तरह छह से बारह तरह भीमकाय पक्षी आज विलुप्त हो गए।
आस्ट्रेलिया का पूर्वी तट न्यू कैलेडोनिया वन एवं वन्य जीवों के लिए विख्यात है। यहाँ पर 1575 पादप प्रजातियों में से 89 प्रतिशत स्थानीय हैं। फ्रेंच कालोनी के आगमन से यह वन लगभग समाप्तप्रायः हो गया है। अब तो 15 वर्ग कि.मी. यानि कि द्वीप का केवल 9 प्रतिशत भाग ही शेष है। दक्षिणी पश्चिमी आस्ट्रेलिया में 366 प्रकार के पादप पाए जाते हैं। इसमें से 78 प्रतिशत स्थानीय हैं। इसकी एक-चौथाई प्रजातियाँ आज खतरे में हैं। इस प्रकार विश्व के प्रमुख वनों में पाए जाने वाली जैव विविधता के सर्वेक्षण से स्पष्ट होता है कि ये सभी खतरे में हैं।
पश्चिमी इक्वेडोर भी कोलंबिया के समान समृद्ध संपन्न रहा है। एंडीज के पश्चिम में स्थित यह घाटी लगभग 1 पादप प्रजातियों से भरी-पूरी है। यह घाटी आर्किड एवं इपीफाइट्स से समृद्ध है। डेनियल जैनेन ने इसे ‘जीवित मृत घाटी’ की संज्ञा दी है। पश्चिमी अमेजन की घाटियाँ भी जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध हैं। यह दक्षिण कोलंबिया से बोलिविया तक 5 मीटर चौड़ी व 15 मीटर ऊँची तथा 5 कि.मी. तक फैली है। इसकी विशेषता कोलंबिया व इक्वेडोर के समान है। पिछले चालीस वर्षों में यहाँ की जनसंख्या 45 से तीन लाख तक पहुँच गई है। यदि इसी दर से जनसंख्या बढ़ती गई, तो 9 प्रतिशत जीव एवं वनस्पति अपने आप समाप्त हो जाएंगे।
ब्राजील का अटलाँटिक तट सुरम्य वन के रूप में जाना जाता है। सन् 1832 में चार्ल्स डार्विन इस वन को देखकर बहुत प्रभावित हुए थे। लाखों वर्ग कि.मी. में फैला यह अटलाँटिक वन सचमुच ही धरती का वरदान था। परंतु मानवी नृशंसता एवं बर्बरता ने इसके 9 प्रतिशत भाग को समाप्त कर दिया है। केवल 5 प्रतिशत भाग में जैव विविधता अपनी अंतिम सांसें गिन रही हैं। दक्षिण पश्चिमी आखोरी तट के वन का क्षेत्रफल 1,6, वर्ग कि.मी. में फैला है। यह वन प्रतिवर्ष 2, कि.मी. की दर से कटता रहा। अब केवल 16, वर्ग कि.मी. में ही सीमित रह गया है। प्राकृतिक वनस्पतियों का यह निवास अब अवसान के गर्त में हैं। दक्षिण अफ्रीका का जंगल 89 वर्ग कि.मी. में फैला था। इस वन में 86 पादप प्रजातियाँ पाई जाती थीं। इसमें 73 प्रतिशत स्थानीय हैं। आधुनिक मानव ने इसमें से 26 प्रजातियों को नष्ट कर डाला हैं एवं 15 को अस्तित्व संकट में झोंक दिया है। इसे दक्षिण अफ्रीका की प्राकृतिक विरासत माना जाता है।
श्रीलंका भी जैव विविधता का अच्छा उदाहरण हैं, परंतु यहाँ वन की कटाई प्रतिवर्ष 26 व्यक्ति प्रति कि.मी. की दर से बढ़ रही है। अतः केवल 1 प्रतिशत मूल व नहीं शेष हैं। मलेशिया में 85 प्रकार के पादप पाए जाते हैं। सन् 198 के बाद यह भी गंभीर संकट से गुजर रहा है। इसका आधा भाग अर्थात् 425 प्रजातियाँ खतरे में हैं। फिलीपींस के वनों में भी 71 वृक्ष-वनस्पतियों की प्रजातियाँ मिलती है। आज के आधुनिकीकरण ने वन विनाश किया है। अमेरिका में 2, पौधों में से 213 से 228 प्रजातियाँ लुप्त हो चुकी हैं। सन् 2 के अंत तक इसकी 68 किस्मों के और समाप्त हो जाने के आसार बढ़ गए हैं। जर्मनी, आस्ट्रिया एवं हालैंड में भी पिछले साठ वर्षों में 4 से 5 प्रतिशत फंजाई समाप्त हो चुके हैं। इसके लिए औद्योगिक क्षेत्रों से निकलते हुए धुएँ को जिम्मेदार माना गया है।
इसी तरह मैक्सिको में कठफोड़वा पक्षी का लगभग सफाया हो गया है। अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको में 133 प्रकार की मछलियाँ पाई जाती थीं। पिछले सौ वर्षों में 27 किस्म की (3 प्रतिशत) मछलियाँ विलुप्त हो गई हैं एवं 265 या 27 प्रतिशत मछलियाँ संकट से गुजर रही हैं। मीठे जल की 2 प्रतिशत मछलियाँ या तो समाप्त हो चुकी हैं या समाप्ति के कगार पर है।
यही नहीं पिछले दो हजार वर्षों में विश्व में कुल पक्षियों का पाँचवाँ भाग समाप्त हो गया है। 11 प्रजातियों में केवल 14 प्रजातियाँ ही शेष हैं। इसमें भी 11 प्रतिशत या 129 खतरे में हैं। सोलोमन द्वीप में 164 प्रकार के पक्षी हैं। सन् 1953 के पश्चात् इनमें से 12 का तो निशान तक नहीं है। मध्य अटलाँटिक अमेरिका में सन् 194 से 8 के बीच प्रवासी पक्षियों में 5 प्रतिशत की कमी आई हैं।
इस तरह देखा जाए, तो समस्त विश्व जैव विविधता के आसन्न संकट से जूझ रहा है। इसका एकमात्र कारण हैं, मानवीय बर्बरता, नृशंसता एवं स्वार्थ। जारेड डायमंड के अनुसार मानवी विकास के साथ जहाँ प्रकृति को समृद्ध करने का प्रयास किया जाना चाहिए था, वहीं मानव ने इसका विनाश करना प्रारंभ कर दिया। अब तो यही प्रचलन बन चुका है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का संदेश देने वाले अपने देश में वन एवं वन्य जीवों को अपनी संस्कृति का अंग माना जाता रहा है। परंतु इस भाव के तिरोहित होते ही यहाँ भी वही विनाश का परिदृश्य है। सादगी भरे जीवन का विस्तार एवं मानवी सहिष्णुता ही इस विनाश लीला को रोक सकता है। मनुष्य, प्रकृति एवं जीवों में संतुलन बना रहे, तभी हम सुखी रह सकते हैं।
ईश्वरचंद्र विद्यासागर तब किशोरावस्था में ही थे। उदारतापूर्वक बाँटते रहने की भावना का बचपन से ही उनके हृदय में स्थान था, पर उसे पोषण मिला वात्सल्यमयी माँ से कहा, “यह फीस के पैसे न होने कारण परीक्षा नहीं दे पा रहे हैं। क्या हम इनकी कुछ मदद कर सकते हैं।” माँ ने तुरंत अपना मंगलसूत्र निकाल कर दे दिया, उसे गिरवी रखकर फीस की व्यवस्था की गई। छात्र परीक्षा में बैठा, उत्तीर्ण हुआ। गिरवी रखा मंगलसूत्र लाकर उसने ईश्वरचंद्र की माँ के चरणों में रखा। ममता भरी डाँट लगाते हुए वे बोलीं, “बेटा! इसका नाम ही मंगलसूत्र है। इसलिये मंगल प्रयोजन में काम आ गया। तू इसे रख, बेचकर आगे की पढ़ाई की व्यवस्था बना।”
येषाँ न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणों न धर्मः। ते मृत्युलोके भुवि भारभूता मनुष्यरुपेण मृगाष्चरन्ति॥ −भर्तृहरि नीतिषतक
जिन्होंने तप नहीं किया, विद्या नहीं पढ़ी, दान नहीं दिया एवं ज्ञान, शील, गुण और धर्म का अभ्यास नहीं किया, वे मनुष्य मृत्युलोक में पृथ्वी के लिए भारभूत हैं और मनुष्य के रूप में विचरते हुए भी साक्षात् पशु हैं।
यमराज द्वारा नचिकेता की निष्ठा पर प्रसन्न होकर तीन वर दिए गए। उन्होंने मृत्यु भय से मुक्त होने के स्थान पर पिता के क्रोध की शांति का पहला वर माँगा। परलोक के लिए स्वर्ग के साधन रूप अग्नि विज्ञान का दूसरा वर प्राप्त करके उसने तीसरा वर आत्मा के यथार्थ स्वरूप और उसकी प्राप्ति का उपाय जानना चाहा। यमराज द्वारा वचनबद्ध होते हुए भी तीसरे वर का उसे पात्र न मानने के कारण आत्मतत्व तथा आत्मा के मरणोपराँत अस्तित्व संबंधी अनुभूत ज्ञान के अतिरिक्त उसने कुछ न माँगा।
चयन की स्वतंत्रता सामने होते हुए भी नचिकेता ने सुखोपभोग, मुक्ति, पुनरुज्जीवन जैसे लाभ एक ओर होते हुए भी ब्रह्मविद्या व आत्मविद्या के ज्ञान को जानने की प्राथमिकता दी। पंचाग्नि विद्या को आत्मसात् कर साधना पथ का मार्गदर्शन मानव मात्र के लिए कर सकने में वे सफल हुए। ऐसे सौभाग्यशाली बिरले ही होते हैं।
स्मरण शक्ति की कमी की शिकायत वृद्ध ही नहीं, युवा व्यक्ति भी करते पाए जाते हैं। इस कमी से वे परीक्षा में उत्तीर्ण होने से लेकर व्यावसायिक तथा दैनिक कामकाजों में बड़ी अड़चन अनुभव करते हैं। बहुधा इसे कोई रोग मान लिया जाता है और उसके निवारण के लिए तरह-तरह के औषधि उपचारों तथा पुष्टाई सेवन का सिलसिला चलता है।
उपचार करने से पूर्व विस्मृति का कारण जानने की आवश्यकता है, साथ ही यह समझना भी उपयोगी है कि मस्तिष्क में स्मृति को संग्रह करने वाली, सुरक्षित रखने वाली संरचना कैसी है? मोटर की मशीन और उसके चलाने की विधि ठीक तरह समझ ली जाए, तो उसके संचालन में जो व्यवधान आते हैं, उनमें से अधिकांश का निवारण सहज ही हो जाता है।
स्मरण शक्ति प्रायः अपने स्थान पर यथावत् रहती है। बचपन के प्रारंभिक और वृद्धावस्था के अंतिम दिनों को छोड़कर शेष प्रौढ़-परिपक्वावस्था में स्मृति का स्तर प्रायः समान ही रहता है। स्मरण रखने की प्रक्रिया में अंतर पड़ जाने से हमें उसकी मात्रा घट-बढ़ जाने का भ्रम होने लगता है। यदि स्मरण रखने की पद्धति का ज्ञान हो और स्मरण तंत्र की संरचना ध्यान में रखते हुए तदनुरूप घटनाओं को स्मरण रखने की विधि-व्यवस्था बना ली जाए, तो फिर स्मृति संबंधी उतनी शिकायत न रहे जैसी आमतौर से रहती हैं। यों हर मनुष्य में दूसरों की अपेक्षा कुछ-न-कुछ तो न्यूनाधिकता हर बात में रहती ही है।
समझा जाता है कि बचपन में स्मरण शक्ति तीव्र होती है और पीछे आयु बढ़ने के साथ-साथ मंद होती जाती हैं, पर वस्तुतः बात ऐसी है नहीं। छोटी आयु में मस्तिष्क के ऊपर बोझ कम रहता है और जो सोचना, याद रखना हैं, वह आसानी से निपट जाता है, किंतु बड़े होने के साथ-साथ कार्यक्षेत्र बढ़ता जाता है, साथ ही स्मरण रखने, निष्कर्ष निकालने, निर्णय करने का भार भी। ऐसी दशा में बहुत काम करते रहने पर भी कुछ में अधूरापन रह जाना अप्रत्याशित नहीं। जो कुछ सही रीति से पूरा हो गया, उसकी ओर तो ध्यान दिया नहीं गया, पर जो कमी रह गई, उसी को मस्तिष्क की कमजोरी या स्मरण शक्ति की कमी मान लिया गया। ऐसे ही प्रसंगों को लेकर दिमागी शक्ति घट जाने की बात सोच ली जाती है और चिंता होने लगती हैं, जबकि वस्तुतः वैसा कुछ होता नहीं।
विस्मृति का बहुत बड़ा कारण हैं, उपेक्षा। जिस वस्तु, बात या संदर्भ में अन्यमनस्कता होती हैं, वहाँ उथला ध्यान दिया जाता है और स्मृति की परतों पर अंकन बहुत ही हलका-धुँधला हो पाता है। उसके मिटने में देर नहीं लगती। इसके विपरीत जिन प्रसंगों में अपनी दिलचस्पी होती हैं, उन्हें ध्यानपूर्वक सुना, देखा और समझा जाता है, फलतः उनके मानस चित्र अधिक स्पष्ट बनते हैं और स्मृतिपटल पर उसका अंकन इतना गहरा हो जाता है कि आवश्यकतानुसार उसे फिर पूर्ववत् देखा जा सकें। यों समय बीतने के साथ-साथ सभी स्मृतियाँ धुँधली पड़ती जाती हैं, फिर भी जिन्हें मनोयोगपूर्वक अपनाया गया हैं, उसकी रेखाएं अमिट न सही, चिरस्थायी तो बनी ही रहती हैं।
विद्यार्थियों को पाठ याद न होने की अक्सर शिकायत रहती हैं, पर वे ही किसी देखी फिल्म का पूरा कथानक भलीप्रकार सुना देते हैं और साथ ही उसके गीत भी याद रखते हैं। दादी अपनी पोती का नाम बार-बार भूल जाती हैं, पर अपने पति या ससुर की श्राद्ध तिथि नहीं भूलती। व्रत-उपवास की तिथियाँ भी विस्मरण नहीं होती। सामान्य प्रसंगों में तारीखें याद नहीं रहतीं, पर वेतन पाने की तारीखें भूलने में कदाचित् ही किसी से कभी भूल होती होगी। भुलक्कड़पन वस्तुतः कोई रोग नहीं, वरन् आदत हैं, जो दिलचस्पी की कमी वाले क्षेत्रों को ही प्रभावित करती हैं।
भगवान् ने स्मृति की ही तरह विस्मृति को भी एक वरदान की तरह सृजा है। उपयोगी बाते याद रखें और आवश्यकता के समय सहायक बनें, यह उत्तम है। इसी प्रकार यह भी ठीक है कि द्वेष-दुर्भाव और शोक-संताप की कटु स्मृतियाँ धुंधली होते-होते विस्मरण स्तर तक जा पहुँचें। क्रोध, हानि, वियोग आदि की स्थिति में मन जितना उद्विग्न होता है, यदि उतना ही संताप बना रहे, तो जीवन कठिन हो जाए। मस्तिष्क में करोड़ ग्रंथों के समा सकने जितना स्मृति क्षेत्र हैं, पर क्षण-क्षण में जो विविध जानकारियाँ मस्तिष्क को मिलती रहती हैं, उनका विस्तार तो स्मृति क्षेत्र की तुलना में बहुत अधिक है। ऐसी दशा में पुरानों को हटाकर ही नयों को जगह मिल सकती है। रेलगाड़ी के मुसाफिरखानों में बैठे यात्री यदि वहाँ जम बैठें, तो नए आगंतुकों को जगह कहाँ मिलेगी?
स्मृति और मस्तिष्क का तारतम्य समझने के लिए हमें यह भी जानना चाहिए कि ज्ञानेंद्रिय की सहायता से मस्तिष्क को अनेकों प्रकार की जानकारियाँ हर घड़ी प्राप्त होती रहती हैं। इसमें अधिकांश वे होती हैं, जो स्थिति का परिचय देकर अपना काम समाप्त कर देती हैं। उस जानकारी का यदि कुछ सीधा प्रभाव अपने ऊपर नहीं पड़ता है और उसकी कुछ प्रतिक्रिया नहीं होती हैं, तो वे विस्मृति की, रद्दी की टोकरी में जा पड़ती हैं और सदा के लिए समाप्त हो जाती हैं। कुछ जानकारियाँ ऐसी हैं, जिनसे निपटना हैं, तो शरीर के अन्य कल-पुर्जों को वैसा आदेश मिलता है और तदानुसार हलचल होती हैं, जैसे पैर में मच्छर काटे, तो मस्तिष्क उसके निवारण के लिए हाथ को आज्ञा देता है और वह तत्काल उस स्थान पर पहुँचकर मच्छर पर आक्रमण करता है। ऐसी जानकारियाँ जली हुई दियासलाई की तरह अपना सामयिक प्रयोजन पूरा करके विस्मृति के गर्त में चली जाती हैं। संग्रह तो थोड़ी-सी ही की जा सकती हैं। मस्तिष्क में इतनी जगह नहीं है कि हर घड़ी इंद्रियों की सहायता से जो ज्ञान प्राप्त होता है, उनमें से सभी को अर्जित किया जा सके, तो भी जो महत्वपूर्ण हैं, उसे सुरक्षित रखे जाने की इस छोटे किंतु सुविस्तृत भंडार में पर्याप्त जगह हैं।
मस्तिष्क विज्ञानी स्मरण शक्ति का आधार उस विद्युत् धारा को मानते हैं, जो संवादवाहिनी तंत्रिकाओं में गतिशील रहती हैं। न केवल स्मृतियों का अंकन और पुनर्जागरण, वरन् मस्तिष्कीय संरचना को अपना काम ठीक तरह करने योग्य बनाए रहने में भी इसी विद्युत् धारा की प्रधान भूमिका रहती है। विज्ञान के छात्र आवर्तनशील विद्युत् रिवर्वरेटिंग सर्किट की क्रिया-प्रक्रिया से परिचित होते हैं। नाड़ियों में रक्त परिभ्रमण की तरह कुछ विद्युत् धारा भी अपने कार्यक्षेत्र में गतिशील रहती हैं। इस गतिचक्र में कितना विद्युत् आवेश और परिभ्रमण की तरह कुछ विद्युत् धारा भी अपने कार्यक्षेत्र में गतिशील रहती हैं। इस गतिचक्र में कितना विद्युत् आवेश और परिभ्रमण में कितनी गतिशीलता है, इन दोनों बातों पर यह निर्भर हैं कि स्मृतियों का स्थापन कितने समय तक और किस सीमा तक बना रहेगा। यह विद्युत् स्वसंचालित और स्वनिर्मित होती है। मस्तिष्कीय तंत्रिकाओं की संरचना में सोडियम और पोटेशियम के आयन काम करते हैं। उनमें उथल-पुथल शरीर के अन्य अवयवों की भाँति होती रहती हैं। उसी सहज हलचल से मस्तिष्कीय विद्युत् धारा उत्पन्न होती और अपना काम करती है। यह झीनी तो होती जाती हैं, पर पूर्णतया अंत उसका तब तक नहीं होता, जब तक कि जीवसत्ता का ही पूरी तरह अंत न हो जाए।
मस्तिष्क या शारीरिक अवयव माना जाता रहा हैं, पर जीव चेतना का केंद्र संस्थान यही है। जड़ और चेतन का संगम इसी को माना जाता है। शरीर न रहने पर भी मस्तिष्क का सार तत्व जीव चेतना के साथ लिपटा रहता है। मरणोत्तर काल में भी उसकी सत्ता बनी रहती है। ऐसा कहा जाता है कि भूत-प्रेतों को परित्यक्त शरीर के साथ संबंधित घटनाएँ स्मरण बनी रहती है और वे उस भूत चिंतन के आधार पर ही अपना समय गुजारते हैं। वर्तमान और भविष्य के लिए उपर्युक्त साधन उनके पास उस स्थिति में नहीं होते, अस्तु भूतकालीन स्मृतियों का दबाव ही उन पर छाया रहता है। संभवतः मृतात्माओं का नामकरण ‘भूत’ इसी आधार पर किया गया हो। पुनर्जन्म में कइयों को कितनी ही घटनाएँ पिछले जीवन की याद रहती हैं और ऐसे कथन बहुत बार आश्चर्यजनक रीति से सत्य पाए जाते हैं। इतना तो हर किसी के साथ होता है कि भूतकाल के अनुभव एवं संस्कार जन्म-जन्माँतरों तक चले जाते हैं। जन्मजात विशेषताओं को ऐसा परिचय भी बहुत परिस्थितियों के साथ कुछ भी तालमेल नहीं बैठता। पूर्व जन्मों की संग्रहीत पूँजी मस्तिष्क के बही-खाते में जमा रहती हैं और अपने अस्तित्व के प्रभाव का परिचय नए जन्म में भी देती रहती हैं।
ईंधन न मिलने पर चूल्हा ठंडा पड़ जाता है। मस्तिष्कीय कोशिकाओं को भी अपना काम सही रीति से करते रहने के लिए ऑक्सीजन का ईंधन चाहिए। बचपन में नई मशीन इस ईंधन को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध और वितरित करती है। तब मस्तिष्क को भी यह खुराक पर्याप्त मात्रा में मिलती है और बच्चों की स्मरण शक्ति तीव्र रहती है। वे अपने पाठ आसानी से याद कर लेते हैं। जैसे-जैसे आयु बढ़ती हैं, वैसे-वैसे कोमलता घटती है और कठोरता बढ़ती हैं, फलतः ऑक्सीजन का उत्पादन-वितरण घटता जाता है। अवयवों में जो कोमलता बचपन अथवा किशोरावस्था में होती हैं, वह आयु बढ़ने के साथ घटती जाती हैं। ऑक्सीजन प्रवाह के मस्तिष्कीय कोषाओं तक पूरी तरह पहुँचने में भी व्यवधान उत्पन्न होता है, फलतः उम्र के साथ-साथ स्मरण शक्ति घटती चली जाती है। बुद्धिमत्ता समस्त स्मृतियों के मंथन को निष्कर्ष हैं। उसकी मात्रा तो बढ़ती हैं, पर स्मरण शक्ति के संदर्भ में बच्चों की स्थिति की अपेक्षा बड़ी आयुष्य वाले कमजोर ही पड़ते हैं। वृद्धावस्था में रक्त-वाहिनियाँ कठोर पड़ जाती हैं और रक्त-संचार उतनी अच्छी तरह नहीं हो पाता, फलतः मस्तिष्कीय कोशाएं पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन न मिलने के कारण दुर्बल होती जाती हैं। अतः बूढ़े लोगों की स्मृति दिन-दिन क्षीण होती जाती है। प्रायः वे अपने दैनिक उपयोग की वस्तुएँ तक जहाँ-तहाँ भूलने लगते हैं। परिचितों के नाम तक याद नहीं रहते।
इतने पर भी देखा गया हैं कि बूढ़ों को भी अपने बचपन या युवावस्था की वे स्मृतियाँ बिल्कुल तरोताजा रहती हैं, जिन्हें वे महत्वपूर्ण समझते रहते हैं। देखा गया है कि वे अपनी इन स्मृतियों को आए दिन किसी-न-किसी को सुनाते रहते हैं। उन्हें वह सब कुछ इस प्रकार याद रहता है, मानो अभी कल-परसों की बात हो। ऐसा इसलिए भी होता है कि नई स्मृतियाँ समुचित ऑक्सीजन के अभाव में न तो मस्तिष्कीय कोषाओं पर पूरी तरह अंकित हो पाती हैं और न उनमें स्थायित्व होता है। ऐसी दशा में नई स्मृतियों की भीड़-भाड़ रहती नहीं और वे पुरानी अनुभूतियाँ निर्द्वंद्व होकर पूरे मस्तिष्क पर छाई रहती हैं।
मस्तिष्कीय गतिविधियों की प्रत्यक्ष जानकारी को देखते हुए उसे किसी अलौकिक कलाकार की अद्भुत संरचना कहा जा सकता है। वैसा कुछ बना सकने की बात सोचने का साहस ही कौन करेगा। अभी तो उसकी गतिविधियों को समझ सकने में ही बुद्धि हतप्रभ रह जाती है। अनुमान है कि विदित मस्तिष्कीय गतिविधियाँ बहुत स्वल्प हैं। समूची मानसिक क्षमताओं का प्रायः सात प्रतिशत ही क्रियाशील पाया जाता है। शेष तो अभी अविदित-अर्द्धमूर्च्छित स्थिति में ही सीलबंद स्टोर की तरह सुरक्षित पड़ी हैं। जो क्रियाशील हैं, वे उस प्रयोजन में काम आती हैं, जिसमें सामान्य जीवन की निर्वाह व्यवस्था का संचालन होता है। निर्वाह प्रयोजन तो समग्र जीव सत्ता का एक छोटा-सा अंश हैं। इसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ सोचने और करने को बच जाता है। कभी किसी को उस अविज्ञात को जानने की, निष्क्रिय को क्रियाशील बनाने की और प्रसुप्त को जाग्रत् करने की आवश्यकता पड़ें, तो उसे इन सीलबंद स्टोरों को खोलना पड़ेगा, जो अपने भीतर बढ़ी-चढ़ी दिव्य क्षमताएँ छिपाए हुए हैं। उच्च अध्यात्म प्रयोजनों के लिए इन्हीं कोष्ठकों को खोलने और उनसे उपलब्ध क्षमता को असाधारण कार्यों में लगाने का प्रयत्न योगी तपस्वियों द्वारा किया जाता है।
स्मृति-विस्मृति की चर्चा करने की अपेक्षा जागृति और सुषुप्ति के आधार पर विवेचन करना अधिक युक्तियुक्त है। असावधानी, उपेक्षा और अनुत्साह की मनः स्थिति रहेगी, तो विस्मृति की शिकायत बनी ही रहेगी। जहाँ ऐसी कठिनाई अनुभव होती हो, वहाँ मानसिक पोषण देने वाले आहार का परामर्श देना कोई विसंगति नहीं हैं, पर अधिक उपयुक्त यह है कि चिंतन तंत्र पर छाई हुई शिथिलता को दूर किया जाए। इसके लिए ध्यान-धारणा के सभी उपचार न्यूनाधिक मात्रा में लाभदायक ही सिद्ध होते हैं। उपासना में ध्यान-धारणा पर जोर देने के अनेक शारीरिक-अध्यात्मिक लाभों के अतिरिक्त एक अतिरिक्त लाभ यह भी हैं कि उसे करते रहने पर विस्मृति की शिकायत पनपने नहीं पाती।
विज्ञान बाहर की प्रगति हैं और ज्ञान अंतः की अनुभूति
एक व्यक्ति को महात्मा जी के आशीर्वाद से सात दिन के लिए पारस पत्थर तो मिल गया, पर अब वह व्यक्ति सस्ते लोहे की तलाश में शहर-शहर भटकने लगा। एक जगह नहीं मिला, तो दूसरी जगह दौड़ा। इसी दौड़-धूप में सारा समय गुजर गया और वह रत्तीभर भी सोना न बना सका। सातवें दिन महात्मा ने मणि वापस ले ली।
यह जीवन भी पारसमणि हैं। जो इसे आत्मिक संपदा में बदलना चाहता है वह अवसर नहीं गंवाता। आकर्षणों में भटककर समय नष्ट नहीं करता। आत्मावलंबनजन्य विभूतियाँ उसे जो संतोष-परितृप्ति देती हैं, उनकी तुलना में उसे सारा वैभव अर्थहीन नजर आता है।
प्राचीनकाल में आरोग्य संवर्द्धन एवं रोग निवारण के लिए ‘भैषज्ञ’ यज्ञ किए जाते थे और लोग उनसे लाभ प्राप्त करते थे। ये यज्ञ ऋतुओं के संधिकाल में होते थे, क्योंकि इसी समय व्यापक स्तर पर व्याधियों का प्रकोप होता था। इन यज्ञों की विशेषता होती हैं कि इनमें होमी गई हवन सामग्री वायुभूत होकर न केवल शारीरिक व्याधियाँ दूर करती हैं, वरन् इसके प्रभाव से व्यक्ति मानसिक बीमारियों एवं मनोविकृतियों से भी छुटकारा पा लेता है। कषाय-कल्मष कटते हैं और व्यक्तियों में सत्प्रवृत्तियों को भर देने वाले उभार उमगते हैं। समग्र व्यक्तित्व-विकास में इससे अपूर्व सहायता मिलती है।
इसे विडंबना ही कहना चाहिए कि आज की समस्त चिकित्सापद्धतियाँ मात्र शारीरिक रोगों तक ही अपने आपको सीमित किए हुए हैं, जबकि मस्तिष्कीय उपचार की आवश्यकता शारीरोपचार से भी अधिक है। इन दिनों मनोविकारों, मानसिक रोगों की भरमार शारीरिक व्याधियों से कहीं अधिक है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आज नब्बे प्रतिशत व्यक्तियों को तनाव, दबाव, अवसाद, अनिद्रा, चिंता, आवेश, क्रोध, उत्तेजना, मिरगी, उन्माद, सनक, निराशा, उदासीनता, आशंका, अविश्वास, भय, असंतुलन आदि में से किसी-न-किसी मनोव्याधि से ग्रस्त देखा जाता है। इन विकारों से व्यक्तित्व टूट जाता है। संतुलित एवं विवेकशील व्यक्तित्व विरले ही दिखाई देते हैं।
व्यक्तित्व संबंधी इन विकृतियों का निदान यज्ञ चिकित्सा में सन्निहित है। यहाँ तक कि यदि कोई व्यक्ति उन्मत्त या पागल हो जाए और प्रलाप करने लगे, तो उस स्थिति में भी वह यज्ञ चिकित्सा से स्वस्थ हो सकता है। यज्ञाग्नि में हवन की हुई औषधियों की सुवासित ऊर्जा उसके विकृत मस्तिष्क और उत्तेजित मन को ठीक कर सकती है। इसका प्रमुख कारण यह है कि यज्ञ में सुगंधित औषधियाँ होमी जाती हैं, उससे जो ऊर्जा निस्सृत होती हैं, वह हलकी होने के कारण ऊपर को उठती है। जब यह नासिका द्वारा अंदर खींची जाती हैं, तो सर्वप्रथम मस्तिष्क, तदुपराँत फेफड़ों में फिर सारे शरीर में फैलती है। उसके साथ औषधियों के जो अत्यंत उपयोगी सुगंधित सूक्ष्म अंश होते हैं, वे मस्तिष्क के उन क्षेत्रों तक जा पहुँचते हैं, जहाँ अन्य उपायों से उस संस्थान का स्पर्श तक नहीं किया जा सकता। अचेतन की पवन परतों तक यज्ञीय ऊर्जा की पहुँच होती हैं और वहाँ जड़ जमाए हुए मनोविकारों, बीमारियों को निकाल बाहर करने में सफलता मिलती है।
यज्ञ चिकित्सा को घरेलू उपचार भी कह सकते हैं। इससे शारीरिक एवं मानसिक आधि-व्याधियों का निराकरण होता तथा दोनों ही क्षेत्रों की क्षमता में अभिवृद्धि होती है। इस संदर्भ में ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान द्वारा जो विविध प्रयोग-परीक्षण किए गए हैं, उनमें शोधकर्मियों को आशातीत सफलता मिली है। इस शृंखला में मानसिक रोगों, मनोविकृतियों पर यज्ञोपचार के जो विशेष परीक्षण हुए हैं, उसके सार-निष्कर्ष यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
चंद्रमा का मन से सीधा संबंध है। अतः मानसिक रोगों, मनोविकृतियों, मन में संचित विषों आदि उष्णताओं का शमन चंद्र गायत्री से होता है। अंतरात्मा की शांति, चित्त की एकाग्रता, पारिवारिक क्लेश, द्वेष, वैमनस्य, मानसिक उत्तेजना, क्रोध, अंतर्कलह आदि को शांत करके शीतल मधुर संबंध उत्पन्न करने के लिए भी चंद्र गायत्री विशेष लाभप्रद होती है।
चंद्र गायत्री का मंत्र इस प्रकार है-
ॐ भूर्भुवः स्वः क्षीर पुत्राय विऽहे, अमृत तत्वाय धीमहि तन्नः चंद्रः प्रचोदयात्।
इस मंत्र द्वारा रोगानुसार विशेष प्रकार से तैयार की गई हवन सामग्री से नित्यप्रति कम-से-कम चौबीस बार हवन करने एवं संबंधित सामग्री के सूक्ष्म कपड़छन पाउडर को सुबह-शाम लेते रहने से शीघ्र ही मनोविकृतियों से छुटकारा मिल जाता है। हवन करने वाले का चित्त स्थिर और शांत हो जाता है। मानसिक दाह, उद्वेग, तनाव आदि विकृतियाँ उसके पास फटकती तक नहीं।
सर्वप्रथम मस्तिष्क रोग की सर्वमान्य विशेष हवन सामग्री यहाँ दी जा रही है। इसके साथ ही पूर्व लिखित हवन सामग्री (नं 1) को भी बराबर मात्रा में मिलाकर तब हवन करना चाहिए। विस्तृत विवरण अखण्ड ज्योति के फरवरी अंक 12 में पृष्ठ सं. 42-43 पर देखा जा सकता है। (नं. 1) हवन सामग्री में जो वनौषधियाँ बराबर मात्रा में मिलाई जाती हैं, वे हैं, अगर, तगर, देवदार, चंदन, लाल चंदन, जायफल, लौंग, गुग्गल, चिरायता, गिलोय एवं असगंध।
(1) मस्तिष्क रोगों की विशेष हवन सामग्री-
(1) देशी बेर का गूदा (पल्प) (2) मौलश्री की छाल (3) पीपल की कोपलें (4) इमली के बीजों की गिरी (5) काकजंघा (6) बरगद के फल (7) खरैटी (बीजबंद) बीज (8) गिलोय (9) गोरखमुँडी (10) शंखपुष्पी (11) मालकंगनी (ज्योतिष्मती) (12) ब्राह्मी (13) मीठी बच (14) षतावर (15) जटामाँसी, (16) सर्पगंधा।
इन सभी सोलह चीजों के जौकुट पाउडर को हवन सामग्री के रूप में प्रयुक्त करने के साथ ही सभी चीजों को मिलाकर सूक्ष्मीकृत चूर्ण को एक चम्मच सुबह एवं एक चम्मच शाम को घी-शक्कर या जल के साथ रोगी व्यक्ति को नित्य खिलाते रहना चाहिए।
मस्तिष्कीय रोगों में समिधाओं का भी अपना विशेष महत्व है। अतः जहाँ तक संभव हो क्षीर एवं सुगंधित वृक्ष अर्थात् वट, पीपल, गूलर, बेल, चंदन, देवदार, खैर, शमी का प्रयोग करना चाहिए। चंद्रमा की समिधा-पलाश है। यदि यह मिल सके, तो सर्वश्रेष्ठ समझना चाहिए। उद्विग्न-उत्तेजित मन-मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करने में उससे पर्याप्त सहायता मिलती है।
(2) तनाव ‘स्ट्रेस’ एवं हाइपर टेन्शन की विशेष हवन सामग्री-
तनाव से छुटकारा पाने के लिए निम्नलिखित अनुपात में औषधियों की जौकुट सामग्री मिलाई जाती है-
(1) ब्राह्मी-1 ग्राम, (2) शंखपुष्पी-1 ग्राम, (3) शतावर-1 ग्राम, (4) सर्पगंधा-1 ग्राम, (5) गोरखमुँडी-1 ग्राम, (6) मालकाँगनी-1 ग्राम, (7) मौलश्री छाल-1 ग्राम, (8) गिलोय-1 ग्राम, (9) सुगंध कोकिला-1 ग्राम, (1) नागरमोथा-2 ग्राम, (11) घुड़बच-5 ग्राम, (12) मीठी बच-5 ग्राम, (13) तिल-1 ग्राम, (14) जौ-1 ग्राम, (15) चावल-1 ग्राम, (16) घी 1 ग्राम, (17) खंडसारी गुड़-5 ग्राम, (18) जलकुँभी (पिस्टिया)-1 ग्राम।
इस प्रकार से तैयार की गई विशेष हवन सामग्री से चंद्र गायत्री मंत्र के साथ हवन करने से तनाव एवं उससे उत्पन्न अनेकों बीमारियाँ तथा हाइपरटेंशन से प्रयोक्ता को शीघ्र लाभ मिलता है। यहाँ इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि उक्त सामग्री में क्रमाँक (1) अर्थात् ब्राह्मी से लेकर क्रमाँक (12) अर्थात् मीठी बच तक की औषधियों का महीन बारीक पिसा एवं कपड़े द्वारा छना हुआ चूर्ण सम्मिश्रित रूप से एक-एक चम्मच सुबह एवं शाम को जल या दूध के साथ रोगी को सेवन कराते रहना चाहिए।
(3) दबाव-अवसाद-’डिप्रेशन’ आदि मानसिक रोगों की विशेष हवन सामग्री-
(1) अकरकरा, (2) मालकाँगनी, (ज्योतिष्मती) (3) विमूर (4) मीठी बच, (5) घुड़बच, (6) जटामाँसी, (7) नागरमोथा, (8) गिलोय, (9) तेजपत्र, (1) सुगंध कोकिला, (11) जौ, तिल, चावल, घी, खंडसारी गुड़।
उक्त औषधियों से तैयार हवन सामग्री से हवन करने के साथ ही (नं 1) से (नं 1) तक की औषधियों का बारीक पिसा हुआ चूर्ण रोगी को सुबह शाम एक-एक चम्मच जल या दूध के साथ नित्य खिलाते रहने से शीघ्र लाभ मिलता है। इसके साथ ही डिप्रेशन या दबाव से पीड़ित व्यक्ति को शीघ्र स्वस्थ एवं सामान्य स्थिति में लाने के लिए यह आवश्यक है कि उसके मन के अनुकूल बातें की जाएँ।
(4) मिर्गी-अपस्मार या ‘फिट्स’ की विशेष हवन सामग्री-
मिर्गी एवं इससे संबंधित रोगों पर निम्नलिखित औषधियों से बनाई गई हवन सामग्री से यजन करने पर यह रोग समूल नष्ट हो जाता है।
(1) छोटी इलायची, (2) अपामार्ग के बीज, (3) अश्वगंधा, (4) नागरमोथा, (5) गुरुचि, (6) जटामाँसी, (7) ब्राह्मी, (8) शंखपुष्पी, (9) चंपक, (10) मुलहठी, (11) गुलाब के फूल, (12) कनेर के फूल, (13) कमलगट्टा, (14) गुग्गल, (15) धूप, (16) कूठ, (17) कुलंजन, (18) दारुहल्दी, (19) साठी, (2) मुष्ता, (12) छाड़-छड़ीला, (22) गोक्षरु, (23) सरसों, (24) राई, (25) कालीमिर्च, (26) मीठी बच।
हवन करने के साथ ही इन औषधियों के बारीक चूर्ण को एक-एक चम्मच सुबह-शाम जल या दूध के साथ रोगी को नित्यप्रति कम-से-कम 4 दिन तक खिलाते रहना चाहिए। ‘टेन्शन’ एवं ‘डिप्रेशन’ से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए भी इसे प्रयुक्त किया जा सकता है। अगर सब औषधियों के बारीक चूर्ण को एक-एक चम्मच सुबह-शाम जल या दूध के साथ रोगी को नित्यप्रति कम-से-कम 4 दिन तक खिलाते रहना चाहिए। ‘टेन्शन’ एवं ‘डिप्रेशन’ से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए भी इसे प्रयुक्त किया जा सकता है। अगर सब औषधियाँ उपलब्ध न हो सकें, तो (नं 12) तक की औषधियां की हवन सामग्री बनाकर हवन करने एवं खाने से भी रोगी रोगमुक्त हो जाता है।
(5) अनिद्रा रोग की विशेष हवन सामग्री-
(1) काकजंघा, (2) पीपलामूल, (3) भारंगी, (4) जटामाँसी, (5) जलकुँभी (पिस्टिया) (6) ब्राह्मी, (7) शंखपुष्पी, (8) सर्पगंधा, (9) सुगंध कोकिला, (1) ज्योतिष्मती।
इस हवन सामग्री का उपयोग यदि क्षीरवृक्ष अर्थात् गूलर, पाकर, पलाश, वट-पीपल आदि की समिधाओं के साथ किया जाए, तो उन्माद रोग में भी शीघ्र लाभ होता है। हवन करने के साथ ही उक्त सभी दस औषधियों के बारीक पिसे हुए चूर्ण को घी और शक्कर के साथ सुबह-शाम एक-एक चम्मच खिलाते रहना चाहिए, पूर्ण लाभ तभी मिलता है।
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियों, भाइयों! अपने भारतीय धर्म में संध्यावंदन के दो समय नियुक्त हैं, एक प्रातःकाल एवं दूसरा सायंकाल। जब रात्रि और दिन दोनों मिलते हैं, तो उसे ‘संध्याकाल’ कहते हैं। यह सबेरे भी होता है और सायंकाल को भी होता है। इसलिए संध्यावंदन जब सूर्य उदय होता है तब और जब सूर्य अस्त होता है तब करना चाहिए। अध्यात्मिक जीवन में इस संध्यावंदन को हम एक और तरीके से कर सकते हैं। सोने को हम रात मान लें और जागने को दिन मान लें, तब प्रातःकाल एवं सायंकाल की संध्यावंदन का अध्यात्मिक समय वह बनेगा, जब आदमी सोकर उठेगा अथवा सोएगा।
प्रातःकाल की और सायंकाल की संध्यावंदन के लिए यही हो सकता है कि लोग शिकायत करें कि उस वक्त तक हमारी नींद नहीं खुलती हैं, उस वक्त तक तो हम दुकान पर रहते हैं, अमुक काम करते हैं। परंतु यह संध्यावंदन हरेक आदमी के लिए संभव है कि वह जब प्रातःकाल उठे, किसी भी वक्त तो उठेगा, अतः कभी भी सोए तो जो सोने का समय हो, उसे रात्रि का संध्यावंदन काल मान लिया जाए और जब उठ जाए, तो प्रातःकाल का संध्यावंदन का समय मान लें, तब फिर किसी को यह शिकायत नहीं रहेगी कि हमको साधना-उपासना के लिए, संध्यावंदन के लिए समय नहीं मिलता।
सबसे सरल तरीका
मित्रों! दैनिक उपासना करने के संबंध में लोगों को एक और भी शिकायत रहती है कि हमको जाड़े के दिनों में ठंड लगती हैं, स्नान करना संभव नहीं होता, कैसे उठें, पानी मिलता नहीं है। उसके लिए यह संध्यावंदन, जो आपको हम बता रहे हैं, इसको आप यहाँ से जा करके नियमित रूप से करते रहें। संध्यावंदन के लिए ऋषियों ने जो प्रातःकाल और सायंकाल का समय बताया हैं, उसके स्थान पर प्रातःकाल सो करके उठने का समय और रात्रि को सोने का समय, यह दो समय आपके लिए हम नियुक्त किए देते हैं। कई लोगों के पास स्थान नहीं होता है, पर स्थान नहीं हैं, पूजा का सामान नहीं हैं, नहाने का समय नहीं हैं, तो न सही, फिर आप ऐसा करें, चारपाई पर पड़े-पड़े ही संध्यावंदन कर लिया करें। इसके लिए न उठने की जरूरत है और न कुछ है। इससे सरल तो संध्यावंदन का और कोई तरीका हो ही नहीं सकता। यह सबसे सरलतम तरीका है कि आप प्रातःकाल और सायंकाल का संध्यावंदन अपनी चारपाई पर पड़े हुए भी उस समय कर लिया करें, जबकि आपकी नींद खुलती है और आप नींद लेने के लिए जाते हैं। दोनों समय की इस संध्या को आप भूलना मत। इसमें सिवाय आपकी लापरवाही और गैर जिम्मेदारी के अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं हो सकती? आप चाहें तो नियमित रूप से, हर परिस्थितियों में, बीमारियों में भी, सफर में भी, कही भी यह संध्यावंदन कर सकते हैं।
नया जन्म नई मौत
मित्रों! सायंकाल की संध्या और प्रातःकाल की संध्या में क्या करें? क्या करना चाहिए, क्या विचार करना चाहिए? आपको इन दोनों समयों में आत्मबोध और तत्वबोध की साधना करनी चाहिए। प्रातःकाल जब आप उठा करें, तो एक नए जीवन का अनुभव किया कीजिए कि रात को सोने का अर्थ हैं, ‘पिछले जन्म की स्मृति और उस दिन की मौत’ सबेरे उठने का अर्थ हैं, ‘नया जन्म’। ‘जब आँख खुली तब नया जन्म’ आप यह अनुभव कर लिया करें, तो मजा आ जाए। आप हर दिन सबेरे यह अनुभव किया कीजिए कि हमारा नया जन्म हो गया। अब नए जन्म में क्या करना चाहिए? आपकी सारी बुद्धिमानी इस बात पर टिकी हुई है कि आपने अपनी जीवन संपदा का किस तरीके से उपयोग किया। यह मानना सही नहीं है कि यह जन्म भजन करने के लिए मिला हुआ है। नहीं मित्रो! यह जीवन भजन करने के लिए नहीं मिला हुआ हैं, वरन् इसलिए मिला हुआ है कि आप इस जीवन की संपदा को ठीक तरीके से इस्तेमाल करें। यह आपकी परीक्षा है। परीक्षा में जो पास हो जाते हैं, तो और आगे चढ़ा दिए जाते हैं।
साथियों! यह जो पहली परीक्षा भगवान् ने आपको मनुष्य का जीवन देकर ली है, उसमें आपका एक ही फर्ज हो जाता है कि आप इसका अच्छे-से-अच्छा उपयोग करके दिखाएँ। बस भगवान् ने यही अपेक्षा की है आप से, यही उम्मीद है और यही वह चाहता है। वह न आपसे पूजा चाहते हैं, न उपहार चाहता है, न भजन चाहता है, न मनुहार चाहता है, न मिठाई चाहता है, न कपड़े चाहता है, न कथा चाहता है, न कीर्तन चाहता है। इन सब बातों से भगवान् का कोई ताल्लुक नहीं है। यह तो अपने आपके परिशोधन की प्रक्रियाएँ हैं। न जाने क्यों लोगों ने यह मान लिया है कि इससे भगवान् प्रसन्न हो जाएगा। आप लोग विश्वास रखें, इससे भगवान् कभी प्रसन्न नहीं हो सकता। इससे आपको जीवन संशोधन करने में, कार्य निवारण करने में तो सहायता मिल सकती हैं, लेकिन जहाँ तक भगवान् की प्रसन्नता का ताल्लुक हैं, वहाँ सिर्फ एक बात है कि आपको जो बहुमूल्य मनुष्य का जीवन दिया गया था, उस जीवन का आपने किस तरीके से और कहाँ उपयोग किया। बस यही एक प्रश्न है, दूसरा कोई प्रश्न नहीं है। तब आपको यह दिया गया हैं, तो विश्वास रखें कि भगवान् ने अपनी बहुमूल्य संपत्ति आपके हाथ कर दी। इससे बड़ी संपत्ति भगवान् के खजाने में और कोई नहीं है।
आदमी बनने का प्रयास करें
मित्रों! मनुष्य के जीवन में बढ़कर और क्या हो सकता है? आप दूसरे प्राणियों पर नजर डालिए न। कोई नंगा फिर रहा हैं, किसी के खाने का ठिकाना नहीं हैं, कोई कहीं हैं, तो कोई कहीं हैं, न बोल सकता है, न लिख सकता है। किंतु आपको सारी सुविधाओं से भरा हुआ जीवन इसलिए दिया गया है कि आप उसका अच्छे-से-अच्छा उपयोग करके दिखाएँ। क्या अच्छा उपयोग हैं, एक आप स्वयं को ऐसा बनाएँ, जिसको कि आदमी कहा जा सकता है। दूसरों के सामने आपका उदाहरण इस तरीके से पेश होना चाहिए कि जिसको देख करके दूसरे आदमियों को प्रकाश मिलें, रोशनी मिले या पीछे चलने का मौका मिले और आपकी अंतरात्मा कषाय-कल्मषों का परिशोधन करती हुई साफ और स्वच्छ बनती चली जाए। यह आपका स्वार्थ है। और परमार्थ? परमार्थ यह है कि भगवान् की इस विश्व-वाटिका में, जिसमें कि आपको काम करने के लिए भेज गया हैं, उसमें आप एक अच्छे माली के तरीके से काम करें। भगवान् को साथियों की जरूरत है, इंजीनियरों की जरूरत हैं, ताकि उनमें इतने बड़े बगीचे, इतने बड़े कारखाने की सुव्यवस्था करने में वे हाथ बँटा सकें। आपको हाथ बँटाने के लिए पैदा किया गया है, खुशामदें करने के लिए नहीं, नाक रगड़ने के लिए नहीं, चापलूसी करने के लिए नहीं, चमचागिरी करने के लिए नहीं, मिठाई, उपहार भेंट करने के लिए नहीं पैदा किया गया। आपको सिर्फ इसलिए पैदा किया गया है कि बेहतरीन जिंदगी जिएँ और भगवान् के काम में हाथ बँटाएँ।
इसके लिए मित्रों क्या करना चाहिए? आमतौर से आदमी काम की बातें भूल जाते हैं और बेकार की बातें, बेवकूफी की बातें सब याद रखते हैं। आपको सबेरे उठते ही प्रातःकाल चारपाई पर पड़े-पड़े यह ध्यान करना चाहिए कि आज हमारा नया जन्म हुआ है और हमको इतनी बड़ी कीमत मिली, संपत्ति मिली कि जिसकी तुलना में और किसी प्राणी को कोई चीज नहीं मिली। आप अपने आपको सौभाग्यवान् महसूस कीजिए, भाग्यशाली अनुभव कीजिए। यह अनुभव कीजिए कि हमारे बराबर भाग्यशाली कोई नहीं। अभावों की बात, चिंता की बात, कठिनाइयों की बात आप सोचते रहते हैं, लेकिन यह क्यों नहीं सोचते कि आप कितने शक्तिशाली हैं कि इतना बड़ा जीवन आपको भगवान् ने दिया। आप अपने भाग्य को सराहें और सराहना के साथ-साथ एक और बात ध्यान में रखें। आप एक ऐसी ‘स्कीम’ बनाएं, ‘योजना’ बनाएँ, जिससे इस जीवन का अच्छे-से-अच्छा उपयोग करना संभव हो सके।
जीवन सँवारने के सूत्र
मित्रों! यह प्रयोग एक दिन के जीवन से करना चाहिए। जिस दिन आप सोकर उठें, उसी दिन आप यह याद रखिए कि बस हमारे लिए एक ही दिन जिंदगी का है और इस आज के दिन को अच्छे-से-अच्छा बनाकर दिखाएँ। बस, इतने क्रम को दैनिक जीवन में सम्मिलित कर लें, तो इसे रोज-रोज अपनाते हुए आप अपनी सारी जिंदगी को अच्छा बना सकते हैं। एक-एक दिन को हिसाब से जोड़ देने का मतलब होता है, सारे समय को और सारी जिंदगी को ठीक तरह और सुव्यवस्थित बना देना। आप प्रातःकाल उठा कीजिए और यह ध्यान किया कीजिए कि ‘हर दिन नया जन्म और हर दिन नई मौत को आप प्रातःकाल से सायंकाल तक कैसे प्रयोग करेंगे? इसके लिए सुबह से ही उठकर टाइमटेबिल बना लेना चाहिए कि आज आप क्या करेंगे, कैसे करेंगे और क्यों करेंगे? क्रिया के साथ में आप चिंतन को जोड़ दीजिए। चिंतन और क्रिया को जोड़ देते हैं, तो दोनों से एक समग्र स्वरूप बन जाता है। आप शरीर से काम करते रहें, मगर कोई उद्देश्य न हो अथवा अगर आप उद्देश्य ऊँचे रखें, लेकिन उसे क्रियान्वित करने का कोई मौका न हो, तो दोनों ही बातें बेकार हो जाएँगी। इसलिए मित्रो! सबेरे उठते ही जहाँ अपने जीवन को सराहें या मनुष्य जीवन पर गौरव का अनुभव करें, वहाँ एक बात और साथ-साथ में चालू कर दें, सुबह प्रातःकाल से लेकर सायंकाल तक का एक ऐसा टाइमटेबिल बनाएँ जिसको कि सिद्धाँतवादी कहा जा सके, आदर्शवादी कहा जा सके। इसमें भगवान् की हिस्सेदारी रखिए। शरीर के लिए भी गुजारे का समय निकालिए, भगवान् के लिए भी गुजारे समय निकालिए। आपके जीवन में भगवान् भी तो हिस्सेदार हैं, उसके लिए भी तो कुछ करना है। आपका शरीर ही सब कुछ थोड़े ही है, आत्मा भी तो कुछ है। आत्मा के लिए भी तो कुछ किया जाना चाहिए। सब कुछ शरीर को ही खिलाने-पिलाने के लिए करेंगे क्या? ऐसा क्यों करेंगे? आत्मा का कोई औचित्य नहीं है क्या? आत्मा की कोई इज्जत नहीं है क्या? आत्मा का कोई मूल्य नहीं है क्या? आत्मा से आपका कोई संबंध नहीं है क्या? अगर है तो फिर आपको ऐसा करना पड़ेगा कि साथ-साथ दिनचर्या में आदर्शवादी सिद्धाँतों को मिलाकर रखना पड़ेगा।
मित्रों! अपनी दिनचर्या ऐसी बनाइए जिसमें आपके पेट भरने की भी गुंजाइश हो और अपने कुटुँब के परिवार के लोगों के लिए भी गुंजाइश हो और अपने कुटुँब के परिवार के लोगों के लिए भी गुंजाइश हो। लेकिन साथ-साथ में एक और गुंजाइश होनी चाहिए कि अपनी आत्मा को संतोष देने के लिए और परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए कार्यों का और विचारों का भी समावेश हो। आप स्वाध्याय का दैनिक जीवन में स्थान रखिए। आप सेवा का दैनिक जीवन में स्थान रखिए, आप उपासना का दैनिक जीवन में स्थान रखिए। इन सब बातों का समन्वित जीवन का अभ्यास कर लें, तो कल प्रातःकाल वाला संध्यावंदन पूरा हो हो जाएगा।
व्यस्त रहें, जीवनचर्या व्यवस्थित बनाएँ
जीवन की अनुभूति, जीवन की महत्ता की अनुभूति के साथ-साथ में सोते समय तक की सारी कार्य विधि का निर्धारण अगर आप कर लेते हैं, तो फिर आपकी उन-उन खुराफातों से बचत हो जाएगी, जो कि आप गृहस्थ जीवन के अभाव में करते रहते हैं। जो आदमी व्यस्त हैं, वह एक निर्धारित लक्ष्य में लगा रहता है। जो आदमी खाली है अर्थात् जो शरीर से खाली होगा, तो उसका दिमाग भी खाली होगा और दिमाग का खाली होना शैतान की दुकान है। इसलिए अपना दिमाग शैतान की दुकान न होने पाए और आपका शरीर खाली रहने की वजह से दुष्प्रवृत्तियों में न लगने पाए, इसके लिए बहुत अधिक आवश्यक है कि आप व्यस्तता से भरा हुआ टाइमटेबिल और कार्यक्रम बना लें और उस पर चलें। न केवल टाइमटेबिल बना लें, वरन् यह भी हर समय ध्यान रखें कि जो सबेरे कार्यपद्धति बनाई गई थी, वह ठीक तरीके से प्रयोग होती भी है कि नहीं।
आप अपने टाइमटेबिल में विश्राम का समय भी नियत रखें। यह कोई नहीं कहता कि विश्राम मत रखिए, लेकिन विश्राम भी एक समय से होना चाहिए, टाइम से होना चाहिए और एक विधि से होना चाहिए। चाहे जहाँ जरा-सा काम किया और फिर विश्राम, जरा-सा काम और फिर विश्राम ऐसे कोई काम होते हैं क्या? काम करने की शैली ही कर्मयोग है। कर्मयोग को अगर आप ज्ञानयोग में मिला दें, संध्यावंदन में मिला दें, तो मजा आ जाए, सारी की सारी दिनचर्या को आप भगवान् का कार्य मानकर चलें, तो फिर समझिए आपकी प्रातःकाल की संध्या पूर्ण हो गई।
इसके बाद अब सायंकाल की संध्यावंदन का नंबर आ गया। आप सायंकाल की संध्या उस समय किया कीजिए, जब आप साया करें। जब भी सोएँ-नौ बजे, ग्यारह बजे, बारह बजे, सोना तो आखिर है ही आपको। जब सोएंगे, तो यह बात भी सही है कि आप नींद की गोद में अकेले ही जाएँगे। ठीक हैं, बच्चे बगल में सोते हों तो क्या और कोई सोता हो तो क्या, परंतु नींद तो आपको अकेले ही को आएगी न, दो को तो एक साथ नहीं आ सकतीं? आप सुबह उठेंगे, तो अकेले उठेंगे न, दो तो एक साथ नहीं उठा सकते? यह आपका एकाँत जीवन है। सायंकाल को सोते समय आप उस एकाँत जीवन में ऐसे विचार किया कीजिए कि हमारे जीवन का अब समाप्ति का समय आ गया, अंत आ गया। अंत को लोग भूल जाते हैं। आदि को भी भूल जाते हैं बस मध्य में ही उलझे रहते हैं।
आदि और अंत का ध्यान
मित्रो! आदि यह है मनुष्य योनि में जन्म का सौभाग्य और उसको ठीक तरीके से उपयोग करने का निर्धारण। और अंत? अंत वह है जिसमें भगवान् के दरवाजे पर जाना ही पड़ेगा, भगवान् की कचहरी में पेश होना ही पड़ेगा, इससे कोई बचत नहीं हो सकती। आपको भी दूसरों की तरह मरना ही पड़ेगा और मरना भी चाहिए। यह नहीं हो सकता कि आपके मरने का कोई दिन न आए, जरूर आएगा, निश्चित आएगा। जब आपके मरने का दिन आएगा, तो फिर क्या होगा? तब आपको यहाँ से जाने के बाद में सीधे भगवान् के दरबार में जाना पड़ेगा और सिर्फ एक बात का जवाब देना पड़ेगा कि आपने इस जिंदगी का कैसे इस्तेमाल किया। अगर आपने ठीक तरीके से इस्तेमाल नहीं किया हैं, तो भगवान् आपसे बेहद नाराज होंगे, भले ही आपने अनुष्ठान किया हो, तीर्थयात्रा की हो, उपवास किए हों, तिलक लगाए हों, जो भी किया हो, इससे भगवान् का कोई समाधान होने वाला नहीं है।
इसलिए रात्रि को सोते समय यह ख्याल किया कीजिए कि अब हमारे जीवन का अंत है और अंत को अगर आप ध्यान कर लें तब? तब फिर आप चौंक पड़ेंगे। जिंदगी भर आदमी न जन्म को याद किया करें, तो मजा आ जाए। सिकंदर जब मरने को हुआ, तो उसने सब लोगों को बुलाया और कहा कि हमारा सब माल-खजाना हमको दीजिए, हम साथ लेकर के जाएंगे। क्योंकि बड़ी मेहनत से भी कमाया है और बड़ी बेईमानी से भी कमाया है। उसने जो कमाया था लोगों ने वह सब उसके सामने रख दिया। सिकंदर कहने लगा कि इसे हमारे साथ भेजने का इंतजाम करो। लोगों ने कहा, यह कैसे हो सकता हैं? यह सब चीजें तो यहीं की थीं और यही पड़ी रह जाएंगी। आप तो बेकार ही कहते हैं कि यह हमारे साथ जाएगा। आपके साथ तो आपका पुण्य और पाप जाएगा और कुछ नहीं जा सकता।
काश! हमें हर पल मौत याद रहे
सिकंदर फूट-फूटकर रोने लगा। उसने कहा कि अगर मुझे यह मालूम होता कि मेरे साथ में केवल पुण्य-पाप ही जाने वाला है, तो मैं इस छोटी-सी जिंदगी को गुनाहों से भरी हुई न बनाता। फिर मैं भगवान् बुद्ध के तरीके से जिया होता, सुकरात के तरीके से जिया होता, ईसा के तरीके से जिया होता। ऐसी गलती क्यों कर डाली? इस संपदा को, जिसकी मुझे जरूरत नहीं थी, उसी को मैं इकट्ठा करता रहा। यह क्यों करता रहा? मौत तो होनी ही है। उसको जब मौत याद आई, तो वह बार-बार यही बोला, मरते वक्त मेरे दोनों हाथ ताबूत से बाहर निकालकर रखना। उसने अपने सैनिकों से कहा कि आप लोग जब हमें दफनाने के लिए जाएँ, तो हमारे दोनों साथ ताबूत से बाहर निकालकर रखना। उसने अपने सैनिकों से कहा कि आप लोग जब हमें दफनाने के लिए जाएं, तो हमारे दोनों हाथ हमारे जनाजे से बाहर निकाल देना, ताकि लोग यह देखें कि सिकंदर खाली हाथ आया था और खाली हाथ चला गया।
मित्रों! यह वैराग्य श्मशान घाट में ही बन सकता है। श्मशान घाट की एवं मौत की याद आपको आ जाए, तो आप निश्चित ही जो घिनौनी जिंदगी जी रहे हैं, उसकी कतई इच्छा नहीं होगी। फिर आप यह कहेंगे कि इस नए मौके का अच्छे-से-अच्छा उपयोग क्यों न कर लिया जाए।
फिर आप क्या करेंगे? फिर आप अपना टाइमटेबिल और अपनी रीति-नीति ऐसी बनाएंगे जैसे कि राजा परीक्षित ने बनाई थी। राजा परीक्षित को मालूम पड़ गया था कि आज से सातवें दिन साँप काट खाएगा। उसने यह निश्चय किया कि इन सात दिनों का अच्छे-से-अच्छा उपयोग करेंगे। उन्होंने भागवत् कथा का अनुष्ठान किया और दूसरे अच्छे कर्म किए। इससे उनकी मुक्ति हो गई।
मित्रों! सात दिन में तो सबको ही साँप काटने वाला है। आपको भी सात दिन में ही काटेगा। कुल सात ही दिन तो होते हैं न, मौत का साँप इन्हीं दिनों में तो काटता है। सातवें दिन के बाद आठवाँ दिन कहाँ हैं? इसलिए आप भी राजा परीक्षित के तरीके से विचार कर सकते हैं कि हमारी बची हुई जिंदगी, जो मौत के दिनों के बीच में बाकी रह गई हैं, इसका हम अच्छे-से-अच्छा कैसे उपयोग कर सकते हैं? सायंकाल को आप विचार किया कीजिए कि इसका कैसे अच्छे-से-अच्छा उपयोग किया जाए। सायंकाल को दिनभर के कार्यों की समीक्षा किया कीजिए और समीक्षा करने के बाद में यदि लगे कि हमने गलती की या नहीं की। यदि की हैं, तो उसके लिए अपने को धिक्कारिए नहीं, धमकाइए नहीं, वरन् अपने आपको इस बात के लिए रजामंद कीजिए कि जो कुछ आज कमियाँ रह गई अथवा गलतियाँ हो गई, वह कल नहीं होगी। कल हम उस कमी को पूरा कर लेंगे, गलती को सुधार लेंगे। फिर क्या हो जाएगा? कमी की पूर्ति हो जाएगी। अगली बार गलती नहीं होगी, काम बहुत अच्छा हो जाएगा।
गलतियों से सीखें, आत्मचिंतन करते रहें
इस तरह प्रातःकाल जिस तरीके से आपने आज की नीति का निर्धारण किया था, उसी तरीके से आज की गलतियों का और आज की सफलताओं का अनुमान लगाते हुए कल की बावत आप तैयारी कर सकते हैं कि पहले तय कर लेंगे, तो दूसरे दिन आपको सफलता मिलेगी, यकायक चिंतन करेंगे, तो थोड़ा कठिन पड़ेगा। इसलिए हर दिन सोते समय में, मौत की गोद में, नींद की गोद में जाते समय यह विचार लेकर जाया करें कि अब हम इस संसार से चले और भगवान् के यहाँ गए। ऐसी स्थिति में फिर आपको क्या करना चाहिए? लगाव को कम करना चाहिए। लोगों से, वस्तुओं से आपका लगाव जितना ज्यादा होगा, आप उतना ही ज्यादा कष्ट पाएंगे। आप लगाव को कम कीजिए। लगाव ही ज्यादा कष्टकारक है, जिम्मेदारियों का निभाना ज्यादा कष्टकारक नहीं है। जिम्मेदारियाँ तो आपको निभानी ही चाहिए। आप अपनी जिम्मेदारी माता के प्रति निभाइए, पत्नी के प्रति निभाइए, बच्चों के प्रति निभाइए, मोहल्ले के प्रति निभाइए और समाज के प्रति निभाइए, लेकिन लगाव आपको बहुत हैरान कर देगा। हमारा ही बच्चा हैं, यह आप क्यों कहते हैं? यह क्यों नहीं सोचते और कहते कि भगवान का बच्चा है। यह हमारी बीवी हैं, क्यों कहते हैं? यह क्यों नहीं करते कि यह भगवान् की बेटी हैं। यह कह देंगे, तो क्या हो जाएगा?
आप रात्रि को जब सोया करें और मौत को जब याद किया करें, तो साथ में दो बातें और भी याद कर लिया करें कि हम खाली हाथ जा रहे हैं। लालच हमारे साथ जाने वाला नहीं है और मोह भी हमारे साथ जाने वाला नहीं है। हर प्राणी अपने संस्कार लेकर आया है और अपने संस्कार लेकर चला जाएगा। फिर आप उनके मालिक कैसे हुए? संपत्ति जितनी आप खा सकते हैं और जितनी इस्तेमाल कर सकते हैं, उतनी ही तो ले सकते हैं। बाकी जमीन पर ही छोड़नी पड़ेगी, चाहे संबंधियों के लिए छोड़ें, चाहे उत्तराधिकारियों के लिए छोड़ें और चाहे पुलिस वालों के लिए छोड़ें। तो जब छोड़नी ही पड़ेगी, तो आप उन लोगों के लिए क्यों नहीं छोड़ते, जो कि इसके हकदार हैं। आप उतना ही क्यों न कमाएँ, जिससे कि आप ईमानदारी के साथ अपने लोक और परलोक को बनाए रखें। आप अपने खरच उतने ही क्यों न रखें, जिससे कि सीमित आजीविका में ही आदमी का गुजारा चल सकता है।
करें हर क्षण मृत्यु का स्मरण
मित्रों! ऐसे हजारों विचार हैं जो आपको तब आएंगे जब आप यह ख्याल करेंगे कि हमको मौत के मुँह में जाना है। अगर यह ख्याल आप नहीं कर सकते, तो फिर आप पर व्यामोह छाया रहेगा और यही भवबंधन छाए रहेंगे कि और कमाना चाहिए। लालच छाया रहेगा, मोह छाया रहेगा, चाहे उसकी जरूरत हो या न हो। बेटे-पोते सब समर्थ हो गए हैं, फिर भी आप यही सोचते रहेंगे कि इनकी सहायता करें। इनको ही पैसा दें आपके मन में कभी यह ख्याल भी नहीं आएगा कि इनके अलावा भी कोई दुनिया में और भी रहता है। यह त्याग, वैराग्य, भक्ति तब आती है जब आदमी मृत्यु का स्मरण करता है। आप मृत्यु का स्मरण कीजिए। मृत्यु का स्मरण करना बहुत जरूरी है। ॐ कृतो स्मरः......। किसको याद करो, मौत को याद करो। “भस्मीभूतमिदं षरीरं” यह शरीर भस्मीभूत होने वाला है।
आप इस मरने वाले शरीर के बारे में ध्यान रखें कि यह कल या परसों मिट्टी में मिलने वाला है। फिर हम क्यों ऐसे गलत काम करें, जिससे हमारी परंपरा बिगड़ती हो, पीछे वालों को कहने का मौका मिलता हो, धिक्कारने का मौका मिलता हों और आपकी आत्मा को असंतोष की आग में जलने का मौका मिलता हो। आप मत कीजिए ऐसा काम। यह दोनों शिक्षाएं आपको नया जीवन और नई मौत के स्मरण करने से मिल सकती हैं और कोई तरीका नहीं है। आप इन दो संध्यावंदन को भूलिए मत। गुरुजी हम तो उस समय गायत्री मंत्र का जप करते हैं। दूसरे समय पर कीजिए। प्रातःकाल तो यह चिंतन और मनन कीजिए “नया जन्म नई मौत” “और हर दिन को नया जन्म और हर रात को नई मौत।” इस मौत और जिंदगी के झूले में आप झूलते हुए अपने फर्ज, कर्तव्य और बुद्धिमत्ता के बारे में विचार करेंगे, तो ऐसी हजारों बाते मालूम पड़ेंगी, जिसके आधार पर आपका जन्म सार्थक हो सके आप अध्यात्मवाद के सच्चे अनुयायी और उत्तराधिकारी बन सकें। आज आप से यही कहना था। ॥ॐ शांति॥
पुराने जमाने में ईश्वर पर विश्वास नहीं करने वाला नास्तिक होता था और नए धर्म में स्वयं पर विश्वास न करने वाला नास्तिक कहलाता है।
-विवेकानंद
सुँदरता चेहरे की बनावट एवं साज-सज्जा पर टिकी हुई नहीं है। वह तो अच्छे स्वभाव और सज्जनोचित व्यवहार से उभरती है।
घृणा को घृणा से और बैर को बैर से जीत सकना कठिन है। आग में ईंधन डालने से वह भड़कती भर है। बुझाने के लिए प्यार की सजलता चाहिए।
लोग धर्म के लिए कहते हैं, सुनते हैं, झगड़ते और मरते-मारते हैं। पर ऐसे कुछ ही लोग हैं, जो धर्म के लिए जीवन जीते हैं।
(गीता के चतुर्थ अध्याय ज्ञान कर्मसंन्यासयोग की युगानुकूल व्याख्या की चौथी कड़ी)
भगवान् के जन्म भी दिव्य होते हैं एवं कर्म भी दिव्य होते हैं, इस प्रकरण पर बड़े विस्तार से मात्र एक ही श्लोक की व्याख्या के माध्यम से विगत अंक की कड़ी प्रस्तुत की गई थी। भगवान् के अवतरण एवं आरोहण की चर्चा के साथ यह भी बताया गया था कि भगवान् की “संभवामि युगे युगे” की उद्घोषणा किस तरह साकार होती है।
जन्म कर्म च में दिव्यमेंवं यो वेत्ति तत्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जनम नैति मामेति सोऽर्जुन॥
“इस तरह हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् निर्मल और आलौकिक हैं, इस तथ्य को जो मनुष्य तत्व से जान लेता है, वह शरीर त्यागने के बाद पुनः जन्म नहीं लेता, मुझे ही प्राप्त होता है।” (4/9) गीता के चौथे अध्याय के नवें इस श्लोक की व्याख्या सचमुच बहुत गूढ़ है। मनुष्य तो अपने प्रारब्ध के वशीभूत हो जन्म लेता है, किंतु भगवान् अपनी इच्छा से लोक कल्याण हेतु जन्म ग्रहण करते हैं। सृष्टि की सारी संवेदना अपने अंदर साकार कर करुणा का महासागर बनकर अवतार जन्म लेता है। मेरेपन से परे जाकर अवतार चेतना में स्थित होकर इतनी बड़ी बात श्रीकृष्ण कह लेते हैं कि यह रहस्य जान लेना एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक उपलब्धि है कि भगवान् के जन्म व कर्म कितनी दिव्यता से भरे होते हैं। परमात्मा जो अज हैं, अव्यय हैं, इस दिव्य कर्म के उद्देश्य से अवतरित होते हैं कि वे समग्र मानवजाति की चेतना को दिव्य बना सकें, ताकि वह ऊर्ध्वमुखी हो सकें। लाखों-करोड़ों व्यक्तियों की चेतना में नवजीवन लाया जा सके। मानव चेतना में जब भी कोई रूपांतरण-महान परिवर्तन होने जा रहा हो, अवतारी चेतना की आवश्यकता होती है। ऐसे सभी साधक जो सर्वत्र उसी ईश्वरीय सत्ता का क्रीड़ा-कल्लोल देखते हैं, शरीर छोड़ने के बाद कभी पुनः जन्म नहीं लेते, यह बात बड़ी स्पष्टता से प्रभु ने कही है। भगवान् को प्राप्त हो जाने के बाद वीतराग बन, अपने अहं व भय को नष्ट करने के साथ ही इस जीवन शैली को अपनी दैनंदिनचर्या का अंग बना लेने के प्रकरण को हम मात्र स्पर्श कर पाए थे। अब उसके आगे की व्याख्या दसवें श्लोक से, जो आरंभ होकर कर्म-अकर्म-विकर्म की व्याख्या तक हमें ले जाती है, इस व आगे के अंकों में प्रस्तुत है।
दसवें श्लोक में भगवान् कहते हैं-
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥ 4/1
“पहले भी, आसक्ति, भय और क्रोध से रहित, मेरे साथ तादात्म्य को प्राप्त हुए, मेरी ही शरणागत हुए तथा ज्ञानरूपी तप द्वारा पवित्र हुए बहुत से लोग मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।” (अध्याय 4, दसवाँ श्लोक)
प्रभु के स्वरूप को प्राप्त होना
एक ही श्लोक में कितनी ही बातें एक गुरु ने अपने शिष्य को कह दी हैं जो अवतार को पहचान लेता है, उसके दिव्य कर्म को जान लेता है, वह भगवत् तत्व को प्राप्त हो जाता है। क्यों? क्योंकि फिर वह राग, भय और क्रोध से मुक्ति पा लेता है। बंधन मुक्ति-जीवन मुक्ति का पथ पा जाता है। दिव्य जन्म और दिव्य कर्म को जानना (जो कि विगत अंक में बताया गया) एक सत्य हमारे समक्ष उद्घाटित करता है कि हमारे सभी कार्यों में वह सर्वशक्तिमान प्रभु हमारी उपाधियों के द्वारा स्वयं काम करते हैं। हम तो उनके निमित्त मात्र बन कर्म करते रहते हैं। इससे हमारे समक्ष अति आकर्षक अनेकानेक संभावनाओं के द्वार खुल जाते हैं। जब वह अनंत ही हमारे अंदर कार्य कर रहा है, तो हमारी क्षमता भी अनंत है। स्वामी विवेकानंद की वह प्रसिद्ध उक्ति ‘इच सोल इज पोटेन्शियली डिवाइन’ हर आत्मा में वह देवत्व समाया पड़ा है, हमारे समक्ष अद्वैत की व्याख्या करती हुई मुखरित होने लगती हैं। सहज ही हम असंभव कार्य करने लगते हैं, क्योंकि वे स्वतः होने लगते हैं, हमारा उन पर कोई नियंत्रण नहीं होता।
गीता एक सुनिश्चित अनुशासन हमारे समक्ष रखती है। उस अनुशासन का पालन करने पर वह कहती है कि हम सहज भाव से इस दिव्य मनः स्थिति का आह्वान कर सकते हैं और हमेशा उसी स्थिति में बने रहने का स्वयं को प्रशिक्षण दे सकते हैं। क्या है वह अनुशासन? वह है, आसक्ति का त्याग, भय से मुक्ति, क्रोध से दूरी। जहाँ कहीं भी आसक्ति होती हैं, वहाँ समेटकर रखने को मन होता है, वस्तुओं के चले जाने का भय होता है। जब हमारी कामना की पूर्ति नहीं होती, तो क्रोध का आना स्वाभाविक ही हैं। जब-जब भी हमारा ध्यान बहिर्मुखी होता है, विषय पदार्थों की प्राप्ति और उनमें ही तृप्ति-प्रसन्नता पाने हेतु लगने लगता है, तो ये तीनों वृत्तियाँ अनायास ही आकर हमसे चिपट जाती हैं। भगवान् कहते हैं कि मेरे साथ एक भाव को प्राप्त हुए, मेरी शरण में आए व्यक्ति इन तीनों से मुक्ति पा जाते हैं।
वीतरागता की सिद्धि
वीतराग होना एक सबसे बड़े स्तर की सिद्धि है। इसे प्राप्त करने के बाद मनुष्य कभी अशांत नहीं होता, अंदर से बाहर तक वह प्रभु भाव से जीवन जीता है एवं तुरंत ही आध्यात्मिक सिद्धि के उच्च सोपानों को पा जाता है। भगवान् बुद्ध के एक शिष्य ने आकर उनसे कहा, “प्रभु! एक वेश्या ने मुझसे अपने यहाँ आकर चातुर्मास करने को कहा है। मैंने भी सोचा कि करके देख लेता हूँ। जब हर श्वास में आप ही आप समाए हुए हैं, तो मेरा क्या बिगड़ेगा। आपके शिष्य की परीक्षा भी हो जाएगी।” औरों ने सुना, शिष्यों ने सुना तो प्रताड़ना देने लगे कि यह कैसी बात अपने प्रभु से करते हो? किंतु बुद्ध ने कहा कि बड़े मजे की बात कह रहा है। करने दो इसे। इससे सभी को एक शिक्षण मिलेगा।
बुद्ध की इजाजत पाकर वह शिष्य वेश्या के घर चला गया। चातुर्मास चालू हुआ। वेश्या नाची गाई, विभिन्न प्रकार की चेष्टाएँ करती रही। वह कभी भी यह नहीं कहता कि ऐसा क्यों कर रही हो। कभी रुक जाती, तो यह नहीं कहता ऐसा नाचो। जब वह उसके बहुत पास जाकर कामुक नृत्य करती, तो यह भी नहीं कहता कि मत करो। वह अपने व्यय में प्रसन्न बना रहा। उसे बहुत अच्छा लग रहा था। वह वीतराग स्थिति को पहुँच गया। उसे न नृत्य से परेशानी थी, और न उसके थककर बैठ जाने से। उसका तो उद्देश्य था, प्रभु में मन लगाकर चातुर्मास जप-तप में लीन हो पूरा करना। गुमान में स्थित होकर मन को तद्रूप बनाना। चार माह देखते ही देखते बीत गए। चौथे माह के समापन पर चातुर्मास होने पर वह भिक्षु एक भिक्षुणी को लेकर वापस लौटा। अर्थ वह भिक्षुणी? वही वेश्या भिक्षुणी बनकर उस शिष्य के साथ लौटी एवं प्रभु के चरणों में आकर गिर गई। उसने देखा कि मेरे पास जो भी कुछ हैं, उससे भी अंदर की शांति का राजमार्ग इस भिक्षु ने पा लिया है। वह बोली, मैं भी उस आराध्य का आनंद लेने आई हूँ, जिसने तुम्हारी मनःस्थिति ऐसी बना दी। यह लौकिक-क्षणिक सुख किस काम का? इतना समझते ही वह प्रभु में लीन हो गई। यह कहलाता है वीतराग होना।
कौन-सा ऋषि सर्वश्रेष्ठ
देवताओं की सभा में एक विवाद चल पड़ा। विषय था धरती पर ऐसा कौन-सा ऋषि है जो वीतराग है, पूर्णतः राग-आसक्ति से परे है। नारद ऋषि भी सभी में विराजमान थे। वे बोल उठे, ऐसे तीन ऋषियों को तो मैं जानता हूँ। एक का नाम है पर्वत ऋषि, दूसरे हैं कुतुक ऋषि एवं तीसरे हैं कर्दम ऋषि। यह तीन ऋषि बड़े ही प्रख्यात तपस्वी है। उनने इंद्र सहित पूरी सभा से कहा, तुम चाहो तो इन्हें परख लो। उर्वशी वहीं बैठी थीं, हंसी और बोली कि जीवनभर हमने यही काम किया है। हमें भी इन ऋषिगणों की आसक्ति पर विजय को परखने का मौका दीजिए। नारद जी ने कहा कि हाँ परीक्षा भी हो जाएगी। देवसभा में तीनों ऋषियों को आमंत्रित कर लिया गया।
उर्वशी ने निर्णय लिया कि वह कुमौक नृत्य प्रस्तुत करेगी। कुमौक नृत्य का अर्थ होता है क्रमशः अपने वस्त्र उतारते चले जाना। संस्कृत में केंचुल उतारने को कुमौक नृत्य कहते हैं। आजकल के कैबरे नृत्यों से उसकी तुलना की जा सकती है। पर्वत ऋषि पहले क्रम में आए। नृत्य आरंभ हुआ। उनने कहा, “हमें यह दृश्य क्यों दिखा रहे हो। अरे भई! इसे बंद करो।” उर्वशी बोली कि ये तो पहले प्रहार में ही चले गए। अर्थात् वीतराग स्थिति में होते तो उन्हें कोई आपत्ति न होती। पर्वत ऋषि असफल प्रमाणित कर दिए गए। नृत्य चलता रहा, कर्दम ऋषि ने अपनी आँखें बंद कर लीं, ताकि वह दृश्य न देख सकें। उनके बारे में भी यही उक्ति बनी कि ये भी असफल रहे। जो आँख बंद कर ले वह वीतराग नहीं हो सकता। जो निरपेक्ष भाव से, बिना आसक्ति के उस नृत्य को देख ले वही वीतराग हो सकता था। कुतुक ऋषि नृत्य देखते रहे, बड़े प्रसन्न मन से देखते रहे। बोले, एक-एक केंचुल उतारोगी। वह तो तुमने अभी तक दिखाया नहीं?” उर्वशी बोली, ऋषिवर! आपके सामने ही सभी वस्त्र उतार दिए और आप कहते हैं कि हमें नृत्य नहीं दिखाया। क्या आपको दिखाई नहीं पड़ रहा है। ऋषि बोले, “उर्वशी! आत्मा पर भी तो पाँच आवरण चढ़े हैं। अन्नमय कोष, मनोमय कोष, प्राणमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोष। वह तो तुमने उतारे नहीं। अगर है उतारकर दिखातीं, तो वस्तुतः आनंद आता। तुमने पूरा नृत्य दिखाया होता तो ही तुम्हारे नृत्य की सार्थकता थी। पाँचों आवरण तो हमें यथावत चढ़े दिखाई दे रहे हैं।” सभी देवताओं ने, नारद ऋषि ने एक मत से स्वीकार किया कि कुतुक ऋषि ‘वीतराग‘ स्थिति की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए हैं। रागों से परे, आसक्ति से परे उनका चिंतन है। वे पूर्णतः ईश्वरनिष्ठ-आत्मसत्ता में तन्मय महापुरुष है।
तत्त्वरूप से जानें भगवान् को
इस पौराणिक कथा से हम सौंदर्य की, उसके प्रति आसक्ति की, वीतराग होने की पूरी विवेचना समझ सकते हैं। आज जो प्रत्यक्षवादी, भोगवादी चिंतन काया तक सिमटा, अश्लीलता की परिधि लाँघता दिखाई दे रहा है, वही समाज के पतन का, दैवी आपदाओं का, बढ़ते संक्षोभों का मूल कारण है। यदि हमारी दृष्टि ऋषिप्रवर कुतुक जैसी हो जाए, तो हम बहुत सारी समस्याओं का समाधान पा सकते हैं। बहुचित्तीय राग-आसक्तिप्रधान वृत्ति से निरपेक्ष होते ही सही व्यक्तित्व उभरकर आ जाता है। भगवान् को ‘तत्त्वरूप’ से जान पाना बिना वीतराग स्थिति में जाए संभव नहीं है। यह भी कहा जा सकता है कि भगवान् को जान लेने के बाद ‘वीतराग‘ स्थिति एक सिद्धि के रूप में हस्तगत हो जाती है।
आह्लादमय मनः स्थिति की प्राप्ति हेतु गीता एक सुनिश्चित अनुशासन हमारे समक्ष रखती है। आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्ति प्राप्त करना। एक सच्चा अनुप्राणित मन तब इस योग्य बनता है कि वह परमात्मचेतना का आह्वान कर सके। अहंकेंद्रित तुच्छ भोगमय जीवन बिताने वालों में यही तीन बाधाएँ सतत उनके प्रगतिपथ को अवरुद्ध किए रहती है। भगवान् कहती हैं कि जब मनुष्य मेरे आश्रित हो जाता है। (मामुपाश्रिताः) तभी वह इन बाधाओं को पारकर तद्रूपता (प्रभु के साथ एकाकार) को पाता है।
अंदर-बाहर दोनों ओर से ज्ञानी
शुकदेव जी के जीवनवृत्त से भली भाँति समझ में आ जाता है कि वीतराग की सिद्धि कैसे प्राप्त की जा सकती है। शुकदेव जी ने भागवत की कथा सुनाकर पूर्ण की तो व्यास जी बोले, “इतने भर से नहीं प्रमाणित हो जाता कि तुम वीतराग हो। कथा तो कोई भी कह सकता है। वीतराग की स्थिति में जो अपने उद्देश्यों से दूसरों को ऊँचा उठा सके, वही सच्चा परमात्ममय साधक कहा जा सकता है।” व्यास जी बोले, “तुम जनक के पास जाकर ज्ञान लो। तुम्हारी परीक्षा वहीं होगी।” जनक जी के दरबार में घुसे तो शुकदेव जी को रोक दिया गया। काफी समय तक बिना किसी प्रकार का भाव प्रकट किए वहीं साधना करते रहे। फिर राजा स्वयं बाहर आकर उन्हें अंदर ले गए। सारे ऐश्वर्य भोगों-सुविधाओं से भरे प्रमदवन में उनके ठहरने की व्यवस्था कर दी गई। चारों ओर ऐश्वर्य-ही-ऐश्वर्य, भोग-ही-भोग, सुबह से शाम तक सुँदर नर्तकियाँ तरह-तरह के व्यंजन लेकर खड़ी रहती थीं। लेकिन जनक के उस महल में विराजे शुकदेव जी की त्रिकाल संध्या चलती रही। वे निरपेक्ष भाव से ध्यान में आत्मतल्लीन बने रहे। तब जनक उनके पास आए व बोले, “प्रभु! मैंने व्यास जी की आज्ञानुसार आपकी परीक्षा ले ली। आप अंदर से भी ज्ञानी हैं, बाहर से भी ज्ञानी। मैं तो एक राजा हूँ, जो मात्र अंदर का ज्ञान जान पाया हूँ। किंतु आप सही अर्थों में वीतराग हैं।”
गायत्री परिवार के कार्यक्रमों में हम सभी बाहर जाते हैं। कभी सामान्य, तो कभी बड़े-बड़े लोगों के घरों में ठहरते हैं। कनाडा में एक व्यक्ति के घर ठहरे तो उसने हमें तीन मंजिल का अपना घर दिखाया। प्रत्येक कमरे में चलने का अनुरोध किया। लड़की का मकान था, बड़ा सुँदर वालपेपर लगा था। बार-बार प्रतिक्रिया जानने की इच्छा रखते कि कैसा लगा ! हमने कहा, बड़ा सुँदर है। आप प्रभावित ही नहीं हुए। और लोग तो बड़ी तारीफ करके जाते हैं। हमने कहा कि आपने बड़ी मेहनत की, पर मकान बनाना कौन-सी बड़ी बात है। उनका मन दुखी देख हमने थोड़ी तारीफ कर दी, वे प्रसन्न हो गए। हर व्यक्ति अपने लौकिक पुरुषार्थ की सराहना चाहता है। वह जानता है कि यह क्षणभंगुर हैं, तब भी। इस राग से परे चलना ही गीता का संदेश है।
एकत्व भाव की सिद्धि
भगवान् के स्वरूप को जानने के बाद, वीतराग हो जाने के बाद उन्हीं में अनन्य भाव से स्थित रहने की सिद्धि मिल जाती है। सूफी संत बराबर एक ही बात कहते हैं, अनलहक। “हम वहीं है जो तू हैं।” इससे उलटी एक बात हैं कहते हैं, यादेहक, अपने प्रिय की याद में जीना। ये दो ही संप्रदाय है सूफियों के। कुछ आत्मतत्व को मानते हैं, कुछ उसी में लीन अपने को मानते हैं। संत कबीरदास जी लिखते हैं, “हरि मोर पीउ मैं राम की बहुरिया।” हरि मेरे प्रीतम हैं, मैं राम की बहुरिया हूँ। यह एकत्व भाव ही हमें प्रभु के अति समीप ले जाता है। कबीर अपनी इसी लेखनी के कारण सूफी संतों के अति समीप माने जाते हैं। कबीर की उलटबांसियां एवं गीता का काव्य हमारे अध्यात्मिक वाङ्मय की अनमोल निधि हैं, जो हमें जीवन-दर्शन का बोध कराती है।
सामान्यतया जीवन व्यापार में लगे हम सभी सामान्य लोग बिना अधिक सोचे-विचार अपने जीवन के सुखों को विषय पदार्थ, गृह-धन और संबंधियों द्वारा सुरक्षित कर लेना चाहते हैं। सुरक्षा के लिए हम इन साँसारिक पदार्थों की शरण लेते हैं। जितना-जितना हम न पर आश्रित होते जाते हैं, उतना ही हमारा विश्वास उनमें बढ़ता जाता है। उतने ही हम भगवान् से दूर होते चले जाते हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण हमें अपनी शरण में लेने की सलाह देते हैं, ताकि हमारा विश्वास सतत दृढ़ होता चला जाए। हम उनके साथ पूर्णतः तद्रूप होते चले जाएं, भगवत् भाव में जीते चले जाएं।
राग, भय और क्रोध से मुक्ति, परमात्मा में तल्लीनता और शरणागति, इन तीनों की प्राप्ति हो जाने पर हमारा समग्र व्यक्तित्व, उसकी सभी तहें एकाग्र भाव से उसी परमात्म चेतना के ध्यान में तल्लीन हो जाती है। यही है ध्यान की अवस्था, पराकाष्ठा की स्थिति। ध्यान में परमात्मा की उपस्थिति मानकर, उसके प्रति जागरुक बने रहकर जब हम कर्तव्य कर्मों का संपादन करते हैं, तो क्रमशः हमारी वासनाओं का क्षय होता चला जाता है। हमारे भीतरी यंत्र, मन, बुद्धि शुद्ध होते चले जाते हैं। ऐसा शुद्ध हृदय वाला ही दिव्य प्रेरणाएँ पाता है और आलौकिक स्तर के कर्म करता है।
ईश्वर एक आइना
गीताकार कहते हैं, ईश्वर आइना है। आइने के सामने जाते ही सब कुछ दिखाई पड़ने लगता है। हम जैसा करते हैं, बनने का प्रयास करते हैं, वही हमें ईश्वर के समीप, गुरु के समीप जाते ही दिखाई देने लगता है। गुरु के सामने, भगवान् के सामने जाते ही हम अपनी क्रियाओं को प्रतिबिंबित करने लगते हैं। हमारा वास्तविक चेहरा ही निर्विकार रूप में भगवान् के सामने आता है। अच्छे-अच्छे ज्ञानी लोग खुल जाते हैं, जैसे-जैसे वे ईश्वर के समीप जाते हैं। परमपूज्य गुरुदेव के समक्ष सभी नंगे हो जाते थे। लोग कहीं और से आरंभ करते थे अपनी राम कहानी, परंतु गुरुदेव उससे अपनी मन की बात कर लेते थे। गुरु भगवान् आइना-दर्पण के समान होते हैं। जो भगवान् सूफियों के लिए प्रेमी रूप हैं, वैष्णवों के लिए सृजेता के रूप हैं, ज्ञानियों के लिए वहीं भगवान् एक सिद्ध पुरुष के रूप में हैं। सच्चे शिष्यों के लिए गुण रूप में वे ही भगवान् हैं। इसी बात को कि ईश्वर गुरु दर्पण समान किस तरह हैं, बड़ी सुँदरता से अगले श्लोक में कहा गया है,
ये यथा माँ प्रपद्यन्ते ताँस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वषः॥ 4/11
“हे अर्जुन! जो भक्त जिस प्रकार मुझे भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ (जिस भावना से मेरी उपासना करते हैं, उसी के अनुसार, मैं उनकी कामनाओं को पूरी करता हूँ) क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।” (अध्याय 4 ग्यारहवाँ श्लोक)
भगवान् सबकी सुनते हैं
प्रस्तुत श्लोक को दसवें श्लोक के साथ आत्मसात् करने का प्रयास किया जाए, तो ही समझ में आ सकेगा। ज्ञान की तपः शक्ति से अभिपूरित होकर (ज्ञान तपसापूताः), अपरा प्रकृति से मुक्त होकर भगवान् के स्वरूप को, स्वभाव को जो प्राप्त होते हैं, वे दिव्य जन्म और दिव्य कर्म के मर्म को जान लेने के कारण वीतरागता की सिद्धि को प्राप्त हो भय व शोक से मुक्त होकर उनकी चेतना में ही निवास करने लगते हैं। वे भगवान् के स्वरूप और स्वभाव को प्राप्त होते हैं। इस तरह भगवान् दिव्य व्यक्तित्व के रूप में अवतरित होते हैं। अवतार किस रूप में, किस नाम से आएंगे, भगवान् के किस पहलू को मानव जाति के समक्ष रखेंगे, इसका विशेष महत्व नहीं है। क्योंकि भिन्न-भिन्न प्रकृति के अनुसार जितने भी विभिन्न मार्ग हैं, उन सभी में मनुष्य भगवान् द्वारा नियत मार्ग पर ही चल रहे हैं। मनुष्य चाहे जिस तरह भगवान् को अपनाता, उनसे प्रेम करता, आनंदित होता हो, भगवान् उन्हें उसी तरह से अपनाते, उनने प्रेम करते व आनंदित होते हैं, यही भाव आया हैं “ये यथा माँ प्रपद्यन्ते ताँस्तथैव भजाम्यहम्“ में।
कोई भी व्यक्ति प्रभु का किसी भी रूप में आह्वान करें, चाहे वह चर्च में हो, मस्जिद में, बौद्ध विहार में, गुरुद्वारे में या मंदिर में, उसकी जैसी उपासना पद्धति, जितनी गहरी उसकी तीव्रता होती है, भगवान उसकी सुनते हैं। आह्वान का, उपासना का ढंग कुछ भी हो, यदि मूलभूत अनिवार्य शर्तें पूरी होती हों तो उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होंगी, यह प्रभु का आश्वासन है। जिस व्यक्ति की गहन तन्मयता के साथ जैसी कामनापूर्ति के लिए तप किया जाएगा, उसकी उसी निष्ठापूर्वक प्रार्थना को भगवान् द्वारा सुना जाएगा। फिर यह शिकायत करना जायज नहीं कि भगवान् ने हमें यह दिया, उसे यह दिया। जैसी मन की आँतरिक स्थिति थी वैसा ही मिला। कबीर साहब ने इसी बात को इस तरह लिख दिया हैं-
जिहि हरि जैसा जाणियाँ, तिनकूँ तैसा लाभ। ओसौ प्यास न भाजई, जब लगे धसै न आभ॥
“जो ईश्वर को जैसा जानता है या भजता है उसे वैसा ही लाभ होता है। कम भजन से कम व अधिक से अधिक फल मिलता है। ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती, प्यास बुझाने के लिए तो पानी में प्रवेश करना ही होता है।”
गीता के इस ग्यारहवें की और भी विस्तृत तथा आगे के श्लोकों की व्याख्या अब आगामी अंक में।
श्री कबीर साहब ने लिखा है-
सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार। लोचन अनंत उघड़िया, अनंत दिखावणहार॥
“सद्गुरु की महिमा अपरंपार है। उन्होंने शिष्य पर अनंत उपकार किए हैं। उनने विषय-वासनाओं से बंद शिष्य की आँखों को ज्ञान द्वार खोलकर उसे सान्त नहीं अनंत तत्व ब्रह्म का दर्शन करा दिया है।” आगे इसी प्रसंग में वे लिखते हैं-
भली भई जु गुर मिल्या, नहीं तर होती हाँणि। दीपक दिष्टि पतंग ज्यूँ, पड़ता पूरी जाँणि॥
“अच्छा हुआ कि सद्गुरु मिल गए, वरना बड़ा नुकसान होता। जैसे सामान्यजनक पतंगे के समान माया की चमक-दमक में पड़कर नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही मेरा भी नाष हो जाता। जैसे पतंगा दीपक को पूर्ण समझ लेता है, सामान्यजन माया को पूर्ण समझकर उस पर अपने आपको निछावर कर देते हैं। वैसी ही दशा मेरी भी होती।”
गुरु के माहात्म्य को सद्गुरु कबीर से अच्छा और कौन समझा पाता है। परमपूज्य गुरुदेव के प्रसंग में जब भी हम उनके लीला संदोह के विषय में गहरा और गहरा चिंतन करते हैं, तो यही बोध होता है कि कितने भाग्यशाली हैं हम, जिन्हें ऐसे गुरु मिले। उनके ही हाथों से लिखा 7 सितंबर 1967 का एक पत्र यहाँ उद्धृत कर रहे हैं-
“रामकृष्ण परमहंस के रूप में देखना एक सत्य है। हमारे उस जीवन में भी आप हमारे साथ बहुत अधिक संबद्ध रहे हैं। वे ही स्मृतियाँ अब उभर आती हैं।”
रामकृष्ण परमहंस के रूप में देखना एक सत्य है। हमें उस जीवन में भी इसे मात्र बहुत अर्थात् संवत् रहे हैं। वे ही पहले अब भी आती है।
स्वप्न में शिष्य ने जैसा देखा, लिख दिया। गुरुसत्ता ने स्पष्टीकरण कर बोध करा दिया। सद्गुरु के रूप में हमारे बंद चक्षुओं को खोलकर ज्ञान का, सत्य का मार्ग दिखाना गुरु का कार्य है एवं वह उसे बखूबी करता है। जीवन-साधना के पथ में एकमात्र पथ प्रदर्शक गुरुसत्ता ही है। वे कदम-कदम पर साथ चलकर मार्गदर्शन करते हैं। अंधेरी गलियों को प्रकाशवान् बनाते हैं। इसी प्रकार एक साधक को 28-11-1951 को लिखा एक पत्र यहाँ पठनीय हैं।
“आपकी साधना ठीक गतिपूर्वक चल रही है। आपका व्यावहारिक जीवन जिस स्थिति में हो, उसी के अनुरूप मनोदशा रहे, इसका हम प्रयत्न करते हैं। अधिक उत्साह एवं आवेश उत्पन्न हो जाए, तो आपको बाह्य जीवन में उलट-पलट करनी पड़ेगी। इसलिए हम यह प्रयत्न करते रहते हैं कि शांत तरीकों से चुपचाप आपका अंतरात्मा पकता रहे और व्यावहारिक जीवन में कोई उलट-पुलट न आने पाए। अन्यथा आप गृही से विरागी हो सकते हैं। वह स्थिति आपके कर्म बंधनों को पूरा होने तक, गृहस्थ का उत्तरदायित्व हल्का होने तक आ जाना ठीक नहीं।”
आपकी साधना ठीक शांतिपूर्वक चल रही है। आप का व्यवहारिक जीवन निर्वात में हो उसी के अनुरूप आदेश रहे उसका हम प्रकट करते हैं। आवश्यक उत्तम एवं आवेश उत्तक हो जाये तो आपको बाह्य जीवन में उलट पलट करनी पड़ेगी। इसलिए हम पर प्रसन्न करते रहते हैं कि षाना तरीकों से चुपचाप आपका अंतःकरण एकता रहे और व्यवहारिक जीवन में कोई से उलट पलट न आने वाले। आपका आप नहीं में निराशी हो सकते हैं। वह स्थित आपके कर्म वक्रतों को पूरा होने तक गृहस्थ कर एक आस्तिक हलका होने तक ठीक नहीं।
साधना संबंधी व्यावहारिक मार्गदर्शन कितना गहरा हैं, यह यहाँ देखा जा सकता है। अक्सर होता यह है कि अति उत्साह में व्यक्ति कुछ ज्यादा ही करने की सोचता है। बहिरंग जीवन अस्त-व्यस्त होने लगता है। परिवार में सभी गड़बड़ाने लगते हैं। साधारण सद्गृहस्थ बने रहकर साधना करना आसान हैं, परंतु उस समय अत्यधिक आवेश के कारण वैरागी होने का, घर से भागकर कहीं निर्जन में तप करने का मन करता है, तब यह मार्गदर्शन कितना युगानुकूल है कि कहीं गृही से वैरागी होने की बात न सोच बैठना। पहले गृहस्थ के उत्तरदायित्वों को पूरा करना, कर्म बंधनों को शिथिल करना और चिंता मत करना, हम तुम्हारे साथ है, तुम्हारी अंतरात्मा को धीरे-धीरे पका रहे हैं। बस जितना बताया है उस पर चलो।
इसी प्रकार का, लगभग ऐसे ही आशय का एक और पत्र 31-3-67 को अंजार (कच्छ) के श्री लाभशंकर जी दवे को लिखा हमारे पास है। पूज्यवर लिखते हैं-
“ढलती आयु में वैराग्य उचित हैं, पर यह वैराग्य पलायनवादी-अकर्मण्य न होना चाहिए। आप भविष्य में एक उच्चकोटि के धर्म प्रचारक बनें। ब्राह्मण जीवन ऐसे ही पुनीत उद्देश्यों के लिए मिलता है। आप स्वयं प्रकाशवान् बनें और संसार में प्रकाश उत्पन्न हो, ऐसी योजना भविष्य के लिए बना लें।”
ढलती आयु में वैराग्य उचित है। वह वैराग्य, पलायनवादी अकर्मण्य न होना चाहिए। आप भविष्य में एक उच्चकोटि के धर्म प्रचारक बनें। वयस्क जीवन ऐसे ही दुर्लभ उद्देश्य के लिए मिलता है। आप स्वयं प्रकाश वान बनें और संसार में प्रकाश उत्पन्न हो ऐसी योजना बना लें।
सहज ही कभी भी इस भौतिकवादी दुनिया से वैराग्य की भावना जाग उठती है। मन चाहता है कि सब छोड़कर हिमालय चल दें, गृहस्थी की बोझभरी जिंदगी से मुक्त हो एकाकी मस्तमौला जीवन जियें, किंतु परमपूज्य गुरुदेव अध्यात्म का क, ख, ग, समझाते हैं व कहते हैं कि अकर्मण्यता वैराग्य नहीं है। धर्मप्रचार हेतु किया जाने वाला सत्कर्मरूपी पुरुषार्थ गृहस्थी में भी संभव हो सकता है और वह ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। वे लिखते हैं कि ब्राह्मण जीवन मिला है, सही अर्थों में ब्राह्मण हैं, तो प्रकाशवान् बनें, प्रकाश का विस्तार करें। “रत्नप्रभं दिव्यमनादिरुपं दीप्तिकरं विषालम्“ से उक्ति दी है परमपूज्य गुरुदेव ने ब्राह्मण की। वही प्रारंभिक शिक्षा लाभशंकर जी को मिली। लाभशंकर दवे जी ने अपना सारा जीवन पूज्यवर की विचारधारा के प्रचार-प्रसार में लगा दिया। उनने अंजार-गाँधीधाम गायत्री शक्तिपीठ के निर्माण में महती भूमिका निभाई। कच्छ के प्रवेशद्वार पर स्थित अंजार शक्तिपीठ एकमात्र ऐसा देवालय था, जो विगत जनवरी के भूकंप के तबाही भरे महाविनाश में खड़ा रहा। एक खरोंच तक नहीं आई है, इस शक्तिपीठ व इसके आसपास के क्षेत्र में, जबकि सारा अंजार ही ध्वस्त हो गया है। उस महासत्ता की अनुकंपा पाए हमारे लाभशंकर जी आज हमारे बीच तो नहीं हैं, पर सभी उनके पुण्य-परमार्थ को बराबर याद करते हैं।
साधनाओं में साधकों को कई प्रकार की बाधाएँ आती है। कभी-कभी मन परेशान हो जाता है। ऐसे में सभी साधक अपनी मनोव्यथा पूज्यवर को लिख बैठते हैं। तब उनके उत्तर हम सबके लिए मार्गदर्शक बन जाते हैं। 12-1-61 को राठ के श्री रामस्वरूप चाचोदिया जी को लिखा पत्र इस संबंध में प्रस्तुत है।
“तप को भंग करने के लिए आसुरी शक्तियां सदा गड़बड़ी फैलाती है। प्राचीनकाल में भी ऐसे ही विघ्न आते थे, जिनके कारण ऋषि-मुनि बहुधा चिंतित रहते थे। आपके तप को भी नष्ट करने का आसुरी शक्तियों ने प्रयत्न किया है। जो सर्प, जो बालक, जो पुरुष आपके निकट घूमता रहा हैं, वह असुरत्व ही है। माता का प्रकाश प्रदीप्त होने से उसका कुछ वश नहीं चला। आपके स्वप्नों से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि दैवी और आसुरी शक्तियां आपके संबंध में अपने-अपने दाँव फेंक रही है। हमें विश्वास हैं, अंत में आपका दैवी तत्व ही सफल होगा।”
तप को करने के लिए आसुर शक्तियां एक गड़बड़ी फैलाती है। प्राचीन काल में भी ऐसे विघ्न आये थे जिसके कारण ऋषि मुनि बहुत चिन्तित रहते थे। आपके तप को भी काट करने का आसुरी शक्तियों ने प्रयास किया है। और सर्प जो बालक जो पुरुष आपके बिना घूमता रहा है वह असुरता ही है। आज तक प्रकाश प्रदीप होने से उसका भय सध नहीं चला। उसके समयों से यह प्रतीत होता है कि देवी और आसुरी शक्तियां आपके समय में अपने अपने दाँव पर नहीं है।
साधक की चिंता थी स्वप्न में होने वाले कई तरह के अनुभव। साधना में मन भी नहीं लगता था। ऐसे में स्पष्ट मार्गदर्शन मिलते हैं। आश्वासन मिलते ही साधना सफलता की ओर अग्रगामी होने लगती है।
कई बार साधकों को उच्चस्तरीय आनंद की साधना के माध्यम से अभीप्सा रहती है। मन उसे पाने को लालायित हो उठता है। लगता है कि गुरुसत्ता अभी उन साधना सूत्रों को हमें बता नहीं रही है। बारंबार आग्रह करने पर पूज्यवर का उत्तर इस प्रकार होता था। 12/2/54 को श्री धर्मपाल सिंह जी (चाँदपुर बिजनौर) को लिखा पत्र इस संबंध में द्रष्टव्य है।
“आनंद मनोलय का एक लक्षण है। कर्मयोग में वैसा आनंद नहीं आता, पर कर्तव्यपालन का संतोष रहता है। यह संतोष ही कर्मयोग का आनंद है। आप अपने मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक बढ़ते चलें। मनोलय के आनंद की चिंता न करें, क्योंकि वह भी इंद्रिय आनंद से कुछ ऊँचा, एकाग्रताजन्य मानसिक आनंद ही है। साधना से शुद्ध हुआ आत्मा जब अपनी मूल स्थिति को पहुँचता है तो वह स्वयं ही आनंदमय हो जाता है।”
आनंद मनोलय कर एक लक्षण है। कर्म योग में वैराग्य आनंद नहीं आता पर कर्तव्य पालन कर संतोष रहता है। यह संतोष ही कर्मयोग का आनंद है। आप अपने मार्ग पर दृढ़तापूर्वक बढ़ते चलें। मनोलय में आनंद की चिंता न करें क्योंकि वह भी इन्द्रिय आनंद से एकाग्रताजनक मानसिक आनंद ही है। साधना से शुद्ध हुई आत्मा जब अपनी मूल निर्वात में पहुंचती है तो वह स्वयं तो वह स्वयं ही आनंद हो जाता है।
कितना सरल-सुँदर स्पष्टीकरण है एवं उंगली पकड़कर किया गया मार्गदर्शन है। सद्गुरु के माहात्म्य का इसी कारण ग्रंथों में गायन किया गया है। बार-बार यही बात कही जाती है कि आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में अवलंबन गुरुसत्ता का ही लें। हमारे जो भी संशय हैं, वे स्वतः ही दूर हो जाते हैं। जो हम चाहते हैं, फिर हमें वही उपलब्ध होने लगता है।
कबीरदास जी ने सही ही कहा है-
सतगुरु साँचा सूरिवाँ, तातैं लोहिं लुहार। कसणी दे कंचन किया, ताई लिया ततसार॥
“सदगुरु सच्चा सूरमा हैं, जो लोहे के समान तामसिक वृत्ति से भरे शिष्य को भी साधना की आग में गरम कर आकार दे देता है। उसका तमस दूर करता है। (यहाँ गुरु का द्रष्टाँत लोहार (थूरमा) और शिष्य का तमस भरे लोहे से दिया गया है।) दूसरी पंक्ति में गुरु को सुनार कहा गया हैं, जो सोने के समान शिष्य को साधना की आग में गरम कर शुद्ध करता है और ज्ञान-कसौटी पर घिसकर उसकी शुद्धता प्रमाणित करता है।”
कबीर को समझ लिया तो हमने सद्गुरु को समझ लिया। परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी को समझ लिया, तो हमने गुरुतत्त्व के मर्म को जान लिया। ऐसे में एक अंतिम पत्र और देख लें। सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा। यह पत्र 3/2/51 को भिण्ड म.प्र.) के श्री राममूर्ति दीक्षित को लिखा गया था।
“हम तुम्हारी आत्मा में अधिक तीव्र ब्रह्मतेज प्रवेश करने के उद्देश्य से पिछले दिनों कई बार भिंड गए हैं। उसी सूक्ष्म यात्रा को तुमने स्वप्न में देखा है। वह केवल स्वप्न नहीं हैं, वरन् एक सच्ची अनुभूति है।
पिछले जन्म में तुम उच्च कोटि के तपस्वी थे। कुछ साधना शेष थी। उसे पूरा करने तथा कुछ प्रारब्ध भोगने को शेष थे, इन्हें भोगने को यह जन्म लेना पड़ा। अब उस पूर्व लक्ष्य की ओर ही अधिक ध्यान देना चाहिए। साँसारिक माया में फिर पैर फंस जाए, तो पीछे वह उद्देश्य नष्ट हो जाएगा और चौरासी के चक्र में फिर लाखों वर्ष घूमना पड़ेगा। इस झंझट से सावधान करने के लिए हम अक्सर तुम्हारी सूक्ष्म चेतना को स्पर्श करने जाया करते हैं।”
पिछले जनम में तुम उच्च कोटि के तपस्वी थे। इस साधना शोक के लिए करने के लिये शेष नहीं है।
बिना किसी व्याख्या के यह प्रसंग यहीं समाप्त करते हैं।
इस सहस्राब्दी का प्रथम गणतंत्र दिवस। नई दिल्ली में राजपथ पर भारत के इक्कीसवीं सदी के सैन्यशक्ति संपन्न भारत के दर्शन को हजारों आँखें प्रत्यक्ष व लाखों-करोड़ों नजरें टेलीविजन पर लगी थीं। कुछ ही अवधि बाकी थीं, जब राष्ट्रपति को राजपथ की परेड का सैल्यूट लेना था। यह सब कुछ हुआ, पर तबाही के उस ताँडव के बाद, जो प्रातः आठ-पचास की वेला में अब तक के सबसे भयावह भूकंप के रूप में घट गया। राष्ट्र का सबसे संपन्न कहा जाने वाला व्यवसायिक दृष्टि से संपन्न राज्य गुजरात कुछ ही क्षणों में मौत व तबाही के नजारे में बदल गया।
तबाही का मंजर
गणतंत्र दिवस न होता तो अनुमानतः सरकारी आंकड़ों के अनुसार तीस हजार एवं जनसामान्य के आकलन के अनुसार प्रायः एक लाख मौतों का अनुपात कई गुना होता, ऐसा कइयों का मत है। कई लोग इसलिए बच गए कि वे घरों में न होकर खुले मैदानों में थे, अपने नौनिहालों के साथ मौजूद थे। छुट्टी का दिन था, कई लोग इस कारण काल कवलित हो गए कि वे बिस्तरों में थे एवं टेलीविजन पर परेड देखने के बाद तरोताजा होना चाहते थे। अजार के एक स्कूल की चार सौ बच्चों की एक रैली गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में एक सँकरी गली से निकल रही थी, जय-जयकार के नारे लगा रही थी, पर भूकंप ने हिलती भवन की दीवारों को उन पर ढहा दिया। अधिकांश अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गए। कुछ ही बच गए। छुट्टी के दिन विशेष रूप से आयोजित एक परीक्षा में अहमदाबाद मणीनगर के एक विद्यालय में भाग ले रहे बच्चों में से एक बहुत बड़ा हिस्सा स्कूल भवन के धराशायी होने से यौवन में पैर रखने से पूर्व ही धरती से चला गया। क्या कहा जाए? कुछ समझ में नहीं आता। गणतंत्र दिवस ने बचाया भी, मारा भी।
मलबों में दबी सिसकियाँ
अंदर से आवाज आ रही “हो अमने बचावो” “अरे कोई बचावो” एवं बड़ी-बड़ी मलबा हटाने वाली मशीनें लगी हों, तब भी बचावकर्मी कुछ न पा रहे हों तो क्या करें? मलबा बेहद सावधानी और सतर्कता से हटाया जाना था, क्योंकि भीतर मौजूद लोग कहाँ-किस तरह दबे हैं, यह जानकारी नहीं थी। जैसे-जैसे समय गुजरता गया, भारी सीमेंट-कंक्रीट को तोड़कर स्थान बनाने में वक्त निकल गया, ऐसी आवाजें क्रमशः धीमी होती चली गईं। यह नहीं कि बचाया न गया हो। लोग मलबे में दबे एक घंटे नहीं, चौबीस घंटे नहीं, बारह-पंद्रह दिन बाद तक निकल हैं। कैसे-कैसे भगवान् ने उनको जीवित रखा हैं, ये सब अपने आप में याद रखने योग्य संस्मरण हैं, परंतु यदि ये भारी सीमेंट-कंक्रीट के स्लैब न होते, बहुमंजिली भवनों के ताश के पत्तों के गिरने की तरह ढलने की प्रक्रिया न होती, तो शायद अधिकांश की जान बचाई जा सकती थी।
बचाव कार्यों की तकनीक जो उपयोगी हो सकती थी
मलबे में कैमरे को डालकर जीवित लोगों को देखा जा सकता है। अनावश्यक खुदाई कर कष्ट में फंसे व्यक्ति को और अधिक तकलीफ देकर मारने की जरूरत नहीं। पर अभी संभवतः यह तंत्र हमारे यहाँ विकसित नहीं हो पाया है। सेंसर की मदद से साउंड मशीनों के जरिए मलबे के बड़े क्षेत्र में जीवित लोगों को तलाशा जा सकता है। इसके अलावा इस तरह की आपदा में खोजी कुत्ते बहुत कारगर होते हैं। वे इसके लिए प्रशिक्षित होते हैं और कुछ पता चलने पर ही भौंकते हैं। स्विट्जरलैंड, क्रोएषिया, यूक्रेन, फ्राँस, रूस, इंग्लैंड, स्वीडन आदि देशों में ऐसी तकनीक से संपन्न खोजी कुत्ते लेकर ढेरों टीमें पहुँचीं। उनने काफी जीवित व्यक्तियों को निकाला भी। परंतु जब दल आ जाएं व स्थान विशेष तक बड़ी देर से पहुँचें, केवल शासकीय मशीनरी की काहिली के चलते, तो कोई क्या कर सकता हैं? स्विस एयर का विशेष विमान रेडक्राँस की व डिजेस्टर रिलीफ की टीम लेकर 16 टन उपकरणों के साथ 27 जनवरी की प्रातः मात्र 14 घंटे के अंदर अहमदाबाद पहुँच चुका था। ऐसे और भी दल 28 व 29 जनवरी की शाम तक आ गए थे। यह अलग बात है कि हम उनका पूरा लाभ न ले पाए। मौत कभी किसी की प्रतीक्षा करती है?
देश का अब तक का सबसे बड़ा राहत अभियान
गुजरात की इस त्रासदी ने अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर वायुसेना के विमानों, सेना के बलों तथा शासकीय अधिकारीगणों, विदेशी सहायता दलों, स्वैच्छिक समाजसेवी संगठनों के माध्यम से इस शताब्दी सबसे बड़ा राहत अभियान देखने का अवसर दिया। राहत सामग्री प्रायः हर घर से, हर नागरिक की ओर से सौराष्ट्र व कच्छ पहुँची। चूँकि नाम भुज का था, अतः अधिकांश राहत दल शुरू में वहीं पहुँचे, किंतु धीरे-धीरे वे आस-पास के क्षेत्रों में, गाँवों-ताल्लुकाओं में फैलते चले गए। अखिल विश्व गायत्री परिवार, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, स्वामी सेवक संघ, स्वामी नारायण संप्रदाय, विश्व हिंदू परिषद, स्वाध्याय परिवार सहित सिख-मुसलिम सभी संगठन अपने दल-बल के साथ चौबीस घंटों में पहुँचकर सक्रिय हो गए, तुरंत ही जीवितों को निकालने, उन्हें फर्स्ट एड देने, आर्थोपेडिक स्तर पर कुशलतम सहायता देने का क्रम आरंभ हो गया। सुदूर गाँवों में यह विशेषज्ञ स्तर की मदद देरी से पहुँची, पर स्वैच्छिक संगठनों ने अपनी ओर से कोई कसर न रखी।
सामान्यजन कई बार भूल जाते हैं कि ऐसी तबाही के ताँडव में सरकारी अधिकारी, उनके कार्यालय व परिवार भी चपेट में आ जाते हैं। राहत सामग्री के वितरण में देरी हेतु उन्हें दोष देने का क्रम इस बार नहीं चला, क्योंकि वे स्वयं भी पीड़ितों में से थे। जो भी संगठन जहाँ पहुँचा, कैंप डालकर सबसे पहले तात्कालिक राहत कार्यों में लग गया। शांतिकुंज हरिद्वार का दल भचाऊ पहुँचकर वहाँ के चौराहे पर 26 की शाम को कैंप लगाकर 27-1 की प्रातः वहाँ से नियमित दवाओं, भोजन आदि कही आपूर्ति आरंभ कर चुका था। बाद में स्थान बड़ा होता गया एवं उसने आस-पास के सभी संगठनों के आधार शिविरों को न केवल वाहन उपलब्ध कराए, उन्हें भोजन-पानी भी उपलब्ध कराया एवं एक अस्थाई नगर का निर्माण भी होता चला गया। भुज कलेक्ट्रेट, अंजार गायत्री शक्तिपीठ, भचाऊ नगर (जोकि पूरा विस्मार हो गया था) राजमार्ग से लगा चौराहा तथा मोरबी-मालिया क्षेत्र में चार कैंप 29 जनवरी की शाम से गायत्री परिवार की ओर से आरंभ कर दिए गए थे। विभिन्न संगठन अपनी ओर से विशेषज्ञों, चिकित्सकों, राहत दलों, लाश निकालने वाले स्वयंसेवी कार्यकर्त्ताओं के साथ सक्रिय रहे, यही कारण था कि मृत्यु के आंकड़े जहाँ बढ़ सकते थे, वहाँ सिमटकर रह गए।
बड़ी व्यापक तबाही हुई है कच्छ-सौराष्ट्र में
लगभग 7.9 तीव्रता वाले (पूर्व में 6.9 इसे आँका गया था) इस भूकंप ने अपने केंद्र अमरसर (भुज से बीस किलोमीटर उत्तर-पश्चिम) से तबाही आरंभ कर तीन मिनट में पूरा भुज जिला, राजकोट, जामनगर, मोरबी, सुरेंद्रनगर, भावनगर तक को प्रभावित कर दिया था। अहमदाबाद, सूरत आदि शहरों की तबाही मानवजन्य हैं, पर हुई तो है। सर्वाधिक मौतें भुज में हुईं, उसके बाद अंजार, भचाऊ, रापर और मोरबी शहरों में हुई हैं। दो मंजिल से अधिक के जितने भी भवन थे, भुज शहर व अंजार के पुराने शहर में बिस्मार हो गए। जिले के 55 गाँव लगभग 6 प्रतिशत से अधिक नष्ट हुए हैं। बिजली, पानी, टेलीफोन के अभाव में स्थिति प्रलय की तरह लगती थी। अहमदाबाद, राजकोट, जामनगर, सुरेंद्रनगर जिले एवं सौराष्ट्र के गाँवों में भी काफी जानें गईं। घायलों के आंकड़े भी पचास हजार से ऊपर हैं। प्रसन्न चित्त रहने वाले, जीवट के धनी एवं अपने हस्त शिल्प के लिए विश्वविख्यात भुज-कच्छ क्षेत्र मानों भूतों के एक डेरे में बदल गया। वायुसेना स्टेशन, सिविल अस्पताल व अधिकांश सरकारी दफ्तर धराशायी हो गए। परंतु मानवी पुरुषार्थ ने अस्थाई अस्पतालों का निर्माण कर तंत्र पुनः खड़ा कर दिया। बिजली विभाग ने जहाँ संभव था बिजली की सप्लाई 1 फरवरी तक आरंभ कर दी थी, साथ ही पानी के टैंकर भी स्थान-स्थान पर पहुँच गए थे। शुरू में तो मात्र पानी के पाउचों व बॉटल्स का ही सहारा था, जो सारे देश से बहुसंख्य मात्रा में पहुँच गए थे। एक सबसे अच्छा कार्य यह हुआ कि सड़क विभाग के निर्माण की दक्षता के कारण कहीं भी सड़कें नहीं बैठी एवं सब ओर राहत दल पहुँच सके। दूसरा दूरसंचार की लाइनें बिछा पाना तो संभव नहीं था, किंतु मोबाइल फोन का सेल्युलर नेटवर्क पाँच दिन के अंदर आरंभ हो गया। इससे पारस्परिक तालमेल स्थापित करने में बड़ी मदद मिली।
भय व आतंक चारों ओर
जब धरती काँपने लगी, तो डर के मारे कई लोग ऊँची मंजिलों से कूद पड़े। कुछ शायद बच जाते, पर जान गंवा बैठे एवं कई घायल हो गए, अपने पैर तोड़ बैठे। भूकंप के बाद भी कई दिनों तक ऊर्जा निकलती है। अतः ‘आफ्टर शॉक्स’ आते हैं। इन्हें गुजराती में ‘आँचके’ हिचकोले कहते हैं। ये भी कभी 1 या 2 तीव्रता के, कभी 5 से भी अधिक तीव्रता के होते हैं। कई दिन तक आते रहे इन हिचकोलों (आँचकों) ने भी कइयों को भयभीत कर घर से बार निकालने या कूदने पर मजबूर कर दिया। बच्चों में जहाँ दहशत थी, वहाँ बड़े अपने घरों में रहने को लगभग बीस दिन बाद तक भी तैयार नहीं हो पाए थे। क्या बड़े, क्या छोटे सभी टैंपरेरी टेंट में घर के बाहर सड़क के किनारे निवास करने को तैयार हैं, पर प्रायः जर्जर हो गई छह सौ से अधिक इमारतों में रहने की हिम्मत नहीं हो रही है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार उस भय को सामान्य स्थिति आने में अभी काफी समय लगेगा। सबसे बड़ी चिंता उनकी हैं, जो इस हादसे में एकाकी रह गए हैं। कहीं किसी घर में एक या दो बच्चे रह गए हैं, तो कही एक 8 साल की बूढ़ी अम्मा जिंदा रह गई हैं, मानो प्रकृति भी उनसे मजाक कर रही हो। जो परिवार उजड़ गए हैं, उन्हें मनोवैज्ञानिक आधार देने में काफी समय लगेगा। शवों और घायलों के दृश्य सारे विश्व ने अपने टी.वी. स्क्रीन पर देखे हैं। महाविनाश की झाँकी भी देखी हैं। अभी लाखों लोग उसे नहीं भूल पाएंगे। पत्थर दिल आदमी भी पिघल जाए, ऐसे दृश्य हममें से कइयों ने अपनी आँखों से देखे हैं।
सेना की सराहनीय भूमिका
सेना के जवानों ने प्रारंभिक एक सप्ताह में जिस तरह कार्य को अंजाम दिया है, सराहनीय है। हमेशा की तरह सेना के जवान तुरंत बचाव कार्य में लग गए। मलबों से कई जिंदा लोगों को निकालने, अस्पताल पहुँचाने का श्रेय उन्हीं को जाता है। वायुसेना ने मानो दिल्ली व भुज के बीच, दिल्ली अहमदाबाद के बीच एक पुल बना डाला। बड़े-बड़े फोल्डिंग अस्पताल, जेनरेटर्स, इंजीनियरिंग के उपकरण, खाद्य सामग्री, टेंट्स व दवाइयाँ तुरंत उन्हीं के प्रयासों से पहुँच गईं। यूक्रेन का एक सैनिक अस्पताल शांतिकुंज के बेंस कैंप के पास आकर टिका। उसके जनरल व 6 से अधिक मेडीकल, पैरामेडिकल कार्यकर्ताओं ने सात दिन एक कर भचाऊ क्षेत्र में कैंपिग कर गाँवों से ढूंढ़-ढूंढ़कर लाए गए कई फ्रैक्चर आदि के रोगियों का स्थायी इलाज किया।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहायता
तीन दिन के अंदर बीस देशों ने राहत सामग्री भेजी और लाखों डालर के बराबर सहायता का वादा ही नहीं किया, उसे भेज भी दिया। प्रवासी भारतीय भी पीछे नहीं रहे। सभी ने बढ़-चढ़कर योगदान दिया एवं इसमें उनके साथ कार्य करने वाले अमेरिकन्स, कैनेडियन्स, ब्रिटिश सभी ने साथ दिया है। एक जहाज भर के पीने का पानी एवं फ्रूट जूस जहाँ सउदी अरब भेजता है वहाँ एक वर्ष तक पूरे गुजरात के सभी अस्पताल उपयोग कर सकें, इतनी औषधियाँ पूरे यूरोप के देशों ने मिलकर भेजी है। पाकिस्तान ने कंबलों की पूरी खेप एवं भारी संख्या में टेंट भेजे हैं। वसुधैव कुटुँबकम् का एक साकार स्वरूप-सा दीखता है, इस त्रासदी में।
तात्कालिक के बाद अब स्थायी प्रयास जरूरी
तात्कालिक राहत में जो सबसे विलक्षण पहलू सामने आया है, वह है लोगों का स्वाभिमान-मुसीबतों से जूझकर अपने पैरों पर पुनः खड़ा होने का साहस तथा आवश्यक न होने पर सहायक के लिए मना कर देना। जुझारू कच्छ व सौराष्ट्र के लोगों ने राहत सामग्री के लिए कहीं अव्यवस्था नहीं पैदा की, न ही यह देखने को मिला कि कहीं किसी ने कुछ जमा की है। राहत सामग्री तो इतनी पहुँच गई है कि वर्षभर यदि इसका वितरण सुनियोजित ढंग से हो, तो यह सारे सौराष्ट्र व कच्छ को संकट से उबालकर, दुर्भिक्ष से भी निकालकर पुनः खड़ा कर देगी। पीड़ित नागरिक अपनी जगह सही हैं, पर पुनर्निर्माण हेतु तो वे सरकार का मुँह देखेंगे ही। सरकार भी चाहती है कि मकान पुनः बन जाएँ, मानसून आने से पूर्व ही सबके सिर पर छत हो। पर यह मुमकिन नहीं। जिनके घर जहाँ थे, जिस स्थिति में थे, वे उसी तरह वहीं पर बनाना चाहते हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक यही प्रश्न पेचीदा बना हुआ था कि पुनर्वसाहट हेतु सरकार एवं अशासकीय स्वैच्छिक संस्थाएँ किस तरह कार्य करें। यदि प्रशासकीय मशीनरी पर विश्वास नहीं हो पा रहा हैं, तो वह स्वाभाविक है।
जो लोग बेघर हो गए, कच्छ की ठंडी रात्रि व दिन की तपती धूप में अभी मात्र उनमें से पचास प्रतिशत को अस्थायी शरण मिल पाई हैं। झुग्गी-झोपड़ों में जिस तरह ताल पत्री की छत बनाकर अस्थायी रूप से लोग रहते हैं, वैसे ही अधिसंख्य व्यक्ति रह रहे हैं। जो संपन्न थे, समर्थ थे, वे अपने संबंधियों के पास मुँबई, बैंगलोर, गुजरात के अन्य क्षेत्रों में चले गए। सामान चला गया तो क्या, जान तो बची। कई तो संभवतः वापस न भी लौटें। पर अब प्रयास सभी के लिए स्थायी स्तर पर आवास निर्माण के माध्यम से होना है। गायत्री परिवार ने अन्य कई संगठनों के साथ मिलकर प्रत्येक गाँव में एक स्कूल, एक चिकित्सालय का तंत्र खड़ा करने का निश्चय किया है। संभव है सरकार भी उसमें सहायता करे। इसके अतिरिक्त ‘होंमडाउन’ के रूप में कच्छ की पुरानी संस्कृति के अनुरूप ‘भूँगा’ जो पूरी तरह से एयरकंडीशंड भी होते हैं तथा भूकंप विरोधी भी, सहयोगी संगठनों की मदद से निर्माण करने का सोचा है। भूकंप, तूफान या तापमान की बढ़ोत्तरी से जूझने वाले ये स्थायी निर्माण निश्चित ही लाटूर में की गई गलतियों का समाधान करेंगे।
स्कूलों का निर्माण कर बच्चों की पढ़ाई सतत चालू रखना उन्हें ‘साइकोलॉजिकल ट्रॉमा’ से बचाने का एक प्रयास है। यह कार्य अस्थायी 4 स्कूल खोलकर गायत्री परिवार ने आरंभ कर दिया है। अभी भी बहुत बड़ा क्षेत्र बाकी है, जहाँ यह कार्य होना है। स्थायी कार्यों में भुज के, कच्छ के शिल्प को, शिल्पकारों को अपने पैरों पर खड़ा करने का तंत्र खड़ा करना एक सबसे बड़ा प्रयास होगा। यहाँ की दस्तकारी सारी दुनिया में विख्यात है। यदि इसे पुनरुज्जीवित किया जा सका, तो कच्छ अपने पैरों पर पुनः खड़ा हो सकेगा।
काश यह संवेदना आगे भी जीवित बनी रहे
गुजरात की इस त्रासदी में भारतवर्ष को एक होते देखा गया। संप्रदाय-वर्ग-जाति का भेद भूलकर सभी औरों के हित जीते देखे गए। संवेदना का उभार इस सीमा तक था कि हर व्यक्ति ने अपना न्यूनतम अंशदान दिया ही, कइयों को प्रेरित भी किया। जिस तादाद में राहतकर्मी व सामग्री प्रभावित क्षेत्र में पहुँचे हैं, यह एक कीर्तिमान है। वहाँ के दुखी-आहत-छत से महरुम हुए लोगों के प्रति जगी यह संवेदना इसी तरह जगी रहे, तो हम एक नए भारत को जागकर खड़ा होते देख सकेंगे। अनाथ बच्चे कितने गोद लिए जाते हैं, कितने बूढ़े माता-पिता आश्रयस्थलों पर शरण ले पाते हैं, कितनों को हम उनके घावों पर मरहम लगाकर पुनः वापस लौटा पाते हैं, यह सभी प्रश्न अभी अनुत्तरित हैं, पर सभी में संवेदनशीलों के लिए अनंत संभावनाएं छिपी पड़ी है। यही भारत की थाती है। गुजरात के सौराष्ट्र का लिंबड़ी से पाटडी तक, जौडिया से भचाऊ तक एवं रापर से माँडवी, भुज-अंजार तक का क्षेत्र पुनः उठ खड़ा होगा, इसमें जरा भी अविश्वास किसी को नहीं करना चाहिए। यही आशावाद तो भारतीय अध्यात्म का प्राण है।
26 जनवरी 12 की प्रातः 8.5 की वेला में भारत के पश्चिमी भाग में आए भूकंप ने तबाही और विनाश का जो मंजर खड़ा कर दिया है, उसने सबका ध्यान पुनः प्रकृति के इस रौद्र रूप की ओर खींचा है। भूकंप पहले भी आते रहे हैं, किंतु इक्कीसवीं सदी के आते-आते जिस तेजी से उनके आने की अवधि और समीप आती आ रही है एवं जिस तीव्रता से वे आते जा रहे हैं, हम सभी को सतर्क करने के लिए काफी हैं। 1819 से 195 तक की प्रायः एक सौ तीस वर्ष की अवधि में प्रति 13 वर्ष में एक बार भारत में कहीं भूकंप आता था। 195 से 1975 के बीच में यह अवधि घटकर 6.25 वर्ष रह गई। अब 1988 से 12 के बीच प्रति दो वर्षों में तबाही लाने वाले भूकंप सतत आ रहे हैं। इस रिपोर्ट से हमें अभी से सावधान हो जाना चाहिए एवं विकास के विषय में अपनी रणनीति पर विचार करना चाहिए।
बढ़ती जा रही है तीव्रता इन भूकंपों की
1819 में कच्छ-गुजरात (जहाँ अभी ताँडव नृत्य हमने देखा है) में 8. रीक्टी स्केल की तीव्रता का, 1918 में मध्य आसाम में 7.3 तीव्रता का, 1930 में धुबरी आसाम में 7.1 की तीव्रता का, 1934 में बिहार नेपाल सीमा पर 8.3 तीव्रता का तथा 1941 में अंडमान में पुनः 8.5 की तीव्रता का, 1956 में अंजार गुजरात में 7. की तीव्रता का, 1967 में कोयना महाराष्ट्र में 6.5 की तीव्रता का तथा 1975 में किन्नौर हिमाचल में 6.2 की तीव्रता का भूकंप आया। 1988 में 7.2 की तीव्रता का भूकंप भारत-वर्मा सीमा पर आया था। इसी वर्ष पुनः बिहार-नेपाल सीमा पर 6.5 की तीव्रता का कंपन हुआ था। 1999 में उत्तरकाशी (6.6), 1993 में लाटूर महाराष्ट्र (6.8) हम सबकी याद में अभी भी ताजा है। अब उसी शृंखला में भुज गुजरात में 7.9 की तीव्रता का यह भूकंप आया हैं, जिसने पूरे कच्छ व सौराष्ट्र के बहुत बड़े भाग, अहमदाबाद-सूरतनगर में तबाही लाकर यह चेतावनी दी है कि अब इनकी तीव्रता और भी अधिक होगी, तबाही भी अधिक होगी।
क्यों आ रहे हैं ये हिचकोले
इस बीच इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भूकंप के पाँच सौ से अधिक झटके इस क्षेत्र में आ चुके हैं तथा एलसल्वाडोर, टर्की, इंडोनेशिया, चीन एवं सिएटल वाशिंगटन (अमेरिका का उत्तर पश्चिमी तट) भूकंप से बुरी तरह प्रभावित हो चुके है। यह सब विगत दो माह में ही हुआ है। भारत के विषय में सारे विश्व के भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि यहाँ तेजी से भूगर्भ के नीचे ऊपर की ओर टेक्टाँनिक प्लेट्स के खिसकाने की प्रक्रिया जारी है। पृथ्वी के ऊपरी पटल में ठोस चट्टानों की कई विशाल परतें हैं, जो अपने अंतिम छोरों पर गतिमान रहती है। इन छोरों को प्लेट बाउंड्रीज भी कहा जात है। ज्यादातर भूकंप इन परतों के अंतिम छोरों या फिर परतों में मौजूद दरारों (फाल्ट लाइन्स) से शुरू होते हैं। गुजरात का भूकंप भी इसी तरह का था।
हैदराबाद के ‘नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के वैज्ञानिकों के मुताबिक समुद्रतल हर वर्ष पाँच सेंटीमीटर की दर से उत्तर पूर्वी दिशा में बढ़ रहा है। साथ ही सौराष्ट्र की जमीन विपरीत दिशा में घूम रही है। इस तरह हर 25 से 3 साल में समुद्रतल 125 से 15 सेंटीमीटर फैल रहा है। यही वजह है कि न सिर्फ सौराष्ट्र बल्कि उसके दूसरे छोर हिमालय में भी भूकंप का कारण बन रहा है। प्लेट टेक्टाँनिक थ्योरी की व्याख्या से समझाते हुए वैज्ञानिक कहते हैं कि भारतीय प्लेट में कटाव और उठान हो रहा हैं, जो कि भूकंप का कारण बनता जा रहा है।
तीव्रता का एक अनुमान
वैज्ञानिकों के अनुसार 8 की तीव्रता का भूकंप लगभग 1 मिलियन टन टी.एन.टी. के विस्फोट के बराबर होता है। 1973 में ताँगशान (चीन) जिसमें 65 लोग मरे थे, प्रायः 7.9 स्केल का था एवं इससे अधिक तीव्रता का 8.9 की तीव्रता का भूकंप क्वीटो इक्वेडोर (लातिनी अमेरिका) में आया था। इससे 1.25 मिलियन टन ऊर्जा का विस्फोट हुआ था। हिरोशिमा में हुआ बम विस्फोट इसके दस हजारवें हिस्से के बराबर मात्र का था, इससे भूकंप के महाविनाश की कल्पना की जा सकती है।
भूकंप का पूर्वानुमान असंभव क्यों?
अभी तक कोई ऐसी तकनीक नहीं विकसित हो पाई हैं, जिससे कि पहले से भूकंप की चेतावनी दी जा सके। आइ. आइ. टी. मुँबई के डॉ. पी. बनर्जी कहते हैं कि जापान व अमेरिका के पास भी भूकंप का पूर्वानुमान लगाने वाली कोई विधा नहीं है, जबकि वहाँ अक्सर भूकंप आते हैं। यदि ऐसा होता तो वे 1994 में कैलीफोर्निया व 1995 में कोबे (जापान) में आए अति विनाशकारी भूकंप का पता पहले लगा लेते। भारत में दो प्रमुख पट्टियाँ हैं, तो भूकंप से जुड़ी है, ‘मेन सेंट्रल थ्रस्ट’ एवं ‘मेन बाउंड्री फाल्ट’। ये दोनों ही हिमालय क्षेत्र में दो हजार किलोमीटर तक फैली हैं। इतने विशाल क्षेत्र पर नजर रख पाना संभव नहीं। चीनी शोधकर्त्ताओं के अनुसार भूकंप जाने से पहले जीव-जंतु अजीबोगरीब हरकतें करना शुरू कर देते हैं। कैसे इन्हें पहचाना जाए, यह कह पाना संभव नहीं है। वर्तमान गुजरात भूकंप के समय भी कई ऐसे व्यवहार देखने में आए, पर उनसे यह कह पाना मुश्किल था कि भूकंप की त्रासदी से बचा जा सकता था।
पच्चीस वर्ष पूर्व 1975 में हाइचेंग नामक मंचूरियन शहर को चीन के अधिकारियों ने खाली कराके 1 ़ जिंदगी बचा ली थीं। कंपनी-हिचकोलों की बढ़ती तीव्रता एवं पानी के स्तर का ऊँचा-नीचा होना। 7.3 की स्केल पर उनने मापन किया था व उतना ही वह निकला। प्रतिवर्ष दस लाख से अधिक भूकंप के झोंके सारे संसार में आते हैं, अकेले जापान में एक हजार प्रतिदिन। मात्र पिछले तीस वर्षों में ‘प्लेट टेक्टोनिक्स’ के अध्ययन के द्वारा हम जान पाए हैं कि इनमें से कितने वास्तव में कितने खतरनाक होते हैं। फिर भी यह कह पाना असंभव है कि कब-कहाँ कितनी तीव्रता का भूकंप आने वाला है।
वैज्ञानिक बढ़ते भूकंपों का कारण मात्र प्राकृतिक ही नहीं मानवी बताने लगे हैं। भूगर्भीय अणु-आयुधीय परीक्षण, रत्नगर्भा भूमि का अनंत सीमा तक दोहन, बाँधों में जमा पानी के भार से बढ़ता भूगर्भीय दबाव तथा अवशिष्ट द्रव्यों का भूमि की सतह से नीचे रिसते चले जाना। भूकंपों के आने की प्रक्रिया को बलवली कर देते हैं, ऐसा उनका मत है ।
14 जनवरी के ‘द वीक’ साप्ताहिक पत्रिका के अंक में भूकंपों के आने की भविष्यवाणियाँ पक्की थीं। इसमें आर नारायप्रान डॉ. प्रार्थ सारथी प्रेम ऊषा के मन राव भोजराज द्विवेदी एवं के एन सामयाजी आदि सभा न जनवरी 12 से 22 के बीच भूकंपों की शृंखला व दुर्घटनाओं की बाढ़ के विषय में लिखा था। अब यह तो कोई भी न कह सका कि यह अंक पहुँचने के 1 दिन के भीतर ही यह सब हो जाएगा।
नुकसान इतना न होता यदि सावधानी रही होती
वस्तुतः भूकंप में नुकसान धरती हिलने से कम हमारे आश्रयस्थलों-मकानों की छतों के गिरने से अधिक होता है। जितने भी व्यक्ति मरे हैं, वे सीमेंट-कंक्रीट के मलबे में दबने से मरे हैं। भूकंप संवेदनशील स्थान होते हुए भी निर्माण में जिस तकनीक का उपयोग होता चला आया है, उसने सर्वाधिक जान-माल की क्षति की हैं। अहमदाबाद-सूरत में जहाँ बड़ी बहुमंजिला इमारतें गिरी हैं, वहाँ निर्माण के लिए उपयुक्त सामग्री तो घटिया पाई ही गई है, यह भी देखा गया कि वे उन क्षेत्रों में बनी थीं, जहाँ पहले कभी खाली स्थान था, पानी था व उसे भरकर रहने योग्य बना दिया गया। शहरीकरण का वर्तमान स्वरूप कितना त्रासदायक होता है, यह वही जानता है, जिसने अहमदाबाद-सूरत ही नहीं, भुज-अंजार-भचाऊ क्षेत्र में सीमेंट-कंक्रीट का समुद्र देखा है, जिसमें लाशें व सामान एकाकार होकर लुप्त हो गए थे।
भवन निर्माण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सही मानकों का निर्धारण कर समुचित सुरक्षा के उपाय रखे जाएँ, उनका परिपालन भी किया जाए, तो प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले विनाश से बचा सा सकता है। भुज और अहमदाबाद की गगनचुँबी बिल्डिंगों के विषय में यही कहा जा रहा है कि इन नियमों को ताक पर रखकर निर्माण किया गया। नक्शे पास करने में होते भ्रष्टाचार को भी इस महासंहार का कारण माना जा सकता है। यही कारण है कि इतनी ही तीव्रता का भूकंप 1993 में लॉस एंजेल्स में आता है, तो धन की हानि तो होती हैं, किंतु मात्र चार आदमी मरते हैं, 12 में सिएटल में आता है, तो मात्र एक व्यक्ति मरता है, वह भी भूकंप से नहीं हार्ट अटैक से।
मत्स्य पुराण देता है समाधान
वास्तु विज्ञान के मुताबिक किसी भी भूकंपसंवेदी क्षेत्र में जब निर्माण किया जाए, तो कुछ सतर्कताओं का पालन अवश्य किया जाए। मकान या भवन का दक्षिण-पश्चिमी कोना भारी-भरकम बनाया जाए। भवन निर्माण के दौरान दक्षिण-पश्चिमी कोने की दीवारों की चौड़ाई बढ़ा दी जाय। यदि मकान बनाते समय इस बात का ख्याल न रखा गया हो, तो इस कोने में लोहे के भारी-भरकम संदूक, ट्रंक या मशीनरी रख देने चाहिए। मत्स्य पुराण कहता है कि आवास के उत्तर-पूर्वी कोने को हल्का और खुला ही रखना चाहिए। यह इसलिए कि भूकंप की चुंबकीय तरंगें उत्तर से दक्षिण को ओर चलती हैं।
यह भी इसमें उल्लेख है कि भूखंड की पहले गाय के गोबर द्वारा शुद्धि की जाए, दक्षिण-पश्चिमी कोने की नींव भारी कंक्रीट, सीमेंट और स्टील के मेल से रखी जाए। किसी पवित्र नदी की रेत की परत भी नींव में लगाई जाए, जो कम-से-कम 1 इंच मोटी हो। भूखंड जिस पर निर्माण होना है, न अधिक पथरीला हो, न रेतीला। चूने और राख के सम्मिश्रण का भी निर्माण में प्रयोग हो।
आबादी बढ़ रही है, 12 के आगमन के साथ ही प्रकृति ने चेतावनी दे दी है। यही समय है कि हम सँभल लें। गुजरात कुछ वर्षों में पुनः बस जाएगा, पर जो घाव छोड़ गया है, वे अभी वर्षों नहीं भरेंगे। दैवी आपदाएँ हमें दंड भी देती हैं, शिक्षण भी लेने को कहती हैं। अब हम नादान बने रह तथाकथित विकास की दिशा में अनवरत चलें, तो महाविनाश होना ही है।
नई सहस्राब्दी की शुरुआत ही महाकाल द्वारा सभी की, मानव मात्र की एक परीक्षा से हुई है। जिन दैवी आपदाओं से कहर बरसने एवं प्रलय जैसा वातावरण बनने की बात गुरुसत्ता द्वारा 1987 से 199 तक सतत कही जाती रही, लगभग वैसा ही कुछ स्वरूप पिछले दिनों देखने को मिला है। भचाऊ एक बड़ा समृद्ध शहर कच्छ जिले ही नहीं, पूरे गुजरात में माना जाता रहा है। किंतु 26 जनवरी 12 की प्रातः 8 5 से पूर्व तक ही। इसके तीन मिनट बाद वहाँ एक भी सबूत दीवार नहीं बची, सब कुछ जमींदोज जो हो गया था। हमारे आधार शिविर से कुछ पीछे मलबे की सफाई के दौरान एक मृत व्यक्ति की जेब से पूज्यवर का लिखा एक पर्चा मिला, जो गायत्री परिवार के कार्यकर्त्ताओं ने वितरित किया होगा। उसमें युग बदलने, महाविनाश की परिस्थितियों से सँभलने की स्पष्ट चेतावनी दी गई थी। यह पर्चा हमने 22 2 1 को प्रातः गुजरात भर के कार्यकर्त्ताओं की एक गोष्ठी में भचाऊ शिविर में पढ़कर सुनाया। जो छपा था, जो हो चुका था, उसमें कितना गजब का साम्य था। सब दहलकर रह गए। (राजकोट) के पीपल्या चौक के पास छह कैंप लगा दिए गए। अपने विभिन्न जिलों से कार्यकर्त्ता पहुँचने लगे। प्रायः डेढ़ हजार कार्यकर्त्ताओं ने नगरों-कस्बों-गाँवों में जाकर भोजन, राशन, कंबल, दवाओं का वितरण आरंभ कर दिया था। स्वयं श्री गौरीशंकर शर्मा 1 फरवरी से सतत वही बने रह अस्थायी-स्थायी आवास एवं विद्यालयों के निर्माण तथा राहत सामग्री के वितरण का कार्य देख रहे हैं। लाइफ लाइन एक्सप्रेस एवं यूक्रेन के अस्पतालों के समीप होने से सुदूर गांवों से बारह वाहनों, 4 एंबुलेंसों द्वारा मरीजों को लाकर उन्हें स्थायी राहत दी जाने लगी थी। स्वयं डॉ. प्रणव पण्ड्या 18 से 24 फरवरी की अवधि में छह दिन भचाऊ आधार शिविर रुके। उनने भुज व आसपास के क्षेत्र का, जामनगर के सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र जोडिया एवं आमरण का, मोरबी व मालिया में क्षतिग्रस्त गाँवों का, सुरेंद्रनगर में पाटडी तथा लिंबड़ी क्षेत्र का निरीक्षण किया। लौटने से 2 दिन पूर्व 22 2 1 को पूरे गुजरात के सभी कार्यकर्त्ताओं को आपातकालीन मीटिंग में बुलाकर उस क्षेत्र में पुनर्निर्माण की जिम्मेदारियाँ सौंपी गई। लौटते में मुख्यमंत्री
शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ की अपनी ओर से पहल एवं सभी से अनुरोध
शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ से इस त्रासदी में 26 जनवरी को वापस रवाना हो रहे जयंती भाई, वासंती बेन पटेल को राजकोट से तुरंत भूकंप के केंद्र कच्छ पहुँचने को कहा गया। बड़ौदा एवं अहमदाबाद जहाँ भी टेलीफोन से संपर्क हो पाया, वस्तुस्थिति बताने एवं तुरंत राहत कार्य आरंभ करने को कहा गया। 27 जनवरी की प्रातः पचास से अधिक कार्यकर्त्ता शाम तक लगभग तीन सौ तथा 28 जनवरी की प्रातः तक शाँतिकुँज से वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं का चार सदस्यीय दल श्री वीरेश्वर उपाध्याय, डॉ. अमलकुमार दत्ता, ब्रजमोहन गौड़ एवं शिवप्रसाद मिश्रा के नेतृत्व में आधार शिविर पहुँचकर बारह ट्रक राहत सामग्री से अपना कार्य आरंभ कर चुका था।
स्वयं टेली कम्यूनिकेशन विभाग भी प्रभावित होने व उसका असर दिल्ली के एक्सचेंज होने के कारण कहीं भी संपर्क न हो पा रहा था। 12 जनवरी वसंत पर्व के प्रातः गुरुसत्ता के संदेश देने के पश्चात् डॉ. प्रणव पण्ड्या एवं श्रीमती शैलबाला भी 12 जनवरी की शाम ही अहमदाबाद पहुँचकर सीधे आधार शिविर पहुँच गए। 3, 31 जनवरी एवं 1 फरवरी को सारे क्षेत्र का निरीक्षण कर आधार नीति बनाई गई। इस बीच राहत दलों का, सामग्रियों का आगमन आरंभ हो गया था। तुरंत भुज शक्तिपीठ, कलेक्टेऊट, अंजार शक्तिपीठ, गाँधीधाम शक्तिपीठ, भचाऊ बेस एवं मालिया सहित वरिष्ठ मंत्रियों एवं वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा कर कुछ निर्धारण किए गए।
पूरे भारत व विश्वभर से आ रही सहायता को देखते हुए शांतिकुंज द्वारा प्रायः पाँच करोड़ रुपये की राशि से तात्कालिक एवं स्थायी राहत कार्य चलाते रहने की बात कही गई। जितनी राशि इस फंड में आती जाएगी, उसे इसी कार्य में लगा दिया जाएगा। निर्णय लिए गए कि (1) कच्छ जिले में 2, जामनगर में दो, राजकोट में दो तथा सुरेंद्र नगर में एक इस प्रकार पच्चीस गांवों के पुनर्निर्माण में शाँतिकुँज पूरा सहयोग करेगा। अभी तक प्रायः चालीस अस्थायी स्कूल खोले जा चुके हैं, जिनमें दस हजार विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। इसी तरह अस्थायी आवास प्रायः पाँच हजार परिवारों को दिए जा चुके हैं। प्रत्येक चुने गए गाँव में एक प्राइमरी हेल्थ केयर सेंटर एवं एक प्राथमिक पाठशाला का निर्माण हम करेंगे। इनमें प्रायः चार करोड़ राशि लगने की संभावना है।
(2) इसके अतिरिक्त कच्छ क्षेत्र की मूल विरासत वहाँ की दस्तकारी-हैण्डीक्राफ्ट को जिंदा बनाए रखने के लिए प्रायः चार हजार तकनीकी आर्टीजन्स को प्राथमिक आश्रय स्थल, कच्चा सामान व उनके उत्पादों की खपत का तंत्र खड़ा करने का निर्णय भुजौड़ी गाँव की ‘सृजन’ शाखा के सहयोग से किया गया है। लगभग एक लाख व्यक्ति परिवार के सदस्यों सहित प्रभावित हुए हैं। सरकार अपने स्तर पर इनके लिए कर रही है। हम यह चाहेंगे कि कच्छ की मूल संस्कृति जिंदा रहे। आजीविका का आधार जिंदा रहेगा, तो हुनर के आधार पर ये सभी कारीगर दस्तकार पुनः अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे। कच्छ के रण के बन्नी क्षेत्र से लेकर भुज के उत्तर में बड़ी संख्या में ऐसे कारीगर हैं, जिनकी बनाई शालें, स्कार्फ, तकिया, खद्दर आदि विश्वभर में जाते हैं। इस आधार तंत्र को खड़ा करने का मूलभूत कार्य किया जाए, तो यह दस्तकारी जिंदा बनी रह सकती है। (3) इस क्षेत्र में गौधन 11 लाख से अधिक है। प्रायः सभी जीवित है। उन्हें जिंदा बचाए रखने, इनके लिए कैटल शैड्स की व्यवस्था करने, इनके लिए पानी व चारे की व्यवस्था बनाने, गोमूत्र-गोबर से औषधि बनाकर उनसे आधार खड़ा करने की आवश्यकता है। अभी अपने स्तर पर तीन ऐसी बड़ी गौशालाओं के निर्माण का तंत्र शांतिकुंज खड़ा करने पर विचार कर रहा है। गौधन जिंदा रहा, तो ग्रामीण कच्छ एवं सौराष्ट्र पुनः अपने पैरों पर खड़ा हो सकेगा। अकाल की परिस्थितियाँ अप्रैल से ही सामने दिखाई दे रही है।
(4) भुज, गाँधीधाम, भद्रेष्वर एवं भचाऊ के गायत्री शक्तिपीठ आंशिक या पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त हैं। कई परिजन प्रभावित हुए हैं। शक्तिपीठों के नवनिर्माण का तंत्र खड़ा किया जा रहा है एवं परिजनों को प्राथमिक आधार खड़ा करने हेतु सहायता दी जा रही है। भूकंप ने किसी को भी नहीं छोड़ा, फिर भी आश्चर्यजनक रूप से गायत्री परिवार से जुड़े तीन परिवारों को छोड़कर शेष प्रायः एक लाख परिजन सुरक्षित बच गए हैं। भचाऊ आधार शिविर पर नियमित तर्पण-यज्ञ की एवं गाँव-गाँव में, घरों-घरों में शांतिपाठ की व्यवस्था की गई हैं। इससे लोगों का विश्वास लौटा है एवं दग्ध अंतःकरण को शांति मिली हैं।
(भ्) बड़े व्यापक स्तर पर साधना महापुरुषार्थ को गति देने एवं जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन समिति केंद्र शांतिकुंज के मार्गदर्शन में बनाने हेतु परिजनों से कहा गया है। फरवरी 12 के अंक में साधनप्रधान, साधनाप्रधान, श्रमप्रधान तीन उपायों की चर्चा की गई थी। साधनप्रधान में सभी से सप्ताह में न्यूनतम एक बार का भोजन न लेने, उसकी राशि बचाने का अनुग्रह किया गया था। यह भी आँकड़ा दिया गया था कि यदि यह दुगनी हो सके, तो इस निधि से सरकार के समानाँतर एक तंत्र खड़ा कर न जाने कितना बड़ा आधार बन सकता है। मात्र आत्मसंयम की, राशि को बचाने की एवं व्यवस्थित रूप में केंद्र के परामर्श से उसके नियोजन की आवश्यकता है। यदि मात्र ‘अखण्ड ज्योति’ व अन्य सहयोगी पत्रिका के पाठक भी पचास रुपया प्रति सदस्य एकत्र करें, तो पाँच करोड़ की राशि एक माह में एकत्र कर सकते हैं। परिवार के सदस्य जुड़ जाएं, तो यह मात्रा कितनी भी बढ़ सकती है। इस राशि को ‘श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट भूकंप राहत कोष’ के नाम भेजा जा सकता है।
साधना अभियान में सभी से अपनी साधना के अतिरिक्त अनिष्ट निवारण हेतु, विशिष्ट पुरुषार्थ हेतु कहा जा रहा है। वरुण गायत्री एवं पृथ्वी गायत्री के मंत्रों से यज्ञों में आहुतियाँ देने को कहा जा रहा है। सामान्य यज्ञ जो हो रहे हैं, उन्हीं में इन्हें जोड़ लेने से भावी विपत्तियाँ कम हो सकती हैं। श्रम प्रधान कार्यक्रमों में सभी से पुनर्निर्माण के कार्यों में भागीदारी, जलागम क्षेत्रों में श्रमदान, पानी की खेती स्थान-स्थान पर करने, कुएँ व तालाबों को गहरा करने हेतु सामूहिक पुरुषार्थ का आह्वान किया गया है। दुर्भिक्ष इससे कम में नहीं टलेगा एवं एक बार जलस्तर ऊँचा उठने लगे, हरीतिमा का कवच बनने लगे, तो अन्य विपत्तियाँ भी टलेंगी।
(6) पूरे भारत में एक आपदा प्रबंधन वाहिनी खड़ी करने की बात सोची गई हैं। इसमें एक लाख कार्यकर्ताओं को रिस्क्यू एवं रिलीफ कार्य तथा पुनर्निर्माण के कार्य में प्रशिक्षित किया जाएगा। ये चार स्थानों नागपुर या हैदराबाद, अहमदाबाद या जयपुर, देहरादून या दिल्ली तथा भुवनेश्वर या रायपुर क्षेत्र में बने केंद्रों से जुड़े रहेंगे। कभी भी कोई भी प्राकृतिक आपदा आने पर पूर्णतः प्रशिक्षित ये कार्यकर्ता तुरंत वहाँ पहुँचेंगे एवं कुछ ही घंटों में अपना कार्य प्रारंभ कर देंगे। इन्हें केंद्र के मार्गदर्शन में फर्स्ट एड से लेकर प्राथमिक राहत सामग्री के वितरण, एक चलते-फिरते अस्पताल के साथ पहुँचकर प्रारंभिक कार्य करने, बाढ़, भूकंप, दुर्भिक्ष एवं तूफान की स्थिति में निपटने हेतु तैयार किया जाएगा। निर्माण विशेषज्ञों, इंजीनियर्स की एक टीम सबके साथ जुड़ी रहेगी, जो तुरंत तात्कालिक कार्य करने लगेगी। आपदाओं की भविष्यवाणियाँ तो नहीं की जा सकतीं, पर उनसे मोर्चा लेने हेतु सतत उद्यत रहने को यदि विशेषज्ञ बल हमारे पास होगा, तो हम समाज की, पीड़ित मानवता की विशेष सेवा कर पाएँगे। इच्छुक परिजनों से इसके लिए शांतिकुंज से संपर्क करने को कहा जा रहा है।
संगठनों के संगतिकरण का एक महायज्ञ पिछले दिनों आपदा की स्थिति में देखने को मिला। यदि यह भावना वस्तुतः जीवित बनी रहे, तो किसी भी प्रतिकूलता से जूझने की, मानव मात्र के प्रति संवेदना के जागरण की, राष्ट्र-धर्म के प्रति समर्पित होने की मनःस्थिति स्थायी बनाई जा सकती है। कुछ दिनों में लोग भूल जायेंगे और फिर कहीं कोई बाढ़, कोई अकाल या समुद्री तूफान आकर हमें चेताएगा। हम यदि पूर्व से सचेत जाएं, तो न केवल हम स्वयं को प्रभावित होने से बचा पायेंगे, औरों के लिए कुछ करके पुण्य-परमार्थ भी कमा जायेंगे। यही आज का युगधर्म है एवं 26 जनवरी 12 की चुनौती भी है। राष्ट्रीय आपदा की कड़ी में हम गुरुसत्ता को परमात्मसत्ता को आश्वासन दें कि पीड़ा-पतन-पराभव से मानव जाति को बचाने हेतु हम यथासंभव पुरुषार्थ करेंगे, करते रहेंगे।
युगचेतना के अवतरण ही हीरक जयंती का वर्ष है यह, जो वसंत पर्व 12 (29/1/12) से आरंभ हुआ है। इक्कीसवीं सदी में भारी उथल-पुथल के बीच नवसृजन की संभावनाओं को लेकर जिस महापुरुषार्थ की शुरुआत सन् 1926 में हुई थी, उसने 75 वर्ष की परिपक्वता प्राप्त कर ली है। अब भारतभर एवं विश्वभर में गायत्री परिवार से जुड़े परिजनों को इसके लिए विशिष्ट पुरुषार्थ करना है। इसके लिए उत्साह भरा वातावरण बनाने एवं कुछ रचनात्मक कर दिखाने हेतु मार्गदर्शक बिंदु यहाँ प्रस्तुत हैं।
(अ) हीरक जयंती क्या है, यह समझाने का प्रयास सभी के द्वारा चलना चाहिए। अखंड दीपक के 75वें वर्ष में प्रवेश के कारण यह अपनी निज की जीवन-साधना को प्रखर बनाने का वर्ष है। परमवंदनीया माताजी के 75 वर्ष पूरे होने के कारण यह नारी जागृति-नारी शक्ति को नेतृत्व प्रदान करने वाला वर्ष है। भागवत् चेतना के धरती पर अवतरण का 75वाँ वर्ष होने के कारण यह सभी में विधेयात्मक उल्लास भरने का वर्ष है। इसके लिए पोर्स्टस, बैनर्स, पर्चे वितरण करना चाहिए स्थान-स्थान पर उन्हें लगाना चाहिए तथा रैली आदि एवं छोटे कार्यक्रमों द्वारा उन्हें जन-जन के मनों में बिठाने का प्रयास किया जाना चाहिए। प्रज्ञा अभियान ‘पाक्षिक’ के पृष्ठ पाँच पर ऐसे बैनर्स-परिपत्रों के प्रारूप दिए गए हैं। उन्हें अपने स्तर पर प्रकाशित कर वितरित किया जा सकता है। ‘हीरक जयंती वर्ष के अभियान की दिशाधारा’ को स्पष्ट करते हुए एक पुस्तिका तैयार कर दी गई है। इसे भी मँगाकर वितरित किया जा सकता है।
(ब) यह वर्ष सात आंदोलनों को गति देने का वर्ष है। साधना स्वास्थ्य शिक्षा स्वावलंबन पर्यावरण नारी जागरण, व्यसन मुक्ति, कुरीति उन्मूलन इन सातों आंदोलनों से संबंधित प्रदर्शनियों, प्रशिक्षण एवं इनसे जुड़ी विभूतियों को जगाने हेतु संकल्पित कराने हेतु विशिष्ट दीपयज्ञों का क्रम बन सकता है। प्रदर्शनियों का निर्माण केंद्र में किया जा रहा है। प्रशिक्षण के क्रम में जीवन साधना आँदोलन को गति देने के लिए शक्तिपीठों पर सत्रों का क्रम 2 मार्च से आरंभ हो चुका है। विशिष्ट विधाओं के प्रशिक्षण भी इसी क्रम में आगे चलते रहेंगे। नगर, मुहल्ले, गाँवों के स्तर पर इन आँदोलनों के दीपयज्ञों में संकल्प कराए जा सकते हैं एवं सुनिश्चित लक्ष्य निर्धारित किए जा सकते हैं। आँदोलन को गति देने के लिए समयदान-श्रमदान-साधनदान एवं विभूतिदान के संकल्प भी कराए जा सकते हैं।
(स) युगशक्ति के प्रतीक की स्थापनाओं का क्रम- नवसृजन हेतु देवत्व संगठित होकर दुर्गाशक्ति-युगशक्ति का विकास करे, अब यह जरूरी है। इसके लिए परमपूज्य गुरुदेव द्वारा निर्धारित लाल मशाल का एक चित्र इन्हीं के द्वार प्रदत्त व्याख्या सहित बना दिया गया है। इस प्रतीक चित्र की स्थापना धर्म-संप्रदाय-जाति-वर्ग के भेद से परे कहीं भी कराई जा सकती है। जहाँ भी यह स्थापित होगा, भावनाशीलों को नवसृजन में लगे रहने की प्रेरणाएँ देता रहेगा। ईश्वर के साथ भागीदारी एवं संगठित महापुरुषार्थ की प्रेरणाएँ देता रहेगा। इसे अपने उपासनागृहों, शक्तिपीठों, प्रज्ञामंडलों, संगठित इकाइयों, घरों, कार्यालयों, क्लबों, संगठनों के मिलन केंद्रों पर भी लगाया जा सकता है। इस प्रतीक स्थापना के परिणाम बड़े दूरगामी होंगे।
(द) हीरक इकाइयों का विकास- हर क्षेत्र समर्थ बने, अपनी जिम्मेदारियाँ स्वयं उठाने लगे, उस क्षेत्र के सभी दायित्वों को निभाते रहने की सामर्थ्य विकसित कर सके, इसके लिए विकसित क्षेत्रों को हीरक इकाई नाम दिया जा रहा है। प्रत्येक इकाई में प्रचारक-प्रशिक्षक, सहयोगी-समीक्षक हर स्तर के कार्यकर्ता होंगे। इस संबंध में पुराने कार्यकर्ताओं को मात्र व्यवस्थित होने की जरूरत है। केंद्र इस संबंध में सुनिश्चित मार्गदर्शन सतत देता रहेगा।
(ई) झोला पुस्तकालयों का पुनरुज्जीवन-परमपूज्य गुरुदेव ने ज्ञानयज्ञ को सबसे बड़ा यज्ञ कहा है। नए लोगों में मिशन फैलेगा, तो उस विचारक्राँति आँदोलन को गति देने से, जो झोला पुस्तकालयों द्वारा आरंभ किया गया था। अब कहीं-कहीं वह प्रक्रिया शिथिल होती दिखाई देती है। हीरक जयंती वर्ष में नए प्राणवान् साहित्य एवं ‘अखण्ड ज्योति’ सहित झोलाधारी अपने साथियों की संख्या बढ़ाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
(फ) हीरक जयंती वर्ष के कुछ जयघोष-(1) हीरक वर्ष मनाएंगे-हम हीरे कहलाएंगे (2) गढ़े तराशे जाएंगे-हीरे से बन जाएंगे (3) बुरे भाव मिट जाएंगे-मन हीरे बन जायेंगे (4) चाहता यही वतन-सृजनशील संगठन (5) चाहते धरा गगन-सृजनशील संगठन (6) कौन रोक दे पतन-सृजनशील संगठन (7) कौन करे नवसृजन-सृजनशील संगठन (8) जीवन में देवत्व जगाएं-सच्चे सृजनवीर कहलाएँ (9) मन निर्मल तन स्वस्थ बनाएँ-सच्चे सृजनवीर कहलाएँ (10) हीरे-सा व्यक्तित्व जगाएँ-सच्चे सृजनवीर कहलाएँ (11) देवों-सा परिवार बनाएँ-सच्चे सृजनवीर कहलाएँ (12) युग की पहचान-बेहतर इंसान (13) माँगता जहान बेहतर इंसान (14) नवयुग का है लक्ष्य महान्-बनें सभी बेहतर इंसान (15) यही माँगता आज जहान-बनें सभी बेहतर इंसान।
सिंधु है परमात्मसत्ता, आत्मसत्ता बिंदु है। किंतु तात्विक दृष्टि से तो बिंदु भी तो सिंधु है॥
‘जीव’ उसका अंश है, जो ‘चेतना’ आनंदमय। चेतनावत् आत्मा भी अमर है व है अभय। आत्म है रश्मियां, परमात्मसत्ता इंदु है। सिंधु है परमात्मसत्ता, आत्मसत्ता बिंदु है॥
‘महाप्राण’ समा रहा है विश्व में ब्रह्माँड में। समाया है वही तो, हर ‘प्राण’ के देहांग में। तत्वतः अद्वैत ही है, द्वैत भ्रमजन्य-द्वंद्व है। और तात्विक दृष्टि से तो, बिंदु भी तो सिंधु है॥
प्रकृतिजन्य बादलों ने, सूर्य को ज्यों ढक लिया। विकृतिजन्य ‘माया’ के द्वारा ‘जीव’ आच्छादित हुआ। खिलाता गुरुज्ञान-रवि ही, अमल-आत्म-अरविंद है। सिंधु है परमात्मसत्ता, आत्मसत्ता बिंदु है॥
आत्मा का बोध कर, निष्काम-कर्म करते चलो। द्वैतजन्य विकार, दुख, भव सिंधु से तरते चलो। आत्मा, परमात्मा का अंश आनंद कंद है। और तात्विक दृष्टि से तो, बिंदु भी तो सिंधु है॥
वास है सब प्राणियों में एक ही परमात्म का। इसलिए ही ‘लोकसेवा’ श्रेष्ठ कर्म है आत्म का। विश्व रूप परमात्मा के प्रेम का यह छंद है। सिंधु है परमात्मसत्ता, आत्मसत्ता बिंदु है॥
-मंगलविजय ‘विजयवर्गीय’
*समाप्त*
महत्वाकाँक्षा की धुरी पर घूमने वाला जीवन वृक्ष ही नरक हैं। महत्वाकाँक्षाओं का ज्वर जीवन को विषाक्त कर देता है। जो इस ज्वर की हवाओं से उद्वेलित हैं, शाँति का संगीत और आत्मा का आनंद भला उनके भाग्य में कहाँ? वे तो स्वयं में ही नहीं होते हैं और शाँति का संगीत एवं आत्मा का आनंद तो स्वयं में होने के ही फल है।
बड़ी सहज जिज्ञासा है, इस महत्वाकाँक्षा का मूल क्या है? इसका उत्तर भी उतना ही सहज है, “हीनता का भाव अभाव का बोध।” हालाँकि ऊपर से दिखने में हीनता का भाव और महत्वाकाँक्षी चेतना परस्पर विरोधी दिखाई देते हैं, लेकिन वस्तुतः वे एक ही भावदशा के दो छोर है। एक छोर से जो जीनता है, वही दूसरे छोर से महत्वाकाँक्षा। हीनता ही स्वयं को ढकने-छिपाने के प्रयास में महत्वाकाँक्षा बन जाती है। अपनी इस कोशिश में वह स्वयं को ढक तो लेती है, पर मिटती नहीं और ध्यान रखने की बात तो यह है कि किसी भी रोग को ढकने भर से कभी भी कोई छुटकारा नहीं है। इस भाँति रोग मिटते नहीं वरन् पुष्ट ही होते हैं।
व्यक्ति जब तक स्वयं की वास्तविकता से दूर भागता है, तब तक वह किसी न किसी रूप में महत्वाकाँक्षा के ज्वर से ग्रसित होता रहता है। स्वयं से दूर भागने की आकाँक्षा में वह स्वयं जैसा है, उसे ढकता है और भूलता है, लेकिन क्या आप की विस्मृति और उसका विसर्जन एक ही बात है? नहीं। हीनता की विस्मृति हीनता से मुक्ति नहीं है। इससे पहले स्वयं को जानकार ही है, क्योंकि स्वयं से भागना ही वह मूल और केंद्रीय भाव है, जिससे सारी हीनताओं का प्रभाव होता है।
विज्ञान वे अतिरिक्त इस आँतरिक अभाव से और महत्वाकाँक्षा के ज्वर से मुक्ति का कोई उपाय नहीं है। उसमें जीने और जगाने का साहस करते हैं, उनके लिए शून्य ही पूर्ण बनाया गया है। फिर न हीन भावना है और न उससे उपजने वाला महत्वाकांक्षा का ज्वर।
जीवन में भक्ति की प्रतिष्ठा के पीछे सहस्रों वर्षों का इतिहास छुपा है। भक्ति की भावना वेदों से निःसृत हुई, ऐसा विद्वानों का मत है। ‘भज’ धातु से भक्ति शब्द की व्युत्पत्ति हुई है। वैदिक साहित्य में इसका अर्थ है, बाँटना, भाग पाना या लेना अथवा हिस्से का साझीदार बनना। इन अर्थों में भक्त भगवान का साझीदार है। भगवत् संवेदना का साझीदार होने के कारण ही वह भक्त कहलाता है। ऋग्वेद में भक्त भक्ति और भगवन् शब्दों का प्रयोग इन्हीं अर्थों में हुआ है।
इन अर्थों के प्रयोग के पश्चात् भगवन् शब्द को अलौकिक सर्वशक्तिमान परम तत्व के रूप में निरूपित किया जाने लगा। उस तत्व की कल्पना ऐसी शक्ति के रूप में की गई, जिसका समस्त ऐश्वर्य एवं संपदा पर प्रभुत्व था और जो अपने उपासक को उसका एक अंश भक्ति के रूप में प्रदान कर उसे अपना भक्त बना सकता था। इसी वजह से भक्ति और भक्त के प्रारंभिक प्रयोग कर्मव्यापत्व में हुए है। भगवन् के अनुग्रह से उसके एक अंश के प्राप्त कर्ता होने के कारण भक्त और भक्ति शब्द शक्ति के साथ भी प्रयुक्त हुआ है। ये शब्द उस शक्ति की सहभागिता एवं घनिष्ठ आत्मीय भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सर्वथा उपयुक्त थे। इन्हीं कारणों से धार्मिक विचारधारा में भक्ति शब्द एक सशक्त प्रतीक के रूप में परिभाषित हुआ है।
वेदों में भक्ति के तीन सोपान है, स्तुति, प्रार्थना, और उपासना। स्तुति में प्रभु के गुणों का कीर्तन होता है। यह ज्ञान की मीमाँसा है। प्रार्थना में प्रभु से पापों के प्रायश्चित और पुण्य प्राप्ति के लिए कामना की जाती है। पापमयी दानवता का दमन तथा पुण्यमयी दैवी विभूतियों का समावेश प्रचंड कर्म की अपेक्षा रखते हैं। अनवरत कर्म की सिद्धि सतत अभ्यास के द्वारा ही संभव हो सकती है। ज्ञान लक्ष्य का बोध कराता है, तो कर्म उस स्थल तक पहुँचाता है और उपासना उस लक्ष्य के समीप आसीन करा देती है। अतः भक्ति ज्ञान, कर्म एवं उपासना की पावन त्रिवेणी का संगम है। ज्ञान और कर्म संपत्ति का प्रभु अनुग्रह के साथ सामंजस्य ही वैदिक भक्ति का आदर्श है।
वैदिक महर्षिगण भक्त को चेतना के, ज्ञान के उत्तुँग शिखरों तक ले जाते हैं, जहाँ परम आनंद का स्रोत है। प्रभु का प्रकाश या ज्ञान की ध्यान-धारणा से जीवन आनंददायक हो जाता है। यही वैदिक भक्ति का स्वरूप है। इसके साधनों में प्रवृत्ति एवं निवृत्ति, अभ्यास तथा वैराग्य दोनों सम्मिलित हैं, जबकि परवर्तीकाल में निवृत्ति को ही एकमात्र साधन मान लिया गया है। सही कहा जाए, तो वेदों में भक्ति का समग्र स्वरूप झलकता है। वेद ने भक्त के लिए जिन साधनों का प्रतिपादन किया है, वे आत्मा, परमात्मा व प्रकृति ज्ञान से सम्बन्धित हैं। इन साधनों में व्यापकता और गंभीरता की अभिव्यक्ति हुई है, लेकिन बाद के समय में यह स्वरूप दिखाई नहीं देता। यहाँ तक कि भागवत भक्ति के नवधा भेदों में भी वैदिक भक्ति का समग्र रूप समाहित नहीं हो पाता।
वेदों में जीव का प्रभु से विरह अवस्था का अत्यंत करुण, मर्मस्पर्शी वर्णन मिलता है। वैदिक ऋचाओं में भक्तिभाव का अंकुरण देखा जा सकता है। यही भक्ति परवर्तीकाल की भागवत, शैव आदि भक्ति पद्धतियों से कई अंशों में भिन्नता एवं समानता रखती है।
ऐतरेय ब्राह्मण में ज्ञान चेतना की प्रमुखता होने से भक्ति भावना न्यून मात्रा में है। शतपथ ब्राह्मण में कर्मकाँड का प्रभाव अधिक हैं कर्म अपने सूक्ष्म रूप में ज्ञान और उपासना दोनों के अंदर सन्निहित है। अतः इसमें भक्तिभाव अंकुरित होते देखा जा सकता है। शतपथ ब्राह्मण में भक्ति की पर्याप्त विवेचना हुई है। जैसे, द्वेष से दूर रहना, सबसे प्रेम करना, दिव्यता और पवित्रता का प्रयास करना, आत्म-तत्व को प्राप्त करना आदि को प्रधानता दी गई है। ये भक्ति के अनिवार्य अंग कहे जा सकते हैं। गोपथ ब्राह्मण में भक्ति को ज्ञान का रस कहा गया है।
ईसा पूर्व छठी शताब्दी में विकृत कर्मकाँड और यज्ञों के विरोध में कई आँदोलन उठ खड़े हुए। इसी के पुनरुत्थान हेतु एक ओर बौद्ध और जैन धर्मों की स्थापना हुई, तो दूसरी ओर भागवत धर्म का उदय हुआ। भक्ति का प्रचार प्रसार इसके बाद ही संभव हुआ। वेदों के ब्राह्मण ग्रंथ कर्मकाँड को प्रमुखता देते हैं, परंतु उपनिषदों में ज्ञानकाँड की प्रधानता है। यह ज्ञानकाँड विश्व के मूल में निहित आध्यात्मिक सत्य से सम्बन्धित है। इसमें वर्णित आध्यात्मिक भावना ही भक्ति के मूल तक पहुँचती है और तभी यह भक्ति उपनिषदों में बिखरे मोती के रूप में दिखाई पड़ती है।
प्रभु की भक्ति और भगवान अनुग्रह पर कठोपनिषद् तथा मुंडकोपनिषद् दोनों ही उपनिषदों में बल दिया गया है। श्वेताश्वेतर उपनिषद् में भी भक्ति की विवेचना की गई है और ईश्वर भक्ति के साथ गुरु भक्ति को भी मान्यता प्रदान की गई है। भक्ति का मूल आधार प्रभु की कृपा ही है। यही तथ्य आगे चलकर शैव व वैष्णव दोनों ही संप्रदायों में स्वीकृत हुआ। वैष्णवों में आचार्य बल्लभ ने प्रभु के प्रसाद को पुष्टि का नाम दिया, तो शैवों और शाक्तों ने उसे शक्तिपात कहकर पुकारा।
हालाँकि वैदिक भक्ति का विकसित एवं समग्र रूप ब्राह्मण तथा उपनिषद् युग में एकाँगी बन गया। इनमें भक्ति की रेखा काफी क्षीण एवं दुर्बल दिखाई देती है, परंतु इसका आस्तित्व लोप नहीं हुआ। बाद के समय में इस भक्ति भावना का स्पष्ट उद्घोष महाभारत, रामायण एवं पुराणों में मिलता है। इसमें प्रायः सभी देवी देवता भक्तिमयी उपासना के पात्र हैं। पौराणिक देवताओं में प्रायः विष्णु और शिव ही भक्तिमयी उपासना के केंद्र -बिंदु है। महाभारत में भक्ति चेतना का सुस्पष्ट एवं प्रभावपूर्ण प्रतिपादन हुआ है। इसमें वासुदेव कृष्ण के देवत्व की परिकल्पना की गई है और तभी इस महाकाव्य को धर्मग्रंथ की संज्ञा मिली है।
वैष्णव संप्रदाय का प्रारम्भिक इतिहास लिखते हुए हेमचंद्र राय चौधरी ने अपना मत व्यक्त किया है कि बौद्ध धर्म द्वारा वैदिक धर्म का, भूल चुके विकृत कर्मकाँडों का प्रचंड विरोध हुआ। एक अर्थ में यह भागवत धर्म की शुरुआत थी। तभी इस धर्म में महात्मा बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार माना गया। इस आराधना पर केंद्रित भागवत धर्म आगे चलकर वैष्णव धर्म में परिवर्तित हो गया। इन दिनों भक्ति के विभिन्न स्वरूप दिखाई दिए।
तत्कालीन परिस्थितियों में एक और महत्वपूर्ण घटना घटी। इसी घटना के फलस्वरूप पुराणों का अभ्युदय हुआ। वैदिक यज्ञों की कर्मकांडों परंपरा मूलतः पशुपालन एवं कृषि व्यवस्था से सम्बन्धित थी। परंतु शहरी सभ्यता के विकास से व्यापारी एवं शिल्पकारी की उन्नति से ईसापूर्व की कतिपय शताब्दियों में समाज में अनेक नए वर्गों का उदय हुआ। ये वर्ग बढ़ती हुई समृद्धि के भागीदार थे, परंतु समाज में उन्हें पर्याप्त सम्मान एवं आत्मीयता नहीं मिल सकी। इसके विपरीत उन्हें निम्नस्तरीय माना जाता था। ऐसे लोगों में याज्ञिक कर्मकाँड के स्थान पर भक्ति पर आधारित देवी-देवताओं की पूजा ही अधिक लोकप्रिय हुई। इस परिस्थितियों ने अनेक-मनीषियों -विद्वानों को धर्म के स्वरूप पर गहराई से विचार करने की प्रेरणा दी। फलतः महाकाव्य ही धर्मग्रंथ नहीं बने, बल्कि देवी देवता, पूजा भक्ति के केंद्र -बिंदु रूप में स्वीकृति हुए। इससे अनेक पुराणों की रचना भी हुई इन पुराणों ने भक्ति की भावधारा को जन-जन तक पहुँचाने में कारगर भूमिका निभाई।
इस प्रक्रिया को भागवत पुराण में स्पष्टता देखा जा सकता है। टीजे हापकिन्स ने ‘द सोशल टीचिंग ऑफ द भागवत पुराण’ में उल्लेख किया है, भक्ति आँदोलन का नेतृत्व ऐसे संन्यासियों और विद्वानों ने किया था, जो भले ही ब्राह्मण वर्ग के रहे हों, परंतु उनकी भावनाएँ व्यापक और विराट् थी। उनके अधिकाँश अनुयायी शूद्र एवं निम्न जाति के थे। उन्होंने वर्ण व्यवस्था की कट्टरता पर आघात न करते हुए भी उसे भगवद् प्राप्ति हेतु निरर्थक माना। संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान जेएवी. वैन व्यूलेनिन ने भागवत् पुराण की रचना को जनप्रिय आँदोलन के संस्कृतिकरण और वैदिक परंपरा से उसका तारतम्य बिठाने का प्रयास किया है। उनके अनुसार यह आँदोलन भगवद्भक्ति की ओर एक अनोखा प्रयास था।
पुराणकाल में भक्ति भावना का सुँदर विकास देखा जा सकता है। अपने वर्तमान रूप में भगवद्गीता भी भक्ति सिद्धाँत का काफी स्पष्ट निरूपण करती है। गीता के भक्ति सिद्धाँत में शरण्य एवं दास्य भाव प्रधान हैं। इसमें प्रेम के भावुक भाव की अभिव्यक्ति कम ही मिलती है। यहाँ भक्त को अपनी अकिंचनता का बोध है और वह विनम्रतापूर्वक भगवत् अनुग्रह की प्रार्थना करता है। ऋग्वेद की ऋचाओं में जिस प्रकार का एक वर्गहीन समाज के आत्मीय सम्बन्धों की झलक पाई जाती है। ठीक इसी प्रकार एक वर्गबद्ध समाज में अवस्थित गीता का कवि भक्त की कल्पना एक विनम्र दास के रूप में करता है। वह अपने अधिपति या स्वामी के प्रभुत्व से पूर्णतः अभिभूत है और वह उनकी कृपा पर अवस्थित है। गीता की भक्ति कल्पनाशील उपासक के मनोभाव तक ही सीमित नहीं है। उसका प्रबल सामाजिक पक्ष है, जिसमें निष्काम कर्म का उपदेश दिया गया है।
इस तरह भगवद्गीता के माध्यम से भक्ति का यह नया स्वरूप सामने आया। बाद में समाज में भक्ति की भावधारा को आगे बढ़ाने का प्रयास-पुरुषार्थ कई भक्तों एवं संतों के माध्यम से हुआ। इनमें छठी- सातवीं के आलवर एवं नायनार संतों का योगदान महत्वपूर्ण था। भागवत पुराण के माध्यम से भक्ति आँदोलन को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य नाथमुनि, यामुनाचार्य एवं रामानुजाचार्य ने किया। इसमें पंचरात्र की धार्मिक पद्धति को वैदिक भक्ति से जोड़ने का प्रयत्न किया गया।
सत्वगुण प्रधान भक्ति की विचारधारा चैतन्य, मीरबाई, तुलसीदास एवं सूरदास में प्रस्फुटित हुई। इन्होंने भक्ति के द्वारा समाज में प्रेम, सहिष्णुता, दया, करुणा, भ्रातृत्व भावना का प्रचार किया। धन्ना जाट, कबीर, रविदास, दादू आदि ने भी निर्गुण भक्तिधारा के माध्यम से समाज में इन्हीं सब कोमल भावनाओं वर्तमान समय में परमपूज्य गुरुदेव के प्रज्ञा पुराण के माध्यम से जन-जन में प्रवाहित होते देखी जा सकती है। भावी सतयुगी समाज में भावमय भक्ति तत्व की प्रधानता रहेगी, जिसमें वैदिक भक्ति का समग्र स्वरूप प्रकट हो सकेगा। अतः हम सभी को भावभरे हृदय से परमपूज्य गुरुदेव के इस विशेष अभियान में प्राणपण से जुट जाना चाहिए। यह पुण्य कार्य हमारे हृदय की भावनाओं को भावमय भगवान से जोड़ने वाला सिद्ध होगा।
ज्ञान, भावना और कर्म तीनों अपने आपको ज्येष्ठ बताया करते थे इसके लिए झगड़ा हो गया। निपटारे के लिए तीनों ब्रह्माजी के पास गए। ब्रह्माजी बोले, “जो आकाश को छू ले वही बड़ा है।” ज्ञान सूर्य तक पहुँचा। आगे उसकी गति न थी। भावना ने छलाँग लगाई, तो आकाश के दूसरे छोर में पहुँच गई, पर नीचे न उतर पाई, वही लटकी रह गई। कर्म ने सीढ़ियां बनानी शुरू की, पर दोपहर तक ही थक गया। ब्रह्मा ने तीनों को दुबारा बुलाकर समझाया कि तुम्हारी पूर्णता साथ-साथ रहने में ही है, अकेले तीनों अधूरे हैं।
इनमें से एक भी कम अधिक होने पर व्यक्तित्व के उठने गिरने का कारण बन जाता है। कई बार प्रारंभिक जीवनक्रम अच्छा होने पर भी, संवर्द्धन का साधन क्रम न बने रहने से आचरण भ्रष्ट होने लगता है और यह पतन का कारण बनता है। आज बहुसंख्य व्यक्ति इसी समूह के अंतर्गत आते हैं।
एक गाँव में आग लग गई। सभी आदमी तो सुरक्षित भाग निकले, पर दो वृद्ध ऐसे थे, जो भाग नहीं सकते थे, एक अंधा, एक पंगा। दोनों ने एकता स्थापित की, अंधे ने पंगे को कंधे पर बैठा लिया, पंगा रास्ता बताने लगा और अंधा तेज दौड़ने लगा, दोनों सकुशल बाहर आ गए। सहयोग का अर्थ ही है- अनेक तरह की सामर्थ्यों से एक परिपूर्ण शक्ति का उद्भव।
बंदा वैरागी अपने युग की, समय की पुकार की अवहेलना कर संघर्ष में न लगकर एकाँत साधना कर रहे थे। उन्हीं दिनों गुरुगोविंद सिंह की वैरागी से मुलाकात हुई। उन्होंने एकाँतसेवन को आपत्तिकाल में हानिकारक बताते हुए कहा, “बंधु! जब देश, धर्म, संस्कृति की मर्यादाएँ नष्ट हो रही हैं और हम गुलामी का जीवन बिता रहे हैं, आतताइयों के अत्याचार हम पर हो रहे हैं, तब तक यह भजन-पूजन, ध्यान-समाधि आदि किस काम के हैं?” गुरुगोविंद सिंह की युक्तियुक्त वाणी सुनकर बंदा वैरागी उनके अनुयायी हो गए और गुरु की तरह उनने भी आजीवन देश को स्वतंत्र कराने, अधर्मियों को नष्ट करने और संस्कृति की रक्षा करने की प्रतिज्ञा की। इसी उद्देश्य के लिए बंदा वैरागी आजीवन प्रयत्नशील रहे। मुसलमानों द्वारा वैरागी पकड़े गए। उन्हें एक पिंजरे में बंद किया गया। मौत या धर्म परिवर्तन की शर्त रखी गई, लेकिन वे तिल मात्र भी विचलित नहीं हुए। अंततः आतताइयों ने उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। बंदा अंत तक मुस्कराते ही रहे। भले ही बंदा मर गए, परंतु अक्षय यश और कीर्ति के अधिकारी बने।
आर्यों के आदि निवास के रूप में भारतवर्ष एवं उनकी प्राचीनतम वैदिक सभ्यता की प्रामाणिकता एक सर्वमान्य सत्य है। ज्ञान-विज्ञान की विभिन्न धाराएँ भी इस तथ्य को सत्य प्रमाणित करती हैं। इसकी पुरातनता के प्रमाण खगोल विद्या में भी मिलते हैं। डेविड फराँले की पुस्तक ‘गॉड, सेजीस एंड किंग्ज’ के अनुसार वैदिक प्रतीकवाद में संयात/संक्राँति एवं (मुनपदवग) विषुव/सायन जैसी खगोलीय घटनाओं का उल्लेख आता है। जिसकी अवधि 4 से 6 ई. पू. के मध्य बताई जाती है। एक भारतीय खगोलविद् के जी. सिद्धार्थ ने कृष्ण यजुर्वेद में 85 ई. पू. के लगभग एक (वसपेसपबम) का स्पष्ट संदर्भ खोजा है, जो ऋग्वेद को ओर प्राचीन सिद्ध करता है। ब्राह्मण एवं सूत्रों को इसके बाद 3 ई. पू. काल का बताया जाता है।
गणित से भी वैदिक सभ्यता की पुरातनता पर प्रकाश पड़ता है। ‘पॉलीटिक्स ऑफ हिस्ट्री’ नामक ग्रंथ में एन. एस. राजाराम के अनुसार, अमेरिकी गणितज्ञ ए सैदेनवर्ग ने सिद्ध किया है कि प्राचीन मिश्र, बेबीलोन एवं यूनान की ज्यामिती सुलभ सूत्र गणित से ली गई है। मिश्र व बेबीलोन साम्राज्यों में ज्यामिती का प्रथम प्रकटीकरण 2 ई.पू. में हुआ था। अर्थात् सुलभ सूत्रों की रचना 2 ई.पू. से पहले की प्रमाणित होती है, जिसका उपयोग समकालीन सिंधु सरस्वती सभ्यता की अद्भुत नगरीय व्यवस्था एवं पूजा स्थलों में देखने को मिलता है।
धातु विज्ञान से भी वैदिक युग की प्राचीनता का प्रमाण मिलता है। एक अमेरिकी व्यक्ति ने 1956 में दिल्ली में एक प्राचीन सिक्का पाया। जिसे कई प्रयोगशालाओं ने 37-38 ई.पू. का बताया। इस पर एक ऋषि का तेजस्वी चेहरा बना हुआ था।
आर्य आक्राँता मत की निराधारता पर प्रहार करते हुए अमेरिकी पुरातत्ववेत्ता जिम शेफर अपनी पुस्तक ‘द इंडो आर्यन इन्वेजन : कल्चरल मिथ एंड आरकिओलॉजिकल रिएलिटी’ में 1984 में लिखते हैं, “भाषाई आंकड़ों के आधार पर यह मत गढ़ा गया था। जिसके आधार पर आगे चलकर पुरातत्ववेत्तीय एवं नृतत्ववेत्तीय आंकड़ों की व्याख्या की गई। जो सिद्धाँत था वह निर्विवाद सत्य बन गया। अब इस भाषाई निरंकुशता को समाप्त करने का समय आ गया है। वर्तमान की पुरातत्वीय खोजें पूर्व ऐतिहासिक या उत्तर ऐतिहासिक काल के किसी भी खंड में इंडो आर्यन या यूरोपीय आक्राँताओं की बात को पुष्ट नहीं करती। इसके स्थान पर प्रागैतिहासिक काल से ऐतिहासिक काल तक पुरातत्वीय आंकड़ों के आधार पर साँस्कृतिक परिवर्तन की श्रृंखलाओं की व्याख्या संभव है, जिसमें महत्वपूर्ण विकास हुए।”
भारतीय परंपरा में वेद हजारों वर्ष पुराने है। मैक्समूलर ने आधे-अधूरे तथ्यों के आधार पर इन्हें 12 ई. पू. तक ला दिया था, लेकिन सिंधु सरस्वती सभ्यता का असंदिग्ध वैदिक चरित्र इसे कम से कम 4 ई.पू. का बताता है। कुछ भाषाविज्ञानी इसे 5 ई. पू. तक का बताते हैं। खगोल विद्या तो इसे और भी पुरातन 9 ई.पू. तक का बताती है।
भारतीयों की पुरातनता के संदर्भ में वाल्टेयर ने अपने सहज बोध के आधार पर कहा था कि जब उनके पूर्वज जंगलों में बर्बर जीवन जी रहे थे तब भारतीय लोग सभ्य जीवन जी रहे थे।
लेकिन हमारी सभ्यता की पुरातनता ऋग्वेद से भी पूर्व की है, जैसा कि इसके स्रोतों में पितर मनुष्य के रूप में प्राचीन ऋषियों का उल्लेख आता है। महर्षि अरविंद के अनुसार, हमारी वास्तविक संहिता अवधि के अंत का प्रतिनिधित्व करती है, न कि इसके आरंभ या मध्यकाल का। वेदव्यास द्वारा संकलित वृहद् ग्रंथों का संग्रह अधिक समृद्ध आर्य पूर्वजों के मौखिक ज्ञान का एक चुनाव भर हो सकता है। विश्व में हमारी सबसे पुरानी परंपरा है, जिसमें 6 से 8 या इससे भी अधिक वर्षों तक मौखिक रूप से श्रुति -स्मृति के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान का हस्ताँतरण होता रहा है।
क्या पूर्वकाल में भी कोई विकसित सभ्यता रही है? विज्ञान इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर देता है, जिसके अनुसार मानव समाज का विकास आदिमानव से एक सरल रेखा में हुआ है। लेकिन यह श्री अरविंद के अनुसार यूरोपीय विद्वानों की एक धारणा से अधिक कुछ भी नहीं है, जो मानव सभ्यता का आरंभ काल फीजी द्वीपवासियों से शुरू कर आज के हेकल व रॉकफेलर तक का समय मानती है व पुरातन संस्कृति को आदिमानव करार देती है, वह भी अर्द्धसभ्य। यह आधुनिक विचारों का अंधविश्वास भर है कि ज्ञान की यात्रा अपने समग्र रूप में आगे की ओर ही हुई है। कम से कम उनका यह मानना है कि विकसित सभ्यता का एक महान वैदिक युग हुआ है, जो समय व परिस्थितिवश खंडित हुआ। यह संभव है कि इसके पास आज की तरह भौतिक सुख साधन न रहे बेहतर-श्रेष्ठ कुछ चीज थी। शायद यह संकेत आध्यात्मिक संपदा की ओर हो रहा है। विविध क्षेत्रों में पुरातन भारत की उपलब्धियों व उनका समस्त विश्व पर प्रभाव विचारणीय है, जो उसके विकसित स्वरूप पर प्रकाश डालता है।
बेबीलोन व पुरातन यूनानियों ने गणित ज्ञान भारत से सीखा था, जो 3 ई. पू. तक इस क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ चुके थे। भारत में खगोल विद्या भी बहुत प्राचीनकाल से विकसित रही, जिसे पाश्चात्य लोग कुछ शताब्दी ई. पू. की मानते हैं। (पदकवसवहपेज) भारत-विद्या शास्त्री सुभाष काक ने ऋग्वेद के सूत्रों में खोज से नए-नए तथ्यों को उजागर किया है। अपनी पुस्तक एस्ट्रोलॉजिकल कोड ऑफ ऋग्वेद में वे लिखते हैं कि ऋषि लोग जानते थे कि सूर्य एवं पृथ्वी के बीच दूरी सूर्य के व्यास का 38 गुणा अधिक होती है। वे पाँच ग्रह, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पतिवार एवं शनि के परिक्रमण-काल से परिचित थे। मिस्र, बेबीलोन व यूनान के वासियों से कई हजार वर्षों पूर्व भारतीय ऋषियों को सौरवर्ष की अवधि का ज्ञान था। जिसे वे 365-365 दिन के बीच मानते थे। भाषाई क्षेत्र में यह प्रमाणित हो चुका है कि सदियों के विकासक्रम में सिंधु सरस्वती लिपि एक ओर सेमेटिक लिपि और दूसरी ओर ब्राह्मी लिपि में विकसित हुई। इस तरह स्पष्टतः यह लिपि प्रायः अन्य सभी लिपियों की उत्पत्ति स्रोत बनती है।
इस तरह गणित हो या खगोल विज्ञान, भाषा लिपि हो या शून्य, दशमलव ज्ञान, तथाकथित अरबी संख्याएँ (मूलतः भारतीय) हों या वर्णमाला ज्ञान सभी भारत से उत्पन्न हुए। 18वीं सदी के यूरोपीय विचारक/विद्वान पुरातन आर्ष ग्रंथों की गहराई में ज्ञान विज्ञान की समृद्धता को देखकर रोमाँचित एवं आश्चर्यचकित हो उठे थे। तभी तो जर्मन विद्वान डोहम कह उठे थे कि भारत मानव जाति का पालना है, सभ्यता का जन्म स्थल है। विलियम मैकिन्टरो की उक्ति, “सारा इतिहास भारत को ज्ञान विज्ञान एवं कला की माँ बताता है।” फ्राँसीसी प्रकृतिविद् पियरे सॉनेरट लिखते हैं, “ हम भारतीयों में अधिकतम सुदूर पुरातनता के अवशेष पाते हैं। सभी लोग यहाँ ज्ञान पिपासा शाँत करने आए। भारत ने अपने गौरव काल में समूचे विश्व को अपने धर्म व ज्ञान से आलोकित किया। मिश्र व यूनानवासी अपने ज्ञान के लिए भारत के ऋणी है।”
वाल्टेयर 1773 में अपने ग्रंथ ‘फ्रेगमेन्टस हिस्टोरिक्यूज सर इन्डे’ में लिखते हैं, यह महत्वपूर्ण है कि 35 वर्ष पूर्व पाइथागोरस सामोस से गंगातट पर ज्यामिती सीखने गया। वह इतनी लंबी यात्रा न करता, यदि भारत के विज्ञान की ख्याति यूरोप में पहले से स्थापित न होती। हम पहले से ही यह मानते हैं कि भारतीयों के बीच अंकगणित, ज्यामिती, खगोल विद्या पढ़ाई जाती थी। अनंतकाल से वे विषुव (मुनपदवग) के अयन (चतमबमेपवद) से परिचित थे। भारत में कई वर्ष बिताने वाले फ्राँसीसी खगोलविद् ले जेंटिल भारतीयों के विज्ञान के प्रशंसक थे व आश्चर्यचकित थे कि भारतीयों को इस ज्ञान तक पहुँचने में कितना समय लगा होगा, जिसके बारे में चीनी लोगों को भी कोई मान न था। जिसमें मिश्रवासी व चाल्डियन तक अनभिज्ञ थे मुझे दृढ़ विश्वास है कि खगोल विद्या, ज्योतिष विज्ञान, पुनर्जन्म आदि सभी कुछ हमारे यहाँ गंगा के तट से आया है। ये सब उद्गार आर्यों की मौलिकता को स्पष्ट करते हैं। उनके विदेशी आक्राँता होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
‘द इन्वेजन देट नेवर वाज’ के विख्यात लेखक माइकल डेनिनो आर्य आक्राँता सिद्धाँत का विधिवत खंडन करते हुए, सिंधु-सरस्वती सभ्यता पर व्यापक प्रकाश डालते हुए भारतीय संस्कृति की पुरातनता, एकता एवं अखंडता की बात करते हुए कहते हैं कि भारतीय इतिहास का नैरंतर्य युगों तक रहा है। वैदिक युग 4 ई. पू. से बहुत पहले अपनी प्रौढ़ावस्था में था। इसके बाद सिंधु- सरस्वती सभ्यता आई, जो इसका स्वाभाविक रूप से विकसित रूप था। सरस्वती नदी के सूखने के बाद यह गंगा सभ्यता के रूप में प्रकट हुई। भौगोलिक एवं पारिस्थितिक परिवर्तनों के बीच कोई स्पष्ट विभाजन नहीं रहा। आर्य व द्रविड़ों में भी भाषा, सभ्यता व इष्ट देवताओं के बीच कोई स्पष्ट विभाजन नहीं हैं। सिंधु सरस्वती के कुछ स्थलों ने 4 वर्षों तक अनवरत विकास को दर्शाया है। कही भी प्राकृतिक आपदाओं के अतिरिक्त युद्ध व आकस्मिक व्यवधान का चिन्ह नहीं है। भावी खोजें भी इसी तथ्य की ही पुष्टि करेंगी। श्री अरविंद ‘द फाउंडेशन ऑफ इंडियन कलचर’ में लिखते हैं, “भारत में बहुत पहले से आध्यात्मिक एवं साँस्कृतिक एकता पूर्णता पा चुकी थी और हिमालय तथा दो सागरों के बीच की मानवता भी जीवन प्राण बन चुकी थी।”
यह सुनिश्चित सत्य है कि भारत का अपना गौरवमयी अतीत रहा है, जिसकी ज्ञान-विज्ञान की उपलब्धियाँ स्वयं में अद्वितीय थी व जिसके आलोक में विश्व की अन्य सभ्यताएँ भी प्रकाशित हुई। आज समूची मानव जाति घोर अंधकार एवं अनास्था के दौर में भटक रही है। हम आत्म-विस्मृति के कारण दीन-हीन एवं पतन पराभव की स्थिति में पड़े है। समय आ गया है कि हम अपने अंदर विद्यमान श्रेष्ठता एवं दिव्यता के पक्षधर आर्यत्व को जगाएँ अपने खोए हुए वर्चस्व को पुनः प्राप्त करके न केवल अपने देश को गौरवशाली बनाएँ, बल्कि विश्व -कल्याण के उस उत्तरदायित्व का भी वहन करें, जिसे इस देश ने सहस्राब्दियों तक अपने कंधे पर उठाए रखा था।
जगद्गुरु शंकराचार्य से माँधाता ने पूछा, “भगवन् सर्वोपरि देव कौन है, जिनकी उपासना से लोक -परलोक दोनों सधते हों।”
शंकराचार्य ने कहा, “ वह है गायत्री! गायत्री की महिमा का वर्णन करना मनुष्य की सामर्थ्य से बाहर है। सद्बुद्धि का होना इतना बड़ा कार्य है। जिसकी समता संसार में और किसी से नहीं हो सकती। आत्मज्ञान प्राप्त करने की दिव्य दृष्टि जिस बुद्धि से प्राप्त होती है, उसकी प्रेरणा गायत्री द्वारा होती है।”
यज्ञेषु देवास्तुष्यन्ति यज्ञे सर्व प्रतिष्ठितम्। यज्ञेन ध्रियते पृथ्वी यज्ञस्तारयति प्रजाः॥ अन्नेन भूता जीवन्ति यज्ञे सर्व प्रतिष्ठिम। पर्जन्यें जायते यज्ञात सर्व यज्ञमयं ततः॥
यज्ञों से देवता संतुष्ट होते हैं, यज्ञ ही समस्त चराचर जगत् का प्रतिष्ठापक है। यज्ञ पृथ्वी को धारण किए हुए है, यज्ञ ही प्रजा को पापों से बचाता है। अन्न से प्राणी जीवित रहते हैं। वह अन्न बादलों द्वारा उत्पन्न होता है और बादलों की उत्पत्ति यज्ञ से होती है। अतः यह संपूर्ण जगत् यज्ञमय है।
-कालिकापुराण 23-7-8
मंदिर के जिस प्रकोष्ठ में भगवान सुब्रह्ण्यम की मूर्ति थी, उसी के सामने वाले भाग में एक सुँदर वीणा रखी हुई थी। मंदिर में कई लोग तो वीणा के दर्शन कर लेते और चले जाते। कुछ उसे बजाने की इच्छा करते, पर वहाँ बैठा हुआ मंदिर का रक्षक उनसे मना करता और वे वहाँ से चल देते। इस प्रकार सुँदर स्वरों वाली वह वीणा जहाँ थी, वही रखी रहती थी उसका कभी कोई उपयोग न होता था।
एक दिन एक व्यक्ति आया, उसने वीणा बजाने की इच्छा व्यक्त की, पर उस व्यक्ति ने उसे भी मनाकर दिया। वह व्यक्ति वहाँ चुपचाप खड़ा रहा। थोड़ी देर में सब लोग मंदिर से निकलकर बाहर चले गए, तो उस व्यक्ति ने वीणा उठा ली और उसका लयपूर्वक वादन करने लगा। वीणा का मधुर स्वर लोगों के कानों तक पहुँचा, तो लोग पीछे लौटने लगे और उस मधुर संगीत का रसास्वादन करने लगे। वाद्य घंटों चला और लोग मंत्रमुग्ध सुनते रहे। जब वह बंद हुआ तब भी लोग ईश्वरीय आनंद की अनुभूति करते रहे। लोगों ने कहा आज वीणा सार्थक हो गई।
भावार्थ यह है कि भगवान काया तो सबको देता है, पर कुछ लोग अज्ञानवश व कुछ अभिमानवश इस वीणा रूपी यंत्र का सदुपयोग नहीं कर पाते। यदि इन दो दोषों से दूर रहकर कोई शरीररूपी वीणा से मधुर लहरियाँ निकाले, तो उस आनंद से न केवल वह वरन् संपर्क के सैकड़ों लोग उसमें ईश्वरीय आनंद की झलक पाते हैं।
महर्षि अत्रि की एकमात्र संतान थी, उनकी पुत्री अपाला। स्वभाव से सुशील और नम्र तथा बुद्धि में अपने पिता की प्रतिमूर्ति। केवल एक बार सुनने से उसे सब कुछ कंठस्थ हो जाता। महर्षि अत्रि वेदों की ऋचाएँ उसे याद करने के लिए देते और वह उन्हें एक बार पढ़कर ही अपने मस्तिष्क में सुरक्षित रख लेती। पिता श्री के पूछने पर वह बिना किसी हिचकिचाहट के सब कुछ सुना देती। इतना ही नहीं, महर्षि अत्रि नित्यप्रति अपने शिष्यों को बतलाते तो अपाला भी उसे भलीभाँति सुनती और उसे सुनकर कंठस्थ कर लेती। धीरे-धीरे उसे चारों वेद और उनके अर्थ कंठस्थ हो गए। वेदों का उसे गहरा ज्ञान भी था। ऋचाओं के गहन अर्थ वह ढूंढ़ती और उनके बारे में जब अपनी आशंकाओं को पिताश्री के सामने रखती, तो महर्षि अत्रि भी उसकी प्रतिभा को देखकर गदगद हो उठते।
महर्षि अत्रि के लिए अपाला जहाँ गर्व और गौरव की वस्तु थी, वही वह उनके लिए चिंता का भी कारण बनी हुई थी। अपाला को बचपन से ही चर्म रोग था। उसके शरीर में यत्र तत्र श्वेत कुष्ठ रोग के चिन्ह थे महर्षि अत्रि ने निकटवर्ती सभी वैद्यों को अपने आश्रम में बुलाया और उसके रोग के निदान का प्रयत्न किया। निदान अनवरत चल रहा था, मगर सफलता के लक्ष्य से अति दूर।
बचपन में तो अपाला को अपने रोग के बारे में कोई ज्ञान ही नहीं हुआ। वह पक्षियों की तरह कलरव करती हुई आश्रम में स्वच्छंद विहार करती और वात्सल्य रस से अभिभूत महर्षि उसे देखकर अपने सभी दुख दर्दों को भूलकर आत्मविभोर हो उठते मगर ज्यों-ज्यों वह किशोरावस्था को प्राप्त करने लगी, त्यों-त्यों उसे अपने रोग की भयानकता का अहसास होने लगा। इससे उसे मानसिक पीड़ा हुई, मगर उससे भी कही अधिक चिंता उसे इस बात की थी कि उसके पिता श्री भी दुखी रहते हैं तथा स्वाध्याय में दत्तचित्त नहीं हो पाते। पिता को चिंतित देखकर वह तरह-तरह की बातें करके उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करती और जब इसमें वह असफल हो जाती, तो उनके पास जाकर वह धैर्य बँधाने लगती, पिता श्री क्यों चिंता करते हैं? यह रोग तो अपने आप ही निर्मूल हो जाएगा। औषधियाँ भी चल ही रही है। यदि निर्मल नहीं भी हो तो चिंता करने से क्या लाभ? वस्तुस्थिति को स्वीकारना ही पड़ेगा।
अपाला ने धीरे-धीरे यौवनावस्था में पदार्पण किया, तो महर्षि को उसके विवाह का चिंता सताने लगी। महर्षि ने कई युवकों के मन को टटोलने की कोशिश की, परंतु श्वेत कुष्ठ चिन्हों के कारण कोई भी युवक अपाला से विवाह के लिए तैयार नहीं हुआ। इस स्थिति ने महर्षि को और भी झकझोर दिया।
युवावस्था मनुष्य के अनेक शारीरिक दोषों पर परदा डाल देती है। अपाला पर जब युवावस्था गहराने लगी, तो श्वेत कुष्ठ के चिह्न धीरे-धीरे हलके पड़ने लगे। अब पूर्ण जानकारी होने पर ही वे चिन्ह दृष्टिगत होते थे। सामान्यतः अपाला का चेहरा काफी आकर्षक था और वह किसी व्यक्ति को इतना अवसर ही नहीं देता था कि उसकी दृष्टि शरीर के दोषों की ढूंढ़ सके। ऐसे ही अवसर पर एक दिन कृशाश्व नाम के एक ऋषि और ब्रह्मवेत्ता का महर्षि अत्रि के आश्रम में आगमन हुआ। कृशाश्व ने सहज दृष्टि से कुसुमित अपाला को निहारा, तो स्तंभित से रह गए। यौवन काँति की चकाचौंध में वे कुष्ठ चिन्हों का आभास ही नहीं कर पाए। उन्होंने महर्षि से अपाला के परिणय की माँग की, तो महर्षि प्रसन्नता से झूम उठे। महर्षि ने शुभ दिन और शुभ मुहूर्त ज्ञातकर वेदोक्त पद्धति से सौंदर्य प्रतिमा अपाला का विवाह ऋषि कृशाश्व के साथ कर दिया। सौंदर्योपासक कृशाश्व ने नवोढ़ा अर्द्धांगिनी अपाला के साथ अपने आश्रम की ओर प्रस्थान किया।
कुछ समय तक तो अपाला और कृशाश्व का वैवाहिक जीवन बड़े ही प्रेमपूर्ण वातावरण में व्यतीत हुआ। मगर ज्यों-ज्यों युवावस्था ढलने लगी, त्यों-त्यों ही श्वेत कुष्ठ के चिन्ह उभरने लगे। कृशाश्व ने जब देखा, तो मन में प्रेम के स्थान पर घृणा के अंकुर फूटने लगे। वह सौंदर्योपासक अब अपाला के वीभत्स रूप को सहन नहीं कर पाया। उसकी बार-बार इच्छा हुई कि अपाला को महर्षि के आश्रम में छोड़ आए, परंतु महर्षि का सामना करने का साहस वह नहीं जुटा पा रहा था। वस्तुस्थिति को समझकर अपाला स्वयं कृशाश्व की स्वीकृति लेकर अपने पिता के आश्रम की ओर चल दी।
महर्षि अत्रि ने अपनी पुत्री अपाला को देखा तो उनके दुख और वात्सल्य एक साथ ही आँखों की आस फूट निकले। उन्हें इस प्रकार की कुछ आशंका तो पहले से थी ही। फिर भी उस स्थिति का सामना करके वह शाँत न रह सके।
महर्षि अत्रि ने अपनी पुत्री को धैर्य बँधाया और उसे निश्चित होकर आश्रम में रहने के लिए कहा। आश्रम का वातावरण लगभग वैसा ही था जैसा अपाला छोड़ गई थी। समय का प्रभाव अवश्य ही सब कही था। महर्षि भी अब कुछ वृद्ध हो चले थे। अभी भी उनकी कर्मठता चुकी नहीं थी। अपाला आश्रम के वातावरण में शीघ्र ही घुल-मिल गई, पर उसकी वेदना रह -रहकर उसके चेहरे पर उभर आती। उसे विशेष रूप से यह सोचकर कष्ट होता है कि उसी के कारण कृशाश्व का जीवन संकटमय हुआ और पिता श्री को तो वह सदैव कष्ट देती ही रही है।
महर्षि अत्रि अपनी पुत्री के चेहरे के भावों को पढ़ते रहते। उन्होंने एक दिन अपाला को अपने निकट बुलाया और कहा, “बेटी! नियमित आहार, अध्ययन, उपासना और शयन से तेरा उपकार होगा। तू तपस्या कर। उसी से तेरा उद्धार होगा।”
अपाला ने अपने पिता की आज्ञा मानकर इंद्र की तपस्या करनी प्रारंभ कर दी। उसकी तपस्या पूर्ण निष्ठा और लगन से चल रही थी। वह नित्य सूर्य को अर्घ्य देती और शनैः शनैः सभी मानवीय दुर्बलताओं से मुक्त होती जा रही थी।
अपाला की तपस्या से इंद्र प्रभावित हुए। वे अपाला के सामने आए, तो वह श्रद्धा से नत हो गई। वह वेदों की ज्ञाता थी, इसलिए वह जानती थी कि इंद्र को सोमरस प्रिय है। उसके पास सोम बेल थी, पर आस-पास इसे निकालने के लिए कोई साधन नहीं था। वह निराश सी इधर-उधर दृष्टि दौड़ने लगी। साधन हीन होकर भी सोमबेल को अपने दाँतों में दबाकर उसी से सोमरस एक पात्र में निकालने लगी। इस प्रकार सोमरस निकालकर इंद्र को प्रस्तुत किया, तो अपाला की निश्छल भावना को देखकर वे भाव-विभोर हो उठे। उन्होंने प्रेम से सोमरस का पान किया और अपाला से वरदान माँगने के लिए कहा।
अपाला ने वरदान माँगा, हे इंद्र! मुझे आप सुलोम बनाइए। मेरे अंगों को देखकर दोषरहित और श्रेष्ठ त्वचा वाले बनाइए। तभी मैं अपने ऊपर आरोपित आरोपों से मुक्त हो सकती हूँ और अपने पिता एवं पति को प्रसन्न रख सकूँगी।
इंद्र ने अपाला पर अपनी विद्या का प्रयोग किया और तीन बार उसकी त्वचा का शोधन किया। इससे अपाला की त्वचा अत्यंत आकर्षक और दोषरहित बन गई। उसने इंद्र का स्तवन किया और आभार माना।
उधर कृशाश्व भी अपाला के जाने के बाद प्रसन्न नहीं थे उन्हें लग रहा था जैसे उन्होंने भी अपाला के साथ अन्याय किया हो। वह जैसी भी थी उनकी पत्नी थी, जिसका उन्होंने स्वयं अपनी इच्छा से वरण किया था। सो वे अपाला को पुनः लेने के लिए महर्षि आश्रम में आ पहुँचे। ठीक उसी समय अपाला भी तपस्या में सफलता प्राप्त करके वहाँ आई। अपाला के नए रूप को कृशाश्व ने देखा, तो उसकी प्रसन्नता की कोई सीमा न रही। नारी के तप की गरिमा के सामने उनके पौरुष की आँखें नीची हो गई थी। वह समझ चुके थे कि वास्तविक सौंदर्य तप में है, शरीर में नहीं।
दिव्य आत्मा कौन?
‘परमार्थ प्रयोजनों के लिए बहुत कुछ कर गुजरने की अभिलाषा’ एक ऐसा तत्व है, जिसे ईश्वरीय प्रकाश एवं पूर्व जन्मों के संचित उत्कृष्ट संस्कारों का प्रवाह कह सकते हैं। जिसके भीतर जितनी ईश्वरीय प्रयोजनों में सहयोगी बनने की तड़पन हैं, वह उतना ही दिव्य आत्मा है। तड़पन पानी के स्रोतों की तरह है, जो पहाड़ जैसी कठोरता को चीरकर बाहर निकल आती है। साधारण परिस्थिति के लोग भी उपयुक्त अवसर पर अपनी तड़पन क्रियान्वित करने का साहस कर बैठते हैं, तब वह साहस ही ईश्वरीय अवतरण के रूप में उन्हें सूर्य चंद्रमा की तरह चमका देता है। तड़पन का फूट पड़ना, इसी का नाम अवतरण है।
-वाङ्मय 28, पृ. 2.87
इंद्रियों की सामर्थ्य सीमित होती है। इनकी पहुँच स्थूल जगत् के कुछ क्षेत्रों तक ही है। इससे परे भी कई अज्ञात लोक है। यह ज्ञान अतींद्रिय सामर्थ्य द्वारा जाना जाता है। इसी के माध्यम से देवों का दर्शन, स्वप्न द्वारा पूर्वाभ्यास आदि अलौकिक अनुभूति प्राप्त होती हैं। साधक-तपस्वियों का जीवन इसी तरह अलौकिक घटनाओं से भरा होता है। सामान्यजन भी अपनी मनःस्थिति को सात्विक रखकर इस तरह की अनुभूतियों से साक्षात्कार कर सकते हैं। आजकल इसे मात्र कल्पना नहीं माना जाता, वरन् यह विषय आधुनिक परामनोविज्ञान के अंतर्गत आता है, जिसमें कई प्रकार के अनुसंधान-अन्वेषण हो रहे है।
इस क्षेत्र में कई प्रमाणित शोध ग्रंथ भी उपलब्ध है, जिसमें अगणित सच्ची घटनाओं का वर्णन किया है। इस परिप्रेक्ष्य में सीजर डी वेस्मी की पुस्तक ‘ल हिस्टारि एंड स्पिरिट्स इन एनशिएंट वर्ल्ड’ काफी महत्वपूर्ण है। इन पुस्तकों से प्राप्त उद्धरणों से पता चलता है कि इंद्रियों से परे भी एक ज्ञान है, जिसे अतींद्रिय बोध आदि कहा जा सकता है।
यूनानी दार्शनिक प्लूटार्क ने अपनी कृति ‘द जोनियो सोक्रेटिस’ में सुकरात के जीवन से सम्बन्धित कई घटनाओं का जिक्र किया है। इस पुस्तक से पता चलता है कि सुकरात के अंदर एक डेमन रहता था। यह डेमन उन्हें समय-समय पर आगामी घटनाओं की पूर्व सूचनाएँ देता रहता था। प्लेटो की ‘थीसीज’ में सुकरात के डेमन का रोचक प्रसंग है। एक शाम सुकरात तिमार्कस नामक एक व्यक्ति व अपने कुछ अन्य साथियों के साथ बैठे खाना खा रहे थे। कुछ समय बाद तिमार्कस कही जाने को अपने स्थान से उठ खड़ा हुआ। “अपने स्थान से तनिक भी नहीं उठना,” सुकरात तुरंत बोल पड़े। सुकरात ने इसे और स्पष्ट करते हुए बस इतना कहा, मुझे अभी-अभी खतरे की सूचना मिली है। तिमार्कस बैठ गया। थोड़ी-थोड़ी देर बाद जब-जब भी तिमार्कस उठने लगता, सुकरात उसे पुनः बिठा दिया करते। आखिरकार तिमार्कस से नहीं रहा गया और वह चुपचाप उठकर चल दिया। वहाँ से चलने के बाद वह षड्यंत्रकारियों के दल से मुठभेड़ के कारण मारा गया। पूर्वाभास स्वप्न में माध्यम से भी होते हैं। कइयों ने इसे माना और लाभान्वित हुए और जो इसे मात्र कल्पना लोक की उड़ान समझे, खतरे में पड़े। एक ऐतिहासिक प्रसंग में स्वप्न के माध्यम से पूर्वाभास का वर्णन है। जूलियस सीजर की पत्नी को एक रात स्वप्न आया कि उसके पति की प्रतिमा में खून टपक रहा है। दूसरे दिन उसने सीजर को सीनेट में जाने से बहुत रोका। सीजर ने अपनी पत्नी को इतना विचलित कभी नहीं देखा था। वह स्वप्न के प्रभाव के कारण अत्यंत क्षुब्ध थी और एक बार तो सीजर जाने से रुक भी गया था। किंतु आखिर वह चला भी गया अपने अदृष्ट की ओर। वहाँ से भारी हानि उठानी पड़ी।
विश्व के महान इतिहासकार हिरोडोट्स ले लाडा के राजा कोशस का उल्लेख किया है, जिसमें अतींद्रिय प्रत्यक्षण का वर्णन है। 56-546 ई. पू.र्व अपने शासनकाल के दौरान जब राजा अपने शत्रुओं की बढ़ती हुई ताकत से आतंकित होने लगा, तो इसके उचित समाधान हेतु किसी भविष्यवक्ता की इच्छा की। इसके लिए सात भविष्यवक्ता जाँच के लिए चुने गए। सातों में से डेल्फी की भविष्यवाणी ही सही निकली। जिसका विवरण सुनकर राजा अत्यंत प्रभावित हुआ। डेल्फी के पास आए राजा के संदेशवाहक को उसने कहा, “तुम्हारा राजा पीतल के बड़े बरतन में जिस पर पीतल का ही ढक्कन था, एक कछुए व भेड़ को साथ-साथ भून रहा था।” यह एक आश्चर्यजनक सत्य था। इसके पश्चात डेल्फी ने अपने प्रति विश्वस्त राजा को अपनी अतींद्रिय सामर्थ्य के माध्यम से बहुत लाभ पहुँचाया।
भविष्यज्ञाता एलेशा के बारे में कहा गया है कि वह सीरिया के सैनिक भेद जानने हेतु इसी अतींद्रिय ज्ञान का प्रयोग करते थे। इसी ज्ञान को जानने के कारण महाभारत में संजय धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र में लड़े जा रहे युद्ध का समाचार इस तरह सुना रहे थे मानो वह प्रत्यक्ष देख रहे हों। स्वीडन बोर्ग ने भी अपने मित्रों को सैकड़ों मील दूरस्थ अपने गाँव में हो रहे भीषण अग्निकाँड का विवरण इसी प्रकार दिया, मानो सभी कुछ उसकी आँखों के सामने हो रहा है।
दार्शनिक काँट अतींद्रिय प्रत्यक्षण को सत्य मानते थे। इस बारे में उन्होंने अपनी पुस्तक ‘ड्रीम ऑफ ए बिलीवर’ में सुविख्यात गणितज्ञ विद्वान वैज्ञानिक स्वीडन बोर्ग के एक अनुभव का जिक्र किया है। उनके अनुसार, एक शनिवार की शाम को करीब चार बजे स्वीडन बोर्ग इंग्लैंड से गोहनर्ब पहुँचे ही थे कि एकदम बेचैन हो गए। अपने सहपाठियों को छोड़कर वे बाहर जाकर घूमने लगे। लौटने पर उन्होंने बतलाया कि अभी अभी स्टाक होम में उनके मकान के निकट भीषण अग्निकाँड हुआ और आग की लपटें बड़ी तीव्र गति से बढ़ती जा रही हैं। स्वीडन बोर्ग उस समय अत्यंत उद्विग्न व परेशान रहे। करीब आठ बजे वे कुछ शाँत हुए और बोले, ईश्वर का धन्यवाद है कि आग हमारे मकान से बीस मकान पूर्व ही बुझा दी गई। काँट इस घटना से अत्यंत प्रभावित हुए।
बोकाकियो द्वारा रचित दाँते की जीवनी में भी ऐसा ही एक रोचक प्रसंग मिलता है। इसमें दाँते की मृतात्मा ने अपनी पुस्तक के रुके हुए भाग को पूरा करने में सहायता प्रदान की थी। ‘द डिवाइन कॉमेडी’ के महान रचनाकार की मृत्यु के बाद यह पाया गया कि उसके अंतिम भाग पेराडिसों के कई अंतिम छंद नहीं मिल रहे हैं। बहुत खोजने पर भी जब वह छंद नहीं मिले, तो उनके सुपुत्रों ने स्वयं लिखकर कृति को पूरा करने का निश्चय किया। इस दौरान दाँते के एक पुत्र जाकोया ने रात में दाँते को स्वप्न में देखा चिंतित जाकोया ने तुरंत पिता से छंदों के बारे में पूछा। दाँते उसे पुराने मकान के एक कमरे में ले गए और उसकी दीवार को स्पर्श करते हुए बोले, जिसके लिए तुम इतने परेशान हो, वह इसमें विद्यमान है। जाकोया तुरंत उठा और अन्य व्यक्तियों को साथ लेकर उस मकान में गया, जहाँ मृत्यु के पूर्व उसके पिता रहते थे। दाँते द्वारा इंगित दीवार पर एक चित्र टँगा हुआ था। जब उसे हटाया गया तो पीछे तेरह छंद मिले, जिनसे कि वह अधूरी पड़ी कृति पूर्ण हो सकी। इस पाँडुलिपि की हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि यदि वे कुछ दिन वही पड़े रह गए होते, तो पूर्णतः सड़-गल जाते।
स्वप्न द्वारा प्राप्त इस तरह की जानकारी सचमुच में अद्भुत और आलौकिक है। ऐसी और भी कई घटनाएँ हैं।1956 की एक घटना में एम राँवेल नामक एक व्यक्ति ने ‘एलेन कोर्डेक’ के नाम से अदृश्य प्रेतात्माओं द्वारा लिखाई गई एक पुस्तक ‘द बुक ऑफ द स्पिरिट्स’ प्रकाशित की। इस पुस्तक का विश्व की लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। इसी तरह शिवरामिकंकर योगत्रयानंद के बारे में कहावत है कि पाणिनि की आत्मा ने स्वयं आकर उन्हें व्याकरण के सूत्र सिखाए थे।
अतींद्रिय सामर्थ्य से पूर्वी पूर्णतः परिचित है, बल्कि यह कहने में जरा भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह ज्ञान यही की देन है। पाश्चात्य जगत् भी इससे अछूता नहीं है। काँट, गेटे, शैलिंग, हीगल, शोपेनहावर, सदृश दार्शनिकों ने भी इस सत्य को हृदयंगम किया है। 1816 में डॉ. वलूग व डॉ. वाँलफाँट ने अपनी पुस्तक ‘डेर मेग्नेटिज्मस’ में इसके अनोखे विवरण प्रस्तुत किए हैं। 1829 में डॉ. करनर ने एक लेख ‘टू सीअर ऑफ प्रोवोर्स्ट’ में अतींद्रिय क्षमतासंपन्न फ्रेडरिका हाफे नामक महिला का उल्लेख किया है। फ्रेडरिका बचपन से ही होने वाली घटनाओं की पूर्व सूचना दे देती थी। ईसा के जीवनी लेखन डेविड स्ट्राँस ने भी इस सत्यता की पुष्टि की है।
उपर्युक्त विवरणों एवं वर्णनों को मात्र कौतुक -कल्पना नहीं कहा जा सकता है। यह प्रक्रिया सच्ची है। इसका संपूर्ण आधार मन है। मन यदि सात्विकता से ओत-प्रोत है। तो स्वप्न में भावी जीवन एवं घटनाओं की पूर्व सूचना मिल सकती है। सच्चे मन से साधना करने पर भी इन अनुभूतियों से एकाकार हुआ जा सकता है। यह पूर्वाभास जाग्रत अवस्था में भी प्राप्त हो सकता है। यदि साधना, पुण्य एवं संकल्प प्रगाढ़ और प्रबल हो तो सचेतन व जाग्रत अवस्था में भी दिव्य दर्शन संभव है। मनुष्य जिस मनःस्थिति में रहता है, उसी के अनुरूप से आभास मिलते हैं। शरीर एवं मन को सात्विकता का आगार बनाकर साधना द्वारा अनेकों अलौकिक अनुभूतियों से साक्षात्कार किया जा सकता है।
निष्ठुरता से बढ़कर कुरूपता और कहीं कोई नहीं।
जाग्रत आत्माओं एवं महापुरुषों का एक ही चिन्ह है कि वे संकीर्ण क्षेत्र में सीमित नहीं रहते। शरीर, घर और धन इतना ही सब कुछ है, ऐसा वे नहीं मानते और उसके अतिरिक्त और कुछ कर्तव्य भी उनका है, ऐसा वे सोचते हैं। अपने समय की, देश धर्म, संस्कृति एवं समाज की जिम्मेदारियाँ वे समझते हैं और उनकी सामयिक आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए वे कुछ करते भी हैं।
आधुनिक कही जाने वाली जीवन शैली ने जीवन चेतना को क्षत-विक्षत कर दिया है। यही वजह है कि आज मनोरोगों की भरमार हो चली है। इन सभी मनोरोगों का सम्बन्ध मन से है। मन एक भावबोधक शब्द है, जो मस्तिष्क के जटिल क्रियात्मक पहलू को उजागर करता है। मन के मुख्य रूप से दो क्रियात्मक स्तर हैं, (1) ऊपर का या सतही मन, (2) गहराई वाला अवचेतन मन।
सामान्य क्रम में व्यक्ति को सिर्फ चेतन मन का ही ज्ञान होता है। अवचेतन मन का अनुभव तब होता है, जब कोई बेधक विचार कौंधता है या फिर आत्मविश्लेषण किया है और उसी की इच्छा के अनुरूप जीवनयापन करते हैं। अवचेतन मन की इच्छाओं आकाँक्षाओं की ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता। यदि कभी ऐसा होता भी है, तो उसे बलपूर्वक दबा दिया जाता है अवचेतन मन पर पड़ने वाला यह आवश्यक दबाव भी कालाँतर में मानसिक रोग का कारण बन जाता है।
मनुष्य के अपने मन की विकृतियाँ ही मानसिक रोगों का प्रमुख कारण होती हैं। अपनी सामान्य अवस्था से विचलित होना ही विकृति कहलाती है। मन की विकृति के कई लक्षण हैं, जैसे अत्यधिक चिंता या बेवजह का डर, बेचैनी और अनिद्रा, आवेशों की अधिकता, अवास्तविकता अथवा काल्पनिक विचारों में खोए रहना, असामान्य व्यवहार, अपनी और अपने आश्रितों की देखभाल में लापरवाही आदि। मन की ये विकृतियाँ कायिक एवं क्रियात्मक दो रूपों में परिलक्षित होती हैं। कायिक विकारों से मस्तिष्क प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होता है, जबकि क्रियात्मक विकारों से मस्तिष्क तो सामान्य रहता है, लेकिन उसके कार्य में बाधाएँ पहुँचती है। मन की विकृति का काया पर पड़ने वाला प्रभाव उन्माद, मिरगी आदि रोगों के रूप में दिखाई पड़ता है। इन रोगों से ग्रस्त व्यक्ति की मेधा शक्ति क्षीण होने लगती हैं। जिसके कारण वह भुलक्कड़ अस्त-व्यस्त मंद बुद्धि एवं एक ही क्रिया को बार-बार दुहराने वाला हो जाता है। इस रोग की चरम अवस्था में उपचार असंभव हो जाता है, परंतु प्रारंभिक अवस्था में उचित उपचार द्वारा रोगी ठीक हो सकता है।
क्रियात्मक विकारों से आवेशों, विचारों और व्यवहार पर बहुत ज्यादा पड़ता है। रोगी के मन में आवेशों की एक असामान्य लहर उमड़ती है, जिसमें उत्साह या अवसाद होता है। उत्साह के कारण आवेशित व्यक्ति बेचैन, निद्राहीन, बातूनी और कई बार हिंसात्मक भी बन जाते हैं। अवसाद से आवेशग्रस्त होने वाला व्यक्ति दुःखी, बेचैन, निराश और आत्महत्या की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं। ये दोनों कई बार अपने आप ठीक भी हो जाते हैं, पर इनकी आवृत्ति प्रायः होती रहती है।
चिंता, हिस्टीरिया, स्क्रिजोफ्रेनिया, आब्सेसिव-कंपल्सिव आदि कुछ अन्य प्रमुख मानसिक विकार हैं। चिंता की अवस्था में व्यक्ति अपने स्वास्थ्य एवं सुरक्षा को लेकर अत्यधिक चिंतित रहता है। पूर्ण स्वस्थ होते हुए भी काल्पनिक रोगों के भय से स्वयं को इतना परेशान कर लेता है कि चिकित्सक द्वारा आश्वासन दिए जाने पर भी उसे विश्वास नहीं होता। हिस्टीरिया में भी व्यक्ति अपने आपको रोगग्रस्त मानकर लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने की कोशिश करता है। इन मनोरोगों की दशा में व्यक्ति का मन पूरी तरह संदेहों और अनिश्चितता से भर जाता है। इनका इलाज बहुत कठिन होता है और धीरे-धीरे स्थायी बनता चला जाता है। चिंता और हिस्टीरिया का उपचार आरंभिक अवस्था में मनोचिकित्सकों द्वारा किया जा सकता है। इसकी आवृत्ति भी प्रायः कम होती है।
स्क्रिजोफ्रेनिया अर्थात् विखंडित मनोविक्षिप्त का प्रमुख लक्षण सोचने एवं बातचीत में आई गड़बड़ी है। रोगी की मानसिक कार्यप्रणाली के विभिन्न अवयवों से तालमेल समाप्त हो जाता है। विचारों और संवेगों के बीच तारतम्य का लोप हो जाता है। अतः रोगी की बातचीत एवं कार्यकलाप एक दूसरे से परस्पर विरोधी या असंबद्ध हो जाते हैं। कुछ रोगी परिस्थिति एवं समय से परे लगातार निरर्थक बातें करते रहते हैं। इसके विपरीत कई रोगी बोलते ही नहीं, बस एकदम भावविहीन नेत्रों से टकटकी लगाए देखते रहते हैं। रोगी की संवेगात्मक अनुभूति की क्षमता में अत्यधिक परिवर्तन आ जाता है। वे न तो खुशी का अनुभव कर पाते हैं, न दुख का। कुछ मरीज बिना किसी कारण के हँसते या रोते दिखाई पड़ते हैं या फिर अचानक गुस्से में भरकर मारपीट करने लगते हैं। इस रोग की कैटाटोनिक अवस्था में कुछ रोगी हफ्तों बिना कुछ खाए-पिए चुपचाप एक विचित्र मुद्रा में पड़े रहते हैं। इस रोग के लिए ई.सी.टी. चिकित्सा सामान्यतया दी जाती है, जो कि नुकसानदायक होती है।
आब्सेसिव कंपल्सिव रोग एक ऐसी मानसिक बीमारी है, जिसमें व्यक्ति के मस्तिष्क में लगातार एक चेन की तरह न समाप्त होने वाले विचारों के आने की प्रक्रिया सतत रूप से चलती रहती है, जो स्वयं व्यक्ति के लिए काफी कष्टकारी होती है। रोगी उन विचारों की निरर्थकता के प्रति जागरुक होता है। वह उन्हें रोकने की कोशिश भी करता है, परंतु असफल रहता है। इन्हीं विचारों को रोगी जब व्यवहार में करने लगता है, तो वह असामान्यता कंपल्शन के नाम से जानी जाती है। कंपल्शन के रोगी अपने विभिन्न व्यवहारों को एक निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर करने के लिए बाध्य होते हैं। इस तरह के असामान्य व्यवहारों में मुख्य रूप से कई’-कई बार और काफी-काफी देर तक रोगी द्वारा अपने हाथ धोना, बार-बार खिड़की दरवाजे और सिटकनी चेक करना, बिजली के स्विच चेक करना या किसी चीज को बार-बार छूना गिनती का कंपल्शन होने पर रोगी कई बार पैसों की गिनती करता है, चौराहों से गुजरने वाली गाड़ियों एवं व्यक्तियों की भी गिनती घंटों तक करता रहता है। कई बार तो रोगी कुछ काम शुरू करने से पहले एक खास नंबर तक की गिनती गिनता रहता है।
आब्सेशन के रोगी को बहुत अधिक उद्विग्नता का सामना करना पड़ता है, जिससे उसके मस्तिष्क में एक द्वंद्व सा चलता रहता है। ऐसी स्थिति में रोगी कुछ निरर्थक अतर्किक व्यवहार करते हैं, जिससे उनके तनाव एवं घबड़ाहट में कमी आ जाती है। ऐसा करके रोगी कुछ देर के लिए अपने को आरामदायक स्थिति में रख पाता है।
मनोरोग विशेषज्ञों एवं अन्य चिकित्साशास्त्रियों ने अपने विभिन्न शोध-परिणामों के आधार पर यह प्रमाणित कर दिया है कि आब्सेशन एक विशुद्ध मनोवैज्ञानिक रोग हैं। इसके उपचार में मुख्य रूप से दो तरह की पद्धतियाँ प्रभावी पाई गई है, (1) औषधि द्वारा एवं (2) बिहेवियर थेरेपी द्वारा।
मिरगी भी एक प्रमुख मानसिक रोग है। जब मस्तिष्क की स्नायु प्रणाली जो अत्यधिक संवेदनशील है, पर कोई अनावश्यक दबाव पड़ता है, तब ऐसी अवस्था में शरीर के अंगों में अकड़न, प्रकंपन एवं अचेतना तथा कुछ हद तक दृष्टिदोष भी उत्पन्न हो जाता है। इसी स्थिति को मिरगी के दौरा के रूप में जाना जाता है। आयुर्वेद में इस रोग के कारणों पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि चिंता, शोक, क्रोध, मोह आदि से कुपित हुए दोष वातपित्त-कफ हृदय में स्थित नाड़ी के साथ मिलकर ज्ञान शक्ति का नाश करके मिरगी या अपस्मार को उत्पन्न करते हैं। अच्छी नौकरी, अधिक धन प्राप्त करने की चिंता, पारिवारिक कलह, अनुचित खान-पान एवं उत्तेजक औषधियों के सेवन से मस्तिष्क विकृत हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप ही लोग मिरगी रोग के शिकार हो जाते हैं। इस रोग के उपचार के सम्बन्ध में ध्यान रखने योग्य सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस रोग से जुड़े अंधविश्वासों से बचा जाए और किसी अच्छे मनोरोग चिकित्सक द्वारा इसका उपचार कराया जाए।
वर्तमान समय में अधिकाँश मानसिक रोगों के उपचार के लिए ‘ध्यान’ एक सफल चिकित्सापद्धति के रूप में उभरकर आया है। भारतीय ऋषि-महर्षियों द्वारा प्रणीत ध्यान की शैली का प्रयोग कर विभिन्न देशों के मनोचिकित्सकों ने मानसिक रोगियों का सफल उपचार किया। तभी से आधुनिक चिकित्सा विज्ञानी यह मानने लगे कि मानसिक विकृति को दूर करने के लिए ध्यान एक सशक्त माध्यम है। कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ साइको फिजियोलॉजिकल मेडिसिन में साइकियाट्री के डायरेक्टर हेरल्ड एच ब्लूमफील्ड एमडी ने मानसिक विकृतियों से जुड़े एक सौ दो रोगियों पर ध्यान का सामूहिक परीक्षण किया। परिणाम अत्यंत उत्साहपूर्वक रहा। इनमें कुछ रोगियों को आदर्शजनक ढंग से लाभ हुआ। 25 वर्षीय स्नातक छात्रा जान 17 वर्ष की उम्र से मिरगी एवं अन्य कई मानसिक विकृतियों की शिकार थी। एक वर्ग तक लगातार ध्यान करने के बाद वह पूरी तरह रोगमुक्त हो गई। 28 वर्षीय जार्ज भी अनेक मानसिक रोगों से पीड़ित था। 14 महीने के ध्यान उपचार के बाद वह भी पूर्ण स्वस्थ हो गया।
मन की अस्त-व्यस्तता ही मानसिक विकृतियों का कारण होती है। ध्यान द्वारा मन एकाग्र होता है। उसकी चंचलता धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। ध्यान के क्षणों में मिलने वाला आत्मिक सुख एवं गहन शाँति मन की सारी ग्रंथियों को तोड़ देते हैं और व्यक्ति अपने आपको हल्का-फुल्का महसूस करने लगता है।
जीवन परमात्मा का अनमोल उपहार है। यह स्वयं में ही इतना दिव्य, पवित्र और परिपूर्ण है कि संसार का कोई भी अभाव इसकी पूर्णता को खंडित करने में असमर्थ है। आवश्यकता सिर्फ इतनी है कि हम अपने मन का गहराई से अध्ययन कर उसे उत्कृष्टता की दिशा में उन्मुख करें। ईर्ष्या, द्वेष, लोभ एवं अहं के दोषों से मन को विकृत करने की बजाय अपनी जीवन शैली को बदल कर सेवा, सहकार आदि गुणों के सहारे न केवल मानसिक रोगों से बचा जा सकता है, बल्कि अपनी भरपूर मानसिक क्षमताओं को विकसित किया जा सकता है।
श्रुतायुघ के पास शंकर जी के वरदान से प्राप्त एक गदा थी। शर्त मात्र यही थी कि वह उसका अनीतिपूर्वक प्रयोग न करे। यदि करेगा, तो लौटकर वह उसी को नष्ट करेगी। महाभारत युद्ध में क्रोध के आवेश में उसने उस गदा का प्रयोग सारथी की भूमिका निभा रहे भगवान कृष्ण पर कर डाला। गदा बीच से ही वापस लौटकर श्रुतायुध पर ही आ गिरी और उसे क्षत-विक्षत कर गई। भस्मासुर ने भी यही वरदान माँगा था कि वह जिसके सिर पर हाथ रख देगा। वही भस्म हो जाएगा। जब उसने वरदान का दुरुपयोग आरंभ किया, तो भगवान ने माया रची और उसकी दुर्बुद्धि ने उसे स्वयं अपने ऊपर हाथ रखवाकर भस्म कर डाला। यह चयन की दिशाधारा ही है, जो मनुष्य का गंतव्य भवितव्य निर्धारित करती हैं।
एक सभा में वाद-विवाद चल रहा था। एक पक्ष ने कहा, “मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, क्योंकि वह सभी जीवधारियों को वश में कर लेता है।” दूसरा पक्ष कहता था, “प्राणी श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे जिंदगी भर बिना कुछ माँगे मनुष्य की सेवा करते हैं।” निर्णय नहीं हो पा रहा था। विवाद बढ़ता ही गया। एक ज्ञानी उधर से जा रहे थे। सबने उनकी सम्मति माँगी। ज्ञानी ने दोनों पक्षों की बात सुनी और बोले, “भाई! मानवी स्वतंत्रता की भी अपनी सीमा है। हर कोई जीवन जीने का मर्म नहीं जानता। मनुष्य जब तक सत्कर्म करता है, तब तक ही श्रेष्ठ है और जब वह दुष्कर्म करने लगता है, तो वह नीचे गिर जाता है। जब भी ऐसे चयन के अवसर आए हैं, मानवी बुद्धिमता की पूरी परीक्षा हुई है।”
मगध के एक धनी व्यापारी ने बहुत धन कमाया। उसे अपनी संपन्नता पर इतना गर्व हुआ कि वह अपने घर के लोगों पर ऐंठा करता। फल यह हुआ कि उसके लड़के भी उद्दंड और अहंकारी हो गए। पिता पुत्रों में ही ठनने लगी। घर नरक बन गया।
उद्विग्न व्यापारी ने महात्मा बुद्ध की शरण ली और कहा, “भगवन्! मुझे इस नरक से मुक्ति दिलाइए, मैं भिक्षु होना चाहता हूँ।”
तथागत ने कुछ सोचकर उत्तर दिया, “भिक्षु बनने का अभी समय नहीं है। तात! तुम जैसा संसार चाहते हो वैसा आचरण करो, तो घर में ही स्वर्ग के दर्शन कर सकोगे। उपवन में भी तुम्हें शाँति नहीं मिलेगी, जब तक मन अशाँत है। यह नरक तुम्हारा अपना ही पैदा किया हुआ है।”
व्यापारी घर लौट आया। उसने जैसे ही अपना दृष्टिकोण व्यवहार-आचरण बदला, सबके हृदय बदले व उसे घर में ही स्वर्ग के दर्शन होने लगे।
प्रगति दुर्गति तथा स्वर्ग नरक मनुष्य स्वयमेव ही रचता है।
रामनवमी मर्यादाओं और आदर्शों का अवतरण दिवस है, साथ ही शाश्वत, सनातन और चिरंतन सत्य की अभिव्यक्ति का पुण्य क्षण भी आर्ष साहित्य और लोक साहित्य की प्रवहमान चिंतन धारा में यही सत्य विविध रूपों में वर्णित हुआ है। यह तथ्य स्पष्ट है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम एवं आद्यशक्ति सीता आदर्शों की स्थापना के लिए तो अवतरित हुए ही थे, परंतु साथ ही सनातन ब्रह्मा एवं शक्ति भी राम एवं सीता के रूप में लीला करने इस भूतल पर आए थे।
राम और सीता दो होते हुए भी एक थे। गोस्वामी जी कहते हैं-
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बंदउँ सीता राम पद जिन्हें परम प्रिय खिन्न॥
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को भारतीय धर्म साधना मूलतः ब्रह्म के रूप में इस सचराचर जगत् में परिव्याप्त मानकर सर्वोच्च सनातन होने में अपनी आस्था को व्यक्त करती है, वही एक सूक्ष्म धारणा राम तथा ॐ की तात्विक एकता की ओर भी सूक्ष्म संकेत करती है।
वस्तुतः ‘राम’ शब्द जब निराकार एवं सकल ब्रह्म के रूप में व्यवहृत होता है, तो आश्चर्यजनक रूप में राम ही ‘ऊँ’ हो जाता है। व्याकरणविदों एवं भाषाशास्त्रियों के अनुसार राम शब्द में आने वाली ‘आ’ तथा ‘अ’ स्वर ध्वनियाँ इस शब्द में आने वाली ‘र’ तथा ‘म’ व्यंजन ध्वनियों के उच्चारण की दृष्टि से ही आती हैं।
‘माँडूक्योपनिषद्’ में आया एक प्रामाणिक सूत्र कहता है, ‘ओमित्येदक्षरम’ जिससे राम तथा ॐ की तात्विक एकता प्रमाणित होती है। महाकवि तुलसीदास भी रामचरित मानस में इसी तथ्य को पुष्ट करते हुए कहते हैं-
एकु छत्र एकु मुकुटमनिसब वरननि पर जोउ। तुलसी रघुबर नाम के बरन विराजत दोउ॥
यही सत्य आदिकवि वाल्मीकि ने रामायण के ‘युद्धकाँड’ में राम को भगवान विष्णु (ऊँकार स्वरूप) से अभिन्न मानते हुए कहा है-
अक्षरं ब्रह्रा सत्यं च मधेवाँते च राघव, लोकाँनाँ त्वं परोधर्मो विश्वक्सेनश्चतुर्भुजः।
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय मनीषा मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को सच्चिदानंद ब्रह्म मानकर उन्हें सर्वोच्च सनातन सत्ता के रूप में पूजती रही है। इसी तरह वह सीता को आद्यशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करके सर्वोच्च सम्मान देती रही है। ‘युद्धकाँड’ में ही उल्लेख आता है-
एषः सीता हरेर्माया, सृष्टिस्थित्यंतकारिणी। सीता साक्षात जगदधेतुश्चित्छवितर्जगदात्यिका॥
अर्थात् विश्व की सृष्टि, स्थिति, अंत की सूत्रधारिणी, आद्यशक्ति साक्षात महामाया सीता, जगत् का कारण और चेतना शक्ति और जगत् का रूप हैं। यही सत्य मानस के ‘बालकाँड’ में कवि तुलसी अत्यंत श्रद्धापूर्वक व्यक्त करते है-
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्। सर्वश्रेयस्करी सीता नतोऽहं रामबल्लभाम्॥
भाषाशास्त्रियों के अनुसार भी सीता शब्द का अर्थ पृथ्वी से उत्पन्न है। जो निश्चय ही सृष्टि के सृजन, पोषण एवं संहार की सूत्रधार शक्ति के लिए आया है। व्याकरणविदों
एवं दार्शनिकों ने सीता शब्द की विशिष्ट व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि राम की शक्ति बनकर ही सीता अवतरित हुई है। इसी शक्ति की स्वीकृति आदि महाकवि वाल्मीकि ने रामायण में तथा महर्षि वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत में सीता को ‘महालक्ष्मी’ कहकर दी है।
महाकवि तुलसीदास ने दर्शन के इसी सूक्ष्म तत्व को मनोहारी रूप में व्यक्त करते हुए ब्रह्म एवं शक्ति के सनातन ऐक्य को यूँ व्यक्त किया-
सीयाराम मय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
आइए, हम भी भगवान राम की पावन जयंती रामनवमी के इस पुण्य पर्व पर युगों से हमारे सनातन विश्वास एवं आस्था के केंद्र ब्रह्मस्वरूप भगवान राम एवं आद्यशक्तिस्वरूपा भगवती सीता के अभिन्न युगल को श्रद्धापूर्वक स्मरण करें। जब समस्त प्राणियों में सियाराम बसे हुए हैं, तब मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि में भेदभाव कैसा? क्यों न हम घृणा-द्वेष के खूनी मार्ग को छोड़कर स्नेह-आत्मीयता की राह अपनाएँ और ‘सीयाराम मय सब जग जानी का अमृत बाँटें।
जीवन का वास्तविक आनंद सरलता और मधुरता में सन्निहित है।
अपने सरलतम और सबसे आदिम रूप में प्रार्थना मनुष्य की गहनतम इच्छा की अभिव्यक्ति है, जिसमें आत्मनिवेदन द्वारा ईश्वरीय शक्ति को प्रभावित करने का सचेष्ट प्रयास किया जाता है। यह इच्छा कुछ कामनाओं की पूर्ति के रूप में हो सकती है या किसी भय या खतरे से रक्षा की गुहार के रूप में हो सकती है और अपने श्रेष्ठतम रूप में यह अपने इष्टदेव से संवाद की प्रक्रिया है, जिसमें आत्मा बोलती है, तो विश्वात्मा सुनती है। सुनती ही नहीं, इसका प्रत्युत्तर भी देती है। स्पेन की संत टेरेसा (16वीं सदी) के शब्दों में, प्रार्थना अपने अनन्य इष्ट के साथ सघन आत्मीयता एवं सतत संवाद की स्थिति है।
प्रार्थना की इसी गूढ़तम अवस्था में समस्त धर्मों का अलौकिक उद्भव हुआ है। वेदों की ऋचाएँ प्रार्थना की इसी स्थिति में ऋषियों के अंतरंग में गूँजी थी। गीता का महाप्रसाद श्रीकृष्ण ने इसी अवस्था में अर्जुन को दिया था। मीरा के गिरिधर गोपाल, रामकृष्ण की काली माँ इसी की उच्चतम अभिव्यक्तियाँ है। इस्लाम का उद्भव भी प्रार्थना से ही हुआ है। मुस्लिम का तो अर्थ ही प्रार्थना है। कुरान को प्रार्थना का ग्रंथ कहा गया है। इस्लाम में नमाज, प्रार्थना का ही एक रूप है, जो प्रत्येक मुस्लिम के लिए आवश्यक मानी गई है। ईसाई धर्म में हर रविवार को प्रार्थना का क्रम रहता है। जापान का प्रसिद्ध धर्म शिन्तों पूर्णतः प्रार्थना पर आधारित है। ईसाई संत आगस्टीन द्वारा प्रवर्तित ‘कन्फेशन’ स्रष्टा के साथ संवाद के रूप में एक लंबी प्रार्थना ही है।
यह सुनिश्चित तथ्य है कि धर्म भावना का उद्भव प्रार्थना से ही होता है। अमेरिकी दार्शनिक विलियम जेम्स के शब्दों में, बिना प्रार्थना के धर्म की कल्पना भी नहीं की जा सकती। धर्म में प्रार्थना का वही केंद्रीय स्थान है, जो दर्शन में युथ्कतपरम विचारशीलता का 19वीं सदी के जर्मन दार्शनिक लुडविग फ्यूरवेच अपने सारगर्भित निष्कर्ष को प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि धर्म का सबसे उच्चतम सार उसकी सबसे सरल क्रिया द्वारा व्यक्त होता है, जो है- प्रार्थना।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, यह प्रक्रिया अव्यक्त मन से उठी एक चेतना की लहर मात्र है, जिसे प्रगाढ़ आत्म संकेत (ऑटो सजेशन) भी कह सकते हैं और इसका आधार व्यक्ति का गुप्त मन है। विलियम जेम्स एवं मनोविद् जाँस सेंग्रंड ने प्रार्थना को अचेतन मन के भावनात्मक बहाव के रूप में परिभाषित किया है और इसे मन की अदृश्य सत्ता से संवाद में आने का अंतःस्फोट कहा है। समाजशास्त्री धार्मिक वातावरण को इसका प्रमुख कारक मानते हैं, जो कि व्यक्ति के आध्यात्मिक व्यवहार को प्रेरित करता है।
सर्वसामान्य एवं व्यावहारिक अर्थों में प्रार्थना हृदय की आकुल पुकार है। जब व्यक्ति जीवन के दुख कष्टों, घात -प्रतिघातों एवं दुरूह जटिलताओं से क्लाँत हो जाता है, जब उसके पुरुषार्थ एवं आशा की सीमाएँ टूट जाती है। और कोई सहारा नहीं दिखता, तो वह शक्ति प्रेम और करुणा के उच्चतम आदर्श (इष्ट देव -भगवान -गुरु- देवशक्ति) की मन में स्थापना करता है। उससे अपनी अंतर्व्यथा को निवेदित करता है। मन के गुह्यतम क्षेत्र में परमात्मा की अनंत, अद्भुत एवं अतुलित शक्ति सामर्थ्य निवास करती है। प्रार्थना से हम इसी आँतरिक शक्ति केंद्र की ओर उन्मुख होते हैं। यही से एक ऐसा बल एवं उत्साह प्राप्त होता है, जो शरीर के अणु-अणु में अद्भुत बल का संचार करता है, आत्म की ज्योति जगा देता है, मन को पुरुषार्थ से भर देता है। एक ऐसी शाँतिदायिनी लहर को प्रसारित करता है, जो प्रार्थी को चैतन्य और अभय बना देती है। ऐसे में इएच चौमिन के शब्दों में प्रार्थना किए बिना मनुष्य रह नहीं सकता, यह हृदय से उठने वाली सहज एवं स्वस्फूर्त पुकार है। स्वेचीन के शब्दों में, हताशा में, किंतु भावों की गहराई से उठी पुकार उस अदृश्य चैतन्य सत्ता से आत्मा का एक सहज निवेदन होता है, एक प्रार्थना होती है।
इस तरह प्रार्थना जीवन का सहज, किंतु महान अवलंबन है। यह विषम संकटों, दुर्भाग्य, दुर्योगों, हृदय विदारक एवं असह्य कष्टों में जाने की शक्ति देती है और आशा की ज्योति को जलाए रखती है। इसीलिए महात्मा गाँधी कहा करते थे, प्रार्थना ने कई अग्निपरीक्षाओं में मेरा उद्धार किया है। जिस क्षण मैंने स्वयं को प्रभु के हाथों में छोड़ दिया, उसी क्षण एक प्रशाँत लहर मेरी अंतःचेतना में दौड़ पड़ी और मुझे सब कुछ सहन करने की शक्ति मिल गई। मेरी ईश्वर की प्यास को मात्र एक भावभरी प्रार्थना ही संतुष्ट कर पाती है।
प्रार्थना की अद्भुत शक्ति जीवनरूपी वृक्ष की जड़ों को भरपूर पोषण करती है, क्योंकि यह जीवन के आदि स्नेह में व्यक्ति का सम्बन्ध जोड़ती है। इसी कारण मनीषी अलेक्स कैरल ने कहा है, प्रार्थना सबसे शक्तिशाली ऊर्जा है जिसे मनुष्य पैदा कर सकता है। शरीरशास्त्री भले ही मानवीय शरीर एवं मस्तिष्क पर इसके प्रभाव को ग्रंथियों के स्राव के रूप में दर्शाएँ, पर इसके परिणामस्वरूप शारीरिक सशक्तता, बौद्धिक प्रखरता, नैतिक साहस और मानवीय सम्बन्धों में अंतर्निहित गहन सार्थकता सब कुछ जीवंत हो उठती है। प्रार्थना जीवन को विधेयात्मक ढंग से जीने का एक तरीका है। सच्चा जीवन वस्तुतः प्रार्थना से भरा हुआ जीवन है। निश्चित रूप से प्रार्थना आत्मा के लिए टॉनिक की तरह काम करता है और जीवन को जीवंत एवं सार्थक बनाता है। प्रार्थना के बिना जीवन की क्या नियति एवं क्या गति होती है, अँगरेजी कवि टेनीसन के शब्दों में सुनें, “बिना प्रार्थना मनुष्य पशु-पक्षियों जैसा निर्बोध है। प्रार्थना जैसी महाशक्ति से कार्य न लेकर अपनी थोथी शान में रहकर सचमुच हम बड़ी मूर्खता करते हैं। यही हमारी विडंबना है।”
इस विडंबना से उबरने के लिए हर व्यक्ति को इसका अवलंबन लेना चाहिए। इस दृष्टि की रचयिता, इसका लालन-पालन करने वाली, हमारी आदि कारण महाशक्ति से संपर्क साधने का यही एक तरीका है। यही अलौकिक साम्राज्य में प्रवेश का एक मात्र माध्यम है। टी.एस.ब्रुक्स के शब्दों में, “स्वर्ग के सबसे मधुर एवं श्रेष्ठ पुष्प उपहार में भगवान अपने बंदो को तब देता है, जब वे घुटनों के बल होते हैं, अर्थात् प्रार्थना कर रहे होते हैं। प्रार्थना स्वर्ग का द्वार है, यह अलौकिक सौंदर्य एवं आनंद की उस दिव्य भूमि में प्रवेश है।” जिसे प्रार्थना करना आ गया, वह बिना जप-तप, मंत्र तंत्र के ही उस पराशक्ति से तादात्म्य स्थापित कर लेता है।
इस रूप में प्रार्थना का केंद्रीय तत्व अंतः की गहराई की उपजी भावना है। व्यक्ति की श्रद्धा भावना संयुक्त प्रार्थना बिना शब्दों के हो सकती है, किंतु बिना हृदय के नहीं। गाँधी जी के शब्दों में, “प्रार्थना में भावहीन शब्दों में, शब्दहीन हृदय बेहतर है।” जीवन को प्रार्थना के महान अवलंबन से भरा पूरा बनाने के लिए बस आवश्यकता हृदय के भावक्षेत्र को जगाने की है, जिसकी आकुलता में प्रार्थना का मर्म छिपा हुआ है।
अज्ञान के साथ भय, भ्रम, कष्ट और जंजाल जुड़े रहते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण के पास दुर्योधन व अर्जुन दोनों पहुँचे। महाभारत युद्ध के पूर्व कौरव व पाँडव दोनों ही कृष्ण को अपने पक्ष में करना चाहते थे। दुर्योधन पहले पहुँचे व अहंकारवश सो रहे श्रीकृष्ण के सिरहाने बैठ गए। बाद में अर्जुन आए व अपनी सहज श्रद्धा भावनावश पैरों के पास बैठ गए। श्रीकृष्ण जागे। अर्जुन पर उनकी दृष्टि पड़ी। कुशल क्षेम पूछकर अभिप्राय पूछने ही जा रहे थे कि दुर्योधन बोल उठा, “पहले मैं आया हूँ, मेरी बात सुनी जाए।” श्रीकृष्ण असमंजस में पड़े। बोले, “ अर्जुन छोटे है इसलिए प्राथमिकता तो उन्हीं को मिलेगी, पर माँग तुम्हारी भी पूरी करूंगा। एक तरफ मैं हूँ, दूसरी तरफ मेरी विशाल चतुरंगिणी सेना। बोलो अर्जुन? तुम दोनों में से क्या लोगे?” चयन की स्वतंत्रता थी, यह विवेक पर निर्भर था, कौन क्या माँगता है, भगवान की कृपा अथवा उनका वैभव?
अर्जुन बोले, भगवन्! मैं तो आपको ही लूँगा। भले ही आप युद्ध न करें, बस साथ भर बने रहें। दुर्योधन मन ही मन अर्जुन की इस ‘मूर्खता’ पर प्रसन्न हुआ और श्रीकृष्ण की विशाल अपराजेय सेना पाकर फूला न समाया। अनीतिवादी दुर्योधन, ईश्वरीय समर्थन वाले अर्जुन जिसके पास श्रीकृष्ण भी निःशस्त्र थे, से हारा ही नहीं महाभारत के युद्ध में बंधु-बाँधवों सहित पास भी गया। दुर्योधन जैसे अनीति का चयन करने वाले एवं अर्जुन जैसे ईश्वरीय कृपा को ग्रहण करने वाले तत्व हर मनुष्य के भीतर विद्यमान हैं, एक को विवेक या सुबुद्धि एवं दूसरे के विवेक या दुर्बुद्धि कह सकते हैं। किसका चयन व्यक्ति करता है, यह उसकी स्वतंत्रता है।
हवा जब तक गेंद में भरी रहती है, तब तक उसे विस्तृत और विशाल वायुमंडल से एकाकार होने का मौका नहीं मिलता, किंतु उसके ऊपर के मोटे आवरण को ढीला करते ही वह बाह्य वायु से मिलकर अधिक व्यापक और विराट् हो जाती है। मनुष्य के साथ भी यही बात है। वह जब तक स्थूलता में जीता है, हाड़ माँस का पुतला भर बना रहता है, पर जैसे -जैसे यह बंधन ढीला होता जाता है, वैसे ही वैसे उसकी सूक्ष्मता बढ़ती है और अंततः वह स्थिति पैदा होती है, जहाँ उसकी सूक्ष्म सत्ता सूक्ष्म जगत् में प्रवेश कर नवीन जानकारियाँ अर्जित करने लगे। यही वह अवस्था है, जिसमें समय से पीछे चलकर विगत का ज्ञान प्राप्त कर सकना संभव होता है।
यों तो समय के तीन कालखंडों में से मनुष्य सामान्य स्थिति में केवल वर्तमान में जीता है, भूत और भविष्य उसके लिए अविज्ञात स्तर के रहस्य जैसे बने रहते हैं। इतने पर भी सच यह है कि वह एक साथ इन तीनों में जीता है या दूसरे शब्दों में कहे, तो वर्तमान शेष दोनों को अपने में सँजोए रहता है। अंतर मात्र इतना है कि विगत और अनागत के सूक्ष्म भूमिकाओं में होने के कारण मनुष्य उन्हें वर्तमान की तरह ग्रहण नहीं कर पाता; किंतु इतने से ही सत्य बदल नहीं सकता। शब्द और ध्वनि उच्चारण के बाद विलुप्त होते प्रतीत होते हैं। ऐसा लगता है कि उनका अस्तित्व समाप्त हो गया; पर विज्ञान के विद्यार्थियों को यह भलीभाँति मालूम है कि उनका नाश नहीं होता। सिर्फ अपनी स्थूलता और अभिव्यक्ति खोकर अव्यक्त स्थिति में चले जाते हैं। काया मरती है; पर आत्मवेत्ता जानते हैं कि जीवन एक सतत प्रवाह है। वह मरता कहाँ है! अग्नि जलती है, फिर भी उसकी ऊर्जा अक्षुण्ण बनी रहती हैं। घटनाओं के संदर्भ में भी यही बात है। वह एक बार अस्तित्व में आने के बाद समाप्त हो जाती है, सो बात नहीं, मात्र व्यक्त से अव्यक्त बनती है।
भौतिक जगत् में समय को घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में देखने का आम प्रचलन हैं। इस आधार पर जो कुछ सामने दृष्टिगोचर होता है, समय के उस भाग को वर्तमान कह दिया जाता है और जो बीत गया उसे ‘भूत’ एवं अनागत वाले हिस्से को ‘भविष्यत’ कहा जाता है। इतने पर भी ‘समय’ न तो केवल भूत है, न भविष्य, न वर्तमान। वह एक संघर्ष इकाई है, जिसमें एक साथ तीनों उपस्थित होते हैं। विज्ञानवेत्ताओं का कहना है कि जब रैखिक समय के मध्य भाग (वर्तमान) को मनुष्य जान सकता है, तो कोई कारण नहीं कि उसके आगे (भविष्य) और पीछे (भूत) वाले हिस्से को वह न ग्रहण कर सके। सिद्धाँत रूप में वैज्ञानिकों ने इसे संभव बताया है और इसके लिए कई उपाय सुझाए हैं।
फ्राँसीसी विज्ञानवेत्ता अपनी पुस्तक ‘इन दि डेड पास्ट’ में आशा व्यक्ति करते हुए लिखते हैं कि आने वाले समय में काल के विगत और अनागत वाले हिस्से में पहुँच पाना न केवल यथार्थ सिद्ध होगा, वरन् वैज्ञानिक विधियों द्वारा लोग उसमें आ जा सकेंगे। विगत में पहुँचने संबंधी एक परिकल्पना का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि चूँकि समय स्थिर है और गति हम सब कर रहे हैं, इसलिए भूत में पहुँचने के लिए यह जानना जरूरी होगा कि विगत की उक्त तिथि में पृथ्वी अंतरिक्ष के किस बिंदु पर स्थित थी। चूँकि वह सूर्य के चारों ओर एक कुँडलाकार पथ में परिभ्रमण कर रही है और संपूर्ण सौर तंत्र स्वयं भी कृतिका नक्षत्र की परिक्रमा कर रहा है, अतः बीते समय के एक निश्चित दिन अपने ग्रह की वास्तविक स्थिति का पता लगा पाना बहुत ही मुश्किल काम होगा। अतएव यह यात्रा भी असंभव स्तर की है या यों कहना चाहिए कि मात्र सैद्धाँतिक है।
इसी प्रकार परिभ्रमणशील ब्रह्मांड में आइंस्टीन के सापेक्षवाद का सिद्धाँत भी भूत भ्रमण की संभाव्यता प्रकट करता है। इसको आधार मानते हुए कुर्ट गोडेल नामक एक आस्ट्रियन विज्ञानविद् एवं तर्कशास्त्री ने तो यहाँ तक कह डाला है कि यदि यह संभव हुआ, तो यात्रा के दौरान हर व्यक्ति अपनी ही युवा अनुकृति से मिल सकेगा।
मूर्द्धन्य भौतिकीविद् जॉन ह्वीलर का ‘वर्महोल सिद्धाँत’ भी इस बात की संभावना दर्शाता है कि यदि दो ब्रह्मांडों को जोड़ने वाली इस सुरंग में से किसी उपयुक्त में प्रवेश कर पाना शक्य हुआ, तो संभव है कि हम कही सुदूर भूत में बाहर निकलें।
किंतु यह सब संभावना मात्र है। संभावना भी ऐसी, जो शायद ही साकार हो सके। ऐसे में विज्ञान लगभग निराश हो चुका था और मानने लगा था कि इस प्रकार की सफलता शायद इस विधा द्वारा संभव नहीं। इसी बीच एक घटना घट गई। 17 अगस्त 1958 को ‘मियार्म’ हेराल्ड’ नामक समाचार पत्र ने एसोसिएटेड प्रेस के हवाले से एक ऐसे प्रयोग का समाचार छापा, जो उन दिनों यूनाइटेड स्टेट्स एयरफोर्स में चल रहा था। विवरण का उल्लेख करते हुए अखबार लिखता है कि एक विशिष्ट प्रकार के अवरक्त (इन्फ्रारेड) कैमरे से एक बार सर्वेक्षण विमान के माध्यम से एक ऐसे भूखंड का चित्र खींचा गया, जो गाड़ियाँ खड़ी करने के काम आता था; पर तस्वीर लेते समय भूमि बिल्कुल खाली थी; वहाँ कोई भी वाहन नहीं था। कुछ घंटे पूर्व जो कारें खड़ी थी। वह सब जा चुकी थी। फोटो जब बन कर आया, तो सब यह देखकर हैरान रह गए कि उसमें असंख्यों मोटरें खड़ी दिखाई पड़ रही थी। इसका अर्थ यह हुआ कि कैमरे ने कुछ घंटे पूर्व के दृश्य को भी अपने अंदर कैद कर लिया था। यही महत्वपूर्ण सूत्र साबित हुआ, जिसका कि बाद में सहारा लिया गया।
इस संपूर्ण प्रसंग का वर्णन एण्ड्र थामस ने अपने चर्चित ग्रंथ ‘बियाँण्ड दि टाइम बेरियरत्त् में विस्तारपूर्वक किया है। उक्त घटना के उपरांत विज्ञानी यह मानने के लिए विवश हो गए कि समय के बीते भाग में इस प्रकार का प्रवेश संभव तो है, पर ऐसा मानसिक धरातल पर ही हो सकता है, शारीरिक स्तर पर नहीं। उनका विचार था कि सामान्य कैमरे से इस प्रकार के चित्र नहीं आने का एक ही मतलब हो सकता है। कि साधारण प्रकाश भूत और वर्तमान के मध्यवर्ती अवरोध को चीरकर भूतकाल के गर्व में प्रवेश पाने की क्षमता नहीं रखता, जो अपेक्षाकृत सूक्ष्म इन्फ्रारेड में विद्यमान है। अतः वह कुछ घंटे पूर्व की घटना का फिल्माँकन करने में सफल होता है। इस सफलता के उपराँत वैज्ञानिक यह जानने का प्रयास करने लगे कि क्या ऐसा सुदूर भूत के दृश्यों और घटनाओं के साथ भी संभव हो सकता है? इस निमित्त उनने भिन्न-भिन्न स्थानों के कई ऐसे चित्र खींचे, जहाँ सदियों पूर्व सुविकसित सभ्यताएँ थीं, पर आज वे बीहड़ों जंगलों और रेगिस्तानों में परिवर्तित हो चुके हैं। तस्वीर जब बनकर सामने आई, तो उसमें वही सारे दृश्य देखे गए, जो तब साकार रूप में वहाँ मौजूद थे अर्थात् चित्रों में झाड़ झंखाड़ के अतिरिक्त कोई ऐसी विलक्षणता नहीं दिखलाई पड़ी, जो इन स्थानों में उस समय दृश्यमान न हो। इससे शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि समय के साथ-साथ घटनाएँ और दृश्यावलियाँ अपेक्षाकृत अधिक सूक्ष्म स्तरों में प्रवेश करती जाती हैं, फलतः वे विशिष्ट प्रकार के इन्फ्रारेड कैमरों की पकड़ से ही बची रहती हैं। यदि कोई और वेधक सामर्थ्य वाली संभव है, पर विशेषज्ञ अभी ऐसी कोई रोशनी या कैमरा ढूंढ़, पाने में सफल नहीं हो सके हैं। ऐसी स्थिति में भूतकालीन जानकारियाँ उपलब्ध करने के लिए अनुसंधानकर्ता सूक्ष्म चेतना के महत्व से इनकार नहीं करते।
‘टाइम-दि अल्टीमेट एनर्जी’ पुस्तक की विद्वान लेखिका मेरीहोप अपने उक्त ग्रंथ में लिखती हैं कि चूँकि चेतना विश्व का सर्वाधिक सूक्ष्म तत्व है, अतएव वह समय के अवरोध को पार करते हुए किसी भी कालखंड में प्रवेश करने में समर्थ होती है। सुषुप्ति की अवस्था में हर एक के साथ ऐसा इसलिए संभव हो पाता है, क्योंकि इस दशा में चेतना और शरीर के बीच का बंधन ढीला पड़ जाता है, फलतः वह भूत-भविष्य के किसी भी भाग में जाकर स्वप्नों के माध्यम से स्वप्नद्रष्टा को अनागत -विगत की ऐसी सूचनाएं देने लगती है, जिससे वह सर्वथा अनभिज्ञ होता है। कई बार यह जानकारियाँ इतनी स्पष्ट होती है और बार-बार आती हैं कि द्रष्टा भयभीत हो उठता है और किसी अनिष्ट की आशंका से चिंताग्रस्त हो जाता है।
मेरीहोप ने उपर्युक्त पुस्तक में विगत का ज्ञान कराने वाले ऐसे अनेक स्वप्नों का उल्लेख किया है, जिसके बारे में सम्बन्धित व्यक्ति को कोई जानकारी नहीं थी। स्वप्न संकेतों के पश्चात जब सम्बद्ध स्थानों में पहुँचा गया, तभी उनके बार-बार आने का रहस्य समझा जा सका।
इतना स्पष्ट हो जाने के बाद अन्वेषणकर्ता यह तो मानने लगे कि सुषुप्तावस्था में बीते काल की उदरदरी में गति कर पाना संभव है, पर फिर भी वे इस संभावना से इनकार करते रहे कि जाग्रत अवस्था में भी ऐसा कुछ संभाव्य है। इसका कारण वे एक ही बताते रहे कि इस दशा में चेतना काया से इस बुरी तरह आबद्ध रहती है कि दोनों को परस्पर पृथक कर पाना सरल नहीं। जिन दिनों विज्ञान जगत् में इस विषय पर गंभीर चिंतन चल रहे थे, उन्हीं दिनों कुछ विलक्षण घटनाएं घट गई, जिससे वैज्ञानिक इस पर पुनर्विचार के लिए मजबूर हो गए।
घटना स्वीडेन की है। म्यूरेरा परिवार की वहाँ बड़ी जागीर थी। परिवार का मुखिया पेडिगो म्यूरेरा था। जागीर की देखभाल वही करता था। बच्चे उसमें सहायता करते थे पेडिगो को प्रातः भ्रमण का बहुत चाव था, अतः वह भाँति उस दिन भी वह भ्रमण के लिए निकला। आज मौसम अत्यंत सुहावना था। हल्की -फुलकी बूँदा-बाँदी के बाद बहने वाले शीतल पवन के झोंके मन को बरबस किसी अन्य तल में ले जाते थे। ऐसा प्रतीत होता था, मानो चेतना आज अपना सामान्य धरातल खो चुकी हो। उसके अंदर का उल्लास किसी ध्यानी के ब्रह्म साक्षात्कार से उपलब्ध होने वाले आनंद से संप्रति कम न था। वह अपनी धुन में चला जा रहा था, मन की यह उन्मनी अवस्था आज उसे काफी आगे तक ले आई थी, फिर भी वह उस दिव्य मादकता की स्थिति में रुकने का नाम न ले रहा था, बढ़ता ही जा रहा था। अगणित खेत-मैदानों को पार करते हुए वह एक स्वेडिश मुहल्ले के समीप पहुँचा, तो अचानक उसे होश आया, वह कहाँ पहुँच गया! कहीं अन्यत्र तो नहीं? पीछे दृष्टि दौड़ाई, तो पता चला कि वह अपनी जागीर वाले भूभाग में ही है, बस थोड़ा आगे निकल आया है, किंतु यह मुहल्ला तो पहले कभी नहीं देखा! उसका चिंतन तंत्र सक्रिय हो उठा, पर यह सोचकर कि शायद आज की विशिष्ट मनोदशा के कारण ही वह पूर्व में देखे गए दृश्यों को भूल रहा हो, उस पर विशेष ध्यान न दिया। वहाँ एक तालाब था, जिसमें अनेक बतखें और हंस जलक्रीडा कर रहे थे। थोड़ी देर रुककर वह उनकी अठखेलियों को निहारता रहा, फिर आगे बढ़ गया। झोंपड़ियों के बाहर अनेक लोग धूप सेंक रहे थे और परस्पर वार्तालाप में संलग्न थे। उसने उनमें से एक दो से बात करने की कोशिश की, पर सुलह न हो सका। ऐसा लगा, जैसे वे बहरे हों और उसके शब्द उन्हें सुनाई ही न पड़े हों। उनकी पोशाकें प्राचीन युगीन लग रही थीं। उस मुहल्ले का एक चक्कर लगाने के उपराँत पेडिगो वापस लौट आया। घर पहुँचकर उसने उस बस्ती के बारे में लोगों को बताया, पर सब यही कहते रहे कि जागीर के उस भाग में कही कोई बस्ती नहीं है। जब दुबारा पेडिगो उन्हें साथ लेकर वहाँ पहुँचा, तो हैरान रह गया। वहाँ सचमुच बस्ती तो क्या, कोई झोंपड़ी तक न थी, पर वह उसे आँखों का धोखा या भ्रम मानने के लिए कदापि तैयार नहीं था।
इस घटना के बाद अनुसंधानकर्ता यह अनुमान लगाने लगे कि क्या जाग्रतावस्था में भी देह का बंधन किसी प्रकार ढीला होने पर चेतना शरीर परिधि से बाहर समय के दूसरे कालखंडों में भी प्रवेश कर सकती है? इस संभावना से उनने सर्वथा इनकार नहीं किया है, पर इसकी कोई सुनिश्चित प्रक्रिया बता पाने में वे अब तक विफल रहे हैं। विज्ञान भले ही इसकी कोई विधा नन बता पाया हो, पर अध्यात्म में इसका सुनिश्चित उपाय है, जिसका यदि निष्ठापूर्वक परिपालन किया गया, तो इस पथ का कोई भी पथिक इस विभूति को करतलगत कर भूत-भविष्य के अविज्ञात हिस्सों में प्रवेश पर सकता है। उदात्त चरित्र, उत्कृष्ट चिंतन और शालीन व्यवहार के मूलभूत अनुबंध को जिसने पूरा कर लिया, उसके लिए समय के अवरोध को पार कर सकना कठिन नहीं, ऐसा तत्ववेत्ताओं का सुनिश्चित मत है।
सफलता का एकमात्र रहस्य है- दृढ़ संकल्प और कठोर परिश्रम।
वीतराग शुकदेव जी के मुँह से राजा परीक्षित ने भागवत् पुराण की कथा सुनकर मुक्ति प्राप्त की थी। यह बात एक धनवान व्यक्ति ने सुनी तो उसके मन में भागवत पर बड़ी श्रद्धा हुई और वह भी मुक्ति के लिए किसी ब्राह्मण से कथा सुनने के लिए आतुर हो उठा।
खोज की तो भागवत के एक बहुत बड़े विख्यात पंडित जी मिले। कथा-आयोजन का प्रस्ताव किया तो पंडित जी बोले, यह कलियुग है। इसमें धर्मकृत्यों का पुण्य चार गुना कम हो जाता है, इसलिए चार बार कथा सुननी पड़ेगी। चार बार कथा-आयोजन की सलाह देने का कारण था पर्याप्त दान-दक्षिणा। पंडित जी को फीस देकर धनी व्यक्ति ने चार भागवत सप्ताह सुने, परंतु लाभ कुछ नहीं मिला। धनी एक उच्चकोटि के संत से मिला। भागवत सुनने का लाभ परिक्षित कैसे ले सके और मुझे क्यों नहीं मिला। संत ने इसका कारण बताया, “परीक्षित मृत्यु को निश्चित जानकर संसार से पूर्णतया विरक्त होकर कथा सुन रहे थे और मुनि शुकदेव सर्वथा निर्लोभी रहकर कथा सुना रहे थे। उस कसौटी पर तुम दोनों ही असफल रहे।”
जिस किसी को भी ज्ञान-उपदेश उपदेश अथवा सत्परामर्श के रूप में सुनने को मिला है, वही श्रेय पथ पर चल सका है।
प्रकाँड विद्वता और अनुपम शास्त्रीय ज्ञान के कारण अनमीषि को ‘अक्षर महर्षि’ कहा जाता था। वे आश्रम में ब्रह्मचारियों का शिक्षण करते और अपने ज्ञान का निरंतर दान करते रहते। उनके आश्रम के लिए नागरिक अन्नादि की व्यवस्था जुटा देते थे।
एक दिन अनमीषि के आश्रम में एक संत का आगमन हुआ। संत ने प्रार्थना की, हमें कुछ अन्नदान दें, जिससे निर्धनों- भूखों के लिए सदावर्त चलाए जा सकें। ब्रह्मर्षि ने कहा, श्रीमान! मेरे पास ज्ञानधन है, उसका ही दान करता हूँ। अनाज तो सीमित ही है, उसका दान मैं कैसे करूं?
संत ने कहा, ऋषिवर! ज्ञान का दान तो श्रेष्ठ कर्म है ही, पर व्यक्ति के पास इसके अलावा भी अन्न एवं श्रम आदि के रूप में कुछ धन रहता है, परंतु अन्न भी तो आपके द्वारा उपार्जित धन ही है। उसका भी एक अंश लोकमंगल के लिए समर्पित होना ही चाहिए। मात्र अपने निहितार्थ उपयोग करने वाले को स्वार्थी की संज्ञा दी गई है। विद्वान ऋषि को यह शास्त्रोक्त कथन उचित और उपयुक्त लगा। विनयपूर्वक उन्होंने संत से क्षमा माँगी और कहा, मैं आपके इस उपदेश को जीवन में उतारुँगा।
जीवन सहचरी से महर्षि ने मंत्रणा की। उस धर्म परायण ने सहर्ष स्वीकृति दे दी। महर्षि दंपत्ति नित्य किसी क्षुधा पीड़ित का भोजन कराकर ही अन्न जल ग्रहण करते। यह उनका नित्य नियम बन गया और उन्हें यह करते हुए असीम आनंद मिलता था।
लंबे समय बाद एक दिन ऐसा हुआ कि कोई भी आश्रम के द्वार पर नहीं आया। प्रतीक्षा में दिन ढल चला। ऋषि दंपत्ति को लगा कि आज यह क्रम भंग हो जाएगा। निरंतर एवं अनवरत चल रहे इस क्रम के भंग होने की आशंका से वे अत्यंत व्यग्र हो उठें। किसी सत्पात्र की खोज में ऋषि दंपत्ति आश्रम के बाहर निकल पड़े। कुछ दूर जाने पर उन्होंने एक वृक्ष के नीचे एक वृद्ध कुष्ठ रोगी को पीड़ा से कराहते हुए लेटे देख। उसके शरीर में जगह-जगह घाव थे। घाव से खून रिस रहा था और उस पर मक्खियाँ भिनभिना रही थी। बड़ा ही वीभत्स दृश्य था। इसे देख ऋषि करुणा से भर उठे। वे तत्क्षण वृद्ध के पास पहुँचे और उसे अपने आश्रम में भोजन कराने एवं सेवा सुश्रूषा हेतु ले चलने का अनुरोध किया।
पीड़ा भरे स्वर में वृद्ध ने कहा, आर्यश्रेष्ठ! मैं चाँडाल हूँ। आश्रम में कैसे जाऊँ? आप करुणामूर्ति है। प्रभु आपका मंगल करें। आप कुछ बची-खुची सामग्री यही भेज दें, तो मैं उसे खाकर तृप्त हो जाऊँ।
ऋषि दयार्द्र हो उठे। उनकी कोमल भावना नेत्र से अश्रुधार बन बहने लगी। उन्होंने विनम्र एवं दृढ़ शब्दों में कहा, तात! हम ऐसी मिथ्या मर्यादाएँ नहीं मानते, जो मानवी स्नेह सौजन्य में बाधा पहुँचाती हैं। हम सभी एक ही परमात्मा के अंश हैं। हममें और आपमें कोई भेद नहीं। आप कृपा कर आश्रम चलें व हमें सेवा का अवसर दें।
महर्षि दंपत्ति के आग्रह को टाल पाना वृद्ध के वश में नहीं था। वे दोनों उसे आश्रम ले गए। उसके हाथ-पैर धुलाए और प्राथमिक उपचार किया तथा भोजन कराकर अपना व्रत पूर्ण किया।
रात की गहरी निद्रा में निमग्न महर्षि को लगा कि प्रभु उनसे स्नेह कर रहे हैं, “अनमीषि! यही है सच्चा सेवा धर्म। इसी को अपनाने से आत्मा की प्राप्ति तथा ब्रह्म का साक्षात्कार होता है।” प्रातः जगने पर ऋषि को अनुभव हुआ कि उनके और उनकी धर्मपत्नी के मुखमंडल पर ब्रह्मतेज झलक रहा है, गहरी तृप्ति, आँतरिक आह्लाद एवं प्रसन्नता के भाव छाए हैं।
जीव विशुद्ध रूप में जल की बूँद के समान एक धरती पर आता है। एक ओर जल की बूँद धरती पर गिरकर कीचड़ बन जाती है व दूसरे ओर जीव माया में लिप्त हो जाता है। यह तो जीव के ऊपर है, जो स्वयं को माया से दूर रख समुद्र में पड़ी बूँद के आत्मविस्तरण की तरह सर्वव्यापी हो मेघ बनकर समाज पर परमार्थ की वर्षा करे अथवा कीचड़ में पड़ा रहे।
मनुष्य को जीवन सबसे प्रिय है। मृत्यु की सामान्यतः कल्पना करने तक से वह घबराता है। यक्ष के पूछे जाने पर युधिष्ठिर ने जीवन के मोह व मृत्यु के भय को सबसे बड़ा आश्चर्य बताया था कि मनुष्य मृत्यु के अटल सत्य को जानते हुए भी मृत्यु से भागता फिरता है। किंतु आज यह सबसे बड़ा आश्चर्य एक सामान्य -सी बात होती जा रही है, जब हम प्रतिदिन अखबारों में ऐसी कितनी ही घटनाओं को सहज क्रम में पढ़ लेते हैं, जिसमें व्यक्ति स्वयं की आत्महत्या जैसे जघन्य कृत्य द्वारा अपनी जीवन-लीला समाप्त कर देता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष सात लाख से अधिक लोग आत्महत्या द्वारा मरते हैं। अर्थात् प्रतिदिन लगभग 2 व्यक्ति आत्महत्या करते हैं। इसी की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1984 से 94 के दौरान भारत में आत्महत्या करने वालों के पीछे यह दर 6.8 से 9.9 तक बढ़ी है। गत एक दशक में आत्महत्या का प्रयास करने वालों में नौ गुना वृद्धि हुई है। महानगरों में चैन्नई व बेंगलोर में सर्वाधिक 12.2 प्रतिशत की दर सही। इसके पश्चात मुँबई की प्रतिशत दर 14.65 रही। महानगरों में जयपुर की 1.4 प्रतिशत पर न्यूनतम रही।
भारत की अपेक्षा विकसित देशों में व कुछ विकासशील देशों में आत्महत्या की समस्या और भी अधिक गंभीर है। दक्षिण एशिया में शिक्षा एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से विकसित माने जाने वाला देश श्रीलंका इस संदर्भ में सर्वोपरि है। 1991 में यहाँ आत्महत्या करने वालो की संख्या प्रति लाख व्यक्ति 49 थी। गत पचास वर्षों में यहाँ जनसंख्या वृद्धि मात्र 3 प्रतिशत हुई है, जबकि आत्महत्या दर में 5 प्रतिशत वृद्धि हुई मरने वालों में अधिकाँशतः 60 वर्ष की आयु से अधिक के वृद्ध थे। 1983 से अब तक पिछले 15-16 वर्षों में जातीय व गृहयुडडडडडड में लगभग 5, व्यक्ति मारे गए, वही आत्महत्या के कारण इससे कही अधिक 6, व्यक्ति मारे गए।
भूतपूर्व साम्यवादी देशों में भी यह स्थिति बदतर है। सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में तेजी से गिरावट आने के कारण रूस में आत्महत्या करने वालों में चार गुना अधिक वृद्धि हुई है। फिनलैंड की आत्महत्या दर भारत से तीन गुना अधिक व फ्राँस स्विट्जरलैंड की दो गुना अधिक है।
अमेरिका में जनसंख्या का एक प्रतिशत आत्महत्या द्वारा मरता है। यहाँ आत्महत्या मृत्यु के आठ प्रमुख कारणों में से एक है। 15 से 24 वर्षीय किशोर एवं युवाओं में यह मरने का दूसरा प्रमुख कारण है। यहाँ पुरुषों से तीन गुना अधिक महिलाएँ आत्महत्या का प्रयास करती है, किंतु महिलाओं से तीन गुना अधिक पुरुष आत्महत्या द्वारा मरते हैं। गत 15 वर्षों में 15 से 44 वर्षीय युवाओं में दो से तीन गुना वृद्धि हुई है। अमेरिका में 2 लाख व्यक्ति प्रतिवर्ष आत्महत्या का प्रयास कतरे हैं। जिनमें 26 ही सफल हो पाते हैं।
अपने देश में शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आर्थिक रूप से सर्वाधिक विकसित प्राँत केरल एक अद्वितीय उदाहरण है, जिसके विकास का मॉडल चर्चा का विषय रहा है लेकिन यहाँ आत्महत्या करने वालों की संख्या सर्वाधिक है, जो लगभग प्रति लाख के पीछे 25 है। यह देश के औसत से ढाई गुना अधिक है। मनोचिकित्सक डॉ. सूरजमणि के अनुसार, केरल में तीव्रता से बढ़ता शहरीकरण उतनी ही तीव्रता से विलुप्त होता संयुक्त परिवार व अन्य पारंपरिक सहायक ढाँचा इसका प्रमुख कारण है। समाजशास्त्री जॉन कट्कयम के अनुसार केरल में बढ़ती सामूहिक आत्महत्याओं के पीछे मूल कारण गरीबी के साथ बढ़ती भोग लिप्सा है। मध्यम व उच्च आय वर्ग भी इसी कारण आत्महत्या की गिरफ्त में आ रहे हैं। उपभोक्ता संस्कृति ने सभी को धनलिप्सा की अंधी दौड़ में शामिल कर दिया है। वे ऐसी साधन’-सामग्री खरीदते हैं, जिससे वे अपने पड़ोसी, मित्रों व सम्बन्धीजनों के स्तर पर जीने की लालसा पूरी कर सकें। इससे वे या तो कर्ज के बोझ में दब जाते हैं या उस स्तर पर जीने में असफल होते हैं परिणामतः निराशा, हताशा व अवसाद के घोर तमस से घिर जाते हैं और आत्महत्या जैसे वीभत्स कृत्य के रूप में जीवन की इतिश्री कर देते हैं।
केरल के अतिरिक्त त्रिपुरा, तमिलनाडु, पश्चिमी बंगाल, महाराष्ट्र और कर्नाटक की दर भी औसत से अधिक है। बढ़ती सामाजिक- आर्थिक विषमता इसका प्रमुख कारण मानी जा रही है। विकास की त्रुटिपूर्ण नीतियों के कारण एक समूह विशेष के हाथों क्रय शक्ति के केंद्रीकरण से समाज का बृहत्तर भाग हताशा और अवसाद में जी रहा है। बढ़ती जनसंख्या और घटते संसाधनों के साथ उदारवादी आर्थिक नीतियों ने इस सामाजिक स्थिति को और जटिल बना दिया है। इसी कारण जहाँ जितना अधिक भूमंडलीकरण हुआ, वहाँ आत्महत्या की संख्या में उतनी ही वृद्धि हुई। आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, व दो के अन्य क्षेत्रों में किसानों द्वारा आत्महत्या की चौंकाने वाली घटनाएँ इसी प्रकाश में देखी जा सकती हैं। यहाँ विदेशी निवेश खुशहाली के साथ मौत का पैगाम भी लेकर आया है।
गरीबी के साथ शराब को भी आत्महत्या का प्रधान कारण देखा गया है। श्री लंका के मालोन्नयबा जिले में आर्थिक तनाव एक कारण था, किंतु साथ ही शराब भी प्रमुख कारण था। अच्छी उपज के साथ वहाँ किसानों में शराब की लत बहुत बढ़ गई थी। बाद में जब फसल अच्छी नहीं हुई, तो इसी शराब की लत ने आर्थिक तबाही की और शराब की अत्यधिक खपत कई तरह से आत्महत्या का कारण बनीं।
व्यक्ति की शिखा, व्यवसाय एवं सामाजिक स्थिति का भी आत्महत्या से नजदीकी रिश्ता पाया गया है। उच्च प्रशिक्षित व्यवसायियों, इंजीनियर, डॉक्टरों और विश्वविद्यालयों, मेडिकल व इंजीनियरिंग कॉलेजों के छात्रों में आत्महत्याएँ अपेक्षाकृत अधिक देखी गई हैं। शायद विकृत जीवन शैली का दबाव तनाव उनके लिए भारी सिद्ध होता है। दूसरी ओर गांवों में रहने वालो, धर्म में आस्था रखने वालों विवाहितों एवं महिलाओं में आत्महत्या की दर कम देखी गई है। इससे स्पष्ट होता है कि शहर की भागदौड़ भरी जिन्दगी का तनाव, टूटते मानव मूल्य, निताँत एकाकीपन जीर्ण होती सामाजिक दीवारें, आशा की ढहती इमारतें, बिखरती, धार्मिक निष्ठाएँ बढ़ती आत्महत्या की जड़ में हैं। संपन्न वर्ग में बढ़ती आत्महत्या की वृत्ति के पीछे तथाकथित उदारवाद पश्चिमीकरण और आधुनिकता की हवा को देखा जा सकता है।
शायद इसी कारण सर्वाधिक हत्याएँ एवं आत्महत्याएँ चारित्रिक पतन एवं संपत्ति के बर्बर बँटवारे को लेकर हुई हैं। उदाहरणार्थ दिल्ली में 352 महिलाओं और 434 पुरुषों के द्वारा की गई आत्महत्याओं में 1 महिलाओं व 24 पुरुषों के पीछे निहित कारण उनके साथी की चारित्रिक बेवफाई को बताया गया। अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में कहा गया है कि महानगरों के पुरुषों व महिलाओं के दुश्चरित्र होने की घटनाएँ बढ़ रही हैं, फलस्वरूप आत्महत्याओं में तेजी से वृद्धि हुई है। उपभोग की अतृप्त इच्छाएँ व्यक्ति को तेजी से सामाजिक एवं चारित्रिक पतन के मार्ग में ढकेल रही हैं। इन इच्छाओं की पूर्ति के लिए लोग ‘शॉर्टकट’ मार्ग अपनाते हैं और असफल होने पर आत्महत्या का मार्ग पकड़ लेते हैं, जो किसी तरह से ठीक नहीं है।
पर यह तभी समझा जा सकता है, जब यह सुनिश्चित तौर पर जान लिया जाए कि जीवन विधाता का सर्वोत्कृष्ट वरदान है। इसमें गहरी सार्थकता और गहन अर्थ छुपा हुआ है। उसे उजागर करना है। इस उद्देश्य की ओर बढ़ने वाला हर व्यक्ति गीता के स्वरों में यही गुनगुनाता है, यं लब्ध्वा चापंर लाभं मन्यते नाधिकं ततः। सचमुच जीवन अमृत हैं, इसे यूँ ही खोएँ नहीं, बल्कि इसकी सार्थकता की खोज करें।
अर्जुन के हाथ से युद्ध मध्य में गाँडीव छूटते, मुख सूखते देख कृष्ण झुँझला पड़े थे। कथनी और करनी में व्यतिरेक-व्यामोह उनसे सहन नहीं हुआ। भौहें तरेरते हुए वे बोल उठे-
कुतस्त्वा कश्मलमिंद विषमें समुपस्थितम्।
हे अभागे! इस विषम वेला में यह कृपणता तेरे मन मस्तिष्क पर किस प्रकार चढ़ बैठी? दिग्भ्राँत अर्जुन की आँखें खुली और उभरे उत्साह ने गाँडीवधारी अर्जुन को महाभारत विजय का श्रेय दिलाया। कार्य तो ईश्वरीय चेतना ने ही किया पर जाग्रत व उफनकर आए सत्साहस की परिणति ही पूर्व भूमिका बना सकी।
रास्ता रोके खड़े डाकू वाल्मीकि से सप्तऋषियों ने इतना ही तो कहा था कि क्या ये स्वजन-सम्बन्धी तुम्हारे पापों में भी उतने ही भागीदार होंगे, जितना सुख वैभव में हैं? पत्नी व बच्चों तक ने जब अपना उत्तर नकारात्मक दिया, तो उसे अपनी दा का मान हो गया। आत्मप्रगति का मंत्र ऋषिगणों से पाकर उसने अपनी जीवन धारा ही मोड़ दी और वह संत वाल्मीकि बन गया। नरक को उन्मुख हो रहा डाकू, अपनी विवेक-बुद्धि को सत्परामर्श के सहारे प्रयुक्त कर सही दृष्टि पा गया और आदि कवि के रूप में इतिहास में अमर हो गया
(1) सूर्य उदय होने से पहले ही उठ जाना।
(2) आरीं किए काम को समय पर पूरा करना।
(3) दिनचर्या में अनुशासन रखना।
(4) सादा-सुपाच्य और ताजा भोजन ही करना।
सरदी-गरमी, कष्ट-सुविधा, प्रिय-अप्रिय और अनुकूल -प्रतिकूल परिस्थितियों से विचलित हुए बिना अविराम कर्म करते रहा जा सके, तो समझना चाहिए कि जीवन में तप की प्रतिष्ठा हो गई है। ‘तपस्वी’ विशेषण सुनते ही पंचाग्नि तप कर रहे, नंगे बदन, कांटों पर सोने या नंगे पैर चलने वाले साधु-बाबाओं की छवि आँखों के सामने तैर जाती है। साधु-तपस्वियों की यह चर्या दिखावे के लिए भी हो सकती है और इनके पीछे कोई आध्यात्मिक आत्मिक उद्देश्य भी हो सकता है, लेकिन सामान्य साधकों को इन कठिन व्रतों या अभ्यासों पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। पतंजलि ने जिस ‘तप’ का उपदेश दिया है वह शरीर को साधना के अनुरूप समर्थ-सक्षम बनाने के लिए है।
शरीर स्वस्थ रहे, कोई कष्ट-कठिनाई चित्त को विचलित नहीं करे,, सुख-दुख आदि द्वंद्व सामने आएँ तो मन में ऐसा क्षोभ उत्पन्न न हो कि जीवनचर्या में विक्षेप आ जाए। यम-नियम के अंतर्गत आने वाले तप का इतना ही अर्थ है। यही सार्वभौम भी है। श्रीकृष्ण ने तप को व्यापक अर्थ देते हुए, उसमें पूरी जीवनचर्या को ही समाविष्ट कर दिया था। अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए उन्होंने तप की जैसी व्याख्या की है, उसमें पूरी जीवन साधना ही आ जाती है। तप को शरीर, वाणी और मन के खंडों में बाँटते हुए उन्होंने कहा है, “देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा यह शरीर सम्बन्धी तप कहा जाता है। जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है तथा सत्साहित्य के अध्ययन, पाठ और मंत्रजप का अभ्यास है, वह वाणी सम्बन्धी तप है। मन की प्रसन्नता, शाँतभाव, मौन रहकर आत्मचिंतन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अंतःकरण के भावों की भलीभाँति पवित्रता को धन सम्बन्धी तप कहते हैं।” (गीता 17/14-16)
भगवद्गीता के इन श्लोकों के अनुसार तप एक समग्र जीवनपद्धति है। इन विधि निषेधों का उद्देश्य व्यक्तित्व में समरसता लाना, सामंजस्य स्थापित करना और संतुलन साधना है।
योगशास्त्र के यम-नियमों में इन मर्यादाओं का कुछ अलग ढंग से लेकर विस्तृत मार्गदर्शन आ गया है। परिभाषा और कसौटियों को सीधे लागू नहीं किया जा सकता। उन तक पहुँचने के लिए छोटे आरंभ ही सहयोगी होते हैं। तप का अर्थ जीवन को द्वंद्व रहने योग्य बनाना है, तो आरंभ छोटे मोटे अनुशासन से ही करना चाहिए। सामान्यतः हमारा जीवन अस्त-व्यस्त रहता है। तीन -चौथाई काम इसलिए पूरे नहीं होते या उनका आरंभ ही खटाई में पड़ जाता है कि उनकी कोई व्यवस्थित योजना नहीं बन पाती।
तप का व्यावहारिक पक्ष दैनिक जीवन को व्यवस्थित करने के साथ आरंभ होता है। छोटी सी शुरुआत सूर्योदय से पहले उठने के साथ की जा सकती है। स्वास्थ्य, मानसिक आरोग्य और शेष दिन स्फूर्ति बने रहने की दृष्टि से सूर्य उदय होने से पहले ही जाग जाने के कई लाभ है। उनकी चर्चा यहाँ अभीष्ट नहीं है, सिर्फ यही समझना पर्याप्त है कि जल्दी उठना एक अच्छी शुरुआत की दृष्टि से उपयोगी है। देर तक सोते रहने के लिए शहरी जीवन के तकाजों की ओट ली जाती है। कामकाजी या शहरी जीवन की व्यवस्था के कारण देर तक सोने की मजबूरी मुश्किल से आधा प्रतिशत लोगों के साथ ही जुड़ी हुई है। निन्यानवे प्रतिशत से ज्यादा लोगों की व्यस्तता शाम के बाद नौ-दस बजे तक पूरी हो जाती है। भोजन आदि के घंटा आधा घंटे बाद वे सो जाएँ, तो सुबह छह बजे से पहले आसानी से उठा जा सकता है।
जिनके साथ अपरिहार्य स्थितियाँ जुड़ी हुई है, वे नींद खुल जाने के बाद प्रमाद और आलस्य में यों ही पड़े रहने की आदत छोड़ें। आँख खुलने के बाद उठ जाने और दिनचर्या आरंभ कर देने का क्रम अपनाएँ। समय पर उठने और तुरंत बाद दिनचर्या आरंभ करने का प्रभाव पूरे दिन दिखाई देगा। यह बहुत साधारण सी बात लगती है और बहुतों को शायद विश्वास भी नहीं हो कि जल्दी उठने की आदत व्यक्ति को अपने काम तत्परता से पूरा करने की ऊर्जा देती है। जल्दी उठने का अभ्यास शुरू करते समय कुछ दिन के लिए थोड़ी असुविधा भले हो, लेकिन जल्दी ही वह सिद्ध हो जाता है। आरंभ में एक सप्ताह पूरा होने तक यह अभ्यास प्रफुल्लता देने लगता है। वह उत्साह चित्त को स्फूर्तिवान बनाता है।
स्फूर्ति और उत्साह के अभाव में ही दिनचर्या के अधिकाँश काम अधूरे रह जाते हैं। हड़बड़ी में किए गए काम भी अधूरे ही कहे जाएँगे। उदाहरण के लिए, कार्यालय में फाइल पर ठीक से फीता नहीं बँधा है। कुछ कागज बाहर निकल रहे है। घर में या दफ्तर में सामान बिखरा हुआ है। गाड़ी में बैठ रहे है या बस में चढ़ रहे हैं, तो कपड़े उलझ रहे हैं। इस तरह की अस्त-व्यस्तता हड़बड़ी और आधी-अधूरी तैयारियों का ही परिणाम है।
एक समय में एक ही काम करने का अभ्यास भी काम को सावधानी से करने का उपाय है। आमतौर पर लोक एक साथ कई काम शुरू कर देते हैं, उदाहरण के लिए भोजन करते समय लोग अखबार पढ़ने लगते हैं या थोड़ी सी आहट होने पर बाहर झाँकने लगते हैं। पढ़ने-लिखने और घूमने-फिरने के अलावा दूसरे काम करते हुए भी इस तरह का बिखराव आ जाता है। नतीजा यह होता है कि कोई भी काम ठीक से नहीं हो पाता। जो काम करें, मन लगाकर और इधर -उधर ध्यान बँटाए बिना करें।
अभ्यास की पूर्णता आरंभ किए काम को समय पर पूरा करने के रूप में होनी चाहिए। ज्यादातर काम इसलिए अधूरे पड़े रहते या आरंभ होने के बाद टलते जाते हैं कि अब बीच में दूसरे काम शुरू हो जाते हैं। आरंभ किए गए काम को पूरा सम्मान दिया जाए, तो वह मनोयोग से भी होता है और पूरी कुशलता से संपन्न होता है। यह पद्धति किसी उपलब्धि तक पहुँचाती है। वैज्ञानिक फ्रैंकलिन ने सफलता के तेरह नियमों का निर्धारण करते हुए उस मर्यादा को आधार बताया था। अपने व्याख्यानों में वे कहा करते थे कि इस नियम का पालन नहीं किया जाए, तो आप एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकेंगे। आगे बढ़ने के लिए पहला कदम पूरी तरह जमाए बिना ही आप दूसरा कदम उठा देंगे और धड़ाम से नीचे गिर पड़ेंगे।
काम-काज, लोक व्यवहार और दैनंदिन चर्या में नियमित व्यवस्थित होने के लिए सजग रहना जरूरी है। हम जो खरच कर रहे है, जिन लोगों से मिल जुल रहे हैं, समय के जिस तरह व्यतीत कर रहे हैं, उसका औचित्य है या नहीं? समय, साधन और शक्ति के व्यय को नियोजन की तरह समझना चाहिए। उस नियोजन का लाभ आत्मविकास के रूप में होना चाहिए। अपने निजी, पारिवारिक और आस-पास के जीवन में उस नियोजन से सुख शाँति में अभिवृद्धि नहीं होती हों, तो व्यर्थ मानना चाहिए।
फ्रैंकलिन ने लिखा है कि परमात्मा ने आपको जीवन में संपदा के तौर पर जो दिया है वह समय है। समाज आपको साधनों के रूप में संपदा भेंट करता है। समय और साधनों का उपयोग करने से पहले सोचना चाहिए कि यदि यह व्यय नहीं किया जाए, तो क्या नुकसान होगा? आपका विवेक यदि कहे कि कोई हानि नहीं है, तो सच मानिए कि वह अपव्यय है। इस कसौटी को ध्यान में रखकर आप अपव्यय की आदत पर अंकुश लगा सकेंगे।
किन्हीं भी अभ्यासों के लिए सजग रहने का अर्थ हर आचरण के समय ऊहापोह से गुजरना नहीं है। आत्म समीक्षा या ग्रहण किए जा रहे नियमोँ को प्रतिदिन पढ़ने और उस आधार पर दिनभर के कामों का लेखा जोखा लेने से सजगता का उदय होने लगता है। तप-अनुशासन का चौथा नियम आहार से सम्बन्धित है। भोजन का उद्देश्य स्वाद न होकर पोषण मान लिया जाए, तो आहार संयम की आधी मंजिल पूरी हो जाती है।
आहार-संयम का उद्देश्य स्वास्थ्य और पोषण तो है, लेकिन साधकों के लिए वह इससे भी कही ज्यादा है। साधक शक्ति और पोषण के लिए ही नहीं खाता। यह प्राथमिक लेकिन अपेक्षाकृत गौण उद्देश्य है, असल उद्देश्य चेतना को संस्कारित करना है। बल और पोषण देना ही उद्देश्य होता है। साधकों को गरिष्ठ और राजसी भोजन करने के लिए मना किया जाता है। उस भोजन को पचाने के लिए कठोर श्रम करने और पसीना बहाने की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिए साधकों को सादा-सात्विक, आसानी से पचने योग्य हल्का- फुल्का भोजन करने की सलाह दी गई है।
सात्विक भोजन में कुछ आहर ऐसे भी हैं, जो दूसरे पदार्थों की तुलना में बहुत कम पोषण देते हैं, लेकिन उनका प्रभाव चित्त हो हल्का और निर्मल बनाता है। लहसुन प्याज जैसे पदार्थों का औषधीय गुणों के कारण आयुर्वेद में विशेष महत्व दिया गया है, लेकिन दक्षिणमार्गी साधकों के लिए ये वर्जित है। योग के आचार्य इन्हें तामसी मानते हैं, उड़द, चना, अरहर, राजमा, सेम, मटर और विभिन्न अनाज पोषण की दृष्टि से उन्नीस बीस होते हुए भी साधकों के लिए कुछ विहित हैं और कुछ निषिद्ध। आहार का यह सूक्ष्म विवेक बहुत आगे की स्थिति में किया जाता है। आरंभ सादा, सुपाच्य और सात्विक भोजन की मर्यादा से ही किया जाना चाहिएं वह सध जाए तो आगे की यात्रा सहज होने लगती है।
भविष्य के पूर्वानुमान का आधार क्या है? संभाव्य का ज्ञान व्यक्ति को, समूहों को पूर्व चेतावनी अथवा संदेशों के रूप में किस प्रकार मिल जाता है, इसका उल्लेख करने से पूर्व हमें कालचक्र और उसकी संरचना को समझना होगा। उसे प्रायः तीन भागों में बाँटा जा सकता है, भूत, वर्तमान एवं भविष्य। तीनों का संयुक्त स्वरूप ही समग्र और अखंड काल है। तीनों का ही अपना-अपना महत्व है।
सामान्यतया मनुष्य का, घटनाओं का वर्तमान ही सबके परिचय में आता है। भूतकाल की उपयोगिता इतनी भर है कि उन स्मृतियों, घटनाक्रमों और अनुभूतियों के आधार पर वर्तमान को बनाया, सुधारा, सँवारा जा सकता है। किंतु भविष्य में क्या होना है? कैसे संभव होना है? इसको तो मात्र कल्पना के आधार पर आज के क्रिया कलापों को देखते हुए ही जाना जा सकता है। चिंतन क्षेत्र का अधिकाँश हिस्सा भविष्य की कल्पनाओं में ही सदैव निरत रहता है। इसे यों कहना ठीक रहेगा कि भावी निर्धारणों का स्वरूप ही चिंतन क्षेत्र की सबसे बहुमूल्य संपदा है। प्रत्यक्षतः भविष्य दिखाई न पड़ने पर भी शक्ति उन काल्पनिक निर्धारणों में सर्वाधिक खरच होती है, पर सत्य है कि जो जैसा सोचता है, वह वैसा ही बन जाता है। समूहगत चिंतन प्रवाह जिस दशा में बहने लगता है, तदनुरूप ही उसकी नियति बन जाती है। इसी को कहते हैं, भविष्य निर्धारण।
भविष्य निर्धारण में सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग है- पूर्वाभास, पूर्वकथन या भविष्यवाणी। घटनाक्रम घटने के पूर्व ही उसके स्वरूप की, घटने के समय की लगभग सही भविष्यवाणी कर देना, यही भविष्य कथन या प्रोफेसी है। समय को, कालखंड को बहुआयामी मानने वाले मनीषीगण कहते हैं कि भविष्य के बीजाँकुर वर्तमान में निहित होते हैं एवं इन्हें प्रस्फुटित कर उस भावी परिणति को जान पाना तथा वाँछित परिवर्तन कर पाना मनुष्य के लिए संभव है। एक माली बीज का पर्यवेक्षण कर बता सकता है कि वृक्ष का स्वरूप कैसा होगा? कैसे फल देगा? कब फल देगा? इंजीनियर्स कल्पना शक्ति के आधार पर भव्य रचनाओं की, अट्टालिकाओं की आकृति अंकित कर एक प्रकार से संभाव्य को मूर्त रूप दे देते हैं। ऋतु बदलती है, लोग परिवर्तन के पूर्वानुमान के सहारे अपनी तैयारी कर पाना भविष्य ज्ञान तो वह है, जो व्यक्ति को चिर संचित अनुभवों के आधार पर अपनी पूर्व तैयारी की दिशा देता है।
लीवरपूल विश्वविद्यालय के भौतिकीविद् डॉ. अरनोल्ड ओटवे का कथन है कि मनुष्य को भविष्य का आभास इसलिए होता रहता है कि विभिन्न घटनाक्रम ‘टाइम लेस मेंटल पैटर्न’ चिंतन क्षेत्र के निर्धारणों के रूप में विद्यमान रहते हैं। ब्रह्माँड का हर घटक इन घटनाक्रमों से जुड़ा होता है, चाहे वह जड़ हो अथवा चेतन।
स्वामी प्रतयग्यात्मानंद का मत है कि यूनीवर्स यह सृष्टि जिसे ‘मेक्रोकॉम्स’ नाम से जाना जाता है, अपने गर्भ में अगणित माइक्रोकॉम्स व्यष्टि घटकों को समाहित किए है। ये विभिन्न घटनाक्रमों एवं चलते फिरते जीवों मानवों के रूप में भी हैं तथा जड़ समझे जाने वाले पादप, वृक्ष वनस्पति एवं अन्य घटकों के रूप में भी। अणु में विभु, लघु में महान क्षुद्र में विराट के रूप में इसी संज्ञा को वर्णित किया जाता है। इन व्यष्टि घटकों में समष्टि से सम्बन्ध स्थापित करने, तादात्म्य बिठाने की अभूतपूर्व सामर्थ्य होती है। यही भविष्य विज्ञान को कुछ भी घटित होने वाला है, उसकी झलक झाँकी अपने मन मस्तिष्क में देखने पाने का मूलभूत आधार है।
मूर्द्धन्य दार्शनिक लिबनिज का कथन था कि हर व्यक्ति में यह संभावना छिपी पड़ी है कि वह अपनी अंतर्प्रज्ञा करे जगाकर भविष्य काल को वर्तमान की तरह दर्पण में देते ले। जो भी दिव्य द्रष्टा मनीषी हुए हैं, वे इसी क्षमता का जगाकर भविष्य की संभावनाएँ व्यक्त कर सके एवं उनका आधार पर वर्तमान के ढाँचे को बदलने की, परिष्कृत की सम्मति दे सके। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के भौतिकीविद् प्रोफेसर एड्रियन डॉब्स ने भविष्य कथन सम्बन्धी अपना प्रतिपादन एक सेमीनार में सन 1965 में प्रस्तुत करते हुए कहा था कि भविष्य में घटने वाली हलचलें मानव की वर्तमान में एक प्रकार की तरंगें पैदा करती हैं, जिन्हें ‘साइट्रोनिकवेवफ्रंट’ कहा जा सकता है। इन तरंगों की स्फुरणाओं को मानवी मस्तिष्क के घटक न्यूरॉन्स पकड़ लेते हैं एवं इस प्रकार व्यक्ति भविष्य का अनुमान लगा पाने की स्थिति में आ जाता है। मस्तिष्क की अल्फा तरंगों तथा साइट्रोनिक वेव्स की फ्रीक्वेन्सी एक ही होने से यह एक बड़ी सरल प्रक्रिया है। मात्र मस्तिष्क को सचेतन स्तर पर जाग्रत बनाए रहने की आवश्यकता है, ताकि संभावित घटनाक्रमों का खाका समझा जा सकें।
अपने ग्रंथ ‘सुपरनेचर’ में लायल वाअसन ने ‘प्रिकागनीशन’ शब्द का अर्थ ‘ पूर्वानुमान’ किया है। अर्थात् जो कुछ घटित होने वाला हो, उसकी पहले से जानकारी हो जाना। वे एक पुस्तक ‘आइचिंग‘ अर्थात् ‘दि बुक ऑफ चेंजेज’ जो अब से प्रायः 3 वर्ष पूर्व लिखी गई थी, का हवाला देते हुए लिखते हैं कि भाव निर्धारण एवं वर्तमान में जो किया जा रहा है, उसमें क्या कुछ परिवर्तन कर भविष्य को स्वयं व अन्यों के लिए उज्ज्वल बनाया जा सकता है, यह पूर्णतः ज्यामितीय आधार पर गणना करके जाना जा सकता है। मानवी मस्तिष्क में वे सभी समाधान तथा संभावनाएँ एवं उनके विकल्प विद्यमान है। क्रिस्टल बॉल के द्वारा श्रीमती जीन डिक्सन इसी आधार पर अपनी अंतप्रा को जाग्रत का भविष्य के गर्भ में झाँका करती थी। वे लिखते हैं कि हर मनुष्य भविष्यवक्ता बन सकता है। किंतु कुछ व्यक्ति कभी-कभी शत-प्रतिशत सही भविष्यवाणी बिना किसी पुरुषार्थ के करने की जो योग्यता रखते हैं, वह या तो दैवी अंतः स्फुरणा के आधार पर अथवा व्यष्टि चेतना का समष्टि से सीधे संपर्क होने पर व्यक्ति विशेष, समय विशेष अथवा परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त हो जाने की क्षमता के कारण उनमें विकसित होती है। यह पूर्व जन्मों के आधार पर विशेषता भी हो सकती है। नोस्ट्राडेमस, काँट लुई हेमन (कीरो) तथा महर्षि अरविंद ऐसे ही दिव्यदृष्टि संपन्न व्यक्तियों में गिने जाते हैं।
विलियम काक्स नामक एक अमेरिकी गणितज्ञ एवं दार्शनिक ने एक रोचक सर्वेक्षण कर यह जानने का प्रयास किया है कि क्यों विभिन्न स्थानों पर बैठे व्यक्ति अचानक उन यात्राओं को, जो रेल या हवाई जहाज से की जाने वाली थीं, स्थगित कर देते हैं। पीछे पता चलता है कि वे किसी दैवी प्रेरणा अथवा पूर्वाभास के कारण एक ऐसी अभिशप्त यात्रा से बच गए, जो उन्हें सीधे मौत के मुँह में ले जाती। उन्होंने दुर्घटनाग्रस्त वाहनों का सर्वे करके पाया कि उस दिन उस विशेष यान अथवा रेल से यात्रा करने वालों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम रही एवं कइयों ने अपने रिजर्वेशन निरस्त कराए। दुर्घटनाग्रस्त यान या रेल डिब्बे में बैठने से पूर्व ही उन्हें पूर्व ज्ञान हो जाने से जान-बूझकर उनने यात्रा का स्थगित कर दिया। काक्स कहते हैं कि दुर्घटनाग्रस्त हुई टेऊन अथवा वायुयान में यात्रा करने वालों एवं इनके पूर्व तथा बाद में यात्रा करने वालों की संख्या में इतना बड़ा अंतर था कि इसे मात्र संयोग नहीं कहा जा सकता। आसन्न संकट की यह एक समष्टिगत चेतावनी मानी जा सकती है, जो संभव है, सबको मिली हो, पर जो काल के ग्रास हो गए, ने उसकी अवमानना करके उस ‘डूम्ड’ (अभिशप्त) वाहन में बैठे तथा जो बच गए, उनने उसे गंभीरता से लिया, उसकी उपेक्षा नहीं की और बच गए। इसे वे ‘कलेक्टिव अवेयरनेस’ कहते हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ है, आसन्न भवितव्यता के विषय में समूहगत जागरुकता एवं भावार्थ हुआ, दैवी प्रेरणा, अंतःस्फुरणा, पूर्वाभास। ‘जरनल आुँडडडडड अमेरिकन सोसायटी फॉर साइकिकल रिसर्च’ (1956) में प्रकाशित विलियम काक्स के विवरणानुसार 15 जून 1952 को शिकागो एवं इलिनायस के बीच यात्रा करने ली ‘जार्जियन’ नामक दुर्घटनाग्रस्त हुई टेऊन के यात्री उस विशेष दिन मात्र नौ थे, जबकि उस घटना के 14 दिन पूर्व तथा बाद के 14 दिनों में उनकी संख्या औसतन बासठ से अड़सठ के बीच थी। संख्या का वह विरोधाभास उनने 15 दिसंबर 1952 को दुर्घटनाग्रस्त हुई शिकागो मिलवाऊकी के बीच चलने वाली टेऊन में भी पाया। ऐसी लगभग 10 घटनाओं में से 9 से अधिक में यात्रा करने वालों को, जो जीवित बच गए, घटना का पूर्वाभास हो चुका था।
सन 1966 शुक्रवार 12 अक्टूबर के दिन रात्रि एक बजकर पंद्रह मिनट पर इंग्लैंड के वेल्श खदानों के क्षेत्र में एक भयंकर दुर्घटना हुई। इसमें अबरफान नामक एक गाँव पूरी तरह बर्बाद हो गया। कारण कि भूस्खलन था, जिसमें 5 लाख टन कोयला तथा मिट्टी ने खिसककर घरों को पूर्णरूपेण ढक दिया और वहाँ के एक सौ चालीस ग्रामवासियों को असमय काल का ग्रास बना दिया। कइयों ने इस समाचार को अखबार में पढ़ा। इस दुर्घटना के सम्बन्ध में पूरे इंग्लैंड में अगणित व्यक्तियों को पूर्वाभास कुछ क्षणों से कुछ दिन पूर्व तक सतत होता रहा था। एक व्यक्ति जिसने गाँव का नाम भी नहीं सुना था, स्वप्न में देखी गई स्पेलिंग के आधार पर स्थानीय पेपर को उसका नाम लिख भेजा और स्वप्न का पूरा वृत्तांत भी बताया कि ऐसा कुछ घटित होने वाला है। इसके बारे में दिवंग एरिल जोन्स नामक 9 वर्षीया एक लड़की ने अपनी माँ को एक दिन पूर्व ही बताया था कि उसके स्कूल पर काला पहाड़ गिर पड़ा है एवं स्कूल नष्ट हो गया है, यह स्वप्न उसने देखा है। माँ बच गई, किंतु वह लड़की अपना पूर्वाभास बताकर मौत के मुँह में चली गई। किसी ने लोगों की चीख-पुकार, किसी ने पहाड़ टूटने, किसी ने जमीन में बड़ा गड्ढा होने, ऐसे स्वप्न लगभग दो सप्ताह पूर्व से घटना के दिन तक प्रतिदिन देखे। केंट का एक व्यक्ति, जिसने इस घटनाक्रम को यथावत् देखा, दो दिन पूर्व अपने सहकर्मियों को यह कहता पाया कि शुक्रवार को कुछ भयंकर वेल्श में घटित होने जा रहा है। बाद में किए सर्वेक्षण में भी काफी लोगों ने अपने पूर्वाभास की सूचना दी। यह समूहगत पूर्वाभास की साक्षी देने वाली एक महत्वपूर्ण घटना है।
डेविड बूथ नामक व्यक्ति ओहियो, अमेरिका का रहने वाला था। वह बिजली का सामान बनाने वाली एक कम्पनी में मैनेजर था। मई 1979 में दस दिन तक लगातार उसे यह पूर्वाभास होता रहा कि अमेरिकन एयरलाइंस का एक विमान आकाश में फट पड़ा तथा जलते यान के मलबे में, लपटों में कई शव पड़े है। वे कहते हैं कि यह स्वप्न नहीं था, बैठे-बैठे उन्हें कई बार रोमाँचित कर देने वाली यह लोमहर्षक अनुभूति हुई जैसे वेटी देख रहे हों। 22 मई 1979 को उन्होंने फेडरल एविएशन अथॉरिटी एवं सिनसिनाटी एयरपोर्ट के कार्यालयों में फोन पर यह सूचना भी दी एवं एक मनः चिकित्सक से संपर्क कर उसे भी सारा प्रसंग सुनाया। 26 मई को 4 दिन बाद शिकागो के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अमेरिकन एयरलाइंस का एक डी. सी. 1 जेट विमान जब दुर्घटनाग्रस्त हुआ, तो यह अमेरिका के इतिहास में भयंकरतम घटनाओं में से एक था। इसमें सभी 274 यात्री मारे गए। दुर्घटना के बाद ही सभी ने डेविड बूथ के पूर्वाभास को याद किया। यह पूर्वाभास इतना सही था कि फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन जो इस एयरलाइंस को चलाता था, हैरान हो गया। क्योंकि डेविड बूथ ने उसे भी इस सम्बन्ध में सूचित किया था और आग्रह किया था कि संभावित दुर्घटना को हर हाल में रोका जाना चाहिए। ‘दि अनएक्सप्लेंड मिस्ट्रीज ऑफ माइंड एंड स्पेस’ नामक ग्रंथ में इसका विस्तारपूर्वक उल्लेख है।
अचेतन के ऐसे पूर्वाभास इनमें से अनेकों को होते रहते हैं। कुछ उन्हें गंभीरतापूर्वक लेते और याद रखते हैं, तो कुछ मन की स्वाभाविक उधेड़बुन समझकर उसकी उपेक्षा कर देते हैं। यदि समष्टि चेतना की व्यापकता को समझा जा सके और वह स्मरण रखा जा सके। कि व्यष्टि चेतना कोई स्वतंत्र इकाई नहीं, वरन् उसी का एक घटक है तो इस प्रकार के सामूहिक पूर्वाभास की घटनाओं को अधिक सरलतापूर्वक हृदयंगम किया जा सकेगा। इससे जहाँ अशुभ-अनिष्टों से बचा जा सकना आसान होगा, वही सुखद संभावनाओं से लाभ उठा पाना भी कठिन न रह जाएगा।
सामने आया समय बार-बार नहीं आता। मानव जीवन एक सौभाग्य है, जो बार-बार नहीं मिलता? विडंबना यही है कि इसका सदुपयोग करने वाले कम ही होते हैं। जो जीवन का समुचित उपयोग करना जानते हैं, वे क्रमिक गति से ऊँचे उठते हुए चरम ध्येय को अंततः प्राप्त करके ही रहते हैं।
जो आत्मस्वरूप को भूलते और उत्तरदायित्वों से विमुख होते हैं, वे पतन के गर्त में गिरते हैं।
पुलस्त्य के विश्रवा के यहाँ एक कुरूप संतान ने जन्म लिया। बेडौल आकार का होने के कारण सभी उसकी हँसी उड़ाते। उसे लोगों की मूर्खता पर बड़ा क्षोभ हुआ। ‘कुबेर’ नामक इस पुरुषार्थी ने अपनी हँसी अपने ही घर में उड़ते देख ठान ली कि वह मानव समुदाय को यह बताकर रहेगा कि सभी को प्राप्त मनुष्य जीवन रूपी संपदा का सदुपयोग कर महान से महान बना जा सकता है। शरीरगत सुँदरता नहीं, अपितु गुणरूपी संपदा महत्वपूर्ण है एवं उसे ही अर्जित किया जाना चाहिए, यह सोचकर उसने अपनी योग्यता बढ़ाने के लिए कठोर तप किया। अपनी लगन से उसने पिता व बाबा को भी इस साधना में सम्मिलित कर लिया। देवताओं ने उन्हें अपना धनाधीश लोकपाल बनाया और वे अलकापुरी में राज करने लगे।
वरतंतु कौत्स को बहुत प्यार करते थे। न जाने कहाँ से आकर एक दिन वह उनके द्वार पर खड़ा हो गया था। तब से उन्होंने ही उसे पाल पोस्कर बड़ा किया था। महर्षि का उस पर सच्चा स्नेह था। उन्होंने उसे अपना समस्त ज्ञान प्रदान किया था। अब कौत्स के लिए आरम्भ में रुकना उचित न था। अतः वह गुरु के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। वरतंतु ने आँख उठाकर देखा, उनकी आँखों में प्रश्न था?
कौत्स ने कहा, “ गुरुदेव! यहाँ से जाने से पूर्व मुझसे गुरु दक्षिणा ले लें। गुरु ऋण चुकाए बिना मेरी विद्या व्यर्थ हो जाएगी।”
वरतंतु ने हँसकर कहा, “तुमने स्वयं ही इतनी सेवा की है कि मुझे और कुछ नहीं चाहिए।” कौत्स फिर भी नत-मस्तक खड़ा रहा। उसने फिर वही बात दुहराई, “भगवन्! मुझे कुछ आाडडडड अवश्य दें। बिना आपकी सेवा में कुछ अर्पण किए मुझे कहाँ संतोष होगा?”
गुरु मुस्कराए। उनकी आँखों में अपने शिष्य की एक और परीक्षा लेने का भाव उभरा और उन्होंने कहा, “यदि तुम नहीं मानते हो तो अपनी सीखी हुई चौदह विद्याओं के लिए चौदह सहस्र स्वर्ण मुद्राएँ लाकर दे जाओ।” कौत्स ने गुरु आाडडडड शिरोधार्य की। उसके पाँव सीधे अयोध्या की ओर बढ़ चले।
उन दिनों चक्रवर्ती सम्राट रघु राज्य कर रहे थे। कौत्स को अपनी सभा में आया देखकर राजा रघु ने उठकर दंडवत की, चरण धोए एवं उसका विधिवत पूजन किया। कौत्स निर्विकार भाव से यह सब देखता रहा। पूजन की समाप्ति पर वह उठकर जाने लगा।
राजा रघु हाथ जोड़कर सामने खड़े हो गए एवं बड़े ही विनम्र स्वर में पूछा, “ ऋषिवर! आपने सेवक को कुछ आज्ञा नहीं दी? अवश्य ही मेरी सेवा में कोई त्रुटि रही है।”
कौत्स के आने के कुछ दिन पूर्व ही सम्राट रघु ने जनहित में किए गए विश्वजित् यज्ञ में अपना सर्वस्व दान कर दिया था। यह बात कौत्स को ज्ञात न थी। सम्राट की अभ्यर्थना में मिट्टी के पात्रों को देखकर वह समझ गया कि यहाँ अभीष्ट की पूर्ति संभव नहीं है। अतः वह उठकर जाने लगा था, परंतु राजा के बारंबार आग्रह करने पर अपने आगमन का कारण बताते हुए उसने कहा, “राजन! मैं आपके पास गुरु दक्षिणा के लिए आया था, परंतु आपने तो अपना सर्वस्व दान कर दिया है। यहाँ तक कि अतिथि सत्कार के बरतन भी आपके मिट्टी के पात्र रह गए इस दशा में मैंने आपसे कुछ भी कहना अनुचित समझा। आप संकोच न करें मैं अन्यत्र जा रहा हूँ, मेरे अभीष्ट की पूर्ति हो जाएगी।”
राजा रघु के द्वार से कोई याचक वापस चला जाए, यह असंभव था। सम्राट ने कौत्स से प्रार्थना की, “महात्मन् मुझे तीन दिन का समय दें। मैं आपकी इच्छा को अवश्य पूर्ण करूंगा। रघु ने द्वार से कोई स्नातक निराश लौट जाए, इस कलंक से मेरी रक्षा करें।”
कौत्स ने तीन दिन के लिए उनका आतिथ्य स्वीकार कर लिया। रघु वापस अपने महल नहीं आए। सीधे युद्ध के लिए सजे हुए रथ में सवारी कर युद्ध की तैयारी में जुट गए। उन्होंने सोचा कि मैं पृथ्वी के समस्त राजाओं से कर ले चुका हूँ। दुबारा इतना शीघ्र फिर से उनसे कर की याचना करना अन्याय एवं अनीति होगी। अतः उन्होंने सीधे धनाधीश कुबेर पर चढ़ाई करने का संकल्प किया और उसी रथ पर सो गए।
प्रातःकाल राजा के उठते ही राज्य के कोषाध्यक्ष ने सूचना दी कि कोष में आकाश से स्वर्ण की वर्षा हो रही है। सम्राट मुस्करा उठे। कोषपाल कुबेर ने चुपचाप रघु का खजाना भर देने में ही अपनी कुशलता समझी। अतः उन्होंने स्वर्णमुद्राओं का ढेर लगा दिया।
रघु ने कौत्स को बुलाकर समस्त धन ले लेने का आग्रह किया। कौत्स ने हँसते हुए कहा, “ राजन्! मुझे धन की क्या आवश्यकता? मैं तो केवल चौदह सहस्र मुद्राएँ ही लूँगा, बस। शेष धन आप चाहें तो दान कर दें।” राजा रघु ने शेष सारा धन गाँवों को दान कर दिया। दो महान त्यागियों के बीच का त्याग जीवंत दिख रहा था। कौत्स ने अपना इच्छित धन लेकर गुरु दक्षिणा देने के लिए प्रस्थान किया।
जिसने ज्ञान को आचरण में उतार लिया, उसने ईश्वर को मूर्तिमान कर लिया।
-विनोबा भावह्य
जीवन में प्रयास, पुरुषार्थ, अवरोध एवं संघर्ष का क्रम एक शाश्वत सत्य हैं और इनमें सफलता -विफलता का दौर भी शाश्वत है। इन सबके बीच व्यक्ति की जीवन यात्रा प्रगति उत्थान की दिशा में बढ़ रही है या अवगति पतन की ओर, इसके निर्धारक तत्वों में उसके दृष्टिकोण की भूमिका सर्वोपरि रहती हैं।
व्यक्ति यदि छोटी छोटी असफलता अवरोधों से हिम्मत हार बैठता है और नकारात्मक भावों को जीवन में हावी होने देता है। तो यात्रा का हर एक कदम दूभर एवं कष्टप्रद अनुभव बन जाता है । जीवन एक दुखद घटना एवं दुर्भाग्यपूर्ण मजाक लगने लगता है। जीवन ऊर्जा नकारात्मक भावों में उलझकर कुँठित होने लगती है और अस्तित्व हताशा, निराशा एवं कुँठाओं के बीच दम तोड़ने लगता है। चहुँओर अंधेरा ही अंधेरा दिखने लगता है, अपने पराये लगने लगते हैं। अधिकाँशतः लोग ऐसे में अपने दुख दर्द एवं दुर्भाग्य के लिए भाग्य को कोसते हैं या दूसरों को दोषी मान बैठते हैं और नहीं तो भगवान को कोसने लगते हैं।
किंतु जीवन के प्रति दृष्टिकोण के बदलते ही स्थिति पलटने लगती है। अंतर्मन में पूर्ण सकारात्मक भाव के जागते ही जीवन के क्षितिज पर आशा की किरणें फूटने लगती हैं, निराशा-अवसाद का सघन अंधकार न जाने कहाँ तिरोहित होने लगता है, जीवन में साहस उत्साह का संचार होने लगता है और उमंग उल्लास का झरना बहने लगता है।
वस्तुतः आशापूर्ण विचार ही जीवन की सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है। मनीषी अलेक्जेन्डर के शब्दों में, ‘आशा’ मनुष्य की सबसे बड़ी संपदा है। यदि व्यक्ति इसे खो बैठता है, तो जीवन नैया डूबने लगती है, क्योंकि इसके बिना जीवन में अंधकार, अभाव और अशक्ति के अतिरिक्त कुछ नहीं सूझता। आशा ही घोर अभाव, विषमताओं और संकट के बीच भी जीवन निर्माण के तत्वों की खोज करती है तथा पर भासित अभिशाप को भी वरदान में बदलने का चमत्कार प्रस्तुत करती है। निराशावादी, नकारात्मक दृष्टिकोण के रहते अनुकूल अवसरों में भी प्रतिकूलता को देखते हैं, ताकि आशावादी विषम परिस्थितियों में भी अनुकूल है।
महान वैज्ञानिक एडीसन की प्रयोगशाला एक भीषण अग्निकाँड में पूरी तरह जलकर ध्वस्त हो गई। जीवनभर की बहुमूल्य शोध सामग्री उपकरण सब जलकर खाक हो गए। इसके अतिरिक्त आर्थिक क्षति हुई सो अलग। सामान्य व्यक्ति होता तो इस हादसे से जीवनभर न उबर पाता,किंतु आशा के पुतले एडीसन के उद्गार कुछ और ही थे, जो हर इनसान के लिए एक अमूल्य संदेश दे रहे थे, “ऐसे हादसों का बहुत महत्व है। इनमें हमारी भूलें जलकर नष्ट हो जाती हैं। हमें इसके लिए भगवान का कृतज्ञ होना चाहिए कि अब हम नए सिरे से जीवन को शुरू कर सकते हैं।”
यदि घटनाएँ हमारे अनुरूप नहीं घटती एवं हमें विफलता एवं निराशा का संदेश दे जाती है, तो भी हिम्मत हारने एवं हताश होने की आवश्यकता नहीं। चाहें संघर्ष पथ पर हम गिर भी जाएँ पिट भी जाएँ हमें नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी असफलता अंतिम नहीं होती। यदि लक्ष्य के प्रति अदम्य भाव अंतर में विद्यमान है, तो हर विफलता गिरकर फिर से उठ खड़े होने व दुगने उत्साह के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं।
इसमें महत्वपूर्ण सत्ता यह भी है कि हम जीवन व्यापार की तमाम संभावनाओं को मद्देनजर रखते हुए व्यावहारिक रुख को अपनाए रखें, अन्यथा अपनी क्षमता से बहुत अधिक भारी बोझ उठाने के प्रयास में हम ऐसी बुरी तरह न पिट जाएँ कि उठने का उत्साह ही चुक जाए। अतः अपनी योग्यता एवं क्षमता के अनुरूप ही प्राथमिकताओं का उचित निर्धारण भी आवश्यक है। जिससे हम अभीष्ट लक्ष्य की ओर सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुए उत्साह उमंग के साथ बढ़ते जाएँ, क्योंकि बार-बार के विफल प्रयास व्यक्ति को हताश कर देते हैं। व्यक्ति थक-हारकर आशाहीनता की स्थिति में आ जाता है। ऊर्जा ह्रास के कारण प्रयास को ही छोड़ बैठता है व कई तरह की कुँठाओं व ग्रंथियों से ग्रस्त होकर मनोविकारों का शिकार हो जाता है। जीवन के प्रति आस्था का क्षय कुछ इस हद तक हो जाता है कि इसकी सार्थकता का कोई किनारा सहारा नहीं सूझ पड़ता और घोरतम निराशा की स्थिति में कुछ तो अपनी जीवन लीला को ही समाप्त करने का घातक कदम तक उठा बैठते हैं।
आशावादी व्यवहारिक रुख अपनाते हुए अपने जीवन की छोटी-छोटी सफलताओं से क्रमशः आगे बढ़ता है। अपनी कार्य कुशलता और इच्छाशक्ति को क्रमशः विकसित करता जाता है। उनकी यह पद्धति जीवन में रचनात्मकता की अजस्र स्रोत बनकर उसे आगे बढ़ाती है। निराशावादी जहाँ एक दरवाजा बंद देखते ही प्रयास छोड़ देता है, आशावादी वही दूसरे खुले दरवाजे की ओर देखता है। निराशावादी जहाँ सतत हारता जाता है, वही आशावादी सामयिक विफलताओं के बावजूद भी एक विजेता होता है।
वास्तव में जब तक हम अपने जीवन के अर्थ एवं सुख की खोज के लिए बाहरी वस्तु, व्यक्ति एवं परिस्थितियों पर निर्भर रहते हैं, निराशावादी भाव जीवन में एक प्रभावी तत्व बनते जाते हैं और जब दृष्टि अपने अंदर के मूल स्रोत की ओर मुड़ने लगती है, तो निराशा का कुहासा छँटने लगता है। आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार एवं आत्मनिर्भरता के बल पर ही हम आशा के अंतर्निहित स्रोत की ओर बढ़ते हैं, जो हमें बाहरी जीवन में भी अंतर्संबंधित ठोस उपलब्धियों से संपन्न बनाता है और प्रगति पथ पर निरंतर आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित करता है।
यही पर हमें परमात्मा की कृपा एवं वरदान की भावभरी अनुभूति होती है, जो हर कर्तव्यपरायण व्यक्ति के लिए सुरक्षित है। अपने ईमानदार प्रयास के साथ प्रभु प्रेम एवं उसके अचूक न्याय विधान के प्रति आस्था को धारण कर हम अनायास ही आस्तिकता एवं धार्मिकता के पथ पर बढ़ जाते हैं। यही हमें जीवन की सफलता-सार्थकता के बोध की ओर ले चलती है।
एक बार एक ब्राह्मण ने युधिष्ठिर के पास जाकर दान की याचना की। युधिष्ठिर राज्य कार्यों में व्यस्त थे, इसलिए ब्राह्मण को दूसरे दिन आने को कह दिया। भीमसेन को यह बात अच्छी न लगी। उन्होंने सेवकों को बुलाकर सभी मंगल वाद्य बजाने की आज्ञा दी और स्वयं भी दुँदुभि बजाने लगे। वाद्यों की आवाज सुनकर युधिष्ठिर दौड़े आए। उन्होंने भीम से इसका कारण पूछा। भीमसेन ने कहा, “महाराज! आपने काल जीत लिया है। इस खुशी में यह कर रहे हैं। कल ब्राह्मण को बुलाने का तात्पर्य यही है कि कल तक का समय आपके वश में हैं।” युधिष्ठिर ने अभिप्राय समझा और कहने लगे, “सचमुच भीम! अच्छे कार्यों में देर नहीं करनी चाहिए।”
एक राजा वन भ्रमण को गया। रास्ता भूल जाने पर भूख प्यास से पीड़ित वह एक वनवासी की झोंपड़ी पर पहुँचा। समय पर मिले रूखे सूखे आतिथ्य ने उसे तृप्त कर दिया। चलते समय उसने उस वनवासी से कहा, हम इस राज्य के शासक हैं। तुम्हारी सज्जनता से प्रभावित होकर चंदन का एक बाग तुम्हें देते हैं। तुम्हारा शेष जीवन आनंद से बीतेगा।
चंदन का वन तो उसे मिल गया, पर चंदन का क्या महत्व है और उससे किस प्रकार लाभ उठाया जा सकता है, इसकी जानकारी न होने से वनवासी चंदन के वृक्ष काटकर उनका कोयला बनाकर नगर में बेचने लगा इस प्रकार किसी तरह उसके गुजारे की व्यवस्था तो बन गई।
धीरे-धीरे सभी वृक्ष समाप्त हो गए। एक अंतिम पेड़ बचा। वर्षा होने के कारण कोयला न बन सका, तो उसने लकड़ी बेचने का निश्चय किया। लकड़ी का गट्ठा लेकर जब बाजार में पहुँचा, तो सुगंध से प्रभावित लोगों ने उसका भारी मूल्य चुकाया आश्चर्यचकित वनवासी ने इसका कारण पूछा, तो लोगों ने कहा यह चंदन काष्ठ है, बहुत मूल्यवान है। यदि तुम्हारे पास ऐसी ही और लकड़ी हो तो उसका प्रचुर मूल्य प्राप्त कर सकते हो।
वनवासी अपनी नासमझी पर पश्चात्ताप करने लगा कि उसने इतना बड़ा बहुमूल्य चंदन वन, कौड़ी मोल कोयला बनाकर बेच दिया। पछताते हुए नासमझ को साँत्वना देते हुए एक विचारशील व्यक्ति ने कहा, मित्र पछताओ मत, यह सारी दुनिया तुम्हारी ही तरह नासमझ है। जीवन का एक-एका क्षण बहुमूल्य है, पर लोग उसे वासना और तृष्णाओं के बदले कौड़ी मोल में गँवाते हैं। तुम्हारे पास जो एक वृक्ष बचा है, उसी का सदुपयोग कर लो तो कम नहीं। बहुत गँवाकर भी अंत में यदि कोई मनुष्य सँभल जाता है, तो वह भी बुद्धिमान ही माना जाता है।
आंसुओं का मनोभावों से सीधा रिश्ता है। कभी खुशी में तो कभी गम में आँसू बरबस आंखों से टपक ही पड़ते हैं। किंतु प्रचलित मान्यताओं के प्रभाव में हम आँसुओं को छलकने से प्रायः रोक देते हैं कि कही लोग हमें बचकाना, भावुक या दुर्बल न समझ बैठें। आँसुओं के रूप में भावों का यह दमन विशेषज्ञों के अनुसार स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। उनके अनुसार आँखों से आँसुओं का सहज एवं मुक्त बहाव शारीरिक एवं मानसिक हर दृष्टि से स्वास्थ्य के लिए अति उत्तम है।
मिनिसोटा विश्वविद्यालय के डॉ. विलियम फ्रे ने सबसे पहले यह सुझाव दिया था कि भावनात्मक दमन शरीर में विषाक्त तत्वों का उत्पादन करता है और रोना चिल्लाना इसके निष्कासन में सहायक होता है। आँसुओं को रोकने से दमित भाव कई रूपों में विकृत होकर अधिक गंभीर रूप लेने है। इसी संदर्भ में डॉ. राबर्ट प्लचिक अपनी पुस्तक ‘इमोशन ए साइको इवोल्यूसरी सिंथेसिस’ में लिखते हैं कि आँसुओं के साथ रोना या चिल्लाना मदद की पुकार का एक संकेत होता है, जो प्रायः सुना जाता है। इसका दमन अन्य आहत क्षणों में भय, क्रोध, या उद्विग्नता जैसे मनोभावों के दमन की ओर ले जाता है, जिससे अवसाद, कुँठा, द्वंद्व तनाव व अन्य दिमागी विकृतियाँ पैदा होती हैं। आँसुओं के जबरन रोकने से दिल व दिमाग पर बोझ पड़ने लगता है और शरीर में अल्सर एवं कोलाइटिस जैसी व्याधियों का कारण बन सकता है।
घोर विपत्ति या दुख के समय यदि किसी व्यक्ति की आँखों में आंसू न आएँ, तो चिकित्सकों के अनुसार व्यक्ति अस्वस्थ माना जाता है। यदि किसी महिला की आँखों में घोर शोक अथवा संकट की घड़ी में आँसू न आएँ, तो वह शुष्काग्नि रोग से ग्रसित होती है, जिसे असाध्य माना जाता है। अभी हाल में ही बच्चों में ‘फेमिलियल डिसटोनिया’ नामक एक वंशानुगत रोग की खोज हुई है। इसमें बच्चे रोते हैं तो उनके आँसू नहीं निकलते या बहुत कम निकलते हैं। इसे एक घातक रोग माना गया है। इसके कारण बच्चों को समुचित विकास नहीं हो पाता है और वे बड़े होने पर प्रायः आक्रामक वृत्ति के होते हैं।
आँखों से आँसू न आने के कारण कई तरह की विकृतियाँ आँखों में चुभन या जलन, दिखने में कठिनाई होना, जोड़ो में दर्द, श्वासनली में खुश्की, मुँह फटना, नाक का सूखा रहना, सरदर्द आदि हो सकते हैं। इसी कारण आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सकों का मत है कि आँसुओं के बहने से रुका हुआ जुकाम, गरदन की अकड़ आँख व सिर के दर्द से छुटकारा मिलता है।
नवीन अनुसंधान के अनुसार आँसू भी असली और नकली होते हैं। अलग-अलग स्थिति में निकलने वाले आँसुओं की संरचना अलग-अलग होती है। अमेरिकी नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. जेम्स के अनुसार धुँआ लगने, प्याज काटने या आँखों में कुछ गिर जाने से निकलने वाले आँसू नकली तथा दुख दर्द में बहने वाले आँसू असली होते
संत अरिष्टनेमि की भक्ति से प्रसन्न होकर इंद्र ने देवदूत को उन्हें सादर स्वर्ग में लाने के लिए भेजा। देवदूत संत के पास आकर बोला, “महाभाग! मुझे सुरपति इंद्र ने भेजा है। उनका आग्रह है कि आप मेरे साथ स्वर्ग चलें और वही निवास करें।”
‘स्वर्ग!” संत ने तो परमार्थ से आत्मकल्याण की बात सुनी थी, जब स्वर्ग बीच में आ टपका तो उनको कहना ही पड़ा, “भाई अपना स्वर्ग तो मैंने यही बना रखा है। मैं क्या करूंगा, उन सुविधाओं का? हो आनंद मुझे उन उपभोगों में मिलता, वही यहाँ धरती पर जन-जन की सेवा करने में मुझे प्राप्त होता है। इसके समक्ष तुम्हारा स्वर्ग मेरे लिए फीका है।”
संत अरिष्टनेमि की भक्ति से प्रसन्न होकर इंद्र ने देवदूत को उन्हें सादर स्वर्ग में लाने के लिए भेजा। देवदूत संत के पास आकर बोला, “महाभाग! मुझे सुरपति इंद्र ने भेजा है। उनका आग्रह है कि आप मेरे साथ स्वर्ग चलें और वही निवास करें।”
‘स्वर्ग!” संत ने तो परमार्थ से आत्मकल्याण की बात सुनी थी, जब स्वर्ग बीच में आ टपका तो उनको कहना ही पड़ा, “भाई अपना स्वर्ग तो मैंने यही बना रखा है। मैं क्या करूंगा, उन सुविधाओं का? हो आनंद मुझे उन उपभोगों में मिलता, वही यहाँ धरती पर जन-जन की सेवा करने में मुझे प्राप्त होता है। इसके समक्ष तुम्हारा स्वर्ग मेरे लिए फीका है।”
राजा उदावर्श्र बहुमूल्य रत्नराशि लेकर महर्षि कणाद के आश्रम में पहुँचे और उनसे ब्रह्मविधा का उपदेश करने की प्रार्थना की। महर्षि ने धन अस्वीकार कर उनसे एक वर्ष बाद पुनः आने पर उपदेश की संभावना व्यक्त की और कहा, इस बीच आप अंतर्मुखी होने की साधना करें। वृत्तियों से अपना मुँह मोड़ें।
राजा निराश लौटे, बुरा भी लगा और क्षुब्ध भी थे। मंत्री द्युतकीर्ति ने उनकी खिन्नता दूर करते हुए कहा, “राजन् भूखे को ही अन्न पचता है। जिज्ञासु को ही ज्ञान का लाभ मिलता है। ऋषि ने एक वर्ष की अवधि देकर आपकी जिज्ञासा को परखा है। अनाधिकारी में ज्ञान को पचाने की सामर्थ्य नहीं होती। मनोरंजन के लिए कुछ कहने में समय की बर्बादी समझकर ऋषि ने आपको लौटाया है। उसमें बुरा न मानें।”‘ ऋषि का अभिप्राय उदावर्श्र की समझ में आया। एक वर्ष ब्रह्मचर्य पालनकर अपनी वृत्तियों पर नियंत्रण कर आत्मिक ज्ञान के अधिकारी बनकर वे आश्रम पहुँचे, तो कणाद ने उन्हें गले से लगा लिया, बोले, “धैर्यवान, श्रद्धावान, जिज्ञासु ही ब्रह्मज्ञान के अधिकारी होते हैं। अब आप ब्रह्मविद्या का लाभ उठा सकेंगे।”
दिल्ली में सेठ हरभजन वणिकों में अग्रगण्य थे। उन्होंने दिल्ली में अपना एक नया आलीशान भवन बनवाना शुरू किया। इस भवन की चर्चा चारों ओर फैली। सेठ हरभजन शाह के प्रतिद्वंद्वी व्यापारी श्रीचंद को जब इस निर्माण का समाचार मिला, तो उन्होंने कटाक्ष किया,”पितरों की नगरी तो उजड़ रही है और सेठजी यष के लिए यहाँ संपत्ति पानी की तरह बहा रहे हैं।”
सेठ हरभजन को इस कथन का पता चला। उन्होंने हवेली का निर्माण रुकवा दिया और सारी धन-संपदा लेकर अग्रोहा को चल दिए। सेठजी ने अग्रोहा पहुँचकर चारों ओर खबर फैला दी, अग्रोहा में आकर बसने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सेठ हरभजन सभी आवश्यक साधन एवं सुविधाएँ प्रदान करेंगे। लखी नामक बनजारा भी अग्रोहा पहुँचा। उसने व्यापार करने के लिए सेठ हरभजन शाह से रुपया माँगा। सेठ ने पूछा,”किस जन्म में इस कर्ज को चुकाओगे?”
लखी सेठजी के इस प्रश्न पर चौंका और बोला,”मैं आपका आशय नहीं समझा, सेठजी।” “भाई इस जन्म में चुकाने का वायदा करते हो तो हिसाब करके रोकड़िया से रुपये ले लो और अगले जन्म में चुकाना हो तो ऊपर वाले खंड में चले जाओ और जितना चाहे ले लो। हम उस रुपये की कोई लिखा-पढ़ी नहीं करते।”
लखी ने सोचा, अगले जन्म में कौन किससे मिलेगा? नई मंडी हैं, व्यापार में घाटा हुआ, तो सेठजी को रुपये कैसे लौटाऊँगा? उसने कहा, मुझे तो अगले जन्म में चुकाना है।
सेठजी ने उसे हवेली के ऊपर वाले खंड पर भेज दिया। वहाँ से उसने एक लाख रुपया लिया और अपने डेरे पर आया। वह मन-ही-मन प्रफुल्लित हो रहा था कि सेठ भी कैसा मूर्ख एवं नासमझ है। अगले जन्म में उसे कौन चुकाएगा? वह तो यूँ ही अपना रुपया बर्बाद कर रहा है।
अपने डेरे के बाहर बैठा वह यही सब कुछ सोच रहा था कि सामने से एक संत निकले। महात्माजी को देखते ही वह उठ खड़ा हुआ और बोला, महाराज! आप आज मेरे यहाँ विश्राम कर मुझे सेवा का मौका प्रदान करें। संत लखी के इस निश्छल आग्रह को ठुकरा न सके, स्नेहपूर्वक बोले, क्या बात है लखी! आज कोई विशेष बात है क्या?
लखी ने अपना सारा वृत्तांत कह सुनाया और बोला, महाराज अब आप ही बताइए कि क्या अगले जन्म में मुझे और सेठ हरभजन शाह को मानव चोला ही मिलेगा? क्या यह भी निश्चित है कि हम दोनों एक ही जगह पैदा होंगे और हम दोनों की स्मृतियाँ भी अक्षुण्ण रहेंगी?
महात्मा जी ने उसे पुनर्जन्म का विधान बताया और कहा, कर्म अविनाशी है, ये कभी नष्ट नहीं होते। जन्म-जन्मान्तर तक अच्छी-बुरी परिस्थितियों के रूप में इन्हें भुगतना पड़ता है। अपनी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए उन्होंने कुछ पौराणिक प्रसंग बताते हुए कहा कि तुम्हें बैल बनकर यह कर्जा चुकाना पड़ेगा। महात्मा जी की बात सुनकर वह घबराया और रुपया लेकर वापस हरभजन शाह की हवेली पर पहुँचा।
वहाँ जाकर उसने सारा धन सेठ के समक्ष रखा और बोला,”सेठजी अगले जन्म में यहां रुपया चुकाने की क्षमता मेरे पास नहीं है। इसे आप वापस ले लें।”
सेठजी ने रुपया लेने से इन्कार कर दिया। लखी ने बहुत अनुनय-विनय की, लेकिन वे नहीं मानें। लखी वापस महात्माजी के पास आया और उन्हें सारी बात बताई।
महात्माजी ने उसे सुझाव दिया कि अग्रोहा में कोई सरोवर नहीं है। अतः तुम इन रुपयों से एक सरोवर का निर्माण शुरू कर दिया। सरोवर देखकर सारे नगरवासी प्रशंसा करने लगे। लखी ने वहाँ दो चौकीदार नियुक्त कर दिए और आदेश दिया कि इस सरोवर में किसी को जाने न दें।
नगरवासी लखी के पास गए। लखी ने कहा, सरोवर तो सेठ हरभजन शाह का है, वे ही उसको खुलवा सकते हैं। सेठजी तक बात पहुँची तो उन्होंने कहा, एक निताँत असत्य बात है। सरोवर मेरा नहीं है।
सेठजी तत्काल लखी के पास पहुँचे। लखी से कहा, लखी! यह सरोवर तुम्हारा है। तुम्हें इसे जनता के उपयोग के लिए खोल देना चाहिए। लखी बोला, सेठजी अपराध के लिए क्षमा चाहूँगा। आपसे अगले जनम में चुकाने के लिए एक लाख रुपया उधार लिया था। आपको रुपया वापस लौटाना चाहा, तो आपने लेने में असमर्थता दिखाई। उसी रकम से मैंने यह सरोवर बनवाया है। आपकी संपदा हैं, आप ही इसके स्वामी है। सेठजी बात समझ गए। उन्होंने उसी क्षण शेष रुपयों की भरपाई कर दी।
सेठजी ने उस सरोवर का नाम ‘लखी सरोवर’ रखा और कहा, जब तक यह सरोवर रहेगा, लखी के कायाकल्प की कहानी लोगों को प्रेरणा देती रहेगी कि कर्मफल विधान सृष्टि का एक अनिवार्य सच है।
जैव विविधता प्रकृति का अनुपम एवं अद्भुत शृंगार है। वृक्ष-वनस्पति एवं जीव-जन्तु प्रकृति में नूतन प्राण का संचार करते हैं। इन्हीं के कारण पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहता है। प्राकृतिक संतुलन ही प्रकृति को समृद्ध एवं विकसित कर सकता है। सृष्टि के सबसे बुद्धिमान प्राणी मानव पर ही इसके संरक्षण का उत्तरदायित्व था। परंतु दुर्भाग्य से वह रक्षक की जगह भक्षक सिद्ध हुआ। मानव ने अपने तथाकथित आधुनिक विकास की नींव जैव विविधता के विनाश पर रखी। शहरीकरण, औद्योगीकरण आदि मानव उद्यमों से जैव विविधता की विनाश-लीला चल पड़ी और आज संसार के समस्त पादप एवं जीव-जंतु तथा सभी जंगल व वन इससे प्रभावित हैं।
जैव विविधता का विनाशचक्र आधुनिकता के विकास एवं विस्तार के साथ ही प्रारंभ हो गया था। पहले यह दर अपेक्षाकृत बहुत कम थी, लेकिन देखते-देखते इस विनाश में भारी वृद्धि हुई हैं। सन् 16 से 17 के बीच प्रत्येक चार साल में एक प्रजाति विलुप्त हुई थी। इसके पश्चात् सन् 1975 तक मानवी निरंकुशता ने इसमें एक हजार से 1 हजार गुना वृद्धि की है। इस तरह सन् 22 तक इस विनाश की दर प्रति घंटे एक प्रजाति होने की संभावना है। रेड डाका बुक के अनुसार प्राणियों में 35 प्रजातियाँ तथा पादप में 22 प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में है। जैव विविधता का सर्वाधिक विनाश बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही हुआ है।
जैव विविधता का उद्गम एवं आश्रयस्थल वन एवं जंगल होते हैं। वन विनाश के साथ ही इनका अस्तित्व संकट में पड़ जाता है। पश्चिमी एंडियन तलहटी में बसा ‘सेंटेनेला’ जैव विविधता के लिए विश्वप्रसिद्ध घाटी के रूप में विख्यात है। सन् 1978 में जेंड्री और हडसन ने इस सुरम्य और मनोरम घाटी का दौरा किया था। एंडीज पर्वत के दोनों ओर 42 वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल में फैले इस वन में स्पर और सैड्लस वृक्षों की भरमार थी। हडसन के अनुसार यहाँ पर 1 पादप प्रजातियाँ मौजूद थीं। दुर्लभ प्रकार के आर्किड्स एवं इपीफाट्स यहाँ की विशेषता थी। 1983 तक इस वन के 16 प्रतिशत भाग को काटकर कृषि योग्य भूमि में परिवर्तित कर दिया गया। इससे जैव विविधता का व्यापक अवसान हुआ, जिसे ‘सेंटेनलीयन अवसान’ के रूप में जाना गया है। अब तो यहाँ की प्रायः समस्त प्रजातियाँ समाप्त हो गई हैं।
‘सैंटेनेलीयन अवसान’ किसी एक क्षेत्र विशेष का उदाहरण मात्र नहीं हैं, वरन् इसे समस्त विश्व में देखा जा रहा है। पैसीफिक द्वीप में पक्षियों के जीवाश्म का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों स्टार आल्सन, हेलेन जेमेन और डेविड स्टीडमेन के अनुसार यहाँ पर पिछले दस वर्षों में पक्षियों का अत्यधिक विनाश हुआ। इन दस सालों में हुए विनाश का अनुपात पिछले सैकड़ों सालों के बराबर है। इस द्वीप में मॉडर्न पोलीनेषीयन जाति के पूर्वज लापिता जाति के लोग निवास करते हैं। प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए ये लोग 3 वर्ष पूर्व फिजी, टोंगा व सोमाओ में आकर बस गए। बाद में इनका प्रवास हवाई द्वीप में हुआ। तोंगा में 1 वर्ष पूर्व जब ये आदिम जाति पहुँची, तो वहाँ पक्षियों की 25 प्रजातियाँ थीं, परंतु आज केवल आठ प्रजाति ही शेष हैं। न्यूजीलैंड और हैंडरसन के 19 कि.मी. के लंबे मोतियों के द्वीप में भी जैव विविधता का अस्तित्व संकट में हैं।
हवाई द्वीप में 1778 में कैप्टन कुक के प्रथम बार आगमन के समय यहाँ पर 5 प्रकार की प्रजातियाँ थीं दो शताब्दी बाद अब केवल 15 प्रजातियाँ बच पाई हैं। शेष 35 प्रकार के पक्षियों की पहचान जीवाश्म के द्वारा होती है। इसमें दुर्लभ किस्म के गिद्ध, बतख, उल्लू आदि शामिल हैं। मानव की बर्बरता एवं नृशंसता ने इन जीवों पर कहर ढाया है। सेटेंनेलीयन अवसान का परिदृश्य अफ्रीका एवं यूरोपियन देशों में भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उत्तरी अमेरिका में 12, वर्ष पूर्व पेलियो इंडियन शिकारी जाति के लोग रहते थे। इन्होंने वनों को काटना प्रारंभ किया। सभ्यता के विकास ने कृषि एवं शहरों की संख्या में वृद्धि की। इसके परिणामस्वरूप जैव विविधता में गंभीर संकट पैदा हो गया। यहाँ अब तक स्तनधारियों को 76 प्रतिशत जातियाँ लुप्त हो चुकी है। दक्षिण अमेरिका में यह संख्या 7 प्रतिशत को पार कर गई हैं। ये विभिन्न प्रजातियाँ प्लिस्टोसीन के अंतिम काल में बहुतायत में थीं। 12, साल पहले पेलियो इंडियन शिकारी प्रतिवर्ष औसतन 16 किसी, जंगल को काटते चले गए और वर्तमान समय में विद्यमान कोलंबियन, इम्पिरीयल तथा वूली नाम के शिकारी लोगों ने तमाम तरह के दुर्लभ पक्षियों का शिकार कर इन्हें समाप्तप्रायः कर दिया है।
‘द डायर्विसीटी आफ लाइफ’ के लेखक एडवर्ड ओविल्सन की मान्यता है कि जैव विविधता की क्षति प्राकृतिक कारणों की अपेक्षा मानवीय नृशंसता के ही कारण होती है। इन्होंने इसकी पुष्टि के लिए बहुत वर्षों पूर्व के काल को उद्धत किया है। उस समय अमेरिका में क्लेवीस जाति के लोग रहते थे। इन बर्बर जातियों ने शताब्दियों तक वन्य जीवों का सफाया किया है। इसके परिणामस्वरूप अधिकांश जीव समाप्त हो गए। पाल मार्टिन के अनुसार न्यूजीलैंड, मेडागास्कर और आस्ट्रेलिया में भी कानव के विकास के साथ-साथ जैव विविधता का विनाश चक्र प्रारंभ हो गया था।
न्यूजीलैंड में 1 एडी में मनुष्य का पदार्पण हुआ। इस दौरान वहाँ पर बड़ी संख्या में पक्षी थे। इसमें से 13 प्रजातियाँ भारी भरकम थीं। इसमें एक मोआ पक्षी का वजन 23 कि.ग्रा. था। लेकिन 18 ई. में अंग्रेजों ने इस द्वीप के ‘फलोराकाना’ को तहस-नहस कर डाला।
मेडार्गास्कर दुनिया का चौथा सबसे बड़ा द्वीप है। यहाँ पर मानव का विकास लगभग 5 एडी पूर्व हुआ। यह द्वीप भी जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध था। यहाँ पर दुर्लभ किस्म के पक्षी पाए जाते थे। इतिहास प्रसिद्ध ऐपियार्निस के मैक्सीमस नामक पक्षी इसी क्षेत्र का देन है। तीन मीटर ऊँचे इस पक्षी का अंडा फुटबाल जैसा होता था। लेकिन आज अंग्रेजी जीवाश्म ही मिलते हैं। इसी तरह छह से बारह तरह भीमकाय पक्षी आज विलुप्त हो गए।
आस्ट्रेलिया का पूर्वी तट न्यू कैलेडोनिया वन एवं वन्य जीवों के लिए विख्यात है। यहाँ पर 1575 पादप प्रजातियों में से 89 प्रतिशत स्थानीय हैं। फ्रेंच कालोनी के आगमन से यह वन लगभग समाप्तप्रायः हो गया है। अब तो 15 वर्ग कि.मी. यानि कि द्वीप का केवल 9 प्रतिशत भाग ही शेष है। दक्षिणी पश्चिमी आस्ट्रेलिया में 366 प्रकार के पादप पाए जाते हैं। इसमें से 78 प्रतिशत स्थानीय हैं। इसकी एक-चौथाई प्रजातियाँ आज खतरे में हैं। इस प्रकार विश्व के प्रमुख वनों में पाए जाने वाली जैव विविधता के सर्वेक्षण से स्पष्ट होता है कि ये सभी खतरे में हैं।
पश्चिमी इक्वेडोर भी कोलंबिया के समान समृद्ध संपन्न रहा है। एंडीज के पश्चिम में स्थित यह घाटी लगभग 1 पादप प्रजातियों से भरी-पूरी है। यह घाटी आर्किड एवं इपीफाइट्स से समृद्ध है। डेनियल जैनेन ने इसे ‘जीवित मृत घाटी’ की संज्ञा दी है। पश्चिमी अमेजन की घाटियाँ भी जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध हैं। यह दक्षिण कोलंबिया से बोलिविया तक 5 मीटर चौड़ी व 15 मीटर ऊँची तथा 5 कि.मी. तक फैली है। इसकी विशेषता कोलंबिया व इक्वेडोर के समान है। पिछले चालीस वर्षों में यहाँ की जनसंख्या 45 से तीन लाख तक पहुँच गई है। यदि इसी दर से जनसंख्या बढ़ती गई, तो 9 प्रतिशत जीव एवं वनस्पति अपने आप समाप्त हो जाएंगे।
ब्राजील का अटलाँटिक तट सुरम्य वन के रूप में जाना जाता है। सन् 1832 में चार्ल्स डार्विन इस वन को देखकर बहुत प्रभावित हुए थे। लाखों वर्ग कि.मी. में फैला यह अटलाँटिक वन सचमुच ही धरती का वरदान था। परंतु मानवी नृशंसता एवं बर्बरता ने इसके 9 प्रतिशत भाग को समाप्त कर दिया है। केवल 5 प्रतिशत भाग में जैव विविधता अपनी अंतिम सांसें गिन रही हैं। दक्षिण पश्चिमी आखोरी तट के वन का क्षेत्रफल 1,6, वर्ग कि.मी. में फैला है। यह वन प्रतिवर्ष 2, कि.मी. की दर से कटता रहा। अब केवल 16, वर्ग कि.मी. में ही सीमित रह गया है। प्राकृतिक वनस्पतियों का यह निवास अब अवसान के गर्त में हैं। दक्षिण अफ्रीका का जंगल 89 वर्ग कि.मी. में फैला था। इस वन में 86 पादप प्रजातियाँ पाई जाती थीं। इसमें 73 प्रतिशत स्थानीय हैं। आधुनिक मानव ने इसमें से 26 प्रजातियों को नष्ट कर डाला हैं एवं 15 को अस्तित्व संकट में झोंक दिया है। इसे दक्षिण अफ्रीका की प्राकृतिक विरासत माना जाता है।
श्रीलंका भी जैव विविधता का अच्छा उदाहरण हैं, परंतु यहाँ वन की कटाई प्रतिवर्ष 26 व्यक्ति प्रति कि.मी. की दर से बढ़ रही है। अतः केवल 1 प्रतिशत मूल व नहीं शेष हैं। मलेशिया में 85 प्रकार के पादप पाए जाते हैं। सन् 198 के बाद यह भी गंभीर संकट से गुजर रहा है। इसका आधा भाग अर्थात् 425 प्रजातियाँ खतरे में हैं। फिलीपींस के वनों में भी 71 वृक्ष-वनस्पतियों की प्रजातियाँ मिलती है। आज के आधुनिकीकरण ने वन विनाश किया है। अमेरिका में 2, पौधों में से 213 से 228 प्रजातियाँ लुप्त हो चुकी हैं। सन् 2 के अंत तक इसकी 68 किस्मों के और समाप्त हो जाने के आसार बढ़ गए हैं। जर्मनी, आस्ट्रिया एवं हालैंड में भी पिछले साठ वर्षों में 4 से 5 प्रतिशत फंजाई समाप्त हो चुके हैं। इसके लिए औद्योगिक क्षेत्रों से निकलते हुए धुएँ को जिम्मेदार माना गया है।
इसी तरह मैक्सिको में कठफोड़वा पक्षी का लगभग सफाया हो गया है। अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको में 133 प्रकार की मछलियाँ पाई जाती थीं। पिछले सौ वर्षों में 27 किस्म की (3 प्रतिशत) मछलियाँ विलुप्त हो गई हैं एवं 265 या 27 प्रतिशत मछलियाँ संकट से गुजर रही हैं। मीठे जल की 2 प्रतिशत मछलियाँ या तो समाप्त हो चुकी हैं या समाप्ति के कगार पर है।
यही नहीं पिछले दो हजार वर्षों में विश्व में कुल पक्षियों का पाँचवाँ भाग समाप्त हो गया है। 11 प्रजातियों में केवल 14 प्रजातियाँ ही शेष हैं। इसमें भी 11 प्रतिशत या 129 खतरे में हैं। सोलोमन द्वीप में 164 प्रकार के पक्षी हैं। सन् 1953 के पश्चात् इनमें से 12 का तो निशान तक नहीं है। मध्य अटलाँटिक अमेरिका में सन् 194 से 8 के बीच प्रवासी पक्षियों में 5 प्रतिशत की कमी आई हैं।
इस तरह देखा जाए, तो समस्त विश्व जैव विविधता के आसन्न संकट से जूझ रहा है। इसका एकमात्र कारण हैं, मानवीय बर्बरता, नृशंसता एवं स्वार्थ। जारेड डायमंड के अनुसार मानवी विकास के साथ जहाँ प्रकृति को समृद्ध करने का प्रयास किया जाना चाहिए था, वहीं मानव ने इसका विनाश करना प्रारंभ कर दिया। अब तो यही प्रचलन बन चुका है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का संदेश देने वाले अपने देश में वन एवं वन्य जीवों को अपनी संस्कृति का अंग माना जाता रहा है। परंतु इस भाव के तिरोहित होते ही यहाँ भी वही विनाश का परिदृश्य है। सादगी भरे जीवन का विस्तार एवं मानवी सहिष्णुता ही इस विनाश लीला को रोक सकता है। मनुष्य, प्रकृति एवं जीवों में संतुलन बना रहे, तभी हम सुखी रह सकते हैं।
ईश्वरचंद्र विद्यासागर तब किशोरावस्था में ही थे। उदारतापूर्वक बाँटते रहने की भावना का बचपन से ही उनके हृदय में स्थान था, पर उसे पोषण मिला वात्सल्यमयी माँ से कहा, “यह फीस के पैसे न होने कारण परीक्षा नहीं दे पा रहे हैं। क्या हम इनकी कुछ मदद कर सकते हैं।” माँ ने तुरंत अपना मंगलसूत्र निकाल कर दे दिया, उसे गिरवी रखकर फीस की व्यवस्था की गई। छात्र परीक्षा में बैठा, उत्तीर्ण हुआ। गिरवी रखा मंगलसूत्र लाकर उसने ईश्वरचंद्र की माँ के चरणों में रखा। ममता भरी डाँट लगाते हुए वे बोलीं, “बेटा! इसका नाम ही मंगलसूत्र है। इसलिये मंगल प्रयोजन में काम आ गया। तू इसे रख, बेचकर आगे की पढ़ाई की व्यवस्था बना।”
येषाँ न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणों न धर्मः। ते मृत्युलोके भुवि भारभूता मनुष्यरुपेण मृगाष्चरन्ति॥ −भर्तृहरि नीतिषतक
जिन्होंने तप नहीं किया, विद्या नहीं पढ़ी, दान नहीं दिया एवं ज्ञान, शील, गुण और धर्म का अभ्यास नहीं किया, वे मनुष्य मृत्युलोक में पृथ्वी के लिए भारभूत हैं और मनुष्य के रूप में विचरते हुए भी साक्षात् पशु हैं।
यमराज द्वारा नचिकेता की निष्ठा पर प्रसन्न होकर तीन वर दिए गए। उन्होंने मृत्यु भय से मुक्त होने के स्थान पर पिता के क्रोध की शांति का पहला वर माँगा। परलोक के लिए स्वर्ग के साधन रूप अग्नि विज्ञान का दूसरा वर प्राप्त करके उसने तीसरा वर आत्मा के यथार्थ स्वरूप और उसकी प्राप्ति का उपाय जानना चाहा। यमराज द्वारा वचनबद्ध होते हुए भी तीसरे वर का उसे पात्र न मानने के कारण आत्मतत्व तथा आत्मा के मरणोपराँत अस्तित्व संबंधी अनुभूत ज्ञान के अतिरिक्त उसने कुछ न माँगा।
चयन की स्वतंत्रता सामने होते हुए भी नचिकेता ने सुखोपभोग, मुक्ति, पुनरुज्जीवन जैसे लाभ एक ओर होते हुए भी ब्रह्मविद्या व आत्मविद्या के ज्ञान को जानने की प्राथमिकता दी। पंचाग्नि विद्या को आत्मसात् कर साधना पथ का मार्गदर्शन मानव मात्र के लिए कर सकने में वे सफल हुए। ऐसे सौभाग्यशाली बिरले ही होते हैं।
स्मरण शक्ति की कमी की शिकायत वृद्ध ही नहीं, युवा व्यक्ति भी करते पाए जाते हैं। इस कमी से वे परीक्षा में उत्तीर्ण होने से लेकर व्यावसायिक तथा दैनिक कामकाजों में बड़ी अड़चन अनुभव करते हैं। बहुधा इसे कोई रोग मान लिया जाता है और उसके निवारण के लिए तरह-तरह के औषधि उपचारों तथा पुष्टाई सेवन का सिलसिला चलता है।
उपचार करने से पूर्व विस्मृति का कारण जानने की आवश्यकता है, साथ ही यह समझना भी उपयोगी है कि मस्तिष्क में स्मृति को संग्रह करने वाली, सुरक्षित रखने वाली संरचना कैसी है? मोटर की मशीन और उसके चलाने की विधि ठीक तरह समझ ली जाए, तो उसके संचालन में जो व्यवधान आते हैं, उनमें से अधिकांश का निवारण सहज ही हो जाता है।
स्मरण शक्ति प्रायः अपने स्थान पर यथावत् रहती है। बचपन के प्रारंभिक और वृद्धावस्था के अंतिम दिनों को छोड़कर शेष प्रौढ़-परिपक्वावस्था में स्मृति का स्तर प्रायः समान ही रहता है। स्मरण रखने की प्रक्रिया में अंतर पड़ जाने से हमें उसकी मात्रा घट-बढ़ जाने का भ्रम होने लगता है। यदि स्मरण रखने की पद्धति का ज्ञान हो और स्मरण तंत्र की संरचना ध्यान में रखते हुए तदनुरूप घटनाओं को स्मरण रखने की विधि-व्यवस्था बना ली जाए, तो फिर स्मृति संबंधी उतनी शिकायत न रहे जैसी आमतौर से रहती हैं। यों हर मनुष्य में दूसरों की अपेक्षा कुछ-न-कुछ तो न्यूनाधिकता हर बात में रहती ही है।
समझा जाता है कि बचपन में स्मरण शक्ति तीव्र होती है और पीछे आयु बढ़ने के साथ-साथ मंद होती जाती हैं, पर वस्तुतः बात ऐसी है नहीं। छोटी आयु में मस्तिष्क के ऊपर बोझ कम रहता है और जो सोचना, याद रखना हैं, वह आसानी से निपट जाता है, किंतु बड़े होने के साथ-साथ कार्यक्षेत्र बढ़ता जाता है, साथ ही स्मरण रखने, निष्कर्ष निकालने, निर्णय करने का भार भी। ऐसी दशा में बहुत काम करते रहने पर भी कुछ में अधूरापन रह जाना अप्रत्याशित नहीं। जो कुछ सही रीति से पूरा हो गया, उसकी ओर तो ध्यान दिया नहीं गया, पर जो कमी रह गई, उसी को मस्तिष्क की कमजोरी या स्मरण शक्ति की कमी मान लिया गया। ऐसे ही प्रसंगों को लेकर दिमागी शक्ति घट जाने की बात सोच ली जाती है और चिंता होने लगती हैं, जबकि वस्तुतः वैसा कुछ होता नहीं।
विस्मृति का बहुत बड़ा कारण हैं, उपेक्षा। जिस वस्तु, बात या संदर्भ में अन्यमनस्कता होती हैं, वहाँ उथला ध्यान दिया जाता है और स्मृति की परतों पर अंकन बहुत ही हलका-धुँधला हो पाता है। उसके मिटने में देर नहीं लगती। इसके विपरीत जिन प्रसंगों में अपनी दिलचस्पी होती हैं, उन्हें ध्यानपूर्वक सुना, देखा और समझा जाता है, फलतः उनके मानस चित्र अधिक स्पष्ट बनते हैं और स्मृतिपटल पर उसका अंकन इतना गहरा हो जाता है कि आवश्यकतानुसार उसे फिर पूर्ववत् देखा जा सकें। यों समय बीतने के साथ-साथ सभी स्मृतियाँ धुँधली पड़ती जाती हैं, फिर भी जिन्हें मनोयोगपूर्वक अपनाया गया हैं, उसकी रेखाएं अमिट न सही, चिरस्थायी तो बनी ही रहती हैं।
विद्यार्थियों को पाठ याद न होने की अक्सर शिकायत रहती हैं, पर वे ही किसी देखी फिल्म का पूरा कथानक भलीप्रकार सुना देते हैं और साथ ही उसके गीत भी याद रखते हैं। दादी अपनी पोती का नाम बार-बार भूल जाती हैं, पर अपने पति या ससुर की श्राद्ध तिथि नहीं भूलती। व्रत-उपवास की तिथियाँ भी विस्मरण नहीं होती। सामान्य प्रसंगों में तारीखें याद नहीं रहतीं, पर वेतन पाने की तारीखें भूलने में कदाचित् ही किसी से कभी भूल होती होगी। भुलक्कड़पन वस्तुतः कोई रोग नहीं, वरन् आदत हैं, जो दिलचस्पी की कमी वाले क्षेत्रों को ही प्रभावित करती हैं।
भगवान् ने स्मृति की ही तरह विस्मृति को भी एक वरदान की तरह सृजा है। उपयोगी बाते याद रखें और आवश्यकता के समय सहायक बनें, यह उत्तम है। इसी प्रकार यह भी ठीक है कि द्वेष-दुर्भाव और शोक-संताप की कटु स्मृतियाँ धुंधली होते-होते विस्मरण स्तर तक जा पहुँचें। क्रोध, हानि, वियोग आदि की स्थिति में मन जितना उद्विग्न होता है, यदि उतना ही संताप बना रहे, तो जीवन कठिन हो जाए। मस्तिष्क में करोड़ ग्रंथों के समा सकने जितना स्मृति क्षेत्र हैं, पर क्षण-क्षण में जो विविध जानकारियाँ मस्तिष्क को मिलती रहती हैं, उनका विस्तार तो स्मृति क्षेत्र की तुलना में बहुत अधिक है। ऐसी दशा में पुरानों को हटाकर ही नयों को जगह मिल सकती है। रेलगाड़ी के मुसाफिरखानों में बैठे यात्री यदि वहाँ जम बैठें, तो नए आगंतुकों को जगह कहाँ मिलेगी?
स्मृति और मस्तिष्क का तारतम्य समझने के लिए हमें यह भी जानना चाहिए कि ज्ञानेंद्रिय की सहायता से मस्तिष्क को अनेकों प्रकार की जानकारियाँ हर घड़ी प्राप्त होती रहती हैं। इसमें अधिकांश वे होती हैं, जो स्थिति का परिचय देकर अपना काम समाप्त कर देती हैं। उस जानकारी का यदि कुछ सीधा प्रभाव अपने ऊपर नहीं पड़ता है और उसकी कुछ प्रतिक्रिया नहीं होती हैं, तो वे विस्मृति की, रद्दी की टोकरी में जा पड़ती हैं और सदा के लिए समाप्त हो जाती हैं। कुछ जानकारियाँ ऐसी हैं, जिनसे निपटना हैं, तो शरीर के अन्य कल-पुर्जों को वैसा आदेश मिलता है और तदानुसार हलचल होती हैं, जैसे पैर में मच्छर काटे, तो मस्तिष्क उसके निवारण के लिए हाथ को आज्ञा देता है और वह तत्काल उस स्थान पर पहुँचकर मच्छर पर आक्रमण करता है। ऐसी जानकारियाँ जली हुई दियासलाई की तरह अपना सामयिक प्रयोजन पूरा करके विस्मृति के गर्त में चली जाती हैं। संग्रह तो थोड़ी-सी ही की जा सकती हैं। मस्तिष्क में इतनी जगह नहीं है कि हर घड़ी इंद्रियों की सहायता से जो ज्ञान प्राप्त होता है, उनमें से सभी को अर्जित किया जा सके, तो भी जो महत्वपूर्ण हैं, उसे सुरक्षित रखे जाने की इस छोटे किंतु सुविस्तृत भंडार में पर्याप्त जगह हैं।
मस्तिष्क विज्ञानी स्मरण शक्ति का आधार उस विद्युत् धारा को मानते हैं, जो संवादवाहिनी तंत्रिकाओं में गतिशील रहती हैं। न केवल स्मृतियों का अंकन और पुनर्जागरण, वरन् मस्तिष्कीय संरचना को अपना काम ठीक तरह करने योग्य बनाए रहने में भी इसी विद्युत् धारा की प्रधान भूमिका रहती है। विज्ञान के छात्र आवर्तनशील विद्युत् रिवर्वरेटिंग सर्किट की क्रिया-प्रक्रिया से परिचित होते हैं। नाड़ियों में रक्त परिभ्रमण की तरह कुछ विद्युत् धारा भी अपने कार्यक्षेत्र में गतिशील रहती हैं। इस गतिचक्र में कितना विद्युत् आवेश और परिभ्रमण की तरह कुछ विद्युत् धारा भी अपने कार्यक्षेत्र में गतिशील रहती हैं। इस गतिचक्र में कितना विद्युत् आवेश और परिभ्रमण में कितनी गतिशीलता है, इन दोनों बातों पर यह निर्भर हैं कि स्मृतियों का स्थापन कितने समय तक और किस सीमा तक बना रहेगा। यह विद्युत् स्वसंचालित और स्वनिर्मित होती है। मस्तिष्कीय तंत्रिकाओं की संरचना में सोडियम और पोटेशियम के आयन काम करते हैं। उनमें उथल-पुथल शरीर के अन्य अवयवों की भाँति होती रहती हैं। उसी सहज हलचल से मस्तिष्कीय विद्युत् धारा उत्पन्न होती और अपना काम करती है। यह झीनी तो होती जाती हैं, पर पूर्णतया अंत उसका तब तक नहीं होता, जब तक कि जीवसत्ता का ही पूरी तरह अंत न हो जाए।
मस्तिष्क या शारीरिक अवयव माना जाता रहा हैं, पर जीव चेतना का केंद्र संस्थान यही है। जड़ और चेतन का संगम इसी को माना जाता है। शरीर न रहने पर भी मस्तिष्क का सार तत्व जीव चेतना के साथ लिपटा रहता है। मरणोत्तर काल में भी उसकी सत्ता बनी रहती है। ऐसा कहा जाता है कि भूत-प्रेतों को परित्यक्त शरीर के साथ संबंधित घटनाएँ स्मरण बनी रहती है और वे उस भूत चिंतन के आधार पर ही अपना समय गुजारते हैं। वर्तमान और भविष्य के लिए उपर्युक्त साधन उनके पास उस स्थिति में नहीं होते, अस्तु भूतकालीन स्मृतियों का दबाव ही उन पर छाया रहता है। संभवतः मृतात्माओं का नामकरण ‘भूत’ इसी आधार पर किया गया हो। पुनर्जन्म में कइयों को कितनी ही घटनाएँ पिछले जीवन की याद रहती हैं और ऐसे कथन बहुत बार आश्चर्यजनक रीति से सत्य पाए जाते हैं। इतना तो हर किसी के साथ होता है कि भूतकाल के अनुभव एवं संस्कार जन्म-जन्माँतरों तक चले जाते हैं। जन्मजात विशेषताओं को ऐसा परिचय भी बहुत परिस्थितियों के साथ कुछ भी तालमेल नहीं बैठता। पूर्व जन्मों की संग्रहीत पूँजी मस्तिष्क के बही-खाते में जमा रहती हैं और अपने अस्तित्व के प्रभाव का परिचय नए जन्म में भी देती रहती हैं।
ईंधन न मिलने पर चूल्हा ठंडा पड़ जाता है। मस्तिष्कीय कोशिकाओं को भी अपना काम सही रीति से करते रहने के लिए ऑक्सीजन का ईंधन चाहिए। बचपन में नई मशीन इस ईंधन को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध और वितरित करती है। तब मस्तिष्क को भी यह खुराक पर्याप्त मात्रा में मिलती है और बच्चों की स्मरण शक्ति तीव्र रहती है। वे अपने पाठ आसानी से याद कर लेते हैं। जैसे-जैसे आयु बढ़ती हैं, वैसे-वैसे कोमलता घटती है और कठोरता बढ़ती हैं, फलतः ऑक्सीजन का उत्पादन-वितरण घटता जाता है। अवयवों में जो कोमलता बचपन अथवा किशोरावस्था में होती हैं, वह आयु बढ़ने के साथ घटती जाती हैं। ऑक्सीजन प्रवाह के मस्तिष्कीय कोषाओं तक पूरी तरह पहुँचने में भी व्यवधान उत्पन्न होता है, फलतः उम्र के साथ-साथ स्मरण शक्ति घटती चली जाती है। बुद्धिमत्ता समस्त स्मृतियों के मंथन को निष्कर्ष हैं। उसकी मात्रा तो बढ़ती हैं, पर स्मरण शक्ति के संदर्भ में बच्चों की स्थिति की अपेक्षा बड़ी आयुष्य वाले कमजोर ही पड़ते हैं। वृद्धावस्था में रक्त-वाहिनियाँ कठोर पड़ जाती हैं और रक्त-संचार उतनी अच्छी तरह नहीं हो पाता, फलतः मस्तिष्कीय कोशाएं पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन न मिलने के कारण दुर्बल होती जाती हैं। अतः बूढ़े लोगों की स्मृति दिन-दिन क्षीण होती जाती है। प्रायः वे अपने दैनिक उपयोग की वस्तुएँ तक जहाँ-तहाँ भूलने लगते हैं। परिचितों के नाम तक याद नहीं रहते।
इतने पर भी देखा गया हैं कि बूढ़ों को भी अपने बचपन या युवावस्था की वे स्मृतियाँ बिल्कुल तरोताजा रहती हैं, जिन्हें वे महत्वपूर्ण समझते रहते हैं। देखा गया है कि वे अपनी इन स्मृतियों को आए दिन किसी-न-किसी को सुनाते रहते हैं। उन्हें वह सब कुछ इस प्रकार याद रहता है, मानो अभी कल-परसों की बात हो। ऐसा इसलिए भी होता है कि नई स्मृतियाँ समुचित ऑक्सीजन के अभाव में न तो मस्तिष्कीय कोषाओं पर पूरी तरह अंकित हो पाती हैं और न उनमें स्थायित्व होता है। ऐसी दशा में नई स्मृतियों की भीड़-भाड़ रहती नहीं और वे पुरानी अनुभूतियाँ निर्द्वंद्व होकर पूरे मस्तिष्क पर छाई रहती हैं।
मस्तिष्कीय गतिविधियों की प्रत्यक्ष जानकारी को देखते हुए उसे किसी अलौकिक कलाकार की अद्भुत संरचना कहा जा सकता है। वैसा कुछ बना सकने की बात सोचने का साहस ही कौन करेगा। अभी तो उसकी गतिविधियों को समझ सकने में ही बुद्धि हतप्रभ रह जाती है। अनुमान है कि विदित मस्तिष्कीय गतिविधियाँ बहुत स्वल्प हैं। समूची मानसिक क्षमताओं का प्रायः सात प्रतिशत ही क्रियाशील पाया जाता है। शेष तो अभी अविदित-अर्द्धमूर्च्छित स्थिति में ही सीलबंद स्टोर की तरह सुरक्षित पड़ी हैं। जो क्रियाशील हैं, वे उस प्रयोजन में काम आती हैं, जिसमें सामान्य जीवन की निर्वाह व्यवस्था का संचालन होता है। निर्वाह प्रयोजन तो समग्र जीव सत्ता का एक छोटा-सा अंश हैं। इसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ सोचने और करने को बच जाता है। कभी किसी को उस अविज्ञात को जानने की, निष्क्रिय को क्रियाशील बनाने की और प्रसुप्त को जाग्रत् करने की आवश्यकता पड़ें, तो उसे इन सीलबंद स्टोरों को खोलना पड़ेगा, जो अपने भीतर बढ़ी-चढ़ी दिव्य क्षमताएँ छिपाए हुए हैं। उच्च अध्यात्म प्रयोजनों के लिए इन्हीं कोष्ठकों को खोलने और उनसे उपलब्ध क्षमता को असाधारण कार्यों में लगाने का प्रयत्न योगी तपस्वियों द्वारा किया जाता है।
स्मृति-विस्मृति की चर्चा करने की अपेक्षा जागृति और सुषुप्ति के आधार पर विवेचन करना अधिक युक्तियुक्त है। असावधानी, उपेक्षा और अनुत्साह की मनः स्थिति रहेगी, तो विस्मृति की शिकायत बनी ही रहेगी। जहाँ ऐसी कठिनाई अनुभव होती हो, वहाँ मानसिक पोषण देने वाले आहार का परामर्श देना कोई विसंगति नहीं हैं, पर अधिक उपयुक्त यह है कि चिंतन तंत्र पर छाई हुई शिथिलता को दूर किया जाए। इसके लिए ध्यान-धारणा के सभी उपचार न्यूनाधिक मात्रा में लाभदायक ही सिद्ध होते हैं। उपासना में ध्यान-धारणा पर जोर देने के अनेक शारीरिक-अध्यात्मिक लाभों के अतिरिक्त एक अतिरिक्त लाभ यह भी हैं कि उसे करते रहने पर विस्मृति की शिकायत पनपने नहीं पाती।
विज्ञान बाहर की प्रगति हैं और ज्ञान अंतः की अनुभूति
एक व्यक्ति को महात्मा जी के आशीर्वाद से सात दिन के लिए पारस पत्थर तो मिल गया, पर अब वह व्यक्ति सस्ते लोहे की तलाश में शहर-शहर भटकने लगा। एक जगह नहीं मिला, तो दूसरी जगह दौड़ा। इसी दौड़-धूप में सारा समय गुजर गया और वह रत्तीभर भी सोना न बना सका। सातवें दिन महात्मा ने मणि वापस ले ली।
यह जीवन भी पारसमणि हैं। जो इसे आत्मिक संपदा में बदलना चाहता है वह अवसर नहीं गंवाता। आकर्षणों में भटककर समय नष्ट नहीं करता। आत्मावलंबनजन्य विभूतियाँ उसे जो संतोष-परितृप्ति देती हैं, उनकी तुलना में उसे सारा वैभव अर्थहीन नजर आता है।
प्राचीनकाल में आरोग्य संवर्द्धन एवं रोग निवारण के लिए ‘भैषज्ञ’ यज्ञ किए जाते थे और लोग उनसे लाभ प्राप्त करते थे। ये यज्ञ ऋतुओं के संधिकाल में होते थे, क्योंकि इसी समय व्यापक स्तर पर व्याधियों का प्रकोप होता था। इन यज्ञों की विशेषता होती हैं कि इनमें होमी गई हवन सामग्री वायुभूत होकर न केवल शारीरिक व्याधियाँ दूर करती हैं, वरन् इसके प्रभाव से व्यक्ति मानसिक बीमारियों एवं मनोविकृतियों से भी छुटकारा पा लेता है। कषाय-कल्मष कटते हैं और व्यक्तियों में सत्प्रवृत्तियों को भर देने वाले उभार उमगते हैं। समग्र व्यक्तित्व-विकास में इससे अपूर्व सहायता मिलती है।
इसे विडंबना ही कहना चाहिए कि आज की समस्त चिकित्सापद्धतियाँ मात्र शारीरिक रोगों तक ही अपने आपको सीमित किए हुए हैं, जबकि मस्तिष्कीय उपचार की आवश्यकता शारीरोपचार से भी अधिक है। इन दिनों मनोविकारों, मानसिक रोगों की भरमार शारीरिक व्याधियों से कहीं अधिक है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आज नब्बे प्रतिशत व्यक्तियों को तनाव, दबाव, अवसाद, अनिद्रा, चिंता, आवेश, क्रोध, उत्तेजना, मिरगी, उन्माद, सनक, निराशा, उदासीनता, आशंका, अविश्वास, भय, असंतुलन आदि में से किसी-न-किसी मनोव्याधि से ग्रस्त देखा जाता है। इन विकारों से व्यक्तित्व टूट जाता है। संतुलित एवं विवेकशील व्यक्तित्व विरले ही दिखाई देते हैं।
व्यक्तित्व संबंधी इन विकृतियों का निदान यज्ञ चिकित्सा में सन्निहित है। यहाँ तक कि यदि कोई व्यक्ति उन्मत्त या पागल हो जाए और प्रलाप करने लगे, तो उस स्थिति में भी वह यज्ञ चिकित्सा से स्वस्थ हो सकता है। यज्ञाग्नि में हवन की हुई औषधियों की सुवासित ऊर्जा उसके विकृत मस्तिष्क और उत्तेजित मन को ठीक कर सकती है। इसका प्रमुख कारण यह है कि यज्ञ में सुगंधित औषधियाँ होमी जाती हैं, उससे जो ऊर्जा निस्सृत होती हैं, वह हलकी होने के कारण ऊपर को उठती है। जब यह नासिका द्वारा अंदर खींची जाती हैं, तो सर्वप्रथम मस्तिष्क, तदुपराँत फेफड़ों में फिर सारे शरीर में फैलती है। उसके साथ औषधियों के जो अत्यंत उपयोगी सुगंधित सूक्ष्म अंश होते हैं, वे मस्तिष्क के उन क्षेत्रों तक जा पहुँचते हैं, जहाँ अन्य उपायों से उस संस्थान का स्पर्श तक नहीं किया जा सकता। अचेतन की पवन परतों तक यज्ञीय ऊर्जा की पहुँच होती हैं और वहाँ जड़ जमाए हुए मनोविकारों, बीमारियों को निकाल बाहर करने में सफलता मिलती है।
यज्ञ चिकित्सा को घरेलू उपचार भी कह सकते हैं। इससे शारीरिक एवं मानसिक आधि-व्याधियों का निराकरण होता तथा दोनों ही क्षेत्रों की क्षमता में अभिवृद्धि होती है। इस संदर्भ में ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान द्वारा जो विविध प्रयोग-परीक्षण किए गए हैं, उनमें शोधकर्मियों को आशातीत सफलता मिली है। इस शृंखला में मानसिक रोगों, मनोविकृतियों पर यज्ञोपचार के जो विशेष परीक्षण हुए हैं, उसके सार-निष्कर्ष यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
चंद्रमा का मन से सीधा संबंध है। अतः मानसिक रोगों, मनोविकृतियों, मन में संचित विषों आदि उष्णताओं का शमन चंद्र गायत्री से होता है। अंतरात्मा की शांति, चित्त की एकाग्रता, पारिवारिक क्लेश, द्वेष, वैमनस्य, मानसिक उत्तेजना, क्रोध, अंतर्कलह आदि को शांत करके शीतल मधुर संबंध उत्पन्न करने के लिए भी चंद्र गायत्री विशेष लाभप्रद होती है।
चंद्र गायत्री का मंत्र इस प्रकार है-
ॐ भूर्भुवः स्वः क्षीर पुत्राय विऽहे, अमृत तत्वाय धीमहि तन्नः चंद्रः प्रचोदयात्।
इस मंत्र द्वारा रोगानुसार विशेष प्रकार से तैयार की गई हवन सामग्री से नित्यप्रति कम-से-कम चौबीस बार हवन करने एवं संबंधित सामग्री के सूक्ष्म कपड़छन पाउडर को सुबह-शाम लेते रहने से शीघ्र ही मनोविकृतियों से छुटकारा मिल जाता है। हवन करने वाले का चित्त स्थिर और शांत हो जाता है। मानसिक दाह, उद्वेग, तनाव आदि विकृतियाँ उसके पास फटकती तक नहीं।
सर्वप्रथम मस्तिष्क रोग की सर्वमान्य विशेष हवन सामग्री यहाँ दी जा रही है। इसके साथ ही पूर्व लिखित हवन सामग्री (नं 1) को भी बराबर मात्रा में मिलाकर तब हवन करना चाहिए। विस्तृत विवरण अखण्ड ज्योति के फरवरी अंक 12 में पृष्ठ सं. 42-43 पर देखा जा सकता है। (नं. 1) हवन सामग्री में जो वनौषधियाँ बराबर मात्रा में मिलाई जाती हैं, वे हैं, अगर, तगर, देवदार, चंदन, लाल चंदन, जायफल, लौंग, गुग्गल, चिरायता, गिलोय एवं असगंध।
(1) मस्तिष्क रोगों की विशेष हवन सामग्री-
(1) देशी बेर का गूदा (पल्प) (2) मौलश्री की छाल (3) पीपल की कोपलें (4) इमली के बीजों की गिरी (5) काकजंघा (6) बरगद के फल (7) खरैटी (बीजबंद) बीज (8) गिलोय (9) गोरखमुँडी (10) शंखपुष्पी (11) मालकंगनी (ज्योतिष्मती) (12) ब्राह्मी (13) मीठी बच (14) षतावर (15) जटामाँसी, (16) सर्पगंधा।
इन सभी सोलह चीजों के जौकुट पाउडर को हवन सामग्री के रूप में प्रयुक्त करने के साथ ही सभी चीजों को मिलाकर सूक्ष्मीकृत चूर्ण को एक चम्मच सुबह एवं एक चम्मच शाम को घी-शक्कर या जल के साथ रोगी व्यक्ति को नित्य खिलाते रहना चाहिए।
मस्तिष्कीय रोगों में समिधाओं का भी अपना विशेष महत्व है। अतः जहाँ तक संभव हो क्षीर एवं सुगंधित वृक्ष अर्थात् वट, पीपल, गूलर, बेल, चंदन, देवदार, खैर, शमी का प्रयोग करना चाहिए। चंद्रमा की समिधा-पलाश है। यदि यह मिल सके, तो सर्वश्रेष्ठ समझना चाहिए। उद्विग्न-उत्तेजित मन-मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करने में उससे पर्याप्त सहायता मिलती है।
(2) तनाव ‘स्ट्रेस’ एवं हाइपर टेन्शन की विशेष हवन सामग्री-
तनाव से छुटकारा पाने के लिए निम्नलिखित अनुपात में औषधियों की जौकुट सामग्री मिलाई जाती है-
(1) ब्राह्मी-1 ग्राम, (2) शंखपुष्पी-1 ग्राम, (3) शतावर-1 ग्राम, (4) सर्पगंधा-1 ग्राम, (5) गोरखमुँडी-1 ग्राम, (6) मालकाँगनी-1 ग्राम, (7) मौलश्री छाल-1 ग्राम, (8) गिलोय-1 ग्राम, (9) सुगंध कोकिला-1 ग्राम, (1) नागरमोथा-2 ग्राम, (11) घुड़बच-5 ग्राम, (12) मीठी बच-5 ग्राम, (13) तिल-1 ग्राम, (14) जौ-1 ग्राम, (15) चावल-1 ग्राम, (16) घी 1 ग्राम, (17) खंडसारी गुड़-5 ग्राम, (18) जलकुँभी (पिस्टिया)-1 ग्राम।
इस प्रकार से तैयार की गई विशेष हवन सामग्री से चंद्र गायत्री मंत्र के साथ हवन करने से तनाव एवं उससे उत्पन्न अनेकों बीमारियाँ तथा हाइपरटेंशन से प्रयोक्ता को शीघ्र लाभ मिलता है। यहाँ इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि उक्त सामग्री में क्रमाँक (1) अर्थात् ब्राह्मी से लेकर क्रमाँक (12) अर्थात् मीठी बच तक की औषधियों का महीन बारीक पिसा एवं कपड़े द्वारा छना हुआ चूर्ण सम्मिश्रित रूप से एक-एक चम्मच सुबह एवं शाम को जल या दूध के साथ रोगी को सेवन कराते रहना चाहिए।
(3) दबाव-अवसाद-’डिप्रेशन’ आदि मानसिक रोगों की विशेष हवन सामग्री-
(1) अकरकरा, (2) मालकाँगनी, (ज्योतिष्मती) (3) विमूर (4) मीठी बच, (5) घुड़बच, (6) जटामाँसी, (7) नागरमोथा, (8) गिलोय, (9) तेजपत्र, (1) सुगंध कोकिला, (11) जौ, तिल, चावल, घी, खंडसारी गुड़।
उक्त औषधियों से तैयार हवन सामग्री से हवन करने के साथ ही (नं 1) से (नं 1) तक की औषधियों का बारीक पिसा हुआ चूर्ण रोगी को सुबह शाम एक-एक चम्मच जल या दूध के साथ नित्य खिलाते रहने से शीघ्र लाभ मिलता है। इसके साथ ही डिप्रेशन या दबाव से पीड़ित व्यक्ति को शीघ्र स्वस्थ एवं सामान्य स्थिति में लाने के लिए यह आवश्यक है कि उसके मन के अनुकूल बातें की जाएँ।
(4) मिर्गी-अपस्मार या ‘फिट्स’ की विशेष हवन सामग्री-
मिर्गी एवं इससे संबंधित रोगों पर निम्नलिखित औषधियों से बनाई गई हवन सामग्री से यजन करने पर यह रोग समूल नष्ट हो जाता है।
(1) छोटी इलायची, (2) अपामार्ग के बीज, (3) अश्वगंधा, (4) नागरमोथा, (5) गुरुचि, (6) जटामाँसी, (7) ब्राह्मी, (8) शंखपुष्पी, (9) चंपक, (10) मुलहठी, (11) गुलाब के फूल, (12) कनेर के फूल, (13) कमलगट्टा, (14) गुग्गल, (15) धूप, (16) कूठ, (17) कुलंजन, (18) दारुहल्दी, (19) साठी, (2) मुष्ता, (12) छाड़-छड़ीला, (22) गोक्षरु, (23) सरसों, (24) राई, (25) कालीमिर्च, (26) मीठी बच।
हवन करने के साथ ही इन औषधियों के बारीक चूर्ण को एक-एक चम्मच सुबह-शाम जल या दूध के साथ रोगी को नित्यप्रति कम-से-कम 4 दिन तक खिलाते रहना चाहिए। ‘टेन्शन’ एवं ‘डिप्रेशन’ से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए भी इसे प्रयुक्त किया जा सकता है। अगर सब औषधियों के बारीक चूर्ण को एक-एक चम्मच सुबह-शाम जल या दूध के साथ रोगी को नित्यप्रति कम-से-कम 4 दिन तक खिलाते रहना चाहिए। ‘टेन्शन’ एवं ‘डिप्रेशन’ से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए भी इसे प्रयुक्त किया जा सकता है। अगर सब औषधियाँ उपलब्ध न हो सकें, तो (नं 12) तक की औषधियां की हवन सामग्री बनाकर हवन करने एवं खाने से भी रोगी रोगमुक्त हो जाता है।
(5) अनिद्रा रोग की विशेष हवन सामग्री-
(1) काकजंघा, (2) पीपलामूल, (3) भारंगी, (4) जटामाँसी, (5) जलकुँभी (पिस्टिया) (6) ब्राह्मी, (7) शंखपुष्पी, (8) सर्पगंधा, (9) सुगंध कोकिला, (1) ज्योतिष्मती।
इस हवन सामग्री का उपयोग यदि क्षीरवृक्ष अर्थात् गूलर, पाकर, पलाश, वट-पीपल आदि की समिधाओं के साथ किया जाए, तो उन्माद रोग में भी शीघ्र लाभ होता है। हवन करने के साथ ही उक्त सभी दस औषधियों के बारीक पिसे हुए चूर्ण को घी और शक्कर के साथ सुबह-शाम एक-एक चम्मच खिलाते रहना चाहिए, पूर्ण लाभ तभी मिलता है।
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियों, भाइयों! अपने भारतीय धर्म में संध्यावंदन के दो समय नियुक्त हैं, एक प्रातःकाल एवं दूसरा सायंकाल। जब रात्रि और दिन दोनों मिलते हैं, तो उसे ‘संध्याकाल’ कहते हैं। यह सबेरे भी होता है और सायंकाल को भी होता है। इसलिए संध्यावंदन जब सूर्य उदय होता है तब और जब सूर्य अस्त होता है तब करना चाहिए। अध्यात्मिक जीवन में इस संध्यावंदन को हम एक और तरीके से कर सकते हैं। सोने को हम रात मान लें और जागने को दिन मान लें, तब प्रातःकाल एवं सायंकाल की संध्यावंदन का अध्यात्मिक समय वह बनेगा, जब आदमी सोकर उठेगा अथवा सोएगा।
प्रातःकाल की और सायंकाल की संध्यावंदन के लिए यही हो सकता है कि लोग शिकायत करें कि उस वक्त तक हमारी नींद नहीं खुलती हैं, उस वक्त तक तो हम दुकान पर रहते हैं, अमुक काम करते हैं। परंतु यह संध्यावंदन हरेक आदमी के लिए संभव है कि वह जब प्रातःकाल उठे, किसी भी वक्त तो उठेगा, अतः कभी भी सोए तो जो सोने का समय हो, उसे रात्रि का संध्यावंदन काल मान लिया जाए और जब उठ जाए, तो प्रातःकाल का संध्यावंदन का समय मान लें, तब फिर किसी को यह शिकायत नहीं रहेगी कि हमको साधना-उपासना के लिए, संध्यावंदन के लिए समय नहीं मिलता।
सबसे सरल तरीका
मित्रों! दैनिक उपासना करने के संबंध में लोगों को एक और भी शिकायत रहती है कि हमको जाड़े के दिनों में ठंड लगती हैं, स्नान करना संभव नहीं होता, कैसे उठें, पानी मिलता नहीं है। उसके लिए यह संध्यावंदन, जो आपको हम बता रहे हैं, इसको आप यहाँ से जा करके नियमित रूप से करते रहें। संध्यावंदन के लिए ऋषियों ने जो प्रातःकाल और सायंकाल का समय बताया हैं, उसके स्थान पर प्रातःकाल सो करके उठने का समय और रात्रि को सोने का समय, यह दो समय आपके लिए हम नियुक्त किए देते हैं। कई लोगों के पास स्थान नहीं होता है, पर स्थान नहीं हैं, पूजा का सामान नहीं हैं, नहाने का समय नहीं हैं, तो न सही, फिर आप ऐसा करें, चारपाई पर पड़े-पड़े ही संध्यावंदन कर लिया करें। इसके लिए न उठने की जरूरत है और न कुछ है। इससे सरल तो संध्यावंदन का और कोई तरीका हो ही नहीं सकता। यह सबसे सरलतम तरीका है कि आप प्रातःकाल और सायंकाल का संध्यावंदन अपनी चारपाई पर पड़े हुए भी उस समय कर लिया करें, जबकि आपकी नींद खुलती है और आप नींद लेने के लिए जाते हैं। दोनों समय की इस संध्या को आप भूलना मत। इसमें सिवाय आपकी लापरवाही और गैर जिम्मेदारी के अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं हो सकती? आप चाहें तो नियमित रूप से, हर परिस्थितियों में, बीमारियों में भी, सफर में भी, कही भी यह संध्यावंदन कर सकते हैं।
नया जन्म नई मौत
मित्रों! सायंकाल की संध्या और प्रातःकाल की संध्या में क्या करें? क्या करना चाहिए, क्या विचार करना चाहिए? आपको इन दोनों समयों में आत्मबोध और तत्वबोध की साधना करनी चाहिए। प्रातःकाल जब आप उठा करें, तो एक नए जीवन का अनुभव किया कीजिए कि रात को सोने का अर्थ हैं, ‘पिछले जन्म की स्मृति और उस दिन की मौत’ सबेरे उठने का अर्थ हैं, ‘नया जन्म’। ‘जब आँख खुली तब नया जन्म’ आप यह अनुभव कर लिया करें, तो मजा आ जाए। आप हर दिन सबेरे यह अनुभव किया कीजिए कि हमारा नया जन्म हो गया। अब नए जन्म में क्या करना चाहिए? आपकी सारी बुद्धिमानी इस बात पर टिकी हुई है कि आपने अपनी जीवन संपदा का किस तरीके से उपयोग किया। यह मानना सही नहीं है कि यह जन्म भजन करने के लिए मिला हुआ है। नहीं मित्रो! यह जीवन भजन करने के लिए नहीं मिला हुआ हैं, वरन् इसलिए मिला हुआ है कि आप इस जीवन की संपदा को ठीक तरीके से इस्तेमाल करें। यह आपकी परीक्षा है। परीक्षा में जो पास हो जाते हैं, तो और आगे चढ़ा दिए जाते हैं।
साथियों! यह जो पहली परीक्षा भगवान् ने आपको मनुष्य का जीवन देकर ली है, उसमें आपका एक ही फर्ज हो जाता है कि आप इसका अच्छे-से-अच्छा उपयोग करके दिखाएँ। बस भगवान् ने यही अपेक्षा की है आप से, यही उम्मीद है और यही वह चाहता है। वह न आपसे पूजा चाहते हैं, न उपहार चाहता है, न भजन चाहता है, न मनुहार चाहता है, न मिठाई चाहता है, न कपड़े चाहता है, न कथा चाहता है, न कीर्तन चाहता है। इन सब बातों से भगवान् का कोई ताल्लुक नहीं है। यह तो अपने आपके परिशोधन की प्रक्रियाएँ हैं। न जाने क्यों लोगों ने यह मान लिया है कि इससे भगवान् प्रसन्न हो जाएगा। आप लोग विश्वास रखें, इससे भगवान् कभी प्रसन्न नहीं हो सकता। इससे आपको जीवन संशोधन करने में, कार्य निवारण करने में तो सहायता मिल सकती हैं, लेकिन जहाँ तक भगवान् की प्रसन्नता का ताल्लुक हैं, वहाँ सिर्फ एक बात है कि आपको जो बहुमूल्य मनुष्य का जीवन दिया गया था, उस जीवन का आपने किस तरीके से और कहाँ उपयोग किया। बस यही एक प्रश्न है, दूसरा कोई प्रश्न नहीं है। तब आपको यह दिया गया हैं, तो विश्वास रखें कि भगवान् ने अपनी बहुमूल्य संपत्ति आपके हाथ कर दी। इससे बड़ी संपत्ति भगवान् के खजाने में और कोई नहीं है।
आदमी बनने का प्रयास करें
मित्रों! मनुष्य के जीवन में बढ़कर और क्या हो सकता है? आप दूसरे प्राणियों पर नजर डालिए न। कोई नंगा फिर रहा हैं, किसी के खाने का ठिकाना नहीं हैं, कोई कहीं हैं, तो कोई कहीं हैं, न बोल सकता है, न लिख सकता है। किंतु आपको सारी सुविधाओं से भरा हुआ जीवन इसलिए दिया गया है कि आप उसका अच्छे-से-अच्छा उपयोग करके दिखाएँ। क्या अच्छा उपयोग हैं, एक आप स्वयं को ऐसा बनाएँ, जिसको कि आदमी कहा जा सकता है। दूसरों के सामने आपका उदाहरण इस तरीके से पेश होना चाहिए कि जिसको देख करके दूसरे आदमियों को प्रकाश मिलें, रोशनी मिले या पीछे चलने का मौका मिले और आपकी अंतरात्मा कषाय-कल्मषों का परिशोधन करती हुई साफ और स्वच्छ बनती चली जाए। यह आपका स्वार्थ है। और परमार्थ? परमार्थ यह है कि भगवान् की इस विश्व-वाटिका में, जिसमें कि आपको काम करने के लिए भेज गया हैं, उसमें आप एक अच्छे माली के तरीके से काम करें। भगवान् को साथियों की जरूरत है, इंजीनियरों की जरूरत हैं, ताकि उनमें इतने बड़े बगीचे, इतने बड़े कारखाने की सुव्यवस्था करने में वे हाथ बँटा सकें। आपको हाथ बँटाने के लिए पैदा किया गया है, खुशामदें करने के लिए नहीं, नाक रगड़ने के लिए नहीं, चापलूसी करने के लिए नहीं, चमचागिरी करने के लिए नहीं, मिठाई, उपहार भेंट करने के लिए नहीं पैदा किया गया। आपको सिर्फ इसलिए पैदा किया गया है कि बेहतरीन जिंदगी जिएँ और भगवान् के काम में हाथ बँटाएँ।
इसके लिए मित्रों क्या करना चाहिए? आमतौर से आदमी काम की बातें भूल जाते हैं और बेकार की बातें, बेवकूफी की बातें सब याद रखते हैं। आपको सबेरे उठते ही प्रातःकाल चारपाई पर पड़े-पड़े यह ध्यान करना चाहिए कि आज हमारा नया जन्म हुआ है और हमको इतनी बड़ी कीमत मिली, संपत्ति मिली कि जिसकी तुलना में और किसी प्राणी को कोई चीज नहीं मिली। आप अपने आपको सौभाग्यवान् महसूस कीजिए, भाग्यशाली अनुभव कीजिए। यह अनुभव कीजिए कि हमारे बराबर भाग्यशाली कोई नहीं। अभावों की बात, चिंता की बात, कठिनाइयों की बात आप सोचते रहते हैं, लेकिन यह क्यों नहीं सोचते कि आप कितने शक्तिशाली हैं कि इतना बड़ा जीवन आपको भगवान् ने दिया। आप अपने भाग्य को सराहें और सराहना के साथ-साथ एक और बात ध्यान में रखें। आप एक ऐसी ‘स्कीम’ बनाएं, ‘योजना’ बनाएँ, जिससे इस जीवन का अच्छे-से-अच्छा उपयोग करना संभव हो सके।
जीवन सँवारने के सूत्र
मित्रों! यह प्रयोग एक दिन के जीवन से करना चाहिए। जिस दिन आप सोकर उठें, उसी दिन आप यह याद रखिए कि बस हमारे लिए एक ही दिन जिंदगी का है और इस आज के दिन को अच्छे-से-अच्छा बनाकर दिखाएँ। बस, इतने क्रम को दैनिक जीवन में सम्मिलित कर लें, तो इसे रोज-रोज अपनाते हुए आप अपनी सारी जिंदगी को अच्छा बना सकते हैं। एक-एक दिन को हिसाब से जोड़ देने का मतलब होता है, सारे समय को और सारी जिंदगी को ठीक तरह और सुव्यवस्थित बना देना। आप प्रातःकाल उठा कीजिए और यह ध्यान किया कीजिए कि ‘हर दिन नया जन्म और हर दिन नई मौत को आप प्रातःकाल से सायंकाल तक कैसे प्रयोग करेंगे? इसके लिए सुबह से ही उठकर टाइमटेबिल बना लेना चाहिए कि आज आप क्या करेंगे, कैसे करेंगे और क्यों करेंगे? क्रिया के साथ में आप चिंतन को जोड़ दीजिए। चिंतन और क्रिया को जोड़ देते हैं, तो दोनों से एक समग्र स्वरूप बन जाता है। आप शरीर से काम करते रहें, मगर कोई उद्देश्य न हो अथवा अगर आप उद्देश्य ऊँचे रखें, लेकिन उसे क्रियान्वित करने का कोई मौका न हो, तो दोनों ही बातें बेकार हो जाएँगी। इसलिए मित्रो! सबेरे उठते ही जहाँ अपने जीवन को सराहें या मनुष्य जीवन पर गौरव का अनुभव करें, वहाँ एक बात और साथ-साथ में चालू कर दें, सुबह प्रातःकाल से लेकर सायंकाल तक का एक ऐसा टाइमटेबिल बनाएँ जिसको कि सिद्धाँतवादी कहा जा सके, आदर्शवादी कहा जा सके। इसमें भगवान् की हिस्सेदारी रखिए। शरीर के लिए भी गुजारे का समय निकालिए, भगवान् के लिए भी गुजारे समय निकालिए। आपके जीवन में भगवान् भी तो हिस्सेदार हैं, उसके लिए भी तो कुछ करना है। आपका शरीर ही सब कुछ थोड़े ही है, आत्मा भी तो कुछ है। आत्मा के लिए भी तो कुछ किया जाना चाहिए। सब कुछ शरीर को ही खिलाने-पिलाने के लिए करेंगे क्या? ऐसा क्यों करेंगे? आत्मा का कोई औचित्य नहीं है क्या? आत्मा की कोई इज्जत नहीं है क्या? आत्मा का कोई मूल्य नहीं है क्या? आत्मा से आपका कोई संबंध नहीं है क्या? अगर है तो फिर आपको ऐसा करना पड़ेगा कि साथ-साथ दिनचर्या में आदर्शवादी सिद्धाँतों को मिलाकर रखना पड़ेगा।
मित्रों! अपनी दिनचर्या ऐसी बनाइए जिसमें आपके पेट भरने की भी गुंजाइश हो और अपने कुटुँब के परिवार के लोगों के लिए भी गुंजाइश हो और अपने कुटुँब के परिवार के लोगों के लिए भी गुंजाइश हो। लेकिन साथ-साथ में एक और गुंजाइश होनी चाहिए कि अपनी आत्मा को संतोष देने के लिए और परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए कार्यों का और विचारों का भी समावेश हो। आप स्वाध्याय का दैनिक जीवन में स्थान रखिए। आप सेवा का दैनिक जीवन में स्थान रखिए, आप उपासना का दैनिक जीवन में स्थान रखिए। इन सब बातों का समन्वित जीवन का अभ्यास कर लें, तो कल प्रातःकाल वाला संध्यावंदन पूरा हो हो जाएगा।
व्यस्त रहें, जीवनचर्या व्यवस्थित बनाएँ
जीवन की अनुभूति, जीवन की महत्ता की अनुभूति के साथ-साथ में सोते समय तक की सारी कार्य विधि का निर्धारण अगर आप कर लेते हैं, तो फिर आपकी उन-उन खुराफातों से बचत हो जाएगी, जो कि आप गृहस्थ जीवन के अभाव में करते रहते हैं। जो आदमी व्यस्त हैं, वह एक निर्धारित लक्ष्य में लगा रहता है। जो आदमी खाली है अर्थात् जो शरीर से खाली होगा, तो उसका दिमाग भी खाली होगा और दिमाग का खाली होना शैतान की दुकान है। इसलिए अपना दिमाग शैतान की दुकान न होने पाए और आपका शरीर खाली रहने की वजह से दुष्प्रवृत्तियों में न लगने पाए, इसके लिए बहुत अधिक आवश्यक है कि आप व्यस्तता से भरा हुआ टाइमटेबिल और कार्यक्रम बना लें और उस पर चलें। न केवल टाइमटेबिल बना लें, वरन् यह भी हर समय ध्यान रखें कि जो सबेरे कार्यपद्धति बनाई गई थी, वह ठीक तरीके से प्रयोग होती भी है कि नहीं।
आप अपने टाइमटेबिल में विश्राम का समय भी नियत रखें। यह कोई नहीं कहता कि विश्राम मत रखिए, लेकिन विश्राम भी एक समय से होना चाहिए, टाइम से होना चाहिए और एक विधि से होना चाहिए। चाहे जहाँ जरा-सा काम किया और फिर विश्राम, जरा-सा काम और फिर विश्राम ऐसे कोई काम होते हैं क्या? काम करने की शैली ही कर्मयोग है। कर्मयोग को अगर आप ज्ञानयोग में मिला दें, संध्यावंदन में मिला दें, तो मजा आ जाए, सारी की सारी दिनचर्या को आप भगवान् का कार्य मानकर चलें, तो फिर समझिए आपकी प्रातःकाल की संध्या पूर्ण हो गई।
इसके बाद अब सायंकाल की संध्यावंदन का नंबर आ गया। आप सायंकाल की संध्या उस समय किया कीजिए, जब आप साया करें। जब भी सोएँ-नौ बजे, ग्यारह बजे, बारह बजे, सोना तो आखिर है ही आपको। जब सोएंगे, तो यह बात भी सही है कि आप नींद की गोद में अकेले ही जाएँगे। ठीक हैं, बच्चे बगल में सोते हों तो क्या और कोई सोता हो तो क्या, परंतु नींद तो आपको अकेले ही को आएगी न, दो को तो एक साथ नहीं आ सकतीं? आप सुबह उठेंगे, तो अकेले उठेंगे न, दो तो एक साथ नहीं उठा सकते? यह आपका एकाँत जीवन है। सायंकाल को सोते समय आप उस एकाँत जीवन में ऐसे विचार किया कीजिए कि हमारे जीवन का अब समाप्ति का समय आ गया, अंत आ गया। अंत को लोग भूल जाते हैं। आदि को भी भूल जाते हैं बस मध्य में ही उलझे रहते हैं।
आदि और अंत का ध्यान
मित्रो! आदि यह है मनुष्य योनि में जन्म का सौभाग्य और उसको ठीक तरीके से उपयोग करने का निर्धारण। और अंत? अंत वह है जिसमें भगवान् के दरवाजे पर जाना ही पड़ेगा, भगवान् की कचहरी में पेश होना ही पड़ेगा, इससे कोई बचत नहीं हो सकती। आपको भी दूसरों की तरह मरना ही पड़ेगा और मरना भी चाहिए। यह नहीं हो सकता कि आपके मरने का कोई दिन न आए, जरूर आएगा, निश्चित आएगा। जब आपके मरने का दिन आएगा, तो फिर क्या होगा? तब आपको यहाँ से जाने के बाद में सीधे भगवान् के दरबार में जाना पड़ेगा और सिर्फ एक बात का जवाब देना पड़ेगा कि आपने इस जिंदगी का कैसे इस्तेमाल किया। अगर आपने ठीक तरीके से इस्तेमाल नहीं किया हैं, तो भगवान् आपसे बेहद नाराज होंगे, भले ही आपने अनुष्ठान किया हो, तीर्थयात्रा की हो, उपवास किए हों, तिलक लगाए हों, जो भी किया हो, इससे भगवान् का कोई समाधान होने वाला नहीं है।
इसलिए रात्रि को सोते समय यह ख्याल किया कीजिए कि अब हमारे जीवन का अंत है और अंत को अगर आप ध्यान कर लें तब? तब फिर आप चौंक पड़ेंगे। जिंदगी भर आदमी न जन्म को याद किया करें, तो मजा आ जाए। सिकंदर जब मरने को हुआ, तो उसने सब लोगों को बुलाया और कहा कि हमारा सब माल-खजाना हमको दीजिए, हम साथ लेकर के जाएंगे। क्योंकि बड़ी मेहनत से भी कमाया है और बड़ी बेईमानी से भी कमाया है। उसने जो कमाया था लोगों ने वह सब उसके सामने रख दिया। सिकंदर कहने लगा कि इसे हमारे साथ भेजने का इंतजाम करो। लोगों ने कहा, यह कैसे हो सकता हैं? यह सब चीजें तो यहीं की थीं और यही पड़ी रह जाएंगी। आप तो बेकार ही कहते हैं कि यह हमारे साथ जाएगा। आपके साथ तो आपका पुण्य और पाप जाएगा और कुछ नहीं जा सकता।
काश! हमें हर पल मौत याद रहे
सिकंदर फूट-फूटकर रोने लगा। उसने कहा कि अगर मुझे यह मालूम होता कि मेरे साथ में केवल पुण्य-पाप ही जाने वाला है, तो मैं इस छोटी-सी जिंदगी को गुनाहों से भरी हुई न बनाता। फिर मैं भगवान् बुद्ध के तरीके से जिया होता, सुकरात के तरीके से जिया होता, ईसा के तरीके से जिया होता। ऐसी गलती क्यों कर डाली? इस संपदा को, जिसकी मुझे जरूरत नहीं थी, उसी को मैं इकट्ठा करता रहा। यह क्यों करता रहा? मौत तो होनी ही है। उसको जब मौत याद आई, तो वह बार-बार यही बोला, मरते वक्त मेरे दोनों हाथ ताबूत से बाहर निकालकर रखना। उसने अपने सैनिकों से कहा कि आप लोग जब हमें दफनाने के लिए जाएँ, तो हमारे दोनों साथ ताबूत से बाहर निकालकर रखना। उसने अपने सैनिकों से कहा कि आप लोग जब हमें दफनाने के लिए जाएं, तो हमारे दोनों हाथ हमारे जनाजे से बाहर निकाल देना, ताकि लोग यह देखें कि सिकंदर खाली हाथ आया था और खाली हाथ चला गया।
मित्रों! यह वैराग्य श्मशान घाट में ही बन सकता है। श्मशान घाट की एवं मौत की याद आपको आ जाए, तो आप निश्चित ही जो घिनौनी जिंदगी जी रहे हैं, उसकी कतई इच्छा नहीं होगी। फिर आप यह कहेंगे कि इस नए मौके का अच्छे-से-अच्छा उपयोग क्यों न कर लिया जाए।
फिर आप क्या करेंगे? फिर आप अपना टाइमटेबिल और अपनी रीति-नीति ऐसी बनाएंगे जैसे कि राजा परीक्षित ने बनाई थी। राजा परीक्षित को मालूम पड़ गया था कि आज से सातवें दिन साँप काट खाएगा। उसने यह निश्चय किया कि इन सात दिनों का अच्छे-से-अच्छा उपयोग करेंगे। उन्होंने भागवत् कथा का अनुष्ठान किया और दूसरे अच्छे कर्म किए। इससे उनकी मुक्ति हो गई।
मित्रों! सात दिन में तो सबको ही साँप काटने वाला है। आपको भी सात दिन में ही काटेगा। कुल सात ही दिन तो होते हैं न, मौत का साँप इन्हीं दिनों में तो काटता है। सातवें दिन के बाद आठवाँ दिन कहाँ हैं? इसलिए आप भी राजा परीक्षित के तरीके से विचार कर सकते हैं कि हमारी बची हुई जिंदगी, जो मौत के दिनों के बीच में बाकी रह गई हैं, इसका हम अच्छे-से-अच्छा कैसे उपयोग कर सकते हैं? सायंकाल को आप विचार किया कीजिए कि इसका कैसे अच्छे-से-अच्छा उपयोग किया जाए। सायंकाल को दिनभर के कार्यों की समीक्षा किया कीजिए और समीक्षा करने के बाद में यदि लगे कि हमने गलती की या नहीं की। यदि की हैं, तो उसके लिए अपने को धिक्कारिए नहीं, धमकाइए नहीं, वरन् अपने आपको इस बात के लिए रजामंद कीजिए कि जो कुछ आज कमियाँ रह गई अथवा गलतियाँ हो गई, वह कल नहीं होगी। कल हम उस कमी को पूरा कर लेंगे, गलती को सुधार लेंगे। फिर क्या हो जाएगा? कमी की पूर्ति हो जाएगी। अगली बार गलती नहीं होगी, काम बहुत अच्छा हो जाएगा।
गलतियों से सीखें, आत्मचिंतन करते रहें
इस तरह प्रातःकाल जिस तरीके से आपने आज की नीति का निर्धारण किया था, उसी तरीके से आज की गलतियों का और आज की सफलताओं का अनुमान लगाते हुए कल की बावत आप तैयारी कर सकते हैं कि पहले तय कर लेंगे, तो दूसरे दिन आपको सफलता मिलेगी, यकायक चिंतन करेंगे, तो थोड़ा कठिन पड़ेगा। इसलिए हर दिन सोते समय में, मौत की गोद में, नींद की गोद में जाते समय यह विचार लेकर जाया करें कि अब हम इस संसार से चले और भगवान् के यहाँ गए। ऐसी स्थिति में फिर आपको क्या करना चाहिए? लगाव को कम करना चाहिए। लोगों से, वस्तुओं से आपका लगाव जितना ज्यादा होगा, आप उतना ही ज्यादा कष्ट पाएंगे। आप लगाव को कम कीजिए। लगाव ही ज्यादा कष्टकारक है, जिम्मेदारियों का निभाना ज्यादा कष्टकारक नहीं है। जिम्मेदारियाँ तो आपको निभानी ही चाहिए। आप अपनी जिम्मेदारी माता के प्रति निभाइए, पत्नी के प्रति निभाइए, बच्चों के प्रति निभाइए, मोहल्ले के प्रति निभाइए और समाज के प्रति निभाइए, लेकिन लगाव आपको बहुत हैरान कर देगा। हमारा ही बच्चा हैं, यह आप क्यों कहते हैं? यह क्यों नहीं सोचते और कहते कि भगवान का बच्चा है। यह हमारी बीवी हैं, क्यों कहते हैं? यह क्यों नहीं करते कि यह भगवान् की बेटी हैं। यह कह देंगे, तो क्या हो जाएगा?
आप रात्रि को जब सोया करें और मौत को जब याद किया करें, तो साथ में दो बातें और भी याद कर लिया करें कि हम खाली हाथ जा रहे हैं। लालच हमारे साथ जाने वाला नहीं है और मोह भी हमारे साथ जाने वाला नहीं है। हर प्राणी अपने संस्कार लेकर आया है और अपने संस्कार लेकर चला जाएगा। फिर आप उनके मालिक कैसे हुए? संपत्ति जितनी आप खा सकते हैं और जितनी इस्तेमाल कर सकते हैं, उतनी ही तो ले सकते हैं। बाकी जमीन पर ही छोड़नी पड़ेगी, चाहे संबंधियों के लिए छोड़ें, चाहे उत्तराधिकारियों के लिए छोड़ें और चाहे पुलिस वालों के लिए छोड़ें। तो जब छोड़नी ही पड़ेगी, तो आप उन लोगों के लिए क्यों नहीं छोड़ते, जो कि इसके हकदार हैं। आप उतना ही क्यों न कमाएँ, जिससे कि आप ईमानदारी के साथ अपने लोक और परलोक को बनाए रखें। आप अपने खरच उतने ही क्यों न रखें, जिससे कि सीमित आजीविका में ही आदमी का गुजारा चल सकता है।
करें हर क्षण मृत्यु का स्मरण
मित्रों! ऐसे हजारों विचार हैं जो आपको तब आएंगे जब आप यह ख्याल करेंगे कि हमको मौत के मुँह में जाना है। अगर यह ख्याल आप नहीं कर सकते, तो फिर आप पर व्यामोह छाया रहेगा और यही भवबंधन छाए रहेंगे कि और कमाना चाहिए। लालच छाया रहेगा, मोह छाया रहेगा, चाहे उसकी जरूरत हो या न हो। बेटे-पोते सब समर्थ हो गए हैं, फिर भी आप यही सोचते रहेंगे कि इनकी सहायता करें। इनको ही पैसा दें आपके मन में कभी यह ख्याल भी नहीं आएगा कि इनके अलावा भी कोई दुनिया में और भी रहता है। यह त्याग, वैराग्य, भक्ति तब आती है जब आदमी मृत्यु का स्मरण करता है। आप मृत्यु का स्मरण कीजिए। मृत्यु का स्मरण करना बहुत जरूरी है। ॐ कृतो स्मरः......। किसको याद करो, मौत को याद करो। “भस्मीभूतमिदं षरीरं” यह शरीर भस्मीभूत होने वाला है।
आप इस मरने वाले शरीर के बारे में ध्यान रखें कि यह कल या परसों मिट्टी में मिलने वाला है। फिर हम क्यों ऐसे गलत काम करें, जिससे हमारी परंपरा बिगड़ती हो, पीछे वालों को कहने का मौका मिलता हो, धिक्कारने का मौका मिलता हों और आपकी आत्मा को असंतोष की आग में जलने का मौका मिलता हो। आप मत कीजिए ऐसा काम। यह दोनों शिक्षाएं आपको नया जीवन और नई मौत के स्मरण करने से मिल सकती हैं और कोई तरीका नहीं है। आप इन दो संध्यावंदन को भूलिए मत। गुरुजी हम तो उस समय गायत्री मंत्र का जप करते हैं। दूसरे समय पर कीजिए। प्रातःकाल तो यह चिंतन और मनन कीजिए “नया जन्म नई मौत” “और हर दिन को नया जन्म और हर रात को नई मौत।” इस मौत और जिंदगी के झूले में आप झूलते हुए अपने फर्ज, कर्तव्य और बुद्धिमत्ता के बारे में विचार करेंगे, तो ऐसी हजारों बाते मालूम पड़ेंगी, जिसके आधार पर आपका जन्म सार्थक हो सके आप अध्यात्मवाद के सच्चे अनुयायी और उत्तराधिकारी बन सकें। आज आप से यही कहना था। ॥ॐ शांति॥
पुराने जमाने में ईश्वर पर विश्वास नहीं करने वाला नास्तिक होता था और नए धर्म में स्वयं पर विश्वास न करने वाला नास्तिक कहलाता है।
-विवेकानंद
सुँदरता चेहरे की बनावट एवं साज-सज्जा पर टिकी हुई नहीं है। वह तो अच्छे स्वभाव और सज्जनोचित व्यवहार से उभरती है।
घृणा को घृणा से और बैर को बैर से जीत सकना कठिन है। आग में ईंधन डालने से वह भड़कती भर है। बुझाने के लिए प्यार की सजलता चाहिए।
लोग धर्म के लिए कहते हैं, सुनते हैं, झगड़ते और मरते-मारते हैं। पर ऐसे कुछ ही लोग हैं, जो धर्म के लिए जीवन जीते हैं।
(गीता के चतुर्थ अध्याय ज्ञान कर्मसंन्यासयोग की युगानुकूल व्याख्या की चौथी कड़ी)
भगवान् के जन्म भी दिव्य होते हैं एवं कर्म भी दिव्य होते हैं, इस प्रकरण पर बड़े विस्तार से मात्र एक ही श्लोक की व्याख्या के माध्यम से विगत अंक की कड़ी प्रस्तुत की गई थी। भगवान् के अवतरण एवं आरोहण की चर्चा के साथ यह भी बताया गया था कि भगवान् की “संभवामि युगे युगे” की उद्घोषणा किस तरह साकार होती है।
जन्म कर्म च में दिव्यमेंवं यो वेत्ति तत्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जनम नैति मामेति सोऽर्जुन॥
“इस तरह हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् निर्मल और आलौकिक हैं, इस तथ्य को जो मनुष्य तत्व से जान लेता है, वह शरीर त्यागने के बाद पुनः जन्म नहीं लेता, मुझे ही प्राप्त होता है।” (4/9) गीता के चौथे अध्याय के नवें इस श्लोक की व्याख्या सचमुच बहुत गूढ़ है। मनुष्य तो अपने प्रारब्ध के वशीभूत हो जन्म लेता है, किंतु भगवान् अपनी इच्छा से लोक कल्याण हेतु जन्म ग्रहण करते हैं। सृष्टि की सारी संवेदना अपने अंदर साकार कर करुणा का महासागर बनकर अवतार जन्म लेता है। मेरेपन से परे जाकर अवतार चेतना में स्थित होकर इतनी बड़ी बात श्रीकृष्ण कह लेते हैं कि यह रहस्य जान लेना एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक उपलब्धि है कि भगवान् के जन्म व कर्म कितनी दिव्यता से भरे होते हैं। परमात्मा जो अज हैं, अव्यय हैं, इस दिव्य कर्म के उद्देश्य से अवतरित होते हैं कि वे समग्र मानवजाति की चेतना को दिव्य बना सकें, ताकि वह ऊर्ध्वमुखी हो सकें। लाखों-करोड़ों व्यक्तियों की चेतना में नवजीवन लाया जा सके। मानव चेतना में जब भी कोई रूपांतरण-महान परिवर्तन होने जा रहा हो, अवतारी चेतना की आवश्यकता होती है। ऐसे सभी साधक जो सर्वत्र उसी ईश्वरीय सत्ता का क्रीड़ा-कल्लोल देखते हैं, शरीर छोड़ने के बाद कभी पुनः जन्म नहीं लेते, यह बात बड़ी स्पष्टता से प्रभु ने कही है। भगवान् को प्राप्त हो जाने के बाद वीतराग बन, अपने अहं व भय को नष्ट करने के साथ ही इस जीवन शैली को अपनी दैनंदिनचर्या का अंग बना लेने के प्रकरण को हम मात्र स्पर्श कर पाए थे। अब उसके आगे की व्याख्या दसवें श्लोक से, जो आरंभ होकर कर्म-अकर्म-विकर्म की व्याख्या तक हमें ले जाती है, इस व आगे के अंकों में प्रस्तुत है।
दसवें श्लोक में भगवान् कहते हैं-
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥ 4/1
“पहले भी, आसक्ति, भय और क्रोध से रहित, मेरे साथ तादात्म्य को प्राप्त हुए, मेरी ही शरणागत हुए तथा ज्ञानरूपी तप द्वारा पवित्र हुए बहुत से लोग मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।” (अध्याय 4, दसवाँ श्लोक)
प्रभु के स्वरूप को प्राप्त होना
एक ही श्लोक में कितनी ही बातें एक गुरु ने अपने शिष्य को कह दी हैं जो अवतार को पहचान लेता है, उसके दिव्य कर्म को जान लेता है, वह भगवत् तत्व को प्राप्त हो जाता है। क्यों? क्योंकि फिर वह राग, भय और क्रोध से मुक्ति पा लेता है। बंधन मुक्ति-जीवन मुक्ति का पथ पा जाता है। दिव्य जन्म और दिव्य कर्म को जानना (जो कि विगत अंक में बताया गया) एक सत्य हमारे समक्ष उद्घाटित करता है कि हमारे सभी कार्यों में वह सर्वशक्तिमान प्रभु हमारी उपाधियों के द्वारा स्वयं काम करते हैं। हम तो उनके निमित्त मात्र बन कर्म करते रहते हैं। इससे हमारे समक्ष अति आकर्षक अनेकानेक संभावनाओं के द्वार खुल जाते हैं। जब वह अनंत ही हमारे अंदर कार्य कर रहा है, तो हमारी क्षमता भी अनंत है। स्वामी विवेकानंद की वह प्रसिद्ध उक्ति ‘इच सोल इज पोटेन्शियली डिवाइन’ हर आत्मा में वह देवत्व समाया पड़ा है, हमारे समक्ष अद्वैत की व्याख्या करती हुई मुखरित होने लगती हैं। सहज ही हम असंभव कार्य करने लगते हैं, क्योंकि वे स्वतः होने लगते हैं, हमारा उन पर कोई नियंत्रण नहीं होता।
गीता एक सुनिश्चित अनुशासन हमारे समक्ष रखती है। उस अनुशासन का पालन करने पर वह कहती है कि हम सहज भाव से इस दिव्य मनः स्थिति का आह्वान कर सकते हैं और हमेशा उसी स्थिति में बने रहने का स्वयं को प्रशिक्षण दे सकते हैं। क्या है वह अनुशासन? वह है, आसक्ति का त्याग, भय से मुक्ति, क्रोध से दूरी। जहाँ कहीं भी आसक्ति होती हैं, वहाँ समेटकर रखने को मन होता है, वस्तुओं के चले जाने का भय होता है। जब हमारी कामना की पूर्ति नहीं होती, तो क्रोध का आना स्वाभाविक ही हैं। जब-जब भी हमारा ध्यान बहिर्मुखी होता है, विषय पदार्थों की प्राप्ति और उनमें ही तृप्ति-प्रसन्नता पाने हेतु लगने लगता है, तो ये तीनों वृत्तियाँ अनायास ही आकर हमसे चिपट जाती हैं। भगवान् कहते हैं कि मेरे साथ एक भाव को प्राप्त हुए, मेरी शरण में आए व्यक्ति इन तीनों से मुक्ति पा जाते हैं।
वीतरागता की सिद्धि
वीतराग होना एक सबसे बड़े स्तर की सिद्धि है। इसे प्राप्त करने के बाद मनुष्य कभी अशांत नहीं होता, अंदर से बाहर तक वह प्रभु भाव से जीवन जीता है एवं तुरंत ही आध्यात्मिक सिद्धि के उच्च सोपानों को पा जाता है। भगवान् बुद्ध के एक शिष्य ने आकर उनसे कहा, “प्रभु! एक वेश्या ने मुझसे अपने यहाँ आकर चातुर्मास करने को कहा है। मैंने भी सोचा कि करके देख लेता हूँ। जब हर श्वास में आप ही आप समाए हुए हैं, तो मेरा क्या बिगड़ेगा। आपके शिष्य की परीक्षा भी हो जाएगी।” औरों ने सुना, शिष्यों ने सुना तो प्रताड़ना देने लगे कि यह कैसी बात अपने प्रभु से करते हो? किंतु बुद्ध ने कहा कि बड़े मजे की बात कह रहा है। करने दो इसे। इससे सभी को एक शिक्षण मिलेगा।
बुद्ध की इजाजत पाकर वह शिष्य वेश्या के घर चला गया। चातुर्मास चालू हुआ। वेश्या नाची गाई, विभिन्न प्रकार की चेष्टाएँ करती रही। वह कभी भी यह नहीं कहता कि ऐसा क्यों कर रही हो। कभी रुक जाती, तो यह नहीं कहता ऐसा नाचो। जब वह उसके बहुत पास जाकर कामुक नृत्य करती, तो यह भी नहीं कहता कि मत करो। वह अपने व्यय में प्रसन्न बना रहा। उसे बहुत अच्छा लग रहा था। वह वीतराग स्थिति को पहुँच गया। उसे न नृत्य से परेशानी थी, और न उसके थककर बैठ जाने से। उसका तो उद्देश्य था, प्रभु में मन लगाकर चातुर्मास जप-तप में लीन हो पूरा करना। गुमान में स्थित होकर मन को तद्रूप बनाना। चार माह देखते ही देखते बीत गए। चौथे माह के समापन पर चातुर्मास होने पर वह भिक्षु एक भिक्षुणी को लेकर वापस लौटा। अर्थ वह भिक्षुणी? वही वेश्या भिक्षुणी बनकर उस शिष्य के साथ लौटी एवं प्रभु के चरणों में आकर गिर गई। उसने देखा कि मेरे पास जो भी कुछ हैं, उससे भी अंदर की शांति का राजमार्ग इस भिक्षु ने पा लिया है। वह बोली, मैं भी उस आराध्य का आनंद लेने आई हूँ, जिसने तुम्हारी मनःस्थिति ऐसी बना दी। यह लौकिक-क्षणिक सुख किस काम का? इतना समझते ही वह प्रभु में लीन हो गई। यह कहलाता है वीतराग होना।
कौन-सा ऋषि सर्वश्रेष्ठ
देवताओं की सभा में एक विवाद चल पड़ा। विषय था धरती पर ऐसा कौन-सा ऋषि है जो वीतराग है, पूर्णतः राग-आसक्ति से परे है। नारद ऋषि भी सभी में विराजमान थे। वे बोल उठे, ऐसे तीन ऋषियों को तो मैं जानता हूँ। एक का नाम है पर्वत ऋषि, दूसरे हैं कुतुक ऋषि एवं तीसरे हैं कर्दम ऋषि। यह तीन ऋषि बड़े ही प्रख्यात तपस्वी है। उनने इंद्र सहित पूरी सभा से कहा, तुम चाहो तो इन्हें परख लो। उर्वशी वहीं बैठी थीं, हंसी और बोली कि जीवनभर हमने यही काम किया है। हमें भी इन ऋषिगणों की आसक्ति पर विजय को परखने का मौका दीजिए। नारद जी ने कहा कि हाँ परीक्षा भी हो जाएगी। देवसभा में तीनों ऋषियों को आमंत्रित कर लिया गया।
उर्वशी ने निर्णय लिया कि वह कुमौक नृत्य प्रस्तुत करेगी। कुमौक नृत्य का अर्थ होता है क्रमशः अपने वस्त्र उतारते चले जाना। संस्कृत में केंचुल उतारने को कुमौक नृत्य कहते हैं। आजकल के कैबरे नृत्यों से उसकी तुलना की जा सकती है। पर्वत ऋषि पहले क्रम में आए। नृत्य आरंभ हुआ। उनने कहा, “हमें यह दृश्य क्यों दिखा रहे हो। अरे भई! इसे बंद करो।” उर्वशी बोली कि ये तो पहले प्रहार में ही चले गए। अर्थात् वीतराग स्थिति में होते तो उन्हें कोई आपत्ति न होती। पर्वत ऋषि असफल प्रमाणित कर दिए गए। नृत्य चलता रहा, कर्दम ऋषि ने अपनी आँखें बंद कर लीं, ताकि वह दृश्य न देख सकें। उनके बारे में भी यही उक्ति बनी कि ये भी असफल रहे। जो आँख बंद कर ले वह वीतराग नहीं हो सकता। जो निरपेक्ष भाव से, बिना आसक्ति के उस नृत्य को देख ले वही वीतराग हो सकता था। कुतुक ऋषि नृत्य देखते रहे, बड़े प्रसन्न मन से देखते रहे। बोले, एक-एक केंचुल उतारोगी। वह तो तुमने अभी तक दिखाया नहीं?” उर्वशी बोली, ऋषिवर! आपके सामने ही सभी वस्त्र उतार दिए और आप कहते हैं कि हमें नृत्य नहीं दिखाया। क्या आपको दिखाई नहीं पड़ रहा है। ऋषि बोले, “उर्वशी! आत्मा पर भी तो पाँच आवरण चढ़े हैं। अन्नमय कोष, मनोमय कोष, प्राणमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोष। वह तो तुमने उतारे नहीं। अगर है उतारकर दिखातीं, तो वस्तुतः आनंद आता। तुमने पूरा नृत्य दिखाया होता तो ही तुम्हारे नृत्य की सार्थकता थी। पाँचों आवरण तो हमें यथावत चढ़े दिखाई दे रहे हैं।” सभी देवताओं ने, नारद ऋषि ने एक मत से स्वीकार किया कि कुतुक ऋषि ‘वीतराग‘ स्थिति की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए हैं। रागों से परे, आसक्ति से परे उनका चिंतन है। वे पूर्णतः ईश्वरनिष्ठ-आत्मसत्ता में तन्मय महापुरुष है।
तत्त्वरूप से जानें भगवान् को
इस पौराणिक कथा से हम सौंदर्य की, उसके प्रति आसक्ति की, वीतराग होने की पूरी विवेचना समझ सकते हैं। आज जो प्रत्यक्षवादी, भोगवादी चिंतन काया तक सिमटा, अश्लीलता की परिधि लाँघता दिखाई दे रहा है, वही समाज के पतन का, दैवी आपदाओं का, बढ़ते संक्षोभों का मूल कारण है। यदि हमारी दृष्टि ऋषिप्रवर कुतुक जैसी हो जाए, तो हम बहुत सारी समस्याओं का समाधान पा सकते हैं। बहुचित्तीय राग-आसक्तिप्रधान वृत्ति से निरपेक्ष होते ही सही व्यक्तित्व उभरकर आ जाता है। भगवान् को ‘तत्त्वरूप’ से जान पाना बिना वीतराग स्थिति में जाए संभव नहीं है। यह भी कहा जा सकता है कि भगवान् को जान लेने के बाद ‘वीतराग‘ स्थिति एक सिद्धि के रूप में हस्तगत हो जाती है।
आह्लादमय मनः स्थिति की प्राप्ति हेतु गीता एक सुनिश्चित अनुशासन हमारे समक्ष रखती है। आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्ति प्राप्त करना। एक सच्चा अनुप्राणित मन तब इस योग्य बनता है कि वह परमात्मचेतना का आह्वान कर सके। अहंकेंद्रित तुच्छ भोगमय जीवन बिताने वालों में यही तीन बाधाएँ सतत उनके प्रगतिपथ को अवरुद्ध किए रहती है। भगवान् कहती हैं कि जब मनुष्य मेरे आश्रित हो जाता है। (मामुपाश्रिताः) तभी वह इन बाधाओं को पारकर तद्रूपता (प्रभु के साथ एकाकार) को पाता है।
अंदर-बाहर दोनों ओर से ज्ञानी
शुकदेव जी के जीवनवृत्त से भली भाँति समझ में आ जाता है कि वीतराग की सिद्धि कैसे प्राप्त की जा सकती है। शुकदेव जी ने भागवत की कथा सुनाकर पूर्ण की तो व्यास जी बोले, “इतने भर से नहीं प्रमाणित हो जाता कि तुम वीतराग हो। कथा तो कोई भी कह सकता है। वीतराग की स्थिति में जो अपने उद्देश्यों से दूसरों को ऊँचा उठा सके, वही सच्चा परमात्ममय साधक कहा जा सकता है।” व्यास जी बोले, “तुम जनक के पास जाकर ज्ञान लो। तुम्हारी परीक्षा वहीं होगी।” जनक जी के दरबार में घुसे तो शुकदेव जी को रोक दिया गया। काफी समय तक बिना किसी प्रकार का भाव प्रकट किए वहीं साधना करते रहे। फिर राजा स्वयं बाहर आकर उन्हें अंदर ले गए। सारे ऐश्वर्य भोगों-सुविधाओं से भरे प्रमदवन में उनके ठहरने की व्यवस्था कर दी गई। चारों ओर ऐश्वर्य-ही-ऐश्वर्य, भोग-ही-भोग, सुबह से शाम तक सुँदर नर्तकियाँ तरह-तरह के व्यंजन लेकर खड़ी रहती थीं। लेकिन जनक के उस महल में विराजे शुकदेव जी की त्रिकाल संध्या चलती रही। वे निरपेक्ष भाव से ध्यान में आत्मतल्लीन बने रहे। तब जनक उनके पास आए व बोले, “प्रभु! मैंने व्यास जी की आज्ञानुसार आपकी परीक्षा ले ली। आप अंदर से भी ज्ञानी हैं, बाहर से भी ज्ञानी। मैं तो एक राजा हूँ, जो मात्र अंदर का ज्ञान जान पाया हूँ। किंतु आप सही अर्थों में वीतराग हैं।”
गायत्री परिवार के कार्यक्रमों में हम सभी बाहर जाते हैं। कभी सामान्य, तो कभी बड़े-बड़े लोगों के घरों में ठहरते हैं। कनाडा में एक व्यक्ति के घर ठहरे तो उसने हमें तीन मंजिल का अपना घर दिखाया। प्रत्येक कमरे में चलने का अनुरोध किया। लड़की का मकान था, बड़ा सुँदर वालपेपर लगा था। बार-बार प्रतिक्रिया जानने की इच्छा रखते कि कैसा लगा ! हमने कहा, बड़ा सुँदर है। आप प्रभावित ही नहीं हुए। और लोग तो बड़ी तारीफ करके जाते हैं। हमने कहा कि आपने बड़ी मेहनत की, पर मकान बनाना कौन-सी बड़ी बात है। उनका मन दुखी देख हमने थोड़ी तारीफ कर दी, वे प्रसन्न हो गए। हर व्यक्ति अपने लौकिक पुरुषार्थ की सराहना चाहता है। वह जानता है कि यह क्षणभंगुर हैं, तब भी। इस राग से परे चलना ही गीता का संदेश है।
एकत्व भाव की सिद्धि
भगवान् के स्वरूप को जानने के बाद, वीतराग हो जाने के बाद उन्हीं में अनन्य भाव से स्थित रहने की सिद्धि मिल जाती है। सूफी संत बराबर एक ही बात कहते हैं, अनलहक। “हम वहीं है जो तू हैं।” इससे उलटी एक बात हैं कहते हैं, यादेहक, अपने प्रिय की याद में जीना। ये दो ही संप्रदाय है सूफियों के। कुछ आत्मतत्व को मानते हैं, कुछ उसी में लीन अपने को मानते हैं। संत कबीरदास जी लिखते हैं, “हरि मोर पीउ मैं राम की बहुरिया।” हरि मेरे प्रीतम हैं, मैं राम की बहुरिया हूँ। यह एकत्व भाव ही हमें प्रभु के अति समीप ले जाता है। कबीर अपनी इसी लेखनी के कारण सूफी संतों के अति समीप माने जाते हैं। कबीर की उलटबांसियां एवं गीता का काव्य हमारे अध्यात्मिक वाङ्मय की अनमोल निधि हैं, जो हमें जीवन-दर्शन का बोध कराती है।
सामान्यतया जीवन व्यापार में लगे हम सभी सामान्य लोग बिना अधिक सोचे-विचार अपने जीवन के सुखों को विषय पदार्थ, गृह-धन और संबंधियों द्वारा सुरक्षित कर लेना चाहते हैं। सुरक्षा के लिए हम इन साँसारिक पदार्थों की शरण लेते हैं। जितना-जितना हम न पर आश्रित होते जाते हैं, उतना ही हमारा विश्वास उनमें बढ़ता जाता है। उतने ही हम भगवान् से दूर होते चले जाते हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण हमें अपनी शरण में लेने की सलाह देते हैं, ताकि हमारा विश्वास सतत दृढ़ होता चला जाए। हम उनके साथ पूर्णतः तद्रूप होते चले जाएं, भगवत् भाव में जीते चले जाएं।
राग, भय और क्रोध से मुक्ति, परमात्मा में तल्लीनता और शरणागति, इन तीनों की प्राप्ति हो जाने पर हमारा समग्र व्यक्तित्व, उसकी सभी तहें एकाग्र भाव से उसी परमात्म चेतना के ध्यान में तल्लीन हो जाती है। यही है ध्यान की अवस्था, पराकाष्ठा की स्थिति। ध्यान में परमात्मा की उपस्थिति मानकर, उसके प्रति जागरुक बने रहकर जब हम कर्तव्य कर्मों का संपादन करते हैं, तो क्रमशः हमारी वासनाओं का क्षय होता चला जाता है। हमारे भीतरी यंत्र, मन, बुद्धि शुद्ध होते चले जाते हैं। ऐसा शुद्ध हृदय वाला ही दिव्य प्रेरणाएँ पाता है और आलौकिक स्तर के कर्म करता है।
ईश्वर एक आइना
गीताकार कहते हैं, ईश्वर आइना है। आइने के सामने जाते ही सब कुछ दिखाई पड़ने लगता है। हम जैसा करते हैं, बनने का प्रयास करते हैं, वही हमें ईश्वर के समीप, गुरु के समीप जाते ही दिखाई देने लगता है। गुरु के सामने, भगवान् के सामने जाते ही हम अपनी क्रियाओं को प्रतिबिंबित करने लगते हैं। हमारा वास्तविक चेहरा ही निर्विकार रूप में भगवान् के सामने आता है। अच्छे-अच्छे ज्ञानी लोग खुल जाते हैं, जैसे-जैसे वे ईश्वर के समीप जाते हैं। परमपूज्य गुरुदेव के समक्ष सभी नंगे हो जाते थे। लोग कहीं और से आरंभ करते थे अपनी राम कहानी, परंतु गुरुदेव उससे अपनी मन की बात कर लेते थे। गुरु भगवान् आइना-दर्पण के समान होते हैं। जो भगवान् सूफियों के लिए प्रेमी रूप हैं, वैष्णवों के लिए सृजेता के रूप हैं, ज्ञानियों के लिए वहीं भगवान् एक सिद्ध पुरुष के रूप में हैं। सच्चे शिष्यों के लिए गुण रूप में वे ही भगवान् हैं। इसी बात को कि ईश्वर गुरु दर्पण समान किस तरह हैं, बड़ी सुँदरता से अगले श्लोक में कहा गया है,
ये यथा माँ प्रपद्यन्ते ताँस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वषः॥ 4/11
“हे अर्जुन! जो भक्त जिस प्रकार मुझे भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ (जिस भावना से मेरी उपासना करते हैं, उसी के अनुसार, मैं उनकी कामनाओं को पूरी करता हूँ) क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।” (अध्याय 4 ग्यारहवाँ श्लोक)
भगवान् सबकी सुनते हैं
प्रस्तुत श्लोक को दसवें श्लोक के साथ आत्मसात् करने का प्रयास किया जाए, तो ही समझ में आ सकेगा। ज्ञान की तपः शक्ति से अभिपूरित होकर (ज्ञान तपसापूताः), अपरा प्रकृति से मुक्त होकर भगवान् के स्वरूप को, स्वभाव को जो प्राप्त होते हैं, वे दिव्य जन्म और दिव्य कर्म के मर्म को जान लेने के कारण वीतरागता की सिद्धि को प्राप्त हो भय व शोक से मुक्त होकर उनकी चेतना में ही निवास करने लगते हैं। वे भगवान् के स्वरूप और स्वभाव को प्राप्त होते हैं। इस तरह भगवान् दिव्य व्यक्तित्व के रूप में अवतरित होते हैं। अवतार किस रूप में, किस नाम से आएंगे, भगवान् के किस पहलू को मानव जाति के समक्ष रखेंगे, इसका विशेष महत्व नहीं है। क्योंकि भिन्न-भिन्न प्रकृति के अनुसार जितने भी विभिन्न मार्ग हैं, उन सभी में मनुष्य भगवान् द्वारा नियत मार्ग पर ही चल रहे हैं। मनुष्य चाहे जिस तरह भगवान् को अपनाता, उनसे प्रेम करता, आनंदित होता हो, भगवान् उन्हें उसी तरह से अपनाते, उनने प्रेम करते व आनंदित होते हैं, यही भाव आया हैं “ये यथा माँ प्रपद्यन्ते ताँस्तथैव भजाम्यहम्“ में।
कोई भी व्यक्ति प्रभु का किसी भी रूप में आह्वान करें, चाहे वह चर्च में हो, मस्जिद में, बौद्ध विहार में, गुरुद्वारे में या मंदिर में, उसकी जैसी उपासना पद्धति, जितनी गहरी उसकी तीव्रता होती है, भगवान उसकी सुनते हैं। आह्वान का, उपासना का ढंग कुछ भी हो, यदि मूलभूत अनिवार्य शर्तें पूरी होती हों तो उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होंगी, यह प्रभु का आश्वासन है। जिस व्यक्ति की गहन तन्मयता के साथ जैसी कामनापूर्ति के लिए तप किया जाएगा, उसकी उसी निष्ठापूर्वक प्रार्थना को भगवान् द्वारा सुना जाएगा। फिर यह शिकायत करना जायज नहीं कि भगवान् ने हमें यह दिया, उसे यह दिया। जैसी मन की आँतरिक स्थिति थी वैसा ही मिला। कबीर साहब ने इसी बात को इस तरह लिख दिया हैं-
जिहि हरि जैसा जाणियाँ, तिनकूँ तैसा लाभ। ओसौ प्यास न भाजई, जब लगे धसै न आभ॥
“जो ईश्वर को जैसा जानता है या भजता है उसे वैसा ही लाभ होता है। कम भजन से कम व अधिक से अधिक फल मिलता है। ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती, प्यास बुझाने के लिए तो पानी में प्रवेश करना ही होता है।”
गीता के इस ग्यारहवें की और भी विस्तृत तथा आगे के श्लोकों की व्याख्या अब आगामी अंक में।
श्री कबीर साहब ने लिखा है-
सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार। लोचन अनंत उघड़िया, अनंत दिखावणहार॥
“सद्गुरु की महिमा अपरंपार है। उन्होंने शिष्य पर अनंत उपकार किए हैं। उनने विषय-वासनाओं से बंद शिष्य की आँखों को ज्ञान द्वार खोलकर उसे सान्त नहीं अनंत तत्व ब्रह्म का दर्शन करा दिया है।” आगे इसी प्रसंग में वे लिखते हैं-
भली भई जु गुर मिल्या, नहीं तर होती हाँणि। दीपक दिष्टि पतंग ज्यूँ, पड़ता पूरी जाँणि॥
“अच्छा हुआ कि सद्गुरु मिल गए, वरना बड़ा नुकसान होता। जैसे सामान्यजनक पतंगे के समान माया की चमक-दमक में पड़कर नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही मेरा भी नाष हो जाता। जैसे पतंगा दीपक को पूर्ण समझ लेता है, सामान्यजन माया को पूर्ण समझकर उस पर अपने आपको निछावर कर देते हैं। वैसी ही दशा मेरी भी होती।”
गुरु के माहात्म्य को सद्गुरु कबीर से अच्छा और कौन समझा पाता है। परमपूज्य गुरुदेव के प्रसंग में जब भी हम उनके लीला संदोह के विषय में गहरा और गहरा चिंतन करते हैं, तो यही बोध होता है कि कितने भाग्यशाली हैं हम, जिन्हें ऐसे गुरु मिले। उनके ही हाथों से लिखा 7 सितंबर 1967 का एक पत्र यहाँ उद्धृत कर रहे हैं-
“रामकृष्ण परमहंस के रूप में देखना एक सत्य है। हमारे उस जीवन में भी आप हमारे साथ बहुत अधिक संबद्ध रहे हैं। वे ही स्मृतियाँ अब उभर आती हैं।”
रामकृष्ण परमहंस के रूप में देखना एक सत्य है। हमें उस जीवन में भी इसे मात्र बहुत अर्थात् संवत् रहे हैं। वे ही पहले अब भी आती है।
स्वप्न में शिष्य ने जैसा देखा, लिख दिया। गुरुसत्ता ने स्पष्टीकरण कर बोध करा दिया। सद्गुरु के रूप में हमारे बंद चक्षुओं को खोलकर ज्ञान का, सत्य का मार्ग दिखाना गुरु का कार्य है एवं वह उसे बखूबी करता है। जीवन-साधना के पथ में एकमात्र पथ प्रदर्शक गुरुसत्ता ही है। वे कदम-कदम पर साथ चलकर मार्गदर्शन करते हैं। अंधेरी गलियों को प्रकाशवान् बनाते हैं। इसी प्रकार एक साधक को 28-11-1951 को लिखा एक पत्र यहाँ पठनीय हैं।
“आपकी साधना ठीक गतिपूर्वक चल रही है। आपका व्यावहारिक जीवन जिस स्थिति में हो, उसी के अनुरूप मनोदशा रहे, इसका हम प्रयत्न करते हैं। अधिक उत्साह एवं आवेश उत्पन्न हो जाए, तो आपको बाह्य जीवन में उलट-पलट करनी पड़ेगी। इसलिए हम यह प्रयत्न करते रहते हैं कि शांत तरीकों से चुपचाप आपका अंतरात्मा पकता रहे और व्यावहारिक जीवन में कोई उलट-पुलट न आने पाए। अन्यथा आप गृही से विरागी हो सकते हैं। वह स्थिति आपके कर्म बंधनों को पूरा होने तक, गृहस्थ का उत्तरदायित्व हल्का होने तक आ जाना ठीक नहीं।”
आपकी साधना ठीक शांतिपूर्वक चल रही है। आप का व्यवहारिक जीवन निर्वात में हो उसी के अनुरूप आदेश रहे उसका हम प्रकट करते हैं। आवश्यक उत्तम एवं आवेश उत्तक हो जाये तो आपको बाह्य जीवन में उलट पलट करनी पड़ेगी। इसलिए हम पर प्रसन्न करते रहते हैं कि षाना तरीकों से चुपचाप आपका अंतःकरण एकता रहे और व्यवहारिक जीवन में कोई से उलट पलट न आने वाले। आपका आप नहीं में निराशी हो सकते हैं। वह स्थित आपके कर्म वक्रतों को पूरा होने तक गृहस्थ कर एक आस्तिक हलका होने तक ठीक नहीं।
साधना संबंधी व्यावहारिक मार्गदर्शन कितना गहरा हैं, यह यहाँ देखा जा सकता है। अक्सर होता यह है कि अति उत्साह में व्यक्ति कुछ ज्यादा ही करने की सोचता है। बहिरंग जीवन अस्त-व्यस्त होने लगता है। परिवार में सभी गड़बड़ाने लगते हैं। साधारण सद्गृहस्थ बने रहकर साधना करना आसान हैं, परंतु उस समय अत्यधिक आवेश के कारण वैरागी होने का, घर से भागकर कहीं निर्जन में तप करने का मन करता है, तब यह मार्गदर्शन कितना युगानुकूल है कि कहीं गृही से वैरागी होने की बात न सोच बैठना। पहले गृहस्थ के उत्तरदायित्वों को पूरा करना, कर्म बंधनों को शिथिल करना और चिंता मत करना, हम तुम्हारे साथ है, तुम्हारी अंतरात्मा को धीरे-धीरे पका रहे हैं। बस जितना बताया है उस पर चलो।
इसी प्रकार का, लगभग ऐसे ही आशय का एक और पत्र 31-3-67 को अंजार (कच्छ) के श्री लाभशंकर जी दवे को लिखा हमारे पास है। पूज्यवर लिखते हैं-
“ढलती आयु में वैराग्य उचित हैं, पर यह वैराग्य पलायनवादी-अकर्मण्य न होना चाहिए। आप भविष्य में एक उच्चकोटि के धर्म प्रचारक बनें। ब्राह्मण जीवन ऐसे ही पुनीत उद्देश्यों के लिए मिलता है। आप स्वयं प्रकाशवान् बनें और संसार में प्रकाश उत्पन्न हो, ऐसी योजना भविष्य के लिए बना लें।”
ढलती आयु में वैराग्य उचित है। वह वैराग्य, पलायनवादी अकर्मण्य न होना चाहिए। आप भविष्य में एक उच्चकोटि के धर्म प्रचारक बनें। वयस्क जीवन ऐसे ही दुर्लभ उद्देश्य के लिए मिलता है। आप स्वयं प्रकाश वान बनें और संसार में प्रकाश उत्पन्न हो ऐसी योजना बना लें।
सहज ही कभी भी इस भौतिकवादी दुनिया से वैराग्य की भावना जाग उठती है। मन चाहता है कि सब छोड़कर हिमालय चल दें, गृहस्थी की बोझभरी जिंदगी से मुक्त हो एकाकी मस्तमौला जीवन जियें, किंतु परमपूज्य गुरुदेव अध्यात्म का क, ख, ग, समझाते हैं व कहते हैं कि अकर्मण्यता वैराग्य नहीं है। धर्मप्रचार हेतु किया जाने वाला सत्कर्मरूपी पुरुषार्थ गृहस्थी में भी संभव हो सकता है और वह ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। वे लिखते हैं कि ब्राह्मण जीवन मिला है, सही अर्थों में ब्राह्मण हैं, तो प्रकाशवान् बनें, प्रकाश का विस्तार करें। “रत्नप्रभं दिव्यमनादिरुपं दीप्तिकरं विषालम्“ से उक्ति दी है परमपूज्य गुरुदेव ने ब्राह्मण की। वही प्रारंभिक शिक्षा लाभशंकर जी को मिली। लाभशंकर दवे जी ने अपना सारा जीवन पूज्यवर की विचारधारा के प्रचार-प्रसार में लगा दिया। उनने अंजार-गाँधीधाम गायत्री शक्तिपीठ के निर्माण में महती भूमिका निभाई। कच्छ के प्रवेशद्वार पर स्थित अंजार शक्तिपीठ एकमात्र ऐसा देवालय था, जो विगत जनवरी के भूकंप के तबाही भरे महाविनाश में खड़ा रहा। एक खरोंच तक नहीं आई है, इस शक्तिपीठ व इसके आसपास के क्षेत्र में, जबकि सारा अंजार ही ध्वस्त हो गया है। उस महासत्ता की अनुकंपा पाए हमारे लाभशंकर जी आज हमारे बीच तो नहीं हैं, पर सभी उनके पुण्य-परमार्थ को बराबर याद करते हैं।
साधनाओं में साधकों को कई प्रकार की बाधाएँ आती है। कभी-कभी मन परेशान हो जाता है। ऐसे में सभी साधक अपनी मनोव्यथा पूज्यवर को लिख बैठते हैं। तब उनके उत्तर हम सबके लिए मार्गदर्शक बन जाते हैं। 12-1-61 को राठ के श्री रामस्वरूप चाचोदिया जी को लिखा पत्र इस संबंध में प्रस्तुत है।
“तप को भंग करने के लिए आसुरी शक्तियां सदा गड़बड़ी फैलाती है। प्राचीनकाल में भी ऐसे ही विघ्न आते थे, जिनके कारण ऋषि-मुनि बहुधा चिंतित रहते थे। आपके तप को भी नष्ट करने का आसुरी शक्तियों ने प्रयत्न किया है। जो सर्प, जो बालक, जो पुरुष आपके निकट घूमता रहा हैं, वह असुरत्व ही है। माता का प्रकाश प्रदीप्त होने से उसका कुछ वश नहीं चला। आपके स्वप्नों से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि दैवी और आसुरी शक्तियां आपके संबंध में अपने-अपने दाँव फेंक रही है। हमें विश्वास हैं, अंत में आपका दैवी तत्व ही सफल होगा।”
तप को करने के लिए आसुर शक्तियां एक गड़बड़ी फैलाती है। प्राचीन काल में भी ऐसे विघ्न आये थे जिसके कारण ऋषि मुनि बहुत चिन्तित रहते थे। आपके तप को भी काट करने का आसुरी शक्तियों ने प्रयास किया है। और सर्प जो बालक जो पुरुष आपके बिना घूमता रहा है वह असुरता ही है। आज तक प्रकाश प्रदीप होने से उसका भय सध नहीं चला। उसके समयों से यह प्रतीत होता है कि देवी और आसुरी शक्तियां आपके समय में अपने अपने दाँव पर नहीं है।
साधक की चिंता थी स्वप्न में होने वाले कई तरह के अनुभव। साधना में मन भी नहीं लगता था। ऐसे में स्पष्ट मार्गदर्शन मिलते हैं। आश्वासन मिलते ही साधना सफलता की ओर अग्रगामी होने लगती है।
कई बार साधकों को उच्चस्तरीय आनंद की साधना के माध्यम से अभीप्सा रहती है। मन उसे पाने को लालायित हो उठता है। लगता है कि गुरुसत्ता अभी उन साधना सूत्रों को हमें बता नहीं रही है। बारंबार आग्रह करने पर पूज्यवर का उत्तर इस प्रकार होता था। 12/2/54 को श्री धर्मपाल सिंह जी (चाँदपुर बिजनौर) को लिखा पत्र इस संबंध में द्रष्टव्य है।
“आनंद मनोलय का एक लक्षण है। कर्मयोग में वैसा आनंद नहीं आता, पर कर्तव्यपालन का संतोष रहता है। यह संतोष ही कर्मयोग का आनंद है। आप अपने मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक बढ़ते चलें। मनोलय के आनंद की चिंता न करें, क्योंकि वह भी इंद्रिय आनंद से कुछ ऊँचा, एकाग्रताजन्य मानसिक आनंद ही है। साधना से शुद्ध हुआ आत्मा जब अपनी मूल स्थिति को पहुँचता है तो वह स्वयं ही आनंदमय हो जाता है।”
आनंद मनोलय कर एक लक्षण है। कर्म योग में वैराग्य आनंद नहीं आता पर कर्तव्य पालन कर संतोष रहता है। यह संतोष ही कर्मयोग का आनंद है। आप अपने मार्ग पर दृढ़तापूर्वक बढ़ते चलें। मनोलय में आनंद की चिंता न करें क्योंकि वह भी इन्द्रिय आनंद से एकाग्रताजनक मानसिक आनंद ही है। साधना से शुद्ध हुई आत्मा जब अपनी मूल निर्वात में पहुंचती है तो वह स्वयं तो वह स्वयं ही आनंद हो जाता है।
कितना सरल-सुँदर स्पष्टीकरण है एवं उंगली पकड़कर किया गया मार्गदर्शन है। सद्गुरु के माहात्म्य का इसी कारण ग्रंथों में गायन किया गया है। बार-बार यही बात कही जाती है कि आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में अवलंबन गुरुसत्ता का ही लें। हमारे जो भी संशय हैं, वे स्वतः ही दूर हो जाते हैं। जो हम चाहते हैं, फिर हमें वही उपलब्ध होने लगता है।
कबीरदास जी ने सही ही कहा है-
सतगुरु साँचा सूरिवाँ, तातैं लोहिं लुहार। कसणी दे कंचन किया, ताई लिया ततसार॥
“सदगुरु सच्चा सूरमा हैं, जो लोहे के समान तामसिक वृत्ति से भरे शिष्य को भी साधना की आग में गरम कर आकार दे देता है। उसका तमस दूर करता है। (यहाँ गुरु का द्रष्टाँत लोहार (थूरमा) और शिष्य का तमस भरे लोहे से दिया गया है।) दूसरी पंक्ति में गुरु को सुनार कहा गया हैं, जो सोने के समान शिष्य को साधना की आग में गरम कर शुद्ध करता है और ज्ञान-कसौटी पर घिसकर उसकी शुद्धता प्रमाणित करता है।”
कबीर को समझ लिया तो हमने सद्गुरु को समझ लिया। परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी को समझ लिया, तो हमने गुरुतत्त्व के मर्म को जान लिया। ऐसे में एक अंतिम पत्र और देख लें। सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा। यह पत्र 3/2/51 को भिण्ड म.प्र.) के श्री राममूर्ति दीक्षित को लिखा गया था।
“हम तुम्हारी आत्मा में अधिक तीव्र ब्रह्मतेज प्रवेश करने के उद्देश्य से पिछले दिनों कई बार भिंड गए हैं। उसी सूक्ष्म यात्रा को तुमने स्वप्न में देखा है। वह केवल स्वप्न नहीं हैं, वरन् एक सच्ची अनुभूति है।
पिछले जन्म में तुम उच्च कोटि के तपस्वी थे। कुछ साधना शेष थी। उसे पूरा करने तथा कुछ प्रारब्ध भोगने को शेष थे, इन्हें भोगने को यह जन्म लेना पड़ा। अब उस पूर्व लक्ष्य की ओर ही अधिक ध्यान देना चाहिए। साँसारिक माया में फिर पैर फंस जाए, तो पीछे वह उद्देश्य नष्ट हो जाएगा और चौरासी के चक्र में फिर लाखों वर्ष घूमना पड़ेगा। इस झंझट से सावधान करने के लिए हम अक्सर तुम्हारी सूक्ष्म चेतना को स्पर्श करने जाया करते हैं।”
पिछले जनम में तुम उच्च कोटि के तपस्वी थे। इस साधना शोक के लिए करने के लिये शेष नहीं है।
बिना किसी व्याख्या के यह प्रसंग यहीं समाप्त करते हैं।
इस सहस्राब्दी का प्रथम गणतंत्र दिवस। नई दिल्ली में राजपथ पर भारत के इक्कीसवीं सदी के सैन्यशक्ति संपन्न भारत के दर्शन को हजारों आँखें प्रत्यक्ष व लाखों-करोड़ों नजरें टेलीविजन पर लगी थीं। कुछ ही अवधि बाकी थीं, जब राष्ट्रपति को राजपथ की परेड का सैल्यूट लेना था। यह सब कुछ हुआ, पर तबाही के उस ताँडव के बाद, जो प्रातः आठ-पचास की वेला में अब तक के सबसे भयावह भूकंप के रूप में घट गया। राष्ट्र का सबसे संपन्न कहा जाने वाला व्यवसायिक दृष्टि से संपन्न राज्य गुजरात कुछ ही क्षणों में मौत व तबाही के नजारे में बदल गया।
तबाही का मंजर
गणतंत्र दिवस न होता तो अनुमानतः सरकारी आंकड़ों के अनुसार तीस हजार एवं जनसामान्य के आकलन के अनुसार प्रायः एक लाख मौतों का अनुपात कई गुना होता, ऐसा कइयों का मत है। कई लोग इसलिए बच गए कि वे घरों में न होकर खुले मैदानों में थे, अपने नौनिहालों के साथ मौजूद थे। छुट्टी का दिन था, कई लोग इस कारण काल कवलित हो गए कि वे बिस्तरों में थे एवं टेलीविजन पर परेड देखने के बाद तरोताजा होना चाहते थे। अजार के एक स्कूल की चार सौ बच्चों की एक रैली गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में एक सँकरी गली से निकल रही थी, जय-जयकार के नारे लगा रही थी, पर भूकंप ने हिलती भवन की दीवारों को उन पर ढहा दिया। अधिकांश अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गए। कुछ ही बच गए। छुट्टी के दिन विशेष रूप से आयोजित एक परीक्षा में अहमदाबाद मणीनगर के एक विद्यालय में भाग ले रहे बच्चों में से एक बहुत बड़ा हिस्सा स्कूल भवन के धराशायी होने से यौवन में पैर रखने से पूर्व ही धरती से चला गया। क्या कहा जाए? कुछ समझ में नहीं आता। गणतंत्र दिवस ने बचाया भी, मारा भी।
मलबों में दबी सिसकियाँ
अंदर से आवाज आ रही “हो अमने बचावो” “अरे कोई बचावो” एवं बड़ी-बड़ी मलबा हटाने वाली मशीनें लगी हों, तब भी बचावकर्मी कुछ न पा रहे हों तो क्या करें? मलबा बेहद सावधानी और सतर्कता से हटाया जाना था, क्योंकि भीतर मौजूद लोग कहाँ-किस तरह दबे हैं, यह जानकारी नहीं थी। जैसे-जैसे समय गुजरता गया, भारी सीमेंट-कंक्रीट को तोड़कर स्थान बनाने में वक्त निकल गया, ऐसी आवाजें क्रमशः धीमी होती चली गईं। यह नहीं कि बचाया न गया हो। लोग मलबे में दबे एक घंटे नहीं, चौबीस घंटे नहीं, बारह-पंद्रह दिन बाद तक निकल हैं। कैसे-कैसे भगवान् ने उनको जीवित रखा हैं, ये सब अपने आप में याद रखने योग्य संस्मरण हैं, परंतु यदि ये भारी सीमेंट-कंक्रीट के स्लैब न होते, बहुमंजिली भवनों के ताश के पत्तों के गिरने की तरह ढलने की प्रक्रिया न होती, तो शायद अधिकांश की जान बचाई जा सकती थी।
बचाव कार्यों की तकनीक जो उपयोगी हो सकती थी
मलबे में कैमरे को डालकर जीवित लोगों को देखा जा सकता है। अनावश्यक खुदाई कर कष्ट में फंसे व्यक्ति को और अधिक तकलीफ देकर मारने की जरूरत नहीं। पर अभी संभवतः यह तंत्र हमारे यहाँ विकसित नहीं हो पाया है। सेंसर की मदद से साउंड मशीनों के जरिए मलबे के बड़े क्षेत्र में जीवित लोगों को तलाशा जा सकता है। इसके अलावा इस तरह की आपदा में खोजी कुत्ते बहुत कारगर होते हैं। वे इसके लिए प्रशिक्षित होते हैं और कुछ पता चलने पर ही भौंकते हैं। स्विट्जरलैंड, क्रोएषिया, यूक्रेन, फ्राँस, रूस, इंग्लैंड, स्वीडन आदि देशों में ऐसी तकनीक से संपन्न खोजी कुत्ते लेकर ढेरों टीमें पहुँचीं। उनने काफी जीवित व्यक्तियों को निकाला भी। परंतु जब दल आ जाएं व स्थान विशेष तक बड़ी देर से पहुँचें, केवल शासकीय मशीनरी की काहिली के चलते, तो कोई क्या कर सकता हैं? स्विस एयर का विशेष विमान रेडक्राँस की व डिजेस्टर रिलीफ की टीम लेकर 16 टन उपकरणों के साथ 27 जनवरी की प्रातः मात्र 14 घंटे के अंदर अहमदाबाद पहुँच चुका था। ऐसे और भी दल 28 व 29 जनवरी की शाम तक आ गए थे। यह अलग बात है कि हम उनका पूरा लाभ न ले पाए। मौत कभी किसी की प्रतीक्षा करती है?
देश का अब तक का सबसे बड़ा राहत अभियान
गुजरात की इस त्रासदी ने अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर वायुसेना के विमानों, सेना के बलों तथा शासकीय अधिकारीगणों, विदेशी सहायता दलों, स्वैच्छिक समाजसेवी संगठनों के माध्यम से इस शताब्दी सबसे बड़ा राहत अभियान देखने का अवसर दिया। राहत सामग्री प्रायः हर घर से, हर नागरिक की ओर से सौराष्ट्र व कच्छ पहुँची। चूँकि नाम भुज का था, अतः अधिकांश राहत दल शुरू में वहीं पहुँचे, किंतु धीरे-धीरे वे आस-पास के क्षेत्रों में, गाँवों-ताल्लुकाओं में फैलते चले गए। अखिल विश्व गायत्री परिवार, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, स्वामी सेवक संघ, स्वामी नारायण संप्रदाय, विश्व हिंदू परिषद, स्वाध्याय परिवार सहित सिख-मुसलिम सभी संगठन अपने दल-बल के साथ चौबीस घंटों में पहुँचकर सक्रिय हो गए, तुरंत ही जीवितों को निकालने, उन्हें फर्स्ट एड देने, आर्थोपेडिक स्तर पर कुशलतम सहायता देने का क्रम आरंभ हो गया। सुदूर गाँवों में यह विशेषज्ञ स्तर की मदद देरी से पहुँची, पर स्वैच्छिक संगठनों ने अपनी ओर से कोई कसर न रखी।
सामान्यजन कई बार भूल जाते हैं कि ऐसी तबाही के ताँडव में सरकारी अधिकारी, उनके कार्यालय व परिवार भी चपेट में आ जाते हैं। राहत सामग्री के वितरण में देरी हेतु उन्हें दोष देने का क्रम इस बार नहीं चला, क्योंकि वे स्वयं भी पीड़ितों में से थे। जो भी संगठन जहाँ पहुँचा, कैंप डालकर सबसे पहले तात्कालिक राहत कार्यों में लग गया। शांतिकुंज हरिद्वार का दल भचाऊ पहुँचकर वहाँ के चौराहे पर 26 की शाम को कैंप लगाकर 27-1 की प्रातः वहाँ से नियमित दवाओं, भोजन आदि कही आपूर्ति आरंभ कर चुका था। बाद में स्थान बड़ा होता गया एवं उसने आस-पास के सभी संगठनों के आधार शिविरों को न केवल वाहन उपलब्ध कराए, उन्हें भोजन-पानी भी उपलब्ध कराया एवं एक अस्थाई नगर का निर्माण भी होता चला गया। भुज कलेक्ट्रेट, अंजार गायत्री शक्तिपीठ, भचाऊ नगर (जोकि पूरा विस्मार हो गया था) राजमार्ग से लगा चौराहा तथा मोरबी-मालिया क्षेत्र में चार कैंप 29 जनवरी की शाम से गायत्री परिवार की ओर से आरंभ कर दिए गए थे। विभिन्न संगठन अपनी ओर से विशेषज्ञों, चिकित्सकों, राहत दलों, लाश निकालने वाले स्वयंसेवी कार्यकर्त्ताओं के साथ सक्रिय रहे, यही कारण था कि मृत्यु के आंकड़े जहाँ बढ़ सकते थे, वहाँ सिमटकर रह गए।
बड़ी व्यापक तबाही हुई है कच्छ-सौराष्ट्र में
लगभग 7.9 तीव्रता वाले (पूर्व में 6.9 इसे आँका गया था) इस भूकंप ने अपने केंद्र अमरसर (भुज से बीस किलोमीटर उत्तर-पश्चिम) से तबाही आरंभ कर तीन मिनट में पूरा भुज जिला, राजकोट, जामनगर, मोरबी, सुरेंद्रनगर, भावनगर तक को प्रभावित कर दिया था। अहमदाबाद, सूरत आदि शहरों की तबाही मानवजन्य हैं, पर हुई तो है। सर्वाधिक मौतें भुज में हुईं, उसके बाद अंजार, भचाऊ, रापर और मोरबी शहरों में हुई हैं। दो मंजिल से अधिक के जितने भी भवन थे, भुज शहर व अंजार के पुराने शहर में बिस्मार हो गए। जिले के 55 गाँव लगभग 6 प्रतिशत से अधिक नष्ट हुए हैं। बिजली, पानी, टेलीफोन के अभाव में स्थिति प्रलय की तरह लगती थी। अहमदाबाद, राजकोट, जामनगर, सुरेंद्रनगर जिले एवं सौराष्ट्र के गाँवों में भी काफी जानें गईं। घायलों के आंकड़े भी पचास हजार से ऊपर हैं। प्रसन्न चित्त रहने वाले, जीवट के धनी एवं अपने हस्त शिल्प के लिए विश्वविख्यात भुज-कच्छ क्षेत्र मानों भूतों के एक डेरे में बदल गया। वायुसेना स्टेशन, सिविल अस्पताल व अधिकांश सरकारी दफ्तर धराशायी हो गए। परंतु मानवी पुरुषार्थ ने अस्थाई अस्पतालों का निर्माण कर तंत्र पुनः खड़ा कर दिया। बिजली विभाग ने जहाँ संभव था बिजली की सप्लाई 1 फरवरी तक आरंभ कर दी थी, साथ ही पानी के टैंकर भी स्थान-स्थान पर पहुँच गए थे। शुरू में तो मात्र पानी के पाउचों व बॉटल्स का ही सहारा था, जो सारे देश से बहुसंख्य मात्रा में पहुँच गए थे। एक सबसे अच्छा कार्य यह हुआ कि सड़क विभाग के निर्माण की दक्षता के कारण कहीं भी सड़कें नहीं बैठी एवं सब ओर राहत दल पहुँच सके। दूसरा दूरसंचार की लाइनें बिछा पाना तो संभव नहीं था, किंतु मोबाइल फोन का सेल्युलर नेटवर्क पाँच दिन के अंदर आरंभ हो गया। इससे पारस्परिक तालमेल स्थापित करने में बड़ी मदद मिली।
भय व आतंक चारों ओर
जब धरती काँपने लगी, तो डर के मारे कई लोग ऊँची मंजिलों से कूद पड़े। कुछ शायद बच जाते, पर जान गंवा बैठे एवं कई घायल हो गए, अपने पैर तोड़ बैठे। भूकंप के बाद भी कई दिनों तक ऊर्जा निकलती है। अतः ‘आफ्टर शॉक्स’ आते हैं। इन्हें गुजराती में ‘आँचके’ हिचकोले कहते हैं। ये भी कभी 1 या 2 तीव्रता के, कभी 5 से भी अधिक तीव्रता के होते हैं। कई दिन तक आते रहे इन हिचकोलों (आँचकों) ने भी कइयों को भयभीत कर घर से बार निकालने या कूदने पर मजबूर कर दिया। बच्चों में जहाँ दहशत थी, वहाँ बड़े अपने घरों में रहने को लगभग बीस दिन बाद तक भी तैयार नहीं हो पाए थे। क्या बड़े, क्या छोटे सभी टैंपरेरी टेंट में घर के बाहर सड़क के किनारे निवास करने को तैयार हैं, पर प्रायः जर्जर हो गई छह सौ से अधिक इमारतों में रहने की हिम्मत नहीं हो रही है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार उस भय को सामान्य स्थिति आने में अभी काफी समय लगेगा। सबसे बड़ी चिंता उनकी हैं, जो इस हादसे में एकाकी रह गए हैं। कहीं किसी घर में एक या दो बच्चे रह गए हैं, तो कही एक 8 साल की बूढ़ी अम्मा जिंदा रह गई हैं, मानो प्रकृति भी उनसे मजाक कर रही हो। जो परिवार उजड़ गए हैं, उन्हें मनोवैज्ञानिक आधार देने में काफी समय लगेगा। शवों और घायलों के दृश्य सारे विश्व ने अपने टी.वी. स्क्रीन पर देखे हैं। महाविनाश की झाँकी भी देखी हैं। अभी लाखों लोग उसे नहीं भूल पाएंगे। पत्थर दिल आदमी भी पिघल जाए, ऐसे दृश्य हममें से कइयों ने अपनी आँखों से देखे हैं।
सेना की सराहनीय भूमिका
सेना के जवानों ने प्रारंभिक एक सप्ताह में जिस तरह कार्य को अंजाम दिया है, सराहनीय है। हमेशा की तरह सेना के जवान तुरंत बचाव कार्य में लग गए। मलबों से कई जिंदा लोगों को निकालने, अस्पताल पहुँचाने का श्रेय उन्हीं को जाता है। वायुसेना ने मानो दिल्ली व भुज के बीच, दिल्ली अहमदाबाद के बीच एक पुल बना डाला। बड़े-बड़े फोल्डिंग अस्पताल, जेनरेटर्स, इंजीनियरिंग के उपकरण, खाद्य सामग्री, टेंट्स व दवाइयाँ तुरंत उन्हीं के प्रयासों से पहुँच गईं। यूक्रेन का एक सैनिक अस्पताल शांतिकुंज के बेंस कैंप के पास आकर टिका। उसके जनरल व 6 से अधिक मेडीकल, पैरामेडिकल कार्यकर्ताओं ने सात दिन एक कर भचाऊ क्षेत्र में कैंपिग कर गाँवों से ढूंढ़-ढूंढ़कर लाए गए कई फ्रैक्चर आदि के रोगियों का स्थायी इलाज किया।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहायता
तीन दिन के अंदर बीस देशों ने राहत सामग्री भेजी और लाखों डालर के बराबर सहायता का वादा ही नहीं किया, उसे भेज भी दिया। प्रवासी भारतीय भी पीछे नहीं रहे। सभी ने बढ़-चढ़कर योगदान दिया एवं इसमें उनके साथ कार्य करने वाले अमेरिकन्स, कैनेडियन्स, ब्रिटिश सभी ने साथ दिया है। एक जहाज भर के पीने का पानी एवं फ्रूट जूस जहाँ सउदी अरब भेजता है वहाँ एक वर्ष तक पूरे गुजरात के सभी अस्पताल उपयोग कर सकें, इतनी औषधियाँ पूरे यूरोप के देशों ने मिलकर भेजी है। पाकिस्तान ने कंबलों की पूरी खेप एवं भारी संख्या में टेंट भेजे हैं। वसुधैव कुटुँबकम् का एक साकार स्वरूप-सा दीखता है, इस त्रासदी में।
तात्कालिक के बाद अब स्थायी प्रयास जरूरी
तात्कालिक राहत में जो सबसे विलक्षण पहलू सामने आया है, वह है लोगों का स्वाभिमान-मुसीबतों से जूझकर अपने पैरों पर पुनः खड़ा होने का साहस तथा आवश्यक न होने पर सहायक के लिए मना कर देना। जुझारू कच्छ व सौराष्ट्र के लोगों ने राहत सामग्री के लिए कहीं अव्यवस्था नहीं पैदा की, न ही यह देखने को मिला कि कहीं किसी ने कुछ जमा की है। राहत सामग्री तो इतनी पहुँच गई है कि वर्षभर यदि इसका वितरण सुनियोजित ढंग से हो, तो यह सारे सौराष्ट्र व कच्छ को संकट से उबालकर, दुर्भिक्ष से भी निकालकर पुनः खड़ा कर देगी। पीड़ित नागरिक अपनी जगह सही हैं, पर पुनर्निर्माण हेतु तो वे सरकार का मुँह देखेंगे ही। सरकार भी चाहती है कि मकान पुनः बन जाएँ, मानसून आने से पूर्व ही सबके सिर पर छत हो। पर यह मुमकिन नहीं। जिनके घर जहाँ थे, जिस स्थिति में थे, वे उसी तरह वहीं पर बनाना चाहते हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक यही प्रश्न पेचीदा बना हुआ था कि पुनर्वसाहट हेतु सरकार एवं अशासकीय स्वैच्छिक संस्थाएँ किस तरह कार्य करें। यदि प्रशासकीय मशीनरी पर विश्वास नहीं हो पा रहा हैं, तो वह स्वाभाविक है।
जो लोग बेघर हो गए, कच्छ की ठंडी रात्रि व दिन की तपती धूप में अभी मात्र उनमें से पचास प्रतिशत को अस्थायी शरण मिल पाई हैं। झुग्गी-झोपड़ों में जिस तरह ताल पत्री की छत बनाकर अस्थायी रूप से लोग रहते हैं, वैसे ही अधिसंख्य व्यक्ति रह रहे हैं। जो संपन्न थे, समर्थ थे, वे अपने संबंधियों के पास मुँबई, बैंगलोर, गुजरात के अन्य क्षेत्रों में चले गए। सामान चला गया तो क्या, जान तो बची। कई तो संभवतः वापस न भी लौटें। पर अब प्रयास सभी के लिए स्थायी स्तर पर आवास निर्माण के माध्यम से होना है। गायत्री परिवार ने अन्य कई संगठनों के साथ मिलकर प्रत्येक गाँव में एक स्कूल, एक चिकित्सालय का तंत्र खड़ा करने का निश्चय किया है। संभव है सरकार भी उसमें सहायता करे। इसके अतिरिक्त ‘होंमडाउन’ के रूप में कच्छ की पुरानी संस्कृति के अनुरूप ‘भूँगा’ जो पूरी तरह से एयरकंडीशंड भी होते हैं तथा भूकंप विरोधी भी, सहयोगी संगठनों की मदद से निर्माण करने का सोचा है। भूकंप, तूफान या तापमान की बढ़ोत्तरी से जूझने वाले ये स्थायी निर्माण निश्चित ही लाटूर में की गई गलतियों का समाधान करेंगे।
स्कूलों का निर्माण कर बच्चों की पढ़ाई सतत चालू रखना उन्हें ‘साइकोलॉजिकल ट्रॉमा’ से बचाने का एक प्रयास है। यह कार्य अस्थायी 4 स्कूल खोलकर गायत्री परिवार ने आरंभ कर दिया है। अभी भी बहुत बड़ा क्षेत्र बाकी है, जहाँ यह कार्य होना है। स्थायी कार्यों में भुज के, कच्छ के शिल्प को, शिल्पकारों को अपने पैरों पर खड़ा करने का तंत्र खड़ा करना एक सबसे बड़ा प्रयास होगा। यहाँ की दस्तकारी सारी दुनिया में विख्यात है। यदि इसे पुनरुज्जीवित किया जा सका, तो कच्छ अपने पैरों पर पुनः खड़ा हो सकेगा।
काश यह संवेदना आगे भी जीवित बनी रहे
गुजरात की इस त्रासदी में भारतवर्ष को एक होते देखा गया। संप्रदाय-वर्ग-जाति का भेद भूलकर सभी औरों के हित जीते देखे गए। संवेदना का उभार इस सीमा तक था कि हर व्यक्ति ने अपना न्यूनतम अंशदान दिया ही, कइयों को प्रेरित भी किया। जिस तादाद में राहतकर्मी व सामग्री प्रभावित क्षेत्र में पहुँचे हैं, यह एक कीर्तिमान है। वहाँ के दुखी-आहत-छत से महरुम हुए लोगों के प्रति जगी यह संवेदना इसी तरह जगी रहे, तो हम एक नए भारत को जागकर खड़ा होते देख सकेंगे। अनाथ बच्चे कितने गोद लिए जाते हैं, कितने बूढ़े माता-पिता आश्रयस्थलों पर शरण ले पाते हैं, कितनों को हम उनके घावों पर मरहम लगाकर पुनः वापस लौटा पाते हैं, यह सभी प्रश्न अभी अनुत्तरित हैं, पर सभी में संवेदनशीलों के लिए अनंत संभावनाएं छिपी पड़ी है। यही भारत की थाती है। गुजरात के सौराष्ट्र का लिंबड़ी से पाटडी तक, जौडिया से भचाऊ तक एवं रापर से माँडवी, भुज-अंजार तक का क्षेत्र पुनः उठ खड़ा होगा, इसमें जरा भी अविश्वास किसी को नहीं करना चाहिए। यही आशावाद तो भारतीय अध्यात्म का प्राण है।
26 जनवरी 12 की प्रातः 8.5 की वेला में भारत के पश्चिमी भाग में आए भूकंप ने तबाही और विनाश का जो मंजर खड़ा कर दिया है, उसने सबका ध्यान पुनः प्रकृति के इस रौद्र रूप की ओर खींचा है। भूकंप पहले भी आते रहे हैं, किंतु इक्कीसवीं सदी के आते-आते जिस तेजी से उनके आने की अवधि और समीप आती आ रही है एवं जिस तीव्रता से वे आते जा रहे हैं, हम सभी को सतर्क करने के लिए काफी हैं। 1819 से 195 तक की प्रायः एक सौ तीस वर्ष की अवधि में प्रति 13 वर्ष में एक बार भारत में कहीं भूकंप आता था। 195 से 1975 के बीच में यह अवधि घटकर 6.25 वर्ष रह गई। अब 1988 से 12 के बीच प्रति दो वर्षों में तबाही लाने वाले भूकंप सतत आ रहे हैं। इस रिपोर्ट से हमें अभी से सावधान हो जाना चाहिए एवं विकास के विषय में अपनी रणनीति पर विचार करना चाहिए।
बढ़ती जा रही है तीव्रता इन भूकंपों की
1819 में कच्छ-गुजरात (जहाँ अभी ताँडव नृत्य हमने देखा है) में 8. रीक्टी स्केल की तीव्रता का, 1918 में मध्य आसाम में 7.3 तीव्रता का, 1930 में धुबरी आसाम में 7.1 की तीव्रता का, 1934 में बिहार नेपाल सीमा पर 8.3 तीव्रता का तथा 1941 में अंडमान में पुनः 8.5 की तीव्रता का, 1956 में अंजार गुजरात में 7. की तीव्रता का, 1967 में कोयना महाराष्ट्र में 6.5 की तीव्रता का तथा 1975 में किन्नौर हिमाचल में 6.2 की तीव्रता का भूकंप आया। 1988 में 7.2 की तीव्रता का भूकंप भारत-वर्मा सीमा पर आया था। इसी वर्ष पुनः बिहार-नेपाल सीमा पर 6.5 की तीव्रता का कंपन हुआ था। 1999 में उत्तरकाशी (6.6), 1993 में लाटूर महाराष्ट्र (6.8) हम सबकी याद में अभी भी ताजा है। अब उसी शृंखला में भुज गुजरात में 7.9 की तीव्रता का यह भूकंप आया हैं, जिसने पूरे कच्छ व सौराष्ट्र के बहुत बड़े भाग, अहमदाबाद-सूरतनगर में तबाही लाकर यह चेतावनी दी है कि अब इनकी तीव्रता और भी अधिक होगी, तबाही भी अधिक होगी।
क्यों आ रहे हैं ये हिचकोले
इस बीच इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भूकंप के पाँच सौ से अधिक झटके इस क्षेत्र में आ चुके हैं तथा एलसल्वाडोर, टर्की, इंडोनेशिया, चीन एवं सिएटल वाशिंगटन (अमेरिका का उत्तर पश्चिमी तट) भूकंप से बुरी तरह प्रभावित हो चुके है। यह सब विगत दो माह में ही हुआ है। भारत के विषय में सारे विश्व के भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि यहाँ तेजी से भूगर्भ के नीचे ऊपर की ओर टेक्टाँनिक प्लेट्स के खिसकाने की प्रक्रिया जारी है। पृथ्वी के ऊपरी पटल में ठोस चट्टानों की कई विशाल परतें हैं, जो अपने अंतिम छोरों पर गतिमान रहती है। इन छोरों को प्लेट बाउंड्रीज भी कहा जात है। ज्यादातर भूकंप इन परतों के अंतिम छोरों या फिर परतों में मौजूद दरारों (फाल्ट लाइन्स) से शुरू होते हैं। गुजरात का भूकंप भी इसी तरह का था।
हैदराबाद के ‘नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के वैज्ञानिकों के मुताबिक समुद्रतल हर वर्ष पाँच सेंटीमीटर की दर से उत्तर पूर्वी दिशा में बढ़ रहा है। साथ ही सौराष्ट्र की जमीन विपरीत दिशा में घूम रही है। इस तरह हर 25 से 3 साल में समुद्रतल 125 से 15 सेंटीमीटर फैल रहा है। यही वजह है कि न सिर्फ सौराष्ट्र बल्कि उसके दूसरे छोर हिमालय में भी भूकंप का कारण बन रहा है। प्लेट टेक्टाँनिक थ्योरी की व्याख्या से समझाते हुए वैज्ञानिक कहते हैं कि भारतीय प्लेट में कटाव और उठान हो रहा हैं, जो कि भूकंप का कारण बनता जा रहा है।
तीव्रता का एक अनुमान
वैज्ञानिकों के अनुसार 8 की तीव्रता का भूकंप लगभग 1 मिलियन टन टी.एन.टी. के विस्फोट के बराबर होता है। 1973 में ताँगशान (चीन) जिसमें 65 लोग मरे थे, प्रायः 7.9 स्केल का था एवं इससे अधिक तीव्रता का 8.9 की तीव्रता का भूकंप क्वीटो इक्वेडोर (लातिनी अमेरिका) में आया था। इससे 1.25 मिलियन टन ऊर्जा का विस्फोट हुआ था। हिरोशिमा में हुआ बम विस्फोट इसके दस हजारवें हिस्से के बराबर मात्र का था, इससे भूकंप के महाविनाश की कल्पना की जा सकती है।
भूकंप का पूर्वानुमान असंभव क्यों?
अभी तक कोई ऐसी तकनीक नहीं विकसित हो पाई हैं, जिससे कि पहले से भूकंप की चेतावनी दी जा सके। आइ. आइ. टी. मुँबई के डॉ. पी. बनर्जी कहते हैं कि जापान व अमेरिका के पास भी भूकंप का पूर्वानुमान लगाने वाली कोई विधा नहीं है, जबकि वहाँ अक्सर भूकंप आते हैं। यदि ऐसा होता तो वे 1994 में कैलीफोर्निया व 1995 में कोबे (जापान) में आए अति विनाशकारी भूकंप का पता पहले लगा लेते। भारत में दो प्रमुख पट्टियाँ हैं, तो भूकंप से जुड़ी है, ‘मेन सेंट्रल थ्रस्ट’ एवं ‘मेन बाउंड्री फाल्ट’। ये दोनों ही हिमालय क्षेत्र में दो हजार किलोमीटर तक फैली हैं। इतने विशाल क्षेत्र पर नजर रख पाना संभव नहीं। चीनी शोधकर्त्ताओं के अनुसार भूकंप जाने से पहले जीव-जंतु अजीबोगरीब हरकतें करना शुरू कर देते हैं। कैसे इन्हें पहचाना जाए, यह कह पाना संभव नहीं है। वर्तमान गुजरात भूकंप के समय भी कई ऐसे व्यवहार देखने में आए, पर उनसे यह कह पाना मुश्किल था कि भूकंप की त्रासदी से बचा जा सकता था।
पच्चीस वर्ष पूर्व 1975 में हाइचेंग नामक मंचूरियन शहर को चीन के अधिकारियों ने खाली कराके 1 ़ जिंदगी बचा ली थीं। कंपनी-हिचकोलों की बढ़ती तीव्रता एवं पानी के स्तर का ऊँचा-नीचा होना। 7.3 की स्केल पर उनने मापन किया था व उतना ही वह निकला। प्रतिवर्ष दस लाख से अधिक भूकंप के झोंके सारे संसार में आते हैं, अकेले जापान में एक हजार प्रतिदिन। मात्र पिछले तीस वर्षों में ‘प्लेट टेक्टोनिक्स’ के अध्ययन के द्वारा हम जान पाए हैं कि इनमें से कितने वास्तव में कितने खतरनाक होते हैं। फिर भी यह कह पाना असंभव है कि कब-कहाँ कितनी तीव्रता का भूकंप आने वाला है।
वैज्ञानिक बढ़ते भूकंपों का कारण मात्र प्राकृतिक ही नहीं मानवी बताने लगे हैं। भूगर्भीय अणु-आयुधीय परीक्षण, रत्नगर्भा भूमि का अनंत सीमा तक दोहन, बाँधों में जमा पानी के भार से बढ़ता भूगर्भीय दबाव तथा अवशिष्ट द्रव्यों का भूमि की सतह से नीचे रिसते चले जाना। भूकंपों के आने की प्रक्रिया को बलवली कर देते हैं, ऐसा उनका मत है ।
14 जनवरी के ‘द वीक’ साप्ताहिक पत्रिका के अंक में भूकंपों के आने की भविष्यवाणियाँ पक्की थीं। इसमें आर नारायप्रान डॉ. प्रार्थ सारथी प्रेम ऊषा के मन राव भोजराज द्विवेदी एवं के एन सामयाजी आदि सभा न जनवरी 12 से 22 के बीच भूकंपों की शृंखला व दुर्घटनाओं की बाढ़ के विषय में लिखा था। अब यह तो कोई भी न कह सका कि यह अंक पहुँचने के 1 दिन के भीतर ही यह सब हो जाएगा।
नुकसान इतना न होता यदि सावधानी रही होती
वस्तुतः भूकंप में नुकसान धरती हिलने से कम हमारे आश्रयस्थलों-मकानों की छतों के गिरने से अधिक होता है। जितने भी व्यक्ति मरे हैं, वे सीमेंट-कंक्रीट के मलबे में दबने से मरे हैं। भूकंप संवेदनशील स्थान होते हुए भी निर्माण में जिस तकनीक का उपयोग होता चला आया है, उसने सर्वाधिक जान-माल की क्षति की हैं। अहमदाबाद-सूरत में जहाँ बड़ी बहुमंजिला इमारतें गिरी हैं, वहाँ निर्माण के लिए उपयुक्त सामग्री तो घटिया पाई ही गई है, यह भी देखा गया कि वे उन क्षेत्रों में बनी थीं, जहाँ पहले कभी खाली स्थान था, पानी था व उसे भरकर रहने योग्य बना दिया गया। शहरीकरण का वर्तमान स्वरूप कितना त्रासदायक होता है, यह वही जानता है, जिसने अहमदाबाद-सूरत ही नहीं, भुज-अंजार-भचाऊ क्षेत्र में सीमेंट-कंक्रीट का समुद्र देखा है, जिसमें लाशें व सामान एकाकार होकर लुप्त हो गए थे।
भवन निर्माण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सही मानकों का निर्धारण कर समुचित सुरक्षा के उपाय रखे जाएँ, उनका परिपालन भी किया जाए, तो प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले विनाश से बचा सा सकता है। भुज और अहमदाबाद की गगनचुँबी बिल्डिंगों के विषय में यही कहा जा रहा है कि इन नियमों को ताक पर रखकर निर्माण किया गया। नक्शे पास करने में होते भ्रष्टाचार को भी इस महासंहार का कारण माना जा सकता है। यही कारण है कि इतनी ही तीव्रता का भूकंप 1993 में लॉस एंजेल्स में आता है, तो धन की हानि तो होती हैं, किंतु मात्र चार आदमी मरते हैं, 12 में सिएटल में आता है, तो मात्र एक व्यक्ति मरता है, वह भी भूकंप से नहीं हार्ट अटैक से।
मत्स्य पुराण देता है समाधान
वास्तु विज्ञान के मुताबिक किसी भी भूकंपसंवेदी क्षेत्र में जब निर्माण किया जाए, तो कुछ सतर्कताओं का पालन अवश्य किया जाए। मकान या भवन का दक्षिण-पश्चिमी कोना भारी-भरकम बनाया जाए। भवन निर्माण के दौरान दक्षिण-पश्चिमी कोने की दीवारों की चौड़ाई बढ़ा दी जाय। यदि मकान बनाते समय इस बात का ख्याल न रखा गया हो, तो इस कोने में लोहे के भारी-भरकम संदूक, ट्रंक या मशीनरी रख देने चाहिए। मत्स्य पुराण कहता है कि आवास के उत्तर-पूर्वी कोने को हल्का और खुला ही रखना चाहिए। यह इसलिए कि भूकंप की चुंबकीय तरंगें उत्तर से दक्षिण को ओर चलती हैं।
यह भी इसमें उल्लेख है कि भूखंड की पहले गाय के गोबर द्वारा शुद्धि की जाए, दक्षिण-पश्चिमी कोने की नींव भारी कंक्रीट, सीमेंट और स्टील के मेल से रखी जाए। किसी पवित्र नदी की रेत की परत भी नींव में लगाई जाए, जो कम-से-कम 1 इंच मोटी हो। भूखंड जिस पर निर्माण होना है, न अधिक पथरीला हो, न रेतीला। चूने और राख के सम्मिश्रण का भी निर्माण में प्रयोग हो।
आबादी बढ़ रही है, 12 के आगमन के साथ ही प्रकृति ने चेतावनी दे दी है। यही समय है कि हम सँभल लें। गुजरात कुछ वर्षों में पुनः बस जाएगा, पर जो घाव छोड़ गया है, वे अभी वर्षों नहीं भरेंगे। दैवी आपदाएँ हमें दंड भी देती हैं, शिक्षण भी लेने को कहती हैं। अब हम नादान बने रह तथाकथित विकास की दिशा में अनवरत चलें, तो महाविनाश होना ही है।
नई सहस्राब्दी की शुरुआत ही महाकाल द्वारा सभी की, मानव मात्र की एक परीक्षा से हुई है। जिन दैवी आपदाओं से कहर बरसने एवं प्रलय जैसा वातावरण बनने की बात गुरुसत्ता द्वारा 1987 से 199 तक सतत कही जाती रही, लगभग वैसा ही कुछ स्वरूप पिछले दिनों देखने को मिला है। भचाऊ एक बड़ा समृद्ध शहर कच्छ जिले ही नहीं, पूरे गुजरात में माना जाता रहा है। किंतु 26 जनवरी 12 की प्रातः 8 5 से पूर्व तक ही। इसके तीन मिनट बाद वहाँ एक भी सबूत दीवार नहीं बची, सब कुछ जमींदोज जो हो गया था। हमारे आधार शिविर से कुछ पीछे मलबे की सफाई के दौरान एक मृत व्यक्ति की जेब से पूज्यवर का लिखा एक पर्चा मिला, जो गायत्री परिवार के कार्यकर्त्ताओं ने वितरित किया होगा। उसमें युग बदलने, महाविनाश की परिस्थितियों से सँभलने की स्पष्ट चेतावनी दी गई थी। यह पर्चा हमने 22 2 1 को प्रातः गुजरात भर के कार्यकर्त्ताओं की एक गोष्ठी में भचाऊ शिविर में पढ़कर सुनाया। जो छपा था, जो हो चुका था, उसमें कितना गजब का साम्य था। सब दहलकर रह गए। (राजकोट) के पीपल्या चौक के पास छह कैंप लगा दिए गए। अपने विभिन्न जिलों से कार्यकर्त्ता पहुँचने लगे। प्रायः डेढ़ हजार कार्यकर्त्ताओं ने नगरों-कस्बों-गाँवों में जाकर भोजन, राशन, कंबल, दवाओं का वितरण आरंभ कर दिया था। स्वयं श्री गौरीशंकर शर्मा 1 फरवरी से सतत वही बने रह अस्थायी-स्थायी आवास एवं विद्यालयों के निर्माण तथा राहत सामग्री के वितरण का कार्य देख रहे हैं। लाइफ लाइन एक्सप्रेस एवं यूक्रेन के अस्पतालों के समीप होने से सुदूर गांवों से बारह वाहनों, 4 एंबुलेंसों द्वारा मरीजों को लाकर उन्हें स्थायी राहत दी जाने लगी थी। स्वयं डॉ. प्रणव पण्ड्या 18 से 24 फरवरी की अवधि में छह दिन भचाऊ आधार शिविर रुके। उनने भुज व आसपास के क्षेत्र का, जामनगर के सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र जोडिया एवं आमरण का, मोरबी व मालिया में क्षतिग्रस्त गाँवों का, सुरेंद्रनगर में पाटडी तथा लिंबड़ी क्षेत्र का निरीक्षण किया। लौटने से 2 दिन पूर्व 22 2 1 को पूरे गुजरात के सभी कार्यकर्त्ताओं को आपातकालीन मीटिंग में बुलाकर उस क्षेत्र में पुनर्निर्माण की जिम्मेदारियाँ सौंपी गई। लौटते में मुख्यमंत्री
शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ की अपनी ओर से पहल एवं सभी से अनुरोध
शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ से इस त्रासदी में 26 जनवरी को वापस रवाना हो रहे जयंती भाई, वासंती बेन पटेल को राजकोट से तुरंत भूकंप के केंद्र कच्छ पहुँचने को कहा गया। बड़ौदा एवं अहमदाबाद जहाँ भी टेलीफोन से संपर्क हो पाया, वस्तुस्थिति बताने एवं तुरंत राहत कार्य आरंभ करने को कहा गया। 27 जनवरी की प्रातः पचास से अधिक कार्यकर्त्ता शाम तक लगभग तीन सौ तथा 28 जनवरी की प्रातः तक शाँतिकुँज से वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं का चार सदस्यीय दल श्री वीरेश्वर उपाध्याय, डॉ. अमलकुमार दत्ता, ब्रजमोहन गौड़ एवं शिवप्रसाद मिश्रा के नेतृत्व में आधार शिविर पहुँचकर बारह ट्रक राहत सामग्री से अपना कार्य आरंभ कर चुका था।
स्वयं टेली कम्यूनिकेशन विभाग भी प्रभावित होने व उसका असर दिल्ली के एक्सचेंज होने के कारण कहीं भी संपर्क न हो पा रहा था। 12 जनवरी वसंत पर्व के प्रातः गुरुसत्ता के संदेश देने के पश्चात् डॉ. प्रणव पण्ड्या एवं श्रीमती शैलबाला भी 12 जनवरी की शाम ही अहमदाबाद पहुँचकर सीधे आधार शिविर पहुँच गए। 3, 31 जनवरी एवं 1 फरवरी को सारे क्षेत्र का निरीक्षण कर आधार नीति बनाई गई। इस बीच राहत दलों का, सामग्रियों का आगमन आरंभ हो गया था। तुरंत भुज शक्तिपीठ, कलेक्टेऊट, अंजार शक्तिपीठ, गाँधीधाम शक्तिपीठ, भचाऊ बेस एवं मालिया सहित वरिष्ठ मंत्रियों एवं वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा कर कुछ निर्धारण किए गए।
पूरे भारत व विश्वभर से आ रही सहायता को देखते हुए शांतिकुंज द्वारा प्रायः पाँच करोड़ रुपये की राशि से तात्कालिक एवं स्थायी राहत कार्य चलाते रहने की बात कही गई। जितनी राशि इस फंड में आती जाएगी, उसे इसी कार्य में लगा दिया जाएगा। निर्णय लिए गए कि (1) कच्छ जिले में 2, जामनगर में दो, राजकोट में दो तथा सुरेंद्र नगर में एक इस प्रकार पच्चीस गांवों के पुनर्निर्माण में शाँतिकुँज पूरा सहयोग करेगा। अभी तक प्रायः चालीस अस्थायी स्कूल खोले जा चुके हैं, जिनमें दस हजार विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। इसी तरह अस्थायी आवास प्रायः पाँच हजार परिवारों को दिए जा चुके हैं। प्रत्येक चुने गए गाँव में एक प्राइमरी हेल्थ केयर सेंटर एवं एक प्राथमिक पाठशाला का निर्माण हम करेंगे। इनमें प्रायः चार करोड़ राशि लगने की संभावना है।
(2) इसके अतिरिक्त कच्छ क्षेत्र की मूल विरासत वहाँ की दस्तकारी-हैण्डीक्राफ्ट को जिंदा बनाए रखने के लिए प्रायः चार हजार तकनीकी आर्टीजन्स को प्राथमिक आश्रय स्थल, कच्चा सामान व उनके उत्पादों की खपत का तंत्र खड़ा करने का निर्णय भुजौड़ी गाँव की ‘सृजन’ शाखा के सहयोग से किया गया है। लगभग एक लाख व्यक्ति परिवार के सदस्यों सहित प्रभावित हुए हैं। सरकार अपने स्तर पर इनके लिए कर रही है। हम यह चाहेंगे कि कच्छ की मूल संस्कृति जिंदा रहे। आजीविका का आधार जिंदा रहेगा, तो हुनर के आधार पर ये सभी कारीगर दस्तकार पुनः अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे। कच्छ के रण के बन्नी क्षेत्र से लेकर भुज के उत्तर में बड़ी संख्या में ऐसे कारीगर हैं, जिनकी बनाई शालें, स्कार्फ, तकिया, खद्दर आदि विश्वभर में जाते हैं। इस आधार तंत्र को खड़ा करने का मूलभूत कार्य किया जाए, तो यह दस्तकारी जिंदा बनी रह सकती है। (3) इस क्षेत्र में गौधन 11 लाख से अधिक है। प्रायः सभी जीवित है। उन्हें जिंदा बचाए रखने, इनके लिए कैटल शैड्स की व्यवस्था करने, इनके लिए पानी व चारे की व्यवस्था बनाने, गोमूत्र-गोबर से औषधि बनाकर उनसे आधार खड़ा करने की आवश्यकता है। अभी अपने स्तर पर तीन ऐसी बड़ी गौशालाओं के निर्माण का तंत्र शांतिकुंज खड़ा करने पर विचार कर रहा है। गौधन जिंदा रहा, तो ग्रामीण कच्छ एवं सौराष्ट्र पुनः अपने पैरों पर खड़ा हो सकेगा। अकाल की परिस्थितियाँ अप्रैल से ही सामने दिखाई दे रही है।
(4) भुज, गाँधीधाम, भद्रेष्वर एवं भचाऊ के गायत्री शक्तिपीठ आंशिक या पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त हैं। कई परिजन प्रभावित हुए हैं। शक्तिपीठों के नवनिर्माण का तंत्र खड़ा किया जा रहा है एवं परिजनों को प्राथमिक आधार खड़ा करने हेतु सहायता दी जा रही है। भूकंप ने किसी को भी नहीं छोड़ा, फिर भी आश्चर्यजनक रूप से गायत्री परिवार से जुड़े तीन परिवारों को छोड़कर शेष प्रायः एक लाख परिजन सुरक्षित बच गए हैं। भचाऊ आधार शिविर पर नियमित तर्पण-यज्ञ की एवं गाँव-गाँव में, घरों-घरों में शांतिपाठ की व्यवस्था की गई हैं। इससे लोगों का विश्वास लौटा है एवं दग्ध अंतःकरण को शांति मिली हैं।
(भ्) बड़े व्यापक स्तर पर साधना महापुरुषार्थ को गति देने एवं जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन समिति केंद्र शांतिकुंज के मार्गदर्शन में बनाने हेतु परिजनों से कहा गया है। फरवरी 12 के अंक में साधनप्रधान, साधनाप्रधान, श्रमप्रधान तीन उपायों की चर्चा की गई थी। साधनप्रधान में सभी से सप्ताह में न्यूनतम एक बार का भोजन न लेने, उसकी राशि बचाने का अनुग्रह किया गया था। यह भी आँकड़ा दिया गया था कि यदि यह दुगनी हो सके, तो इस निधि से सरकार के समानाँतर एक तंत्र खड़ा कर न जाने कितना बड़ा आधार बन सकता है। मात्र आत्मसंयम की, राशि को बचाने की एवं व्यवस्थित रूप में केंद्र के परामर्श से उसके नियोजन की आवश्यकता है। यदि मात्र ‘अखण्ड ज्योति’ व अन्य सहयोगी पत्रिका के पाठक भी पचास रुपया प्रति सदस्य एकत्र करें, तो पाँच करोड़ की राशि एक माह में एकत्र कर सकते हैं। परिवार के सदस्य जुड़ जाएं, तो यह मात्रा कितनी भी बढ़ सकती है। इस राशि को ‘श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट भूकंप राहत कोष’ के नाम भेजा जा सकता है।
साधना अभियान में सभी से अपनी साधना के अतिरिक्त अनिष्ट निवारण हेतु, विशिष्ट पुरुषार्थ हेतु कहा जा रहा है। वरुण गायत्री एवं पृथ्वी गायत्री के मंत्रों से यज्ञों में आहुतियाँ देने को कहा जा रहा है। सामान्य यज्ञ जो हो रहे हैं, उन्हीं में इन्हें जोड़ लेने से भावी विपत्तियाँ कम हो सकती हैं। श्रम प्रधान कार्यक्रमों में सभी से पुनर्निर्माण के कार्यों में भागीदारी, जलागम क्षेत्रों में श्रमदान, पानी की खेती स्थान-स्थान पर करने, कुएँ व तालाबों को गहरा करने हेतु सामूहिक पुरुषार्थ का आह्वान किया गया है। दुर्भिक्ष इससे कम में नहीं टलेगा एवं एक बार जलस्तर ऊँचा उठने लगे, हरीतिमा का कवच बनने लगे, तो अन्य विपत्तियाँ भी टलेंगी।
(6) पूरे भारत में एक आपदा प्रबंधन वाहिनी खड़ी करने की बात सोची गई हैं। इसमें एक लाख कार्यकर्ताओं को रिस्क्यू एवं रिलीफ कार्य तथा पुनर्निर्माण के कार्य में प्रशिक्षित किया जाएगा। ये चार स्थानों नागपुर या हैदराबाद, अहमदाबाद या जयपुर, देहरादून या दिल्ली तथा भुवनेश्वर या रायपुर क्षेत्र में बने केंद्रों से जुड़े रहेंगे। कभी भी कोई भी प्राकृतिक आपदा आने पर पूर्णतः प्रशिक्षित ये कार्यकर्ता तुरंत वहाँ पहुँचेंगे एवं कुछ ही घंटों में अपना कार्य प्रारंभ कर देंगे। इन्हें केंद्र के मार्गदर्शन में फर्स्ट एड से लेकर प्राथमिक राहत सामग्री के वितरण, एक चलते-फिरते अस्पताल के साथ पहुँचकर प्रारंभिक कार्य करने, बाढ़, भूकंप, दुर्भिक्ष एवं तूफान की स्थिति में निपटने हेतु तैयार किया जाएगा। निर्माण विशेषज्ञों, इंजीनियर्स की एक टीम सबके साथ जुड़ी रहेगी, जो तुरंत तात्कालिक कार्य करने लगेगी। आपदाओं की भविष्यवाणियाँ तो नहीं की जा सकतीं, पर उनसे मोर्चा लेने हेतु सतत उद्यत रहने को यदि विशेषज्ञ बल हमारे पास होगा, तो हम समाज की, पीड़ित मानवता की विशेष सेवा कर पाएँगे। इच्छुक परिजनों से इसके लिए शांतिकुंज से संपर्क करने को कहा जा रहा है।
संगठनों के संगतिकरण का एक महायज्ञ पिछले दिनों आपदा की स्थिति में देखने को मिला। यदि यह भावना वस्तुतः जीवित बनी रहे, तो किसी भी प्रतिकूलता से जूझने की, मानव मात्र के प्रति संवेदना के जागरण की, राष्ट्र-धर्म के प्रति समर्पित होने की मनःस्थिति स्थायी बनाई जा सकती है। कुछ दिनों में लोग भूल जायेंगे और फिर कहीं कोई बाढ़, कोई अकाल या समुद्री तूफान आकर हमें चेताएगा। हम यदि पूर्व से सचेत जाएं, तो न केवल हम स्वयं को प्रभावित होने से बचा पायेंगे, औरों के लिए कुछ करके पुण्य-परमार्थ भी कमा जायेंगे। यही आज का युगधर्म है एवं 26 जनवरी 12 की चुनौती भी है। राष्ट्रीय आपदा की कड़ी में हम गुरुसत्ता को परमात्मसत्ता को आश्वासन दें कि पीड़ा-पतन-पराभव से मानव जाति को बचाने हेतु हम यथासंभव पुरुषार्थ करेंगे, करते रहेंगे।
युगचेतना के अवतरण ही हीरक जयंती का वर्ष है यह, जो वसंत पर्व 12 (29/1/12) से आरंभ हुआ है। इक्कीसवीं सदी में भारी उथल-पुथल के बीच नवसृजन की संभावनाओं को लेकर जिस महापुरुषार्थ की शुरुआत सन् 1926 में हुई थी, उसने 75 वर्ष की परिपक्वता प्राप्त कर ली है। अब भारतभर एवं विश्वभर में गायत्री परिवार से जुड़े परिजनों को इसके लिए विशिष्ट पुरुषार्थ करना है। इसके लिए उत्साह भरा वातावरण बनाने एवं कुछ रचनात्मक कर दिखाने हेतु मार्गदर्शक बिंदु यहाँ प्रस्तुत हैं।
(अ) हीरक जयंती क्या है, यह समझाने का प्रयास सभी के द्वारा चलना चाहिए। अखंड दीपक के 75वें वर्ष में प्रवेश के कारण यह अपनी निज की जीवन-साधना को प्रखर बनाने का वर्ष है। परमवंदनीया माताजी के 75 वर्ष पूरे होने के कारण यह नारी जागृति-नारी शक्ति को नेतृत्व प्रदान करने वाला वर्ष है। भागवत् चेतना के धरती पर अवतरण का 75वाँ वर्ष होने के कारण यह सभी में विधेयात्मक उल्लास भरने का वर्ष है। इसके लिए पोर्स्टस, बैनर्स, पर्चे वितरण करना चाहिए स्थान-स्थान पर उन्हें लगाना चाहिए तथा रैली आदि एवं छोटे कार्यक्रमों द्वारा उन्हें जन-जन के मनों में बिठाने का प्रयास किया जाना चाहिए। प्रज्ञा अभियान ‘पाक्षिक’ के पृष्ठ पाँच पर ऐसे बैनर्स-परिपत्रों के प्रारूप दिए गए हैं। उन्हें अपने स्तर पर प्रकाशित कर वितरित किया जा सकता है। ‘हीरक जयंती वर्ष के अभियान की दिशाधारा’ को स्पष्ट करते हुए एक पुस्तिका तैयार कर दी गई है। इसे भी मँगाकर वितरित किया जा सकता है।
(ब) यह वर्ष सात आंदोलनों को गति देने का वर्ष है। साधना स्वास्थ्य शिक्षा स्वावलंबन पर्यावरण नारी जागरण, व्यसन मुक्ति, कुरीति उन्मूलन इन सातों आंदोलनों से संबंधित प्रदर्शनियों, प्रशिक्षण एवं इनसे जुड़ी विभूतियों को जगाने हेतु संकल्पित कराने हेतु विशिष्ट दीपयज्ञों का क्रम बन सकता है। प्रदर्शनियों का निर्माण केंद्र में किया जा रहा है। प्रशिक्षण के क्रम में जीवन साधना आँदोलन को गति देने के लिए शक्तिपीठों पर सत्रों का क्रम 2 मार्च से आरंभ हो चुका है। विशिष्ट विधाओं के प्रशिक्षण भी इसी क्रम में आगे चलते रहेंगे। नगर, मुहल्ले, गाँवों के स्तर पर इन आँदोलनों के दीपयज्ञों में संकल्प कराए जा सकते हैं एवं सुनिश्चित लक्ष्य निर्धारित किए जा सकते हैं। आँदोलन को गति देने के लिए समयदान-श्रमदान-साधनदान एवं विभूतिदान के संकल्प भी कराए जा सकते हैं।
(स) युगशक्ति के प्रतीक की स्थापनाओं का क्रम- नवसृजन हेतु देवत्व संगठित होकर दुर्गाशक्ति-युगशक्ति का विकास करे, अब यह जरूरी है। इसके लिए परमपूज्य गुरुदेव द्वारा निर्धारित लाल मशाल का एक चित्र इन्हीं के द्वार प्रदत्त व्याख्या सहित बना दिया गया है। इस प्रतीक चित्र की स्थापना धर्म-संप्रदाय-जाति-वर्ग के भेद से परे कहीं भी कराई जा सकती है। जहाँ भी यह स्थापित होगा, भावनाशीलों को नवसृजन में लगे रहने की प्रेरणाएँ देता रहेगा। ईश्वर के साथ भागीदारी एवं संगठित महापुरुषार्थ की प्रेरणाएँ देता रहेगा। इसे अपने उपासनागृहों, शक्तिपीठों, प्रज्ञामंडलों, संगठित इकाइयों, घरों, कार्यालयों, क्लबों, संगठनों के मिलन केंद्रों पर भी लगाया जा सकता है। इस प्रतीक स्थापना के परिणाम बड़े दूरगामी होंगे।
(द) हीरक इकाइयों का विकास- हर क्षेत्र समर्थ बने, अपनी जिम्मेदारियाँ स्वयं उठाने लगे, उस क्षेत्र के सभी दायित्वों को निभाते रहने की सामर्थ्य विकसित कर सके, इसके लिए विकसित क्षेत्रों को हीरक इकाई नाम दिया जा रहा है। प्रत्येक इकाई में प्रचारक-प्रशिक्षक, सहयोगी-समीक्षक हर स्तर के कार्यकर्ता होंगे। इस संबंध में पुराने कार्यकर्ताओं को मात्र व्यवस्थित होने की जरूरत है। केंद्र इस संबंध में सुनिश्चित मार्गदर्शन सतत देता रहेगा।
(ई) झोला पुस्तकालयों का पुनरुज्जीवन-परमपूज्य गुरुदेव ने ज्ञानयज्ञ को सबसे बड़ा यज्ञ कहा है। नए लोगों में मिशन फैलेगा, तो उस विचारक्राँति आँदोलन को गति देने से, जो झोला पुस्तकालयों द्वारा आरंभ किया गया था। अब कहीं-कहीं वह प्रक्रिया शिथिल होती दिखाई देती है। हीरक जयंती वर्ष में नए प्राणवान् साहित्य एवं ‘अखण्ड ज्योति’ सहित झोलाधारी अपने साथियों की संख्या बढ़ाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
(फ) हीरक जयंती वर्ष के कुछ जयघोष-(1) हीरक वर्ष मनाएंगे-हम हीरे कहलाएंगे (2) गढ़े तराशे जाएंगे-हीरे से बन जाएंगे (3) बुरे भाव मिट जाएंगे-मन हीरे बन जायेंगे (4) चाहता यही वतन-सृजनशील संगठन (5) चाहते धरा गगन-सृजनशील संगठन (6) कौन रोक दे पतन-सृजनशील संगठन (7) कौन करे नवसृजन-सृजनशील संगठन (8) जीवन में देवत्व जगाएं-सच्चे सृजनवीर कहलाएँ (9) मन निर्मल तन स्वस्थ बनाएँ-सच्चे सृजनवीर कहलाएँ (10) हीरे-सा व्यक्तित्व जगाएँ-सच्चे सृजनवीर कहलाएँ (11) देवों-सा परिवार बनाएँ-सच्चे सृजनवीर कहलाएँ (12) युग की पहचान-बेहतर इंसान (13) माँगता जहान बेहतर इंसान (14) नवयुग का है लक्ष्य महान्-बनें सभी बेहतर इंसान (15) यही माँगता आज जहान-बनें सभी बेहतर इंसान।
सिंधु है परमात्मसत्ता, आत्मसत्ता बिंदु है। किंतु तात्विक दृष्टि से तो बिंदु भी तो सिंधु है॥
‘जीव’ उसका अंश है, जो ‘चेतना’ आनंदमय। चेतनावत् आत्मा भी अमर है व है अभय। आत्म है रश्मियां, परमात्मसत्ता इंदु है। सिंधु है परमात्मसत्ता, आत्मसत्ता बिंदु है॥
‘महाप्राण’ समा रहा है विश्व में ब्रह्माँड में। समाया है वही तो, हर ‘प्राण’ के देहांग में। तत्वतः अद्वैत ही है, द्वैत भ्रमजन्य-द्वंद्व है। और तात्विक दृष्टि से तो, बिंदु भी तो सिंधु है॥
प्रकृतिजन्य बादलों ने, सूर्य को ज्यों ढक लिया। विकृतिजन्य ‘माया’ के द्वारा ‘जीव’ आच्छादित हुआ। खिलाता गुरुज्ञान-रवि ही, अमल-आत्म-अरविंद है। सिंधु है परमात्मसत्ता, आत्मसत्ता बिंदु है॥
आत्मा का बोध कर, निष्काम-कर्म करते चलो। द्वैतजन्य विकार, दुख, भव सिंधु से तरते चलो। आत्मा, परमात्मा का अंश आनंद कंद है। और तात्विक दृष्टि से तो, बिंदु भी तो सिंधु है॥
वास है सब प्राणियों में एक ही परमात्म का। इसलिए ही ‘लोकसेवा’ श्रेष्ठ कर्म है आत्म का। विश्व रूप परमात्मा के प्रेम का यह छंद है। सिंधु है परमात्मसत्ता, आत्मसत्ता बिंदु है॥
-मंगलविजय ‘विजयवर्गीय’
*समाप्त*